VIDEHA — Issue 214 / अंक २१४

Publication: VIDEHA · Issue: 214
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187 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २१४ म अंक १५ नवम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०७ अंक २१४) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-मैथिली संस्कृति केर अवयव २.२.सत्य नारायण झा- लघुकथा- कुमार साहेब २.३.मनोज कुमार मंडल-किछु बीहनि कथा २.४.जगदीश प्रसाद मंडल- गामक जिनगी (लघु कथा संग्रह- चारिम संस्करण) ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- 3 टा गजल ३.२.विन्देश्वर_ठाकुर- सामा ३.३.संतोष कुमार झा- सामा-चकेबा ३.४.मनोज कुमार मंडल- गजल ४.बालानां कृते-मनोज कुमार मंडल- २ टा बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय बीहनि (विहनि) कथा बा अति लघु कथा [ सीड स्टोरी (फ्लैश फिक्शन) बा वेरी शॉर्ट स्टोरी] मैथिलीमे बेइमान साहित्य अकादेमीक, ओकर बेइमान मैथिली परामर्शदात्री समितिक आ मैथिली साहित्य लेल दइ जाइबला पुरस्कारक बेइमान जूरीक प्रति विदेहक सर्जिकल स्ट्राइक दस सालसँ चलि रहल अछि। ओकर विरोधमे बेइमान लोकनि कखनो गजलक नामपर, कखनो नाटकक नामपर, कखनो वर्तनीक नामपर आ कखनो बीहनि कथाक नामपर भेख बदलि-बदलि छद्म बहस चलेबाक बेइमानी करैत रहल छथि। बेइमान साहित्यकार सभ मुदा दुबराइते गेला, अपन विचारधारक दुर्बलता देखि ओ ऐ छद्म बहसक लेल बाध्य भेला। आ ओइमे बेइमान संस्था आ जूरीक संग हुनकर समर्थन धूर्त मिथिला राज्य अभियानी सभ सेहो केलक। हँ, मैथिलीक साहित्य अकादेमीमे जे बेइजत्ती हिनका सभक कारण कएल जा रहल अछि, तकर ५० साल पूर्ण भेल। मैथिलीकेँ मारि बेइमानीक धंधा विदेहक सर्जिकल स्ट्राइक कारण थम्हल अछि, आ ओइ स्ट्राइकक कारण मूल धारा समानान्तर धाराक सोझाँ चित्त भऽ गेल अछि, गुणात्मके नै मात्रामे सेहो। बीहनि (विहनि) कथा बा अति लघु कथा [ सीड स्टोरी (फ्लैश फिक्शन) बा वेरी शॉर्ट स्टोरी] विदेह विहनि कथा विशेषांकमे विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र आएल। विदेह प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना विशेषांकमे साहित्यक समीक्षाशास्त्र आएल। कियो अति लघु कथाकेँ बीहनि कथा नै लिखत तँ तकरा खून तँ नै कऽ देबै। आ कियो बीहनि कथाकेँ अति लघुकथा लिखत तँ ओकरासँ भतबड़ी तँ नै कएल जा सकैए। अंग्रेजीमे अति लघुकथा लेल मुदा अहाँ "शॉर्ट-स्टोरी" नै लिखि सकै छी। ओइ लेल सीड स्टोरी बा फ्लैश फिक्शन बा आन कोनो शब्दावली लिखैये पड़त। ओतऽ ओइपर बहस चलिये रहल अछि। मुदा ओइ लेल "शॉर्ट-स्टोरी" नै लिखि सकै छी, अइपर ओतऽ कोनो विवाद नै अछि। किछु मैथिलीक अंग्रेजी (!!) प्रोफेसर केँ ई गप नै बुझल छन्हि, तइ लेल भारतक विश्वविद्यालयमे चयन कोना होइत अछि से ककरोसँ नुकाएल नै अछि। हँ मैथिलीमे बीआ आ बीहनि सीड आ सैपलिंग दुनूकेँ कहल जाइए। आब आउ बीहनि कथाक गुणात्मक विश्लेषणपर। पद्यक विधा हाइकूकेँ हम ऐमे जोड़ि कऽ देखब। बीहनि कथाक मान्यता कि ओइ बेइमान साहित्य अकादेमीक हाथमे अछि? मानि लिअ काल्हि साहित्य अकादेमीमे सर्जिकल स्ट्राइक होइए आ ओतऽ भुसकोल लोकक अकाल भऽ जाइए। तइयो कि बीहनि कथा (अति लघु कथा) संग्रह बा हाइकू संग्रहकेँ पुरस्कार देल जा सकत? कि बीहनि कथाक नाम अति लघु कथा कऽ देले टा सँ ओइमे गुणात्मक वृद्धि भऽ जाएत बा अति लघु कथाक नाम बदलि बीहनि कथा कऽ दी तँ ओही लेखकक वएह रचना खरापसँ नीक भऽ जाएत। आ मानि लिअ कोनो तेसरे शब्द अति लघु कथा बा बीहनि कथा लेल प्रयुक्त हुअए लागए, बा लघु कथा संग्रहमे एकटा बीहनि (अति लघु) कथा सेहो लेखक सम्मिलित कऽ लेथि तँ की ओकर समीक्षा अहाँ नै करब। आ जँ एकर विषय प्रेम रहए आ किछु युवा लप्रेक (लघु प्रेम कथा) कहि एकरा सम्बोधित करथि तँ की हम ई कहि समीक्षा करब जे लघु बीहिनि प्रेम कथा लिखब तँ ओ लोकनिसमीक्षा करता आ अति लघु प्रेम कथा लिखब तखन ई लोकनि समीक्षा करता। एक पाँतिक गद्य/ पद्य हुअए बा एक लाख पाँतिक, ओ साहित्यिक रचना भेल आ ओकर समीक्षा हेबे टा करत, चाहे ओकर नामकरण अहाँ जे करी। मुदा हाइकू आकि बीहनि कथा संग्रह सभमे एकटा समस्या अछि। बेशी गोटे जे ऐ दुनू विधामे छथि, से गुणक बले नै नामकरणक बले पुरस्कार जीतऽ चाहै छथि। जँ ई कही जे ऐ दुनू विधामे कम प्रतिभावान साहित्यकार सक्रिय छथि तँ असत्य नै हएत। मुदा एकर अर्थ ई नै जे ओ सभ एकोटा नीक बीहनि कथा नै लिखने छथि। हँ जँ हुनकर लेखनीकेँ देखी तँ एक-आधेटा नीक रचना ओ दऽ सकल छथि। आ जाधरि संग्रह भरि नीक बीहनि कथाक संग्रह ओ नै दऽ सकता, बिन पैरवी-पैगामक पुरस्कार भेटब कठिने हेतन्हि। तँ की ई लोकनि पूर्ण लघु-कथा लिखबाक योग्य नै छथि तेँ मजबूरीमे बीहनि कथा लिखै छथि? हँ बुझाइ तँ सएह अछि। राजमोहन झा अपन लघु कथा संग्रहक अन्तमे एकटा बीहनि कथा लिखलन्हि, "चलह"- सनगर बीहनि कथा। किछु नीक बीहनि कथामे परमेश्वर कापड़िक "सतबरती", अमरनाथ  झा केर "देह", ज्योति झा चौधरीक "नबका पीढ़ी", उमेश मण्डलक "रुपैआक ढेरी", कपिलेश्वर राउतक "छूआ-छूत", मुन्नाजीक "रेवाज", अनमोल झा केर "प्राथमिकता" आ ओमप्रकाश झा केर "स्पेशल परमिट" अबैत अछि। ऐ सभ बीहनि कथाकेँ एकत्र करी तँ एकटा पुरस्कार पेबा योग्य संग्रह बनत, आ पुरस्कार संयुक्त रूपेँ देल जा सकत।  हाइकूमे समस्या आर गम्भीर अछि, बाशो लिखै छथि जे जे कियो १२ टा हाइकू लिखि लेथि तँ ओ महाकवि भेला, तखन मैथिलीमे सभ महाकविये भऽ जेता, आ एकाध टा नीक आ हजारक हजार बीहनि-सन कथा लीखि बहुत गोटे महा-बीहनिकथाकार कहेता। विदेहक http://videha.co.in/ 1 जनवरी 2017 केर अंक निकलिते विदेह दसम बर्खमे प्रवेश कऽ जाएत। अइ अवसरपर विदेह गीत-संगीतक एलबम केर समीक्षा आदि प्रकाशित करबाक निर्णय लेलक अछि। छिटपुट प्रयासक अतिरिक्त शायद ई पहिल अवसर हेतै मैथिली पत्रिकारितामे जखन कि कोनो साहित्यिक पत्रिकाक कोनो एकटा अंकमे फिल्मी गीतक एलबम वा कि स्वतंत्र गीत-गजलक एलबम केर समीक्षा देबाक प्रयास वा निर्णय कएल गेल हुअए। संगीत समीक्षक लोकनिसँ आग्रह जे ओ कोनो एलबमक कोनो गीत-गजल-संगीत की पूरा एलबम केर समीक्षा पठाबथि। समीक्षा-लेख आदिमे गीत-संगीतक भाव पक्ष, टेक्नीकल पक्ष, शब्द चयन पक्ष, एडीटिंग पक्ष, मार्केटिंग पक्ष आदि केर वर्णन हुअए। लेखकेँ ggajendra@videha.com पर 1 दिसम्बर 2016 धरि पठाएल जाए।ऐ अंकमे समान्य रचना ओ स्थायी स्तंभ सभ सेहो रहबे करत। प्रयास रहत जे बेसीसँ बेसी गीत-गजल-संगीत आकि पूरा एलबमक समीक्षा आबए। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित रचनाकारक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-मैथिली संस्कृति केर अवयव २.२.सत्य नारायण झा- लघुकथा- कुमार साहेब २.३.मनोज कुमार मंडल-किछु बीहनि कथा २.४.जगदीश प्रसाद मंडल- गामक जिनगी (लघु कथा संग्रह- चारिम संस्करण) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र मैथिली संस्कृति केर अवयव मैथिली संस्कृति के समग्रता में मिथिलाम कहल जा सकैत अछि। कुनो सांस्कृतिक क्षेत्र अपन किछु विशेष खानपान, विध बेबहार, गीत संगीत आदि के कारणे विशेष स्थान आ पहिचान रखैत अछि। मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलाम के सेहो अपन विलक्षण विशेषता छैक। कनिक ओहि विलक्षणता पर विचार करी। मिथिलाम के संक्षिप्त रूप सँ 6 भाग में देखल जा सकैत अछि: क)  खानपान, ख) वस्त्र विन्यास, ग) गीत आ संगीत, घ) वाद्ययंत्र, च) भाषा , छ) धार्मिक संप्रदाय आ परंपरा। क. खानपान  खानपान कोनो समाज के संस्कृति के मूल होइत अछि। मिथिला में खानपान के दू दृष्टिकोण सँ देखल जा सकैत अछि। भोजन के मुख्य आ स्थानीय तत्त्व आ दोसर भोजनक सचार। जखन बहुत रासक वस्तु सँ भोजनक थारी अथवा थार सजैल जैत अछि त ई भेल सचार। सचार में कोनो जरुरी नहि जे सब वस्तु अथवा भोज्य सामग्री स्थानीय हो। जखन भोज्य सामग्री के बात करैत छी त मिथिलाक मूल भोज्य सामग्री के बुझ पडत।  एक फकरा में कहल जैत छैक: तिरहुतीयता के भोजन तीन। कदली कबकब मीन।। आब कनि एकरा देखी: कदली (केरा): केरा गाछक सब चीज़क प्रयोग मिथिला में होइत अछि। थम्ब के भीतर केर तरकारी, कोषा केर तरकारी, कांच केरा केर तरकारी, पाकल केराक विविध रूप में प्रयोग। कोनो भार बिना केरा के पूर्ण नहि अछि। केराक प्रयोग सब बिध, बेबहार, पूजा पाठ, उत्सव, सत्यनारायण कथा आदि में होइत अछि। कांच केराक तरकारी पथ्य के रूप में प्रयुक्त अछि। केरा थम्भ के बहुत शुभ कार्य में प्रयोग होइत अछि। केराक पात पर भोजन करब अदौ सँ अबैत परंपरा अछि। कबकब: कबकब के अंतर्गत भेल ओल, खमहारु , कौआं पात , ओलक पेंपी, कन्ना पात, अरिकंचक लोढ़हा, आदि। ओल शुद्ध आ सुपाच्य वस्तु अछि। सामूहिक भोज में ओलक सन्ना अनिवार्य रहैत अछि। ओलक तरकारी सेहो खूब चाव सँ हमरालोकनि खाइत छी। खमहारु के तरुआ अथवा खमहारुआ मिथिलाक विशेषता अछि। अरिकोंच ओना त सब खाइत छथि मुदा स्त्रीगनक मध्य ई कनि अधिक प्रिय अछि। कबकब भोज्य पदार्थ के बनेबा में कागजी, ज़मीरी नेबो, कांच आम, आ आमिल के प्रयोग होइत अछि। मीन : मीनक अर्थ भेल माछ। माछ त अपना सभक भोजनक मुख्य पदार्थ अछि। अनेक तरहक माछ आ माछक संग संग ओहि प्रजातिक अन्य चीज़ जेना कांकोड, डोका, काछु आदि खेबाक परंपरा मिथिला में अछि। ई त भेल तीन मुख्य तत्त्व। एकरा अतिरिक्त किछु पदार्थ अछि जे मैथिल के बहुत प्रिय छनि। ई सब अछि: दही-चूरा, चीनी: समस्त विश्व में मिथिले एहेन क्षेत्र अछि जत दही-चूरा-चीनी के मुख्य भोजन आ भोज इत्यादि में सामूहिक भोजन के रूप में खैल जैत अछि।  आ सब व्यंजन पर भारी पड़ैत अछि अपन मिथिलाक तिलकोरा । सर्वत्र उपलब्ध, ने दाम ने छदाम, आ स्वाद केर की कहब? छोट पैघ सब में अपन स्थान रखने अछि। ई एहेन भोज्य पदार्थ अछि जकरा केवल मैथिल खाइत छथि।  मखान: भारतवर्ष में सबसँ अधिक मखान अपन मिथिला में होइत अछि आ सबसँ बेसी एकर उपयोग सेहो हमरे लोकनि करैत छी।  अंततः भोजनक पूर्णता मुखशुद्धि सँ होइत अछि आ मुखशुद्धि पान सुपारी संगे। ख. वस्त्र विन्यास  परंपरागत वस्त्र मिथिलाक पुरुष लेल धोती, गमछा, या मुरेठा आ स्त्रीगण लेल नुआ, आंगी अछि। किछु विशेष वर्ग केर लोक या त विशेष अवसर पर अथवा ओहुना पाग सेहो धारण करैत छथि। धोती त।मिथिलाक मुसलमान सेहो पहिरैत छला। आब मुस्लमानक बाते छोड़ू हिन्दू सब सेहो धोती सँ बप्पा बैर केने जा रहल छथि। पहिने अपना ओत कोकटा बाँग होइत छल जाकर प्राकृतिक रंग ऑफ वाइट होइत छलैक। ओही बांग केर धोती के कोकटा धोती कहल जैत छलैक।  प्राचीन समय में पुरुष गाम गमैत भ्रमण करबा काल धोती, मिर्जई, दुपट्टा, गमछा, आदिक प्रयोग करैत छला। पैर में खराम पहिरबाक प्रथा हाल तक छल। पाहून परख के पैर धोबक हेतु खराम देल जेबाक परंपरा एखनो बहुत ठाम अछि। उच्च वर्ण में खराम पहिरक व्यवस्था उपनयन संग प्रारम्भ भ जाइत छल। किछु लोक खरपा सेहो पहिरैत छला। खरपा के आधार आर्थत तरवा काठ के आ ऊपर में आँगुर लग प्लास्टिक अथवा चाम लागल रहैत छलैक।  बाद में लोक गोल गला सेहो पहिरनाइ  प्रारम्भ केलनि।  मिथिलाक स्त्रीगण सब व्यवहार कैल वस्त्र यथा धोती आ नुआ सँ केथड़ी आ सुजनीक निर्माण सुई ताग सँ करैत छली। केथड़ी मोटगर होइत छैक जकर व्यवहार मोटगर गद्दा जकाँ जारक समय बिछेबक हेतु कैल जाइत छैक। सुजनी कलात्मक होइत छैक। सुजनी में अनेक तरहक ताग के सुन्नर संयोजन सँ बहुत रास डिजाईन , मोटिफ, वोटिफ, पैटर्न आदि बनेबाक प्रथा मिथिला में छलैक। सब वर्ग आ जातिक स्त्रीगण एहि कला में निपुण होइत छली। सुजनीक प्रयोग ओछाइन केर चद्दरि के रूप में होइत छैक। किछु लोक गरीबी में केथड़ी सेहो ओढ़ैत छथि। ग. गीत संगीत  मिथिलाक लोकगीत एक महासागर अछि। एकर संख्या कतेक अछि से कहब असंभव। मैथिली लोकगीतक विशेषता एकर समवेत गायन शैली छैक। लगभग 98 प्रतिशत गीत बिना कोनो वाद्ययंत्र और विशेष राग सँ गैल जाइत अछि। मुदा गीतक शब्द, भाव, गबैय्या के उत्साह आ समर्पण, विध बेबहार के प्रति ध्यान , ऋतुक संग स्वभाव, क्रियाकलाप सँ प्रतिबद्धता, काज में लगाव, आपसी प्रेम आ प्रकृति सँ अनुराग बिना कोनो वाद्ययंत्र के सेहो मैथिली लोकगीत के अलग संसार में ल जाइत अछि। विद्यापतिक पदावली, ताहू में उत्सव विशेष केर गीत, सोहर, समदाउन, उदासी, साँझ, प्राती आ शिवक गीत में महेशवानी , नचारी आ कंरथुआ गीत बहुत हर्षित करैत अछि तन के आ मोन के। सीता, राजा सलहेस, कारिख महाराज, दीनाभद्री, आदिक लोकगाथा आ गीत सेहो अपन अलग स्थान रखैत अछि। सब शास्त्रीय गीत मिथिला में बहार सँ आयातित अछि, यद्यपि ध्रुपद मैथिली लोकशैली संगे तारतम्य बना सकल अछि। बटगबनी, तिरहुत, लगनी तीव्रगति सँ चलैत गीत आ मोन लगबे बला गीत अछि। उदासी संत परंपरा, कबीरपंथी परम्परा, सँ प्रभावित भ रचल गेल अछि।  मिथिलाक उच्चवर्ग विशेष रूप सँ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ अपन महिला के पब्लिक स्पेस में गायन, वाद्ययंत्र संगे गायन, नृत्य आदिक स्वतंत्रता नहि देने छथि जाहि सँ एहि वर्ग केर महिला में नृत्य, नृत्यगीत, नृत्यनाटिका आदिक शैली नहि विकशित भ सकल छनि। अन्य जाति सब में डोमकच्छ, जटा-जटिन, झ्झिया, आदिक रूप भेटैत अछि। शामा चकेबा में बहुत साधारण तरहक नृत्य आ उत्साहक स्वतंत्रता देखैत छी।  मुस्लमान महिला सब ताजिया के समय झिझिया छाती पीट पीट गाबैत छथि। हुनकर स्वर आ टोन बहुत हद तक उदासी आ समदाउन सँ मेल खाइत छनि। घ. वाद्ययंत्र  मिथिलाक मूल वाद्ययंत्र रसनचौकी में प्रयुक्त होइत अछि। दुर्भाग्य सँ एकरा कहियो मिथिलाक तथाकथित विद्वान लोकनि प्रोत्साहित नहि केला। एकरा बारे में कहल जाइत अछि जे जखन सीता कुम्भ सँ बहार भेली त भगवान स्वर्ग सँ प्रसन्न होइत अप्सरा, वाद्ययंत्र आ ओकरा बजबय बला कलाकार सेहो मिथिला पठेला। किछु लोकक कहब छनि जे चूँकि ई वाद्ययंत्र चमार बजबैत छथि ताहि एहि पर विशेष ध्यान नहि देल गेल। च. भाषा: मैथिली भाषा प्राचीन भाषा अछि। एकर अपन लिपि छैक मुदा आब लोक देवनागरी में लिखैत छथि। बंगला लिपि मिथिलाक्षर सँ प्रेरित भ बनल अछि। एहि भाषा में विद्यापति, ज्योतिरेश्वर, चंदा झा, लाल दास, हरिमोहन झा आ यात्री सनहक़ साहित्यकार भेल छथि। आन भाषा जकाँ मैथिली में सेहो स्थान आ लोक ज्ञाने भाषा के बजबाक शैली, शब्द व्यवहार, टोन, आदि में परिवर्तन पैल जाइत अछि। बेगूसराय, बरौनी, मुंगेर आदिक मैथिली दक्षिण प्रभाव सँ ओत प्रोत अछि आ शैली में स्थानीय आनंदक अनुभूति भेटत। यद्यपि दरभंगा, मधुबनी में रहनिहार मैथिल सब अपन बोली के प्रमाणित करबा लेल बेहाल रहैत छथि। तहिना मिथिला केर पश्चिम में प्रयुक्त भाषा में कनि अलग स्थानीय भाव भेटैत अछि। भागलपुर, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज, दुमका, बांका में व्यवहृत मैथिली के अंगिका कहल जैत अछि। वैशाली क्षेत्र के मैथिली के बज्जिका कहल जाइत अछि। उच्च आ निम्न वर्ग ज्ञाने सेहो मैथिली बजबाक शैली में किछु उतार चढ़ाव भेटैत अछि। सब क्षेत्र, समुदाय, के स्थानीय शब्द, शैली, उपमा, अलंकार, पिहानी, फकरा, गीत नाद आदि के आधार मानि एक प्रामाणिक मैथिली भाषा के विकशित करबाक जरुरत अछि जे सबके मान्य हो, सब के सोहनगर लागनि। छ. धर्म आ संप्रदाय  मिथिला में सब वर्ण के लोक, सब धर्म के लोक रहैत छथि। अतै केर हिन्दू पंचोपासक छथि। महादेव केर पूजा माटिक महादेव बना अद्भुत ढंग सँ कैल जैत अछि। बुद्ध केर भाषा आ चार्यपद के एखनो मैथिली अपना में आत्मसात केने अछि। तंत्र में बौद्ध तंत्र के स्पष्ट प्रभाव छैक। सिद्ध पीठ आ बज्रयान केर तंत्र स्थल मिथिला में आबि जेना संगम जकाँ एक दिशा में एक भे बहे लगैत अछि। मुस्लमान सब सेहो अपन धर्म केर पालन करैत छथि संगहि किछु लोक परंपरा केर तत्व के अपना में समावेश क लेत छथि। सीता के मिथिलाक स्त्री नायिका के प्रतिनिधि आ राजा सलहेस के पुरुष नायक के प्रतिनिधि कहल जा सकैत अछि। मिथिला चित्रकला मिथिला चित्रकला जकरा मधुबनी चित्रकला सेहो कहल जाइत अछि, अपन स्थान आ नाम कला संसार में नीक जकाँ दर्ज करा लेने अछि। एहि पर बड्ड लिखब अनिवार्य नहि। इंगित भ गेल अतेक पर्याप्त अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सत्य नारायण झा लघुकथा कुमार साहेब जैह सुनलकै सैह स्तब्ध भए गेलैक ।मृत्व ओतेक भयावह नहि होयत छैक मुदा जेना कुमार साहेब दय लोक सुनलकै से सभ के विस्मयकारी लगलैक ।कुमार साहेब बहुत मेधावी छात्र रहथि ।एम एस सी मे पुरे विश्व विद्यालय मे प्रथम आयल रहथि ।तत्काल एकटा नामी गिरामी कओलेज मे शिक्षक नियुक्त भए गेल रहथि ।सिद्धान्तवादी ,इमंदार आ कर्तव्य परायण छलाह ।कओलेज शिक्षक रहितो आर्थिक रुपे कमजोरे छलाह ।अनर्गल अर्जन करब महापाप बुझैत छलाह ।विद्यार्थी लोकनि के ट्युसन दैत छलखीन मुदा निःशुल्क ।विश्वविद्यालय मे लोक प्रिय छलाह ।कुमार साहेबक बचपन बर कठिन समय सँ बितल रहनि ।हुनक पिता साधारण कृषक रहथीन ।माय-बापक एक मात्र सन्तान ओ रहथि ।कुमार साहेब माय बापक परम भक्त छलाह ।नौकड़ी भेटला के बाद बूढ़ माय बाप के संगहि रखलनि आ अन्त तक माय बाप के सेवा करैत रहलाह ।माय बापक जीविते ओ अपन ब्याह केने छलाह ।पत्नी सुशीलाजी नामेक अनुरुप सुदृढ़ आ मृदुभाषी रहथीन ।कुमार साहेब के तीनटा पुत्र रहथीन ।बेटा सभक पढ़ाइ लिखाइ मे कोनो कमी नहि केलखीन ।अपने जकाँ बेटा सभ प्रतिभाशाली रहथीन । मुदा बेटा सभक सोच आ कुमार साहेबक सोच मे आकाश पतालक अन्तर छल ।जहाँ कुमार साहेब अर्थवाद सँ दूर रहैत छलाह ,एकर विपरीति बेटा सभ अर्थक पाछू बताह जकाँ करथीन ।तीनू भाई समाज लोक वेद सँ दूर रहथीन ।पतिये के पदचिह्न पर पुतौहु सभ रहथीन ।केकरो सँ कोनो मतलव नहि ।तीनू पुतौहु आधुनिकता सँ भरल ।कोनो चिन्तन नहि ,कोनो सोच नहि ,बस मात्र निज सुख ।कुमार साहेब दुनू बेकती के कष्ट होनि मुदा बाजथि नहि जे एखनुक समय एहिना छैक । जेष्ठ पुत्र अमेरिका ,माझिल इंगलैन्ड आ छोट जर्मनी मे कार्यरत रहथीन ।अर्थोपार्जन आ सुख सुविधा मे ततेक तल्लीन तीनू भाई रहथीन जे माय बाप कोना छथीन तेकर ध्यान तीनू मे केकरो नहि ।बस अपना मे तीनू मस्त । रिटायर भेलाक बाद कुमार साहेब अपन गृह जिला भागलपुर मे रहय लगलाह ।कहुना कय जीवनक गाड़ी चला रहल छलाह ।कोनो एहन कष्टो नहि रहनि ।मुदा सभ दिन नीके रहत तेकर कोन ठेकान छैक ?केकरा भाग्य मे विधाता की लिखने छथीन, से के जनैत अछि ।विधाताक प्रकोप कुमार साहेब कें सेहो घेर लेलकनि ।कुमार साहेबक पत्नी के लकवा मारि देलकनि ।हाथ पैर शिथिल भए गेलनि ।वाक हरण सेहो भए गेलनि ।सुशीलाजी के ने उठि होनि ने बैस सकैत छलीह । खबरि भेला पर बेटा पुतौहु एलखीन ।पाँच –दस दिन रहि सभ अपन अपन गंतब्य स्थान चलि गेल खीन ।फेर तीनू बेटा पुतौहु पलटि के नहि अयलखीन्ह । एहिना समय बितैत गेलैक ।कुमार साहेब अपन पति धर्मक काज करैत रहलाह । पत्नीक परिचर्या अपने करथि ।पत्नीक सभ आवश्यक काज अपने करथि ।कुमार साहेब गम्भीर प्रकृतिक लोक छलाह ।केखनो कय बाल बच्चा पर क्षोभ होनि मुदा अपन कपारक दोष दय शान्त भए जाथि ।बेटा सभ के माय बाप सँ डर होमय लगलनि कारण माय बापक भार कियो उठाबय नहि चाहैत रहथीन ।कुमार साहेब सभ दुख पीबि जाइत छलाह मुदा अनावश्यक तनाव मे आबि जाथि । कुमार साहेब भोरे उठि पहिने पत्नी के शौच क्रिया सँ निवृत करा दैत छलखीन ।पत्नी के सभ आवश्यक काज कराय ,तखन अपना काज मे लगैत छलाह ।तीन दिन पहिने भोर भेलैक ।पत्नी जागल रहथीन ।पत्नी देखथीन जे कुमार साहेब सुतले छथि ।जखन बरीकाल भए गेलैक तखन पत्नी चिन्तित भए गेलखीन ।ओ बाजि त सकैत नहि छलखीन ।अन्त मे ओ लैन्ड लाइन फोन जे हुनका सँ कनेके हटि कय रहैक ,ततय कहुना कय हाथ लय गेलीह ।बहुत चेष्टा के बाद बगलबाला पड़ोसी के नम्बर डायल केलनि ।मुदा हिनका बाजल नहि होनि ।एहि प्रकारे तीन चारिबेर रिंग केलखीन ।पड़ोसी के शंका भेलनि ।ओ आबि काँल वेल दवेलखीन ।मुदा कोनो रिसपोन्स नहि भेलैक ।ताबे कोलोनी के कयएक लोक आबि गेलाह ।अन्त मे दरवाजा तोड़ल गेलैक ।कुमार साहेब के निधन भए गेल रहनि ।जहिना कुमार साहेबक निधन हुनक पत्नी सुनलखीन ,हुनको प्राणान्त भय गेलनि । लोक सभ तीनू बेटा के खबरि कय देलखीन । बेटा सभक प्रतीक्षा मे लास तीन दिन तक राखल गेलैक । कुमार साहेब बहुत लोकप्रिय लोक छलाह फलस्वरुप हुनक अन्तिम संस्कार मे लोकक हुजुम छल ।दुनू बेकती के एके स्थान पर संस्कार कय देल गेलैनि ।सैकड़ो लोक रहैक मुदा नहि रहैक त हुनक तीनू पुत्र । आइ एकटा मित्र भेट करय आयल छलाह ।वैह ई कथा कहलनि । सुनि स्तब्ध भए गेलौ ।तत्क्षण कलम उठायल आ आत्म संतोष लेल कथा लिखल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार मंडल-किछु बीहनि कथा 1 हिलकोर अगहन मास। दुपहरियाक समय। राम लखन भोजन केला पछाति दरबज्जाक आगू रौदमे चटाई बिछा बैठके विदेह समालोचनाक पोथी उलटबैत छला। संगे सिरहोनामे राखल रेडियोमे दरभंगा आकाशवाणीसँ दैत लोकगीत सेहो सुनि रहल छला। एकाएक धियान पेरा दिश गेलैन आकि दरबज्जा दिश मुस्की दैत राघवके अबैत देखलैन । देखते पहिने तऽ अकचकेला पर मिनटे भरि पछाति अख्यासि उठि कऽ ठाढ भऽ गेला । राघव सेहो डेग नम्हर करैत झट राम लखनसँ हाथ मिलबैत गलामे गला सेहो मिलला। दुनू गोटाक खुशीक कोनो सिमाने नहि। राम लखन आ राघव बाल संगी छला। जा धरि पाँचवाँसँ मैट्रिक केला छनो भरि एक दोसरसँ दूर नै रहैत छला। पढैयोमे जहिना राम लखन वर्गमे ऊपरसँ पहिल तहिना राघव नीचासँ पहिल अबै छला। अखन राम लखनक जीविका ट्यूशन पढा कऽ चलै छैन आ राघव दिल्ली सर्वोच्च न्यायालयमे अधिवक्ता छथि।  दुनू गोटा असथिर भेला बाद चटाए पर बैठला। राम लखन बजला " हम पहिने तऽ चिन्हबे नहि केऔं कारण दसो बरखसँ बेसिए भऽ गेल छल अहाँसँ मिलब।"  " अहिना नऽ हमरा बीसरि जाएब। तेरह बरखक बाद गाम एलहुँ हन। " " तहन कहु जे के किनका बीसरि गेला। " दुनू गोटा रंग बिरंगक गप सप करैत रहला। घंटोभरिसँ बेसए भऽ गेल। राम लखन बेटीके हाक दऽ बजला " गै बेटा दुविधा माय कऽ कहुन चाय बनाबै लऽ। फेर राघवसँ बजला " अपना सब तना नहि गपमे तल्लीन भऽ गेलहुँ जे बेर धियाने नहि रहल।"  " कोनो नै ढेरो दिनक बाद भेटलहुँ हन तऽ गपो तऽ बेसिए रहत किने। "  राम लखन ई सुनि मुस्कीएला। राघवक नजरि ओछान पर राखल पोथी पर परलैन। पोथी हाथमे लऽ उलटा - पुलटाके देखैत बजला " अहुँ केहन केहन पोथी पढैत रहै छी। के जनै छै मैथिली ? ई पढिके की हेतै ? " राम लखन मने मन सोचला ई बदलि गेला से तऽ बुझिते रही पर सोचक परिधि अतेक ओछ भऽ गेल हेतैन ई अंदाज नहि छल। ओना बहुत दिनक बाद भेटला अछि तेँ किछ कहब उचित नहि। फेर मनमे एलैन छिया तऽ संगी तेँ जँ ठमकि गेला अछि तऽ सचेत नहि कोना करबैन। ई गप मनमे अबिते बजला " राघव! एकटा बात कहु दुनियामे जतेक मनुख अछि सबके माय छै। तेँ कि दोसर स्त्री हमर मायक असथान लऽ सकै छथि ।"  " एहनो कतौ लऽ सकै छथि । " " हँ दोसर स्त्रीक सम्मान करब मनुखक करतब अछि। " " हँ से तऽ अछिए। " ततबे कालमे राम लखनक पत्नी चाय लऽ कऽ एली। दुनू गोटा चाय पीला कप रखलैन। राधव उठि बिदा भेला। मनमे जेना हिलकोर...... । 2 छुतहर बुढिया दादी आए भोरेसँ चरभर बजैत छली कारण केओ पछुएतमे राखल छुतहर बिन कहने उठा कऽ लऽ गेल छलै। जानि नहि के कहिया लऽ गेल छलै। ओ तऽ मरूआ बीहनि पटेबाक खागता पड़ने बुढिया दादीक धियान गेलैन। भरि टोल भँजया एली कतौ थाह पता नहि लगलैन। अंगना अबिते काकीके सुनबैत बजली " अंगनाक मनुख सब सेहो छुतहरि खापैर सब भऽ भऽ गेल। जखन अंगनामे मनुख रहत तयो लोग चीज बौस उठा कऽ लऽ जाएत तऽ ओए मनुखक कोन काज ?" काकी बुढिया दादीक गप सुनि अकचकेले रहली। बुढिया दादीसँ पूछैत बजली " ई एना किए बजैत छथिन। के कई लऽ गेलै - - - - ? काकी बैजते छली आकि बुढिया दादी बीचहिमे टभकैत बजली " जखन अंगनामे रहै बाली सबके किछ बुझले नहि रहै छै तहन हे भगवान जनिहऽ तू अहि घर दुआरके आब भगवाने बचौत। " बुढिया दादी बैजते छली ताधरि कक्का अंगना एला। दादीके बजैत देखि पूछलखिन " दादी की भेलौ?"  "हरौ मोहना तोहि कह जे आब मरूआ बीहनि कथिसँ पटौल जाएत । चनबारमे टांगल छुतहर कोए लऽ गेल आ अंगनाक मनुखके कुछ पते नहि। " " केहन बढिया तऽ गठुलामे राखल रहै छलै तकरा तू पछुएतमे राखि एलेँह। तहन - - - - - ।" " तहुँ की अलछ जेँका बाजै छेँ । छुतहर कोए घरमे रखै अछि। दोसर बरतनमे भिरने ओहो छुआ जाएत किने। " " जखन दोसर बरतनमे भिरने छुआ जाएत तहन तऽ मरूआ सेहो छुएन जाएत किने। " बुढिया दादी हँसैत बजली " जो हम बात नहि पदबै छी। बीहनि केना पटेमे से तू जान। " कक्का काकीके देखि मुसकी दऽ दरबज्जा दिश बिदा भेला। 3 अध्यापन  दू ढाई बजेक दुपहरियाक समय छलए। मंडलजी मास्सैब साइकिलसँ तबधल गाम दिस जाय छला। जखन गंजक चौक लग एला आकि वैद्यनाथजीक नजरि मंडलजी मास्सैब पर पड़लैन। जोरसँ हाक दैत बजला " यऊ गुरूजी ! गुरुजी !" मास्सैब साइकिले परसँ उलैट कऽ तकला तऽ देखलैन वैद्यनाथजी हाथसँ इशारा दैत छलैन। ओ साइकिल धूमा वैद्यनाथजीक दरबज्जा पर बैठला आ पूछलैन "आब कहु अपने की कहि रहल छी।"  " अपनेक सबके शिक्षा दैत छिए तेँ कहलौ जे हमरो दुनू बेटाके पढा दैतिए। " " हम सबके नहि कछेक धियापुताके पढबै छी आ पढेब की जे अपने पढै छी। " मंडलजीक गप सुनि वैद्यनाथजी हँसैत बजला " अहुँ गप पकैड़ि लै छिए। हमरो बच्चा सबके पढा देल जाउ। अपने जे कहबै से हम देब। " " आब अहाँ कहै छी तऽ पढा देब। " " शुल्क कहिऔ न कते दऽ देब? " " अहाँक जे उचित बुझना जाएत ओ दऽ देबै। पर हे दू मासक शुल्क हम ओहिना लेब। " " ई बुझलौं नहि गुरुजी!"  " पहिने हम दू मास अहाँ बच्चा सबसँ पढबा पछाइत पढैब ।" " अहाँ की पढबै। " " जाछरि हम अहाँ बच्चा सबके नहि पढबऽ ताधरि हम कोना पढा सकब। " मंडलजीक गपक मर्म बुझि वैद्यनाथजी बजला " अपनेक दूए मासक नहि हम सालो भरिक शुल्क ओहिना देब। अपने पढा देल जाउ। " " बेस।" कहि मंडलजी मास्सैब उठि बिदा भेला। 4 अगरजीत  --- रौ छौड़बा ! कतऽ अए रौदमे बिदा भेलें हन?  --- माए नहाए लऽ जाए छी।  --- कल बाड़ीमे छै कि चौमास दिश, तू चौमास दिश किए भागल जाए छें ?  --- माए पोखैर जाए छिए ।  --- नइ कोनो काज छै तू चुप चाप कल पर नहा ले नहि तऽ गत्तर ससाइर देबौ । --- माए आइएटा जै छिऔ । ई कहि फुदना लंक लऽ लेलक । जाबे माए सोर पारै पारै ताबे तऽ ओ पोखरि पहुँचि गेल। पोखरिमे फुदने जेकाँ और छोड़ा सब उमकै छलै। सब हेलि हेलि जाएठ लग जाए छलै। फुदना सेहो हेलि जाएठ छुबै लेल बिदा भेल परंतु जाएठ लग जाएसँ पहिनए हिम्मत हारि देलकै। आब पानिमे उगडुम उगडुम करऽ लागल । ताबे कोए ओकरा माए कऽ कहऽ गेलै । माए पोखैर दिश आबैत बजली --- ई छोड़बा छैइछे अते अगरजीत तऽ मरऽ---------। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गामक जिनगी लघु कथा संग्रह जगदीश प्रसाद मण्डल कथा लेखन क्रम 1. भैंटक लावा- शब्‍द संख्‍या : 3100, 2. बिसाँढ़- शब्‍द संख्‍या : 2516, 3. पीरारक फड़- शब्‍द संख्‍या : 2064, 4. अनेरुआ बेटा- शब्‍द संख्‍या : 3369, 5. दूटा पाइ- शब्‍द संख्‍या : 3294, 6. बोनिहारिन मरनी- शब्‍द संख्‍या : 3412, 7. हारि‍-जीत- शब्‍द संख्‍या : 2373, 8. ठेलाबला- शब्‍द संख्‍या : 2572, 9. जीविका- शब्‍द संख्‍या : 3655, 10. रिक्साबला- शब्‍द संख्‍या : 3963, 11. चुनवाली- शब्‍द संख्‍या : 2452, 12. डीहक बटबारा- शब्‍द संख्‍या : 4789, 13. भैयारी- शब्‍द संख्‍या : 4026, 14. बहि‍न- शब्‍द संख्‍या : 2688,15. घरदेखिया- शब्‍द संख्‍या : 4021, 16. पछताबा- शब्‍द संख्‍या : 2663, 17. डाक्टर हेमन्त- शब्‍द संख्‍या : 4407, 18. बाबी- शब्‍द संख्‍या : 2167 19. कामिनी- शब्‍द संख्‍या : 2289, 20. स्रष्टाक समग्र रचना- शब्‍द संख्‍या : 137, 21. प्रतिभा- शब्‍द संख्‍या : 154, 22. मर्म- शब्‍द संख्‍या : 142, 23. अधखरूआ- शब्‍द संख्‍या : 255, 24. समैक बेरबादी- शब्‍द संख्‍या : 213, 25. पहिने तप तखनि ढलिहेँ- शब्‍द संख्‍या : 084, 26. खलीफा उमरक सि‍नेह- शब्‍द संख्‍या : 165, 27. जखने जागी तखने परात- शब्‍द संख्‍या : 103, 28. अस्तित्वक समाप्ति- शब्‍द संख्‍या : 218, 29. खजाना- शब्‍द संख्‍या : 388,30. उग्रघारा- शब्‍द संख्‍या : 328, 31 बेवहारिक- शब्‍द संख्‍या : 218, 32. समर्पण- शब्‍द संख्‍या : 149, 33 उत्थान-पतन- शब्‍द संख्‍या : 138,34. देवता- शब्‍द संख्‍या : 232, 35. पाप आ पुण्य- शब्‍द संख्‍या : 218, 36. परख- शब्‍द संख्‍या : 129, 37. आलसी- शब्‍द संख्‍या : 136, 38.प्रेम- शब्‍द संख्‍या : 293, 39. हैरियट स्टो- शब्‍द संख्‍या : 137, 40. बुझैक ढंग- शब्‍द संख्‍या : 142, 41. श्रमिकक इज्जत- शब्‍द संख्‍या : 093,42. वंश- शब्‍द संख्‍या : 074, 43. तियाग- शब्‍द संख्‍या : 145, 44. सद्वि‍चार- शब्‍द संख्‍या : 184, 45. साहस- शब्‍द संख्‍या : 103, 46. बरदास- शब्‍द संख्‍या : 133, 47. भूल- शब्‍द संख्‍या : 139, 48. धैर्य- शब्‍द संख्‍या : 099, 49. मनुखक मूल्य- शब्‍द संख्‍या : 099, 50. मदति नै चाही- शब्‍द संख्‍या : 209, 51. मेहनति‍क दरद- शब्‍द संख्‍या : 281, 52. मैक्सिम गोर्की- शब्‍द संख्‍या : 146, 53. मूलधन- शब्‍द संख्‍या : 174, 54.कपटी मि‍त- शब्‍द संख्‍या : 281, 55. भीख- शब्‍द संख्‍या : 118, 56. भगवान- शब्‍द संख्‍या : 098, 57. एकाग्रचित- शब्‍द संख्‍या : 261, 58.सीखैक जिज्ञासा- शब्‍द संख्‍या : 101, 59. अनुभव- शब्‍द संख्‍या : 092, 60. आसिरवादक विरोध- शब्‍द संख्‍या : 088, 61. धर्मक असल रूप- शब्‍द संख्‍या : 197, 62. सौन्दर्य- शब्‍द संख्‍या : 138, 63. स्तब्ध- शब्‍द संख्‍या : 257, 64. एकता- शब्‍द संख्‍या : 236, 65. विधवा बि‍आह- शब्‍द संख्‍या : 176, 66. देश सेवाक व्रत- शब्‍द संख्‍या : 134, 67. आत्मबल- 1- शब्‍द संख्‍या : 110, 68. स्वाभिमान- शब्‍द संख्‍या : 121, 69. कलंक- शब्‍द संख्‍या : 429, 70. बुलकी- शब्‍द संख्‍या : 211, 71. भद्रपुरुष- शब्‍द संख्‍या : 173, 72. झूठ नै बाजब- शब्‍द संख्‍या : 103, 73. आर्दश माए- शब्‍द संख्‍या : 097, 74. नारी सम्मान- शब्‍द संख्‍या : 100, 75. अनुशासन- शब्‍द संख्‍या : 190, 76. सादा जि‍नगी- शब्‍द संख्‍या : 127, 77.विचारक उदय- शब्‍द संख्‍या : 072, 78. पुष्ट इकाइसँ समर्थराष्ट बनैत- शब्‍द संख्‍या : 102, 79. डर नै करी- शब्‍द संख्‍या : 119, 80. आसिरवाद उलटि गेल- शब्‍द संख्‍या : 223, 81. रत्न गमेवाक दुख- शब्‍द संख्‍या : 226, 82. निसाँ- शब्‍द संख्‍या : 194, 83. सामना- शब्‍द संख्‍या : 124, 84.शिष्टाचार- शब्‍द संख्‍या : 171, 85. ठक- शब्‍द संख्‍या : 115, 86. पत्नीक अधिकार- शब्‍द संख्‍या : 128, 87. शिनीची सि‍नेह- शब्‍द संख्‍या : 211, 88. सिखबैक उपए- शब्‍द संख्‍या : 171, 89. कर्तव्यपरायन सुगा- शब्‍द संख्‍या : 171 90. तस्वीर- शब्‍द संख्‍या : 134, 91. मि‍तक प्रयोजन- शब्‍द संख्‍या : 359, 92. स्वार्थपूर्ण विचार- शब्‍द संख्‍या : 121, 93. संगीक महत- शब्‍द संख्‍या : 130, 94. उपहास- शब्‍द संख्‍या : 196, 95. महादान- शब्‍द संख्‍या : 176, 96. भाग्यवाद- शब्‍द संख्‍या : 171, 97. सद्वृति‍- शब्‍द संख्‍या : 150, 98. आश्रम नै सोभाव बदली- शब्‍द संख्‍या : 281, 99. पुरुषार्थ- शब्‍द संख्‍या : 255, 100. नैष्ठिक सुधन्वा- शब्‍द संख्‍या : 274, 101.सद्गृहस्त- शब्‍द संख्‍या : 195, 102. सद्भाव- शब्‍द संख्‍या : 134, 103. आलस्य वनाम पिशाच- शब्‍द संख्‍या : 302, 104. स्वर्ग आ नर्क- शब्‍द संख्‍या : 265, 105. यथार्थक बोध- शब्‍द संख्‍या : 115, 106. विद्वताक मद- शब्‍द संख्‍या : 165, 107. अनन्‍त- शब्‍द संख्‍या : 128, 108. हँसैत लहास- शब्‍द संख्‍या : 184, 109. अनगढ़ चेतना- शब्‍द संख्‍या : 162, 110. सत्‍य विद्या- शब्‍द संख्‍या : 108, 111. समता- शब्‍द संख्‍या : 165, 112.जेते चोट तेते सक्कत- शब्‍द संख्‍या : 116, 113. परिष्कार- शब्‍द संख्‍या : 198, 114. कथनी नै करनी- शब्‍द संख्‍या : 176, 115. शालीनता- शब्‍द संख्‍या : 157, 116. मजूरी- शब्‍द संख्‍या : 140, 117. जीवन यात्रा- शब्‍द संख्‍या : 145, 118. ज्योति‍- शब्‍द संख्‍या : 081, 119. पवनक विवेक- शब्‍द संख्‍या : 180, 120. आत्मबल-2- शब्‍द संख्‍या : 105, 121. खुदीराम बोस- शब्‍द संख्‍या : 172, 122. शिष्यकेँ शिक्षेटा नै परीक्षो- शब्‍द संख्‍या : 187, 123. लौह पुरुष- शब्‍द संख्‍या : 124, 124. जंग लगल- शब्‍द संख्‍या : 150, 125. जीवकक परीछा- शब्‍द संख्‍या : 117, 126. तप- शब्‍द संख्‍या : 162, 127. उल्टा अर्थ- शब्‍द संख्‍या : 203, 128. जाति नै पानि- शब्‍द संख्‍या : 142, 129. ऊँच-नीच- शब्‍द संख्‍या : 206, 130.पागलखाना- शब्‍द संख्‍या : 223, 131. दोहरी मारि‍- शब्‍द संख्‍या : 1357, 132. केना जीब? - शब्‍द संख्‍या : 1031, 133. नवान- शब्‍द संख्‍या : 2282, 134. तिलासंक्रान्तिक लाइ- शब्‍द संख्‍या : 2034, 135. भाइक सिनेह- शब्‍द संख्‍या : 1166, 136. प्रेमी- शब्‍द संख्‍या : 2520, 137.बपौती सम्‍पति- शब्‍द संख्‍या : 2352‍, 138. डंका- शब्‍द संख्‍या : 2422, 139. संगी- शब्‍द संख्‍या : 1858, 140. ठकहरबा- शब्‍द संख्‍या : 2351,141. अतहतह- शब्‍द संख्‍या : 2477, 142. अर्द्धांगि‍नी- शब्‍द संख्‍या : 3045, 143. ऑपरेशन- शब्‍द संख्‍या : 1605, 144. धर्मनाथ- शब्‍द संख्‍या : 1983, 145. सरोजनी- शब्‍द संख्‍या : 1816, 146. सुभद्रा- शब्‍द संख्‍या : 1910, 147. सोनमाकाका- शब्‍द संख्‍या : 1537, 148. दोती बि‍आह- शब्‍द संख्‍या : 1816, 149. पड़ाइन- शब्‍द संख्‍या : 1988, 150. केतौ नै- शब्‍द संख्‍या : 1211, 151. बि‍हरन- शब्‍द संख्‍या : 3174, 152. मायराम- शब्‍द संख्‍या : 2037, 153. गोहि‍क शि‍कार- शब्‍द संख्‍या : 2113, 154. मातृभूमि- शब्‍द संख्‍या : 1036, 155. भबडाह- शब्‍द संख्‍या : 2053,156. परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा- शब्‍द संख्‍या : 1888, 157. फागु- शब्‍द संख्‍या : 2096, 158. लफक साग- शब्‍द संख्‍या : 1192, 159. ति‍लकोरक तरुआ- शब्‍द संख्‍या : 1826, 160. एकोटा ने- शब्‍द संख्‍या : 1071, 161. धोतीक मान- शब्‍द संख्‍या : 472, 162. साझी- शब्‍द संख्‍या : 989,163. सतभैंया पोखरि- शब्‍द संख्‍या : 2990, 164. न्‍याय चाही- शब्‍द संख्‍या : 1308, 165. पनि‍याहा दूध- शब्‍द संख्‍या : 2114, 166. कर्ज- शब्‍द संख्‍या : 2860, 167. परदेशी बेटी- शब्‍द संख्‍या : 2451, 168. मान- शब्‍द संख्‍या : 631, 169. मनोरथ- शब्‍द संख्‍या : 1151, 170. कि‍यो ने- शब्‍द संख्‍या : 3699, 171. सूदि‍ भरना- शब्‍द संख्‍या : 904, 172. जन्‍मति‍थि- शब्‍द संख्‍या : 2356, 173. इमानदार घूसखोर- शब्‍द संख्‍या : 2204,174. पटि‍याबला- शब्‍द संख्‍या : 2356, 175. सनेस- शब्‍द संख्‍या : 1248, 176. उलबा चाउर- शब्‍द संख्‍या : 2588, 177. बलजोर- शब्‍द संख्‍या : 2320, 178. बेटी हम अपराधी छी- शब्‍द संख्‍या : 3240, 179. बगबारि‍‍- शब्‍द संख्‍या : 1847, 180. मुइलो बि‍सेबनि- शब्‍द संख्‍या : 4244,181. सड़ल दारीम- शब्‍द संख्‍या : 2442, 182. चुप्‍पा पाल- शब्‍द संख्‍या : 2517, 183. एक धाप जमीन- शब्‍द संख्‍या : 2522, 184. ओझरी- शब्‍द संख्‍या : 1963, 185. मुसहनि- शब्‍द संख्‍या : 2277, 186. केलवाड़ी- शब्‍द संख्‍या : 2628, 187. स्‍वरोजगार- शब्‍द संख्‍या : 2338, 188.घूर- शब्‍द संख्‍या : 2749, 189. कनियाँ-पुतरा- शब्‍द संख्‍या : 2340, 190. वारंट- शब्‍द संख्‍या : 1601, 191. गामक मुँह फेर देखब- शब्‍द संख्‍या : 2897, 192. कचोट- शब्‍द संख्‍या : 313, 193. काँच सूत- शब्‍द संख्‍या : 390, 194. बुधनी दादी- शब्‍द संख्‍या : 267, 195. खि‍लतोड़- शब्‍द संख्‍या : 396, 196. मुँह-कान- शब्‍द संख्‍या : 234, 197. अनदि‍ना- शब्‍द संख्‍या : 312, 198. अपन काज- शब्‍द संख्‍या : 366, 199. दूरी- शब्‍द संख्‍या : 264, 200. पुरनी भौजी- शब्‍द संख्‍या : 116, 201. छूटि‍ गेल- शब्‍द संख्‍या : 111, 202. काल्हि‍ दि‍न- शब्‍द संख्‍या : 151, 203. अप्‍पन हारि- शब्‍द संख्‍या : 283, 204. कनफुसकी- शब्‍द संख्‍या : 137, 205. मुँहक बात मुहेँमे- शब्‍द संख्‍या : 135, 206. कनीटा बात- शब्‍द संख्‍या : 098, 207. गति‍-गुद्दा- शब्‍द संख्‍या : 250, 208. बि‍सवास- शब्‍द संख्‍या : 316, 209. कचहरि‍या भाय- शब्‍द संख्‍या : 270, 210. गुहारि- शब्‍द संख्‍या : 432, 211. शि‍वजीक डाक-बाक्- शब्‍द संख्‍या : 089, 212. सोग- शब्‍द संख्‍या : 341, 213. पनचैती- शब्‍द संख्‍या : 197, 214. कनमन- शब्‍द संख्‍या : 313, 215. अजाति- शब्‍द संख्‍या : 085, 216. पटोर- शब्‍द संख्‍या : 412, 217. फुसि‍याह- शब्‍द संख्‍या : 308, 218. गति‍-मुक्‍ति- शब्‍द संख्‍या : 241, 219. चौकीदारी- शब्‍द संख्‍या : 437, 220. झगड़ाउ-झोटैला- शब्‍द संख्‍या : 256, 221. घबाह ट्यूशन- शब्‍द संख्‍या : 246,222. दादी-माँ- शब्‍द संख्‍या : 408, 223. पटोटन- शब्‍द संख्‍या : 349, 224. मुसाइ पण्‍डित- शब्‍द संख्‍या : 567, 225. भरमे-सरम- शब्‍द संख्‍या : 231, 226. देखल दि‍न- शब्‍द संख्‍या : 434, 227. फज्झति- शब्‍द संख्‍या : 403, 228. अकास दीप- शब्‍द संख्‍या : 233, 229. बुधि‍-बधि‍या- शब्‍द संख्‍या : 268, 230. पहाड़क बेथा- शब्‍द संख्‍या : 216, 231. उमकी- शब्‍द संख्‍या : 324, 232. बजन्‍ता-बुझन्‍ता- शब्‍द संख्‍या : 147, 233. चर्मरोग- शब्‍द संख्‍या : 578, 234. शंका- शब्‍द संख्‍या : 325, 235. ओसार- शब्‍द संख्‍या : 213, 236. छोटका काका- शब्‍द संख्‍या : 394, 237. सीमा-सरहद- शब्‍द संख्‍या : 195, 238. रमैत जोगी बोहैत पानि- शब्‍द संख्‍या : 253, 239. गंजन- शब्‍द संख्‍या : 172, 240. सजए- शब्‍द संख्‍या : 089, 241. घटक बाबा- शब्‍द संख्‍या : 335, 242. आने जकाँ- शब्‍द संख्‍या : 048, 243. दान-दछि‍ना- शब्‍द संख्‍या : 150, 244.उड़हड़ि- शब्‍द संख्‍या : 503, 245. मत्हानि- शब्‍द संख्‍या : 260, 246. मेकचो- शब्‍द संख्‍या : 221, 247. झुटका वि‍दाइ- शब्‍द संख्‍या : 350,248. मुँहक खति‍यान- शब्‍द संख्‍या : 278, 249. कोसलि‍या- शब्‍द संख्‍या : 234, 250. हूसि‍ गेल- शब्‍द संख्‍या : 204, 251. पोखला कटहर- शब्‍द संख्‍या : 153, 252. सरही सौबजा- शब्‍द संख्‍या : 267, 253. तेरहो करम- शब्‍द संख्‍या : 322, 254. डुमैत जिनगी- शब्‍द संख्‍या : 295,255. चोर-सि‍पाही- शब्‍द संख्‍या : 197, 256. दूधबला- शब्‍द संख्‍या : 271, 257. टाइपि‍स्‍ट- शब्‍द संख्‍या : 263, 258. समदाही- शब्‍द संख्‍या : 300, 259. बुढ़ि‍या दादी- शब्‍द संख्‍या : 331, 260. पाइक मोल- शब्‍द संख्‍या : 2412, तिथि : 22 दिसम्‍बर 2013 261. चोरूक्का झगड़ा- शब्‍द संख्‍या : 538, तिथि : 24 दिसम्‍बर 2013 262. अपसोच- शब्‍द संख्‍या : 548, तिथि : 26 दिसम्‍बर 2013 263. पतझाड़- शब्‍द संख्‍या : 2587, तिथि : 31 दिसम्‍बर 2013 264. झीसीक मजा- शब्‍द संख्‍या : 453, तिथि : 1 जनवरी 2014 265. मति-गति- शब्‍द संख्‍या : 1807, तिथि : 07 जनवरी 2014 266. अपन सन मुँह- शब्‍द संख्‍या : 5696, तिथि : 25 जनवरी 2014 267. रिजल्‍ट- शब्‍द संख्‍या : 2343, तिथि : 16 जनवरी 2014 268. सुमति- शब्‍द संख्‍या : 3052, तिथि : 30 जनवरी 2014 269. फेर पुछबनि- शब्‍द संख्‍या : 346, तिथि : 31 जनवरी 2014 270. माघक घूर- शब्‍द संख्‍या : 1683, तिथि : 06 फरवरी 2014 271. खर्च- शब्‍द संख्‍या : 330, तिथि : 07 फरवरी 2014 272. अखरा-दोखरा- शब्‍द संख्‍या : 342, तिथि : 10 फरवरी 2014 273. पेटगनाह- शब्‍द संख्‍या : 593, तिथि : 14 फरवरी 2014 274. बड़की माता- शब्‍द संख्‍या : 1224, तिथि : 18 फरवरी 2014 275. धरती-अकास- शब्‍द संख्‍या : 184 , तिथि : 19 फरवरी 2014 276. बकठाँइ- शब्‍द संख्‍या : 883, तिथि : 24 फरवरी 2014 277. चैन-बेचैन- शब्‍द संख्‍या : 936, तिथि : 09 मार्च 2014 278. हथि‍याएल खुरपी- शब्‍द संख्‍या : 645 , तिथि : 11 मार्च 2014 279. अलपुरि‍या बरी- शब्‍द संख्‍या : 287, तिथि : 12 मार्च 2014 280. नीक बोल- शब्‍द संख्‍या : 565, तिथि : 13 मार्च 2014 281. सुआद- शब्‍द संख्‍या : 624, तिथि : 14 मार्च 2014 282. गंगा नहेलौं- शब्‍द संख्‍या : 690, तिथि : 19 मार्च 2014 283. भोँटक गहमी- शब्‍द संख्‍या : 508, तिथि : 24 मार्च 2014 284. भँसैत नाह- शब्‍द संख्‍या : 597, तिथि : 26 मार्च 2014 285. पान पराग- शब्‍द संख्‍या : 1692, तिथि : 29 मार्च 2014 286. सि‍रमा- शब्‍द संख्‍या : 760, तिथि : 31 मार्च 2014 287. नौमीक हकार- शब्‍द संख्‍या : 1119, तिथि : 03 अप्रैल 2014 288. फोंक मकड़- शब्‍द संख्‍या : 1744, तिथि : 10 अप्रैल 2014 289. केते लग केते दूर- शब्‍द संख्‍या : 1252, तिथि : 14 अप्रैल 2014 290. अभि‍नव अनुभव- शब्‍द संख्‍या : 326, तिथि : 16 अप्रैल 2014 291. खोंटकर्मा- शब्‍द संख्‍या : 1184, तिथि : 19 अप्रैल 2014 292. कि‍छु ने- शब्‍द संख्‍या : 503, तिथि : 22 अप्रैल 2014 293. झकास- शब्‍द संख्‍या : 1589, तिथि : 26 अप्रैल 2014 294. अप्‍पन-बीरान- शब्‍द संख्‍या : 2919, तिथि : 01 मई 2014 295. सजमनि‍याँ आम- शब्‍द संख्‍या : 611, तिथि : 04 मई 2014 296. अर्जुन रोग- शब्‍द संख्‍या : 1003, तिथि : 7 मई 2014 297. गरदनि‍ कट्टा बेटा- शब्‍द संख्‍या : 575, तिथि : 10 मई 2014 298. नैहराक धाड़- शब्‍द संख्‍या : 885, तिथि : 14 मई 2014 299. अवाक- शब्‍द संख्‍या : 1047, तिथि : 17 मई 2014 300. पोखरि‍क सैरात- शब्‍द संख्‍या : 923, तिथि : 20 मई 2014 301. दनि‍याँ डाबा- शब्‍द संख्‍या : 409, तिथि : 22 मई 2014 302. धरम काँट- शब्‍द संख्‍या : 395, तिथि : 23 मई 2014 303. पलभरि- शब्‍द संख्‍या : 1116, तिथि : 24 मई 2014 304. कि‍रदानी- शब्‍द संख्‍या : 5296, तिथि : 14 जुन 2014 305. सगहा- शब्‍द संख्‍या : 2867, तिथि : 22 जुन 2014 306. अकाल- शब्‍द संख्‍या : 1238, तिथि : 24 जुन 2014 307. उझट बात- शब्‍द संख्‍या : 1152, तिथि : 26 जुन 2014 308. कर्जखौक- शब्‍द संख्‍या : 1175, तिथि : 2 जुलाई 2014 309. उनटन- शब्‍द संख्‍या : 1187, तिथि : 6 जुलाई 2014 310. रेहना चाची- शब्‍द संख्‍या : 1307, तिथि : 9 जुलाई 2014 311. बुधनी दादी- शब्‍द संख्‍या : 1256, तिथि : 11 जुलाई 2014 312. अउतरि‍त प्रश्‍न- शब्‍द संख्‍या : 1229, तिथि : 14 जुलाई 2014 313. हारि- शब्‍द संख्‍या : 1240, तिथि : 16 जुलाई 2014 314. सोनाक सुइत- शब्‍द संख्‍या : 1135, तिथि : 17 जुलाई 2014 315. मरूभूमि‍- शब्‍द संख्‍या : 1214, तिथि : 20 जुलाई 2014 316. असगरे- शब्‍द संख्‍या : 1557, तिथि : 24 जुलाई 2014 317. पुरनी नानी- शब्‍द संख्‍या : 1304, तिथि : 27 जुलाई 2014 318. कटा-कटी- शब्‍द संख्‍या : 1140, तिथि : 30 जुलाई 2014 319. केते लग केते दूर- शब्‍द संख्‍या : 1206, तिथि : 3 अगस्‍त 2014 320. गलती अपने भेल- शब्‍द संख्‍या :3386, तिथि : 06 अगस्‍त 2014 321. चोरक चोरबती- शब्‍द संख्‍या : 884, तिथि : 6 अगस्‍त 2014 322. घर तोड़ि‍ देलि‍ऐ- शब्‍द संख्‍या : 1527, तिथि : 10 अगस्‍त 2014 323. सजल स्‍मृति- शब्‍द संख्‍या : 2363, तिथि : 14 अगस्‍त 2014 324. सनेस- शब्‍द संख्‍या : 2654, तिथि : 16 अगस्‍त 2014 325. सए कच्‍छे- शब्‍द संख्‍या : 488, तिथि : 19 अगस्‍त 2014 326. एक मुठी घास- शब्‍द संख्‍या : 411, तिथि : 21 अगस्‍त 2014 327. करि‍छौंह मुँह- शब्‍द संख्‍या : 318, तिथि : 24 अगस्‍त 2014 328. पुरस्‍कार- शब्‍द संख्‍या : 2414, तिथि : 24 अगस्‍त 2014 329. गावीस मोइस- शब्‍द संख्‍या : 687, तिथि : 29 अगस्‍त 2014 330. मनकमना- शब्‍द संख्‍या : 6118, तिथि : 19 सि‍तम्‍बर 2014 331. घरवास- शब्‍द संख्‍या : 4884, तिथि : 26 सि‍तम्‍बर 2014 332. समधीन- शब्‍द संख्‍या : 6096, तिथि : 04 अक्‍टुबर 2014 333. चापाकलक पाइप- शब्‍द संख्‍या : 1616, तिथि : 7 अक्‍टुबर 2014 334. कलम हानि कऽ- शब्‍द संख्‍या : 2226, तिथि : 10 अक्‍टुबर 2014 335. लतियाएल जिनगी- शब्‍द संख्‍या : 1184, तिथि : 14 अक्‍टुबर 2014 336. गामक शकल-सूरत- शब्‍द संख्‍या : 2596, तिथि : 20अक्‍टुबर 2014 337. जितिया पावनि- शब्‍द संख्‍या : 3706, तिथि : 24 अक्‍टुबर 2014 338. सुखाएल सूरत- शब्‍द संख्‍या : 3690, तिथि : 30 अक्‍टुबर 2014 339. भैयारी हक- शब्‍द संख्‍या : 3131, तिथि : 4 नवम्‍बर 2014 340. ठकुआएल भुसवा- शब्‍द संख्‍या : 3356, तिथि : 13 नवम्‍बर 2014 341. खुदियाएल- शब्‍द संख्‍या : 2894, तिथि : 17 नवम्‍बर 2014 342. खटहा आम- शब्‍द संख्‍या : 3528, तिथि : 22 नवम्‍बर 2014 343. ढकरपेँच- शब्‍द संख्‍या : 3740, तिथि : 30 नवम्‍बर 2014 344. असहाज- शब्‍द संख्‍या : 2853, तिथि : 04 दिसम्‍बर 2014 345. समरथाइक भूत- शब्‍द संख्‍या : 3832, तिथि : 07 दिसम्‍बर 2014 346. विदाइ- शब्‍द संख्‍या : 5103, तिथि : 17 दिसम्‍बर 2014 347. खलओदार- शब्‍द संख्‍या : 731, तिथि : 19 दिसम्‍बर 2014 348. मनुखदेवा- शब्‍द संख्‍या : 1016, तिथि : 22 दिसम्‍बर 2014 349. उमेद- शब्‍द संख्‍या : 3643, तिथि : 31 दिसम्‍बर 2014 350. गलगर भैंस- शब्‍द संख्‍या : 3392, तिथि : 4 जनवरी 2015 351. जाड़ फाटि गेल- शब्‍द संख्‍या : 3328, तिथि : 9 जनवरी 2015 352. सुरता- शब्‍द संख्‍या : 3304, तिथि : 15 जनवरी 2015 353. असुध मन- शब्‍द संख्‍या : 2353, तिथि : 19 जनवरी 2015 354. धरमूदासक अखड़ाहा- शब्‍द संख्‍या : 1410, तिथि : 21 जनवरी 2015 355. ठोररंगू- शब्‍द संख्‍या : 1531, तिथि : 23 जनवरी 2015 356. लगबे ने कएल- शब्‍द संख्‍या : 1449, तिथि : 25 जनवरी 2015 357. उकड़ू समय- शब्‍द संख्‍या : 1467, तिथि : 27 जनवरी 2015 358. चास-बास दुनू गेल- शब्‍द संख्‍या : 1615, तिथि : 29 जनवरी 2015 359. नहरकन्‍हा- शब्‍द संख्‍या : 1209, तिथि : 11 मार्च 2015 360. बटखौक- शब्‍द संख्‍या : 1272, तिथि : 14 मार्च 2015 361. पसेनाक धरम- शब्‍द संख्‍या : 1263, तिथि : 16 मार्च 2015 362. जेठुआ गरदा- शब्‍द संख्‍या : 1103, तिथि : 18 मार्च 2015 363. हँसीएमे उड़ि गेलौं- शब्‍द संख्‍या : 1243, तिथि : 20 मार्च 2015 364. बुड़िबकहा बुड़िबक बनौलक- शब्‍द संख्‍या : 1234, तिथि : 23 मार्च 2015 365. हमर बाइनिक विचार- शब्‍द संख्‍या : 1207, तिथि : 26 मार्च 2015 366. नोकरिहारा- शब्‍द संख्‍या : 1146, तिथि : 26 मार्च 2015 367. घसवाहि- शब्‍द संख्‍या : 1213, तिथि : 28 मार्च 2015 368. तेतर भाइक कविता- शब्‍द संख्‍या : 1319, तिथि : 1 अप्रैल 2015 369. छूआ- शब्‍द संख्‍या : 1223, तिथि : 6 अप्रैल 2015 370. दोसराइत- शब्‍द संख्‍या : 1270, तिथि : 9 अप्रैल 2015 371. लछनमान- शब्‍द संख्‍या : 1173, तिथि : 13 अप्रैल 2015 372. हमर कोन दोख- शब्‍द संख्‍या : 1527, तिथि : 17 अप्रैल 2015 373. मौसी- शब्‍द संख्‍या : 1393, तिथि : 21 अप्रैल 2015 374. नटकिया गति- शब्‍द संख्‍या : 1313 24 अप्रैल 2015 375. खाए चाहैए- शब्‍द संख्‍या : 1223, तिथि : 27 अप्रैल 2015 376. मधुमाछी- शब्‍द संख्‍या : 1892, तिथि : 07 मई 2015 377. दनगर घास- शब्‍द संख्‍या : 2775, तिथि : 13 मई 2015 378. सझिया खेती- शब्‍द संख्‍या : 3135, तिथि : 23 मई 2015 379. मुफतिया माल- शब्‍द संख्‍या : 3231, तिथि : 29 मई 2015 380. मथाहाथ- शब्‍द संख्‍या : 2923, तिथि : 02 जून 2015 381. पहपटि- शब्‍द संख्‍या : 1369, तिथि : 05 जून 2015 382. इजोरिया राति- शब्‍द संख्‍या : 1512, तिथि : 07 जून 2015 383. तीन जुगिया भाय- शब्‍द संख्‍या : 2010, तिथि : 12 जून 2015 384. अँगनेमे हेरा गेलौं- शब्‍द संख्‍या : 605, तिथि : 14 जून 2015 385. डकरा हाल- शब्‍द संख्‍या : 2529, तिथि : 17 जून 2015 386. जेतए जे हौउ- शब्‍द संख्‍या : 2062, तिथि : 21 जून 2015 387. गठूलाक गारि- शब्‍द संख्‍या : 1532, तिथि : 25 जून 2015 388. कनी हमरो सुनू- शब्‍द संख्‍या : 1983, तिथि : 29 जून 2015 389. गामक बान्‍ह- शब्‍द संख्‍या : 2437, तिथि : 03 जुलाई 2015 390. गुड़ा खुद्दीक रोटी- शब्‍द संख्‍या : 2443, तिथि : 08 जुलाई 2015 391. सीरक गाछ- शब्‍द संख्‍या : 3071, तिथि : 13 जुलाई 2015 392. हरदीक हरदा- शब्‍द संख्‍या : 2924, तिथि : 19 जुलाई 2015 393. जाम- शब्‍द संख्‍या : 3355, तिथि : 29 जुलाई 2015 394. गण्‍डा- शब्‍द संख्‍या : 2304, तिथि : 5 अगस्‍त 2015 395. हाथी आ मूस- शब्‍द संख्‍या : 3016, तिथि : 11 अगस्‍त 2015 396. मुसरी आ घोड़ा- शब्‍द संख्‍या : 3625, तिथि : 17 अगस्‍त 2015 397. फलहार- शब्‍द संख्‍या : 2350, तिथि : 25 अगस्‍त 2015 398. भोरक झगड़ा- शब्‍द संख्‍या :  2697, तिथि : 31 अगस्‍त 2015 399. क्रियाशील- शब्‍द संख्‍या :  3395, तिथि : 13 सितम्‍बर 2015 400. आइ एम शॉरी- शब्‍द संख्‍या : 2927, तिथि : 23 सितम्‍बर 2015 401. ओऽ होऽ होऽ हूसि गेल- शब्‍द संख्‍या : 1025, तिथि : 29 सितम्‍बर 2015 402. मीनी भ्रष्‍टाचार- शब्‍द संख्‍या : 825, तिथि : 5 अक्‍टूबर 2015 403. गजपट खेती- शब्‍द संख्‍या : 1171, तिथि : 8 अक्‍टूबर 2015 404. समुद्री विद्या- शब्‍द संख्‍या : 787, तिथि : 11 अक्‍टूबर 2015 405. राकशे रहि गेलौं- शब्‍द संख्‍या : 959, तिथि : 12 अक्‍टूबर 2015 406. निनिया देवीक आराधना- शब्‍द संख्‍या : 679, तिथि : 13 अक्‍टूबर 2015 407. बताहे बताह बनौलक- शब्‍द संख्‍या : 574, तिथि : 15 अक्‍टूबर 2015 408. धोखा- शब्‍द संख्‍या : 1172, तिथि : 17 अक्‍टूबर 2015 409. खसैत गाछ- शब्‍द संख्‍या : 2234, तिथि : 22 अक्‍टूबर 2015 410. वैष्‍णवी भगवती- शब्‍द संख्‍या : 2099, तिथि : 01 नवम्‍वर 2015 411. ठूठ गाछ- शब्‍द संख्‍या :  23,174, तिथि : 25 अक्‍टूबरसँ 16 दिसम्‍बर 2015 412. प्रिगर शत्रु- शब्‍द संख्‍या : 1080, तिथि : 26 दिसम्‍बर 2015 413. एगच्‍छा आमक गाछ- शब्‍द संख्‍या : 1167, तिथि : 31 दिसम्‍बर 2015 414. माघ नहाइले जाएब- शब्‍द संख्‍या : 2623, तिथि : 4 जनवरी 2016 415. एक घोंट पानि- शब्‍द संख्‍या : 2522, तिथि : 10 जनवरी 2016 416. एते दिन अपना-ले आब अनका-ले- शब्‍द : 3407, तिथि : 16 जनवरी 2016 417. माइक वचन- शब्‍द संख्‍या : 3009, तिथि : 21 जनवरी 2016 418. पान- शब्‍द संख्‍या : 3120, तिथि : 26 जनवरी 2016 419. आजुक जिनगीक आइ परीछा- शब्‍द : 1684, तिथि : 01 फरवरी 2016 420. शुभचिन्‍तक- शब्‍द संख्‍या : 3947, तिथि : 08 फरवरी 2016 421. करिछौन लाली- शब्‍द संख्‍या : 3000, तिथि : 13 फरवरी 2016 422. मोहरा- शब्‍द संख्‍या : 1223, तिथि : 15 फरवरी 2016 423. अपन पुरखाक डीह- शब्‍द संख्‍या : 1187, तिथि : 17 फरवरी 2016 424. जेना हाथी रही- शब्‍द संख्‍या : 1245, तिथि : 20 फरवरी 2016 425. कठफल- शब्‍द संख्‍या : 1294, तिथि : 22 फरवरी 2016 426. गामे उपैट गेल- शब्‍द संख्‍या : 1680, तिथि : 25 फरवरी 2016 427. झूठे- शब्‍द संख्‍या : 1969, तिथि : 29 फरवरी 2016 428. लाही- शब्‍द संख्‍या : 2335, तिथि : 3 मार्च 2016 429. परतीहा खढ़- शब्‍द संख्‍या : 1667, तिथि : 6 मार्च 2016 430. उजगी- शब्‍द संख्‍या : 1079, तिथि : 9 मार्च 2016 431. हाथक जिनगी- शब्‍द संख्‍या : 983, तिथि : 14 मार्च 2016 432. गाछपर सँ खसला- शब्‍द संख्‍या : 2000, तिथि : 20 मार्च 2016 433. केतौ ने रहलौं- शब्‍द संख्‍या : 2103, तिथि : 25 मार्च 2016 434. अपने केलहा- शब्‍द संख्‍या : 2314, तिथि : 31 मार्च 2016 435. बत्तु- शब्‍द संख्‍या : 2244, तिथि : 10 अप्रैल 2016 436. कछमछी- शब्‍द संख्‍या : 2322, तिथि : 15 अप्रैल 2016 437. गैत-वीध- शब्‍द संख्‍या : 2424, तिथि : 21 अप्रैल 2016 438. दियरबा-भैंसुर- शब्‍द संख्‍या : 2089, तिथि : 29 अप्रैल 2016 439. एक दिन- शब्‍द संख्‍या : 2063, तिथि : 5 मई 2016 440. दुधियाएल बरखा- शब्‍द संख्‍या : 2059, तिथि : 11 मई 2016 441. गलफूलू- शब्‍द संख्‍या : 2117, तिथि : 14 मई 2016 442. बिटगरहा- शब्‍द संख्‍या : 1992, तिथि : 19 मई 2016 443. आब नइ आगि लगैए?- शब्‍द संख्‍या : 1962, तिथि : 23 मई 2016 444. कटौज- शब्‍द संख्‍या : 1977, तिथि : 28 मई 2016 445. बाल बोध- शब्‍द संख्‍या : 2621, तिथि : 2 जून 2016 446. डभियाएल गाम- शब्‍द संख्‍या : 2483, तिथि : 6 जून 2016 447. एकबोलिया दादी- शब्‍द संख्‍या : 2189, तिथि : 11 जून 2016 448. मरियाएल मन- शब्‍द संख्‍या : 1921, तिथि : 17 जून 2016 449. त्राहि-कृष्‍ण- शब्‍द संख्‍या : 2900, तिथि : 23 जून 2016 449. कन्‍हा भँट्टा- शब्‍द संख्‍या : 2539, तिथि : 30 जून 2016 449. जिगेसा- शब्‍द संख्‍या : 3977, तिथि : 8 जुलाई 2016 449. गुलेती दास- शब्‍द संख्‍या : 5993, तिथि : 12 अगस्‍त 2016 449. भोलानाथ बाबा- शब्‍द संख्‍या : 2359, तिथि : 17 अगस्‍त 2016 449. दुरकाल- शब्‍द संख्‍या : 3189, तिथि : 22 अगस्‍त 2016 449. कलंक- शब्‍द संख्‍या : 2763, तिथि : 27 अगस्‍त 2016 450. अड़िकट्टा चोर- शब्‍द संख्‍या : 2077, तिथि : 31 अगस्‍त 2016 ◌◌◌ टैगोर साहित्‍य पुरस्‍कारसँ पुरस्‍कृत एवं विदेह साहित्‍य सम्‍मानसँ सम्‍मानित पोथीकेँ तत्‍खनात् व्‍यक्तिगत रूपे सोझहा आनल जा रहल अछि...। -लेखक मि‍थि‍लाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलबाड़ी लगौनि‍हार तथा नव वि‍हान अननि‍हारकेँ समरपित ••• •• चारिम संस्‍करण : अक्‍टुबर 2016 कथाक सत्तैर- दू शब्‍द/7 भैंटक लावा/8 बिसाँढ़/18 पीरारक फड़/27 अनेरुआ बेटा/34 दूटा पाइ/46 बोनिहारिन मरनी/57 हारि-जीत/68 ठेलाबला/77 जीविका/86 रिक्साबला/99 चुनवाली/112 डीहक बटबारा/120 भैयारी/137 बहि‍न/150 घरदेखिया/160 पछताबा/175 डाक्टर हेमन्त/184 बाबी/199 कामिनी/207 कथा लेखन क्रम/216 दू शब्‍द 1942-43 क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्‍य सेन लिखै छथि जे ऐ अकालमे बंगालमे लाखक-लाख लोक मुइलाह (फेमीन इन्‍क्वायरी कमीशनक अनुसार 15 लाख) मुदा अमर्त्‍यक एकोटा सर-सम्‍बन्‍धीक मृत्‍यु ओहिमे नहि भेल। तहिना मिथिलाक 1967 ईस्‍वीक अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाओल गेलन्‍हि जे केना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा एहिपर कथा लिखल गेल 2009 ईस्‍वीमे जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी द्वारा। आ ऐ विलम्‍बक कारण सेहो स्‍पष्‍ट अछि। मैथिली साहित्‍यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, ताहि कारणसँ अमर्त्‍य सेन जकाँ हमरो साहित्‍यकार सभ ओइ महाविभीषिकासँ ओतेक प्रभावित नहि भेल होएताह। आ एतए जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह होएबासँ बँचा लैत अछि। ऐ संग्रहक सभटा कथा उत्‍कृष्‍ट अछि, रिक्त स्‍थानक पूर्ति करैत अछि आ मैथिली साहित्‍यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्‍ध करबैत अछि। -गजेन्‍द्र ठाकुर भैंटक लावा पैछला बाढ़ि मोन पड़िते देह भुटैक जाइए। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइए। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नाचए लगैए। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बाढ़ियो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुढ़िया। बुढ़िया रूप बना नृत्य करैत। केकरा कहूँ बड़की धार आ केकरा कहूँ छोटकी, सभ अपन-अपन चीन-पहचीन मेटा समुद्र जकाँ बनि गेल। जेमहर देखू तेमहर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दच्‍छिन-मुहेँ दौगल जाइत। केतेक गाम-घर पजेबाक नइ रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखैर, बोरिंग, चापाकल पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल। एहेन भयंकर दृश्य देख लोककेँ डरे छने-छन पियास लगलोपर पीबैक पानि नइ भेटैत। जीवन-मरण आगूमे ठाढ़ भऽ झिक्कम-झिक्का करैत। घर खसल, घरक कोठी खसल, कोठीक अन्न भँसल। जेहने दुरगैत घरक तेहने गाइयो-महींस, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक। घरक नूआँ-वस्तर आ बासन-कुसनक संग आनो-आन समानक मोटरी बान्हि माथपर लऽ अपनो डाँड़मे दू भत्ता खरौआ डोरी बान्हि आ बेटोक डाँड़मे बान्हि आगू-आगू मुसना आ पाछू-पाछू घरवाली-जीबछी, बेटी-दुखनीकेँ कोरामे लऽ कन्हा लगौने पोखैरक ऊँचका महार दिस चलल। अखन धरि ओ महार बोन-झाड़ आ पर-पैखानाक जगह छल, जइमे साँप-कीड़ा बसेरा बनौने, बाढ़ि ओकरा घराड़ी बना देलक। जहिना इजोतमे छाँह लोकक संग नै छोड़ैत, तहिना बर्खा बाढ़िक संग छोड़ैले तैयार नहि। निच्चाँ पानिक तेज गति आ ऊपरसँ बर्खाक नमहर बून। महारपर मुसनाकेँ पहुँचैसँ पहिनहि बीस-पच्चीस गोरे अप्पन-अप्पन धिया-पुता, चीज-वौस आ माल-जालक संग पहुँच‍ चुकल छल। महारपर पहुँच‍ मुसना रहैक जगह हियाबए लगल। शौच करैक ढलान लग खाली जगह देख मुसना मोटरी रखलक। मोटरी रखि‍ बिसनाइरिक डारि‍ तोड़ि खर्ड़ा बनौलक। ओइ खर्ड़ासँ खर्ड़ए लगल। एक बेर खरैड़ कऽ देखलक तँ मनमे पड़पन नइ भेलइ। फेर दोहरा कऽ खरैड़ चिक्कन बनौलक। चिक्कन जगह देख दुनू बेकतीक मनमे चैन भेलइ। मोटरी खोलि मुसना एकटा बोरा निकालि चारिटा बत्तीक खुट्टा गाड़ि, खरौआ जौड़सँ ओइ चारू खूटकेँ बत्तीमे बान्हि घर बनौलक। दोसर बोरा निच्चाँमे ओछा धियो-पुतोकेँ बैसौलक आ समानो रखलक। चिन्तासँ दुनू परानी मुसनाक मुँह सुखाएल। एक दिस दुनू बच्चाकेँ देखए आ दोसर दिस गनगनाइत बाढ़िकेँ। माथपर दुनू हाथ दऽ जीबछी मने-मन कोसी-कमला महरानीकेँ गरियेबो करैत आ जान बँचबैले निहोरो करैत। दुनू बच्चो कखनो बाढ़ि देख हँसैत तँ कखनो जाड़े कनैत। बाढ़िक वेगमे एकटा घर भँसियाएल अबैत देख मुसना बाँसक टोन आ कुरहैर लऽ दौगल। पानिमे पैस हियाबए लगल जे कोन सोझे घर औत। ठेकना कऽ हाँइ-हाँइ पाँचटा खुट्टा ठोकलक। आस्ते-आस्ते घर आबि कऽ खुट्टामे अड़कल, खुट्टामे अड़ल घर देख घरवालीकेँ हाक पाड़ि कहलक- “हाँसू नेने आउ। घरक समचा सभ उघि-उघि लऽ जाउ।” घरक ऊपरमे एकटा कुकुर सेहो भँसैत आएल। लोकक सुन-गुन पाबि कुकुर कुदि कऽ महारपर चलि गेल। ठाठक बत्तीमे जहाँ मुसना हाँसू लगौलक कि एकटा साँप लप-दे हाथेमे हबक मारि देलकै। थालमे गड़ल खुट्टा घरक भार नहि सम्हारि सकल। पाँचो खुट्टा पानिमे गिर पड़ल। घर भँसि‍ गेलइ। खूब जोरसँ मुसना कनबो करैत आ हल्लो करैत जे हौ लोक सभ, दौड़ै जाइ जा हौ, हमरा साँप काटि लेलक। मुसनाक कानब सुनि जीबछी सेहो बपहारि काटए लगल। बपहारि कटैत घरवालीकेँ मुसना कहलक- “हे गइ दुखनी माए, नाग डँसि लेलकौ। छाती लग बिख आबि गेल। कनीए बाँकी अछि कण्‍ठ छुबैले। धिया-पुताकेँ हाक पाड़ि कनी मुँह देखा दे। आब नै बँचबौ।” जीबछी हल्लो करैत आ घरबलाक बाँहि पकैड़ ऊपरो करैत। महारक किनछैरमे पहुँच‍ जहाँ ऊपर हुअ लगल कि दुनू गोरे पिछैर कऽ तरे-ऊपरे निच्चाँमे खसि पड़ल। दुनू परानी भीजल तँ रहबे करए, आरो नहा गेल। मुदा तैयो ओरिया-ओरिया कऽ ऊपर भेल। महारपर आबि जीबछी चुनक कोहीसँ चुन निकालि दाढ़मे लगौलक। साँपक बिख झाड़निहार गाममे एकोटा नहि। मुदा रौदिया अही बेरक दशमीमे चनौरा गहबरमे चाटी सिखने छल। सभ कियो रौदियाक खोज करए लगल। रौदिया माछ मारैले सोहत लऽ कऽ बाध दिस गेल छल। एक गोरे ओकरा बजा अनलक। अबिते रौदिया सोहत कातमे रखि हाथ-पएर धोइ मुसना लग आबि बाजल- “हौ भाय, हमर चाटी सिद्ध नइ भेल अछि, किएक तँ हम अखन धरि गंगा स्नान नै केलौं हेन। मुदा तैयो बिसहाराकेँ सुमैर देखै छिऐ।” मुसनाकेँ आगूमे बैसा रौदिया हाथेसँ जगहकेँ झाड़ि चाटी रखलक। सभ रौदिया दिस देखैत। मुदा चाटी चलबे ने कएल। बाढ़ि दुआरे आन गामसँ झाड़निहार आ चट्टिबाहकेँ बजाएब महाग मोसकिल रहए। सभ निराश भऽ गेल। छाती पीटि-पीटि जीबछी कनबो करए आ देवी-देवताकेँ कबुलो करए। मुदा ढोढ़ साँप कटने छेलै तँए बिख लगबे ने केलइ। गोसाँइ लूक-झूक करए लगला। गामक ढेरबा, बुढ़ आ जुआन स्‍त्रीगण सभ चँगेरियो आ चँगेरोमे काँच माटिक दियारी लऽ लऽ पोखैरक घाट लग जमा भऽ कमला महरानीकेँ साँझ दऽ गीत गाबए लगल। बच्चा सभ जय-जयकार करैत। तैबीच लुखिया कमला महरानीकेँ पाठी कबुला केलक, सुबधी एक सेर मधुर। दोसर साँझ धरि गीत-गाबि सभ घुमि कऽ आएल। एक रफ्तारमे बाढ़ि पाँच दिन रहल। मुदा पोह फटिते छठम दिन पानि कमए लगलै। बाढ़िक पानि जहिना हुहुआ कऽ अबैए, तहिना जाइए। बेर झुकैत-झुकैत घर-अँगनाक पानि निकैल गेल मुदा थाल-खिचार रहबे करए। सातम दिनसँ लोक घर ठाढ़ करए लगल। बाढ़ि सटैकते लोक परदेश दिस पड़ाए लगल। गाममे ने एक्कोटा धानक गब बँचल आ ने खेत रोपैले बीरार। नारक टाल सभ केतए भँसि कऽ गेल तेकर ठेकान नहि। गहुमक भुस्सी भुसकाँड़ेमे सड़ि-सड़ि गोबर बनि गेल। मनुखसँ बेसी दिक्कत माल-जालकेँ भऽ गेलइ। आमक पात,बाँसक पात आन-आन गाछ सबहक पात काटि-काटि माल-जालकेँ लोक खुबए लगल। आन-आन गामसँ नार, भुस्सी कीनि-कीनि आनए लगल। मुदा माल-जाल तैयो अनधुन मुइलै। जे बँचल रहै, ओहो सुखा कऽ संठी जकाँ भऽ गेलइ। तैपर सँ रंग-बिरंगक बेमारी सभ सेहो आबि गेलइ। केकरो खुरहा तँ केकरो पेट-झर्ड़ी। ..