VIDEHA — Issue 212 / अंक २१२

Publication: VIDEHA · Issue: 212
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82 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २१२ म अंक १५ अक्टूबर २०१६ (वर्ष ९ मास १०६ अंक २१२) ऐ अंकमे अछि:- ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्य मे २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- लघु कथा- मुड़ियाएल घर २.३.चन्‍दना दत्त- आलेख- बाबा लालदास २.४.अंकुर- लघु कथा संग्रह- राम विलास साहु ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.ओम प्रकाश- गजल ३.३.बाबा बैद्यनाथ-आजाद गजल ३.४.जगदीश चन्द्र ठाकुर  अनिल- गजल ३.५. पल्लवी मण्डल-समय ४.बालानां कृते-डॊ शशिधर कुमर- ऊद या ऊदबिलाड़ि (बाल कविता) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय प्रबोध सम्मानसँ सम्मानित श्री चन्द्रभानु सिंह स्वर्गीय भऽ गेला। श्रद्धांजलि। विदेहक http://videha.co.in/ 1 जनवरी 2017 केर अंक निकलिते विदेह दसम बर्खमे प्रवेश कऽ जाएत। अइ अवसरपर विदेह गीत-संगीतक एलबम केर समीक्षा आदि प्रकाशित करबाक निर्णय लेलक अछि। छिटपुट प्रयासक अतिरिक्त शायद ई पहिल अवसर हेतै मैथिली पत्रिकारितामे जखन कि कोनो साहित्यिक पत्रिकाक कोनो एकटा अंकमे फिल्मी गीतक एलबम वा कि स्वतंत्र गीत-गजलक एलबम केर समीक्षा देबाक प्रयास वा निर्णय कएल गेल हुअए। संगीत समीक्षक लोकनिसँ आग्रह जे ओ कोनो एलबमक कोनो गीत-गजल-संगीत की पूरा एलबम केर समीक्षा पठाबथि। समीक्षा-लेख आदिमे गीत-संगीतक भाव पक्ष, टेक्नीकल पक्ष, शब्द चयन पक्ष, एडीटिंग पक्ष, मार्केटिंग पक्ष आदि केर वर्णन हुअए। लेखकेँ ggajendra@videha.com पर 1 दिसम्बर 2016 धरि पठाएल जाए। ऐ अंकमे समान्य रचना ओ स्थायी स्तंभ सभ सेहो रहबे करत। प्रयास रहत जे बेसीसँ बेसी गीत-गजल-संगीत आकि पूरा एलबमक समीक्षा आबए। ई-पत्र आदरणीय गजेंद्र जी नमस्कार विदेह के २१० म अंक में डाक्टर शशिधर कुमार के बाल कविता चिता आ २११ म अंक में २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र- मैथिली लोकगीतमे कौआ सम्बाहक ख़ास रुचिगर लागल अछि ।- प्रणव झा जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित रचनाकारक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. 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हीरामन सुग्गा सिंहलद्वीप के राजकुमारी पद्मावती आ चित्तोडगढक राजा रत्नसेन केर प्रेम में सुत्रधारक भूमिका के निर्वहन करैत अछि, के बारे में सबके बुझल अछि। बात मैथिली लोकगीत में सुग्गाक स्थान पर क रहल छी ताहि पद्मावत के प्रसंग पर विस्तार सं नहि जा रहल छी। अगर लोक व्यव्हार के बात करी त मिथिला समाज में सुग्गा आ आनो चिरै-चुनमुन एवं जानवर सबहक अपन भूमिका अछि। ओकरा मानवीकरण कए ओकर भाव के देखल जैत छैक। लोक अपन बच्चा, प्रिय लोक, जमाय के सुग्गा कहि संबोधित करैत छथि। ओ बच्चा जकर स्मरण शक्ति तीक्ष्ण होइत छैक तकरा सुग्गा कहि संबोधित कैल जैत छैक।माय, पितियाईन, नानी, दाई इत्यादि अपन बच्चा के सुग्गा कौर, मेना कौर कहि क भोजन खुअबैत छथि। नायक अथवा नायिका के नाक अगर बड्ड सुन्दर छैक त ओकरा सुग्गाक ठोर या चोंच स उपमा देल जैत छैक। मधुर बोली के सुग्गा सनहक बोली कहल जैत छैक। स्त्रीगन सब फ्रेम में कुरुश स सुग्गा मेना बनबैत छली. मिथिला चित्रकला में आ कोहबर घर में स्त्री आ पुरुष सुग्गा के स्नेहालिंगन अवस्था में बॉर्डर पर चित्रित कैल जैत छैक। स्नेहालिंगन के ठेठ मैथिली में लटपटायल अवस्था कहल जैत छैक। मिथिला चित्रकला में बॉर्डर पर वैह लटपटिया सुग्गा आपस में एक दोसर के पकड़ने चोंच में चोंच सटेने अंकित रहैत छैक। कोबरघर में एहि चित्रांकन केर उकेरबाक तात्पर्य ई रहैत छैक कि जेना सुग्गा के पति-पत्नीक जोड़ी में प्रेम रहैत छैक तेहने प्रेम, सिनेह आ आकर्षण एहि वरआ कनिया में बनल रहैक। दुनु एक दोसर स कहियो अलग नहि हो। दुलहिन स्त्री सुग्गा आ दुलहा पुरुष सुग्गा बनि जैत छैक। सुग्गा स्नेहक संग-संग सौन्दर्य आ रंगक प्रतिबिम्ब सेहो बनि जैत छैक। अगर बड्ड सुन्दर हरियर रंग केर सारी अथवा नुआ छैक त ओ सुगबा रंग अथवा सुगापंखी रंग कहेतै। लाल रंग केर मान्यता तखन स्थापित हेतैक जखन ओकर तुलना सुग्गाक ओठ स कैल जेतैक। सुग्गा स सिनेह अतेक जे ओकरा सोनाक पिंजरा में रखबाक कल्पना कैल जैत छैक। मैथिली लोकपरम्परा में सुग्गा बड्ड महत्त्व रखैत अछि। दुटा एहेन दन्तकथा मिथिला भूमि में व्याप्त अछि जाहि में सुग्गाक भूमिका के बेर-बेर स्मरण गर्व स कैल जैत अछि।पहिला कथा सीता सं सम्बंधित अछि आ दोसर कथा आदि गुरु शंकराचार्य के महापण्डित मंडन मिश्रक गामक यात्रा सं। एहि आलेख के आगा बढ़ाबी ओहि स पहिने ई दुनु दन्तकथा के बुझब जरुरी। प्रारंभ सीताक प्रसंग सं करैत छी। मिथिला में सुग्गा आ सीता के लऽ कऽ एकटा दन्तकथा प्रचलित अछि। बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी में भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से काम। झुला लागल प्रेमक डाली। झुलथि सीता प्यारी ना।। सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर में गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान में मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ में प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली। सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल में आनि पिंजरा में राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत! राजमहल में अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी में सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ीमनुखक आवाज़ में मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी में स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"। सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी में स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा में बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा में देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली। ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरुहमर पत्नी के बदला में अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा में बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक। अपन पत्नी के प्रेम में मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल में आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन! बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट में हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!" कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना में मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल में कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी।आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था में घर स निकालि देता”। आव सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत  छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन। आब दोसर दन्तकथा दिस बढ़ी। दोसर दन्तकथा शकाराचार्य आ महापण्डित मंडन सं जुड़ल अछि। मिथिला में अगाध पण्डित आ विद्वान सब भारतवर्ष केर सब कोनस अबैत छलाह। अतए अर्थात  मिथिला में परम्परानुसार एक बेर में अनेक दिन धरि चलए बला शास्त्राथ में जीवन-जगत सं संबंधित विषय एवं उप-विषय पर वाद-विवाद चलैत छल। जे विद्वान शास्त्रार्थ में जितैत छला हुनकर विशेष सम्मान होइत छल। मान्यता ई अछि जे शंकराचार्य मिथिला के परम विद्वान आ कुमारिल भट्ट केर शिष्यमहापण्डित मंडन मिश्रक प्रसिद्धि सं प्रभावित भ स्वयं हुनका सं भेट करक हेतु आ शाश्त्रार्थ करबाक हेतु भ्रमण करैत मंडन केर गाम पहुचला। गामक इनार पर पनिहारिन सब पानि भरैत आपस में संस्कृत में वार्तालाप क रहल छलि। शंकराचार्य पनिहारिन सबके पुछलथिन: “महापण्डित मंडन मिश्रककुन घर छनि?”पनिहारिन में स एक महिला आगा अबैत बजली: “आगा बढ़ल जाऊ। जाहिदरबज्जा पर सुग्गो आपस में शास्त्रार्थ करैत हो, वैह घर महापण्डित  मंडन मिश्रकहेतनि”। शंकराचार्य अपन शिष्य मण्डलीक संग आगू बढ़लनि। कलम, पोखरि, बसबट्टी, फुलक कियारी, लहलहातइत हरियर धानक खेत होइत थोरेक काल में महिषी गांव पहुंचला। महापण्डित मंडन मिश्रक घर ताक में कुनों दिक्कत नहि भेलनि। एक घर के दरबज्जा पर पिंजडा में सुग्गा आपस में  शास्त्रार्थ क रहल छल। शंकराचार्य के भांगठ नहि रह्लनि जे यैह घर महापण्डित मंडन मिश्रक छनि। आब लोकगीत केर आंगन में प्रवेश करी आ देखी जे सुग्गा अपन कहेन स्थान बनेने अछि। एक नायिका के दर्द देखू. बेचारी के पति परदेस गेल छैक। बहुत दिन भ गेलैक परदेस स गाम एला। अखाढ़ मास समाप्त होम पर छैक लोक खरही काटि घर लग जमा करैत अछि। कथी लेल? जे घर के छारत। मनुखक त बाते छोडि देल जाओ चिरै-चुनमुन सब एक-एक खर के चुनि अपन खोता अथवा नीड़ के निर्माण क रहल अछि। सब आब मधुमास अर्थात बरसात में अपन-अपन जोड़ी संग रहत। मधुमसक मिलन यामिनीक सुख भोगत। देह आ नेह एक बनतैक। मुदा हाय रे दुर्भाग्य! बेचारीक कंत त एखनो परदेसे में छैक।लगैत अछि जे नायिका अही वियोग स शरीर ने त्यागि दे! अखाढहि मास अखाढी रोप कि नब खरही सब काटए लोक चिडै चुनमुनी सब खोता लगाएल कि हमरो कंत रहल घर छोडि कि हम मरि जइहें।। छठि माता के प्रसन्न करबाक हेतु महिला सब रंग-विरंगक गीत गबैत घाट दिस जैत छथि। हरेक गीत में प्रसाद सामग्री के वर्णन, विधक विधान, माता के गुणगान, आ सुचिताक ध्यानक वर्णन रहैत छैक। एक गीतक दू पांति देखू जे केना ओहि में सुगा के वर्णन अछि। कांच बांस के आधार बना केराक दू घौर के बीचो बीच फसा देल गेल छैक। दुनु कात घौर में हत्थाक हत्था पाकल-पाकल पीयर-पीयर केरा लुबझल छैक। केरा के आकर्षण देखि झुण्डक झुण्ड सुग्गा ओहि पर लुधकि रहल छैक। पबनौतिन मनुख जकां सुग्गा के बुझबैत छथिन के हे सुग्गा ई केराक घौर छठि महरानी के निमित्त छैक। एहि पर तों चोंच मारि एकरा अपित्र नहि कर। जखन पूजा पूरा भ जेतैक त तोरा तोहर हिस्सा भेट जेतौक।सम्बाद एहेन जेना सुगा एक एक शब्द के बुझैत हो आ आज्ञा के मानबक हेतु तत्पर। ई भेल लोक परमपरा में मनुख आ चिरै के बीच तारतम्य आ सामंजस्य। कांचहि बांस के बगहिया बह्गी लचकत जाए केरा फरल घौर स ओहि पर सुगा मंडराय छठि महरानी के दोसर गीत में कनि पबनौतिन तमसा जैत छथि कियैक त सुग्गा कनि लुबधि-लुबधि क आवश्यकता स अधिक परेशान क देने छनि। अहि बेर गीत में ओकरा सावधान भ जएबाक लेल कहैत छथिन: “देख सुग्गा! बड्ड भ गेल. लाख बुझेलाक बादो तों समरह के नाम नहि ल रहल छै। कहि देल्युक ने जे ई केराक घौर छठि महारानी के निमित्त छैक! मुदा तों आजिज क देलै। आब किछु नहि कहबौ। बौआ के पिताजी आबि रहल छथिन बन्दुक हुनका संगे छनि। गोली मारि देथुन। फेर हमरा नहि कहिहैं जे सावधान नहि केलयौक?” ई भेल लोकक चिरै आ चुनमुन के प्राति सिनेह। जेना माय अपना बच्चा के डरबैत छथि तहिना ओही सिनेह आ अनुराग स पबनौतिन सुग्गा के डरा रहल छथि। गोली मरबाक बात होइत छैक। मारल नहि जैत छैक। एहन अवस्था में जौ प्रकृति आ संस्कृति में समन्वय नहि बनत त कोना बनत? जखन वर बरियाती संगे कन्या के घर पर प्रवेश करैत अछि त बरक सुन्दर छवि देखि सासु गदगद भ जैत छथि। बरक मनमोहक छवि के तुलना सुग्गा सं कैल जैत अछि। महाकवि विद्यापति सेहो अपन पदावली में एक गीत में वरक सुन्दरता सुग्गा स करैत छथि।जमाए केर तुलना सोभनगर सुग्गा सं करैत सासु आ बूढ पुरान महिला सब प्रसन्न भ रहल छथि. धिया के भाग्य पर गुमान भ रहल छनि। गीत गाबि-गाबि सोचैत छथि जे ई जे अतेक निक सुग्गा रूपी जमाए छथि से कत स आबि क नेह लगेने छथि? ई सबहक मनमोहना कत बसेरा बनेने छथि? ई सोभनगर सुग्गा अपन गाँव स आबि सासुर में बसेर केने छथि आ सासुरक लोक सभ सं नेह लगेने छथि। हुनकर ससुर पिंजरा बना ओहि में एहि बर रूपी सुग्गा के बझा रखने छथि। पिजरा शब्द दुलहिन लेल कैल गेल छैक. सुग्गा जखन पिजरा में रहत त ओकरा आहार चाही। से आहार देबाक जिम्मेदारी सासु के देल गेल छनि। एहेन आहार देथु जाहि स सुग्गा के उचाट नहि लागै। संगहि सासु के इहो डर भ रहल छनि जे सुग्गा के जखन पाँखि झमटगर आ मजबूत भ जेतैक त भागि ने जाय? ताहि सासु एहो कहैत छथि जे एहेन सुग्गा के पोसने की लाभ।थोरेकबे दिनक बाद ई अपन घर चलि जायेत। आखिर जमाए रूपी सुग्गा कतेक दिन सासुर रूपी पिजरा में सासु हाथक चारा अर्थात व्यन्जन खा रहत? विद्यापति कहैत छथि जे ई गौरी रूपी दुलहिन के भाग्य छनि जे साक्षात् महादेब रूपी मनमोहक वर भेट गेल छनि। हे दाइ-माइ हुलसित भ गीत नाद गाऊ आ विध-बेभार करू। कहमाँसँ सुगा आयल, नेह लायल। कहमा लेल बसेरा सुगा मन मोहल। फल्लां ठासँ सुग्गा आयल, नेह लायल। फल्लां गाम लेल बसेरा, सुग्गा मन मोहल। फल्लां ससुर पिजुरा गढ़ाओल, सुग्गा बझाओल। हे फल्लां सासु देथु आहर सुग्गा मन मोहब। एहन सुग्गा नहि पोसब जे पोस ने मानत। हे सुगबा होयत उड़ाँत, अपन गृह जायत। एहन सुग्गा हम पोसब जे पोस मानत। हे सुगबा होयत बुधियार, पलटि फेर आओत। भनहि विद्यापति गाओल, फल पाओल। हे गौरी केँ बढ़नु अहिबात, सुन्दर बर पाओल।। विवाह के समय में जखन बरिआत के संग वर अपन सासुर विवाह करक हेतु प्रस्थान करैत अछि त दरबज्जा परदाई-माई सब बरिआती लेल रंग विरंगक गीत समवेत आ उच्च स्वर में गबैत छथि। वर्णन होइत अछि बरिआतिक साज के, श्रृंगार के, उत्साह के, तैय्यारी के, वस्त्र विन्यास के। बरक पितामह एक चीज़क व्यवस्था त पितामह के भाई दोसर चीज केर व्यवस्था में लागल छथि।कियो बाजा-गाजा के व्यवस्था में त कियोकआन चीजक। एक आदमी हरियर सुग्गा के पिजरा के सजा रहल छथि कारण विवाह में सुग्गा नहि जैत से कोना? गीत इहो बतबैत अछि जे बरिआती दल के सदस्य के कत-कत ठहराएल जैत। सुग्गा सेहो ओना थोरे ने जैत? पूरा बनि ठनि क जैत।चिरै रूपी सुग्गा वरक ससुर के पोखरिक भीड़ पर चानन गाछ के ठारि पर बैसत आ वर रूपी सुग्गा अपन सासु के बनाओल कोहबर घर में दुलहिन संगे बैसता।सुगा के फल भोजन करक लेल देल जेतैक आ रहबाक लेल सोनाक पिजरा। बरिआत सब दरबज्जा पर विश्राम करता। आंगन केर सोझा में आजन-बाजन राखल जैत। बरिआती सब के लाल पीयर धोती पहिरक हेतु देल जएतैक। सुग्गा, सुग्गा संग सोनाक पिजरा आ फल भोजन जेना अनिवार्य होइक? बरिआतक लोक सब धोती पाबि प्रसन्न भ जेता आ जमाए बेटी देख खुश भ जेता। कोने बाबा साजल आजन बाजन कोने बाबा साजु बरिआत हे। कोने बाबा सजथु हरियर सुगबा सुगा लय जायब बरिआत हे। बड़का बाबा साजल आजन बाजन मझिला बाबा साजु बरिआत हे। छोटका बाबा साजथु हरियर सुग सुगा लय जायब बरिआत हे। कहमा बैसायब आजन-बाजन कहमा बैसायब बरिआत हे। कहमा बैसाएब हरियर सुगा सुगा लय जायब बरिआत हे। पोखरि बैसायब आजन-बाजन दुअरे बैसायब बरिआत हे। पिजड़े बैसायब हरियर सुगा सुगा लए जायब बरिआत हे। कथी लए जायब बरिआत हे। कथी लय बुझायब बरिआत हे। कथी लए बुझायब हरियर सुगा सुगा कथी लए बुझायब जमाइ हे। टारा लए बुझायब आजन-बाजन धोती लए बुझायब बरिआत हे। फल लए बुझायब हरियर सुगा बेटी लए बुझाएब जमाइ हे। एहेन जमइया कतहु ने देखल सुगा लए आयल बरिआत हे। दोसर बरिआत गीत में एहेन कल्पना कैल जैत अछि जे दुलहा घुमबाक हेतु तथा खेलबाक हेतु बहुत दूर हरियर क्षेत्र दिस चलि जैत छथि। रस्ता में अनेक तरहक गाछ-बृक्ष, पोखरि, फुलवारी भेटैत छनि।जैत-जैत एक गाछ पर सोहनगर हरियर कचोर सुग्गा भेटैत छनि जकरा पकडि क ल अबैत छथि। सुग्गा मांझ आंगन में बैस जैत अछि आ रुसि रहैत अछि जे ओकरा सेहो बरिआती जएबाक छैक। मुदा बरिआती में ओना थोरे ने जैत सुग्गा। सुग्गा के ओहि लेल अँगिया आ टोपी चाही। ओ सजि क सुन्दर बनि क बरिआत में जाए चाहैत अछि। सुग्गाक अतेक मानवीकरण केवल लोकगीत में भ सकैत अछि। आगा- आगा देखैत जाऊ सुग्गा के नखरा। सब बरिआतिक सदस्य दरबज्जा पर स्थान ग्रहण केलक। अतए सुग्गा के एकाएक चिरै छी ताहि बातक अनुभूति भेलैक। ताहि बरिआती के कन्या पक्ष के ओतए पहुचला उत्तर सुग्गा एक आमक गाछक ठारि पर चढि गेल आ ओतए स सब विध व्यवहार देखि पुलकित होइत रहल। सुग्गा के ठोर बड्ड रमनगर। जेहने सुग्गा के ठोर तेहने वरक ठोर। सासु आनंदे बताहि। प्रेमाधिक्य में मातलि कखनो सुग्गा के ठोर निहारथि त कखनो जमाय के ठोर आ नैन नक्श। सासुरानी के फेरो इहो डर बीच-बीच में भ रहल छनि जे कियोक दाई-माई कुनो करामात ने क देथि! की पता नजरि लागि जैक सुग्गा के, जमेईया के, या दुनु के? इहो सोचैत छथि जे सुग्गा त वनक प्राणी अछि ताहि अंतत वन में वापस चलि जैत मुदा बेटी आ जमाए त कम-स-कम थिर भ क रहत ने! हमरो दुलहा के फलां दुलहा खेल जेता बड़ी दुर हे। ओत स जे लएला दुलरुआ हरियर सुगबा सुगबा बइसल माँझे ठाम हे। सभ केओ साजल जाइ बरिअतिया सुगा लेल अंगुरी पसारि हे। हमहु त लेब बाबा अँगिया टोपिया हमहु त जायब बरिआत हे। सभ बरिअतिया अटकल दरबज्जा सुगबा अटकल आमक ठारि हे। सभ केयो निरेखथि जाइत बरिअतिया सासु निरेखि सुगा ठोर हे। आइ हे माइ पर हे पड़ोसिन सुगा जुनि नजरि लगाउ हे। वनहि के सुगबा बनहि उडि जायत रहि जायत धीअहि जमाई हे। झरनी जे मिथिलाक मुसलमान महिला सब आ ओकरा संगे कतौं-कतौं हिन्दू सब सेहो दहा संगे चलैत रहैत अछि आ गबैत रहैत अछि। यद्यपि झरनी उदासी के तर्ज पर आ तेज़ी स चलैत बटगबनी जकां गैल जैत छैक जाहि में मक्का मदीना आ हसन हुसैन के सहादत केर गुणगान तथा हुनकर सौन्दर्य एवं सौर्य केर गाथा गैल जैत छैक। माहोल उदास मुदा जोश आ ओज सं भरल।लोक अही बहाने हसन आ हुसैन के कुर्बानी के याद करैत अछि। हसन आ हुसैन मोहम्मद साहेब केर नाति छला। इस्लाम, न्याय आ शांति के रक्षा के लेल अपन जान गमा लेला मुदा सत्य केर रस्ता सं नहि भटकलनि। हुनकर सहादत केर गाथा कतौं अज़ादारी त मिथिला में झरनी के रूप में गैल जैत अछि। केवल चरित्र अरब के होइत छैक मुदा चित्रण स्थानीय भावक अनुकूल। उपमा आ अलंकार वैह जे मिथिलाक लोक उदासी में अथवा आर कुनो कारुणिक गीत में प्रयुक्त करैत छथि। गीत गेबा में सेहो हिन्दू महिला जकां मुसलमान महिलाक प्राबल्य। एक झरनी में छाती पिटैत महिला सब गबैत छथि हाय अल्ला सुन्दर आ सोहनगर लाल सुग्गा के जन्म कोन ठाम भेल आ कोन ठाम ई दुनु भाई अर्थात हसन आ हुसैन जन्म लेलाह? फेर उत्तर में बजैत छथि जे पर्वत पर हरियर गाछ पर ललका सुग्गा जन्म लेलक आ अरब के मक्का शहर में हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के जन्म भेलैक। हे दाई- माई, कथी खुआक क लाल सुग्गा के हम पोसब आ कथी खुआ क दुनु बच्चा के? चारा अथवा आहार खुआ क सुग्गा के पोसब आ दूध पिया क हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के प्राण बचायेब। सोना के पिजरा में सुग्गा के बाजब सिखायेब आ इसकुल में भेज क दुनु बच्चा के पढ़ेएब। अगिला अंश में उदासी प्रबल भ जैत छैक। गीतक बोल कहैत छैक जे लाल सुग्गा उड़ात भेला पर कत उडि जैत आ बच्चा नमहर भेला पर कत चलि जैत? प्रश्न आ उत्तर के तर्ज पर झरनी गैल जैत अछि। एहि प्रश्न के उत्तर में कहल जैत छैक की उड़ात भेला पर सुग्गा फेरो पर्वत पर उडि जैत आ दुनु बच्चा नमहर भेलाक बाद मक्का चलि जेतैक कारण ओकरा धर्म केर रक्षा करबाक छैक। एहि झरनी के गंभीरता स देखला आ मनन केला सं ई अनुभूति होइत छैक जे उदासी आ झरनी में कतेक समानता छैक। जमाए के जखन सुग्गा स तुलना हिन्दू महिला सब अपन गीत में करैत छथि त कहैत छथि: “वनक सुग्गा वने उडि जायत”, “सुगबा हैत ओड़ियात अपन घर जायत” आदि। अतए पहार स सुग्गा अबैत छैक आ पहार में वापस चलि जैत छैक। हाय-हाय कहमा जलम लेल लाल एक सुगबा कहमा जलम दुनू बचबे हाय। हाय-हाय परबत जलम लेल लाल एक सुगबा मक्का जलम दुनू बचबे हाय। हाय-हाय कथिये खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा कथिये खिअयबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय आहरा खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा दुधबा पिलयबइ दुनु बचबे हाय। हाय-हाय कथिये पढ़ेबइ हम लाल एक सुगबा कथिये पढ़ेबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय पिजड़े पढ़ेबइ हमें लाल एक सुगबा इसकुल पढेबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय कहाँ उडि जेतइ लाल एक सुगबा कहाँ चलि जेतइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय परबत उडि जेतइ लाल एक सुगबा मक्का चलि जेतइ दुनू बचबे हाय।। मुसलमान महिला में हरियर रंग के सारी अथवा आनो वस्त्र के क्रेज रहैत छैक। हरियर के झरनी में सुगबा रंग कहल जैत छैक। एक अन्य  झरनी में महिला सब अपन उत्सव आ सिंगारक चर्च करैत छथि। अते स्थान, उपमा, अलंकार, विधान सब खांटी देसी भ जैत छैक।