425 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २१५ म अंक ०१ दिसम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०८ अंक २१५) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद २.२.जगदीश प्रसाद मंडल- जिनगीक जीत (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.३.जगदीश प्रसाद मंडल- उत्थान-पतन (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.४.जगदीश प्रसाद मंडल- मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास- तेसर संस्करण) ३. पद्य ३.१.पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविता (अनुवाद-भावानुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) ३.२.आशीष अनचिन्हार- ३ टा गजल ३.३.१. जगदीश चंद्र ठाकुर- गजल- २. लालदेव कामत- कविता- उर्फ नाम ३.४.१. राम प्रीत पासवान- कविता- भूतक बाप पिशांच उर्फ आशारामक जोड २. किशन कारीगर- इस्कूल ४.बालानां कृते- बाबा बैद्यनाथ- आजाद बाल गजल Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेहक http://videha.co.in/ 1 जनवरी 2017 केर अंक निकलिते विदेह दसम बर्खमे प्रवेश कऽ जाएत। अइ अवसरपर विदेह गीत-संगीतक एलबम केर समीक्षा आदि प्रकाशित करबाक निर्णय लेलक अछि। छिटपुट प्रयासक अतिरिक्त शायद ई पहिल अवसर हेतै मैथिली पत्रिकारितामे जखन कि कोनो साहित्यिक पत्रिकाक कोनो एकटा अंकमे फिल्मी गीतक एलबम वा कि स्वतंत्र गीत-गजलक एलबम केर समीक्षा देबाक प्रयास वा निर्णय कएल गेल हुअए। संगीत समीक्षक लोकनिसँ आग्रह जे ओ कोनो एलबमक कोनो गीत-गजल-संगीत की पूरा एलबम केर समीक्षा पठाबथि। समीक्षा-लेख आदिमे गीत-संगीतक भाव पक्ष, टेक्नीकल पक्ष, शब्द चयन पक्ष, एडीटिंग पक्ष, मार्केटिंग पक्ष आदि केर वर्णन हुअए। लेखकेँ ggajendra@videha.com पर 1 दिसम्बर 2016 धरि पठाएल जाए।ऐ अंकमे समान्य रचना ओ स्थायी स्तंभ सभ सेहो रहबे करत। प्रयास रहत जे बेसीसँ बेसी गीत-गजल-संगीत आकि पूरा एलबमक समीक्षा आबए। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। ई-पत्र विदेहक अंक २१४- केर संपादकीयसँ पूर्ण सहमति अछि। आ ओइमे दूटा गप्प जोड़ए चाहैत छी-- १) हाइकू या बीहनि कथा नै बल्कि गजल ओ आन छोट-छोट कोनो विधामे पुरस्कार ता धरि नै भेटि सकैए जा धरि ओकरा बिना पुरस्कारक लोभ बला नेतृत्व नै भेटै। एखन हिंदीमे गजल पूर्ण स्थापित छै कारण हिंदी गजलकेँ दुष्यंत कुमार सन नेतृत्व भेटलै जिका पुरस्कारक कोनो लोभ नै रहनि। दुष्यंत कुमार सरकारी नौकरीमे रहितों आपातकालक विरोध केलथि गजलक माध्यमें। दुष्यंत कुमारकेँ कथित साहित्य अकादेमी सम्मान नै भेटलनि। तँए जँ कियो हाइकू, बीहनि कथा, गजल या अन्य कोनो छोट विधाकेँ स्थापित करए चाहै छथि तँ हुनका पुरस्कारक मोह तेयागि देबए पड़तनि। नै तँ कोनो विधा स्थापित नै भऽ सकत। -आशीष अनचिन्हार विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही,जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर),जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित रचनाकारक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद २.२.जगदीश प्रसाद मंडल- जिनगीक जीत (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.३.जगदीश प्रसाद मंडल- उत्थान-पतन (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.४.जगदीश प्रसाद मंडल- मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास- तेसर संस्करण) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद लोक गाथाक परिवेश हमर नानी लोक-परम्परा केर संरक्षिका छली।शायद अक्षरमालाके ज्ञान हुनका नहि छलनि मुदा लोकज्ञान जेना कंठमें कंप्यूटरके कोनो चिप जकाँ सेट छलनि। जखन हुनका लग जाई ओ किछु नव आ महत्त्वपूर्ण लोकव्यव्हार अथवा कथा अथवा गीतअ थवा फकरा, देव ीदेवता, स्थानक विशेषता आदिकसन्दर्भमें बात करथि। गंभीर बात। एक-एक चीज़क अर्थ स्पष्ट करैत विवरण दैत छली। नानी छली बड़ा कुलीन घरसं। नाना सेहो अपना समय केरजमींदार छला। मुदा बजबाक शैलीमे ंनानी मधु छली। हमरा कखनो “रौ” के त छोडू “हौ” नहि कहलनि। सदरिकाल “यौ” कहि सम्बोधन करथि।बजबाकशैली विलक्षण। भेटथि त कुशल क्षेम पुछबाक अद्भुत अंदाज़। जखन कहियो नानी लग जाई अपन गामक संस्कारके तिलांजलि द दी। बिना डांट-फटकार केनिक संस्कार कोना सिखाबी ई कियो नानीक व्यवहार संग्रहण क सकैत छल। हमर जेठ बहिन केर नाम विद्या आ सरोज छनि। जखन कखनो नानी लगजाईत हुनका सबहक कुशल क्षेम अहि तरहे पुछथि: “विद्या कुमारी कोना छथि? सरोज कुमारी कोना छथि?” ई छलनि नानी के व्यवहार अपन बेटीक बेटीके प्रति; सेहो परोक्षमे। कहि नहि कथी लेल नानी के हमरापर बड्ड विश्वास छलनि। जखन जाई नानी घंटों बात करथि – कखनो घरमे, कखनो चिनबार लग, कखनोदलानपर त कखनो आमक गाछीमे।नानी के शायद ई भान छलनि जे: “कैलाश कहियो ने कहियो मैथिली लोकपरंपरा लेल किछु करताह!” बहुत रास अजगुत गीत सब नानी गबैत छली। कतेको बेर सोचलौं रेकॉर्ड करब आ लिखियो लेब। किछु लिखबो केलों। मुदा देव संयोग ई छलजे नानी बिचहिंमें बैकुंठक रस्ता ध लेली। एक बेर नानी लग दालान पर बैसल गप्प करैत रही ततबे में एक नाथ जोगी हाथ में सारंगी लेने, बढ़ल दाढ़ी आ भगबा वस्त्र में सारंगी के तार के झनकबैत आबि गेलैक। बिना ककरो आज्ञा के इंतजार केने तारक झनकार तेज भ गेलैक। करुण रस झहरए लगलैक। नानी हमरा कहलनि : “कैलाशजी, जोगी जी के कुर्सी दियौन बैसबाक हेतु”। हम तुरत एक कुर्सी के झारि जोगी जी के द देलयनि। जोगी जी सारंगी बजबैत मस्त भेल चुपचाप कुर्सी ग्रहण केलनि आ कनिकाल में सारंगी केर तान संगे उच्च स्वर में गोपीचंद के गीत गाबय लगला। धीरे-धीरे अगल-बगल सं बहुत स्त्रीगन आ नेना सब जमा भ गेल। किछु पुरुख सेहो एला। जोगी महराज गीत गबैत रहला, सारंगी बजबैत रहला आ स्त्रीगन सब कनैत रहली।पूरा वातावरण उदासी के भाव सं ओतप्रोत छल। पूरा त नहि परन्तु आंशिक बात हमहु बुझलियैक आ थोरेक द्रवित सेहो भेलौं। जोगी डेढ़ घंटा धरि सारंगी के तान पर गीत गबैत रहला।जखन समाप्त भ गेलनि त कियोक पाई, कियोक अन्न, कियोक वस्त्र आदि देलकनि। मामी किछु जलखई देलथिन आ चाह सेहो भेटलनि। जलखई समाप्त क जखन जोगी जी चाह पीब लगला ओही क्षण एक आश्चर्यजनक दृश्य उपस्थित भ गेलैक।एक 90 वर्ष केर महिला हाथ में लाठी पकड़ने आबि गेली। जोगी के पकडि कानय लगली: “रे बुधना! हम छियौ तोहर माय! रे हमर बेरा पार लगा दे तखन फेर जोगी बनि जैहें। बाप बुधना बुधना रटैत प्राण त्यागि देल्थुन। अपटी खेत में हुनकर आत्मा भटकैत हेतनि। रे बइमान! रे बाप के तर्पण दे। संस्कार कर। रे वंशक रक्षक कर!” बेचारा जोगी हतप्रभ! बुढ़िया किछु बजबाक अवसर देबाक हेतु तैयार नहि। जोगी कहलकै, “बूढी माँ, मै छपरा जिले का हूँ और जाति से कुम्भकार हूँ।मै चार भाई हूँ और मेरी माँ मर चुकी है। मै आपका पुत्र या कोई बुधना नही हूँ। मेरी नाथ सम्प्रदाय में दीक्षा से पहले मेरा नाम रमेश पण्डित था। दीक्षा के बाद मेरा नाम जोगी मोतीनाथ है।” लेकिन बुढ़िया ओकर तर्क सुनबाक हेतु तैयार नहि। बड़ा बिपत्ति! पुराण लोक सब ऐल। ओकरा चीन्हबाक प्रयत्न केलक। सब कहलकै जे ई बुधना नहि थिक. मुदा पुत्रविछोह सं तरपैत माय के बुझेनाई अतेक सहज कहाँ? अंत में सब कहलकै “ठीक छै, कोनो एक चिन्ह बताऊ जे बुधना के खाश छलैक?” कनिकाल लेल बुढ़िया चुप भ गेल। फेर सोचैत बाजलि: “हमर बुधना के मध्य पीठ पर तीन टा नमहर-नमहर तील छैक।” लोक सब जोगी के पीठ देखेबा लेल कहलकै। जोगी शुरू में पीठ उघारबा लेल तैयार नहि छल। अहि बात सं बुढ़िया के शंका आर प्रबल भ गेलैक। बुढ़िया जोर-जोर सं कानि-कानि लोक के कहए लागलि: “देखू हे माई दाई! ई बुधने अछि। पीठ नहि उघारि रहल अछि. हम दूध पियेने छी एकरा। हमरा आंखि सं कोना अपना आप के बचा लेत?” बुढ़ियाक कानब सं द्रबित होइत लोक सब में एक प्रमुख व्यक्ति जोगी के सम्बोधित करैत बजला: “देखू जोगी जी! एहि 90 वर्ष केर महिला पर दया करू। हिनका पीठ उघारि देखा दियौन। जं तीन तील लगातार एक ठाम मध्य पीठ में नहि हैत त अहाँ के हमरालोकनि छोडि देब अन्यथा अहाँ अतए सं नहि जा सकैत छी।” कनि ना नुकुर केलाक बाद जोगी पीठ उघारबा लेल तैयार भ गेल। सब जिज्ञासा सं जोगी के पीठक निरिक्षण केलक मुदा मध्य पीठ में तीन तीलक त बाते नहि एकौ तील नहि रहैक। बुढ़िया झमा खसलि। जोगी प्रफुल्लित होइत सारंगी उठा सारंगी बजबैत दोसर गाम दिस बिदा भेल। राति में सुते सं पहिने नानी सं हम जोगी आ समस्त चीज़ के सम्बन्ध में जिज्ञासा कैल। नानी कहली: “हमरा ज्ञात छल जे अहाँ ई प्रश्न करब. अगर अहाँ नहि करितों तैयो हम जोगी आ सारंगी के सम्बन्ध में आई चर्चा करितौं.” हमरा नानीक ई कहब बड्ड निक लागल. नानी कहली जे ई सब नाथ सम्प्रदाय जकर आदिगुरु गोरखनाथ छथि केर सदस्य छथि. हिनका सबके अपन मिथिला में जोगी, सारंगीबला जोगी, सिध्ह