44 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २१३ म अंक ०१ नवम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०७ अंक २१३) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-छागरक बलिप्रदानपर चिन्तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्य २.२.प्रणव कुमार झा-लघु कथा- नव-आशा २.३.मनोज कुमार मंडल-किछु बीहनि कथा २.४.मनोज कुमार मंडल- युक्ति शक्ति (लघु कथा) ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- 3 टा गजल ३.२.ओम प्रकाश- गजल ३.३.मनोज कुमार मंडल- किछु गजल ३.४.मनोज कुमार मंडल- किछु कविता ४.बालानां कृते-मनोज कुमार मंडल- 3 टा बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेहक http://videha.co.in/ 1 जनवरी 2017 केर अंक निकलिते विदेह दसम बर्खमे प्रवेश कऽ जाएत। अइ अवसरपर विदेह गीत-संगीतक एलबम केर समीक्षा आदि प्रकाशित करबाक निर्णय लेलक अछि। छिटपुट प्रयासक अतिरिक्त शायद ई पहिल अवसर हेतै मैथिली पत्रिकारितामे जखन कि कोनो साहित्यिक पत्रिकाक कोनो एकटा अंकमे फिल्मी गीतक एलबम वा कि स्वतंत्र गीत-गजलक एलबम केर समीक्षा देबाक प्रयास वा निर्णय कएल गेल हुअए। संगीत समीक्षक लोकनिसँ आग्रह जे ओ कोनो एलबमक कोनो गीत-गजल-संगीत की पूरा एलबम केर समीक्षा पठाबथि। समीक्षा-लेख आदिमे गीत-संगीतक भाव पक्ष, टेक्नीकल पक्ष, शब्द चयन पक्ष, एडीटिंग पक्ष, मार्केटिंग पक्ष आदि केर वर्णन हुअए। लेखकेँ ggajendra@videha.com पर 1 दिसम्बर 2016 धरि पठाएल जाए।ऐ अंकमे समान्य रचना ओ स्थायी स्तंभ सभ सेहो रहबे करत। प्रयास रहत जे बेसीसँ बेसी गीत-गजल-संगीत आकि पूरा एलबमक समीक्षा आबए। ई-पत्र आदरणीय गजेंद्रजी छठि पाबैन के अशेष बधाई। विदेह के 212 म अंक पढलौं। सभ अंक सन इहो अंक नीक लागल। डॉ0 शशिधर कुमारक बाल कविता उदबिलाड़ी, बाबा बैद्यनाथ आ जगदीशजी के गजल आ जगदीश मंडलक कथा मुड़ियायल घर खूब पसन्द पड़ल प्रणव कुमार राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही,जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर),जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित रचनाकारक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-छागरक बलिप्रदानपर चिन्तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्य २.२.प्रणव कुमार झा-लघु कथा- नव-आशा २.३.मनोज कुमार मंडल-किछु बीहनि कथा २.४.मनोज कुमार मंडल- युक्ति शक्ति (लघु कथा) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र छागरक बलिप्रदानपर चिन्तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्य हम सोभाव आ कर्मसँ परम्परावादी छी। परम्पराकेँ मानबो करै छी आ परम्पराक सम्बन्धमे लिखबो करै छी तथा परम्परेमे जीवितो रहलौं अछि। परम्परामे बहुत नीको बात सभ अछि तेकरा बारेमे लोककेँ जाग्रत सेहो करैत रहै छी। परम्परा आ प्रकृतिमे सामंजस्य देखैत छी। मुदा परम्पराक पालन, प्रशंसा आ लेखनमे साकांक्ष सेहो रहै छी। परम्परा जे लोक विरूद्ध नहि हो, परम्परा जे हिंसक नहि हो, परम्परा जे केकरो शोषण अथवा दोहनक पुष्टि नहि करैत हो, वएह परम्परा अनुकरणीय परम्परा अछि...। जखन परम्पराकेँ अमानवीय पक्षपर कियो बात करैत अछि तँ ओकर विरोध होइत छइ। आ एक टटष्ठ शोधार्थी अथवा समाजिक बेकतीकेँ एहि तरहक विरोध सहबाक लेल तैयार रहक चाही। कनी सोचु, अगर राजा राममोहन राय सती-प्रथाकेँ विरोध नहि केने रहितैथ तँ आई की स्थिति रहैत? कोना परम्पराक नामपर जीबैत स्त्रीगणकेँ हुनक पतिक संग चितामे बलपूर्वक झोंइक हुनका जरा देल जाइ छल? आ लोकक सतीमाता केर जयकारक नादमे जरैत महिलाक दर्द, पीड़ाकेँ दबा देल जाइत छल। अखनो जखन परम्पराक नामपर मधुश्रावनी पाबैनमे नव विवाहित महिलाक ठेहुनकेँ टेमीसँ दागल जाइत अछि तँ हम इतिहासक गर्तमे चलि जाइ छी। जहिया सती जरैत छेली! मुदा नचार भऽ परम्पराक समक्ष अपने-आपकेँ असहाय बुझैत छी। छोटे स्तरपर किएक नहि, अपन विरोध अवश्य दर्ज करा लैत छी। जखन हमर विवाह भेल तँ अपन मधुश्रावनीमे हम किनको अपन पत्नीक ठेहुन दगबाक अनुमति नहि देलिऐन। थोड़ेक उपहासक पात्र बनलौं। स्त्रीगण सभ कियो ‘मौगियाह’ तँ कियो ‘घमण्डी’ कहलैन। सुनि लेलौं, मुदा ‘नइ’ कहि देलिऐन तँ नहियेँ करए देलिऐन। आब अबैत छी छागरक बलिदानक प्रथापर। अपन अनुभवक अधारपर कहि सकैत छी जे ई प्रथा बड्ड नीक परम्परा नहि अछि। छागरक बदला किछु और व्योंत हेबाक चाही जाहिसँ एहि प्रथाक अन्त हो। उत्सव, संस्कार विशेष रूपेण दुर्गापूजा, केतौ-केतौ काली पूजा, उपनयनमे घरक कुलदेवी अथवा कुलदेवताक समक्ष किंवा ब्रह्मस्थान आदिमे छागरक बलिदान जेना मनकेँ विचलित कऽ दैत अछि..! एहि बातकेँ अपन जीवनक दू अनुभवसँ जोड़ि कऽ देखै छी। एकमे नेना रही तँए लाचार आ दोसरमे परम्पराक आड़िमे माँ, बहिन, भाय लाचार कऽ देने छला। एक घटना पाबैन– दुर्गापूजासँ सम्बन्धित तँ दोसर संस्कार– उपनयन-सँ सम्बन्धित अछि। प्रारम्भ प्रथम घटनासँ करैत छी। नेना रही तँ दुर्गापूजा सँ सात मास पहिनहि एकटा छागर माँ कीनि लेने छेली बलिप्रदान लेल। भगवतीक नामे राखल छागर बान्हल कम आ खुजल बेसी रहै छल। दियाद सबहक बाड़ी-झाड़ीक तीमन तरकारी चरि जाइ तँ भगवतीक नामक कारणे कियो किछु ने बाजैथ। बहुत धियान राखल जाइक। पूरा बलन्ठ आ बोतो बनि गेलैक। अन्ततः अष्टमी दिन ओकरा हमसभ दुर्गास्थान लऽ गेलौं। पूजा पाठसँ पहिनहि ओ छागर दोसर टोलक छागरसँ लड़ल। सिंघसँ सिंघक युद्ध। हमर सबहक छागर जीत गेल। जयकार मचलइ..! आब ओहि एकरंगी कारी छागरकेँ पोखैरमे नहाएल गेल। गरदैनसँ रस्सी हटा दूटा कबगर समाँग ओकरा अपन कब्जामे लेने रहला। नहेला बाद छागरकेँ भगवती लग लऽ गेला। पण्डितजी खर्गक पूजा कऽ लेने छला। महाभयानक खर्ग। पैघ, धरगर, तेजगर आ प्रलयंकारी! हम रही ता बारह वर्षक नेना। आब भेल जे एते दिनक पोसल छागर बलि चढ़ि जाएत। आइ सभ किछु समाप्त। स्त्रीगण सभ गीत गेबामे मग्न। गाममे एक पहलमान छला। लोकक कहब रहै जे हुनकापर साक्षात् भगवती सवार भऽ जाइ छथिन। केहनो जुआएल छागरकेँ एक्केबेर-मे ओ धरसँ गरदैनकेँ अलग कऽ दैत छला। खर्ग उठेबासँ पहिने भगवतीक मुर्ती लग एक पैरपर हाथ जोड़ने एक घन्टा ठाढ़ रहैत छला। स्नान केलाक बाद लाल धोती आ बिनु सीअल वस्त्र पहिरने। जखन बाहर अबैत छला हाथमे खर्ग लेने तँ यमक सहोदर लगैत छला। लोक सभ कण्ठ फारि-फारि "दुर्गा महरानी की जय" केर नादसँ हुनका आरो विभत्स बना दैत छल। ओहि जयकारक अवाजमे छागरक अवाज जेना विलुप्त भऽ जाइत छल! खएर! पण्डितजी पूजा केलैन। मंत्र पढ़ला। फूल, अक्षत आ जल लऽ भिजल छागरक ऊपर फेकलथिन। छागर सिहैर उठल। भूल्लाक गरदैन हिलाबए लागल। कान पटकए लागल। सबहक मन खुशीसँ बताह। लोक चिचियाएल- "छागर परीक्षा लऽ लेलक।" समस्त विजयी मुश्कान। एकबेर फेर अवाज भेलै- "दुर्गा महरानी की जय।" आब छागरकेँ मन्दिरसँ बाहर लाएल गेल। भेलै ई जे दोसर टोलबला छागरकेँ पहिने बलिदान पड़तै। बलिदान देमए-बला अपन हाथमे खर्ग लेने बाहर आबि गेला। लोक सभ ‘जय-जयकार’ करैत रहल। छागर सभ कटैत रहल। भगवती लग एक माय केर सन्तान दोसर माय केर सन्तानक स्वाद, आयु, उन्नति, विकास लेल कटैत रहल। खूनक धार बहैत रहल। छागरक मेमियेनाइ जय-जयकार आ गीतक ध्वनिमे गौण होइत रहल...। हमर बाल्य-मन भरि रास्ता कनैत रहल। दुर्गा लग जा-जा ई पाँति बेर-बेर गबैत रहलौं- "गे माय, तोरा बेटाकेँ खाइत केना नीक लगलौ?” मन बेर-बेर असहाय छागरक काटल मुड़ीसँ बहैत शोनितक स्मरण कऽ रहल छल। लोकक जय-जयकार तेहेन जेना बुझि पड़ए कान फाड़ि देत। मनमे डर घुसि गेल। स्त्रीगणक समवेत गान आ दुर्गाक भजन सोहनगर नहि लागि रहल छल। घर एला बाद ओहि छागरक मौस बनल। ओना, ‘मौस’ कहैसँ माँ परहेज केने छेली। कहने छेली ई ‘दुर्गाक प्रसाद’ छी। दियादी परिवारमे प्रसादक बेन बँटाएल। अपनो घरमे रनहाएल। सभ खेलक खूब प्रेमसँ खेलक। परसन-पर-परसन लऽ कऽ खेलक। मुदा हम नहि खेलौं। माँ कहैत-कहैत रहि गेली मुदा हम नइ खेलौं। आब दोसर अनुभव दिस चली। हमर पुत्र शशांक केर उपनयन हएब निसचित भेल। तिथि छल, जून 2014 माने दू-अढ़ाइ साल पूर्व। हमर कनियाँ शाकाहारी छैथ। ओ किएक शाकाहारी छैथ तहूमे एक बलिप्रदानेसँ जुड़ल घटना अछि। हमर पूनम माछ-मौस खूब खाइत छेली। एकबेर–भाइक उपनैनमे–छागरक बलि चढ़लै। ओहो अपना आँखिए देखलखिन। अतेक वीभत्स लगलैन जे ओही दिनसँ माछ-मौस खेनाइ छोड़ि देलैन। तेतबे नहि, हिनकर अनुकरण करैत अपन छोट बहिन सेहो शाकाहारी भऽ गेलैन। ..