झरनी के प्रकृति प्रश्न आ उत्तर सं छैक। एहि गीत में गीत गाईन सब अपने में चर्च करैत प्रश्न करैत छथि जे हाजीपुर, पटना आ बेतिया शहर के जा रहल छैक? फेर उत्तर दैत कहैत छथि, पिताजी हाजीपुर, भैया पटना आ पतिदेब बेतिया शहर जा रहल छथि। कथी लेल? पिताजी सुग्गा रंगक सारी लेबाक लेल, भैया कंगना लेबाक लेल आ पतिदेब माथक सिन्दुर लेबाक लेल। देखू कोना स्थानीय परंपरा में रंगा जैत छथि मुसलमान स्त्रीगन मिथिला में। सिन्दुर आ सोहाग के महत्त्व एकाएक प्रबल भ जैत अछि। धर्म अपन स्थान पर मुदा स्थानीयता कुनो कम थोरे? अगर सिन्दुर हिन्दू स्त्रीक श्रृंगारअइहबहोबाक प्रमाण त मुसलमानस्त्रीगन केलेल कियैक नहि। फेर गीत लिखनिहार आ गेनीहारिके के रोकि सकैत अछि? हाय-हाय के जयतै हाजीपुर के जयतै पटना के जयतै बेतिया शहरबे हाय। हाय-हाय बाबा जयतै हाजीपुर भैया जयतै पटना स्वामी जयतै बेतिया शहरबे हाय। हाय-हाय के लयतै सारी सुगबा के लयतै कंगना के लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय बाबा लयतै सारी सुगबा भैया लयतै कंगना स्वामी लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय के पहनतै सारी सुगबा के पहनतै कंगना के पहनतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय अम्मा पहनतै सारी सुगबा भऊजो पहनतै कंगना हमें पहनबै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय फाटि जयतै सारी सुगबा टूटी जयतै कंगना रहि जयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। अपन एक छोट कविता फूलडालीक कनेर में कवि कृष्णमोहन झा लिखैत छथि जिलेबीक काँट जकाँ हम अहाँक धानक लाबा सन तरबा मे गड़ि जायब आ किछु दिन धरि बिसबिसायब। चतुर्थीक औंठी आ बरसाइतक मेहदी जकाँ हम अहाँक विकल संसर्ग मे आयब आ असंख्य सुग्गा बनि अहाँक मोन मे उड़ियाएब। कवि नायिका के अंतःकरण के बुझैत छथि। ह्रदय में प्रवेश करबाक हिम्मत रखैत छथि। कहैत छथिन जे झुण्डक झुण्ड सुग्गा जकां नायिका के स्मृति में बेर-बेर आबि अपन होबाक प्रमाण देता. नायिका टीस में पतिक अथवा प्रेमीक अनुभूति करैत रहती। भगबान केर भजन, प्राति, उदासी आदि में मनुख त मनुखे भगबानो के सिनेहवससुग्गा बना क हुनकर सौन्दर्य, वात्सल्य, मनोहर स्वरुप के लोक स्मरण करैत अछि। कृष्ण लेल सुग्गा मनमोहन त जन-जन के कंठ में जेना रचल बसल हो।भगबान कृष्ण केर मथुरा सं द्वारका केर यात्रा लोक के अतेक दुखी क दैत छैक जे सखी बहिनपा सब अपन जीवन के उद्देश्यहीन बुझैत छथि। पूरा नगर उदास अछि। कखनो मोन होइत छनि जे यमुना के कारी, तीव्र गति सं चलैत अथाह पानि में डूबि क आत्महत्या क लेथि त कखनो होइत छनि जे जहर-माहुर खा प्राण के समाप्त क ली। हे निर्मोही कृष्ण कोना अहाँ मथुरा छोरि सबके ह्रदय दुखा सुग्गा जकां पिजरा सं बाहर निकलिते द्वारका चलि गेलौं? कनिकबोदरेग नहि भेल? अहि तरहे लोक अपन व्यवहार, संस्कार, संस्कृति सं सुग्गा आ अन्य चिरै-चुनमुन संग प्रेम आ सामंजस्य स्थापित केने अछि। हलांकि तथाकथित आधुनिकता, विज्ञान, विज्ञानक प्रयोग आ मनुष्य केर नित नूतन खोज एहि तरहक परम्परा के शनै शनै कमजोर केने जा रहल अछि। लोक सब अहि तरहक समंजस्य के बिसरल जा रहल अछि। ई कुनो अर्थ में निक बात नहि। सुग्गा आ मैनाक कथा ग्राम्य जीवन स समाप्त भेल जा रहल अछि आ किताब में सिमटल जा रहल अछि। खेत खरिहान, जंगल, पर्वत, पोखरि, गाछ सब खत्म भेल जा रहल अछि। सुग्गे नहि आरो चिरै-चुनमुन धीरे-धीरे अतितक वस्तु बनल जा रहल अछि।अगर संस्कृति के ओ स्वरुप जे सब के संगे चलबाक सामर्थ्य रखैत अछि समाप्त भ जैत त किछु नहि बचत।सब के एहि विषय पर गंभीरता स सोचबाक चाही आ संतुलन के सिद्धांत के मनबाक चाही। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल- लघु कथा- मुड़ियाएल घर जागेश्‍वर काका दुनू परानी दरबज्‍जाक ओसारक चौकीपर बैस बेरुका चाह पीबै छला। फागुनक समए, परसु शिवराति छी। जाड़क सरपोख नहाएल समए वसन्‍ती रौद पेब सोलहन्नी तँ नहि मुदा आधासँ बेसी जाड़क जकड़न तियागि चुकल छल। एक तँ अढ़ाइ-तीन बजेक बेरुका समए, तैपर मन्‍द-मन्‍द पुर्बाक लहकी सेहो लहलहाइत। ओना चाहक रंग-रूप आ सुआदो आन दिनसँ नीक अछि। नीकक कारण अछि एक तँ बकेन महींसिक दूध तैपर जागेश्‍वर कक्काक भातीज जे दार्जिलिंगमे रहि चाहे कम्‍पनीमे नोकरी करै छैन, ओ आधा किलोक चाहक पॉकेट देने रहैन, वएह टटका चाहपत्ती। ओना, बनौनिहारि पुतोहुक लूरिमे कोनो बढ़ोत्तरी नइ भेल छेलैन। मुदा काजोक तँ शुभ संजोग होइते अछि। भरिसक सएह सुधनीकेँ भेलैन, जइसँ चाहक सेखियो आ रंगो-सुआद नीक बनलैन। जिराएल मन जागेश्‍वर कक्काक, तँए पहिने चारि-पाँच घोंट चाह एक-लखाइत पीलैन। चारि-पाँच घोंट चाह पीला पछाइत जागेश्‍वर कक्काक मन फुरफुरेलैन। फुरफुराइते बजला- “चाह तँ निम्‍मन बनल अछि मुदा एहेन सभ दिन हुअए तखन ने।” जागेश्‍वर कक्काक बात सुनि रमणी काकीक मन रमकलैन नहि, असथिरे भेलैन। असथिर होइते पुतोहुक लूरिपर मन पहुँच नचलैन। नचिते उठलैन- जँ परिवारक भनसिया नीक भोजन, नीक भोजनक अर्थ नीक वस्‍तुए-टा नहि सुआदो, बनबैथ तँ भोजन केनिहारक मनो आ पेटो परिपूर्ण हेबे करत।  जखने मनो आ पेटो परिपूर्ण हएत तखने ने बातो आ विचारोमे परिपूर्णता एबे करत, जइसँ खाइ-पीबैक झगड़ परिवारसँ मेटेबे करत। मुँहक चाहकेँ कण्‍ठसँ निच्‍चाँ उताइर रमणी काकी बजली- “गामक बहुत गोरे काल्‍हि जतरापर जेता।” ओना जागेश्‍वर काकाकेँ सेहो केते गोरे तीन-चारि दिनसँ कहलकैन अछि जे शिवराति दिन वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करए चलू। तीन-चारि घन्‍टाक रस्‍ता टेम्‍पूसँ अछि। शिवरातिसँ एक दिन पहिने दुपहरक पछाइत विदा हएब आ चारि-पाँच बजे तक पहुँच जाएब। ओत्तै रातिमे विश्रामो करब आ साँझमे शिव उपासक फलहारो करब। मुदा जागेश्‍वर काका सबहक बात सुनैत गेला, किनको किछु कहलखिन नहि। नइ कहैक कारण रहैन जे मने-मन उदयपुरक सभकेँ चिन्‍हते रहैथ, माने गौंआँ सभकेँ। जे केकरो जड़ि-छीपक ठेकान नइ अछि। बाजत किछ आ करत किछ। करनी-धरणी एहने रखने अछि आ दर्शन करत वाणीश्‍वरी भगवतीक। मुदा विचारसँ उतैर जागेश्‍वर कक्काक मनमे एलैन जे जखन गामक लोक सभ जाइए रहला अछि आ अपनो केते दिनसँ विचारैत आबि रहल छी जे वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन दुनू परानी मिलि करब, मुदा ने कहियो गर लागल आ ने जा भेल। ..ओना रमणी काकी वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक चर्च नइ केने छेलखिन, मुदा जतरासँ वएह मतलब रहैन। तैपर, जवाबमे जागेश्‍वर कहलखिन- “जखन गामक भेड़िया-धसान लोक दर्शन करए जेबे करता तँ अपनो दुनू परानी अही लाटमे चलि कऽ दर्शन कऽ लिअ।” पतिक विचारसँ सहमत होइत रमणी काकी मुड़ी डोलबैत बजली- “भेल तँ शिवरातिसँ एक दिन पहिने जाएब आ शिवरातिक परात भने चलिए आएब। मोटा-मोटी दू दिन भेल।” पत्नीक विचारमे सहमत जतबैत जागेश्‍वर काका बजला- “हँ से तँ सएह भेल। काल्‍हि बारह बजेक पछाइत निकलब आ तेसर दिन बारह बजेसँ पहिने घुमि कऽ आबिए जाएब।” पतिक विचारमे अपन विचार सटबैत रमणी काकी बजली- “जखन दुनू परानी घरसँ निकैल बाहर जाएब तखन बेटो-पुतोहुकेँ जना देब नीक हएत। ओना अपनो दुनू परानी बहुत दिनसँ, बहुत दिनसँ कि सभ दिने वाणीश्‍वरी भगवतीक आराधना-उपासना करिते आबि रहल छी तँए भगवतीए धाममे उपासक फलहारो करब तँ जिनगीक परीछे देब हएत किने।” पत्नीक विचार सुनि जागेश्‍वर कक्काक मन फुला गेलैन। फुलाइते बजला- “जखन उदयपुरक लोक जाइक मन बना लेलैन तखन संग-साथमे अपनो दुनू परानीक जाएब उचिते हएत। मुदा ओ सभ अपन-अपन सवारीक बेवस्‍था करता, अपना दुनू गोरे अलग बेवस्‍था करब।” ओना जागेश्‍वर काका पत्नीक अभ्‍यन्‍तरक बात अपनो बुझै छला। अपना बुझैक कारण बेवहारिक छेलैन। बेवहारिक ई जे कहैले तँ सभ (गौंआँ) वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करए जेता मुदा घरसँ बाहर धरिक जे बोली-वाणीक रूप बना नेने छैथ, से की अपने वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करता, ओ तँ अप्‍पन दर्शन भगवतीकेँ देथिन। मुदा जे हौउ, एके गाममे सभ रहै छी, मुदा...। अपन विचारकेँ तहियबैत अबोध जकाँ जागेश्‍वर काका बजला- “जेना-जे विचार हएत से करब।” शुरूमे उदयपुर छोटे गाम छल। मुदा मिथिलांचलक घर-घराड़ीकेँ कमला-कोसीक बाढ़ि कम उपटान उपटौलक सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। केतेको निम्‍मन गामक मनुखक घराड़ी चौर भऽ माछ-कौछुक घराड़ी बनि गेल अछि जेकरो तँ नकारल नहियेँ जा सकैए। मुदा तँए ईहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए जे बत्तीसोअना गाम अहिना भऽ गेल अछि। खएर जेतए जे भेल से भेल, मुदा उदयपुरक उदयमे सभ दिन बाढ़ि ऐछे। ने यमुना तीरक उपद्रव आ ने कोसी-कमला घाटक घटवारिसँ भेँट, जइसँ गाममे कहियो कोनो विघटन किए हएत। तँए दिन-दिन बढ़िते गेल। आने-आन गामसँ उजरल-उपटल लोको आ उदयपुरक महत बुझनिहारो तँ आबि-आबि उदयपुरमे बसले छैथ। तैसंग नव-नव एबो करिते छैथ। गाममे वासभूमिक कमियोँ छइहे नहि जे घराड़ीक अभावक दुआरे कियो बसि नइ सकै छैथ, आकि अपनामे रग्‍गड़े-झग्‍गड़ करता। तँए कि गाममे निचरस खेत नइ अछि, कोनो धार-धूर नइ अछि, ओ गामे ने वासभूमि भेल। तँए केतबो परिवार आन गामसँ आबि बसता तैयो उदयपुरमे वासक कमी नहियेँ हएत। अनुकूल मौसम बनने जहिना बरखा होइए, अनुकूल मौसम बनने जहिना वसन्‍त अबैए, अनुकूल मौसम बनने जहिना ठनका खसैए तहिना वासभूमिक अनुकूलते ने घरवासकेँ गामवास सेहो बनबैए। जखने घरवास गामवास बनए लगैए तखनेसँ ने विचारवासी विवेकवासी बनि वास करए लगैए। से तँ गाममे ऐछे। जहिना श्रीपंचमीमे वीणा पुस्‍तक-धारिणी सरस्‍वतीक आ हाथ सजलक संग लक्ष्‍मीक पूजा[1] एके दिन एके समए– प्रभात वेलाक शुभ मुहूर्त्तमे लोक करै छैथ तहिना ने जिनगियोक प्रभात वेला अछि। वाणीश्‍वरी भगवती धामक धरमशालामे दुनू परानी जागेश्‍वर काका एकटा कोठली सबा रूपैआ दैछना दऽ कऽ लेलैन। तीन मंजिला मकानक नमहर धरमशाला ऐछे, जइमे छोट-पैघ अनेको कोठली भीतर अछि। उदयपुरक तँ मात्र पनरहे-बीसटा यात्री छैथ जे आनो-आनो गामक अनेको यात्री रहितो धरमशालाक किछु कोठली खालीए अछि। ओना, धरमशालाक भाड़ा होटल आकि भाड़ाबला आन मकान जकाँ बेसी नहियेँ अछि। तेकर कारण अछि ई धरमशाला वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक छिऐन। जे स्‍थानक चन्‍दा-चढ़ौआसँ बनल अछि। भाड़ा नामक किछु ने छै मुदा ओकर रख-रखावक जे बेवस्‍थामे खर्च होइ छै, बस ओही रूपक भाड़ा बनल अछि। सूर्यास्‍त भऽ गेल। स्‍थानक अप्‍पन बिजली बेवस्‍था, माने जेनरेटरक बेवस्‍था तँए स्‍थान भरिमे माने वाणीश्‍वरी भगवती-मन्‍दिरक संग आरो केते छोट-पैघ मन्‍दिरो तँ ऐछे। तैसंग पण्‍डा-पुजेगरीक रहैक वासक संग नमहर धरमशलो अछि आ बीचक जे अगनेय अछि, जइमे रंग-रंगक दोकान-दौरी अछि, तैबीच भरि राति एके रंगक इजोतक बेवस्‍था तँ चाहबे करी, जे ऐछे। पावर-हाउसक बिजली जकाँ नहि, जे कखन रहत आ कखन नइ रहत। होइतो तँ ऐछे जे दिनमे जखन बिजली इजोतक जरूरत नइ रहै छै तखन बिजलियो रहैए आ रातिमे जखन अन्‍हार होइ छै तखन रहबे ने करैए। तइसँ सैयो कच्‍छे वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक तँ ऐछे। दिनमे जखन इजोतक खगता नइ रहै छै तखन जेनरेटर बन्न रहल आ जखन जेते काल खगता भेल, तेते काल चलल। यएह ने जिनगीक ओ उपलब्‍धिक पड़ाव छिऐ जेतए लोककेँ अपन जिनगीक काज अपना हाथमे आबि जाइए, जइसँ अपन मनोनुकूल कार्यक्रमक बीच जिनगीक चक्की चलैत रहैए। सूर्यास्‍त होइते भगवतीक सिंह दुआरिक घड़ी-घण्‍ट बाजल। घड़ी-घण्‍ट बजिते सभ उपासी– शिवक उपास केनिहार आकि केनिहारि–क मनमे उपासनाक फलहारक आशा जगलैन। जहिना तुलसी बाबा कहने छैथ जे, जेहने जेकर मनक भाव रहत तेहने रामक दर्शनसँ भेँट हएत। ‘रामो रामो’ कहनिहारक कमी अछि, केतौ ठक-ठाकुर-चोर मिला जपैए तँ केतौ रस्‍ता-पेरामे रामक जप लुटाइए! लूटि लिअ जेकरा जे लूटैक अछि। भगवती स्‍थानक घण्‍टीक अवाज सुनि रमणी काकीक मन चपचपाइत थलथला कऽ जलजला गेलैन। जलजलाइते पति दिस तकैत रमणी काकी बजली- “गामेसँ फलहारक सभ फल अनने छी। पहिने दुनू परानी नहा कऽ नव वस्‍त्र पहिर लिअ, पछाइत डाली साजि भगवतीक मन्‍दिरमे फल चढ़ा दुनू गोरे शिवरातिक उपासनाक फलहार कऽ लेब।” होइते अहिना छै जे भूखल आगू किछु खेबाक वौस आ पियासल आगू पानि आबि गेलापर जहिना मनमे सब्रक बीजक अंकुर जगैए तहिना जागेश्‍वर काकाकेँ सेहो भेलैन। कोठलीक खिड़की खोलि जागेश्‍वर काका गौंआँ यात्रीक कोठली दिस तकला तँ देखलैन जे किनको अपन घरक फलहारक फल नइ छैन, तँए सभ झोरा लऽ लऽ दोकान दिस जा रहल छैथ...। अवसरक लाभ उठबैक परियास करैत, समयक उपयोग करैत जागेश्‍वर काका बजला- “नहेला पछाइत ने भगवतीक डाली सजब। अखन सभ यात्री फलहारक फल कीनैले दोकान-दौरी टहैल रहल छैथ, स्‍नानक घाट खाली अछि...।” दुनू परानी जागेश्‍वर काका नहेला पछाइत नव वस्‍त्र धारण केलैन। पुरना वस्‍त्र घाटपर खीच-फखारि कऽ पानि गाड़ि कोठरीमे पसाइर लेलैन। थर्मशमे गाइक दूध, पाकल केरा, दारीम, लताम आ खीरा मोटरीसँ निकालि रमणी काकी काकाकेँ कहलखिन- “सभ अपने चास-बासक छी।” एक तँ यात्राक पछाइत स्‍नानक सुख, तैपर सँ वाणीश्‍वरी भगवतीक सरोवरक घाट टपल जागेश्‍वर काका रहबे करैथ, मन गुदगुदा गेलैन। गुदगुदाइते बजला- “भगवतियोकेँ अपन-चास-वासक फल देख मने-मन खुशी हेबे करतैन।” ओना जागेश्‍वर काका संगी-साथी जकाँ वाणीश्‍वरी भगवतीकेँ बुझि बजला मुदा से रमणी काकीकेँ नीक नइ लगलैन। ओना, अनसोहाँतो नहियेँ लगलैन, मुदा एक धान एक चाउर होइतो किछु एहनो तँ ऐछे जे सुगन्‍धित अछि, एकर माने ईहो नइ जे सभ सुगन्‍धिते अछि। मुदा ईहो केना कहल जाएत जे चाउरक जे अपन सुगन्‍ध अछि ओ फल्‍लाँ चाउरमे नइ अछि। ओ तँ उपरारिमे उपजल सतरिया धानक चाउर हुअए कि तुलसी फुलक आ चाहे चौरीमे उपजल बेलौर-दसरिया आकि पाखैरे-पिच्‍चैर किए ने हुअए मुदा चाउरक जे अपन गुण-धर्म-सुगन्‍ध छै ओ तँ छइहे। ओना मने-मन जहिना जागेश्‍वर काका चाउर-गुड़ चिबबै छला तहिना रमणियोँ काकी चिबैबते छेली, मुदा बजली नहि, अपन फलहारक ओरियानमे अपनाकेँ लगौने सभ फलकेँ ओरिया-ओरिया सैंत-सैंत डाली सजबैत रहली। ..डाली सजिते जागेश्‍वर काका टोन मारलैन- “जे सभ फल वाणीश्‍वरी माएकेँ चढ़ेबैन से तँ मंत्र जकाँ कहि देबैन किने?” ओना जागेश्‍वर कक्काक मनमे होइत रहैन जे भरिसक पत्नीकेँ ईहो बात नीक नइ लगतैन, मुदा से विपरीत भेल, रमणी काकीकेँ नीक लगलैन। दुनू खीरापर हाथ रखि बजली- “ई भेल लत्तीक फल। जेकरा डाँड़मे, अपन फल जकाँ तागतो ने छै जे अपने भरे ठाढ़ो हएत मुदा फल तँ एहेन ऐछे जे गाछक सैयो फलसँ नम्‍हरो आ सुअदगरो ऐछे।” बिच्‍चेमे टोन दैत जागेश्‍वर काका बजला- “मुदा खीरा मीठ कहाँ होइए?” रमणी काकीकेँ सुतरलैन। बजली- “मीठ केकरा कहै छै से अखैन नइ कहब। जाबे आन यात्री नहेता-सोनेता तइसँ पहिने अगुआ कऽ भगवतीक दर्शन करब बेसी नीक हएत।” हत्‍थो भरि गौरिया केराकेँ दहिना हाथसँ उठा रमणी काकी निंगहारि-निंगहारि देखए लगली जे पाल परक कलकतिया-आम जकाँ ठाम-ठीम खोंइचा दगि गेल अछि। बिच्‍चेमे जागेश्‍वर काका टोनियबैत बजला- “केरा सड़ल जकाँ बुझि पड़ैए!” झपटैत रमणी काकी बजली- “सड़ल नइ अछि, परसाएल अछि। असल तँ यएह भेल जे परसाद बनि परसाइबला सेहो छी। तोहूमे आम-लतामक गाछ जकाँ कि कोनो हड्डी-पसलीबला गाछक फल छी। जल-जल, थल-थल, पल-पल गाछक पेटसँ निकलल फल छी।” ओना रमणी काकीक बात सुनि जागेश्‍वर काका भकचका गेला। भक-चकीमे पड़ल मनकेँ जाबे सोझरबैथ तइ बिच्‍चेमे दारीमकेँ देखैत रमणी काकी बजली- “केते सुन्‍दर धरतीक अकारक गोल फल झाड़-झाड़ीमे नुकाएल रहैए।” रमणी काकीक मुहसँ निकैलते जागेश्‍वर काका बजला- “कोनो कि झाड़ीक-झाड़मे फलेटा नुकाएल रहैए, फलक तरोमे फलहार नुकौने रहैए। तेहेन भारी चोर अछि जे खीरा आकि लताम जकाँ गुद्दा-बीआ आकि रस-खोंइचा एकबट्ट केने रहैए, सजनी जकाँ कोठरी बना-बना अपनाकेँ सजने रहैए।” ओना रमणी काकीक मनमे उपकैत रहैन जे कहिऐन- मुँहक दाँत जहिना रजो छी आ चोरो छी, तहिना ने अनारो अछि, मुदा बकबासमे समैकेँ हाथसँ छोड़ब नीक नहि, तँए रमणी काकी चुपे रहि थर्मश निकालि दूधक रंग देखए लगली। बकेन गाइक दूध...। डाली साजि रमणी काकी जागेश्‍वर काकाकेँ कहलखिन- “चलू, भगवती-माइक दर्शन काइए ली। फलहारोक बेर उनैह जाएत।” रमणी काकीक बात सुनि जागेश्‍वर काका बजला- “हम तँ नहेला पछाइतेसँ दर्शन करैले तैयार छी मुदा बीचमे अहीं ने लटघाँइर लगौने छी।” पतिक बात रमणी काकी सोल्‍होअना नइ सुनि पेली। आँखि उठा तकली तँ सोझे पतिक मुँह पटपटाइत देखली, जेना मने-मन कियो मंत्र-जप करै छैथ, तहिना। वाणीश्‍वरी भगवती जेना आगू आबि ठाढ़ भऽ अपन रूप दर्शन करबए लगल होनि तहिना रमणी काकी अनसून भऽ गेली। अनसून होइते मन नाचए लगलैन। नचिते आँखिक सोझमे भगवतीक तीन रूप चमकए लगलैन। मनुखमे देव जोग वएह ने भेल जे विचारकेँ विवेकक कसौटीक मुखाड़ी बान्‍हि बाइन बना भूमिक रणभूमिमे जीवन यात्रा करैत चलए। वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन आ फलहार केला पछाइत दुनू परानी जागेश्‍वर काका धरमशालाक ओइ कोठरीमे आबि बैसला, जे सवा रूपैआ दैछना दऽ दू दिन रहैले नेने छला। भरल मन दुनू परानीक रहबे करैन। रौतुका खेबोक खगता नहियेँ बुझि पड़ैन। जागेश्‍वर काका पत्नीकेँ कहलखिन- “एक बेर गौंओं-घरूओकेँ देख अबए चलू।” एक तँ ओहुना रमणी काकी पति भक्‍त, तैपर वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थान, बिनु ‘हँ’ ‘हूँ’ बजने उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेली। दुनू परानी जखन कोठरीसँ निकैल आनो-आनो यात्री आ अपन गौंआँ-यात्रीकेँ देखलैन तँ मने-मन हँसी लागए लगलैन। मुदा ने कियो हँसबे केला आ ने किछु बजबे केलैन। चुपचाप देख-सुनि कऽ अपन कोठरी आपस आबि गेला। जहिना अनुकूल मौसम पौने प्रकृतिमे सेहो अनुकूलता आबि जाइ छै, तहिना दुनू परानी जागेश्‍वर काकाक बीच सेहो ऐलैन। ..