जोगी, गुदडियाबाबा, घुनाबाबा, गोपीचंद बाबा सेहो कहल जैत छैन। मान्यता छै कि जे रुईसक घर सं भागि जैत छला वो गोरखपुर जा बाबा गोरखनाथ के नाथ सम्प्रदाय केर चेला भ जैत छला। घर-द्वार सं उन्मुक्त। ने उधो को लेना ने माधो को देना। ओ सन्यासी के श्रेणी में आबि जैत छथि। संसारिकता केर मोहजाल सं मुक्त। ओतए हरेक जोगी के एकटा सारंगी देल जैत छनि। वैह सारंगी बजबैत आ गीत शिक्षा में निपुण भेला पर नगर आ ग्राम में घरे-घरे भीख मांगि बारह बर्ष धरि ओ जीवन व्यतीत करैत छथि। बारह बरिख सं पहिने हुनका अपन माए सं भीख लेबा में सफल होबाक छनि। जे सफल भ गेला ओ सिद्ध जोगी आ ओकर बाद ओ आनो के गुरु के रूप में दीक्षा द सकैत छथि। ओहि समय में जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्ति पर जोर दे लिख रहल छी। अहि लोक स्मरण में जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओ नानीक छनि आ जतएकथा इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक। लोक परंपरा में जननायक के रूप में प्रतिष्ठित भर्तृहरि राजा के जीवन वृत्तान्त, नीति आ उपदेश के लोक शैली में भरथरी में नाथ जोगी सब गाबि-गाबि सुनबैत अछि. एहि लोकगाथा के गोरखपंथी साधु अपन सारंगी पर गबैत छथि. सारंगी के कतौ- कतौ चिकारे सेहो कहल जैत छैक। नाथ सम्प्रदाय केर गुरु गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ केर निर्गुण सिद्धांत सं प्रेरित एहि लोकगाथा में सामदेवी रानी आ समस्त विलासिता आ राजभोग के त्यागि भरथरी राजा केना वैराग्य लेलनि आ फेर जोगीक वेश में रह्लनि एकर बहुत करुण विवरण अछि। एहि लोकगाथा के दू पाट में बाटि बुझल जा सकैत अछि। प्रथम भाग में राजा भरथरी के वैराग्य तथा पिंगला द्वारा पूर्व जन्म केर कथा। दोसर भाग में जंगल में गेलाक बाद भरथरी राजा द्वारा कारी मृग के वध करब तथा माता मैनावती के आज्ञा के शिरोधार्य करैत जोगी अथवा वैरागी होबाक कथा छैक। एहि गेय गाथा में योग-भोग केर अंतर्द्वंद तथा करुण विप्रलम्भ केर प्रयोग चरमोत्कर्ष पर भेटैत छैक। कथा ऐना शुरू होइत छैक। राजा भरथरी के एकाएक वैराग्य उत्पन्न होइत छनि।एकर कारण हुनकर जन्म कुण्डली में वैराग्य लिखल छनि. फेर की, भरथरी राजा सामदेवी रानी के छोडि भरल जुआनी में वैराग्य लेल जा रहल छथि। रानी पहिने त मना करैत छथिन लेकिन जखन भरथरी राजा नहि मानैत छथि त पुछैथ छथिन: “ठीक छैक स्वामी! अहाँ जा रहल छी मुदा जएबाक कारण त बता दिय हमरा?” भरथरी राजा कहैत छथिन: “हे रानी, एकर एकमात्र कारण थिक हमर जन्म कुण्डली में वैराग्यक योग।” मुदा सामदेवी रानी एहि जवाब सं संतुष्ट नहि होइत छथि आ भरथरी राजा के बाहर जएबाक अनुमति नहि दैत छथिन। भरथरी मोन मसोसि क रहि जैत छथि।भरथरी राजा एक प्रश्न रानी सं पुछैत छथिन: “हे रानी एक बात के उत्तर हमरा अहाँ दिय! अपन सबहक सोहाग राति में पलंग केर पाटी कुन कारने बिखंडित भ गेल?” भेल ई रहनि जे जखने सोहागराति के समय राजा अपन रानी सं काम क्रिया करबा लेल उद्दत भ रानी के बाहुपास में लेमै लगला एकाएक पलंग केर फट्ठी टूटि गेलैक। रानी आ राजा के एहि बात सं किछु अशुभ केर शंका भेलनि। निर्णय केलनि जे आई राति सोहाग नहि मनेता आ ने कामेक्रिया में लिप्त हेता। एक दिन में कोनो बैकुण्ठ थोरे ने खासि पड़तैक? ओकर बादे राजा भरथरी के मोन में विचित्र तरहक उचाट होबए लगलनि। कखनो रानी लग जएबाक मोने ने करनि। वैह प्रश्न आई राजा अपन रानी सामदेवी सं पुछि देलथिन। रानी सामदेवी बजली: “राजन, एहि बात के हम नहि जनैत छी। हलांकि हम्मर छोट बहिन पिंगला अग्रज्ञानी अछि। ओकरा भुत, वर्तमान आ भविष्य सब चीज़ के अपूर्व ज्ञान छैक। मुदा पिंगला दिल्ली में रहैत अछि।” राजा तुरत अपन सारि पिंगला के चिट्ठी लिख दिल्ली सं मालवा एबाक प्रार्थना केलनि। चिट्ठी पाबि पिंगला झट दनि राजा लग जैत छथि आ कहैत छथिन: “हे राजन! जों हम सत्य कहब त अहाँ स्वीकार नहि क पैब। ताहि पूर्व जन्मक सत्य जनबाक हठ छोडि देल जाओ।” मुदा भरथरी राजा अपन जिद्द पर अटल रहला। कहलथिन: “हे हमर सुन्नरि, दुलारू आ गुनमति सारि पिंगला, अहाँ सत्य कहू। हम चेतन्य आ कठोर ह्रदय केर पुरुख छी।केहनो सत्य के स्वीकार करबाक क्षमता हमरा में अछि। अहाँ निश्चिन्त भ जे सत्य छैक तकर बखान करू।” आब पिंगला गंभीर भेली आ बजली: “ठीक छैक भरथरी राजा, अगर अपने सत्य सुनबा लेल आतुर छी त हम आई एहि क्षण अहाँ के सत्य बता दैत छी। हम्मर बहिन सामदेवी रानी जे अहि जन्म में अहाँक पत्नी छथि पूर्व जन्म में अहाँक माँ छली। ई बात अही लेल हम अहाँके नहि बता रहल छलों। ओना रानी सामदेवी के सेहो पूर्व जन्म के बात ज्ञात छनि मुदा एहि जन्म में त ओ अहाँक पत्नी छथि ताहि नहि बतेली। आब ई अहाँ ऊपर अछि की भोगमय बिलाशिता पूर्वक जीवन जीबी अथवा योगमय कोनो जोगी अथवा संयासिक जीवन।” ई बात सुनि भरथरी राजा उदास भ जैत छथि। माथा टनकए लगैत छनि। संसार आ मानवीय सम्बन्ध सब में मिथ्याभाव लगैत छनि। कनि काल बाद भरथरी राजा अपन नव व्याहित रानी सामदेवी सं आज्ञा लै सिंहलद्वीप केर घनघोर बोन में कारी मृग के शिकार हेतु प्रस्थान करैत छथि। मृग केर पत्नी हरिनी भरथरी राजा के शिकारी के खेमा देखि अनिष्ट केर आशंका सं घबरैत अपन पतिक प्रानक रक्षा में लागि जैत अछि। जखन कोनों व्योंत नहि भेटैत छैक त स्वयं राजा भरथरी लग आबि जैत अछि आ निवेदन करैत छैक: “हे राजा, अहाँ हमर पति केर प्राण केर रक्षा करू। हुनकर शिकार नहि करू। हुनका बदला में हम्मर शिकार क लिय!” लेकिन भरथरी राजा ओकर निवेदन के स्वीकार नहि करैत छथि. हरिणी निराश भ जैत अछि। हरिणी हारि नहि मानैत अछि आ पतिक प्राण केर रक्षा कोनो ने कोनो हालत में कर चाहैत अछि। दौर क कारी हरिण लग जैत अछि आ हाफैत कहैत छैक: “हे प्रिय, भरथरी राजा अपन शिकारी दल के संग बोन में घुसि गेल छथि। ओ अहाँक शिकार करता। अहाँ तुरत एहि बोन के छोडि कोनो आन ठाम चलि जाऊ।” कारी हरिण सोचलक: “आखिर भरथरी राजा अकारण हमरा कथी लेल मरता? हमरा हुनका संग कोनो तरहक वैमनस्य नहि अछि। कथी लेल एहेन सुन्दर बोन के छोड़ी, अनजान बोन में धक्का खेबाक हेतु जाई?” यैह सोचैत ओ हरिणी के सम्बोधित करैत बाजल: “हे हमर दुल्लरि! अहाँ चिंता जुनि करू। हमरा राजा नहि मारता। हम हुनकर कोनो अहित नहि केने छी। केवल वैह प्राणी दोसर प्राणी के मारि सकैत अछि जे ओकरा कोनो तरहक दुःख देने होइक अथवा अहित केने होईक। हमरा कोनो आन बोन में अनेरे नहि जएबाक चाही।” आब हरिणी मोन मसोसि क रहि जैत अछि। इम्हर भरथरी राजा अपन शिकारी दल संगे गहन बोन में बढ़ल जैत छथि। एकाएक कारी मृग के देखैत छथि आ ओकरा वध करबाक हेतु तीर के धनुष के प्रत्यंचा पर चढ़ा लैत छथि। माजल शिकारी जकाँ लगातार सात तीर सं प्रहार करैत छथि। सात में स छ तीर गंगा माता, वनस्पति देवी, गुरु गोरखनाथ, एवं कारी मृग केर सिंघ सं बेकार भ जैत छनि मुदा सातम तीर सं मृग घायल भ जैत अछि। शोनित सं भरल देह, तीरक टीस सं व्यथित मृग वेदना के आधिक्य में भरथरी राजा के श्राप दैत छनि: “हे राजन! अहाँ त नृशंश भ हमरा मारि देलौं! आब हमर नेत्र अहाँ अपन रानी के श्रृंगार करबा लेल द देबनि; हमर सुन्दर कलात्मक सिंघ कोनो राजा के दरबज्जा पर मढबाक हेतु द देबनि; हमर चाम के कोनो साधु के आसन बनेबा लेल द देबनि; आ अन्ततः हमर माउस अहाँ रान्हि बघारि क खा लेब। मुदा एक बात स्मरण राखब, जहिना हम्मर सत्तरि सै रानी कलपि रहल छथि तहिना एक दिन अहुक रानी सब कलपती।” अपन बात के समाप्त करैत कारी मृग जे ओहि बोनक हरिण सबहक राजा छल, अपन प्राण त्यागि देलक। भरथरी राजा द्रवित भ गेला. तुरत हुनका अपना आप सं घृणा होबए लगलनि। कोनो तरहें ओ आब कारी मृग के जानक रक्षा करै चाहैत छथि। व्यथित भ गुरु गोरखनाथ के कुटिया में घुसैत छथि आ अपन गलती के स्वीकार करैत निवेदन करैत छथिन: “हे गुरु गोरखनाथ! हमरा सं बड्ड पैघ पाप भ गेल। अहाँ कोनो तरहें अपन दैवीय शक्ति सं अहि कारी मृगराज के प्राण के पुनः वापस क दियौक!” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “हे राजन! आब एकरा पुनः जीवित केनाई हमरा वशक बात नहि अछि।” भरथरी राजा पागल जकां कर लगैत छथि। माटि में ओहरिया मरैत छथि। कनैत बेहाल भ जैत छथि आ गुरु गोरखनाथ के कहैत छथिन: “अगर अहाँ अहि मृगा के प्राण नहि वापस केलौं त हम अही ठाम अपन प्राण त्यागि लेब!” विवश भ गुरु गोरखनाथ कारी मृगराज के अपन दैवीय शक्ति सं पुनः जीवित क दैत छथिन। मृग उठि क बैस जैत अछि। राजा पर एकबेर फेर दयाभाव देखबैत कारी मृग अपन श्राप वापस ल लैत अछि।समस्त हरिण समुदाय में उत्सव केर वातावरण भ जैत छैक। हरिणराज केर सत्तर सए रानी मस्त भ नाचए लगैत छैक। कस्तूरी केर सुगन्ध सं बोनक वातावरण महो-महो भ जैत छैक। कारी मृग अपन रानी सब लग बिचरन करए चलि जैत अछि। एहि दृश्य के देखि भरथरी राजा आनन्दविभोर भ जैत छथि। इम्हर भरथरी राजा के ह्रदय परिवर्तित भ जैत छनि। संसार क्षद्म लगैत छनि। मोन में सांसारिक सुख सं वैराग्य उत्पन्न भ जैत छनि।