किछु गोरे अपन सभ मालकेँ कुटमैती सभमे दऽ आएल। चारिक अमल। पिसुआ भांग पीब श्रीकान्त मैदान दिससँ आबि दलानपर बैस चाह पिबैत रहैथ। सोगसँ अधमरु जकाँ भेल श्रीकान्‍त मने-मन सोचैथ जे महाजनी तँ चलिए गेल जे आब अपनो साल भरि की खाएब..! अगते धान सबाइ लगा देलौं। बड़ पैघ गलती भेल जे एक्को बखाड़ी पछुआ कऽ नै रखलौं। मुदा एक बखाड़ी रखनहि की होइत। के केकरा मदैत करत। ठीके कहब छै जे सभकेँ अपना भरोसे जीबा चाही। भने दुआर परहक बखाड़ीक धान सठि गेल। कियो दरबज्जापर औत तँ देखा देबइ। मुदा अपनो तँ जरूरत ऐछे, से केतएसँ आनब? लऽ दऽ कऽ घरक कोठीमे जे चाउर अछि, ओतबे अछि। एक्को धूर धान नै बँचल जे अगहनोक आशा हएत। आब अवादो तँ नहियेँ हएत, आगू रब्बीएक आशा रहल। जे सभ दिन कीनि-बेसाहि कऽ खाइए ओकरा तँ किछु नहि, मुदा हमरा लोक की कहत..? चाह पिबते-पिबते श्रीकान्तकेँ चौन्ह आबए लगलैन। मन पड़लैन- ‘बाबा कहने रहैथ जे दरबज्जापर जँ कि‍यो दू-सेर वा दू-टका मांगैले आबए तँ ओकरा ओहिना नै घुमबिहक। ओइसँ लछमी पड़ाइ छथिन।’ जीबछीकेँ अबैत देख श्रीकान्त हाक पाड़लखिन। सालो भरि जीबछी हुनके कुटाउन कऽ गुजर करै छल। चाउर-चूड़ा कुटैमे जीबछी गाममे सभसँ बेसी लूरिगर। श्रीकान्तक लग आबि जीबछी हँसैत कहलकैन- “एते किए सोगाएल छैथ‍ काका! हिनका एते छैन‍‍ तहन‍ एते दुख होइ छैन‍‍, हमरा तँ किछु ने अछि तँए की मरि जाएब।” जीबछीक बात सुनि भखरल स्वरमे श्रीकान्त बजला- “जहिना सभ किछु बाढ़िमे दहा गेल तहिना जँ अपनो सभ तूर भँसि जइतौं, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, तेतबे काल ने तकलीफ होइत मुदा आगू तँ दुख नै काटए पड़ैत।” मुस्‍कियाइत जीबछी कहलकैन- “एक्केटा बाढ़िमे एते चिन्ता करै छैथ‍ काका! कनी नीक आकि कनी अधला, दिन तँ बितबे करतैन।” चीलम पिबैत मुसना ओसारपर बैसल। कसि कऽ सोँठ मारि‍ मने-मन सोचए लगल- अगहन-पूस-दुनू मास मुसहैन खुनि-खुनि गुजर करै छेलौं। दस सेर जमो भऽ जाइ छल आ गुजरो कऽ लइ छेलौं। ओहो चलि गेल। ने एक्को गब केतौ धान बँचल आ ने गाममे एकोटा मूस..! दोसर दम घिंच धुआकेँ घोटिते मनमे एलै- मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भात जँ जाड़क मासमे भेटए तँ ऐसँ नीक दोसर की हएत। एहेन खेनाइ तँ रजो-महरजोकेँ सिहिन्ते लगल रहतैन। ओ-हो-हो! भगवान गरीबेक सुख छीनि लेलैन..! मुसनाक पहिलुका नाओं मकसूदन छल। मुदा मूस आ मुसहैनसँ बेसी सिनेह रहने लोक मुसना कहए लगलै। जीबछी आँगनक चुल्हिपर रोटी पकबैत। इनारपर हाथ-पएर धोय मुसना लोटामे पानि नेने आँगन आबि जलखै करैले बैसल। टिनही छिपलीमे रोटी-नून लऽ जीबछी पतिक आगूमे देलक। अँगनामे दुखबाकेँ नइ देख मुसना जोरसँ शोर पाड़लक। पिताक अवाज सुनिते दुखबा दौगल आबि धुराएले हाथे-पएरे आबि खाइले बैस रहल। दुनू बापूत खाए लगल। चुल्हिये लगसँ मुस्‍कियाइत जीबछी बाजल- “केकरो किछु हौउ मुदा जेकरा लूरि‍ रहतै ओ जीबे करत। ऐठाम देखै छिऐ जे एक्के दहारमे किदैन बहारक खिस्सा अछि। सभ हाकरोस करैए!” मुँहक रोटी मुसना हाँइ-हाँइ चिबा जीबछी दिस देखैत बाजल- “तेते ने माछ भँसि-भँसि आएल अछि जे खत्ता-खुतीमे सह-सह करैए। कनी पानि तँ कम हौउ। जखने पानि कम भऽ उपछै-जोकर भेल आकि मछबारि शुरू कऽ देब। खेबो करब आ बेचबो करब। हरिदम दू पाइ हाथेमे रहत।” अपन नहिराक बात मन पड़िते जीबछी बाजए लगल- “हमरा नैहरमे पच्‍छि‍मसँ गंडक आ पूबसँ कोसीक बाढ़ि सभ साल अबै छेलइ। तैबीच जे धार अछि ओकर पानि तँ घुमैत-फिरैत रहिते छल। सगरे गाम साउनेसँ जलोदीप भऽ जाइ छेलइ। टापू जकाँ एकटा परती-टा सूखल रहै छेलइ। ओइपर सौंसे गामक लोक बरसाती घर बना रहै छल। कातिक अबैत-अबैत खेत सभ जागए लगै छेलइ। तेकर पछाइत‍ लोक खेती करै छल। गहिंरका खेत आ खाधि-खुधिमे भैंटक गाछ सोहरी लागल जनमै छेलइ। अगहन बितैत-बितैत ओ तोड़ैबला हुअ लगै छेलइ। हम सभ ओइ भैंटकेँ तोड़ि-तोड़ि आनी, ओकरे दाना निकालि सुखा कऽ लावा भूजी। तेते लावा हुअए जे अपनो खाइ आ बेचबो करी। ..काल्हि गिरहत काका ऐठाम जाएब आ कहबैन जे चौरीमे जे मनसम्फे भैंट जन्‍मल अछि, ओ हमरा दऽ दिअ।” अखन धरि दुनू परानी मुसना, चाउर आ चूड़ाक कुट्टी करै छल, सेहो ढेकीमे। किएक तँ गाममे एक्कोटा छोटको मशीन धनकुटियाक नै छल। अधिकतर परिवार अपन-अपन ढेकी-उक्खैर रखै छल। मुसना सेहो कुट्टी दुआरे अपन ढेकी-उक्खैर रखने अछि। नीक चाउर बनबैमे जीबछीकेँ सभ लोहा मानैए। ऐ बेर तँ धनकुट्टी चलत नहि। मुदा बाढ़िमे आन गामसँ तेते भैंट दहा कऽ चौरीमे आएल जे सापरपिट्टा गाछ सौंसे चौरीमे जनैम गेल अछि। तँए जीबछी मने-मन चपचपाइत। दोसरकेँ भैंटक भाँज बुझले नहि। सभ दिन नहाइ बेरमे जीबछी चौरी जा भैंट देख-देख अबैत। चौरगर-चौरगर पात सौंसे चौरीकेँ छेकने। थोड़बे दिनमे गोटि-पँगरा फूल हुअ लगलै। फूल देख जीबछीक मनमे होइ जे एतेटा फुलवाड़ी इन्द्रो भगवानकेँ हेतैन की नहि...। पाँचे दिनमे सौंसे चौरी फूल फुला गेल। अगता फूलक पत्ती झड़ि-झड़ि खसए लगल, फूलमे नुकाएल फड़ निकलए लगल। गोल-गोल, हरि‍अर-हरि‍अर। फड़ देख जीबछी आमदनी बुझि, चौरीक कातमे बैस नव-नव योजना मने-मन बनबए लगल, ऐ बेर एकटा खूब निम्मन महींस कीनब। जँ महींस-जोकर आमदनी नै हएत तँ दूटा गाइए कीनि लेब। अप्पन तँ सम्‍पैत भऽ जाएत। ओकरे खूब चराएब-बझाएब। ओहीसँ तँ चारू परानीक गुजर चलत। जिनगी भरि तँ कुटाउने करैत रहलौं मुदा ऐ बेर कमलो महरानी आ कोसियो महरानी दुख हइर लेलैन। मने-मन जीबछी कोसी-कमलाकेँ गोड़ लगलक। गोड़ लगिते मनमे उठलै- अपन धन हएत, तैपर सँ मेहनत‍ करब तँ कोन दरिदराहा दुख आबि कऽ हम्मर सुख छीनि लेत। मजगूत घर बान्हब, बेटा-बेटीक बिआह करब। नाति-पोता हएत, बाबा-दादी बनि कऽ जेते दिन जीबी ओ की देवलोकसँ कम भेल। अहीले ने सभ हरान अछि। केलासँ सभ किछु होइ छै, बिनु केने पतरो फुसि। घनगर गाछ देख जीबछीक मनमे एलै, बीच-बीचमे सँ जँ गाछ उखारि देबै तँ सौरखियो करहर भऽ जाएत आ छेहर गाछ रहने फड़ो नमहर हएत आ दन्नो नीक। अखनेसँ आमदनी शुरू भऽ जाएत। उत्साहित भऽ जीबछी भैंटक कमठौन शुरू केलक। मुदा करहर उखाड़ैमे तेते डाँड़ दुखाइ जे हूबा कमए लगलै। कमठौन छोड़ि देलक। देखते-देखते फड़मे लाली पकड़ए लगलै। अगता फूल अगता फड़ भेल। नमहर-नमहर, पोछल-पोछल, गोल-गोल पुष्ट, रंगल फड़ देख जीबछी बुझि गेल जे आब ई तोड़ैबला भऽ गेल। दोसर दिनसँ फड़ तोड़ैक विचार जीबछी मने-मन कऽ लेलक। दोसर दिन भोरे जीबछी रोटी पका, दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खेनाइ खा प्लास्टिकक बोरा लऽ फड़ तोड़ैले विदा हुअ लगल कि धक-दे मन पड़लै, बोरामे तँ फड़ राखब मुदा पानिमे तोड़ि-तोड़ि कथीमे रखब। फड़ तोड़ैले तँ झोरा नीक जे अपना अछि नहि! आब की करब? ..लगले जीबछी पुरना साड़ीकेँ फाड़ि दूटा झोरा सीलक। झोरा सीबि बोरो आ झोरोकेँ चौपेत एकटा झोरामे रखि, दुनू बच्चो आ दुनू गोरे अपनो, चौर दिस विदा भेल। फड़क रूप-रंगसँ जीबछीक मन गदगद। मुदा अनभुआर काज बुझि मुसना तर्क-वितर्क करैत। चौरक कात पहुँच‍ ऊपरका खेत जे सुखाएल छल तइमे दुनू बच्चो, बोरो आ रोटियो-पानिकेँ रखि‍ दुनू परानी भैंट तोडै़ले पानिमे पैसल। पानिमे पैसते जीबछीक नजैर भैंटक फड़क ऊपरे-ऊपर नाचए लगलै। जहिना केकरो रूपैआक थैली भेटलासँ खुशी होइ छै, तहिना जीबछीक मनमे भेलइ। एक टकसँ देख जीबछी दुनू हाथे हाँइ-हाँइ फड़ तोड़ए लगल। खिच्चा फड़ देख जीबछी पतिकेँ कहलक- “जुएलके फड़टा तोड़ब, अजोहा अखन छोड़ि दियौ। पछाइत‍ तोड़ब।” झोरा भरिते जीबछी ऊपर आबि-आबि बोरामे रखैत। मुसनो सएह करैत। दुनू बोरा भरि गेल। ऊपर आबि जीबछी पतिकेँ कहलक- “कनी काल सुस्ता लिअ। पानिमे निहुरल-निहुरल डाँड़ो दुखा गेल हएत। अहाँ एत्तै रहू, हम एक बेर अँगनासँ रखने अबै छी।” जीबछी एकटा बोरा उठा आँगन विदा भेल‍। एक तँ पानिक भीजल, दोसर ओजनगर वस्‍तु। मुदा जीबछी भारी बुझबे ने करए। किएक तँ सम्‍पैत‍क मोटरी रहै किने! आँगन आबि ओसारपर बोरा रखि‍ पुनः जीबछी चौर दिस रमकल विदा भेल। लग आबि पतिकेँ कहलक- “हम बोरा लइ छी, अहाँ दुनू बच्चो आ डोलोकेँ सम्हारने चलू।” दुनू बच्‍चाक संग एक हाथमे डोल नेने आगू-आगू मुसना आ माथपर बोरा नेने पाछू-पाछू जीबछी विदा भेल। थोड़े दूर बढ़लापर जीबछी पतिकेँ कहलक- “भगवान दुःख हइर लेलैन।” मुदा स्‍त्रीक बात सुनि मुसनाकेँ ओ खुशी नहि एलै जे जीबछीकेँ रहए। आँगन आबि जीबछी पहिलुके बोरा लग दोसरो बोरा रखि‍ भानसक ओरियान करए लगल। चारिम दिन पहिलुके खेप भैंट तोड़ै काल मुसनाकेँ एकटा ठेंगी बाँहिमे पकैड़ लेलकै। जे शुरूमे नै बुझलक। मुदा जहन‍ ठेंगी भरि पोख खून पीब भरिया गेल, तहन‍ नजैर पड़लै। ठेंगीकेँ देखते मुसनाक परान उड़ि गेलइ। थरथर काँपए लगल। खूब जोरसँ घरवालीकेँ कहलक- “बाप रे बाप! देहक सभटा खून ठेंगी पीब लेलक। कोन पाप लागल जे ऐ मौगिया भाँजमे पड़लौं। एक तँ बाढ़िक मारल छी जे भरि पोख अन्न नै होइए, सुखा कऽ संठी भेल छी। तैपर जेहो खून देहमे छेलए सेहो ठेंगीए पीब गेल। झब-दे आउ नहि तँ हम पानियेँमे खसि पड़ब।” पतिक बातकेँ अनठबैत जीबछी हाँइ-हाँइ फड़ो तोड़ैत आ मने-मन बजबो करैत- “जेना नाग डँसि नेने होइ तहिना अर्ड़ाहैए। भभटपन ने देखू! एहने-एहने पुरुख बुते परिवार चलत!” दुनू झोरा भरिते जीबछी मुसना लग आबि हाथेसँ ठेंगी पकैड़ एकटा चिचोरमे बान्हि देलक। मुदा जैठाम ठेंगी धेने रहै तैठामसँ छर्र-छर्र खून बहैत। अपन दहिना औंठासँ जीबछी दाबि देलक। कनीए कालक पछाइत‍‍ खून बन्न भऽ गेलइ। जीबछी फेर फड़ तोड़ैले पानिमे पैसल। मुसना बैसले रहल। थोड़े कालक पछाइत जीबछी बाजल- “आउ ने, आब किछु ने हएत।” जीबछीक बात सुनि मुसना आँखि गुड़ैर कऽ बाजल- “ई मौगिया, जान मारैपर लगल अछि! होइ छै जे कहुना मरि जाए। कोनो कि दुनियाँमे सँएक कमी छइ, दोसर कऽ लेत।” दुनू बच्चा दिस देखैत मुसना फेर बाजल- “मुदा ऐ टेल्हुक सबहक की हेतइ। बिलैट कऽ मरत की नहि?” पति दिस देख जीबछी मुस्‍कियाइत बाजल- “नइ तोड़ब तँ नइ तोड़ू। ओतै बैस बच्चा सभकेँ खेलाउ।” दुनू बोरा भरि कऽ जीबछी आँगन अनलक। सभकेँ सम्हारने मुसनो आएल। आँगन आबि जीबछी चुल्हि पजारि भानस कऽ दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खेलक। खा कऽ हाँसू लऽ भैंटक फड़ चीरि-चीरि दाना निकालए लगल। लाल-लाल, गोल-गोल दाना। मुसना सेहो दाना निकालए लगल। दुनू बच्चा दुनू भाग बैस दूटा फड़केँ गुड़कबैत खेलैत। दानाकेँ एकटा चटकुन्नीपर थोपि-थोपि रखैत जाए। मुदा कनीए कालक पछाइत‍‍ मुसनाकेँ चीलम पीबैक मन भेलइ। उठि कऽ चुल्हि लग जा आगियो तापए लगल आ चीलमो पीबए लगल। दानाक ढेरी देख जीबछी गर अँटबए लगल जे एते राखब केतए। गुनधुन करैत। एकाएक नैहरक बात मन पड़लै। मन पड़िते मुहसँ हँसी फुटलै। जीबछीकेँ हँसैत देख मुसना अह्लादित भऽ पुछलक- “अँइ गइ, कोन सोनाक तमघैल तोरा भेट गेलौ हेन जे एना खिखिआइ छेँ?” मुदा पाशा बदलैत जीबछी बाजल- “अखन तँ अन्हार भऽ गेलै, काल्हि भोरे एकटा खाधि अँगनेमे टाट सटा कऽ खुनि देबइ।” भोरे उठि मुसना ढक जकाँ गोल-मोल खाधि खुनलक। जीबछी दुलेब कऽ लेब सुखौलक। ओइमे भैंटक दाना सुखा-सुखा रखैत गेल। ऊपरसँ टाटक झँपना बना मुसना झाँपि देलक। मास दिनक मेहनतसँ जीबछीक आँगन भैंटक दानासँ भरि गेल। अनभुआर चीज तँए चोरी-चपाटीक कोनो डरे नहि। ..भरल आँगन देख जीबछीक मनमे समुद्रक लहैर जकाँ खुशी हिलकोर मारए लगलै। कनडेरिये आँखिए मुसना दिस देख मुस्कियाए लगल। घरवालीक मुस्की देख मुसना खिसिया कऽ बाजल- “हमरा देख-देख तोरा हँसी लगै छौ। हँसि ले, जेते हँसमेँ से हँसि ले। जाबे जीबै छियौ ताबे। भगवान केलखुन आ मरलियौ तहन‍ तोहर हँसी नगरक लोक देखतौ।” मुदा जीबछी-ले धैनसन। किएक तँ खुशीसँ मन एते भरल रहै जे घरबलाक बात ओइमे पैसबे ने केलइ। मने-मन जीबछी लावा भुजैक विचार करए लगल। लावा भुजैले एकटा नमहर खापैड़ चाही। बाउल रखैले एकटा कोहा चाही। लाड़ैन तँ अपनो खड़हीसँ बना लेब आ बाउलो नदी कातसँ लऽ आनब। जहन‍‍ कुमहैन ओइठाम जाएब तँ कँचकूह ताकि कऽ एकटा नमहर तौला लऽ आएब। ओकरे खापैड़ बना लेब। बाउल धिपबैले मझोलको कोहासँ काज चलि जाएत। एकटा सरबा सेहो चाही। किएक तँ बाउल जे देबै से तँ हाथसँ नै हएत। ओइमे एकटा बत्तीक डाँट लगबए पड़त। लगा लेब। मुसनाकेँ कहलक- “लावा भुजैले जारैन सेहो ओरियाबए पड़त।” लावाक नाओं सुनि मुसनाक मनमे खुशी भेलइ। मुस्‍कियाइत बाजल- “अखन‍ टेंगारी सुढ़िया लइ छी। बेरू-पहर गिरहत कक्काक गाछीसँ बाँझियो आ सूखल ठौहरियो सभ आनि देब।” भरि दिनमे दुनू परानी जीबछी सभ कथूक ओरियान कऽ लेलक। पराते भने जीबछी लावा भुजब शुरू केलक। दू चुल्हिया चुल्हि। एक मुँहमे खापैड़, दोसरमे कोहा। खापैड़मे भैंटक दाना भुजैत आ कोहामे बाउल धिपबैत। पहिल घानी भुजि जीबछी एक चुटकी चुल्हिमे दऽ दोसर घानी भुजब शुरू केलक। दोसर घानीक लावा देख जीबछीक मन तर-ऊपर हुअ लगलै। पहिलुका घानीक लावा चँगेरीमे लऽ दुनू बच्चो आ घरोबलाकेँ आगूमे देलक। आगूमे लावा देख मुसना मने-मन सोचए लगल, ई मौगिया बड़ लूरि‍गर अछि। एहेन स्‍त्री भगवान सभकेँ देथुन। कहू जे अखन तक हम जे बुझितो ने छेलौं से आइ खाइ छी। धिया-पुताकेँ पोसब कोन बड़का भारी बात जे समाजो-ले लोक बहुत किछु कऽ सकैए। लावाक गमक पुर्बा हवामे मिलि सौंसे गामकेँ सुगन्‍धित कऽ देलक। सुगन्‍ध पाबि टोलोक आ गामोक स्‍त्रीगण सभ लावा किनैले एक्के-दुइए जीबछीक आँगन आबए लगली। मुदा एक्केटा जवाब जीबछी सभकेँ दैत- “पहिने गिरहत काकाकेँ खुएबैन, तहन‍‍ केकरो देब।” भरि दुपहर जीबछी लावा भुजलक। दू छिट्टा भेलइ। दुनू छिट्टा लावा घरमे रखि‍ ओइमे सँ एक मुजेला लऽ साड़ीसँ झाँपि जीबछी मुसनाकेँ कहलक- “हम गिरहत काका ओइठाम जाइ छी। अहाँ अँगनेमे रहब।” कहि जीबछी माथपर मुजेला नेने श्रीकान्त ऐठाम विदा भेल। जीबछीक माथपर मुजेला देख श्रीकान्त गौर करैत मुस्‍किया कऽ पुछलखिन- “बड़ खुशी देखै छी लछमी महरानी। मुजेलामे की चोरा कऽ अनलौं हेन। कनी हमरो देखए दिअ?” अनसुनी करैत जीबछी मुस्‍कियाइत आँगन जा गिरहतनीक आगूमे मुजेला रखि‍ कहलकैन- “काकी, थोड़ेकेँ लाइ बना लिहैथ आ अखन कनीमे नोन-मरीच-तेल मिला कऽ दौथ, जे काकाकेँ दऽ अबै छिऐन।” छिपलीमे लावा नेने जीबछी दरबज्जापर जा श्रीकान्तक आगूमे देलकैन। ओ छिपलीमे उज्जर-उज्जर रमदाना-लावा जकाँ लावाकेँ निंगहारि-निंगहारि देखए लगला। जीबछी कहलकैन- “काका, की निंगहारै छथिन, पहिने एक मुट्ठी मुँहमे दऽ कऽ देखथुन ने। भैंटक लावा छिऐ।” एक मुट्ठी उठा श्रीकान्त मुँहमे लेला। लावाक कोमलता आ सुआद पाबि‍ श्रीकान्त खुशीसँ पत्नीकेँ हाक पाड़ि कहलखि‍न- “एते सुन्नर वस्तुकेँ अखन धरि जनितौं ने छेलौं। धन्य अछि कमलपुरवालीक ज्ञान आ लूरि‍ जे एहेन सुन्नर हेराएल वस्‍तुकेँ ऊपर केलक। साक्षात् देवी छी कमलपुरवाली। जाउ, सन्दूकसँ एकजोड़ साड़ी आ आँगी निकालने आउ। जीबछीकेँ अपना ऐठामसँ पहिरा कऽ विदा करब। गरीब-दुखियाक देवी छी कमलपुरवाली।” सभ दिन जीबछी लावा भुजैत आ अँगनेसँ लोक सभ कीनि-कीनि लऽ जाइत। पनरह दिनक जमा कएल रूपैयो आ फुटकुरियो जीबछी मुसनाकेँ गनैले आगूमे देलक। पाइ देख मुसनाक मन उड़ि गेल। मुहसँ ठहाका निकलल। एक टकसँ मुसना जीबछी दिस देख कैंचा गिनए लगल। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 3100 बिसाँढ़ पैछला चारि सालसँ रौदी भेने गामक सुर्खीए बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरिअर-हरिअर गाछ-बिरीछ, अन्नसँ लहलहाइत खेत, पानिसँ भरल इनार-पोखैर, सैंकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंगसँ लऽ कऽ गाए-महींस आ बकरीसँ भरल रहै छल ओ मरनासन्न भऽ गेल। सुन-मसान जकाँ। बीरान। सबहक मनमे एक्केटा विचार अबैत जे आब ई गाम नइ रहत। जँ रहबो करत तँ खाली माटिए-टा। किएक तँ जइ गाममे खाइले अन्न नै उपजत, पीबैले पानि नइ रहत तइ गामक लोक की हवा पीब कऽ रहत? जइ मातृभूमिक महिमा अदौसँ सभ गबैत एला ओ भूमि चारिए सालक रौदीमे पेटकान लाधि देलक। मुदा तैयो लोकक टुटैत आशाक वृक्षमे नव-नव फुलक कोढ़ी टुस्साक संग जरूर निकैल रहल अछि। निकलबोकेना ने करत, आखिर जनकक राज मिथिला छिऐ कि‍ने। जइ राज्यमे बारह-बर्खक रौदीक फल सीता सन भेटल तइ राज्‍यमे, हो-ने-हो जँ कहीं ओहने फल फेर भेटए! ..एक दिस रौदीक सघन मृत्युवाण चलैत तँ दोसर दिससँ आशाक प्रज्वलित वाण सेहो ओकर मुकाबला करैत। जेकर हँसेरियो नमहर। एहनो स्थितिमे दुनू परानी डोमनक मनमे जीबैक ओहने आशा बनल रहल, जेहने सुभ्यस्त समैमे। कान्हपर कोदारि नेने आगू-आगू डोमन आ माथपर सिंगही माछ आ बिसाँढ़सँ भरल पथिया नेने पाछू-पाछू सुगिया, जिनगीक गप-सप्‍प करैत बड़की पोखैरसँ आँगन अबैत रहए। चानिक पसीना दहिना हाथसँ पोछि, मुस्‍कियाइत सुगिया बाजल- “जेकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि‍-उहि छै ओ कथीक चिन्ता करत?” पत्नीक बात सुनि डोमन पाछू घुमि सुगियाक चेहरा देख, बिनु किछु बजने नजैर निच्चाँ केने आगू डेग बढ़बए लगल। किएक तँ खाइक ओते चिन्ता मनमे नहि, जेते पानि पीबैक। डोमनकेँ अपन खेत-पथार नहि। मुदा दुनू बेकती तेहेन मेहनती जे नहियोँ किछु रहने नीक-नहाँति गुजर करैत। गिरहस्तीक सभ काजक लूरि‍ रहितो डोमन कोनो गिरहस्तसँ बन्हाएल नहि, ओना समए-कुसमए अपन काज नइ रहने बोइनो कऽ लइत। ओना, अपना खेत नइ रहने खेती तँ नहियेँ करैत मुदा दस कट्ठा मरूआ धरि सभ साल बटाइ रोपि लैत, जइसँ पाँच मन अन्नो घर लऽ अबैत। मरूआ-बीआ तैयार करैमे बेसी मेहनत होइए। सभ दिन बीआ पटबए पड़ैए। शुरूहे रोहैणमे बड़की पोखैरक किनछैरमे डोमन बीआ पाड़ि लइत। लगमे पानि रहने पटबैयोक सुविधा। आरू बीराड़ तँए बीओ नीक उमझैत। पनरहे दिनमे रोपाउ भऽ जाइत। मिरगिसरामे बर्खा होइते डोमन सभ साल अगते मरूआ रोपि लैत, मुदा ऐ बेर से नइ भेलइ। बर्खा नइ भेने बीआ बीराड़ेमे बुड़हा गेलइ। एक्को धूर मरूआक खेती गाममे नहि भेल। तेतबे नहि, अखन धरि कियो ने धानक बीराड़क खेत जोतलक आ ने बीआ बागु केलक। रौदीक आगम सबहक मनमे हुअ लगल। मुदा तैयो केकरो मनमे अन्देशा नहि! किएक तँ ढेनुआर नक्षत्र सभ पछुआएले रहए। जहिना रोहैण-मिरगिसरा फोंक गेल तहिना अदरो। समए सेहो खूब तबि गेल। दस बजेसँ पहिनहि लोक बाधसँ आँगन आबि जाइत, किएक तँ लू लगैक डर सबहक मनमे। मरूआ खेती नइ भेने दुनू परानी डोमनक मनमे चिन्ता पैसए लगल। दोसर दिन बड़की पोखैरसँ दुनू परानी पुरैनक पातक बोझ माथपर नेने अँगना अबैत बाटमे सुगिया बाजल- “ऐ बेर एक्को कनमा मरूआ नइ भेल। बटाइयो केने आन साल ओते भऽ जाइ छल जे सालो भरि जलखै चलि जाइ छेलए। ऐ बेर तँ जलखैयो बेसाहिये कऽ चलत।” माथ परहक पुरैनक पातक बोझसँ पानि चुबैत। जे डोमनो आ सुगियोकेँ अधभिज्जु कऽ देने। नाक परहक पानि पोछैत डोमन उत्तर देलक- “कोनो कि अपनेटा नइ भेल आकि गामेमे केकरो नइ भेलइ। अनका होइतै आ अपना नै होइत तहन‍‍ ने दुख होइतए। मुदा जब केकरो नइ भेलै तँ हमरे किए दुख हएत। जे दसक गति हेतै से अपनो हएत। अपना तँ पुरैन-पातक रोजगारो अछि आ जेकरा ईहो ने छइ?” पतिक उत्तर सुनि सुगिया मिरमिराइत बाजल- “हँ, से तँ ठीके। मुदा ठनका ठनकै छै तँ कियो अपने माथपर ने हाथ दइए। तहन‍‍ तँ ई रौदी इसरक डाँग छी! लोकक कोन साध!” अखन धरिक समैकेँ कियो रौदी नइ बुझलक। सबहक मनमे यएह होइत जे ई भगवानक लीले छिऐन। कोनो साल अगतेसँ पानि हुअ लगैत तँ कोनो साल अन्‍तमे होइत। कोनो साल बेसियो होइत तँ कोनो साल कम्मो आ कोनो-कोनो साल नहियेँ होइत। जइ साल अगते बिहरिया हाल भऽ जाइत ओइ साल समैपर गिरहस्ती चलैत मुदा जइ साल पचता बर्खा होइत तइ साल अधखड़ू खेती भऽ जाइत...। जखन‍‍ हथियो नक्षत्र धरिमे बर्खा नइ भेल तखन‍‍ सबहक मनमे आबए लगलै जे ऐ बेर रौदी भऽ गेल। ओहि‍ना जोतल-बिनु-जोतल खेतसँ गरदा उड़ैत। घास-पातक केतौ दरस नहि। मुदा तँए कि लोक हारि मानि लेत? कथमपि नहि! सभ दिनसँ गामक लोकमे सीना तानि कऽ जीबैक जे अभि‍यास बनल अछि ओ पीठ केना देखौत...। भऽ सकैए जे इन्द्र भगवानकेँ कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतैन। जइसँ बिगैड़ कऽ एना केलैन। तँए हुनका वौसब जरूरी अछि। जखने फेर सुधैर जेता तखनेसँ सभ काज सुढ़िया जाएत। ..यएह सोचि कियो भूखल-दूखलकेँ अन्न दान करैत, तँ कियो कीर्तन-अष्टयाम-नवाह, तहिना कियो चंडी, विष्णु यज्ञ-जप, तँ कियो महादेवक पूजा इत्यादि। अनेको रंगक बौसैक ओरियान लोक सभ शुरू केलक। जनिजाति सभ सेहो कमला-कोसीकेँ छागर-पाठी कबुलए लगली। जँ हुनकर महिमा जगतैन तँ बिनु बर्खोक बाढ़ि अनती। बाढ़ि औत पोखैर-झाँखैरसँ लऽ कऽ चर-चौरी, डोह-डाबर सभ भरत। रौदी कमत। अदहा-छि‍दहा उपजो हेबे करत...। बर्खाक मकमकी देख नेंगरा काका महाजनी बन्न कऽ लेलैन। ओ बुझि गेला जे ऐ बेरक रौदी ऐगला साल बिसाएत। मुदा सोझमतिया बौकी काकी सभटा चाउर सबाइ लगा लेलैन। ओना बौकी काकीक लहनो छोट, खाली चाउरेक, सेहो पावैने-तिहार धरि समटल रहै छैन। बौकी काकीक महाजनी मातृ-नौमी, पितृ-पक्षसँ शुरू भऽ पाहुन-परक होइत दुर्गापूजा-कोजगरा होइत दिवाली-परेब,गोवर्धनपूजा-भरदुतिया आ छठि होइत सामा धरि अबैत-अबैत सम्पन्न भऽ जाइ छैन। किएक तँ समाकेँ सभ नवका चूड़ा खुअबैत। खुएबे-टा नहि करैत, संगे भारो दइत। ताधैर कोला-कोली धानो पकि जाइत। मुदा ई बात बौकी काकी बुझबे ने केलैन जे ऐ बेर रौदी भऽ गेल। तँए अपनो खाइले नै रखली। जहिना बोनिहार-किसान तहिना महाजन बौकियो काकी भऽ गेली। अगहन अबैत-अबैत सभकेँ चि‍न्‍ता हुअ लगलै जे अपने की खाएब आ माल-जालकेँ की खुआएब। किएक तँ कातिक धरिक ओरियान, अपनो आ मालो-जाल-ले तँ अधिकांश लोक पहिनहिसँ करि कऽ रखैत। जे ऐबेर नेंगरा काका छोड़ि सबहक सठि गेलैन..!अन्‍तमे धानोक बीआ सभ कुटि-छाँटि कऽ खा गेल। ..ऐबेर धानक कोन गप जे हाल दुआरे रब्बियो-राइ हएब कठिन। एकाएक सबहक भक्क खुजल। भक्क खुजिते मनमे चिन्ता समाए लगलै। जेना-जेना समए बितैत तेना-तेना चिन्तो फौदाइत। एक तँ ओहिना चुल्हि सभ बन्न हुअ लगल, ऊपरसँ सुरसा जकाँ समए मुँह बाबि सबहक आगूमे ठाढ़। चिन्तासँ लोक रोगाए लगल। भोर होइते धिया-पुताक बाजा सौंसे गाममे बजए लगैत। मौगी पुरुखकेँ करमघट्टू तँ पुरुख मौगीकेँ राक्षसनी कहए लगल। जइसँ धिया-पुताक बाजाक संग दुनू परानीक नाच शुरू भऽ जाइत। मुदा एहेन समए भेलोपर दुनू परानी डोमनक मनमे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। किएक तँ जुड़ेशीतलसँ पुरैनक पातक रोजगारा शुरू केलक। रोजगारो नमहर। बावन बीघाक बड़की पोखैर। जइमे सापरपिट्टा पुरैनक गाछ। बजारो नमहर। निर्मली,घोघरडीहाक संग झंझारपुरक नबको आ पुरनो बजार। ..असगरे सुगिया केते बेचत। पुरैनक पात किननिहार हलुआइसँ लऽ कऽ मुरही-कचड़ीवाली धरि। तैपर सँ भोज-काजमे सेहो बिकाइत। तँए आठ दिनपर पार लगौने रहए। भरि दिन डोमन पत्ता तोड़ि-तोड़ि जमा करैत। एक दि‍न सुगि‍या पातकेँ सेरिया-सेरिया तेसरा दि‍नपर भोरुके गाड़ीसँ बेचैले जाइत। जे पात उगैर जाइ ओकरा डोमन सुखा-सुखा रखैत। किएक तँ सुखेलहो पातक बिकरी होइए। आइ निर्मलीसँ पात बेच कऽ सुगिया आबि पतिकेँ कहलक- “रौदी भेने अपना चलतीए आबि गेल!” चलतीक नाओं सुनि मुस्‍कियाइत डोमन पुछलक- “से की?” “सभ पात बेचनिहार वेपारी थस लऽ लेलक। सभ गामक पोखैर सुखि गेलै, जइसँ सबहक कारबार बन्न भऽ गेलइ। अपनेटा पात बजार पहुँचैए। आइ तँ जहाँ गाड़ीसँ उतरलौं कि दोकानदार आबि‍-आबि‍ बुझू जे लुझि लेलक। टीशनेपर छुहुक्का उड़ि गेल।” डोमन- “अहाँकेँ लूरि‍ नै छेलए जे दाम बढ़ा दैतिऐ, एकक दू होइत।” सुगिया- “ऐगला खेपसँ सएह करब। आब तँ बर्ड़ी सेहो जुआइत हएत कि‍ने?” डोमन- “गोटे-गोटे जुआएल अछि‍। अखन बीछि-बीछि तोड़ए पड़त, तँए पाँच दिन आरो छोड़ि दइ छिऐ।” तेसर साल चढ़ैत-चढ़ैत गामक एकटा बड़की पोखैर आ पाँचटा इनार छोड़ि सभ सुखि गेल। नमहर आँट-पेटक बड़की पोखैर। किएक तँ दाँइत खुनने अछि‍ कि‍ने? लोकक खूनल थोड़े छिऐ। देव अंश अछि। तँए ने गामक सभ अपन बेटाकेँ उपनयनो आ बिआहोमे ओही पोखैर जा पहि‍ने नहबैए। तेतबे नहि, छठिमे हाथो उठबैए। हमरा इलाकाक पृथ्‍वीक बनाबट सेहो अजीब अछि। बुझू तँ माटिक पहाड़। पाँच साए फुटसँ निच्चाँ धरि ने बाउल अछि आ ने पानि। शुद्ध माटि। जइसँ ने एक्कोटा चापाकल आ ने बोरिंग गाममे। पानि दुआरे गाम-गामक लोककेँ पड़ाइन लगि‍ गेल। माल-जाल उपैट गेल। सभटा गाए-माल चाहे तँ लोक बेच लेलक वा खढ़ पानि दुआरे मरि गेलइ। अदहासँ बेसी गाछो-बिरीछ सुखि गेल। चिड़ै-चुनमुनी इलाका छोड़ि देलक। जे मूस अगहनमे अंग्रेजी बाजा बजा-बजा सत-सतटा बि‍आह करै छल ओहो या तँ बिलेमे मरि गेल वा केतए पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि। हमरो गामक अदहासँ बेसीए लोक पड़ा गेल। मुदा तैयो जिबठगर लोक गाम छोड़ैले तैयार नहि। पुरुख सभ गाम छोड़ि परदेश खटैले चलि गेल। मुदा बाल-बच्चा आ जनि-जाति गामेमे रहल। पोखैर-इनारकेँ सुखैत देख लोक पानि पीबैले बड़कीए पोखैरक कतबाहिमे कूप खुनि लेलक। अपन-अपन कूप सभकेँ। पानिक कमी नहि। तीन सालक जे रौदी परोपट्टा-ले बाम भऽ गेल अछि, ओ डोमन दुनू परानी-ले दहीन भऽ गेल। काज तँ आने साल जकाँ मुदा आमदनी दोबर-तेबर भऽ गेलइ। गामक जमीनोक दर घटल। जइसँ डोमन खेत कीनए लगल। ओना सुगियाक इच्छा खेत किनैक नहि। किएक तँ मनमे होइ जे अहि‍ना सभ दिन रौदी रहत आ खेत सभ पड़ता। तँए अनेरे खेत लऽ कऽ की करब। घास-पानिक दुआरे मालो-जाल लेब नीक नहियेँ हएत। डोमनक मनमे आशा रहै जे जहिना लूल्हियो कनियाँ बेटा जनमा कऽ गिरथाइन बनि जाइए तहिना ने पानि भेने परतियो खेत हएत। योगी-तपस्वीक भूमि मिथिला अदौसँ रहल। जे अपन देह जीव-जन्तुक कल्याण-ले गला लेलैन। ओ की ऐ बातकेँ नहि जनै छला? जरूर जनै छला! तँए ने गाममे अठारह गण्डा[1] पोखैर, सत्ताइस गण्डा[2] इनारक संग-संग चौरीमे सैंकड़ो कोचाढ़ि-बिरइ खुनि पानिक बखाड़ी बनौने छला। सोल्‍होअना बरखे भरोसे नहि, अपनो जोगार केने छला। तीन साल तँ दुनू परानी डोमन चैनसँ बितौलक। मुदा चारिम साल अबैत-अबैत बेचैन हुअ लगल। गामक सभ पोखैर-इनार तँ पहिनहि सुखि गेल छल। लऽ दऽ कऽ बड़की पोखैरटा बँचल रहइ। तहूमे आब सुखैत-सुखैत मात्र कठ्ठा पाँचेमे पानि बँचल। सूखल दिस पुरैनियोँ उपैट गेल। खाली बीचमे जे पानि अछि मात्र ओहीमे पुरैनक गाछ बँचल, मुदा तइमे जाँघ भरिसँ ऊपरे गादि छइ। पैसब महाग मोसकिल अछि। पएर दैते सरसरा कऽ जाँघ भरि गड़ि जाइत अछि। के जान गमबए पैसत। निराशाक जंगलमे डोमन वौअए लगल। मनमे हुअ लगलै, जहिना गामक लोक चलि गेल तहिना हमहूँ चलि जाएब। जानि कऽ परानो गमाएब नीक नहि। जिनगी बँचत, समए-साल बदलतै तँ फेर घुमि कऽ आएब नइ तँ केतौ मरि जाएब। जहिना गामक सभ कि‍छु बिलैट गेल, समाजक लोक बिलैट गेल, तहिना हमहूँ बिलैट जाएब...। पतिकेँ चिन्तित देख सुगिया पुछलक- “किछु होइए की? एना किए मन खसल अछि?” पत्नीक प्रश्‍न सुनि डोमन आँखि उठा कऽ देख पुनः आँखि निच्चाँ कऽ लेलक। आँखि निच्चाँ करिते सुगिया दोहरा कऽ पुछलक- “मन-तन खराप अछि?” नजैर उठबैत डोमन बाजल- “तन तँ नइ खराब अछि मुदा तनेक दुख देख मन सोगाएल अछि। जइ आशापर अखन धरि खेपलौं ओ तँ चलिए गेल जे ऐगलोक कोनो आशा नइ देखै छी। की करब आब?” सुगिया- “अपना केने किछु ने होइ छइ। जे भगवान जन्‍म देलैन आ मुँह चीरने छैथ‍, अहारो तँ वहए ने देता। तइले एते चिन्ता किए करै छी?” डोमन- “सभ कि‍छु बिलैट गेल। एहेन सुन्दर गाम छल सेहो उपैट रहल अछि। खाली माटिटा बँचल अछि। की माटि खुनि-खुनि खाएब?बिनु अन-पानिक कए दिन ठाढ़ रहब?” “चिन्ता छोड़ू। जहिया जे होइक हेतै से हेतइ। अखन तँ पाइनो ऐछे आ अन्नो ऐछे। जाधैर ऐ धरतीपर दाना-पानी लिखल हएत ताधैर भेटबे करत। जहिया उठि जाएत तहिया केकरो रोकने रोकेबै। तइले एते चिन्ता किए करै छी?” कहि सुगिया भानसक ओरियानमे जुटि गेल। पत्नीक बात सुनि डोमन मने-मन सोचए लगल जे हमरा तँ मरैयोक डर होइए मुदा एकरा कहाँ होइ छइ! ई तँ मरैयो-ले तैयारे अछि। ..फेर मनमे उठलै, जीवन-मृत्युक बीच सदासँ संघर्ष होइत आएल अछि आ होइत रहत। तइसँ पाछू हटब कायरता छी। जे मनुख कायर अछि ओ कोन जिनगीक आशामे अनेरे दुनियाकेँ अजबारने अछि। पुनः अपना दि‍स तकलक। अपना दि‍स तकिते डोमनकेँ मनमे उठलै, जनु जीबैक बाट हेरा गेल अछि तँए एते चिन्ता दबने अछि...। तमाकुल चुना कऽ डोमन मुँहमे लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते डोमनकेँ अपन माए-बापसँ लऽ कऽ पैछला पुरखा दिस घोड़ा जकाँ नजैर दौगलै। मुदा केतौ रूकलै नहि। जाइत-जाइत मनुखक जड़िमे पहुँच‍ गेलइ। पुनः घुमि कऽ आबि माए लग अँटैक गेलइ। मन पड़लै माइक संग बितौलहा जिनगी। मन पड़लै माइक ओ बात जे दस बर्खक अवस्थामे रौदी बितौने छल। रौदी मन पड़िते बड़की पोखैरक बिसाँढ़ आ अन्है माँछ डोमनक आँखिक सोझमे आबि गेल। कनी काल धरि गुम्म भऽ मन पाड़ए लगल। मन पड़लै, अही पुरैनक जड़िमे तँ बिसाँढ़ो फड़ैए। अल्हुए जकाँ। जहिना माटिक तरमे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ रहै छै तहिना पुरैनक जड़िमे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैए। अनासुरती मुहसँ निकललै- “बाप रे! बाबन बीघाक पोखैरमे तँ केते-ने-केते बिसाँढ़ हेतइ। ओकरे खुनैमे माछो भेटत। खाधि बना-बना सिंही-माङुर रहैए।” एक पंथ दू काज। मनमे खुशी अबिते पत्नीकेँ हाक पाड़ि डोमन कहलक- “भगवान बड़ीटा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीव-जन्‍तुकेँ जन्‍म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।” पतिक बात सुनि सुगिया अकबका गेल। जेना किछु बुझबे ने केलक। मुँह बाबि पति दिस तकैत रहल। पत्नीकेँ टकटक तकैत देख ‍ डोमन बाजल- “चुल्हि मिझा दियौ। घुमि कऽ आएब तखन‍‍ भानस करब।” पतिक उत्साह देख सुगियाक मनमे शंका भेलै जे मन ने तँ सनैक गेलैन हेन! अखने मुर्दा जकाँ पनिमरू छला आ लगले की भऽ गेलैन! दोसर बात परखैक खियालसँ सुगिया किछु बाजल नहि, चुप-चाप ठाढ़ रहल। डोमन फेर बाजल- “की कहलौं! पहिने आँच मिझा दियौ, घरक फट्टक लगा दियौ आ छिट्टा लऽ कऽ संगे चलू।” सुगिया पुछलक- “केतए।” “बड़की पोखैर।” “किए?” “एहेन-एहेन सैयो रौदी कटैक खेनाइ पोखैरमे दाबल अछि। आनैले चलू।” सवाल-जवाब नहि कऽ सुगिया आगि पझा, फट्टक लगा छिट्टा लऽ तैयार भेल। घरसँ कोदारि निकालि डोमन विदा भेल। आगू-आगू डोमन आ पाछू-पाछू सुगिया। बड़की पोखैरक महारपर पहुँच‍ल। पहुँचते डोमन हाथक इशारासँ देखबैत पत्नीकेँ कहलक- “जेते पोखैरक पेट सूखल अछि ओइमे तेते खाइक वस्तु गड़ाएल अछि। ने खाइक कमी रहत आ ने पीबैक पानिक। जेना-जेना पानि सुखैत जेतै तेना-तेना कूपकेँ गहींर करैत जाएब। जेते पुरैनक गाछ सुखाएल अछि ओइमे घौर्छा जकाँ बिसाँढ़ फड़ल हएत।” पोखैर धँसि डोमन तीन डेग उतरे-दछिने आ तीन डेग पूबे-पछिमे नापि कोदारिसँ चेन्ह देलक। एक धूर भरिमे। उत्तरबरिया-पुबरिया कोणपर कोदारि मारलक। माटि तेते सक्कत जे कोदारि धँसबे ने कएल। दोहरा कऽ फेर जोरसँ कोदारि मारलक। कोदारि फेर नइ धँसल। आगू दिस देख डोमन हियाबए लगल जे किछु दूर आगूक माटि नरम हएत। खुनैमे असान हएत। मनक खुशी उफैन कऽ आगू बढ़लै,बाजल- “अँइ यइ ढोरबा माए, हम पुरुख नै छी? देखियौ! हमरा माटि गुदानबे ने करैए! अहाँ हमरासँ पनिगर छी, दू छअ मारि कऽ देखियौ तँ।” “पहिने हमर चूड़ी-साड़ी पहिर लिअ आ हमरा अपन धोती दिअ। तहन‍‍ कोदारि पाड़ि कऽ देखा दइ छी।” मुस्‍कियाइत दुनू आगू-मुहेँ ससरल। एक लग्गा आगू बढ़लापर माटि नरम बुझि पड़लै। कोदारि मारि कऽ देखलक तँ माटि सहगर लगलै। एक धूर नापि डोमन खुनए लगल। पहिलुके छअमे एकटा बिसाँढ़क लोली जगलै। लोल देखते उछैल कऽ बाजल- “हे देखियौ! यएह छी बिसाँढ़!” “लोल देखने नै बुझब। सौंसे खुनि कऽ देखा दिअ?” पत्नीक बात सुनि डोमनकेँ शंका भेलै जे हो-ने-हो कहीं अधेपर सँ ने कटि जाए। तँए लोल पकैड़ डोला कऽ हाथेसँ उखाड़ए लगल। मुदा नइ उखड़लै। कनी हटि दमसा कऽ दोसर छअ मारलक। छअ मारिते एक बीतक देखलाहा आ तैसंग दूटा आरो देखलक। तीनूकेँ खुनि दुनू परानी डोमन निंगहारि-निंगहारि बिसाँढ़ देखए लगल। उज्जर-उज्जर। नाम-नाम। लठिआहा बाँस जकाँ गोल-गोल। मोट। हाथीक दाँत जकाँ चिक्कन। बित भरिसँ हाथ भरिक। पाव भरिसँ आध सेर धरिक। पत्नी दिस नजैर उठा कऽ डोमन देखलक तँ पचास वर्षक आगूक जिनगी बुझि पड़लै। पति दिस नजैर उठा कऽ सुगिया देखलक तँ चूड़ीक मधुर स्वर आ चमकैत मांगक सिनुर देखलक। छिट्टा भरि बि‍साँढ़ आ सेर चारिए-क सिंही माछ नेने दुनू परानी- डोमन आ सुगिया खुशीसँ हलसैत विदा भेल। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2516 पीरारक फड़ गोल-गोल हरिअर-हरिअर भुआ जकाँ सोहरी लागल डारिमे, जेहने हरिअर पात तेहने फड़, यएह छी पीरारक फड़। पाँचेटा पुरान गाछ गाममे, बड़का-बड़का आम, जामुन आ शि‍शो गाछक जन्‍म ओ पाँचो पीरारक गाछ देखने। साए बर्खक करियाबाबा बजैत- ‘जहियासँ मोन अछि ओ पाँचो गाछ ओहिना बुझि पड़ैए। एते ठनका खसल, बिहाड़ि आएल मुदा ओइ पाँचो गाछक रोइयाँ-भगन नइ भेलइ।’ दस गजसँ नमहर नहि, ने मेघडम्मर जकाँ बहुत पसरल आ ने छिड़ियाएल। छोट-छीन बर्खाकेँ रोकि पानिक बूनकेँ माटिक मुँह नइ देखए दइत। घनगर पात सजा-सजा पाँचो गाछ सजल। सोहत केर कोथी सन चोखगर काँट सभ डारिकेँ पहरेदार जकाँ सजौने। छरगर-छरगर डारिमे चौरगर-चौरगर पात, जेना इन्द्रकमल वा तगर फूलक होइत। तहिना फूलो। पाँचो पीरारक गाछ सैयो बिहाड़ि आ हजारो बर्खाक संग नमहरसँ छोट धरि सैयो बेर पाथरक चोट खेलक। तेतबे नहि, केतेकोबाढ़ि-रौदीकेँ सेहो हँसैत-हँसैत सहलक। जहिना गामक उत्तरबरिया बाधमे एक्के आड़िपर पतियानी लगा पाँचो गाछ ठाढ़ तहि‍ना देखैयोमे पाँचो एक्के रंग। ने नमहर ने छोट डारि जे एक-दोसरसँ हक-हिस्सा-ले झगड़ैत। पाँचोमे अटुट प्रेम। जहन‍‍ पाँचो फूलसँ सजैत तहन‍‍ बुझि पड़ैत जे एक-दोसरक जुआनीक रंग देख हृदैसँ खिलखिला-खिलखिला हँसैत हुअए। एतेक नमहर जिनगीमे ने कियो जड़िकेँ तामि-कोरि पानि देलक आ ने ठारिकेँ छकैड़-छुकैड़ गाछकेँ सुन्दर बनौलक। सोल्‍होअना देखभाल भगवानेक ऊपर। तँए पाँचो गाछ स्वाभिमानसँ भरल जे केकरो एहसान रूपी कर्ज जिनगीमे नै लेलौं। हरिदम पाँचो हँसैत-इठलाइत मन्द हवामे झूमैत...। पहिने पाँचो गाछक फूल फुला फड़ बनि झड़ि जाइत, पछाइत फड़ पूर्ण जिनगीक सुख भोगि अन्‍तिम अवस्थामे आबि पवन रूपी नौतहारीकेँ पठा चिड़ै-चुनमुनीकेँ बजा-बजा अपन शरीर दान करैत, यएह पाँचो गाछक जिनगी भरिक धरम रहल। ओइ गाछसँ हटिए कऽ लोक अपन खेतक जोत-कोर आदि करैत जे ओइ गाछपर सुगबा साँप रहैए। सुगबा साँप लोककेँ देखैमे अबिते ने छै किएक तँ ओ हरिअर-लत्ती जकाँ होइए। जेकरा कटलासँ स्वर्ग-नरकक द्वार अनेरे खुजि जाइ छइ। बीचमे केतौ कोनो रूकाबट‍ नै होइए। उत्तरबारि बाधक रखबारि रतना करै छल। दू साल पहिनहि दुनू परानी रतना मरि गेल। दू सालसँ कि‍यो बाधक रखबारि करैले तैयारे ने होइत। डर होइ जे पीरारक गाछपर सुगबा साँप रहैए, के अपन जान गमौत, दू-चारि सेर अन्न सालमे हएत कि‍ नइ हएत। साल भरि पहिने पिचकुन नोकरी करैले मोरंग गेल। रौदियाह समए भेने जखन‍‍ किसानो सबहक दशा नीक नहि, तखन‍‍ जन-बोनिहारक चर्चे की। साँझक-साँझ चुल्हि नै पजरैत। गरीब-गुरबा गाए-बकरी बेच-बेच कियो मोरंग, कियो सिलीगुड़ी, तँ कियो आसाम नोकरी करए गेल। पिचकुन सेहो रखबारीवाली नवकी कनियासँ पनरह रूपैआ कर्जा लऽ गेल। अखन धरि गाममे पिचकुनकेँ बकलेले-ढहलेल लोक बुझैत। जेते गोरेक मेड़िया नोकरी करए गेल छल ओइमे सँ किछु गोरे विराटनगर, किछु गोरे रंगैली, किछु गोरे सिलीगुड़ी आ किछु गोरे आसाम गेल। पिचकुनमाकेँ बकलेल बुझि सभ छोड़ि अपन-अपन गर लगबए लगल। असगरे पिचकुनमा इटहरी चौकसँ थोड़े आगू जा एकटा गाछक निच्चाँमे बैस चूड़ा आ घुघनी खाए लगल। खाइते छल आकि दू गोरे केँ उत्तर-मुहेँ जाइत देख चूड़ा-घुघनीकेँगमछाक खोंचैड़मे लऽ खाइते पाछू-पाछू विदा भेल। खेबो करए आ गप्पो-सप्प करए। जाइत-जाइत धनकुटाक करीब पहुँचल। जइ दुनू गोरेक संग रहए ओ दुनू किसान। ओहीमे सँ एक गोरे पिचकुनकेँ नोकरी रखि लेलक। मरद-मौगी मिला पचासोसँ बेसी जन मंगत राम खटबैत। मंगत राम सखुआ-लकड़ीक तीन महला घर बनौने। किछु खेत पहाड़ोपर छइ। जइमे मरूआ, सामी-कौनी इत्‍यादि उपजबैत, तैसंग नेबो समतोला सबहक गाछ सेहो रोपने अछि। पहाड़क ऊपरमे चमकैत रौदकेँ पिचकुन उजड़ा पहाड़ बुझैत। छोट-छोट गाछसँ लऽ कऽ पैघ-पैघ गाछक जंगल। छोट-छोट पहाड़सँ लऽ कऽ नमहर-नमहर पहाड़ देख पिचकुन मने-मन सोचए जे दोसर दुनियाँमे चलि एलौं। मुदा रस्ताक ठेकान रहने भरोस रहै जे तीन दिनमे अपन गाम चलि जाएब। बड़का-बड़का बखाड़ी, नारक बड़का-बड़का टाल देख पिचकुन मने-मन खुशी होइत जे मालिक खूब धनिक अछि। कहियो नोकरीसँ हटौत नहि। जखन गाम जाइक मन हएत छुट्टी लऽ कऽ चलि जाएब आ फेरो चलि आएब। रस्तो तँ देखले अछि। साल भरि नोकरी केला पछाइत‍‍ पिचकुनकेँ गाम अबैक मन भेलइ। जहियासँ पिचकुन नोकरी कऽ रहल छल तैबीच एक्को पाइ घर नै पठौलक। पठैबतए केना? ने डाकघरक ज्ञान रहै आ ने केकरो अबैत-जाइत देखइ। एकटा थारूनसँ पिचकुनकेँ लाट-घाट भऽ गेलइ। अठारह-उन्नैस बर्खक ओ थारून। मंगते रामक जन। ओकर नाओं छल धनियाँ। पिचकुनक संग अबैले धनियाँ राजी भऽ गेल। साल भरिक पछाइत‍‍ पिचकुन गाम जाएत तँए माए-ले ऊनी स्वीटर, चद्दैर आ अपना-ले फुलपेन्‍ट, भरि बाँहिक स्वीटर, चद्दैर किनलक। समाज सभ-ले समतोला किनलक। कपड़ा, समतोला आदि‍क मोटरी बान्हि, रूपैआकेँ फुलपेन्‍टक जेबीमे लऽ मोटरीमे रखि‍ बन्हलक। बटखर्चा-ले मुरही लऽ लेलक। धनियोँ अपन धएल-धरल रूपैआ, कपड़ा सभ बान्हि रातिए-मे तैयार भेल। ..जंगल-झार दुआरे रातिमे नै निकलल। भुरूकबा उगिते दुनू गोरे अपन-अपन मोटरी लऽ चुपचाप विदा भेल। जही रस्तासँ पिचकुन गेल रहए ओही रस्ते चलल। इटहरी आबि दुनू गोरे बस पकड़लक। बससँ बथनाहा आबि पएरे विदा भेल। कोसीमे नावपर पार भऽ निर्मली तक पएरे आएल। निर्मलीमे टेन पकैड़ गाम आएल। फुलपेन्‍ट कमीज आ पैरमे चप्पल पहिरने, बाबड़ी उनटौने, कान्हपर मोटरी नेने आगू-आगू पिचकुन आ पाछू-पाछू धनियाँ आबि माएकेँ गोड़ लगलक। टोल-पड़ोसक लोक पिचकुनकेँ चिन्हबे ने करैत। पिचकुन माएकेँ गोड़ लागि ओलतीमे चप्पल खोलि‍‍ माएकेँ घर लऽ जा मोटरी खोलि रूपैआक गड्डी चुपचाप देखौलक। देख‍ते बुझू ऊसरमे दुभि जनैम गेल। रूपैआक गड्डी देख माइक मोन उड़ि गेलइ। हँसोंथि-पसोंथि कऽ सभ कपड़ा समैट, रूपैआ तरमे घोंसिया मोटरी बान्हि मुनेसरी धरैनपर रखलक। धनियाँ ओसारपर बैसल। धनियाँक सम्बन्धमे माए पिचकुनकेँ पुछलक- “ई कनियाँ के छेथि‍न?” मुसकी दैत पिचकुन कहलक- “तोरे पुतोहु। ओतै बिआह कऽ लेलौं।” एक्के-दुइए टोलक जनिजाति आबए लगली। पिचकुनक माए सभकेँ एक-एकटा समतोला देलक। एकटा दसटकही जेबीसँ निकालि पिचकुन माएकेँ दैत कहलक- “माए, भूख लगल अछि, जो दोकानसँ बेसाहि सभ कि‍छु लऽ आन। पहिने भानस कर। ताबे हम नहा लइ छी। तीन दिनक रस्ताक झमारल छी, ओंघीसँ देह भँसियाइए।” पुतोहुकेँ देख मुनेसरी सौंसे टोल पुतोहु देखैले हकार देलक। तैसंग जातिक भोजो गछलक। सातम दिन पिचकुन दुनू परानी साँझमे सोमनी दादीक ऐठाम गेल, आँगनमे बिछान बिछा सोमनी दादी पोता-पोती सभकेँ खेलबैत रहैथ। दादीकेँ पिचकुन गोड़ लागि इशारासँ धनियाकेँ सेहो गोड़ लगैले कहलक। धनि‍योँ दादीकेँ गोड़ लगलकैन। ओछाइनिक कोणपर बैस पिचकुन आँखिक इशारासँ दादीकेँ जाँतैले सेहो कहलक। धनियाँ सोमनी दादीकेँ जाँतब शुरू केलक तखने पिचकुन सोमनी दादीकेँ कहए लगल- “दादी, गाममे तँ सभ बकलेले-ढहलेल बुझै छेलए। साल भरि पहिनहि मोरंग गेलौं। कमेबो केलौं आ ओतै बिआहो कऽ लेलौं। आब गामेमे रहब। गाममे अहाँ सभसँ पैघ छी, दुनू परानीकेँ असिरवाद दिअ।” उत्तरबारि बाधमे, सभसँ बेसी खेत सोमनी दादीक, जइ बाधमे दू सालसँ रखबार नहि। पिचकुनकेँ दादी उत्तरबारि बाध रखबारि करैले कहलक। संगे पाँच कट्ठा खेत बटाइयो करैले कहलक। ..रोजी देख पिचकुन गछि लेलक। दादियो खोपड़ी बन्हैले दूटा बाँस, एक बोझ खढ़ आ एक मुट्ठी साबे गछि लेलखिन। दोसर दिन पिचकुन दुनू परानी उत्तरबारि बाध जा कऽ खोपड़ी बन्हैक जगह टेबलक। एकटा ऊँचगर परती, जैपर बरसातोमे पानि नै अँटकैत। ओही जगहकेँ पिचकुन हियबैत रहए। आ एमहर धनियाँक नजैर पीरारक गाछपर पड़लै। गाछ लग जा फड़केँ तजबीज करए लगल। फड़ देख धनियाँ साड़ीक फाँड़ बान्हि गाछपर चढ़ि गेल। गाछमे लुबधल पीरारक फड़ देख धनियाँक मन चपचपा गेल। तीमन करैले दसटा तोड़ियो लेलक। जेना केकरो माटिमे गड़ल रूपैआक तमघैल भेटलासँ खुशी होइत तहिना धनियाँक मोन खुशीसँ चपचपा गेलइ। पिचकुन कोदारिसँ परतीकेँ छिलए-बनबए लगल। मने-मन धनियाँ एक मनसँ ऊपरे फड़ एक-एकटा गाछमे ठेकलक। खुशीसँ धनियाँक मुहसँ गीत निकलए लगल। गीत गुनगुनाइत धनियाँ पिचकुनकेँ हाक पाड़ि बाजल- “तकदीर जागि गेल। देखै छिऐ गाछमे कोंकची लगल फड़! काल्हिसँ तोड़ि-तोड़ि हाट लऽ जाएब। खूब महग बिकाएत।” पिचकुनकेँ बुझले ने। धनियाँक बातपर बिसवासे ने करए। खिसिया कऽ पुछलक- “अहाँ चिन्है छिऐ जे की छिऐ? जँ लोक खइतै तँ अहि‍ना लुधकी लगल रहितै?” जहिना पीरार देख मने-मन धनियाँ अपन गरीबीकेँ खुशहाली दिस‍ बढ़ैत देखए‍, गरीबीक मनमे अमीरीक ज्योति अबैत देखए। तहिना सौंसे बाधक रखबारिक संग पाँच कट्ठाक बँटाइक खुशी पिचकुनक मनमे। तँए पत्नीक संग रक्का-टोकी नै करब उचित बुझि पिचकुन बाजल- “हमरा हाट-बजार करैक लूरि‍ नै अछि, केना बेचब?” धनियाँ नैहरमे हाटो-बजार करै छल। खेतीक सभ काजक लूरि‍ सेहो छेलइ। तेतबे नहि, हाँस-बत्तक पोसबो करए आ हाट जा बेचबो करए। निर्भीक भऽ धनियाँ बाजल- “कड़चीक लग्गी बना कऽ सभ दिन तोड़बो करब आ हाट जा बेचबो करब। अहाँ संगमे रहब आ देखबै।” आसिन आबि गेल। बर्खा ठमकल। सवारी समए। अधिक बर्खा भेने खेत सभमे धान ऊपरा-ऊपरी। जेतए धरि नजैर जाइत तेतए धरि एकरंग हरिअर धान बुझि पड़ैत। बेर टगिते धानक पातपर ओसक बून चमकए लगैत। जहिना कोनो बाला हरिअर साड़ी, हरिअर आँगीक संग माथमे मंगटि‍का पहिर देखैमे लगैत तहिना खेत रूपी बाला देखैमे लगैत। मन्द-मन्द पुर्बा हवा चलए लगल। जेतै बैसू तेतै आलस आबि जाएत। बाधमे तीनठाम पानि बहैले कटारि। जइसँ ऊपरका खेतक पानि निचला खेत दिस‍ बहैत। पिचकुन तीनू कटारिकेँ दुनू भागसँ बान्हि अपियारी बनौलक। अपियारीक पानि उपैछते अनेरूआ माछ कुदि-कुदि ओइमे फँसए लगल। धनियाँ अपियारियो ओगरैत आ माछो बिछैत। पिचकुन छिट्टामे लऽ हाटो जा बेचैत आ गामोमे घुमि-घुमि बेचए लगल। दोसर-दोसर माछ बेचनिहार पिचकुनकेँ एकटा साइकिल कीनि लइले कहलक। माथपर माछक छिट्टा लऽ घुमने देहो महकै। साइकिलक नाओं सुनि पिचकुनक सूतल मन फुरफुरा कऽ उठल। मुदा साइकिल चढ़ब नै अबैए! पिचकुन थतमतमे पड़ि गेल। थतमतमे पड़ल पिचकुनक मनमे थोड़े कालक पछाइत उठलै, जहन‍‍ साइकिल भऽ जाएत तहन‍‍ चढ़ब सिखबो करब आ जाबे सीखल नै हएत ताबे पैछला सीटपर छिट्टा रखि गुड़काइए कऽ घुमि-घुमि बेचब...। हाटसँ घुमैत काल पिचकुन धनियाकेँ कहलक- “अधपुराने एकटा साइकिल कीनि लेब।” आमदनीक खुशी धनियाकेँ रहबे करए। मुस्‍कियाइत बाजल‍- “जहन‍‍ साइकिले कीनब तँ अधपुरान किए कीनब? लबके कीनि लिअ।” जितिया पावैन। मरूआ रोटी माछक पावैन। एक दिन पहिनहि पिचकुनकेँ माछक बेना लोक सभ दऽ गेल। सुतली रातिमे पिचकुन चहा-चहा कऽ उठैत आ घरवालीकेँ कहैत- “अपियारीक सभ माछ बीछि लेलक।” मुदा धनियाँ सपना बुझि फेर सुति रहए। ..अन्हरोखे दुनू परानी पिचकुन टौहकी-छिट्टा लऽ अपियारी लग गेल। अन्हार रहने माछ देखबे ने करए। एकटा अपियारी लग पिचकुन बैसल आ दोसर लग धनि‍याँ। बीड़ी लगा-लगा पिचकुन पिबैत। फरिच्छ होइते एकटा अपि‍यारीमे पिचकुन आ दोसरमे धनियाँ पैसल। दुनू गोरे माछ बिछए लगल। जितिया छी, माछ हएत की नहि, तँए लोक दुआरे लोक अपियारीए लग पहुँचए लगल। तरजू-बैटखाड़ा नइ रहने पिचकुन अन्दाजेसँ बेचए लगल। छिट्टासँ ऊपरे माछ बीकि‍ गेलइ। बँचलाहा माछ दुनू परानी आँगन नेने आएल। अदहासँ बेसीए अँगनोमे बीकल। पावैनक दिन रहने हाटक भरोसे रहब पिचकुन नीक नै बुझि धनियाकेँ कहलक- “झब-दे जलखै बनाउ, अखने माछ बेचए जाएब।” हाँइ-हाँइ कऽ धनियाँ रोटी पका माछक सन्ना बनौलक। खा कऽ पिचकुन साइकिलपर छिट्टा लादि अँगने-अँगने माछ बेचए विदा भेल। बारह बजैत-बजैत सभटा माछ बीकि‍ गेलइ। रौद तीखर। पिचकुन माछ बेच पसि‍खाना पहुँच‍‍ गेल। पसि‍खाना ताड़ी पिआकसँ भरल। दुनू परानी पासी गहिंकी सम्हारैमे तंग-तंग। बैसैक जगह नहि। तँए पिचकुन पासी लग जा एक बम्मा ताड़ी लऽ ठाढ़े-ठाढ़ पीब कैंचा दऽ साइकिलपर चढ़ि विदा भेल। धनियाकेँ भाँज लगि‍ गेलै जे पिचकुन ताड़ी पीबैए। दूरेसँ पिचकुनकेँ साइकिलपर अबैत देख धनियाँ ओसारपर ओछाइन ओछा सुजनी ओढ़ि कुहरए लगल। ..आँगन अबिते पिचकुन धनियाकेँ कुहरैत देख लगमे जा पुछलक- “की-इ-इ होइ-इ-इ अए-ए-ए?” पिचकुनक बोली सुनि धनियाँ आरो जोर-जोरसँ कुहरए लगल। धनियाँक मुँह उघारैत पिचकुन फेर पुछलक। तैपर नकियाइत धनियाँ बाजल- “मरि जाएब! बड़का दुख पकैड़ लेलक! छाती दुखाइए! जाउ दोकानसँ करूतेल नेने आउ। सगरे देह मालिस करू, तखने छूटत।” लटपटाइते पिचकुन शीशी लऽ दोकानसँ तेल आनि धनियाकेँ मालिस करए लगल। कड़ घुमि-घुमि‍ धनियाँ पिचकुनसँ भरि पोख मालिस करौलक। जखन‍ पिचकुनकेँ हाथ दुखा गेलै तखन‍ धनियाँ बाजल- “आब, कन्नी मन हल्लुक लगैए।” मन हल्लुक सुनि पिचकुनक मनमे आशा जगलै। फेर मालिस करए लगल। धीरे-धीरे पिचकुनोक निशोँ उतरै आ धनियोँक तामस कमइ। पिचकुन खुशी जे घरवाली बँचि गेल, आ धनियाँ खुशी जे ताड़ी पीबैक नीक सजा देलिऐन। आसिन कातिकक आमदनीसँ पिचकुनक जिनगीक नींव पड़ल, पीरारसँ लऽ कऽ माछ तकमे नीक कमेलक। जइ पिचकुनक जिनगी गरीबीसँ जर्जर छल जे जानवरोसँ बत्तर जिनगी जीबैत रहए, ओ पिचकुन जहिना मनुख जानवरक विकसित रूप छी तहिना जानवरक जिनगी टपि मनुखक जिनगीमे प्रवेश केलक। जहिना हमर पूर्वज खोपड़ी बना रहै छला आ धीरे-धीरे आइ नीक मकानमे रहै छैथ‍ तहिना पिचकुन माटिक भीतक देबालक घर बनबैक विचार केलक। ओना पानि पीबैक अपना कोनो उपाय नइ छै जेकरा-ले आगू साल जोगार करैक विचार दुनू परानी मिलि केलक। ओना, खाली घरे आ पानियेँक दिक्कत पिचकुनकेँ नहि। ने घरमे सुतैले चौकी आ ने भानस करैले बरतन छै, मुदा सेहो सभ रसे-रसे जोगार करैक विचार केलक। सौंसे बाधमे धान फुटि कऽ लबल। हरिअर-उज्जर-लाल-कारी शीशसँ बाध चमकए लगल। दुनू परानी पिचकुन घर-आँगन छोड़ि भरि-भरि दिन बाधेमे रहए लगल। जँ बाधमे नै रहैत तँ साँढ़-पाड़ाक उपद्रव, घसवहिनीक उपद्रवसँ गिरहस्तक-मुहेँ फज्झैत सुनैत। साँझू-पहरकेँ धनियाँ सोमनी दादी लग जा खेतमे लुबधल धानक प्रशंसा करैत। सोमनी दादी हृदैसँ धनियाकेँ असिरवाद दइत। सामा पावैन भऽ गेल। गोटि‍-पँगरा खेतक धान सेहो पाकए लगल। बैसारी देख धनियाँ पिचकुनकेँ कहलक- “पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि-कोरि सेरिया दियौ जे आगू नीक-नहाँति फड़त।” धनियाँक बात सुनि पिचकुन बढ़ियाँ जकाँ पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि तामि बकरी भेराड़ी मिलल छाउर पाँचो गाछक जड़िमे चारि-चारि पथिया दऽ दू-दू घैल पानि सेहो देलक। ..पनरहे दिनक पछाइत‍‍ पाँचो गाछक रंग बदैल हरिअर-कचोर भऽ गेल। सभ मुड़ीमे नवका कलश सेहो कलशल। जहिना मनुख अपन बच्चाकेँ सेवा करैत तहिना दुनू परानी पिचकुन पीरारक गाछकेँ करए लगल। अपन सेवा देख पाँचो पीरारक गाछ हृदैसँ दुनू परानी-धनियाकेँ असिरवाद देबए लगल। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2064 अनेरूआ बेटा तेसर साँझ। अन्हरियाक चौठ रहने चान तँ नइ उगल रहै मुदा पूबसँ धाही छिटकए लगल छेलइ। सुनसान अन्हार देख किछु क्षण पहिनहि एकटा कुमारि-कन्‍याँ, समाजमे लोक-लाज बँचबैक खिआलसँ अपन दस दिनक जन्‍मल बच्चाकेँ रस्ताक किनछैरमे रखि अढ़े-अढ़ आँगन चलि गेल। बच्चाकेँ नअ दिन तँ झाँपि-तोपि कऽ बेमारीक बहन्ना बना रखलक। मुदा घटना खुलै दुआरे दसम दिन जी-जाँति कऽ फेकलक नहि, रस्ताक कातमे ओरिया कऽ रखि‍ देलक। पाँचे-सात मिनटक पछाइत‍ गंगाराम हाटसँ घर अबैत रहए। जनमौटी बच्चाक रुदन सुनलक, एकाएक पएर अस्थिर भऽ गेलइ। बीच बाटपर ठाढ़ भऽ अवाजकेँ अकानए लगल। ई अवाज तँ कोनो जानवर-जन्तुक वा चिड़ै-चुनमुनीक तँ नइ छी! मनुखक बच्चाक बोली बुझि पड़ैए..! अकचकाइत गंगारामक मनमे उठलै, ऐठाम मनुखक बच्चाकेँ बोली भऽ केना सकैए? तहूमे केकरो देखबो ने करै छिऐ। ..बाँसक गाड़ल खुट्टा जकाँ गंगाराम बीच बाटपर ठाढ़ भऽ गेल। कनी काल ठाढ़ रहि ओ आस्ते-आस्ते बच्चा दिस पएर बढ़ौलक। झल-अन्हार रहने अधिक दूर देखबो ने करै छल। अगल-बगलक खेतसँ लऽ सौंसे बाधमे कीड़ी-मकोड़ी सभ अपन-अपन स्‍वरमे कि‍यो माए-बापकेँ हाक पाड़ैत, तँ कि‍यो अरामसँ गीत गबैत। जइसँ सौंसे बाधमे अनघोल मचल। लग पहुँच‍ गंगाराम बच्चाकेँ निहारए लगल। एक मन कहलकै- ‘ई तँ मनुखक बच्चा छी।’ लगले दोसर मन कहलकै- ‘ऐठाम बच्चा आएल केना?’ तरकारीबला झोरा दुभिपर रखि‍, दहिना हाथ बच्चाक देहपर दऽ हसोंथए लगल। देह सिहैर गेलइ। सगर देहक रोइयाँ ठाढ़ भऽ गेलइ। मुदा मनमे खुशी उपकलै। मन थीर कऽ बच्चाकेँ दुनू हाथे उठा लेलक। उठा कऽ पेटमे साटि, बामा हाथे बच्चाकेँ थाम्हि दहिना हाथे खढ़-पात पोछए लगल। बच्चा ओहिना पूर्ववते कनैत रहए। खढ़ पोछि गंगाराम कान्हपर सँ गमछा उतारि बच्चाकेँ ओइमे लपैट लेलक। तरकारीक झोरा कान्हमे टाँगि छाती लगौने बच्चाकेँ अपना ऐठाम अनलक। आँगन आबि गंगाराम हँसैत घरवालीकेँ कहलक- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलैन!” ‘बेटा देलैन’ सुनिते भुलिया अकचकाइत दौगल आबि पतिक कोरासँ अपना कोरामे बच्‍चाकेँ लैत बच्‍चा दिस निंगहारि-निंगहारि देखैत बाजल- “केतए ई बच्चा भेटल! आ-हा-हा, बच्चा तँ बड़ दीब अछि!” “हाटसँ घुमैत काल बाटपर भेटल। एकर सेवा करू। जँ अप्पन बनि कऽ आएल हएत तँ जीबे करत, नहि तँ जहिना रस्ते-रस्ते आएल तहिना चलि जाएत।” पतिक बात सुनि भुलिया मने-मन सोचए लगल, अपना तँ ने गाए अछि आ ने बकरी, जेकर दूध पिआ बच्चाकेँ पालब। अपने तँ दूध हेबे ने करत किएक तँ बुढ़ाड़ीमे सभ अंग सुखा गेल। भुलिया निराश भऽ गेल। मुदा थोड़े कालक पछाइत भुलियाकेँ आशा जगल। मनमे एलै- अपन ने छाती सुखि गेल मुदा पितियौत दियादनी तँ चिलकौर ऐछे। ..मन पड़िते भुलिया भगवानकेँ धैनवाद दैत बाजल- “जहिना भगवान सुखाएल बोनमे फूल फुलौलैन तहिना ओकर अहारोक ओरियान तँ वएह करथिन।” पचास बर्खक गंगाराम। अड़तालीस बर्खक भुलिया। मुदा जेते थेहगर गंगाराम तइसँ कम भुलिया। अड़तालीस बर्खक भुलिया साठि बर्खसँ ऊपर बुझि पड़ैत अछि‍। झुनकुट बुढ़ जकाँ। बुढ़क सभ लक्षण भुलियामे आबि गेल अछि‍, मुदा कोरामे बच्चा देख भुलियाक शरीरमे जुआनीक खून दौगए लगलै। नव उत्साह, नव-जीवन। आनन्दि‍त भऽ विह्वल होइत भुलिया पतिकेँ देखैत आ गंगाराम पत्नीकेँ। दुनूक मनमे खुशीक हिलोर उठए लगलै, पानिक गुब्बारा जकाँ खुशी मुहसँ निकलए चाहइ..। बच्चाकेँ चुप रहै दुआरे भुलिया अपन छातीमे लगा लेलक। कनी काल बच्चा छातीमे लागि‍ मुँह बन्न केलक मुदा दूध नइ भेटने फेर ओहिना कानए लगल। गंगारामक घरक बगलेमे पितियौत भाए-रूपलालक घर। बच्चाकेँ छाती लगौने भुलिया रूपलालक आँगन पहुँचल। रूपलालक स्‍त्री-कबुतरी अपना बच्चाकेँ दूध पि‍अबैत रहए। तीन मासक बच्चा रहइ। ..भुलियाक कोरामे बच्चाकेँ कनैत देख अपना बच्चाकेँ ओछाइनपर सुता कबुतरी भुलिया कोरासँ बच्चाकेँ लैत दूध पियाबए लगल। भूखल बच्चा, हपैस-हपैस कऽ दूध पीबए लगल। बच्चाकेँ दूध पिबैत देख भुलिया कबुतरीकेँ कहलक- “भगवान तोरा सातगो बेटा औरो देथुन।” भुलियाक बातकेँ हँसीमे उड़बैत कबुतरी बाजल- “चारिए-टा मे तँ अकैछ गेलौं आ सातटा आरो पोसब पार लगत। अपन असिरवाद घुमा लौथु। जेतबे अछि तेकरे निमेड़ा होइतहीसँ बहुत हएत।” बात बदलैत कबुतरी फेर बाजल- “दीदी, बुढ़ाड़ियोमे जे हिनका बेटा भेलैन से केहेन पोरगर छैन‍‍। हि‍नके जकाँ आँखि, मुँह, नाक लगै छैन‍‍। भैया जकाँ किछु ने बुझि पड़ैए।” भुलिया- “सभ दिन तूँ एक्के रंग रहि गेलेँ। कहियो तोरा बजै-भुकैक लूरि‍ नइ भेलौ। जेठ-छोटक विचार तँ बुझबे ने करै छीही। केकरो किछु कहि दइ छीही। कोनो गत्तरमे लाज-सरम तँ छौहे नहि।” हँसैत कबुतरी तेहरौलक- “एँह दीदी, हिनका अखन की भेलैन हेन, एकटाकेँ के कहाए जे जोड़ो लगि‍ जेतैन।” कबुतरीक बातसँ भुलियाकेँ तामस नै उठइ। बच्चाक आनन्द हृदैकेँ पानि जकाँ कोमल बना देने छेलइ। बच्‍चाक उद्गार भुलियाक कोमल हृदैकेँ खोलि‍ देलक- “तोरे भैयाकेँ हाटसँ अबै काल रस्तामे ई बच्चा भेटलै।” कबुतरी- “भेटुआ बच्चाक मुँह हिनका मुहसँ किए मिलै छैन‍‍? ई हमरासँ छिपबै छैथ।” खौंझाइत भुलिया बाजल- “अच्छा हो, हमरे भेल। आब तँ मनमे सबुर भेलौ ने।” बात बदलैत कबुतरी बाजल- “दीदी, जहिना एकटा बच्चाकेँ दूध पीअबै छी तहिना अहू बच्चाकेँ दूध पिआ देबैन। कोनो कि हमरा घरमे मौसरी नै अछि जे बच्चाकेँ दूधकटू हुअ देबैन। लोकेक काज समाजमे लोककेँ होइ छै किने। हिनका अन्हार घरमे दीप जरलैन तइसँ कि हमरा खुशी नै होइए।” कबुतरीक बात सुनि भुलियाक मन गदगद भऽ गेल। भुखाएल बच्चाकेँ पेट भरिते निन्न आबि गेलइ। बच्चाकेँ बिछौनपर सुतबैत कबुतरी बाजल- “दीदी, बच्चाकेँ एतै रहए देथुन। राति-बि‍राति जहन‍‍ भूख लगतै, पिया देबइ।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि भुलिया अपना आँगन आबि पतिकेँ कहलक- “आब बच्चा जीबे करत। बड़ दूध गोधनपुरवालीकेँ होइ छइ। दुनू बच्चाकेँ पालि‍ लेत।” बच्चा-ले गंगारामक मन कनैत। मुदा भुलियाक बात सुनि मन हरिया गेलै मुदा शंको उठलै। बाजल- “बच्चाकेँ अपना अँगना किए ने नेने अएलौं। आन तँ आने छी।” पतिकेँ चोहटैत भुलिया कहलक- “अहाँ पुरुख छी, तँए की बुझबै जे माइक की मासचर्ज होइ छइ? से स्‍त्रीगणे बुझि सकैए। जे माए एक दिन बच्चाकेँ छातीसँ लगा लेत ओ जिनगीमे कहियो ओइ बच्चाक अधला नै सोचत।” गंगाराम चुप भऽ गेल। एकटा बात मन पड़लै। पुछलक- “अपने दुनू गोरे ने ओकर बाप-माए हेबै, तँए कोनो नाओं तँ रखि‍ देबै किने।” पतिक बात सुनि भुलियाक मनमे छठियारक दृश्य आबि गेलइ। मुस्‍कियाइत बाजल- “आन बच्चाकेँ तँ स्‍त्रीगण सभ मिलि कऽ नाओँ रखै छइ। मुदा से तँ ऐ बच्चाकेँ नइ भेल। अपने दुनू गोरे मिलि कऽ नाओं रखि‍ दियौ।” पत्नीक विचार सुनि गंगाराम बिहुँसैत बाजल- “मंगल नाओं रखि‍ दियौ।” सात मासक पछाइत‍‍ बच्चाक मुँहमे दाँतो जन्‍मए लगल आ ठाढ़ भऽ कऽ डेगा-डेगी चलौ लगल। अन्न सेहो चाटए लगल आ पानि सेहो पीबए लगल। बच्चाक सिनेह एते अधिक दुनू परानी-गंगारामक हृदैमे रहै जे कखनो आँखिक परोछ हुअए, से नै चाहए। भुलिया बोइन करब छोड़ि, अँगना-घरक काज सम्हारि साबेक जौड़ ओसारेपर बैस बाँटए लगल। ओकरे बेच-बेच दू पाइ कमा लइत। अपना तँ साबे नै रहै मुदा अधियापर बँटैले गाममे साबे भेटइ। दुनू परानी गंगाराम ओहन उत्‍साहित भऽ गेल जेना दस बर्ख पहिने होइत छल। भरि-भरि दिन काज करैत मुदा थाकैन बुझिए ने पड़इ। भुलियाकेँ जखन मंगल ‘माए’ कहैत तखन‍ आनन्दसँ ओ उन्मत भऽ जाए। पाँच बर्खक अवस्थामे मंगलक नाओं पिता स्कूलमे लिखा देलक। मंगल पढ़ए लगल। पाँचे किलास तक पढ़ाइ गामक स्कूलमे होइत रहइ। पँचमा तक मंगल पढ़ि लेलक। दस बर्खक भइयो गेल। मुदा दुनू परानीमे गंगारामक देह एते अब्‍बल भऽ गेलै जे काज करैले लोक अढ़ौनाइ छोड़ि देलकै। कहुना-कहुना दुनू परानी जौड़ बाँटि-बाँटि गुजर करए। जिनगी भारी लगए लगलै। मुदा दसे बर्खक मंगलमे ज्ञानक उदए कनी-मनी भऽ गेल। जहिना बच्चेमे हनुमान बाल सुरूजकेँ गीर गेल छला, तहिना। मंगल पिताकेँ कहलक- “बाबू अहाँ दुनू गोरे काज करै-जोकर  आब नइ रहलौं। हमरा मन होइए जे चाहक दोकान खोली। अपने डेढ़ियापर एकटा एकचारी बान्हि दिअ, दोकान खोलब।” गंगारामक मनमे जँचलै। मुदा चाह तँ गामक लोक पिबैत नहि, तखन‍‍ दोकान चलतै केना। मुदा तैयो एकचारी बान्हि देलक। बाड़ीमे एकटा जीमहर-गाछ रहै ओकरा पच्चीस रूपैआमे बेच, चाह बनबैक बरतन-बासन सेहो कीनि देलक। चाहक दोकान मंगल शुरू केलक। नव वस्तुक दोकान गाममे। मुदा पहिल दोकानकेँ तँ मोनोपोली होइते छइ। शुरूमे गामक लोक नव चीज पेय बुझि सि‍हन्ते पिनाइ शुरू केलक। मुदा धीरे-धीरे दोकान जमि गेल। जइसँ एतेक कमाइ हुअ लगलै जे कहुना-कहुना गुजर चलि‍ जाइ। तीन साल बितैत-बितैत दुनू परानी गंगाराम मरि गेल। जाधैर गंगाराम जीबै छला ताधैर गाममे मंगलक प्रति केकरो कोनो तरहक घृणा नै छेलै मुदा गंगारामक मरला पछाइत‍‍ लोकमे घृणा जागए लगलै। मुदा तैयो दोकानक बिकरीमे कमी नै एलै, किएक तँ समाजक लोक चाह-पानि पीअब शुरू कऽ देने छल। चाहक दोकान केला उपरान्तो मंगलक मनमे पढ़ैक जिज्ञासा जीविते। खाइ-पीबैसँ जे पाइ उगरै ओइसँ किताब-कागत-कलम कीनि-कीनि पढ़बौ करए आ लिखबो करए। मरै काल गंगाराम मंगलकेँ जन्‍मक इतिहास सुना देने रहथि‍न। जइसँ समाजक कुरीति-कुबेवस्‍था जे करमी लत्ती जकाँ छाड़ने अछि,ओइ बिन्दुपर मंगलक नजैर पहुँच‍ गेल छेलइ। तँए किताबक अध्ययनक संग-संग समाजक बेवहारक अध्ययन सेहो करए लगल। मंगल चाहक दोकान चलबैत तँए दस गोरे संग गप-सप्‍प करैक लूरि‍ सेहो सीखि लेलक। तेतबे नहि, साँझू-पहर, जखन एक झोँक चाहक बिकरी खूब होइ, तेकर पछाइत, जखन गहिंकी पतरा जाइ तँ‍ रूपचन मंगलक दोकानपर अबइ। अबिते दू गिलास चाह पिया मंगल रूपचनक दिमाग साफ कऽ दइ। रूपचन गामक खिसक्कर। मुदा बड़ गरीब। दू-चारिटा पछुएलहा गहिंकियो रहै, तैबीच रूपचन पुरना खिस्सा उठबै। एक घन्‍टा, दू घन्‍टा, तीन-तीन घन्‍टा तक रूपचन खिस्सा मंगलकेँ सुनबै। खिस्सा सभ दिन बदैल-बदैल कऽ कहइ। कहियो राजा-रानी, तँ कहियो रानी-सरंगा, तँ कहियो रजनी-सजनीक। तहिना कहियो गोनू झाक, तँ कहियो डाकक, कहियो अल्हा-रुदलक, तँ कहियो दीना-भदरीक, कहियो लोरिक, तँ कहियो सलहेसक। ऐ तरहेँ मंगलक बुधि‍क बखाड़ीमे किताबक ज्ञान, समाजक ज्ञान आ खिस्साक ज्ञान जमा हुअ लगलै। रातिमे जे खिस्सा सुनै ओ दिनमे जखन‍ समए भेटै, लिखि लिअए। लिखैत-लिखैत पाँति सेहो सोझ-साझ हुअ लगलै आ जिज्ञासो बढ़ए लगलै। एक दिन बेर टगैत एक गोरे मंगलक ऐठाम चाह पीबए आएल। देह-दशासँ बिल्कुल साधारण। हाथमे एकटा चमड़ाक बैग रहइ। ओ आदमी “भारत जागरण” पत्रिकाक सम्पादक छला। गामक दशा-दिशाक अध्ययन करैले गाम दिस आएल रहैथ। ..