पत्नी दिस देखैत जागेश्‍वर काका बजला- “अनेरे दुनियाँक नीक-अधला देखै पाछू अपन जिनगी आ कर्तव्‍य छोड़ि मुँह तकैत रही, हमरा बुझने से नीक नहि।” जहिना केकरो-केकरो ठोरेपर बरी पकैए, माने कोनो बातक विचार लगले कऽ देब, तहिना रमणी काकीकेँ सेहो भेलैन। बजली- “एकरा के काटत।” पत्नीक समरथनमे जागेश्‍वर कक्काक मन हरिया गेलैन। हरिया ई गेलैन जे विधातो नारी-पुरुखक भेद रचि दुनूकेँ दू दिशामे मोड़ि देलैन। तैठाम जँ पति-पत्नी ओइ भेदकेँ सहीट बनबैत जिनगीक संगी बनि जीवन-यात्रा करै छैथ तँ ओ निसचिते ने नीक भेल। जागेश्‍वर काका बजला- “बेकती रूपमे नर आ नारी भेल, दुनूक सम्‍बन्‍धे ने घर-परिवारक निर्माण करत। जे सभ नारीक जिनगीक दायित्त्व बनिते अछि।” बिच्‍चेमे रमणी काकी बजली- “पुरुख-नारीक सम्‍बन्‍ध ओइ परिवार-ले अनिवार्य भेल जे अतीत-सँ-भविस धरिक परिवार भेल, मुदा परिवार तँ असगरोक होइ छै आ निसचिन्‍तसँ लोक जीवन-यात्रा करैए।” पत्नीक विचार सुनि जागेश्‍वर काका बजला- “हँ, से तँ भेल मुदा ओ चलन्‍त परिवार भेल। चलन्‍त परिवार ई जे जेत्तै रहब तेत्तै परिवार भेल, कोनो गाम-समाज आकि देश-कोस नइ भेल। मुदा जे भेल से भेल, अपना तँ से नहि अछि। तँए जे अछि तहीले ने विचारबो करब आ करबो करब।” जागेश्‍वर कक्काक विचार रमणी काकीकेँ जँचलैन। जँचिते बजली- “अखन जइ धाममे छी ओ तँ तखने धर्मस्‍थल हएत जखन ओइ मर्मकेँ मर्मस्‍थलमे बसा कर्मस्‍थलमे समरपित करब।” रमणी काकीक विचार नीक जकाँ जागेश्‍वर काका नइ बुझला। एकर माने ई नहि जे जागेश्‍वर काकाकेँ बुझैक अवगैत नइ छेलैन। विचार व्‍यक्‍त कएल जाइए पात्रक माध्‍यमसँ। जँ एक रंग पात्र रहल तँ एक-धारामे चलैए आ जँ पात्रमे भेद रहल, अन्‍तर रहल तँ केतौ-केतौ बाधा-रूकाबट होइते अछि। सएह जागेश्‍वर काकाकेँ भेलैन। मुदा कनियेँ-काकलक पछाइत जेना मनक ओझरी सोझरा गेलैन तहिना मन विहुँसलैन। विहुँसैत जागेश्‍वर काका बजला- “जहिना नर-नारीक बीच परिवार बनल अछि तहिना ने एक नर दोसर नरक धारा भेल।” ओना रमणी काकी अखन तक नरक माने ‘पुरुख’ बुझै छेली आ नारीक माने ‘महिला’। मुदा जागेश्‍वर काका नरक अद्वैत रूपमे चर्च केने छला, द्वैत रूपमे नहि। माने ओकर खण्‍डित रूपमे नहि। तँए रमणी काकीकेँ कनी बुझैमे भेद भेबे केलैन। निर्मल-निरजल रमणी काकीक हृदय, बजली- “नीक नहाँति नइ बुझि पेलौं।” हँसैत जागेश्‍वर काका कहलखिन- “द्वैत-अद्वैतक बीच परिवार चलैए। कखन ‘द्वैत’ ‘अद्वैत’ हएत आ ‘अद्वैत’ ‘द्वैत’, यएह ने..?” पतिक विचार सुनि रमणी काकी रमैत जिनगीमे रमि गेली। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2383, तिथि :  11 अक्‍टुबर 2016 [1] कृषि कार्य हेतु हर ठाढ़ कएल जाइए ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चन्‍दना दत्त- आलेख- बाबा लालदास “जे क्‍यो ई कथा मनदय सुनतीह तनिकाँ सन्‍तति, सम्‍प्रत्ति एवं सौभाग्‍यक वृद्धि होयतन्‍हि। अन्‍तकाल तक धर्मराजक प्रसादेँ निर्भय रहतीह।” प्रात: स्‍मरणीय माँ सावित्रीकेँ गोड़ लगैत सभ स्‍त्रीगण बड़क गाछमे जल ढारए लगलीह। “ईकथा बड्ड नीक लगैत अछि सुनबामे, तँए गाछ तर बैसल रहैत छी पिंकी माइक आसमे। हुनकेँ लग छन्‍हि ई पोथी,एक गोटा बजलीह। सुनि हमर माइक ठोरपर मुस्‍की आबि गेल।” ‘हमर परबाबा लिखने छथि’ गवौक्‍ति छलनि हुनकर कथमे। माइक संग हमहूँ गेल छलहुँ बड़ए गाछ तर। खिस्‍सा-पिहानी नीक लगैत छल सुनबामे। ताहि दिनमे स्‍त्रीक लेल ‘सम्‍पत्ति, संतति आ सोगाह’क महात्ता की अछि से बुझल कहाँ छल? ज्ञज्ञन भेलापर ज्ञात भेल जे ई पोथी ‘स्‍त्री धर्म शिक्षा’ हमर माइक परबाबाक लिखल छन्‍हि,जनिकाँ ओ बहुमूल्‍य थाती जकाँ रखने छलीहकिएक तँ हमर माएकेँ दहेजमे ई पोथी भेटल छलनि। ओ छलाह महाकवि पण्‍डित लालदास। कतेक अल्‍प शब्‍दमे बाबा लालदास कतेक पैघ आशीर्वाद स्‍त्रीगणकेँ देलखिन्‍ह अछि ई हुनक विचार एवं लेखनीक विशेषता छन्‍हि। कोनो नारी लेल संततिक की महत्‍व अछि ई हमरा सभकेँ सद्यप्रसवा नारीक ठज्ञेरक मुस्‍की देखि बुझना जाइत अछि जे कोरमे शिशुकेँ लए जखन स्‍तनपान करबैत छथि तँ अपन तमाम कष्‍ट बिसरि जाइत छथि जे ओहि बालककेँ जन्‍म देबा काल उठौने रहैत छथि। सम्‍पत्तिक महत्ता तँ आदिकालसँ सभ स्‍वीकार कयने छथि मुदा स्‍त्रीगणक लेल अपन घर-गृहस्‍तीकेँ सुचारू रूपसँ व्‍यवस्‍थित रखबाक लेल सम्‍पत्ति भेलाइ अत्‍यावश्‍यक रहैत छन्‍हि। भनहि ओ धन सम्‍पत्तिक अर्जन नहि करैत छलीह मुदा सम्‍पत्तिक संरक्षण करबामे कतेक व्‍योंत लगबय पड़ैत छन्‍हि एहि बातकेँ संयुक्‍त परिवारमे रहनिहार बाबा खूब जनैत छलाह। सौभाग्‍य तँ स्‍त्रीकेँ नीक पति भेटलाक उपराँते प्राप्‍त होइत छन्‍हि ताहि सौभाग्‍यक लेल सावित्री पिता, नारद मुनि आ अन्‍त धरि धर्मराजोसँ अपन बात मनबा कऽ रहलीह। एहि कथामे ईहो लिखने छथि जे मिथिलामे माए सभ अपन पुत्रीकेँ बाल्‍यावस्‍थासँ लिखाय-पढ़ाय, उत्तम उत्तम उपदेश ओ गृह परिचर्य्या आदि स्‍त्री धर्मसँ सुशिक्षित कय लोक हेतु आदर्श बनबैत छथि। कोनो धर्म-संस्‍कृति वा संस्‍कारक प्रचार-प्रसार वा संरक्षण समाजमे स्‍त्रीगणेँ द्वारा होइत आएल अछि। आइ जँ विद्यापति विश्‍वप्रसिद्ध भेला तँ एहिमे हुनक काव्‍यकेँ अपन गोसाउनि गीत बनाय, अपन स्‍वरलहरी देबय वाली स्‍त्रीगणक महत्‍व कतहु कम नहि कहल जा सकैछ। आइ जखन स्‍त्री-शिक्षापर विश्‍व स्‍तरपर जोर अछि। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’क नारा बुलन्‍द भऽ रहल अछि ओतय आइसँ सैंकड़ो वर्ष पूर्व मिथिलाक बेटी सीता-सावित्री अपन आचरण, धर्म-शास्‍त्रक ज्ञानसँ विश्‍वक लेल आदर्श उपस्‍थित कयने छथि। महाकविक लेखनी स्‍त्री धर्म शिक्षासँ रामायण तकमे अपूर्व चललनि। मकाकवि लालदासकेँ विश्‍वास छलनि जे सीता हिनका रामायण लिखबाक लेल प्रेरित कएल। ‘ब्रह्मर्वेवर्त पुराण’क अनुसारेँ लक्ष्‍मीक जन्‍म कुशध्‍वजक पुत्रीक रूपमे भेलनि। लंकापति रावण अंहकार मदसँ भरल छल ओ हिनक सौंदर्यपर आकृष्‍ट भए लक्ष्‍मीसँ विवाह करबाक लेल उद्दत छल। लक्ष्‍मी रावणक एहि प्रकारक व्‍यवहारसँ क्षुब्‍ध भए सराप देलथिन्‍ह आ तकरे परिणामस्‍वरूप सीताक रूपमे मिथिलामे जन्‍म लेल जे रावण सपरिवार समूल नष्‍ट भए सकए। लालदास कविवरक हेतु सीता वा माँ मैथिली सर्वशक्‍तिमान छथिन। मैथिली साहित्‍यमे लालदास सीताकेँ गरिमा प्रदान कएलनि आ मिथिलाक बेटीकेँ सर्वोच्‍च स्‍थान देलनि। “सीता चरित ललित अनुमानि। रामकथा भए कहब बखानि।।” महाकवि लाल दास अपन रामायणमे मिथिलाक सभ्‍यता एवं संस्‍कृतिक चित्रण विशद रूपेँ कएलनि अछि। मुख्‍य रूपेँ गिरिजा अर्चना,सीता अर्चना, परदा प्रथा, विवहोत्सव, अतिथि सत्‍कार, महुअक, डहकन, उचिती, विधकरी, दुरागमन, समदाउन, भार-दउर केर विशेष वर्णन कएलनि अछि। अपन मातृभूमिक प्रति महाकविकेँ प्रेम हुनक लेखनीकेँ मिथिलाक गौरव गान करबामे दृष्‍टव्‍य अछि- “जन्‍मभूमि नैहर सीताक। जतय स्‍वयं शिवरूप पिताक।। शक्‍तिपीठ उत्म स्‍थान। उग्रभूमि सभ भाँति महान।।” अपन मातृभूमिक वर्णन कए महाकवि मिथिला राज्‍यक शोभा सुन्‍दरता, मिथिलाक उद्यान, नदी, जलाशय, खेत-पथार संगहि मिथिलावासीक सदाचारिता, तपस्‍या,धर्मप्रियता प्रभृतिक वर्णन अनेक दृष्‍टिसँ कएलनि। ई मर्त्‍यलोकमे मिथिलाक तुलना सुरलोकक विष्‍णुधामसँ कयने छथि- “आसमान मिथिलापुरी, रवि सन तेज प्रचण्‍ड। बुझि पड़ अनुमप देश जनि, महिगत स्‍वर्गक खण्‍ड।।” मिथिलाकेँ प्राकृतिक सौन्‍दर्य अनुपम अछि। गाछ-बिरीछ, नदी, पोखरि, जीव-जन्‍तु चिड़ै-चुनमुनीक विविधता कविवरक लेखनीमे मुखरित भए आएल अछि। यथा- “कति विध मृग पशु-जन्‍तु बिराज से जनि तपसिक प्रजा-समाज, गरजे मृगपति बैर-बिहाय मुनि पहरा तनि पड़ए सदाय, शुक पिक चातक चक्र चकोर गुंजय मधुकर मधुर सुराग वीण वाद्य सम सुनि प्रिय लाग...।” ऐ प्रकारेँ हम कहि सकैत छी जे बाबा लालदास जे उद्भट विद्वान, शक्‍ति पूजक, गद्यकार, चित्रकार, लिपिकार, भाषाविद्, कलाकार,समाज सुधारक, राष्‍ट्रीय चेतनाक सम्‍पोषक, ओजस्‍वी वक्‍ता छलाह। हुनक विराट व्‍यक्‍तित्‍व आ नवीन मार्ग प्रदर्शक तथा उदार दृष्‍टिकोणक फलस्‍वरूप हम कहि सकैत छी गर्वसँ कि हम एहन जातिसँ छी जतय सभ महिला साक्षर छलीह आ ई महाकविक देन छल। किएक तँ दहेज स्‍वरूप एहन अनमोल पोथी बेटीकेँ देल जाइत छल जे ओ बेटी सभ दुहू कुलक नाम रौशन करैत छलीह। महाकवि लालदास निज भाषानुरागी छलाह। माँ मैथिलीक संग अपन मातृभाषाक हुनक प्रेम मैथिलीक प्रति लिखल एहि पंक्तिमे देखल जा सकैछ- “निज भाषा जननी निज देश स्‍वर्गोसँ जानथि जन वेश।” आखिरमे हम खड़ौआक माटि-पानिक प्रति अपन भाव कहब। हमर माँ-पापाक विवाहक पचासम वर्षगाँठ छल- 16 मई 2012 केँ। फारबिसगंज स्‍थित निज निवास आचार्यपूरीमे, छोट-छीन कार्यक्रमक संग हम सभ भाए-बहिन आ बहुत रास परिजनक संग हमर प्रिय नानी सेहो उपस्‍थित छल। पूजा-पाठ भोज भातक पश्‍चात रात्रिमे नाति-नातीन, पोता-पोती सांस्‍कृतिक कार्य-क्रमक आयोजन भेल। सभ खूब आनन्‍दित छल। धिया-पुताक नाच-गानक पश्‍चात हम मायसँ पुछलहुँ- “अहाँ अपन विवाहक पश्‍चात पापासँ गप्‍प-सप्‍पक किछु प्रसंग कहू।” माँ बजलीह- “ई तँ विवाहेक रात्रिसँ हमरा अंगरेजी सिखबय लगलाह, मुदा हम लालदासक परपोती अपन मैथिली कोना छोड़ितहुँ।” ताहिपर हमर बड़की बहिन ‘पिंकी दीदी’ चुटकी लेलक- “अंगरेजीक विभागाध्‍यक्ष हमर बाबूजीकेँ माँ मैथिली लिखबा कऽ मानल तहन ने साहित्‍य अकादमीक मैथिली अनुवाद पुरस्‍करसँ सम्‍मानित भेलाह।” सम्‍पर्क- राँटी (मधुबनी) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अंकुर लघु कथा संग्रह राम विलास साहु समरपन भाव अन्‍हरि‍या राति‍ इजोतक नै कोनो उपाय सोचै छेलौं केना भागत ई वियाधि‍ सोचैत मनमे आएल सहजे एक उपाय फुराएल एक दीप जराएल कि‍छु अन्‍हार भागल-पड़ाएल मुदा सोचलौं ई अन्‍हरि‍या बेर-बेर आबि दोहराएत! मन पड़ल ज्ञानक दीप कथाक सत्तैर- डोमक आगि/8 स्‍वर्गक सुख/13 स्‍कूलक खिचड़ी/17 चोर-सिपाही/19 इमानदारीक पाठ/20 बौआ बाजल/22 घूसहा घर /24 गंगा नहाएब/27 शिक्षाक महत/ 33 ई छी हमर मजबुरी/ 37 बाल बोध/ 39 अबिसवास/ 46 जातिक भोज/ 50 जाति/ 55 हहौती/ 59 बुजुर्गक दुख के हरत?/ 63 बिलाइ रस्‍ता कटलक/ 68 छुतहर / 72 मोंछक लड़ाइ/ 79 केते उचित/ 84 इज्‍जतक सवाल/ 95 बेंगक महंथी/100 डोमक आगि जेठरैत कक्काक मृत्‍यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलैन। सौंसे गाममे सोग पसैर गेल। गाममे चर्चा हुअ लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्‍त भेने एकटा युगक अन्‍त भऽ गेल। जेठरैत कक्काक धाक जहिना गामक लोक मानैत तहिना आदरो करैत। मुइला पछाइत समुच्‍चा गामक लोक दाह संस्‍कारमे पँचकठिया दइले पहुँचल छल। भीड़ बहुत मुदा अखन धरि अछियामे आगि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ठाढ़, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ किछु लोक निर्गुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्‍हरा बनि हे...।” “सभ दिन होत ने एक समाना...।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर...।” भिनसरसँ दुपहर भेल जाइत रहै। अखन धरि लोक कोन आशामे समए बितबै छल, तेकर कोनो थाह-पता नहि छल। जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखसँ पेटमे बिलाइ कुदऽ लगलै, तखन जा कऽ विलमक कारणक पता लगबऽ लगल। मलिकपना-बला बात, के हिम्‍मत करत आ आगू भऽ पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत रहए। कियो आगू जेबे ने करए। तखने रौदी बाबा पहुँचला। पहुँचते बजला- “अखन तक अछियामे आगियो ने पड़ल। किए एते अबेर भेल। धिया-पुता सभ भूखे लहालोठ होइए!” सभ कियो रौदी बाबाकेँ कहलकैन- “अहाँ बुढ़ो-पुरान छी आ गामक अनुभवी सेहो छी, से कनी झब-दे पता करियनु जे...।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल मुर्दा लग पहुँचला। ओइ ठाम जेठरैत कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल कुटुम सभ अपनामे कहा-सुनी करै छल...। लगमे जा रौदी बाबा जोरसँ पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ लाशकेँ जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरैत कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्‍द- कहलकैन- “दादा, सभ किछु तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्‍तजारमे छी।” रौदी बाबा पुछलखिन- “से किए?” रूपचन्‍द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि लाशकेँ जरौलासँ मोक्षक प्राप्‍ति होइ छै तँए कनी बौकू डोमक बाट तकै छी।” रौदी बाबा बजला- “अहीले एते अबैर होइए आकि आरो कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो भोरसँ आएल अछि ओकरा कानमे खबैरो ने छै।” रूपचन्‍द- “नइ हौ काका, काल्हि‍ये बौकू समधियौना गेल रहए, खबैर भऽ गेल छै। ओ जखने-ने-तखने पहुँचैए-बला अछि।” रूपचन्‍दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकेँ अनरगल लगलैन। तड़बाक लहैर मगज धरि पहुँच गेलैन। जोरसँ बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छैथ‍ ओ बुड़िबके छैथ‍ की! जखन एते बुझै छहक जे डोमक हाथक आगि कीनि कऽ ओइ आगिसँ मुखाग्‍नि करब तँ पहिने डोमकेँ बजा लइतह। पछाइत लोक सभकेँ बजैबतह। भिनसरसँ दुपहर भऽ गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ भऽ रहल अछि आ बौकू डोमक अखनो कोनो थाह-पता नइ छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून। जखन जे मनमे फुड़ैए सहए करऽ लगैए! नव-नव जोगीकेँ भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लोक सभ लग अबऽ लगल। सभकेँ होइ कखन झबदे आगि पड़ै जे लोक पँचकठिया फेकि नहाइ-सोनाइले चलि जाएत। मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल। सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्‍द मालिक, कथी-ले एते लेट भऽ रहल छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल। जखन बुझै छिऐ जे डोम समाजक लेल एते पैघ लोक छै, बिना डोमक आगिसँ लोककेँ मरलोमे  मुक्‍ति नइ भेटै छै, तखन डोमकेँ एते निच्‍चा किए बुझै छिऐ...। जखन कि जीबैतमे सभ डोमसँ छूबाइ छी, आ मुइलापर पैघ बुझै छी...। डोमो तँ अही समाजक लोक छी, मुदा गामसँ हटि कऽ वेचारा सभ गाममे बसैए। सभ कियो ओकरा अछोप बूझि आइ धरि लग बैस खेनाइ तँ दूर जे बातो ने करैए। एक लग्‍गा फटिकेसँ पुछ-पाछ करैए...। ऐबेरमे कोन असोकर्ज हुअ लगैए...। रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नचऽ लगलैन। मिथिलाक समाजिक पद्धतिक बनाबटपर धियान गेलैन। जाइते मन जेना आरो चौतरफ वौअए लगलैन। बेवस्‍थाक जलियाएल रूप सभ सोझा अबऽ लगलैन। किछु बाजि नइ रहल छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू डोमसँ आगि कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरैत काका गामेक मालिक छला तँ हमरो मालिक। हमरा कोनो लोभ-लालच नइ अछि मुदा दान-दछिनामे जे देब से खुशी-खुशी दऽ दिअ।” रूपचन्‍द एकटा चानीक सिक्का दऽ आगि कीनऽ आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा आ सीताराम दास अपनामे विचार कऽ बजला- “ई उचित नइ भेलऽ रूपचन्‍द। जेकरा खातिर भोरसँ दुपहर भऽ गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरैत काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छैथ‍ जे तीनो पीढ़ीमे नइ सधत। अपनो समांग बूझि बौकूकेँ जे देबै से दियौ, तखन ने बौकूओ अप्‍पन बूझत।” सएह भेल। मुखाग्‍नि भेला पछाइत सभ काजक अन्‍त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल। निर्गुन गौनिहारकेँ जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलैन। पुन: गाबए लगला- “सभ दिन होत ने एक समाना...।” O स्‍वर्गक सुख कोसी नदीक छीटपर बौकू सदाय खोपड़ी बना रहै छल। अगल-बगलमे आरो लोक सभ काश-पटेरक खोपड़ी बना रहै छल। कोसीक कटनियाँ भेने मुसहरी टोल उजैर गेल। माघ मासक समए। वस्‍त्रक अभावसँ जाड़क मारल बौकू ठिठुरैत घूर तपै छल। जखने घूरमे आगि देलक आकि बौकूक बेटा-बेटी सटि कऽ बैस आगि खोरि-खोरि तापए लगल। पत्नी बलबावाली खोपड़ीसँ बकरी निकालैत जोरसँ बजली- “रातियोँ सिदहाक अभावमे सभ कोइ भुखले सुति रहलौं, आब दिनोमे बाल-बच्‍चा की खाएत। भूखसँ तरैप की बाल-बच्‍चाक संगे कोसीमे डुमि मरब।” बौकू सदाय बाजल- “भोरे-भोर एहेन अशुभ बात नइ बाजू। शीतलहरी भरि कोनो तरहेँ परान बँचाउ। परान बँचत तँ लाखो उपए करब। कनिक्को समए फरिच हेतै तँ खाइ-पीबैक जोगार करब। एक तँ कोसी मैयाक मारल छी दोसर भगवानो बेमुख अछि।” शीतलहरीक कोनो ठेकान नइ अछि मुदा भूख तँ समैपर लगिये जाइए। बेटा-बेटी रातिमे किछु ने खेलक। भिनसर होइते जोर-जोरसँ खाइले माँगए लगल। बलबावाली पड़ोसीसँ दू सेर अल्‍हुआ पैंच आनि घूरक आगिमे पका-पका बेटा-बेटीकेँ देलक। अपनो दुनू परानी खेलक। ऊपरसँ पानि पीब-पीब भूख मेटेलक। कुहेस कमिते रौदक दर्शन भेल। बलबावाली पतिकेँ कहलकैन- “दू दिनसँ सुखल रोटी आ अल्‍हुआ खा कऽ कोनो तरहेँ दिन कटलौं मुदा आइ भातक कोनो जोगार करू।” बौकू जाड़क कोनो परवाह नइ करैत धोतीक तर-ऊपरा ओढ़ैत बाजल- “सब मिलि चलू परसा चौरीमे धानो लोढ़ब आ घोंघी-डोका सेहो बीछि आनब।” साबिकेसँ परसा चौरीक सिंगरा-बेलौड़ आ सतराज धान नामी अछि। चौरी पहुँचते बौकू बेटा-बेटीकेँ कहलक- “तूँ सभ घोंघी-डोका बीछि-बीछि छिट्टामे राख आ हम दुनू गोरे धान बीछै छी।” दुनू गोरे मिलि करीब पसेरी भरि धान लोढ़लक। बेटा-बेटी घोंघी-डोका छिट्टामे उठौलक। जखन घर चलैले तैयार भेल तँ बौकूक पत्नी बजली- “सुतैले एकेटा गोनैर अछि। किछ नार सेहो नेने चलू। बिछौना मोटसँ देबै। ” नार बीछैकाल बौकू एकटा अढ़ैया भरिक काछुकेँ देखलक। देखते बौकू काछुकेँ उनटौलक। काछुकेँ उनटा देने भागल नइ होइ छै। उठा कऽ तौनीमे बान्‍हलक। धान आ नार पत्नीक माथपर देलक आ अपने बौकू घोंघी-काछु लऽ बेटा-बेटीकेँ संग केने विदा भेल। घर पहुँचते धान रौदमे पसारलक। पड़ोसीसँ उक्‍खैर-समाठ आनि धान-कुटि कऽ चाउर तैयार केलक। कौछक मासु बना रान्‍हलक। दोसर बरतनमे भात रान्‍हलक।  सभ कोइ संगे खेनाइ खाइले बैसल। जाड़क समैमे सिंगरा-बेलौड़ आ देसहरिया धानक चाउरक लाल-लाल भात तेलगर आ स्‍वादिष्‍ट होइते अछि। तैपर सँ कौछक मासु अपने तेलसँ ऐंठल-ऐंठल, भातपर पड़िते भातो तेलसँ तर-बतर भऽ गेल। बौकू बमरोटिया हाथसँ भात-मासु बँटबो करए आ खेबो करए। खेनाइ अधपेटा भेल तँ पानि पीब पियास मिझा नहमर साँस लैत बाजल- “एहेन खेनाइ भागशालीए लोक खाइए। राजा-महराजाकेँ नशीव नइ होइ छै। ई खेनाइ देखते केहेन-केहेन साधु-बबाजीकेँ सेहो मन ललिचा जेतइ।” भोजन केलापर बौकू घूर पजारि देह टनकौलक। बलबावाली अरामसँ सुतैले ठेहुन भरि नार बिछौलक आ बाल-बच्‍चाक संग ओइपर सुतल। आ ऊपरसँ गोनैर ओढ़ि लेलक। कनीकालक पछाइत सबहक देह गरमा गेलै। बलबावाली हाफी करैत पतिकेँ कहली- “औझका मेहनत साफल भेल। एहेन बिकट समैमे एहेन खेनाइ आ एहेन ओढ़ना बिछौना मिलल।” नीक अवसर देख बौकू बाजल- “ई छी स्‍वर्गक सुख। एहेन सुख रजो-रजवारकेँ सुन्‍दर महल आ सजल पलंगपर नइ भेटैए। अपना देखियो तर नारायण आ ऊपर गोविन्‍द छै आ बीचमे बौकूक परिवार अरामसँ सुतल छै। नइ कोनो डर-भर छै आ बगलेमे कासी मैयाक दिन-राति पहरा पड़ै छै।” O स्‍कूलक खिचड़ी एकटा अभि‍भावक तमसा कऽ स्‍कूल पहुँचला। हेड मास्‍टरकेँ उपराग दैत बजला- “पढ़ाइ-लि‍खाइ तँ जएह-सएह होइए। खाली खि‍चड़ीयेमे बेहाल रहै छी। जखन‍ धि‍या-पुता पढ़बे नै करतै तखन‍ तँ हाकि‍म-हुकुमक तँ बाते छोड़ू चपरासि‍यो नै बनतै। एसँ नीक तँ प्राइवेटे स्‍कूल ने जइमे दूटा पाइये ने लगै छै, पढ़ाइ तँ नीक होइ छै। आइ तक ऐ स्‍कूलक बच्‍चा पढ़ि‍ कऽ कोन नाम कमेलकै।” मास्‍टर सहाएब शान्‍त भावसँ अभि‍भावककेँ समझबैत बजला- “देखू, तमसाउ नै कोनो हम खि‍बै छी खि‍चड़ी। ई तँ सरकारक योजना छी। ऐ योजनासँ लाभो बहुत छै। नि‍च्‍चासँ ऊपर धरि‍ सभ माले-माल होइ छै।” अभि‍भावक बजला- “से केना?” मास्‍टर सहाएब कहलखि‍न- “सहीमे प्राइवेट स्‍कूलक बच्‍चा सभ पढ़ि‍-लि‍खि‍ हाकि‍म-हुकुम बनै छै। आ ईहो देखैत हेबै जे ओ सभ माए-बाप, गाम-समाजकेँ छोड़ि‍ एवं मातृभूमि‍केँ बि‍सैर‍ जाइए, बूझू बौर जाइए। से तँ ऐ स्‍कूलक बच्‍चामे नै होइए।” O चोर-सिपाही माघ मास अन्‍हरि‍या राति‍। ओस-कुहेससँ हाथो-हाथ ने सुझैत। एकटा चोर चोरि‍ कऽ भागल जाइ छल। तखने एकटा सि‍पाही गश्‍तीमे आबि‍ रहल छल। चोर सि‍पाहीकेँ देख‍ते भागल। चोर बूढ़ छल मुदा सि‍पाही बलंठ छलै। भागैत चोरकेँ रपैट‍ कऽ पकड़लक सि‍पाही। पकैड़‍ हाजत‍ लेने जाइ छल। चोरकेँ ठंढासँ देह थरथराइ छल। मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथसँ बचब। थोड़े आगू चलि‍ कऽ सड़कसँ हटि‍ एकटा घूर रहै। आगि‍ देखते चोर बाजल- “सर, अहाँ एत्तै रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बि‍ड़ी नेसने अबै छी?” सि‍पाही कने सोचि‍ कऽ बाजल- “अरे, तूँ हमरा मूर्ख बुझै छेँ रे! आ जँ तूँ भागि‍ जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसँ बीड़ी सुनगेने अबै छी।” O इमानदारीक पाठ ननुआँ पुछलक कनुआँसँ- “भैया आइ-काल्हि‍ तँ गामोक स्‍कूलमे बड़ सुवि‍धा भेटै छै आ पढ़ाइओ होइ छै तैयो वि‍द्यार्थी सभ शहरक स्‍कूलमे कि‍ए पढ़ै छै?” कनुआँ जबाब देलक- “गामक स्‍कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक स्‍कूलमे रोजगारक पाठ पढ़बै छै।” “से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक। कनुआँ उत्तर देलक- “गामक स्‍कूलमे एहेन पाठ पढ़बै छै जे कहुना साक्षर भऽ जाए, गाए-भैंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती करए। अन्न उपजा कऽ अपनो खाए आ आनोकेँ खि‍याबए। ई छि‍ऐ ने इमानदारीक पाठ मुदा शहरक स्‍कूलमे वि‍द्यार्थी सभकेँ रोजगारक पाठ पढ़बै छै। ओ सभ पढ़ि‍-‍लिखि रोजगार लेल आन-आन शहर चलि‍ जाइ छै। अपन घर-परि‍वार आ समाज सेहो छुटि‍ जाइ छै। समाजसँ बेमुख भऽ जाइ छै। आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?” O बौआ बाजल पढ़ल-लि‍खल बेरोजगार छी मुदा दि‍न केना कटै छल तकर कोनो सुधि‍-बुधि‍ नै छल। ऊपरसँ परि‍वारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्‍छा रहि‍तो कि‍छु नै कऽ सकलौं। एक दि‍न मनमे फुराएल जे कि‍छु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़ि‍आएले छी औरो बुड़ि‍या जाएब। एक दि‍न भोरमे बौआ-बुच्‍चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलि‍ऐ। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे बौआ पुछलक- “लोक एत्ते मेहनतसँ कि‍ए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दि‍न मरि‍ऐ जाइए?” बौआकेँ हम समझबैत कहलि‍ऐ- “जीवन-मरण तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। ओ नि‍रंतर होइत रहैत अछि‍।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक कि‍ए पढ़ैए?” “मनुख पढ़ि‍-लि‍ख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जि‍नगीकेँ सुलभ बना असली जि‍नगी जीबैए। लोक पढ़ि‍-लि‍खि डाक्‍टर-इंजि‍नि‍यर, औफि‍सर, कवि‍, लेखक आ उपदेशक इत्‍यादि‍ बनैए। अच्‍छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?‍” बौआ बाजल- “हम पढ़ि‍-लि‍ख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि‍-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जि‍नगी बि‍तबै छैथ‍‍ मुदा कवि‍-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छैन‍। अखबारमे पढ़लि‍ऐ जे मरला बाद पुरस्‍कार भेटै छै।” O घूसहा घर मुखि‍याजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल ढोल्हो दि‍यौलैन‍। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचला। सभाकेँ सम्‍बोधि‍त करैत मुखि‍याजी बजला- “ऐ बैसारमे सभ कि‍यो मि‍ल ‍निर्णए लि‍अए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जि‍नकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ, ओइ बेकती‍क सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्‍दि‍रा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतैन‍।” वार्ड सदस्‍यक सहयोगसँ मुखि‍याजी लग इन्‍दि‍रा आवासबला सूची पहुँचल। बि‍हानेसँ मुखि‍याजीक दलाल सभ सूचीमे नामांकि‍त बेकती‍सँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि‍ देलक जे फार्म भरि‍ कऽ मुखि‍याजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दि‍अए पड़त। तखन इन्‍दि‍रा आवास भेटत। बहुत गोटे तँ अपन गाए-महींस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि‍ कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। कि‍छु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचि‍त रहि‍ गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक। कि‍छु दि‍नक बाद रघि‍या मसौमात इन्‍दि‍रा-आवास ले फार्म भरि‍ मुखि‍या जी लग पहुँचली। मुखि‍याजी फार्म पढ़ि‍ बजला- “पहि‍ले इन्‍दि‍रा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालि‍स हजार भेटै छै मुदा आगूसँ साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्‍चीसमे पाँच हजार आ अखन चालि‍समे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।” रधि‍या सुनिते कानि‍-कलैप कऽ अपन मजबूरी सुनौलकैन‍। मुखि‍याजी मुड़ी डोलबैत बजला- “यइ काकी, हमरे केने नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकि‍म-हुकुम बैसल छै। ओहो तँ कटि‍या सोन्‍हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतै। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे नि‍महै छि‍ऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।” ‍रधि‍या सभ बात सुनि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍ बूझि‍ आपस आबि‍ गेली। बुधनी बुढ़ि‍या गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनि‍येमे घरबला बाढ़ि‍मे डुमि‍ कऽ मरि‍ गेलखि‍न। दूटा बेटाक संग बुधनी कहि‍यो हि‍म्‍मत नै हारली। संघर्ष करैत आत्‍म-‍निर्भरतापर धि‍यो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छैथ‍। हलाँकि‍ आर्थिक रूपे कमजोरे छैथ‍। एक दि‍न मुखि‍याजीक नजैर‍ बुधनी बुढ़ि‍यापर पड़लैन‍ आ देखते पुछलखि‍न- “गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन आ दोसर इन्‍दि‍रा आवासक।” बधनी बजली- “ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?” मुखि‍याजी- “हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच सए आ इन्‍दि‍रा-आवासमे पनरह हजार।” बुधनी- “हम ई लाभ नै लेब।” मुखि‍याजी- “कि‍ए नै लेब?” बुधनी- “घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?” मुखि‍याजी आ बुधनी बुढ़ि‍याक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधि‍या मसोमात सुनैत छेली अपना मनकेँ बुझबैत बजली- “इन्‍दि‍रा आवास कि‍ए घूसहा घर कहि‍यो ने।” O गंगा नहाएब कातिक मासक पुर्णिमा लगिचाएल। सालक तेरहम मास, बेसी पावैन‍-तिहार भेने हाथो खालीए, मुदा गाममे दलमलित होइए- गंगा नहाइले सिमरिया घाट जाएब। ऐबेर पुरुखसँ बेसी जनानीए सभ गंगा स्‍नान करए जाइले छाल छीलने। तीनू टोलक जनानी सभ गुदुर-फुसुर करैमे भरि-भरि दिन लगल। चनरदेव भोरे उठि गाए-बरदकेँ कुट्टी-सानी लगा धनखेती दिस विदा भेल कि बड़की भौजी आ सावित्री माए डेढ़ियापर आबि गेली। बड़की भौजी मुस्‍की मारि बजली- “बौआ चनरदेव, सुनै छी गामक लोक सभ गंगा नहाइले जा रहल अछि। अहाँ नइ जाएब। कहिया पुर्णिमा छिऐ।” चनरदेव दिन-तिथि गिनैत बाजल- “परसुए पुर्णिमा छी। हमर तँ हाथे खाली अछि, तहन छुच्‍छे हाथ जाएब केना। ऐबेर नइ जाएब। गंगा मैया जँ ऐ साल निके-सुखे रखलैन तँ ऐगला साल अबस्‍स जाएब।” सावित्री माए बजली- “चनरदेव, एहनो बात लोक बजैए! गंगा नहाइले तँ बिना जतरो-के-जतरा बनबैए, अहाँ किए मुँह मोड़ै छी।” गंगा नहाइक चर्च सुनि एक्के-दुइए जनिजाति सभ ससैर-ससैर आबि चनरदेवकेँ घेरि लेली। बड़की भौजी चौल करैत कहलखिन- “यौ अहाँ सभ दिनक बहन्नाबाज छी, से बहन्ना छोड़ू जे हाथ छुच्‍छे अछि। अपनो चलू आ हमरो सभकेँ नेने चलू। रहल खर्चाक बात, हम तँ खर्चा देखबे ने करै छी। घरेसँ खेनाइ-पीनाइक समान बना लऽ लेब। रेलगाड़ीमे मेलाक भीड़ रहबे करत, टिकट कोनो लगबे ने करत। एक गाड़ीसँ रातिये-राति जाएब आ दोसर दिन घर घूमि चलि आएब। ने कोनो घरक काज पछुआएल आ मंगनीमे गंगा नहा लेब। जखन मेलामे कोनो चीज-वौस कीनबे ने करब तखन खर्च बेसी किए हएत। अहूँ तँ सियार गुँहकेँ परबत बनबै छी।” बड़की भौजी गपक बखाड़ी खोलि चारू दिससँ चनरदेवकेँ गछारि लेली। चनरदेव सकदम भऽ गेल। किछु उत्तर नइ देलक। जनिजाति सभ समैझ गेली जे चलैले तैयार भऽ गेल। चनरदेव मने-मन सोचए लगल जे वेद-पुराणसँ लऽ कऽ साइयो पोथीमे गंगा स्‍नानक बड़ पैघ महत बतौने अछि। सतयुगसँ लऽ कऽ अखन धरि अपन देशक लोक आ आनो देशक लोक गंगा नहाइए तँ चनरदेव किए पाछू रहत। हमहूँ किए ने लगले सूरमे बेड़ा पार भऽ जाइ। एमहर भरिये दिनमे जनिजाति सभ खेनाइ-पीनाइक ओरियानमे लगि गेली। कियो अरबा चाउरक रोटी, अल्‍लूक भुजिया बनौलक तँ कियो परोठा-भुजिया, तँ कियो चूड़ा-मुरही, सतुआ-नोन आ मिरचाइक मोटरी बान्‍हि चलैले तैयार भऽ गेल। पचीस-तीस गोटे सँझुके गाड़ी पकड़ैले टिशन दिस विदा भेल। निरमलीसँ सकरी जाइत-जाइत भीड़क कारणे बुझू देहक मोलि छुटि गेल। मुदा कोनो धरानी भोरे-भोर सिमरिया टीशन पहुँच गेल। किछुकाल टिशनेपर अँटकै गेल आ अन्‍हरोखे गंगा घाट दिस सभ कियो विदा भेल। टिशनसँ घाट धरि चुटी जकाँ सत्तैर लगल लोक। केतौ कनीयोँ जगहे नइ जे ठाढ़ो भऽ लोक जीड़ाएत। ससरैत-ससरैत कहुना गंगा घाट पहुँच गेल। दिसा-मैदानसँ आबि चनरदेव दतमनि करए लगल। गामेसँ साहोरक दतमनि अनने छेलए। मुँह-हाथ धोय बेरा-बेरी गंगामे नहाइ गेल। चोर उचक्काक कोनो कमी नइ, जँ एकेबेर सभ कियो नहाइले जेइतए तँ झोड़ा-झंटी लऽ पार भऽ जइतए। लोक तँ गंगा नहाइत अछि पुन्‍य समैझ कऽ मुदा पापो करैबला ओतए बेसी रहइ। सभ कियो नहा एक-एक डिब्‍बा गंगाजल भरि आनि ऊपर रखलक। पानि तेते घोर-मट्ठा भेल घिनाएल छेलै जे मुहोँमे नइ लइके मन होइत। घाटसँ हटि ऊपरमे एकटा मन्‍दिर छल। ओतइ एकटा चापाकल सेहो छल। सभ कियो धक्कम-धुक्का करैत कल लग पहुँचल। भूख-पियास सभकेँ लगल छेलै अपन-अपन खाएक निकाइल खा-खा पानि पीब, मोटरी-चोंटरी बान्‍हि लेलक। सबहक विचार भेल जे गड़ीमे बड़ देरी छै तँए हम सभ ताबे मेला घूमि देखब। घूमि-घूमि गंगा घाटक मनोरम छबिक आनन्‍द लेब। सभ कियो घुमैत दछिन-पूब दिस गेल।  जेतए खाली मुरदे जरै छेलै। लाश अधजरू होइ कि पानिमे धफारि-धफारि कऽ भँसा दइ छेलै। तइ बगलेमे एतेक घिनाएल छेलै जे थुको फेकनाइ अपराधे बुझै छल। नाक-मुँह मुनि सभ कियो पड़ाएल। गंगा कातमे किछु दूर तक घाट बनल। नहाइक भीड़ ओरेबे नइ करैबला। तखन घुमैत सभ कियो राजेन्‍द्र पुल लग आबि गेल। जेना पुल कियो देखने नइ छल तहिना ऑंखि फारि-फारि पुलकेँ देखऽ लगल। घुमैत-फिड़ैत सभ थाकि-हारि गेल। कातिकक दुपहरियाक तिखर रौद भेने गरमी बढ़ि गेल। छाहैरक कोनो असे नइ। भिजलाहा वस्‍त्र माथपर राखि हाथसँ पकैड़ झॉंह बना-बना सभ घुरिया कऽ बैसल। बैसले-बैसल लोक सभ गंगा महात्‍मक चर्च करए लगल। जेकरा जे बुझल-सुनल आकि मनमे फुराइ से बजै छल। तखने बड़की भौजी आ कुपहावाली काकीकेँ रहि-रहि कऽ मन हौंरऽ लगलैन। बोकरि-बोकरि भरली। गंगामे कखनो मरलाहा जीव-जन्‍तुकेँ भँसैत जाइत देखै तँ कखनो मुरदाकेँ, तहिना चारूकात जे घिनाएल देखै से परपंचे ने होइ। चनरदेवक मनमे गंगाक प्रति श्रद्धा-भक्‍ति आ आस्‍था छल ओहो कमए लगलै। कथा-पुराण आ साधु-संतक प्रवचनमे गंगा-महात्‍म पढ़ने-सुनने रहए ओ साँच छी की झूठ तइ ओझरीमे ओझरा गेल। तैयो चनरदेव मनमे सवुर बान्‍हि सोचए- जेतए चारू जुगमे लोक गंगा-महात्‍मकेँ मानैत आएल छैथ‍, तेतए हमरा मानने वा नइ मानने की हएत। एतेक लोक जे गंगा नहाइए, की ओइ पुण्‍य-प्रतापे सभ स्‍वर्ग जाइए? आ जे गंगा नइ नहा पबैए ओ की नरक जाइए? तखन तँ केहनो कुकर्म करि लिअ आ गंगा नहा स्‍वर्ग चलि जाउ, सुकर्मक कोनो जरूरते नइ! तही बिचमे सुगापट्टीवालीकेँ बड़बड़ैनी धेलकै। अकचकाइत वीरपुरवालीकेँ कहलक- “दीदी, एगो बात फरिछा कऽ बुझा दथु। जखन गंगा अपने एते घिनाएल अछि आ लोक सभ नहा कऽ अपन पाप धोइए तँ एतेक गन्‍दगी आ पापकेँ गंगा मैया केतए जमा करैए?” वीरपुरवाली काकी सुगापट्टीवालीकेँ समझबैत कहलखिन- “देखै नइ छहक गंगा मैयाकेँ कोनो बखारी आकि गोदाम छै जे ओइमे जमा राखत।” सुगापट्टीवाली- “तखन गंगाजी अपना पेटमे सोन्‍हि–मोइन बना रखैत हेती।” तैपर वीरपुरवाली बजली- “हे हइ, एना अनरगल किए बजै छहक! गंगा मैया एहेन नइ छैथ‍ जे एतेक रास पाप आ गन्‍दगीकेँ जमा करत। कथीले करत आ किए जमा करत। पाप आ गंदा तँ लोक करैए। जे करत से ने भोगत। ओ अपने ने पाप करैए आ ने गंदा। सभटा लोककेँ बॉंटि दइए।” सुगापट्टीवाली- “से केना दीदी। एतेकालसँ छी, कहाँ किछु बँटैत देखै छी गंगाजीकेँ।” वीरपुरवाली काकी बजली- “हइ सुगापट्टीवाली, तोरा सनक सोझमतिया जनानी अहू जुगमे अछि से हम नइ बुझने छेलौं। एक गाममे जनमलह आ दोसर गाममे गिरथाइन बनल छहक से ओहिना। देखहक गंगा केना पाप आ गन्‍दगीकेँ बँटै छथिन। जेते लोक गंगा नहा कऽ पाप धोइए ओ अपना-अपना मनक भरम दूर करैए। जखन ओ डुबकी मारि डिब्‍बामे जल घरक खातिर भरैए, जइ जलसँ लोक तन-मन शुद्ध करैए तखने जेकर जे पाप केलहा रहै छै, तेकरा गंगा बॉंटि दइ छै।” बिच्‍चेमे कुपहावाली काकी आ बड़की भौजीकेँ विषयसँ भँसियाइत देख सावित्री माए बजली- “बौआ चनरदेव, हम तँ कान पकड़ै छी एहेन करम जिनगीमे फेर कहियो ने करब। ई तँ देखौंस केलौं। असल गंगा तँ सबहक मनेमे बसैए। जे कियो देखबे ने करैए। कहबियो छै, मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा। रहल गंगा नहा कऽ पाप धोअब आ पुण्‍य लूटब। तँ जखन पाप करबै ने करब तँ पुण्‍यक कोन काज अछि। जखन करमकेँ धरम बूझि करब तखन अधरम किए हएत। जे जेहेन करत तेकर फलो तँ तेहने ओकरा भोगए पड़त। हमरा बुझने ई सभटा मनक भरम छिऐ।” गप-सप्‍पक बीच दुपहरिया बितल कि तखने घर जाइले गड़ी धुधुआइत आबि गेल। सभ कियो गड़ीपर चढ़ि विदा भेल। टिशनसँ चलि जखन गामक सीमा कात आएल तखने सभ कियो तीन-तीन बेर गंगाजी केँ गोड़ लागि बाजल जे एहेन दिन नइ करिहह जे दोसर बेर आब कहियो गंगा नहाइले जाए पड़ए। कान पकैड़-पकैड़ जिनगी भरिक लेल गंगाजी सँ माफी मांगि लेलक। O शिक्षाक महत जीबछ घरजमैया छल। हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि‍ छलि। रधि‍याक पि‍ताकेँ चारि‍ बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल। खेती-बाड़ीसँ जि‍नगी चलै छेलैन‍। सोझमति‍या रहने कोनो छल-कपट नै रहैन। पि‍तमरू छला। परि‍वारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहैन‍ खाली जीबछ ट-ब कए कऽ साक्षर छल। रधि‍याक पि‍ता जरूरत‍ पड़लापर जखन‍ समाजमे कोनो लेन-देन करै छला तँ औंठेक नि‍शान दइ छला। एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि‍-पानि‍सँ दहि‍ गेलै। ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलै। दोसर साल रौदी भऽ गेलै। एक तँ बाढ़ि‍क मारल, दोसर रौदीक जरल। गरीब-गुरबाकेँ गुजर कटनाइ पहाड़ भऽ गेलै। केतेको परि‍वार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा कि‍छु दि‍न समए कटलक। मुदा ई सुवि‍धा सबहक नशीव नै छेलै। गामक नमहर जमीनदार, मालि‍क-गुमस्‍ता  जे छला हुनका तँ पहुलके सालक पुरना अन्न बखारीक-बखारी भरल छेलैन। हुनका सभकेँ कोनो चि‍न्‍ता नै छेलैन‍। रधियाक माए-बाप बूढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत। ओ दुनू गामेमे मालि‍कसँ कहि‍यो मरूआ तँ कहि‍यो धान तँ कहि‍यो छाँटी चाउर कर्जा लऽ समए काटै छल। कर्जा देनि‍हार मालि‍क सभ वि‍पति‍क समैमे गरीबक शोषण सेहो करैत। एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत। तेकर बादो औंठाक नि‍शान एकटाकेँ के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लइ छेलखि‍न। गरीब अपन परान बँचाएत आकि‍ छापक परबाह करत। कर्जा खेनि‍हार थोड़े बुझै छल कि‍ छाप देबै कागतपर आ हमर जमीन जत्‍था चलि‍ जेतै तक्खापर। एक दू साल समए बि‍तलै। जीबछ अपन सोसराइरेमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी कऽ गुजर-बसर करै छल। कि‍छु समए पछाइत‍ सासु-ससुर मरि‍ गेलखि‍न। श्राद्ध-कर्मसँ नि‍वृत भेले छल आकि‍ गामक मालि‍क-गुमस्‍ता लोकैन‍ अपन-अपन कागत लऽ जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला। कर्जा तँ करारीपर देने रहैन‍‍। ओ समय‍ बीति‍ गेल छल। कर्जा खेनि‍हार पहि‍ले कागतपर छाप देने रहैन‍‍। ओइ कागतपर मालि‍क-जमीनदार लोकैन‍ जमीनक खाता-खेसरा रकबा लि‍खि‍ कऽ अपन नाओं कऽ लेलैन‍। गरीब सबहक जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरैप‍ लेलकैन‍। जइमे रधि‍याक जमीन सेहो चलि‍ गेल। आब जीबछ-रधि‍याकेँ दूटा बेटी, एकटा बेटा आ परि‍वारक भरन-पोषण करनाइ कठि‍न भऽ गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि‍ गेल। बाहरमे पढ़ल-लि‍खल आदमीकेँ नोकरी जल्‍दीए होइ छेलै आ बेसी दरमाहा सेहो भेटै छेलै। जीबछ बेसी पढ़ल तँ नै मुदा साक्षर छल। जइसँ शि‍क्षाक महत जि‍नगीमे केतेक होइ छै से मोने-मन महशूस करै छल। जीबछ ट-ब-ट काए कहुना कऽ चि‍ट्ठी लि‍खि‍ घर पठेलक। ओइमे बेटा-बेटीकेँ पढ़बैले रधि‍याकेँ प्रेरि‍त करैत कहै छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए कऽ पठाएब मुदा अहाँ धि‍या-पुताकेँ पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब। रधि‍यो मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शि‍क्षाक बड़ महत छै। जे हम आ हमर माए-बाप जँए नै पढ़ल छेलौं तँए ने सभटा जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरैप‍ लेलैन‍। जखन‍ पढ़ल रहि‍तौं तँ ई मुसि‍बत नै अबि‍ताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा धि‍या-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब। अइले हमरा जे परि‍श्रम आ ति‍याग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दि‍न अपन धि‍या-पुताकेँ समैपर संगे जा स्‍कूल पहुँचाबए लगली। रधि‍याक टोलेमे बुच्‍ची बाबू छला। बुच्‍ची बाबू अंचलमे बड़ाबाबू छैथ‍। छुट्टीमे घर आएल छैथ‍। हुनका काल्हि‍ भोरे ट्रेन पकैड़‍ ड्यूटीपर जेबाक छेलैन‍ से रधि‍याकेँ कहलखि‍न- “रधि‍या, कि‍छु समान अधि‍क अछि‍। गाममे कएक गोटेकेँ कहलि‍ऐ जे काल्हि‍ भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी समान स्‍टेशनपर पहुँचा दि‍अ, मुदा कि‍यो तैयार नै भेल। तूँ कनी पहुँचा दइ। हम तोहर बड़ उपकार मानबो।” रधि‍या बाजलि‍- “ठीक छै, कअए बजै चलब। कहि‍ दि‍अ हम समान पहुँचा देब।” बुच्‍ची बाबू बजला- “सात बजे भोरेमे चलब। कि‍एक तँ आठ बजेमे ट्रेन छै। तीन-चारि‍ कि‍लो मि‍टर स्‍टेशन दूरो छै।” रधि‍या भोरे उठि‍ सभ काज कऽ जलखै बना धि‍या-पुताकेँ खाइले दऽ बजली- “तूँ सभ जल्‍दीसँ खो, आइ कनी पहि‍नहिये तोरा सभकेँ स्‍कूल पहुँचा दइ छि‍यौ, तखन‍ बुच्‍ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब।” एम्‍हर बुच्‍ची बाबू तैयार भऽ रधि‍याक बाट तकै छला। पाँच मि‍नट पछाइत‍ रधि‍या पहुँचली। बुच्‍ची  बाबू तमसाइत बजला- “रधि‍या, तोरा कहने छेलि‍यौ साते बजै चलैले, देरी भऽ गेल। ट्रेन छूटि‍ जाएत। तोरा कोनो चि‍न्‍ता  नै।” रधि‍या बजली- “अपने तमसाउ नै। धीरे-धीरे बढ़ू हम समान लेने लफरल पि‍ट्ठेपर आबि‍ रहल छी। कनी धि‍या-पुताकेँ स्‍कूल पहुँचबैमे देरी लागि‍ गेल।” बुच्‍ची बाबू- “पहि‍ले समान पहुँचा दइतैं, हमरा ट्रेन छूटि‍ जाइत। एक दि‍न तोहर बेटा-बेटी स्‍कूल नै जेतौ तँ की हेतै। एक्के दि‍न कोनो पढ़ि‍ कऽ कलक्‍टर बनि‍ जेतौ?” रधि‍या मोने-मन सोचए लगली, कहै छि‍ऐन आगू बढ़ैले से उठि‍ए ने होइ छैन‍। हम तँ लफरल हि‍नकासँ पहि‍नहि‍ पहुँच जाएब। ट्रेन थोड़े छुटतैन‍। अपने बेगरते आन्‍हर छैथ‍। अनेरे गछलौं। O ई छी हमर मजबुरी जमुना बाबाक दुआरि‍पर सतसंग-प्रवचन होइ छेलै। भीड़ देख‍ हमहूँ ससैर‍ कऽ गेलौं आ बैस सुनए लगलौं। प्रवचनकर्ता सेहो ज्ञानी आ वि‍द्वान बूझि‍ पड़ला। ओ मनुखक जि‍नगीक समरूपता बतबै छला। कहब रहैन‍ जे सभ मनुख एक समान छी। सभ एके ईश्वरक सन्‍तान छी आ सबहक अत्‍मामे एके परमात्‍माक अंश रमि‍ रहल-ए। मुदा हम तँ बड़ अन्‍तर देखै छी। सबहक क्रि‍या-कलाप, रहन-सहन आ खानो-पानमे बड़ पैघ भि‍न्नता अछि‍। केकरो बोरे-बोरे नून आ केकरो रोटियोपर ने नून। कोइ खाइते-खाइते मरैए आ कोइ खाइए बि‍नु मरैए। केकरो बीघा-बीघे कोठा-सोफा केकरो खोपड़ियोपर आफत। कोइ रौदे-वसाते जरि‍-मरि‍ काज करैए तँ कोइ ए.सी.