गुरु गोरखनाथ के चरण पर बैस जैत छथि। कहैत छथिन: “हे गुरुदेव! हमर उद्धार करू। हमरा अपन शरण में लेल जाओ। अपन शिष्य बना हमरा धन्य करू।” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “राजन! हम कोनो स्थिति में अहाँ के अपन शिष्य नहि बना सकैत छी। एकर एकमात्र कारण थिक अहाँक राजसिक वृत्ति। अहाँ राजा थिकहूँ। राजा भला जोगी कोना क बनत?” भरथरी राजा उत्तर में कहैत छथिन: “हे गुरु श्रेष्ठ! हम अहाँक पथ पर अहाँक चेला बनि चलए चाहैत छी। एहि लेल सब किछु भौतिक पदार्थक संग-संग अपन चित्तक चीज़ के सेहो त्याग करक हेतु तैयार छी।” अंतत गुरु गोरखनाथ एहि शर्त पर की भरथरी राजा सन्यासी त बनि जेताह मुदा हुनका अन्तिम दीक्षा गोरखनाथ तखन देथिन जखन भरथरी राजा अपन रानी सामदेवी सं ‘माए’ कहि भीख मंगताह। आब एतहि सं भरथरी राजा नाथ जोगी के रूप धारण क, गेरुआ वस्त्र पहिर, हाथ में सारंगी लेने गामे-घरे होइत राजक द्वार पर अलख जगेने गीत गाबि रहल छथि। रानी साम देवी जखन भरथरी राजा के जोगी के भेष में देखैत छथि त परेशान भ जैत छथि।रानी हुनका कोनो स्थिति में भीख देबाक हेतु तैयार नहि भ रहल छथिन। भरथरी राजा अहि बात पर हुनका कहैत छथिन जे ओ अपन नैहर चलि जाथु। मुदा रानी नैहर नहि जैत छथि आ उलटे भरथरी राजा के राजमहल में कोनो एकांत स्थान में रहि जोगी के भेष में तपस्या करक हेतु कहैत छथिन। भरथरी राजा कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर अहाँ गंगा के निर्मल धार एते ल आबी त हम राजमहल में रहि क तपस्या क लेब।” रानी छली परम सती. तुरत अपन सत सं गंगा के धार के ओतहि ल एली। आब भरथरी राजा हुनका बतबैत छथिन जे कोना एक जोगी के सर्वाधिक पुन्य तीर्थ स्थल केर भ्रमण सं भेटैत छैक। ई सुनि रानी गंगा के धार के वापस चलि जएबाक हेतु कहैत छथि। रानीक बात के सम्मान करैत गंगा केर धारा वापस चलि जैत छैक। एकर बादो रानी सामदेवी भरथरी राजा के भीख देबाक लेल तैयार नहि भेली। भरथरी राजा के भेलनि “अगर रानी भीख नहि देती त साधना बीचहि में अटकि जैत। फेर की हैत? गुरु दीक्षा भेटबे ने करत. फेर बैकुण्ठ कोना प्राप्त हैत?” अंततः गुरु गोरखनाथ स्वयं अबैत छथि. रानी सामदेवी के पूरा बात बुझबैत छथिन। आब रानी मानि जैत छथि आ भरथरी राजा के भीख द दैत छथिन। एकर बाद भरथरी राजा के अपना संगे गुरु गोरखनाथ जोगीक गहन तपस्याक हेतु बोन में लेने जैत छथि। ओही दिन सं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माए सं भीख मंगबा में सफल भ जैत।मिथिला कहियो वैराग्य के स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवन में रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक। ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माए सं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक। नानी कथो कहथि आ बीच-बीच में गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल।नानी सेहो कानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथा में मस्त – एक सुनेबा में मस्त आ दोसर सुनबा में मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैत छलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़ में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्य कलाकार नानी आ एक मात्र श्रोता हम मुदा दुनु के आंखि, ह्रदय, आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथा वाचिका केर गुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतःकरण में कथा के बसेला सं अबैत छैक। हमरा एकाएक स्मरण भेल जे दिन में नाथ जोगी किछु मैनावती आ गोपीचंद केर गीत सेहो गबैत छल। हम नानी के स्मरण दियेलएनि। नानी कहली: “गोपीचंद आ मैनावती केर प्रसंग भरथरी राजा के जोगी बनलाक बाद अबैत छैक। गोपीचंद केर प्रसंग सेहो बड़ा रोचक छैक। बड्ड राति भ गेल। आई सुनब की काल्हि?” हमर जिज्ञासा प्रबल छल। भेल एखने सुनि ली। नानी के कहलिएनि: “हमरा निन नहि लागल अछि। गाथाक अन्तिम भाग जानबाक उत्कंठा सेहो अछि। ताहि निक यैह रहत जे लगले में मैनावती आ गोपीचंद केर कथा सेहो सुना दी अहाँ?” नानी सहज भाव सं हमर निवेदन के स्वीकार करैत कथा कहनाई प्रारंभ केलनि। गोपीचंद एक संस्कारी पुत्र छथि पदामसेन राजा आ मैनावती रानी के।मैनावती भरथरी के बहिन छथिन।गोपीचंद के चंद्रावल नामक एक सहोदर बहिन छथिन। जवान भेला पर गोपीचंद के विवाह होइत छनि। संयोग सं पहिल पत्नी सं हिनका पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लोभ में ब्याकुल रानी पद्मावती अपन असगर पुत्र गोपीचंद के दोसर विवाह कर दैत छथिन। दोसरो पत्नी सं गोपीचंद के पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लालषा में मैनावती गोपीचंद के तेसर, चारिम, पाचम करैत १६ टा विवाह करा दैत छथिन। विधनाक विधान देखू, गोपीचंद के १६ रानी सं १२ पुत्री त भ जैत छनि मुदा बेटा एकौटा नहि।मैनावती अंत में अपन भाई भरथरी जे नाथ जोगी भ गेल छथि के बजबैत छथि आ अपन रोदना पसारैत छथि। कहैत छथिन: “अगर हिनका पुत्र नहि भेलनि त समस्त राजपाट समाप्त भ जैत। वंशक अंत भ जैत। कियोक पितृ के तर्पण देब लेल नहि रहत। एहेन जीवन जीब सं बढियाँ जे आत्महत्या क ली? किछु उपाय करू हे भाई भरथरी जाहि सं गोपीचंद के एक पुत्र भ जाईन।” जोगी भरथरी कनि ध्यानस्थ होइत छथि। फेर चिंतित भ कहैत छथिन: “बहिन दाई, बड्ड दुखक बात! भागिन गोपीचंद के संतानक योग नहि छनि। हम एहि में किछु करबा में असमर्थ छी।” ई बात सुनि रानी मैनावती बिलाप करै छथि। बड्ड जोर-जोर सं कनैत छथि।कहैत छथिन: “हम किछु नहि जनैत छी। अहाँ कोनो युक्ति निकालू जाहि सं गोपीचंद के पुत्र होनि!” आब आरो गंभीर होइत भरथरी कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर भागिन राजमहल त्यागि घनघोर बोन में नाथ जोगी बनि तपस्या करथि त हिनका पुत्र भ सकैत छनि।” ई बात सुनि मैनावती रानी झमा खसैत छथि। मुदा भरथरी के बुझेलाक बाद अपन पुत्र के जोगी बना बिजन बोन में जएबाक लेल कहैत छथिन। गोपीचंद माए केर आज्ञा पाबि सोलहो रानी लग जैत छथि आ भरथरी जी के निर्णय बतबैत छथिन। सोलहो रानी पुत्र आकांक्षा के ध्यान में रखैत छाती के पाथर क लैत छथि आ अपन पति राजा गोपीचंद के जोगी बना बीजन बोन में भेजि दैत छथि। बोन में गेलाक बाद गोपीचंद घोर साधना में लागि जैत छथि। दिनभरि जंगल में साधना आ साँझ पहर भिक्षाटन लेल नगर आ ग्राम केर यात्रा हाथ में सारंगी लेने वैराग्य केर गीत गबैत। यैह हिनकर सब दिनका जीवन भ गेल छनि। एक दिन भिक्षाटन के क्रम में घुमैत-घुमैत गोपीचंद अपन बहिन चंद्रावल के सासुर चैल जैत छथि। जोगी के देखि चन्द्रावल घर सं भीख देबा ले बाहर भेली। देखैत छथि जे ई जोगी कोनो आन नहि अपितु हुनकर सहोदर भाई राजा गोपीचंद छथि।कुहेस फाटि गेलनि। आंखि अन्हार भ गेलनि. धम्म सं धरती पर चित्ते खसली। जखन लोक उठेलकनि त पता चललैक जे प्राण त्यागि देने छथि। गोपीचंद के सहोदर के ममत्व जागि जैत छनि। बफारि मारि-मारि कनैत छथि। मुदा आब की चंद्रावल बहिन त समाप्त भ गेल छथिन! हिम्मत नहि हारेत छथि गोपीचंद। चट्टे गुरु गोरखनाथ लग बहिन के पुनः जियेबाक हेतु जैत छथि. बहुत अनुनय विनय करैत छथिन. कहैत छथिन: “बरु हम्मर प्राण ल लिय मुदा बहिन दाई के जिया दियौन।” गुरु गोरखनाथ द्रवित भ जैत छथि आ गोपीचंद संगे चंद्रावल केर मृत शरीर लग अबैत छथि। हुनकर स्पर्श मात्र सं चंद्रावल जीब जैत छथि आ उठि क बैस जैत छथि। आब चंद्रावल अपन भाए गोपीचंद लेल गुरु गोरखनाथ सं निवेदन करैत छथिन जे हुनका पुत्र होबाक बरदान देथुन।गुरु गोरखनाथ भाए-बहिन के अपूर्व प्रेम देखि बड्ड प्रसन्न होइत गोपीचंद के पुत्र प्राप्त हेबाक आशीर्वाद त दईते छथिन संगहिं अमर होबाक बरदान सेहो दैत छथिन। गोपीचंद ख़ुशी-ख़ुशी अपन राजमहल वापस आबि जैत छथि। एहिकथा गाथा के प्रसंग बहुत निक अछि। एक बात त ई छैक जे राजा भरथरी,रानीसामदेवी,रानीमैनावती, गोपीचंद, चंद्रावल, आ गुरु गोरखनाथ सब कियोक मिथिला के चरित्र नहि छथि। मुदा जोगी परंपरा सं जुड़ने कथा में स्थानीय भाव आबि जैत छैक। लोक जोगी के केवल भीख देबाक हेतु नहि बजबैत छैक। जोगी अपन सारंगी आ सुमधुर कंठ के कारण एक लोक कलाकार सेहो बनि जैत अछि। गाथाक भावनात्मक पक्ष अतेक प्रबल छैक जे मिथिलाक लोक सेहो कथा के अनेक प्रसंग के उदासी, चौमासा, छौमासा, बारहमासा के रूप में लोकगीतक स्वरूप में गबैत छथि।अहि तरहे ई कथावाचना जोगी आ गृहस्त दुनु के द्वारा गैल जैत अछि।एक कला के मात्र कलाप्रशंशक अथवा श्रोताक संग-संग अनेक प्रकारक कलाकार– गीतकरचना करनिहार, गेनिहार/गीतगैन, कथावाचक, कथावाचिका – सेहो भेट जैत छैक।