मंगलसँ गप-सप्‍प करैत ओ सम्पादक जेना हेरा गेला। उन्मत्त भऽ गेला। जेना मंगलक हृदए आ सम्पादकक हृदए एकठाम भऽ केतौ सफरमे निकैल गेल हुअए, तहिना। भक्क टुटिते दुनू गोरे हँसए लगला। सम्पादक कहलखिन- “बौआ, चाह बनाउ। पहिने चाह पीअब अखन धरि नै पीने छेलौं। आइ हम रहब, निचेनसँ गप-सप्‍प करब।” मंगल चाह बनबए लगल। चाह बना दुनू गोरे पीलैन‍। खेला-पीला पछाइत‍‍, रातिमे दुनू गोरे एक्के बिछानपर बैस गप-सप्‍प करए लगला। जे किछु खिस्सा-पिहानी मंगल लिखने छल ओ हुनका आगूमे रखि‍ देलकैन‍। उनटा-पुनटा सम्पादकजी देखए लगला। भाषा-शैली तँ नइ जँचलैन मुदा विषय-वस्तु हृदैकेँ पकैड़ लेलकैन...। हँसैत सम्‍पादक बजला- “बड़ सुन्दर वस्तु सभ अछि। एकरे तकैले हम आएल छी।” कहि बैग खोलि किछु पत्रिका आ किछु किताब दैत कहलखिन- “ऐमे लिखैक तौर-तरीका निर्धारित कएल अछि। एकरा ठीकसँ पढ़ि जे अधार निर्धारित अछि, ओइ अधारपर लिखब। हम सम्पादक छी। मासिक पत्रिका चलबै छी। अहाँक एक-एक कथा सभ मासक पत्रिकामे छापब आ एक कॉपी अहूँकेँ पठा देल करब।” तीन-चारि घन्‍टा धरि सम्पादकजी मंगलकेँ बुझबैत रहलखिन। भोरे सुति उठि चाह पीब सम्‍पादक चलि गेला। मंगलक कथा पत्रिकामे मासे-मास छापए लगल। मंगलक अनेको पाठकमे एकटा लड़की सेहो। नाओं सुनयना। दर्शन शास्‍त्रसँ एम.ए.मे पढ़ैत। पाँचम मासक पत्रिकामे सम्पादकजी मंगलक परिचए-मे एकटा उपन्यासक चर्चा सेहो कऽ देलखिन, नाओं छेलै “मरल गाम”। सुनयनाक पिता ओकील। सुनयनाक मन “मरल गाम” नाओं पढ़ि नाचए लगल। मनमे आबए लगलै, हमर देश तँ गामक देश छी। जहन‍‍ गामे मरल अछि तहन‍‍ देशकेँ की कहबै? ..ई विचार सुनयनाक मनमे उड़ी-बीड़ी लगा देलक। जे सुनयना, पिताक सोझाँमे भरि मुँह कहि‍यो बजैत नहि, ओ सुनयना आइ पितासँ डिस्कस करैले तैयार भऽ गेल। कोर्टसँ आबि ओकील साहैब चाह पीब टहलैले गेला। टहैल-बूलि कऽ दोसर साँझमे आबि कौल्हुका केसक तैयारी-ले फाइल निकाललैन। पत्नी चाह आनि कऽ देलखिन। चाह पीब, पान खा फाइल खोलैत रहैथ कि सुनयना आबि कऽ आगूक कुरसीपर बैसते कहलकैन- “बाबूजी, एकटा सवाल मनमे घुरिया रहल अछि। ओ कनी बुझा दिअ?” “की?” “आइ पत्रिकामे पढ़ने छेलौं जे सचमुच गाम मरल अछि। जँ गामे मरल अछि, आ देश गामक छी, तखन देशकेँ की कहबै?” सुनयनाक प्रश्‍नक गंभीरतापर नजैर नइ दऽ ओकील साहैब बजला- “ई साहित्यकार सबहक समझ छिऐन, तँए ऐ पर किछु नै कहि सकै छिअ।” “साहित्यकारो तँ अही समाजक लोक होइ छैथ। हुनको आने लोक जकाँ जिनगी छैन‍। तहन‍‍ ओ एहेन विचार किए लिखलैन?” “साहित्यकारक बात साहित्यकारे बुझि सकै छैथ। हम तँ ओकील छी, कानूनक बात बुझै छिऐ। अखन तूँ जा, हम एकटा केसक तैयारी करब।” सुनयना उठि कऽ चलि गेल। अपना कोठरीमे बैस कऽ विचार करए लगल। जइ देशक गाममे ने पानि पीबैक ओरियान छै, ने खाइले सभकेँ संतुलित भोजन भेटै छै, ने भरि देह कपड़ा भेटै छै आ ने रहैले घर छै, ओइ देशकेँ मरल नै कहबै तँ की कहबै? अखनो लोक सरल पानि पीबैए, कहुना किछु खा दिन कटैए, गाछक निच्चाँमे आगि तापि समए बितबैए, हजारो रंगक रोग-वियाधिसँ घेरल अछि। जइ देशक मनुखक जिनगी एहेन अछि ओइ देशकेँ की कहबै? तेतबे नहि, हजारो बर्खक मनुखक इतिहासमे जेतए अखनो धरि सरस्वतीक आगमन सभ मनुख धरि नइ भेल अछि, ओइ देशकेँ की कहबै..? ढेरो प्रश्‍न सुनयनाक आगूमे ठाढ़ भऽ मनकेँ घोर-घोर कऽ देलकै। अचेत जकाँ सुनयना कुरसीपर ओंगैठ सोचए लगल। सोचैत-विचारैत अन्‍तमे ऐ प्रश्‍नपर आबि अँटकल जे ‘मरल गाम’ केँ पहिने पढ़ब। मुदा किताब भेटत केतए? फेर मनमे एलै- लिखनिहारे लग पहुँच‍ किताबक भाँज लगाएब। ..पत्रिका निकालि सुनयना लेखकक पता पुरजीपर लिखलक। दोसर दिन सुनयना मंगलक भाँज लगबैले विदा भेल। नअ बजेक समए। भिनसुरका गहिंकीकेँ सम्हारि मंगल केतली, टोपिया,ससपेन, गिलास इत्यादिकेँ दोकानक आगूमे रखि‍, चुल्हिसँ छाउर निकालि चुल्हि निपैत रहए। सुनयना चाहक दोकानपर ऐ दुआरे पहुँचल जे ऐठामसँ सौंसे गामक लोकक भाँज लगि सकैए। ..दोकानपर पहुँच‍ सुनयना मंगलकेँ पुछलक- “ऐ गाममे ‘मंगल’ नामक एक बेकती छैथ हुनकर घर बता दिअ।” अपन नाओं सुनि मंगल चौंक गेल। मुदा चुप्पे रहल। जेना मने-मन गाममे मंगलकेँ तकैत रहए। सुनयनो सएह बुझलक। कनी काल गुम्म रहि मंगल बाजल- “बहि‍नजी, अगर मंगल ऐ गाममे हएत तँ जरूर भाँज लगा देब। मुदा अखन हमरा ऐठाम आएल छी तँए बिनु खेने-पीने केना जाएब, बैसू। ई तँ मिथिला छिऐ। जहिना घरवारी-ले स्वागत करब अनिवार्य अछि तहिना तँ अतिथो लेल...।” मंगलक बात सुनि सुनयनाक मनमे जेना पियासलकेँ शीतल पानि भेट गेने होइत तहिना भेल। बाँसक फट्ठाक बनौल ब्रेंचपर सुनयना बैस गेल। हाथ धोइ मंगल सस्पेन अखारि, चुल्हि पजारि चाह बनबए लगल। ब्रेंचपर सँ उठि सुनयना चुल्हि लग जाए चाहलक कि कुर्तीक निचला कोण फट्टीमे फँसि गेलै, जइसँ कनी फाटि गेलइ। मुदा तेकर चिन्ता नै कऽ सुनयना मंगल लग जा बैसए लगल। ..लगमे सुनयनाकेँ बैसैत देख मंगल बाजल- “मंगलसँ कोन काज अछि?” सुनयना- “मंगल साहित्यकार छैथ। हुनकर लिखल एकटा उपन्यास ‘मरल गाम’ छैन‍। ओइ पोथीक भाँज हम बजारमे लगेलौं मुदा केतौ नइ भेटल, तँए लिखिनिहारेक भाँज लगबए एलौं।” सुनयनाक बात सुनि मंगल नमहर साँस छोड़ैत बाजल- “मंगलकेँ अहाँ केना जनै छी?” सुनयना- “हुनकर लिखल कथा ‘भारत जागरण’ मे पढ़ै छी। ओइमे ‘मरल गाम’ उपन्यासक चर्चा देखलिऐ। जेकरा पढ़ैक इच्छा मनमे भेल। तँए एलौं हेन।” मंगल बुझि गेल। खुशीसँ मन ओलैर गेलइ। मनमे एलै, पियासलकेँ पानि देब ओहने आवश्यक होइए जेना भूखलकेँ अन्न। मुदा हमरा तँ एक्के कॉपी अछि जे लिखने छी। जँ ई कॉपी दऽ देबै तँ अपन साल भरिक मेहनत‍ चलि जाएत। मुदा नै देनाइ तँ आरो महा पाप हएत। फेर मनमे एलै, कहि दिऐ जे जहिया हमर दिन-दुनियाँ घुमत तहिया छपाएब, अखन एके कॉपी लिखलेहेटा अछि। हँ, छपेलापछाइत‍‍ अहुँकेँ जरूर देब। ताबे ऐठाम रहि पढ़ि लिअ। तैबीच चाह बनल। दुनू गोरे पीलक। चाह पीब सुनयना बाजल- “मंगलक भाँज लगा दिअ।” विस्‍मि‍त भऽ मंगल बाजल- “हमरे नाओं मंगल छी। हमहीं उपन्यास लिखने छी। मुदा छपौल नै अछि। खाली लिखलेहेटा अछि। तँए हम आग्रह करब जे ऐठाम रहि पढ़ि लिअ। जहिया छपाएब तहिया अहाँकेँ एक कॉपी जरूर देब।” मंगलक बात सुनि सुनयना अचम्‍भित भऽ गेल। पैरसँ माथ धरि मंगलकेँ निंगहारए लगल। ..आगिक धुआँ आ चुल्हिक कारीखसँ मंगल बेदरंग भेल। देहक वस्‍त्र परसौतीक वस्‍त्र जकाँ, सौंसे देहसँ गरीबी झक-झक करैत। मंगलक बगए देख सुनयनाक आँखि नोरा गेलइ। नोर पोछैत सुनयना बाजल- “ऐठाम रहि कऽ हम उपन्यास नै पढ़ि सकब। किएक तँ कोनो पोथी पढ़ैक मतलब होइए जे ओइ पोथीक विषय-वस्तुकेँ नीक जकाँ बुझब। से धड़-फड़मे केना सम्‍भव हएत?” सुनयनाक विचारमे गंभीरता देख मने-मन मंगल सोचए लगल। आत्माक उत्साह बढ़ए लगलै। सुनयना दिस तकलक। सुनयनाक आँखिमे पढ़ैक भूख जोर पकड़ने देखलक। मनमे एलै, हमहूँ तँ अनके-ले लिखने छी।  हँ तखन छपौलासँ हजारो हाथ जेतै मुदा अखन तँ एक्के हाथ जा रहल अछि। मनमे सबुर भेलै, कम-सँ-कम एक्कोटा पढ़निहारक हाथ तँ जाएत। तैबीच सुनयना बाजल- “जहिना हम कॉपी ऐठामसँ लऽ जाएब तहिना पढ़ला पछाइत‍‍ घुमा देब। तँए पोथी हेराइक कोनो सम्‍भावने ने अछि। ऐठाम रहि पढ़ैमे हमरो लाचारी अछि। लाचारी ई अछि जे भरि दिन तँ हम केतौ रहि सकै छी मुदा सूर्यास्तक पछाइत‍‍ घर पहुँचब अनिवार्य अछि।” मंगलक विचारमे स्‍वत: सि‍नेह एलइ। बाजल- “बड़बढ़ियाँ, हम अहाँकेँ पोथी दऽ दइ छी। आगूक बात अहाँ जानी।” हाथमे पोथी अबिते सुनयनाक मनमे खुशी एलइ। एक टकसँ पोथी देख मंगल दिस तकैत मुस्कियाए लगल। ..मने-मन मंगलो सुनयनाकेँ पढ़ैत रहल आ सुनयनो मंगलकेँ। हँसैत सुनयना विदा भऽ गेल। सुनयना एम.ए. नीक जकाँ पास केलक। नारी अधिकारक सर्मथक ओकील साहैब। मुदा मन ओतए ओझरा जाइन‍ जेतए देखैथ जे नारी खाली एक्के-आध बिन्दुपर नहि, जीवनक सभ क्षेत्रमे जकड़ल अछि। जेकरा मेटाएब धिया-पुताक खेल नहि। कठिन संघर्षसँ हएत। केतौ वैचारिक संघर्ष करए पड़त तँ केतौ बलक...। अही विचारमे ओझराएल ओकील साहैब कुरसीपर बैसल छला। साँझक समए। पत्नी चाह बनौने एलखि‍न। टेबुलपर चाह रखि, बगलक खाली कुरसीपर बैस पत्नी कहलकैन- “अपना सबहक पढ़ल-लिखल समाजक परिवारमे सुनयना अछि तँए ने, मुदा जँ एहेन बेटी किसानक घरमे रहैत तँ लोक एना उन्मुक्त रहए दइतै!” चाहक चुसकी लैत ओकील साहैब बजला- “अहाँ जे कहए चाहै छी ओ कनी खोलि कऽ बाजू।” “सुनयनाक बिआह कऽ लिअ, तहन‍‍ तँ मनोज रहत कि‍ने ओ तँ बेटा धन छी। बेटा-बेटीक बिआह करब माए-बापक अनिवार्य कर्तव्य छी।” “हमरा मनमे एकटा नव विचार अछि, ओ ई जे सुनयनाकेँ सेहो पुछि लिऐ?” सुनयनासँ पुछैक बात सुनि पत्नी ढोढ़ साँप जकाँ हनहनाइत बजली- “लोक की कहत? आइ धरि केकरा देखलिऐ जे माए-बाप बेटा-बेटीसँ पुछि कऽ बिआह करैए।” पत्नीक विचार सुनि ओकील साहैब मने-मन सोचए लगला जे नारीकेँ मात्र पुरुखे नै नारियो दाबि कऽ राखए चाहैए। अजीब घेरा-बन्‍दीमे नारी फँसल अछि। मुदा अपन विचारकेँ मनेमे रखि ओकील साहैब सुनयनाकेँ हाक पाड़लखिन। अपना कोठरीसँ निकैल सुनयना आबि कुरसीपर बैसल। बैसते सुनयना माए दिस देखए लगल। तामसे माए पति दिस तकैत...। ओकील साहैब सुनयनाकेँ कहलखि‍न- “बाउ, आब तूँ एम.ए. पास कैये लेलह। माए-बापक दायित्व होइ छै बेटा-बेटीक बिआह करब। तँए हमहूँ अपन भार उतारए चाहै छी। तोरो किछु बजैक छह?” पिताक बात सुनि सुनयनाक देहमे कँप-कँपी आबि गेल। मनमे थोड़ेक ओज सेहो। मुदा असथिरसँ बाजल- “बाबूजी, बि‍आह तँ सभ पुरुख-नारी-ले अनिवार्य प्रक्रिया छिऐ। जइसँ सृष्टिक विकास प्रक्रियामे सहयोग होइ छइ। रहल बात जे बि‍आह केहेन हुअए। अखन जे देख रहल छी ओ नब्बे-पनचानबे प्रतिशत अनमेल बिआह होइए। केतौ धनक मिलानीसँ तँ केतौ दहेजक चलैत, केतौ कुल-मुलक चलैत तँ केतौ किछु। मुदा हमरा विचारे बिआह हेबा चाही मनक मिलानीसँ। जे टिकाउए-टा नहि, आनन्दमय सेहो हएत।” सुनयनाक बात सुनि बिच्‍चेमे उत्तेजित होइत माए बजली- “बेटी, हमरा सबहक मिथिलाक परम्परा रहल अछि जे ई काज माए-बापक विचारसँ होइ नइ कि‍ बेटा-बेटीक विचारे। नहि जँ बेटा-बेटीक विचारसँ बिआह हएत तँ समाज ढनमना जाएत।” सुनयना बाजल- “बड़ सुन्नर बात कहलीही माए, मुदा परम्पराक भीतर जे दुरगुण छै ओहूपर नजैर देबए पड़तौ।” मुँहपर हाथ नेने ओकील साहैब चुप-चाप सुनैत रहैथ। सुनयना तर्कक आगू माए कमजोर पड़ैत गेली। मुदा तैयो चुप होइले तैयार नहि। सामंजस करैत ओकील साहैब सुनयनाकेँ कहलखिन- “बाउ, तूँ अप्पन विचार दएह?” सुनयना बाजल- “अहाँ खर्च केते करए चाहै छी, बाबूजी?” खर्चक नाओं सुनि ओकील साहैब चौंकला। मुदा अपनाकेँ अस्थिर करैत मद्धिम स्‍वरमे बजला- “बाउ, अप्पन की ओकाइत अछि से तहूँ जनिते छह। मुदा जे ओकाइत अछि ओइमे हम कंजूसी नइ करबह। दू भाए-बहि‍न छह,ई सम्‍पैत‍ तँ तोरे सबहक छिअ।” सुनयना बाजल- “बाबूजी, मनुख देहे आ धने पैघ नहि होइए, पैघ होइए ज्ञान आ कर्तव्यसँ। सभ स्‍त्री चाहैए जे हमर जीवन-संगी बुधियार आ कर्मठ हुअए। अखन हम अहाँकेँ अन्‍तिम निर्णए नै दऽ रहल छी मुदा एते जरूर कहब जे सोनपुरमे मंगल नामक एकटा चाहक दोकानदार अछि। ओकरा कियो ने छइ। मुदा ओकर जे काज आ बुधि‍ छै, ओ ओकरा एक दिन महान साहित्यकारक रूपमे दुनियाँक बीच आनत। अखन ओकरा गरीबी जर्जर बनेने छइ। गरीबीक जालमे ओ तेना ओझरा गेल अछि जइसँ निकलब कठिन छइ, किन्तु जँ ओकरा ओइ गरीबीक जालसँ निकालल जाए तँ ओ जरूर उगैत सुरूज जकाँ अकासमे चमकए लगत।” ओकील साहैब- “बाउ, यदि तूँ हृदैसँ ओकरा चाहै छह तँ हमरा दिससँ कोनो आपैत‍ नहि। मुदा अखन समए रहैत नीक जकाँ विचारि लएह।” सुनयना- “अनेक विषमता रहितो हमरा दुनू गोरेक बीच आत्माक समता अछि। हमहूँ नारीक सम्बन्धमे किछु लिखए चाहै छी। किएक तँ अपना ऐठाम नारीक प्रति जे अदौसँ अखन धरि अन्याय होइत रहल अछि ओ हमरा हृदैकेँ दलमलित कऽ देने अछि। दुनियाँक सुन्दरसँ सुन्दर वस्तु हमरा फि‍क्का लगि‍ रहल अछि।” ओकील साहैब- “बाउ, हम तोहर विचारकेँ मानि लेलियह। तूँ अपनेसँ जा कऽ देख आबह जे केते मदैत‍सँ मंगल उठि कऽ ठाढ़ हएत। हम ओते मदैत कऽ देब।” पिताक विचार सुनि सुनयना हँसैत अपना कोठरी दिस विदा भेल। सुनयनाक विचारपर ओकील साहैब मने-मन गौर करए लगला। मुदा पत्नीक मनक तामस आरो बढ़िते गेलैन। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 3369 दूटा पाइ हलहोरिमे फेकुओ दिल्लीक रैलीमे जाइक विचार केलक। परसू सौंझका गाड़ी सभ पकड़त। दिल्लीक लड्डूक बात फेकुआकेँ बुझल तँए खाइक मन रहइ। अवसर बुझलक, किएक तँ ने गाड़ीमे टिकट लगतै आ ने संगबेक कमी। मात्र चारि दिनक खेनाइटा अपन खर्च। ओना, गाड़ीमे लोक बेसी खाइतो नहियेँ अछि किएक तँ पेशाब-पैखानाक समस्या रहै छइ...। फेकुआ माएकेँ कहलक- “माए, परसू दिल्ली जेबौ, बटखर्चाक ओरियान कऽ दिहेँ?” माए पुछलकै- “की सभ लेबही?” “दू सेर चूड़ा लऽ कऽ डाक्टर साहैब, नागेंद्रजी चलैले कहलखिन हेन। हमरो दू सेर चूड़ा कुटि दिहेँ।” फेकुआक बातक बि‍सवास माएकेँ नइ भेलइ। मनमे एलै जे दू सेर चूड़ा तँ एक दिनमे लोक खाइए, चारि दिन केना पुरतै? ..फेर मनमे एलै, दू सेर चूड़ो आ चारि-दुना आठटा रोटियो पका कऽ दऽ देबइ। कहुना भेल तँ रोटी सिद्ध अन्न भेल। गाड़ी अबैसँ पहिनहि जुलुसक संग फेकुआ स्टेशनपर पहुँचल। जिनगीक पहिल दिन फेकुआ टेन-गाड़ीमे चढ़त। प्लेटफार्मपर भीड़ देख फेकुआक मन घबरेबो करइ आ उत्साहो जगै जे एते लोक चढ़त से हेतै आ हमरा बुते की नै चढ़ि हएत। निर्मली-सकरी बीच छोटी लाइन। गाड़ियो छोटकीए। मुदा सकरीसँ दिल्लीक गाड़ियो बड़की आ लाइनो बड़की। ..गाड़ीमे चढ़ि फेकुआ सकरी पहुँचल। दिल्लीक गाड़ी सकरीमे लगले रहइ। हाँइ-हाँइ कऽ निर्मलीक गाड़ीसँ उतैर दिल्लीवाली गाड़ीमे सभ चढ़ल। गाड़ी खुजल। ओना सकरीसँ दिल्ली जाइमे चौबीस घन्‍टा लगैत। मुदा आइ से नइ भेल, चालीस घन्‍टामे पहुँचल। मुदा चालीस घन्‍टा केना बि‍तल से फेकुआ बुझबे ने केलक। हलहोरिए-मे पहुँच‍ गेल। ने एक्को बेर खेलक आ ने पानि पीलक। मुदा तैयो भूख बुझिए ने पड़ैए। गाड़ीसँ उतरै काल फेकुआ खिड़की देने प्लेटफार्म दिस तकलक तँ जेरक-जेर सिपाहीकेँ घुमैत देखलक। मुदा फेकुआक नजैर केतौ नै अँटैक मोटका सिपाहीपर अँटकल। ओकर मनही पेटपर नजैर गेलइ। तैपर सँ छह आँगुर चाकर ललका बेल्टपर सेहो। जे बेर-बेर निच्चाँ ससरैत। चानि‍पर सँ पसीनाक टघार। दस किलोक बन्दुक कान्हमे लटकल। मुदा तखने डाक्‍टर साहैबकेँ अपन छबो संगीक संग हाथसँ सभकेँ उतरैक इशारा दैत देखलक। देखते धड़फड़ा कऽ फेकुओ उतरल। प्लेटफार्म टपि जहाँ फेकुआ मोसाफिर खाना प्रवेश करए लगल कि ममियौत भायपर नजैर गेलइ। ममियौत भाय- रतना चरिपहिया गाड़ीक ड्राइवर। अपना मालिककेँ गाड़ी पकड़बैले आएल। भायपर नजैर पड़िते फेकुआ लगमे जा गोड़ लगलक। गोड़ लगि लालकिला मैदान दिसक रस्ता धेलक। पाछूसँ झटैक कऽ आगू बढ़ि रतना फेकुआसँ घरक कुशल पुछलक। कुशलक जवाब नै दऽ फेकुआ कहलक- “काल्हि साँझ तक लालकिला मैदानमे रहब तँए ओतै अबिहह। अखन नै रूकबह।” “कनी चाहो पीब ने ले?” “नै अखन कुछो नै पीबह।” फेकुआ बढ़ि गेल। मुदा रतनाकेँ पाछू घुमैक डेगे ने उठैत। फेकुए दिस तकैत रहल। मनमे उठलै जे हो-ने-हो काल्हि भेँट नै हुअए। ओते लोकमे के केतए रहत तेकर कोन ठीक। तहूमे सौंझका बात कहलक। दिल्ली छिऐ। कोन ठीक जे बिजलीक इजोत रहतै की नहि। एते लोकमे तँ दिनोमे अन्हराएले रहत। एक्को दिन मेजमानियोँ ने करौलिऐ। गाममे दीदी सुनत तँ की कहत। ओ की कोनो दिल्लीकेँ दिल्ली बुझैत हएत, ओ तँ गामे जकाँ बुझैत हएत। जहिना गाममे सभकेँ सभ चिन्है छै तहिना। मुदा ई तँ दिल्ली छी। भाड़ाक एक कोठरीमे सोहर गौल जाइ छै आ दोसरमे कन्नारोहट होइ छै...। विचित्र स्थितिमे रतना पड़ि‍ गेल। आइ धरि रतनाक बुधि‍पर एहेन भार कहियो नै पड़ल। एकाएक मनमे एलै, कौल्हुका छुट्टी लऽ कऽ भोरे फेकुआसँ भेँट करब। भेँट भेलापर लालकिला, जामा मस्जिद देखा देबइ। दोसर दिन भोरे रतना फेकुआसँ भेँट करए विदा भेल। लालकिला मैदान पहुँचते भेँट भऽ गेलइ। भेँट होइते दुनू भाँइ गामेक बसिया रोटी खा पानि पीलक। भरि दिन संगे, रैली समाप्त कऽ दुनू गोरे डेरापर आएल। पैघ सेठक ड्राइवर रतना तँए डेरो नीक। सभ सुविधा। मुदा रतनाक डेरासँ फेकुआक मनमे खूब खुशी नइ भेलइ। मन पड़ि गेलै माइक ओ बात जे हरिदम बजैत- “अनकर पहिर कऽ साज-बाज, छीनि लेलक तँ बड़ लाज। ..अपना जएह रहए ओइसँ सबुर करी।” मुदा माइक बात फेकुआक मनमे बेसी काल नै अँटकल। किएक तँ तीन दिनसँ नहाएल नै छल। जइसँ देहमे एकोरती लज्जैत नइ बुझि पड़इ। रतनाकेँ कहलक- “भैया, पहिने हम नहेबह। बिनु नहेने मन खनहन नै हएत। ओना ओंघियो लगल अछि, तँए नहा कऽ खेबह आ भरि मन सुतबह।” फेकुआकेँ रतना बाथरूम देखा देलक। बाथरूममे बिजली जरैत, पानि चलैत...। बाथरूम देखा रतना गैस चुल्हि पजारि भानस करए लगल। ..भरि मन फेकुआ नहाएल। मन शान्त भेलइ। जहन‍‍ दिल्ली आबि गेलौं तँ किछु लइए कऽ जाएब...। रतना लग आबि बैसल। भानसमे देरी देख रतना कहलकै- “बौआ, ई दिल्ली छिऐ। ऐठाम लोक सोलह-सोलह घन्‍टा खटैए। दरमाहाक संग ओभरटाइमोक पाइ भेटै छइ। मुदा जिनगी जीबैक लूरि‍ नइ रहने सभ चलि जाइ छइ। ने गामक कर्जसँ मुक्ति होइ छै आ ने अहीठाम चैनसँ रहैए। भुतलग्गु जकाँ हरिदम बुझि पड़तौ। तोरा ऐ दुआरे कहि दइ छियौ जे तूँ अपन छोट भाए छँह।” रतनाक बात सुनि कनी काल गुम रहि फेकुआ बाजल- “भैया, तूँ सभ तरहेँ पैघ छह। जखन‍ तोरा लग छी तँ तोहीं ने हमर नीक-बेजाए बुझबहक।” फेकुआक बातसँ रतनाकेँ अपन जिम्माक भार बुझि पड़लै। बाजल- “देखही बौआ, अखन जे कहलियौ से स्टील फैक्ट्रीक स्टाफक बात कहलियौ। मुदा सभ एहने अछि सेहो बात नहि। एहनो लोक अछि जे अपन मेहनत‍ आ लूरि‍सँ गरीब रहितो अमीर बनि गेल। अपने इलाकाक ढोरबा छी। जेकरा हम तँ ढोरबे कहै छिऐ मुदा ओ ढोढ़ाइबाबू बनि गेल। जहन‍‍ गामसँ आएल तँ वौआ-ढहना कऽ चारि दिनक पछाइत‍ ऐठाम आएल, हमरा लग। ओकरा शैलूनमे नोकरी लगा देलिऐ। किछु दिन तँ काज करैमे लाज होइ। किएक तँ ओ धानुक छी। मुदा किछुए दिनक पछाइत‍ तेहेन हाथ बैस गेलै जे लौओकेँ उन्नैस करए लगल। अपनो खूब मन लगए लगलै। दरमहो बढ़ि गेलइ। तीन सालक पछाइत‍‍ जेना ओकरा ऐठामसँ मन उचैट गेलइ। सोचलक जे जहन‍‍ लूरि‍ भऽ गेल तहन‍ तँ‍ केतौ कमा कऽ खा सकै छी। से नहि तँ गामेक चौकपर दोकान खोलब। अपना जँ दू पाइ कम्मो हएत तइसँ की, समाजक उपकार तँ हेतइ। सएह केलक। ले-बलैया! गामक लोक कियो ‘ठाकुर’ तँ कियो ‘नौआ’ तँ कियो ‘हजमा’ कहए लगलै। तेतबे नहि, घरक जनिजातिकेँ ‘नौआइन’ कहए लगलै! सभसँ दुखद घटना तहन‍‍ भेलै जहन‍‍ कथा-कुटुमैती आ जातिक काजसँ अलग कएल गेलइ। मुदा ओहो कर्म-योगी। गामकेँ प्रणाम कऽ अपन परिवारक संग दिल्ली शहर चलि आएल। वाह रे वनक फूल! ऐठाम आबि कऽ अपन शैलूनक कारोबार ठाढ़ कऽ लेलक। अखन छअटा स्टाफ रखने अछि अखन। बहिनक बिआह इंजीनियरसँ केलक। हमहूँ बिआहमे रहिऐ।” फेकुआ बाजल- “हमरो कोनो लाज-सरम नै हएत। जे काजमे लगा देबह, हम पाछू नइ हटबह।” रतना- “परसू रवि छिऐ। हमरो छुट्टी रहत। ताबे दू दिन अरामे कर।” फेकुआ- “हमरा ओते सूतल नीक नै लगतह। चलि जेबह बुलैले।” रतना- “रौ बुड़िबक! गाममे लोक खिस्सा कहै छै जे फल्लाँ तेहेन काबिल छै जे एक्के पाइमे बेच लेतौ। मुदा ऐठाम सभ काबिले छइ। तँए देखबिही जे ऐठाम सभसँ पैघ कारबार मनुक्खेक खरीद-बिकरीक छइ। देहाती बुझि कोइ ठकि कऽ बेच लेतौ। कहतौ चल हवा-जहाजक नोकरी धड़ा देबौ आ चलि जेमए आन देश।” रतनाक बात सुनि फेकुआ क्षुब्ध भऽ गेल। मुदा मनमे एलै, जेना हम बेदरा रही तहिना भैया कहैए। किन्‍तु किछु बाजल नहि। दम साधि कऽ रहि गेल। तीन दिनक पछाइत‍‍ फेकुआ कपड़ा सिलाइक टेलरमे काज शुरू केलक। दू हजार रूपैआ दरमाहा। भिनसर छह बजेसँ राति नअ बजे धरिक ड्यूटी। बीचमे एक बेर अदहा घन्‍टा जलखै-ले आ एक घन्‍टा खाइ बेर छुट्टी होइ। फेकुआक मनमे उठल जे ड्यूटी तँ बीसो घन्‍टा कऽ सकै छी मुदा सुतैक जे आठ घन्‍टा छै से केना पुरत। मुदा फेर मनमे एलै, जहन‍‍ दू पाइ कमाए चाहै छी तहन‍‍ तँ सभ सुख-भोग कमबए पड़त...। दोकानमे आठटा कारीगर। आठो नोकरे। फेकुआ अनारी, तँए दोकानक झाड़-बहारसँ काज शुरू केलक। कपड़ा काटब आ सिलाइ मशीन चलाएब सेहो कनी-कनी सीखए लगल। दुइए माय-पुत फेकुआ। दस साल पहिनहि बाप मरि गेल। अपने दिल्ली धेलक आ माए गाममे। मुदा माइयो थेहगर। पुरुखे जकाँ बोनि-बुत्ता करैत। नोकरी होइते फेकुआकेँ माए मन पड़लै, माइए नहि, गामो मन पड़लै। मन पड़ल गामक स्मृति। ..माइक ममता जागि‍ फेकुआक मनकेँ खोरए लगलै। मनमे उठलै, परदेशिया परिवारमे गेँटक-गेँट कपड़ा.., राशि-राशिक चीज-बौस.., रेडियो, घड़ी, टी.भी,मोबाइल इत्यादि। केकरा नै नीक वस्तुक सि‍हन्ता होइ छइ? मुदा ओहेन सिहन्ते की जेकरा पुरबैक ओकातिये ने रहए..? दू हजार महि‍ना रूपैआक गरमी फेकुआक मनमे तरे-तर चढ़ि गेल। केना नै चढ़ैत? मुदा आमदनियेँक गरमी चढ़ल, खर्चक पानि परबे ने कएल। सोचलक जे सभसँ पहिने माएकेँ चिट्ठी लिखि जना दिऐ। आठ दिनक पछाइत‍‍ फेकुआ रतनाकेँ कहलक- “भैया, हमरा तँ लिखल-पढ़ल नै होइए। मुदा जहन‍‍ नोकरी लगि गेल तँ माएकेँ जनतब देब जरूरी अछि। किएक तँ ओकरा होइत हेतै जे केतए वौआइ-ढहनाइए।” रतनोक मनमे जँचल। वी.आइ.पी. बैगसँ पोस्ट-कार्ड निकालि रतना चिट्ठी लिखैले तैयार भेल। पुछलक- “बाज की सभ दीदीकेँ लिखबीही?” फेकुआ लिखबए लगल- स्थान- दिल्ली ता.- 05.06.2007 माए, गोड़ लगै छियौ, भगवानक दया आ तोरा सबहक असीरवादसँ तेहेन नोकरी भेटल जे कहियो मनमे नै आएल छल। दू हजार रूपैआ महि‍नाक तलब। अपना केते खर्च हएत। जे उगरत से मासे-मास पठा देबौ। बेंगबा काकाकेँ कहिऐन जे चिमनीपर जा कऽ ईंटाक दाम बुझि अबैले। पहिने घर बना लेब। अपना कलो नै छौ, सेहो गड़ा लेब। घरक आगू जे मलिकाबाक चौमास छै, ओहो कीनि लेब। तोरे फेकुआ। सात बजे भिनसर। मेघौन समए। कखनो-कखनो सुरूज देख पड़ैत आ फेर झँपा जाइत। झिहिर-झिहिर पुर्बा हवा चलैत। पान-छह गोरेक संग फेकुआक माए रामसुन्नैर धन-रोपनी करए विदा भेल। किछुए आगू बढ़लापर डाक-प्यूनकेँ देखलक। मुदा आन स्‍त्रीगण जकाँ रामसुन्नैर नहि जे दिनमे दू बेर मोबाइलसँ तीन पन्नाक चिट्ठी आ तैपर सँ जे समदिया भेटल ओकरा दिया समादो पठौत। मनमे कोनो हलचल नहि। रामसुन्नैरक आगूमे आबि हँसैत डाकप्यून कहलक- “काकी, फेकुआक चिट्ठी एलौ हेन।” कहि झोरासँ निकालि पोस्ट कार्ड देलक। छबो स्‍त्रीगण डाकप्यूनकेँ चारू भागसँ घेरि कऽ ठाढ़ भेल। ..हाथमे पोस्ट-कार्ड अबिते रामसुन्नैरक मन बिहाड़िमे उड़ैत ओइ सूखल पात जकाँ जे सरंगोलिया उठि अकासमे उड़ैत, तहिना उड़ि गेल। जिनगीक पहिल पत्र। मनमे एलै, पहिने केकरोसँ पत्र पढ़ा ली। ओना डाकप्यून लगमे सँ चलि गेल। मुदा तेकर अपसोच नइ भेलइ। किएक तँ जाधैर प्यून लगमे छल ताधैर पत्र पढ़बैक विचार मनमे आएलो नै छेलइ। फेर मनमे एलै, काज कामे नै करब। अखन खूटमे बान्हि कऽ रखि‍ लइ छी आ जहन‍‍ निचेन हएब तहन‍‍ पढ़ा लेब। सएह केलक। गोसाँइ डुमैत रामसुन्नैर निचेन भेल। निचेन होइते चिट्ठी पढ़बैले श्याम ऐठाम विदा भेल। श्यामोक घर लगे। पोस्ट-कार्ड हाथमे लऽ श्‍याम सत्यनारायण कथा जकाँ पढ़ए लगल। मुदा दोसरे पाँति‍- दू हजार रूपैआ महिना तलब- मे रामसुन्नैर ओझरा गेल। मने-मन सोचए लगल, छौड़ाकेँ घरक सोह एलइ। बुधि‍यो फुटैक उमेर भेल जाइ छइ। आब कहिया चेतन हएत। ऐगला साल तक बिआहो कैये देबइ। असगरे राकश जकाँ अँगनामे रहै छी...। मुदा रामसुन्नैरक विचार लगले बदैल गेलइ। बुदबुदाए लगल- केना लोक कहै छै जे मसोमातक बेटा दुइर भऽ जाइए। ..विचारमे डुमल रामसुन्नैर। तैबीच श्याम बाजल- “सभ बात बुझलिऐ ने काकी?” श्यामक पुछबसँ रामसुन्नैरक भक्क खुजल। बाजल- “बौआ, चिट्ठी पढ़ल भऽ गेलह। की सभ छौड़ा लिखने अछि?” काकीक मनक बात नै बुझि श्यामकेँ खौंझ उठलै। मुदा किछु बाजल नहि। चिट्ठीकेँ निच्चाँमे रखि‍ मुहजुआनीए बाजए लगल। मुदा पोस्ट-कार्डकेँ निच्चाँमे राखल देख वेचारी रामसुन्नैरकेँ भेलै जे अपने दिससँ कहैए। बिसवासे ने भेलइ। मुदा झगड़ो करब उचित नै बुझलक। किएक तँ बेटाक पहिल चिट्ठी छी तँए अशुभ बेवहार नीक नहि। दोसर दिन एकटा पोस्टकार्ड कीनि रामसुन्नैर चिट्ठी पढ़बैयो आ लिखबैयो-ले सोहन ऐठाम गेल। दुनू पोस्टकार्ड रामसुन्नैर सोहनकेँ दैत बाजल- “बौआ, पहिने पढ़ि कऽ सुना दएह। तहन‍‍ लिखियो दिहह।” पत्र पढ़ि कऽ सोहन सुना देलकै। समाचार सुनि रामसुन्नैरक मन खुशीसँ उत्साहित भऽ गेल। बाजल- “बौआ आब चिट्ठी लिखि दएह। सोहन चिट्ठी लिखए लगल- परमानपुर ता. 03.07.2007 फेकू। असीरवाद। अखन हम अपने थेहगर छी, तँए हम्मर चिन्ता जुनि कर। रहैले घरो ऐछे। एक घैल पानि स्‍कूलबला कलपर सँ लऽ अबै छी वएह भरि दिन चलैए। तँए पानियोँक दिक्कत नहियेँ अछि। नहाइले धारो आ पोखैरो ऐछे। कहियो काल बर्खोमे नहा लइ छी। तँए ऐ सभले तूँ चिन्ता किए करै छेँ! अखन खाइ-खेलाइक उमेर छौ, तँए कमा कऽ जे मन फुरौ से करिहेँ। ऐगला साल धरि अबिहेँ, बिआहो कऽ देबौ। असगरे अँगनामे नीक नै लगैए। माए, रामसुन्नैर।‍ साल बित गेल। जहिना गाममे रामसुन्नैर अपन काजमे हेराएल तहिना दिल्लीमे फेकुओ। साले भरिमे फेकुआ कपड़ा सिलाइक कारीगर बनि गेल। अपना देहक कपड़ा-लत्ता किनैत-किनैत फेकुआक सालो भरिक दरमाहा सठि गेलइ। माइक जिनगी तँ जहिनाक तहिना रहल मुदा फेकुआक जिनगीमे बदलाउ आएल। दुब्बर-दानर फेकुआ फुटि कऽ जुआन भऽ गेल। कपड़ा सिआइक लूरि‍ भेने आत्मबलो मजगूत भेलइ। मुदा गामक जिनगी आ दिल्लीक जिनगीक बीचक संघर्ष फेकुआक मनमे चलिते रहल। रवि दिन। रतनो आ फेकुओकेँ छुट्टी अछि। सुति उठि दुनू ममियौत-पिसियौत विचारलक जे साल भरिसँ बगेरी नै खेलौं, से नहि तँ आइ बगेरीए आनब। तैबीच रोडपर देखलक जे पुलिसक गाड़ी एमहरसँ-एमहर कऽ रहल छइ। दुनू भाँइकेँ कोनो भाँजे ने लगइ। कोठरीसँ निकैल रतना चाहबला लग गेल आ पुछलक तँ भाँज लगलै जे महल्लासँ एकटा जुआन लड़की आ एकटा सेठक बेटाक अपहरण रातिमे भऽ गेलइ। समाचार सुनि दुनू भाँइ डरा गेल। बगेरीक विचार छोड़ि गामक गप-सप्‍प करए लगल। रतना बाजल- “बौआ, तोरा साल लगि‍ गेलह। एक बेर गाम जा सबहक भेँट केने आबह।” गामक नाओं सुनिते फेकुआक मन उड़ि कऽ दोसर दुनियाँमे पहुँच‍ गेल। मन पड़लै- चिमनीक ईंटा.., चापाकल.., घरक आगूक चौमास...। फेकुआक मन गामक सीमानपर अँटैक गेलै, सीमानपर सँ अँगना पहुँचैक साहसे ने होइ। किएक तँ बाटेपर माएकेँ ठाढ़ भेल देखए। की कहैत हएत माए? साल भरि भऽ गेलै, ने एक्कोटा पाइ पठौलिऐ आ ने एक्को खण्ड साड़ी। कहियो काल जे अस्सक पड़ैत हएत तँ के दबाइयो आनि कऽ दैत हेतइ! पौरुकाँ जे एकटा चिट्ठी देलिऐ, तइ दिनसँ दोसर चिट्ठियो ने देलिऐ..। चिन्‍तित फेकुआ। मनमे फेर उठलै- छुच्छे चिट्ठीए लिखने की हेतइ। मने-मन बुढ़िया सरापैत हएत। कहैत हएत जे छौंड़ा ढहलेलक ढहलेले रहि गेल। मुदा हमहीं की करब। छुच्छे हाथे जेबो केना करब। टिकटो-जोकर पाइ नइए। ..चिन्ता आ सोगसँ फेकुआक मन दबा गेल। कोनो बाटे ने सुझइ। मनक भीतर बिर्ड़ो उठि गेलइ। मुदा थोड़े कालक पछाइत बिर्ड़ोक हवामे फेकुआक मन सोगक तरसँ निकलल। मनमे एलै, गाम तँ गाम छी, जैठाम लोक माघक शीतलहरी आगि तापि कऽ काटि लइए। बिनु कम्मर-सीरकक जाड़ बिता लइए, गाछ तर जेठक रौद काटि लइए। मुदा दिल्लीमे से हएत? साल भरिक कमाइ साल भरिक मौसमक अनुकूल कपड़ेमे चलि गेल! नइ लैतौं तँ सेहो नहि बनैत। लेलौं तँ गाम छुटि‍ गेल। ..जहिना घनघोर वादलक फाँटसँ सुरूजक रोशनी छिटकैत तहिना फेकुओक मनमे भेल। रतनाकेँ कहलक- “भैया, एकटा चिट्ठी लिखि दएह।” लगेमे रतनाकेँ सभ कि‍छु छेलइ। पोस्ट-कार्ड निकालि लिखैले तैयार भेल। फेकुआ लिखबए लगल- दिल्ली ता. 11.08.2008 माए, गोड़ लगै छियौ। मनमे बहुत रहल हेतौ जे हमरो बेटा दिल्लीमे नोकरी करैए। मुदा सभ हेरा गेल। खाली एक्केटा चीज बँचल जे ऐठाम- दिल्लीसँ, ओइठाम-गाम धरि जीबैक रस्ता धड़ा देत। तँए खुशी अछि। हाथ खाली अछि। गाम केना आएब? फेकुआ। चारिए दिनमे चिट्ठी माइक हाथ पहुँचल। चिट्ठी हाथमे अबिते रामसुन्नैर निंगहारि-निंगहारि देखए लगल। छौड़ा केतौ अछि जीबैत तँ अछि। बेटा धन छी। केतौ रहह। आब तँ फुटि कऽ जुआन भऽ गेल हएत। जहिना चाह-पान खा-पी बड़का लोकक धोधि फुटि जाइ छै, तहिना तँ फेकुओकेँ भेल हएत। किएक तँ ओहो ने चाह-पान खाइत-पिबैत हएत। गोराइयो गेल हएत। मोछो-दाढ़ी भऽ गेल हेतइ। जहिना भगवान घरसँ पुरुख उठा लेलैन, तहिना तँ फेर दैयो देलैन। ..जुआन बेटापर नजैर पहुँचते रामसुन्नैरक मन खुशीसँ नाचि उठल। मने-मन बुदबुदाएल‍- “दस बर्खसँ घरमे पुरुख नै छल तँए कि‍ कोनो पुरुखक घरसँ हमर घर अधला चलल। संतोषे गाछमे मेबा फड़ै छइ...।” परसुका बात मन पड़लै, चाहक दोकानपर पंडीजी कहैत रहथिन जे ऐ बेर शुरूहे अगहनसँ घन-घनौआ लगन अछि। हमहूँ फेकुआक बिआह कैये लेब। बिआह मनमे अबिते सोचलक, बहुत दिनसँ पाँच गोरेकेँ अँगनामे हाथो नै धुऐलौं, सेहो कैये लेब। समाजक भोजमे तँ नइ सकब मुदा जहाँ धरि सकरता हएत, तइमे पाछुओ नै हटब। लोक ई नै बुझै जे मसोमातक बेटाक बिआह होइ छइ। डफरा-बौसली हवागाड़ी सेहो लइए जाएब। अनका जकाँ एक ढकियाक मुँह नै पसारब। अपना बेटी-जमाए-केँ जे देत से देत। हम किए मंगयौ। जे आदमी पोसि-पालि कऽ एकटा मनुख देबे करत तेकरासँ फेर की मंगयौ? किछु ने मंगबै। लूरि‍ रहत तँ कामधेनु बना कऽ राखब नहि तँ माटिक मुरूत रहत। ..एकाएक रामसुन्नैरक नजैर चिट्ठीपर पहुँचल। पोस्ट-कार्ड निकालि हियासि-हियासि फेर देखए लगल। फुटा-फुटा करिया अक्षर तँ नइ बुझैत मुदा कृष्ण जकाँ कारी मुरूत तँ जरूर बुझि पड़इ...। चिट्ठी पढ़ाबैले रामसुन्नैर विदा भेल। अँगनासँ निकैलते मनमे उठलै, आब की कोनो पहिलुका जकाँ लोककेँ बारह बर्ख कटिया सोन्हबए पड़ै छइ। आब तँ साले भरिमे धिया-पुता भऽ जाइए। कहुना भेल तँ हमरो फेकुआ शहरे-बजारक भेल कि‍ने। ..एते बात मनमे अबिते रामसुन्नैरक मुहसँ हँसी निकलल। मुदा असगर रहनौं रामसुन्नैर जोरसँ बजैत, जेना दोसरकेँ कहैत होइ- ‘एह! फुसियहोक बेटी जुग जितलक। भाग तँ मुँह-कान नीक नइ छइ। नहि तँ जुगमे भूर करैत। बिआहक आठमे मासमे बेटी भऽ गेलइ। ई तँ धैनवाद ऐ समाजकेँ दी जे एक सूरे सभ बाजल जे सतमसुआ बच्चा छिऐ। जँ एना बिआहक बि‍दागरीमे हएत तँ केहेन होएत? मुदा ओ बच्चा सतमसुआ नहि। समाज झूठो बाजि ओकरा पालन-पोसन कऽ बँचेलक..।’ रबिक दरबज्जा लग अबिते रामसुन्नैरक नजैर चिट्ठीपर पहुँचल। रबि दरबज्जेपर बैस किछु लिखै छल। रामसुन्नैरकेँ लग अबिते रबि उठि कऽ चौकीपर बैसबैत पुछलक- “काकी फेकू भैयाक बिआह कहिया करबीही? हमहूँ बरियाती जेबौ?” रबिक बात सुनिते रामसुन्नैरक मन वृन्दावनक रास लीलापर पहुँच‍ गेल। मुदा थोड़बे काल धरि कृष्णक रास-लीला देख घुमि गेल आ चिट्ठी पढ़बो आ लिखबो-ले रबिकेँ कहलक। चिट्ठी पढ़ि कऽ रबि सुना देलक। पत्र लिखैले तैयार होइत रबि बाजल- “की सभ लिखब?” रामसुन्नैर लिखबए लगल- परमानपुर ता. 15.08.2008 बौआ फेकू। हम तोरा कमाइक कोनो आशा केने छी जे पाइ नै छौ तँ गाम केना ऐमे। केकरोसँ पैंच-खोंइच लऽ कऽ चलि आ। तीन भुरकुरी धान-गहुम रखने छी, वएह बेच कऽ दऽ देबइ। आब तहूँ चेतन भेलेँ। लोक कलंक जोड़त। हमरो आब ऐ दुनियाँमे नीक नै लगैए। तँए सोचै छी जे अपन काज जल्दी पुरा ली। अगते अगहनमे चलि अबिहेँ। ताबे कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। अखन हमहूँ थेहगर छी मुदा ऐ जिनगीक कोन ठेकान। आब ई परिवारो आ दुनियोँ तोरे सबहक ने हेतौ। समैपर चलि आ जइसँ काज बिथुत ने हौउ।” माए । माइक पत्र सुनि फेकुआ मने-मन खूब खुशी भेल। मनमे भेलै, हमरो काज ऐ दुनियाँ, ऐ समाजमे छइ। ..मुदा मनमे खुशी बेसी काल टिकलै नहि। लगले माघक कुहेस जकाँ फेकुआक बुधि‍ अन्हरा गेलइ। कोन मुँह लऽ कऽ गाम जाएब। साल भरिक कमाइ माइक हाथमे की देबइ? ई बात सत्य जे हमरा भरोसे माए नै जीबैए। मुदा हमरा ओकर कोनो दायित्व नै अछि, सेहो तँ नहि। हे भगवान कोनो गर सुझाबह। पनरहे दिनक पछाइत‍ एकटा घटना घटल। फेकुआक नोकरी छुटि गेल। ओना, नअ गोरेक संग फेकुआ काज करैत मुदा आठो पुरना कारीगर समयानुसार अपनाकेँ बदलैत नव-नव डिजानिक कपड़ा सिबैक लूरि‍ सिखैत रहए। फेकुआ अनाड़ी, तँए शुरूसँ सिलाइक काज सिखए पड़लै। साल भरिमे कहुना कऽ पुरना दिल्लीक कारीगर बनल। मुदा फैशनमे बिहाड़ि एने फेकुआ उड़ि कऽ कातमे खसल। ओना मालिकोक मनमे बेइमानी घोंसियाएल रहइ। बेइमानीक कारण छल पाइबलाक चसकल मन। एकटा अठारह बर्खक लड़की कारीगर दू हजार दरमाहामे भेँट गेलइ...। सबा बर्खसँ शहरमे रहैत-रहैत फेकुओक सूतल बुधि‍ जागि‍ कऽ करोट लिअ लगलै। जइसँ आत्मबलोक जन्‍म भऽ चुकल छेलइ।मुदा खिच्चा। सक्कत बनियेँ रहल छेलइ। जहिना मालिक नोकरीसँ हटैक बात कहलकै तहिना फेकुओ हिसाब मंगलक। हिसाब लऽ फेकुआ डेरा विदा भेल। पाइ रहबे करइ। रस्तेमे कॉफी पीब डेरा आएल। डेरा आबि पंखा खोलि पलंगपर ओंघरा गेल। ओंघराइते मनमे आबए लगलै- ई शहर छी, गाम नहि। शहरमे जइ तेजीसँ मशीन, फैशन आ जीवन-शैली बदैल रहल अछि, ओइमे हमरा सन-सन मुरूखक कोन बात जे पढ़लो-लिखल लोक ओंघरनियाँ देत। नवका मशीन पुरना इंजीनियरकेँ धक्का देत। पुरना बुधि‍केँ नवका बुधि‍ धक्का देत। मुदा नीक-अधला के बुझत? सभ भोग-विलासक जिनगीक पाछू आन्हर बनि गेल अछि। बाप रे! ई तँ भुमकमक लक्षण छी..! फेकुआकेँ शंका भेलै जे नोकरी छुटने भरिसक हमर माथ तँ ने चढ़ि गेल! मुदा मनकेँ असथिर केलक। ओह! अनका विषयमे अनेरे ओझराइ छी। जेकरा भोगए पड़तै ओकरा सुआस बुझि पड़ै छै, तँ हमरे की। ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना माथपर हाथ लऽ साहोर-साहोर करैए। फेर मनमे एलै, हमहूँ तँ जुड़शीतलक नढ़िये जकाँ भेल छी। एक दिस चारूभागसँ कुकुर दाँतसँ पकैड़-पकैड़ तीड़ैए तँ दोसर दिस शिकारी सभ लाठी बरिसबैए। गामक लूरि‍ सीखलौं नहि, सीखि लेलौं शहरक लूरि‍। तँ लिअ आब। क्‍विन्‍टलिया बोरामे भरि-भरि रखने जाउ! फेकुआक मन औनाए लगल। दुबट्टीए-मे हेरा गेल। तिनबटिया-चारिबट्टिया तँ बाँकीए अछि। माएपर तामस उठलै। बुदबुदाए लगल- “ई बुढ़िया गछा लेलक जे शुरूहे अगहनमे चलि अबिहेँ। कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। बिआह कैये देबौ।” एक दिस केचुआएल कनियाँक बदलैत रूप तँ दोसर दिस माइक सिनेह, समुद्रक पानि जकाँ फेकुआक मनकेँ अस्थिर कऽ देलक। सोचए लगल जे माए नीक छोड़ि कहियो अधला नै केलक आ ने कहियो सोचलक, ओकरापर आँखि उठाएब अनुचित छी। काल्हिए गाम चलि जाएब। बिआहो कैये लेब। दू गोरे ओहेन लोक एकठाम हएब जे किछु कऽ सकब...। फेकुआ दू-पाइक आशा हृदैमे समैट सौंझका गाड़ी पकैड़, तेसर दिन गाम पहुँच‍ गेल। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 3294 बोनिहारिन मरनी छोट-छीन गाम छतौनी। तीनिए जातिक लोक गाममे। साइए घरक बस्‍तियो। छेहा बोनिहारक गाम। ओना, पास-पड़ोसक गामक लोक छतौनीकेँ प्रतिष्ठित गाम नइ बुझैत, किएक तँ ओइ गाम सबहक लोकक विचारे प्रतिष्ठित गाम ओ होइत जइमे छत्तीसो जातिक लोक बसैत। जइसँ समाजक सभ तरहक जरूरतक पूर्ति गामेमे होइत। मुदा से छतौनीमे नहि, तँए छतौनी राजस्‍व गाम भऽ सकैए, प्रतिष्ठित नहि। मुदा ऐ विचारकेँ छतौनीक लोक मानैले तैयारे नहि। छतौनीक लोकक कहब जे जहियासँ हमर गाम बनल तहियासँ ने कहियो अपनामे झगड़ा-झंझट भेल आ ने मारि-पीट। जइसँ ने कहियो कियो कोट-कचहरी देखलौं आ ने थाना-बहाना। तेतबे नहि, तीनिए जातिक लोक रहितो सभ मिलि-जुलि‍ एकठाम बैस खेबो-पीबो करै छी आ तीनू जातिक तीनू देवस्थानमे पूजो-पाठ करै छी संगे परसादियो खाइ छी। तेतबे नहि, सभ जातिक लोक संगे-संग कमेबो करै छी आ एक-दोसराकेँ मौका-मोसीबत पड़लापर, संगो पुरै छी। आन-आन गामबला हमरा गामकेँ ऐ दुआरे गाम नै मानैए जे ओ सभ बहरबैया छी आ हमरा सबहक पूर्वज अदौसँ रहल अछि। छतौनीवासी सभ दिनसँ बोनिहारे नइ रहल अछि। पहिने एकरो सभकेँ अपन-अपन खेत-पथार छेलइ। खेत-पथार गेलै केना? ऐ सम्बन्धमे छतौनीक बुढ़-बुढ़ानुस लोकक कहब छैन‍, हमरा सबहक पूर्वज रौदीक चलैत खेतक बाँकी[3] राज दरभंगाकेँ समैपर नइ दऽ सकलैन, तहीसँ ओ सभ जमीन निलाम कऽ अबधिया, छपरिया हाथे बेच लेलक। हमरा सबहक जमीनक मलिकाना हक खतम भऽ गेल। अबधियो आ छपरियो राजमे नोकरी करै छेलै जे ऐ इलाकामे आबि जमीनो हथिया लेलक आ मुखियो-सरपंच बनि मैनजनी करैए। मुदा एकटा चलाकी ओ सभ जरूर केलक जे जेना अंग्रेज आबि सत्ता हथियौलक तेना चलि नइ गेल बल्‍कि मुगल जकाँ बसि गेल। जहियासँ देश अजाद भेल आ सत्ता-ले भोँट-भाँट शुरू भेल, तहिए-सँ ने एक्कोटा कोनो पार्टीक नेता भोँट मंगैले छतौनी आएल आ ने एक्को बेर गौंआँ भोँट खसौलक। किएक तँ आइ धरि छतौनीमे भोँटक बूथ बनबे ने कएल। तँए नेतो किए औत। गाममे ने चरिपहिया गाड़ी चलैक रस्ता छै आ ने सार्वजनिक जगह स्कूल-अस्पताल, जैठाम भाषण-भुषण हएत। जइ गाममे छतौनीक बूथ बनैत ओइ गामक लोक सभ छतौनियोँक भोँट खसा लइत। छतौनीक लोकक जिनगियो छोट। ने पढ़ै-लिखैक झंझट‍, ने चोर-चहारक झंझट‍ आ ने रोग-बि‍यादि‍‍क झंझट। किएक तँ गामक सभ बुझैत जे जेकरा कपारमे विद्या लिखल रहत ओ डुमियोँ-मरि कऽ पढ़िए लेत। चोर-चहार एबे कथीले करत। रोग-बियाधि-ले पूजो-पाठ आ झाड़ो-फूक ऐछे। तहूसँ पैघ बात जे, जे ऐ धरतीपर रहैले आएल अछि ओ जीबे करत। पानि, पाथर, ठनका ओकर कथी बिगाड़ि लेतइ। आ जे नै रहैबला अछि ओकरा फूलोक गाछपर साँप काटि लेतै, मरि जाएत...। तँए की, छतौनीबलाकेँ भगवानपर बिसवास नइ छइ? जरूर छइ। जँ से नै रहितै तँ देवस्थानमे सालमे एक बेर एते धुमधामसँ पूजा किए करैए? उपास किए करैए? दसनमो स्थान -देवस्थान- आ अपनो-अपनो घरमे गोसाउनिक पीड़ी किए बनौने अछि? तैसंग साले-साल कामौर लऽ कऽ बैजनाथ किए जाइए? सभ अभाव रहितो छतौनीक लोक हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैए। अगर जँ कियो गाममे मरैत वा साँप-ताँप कटैत आकि‍ आगि-छाइ लगैत तँ सभ कियो दासो-दास भऽ लगि‍ जाइत...। पचास बर्खक मरनी सेहो तइमे सँ एक। जे अपना आँखिसँ अपन पति, बेटा आ पुतोहुकेँ गाछक तरमे खून बोकैर कऽ मरैत देखने। आइ वेचारी पाँच बर्खक पोता आ आठ बर्खक पोतीक बीच आशाक संग जीब रहल अछि। कारी झामर एक हड्डा देह, ताड़-खजुरपर बनौल चिड़ैक खोंता जकाँ केश, आँगुर भरि-भरिक पीअर दाँत, फुटल घैलक कनखा जकाँ नाक, गाए-बरदक आँखि जकाँ बड़का-बड़का आँखि, साइयो चेफड़ी लगल साड़ी, दुरगमनियाँ आँगी फटला पछाइत‍‍ कहियो देहमे आँगीक नसीब नइ भेल, बिनु साया-डेढ़ियाक साड़ी पहिरने। यएह छी मरनी। चारि साल पहिने सुबध, मनोहर आ तौनकी धान रोपए बाध गेल। जाधैर तौनकीकेँ दोसर सन्तान नइ भेल ताधैर मरनीए पति आ बेटाक संग, माने सुबध आ मनोहरक संग धनरोपनी, धनकटनी, कमठौन, रब्बी-राइ उखाड़ै-काटैले संगे जाइत आ तौनकी अँगनाक काज सम्हारैत। मुदा जहन‍‍ दूटा पोता-पोती भेलै तहियासँ मरनी अँगनाक काज सम्हारए लगल। ओना, अँगनोमे कम काज नहि। भानस-भात करब, पोता-पोतीकेँ खेलाएब, खुट्टा परहक बाछीक सेवा करब इत्‍यादि। आने परिवार जकाँ मरनियोँक परिवार भरल-पूरल। दस आँटीक जोड़ा। तीन-तीन जोड़ा बीआ उखाड़ि सुबध आ मनोहर पटैपर टँगलक आ राड़ीक जुन्ना बना तौनकी बीआक बोझ बान्हि माथपर लऽ कदबा खेत पहुँचल। कदबा एक दिन पहिनहि गिरहत करा देने छेलइ। तँए तीनू गोरेक मनमे खुशी होइत रहै जे सबेर-सकाल रोपि कऽ चलि जाएब। आन दिन कदबे दुआरे अबेर भऽ जाइ छेलए। ..मने-मन सुबध सोचैत, बेरू-पहर अपनो जे कट्ठा भरिक खेत अछि, ओहो सभ तूर मिलि कऽ हाथे-पाथे रोपि लेब। कदबामे बीआ रखि‍ सुबध आड़िपर बैस तमाकुल चुनबए लगल। मनोहर आ तौनकी खेतमे बीआ पसारए लगल। सौंसे खेत बीओ पसैर गेलै आ सुबधो तमाकुल खा लेलक। तीनू गोरे एक-एक आँटी खोलि खुज्जा पसाइर एक-एक खुज्जा रोपैले बामा हाथमे लेलक। आड़िक कात पच्‍छि‍मसँ तौनकी, बीचमे मनोहर आ पूबसँ सुबध पाहि धेलक। ..एक पाँति‍ रोपि दोसर धेलक आकि पूब दिस एक चिड़की मेघ उठैत देखलक। मुदा मेघक छोट टुकड़ी देख केकरो मनमे बर्खाक शंका नै उठलै। कनी-कनी सिहकी सेहो चलए लगलै। जहिना-जहिना हवा तेज होइत जाइत, तहिना-तहिना करिया मेघक टुकड़ी सेहो उधिया-उधिया ऊपर चढ़ए लगलै। ऊपर चढ़ि-चढ़ि ओ टुकड़ी एक-दोसरमे मिलए लगल, मुदा पच्‍छि‍म दिस रौद उगलै। कनीए कालक पछाइत‍‍ सुरूज झँपा गेल। हवो तेज हुअ लगलै। बिजलोको चमकए लगलै। बुन्दा-बुन्दी पानि पड़ए लगलै। जेते मेघ सघन होइत जाइत तेते पानियोँक बून जोर पकड़ैत गेल। संगे बिजलोको बेसियाएल जाइत। थोड़बे कालक पछाइत घन-घनौआ बर्खा हुअ लगल...। पानिमे भीजै दुआरे तीनू गोरे दौग कऽ आमक गाछ लग पहुँचल। खेतसँ बीघे भरि हटि कऽ आमक गाछ। खूब झमटगर। चारि हाथ ऊपरेमे दू फेंड़ भऽ गेल। सरही आम। ..गाछक पँजरेमे पच्‍छि‍मसँ तौनकी बैसल आ पूबसँ सुबध आ मनोहर। तौनकी साड़ी ओढ़ि दुनू हाथक मुट्ठी बान्हि काँखमे लऽ लेलक। मुदा सुबध आ मनोहर छुच्‍छे देहे। गमछाक मुरेठा बान्हि लेलक। मुदा तैयो जाड़े दुनू बापूत थरथर कँपैत। नमहर-नमहर बून कखनो काल देहपर खसइ। सौंसे देहक रोइयाँ भुलैक कऽ ठाढ़ भऽ गेलइ। मुदा की करैत, कोनो उपाय नहि। पच्‍छिमो मेघ पकैड़ बरिसए लगल। जइसँ दूर-दूर धरि बर्खा हुअ लगलै। रहि-रहि कऽ मेघो गरजै आ बिजलोको चमकै। एक बेर खूब जोरसँ बिजलोका चमकलै। मुदा आन बेरक चमकसँ बिजलोकाक रंग बदलल। आन बेर पिरौंछ इजोत होइत जहन‍ कि ऐ बेर लाल टुह-टुह। दुरकाल समए देख तौनकी मने-मन खौंझा कऽ भगवानकेँ कोसैत, कोनो काजक समए होइ छइ। अखन पानिक कोन काज छइ!जहिना तगतगर लोक हरिदम बलउमकी करैए तहिना ई टिकजरौना इन्द्रो भगवान करैए! अनेरे काजकेँ बरदा जाड़े कठुअबैए! लोक सभ कहै छै जे देवता-पितरकेँ बड़का-बड़का आँखि होइ छै जे एक्केठीम बैसल-बैसल सगरे दुनियाँ देखैए। से आँखि अखन केतए चलि गेलइ। देवियो-देवता गरीबे-गुरबाकेँ जान मारै पाछू लगल रहैए! जन-बोनिहारक काज करैक दू उखड़ाहा होइए। भिनसुरका आ दुपहरिया। भिनसुरका उखड़ाहामे जँ एगारहो बजे पानि भेल वा कोनो बाधा भेल तँ गिरहत थोड़े बोइन देत। अगर जँ जलखै भऽ गेल रहलै तँ बड़बढ़ियाँ नहि तँ जलखैयो पार। यएह तँ ऐठामक चलैन अछि‍। ई टिकजरूआ भगवान गिरहतेकेँ मदैत‍ करै छइ। जाड़सँ कँपैत सुबध मनोहरकेँ कहलक- “बौआ, सोचै छेलौं जे आन दिन रोपैन करैमे अबेर भऽ जाइ छेलए जइसँ अपन काज नै सम्हरै छेल मुदा आइ सबेरे-सकाल रोपैन भऽ जाइत तँ अपनो बाड़ी रोपि लैतौं, से सभ भङैठ गेल। कखन पानि छुटत कखन नहि।” दुनू बापूत गप-सप्‍प करिते छल कि तरतरा कऽ ठनका ओही गाछपर खसल। जैठमसँ दुनू डारि फुटल छेलै तहीठामसँ चिरैत माटिमे चलि गेल। चिरा कऽ गाछ दुनू भाग खसल। एक फाँकक तरमे तौनकी आ दोसर फाँकक तरमे दुनू बापूत- सुबध-मनोहर- पड़ि गेल। पानि छुटल। सौंसे गाममे हल्ला हुअ लगलै जे बाधमे जे आमक गाछ छेलै ओ खसि पड़लै। भरिसक ओहीपर ठनका खसलै। ..एक्के-दुइए लोक देखैले जाए लगल। कातेमे ठाढ़ भऽ भऽ लोक देखैत। गाछोपर आ गाछक नि‍च्‍चाँ जमीनोपर तेते घोरन पसैर गेल जे लोक गाछक भीर जाइक हिम्मते ने करैत। मुदा जीबठ बान्हि करिया गाछक जड़ि देखैले बढ़ल। घोरन तँ खूब कटै मुदा तैयो हिम्मत करि करिया जड़ि लग पहुँचल। ठनकाबला आगिक चेन्ह ओहिना दुनू फाँकमे। ..जड़ि लग ठाढ़ भऽ करि‍या हिया-हिया देखए लगल। देखैत-देखैत मनोहरक टाँगपर नजैर पड़लै। टाँगपर नजैर पड़िते हल्ला करए लगल- “एक गोरे तरमे पिचाएल अछि! दौग कऽ अबै जाइ जा, एकरा बहार करह?” करियाक बात सुनि चारू-भरसँ लोक बढ़ल। देखैत-देखैत तीनू गोरेपर नजैर पड़लै। हल्ला करैत करिया कुरहैर आनए घर दिस दौगल। ..तीनू खून बोकैर-बोकैर मरल। मुदा तैयो सभ बँचा-बँचा कऽ डारि काटए लगल। डारि काटि शील उनटौलक तँ तीनूकेँ थकुचा-थकुचा भेल देखलक। पहिने तँ कियो नै चिन्ह सकलै, किएक तँ तीनू बेदरंग भऽ गेल। मुदा भाँज लगौलापर पता चललै जे दुनू बापूत सुबध काका छी आ पुतोहु छिऐ। अखन धरि मरनी, अँगनेमे दुनू बच्चाकेँ खेलबैत रहए। गौरिया आबि कऽ कहलकै- “दादी, तोरे अँगनाक सभ गाछक तरमे दबि कऽ मरि गेलौ।” गौरियाक बात सुनिते मरनी अचेत भऽ खसि पड़ल। दुनू बच्चो चिचियाए लगलै। मरनीकेँ अचेत देख अलोधनी मुँहपर पानि छीटि बीऐन होंकए लगलै। कनीए कालक पछाइत‍‍ होश भेलइ। होशमे अबिते मरनी फेर बपहारि काटए लगल। बच्चाकेँ कोरामे लऽ अलोधनीक संग मरनी देखैले विदा भेल। गाछ लग पहुँचते तीनू गोरेकेँ मुइल देख मरनी ओंघरनियाँ काटए लगल। ओंघरनियाँ कटैत देख करिया पँजिया कऽ पकैड़ मरनीकेँ कात लऽ गेल। मरनीक दशा देख सभ बोल-भरोस दिअ लगलै। मुदा मरनीक करेज थीरे ने होइ! विचित्र स्थितिमे पड़ल। एक दिस परिवारकेँ नाश होइत देखए तँ दोसर दिस दुनू बच्चाक मुँह। बच्‍चाक मुँह देख कनी-मनी आशा मनमे जगए लगलै। चारि साल पहिलुका नहि, अखुनका बदलल मरनी, नव मरनी। जहिना आगिमे तपैसँ पहिने सोनाक जे रंग रहैत आ तपलापर जहिना चमैक उठैत तहिना। ओना समाजोक बेवहार जे पहिलुका छेलै अहूमे बदलाउ एलइ। कियो खाइक बौस दऽ जाइत तँ कियो बच्चो आ मरनियोँ-ले नुआ-बस्तर। जहन‍‍ केकरो भाँजमे कोनो काज अबै तँ ओ मरनियोकेँ संग कऽ लइत। जहिना परिवारमे बुढ़ आ बच्चाक प्रति जे सिनेह होइत, ओहने सिनेह मरनीक प्रति समाजोक बीच हुअ लगल। अपनो जीबैक आशा आ बच्चोक, मरनीकेँ नव स्फूर्ति पैदा केलक। एते दिन मरनीक हाथमे पुरने खेतीक औजारटा रहै छल मुदा आब ओ बढ़ि कऽ दोबर भऽ गेल। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, कोदारिक संग-संग हथौरी, गैंचा सेहो आबि गेल। समए आगू बढ़ल। देशक विकासक गति सेहो, बहुत तेज नहि मुदा किछु गति तँ जरूर पकड़लक। गाम-गाममे बान्ह-सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल-अस्पताल सेहो बनए लगल। जइसँ खेतीहरो बोनिहारक काज बढ़ल। मरनियोँ छिट्टामे माटि उघब, पजेबा उघब, गिट्टी फोरब, सुरखी कुटब सीखि लेलक। जइसँ बेकारी मेटाए लगलै। रोज कमेनाइ रोज खेनाइ धरि गरीबो लोक आबि‍ गेल। भलेँ जिनगीमे बहुत अधिक उन्नैत नइ एलै मुदा जीबैक आशा जरूर जगलै। ओना, सभ काज छतौनीमे नहि, पास-पड़ोसक आन-आन गाममे। जइमे छतौनियोँक बोनिहार सभ काज करए लगल। छतौनियोँक दिन घुमलै। सात किलोमीटर पक्की सड़क जे एन.एच.सँ लऽ कऽ रेलबे स्टेशनकेँ जोड़ैत, छतौनीए होइत बनब शुरू भेल। जहिए-सँ “प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना” छतौनी होइत बनैक चर्चा भेल तहिए-सँ छतौनीक लोकक मनमे खुशी आबए लगलै। गामक लोकक तँ ओहेन दशा नहि जे बस-ट्रक किनैक विचार करि‍तए। मुदा तैयो एते जरूर भेलै जे बरसातमे जे घरसँ बहराएब कठिन छेलै ओ समस्‍या आब नइ रहतै। ओना, किछु गोरेक मनमे ई बात जरूर उठै जे एते दिन बिनु जूत्तो-चप्पलसँ काज चलै छेलए, मुदा आब से नै चलत। आड़ि-धुर-माटिपर चललासँ, बेसीसँ बेसी काँट-कुश गड़ै छल मुदा पीच भेने शीशाक टुकड़ी, लोहाक टुकड़ी सेहो गड़त। जइसँ पैरक नोकसान बेसी हएत। मुदा फेर मनमे अबै, एते दिन कम आमदनी रहने जुत्ता-चप्पल नै कीनि पबै छेलौं से आब थोड़े हएत। नइ बेसी तँ एक्को जोड़ा जरूरे कीनि लेब। जइसँ पैरमे बेमाए-ओ ने फटत। प्रधानमंत्री योजनाक सड़क बनए लगल। मुदा जेते आशा बोनिहारक मनमे छेलै तेते नइ भेलइ। किएक तँ माटिक काज शुरू होइते रंग-बिरंगक गाड़ी सभ पहुँचए लगलै। जे माटिक काज बोनिहार करैत ओ टेक्टर करए लगलै। ओना काजक गति तेज रहै, मुदा बोनिहारक बेकारी बरकरारे रहलै। सड़कपर माटि पड़िते रौलर आबि सेरियाबए लगल। खेनाइ-पिनाइ छोड़ि धियो-पुतो आ जनिजातियो सभ भरि-भरि दिन देखते रहैत। ओना बुढ़ो-बुढ़ानुस देखैत मुदा घरक चिन्ता घिंच कऽ काज दिस लऽ जाइत। पनरहे दिनमे सातो किलोमीटर सड़कपर माटिक काज सम्पन्न भऽ गेल। एकदम चिक्कन, उज्जर धप-धप, घरसँ ऊँच सड़क बनि गेल। माटिक सड़क बनिते बड़का-बड़का ट्रक चिमनीसँ ईटा खसबए लगल। एह, अजीब-अजीब ट्रको सभ। एते दिन छह-पहिए ट्रकटा गामक लोक देखने मुदा ई सड़क बनने दस पहियासँ लऽ कऽ अठारह-अठारह पहियाबला ट्रक सेहो लोक देखलक। तीनिए दिनमे सातो किलोमीटरक ईंटा खसा देलक। मुदा ईंटा पसारैक काज तँ इंजन नै करत। ओ तँ लोके करत। मुदा ओइले तँ अनुभवी माने एक्सपर्ट लोकक जरूरत हएत। जे छतौनीमे नहि। तँए बाहरेसँ अनुभवी मि‍स्‍त्री औत। ओना, तेहेन बड़का ठीकेदार सड़क बनबैत जे अनेको सड़कक काज एक संग चलबैत। एक्के दिन तेते अनुभवी मि‍स्‍त्री ईंटा पसारैले आएल जे सभकेँ बुझि पड़लै जे दुइए दिनमे सातो किलोमीटर ईंटा पसाइर देत। मुदा ईंटा उघैले तँ मजदूर चाही। पहिल दिन छतौनी गामक बोनिहारकेँ काज भेटलै। ईंटा पसरए लगल। धुरझार काज चलए लगलै। छतौनीक सभ बोनिहार खुशीसँ काज करए लगल। तैबीच ईंटापर पसारैले फुटलाहा ईंटा सेहो ट्रकसँ आबए लगल। दोहरी काज देख छतौनीक बोनिहारक मन खुशीसँ नाचए लगलै। किएक तँ गिट्टी फोड़ैले गामेक बोनिहारकेँ काज भेटतै किने। मुदा ठीकेदारक मुनसी, अपने खाइ-पीबै दुआरे सस्ते दरसँ गिट्टी फोड़ैक रेट लगा देलक। एक टेक्टर पजेबा फोड़ैक दर साठिए रूपैआ दइले तैयार भेल। एक-दू दिन तँ बोनिहार सभ गिट्टी फोरब बन्न केलक मुदा पेटक आगि मजबुरन सभकेँ लऽ गेलइ। मरनी सेहो गिट्टी फोड़ए लगल। एक टेक्टर गिट्टी फोड़ैमे वेचारीकेँ चारि दिन लगैत, मुदा की करैत। ऐ सड़कसँ पहिने जे सड़क बनै ओ रियाइत-खियाइत रहि जाइ। माटिक काज भेलापर साल-दू-साल ईंटा बैसैमे लगइ। जइसँ माटि ढहि-ढ़ुहि कऽ उबड़-खाबड़ बनि जाइ। बड़का-बड़का खाधि सड़कपर बनि जाइ। तहूमे तीन नम्‍मर पजेबा फुटि-भाँगि कऽ गरदा बनि जाइत रहइ। गामक धियो-पुतो उठा-उठा खेत-पथारमे फेक दइत। तेतबे नहि, कोठीक गोड़ा बनबैले स्‍त्रीगण सभ निकहा ईंटा उठा-उठा लऽ जाइत। मुदा ऐ बेर से नै हएत। दुइए मासमे सड़क बनबैक शर्त ठीकेदारकेँ छइ। जाबे बर्खा खसत-खसत ताबे सड़क बनि जाइक छइ। पचास बर्खक मरनी जे देखैमे झुनकुट बुढ़ बुझि पड़ैत। सौंसे देहक हड्डी झक-झक करइ। खपटा जकाँ मुँह। खैनी खाइत-खाइत ऐगला चारू दाँत टुटल। गांगी-जमुनी केश हवामे फहराइत। तहूमे सड़कक गरदासँ सभ दिन नहाइत। मुदा तैयो मरनी अपन आँखि बँचौने रहैत। जखन‍‍ पुर्बा हवा बहै तँ पच्‍छि‍म-मुहेँ घुमि कऽ गिट्टी फोड़ए लगैत आ जखन‍‍ पछबा बहैत तँ पूब-मुहेँ घुमि जाइत। बीच-बीचमे सुसताइयो लैत आ खैनी सेहो खा लइत। मुदा तैयो मरनीक मुँह कखनो मलिन नै होइ। किएक तँ हृदैमे अदम्य साहस आ मनमे असीम बिसवास हरिदम बनल रहइ। तँए हरिदम हँसिते रहए। भिनसुरके उखड़ाहा। करीब नअ बजैत। पूब-मुहेँ घुमि मरनी गिट्टी फोडै़त रहए। तैबीच पच्चीस-तीस बर्खक सुगिया माथ उघारने,छपुआ बनारसी साड़ी आ ओही रंगक आँगी पहिरने, घुमौआ केश सीटि जुट्टी लटकौने, मोजा लगा कऽ एँड़ीदार चप्पल पहिरने, मुँहमे पान-साए नम्‍मर पत्ती देल पान खेने, प्‍लोथि‍नमे नूनक पौकेट, करूतेलक शीशी, मसल्लाक पुड़िया आ साबुन रखि‍ हाथमे लटकौने आबि कऽ मरनीक लग ठाढ़ भऽ मरनीक मेहनत‍ आ बगए देख दिल खोलि मने-मन हँसए लगल। ..मरनी गिट्टी फोड़ैमे मस्त, किएक किम्हरो ताकत। ..सुगियाक हृदैक खुशी मुहसँ हँसी होइत निकलए चाहैत, मुदा मुँहक पानक पीत ठोरक फाटककेँ बन्न केने, तँए पानक पीत फेकब सुगियाकेँ जरूरी भेलइ। जइ पजेबाक ढेरीपर बैस मरनी गिट्टी बनबैत रहए ओही ढेरीपर सुगिया अपन भरल मुँहक पीत फेक देलक। पीतक दू-चारि बून मरनीक देहोपर पड़लै। देहपर पड़िते ओ उनैट कऽ तकलक। टटका पीत चक-चक करैत। कनडेरिये आँखिए मरनी सुगियाक मुँह दिस तकलक। सुगियाकेँ पान चिबबैत देख मरनीक मनमे आगि पजैर‍ गेलइ। पजेबाक ढेरीपर सेहो नजैर पड़लै, सौंसे थूक पड़ल देलखल। आब केना गिट्टी फोरब, ढेरियो आ देहो अँइठ कऽ देलक! ..आँखि गुड़ैर कऽ मरनी सुगियाकेँ कहलक- “गइ रनडिया, तोरा सुझलौ नै जे ढेरीपर थूक फेकलेँ?” गरीब मरनीक कटाह बात सुनि सुगिया तमैक कऽ उत्तर देलक- “तोरे बान्ह छियौ जे हम थूक नै फेकब।” सुगियाक बोलकेँ दबैत मरनी बाजल- “एतेटा बान्ह छै, तइमे तोरा केतौ थूक फेकैक जगह नइ भेटलौ जे ऐठाम फेकलेँ।” सुगिया- “जदी एतै फेकलिऐ तँ तूँ हमर की करमेँ?” मरनी- “की करबौ। आँइ गइ निरलज्जी, तोरा लाज होइ छौ जे सात पुरखाकेँ नाक-कान कटौलही। जेहने कुल-खनदान रहतौ तेहने ने चालि‍ चलमेँ।” सुगिया- “अपन देह-दशा नइ देखै छीही!” मरनी- “की देखबै। ई देह बोनिहारनिक छिऐ। तोरा जकाँ की हम कहियो बमैबला छौड़ा सेने तँ कहियो डिल्लीबला छौड़ा सेने वौआइ छी। एक चुरूक पानिमे डुमि कऽ मरि जेमे से नइ, तीमन चिक्खी नहितन..! जहिना सात घरक तीमन चिक्खै छँए तहिना सातटा मुनसा देखै छँए। हमर परतर सातो जिनगीमे हेतौ? जेकरा संगे बाप हाथ पकड़ा देलक, सहि-मरि कऽ तइ घरमे छी। छुछुनैर कहीं-के! आगि लगा-ले ऐ फुललाहा देहमे..!” मरनीक बातसँ सुगिया सहैम गेल। मनमे डर पैस गेलै जे हो-ने-हो कहीं मारबो ने करए। मुँह सकुचबैत मुड़ी गोंति विदा भेल। ..सुगियाकेँ जाइत देख मरनी साड़ीक खूटसँ तमाकुल-चुन निकालि चुनबए लगल। मुदा तैयो मन असथिर नइ भेलइ। मुड़ी उठा-उठा सुगियो दिस देखै आ मने-मन बजबो करए- “देह केहेन सीटने अछि, उढ़ड़ी। जेना रजा-महराजाक बौह हुअए! हाथ-पैरमे लुलही पकड़ने छैन‍‍ जे कमा कऽ खेती। जेहने छुछुनैर छौड़ा सभ तेहने छौड़ी सभ।” तमाकुल खा मरनी ईंटा फोडै़ले घुमल कि दादी-दादी करैत पोता दौगल आबि दुनू हाथे दुनू कान्‍ह पकैड़ पीट्ठीपर लटैक गेल। पाछूसँ पोतियो एलइ। पोताकेँ कोरामे उठा मुँहमे चुम्मा लऽ पोतीकेँ कहलक- “दाइ, बौआकेँ रोटी नै देलही। दुनू गोरे चलि जाउ, मोरामे रोटी रखने छी, लऽ कऽ दुनू गोरे खा लेब। हम अखन काज करै छी। कनी कालमे आबि कऽ भानस करब।” पोता-पोती, आँगन दिस विदा भेल। पूब-मुहेँ घुमि कऽ मरनी गिट्टी फोड़ए लगल। चारिटा बन्दूकधारी बड्डी-गार्डक संग सड़कक ठीकेदार उत्तरसँ दच्‍छिन-मुहेँ सड़क देखैत जाइ छला। आगू-आगू ठीकेदार पाछू-पाछू बन्दूकधारी। ठिकेदारक नजैर मरनीपर पड़लैन‍। मरनीपर नजैर पड़िते ठिकेदारक डेग छोट हुअ लगलैन‍। ठिकेदारक आँखि मरनीपर अँटैक गेलैन‍। डेग तँ आगू-मुहेँ बढ़बैत रहैथ मुदा आँखिक ज्योति हृदैमे ढुकि कऽ हड़बड़बए लगलैन‍। मनमे जेना अन्हड़-तूफान उठए लगलैन‍। जइसँ मने-मन विचारए लगल जे जेकरा कमाइपर हमरा चारिटा बड्डी गार्ड अछि, करोड़ो-अरबोक आमदनी अछि, तेकर ई दशा! ओ तँ हमर ओहेन समांग जे कमासुत अछि, ओहेन तँ नहि जे ऐश-मौजक जिनगी बना कमेलहे सम्‍पैत‍केँ भोगैए। मुदा अँटकला नहि। आगू-मुहेँ बढ़िते रहला। किछु दूर आगू बढ़लापर जेना मरनीक आत्मा आगूसँ रोकि देलकैन तहिना बि‍च्‍चे सड़कपर ठीकेदार ठाढ़ भऽ गेला। ठाढ़ भऽ एकटा सिपाहीकेँ अढ़ेलखि‍न- “ओइ गिट्टी फोड़निहारिकेँ कनी बजौने आउ?” ठीकेदारक बात सुनि एकटा सिपाही मरनी दिस बढ़ल। मरनी लग जा कहलक- “मालिक बजबै छथुन, चलही?” गिट्टी फोरब छोड़ि मरनी उनैट कऽ सिपाही दिस तकलक। सिपाहीकेँ देख मने-मन सोचए लगल,‍ ने हम कोनो ममिलामे फँसल छी आ ने कोनो बैंकक करजा नेने छिऐ, तहन‍‍ किए हमरा सिपाही बजबैए...। मन सक्कत करि मरनी बाजल- “तूँ नै देखै छहक जे अखन हम काज करै छी। जेकर बोइन लेबै ओकर काज नै करबै। अखन जा। काजक बेर उनैह जेतै तब एबह।” मरनीक बात सिपाहियो आ ठीकेदारो सुनलैन। एक-दोसरकेँ देख आँखि निच्चाँ कऽ लेलैथ। ठीकेदारक मन पीपरक पात जकाँ डोलए लगलैन‍। कखनो मरनीक इमानदारीपर तँ कखनो ओकर अवस्थापर। जइ देशक श्रमिक श्रममे एते बिसवास करैए ओइ देशक विकास जँ बाधित अछि तँ जरूर केतौ-ने-केतौ संचालनकर्तामे बेइमानी छइ। ई बात मनमे अबिते ठीकेदार अपना दिस घुमि कऽ तकला तँ अपन दोख सामनेमे आबि ठाढ़ भऽ गेलैन‍। सिपाही कड़ैक कऽ मरनीकेँ कहलक- “नै जेबही तँ पकैड़ कऽ लऽ जेबौ?” सिपाहीक गर्म बोली सुनि मरनी बाजल- “तोहर हम कोनो करजा खेने छिअ जे पकैड़ कऽ लऽ जेबह। अपन सुखलो हड्डीकेँ धुनै छी, खाइ छी।” मरनीक बात सुनि सिपाहियोक मन उनटए-पुनटए लगलै। एक दिस मालिकक आदेश दोसर दिस मरनीक विचार। आखिर, एहेन लोकक बीच एहेन सक्कत विचार अबैक कारण की अछि? अनका देखै छिऐ जे खाली सिपाहीक वर्दी देख डेरा जाइए, भलेँ ओ सरकारक सिपाही नहियोँ रहए। मुदा हमरा तँ सभ कि‍छु अछि तैयो ऐ बुढ़ियाकेँ डर नै होइ छइ। ..फेर मनमे एलै, हम किछु छी तँ नोकर छी मुदा ई किछु अछि तँ स्वतंत्र बोनिहारिन। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र श्रमिक। जे देशक अधार छी। आखिर देश तँ एकरो सबहक छिऐ। सिपाहीकेँ ठाढ़ देख ठीकेदारे पाछू ससैर कऽ मरनी लग एला। मरनियोँ सभकेँ देखैत आ मरनियोकेँ सभ। ठीकेदार मरनीक आँखिपर अपन नजैर देलैन। नजैर पड़िते मरनीक आँखिमे सुरूजक रोशनी जकाँ प्रखर ज्योति देलखलैन। ललाटसँ आत्म-बिसवास छिटकैत देलखैन। ..मधुर स्वरमे ठीकेदार पुछलखि‍न- “चाची, अहाँक परिवारमे के सभ छैथ?” ठिकेदारक प्रश्‍न सुनि मरनीक आँखिसँ नोर खसए लगल। मन पड़ि गेलै अपन पति, बेटा आ पुतोहुक मृत्यु। टघरैत नोरकेँ आँचरसँ पोछि बाजल- “बौआ, हमर घरबला, बेटा आ पुतोहु ठनकामे मरि गेल। अपने छी आ पिलुआ जकाँ दूटा पोता-पोती अछि।” “बच्चा सभ स्कूलो जाइए?” “नहि। एक तँ गाममे स्‍कूल नइ छइ। तहूमे पहिने गरीब लोकक धिया-पुताकेँ पेट भरतै तब ने जाएत। ने भरि पेट अन होइ छै आ ने भरि देह बस्‍तर, ने रहैक घर छै, तहन‍‍ इसकूल केना जाएत।” मरनीक बात सुनि ठीकेदार सहैम गेला। मने-मन सोचए लगला, जे आँखिक सोझमे देखै छिऐ ओ झूठ केना भऽ सकैए। एते भारी काज केनिहारक देहपर कारी खट-खट कपड़ा छै, तोहूमे सैयो चेफड़ी लागल, काज करै-जोकर उमेर नइ छै, तैपर एते भारी हथौरी पजेबापर पटकैए..! ठिकेदारक मन दहैल गेलैन‍। जहिना अकास आ पृथ्वीक बीच क्षितिज अछि, जैठाम जा चिड़ै-चुनमुनी लसैक जाइए, तहिना ठीकेदारक मन सुख-दुखक बीच लसैक गेलैन‍। जेना सभ कि‍छु मनक हेरा गेलैन तहिना सुन्न भऽ गेला। ने आगूक बाट सुझैत‍ रहैन‍ आ ने पाछूक। मरनीसँ आगू की पुछब से मनमे रहबे ने केलैन‍। साहस बटोरि पुछलखि‍न- “भरि दिनमे केते रूपैआ कमाइ छी?” ठिकेदारक प्रश्‍न सुनि मरनीक मनमे झड़क उठलै। बाजल- “केते कमाएब! जेहने बैमान सरकार अछि तेहने ओकर मनसी छइ। चारि दिनमे एकटा पजेबा ढेरी फोड़ै छी तँ तीन-बीस रूपैआ दइए। तइसँ तीन तूरक पेट भरत? भरि दिन ईंटा फोड़ैत-फोडै़त देह-हाथ दुखाइत रहैए मुदा एकटा गोटियो कीनब से पाइ नै बँचैए।” ठिकेदारक आँखिमे नोर आबि गेल। मनुखता जागि गेल। मुदा ई मनुखता केते काल जिनगीमे अँटकत? जिनगी तँ उनटल अछि‍। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 3412 हारि-जीत चारिमे दिन दुनू परानी सोमन विचारलक जे आब ऐ गाममे जीयब कठिन अछि तँए गामसँ चलिए जाएब नीक हएत। दुनियाँ बड़ीटा छइ। जेतए जीबैक जोगार लागत तेतए रहब। ..