जखन हमर पुत्र शशांक माँक शाकाहारी प्रवृतिकेँ देखलैन तँ ओहो शाकाहारी भऽ गेला। हमरा एहिसँ कुनो समस्या नहि अछि। जे खाए चाहै छैथ खाथु जे नहि चाहैत छैथ नहि खाथु। मुदा एहिसँ एक चीज तँ स्पष्ट भाइए गेल जे हमर पत्नी, हम आ हमर पुत्र तीनू गोरे छागरक बलिप्रदानक पक्षमे साफे नहि छी। खएर, संस्मरणकेँ आगाँ बढ़बैत छी। हमर गामक एक संस्कृतक विद्वान पण्डित- राघवेन्द्र झा दिल्लीक स्कूलमे शिक्षक छैथ। वएह हमर पुत्रक उपनयनक दिन निर्धारित केलैन। पण्डित राघवेन्द्र झाजी स्वयं वैष्णव छैथ। हम अपन समस्या हुनका समक्ष राखल। ओ कहलैन- “एकर उपचार छै, अहाँ चिन्ता नहि करू। जेतेक ओजनक छागर छै तेतेक पसेरी मिठाइ अर्थात् लड्डू भगवतीकेँ आ ब्रह्मस्थानमे सेहो चढ़ा देयौ।” हुनकर एहि व्योंतसँ हम तीनू परानी बड्ड प्रसन्न भेलौं। दोसरे दिन हम गामपर माँ, भैया एवं अन्य सम्बन्धीकेँ उपनयनक दिनक सम्बन्धमे जानकारी दैत सभ तैयारी करबाक निवेदन कएल। तेसरे दिन माँक फोन आबि गेल जे ओ पाँचटा छागरक बेवस्था कऽ लेलीह। ई सुनिते हमर माथ पकैड़ लेलक। गृहयुद्धक पृष्ठभूमि बनि गेल परिवारमे। माँ अपना आगूमे केकरो टेरती नहि, आ पत्नी छागरक बलि लेल तैयार नहि हेती। पुत्र सेहो अपन माइयेक पक्षमे रहता...। अन्तत: हम हिम्मत करैत माँसँ निवेदन केलौं- “मॉं, राघवेन्द्र-गुरुजीक कहब छैन जे जेतेक छागर तेतेक पसेरी लड्डूसँ काज चलि जाएत।” माँ हमर व्योंत सुनिते बिकराल रूप पकैड़ लेली- “की कहैत छी? अहाँ सभ आब देवता-पितर सभकेँ समाप्त करए चाहैत छी? छोटकी काकी[1] मरैसँ पहिने कहलैन ‘कैलाशक माय, सुनु हम आब नहि बाँचब। मुदा अहाँ चिन्ता नहि करू। हम भगबान लग जा भगबानसँ लड़ि कऽ कैलाश लेल बेटा भेजब। अहाँ एक काज करब एकरा बदलामे अहाँ एकटा एकवर्ण कारी-छागर अँगनाक भगवतीकेँ आ एकटा एकवर्ण-छागर ब्रह्मबाबाकेँ ओहि बच्चाक उपनयनक समयमे चढ़ा देबैन। छोटकी काकी थोड़बे दिनमे मरि गेली। आ हुनक पहिल बरखीसँ पहिने शशांकक जन्म भऽ गेलैन। बिसैर गेलौं की?” माँ ई कहैत फ़ोन हमर भौजीकेँ दऽ देलथिन। आब भौजी शुरू भेली- “देखू बौआ! अहाँ दुनू परानी जे करब से करू। मुदा शशांक लेल कुनो अशुभ ठाढ़ नहि करू। बुझल अछि, हमर बाबा वैष्णव छैथ मुदा जखन छागर चढ़ै छै तँ बलि-प्रदानक भूमिसँ एक ठोप रक्त भगवतीक प्रसाद मानि अपना जीभसँ अवश्य सटबैत छैथ। माँ ठीके कहैत छैथ। छोटकी दाइ भरि अँगनामे शशांक लेल कबुला-पाती केने छेली। निसचित रूपसँ ओ भगबानसँ लड़ि कऽ शशांक अहाँ सभ लेल भेजलैन अछि। जे परम्परा अदौंसँ आबि रहल छै तेकरा अहाँ सभ केना समाप्त कऽ देबइ! अहाँ मर्द बनू आ बेटाक शुभकार्य करू। पूनमकेँ बुझा दियौन जे हुनकर दालि एतए नहि गलतैन। जहाँ तक छागरक दामक प्रश्न अछि तँ कुनो बात नहि। शशांक हमर सबहक बेटा पहिने अछि आ अहाँ सबहक बादमे। हम छागरक दाम दऽ दइ छी। एकर अतिरिक्त अहाँ सभ जेतेक मिठाइ, लड्डू आ छप्पन भोग करब से करू। कियो ने मना करत।” अहि तरहेँ माँकेँ तैयार कएल विचारकेँ भौजी ठोस भावनात्मक अधार दऽ देलैन। सभसँ पैघ बात ई जे अपन बात कहि भौजी बिनु हमर बात सुननहि फोन काटि देली। हम चाहियो कऽ अपन पत्नी लग ई बात नहि बजलौं, मुदा रणभूमि युद्ध लेल तैयार भऽ चुकल छल। ओही दिन रातिमे मामाक फोन सेहो आएल। कहलैन- “बौआ, कुनो एहेन काज नहि करू जइसँ बहिनकेँ अहाँक पिताक कमी अनुभव होनि। ई हुनकर अन्तिम पोताक उपनयन छिऐन। अही लेल आइ धरि एकादशी यज्ञक उद्यापन नहि केली। अहाँ सभ जखन अपन पोताकेँ उपनयन करब तँ जेना-जे इच्छा हएत सएह करब। ताबेत धरि ने बहिन रहती आ ने हम। आधा घन्टा धरि फोनपर कनैत छेली। हुनका अनिष्ट केर आशंका भऽ रहल छैन। हमरा कहै छेली जे जहियासँ कैलाशक ओहि परिवारमे विवाह केला, तहियासँ सभ संस्कार बिसरने जा रहल छैथ। अगर छागरक बलिप्रदान नहि हएत तँ हम कुनो आर गाम चलि जाएब। घुमि कऽ ऐ नग्रमे प्रवेश नहि करब। मरला उत्तर हम कैलाशक पिताकेँ की कहबैन जे तमाम मर्यादाकेँ सर्वनाश कऽ हम आबि रहल छी! आब मिसर अर्थात अहाँक पिता नहि छैथ ताहि सम्बन्धमे श्रेष्ठ रहबाक कारण हमर ई उत्तरदायित्व होइत अछि जे अहाँ सभकेँ उचित रस्ता देखाबी। अहाँ हमेशा अपन माता-पिताक आज्ञाकारी रहल छी, कैलाश। कम-सँ-कम ऐ उपनयन धरि ई परम्पराकेँ कायम राखू। रहल कनियाँक प्रश्न तँ अहाँक मामी कहैत छैथ जे ओ अपन पुतोहु अर्थात् शशांक केर मायकेँ समझा-बुझा देथिन।” ऐतेक बात कहि मामा सेहो अपन फोन बिना हमर बात सुननहि काटि देलैन! हमर माथ भारी भऽ गेल। ब्लड-पेसर बढ़ि गेल। माथ घुमय लागल। ऑंखिक आगू पूज्य पिताजी आबि गेला। होइत छल जे अगर पिताजी रहितैथ तँ अवश्य हमरा भावनाकेँ बुझितैथ..! मामा आ भैया तँ एक नम्मर-के पुरानपंथी छैथ। पिताजी हमेशा श्राद्धमे सांढ़ दागबकेँ विरोध करै छला, विरोधी छला। मुदा जखन ओ मरला तँ माँ आ मामा जिद्द ठानि देलैन जे ब्रिखोद्सर्ग श्राद्ध आ सांढ़ दागब अनिवार्य। माँ कहली जे हुनका परिवारमे केकरो अइक बिना श्राद्ध नहि होइत छैन। भावनामे बहैत माँ कहली अगर हमरा अछैत अहाँ सभ अपन पिता लेल ई नहि करब तँ हमर की करब? अन्तमे माँ आ मामाक जिद्दक आगाँ नतमस्तक होइत हम सांढ़ दगबा लेल तैयार भऽ गेलौं। एहि प्रकरणमे भैया सेहो जूमक-जूम तमाकुल खाइत रहला आ मुड़ी डोला-डोला माँ आ मामाक हँ-मे-हँ मिलबैत रहला। आब भयसँ कण्ठ सुखा रहल छल। परम्परा हमरा परास्त कऽ रहल छल। सभ शिक्षा, सभ तर्क धराशायी भऽ रहल छल। भावना ज्ञानकेँ ध्वस्त कऽ रहल छल..! भेल कनी पानि पीबी। पानि-दे पत्नीकेँ कहए चाहलयैन कि बिच्चेमे भैयाक फोन आबि गेल। नहियोँ चाहैत फोन उठा लेलौं। ‘हेलो भौया!’ कहिते मातर भैया दुर्वाषाक रौर्द रूपमे आबि गेला- “ई की भेल! हम अधा घन्टासँ फोन कऽ रहल छी आ अहाँक फोन व्यस्त जा रहल अछि? अहाँ सभ हरेक चीजकेँ मजाक बना देने छी!” हम कनी झल्लाइत मुदा विनम्र भावे भैयाकेँ कहलयैन- “भैया, हम मामासँ गप्प करैत रही। हुनके फोन ऐल छल।” ई बात सुनि भैयाक तामस थोड़ेक शान्त भेलैन। फेर शुरू भेला- “बौआ, एकटा बात मोन अछि। जखन पिताजी दरभंगासँ पटना लऽ जएबाक क्रममे रस्तामे अपन अन्तिम साँस लेलैन तँ हम अहाँकेँ की कहने रही?” हम जवाब दितयैन कि ओइसँ पहिनहि ओ स्वयं बाजए लगला- “हम अहाँकेँ कहने रही जे हमर पिता मरला अछि, अहाँक नहि। आईसँ अहाँक पिता हम छी। कहू कहने रही की नहि?” हम बजलौं- “हाँ भैया, अहाँ कहने रही। आ सैह मर्यादाक पालन अहाँ एखन धरि कऽ रहल छी।” भैया दम्माक रोगी छैथ, तँए जोर-जोरसँ हकमबो करैथ बजबो करैथ- “आब अहाँ कहू, जे हमरा रहैत शशांकक उपनयनक दिन ताकए-बला अहाँ के?” भैया भावनामे कनबो करैथ आ बजबो करैथ- “फेरो, केना करक अछि, की करक अछि। केहेन भोज करक अछि, इत्यादिपर अहाँक की निर्णय? ई निर्णय तँ हमरा लेबाक अछि। अहाँ राखू अप्पन पाइ। हम करब शशांकक उपनयन। माँ दिन भरिसँ अन-पानि तियागने छैथ। बुझल अछि अहाँकेँ? सुनू, अहाँ सबहक खटराग नहि चलत। माँ तँ पाँचटा छागर किनली अछि। हम पाँचटा आरो कीनब। देखै छी हमरा के रोकि लैत अछि? कनियाकेँ कहि दियौन जे अपन सभ नियम दिल्लीए-मे राखैथ। एतय हमर नियम चलत। ऐ घरक मुखिया पिताजीक पछाइत हम छी। आर कियो नहि। अहाँ सम्बन्धमे हमर छोट भाए जरुर छी मुदा हम अहाँ के कहियो अपन पुत्रसँ कम नहि मानल अछि।” भैया ई बात सभ कनैत कहैत रहला आ जखन अपन बात कहल भऽ गेलैन तँ फोन राखि देलैन। हम प्रलयमे पड़ि गेलौं। करी तँ की करी? किंकर्तव्यविमूढ़ भेल किछुकाल ठाढ़ रहलौं। मनमे उठल- आब पत्नीकेँ की कहबैन? ओ तँ छागरक बलिप्रदानबला बात लेल किन्नहु तैयार नहि हेती! “दुःख हरहु द्वारकानाथ शरणमे तेरी..।” अही गुनधुनमे पड़ल रही, कि एतबेमे हमर सासु आबि गेली, हमरा सभसँ भेट करबाक हेतु। हमरा लग अबिते बजली- “की मिसरजी, कुनो चिन्तामे छैथ की?” हम चुपे रहलौं। फेर ओ हमरा अपना लग बैसा सभ बात पुछए लगली। हम सभ बात बता देलिऐन। ओ कनी गंभीर भेली, कारण हमर पत्नीक उग्र सोभावसँ ओ परिचित रहबे करैथ। फेर निर्णयक मुद्रामे अबैत बजली- “मिसरजी, ओना हमहूँ बलिप्रदानक विरोधीए छी, मुदा हिनकर परिवारक लोक सभकेँ कियो नहि बुझा सकैतैन। ई चिन्ता जुनि करौथ, हम पूनमकेँ समझा दइ छिऐ।” हमर सबहक बात चलिए रहल छल कि हमर मामी हमर पत्नीकेँ फोन केलथिन। आब हमर मन घबराए लगल। भेल आब भयंकर कलह हएत घरमे। ईहो डर छल जे पूनम ने कहीं तामसमे हमरा मामीकेँ किछु अन्ट-शन्ट बात कहि दनि! ..खएर, सासु हमर भावनाकेँ बुझि गेली। ओ पूनम लग जा हाथक इसारासँ कहलथिन जे शान्तिसँ गप्प करैथ...। मुदा आशाक विपरीत मामी जनु पूनमे-सन बात बजली। तथापि ई कहलखिन जे हमर नैहरमे बलिदान बन्द भऽ गेल अछि। मुदा मामा सभ एहि बातकेँ कखनो मानैले तैयार नहि। तैपर मामी पूनमकेँ बुझबैत कहलथिन- “की करबै कनियाँ, दीदी आब कते दिन रहती। हुनकर बात मानि जाउ। अहीमे बच्चोकेँ आ अहूँ सबहक कल्याण अछि। नहि तँ ओ सभ पाहुन-परक लग यएह बातक चर्चा करैत रहती।” पूनम छेली अन्तत: एक माए। ई सोचैत जे बच्चा के उपनयनमे कुनो अवग्रह नहि हो मामीक बात मानि गेली। जखन उपनयन प्रारम्भ भेल तँ घरक भगवती लग छागरकेँ जाबे तक परीक्षा भेलै ताबे तक हमर पत्नी, पुत्र आ हम रहलौं। घरक सभसँ पैघ हेबाक कारणे भैया लाल धोती पहिरने भगवती-पूजा लग हमरा संगे बैसल रहला। विजय प्राप्त केलैन आ बलिप्रदान अन्ततः भऽ रहल छेलै ऐ बातक आत्मिक संतुष्टि छलैन। आभा मण्डल जीतक घमण्डमे चमकैत रहैन। शरीरसँ खिन्न भेल माँ सेहो बड़ आह्लादित छेली। भौजी कण्ठ फारि-फारि स्त्रीगण सबहक-संगे गीत गाबि रहल छेली। माँक संग-संग हमर दुनू बहिन सेहो उत्साहित छेली। माँकेँ आ भैयाकेँ आब हमरासँ कुनो शिकबा-शिकायत नहि छेलैन...। अस्तु, एकर विपरीत एकर ‘हम’ हारल, थाकल, लगैत रही। एतेक पैघ उत्सव मुदा आनन्द नइ लऽ पबैत रही। खचाखच भरल भीड़मे असगर..! मुदा संतोषक बात ई छल जे सदिखन तामसे घोर रहैबाली हमर ‘पुनम’ आइ एक मातृत्वक सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत एकदम शान्त छेली। सभ विध-बेवहारकेँ ओही तरहेँ पालन कऽ रहल छेली जेना हमर माँ, हमर बहिन आ ऑंगनमे उपस्थित बुढ़-पुरान सभ निर्देशित करैत छेलखिन। जेना कि पहिनहि निर्धारित रहै, जखने बलिदानक समय एलै कि हम सभ ओतएसँ हटि गेलौं। दू दिनक बाद माँ कहलैन- “पिपही बजबैत शशांक, शशांक केर माता-पिता आ परिवारक सभ सदस्य ब्रह्मस्थान जाएब। आ ब्रह्मबाबाक पूजा अर्चना हेतैन आ ओत्तो जोड़ा छागर चढ़तै।” हम सभ हुनकर आज्ञाकेँ मानैत विदा भेलौं। पूजा अर्चनाक पछाइत, जखन छागरकेँ बलि चढ़बैक सुरसार भेल, तखने हमर नेन-कालक मित्र-पण्डित कहलैन- “कैलाश भाइ, अहाँ ठाढ़ रहू।” हमरा मनमे उठल, जखन सभठाम हारि मानिए लेलौं तँ..। तँए एतौ अपना-आपकेँ समर्पण कऽ देलौं। पहिल छागर तँ एक्केबेर-मे कटि गेलैक मुदा दोसर छागर बेरमे–जइ छागरकेँ रस्सीसँ गरदैन गतानल रहइ–गरदैनक रस्सी टुटि गेलइ। आब अधा गरदैन काटल छागर दौड़ए लगलै। शोनितक धार फुचक्का जकाँ बहए लगलैक। बहुत विभत्स दृश्य भऽ गेलइ। पछाइत लोक हिम्मत केलक। छागरकेँ पकैड़ खर्गसँ ओकर गरदैनकेँ रेति बलि चढ़ौल। बलि देबए-बलाकेँ धोती आ सौंसे देह छागरक रक्तसँ रंगा गेलैक। मुदा ओ एहि बातसँ प्रसन्न छल जे बलिप्रदानक बदलामे ओकरा जोड़ भरि लाल धोती आ 101 टाका नगद भेटलैक। अपन मन घोर भेल छल। अपन कायरतापर मने-मन पश्चाताप होइत रहए। सभ शिक्षा, सभ ज्ञान, सभ सेमिनार आ पब्लिक भीड़मे बजबाक क्षमता सुड्डाह भऽ गेल छल। मनमे ई जरुर अबैत छल जे एतेक विवश केना भऽ गेलौं हम? मनकेँ कुनो कोनमे छिपल दुष्ट जेना बेर-बेर हमर पौरुष आ निर्णय-क्षमतापर अट्टहास कऽ रहल हो..! अस्तु, आब बुझैमे आबि रहल अछि जे राजा राममोहन राय सन समाज सुधारक बनब कतेक दुष्कर कार्य अछि। जे समाज हमरा एकटा बलिप्रदान सन प्रथाकेँ, समाज परिवार तँ दूर अपन बेटाक उपनयनमे नहि समाप्त करए देलक, वएह समाज 19म शदीमे केना राजा राममोहन रायकेँ सती-प्रथा सन विशाल प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल जनजागरण करए देने हेतैन? केना परम्परा, धर्म, तंत्र आ पुन्यक मोहजालमे पुरुष प्रधान समाजकेँ धियानमे रखैत जीवैत स्त्रीगणकेँ मृत पतिक संगे ओही चितामे बैसा, सुन्दर लाल-पीयर बिऔहती नुआ-अंगी-लहठी-गहना पहिरा; लाल सिन्दुरसँ मांग भरि अग्निमे जरा दैत छल! ई पूण्य भेल की नृशंसता? ई सोहागिनक सम्मान भेल आकि मातृशक्तिक अपमान? ई सभ्य समाजक कृत्य भेल आकि हत्याराक अपराध? वेचारी स्त्री केना जीबैत जरैत छल हेती? आ लोक सभ सती माताक गीतक जय-जयकारमे केना हुनकर क्रंदन आ वेदनाकेँ समाप्त कऽ दैत छल हएत! कहल जाइत अछि जे राजा राममोहन रायक जेठ भौजी हुनका पुत्रतुल्य मानैत छलथिन। जखन हुनका पता चललैन जे ई सती-प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल आन्दोलन कऽ रहल छैथ आ अइक विरुद्ध अंग्रेजसँ मिलि कऽ कानून पास करबा रहल छैथ तँ ओही दिनसँ ओ राममोहन रायसँ बातचीत बन्न कऽ देलथिन। अपन पुत्रवत् देओरकेँ घृणा करै लगलैथ। आ ओहू स्थितिक सामना करैत ई महापुरुष अपन संघर्षमे लागल रहला। सतीप्रथाक अमानवीय रूढ़ अन्ततः टुटल, समाप्त भेल। अगर ‘सती-प्रथा’ गलत छल तँ ‘छागरक बलिप्रदान-प्रथा’ सेहो गलत अछि। एकरो समाप्त भऽ जएबाक चाही। कतेक लोक ई तर्क दैत छैथ जे मिथिला तंत्रक केन्द्र रहल अछि। एतुक्का लोक शक्तिक उपासक छैथ। की एतए छागरक बलिप्रदान उचित अछि? ओना, कतेक लोकक ईहो तर्क छैन जे दिल्ली, कलकता, मुम्बई आदि महानगरमे बुचरखानामे विभत्स दृश्य होइत अछि, छागरकेँ काटि कऽ दोकान सभमे उघारे टाँगि कऽ लोक रखने रहैत अछि। ऐ सभकेँ विरोध किएक नहि होइत अछि। अगर से नहि तँ भगवती घर, ब्रह्मस्थान, मन्दिर परिसर आदिमे बलिप्रदानपर विरोध कथी लेल? हमर बहुत मित्र सभ सेहो हमरासँ नाराज छैथ जे हम एहि बातकेँ अनेरे प्रचार कऽ रहल छी। किछु लोक आ मित्र सभ तँ हमरा विधर्मी कहैत छैथ। बहुत लोककेँ नहि बुझल छैन जे परम्परा आ हमरा मध्य साँस आ शरीरक सम्बन्ध अछि। हम प्रति दिन पूजा करैत छी, देव तर्पण, ऋषि तर्पण आ पितृतर्पण करैत छी। मुदा हमरा ईहो लगैत अछि जे मन्दिर परिसर, भगवती घर आ ब्रह्मस्थान आदि सार्वजनिक स्थान