मे मौज करैए। कि‍यो उड़न जहाजसँ देश-वि‍देशक यात्रा करैए तँ कि‍यो पएरे चलि-चलि‍ सड़केपर पराण ति‍यागैए। कि‍नको बि‍मारीक इलाज करोड़ो रूपैआसँ वि‍देशमे होइए तँ कि‍नको पराण साधारण इलाज बि‍नु चलि‍ जाइए। ऐ सभ मुद्दापर सोच-वि‍चार करैत जखन‍ प्रवचन खतम भेल तखन‍ हम हुनका लग जा कहलि‍ऐ- “महराज, अपने प्रवचनमे सभ मनुखकेँ समरूप बतौलि‍ऐन‍। मुदा हम तँ बड़ अन्‍तर देखै छी। से कनी फड़ि‍छा कऽ कहि‍यौ।” प्रवचनकर्ता मधुर स्‍वरमे बजला- “से तँ ठीके अहूँ कहै छी। हम जे प्रवचनमे कहलौं सेहो ठीक आ अहाँ जे कहै छी सेहो ठीक। सत्‍ ई छै प्रकृति‍ द्वारा जे सुवि‍धा मनुखक लेल उपलब्‍ध छै ओ समरूप छै। मुदा मनुखक बीचमे जे अन्‍तर छै से अन्‍तर बेवस्‍थामे कमीक कारणे छै। मनुखे मनुखक दुश्‍मन छि‍ऐ। जे जेते सवल छै ओ ओते दोसराक हक मारि‍ बेवस्‍थाकेँ दुरूपयोग करै छै। जहि‍ना हाथीकेँ दूटा दाँत होइ छै एकटा खाइबला आ दोसर देखबैबला तहि‍ना बेवस्‍था करैबलाकेँ दू नजैर‍ होइ छै। कथनी आ करनीमे अन्‍तर रखने छै। ऐ सभ बातक वि‍चार-अनुभव मनुखकेँ अपने करए पड़तै। ओकर समाधान लेल सघर्ष करए पड़तै। बि‍नु मांगने तँ भीखो नै मि‍लै छै। ई तँ अहाँ अधि‍कारक बात करै छी। जौं हम प्रवचनमे समरूपताक बात नै कहबै तँ बेवस्‍था हमरा नै ने जीबए देत। अहाँ जकाँ जौं हमहूँ प्रवचनमे बाजब तँ कहि‍या ने हमरा जमपुरी पहुँचा देने रहि‍तए। यहए छी हमर मजबूरी।” O बाल बोध दुखीलालकेँ दुखक पहाड़ माथसँ कहि‍यो नि‍च्‍चाँ नै भेल। बूढ़ माए-बापक सेवा टहल, तैपर सँ दूटा भलढ़ेरबा बेटी, छोट-छोट दूटा बेटा, पत्नी आ अपने कुल आठ बेकतीक परि‍वार। पत्नी- फुलि‍या- परि‍वारक काजमे पि‍साइत छेली। सासु-ससुरक टहल-टि‍कोरा आ सेवासँ पलखैते ने। ऊपरसँ एकटा पोसि‍या गाए, एकटा भजैति‍या बरद। मुदा दुनू बेटी चठेलगरि‍ आ हुनरगरि‍ छैन‍। घरक कमौआ दुखीलाल असकरे दि‍न-राति‍ फि‍रि‍शान रहैए। घरक खर्चा पुग्‍बे ने करैए जे पलखति‍ मारत। खेतियो-पथारी कम्मे भेने जने-बुत्तापर घरक खर्चा चलैत अछि‍। जखन‍ खेनाइओ-पीनाइओमे ढनसने तखन‍ बेटा-बेटी पढ़त केना? बर्खक पेसतरे दुखीक माए लकबा रोगसँ मरि‍ गेली। पछाइत‍‍ बूढ़ बाप सेहो रोगसँ रोगा-सोगा दम तोड़ि‍ देलकैन‍। श्राध-कर्म आ भोज-भात कर्जे हाथे भेल। दुखीलालकेँ एक-सबा कट्ठा डीह, तीन कट्ठा चौमास आ छह-सात कट्ठा तीन-फसि‍ला खेत छैन‍। जइसँ छह मास परि‍वारक गुजर चलै छैन‍। जन-मजदूरी कऽ शेष छह मास बि‍तबैत अछि‍। मुदा अखन‍ तँ चौमास आ तीन-फसि‍ला खेत दस हजारमे डेढ़ा सूदि‍पर भरना लगि‍ गेल अछि‍। तैपर सँ दूटा बेटीक बि‍आहक अलगे। दुनू बेटा अखन‍ बाल-बोध! समस्‍या-पर-समस्‍या लदल जा रहल अछि‍। जँ चारि‍-पाँच साल खेत-भरना रूपैआक सूदि‍ नै भरब तँ खेतो सूदि‍ए तरे चलि‍ जाएत। गाए बि‍कल चरबाहि‍येमे कहबी सन हएत। एक दि‍न दुखीलाल बैसारीए छल। कि‍छु सोचैत छल आकि‍ मनमे उपकलै खेतक भरना। जइ खेतसँ हमर बाप-दादा परि‍वार चलबै छला वएह खेत हमरो जीवि‍का अछि‍। मुदा आब बूझि‍ पड़ैए ओ खेत बि‍लैट‍ जाएत। ऐ क्रममे सोचैत दुखीलाल टहैल‍ मालि‍क प्रभूनाथजीक दरबज्जापर पहुँचल। प्रभूनाथजी दुखीकेँ देखते कहलखि‍न- “आबह दुखी, एमकी बहुत दि‍नपर भेँट करए एलह।” दुखीलाल- “मालि‍क, अहाँसँ कथी छुपल अछि‍। एतेक दि‍नसँ माए-बापक कहुना रीन उतारलौं मुदा अपनेक रीन केना चुकाएब से फुड़ेबे ने करैए।” प्रभूनाथजी- “केना चुकेबऽ से तँ तोहर काज छि‍अ। तइले हम कि‍ए मगजमारी करब। साले-साले हमरा रूपैआक डौरहा सूदि‍ बढ़ैत जेतह। पाँच सालक कराड़ी छह, नै चुकेबहक तँ खेत छोड़ह पड़तऽ।” दुखीलाल- “मा‍लिक, एना नै ने बाजू। खेतक नाओं सुनि‍ हमर करेजा फाटि‍ जाइए। ई खेत हमर खनदानक पूजी आ इज्जति‍ छी। अपना जीबैत हम केना बि‍लटए देब।” प्रभूनाथजी- “से तँ तूँ ठीके कहै छह। रूपैआक सूदि‍ जोड़ि‍ चुकता कऽ दहक आ अपन खेत छोड़ा लैह।” दुखीलाल- “मालि‍क, अहींक दरबारमे जन-मजुरी कऽ जीब लेब। रहल अहाँक रूपैआक सूदि‍, तइ एबजमे हम अपन दुनू बेटाकेँ अहीं ऐठाम नोकरी राखि‍ दइ छी। बँचलोहो बासि‍-बेरहट खा जीब लेत आ अहूँक काज चलत। जाधरि‍ अहाँक रूपैआक सूद-मूर‍ नै सधत ताधरि‍ अहींक दरबारमे नोकर बनि‍ खटि‍ देत। रूपैओक चुकता भऽ जाएत आ हमरो खेत छुटि‍ जाएत।” प्रभूनाथजी- “कहलह तँ बड़ नीक। युक्‍ति‍यो तोहर नीमन छह मुदा...।” दुखीलाल- “मा‍लिक ‘मुदा’ कि‍ए कहलौं?” प्रभूनाथजी- “मुदा ऐ दुआरे बजलौं कि‍ तोहर बेटा दुनूकेँ तँ देखने नै छी। अबोध अछि‍ आकि‍ बाल-बोध ” दुखीलाल- “बाल-बोध अछि‍। ठेकनगरि‍, एकबेर सेरि‍या कऽ बता देबै तँ दोसर बेर अढ़बए नै पड़त। देखते-देखते फुर्र-फुर्र काज कऽ देत। एक्को मि‍सि‍या असकति‍या नै अछि‍।” प्रभूनाथजी- “बेस काल्हि‍ये दुनूकेँ बजौने आबह। नैनसँ देखि‍यो लेब आ काज करै जोकर अछि‍ कि‍ नै सेहो ठेकाइन‍ लेब।” दुखीलाल- “बेस मालि‍क, जाइ छी काल्हि‍ये दुनूकेँ संगे नेने अबै छी।” दुखीलाल अपन कर्तव्‍यकेँ हीन बूझि‍ चि‍न्‍तामे डूमि‍ गेल। हम केहेन बाप छी जे बाल-बोध बेटाकेँ भोजन-बस्‍त्र-शि‍क्षा इत्‍यादि‍ पूर नै कऽ अपने बेगरते नोकरी लगबै छी। बेटा-बेटी राजाक हुअए आकि‍ गरीबक सभकेँ अपन सन्‍तान दुलरूआ होइ छै। जखन‍ नमहर-बुधि‍गर-ठेकनगर हएत तँ की कहत! हमर बाप केहेन नि‍ष्‍ठुर छैथ‍‍ जे हमरा संगे एहेन अन्‍याय केलैन‍। मुदा हमरा लग रस्‍ते कोन अछि‍। दोसर कोन उपए लगा सकब। मोनक बात मोनमे रखैत हृदैकेँ सक्कत कऽ बि‍हाने भने पनि‍पि‍आइ करा संगे नेने प्रभूनाथजीक दरबार पहुँचल। दुनू बाल-बोध भाए गांगी-जमुनी, देखैओमे बड़ नुनुआगर, उमेरो आठ-दस बर्खक। प्रभूनाथ जीकेँ मनमे भेलैन‍ बड़ नीमन टहलू हएत। मुदा अनठबैत बजला- “दुखी दुनू बौआ तँ अखन‍ लेधुरिये अछि‍। हमरा ऐठाम कोन काज करत। ऐठाम तँ भीड़गर काज अछि‍।” दुखीलाल बूझि‍ गेल जे मालि‍क हमरा टाड़ि‍ रहल अछि‍। बाजल- “मालि‍क, छोट देख झुझुआउ नै। घरक छोट-छोट सभ काज करत। गाए-बरदक कुट्टी-सानी, दरबज्जा, माल-जालक बथान आ गोहाल घरक झार-बहार करत। गोबर-करसी ढुल-ढालकेँ हटाएत। अहूँकेँ कि‍यो टहल-टि‍कोरा करैबला नै अछि‍ सेहो अपन समैझ करत। अहूँ अपने पोता सन बेवहार करबै। घरे ने बदैल‍ जेतै मुदा रहतै तँ गामेमे। अहाँ लग रहत तँ हम नि‍फि‍कि‍र रहब। ओना हमहूँ तँ अबि‍ते-जाइते रहब।” प्रभूनाथजी- “दुखी, तूँ ने गाम-घरक बात करै छह। लोक तँ शहर जाइले जान गमौने अछि‍।” दुखीलाल- “मालि‍क की कहब, लोक तँ चि‍ड़ै भऽ गेल अछि‍। जेतै पेट भरै छै ओतै खोंता बना रहैत अछि‍।” प्रभूनाथजी- “से ठीके। हमरे बेटाकेँ नै देखै छहक। गाम-समाज छोड़ि‍ हैदराबादमे रहैए। पावैन‍-ति‍हार तँ हम जाबै जीबै छी ताबे कहुना कऽ दइ छि‍ऐ, नै तँ घरक देवताकेँ एक चुरुक पानि‍योँ के देत।” दुखीलाल- “मा‍लिक, छोड़ू दुनि‍याँ-दारीक गप-सप्‍प। हमरो काजपर जाइक अछि‍। और गप-सप्‍प दोसरो दि‍न हेतै। दुनू बाल-बोधकेँ सम्‍हारू।” प्रभूनाथजी- “दुखी, कनी आर बैसह। ई दुनू बौआ अनचि‍न्‍हार अछि‍। कनी बति‍या लइ छी। नाओं बूझल रहत तँ समैपर समझा-बुझा देबै। नै तँ पोसो नै मानत। तूँ तँ बुझबे करै छहक जे हमरासँ दुनू बौआकेँ खटपट तँ नै हएत मुदा हमर बुढ़ि‍याक सोभाव आ बेवहारकेँ तँ तूँ नीकसँ जनै छह, ओ मक्कै लाबा जकाँ दि‍न भरि‍ फटफटाइते रहै छैथ‍। तेहेन झनकाहि‍ अछि‍ जे केकरोसँ पटरीए ने खाइ छै। दि‍न-भरि‍ पूजे-पाठमे लगल रहैए, दि‍नक भोजन राति‍ आ रतुका भोरमे पाड़न करैए। जँ कि‍यो लागि‍यो-भीरियो देतै तँ कहत जे हमर सभ कि‍छु छुबा गेल। एकबेर के कहए जे तीन-तीन बेर नहाएत आ गंगाजलसँ शुद्ध करत। बेटो-पुतोहु आ पोता-पोती जखन‍ अबैए तँ देखते बनरनी जकाँ लड़ि‍ते रहैए। तखन‍ हमर जि‍नगी केहेन अछि‍ से बि‍नु कहने बूझि‍ गेल हेबह।” दुखीलाल- “मालि‍क, ई तँ घरक बात छी। ओइमे हम कि‍ए दखल देब। मनुखो कोनो एक्के रंगक होइए। लोक अपन सुख-दुखक सृजन अपने करैए। अपजश दोसरकेँ लगबैए।” बात समटैत दुखी दुनू बाल-बोधक दि‍स इशारा केलक। प्रभूनाथजी पुछलखि‍न- “बौआ, नाओं की छि‍अ?” दुनू भाँइ एक्के स्‍वरमे अपन-अपन नाओं बाजल- “बुधन-बेचन।” प्रभूनाथ- “मुँह सूखल छह। कि‍छु खेबह?” दुनू भाँइ बाजल- “नै, पनि‍पि‍आइ कऽ लेने छी।” प्रभूनाथजी- “तोहर बापक कहब अछि‍ जे दुनू भाँइ अहीठाम काज करत से करबहक ने?” बुधन- “हँ।” प्रभूनाथजी- “अपन काज कहुना सभ करैए मुदा बीरानक काज कि‍यो करैए आ कि‍यो नै करए चाहैए।” बुधन- “हम अपन आ बीरानमे अन्‍तर नै बुझै छी। काज करब।” दुखीलाल बूझि‍ गेल जे बात बढ़ि‍ जाएत। बातकेँ सम्‍हारैत बाजल- “मालि‍क गरीबक बेटाकेँ कथी परीक्षा लइ छि‍ऐ। जे कहबै से करत। अबेर भऽ गेल काजपर जाइ छी।” प्रभूनाथजी- “कनी दरमाहा फरि‍आ लैह जे पछाइत‍‍ कोनो मुहाँ-ठुठी ने हुअए।” दुखीलाल- “मालि‍क, दरमाहा की हेतै। अहाँसँ रूपैआ दस हजार नेने छी। सालमे पनरह हजार हएत। पँच-पँच सए रूपैआ महि‍नाक हि‍साबसँ दुनू भाँइक एक हजार भेल। पनरह महि‍नामे अहाँक रूपैआ फरि‍या जाएत, नै मानब तँ एक मास बेसीए खटि‍ देत। हमरो खेत छूटि‍ जाएत। ने अहाँकेँ दि‍अ पड़त आ ने हमरा। दुनू भाँइ अहींक दरबारमे खाएत-पीअत काज अहाँक अनुकूल करत।” प्रभूनाथजी- “ठीक छै मानि‍ लेलि‍अ। तूँ तँ हमरोसँ तेज नि‍कललह। हम तँ बाल-बोधक फेरमे अबोध बनि‍ गेलौं।” O अबिसवास काल्हि‍ये नूनू बाबूक बेटीकेँ बि‍आह छी। नूनू बाबू बि‍आहक सरमजान सबहक ओरि‍यानमे लगल छला। गि‍रहत आ सम्‍पन्न परि‍वार रहि‍तो रूपैआक अभाव छेलैन‍। चारि‍ लाख टाका, पाँच भरि‍ सोना आ एकटा मोटर साइकि‍ल देहेजपर बि‍आह फाइलन भेल छल। दुलहा इंजीनि‍यरिंग कौलेजक छात्र। सुखी सम्‍पन्न परि‍वार। दुलहाक पि‍ता मोहन बाबू एस.डी.ओ. औफि‍सक बड़ाबाबू। नीक कमेने-खटेने छैथ‍। तँए नूनू बाबू अपन बेटी सुचि‍ताकेँ हुनके घरमे कुटमैती करैक निर्णए नेने छैथ‍। नूनू बाबू बहुत परि‍यास करैत तीन लाख रूपैआ मोटर साइकि‍ल, दू भरि‍ सोना ति‍लकक समैमे चुकता कऽ देलैन‍। शेष तीन भरि‍ सोना बेटीक गहना स्‍वरूप बि‍आहे दि‍न देब आ एक लाख रूपैआ जे बँकियौता रहि‍ गेल ओ बेटीक नामे एल.आइ.सी. बीमामे जमा अछि‍। जे दू तीन मास पछाइत‍‍ मि‍लत सेहो चुकता कऽ देब। ति‍लक भेला पछाइत‍‍ बि‍आहक दि‍न ठेकल गेल। मुदा दुलहाक पि‍ता मोहन बाबू बड़ लोभी। ओ मोने-मोन सोचलैन‍, पुतोहु जखन‍ हमर हएत तँ एल.आइ.सी.क रूपैआ आइ ने काल्हि‍ हमरे हएत। बँकि‍यौता रूपैआ बि‍आहसँ पहि‍ने लऽ लेब तँ लाभमे रहब। मोहन बाबू बि‍आहसँ एक दि‍न पहि‍ने समाद नूनू बाबूक घर पठौलैन‍ जे हमर एक लाख टाका बँकि‍याहा अछि‍ ओ रूपैआ चुकता करि‍ दि‍अ तखने बरि‍याती जाएत नै तँ अहाँ जानू। नूनू बाबूकेँ समाद सुनि‍ते जेना देहपर बज्‍ज्‍र खसि‍ पड़ल। ओ सोचमे पड़ि‍ गेला। होश सम्‍हारि‍ मोहन बाबूसँ भेँट कऽ बड़ वि‍नती केलैन‍। अखन‍ ऐ लेल माफी दि‍अ। हम बेटीबला छी। बहुत चीज-बौसक ओरि‍यान करए पड़त। तैपर सँ बरि‍यातीक सुआगतमे सेहो बहुत खरच हएत। मुदा मोहन बाबू नूनू बाबूकेँ एकोटा बात नै सुनलकैन‍, आ ने आँखि‍क नोर पोछलकैन‍। तखने नूनू बाबू बजला- “खैर, नै मानब तँ अहाँ बरि‍याती लऽ कऽ आउ, हम दरबज्‍जेपर बि‍आहसँ पहि‍ने रूपैआ बरि‍यातीए घरमे चुकता करि‍ देब तखन‍ बि‍आह करब।” नूनू बाबू खेत भरना रखि‍ रूपैआक ओरि‍यान केलैन‍। बरि‍याती समैपर आएल। सबहक सुआगत भेल। दरबज्‍जेपर सबहक सोझहेमे एक लाख टाका दुलहाक पि‍ता- मोहन बाबूकेँ चुकता कऽ देलैन‍। दुलहाक परि‍छन भेल, वरमालाक काज शुरू हएत तखने एकटा नव बातक चर्चा भेल जे दुलहा पहि‍ने दुलहि‍नकेँ देखता। पसि‍न भेला पछाइत‍‍ ने बरमाला आ सेनूरदान हएत। ऐ बातसँ कन्‍याँ पक्षमे खलबली मचि‍ गेल आ आक्रोश सेहो बढ़ि‍ गेल। अन्‍तमे निर्णए भेल जे ठीक छै पहि‍ने कन्‍याँ देख लेल जाउ। तखने आगूक काज हएत। दुलहि‍न चित्रा तँ पहि‍नेसँ वरमाला लेल सजले छलि‍। एकटा कोठलीमे दुलहाकेँ लोकनि‍याँ संगे बजौल गेल। ओही कोठलीमे दुलहि‍न चि‍त्रा सहेलीक संगे आएल। चि‍त्रा इण्‍टर पास पूर्णिमाक चान सन सुन्नरि‍। दुलहा देख‍ कऽ मोने-मोन खुश भेला। कि‍छु गप-सप्‍प सेहो भेलै। तखने चि‍त्रा बजली- “की यौ दुलहाजी, हम अपनेकेँ पसीन भेलौं?” दुलहा मुस्‍की मारि‍ पीठे लागल बजला- “हँ, की हमहूँ अहाँकेँ...।” चि‍त्रा तुरन्‍ते जबाव देलक- “नै अहाँ हमरा पसीन नै छी। तँए आब ई बि‍आह हम कि‍न्नौं ने करब। चि‍त्राक ई निर्णए सुनि‍ सखी-बहि‍नपा, माए-बाप, समाजक बुजुर्ग इत्‍यादि‍ बहुतो गोटे समझेलकैन‍ मुदा एकेठाम चि‍त्रा जि‍द्द धेने रहलि‍ जे ऐ वरसँ हम बि‍आह नै करब।” दरबज्‍जा बरि‍याती-सरि‍यातीसँ भरल छल। ई बात लगले सनसना कऽ अगि‍लग्गी जकाँ चारू दि‍स सौंसे गाम पसैर‍ गेल। बहुतो बुजुर्ग लोकैन‍ दुलहि‍नक पि‍ताकेँ बुझा-समझा कऽ कहलकैन‍ मुदा चि‍त्रा अपन दृढ़पर अड़ल रहल‍। चि‍त्रासँ कारण पूछल गेल। कहलक- “जखन‍ दुल्हाकेँ अपन माए-बाप आ सर-समाज कि‍नकोपर बि‍सवास नै छैन‍‍ तँ ओ हमरापर बि‍सवास केना करता आ हम केना हुनकापर बि‍सवास करब। दोसर बात जे हि‍नकर पि‍ताजी दहेजक खाति‍र जमीन आ इज्‍जत बेचबा सकै छैथ‍‍ तखन‍ ओ हमरो बेचि‍ सकैत छैथ‍‍ कि‍ने। तँए हम बीख पीब मरि‍ जाएब मुदा एहेन अवि‍सवासी आ दहेज रूपी दानवक बेटा संगे बि‍आह नै करब। ऐसँ नीक तँ हम ओहेन दुल्हा जे गरीबे कि‍एक ने हएत, ति‍नकासँ करब, जे अपन इज्‍जतक संगे दोसरोक इज्‍जत करत।” चि‍त्रा सहेली संगे कोठलीसँ नि‍कैल गेलि‍। दुल्हा आ लोकनि‍याँ सभकेँ ओही कोठलीमे बन्न कऽ ताला लगा आँगन आबि‍ गेलि‍। बि‍आह नै भेल। ई खबैर‍ रातिये भरि‍मे चौतरफा पसैर‍ गेल। पंचैतीक बैसार भेल। पंच लोकैन‍ बि‍आह हेबाक बहुत परि‍यास केलैन‍ मुदा चि‍त्रा अपन संकल्‍पपर अडि‍ग रहलि‍। अन्‍तमे जे दहेजक लेन-देन आ सुआगतक खर्च भेल रहै ओ सभटा आपस भऽ जाए। दुलहि‍नक पि‍ता नूनू बाबू बजला- “चारि‍ लाख टाका, दू भरि‍ सोना,  मोटर साइकि‍ल संगे सुआगतमे दू लाख टाका खर्च भेल अछि‍ से सभटा आपस कऽ दि‍अ तखने हि‍नका सभकेँ छुट्टी भेटतैन‍। नै तँ हम कानूनक शरण लेब आ दुनू बापूतकेँ जहल कटेबैन‍।” सभ पंचक वि‍चार भेलैन‍। बात तँ उचि‍ते ने नूनू बाबू कहै छैथ‍। कोनो जबरन जुर्माना तँ नै...। दुल्हाक पि‍ता मोहनबाबू छह लाख टाका, सोना, मोटर साइकि‍ल घरसँ मंगबा नूनू बाबूकेँ पंचक बि‍च्‍चेमे आपस कऽ देलकैन‍। तखन‍ हुनक बेटाकेँ कोठलीसँ बाहर नि‍काइल देल गेल। जहि‍ना आन गामक चोटाएल कुकुर नांगैर‍ दबौने दुलकी दैत अपन गामक बाट पकैड़‍ सोझहे-सोझ जाइत रहैए तहि‍ना सभ कि‍यो वि‍दा भेला। चि‍त्रा पि‍ताक मुरझाएल मुँह देख‍ बाजलि‍- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चि‍न्‍ता नै करू। हम मनुख संगे बि‍आह करब। पढ़ल-लि‍खल कम्‍मो रहत तइले एको पाइ चि‍न्‍ता नै। एही खाति‍र ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चि‍न्‍ता नै करू।” O जातिक भोज आइ फूलबाबूक बेटाक बिआहक भोज अछि‍। गौआँ सभकेँ आशा छेलैन जे ई भोज हमरो सभकेँ खेबाक अवसैर भेटत। किएक तँ ऐ भोजकेँ सफल बनेबाक लेल बहुतो जाति-वर्गक लोकक सहयोग छेलैन। कियो जारैन फारए तँ कियो साफ-सुथरा करए। कियो बरतन-बासन माजै छल। गामक डोम बाँससँ बनल छिट्टा-पथिया, ढकैस, डाल-दौरा, चङेरा बना देलक। मालि फूल आ फूलक माला, कुमहार वर्तन-वासन, महला पोखैरसँ माछ मारि मनक मन ढेर लगौलक। कतेको करीगर आ हलुआइ सभ भोजक समग्री बनबैमे भिरल छल। भोजमे सहयोग तँ सभ जातिक लोक द्वारा भेल। मुदा खाइक अवसर सभकेँ नै भेटलैन। ओतबे नै, किनको नगद टाका देल गेल तँ किनको उधार रहलै आ किनको सीदहा भेटलै। मुदा भोज खाइक नोत सभकेँ नै भेटलै। भोजक आयोजक भलेँ फूलबाबू छला मुदा करबारी तँ सभ जातिक लोक छेलखिन। किछु लोकक मनमे, जि‍नका सभकेँ नोत नै देल गेलैन‍। हुनका सबहक मनमे ईहो होइन‍ जे काज जखन नै छुआइ छै तँ पाँति‍मे बैस खेलापर पाँति‍ केना छुबा जेतै। भोज बड़ नीक। समानो सभ एक-पर-एक उत्तम आ स्‍वादिष्‍ट बनल अछि। जे खेलक ओ सभ प्रशंशा करैत नै थाकए। मुदा जे नै खेलक ओ कहै- जे भोज ने खाएब तइमे पारा मरि जाए। भोज तँ सम्‍पन्न भेल मुदा एक जतिया-भोज भेने भोजक बनल समानो ढेरक-ढेर उगैर गेल। फूल बाबू सोचए लगला जे एहेन महग आ स्‍वादिष्‍ट भोज्‍य-पदार्थकेँ केना फेकब। तखने मनमे एकटा विचार आरो एलैन। फेकब नै गरीब लोक, छोटहा लोक सभकेँ बजा खुआ देब आ बाँटियो देब। जँ से नै करब आ फेक देब तँ कुकुर-भोज भऽ जाएत। सोच-विचार करैत फूल बाबू निर्णए लेलैन आ नौकर- झगरू-केँ बजा कहलखिन- “गामपर जा गरीब, छोटहा सभकेँ कहि देही जे भोजक समान बेसी बँचल अछि से आबि लऽ जाउ।” झगरू गामपर जा गरीब-छोटहा सभकेँ कहलक मुदा ओ सभ बँचलहा भोजक समान लइसँ इनकार कऽ देलक। किछ लोक तँ मुहेँपर कहियो देलकै जे काज करबै बेरमे हमरा सभसँ छुबेबे ने करै छैथ आ खाइ बेरमे छुबाइ छैथ तँ अपन भोज अपने खौथ। बँचलाहा बसिया-तेबसिया आ ऑंठि-कुठि हम सभ किए लेब। झगरू गामपर सँ घुमि आएल, मालिक फूल बाबूसँ बाजल- “गामक गरीब छोटका सबहक कहब अछि जे हम सभ छोटहा छी तखन भोज केना खाएब, अहाँक भोज छुबा जाएत। तँए भोजकेँ उचगरे लोक-ले रहए दियौ आ भोजक समानो लइसँ इनकार कऽ देलक।” झगरूक बात सुनिते फूल बाबूकेँ माथ चकरा गेलैन। चक्कर काटैत झगरूकेँ कहलखिन- “जाउ राही-बटोहीकेँ बजा-बजा खुआ दियौ। कौआसँ खैर की लुटाएब।” झगरू दू-तीन गोरेकेँ संग कऽ राही-बटोहीकेँ बजबए चलि देलक।  कहला-सुनला पछाइत किछु लोक एबो कएल आ किछु नहियोँ आएल। एकटा बुढ़बा बटोही माथपर सनेसक मोटरीकेँ अंठेका मारने लफरल अबै छला। समए कम आ दूरी बेसी रहने दुलकी चालिमे चलैत आगू बढ़ैत रहैथ। जखन फूल बाबूक घरक कात बाटे जाइ छला कि फूल बाबूक नजैर बुढ़बापर पड़लैन। नजैर पड़िते बुड़हा बटोहीकेँ अबाज देलखिन। लग अबिते पुछलखिन- “नाओ की छी, केतए जाएब?” बुढ़बा बटोही कहलकैन- “हमर नाओं फुसन छी, बड़ दूर बेटी लग जा रहल छी।” फूल बाबू फुसनकेँ भोज खाइक आग्रह केलखिन।  तैपर फुसन ठेकाइन कऽ बजला- “हम तँ बटोही छी, दूर जाए पड़त। तहूमे हम ने तँ नौतल पंच छी आ ने अहाँक जाति-कुटुम छी तखन कोन विचारपर हम अपनेक भोज खाएब।” फूल बाबू बजला- “बातक बखेड़ामे की पड़ब, आग्रह केलापर तँ लोक केतौ खाइए।” फुसन कहलकैन- “हमरा खाइले जे आग्रह कऽ रहल छी से अहाँक गाम-समाजमे भोज खाइले पंच नइए, आकि ढाठ-बान्‍ह केने अछि आकि अहीं ढाठ-बान्‍ह केने छी। जँ से नइ अछि तँ की कारण अछि जे बहरबैयाकेँ खीबैक नौवत आएल। जँ गौआँ नै तखन बहरबैया किए खाएत। हमरा तँ लगैए अहाँ अपनाकेँ ऊँच बुझैत छिऐ आ दोसरकेँ नीच।” फुसन बुढ़बाक बात सुनि फूल बाबूकेँ बकौर लगि गेलैन। किछु फुरेबे ने करैन। फुसन बुढ़बा नजैरसँ फूल बाबूकेँ ऊपरसँ-निच्‍चाँ धरि हियौलैन। मौका पाबि पुन: बजला- “अहाँक मनोभाव देखि हमरा लगैए जे मनमे जातिवादक दुर्गन्‍ध अखनो धरि ऐछे तँए भूखलो छी तँ नै खाएब। जँ से नै रहैत तँ जाति-पातिसँ ऊपर उठि गाम-समाजक सभ वर्गकेँ नौत दऽ खिऐबतौं ने, सभ आनन्‍दित होइतए। सबहक प्रेम आ जश सेहो भेटितए। सभ तँ प्रेम आ भावक भूखल होइए नै कि भातक भूखल। जखन अपने लोककेँ नीच बुझैछिऐ तँए ने लोको अहाँकेँ नीच बुझलक।