समान सभ बान्हि, करेजपर पाथर रखि गामसँ जाइले दुनू परानी-सोमन तैयार भऽगेल। भूखल पेट, सुखाएल मुँह आ निराश मने ओसारपर बैसल दुनू परानीक आँखिसँ दहो-बहो नोर टघरैत रहइ। दुनियाँ अन्हार देख,उठैक साहसे नै होइ। सोमनक मनमे बेर-बेर उठै- की छेलौं आइ की भऽ गेलौं! ..रंग-बिरंगक विचार पानिक बुलबुला जकाँ दुनू परानी सोमनक मनमे उठै आ विलीन भऽ जाइ! आगूमे मोटरी राखल रहै मुदा जहिना सीमा परहक सिपाही छातीमे गोली लगलासँ घाइल भऽजमीनपर खसि छटपटाइत, तहिना दुनू परानी सोमन दुखक अथाह समुद्रमे डुमैत-उगैत। भिनसरसँ बारह बाजि गेलइ...। सहरसा जिलाक गाम मैरचा। पूबसँ कोसी आबि गामक कटनियाँ करए लगलै। गर लगा-लगा गामक लोक जेतए-तेतए पड़ाए लगला। ओना सरकार पुबरिया बान्हक बाहर पुनर्वासक बेवस्‍था सेहो करैत रहै मुदा ओइसँ बोनिहारकेँ की हएत। ओकरा सबहक तँरोजगारो छिना गेल रहइ। बेटा, पुतोहु आ पत्नीक संग फुलचनो पण्‍डित गाम छोड़ि पच्‍छि‍म-मुहेँ विदा भेला। घराड़ी छोड़ि अपना एक्को बीत जमीन-जत्‍था नइ छेलैन। मुदा अपन बेवसायक सभ लूरि‍, तँए मनमे ओ चिन्ता नै रहैन, चिन्ता मात्र रहैन ठौरक रहैन। कखनो-कखनो मनमे होनि जे अपन गाम तँ बुझल-गमल छल, आन गाम केहेन हएत केहेन नहि। मुदा उपाइए की। जीबैले तँ मनुख सभ किछु करैए। ..पछबरिया बान्हसँमील भरि पाछुए रहैथ कि बान्हपर नजैर पड़लैन। बान्ह देखते आशा जगलैन। किएक तँ बान्हक पच्‍छि‍म कोनो धार-धुर नइ अछि। मुस्‍कियाइत फुलचन पत्नीसँ पुछलखिन- “भगवान रामक खिस्सा बुझल अछि?” फुलचनक मुँह दिस देख मुनियाँ बजली- “बहुत दिन पहिने सुनने छेलौं, आब ओते धियान नइए।” “जहिना अपना सभ गाम छोड़ि कऽ जा रहल छी तहिना ओहो सभ गेल रहैथ। अपना सभकेँ तँ बटखर्चो अछि मुदा हुनका सभकेँ तँ सेहो नै रहैन।” तैबीच फुलचनक पुतोहु कपली सासुक बाँहि पकैड़ पाछू-मुहेँ घुमा कहलकैन- “एँड़ीकेँ डोका काटि देलक। खून बहैए। कनी केतौ बैसौथु जे लत्ता बान्हि देबइ।” एँड़ी देख मुनियाँ कहलखि‍न- “कनियाँ, केतौ गाछो ने देखै छिऐ जे कनी सुस्ताइयो लितौं। हमरो पियासे कण्‍ठ सुखैए।” सासु-पुतोहुक बात सुनि फुलचन बजला- “कनियाँ, जानिए-के तँ दैवक डाँग लगल अछि, तहन‍‍ तँ कहुना-कहुना बान्ह धरि चलू। एक तँ रौदाएल छी तैपर सँ जेते काल अँटकब तेते रौदो बेसीए लगत।” बान्हपर पहुँचते सभ निसाँस छोड़लैन। बान्हक पच्‍छि‍मसँ एकटा आमक गाछ रहइ। छाहैर देख सभ कि‍यो ओही गाछ तर पहुँच‍‍ला। एकटा बटोही पहिनहिसँ तौनी बिछा पड़ल छल। कनी काल सुस्तेला पछाइत‍‍ बटोहीकेँ फुलचन पुछलखिन- “भाय, तमाकुल खाइ छह?” जेबीसँ चुनौटी निकालि फुलचनक आगूमे फेकैत ओ बटोही बाजल- “कोन गाम जेबह?” ‘कोन गाम जेबह’ सुनिते फुलचनक हृदए सिहैर गेलैन। मिरमिराइत बजला- “भाय, कोन गाम जाएब तेकर तँ ठेकान नै अछि मुदा मैरचासँ एलौं हेन। धारमे गाम कटि रहल अछि, तँए गाम छोड़ि जा रहल छी। जइ गाममे कुम्हार नै हएत तइ गाममे बसि जाएब।” कुम्हारक नाओं सुनिते बटोही उठि कऽ बैसैत बाजल- “हमरो गाममे कुम्हार नै अछि। चलह, हमरे गाममे रहि जैहह।” आशा देख सोमन पुछलखि‍न- “ऐठामसँ केते दूर अहाँक गाम अछि?” “अढ़ाइ कोस। हमहूँ बहीने ऐठामसँ अबै छी, गामे जाएब।” बेर झुकैत पाँचो गोरे विदा भेला। लछमीपुर पहुँचते बटोही-रतीलाल फुलचनकेँ कहलकैन‍- “भाय, यएह हमर गाम छी।” गाछी बँसबाड़ि देख फुलचन पण्‍डित मने-मन खुशी भऽ अँकलैन जे जारैनक अभाव कहियो ने हएत। गाममे प्रवेश करिते बीघा दुइए-क पोखैर देख‍ फुलचन तँइ केलैन जे नै कतौं रहैक ठौर भेटत तँ पोखैर महार तँ ऐछे। पोखैरक बगलेमे सभ कि‍यो रूकि‍ जाइ गेला। रतीलाल आगू बढ़ि गेल। जहिना गाममे नट-किचककेँ अबिते धिया-पुता देखए अबैत तहिना फुलचनो सभ तूरकेँ देखए गामक धिया-पुता आबए लगल। गाममे कुम्हार अबैक समाचार पसरल। थोड़े कालक पछाइत‍‍ फुलचन पण्‍डित बेटाकेँ हाथ पकैड़ कहलखि‍न- “बौआ सोमन, तूँ सभ एतै बैसह। हम कनी गामक बाबू-भैया सभसँ भेँट केने अबै छी।” कहि फुलचन गाम दिस विदा भेला। इजोरिया पख रहै तँए सूर्यास्त भेलोपर दिने जकाँ लगइ। जाधैर फुलचन घुमि कऽ एबो ने केला तइसँ पहिनहि गामक पनरह-बीसटा नवयुवक पोखैरक महारपर पहुँच‍‍ गेल। सबहक मनमे नव उत्साह। किएक तँ अखन धरि जे अभाव कुम्हारक गाममे रहल ओ पूर्ति भऽ रहल अछि। जहिना आवश्यकताक वस्तु पूर्ति भेलासँ किनको मनमे खुशी होइ छै तहिना कुमहारक एलासँ गामक लोकक मनमे खुशी भेलइ। पोखैरसँ थोड़े हटि कट्ठा तीनिए-क परती छेलइ। सभ युवक विचारलक जे ओही परतीपर बसौल जाए। ताधैर गाम घुमि‍ कऽ फुलचनो एला। फुलचन दुनू बापूत परती देखलैन। परती देख सोमन पिता दिस घुमि बाजल- “कुम्हारक बसै-जोकर परती अछि, मात्र पिऐबला पानिक दिक्कत हएत।” तैपर पिता फुलचन पण्‍डित जवाब देलैन- “अखन ने पानिक दिक्कत हएत मुदा जहन‍‍ अपने इनार खुनैयोक आ पाटो बनबैक लूरि‍ अछि तहन‍‍ दिक्कत किए रहत?” घराड़ी पसि‍न होइते हो-हा करैत युवक सभ बाँस काटए विदा भेल। जे जेहेन बाँसबला, तिनकामे तइ हिसाबसँ बाँस काटि पच्चीसटा बाँस जमा भेल। फुलचनो दुनू बापूत संग दैत रहथिन। हाथे-पाथे सभ घरक काजमे जुटि गेला। रातिक बारह बजैत-बजैत तेरह हाथक घर ठाढ़ भऽ गेलइ। प्रात भेने दुनू बापूत विचारलैन जे एक तँ नव गाम, तहूमे नव बास, काज तँ बहुत अछि तँए काजकेँ सोझरा कऽ चलए पड़त। रहै-जोकर घर भलेँ नइ भेल मुदा दिन कटै-जोकर तँ भइए गेल। घर-आँगन बनबैसँ लऽ कऽ कारोबार धरिक काजमे हाथ लगबए पड़त। फुलचन सोमनकेँ पुछलखिन- “बौआ, मैरचासँ कोन-कोन समान अनने छह?” सोमन बाजल- “बाबू, सोचलौं जे आन गाममे लगले सभ कि‍छु थोड़े भऽ जाएत तँए चाक बनबैक शिला, तख्ता, फट्ठा, जौड़, बेलक कील सभ किछु अनने छी।” बिच्‍चेमे फुलचनक मुहसँ निकललैन‍- “बाह-बाह। चाकक ओरियान तँ भइए गेलह। आरो की सभ अनने छह?” पिताकेँ गदगद होइत देख सोमन आगू बाजल- “चकैठ, हथमैन, पिटना, पीरहुर, मजनी, छन्ना सेहो अनने छी।” मुस्‍कियाइत फुलचन बजला- “काजक तँ सभ किछु ऐछे। आइए चाको बनबैमे हाथ लगा दहक। एक गोरे पात खरैड़ अनिहह, एक गोरे घरक लेबिया-मुनियाँमे हाथ लगा दहक आ हमरा तँ समचे सभ ओड़ियबैमे समए बित जेतह।” दस दिनक मेहनतसँ रहै-जोकर एकटा घर बनि गेल। चाको सुखा गेल। जारनोक ओरियान भऽ गेल। चाक गाड़ि‍, माटि बना सोमन चाक लग बैसल। जहिना उद्योगपतिकेँ नव कारखानाक उद्घघाटन दिन मनमे खुशी रहै छै, तहिना आइ सभ परानी फुलचनोकेँ छैन। हँसैत फुलचन पण्‍डित बेटा दिस देखैत बजला- “बौआ, जेते समान बनबैक लूरि‍ अछि, सभ समान बना, पका कऽ खरिहाँनमे पसाइर, सौंसे गौंआकेँ हकार दऽ देखा देबैन। जिनगीक परीक्षा छी।” आबा उघारि चारू गोरे खल लगा-लगा कूड़, हाथी, ढकना, कोशिया, दीप, पाण्डव, गणेश, लक्ष्मी, मटकूर, छाँछी, डाबा, घैल,सामा-चकेबा, पुरहर, अहिबात, कोहा, फुच्ची, सरबा, सीरी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पातिल, तौला, मल्‍सी, बसनी, उन्नैसमासी, कोही,लाबैन, कलश, कराही, रोटिपक्का, अथरा, कसतारा, लग्जोरी, नादि, लोइट, माँट, टाड़ा, टाड़ी, बधना आ धिया-पुता खेलैक जात इत्यादि सभ वस्‍तुकेँ चारि-चारि खल लगा पावैनक, बिआहक, उपनयनक, श्राद्धक, पोखैरक यज्ञ-कीर्तनक आ घरैलू काजक अलग-अलग सजा कऽ पसारलैन। पछाइत दुनू बापूत जा गौंआकेँ देखैक हकार देलैन। चारू परानी फुलचनकेँ अपना लूरि‍क ठेकान नइ छेलैन ‍किएक तँ सभ काज-ले एक बेर सभ समान कहियो नै बनौने छला। मुदा आइ सभटा एक संग बनौलैन। एक संग देखते सभकेँ ई बिसवास भऽ गेलैन जे जहिना बड़का वेपारीक दोकानमे अनेको कि‍सि‍मक सौदा रहै छै तहिना तँ हमरो अछि। समए बितैत गेल। अधिक बएस भेने दुनू परानी फुलचन शरीरसँ कमजोर हुअ लगला। सोमनोकेँ एकटा बेटा, एकटा बेटी भेलइ। परिवार बढ़लै। खरचो बढ़लै। समए आगू-मुहेँ ससरैत गेल। दुनू परानी फुलचन मरि गेला। ..बेटीक बिआह सेहो सोमन कऽ लेलक। सोमनक बेटा रामदत दुर्गापूजा देखए मात्रिक गेल। ओतैसँ वौड़ गेल। माटिक बरतनक जगह द्रव्यक बरतन सभ परिवारमे धीरे-धीरे बढ़ए लगलै। जइसँ माटिक बरतनक मांग कमए लगल। घटैत-घटैत माटिक बरतन परिवार छोड़ि देलक। रहि गेल मात्र पावैन, उपनयन, बि‍आह आ श्राद्ध। अपन घटैत कारोबार आ टुटैत परिवारसँ दुनू परानी सोमन चिन्तित हुअ लगल। आगूक जिनगी अन्हार लगए लगलै। कोनो रस्ते नै देखाइ। सोचैत-वि‍चारैत सोमनक नजैर एकटा काज ‘खपड़ा बनौनाइ’पर पड़लै। खपड़ापर नजैर पहुँचते मुस्‍कियाइत पत्नीकेँ कहलक- “एकटा बड़ सुन्दर काज अछि जइमे कमाइयो नीक आ काजो माटिए-क।” अकचकाइत कपली बजली- “कोन काज?” सोमन- “खपड़ा बनौनाइ।” कनी काल धरि गुम रहि कपली बजली- “थोपुआ खपड़ा तँ हमहूँ बना सकै छी मुदा नड़िया नै हएत।” जोर दैत सोमन बाजल- “हँ, हएत! चाक परहक भलेँ नै हुअए मगर मुंगरी परहक किए ने हएत।” “हँ, से तँ हएत।” दुनू परानी खपड़ा बनबए लगल। लोककेँ बुझल नै रहै तँए अगुरबार कि‍यो खोज नै केलक। मुदा जखन‍ एकटा भट्ठा लगौलक तखन‍ गामक लोक देखलक। खपड़ो नीक, पाको बढ़ियाँ। गिनतीए हिसाबसँ खपड़ा बेचए लगल। बढ़ियाँ आमदनी हुअ लगलै। बढ़ियाँ कारोबार चलल। मुदा सिमटीबला एस्बेस्ट्स अबिते खपड़ाक मांग कमए लगलै। खपड़ा बनौनिहारकेँ मन्‍दी आबि गेल। ओना सोमनक परिवारो छोट, मात्र दुइए गोरेक। मुदा तैयो गुजरमे कटमटी आबए लगलै जइसँ फेर जिनगी भारी हुअ लगलै। हँसी-खुशीसँ जीवन-यापन करैबला परिवार एहेन स्थितिमे पहुँच‍ गेल जे साँझक-साँझ चुल्हि नै पजरैत। दोसर कोनो लूरि‍ नहि। अपन खसैत जिनगी देख कपली पतिक मुँह दिस तकैत बजली- “एना केते दिन दुख काटब? जखन‍ हाथ-पएर तना-उतार ऐछे आ काज करए चाहिते छी तखन‍ की अही गामकेँ सीमा-नाङैर छइ!चलू ऐ गामसँ।” पत्नीक विचार सुनि सोमनक आँखि नोरा गेल। किछु बजैक हिम्मते ने होइ। मने-मन चिन्‍तित हुअ लगल जे जइ लूरि‍क चलते अखन धरि जीलौं ओ लूरि‍ आब मरि रहल अछि। दोसर लूरि‍ तँ अछि नहि। की करब..? असमंजसमे पड़ल पतिकेँ देख कपली बजली- “दुनियाँ बड़ीटा छइ। जेतै पेट भरत तेतै रहब। जहिना मैरचासँ आबि लछमीपुरमे एते दिन रहलौं तहिना ई गाम छोड़ि दोसर गाममे रहब।” पत्नीक विचारसँ सहमत होइत सोमन बाजल- “अहाँक विचार मानि लेलौं। ऐ गामसँ चारिम दिन चलि जाएब। बीचमे जे दू दिन बाँचल अछि तइमे अहूँ आ हमहूँ गाममे टहैल कऽ सभकेँ जना दियौन जे जहिना एक दिन हँसी-खुशीसँ छाती लगेलौं तहिना आब जा रहल छी। चुपचाप गामसँ चलि जाएब नीक नहि। गामसँ तँ चुपचाप ओ भगैए जे अधला काज केने रहैए।” दुआरिये-दुआरि दूनू परानी गाममे घुमि सभकेँ कहि देलकैन‍- “गामसँ चलि जाएब।” प्रात होइते दुनू परानी घरक सभ समानक मोटरी बान्हि ओसारपर रखलक। भूखल पेट! सुखाएल मुँह! निराश मन! आगू बढ़ैक डेगे नै उठैत। ओसारापर बैसल एक-दोसराक मुहोँ देखैत आ कनबो करैत। दुनूक करेज छहोँछीत भेल...। सबा बजैत। टहटहौआ रौद। हवा शान्त। साफ मेघ। घामसँ तर-बत्तर, माथपर मोटरी, हाथमे वी.आइ.पी. बैग नेने सोमनक बेटा रामदत आँगन पहुँचल। माए-बापक दशा देख छाती काँपए लगलै। मेह जकाँ आगूमे ठाढ़। सोगे दुनूक आँखि बन्न। बन्न आँखिसँ नोर टघरैत। दुनू अधीर। करेजकेँ थीर करैत रामदत बाजल- “बाबू।” ‘बाबू’ शब्द कानमे पड़िते दुनू बेकती सोमनक आँखि खुजलै। मुदा नोर टघैरते रहलै। किन्तु आब नोरक रूप बदलए लगल। अखन धरि जे नोर सोगसँ खसैत रहै ओ सि‍नेहमे बदैल गेलइ। अकचकाइत सोमनक मुहसँ निकलल- “बौआ!” बिच्‍चेमे झपैट कपली बजली- “बे-ट-आ!” ओसारापर बैग-मोटरी रखि रामदत पिताकेँ गोड़ लगैले झूकल आकि‍ तखने कपली उठि कऽ दुनू हाथे पँजिया कऽ पकैड़ चुम्मा लैत बजली- “भाग नीक छेलौ बेटा जे हम सभ भेँट भेलियौ, नहि तँ तूँ केतए रहितेँ आ हम सभ केतए रहितौं..!” माएकेँ गोड़ लागि रामदत मोटरी खोलि दू किलो भरिक रसगुल्लाक पलोथि‍न, किलो भरि कटलेट आ किलो भरिक बीकानेरी भुजियाबला पैकैट निकालि घुसका कऽ रखलक। ..दुनू परानी सोमनकेँ भुखसँ जरल मन। जहिना गाइक गौजरा बच्चा माइक थन दिस आँखि गड़ा देखैत रहैए तहिना रसगुल्ला, भुजिया दिस सोमन आ कपली नजैर एकाग्र केने छल। रामदत दुनू-ले नव वस्‍त्र सेहो निकालि फुटा-फुटा रखलक। तैसंग चमकैत स्टीलक थारी, लोटा, गिलास, बाटी एक भागमे आ चाह बनबैक केटली, कप, छन्ना, आयरन, नारियल तेलक डिब्बा इत्‍यादि आरो-आरो समान निकालि चद्दैरकेँ झाड़लक। जहिना चुल्हिक आगिमे ऊपर सँ थोड़बो पानि पड़लापर ठंढापन आबए लगैत तहिना दुनू परानी-सोमनक हृदए चीज-वौस देख शीतल हुअ लगलै, एकदम स्नानोपरान्तक शीतलता जकाँ। सोमनक शीतल मनसँ मधुर शब्द निकललै- “बच्चा, गरमाएल छह पहिने नहा लएह तहन‍‍ मन चैन हेतह।” माए-बापक मुँह देख रामदत बाजल- “बाबू हमरो भूख लगल अछि। पहिने कनी-कनी खा लिअ। पछाइत‍ नहाएब।” रसगुल्लाक पलोथि‍नक गिड़ह खोलि रामदत दू बाकुट निकालि स्टीलक थारीमे लऽ पिताक आगूमे आ दू बाकुट माइक थारीमे दऽ क्रमश: कटलेट आ भुजियाक गिड़ह खोलैत बाजल- “जेते मन हुअए तेते खाउ। नहाइक कोनो औगताइ थोड़े अछि?” अपनो मुँहमे रसगुल्ला लैत, बैग खोलि, मनी बैग निकालि रामदत पि‍ता आगूमे रखलक। रूपैआ देख कपलीक मन टुकली जकाँपहाड़पर चढ़ि गेल। धरतीकेँ गोड़ लगलक। खाइत-नहाइत बेर टगि गेलइ। पछबरिया घरक छाहैर अदहा आँगन टपि गेल। घरक कोणमे जहिना मोथीक पुरना बिछान बिछौल छल तहिना बिछौले रहए। घरसँ बिछान निकालि कपली पछबरिया ओसार लगा बिछौलक। ऊपरसँ नवका जाजीम बिछौलक। नवका सिरमा रखलक। तीनू गोरे बैस गप-सप्‍प करए लगला। सोमन- “बौआ, तूँ वौड़ केना गेलहक?” मन पाड़ैत रामदत बाजल- “बाबू, हम वौड़लौं कहाँ। मामा गाममे मुजफ्फरपुरक छलगोरिया दुर्गाक मुरती बनबैले आएल रहए। ओहो कुम्हारे, तीन गोरे रहए। ओकर छोटका बेटा हमरे एतेटा रहइ। ओकरासँ हमरा दोस्ती भऽ गेल। ओकरे संगे चलि गेलियह।” बिच्‍चेमे कपली बजली- “रौ डकूबा, तोरा चिट्ठियो-पुरजी नै पठौल भेलौ।” अपनाकेँ स्मरण करैत रामदत बाजल- “माए, काज सिखैमे सभ किछु बिसैर गेल रहियौ। तोरो सबहक हालत तँ बढ़ियेँ रहौ किने, तहन‍‍ चिन्ते कथीक करितौं।” सामंजस करैत, बिच्‍चेमे सोमन बजला- “जहिया जे दुख लिखल छल से भोगलौं। यएह तँ भगवानक लीला छि‍ऐन‍। कखनो दुख तँ कखनो सुख।” रामदत- “बाबू, एहेन दशा भेलह केना?” बेटाक बात सुनि सोमनक आँखि भरि गेलैन, बजला- “बौआ, अखन धरिक जेते लूरि‍-बुधि‍ छेलए से सभ पुरान भऽ गेल। नवका सिखलौं नहि...।” पिताक बात सुनि रामदत नमहर साँस छोड़ि मुस्‍कियाइत बाजल- “बाबू, हमरा तँ छुट्टिए नइ दैत रहए। बीस-बीस हजार रूपैआ मासमे कमाइ छी। तैपर सँ मूर्ति बनबौनिहारक कतार लगल रहैए।” बिच्‍चेमे कपली पुछलखिन- “बेटा, की सभ लूरि‍ छौ?” मुस्‍कियाइत रामदत बाजल- “माए, माटिसँ लऽ कऽ सिमटी धरिक मुरती बनबै छी। तैसंग नाच-तमाशाक परदा, घर सभमे चित्र सभ बनबैक लूरि सेहो अछि।” बेटाक बात सुनि सोमनक अहं जागल। बजला- “बौआ, जहन एते कमाइक लूरि‍ छह, तहन नोकरी किए करै छह?” मुस्‍कियाइत रामदत बाजल- “एते दिन जे नोकरी केलौं ओ नोकरी नइ भेल। साल भरि तँ माटिए सनैमे लगि गेल, तेकर पछाइत साल भरि खढ़ बन्हैमे आ पहिल माटि लगबैमे चलि गेल। तेसर साल मुरती बनबैमे लागल। चारिम साल मुरतीक आँखि बनबैमे लागल। ऐ साल आबि माने पाँचम बर्खमे ऐ साल गुरु दैछना चुका एलौं हेन। आब अपन कारोबार करब। जखने अपन कारोबार हएत तखने ने दू-चारि गोरे सिखबो करत।” अपन मजबूरी देखबैत सोमन बजला- “बौआ, अपन चिन्ता जेते शरीरकेँ नै खेलक तइसँ बेसी तोहर। किए तँ हरिदम मनमे नचैत रहए जे वंश अन्‍त भऽ गेल। जाबे दुनू परानी छी ताबै धरि...। मुदा आइ सबुर भऽ गेल जे जाबे बीटमे बाँस चढ़न्त रहै छै ताबे उन्नैससँ बीस होइत जाइ छै मुदा निच्चाँ-मुहेँ होइते सरसरा कऽ कोँपरो सुखए लगै छइ। ओना, आब आशा भऽ गेल जे हमरो वंश एक-सँ-एक्कैस हएत।” बेटाकेँ आधुनिक मुर्तिकार रूपमे पाबि सोमन गदगद भऽ गेला। हृदए अह्लादसँ भरि गेलैन। नजैर सहजे बेटाक नजैरमे गड़ि गेलैन। धि‍यान बढ़ैत बाँसक बीटमे विचरण करए लगलैन..! सोमनक मनमे एलैन, बेटासँ नव गुण सीखब, अखनो दुनू बेकती बहुतो काज कऽ सकै छी। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2373 ठेलाबला टाबरक घड़ीमे बारह बजेक घण्‍टी बजिते भोलाक निन्न टुटि गेलैन। ओछाइनपर सँ उठि सड़कपर आबि हियासए लगला तँ देखलैनजे डण्‍डी-तराजू माथसँ थोड़बे पच्‍छि‍म झूकल अछि। मेघौन दुआरे सतभैयाँ झँपाएल। जेमहर साफ मेघ रहै ओम्हुरका तरेगन हँसैत मुदा जेमहर मेघौन रहै ओम्हुरका मलिन। गाड़ी-सवारी एक्कोटा नहि। सड़क सुनसान। मुदा बिजलीक इजोत पसरल। गस्तीक सिपाही टहलैत। सड़कपर सँ भोला आबि ओछाइनपर पड़ि रहला मुदा मन उचला-चाल करैत रहैन। सिनेमाक रील जकाँ पैछला जिनगी मनमे नचैत रहैन‍। जहिना चुल्हिपर चढ़ल बरतनक पानि तर-सँ-ऊपर अबैत तहिना भोलोक मनक खुशी हृदैसँ निकैल चिड़ै जकाँ अकासमे उड़ैत रहैन‍। किएक ने खुशी अबि‍तैन‍, हेराएल वस्तु जे भेट गेल रहैन‍। मन गेलैन परसुका चि‍ट्ठीपर, जे गामसँ दुनू बेटा पठौने। असम्‍भव काज बुझि बि‍सवासे नै होइत रहैन। पत्र तँ नइ पढ़ल होइत रहैन मुदा पढ़बै काल जे पाँति‍ सभ सुनने छला से ओहिना आँखिक आगू नचैत रहैन। पत्र उघारि आँखि गड़ा देखए लगला- “बाबू, पाँच तारीखकेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करए जाएब। इच्छा अछि जे घरसँ विदा होइ काल अहाँकेँ गोड़ लागि घरसँ निकली। तँए पाँच तारीखकेँ दस बजेसँ पहिनहि अपने गाम पहुँच‍ जाइ।” पत्रक बात मनमे अबिते भोला गाम आ शहरक बीचक सीमानपर लसैक गेला। मनमे एलैन, समाजसँ निकैल छातीपर ठेला घिंच दूटा शिक्षक समाजकेँ देलिऐ, की ओइ समाजक आरो ऋण बाँकी अछि? जँ नहि तँ किएक ने छाती लगौता...। जहिना गामसँ धोती गोल-गला आ दू टाका लऽ कऽ निकलल छेलौं, तहिना देहक कपड़ा, सनेस, चाह-पानक खर्च छोड़ि किछु ने ऐठामसँ लऽ जाएब...। चिड़ै टाँहि देलकै, फेर ओछाइनपर सँ उठि भोला बाहर निकलला तँ देखलखिन जे बाँस भरि ऊपर भुरूकबा आबि गेल अछि। चोट्टे घुमि कऽ आबि संगी-साथीकेँ उठा अपन सभ किछु बाँटि देलखिन, अपना-ले खाली मासुलक खर्च, सनेस आ पाँकेट खर्च मिला साए रूपैआ रखि, कपड़ा पहिर, धरमशालाकेँ गोड़ लागि हँसैत निकैल गेला। जहन‍‍ आठे बर्खक भोला रहए तहिए माए मरि गेलैन। तीनिए मासक पछाइत‍ पिता चुमौन कऽ लेलखिन। ओना पहिलुको पत्नीसँ रघुनीकेँ चारिटा सन्तान भेल रहैन। मुदा खाली भोलेटा जीवित रहल। सतमाए-केँ परिवारमे एने भोलाकेँ सुखे भेलइ। ओना गामक जनिजातियो आ पुरुखोकेँ होइ जे सतमाए भोलाकेँ अलबा-दोलबा कऽ घरसँ भगा देतै, नहि तँ परिवारमे भिनौज जरूर कराइए देतइ। मुदा सबहक अनुमान गलत भेल। भोला घरसँ सोलहन्नी फ्री भऽ गेल। फ्री खाली काजेटा मे भेला, मान-दान सेहो बढ़िए गेलइ। दुनू साँझ भानस होइते माए फुटा कऽ भोलाले सीकपर थारी साँठि कऽ रखि दइ छेली। भलेँ भोला दिनुका खेनाइ साँझमे आ रौतुका खेनाइ भोरमे खाइत। परोपट्टामे जालिम सिंह आ उत्तमचन्दक नाच जोर पकड़ने। सभ गाममे तँ नाच पार्टी नहि, मुदा एक गाममे नाच भेने चरिकोसीक लोक देखए अबैत। भोलाक गामक नाच पार्टी सभसँ सुन्दर अछि। जेहने नगेड़ा बजौनिहार तेहने बिपटा। जइसँ पार्टीक प्रतिष्ठा दिनानुदिन बढ़िते जाइत। ..घरसँ फ्री भेने भोला नाचक परमानेंट देखनिहार भऽ गेल। नाचो एक-आध घन्‍टा, दू घन्‍टा आकि तीन घन्‍टाक नहि, भरि रौतुका। जेहने देखनिहार जिद्दी तेहने नचिनिहारो। गामक बुढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ छौड़ा-मारड़ि धरि भरि मन मनोरंजन करैत। मनोरंजनो सस्ता। ने नाच पार्टीकेँ रूपैआ दिअ पड़ैत आ ने खाइ-पीबैक कोनो झंझट। ओना गामक बारह-चौदह-अना लोकक हालतो रद्दीए। मुदा जे किसान परिवार छल ओ अपना ऐठाम मासमे एक-दू दिन जरूर नाच करबै छला। नटुआकेँ खैयो-ले दइ छेलखि‍न आ कोनो-कोनो समानो कीनि कऽ। भोलो नाच पार्टीक अंग बनि गेल, डिग्री सेदैक जिम्मा भेट गेलइ। डिग्री सेदैक जिम्मा भेटते भोलाकेँ काजो बढ़ि गेलइ। घूर-ले जारनोक ओरियान करए पड़इ। अपना काजमे भोला मस्त रहए लगल। मुदा एतबेसँ ओकर मन शान्त नइ भेलइ। काजक सृजन ओ अपनोसँ करए लगल। स्टेजक आगूमे जे छोटका धिया-पुता बैस पीह-पाह करइ। ओकरो सभपर निगरानी करए लगल। आब ओ चुपचाप एकठाम नै बैसए। घुमि- घुमि कऽ महफिलोक निगरानी करए लगल। आरो काज बढ़ैलक। नटुआ सबहक बीड़ी सेहो लगबए लगल। बीड़ी सुनगबैत-सुनगबैत अपनो पीयब सीखि लेलक। किछुए दिनक पछाइत‍ भोला नमहर बीड़ी-पियाक भऽ गेल। किएक तँ एक्के-दू दम जँ पीबए तैयो भरि रातिमे तीस-पैंतीस दम भऽ जाइ छेलइ। जइसँ भरि राति मूड बनल रहै छेलइ। बीड़ीक कसगर चहैट भोलाकेँ लगि गेल। रातिमे तँ नटुए सभसँ काज चलि जाइ छेलै मुदा दिनमे जहन‍‍ अमलक तलक जोर करै तँ मन छटपटाए लगइ, मूडे भङैठ जाइ। मूड बनबै दुआरे भोला बापक राखल बीड़ी चोरा-चोरा पीबए लगल। जइक चलैत सभ दिन किछु-ने-किछु बापक हाथे मारि खाइत। एक दिन एक्केटा बीड़ी रघुनीकेँ रहैन। भोला चोरा कऽ पीब लेलक। कोदारि पाड़ि रघुनी गामपर एला तँ बीड़ी पीबैक मन भेलैन। खोलियासँ आनए गेला तँ बीड़ी नइ देखलैन। चोटपर भोला पकड़ा गेल। सभ तामस रघुनी भोलापर उतारि‍ लेलैन‍। ..मारि खाए भोला कनैत उत्तर-मुहेँक रस्ता पकड़लक। कनीए आगू बढ़ल कि करिया कक्काक नजैर कनैत भोलापर पड़ल। कानबसँ ओ बुझि गेला जे भीतरिया मारि लागल छइ। ..पुचुकारि कऽ करिया काका पुछलखिन- “की भेलौ भोला, किए हुचकै छँह?” करिया कक्काक सि‍नेह पाबि‍ भोला आरो हुचैक-हुचैक कानए लगल। हुचकैत भोला जे किछु काकाकेँ कहलकैन ओ हुचकीए-मे हेरा गेल। काका भोलाक बात नै बुझलैन‍। मुदा काका बिगरला नहि, भोलाक दहिना डेन पकैड़ रघुनीकेँ कहए बढ़ि गेला। काकाकेँ देख रघुनियोँक मन पघिल गेलैन‍। लगमे आबि‍ काका कहलखिन- “रघुनी, भोला बच्चा अछि किएक तँ बि‍आह नइ भेलैए। तँए नीक हेतह जे बि‍आह करा दहक। अपन भार उतैर‍ जेतह। परिवारक बोझ पड़तै अपने सुधरत। अखन मारने दोषी हेबह, समाज अबलट्ट जोड़तह जे बाप कुभेला करै छइ। जनिजातिक मुँह रोकि सकबहक ओ कहतह जे ‘माए मुइने बाप पित्ती...।” करिया कक्काक विचार रघुनीक करेजकेँ छेदि देलकैन‍। आँखिमे नोर आबि गेलैन‍। अखन धरि रघुनीक जे आँखि करिया कक्कापर रहैन ओ भोलाक गाल परहक सूखल नोरक टघारपर पहुँच‍ अँटैक गेलैन‍। ओना, मारिक चोट भोलाक देहमे निजाइए गेलै जे संग-संग बि‍आहक बात सुनि मनमे खुशियो उपकलै। बुधि‍क हिसाबसँ भलेँ भोला बुड़िबक अछि मुदा नाचमे मेल-फीमेलक गीत तँ गबिते अछि। पिताक हैसियतसँ रघुनी करिया काकाकेँ कहलखिन- “काका, हम तँ ओते छह-पाँच नै बुझै छिऐ, काल्हिए चलह केतौ लड़की ठेमा कऽ बि‍आह कैये देबइ।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि करिया काका रस्ता घेलैन। भोलाक बि‍आह भेला आठे दिन भेल छेलै कि पाँच गोरेक संग समैध आबि रघुनीकेँ कहलकैन- “बि‍आहसँ पहिने हम सभ नै बुझलिऐ, परसू पता लगल जे लड़ि‍का नाच पार्टीमे रहैए। नटुआ-फटुआ लड़ि‍काक संग अपन बेटीकेँ हम नै जाए देब। ई सम्बन्ध नइ रहत। अपना सभमे तँ खुजले अछि। अहूँ अपन बेटाकेँ बिआहि लिअ आ हमहूँ अपना बेटीक दोसर बि‍आह कऽ देब।” कहि पाँचो गोरे चलि गेला। ससुरक बात सुनि भोलाक बुधि‍ए हेरा गेलइ। जहिना जोरगर बिर्ड़ो उठलापर सभ किछु अन्हरा जाइ छै तहिना भोलोक मन अन्हराए लगलै, दुनियाँ अन्हार लागए लगलै। ओना, तीन मास पहिनहि नाच पार्टी टुटि गेल छेलइ। एकटा नटुआ एकटा लड़कीकेँ लऽ पड़ा गेल जइसँ गाम दू फाँक भऽ दू ग्रुपमे बँटा गेलइ। सौंसे गाममे सनासनी चलए लगलै। तैपर सँ भोला आरो दू फाँक भऽ गेल। पाण्डु रोगी जकाँ भोलाक देहक खून तरे-तर सुखए लगलै। मुदा की करैत वेचारा। किछु फुरबे ने करइ। ग्लानिसँ मन कसाइन हुअ लगलै। मने-मन अपनाकेँ धिक्कारए लगल, कोन सुगराहा भगवान हमरा जन्‍म देलैन जे बहुओ छोड़ि देलक। विचारलक जे ऐ गामसँ केतौ चलिए जाएब नीक हएत। घरसँ भोला पड़ा गेल। संगी-साथीक मुहसँ दिल्ली, कलकत्ता, बम्बइक विषयमे सुननहि रहए। जइसँ गाड़ियोक भाँज बुझले रहइ। मुदा ने जेबीमे पाइ रहै आ ने बटखर्चा। खाली दूटा टाका संगमे रहइ। अबधारि कऽ भोला कलकत्ताक गाड़ी पकैड़ लेलक। हबड़ा स्टेशन गाड़ी पहुँचते भोला उतरल। टिकट नइ रहनौं एक्को मिसिया डर मनमे नहि। निर्मली-सकरीक बीच कहियो टिकट नै कटबै छल। एक बेर पनरह अगस्तकेँ सिमरिया धरि बिनु टिकटे घुमि‍ आएल छल। प्लेटफार्मक गेँटपर दूटा सिपाहीक संग टी.टी. टिकट ओसुलैत। भोलाकेँ देख टी.टी.क मनमे भेलै, दरभंगिया छी भीख मंगए आएल अछि। टिकट नै मंगलकै। सिपाहियोकेँ बुझि पड़लै जे जेबीमे किछु छै नहि। टिकटेबला यात्री जकाँ भोलो गेँट पार भऽ गेल। सड़कपर आबि भोला आँखि उठा कऽ तकलक तँ नमहर-नमहर कोठा, चौरगर सड़क, हजारो छोटका-बड़का गाड़ी आ लोकक भीड़ देखलक। मनमे भेलै, भरिसक आँखिमे ने किछु भऽ गेल! जहिना आँखि गड़बड़ भेने एक्के चान सातटा बुझि पड़ैए तहिना ने तँ बुझि पड़ैए! ..दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि फेर देखलक तँ ओहिना भीड़ देख मनमे उठलै, जहन‍‍ एते लोकक गुजर-बसर चलै छै तँ हमर किए ने चलत। आगू बढ़ि लोकक बोली अकानए लगल। मुदा केकरो बाजब बुझबे नै करैत। अखन धरि बुझैत जे जहिना गाए-महींस सभठाम एक्के रंग बजैए तहिना ने मनुखो बजैत हएत। मुदा से नइ देख भेलै जे भरिसक हम मनुखक जेरिमे हेरा ने तँ गेलौं..! मुदा फेर मनमे उठलै, लोक तँ संगीक बीच हेराइए, असगरमे केना हेराएत। ..विचित्र स्थितिमे भोला पड़ि गेल। ने आगू बढ़ैक साहस होइ आ ने केकरोसँ किछु पुछैक। हिया हारि उत्तर-मुहेँ विदा भऽ भेल। सड़कक किनछैर सभमे खाइ-पीबैक छोट-छोट दोकान पतियानी लागल देखलक। भूख लगले रहै मुदा खाली जेबी आ लोकक बोलक कारण हिम्मते ने होइ। जेबी टोबलक तँ एकटा दू-टकही रहइ। मन पड़लै मधुबनीक स्टेशन कातक होटल, जइमे पाँच रूपैए प्लेट दइत। ई तँ सहजे कलकत्ता छी। ऐठाम तँ आरो बेसी महग हेबे करत। एकटा दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ गर अँटबए लगल जे नइ भात-रोटी तँ एक गिलास सतुए पीब लेब। ..बगे देख दोकानदारे कहलकै- “आबह आबह, बौआ। ठाढ़ किएक छह?” अपन बोली सुनि भोला घुसैक कऽ दोकान लग पहुँच‍ पुछलक- “दादा, केना खुआबै छहक?” “तीन मास पहिने धरि आठे-अनामे खुअबै छेलिऐ। अखन बारह-अनामे खुअबै छिऐ।” भोलाक मनमे संतोख भेलइ। पाइएबला गहिंकी जकाँ बाजल- “कुर्रा करैले पानि लाबह।” भरि पेट खेनाइ खा भोला आगू बढ़ल। ओना तँ रंग-बि‍रंगक वस्‍तु देखैत मुदा भोलाक नजैर खाली दुइए-ठाम अँटकै। देबाल सभमे साटल सिनेमाक पोस्टरपर आ सड़कपर चलैत ठेलापर। जइ पोस्टरमे डान्स करैत देखए ओइठाम अँटैक सोचए जे ई नर्तकी मौगी छी आकि मुनसा। गाम-घरमे तँ पुरुखे मौगी बनि डान्स करैए। फेर मन पड़लै संगीक-मुहेँ सुनल ओ बात जे कहने रहैए सत्य हरिश्चन्द फिल्ममे मर्दे मौगियोक रौल केने रहए...। गुनधुन करैत भोला बढ़ल तँ अपने जकाँ छौड़ाकेँ ठेला ठेलने जाइत देख सोचए लगल, ई काज तँ हमरो बुते भऽ सकैए। गाड़ीक डरेवरी तँ करल नै अबैए। बिनु सिखने रिक्शो केना चलौल हएत। ततमत करैत आगू बढ़ल। सड़कक बगलेमे एकटा ठेलाबलाकेँ चाह पिबैत देखलक। ओइठाम जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल। चाह पीब ठेलाबला पुछलक- “कोन गाँ रहै छह?” भोला बाजल- “बि‍शौल।” ‘बिशौल’सुनिते ठेलाबला कहलकै- “हमहूँ तँ सुखेते रहै छी, चलह हमरा संगे।” गप-सप्‍प करैत दुनू गोरे धरमतल्लाक पुरना धरमशाला लग पहुँचल, ठेलाकेँ सड़केपर छोड़ि दीनमा भोलाकेँ धरमशालाक भीतर लऽ जा कऽ कहलक- “समांग, असगरे केतौ जैहह नहि। हेरा जेबह। एतै रहह, ताबे हम एक ट्रीप मारने अबै छी।” टंकीपर हाथ-पएर धोइ भोला दीनमासँ बीड़ी मांगि पीब, पीलर लगा ओङैठ कऽ बैस रहल। आँखि उठा कऽ तकलक तँ झड़ल-झुरल देबालक सिमटी, तैपर केतौ-केतौ बर-पीपरक गाछ जन्‍मल देखलक। पैखाना कोठरी आ पानिक टंकीक आगूमे ठेहुन भरि थाल किचार सेहो देखलक, मन पड़लै गाम। नाच-पार्टी टुटि गेल! घरवाली छोड़ि देलक! दू पाटी गाम भऽ गेल! सोचिते-सोचिते भोलाकेँ निन्न आबि गेलइ। बैसले-बैसल सुति रहल। गोसाँइ डुमि‍ते बुचाइ (दोसर ठेलाबला) आबि भोलाकेँ जगबैत पुछलक- “कोन गाम रहै छह?” आशा भरल स्वरमे भोला बाजल- “बिशौल।” बि‍शौलक नाओं सुनिते मुस्‍कियाइत बुचाइ पुछलकै- “रूपनकेँ चि‍न्है छहक?” “उ तँ हमरा कक्के हएत।” अपन भाइक ससुर बुझि भोलासँ सार-बहनोइक सम्बन्ध बनबैत बाजल- “चलू, पहिने चाह पीबी। तहन‍‍ निचेनसँ गप-सप्‍प करब।” कहि टंकीपर जा बुचाइ देह-हाथ धोइ, कपड़ा बदैल भोलाकेँ संग केने दोकानपर गेल। आँखिक इशारासँ दोकानदारकेँ दू-दूटा पनितुआ, दू-दूटा समौसा दइले कहलक। दुनू गोरे खा, चाह पीब पानक दोकानपर पहुँच‍ बुचाइ दूटा पान मंगलक। ‘पान’ सुनि भोला बाजल- “पान छोड़ि दियौ, बीड़ीए कीनि लिअ।” बीड़ी पिबैत दुनू गोरे धरमशालाक भीतर पहुँचल। समए भेने एका-एकी ठेलाबला सभ आबए लगल। बिशौलक नाओं सुनिते अपन-अपन सम्बन्ध सभ फरि‍छौलक। सम्बन्ध स्थापित होइते बेरा-बेरी चाह चलए लगलै। चाह पिबैत-पिबैत भोलाक पेट अगिया गेल। अखन धरिक जिनगीमे एहेन सि‍नेह भोलाकेँ पहिल दिन भेटलै। भेला ठेलाबला सबहक परिवारक अंग बनि गेल। सभ बेवस्‍था ठेलाबला सभ कऽ देलक। दोसर दिनसँ ठेला ठेलए लगल। शनि दिनकेँ सभ ठेलाबला रौतुका शो सिनेमा देखए जाइत। ओइ शोमे एक क्लासक कन्सेशन भेटइ। भोलो सभ शनिकेँ सिनेमा देखए लगल। चौदह मास बि‍तला पछाइत‍‍ भोला गाम आएल। नव चेहरा नव वि‍चार भोलाक। घरक सभ सदस-ले कपड़ा अनलक। धिया-पुताकेँ दू-दूटा चौकलेट देलक। धिया-पुताक हाथमे चौकलेट देख एका-एकी जनिजातियो सभ आबए लगली। झबरी दादी सेहो एली। भोलाकेँ देखते झबरी दादी बाजए लगली- “कहू तँ ऐसँ सुन्नर पुरुख केहेन होइ छै जे सौंथ जरौनियाँ छोड़ि देलकै!” दादीक बात भोलाकेँ बेधि देलक। आँखि नोराए लगलै। रघुनीक मन सेहो कानए लगलै। दोसरे दिन रघुनी लड़की ताकए घरसँ निकलल। ओना लड़कीक तँ कमी नहि, मुदा गाम-घर देख कऽ कुटुमैती करैक विचार रघुनीक मनमे रहैन। लड़कीक कमी तँ ओइ समाजमे अधिक अछि जइमे भ्रूण-हत्याक रोग धेने छइ। समैयो बदलल। गिरहस्त परिवारसँ अधिक पसि‍न लोक नोकरिया परिवारकेँ करैए। बगलेक गाममे भोलाक बि‍आह भऽ गेल। बि‍आहक तीनिए दिनक पछाइत‍ कनियाँक बिदागरियो भऽ गेलै आ पाँचमे दिन भोला कलकत्तो चलि आएल। सालक एगारह मास भोला कलकत्ता आ एक मास गाममे गुजारए लगल। गाम अबैत तँ अपनो घरक काज सम्हारि अनको सम्हारि दइत। तेसर साल चढ़िते भोलाकेँ जौंआँ बेटा भेलइ। नवम् मास चढ़िते भोला गाम आबि गेल। मनमे आशो बनले रहै जे पाइ-कौड़ीक दिक्कत तँ नहियेँ हएत। सभ ठेलाबला अपन संस्था बना पाइ-कौड़ीक प्रबन्ध केने अछि। मुदा पहिल बेर छी, कनियाँक देखभाल तँ कठिन ऐछे। सरकारीक कोनो बेवस्थो नहियेँ छइ। मुदा समाजो तँ समुद्र छी, जेतए बिनु कहनौं सेवा भेटैए। जइसँ भोलोकेँ कोनो बेसी परेशानी नहियेँ भेल। समए आगू बढ़ल। पाँच बर्ख पुरिते भोला दुनू बेटाकेँ स्कूलमे नाओं लिखौलक। शहरक वातावरणमे रहने भोलोक विचार धिया-पुताकेँ पढ़बै दिस झुकि गेल रहइ। मनमे अरोपि लेलक जे भलेँ खटनी दोबर किएक ने बढ़ि जाए मुदा दुनू बेटाकेँ जरूर पढ़ाएब। अपन आमदनी देख पत्नीक ऑपरेशनो कराइए नेने रहए। जइसँ परिवारो समटले रहइ। पढ़ैमे जेहने चन्सगर रतन तेहने लाल। क्लासमे रतन फस्ट करैत आ लाल सेकेण्ड। सतमा क्लास धरि दुनू भाँइ फस्ट-सेकेण्ड स्कूलमे करैत रहल। हाइ स्कूलमे दुनू भाँइ आर्ट लऽ पढ़ए लगल जइसँ क्लासमे कोनो पोजीसन तँ नहियेँ होइत मुदा नीक नम्बरसँ पास करए लगल। मैट्रिकक परीक्षा दऽ दुनू भाँइ कलकत्ता गेल। अखन धरि आने परदेशी जकाँ अपनो पिताकेँ बुझै छल, तँए मनमे रंग-बि‍रंगक इच्छा संयोगने कलकत्ता पहुँचल रहए। मुदा पिताक मेहनत‍, छाती बले ठेला घीचैत देख पराते भने गाम घुमैक विचार दुनू भाँइ कऽ लेलक। पितेक जोरपर तीन दिन अँटकल। मुदा किछु किनैक विचार छोड़ि देलक। मेहनतक कमाइ देख अपन इच्छाकेँ मनेमे दुनू भाँइ दाबि लेलक। मुदा तैयो भोला दुनू बेटाकेँ फुलपेन्‍ट, शर्ट, घड़ी, जुत्ता कीनि देलखिन। तीन मासक पछाइत‍‍ मैट्रिकक रिजल्ट निकलल। दुनू भाँइ, रतनो आ लालो प्रथम श्रेणीसँ पास केलक। फस्ट डिवीजन भेलोपर आगू पढ़ैक विचार मनमे नै अनलक। उपार्जन-ले सोचए लगल। नोकरीक भाँज-भुँज लगबए लगल। नोकरियो सबहक तँ वएह हाल। गामक-गाम पढ़ल बिनु पढ़ल नौजवानक फौज तैयार अछि। एक काज-ले हजार हाथ तैयार अछि। जइसँ समाजक मूल पूजी, मानवीय पूजी आगिमे जरैत सम्‍पैत जकाँ नष्ट भऽ रहल अछि। समए मोड़ लेलक। पढ़ल-लिखल नौजवान-ले नोकरीक छोट-छीन दरबज्जा खुजल। गामक स्कूलमे शिक्षा-मित्रक बहाली हुअ लगलै। जइसँ नव ज्योतिक संचार गामोक पढ़ल लिखल नौजवानमे भेल। ओना, समैक हिसाबसँ शिक्षा मित्रक मानदेय मात्र खोराकी भरि अछि मुदा बेरोजगारीक हिसाबसँ तँ नीक ऐछे। बगलेक गामक स्कूलमे रतनो आ लालोक बहाली भऽ गेलइ। पाँच तारीककेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करत। आगू नहि पढ़ैक दुख जेते दुनू भाँइक मनमे रहै तइसँ बेसी खुशी नोकरीसँ भेलइ। ओना, कोँपर सन बुधि‍मे कलुषताक मिसियो भरि आगमन नइ भेल छल। तथापि दुनू भाँइ बैस कऽ अपन परिवारक सम्बन्धमे सोचए-विचारए लगल। रतन लालकेँ कहलक- “बौआ, कोन धरानी बाबू अपना दुनू भाँइकेँ पढ़ौलैन से तँ देखले अछि। अपनो सभ एक सीमा धरि पहुँच गेल छी, तँए अपनो सबहक की दायित्व बनैए से तँ सोचए पड़तह?” रतनक बात सुनि लाल बाजल- “भैया, अपना सभ ओइ धरतीक सन्तान छी जइ धरतीपर श्रवण कुमार सन बेटा भऽ चुकल छैथ। पाँच तारीखसँ पहिने बाबूकेँ कलकतासँ बजा लहुन। हम सभ ठेलाबलाक बेटा छी, ऐमे कोनो लाज नै अछि। मुदा लाजक बात तहन हएत जहन ओ ठेला घिंचता आ अपना सभ कुरसीपर बैस दोसरकेँ उपदेश देबइ।” मुड़ी डोला स्वीकार करैत रतन बाजल- “आइए बाबूकेँ चि‍ट्ठी खसा दइ छि‍‍ऐन‍ जे पढ़ि‍ते गाड़ी पकैड़ घर चलि आउ। पाँच तारीखकेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करए जाएब। दुनू भाँइक विचार अछि जे अहाँकेँ गोड़ लागि घरसँ डेग उठाएब।” दुनू भाँइक विचार सुनिते माइक मन सुख-दुखक सीमानपर लसैक गेलैन। जरल घराड़ीपर चमकैत कोठा देखए लगली। आँखिमे नोर छि‍लैक एलैन। मुदा ओ दुखक नै सुखक...। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2572 जीविका शिवराति‍क प्रात। मध्य मास। डेढ़ मासक शीतलहरीमे सुरूज मरनासन्न भऽ गेल छला मुदा जीबैक नव शक्ति आबि गेलैन। तँए रौदमे धीरे-धीरे गरमी आबए लगल। चारि बजे भोरमे उमाकान्तक नीन टुटल। निन्न टुटिते देबाल घड़ीपर नजैर देलक। चारि बजैत। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल उमाकान्‍त अपन आगूक जिनगी दिस देखए लगल। ओना काल्हिए दिनमे दुनू मि‍त्र विचारि नेने छल जे दुनू गोरे टेम्पू कीनए भोरुके गाड़ीसँ दरभंगा जाएब। बदलैत जिनगीक संकल्प उमाकान्तक मनमे, किएक तँ जिनगी मनुखकेँ किछु करैले भेटैए। मनमे एलै, पाँच-पचपनमे गाड़ी अछि तँए पाँच बजे घरसँ निकलब। ओना अदहे घन्‍टाक रस्ता स्टेशनक अछि, मुदा किछु पहिनहि पहुँचब नीक। हलाँकी, कहियो कोनो गाड़ी अपना समैपर नहियेँ अबैए, एकाध घन्‍टा लेट रहिते अछि मुदा तइसँ हमरा की। हम समैपर जाएब। शुभ काज हरिदम समैसँ पहिनहि करैक कोशिश करक चाही। ..एते बात मनमे अबिते उमाकान्त ओछाइन छोड़ि उठि गेल। उठिते मनमे एलै, हमर ने नीन टुटि गेल मुदा जँ दोसक नीन नै टुटल होइ तहन‍‍ तँ गड़बड़ हएत। से नहि तँ पर-पैखाना जाइसँ पहिने ओकरो जा कऽ उठा दिऐ। फेर मनमे एलै, दतमैन करिते जाएब, एकटा काजो तँ अगुआएल रहत। ..हाथमे दतमैन लइते उमाकान्‍तकेँ मनमे एलै, किछु खा-पी कऽ घरसँ निकलब। रस्ता-बाटक कोन ठेकान। तहूमे लोहा-लक्कड़क सवारी। कखन नीक रहत कखन बगैद जाएत तेकर कोन ठेकान। एक बेर अहि‍ना भेल रहए कि‍ने। दरभंगे जाइत रही, मनीगाछी लोहनाक बीच रेलक इंजिन खराब भऽ गेलइ। भोरुके गाड़ी, तँए सोचने रही जे दरभंगे पहुँच‍ किछु खाएब-पीब। ले-बलैया! दू बजे तक गाड़ी ओतै अँटैक गेल! कखनो गाड़ीक डिब्बामे जा बैसी तँ कखनो उतैर कऽइंजिन लग पहुँच‍ ड्राइवरकेँ पुछिऐ। ओहू वेचाराक मन घोर-घोर भेल रहइ। हमहूँ आशा-बाटीमे रहि गेलौं। से जँ पहिने बुझितिऐ तँ गाड़ी छोड़ि बिदेसर चौकपर चलि जइतौं आ बस पकैड़ सबेर सकाल दरभंगा पहुँच‍ जइतौं। सेहो नै केलौं। तेकर फल भेल जे भूखे-पियासे खूब टटेलौं। तँए, बिनु किछु मुँहमे देने घरसँ नै निकलब। ..ई बात मनमे अबिते उमाकान्त पत्नीकेँ उठबैत कहलक- “जाबे हम दोस ऐठामसँ अबै छी, ताबे अहाँ चारिटा रोटी आ अल्लूक भुजिया बना लेब।” कहि उमाकान्त शोभाकान्तक ऐठाम दतमैन करैत विदा भेल। दाँतमे घुस्सो दिअए आ मने-मन वि‍चारबो करए, काजे एहेन छी जे मनुखकेँ मनुखो बनबैए आ जानवरो। ओना, दुनियाँक सभ मनुख तँ किछु-ने-किछु करिते अछि। मुदा कियो देव बनि जाइए तँ कियो दानव। तँए काजकेँ परखब सभसँ मूल बात छी...। शोभाकान्त ऐठाम पहुँचते उमाकान्त रस्तेपर सँ बोली देलक- “दोस छेँ रौ, रौ दोस?” ओछाइनपर सँ उठैत शोभाकान्त बाजल- “हँ दोस, छिऐ रौ, हमरो नीन टुटले अछि। अखन तँ अन्हारे छइ।” उमाकान्त- “सबा चारि बजै छइ। तैयार होइत-होइत पाँच बजिए जाएत। कनी पहिले स्टेशन जाएब।” उमाकान्त आ शोभाकान्त एक्के बतारी। दुनूमे उमेरक हिसाबसँ के छोट आ के पैघ, से तँ ने अपने दुनू गोरे बुझए आ ने कियो टोले-पड़ोसक। किएक तँ टिप्‍पैन दुनूमे सँ केकरो नहि। बच्चेसँ दुनू गोरे बेसी काल एक्केठाम रहैत तँए समाजोक लोक बिसैर गेल। दुनू गोरेक माइयो-बाप मरिये गेल, आन मोने किएक राखत। मुदा दुनू गोरे ऐ मौकाक लाभ उठबैत। लाभ ई उठबैत जे दुनू एक-दोसराक स्‍त्रीसँ हँसी-चौल करैत। तइले दुनूमे सँ केकरो मलाल नहि। मुदा गामक बुढ़ो-बुढ़ानुस आ नवकियो कनियाँ, दुनू स्‍त्रीगणकेँ निरलज कहैत। किन्‍तु तेकर गम दुनूमे सँ केकरो नहि। किएक तँ सभ स्‍त्रीगणकेँ होइत जे अधिक-सँ-अधिक पुरुखक संग गप-सप्‍प-हँसी-मजाक हुअए। बच्चेसँ उमाकान्त आ शोभाकान्त एक्केठाम गुल्लियो-डण्‍टा खेलए आ गामेक स्कूलमे पढ़बो करए। बच्चामे दुनू गोरे दुनूकेँ नामे धऽ-धऽ बजैत। मुदा चेष्टगर भेलापर, कनगुरिया ओंगरीमे ओंगरी भिरा दोस्ती लगा लेलक। मिडिल तक गामेक स्कूलमे संगे पढ़बो केलक। मुदा हाइ स्कूलमे उमाकान्तेटा नाओं लिखेलक। शोभाकान्त गरीब, तँए पढ़ाइ छोड़ि देलक। मुदा उमाकान्तकेँ दू-तीन बीघा खेतो आ पितो गामेक स्कूलमे नोकरी करैत। ओना शोभाकान्त उमाकान्तसँ बेसी चरफरो आ पढ़ैयोमे नीक। तँए अपना क्लासक मेटगीरी सेहो करैत। मुनीटरक बात शिक्षको अधिक मानैथ‍ आ चट्टियाक बीच धाखो। ..पढ़ाइ छोड़ला पछाइत‍‍ शोभाकान्त नोकरी करए पटना गेल। गामसँ तँ यएह सोचि निकलल जे जएह काज भेटत सएह करब। मुदा रस्तामे वि‍चार बदैल गेलइ। विचार ई बदललै जे ने चाहक दोकानमे नोकरी करब आ ने होटलमे, ने कोठीमे काज करब आ ने ताड़ी-दारूक दोकानमे। अगर जँ नोकरी नै हएत तँ रिक्शे चलाएब वा मोटिये-मे काज करब। सरकारी नोकरीक तँ कोनो आशे नहि, किएक तँ उमेरो नइ भेल हेन। गामसँ शहर शोभाकान्त पहिले-पहिल पहुँचल। मुदा जे आकर्षण शहर-बजार देख लोककेँ होइ ओ आकर्षण शोभाकान्तकेँ नइ भेलइ। जहिना सोना-चानीक दोकान दिस गरीबक नजैर नै पड़ैए, तहिना। स्टेशनसँ उतैर शोभाकान्‍त उत्तर-मुहेँक रस्ता धेलक। कोठा-कोठीपर नजैर पड़बे ने करइ। किछु दूर गेलापर एकटा साइकिल मिस्‍त्रीक दोकान देखलक। रस्तापर ठाढ़ भऽ दोकान हियासए लगल। दोकानदारोक नजैर पड़लै। शोभाकान्तपर नजैर पड़िते दोकानदारक मनमे एलै जे छोटो-छोटो काजमे अपने बरदा जाइ छी जइसँ नमहरकाज पछुआ जाइए। से नहि तँ ऐ बच्चाकेँ पुछिऐ जे नोकरी रहत। जँ रहत तँ रखि‍ लेब। ..हाथक इशारासँ हाक पाड़ि‍ मिस्‍त्री पुछलक- “बाउ, की नाओं छी? “शोभाकान्त।” “केतए घर छी?” “मधुबनी जिला।” “केतए जाएब?” “नोकरी करए एलौं।” “ऐठाम रहब?” “हँ। रहब।” जहिना अतिथि-अभ्यागतकेँ दुआरपर अबिते घरवारी लोटामे पानि आनि आगूमे दैत, खाइक आग्रह करैत तहिना शोभाकान्तकेँ मिस्‍त्री केलक। आठ-अना पाइ दऽ आँगुरक इशारासँ मुरही-कचड़ीक दोकान देखबैत कहलकै जे ओइ दोकानसँ जलखै केने आउ। ..झोरा रखि‍ शोभाकान्त विदा भेल। ओना गाड़ीक झमारसँ देहो-हाथ दुखाइत रहै आ भूखो लगलै रहइ। किन्‍तु नोकरी पाबि देहक दरदो आ भूखो कमए लगलै। खाएर.., मुरही-कचड़ीक दोकानपर बैसते शोभाकान्‍तकेँ बगे-बाणि देख दोकानदार पुछलकै- “बौआ, अहाँक घर केतए छी?” “मधुबनी जिला।” “गामक नाओं कहू।” “लालगंज।” “हमरो घर तँ अहाँक बगलेमे अछि, रूपौली। बीस-पच्चीस बर्खसँ हम ऐठाम रहै छी।” बिनु पाइ नेनहि दोकानदार शोभाकान्तकेँ भरि पेट खुआ देलक। खा कऽ शोभाकान्त साइकिल दोकानपर आबि मिस्‍त्रीकेँ पाइ घुमबैत कहलक- “दोकानदार पाइ नै लेलक।” मुदा गहिंकी सबहक भीड़ दुआरे मिस्‍त्री आगू किछु नइ पुछलक। पंचर साटब, छोट-छोट भंगठी केनाइसँ शोभाकान्त अपन जिनगी शुरू केलक। छोट-छोट काज भेने दोकानदारोकेँ आगू बढ़ैक अवसर हाथ लगलै। साइकिल, रिक्शाक संग मोटर साइकिल आ टेम्पूक मरम्मत केनाइ सेहो शुरू केलक। ..शोभाकान्तोकेँ मौका भेटलै। उपार्जनक लूरि‍ आबए लगलै। दुनियाकेँ बिसैर रिंच-हथौरीमे मगन भऽ गेल। छह मास बितैत-बितैत शोभाकान्त साइकिल-रिक्शाक मिस्‍त्री बनि गेल, संगे मोटर साइकिल आ टेम्पू चलौनाइ सेहो सीखि लेलक। मेहनत‍ केने शरीरो फौदा गेलइ। साले भरिमे जवान भऽ गेल। ड्राइवरीक लाइसेंस शोभाकान्त बना लेलक। लाइसेंस बनैबते शोभाकान्तक मनमे द्वन्‍द उत्पन्न हुअ लगलै जे ड्राइवरी करी आकि अपन दोकान खोलि मि‍स्‍त्रियाइ। मुदा अपन दोकान खोलैले घर भाड़ाक संग मरम्मत करैक समानो लिअ पड़त। फेर मनमे एलै, एक तँ मेन-रोडमे घर नइ भेटत, दोसर पैयो ओते नइए जे समानो कीनब। तइसँ नीक जे ड्राइवरीए करी। सएह केलक। ड्राइवरीमे दरमहो नीक आ बाइलियो आमदनी। महि‍ना दिन तँ अ-बेवस्थिते रहल मुदा दोसर मास बितैत-बितैत असथिर भऽ गेल। दरमाहा जमा करए लगल आ बाइली आमदनी घर पठबए लगल। साल भरिक दरमाहासँ शोभाकान्त टेम्पू कीनि लेलक आ अपन सभ समान ओहीपर लादि सोझे गाम चलि आएल। सेकेण्ड डिवीजनसँ उमाकान्त बी.ए. पास केलक। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम मुदा ओहूसँ कम नोकरी। खेती-पथारी आ कारोबार कियो पढ़ल-लिखल करए नइ चाहैत। जइसँ गाम-सबहक दशा दिनो-दिन पाछुए-मुहेँ ससरैत। गामक लोको तेहने जे पढ़ल-लिखल लोककेँ खेती करैत देख दिल खोलि कऽ हँसबो करैत आ लाख तरहक लांछना सेहो लगबैत। जइसँ गामक पढ़ल-लिखल लोककेँ नोकरी करब मजबूरी भऽ जाइत। नोकरीक भाँजमे उमाकान्त दौग-धूप करए लगल। मुदा मनमे संकल्प रखने जे घूस दऽ कऽ नोकरी नै करब। चाहे नोकरी हुअए वा नहि। दौग-धूपसँ मन विचलित हुअ लगलै, संकल्प डोलए लगलै, मनमे अनेको प्रश्‍न औंढ़ मारए लगलै। कखनो-कखनो मनमे होइ जे पाँच कट्ठा खेत बेच कऽ नोकरी पकैड़ लेब। मुदा फेर मनमे होइ जे जहन‍‍ घूस दऽ कऽ नोकरी लेब तँ घूस लऽ कऽ लोकक काज किए ने करबै।फेर मनमे होइ जे तहन‍‍ जिनगी केहेन हएत? अछैते जीबने मुर्दा बनल रहब। लोक शरीर तियागक पछाइत‍‍ मृत्यु धारण करैए आ हम जीवितेमे मरल रहब। फेर मनमे एलै, पत्नी तँ जीवन-संगिनी छैथ‍ तँए एक बेर हुनकोसँ पुछि लिऐन। उमाकान्‍तक मनमे शान्ति एलै, पत्नी लग जा पुछलक- “बिनु घूस-घासक नोकरी भेटब कठिन अछि, से अहाँक की‍ विचार?” मुस्‍कियाइत पत्नी कहलकैन- “आइक जुगमे नोकरी भेटब जिनगी भेटब छी, तँए हमरो गहना-जेबर अछि आ जँ ओइसँ नै पुरए तँ थोड़े खेतो बेच कऽ नोकरी पकैड़ लिअ। देखते छिऐ जे साले भरिमे लोक की-सँ-की कए लइए।” एक तँ ओहिना उमाकान्तक मन घोर-घोर होइत रहै, तैपर सँ पत्नीक बात आरो मरनासन्न बना देलकै। जिनगीक आशा टुटए लगलै। आँखिक रोशनी क्षीण हुअ लगलै। आशाक ज्योति केतौ बुझिए ने पड़इ। जहिना अन्हारमे सगतैर भूते-प्रेत, चोरे-चहार आ साँपे-छुछुनैर बुझि पड़ैत तहिना उमाकान्तकेँ हुअ लगलै। मुदा डुमैत जिनगीक आशामे कनी टिमटिमाइत इजोत बुझि पड़लै। इजोत अबिते शक्तिक संचार हुअ लगलै। मनमे संकल्पक अंकुर अंकुरित हुअ लगलै। जइसँ दृढ़ताक उदए सेहो हुअ लगलै। मने-मन विचार करए लगल, जिनगीक किछु लक्ष्य हेबा चाही। मनुख तँ चुट्टी-पिपड़ी नहि ने छी जे साधारण केकरो पएर पड़लासँ मरि जाएत। मनुख तँ व्रह्मक अंश छी, जइमे विशाल शक्ति छिपल छइ। जिनगीमे अहि‍ना हवा-बिहाड़ि अबै छै तइसँ की मनुख मनुखता गमा लेत। मनुखते तँ मनुखक धरोहर सम्‍पैत छी। जेकरा लोक ओहिना केतौ फेक देत? कथमपि नहि..! उमाकान्‍तक मनमे उठलै। मने-मन तँइ केलक जँ हमरा नोकरी नइ भेटत तँ की हाथपर हाथ दऽ कऽ बपहारि काटब? एते कमजोर छी? की हमरामे मनुखक सभ गुण मरि चुकल अछि, हमरा बुते किछु कएल नै हएत? जरूर हएत..! नोकरी दिससँ नजैर हटा उमाकान्त राशनक दोकान चलबैक विचार केलक। विचार ऐ दुआरे केलक जे जीबैले अर्थक उपार्जन जरूरी होइत। जिनगीक अधिकांश काज अर्थेसँ चलैत, तँए बिनु अर्थे जिनगी जिनगी नै रहि जाइत। हँ ई बात जरूर जे अर्थक उपार्जन आ उपयोगक ढंग नीक हेबा चाही। राशनक दोकानक जरूरत‍ सभ गाममे ऐछे, सरकार आ समाजक बीचक कड़ी सेहो छी। ओना डीलरीक लाइसेंसो बनबैमे पाइयेक खेल चलैए। मुदा तैयो जी-जाँति कऽ उमाकान्त लाइसेंस बनबै दिस बढ़ल। डीलरीक लाइसेंस बनौला पछाइत‍‍ उमाकान्त समान उठबैसँ पहिने मिश्रीलालसँ कारोबारक तौर-तरीका बुझैले गेल। मिश्रीलाल पुरान डीलर। मुदा जहिना गाममे अपन इज्जत बनौने तहिना सरकारियो ऑफिसमे। इज्जत बनबैक अपन तरीका मि‍श्रीलालक। तँए ब्लौकक पैंतालिसो डीलर मिलि मिश्रीलालकेँ यूनियनक सेक्रेट्री बनौने। जहिना सभ डीलर मिश्रीलालकेँ मानैत तहिना मिश्रीलालो सभकेँ। ..यएह बुझि उमाकान्त भेँट करब आवश्यक बुझलक। मिश्रीलाल ऐठाम उमाकान्त पहुँचल तँ देखलक जे चारि-पाँचटा धिया-पुता रजिस्टरपर दसखतो करैए आ निशानो लगबैए। किएक तँ पैछला मासक समान बँटबारा भऽ गेल छेलै, तँए बिनु रजिस्टर तैयार भेने ऐगला समान थोड़े उठत। जरूरी काज बुझि मिश्रीलाल मगन भऽ अपन काज करैत। ..उमाकान्तकेँ देखते मिश्रीलाल रजिस्टरक बि‍च्‍चेमे, जइ पेजमे निशान आ हस्ताक्षर करबैत रहए, तही पेजमे पेनो आ कार्बनो रखि‍ मोड़ैत बेटाकेँ कहलक- “बौआ, चाह बनबौने आबह?” उमाकान्त दिस होइत पुछलक- “किमहर किमहर एनाइ भेलै बौआ।” निर्विकार भऽ उमाकान्त बाजल- “भैया, अहाँ पुरान डीलर छी। डीलरीक सभ कि‍छु जनै छिऐ। बी.ए. केला पछाइत‍‍ हम दू साल नोकरीक पाछू वौएलौं मुदा केतौ गर नै धेलक। आब तँ नोकरीक उमेरो ओराएले जाइए, तँए नोकरीक आशा तोड़ि डीलरीक लाइसेंस बनेलौं हेन।” नोकरीक गर नै लागब सुनि मिश्रीलाल पुछलकै- “बौआ, जहिना कोनो परिवारमे चारि-पाँच भाँइक भैयारी रहैए। सभ कि‍छु शामिले रहै छइ, मुदा सभ भाँइक पत्नीकेँ अप्पन-अप्पन सम्‍पैत‍ सेहो छइ, जइमे भाइयो सभ चोरा-नुका शामिल भऽ जाइए, जेकर फल होइ छै घरमे आगि लागब, तहिना नोकरियो सभमे भऽ गेल अछि। जे कुरसीपर अछि ओ अपने सार-बहनोइक जोगारमे रहैए। कहीं केतौ बिकरियो होइ छइ। जेकर परिणाम बनि गेल अछि जे नोकरी केनिहारोक वंश बनि गेल अछि। देशक विकास केहेन अछि से तँ तूँ पढ़ले-लिखल छह, सभ कि‍छु जनिते छहक। जँ कनी-मनी एक रत्ती आगूओ बढ़ि रहल अछि तँ ओइसँ बेसी ओइ नोकरिहाराक वंशमे नोकरी केनिहार बढ़ि रहल अछि। तँए देखबहक जे डाक्टरेक बेटा डाक्टर बनत। इंजीनियरेक इंजीनियर। केते कहबह। जे जेतै अछि ओ बपौती बुझि ओकरा पकड़ने अछि। तैबीच तेसरकेँ जे गति हेबा चाही सएह तोरो भेलह। तहूसँ बेसी जुलुम अछि जे किछु गनल-गूथल लोक अछि जे नोकरियो करैए, खेतो हथियौने अछि आ जे कोनो सरकारी योजना बनै छै ओकरो हड़पैए। जइसँ देखबहक जे केकरो सम्‍पैत‍ राइ-छित्ती होइ छै आ कियो सम्‍पैत‍-ले लल्ल अछि।” उमाकान्त- “भैया, दुनियाँ-दारीक गप छोड़ू। अपना काजक विषयमे कहू।” मिश्रीलाल- “बौआ, अखन तूँ जुआन-जहान छह। मुदा जे काज करि कऽ अपना जीबए चाहै छह ओ गलती भेलह। तोरा सन आदमीकेँ डीलरी नइ करक चाही। हम तँ सभ घाटक पानि पिनाइ सीखि नेने छी। की नीक की अधला से बुझिते ने छिऐ। बुझह तँ नढ़ड़ा-हेल हेलै छी, तँए हमर कारबार ठीक अछि। मुदा तोरा बुते नै हेतह। उमाकान्त- “किए?” तैबीच चाह आएल। दुनू गोरे हाथमे गिलास लेलक। एक घोंट चाह पीब मिश्रीलाल बाजला- “देखहक, डीलरी दू दुनियाँक सीमा परहक काज छी। एक दिस सत्ताक दुनियाँ अछि आ दोसर दिस आम लोकक। गड़बड़ दुनू अछि।” उमाकान्त- “से की?” मिश्रीलाल बुझबैत बजला- “पहिने पब्लिकेक बात कहै छिअ। राशनक वस्तु चीनी-मटियातेल तँ हिसाबेसँ भेटैए। नामे छिऐ कोटा। जँ मनमाफित भेटैत तँ खुल्ला बजार रहितै, से तँ नइ अछि। गाममे किछु एहेन-एहेन रंगबाज सभ बनि गेल अछि जेकरा खाइ-पीबैले नै देबहक तँ भरि दिन अपनो आ अनको उसका-उसका रग्गड़े करैत रहतह। रग्गड़केँ तँ कोनो सीमा नै होइ छइ। जँ कहीं गोटे दिन लाठीए-लठौवैल भऽ जेतह तहन‍ तँ लेनीक देनी पड़ि जेतह। दू पाइ कमाइले धन्‍धा करबह आकि कोट-कचहरीक फेड़मे पड़बह। बुझिते छहक जे कोट-कचहरी लोकेक पाइपर ठाढ़ अछि। ओइ साला रंगबाज सभकेँ की अछि। अपने किछु करतह नइ आ अनका काजमे हरिदम टाँगे अड़ौतह। गामक उत्पातसँ लऽ कऽ थाना-पुलिस, कोट-कचहरीक दलाली भरि दिन करैत रहतह। आब तोंही कहह जे बरदाश हेतह? नीक लोक-ले ऐ दुनियाँमे केतौ जगह नइ अछि। ओइ साला सभकेँ की छै, भरि दिन ताड़ी-दारू पीब ढहनाइत रहैए। ने छोट-पैघक विचार छै आ ने गारि-मारिक। तैपर सँ पंचायतक मुखियो आ वार्डो-मेम्बर सभकेँ कमीशन चाहबे करिऐ। पब्लिको तेहने अछि। देखबहक जे केतेक एहेनो परिवार अछि जेकरा कोटाक वस्तुक जरूरत‍ नइ छै जेना चीनी। मुदा ओहो कोटासँ चीनी उठा दोकानमे किछु नफा लऽ कऽ बेच लइए। जहन कि किछु परिवार एहेनो अछि जेकरा कोटाक वस्तुसँ खर्च नै पुरै छइ। अपनो आँखिसँ देखबहक जे दस-बीस कप चाह आने पीबै छइ। की ओकरा सभकेँ फाजिल नै देबहक? जखने एक गोरेकेँ फाजिल देबहक तँ दोसराक हिस्सा कटबे करत। एहेन स्थितिमे डीलरे की करत। आखिर ओहो तँ समाजेक लोक छी किने...।” उमाकान्त- “सभ गोरे तँ कोटा उठैबतो नै हेतइ?” मिश्रीलाल- “हँ, सेहो होइए। मुदा ओ तहन‍‍ होइए जहन‍ कोटाक वस्तुक दाम आ खुल्ला बजारक दाममे अन्तर नै रहैए। मुदा जहन‍ दुनूक दाममे अन्तर रहैए तहन‍‍ जेकरो ने अपना पाइ रहै छै ओहो दोकानदार सभसँ अदहा-अदही नफापर पाइ लऽ कऽ समान उठा लइए आ बेच लइए। तेतबे नहि, ओहो चाहतह जे किछु फाजिले कऽ समान भेटए।” मुँह बिजकबैत उमाकान्त बाजल- “तब तँ बड़ ओझरी अछि।” उमाकान्तक सोचकेँ गहराइ दिस जाइत देख मुस्‍कियाइत मिश्रीलाल- “बौआ, एतबेमे छगुन्ता लगै छह। ई तँ एक दिसक बात कहलियह। अहूमे केते ओझरी छुटिए गेलह। जँ सेरिया कऽ सभ बात कहबह तँ सैंकड़ो ओझरी आरो अछि। आब सुनह ऑफिस, बैंक आ एफ.सी.आइ. गोदामक सम्बन्धमे। दौग-बरहा जे करए पड़तह ओकरा छोड़ि दइ छिअ। किएक तँ मोटा-मोटी यएह बुझह जे एक दिनक काजमे पनरहो दिनसँ बेसीए लगतह। जइमे समैक संग पच्चीस-पचास पौकेटो खर्च हेबे करतह।” उमाकान्त- “तब तँ बड़ लफड़ा अछि?” मिश्रीलाल- “लफड़ा की लफड़ा जकाँ अछि। जखने ब्लौक पएर देबहक आकि गीध जकाँ चारू-भरसँ अफसरसँ लऽ कऽ चपरासी धरि, नोंचए लगतह। कियो कहतह जे चाह पिआउ तँ कियो कहतह पान खुआउ। कियो कहतह सिगरेट पियाउ तँ कियो मिठाइ खुआउ। सुनि-सुनि मन मौहुरा जेतह। मुदा की करबहक। भीखमंगोसँ गेल-गुजरल चालि देखबहक। जेना अपना दरमाहा भेटते ने होइ। मुदा डीलरे की करत। अगर जँ सभकेँ खुशी नै राखत तँ काजे लटपटेतै। काजो तेहेन अछि जे एक्के टेबुलसँ नै होइ छइ। जेते टेबुल तेते खर्च। ..अखन हमहू औगताएल छी तँए नीक-नहाँति नै कहि सकबह। देखते छहक जे रजिस्टर तैयार करै छी, ब्लौक जाएब। मुदा तैयो एक-दूटा बात कहि दइ छिअह। सबहक तड़ी-घटी ने हम बुझै छिऐ।” उमाकान्त- “कनी-कनी सबहक बात कहि दिअ?” मिश्रीलाल- “औगताएलमे की सभ बात मनो पड़ै छइ। मुदा जे मन पड़ैए से कहि दइ छिअ। पहिने बैंकक सुनह। कोरियापट्टीमे दुनियाँलाल डीलर अछि। वेचारा बड़ मुँहसच्‍च। जहिना-जहिना समान बिकाएल रहै तहिना-तहिना पाइ रखने रहए। खुदरा समानक बिकरी तँए खुदरा पाइ। ऐगला कोटा-ले जहन‍‍ बैंकमे जमा करए गेल तँ खुदरा पाइ देख बैंकमे लेबे ने केलकै। कहलकै जे ओते हमरा छुट्टी अछि जे भरि दिन तोरे पाइ गनैत रहब। ..भरि दिन वेचारा छटपटा कऽ रहि गेल। बैंकसँ निकलबो ने करए जे पौकेटमार सभ ने कहीं पाइ उड़ा दिअए। दोसर दिन आबि कऽ हमरा कहलक। तामस तँ बड़ उठल। किएक तँ जेना मोटका पाइ सरकारक होइ आ खुदरा नहि! जहन‍‍ पाइयेक लेन-देन बैंकमे होइ छै तँ गनैले स्टाफ राखह। मुदा की करितिऐ। दोसर दिन गेलौं। मनेजरकेँ कहलिऐ। तहन‍‍ दू प्रतिशत कमीशनपर फरियाएल। आब तोंही कहह जे ई दू प्रतिशत कोन बिलमे चलि गेल? तहिना दोसर बात लएह- सप्लाइ इन्सपेक्टरक। इन्सपेक्टरक बदली भेल। नव इन्सपेक्टर बुझि पनरह-बीसटा डीलर ओकरा पाइ नै देलकै। ओना पचास रूपैए प्रति डीलर प्रति मास इन्सपेक्टरकेँ दइए। सभकेँ मनमे भेलै, नव हाकिम छैथ‍ तँए छह मास तँ इमानदारी रखबे करता। ले-बलैया! जहाँ डीलर दोसर कोटाक सभ समान उठौलक आकि पराते भेने बिसनाथ डीलर ऐठाम पहुँच‍ गेल! बिसनाथोकेँ कोनो डर मनमे नहि। किएक तँ समान ओहिना पड़ल छेलइ। घरपर अबिते इन्सपेक्टर चीनी काँटा करैले बिसनाथकेँ कहलकै। बिसनाथो तैयार भऽ काँटा करए लगल। पाँचो बोरा मिला कऽ चौदह किलो चीनी कमि गेलइ...।” बि‍च्‍चेमे उमाकान्त- “किए, चीनी तौल कऽ नइ नेने रहइ?” मिश्रीलाल- “ई एफ.सी.आइ. गोदामक खेल छि‍ऐ। एफ.सी.आइ. गोदाम तँ ब्लौके-ब्लौके ने अछि। तँए देखबहक जे डीलर सबहक नम्‍मरलगल अछि। सभकेँ औगताइ करैत देखबहक। किएक तँ अपन टाएर गाड़ी तँ सभ डीलरक रहै नइ छइ। अधिक डीलर भड़ेपर गाड़ी लऽ जाइए। तँए मनमे होइत रहै छै जे जेते जल्दी समान हएत तेते कम भाड़ा लगत, तँए कियो समान तौलबैत नै अछि। हँ, जँ कियो पच्चीस रूपैए बोरा मनेजरकेँ दऽ देने रहलै ओकरा तँ नीक समानो आ पुरल बोरो देलक आ जे पाइ नै देने रहल ओकरा समानो दब आ घटल बोरो देलक। चोर-पर-चोर अछि!” क्षुब्ध होइत उमाकान्त बाजल- “हद लीला सभ अछि।” मिश्रीलाल- “आब मार्केटिंग अफसर एम.ओ.क बात सुनह। अखुनका जे एम.ओ. अछि ओ पिआक अछि। ओना काज करैमे भुते अछि। रस्तो-बाटमे मोटर साइकिल लगा फाइलपर लिखि दइए, मुदा ओहिना नहि। पहिले एक बोतल पिआ देबहक, तखन‍।” उमाकान्त- “अफसर भऽ कऽ रस्ता-बाटपर बोतल पीबैए?” ठहाका मारि हँसि मिश्रीलाल- “बौआ, तूँ गाम-घरक बात बुझै छहक। गाम-घरमे जे छोट-पैघ आकि इज्जत-आबरूक विचार अछि ओ केतए पेबह। मुदा तैयो ओकरामे दूटा गुण जरूर छइ। पहिल गुण छै जे आन कोनो स्‍त्रीगण दिस नै तकैए। आ दोसर गुण छै जे केकरोसँ एक्को पाइ नै लइए। मुदा ऐसँ पहिलुका एम.ओ. जे रहए ओ भारी पइ-खौक। सभ काजक रेट बनौने रहए। जे सभ बुझइ। तँए जेकरा जे काज रहै ओ ओइ हिसाबसँ पाइ दऽ दइ आ लगले काज करा लिअए।” मुस्‍कियाइत उमाकान्त- “तब तँ पक्का नटकिया सभ अछि।” मिश्रीलाल- “नटकिया कि‍ नटकिया जकाँ अछि। रंग-बिरंगक चोर सभ पसरल अछि। कियो धनक चोर अछि तँ कियो धर्मक। कियो बुधिक चोर अछि तँ कियो विवेकक। केते कहबह। तेसराक सुनह। अन्‍दाज करीब पचपन छप्पन बर्खक उमेर ओकर रहइ। मुदा फीट-फाटमे जुआनक कान कटैत। जेहने हीरोकट कपड़ा पहिरैत तेहने हिप्पीकट केश रखैत। रंग-बिरंगक तेल आ सेंट लगबै। हरिदम ऊपरका जेबीमे ककही देखबे करितहक। रातियोमे कएक बेर केश सीटइ। चौबीस घन्‍टामे दू बेर दाढ़ी बनबै। ओ एम.ओ. भारी नरचोप, जेहने अपने तेहने बहुओ। दिन भरिमे पच्चीसो बेर कपड़ा साड़ी-ब्लाउज आ जूत्ता-चप्पल बदलै। केशमे केते रंगक क्लीप लगबै तेकर ठेकान नहि। भरि दिन रिक्शापर ऐ डेरासँ ओइ डेरा आ ऐ बजारसँ ओइ बजार घुमिते रहै छल। संयोगो ओकरा नीक भेटलै। एक्के बेर बी.डी.ओ., सी.ओ.क बदली भऽ गेलइ। ओकरे दुनू गोरे चार्ज दऽ कऽ गेल। ओही बीच शिक्षा मित्रक भेकेन्सी भेल। लड़की सभकेँ आरक्षण भेटलै। जइमे जाति प्रमाणपत्रक जरूरत‍ पड़इ।” अपसोच करैत मि‍श्रीलाल आगू बाजल- “बौआ की कहबह, ओइ सालाक डेरा बेश्यालय बनि गेल! कखनो ब्लौक ऑफिसमे नै बैइसै। जहन‍‍ बैसबो करै तँ आन-आन कागत देखै मुदा एक्कोटा जाति प्रमाणपत्रपर हस्ताक्षर नै करइ।” बिच्‍चेमे उमाकान्‍त बाजल- “परिवारक कियो किछु ने कहइ?” “स्‍त्रीक विषयमे तँ कहिए देलियह। जेठकी बेटी बी.ए.मे पढ़ैत रहइ। ओकरो चालि-ढालि बापे-माए जकाँ। कौलेजेक एकटा छौंड़ा जे आदिवासी क्रिश्चन छल तेकरा  संग भागि‍ गेल।” उमाकान्त- “बाप-माएकेँ लाज नइ भेलइ?” “लाज तँ तेहेन भेलै जे राता-राती ऐठामसँ भागल।” “अहूँकेँ बहुत काज अछि आ हमरो मन भरि गेल। आखिरीमे एकटा बात बुझा दिअ।” मिश्रीलाल- “की?” उमाकान्त- “अहाँ केना अप्पन प्रतिष्ठा समाजो आ ऑफिसोमे बना कऽ रखने छी?” मिश्रीलाल मुस्‍कियाइत- “समाजमे जेकरा ऐठाम सराध, बिआह, उपनैन, मूड़न, भनडारा वा आन कोनो तरहक काज होइ छै तँ ओकरा हम जरूर चीन्नियोँ आ मटियो तेलक पूर्ति कैये दइ छिऐ। भलेँ अपना लग नहियोँ रहल तैयो जेतए-तेतएसँ आनि पुराए दइ छिऐ। जइसँ समाजक सभ खुशी रहैए। ऑफिसक बात तँ पहिने कहि देलियह।” उमाकान्त- “हमरा की करक चाही? किएक तँ जइ हिसाबे अहाँ कहलौं तइसँ हम्मर मन भटैक रहल अछि।” मिश्रीलाल- “बौआ, जहन‍‍ लाइसेंस बना लेलह तहन‍‍ कम-सँ-कम एक खेप समान उठा कऽ बाँटि लएह। जइसँ समाजोक चालि-ढालि आ ऑफिसोक चालि-ढालि देख लेबहक। बेवहारिक ज्ञान भऽ जेतह। बेवहारिके ज्ञान असली ज्ञान छिऐ। अखन हम एते मदैत जरूर कऽ देबह जे तोरा केतौ अड़चन नै हेतह। मुदा दोसर खेपक भार हम नै लेबह। किएक तँ बुझिते छहक जे बिलाइ जे मूससँ दोस्ती करत तँ खाएत की? तोरो सीखैक अवसर भेट जेतह।” उमाकान्त- “बड़बढ़ियाँ! जहिना अहाँ कहलौं तहिना करब।” मिश्रीलाल- “बाउ, आब तँ हम बुढ़ भेलौं। जहिया हम सोल्‍हे बर्खक रही तहिए-सँ डीलरी करै छी। मुदा पहिलुका आ अखुनकामे अकास-पतालक अन्‍तर भऽ गेल अछि। जेते धन आ शिक्षाक प्रसार भेल जा रहल छै ओते घटिया मनुख सेहो बढ़ि रहल अछि। पहिने इमानदार लोक बेसी छल मुदा आब आँगुरपर गनए पड़तह। हम तँ डीलरीमे रमि गेलौं। सभ घाटक पानि पिनाइ सीखि नेने छी तँए नीक छी।” उमाकान्त- “चलैत-चलैत किछु..?” “जहिना आमक गाछ होइ छै जे आमक आँठीसँ जनमैए तहिना तँ मनुखोक होइ छइ। दुनियाँमे जेते मनुख अछि, सभ तँ मुरूखे भऽ कऽ जन्‍म लइए। मुदा ऐठाम जेकरा जेहेन परिवार, समाज आ वातावरण भेटै छै ओ ओहेन बनैए। जहिना आमक छोट-छोट सरही गाछकेँ नीक-नीक कलमी आमक गाछक डारिमे बान्हि कलम लगा नीक-नीक आम बनौल जाइए। तहिना मनुखोक होइत। मुदा नीक परिवार, नीक समाज ऐछे केतेक। अधिकांश तँ गेले-गुजरल अछि। ने सभकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छै आ ने नीक बात-विचार। तहन‍‍ नीक मनुख बनत केना? जाधैर नीक मनुख नै बनत ताधैर नीक समाज केना बनत? तहन‍‍ तँ जएह अछि तइमे अपनाकेँ जेते नीक बना जीब सकी, वएह संतोखक बात। तहूँ अखन सादा कागत जकाँ साफ छह, तँए हम चाहब जे गन्दा नै हुअ। जेहेन विचार, हाथ होइत कर्म बनि‍ निकलतह तेहेन जिनगी हेतह। कियो शरीरांतकेँ मृत्यु बुझैए आ कियो आत्माक हननकेँ। मनुखमे असीम शक्ति छिपल छै,ओकरा जगबैक अछि, जे हमहूँ सेरिया कऽ नहियेँ बुझै छिऐ।” जहिना तेज हथियार हाथमे एलासँ सक्कत-सक्कत वस्तु काटैक हूबा बनि जाइत तहिना उमाकान्तोकेँ भेल। विचार केलक जे आब बैलगाड़ीक जुग नइ रहल। मशीनक जुग आबि गेल तँए हमहूँ अपना हाथसँ इन्जिने चलाएब। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 3655 रिक्‍शाबला “ओ रिक्शा, ओ रिक्शा।” कनी फरिक्केसँ जीबछ जोरसँ बाजल। हाथमे बम्बैया बैग, जिन्स पेन्ट आ शर्ट पहिरने, दहिना हाथमे चौड़गर घड़ी। फुल जुत्ता, मौजा सेहो लगौने। बम्बैए हिप्पी कट केश,बुच्चा मोछ आ आँखिपर चश्मा। रिक्शाबला-बचनू अपन ताशक संगीक संग ताश खेलैत। ताशो ओहिना नइ खेलैत, एक सेटपर चारू गोरेक चाह-पानक खर्च, हारलाहा पार्टीकेँ देबए पड़ैत। पाँचटा लाल बचनूक जोड़ाकेँ, तँए एक्केटा सेठ होइमे बाँकी। मात्र एकटा लाल हएत, चाह-पानक जोगार लगि जाएत। तँए एकाग्र भऽ बचनू लालक पाछू दिमाग लगौने। ..