थिक। ओतए कुनो तरहक बलिप्रदान नहि हो। बदलैत समयमे लोक धोती पहिरनाइ छोड़ि देलैथ, बहुत स्त्रीगण सभ सेहो आब उत्सव इत्यादिमे मात्र साड़ी पहिरै छैथ, घरही लोक मुर्गाक मौस खाइत अछि, पीयाउज, लहसुन सहरगंजा भऽ गेल, एहि सभ कर्म लेल धर्म अहाँकेँ किछु ने कहैत अछि मुदा छागरक बलिप्रदान छोड़ि देलासँ अहाँक धर्म भ्रष्ट भऽ जाएत! अहाँ पापक रस्ता दिस चलि पड़ब। वाह रे सोच! जेतेक माछ, मौस खेबाक अछि खाउ। के मना करैत अछि। मुदा पवित्र परिसरकेँ रक्तमय नहि बनाउ। भऽ सकैत अछि नर बलि प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल छागरक एवं अन्य जीव केर बलिक प्रथा प्रारम्भ भेल हो। आब ओकरो बन्द करू। छागरक बदला बेल, कुम्हर आदिकेँ प्रतीक रुपे बलि पड़िते अछि। होबए दियौक। ओकरेमे आरो नीक विधि-विधान जोड़ू। नागा जनजातिमे किछु वर्ष पूर्व धरि नर-बलि केर प्रथा छेलइ। नागाक हेड हंटर अथवा सिरकेँ शिकारी कहल जाइत छेलइ। नागा आब अपनामे सुधार केलक आ ऐ प्रथाकेँ समूल समाप्त केलक। नर-बलि प्रथाकेँ आब स्वांग, नृत्य आ नाटकक रूपमे मनबैत अछि। हमरो सभकेँ एहिपर गंभीरता पूर्वक सोचबाक खगता अछि। संतोषक विषय ई अछि जे ‘पण्डित’ आ ‘कर्मकाण्डी’क एक पैघ-वर्ग छागर बलिकेँ समाप्त करए चाहै छैथ। वो सभ एकर बदलामे फल, मिठाई एवं अन्य शास्त्र सम्मत विधान बतेबा लेल तत्पर छैथ। केतेको लोक एहि प्रथाकेँ छोड़ियो देने छैथ आ छोड़रो रहल छैथ। एक सर्वसम्मति निर्णय हो। सबहक सहमति हो। सबहक सहभागिता हो। सबहक विचारसँ एकर विकल्प (अल्टरनेटिव) दिस धियान जाए आ ई प्रथा समाप्त हुअए। निर्णय सबहक हो, सहमति सबहक हो, केकरो बीच द्वेष नहि हो आ नव प्रथाक सूत्रपात हो जे सभ लेल कल्याणकारी हो। एहने प्रथाक प्रारम्भ हएत से आशा करैत छी। सम्पर्क- मो. [1] हमर पिताक पितियाइन ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव कुमार झा-लघु कथा- नव-आशा मीरा आई पहिल बेर हवाई जहाज के यात्रा क रहल छली; पटना सं बैंगलोर वाया दिल्ली । पटना सं त ओ दिल्ली पहूंच गेल छली मुदा दिल्ली से बैंगलुरू क फ़्लाईट दू घंटा बाद छल । मीरा इंदिरा गांधी हवाई अड्डा के प्रतीक्षालय में बैसल इंतजार क रहल छली। दरअसल बात ई छल जे ओ अपन एकटा छात्रा आशा क विवाह में शामिल होई खातिर बैंगलुरू जा रहल छली । मीरा के विशेष रूप सं आशा न्योत देने छल आ हिनका लेल न्योत के संगहि हवाई-जहाजक टिकट पठौने छल । आ सब सं विशेष गप्प ई जे, जै फ़्लाईट सं मीरा दिल्ली सं बैंगलोर जाई बला छैथ ओकर पाईलट आर कियौ नै बल्कि आशा क होमय बला वर आकाश कुमार छैथ । बैसल बैसल मीरा क मोन अतीत क यात्रा करय लागलैन। मीरा गामक मध्य विद्यालय में शिक्षिका छथिन । एकटा निक शिक्षिका, जे धिया-पुता के खुब मानै वाली । बात किछु १५ – १६ बरष पहिले के आछि । मीरा शिक्षिका के व्यवसाय के अपनौने छलि त इ मूल-मंत्र के संगे जे "सब बच्चा भगवतीक संतान थीक आ ओकरा लाड-दुलार केनाई मनुक्खक कर्तव्य" । किन्तु हुनकर कक्षा में एकटा बचिया आबै छल जेकर नाम छल "आशा" । आन बच्चा सब त ठिक-ठाक सं रहै छल मुदा आशा नै ढंग सं स्कूलड्रेस पहिरै छल, नै ओकर किताब-बस्ता ओरियाईल रहैत छल । नै माथ मे तेल देने नै ठिक सं केस थकरने। मैल-कुचैल में लपटायल! इ सब देख मीरा के ओकरा स घीन आबै छल । आ ओ चाहितो ओकरा नै ठीक सं पढा पाबै छलि आ नै ओकरा सं दुलार क पाबै छलि, अपितु यदा-कदा ओकरा दुत्काइरियो दै छलखिन । मुदा मीरा के अपन इ व्यवहार पर कखनो काल आत्मग्लानियो होई छलैन । एक दिन अपन इ समस्या मीरा विद्यालयक हेड-मास्टर साहब सं साझा केलैन । "सर अहां कहै छी जे सब बच्चा भगवतीक संतान थीक आ ओकरा लाड-दुलार केनाई मनुक्खक कर्तव्य।" हम ऐ विचार के मानै छी । मुदा अही कहु जे औइ बच्ची सं हम कोना क दुलार क सकै छि जे नै ढंग से कपडा पहिरै अछि आ नै जेकरा साफ़-सफ़ाई के कोनो लिहाज अछि" । विद्यालयक हेड-मास्टर श्री शशिभुषण झा बड्ड सौम्य व्यक्तित्वक इंसान छालाह । ओ मीरा क सभटा बात सुनि क कहलैथ : "मीरा अहां ओई बचिया क समस्या देखलौं मुदा की अहां औई समस्या क कारण बुझबा क चेस्टा केलहुं? अहां इ बुझबा क प्रयत्न केने रहितौं त अहांक आई इ बातक असोकर्ज नै रहत छल जे अहां अपन कर्तव्य क पालन निक सं नै क पाबि रहल छी । ओ बच्ची एकटा दुखियारी बच्ची अछि जेकार बाबू दिहाडी मजदूर अछि आ माई कैंसर सं पीडीत! आब अहां कहू जे एहन स्थिति में ओकर ठीक सं परिचर्या के करत? आ इ सब मे ओ बच्ची के कोन दोष ? मीरा ! चिक्कन-चुनमुन आ सुन्नैर नेना सब के त सभ केयौ दुलार क लै अछि मुदा आशा सन जे इश्वरक संतान अछि ओकरा जे दुलार क पाबै अछि वैह इश्वरक सच्चा सेवक होई अछि । की! अहांक अखनो कोनो आशंका या असोकर्ज अछि? " मीरा क अपन सभटा प्रश्नक जवाब भेट गेल छल । आ ओ अपन कमीयो के चिन्ह लेलखिन । आ आब समय छल ओई कमी सं पार पाबैक । मीरा आब अपन सभटा ग्यान आ दुलार आशा पर उझैल देलखिन । ओकर पढाई-लिखाई, कपडा-लत्ता, तेल-कूड় सबहक ध्यान ओ राखय लागलखिन । कालान्तर में आशा क माई क देहांत भ गेल छल । आ आशा सेहो मीरा क छत्रछाया में बरहैत मैट्रीक क नेने छली। ओ मैट्रीक क परीक्षा में सम्म्पूर्ण जिला में टा̆प केने छली । डीएम साहब आशा के एहि उपलब्धि लेल अपन हाथ सं सम्मनित केने छलथिन । मुदा इ त कामयाबी क पहिल सीढी छल। अखन त आगा कामयाबीक अनेको पिहानी लिखेनाई बांकिए छल । मैट्रीक के बाद आशा के पोस्ट मैट्रीक स्कालरशीप सेहो भेंट लागल, मुदा आब हुनक बाबूजी हुनक विवाह क सुर-सार में लागि गेलाह । ई बात कनैत-कनैत आशा मीरा के बतौने छल । मीरा ओकरा ओहि दिन बड्ड मोश्किल सं चुप्प करेने छली । " ऐंगे एहि लेल तो एना कनै किएक छैं । हम बुझैबैन ने तोरा बाबू के आ ओ बुझियो जेथुन। हम मस्टरनी जे बनलहुं से कथि लेल? एं हमर त काजे अछि लोक के निक-बेजाय बुझेनाइ। आ हम केह्न-केहन के त बुझा क पटरी पर आनने छी । अहां त बड्ड होशियार नेना छि आहां त आगा बड्ड परहब आ पैघ डा̆क्टर बनब।" मीरा के द्वारा सान्त्वना के लेल कहल गेल ई वाक्य सब आशा क मोन मे घर क गेल छल । मीरा आशा क बाबूजी के बजौली । हुनका कहल्थिन औ जी अहांक भगवत्ती क̨पा केने छैथ जे एत्तेक निक बेटी देली जे मैट्रीक परीक्षा में समुचा जिला में प्रथम आबि अहांक संगहि गाम-समाजक सेहो नाम केलक अछि । आ अहां एकरा पैर में विवाहक सीकडी बान्हय चाहै छी ! आशा क बाबू कहलखिन "देवीजी अहां कहै त ठीके छि मुदा हम गरीब अनपढ लोक छी दिहाडी मजूरी पर जिबय बला आ आगा-पाछा कियौ अछियो नै सम्हारै बला; माय एकर पहिनहि छोडि क चल गेल अछि। एना में अहीं कहू जे बेटी क बाप होमय के नाते हम एकर विवाह कय एकर घर बसा देबाक विषय में सोचै छि से कि गलत करै छि? मीरा कहलखिन अहां अपन सक भैर त निके सोचै छी मुदा एहि सं आगा बरहु। आशा कोनो साधारण बालिका नै अछि। ओकरा में समाज के आगां बढाबै के सामर्थ अखने सं देखबा में आबि रहल अछि । ताहि लेल अहां इ निजी समस्या से आगा सोचबा के प्रयत्न करू । एखन ओकरा पढाई के समर्थन लेल एकटा छात्रव̨त्ति भेलट अछि, आगा आर कैयेक टा भेटत जै के बल पर ओ आगा अपन पढाई आ जिनगी में स्वाबलंबी भ जेति । तहु सं जौं अहां के भरोस नै अछि त अहां के हम वचन दै छि जे आइ सं मीरा क सभटा भार हम उठब लेल तैयार छी । एहि प्रकारे येन-केन दलील सं मीरा आशा क बाबू के राजी क नेने छलि । आब आशा के नाम इंटर में लिखा गेल छल । दरिभंगा में रहि ओ सी एम साइंस कालेज सं इंटर क पढाई कर लागली आ संगहि मेडिकल प्रवेश परीक्षा