रचना के कारण भाषा सेहो संपन्न होइत छैक। नव शैली, शब्दाबली के प्रयोग होइत छैक। ई मूल कथा मालवा सं बहुत क्षेत्र के भ्रमण करैत भोजपुरी क्षेत्र होइत मिथिलाक माटि में प्रवेश करैत छैक। गोरखपुर भोजपुरी क्षेत्र छैक ताहि कारने नाथ जोगीक भाषा भोजपुरी भ जैत छैक। ओ मूल गीत भोजपुरी के लोक स्वरुप में गबैत छैक।ओहि स्टाइल के कॉपी मिथिला में सेहो लोकगीत (जोगी गीत) में बहुत उत्तम रूप में भेटैत छैक। दुनु भाषा – मैथिली आ भोजपुरी – सहोदरा अर्थात गंगा जमुना जकां एक भय भव्य रूप सं हिलकोरा मारैत कल-कल करैत बहैत रहैत छैक।जखन गरीबी, भावनात्मक टूटन, असफलता, अपमान आदि सं व्यथित भ कुनो युवक नाथ सम्प्रदाय के सदस्य बनि जोगी भ जैत छथि त कथा ओहि व्यक्ति, ओकर माता-पिता, पत्नी-संतान, भाए-बहिन, समाज आ गाम लेल एकभावनात्मक आ जिवंत बात भ जैत छैक।लोक झट दनि अपना आप के चरित्र सं जोड़ लगैत छथि। भरथरी, मैनावती, गोपीचंद एकाएक सब जीब जैत छथि। गीत में नव रक्त प्रबह्मान भ जैत छैक, स्वक्ष आ फ्रेश ऑक्सीजन साँस लेबाक लेल भेट लगैत छैक।मालवाक कथा एकहि क्षण में मिथिला के कथा भ जैत छैक। ओ महिला सब जिनकर पति मिथिला सं बाहर रहैत छथिन काज धंधा के चक्कर में ओ सब अपन परदेसिया अथवा बिदेसिया पति के जोगी के रूप में देखि गीत गबैत छथि। विरहअपन चरम अवस्था में पहुच जैत अछि। एक एक आखर मर्म के आखर भ जैत छैक।एहने एक गीत देखू: कथीलै प्रीति लागौलें रे जोगिया प्रीति छोड़ेने चलि जाय आंगन मोरा लेखे विजुवन रे जोगिया घर लागै दिवस अन्हार लाली पलंगिया सुन्न भेलै रे जोगिया तकिया मोहि ने सोहाए खुजल केश नीड़ भेलै रे जोगिया काजर गेल दहाए एहि गीत में विरहिणी नायिका के अपन पति बिना आंगन एकांत वन; घर दिनों में अन्हरिया राति जकाँ अन्हार, ललका सजल पलंग अनसोहानगर, तकिया मारुक लगैत छैक। खुजल केश बेकार लागि रहल छैक, अंखि सं नोरक धार कम होबाक नामे नहि लैत छैक। नोर केर धार काजर के मेटा देने छैक। ऐना लगैत छैक जेना ओकर पति नाथ जोगी बनि गेल हो। घर सं भागि गेल हो! दोसर गीत में ई प्रदर्शित कैल जा रहल छैक जे राजा भरथरी जंगल में कारी मृग(हरिण) के शिकार करक हेतु गेल छथि। रानी के अपना राजा पर गर्व छनि। बुझल छनि जे बिना शिकार के नहि औताह। रानी रातुक रभस के तैय्यारी क रहल छथि. सोहागिन रानी अपन सौन्दर्य के चानन के लेप सं सुगन्धित, फुलक हार सं सुशोभित, आ माथक सिन्दूर सं मनमोहक केने छथि. मुदा ई की? आंगन केर प्रवेश पर एक जोगी सारंगी लेने गीत गाबि रहल छैक: “हे रानी! हम दूर देस केर जोगी छी. हमरा जल्दी-जल्दी भीख द दिय, हम अहाँक दुआरि छोडि दोसर अंगना भीख लेल चलि जैब।” बेचारी रानी के की बुझल जे ई जोगी आर कियो आन व्यक्ति नहि अपितु हुनके पति राजा भरथरी छथिन। चानन रगड़ी सोहागिन हे गले फूलक हार सिंदुरा से मंगिया भरलअछिहे सुख मास अखार राजा गईले मृग मारन हे वन गईले शिकार जोगी एक ठाढ़ आंगन में हे रानी सुनले मेरी बात दए दीय भिक्षा जोगी के हे ओ त छोड़त दुआर... ओही दिनसं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माएसं भीखमंगबामें सफल भ जैत। मिथिला कहियो वैराग्यके स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवनमें रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक।ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माएसं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक। नानी कथो कहथि आ बीच-बीचमें गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल। नानी सेहोकानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथामें मस्त – एक सुनेबामें मस्त आ दोसर सुनबामें मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैतछलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्यकलाकार नानी आ एकमात्र श्रोता हम मुदा दुनुके आंखि, ह्रदय. आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथावाचिका केरगुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतः करणमें कथाके बसेलासं अबैत छैक। नम्रनिवेदन ओहि समयमें जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्तिपर जोर द' लिख रहल छी। अहि लोकस्मरणमें जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओनानीक छनि आ जतए इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। िजनगीक जीत उपन्यास जगदीश प्रसाद मण्डल पोथीकेँ तत्खनात् व्यक्तिगत रूपे सोझहा आनल जा रहल अछि...। -लेखक समर्पण मिथिलाक वृन्दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलवाड़ी लगौनिहार संगे नव विहान अननिहारकेँ तेसर संस्करण : 2016 आमुख प्रायः चारि-पाँच बर्ख पहिनेक बात थिक जे जगदीश जीक सम्बन्धमे हमरा पहिले बेर जनबाक अवसर भेटल रहय। ओ हमर पुस्तक सभक प्रेमी पाठक छलाह आ ताकि ताकि कऽ हमर रचना पढ़ल करथि। ओहि दिनमे हमर कोनो नव पुस्तक छपल रहय जकरा मादे ओ सुनने रहथि मुदा उपलब्ध नहि भऽ सकल रहनि। ताहि क्रममे हुनक स्फूर्तिवान बालक उमेश हमरासँ भेँट करय पटना आएल रहथि। तखनहि पता चलल छल जे जगदीश जी लिखबो करैत छथि। उमेश अपना संग हुनकर पोथी सभक पांडुलिपि अनने छलाह। हम चकित रही जे विद्याक ई अनुरागी पुरुष कोना साहित्यक मुख्य धारा तँ के कहय जे अवान्तरो धारा सँ एकदम्मे एकात धरि निरन्तर साहित्य साधनामे लागल छथि। पता चलल जे ओ मैथिलीमे पाँचटा उपन्यास, एकटा नाटक आ गोट बीसेक कथा लिखने छथि। तहिये पहिल बेर हुनकर पांडलिपि सभकें हम उनटा-पुनटा कऽ देखने छेलियनि। तहियो हमरा ई बात स्पष्ट लागल छल जे हुनकर लेखनमे कला भने जेतबे होउक प्रामाणिकता धरि भरपूर छनि। हम अपना सक्क भरि हुनका मनोबलकेँ मजगूत आ दृष्टिकेँ फड़िच्छ करबाक प्रयास केलियनि। मधुबनीमे रही तँ ओ हमरासँ सम्पर्कोमे रहलाह। साहित्यक बिरादरीमे तहिये हुनकर प्रवेश भेलनि। हमरा खुशी अछि जे पछिला दू सालमे ओ आइ बेसी ऊर्जस्वी, आर रचनाशील, आर बेसी निधोख भेलाह अछि। आ आइ श्रुति प्रकाशनसँ हुनकर पुस्तक सभ प्रकाशित भऽ रहलनि अछि। हमरा लेल ई बहुत खुशीक बात थिक। एहि हेतू हम गजेन्द्र जीकेँ धन्यवाद आ बधाइ दैत छियनि। जगदीश जीक साहित्यमे मिथिलाक ग्रामीण समाजक अद्भुत चित्र आएल अछि। मैथिलीमे एहि वस्तुक खगता सभ दिनसँ रहल अछि। हमरा लोकनि अक्सरहां चिन्तित होइत रहै छी जे गाम उजरि रहल अछि, गामक सम्बन्धमे जतबे जे किछु लेखन भऽ रहल अछि से निगेटिभ फोर्ससँ भरल अछि, अधिकाधिक हताश करऽ बला अछि। हमरा लगैत अछि जे जीवनमे देखबाक जे दृष्टिकोण जगदीश जीक छनि से आम मैथिली साहित्यकारक दृष्टिकोणसँ फराक छनि तेँ ओ एहन चित्र रचि पबैत छथि जे सामान्यसँ हटि कऽ अछि। हम तँ हुनक लेखनकेँ ग्रामीण समाजक सकारात्मक जीवन-शैलीक डक्यूमेन्टेशनक रुपमे देखैत छी। हुनकर साहित्यमे जे लोक सभ आएल अछि, से मिथिलाक साधारण लोक सभ थिक– वर्ण आ जातिसँ छोट-छोट लोक सभ। ई लोक सभ मैथिली साहित्यमे पहिनहु आएल छथि। किछु बहुत प्रामाणिक चित्र सभ पहिनहु प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। मुदा, हमर ई असंदिग्ध मान्यता अछि जे जाहिठाम ई छोट लोक अपन सम्पूर्ण मानवीय गरिमाक संग प्रस्तुत भेल होथि, सएह, केबल सएह टा, एहि लोकक प्रमाणिक चित्र कएल जा सकैत अछि। जगदीश जीक कथा साहित्यकेँ देखू तँ ई बात स्पष्ट भऽ सकैत अछि। जे बाहरसँ देखने छोट प्रतित होइत अछि, से लोक सभ वस्तुतः बहुत पैघ-पैघ लोक सभ छथि। हुनका सभक उन्नत सांस्कृतिक आयामकेँ देखल जाय। मानवताक गुणसँ भरपूर ई लोक सभ दया, ममता, सहयोग सद्भावनासँ कते भरपूर लोक सभ छथि! तखन, एहन अवश्य लागि सकैत अछि जे ई चित्र सभ आजुक मिथिलाक चित्र नहि थिक अपितु अतीतक थिक! मुदा, जाहि देशमे जेट विमान आ कटही गाड़ी एक्के संग चलैत हो, ततय कोन अतीत आ कोन वर्त्तमान से निर्णय करब कठीन अछि। आ जाहिठाम सकारात्मक जीवन-शैली दस्तावेजीकरणक प्रश्न हो, ततय तँ ई अत्यन्त उपादेय। जगदीश जीक लेखनक जे सामान्य विशेषता सभ छनि, से सम्पूर्णतः प्रस्तुत उपन्यास ‘जिनगीक जीत’ मे देखार पड़त। द्वन्द्व आ दुविधाक अन्हारक भीतर किरणमालाक खोज एहि उपन्यासक इष्ट छिऐक। एकर नायक अनेकानेक संघर्षसँ आगू बढ़ैत एकटा सुखी जीवनक पड़ावपर पहुँचैत अछि, जतय ओकरा परम सेहन्ता एहि बातक छैक जे ओकरा ‘सुखी जीवन’ एकटा ‘सार्थक जीवन’ सेहो होइक। सुखी बनाम सार्थककेँ अन्तर्संघर्षसँ ओकर जीवन आक्रान्त अछि। एहिठाम कृषि संस्कृति आ सेवा संस्कृतिक अन्तर्द्वन्द सेहो बेस फरिच्छ भऽ कऽ आएल अछि। सदासँ मिथिलाक लोक कृषि कर्म करैत, कृर्षि-संस्कृतिक ताना-बानामे जीबैत आएल अछि। एहि युगमे आबि कऽ नोकरी (सेवा-संस्कृति) प्रधान लक्ष्य भऽ गेलैक अछि तँ स्वाभाविक थिक जे एहिसँ पूर्व-व्यवस्थित जीवन क्रममे विक्षोभ उत्पन्न भेलैक अछि। जगदीश जीक एहि समस्याकेँ नायक (बचेलाल)क पत्नी (रुमा)क पृष्ठभूमिक रुपमे उठौलनि अछि जे नोकरिहारा परिवारसँ कृषक परिवारमे बिआहलि गेलि छथि। हमरा लोकनि देखैत छी जे बचेलाल एहि दू संस्कृतिक बीच समायोजन करबामे ततेक झमारल गेलाह अछि जे मानसिक रुपसँ अवसाद ग्रस्त भऽ गेल छथि। एहि अवसाद (डिप्रेशन)सँ उबारैत छथिन हुनकर माय (सुमित्रा), जे कृषि-संस्कृतिक प्रतिनिधित्व करैवाली एक सबला मैथिलानी थिकीह। श्रमजीवी समाजसँ आएल एहन स्त्री अबला कदापि नहि भऽ सकैत छथि। आ एहि स्त्री, सुमित्राक द्वारा सम्पन्न कराओल जाइत अछि जिनगीक जीत, जेना कहियो सत्यवतीक द्वारा महाभारत सम्पन्न कराओल गेल छल। एहन प्रतित भऽ सकैत अछि जे एहि रचनामे पठनीयताक अभाव छैक आ जेना कि एक औपन्यासिक कृतिसँ जिनगीक घात-प्रतिघातकेँ चिन्तित करबाक आशा कएल जाइछ तकरो अभाव छैक। एहिठाम सभ कथू एकदम सरलतासँ, आसानीसँ सम्पन्न होइत देखाओल गेल अछि, तेना वास्तविक जीवनमे प्रायः नहि होइछ। मुदा, एहि कृतिक प्रामाणिकता एकर अभावकेँ भांपि दैत छैक। असलमे साहित्यक तीनटा उद्येश्य होइत छै- रंजन, शिक्षण आ प्रेरण। से हम देखैत छी जे शिक्षण आ प्रेरणक तत्त्व एहिठाम ततेक सक्रिय छैक जे रंजनक कसौटीपर एकर मूल्यांकन कयने रचनाक संग न्याय संभव नहि छैक। एक बेर फेर हम जगदीश जीकेँ एहि रचनाक लेल धन्यवाद दैत छियनि। ◌ -भभुआ, 9. 