ताशक चौखरी लग आबि जीबछ दुइभेपर बैग रखि‍ रूमालसँ मुँह लग होंकए लगल। कनी काल होंकि रिक्शाबलाकेँ चरियबैत कहलक- “हौ भाय, हमरा बहुत दूर जाइक अछि, झब-दे चलह?” ताशपर सँ नजैर उठा, जीबछ दिस देख बचनू बाजल- “भाय, केहेन सुन्दर ठंढा छै, कनी सुसता लएह। तोरो देखै छिअ जे पसीनासँ तर-बत्तर भेल छह। हमरो एक्केटा लाल बाँकी अछि,दू-तीन खेपमे भइए जाएत। अगर जँ अपन लाल नहियोँ हएत आ विरोधीए-केँ दूटा कारी भऽ जेतै तैयो जीत हेबे करत।” बचनूक बात सुनि जीबछ शर्टो आ गंजियो निकालि कऽ रौदमे पसाइर देलक। आसीन मास। तीख रौद। तैपर सँ गुमकी सेहो। रेलबे स्टेशनसँ जीबछ पएरे आएल। किएक तँ स्टेशनक बगलेमे तेहेन हच्चा बाढ़िमे बनि गेल जे रिक्शो आ टमटमोक रस्ता बन्न भऽ गेलइ। पएरे लोक कहुना-कहुना थाल-पानिमे टपैए। बाढ़ि तँ तेहेन आएल छेलै जे जँ स्टेशन ऊँचगर जमीनपर नै रहैत तँ ओहो भँसि कऽ केतए-कहाँ चलि जाइत। मुदा तैयो स्टेशनक पुबरिया गुमती, पुल आ आध किलोमीटर रेलबे लाइन दहाइए गेल। तैसंग, रेलबेक दच्‍छिन तेहेन मोइन फोड़ि देलकै जे गाड़ियो बन्न भऽ गेल। डेढ़ मासमे पुलो बनल आ गाड़ियो चलब शुरू भेल। भरि‍ गाममे बचनूए-टाकेँ रिक्‍शा। जइसँ कोनो तरहक प्रतियोगिता नहि। प्रतियोगिता तँ शहर-बजारमे होइए, जैठाम सैंकड़ो-हजारो रिक्शा अछि। अनेरो रिक्शाबला सभ रिक्शापर बैस, एमहरसँ ओमहर घुमबैत बजैत रहैए- “कोट-कचहरी.., बैंक.., पोस्ट ऑफिस.., कौलेज.., स्कूल.., स्टेशन.., बस स्टेण्ड.., अस्पताल.., बड़ा बजार.., सिनेमा चौक.., डाकबंगला.., भगतसिंह चौक.., अजाद चौक...।” मुदा से तँ गाममे नहि। तँए कि गामक रिक्शाबलाकेँ कमाइ नइ होइए? खूब होइए। एक तँ गामक कच्ची रस्ता, तैपर सँ जेतए-तेतए टुटलो आ गहुम पटौनिहार सभ कटनौं। एहेन सड़कमे दोसर कोन इंजनबला सवारी सकत, तँए गामक सवारी रिक्शा। जइसँ गामक बेटी-पुतोहुक बि‍दागरी निमहैत। ..धैनवाद तँ रिक्शेबलाकेँ दी जे वेचारा छातीपर भार उठा, कखनो चढ़ि कऽ तँ कखनो उतैर कऽ पार लगबैत कठिन मेहनतक पाइ कमाइत। अखन धरि ताशक खेल नै फरियाएल। किएक तँ कखनो लाल कमि जाए तँ कखनो कारी। ..धड़फड़ाइत जीबछ फेर बाजल- “भाय, ताश नै फरियेतह। बहुत दूर जाइक अछि, झब-दे चलह। नहि तँ अन्हार भेने तोरो दिक्कत हेतह आ हमरो अबेर भऽ जाएत। कहुना-कहुना तँ ऐठामसँ सुग्गापट्टी पाँच कोस हएत।” बचनू- “हँ, से तँ पाँच कोससँ कम नहियेँ हएत। मुदा तइसँ की। ई की कोनो शहर-बजार छिऐ जे रातिक कोन बात जे दिने देखार पौकेटमारी, डकैती, अपहरण होइ छइ। ने रस्तामे भीड़-भड़क्का आ ने कोनो चीजक डर। निचेनसँ जाएब।” गामक बीचमे चौबट्टी। जैठाम पान-सातटा छोट-छोट दोकान। जइसँ गामोक आ आनो गामक लोक चौक कहए लगल। चौकक पछबरिया कोणपर एकटा खूब झमटगर पाखैरक गाछ अछि जैपर हजारो चिड़ैक खोँता छइ। दिन भरि चिड़ै सभ चराउर करए बाहर जाइत आ गोसाँइ निच्चाँ होइते पतियानी लगा-लगा गाछपर आबए लगैत। केतेको रंगक चिड़ै, तँए सभ जातिक चिड़ै अपन-अपन संगोर बना-बना अबैत। तेतबे नहि, गाछक डारियो बाँटि नेने अछि। जहिना एक जातिक चिड़ै एक डारिपर खोँता बनौने अछि तहि‍ना दोसर-तेसर दोसर-तेसर डारि‍पर। तँए एक जातिक चिड़ैसँ दोसर जातिक चिड़ैक बीच ने कहा-कही होइत आ ने झगड़ा-झंझट। ओना, अपनामे एक जातिक बीच नीक-अधलाक गप-सप्‍प जरूर होइ। कथा-कुटुमैतीसँ लऽ कऽ रामायण-महाभारतक खि‍स्‍सा-पिहानी सेहो होइ। तैसंग पान-पुनक चर्चा सेहो करैत आ अधला काज केनिहारकेँ डाँटो-फटकार दैत आ जुरि‍मनो करैत। ..ओही गाछक निच्चाँमे बाटो-बटोही रौदमेठंढाइत आ पानि-बुनीमे सेहो जान बँचबैत आ ताशक चौखरी सेहो जमैत। बचनूक बात सुनि जीबछ पेन्टक पैछला पौकेटसँ सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकाललक। एकटा सिगरेट अपनो लेलक आ एकटा बचनूओंकेँ देलक। दुनू गोरे सिगरेट लगा, रिक्शापर चढ़ि विदा भेल। कनीए आगू बढ़ल कि बचनू जीबछकेँ पुछलक- “भाय तूँ बम्बैमे रहै छह?” “हँ” “मन तँ हमरो बहू-दिनसँ होइए मुदा पलखैते ने होइए जे जाएब।” “ओइठीम मन तँ खूब लगैत हेतह?” “एँह भाय मन! की कहबह! जखैने डेरासँ निकलबह आकि रंग-बिरंगक छौड़ी सभकेँ देखबहक। उमेरगरो सभ जे कपड़ा लगौने रहतह से देखबहक तँ बुझि पड़तह जे कुमारिये अछि। मुदा छौड़ो सभ की ओइसँ कम अछि। एक तँ ओहिना छौड़ी सभ दामी-दामी कपड़ा पहिरने अछि आ सौंसे देह झक-झक करै छइ। तैपर सँ छौड़ो सभ करीक्का चश्मा पहिर लेतह आ निंगहारि-निंगहारि देखैत रहतह। चश्मो की कोनो एक्की-दुक्की रहै छइ। जखैने आँखिमे लगेबह आकि देहपर कपड़ा बुझिए ने पड़तह।” “ओहेन चश्मा हमरा सभ दिस कहाँ छै, हौ।” “एँह, ओइठीन विदेशी चश्मा सभ बिकाइ छै कि‍ने। देहातमे ओहेन चश्मा के कीनत।” चौकसँ कनीए उत्तर एकटा ताड़ीक दोकान। चारि-पाँच कट्ठाक खजुरबोनी। बीच-बीचमे ताड़क गाछ सेहो। उतरे-दछिने रस्ता। पछबारि भाग ताड़ी दोकान। ताड़ी दोकान देख जीबछ बचनूक पीठमे आँगुरसँ इशारा करैत रोकैले कहलक। बचनूकेँ मनमे भेलै, भरिसक पेशाब करत। रिक्शा रोकि उतैर गेल। जीबछ बाजल- “भाय, ताड़ी दोकान देखै छिऐ। चलह दू घोंट मारि‍ दि‍ऐ, तहन‍‍ चलब। हमहीं पैयो देबइ।” ताड़ीक नाओं सुनि बचनू कहलक- “ओना ताड़ी हमहूँ पीबै छी मुदा ताड़ी पीब कऽ ने रिक्शा चलबै छी आ ने ताड़ी पीनिहारकेँ रिक्शापर चढ़बै छी। तँए अखन ताड़ी-दारू बन्न करह। जहन‍‍ घरपर पहुँचबह तहन‍‍ जे मन हुअ से करिहह।” “भाय, ओतए भेटत की नइ भेटत, अखन तँ आगूमे अछि।” “तब अखन नै जाह। ताड़ी कीनि कऽ नेने चलह। गामेपर दुनू गोरे पीब लेब आ रातिमे रहि जैहह।” “ऐठाम केतए रहब?” “किए, हमरा घर-दुआर नै अछि। ओतै रहि कऽ राति बि‍ता लिहह। भोरे पहुँचा देबह।” “अच्छा, ठीक छै, चलह।” दुनू गोरे ताड़ी दोकान दिस बढ़ल। दोकान लग पहुँचते जीबछ घैलक-घैल ताड़ी फेनाइत देखलक। घैलक पतियानी देख मने-मन सोचए लगल जे अपना होइ छेलए जे शहरे-बजारक लोक ताड़ी पीबैए। मुदा से नहि, गामो-घरक लोक खूब पीबैए। पच्चीस-तीस गोरे दोकानक भीतरो आ बाहरो ताड़क पातक चटाइपर बैस ताड़ियो पिबैत आ चखनो खाइत। कियो-कियो असगरे पिबैत आ कियो-कियो दू-दू, तीन-तीन, चारि-चारि गोरेक संगोरमे, कियो खिस्सा कहैत, तँ कियो गीत गबैत आ कियो अन्ना-गाहिंस गारिये पढ़ैत। सभ उमंगमे। जहिना ताड़ीक फेन उधियाइत तहिना सबहक मन। ..ताड़ीक खटाइन गन्‍ध लगिते जीबछकेँ होइ जे कखन दू गिलास चढ़ा दिऐ। ताड़ी दोकानसँ कनी हटि दूटा बुढ़िया चखनाक दोकान पसारने। एकटा दोकानमे मुरही, घुघनी, कचड़ी आ दोसरमे चारि पाँच रंगक माछक तरूआ। ओंगरीक इशारासँ मझोलका डाबा देखबैत जीबछ बचनूकेँ कहलक- “भाय, दुइए गोरे पीनिहार छी, तँए यएह डाबा लऽ लएह।” बचनू- “पहिने दाम पुछि लहक?” डाबाक कान पकैड़ जीबछ पासीकेँ दाम पुछलक। तोड़-जोड़ करैत पैंतीस रूपैआमे पटलै। पेन्टक जेबीसँ नमरी निकालि जीबछ देलक। नमरी पकड़ैत दोकानदार बाजल- “ताड़ीए टाक दाम कटै छिअ। डाबा घुमा दिहह।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि बचनू डाबा उठा लेलक। डाबाकेँ चखना दोकानक आगूमे रखि‍ बचनू मने-मन सोचए लगल जे औझुका तँ कमाइयो ने भेल। धिया-पुता की खाएत। से नहि तँ तेना कऽ मुरही-कचड़ी कीनि ली जे सभ तूरकेँ भऽ जाएत। जेहने झुर कचड़ी बनौने तेहने माछक कुटिया। एकदम लाल-बुन्द। माछक कुटिया देख जीबछकेँ मुँहमे पानि आबए लगलै। मन चटपटाए लगलै। बचनूकेँ कहलक- “भाय, केते चखना लेबह?” मने-मन बचनू हिसाब जोड़ए लगल। दू-दूटा कचड़ी आ दू-दूटा माछ दुनू बच्चा-ले आ अपना सभ-ले चारि-चारिटा। किएक तँ गरम चीज होइ छै, तँए बेसी अपकारे करत...। बाजल- “भाय, एक किलो मुरही, एक किलो घुघनी, सोलहटा कचड़ी आ सोलहटा माछक कुटिया लऽ लएह।” सएह केलक। ताड़ीक डाबा उठा जीबछ विदा भेल। रिक्शा लग आबि बचनू चखनाबला मोटरी सेहो जीबछेकेँ दऽ देलक। चौकक रस्ता छोड़ि बचनू घर दि‍सक रस्ता धेलक। घरो लगेमे। दुइए हन्नाक घर बचनूकेँ। रिक्शा रखैले एकचारी भनसे घरक पँजरामे देने। एकटा घरमे भानसो करए आ जरनो-काठी राखए। दोसरमे सभतूर सुतबो करए आ चीजो-बौस राखए। अपना दरबज्जा नहि। मुदा घरक आगूमे दस धूरक परती, जैपर सरकारी चबुतरा बनौल। ..घर लग अबिते बचनू रिक्शा ठाढ़ कऽ बाढ़ैन आनए आँगन गेल। बचनूकेँ देख घरवाली कहलकै- “आइ जे भाड़ा नै कमेलौं, तँ राति खएब की? अपना दुनू गोरे तँ ओहुना सुति रहब मुदा बच्चा सभ केना रहत?” बिनु किछु उत्तर देनहि बचनू बाढ़ैन‍ लऽ अँगनासँ निकैल गेल। चबुतराकेँ दोहरा कऽ बहारलक। चबुतराक बनाबट सुन्दर तँए बहारिते चमकए लगल। चबुतराक चमकी देख जीबछ बाजल- “भाय, जेहने मजगूत चबुतरा छह तेहने सुन्दरो, संगमरमर जकाँ चमकै छह।” जीबछक बात सुनि बचनूकेँ ओ दिन मन पड़लै जइ दिन ठीकेदारकेँ गरियौने रहए। मुस्‍कियाइत बाजल- “भाय, ओहिना एहेन सुन्दर बनल अछि। जे ठीकेदार बनबैक ठीकेदारी नेने रहए ओ नमरी चोर। तीन नम्बर ईंटा आ कोसीकातक बालुसँ बनबए चाहैत रहए। हम गामपर नै रही। जहन‍‍ एलौं तँ देखलिऐ। देखते सौंसे देह आगि लगि‍ गेल। मुदा ऐठाम रहए कि‍यो ने। दोसर दिन न्‍योँ कोरए ठीकेदारो आ जनो आएल। हमरा तँ गरमी चढ़ले रहए। जखने कोदारि लगौलक कि जनक हाथसँ कोदारि छीनि ठीकेदारकेँ गरियाबए लगलौं। जहाँ गारि पढ़लिऐ आकि ठीकेदारो गहुमन साँप जकाँ हुहुआ कऽ उठल। जहाँ ओ जोरसँ बाजल आकि हमहूँ गरिऐबते दुनू हाथे कोदारिक बेंट पकैड़ कहलिऐ, ‘सार न्‍योँ लइसँ पहिने तोरे काटि देबह।’ मुदा सभ पकैड़ लेलक। डरे ठीकेदारो थरथर कँपए लगल। तहन‍‍ जा कऽ एक नम्मर सभ किछु, ईंटा-सिमटी-बाउल आनि बनौलक।” जीबछ बाजल- “बाह!” बचनू- “कनी ऊपर आबि कऽ देखहक जे की सभ बनबौने छी। देखहक ई खेलाइले पच्चीसी घर छी, कौड़ीसँ खेलाएल जाइए। मुदा ई खेल समैया छी। एकर चलती खाली आसिनेटा मे रहैए। कोजगरा दिन तँ लोक भरि राति खेलते रहैए।” दोसरकेँ देखबैत- “ई मुगल पैठानक घर छी। हमरा गाममे लोक एकरा ‘मुगल-पैठान’ कहै छै मुदा आन-आन गाममे एकरा ‘कौआ-ठुट्ठी’ कहै छइ। गोटीसँ खेलाएल जाइए।” तेसर घर देखबैत- “आ ई बच्चा सबहक छिऐ। एकरा ‘चैरखी-चैरखी’ घर कहैए। झुटकासँ खेलल जाइए।” जीबछ बाजल- “हौ भाय, तूँ तँ बड़ खेलौड़िया बुझि पड़ै छह।” बचनू- “हौ, जिनगीमे आउर छै की? खाइत-पिबैत, हँसी-चौल करैत बिता ली। सभ दिन कमेनाइ, सभ दिन खेनाइ। कोनो हर-हर-खट-खट नहि। धिया-पुताले तँ हम अपने स्‍कूल खोलि देने छिऐ। खेती-पथारीक काजसँ लऽ कऽ रिक्शा चलौनाइ, ईंटा बनौनाइ सभ लूरि‍ हमरा अछि। धिया-पुता तँ देखिए-कऽ सीखि लेत।” ओना, जीबछ बचनूक गपो सुनैत मुदा मन ताड़ीक खटाइन गन्‍धपर अँटकल। होइ जे कखन दू गिलास चढ़ाएब। नहि तँ कम-सँ-कम आँगुरमे भीरा नाकक दुनू पुड़ामे लगा ली। ..तैबीच जीबछकेँ बचनू कहलक- “भाय, ताबे तूँ सभ कि‍छु सेरियाबह, हम घरमे रिक्शा रखि‍ दइ छिऐ। काजसँ निचेन भऽ जाएब।” जीबछ सभ समान सेरियाबए लगल। रिक्शाकेँ गुड़कौने बचनू एकचारीमे रखि‍ आँगन जा दुनू बच्चो आ पत्नियोकेँ कहलक- “दुनू बाटियो आ दुनू छिपलियो नेने चलू।” कहि बचनू आगू बढ़ि गेल। पत्नीक मन खुशीसँ झूमि उठल। दुनू बच्चा दुनू बाटी नेने आगू बढ़ल। दुनू छिपली नेने पत्नी डेढ़िया लग ठाढ़ भऽ मुँहपर नुआ नेने कनडेरिये आँखिए दुनूकेँ देखैत। ..अपना दुनू गोरे-ले बचनू चारि-चारिटा तड़ल माछक कुटिया आ चारि-चारिटा कचड़ी आ तैसंग अदहा किलो करीब मुरही-घुघनी मिला कऽ रखि‍, दुनू बच्चाकेँ एक-एक कचड़ी, एक-एक माछक कुटिया आ दू-दू मुट्ठी मुरही-घुघनी मिला कऽ देलक। दुनू बच्चा देख कऽ चपचपा गेल। अपन-अपन बाटी बामा हाथे उठा दहिना हाथे खाइत विदा भेल। माए लग पहुँच‍‍ दुनू बच्चा अपन-अपन बाटी देखए देलक। बाटीमे घुघनी-टुकड़ीबला मिरचाइकेँ देख माए कहलकै- “बौआ, मिरचाइ बीछि कऽ रखि‍ लि‍हँ, कड़ू लगतौ।” तैबीच बचनू गमछाक एक भागमे मुरही-घुघनीकेँ मिला, चारि-चारिटा कचड़ी आ चारि-चारिटा माछक कुटिया फुटा, दुनू गोरे-ले रखलक। चबुतरेपर सँ बचनू घरवालीकेँ हाक पाड़ैत बाजल- “ई सभ लऽ जाउ।” अदहा मुँह झँपने बचनूक सरधा चबुतरापर पहुँच‍‍ दुनू छिपली बचनूक आगूमे रखि‍ देलक। एकटा छिपलीमे मुरही कचड़ी आ दोसरमे घुघनी-माछ बचनू दऽ देलक। झुर माछक तरूआ देख सरधाक मन हँसए लगलै। मनमे एलै, कौल्‍हुका जलखै तकक ओरियान भऽ गेल। दुनू छिपली तरा-ऊपरी रखि‍ दुनू हाथसँ छिपली उठा आँगन विदा भेल। एमहर जीबछ आ बचनू दुनू भाग बैस बीचमे ताड़ीक डाबा, गिलास आ चखना रखलक। दुनू गिलासमे जीबछ ताड़ी ढारि, आगूमे रखि‍ आँखि मूनि कऽ ठोर पटपटबैत मंत्र पढ़ए लगल। कनी काल मंत्र पढ़ि, आँखि खोलि तीन बेर ताड़ीमे आँगुर डुबा निच्चाँमे झाड़िबाजल- “हुअ भाय, आब हुअह।” छगाएल दुनू, तँए एक लगाइते तीन-तीन गिलास पीब लेलक। मन शान्त भेलइ। शान्त होइते जीबछ सिगरेट निकालि एकटा अपनो लेलक आ एकटा बचनूओंकेँ हाथमे देलकै। दुनू गोरे सिगरेट धड़ा पीबए लगल। पिबैत-पिबैत दुनूकेँ निशाँ चढ़ए लगल। निशाँ चढ़िते गप-सप्‍प करैक मन हुअ लगलै। एक मुट्ठी मुरही आ एक टुकड़ी माछ लऽ जीबछ मुँहमे लेलक। बचनूओं लेलक। मुँह महक घोंटि जीबछ बाजल- “भाय, तोरा रिक्शा चला कऽ परिवार चलि जाइ छह?” कचड़ी तोड़ि मुँहमे लैत बचनू उत्तर देलक- “किए ने चलत। हमरा की कोनो कोठा बनबैक अछि जे गुजर नै चलत। तहूमे की हम रिक्शा बारहो मास थोड़बे चलबै छी। भरि बरसात चलबै छी। जहाँ बर्खा बन्न भेलै आकि महाकान्त भाइक चिमनीमे काज करै छी।” “नोकरियो करै छहक?” “एहेन नोकरी तँ भगवान सभकेँ देथुन। अलबेला लोक छैथ‍ महाकान्त भाय। हुनकर खाली पूजीटा छि‍ऐन‍। असली कारोबारी हम दू गोरे छी। सरूप मुनसी आ हम। पजेबाक खरीद-बिकरीसँ लऽ कऽ कोइला मंगौनाइ, ओकर हिसाब-बारी केनाइ हुनकर काज छि‍‍ऐन‍ आ हमर काज पथेड़ीक देखभाल केनाइ, समैपर दमकल चला खाधिमे पानि देनाइसँ लऽ कऽ बजारसँ समान कीनि कऽ अननाइआ चिमनीपर सँ घरपर दौग-बरहा केनाइ धरि हमर।” “तब तँ खूब कमाइ होइत हेतह?” “कमाइ जँ करए चाही तँ ठीके खूब हएत। मुदा से नइ करै छी। एक साए रूपैआ रोज होइए। ओ घरवालीक हाथमे दऽ दइ छिऐ। बाँकी खेलौं-पीलौं। किएक तँ नजाइज पाइ जँ घरमे देबै तँ ओइसँ भाभन्स नै हएत।” दुनू गोरे डबो भरि ताड़ियो पीब गेल आ चखनो खा लेलक। ..एक दिस निशाँसँ दुनूक देह भँसियाइत, दोसर दिस जोरसँ पेशाब लगि‍ गेलइ। उठैक मने ने होइ। मुदा पेशाबो जोरे होइत गेलइ। दुनू गोरे उठि कऽ पेशाब करए गेल। जाबे पेशाब करैले बैसै-बैसै ताबे बुझि पडै़ जे कपड़ेमे भऽ जाएत। मुदा कहुना-कहुना कऽ सम्हारि पेशाब करए बैसल। पेशाब बन्ने ने होइ। बड़ी कालक पछाइत‍‍ पेशाबो बन्न भेलै आ भक्को खुजलै। चबुतरापर दुनू गोरे आबि कऽ बैसल। बैसते जीबछ बाजल- “भाय, हमरा डान्स करैक मन होइए।” जीबछक बात सुनि बचनू पल्था मारि बैस, ठेहुनपर दुनू हाथसँ बजबए लगल। मुदा ओइसँ अवाज नै निकलै, अवाज निकलै मुहसँ। जहिना-जहिना मुहसँ बोल निकलै तहिना-तहिना दुनू ठेहुनपर हाथ चलबै। तैबीच दुनू बच्चो चबुतरापर आबि थोपड़ी बजबए लगल। अँगनाक मुहथैरपर सरधो बैस कऽ देखए लगली। जीबछ डान्स करए लगल। थोड़े कालक पछाइत‍‍ बचनूक मुँह दुखा गेलइ। मुदा जीबछ डान्स करिते रहल आ दुनू बच्चो थोपड़ी बजैबते रहल। जहिना बाढ़िक रेतपर हेलिनिहार चीत गरे सुति केतौ-सँ-केतौ भँसिया कऽ चलि जाइत तहिना बैसल-बैसल सरधाक मन भँसियाइत रहैन। तैबीच बचनू उठि कऽ आँगन गेल आ घैलची परहक घैल उठा, पानि फेक नेने आबि उल्टा कऽ रखि, दुनू हाथे घैलक पेनपर बजबए लगल। आँगुरमे औंठी रहबे करइ, लाजवाब बाजा। ..नचैत-बजबैत दुनू गोरे थाकि गेल। सुति रहल। भोर होइते दुनू गोरे उठि, मुँह-हाथ धोइ रि‍क्‍शा लऽ वि‍दा भेल। ऐ बेर आसिन अपन चालि बदैल लेलक। किएक तँ आन साल अधहा आसिनक पछाइत‍‍ हथिया नक्षत्र चढ़ै छल से ऐ बेर नइ भेल। पहिने हथिये चढ़ल। दू दिन हथिया बितला पछाइत‍‍ आसिन चढ़ल। ओना बुढ़-बुढ़ानुसक कहब छैन‍‍ जे दुर्गापूजामे हथिया पड़िते अछि,मुदा से नइ भेलइ। आसिनक इजोरिया पखक परीवकेँ दुर्गा पूजा शुरू होइत, जइमे हथियो नक्षत्र रहैत। ऐ बेर अमाबसिये दिन हथिया चलि गेल। तहिना बर्खोक भेल। जइ दिन आसिन चढ़ल ओइ दिन घनघनौआ बर्खा भेल आ तेकर पछाइत‍‍ फुहियो ने पड़ल। झाँटक कोन गप। हथिया-ले ओरियौल जरनो-काठी आ अनो-पानि सबहक घरमे रहिए गेल। मुदा तैयो किसान सबहक मनमे खुशी नै कमल। किएक तँ जँ हथियामे धानक खेतमे ठेंगाक हूर गड़त तँ धान हेबे करत। मुदा किछु गोरेक मनमे शंका जरूर होइ जे निचला खेतमे ने पानि लागल अछि मुदा ऊपरका खेतक धान केना फुटत? किएक तँ ऊपरका खेतक पानि टघैर कऽ निचला खेतमे चलि गेल। किछु खेतक पानि काँकोड़क बोहैर देने तँ किछु खेतक पानि मूसक बिल देने बहि गेल। जइसँ बर्खाक तेसरे दिन ऊपरका खेत सभ सुखि गेल। ओना दशमीक मेलो देखनिहारक आ मेलामे दोकानो-केनिहारक मनमे खुशी। किएक तँ रूख-सुखमे नाचो-तमाशा जमत आ देखनिहारोक भीड़ जुटत। ओना पैछला सालक सभ छगाएल। किएक तँ जइ दिन सतमी मेला शुरू भेलै ओही दिन तेहेन झाँट आ पानि भेलै जे मेलाक चुहचुहीए चलि गेलइ। सुखार समए रहने महाकान्त ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल सोचए लगल। जहियासँ चिमनी शुरू केलौं तहियासँ एहेन समए नै पकड़ाएल छल। आन साल दियारीक पछाइत‍ चिमनीक काजमे हाथ लगबै छेलौं, से ऐ बेर भगवान तकलैन। कहुना-कहुना तँ दियारी अबैत-अबैत दू खेप भट्ठा जरूर लागि‍ जाएत। सरकारोक योजना नीक पकड़ाएत। एक दिस खरन्जाक स्कीम तँ दोसर दिस इन्दिरा आबासक घर। तेतबेनहि, स्कूल आ अस्पताल सेहो बनत। आ सेहो अपने गामटा मे बनत से नहि, आनो-आन गाममे बनत। सालो भरि ईंटाक महगीए रहत। ओते पुराइए ने पाएब। ..एते बात मनमे अबिते महाकान्‍तक मुहसँ हँसी निकलल। तखने पत्नी रागिणी बेड-टी नेने आबि चुप-चाप सिरमा दिस ठाढ़ भऽ पतिकेँ मुस्‍कियाइत देखली। पतिक मुस्की देख रागिणी मने-मन सोचए लगली, की बात छिऐ जे ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल मुस्कुरा रहल छैथ। मुदा बिनु किछु बजनहि रागिणी टेबुलपर चाह रखि‍, ओरिया कऽ नाक पकैड़ डोला देलकैन। नाक डोलैबते महाकान्त उठि कऽ बैस रहला। आगूमे रागिणीकेँ ठाढ़ देख चौअन्नियाँ मुस्‍की दैत आँखिक इशारासँ पलंगपर बैसैले रागिणीकेँ कहलक। पतिक मूड देख रागिणी ससरिये जाएब नीक बुझली। महाकान्त आ रागिणी, संगे-संग कौलेजमे पढ़ने। जहिए दुनू गोरे बी.ए.मे पढ़ै छल तहिए दुनूक बीच प्रेम भऽ गेल। दुनूक सम्पन्न परिवारक। ओना पढ़ैमे दुनू ओते नीक नै जेते दुनूक रिजल्ट नीक होइ। दुनूकेँ मैट्रिको आ इन्टरोमे फस्ट डिविजन भेल रहइ। तेकर कारण मेहनत‍ नहि पैरबी छल। नीक रिजल्ट दुआरे संगियो-साथीक बीच आ शिक्षकोक बीच दुनूक आदर होइत। दुनूक बीच सम्बन्ध बी.ए. आनर्सक क्लासमे भेलइ। किएक तँ आनर्समे कम विद्यार्थी रहने गप-सप्‍प करैक अधिक समए भेटइ। दुनूक बीच सम्बन्ध गप-सप्‍पसँ शुरू भेल। तेकर पछाइत‍‍ किताबक लाथे डेरोमे एनाइ-गेनाइ शुरू भेल। सम्बन्ध बढ़िते गेलइ। संगे बजार बुलनाइ, किताब-कॉपी खरीदनाइसँ लऽ कऽ कपड़ा, जुत्ता-चप्पल खरीदनाइ धरि संगे हुअ लगलै। पछाइत मेटनियोँ शोमे सिनेमा देखए लगल। जइसँ आंगिक सम्बन्ध सेहो शुरू भऽ गेलइ। एकटा डबल बेडक रूम लऽ दुनू गोरे डेरो एकठाम कऽ लेलक। दुनूक बीचक सम्बन्धक चर्चा खाली विद्यार्थीए आ शिक्षके धरि नै रहि दुनूक पिता धरि पहुँच‍ गेल। मुदा दुनूक पिताक दू विचारक तँए बुझियो कऽ दुनू अनठा देलैन। ..महाकान्तक पिता सुधीर जुआन-जहानक खेल बुझैत तँ रागिणीक पिता रमानन्द सम्पन्न परिवार आ पढ़ल-लिखल लड़ि‍का बुझि बेटीक भार उतरब बुझैथ। एम.ए. पास केलापर दुनूक बि‍आह भऽ गेल। सुधीरक परिवार एक-पुरखिया। अपनो भैयारीमे असगरे आ बेटो तहिना। ओना,बेटी चारिटा जे सासुर बसैत रहैन। परिवारक काजसँ महाकान्तकेँ कम्मे सरोकार। तँए भरि-भरि दिन चौखरी लगा जुओ खेलैथ आ शराबो पिबैथ। जे पितो बुझैत रहैन। महाजनीक कारोबार, तँए भरि दिन सुधीर रूपैए-क हिसाब-बारी आ धनेक लेन-देनमे व्‍यस्‍त रहै छला। ..महाकान्तक क्रियाकलाप देख एक दिन खिसिया कऽ सुधीर कहलखिन- “बौआ, बड़ कठिनसँ धन होइ छइ। एना जे भरि-भरि दिन वौआएल घुमै छह तइसँ कएक दिन लछमी रहथुहुन। किछु उद्यम करह।” पिताक बात महाकान्त चुपचाप सुनि लेलक, किछु बाजल नहि। बेटाकेँ चुप देख फेर सुधीर बजला- “पाँच लाख रूपैआ दइ छिअ, चिमनी चलाबह। उत्तरबरियो बाधमे अपन बीस बीघा ऊँच जमीन छहे, ओहीमे चिमनी बना लएह।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि महाकान्तो चुप भऽ गेल। पिताक मनमे रहैन‍ जे जखने काजमे लगि‍ जाएत तखने चालि-ढालि बदैल जेतइ। किएक तँ काज ओहेन कारखाना होइए जइमे मनुख पैदा लइत, मनुख मनुख बनैत। आने साल जकाँ अपन काज बचनू करए लगल। पथेड़ीक देखभालसँ लऽ कऽ हाट-बजार आ महाकान्तक घरपर जा रागिणीकेँ ब्राण्डीक बोतल पहुँचबै धरि...। महाकान्तो अपन आने साल जकाँ निअमित काज करए लगला। सबेरे आठ बजेमे जलखै खा मोटर साइकिलसँ चिमनीपर चलि अबैथ। चिमनीपर आबि तीनू गोरे–महाकान्त, सरूप, बचनू–भरि मन गाँजा पीबए। पीला पछाइत महाकान्त अपन कार्यालयमे सुति रहैथ। बारह बजेमे बचनू उठा दैन। उठिते महाकान्त मुनसीसँ रूपैआ मांगि बचनूकेँ ब्राण्डी किनैले बजार पठा अपने मुँह-हाथ धोइ खाइले घरपर विदा भऽ जाइथ। घरपर पहुँच‍ धड़फड़ करैत खेनाइ खा पुन: घुमि कऽ चिमनीपर आबि सुति रहैथ, जे एक्केबेर चारि बजे उठैथ। बचनूओं बजारसँ शराब खरीद महाकान्तक घरपर जा रागिणीकेँ दऽ दइत...। कौलेजे जिनगीसँ दुनू परानी–महाकान्त-रागिणी–शराब पिबैथ। ओना रागिणी ब्राण्डीए-टा पिबथिन मुदा महाकान्त सभ कि‍छु–गाँजा, भाँग, इंग्लिश, पलोथि‍न, अफीम, ताड़ी इत्‍यादि जखन‍ जे भेटल तखन‍ सएह। आइ जखन‍ बचनू ब्राण्डीक बोतल लऽ रागिणी लग पहुँचल तँ बचनूकेँ देखते रागिणीक नजैरमे नव विचार उपकलैन। आन दिन रागिणी बचनूसँ बोतल लऽ रखि‍ लैत रहैथ, मुदा आइ आदरसँ बचनूकेँ हाथक इशारासँ पलंगेपर बैसैले कहलखिन। बचनू बैसल। दुनू आमने-सामने। रागिणी बजली- “बहुत दिनसँ मनमे छेलए जे अहाँसँ भरि मन गप करितौं। मुदा अहाँ तेते धड़फड़ाएल अबै छी जे किछु कहैक मौके ने भेटैए।” बचनू- “गिरहतनी, हम तँ मुरूख छी, अहाँ पढ़ल-लिखल छी। अहाँक गप्पक जवाब हमरा बुते थोड़े देल हएत।” रागिणी- “कोनो की हम अहाँसँ शास्‍त्रार्थ करब जे जवाब देल नै हएत। अपन मनक बेथा कहब। जे सभकेँ होइ छइ।” मनक बेथा-दे सुनि बचनू मने-मन सोचए लगल जे हम सभ गरीब छी, हरिदम एकटा-ने-एकटा भूर फुटले रहैए। मुदा रागिणी तँ सभ तरहेँ सम्पन्न छैथ। नीक भोजन, नीक रहन-सहन तैसंग दुनू परानी पढल-लिखल.., तहन‍‍ की मनमे बेथा छैन‍‍ जे हमरा कहती। मुदा तैयो मनकेँ असथिर करैत बचनू रागिणी दिस देखए लगल। मनमे उत्सुकतो बढ़ैत रहइ। मुदा रागिणीक चेहरामे डुमैत सुरूज जकाँ मलिनता अबैत गेलइ। रागिणी बजली- “हमरासँ अहाँ बहुत नीक जिनगी जीबै छी।” अपन प्रशंसा सुनि बचनू गदगद भऽ गेल। आँखि चौकन्ना हुअ लगलै। मनमे ओहेन-ओहेन विचार सेहो उपकए लगलै जेहेन आइ धरि कहियो ने आएल छेलइ। मुदा किछु बाजए नहि। बचनूकेँ चौकन्ना होइत देख रागिणी बाजए लगली- “जहिना अकासमे चिड़ैकेँ उड़ैत देखै छिऐ तहिना अहूँ छी। मुदा हम पिजरामे बन्न चिड़ै जकाँ छी। जखन पढ़ै छेलौं तखन‍‍ यएह सोचै छेलौं जे कोनो कौलेजमे प्रोफेसर बनि जिनगी बिताएब मुदा से सभ मनेमे रहि गेल। भरि दिन अँगनामे घेराएल रहै छी। ने केकरोसँ कोनो गप-सप्‍प होइए आ ने अँगनासँ निकैल केतौ जा सकै छी। तहूमे असगरूआ परिवार अछि। लऽ दऽ कऽ सासुटा छैथ, ने दोसर दियादनी आ ने कियो तेसर। भरि दिन पलंगपर पड़ल-पड़ल देह-हाथ दुखा जाइए। जाधैर पढ़ै छेलौं ताधैर दुनियाँ किछु आर बुझाइ छल। मुदा आब किछु आर बुझाइए। कखनो मन होइए तँ किछु पढ़ै छी नहि तँ टी.बी. देखैत रहै छी। पढ़िए कऽ की हएत। ने दोसरकेँ बुझा सकै छी आ ने अपना कोनो काज अछि, जइले सीखब। जानवरोसँ बत्तर जिनगी बनि गेल अछि। जहिना गाए-महींस भरि पेट खेलक आ खुट्टापर बान्हल रहल, तहिना भऽ गेल छिऐ। मुदा मनुख तँ मनुख छी। जाधैर अपना मनक बात दोसरकेँ नै कहत आ दोसरक पेटक बात नै सुनत ताधैर नीक थोड़े लगत। मनमे सदिखन उठैत रहैए जे जँ लकीरक फकीरे बनि जीबैक छइ तँ अनेरे लोक किए पढ़ैए।?” सूखल मुस्‍की दैत बचनू बाजल- “गिरहतनी, अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि जे कोनो तरहक दुख हएत।” रागिणी- “अहाँ जे कहलौं ओ ठीके। किएक तँ एहनो बुझनिहारक कमी नै अछि। एहनो बहुत लोक अछि जे धनेकेँ सभ कि‍छु बुझैए। मुदा धन तँ खाली शरीरक भरण-पोषण कऽ सकैए, मनक नहि। तीन सालसँ बेसी ऐठाम एला भऽ गेल मुदा ने एक्कोटा सिनेमा देखलौं आ ने एक्को दिन केतौ घुमै-फिरैले गेलौं। जाधैर बेटी माए-बाप लग रहैए ताधैर सभ कि‍छु माने धन-सम्‍पैत‍-कुटुम-परिवार इत्‍यादि अपन बुझि पड़ै छै, मुदा सासुर पएर दैते जहिना सभ बीरान भऽ जाइ छइ तहिना माए-बापक बीच जे अजादी बेटीकेँ रहै छै ओ सासुर एलापर एकाएक बन्न भऽ जाइ छइ। बचनू- “जँ केतौ जाइक मन होइए वा देखैक मन होइए तँ नैहर किए ने चलि जाइ छी?” रागिणी- “जहिना सासुर तहिना नैहरो भऽ गेल। जहिना सासुरमे पुतोहु बनि जीबै छी तहिना नैहरोमे पाहुन बनि जाइ छी। जेना हम्मर किछु रहिते ने अछि। जे घर अप्पन नइ रहत ओइ घरमे केकरा कहबै जे हम फल्लाँ-ठाम जाएब। जन्‍म देनिहारि माइयो आने बुझैए। तैपर सँ भाए-भौजाइक जुइत...। ई तँ नैहरक गप कहलौं आ ऐठामक जे होइए से हमहीं बुझै छी। बुड़हा जहन‍‍ आँगन औता तँ बुझि पड़त जे जेना अस्सी मन पानि पड़ल छैन‍‍। बुड़ही तँ कनी हँसियो कऽ गप्प करता मुदा हमरा देखिए-कऽ झड़कबाहि उठि जाइ छैन‍‍। जँ कहियो माथपर नुआ नइ देखलैन तँ बुढ़हीकेँ अगुआ की कहता की नहि, तेकर कोनो ठेकान नहि। पहाड़ी झरना जकाँ भरि-भरि दिनआँखिसँ नोर झहरैत रहैए। कियो पोछनिहार नहि।” बचनू- “गिरहतनी, हमरा बड़ देरी भऽ गेल। महाकान्त भाय बिगड़ता।” रागिणी- “अच्छा, चलि जाएब। कहै छेलौं, हरिदम तरे-तर मन औंढ़ मारैत रहैए जे लछमी बाइ जकाँ तलवार उठा परदा-पौसकेँ तोड़ि दी,मुदा साहस नै होइए। केराक भालैर जकाँ करेज डोलए लगैए। आइ जहन‍‍ अपन मनक बात अहाँकेँ कहलौं तँ मन कनी हल्लुक बुझि पडै़ए।” बचनू- “तहन‍‍ तँ गिरहतनी हमहीं नीक छी।” रागिणी- “बहुत नीक। बहुत नीक। एते काल जे अहाँसँ गप केलौं से जहिना पाकल घाउक पीज निकललापर जे सुआस पड़ै छै तहिना भऽ रहल अछि। आब सभ दिन एक घन्‍टा गप्प कएल करब। अहाँ कियो आन छी, घरेक लोक छी।” एक टकसँ जहिना बचनू रागिणीक आँखि-पर-आँखि दऽ हृदए देखए लगल, तहिना रागिणियोँ बचनूक हृदए पढ़ए लगली। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 3963 चुनवाली नीन्न टुटिते मखनी मोथीक बिछान समैट ओसारक उत्तरबरिया-पुबरिया कोणमे ठाढ़ कऽ निच्चाँ उतरए लगल कि सीढ़ीपर पिछैर गेली। पएर पिछैरते हाथसँ ओसार पकड़ए चाहली। मुदा जाबे सेरिया कऽ ओसार पकड़ैथ‍-पकड़ैथ‍ ताबे ओलतीमे खसि पड़ली। झलफल रहने कियो दोसर उठल नहि। थोड़बे पहिने एकटा छोटकी अछार भेल रहइ। घरक चारसँ ठोपे-ठोप पानि चुबिते छेलइ। सीढ़ीपर सँ खसिते मखनीक दहिना ठेहुनक जोड़ छिटैक गेलैन‍। तत्काल छिटकब तँ नइ बुझलैथ‍, मात्र एतबे बुझलैथ‍ जे ठेहुन कट दऽ उठलैन हेन। मनमे एलैन‍, कियो देखलक तँ नहि, तँए हाँइ-हाँइ उठए लगली। जोशमे उठि तँ गेली मुदा ठेहुनक कचकबसँ फेर ओसार पकैड़ सीढ़ीए-पर बैस रहली। बैसते मनमे आबए लगलैन- केना मटकुरियाक परबरिस चलतै..! ढेरबा बेटी छै बिआह कन्ना करत..! अपना कमाइक कोनो लूरि‍ नइ छै.., बहुओ धमधुसरीए छै..! अपना खेत-पथार नइ छै..! गामक लोको तेहेन अछि जे केकरो कियो नीक नै करैत..! हे भगवान कोन बिपैत दऽ देलह..! कनी काल गुम्म रहि मखनी जोरसँ बेटाकेँ हाक पाड़ली- “मटकुरिया, रौ मटकुरिया? मटकुरिया दुनू परानी अपनो आ दुनू धियो-पुतो नि‍सभेर रहए। तँए ने मटकुरिया उठल आ ने कियो दोसर-तेसर। ..पुनः दोहरा कऽ मखनी जोरसँ शोर पाड़ली- “रौ बौआ, बौआ रौ। हम पिछैर कऽ खसि पड़लौं से उठिए ने होइए।” धड़फड़ा कऽ उठैत मटकुरिया बाजल- “माए! माए! अबै छी।” ताधैर फुलियो, कबुतरियो आ बेटोक नीन टुटल। केबाड़ खोलि मटकुरिया दौगल माए लग आबि पुछलक- “केना कऽ खसलेँ?” पाछूसँ स्‍त्रियो आ बेटो-बेटी पहुँचल। बेटा तँ पाँचे बर्खक मुदा तैयो माए-बापक देखा-देखी करैत दादीकेँ पकड़लक। चारू गोरे उठा मखनीकेँ ओसारपर लऽ गेलैन‍। बिछान बिछा सुता देलकैन‍। कनी-कनी ठेहुन फुलए लगलैन‍। फुलब देख फुलिया पतिकेँ कहलक- “अहाँ पहिने डाकदर बजा लाउ। हम ताबे करूतेलसँ ससारि दइ छि‍‍ऐन‍।” पतिकेँ कहि फुलिया बेटीकेँ अढ़ौलक‍- “बुच्ची घरसँ तेलक शीशी नेने आ।” मटकुरिया डाक्टर ऐठाम विदा भेल। तेलक शीशी आनए कबुतरी घर गेल। तैबीच मंगनियाँ दादीकेँ पुछलक- “आँइ गइ बुढ़िया, एतने ऊपरसँ...।” बेटाक मुँहपर फुलिया हाथ दऽ आगू बाजब रोकि देलक। मुदा पोताक बातसँ मखनीकेँ एक्को मिसिया दुख नइ भेलैन‍। मुस्‍कियाइतबजली- “बिलाइ खसा देलक।” शीशीक मुन्ना खोलिते कबुतरी आएल। दुनू मायधी तरहत्थीपर तेल लऽ लऽ मिलबैत जाँघ सहित दहिना पैरमे ओंसए लगल। मखनीक ठेहुनक दर्द बढ़िते जाइत। जइसँ दुनू गोरेकेँ ससारब छोड़ि दइले कहलक। ताबे डाक्टरक संग मटकुरीया सेहो पहुँचल। मखनीक ठेहुन देखते डाक्टर बजला- “हिनका ठेहुनक जोड़ छिटैक गेल छैन‍। पलश्‍तर करबए पड़त। ताबे दर्द कम होइले इन्जेक्शन दऽ दइ छि‍ऐन‍। पलश्‍तरक समान सभ मंगबए पड़त।” एक्के-दुइए गामक जनिजाति पहुँचए लगल। जनिजातिक संग धियो-पुता आएल। लोकसँ मटकुरियाक आँगन भरि गेल। पलश्‍तरक समान मंगा डाक्टर पलश्‍तर करैत बजला- “चिन्ता करैक बात नै अछि। पनरह दिनमे ठीक भऽ जेतैन।” कहि अपन फीस लऽ डाक्‍टर चलि गेला। मुदा लोकक आबा-जाही लगले रहल। रंग-बि‍रंगक गपसँ अँगना गनगनाइत रहल। भरि दिन सभ तूर मटकुरिया भुखले रहि गेल। ने भानसपर धि‍यान गेलै आ ने केकरो भूखे बुझि पड़लै। घरमे चूड़ा रहै, जे मंगनियाँ खेलक। बेर झुकैत-झुकैत अँगना खाली भेल। खाली अपने पाँचो गोरे अँगनामे रहल। सबहक मनो असथिर भेल। असथिर होइते मटकुरियो, फुलियो आ कबुतरियो अपना-अपना ढंगसँ सोचए लगल। ओना कहियो काल, सासुकेँ मन खराब भेने वा केतौ गाम-गमाइत गेने, फुलिये चुन बेचए जाइत। सभ काज बुझले तँए मनमे बेसी चिन्ता नहि। चिन्ता खाली एतबे जे कहुना सासुक परान बँचि जाइन‍। मुदा खुशी बेसी। सोलह बर्खसँ सासुर बसै छी मुदा अखन धरि घरक गार्जन नै बनलौं। लोककेँ देखै छिऐ जे सासुर अबिते अपन जुइत लगबए लगैए। भगवान हमरो दहीन भेला। आब हमहूँ गार्जन बनब। घरक गार्जन तँ वएह ने होइत जे कमाइए, आ जे उपारजने नइ करत ओ घरक जुतिए-भाँति की लगौत। अगर जँ लगेबो करत तँ चलतै केना। छुच्‍छ हाथ थोड़े मुँहमे जाइए। काजक अपन रस्ता होइ छइ, जे केनिहारे बुझैत। बिनु केनिहार जँ जुतिए लगौत तँ ओ या तँ दुरि हेतै वा गरे ने पकड़तै...। ओना अखन फुलियाक घरोबला आ साउसो जीविते, तँए गार्जनियोँ हाथमे आएब कठिन। मुदा तैयो आशा रहइ। अखन धरि सिनुरो-टिकली-ले खुशामदे करै छल, से आब नै करए पड़तै.., फुलिया तँए खुशी। कबुतरीक मनमे ऐ दुआरे खुशी होइत जे जेते लूरि‍ दादीकेँ छै ओते लूरि‍ गाममे केकरो ने अछि। मुदा कमाइक तेहेन भूत लगि‍ गेल छै जे जइ दिन मरत तही दिन छोड़तै। सभ लूरि‍ संगे चलि जेतइ। तँए नीक भेलै जे अबाह भऽ गेल, आब तँ अँगनामे रहत। जखने अँगनामे रहए लगत तखने एका-एकी सभ लूरि‍ दादीसँ सीख लेब। मुदा दादीए-केँ की दोख देबइ। भरि दिन दस सेरक छिट्टा माथपर नेने बुलैए, तँए देह-हाथ तँ दुखेबे करतै। साँझ खिन-के थाकल-ठेहियाएल अबैए आ असुआ कऽ पड़ि रहैए। से आब नै हेतइ। निचेनसँ पावैनो-तिहारक विधि-विधान आ गीतो-नाद सीखब। एतेटा भऽ गेलौं, ने अखन तक एक्कोटा गीत अबैए आ ने बि‍आह-दुरागमनक अरिपन बनौल होइए। केता दिन मनमे अबैए जे मालतीए जकाँ हमहूँ अपन गोसाँइ घरक ओसारमे पुरैनक लत्ती, कदमक गाछ लिखी। से लूइरो रहत तब ने। साँझू-पहरमे, जेते काल दादीकेँ जँतै छिऐ तेते काल समैयो भेटैए तँ नहियेँ होइए। किएक तँ बिछानपर पड़िते ओंघा जाइए। जँ पुछबो करै छिऐ तँ ऐ गीतक पाँति ओइ गीतमे आ ओइ गीतक भाष ऐ गीतमे कहए लगैए। जइसँ किछु सीखि नै पबै छी। मटुकलालकेँ ऐ दुआरे खुशी होइत जे बेटा-पुतोहुक रहैत बुढ़ माए एते खटए से उचित नहि। मुदा कहबो केकरा करबै। हमरा कोनो मोजर दइए। दूटा धिया-पुता भेल। बेटियो बि‍आह करै-जोकर भऽ गेल मुदा हमरा बच्चे बुझैए। हम की करूँ। तँए भगवान जे करै छथिन से नीके करै छथिन। भने आब भारी काज करै-जोकर माए नइ रहल। जे अपनो बुझत आ मनाही करबै तँ मानियोँ जाएत। मरैक डर केकरा ने होइ छइ। तहूमे बुढ़-बुढ़ानुसकेँ...। मटकुरिया तँए मने-मन खुश। लोक हमरा तड़िपीबा बुझि बुड़िबक बुझैए। तँए की हम बुड़िबक छी। कियो बुझैए तँ बुझह। जहिया बाबू मुइला तहिया जेते भार कपारपर आएल, से कियो आन सम्हारि दइए आकि अपने करै छी। ..पसिखन्ने जाइ छी तँ की लुच्चा-लम्पटक संग बैस पीबै छी जे चोरी-छिनरपन्नी सीखब। या तँ असगरे बैस कऽ पीबै छी या बड़का लोक लग बैस कऽ पीबै छी। बड़का लोकक मुँहमे हरिदम अमृत रहैए। रमानन्द बाबूसँ गियनगर लोक ऐ इलाकामे दोसर के अछि। हुनकासँ हमरा दोस्ती अछि। हुनकर ओ बात हम गिरह बान्हि नेने छी जे जहिना कियो जनमैए, बढ़ि कऽ जुआन होइए। जुआनसँ बुढ़ भऽ मरि जाइए। ई तँ दुनियाँक निअमे छिऐ। सभकेँ हएत। जे नै बुझत ओ नै बुझह। मुदा हम तँ वएह मानै छी...। फेर मटकुरि‍याक नजैर माए दिस घुमलै। मने-मन सोचए लगल, माइक पएर टुटब कोनो अनहोनी थोड़े भेलै, ई तँ भगवानक लीले छिऐन। भगवान कखनो अपना सिर अजश लेता। कोनो-ने-कोनो कारण भइए जाइए। तइले हमरा दुखे किए हएत। जहिना एते दिन बि‍तल तहिना आगुओ बि‍तत। एते दिन जहिना माएकेँ, बेच कऽ घुमै काल आगूसँ पथिया आनि दइ छलिऐ तहिना आब घरोवालीकेँ आनि देबइ। कियो हमरा देखा दिअ तँ जे एक्को दिन हमरा काजमे नागा भेल। गोसाँइ डुमै बेर, केतौ रही, केतबो पीब कऽ बुत्त रही मुदा तँए की अपन काज कहियो छोड़ै छी..? मटकुरियाक परिवारक खानदानी जीविका चुनक। महिला प्रधान रोजगार। किएक तँ चुनक बिकरी अँगने-अँगने होइत। शुद्ध गमैआ बेवसाय। ने चुन बनबैक समान बाहरसँ आनए पड़ैत आ ने बेचैक असुविधा। गामक अधिकांश परिवारमे चुनक खर्च। कियो पान खाइत तँ कियो तमाकुल। दुनूमे चुनक जरूरत‍। चुन बनाएबो कठिन नहि। डोका जरा कऽ बनैत। अन्नेक कोठी जकाँ डोको जरबैक कोठी होइत। मुदा अन्नक कोठीक ऊपरमे छोट मुँह, अन्न ढारैले बनौल जाइत, जखन कि चुनक कोठीक ऊपरका भाग खुलल रहैत। निच्चाँक मुँह दुनूक एक्के रंग...। चुन बनबैले कच्चो मालक कमी नहियेँ। किएक तँ गरीब-गुरबा लोक डोकाक मौस खाइत। मौसो पवित्र। किएक तँ डोका माटि खा जीवन-बसर करैत। डोकेक ऊपरका भागसँ माने खपलौइयासँ चुन बनैत। चुनक बजारो गामे-घर। बिरले गोटेक घरमे चुनक खर्च नै होइत, नहि तँ सबहक घरमे होइत। पहिने मटकुरियाक दादी-परदादी चुन बेचै छेली, मुइला पछाइत‍ माए बेचए लगलैन‍। सात दिनक सप्ताहमे पाँच दिन मखनी गामे-गामे भौड़ी करैत छेली। एक-एक गाममे एक-एक दिनक पार बनौने। आठ दिन खर्चक हिसाबसँ सभ कियो चुन किनैत। सभ काज अन्दाजेसँ। अन्दाजेसँ चूनो दैत आ अन्दाजेसँ धान-मरूआ बेचो लइत। कोनो हरहर-खटखट नहि। किएक तँ मनक उड़ान छोट। ने कोठा-कोठीक इच्छा, ने सुख-भोगक। बान्हल मन तँए मात्र मनुख बनि जीबैक इच्छा। बजारोमे प्रतियोगिता नहि, कारोबारमे छीना-झपटी नहि। किएक रहतै। जहिना जातिक शासन तहिना समाजक दण्‍डात्मक रूखि। समाजमे निसचित जाति निसचित काजसँ बान्हल। एकक काज दोसर नै करैत, तँए लक्कड़-झक्कड़ कम। जेना डोम, नौआ, धोबि, बरही कुम्हार इत्यादिक अपन-अपन जीविकाक धंघा, जेकर कड़ाइसँ पालन होइत। दुनू बिन्दुपर। करौलो जाइत आ करबो करैत। सीमित क्षेत्रक बीच कारोबार। कियो अतिक्रमण नै करैत। जँ कहीं केतौ अतिक्रमण होइत तँ जातिक बीच ओकर फरिछौट होइत, तँए सभ अपन-अपन सीमाक भीतर रहैत। हँ, ई बात जरूर होइत जे सीमाक भीतर भैयारीक बँटबारासँ विभाजित होइत। मुदा मटकुरियाक परिवार एक-पुरखिया, तँए एहेन प्रश्‍ने नहि। रोजगारो-ले तहिना। सबहक अपन-अपन सीमित क्षेत्र। एक क्षेत्रमे दोसरक प्रवेश बर्जित। मुदा बेर-बेगरतामे एक-दोसराकेँ भार दऽ समाजक काजमे बाधा उपस्थिति नै हुअए दइत। चुन बेच मखनी खाली परिवारे नै चलबैत, महाजनियोँ करैत। किएक तँ सोल्‍होअना श्रमे पूजी। मेहनत‍ कऽ डोका एकत्रित करैत,डोका जरा कऽ चुन बनबैत आ अन्नसँ बदलैत। चुनक कीमतो अलग-अलग। जैठाम गरीब लोक चुनक कम कीमत दैत तैठाम सुभ्यस्त किछु बेसीए दइत। पाँचे गोरेक परिवार मखनीक। केते खाएत। तँए फजिलाहा अन्न सबाइपर लगबैत। सेहो बिनु लिखा-पढ़ीक। मुँह जवानी। जइसँ किछु ऊपरो होइत किछु बुड़ियो जाइत...। पाँच गाममे मखनीक कारोबार। अगर जँ ऐसँ आगू कारोबार बढ़बए चाहती तँ सम्हारले ने हेतैन‍। किएक तँ डोका जमा करैसँ चुन बनबै धरिमे दू दिन समए लगि‍ जाइत। आठे दिनपर बिकरीक बीट घुमैत, तँए पाँच गामसँ बेसी गाम सम्हारब कठिन। टाँग अबाह होइते मखनी चुन बेचब छोड़ि देलैन‍। मुदा परिवारक रोजगार बन्न नइ भेलइ। आब फुलिया बेचए लगल। चिन्हार गाम चिन्हार गहिंकी। तँए केतौ बाधा नहि। मुदा मखनीक महाजनी बुड़ि गेलैन‍। किएक तँ पाँचो गाममे पाँच गोरे ऐठाम अपन धान-मरूआ रखै छेली आ ओहीठामसँ ओइ गाममे सबाइ लगबै छेली। अपन आवाजाही बन्न भेने बिसैर गेली। लेनिहारो बिसैर गेल। मुदा तइले मखनीक मनमे दुख नइ भेलैन‍। खुशीए भेलैन‍। खुशी ऐ दुआरे भेलैन‍ जे जाबत देहमे तागत छेलए ताबे अपनो, परिवारो आ दोसरोकेँ खुऔलौं। जिनगीक सार्थकता ऐसँ बेसी की हएत। यएह ने धरम छी। धर्ममय जिनगी बना बुढ़ाड़ी धरि जीब लेलौं, ऐसँ बेसी की चाही। तँए मने-मन खुशी। समए आगू बढ़ल। कारोबारक रूपो बदलल। केना नै बदलैत? समैयोक तँ कोनो ठेकान नहि। कोनो साल अधिक बर्खा होइत तँ कोनो साल रौदी। अधिक बर्खा भेने तँ अधिक डोकाक वृद्धि होइत मुदा रौदीमे कमि जाइत। बिसवासू कारोबार-ले वस्तुक उपलब्धि अनिवार्य। जे आब नै भऽ पबैत। मुदा समैयो तँ पाछू नहि आगू-मुहेँ ससरत। पत्‍थल-चूना बजारमे आबि गेल। पर्याप्त वस्तुक उपलब्धि भऽ गेल। बजारो बढ़ल। जैठाम उमरदार लोक तमाकुल-पान सेवन करै छला तैठाम आब स्कूल-कौलेजक विद्यार्थी सेहो करए लगल। तेतबे नहि, बाल-श्रमिक सेहो करए लगल। गामे-गाम चौक-चौराहा बनि गेल। जइसँ चाहो-पान खेनिहार बढ़ल। ओना तमाकुल-पानक अतिरिक्त पान-पराग, शिखर, रंग-बि‍रंगक गुटका सेहो बढ़ि गेल। तेकर अतिरिक्त सार्वजनिक उत्सव सेहो बढ़ल। परिवारक मांगलिक काज जेना- बि‍आह, मूड़न, सराध, सेहो नमहर भेल। जइसँ पान-तमाकुलक खर्च बढ़ल। तँए चुनोक खर्च केतेको गुणा बढ़ि गेल। मखनीक जगह फुलिया लेलक। ओना घरक रोजगार तँए फुलियोकेँ किछु सीखैक जरूरत‍ नहि। सभ सीखले-बुझले। सासुक रहितो, कहियो काल फुलियो बेचए जाइ छल। किएक तँ जइ दिन मखनी नैहर जाइत तइ दिन फुलीये बेचैयो-ले जाइत आ डोका आनि-आनि चुनो बनबैत। मुदा आब तँ चुन बनबैक रूपे बदैल गेल। लोको डोकाक चुनक बदला पत्‍थल-चूना खाए लगल। ओना अखनो बुढ़-बुढ़ानुस सभ पत्‍थल-चूनाकेँ घटिया बुझैत। जे तेजी डोकाक चुनमे होइत ओ पाथरक चुनमे नहि। मुदा हारल नटुआ की करत...। चुन बेचैयोक रूपो बदलल। अखन धरि जे अन्‍दाजसँ बिकरी होइ छल ओ आब तौल कऽ हुअ लगल। बेचक जगह पाइ लेलक। ओना अन्नोक चलैन सोलहन्नी समाप्त नहियेँ भेल हेन। आब ओतबे अन्न पड़ैत जे आनठाम रखैक जरूरत फुलियाकेँ नै होइत। पाइ बौगलीमे रखैत आ अन्न पथियामे। ओना कर्जखौक सेहो कमल। किएक तँ समए आगू बढ़ने खाइ-पीबैक उपाय सेहो लोककेँ भेल। बोइन सेहो सुधरल। पाइक आमदनी किसानोकेँ हुअ लगल। लोकक पीढ़ि सेहो बदलल जइसँ विचारोमे बदलाउ आएल। समए आगू बढ़ने कारोबार असान भेल। जइसँ मटकुरियाक परिवार सेहो आगू-मुहेँ ससरल। मुदा मटकुरिया जहिना-के-तहिना रहि गेल। पहिने जे मटकुरिया माइक संग डोका आनै छल ओ आब एक्केठाम बजारसँ चुन कीनि कऽ लऽ अबैए। सूखल चुन। सूखल चुनकेँ गील बनबैमे सेहो अधिक फीरिसानी नहियेँ...। फागुन मास। शिवरातिक तीन दिनक पछाइत‍। धुरझार लगन चलैत। मेला जकाँ बरियाती चलैत। अंग्रेजीबाजा आ लॉडस्पीकरक अवाजसँ वायुमण्‍डल दलमलित। आन दिन चारि बजे मुदा आइ सबेरे मटकुरिया पसिखाना विदा भेल। समैयो सोहनगर। झिहिर-झिहिर हवा चलैत। अकासमे जहिना चिड़ै गीत गबैत तहिना हवामे गाछ-बिरीछ नचैत। ..पसिखाना पहुँचते मटकुरियाकेँ पासी कहलक- “भैया, आइ निम्मन बसन्ती माल अछि, खजुरिया नै ताड़क।” पासीक बात सुनि मटकुरियाक मनमे खुशी उपकल। मने-मन सोचलक, दू गिलास आरो बेसी चढ़ा देबै, बाजल- “तब तँ आइ जतरा नीक बनल अछि।” “अहाँ तँ हमर पुरान अपेछित छी भैया, तँए दू गिलास ओहिना मंगनीए पिआएब।” दू गिलास मंगनी सुनि मटकुरिया सोचलक जे पहिल दिन छिऐ तँए आन दिनसँ कम केना लेब। यात्रा तँ पहिलुके दिन नीक होइ छइ। वेचाराकेँ सगुन केना दुरि करबै। मुस्‍कियाइत मटकुरिया बाजल- “बड़बढ़ियाँ। अपनो मिला कऽ नेने आबह।” वसन्ती ताड़ी, पिबते मटकुरियाकेँ रंग चढ़ए लगल। ताड़ी पीब मटकुरिया सोझे, पसिखन्नेसँ, पत्नीकेँ माथ परहक पथिया आनए दच्‍छिन-मुहेँ विदा भेल। गामक दछिनबरिया सीमानपर ठाढ़ भऽ आगू तकलक। जेते दूर नजैर गेलै तैबीच केतौ पत्नीकेँ अबैत नइ देखलक। कनी काल पाखैरक गाछ लग ठाढ़ भऽ सोचए लगल जे आगू बढ़ी वा एतै रूकि‍ जाइ। ..अंग्रेजी बाजा आ लॉडस्पीकरक फिल्मी गीत कानमे पैस-पैस मनकेँ डोलबैत रहइ। मन पड़लै अपन बि‍आह। बिआह मन पड़िते फुलियाक रूप आगूमे ठाढ़ भऽ गेलइ। गुनधुन करैत सोचलक जे ऐठाम ठाढ़ भऽ कऽ समए बिताएब, तइसँ नीक जे आरो थोड़े बढ़ि जाइ। आगू बढ़ल। किछु दूर आगू बढ़लापर पत्नीकेँ ऐगला गाम टपल अबैत देखलक। बाधो कोनो नमहर नहि। फुलियाक नजैर सेहो मटकुरियापर पड़लै। दुनूक डेग तेज भेल। तेज होइक दुनूक दू कारण। मटकुरियाक मनमे जे जेते जल्दी लगमे पहुँचब तेते जल्दी भार उतरतै। जखन कि पसीनासँ नहाएल फुलियाक मनमे शान्ति। शान्ति अबिते पथिया हल्लुक लगए लगलै। दुनूक मनमे केतेको नव-नव विचार आबए लगलै...। पत्नीकेँ लग अबिते मटकुरिया धोतीक ढट्ठा सेरियौलक। किएक तँ माथपर भारी एलासँ डाँड़क धोती डाँड़मे बैस जाइत। ढट्ठा सेरिया गमछाक मुरेठा बान्हि दुनू हाथसँ पकैड़ फुलियाक माथ परहक पथिया अपना माथपर लेलक। माथपर लइते किछु कहैक मन भेलइ। मुदा किछु बाजल नहि। किएक तँ मनमे एलै, वेचारी थाकल अछि, तँए मन अगियाएल हेतइ। हो-ने-हो किछु करूआएल बात बाजि दिअए...। जखन कि एकाएक माथ परहक भार उतरलासँ फुलियाक मन हल्लुक भेल। मुदा ओहो किछु बाजल‍ नहि, ओहिना देह कठियाएल। आगू-पाछू दुनू बेकती घर दिस विदा भेल। जेते आगू बढ़ैत तेते फुलियाक मन हल्लुक होइत आ मटकुरियाक मन भारी। पत्नीसँ किछु कहैक विचार मटकुरियामे कमए लगल। जेना मुँह खोललासँ भार बढ़तै। मुदा जेना-जेना आगू बढ़ैत तेना-तेना फुलियाक देहो-हाथ सोझ होइत आ पतिकेँ किछु कहैक इच्‍छा सेहो बढ़इ, मुदा किछु बाजए नहि। किएक तँ पति-पत्नीक बीच गप्पक आनन्‍द तहन‍‍ होइत जहन‍‍ दुनूक मन सम रहत माने ने बेसी सुख आ ने बेसी दुख। से अखन धरि दुनूक बीच नइ भेल छेलइ। एते काल फुलियाक माथपर पथिया रहने मन पीताएल रहै आ आब मटकुरियाक हुअ लगल। ने फुलिया पतिकेँ किछु कहैत आ ने मटकुरिया पत्नीकेँ। मुदा बाटक बीच बाधमे अबैत-अबैत दुनूक मुहसँ हँसी निकलल। पथिया नेनहि मटकुरिया पाछू घुमि कऽ तकलक तँ देखलक जे फुलिया मुस्किया रहल अछि। फुलियोक नजैर मटकुरियाकेँ मुस्कियाइत देखलक। एक टकसँ एक-दोसरपर आँखि गड़ौने अपन जिनगी देखए लगल। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2452 डीहक बँटवारा अमानतक दिन। चारि बजे भोरेसँ पुड़ी-जिलेबी-तरकारी इत्‍यादि‍क सुगन्‍ध गामक हवामे पसैर गेल। सौंसे गामक लोककेँ बुझले तँए केकरो सुगन्‍धसँ आश्‍चर्ज नहि। भोरे श्रीकान्तो आ मुकुन्दोक पत्नी फूल तोड़ि नहा-सोना कऽ बरहम स्थान पूजा करए गेली। हलुआइ दू-चुल्हियापर तरकारियो बनबैत आ जिलेबियो छनैत। कुरसीपर बैसल श्रीकान्त मने-मन बरहम बाबाक कबुला केलैन जे जँ हमरा मनोनुकूल नापी भेल तँ जोड़ा छागर चढ़ेबह। तहिना मुकुन्‍दो बरहम बाबाकेँ छागर कबुललैन। गामक सुगन्‍धित हवामे सबहक मन उधियाइत। चाह बनबैबला चाह बनबैमे आ पान लगबैबला पानमे व्‍यस्‍त। दुनू दिस कट्ठा-कट्ठा भरिक टेन्‍ट लगल, दड़ी आ जाजीम बिछौल। एक भागमे गाँजा पीनिहारक बैसार आ दोसर भागमे दारूक। जहिना बुचाइ कुदि कऽ कखनो हलुआइ लग जा देखैत तँ कखनो दारूबलाक बैसारमे जा दू-गिलास चढ़ा लैत, तहिना सरूपो। सभ कथूक ओरियान काल्हिए दुनू गोरे दुनू दिस कऽ नेने तँए अनतए जाइक जरूरते नहि। चाह-पानक इत्ता नहि। जेकरा जेते मन हुअए से तेतै खाउ-पीबू। जलखैमे पुड़ी-जिलेबी-डलना आ कलौमे खस्सीक मौस आ तुलसीफुलक भात। तँए भरि दिनक चिन्ता सबहक मनसँ पड़ाएल। जीविलाह सभ दुनू दिस टहैल-टहैल खाइत-पिबैत। श्रीकान्तो आ मुकुन्दो इंजीनियर। दुनू एक्के वंशक। दुनूक परदादा सहोदरे भाए। पाँच कट्ठाक घराड़ी, जइमे दुनू गोरेक अदहा-अदहा हिस्सा। जहिए-सँ दुनू गोरे नोकरी शुरू केलैन, तहिए-सँ गाम छोड़ि देलैन। एक-पुरखिया वंश तँए परिवारमे दोसर नहि। पैंतीस सालक नोकरीक बीच कहियो दुनूमे कियो गाम नै एला। जइसँ पिताक बनौल घर दुनूक खसि पड़लैन। गामक स्‍त्रीगण सभ ठाठ-कोरो-धरैनकेँ उजाड़ि-उजाड़ि जरा लेलक आ ढि‍मका-ढि‍मकीकेँ सेरिया गामक छौड़ा सभ फील्ड बना लेलक। गामक जेते खेलौड़ि‍आ छौड़ा सभ छल ओ सभ अपन-अपन खेलक जगह बाँटि लेलक। एकटा फील्ड कबड्डीक, दोसर गुड़ी-गुड़ीक, तेसर चिक्का-चिक्काक, चारिम गुल्ली-डण्‍टाक आ पाँचम रूमाल चोरक बनि गेल। उकट्ठी छौड़ा सभ एक दोसराक फील्डमे राता-राती झाड़ा फीर दइ। मुदा खेल शुरू करैसँ पहिने दस-बीसटा गारि पढ़ि सभ अपन-अपन फील्ड चिक्कन बना लिअए। ओना दुनू गोरे–श्रीकान्तो आ मुकुन्दो–बाहरे घर बना नेने छैथ‍ मुदा मरै बेरमे दुनूकेँ गाम मन पड़लैन। साले भरिक नोकरी दुनूक बाँचल तँए तीन मासक छुट्टी लऽ लऽ गाम एला अछि। गाम अबैसँ पहिने दुनू गोरे फोनक माध्यमसँ अबैक दिन निर्धारित कऽ नेने छला। किएक तँ परोछा-परोछी नापी करौलासँ आगू झंझटक डर दुनूक मनमे रहैन। घराड़ी नापी होइसँ दस दिन पहिनहि श्रीकान्त गाम एला। अपना तँ घरो नहि, मुदा अबै काल एकटा रौटी आ सुतै-बैसैक समानक संग भानसो करैक सभ कि‍छु नेने एला। गाम आबि पितियौत भाएकेँ कहि सभ बेवस्था केलैन। सभ गर लगला पछाइत‍‍ भाएकेँ पुछलखिन- “बौआ, गाममे के सभ मुँह-पुरखी करैए?” भाए कहलकैन- “गाममे तँ कियो राजनीति नहियेँ करैए मुदा बुचाइ आ सरूप सभ धन्‍धा करैए।” “की सभ धन्‍धा?” “जेना कियो खेत किनैए वा बेचैए तैबीचमे पड़ि किछु कमा लइए। तहिना गाइयो-महींसमे करैए तँसंग भोँट-भाँटसँ लऽ कऽ कथा-कुटुमैती धरिमे सेहो किछु-ने-किछु हाथ मारिए लइए।” भाएक बात सुनि इंजीनियर साहैब कनी काल गुम्म भऽ गेला। मने-मन सोचि-विचारि कऽ बजला- “कनी बुचाइकेँ बजौने आबह?” “बड़बढ़ियाँ” कहि भाए बुचाइकेँ बजबए विदा भेल। मने-मन श्रीकान्त सोचए लगला जे गाममे तँ सबहक हालत तेनाहे सन अछि। देखै छिऐ जे जेहने घर-दुआर छै तेहने बगए बानि। दू चारिटा जे ईंटो घर देखै छिऐ सेहो भितघरे जकाँ। तँए गाममे ओहेन घर बना कऽ देखा देबै जे गामक कोन बात, परोपट्टाक लोक देखए औत। पुरान लोक सबहक कहब छैन‍‍ जे जेहेन हवा बहै ओइ अनुकूल चली। जुग पाइक अछि,जेकरा पाइ रहतै ओ बुधियार आ जेकरा पाइ नइ रहतै ओ किछु नहि। असगर बरसपैतो फुसि। जेकरा पाइ छै वएह नीक घर बनबैए, नीक गाड़ीमे चढ़ैए, ओकरे धिया-पुता नीक स्कूल-कौलेजमे पढ़ैए आ ओकरे परिवारक लोक नीक लत्ता-कपड़ा पहिरैए आ तैसंग बेटा-बेटीक बि‍आह नीक परिवारमे होइ छइ। तेतबे नहि, आइक जे सुख-सुविधा विज्ञान करौलकहेँ ओकरो सुख भोगैए...। यएह ने जुगक संग चलब छी। समाजक बीच प्रतिष्ठा बनाएब तँ बामा हाथक काज अछि। अधलासँ अधला काज करि कऽ पाइ कमा लिअ आ समाजकेँ भोज खुआ दियौ, बस जशे-जश, प्रतिष्ठे-प्रतिष्ठा। हाथमे पाइ ऐछे, सभ कि‍छु गौंआकेँ देखा देबइ। बेटो-बेटीकेँ पढ़ा-लिखा, बिआह-दुरागमन करा कऽ निचेने छी। तहन‍‍ तँ एकटा काज मात्र पछुआएल अछि, समाजिक प्रतिष्ठा। सेहो बनाइए लेब। मने-मन श्रीकान्त विचारिते रहैथ कि बुचाइक संग भाए पहुँचलैन। लगमे अबिते बुचाइ दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “गोड़ लगै छी काका। अहाँ तँ गामकेँ बिसैर गेलिऐ। सरकारक एयर कण्‍डीशन मकान भेटले अछि तहन‍‍ कथीले थाल-कादोमे आबि मच्छर कटाएब?” अपनाकेँ छिपबैत श्रीकान्त बजला- “नै बौआ, से बात नइ अछि। जखने नोकरीक जिनगी शुरू केलौं तखने दोसराक गुलाम बनि गेलौं। जे-जे हुकुम देत से से करए पड़त। तूँ सभ कम उमेरक छह तँए नइ देखलहक, मुदा हम तँ अंग्रेजक शासन देखने छी कि‍ने। शासन तरे-तर चलै छै, जे सभ थोड़े बुझैए। अंग्रेजक पीठपोहू छल ऐठामक राजा-रजबार आ ओकरा सबहक फाँड़ी छी जमीनदार सभ। ओ सभ जे ऐठामक लोकक संग बेवहार करै छल आ करैए से तँ तहूँ सभ देखते छहक। मुदा ऐ सभ गपकेँ छोड़ह। तोरा जे बजौलियह से सुनह। साले भरि आब नोकरी अछि। नोकरी समाप्त भेला पछाइत‍‍ गामेमे रहब। तँए तीन मासक छुट्टी लऽ कऽ एलौं हेन जे घराड़ीक अमानत करा घर बनाएब। बिनु घरे रहब केतए।” बुचाइ- “हँ, ई तँ जरूरीए अछि, मुदा हमरा किए बजेलौं?” पासा बदलैत श्रीकान्त बजला- “मुकुन्दजीकेँ सेहो खबैर दऽ देने छिऐन। ओहो काल्हिसँ परसू धरि एबे करता। ऐठाम तँ दुइए गोरेक घराड़ी अछि, तँए दुनू गोरेक रहब जरूरी अछि। तोरा तँ नइ बुझल हेतह, हमर परबाबा आ मुकुन्दक परबाबा सहोदरे छला। अढ़ाइ-अढ़ाइ कट्ठाक हिस्सा जमीन दुनू गोरेकेँ अछि। तँए कोनो पेंच लगाबह जे हमरा तीन कट्ठा हुअए।” श्रीकान्तक पेटक मोलि‍ बुचाइ देख गेल। मुस्‍कियाइत बाजल- “एँह, अहीले अहाँ एते चिन्तित छी। ई तँ बामा हाथक काज अछि। अमीनकेँ मिला लेब, सभ काज भऽ जाएत। किएक तँ अमीनक गुनियाँ-परकालमे पाँच-दस धूर जमीन नुकाएले रहै छइ। मुदा अइले खरचा करए पड़त। हम तँ जोगारे ने बैसाएब, खर्च तँ अहींकेँ करए पड़त।” पाइक गरमी श्रीकान्तकेँ रहबे करैन। मनमे ईहो बात रहैन जे भलेँ मुकुन्दो इंजीनियर छैथ‍, दुनू गोरेक दरमहो एक्के रंग अछि मुदा पाइमे बरबैर कऽ लेता, से केना हेतैन। मुस्‍कियाइत श्रीकान्‍त बजला- “बुचाइ, तोहर मेहनत‍ आ हम्मर पाइ। सएह ने। जेते खर्च हएत, हएत। मुदा मैदानसँ जीति कऽ अबैक छह।” श्रीकान्तक बात सुनि बुचाइ मने-मन खुश भेल। मनमे एलै, नीक मोकि‍र हाथ लागल। भरिसक राशि घुमल हेँ। ओह! बहुत दिनसँ अखबारो ने पढ़लौं जे कनी राशि देख लैतिऐ। खएर.., नहियोँ पढ़लौं तैयो शुभ बुझि पड़ैए। जोशमे बुचाइ बाजल- “काका, रूपैआ-पुत पहाड़ तोड़ैए। ई तँ मात्र अमानते छी, जे चाहबै से हेतइ। खाली अहाँ कंजूसी नै करबै।” कंजूसीक नाओं सुनि श्रीकान्त बजला- “मरदक बात छिऐ। जे बाजि देब ओ बिनु पुरौने छोड़ब।” बैगसँ पाँच हजार रूपैआ निकालि श्रीकान्त बुचाइकेँ देलखिन। रूपैआ जेबीमे रखि बुचाइ प्रणाम कऽ विदा भेल। गामक पेंच-पाँचमे बुचाइ माहिर मुदा समाजमे अनुचित हुअए, से कखनो नइ सोचए। जहिया कहियो कोनो उकड़ू काज अबै तँ‍ गुरु काकासँ पुछि लइत। ..बुचाइ मने-मन रस्तामे सोचए लगल जे ऐ बेर हिनका तेहेन सिखान सिखेबैन जे मरै काल तक मन रहतैन। सरकारी खजानासँ लऽ कऽ ठीकेदार धरिसँ झिटलाहा रूपैआ केहेन होइ छै, से सिखता। आँगन पहुँच‍ बुचाइ चारि हजार पत्नीक हाथमे आ एक हजार अपना हाथमे रखलक। जहिना अगहनमे धानक ढेरी देख, दुनू परानी किसानक मन खुशीसँ गदगदा जाइत तहिना दुनू परानी बुचाइकेँ भेल। मुदा दुनूक खुशीमे अन्तर होइए। किसानक खुशी मेहनतक फल देख होइत जखन कि बुचाइक खुशी दलालीक। ..मुस्‍की दैत बुचाइ घरवालीकेँ कहलक- “खिड़कीपर एकटा शीशी अछि, नेने आउ?” मुँह चमकबैत घरवाली बाजल- “खाइ-पीबै रातिमे शीशी की करब?” बुचाइ- “शीशियो नेने आउ आ खेनाइयो नेने आउ। दुनू संगे चलतै। जाबे भरि मन पीअब नइ ताबे मूड नै बनत। बहुत बात सोचैक अछि। अहाँ नहि ने हमर बात बुझबै?” पत्नी- “अहाँक बात बुझैक जरूरत‍ हमरा कोन अछि। हमरा तँ अपने मन केनादन करैए, देह भँसियाइए।” “अच्छा ठीक अछि, अहूँ दू घोंट पीब लेब।” भोरे बुचाइ चौकपर पहुँचल। गामक बीचमे चौबट्टी। जइ चौबट्टीपर चारू-भरसँ तीस-पैंतीसटा छोट-छोट दोकान। दस-बारहटा दू-चारी घर, बाँकी कठघारा। ओना एक्कोटा नमहर दोकान नहि, मुदा सभ कथुक दोकान। जइसँ गामक लोककेँ हाट-बजार जाइक जरूरत कम पड़ैत। जहिया कहियो कोनो परिवारमे नमहर काज जेना बिआह, सराध इत्यादि होइत तखने बजार जाइक खगता पड़ैत। ओना भरि दिन चौकक दोकान खुजल रहैत मुदा गहिंकीक भीड़ साँझे-भिनसर होइत। भरि दिन लोक अपन-अपन काज-उदेम करैत आ साँझू-पहरमे दोकानक काज कऽ लइत। खाली चाहे-पानक बिकरी भिनसरु-पहरमे बेसी होइत। चौकपर पहुँच‍ बुचाइ दुनू चाहबलाकेँ एक-एक साए रूपैआ दऽ दोकानपर बैसल आ सभकेँ चाह पीअबैले कहलक। ..गाँजा पिआकक सेहो तीन ग्रुप चलैत। चाह पीब पान खा बुचाइ चिलमक ग्रुपमे पहुँच‍, दू दम लगा, तीनू ग्रुपमे पचास-पचास रूपैआ गाँजा-ले दऽ देलक। सबहक मन खुशी भऽ गेलइ। मुस्‍कियाइत बुचाइ अमीन ऐठाम विदा भेल। गाममे तीनटा अमीन। रामचन्द्र, खुशीलाल आ किसुनदेव। कहैले तँ तीनू अमीने मुदा पढ़ि कऽ अमीन रामचन्द्रेटा भेल। ..मिडिल पास केला पछाइत‍‍ रामचन्द्र हाइ स्कूलमे नाओं नै लिखा सकल। आब तँ लगेमे हाइ स्कूल खुगि‍ गेल छै, मुदा ओइ समैमे एक्कोटा हाइ स्कूल परोपट्टामे नै छल, जइसँ रामचन्द्र आगू नै पढ़ि सकल। बाहर पठा बेटा पढ़बैक ओकाइत रामचन्द्रक पिताकेँ नहि। सर्वे अबैसँ दस-पनरह बर्ख पहिने मुजफ्फरपुरक एकटा अमीन गाममे आबि अमानतक स्कूल खोललक। छह मासक कोर्स। चारि विषयक- पैमाइस, क्षेत्रमिति,कानून आ चकबन्दीक-पढ़ाइ। ओना समानो सभ जेना- गुनियाँ, परकाल, मास्टर, स्केल, लेन्स, राइटऐंगिल, प्लेन, टेबुल, कंघी, टाँक,थ्याजो रैटर, जंजीर, फीता इत्‍यादि रखने। पाँच रूपैआ महि‍ना फीस लइत। मधुकान्तक दरबज्जेपर स्कूल खोललक। मधुकान्ते खैयो-ले दइ। जेकरा बदलामे मधुकान्तकेँ सेहो पढ़ा देलक। ओना गामोक आ गामक चारू-भरक गामक विद्यार्थी सेहो पढ़लक। कुल मिला कऽ पनरह गोरे पढ़लक। मुदा जमीनक नापी-जोखी कम होइत, तँए रामचन्द्र छोड़ि सभ अमीनी छोड़ि देलक। सर्वे अबैसँ महि‍ना दिन पूर्व बेगूसरायक एक गोरे आबि पँच-पँच साएमे अमानतक सर्टिफिकेट बेचए लगल। ओकरेसँ खुशीलालो आ किसुनदेवो सर्टिफिकेट कीनि लेलक। गामे-गाम सर्वे शुरू भेल। अमीन सबहक चलती आएल। नक्शा बनब शुरू होइते दलाली शुरू भेल। पाइ दऽ दऽ लोक अपन-अपन खेतक नक्शा बढ़बए लगल। लोकक दलाल अमीन आ सरकारक सर्वेयर। खुशीलालो आ किसुनदेवो उठि बैसल। मुदा रामचन्द्र कात रहल। गाए-महींस, गाछ-बिरीछ बेच-बेच लोक रूपैआ बुकए लगल। रामचन्द्र दबि गेल मुदा खुशीलाल आ किसुनदेव, नाओं कमा लेलक। जेमहर निकलैत तेमहर लोक सभ चाहो-पान करबै आ ‘अमीन साहैब’, ‘अमीन साहैब’ कहि परनामो करइ। दुनू गोरे सर्वेक नाँगैर पकैड़ किस्तवारसँ लऽ कऽ तसदीक खानापुरी, दफा-3, दफा-6,8,9 धरि दौग-बड़हा करैत रहल। जइसँ मोटर साइकिल मेण्‍टेन करए लगल। खुशीलाल ऐठाम पहुँच‍ बुचाइ श्रीकान्त दिससँ नापीक अमीन मुकर्रर कऽ लेलक। नापीक फीसक अतिरिक्त पक्ष लइक फीस सेहो गछि लेलक। दोसर दिन मुकुन्दजी सेहो गाम पहुँचला। बाहरेसँ रहैक सभ ओरियान केने एला। गाम अबिते दूटा जन रखि‍ परती छिलबा रौटी ठाढ़ करौलैन। जखन‍‍ जन जाए लगल तँ‍ मुकुन्‍द पुछलखिन- “गाममे के सभ नेतागीरी करैए?” मुकुन्दजीक बात सुनि एक गोरे बुचाइक नाओं कहलकैन। बुचाइक नाओं सुनि मुकुन्‍द बजा आनैले कहलखिन। दुनू गोरे विदा भेल। दुनू कोदारि लऽ एक गोरे घरपर गेल आ दोसर गोरे बुचाइ ऐठाम। तैबीच मुकुन्दजी पत्नीकेँ कहलखिन- “कनी चाह बनाउ? पत्नी चाह बनबैक ओरियान करए लगली। गैस चुल्हिपर ससपेन चढ़ा बजली- “केकरा-ले तीन महला मकान बनेलौं।” पत्नीक बात सुनि मुकुन्दजीक करेज दहैल गेलैन। करेजकेँ दहैलते आँखिमे नोर आबि गेलैन। आँखि उठा पत्नी दिस देख नजैर निच्चाँ कऽ लेलैन। रूमालसँ नोर पोछि मुकुन्दजी मने-मन सोचए लगला जे अपन हारल केकरा कहबै! सपनोमे नै सपनाएल रही जे पढल़-लिखल मनुख एते नीच होइए। केते मेहनतसँ बेटाकेँ पढ़ेलौं..! नोकरी दिएलौं। नीक घर, नीक पढ़ल-लिखल कन्याँक संग बि‍आह करेलौं,मुदा फल उल्टा भेटल। पढ़ल-लिखल लोक जे अपन सासु-ससुरक संग एहेन बर्ताव करैए तँ लोक जीवि‍ए कऽ की करत? ऐसँ नीक मरब। मुदा मृत्युओ तँ ओते असान नहि, तहन‍‍ तँ जे भाग-तकदीरमे लिखल अछि से भोगब। अगर जँ बुढ़ाड़ीमे गंजने लिखल रहत तँ कियो बाँटि लेत। ओ तँ विधाताक रेख छी, के बदैल देत..! मुड़ी गोंतने मुकुन्द घुनघुना कऽ बजैत रहैथ। ..पत्नीक आँखि तँ ससपेनपर रहैन मुदा करेज पीपरक पात जकाँ, जे बिनु हवोक डोलैत, डोलैत रहैन। आँखिसँ समतल भूमिक पानि जकाँ नोर टघरैत रहैन...। चाह बनल। दुनू गोरे आमने-सामने बैस पीबए लगला। एक-एक घोंट चाह पीब एक-दोसरक मुँह दिस तकैथ तँ मुदा कियो किछु बजैथ‍ नहि। जेना दुनूक हृदैक भीतर विर्ड़ो उठैत रहैन‍। ..मुकुन्‍दजी दुइए घोंट चाह पीलैन, बाँकी सभ सरा कऽ पानि भऽ गेल। तही काल बुचाइ पहुँचल। अबिते बुचाइ दुनू हाथ जोड़ि, दुनू गोरेकेँ प्रणाम कऽ बैसल। बुचाइकेँ देखते मुकुन्द मनकेँ थीर करैत पत्नीकेँ कहलखिन- “भरि दिनक थकान देहकेँ खण्ड-खण्ड तोड़ैए। मन केनादन करैए। कनी एटैचीसँ एकटा बोतल नेने आउ। जाबे पीब नहि, ताबे कोनो बाते ने कएल हएत।” पतिक बात सुनि पत्नी एटैचीसँ एकटा हजार एम.एल.क ब्राण्डीक बोतल आ दूटा गिलास निकालि कऽ आनि आगूमे रखि‍ देलकैन। त्रिकोण जकाँ तीनू गोरे तीन दिससँ बैसल आ बीचमे लोहाबला मोड़ुआ टेबुल, जैपर गिलास बोतल राखल। ..बोतलक मुन्ना खोलि मुकुन्द अपनेसँ दुनू गिलासमे ब्राण्डी ढारलैन। एक गिलास अपने आ दोसर गिलास बुचाइ दिस बढ़ौलैन। ब्राण्डी देख बुचाइक मन चटपटाए लगल मुदा अनभुआर लोकक संग पीबैक परहेज करैत बाजल- “काकाजी, ई सभ हम नै पीबै छी। गाममे हमरा केतए ई चीज भेटत। गरीब-गुरबा लोक छी, जँ कहियो मनो होइए तँ एक दम चीलममे लगा लइ छी। नहि तँ पीसुआ भाँगक एकटा गोली कहियो-काल चढ़ा दइ छिऐ।” जिद्द करैत मुकुन्द कहलखिन- “ई तँ फलक रस छिऐ। कोनो की मोहुआ-दारू आकि पलोथि‍न छिऐ जे अपकार करतह।” मुकुन्दक मनमे रहैन जे शराब पिआ बुचाइसँ सभ बात उगलबा लेब। जाबे गामक तहक बात नै बुझब ताबे किछु करब कठिन हएत। ..दुनू गोरे एक-एक गिलास पीलैन। गिलास रखि‍ मुकुन्द सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकालि, एकटा अपनो हाथमे लेलैन आ एकटा बुचाइयोकेँ देलखिन। दुनू गोरे सिगरेट पीबए लगला। सिगरेटक धुआँ मुहसँ फेकैत मुकुन्द बजला- “बुचाइ, हम तँ आब बुड़हा गेलौं, तूँ सभ नौजवान छह। तोरे सभपर ने गामसँ लऽ कऽ देश तकक दारोमदार अछि। शहरमे रहैत-रहैत मन अकछा गेल। ओना, साले भरि नोकरियो अछि, तँए चाहै छी जे जल्दी नोकरी समाप्त हुअए जे गाम आबि अपन सर-समाजक बीच रहब। मुदा गाममे तँ अपना किछु अछि नहि। लऽ दऽ कऽ थोड़े घराड़ीटा अछि। जेकरा नपा कऽ घर बनबए चाहै छी। तइमे तूँ कनी मदैत कऽ दाए।” बुचाइ- “हमरा बुते जे हएत से जरूर कऽ देब। अहाँ तँ अपने तेतै कमा कऽ टलिया नेने छी जे अनकर कोन जरूरत पड़त।” मुकुन्द- “तूँ तँ जनिते छहक जे सभ दिन नीक एयर कण्‍डीशन घरमे रहै छी, नीक गाड़ीमे चढै़ छी, नीक लोकक बीच आमोद-प्रमोद करै छी, से केना हएत? बुचाइ- “अहाँ की कोनो खेती-पथारी करब आकि माल-जाल पोसब, जे तइले खेत-पथार चाही। लऽ दऽ कऽ रहैक घर चाही, से तँ घराड़ी ऐछे। मुकुन्द- “कहलह तँ ठीके, मुदा रहैले तँ घर बनबए पड़त। बिजलियो तँ गाममे अछि नइ तइले जेनरेटर बैसबै पड़त, तहिना पानिक टंकी सेहो नहियेँ छै, तँए कलक संग-संग मोटर सेहो लगबए पड़त। गाड़ी रखैले घर आ साफ करैले जगह सेहो चाही।  