क तैयारी सेहो । अपन खर्च निकाल लेल ओ ट्यूशन पढेनाई सेहो शुरू क देने छलि आ संगही जरूरत पड়ला पर मीरा क मार्गदर्शन आ सहयोग सेहो भेट जाई छलैन । एही प्रकारे मीरा क मार्गदर्शन, आशीर्वाद आ अपन मेहनत-लगन के फ़ल आशा क ई भेटलैन जे ओ इंटर के संग बीसीईसीई परीक्षा सेहो पास क गेल छलि आ दरभंगा मेडिकल कालेज में हुनका एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश भेंट गेल छल । आब आशा नव पंख लगा क सफ़लता क नव ’आकाश’ में उड় लेल तैयार छलि । दिन बितैत गेल आ क्रमश: आशा एमबीबीएस क क डाक्टरी के प्राथमिक डिग्री प्राप्त क लेली संगहि पीजी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में निक रैंक आनि क ओ जीपमर में एमडी मेडीसीन के पाठ्यक्रम में सेहो प्रवेश पाबि गेली आ एहि प्रकारे पीजी केली आ आई नरायणा ह्रुदयालया बैंगलुरू में डीएनबी(कार्डियोलोजी) क टैनिंग के संग सिनियर रेसीडेंसी क रहल छैथ । समय के एहि कालक्रम में आशा क संपर्क मीरा सं धीरे धीरे कम होइत चल गेल छल । मुदा आशा अपन मूल्य आ संसकार के स्म्हारने छलि । सफ़लता क एहि आकाश पर चढला के बावजूद ओ अपन वजूद आ ओकरा बनब वाली अपन गुरूआई के नै बिसरल छलि । स्वाईत ओ बातचित के क्रम में अक्सर आकाशजी से मीरा दीदी के चर्चा केने नै थाकै छलि । आ अक्सर कहै छलि जे हमर विवाह में क्यों आबै कि नै आबै मीरा दीदी के त बजेबे करबै । आ आकाश मजाक में उत्तर दै छलखिन जे अहां चिंता जुनि करू अहांक मीरा दीदी के त हम अपने जहाज पर चढा क नेने चलि आयब नै त अहांक कोन ठेकान जे फ़ेरे लै सं मना क दी ! इ सब सोचैत सोचैत अचानक माईक पर विमानक अनांसमेंट सुनि क मीरा क भक खुजलैन आ ओ अपन समान उठा क चेकईन के ले विदा भ गेली । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार मंडल-किछु बीहनि कथा 1 एना किए झलफल साँझक समय। बैजू अंगनामे ओसार पर बैठि रेडियोमे दैत गीत नाद सुनए छला। तखने कनिया पारो हाथमे उगहैन लेने आठ बरखक बेटी सुधाके चोटियाबैत आ उच - नीच बजैत दरबज्जा दिशसँ अंगना एली। बैजू देखलैन सुधा डरे कठौत बनल एछ पारो बजैत बजैत अफस्यात छथि । रेडियो बन्न कऽ गप बुझैक जिज्ञासासँ पूछलैन " की गप छिए ? किए ई साँझ भरली अलगौने छै ? पारो बैजूके जबाब दैत बजली " की रहतै! ई छौड़ी उगहैन आ डोल लऽ इनार पर गेल छलै। खेलौर करऽ लागल हेतै । उगहैन छइहे आ डोल कोए उड़ा लेलकै। " बैजू सुधासँ पूछैत बजला " गै सुधा की भेलौ डोल केना हरा गेलौ ? " ओ तना नहि डरि गेल छलै जे आर हिचकऽ लागल। बैजू अपने उगहैनके तजबिज कऽ देखलैन तऽ बुझि पड़िलैन जे जनु डोल इनारमे गिर पड़लै। जखने मनमे ई गप एलैन आकि पारोसँ कहलखिन " सुनै छै ! देखौ न लाल कक्का घरमे काँकोर हेतै। भऽ सकै छै इनारमे गिर पड़ल हेतै। " " इहो खटरास करै छै ! मौगी सब उड़ा नइ तऽ लेलकै हन । " बैजू गप हलूक करैत बजला -" धू इहो जे एछ न ! जँ कोए लओ लेने हेतै तऽ आइ नइ काइल्ह पकड़ले जाएत । कहिओ नइ कहिओ इनार पर लौत तऽ पकड़ले जाएत । " " ई नहि बुझै छए मौगी सबहक खेल - बेल। नएहर सासुर साँइठ देत। " बैजू गप बदलैत बजला " आब हरा तऽ गेबे केलै। देखौ न! लाल कक्का घरमे काँकोर। " बैजूके कहिते पारो लाल कक्का अंगना दिश बिदा भेली। पाछु लागल हाथमे उगहैन लऽ बैजू सेहो बिदा भेला कारण लाल कक्काक अंगना इनारे लग छल। जाधरि बैजू इनार पर पहुँचला ता पारो लाल कक्काक अंगनासँ बूल दऽ निकल्ली । अपने बैजू झट दऽ उगहैनमे बाइन्ह चारि पाँच बेर इनारमे तेहला आकि काँकोरमे फँसल एकटा डोल। हाँय हाँय ऊपर केला। पारो तजबिज कऽ देखैत बजली "ई डोल तऽ अप्पन नहि छिए। अप्पन डोल पुरान छलै आ ई तऽ नवे छै।" बैजू सेहो तजबिज कऽ बजला " हँ ई तऽ जनु अप्पन नहि छिए। " बैजू ई कहि फेरसँ काँकोर इनारमे खसा थेहऽ लगला । कने काल थेहला पछाइत फेर एकटा डोल फँसलैन। ऊपर निकल्ला बाद देखलैन तऽ ई डोल हुनके छलैन। पारोके सुनबैत बजला " देखौ ई डोल अप्पन छिए। " " तऽ ई अप्पने छिए। ई छोड़ी बजबो केलै। " " अहि दोसर डोलके कि करतै। " " नेने चलबै अंगना की। कोनो हम केकरो चोरा लेलए हन ।" " जेकर हेतै ओकरा दऽ देतै । एक्के इनार भेने कहियो नहि कहियो देखिए लेत। बेमतलबक झगड़ा हेतै। " " हम नहि एकरा जँका बटने घुरए छी । आरतीके डोल फूइट गेल छै ओकरे भेज देबै। " बैजू कनियाक बाजब सुनि छुब्ध भऽ गेला आब बजता - - - - -? 2 उपवास ज्ञानेंद्रक नजरि कनीया पर पड़िते पूछलैन --- "हे यइ! एना किए लटुएल पटुएल छी ?" --- " आए देवउठौन एकादशीक उपवास एछ किने तै परसँ ई दुनू ततेक हैरान केलक अछि जे पूछू जूनि।" --- " आब की चाही धन - संपत्ति, काया - समांग आ ज्ञानसँ नहिअरे - सासुर भरल पूरल छीहे तखनो देहके किएक सतबैत छी ।" --- "जाउ अहुँ जे हेब न! " कोनो बाल बच्चा नहि अछि। बाल - बच्चा आ सोहागक चिंता केकरा नहि रहैत छै? " ---" तऽ अहाँक कहब अछि अहि लेल अहाँ देह सधने छी? एना देह सधने सब ठीक रहत? " ---" अहुँ जे हेब न! अहाँ जे बुझिए। " ---" मासो दिन नहि भेलए हन बमभोलीक कनीया सखरा भगवतीक दर्शन लेल जाए छली। बाटमे टैम्पो उलैट गेलै आ ओ बेचारी मरि गेली। " ---" हे जुलुम भऽ गेलै! धिया पुताक जे गैत होए छै कहल नहि जाए।" --- "तहन अहिँ कहु किने जँ उपवास रखने सब कुशल रहैत तऽ ओ बेचारी तऽ अपन प्राणे अर्पित कऽ देली तहन धिया पुता-----।" ज्ञानेंद्रक गप सुइनते कनीया एकटक्की लगा देखैत - - - - - । 3 अवाक दादी निर्मला अपना जमानाक दर्शन शास्त्रमे एम. ए कऽ बिहार विश्वविद्यालयमे दर्शन शास्त्रक अध्यापिका छली। पोती सुजाता आ दादीसँ नहि केवल मेलजोल रहै छल बल्कि सखि बहिनपा जेँका दादी पोतीक बीच संबंध छलैन। सुजाताके जखन जे मनमे अबैत दादीसँ बेधरक पूछि लैत छली । दादी सेहो निसंकोच सुजाताके जिज्ञासा शांत कऽ दैत छली। ---" दादी ! एकटा बात पूछिऔ ? " ---" हँ पूछ ने " ---" जतऽ बहुत रास कुल्टा स्त्री एक्के संगे रहैत अछि ओकरा की कहै छै ? " ---" वेश्यालय।" --- "जतऽ बहुत रास चरित्रहीन पुरुख घरे-घर होए ओकरा की कहै छै ?" दादी सुजाताक जिज्ञासा सुनि अवाके रहि गेली। कारण जबाब - - - - - । 4 लाल काकी आइ भोरे भोर दरबज्जा परसँ सहटि सड़क पर थोरबे दूर गेला पछाइत लाल काकी पर नजरि पड़ल। लाल काकी देखते बजलीह ---यऊ बउआ! अहिँके तकैत अबै छलूँ । ---की बात काकी ? --- कने हमरा अंगना एब। --- कहुने की बात। --- देखही! अंगना एब तबने। --- बेस एब । जलपान कऽ लाल काकी अंगना पहुँचि पूछलएन ---कहु काकी की बात? ---- कक्का फोन केने छला आ कहलैन एकटा दूधगर गाए भजियाके खरीदबा देमऽ लऽ । ---- बेस ! कतेक तक भऽ जाएत तऽ लऽ लेबै । ---- कमसँ कम तक भऽ जाए। हम लगा नहि राखब। हम लाल काकीके मूँहे तकैत रहि गेलहूँ । 