3. 2010 तारानन्द वियोगी एकसत्तैर- एक / 12 दू / 24 तीन / 34 चारि / 39 पाँच / 51 छह / 62 सात / 71 आठ / 92 नअ / 106 दस / 126 एगारह / 139 बारह / 152 तेरह / 160 चौदह / 167 पनरह / 173 1. छोट-छीन गाम कल्याणपुर। गामकेँ देखते बुझि पड़ैत जे आदिम युगक मनुखसँ लऽ कऽ आइ धरिक मनुख हँसी-खुशीसँ रहैए। मनुखेटा नहि मालो-जाल तहिना। एक फुच्ची दूधवाली गाएसँ लऽ कऽ बीस लीटर दूधवाली गाए धरि। बकरियोक सएह नश्ल। एहनो बकरी अछि जेकरा तीन-तीन-चरि-चरिटा बच्चा भेने एक-दूटा दूधक दुआरे मरिये जाइत। आ एहनो अछि जेकरा चारि लीटर दूध होइए। गाछियो-बिरछी तहिना। एहनो गाछी अछि जइमे एकछाहा शीशोए, तँ दोसर बगुरेक। आमो गाछीक वएह हाल। कोनो एकछाहा सरहीक अछि तँ कोनो एकछाहा कलमीक। तेतबे नहि, ओहन-ओहन गाछ अखनो अछि जे दू-दू कट्ठा खेत छेकने अछि तँ ओहनो गाछी अछि जइमे पनरह-पनरहटा आमक गाछ कट्ठे भरिमे फइलसँ रहि मनसम्फे फड़बो करैए। औझुका जकाँ कल्याणपुर चालीस बरख पहिने नइ छल। ने एकोगो चापाकल छेलै आ ने बोरिंग। त्रेता युगमे जेहने हरसँ राजा जनक जोतने छला तेहने हरसँ अखनो कल्याणपुरक खेत जोतल जाइए। ने अखुनका जकाँ उपजा-बाड़ी होइ छल आ ने बर-बिमारीक उचित उपचार। सवारीक रूपमे सभकेँ दू-दूटा पएर वा गोटि-पँगरा बरद जोतल काठक पहियाक गाड़ी। अंग्रेजी शासन मेटा गेल मुदा गमैया जिनगीमे मिसियो भरि सुधार नहि भेल। जहिना जत्तामे दूटा चक्की होइत- तरौटा आ उपरौटा, तरौटा कीलमे गाड़ल रहैत, तहिना शहरी आ देहाती जिनगीक अछि। शहरी जिनगी तँ आगू-मुहेँ घुसकल मुदा देहाती जिनगी तरौटा चक्की जकाँ ओहिना गड़ाएल अछि। बान्ह-सड़क, घर-दुआर सभ ओहिना अछि जहिना चालीस बरख पहिने छल। तँए, कि कल्याणपुरक लोक अंग्रेजी शासन तोड़ैमे भाग नइ लेलक? जरूर लेलक, दिल खोलि साहससँ लेलक। सगरे गामकेँ गोरा-पल्टन आगि लगा-लगा तीनबेर जरौलक। केते गोरे बन्दूकक कुन्दासँ तँ केते गोरे मोटका चमड़ाक जूत्तासँ थोकचल गेला। जहल जाइबलाक धरोहि लगि गेल रहए। केते गोरे डरे जे गाम छोड़ि पड़ाएल ओ अखनो धरि घुमि कऽ नइ आबि सकल। केते गोरेक परिवार बिलटलै तेकर कोनो ठेकान अखनो धरि नइ अछि। कल्याणपुरक एक परिवार अछेलालक। अगहन पूर्णिमाक तेसर दिन, बारह बजे रातिमे घूर धधका दुनू परानी अछेलाल आगि तपैत रहए। पहिलुके साँझमे मखनीकेँ पेटमे दरद उपकल। प्रसवक अन्तिम मास रहने मखनी बुझलक जे प्रसवक पीड़ा छी। अछेलालोकेँ सएह बुझि पड़लै। ओसरेपर चटकुन्नी बिछा मखनी पड़ि रहल। चटकुन्नीक बगलेमे अछेलालो बैस गेल। दरद असान होइते मखनी बाजल- “दरद असान भेल जाइए।” मुँहपर हाथ नेने अछेलाल मने-मन सोचैत जे असगरूआ छी केना पल्हैनक ऐठाम जाएब? केना अगिआसी जोड़ब? जाड़क समए छिऐ। परसौती-ले जाड़ ओहने दुश्मन होइए जेहने बकरी-ले फौती। दरद छुटिते मखनी फुर-फुरा कऽ उठि भानसक जोगारमे जुटि गेल। पानि भरैक घैल लऽ जखने घैलची दिस बढ़ए लगल आकि पति बाँहि पकैड़ रोकैत कहलकै- “अहाँ ऊपर-निच्चाँ नै करू। हम पानि भरि अनै छी। अहाँ घरसँ बासन-कुसन निकालू। हम ओकरो धोइ कऽ आनि देब।” मखनी चुल्हि पजारए लगल आ अछेलाल लुड़ु-खुड़ु करए लगल। बरतन-बासन धोइ अछेलालो चुल्हिए-पाछूमे बैस आगियो तापए लगल आ मुस्कियाइत गपो-सप्प शुरू केलक- “ऐ बेर भगवान बेटा देता।” बेटाक नाओं सुनि सुखक समुद्रमे मखनी हेलए लगली। मने-मन सुखक अनुभव करैत मनमे उठलै- बच्चाकेँ दूध पिआएब...। तेल-उबटनसँ जाँतब...। आँखिमे काजर लगा किसुन भगवान बना चुम्मा लेब...। कोरामे लऽ अनको अँगने-अँगना घुमैले जाएब...। स्कूलमे नाओं लिखा पढ़बैक विचार एलै आकि जहिना गमकौआ चाउरक भात आ नेबो रस देल खेरही दालिमे सानल कौर मुँहमे दइते ओहन आँकर पड़ि जाइत जइसँ जीह कुचा जाइत तहिना मखनीकेँ भेल। मनक सुख मनेमे अँटैक गेलइ। पत्नीक मलिन होइत मुँह देख अछेलाल बाजल- “गरीबक मनोरथ आ बर्खाक बुलबुला एक्के रंग होइ छइ। जहिना पानिक बुलबुला सुन्नर अकार आ रंग लऽ जा कि बढ़ए लगैए कि फुटिए जाइए, तहिना।” मखनीक मनमे दोसर विचार उठलै जे धन तँ बहुत रंगक होइ छै- खेत-पथार, गाए-महींस, रूपैआ-पैसा इत्यादि, मुदा ऐ सभ धनसँ पैघ बेटा-धन होइ छै जे बुढ़मे माए-बापक सवारी बनि सेवा करैए। तेतबे नहि, परिवारो-खनदानोकेँ आगू बढ़बैए। तहूमे जँ कमासुत बेटा तँ जीबतेमे माए-बापकेँ स्वर्गक सुख दइए। भानस भेलइ। दुनू परानी खेलक। मोटगर पुआरपर चटकुन्नी बिछौल छेलै, तैपर जा मखनी सुति रहल। एमहर थारी-लोटा अखारि, चुल्हि-चिनमारक सभ काज सम्हारि अछेलाल चुल्हिए लग बैस आगि तापए लगल। तमाकुल चूना मुँहमे लेलक। चुल्हिए लग बैसल-बैसल अछेलाल ओंघाइयो लगल। ओंघी तोड़ैले उठि कऽ अँगनामे टहलए लगल। भक टुटिते फेर चुल्हि लग आबि आगि तापए लगल। मखनी निन पड़ि गेल। मखनीक नाकक अवाज सुनि अछेलाल सोचलक जे जँ राति-बिराति दरद उपकतै तँ महाग-मोसकिलमे पड़ि जाएब। अपने तँ किछु बुझै नइ छी। दशमी डगरक सिदहा दऽ नै सकलिऐ तँए पल्हैनियो औत कि नहि औत..! चुल्हिक आगि मिझाइत देख अछेलाल जारैन आनए डेढ़ियापर गेल। ओससँ जरनो सिमसल। लतामक गाछपर सँ टप-टप ओसक बून खसैत। अन्हारक तृतीया रहने, चान तँ भरि राति उगल रहत..। मनमे अबिते अछेलाल मेघ दिस तकलक। चान तँ उगल देखैत मुदा ओसक दुआरे जमीनपर इजोत अबिते नहि। पाँजमे जारैन नेने अँगना आएल। ओसारपर चुल्हि रहने सोचलक जे घरेमे घूर लगौनाइ बढ़ियाँ हएत,घरो गरमाएल रहत। अछेलालक पएरक दम्मससँ मखनीक निन टुटि गेलइ। धधकैत घूर देख मखनियोकेँ आगि तपैक मन भेलइ। ओछाइनपर सँ उठि ओहो घूर लग आबि बैसली। बीचमे घूर धधकैत आ दुनू भाग दुनू परानी बैसल। जहिना देहक दुखसँ मखनी तहिना मनक दुखसँ अछेलाल दुखीत। बेवसीक स्वरमे अछेलाल बाजल- “अदहा राति तँ बिते गेल, अदहे बाँकी अछि। जहिना अदहा बितल तहिना बाँकियो बितबे करत।” अछेलालक बात सुनि मखनी पुछलक- “अखन धरि अहाँ जगले छी?” “हँ, की करब। जँ सुति रहितौं आ तैबीच अहाँकेँ दरद उठैत तँ फटोफनमे पड़ि जइतौं। सौंसे गामक लोक सूतल अछि। केकरा शोरो पाड़बै। एक्के रातिक तँ बात अछि। कहुना-कहुना कऽ काटिए लेब। मनमे होइ छल जे बहिनकेँ विदागरी करा कऽ लऽ अनितौं मुदा ओहो तँ पेटबोनियेँ अछि। तहूमे चारि-पाँचटा लिधुरिया बच्चो छइ। जँ विदागरी करा कऽ आनब तँ पाँच गोरेक खरचो बढ़ि जाएत। घरमे तँ किछु अछि नहि। कमाइ छी खाइ छी।” “कहलिऐ तँ ठीके। अपना घरमे लोक भूखलो-दुखलो रहि जाइए। मुदा जेकरा माथ चढ़ा अनबै ओकरा केना भूखल रहए देब? दिन-राति चिन्ता पैसल रहैए जे पार-घाट केना लागत। भगवानो सभटा दुख अपने दुनू परानीकेँ देने छैथ। खाएर.., एक पसेरी चाउर घैलामे रखने छी कहुना-कहुना पान-सात दिन चलबे करत तेकर बाद बुझल जेतइ।” ‘पसेरी भरि चाउर’ सुनि अछेलालक मनमे आशा जगल। मुहसँ हँसी निकलए लगलै, बाजल- “जँ हमर बनि बच्चा जनम लेत तँ केतबो दुख हेतै तैयो जीबे करत। नै जँ कोनो जन्मक कर्जा खेने हेबै तँ असुलि कऽ चलि जाएत।” पतिक बात सुनिते मखनीकेँ पहिलुका दुनू बच्चा मन पड़ल। मने-मन सोचए लगल- जँ नीक-नहाँति सेवा होइतै तँ ओहो बच्चा नै मरितए...। मुदा मनुखे की करत?