तहिना पैखानाक संगनहाइले सेहो घर चाही। तेतबे नहि, घरक आगूमे दसो धूरक फुलवाड़ी, बैसैले चबुतरा सेहो चाही। चारू-भर छहरदेवाली से बनबए पड़त। सभले तँ जमीने चाही।” बुचाइ- “हँ, से तँ चाहबे करी। मुदा हमरा की कहए चाहै छी? मुकुन्द- “तोरा यएह कहै छिअ जे अपना अढ़ाइए कट्ठा घराड़ी अछि तइमे सभ कि‍छु केना हएत। कहुना कऽ दसो धूर बढ़बैक गर लगाबह।” मुकुन्दक बात सुनि बुचाइक मनमे हँसी उठल। मुदा हँसीकेँ दबैत बाजल- “देखियौ काका, पान-दस धूर जमीन अमीनक हाथमे रहै छै, मुदा ओ तँ तखने हएत जखन‍‍ पंचो आ अमीनो पक्षमे रहत।” मुकुन्द- “तहीले ने तोरा बजेलियह। हमरा तँ केकरोसँ जान-पहचान नै अछि, तोरा तँ सभसँ छह। तँए, तूँ हमरा अप्पन बुझि मदैत करह।” मने-मन बुचाइकेँ बुझि पड़लै जे ई पनहाएल गाए जकाँ छैथ‍, तँए सेरिया कऽ हिनका सिखबैक अछि। चपाड़ा दैत बाजल- “देखियौ काका, गामक लोक गरीब अछि, ओ जे पक्ष लेत से ओहिना किए लेत। गौंआँक लिए जेहने अहाँ तेहने श्रीकान्त काका। तहन‍‍ तँ कियो जे नेत घटौत से बिनु मीठ खेने किए घटौत?” मुकुन्द- “तइले हमहूँ तैयारे छी। जेना जे तूँ कहबह से हम देबह।” बुचाइ- “अच्छा हम भाँज-भूज लगबैले जाइ छी। मुदा काल्हि खन श्रीकान्त काका सेहो कहने रहैथ। ओना हम हुनका कहि देने रहिऐन जे अमानतक दिन हमहूँ रहब। तँए थोड़े दिक्कत हमरा जरूर अछि। मुदा तैयो दिन-देखार तँ हम अहाँक भेँट नै करब, साँझमे जरूर करब। जेना जे हेतै से सभ बात अहाँकेँ कहैत रहब आ अहूँ ओइ हिसाबसँ अपन गर अँटबैत रहब। ओना, गाममे अखन सरूपक संग बेसी लोक छै, तँए अहाँकेँ ओकरासँ भेँट करा दइ छी। ओ जँ तैयार भऽ जाएत तँ कियो ओकरा रोकि नै सकतै।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि मुकुन्द बैगसँ दस हजार रूपैआ निकालि बुचाइकेँ दऽ देलखिन। रूपैआ गनि बुचाइ बाजल- “ऐसँ की हएत? हम ने गामक पेंच-पाँच बुझै छी। काजो तँ उकड़ूए अछि।” “एते ताबे राखह। जेना-जेना काज आगू बढै़त जाएत तेना-तेना कहैत जैहह।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि बुचाइ प्रणाम कऽ विदा भेल। मने-मन मुकुन्द सोचए लगला जे भलेँ श्रीकान्तो इंजीनियरे छैथ‍ मुदा जेते पाइ हम कमेलौं तेते हुनकर नन्नो ने देखने हेतैन। भऽ जाए पाइयेक भिड़न्‍त। मने-मन सोचबो करैथ‍ आ खुशियो होथि‍। मुकुन्द ऐठामसँ निकलला पछाइत‍‍ रस्तामे बुचाइक छगुन्‍ता बढ़लै जाइ, मनमे अबै- आरौ बहिं, आइ धरि एहेन-एहेन बुढ़बा चोट्टा नइ देखने छेलौं। जिनगी भरि पाइए होंसतैत रहल मुदा सबुर नइ भेलइ। अच्छा, ऐ बेर दुनू सिखता। जइ गामक लोक आइ धरि सहि-मरि अपन बाप-दादाक गाम आ घराड़ी धेने रहल, समाजक बेर-बिपैतमे संगे प्रेमसँ रहल ओइ गाममे जँ एहेन-एहेन चोट्टा आबि कऽ रहत तँ कए दिन गामकेँ सुख-चैनसँ रहए देत। सभकेँ टीकमे टीक ओझरा नाशे करत किने..!” दोसर दिन, सबेरे सात बजे बुचाइ सरूप ऐठाम पहुँचल। दुनूकेँ बच्चेसँ दोस्ती, तँए धियो-पुता भेलोपर दुनूक बीच रउए-रउ चलैत। सरूपकेँ दरबज्जापर नइ देख बुचाइ हाक पाड़ए लगल- “दोस छेँ रौ, रौ दोस?” अँगनाक दछिनबरिया ओसारपर बैस सरूप दारूक बोतलक मुन्ना खोलैत रहए। बुचाइक अवाज सुनि, बाजल- “हँ, दोस रौ, आ-आ, अँगने आ।” घरक कोणचर लग अबिते बुचाइ सरूपक घरवालीकेँ देख बाजल- “दोस रौ, दोस्‍तिनीक थुथुन बड़ लटकल देखै छियौ। रौतुका झगड़ा अखन तक लदनहि छेँ, फरियेलौ हेन नहि। हम तँ रौतुका झगड़ा रातिए-मे उठा-पटक करैत फरिया लइ छी आ तूँ अखन तक रखनहि छेँ।” बुचाइक बात सुनि सरूप बाजल- “धुर बुड़ि, सभ दिन एक्के रंग रहि गेलेँ। कहियो तोरा बजैक ठेकान नै हेतौ।” बाजि सरूप पत्नीकेँ कहलक- “एकटा गिलास नेने आउ?” एकटा गिलास आनि पत्नी सरूपक आगूमे रखलक। दुनू गोरे एक-एक गिलास दारू पीलक। बोतलकेँ डोला कऽ देख सरूप फेर दुनू गिलासमे ढारए लगल। तैबीच बुचाइ बाजल- “एक गिलास दोस्‍तिनियोँकेँ दहुन?” बुचाइक बात सुनि कला बजली- “हम नै गाइक गोंत पीबै छी।” बुचाइ- “कनी पी कऽ देखियौ जे केहेन ताउ चढै़ए।” कला मुस्‍कियाए लगली, तैबीच बात बदलैत सरूप बाजल- “भोरे-भोर दोस किमहर एलेँ?” जेबीसँ पाँच हजार रूपैआक गड्डी निकालि बुचाइ सरूपक आगूमे रखैत बाजल- “ले, ई तोहर हिस्सा छियौ। गाममे दूटा मोकि‍र फँसलौ हेन। तँए सेरिया कऽ दुनूकेँ सिखबैक छौ। एकटाकेँ हम संग देबै आ दोसरकेँ तूँ दही। जहिना धिया-पुता दूटा मुसरीकेँ नाङैर पकैड़ लड़बैए तहिना दुनू गोरे दुनूकेँ लड़ा।” सरूपक आगूमे रूपैआ देख कलाक मुहसँ हँसी निकललैन। हँसी देख बुचाइ बाजल- “एकटा बात बुझै छिऐ दोस्‍तिनी, लछमी दुइए-टा होइए। एकटा घरवाली आ दोसर रूपैआ। दोस, तोहर भाग बड़ जोरगर छौ। किएक तँ दुनू तोरा लगेमे छौ।” बुचाइक बात सुनि कला पाछू दिस मुँह घुमा लेली। कलाकेँ पाछू-मुहेँ घुरल देख बुचाइ बाजल- “मुँह घुमौने नै हएत दोस्‍तिनी। अहीमे-सँ रूपैआ लिअ आ दोकानसँ अण्‍डा नेने आउ। भुजल चूड़ा आ अण्‍डाक कोफ्ता खुआउ।” एकटा पचसटकही लऽ कला अण्‍डा आनए दोकान विदा भेली। खाली अँगना देख बुचाइ सरूपकेँ फुसफुसाइत कहलक- “दोस, दूटा जुएलहा चोर गाम एलौ हेन। दुनू जेहने ‘चोर’ तेहने ‘लोभी’ अछि। दुनू अपन-अपन घराड़ी नपौत। दुनूकेँ अढ़ाइ-अढ़ाइ कट्ठा जमीन छै, जे खतियानी छिऐ। किएक तँ दुनू एक्के वंशक छी। एक-पुरखिया अछि तँए दोसर-तेसर नइ छइ। दुनू चाहैए जे हमरा तीन कट्ठा हुअए तँ हमरा तीन कट्ठा हुअए। दुनूकेँ पाइक गरमी छै, तँए एक-दोसरकेँ निच्चाँ देखबै चाहैए। गामक लोक तँ दुनूक नजैरमे बोन झाँखुर छी। से थोड़े हुअए देबइ। पैयो खा जेबै आ सुपत-सुपत बँटबरो करा देबइ।” कनी काल गुम्म रहि सरूप बाजल- “आँइ रौ दोस, अपने सभ कोन नीक लोक छेँ रौ। भरि दिन झूठ-फूस बजै छी, ताड़ी-दारू पीबै छी, तहन‍‍ नीक केना भेलौं रौ।” बुचाइ- “धुर बुड़ि, तोरा निशाँ चढ़ि गेलौ, तँए नइ बुझै छीही। तोहीं कह जे गाममे कोनो जातिक लोक किए ने हुअए मुदा जहन‍‍ मरैए तँ कठियारी जाइ छिऐ की नहि? गरीबसँ गरीब लोक किए ने हुअए, कियो बिनु कफने जरौल गेल? अपना हाथमे जँ पाइ नहियोँ रहल तँ दू-चारि गोरेसँ मांगि-चांगि पूरा दइ छिऐ की नइ? तेसर सालक गप मन छौ की नहि, देखने रही कि‍ने जे मखनाक गाए बाढ़िमे भँसल जाइत रहै तँ भरि छाती पानिमे सँ पकैड़ अनलौं। मोतिया बेटीक बिआह कोन पेंचपर करा देलिऐ से बिसैर गेलही। खंजनमा-डोमक घरमे जे आगि लगल रहै तँ देखने रही की नै जे अपन घैलची परहक घैल लऽ कऽ सभसँ पहिने आगि मिझबैले गेल रहिऐ। हमरा देखलक तहन‍‍ पाछूसँ सभ गेल। जइकेँ चलैत माए केते दिन तक गरियबैत रहल आ कहैत रहल जे तहूँ छुबा गेलेँ आ घैलो छुबा गेल। आँइ रौ, गारियो-फज्झैत सुनि कऽ जे सेवा करै छी उ धरम नइ भेल?” मुड़ी डोलबैत सरूप बाजल- “हँ, से तँ ठीके कहै छेँ।” बुचाइ- “हम श्रीकान्त कक्काक पछ लऽ कऽ रहब आ तूँ मुकुन्द काकाकेँ संग दहुन। जहिना इलेक्शनमे परचार करैक, ऑफिस चलबैक,चाह-पानक खर्च, लॉडस्पीकर आ सवारीक खर्च, तैसंग बूथपर दसटा कार्यकर्ता रखैक खर्च, एजेंटक खर्च, नेता सबहक सुआगत-ले मेहराउ बनबैक खर्च नेतासँ लइ छिऐ तहिना अखनसँ जाबे तक नापी हेतै ताबे तकक खरचा दुनू गोरेसँ दुनू गोरे लेब। हेतै तँ उचिते मुदा ठकसँ ठकब कोनो पाप थोड़े छी।” सरूप- “केना-केना पाइ लेबही से तँ प्लानिंग कऽ लेमे कि‍ने?” बुचाइ- “घबराइ छँए किए, इलेक्शनोसँ बेसी लेबइ। अमीनक घूस, पंचक घूस, चौक-चौराहाक चाह-पान-गाँजा-भाँग आ ताड़ी-दारूक,तैसंग लठैतक खर्च। केतेक कहबौ। जेना-जेना काज अबैत जेतै तेना-तेना टनैत जेबइ। अखन जे आएल हेन ओ सगुन छी। साँझमे जहन‍‍ खूब अन्हार तेसर साँझ भऽ जेतै तहन‍‍ चलिहेँ। तोरा दुनू गोरेकेँ मुँह-मिलानी करा देबौ। चौकपर दूटा चाहक दोकान छेबे करै,एकटा पर साँझ-भिनसर तूँ बैसिहेँ आ एकटा पर हम बैसब। तूँ मुकुन्दजी दिससँ बजिहेँ जे हुनका तीन कट्ठा घराड़ी छैन‍‍ आ दोसरपर हम बैस बाजब। मुदा एकटा बात मन रखिहेँ जे जहन‍‍ श्रीकान्त काका चौकपर आबैथ, तखन‍‍ अपने दिससँ चाह-पान खुआ, हुनके बात बजिहेँ आ जखन‍‍ मुकुन्द काका औता तँ हमहूँ बाजब। जइसँ हुनका सभकेँ हेतैन जे सौंसे गौंआँ हमरे दिस अछि। अखन तँ गौंआँ सभकेँ चाहे-पान आ गँजो-ताड़ी पइर लगतै मुदा नापी दिन पुड़ी-जिलेबी जलखैमे आ मौस-भात कलौमे भोजन करा देबइ।” सरूप- “बड़बढ़ियाँ प्लानिंग छौ।” बुचाइ- “हम श्रीकान्त काका दिससँ खुशीलाल अमीनकेँ ठीक केलौं हेन, तूँ मुकुन्द काका दिससँ किसुनदेव अमीनकेँ ठीक करिहेँ। दुनू अमीन तँ दुनू पार्टीक हएत, मुदा एकटा मध्यस्त अमीन सेहो चाही। तइले रामचन्द्र भायकेँ पकैड़ लेब। तहिना गामोक लोक तँ दुनू दिस बँटाएल रहत, मुदा एक्कोटा तँ तेहल्ला पंच चाही, तइले गुरु काकाकेँ पकैड़ लेब। जखने गुरु काका पंच आ रामचन्द्र भाय अमीन रहता तखने एक्को तिल जमीन एमहर-ओमहर थोड़े हएत।” दोसर दिन बुचाइयो आ सरूपो गुरु काका लग पहुँचल। गुरु काका दलानेपर बैसल छला। गुरु काकाकेँ प्रणाम करैत दुनू गोरे बैसल। दुनूकेँ एक संग देख गुरु काका बजला- “की बात छिऐ हौ बुचाइ! दुनू भजारकेँ संगे देखै छिअ?” बुचाइ- “अहीं लग एलौ हेन काका। श्रीकान्तो काका आ मुकुन्दो काका घराड़ी नपौता, तहीमे अपनो रहबै।” गुरु काका- “की करता ओ सभ घराड़ी नपा कऽ। केहेन बढ़ियाँ तँ धिया-पुता सभ खेलाइए।” सरूप- “रिटायर केला पछाइत‍‍ गामेमे रहता, नोकरियो लगिचाएले छैन‍‍। तँए अखने नपा कऽ घरमे हाथ लगौता।” गुरु काका- “सुनै छी जे दुनू गोरे शहरेमे घर बनौने छैथ‍, तहन‍‍ गामोमे अनेरे किए बनौता, हुनका सभकेँ गाममे थोड़े बास हेतैन। जिनगी भरि तँ बड़का-बड़का होटल देखलैन, नीक रोडपर नीक सवारीमे चललैथ, दामी-दामी वेश्यालय देखलैन, से सभ गाममे थोड़े भेटतैन। अनेरे गाममे आबि कऽ किए थाल-कादोमे चलता आ मच्छर कटौता?” गुरु कक्काक बात सुनि लपैक कऽ बुचाइ बाजए लगल- “से नै बुझलिऐ काका, दुनू गोरे भारी चोट खा कऽ चोटाएल छैथ। तँए गाम दिस झुकला।” अकचकाइत गुरु काका पुछलखिन‍। “से की?” बुचाइ कहए लगलैन‍- “तेसर सालक घटना छिऐ। श्रीकान्त कक्काक पत्नी ड्राइवरकेँ संग केने बजार गेली। बजारसँ समान कीनि जहन‍‍ घुमली तँ दोसर गाड़ी सेहो पछुअबैत रहैन। जहन‍‍ पाँतरमे गाड़ी पहुँचलैन तँ पैछला गाड़ी आगू आबि रोकि देलकैन। गाड़ीसँ चारि गोरे उतैर हिनका गाड़ीमे बैस ड्राइवरकेँ दोसर रस्तासँ बढ़बैले कहलक। वेचारा की करैत। बढ़ल। थोड़े दूर गेलापर गाड़ी रोकि, काकीकेँ उतारि ड्राइवरकेँ कहलकै, मालिककेँ जा कऽ कहुन जे पाँच लाख रूपैआ नेने आबैथ आ पत्नीकेँ लऽ जाइथ। दू घन्‍टाक समए दइ छिअ। ..ड्राइवर विदा भेल। एमहर काकीकेँ चारि-पाँच ठूसी मुँहमे लगा देलकैन। जइसँ ऐगला चारिटा दाँतो टुटि गेलैन। ठोह फाड़ि कऽ कानए लगली। कनिते काल मोबाइल दऽ कहलकैन जे पतिकेँ कहियौन जे जल्दी रूपैआ लऽ कऽ आउ नहि तँ हम नै बँचब। ..ताबे ड्राइवरो पहुँच‍ कऽ कहलकैन। अपना हाथमे दुइए लाख रूपैआ छेलैन,‍ जे हालक आमदनी रहैन बाँकी रूपैआ सभ बैंकमे रहैन‍। वएह दुनू लाख रूपैआ लऽ कऽ गेला आ पएर-दाढ़ी पकैड़ कऽ पत्नीकेँ छोड़ा अनलैन।” बुचाइक बात सुनि ठहाका दैत गुरु काका बजला- “आ मुकुन्द किए औता?” मुस्‍कियाइत बुचाइ- “हुनकर तँ आरो अजीव बात छैन‍‍। एक दिन एकटा ठीकेदारक पार्टी चललै। जेते बड़का-बड़का हाकिम आ ठीकेदार सभ छल,सभ रहए। मुकुन्द अपन पुरना गाड़ी छोड़ि नवका गाड़ी, जे बेटाकेँ सासुरमे देने रहैन, लऽ कऽ गेला। जहन‍‍ पार्टीसँ घुमि कऽ एला तँ पुतोहु कहलकैन- पुतोहुक गाड़ीपर चढ़ैत केहेन लगल? ऐ बातक चोट हुनका खूब लगलैन। बेटा-पुतोहुसँ मोह टुटि गेलैन। तँए गामेमे रहता।” बुचाइक बात सुनि गुरु काका गुम्म भऽ जेना किछु सोचए लगला। कनी कालक पछाइत बजला- “गाम तँ गामे छी। शुद्ध मिथिला। भारत। जे स्वर्गोसँ नीक अछि। मुदा सभ गामक अपन-अपन चरित्र आ प्रतिष्ठा छइ। जे चरित्र आ प्रतिष्ठा गामक कर्मठ, तियागी लोकैन बनौने छैथ‍, अपन कठिन मेहनत आ कर्तव्यसँ सजौने छैथ। ओकरा जीवित राखब तँ अखुनके लोकक कान्हपर भार अछि। नोकरीक जिनगीमे किछु कियो केलैन तइसँ समाजकेँ कोन मतलब, अपना-ले केलैन। समाजक एक अंग होइक नाते हुनको सबहक कान्हपर किछु भार छेलैन जे अखन धरि थोड़बो नहि निमाहि सकला। मुदा तैयो जँ समाजमे आबि, समाज रूपी फुलवाड़ीमे फूल लगबए चाहता तँ बढ़ियाँ बात। मुदा से लक्षण-करणसँ नै बुझि पड़ैए। समाजमे रहैले समाजक चरित्रक अनुकूल अपन चरित्र बनौता तखने ने समाजमे अँटाबेश हेतैन। ई तँ नहि जे गदहा गेल स्वर्ग तँ छान-पगहा लगले गेलइ।” गुरु कक्काक बात सुनि बुचाइयो आ सरूपो एक्केबेर पुछलकैन- “काका, गामक विषयमे हम सभ किछु ने बुझै छी, से कनी बुझा दिअ?” गुरु काका- “अखन काजक बेर अछि तँए बहुत बात तँ नइ कहि सकबह, मुदा जहन‍‍ बुझैक जिज्ञासा छह तँ दूटा बात जरूर कहबह। देखहक, गामक पढ़ल-लिखल वा बिनु पढ़ल-लिखल लोक, पेट भरै दुआरे नोकरी करैले बाहर जाइ छैथ‍, नीक बात। मुदा गामकेँ सोलहन्नी नै छोड़ि दैथ। अखन देखै छी जे अमेरिका, इंग्लैडसँ लोक तीन दिनमे गाम आबि सकै छैथ। तँए सालमे कम-सँ-कम एक्को बेर,नहि तँ हुनको गाम छिऐन, केतेको बेर आबि सकै छैथ। जइसँ गामक लोक आ खेत-पथारक संग सम्बन्ध बनल रहतैन। मुदा से नै कऽ गामकेँ सोलहन्नी छोड़ि, अनतहि घर बना रहए लगै छैथ, ओ गामक दुर्भाग्य छी। जेकर फल होइए गामक ज्ञान निर्यात भऽ जाइए। जइसँ सूतल गाम सुतले रहि जाइए। संगे गामक बेवहार, कला-संस्कृति सभ टुटि जाइए। रिटायर केला पछाइत‍‍ वा जिनगीक अन्‍तिम अवस्थामे, जँ कियो गाम आबि रहए चाहता तँ हुनका गाम केहेन लगतैन। डेग-डेगपर टक्कर आ बात-बातमे विवाद हेबे करतैन। ..दोसर बात सुनह, अपना गाममे वैदिकजी भेल छैथ। जिनके पोता शुभकान्त छिऐन। वेदक प्रकाण्ड विद्वान वैदिकजी। नाओं तँ छेलैन गंगाधर मुदा वैदिकजी नाओंसँ विख्यात भेला। अपनो राज्‍यमे आ आनो-आनो राज्‍यमे जहन‍‍ पण्‍डितक बीच शास्‍त्रार्थ होइ तँ हुनकर जवाब देनिहार कियो ने ठहरैत। अनेको तगमा आ प्रशस्ति पत्र भेटलैन। अखनो परोपट्टाक लोक हुनके नाओंपर अपना गामक नाओं‘वैदिकजीक गाम’ बुझैए। हुनके चलौल अपना गामक पानि छी। पहिने पानिक छुआ-छूत अपनो गाममे छल, मुदा ओ सभकेँ बैसार करा कऽ बुझा देलखिन जे दुनियाँमे जेते मनुख अछि, सभ मनुख छी, तँए मनुख-मनुखक बीच छुआ-छूत नै हेबा चाही। थोपड़ी बजा सभ हुनकर विचारक समर्थन कऽ देलक। ओइ दिनसँ पानिक छुआ-छूत गामसँ मेटा गेल। तहिना दोसर भेल जोगिनदर, भिखारी दासक पक्का चेला। अजीब कला हुनकोमे छेलैन। जहिना नचैमे अगिया-बेताल, तहिना गीत गबैमे। जे पार्ट लऽ कऽ स्टेजपर अबैत, धऽ कऽ झहरा दइत। एहेन बिपटा अखन धरि कोनो नाचमे नइ देखलिऐ। ओकरे परसादे गाममे भिखारी दासक नाच केतेको बेर भेल। जहन‍‍ भिखारी दासक पार्टी छपरासँ पूब-मुहेँ असाम, बंगाल, नेपाल विदा होइ तँ अपने गाममे रूकइ। खाली खेनाइ आ इजोतक खर्च गौंआँक होइ। तहिना जब तीन-चारि मासमे घुमै तँ फेर अँटकै। तहिना भेल महावीर। वेचारा बड़ गरीब छल। नोकरी करैले कलकत्ता गेल। मुदा नोकरी नै कऽ रिक्शा चलबए लगल। अजीब संस्कार ओकरोमे छेलइ। रिक्शो चलबै आ गीतो-कविता बनबै। पहिने तँ लिखल-पढ़ल नै होइ, मुदा अ-आसँ सीखब शुरू केलक। किछुए दिनक पछाइत‍‍ लिखबो आ पढ़बो सीखि लेलक। रिक्शापर जहन‍‍ चलै तँ अपन बनौल गीत गाबए। एक दिन एकटा साहित्य प्रेमी रिक्शापर चढ़ल रहैथ आ महावीर रिक्शो चलबै आ गीतो गबइ। उतरै काल कवि पुछि देलखिन। सभ बात महावीर कहलकैन। ओ एकटा कवि गोष्ठीमे आमंत्रित कऽ देलखिन। ओइ गोष्ठीमे पहुँच‍ महावीर तीनटा कविता आ दूटा गीत गौलक। तइ दिनसँ कवि गोष्ठीमे आमंत्रित हुअ लगल। बंगाल सरकार दस हजारक पुरस्कार आ प्रशस्तिपत्रसँ सम्मानित केलकैन। तहिना भेल कारी खलीफा। जेकरा इलाकाक लोक खलीफा मानैत। बड़का-बड़का दंगलमे पहुँच ओ आन-आन जिलाक केतेको खलीफाकेँ पटकलक। ओकरा चलैत गाममे कियो केकरो बहु-बेटीकेँ खराब नजैरसँ नै देखैत। एक बेर एकटा घटना जमीनदारक सिपाहीक संग घटलै। एक साए लाठी सिपाहीकेँ समाजक बीचमे मारलकै। तही दिनसँ जमीनदार दू बीघा खेत ओहिना दऽ देलकै। एहेन-एहेन पण्‍डित, कलाकारक बनौल गाम छी, तेकरा हम सभ अपना जीबैत केना दुइर कऽ देबइ। आइ जँ गाम दुइर हएत तँ ऐगला पीढ़ी केकरा गारि पढ़तै। तँए जँ दुनू गोरे मनुख बनि गाममे रहए चाहता तँ बड़बढ़ियाँ, नहि तँ गाममे रहने कियो समाज तँ नहि बनि जाइत।” अमानत भेल। कोनो बेसी झमेल रहबे नै करइ। पाँच कट्ठाकेँ दू भाग केनाइ। बँटवारा करि रामचन्द्र अमीन बजला- “जिनका संदेह हुअए ओ चाहे कड़ीसँ वा फीतासँ वा लग्गीसँ आकि‍ डेगसँ भजारि लिअ।” ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 4789 भैयारी मैट्रिक परीक्षा दऽ दीनानाथ आगू पढ़ैक आशसँ, संगियो-साथी आ शिक्षको ऐठाम जा-जा विचार-विमर्श करए लगल। बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक रहने, कौलेजक पढ़ाइक तौर-तरीका नै बुझैत। ओना ओ हाइ स्कूलमे थर्ड करैत मुदा क्लासमे सभसँ नीक विद्यार्थी। सभ विषय नीक जकाँ परीक्षामे लिखने, तँए फेल करैक चिन्ता मनमे एक्को मिसिया रहबे ने करइ। मुरूख रहितो माए-बाप बेटाकेँ पढ़बैमे जी-जान अरोपने। ओना घरक दशा नीक नहि, मुदा पढ़बैक लीलसा दुनू परानी रामखेलौनक हृदैमे कुट-कुट कऽ भरल। जखन‍‍ दीनानाथ मैट्रिक परीक्षा दइले दरभंगा सेन्टरपर जाइक तैयारी करए लगल, तखन‍‍ माए अपन नाकक छक, जे डेढ़-अना माने छह पाइ भरिक रहै, बेच कऽ देलकै। अगर जँ माए-बापक मन बेटा-बेटीकेँ पढ़बैक रहत आ थोड़बो मेहनतसँ ओ पढ़त तँ लाख समस्याक बावजूद ओ पढ़बे करत। तहीमे सँ एक दीनानाथो। काल्हि एगरबजिया गाड़ीसँ दीनानाथ परीक्षा दिअ जाएत तँए आइए साँझमे रामखेलौन पत्नीकेँ कहलक- “काल्हि एगारह बजे बौआ गाड़ी पकड़त तँए अखने केकरोसँ आध सेर दूध आनि कऽ पौड़ि दियौ, दहीक जतरा नीक होइ छइ।” पतिक बात सुमित्राकेँ मनमे जँचलै। आध सेर दूध पौड़ैक विचार कऽ मने-मन बरहम बाबाकेँ कबुलो केलक जे ‘अहाँ हमरा बेटाकेँ पास करा देब तँ कुमारि भोजन कराएब।’ तैसंग सुमित्रा हाँइ-हाँइ कऽ चिकनी माटि लोढ़ीसँ फोड़ि अछींनजल दऽ सानि, दियारी बना,साफ पुरना कपड़ाक टेमी बना, दियारीमे करूतेल दऽ साँझ दिअ बरहम स्थान विदा भेल। रस्तामे मने-मन बरहम बाबाकेँ कहैत जे ‘हे बरहम बाबा कहुना हमरा बेटाकेँ पास कऽ दिहक, तोरेपर असरा अछि।’ स्कूलमे सभसँ नीक विद्यार्थी दीनानाथ, मुदा नीक रहितो क्लासमे थर्ड करैत। एकर कारण रहै जे हाइ स्कूल सेक्रेट्रीक मातहत चलइ। जइसँ स्कूलक सर्वेसर्वा सेक्रेट्रीए। इज्जतो दुआरे आ फीसोक चलैत स्कूलमे फस्ट सेक्रेट्रीए-क लगुआ-भगुआ करै आ जँ कहीं सेक्रेट्रीक समांग नै रहल तखन‍‍ हेडमास्टरक समांग फस्ट करइ। मुदा ऐ बैचमे सेक्रेट्रियोक समांग आ हेडमास्टरोक समांग, तँए सेक्रेट्रीक समांग फस्ट करैत आ हेडमास्टरक समांग सेकेण्ड आ दीनानाथ थर्ड। जे फस्ट करैत ओकरा पूरा फीस आ सेकेण्ड-थर्डकेँ अदहा फीस माफ होइ। ओना, आन शिक्षक सभकेँ ऐ बातक क्षोभ होनि मुदा कैयो की सकै छला। किएक तँ आन शिक्षक सबहक गति कोठीक नोकरसँ नीक नहि, सात घण्‍टी पढ़ौनाइ आ डेढ़ साए रूपैआ महि‍ना पौनाइ मात्र रहैन। मुदा तैयो ओ सभ इमानदारीसँ काज रहैथ। असि‍समेंटक चलैन सेहो रहइ। बीस नम्बरक हिसाबसँ सभ विषयक असि‍समेंट होइत। खाली समाजे-अध्ययनक हिसाब अलग रहइ। असि‍समेंटक नम्बर परीक्षाक नम्बरमे जोड़ि कऽ रिजल्ट होइत। जे असि‍समेंटक नम्बर सेक्रेट्री आ हेडमास्टरक हाथक खेल छल। परीक्षाक तीन मासक पछाइत‍‍ रिजल्ट निकलै छल। मास दिन परीक्षाक बित गेल। दू मास रिजल्ट निकलैमे बाँकी। माघक अन्‍तिम समए। सरस्वती पूजा पाँच दिन पहिनहि भऽ गेल। शीतलहरी चलैत रहइ। जइसँ मिथिलांचल साइबेरिया बनि गेल छल। रातिए जकाँ दिनो, दुनू एक्के रंग। बर्खाक बून जकाँ ओस टप-टप खसैत। सुरूजक दर्शन दू माससँ कहियो ने भेल। दिन-राति कखन होइ ओ लोक अन्हारेसँ बुझैत। सभ अपन-अपन जान बँचबै पाछू पड़ल। खेती-पथारीक काज सबहक बन्न। रब्बी-राइ ठण्‍ढसँ कठुआएल, जइसँ बढ़बे ने करैत। झोली ओढ़ोला पछाइतो माल-जाल थरथर कँपैत। जहिना महींसक बच्चा तहिना गाइक बच्चा कठुआ-कठुआ मरैत। बकरी-ले तँ फौतीए आबि गेल। गाछ सभ परहक घोरन सुड्डाह भऽ गेल। चिड़ै-चुनमुनीसँ लऽ कऽ नढ़िया, खिखिर, साँप इत्‍यादि‍ मरि-मरि जेतए-तेतए गन्‍हकैत। माघक पूर्णिमासँ दू दिन पूर्व रामखेलौनकेँ लकबा लपैक लेलक। सौंसे देहक अदहा भाग सुन्न भऽ गेलइ। क्रियाहीन। बिठुओ कटलापर किछु नइ बुझैत। चिड़ैक लोल सन टेढ़ मुँह भऽ गेलइ। ओना, उमेरो कोनो बेसी नहि, चालीस बर्खसँ भीतरे छेलइ। रौतुका समए। शीतलहरीक चलैत अन्हारो बेसी। ओना, पख इजोरिये रहै, मुदा भादबक अन्हार जकाँ अन्हार। पिताक दशा देख दीनानाथक मन घबरा गेल, तहिना मैयोक। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत दीनानाथ डाक्टर ऐठाम विदा भेल। किछु दूर गेलापर पएर तेना कठुआ गेलै जे चलिए ने होइ, बुझि पड़लै, बाबूसँ पहिने अपने मरि जाएब, घरोपर घुमि कऽ नै गेल हएत। ..असोथकित दीनानाथ बीच पाँतरमे असगरे। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलै। मनमे एलै, आब की करब? मुदा फेर मनमे एलै, हाथसँ ठेहुन रगड़लापर पएर हल्लुक हएत। सएह करए लगल। जाँघ हल्लुक भेलइ। हल्लुक होइते डाक्टर ऐठाम विदा भऽ गेल। डाक्टर ऐठाम पहुँचते रोगीक भीड़ देख दीनानाथ फेर घबरा गेल। बुझि पड़लै, सौंसे दुनियाँक रोगी एतै जमा भऽ गेल अछि। असगरे डाक्टर साहैब छैथ‍ आ दूटा कम्पाउण्डर छैन‍‍, केना सभकेँ देखथिन। मुदा रोगो एकरंगाहे, तँए बेसी मत्था-पच्ची डाक्टरकेँ करैये ने पड़ैन। धाँइ-धाँइ इलाज करैत जाइथ। मुदा मेले जकाँ रोगी एबो करए। थोडे़ काल ठाढ़ भऽ कऽ देख दीनानाथ सिरसिराइते डाक्टर लगमे जा बाजल- “डाक्टर साहैब, कनी हमरा एठीम चलियौ। हमर बाबू एते बि‍मार भऽ गेल छैथ‍ जे अबै-जोकर नै छथिन।” दीनानाथक बात सुनि डाक्टर बजला- “बौआ, ऐठाम तँ देखते छी, केना एते रोगी छोड़ि कऽ जाएब? जे ऐठाम पहुँच‍ गेल अछि ओकरा छोड़ि कऽ जाएब उचित हएत।” “समए रहैत जँ हमरा ऐठाम नै जाएब तँ बाबू मरि जेता।” “अहाँ घबराउ नै तत्खनात दूटा गोटी दइ छी। हुनका खुआ देबैन आ एतै नेने अबियौन।” दीनानाथक मनमे पिताक मृत्यु नाचए लगल। मन मसोसि दुनू गोटी लऽ विदा भेल। मुदा घर दिस बढ़ैक डेगे ने उठइ। एक तँ ठण्‍ढ, दोसर मनमे निराशा आ तेसर शीतलहरीसँ रातियो अन्हार। मुदा तैयो जिबठ बान्हि दीनानाथ विदा भेल। कच्ची रस्ता रहने जेतए-तेतए मेगर आ तैपर सँ केतेठाम टुटलो। जइसँ कए बेर खसबो कएल मुदा तैयो हूबा बान्‍हि उठि-उठि आगू बढ़िते रहल। घरपर अबिते, दुनू गोटी पिताकेँ खुऔलक। तैबीच माए गोइठाक घूर कऽ सौंसे देह सेदैत। अपना खाट नहि। एते रातिमे केकरा कहब। मुदा पितियौत भाइक खाट मन पड़लै। मन पड़ि‍ते पितियौत भाय लग जा दीनानाथ बाजल- “भैया, खाटो दिअ आ संगे चलबो करू। एहेन समैमे अनका केकरा कहबै, के जाएत?” दीनानाथक बात सुनिते पितियौत भाय धड़फड़ा कऽ उठि खाट नेनहि बढ़ल। खाटपर एक पाँज पुआर बिछा सलगी बिछौलक। दुनू पाइसमे बरहा बान्हि खाट तैयार केलक। खाट तैयार होइते दुनू गोरे रामखेलौनकेँ उठा ओइपर सुतौलक। बड़हामे बाँस घोंसिया दुनू गोरे कान्हपर उठा विदा भेल। पाछू-पाछू सुमित्रो विदा भेली। थोड़े काल तँ दीनानाथ किछु नै बुझलक मुदा पछाइत‍‍ कन्हा भकभकाए लगलै। कान्ह परहक छाल ओदैर गेलइ। जइसँ बाँस कान्हपर रखले ने होइ। लगले-लगले कान्ह बदलए लगल। मुदा जिबट बान्हि डाक्टर ऐठाम पहुँच‍ गेल। डाक्टर ऐठाम पहुँचते डाक्टर साहैब देखलखिन। बेमारी देखारे रहइ। धाँइ-धाँइ पाँचटा इन्जेक्शन लगा देलखिन। इन्जेक्शन लगा डाक्टर साहैब दीनानाथकेँ कहलखिन- “हिनका खाटेपर रहए दियौन। बेसी चिन्ता नै करू। तहन‍‍ तँ नमहर बेमारी पकड़नहि छैन‍, किछु दिन तँ लगबे करत।” रामखेलौनकेँ नीन आबि गेलइ। खाटक निच्चाँमे तीनू गोरे बैसल। सुमित्रा मने-मन सोचैत, समए-साल तेहने खराब भऽ गेल अछि जे बेटा-पुतोहु केकरा देखै छइ। जाबे पति जीबैत रहै छै ताबे स्‍त्रीगण गिरथाइन बनल रहैए। पुरुखकेँ परोछ होइते दुनियाँ अन्हार भऽ जाइ छइ। बिनु पुरुखक स्‍त्रीगण ओहने भऽ जाइए जेहने सुखाएल गाछ। कहलो गेल छै जे साँइक राज अप्पन राज, बेटा-पुतोहुक राज मुँहतक्की। मुदा की करब। अपन कोन साध। ई तँ भगवानेक डाँग मारल छिऐन। हे माँ भगवती, कहुना हिनका नीक बना दियौन। जँ से नै करबैन तँ पहिने हमरे लऽ चलू...। दोसर दिन डाक्टर रामखेलौनकेँ देख कहलखिन- “हिनका घरेपर लऽ जैयौन। ऐठामसँ नीक सेवा घरपर हेतैन। बेमारी आब आगू-मुहेँ नै बढ़तैन मुदा इलाज बेसी दिन करबै पड़त। हमर कम्पाउण्डर सभ दिन जा-जा सुइयो देतैन आ देखबो करतैन। तैबीच जँ कोनो उपद्रव बुझि पड़त तँ अपनो आबि कऽ कहब।” कहि दूटा सुइआ आरो डाक्टर साहैब लगा देलखिन। दबाइक पुरजा सेहो बना देलखिन। एकटा सुइआ आ तीन रंगक गोटी सभ दिन दइले कहि देलखिन। ..गप-सप्‍प सभ कियो करिते छला आकि तैबीच रामखेलौन पत्नीकेँ कहलक- “किछु खाइक मन होइए।” खाइक नाओं सुनिते दीनानाथक मुहसँ हँसी निकलल। लगले दोकानसँ दूध आ बिस्कुट आनि कऽ देलक। पिताकेँ दूध-बिस्कुट खुआ दुनू भाँइ खाट उठा विदा भेल। घरपर अबिते टोल-पड़ोससँ लऽ कऽ गाम भरिक लोक देखए आबए लगल। शीतलहरी रहबे करै मुदा तैयो लोकक अबैक ढबाहि लगले रहल। दू घन्‍टा धरि लोक अबैत रहल। ..दीनानाथ माएकेँ कहलक- “माए, बड़ भूख लगल अछि। पहिने भानस कर। भुखे पेटमे बगहा लगैए।” दीनानाथक बात सुनि सुमित्रा भानस करए विदा भेली। भूख तँ अपनो लगल रहैन मुदा बजती केतए, कहती केकरा। बेर-बिपैतमे तँ एना होइते छइ। दीनानाथक बात पितियाइन सेहो सुनलक। वेचारी पितियाइन सोचलक जे सभ भुखाएल अछि, बेरो उनैह गेलइ। आब जे भानस करए लगत तँ साँझे पड़ि जेतइ। तहूमे सभ भुखे लहालोट होइए। से नहि तँ घरमे जे चूड़ा अछि से दऽ दइ छिऐ जइसँ तत्खनात् तँ काज चलि जेतइ। सएह केलक। दुनू मायपुत चूड़ा भिजा कऽ खाइते छल कि दीनानाथक माम एला। भाएकेँ देखते सुमित्राक आँखिमे नोर आबि गेल। बिनु पएर धोनहि बहनोइ लग पहुँच‍ देखए लगला। बहनोइक दशा देख मकसुदनकेँ दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलैन। नोर पोछि वेचारे सोचए लगला जे हम तँ सियान छी तहूमे पुरुख छी। जँ हमहीं कानबै तँ बहि‍न आ भागिनक दशा की हएत। ..धैर्य बान्हि मकसुदन बहि‍नकेँ कहलखिन- “दाइ, ई दुनियाँ अहि‍ना चलै छइ। रोग-वियाधि‍ सह-सह करैए। जइठीम गर लागि‍ जाइ छै पकैड़ लइए। अपना सभ सेबे करबैन कि‍ने मुदा...। रूपैआ दुआरे दबाइ-दारूमे कोताही नै होइन‍‍। आइ भोरे पता लागल। दौगल एलौं। अपने गाए बिआएल अछि। काल्हि गाइयो आ जहाँ धरि हएत तहाँ धरि रूपैओ आनि कऽ दऽ देबौ। अखन हम जाइ छी, काल्हि आएब।” चारि दिनक पछाइत‍ रामखेलौनक मुँह सोझ भऽ गेल। उठि कऽ ठाढ़ सेहो हुअ लगल। मुदा एकटा पएर नीक नइ भेलइ। कनी-कनी झखाइते डेग उठइ। सभ दिन भोरे आबि कऽ कम्पाउण्डर सूइयो दैत आ चला-चला देखबो करैत। दू मासक पछाइत‍‍ दीनानाथक रिजल्ट निकलल। फस्ट डिवीजन भेलइ। नम्बरो नीक। छह साए तीन नम्बर। हेडमास्टरक समांगकेँ सेहो फस्ट डिवीजन भेलइ। मुदा नम्बर कम। पाँच साए पैंतालिस आ सेक्रेट्रीक समांगकेँ सेकेण्ड डिवीजन भेलै, मुदा नम्बर बढ़ियाँ, पाँच साए चौंतीस। आगू पढै़क आशा दीनानाथ तोड़ि लेलक। किएक तँ घरमे कियो दोसर करताइत नहि। एक तँ पिताक बेमारी, दोसर घरक खर्च जुटौनाइ, तैपर सँ छोट भाए अठमामे पढै़त। मुदा दीनानाथकेँ अपन पढ़ाइ छोड़ैक ओते दुख नइ भेलै जेते परिवार चलौनाइसँ लऽ कऽ पिताक सेवा करैक सुख मनमे जगलै। जे बेटा बाप-माइक सेवा नै करत से बेटे की। अपन पढ़ैक आश दीनानाथ छोट भाए कुसुमलालपर केन्द्रित कऽ देलक। अधिक काल मकसुदन बहिने ऐठाम रहए लगला। गाइयोक सेवा आ खेतो-पथारक काज सम्हारए लगला। अपना ऐठामसँ अनो-पानि आनि-आनि दिअ लगलखिन। अपना घर जकाँ भार उठा लेलैन। अपन दशा देख रामखेलौन मकसुदनकेँ कहलखिन- “हम तँ अबाहे भऽ गेलौं। जाबे दाना-पानी लिखल अछि ताबे जीबै छी। मरैक कोनो ठीक नै अछि तँए अपना जीबैत केतौ दीनानाथक बिआह करा दियौ। बेटा-बेटीक बिआह-दुरागमन कराएब तँ माए-बापक धरम छिऐ। मुदा हम तँ कोनो काजक नइ रहलौं। कम-सँ-कम देखियो तँ लेबइ।” बहनोइक बात सुनि मकसुदन गुम्म भऽ गेला। मने-मन सोचए लगला, समए-साल तेहने खराब भऽ गेल अछि जे नीक मनुख घरमे आनब कठिन अछि। सभ खेल रूपैआपर चलि रहल अछि। मनुखक कोनो मोले ने रहलै। एहेन स्थितिमे नीक कन्याँ केना भेटत? हँ, तखन‍‍ एकटा उपाय जरूर अछि जे रूपैआ-पैसाक भाँजमे नै पड़ि, गुणगर कन्याँक भाँज लगाबी। जइसँ घरक कल्याण हेतइ। पाहुन जहन‍‍ हमरा भार देलैन तँ हम दान-दहेज नै आनि नीक कन्याँ आनि देबैन। ..बहनोइकेँ कहलखिन- “पाहुन, रूपैआक पाछू लोक भँसियाइए। अगर अहाँ हमरा भार दइ छी तँ हम रूपैआक भाँजमे नै पड़ि नीक मनुख आनि कऽ देब। से की विचार?” मकसुदनक बात सुनि बहि‍न धाँइ-दे बजली- “भैया, रूपैआ मनुखक हाथक मोलि‍ छिऐ। मुदा मनुख तपस्यासँ बनैए, तँए हमरा नीक पुतोहु हुअए। रूपैआक भूख हमरा नै अछि।” बहि‍नक बात सुनि मकसुदनकेँ सबुर भेलैन। बजला- “बहि‍न, जहिना तोरा सबहक पुतोहु तहिना तँ हमरो हएत कि‍ने। के एहेन अभागल हएत जे अपन घर अवाद होइत नइ देखत।” अपन पढ़ाइक आशा तोड़ि दीनानाथ मने-मन अपना पैरपर ठाढ़ होइक बाट ताकए लगल। संकल्प केलक जे जहिना नीक रिजल्ट पबैले विद्यार्थी जी-तोड़ मेहनत करैए तहिना हमहूँ परिवारकेँ उठबैले जमि कऽ मेहनत करब। बियौहती लड़कीक भाँज मकसुदन लगबए लगला। मुदा मनमे एलैन जे हम तँ वर पक्ष छी, तँए लड़की ऐठाम पहिने केना जाएब?कनी काल गुनधुन करैत सोचलैन जे बेटा-बेटीक बिआह परिवारक पैघ काज होइए तँए एहेन-एहेन छोट-छीन बेवहारपर नजैर नहियेँ देब उचित हएत। तहूमे हम लड़ि‍काक बाप नै माम छिऐ। पाहुन जहन‍‍ भार देलैन तँ नहियोँ करब उचित नइ हएत। अपना गामक बगलेक गाममे लड़कीक भाँज मकसुदनकेँ लगलैन। परिवार तँ साधारणे मुदा लड़की काजुल। काजमे तपल। किएक तँ माए हरिदम ओकरा अपने संग रखि खेत-पथारक, घर-आँगनक काजसँ लऽ कऽ अरिपन लिखब, दुआरिमे पुरैन, फूलक गाछ,कदमक फुलाएल गाछक संग-संग पावैन-तिहारमे गीत गौनाइ सभ सिखबैत। ..बरद किनैक बहन्नासँ मकसुदन भेजा विदा भेला। पहिने दू-चारि गोरेक ऐठाम पहुँच‍ बरदक दाम करैत कन्यागतक दुआरपर पहुँचला। कन्यागत दुआरपर नहि। मुदा लड़की बाल्टीमे पानि‍ भरि अँगना जाइत। लड़कीकेँ देख मकसुदन पुछलखि‍न- “बुच्ची, घरवारी केतए छैथ‍?” बाल्टी रखि‍ सुशीला बाजल- “बाड़ीमे मिरचाइ कमाइ छथिन। अपने चौकीपर बैसियौ, बजौने अबै छिऐन।” बाल्टी अँगनामे रखि‍ सुशीला बाड़ीसँ पिताकेँ बजौने आएल। पड़ोसी होइ दुआरे दुनू गोरे दुनू गोरेकेँ चेहरासँ जाने-पहचानक मुदा मुहाँ-मुही गप नइ भेने अनचिन्हार। कन्यागत पुछलखि‍न- “किनकासँ काज अछि?” मुस्‍कियाइत मकसुदन- “अखन दुइए गोरे छी, तँए मनक बात कहै छी। हमरो घर बीरपुरे छी। हमरा भागिन अछि। काल्हि-खन पता चलल जे अहाँकेँ बियौहती बच्‍चि‍या अछि, ओइठाम कुटमैती कऽ लिअ।” कुटुमैतीक नाओं सुनि कन्यागत गुम्म भऽ गेला। कनी काल गुम्म रहि बजला- “हम गिरहस्त छी। सेहो नमहर नहि, छोट। ऐठामक गिरहस्‍तक की हालत‍ अछि से अहाँ जनिते छी। तँए ऐ बेर बेटीक बिआह नै सम्हरत।” कन्यागतक सूखल मुँह देख मकसुदन कहलखि‍न- “मनमे जे दहेजक भूत पकड़ने अछि से हटा लिअ। अहाँकेँ जहिना सम्हरत तहिना बिआह निमाहि लेब।” मकसुदनक विचार सुनि कन्यागतक मुँह हरियाए लगलैन। दरबज्जेपर सँ बेटीकेँ हाक पाड़ि अढ़ेलखि‍न- “बुच्ची, शर्बत बनौने आबह?” बड़का लोटामे शर्बत आ गिलास नेने सुशीला दरबज्जापर आबि चौकीपर रखए लगल, तैबीच पिता कहलकैन- “बुच्ची, ईहो कियो आन नइ छैथ, पड़ोसीए छिआ। बीरपुरे रहै छैथ। दहुन शर्बत।” दुनू गोरे शर्बत पीलैन। शर्बत पीब पिता कहलखिन- “बुच्ची, चाहो बनौने आबह।” सुशीला चाह बनबए गेल। दरबज्जापर दुनू गोरे गप-सप्‍प करए लगला। मकसुदन- “जेहने अहाँक कन्याँ छैथ‍ तेहने हमर भागिन। अजीब जोड़ा वि‍धाता बना कऽ पठौने छैथ। काल्हिए अहूँ लड़ि‍काकेँ देख लियौ। संयोग नीक अछि तँए शुभ काजमे बि‍लम नइ करू।” मकसुदनक विचारसँ जेते उत्साहित कन्यागतकेँ हेबा चाहिऐन तेते नै होथि‍। किएक तँ मनमे घुरियाइत रहैन‍, कहुना छी तँ बेटीक बिआह। फुसलेने काज थोडे़ चलत। मुदा कन्याँक माए दलानक भीतक भुरकी देने अढ़ेसँ गप्पो सुनैथ‍ आ दुनू गोरेकेँ देखबो करैत रहथि‍न। मने-मन उत्साहितो होइ छेली जे फँसल शिकार छोड़ब मुरूखपना छी। माए-बापक सराध आ बेटीक बिआहमे केकरा नै करजा होइ छइ। जानियेँ कऽ तँ हम सभ गरीब छी। गरीबकेँ जन्‍मसँ लऽ कऽ मरै धरि करजा रहिते छइ। तइले एते सोचै विचारैक कोन काज। करजो हाथे बेटीक बिआह कैये लेब। फस्ट डिवीजनसँ मैट्रिक पास लड़ि‍का अछि। एहेन पढ़ल-लिखल लड़ि‍का थोड़े भेटत। कहबियो छै जे पढ़ल-लिखल लोक जँ हरो जोतत तँ मुरूखसँ सोझ सि‍ड़ौर हेतइ। आइक जुगमे मुरूखो बरक बाप पचास हजार रूपैआ गनबैए। ..खुशीसँ मनमे होइ जे छड़ैप कऽ दरबज्जापर जा कहिऐन जे अगर अहाँ आइए बिआह करए चाही तँ हम तैयार छी। मुदा स्‍त्रीगणक मर्यादा रोकि दइत। तँए वेचारी अढ़ेमे अहुरिया कटैत। ..मुदा पतिक मन बदलल, मकसुदनकेँ कहलखिन‍- “देखू, हम भैयारीमे असगरे छी, मुदा गृहिणी तँ छैथ। हुनकासँ एक बेर पुछि लइ छिऐन। किएक तँ हम घरक बाहरक काजक गार्जन छी ने, घरक भीतरी काजक गार्जन तँ वएह छैथ। जँ कहीं बेटी बिआह दुआरे किछु ओरिया कऽ रखने होथि तँ कैये लेब।” कन्यागत भोला उठि कऽ आँगन गेला। आँगन पहुँचते पत्नी झपैट कऽ कहए लगलैन- “दुआरपर उपकैर कऽ लड़ि‍काबला एलाहेँ तँए अहाँ अगधाइ छी। जहन‍‍ लड़ि‍काक भाँजमे घुमैत-घुमैत तरबा खियाएत आ बेमाएसँ खूनक टघार चलत तहन‍‍ बुझबै। तीन-तीन साल बेटीबला घुमैए तहन‍‍ जा कऽ केतौ गर लगै छइ। जा कऽ कहि दियौन जे अखन हमर हालत नीक नै अछि मुदा जँ अहाँ तैयार छी तँ हमहूँ तैयार छी। वर देखैक दिन कौल्हुके दऽ दियौन। पत्नीक बातसँ उत्साहित भऽ भोला आबि कऽ बजला- “पत्नीक विचार सोल्‍होअना छैन‍‍। मुदा कहबे केलौं जे अखन हमर हालत बढ़ियाँ नै अछि।” मकसुदन- “काल्हि अहाँ लड़ि‍का देख लियौ। जँ पसिन हएत तँ जहिना कुटमैती करए चाहब तहिना कऽ लेब। असलमे हमरा लोकक जरूरत अछि, ने कि रूपैआ-पैसाक।” आठे दिनक दिनमे बिआह भऽ गेल। भोलाक बहिनो आ साउसो नीक जकाँ मदैत केलकैन। अपना घरसँ खाली एकटा सोनाक सुक्की -नअटा चौवन्नीक छड़- भोलाकेँ निकललैन‍। पनरह दिनक पछाइत‍‍ दीनानाथ पुबरिया ओसारपर बैस, पितासँ छीपि कऽ माएकेँ कहलक- “माए, घरक दशा जे अछि से तहूँ देखते छीही। जेना घर चलैए तेना केते दिन चलत। साले-साल खेत बिकाइए। जइसँ किछुए सालक पछाइत‍‍ सभ सठि जाएत। छोड़ैबला काज एक्कोटा ने अछि। जहिना कुसुमलालक पढ़ैक खर्च, तहिना बाबूक दबाइ आ पथ्य अछि। मुदा आमदनी तँ कोनो दोसर अछि नहि, लऽ दऽ कऽ खेती। सेहो डेढ़ बीघा। तहूमे, ने पानिक जोगार अपना अछि आ ने खेती करैक लूरि‍। एते दिन तँ बाबू कहुना-कहुना कऽ करै छला, आब तँ सेहो नइ हएत। हमहूँ जँ केतौ नोकरी करए जाएब सेहो नै बनत,किएक तँ बाबूक देखभाल सेहो करैक अछि। तहन‍‍ तँ एक्केटा उपाय अछि जे घरेपर रहि आमदनीक कोनो काज ठाढ़ करी।” बेटाक बात सुनि सुमित्रा गुम्म भऽ गेली! जइ घरमे आमदनी कम आ खर्चा बेसी हएत से घर केना चलत? ..एते बात मनमे अबिते माइक आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलैन। आँचरसँ नोर पोछि बजली- “बौआ, हम तँ स्‍त्रीगणे छी, घर-अँगनामे रहैवाली मुदा तूँ जँ बच्चो छह तँ पुरुखे छह। जहन‍‍ भगवाने बेपाट भेल छथुन तहन‍‍ तँ किछु करए पड़तह।” दुनू मायपुतक मुँह निच्चाँ-मुहेँ खसल रहल। ने बेटाक नजैर माए दिस उठैत आ ने माइक नजैर बेटा दिस। जहिना मरुभूमिमे पियासल लोकक दशा होइत तहिना दुनूक दशा भेल छल। केबाड़ लग ठाढ़ सुशीला दुनूकेँ देखैत। जोरसँ कियो ऐ दुआरे नै बजैत जे रोगाएल पिता वा पति जँ सुनता तँ सोगसँ आरो दुख बढ़ि जेतैन। केबाड़ लगसँ घुसैक ओसारपर आबि सुशीला बजली- “माए चिन्ता केलासँ दुख थोड़े भगतैन। दुखकेँ भगबैले किछु उपाय करए पड़तैन। छोटका बौआ बच्चे छैथ‍, बाबू रोगाएले छैथ‍,मुदा अपना तीनू गोरे तँ खटैबला छी। खटलासँ सभ कि‍छु होइ छइ।” पुतोहुक बात सुनि सासु बजली- “कनियाँ, कहलिऐ तँ बड़बढ़ियाँ मुदा ओहिना तँ पानि‍ नै डेंगाएब।” सासुक बात सुनि पुतोहु बजली- “हमर एकटा पित्ती धानक कुट्टी करै छैथ। जहिना अपन परिवार अछि तहूसँ नचरल हुनकर परिवार छेलैन। तैपर सँ चारि-चारिटा बेटियो छेलैन। मुदा जइ दिनसँ धानक कुट्टी करए लगला तइ दिनसँ दिने-दुनियाँ घुमि गेलैन। चारू बेटियोक बिआह केलैन, बेटोकेँ पढ़ौलैन, ईंटाक घरो बनौलैन आ पाँच बीघा खेतो कीनि लेलैन। अखन हुनकर हाथ पकडै़बला गाममे कियो ने अछि।” पत्नीक बात सुनि दीनानाथक भक्क खुजल। भक्क खुजिते दीनानाथ खुशीसँ उछैल अँगनामे कूदल। दरबज्जापर आबि कागत-कलम निकालि हिसाब जौड़ए लगल। डेढ़ सेर धानमे एक सेर चाउर होइए। ओना, धानक बोरा अस्सीए किलोक होइए जखन कि चाउरक साए किलोक। चारि साए रूपैए बोरा धान बिकैए तँ पान साए रूपैए क्‍विन्‍टल भेल। एक क्‍विन्‍टल धानक सरसैठ किलो चाउर हएत। दू-चारि किलो खुद्दियो हएत जेकर रोटी पका कऽ खाएब। एक किलो चाउरक दाम साढ़े दस रूपैआसँ एगारह रूपैआ होइत। ऐ हिसाबसँ एक क्‍विन्‍टल धानक चाउरक लगधग सात साए रूपैआ भेल। पान साएक पूजीसँ सात साए आमदनी हएत। तैपर सँ तीस किलो गुरो। जेकर दाम साठि रूपैआ होइए। खर्चमे खर्च खाली जारैन‍, कुटाइ आ गाड़ीक भाड़ा पड़त। बाँकी सभ मेहनतक फल हएत। अगर जँ एक बोराक कुट्टी सभ दिनक हिसाबसँ करब तँ पाँच हजारक महि‍ना आमदनी जरूर हएत। ..हिसाब जोड़ैत-जोड़ैत दीनानाथक मनमे शंका उठल जे हिसाबेमे तँ ने गलती भऽ गेल। कागत-कलम छोड़ि उठि कऽ टहलए लगल। मने-मन हिसाबो जोड़ैत। मनमे कखनो हिसाब सही बुझि पड़ै तँ कखनो शंको होइ। आँगन जा पानि पीलक। दू-चारि बेर माथ हसोंथलक। फेर आबि कऽ हिसाब जोड़ए लगल। मुदा हिसाब ओहिना कऽ ओहिना होइ। मनमे बिसवास जगलै, जइसँ काजक प्रति आकर्षण सेहो भेलइ। फेर आँगन जा माएकेँ पुछलक- “एक बोरा धान उसनैमे केते समए लगतौ?” “एक बोरा धान तँ दसे टीन भेल। दू-चुल्हियापर पाँच खेप हएत आ चरि चुल्हियापर अढ़ाइए खेप हएत। एक्के घन्‍टामे उसैन लेब।” माइक बात सुनि दीनानाथ तँइ केलक जे हमहूँ यएह रोजगार करब। पूजी-ले पत्नीक सोनाक सुक्कीमे सँ पाँचटा निकालि सबा भरि बेच, धान कीनि कुट्टी शुरू केलक। जइसँ परिवारमे खुशहाली आबए लगलै। कुसुमलाल बी.ए. पास कऽ मधुबनी कोर्टमे किरानीक नोकरी शुरू केलक। कोर्टेक बड़ाबाबूक बेटीसँ बिआह सेहो केलक। मधुबनीए-मे डेरा रखि दुनू परानी रहए लगल। तीन-चारि बर्ख तँ संयमित जीवन बितौलक। खाली वेतनेपर गुजर करए। मुदा तेकरपछाइत‍‍ पाइ कमाइक लूरि‍ सीखि लेलक। जइसँ खाइ-पीबैक संग-संग औरो लूरि‍ भऽ गेलइ। घरोवाली पढ़ल-लिखल। जहिना कमाइ तहिना खर्च। शहरक हवामे उधियाए लगल। सिनेमा देखैक, शराब पीबैक, नीक-नीक वस्तु किनैक आदत बढ़ैत गेलइ। एक दिन पत्नी कहलकै- “गाममे जे खेत अछि से अनेरे किए छोड़ने छी। ओइसँ की लाभ होइए। ओकरा बेच कऽ अहीठाम जमीन कीनि अपन घर बना लिअ।” स्‍त्रीक बात कुसुमलालकेँ जँचल। रवि दिन छुट्टी रहने गाम आबि दीनानाथकेँ कहलक- “भैया, हम अपन हिस्सा खेत बेच लेब। मधुबनीए-मे दू कट्ठा जमीन ठीक केलौं हेन। ओतै घर बनाएब। भाड़ाक घरमे तेते भाड़ा लगैए जे एक्को पाइ बँचबे ने करैए जे अहूँ सभकेँ देब।” कुसुमलालक बात सुनि दीनानाथ बाजल- “बौआ, अखन बाबू-माए जीविते छथुन, तँए हम की कहबह? हुनके कहुन।” दीनानाथक जवाब सुनि कुसुमलाल पिताकेँ कहलक। रोगाएल रामखेलौन खिसिया कऽ बाजल- “डेढ़ बीघा खेत छौ। दस कट्ठा हमरा दुनू परानीक भेल, दस कट्ठा दीनानाथक भेलै आ दस कट्ठा तोहर भेलौ। अपन हिस्सा बेच कऽ लऽ जो।” खेत किनै-बेचैक दलाल गामे-गाम रहिते अछि। कुसुमलाल जा कऽ एकटा दलालकेँ कहलक। पाँच हजार रूपैए कट्ठाक हिसाबसँ दलाल दाम लगा देलकै। कुसुमलाल राजी भऽ गेल। मुदा बेना नै लेलक। तरे-तर दीनानाथो भाँज लगबैत। साँझू-पहर जखन‍‍ कुसुमलाल मधुबनी विदा हुअ लगल तखन‍‍ दीनानाथ कहलकै- “बौआ, जेते दाम तोरा आन कियो देतह तेते हमहीं देबह। बाप-दादाक अरजल सम्‍पैत छी, आन कियो जे आबि कऽ घराड़ीपर भँट्टा रोपत से केहेन हएत?” मुदा दीनानाथक बात कुसुमलाल मानि गेल। पचास हजारमे जमीन लिखि देलक। मधुबनीए-मे कुसुमलाल घर बना लेलक। अपना गामक लोकसँ ओते सम्बन्ध नइ रहलै जेते सासुरक लोकसँ। सासुरक दू-चारि गोरे सभ दिन अबिते-जाइत रहइ। आदरो-सत्कार नीक होइ छेलइ। बीस बर्खक पछाइत‍‍ दीनानाथक बेटा मेडिकलक प्रवेश परीक्षा पास केलक। बेटी आइ.एस.सी.मे पढ़िते। पढ़ैमे दुनू भाए-बहि‍न ऊपरा-ऊपरी। तँए परिवारक सभकेँ आश रहै जे बेटियो मेडिकल पास करबे करत। माए-बापक सेवा आ बेटा-बेटीक पढ़ाइ देख दुनू परानी दीनानाथक मन खुशीसँ गदगद। परिवारोक दशा बदैल गेल। मुदा तैयो दीनानाथ धानक कुट्टी बन्न नै केलक। आरो बढ़ा लेलक। मनमे ईहो होइ जे धनकुटिया मील गड़ा ली मुदा समांग दुआरे नै गड़बैत। टाएरगाड़ी कीनि लेलक। जइसँ खेतियो करए आ भड़ो कमाए। कुसुमलालकेँ सेहो दूटा बेटा। दुनू पब्लिक स्कूलमे पढ़ैत। जेठका अठमामे आ छोटका छठामे। मधुबनीए-मे डेरा रहितो दुनूक होस्टलेमे रखने। तैपर सँ सभ विषयक ट्यूशन सेहो पढ़ैत, तँए नीक खर्च पड़इ। शराब पिबैत-पिबैत कुसुमलालक लीभर गलए लगलै। किछु दिन मधुबनीए-मे इलाज करौलक मुदा ठीक नइ भेने दरभंगाक अस्पतालमे भर्ती भेल। चारि मास दरभंगोमे रहल मुदा ओतौ लीभर ठीक नइ भेलइ। तहन‍‍ पटना गेल। पटनोमे ठीक नइ भेलै, शरीर दिनानुदिन खसिते गेलइ। अन्‍तमे दिल्लीक एम्समे भर्ती भेल। ओत्तौ ठीक नइ भेलइ। शरीर एते कमजोर भऽ गेलै जे अपनेसँ उठियो-बैस ने होइ। हारि-थाकि कऽ मधुबनीक डेरापर आबि गेल। मुदा एते दिनक बेमारीक बीच दीनानाथकेँ जानकारियो ने देलक। सारे-सरहोजिक संग घुमैत रहल। ओछाइनपर पड़ल-पड़ल सौंसे देहमे धाव भऽ गेलइ। ढाकीक-ढाकी माछी देहपर सोहरए लगलै। केतबो कपड़ा ओढ़बै तैयो माछी घूसि-घूसि असाय दऽ दइ। दिन-राति दर्दसँ कुहरैत। हरिदम घरवालीक मन तामसे लह-लह करैत। गरियेबो करैत। दुनू बेटामे सँ एक्कोटा लगमे रहैले तैयार नहि। जेठका बेटा कहइ- “पप्पा जी, महकता है।” जहन‍‍ कखनो लगमे अबैत तँ नाक मूनि कऽ। छोटका बेटा सेहो तहिना। हरिदम बजैत- “पप्पा जी, अब भूत बनेगा। लगमे रहेंगे तो हमको भी पकड़ लेगा।” जइ ऑफिसमे कुसुमलाल काज करैत ओइ ऑफिसक एकटा स्टाफ दीनानाथकेँ फोनसँ कहलक- “कुसुमलाल अन्‍तिम दिन गनि रहल छैथ‍,‍ आबि कऽ मुँह देख लियौन।” फोन सुनि दीनानाथ सन्न भऽ गेल। जेना दुनियाँक सभ कि‍छु आँखिक सोझहासँ निपत्ता हुअ लगल। सुन-मशान दुनियाँ लगए लगलै। मनमे एलै, कियो केकरो नहि। दुनू आँखिसँ नोर टधरए लगलै। नोर पोछैत मनमे उठलै- कियो झूठे ने तँ फोन केलक। फेर मनमे एलै, एहेन समाचार झूठ किए हएत। अनेरे कियो पैसा खर्च कऽ फोन किए करत। एहेन अवस्थामे कुसुमलाल पहुँच‍‍ गेल मुदा आइ धरि किछु कहबो ने केलक। खएर जे हौउ, मुदा हमरो तँ किछु धरम अछि। अपना कर्तव्यसँ कियो मनुख ऐ दुनियाँमे जीबैए। अखन तँ अबेर भऽ गेल। काल्हि भोरुके गाड़ीसँ मधुबनी जाएब...। एते विचारि माएकेँ कहलक- “माए, एक गोरे मधुबनीसँ फोन केने छेला जे कुसुमलाल बहुत दुखित छैथ‍ तँए आबि कऽ देखियौन।” दीनानाथक मुँहक बात सुनिते माइक देहमे जेना आगि लगि‍ गेलैन तहिना जरैत मने बजली- “कुसुमा हमर बेटा थोड़े छी जे मुँह देखबै। उ तँ ओही दिन मरि गेल जइ दिन हमरा दुनू परानीकेँ छोड़ि चलि गेल। जँ ऐ धरतीपर धर्मक कोनो स्थान हेतै तँ ओइमे हमरो केतौ जगह भेटत। जँ कोनो शास्‍त्र-पुराणमे पतिव्रता स्‍त्रीक चर्चा हेतै तँ हमरो हएत। आइ बीस बरखसँ ऐ हाथ-पैरक बले बि‍मार पतिकेँ जीवित रखि अपन चूड़ी आ सिनुरक मान रखने छी।” माइक बात सुनि दीनानाथ मने-मन सोचलक जे कुसुमलाल अगर हमरा कमा कऽ नहियेँ देलक तँ हमर की बिगरल। माइयो-पिताक दर्शन भोरे-भोर होइते अछि, बालो-बच्चा आनन्‍देसँ अछि। तहन‍‍ तँ एक-वंशक छी, जा कऽ देख लिऐ। दोसर दिन भोरुके गाड़ीसँ दीनानाथ मधुबनी पहुँच‍ कुसुमलालक डेरापर पहुँचल। बाहरेक कोठरीमे कुसुमलाल पड़ल छल। चद्दैरसँ सौंसे देह झाँपल रहइ। मुँह उघारिते कुसुमलाल बाजल- “भइ-इ-आ..!” ‘भइ-इ-आ’ कहैत कुसुमलाल सदा-सदाक लेल आँखि मूनि लेलक। दीनानाथ- “बौआ कुसुम! बौआ..! बौआ..! बउआ..!!” ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 4026 बहिन “आब अधिक दिन माए नै खेपती। ओना उमेरो नब्बे बर्खक धतपत हेबे करतैन। तहूमे बर्ख पनरह-बीसेकसँ कहियो बोखार के कहए जे उकासियो ने भेलैन। एक तँ ओहिना पाकल उमेर तैपर सँ देहक रोगो पछुआएल, तँए भरिसक ऐ बेर उठि कऽ ठाढ़ हेबामे कम भरोस। किएक तँ एक-ने-एक उपद्रव बढ़िते जाइ छैन‍। अनो-पानि अरुइचे जकाँ भेल जाइ छैन‍‍।” भखरल स्वरमे राधेश्याम पत्नीकेँ कहलखि‍न। पतिक बात सुनि रागिणी कनी काल गुम्म रहि बजली- “केकरो, औरुदा तँ कियो नहियेँ दऽ सकैए। तहन तँ जाधैर जीबै छैथ‍ ताधैर हम-अहाँ सेबे करबैन कि‍ने?” “हँ, से तँ सएह कऽ सकै छिऐन मुदा जिनगीक कठिन परीक्षाक घड़ी आबि गेल अछि। एते दिन जे केलौं ओकर ओते महत नहि जेते आबक अछि। किएक तँ कखनो पानि मंगती वा किछु कहती, तइमे जँ कनि‍को देरी हएत आ कियो सुनि लेत तँ अनेरे बाजत जे फल्लाँक माए पानि दुआरे किकिहारि कटैत रहै छथिन, मुदा बेटा-पुतोहु तेहेन छै घुमियोँ कऽ एको बेर तकितो ने छइ। केकरो मुँहमे ताला लगेबै? देखते छिऐ जे गाममे केना लोक झूठ बाजि-बाजि झगड़ो लगबैए आ कलंको जोडै़ छइ। तँए चैबीसो घन्‍टा केकरो-ने-केकरो लगमे रहए पड़त। जँ से नै करब तँ अन्‍तिम समैमे कलंकक मोटरी कपारपर लेब।” “कहलौं तँ ठीके मुदा बच्चा सबहक हिसाबे कोन, तहन तँ दू परानी बचलौं। बेरा-बेरी दुनू गोरे रहब। अन्तुका काज अहूँ छोड़ि दियौ, किएक तँ अँगनेक काज बढ़ि गेल। बहिनो सभकेँ जनतब दइए दियौन।” “अपनो मनमे सएह अछि। जँ तीनू बहि‍न आबि जाएत तँ काजो बँटा कऽ हल्लुक भऽ जाएत। ओना अँगनासँ दुआरि धरि काजो बढ़बे करत। जखने सर-सम्‍बन्‍धी, दोस्त-महिम बुझता तँ जिगेसा करए एबे करता। जहन‍‍ दरबज्जापर औता तँ सुआगत-बात करइ पड़त”। मुड़ी डोलबैत रागिणी बजली- “हँ, से तँ हेबे करत।” “अखन निचेन छी आ काजो करैयेक अछि, तँए अखने तीनू बहिनो आ ममोकेँ जनतब दइए दइ छिऐन। आन कुटुमकेँ अखन जनतब देब जरूरी नहि।” कहि‍ मोबाइलमे मामाक नम्बर लगौलैन‍। “हेलो, मामा। हम राधेश्याम।” “हँ, राधेश्याम। की हाल-चाल?” “माए, बड़ जोर दुखित पड़ि गेली।” “अखन हम एकटा जरूरी काजमे बँझल छी। साँझ धरि आबि रहल छीअ।” मोबाइल बन्न कऽ राधेश्याम जेठ बहि‍न गौरीकेँ फोन लगौलक। “हेलो, बहि‍न। माए दुखित पड़ि गेलखुन।” “अखन हम स्कूलेमे छी आ अपनौं कौलेजेमे छैथ। छुट्टीक दरखास दइए दइ छिऐ। साँझ धरि पहुँच‍‍ जाएब।” मोबाइल बन्न कऽ छोटकी बहिनक नम्‍बर लगौलक। “सुनीता। हम राधेश्याम।” “भैया, माए नीके अछि कि‍ने?” “अखन की नीक आ कि अधला। तीन दिनसँ ओछाइन धेने छथुन, तँए किछु कहब कठिन।” “हम अखने छुट्टीक दरखास दऽ आबि रहल छी।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि मैझली बहि‍न रीताक नम्बर लगौलक। “हेलो, रीता। हम राधेश्याम। माए, बड़ जोर दुखित छथुन।” “भैया, हम तँ अपने तेते फिरीसान छी जे खैयोक छुट्टी ने भेटैए। काल्हिए-सँ दुनू बच्चाक प्रतियोगिता परीक्षा सेहो छिऐ।” बिनु स्विच ऑफ केनहि राधेश्याम मोबाइल रखि अकास दिस देखए लगला, ठोर पटपटबैत बड़बड़ाए लगला- “बच्चाक परीक्षा.., मृत्यु सज्जापर माए..! केकरा प्राथमिकता देल जाए? एक दिस, जे बच्चा अखन धरि जिनगीमे पएरो ने रखलक, सौंसे जिनगी पड़ल छै, दोसर दिस कष्टमय जिनगीमे पड़ल वृद्ध माए। खएर, सभकेँ अपन-अपन जिनगी होइ छै आ अपना-अपना ढंगसँ सभ जीबए चाहैए। हम चारि भाए बहि‍न छी तँए ने दोसरपर ओंगठल छी। मुदा जे असगरे अछि, से केना माए-बापक पार-घाट लगबैए। ..किछु सोचिते छल कि नव उत्साह मनमे जगलैन‍। नव उत्साह जगिते राधेश्‍यामक नजैर पाछू-मुहेँ ससरलैन‍। चारू भाए-बहि‍नमे माए सभसँ बेसी ओकरे मानैत रहलखि‍न आ ओकर सेवो सभसँ बेसी भेलइ। कारणो छेलै जे बच्चेसँ ओ रोगा गेल छल। मुदा आश्‍चर्जक बात तँ ई जे जेकरा माए सभसँ बेसी सेवा केलैन‍ वएह सभसँ पहिने बिसैर रहल छैन‍!” गोसाँइ डुमैत-डुमैत मामो आ दुनू बहिनो-बहनोइ एला। अबिते डाक्‍टर सुधीर (छोट बहनोइ) आला लगा सासुकेँ देख राधेश्‍यामकेँ कहलखिन- “भैया, माए बँचती नहि। मुदा मरबो दस दिनक बादे करती। तँए अखन ओते घबराइक बात नहि। अखन हम जाइ छी, मुदा बहि‍न डाक्‍टर सुनिता रहती। ओना हमहूँ दू-दिन तीन-दिनपर अबैत रहब।” डाक्‍टर सुधीरक बात सुनि सभकेँ क्षणिक संतोख भेलैन। तैबीच मामा बजला- “भागिन, ओना हम केकरो छिट्टा-कस्सी नै करै छिऐन मुदा अपन अनुभवक हिसाबे कहै छिअ जे भरि दिन तँ स्‍त्रीगण सभ मुस्तैज रहथुन मुदा रातिमे नहि। ओना, हमरो गाम बहू-दूर नहियेँ अछि। अखन तँ धड़फड़ाएले चलि एलौं, तँए अखन जाइ छी। काल्हिसँ साँझू पहर-के एबह आ भोर-के चलि जेबह। भरि राति दुनू मामा-भागिन गप-सप्‍प करैत ओगैर लेब।” दुनू बहनोइयो आ मामो चलि गेलखिन। “आइ सातम दिन माएकेँ अन्न छोड़ना भऽ गेलैन। दू-चारि चम्मच पानि आ दू-चारि चम्मच दूध मात्र अधार रहि गेल छैन‍‍।” –आँगनसँ दरबज्जापर आबि रागिणी पतिकेँ कहलखि‍न। पत्नीक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचए लगला। मनमे उठलैन चारू भाए-बहि‍नक परिवारिक जिनगी। केतेक आशासँ माए-पिता हमरा चारू भाए-बहि‍नकेँ पोसि-पालि, पढ़ा-लिखा, बि‍आह-दुरागमन करा परिवार ठाढ़ कऽ देलैन। जहिना गौरी जेठ बहि‍न एम.ए. पास अछि। तहिना एम.ए. पास बहनोइयो छैथ। हाइ स्कूलमे बहि‍न नोकरी करैए आ कौलेजमे बहनोइ छैथ। परिवारक प्रतिष्ठा, समाजोमे बढ़बे केलैन जे कमलैन नहि। तहिना छोटकियो बहि‍न अछि। बहिनो डाक्‍टर आ बहनोइयो डाक्टर। तहिना तँ पिताजी मैझलियो बहि‍नकेँ केलैन। दुनू परानी इंजीनियर अछि‍। बम्बइमे दुनू गोरे नोकरी करैत अछि‍। जहिना तीनू बहि‍न पढ़ल-लिखल अछि, तहिना बहनोइयो छैथ। अद्भुत नजैर पिताजीक छेलैन, मनुखक पारखी छला। तँए ने बहि‍नक बि‍आह समतुल्य बहनोइक संग केलैन। एक माए-बापक तीनू बेटी, पढ़ल-लिखल, एक परिवारमे पालल-पोसल गेली, मुदा तीनूक विचारमे एते अन्‍तर केना आबि गेल..? ऐ प्रश्‍नक जवाब राधेश्यामकेँ बुझैमे एबे ने करैन जइसँ मन घोर-घोर होइत रहैन‍। एक दिस माइक अन्‍तिम अवस्थापर नजैर रहैन,तँ दोसर दिस मैझली बहि‍नक बेवहारपर। विचारक दुनियाँमे राधेश्याम औनाए लगला। प्रश्‍नक जवाब भेटबे ने करैन। अपन परिवारपर सँ नजैर हटा बहि‍न सबहक परिवार दिस दौड़ौलैन। गौरीक ससुर ‘उमाकान्त’ हाइ स्कूलक शिक्षक छला। अपने बी.ए. पास मुदा पत्नी साफे पढ़ल-लिखल नहि। नाओं-गाओं लिखल नै अबैन। ओना, पिता पण्‍डित रहथिन। मुदा बेटीकेँ परिवार चलबैक लूरिकेँ बेसी महत देथिन। जइसँ कुशल गृहिणी तँ बनि जाएत, मुदा ने चिट्ठी-पुरजी पढ़ल होइ आ ने लिखल। ओना जरूरतो नहि। किएक तँ ने पति-पत्नीक बीच चिट्ठी-पुरजीक जरूरत आ ने कुटुम-परिवारक संग। मुदा दुनू परानी उमाकान्त आ सरिताक बीच असीम सि‍नेह रहैन। मास्टर साहैबकेँ अपन बाल-बच्चासँ लऽ कऽ विद्यालयक बच्चा सभकेँ पढ़बै-लिखबैक मात्र चिन्ता रहैन। जइ पाछू भरि दिन लगलो रहैथ। जखन कि सरिता परिवारक सभ काज सम्हारैत रहथिन। ओना, अखनुका जकाँ लोकक जिनगियो फल्लर नहि, समटल रहइ...। गौरीक परिवारपर सँ नजैर हटा राधेश्याम छोटकी बहि‍न डाक्‍टर सुनिताक परिवारपर देलैन। जहिना बहि‍न डाक्टरी पढ़ने तहिना बहनोइयो। जोड़ो बढ़ियाँ। सुनिताक ससुर वैद्य रहथिन। जड़ी-बुटीक नीक जानकार। जहिना जड़ी-बुटीक जानकार तहिना रोगो चिन्हैक। जइसँ समाजमे प्रतिष्ठो नीक आ जिनगियो नीक जकाँ चलैन। तँए अपन चिकित्साक वंशकेँ जीवित रखै दुआरे बेटाकेँ डाक्टरी पढ़ौलैन। पत्नियो तेहने। अँगनाक काज सम्हारि, बाध-बोनसँ जड़ियो-बुटी आनैथ‍ आ खलमे कुटबो करैत रहथिन। दबाइ वैद्यजी अपने बनबैथ किएक तँ मात्राक बोध गृहिणीकेँ नइ रहैन...। छोटकी बहि‍नक परिवारपर सँ नजैर हटा मैझली बहि‍नक परिवारपर देलैन। रीताक ससुर मलेटरीक इंजीनियरिंग विभागमे हेल्परक नोकरी करै छला। अपनहि विचारसँ मलेटरीक बेटीसँ बि‍आहो केने छला। मलेटरीक नोकरी, तँए पैयो आ रूआबो। हाथमे हरिदम हथियार तँए मनो सनकल। मुदा बेटा-बेटीकेँ नीक जकाँ पढ़ौलैन। जहिना रीता इंजीनियरिंग पढ़ने तहिना घरोबला। दुनू बम्बइक कारखानामे नोकरी करै छैथ। कमाइयो नीक खरचो नीक, तहिना मनक उड़ानो बेसी छैन। ..एकाएक राधेश्यामक मनमे उठलैन‍ जे आब तँ माइक अन्‍तिमे समए छी तँए एक बेर रीताकेँ फेर फोन करि कऽ जनतब दऽ दिऐ। मोबाइल उठा रीताक नम्‍बर लगौलैन- “हेलो रीता, हम राधेश्याम।” “हँ भैया, अखन हम स्टाफ सबहक संग काजमे व्‍यस्‍त छी।” रीताक जवाब सुनि राधेश्याम सन्न रहि गेला। रातिक दस बजैत, इजोरियाक सप्तमी। अन्हार-इजोतक बीच घमासान लड़ाइ चलैत। किछुए पहिने जइ चन्द्रमाक ज्योति अन्हारपर शासन करैत, वएह चन्द्रमा पछैड़ रहल छैथ। तेज गतिसँ अन्हार आगू बढ़ि रहल अछि। तैबीच छोटकी बहि‍न– डाक्‍टर सुनीता–आँगनसँ आबि राधेश्यामकेँ टोकलकैन‍- “भैया, हम तँ भगवान नै छी, मुदा माइक दशा जइ तेजीसँ बिगैड़ रहल छैन‍‍, तइसँ अनुमान करै छी जे काल्हि साँझ धरि परान छुटि जेतैन।” ..एक दिस माइक अन्‍तिम दशा आ दोसर दिस रीताक वि‍चारक बीच राधेश्यामक धैर्यक सीमा डगमगए लगल। विचित्र स्थिति। जिनगीक तीनि बट्टीपर राधेश्‍याम वौआए लगला। तीनि बट्टीक तीनू रस्ता तीन दिसक। एक देव मन्‍दिर दिस, तँ दोसर दानवक काल-कोठरी दिस। बीचक रस्तापर राधेश्याम ठाढ़। ..एकाएक निर्णए करैत सुनिताकेँ कहलखिन- “कनी गौरियोकेँ बजाबह।” आँगन जा सुनिता गौरीकेँ बजौने आएल। दुनू बहि‍नक बीच राधेश्याम बजला- “बहि‍न, जहिना हमर बहि‍न रीता, तहिना तँ तोरो सबहक छिअ। तँए, तहूँ सभ एक बेर फोन लगा माइक जनतब दऽ दहक। हम निर्णए कऽ लेलौं जे जहिना ऐ दशामे माएकेँ रहनौं, ओकरा अपन धिया-पुतासँ अधिक नइ सुझै छै तहिना हमहूँ ओकरा भरोसे नै जीबै छी। तँए जँ माइक जीवि‍तमे नै औत तँ मुइला पछाइत‍‍ नहो-केश कटबैक जनतब नै देबइ। हमरा-ओकरा बीच ओतबे काल धरि सम्बन्ध अछि जेते काल माइक परान बँचल छैन। कहलो गेल छै ‘भाए-बहि‍न महींसक सींग, जखने जन्‍मल तखने भीन।’ मन तँ होइए जे भने ओ अखन स्टाफ सबहक बीच ऐछे, तँए अखने सभ बात कहि दिऐ। मुदा कहनौं तँ किछु भेटत नहि, तँए छोड़ि दइ छिऐ।” बाजि‍ राधेश्‍याम भनभनाए लगला- “जहिना अकासमे उड़ैत चिड़ैकेँ वंश रहितो परिवार नै होइ छै तहिना जँ मनुखोक होइ तँ अनेरे भगवान किएक बुधि‍-विवेक दइ छथिन। किए ने मनुखोकेँ चिड़ैए-चुनमुनी आकि चरिटंगा जानवरेक जिनगी जीबए देलखिन?” बजैत-बजैत राधेश्यामो आ दुनू बहिनोक करेज जेना फाटए लगलैन, आँखिसँ नोर टघरए लगलैन। भाए-बहि‍नक टुटैत सम्बन्धसँसभ अचम्‍भित हुअ लगला। सबहक हृदैमे रीता नाचए लगली। बच्चासँ बि‍आह धरिक रीताक जिनगी सबहक आँखिमे सटि गेलैन। एक दिस रीता बम्बइक घोड़दौड़ जिनगीक प्रतियोगितामे आगू बढ़ए चाहैए तँ दोसर दिस देबालमे टॉंगल फोटो जकाँ सबहक हृदैमे चुहैट‍ कऽपकड़ने अछि। जहिना बाँसक झोंझसँ बाँस काटि निकालैमे कड़चीक ओझरी लगैत तहिना धि‍या-पुताक ओझरीमे रीता ओझराएल। तीनू ननैद-भौजाइ माने गौरी, सुनिता आ रागिणी माए लग बैस मने-मन सोचए लगली। कियो-केकरो टोकैत नहि। तीनू गुमसुम। खाली आँखि नाचि-नाचि एक-दोसरपर जाइत। मुदा मन श्वेतवाण रामेश्वरम् जकाँ। एक दिस जिनगी रूपी भूमि, स्थल जकाँ विशाल भूभाग देखैत तँ दोसर दिस मृत्यु रूपी अथाह समुद्र। यएह छी जिनगी आ जिनगीक खेल। जइ पाछू पड़ि लोक आत्माकेँ बलि चढ़बैए। ..तैबीच माइक मुहसँ नि‍कललैन‍- “रीता...।” रीताक नाओं सुनि तीनू गोरेक हृदैमे ऐहेन धक्का लगलैन जइसँ तीनू तिलमिला गेली। रातिक एगारह बजैत। गामक सभ सुति रहल। इजोरियो डुमैपर। झल-अन्हार। दलानक आगूमे, कुरसीपर बैस राधेश्याम आँखि मूनि अपन वंशक सम्बन्धमे सोचैत रहैथ। मनमे एलैन, आइ सप्तमीक चान डुमि‍ रहल अछि, अन्हार पसैर रहल अछि, मुदा की कौल्‍हुका चान आइसँ कम ज्योतिक हएत? की ऐगला ज्योति पैछला अन्हारक अनुभव नइ करत? सभ दिनसँ अन्हार-इजोतक बीच संघर्ष होइत आएल अछि आ होइत रहत...। फेर मनमे उठलैन, आजुक राति हमरा-ले ओहेन राति अछि जे भरिसक माइक जिनगीक अन्‍तिम राति हएत। जि‍नका संग हजारो राति बि‍तल ओइपर विराम लागि‍ रहल अछि। ..विचारक दुनियाँमे राधेश्याम उगैत-डुमैत रहैथ। तखने शबाना पोतीक संग पहुँचली। दलान-आँगनक बीच रस्तापर दुनू गोरे चुपचाप ठाढ़। दुनू डेराएल। राधेश्याम आँखि मुनने तँए नै देखैत...। परोपट्टामे हिन्दु-मुसलमानक बीच तना-तनी, जइ डरसँ शबाना दिनमे नै आबि अन्हारमे आएल। किएक तँ सरोजनीक सि‍नेह खिंच कऽ लऽ अनलकै। रेहना शबानाकेँ कहलक- “दादी, ऐठाम किए ठाढ़ छीही, अँगना चल ने?” रेहनाक अवाज सुनिते राधेश्याम आँखि तकलैन तँ दुनू गोरेकेँ ठाढ़ देखलैन। पुछलखि‍न- “के?” शबाना बाजल- “बेटा, राधे।” “मौसी।” “हँ।” “एत्ती राति-के किएक एलँहेँ?” “बौआ, से तूँ नै बुझै छहक जे गाम-गाममे केहेन आगि लागि रहल छइ। पाँचम दिन सुनलौं जे बहि‍न बड़ जोर अस्सक छैथ। जखने सुनलौं तखने मन भेल जे जाइ। मुदा की करितौं? मन छटपटाइ छेलए। बेटाकेँ पुछलिऐ तँ कहलक ‘से तूँ नै देखै छीही रस्ता-बाटमे इज्जत-आवरूक की भऽ रहल छइ। मार-काट भऽ रहल छइ। एहेन स्थितिमे केना जेमए।’ ..