अपने कहने जँ लोक मड़र होइतए तँ सभ मड़रे ने कहाइबतै। जीविका लेल ने लोक अलग-अलग काज करैए। मुदासभ तँ मनुखे जाति ने छी। से जँ आबो नै बुझबै तँ साड़ामे जाइबेर बूझि की करबै। एतेक तँ खियाल राखै पड़त जहिना सभ जाति मिलि समाजमे सबहक काजमे मदैत करैए तहिना जँ सभ जाति मिलि खानो-पीन, मेलो-बेवहार करब तखन ने समाजमे आपसी प्रेम-भाव बढ़त। अही अभावक कारणे ने आइ धरि समाज पछुआएले अछि।” फूसन बुढ़बाक बात सुनि झगरूकेँ दिमाग भक्-दे खुजल। दिमाग खुलिते झगरू फूल बाबूकेँ कहलकैन- “मालिक हिनकर ठेकनगर बात सुनि आइ हमरो अकील-ज्ञान भेल। जहिना नमहर घैलमे नान्‍हिटा छेद भेलापर सभ पानि रसे-रसे चूई जाइए तहिना ने ऊँच-नीच जातिक भेद भावसँ समाजक रस बहि-बहि भेथिया गेल अछि। जखन रसे ने तखन एक साँझ खाइये कऽ की हएत। जँ अपने केलासँ भोज होइए तँ अपने घरमे भात-दालि आ दू-चारिटा तरूआ-बघरूआ, बरी-झोड़ी बना लेब आ एक-दू सेर दूधक सौजबी दही पौड़ परिवार मिलि खा लेब। तखन जातिक भोज लोक किए करत। कियो खाइए, कियो मुँह तकैए।” फूल बाबू बजला- “हम तँ अखनो धरि नै बुझलौं जे लोक जाति-ले किए मरैए। स्‍वार्थ सिद्ध करैले आकि राजनीति करैले। जातिक पेंचक बीच फँसि हमहूँ दूरि भऽ गेलौं।” फूल बाबूक भोथियाएल बात सुनि फूसन बुढ़बा कहलखिन- “एतेक मगजमारी जे जाति-ले लोक करैए ओइसँ केकरा की प्राप्‍त भेलैए। जाति छोड़ि जँ मानव जाति लेल एतेक काज केने रहितौं तँ महा मानव बनि गेल रहितौं।” फूल बाबू दुनू हाथ जोड़ि फूसन बुढ़बाक आगू विनतीक स्‍वरमे बजला- “बाबा, हमर बुधि जातिक भोजमे घुसैर गेल जे आब बुझलौं।” “जखने जागी तखने परात।” कहि फूसन बुझबा मोटरी लऽ विदा भऽ गेला। O जाति आसिन मासक चारिम सप्‍ताहक समए अछि। बर्खाक पानि आ बाढ़िक पानि सेहो थीर भऽ गेल अछि। मुदा चर-चाँचरमे पानि भरले अछि। जइमे खेतिहर सभ पटुआ, सन्नइ, चन्नी, चन्ना काटि-झाड़ि गोड़ैत अछि। पानि गनहा रहल अछि। दू गामक बीच अछि तँए चर दूर तक पसरल अछि। बहुत पहिनहिसँ दुनू गामक लोकक सेवा सेहो करैए। बुढ़-पुरानक कहब छैन जे पहिने कोसी अही चर देने बोहै छल। पछाइत मुँह भरना भेने दोसर दिस धार घूमि गेल। बरखा आ बाढ़िक समए उनटे कोसीक पानि आबि चरकेँ उपेछाल करि दइए। जखन बाढ़िक पानि घटैए तखन चरोक पानि स्‍वत: घटि जाइए। चरक पानि करिया समाढ़सँ करियाएल, तइमे भैँटक फूल कोसो धरि फुला शोभा बढ़ेने रहैए। तैबीच सिल्‍ली, गागन, लालशर, पनि कौआ इत्‍यादि अनेको रंगक चिड़ै-चुनमुनीक क्रीड़ा स्‍थलक संग शरण स्‍थल सेहो बनलए। एक-दोसर गामक लोक जाइ-अबैले केतए-केतए समाढ़ हटा-हटा बीचमे सिरौर बना पानि टपैले रस्‍ता बनौने अछि। पानि बेसी रहने नाहक साधन सभ अपन-अपन रखने। जे नै रखने अछि ओ भरि डाँड़ भरि जाँघ पानि टपि ऐ-पारसँ ओइ-पार करैत अछि। बेवस्‍थो कोसी क्षेत्र-ले बेमुखे अछि। ऐ क्षेत्रक नेता सभ क्षेत्रक विकास तँ कमे सन मुदा अपन विकास कऽ गामसँ दूर शहरमे बड़का फ्लैट बना रहै छैथ। तँ गाम बाढ़ि-पानिमे डुमैले किए औता। ई तँ गामबला बुझत जे गाम केकर छी। डीहबासूकेँ आकि बहरबैयाकेँ। नेतासभ तँ पाँच बर्खक पछाइत चुनावी महाकुम्‍भमे मात्र नहाइले अबै छैथ। सभ पुण्‍यकेँ मोटरी बान्‍हि नेने चलि जाइ छैथ। चुनावक समए आएल। नेता सबहक उजैहिया गामे-गाम आबि गेल। क्षेत्रक वोँट बटोरै खातिर ओही कोसीक चर टपि ऐगला गाम जेबाक छैन। सोचलैन पएरे टपने लोक संघर्षशील नेता बुझत। जइसँ अधिक भोँट हएत। नेता आ नेताक पीठलगुआ गामक कार्यकर्ता संगे सभ कियो जाँघ भरि पानि टपि पार हुअ लगला। तही क्रममे नेताजीकेँ एकटा नमहर पलैहिया जोंक धऽ लेलकैन। पार होइते नेताजीक जाँघसँ छरछर खून निकलए लगलैन। छरछर खून बहैत देख नेताजी छटपटा उठला। संगी सभ निहारि देखलक तँ देखैए नमगर जोंककेँ, जे खून पीब मोटा गेल अछि। नेताजी जीबठ बान्‍हि जोंककेँ हाथसँ पकैड़ खींच-तीर कऽ छोड़ौलैन। एक हाथसँ छरछराइत खूनक दाढ़केँ दबने आ दोसर हाथसँ एकटा संगीक लाठीक हूरसँ जोंककेँ थोकैच-थोकैच मारए लगला। जोंक तँ कठजीब होइते अछि। लाठीक हूरसँ नै मरैबला। तमसाएल नेताजीक मुहसँ निकललैन- “तोरा आर कियो ने भेटलौं जे हमरे खून पीबैले एलेँ। तोरा खनू बोकराए मारि देबौ।” छटपटाइत जोंक बाजल- “हमहूँ तँ अहींक जाति छी, जाति जातिये लग ने जाएत। अहाँ जे एहेन निष्‍ठूर भऽ हमरा मरै छी से जातियोपर ने कनियोँ दया-धरम अछि। अखन हम कोनो अपराधो तँ नहियेँ केलौं अछि। ई तँ जातिक सोभाव छी।” नेताजी डाँटैत बजला- “तूँ जलकीट, असरधे पानिमे रहैबला आ हम श्रेष्‍ठ मनुख फ्लैटमे रहनिहार, तखन तूँ केना हमर जाति भऽ सकै छेँ?” जोंक कुहरैत बाजल- “जहिना अहाँ जनताक खून पीबै छी तहिना ने हमहूँ खूने पीलौं अछि। अहूँ खूनपीबा आ हमहूँ खूनपीबा। तखन दुनू गोरे जातिये ने भेलौं। जातिक सर्टिफिकेटक चालि-चलनसँ बढ़ि कऽ आरो कोनो नमहर प्रमाण होइ छै जे देब। एक तँ पहिनहिसँ अहाँ सभ हमरापर एतेक अतियाचार केलौं जे हम भागि पड़ा कऽ पानिमे शरण नेने छी...।” नेताजी आँखि लाल-पीअर करैत बजला- “तूँ अपन प्राण बँचबैले ई जुमला हमरा सुनबै छेँ। तोरा बिनु मारने हम नै छोड़बै।” बाजि नेताजी अनधुन लाठी जोंकक देहपर बरसाबए लगला। अधमरू भेल जोंक बाजल- “अदना सन गलतीपर हमरा सन अब्‍बल जीवकेँ जानसँ मारै छी आ अहाँ जे लाखक-लाख जनताक खून श्रेष्‍ठ मनुख भऽ पीबितो एलौं आ पीबितो छी से नीक लगैए।” जोंकक ई बात नेताजीकेँ आरो तरङा देलकैन। तखने झुण्‍डसँ एक गोरे कहलकैन- “नेताजी, चुन लगबैक आदेश देल जाए, अपने खून बोकरए लगत।” चुनक नाओं सुनिते जोंक अपन प्राणक भीख मंगैत बाजल- “जेकर आधार बना अहाँ अपन जीवनक यात्रा करै छी से तँ हमहूँ छीहे। दया करू..! जातिपर दया करू..!” O हहौती मुनर आ खट्टर दुनू सहोदर भाँइ छैथ। दुनू भॉंइ संग मिलि कमा-खटा कऽ परिवारक भरन-पोषण करै छैथ। बड़ भाय मुनर कमाइमे हुनरगर आ पित्तमरू, मुदा खट्टर कमकोढ़िया आ झंझटिया सोभावक अछि। मुनरकेँ दूटा बेटी आ एकटा बेटा छैन। खट्टरकेँ चारिटा बेटी आ तीनटा बेटा अछि। अनपढ़ रहितो संयुक्‍त परिवारमे मुनर सम-रूपसँ मिलि-जुलि भरन-पोषण करैक परियास करैत रहला अछि। खट्टरक पत्‍नी चतुर-चालाक। घरक समान आ टाका-पैसाक चोरनी। कोसल कऽ नैहरमे रखै छेली तँए परिवारक खर्चाक कोनो थाहे-पता ने लगै छल। खाइ-पीबैमे सेहो दनसन हुअ लगल। एक दिन मुनरकेँ पत्‍नी असगरमे कहलकैन- “ई परिवार आब इजमालमे नै चलत। हमरा तीनटा धिया-पुता अछि दू परानी अपने मिला कुल पाँच गोरे छी,तैयो सभ कियो दिन-राति काज करैत-करैत खिया गेलौं। देखियो खट्टरकेँ सातटा धिया-पुता आ दू परानी लगा नअ गोरे अछि, तैयो ने कोनो काम-धाम करैए आ उनटे बीख उगलैत रहैए। ई बरदास के करत। भीन भऽ जाउ। आब जरमे नै लचत-बनत आ ने परिवारक इज्‍जत बँचत।” पत्‍नीकेँ दमसाबैत मुनर बजला- “अहाँ नै बुझै छिऐ जर परिवारक मरम। जखन काजकेँ बाँटि-बाँटि करब तँ काजो बेसी हएत आ आनो लोक परिवारक संगठन देख सीखबो करत आ डरबो करत। दुखक समैमे एक-दोसरक सहयोगो करत। भीन भेलापर परिवार टुटि कऽ कमजोर भऽ जाइ छै आ समाजमे महौत सेहो घटि जाइ छै।” खट्टरक पत्‍नी बड़ झमेलिया, उनटे कोनो कनाइर कऽ जेठ दियादिनीसँ झगैड़ मारि-पीटि केली। जखन खट्टर घर आएल तँ पत्‍नी उनटे बात बना चेकी-पर-चेकी चढ़बैत पतिक कान भरि देलक। खट्टर ने आगू देखलक आ ने पाछू, सोझे जा भौजीकेँ मुकियौलक आ बिखैन-बिखैन गरियौलक। जखन मुनर घर आएल तँ परिवारक बिगड़ल दशा देख मन महुराएले मने दलानमे जा पड़ि रहला। एम्‍हर खट्टर आ हुनक पत्‍नी घरक समान- बरतन-बासन सभकेँ घरमे तेहिया-तेहिया सैंत लेलक। मुनर सभकेँ समझाबैत कहलखिन- “झगड़ा-झंझट कियो ने करह, मेल-मेधासँ रहह। सभ संगे खा-पीबह।” मुदा खट्टर बड़ भाय- मुनरपर तनि बाजल- “आब जरमे कोनो काज आ खेनाइ-पीनाइ नै हएत, भीन भऽ अपन-अपन काज करू।” मुनर मने-मन विचार केलक- भीनौजी बँटबारामे कोनो दियादकेँ पंचमे नै बजाएब, भऽ सकैए दियादी डाहसँ बहुतो अरचन भऽ जाएत। तँए मुनर खट्टरकेँ कहलखिन- “हम तँ कहबौ सभ मिलि जरे रह आ नै मानमे तँ दुनू भाँइ अपनेमे बँटबारा कऽ ले।” मुदा खट्टर भैयाक बात नै मानलक। बँटबारा करैले दूटा पंच जे मेलुआ छल तेकरा बजौलक। मुनर गामक बुजुर्ग लाल काकाकेँ बजौलक आ बँटबारा शुरू भेल। घर-घड़ारी, बाड़ी-झाड़ी, खेतिहर जमीन, बाँस-गाछी सभकेँ दू हिस्‍सा बाँटि जखन गाए-बरद आ बकरीकेँ हिस्‍सा लगबए लगल तखन निकहा बरद गाए बलजोरी खट्टर अपना हिस्‍सामे लऽ लेलक। बरतन-बासन सेहो पहिनहिसँ घरमे सैंतिये नेने छल। तखन बरबैर हिस्‍सा केना लगत। पंचमे बजौल गेल दुनू पंच खट्टरक पक्षमे मुँह-देखुआ पनचैती करै छल। लाल काका चुप भऽ सभ किछु देखै छला। मुदा केतेकाल तक चुप्‍पी साधने रहता। बजला- “पंच निष्‍पक्ष होइत अछि। जे पंच पंचैती आ बँटबारामे पक्षपात करत ओकरा नरकोमे ने बास हेतै।” खट्टरकेँ इशारा करैत फेर बजला- “देख खट्टर, तोरा हहौती लागल छौ। केना से सुन- पढ़ल-लिखल सभ कहै छैथ जे महाभारतमे दुर्योधनकेँ हहौती लागल छेलै तँए पाण्‍डवकेँ बरबैर हिस्‍सा नै देलकै आ महाभारत भेलै। सभ कौरव युद्धमे मारल गेल। तहिना इतिहास कहै छै, सम्राट अशोक सेहो राजा बनैले निनानबे भाएकेँ मारि गद्दीपर बैसलै। मुगल कालमे औरंजेब सेहो तीनिटा भाएकेँ मारि राजा बनल छेलै। ओइसँ की भेलै सभकेँ सभ नासे-नाबूत भेलै किने। बौआ, धन-यौवन आ बाढ़िक पानि क्षनिक होइ छै। तँए बेइमानी नै कऽ इमानदारीसँ दुनू भाँइ बरबैर कऽ सभ समान बाँटि अपन-अपन राज-काज करै जो। तखन सुख-शान्‍तिसँ रहब। नै तँ दुनू लड़ि-झगैर कऽ बेरबाद भऽ जेमेँ आ अन्‍तमे भेटतौ किछु नइ।” लाल कक्काक बात सुनिते खट्टरकेँ अकिल भेलै। सिर झूका कऽ अपन गलती खातिर क्षमा मंगलक। लाल काका खट्टरकेँ कहलखिन- “जखन तूँ अपन गलती-ले क्षमा मांगै छेँ तँ सुन, जेतए बहुते बरतन रहै छै ओतै ने ढनमनाइ छै तहिना जइ परिवारमे बहुत लोक रहै छै तँ आपसमे टना-टनी भऽ जाइ छै। अखनो किछु ने भेलौ हेन। बँटबारा की करमेँ,मिलि-जुलि जरेमे रह। जर परिवारक एकटा अलग महत होइ छै। मुनर तोहर बड़ भाय छथुन। तूँ भैया आ भौजीक पएर पकैड़ माफी मांगि-ले।” खट्टर भैया-भौजीक पएर पकैड़ माफी मंगलक। दुनू भाँइक आँखिसँ दहो-बहो नोर गिरए लगल। मुनर खट्टरकेँ दुनू हाथसँ पकैड़ छातीसँ लगौलखिन। जेना लगल राम आ भरत दुनू मिलि रहल अछि। अन्‍तमे लाल काका खट्टरकेँ कहलखिन- “एहने प्रेम सभ दिन राखि जिनगी निरवाह करिहह आ जिनगी भरि मन रखिहह जे हहौती ने कहियो आबह।” O बुजुर्गक दुख के हरत? मोहन काका भोरबेमे जागि, घूर लग बैस चिलममे कंकर बौझि हुक्का गुड़गुड़बै छला। जाड़क मास रातियो पहाड़ सन नमहर, ओछनिपर सूतल-सूतल देह भरिया गेल छेलैन। कर्सी-गोइठाक तलफल आगि खोरि तापए लगला। जहिना घूरक आगि तलफए, तहिना मोहन कक्काक दिलमे लगल आगि सेहो तलफैत रहए। हुक्का पिऐक तलक लगलेरहैन तँए उकासीपर उकासी हुअ लगलैन। खोंखी करैत-करैत देह थरथराए लगलैन। तैयो हुक्कामे सोंट मारि-मारि खों-खों करिते छला आकि तखने पड़ोसिया बेचन उठि कऽ मोहन काका लग आगि तापए आएल। मोहन काका बेचनकेँ देख थरथराइते स्‍वरमे बजला- “आबह बेचन बैस कऽ आगि तापि लएह।” बेचन बाजल- “हँ काका, एलौं हेन आगिये तपैले। अहाँक खोंखी सुनि हमरो नीन टुटि गेल। सोचलौं कक्कासँ बहुत दिन भेँट भेला भऽ गेल, भेँटो-घाँट कऽ लेब आ दुख-सुखक गप-सप्‍प सेहो बतिया लेब।” किछु सोचैत बेचन पुन: बाजल- “हौ काका, काकीक चलह-पहल नै देखै छी।” मोहन काका बजला- “बेचन, तोरासँ लाथ की करब। तूँ तँ पड़ोसी छह तोरे सभपर तँ हमरो आशा अछि। दुख-सुखमे तँ तोहीं सभ ने देख-रेख करै छह।” बेचन बाजल- “काका, अहाँक दर्शन तँ भाइए जाइए मुदा काकीक दर्शन भेला बहुत दिन भऽ गेल तँए आइ दर्शन काइए कऽ जाएब।” मोहन काका बजला- “काकी तोहर मास दिनसँ बेमार छह। अखैन तँ ऐ बुढ़ाड़ीमे अपने हाथ-पएर झड़काबए पड़ैए। एक लोटा पानियोँ देनिहार नै अछि। एकटा दवाइ भोरे भूखले पेटे खाए पड़ैए, कनी एक लोटा पानि इनारसँ टटका भरि कऽ आनि दएह।” लोटा लऽ बेचन इनारपर जा लोटाकेँ माजि-धोइ कऽ एक लोटा पानि काका लग राखि देलक। मोहन काका दवाइ खा कऽ बजला- “कनी काकियोकेँ हाल-चाल देख लहक, बेचन। एकटा दवाइयो जनु सठल छै, नै हेतै तँ सेहो कनी आनि दिहक।” बेचन बाजल- “से तँ हम आनि देब काका, मुदा एतेक कष्‍ट जे काटै छह से बेटा-पुतोहुकेँ किछु दिन लेल बजा लेबह से नइ?” मोहन काका सोगाएले मने बजला- “बेचन तूँ तँ जनै छहक जे ऐ इकलौतबा महेशक खातिर कोन-कोन करम ने केलौं। केतेक दुख काटि पढ़ेलौं-लिखेलौं। जन-मजदुरी करैत-करैत हाथ-पएरमे जे ठेला-पर-ठेला पड़ि गेल से अखनो धरि ने मेटाएल हेन। सोचलौं जे दुखो काटि बेटाकेँ पढ़ा-लिखा दइ छी, कोनो नोकरी करत तँ हमरो बुढ़ाड़ीमे सुख हएत। बेटाक कमाइसँ जिनगीक आगूक दिन नीकसँ कटत। मुदा उनटे भऽ गेल।” बेचन बाजल- “एना किए भऽ गेलह, काका? जखैन सपेता रोपब तँ कलकतिया किए भऽ जाएत?” मोहन काका बजला- “गाछपर बिसवास अछि जे ओ अपन गुण-धरमकेँ सोलहन्नी नै बदलैए मुदा मनुखकेँ बदलैमे तँ कोनो समैए ने लगै छै। महेशकेँ कहै छी तँ कहैए छुट्टीए ने मिलैए। पुतोहु तेहेन अँठिलाहि अछि जे ठोर-पर-ठोर बैसबे ने करै छै। जँ कहियो छुट्टी हेबो करै छै तँ नैहरेमे बितबैए। हमरा के देखैए। हम जेहेन केलौं से भोगि रहल छी, एहेन कष्‍ट तँ भगवान सात-घर दुश्‍मनोकेँ नै देथुन।” बेचन बाजल- “हौ काका, बेटा-पुतोहुकेँ यएह धरम बनैए?” मोहन काका बजला- “बेचन बौआ, आब बेसी नै पुछह, अत्‍मा खंगहैर रहल अछि। हम जेहेन खाधि ने खुनलौं जे मुहेँ-भरे अपने खसि पड़लौं। हौ बेचन, समाजसँ बढ़ि कऽ कियो ने हएत। जीतोमे समाज आ मुइलोमे समाज। जिनगी भरि तँ बेटे-ले सभ किछ केलौं मुदा आब पचताइ छी, जे समाज-ले किछु ने केलौं।” मोहन कक्काक बात सुनि बेचन बाजल- “से तँ काका तूँ ठीके कहै छहक, तोरा तँ एकेटा बेटा-पुतोहु छल, जे नै करै छह, मुदा रविकान्‍तकेँ देखहक जे दूटा बेटा छैन, दुनू अधिकारीक पदपर नौकरी करै छैन। ओहो दुनू भाँइ माए-बापकेँ घुमियोँ कऽ ने तकै छैन। रविकान्‍तक पत्नीकेँ पोताक मुँह देखैले मन लगले रहलैन आ मरि गेली। तीन दिन धरि लहास घरेमे बेटा-पुतोहुक आशामे पड़ल रहल मुदा दुनू बेटा माएकेँ आगियो दइले ने एलै। तखन रविकान्‍तक भतीजा बुढ़ियाकेँ आगि दऽ अन्‍तिम संस्‍कार केलकै। कहु काका के अपन भेल? जखैन पढ़ि-लिखि कऽ लोक एक तरफ विकास केलकै तँ दोसर दिस अपन करतबकेँ बिसैर गेल। लोको सभ तँ बेटा-बेटीकेँ ज्ञान-ले थोड़े पढ़बैए, पढ़बैए नोकरी खातिर। जे नोकरी करत ओ माए-बापकेँ की देखत। ओ तँ अपने गुलाम रहैए। लोको तँ अपने बेगरते स्‍वार्थमे आन्‍हर बनल अछि।” गप-सप्‍प करैत दुनू बेकतीक मोन दुखा गेल। थोड़े कालक पछाइत बेचन फेर बाजल- “ऐसँ नीक तँ मुनर अछि, तीनटा बेटा-पुतोहु छै आ दर्जन भरि पोता-पोती। एतेक नमहर परिवार रहितो ने मुनर आ ने ओकर बेटा सभ कहियो कमाइले परदेश गेल। रौदी-दाहीमे सेहो अपने गाम-समाजमे जन-मजदुरी कऽ एक नम्‍मर जिनगी जीबैए। तीनू बेटा कोल्‍हुक बरद जकाँ दिन-राति परिश्रम करैए आ अपन माए-बापकेँ तरहत्‍थीपर रखने अछि। कनिको मन खराब होइ छै तँ बेटा सभ कन्‍हेपर लादि कऽ डाक्‍टर ऐठाम इलाज करबए लऽ जाइए। देखबहक तँ लगतह मुनरक बेटा सभ ऐ युगक श्रवण कुमार छी। आब तोहीं कहह जे पढ़लाहा परिवारमे बुजुर्गक सेवा-सम्‍मान होइ छै कि बिनु पढ़लाहा परिवारकमे। हमरा तँ लगैए जखैन पढ़लाहा परिवारक ई हाल छै तँ आगू समजमे बड़-बुजुर्गक समस्‍या दिनो-दिन बढ़बे करतै। जे पढ़ियो कऽ अपन माए-बापकेँ नै भेलै तँ ओ समाज-ले की करत!” बेचनक बात सुनि मोहन काकाकेँ मुँहक बोल जेना बिला गेलैन किछु ने बाजि होनि। बेचन काकीसँ भेँट कऽ दवाइयक पुर्जा जेबीमे रखि विदा भऽ गेल। O बिलाइ रस्‍ता कटलक बहू-दिनक पछाइत एकठाम मैथिली कथा गोष्‍ठी भऽ रहल छल। दूर-दूरसँ साहित्‍य-प्रेमी श्रोत्रा, कथाकार आ समीक्षक लोकैन आएल छला। गोष्‍ठीक आयोजन-समैपर दीप प्रज्‍वलित करि विधिवत् शुभारम्‍भ भेल। समैपर दीप प्रज्‍वलित कऽ विधिवत् गोष्‍ठीक शुभारम्‍भ कएल गेल। सत्रक अंतमे समीक्षक लोकैन पठित चारू कथापर टिप्‍पणी करैत रहला। दू सत्र बितल आ तेसर सत्रक आरम्‍भमे आनन्‍द बाबू कथा वाचन शुरू केलैन। कथाक शीर्षक छेलैन- ‘अशुभ यात्रा’। कथाक केन्‍द्रीय भाव छेलै जे बिलाइ रस्‍ता काटि हमर यात्राकेँ अशुभ बना देलक, जइसँ दूर्घटना भऽ गेल। बाल-बाल बचलौं। ऐ तरहेँ कथा वाचन होइत सत्रक अन्‍तमे समीक्षा हुअ लगल। प्रोफेसर अमरजी कथाक चर्चा करैत बजला- “सहीमे शुभ यात्राक समए जखन वरतुहारीमे लोक विदा होइए तखन जौं बिलाइ रस्‍ता काटि दइए तँ बुझू जे यात्रा निश्‍चित रूपसँ अशुभ भऽ जाइए। घटना दुर्घटना तँ हेबे करत।” उदाहरण दैत पुन:बजला- “एकबेर कारसँ सात गोरे हम-सब घरदेखीमे जाइ छेलौं आकि बिच्‍चेमे एकटा बिलाइ रस्‍ता काटि भागि गेल। ड्राइवर गाड़ी रोकि गाड़ीकेँ तीन डेग पाछू केलक आ सड़कपर थूक थूका कऽ आगू बढ़ल। किछु कालक पछाइत गाड़ीक पहिया खुजि गेल आ गाड़ीक दुर्घटना भऽ गेल। जइमे तीन गोरेक हाड़-पाँजर टुटल आ तीन गोरेकेँ कपार फूटि गेल। ड्राइवरक एकटा पएर कटि गेल।” दोसर समीक्षक किशोर बाबू बजला- “से तँ ठीके होइए। एक बेर हमहूँ बेटीकेँ परीक्षा दीबैले मोटर साइकिलसँ जाइ छेलौं कि बिलाइ रस्‍ता काटि देलक। मुदा हमरा जल्‍दी जेबाक रहए किए तँ समए कम छेलै। आगू बढ़ैत गेलौं। किछु दूर जा मोटर साइकिलक चक्का अवाज कऽ गेल आ हम दुनू गोरे सड़केपर खसि पड़लौं। टाँग-हाथ टुटि गेल। बेटी परीक्षा की देती, अस्‍पतालमे भर्ती हुअ पड़लै।” तेसर समीक्षक सेहो सहमति भरैत बजला- “हँ, यौ ई बड़गड़बर आ अशुभ होइए जखैन बिलाइ रस्‍ता काटि दइए। ई हमरो विषाएल अछि। एक बेर हमहूँ ऐ चक्करमे पड़ि गेल रही। कहुना बँचैत-बँचैत बँचलौं बुझू जे माए खड़जीतिया केने रहए।” समीक्षा होइते रहै मुदा किछु कथाकार आ समीक्षक लोकैनकेँ अनरगल-अनसोंहाँत आ अनोन-विसनोन लगलैन। किए बिना मतलब समीक्षक लोकैन विषयसँ बोहिया रहला हेन! बिनु मतलबक तूल पकड़ने जा रहला अछि। एतेक छोट गपकेँ तिलक-तार बनौने जा रहल छैथ जे एक छोट जानवरक पाछू पिल कऽ मनुख सन विवेकी प्राणी पड़ि गेल हेन। हमरा तँ बूझि पड़ैए जे ई कथा गोष्‍ठी धिया-पुताक घरबा-दुअरबा खेल तँ ने भऽ गेल। आकि कोनो साजिश रचि एना ओझड़ा-ओझड़ा बाजि रहला हेन। मुदा समस्‍या अछि जे एतेक पैघ विद्वान समीक्षक सभक मुँहपर जबाव के देतैन?जखन जबाव देनिहार जौं सरकारी नौकरी करैबला रहत तँ चक्रव्‍यूहमे फँसा खा जेता। जौं कहीं प्राइवेटमे नौकरी करैत हएत तँ कान पकैड़ हटबा देता। जौं कहीं अखवार, पत्रिका वा फेश-बुकपर किछु टिप्‍पनी करत तँ धमकीपर धमकी पड़ए लगत। तँए बाजबसँ चुप्‍पे भला बुझै छला। तही बिचमे सुमन बाबूकेँ नै रहल गेलैन। ओ ससैर-सहैट कऽ लगमे जा मैककेँ लपैक मुँहसँ सटा कऽ बजला- “दुनियाँमे एतेक घटना-दुर्घटना दिन-राति होइए की तेकर कारण बिलाइए रस्‍ता कटने रहै छै? हजारो-हजार किलो-मीटरक सड़क-मार्ग,रेल मार्ग यातायात लेल बनल अछि, तैपर हजारो जानवर सभ रस्‍ता कटैए अथबा गाड़ीसँ टकरा कऽ मरि जाइए, तेकर ने कोनो चर्चा आ ने सरोकार लोक बुझैए। मुदा बिलाइ सन छोट जानवरपर जे एतेक प्रहार आ अत्‍याचार होइए से किए? की बिलाइकेँ जीबैक अधिकार नै छै। जौं नहि अछि तँ लोक बिलाइकेँ मारि धरतीपर सँ उसरन किए ने कऽ दइ छी। की उत्तरांचलमे जे एतेक प्राकृतिक हादसा भेलै तँ से बिलाइयेक कारण। पंजाबमे एकटा बस नहरमे गिर गेल छेलै, बसमे सवार सभ लोक डूमि कऽ मरि गेल, की बिलाइए रस्‍ता कटने छेलै? बिहारमे सहरसा लग धमौरा स्‍टेशनपर रेलसँ कटि बहुतो लोक मरि गेल तेकरो बिलाइए रस्‍ता कटने छेलै? जौं सहीमे बिलाइक चलते घटना होइ छै तँ सभटा आरोप बिलाइपर किए ने लगै छै।” समीक्षाकेँ आगू बढ़बैत मणिकान्‍त बाबू बजला- “आइ एक्कैसम सदीमे दुनियाँ एतेक आगू बढ़ि गेल अछि। मुदा मिथिलांचलमे लोकक सोचब किए एतेक पछुआएल अछि जे अपन गलतीकेँ सुधार नै करैए आ बिलाइ रस्‍ता काटि दइ छै? तैपर बगुलबा-धियान लगेने रहै छैथ। आइक दिन अन्‍हराकेँ विकासमे बिसवास होइ छै, मुदा आँखिबला किए अंध-बिसवासमे फँसि सभकेँ फँसा रहल छैथ। एहेन अंध-बिसवासमे फँसल लोक केना ज्ञानी आ अज्ञानीक श्रेणीकेँ फुटौता? तँए ने मिथिलाक विकासमे अखनो धरि बिलाइ रस्‍ता कटने अछि।” मणिकान्‍त बाबूक विचार सुनि सभ समीक्षक सोचमे पड़ि गेला। तखने गोष्‍ठीक अध्‍यक्ष महोदय भोजनावकाशक घोषणा केलैन। O छुतहर पंचू बाबा गामक गरीब बेकती छैथ। समाजक पैघ लोकक सामने दबल छैथ, माने गामक मालिक-मुखतियार सभ हिनका तरजूक पासङो बरबैर महत नइ दइ छैन। गाममे बेसी धनिक लोकक चला-चलती रहने गरीब केहनो काबिल रहए मुदा बुड़िबके होइत अछि। मुदा गरीब रहितो पंचू बाबा अपन जिनगीकेँ एतेक सोझरेने आ सरल बनेने छैथ जे बाहरी झाँट-बिहाड़िकेँ कोनो परबाहे ने करै छैथ। परिवारो कमौआ आ समंगर रहने कियो केकरो अब्‍बे-तब्‍बेमे ने रहै छैथ। बूढ़-पुरान रहितो हुनक सोच पुरान, कविकाठी[1] नै छैन। नव विचार संगे समाजसेवी आ जनहित काजमे सेहो रूचि रखैबला लोक छैथ पंचू बाबा। सिरूआ पावैन लगिचाएल अछि। सभ कियो पावैनक ओरियानमे लगल अछि। पंचू बाबा सिरूआ मेलामे सभ साल ओहन चीज-वौस कीनै छैथ जे परिवारमे सबहक उपयोगी होइ।  