जेकरा भगवाने बेपाट भऽ गेल छथिन। पैछला बात मनसँ हटबैत मखनी बाजल- “समाजमे ओहनो बहुत लोक होइत अछि जे बेर-बेगरतामे भगवान बनि ठाढ़ होइए।” “समाज दू रंगक अछि। एकटा समाज ओहन होइ छै जइमे दोसराक मदैतकेँ धरम बुझल जाइ छै आ दोसर ओहन होइ छै जइमे सभ सबहक अधले करैए। अपने गाममे देखै छिऐ। अपन टोल तीस-पैंतीस घरक अछि। चारि-पाँच रंगक जातियो अछि। एक जातिकेँ दोसरसँ भैंसा भैंसीक कनारि अछि। अपन तीन घरक दियादी अछि। तीनू घरमे सुकनाकेँ दू-सेर-दू-टाका छइ। ओकरा देखै छिऐ जे हदिघड़ी झगड़े-झंझटक पाछू रहैए तँए टोलमे सभसँ बाड़लो अछि। ओकरा चलैत हमरोसँ सभ मुँह फुलौने रहैए। ने केकरोसँ टोका-चाली अछि ने खेनाइ-पीनाइ आ ने लेन-देन। ई तँ भगवान रच्छ रखने छैथ जे सभ दिन बोइन करै छी मौजसँ खाइ छी। नइ तँ एक्को दिन ऐ गाममे बास होइतए।” अछेलालक बात सुनि मुड़ी डोलबैत मखनी बाजल- “कहलौं तँ ठीके मुदा जे भगवान दुख दइ छथिन वएह ने पारो-घाट लगबै छथिन।” मखनीक बात सुनि अछेलाल बाजल- “सगरे गाममे नजैर उठा कऽ देखै छी तँ खाली बचेलालेक परिवारसँ थोड़-बहुत मेदहा अछि। सालमे दस-बीस दिन खेतियो सम्हारि दइ छिऐ आ घरो-घरहट। पैंच-उधार तँ नहियेँ करै छी। हमर ब्रह्म कहैए जे अगर बचेलालक माएकेँ कहबैन तँ ओ वेचारी जरूर सम्हारि देती। कहुना राति बीतए जे भोर होइते कहबैन। दुखक रातियो नमहर भऽ जाइ छइ। एक्के निनमे भोर भऽ जाइ छेलए, से आइ बितबे ने करैए।” हाफी करैत मखनी बजली- “देहो गरमा गेल आ डाँड़ो दुखाइए। ओछाइनेपर जाइ छी।” मखनीक बात सुनि अछेलाल ठाढ़ भऽ मखनीक बाँहि पकैड़ ओछाइनपर लऽ गेल। मखनी पड़ि रहल। पड़ले-पड़ल बाजल- “मन हल्लुक लगैए। अहूँ सुति रहू-गे।” अछेलालक मनमे चैन तँ आएल मुदा तैयो सोचए जे ऐ देह आ समैक कोन ठेकान जे कखन की भऽ जाएत! ..गुनधुन करैत बाहर निकैल चारू-भर तकलक। झल-अन्हारक दुआरे साफ-साफ किछु देखबे ने करैत। मुड़ी उठा मेघ दिस तकलक। मेघमे छोटका तरेगन बुझिए ने पड़इ। गोटे-गोटे बड़का देख पड़ैत। ऐना जकाँ चानो बुझि पड़ैत। डण्डी-तराजूकेँ ठेकना ताकए लगल। तकैत-तकैत पछबारि भाग मन्हुआएल देखलक। डण्डी-तराजू देख अछेलालकेँ सन्तोख भेलै जे राति लगिचा गेल अछि। फेर घुमि कऽ आबि घूर लग बैसल। आलस आबए लगलै। तमाकुल चुना मुँहमे लेलक। बाहर निकैल तमाकुल थुकैर कऽ फेक फेर घुरे लग आबि बोरा पसारि घोकरी लगा बाँहियेक सिरमा बना सुति रहल। निन पड़ि गेल। निन पड़िते सपनाए लगल। सपनामे देखए लगल जे घरवाली दरदसँ कुहरैए। चहा कऽ उठि पत्नीकेँ पुछलक- “बेसी दरद होइए?” मुदा मखनी निन छल। किछु उत्तर नहि पाबि। घूरकेँ फुकि अछेलाल धधराक इजोतमे मखनी लग जा निंगहारि कऽ देखए लगल। मनमे भेलै जे कहीं बेहोश तँ ने भऽ गेल। मुदा नाकक साँस असथिर रहइ। कौआ डकिते अछेलाल उठि कऽ बचेलाल ऐठाम विदा भेल। दुनू गोरेक घर थोड़बे हटल मुदा बीचमे डबरा रहने घुमौन रस्ता। बचेलालक माएकेँ अछेलाल भौजी कहैत। दियादी सम्बन्ध तँ दुनू परिवारमे नै मुदा समाजिक सम्बन्धे भैयारी। बचेलालक पिता रघुनन्दन छोटे गिरहस्त मुदा समाजिक हृदए रहने सभसँ समाजमे मिलल-जुलल रहैत। बचेलाल ऐठाम पहुँचते अछेलाल डेढ़ियापर ठाढ़ भऽ बचेलालक माएकेँ शोर पाड़लक। आँगन बहारैत सुमित्रा बाढ़ैन हाथमे नेनहि घरक कोनचर लगसँ देख मुस्कियाइत बजली- “अनठिया जकाँ दुआरपर किए छी? आउ अँगने आउ।” अछेलालक मन्हुआएल मुँह देख सुमित्रा पुछलैन- “रातिमे किछु भेल की? मन बड़ खसल देखै छी?” कँपैत हृदैसँ अछेलाल उत्तर देलकैन- “नहि रातिमे तँ किछु ने भेल मुदा भारी विपैतमे पड़ल छी। तँए एलौं।” “केहन विपैतमे पड़ल छी?” “भनसियाकेँ सन्तान होनहार अछि। पूर मास छिऐ। घरमे तँ दोसर-तेसर अछि नहि। जनिजातिक नीक-अधला तँ अपने बुझै नइ छी। तँए अहाँकेँ कहैले एलौं जे चलि कऽ सम्हारि दियौ।” कनी काल गुम्म भऽ सुमित्रा बजली- “अखन तँ दरद नै ने उपकलै हेन?” “नहि, अखन चैन अछि। साझू-पहर दरद उपकल छेलै मुदा कनीए कालक पछाइत असान भऽ गेलइ।” “लोकेक काज लोककेँ होइ छइ। समाजमे सबहक काज सभकेँ होइ छइ। अगर हमरा गेलासँ अहाँकेँ नीक हएत तँ किए ने जाएब।” कहि सुमित्रा फुसफुसा कऽ पुछलखिन- “परसौतीकेँ खाइले चाउर अछि किने?” अछेलालक मनमे एलै जे झूठ नै कहबैन। कनी गुम्म भऽ बाजल- “एक पसेरी चाउर घरमे अछि, भौजी।” ‘एक पसेरी चाउर’ सुनिते सुमित्राकेँ हँसी लगलैन। मुदा हँसीकेँ दाबि सोचलैन जे कम-सँ-कम एक मासक बुतात चाही। मास दिनसँ पहिने परसौतिक देहमे कोनो लज्जैत थोड़े रहै छइ। तँए एक मासक बुतातक जोगार सेहो कऽ देबइ। बेर पड़लापर गरीब लोकक मन बौआ जाइ छै तँए अछेलाल एना बाजल। पुरुख जाति थोड़े परसौतीक हाल बुझैए। जखन हमरा बजबैले आएल तँ बच्चाकेँ ऐ धरतीपर ठाढ़ करब हमर धर्म भऽ जाइए। सिरिफ बच्चा जनैम गेलासँ तँ नै हएत...। दुनू गोरे गप-सप्प करिते छल कि बचेलाल सुति कऽ उठल। खिड़कीक एकटा पट्टा खोलि हुलकी मारलक तँ दुनू गोरेकेँ गप-सप्प करैत देखलक। केबाड़ खोलि बचेलाल दुनू गोरे लग आबि चुपचाप ठाढ़ भेल। पुतोहुक दुआरे सुमित्रा बजली- “दरबज्जेपर चलू।” तीनू गोरे दरबज्जापर आबि गप-सप्प करए लगल। अपन भार हटबैत सुमित्रा बचेलालकेँ कहलखिन- “बच्चा, अछेलालक कनियाकेँ सन्तान होनिहारि छइ। वेचारा जेहने समांगक पातर अछि तेहने चीजोक गरीब। आशा लगा कऽ अपना ऐठाम आएल हेन। गाममे तँ बहुतो लोक अछि मुदा अनका ऐठाम किए ने गेल। जेँ हमरापर बिसवास भेलै तँए ने आएल।” मुड़ी निच्चाँ केने बचेलाल माइक सभ बात सुनि बाजल- “जखन तोरा बजबैले एलखुन तँ हम मनाही करबौ।” तैपर सुमित्रा बजली- “सोझे गेलासँ तँ नइ हेतइ। कम-सँ-कम एक मासक बुतातो चाही किने?” “माए, जखन तूँ घरक गारजने छेँ तखन हमरासँ पुछैक कोन जरूरी? जे जरूरी बुझै छीही से कर।” अछेलालक हृदैमे आशा जगल। मने-मन सोचए लगल, अखन धरि बुझै छेलौं जे गाममे कियो मदैतगार नइ अछि मुदा से नहि। भगवान केहेन मन बना देलैन जे ऐठाम एलौं...। मुस्कियाइत अछेलाल सुमित्राकेँ कहलक- “बड़ी काल भऽ गेल भौजी, अँगनामे की भेल हएत की नइ। आब नै अँटकब। चलू अहूँ।” सुमित्रा- “बौआ, अहाँ आगू बढ़ू, हम पीठेपर अबै छी।” अछेलाल आँगन विदा भेल। सुमित्रा बचेलालकेँ कहलखिन- “बच्चा, मनुखेक काज मनुखकेँ होइ छइ। आइ जे सेवा करब ओ भगवानक घरमे जमा रहत। महिना दिन हम ओकर ताको-हेर करबै आ खरचो देबइ। भगवान हमरा बहुत देने छैथ। कोन चीजक कमी अछि।” बचेलाल- “माए, तोरा जे नीक सोहाओ से कर, जा कऽ देखही।” दरबज्जासँ उठि सुमित्रा अँगनाक काज सम्हारए लगली। सभ काज सम्हारि अछेलाल ऐठाम विदा भेली...। मखनी ओसारपर बिछान बिछा, पड़ल। पहुँचते सुमित्रा मखनीकेँ पुछलखिन- “कनियाँ, दरदो होइए?” कर फेड़ मखनी बाजल- “दीदी, अखन तँ नइ होइए मुदा आगम बुझि पडै़ए।” मखनीकेँ दूटा सन्तान भऽ चुकल छल तँए आगम बुझैत। सुमित्रा अछेलालकेँ कहलक- “ऐठाम हम छीहे। अहाँ पल्हैनक ऐठाम जा बजौने आउ?” अछेलाल पल्हैनिक ऐठाम विदा भेल। मुदा पल्हैन ऐठाम जाइले डेगे ने उठैत। मनमे होइ जे दशमी डगरक सिदहा नै दऽ सकलिऐ, तँए ओ औत की नइ औत..?मुदा तैयो जी-जाँति कऽ विदा भेल। भरि रस्ता विचित्र स्थितिमे अछेलाल पड़ल रहए। एक दिस सोचैत जे जँ पल्हैन नइ औत तँ बेकार गेनाइ हएत। दोसर दिस होइ जे जाबे हम एमहर एलौं ताबे घरपर की भेल हएत की नहि। पल्हैनक ऐठाम पहुँचते अछेलाल देखलक जे मालक थैरक गोबर उठा पथियामे लऽ पल्हैन खेत विदा अछि। जहिना न्यायालयमे अपराधीकेँ होइत तहिना अछेलालोकेँ बुझि पड़ैत। मुदा तैयो साहस करैत बाजल- “कनी हमरा ऐठाम चलू, भनसियाकेँ दरद होइ छइ।” “माथपर गोबरक छिट्टा नेनहि पल्हैन उत्तर देलक- “हम नइ जेबैन। डगरक सिदहा हमर बाँकीए अछि। पेट-बान्हि केते दिन काज करबैन।” पल्हैनक बात सुनि अछेलाल अपन भाग्यकेँ कोसए लगल। भगवान केहेन बनौने छैथ जे जेकरा-तेकरासँ दूटा बात सुनै छी। मुँह सिकुरियबैत फेर कहलक- “कनियाँ, ऐ साल सिदहा नै दऽ सकलौं तँ कि नइ देब। समए-साल नीक हएत तँ ऐगला साल दोबर देब। समाजमे सबहक उपकार सभकेँ होइ छइ। चलू...।” खिसिया कऽ डेग बढ़बैत पल्हैन बाजल- “किनौं नै जेबैन।” एक टकसँ अछेलाल पल्हैनकेँ देखैत रहल। देहमे जेना एक्को मिसिया तागते ने बुझि पड़इ। हतास भऽ दुनू हाथ माथपर लऽ बैस रहल। आब की करब..? आशा तोड़ि घर दिस विदा भेल। आगू-मुहेँ डेगे ने उठै, पएर पताइत रहइ। जेना बुझि पड़ै जे आँखिसँ लुत्ती उड़ैए। कहुना-कहुना अछेलाल घरपर आएल। तेसर सन्तान भेने मखनीकेँ दरदो कम भेलै आ असानीएसँ बच्चो जनमल। अपना जनैत सुमित्रा सेवोमे कोनो कसैर बाँकी नै रखलखिन। डेढ़ियापर अबिते अछेलालकेँ बुकौर लगि गेलइ। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर टघरए लगलै। अछेलालकेँ देखते मुस्कियाइत सुमित्रा कहलखिन- “बौआ, केकरो अहाँ अधला केने छी जे अधला हएत। भगवान बेटा देलैन। गोल-मोल मुँह अछि मोटगर-मोटगर दुनू हाथ-पएर छइ।” आशा-निराशाक बीच अछेलालक मन उगए-डुमए लगल। हँसी होइत सुख निकलए चाहै आ आँखिक नोर होइत दुख। बेटा जनैमते सुमित्राक अँगनाक टाटपर बैसल कौआ दू बेर मधुर स्वरमे कुचरल। कौआक कूचलव सुनि बचेलालक मुहसँ अनासुरती निकलल- “अछेलाल काकाकेँ बेटा भेल।” मुहसँ निकैलते बचेलाल आँखि उठा-उठा चारू कात देखए लगल जे कियो कहलक नहियेँ तखन मुहसँ किए निकलल? आँगनसँ निकैल बचेलाल टहलैत-टहलैत डबराक कोण लग आएल। कोणपर ठाढ़ भऽ हियासए लगल जे बच्चाक जन्म भेल आकि दरदे होइ छइ। सुमित्रा ओछाइन साफ करैत रहैथ आ अगियासी जोड़ैले अछेलाल डेढ़ियापर जारैन आनए गेल कि बचेलालपर नजैर पड़ल। नजैर पड़िते अछेलाल थोडे़ आगू बढ़ि बचेलालकेँ कहलक- “बौआ, छौड़ा जनमल।” लड़काक नाओं सुनिते बचेलालक एक मनमे आएल जे जा कऽ देख आबी। मुदा लगले दोसर मन कहलकै, अखन जा कऽ देखब उचित नहि। चोट्टे घुमि आँगन आबि पत्नीकेँ कहलक- “अछेलाल काकाकेँ बेटा भेल।” बेटाक नाओं सुनिते मने-मन असिरवाद दैत रूमा बजली- “भगवान जिनगी देथुन।” बच्चाक छठियार भऽ गेल। सुमित्रा अपन अँगनाक काज सम्हारि अछेलालक आँगन पहुँचली। गोसाँइ लुक-झुक करैत। पतियानी लगा बगुला पच्छिमसँ पूब-मुहेँ उड़ैत, अपनामे हँसी मजाक करैत जाइत। कौआ सभ धिया-पुता हाथक रोटी छीनैले पछुअबैत। जेरक-जेर टिकुली गोलिया-गोलिया ऊपरमे नचैत। सुरूज अराम करैक ओरिआनमे लगल...। अछेलालक बीच आँगनमे बोरा बिछा सुमित्रा बच्चाकेँ दुनू जाँघपर सुता जँतबो करैथ आ घुनघुना कऽ गेबो करैथ- “गरजह हे मेघ गरैज सुनाबह हे ऊसर खेत पटाबह सारि उपजाबह हे जनमह आरे बाबू जनमह जनैम जुड़ाबह हे बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुश हे हम नहि जनमब ओइ कोखि अबला कोखि हे मैलहि बसन सुताएत, छौड़ा कहि बजाएत हे जनमह आरे बाबू जनमह जनैम जुड़ाबह हे पीअर बसन सुताबह बाबू कहि बजाबह हे..। झुमि-झुमि सुमित्रा गेबो करैथ आ बच्चाकेँ जँतबो करैथ। बच्चाक आँखि-सँ-आँखि मिलते सुमित्राक मनमे जेना सिनेहक बरखा बरिसए लगैन। बच्चाकेँ कोनो तरहक तिरोट ने होइ, मनमे अबिते सुमित्रा बच्चाक मुँह दिस देखए लगैथ। टाटक अढ़मे बैस अछेलाल, सुमित्राक सिनेह देख दुनियाकेँ बिसैर आनन्द लोकमे बिचरैत रहए। ◌ शब्द संख्या : 2652 2. रवि दिन रहने बचेलाल अबेर कऽ उठल। यएह सोचि बिछानपर पड़ल रहल जे आइ स्कूलो नहि जाएब आ घरोपर कोनो काज नहियेँ अछि। मात्र एक जोड़ धोती, एक जोड़ कुरता आ एक जोड़ गंजीटा खीचैक अछि। दुपहर तक तँ काजो एतबे अछि। बेरू-पहर हाट जा घरक झूठ-फूस कीनि आनब। हाटो दूर नहि गामक सटले अछि...। सुति उठि बचेलाल नित्य-कर्मसँ निवृत्त भऽ दलानक चौकीपर आबि बैसल। रूमा चाह दऽ गेलैन। दू घोंट चाह पिबते पिता मन पड़ि गेलखिन। पिता मन पड़िते बचेलाल अपन तुलना हुनकासँ करए लगल। मने-मन सोचैत रहए, पिता साधारण किसान छला। पढ़ल-लिखल ओतबे जे नाम-गाम टो-टा कऽ लिखि लैथ। काजो ओतबे रहैन जे कहियो काल रजिष्ट्री ऑफिस जा सनाक बनैथ। भरि दिन खेतीसँ लऽ कऽ माल-जालक सेवामे बेस्त रहै छला। मुदा एते गुण अबस्स रहैन जे गाममे केतौ पनचैती होइत वा केतौ भोज-भात होइ वा समाजिक कोनो दसनामा काज, तँ हुनका जरूर बजौल जानि। तेतबे नहि, बुढ़-बुढ़ानुस छोड़ि कियो नाओं लऽ कऽ शोर नइ पाड़ैत रहैन। अपन संगतुरिया ‘भाय’ कहैन आ धिया-पुता-सँ-चेतन धरि कियो ‘गिरहतबाबा’ तँ कियो ‘गिरहतकाका’ कहैन। परिवारे जकाँ समाजोकेँ बुझैत रहला। मुदा हम शिक्षक छी। अपन काजक प्रति इमानदार छी। बिनु छुट्टीए एक्को दिन ने स्कूलमे अनुपस्थित होइ छी आ ने एक्को क्षण बिलम्बसँ पहुँचै छी आ जेते काल स्कूलमे रहै छी, बच्चा सभकेँ पढ़ैबते छी। जेना आन-आन स्कूलमे देखै छी जे शिक्षक सभ कखनो अबै छैथ, कखनो जाइ छैथ आ स्कूलेमे ताशो भँजैत रहै छैथ...। ओना, हमहूँ केकरो उपकार तँ नहियेँ करै छी किएक तँ दरमाहा लऽ काज करै छी। आन शिक्षकक अपेक्षा इमानदारीसँ जीबतो अपना पैघ कमी बुझि पड़ैए। ओ कमी अछि समाजमे रहि समाजसँ कात रहब। स्कूलक समए छोड़ि दिन-राति तँ गामेमे रहै छी मुदा ने कियो टोक-चाल करैए आ ने कियो दरबज्जापर अबैए। मनमे सदिक्षन रहैए जे कमाइ छी तँ दू-चारि गोरेकेँ चाह-पान खुआबी-पीआबी। मुदा कियो कनडेरियो आँखियेँ नै तकैए। हमहूँ तँ केकरो ऐठाम नहियेँ जाइ छी। चेतन सबहक कहब छैन जे दुआर-दरबज्जाक इज्जत छी चारि गोरेकेँ बैसब। मुदा से कहाँ होइए। गाम तँ शहर-बजार नइ छी जे एक्के मकानमे रहितौ लोक–आन-आन क्षेत्रक रहने–लोक आन-आन भाषा बजैए आ आन-आन चलि-ढालिमे अपन जिनगी बितबैए, केकरो कियो सुख-दुखमे संग नै होइत। मुदा समाज तँ से नइ छी। बाप-दादाक बनौल छी। एकठाम साइयो-हजारो बर्खसँ मिलि-जुलि कऽ रहैत एला। रंग-बिरंगक जातियो प्रेमसँ रहैए। सभ सबहक सुख-दुखमे संग रहैए। बच्चाक जन्मसँ लऽ कऽ मरण धरि संग पुरैए...। एहेन समाजमे हमर दशा एहेन किएक अछि? ..जहिना पोखैरक पानिक हिलकोरमे खढ़-पात दहाइत-भँसियाइत किनछैर लगि जाइए तहिना तँ हमरो भऽ गेल अछि! की पानियेँक हिलकोर जकाँ समाजोमे होइ छइ? जँ पानियेँक हिलकोर जकाँ होइ छै तँ हम ओइ हिलकोरकेँ बुझै किए ने छी? हमहूँ तँ पढ़ल-लिखल छी..! जेते समाजक सम्बन्धमे बचेलाल सोचैत तेते मन मलिन भेल जाइत। मुदा बुझि नै पबै छल। अदहा चाह पीला पछाइत जे गिलासमे बँचलै ओ सरा कऽ पानि भऽ गेल। ने चाहक सुधि आ ने अपन सुधि बचेलालकेँ। जेना बुझि पड़ै जे ओहन बोनमे वौआ गेलौं जेतए एक्कोटा रस्ते ने अछि। ..बचेलाल कखनो गंभीरो होइत आ कखनो बड़बड़ाइयो लगैत। आँगनसँ सुमित्रा आबि बचेलालकेँ देख पुछलखिन- “बच्चा, कथीक सोगमे पड़ल छह? किछु भेलह हेन की?” बचेलालक बाजल- “नहि माए, भेल तँ किछु नहि मुदा गामक किछु बात मनमे घुरियाइए। जेकर जवाब बुझिते ने छी।” तारतम करैत सुमित्रा कहए लगलखिन- “गाममे तँ बहुत लोक रहैए मुदा सभ थोड़े गामक सभ बात बुझै छइ। गाममे तीन तरहक रस्ता छइ। पहिल ओ जइसँ समाज चलैए, दोसरसँ परिवार चलैए आ तेसरसँ मनुख चलैए। मनुख अपन चालि परिवारक चालिमे मिला कऽ चलैए। तहिना परिवार समाजक चालिसँ मिला कऽ चलैए तँए तीनूक अलग-अलग चालि रहनौं एहेन घुलल-मिलल अछि जे सभकेँ बुझैमे नै अबैत।” मुँह बाबि बचेलाल माइक बात सुनि बाजल- “माए, तोरो बात हम नीक-नहाँति नहि बुझि सकलौं। मनमे यएह होइए जे किछु बुझिते ने छी। अन्हारमे जेना लोक किछु ने देखैत, तहिना भऽ रहल अछि।” मुड़ी डोलबैत सुमित्रा बजली- “अपने घरमे देखहक- दूटा बच्चा अछि, ओकर तँ कोनो मोजरे नहि। तीन गोरे चेतन छी। तूँ भरि दिन स्कूलेक चिन्तामे रहै छह। भोरे सुति उठि कऽ नअ बजे तक अपन सभ क्रिया-कर्मसँ निचेन भऽ खा कऽ स्कूल जाइ छह। चारि बजे छुट्टी होइ छह। डेढ़ कोस पएरे अबैत-अबैत साँझ पड़ि जाइ छह। घरपर अबैत-अबैत थाकियो जाइत हेबह। पर-पखानासँ अबैत-अबैत दोसर साँझ भऽ जाइ छह। दरबज्जापर बैस कोनो दिन ‘रमायण’ तँ कोनो दिन ‘महाभारत’ पढै़ छह। भानस होइ छै खा कऽ सुतै छह। फेर दोसर दिन ओहिना करै छह। अहिना दिन बितैत जाइ छह। दिनेसँ मास आ मासेसँ साल बनै छइ। कोल्हुक बरद जकाँ घरसँ स्कूल आ स्कूलसँ घर अबैत-जाइत जिनगी बित जेतह। मुदा जिनगी तँ से नइ छी। जिनगी तँ ओ छी, जेना वसन्त ऋृतु अबिते गाछ-बिरीछ नव कलश लऽ बढै़ए तहिना मनुखोक गति अछि। जिनगीक गतिए मनुखकेँ ब्रह्माण्डक गतिसँ मिला कऽ लऽ चलै छइ। अज्ञानक चलैत मनुख ऐ गतिकेँ नहि बुझि छुटि जाइए। छुटैक कारण होइ छै, बेकतीगत, परिवारिक आ समाजिक जिनगी। जे सदिकाल आगूक गतिकेँ पाछू-मुहेँ धकलैत अछि। जइसँ मनुख समैक संग नै चलि पबैए। मुदा तइसँ की। बाधा केतबो पैघ किए ने हुअए मुदा मनुखोकेँ साहस कम नै करक चाही। सदिखन सभ अँगकेँ चौकन्ना करि कऽ चललासँ सभ बाधा टपि सकैए। पुतोहुएजनीकेँ देखहुन। भरि दिन भानस-भात आ धिये-पुतेक आइ-पाइमे लगल रहै छथुन। हमरो जे सक्क लगैए से करिते छी। घर तँ कहुना चलिऐ जाइ छह। मुदा परिवार तँ समाजक एक अँग छी माने परिवारेक समूह ने समाज छी, तँए समाजक संग चलैले परिवारकेँ समाजक रस्ता धड़ए पड़त। से नै भऽ रहल छह। जहिना रेलगाड़ीमे ढेरो पहिया आ कोठरी होइ छै जे आगू-पाछू जोड़ल रहै छइ। मुदा चलै काल सभ संगे चलैए। तहिना मनुखोक होइ छइ।” माइक बात सुनि बचेलालक जिज्ञासु जकाँ बाजल- “अपन परिवारक की गति अछि?” मुस्कियाइत सुमित्रा कहए लगलखिन- “अपन परिवार ठमकल छह। ओना बुझि पड़ैत हेतह जे आगू-मुहेँ जा रहल छी मुदा नहि। तोरा बुझि पड़ैत हेतह जे शिक्षक छी, नीक नोकरी करै छी, नीक दरमहो पबै छी। मुदा अपनो सोचहक जे जखन हम पढ़ल छी, बुधियार छी तखन हमरा बुधिक काज कए गोरेकेँ होइ छइ। जे कियो नहियेँ पढ़ल अछि ओहो तँ अपन काज, अपन परिवार चलैबते अछि। कनी नीक आकि कनी अधला सभ तँ जीबे करैए। आइ तोरा नोकरी भऽ गेलह तँए ने, जँ नोकरी नै होइतह तखन तँ तोहूँ ओहिना जीवितह जहिना बिनु पढ़ल-लिखल जीबैए। अहिना पुतोहुजनीकेँ देखहुन, जेना घरसँ कोनो मतलबे ने छैन। ..