5 ठेकनगर केक दिनसँ दीपचन्द आ रुपचन्द दुनू भायक बीच भिनौजी फरिछोट होए छलै। दुनू भाय मिलके भरि टोलक लोकके बैठौने छला। टोलक लोक अपना हिसाबे सब कथुक बटबारा कऽ देलैन्ह । अंतमे बाँचल विधबा माए आ अलबटैह बहिन। पंच लोकैन्ह पूछखिन्ह "अए दुनू माए - धी के कोना पार लगतैन्ह। दुनू भाए सोचिके कहु।" दीपचन्द बजलाह अपने सबहक जे आदेश हेत ओ हमरा स्वीकार अछि। " रुपचन्दके पूछला पछाति ओ असमंजस होएत भायक बातके समर्थन करैत बजलाह-" अपने सब निर्णय कऽ दिऔ। जे निर्णय हेतै ओ तऽ मानै पड़त। "पंच अपन बात दुनू भायके सुनबैत बजलाह -" हमरा लोकनिक बिचारे एक भाय माएके रखियौ आ एक भाय बहिनके। या मड़ौसी सम्पत्तिसे मिलजुमले 10 कट्ठा जोतसीम आ पाँच कट्ठा गाछी संग दुनू माए-धीके कोनो एक भाए सेहो राखि सकै छी । ई सुनिते रुपचन्द दुनू परानी बाजि उठल हम माए आ बहिन दुनूके रखबा लेल तैयार छी। जखन दीपचन्दसँ पूछल गेल तऽ ओ बजलाह "आब बटबा लेल तऽ किछ नहि बाँचल अछि तऽ हम की बाजी।" पंच लोकैन्ह जब उठै उठै पर भेलाह तहन दीपचन्दक पत्नी बजलीह - - - "एक बेर माताजीसँ सेहो पूछथिन्ह न। हुनकर की मन छैन्ह।" पंच - "बूढी अहाँ कहु, अहाँक की विचार अछि।" माए- "दुनू बेटा तऽ हमरे छी तहन रुपचन्द सब दिन परदेश रहल। हम माए बेटी दीपचन्दक गात पकड़ि अखन तक छी। एसगरे रहितौ तऽ कोनो धरानी रहि लैतौ परंच संगे भगवानक देल डांग सेहो अछि।" दीपचन्दक पत्नी - "माए आ बुच्चीक लेल देल संपत्ति रुप कऽ दऽ देथुन्ह। हम दुनू गोटेके रखबैन्ह।" जखन रुपचन्दके पूछल गेल तऽ ओ कुछ बजबे नहि केलाह। आँखिसँ नोर बहैत छलैन्ह। पंच सेहो दीपचन्दक पत्नीक ठेकनगर गप सुनि अबाक भऽ गेलाह। सब संपत्ति बराबर करैत माए बेटीके दीपचन्दक पत्नीके सोइप उठि बिदा भेला। 6 झूठक खेती ----- की कहु भाय देखिके ताज्जुब लगैत अछि। ----- से की यऊ भाय ? ----- पहिने तऽ ई खेती चोरानुकाके होएत छल परंतु आब तऽ कोनोटा संकोचे नहि छै। ----- भाय कने फरियाके कहुने। कोन खेती ? ---- ओ जाउ भाय अहाँ एखनधरि नहि बुझलिए। ----- कने फरिछ कऽ कहुने । ----- झुठक खेती। ई खेतीओ करबा लेल स्पेशल औजार घरे घर आबि गेल अछि। ----- कोन औजार ? ----- भाय अहुँ किने ! यऊजी मोबाइल। देखै नहि छिए लोक रहै अछि कतौ आ नाम कहै छथि कतौक। 7 पड़ोसिया डाह --- सुनै छिए! आइ लालमैनक बेटा एक टमटम समान लऽ एल। ---- के फोकना एलै हन। ---- हे! बोरा सब उठना नहि उठै छलै। ---- कमाएमे तऽ कोढिए छल। कतौ हाथ साफ कऽ एल हेत। ---- लालमैन दुनू सास पूतहु अफस्यात छली बोरा-बोरी घर करबामे। ---- किए अंगनामे और कोए नहि छलै ? ---- धत्त! केकरो हवा तऽ लगए नहि देलकै। भरि दुपहरिया घर बन्न कऽ समान सबके तीनो परानी गर लगा लेलकै। ---- फोकनाक देह दशा केहन छै? ---- अहुँ केहन गप करै छी ! ठीके हेतै की। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार मंडल- युक्ति शक्ति (लघु कथा) बैसाख मास। ओना दूए दिनक बाद जेठक आगमन होए बला छलै। उम्मस भरल दुपहरियाक समय। अपने भोजन केला बाद ठंडाक बाट जोहैत गाछी दिश टहिल गेलहुँ । गाछी पहुँचतहि बाबा कहलैन "आब तू कने काल रहऽ हम नहेने खेने अबै छी ।" बाबाक बात सुनि हमहूँ हामी भरैत कहलिएन " बेस! जाउ न।" हमर बात सुनते बाबा चलि गेलाह। बाबाक गेला पछाइत गाछीमे टहिल टहिल गाछक आमके हिआबऽ लगलौहँ ई सोचि जे जँ गाछमे बेसी आम पाकल हेत तऽ जाए बेर झखा कऽ नेने जाएब। बाबाक नजरि कमजोर भेने नहि देख पबै छथिन। जँ हवा बिहारिमे गिड़बो करत तऽ छौड़ासब बाबाके एक तऽ पैरपैंख नहि लागऽ देतैन दोसर जेँ जँ केओ कनिओ प्रेमसँ मंगितैन तऽ मना नहि करथिन सहजे दऽ देथिन । कारण बाबाक हमहिटा पोता नहि बल्कि भरि गामक बाल बोधक बाबा छथिन। जाबे दादी जीबै छली ताधरि दादी आ बाबाक बीच होएत कहा सुनीक विषय इहे रहैत छल। बाबा पर भरि गामक बाल मंडलीक जेना सर्वेसर्वा छला। बालो बेदरुक बाबा बात ततबे मानैत छल। समाजमे जतबे गंभीरताक परिचय छलैन ततबे बाल बोध लेल खुजल व्यक्तित्व छलैन। भरि गाछी घूमला बाद आबि खोपरीमे मचान बैठ गेलहुँ। ताधरि देह सेहो ठंडाएल। अमरस्साक नीनक आगमन भेल ठामै लेट गेलहुँ। नीन्न परि गेलहुँ। कनिए कालक पछाइत दूटा छौड़ा तनानै हल्ला केलक जे नीन्न टूटि गेल। दूनू बकझक करै छल। हम सेहो सहिटके लग गेलहुँ ।ताबे बाबा सेहो आबि गेलाह। बाबा दुनू छौड़ाके दबारैत कहखिन "रै छौड़ा सब कथिक हल्ला छिए रौ। खेलहा अन्न नहि पहलौ हन।" बाबा बात सुनि दुनू छौड़ा सहिटके लग आबि पहिने घुसका बाजल "बाबा अहिँ कहु जे सबसे पैघ शक्ति होए अछि न?" घुसकाके कहला बाद दोसर प्रवीण बाजल " बाबा सबसँ पैघ युक्ति होए छै न ? दुनू छौड़ाक बात सुनि हमरो धियान बाबाक निर्णय सुनबा लेल एकाग्र भेल। कारण हम बाबाक स्वभावसँ परिचित रही। भलहिँ पूछने दुनू छौड़ा छल परंतु प्रश्न तऽ गंभीर छल। बाबाक एक मन भेलैन कोनो तरहे अहि बातके सहटैर दिअए कारण उतर तऽ कोनो एक्के बच्चाक पछमे हेत तऽ दोसर बच्चाक मन टूटि जाएत। फेर भेलैन जे बच्चाक जिज्ञासाक दबौने नव पीढ़ीक ज्ञानसँ बिमुख हेबा पापक भागी बनब। तखने हुनकर धियान हमरा पर पलैन। सोचलैन आब जबाब देबए पड़त। तहन तरीका कोनो दोसर अपनाबऽ पड़त। दुनू छौड़ाक धियान बहटबैत बजलाह " एकटा बात बुझलही हन तू सब ? " दुनू एक्के संगे कहलक "की बाबा ?" काइल्ह बेरु पहर बिदेशर गाछ परसँ गिर पड़ल। कहाँ दिन डारे भरे गिरल से डार आ जाग्घक हड्डी टूटि गेल छै। " घुसका आ प्रवीण अपन अपन बातसँ हटि अहि घटनाक बात सुनऽ लागल। अपने सेहो जिज्ञासा जागल। कारण गामक घटना छल। पूछलिएन" कोना खैस पड़ल?" कहलैन " बड़की पोखरिक महार पर नै पेरे कातमे सुरुगंबा सरही आमक गाछ छै तहि पर तीन चारिटा पियरबुन्न पाकर आम छलै। कना नै कना बिदेशरक नजरि ओहि आम पर पड़ि गलै।" हम पूछलिएन "सरही आम अखन तक लगले छलै ?" "नहि, आम तऽ दस दिन पहिनऐ तोड़ि लेने छल। ओ छुटलहा आम छलै। लग्गेमे मुनेश्वरक घर पर दरबज्जे पर लग्गी राखल छलै तै दिश धियाने नहि गलै आ आम पर नजिर पड़िते नहि औ देखलक आ नहि तौ गाछ पर चढि गेल। " " तहन?" " चढैत चढैत गाछक फुनगी पर चढि गेल। आमक डाढि लिबऽ लागल आकि कमजोर डाढि रहने टूटि गेलै। ओ जाबे दोसर डाढि पकैड़ते ताबे जहि पर ठाढ छल सेहो टूटि गेलै। गिर पड़ल। " दुनू छोड़ा जनु अपन बात बिसैर गेल। बाजल" बाबा सपेतामे दस बारटा आम पाकल अछि। लग्गीसँ तोड़ि दौ। " बाबाक सहमति पाबि नुनू आम तोड़ै लऽ चलि गेल। हम्मर धियान जखन छौड़ाक प्रश्न पर गेल की एकाएक बिदेशरक घटना पर ठमैक गेल। बाबाक देल जबाब सुनि मूँह पर मुसकी आबि - - - - - । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- 3 टा गजल ३.२.ओम प्रकाश- गजल ३.३.मनोज कुमार मंडल- किछु गजल ३.४.मनोज कुमार मंडल- किछु कविता आशीष अनचिन्हार- 3 टा गजल गजल 1 अंबार हेतै की नै हेतै जैकार हेतै की नै हेतै हमहूँ पठेने रहियै हुनका स्वीकार हेतै की नै हेतै ग्राहक तँ भेलै छै बरबाद पैकार हेतै की नै हेतै ई ओइ पारक चेन्हासी छै अइ पार हेतै की नै हेतै कीनि एलै दोकानक दोकान व्यवहार हेतै की नै हेतै सभ पाँतिमे 2122 + 222 + 22 तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ अतिरिक्त छूट मानल गेल अछि 2 रातिमे भोरक इच्छा भोरमे साँझक इच्छा डेग छै सभहँक जँइ-तँइ हाथमे हाथक इच्छा छै घृणा स्थायी भाव साथमे प्रेमक इच्छा ओ जरै अपने दुखमे सभ कहै धाहक इच्छा तीर सन फूलो भेटल फूल सन काँटक इच्छा सभ पाँतिमे 2122 +222 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि 3 इम्हर उम्हर बहसल बात बड़ दुख दैए सनकल बात खाली खाली हुनकर मूँह उड़िए गेलै उघरल बात हुनका भेटनि सौंसे सौंस हमरा भेटै चनकल बात दाबल रहतै तैयो भाइ सुनबे करबै निरसल बात झुट्ठा चकमक चकमक दीप सचकेँ मानू झलफल बात सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश गजल कहियो तँ ई बात हेतै जिनगीसँ शह मात हेतै तांडव शुरू भेल फेरसँ दू, पाँच की सात हेतै ऐ गाछकेँ काटि देलक नै आब नब पात हेतै छै राति कारी भयावह कहियो कतौ प्रात हेतै 'ओम'क गजल नै सुनू यौ सुर-ताल-लय कात हेतै -ओम प्रकाश मात्राक्रम अछि 2-2-1-2, 2-1-2-2 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार मंडल किछु गजल 1 चालि एहन जे छैनह जग जाहिर घोघ एहन जे नव कनीए होएथ बजैत तऽ छथि बड