अही गुन-धुनमे पंचू बाबा लगल छला। गामक सटले रानीगढ़ी परतीपर सिरूआ मेला तीन-दिना लगैए। ओइ मेलामे गामक जिनगीसँ जुड़ल जरूरतक सभ चीज वौस बिकाइए। किसानक हर, हरीश, लागैन, पालो, चौकी, पलंग, हँसुआ, खुरपीसँ लऽ कऽ कुम्‍हारक कुम्‍हरौटी माटिक गढ़ल बरतन बासन-कुसन, बच्‍चा-बेदरूक खिलौनाक संग सब तरहक दोकान हाटो-बजारसँ बेसी सजल रहैए। पंचू बाबाक मनमे उपकल- अहुना चैत-बैशाखक रौदक सूखल आ आबामे पकल माटिक बरतन-बासन पकगर रूनगन आ बौकार होइए। मेलामे ऐबेर पानि भरैले घैल आ अचार रखैले करिया रंगक मोहना झँपना लगल कीनब। जेकर खगता परिवारमे ऐछे। घैल कीनै काल पोता पुछलकैन- “दादा, जखन पानि भरैले घरमे दूटा तमघैल ऐछे तखन माटिक घैल की हएत?” पंचू बाबा पोताकेँ कहलखिन- “बौआ, तूँ अखनी नै बुझबीही। माटिक घैलक पानिक जे महत मनुखक जिनगीमे अछि से कोनो आन बरतनक पानिक नै होइए। तहूमे गरमी समैमे तँ अमृत मानल जाइए।” सालो ने लगल, सात-आठ मासक पछाइत जाड़क समैमे मोहन बाबूक बड़ भाय चन्‍दू बाबू स्‍वर्गवास भऽ गेला। हुनका दू बरख पहिने लकबा मारि देने छल। रोगसँ रोगा लोथ भऽ गेल छला। शरीरमे खाली कष्‍ठेटा बँचि गेल रहैन। मृत्‍यु भेने परिवारक लोककेँ कोनो शोक-सन्‍ताप तँ नै भेल। परिवारमे तीनटा बेटी छैन जे सिआन-भलढेरबा,एकपिठिया तराऊपरी अछि। आ दूटा छोट-छोट बेटा पत्नीक माथपर भार छोड़ि गेला। से पैघ समस्‍या भऽ गेल। तैपर सँ श्राद्ध-कर्म आ भोज-भातक खर्चाक चिन्‍ता सेहो। छुतुक भेने केशकट्टा दियाद सभ माटिक बासन- छुतहर, घैल, तौला,पतली, करही, खापैड़ सभटा उठा कऽ बँसबिट्टीमे फेक आएल। मुदा पंचू बाबा दियाद रहितो अपन घरक माटिक बरतन-बासन नै फेकलैन। घरक जनिजातिसँ लऽ कऽ आनो परिवारक जनिजाति सभ कनफुसकी करए लगली। “दू दिन बितियो गेल हेन मुदा पंचू बाबक अँगनामे घैलचीपर घैल अखनो तँ ऐछे! ओही घैलक पानि पीब रहल छैथ।” कनफुसकी बढ़ैत-बढ़ैत सौंसे समाजमे पसैर गेल। छौर-झँप्‍पी माने तेरातिक पछाइत समाजक सम्‍मत-सलाह लेल बैसार बैसल। तइमे पंचू बाबापर सभ कियो कनखड़ल रहबे करए। गामक देबान- बजला- “छुतुक भेने घैल-छुतहर फेकब एक रीत-रेबाजक परमपरा अपना समाजमे पहिनो छल आ अखनो अछि, तखन पंचू बाबा ने किए फेकलैन?” पंचू बाबा ठाढ़ होइत बजला- “छुतुक माटिये बतरनमे किए लगत, तखन तँ घातुओक बरतन ने किए फेकल जाइए। सभ तँ बरतने-बासन ने छी। जखन बरतनक गुण-धरममे छुतुक भेने कोनो परिवर्तने ने होइए तखन किए फेक देब। आखिर की कारणसँ माटिये बरतनकेँ छुतहर मानब आ फेक देब? ऐमे ओकर कोन दोख जे ओकरा एहेन सजा देल जाइए।  जखन जरूरत रहैए तँ गोसाँइ घरसँ लऽ कऽ पूजा-पाठ, देव धरमक काजमे माटिक बरतनकेँ शुद्ध शुभ मानि करै छी आ अन्‍ध-बिसवामे पड़ि गुहाँरीमे ओकरा फेकै छी, से केतेक उचित भेल?” पंचू बाबाक बात सुनि सभ दियादवाद विरोध करैत बाजल- “अहाँ समाजकेँ उल्‍लंधन केलिऐ, अहाँ छुतरहक पनिपीबा छी!  अहाँ अछोप छी तँए अहाँ  दियादवाद आ समाजसँ दूर रहू आ अपने आगिये-पानियेँ निमाह करू।” ई गप तुल पकैड़ समाजक आनो पंच सभ सुनि आरो बतंगर बना देलक। कुकरौंझ करैत सभ कियो बाजए लगल- “पंचू बाबा जाबे जुरिमाना समाजमे नै देता ताबे ढाठल रहता। समाजमे हुनका संग हुक्का-चीलम सेहो बन्न रहत।” पंचू बाबा हिमतगर लोक, हारि नै मानलैन। सही कर्मकेँ धरम बुझै छैथ। ओ ने धर्मान्‍ध आ ने बिटन्‍डी छैथ। असगरे समाजक सामने अरि गेला आ गरजैत बजला- “हम कोनो चोर आ हत्‍यारा नै छी जे अहाँ सबहक सामने सिर झूका माफी मांगि लेब। सभ कियो मिलि पहने श्राद्ध-कर्मसँ निपैट लिअ तखन हम शरहानापर सभा-पंच आ जबारी-पंचक बीच पंचैती देब। जे फैसला हएत से मानब।” समाजक देमानकेँ बाबाक बात जँचल। ओ आगू पंचैतीक निर्णए दऽ उठि गेला। पंचू बाबा घर दिस विदा भेला मुदा मनमे खुदबुदी उठए लगलैन। समाज तँ समाजे छी कखनो प्रबल होइए तँ कखनो दयावान सेहो होइए...। मुदा फेर मनमे भेलैन- की हएत तेकर ठेकान अखैनियेँ करब से नीक नै हएत। ई तँ सत्‍य छी जे सत्‍यक विजय सदिखन होइत आएल आ हेबो करत से बिसवास तँ मनमे ऐछे। एम्‍हर दियाद सबहक मन टुटल, विचार केलक जे पहिने अगुआएल काज तइ सभसँ निचेन भऽ जाइ छी तखन पंचैती चैनसँ हएत। पंचू बाबा समाजसँ अरारि तँ कऽ लेलैन मुदा मन घुचुर-पुचुर करए लगलैन। एक मन कहलकैन- “लोक सबहक कहब छै जे पहिने ने पंच-परमेश्वर होइ छला, मुदा अखुनका पंच तँ घुसेश्वर होइए। एक दिश समाज उलैट पड़ल अछि आ दोसर दिस हम असगरे रण टेकने छी। तखन पंचैती कोन करोट लेत से तँ महेश्वरे ने कहत।” दोसर मन कहलकैन- “जहिया जे हेतै से हेतै, तइले अखैन किए मगजमारी करब। जखन उखरियेमे मुँह देने छी तँ समाठक केतेक डर करब।” श्राद्ध-कर्म आ भोज-भात सम्‍पन्न भेला पछाइत पंचू बाबाक दरबज्‍जापर समाजिक बैसार बैसल। जइमे सभ तरहक पंच, जबारी-पंच आ समाजक बारहो-वर्णक मुख पंच बैसल छला। पंचैतीमे तर्क-वितर्क हुअ लगल। बहसा-बहसी होइत-होइत सभा-पंचमे आ जबारी-पंचमे मतभेद भेल आ नमहर पेंच फँसि मारि-पीटक माहौल बनल। मुदा बँचल। सभा परहक पंचक कहब भेल जे पंचूबाबा समाजक बात किए ने मानलैन, तेकर जुरिमाना दिअ पड़तैन। मुदा जबारी-पंचक कहब रहैन जे अदनीसन बात-ले जुरिमाना किए देता। पंचक बीच एक-मत बनबे ने करए, बेर-बेर धक्कम-धुक्का होइत रहल। तखन पंचू बाबा हाथ जोड़ि पंच-भगवानसँ विनीत स्‍वरमे बजला- “हमरा खातिर कियो मारि-पीट नै करू। मुद्दा अछि, छुतहर। तइले अपनामे किए लड़ि-झगैड़ मरब। हम छुतहरकेँ अहीं सबहक बीच राखि दइ छी। अपने सभ मिलि भाँगि-फोरि दियौ आकि फेरसँ कोनो विचार करियो।” बजैत पंचू बाबा अँगनासँ छुतहर आनि पंचक बीच राखि देलखिन। पंचमे सभ कविकाठीए तँ नहियेँ छला। किनको मति-सुमति तँ किनको कुमति सेहो होइए। के पंच ई छुतहरकेँ भाँगत-फोरत? ई एकटा प्रश्‍न बनि ठाढ़ भेल। सभ चुप। कियो ने किछ बाजैथ। सभकेँ चुप देख छुतहर दीन-भावसँ बाजल- “कनी हमरापर विचार करू जे हमर की कसूर अछि। ने हम किनको किछ बिगाड़ने छी आ ने किनको सतेने छी। हम तँ सदिखन अहाँ सबहक सेवामे आदिये कालसँ लागल रहलौं आ अखनो करैले तैयार छी। तखन भरल सभामे हमर इज्‍जत उतारि हत्‍या करैले किए उतारू छी?” छुतहरक बात सुनि सभ पंचकेँ बुकौर लगि गेलैन। किनको किछु फुरबे ने करैन। अवसर देख छुतहर फेर बाजल- “हम अखैन चूप नै रहब, हम और बाजब। जखन पूजा-पाठ, होम-जाप आदि जनमसँ लऽ कऽ धरम-करम धरिमे संग दइ छी। सभ कियो हमरो मान-सम्‍मान दइ छी, मुदा मरण दिन छुतरह कहि किए बँसबिट्टी, डबरा आकि खत्तामे फोरि-भाँगि कऽ फेकै छी? की बरतन-बासनक रूपमे सबहक घरमे हमहींटा छी? आन-आन बरतनकेँ किए ने छुतहर कहि फेकै छी? जइ दिन आन कोनो बरतनक जनम नइ भेल छल तही दिनसँ हम अहाँ सबहक इज्‍जत रखलौं आ आइ अहाँ सभ छोटहा बुझै छी! ई अवगुण तँ हमरामे नै अछि जे किनको संग ऊँच-नीचक भेद केने होइ। किनको दलित आ किनको महादलित बुझने होइ, किनको छूत आ किनको अछूत बुझने होइ। ऐ तरहक बेवहार हम ने आइ धरि किनको संग केलौं आ ने भविसमे करब। एकबेर आँखि उठा कऽ देखियौ अहाँ सभ अपना समाजमे जे केहेन-केहेन कुकर्मी आ अत्‍याचारीकेँ स्‍थान देने छिऐ। किए हमरा सन निर्दोषकेँ छुतहर कहि हत्‍या करै छी? तैयो हमरा मनमे अहाँ सबहक प्रति कोनो द्वेष नै मुदा अहाँ सभकेँ हमरा प्रति मनरोग किए? तेकर विचार तँ अहीं सभकेँ ने करए पड़त।” O मोंछक लड़ाइ दुभिकेँ अपन चतरल-लतरल हरियरी देख मन उमकल। मन की उमकल, अपन इतिहासक घमण्‍ड छेलै जे हम बड़ गुणकारी आ उपकारी छी। हमरासँ पैघ पवित्र शुभ कियो ने..! पोरे-पोर गोड़ा रोपने धरतीसँ सटि कखनो कनोजैड़ छोड़ैत तँ कखनो सीरकेँ जालसँ भूमिकेँ जलियाह बनबैत अपन लहकी लहलहाइत जिनगी आ वंशजकेँ धरतीपर पसारि राज करैत जे अमरत्व प्राप्‍त केने छी, तैपर घमण्‍ड किए ने करब..? घमण्‍डक निशाँमे मातल दुभि बड़बड़ाइत बाजल- “हम अमृत पीब अमर छी। औषधीय गुणसँ गुणवान छी, केतेक जानवरक भोजन बनि पेट भरै छी। धरतीकेँ बँचबैमे सेहो मददगार छी। मनुखोकेँ पूजा-पाठसँ लऽ कऽ सभ शुभ काजमे काज अबै छी। बेटियोक विदाइ बेर खौंछिमे जा एक गामसँ दोसर गाममे परिवारकेँ हरियरी दइ छी। कियो एकटा-दूटा काज करैए तँ घमण्‍डसँ घमण्‍डी बनि जाइए आ हम तँ सहजे दिन-राति सबहक काजो करै छी आ उपकारो। तखन घमण्‍ड किए ने करब।” दुभिक घमण्‍ड आ बढ़ल-चढ़ल बोली सुनि पड़ोसी अमरलत्तीकेँ अनसोहाँत लगल। ओ हुलकी दऽ टोकारा दैत बाजल- “सभ दिन तूँ बताहे बनल रहबह। कहै छहक हम बड़ पैघ छी, की पैघक यएह लक्षण होइए। नाओं दायबती आ देह उघारे! अपन बड़ाइ जे अपने मुहेँ करै छहक से की शोभा दइ छह? जखन दोसराक मुहेँ सुनबहक से ने नीक हेतह।” टोका-चाली होइत रगड़ासँ झगड़ामे बदैल गेल। दुनू एक-दोसरकेँ बिखैन-बिखैन गारियौलक। उलहन दैत दुभि बाजल- “तू अछोप छेँ तँए ने लोक जमीनपर सँ भगा देलको जे गाछपर फाँसी लगा लटकल रहै छेँ। देहक कोनो गत्तरमे लाजे ने छौ, दोसरेकेँ खून पीबि जीबो करै छेँ। हम आत्‍म-निर्भर छी आ तूँ परजीवी छेँ, तखन हमरासँ पैघ केना भऽ सकै छेँ तूँ?” अमरलत्तीकेँ दुभिक बात सुनि सौंसे देहमे आगि नेस देलक। अगियाएले मने बाजल- “हम कोनो निमोछा छी, तोरा एहेन हाल करबौ जे मन रहतौ। अन्‍हरा दुसए डिठराकेँ। अछोप तँ अपने ने छेँ जे लोको आ जानवरो मुड़ी काटि लइ छौ आ लतियेबो-थुकियेबो करै छौ। पैघ बनैए!” दुभि अपन शब्‍दभेदी वाण चलबैत अमरलत्तीकेँ कहलक- “हम पैघ आ पवित्र कोनो आइसँ छी। अमृत पीब अमर छी  पूजो-पाठमे सबहक सिर चढ़ि रक्षा करै छी। सबहक मान-सम्‍मान करै छी आ सभ हमरो करैए। तखन हम अछोप केना भेलौं?” ब्रह्मास्‍त्र चलबैत अमरलत्ती दुभिकेँ कहलक- “चालैन दुसैए सूपकेँ, मुदा अपने सौंसे देह भूरे-भूर तेकर परि तूँ करै छेँ। तोरा ई नै बुझल छौ जे हमहूँ अमृत पीने छी, तँए ने हमर नाओ अमरलत्ती अछि। हम तँ तोरासँ छूबाइ खातिर जमीन छोड़ि दोसरकेँ माथपर बसि राज करै छी। तोरासँ बुधिजीवि सेहो छी जे ओकरे खून चूसि-चूसि जीबो करै छी आ बिनु परिश्रम केनहि मलाइ खाइत रहै छी। हरि नाम जपि सदिखन हरियरी देने रहै छी।” जेहने रगड़ाह दुभि तेहने अमरलत्ती। दुनूक बीच झगड़ा रहत तखन ने सोझराएत। मुदा ई तँ बातक रगड़ा छी। तहूमे मोंछक लड़ाइ। दुनूक बीच बहुत दिन धरि फुला-फुली आ कनारि चलैत रहल। फरिछौठक कोनो संयोगे ने बनए। मुदा, एतेक विचार दुनूक मनमे रहै जे पड़ोसीसँ झगड़ा नै, मेल-प्रेमसँ रहबाक चाही। किएक तँ सभ किछु बदलल जा सकैए, मुदा पड़ोसी नै बदलल जा सकैए। किछु दिन बितल तखन अमरलत्तीकेँ निशाँ टुटल। दुभि लग आबि बाजल- “यौ, पड़ोसीक नाते तँ दुख-सुखक बात बाजि सकै छी। ई मोंछक लड़ाइ केतेक दिन धरि लड़ब। लड़ब की,सोचैत-सोचैत सोगा-रोगा कऽ चितापर चढ़ि जाएब। तइसँ नीक रगड़ाक फरियौठ करैले तेसर पड़ोसी लग चलल जाए, जे अपना दुनूक बात सुनि पंच बनि दूधक-दूध आ पानिक-पानि बेड़ा देत।” दुभिकेँ अमरलत्तीक कहब जँचल, ‘हँ’मे ‘हँ’ भरलक। विहाने भेने दुभि आ अमरलत्ती तेसर पड़ोसी- खजूर- लग जा अपन-अपन दुखरा बेरा-बेरी सुनौलक। सभ बात सुनि खजूर बाजल- “अहाँ दुनू गोरेक बीच कोनो हक-हिस्‍साक लड़ाइ तँ नै छी, ई तँ मोंछक लड़ाइ छी। फुसि बातक झेलमे पड़ि जे‘हम पैघ तँ हम पैघ’ परेशान छी। मुदा, अहाँक पंचैती हम नै करब, कियो दोसर करत। हम तँ अपने छोट-अछोप छी जे काते-करोटमे रहि देखै छी जे कियो छोटो काज कऽ नमहर बनि गेल अछि आ कियो पैघ काज करैत,तियाग करैत मरियो गेल। मुदा पैघ नै बनि सकल। अखन धरि तँ हमरा वनस्‍पति जगतमे बान्‍ह-ठाठ केने अछि,तखन हम पंचैती केना करब।” खजूरक बेथा सुनि दुभि आ अमरलत्तीकेँ दुखो भेलै आ अचरजो लगलै। दुनू पुछलकै- “एना किए बजलौं, हमरा दुनूकेँ अहाँ ठेलिया कऽ भगबए चाहै छी? दुखी भऽ हम दुनू गोरे अहाँ लग एलौं जे हमरा सबहक ओझरीकेँ सोझरा देब आ अहाँ मुँह मोड़ै छी।” खजूर बाजल- “हम अपन बितलहा बात कहब तँ बिसवासे ने हएत। अखन अहाँ दुनूक सुनलौं, जँ समए अछि तँ हमरो दुखरा सुनियेँ लिअ।” दुखक गप तँ दुखिते मनसँ निकलैए। खजूरक आँखिक नोर सौनक झड़ी सन झहरए लगल। बाजल- “हम आ नारियल दुनू दियादे छी। दुनू रूप गुणमे अन्‍तर भेने लोक सभ नारियलकेँ ऊँच स्‍थान दऽ पूजा करै छैन आ हमरा छोटोमे छोटहा मानैए। जखन कि हम काजो आ तियागो बेसिये केने छी। हम अपन खून पियाकेँ लोकक मन भरै छी, फड़ो गुड़ सन मीठ होइए, मुदा नारियल तँ उपरसँ कठोर, भितुरका गुद्दाक सुआद ने तीते आ ने मीठे होइ छै। तखन ओकरा लोक पूजापर ऊँचगर आसनपर बैसा महंथ बनौने रहै छै। अहीं दुनू गोरे कहू जे हमर न्‍याय आइ धरि कियो केलक?” खजूरक बेथा सुनि दुभिक संग अमरलत्तियोकेँ ज्ञानक आँखि खुजल। मुड़ी डोलबैत विदा हुअ लगल। खजूर फेर बाजल- “जखैन अपनेमे लड़ि-झगैड़ मरब तँ आगूक लड़ाइ लेल रणक्षेत्र के टेकत? आइ धरि जे तियाग आ बलिदान केलिऐ तेकर तँ न्‍याय भेटबे ने कएल आ अड़खिसे जे मोंछक लड़ाइ लड़ै छी तेकर न्‍याय के करत?” O केते उचित भूषण बाबू गामक जमीनदारक इकलौता पुत्र छैथ। गामोमे आ आनो गाममे आदर-सम्‍मान होइ छैन। भूषण बाबू लोकप्रिय छैथ। उपकारी सोभाव छैन। बेटाक जन्‍म दैत पत्नीक मृत्‍यु प्रसवे कालमे भऽ गेलैन। भूषण बाबू उदास आ चिन्‍तित रहितो खेती-बाड़ी नोकर, हरवाह आ जन-मजदूरक सहयोगसँ करबै छैथ। बेटाक लालन-पालनपर विशेष धियान रखै छैथ। तीन पीढ़ीसँ एक-पुरखियाहे आबि रहल छैन। भूषण बाबूकेँ पत्नी नै रहने गामक शुभचिन्‍तक इष्‍ट-मित्र सभ चुमौन कऽ लेबाक सलाह दैत रहलैन- “बाबू साहैब, असगरे जिनगी केना चलत। जखन घरमे घरनी नै रहत तँ घर  नरक सन भऽ जाएत।” मुदा भूषण बाबू लोकक बातकेँ अन्‍ठियबैत रहला। मनमे होइ छैन जे चुमौन करब तँ बेटा- लाल बाबू-क जिनगीमे सतमाए बाधा बनत। कहीं सतमाए कुभेला करतै आ बेटे जँ मरि जाएत तखन तँ वंश नाश हएत। जखन लाल बाबू पाँच बर्खक भेल तँ भोर-साँझ पढ़बैले दूटा गुरुजीकेँ लगौलैन। दू बर्ख धरि घरक शिक्षा देला बाद लाल बाबूकेँ शहरक मसहूर स्‍कूलमे दाखिला करबैक विचार लाल बाबूक मामासँ पुछलखिन। लाल बाबूक मामा लखनऊ शहरमे रहि सरकारी दफ्तरमे काज करै छैथ। सलाह लऽ लखनऊ शहरक नामी अंग्रेजी स्‍कूलमे लाल बाबूकेँ नाओं लिखा, भर्ती कऽ देलखिन। लाल बाबू बच्‍चेसँ मेघावी, इण्‍टर प्रथम श्रेणीसँ पास कऽ मेडिकल परीक्षामे सफलता पौलक। पूणा मेडिकल काजैजमे प्रवेश कऽ डाक्‍टरीक पढ़ाइ शुरू केलक। चारि बर्खक पछाइत डाक्टर बनि घर आपस एला। गामक गरीब-गुरबाक इलाज मंगनीमे करए लगला। कनिके दिनमे ओ लोकप्रिय भऽ गेला। डाक्‍टर लाल बाबूक उद्देश्‍य अछि जे शहरमे बहुत सुविधा-साधन, पैघ-पैघ डाक्‍टर आ अस्‍पताल अछि। मुदा गाम-घरमे गरीबक इलाज लेल ने साधन आ ने डाक्‍टर अछि। तँए हम अपन सेवा गाम-घरमे करब। चैत मास,गहुम-कटनी चलि रहल अछि। भूषण बाबू जन-मजदुर लगा गहुमक कटनी-दौनी करबै छैथ। तेज रौदमे रहने भूषण बाबूक मन पीता गेलैन। बेमार पड़ि गेला। तखन खेतक उपजा-बाड़ीक काज के देखत, तेकर चिन्‍ता सेहो होइन। मुदा दोसर दिन लाल बाबू पिताजीकेँ पनपिआइ करा, बोखारक दबाइ खिया कऽ कहलकैन- “बाबूजी, अहाँ अराम करू हम खेतक काज देखए जाइ छी।” पिताजी सलाह दैत कहलखिन- “एहेन कपरफोरा रौदमे तूँ नै जाह। तोरा ने खेत देखल छह आ ने काजक हूनर छह।” लाल बाबू पिताकेँ कहलखिन- “अहाँ बीमार छी, अराम करू। जखन हम घर आएल छी तँ खेतक काज देखब तखने ने सीखबो करब। नोकर- रघु-केँ संग कऽ जाएब। ओ सभ किछु बता देत।” लाल बाबू विदा भेला। ओना, खेतक-मुँह आँखि नहियेँ देखने छला। मुदा तैयो पहुँचला। गहुम फसिल देख लाल बाबू खुश भेला। रघु कहलकैन- “डाक्‍टर साहैब, ई बीस-बिघबा प्‍लौट अपनेक छी। जइमे गहुम अछि। गामक पछबरिया बाघमे दस-बारह बीघा गहुम आरो कटबैक अछि। तीस-पैंतीसटा मजदूर कटनीमे लागल अछि। पाँच-छह दिनमे कटनी आ दू-तीन दिनमे दौनी करा निसचिन्‍त भऽ जाएब। किएक तँ अखन पछिया हवाक लहकी चलि रहल अछि। ई समए गहुमक कटनी आ दौनी लेल उत्तम अछि। ऐमे जे किसान पछुआएल ओ साल भरि कानत।” लाल बाबू बजला- “रघु, तूँ बड़ नीक विचार देलह। सएह करब। मुदा तूँ घर जा, नीकसँ भोजन बना बाबूजीकेँ भोजन कराबिहऽ आ हम कटनीक देख-भाल करै छी।” चैतक रौद चण्‍डाल रूप धेने छल जे डाक्टर लाल बाबूक कोमल देहकेँ कुम्‍हला देलकैन। घामे-पसीने जखन तर-बत्तर भऽ गेला तखन गाछ-वृक्षक खेाजमे नजैर दौड़बए लगला। खेतसँ किछे दूर हटि रस्‍ता कातमे एकटा आमक चतरल गाछ देखलैन। ओइ गाछक छाहैरमे जा सुस्‍ताए लगला। दिनक एगारह बजैत छल। बोनिहार सभ काटल गहुमक बोझ बान्‍हि दौनीक स्‍थानपर रखि-रखि अबै छल। गाछतर बैसल लाल बाबू अपन परिवारक दशा-दिशापर विचार करए लगला। एतेक जमीन आ सम्‍पैत अछि मुदा खेनिहार तँ दुइए बापुत छी..! फेर लाल बाबूक नजैर दोसर दिस बढ़लैन। जखन एतेक जमीन अछि। तखन हमरा गाम-घर छोड़ा शहरमे रखि डाक्‍टरी किए पढ़ौलैन? डाक्‍टरी-पढ़ाइ तँ विपरीत भेल। जखन एतेक जमीन अछि तखन एग्रीकल्‍चर-पढ़ाइ करितौं। उन्नत खेती करितौं। आ बेसी-सँ-बेसी लोककेँ मजदूरीक अवसरो...। गामक किसानीक विकास सेहो नीक जकाँ होइत। मुदा से तँ नै भेल। लाल बाबूक मनमे फेर उपकलैन। गामेमे रहि डाक्‍टरी बिना फिस-फास लेने करब। तहूसँ समाजक भलाइ हएत। संगे आधुनिक तरीकासँ खेतियो कराएब। रंग-बिरंगक विचार लाल बाबूक मनमे उठैत रहलैन। तखने दस-बारहटा स्‍कूलिया छात्र-छात्रा आबि ओही गाछ लग जिराए लगल। गामक विद्यार्थी। पाँच किलो मीटर दूर जा हाई-स्‍कूलमे पढ़ैत। डाक्‍टर लाल बाबूकेँ ने ओ विद्यार्थी सभ चिन्‍हैन आ ने लाले बाबू विद्यार्थी सभकेँ चिन्‍हैत रहथिन। लाल बाबू विद्यर्थी सभसँ परिचए-पात करए लगला।  जखन सभ कियो गामेक छी कहलकैन, तखन नि:संकोच बात हुअ लगल। चारू लड़कीसँ पढ़ाइक बात पुछलखिन। जइमे एकटा लड़की जे मैल-कुचैल वस्‍त्र पहिरने छलि, मुदा सुन्‍दर-शुशील छरहर काया, जेना चानकेँ मलिन करैत। डाक्‍टर लाल बाबू ओइ लड़कीसँ नाओं-पता पुछलखिन। ओ बचिया कहलकैन- “नाओं चम्‍पा छी, उतरवारि टोलक महेसरजीक एकलौती बेटी छी।” चम्‍पा पढ़ैयोमे तेज आ देहो-दशा छरहर। मैट्रिकमे प्रथम श्रेणीसँ उतीर्ण। इण्‍टरक तैयारी जीन-जानसँ करैत। लाल बाबू प्रभावित भेला। लगभग बीस मिनट समए निकैल गेल छल। सभ विद्यार्थी ओतएसँ विदा भऽ गेल। गहुमक कटनी सम्‍पन्‍न भेला पछाइत डाक्टर लाल बाबू घर आबि पिताजीसँ हाल-चाल पूछि दोसर खोराक दवाइ दऽ बजला- “बाबूजी, अखन अराम करू। हम नहा-खा कऽ गहुमक दौनी करए चलि जाएब।” साँझक समए भूषण बाबूसँ भेँट करए चारि-पाँचटा मित्र आ दूटा पड़ोसी एला। गप-सप्‍प हुअ लगल। बहुतो गपो भेल आ सलाहो-विचार भेल। जइमे भूषण बाबूक एकटा मित्र- गिरधारी बाबू- सलाह दैत कहलकैन- “केतेक दिन कष्‍ट काटब, जखन चुमौन अपने नै केलौं तँ बेटाक बिआह कऽ लिअ। बेटा डाक्‍टर भेल, ओ अपन डाक्‍टरी करत कि अहाँक सेवा करत। मुदा पुतोहु तँ घरमे रहती दुनू वक्‍तक भोजन समैपर भेटत आ घरक आनो काज देखती।” बातकेँ लोकैत आ आगूए दिस फेकैत दोसर मित्र- बिपीन बाबू- बजला- “यौ, यू.पी.मे अपने सबहक जाति अमर चन्‍द्र बाबू एस.डी.ओ. छैथ। हुनकर बेटी- रानी- बी.ए. पास कऽ मिडियाक कॉल-सेन्‍टरमे काजो करैए।” आनो लड़की सबहक चर्च भेल। मुदा भूषण बाबू उत्तर दैत बजला- “देखू हमरा तँ लाल बाबू एकेटा बेटा अछि। बिआह करैसँ पहिने हुनकोसँ राय-विचार ने करए पड़त। जँ इनकार चलि गेल तखन की हएत।” बिपीन बाबू बजला- “ओ कोनो पैघ समस्‍या तँ नै छी, अदनासन बात-ले बेसी मगजमारी किए करब। अखने डाक्‍टर साहैब लग जा विचार कऽ लइ छी।” उठि डाक्‍टर लाल बाबूक कोठलीमे जा गप-सप्‍प करए लगला। तही बीचमे बिआहक चर्च उठौलखिन आ केतेको उदाहरण देलखिन। मुदा डाक्‍टर लाल बाबू कोनो बच्‍चा तँ नै छैथ। अपन परिवारक स्‍थिति आ दिशा-दशा देखैत उत्तर दैत बजला- “बिआह करब मुदा पहिने हम अपन विचार सुना दइ छी, तैपर सभ कियो एकमत भऽ जाएब तखन ने।” बिपीन बाबू बजला- “अपने स्‍पष्‍ट भऽ कऽ बाजू ने जे की मत अछि। तखन ने एकमत हएब कि अनेक मत।” डाक्‍टर लाल बाबू बजला- “हम ओहन लड़कीसँ बिआह करब जे पढ़ल-लिखल हुअए आ किसानक बेटी हुअए। जे परिवारक काज करैत हमरो देखत आ हमरा पिताजीकेँ सेवो करत। शहरी नै गामक जिनगीसँ जुड़ल कुल-कन्‍या हुअए। बिना दाने-दहेज लेने बिआह करब।” बिपीन बाबूकेँ माथ चकरा गेलैन। समझबैत लाल बाबूकेँ कहलखिन- “देखू लाल बाबू, अहाँ पैघ कुल-खनदानक छी। अहाँक बरबैर परिवार अपना परोपट्टामे नै अछि। बिआहक सम्‍बन्‍ध तँ लोक बराबरीमे करैत अछि।” डाक्‍टर लाल बाबू चुप भऽ सोचि-विचारि बिपीन बाबूकेँ कहलखिन- “अपने पिताक समान छी। हमरा विचारसँ सभ मनुख एके जाति छी, भलेँ काज आ व्‍यवसाय अलग करैए। जिनका जइ काजक हूनर रहै छै ओ से काज करैत जिनगी चलबैए।” बिपीन बाबू बजला- “तखन आगू की करब, सेहो खुलि कऽ बाजू।” डाक्‍टर लाल बाबू अपन विचार स्‍पष्‍ट करैत आगू बजला- “लड़की खोजैले दूर-दूर जेबाक जरूरत नै अछि। अपने गामक उतरवारि टोलमे महेसरजीक पुत्री छैन, सुन्‍दर-सुशील सभ गुणसँ सम्‍पन्न। जँ सम्‍भव हुअए तँ सम्‍बन्‍ध करैक विचार कएल जाए।” ई बात सुनिते बिपीन बाबू तमसाइत उठि कऽ भूषण बाबू लग जा जोर-जोरसँ बजला- “बाबू साहैब, अपनेक बेटाक मति कुमति भऽ गेल अछि। ओ जाति-पाति किछ ने मानैए आ नीच जातिमे बिआह करैक मन बनौने अछि। जे कियो ने केलक से अहाँक बेटा करत आ समाजमे सबहक नाक कटा कुल-खनदानकेँ धँसा देत!” भूषण बाबू मित्रक बात सुनि तमसा गेला।