मुदा मन नै मानलक। जिनगी भरि दुनू बहि‍न संगे रहलौं, आइ वेचारी मरि रहल अछि तँ मुहोँ नइ देखब। जी-जाँति पोतीकेँ संग केने एलौं।” कुरसीपर सँ उठि राधेश्याम शबानाक बाँहि पकैड़ आँगन दिस बढ़ैत बहि‍नकेँ शोर पाड़ैत कहलखि‍न- “मौसी एलखुन। पएर धोइले पानि दहुन।” राधेश्यामक बात सुनि दुनू बहिनो आ पत्नी-रागिणियोँ घरसँ निकैल आँगन एली। गौरी बाजल- “मौसी, शबाना मौसी!” “हँ।” शबानो आ रेहनो पएर धोइ सोझे सरोजनी लग पहुँच‍‍ दुनू पएर पकैड़ कानए लगली। कनैत देख सरोजनी पुछलखि‍न- “कनै किए छेँ। हम कि कोनो आइए मरब? एत्ती राति-के किए एलँह?” शबाना- “बहि‍न, रस्ता-पेरा बन्न अछि। दू बर्खसँ भौड़ियो-बट्टा बन्न भऽ गेल। जखन‍‍सँ अहाँ दऽ सुनलौं तखनेसँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि‍ गेल तँए दिन-देखार नै आबि चोरा कऽ अखन ऐलौं हेन।” सरोजनी बहुत कठीनसँ बजली- “धिया-पुता नीके छौ किने?” शबाना कहलकैन- “शरीरसँ तँ सब नीके अछि, मुदा कारबार बन्न भऽ गेल छइ।” “गामो दिस गेल छेलेँ?” “नहि। कन्ना जाएब...। तेसर सालक बाढ़िमे अहूँक गाम कटि कऽ कमला पेटमे चलि गेल आ हमरो गाम कोसीमे। आब सुने छी जे हमरो गाम भरनापर बसल हेन आ अहूँक गाम कमलाक पछबरिया छहरक पछबरिया बाधमे। घनश्यामपुर तक तँ रस्ता ऐछे मुदा ओइसँ आगू रस्ते सभपर मोइन फोड़ि देने छइ। पौरुकाँ जे जाइत रही तँ लगमा लगमे डुमए लगलौं।” सरोजनी गौरीकेँ इशारासँ कहलक- “दाइ, बड़ राति भेलइ। मौसीकेँ खाइले दहक।” शबाना बाजल- “बहि‍न, पहिने हम केना खाएब? पहिने बौआ राधेश्यामकेँ खुआ दियौ। खा कऽ सुति रहत। हम भरि राति बहि‍नसँ गप-सप्‍प करब। बहुत दिनक गप्‍प पछुआएल अछि।” शबानाक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचए लगला जे दुनियाँमे बहिनक कमी नै अछि। लोक अनेरे अप्पन आ बीरान बुझैए। ई सभ मनक खेल छिऐ। हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैमे जे संग रहए, वएह अप्पन। शवानाकेँ कहलक- “मौसी, माए तँ ने खाली हमरे माए छी आ ने अहींक बहि‍न। सबहक अप्पन-अप्पन छिऐ, तँए कियो अप्पन करत कि‍ने?” पुबरिये घरक ओसारपर राधेश्याम सूतल। बाँकी सभ पुबरिया घरमे बैस गप-सप्‍प करए लगली। गौरी मौसीकेँ पुछलकैन- “मौसी, अहाँ दुनू बहि‍न तँ दू गामक छिऐ। दुनू गोरेमे चीन्हा-परिचए कहिया भेल?” शबाना बाजल- “जहिए-सँ ज्ञान-परान भेल तहिए-सँ। हमरा बाप आ तोरा नानाकेँ दोस्‍तियारे रहैन। कोस भरि पूब हमर गाम-झगड़ुआ अछि आ कोस भरि पच्‍छि‍म बहिनक। अखन तँ दुनू गाम उपैट कऽ दोसरठीम बसल अछि। मुदा पहिने बड़ सुन्दर दुनू गाम छेलइ। गौरी- “मौसी, हम तँ बच्चेमे, बहुत दिन पहिनहि गेल रही। तइ दिनमे तँ बड़ सुन्दर गाम रहइ।” शबाना- “हँ, से तँ रहबे करइ। मुदा आब देखबहक तँ बिसवासे ने हेतह जे वएह गाम छिऐ। हँ, तँ कहै छेलिय, काकाकेँ बहुत खेत-पथार रहैन। चारि जोड़ा बरद खुट्टापर रहैन, चारि-पाँचटा महींसो रहैन। मुदा हमरा बापकेँ खेत-पथार नइ रहए। गामेमे खादी-भण्‍डार छेलइ। सौंसे गामक लोक चरखो चलबै आ कपड़ो बीनै। सभसँ नीक कारीगर रहए हमर बाप। घरक सभ कियो सुतो काटी आ कपड़ो बनबैत रही। सलगा, चद्दैर, गमछी आ धोती बीनैमे हमरा बापक हाथ पकड़निहार कियो नहि। बहि‍नक गामक सभ हमरे बापसँ कपड़ा कीनए। सौंसे गामसँ अपेछा रहए। पाँचे-सात बर्खक रही तहिए-सँ बहि‍नक ऐठाम जेबो करिऐ आ खेबो करिऐ।” शबानाक बात सुनि गौरीकेँ अचरज लगलै। मने-मन सोचए लगल जे एक तँ गरीब, तहूमे मुसलमान। तैबीच दोस्ती..!..मुस्‍कियाइत बि‍च्‍चेमे रागिणी पुछलकैन‍- “कोन पुरना खिस्सा मौसी जोति देलखिन। ई कहथु जे दुनू बहि‍नक बिआह एक्के दिन भेलैन?” “धुर्र कनियाँ! अहाँ की बजै छी। हमरासँ बहि‍न दू-तीन बरख जेठ छैथ। बहि‍नक बि‍आहसँ दू बरख पाछू हमर बि‍आह भेल। काका हमरा बापकेँ कहलखिन जे पुबरिया आ दछिनबरिया इलाका कोसिकन्हा भऽ गेल तँए आब कथा-कुटुमैती उतरे-भर करब नीक हएत।” कनी गुम रहि शबाना पुन: बाजल- “बेटी, कपारक दोख भेल। आब अपनो बुझै छी जे नैहरक काजक जे महौत छेलै से ऐ काजक- भौड़ीक- नै अछि। मुदा की करितौं। ऐ ठीम उ काज ऐछे नहि। ने खादी-भण्‍डार छै आ ने कारोबार अछि।” मुस्‍कियाइत रागिणी- “मौसी, अपना बि‍आहमे तँ हम कनीए-टा रही। सभ गप मनो ने अछि। हिनका तँ मन हेतैन, बि‍आहमे झगड़ा किए भेल रहए?” कनी काल गुम रहि शबाना ठाहाका मारि हँसि, बाजल- “अहाँक बाबू बड़ मखौलिया रहैथ। हँसी-चौलमे केकरो नै जीतए देथिन। घरदेखीमे एलैथ। हम दुनू बहि‍न खूब छकौलिऐन। पीढ़ी तरमे खपटा, बैसैले आ रूइआ तरि कऽ खाइले सेहो देलिऐन। खा कऽ जहाँ उठला कि एक डोल करिक्का रंग कपारपर उझैल देलिऐन। मुदा हुनका लिए धनि सन। तहिना बरियातीमे ओहो छकौलकैन। सबहक धोतीमे चारि-पाँच दिनक सड़लाहा खइर लगा देलकैन। पहिने तँ बरियाती सभ अपनमे रक्का-टोकी केलक। मुदा जहन‍‍ भाँज लगलै जे घरवारी सभकेँ सड़लाहा खइर लगा देलक। तहन‍‍ बरियातियो सभ टुटल। मुदा कहे-कही भऽ कऽ रहि गेलइ। मारि-पीटि नै भेलइ।” कहि हँसए लगल। सभ हँसल। राधेश्याम ओसारपर सूतल रहैथ। मुदा एक्को बेर आँखि बन्न नइ भेलैन। किएक तँ मनमे शंका होइत रहैन‍ जे अनचोकेमे ने माए मरि जाए। खिस्से-पिहानीमे राति कटि गेल। भोर होइते शबाना राधेश्यामकेँ कहलक- “बौआ, अपन मन अछि जे आब बहि‍नकेँ एक काठी चढ़ाइए कऽ जाएब। मुदा गामे-गाम जे आगि लगल देखै छिऐ तइसँ डर होइए!” राधेश्याम- “मौसी, ऐठाम कियो किछु नै बिगाड़ि सकै छौ। जहिया तक तोरा रहैक मन हौउ, निर्भीक भऽ कऽ रह।” शबाना- “बौआ, मन होइए जे बहि‍नक सभ नुआ-वस्तर हम खीचि दिऐ। फेर ई दिन कहिया भेटत।” राधेश्याम- “दुनू बहि‍नक बीच हम की कहबौ मौसी। जे मन फुरौ से कर।” ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2688 घरदेखिया नीन्न टुटिते लुखियाक नजैर दिन भरिक काजपर पड़लैन। काज देख मनमे अबूह लगए लगलैन। असकता गेली। मुदा तैयो हूबा बान्‍हि‍ कऽ उठए चाहली कि आँखि पुबरिया घरक छप्परपर गेलैन। ..बिहाड़िमे मठौठ परहक खढ़ उड़िया गेल। हड्डी जकाँ बत्ती झक-झक करैए। की कहता बरतुहार! कहता ने जे मसोमातक घर छिऐ तँए मठौठ उजड़ल छइ। ..लुखियाकेँ खौंझ उठलैन। ठोर पटपटबैत बजली- “जेहने नाशी डकूबा बिहाड़ि तेहने झड़कलहा कारकौआ! जुट बान्हि-बान्हि औत आ लोलसँ खढ़ उजाड़ि-उजाड़ि छिड़ियौत...।” नजैर निच्चाँ होइते दछिनबरिया टाटपर पड़लैन। बरसातमे टाटक आलन गलि कऽ झड़ि गेल। मात्र कड़ची-बत्तीटा झक-झक करैए। जइसँ ओहिना दछिनबरिया बँसबिट्टी देखै छी, बेपर्द आँगन अछि..! लुखि‍याक मन खिन्न हुअ लगलैन। मनमे एलैन, पुरना साड़ी टाटमे टॉंगि देबइ। मुदा बरतुहारक आँखिमे की कोनो गेजर भेल रहतैन जे नइ देखता। तहूमे साड़ीसँ केते अन्हराएत! ओहिना सभ किछु देखत। आरो मन निच्चाँ खसैत जाइत रहैन‍। बाप रे! की कहत बरतुहार..? दिओर-नागेसरपर तामस उठए लगलैन। कोन जरूरी छेलैन जे कौल्हुके दिन दऽ देलखिन। घर-अँगना चिक्कन कऽ लैतौं तहन अबैक दिन दैतऽथिन। कोनो की हमर बेटा बाढ़िमे दहाएल जाइ छेलए। पाँच दिन आगुए-क दिन भेने की होइतै..? तामस बढ़लैन। तैबीच आँखि टाटपर सँ निच्चाँ उतरलैन। नजैर पड़लैन अँगनाक पनिबटपर। झक-झक करैत झुटका। उबड़-खाबड़ सौंसे आँगन। तहूमे जे झुटका सेरियाममे अछि ओ तँ नहि, मुदा जे अलगल अछि ओ तँ चुप-चुप गड़ैए। सौंसे अँगना सेरियबैमे कम-सँ-कम दस छिट्टा माटि लगत। दस छिट्टा माटि उघि, ढेप फोड़ि, सेरिया कऽ पटबैमे तँ भरि दिन लागि‍ जाएत। तहन‍‍ आन काज केना हएत..? काजक तरमे लुखि‍या दबाएल जाइ छैली। तामस आरो लहरए लगलैन। अबूहो बढ़िते गेलैन। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल भारसँ दबैत रहली। दुइए मायपुत की सभ करब? तहूमे आइ ऐ छौड़ाकेँ केना किछु करैले कहबै। ओकरे देखैले ने घरदेखिया औत। छौड़ाकेँ तँ अपनो मारिते रास काज हेतइ। कानी छँटौत। अंगा-घोती खीचत। आइरन करबैले गंजपर जाएत। गमकौआ साबुनसँ नहाएत। तेल लेत। बाबरी सीटत...। तैठाम कोदारि-खुरपी चलबैले केना कहबै? लोहे छिऐ, जँ किनसाइत लगिए जाइ। तहन‍‍ तँ आरो पहपैट हएत। कथकिया जे हाथ-पैरमे पट्टी बान्हल देखथिन तँ की कहता? ..लुखियाक मनक तामस निच्चाँ-मुहेँ ससरए लगलैन। तामस उतैरते नजैर घरदेखियाक खेनाइ-पि‍नाइपर पहुँचलैन। आन काज तँ रहियो-सहि कऽ भऽ सकैए मुदा दूध तँ एक दिन पहिनहि पौड़ल जाइत। जँ से नै पौड़ब तँ दही केना हएत। शुभ काजमे जँ दहीए नै हएत तँ काजक कोन भरोस। एक तँ महींसबला सभ तेहेन अछि जे दूधसँ बेसी पानियेँ मिला दइए। नबका मटकुरियो ने अछि जे पानियोँ सोंखि लेत। ..फेर मनमे खौंझ उठए लगलैन। मुदा नजैर चाउर-दालि दिस बढ़ि‍ते तामस दबलैन। बेटाक घरदेखिया औत, हुनका केना खेसारी दालि आ मोटका चाउरक भात खाइले देबैन। लोको दुसत आ अपनो मन की कहत। कियो किछु कहह कि‍ नहि, मुदा कुल-खानदानक तँ नाको तँ नइ ने कटा लेब। जँ इज्जते नहि तँ जिनगीए की? ..मन पड़लैन घैलमे राखल कनकजीर चाउर। कनकजीर चाउरक भात आ नवका कुटुम मनमे अबिते लुखियाक हृदए पघिलल केरा जकाँ पलड़ए लगलैन। मने-मन भातक प्रेमी- दालिक मिलान करए लगली। मेही भातमे मेही दालिक मिलान नीक हएत। मुदा खेरही-मौसरी दालि तँ भोज-काजमे नै होइत। होइत तँ बदाम-राहैरक। मुदा राहैर तँ घरमे अछि नहि। बोंग-मरना बाढ़ियो तेना दू सालसँ अबैए जे एक्को डाँट राहैर नै होइए। ..तत्-मत् करैत लुखियाक मन फेर झुझुआए लगलैन। बिनु आमिले राहैरक दालि केहेन हएत? आमक मास रहैत तँ चारि फाँक कँचके आम दऽ दितिऐ, सेहो नै अछि। ..फेर मन आगू बढ़लैन, पहिल-पहिल समैध-समधीन बनब आ एगारहोटा तरकारी खाइले नै देबैन से केहेन हएत। गुन-धुन करए लगली। गुन-धुन करिते बर-बरीक आ अदौरी मन पड़लैन‍। एक्के दिनमे केना ओरियान हएत? घाइटे-बेसन बनबैमे तँ तीन दिन लागत। तहन‍‍ केना हएत? फेर तामस पजरए लगलैन। मन फेर खौंझा गेलैन। बाजए लगली- “ई सभटा आगि लगौल नगेसराक छी। जाबे ओकरा छितनीसँ चानि नै तोड़ब ताबे ओकरा बुधि‍ नै हेतइ। तमसाएले नागेसरक आँगन दिस बजैत बढ़ली। पुरुख छी आकि पुरुखक झड़। जइ पुरुखकेँ काजक हिसाबे ने जोड़ए औत ओहो कोनो पुरुखे भेल, ओइसँ नीक तँ मौगी। नागेसर नदी दिस गेल छला। नागेसरकेँ नइ देख लुखिया डेढ़िये पर अनधुन बाजए लगली। मुदा नागेसरक पत्नी–भुरकुरिया चुप-चाप सुनैत। किछु बजैत नहि। किएक तँ मने-मन सोचैत जे दिओर-भौजाइक बीचक बात छी, तैबीच हम किएक मुँह लगबी। बजैत-बजैत लुखियाक पेटक बात सठलैन। सठिते तामसो उतरलैन। बोलीक गरमीकेँ कमैत देख भुरकुरिया बाजल- “अँगना चलौथु दीदी। बीड़ी पीब लौथु, तहन‍‍ जइहैथ।” घरसँ बीड़ी-सलाइ निकालि दुनू गोरे ओसारपर बैस गप-सप्‍प करए लगली। सलाइ खर्ड़ैत भुरकुरिया बाजल- “दीदी, आब पीहुओकेँ जुआन होइमे देरी नै लगतैन। कण्‍ठ फुटि गेलैन।” भुरकुरियाक बात सुनि लुखिया हेरा गेली। जुआन बेटाक सुख मनमे नाचए लगलैन। लुखियाकेँ आनन्दित होइत देख फेर भुरकुरिया बाजल- “भैयोसँ बेसी भीहिगर जवान पीहुआ हेतैन।” खुशीसँ लुखियाक हृदए बमैक उठलैन, बजली- “कनियाँ, खाइ-पीबैमे छौड़ाकेँ कोनो की कोताही करै छिऐ। एक तँ भगवान नउएँ-कउएँ कऽ एकटा बेटा देलैन। तेकरो जँ सुख नै होइ तँ एते खटबे केकरा-ले करै छी। बापक मन तँ परुँके बिआह करैक रहैन‍ मुदा तैबीच अपने चलि गेला। आब साल लगलै तँए ऐ बेर जेना-तेना बिआह कैये देबइ।” कहि आँगन दिस विदा भेली। अँगनासँ निकैलते मन नागेसरपर गेलैन। नागेसरे वेचाराक कोन दोख, ओहो की कोनो अधला केलैन। हुनको मनमे ने होइत हेतैन जे झब-दे पुतोहु घर आबैन। अखन तँ वएह ने बाप बनि ठाढ़ छथिन। मुदा काज औगताएल केलैन। गरीब छी तेकर माने ई नहि ने जे इज्जत नै अछि। इज्जतकेँ तँ बँचा कऽ राखए पड़ै छइ। नव कुटुमैती भऽ रहल अछि। नव कुटुम दुआरपर औता। हुनका जँ पाँच कौर खैयो-ले नै देबैन से केहेन हएत। स्वागत की कोनो धोतीए-टाकासँ होइ छै, आकि दूटा बोल आ दू कौर अन्नोसँ होइ छइ। जेहेन पाहुन रहता तेहने ने बेवहारो करए पड़त। ..लुखियाक मनमे तामस उठए लगलैन। एहेन पुरुखे की जिनका धियो-पुतोक बिआह करैक लूरि‍ नहि‍। तैबीच मन पड़लैन चाह-पान। चाहो-पानक ओरियान तँ करए पड़त। एहेन नहि ने हुअए जे एक दिस करी आ दोसर दिस छुटि जाए। चाहे-पानटा किए, बीड़ियो-तमाकुलक ओरियान करए पड़त ने। ई की कोनो शहर-बजार छिऐ जे लोक एक्के-आधटा अमल डेबैए। ई तँ गाम छिऐ, ऐठाम तँ एक-एक आदमी पनरह-पनरहटा अमल डेबैए। ..अपनहि विचारमे लुखिया ओझरा गेली। किछु फुरबे ने करैन। बुकौर लगए लगलैन। आँखि नोरसँ ढबढबाए लगलैन। मनमे उठए लगलैन जे घर तँ पुरुखेक होइए। ई बात मनमे अबिते लुखिया दूरापर आबि नागेसरक बाट देखए लगली। नदी दिससँ अबैत नागेसरपर नजैर पड़लैन। नजैर पड़िते बजली- “काल्हि घरदेखिया औता आ अहाँ निचेनसँ टहलान मारै छी?” नागेसर- “अच्छा चलू। बैस कऽ सभ विचारि लइ छी।” दुनू गोरे आँगन दिस बढ़लैथ‍। ओचान खर्ड़ैत पीहुआकेँ नागेसर कहलखिन- “अखन तूँ ऐंठार चिक्कन करै छेँ की जा कऽ बाबरी छँटा एमे? काजक अँगना छियौ तँए पहिने बाहरक काज समैट लेमे की घरे-अँगनाक काज करै छेँ, जो जल्दी।” खर्ड़ा रखि पीहुआ विदा भेल। लुखियाक नजैर बदललैन। जहिना चश्माक शीशाक रंग दुनियाँक रंगकेँ बदैल दइ छै तहिना लुखियाक नजैर नागेसरक बदलल रूपकेँ देखलक। बदलल रूप देखते सिनेह उमड़ए लगलैन। सिनेहसँ बजली- “एते लगक दिन किए देलिऐन! चारि दिन आगूक दैतिऐन। भरिए दिनमे सभ काज सम्हारल हएत?” लुखियाक समस्याकेँ हल्लुक बनबैत नागेसर बजला- “आइ पहिल दिन छी घरदेखिया घर-बर देखए औत आकि खान-पीन करए? पसिन हेतैन तँ खेता-पीता, नहि तँ अपना घरक रस्ता धरता। अखन तँ ओ बटोही बनि कऽ औता। तँए हमरो ओते सुआगतक ओरियान करैक जरूरत नै अछि। जहन‍‍ पीहुआ पसिन हेतैन, बिआह करब गछता, तहन‍‍ ने किछु, आकि समधीन बनैले बड़ धड़फड़ाएल छी! होइए जे कखन समैधक संग होरी खेलाइ!” ‘समैधक संग होरी खेलाएब’ सुनि लुखियाक मन उड़ए लगलैन। बजली- “हम की कोनो समैधे भरोसे फगुआ रखने छी, दिअर कोन दिनले अछि?” लुखियाक मनसँ चिन्ता पड़ा गेल। मुस्‍कियाइत बजली- “बाटो-बटोही जँ दुआरपर औता तँ एक लोटा पानियोँ ने देबैन?” नागेसर- “से तँ देबे करबैन। यएह इज्जत तँ हमरा सबहक बाप-दादाक देल अनमोल धरोहर छी।” खुशीसँ भँसियाइत लुखिया कहलकैन- “पुरुखक थाह हम नै पाएब।” नागेसर- “कनी कालमे बजार जाएब। जे सभ जरूरीक वौस अछि से सभ कीनि आनब। तइले एते माथा-पच्ची करैक कोन जरूरी अछि‍। अतिथिक सुआगत मात्र नीक-निकुत खुऔनहि होइत आकि प्रेम-पूर्वक तुकपर खुऔने होइत। बैसैले चद्दैर साफ केलौं? सिरमो खोल खीच लेब।” “सिरमामे खोल कहाँ अछि। ओहिना पुरना साड़ीक बनौने छी। ओहूले दूटा खोल कीनने आएब।” “बड़बढ़ियाँ।” दोसर साँझ आँगनमे बैस नागेसर पीहुआकेँ पुछलक- “तोरा जे नाओं पुछथुन्ह तँ की कहबुहुन?” पीहुआ बाजल- “से की हमरा नाओं नै बुझल अछि। बउओ, माइयो आ गामोक नाओं बुझल अछि।” “ओते नै पुछै छियौ। अपनेटा नाओं बाज।” “पीहुआ” “धुर बुड़िबक। पीहुआ नै पुहुपलाल कहिहौन।” “से हमर नाओं पुहुपलाल कहाँ छी। पहिने सभ कहैत रहए, मुदा आब तँ सभ पीहुए कहैए। अहि‍ना ने लोकक नाओं बदली होइत रहै छइ।” मुँह बिजकबैत लुखिया कहलक- “हँसी-चौलमे लोक तोरा ‘पीहुआ’ कहै छौ आकि जनमौटी नाओं छियौ।” छठियार राति, दाइ-माइ पुहुपलाल नामकरण केलखिन। जहन‍‍ ओ आठ-दस बर्खक भेल, तहन‍‍ जाड़क मास बाधमे फानी लगबए लगल। गहींर खेत सभमे सिल्लियो आ पीहुओ आबि-आबि धान चभैत। जेकरा ओ फानी लगा-लगा फँसबैत। अपनो खाइत आ बेचबो करैत। कछु दिनक पछाइत‍‍ स्‍त्रीगण सभ पीहुआबला कहए लगलै। फेर किछु दिनक पछाइत‍ भौजाइ सभ पीहुआ कहए लगलै। मुदा तेकर एक्को मिसिया दुख ने पीहुए-केँ होइत आ ने पीहुआ माइए-बापकेँ। तँए ‘पुहुपलाल’ बदैल ‘पीहुआ’ भऽ गेल। मने-मन नागेसर वि‍चारलैन जे ई पीहुआ एना नै सुधरत। अखन सिखाइयो देबै तैयो बजै कालमे बाजिए देत। से नहि तँ दोसर गरे काज लिअ पड़त। लुखियाकेँ कहलखिन- “मोटरी खोलि सभ समान मिला लिअ।” दुनू दिओर-भौजाइ सभ समान मिलबए लगल। धोती देख दुनूक बीच मतभेद भऽ गेलैन। कन्यागतक वि‍दाइ-ले एक्के जोड़ धोती नागेसर कीनि कऽ अनने छला। किएक तँ बुझलैन जे बेटीबला धोती नै पहिरैए। मुदा से बात लुखिया बिसैर गेल छेली। तँए बजली- “दू गोरे औता, तहन‍‍ एक जोड़ धोतीसँ की हएत? कम-सँ-कम तँ जोड़ो भरि‍ विदाइ करबैन किने। जेकरा बेसी रहै छै ओ पाँचो टूक कपड़ा विदाइ करैए।” सामंजस करैत नागेसर बजला- “हमरो सासुरक धोती रखले अछि। काज पड़त तँ दऽ देबैन।” “गुलाबीए रंगमे रंगल अछि। एकरो गुलाबीए-मे रंगि लेब। रंगो कीनि कऽ नेनहि आएल छी।” दोसर दिन, सबेरे सात बजे कन्यागत दुनू बापूत पहुँचला। कन्यागतकेँ अबैसँ पहिनहि नागेसर एकचारीमे बिछान बिछा, तैयार केने छला। नबका खोलक सिरमो सिरा दिस देने छला। कन्यागतकेँ अबिते नागेसर हुनका हाथसँ ठेंगा-छत्ता लऽ दरबज्‍जापर रखि,‍ पएर धोइले लोटा बढ़ौलकैन। चाह-पान आनए लुखिया पछुआरे बाटे लफरल चौक दिस विदा भेली। जाधैर दुनू बापूत–डोमन–हाथ-पएर धोइ कुशल-छेम करैत बिछानपर बैसला ताधैर लुखियो चौकपर सँ चाह-पान कीनि एली‍। नागेसरक दुनू आँखि दुनू दिस। तँए देख लेलैन जे चाह आबि गेल। पीहुआकेँ कहलैन- “बौआ, चाह नेने आबह?” “पानो।” “पहिने चाह लाबह। पछाइत‍ पान अनिहह।” पीहुआक बोली डोमन सुनि लेलैन। तँए नाओं-गाओं पुछैक जरूरते ने रहलैन। दोहारा नमगर देह। मने-मन डोमन लड़िका पसि‍न कऽ लेलैन। आँखिक इशारासँ डोमन बुचनकेँ पुछलखिन। आँखिए-क इशारासँ बुचन सेहो स्वीकृति दऽ देलकैन। दुनू बापूतक मुँहमे हँसी नाचि उठलैन। मुदा लगले डोमनक मनमे एकटा शंका पैस गेलैन। शंका ई जे मरदा-मरदी परिवार नै अछि तँए हो-ने-हो कोनो छोट-छीन बाधा ने बीचमे आबि भंगठा दिअए। ..चाह पीब पान खा डोमन नागेसरकेँ कहलखि‍न- “समैध, जाधैर भानस होइए ताधैर बाध दिससँ घुमि अबैले चलू। हँ, एकटा बात तँ कहबे ने केलौं, तीमन-तरकारी बेसी नै करब। सात-आठ दिनसँ लगातार माछ खेलौं, पेट गड़बड़ भऽ गेल अछि। गाममे रहितौं तँ मँड़बज्झू भात आ केरा चाहे भँट्टाक सन्ना संगे खैतौं। मुदा से तँ ऐठाम नै हएत। तँए दालि-भात एकटा तरकारी-सजमैन चाहे झिमनीक- बना लेब। तहूमे बेसी मसल्ला नहि।” बीड़ी-सलाइ गोलगलाक जेबीमे रखि‍ नागेसर लुखियाकेँ कहए आँगन गेला। ओना टाटक अढ़सँ लुखियो सुनि नेने छेली, तँए जवाब दइले मन उबियाइते रहैन। अवसर पाबि लुखिया बजली- “एते रास जे तीमन-तरकारीक ओरियान केने छी से की हएत। अपने नै खेता तँ आँगनवाली-ले मोटरी बान्हि देबैन।” अपियारीमे फँसैत माँछ जकाँ लड़िकाक माएकेँ फँसैत देख डोमन बजला- “तइले की हेतै, हिनको मोटरी बान्हि कन्हापर नेने जेबैन।” आँखि दाबि नागेसर लुखियाक बोली रोकए चाहलैन। मुदा लुखियाक मुँहक बात बरतुहार दिस नै बढ़ि नागेसरे दिस खसलैन- “बड़ बुधियार छैथ। बुझब जे बेटाक बिआह केलौं तँ गामो-घर आ समैधो नीक भेटला। तँए जेना-तेना कुटमैती कैये लेब।” लुखियाक बात सुनि नागेसरक मन हल्लुक भेलैन। लुखियाकेँ अपन भार दऽ बाधा हटा लेलैन। नहि तँ बेर-बेर बाता-बाती होइत। ..समए पाबि डोमन जोरसँ बजला- “समधीने लग नुरियाएल रहब आकि चलबो करब?” लुखियाक मन भीतरसँ चप-चपा गेलैन। बजैले मन लुस-फुस करए लगलैन। बजली- “हिनकेटा समधीन लघैरगर छैन‍, आनकेँ की किछु छइ?” मुस्‍कियाइत नागेसर आँगनसँ निकैल बाध दिस विदा भेला। आँखि उठा-उठा डोमन गाम-घर देखैत जाइत रहैथ। टोलसँ निकैलपच्‍छि‍म-मुहेँ एक पेड़िया धेलैन। गाछी टपि हाथक इशारासँ पच्छिम-मुहेँ देखबैत नागेसर कहलकैन- “पछबारि भाग जे चतरलाहा गाछ देखै छिऐ वएह गामक सीमा छी।” दुनू बापूत देख मुड़ी डोलबए लगला। डोमन पुछलखिन- “आ उत्तरबरिया सीमा?” ओंगरीसँ देखबैत नागेसर कहलकैन- “ओ ढि‍मका जे देखै छिऐ, सएह छी।” “दछिनबरिया।” “तीन चारिटा जे छोटका गाछ एकठाम देखै छिऐ ओ सीमेपर अछि। पीरारक गाछ छिऐ।” बाधकेँ हियासि डोमन आँखिक इशारासँ बुचनकेँ सेहो देखेलकैन। दुनू गोरे मने-मन अन्दाजलैन जे दू साए बीघासँ ऊपरेक बाध अछि। तैबीच नागेसर बजला- “समैध, बाबूक अमलदारीमे तँ सम्मिलिते छल मुदा हमरा दुनू भाँइमे बँटबारा भऽ गेल। उत्तरसँ हमर छी आ दच्‍छिनसँ भातिजक।” डोमन- “खोपड़ी केतए बनौने छी?” नागेसरकेँ पैछला घटना मन पड़लैन। ओंगरीसँ देखबैत बजला- “ओइ बँसबाड़ि आ गाछीक बीच एकटा खाधि छइ। जइमे बिसनारिक गाछ सभ छइ। भदबारि‍‍मे पानि भरि जाइए। बाँसोक पात आ गाछो सबहक पात ओइमे खसि-खसि सड़ैए। बिसनारियोक गाछ सभ सड़ि जाइए। जइसँ कारी खट-खट पानि भऽ जाइ छइ। ढाकीक-ढाकी मच्छर फड़ि जाइ छइ। ओही खाधिमे भैयाकेँ कालाजारक मच्छर काटि लेलकैन। केतबो दबाइ-बिरो भेलैन, मुदा नै ठहरला।” डोमन पुछलकैन‍- “अहाँ सभकेँ सरकारी अस्पतालमे दबाइ नै दइए?” “से जँ दैतै तँ एते लोक मरबै करैत। बीस आदमीसँ ऊपरे हमरा गाममे कालाजारसँ मरल। अस्पतालमे किछु छै थोड़े, ओहिना ईंटाक घरटा ठाढ़ अछि। दबाइकेँ के कहए जे कुरसियो-टेबुल बेच नेने अछि।” बजैत-बजैत नागेसरक आँखि नोरा गेलैन‍। गमछासँ आँखि पोछि आगू बढ़ि गेला। तीनू गोरे खोपड़ी लग पहुँचला। ..बाधक बीचमे कट्ठा दुइए-क परती अछि, ओही परतीपर दुनू फरीक खोपड़ियो बन्‍हने आ पाँचटा अनेरूआ गाछो छइ, जइमे दूटा साहोरक, दू-टा पि‍तोहि‍या आ एकटा बजरकेरायक छइ। साहोरक गाछ सभसँ पुरान मुदा देखैमे सभसँ छोट अछि। तहिना बजरकेराय सभसँ कम दिनकमुदा सभसँ नमहर अछि। पि‍तोहि‍या गाछक निच्चाँमे तीनू गोरे दुबिपर बैस गप-सप्‍प करए लगला। डोमन पुछलखिन- “राखी केना गिरहत सभ दइए?” “बीघामे पाँच घुर धानो आ गहुमो।” “आ, रब्बी-राइ माने दलि‍हन-तेलहन?” “अन्‍दाजेसँ देलक। अपनो सभ उखाड़ि दइ छिऐ। जइसँ बोइनो भेल आ राखियो।” दुनू बापूत डोमन मने-मन हिसाब जोड़ए लगला। अगर कट्ठामे एक क्‍विन्‍टल उपजत तँ पच्चीस किलो बीघामे भेल। जँ से नहि पचासो किलोक कट्ठा हएत, तैयो साढ़े बारह किलो बीघा भेलइ। साए बीघासँ ऊपरेक बाध अछि। तइसँ या तँ पच्चीस क्‍विन्‍टल, नहि तँ साढ़े बारह क्‍विन्‍टल धान सालमे जरूर होइतै हेतैन। तेकर पछाइत‍‍ गहुम भेल, मरूआ भेल, आरो-आरो दलिहन-तेलहन भेल। दुइए मायपुत केते खाएत? हमरो बेटीकेँ अन्नक दुख नै हेतइ। ..मुस्‍कियाइत डोमन बेटा दिस तकलैथ‍। बेटो बाप दिस ताकि आँखिए-सँ गप-सप्‍प कऽ लेलैन। कनी काल चुप रहि डोमन नागेसरकेँ पुछलखिन- “कथी-कथीक खेती बाधमे होइए?” “पान साल पहिने तक तँ अन्नेटा उपजै छल। टो-टा कऽ सेरसो-तोड़ीक खेती सेहो होइ। मुदा आब खेती बदैल रहल अछि।” मुस्‍कियाइत पुन: आगू बजला- “की कहब, बुझू तँ राजा छी। दू साए बीघाकेँ अपन बपौती सम्‍पैत बुझै छी। दुनू साए बीघाक मालिक छी। एक बेर टाँहि दइ छलिऐ तँ जुआन-जुआन घसवहिनी सभ नाङैर सुटका कऽ पड़ा जाइ छल। मुदा आब से नै करै छी। खसल-पड़ल खेतक आ आड़ि परहक घास कटैले केकरो मनाही नै करै छिऐ...।” किछु मन पाड़ि फेर बजला- “हँ तँ कहै छेलौं जे जइ दिनसँ लोक बोरिंग गड़ौलक आ कोसियो नहैर एलै तइ दिनसँ तँ बुझि पड़ैए जे घरसँ बाध धरि लछमी सदिकाल नाचिते रहै छैथ। केकरो देखबै धानक बीआ पाड़ैए तँ कियो रोपैले बीआ उखाड़ैए। कियो कमठौन करैए तँ कियो धान कटैए,तँ कियो बोझ उघैए। कियो दाउन करैए, तँ कियो धान ओसबैए, तँ कियो अग्गो रखैए। कियो धन-उसनियाँ करैए तँ कियो पथार सुखबैए। कियो मीलपर धान कुटबैए तँ कियो चाउर फटकैए...। केते कहब।” डोमन पुछलखि‍न- “आनो-आनो चीजक खेती हुअ लागल हएत?” नागेसर बजला- “एँह की कहब! पचासो कि‍सि‍मक तँ धानेक खेती हुअ लगल अछि। ओते धानक की नाउओं मोन अछि। धानक संग-संग खाद-पानि दऽ कऽ गहुम, दलिहनक खेती सेहो हुअ लगल अछि। एते दिन तँ सेरसौए-तोरक खेती होइ छल। आब सूर्यमुखीक खेती सेहो होइए। राशि-राशिक तीमन-तरकारी सेहो हुअ लगल अछि। बीघा दसेमे पनरह-बीस गोरे नवका आमक कलम सेहो लगौलक अछि। एँह, की कहब, आन्ध्राक आम, मद्रासी आम सभ सेहो लोक लगौलक हेन। अजीब-अजीब आमो सभ अछि। ऐ बेर रोपू तँ पौरुकेँ सँ फड़ए लगत। जेहने देखैमे लहटगर लागत तेहने खैयोमे।” डोमन नागेसरकेँ पुछलखि‍न- “आमक ओगरबाहि केना दइए?” “तीन आममे एक आम सरही आ चारि आममे एक कलमी। से जइ दिन तोड़ल जाएत तइ दिनक कहलौं, तैबीच खसल-पड़ल आमक हिसाब नहि। तेहेन आम सभ अछि जे टुकलेसँ धिया-पुता खाए लगैए। खटहो आमकेँ चुन लगा कऽ मीठ बना लइए। धियो-पुतो तेते बुधियार भऽ गेल अछि जे अँगनेसँ चुन नेने जाएत आ आममे लगा कऽ खाएत।” डोमन पुछलखिन- “आरो की सभ आमदनी बाधसँ अछि?” “सभटा की मनो अछि। (ओंगरीसँ देखबैत) दछिनबारि भाग बीघा बीसेक गहींर खेत छल। चौरी। गोटे साल नहि, ने तँ पहिने सभ साल धान दहाइए जाइ छेलइ। मुदा आब, जहियासँ पानिक सुविधा भेल, सभ गिरहत अपन-अपन खेतकेँ आरो खुनि कऽ पोखैर जकाँ बना-बना माछ पोसए लगल हेन। आन्ध्र प्रदेशक एकटा माछ छै ‘इलिस’। एँह, की कहब, (मुँह चटपटबैत) अपना सभ कहै छिऐ रेहु, मुदा ओइ ‘इलिस’क आगूमे किछु ने छी। जहिना बढै़मे तहिना सुआद। हमरा की कोनो रोक अछि, हमहीं ओगरै छिऐ ने, जहिया मन भेल तहिया बन्‍शीमे दूटा मारि लेलौं आ सभ खेलौं। सभसँ मुश्किल आब बनौनाइ भऽ गेल। काजेसँ ने छुट्टी। के ओते मेठैन करि कऽ खाएत। आब सुरूज माथपर आबि गेल। चलू। भानसो भऽ गेल हएत। गरमे-गरम खाइमे नीक होइ छइ।” तीनू गोरे बाधसँ घर दिसक रस्ता धेलैन। थोडे़ आगू बढ़ला तँ बँसबाड़ि‍मे एकटा चिड़ैकेँ बजैत सुनलैन। बाजबो अजीब ढंगक।मुस्‍कियाइत नागेसर डोमनकेँ पुछलखिन- “कहू तँ ई चिड़ै की बजैए?” कनी अकानि कऽ डोमन बजला- “ई तँ ‘पान, बीड़ी, सिगरेट’ बजैए।” बात सुनि नागेसर ठहाका दऽ हँसए लगला। कनी काल हँसि बजला- “ई चिड़ै अहाँ गाम सभ दिस नै हएत। जहिया कोसीक बाढ़ि अबै छेलै तहिए-सँ ई चिड़ै हमरा गाममे अछि। ई बजैए- ‘बढ़मा, बिसुन, महेश।” विचारक भिन्नताक कारणे डोमन पुनः चिड़ैक बोली अकानए लगला। बुचन सेहो अकानलैन। अपना बातमे मजबूती आनैले नागेसर सेहो अकानए लगला। दुनू चुप। दुनू अपन-अपन दुबि‍धामे। डोमन बुचनकेँ पुछलकैन‍- “बौआ, तूँ तँ इसकुलो देखने छहक, तोंही बाजह।” मामूली सवालमे हारि मानब केकरा पसिन्न होइत। डोमनक मन विचारकेँ मथैत। डोमनक बात सुनि बुचन बजला- “बाबू, हमरा बुझि पड़ैए जे ‘तुलसी, सूर, कबीर’ कहैए।” तीनूक तीन मत, तँए विवादक प्रश्‍ने नहि, तीनू अपन-अपन रमझौआमे ओझराएल। तँए तीनू चुपचाप आगू-पाछू घर दिस विदा भेला। घरपर अबिते डोमन बजला- “लोटा नेने आउ। कनी डोल-डाल दिससँ भऽ अबै छी।” नागेसर आँगनसँ दू लोटा पानि आनि कऽ देलकैन। लोटामे पानि देख बुचन पुछलखि‍न- “बाबू, आगूमे कल-तल नइ छइ?” बि‍च्‍चेमे लपैक‍ कऽ डोमन बजला- “अखन तूँ बच्चा छह, नै बुझल छह?” कहि आगू-मुहेँ गाछी दिस विदा भेला। गाछी पहुँच‍ एकटा सरही आमक गाछक निच्चाँमे दुनू बापूत बैस विचार-विमर्श करए लगला। बुचन- “बाबू, कुटुमैती करै-जोकर परिवार अछि। समलाइके मे बिआह-सादी आकि दुश्मनी-दोस्ती छजैए। लड़िकाक बाप नइ छैन तँ की हेतइ। गाम-घरमे लोक मइटुग्गरकेँ अधला बुझैए।” डोमन बुचनक बातो सुनैत आ मुड़ियो डोलबैत रहैथ मुदा मने-मन परिवारक आमदनी आ ओइ आमदनीकेँ समटैक लूरिपर‍ सोचैत रहैथ। जइ हिसाबसँ आमदनीक जड़ि देख रहल छी ओइ हिसाबसँ सम्हारैक लूरि‍ नइ छैन‍‍। जँ दुनू एक सतहपर आबि जाए तँ परिवारकेँ आगू-मुहेँ ससरैमे बेसी समए नै लगत। एतेटा बाध छइ। अलेल घास सभ दिन रहतै। बाध ओगरैमे की लगै छइ। एक-दू बेर ऐ भागसँ ओइ भाग घुमब मात्र। अगर जँ अपनो काज ठाढ़ कऽ लैथ‍ तँ बैसारियो नइ रहतैन‍ आ आमदनियोँ बढ़ि जेतैन‍। हमरा बेटीकेँ ऐ घर एलासँ एकटा काजुल आ बुधियार समांग बढ़तैन‍। जानकीकेँ सभ हिसाब- कनमा, अधपइ, पौआ, असेरा, सेर, अढ़ैया, पसेरी, धारा आ मनसँ लऽ कऽ बोरा-क्‍वीनटल धरि, जोड़ैक लूरि‍ छइ। तहिना कौड़ी–बीस वस्तु, सोरे–सोलह, सोरहा–सोलह सोरे, दर्जन–बारह, ग्रुस–बारह दर्जन, जोड़ा–धानक आँटी दस, गाही–पाँच, गण्‍डा–चारि, जोड़ा–दू, आ पल्ला–एक, इत्‍यादि सभ हिसाव बुझैए। मनमे खुशी एलैन,बाजल- “बौआ, ओना जानकी गिरहस्तीक काज सम्हारि दूटा गाइयोक सेवा कऽ लेत। मुदा तइसँ दूधेटा क आमदनी बढ़त। जरूरत छै खेतियो बढ़बैक। तँए नीक हएत जे एकटा गाए आ एकटा बरद दऽ दि‍ऐन‍। एकटा बरद आ एकटा हरबाह भेने दू समांग अपन भऽ जेतैन‍। जइसँ बीघा-दू-बीघा खेतियो कऽ सकै छैथ।” बुचन- “अपना खेत जे नइ छैन‍‍?” बुचनक बात सुनि डोमन हँसए लगला। हँसैत बजला- “बौआ, समए एहेन आबि गेल अछि जे खेतोबला सभ खेती छोड़ि नोकरीए-क पाछू वौआ रहल अछि। जइसँ खेती केनिहारक अभाव भऽ रहल छइ। गिरहस्तीक हाल बिगैर गेल छइ। जबकि जरूरत अछि‍ खेतमे मेहनतक। जे सभ किसान नै बुझि रहला अछि।” बुचन- “केना बुझत?” डोमन गंभीर होइत बजला- “बौआ, खेतीमे बड़ बुधि‍क काज छै मुदा खेती दिन-दिन मुरूखेक हाथमे पड़ल जाइ छै, से सोचलहक हेन?” तर्क-वितर्क कऽ दुनू बापूत तँइ कऽ लेलैन जे कुटमैती करबे करब। मुदा एकटा जटिल प्रश्‍न आबि कऽ आगूमे ठाढ़ भऽ गेलैन। ओ ई जे बिआह उट-पटाँग ढंगसँ नै भऽ रस्तासँ पाइक उपयोग केना होइ। यएह गुन-धुन करैत दुनू बापूत घर दिस विदा भेला। जाधैर डोमन पैखाना दिससँ आबैथ‍ ताधैर लुखिया चारि-पाँच बेर दौग-दौग आँगनसँ बान्हपर जा-जा देखलैन। मनमे उड़ी-बीड़ी जेना लगि गेल रहैन। जे कुटमैतीमे कोनो तरहक गड़बड़-सड़बड़ ने भऽ जाए, नहि तँ लोक पिक्की मारत। कहत जे मौगीक मुख्तियारी छी ने, बिनु मरदक मौगी बेलगामक होइते अछि। कहलो गेल छै ‘राँड़ मौगी साँढ़’।” फेर मनमे उठलैन जे किछु हौउ बिआह तँ हमरे बेटाक हएत। तँए केकरो ओंगरी बतबैक रस्ता नइ रहए देबइ। जहिना बरतुहार कहता तहिना हमहूँ करब। जँ दुनू गोरेक मिलान रहत तँ किए कोइ आँखि उठौत। एते बात मनमे अबिते बरतुहारकेँ लुखिया अबैत देखलैन। बान्हपर सँ दौगले आँगन आबि हाँइ-हाँइ कऽ थारी साँठए लगली। हाथ-पएर धोइते नागेसर डोमनकेँ कहलकैन- “पहिने भोजने कऽ लिअ।” आगू-आगू लोटा नेने नागेसर आ पाछू-पाछू दुनू बापूत डोमन आँगन एला। पीढ़ीपर बैसते नागेसर थारी आनि आगूमे देलकैन। आँखि घुमा कऽ देख डोमन बजला- “समैध, समधीनोकेँ अढ़मे बजा लियौन। बि‍आहक सभ गप पक्का-पक्की कैये लेब। बैसारपर जखने गप उठाएब आकि चारू दिससँ लोक आबि अन्टक-सन्ट गप चालिये देत।” आँखिक इशारासँ नागेसर भौजाइकेँ हाक पाड़ि बैसैले कहलकैन। तैबीच डोमन बजला- “समैध, समधीनकेँ पुछियौन जे केना बेटाक बिआह करती?” नागेसरकेँ अगुआ लुखिया बजली- “अहाँ सभ मरदा-मरदी गप करू। हमरा कोनो चीजक लोभ नइ अछि। नीक मनुख घर आबए, बस एतबे।” मने-मन नागेसर सोचैत रहैथ जे हमर केतबो मोजर अछि, तइसँ की। कोनो की हमरा बेटा-बेटीक बि‍आह हएत। तँए हम अनेरे मुँह दुरि किए करब। बजला- “समैध, अहाँ अपने मुहसँ बजियौ जे केना करब?” भात-दालि सनैत डोमन बजला- “समैध, जहिना अहाँक भातिजक बिआह हएत तहिना तँ हमरो बेटीक हएत किने...।” लुखियाकेँ खुश करै दुआरे पुन: आगू बजला- “हमर बेटी साक्षात् लछमी छी। साल भरि कि दसो-साल घुमि कऽ लड़की ताकब तँ ओहेन नइ भेटत, तहूमे आब! आब तँ लोक मनुख थोड़े घर अनैए, अनैए रूपैआ।” नागेसर, टाटक अढ़मे बैसल भौजी दिस तकैत बजला- “खर्च-बर्च करैले किछु तँ चाहबे करी किने..।” नागेसरक बातकेँ कटैत लुखिया बजली- “नहि! हम केकरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।” नागेसर भौजीक गप्प सुनि चुप भऽ गेला। मुस्‍कियाइत लुखिया बजली- “जहन‍‍ दुआरपर आबि बेटा मंगलैन तँ हम दऽ देलिऐन। आब हमरा की अछि। दू कर अन्न आ दू बित कपड़ाटा चाही। घर तँ आब ओकरे सबहक हेतइ।” डोमन बजला- “समैध, पाँच गोरे जे बरियाती चलब, हुनकर सुआगत हम नीक जकाँ करबैन। तैसंग बर-कनियाँ-ले जे नव घर ठाढ़ करैक वस्तु अछि से तँ देबे करब। तेकर अतिरक्ति एकटा बरद आ एकटा लगहैर गाए सेहो देब।” सुनि‍ते सबहक मुहसँ हँसी निकलल। बिआहक दिन तँइ भऽ गेल। मुस्‍कियाइत लुखिया बजली- “आब की हम कहबैन जे समधीनो हमरे दऽ दोथु।” ठहाका दैत डोमन उत्तर देलकैन- “बाह-बाह, तब तँ दुनू रोटी चाउरेक।” चारि बजे सुति-उठि चाह पीब, पान खा डोमन नागेसरकेँ कहलखिन- “समैध, सभ बात तँ तँइ भाइए गेल। आब चलब।” दुनू जोड़ धोती नागेसर आँगनसँ आनि आगूमे रखि‍ देलकैन। धोती देख डोमन बजला- “समैध, केतबो गरीब छी मुदा इज्जत बँचा कऽ रखने छी। बेटीक दुआरपर केना धोती पहिरब?” टाटक भुरकी देने लुखिया देखैत रहैथ। डोमनक बात सुनि दोगसँ बजली- “समैधकेँ कहियौन जे जहन‍‍ बेटी औत तहन‍‍ ने बेटीक घर हेतैन, ताबे तँ हमर छी किने, हम दइ छिऐन‍।” ठहाका दैत डोमन बजला- “जहन‍‍ हमर बेटी ऐ घर औत तहन‍‍ ने ओ समधीन हेती आकि अखने?” तैबीच पीहुआ, सभकेँ गोड़ लगलक। एक्कैस रूपैआ डोमन पीहुआ हाथमे देलखिन। थोड़े दूर अरियाति नागेसर घुमैत बजला- “समैध, आब बढ़ियौ। नवम् दिनक दिन भेल। अहाँ काजमे लगि‍ जाउ आ हमहूँ लगि‍ जाइ छी।” डोमन दुनू बापूत विदा भेला। आगू बेटीक बिआहक ओरियौन रहैन किन्तु मनपर नचैत रहैन लुखियाक गप्प- “केकरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपन घर नै आनब।” देह सिहैर गेलैन, बेटा दि‍स देखए लगला। ओहो आब बि‍आह करै-जोकर भऽ गेल...। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 4021 पछतावा इंजीनियरिंगक रिजल्ट निकैलते रघुनाथ संगी-साथीक संग नोकरी करए अमेरिका जाइक तैयारी कऽ नेने छल। सासुरसँ गाम आबि पिताकेँ कहलक- “बाबू, आइए रौतुका गाड़ी पकैड़ चलि जाएब। परसू दस बजे सुभाषचन्द्र एयरपोर्टसँ जहाज फ्लाइ करत।” जहिना पाकल आम तोड़ैले कियो गाछपर चढ़ैए आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैए, तहिना शिवनाथोकेँ भेलैन। अचम्‍भित होइत पुछलखिन- “किए? तोरा-जोकर काज अपना ऐठाम नइ छइ?” पिताक बात सुनि कनी काल गुम्म भऽ रघुनाथ कहलकैन- “ओइठाम अधिक दरमाहा दइए। संगे अपना ऐठामक रूपैआसँ ओतुका रूपैयो महग छइ।” अमेरिकाक सम्बन्धमे शिवनाथ किछु नै जनै छैथ‍‍ खाली एतबे बुझल छैन‍‍ जे ओहो एकटा देश छी...। किछु काल गुम्म रहि बजला- “तइसँ की, हम ओइ वंशक छी जे देशक गुलामी मेटबैले गोली खा स्वतंत्र देशक उपहार-भार देलैन। तोरा सन-सन पढ़ल-लिखल जँ देशसँ चलि जाएत तँ तोहर सन काज के करत आ केना हएत?” पिताक बातकेँ अनसून करैत गोड़ लागि, बैग लऽ रघुनाथ चुपचाप विदा भऽ गेल। शिवनाथ दुनू परानीक नजैर ताधैर रघुनाथक पीठपर रहलैन जाधैर ओ गाछीक अढ़ नइ भऽ गेल। अढ़ होइते दुनूक मन ऐ रूपे चूर-चूर भऽ गेलैन जहिना ऐनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइए। अखन धरि दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान, पैघ-पैघ सपना छेलैन जे एकाएक फुटल बैलूनक हवा जकाँ वायुमण्‍डलमे मिलि गेलैन। बाढ़िक पानिमे डुमल खेतमे जहिना पानि सुखिते नव-नव पौघक अंकुर उगए लगैए तहिना शिवनाथोक मनमे नव-नव विचार उगए लगलैन, अखन दुनियाँ भलेँ गामे-घरक रूपमे किएक ने बुझि पडै़त हुअए मुदा बापो-बेटाक दूरी हजारो कोस हटि रहल अछि। की हम सभ फेर गुलामीक रस्ता पकैड़ रहल छी आकि अजादीक रस्ता धऽ चलि रहल छी? एक दिस‍ मातृभूमि-ले पिताक तियाग आ दोसर दिस बेटाक भटकल रस्ता...। शिवनाथक आँखिक आगू नाचए लगलैन। भलेँ बेटाक आशा हुअए मुदा एहनो लोक तँ छैथ‍ जि‍नका बेटा नइ छैन‍। मन पड़लैनपिताक ओ बात जे मृत्युसँ चौबीस घन्‍टा पहिने मृत्यु-सय्यापर कहने रहथिन- “बाउ, हमर खून वीरक खून छी जे भारतमाताकेँ चढ़ौलिऐन। भलेँ अखन लड़ाइक दौड़ अछि मुदा ओ खून स्वतंत्रता लइए कऽ छोड़त। तूँ सभ स्वतंत्र देशक स्वतंत्र मनुख हेबह। तँए अपन देशकेँ परिवार बुझि सभकेँ भाए-बहि‍न जकाँ इमानदारीसँ सेवा करैत रहिहह। जइसँ हमर आत्मा अनवरत प्रसन्न रहत। सेवाक मतलब खाली एतबे नै होइत जे देशक सीमाक रक्षा करैए बल्‍कि ईहो होइत जे माथपर ईंटा उघि सड़क बनबैए आ हर-कोदारिसँ अन्न उपजबैए।” पिताक बात मन पड़िते शिवनाथक हृदए तरल पानिसँ ठोस पाथर बनए लगलैन। नव-नव विचार मनमे जागए लगलैन। पत्नीक खसल मन देख पुछलखिन- “अहाँ, एते सोगाएल किए छी?” आँचरक खूटसँ दुनू आँखिक नोर पोछि रुक्मिणी कँपैत अवाजमे बजली- “की सपना मनमे रहए आ कि देख रहल छी। जँ से बुझितिऐ तँ एते देहकेँ किए धौजैन करितौं। नढ़िया-कुकुर जकाँ अनेर छोड़ि दैतिऐ।” पत्नीक बेथा सुनि शिवनाथक हृदए पसीज गेलैन। मुदा अपन बेथाकेँ मनेमे दबैत मुस्‍कियाइत बजला- “अखन धरिक जे जिनगी रहल ओ कर्तव्यनिष्ठक रहल, अपन कर्तव्य इमानदारीसँ निमाहलौं। सभकेँ अपना-अपना आशापर अपन जिनगी ठाढ़ कऽ जीबाक चाही। जहिना बर्खाक एक-एक बून रस्ता धऽ चलैत-चलैत अथाह समुद्रमे पहुँच‍‍ जाइए तहिना अपनो सभ अपन काजकेँ परिवारसँ आगू बढ़ा समाज रूपी समुद्रमे फेंट दी। बेटा अछि तँए बेटापर अपन भार देबए चाहै छी मुदा जि‍नका अपना बेटा नइ छैन‍ ओ केकरापर अपन भार देथिन। तँए अपनो सभ वएह बुझू। बाबूजी एते अरैज कऽ दऽ गेलैथ जे इज्जतक संग हँसैत-खेलैत जिनगी जीबैत रहब।” सन् 1942क असहयोग आन्दोलन सुनगैत-सुनगैत सौंसे देश पजैर गेल। जइमे मिथिलांचलोक योगदान केकरोसँ कम नै अछि। दसकोसीक लोकक मन एते उत्साहित भऽ गेलैन जे चान-सुरूजमे अजादीक झण्‍डा फहराइत देखैथ। सुतली रातिमे ओछाइनपर सँ चहा कऽ उठि नारा लगबैत सड़कपर आबि जाइ छला। जे मिथिला याज्ञवल्क्य, गौतम, नारद सन-सन ऋषि पैदा केलक ओ पंचानन झा आ पुरन मण्‍डल सन वीर अभिमन्यु सेहो पैदा केने अछि। दसकोसीक वीर सिपाही माथमे कफन बान्हि, लाठीमे झण्‍डा फहरा झंझारपुर सर्कल, रेलबे स्टेशन आ पोस्ट आफिसमे आगि लगबैले, रेल-लाइन तौड़ैले सर्कलक मैदानमे एकत्रित भेला। अंग्रेज पलटनक केन्द्र सर्कल छेलइ। आन्दोलनकारीकेँ एकत्रित होइत देख ओहो सभ अपन बन्दूकमे गोली भरि-भरि तैयार भऽ गेल। आन्दोलनकारी भारत माताक नारा जगबैत आगू बढ़ल। अनधुन गोली पलटन सभ चलौलक। एक नै अनेक गोली पंचानन आ पुरनक छातीमे लगलैन। दुनू गोरे नारा लगबैत दम तोड़लैन। खाली दुइए गोरेकेँ गोली नै लागल, अनेको गोरे गोलीसँ घाइल भेला। ओइ घाइलमे शिवनाथक पिता देवनाथो छला। देवनाथकेँ दहिना जाँघमे गोली लागल छेलैन। गोली तँ जाँघक माँस-चमराकेँ कटैत हड्डी तोड़ैत निकैल गेलैन, मुदा घाइल भऽ ओहो खसि पड़ला। पितियौत भाए हुनकर लटकल जाँघक माँसकेँ तौनीसँ बान्हि, हुनका पीठपर उठा घरपर अनलकैन। चिकित्साक समुचित बेवस्‍था नहि, तैपर गामे-गाम सिपाही दमन शुरू केलक। गामक-गाम आगि लगौलक। मर्द-औरतकेँ पकैड़-पकैड़ बन्दूकक कुन्दा आ पैरक बूटसँ मारि-मारि बेहोश केलकैन। ओछाइनपर पड़ल देवनाथक हृदैमे आगि धधकैत रहैन मुदा किछु करैक शक्ति नै रहि गेलैन। जीवन-मृत्युक बीच लटकल छला। तीसम दिन परान छुटि गेलैन। दस बर्खक शिवनाथ 15 अगस्त 1947 ई. केँ अजादीक समए पनरह बर्खक भऽ गेल। पतिक मुइने शिवनाथक माए-राधाक मन टुटलैन नहि, बल्‍कि आगिमे तपल सोना जकाँ आरो चमकए लगलैन, पाकल आमक आंठी जकाँ करेज आरो सक्कत भऽ गेलैन। गुलामीसँ मिझाएल दीपकेँ अजादीक नव तेल-बाती भेटल, जइसँ नव-ज्योति प्रज्वलित भेल। अखन धरिक अबेवस्थित परिवारकेँ दुनू माए-बेटा मिलि सुढ़ियाबए लगला, बेवस्थित बनबए लगला। अढ़ाइ बीघा खेतकेँ अपन दुनियाँ आ कर्मक्षेत्र बुझि दुनू माए-बेटा जी-जानसँ मेहनत‍ करए लगला, जैपर परिवार नीक नहाँति घर ठाढ़ भऽ गेलैन। ओना, शिवनाथक बिआह बच्चेमे भऽ गेल छेलै मुदा दुरागमन पछुआएल रहइ। परिवारक बढ़ैत काज देख बेटाक दुरागमन माए करा लेलैन। देश अजाद होइते गामे-गाम स्कूल बनए लगल। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम छला मुदा जेतबे छला ओ ओइ रूपे विद्या-दानमे भीरि गेला, जइसँ सभ गाममे तँ नहि, मुदा अधिकांश गाममे लोअर प्राइमरी स्कूल ठाढ़ भऽ गेल। केतौ-केतौ मिड्लो स्कूल आ हाइयो स्कूल बनल आ केतौ-केतौ कौलेजो ठाढ़ भऽ गेल। अखन धरि जे स्कूल ठाढ़ भेल ओ समाजिके स्तरपर, सरकारी स्तरपर बहुत कम बनल। स्कूल खोलैक पाछू लोकक मनमे धरमस्थानक बुझब छेलइ। गुरुओजी ओहने रहैथ जे मात्र भोजनपर सेवा करथिन। शनीचरा मात्र जीविकाक अधार छेलैन। पाइ लऽ कऽ पढ़ाएब पाप बुझल जाइ छेलइ। ओना मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल आ कौलेजमे महिनवारी फीस लगै छल, जे संस्थागत सहयोग छल। स्कूल-कौलेज खुजने विद्याक ज्योति प्रज्वलित भेल मुदा अन्‍डी तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जकाँ, जखन कि जरूरी अछि हजार वोल्टबला बौलक इजोत जकाँ। ओना ठाम-ठीम संस्कृत विद्यालय सेहो अछि, मुदा...। दुरागमनक तीन सालक पछाइत‍‍ शिवनाथकेँ बेटा भेलैन। रघुनाथक जन्‍म होइते राधाक हृदए खुशीसँ सूप सन भऽ गेलैन। मनमे नाचए लगलैन बाँसक ओ बीट जइमे दिनानुदिन बेसी बाँसोक जन्‍म होइत आ नमगर, मोटगर सुन्दर-सुडौलौ होइत। मनक खुशीसँ दुनियाँ फुलवाड़ी सदृश बुझि पड़ए लगलैन। बाधक-बाध धानक फूल, गाछीक-गाछी आमक मंजर, जामुन, लताम इत्यादिक फूलसँ सजल ई दुनियाँ सोहनगर लगए लगलैन। मुदा जहिना आसिन मासक अकासकेँ करिया मेघ झँपने रहैए आ केतौ-केतौ मेघक फाटसँ सुरूजक इजोत निकलैए आ सेहो गाछे-बिरीछपर अँटैक जाइए, धरती-जमीन ओहिनाक-ओहिना अन्हार रहि जाइए, तहिना। छबे मासक रघुनाथकेँ अपन मुँह चमका-चमका राधा ‘दा-दा-दा’ सिखबए लगली। ‘दा-दा’मे देवनाथक ओ रूप देखै छेली जे माथपर वीरक मुरेठा बान्हि, हरोथिया लाठीमे लाल झण्‍डा टँगने, हँसैत गोली खेने छला। चारि बर्ख टपिते शिवनाथ रघुनाथक नाओं गामक स्कूलमे लिखा देलखिन साले-साल टपैत रघुनाथ गामक मिड्ल स्कूल टपि केजरीवाल हाइ स्कूल झंझारपुरमे नाओं लिखौलक। रघुनाथकेँ जहिना विज्ञान विषय पढ़ैमे नीक लगै तहिना अंग्रेजियो, जइसँ ठाकुर बाबू आ लत्ती बाबू बेसी मानथिन। चारि बर्खक पछाइत‍ रघुनाथ‍ प्रथम श्रेणीमे मेट्रिक पास केलक। बाढ़ि-रौदीक दुआरे उपजो-बाड़ी नीक नहि, जइसँ परिवारो लड़खड़ाइते चलैत। बाहर जा कऽ आगू पढ़ब असम्‍भव जकाँ रहइ। मुदा संजोग नीक रहलै जे जनतो कौलेजमे साइंसक पढ़ाइ शुरू भेल। रघुनाथो जनते कौलेजमे नाओं लिखौलक। रघुनाथकेँ कौलेजमे नाओं लिखेलाक साल-भरिक पछाइत‍‍ राधा-दादी- मरि गेली। पिताक श्राद्ध तँ शिवनाथ केनहि नै छला मुदा माइक श्राद्ध नीक जकाँ केलैन। जइसँ पाँच कट्ठा खेतो बिका गेलैन, तइले मन मलिन नइ भेलैन। किएक तँ भोजमे खूब जश भेलैन। दू सालक पछाइत‍‍ रघुनाथ फस्ट डिविजनसँ आइ.एस.सी. पास केलक। सत्तैर प्रतिशतसँ ऊपरे नम्बर एलइ। आइ.एस.सी.क रिजल्ट सुनि शिवनाथकेँ बेटा-पढ़बैक उत्साह बढ़लैन। खेत बेचब अधला नै बुझेलैन। मनमे एलैन जे रघुनाथ पढ़ि कऽ नोकरी करत आकि खेती करत। तहन‍‍ खेतक जरूरते की रहतै। संगे हमहूँ समाजकेँ एकटा सक्षम मनुख देब। इंजीनियरिंग, डाक्टरी पढ़बैमे केहेन खर्च होइ छै से तँ नीक जकाँ बुझैथ नहि। मनमे होनि जे पाँच-दस कट्ठा जमीन बेच बेटाकेँ पढ़ा देबइ। मनमे उत्साह रहबे करैन तँए महग बुझि घराड़ीए-क जमीनसँ दू कट्ठा बेच इंजीनियरिंग कौलेजमे बेटाक नाओं लिखा देलैन। नाओं लिखौलाक डेढ़ बर्ख बितैत-बितैत अदहा जमीन बिका गेलैन। आगूक अढ़ाइ बर्ख बाँकी देख चिन्ता घेरए लगलैन। मन मानि गेलैन जे सभ खेत बेचनौं पार नै लगत। सोचैत-वि‍चारैत तँइ केलैन जे पढ़ैक खर्चपर रघुनाथक बिआह करा देबइ। बिआह भेनौं ओकरा पढ़ैमे बाधा थोड़े हेतै, पाँच बर्खक बादे दुरागमन कराएब। समस्याक समाधान होइत देख मनमे खुशी एलैन। फेर मोनमे उठलैन जे समैयो बदैल रहल अछि। पहिने माए-बाप बेटा-बेटीक बिआहकेँ अप्‍पन कर्तव्य बुझै छला तँए पुछब जरूरी नै बुझैथ‍। मुदा आब पुछब जरूरी भऽ गेल अछि। ..परिस्थिति देख रघुनाथो बिआह करब मानि लेलक मुदा शर्त लगा कऽ जे लड़की रंग-रूपमे सुन्दर हुअए। जँ गुणवानक शर्त रहितैन तहन तँ पिता ओझरा जइतैथ। मुदा से नइ भेलैन। बिआहक चर्च शिवनाथ चला देलखिन। इंजीनियर वर तँए कथकियाक ढबाहि लगि गेल। मुदा कोनोक गाम अधला बुझि पड़ैन तँ कोनोक परिवारक कुल-गोत्र। केतौ लड़की दब तँ केतौ उमरगर लड़की भाँज लगैन। होइत-हबाइत एकठाम कथा पटि गेलैन। गाम तँ नीक नहि, मुदा लड़कियो गोर आ पढ़ैक खर्चो गछि लेलकैन। रघुनाथक बि‍आह भऽ गेल। बि‍आहक पछाइत‍‍ दुनू समैध वि‍चारि लेलैन जे सालो भरि जे भाड़-दौड़क फेरीमे पड़ब से नीक नहि। तँए भाड़-दौड़क बेवहार छोड़िए दियौ। दुनू गोरे सएह केलैन। इंजीनियरिंगक अन्‍तिम परीक्षा दऽ रघुनाथ सभ समान लऽ सासुर आबि गेल। ओना दुरागमन बाँकीए मुदा सासुर तँ सासुरे छी, तँए चलि आएल। रिजल्ट निकलैमे तीन मास लागत। काजो तँ अखन किछु नहियेँ अछि, तँए निसचिन्‍तसँ सासुरमे रहैक विचार रघुनाथ कऽ लेलक। दसे दिनक पछाइत‍‍ विदेशमे इंजीनियरक भेकेन्सी खूब निकलल। सभसँ बेसी अमेरिकामे। नव टेकनोलौजी एने नव जुगक आगमन भेल। नव मशीन नव इंजीनियरकेँ जन्‍म देलक। मुदा पुरना तकनीको आ इंजीनियरो, अछैते औरुदे, फाँसीपर लटकए लगला। जहिना गामक-गाम हैजासँ मरैए तहिना इंजीनियरक जमात पटपटाए लगला। मुदा दबाइक करखन्ने नहि, जे दबाइ बनौत..! परीक्षाक पेपर रघुनाथक नीक भेल तँए फेल करैक अन्देशे नहि। हाइए स्कूलसँ अमेरिकाक उन्नैतक आ सुख-मौजक सम्बन्धमे किताबो-पत्रिकामे पढ़ने आ लोकोक-मुहेँ सुनने, तँए मनमे गुदगुदी लगैत रहइ। ई भिन्न बात जे आठ मासमे अस्सीटा बैंक अमेरिकामे दिवालिया भेल। रघुनाथ फस्ट डिवीजनसँ पास केलक। एक तँ फस्ट डिवीजन रिजल्ट, तैपर अमेरिकाक नौकरी। खुशीसँ रघुनाथक मन उड़िया गेल। आवेदन केलाक आठे दिनक पछाइत‍ चिट्ठी भेटलै। स्‍त्रीक गहना बेच दुनू परानीक टिकट बनबौलक। ससुर मात्र पढै़ धरिक खर्चा गछने रहैन तँए टिकटक खर्च दइसँ इन्कार केलकैन। मिशिगन राज्यक राजधानीक शहर लानसिंग। ठण्‍ढ इलाका। ने अपना सभ जकाँ छह ऋतुक मौसम बनैत आ ने ओकर हास-परिहास होइत आ ने एतुक्का जकाँ रंग-बिरंगक गाछ-बिरीछ। लानसिंगक सतरह तल्लाक छोट-छोट तीन कोठरीक आँगन। जइमे ने सभ दिन सुरूजक रोशनी अबैए आ ने भोरे कौआ आबि ओसारपर बैस सारि-सरहोजिक समाचार सुनबैए। रहैत-रहैत दुनू परानी रघुनाथकेँ पनरह बर्ख बित गेलैन। जवानीक सभ सपना मने-मन गुमसैड़ रहल छेलैन। रघुनाथकेँ अमेरिका गेने शिवनाथक जिनगीक गाछ मौलेलैन नहि, बल्‍कि चतैर कऽ पाखैरक गाछ जकाँ झमटगर भऽ गेलैन। दुनू बेकतीक विचारो सुधरलैन। वंशगत सम्बन्ध क्षीण होइत-होइत सुखि गेलैन, समाजिक सम्बन्ध मोटा कऽ जुआएल गाछक शील जकाँ बनि गेलैन। जहिना कोनो समांगकेँ मुइलापर परिवारक लोक आस्ते-आस्ते बिसैर जाइए, तहिना रघुनाथोकेँ दुनू परानी शिवनाथ सोलहन्नी बिसैर गेला। साल भरिक छाया आ साएक-साए बरिषक बर्खी करैक खगते नइ रहलैन। वंश अन्‍त हएत से सद्य: आँखिसँ शिवनाथ देखै छला। स्वतंत्र देशक गुलाम बुधि‍, केना नै बिसैरतैथ? ने कहियो एक्कोटा पत्र लिखि मन राखए चाहलैन आ ने कोनो मनोरथ मनमे संजोगि कऽ रखने छला। पढ़ल-लिखल तँ शिवनाथ नहि, मुदा ‘हरिवंश पुराण’क कथा, गप-सप्‍पक क्रममे बेसी काल दोसराक-मुहेँ सुनै छला। स्वतंत्रताक पछाइत‍‍ विकासपुरक लोकोक विचार सुधरलैन। केना नै सुधैरतैन। बुढ़-बच्चा छोड़ि गामक सभ लाठी-झण्‍डा लऽ झंझारपुर सर्कलमे आगि लगबए जे गेल छला, आँखिसँ सभ किछु देखने जे रहैथ। ओना हजार बीघा रकबाक गाम विकासपुर, जइमे साढ़े चारि साए परिवार हँसी-खुशीसँ कताक पुश्‍तसँ एकठाम रहैत आएल छला। ..स्वतंत्राक पूर्व जमीनदारक मलिकाना गाम छल। मालगुजारीक लेन-देनमे सबहक जमीन निलाम भऽ जमीनदारक हाथमे चलि गेल छेलइ। ओना, कियो अपन खेतक दखल तँ हुनका नै देलकैन मुदा बँटेदार बनि उपजा बाँटि-बाँटि दिअ लगलैन। जागल गामक लोक देख जेतबे-तेतबे दाम लए मालिक खेत घुमा देलकैन। अपन खेतकेँ स्थायी पूजी बुझि ओइमे श्रमक पूजी जोड़ि लोक जिनगीकेँ ठाढ़ करए लगला। बाढ़ि-रौदीक प्रकोप सालो-साल होइते रहै छेलैमुदा विचार आ कर्म बदलने ओहो अभिशाप नै वरदान बनि गेल। बाढ़ि देख माथपर हाथ लऽ नै बैस, ओकर प्रतिकार करैक रस्ता अपनौलैन। तहिना रौदियोक प्रति केलैन। जइसँ बाढ़ि-रौदीसँ बँचैक उपाय कऽ लेलैन। सबहक एहेन धारणा बनि गेलैन। जे बाढ़िक उपद्रव मात्र सौन-सँ-कातिक चारि मास होइए बाँकी बारह मासक सालमे आठ मास तँ बँचैए। जँ आठ मास जमि कऽ मेहनत‍ कएल जाए तँ बारहो मास हँसी-खुशीसँ गुजर चलि सकैए। तेतबे नहि, पानि तँ आगि नै छी जे सभ किछुकेँ जरा देत। पानि तँ उत्पादित पूजी छी, तँए जरूरत अछि ओकर उपयोग करैक। तहिना रौदियोक सम्बन्धमे धारणा बनौने छला। खेतमे रंग-बिरंगक अन्न, फल, तरकारी अछि। ने सभ अन्न-ले एक रंग पानिक जरूरत होइए आ ने फले-तरकारी लेल। अधिक बरखा भेने अधिक पनिसहू फसल होइए आ कम बरखा भेने कम पनिसहू हएत। तैपर थोड़ेक सुविधा सरकारो देलक। नब्बे प्रतिशत अनुदानमे बोरिंग आ पचास प्रतिशत अनुदानमे पम्पसेट देलक। जइसँ पर्याप्त बोरिंग-पम्पसेट गाममे भऽ गेल। किसानक हाथमे पानि चलि आएल। समाजक किसानक कान्ह-मे-कान्ह मिला शिवनाथो चलए लगला। कम खेत रहितो हुनका अन-पानि उगैरे जाइ छैन‍। छह बजे भोरे रघुनाथ धीपल-सराएल पानि मिला अदहा-छि‍दहा नहा, कपड़ा पहिर, चाह-बिस्कुट खा ड्यूटी चलि जाथि आ असगरे श्यामा डेरामे रहि जाइ छेली। ने अंग्रेजी भाषाक बोध छेलैन‍ जे दोकानो-दौरीक काज कऽ सैकतैथ आकि दोसरोसँ गप-सप्‍प करैत समए बितैबतैथ। ओना बगलेक फ्लैटमे आरो-आरो भारतीय–इण्‍डियन–सभ रहैए। मुदा ओहो कियो केरलक तँ कियो मद्रासक छैथ। भाषाक दूरी देख श्यामा मने-मन सोचए लगली जे मनुखसँ नीक पशु होइए जे अपन सोभावसँ एक-दोसरासँ मेलो रखैए। मनुख तँ मनुक्खे छी जे बोलेसँ राजा बनि जाइए...। जहिना पिजराक सुग्गा अकासमे उड़ैत सुग्गाकेँ देख कनैए तहिना कोठरीमे बैसल श्यामाकेँ मने-मन कुही होइ छेलैन‍। मनमे उठैन, कोन जन्‍मक पाप कएल अछि जे एहेन गति भऽ गेल अछि! नैहरसँ सासुर धरिक सभ किछु हेरा गेल..! भिनसरे डेरासँ निकैल रघुनाथ कार्यालय पहुँच‍ जाइ छैथ। कार्यालयेमे खाइ-पीबैक बेवस्‍था सेहो छैन। मशीनेक संग रघुनाथ बारह घन्‍टा बितबै छैथ। बुधि‍सँ लऽ कऽ हाथ धरि मशीनेक संग भरि दिन रहैत-रहैत मशीन बनि गेलैन। संवेदनशून्य मनुख। जइमे दया, श्रद्धा,प्रेमक केतौ जगह नहि। मुदा आइ रघुनाथकेँ कार्यालय पहुँचते मनमे उड़ी-बीड़ी लगि‍ गेलैन। काजक दिस एको-मिसिया धि‍याने नै जाइ छेलैन। ..छुट्टीक दरखास दऽ कार्यालयसँ डेरा विदा भेला। डेरा आबि, देहक कपड़ा आ जुत्ता बिनु खोलनहि पलंगपर, चारू-नाल चीत भऽ ओंघरा गेला। जहिना जेठ मासक तबल धरतीपर बिहरिया बर्खाक बून खसिते गरमी-सरदीक बीच घनघोर लड़ाइ शुरू भऽ जाइए तहिना रघुनाथक मनमे वैचारिक संघर्ष हुअ लगलैन। एहेन जोरसँ वैचारिक बिहारि मनमे उठि गेलैन जे बुधि‍ चहकए लगलैन। चहकैत बुधि‍सँ अनासुरती निकललैन- “हमरासँ सैयो गुना ओ नीक छैथ‍ जे अपना माथपर पानिक घैल उठा मातृभूमिक फुलवाड़ीक फूलक गाछ सींचि रहल छैथ, अपन माए-बाप आ समाजक संग जिनगी बिता रहल छैथ। आइ जे दुनियाँक रूप-रेखा बनि गेल अछि ओ किछु गनल-गूथल लोकक बनि गेल अछि। जिनगीक अन्‍तिम पड़ावमे पहुँच आइ बुझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्हैक बुधि‍ भेल आ ने गाम-समाजकेँ...।” दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबि गालपर होइत पलंगपर खसए लगलैन। शिवनाथ हँसैत ओछाइनपर सँ उठि पत्नीकेँ हाक पाड़लखि‍न- “केतए छी, कनी एमहर आउ?” मुस्‍कियाइत लग आबि रुक्मिणी बजली- “भोरे-भोरे की रखने छी जे हाक पाड़लौं।” “मनमे आबि रहल अछि जे अपन दुनू परानीक श्राद्ध कैये लैतौं। जँ हम पहिने मरि जाएब तँ अहाँक श्राद्ध हएत की नहि, नइ जँ पहिने अहीं मरि जाएब तँ हमर श्राद्ध हएत की नहि।” “अखन हम थोड़े मरैवाली भेलौं हेन जे मरब।” “अपन बिआह बिसैर गेलिऐ? जहन‍‍ अहाँ छह बर्खक रही आ हम सात बर्खक रही तहिए ने बिआह भेल रहए। मोन अछि कि नहि जे खड़हीसँ नापि कऽ जोड़ा लगौल गेल रहए।” किछु काल गुम्म रहि रुक्मिणी बजली- “अपन बिआह-दुरागमन आ माए-बाप जे लोक बिसैर जाएत तँ ओहो कोनो लोके छी।” मुस्‍कियाइत शिवनाथ कहलखिन- “हमरा आँखिमे अहाँ वएह छी जे दुरागमन दिन झाँपल पालकीमे बैस नैहरसँ सासुर आएल रही। अहीं कहू जे हमरा किए ने अहाँक चूड़ीक खनखनीक अवाजमे स्वर-लहरी आ माथक सेनूरमे जिनगीक मधुर फल देखाए पड़त। पचहत्तैर पार कऽ अस्सी बर्खक बीच दुनू गोरे पहुँच‍ चुकल छी तँए खुशी अछि। आँखिक सोझमे देखै छी जे बि‍आहक पाँचे दिनक पछाइत‍‍ चुड़ियो फुटि जाइ छै आ माथो धुआ जाइ छइ। तैठाम हम-अहाँ भाग्यशाली छी की नहि?” पतिक बात सुनि रुक्मिणी मुस्‍कियाइत पतिक आँखिमे अपन आँखि गाड़ि पाछूसँ आगू धरिक जिनगी देखए लगली। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2663 डाक्‍टर हेमन्‍त सभ दिन चारि बजे भोरे उठैबला डाक्टर हेमन्त आइ छह बजे भि‍नसरमे उठला। अबेरे कऽ नीन टुटलैन। एना किए भेलैन? एना ऐ दुआरे भेलैन जे आन दिन परिवारसँ लऽ कऽ अस्पताल धरिक चिन्ता दबने रहै छेलैन, तँए कहियो भरि-भरि राति जगले रहि जाथि तँ कहियो-कहियो लगले-लगले निन्न टुटि जाइन‍‍। कोनो-कोनो राति अनहोनी-अनहोनी सपना देख चहा-चहा कऽ उठि जाथि तँ कोनो-कोनो राति पत्नीसँ झगड़ैत रहि जाइथ। छह बजे नीन टुटिते हेमन्त घड़ी देखलैन। मुदा अबेरो कऽ निन्न टुटने मनमे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। मन फुहराम, एकदम हल्लुक। मनमे जेना चिन्ताक दरस नहि। आन दिन ओछाइनेपर ढेरो चिन्ता घेरि लैन, अनेको समस्या, अनेको उलझन मनकेँ गछारि दैन‍। केसक की हाल अछि, बेटाकेँ नोकरी हएत की नहि.., क्‍लिनिकमे कम्‍पाउण्डरक चलैत रोगी पतरा रहल अछि.., चोट्टा सभ दारू पीब-पीब अन्ट-सन्ट करैत रहैए आ पाइयेक भाँजमे पड़ल रहैए.., जइसँ मुँह-दुबर रोगी सबहक कुभेला होइ छइ। तैसंग अस्पतालोसँ बेर-बेर सूचना भेटैए जे ड्यूटीमे लापरवाही करै छिऐ। बातो सत्य छै मुदा की करब? केस छोड़ि देब तँ पिताक अरजल सम्‍पैत‍ बहि जाएत। क्‍लिनिकमे कम्पाउण्डर सभकेँ जँ किछु कहबै तँ क्लिनिके बन्न भऽ जाएत। जइसँ जेहो आमदनी अछि सेहो चलि जाएत। पुरान कम्पाउण्डर सभ अछि। सभ दिन छोट भाए जकाँ मानैत एलिऐ तेकरा किछु कहबै सेहो उचित नहि। मुदा हमहींटा तँ डाक्टर नइ छी, बहुतो छैथ। रोगीकेँ की, जैठाम नीक सुविधा हेतै तैठाम जाएत। ओझराएल जिनगी डाक्‍टर हेमन्तक, तँए सोझ-साझ वि‍चार मनमे अबिते ने रहैन‍। मुदा आइ अबेर कऽ उठनौं मनमे कोनो ओझरी नै रहैन‍। किएक तँ काल्हिए कोर्टमे लिखि कऽ दऽ देलखिन जे, ‘पिताक सम्‍पैतसँ कोनो मतलब नै अछि, तँए केससँ अलग कएल जाए।’तैसंग बेटोकेँ नोकरी भऽ गेलैन जे ज्वाइन करए काल्हिए माए आ स्‍त्री संग गेल। पिताक देल सम्‍पैतक लड़ाइमे अपनो बीस बर्खक कमाइ गेल रहैन। मुदा प्राप्तिक नाओंपर जान बँचा लड़ाइसँ अलग भेला...। हेमन्तक मनमे उठलैन जे जहिना पिताक सम्‍पैतमे किछु नै प्राप्त भेल तहिना तँ रमेशोकेँ हमरा अरजल सम्‍पैतमे नइ हेतइ। मुदा हमरा आ रमेशमे अन्तर अछि। हम तीन भाँइ छी, जहिक बीच विवाद भेल मुदा रमेश तँ असगरे अछि...। ओना हेमन्तक मनक चिन्ता काल्हिए समाप्त भऽ गेल रहैन मुदा काजक व्‍यस्‍तता मनकेँ असथिर हुअ नै देलकैन। एके बेर आठ बजे रातिमे असथिर भेला। तेकर पछाइत‍‍ पर-पैखाना करैत, हाथ-पएर धोइत, खेनाइ खाइत नअ बजि गेलैन। भरि दिनक झमारल तँए ओछाइनपर पहुँचते तेना नीन आबए लगलैन जे रेडियो खोलि समाचार सुनए चाहलैन, सेहो नइ भेलैन, रेडियो बजिते रहल आ अपने सुति रहला। नीन टुटिते डाक्टर हेमन्तकेँ चाहक तृष्णा एलैन। मुदा घरमे कियो नहि। असगरे। नोकर ऐ दुआरे नै रखने जे काल्हि धरि पत्नी,बेटा-पुतोहु सभ रहैन, जे सभ घरक काज सम्हारैत रहथि‍न। ओना चाहक सभ समचा घरेमे खाली बनौनिहार नहि अछि। ..बिछानपर सँ उठि नित्य-कर्म करैत मनमे एलैन जे चाह पीब। मुदा चाह औत केतएसँ। से नहि तँ पहिने दाढ़िये बना लइ छी आ क्‍लिनिक जाए लगब तँ रस्तेमे चाह पीब लेब। मुदा भोरे-भोर चाहक दोकानपर तँ ओ जाइए, जेकरा घर-परिवार नइ रहै छइ। हमरा तँ सभ कि‍छु अछि। ओह! से नहि तँ अपने चाह बना लेब। चाह बना, कुरसीपर बैस पीबए लगला आकि‍ तखने फाटकपर सँ अवाज आएल- “डाक्टर साहैब, डाक्टर साहैब।” टेबुलपर कप रखि‍, फाटक दिस बढ़ैत डाक्‍टर हेमन्त बजला- “हँ, अबै छी।” फाटकक बाहर डाकिया कन्हामे झोरा लटकौने हाथमे दूटा लिफाफ आ रसीद नेने ठाढ़। डाकियाकेँ देख मुस्‍कियाइत डाक्टर साहैब बजला- “भोरे-भोर कोन शुभ-सन्देश अनलौं हेन?” मुदा डाकिया किछु बाजल नहि। खाँखी शर्टक ऊपरका जेबीसँ पेन निकालि, रसीदो आ पेनो बढ़ा देलकैन। दुनू रसीदपर हस्ताक्षर कऽ दुनू लिफाफ नेने फेर कुरसीपर बैस डाक्‍टर हेमन्‍त चाहक चुस्की लि‍अ लगला‍‍। एकटा लिफाफकेँ टेबुलपर रखि‍, दोसरकेँ खोलि पढ़ए लगला। सरकारी पत्रमे लिखल रहए- “पत्र देखते डेरा छोड़ि दिअ। बाढ़िसँ बहुत अधिक जान-मालक नोकसान भेल अछि, तँए आइए लछमीपुर पहुँच‍‍ जाइक अछि। तइमे जँ कोनो तरहक आना-कानी करब तँ पुलिसक हाथे पठौल जाएब। एक कॉपी पुलिसोक थानामे भेज देल गेल अछि।” पत्र पढ़िते हेमन्तकेँ ठकमुड़ी लगि‍ गेलैन। मने-मन सोचए लगला जे घरमे असगरे छी। केना छोड़ि कऽ जाएब। समए-साल तेहेन भऽ गेल अछि जे दिनो-देखार डकैती होइए। केतौ डकैती, केतौ चोरि‍, केतौ अपहरण तँ केतौ हत्या हरिदम होइते रहैए। एहेन स्थितिमे घर छोड़ब उचित नहि। मुदा जहन‍‍ नोकरी करै छी तँ आदेश मानै पड़त। जँ से नै मानब तँ जहिना बीस बर्खक कमाइ कोट-कचहरीक ईंटा गनैमे गेल तहिना जे पाँच बर्ख नोकरी बँचल अछि ओहो ससपेण्‍ड-डिस्चार्जमे जाएत...। डाक्‍टर हेमन्‍तकेँ कहियो जिनगीमे चैन नहि। घोर-घोर मन होइत रहैन। चाहो सरा कऽ पानि भऽ गेल। गुन-धुन करैत दोसर पत्र खोलला। पत्रमे लिखल रहए- “डाक्टर हेमन्त! काल्हि चारि बजे पछबरिया पोखैरक पछबरिया महारमे जे पीपरक गाछ अछि, ओइ गाछ लग पहुँच‍ हमरा आदमीकेँ दू लाख रूपैआ दऽ देबै, नहि तँ परसू ऐ दुनियाकेँ नइ देख सकब।” पत्र पढ़िते केराक भालैर जकाँ हेमन्तक करेज डोलए लगलैन, सौंसे देहसँ पसीना निकलए लगलैन, थरथराइत हाथसँ पत्र खसि पड़लैन। मनक वि‍चार विवेक दिस बढ़ए लगलैन…। जहिना कियो सघन बोनमे पहुँच‍ जाइत आ एक दिस बाघ-सिंहक गर्जन सुनैत तँ दोसर दिस सुरूजक रोशनी कम भेने अन्हार बढ़ैत जाइत, तहिना हेमन्तकेँ हुअ लगलैन। खाली मन छटपटा उठलैन। की करब, की नै करब से बुझबे ने करैथ। जहिना भोथहा कोदारिसँ सक्कत माटि नै खुनाइत तहिना हेमन्तोक विचार समस्याकेँ समाधान नै कऽ रस्तेमे विलीन भऽ जाइत। लगमे कियो दोसर नहि, जे मनक बात सुनितैन, जहूसँ किछु मन हल्लुक होइतैन। तखने अस्पतालक एकटा कम्पाउण्डर रिक्शासँ आबि गेँटपर पहुँच‍ बाजल- “डाक्टर साहैब..?” कम्पाउण्डरक अवाज सुनि हेमन्‍त धड़फड़ा कऽ उठि गेँट दिस बढ़ला। गेँटपर रिक्शा लागल। रिक्शापर दूटा काटुन लादल। कम्पाउण्डरो आ रिक्शोबला रिक्शासँ हटि, बीड़ी पिबैत। डाक्टर हेमन्तपर नजैर पड़िते कम्पाउण्डर हाथक बीड़ी फेक, आगू बढ़ि प्रणाम करैत कहलकैन- “लगले तैयार भऽ चलू, नहि तँ पुलिस आबि कऽ बेइज्जत करत। बेइज्जत तँ हमरो करैत मुदा पुलिसकेँ अबैसँ पहिनहि हम काटुन रिक्शापर चढ़बैत रही, तँए किछु ने कहलक। रस्तामे अबै छेलौं तँ मोहनबाबूकेँ गरियबैत सुनलिऐन, तँए देरी नै करू। नबे बजे गाड़ी अछि आ सबा आठ बजैए। अपना दुनू गोरे एक टीममे छी।” जहिना जुड़शीतलमे मुइलो नढ़ियापर लाठी पटकैत तहिना कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तकेँ भेलैन‍। मिरमिराइत बजला- “दिनेश, हमरा तँ रातिए-सँ तेते मन खराब अछि जे किछु नीके ने लगैए। एक्को मिसिया देहमे लज्जैत नहि बुझि पड़ैए। होइए जे तिलमिला कऽ खसि पड़ब।” कम्पाउण्डर- “दबाइ खा लिअ, थोड़बे कालमे ठीक भऽ जाएब।” हेमन्त- “देहक दुख रहैत तहन‍‍ ने, मनक दुख अछि। ओ केना दबाइसँ छुटत।” हेमन्तक मन आगू-पाछू करैत देख कम्पाउण्डर कहलकैन- “एक तँ ओहिना मन खराब अछि...।” कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तक मन आरो मौला गेलैन। मनमे अनेको प्रश्‍न उठए लगलैन। देरी हएत तँ जवाबो देबए पड़त। मुदा घरो छोड़ब तँ नीक नै हएत। जखने घर छोड़ब तखने उचक्का सभ सभटा लूटि-ढँगेर कऽ लऽ जाएत। अपने नइ रहने क्लिनिको नहियेँ चलत। अखन जँ रमेशोकेँ अबैले कहबै सेहो केना हएत। काल्हिए तँ ओहो ज्वाइन केलकहेँ। अगर जँ ओकरा माइए-केँ अबैले कहबैन तँ ओहो जपाले। किएक तँ रोज देखै छिऐ अपहरणक घटना...। तैबीच हड़बड़बैत कम्पाउण्डर टोकलकैन- “अहाँ दुआरे हमहूँ नै मारि खाएब। हम जाइ छी।” अधमड़ू भेल हेमन्त बजला- “दू मिनट रूकह, कपड़ा बदलै छी।” हाँइ-हाँइ कऽ कपड़ा बदैल, बैगमे लुंगी, गमछा, शर्ट, पेन्ट, गंजी रखि‍ हेमन्‍त विदा भेला। रिक्शापर चढ़िते रहैथ आकि पुलिसक गाड़ी पहुँच‍‍ गेल। तेते हड़बड़ा कऽ विदा भेल रहैथ जे मोबाइल, घड़ी, दाढ़ी बनबैक वस्तु छुटिए गेलैन। पुलिसक गाड़ी देख जे हड़बड़ा कऽ रिक्शापर चढ़ैत रहैथ तखने चश्मा खसि‍ पड़लैन। जेकर एकटा शीशो आ फ्रेमो टुटि गेलैन। पुलिसक गाड़ीकेँ घुमैत देख मनमे शान्ति एलैन। रिक्शापर चढ़ि थोड़े आगू बढ़ला कि डाक्टर सुनीलकेँ बच्चा सबहक संग बजारसँ डेरा जाइत देखलखिन। सुनील बाबूकेँ देख कम्पाउण्डरसँ पुछलखिन- “सुनील बाबू सभकेँ ड्यूटी नइ भेट‍लैन अछि, की?” कनी काल चुप रहि कम्पाउण्डर कहलकैन- “नीक-नहाँति तँ नहि बुझल अछि मुदा बुझि पड़ैए, जे सभ अस्पतालमे बेसी समए दइ छथिन हुनका सभकेँ छोड़ि देल गेलैनअछि।” कम्पाउण्डरक बात सुनि डाक्‍टर हेमन्तकेँ अपनापर ग्लानि भेलैन। मन पड़लैन सुनील बाबूक परिवार आ जिनगी। सुनील बाबू सेहो डाक्‍टर। दू भाँइक भैयारी। पितो जीविते। चारि बहि‍न। चारू सासुर बसैत। बहि‍न सबहक सासुर देहातेमे, जैठाम पढ़ै-लिखैक नीक बेवस्था नहि। ओना अपनो सुनील बाबू गामेमे रहि पढ़ने छला। डाक्टरी पास केलापर गाम छोड़लैन। हुनकर भैया दरभंगेक हाइ स्कूलमे शिक्षक। परिवारो नमहर। माए-बापक संग दुनू भाँइक पत्नी आ बच्चा। तैपर सँ चारू बहि‍नक पढ़ै-लिखैबला बच्चा सभ। सुनील बाबूक जिनगी आन डाक्टरसँ भिन्न। मात्र दू घन्‍टा अपन क्‍लिनिक चलबैथ। आ नित्‍य आठ घन्‍टा समए अस्पतालमे दैथ। अपना क्‍लिनिकमे चारिटा कम्पाउण्डर आ जाँच करैक सभ यंत्र रखने। जाँच करैक पाइमे सभ कम्पाउण्डरकेँ परसेनटेज दैथ। जइसँ काजो अधिक होइन। कम्पाउण्डरो सभकेँ नीक कमाइ भऽ जाइत, तँए इमानदारीसँ ओहो सभ श्रम करैत। ओना सभ काज कम्पाउण्डरे कऽ लैत मुदा हिसाब-बाड़ी आ जाँचक परताल अपनेसँ करैथ‍। जइसँ अस्पतालोमे जाँच करौनिहार दोहरा कऽ अबैत। आ आन-आन प्राइवेट खानगी जाँच घरक काज सेहो पतराएल। तेतबे नहि, डाक्‍टर सुनीलक चर्चा सीतामढ़ी, दरभंगा, सुपौल आ समस्तीपुर जिलाक गाम-गामक लोकक बीच होइत। जहिना धारक पानि शान्त आ अनवरत चलैत रहैत, तहिना सुनीलक परिवार। कोनो तरहक हड़-हड़-खट-खट परिवारमे कहियो नै होइत...। डाक्टर सुनीलक परिवारक सम्बन्धमे सोचैत-सोचैत डाक्टर हेमन्त अपनो परिवारक सम्बन्धमे सोचए लगला। मन पड़लैन पिता। पि‍ता बंगालसँ डाक्टरी पढ़ि गामेमे प्रैक्टीस शुरू केलैन। किएक तँ सरकारी अस्पताल गनल-गूथल छल। मुदा रोगीक कमी नहि। कमी इलाज आ इलाज कर्ताक। नमहर इलाका। दोसर डाक्टर नहि। गाम-घरमे ओझा-गुनी, झार-फूक, जड़ी-बुटीसँ इलाज चलैत। ओना हेमन्तक पिता-डाक्टर दयाकान्त सभ रोगक जानकार, मुदा तीनिए तरहक रोगक–टुटल हाथ-पैरक पलश्‍तर, सँपकट्टी आ बतहपन्नी–इलाजसँ पलखैत नहि। तँए ओझो-गुनीक चलती पूर्ववते। कमाइयो नीक। जइसँ दू-महला मकानो आ पचास बीघा खेतो कीनलैन। तैसंग तीनू बेटोकेँ खूब पढ़ौलैन। जेठका ओकील, मैझला डाक्टर आ छोटका प्रोफेसर। जाधैर दयाकान्त जीबैत रहलखिन ताधैर गामो आ इलाकोमे सुसभ्य आ पढ़ल लिखल परिवारमे गिनती होइन‍। तीनू भैंयोक बीच अगाध सि‍नेह। जेठ-छोटक विचार सबहक मनमे। जइसँ माइयो-बापकेँ खुशी। ओना, माए पढ़ल-लिखल नहि, मुदा परम्परासँ सभ बुझैत। जखन कि पिता आधुनिक शिक्षा पाबि आधुनिक नजैरसँ सोचैबला। तीनू भाँइक मेहनत देख पिताकेँ ई खुशी होनि जे परिवारक गाड़ी आगू-मुहेँ नीक जकाँ ससरत। बेटा सबहक बिआह इलाकाक नीक-नीक परिवारमे पढ़ल-लिखल लड़कीक संग केलैन। दहेजो नीक भेटलैन। दयाकान्त मरि गेलखिन मुदा स्‍त्री जीवि‍ते रहैन‍। तीनू भाँइ अपन-अपन जिनगीमे ओझराएल। अपन-अपन परिवारक संग रहैत,घरपर खाली माइए-टा। तीनू भाँइक परिवारक गारजनी स्‍त्रीक हाथमे। एक-दोसरसँ आगू बढ़ैक हरिदम परियास करैत। जइसँ गामक सम्‍पैतपर नजैर जाए लगलैन। गामक सम्‍पैत अधिक-सँ-अधिक हाथ लागए तइ भाँजमे बौद्धिक व्यायाम नीक-नहाँति शुरू भेल। मुकदमा बाजी भेल। एकटा कोठरी आ दू बीघा खेत माएकेँ कोटसँ भेटलैन। बाँकी घरो आ खेतो जप्‍त भऽ गेलैन‍। एक साए चौआलीस लगि‍ गेलै जइसँ पुलिसक ड्यूटी भऽ भेल। बीस बर्खक पछाइत‍‍ डाक्टर हेमन्त लिखि कऽ कोर्टमे दऽ देलखिन जे हमरा ऐ सम्‍पैतसँ कोनो मतलब नहि। दरभंगा प्लेटफार्मपर डाक्‍टर हेमन्त देखलैन जे दर्जनो डाक्टर जा रहल छी। दर्जनो कम्पाउण्डरो छइ। मुदा सबहक मुँह लटकल। एक्को मिसिया मुँहमे हँसी नहि। जहिना ठनका ठनकलापर सभ अपने-अपने माथपर हाथ रखि‍ साहोर-साहोर करैत तहिना बाढ़िक इलाकाक ड्यूटीसँ सबहक मनपर भारी बोझ, जइसँ सभ मने-मन कबुला-पाती करैत। ‘हे भगवान’, ‘हे भगवान’ करैत। कियो-केकरो टोकैत नहि। आँखि उठा कऽ देख फेर निच्चाँ कऽ लइत। निर्मली जाइवाली गाड़ी पहुँचल। गाड़ी पहुँचते सभ हड़बड़ करैत, अपनो आ समानो सभ उठा-उठा गाड़ीमे चढ़ौलैन। हेमन्तो चढ़ला। कम्पाउण्डरकेँ बीड़ीक तृष्णा चढ़लै। दुनू काटुन गाड़ीमे चढ़ा अपने उतैर कऽ पानक दोकान दिस बढ़ल। तखने पनरह-बीसटा तरकारीवाली आबि गाड़ीक डिब्बामे कियो छिट्टा चढ़बैत तँ कियो मोटा। तेसर यात्री सभ, तरकारीवालीक काँइ-कच्चर सुनि-सुनि आगू बढ़ि जाइत। कम्पाउण्डरो हाँइ-हाँइ कऽ चारि दम बीड़ी पीब दौगल आबि बोगीक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। तरकारीवाली सबहक झुण्ड देख कम्पाउण्डरकेँ मनमे हुअ लगलै जे हमरा चढ़िए ने हएत। चुपचाप निच्चाँमे ठाढ़। गाड़ीक भीतर बैसल एकटा पसिन्जर उठि कऽ आबि एकटा मोटाकेँ निच्चाँ धकेल देलक। जइ तरकारीवालीक मोटा खसल रहै ओ ओइ आदमीक गट्टा पकैड़ निच्चाँ उतारलक। निच्चाँ उतारिते घोरन जकाँ सभ तरकारीवाली लुधैक गेल। गारियो खूब पढ़लकै आ मारबो केलकै। तखने बोगीक मुँह खाली देख कम्पाउण्डर चढ़ि गेल। गाड़ीकेँ पुक्की दैते सभ हाँइ-हाँइ कऽ चढ़ए लगल मुदा झगड़ा नै छुटलै। गारि-गरौवैल चलिते रहलै। जेते हल्ला सौंसे गाड़ीमे लोकक बजलासँ होइत रहै, ओते खाली ओइ एक्के डिब्बामे होइ। अकैछ कऽ डाक्टर हेमन्त सीटपर सँ उठि समान रखैबला ऊपरकापर जा कऽ बैगकेँ मुड़ी-तरमे रखि‍ पड़ि रहला। ओंघराइते अपना जिनगीपर नजैर गेलैन। मने-मन सोचए लगला जे पिताजी तँ हमरे सबहक सुख-ले ने ओते सम्‍पैत अरजलैन। मुदा की हमरा सभकेँ ओइ सम्‍पैतसँ सुख होइए? अपनो कमाइ तँ कम नै अछि। मुदा चौबीस घन्‍टाक दिन-रातिमे चैनसँ केते समए बितैए? जहिना खाइ काल फोन अबैए तहिना सुतै काल। की यएह छी सुखसँ जिनगी बिताएब? ..