मिचराबैत लगै बेचए बाली बनिया होएथ बाबाक पागक कोनो नहि ठेकान ससुरक मान घटबै पर होएथ घेरल सीमान ओ नांग्घि रहल छथि घरमे जेना टाँग लटकौने होएथि जगमे भूर अहिना न होएत अछि बिन सोचने चालि पकड़ने होएथ 2 हम राह चलैत मुसाफिर छी जानि नहि अंनत राहमे पथिक बनि ई फँसल छी जिनगीक जलेबीया मोर पर लटकल घटमे प्राण जेना हम आब ई अटकल छी जेना वृत पर घूमि एक्के ठाम छी अबैत मूल बिंदू पर जाएसँ पहिने नाचल छी करनी देखबै मरनी बेर सुनै छलहुँ अहिसँ मनोजे कोन केओ नहि बाँचल छी 3 अदलल बदलल रुप बना रंगल सियार शेर बनल छै भरि दिन जाल बिछा रहल ओ फँसलके ओ धमका रहल छै ई दोकान चलतै कहिया तक ई तऽ ओ अकानि नहि रहल छै आगू पाछू लोक देखि रहलै हन ओकर मन लोभमे गड़ल छै देखि देखि मन झाझर होएछ सत्कर्म मनोज ऐक रहल छै 4 हम छी पागल ते घर सँ छी भागल उदरक निमिते बनल छी अभागल मन अखनो रहैत अछि लागल हुनको जी हेतैन हमरे पर लागल परधीन रहि सपना अछि लागल गाम छोरबाक मोहर अछि लागल मायक ममता बर छैन जागल बाबूक मन मिलबाक छैन लागल 5 दुल्हा त' बड़ सुन्नर छला पढ़बामे वैषनबे छला बाजैत छला मिचराबैत लगै पाकल परोरे छला छला नम्बरी नरहेर बाबू हिसाबे हाकीमे छला पढ़ले कनिया चहिएन्ह अपने आठवी फेले छला कहैत त "मनोज "छलैन्ह कनिया बाबू बताहे छला 6 की कहु भाय हमरा पियार भ' गेल अबिते एलहुँ कि चिन्हार भ' गेल आबिते हमरा तरास लागि गेल माँ सँ हमरा दूधक आस भेट गेल मायए सबसँ त चिन्ह करा देल बाबूओ सँ हमरा चिन्हार भ ' गेल एकेटा जड़ि कैकटा ठाढ़ि लागि गेल की कहु भाय सबसँ पियार भ' गेल धीरेसँ सब जबाबदेही भेट गेल तहिमे जीनगी त पार भ ' गेल की कहु भाय बिन नामे क' एल रही अबिते हमरा मनोज नाम पड़ि गेल वर्ण -14 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार मंडल- किछु कविता 1 रिश्ता - नाता अपने, अपनासँ कटि रहल छै, जन्मक नाता सँ दूर भऽ अनचिन्हारसँ चिन्ह परचिन्ह करै छै, सगे संबंधीसँ छुप छाएप दोसर तेसरसँ राज बतबै छै। अपने, अपनासँ कटि रहल छै, भेल दोस्तके छोड़ि छाएर मोबाइल कम्प्यूटरसँ दोस्त बढबै छै, रिश्ता नाताके कातियाबैत अपने सबसँ कतिया रहल छै। अपने, अपनासँ कटि रहल छै, अपन हारि छुपा रहल आ नाता रिश्ता नहि सहेजै छै, स्वार्थक घोड़ा पर चढ़ि चाढि सहज बाट खोइज रहल छै। अपने, अपनासँ कटि रहल छै, अपने अपनाके ठकि रहल गाममे माय बहिन ठीक्के कहै छथि, अपन मामा मरि मरि गेल आ फलना चिलना मामा भेल। 2 भरदुतीया बाट जोहैत दूरखा धेनेऽ ठाढ बहिनिया भायक डेग अकायन रहल छथि मने मन विचारि रहल छथि कखन भाइया औताह मोर पहर बितल जा रहल छै बहि रहल छै बहिनिया आँखिसँ नोर गोबरसँ अंगना नपऽ टाटक दोगसँ तकै छथि बहिनिया कखन भइया औताह मोर बाट रे बटोहिया सँ पूछै छथि बहिनिया देखल बाटमे अबैत भइया मोर आस लगोने बाट तकै छथि मनेही मन आब उठै छैन्ह हिलकोर सब बलाय टरि जाय हे संझा माय जूग जूग जीबैथ भइया हम्मर मोर हिया हारि उठि गेली बहिया लगै छैन आब बकोर भइयाक औरदा रहैन अगिला बरख लिलसा पूरा हेतै मोर। 3 मोती कतेक दिन स्वाति नक्षत्रक बून्नक बाट जोहैत रहब, सीपक मूँहमे बून्न पड़िते ओ मोती बनि निकलि पड़त। नित्य दिन मिलैत अछि मोती कर्मक डोरमे गथल हार , चौबीस दानक बना क' माला पहिर देखू आभा चमकत । एक एक मोतीके जोगेनेसँ सीपक मोतीसँ महगे हेत, नकलत यदि सीपसँ मोती अहाँक हार नमगरे हेत। संजोग त ' निकम्माक होएत कर्मठक सृजन छैक मोती, तेँ न धन रहितो मौगएत धन हीन जीवैत हरखित। संजोग लग वियोग बिराजै कर्मठक लग सदा खुशहाली, कर्मक तप जे तपैत तपस्वी फलित होए देखल जिनगी। 4 दीप होशमे रहि जोश भरल हर्षित मन ओजक उपवन देशक सीमान रक्षा निमित डटल छथि वीर जवान एक दीप अछि हुनक नाम । हेरैथ कालकंस जगदम्ब नीजके अर्पित सब लऽ समर्पित होए नइ किओ कलुषित लेने सपत छथि वीर जवान एक दीप अछि हुनक नाम। सबसँ नाता जोड़ि चलल घर अपनाके छोड़ि चलल आतंकवाद सऽ लड़बा लेल जानक लगौने बाजी वीर जवान एक दीप अछि हुनक नाम। छी अहाँ स्वयं जग दीपक चमकैत अछि जहान ऋणी छी अहाँक हमसब करब स्वीकार वीर जवान एक दीप अछि अहाँक नाम। 5 जानकी गौरवशाली मिथिलाक विलक्षण इतिहास सम्पूर्ण महिला जातिक जन समस्याक रखली जानकी। जन चेतनाक अलख जगबैत रहली बेर बेर राज ऋषि जनक दुलारी वसुंधराक बेटी जानकी। भेटल छलैन संस्कारक सौगात दिआबै छली रामके याद प्रेमक संग मर्यादाक केलैन अंत तक निर्वाह जानकी। बेर एला पर रुप बिकराल रन चंडी बनि केली संहार करैत रहल छली शिव धनुष उठबैक अभ्यास जानकी। रहलैन मर्यादाक सतत् धियान रखली राग रहित प्रेमक मान जखन जतऽ रहली सबमे रचि बसि गेली जानकी। 6 अकरहर बहि गैलैन्ह नोर सुनिते हम्मर बोल देखते कहने रहिएन्ह काकी देखलौ आइ चुलबुलक तन उघार भरि तन लत्ता नहि निकलल छली बहार ई सुनि काकी कहली धौर जाउ बौउआ अहुँ की अकरहर करै छी नव युगक ई छी परिधान करु आब एकरा समान समय बदलि गेलै काकीक गप सुनि चुप्पे रहि गेल रही ताबे पड़लै अगत्तिया सबहक चुलबुल पर धियान धेलक सब पछोर कनैत एलीह घर काकी तिनैक तकैत एलीह हमरा कोरे कोर देखते कहलिएन की सुनब काकी हमरा मूँहे अकरहर काकीके बहि गैलैन्ह नोर सुनते हम्मर बोल। 7 दिपावली आबि रहल अछि खुशीक सौगात लऽ इजोतक राति दिपावली अमावस्याक घनघोर अन्हरिया राति चमकत दीपक स्वभाविक ज्योतिस़ँ चमकल छलै एक दिन अयोध्या रामक कर्म दिव्य ज्योतिसँ लेने छला मानवता स्थापनाक अखण्ड व्रत रावण सनक राक्षसके मारि रावणेक सखा विभिषणके देलएन स्वर्ण जरित लंका दान बालिके मारि सुग्रीवके देलएन सिंहासन अत्ति प्रेम छलएन सियासँ बेर एला पर देलएन वनवास हृदयक अंश सन भायके त्याग कऽ रागरहित पौलएन सम्मान अहि मर्यादाके दोहराबैत अबैत छी खुशीक दीप जरबैत अबैत छी दीप जरेला बादो ओ चमक नहि देखाए अछि मानवताक राह भटैक जनु राक्षस बनि मानव घूमै अछि। 8 परदेशी भेलहूँ परदेशी हम छुटि गेल गाम-घर छुटि गेल घर-परिवार बनि मशीन खटैत रहलौ सबके छोड़ि एसगरे भऽ गेलौँ हम। बेर - बेर सुनएत रही कहै छला लाल कक्का जे पूत परदेश गेलाह देव-पित्तर संगहि नेने गेला ठीक्के कहै छला आब बुझै छी हम। बाबू बेराम छथि गाममे सेवा नहि दऽ पाबि छी हम एक दिश बाबूक सिनेह दोसर दिश नौकरी बीचहि दुबिधामे फँसल छी हम। एखनो बाबूक सिनेह ओतबे छैन जखन हमर दुबिधा बुझलैन कहलैन नौकरी देकहक हम कोनो तरहे खेप लेब हुनकर सिनेह देखि लाजाएल छी हम। 9 कला लुरिसँ भरल बनबैत बहुतो रंगक चीज। लुरि कलाक रुप बनि बनौलक देशेटामे नहि विदेशोमे अपन पहचान। पुरूख बनबैत छीटा-पथीया जोड़ै माटिक देवाल आ बाँसक ओ घर बनाबैथ सुन्दर अतेक देखै संसार। स्त्रीगण मूजक मुजेला बीनै सीक्कीक बिनै छली चंगेरी रंग-बिरंगक चित्र बनबै छली अंगनामे अरिपन भारी। माटिक चूल्ह माटिएक कोठी अन्नसँ भरि रखै छली बरख भरि कहैत छली बखारी। चरखोसँ पहीने तकलीसँ सूत काटए छली शुद्धता आ शुभ भावनासँ जनऊ बनबैत छली । 