मनमे जेनाआगि लगि गेलैन। मुदा मनक आगि मिझबैत विचार करए लगला। समस्‍या पैघ अछि जँ हूसि जाएब तँ नॉंहकमे सभ केलहा पानिमे चलि जाएत। निर्णए लेलैन- जेना बेटा खुशी रहत तहिना करए पड़त। अइले हमरा आमिल पीने आरो गड़बड़ हएत। एकलौता अछि, जँ कोनो दोसर दिस डेग बढ़ा लेत तँ नमहर मुसिबतमे फँसि जाएब। आगू-पाछू सोचैत भूषण बाबूक मनमे एलैन-  महेसर गरीब आ छोट जातिक छी, जँ सम्‍बन्‍ध करब तँ गामक लोक हँसत। आइ भलेँ बेटा पढ़ि-लिखि डाक्‍टर बनि गेल मुदा अछि तँ बच्‍चे। बच्‍चा मनमे अबिते भूषण बाबूकेँ मन पड़लैन,लाल बाबू अछि तँ बच्‍चेसँ जिद्दियाह आ एक बोलिया..! खण्‍डन-मण्‍डन करैत भूषण बाबू बेटा लग जा बजला- “बौआ, अहाँ एहेन निर्णए किए लेलौं?” डाक्‍टर लाल बाबू आदर-भावसँ पिताकेँ कहलखिन- “बाबूजी, अहाँ पुरना रीति-रेबाज, जाति-पाति, उच्‍च-नीचक भेद-भावकेँ मनसँ हटा कऽ देखियो-सोचियो तखन जे अहाँक हृदय कहत ओ मानि लेब। अहाँ जिनका गरीब, नीच माने छिऐन वएह लोक सभ काजो कऽ दइए आ दुख-सुखमे सहयोगो करैए। लोक काजसँ छोट-पैघ होइए मुदा इज्‍जतमे बरबैर होइए। सबहक देहमे लहू एके रंगक होइ छै। हुनके सबहक परिश्रमक बले समाज आ देश टिकल अछि। ई तँ लोकक नजैर बदलल छै जे नीककेँ अधला आ अधलाकेँ नीक बुझैए। आ लोके की, ई दोष बेवस्‍थाक छी।” बेटाक नीक बात सुनि भूषण बाबूक मन घूमि कऽ घुरियए लगलैन। घुरियाएले मने बिपीन बाबू आ पड़ोसिया सभ लग आबि बजला- “बेटा हमर जे निर्णय लऽ नेने अछि, से बदलत नै तँए सभ ओझरी छोड़ि बिआह केना सफल हएत तेकर उपाय करू।” बिपीन बाबू बजला- “ऐ काज लेल अगुआ के बनत। जे अगुआ बनबो करत तेकर मुँह समाजमे थकुचल जाएत।” भूषण बाबू- “मित्रक असल पहचान लोक दुखक समैमे करैए। अहाँ हमर लंगोटिया मित्र छी, ऐ दुखक घड़ीमे संग नै देब से केहेन हएत? ऐ काजक भार अहींकेँ दइ छी। काल्हिये अहाँ दू-तीन गोरे महेसरजीक घर जा एकान्‍तमे बसि समझा-बुझा कऽ मनाउ। तइले अहाँकेँ जे करए पड़त से अपने विवेकसँ करू। मुदा धियान राखब जे आन कियो ने सुनए।” तैपर पड़ोसिया- चन्‍दू- बाजल- “बेसी लोक किए जाएत, जखने बेसी लोक जाएत तखने काने-कान बीआ-बान भऽ जाएत। ऐ काजक लेल बिपीन बाबू असगरे फिट छैथ।” बिपीन बाबू- “जँ कहीं महेसर इनकार कऽ देत तखन?” भूषण बाबू- “तखन आग्रह-विनती करैत गपकेँ आगू बढ़ाएब।” बिपीन बाबू महेसर ऐठाम जेनाइ उचित नै बुझलैन। ओ सोचि-विचार कऽ रघुकेँ भेज महेसरकेँ बजा एकान्‍तमे बैस कहलखिन- “महेसरजी, अहाँ अपन बेटी चम्‍पाक बिआह डाक्‍टर लाल बाबूसँ करू। तँए अपनेकेँ बजेलौं हेन।” बात सुनि महेसरकेँ मजाक बूझि पड़लैन। बजला- “ई सभ कहि हमरा किए बेइज्‍जत करै छी। केतए हम आ केतए भूषण बाबू! केना हमरा ऐठाम सम्‍बन्‍ध करता..!” मुदा बिपीन बाबू भूषण बाबूक खाँटी मित्र छथिन। झूठ-फूसक भाँजमे कहियो ने रहैबला लोक छैथ। महेसर चूप। बिपीन बाबू महेसर दिस तकैथ आ महेसर बिपीन बाबू दिस। बहुतो परियाससँ महेसरकेँ सम्‍बन्‍ध करबा ले मना लेलखिन। बात मानिते मन हरियेलैन। मनक मौध टपकए लगलैन। खुशीक माहौल देख बिआहक दिन निश्‍तुकी भेल आ तैयारीमे सभ जुटि गेला। बिनु दहेजक बिआह, खूब धुम-धामसँ सम्‍पन्न भेल। मुदा जखन बेटीक विदाइक समए आएल तखुनका दृश्‍य देखल नै गेल। एतेक दर्दनाक रहए जे सबहक आँखिसँ नोर बहए लगल। जहिना दुलहा मइटुगर तहिना दुलहिनो। समाजक लोक सभ बाजए- चम्‍पाक माइक अभावक पुरा के करती। चम्‍पाकेँ सासुर बसने महेसर असगरे अनाथ जकाँ बुढ़ाड़ी केना काटत? चम्‍पा विदाइ भऽ सासुर गेली। सासुक अभाव भेने घरक काज अपनेसँ करए लगली। पुतोहुक लूरि-ढंग देख भूषण बाबू खुश रहए लगला। स्‍वर्गक समान घरक वातावरण बनि गेल। चम्‍पाक पिता असगरूआ। असगरूआ जिनगी भेने महेसरजीक घर नरक समान लगैत। किछु दिनक पछाइत अनचोकेमे भूषण बाबू महेसरजीक घर एला। अबिते समैधक दशा देख मन दुखा गेलैन। मनमे उठलैन, समैधक दुखक जिनगी केना बाँटल जाए? ..कनी कालक पछाइत भूषण बाबू बजला- “समैध, आब अपना सभ एक भेलौं। एक खून आ एक रिस्‍ताक परिवार भेल। अहाँकेँ असगर देख हमर विचार अछि जे एकेठाम एके परिवारमे रही। जेहने हमर बेटा पुतोहु तेहने अहूँक बेटी जमाए।” महेसरजीक मनमे केतेको बात आबए लगलैन। एक तँ ओहिना समाजक लोक रंग-बिरंगक बात बजैए, जे महेसर एना किए केलक। चम्‍पा गामक बेटी भेल आकि पुतोहु? भूषण आ महेसर गामक भैयारी भेला आकि समैध? इत्‍यादि...। आ तैपर बेटी ऐठाम रहब केते उचित..? O इज्‍जतक सवाल गामक मुँहपुरुख मुखिया चंचल बाबूक बहिनक बिआह छी। गौआँ सभ पहिनहिसँ नाचक ओरियान करैले मुखियाजीसँ कहने छेलैन। मुखियाजी नाचक कम्‍पनी यूसूफ रहमानकेँ बजा नाचक साटा बनौने छैथ। रहमान कम्‍पनीक नाच ऐ परोपट्टामे नामी अछि। जखने नङेरापर चोट पड़ैए कि कोस भरिक नाच देखनिहार जर हुअ लगैए। जहिना ऐ नाच पाटीमे एक-पर-एक नचनियाँ-गबैया अछि तहिना ढोलक-नङेराक संग आनो-आन साज-बाज। सभ साज-बाज आ नचनियाँ-गबैयाक संग ताल-मिलानी सेहो सुन्‍दर अछि। तेतबे नै, बीच-बीचमे रसमंजरी लेल लोकगीत आ भाव नृत्‍यक बेवस्‍था सेहो नीक अछि। जइमे इलाकाक मशहूर दूटा डान्‍सर कलाकार लखना आ बुचना अछि। एक तँ नाच मशहूर तैपर फिल्‍मी गीतक संग डान्‍सो होएत। दिनेमे मुखियाजी यूसूफ रहमानकेँ बजा कहलकैन- “देखह रहमान, आइ इज्‍जतक सवाल अछि। बरियातीसँ लऽ कऽ गौआँ-घरूआ सभ रहत, किनको कोनो अभाव नै होइ। नीकसँ नाच हुअए, कोनो हल्‍ला-फसाद ने उठए तेकर धियान रखिहह। जगह टेब नाचक मंच जेतए नीक बैसत से सभ अखने बना लएह। नाचक मेरियामे जेतेक कलाकार सभ छैथ, सभकेँ समैसँ पहिनहि बजा, खुआ-पीआ दिहक।” कम्‍पनी रहमानजी मुखियाजीक बात सुनि मंच बनबैक ओरियानमे भीर गेला। मंच बनि तैयार भऽ गेल। साँझक समए। नाचक सभ मेरिया पहुँच गेला मुदा दुनू डान्‍सर नै पहुँचल। कम्‍पनी रहमानजीकेँ चिन्‍ता बढ़ि गेलैन। इज्‍जतक सवाल अछि, जँ नाच गड़बड़ हएत तँ हमर कमाएल इज्‍जत माटिमे मिलि जाएत। ऐ समाजमे जे नाचक खातिर हमरा प्रतिष्‍ठा भेटल अछि से डूमि जाएत। लखना आ बुचना दोसर कम्‍पनीक नाचक मेरियामे नाचए गेल छल। ओना ओ साटा काल्‍हिये तकक रहै, मुदा नाच सुन्‍दर भेने दुनूकेँ रोकि नेने छल। दोसर कम्‍पनी लाल बिहारीसँ यूसूफ रहमानकेँ दोस्‍तियारे छैन। लाल बिहारी कोसी बेल्‍टक नामी नाच कम्‍पनी छैथ। कोसी बेल्‍टमे रंगदारियो बेसी छइहे, किछु रंगदार लाल बिहारीकेँ घेरने छल जे एक राति नाच देखा जइहह। जे पाइ लेबह से लिहह। कम्‍पनी लाल बिहारी सोचै छल जे बेसी रूपैआ हएत तँए दुनू डान्‍सरोकेँ बेसी रूपैआक लोभ देने छल। तैपरसँ चारि-पाँचटा भोलेन्‍टीयरकेँ सेहो लगौने छल जे कहीं लखन-बुचना भागि ने जाए। नाचो सबेर-सकाल शुरू करबाक छेलै। गामक लोक सभ नाच देखैले बेहाल। घर दरबज्‍जासँ सटले नमहर चौमास खसल छल। तहीमे नाचक स्‍टेज बनि तैयार छल। लाल बिहारीक मन चपचपाइत जे आइ हमर नाम अहू इलाकामे बढ़त। मुदा जे इज्‍जत नाच खातिर लाल बिहारी कमबए चाहै छल तइसँ बेसी रहमान कम्‍पनीकेँ इज्‍जतक सवाल छल।जौं आइ रहमानक नाच नै जमतै तँ कमाएल इज्‍जत माटिमे मिलि जेतइ। दोसर, मुखियाजीक इज्‍जत सेहो...। यूसूफ रहमानक मनमे शंका हुअ लगलै जे कोनो साजिश रचि लाल बिहारी हमरा संगे छल कऽ रहल अछि। से तँ हम अपना जीबैत नइ हुअ देबै। दोसर-तेसर साँझ पड़ल। तीनटा बलन्‍ठगर संगीकेँ संग कऽ रहमानजी लखना-बुचनाक खोजमे निकलल। चलैकाल रहमानजी नाचक मनेजरकेँ कहि देलक जे अहाँसभ समैपर नाचक ओरियान करब। हम बुझू गेलौं आ एलौं। रहमानजी चारू गोरे लफरैत कदमाहाक पूबारि टोल दिस चलल जे कोसीक छोटका धारक पूबरिया छींटपर भरिगर बस्‍ती अछि। छोटका नाहसँ पार भऽ लाल बिहारीक घर पहुँचल। लाल बिहारी दलानमे लोकक भीड़, अपने लाल बिहारी महींस दूहै छल। महींस दूहि ओही दूधक चाह बनत आ काजकर्ता सभकेँ पीऔत आ तेकर बाद नाचक ओरियान करत। घरसँ सटले नाचक स्‍टेज बनल देख रहमानजी बूझि गेला जे ऐ खातिर लाल बिहारी लखना-बुचनाकेँ रोकने अछि। रहमानजी दरबज्‍जासँ दूरे रहए तखने जोर-जोरसँ लाल बिहारीक नाओं लऽ लऽ पुकारए लगल। अवाज दैत लगमे पहुँचल आ बाजल- “हमर समांग लखना-बुचना केतए अछि, अखन तक गाम नै पहुँचल हेन?” लाल बिहारी किरिया खाइत बाजल- “जनता भगवान, हम सभ अखने कनियेँ पहिने गाम एलौं। बड़का केसीक ओइ पारसँ।  लखना-बुचना ओही पारमे नदी फीरैले गेल छल तखने नाह खुजि गेल। अखन रातिमे नाह नै आएल तँए ओ दुनूगोरे ओही पारमे रहि गेल।” मुदा रहमानजी नाचक ओरियान आ स्‍टेज बनल देखने, किछु ने नाचक खातिर लखना-बुचनाकेँ नुका कऽ रखने अछि। बाजल- “लाल बिहारीजी हमरा संगे अहाँ क्षल केलौं। दोस्‍तीमे कुश्‍ती करब की?” कहि रहमानजी बड़का कोसी दिस विदा भेल। बस्‍तीसँ हटि रहमानजी विचार केलक जे अछि तँ दुनू छौड़ा अहीठाम। से नइ तँ नाच शुरू होइसँ पहिने मेकप करबे करत। पहिने मेकप करत तखन ने स्‍टेजपर जाएत। तही घड़ी पकैड़ लेब आ गाम दिस विदा भऽ जाएब। एकटा संगी बाजल- “आ जखन गौआ सभ लंठै करत तखन की करब?” रहमानजी अपने रंगवाज, हिम्‍मतगर लोक। अपना जमानाक खलीफा। बाजल- “किछु ने कियो कऽ सकत। खाली दुनूकेँ पकड़ पहिने।” रहमानजी चारू गोरे भाँटा-बाड़ीमे नुका कऽ बैस गेल। किछु कालक बाद जखन नाचक सूरसार भेल तखन चारू गोरे सोझे मेकप रूममे जा दुनूकेँ पकड़लक। दुनू गोरेकेँ दुनू दिससँ दुनू गोरे दुनू बाँहि पकैड़ सोझे गाम दिस विदा भेल। लोक सभ देखते रहि गेल। जहिना पिंजरासँ पक्षी उड़ि जाइए तहिना। बुचनाकेँ रहमानजी कहलक- “एकोबेर बजलें तँ नस काटि धारमे भँसिया देबौ।” रहमानजीक बात सुनि दुनू छौड़ाक होश उड़ि गेल। छोटाक कोसी धार पार भऽ सिसौनीमे दूटा मोटर साइकिलक बेवस्‍था कऽ साढ़े दस बजे रातिमे स्‍टेज लग पहुँचल। नाचक स्‍टेजपर बाजा गनगनाइत छल। देखनिहार लोक करमान लगल छल। गौआँ सभ बरियातीक द्ववार लगबै छल। लखना-बुचनाक मेकप भेलै छेलै, स्‍टेजपर चढ़ा देलकै। प्रार्थनाक गीत भेला पछाइत फिल्‍मी गीत आ डान्‍स शुरू भेल- “परदेमे रहने दो परदा न उठाओ...।” बरियातीक स्‍वागतक पछाइत मुखियाजी रहमानक खोज केलैन। खोजैत नाचक स्‍टेज दिस एला। रहमानपर नजैर पड़िते मुखियाजी रहमानक मन दुखी देखलैन। पुछलखिन- “रहमान भाय, मन दुखी देखै छिअ! किछु भेलह हेन की?” रहमान बाजल- “भेल नै किछो मुदा कनी परेशानी तँ इज्‍जतक खातिर होइते छै।” मुखिया रहमानक बात नै बुझलैन। रहमान बाजल- “अखन अखुनका काज निपटए दिअ, काल्‍हि भिनसर सभ बात कहि सुनाएब।” O बेंगक महंथी जेठुआ समए गर्मीक तपिश आ उम्‍मस रहने हवा गुम-सुम भेल अछि। भण्‍डार कोणमे थोड़बे चिटफटाह करियाएल मेघ बूझि पड़ल। किछु बेंग बर्खाक आगम मानि टर्र-टर्र करए लगल। जखने भण्‍डार कोणमे मेघ जुटुआ देखाइए तँ लोको सभ अनुमान करए लगैए जे किछु-ने-किछु बरखा हेबे करत। तैपर बेंगक बोली सुनि पूर्णरूपेन लोक बूझि जाइए जे बरखा हएत। बरखा हएत तखने ने लोक बीआ-बालि पाड़त। भेल सएह। हवो उठल आ बरखो भेल। नीक बरखा भेल। खत्ता-डबरा भरि गेल आ खेतोमे डकरा हाल भऽ गेल। खत्ता-डबराकेँ भरने बेंग सभ अपन-अपन जगह पकैड़ टरटराए लगल। सभ बेंग खुशी मनबैत कियो टरटराइत तँ कियो गीत गबैत। तैबीच एकटा बेंग परवचन करए लगल- “हम बेंगमे श्रेष्‍ठ छी, ज्ञानी छी, से अहाँ सभ मानि लिअ। किएक तँ हम बरहमसिया बेंग छी। सबहक सभ दिन सेवो करैत सुखलो जमीनपर आ पानियोँमे दुख-सुख सहि जिनगी बितबै छी। मुदा अहाँ सभ तँ समैया बेंग छी। जखन बरखा होइए तखने भुरुकबा जकाँ भुक-दे उगि दर्शन दइ छी। बाँकी समए बिलाएले रहै छी। तँए अहाँ सभ अपनामे ठीकसँ विचारि कऽ हमरा काज-भार दिअ।” ढौंसा बेंग बाजल- “असल बेंग तँ हम सभ छी, अहाँ केना एते छोट रहैत नमहर पदक भार लेबए चाहै छी।” कठबेंग बाजल- “हमरा छोट अहाँ ने बुझै छी, मुदा पढ़ि-लिखि ज्ञानी बनि परवचन जे करै छी आ ज्ञान बँटै छी तखन महंथ केना ने बनब।” कठबेंगक बात सुनि एकटा ढौंसा बेंग ससैर कऽ कठबेंगक लगमे आबि बाजल- “अपने जे कहै छी ‘हम महंथ बनब’ से केना बनब? बेंग रहितो अपनेक महत बेंगक श्रेणीमे अछि केते? ढौंसा बेंग सामने अहाँकेँ के पूछत? असलमे बेंगक सरदार ढौंसा अछि। ओ केना अपन जातिक मुँह-पुरुखी अहाँकेँ दऽ देत? जे बजलौं से बजलौं, एतएसँ सोझे आपस भऽ जाउ।” कठबेंग बाजल- “एतेक दिन ने हम पछुआएल रही, मुदा अखैन तँ योग्‍य छी तखन अहाँ सभ महत्त किए ने देब।” ढौंसा बाजल- “अपने छोट भऽ कऽ एतेक छी  आ हमरामे जे सेरसँ लऽ कऽ अढ़ैया तकक अछि, जे अहाँकेँ कखनो खा-पचा सकैए, से किछु ने? छोट-मुँह आ नमहर बात! भागू नइ तँ सभटा परवचन घोंसाइर देब।” कठबेंग हिम्‍मतगर, हवा पीब देह हनुमान जकाँ फुलबए-बढ़बए लगल। तैबीच दोसर ढौंसा बेंग लग आएल आ बाजल- “अहाँक बनर-भुलकीसँ हम सभ थोड़बे डरब। अहाँ अखन धरि बेंग जातिक लेल की सभ केलिऐ हेन। ने जातिमे मिलि कऽ रहलिऐ आ ने कोनो तियागी-तपस्‍वी बनि जातिक उद्धार केलिऐ, तखन महंथी केना चाहै छी।” एमहर सभ बेंग अपन-अपन घेघ फुला-फलका भों-भाँ करए लगल। मुदा कठबेंग हेहर-थेथर बनि टससँ मस नइ भेल। तखने तेसर ढौंसा बेंग चौकन्ना होइत लग आएल, बूझि पड़ल जे जातिक सेरगर सरदार छी, बाजल- “अपने असलमे परवचन कर्ता छी आकि हाले-सालमे ढोंगी बनि जातिमे धाक जमबए चाहै छी? आइ धरि दोसराक सुनल परवचन केलिऐ कि अपन वचन लोककेँ सुनेलिऐ? जिगनी केहेन रहल अछि तैपर पहिने विचार करू तखन ने समाज महत देत जखन समाजिक जिनगी रहत।” सवालक जवाब दैत कठबेंग बाजल- “अहाँ सभ तँ असलमे अबसरवादी सामन्‍तवादी कमतिया छी सालमे तीन-चारि मास पानिक धनिक भेने दर्शन दइ छी, मुदा हम तँ बारहो मास सबहक सामने अपन समाजमे रहै छी। लोकक कल्‍याण करै छी। से केना सेहो सुनियेँ लिअ- जखन रौदी भेने लोक जट-जटीन बरखा खातिर खेलैए तखैन उक्‍खैरमे दऽ हमरा समाठसँ कुटैए आ हम बेदमोमे बाजि-बाजि मेघकेँ बजबै छी आ बरखा होइ छै। लोकक कल्‍याण होइ छै। हम केना ने लोकक हित-कल्‍याण लेल तियाग आ बलिदान करै छी? छैथ कियो हमरा सन तियागी, तँ हुनका सामने आनू, हुनके महंथी सभ मिलि दऽ देबैन।” कठबेंगक बात सुनि ढौंसा-सरदारकेँ मन गरमेलइ। गरमाइते लपैक कऽ कठबेंगक गरदैन पकैड़ कुश्‍ती करए लगल। मुदा हिमतगर कठबेंग, अपन जान गमबैले तैयार होइत डँटल रहल। एकाएकी बहुतो ढौंसा बेंग आएल आ सरदार बेंगकेँ कहलक- “सरदारजी, नाँहकमे अपन ऊर्जाकेँ किए नोकसान कऽ रहल छी। एतेक दिन अपना सभ महंथी नेने रही, मुदा आब किछु दिन हिनके महंथी दऽ दियौ। जखन जान गम्‍बैले तैयार अछि, माटिपर रहैक आदत छै, मानि कऽ चलू ने जे समाज लेल जरूर करत।” O [1] ओहन कवि जिनकर वाचा कर्मणा बहुत अन्‍तर रहैए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.ओम प्रकाश- गजल ३.३.बाबा बैद्यनाथ-आजाद गजल ३.४.जगदीश चन्द्र ठाकुर  अनिल- गजल ३.५. पल्लवी मण्डल-समय आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल गजल 1 हमरो समय बीति जेतै हुनको समय बीति जेतै ओकर इयादक सहारे सड़लो समय बीति जेतै उज्जर पीयर नील हरियर ललको समय बीति जेतै बंदूक संदूक जे छै तकरो समय बीति जेतै पुरना समयपर नै हँसियौ नवको समय बीति जेतै सभ  पाँतिमे 2212 + 2122 मात्राक्रम अछि अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि 2 ई  हँसी लाबा छै ओ खुशी भुज्जा छै छै हमर दुख काशी सुख हुनक काबा छै देह पूरा पूरी मोन किछु आधा छै ठोर छै तड़कुन सन आँखि बस डाबा छै राग रंगक सीमा प्रेममे बाधा छै सभ पाँतिमे 212+ 222 मात्राक्रम अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश गजल सिनेहक धधरा पजरल किए नै उछेहक सागर उमड़ल किए नै किछो नै रहलौं हम आब ओकर तखन ओ हमरा बिसरल किए नै कतेको धक्का सहि सहि बचल छै नगर ई यादिक उजड़ल किए नै हमर आँखिसँ खूनक नोर झहरै हुनक छवि मोनसँ ससरल किए नै जरै छी हम दिन आ राति सदिखन करेजा 'ओम'क कुहरल किए नै मात्राक्रम अछि 1-2-2-2, 2-2-2, 1-2-2 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बाबा बैद्यनाथ आजाद गजल जिनगी तँ अभिशप्त बनल अछि तइयो तिल-तिल जीबि रहल छी भाग्यक एहि फाटल गोनरिकेँ बूझू कहुना सीबि रहल छी नेनपनेसँ हमरा सभकियोअप्पन बनिकऽ ठगिते रहलै शंकर बनिकऽ तीक्ष्ण हलाहल सभदिनसँ हम पीबि रहल छी हे भगवान ई ककरो नहि दी संकटकेर भंडार एतेक पोरे-पोरे घायल अछि तेँ रक्त बनल हम चूबि रहल छी साँपक आगू नाचि रहल अछि ताल ठोकि ई बेंग कोना हाथमे छूरा आर तमंचा डरें  थर-थर लीबि रहल छी रोगग्रस्त एहि बूढ़ देहसँ आब तँ किछु नहि अर्जन होइए थाकल-मारल आश्रित, दोसर केर हमतँ  'परजीव' रहल छी आब एखन हम ऊबि गेल छी एहि जीवनसँ मरण नीक हो पाकल आम बनल हम देखू ठोपे-ठोपे तूबि रहल छी इएह संतोष बनल अछि "बाबा"दुनियाँ बड़ सम्मान दैत अछि सभक नजरिमे हम पूजाकेर मानू 'अक्षत-दूबि' रहल छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर  अनिल गजल ई जे घर आ आँगन    छै सबहक अप्पन जीवन छै छै कहियो बरखी ककरो  कहियो ककरो  मूड़न छै सकुनी के चलती  सभठां जै-जै ठां  दुरयोधन  छै कखनो ककरो  नै  टारू  सभ ले' ई  आयोजन  छै रावण- दहनक मेलामे  गनियौ  कत्ते  रावण  छै मात्रा–क्रम : 2222–222 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पल्लवी मण्डल, गाम बेरमा, जिला मधुबनी समय अहाँकेँ बनबाके अछि तँ समय जकाँ बनूँ जे निरन्तर चलैत अछि! चलैत रहैत अछि सदिखन ने किनको लेल रूकैत अछि आ ने किनकोसँ नफ़रत करैत आरो तेज चलैत अछि अपन काज ओ इमानदारीसँ करैत अछि चलि जाएत जे एक बेर अहाँ कानू वा माथा पीटू ओ आपस नहि आएत जँ चलब अहाँ समयक संग ई अहाँकेँ समयक दौड़मे परिवर्तित कए अहाँकेँ सफ़ल बनाएत समयक कियो खास नहि ओकर कियो अपन विश्वास नहि ने किनको बैसी, ने किनको कम समय अछि ई जे अछि सभक लेल एक रंग!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॊ शशिधर कुमर ऊद या ऊदबिलाड़ि (बाल कविता) कोना करै छै,  देखही  एकरा, ऊदमति    धऽ    लेलकैए । की छी ऊद आ केहेन ऊदमति, ककरा    धऽ    लेलकैए ?? ऊद छी जीव,  जमीनक बासी, तइयो छै  बड़  पानि  प्रिय । पानिमे  हेलए,  डुम्मी काटए, ओकरा छै  बड़  माछ प्रिय ।। देहमे  ओकरा  बड़ छै  फुर्ती, बुट्टी - बुट्टी   चमकै  छै । की जमीन, की पानिक भीतर, मस्त - मगन ओ रमकै छै ।। बैसि ने रहइछ  ओ  निचैनसँ, पानिमे करइछ  बड़ छलमल । तेँ कहबी छै - ऊदमति धेलकै, जकर  मोन  बेसी  चंचल ।। ऊदमति  मोन  ने  रहए थीर, लगले एम्हर, लगले ओम्हर । जेना  “ऊद”  ने  रहैछ  थीर, एखने एम्हर, एखने ओम्हर ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - ऊद वा ऊदबिलाड़ि मुख्यतः स्थलीय जीव अछि आ मीठ पानिक जलाशय सभसँ लऽ कऽ समुद्रक नोनगर पानि धरि भेटैछ । ओ मांसाहारी जीव अछि आ माछक शिकार करबामे बहुत माहिर होइत अछि । ओ पानिमे डुम्मी कटबामे आ गोंता लगएबामे अत्यन्त कुशल होइत अछि । बांग्लादेशमे एकरा पोशुआ बनाए प्रशिक्षित कएल जाइत अछि आ प्रशिक्षित ऊद मनुक्खक लेल नदीमेसँ माछ पकड़ि कऽ आनैत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  'विदेह' २१२ म अंक १५ अक्टूबर २०१६ (वर्ष ९ मास १०६ अंक २१२)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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