मुदा ऐ प्रश्‍नक उत्तर सोचमे ऐबे ने करैन। फेर मन उनैट कऽ जिनगीक पाछू-मुहेँ घुरलैन। मनमे एलैन, जे धाकर सन-सन तीन बेटाक माए छी, ओइ माएकेँ कियो एक लोटा पानि देनिहार नहि। किएक ने वेचारीक मनमे उठैत हेतैन जे ऐ बेटासँ बिनु बेटे नीक। हमरो अहि‍ना नइ हएत, तेकर कोन गारंटी। गाड़ी घोघरडीहा पहुँचल। यात्री सभ उतरबो करए आ बजबो करए जे किसनीपट्टीसँ आगू लाइन डुमि‍ गेल छै, तँए गाड़ी आगू नै बढ़त। कम्पाउण्डर उठि कऽ हेमन्तक पएर डोलबैत पुछलकैन‍- “डाक्टर साहैब, नीन छिऐ।” “नहि।” “सभ उतैर रहल अछि। गाड़ी आगू नइ बढ़त। उतैर जाउ?” कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तक मनमे अस्सी मन पानि पड़ि गेलैन। मुदा उपाय की? अधमड़ू जकाँ उतरलैथ। प्लेटफार्मपर रिक्शाबला, टमटमबला हल्ला करैत जे कोसीक पछबरिया बान्हपर जाएब?” एकटा रिक्शाबलाकेँ हाथक इशारासँ कम्पाउण्डर हाक पाड़ि पुछलक- “हम सभ लछमीपुर जाएब। तोरा बुझल छह?” रिक्शाबला- “हमरो घर लछमीएपुर छी। बाढ़ि दुआरे ऐठाम रिक्शा चलबै छी।” कम्पाउण्डर- “ऐठामसँ केना-केना रस्ता हेतइ?” रिक्शाबला- “ऐठामसँ हम बान्हपर दऽ आएब। आ ओतएसँ नाव भेटत, जे लछमीपुर पहुँचा देत। ऐठामसँ हम नेने जाएब आ अपने भैयाबला नावपर चढ़ा देब।” कम्पाउण्डर- “बड़बढ़ियाँ, काटुन चढ़ाबह।” सभ कियो रिक्शापर चढ़ि विदा भेल। पुबरिया गुमती लग जैठाम चाउरक बड़का मिलक खंडहर अछि तेतए पहुँच‍ रिक्शावलाकेँ हेमन्त पुछलखिन- “लछमीपुर केहेन गाम अछि?” रिक्शाबला- “बड़ सुन्दर गाम अछि। सन्मुख कोसीसँ मील भरि पछिमे अछि। गामक सभ मेहनती। बाढ़िक समैमे हम सभ रिक्शा चलबै छी आ जखन‍‍ पानि‍ सटैक जाइ छै तहन‍‍ जा कऽ खेती करै छी। गाइयो-महींस पोसने छी। केते गोरे नाव चलबैए आ केते गोरे मछबारि करैए। हमरा गामक लोक पंजाब, डिल्ली नै जाइए। आन-आन गाममे तँ पंजाब, डिल्लीक धरोहि लागि जाइ छै, से हमरा गाममे नइए।” माछक नाओं सुनि बिच्‍चेमे कम्पाउण्डर पुछलकै- “तब तँ माछ खूब सस्ता हेतह?” “हँ, कोनो की जीरा रहै छै, सभ अनेरूआ। एहेन सुअदगर माछ शहर-बजारमे थोड़े भेटत। शहर-बजारक माछ तँ सड़ल-सुड़ल पानिक डबरा महक रहैए।” कोसीक पछबरिया बान्हपर पहुँचते रिक्शाबला अपन भौयाक घाटपर रिक्शा लऽ गेल। भाइक रिक्शा देखते भागेसर नावपर सँ बान्हपर आएल। दुनू भाँइ दुनू काटुन लऽ जा कऽ नावपर रखलक। अदहा नावपर तख्ता बिछौने आ अदहा ओहिना। तख्तापर पटेरक पटिया बि‍छौल, जैपर बैस हेमन्त पूब-मुहेँ तकलैन तँ बुझि पड़लैन जे समुद्रमे जा रहल छी। सौंसे देह सर्द भऽ गेलैन। मनमे डर पैस गेलैनजे केना ऐ पानि‍मे जाएब। मन पड़लैन दरभंगाक पीच परहक कार। मुदा एक्सिडेंट तँ ओतौ होइ छइ। ओतौ लोक मरैए। फेर मनमे एलैनजे महेन्द्रूक नाव जकाँ ऐ नावमे इंजनो नइ छइ। जँ कहीं बीचमे लग्गी छुटि-टुटि जेतै तँ भँसिए जाएब। केतए जाएब केतए नहि। अनासुरती मनमे एलैन जे अखन धरि कम्पाउण्डरकेँ नोकर जकाँ बुझै छेलिऐ ओ उचित नहि। ई तँ छोट भाए-तुल्य अछि। नव विचार मनमे उठिते कम्पाउण्डरकेँ कहलखिन- “बौआ, धन्य अछि ऐठामक लोक। जे सचमुच देवीक पूजो करैए आ लड़बो करैए। किए ने जिबठगर हएत।” नाव खुगलै, माँगि सोझ कऽ नैया–कमलेसरीक गीत उठौलक। नैयाकेँ लग्गी उठबैत आ पानि‍मे रखैत देख डाक्‍टर हेमन्त मने-मन सोचए लगला जे एहेन मेहनत केनिहारकेँ कोन जरूरत दबाइ आ व्यायामक छइ। मन पड़लैन रामेश्वरम्। समुद्रक झलकैत पानि। जइमे लहैर सेहो उठैत। तहिना तँ ओहूठाम पानिक लहैर अछि। फेर मन पड़लैन जेसलमेरक बाउल। अहि‍ना उज्जर धप-धप केतौ-सँ-केतौबाउल। कमलेसरीक गीत समाप्त होइते नाविक कोसी मैयाक गीत उठौलक। अजीब साजो। जहिना नावमे ‘खट-खट’क अवाज तहिना लग्गीक। लग्गीक पानि‍ देहोपर खसै मुदा तँए की ओकर पसीना निकलब थोड़े रूकइ। डाक्‍टर हेमन्तक मन फेर उनटलैन। मिलबए लगला समुद्रक लहैरकेँ कोसीक लहैरसँ। समुद्र रूपी समाजमे सेहो समुद्रे जकाँ लहैरो उठैए आ धारक वेग जकाँ वेगो, मुदा ओ धीरे-धीरे असथिर भऽ जाइए। मुदा कोसीक धार जकाँ जे वेग चलैत ओ पैघसँ पैघ पहाड़केँ तोड़ि धारो बना दैत आ समतल खेतो। तेतबे नहि, पुरानसँ पुरान गामक अधला परम्पराकेँ तोड़ि नवमे सेहो बदैल दइत। जहिना मौसम बदललापर गाछक पुरान पात झड़ि नव पातसँ पुनः लदि जाइत, तहिना। ..असीम विचारमे डुमल हेमन्तक मुँह अनासुरती नाविककेँ पुछलक- “केते दूर अहाँक गाम अछि?” नैया- “छह कोस।” “केते समए जाइमे लगत?” “भट्ठा दिस जाएब, तँए जल्‍दीए पहुँच‍‍ जएब।” जल्दीक नाओं सुनि हेमन्तक मनमे आशा जगल। मुदा ओ आशा लगलेमे जाए लगलैन। किएक तँ सौंसे पानियेँ देखैथ, गाम-घरक केतौ पता नहि। चिन्तित होइत चुप भऽ गेला। ..अपना सुढ़ि‍मे नैया गीत गबैत। मनमे कोनो विकारे नहि। मुदा हेमन्तकेँ कखनो गीत नीको लगैन आ कखनो झड़कबाहियो उठैन। तखने एकटा मुर्दा भँसल जाइत रहए। सबहक नजैर ओइ मुर्दापर पड़ल। मुर्दा देख हेमन्तक नजैर अस्पतालक मुर्दापर गेलैन। मुदा दुनूक दू कारण। एकक जिनगीक अन्‍त रोगसँ तँ दोसराक बाढ़िसँ। नब-नब समस्या उठि-उठि हेमन्तक मनकेँ घोर-मट्ठा कऽ देलकैन। मनक सभ विचार हेराए लगलैन। तैबीच एकटा किलो चारिए-क रौह माछ कुदि कऽ नावमे खसल। माछ देख हेमन्तोक आ कम्पाउण्डरोक मन चट-पट करए लगलैन। लग्गीकेँ माँगिपर रखि भागेसर माछकेँ पकैड़, पानि उपछैबला टीनमे रखैत बाजल- “अहाँ सबहक जतरा बनि गेल!” नैयाक शुभ बात सुनि हेमन्तक मन फेर ओझरा गेलैन। मनमे उठए लगलैन जे जतरा केकरा कहबै? घरसँ विदा भेलौं तेकरा आकि कार्यस्थल तक पहुँचैकेँ? आकि काज सम्पन्न कऽ घर पहुँचलाकेँ? तहूसँ आगू जे काजक बीचोमे नव काज उत्पन्न भऽ सकैए...। नैयाकेँ पुछलखिन- “आब केते दूर अछि?” हाथ उठा आँगुरसँ दच्‍छिन दिस देखबैत नैया कहलकैन- “वएह हमर गाम छी। गोटे-गोटे जमुनीक गाछ देखै छिऐ? अदहा कोस करीब हएत।” ‘अदहा कोस’ सुनि कम्पाउण्डर चहैक उठल- “डाक्टर साहैब, पाँच बजैए। अदहा घन्‍टा आरो लागत। साढ़े पाँच बजे तक पहुँच‍ जाएब।” “भने सबेरे-सकाल पहुँच‍ जाएब।” कहि‍ डाक्‍टर हेमन्‍त देखए-सोचए लगला, अकासमे चिड़ै सभ नै उड़ैए। किएक तँ चिड़ै ओइठाम उड़ैत जैठाम रहैक ठौर होइत। मुदा से तँ नइ छै, सौंसे बाढ़िये पसरल अछि। मुदा तैयो गोटे-गोटे मछखौका चिड़ै जरूर उड़ैए...। लछमीपुर दिस अबैत नावकेँ देख गामक धियो-पुतो, स्‍त्रीगणो आ गोटे-गोटे पुरुखो घाटपर ठाढ़ भऽ एक दोसरकेँ कहैत- “चाउर-आँटाबला छिऐ।” “नुओ-बसतर हेतइ।” “तिरपालो हेतइ।” “बड़का हाकीम सभ छिऐ।” घाटपर आबि नाव रूकल। मुदा पेन्‍ट-शर्ट पहिरने डाक्टर आ कम्पाउण्डरकेँ देख जनिजाति सभ मुँह झाँपए लगल। मरद सभ सहैम गेल। धि‍या-पुता डेरा गेल। नावकेँ बान्हि नैया सुलोचनाकेँ कहलक- “हे गइ सुलोचना, डाकदर साहैब सभ छथिन। बक्सामे दबाइ छिऐ। हम दबाइ उतारै छी तूँ टीन उतार। टीनमे एकटा नमहरमाछ छौ। खूब नीक जकाँ माछकेँ तरि डाकदर साहैबकेँ खुआ दहुन।” माछ उतारि सुलोचना अँगना लऽ गेल। टीन रखि‍‍ बाड़ीक कलपर आबि हाथ धोलक, आँचरसँ हाथ पोछि, स्‍कूलक ओछाइन झाड़ि बिछबए लगल। बिछान बिछा, दौग कऽ आँगनसँ बड़का जाजीम आ दूटा सिरमा आनि लगौलक। हेमन्तो आ दिनेशो आगूमे ठाढ़। मुदा ओते लोकक बीच दुनू गोरेक नजैर सुलोचनेक देह आ काजपर नचैत रहैन। ..बिछान बिछा सुलोचना हेमन्तकेँ कहलकैन- “डाक्टर साहैब, बिछान बिछा देलौं, आब अराम करू।” दिनेश चुप्पे। मुदा हेमन्त बजला- “बुच्ची, देह भारी लगैए। ओना नावपर आरामे सँ एलौं। मुदा तैयो देह भरियाएल बुझि पड़ैए। पहिने नहाएब।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि सुलोचना आँगन बाल्टी-लोटा आनए गेल। आँगनसँ बाल्टी-लोटा नेने कलपर पहुँचल। दुनूकेँ माटिसँ माँजि, बाल्टीमे लोटा रखि‍‍, पानि‍ भरि, हेमन्तकेँ कहलक- “डाक्टर साहैब, नहा लिअ।” चहारदेबालीसँ घेरल टंकीपर नहाइबला डाक्टर हेमन्त खुला धरती-अकासक बीच नहाइले जेता। तँए किछु सोचै-वि‍चारैक प्रश्‍न मनमे उठि गेलैन, मुदा बहुत सोचैक जरूरत नइ पड़लैन। अपना-अपना उमरबला सभकेँ डोरीबला पेन्‍ट, तैपर सँ केकरो लुंगी तँ केकरो चरिहत्थी तौनी पहिरने देखलखिन। ओहो सएह केलैन। मुदा बारह बर्खक सुलोचना कलपर सँ हटल नहि। मातृत्वक दुआरिपर पहुँचल सुलोचनामे फूलक टुस्‍सी जरूर अबि गेल छेलइ। मुदा हेमन्तोक मनमे डाक्टरक विचार। ओना डाक्टर हेमन्त शरीरक सभ अंगक गुण-धर्म बुझैथ‍ मुदा एहनो तँ वस्तु अछि जे गर्म हवाक रूपमे रहैत। जइमे आनन्द आ सृजनक गुण होइत। सुलोचनोमे फूलक कोढ़ी जे सुगन्‍धक वाल्यावस्थामे प्रस्फुटित होइत, महमही हवामे...। एक लोटा माथपर पानि ढारला पछाइत‍‍ हेमन्तक मनमे एलैन‍ जे अखन हम दुनियाँक ओइ धरतीपर छी जैठाम जीवन-मरण संगे रहैए। मुदा तैठाम एहेन सौम्य-सुशील-अल्हड़ वाला केते खुशीसँ चहचहा रहल अछि। तीन साल पहिलुका बात छिऐ। जइ बाढ़िमे केतेको गाम, केतेको मनुख आ केतेको सम्‍पैत नष्ट भेल छल। तँए की? जे बँचल अछि ओ ओइ गामकेँ छोड़ि देत। कथमपि नहि। मुदा बाढ़ि अनहोनी नइ रहए। बैरेजक फाटक खोलल गेल रहइ। फाटको खोलैक मजबुरी रहइ। किएक तँ बैरेजक उत्तर तेते पानिक आमदनी भऽ गेलै जे दुर्दशाक अन्‍तिम शिखरपर पहुँच‍‍ सकै छल। मुदा सुदूर गाममे जानकारीक साधन नहि, आ ने बँचैक उपाय। कोसीक दुनू बान्हक बीच समुद्र जकाँ पानि पसैर गेल। थाहसँ अथाह धरि। कुनौलीसँ दच्‍छिन, कोसी धारक कातमे एकटा गाम। ओही गामक सुलोचना। जेकर सभ कि‍छु मनुखसँ घर धरि दहा गेलइ। मुदा सुलोचना जे बँचल से पढ़ैले कुनौली गेल छल तँए। स्कूलसँ घर जाइ काल बाढ़िक दृश्य देखलक। दृश्य देख बान्हेपर बपहारि काटए लगल। तखने लछमीपुरक चारि गोरे बजारसँ समान खरीद नाव लग अबैत रहए। सुलोचनाकेँ कनैत देख जीयालाल पुछलकै- “बुच्ची, किए कनै छेँ?” कनैत सुलोचना- “बाबा, हम पढ़ैले गेल छेलौं। तैबीच हमर गामे दहा गेल। आब हम केतए रहब?” जीयालाल- “हमरा संगे चल। जहिना बारहटा पोता-पोतीकेँ पोसै छी तहिना तोरो पोसबौ।” जीयालालक विचार सुनि सुलोचनाक हृदैमे जीबैक आशा जगल। कानब रूकि‍ गेलइ। मुदा कखनो काल हुचकी उठिते रहलै। नावपर सभ समान रखि‍‍ चारू गोरे बान्हपर आबि चीलम पीबैक सुर-सार करए लगल। एक भागमे सुलोचनो किताब नेने बैसल। बटुआ खोलि रघुनी चीलम, कंकड़क डिब्‍बा आ सलाइ निकालि बीचमे रखलक, एक गोरे चीलमक ठेकी निकालि, चीलमो आ ठेकियोकेँ साफ करए लगल। दोसर गोरे डिब्बासँ कंकड़ निकालि तरहत्थीपर औंठासँ मलए लगल। चीलम साफ भेलइ। ओइमे ठेकी दऽ कंकड़बला हाथमे देलक। कंकड़बला चीलममे कंकड़ बोझि दुनू हाथसँ चीलमक पैछला भाग पकैड़ मुँहमे भिरौलक। मुँहमे भिरैबते रघुनी सलाइ खड़ैर‍ कंकड़मे लगबए लगल। दू-चारि बेर मुँहक इंजनसँ प्रेशर दैते चीलम सुनैग गेल। चीलमकेँ सुनैगते तेते जोरसँ दम मारलक जे धुआँक संग धधरो उठि गेलइ। मुदा चीलमक दुषित हवासँ धधड़ा मिझा गेल। बेरा-बेरी चारू गोरे चीलम पीब मस्त भऽ नाव दिस विदा भेल। साँझू-पहरकेँ जहिना गाए-महींस बाधसँ घर दिस अबैत। जेकरा पाछू-पाछू छोट-छोट नेरू-पर्ड़ू झुमैत, लुदुर-लुदुर मगन भऽ चलैत, तहिना सुलोचना लछमीपुरबला सबहक संगे पाछू-पाछू नावपर पहुँचल। नावपर चढ़िते लग्गा चलौनिहार कोसी महरानीक दुहाइ देलक। संगेमे सुलोचनो बाजल- “जय।” नाव खुगल। लछमीपुरक चारू गोरेक मन सुलोचनाक जिनगीपर। मुदा सुलोचनाक परिवारक बिछोहक दुखसँ सुख दिस जाए लगल। जइ सुलोचनाक गाम आ परिवारक केतौ अता-पता नहि, ओइ सुलोचनाक मनमे उठए लगल जे गाम-घर भलेँ दहा गेल मुदा माए-बाप जरूर जीबैत हएत। किएक तँ मनुख निर्जीव नै सजीव होइत। बुधि‍-विवेक होइत। तँए ओ दुनू गोरे जरूर केतौ जीबैत हएत। जे आइ-ने-काल्हि जरूर मिलबे करत। तँए सुलोचनाक मनमे जिनगी भरिक दुख नहि, मात्र किछु दिनक दुख। जे कहुना नै कहुना कटिए जाएत। नाव लछमीपुर पहुँचल। जीयालालक बारहोटा पोता-पोती दौग कऽ नाव लग आएल। पोता-पोतीकेँ देख जीयालाल बाजल- “बाउ, तोरा सभले एकटा बहि‍न नेने एलिअयह।” सुलोचना पोता-पोती सबहक पाहुन भऽ गेल। दोसर दिन जीयालाल एकटा घर बना, सुलोचनाकेँ गामक बच्चा सभकेँ पढ़बैले कहलक। गामक बच्चा सभकेँ सुलोचना पढ़बए लगल। वएह सुलोचना छी। हेमन्तो आ दिनेशो नहाएल। नहा कऽ जाबे हेमन्त कपड़ा बदैल, केश सेरिया, तैयार भेला ताबे सुलोचनो आ जीयालालक जेठकी पोती कमलियो चूड़ा भुजि, माछ तड़ि लेलक। दूटा थारीमे चूड़ा-भुजा आ तड़ल माछ साँठि दुनू बहि‍न दुनू थारी नेने हेमन्त लग पहुँच‍ आगूमे रखि‍‍ देलकैन‍। बड़का फुलही थारी तइमे चूड़ाक ऊपरमे माछक नमहर-नमहर तड़ल कुट्टिया पसारल। थारी रखि‍‍ कमली पानि‍ आनए गेल आ सुलोचना आगूमे बैसल। दुनू गोरे खाइत-खाइत दसो माछक कुट्टिया आ थारियो भरि चूड़ा खा लेलैन। शुद्ध आ मस्त भोजन। पानि पीब ढेकार करैत दिनेश बाजल- “डाक्टर साहैब, आइ धरि हम एते नै खेने छेलौं।” हेमन्त- “से तँ हमरो बुझि पड़ैए।” सुलोचना- “डाक्टर साहैब, चाहो पीबै?” हेमन्त- “पीबै तँ जरूर मुदा दू घन्‍टाक पछाइत‍‍। ताबे किछु काज करब। ओना साँझ पड़ि गेल मुदा जाबे फरिच्‍छ छै ताबे दसो-पाँचटा रोगी जरूर देख लेब।” सुलोचना- “अच्छा, अहाँ तैयार हौउ, हम रोगी सभकेँ बजौने अबै छी।” कम्पाउण्डर काटुन खोलि दबाइ निकालि पसाइर देलक। रोगी आबए लगल। रोगी देख-देख हेमन्त कम्पाउण्डरकेँ कहैत जाथिन आ कम्पाउण्डर दबाइ दैत जाए। अस्पताल जकाँ तँ सभ रंगक रोगी नहि। किएक तँ बाढ़िक इलाका तँए गनल-गूथल रोग। दबाइयो तेहने। तीनिए दिनमे सौंसे गामक रोगीकेँ देख डाक्टर हेमन्त निचेन भऽ गेला। मुदा सात दिनक ड्यूटी। तहूमे कठिन रस्ता। मुदा पानि‍ टुटए लगलै। पाँचम दिन जाइत-जाइत रस्ता सुखि गेल। मुदा थाल-खिचार रहबे करइ। आठम दिन भोरे हेमन्त सुलोचनाकेँ कहलखिन- “बुच्ची, आइ हम चलि जाएब।” सुलोचना- “ई तँ मिथिला छिऐ डाक्टर साहैब, बिनु किछु खेने-पीने केना जाएब?” कहि सुलोचना चाह बनबए गेल। तखने एकटा दोस्तसँ भेँट करए कम्पाउण्डर गेल। असगरे हेमन्त। मने-मन सोचए लगला जे सात दिनक समए जिनगीक सभसँ कठिन आ आनन्दक रहल। ई कहियो नै बिसैर सकै छी। बिसरैबला ऐछो नहि। आइ धरि एहेन जिनगीक कल्पनो नै केने छेलौं, जे बि‍तल। तैसंग एहेन मनुखक सेवो करैक मौका पहिल बेर भेटल। मौके नइ भेटल, बहुत किछु देखैक, भोगैक आ सीखैक सेहो भेटल। आइ धरि हम एहेन रोगीकेँ जेकरा सचमुच जरूरत छै, सेवा नइ केने छेलौं, खाली पाइ कमेने छेलौं। गाम-घरमे जेकरा पाइ छै वएह ने दरभंगा इलाज करबए जाइए। जेकरा पाइ नइ छै ओ तँ गामेमे छरपटा कऽ मरैए। तैबीच सुलोचना चाह नेने आएल। कप बढ़बैत बाजल- “मन बड़ खसल देखै छी, डाक्टर साहैब।” “नहि! कहाँ। एकटा बात मनमे आबि गेल तँए किछु सोचए लगलौं।” सुलोचना- “ऐठाम केहेन लगैए डाक्टर साहैब?” सुलोचनाक प्रश्‍नक उत्तर नै दऽ हेमन्त चुप्प रहला। हेमन्तकेँ चुप देख सुलोचना बाजल- “हम तँ बच्चा छी डाक्टर साहैब, तँए बहुत नै बुझै छी। मुदा तैयो एकटा बात कहै छी। जहिना चीनी मीठ होइए आ मिरचाइ कड़ू। दुनूमे कीड़ा फड़ि‍ ओइमे अपन-अपन जीवन-यापन करैए। मुदा चीनीक कीड़ाकेँ जँ मिरचाइमे दऽ देल जाए तँ एको क्षण जीवित नइ रहत, उचितो भेलइ। मुदा की मिरचाइक कीड़ा चीनीमे देला पछाइत‍‍ जीवित रहत? तहिना गाम आ बजारक जिनगी होइए।” सुलोचनाक बात सुनि डाक्टर हेमन्त मने-मन सोचए लगला जे बात ठीके कहलक। अहिना तँ मनुखोमे अछि। मुदा ओ हएत केना। जाबे समाजिक जीवनमे समरसता नै औत ताबे अहि‍ना होइत रहत। दस बजे भोजन कऽ दुनू गोरे लुंगी-गंजी पहिर सभ कपड़ो आ जूत्तोकेँ बैगमे रखि‍‍, पएरे विदा भेला। हेमन्तक बैग सुलोचना आ दिनेशक बैग कमली लऽ पाछू-पाछू विदा भेल। किछु दूर गेलापर हेमन्त कहलखिन- “बुच्ची, आब तों सभ घुमि जा।” हेमन्तक बात सुनि सुलोचनाक आँखि नोरा गेल। डाक्टर हेमन्तकेँ बैग पकड़बैत बाजल- “अन्‍तिम प्रणाम, डाक्टर साहैब।” एकाएक हेमन्तक हृदैसँ प्रेमक अश्रुधारा प्रवाहित हुअ लगलैन। मुहसँ ‘प्रणाम’क उत्तर नै निकललैन। मुड़ी निच्चाँ केने आगू बढ़ि गेला। मुदा किछुए आगू बढ़लापर बुझि पड़लैन जे सुलोचना आ कमलीक आँखि रूपी चारू तीर पाछूसँ बेधि रहल अछि! पाछू उनैट कऽ तकलैन तँ देखलखिन जे दुनू गोरे ठाढे़ अछि। मन भेलैन जे हाथक इशारासँ जाइले कहि दिऐ, मुदा अपना रूपपर नजैर पड़ि गेलैन। खाली पएर जाँघ तक समटल लुंगी, देहमे सेन्डो गंजी, माथक केश फहराइत, तैपर सँ थालक छिटका घुट्ठीसँ लऽ कऽ माथ धरि पड़ल। ..हाथक इशारासँ सुलोचनाकेँ हाक पाड़लखिन। सुलोचनो आ कमलियो हँसैत आगू बढ़ल। लगमे देख हेमन्तोक हृदैमे हँसी उपकल। मुस्‍कियाइतबजला- “बुच्ची, हम अपन दरभंगाक पता कहि दइ छिअ। अबिहह।” सुलोचना- “हम तँ शहर-बजारमे हेराइए जाएब, डाक्टर साहैब। अहाँ जाबे हमरा गाममे छेलौं ताबे बुझि पड़ै छल जे दरभंगा अस्पताल गामेमे अछि।” कहि सुलोचना डाक्‍टर हेमन्‍तक पएर छुबि गोड़ लागि‍ घुमि गेल। बान्हपर आबि दुनू गोरे थाल-कादो धोइ, पेन्ट-शर्ट पहिर स्टेशन दिस बढ़ला। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 4407 बाबी दुर्गापूजा शुरू होइसँ एक दिन पूर्व घर छछारै आ दियारी बनबैले सिरखरियावाली बुढ़िया गाछीक मटि-खोभसँ मनही छिट्टामे चिक्कनि माटि नेने अँगना अबै छेली। रस्ते कातक चौमासक टाटपर बाबी करैला तोड़ैत रहैथ कि सिरखरियावालीक नजैर पड़लैन‍। नजैरपड़िते सिरखरियावाली एक हाथे छिट्टा पकड़ने आ दोसर हाथे चाइनिक घाम आँगुरसँ काछि कऽ फेकैत बाबीसँ पुछलक- “बाबी, छठिकेँ केते दिन छइ?” बाबीक नजैर जुआएल आ सड़ल करैलापर छेलैन। किएक तँ अजोह करैला तीतो बेसी आ सुअदगरो कम होइए। तेतबे नहि,पकैयोक डर रहै छइ। सड़ल करैला सभकेँ ऐ दुआरे लत्तीकेँ बिहिया-बिहिया ताकैथ‍ जे जँ ओकरा तोड़ि नै लेती तँ दोसरोकेँ सड़ौत। सिरखरियावालीक अवाज सुनि बाबी रस्ता दिस देख पुनः करैला ताकए लगली। किएक तँ माथपर भारी देख गप-सप्‍प करब उचित नइ बुझलैन। एक तँ भरल छिट्टा माटि आ तैपर खुरपी गाड़ल देखलखिन। मने-मन सोचए लगली- छठिक अखन मासोसँ बेसीए हेतै तहन‍‍ एहेन कोन हलतलबी-बेगरता भऽ गेलइ। जँ महि‍ना- परि‍व-ति‍थिकेँ‍ जोड़ि कऽ कहए लगब तँ अनेरे देरी हेतइ। जेते देरी हेतै तेते भारियो लगतै। तँए बाबी आँखि उठा कऽ देख बिनु किछु कहनहि नजैर निच्चाँ कऽ लेलैन। मुदा सि‍रखरियोवाली रगड़ी। मनमे होइ जे अखने जँ नै बुझि लेब तँ फेर बिसैर जाएब। जँ बिसैर जाएब तँ किछु-ने-किछु छुटिए जाएत। संजोगसँ मटिखोभमे मन पड़ल जे पौरुका दशमीए-मेलामे तीनटा कोनियाँ एकटा सूप आ एकटा छिट्टा कीनि नेने रही। जइसँ छठि पावैन केलौं। बाबीक नजैर निच्चाँ केने देख सिरखरियावाली दोहरा कऽ टोकलकैन‍- “गरीब-दुखियाक बात आब थोड़े बाबी सुनै छथिन, जे सुनतीहि‍न।” सिरखरियावालीक बात बाबीक करेजकेँ छुबि देलकैन। मुदा क्रोध नइ भेलैन सिनेह उमैड़ गेलैन। एकाएक बाबी अपन बोली बदैल चौअन्नियाँ मुस्‍की दैत बजली- “कनियाँ, मनमे आएल जे चारिटा करैला तोरो तरकारी-ले दिअ। तँए हाँइ-हाँइ करैला ताकए लगलौं। कनीए ठाढ़े रहह?” सिरखरियावाली- “जे पुछलयैन से कहबे ने करै छैथ‍ आ करैला दऽ कऽ फुसलबए चाहै छैथ।” विचित्र अन्तर्द्वन्द बाबीक मनकेँ घोर-मट्ठा करए लगलैन। एक दिस माथपर भारी देखथिन आ दोसर दिस आइसँ छठि धरि जोडै़क समए। तहूसँ उकड़ू बुझि पड़ैन‍ जे सोझ मासक सवाल नै अछि। दू मास बीचक बात छी। सेहो तेहेन मास जइमे लुंगीयाँ मिरचाइक घौंदा जकाँ पावैनक घौंदा अछि! जाधैर सभ सोझरा कऽ नै कहबै ताधैर अपनो मन नै मानत आ ओहो नै बुझत। ..ताल-मेल बैसबैत बाबी बजली- “कनियाँ, अखन जाउ। हमहूँ तीमनक ओरियानमे लगल छी, अहूँक माथपर भारी अछि।” सिरखरियावालीक मनमे होइ जे छठि सन पावैन छी, जँ हिसाबसँ ओरियान नै करैत जाएब तँ कएटा चीज छुटिए जाएत। आन पावैन जकाँ तँ छठि हल्लुक नइ अछि। बड़ ओरियान, बड़ खर्च छै ऐमे। बजली- “दशमी मेलामे जे कोनियाँ, सूप, छिट्टा कीनि नेने रहै छी तँ बुझै छिऐ जे एते काज अगुआएल रहैए।” बाबी- “कनियाँ, एकटा काज करू। छिट्टाकेँ निच्चाँमे रखि‍ दियौ अहूँक देह हल्लुक भऽ जाएत आ हमरो हिसाब जोड़ि-जोड़ि बुझबैमे नीक हएत।” “बाबी, भारी उठबैत-उठबैत तँ माथ सुन्न भऽ गेल अछि। ई माटि केते भारी अछि।” “कनियाँ, बहुत हिसाब जोड़ि कऽ बुझबए पड़त।” “ओते अखन नै कहौथु। खाली छठिए-टा कहि दौथ। गोटे दिन निचेनसँ आबि कऽ सभ बुझि लेब।” आँगुरपर बाबी हिसाबो जोड़ैथ‍ आ ठोर पटपटा कऽ बजबो करैथ- “आइ आसिनक अमवसिये छी। आइए भगवतीकेँ हकारो पड़तैन आ बघा-सँपहाक निमिते खैयो-ले देल जेतइ। काल्हि कलश्‍थापनसँ दुर्गा पूजा शुरू हएत जे नअ-दस दिन धरि चलत। दशमी तिथिकेँ यात्रा हएत। तेकर पाँचे दिनक पछाइत‍‍ कोजगरा हएत। कोजगराक परातसँ कातिक चढ़त। कातिक अमवसियाकेँ दियाबाती.., लक्ष्मी पूजा.., कालीपूजा हएत। परात भेने गोधन पूजा, दोसर दिन भरदुतिया आ चित्रगुप्तो पूजा हएत। भरदुतियाक प्रातसँ छठिक विधि शुरू भऽ जाएत। पहिल दिन माछ-मरूआ बाड़ल जाएत... दोसर दिन नहा कऽ खाएल जाएत... तेसर दिन खरना... चारिम दिन छठिक सौंझुका अर्घ आ पाँचम दिन भिनसुरका अर्घ भेलापर उसैर जाएत...।” आँगुरपर गनैत-गनैत बाबी बजली- “कनियाँ, सबा मास करीब छठिक अछि।” “सबा मास केते भेलै बाबी?” “दू बीसमे तीन दिन कम।” “हम तँ सभ बेर दशमीए मेलामे कोनियाँ, सूप, छिट्टा कीनि लइ छी। तेकरा कए दिन छइ?” “सात पूजाकेँ भगवतीकेँ डिम्‍हा पड़लापर मेला शुरू भऽ जाइए। जेकरा आठ दिन छइ। मुदा एकटा बात पुछै छिअ जे एते अगता किए किनै छह? ताबे ऐ पाइसँ दोसर-तेसर काज करबह से नहि। जहन‍‍ पावैन लगिचा जेतै तहन‍‍ कीनि लेबह?” “पहिने कीनलासँ दू-पाइ सस्तो होइए आ एकटा चीजोसँ निचेन भऽ जाइ छी। एक बेर अहि‍ना नै कीनलौं तँ भेबे ने कएल। आब की करितौं तहन‍‍ पुरने कोनियोँ-सूपो आ छिट्टोकेँ चिक्कनिसँ धोइ देलिऐ आ ओहीसँ पावैन कऽ लेलौं।” सिरखरियावालीक बात सुनि बाबीक नजैर बेवहार दिस बढ़लैन। मनेमे उठलैन- छठि पावैनक महात्म्य बहुत बेसी अछि। खास कऽ किसान लेल। एक दिस पूर्वजक मिठाइ-पकवान तँ दोसर दिस डोमक बनौल कोनियाँ, सूप, छिट्टा। तेसर दिस कुम्हारक बनौल कूड़[4],ढकना, सरबा इत्‍यादि। तँ चारिम दिस अपन उपजौल फल-फलहरी, तीमन-तरकारीक संग मसल्लोक वस्तु, तैसंग आरो बहुतो अछि। तैपर सँ डुमैत सुरूजक पहिल अर्घ...। मने-मन वि‍चारैत बाबी चुप्पे रहली। मनमे भेलैन जे ई तँ ओइ इलाकाक छी जइ इलाकाक स्‍त्रीगण रौद-बसातकेँ गुदानिते ने अछि,खेतक काज करैमे भूते। भगवानोकेँ हारि मनबैवाली। ..बाबीक मनमे होइन‍ जे चुप भऽ गेलौं तँ वेचारी चलि जाएत। मुदा ले-बलैया! ई तँ काग-भुसुण्डी जकाँ डुमि‍ गेल। भानसकेँ अबेर होइत जाइत देख बाबीकेँ अकच्छ लगैन। जखन कि हेजाक मरीज जकाँ, सिरखरियावालीकेँ पियास बढ़ले जाइत। अचता-पचता कऽ बाबी पुछलखिन- “कनियाँ, बेटी सबहक हालत की छह?” बेटीक नाओं सुनिते सिरखरियावाली किछु मन पाड़ि बाजल- “बाबी, हिनकासँ लाथ कोन। तीनूक हालत हमरासँ नीक छइ। भगवान गरदेन-कट्टी केलैन तँए ने, ने तँ की हमहीं अहि‍ना रहितौं।” बाबी- “भगवान केकरो अधला थोड़े करै छथिन जे तोरा केलखुन?” मुड़ी डोलबैत सिरखरियावाली- “तँ केलैन नहि! हमरा पँच-पँच बरीसपर बच्चा देलैन। पाँच बरिसपर देलैन से नीके केलैन जे जहन‍‍ एकटा छँटि जाइ छल तहन‍‍ दोसर होइ छल। मुदा अगता तीनू बेटीए जे देलैन से गरदेन-कट्टी नै केलैन। जँ अगता तीनू बेटा रहैत, नहि तँ मेलो-पाँच करि कऽ तँ..,अखन ई भारी काज अपने करितौं की पुतोहु करितए। पचता बेटा भेल, जे अखन लिधुरिये अछि। बाबी- “जेठकी बेटीक सासुर केतए छह?” “उत्तरभर। खुटौना टीशन लग। वेचारीकेँ खेत तँ कम्मे छै मुदा सभ तूर मेहनतिया अछि। एक जोड़ा बरद रखने अछि। दूटा लगहैर महींस‍ खुट्टापर छै आ तीनटा पोंसियोँ लगौने अछि। अनो-पानि तेते उपजा लइए जे साल-माल लगिए जाइ छइ।” बाबी- “नाति-नातिन छह कि‍ने? “हँ, तीनटा अछि। तीनू लिधुरिये अछि। तंग-तंग बेटी रहैए। तीनूक नेकरम करैत-करैत तबाह रहैए। तैपर सँ घर-गिरहस्तीक काज।” “दोसर बेटीक सासुर केतए छह?” “पूभर। कोसी कात।” “कोसी कात किए केलह?” “बाबी, जानि कऽ कहाँ केलिऐ। गाम तँ नीके रहइ मुदा केतए-सँ-ने-केतएसँ कोसी चलि एलइ। कोसियो एलै तँ अन-पानिक कोनो दुख नै होइ छइ। मुदा अपना सभ जकाँ चिष्टा नहि। गाममे महींस बेसी छै, जइसँ रस्ता-पेरा हेँक-हेँक भेल रहै छइ। बाबी- “छोटकी?” “पच्‍छि‍म भर, पाही। ई हम्मर रानी बेटी छी। जेते दिन ऐठाम रहैए रंग-बिरंगक तीमन-तरकारी खुअबैए। भानस करैक एहेन लूरि‍ दुनूमे केकरो नइ छइ। जहिना भानस-भात करैमे, तहिना बोली वाणी। गीतो-नाद जे गबैए से होइत रहतैन जे सुनिते रही, तहिना चिष्टो-चर्या आ ओढ़बो-पहिरब।” बाबी- “बड़ बेर उठलै। आब तहूँ जा।” “आइ हमरा गंजन लिखल अछि। विचारने छेलौं जे माटि आनि कऽ धान काटि आनब। गरमा धान नहियेँ भेल। काल्हि फेर घरे-अँगना नीपैमे लागि‍ जाएब।” गामक सभ बाबीकेँ मेह बुझैत। छैथो। जँ केकरो मन खराब वा कोनो आफत-असमानी होइत तँ बाबी सभसँ पहिने आबि सेवा-टहलमे लागि‍ जाइत। तहिना जँ कहियो बाबीक मन खराब होइत तँ गामक लोक जी-जानसँ लगि जाइत। किएक तँ सबहक मनमे ई अंदेशा बनल जे बाबीक मुइने गामक बहुत विधि-बेवहार समाप्त भऽ जाएत। ओन, बाबी पढ़ल-लिखल नहि, चिट्ठियो-पुरजी ने पढ़ल होइ छैन‍‍। जरूरतो नहि। किएक तँ सालो भरिक पावैन आ ओकर विधि, संग-संग मांगलिक काज उपनयन, बि‍आह इत्यादिक विधि कण्‍ठस्थ छैन‍‍। कोन गीत कोन अवसरपर गौल जाएत, सभ जीपर राखल छैन। तहिना पूजाक आराधनासँ लऽ कऽ आरती धरि...। सभ कि‍छु रहितो बाबीक मनमे एकटा कचोट समरथाइयेसँ लगल रहि गेलैन। ओ ई जे एकटा बेटा भेला पछाइत‍‍ दोसर सन्तान नइ भेलैन। अपन इच्छा रहैन जे एकटा बेटा, एकटा बेटी हुअए। मुदा बेटा तँ भेलैन मुदा बेटी नहि। जे कचोट सभकेँ कहबो करथिन। कहथिन जे सृष्टिक विकास-ले पुरुख, नारी दुनूक जरूरत अछि। नहि तँ विकास रूकि‍ जाएत। ने एकछाहा पुरुषेसँ काज चलत आ ने एकछाहा नारीएसँ। भरदुतियाक परात बाबी माछ-मरूआ बाड़लैन। काल्हि नहा कऽ खेती। परसू खरना करती। खरना पावैन‍-ले बाबी सतरिया धानक अरबा चाउर सभ साल रखै छैथ। किएक तँ टोलक खरनासँ लऽ कऽ घाटपर हाथ उठबै धरिक काज बाबियेक जिम्मा। मुदा खरना दिन गज-पट भऽ जाइ छैन‍‍। किएक तँ कियो महि‍क्का धानक अरबा चाउर आ गुड़ दइ छैन‍‍ तँ कियो मोटका धानक अरबा चाउर आ गुड़। अरबा तँ अरबे छी। मोटका-महि‍क्काक भेद नहि। तँए बाबीकेँ खीर रन्हैमे पहपैट भऽ जाइ छैन‍‍। फुटा-फुटा कऽ केना करती। तँए सबहक अरबा चाउरकेँ खाइले रखि‍‍ लइ छैथ‍ आ अपन सतरिया चाउरसँ खीर रान्‍हि‍ खरना करै छैथ। खाली खरने नै करै छैथ‍, मनमे ईहो रहै छैन‍‍ जे परिवारक हिसाबसँ एते खीर घुमा दिऐ जे घरमे चुल्हि नै चढ़इ। आइ खष्‍ठी छी, आइए सौंझका अर्घ हएत। तरगरे बाबी सुति उठि कऽ पावैनक ओरियानमे लगि‍ गेली। बहुत चीज भेबो कएल आ बहुत बाँकियो अछि। मुदा भरि दिन तँ ओरियबैक समए अछि। तैबीच डेढ़ियापर सँ ‘बाबी, बाबी’ सुनलैन। मुदा टाटक अढ़ रहने बोली नै चीन्हि सकली। मनमे भेलैन जे आइ पावैन छी तँए कियो किछु पुछैले आएल हएत। ओसारेपर सँ कहलखिन- “के छी। अँगने आउ।” पथियामे दूटा नारियल, पान छीमी केरा, दूटा टाभ नेबो, दूटा दारीम, दूटा ओल, दूटा अड़ुआ, दूटा टौकुना, दूटा सजमैन, गाछ लागल एक मुट्ठी हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक माए आँगन पहुँच‍ बाबीक आगूमे रखैत कहलकैन-‍ “बाबी, अपनो डाली-ले आ हिनको-ले नेने एलिऐन हेन।” पथियासँ सभ वस्तु निकालि ओसारपर रखि‍‍ निंगहारि-निंगहारि बाबी देखए लगली। बच्चेमे रहमत बि‍मार पड़ल, ओकरे कबुला माए केने रहथिन। तँए पान सालसँ ओहो छठि पावैन करै छैथ। जे बात बाबियोकेँ बुझल। ओना बाबी अपने आँगनमे भुसबा, ठकुआ बनबैथ‍। मुदा तेकर दाम रहमतक माए दऽ दन्हि। ..पथिया लऽ रहमतक माए विदा हुअ लगली की बाबी कहलखिन- “कनियाँ, कनी ठाढ़ रहू। रौतुका खरनाक नबेद नेने जाउ।” घरसँ केरा पातपर खीर आनि रहमतक माएकेँ दऽ देलखिन। हाथमे नबेद अबिते रहमतक माइक मन खुशीसँ नाचि उठल। बेटाकेँ निरोग जिनगी जीबैक आशा सेहो भऽ गेलैन। मने-मन दिनकरकेँ गोड़ लागि विदा भेल। अँगनासँ निकैलते छेली कि एक पाँज कुसियारक टोनी नेने परीछन पहुँच‍ गेल। एक टोनी बाबीकेँ आ एक टोनी रहमतक माएकेँ दैत सुरसुराएले आगू बढ़ि गेल। किएक तँ अँगनेमे सभले टोनी बना नेने छल। बाबीकेँ कुसियारक टोनी दैत रहमतक माए कहलकैन- “हमरा आइ हाट छी बाबी, तँए कनी देरीसँ घाटपर आएब।” बाबी- “हम तँ छीहे कनियाँ, तइले तोरा किए चिन्ता होइ छह। दिनकर-दीनानाथ केकरो अधला करै छथिन, जे तोरा करथुन? अपना भरि निअम-निष्ठा रखैक चाही।” रहमतक माए विदा भेली। बाबी फुटा-फुटा सभ वस्तु रखए लगली। तखने दछिनबरिया अँगनामे हल्ला सुनलखिन। ओसारपर सँ उठि डेढ़ियापर ऐली की सुनलखिन जे खुशियाक बेटा केराक घौरसँ एकटा छीमी तोड़ि कऽ खा गेलै तइले माए चारि-पाँच खोरना मरलकै। बेटाकेँ कनैत देख खुशिया घरवालीपर बिगड़ए लगल। तेकरे हल्ला छेलइ। अपने डेढ़ियापर सँ बाबी कहलखिन- “पावैनक दिन छिऐ। तहन‍‍ तूँ सभ भोरे-भोर हल्ला करै छह। दुधमुहाँ बच्चा जँ एक छीमी केरा तोड़ि कऽ खाइए गेलै तइले एते हल्ला किए करै छह।” बाबीक बात सुनि दुनू बेकती खुशिया तँ चुप भेल मुदा छौड़ा हुचैक-हुचैक कनिते रहल। तही बीच सोनरेवाली आबि बाबीकेँ कहलकैन- “बाबी, नीक की अधला तँ हिनके कहबैन कि‍ने। देखथुन जे पाइ दुआरे ने छिट्टा भेल आ ने कोनियाँ।” सोनरेवालीक बात सुनि बाबी गुम्म भऽ गेली। कनी काल गुम्म रहि बजली- “नइ पान तँ पानक डण्‍टियोसँ काज चलैए। जेकरा छै ओ सोना-चानीक कोनियाँमे हाथ उठबैए आ जेकरा नइ छै ओ तँ बाँसोक सुपतीसँ काज चलबैए। तइले मन किए ओछ केने छह। सभकेँ की सभ कि‍छु होइते छइ। जेकरा जेते विभव होइए ओ ओते लऽ कऽ पावैन करैए, तँए की दिनकर केकरो कुभेला करै छथिन।” तैबीच दीपवाली पाँच बर्खक बेटाकेँ हाथ पकड़ने घिसियबैत पहुँच‍ कहलकैन- “बाबी, देखथुन जे ई छौड़ा तेहेन अगिलह अछि जे हाथीकेँ पटैक देलकै। ई तँ गुण भेल जे एक्केटा टाँग टुटलै, नहि तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ जाइत।” मुस्‍कियाइत बाबी कहलखिन- “देखहक कनियाँ, ई सभ देखाबटी छिऐ। मनुखक मनमे श्रद्धा हेबा चाही। अइले बच्चाकेँ किए दमसबै छहक। छोड़ि दहक।” सुरूज उगले सभ घाटपर पहुँच‍ डाली पसारए लगली। नवयुवती सभ गीत गाबए लगली। हाथ उठौनिहारि पानिमे दुनू हाथ जोड़ि ठाढ़ भेली। एक्के तालमे ढोलिया ढोल बजबए लगल। पोखैरक चारू महार दीपसँ जगमगा गेल। परदेशियो सभ छठि पावैन करए गाम आएल। एक गोरेकेँ नाच कबुला रहै ओ नाच करबए लगल। ताबे दूटा छौड़ा दारू पीब फटाका फोड़ए लगलै। दुनू बेमत। एक गोरेक फटाकामे कम अवाज भेलै की दोसर पिहकारी मारि देलक। अपन डुमैत प्रतिष्ठाकेँ जाइत देख ओ पिहकारी देनिहारक कालर पकड़लक। दुनू अपन-अपन परदेशिया भाषामे गारि-गरौवैल शुरू केलक। गारि-गरौवैलसँ मारि फँसि गेल। दुनू एक-दोसरकेँ खूब मारलक। दोसर दिन भिनसुरका अर्घ। खूब अन्हरगरे सभ घाटपर पहुँचल। हाथ उठौनिहारि पानिमे पैसली। चौमुखी दीपसँ सौंसे प्रकाश पसैर गेल। सूर्योदय होइते दीपक ज्योति मलिन हुअ लगल। हाथ उठए लगल। बच्चा-बुच्चीक संग रहमतक माए पोखैरक महारपर आँचर नेने दुनू हाथ जोड़ि बाबीपर आँखि गड़ौने। तखने मुसबा गिलासमे दूध नेने पहुँचल। किनछैरमे पैस एक ठोप, दू ठोप दूध सभ कोनियाँमे छि‍टए लगल। हाथ उठा बाबी पानिसँ निकैल, साड़ी बदैल, छठिक कथा कहए लगलखिन। कथा कहि औंकरी छीटि पावैनक विसर्जन केलैन। अखन धरि जे ढोलिया एक तालमे ढोल बजबै छल ओ समदाउनिक ताल धेलक। नटुओ समदाउन गाबए लगल। सभ अपन-अपन कोनियाँ समैट छिट्टामे रखि‍‍, ढोलियाकेँ एक-एकटा ठकुआ आ एक-एक छीमी केरा दऽ दऽ विदा भेल। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2167 कामिनी अन्हरगरे भैया काका लोटा नेनहि मैदान दिससँ आबि रस्तेपर सँ बोली देलैन...। हमहूँ मैट्रिकक परीक्षा दइले जाइक ओरियान करैत रही। ओना हमर नीन बड़ मोट अछि मुदा खाइए बेरमे माएकेँ कहि देने रहिऐ जे कनी तरगरे उठा दिहेँ, नहि तँ गाड़ी छुटि जाएत। किएक तँ साढ़े पाँचे बजे गाड़ी अछि। आध घन्‍टा स्टेशन जैयोमे लगैए। तँए, पौने पाँच बजे घरसँ विदा हएब तखने गाड़ी पकड़ाएत। जँ ई गाड़ी छुटि जाएत तँ भरि दिन रस्तेमे रहब। निर्मलीसँ जयनगर-ले एक्केटा डायरेक्ट गाड़ी अछि। नहि तँ सभ गाड़ी सकरीमे बदलए पड़ै छइ। तहूमे बसबला सभ तेहेन चलाकी केने अछि जे एक्कोटा गाड़ीक मेले ने रहए देने छइ। जइसँ तीन-चारि घन्‍टा सकरीक प्लेटफार्मपर बैसू तहन‍‍ दरभंगा दिससँ गाड़ी औत। तहूमे तेहेन लोक कोंचल रहत जे चढ़बो मुश्किल। तँए ई गाड़ी पकड़़ब जरूरी अछि। तेतबे नहि, अपन स्कूलक विद्यार्थियो सभ वएह गाड़ी पकड़त। अनभुआर इलाका तँए असगर-दुसगर जाएबो ठीक नहि। सुनै छी जे ओइ इलाकामे उचक्को बेसी छइ। जँ कहीं कोनो समान उड़ौलक तँ आरो पहपैटमे पड़ि जाएब।..भैया कक्काक बोली सुनि चिन्हैमे देरी नइ भेल। किएक तँ हुनकर अवाज तेहेन मेही छैन‍‍ जे आन केकरो बोलीसँ नै मिलैत। बोली अकानि हम दरबज्जेक कोठरीसँ कहलयैन- “काका, आउ-आउ। हमहूँ जगले छी। पँचबजिया गाड़ी पकड़ैक अछि तँए समान सभ सेरियबै छी।” रस्तापर सँ ससैर काका दरबज्जाक आगूमे आबि कहलैन- “कनी हाथ मटिया लइ छी। तहन‍‍ निचेनसँ बैसबो करब आ गप्पो करब।” कहि पूब-मुहेँ कल दिस बढ़ला। हमहूँ हाँइ-हाँइ समान सेरियाबए लगलौं। कलपर सँ आबि काका ओसारक चौकी-तरमे लोटा रखि‍‍ अपने चौकीपर बैसला। चौकीपर बैसते गोलगोलाक जेबीसँ बिलेती तमाकुलक पात निकालि तोड़ैत पुछलैन- “भाय साहैब कहाँ छथुन?” कहलयैन “काल्हिए बेरू-पहर नवानी गेला, से अखन धरि नै एला।” हमर बात सुनि, भैया काका चुनौटीसँ चुन निकालि तरहत्थीपर लैत बजला- “अखन जाइ छी, हएत तँ ओइ बेरमे फेर आएब।” कक्काक आपस होएब हमरा नीक नै लागल। किएक तँ लगले एला आ चोट्टे घुमि जेता, तँए बैसै दुआरे बजलौं- “अहाँ तँ काका गाममे दगबिज्जो कऽ देलिऐ। एते खर्च करि कऽ कियो कन्यादान नै केने छला। अहाँ रेकर्ड बना लेलिऐ।” अपन प्रशंसा सुनि भैया काका मुस्‍कियाइत बजला- “बौआ, जुग बदैल रहल अछि। तँए सोचलौं जे नीक पढ़ल-लिखल वरक संग बेटीक बि‍आह करब। हमरो बेटी तँ बड़ पढ़ल-लिखल नहियेँ अछि। मुदा रामायण-महाभारत तँ धुरझार पढ़िए लइए। चिट्ठियो-पुरजी लिखिए-पढ़ि लइए। घर-आश्रम-जोकर तँ ओहो पढ़नहि अछि। ओकरा की कोनो नोकरी-चाकरी करक छै जे स्कूल-कौलेजक सर्टिफिकेट चाही। अपना सभ गिरहस्त परिवारमे छी तँए बेटीकेँ बेसी पढ़ाएबो नीक नहि।” “किए?” “अपना सबहक परिवारमे गोंत-गोबरसँ लऽ कऽ थाल-कादो धरिक काज अछि। ओ तँ घरेक लोक करत। तइमे देखबहक जे जेस्‍त्रीगण पढ़ल-लिखल अछि ओ ओइ काजक भीड़ नै जाए चाहतह। आब तोंही कहह जे तहन‍‍ गिरहस्ती चलतै केना?” कक्काक तर्कक जवाब हमरा नै फुरल। मुदा चुप्पो रहब उचित नै बुझि कहलयैन- “जहन‍‍ जुग बदैल रहल अछि तहन‍‍ तँ सभकेँ शिक्षित हएब जरूरी अछि कि‍ने? सभ पढ़त, सभ नोकरी करत, नीक तलब उठौत। जइसँ घरक उन्नैत आरो तेजीसँ हएत। तहूमे महिला आरक्षण भेने नोकरियोमे बेसी दिक्कत नहियेँ हएत।” भैया काका- “कहलह तँ बड़ सुन्दर बात मुदा एकटा बात कहह, जँ दुनू गोरे माने दुनू परानी एक्के स्‍कूल आकि‍ ऑफिसमे नोकरी करत तखन‍‍ ने एकठाम डेरा रखि‍‍ परिवार चलौत। मुदा जखन‍‍ पुरुख दोसर राज्य वा दोसर जिला वा दस कोस हटि कऽ नोकरी करत तखन‍‍ केना चलतै। परिवार तँ पुरुख-नारीक योगसँ चलैए कि‍ने? परिवारमे अनेको ऐहेन काज अछि जे दुनूक मेलसँ हएत। मनुख तँ गाछ-बिरीछ नहि छी जे फलक आँठी केतौ फेक देबै तँ गाछ जनैम जाएत। आब तँ तहूँ कोनो बच्चा नहियेँ छह जे नै बुझबहक। मनुखक बच्चा नअ मास माने दू साए सत्तैर‍ दिन माइक पेटमे रहैए। चारि-पाँच मासक पछाइत‍‍ माइक देहमे बच्चाक चलैत केते रंगक रोग-वियाधिक प्रवेश भऽ जाइ छइ। किएक तँ माइक संग-संग बच्चोक विकास-ले अनुकूल भोजन, अराम आ सेवाक खगता होइत। तहन‍‍ माए असगरे की करत?नोकरी करत आकि पालन करत? अइले तँ दोसरेक मदैतक जरूरत होइत।” “आन-आन देशमे तँ मर्द-औरत सभ नोकरी करैए आ ठाठसँ जिनगी बितबैए।” भैया काका- “आन देशक माने की जेते दोसर देश अछि सबहक रीति-नीति जीवन शैली एक्के रंग छइ? नहि। एकदम नहि। किछु देशक एक रंगाहो अछि। मुदा फराक-फराक सेहो अछि। हँ, किछु एहेन अछि जैठाम मनुख सार्वजनिक सम्‍पैत बुझल जाइए। ओइ देशक बेवस्थो दोसर रंगक अछि। सभ तरहक सुविधा सभ-ले अछि। तैठाम-ले ठीक अछि। मुदा अपना ऐठाम, अपना देशमे तँ से नै अछि। तँए ऐठाम-ले ओते नीक नै अछि जेते अधला।” अपनाकेँ निरुत्तर होइत देख बातकेँ विराम दइक विचार मनमे उठए लगल। तैबीच आँगनसँ माए आबि गेली। माएकेँ देखते हम अपन समान सेरियबए कोठरी दिस बढ़ि गेलौं। भैया काकाकेँ देख माए कहलकैन- “बौआ, अहाँ तँ गाममे सभकेँ उन्नैस कऽ देलिऐ। आइ धरि अपना गाममे कियो ने बेटी बि‍आहमे एते खर्च केने छला।” अपन बहादुरी सुनि मुस्‍कियाइत भैया काका बजला- “भौजी कामिनीकेँ असिरवाद दियौ जे नीक जकाँ सासुर बसए।” माए- “भगवान हमरो औरुदा ओकरे देथुन जे हँसी-खुशीसँ परिवार बनाबए। पाहुन-परक तँ सभ चलि गेल हेता?” भैया काका- “हँ भौजी। काल्हि सत्यनारायण भगवानक पूजा कऽ हमहूँ निचेन भऽ गेलौं। पाहुनमे-पाहुन आब सरहोइजेटा रहि गेल अछि। ओहो जाइले छटपटाइए। मुदा ओकरा पाँच दिन आरो रखए चाहै छी।” माए- “जहिना एकटा बेटीक बि‍आहक काजकेँ खेलौना जकाँ गुड़केलौं, तहिना सरहोजिकेँ आब गुड़कबैत रहू।” सरहोजि दिस इशारा होइत देख काका बुझि गेलखिन। मकइक लावा जकाँ बत्तीसो दाँत छिटकबैत बजला- “धरमागती पुछी भौजी तँ एते भारी काज, जइमे ने खाइक पलखैत होइ छल आ ने पानि पीबैक। तीन राति एक्को बेर आँखि नै मुनलौं। मुदा सरहोजिकेँ धैनवाद दिऐ जे घिड़नी जकाँ दिन-राति नचैत रहल। ओते फिरिसानी रहए तैयो कखनो मुँह मलिन नहि होइ,हरिदम मुहसँ लबे छिटकैत रहइ। तँए सोचै छी जे पाँच दिन पहुनाइ करा दिऐ।” माए- “बच्चा कएटा छैन?” “एक्कोटा नहि। तीनिए सालसँ सासुर बसैए। उमेरो बीस-बाइस बर्खसँ बेसी नहियेँ हेतइ।” “आब तँ लोककेँ बिआहे-साल बच्चा होइ छै आ अहाँ कहै छी जे तीनिए सालसँ सासुर बसैए!” “एँह, हमरा तँ अपने पान सालक पछाइत‍‍ भेल आ अहाँ तीनिए सालमे हदिआइ छी। अच्छा एकटा बात हमहीं पुछै छी, भैया ने हमरासँ साल भरि जेठ छैथ‍ मुदा अहाँ तँ साल-छह मास छोटे हएब। अहूँ कोन-कोन गहबर आ ओझा-गुनी लग गेल रही...।” अपनाकेँ हारैत देख बात बदलैत माए बाजल- “सभ मिला कऽ केते खर्च भेल?” भैया काका- “धरमागती पुछी भौजी तँ हमहूँ कंजुसाय केलिऐ। मुदा तैयो पाँच लाखसँ ऊपरे खर्च भेल। तीन लाख तँ नगदे गनि कऽ देने छलिऐ, तैपर सँ डेढ़ लाखक समान, गहना, बरतन, लकड़ीक समान आ कपड़ा देलिऐ। पचास हजारसँ ऊपरे बरियातीक सुआगतमे लागल। तैपर सँ झूठ-फूसमे सेहो खर्च भेल।” “एते खर्च केलिऐ तहन‍‍ किए कहै छिऐ जे हमहूँ कंजुसाय केलिऐ?” “देखियौ भौजी, हमरा दस बीघा खेत अछि। तेकर बादो केते रंगक सम्‍पैत अछि। गाछ-बाँस, घर-दुआर, माल-जाल इत्‍यादि। मुदा ऐ सभकेँ छोड़ि दइ छी। खाली खेतेक हिसाब करै छी। अपना गाममे दस हजार रूपैए कट्ठासँ लऽ कऽ साठि हजार रूपैए कट्ठाक जमीन अछि। ओना सहरगंजा जोड़बै तँ पैंतीस हजार रूपैए कट्ठा भेल। मुदा हम्मर एक्कोटा खेत ओहेन नै अछि जेकर दाम चालीस हजार रूपैए कट्ठासँ कम अछि। बेसियोक अछि। मुदा चालिसे हजारक हिसाबसँ जोड़ै छी तँ आठ लाख रूपैए बीघा भेल। दस बीघाक दाम अस्सी लाख भेल। तीन भाए-बहि‍न अछि। हमरा लिए तँ जेहने बेटा तेहने बेटी। अनका जकाँ तँ मनमे दुजा-भाव नै अछि। आब अहीं कहू जे कोन बेसी खर्च केलिऐ।” बातक गंभीरताकेँ अंकैत माए बाजल- “अहाँ विचारे बेटीक बि‍आहमे केते खर्च बापकेँ करैक चाहिऐ?” भैया काका- “देखियौ भौजी, जे बात अहाँ पुछलौं ओकर जवाब सोझ-साझ नइ अछि। किएक तँ जेते रंगक लोक आ परिवार अछि तेते रंगक जिनगियो छइ। मुदा अनका जे हौउ, हमरा मनमे ई अछि जे बेटा-बेटी एक-रंग जिनगी जीबए। मुदा समस्यो गंभीर अछि। धाँइ-दे किछु कहि देने नै हेतइ।” “एते लोक सोचै छइ?” “से जँ नै सोचै छै तँए ने एना होइ छइ। जँ अपने कोनो बात नै बुझिऐ तँ दोसरसँ पुछैयोमे नै हिचकिचाइक चाही।” कामिनीक बि‍आह लालाबाबूक संग भेल। जेहने हृष्‍ट-पुष्ट शरीर कामिनीक तेहने लालबाबूक। दुनूक रंगमे कनी अन्तर। जैठाम लालबाबू लाल गोर तैठाम कामिनी पिंडश्याम। ने अधिक कारी आ ने अधिक गोर, जइसँ दाइ-माइक अनुमान रहैन जे किछु दिनकपछाइत‍‍ दुनूक रंग मिलि जाएत, माने एकरंग भऽ जाएत। बि‍आहक तीन मासक पछाइत‍‍ लालबाबूक बहाली कौलेजमे डिमोस्‍टेटरक पदपर भेल। नोकरी पबिते सासुरेक दहेजबला रूपैआसँ दरभंगामे डेढ़ कट्ठा जमीन कीनि घर बना लेलक। गामसँ शहर दिस बढ़ल। जइसँ जिनगीमे बदलाउ आबए लगलै। एक दिस बजरूआ आधुनिकता जोर पकड़ए लगलै तँ दोसर दिस ग्रामीण जिनगीक रूप टुटए लगलै। रंग-बि‍रंगक भोग-विलासक वस्तुसँ घर सजबए लगल। पाइक अभावे ने बुझि पड़इ। किएक तँ भैयारीमे असगरे, तँए गामक सभ सम्‍पैत बेच-बेच आनए आ मौज करए। मिथिलाक कन्याँ कामिनी, तँए पतिक काजमे हस्तक्षेप नै करए चाहैत। पति-पत्नीक बीच ओहने सम्बन्ध जेहेन अधिकांशक...। शिक्षाक स्तर खसल। अजाति सभ सरस्वतीक मन्‍दिरमे प्रवेश केलक। जैठाम प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाएब अधला काज बुझल जाइ छल, से प्रतिष्ठित भऽ गेल। परिणाम भेल जे ट्यूशनकेँ अधला आ पाप बुझनिहार शिक्षक स्वयं मुरूखक प्रतीक बनि गेला। अवसरक लाभ अज्ञानीकेँ बेसी भेलइ। पाइ-कौड़ीबला लालबाबू केना नहि अवसरक लाभ उठबैत। बीसे हजारमे लालबाबू एम.एस-सी. फिजिक्सक सर्टिफिकेट कीनि लेलक। विश्वविद्यालैयोमे कानून पास केने जे नव शिक्षकक बहालीमे कौलेजक डिमोस्‍टेटरकेँ प्राथमिकता देल जाएत। लालोबाबू फिजिक्सक प्रोफेसर बनि गेल। हाइ स्कूल वा सरकारी ऑफिस जकाँ प्रोफेसरकेँ ड्यूटियो नहि। सालमे कौलेज छह मास बन्ने रहैत बाँकी समैमे कहियो ड्यूटी हएत कहियो नै हएत। तैपर सँ अपन सी.एल. आ मेडिकल पछुआएले। पाँच बर्ख बितैत-बितैत लालबाबूक माए-बाप मरि गेल। मरने लाभे। घराड़ी धरि बेच कऽ बैंकमे लालबाबू जमा कऽ लेलक। मुदा एकटा जरूर केलक, ओ ई जे घराड़ीक रूपैआसँ पाँचटा आलमारी आ जेते किताबसँ आलमारी भरत, ओते किताबो कीनि लेलक। एक तँ पाइक गरमी दोसर किताबक गरमी। ओना, अध्ययनक गरमी नहि देखलाहा गरमीसँ लालबाबूक मति ऐहेन बदैल गेल जेहेन ठंढा पानि आ ठंढा दूधसँ चाह बनैत। अखन धरि, छह बर्खमे दूटा सन्तान सेहो भेलइ। अपन दुनियाँक बीच कामिनी नचैत तँए लालबाबूक जिनगी केना देखतए? उचितो नहि। किएक तँ हर युवाकेँ अपन जिनगीक बाटपर नजैर रखक चाहिऐ। साँझू-पहर लालबाबू होटलसँ सीधे आबि कोठरीमे कपड़ा बदलए लगल। देहक सभ कपड़ा उतारि‍ लेलक। ऊपर सँ लऽ कऽ भीतर धरि, शरीरमे आगिक ताव जकाँ लहकैत। भगवानक मूर्तिक आगूक जे कोठरीक दिवारक खोलियामे रखने छल, से बौल जरौने बिनु अपन कोठरीक बौल केना जरबैत, तँए पहिने ओ बौल जरौलक। पछाइत‍‍ पंखाक बटन दबलक आ अपन कोठरीक बौल जरौनाइ बिसैर गेल। पियाससँ कण्‍ठ सुखैत। मुदा टंकीपर जाइक डेगे ने उठै। लटपटाइत। कहुना कऽ कुरसीपर बैसल आकि टेबुल तरक जगपर नजैर पड़लै। दिनुके पानि राखल। जग उठा पीब गेल। जग रखि‍‍ कुरसीपर ओङैठ मने-मन अकासक चिड़ैकेँ हियासए लगल। उड़ैत मृगनयनीपर नजैर गेलइ। ..कौलेजक छात्रा मृगनयनीकेँ किछुकाल देख पत्नीपर नजैर एलइ। मनमे उठलै दू बेटीक जिनगी। मुदा फेर मनमे चहकैत मृगनयनी आबि गेलइ। निर्णए केलक जे अपना घर मृगनयनीकेँ जरूर आनब। रसे-रसे मन शान्त हुअ लगलै। दोसर दिन कोर्ट होइत लालबाबू मृगनयनीक संग घर पहुँचल। मृगनयनीकेँ देख कामिनी घबराएल नहि। मन पड़लै दादी मुँहक सुनल खिस्सा, पुरुख-ले दूटा पत्नी होएब कोनो अधला नहि। अपन दुनियाँमे मस्त। काजक कोनो घटती नहि, कनी-मनी बढ़तीए। तँए जुआनीक आनन्द कामिनीमे। बि‍आहक आठ बर्खक बाद जे लालबाबू डिमोस्‍टेटरसँ प्रोफेसर बनल, ओ आइ स्‍त्रीक खिलौना बनि गेल! एहेन-एहेन लोकक केते आश...। आठ बजैत साँझ। बजारसँ दुनू परानी मृगनयनी आ लालबाबू मोटर साइकिलसँ उतैर‍ कोठरीमे पहुँचल। अगल-बगलक कुरसीपर बैस ब्राण्डीक बोतल निकालि टेबुलपर रखलक। अपना ऊपरमे बोतल देख टेबुल कहलकै- “भाय सोझहा-सोझही बेइज्जत नै करह’, हम किताब रखैबला छी, नइ कि बोतल।” मुदा वेचाराक विचार, मिथिलाक कन्याँ जकाँ, तँए सभ कि‍छु सहि लइत। जहिना राज-दरबारमे मिथिलाक राजाकेँ जननिहार पण्‍डित सहि लैथ‍। असेरी गिलाससँ दुनू बेकती एक-एक गिलास ब्राण्डी चढ़ा अपन दुनियाँमे विचरण करए लगल। प्रश्‍न उठल कामिनीक। मृगनयनी- “हम्मर एकटा विचार सुनू।” “बाजू।” “पत्नीक सभ सुख जँ एक पत्नीसँ पूर्ति हुअए तहन‍‍ दोसर रखैक कोन खगता?” “कोनो नहि।” “तहन‍‍ सौतीन कामिनीकेँ रखि‍‍ कऽ की फेदा? कनी गुम्म भऽ लालबाबू सोचए लगल। मन पड़लै कामिनी। निस्सकलंक, स्वच्छ, कोमल-कोमल पंखुड़ीबला गन्‍ध युक्त कामिनी। दोहरा कऽ मृगनयनी बाजल- “बस, यएह पुरुखक कलेजा छी। कामिनीकेँ रस्तासँ हटाएब हम्मर जिम्मा भेल।” मृगनयनीक रूप देख विधातो अपन गल्तीपर सोचितैथ, नारी- पुरुखक बीच जेहेन थलथला पुल बनोलिऐ तेहेन नारी-नारीक बीच किए ने बनोलिऐ! खएर..। मृगनयनी आ लालबाबूक बीचक बात कामिनियोँ सुनैत। जहिना मृगनयनीक करेजमे कामिनीक प्रति आगि धधकैत तहिना मृगनयनियोँक प्रति कामिनीक करेजमे आगि पजैर गेल। मुदा अपनाकेँ सम्हारैत ओ घरसँ निकैल जाएब नीक बुझलक। किएक तँ तीन जिनगीक प्रश्‍न आगूमे आबि ठाढ़ भऽ गेलइ। तहूमे दूटा ओहेन जिनगी जे दुनियाँमे अखन पएरे रखलक अछि। ..चुपचाप कामिनी अपन रहैबला कोठरी आबि दुनू बेटीकेँ एक टक देख, छह बर्खक रीताकेँ पएरे आ तीन बर्खक सीताकेँ कोरामे नेने घरसँ निकैल गेल। मनमे आगि लगल, तँए कोनो सुधि-बुधि नहि। स्टेशन आबि कामिनी टेनक पता लगौलक। चारि घन्‍टाक पछाइत‍‍ गाड़ी। दुनू बच्चाक संग कामि‍नी प्लेटफार्मपर गाड़ीक प्रतीक्षामे बैस रहल। मनमे अनेको रंगक प्रश्‍न उठए लगलै। मुदा सभ प्रश्‍नकेँ मनसँ हटबैत ऐ प्रश्‍नपर आबि अँटकल- जे माए-बाप जन्‍म देलक ओ जरूर गड़ा लगौत। जँ नै लगौत तँ बड़ीटा दुनियाँ छै, बुझल जेतइ। तँए सभसँ पहिने माए-बाप लग जाएब। ..डेढ़ बजे रातिमे गाड़ी पकैड़,दुनू बच्चाक संग भोरमे अपना नैहरक स्टेशन उतरल। भुखे तीनू लहालोट होइत। मुदा ऐठामक नारीमे सभसँ पैघ गुण ई होइते अछि जे धरती जकाँ सभ दुखकेँ सहि लइए। मुदा कामिनी दुनू बेटीक मुँह देख चिन्ताक समुद्रमे डुमए लगल। मनमे उठलै- की केकरोसँ भीख मांगि बच्चाकेँ खुआबी? कथमपि नहि। की बच्चाक जिनगीकेँ एतै अन्त हुअए दिऐ? अपन साध कोन! मुदा नाना ऐठाम तक पहुँचत केना? ..जी-जाँति कऽ कामिनी एकटा मुरही-कचड़ीक दोकानपर पहुँच‍ मुरही बेचैवाली बुढ़ियाकेँ कहलक- “दीदी, हमर नैहर दुखपुर छी। ओतै जाइ छी। दुनू बच्चा रातिमे खेलक नहि, तँए भुखे लहालोट होइए। दू रूपैआक मुरही-कचड़ी उधार दिअ। काल्हि पाइ दऽ देब।” बिनु किछु सोचनहि-विचारने बुढ़िया बाजल- “बुच्ची, तोरा पाइ नै छह तँ की हेतइ। हमरो एहेन-एहेन चारिगो पोता-पोती अछि। हम बच्चाक भूख बुझै छिऐ।” कहि दुनू बच्चाकेँ मुरही-कचड़ी देलक। तीनू खा कऽ विदा भेल। कामिनीकेँ नैहर पहुँचैत-पहुँचैत सुरूज एक बाँस ऊपर चढ़ि गेल। दुखपुरक दछिनबरिया सीमानपर एकटा पाखैरक गाछ। पाखैरक गाछसँ आगू बढ़ैक साहसे ने कामिनीकेँ होइ। गाछक निच्चाँमे बैस ठोह फाड़ि कानए लगल। ..दुखपुरक सैयो ढेरबा बचिया घास छिलैत बाधमे। कामिनीक कानब सुनि सभ पथिया-खुरपी नेनहि पहुँच‍‍ गेल। दुनू बच्चाकेँ दू गोरे कोरामे लऽ कामिनीकेँ संग केने घरपर एली। ¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2289 [1] 72 टा [2] 108 टा [3] मालगुजारी [4] बिनु मोड़ल कानबला घैल, (पनिभरा घैलमेमे मोड़ल कान होइए) कुड़पर चौमुखी दीप जरैत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- 3 टा गजल ३.२.विन्देश्वर_ठाकुर- सामा ३.३.संतोष कुमार झा- सामा-चकेबा ३.४.मनोज कुमार मंडल- गजल आशीष अनचिन्हार- 3 टा गजल गजल 1 खेत मसान सन पेट लगान सन भूख जँ धर्म छै दर्द विधान सन भाव घिसल पिटल शब्द महान सन देह कलश बनल मोन भसान सन आँखि उठल खसल अर्थ असान सन सभ पाँतिमे 211-212  मात्राक्रम अछि 2 इल्ली दिल्ली पटना राज सौंसे पसरल गदहा राज अपना मोने हमहीं पंच के जानैए विधना राज बहुते भेलै गंगा जमुना हमरा चाही कमला राज आगू पाछू छै खरमास तइपर एतै भदबा राज पंडित मुल्ला जनते बीच तँइ सभ चाहै फतबा राज सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि 3 रस्ता छेकल दुनियाँमे हमरे भेटल दुनियाँमे ब्रम्हांडक ई रीत बुझू दुनियाँ फेकल दुनियाँमे अपने लिखलहुँ नाम अपन अपने मेटल दुनियाँमे हमरा एहन तोरा सन बहुते बेकल दुनियाँमे कपड़ा बरतन गहना बुझि मोनो बेचल दुनियाँमे सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विन्देश्वर_ठाकुर सामा भरि साल ओ रहली सासुर नैहर आब बजाबू  एलै देखियौ खरनाके दिन सामा चलू बनाबू छोटकी बहिनो हंस बनाबू जेठकी दिदी चकेबा हम बनाबी ढोलकियासब भौजी बनबू चुगला एलै केहन सोहाबन रतिया  चकमक करै चंगेरा  ताँहिपर चारुदिस पसरल सामा दाइके डेरा  गैयौ सबकिओ गीत गोसाओन करियौ श्री गणेश भैया जिता' सालो-साल करथिन् कृपा महेश  समा-चकेबा खेलू बहिना नीक गीतसब गाबू भैया घर हो अनधन सोना चुगलाके मुंह झरकाबू ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। संतोष कुमार झा सामा-चकेबा निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिईपावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक,सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि,गीतसुमधुर गाबि-गाबि! भोरका अरघ, छईठ पावइन कें, परय जाहिए दिन, रातिताहिये, प्रारंभ होमय, सामा-चकेबा कsसंगीत! कार्तिक पूर्णिमा तक नित, राति, ई खेलल जाय, सब बहिनि केर मुख सौं निकलय सुमधुर संगीत! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! की नेना-भुटका, की बुरही, बहिन त होइछ बहिन! वैह उमंग, वैह उत्साह, सभ में होइछ एक समान, सामा-चकेवा,वृंदावन, चुगला केर मूर्ति, सब भरि डाला में, जुटय छथि सब नारी, जोतल खेत वा चौक पर! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! सुमधुर कंठ-संगीत सौं, कय वातावरण गुंजायमान, करैत छथि सभ, अपन भायक, दीर्घायु कें कामना! सामा-चकेबा कें मूर्ति,एहि संग फेरबइ जाइतछथि, अपन भायक नाम लैत, शिरिक फेरइत जाइत अछि! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! जतेक बेसी फेरी होमय, भायक औरदा बढ़य ओतेक, गाम-टोलक, सभ महिला कें,शिरिक जाइत छै देल! वृंदावन मे आगि लगाए चुगला ओहि मे जराओल जाय, गाबाय छथी, सखी सब मिल: “वृंदावन मे लागल आगि,कियो नहि मिझाबय हे, हमर बड़का-छोटका भईया,मिलिकए मिझाउत जायत हे!” निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! फेर,बहिनि सबमुंखझुलसाए,पुतलाक चरित्र केर निंदा करय, लय सामा-चकेवा केर मूर्ति सभ, विदा होइतछथि,घर दिस! परंतु भाग्य-चक्र सौं बिमुख, मैना केर,दू गोट मूर्ति, कहबइतअछि जे ‘बाटो-बहिन’, बाटे छोडि़ देलजाइत अछि! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! आब पहुंच, घर, अपन भाय सौं,सबटा मूर्ति,तुड़वाओलजाइतअछि, बना नाव बाँस-बत्ती सौं,सब मूर्ति ओहिमें बैसाओल जाइत अछि! पोखरी, झील, नदी में सामा-चकेबा बहाओल जाइत छथि, पुरातन मैथिल कला-संस्कृति मे,घोरय,सामा-चकेवा रंग अनेक! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! कथा,गल्प,शिल्प,कला,संगीत, सब रंग समाओल एहि पर्व में, अछिपंद्रह दिनक कथा-पर्वई,भाय-बहिनिक निश्चल प्रेम कथा-प्रतिरूप! -संतोष कुमार झा वरिष्ठ संकाय एवं कार्यवाहक विभागाध्यक्ष, लेदर गुड्स एवं एक्सेसरिज डिजाइन विद्यालय, फूटवेयर डिज़ाइन एवं डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, ए-१०/ए,सैक्टर-२४, नोएडा-२०१३०१, उत्तर प्रदेश,भारत ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार मंडल- गजल  पूछि तऽ अहाँ उचिते रहल छी मन करैए अछि कहि दी वा नइ आधुनिकतामे फसि उगडुम छी चकाचौंधमे परि कहि दी वा नइ बजारवाद- पूँजीवादीक बिचारल ई गठजोड़ छिए कहि दी वा नइ घर-घर घूसिएल जा रहल छै कोए अछुता नहि कहि दी वा नइ नीक करैत अधलाह होएत छै बिछाएल जाल छै कहि दी वा नइ गप कने मेँही छै सोचलाक बाद मन करैए अछि कहि दी वा नइ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक मनोज कुमार मंडल २ टा बाल कविता १ कली  काँच कली हम बेली छी  मायक हम अलबेली छी नित सुनैत हम लोरी छी सुन्नर उपवन बना बास करब हम फूल बनि छितरब एक दिन  छोट पैग मिल बनौने छी सुन्नर बाग हम बसौने छी सबहक मन ललचौने छी शोभा हम आ शोभित सुन्नर वन फूल बनि गमकब एक दिन  मुनि झाँपि हम रखने छी मायक सिनेह बटोरै छी ज्ञानक सिर सिरजौने छी शुभ हम शुभे हम्मर उपवन फूल बनि देव पूजि एक दिन २ वीरक पत्नी आँचलक दूध दबौने छी आँखिक नोर सुखौने छी बनि गेल आब करेज पाथर सीमानक बाट धऽ निकलल छी नहि देखल जाय अछि बाल रुदन बिलखि रहल वीरक परिवार अवला अवला सुनि सुनि आँचल सक्कतसँ बान्हि निकलल छी एक दिश दानव ललकारि रहल हथियार उठा आतंक मचौने अछि दोसर दिश पेटक ज्वाला आब व्याथासँ व्यथित सिहरल छी रनभेदी आब बाजि उठल अछि ठेकानल डेग आब उठौने छी उड़ी आकाशमे भरि तिरंगा गाड़ी लऽ आब निकलल छी हे जनक नंदनी जानकी माय जानि अहाँक सुमरै छी बल बुधि ज्ञानक आशीष दिऽ अहाँक रुप सिरजाबै छी छुटि गेल अविलम्ब हम्मर अप्पन जिम्माक रुप निहारै छी वीरक काम कऽ पूरा क' कऽ माय अहीँ लग आब आबै छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  'विदेह' २१४ म अंक १५ नवम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०७ अंक २१४)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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