10 खुशी अपन मन अपनेसँ पचताए रहल छी चीज-बौस उलटा-पुलटाके घूमि-घूमि हम खुशी ताएक रहल छी छनीक भेंट जँ भऽओ जाएछ पुरनी पातक पानि जेँका डगमग कऽ ओ छीछैल जाए अछि पकैड़ि राखी हम एकरा से युक्ति नहि लाइग रहल अछि बरख भरिमे सब उत्सव पर ढोल पीट कहैत रहल ढोलकिया तयो मन नहि जागि रहल अछि चकाचौंधमे पड़ि हम दोसरे दिश ध्यान लागल अछि सगर लोक तकै हमरे दिश अपने दिश ध्यान नहि जाए अछि लगेमे ठाढ रही सैदखन ततऽ हमर ज्ञान नहि जाए अछि 11 पंडित जहिना पृथ्वी अपना अक्ष पर घूमि - घूमि राति - दिन आ नव साल - पुरान साल अनैत अछि तहिना ओ चाक घूमाऽ - घूमाऽ गरहैत रहल रंग-बिरंगक बर्तन-बासन आ बनबैत रहल मनुखक जिनगी हल्लुक सुन्दर - सुन्दर मूर्ति बनाऽ-बनाऽ मनुखक मानस पटलसँ नहि मिटाए देलक देवी-देवताक आ ऋषि महर्षिक चित्र जहिना मनुख पाँच तत्वसँ बनल अछि तहिना ओ ओहि तत्वसँ बनबैत रहल प्राण तऽ ओ नहि दऽ सकल पर मनुखक प्राण बचौलक आ पशु सदृश्य जिनगीसँ मनुखक जिनगीक बाट धरौलक अछि समाजो कतेक ईमानदार छेलाह जे पंडितक उपाधिसँ सम्मानीत केलाह लत्ता-कपड़ाक तंगी रहला बादो पावनि-तिहार आ नव उत्सव पर नव कपड़ा दऽ सम्मान दैत रहला पर आइ अहि त्यागक कथा झपि रहल अछि मनुखक कामक कम आ दामक महत्व बढि रहल अछि कैंचे पर नजरि ठमैक रहल अछि 12 माय! अबैत रहलेँ तू बारंबार होएत रहल शक्तिक संचार होएत रहल सब कथुक विस्तार गरहैत गेलहुँ चीज बौस भरैत गेल घर - दुआर बढैत गेलहुँ हमसब ससरैत रहल जिनगी भोगमे उलैझ देखैत रहलौँ संसार छुटि गेल तोहर देल उपहार चुकि गेल भाईचारा आओर प्यार भऽ गेल छै मानवता पर वार बहि रहल छै शोनितक धार माय! एकबेर कहि दे विस्तारसँ कोउना उतड़ब अहिसँ पार कऽ दे फेर एक बेर नव शक्तिक संचार कऽ ले हम्मर ई प्रार्थना स्वीकार 13 भाय! टोलाक बीचहिमे एकगोट इनार छलै स्त्रीगणक साँझ-भोर सभाक अड्डा काँखतरि घैल आ हाथमे उगहैन लागल डोल इनार पर पहुंचतहि नीकलि पड़ै छलै बोल जेँना नींदा-खिस्साक बनि जाए छलै घोल एक दोसरके करै छलै सचेत। भावना जे कुछ रहैत छलै सब प्रेमसँ सकबेधल होएत छलै मनुख कम्मे रहै छलै तेँ नहि तऽ बेटा गामक काम अबै छलै आ बेटी माए-बापक नहि दोसराक सोगारथ पूरा करै छलै कला छलै अगुएल माटिक घरमे गरहै छलै रंग बिरंगक फूल गबै छलै सुख दुखक गीत संगतुरिया सबसँ लगबै छलै मीत मरै काल धरि निभाबै छलै ओ रिस्ता परिवार छलै संयुक्त तयो मनुख छलै प्रेमयुक्त भाय! आब अहीँ कहु हम बढि गेलौ कतेक आगू पीछरि गेलौ कतेक पाछु? 14 मायक बदलैत छवि नौ मासधरि गर्वमे रखलेँ अप्पन खैक तू बाँटि खुएले अपन खूनसँ पियास बुझा तू खूनेसँ नहलौले खून घटबाक कारण केक रोग सिरजौले अपनाके ओछानक संग बितौले तखन तकक रूप तोहर माय बुढिया माय सन छेँले जनम दैते किए बदललें अपन दूध देहे बिलहिके डिब्बाक दूध पीऔले निज देहक आंचल हेराके गमछा तू ओरहेलेँ अपन संस्कार फेक फाकि तू पर संस्कार अपनौलेँ कोना बदललौ तोहर ई छवि ई बात जनथुन् रवि कोन लोभे हमरा जनमेले पुछै छथुन्ह कवि केकरो नहि रहलै ई जवानी किए अपनाके भारमौलेँ खूनक रिश्ताक गप की कहियौ सिनेह प्रेम भोथला भोथला बनियागिरी देखाबई छेँ देवी रूप मायक किए तू आब बिगारै छेँ ? 15 कलह कलहक जडि नहि बुझहब बात कुसंगतक पकड़ने रहब गात खुट्टा गारब अहि ठाम यौ तात बतकटबैल क' दैत रहब मात गाल फुला नहि करब बात नहि बुझब दिन आ नहि राति नीक अधलाहक नहि बिचाराब बात हरिदम सोचब कोना द' दी मात हम एतबे कहब यौ तात एक दोसराक बुजहु बात अहि खेलमे नै बिताबु दिन व राति सुसंगतक पकरू गात माफी मागंने छोट नै होए छै दोस्ती लेल बढाबू अपन हाथ फेरसँ एक बेर गला मिल हाथ जोडि चलु साथ साथ 16 देशी कौआ मन परि रहल अछि ओ दिन जहिया माएक हम छोट नेना रही मायक आँचर तर खेलैत -धुपैत रही माएक बोल हमर ध्यान एक रहैत छल जखने बजै अँगनामे कौआ बुढ़िया दादी बाजि उठै छलिह पाहुन एताह एना लागि रहल अछि सुनिते मन गद -गद भ' जाए छल आब तरुआ -तरकारी के पूछैअ दही -चीनी सेहो भेटत दिन भरिमे कैक बेर पूछिए माए आए कखन पाहुन औताह आब ओ दिनक यादेटा रहि गेल देशी कौआ मरि -मरि गेल कारकौआ गिरिहबासु भ' गेल आजुक कौआ बाजब ई भ' गेल अमंगलक संदेश द' गेल कौआ बैजते कनिया कहै छथि ढेला ल' एकरा भगाओ हम कहलिएन की कहै छि बिन भगौने देशी कौआ भागि गेल की कारो कौआ क ' बिदाहे क देब कौआ देखब सपना क' देब 17 बताह हेलैत -हेलैत पहुचल जाय छै अथाह रस्ता भोथिया गेल छै भेल छै बताह एल छै हिलकोर सम्हारि नै सकलै अपना क' सह पाबि गेल जाय छै दहला . पूंजिबादके भेलै देखि डाह अनलकै बाजारबादक बाइढ़ नक -सक करै छै नाक तक पानि एखनो सम्हारने भेटतै थाह नहि त' भने अछिए अथाह ई देखि -देखि अबै अछि आह ओ ऊपर मे ठाढ़ भ' कहै छै वाह आबो त' मेटाबे अपन इ नव चाह नहि त' सबकुछ बिका देतै क क' बताह सब किछु बिका जेतै ओ किए करतै आह लेने छै अपन ओ मोछ पीजाह त्यागक भूमि पर देतै भोगी बना अपना क' आबो बचा नहि त धन -धरम संगे जेताह खाली हाथ रही जेत बनल इ नव चाह 18 भूख हमारा सहल नहि जाय अछि भूख सबदिन खा -खा क' सूखल आ रुख सैदखन हमरे किए अछि लागल दुख फुफरी परल रहैत अछि हमरे मुख किओ खा -खा बनल अछि नै सोख सबटा हमरे नहि अछि न दोख एक्को दिन हमरो जं भेटैत चोख भैर जैते भूखसँ पचकल कोख तहन मनमे नहि रहिते हमारा रोख 19 उधारी सामान बाबू आब हम नहि जाएब बेचू भाए दोकान लेबा लेल उधारी सामान कतबो कहला पर नहि दै छथि आब ओ कोनोटा समान कहअ लगै छथि ओ हमरा तू छ' रौ बड़ नादान बन्न क' देलिए देनै दान बौआ सुनि ले क क' ध्यान तोरा नै छौ एखनो ज्ञान तोरा सबके दैत -दैत बेचअ पड़त अपन मकान पकैर ले तू अप्पन कान खाली हाथ नहि अबिहे आब कहिओ हमरा दोकान 20 भीखमंगा माए एलैहन एकगोट भीखमंगा संगे एल छै बहिन ओकर गंगा फाटल ठोर लागि रहल छै ठोर मे लागल होए ठोररंगा पेट -पांजर एक भेल छै जेना भूखसँ क' रहल छै दंगा खैक ल' किछु द' दही माए मोन भ' जेतै ओकर चंगा देह ठिठुरने मोन उदास छै द' दही बुच्चीया बाला लहँगा हमर एकटा जे छै भटरंगा पुरना सन राखाल अंगा पेंट सेहो द दही ओकरा हमरे बला जे छै सतरंगा एकर जीनगिए छै बहुरंगा हम पहिरबौ जे तू देमे आब नहि मांगबौ मूहमंगा ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक मनोज कुमार मंडल 3 टा बाल कविता 1 चुट्टी (चींटी ) देख देख देख बाबू चुट्टीक हेँर चलि रहल छै आपसमे घेर -घेर अगिला पिछला क ' क संगमेरह जल्दी जाए वा भ ' जाए अबेर धारी लगा चलै जेना रेल केहन सुन्नर छै सबके मेल अपना बाटमे डरै नै एक्को बेर काजो करै आ करै छै खेल हिम्मत छै ओकरा जेना होए शेर जान रहै वा जाए ओ मरि काज नै छोडै छनो भरि नदी नाला होए वा होए पहाड़ पार करबा ल' लागल रहै बार बार गिरैत पड़ैत होए छै नहि डर बाबू रखिंहे अहिना मेल आफद अबौ घनेरो बेर संग मिल लडिहे हर बेर संग छोडि नहि रहिहे एसगर लक्ष आगू अपने पाछू अपनामे नहि करिहे डर हिम्मत संग आगू बडिहे चाहे आगू रहौ भलहि शेर 2 आब हमरा दे पोथी कीन नहि लेब अँगा नहि लेब टोपी आब हमरा दे पोथी कीन नहि खेलब नहि छुपब रहब हम पढ़बामे लीन नहि हम लड़ब नहि हम झगरब रहब हम सबसंग मील कुसंगतमे हम नहि पड़ब हमरा देखमे ओकरासँ भीन गुल्ली -डनटा हाथमे द' ओ उड़ा देने अछि हमर नीन सब जीवक आदर करब मारब नै हम केकरो पीन गठरी खोल वा पोटरी खोल चाहे हमरा ल' ले रीन आब हमारा दे पोथी कीन आब दुःख सहि गेलौ रहब बनल आब दीन आंखि रहैत आन्हर नहि रहब हमरो जिनगीमे हेतै दिन आब हमरा दे पोथी कीन 3 चंदा मामा चंदा मामा चंदा मामा दूधक कटोरा पठा दिअ नहि तअ अमृत सुधा बरसा दिअ हम अहाँक आंखिक तारा अपने लग बजा कअ हमारा अपने सन समदरसी बना दिअ चंदा मामा चंदा मामा हम अहाँक लाडला अपने सन चमका दिअ कोरा सन निर्मल कायामे शीतल मन बना दिअ ज्ञान प्रकाशक दीप हमरा हिर्दयमे जड़ा दिअ चंदा मामा चंदा मामा अहाँ अपने सन बना दिअ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २१३ म अंक ०१ नवम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०७ अंक २१३)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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