हमरो बिआह-दुरागमन भेल छल, हमहूँ कनियाँ छेलौं मुदा आइ जे घरमे देखै छिअ तेना तँ नइ छल। जखन हम नैहरसँ ऐठाम एलौं तखन भरल-पूरल घर छल। सासु-ससुर जीबते रहैथ। जखन चारि दिनक पछाइत चुल्हि छुलौं, तहियासँ सासु कहियो चुल्हि दिस नै तकलैन। ने कोठीसँ चाउर निकालि कऽ दैथ आ ने किछु कहैथ। जेहने परिवार नैहरक छल तेहने एतुक्को। जे सभ काज नैहरमे करै छेलौं सएह सभ काज अहूठीम छल। अपन घर बुझि एकटा अन्न आकि कोनो वस्तु दुइर नै हुअ दइ छलिऐ। अखन देखै छिअ जे पाँचे गोरेक परिवार रहनौं सभ सभसँ सटल नहि, हटल चलि रहलह हेन। सटि कऽ चलैक अर्थ होइ छै सभ सभ काजमे जुटल रही। ई तँ नै कि कियो काजक पाछू तबाह छी आ कियो बैसले छी। परिवारक सभकेँ अपन सिमान बुझि चलक चाही, से नै छह। हम खेलौं कि नहि, तूँ खेलह कि नहि। भनसिया-ले धैनसन। की खाएब, कोन वस्तु शरीर-ले हितकर आ कोन अहितकर हएत तइसँ सभकेँ बुझैक कोनो मतलबे नहि। जे खाइमे चटगर लागत, भलेँ ओ अहितकरे किए ने हुअए, वएह खाएब। जइसँ घरमे बिमारी लधले रहै छह। जहिना सुरूजक किरिणकेँ देखै छहक जे अनेको दिशामे चलैए तहिना परिवारोक काज, सभ दिशाकेँ जोड़ैए, से नइ भऽ रहल छह।” बिच्चेमे बचेलाल बाजल- “माए, नीक-नाहाँति तोहर बात नहि बुझि रहलौं हेन?” तारतम करैत सुमित्रा बुझबए लगलखिन- “बच्चा, देखहक जहिना गाममे किछु परिवार आगू-मुहेँ ससैर रहल अछि तँ किछु परिवार पाछू-मुहेँ। किछु परिवार ठमकल अछि जइसँ गाम आगू-मुहेँ नै बढ़ि रहल अछि। तहिना परिवारोमे होइ छइ। परिवारोमे किछु गोरे आगू बढ़ैक चेष्टा करैए तँ किछु गोरे अदहा-छिदहामे रहैए आ किछु आलस अज्ञान आदिक चलैत पाछू-मुहेँ ससरैए। तँए परिवारकेँ जइ गतिमे चलक चाही, से नै भऽ रहल अछि। तेतबे नहि, ई रोग मनुखक भीतरोमे अछि। किछु लोक अपनाकेँ समैसँ जोड़ि कऽ चलए चाहैए तँ किछु लोक समैक गति नहि बुझि पाछुए-मुहेँ ढुलकैए। ई बात जाबे नीक नहाँति नै बुझबहक ताबे ने मनमे चैन हेतह आ ने आगू-मुहेँ परिवार बढ़तह।” माइक बातसँ बचेलालक मन घोर-मट्ठा भऽ गेल। की नीक, की अधला से बुझबे ने करैत। माथ कुरियबैत बाजल- “माए, जखन मन असथिर हएत तखन बुझा-बुझा कहिहेँ। एक बेरे नै बूझब, दू बेरे बुझैक चेष्टा करब। दू बेरे नै बूझब तीन बेरे चेष्टा करब। मुदा बिनु बुझने तँ काज नै चलत।” बचेलालक बात सुनि मुस्कियाइत सुमित्रा कहलखिन- “बच्चा जखन तोहर पिता जीबते रहथुन तखन घरमे पाथरक बटिखाड़ा छल। ओइसँ जोखै-तौलै छेलौं। एक दिन अपने आबि कहलैन जे आब लोहाक पक्की सेर आ अढ़ैया-पसेरी सभ आएल। हम पुछलयैन जे पथरक जे सेर, अढ़ैया अछि तेकरा फेक देबै? ओ कहलैन, ‘फेकबै किएक। लोहाक सेरकेँ पथरक सेरसँ भजाइर लेब। बटिखाड़ा कम-बेसी हएत सएह ने हएत, ओकरा अपन बटिखाड़ा हिसाबसँ मानि लेबै और की हेतइ। ...बौआ अखन तोरो मन खनहन नै छह, जा तोहूँ अपन काज देखह। हमरो बहुत काज अछि। जखन मन खनहन हेतह तखन आरो गप करब।” अनोन-बिसनोन मने बचेलाल कपड़ा खीचैले विदा भेल। आँगन जा बाल्टीन-लोटा, कपड़ा आ साबुन नेने कलपर पहुँचल। कपड़ा, साबुनकेँ कातमे रखि पहिने कलक चबुतरा साफ केलक। बाल्टीनमे पानि भरि सभ कपड़ाकेँ बोरलक। एकाएकी कपड़ा निकालि दुनू पीठ साबुन लगा-लगा, बगलमे रखैत। जखन सभ कपड़ामे साबुन लगौल भऽ गेलै तखन पहिलुका साबुन लगौलहा कपड़ा निकालि-निकालि खीचए लगल...। सुमित्रा खन्ती लऽ ओल उखाड़ए बाड़ी दिस विदा भेली। बाड़ीमे पतियानी लगा ओल रोपने छेली। तीन-सलिया ओल! कएटा गाछ फुलाएलो! बाड़ी पहुँचसुमित्रा हियासए लगली जे कोन गाछ खुनी। सभ गाछ डग-डग करैत। पतियानीक बीचमे एकटा गाछक अदहा पत्ता पिरौंछ भऽ गेल। पातकेँ पीअर पात देख सुमित्रा वएह गाछ खुनैक विचार केलैन। ओल कटि ने जाए तँए फइलसँ खूनब शुरू केलैन। सात-आठ किलोक हैदरावादी ओल। टोंटी एकोटा ने। टोंटी नै देख सुमित्रा मने-मन सोचए लगल जँ टोंटी रहैत तँ रोपियो दैतिऐ मुदा से नहि भेल। ..ओलक माटि झाड़ि गाछकेँ टुकड़ी-टुकड़ी काटि खाधिए-मे दऽ ऊपरसँ माटि भरि देलखिन। सुमित्रा चाहैथ जे ओलो आ खन्तियो ऐके बेर नेने जाइ मुदा से गरे ने लगैन। दुनू हाथसँ ओल उठा एक हाथमे लऽ दोसर हाथसँ खन्ती लिअ लगैथ कि ओल गुड़ैक कऽ निच्चाँमे खसि पड़ैन। कएक बेर चेष्टा केलैन मुदा नहियेँ सम्हरलैन। तखन हारि कऽ पहिने दुनू हाथे ओल उठा कल लग रखि, खन्ती आनए गेली। खन्तियोमे माटि लगल आ ओलोमे। तँए दुनूकेँ नीक-नाहाँति घुअ पड़तैन...। माएकेँ ठाढ़ देख बचेलाल हाँइ-हाँइ कपड़ा पखाड़ए लगल। कपड़ा लऽ बचेलाल चारपर पसारए गेल। सुमित्रा ओलकेँ कलक निच्चाँमे रखि कल चलबए लगली। गर उनटा-उनटा दस-पनरह बेर कल चलौलैन। मुदा तैयो सिरक दोग-दागमे माटि रहबे केलइ। तखन ओलकेँ घुसुका बाल्टीनमे पानि भरि लोटासँ ओलो, खन्तियो आ अपनो हाथ-पएर धोलैन। आँगन आबि सुमित्रा पुतोहुकेँ कहलखिन- “आइ रवियो छी, बच्चो गामेपर रहता तँए ओलक बरी बनाउ। बड़ निम्मन ओल अछि तँए दू चक्का तड़ियो लेब।” सुमित्राक बात सुनि मुँह-हाथ चमकबैत पुतोहु कहलकैन- “हिनका हाथमे सरर पड़ल छैन तँए कब-कब नै लगै छैन। हमरा तँ ओल देखिए कऽ देह-हाथ चुलचुलाए लगैए। अपना जे मन फुरैन से बनबौथ। हम चुल्हि पजाइर ताबे भात रन्है छी। सभकेँ नवका चीज नीक लगै छै हिनका पुरने नीक लगै छैन।” पुतोहुक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचए लगली जे जवाब दिऐन कि नहि। समैपर जँ जवाब नै देब तँ दबब हएत। मगर जवाब देनौं तँ झगड़े हएत! अपना जे इच्छा अछि वएह करब मुदा बाता-बाती भेने तँ काजे रूकत। जेते बनबैमे देरी हएत तेते भानसोमे अबेर हेतइ। तैयो जवाब दइले तनफनाइते रहली। ओलकेँ बीचो-बीच काटि चारि फाँक करए लगली, ओलक सुगन्ध आ रंग देख बजली- “कनियाँ, जे चीज सभ दिन नीक लागल ओ आइ अधला केना भऽ जाएत? जाबे जीबै छी ताबे तँ खेबे करब। तूँ जेकरा अधला बुझै छहक ओ अधला नइ छी। दुनू गोरेक नजैरमे अन्तर छह। जे अन्तर नीक-अधलामे बदैल गेल छह। दुनू गोरेक नजैर ऐ दुआरे दू रंग भऽ गेल छह जे दुनू गोरेक जिनगी दू रंग बितल। तूँ नोकरिहारा परिवारक छह हम गिरहत परिवारक। तोहर बाप नगद-नरायण कमाइ छेलखुन जइसँ हाट-बजारसँ समान कीनि आनि खाइ छेलह। मुदा हम तँ समान उपजबैबला परिवारमे रहलौं। कोन वस्तु केना रोपल जाइ छै, केना ओकर सेवा करए पड़ै छै से सभ बुझै छिऐ। हमर नीक आ तोहर नीकमे यएह अन्तर छह।” दुनूक गप-सप्प बचेलालो दरबज्जापर सँ सुनैत। बीच आँगनमे बैस सुमित्रा ओल बनबैत रहैथ आ घरमे पुतोहु भनभनाइत रहैन, से सुमित्रा नीक नहाँति सुनबो ने करैथ। तखने बच्चा नेने मखनी आएल। कोरामे बच्चाकेँ देख सुमित्रा दबारैत मखनीकेँ कहलखिन- “मासे दिनक बच्चाकेँ अँगनासँ किए निकाललह! जँ रस्ता-पेड़ामे हवा-बसात लगि जइतै?” हँसैत मखनी कहलकैन- “दीदी, ऐ आँगनकेँ अनकर अँगना कहै छथिन, हमर नइ छी। अपनो अँगना अबैमे संकोच हएत?” मखनीक बात सुनि सुमित्रा मने-मन अपसोच करैत बजली- “अनकर अँगना बुझि नै कहलौं। अखन बच्चा छोट अछि तँए बँचा कऽ राखए पड़त। बेटा धन छी। घरसँ तँ निकलबे करत...।” बिच्चेमे पुतोहुकेँ शोर पाड़ैत कहलखिन- “पहिले-पहिल दिन बच्चा अँगना आएल। तेल-उबटन दहक। अगर उबटन घरमे नै हुअ तँ तेलेटा नेने आबह। ताबे चुल्हि मिझा दहक। पहिने बच्चाकेँ जाँति-पीचि दहक।” घरसँ रूमा तेल आ बिछान नेने आबि अँगनेमे बिछौलक। तेलक माली लगमे रखि बच्चाकेँ कोरामे लेलक। दुनू पएर पसारि जाँधपर बच्चाकेँ सुतौलक। बच्चाक मुँह देख रूमा मने-मन बजली- “मखनी केहेन भाग्यशाली अछि जे भगवान एहेन सुन्नर बच्चा देलखिन।” बच्चाकेँ उनटा-पुनटा कऽ देखैत रूमाक मनमे उठलै- केना लोक बजैए जे फल्लाँक कपार खराब छै आ फल्लाँक नीक। जँ कपार अधला रहितै तँ बेटी होइतै आ जेकर कपार नीक रहै छै ओकरा खाली बेटे होइतै। भगवानक नजैरमे सभ बरबैर अछि। सभ तँ हुनकेँ सन्तान छी। कोन पापी बाप एहेन हएत जे अपना सन्तानकेँ दूजा-भाव करत। अनेरे लोक कपार गढ़ि भगवानकेँ दोख लगबै छैन। ओल देख मखनी बाजल- “ओल अण्डाएल रहु माछ जकाँ बुझि पड़ैए। दीदी, ‘हाथ धोइ लौथु, हम बना लइ छिऐन।” सुमित्रा हाथसँ ओलो आ कत्तो लऽ मखनी ओल बनबए लगली। सुमित्रा हाथ धोइ कऽ दुनू हाथमे करूतेल लगा अपना पएरमे हसोंथि लेलैन। हाथक कबकबी मेटा गेलैन। बिछानपर जा पुतोहुकेँ कहलखिन- “कनियाँ, बच्चा लाउ। हम जाँति दइ छिऐ। अहाँ चुल्हि लग जाउ।” सासुक कोरामे बच्चाकेँ दऽ रूमा चुल्हि पजारए गेली। सुमित्रा बच्चाकेँ जाँधपर सुतबैत मखनीकेँ कहलखिन- “कनियाँ, बीचला चक्का ओरिया कऽ काटब। ओ तड़ब। कतका सभ उसैन कऽ बरी बनाएब।” मुस्की दैत मखनी कहलकैन- “तेहेन सुन्नर ओल छैन दीदी जे चुल्हिपर चढ़िते गलबला जेतैन। खेबोमे तेहने सुअदगर लगतैन जे किछ कहौ ने..। ऐ आगूमे दुदहो-दहीक कोनो मोल नहि।” सुमित्रा बच्चाकेँ जँतबो करैथ आ घुनघुना-घुनघुना गेबो करैथ- “कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे। कौने बाबी पीसल कसाय ओ जे बच्चाकेँ उङारब हे। बड़का बाबा हरबा जोताओल ओ जे सरसो उपजाओल हे। ऐहब बाबी तेल पेरौली बच्चाकेँ उगहारैथ हे।” जाबे मखनी ओल बनौलक ताबे सुमित्रो बच्चाकेँ जाँति-पीचि चानिमे काजरक टिक्का लगा निचेन भेली। मखनीकेँ कोरामे बच्चा दऽ सुमित्रा एक-डेढ़ सेर चाउर आ तीमन जोकर ओल दऽ देलखिन। ◌ शब्द संख्या : 2410 3. अधरतीए-मे सुमित्राक निन टुटि गेलैन। ओछाइनपर सँ उठि आँगन आबि मेघ दिस हियासए लगली। अन्हरिया राति। साफ अकास। सिंगहारक फूल जकाँ तरेगन चमकैत। घरसँ थोड़े हटल, पुबारि भागमे बँसबिट्टी। बाँसक झोंझमे मेना सबहक खोंता। एकटा मेनाकेँ बाझ पकैड़ उड़ि गेल। बाझकेँ उड़िते आन-आन मेना गदमिशान करए लगल। मेना सबहक अवाजकेँ सुमित्रा अकानए लगली। भिनसुरका बोली नहि बुझि सुमित्राक मनमे उठलैन- ‘जनु किछु भऽ गेलइ तँए एना बजैए।’..कनी काल ठाढ़ भेलोपर रातिक ठेकान नै पाबि सुमित्रा फेर ओछाइनपर आबि पड़ि रहली। अनासुरती मनमे एलैन, जहिना अछेलाल समाजमे रहितो समाजसँ अलग अछि तहिना तँ बचेलालो अछि। ओइ दिन वेचारा सते कहलक जे ने केकरो ऐठाम जाइ छी आ ने कियो हमरा ऐठाम अबैए। ने केकरोसँ गप होइए आ ने गामक कोनो बात बुझै छी...। तखने रूमा उठि कऽ लगमे एलैन। पुतोहुकेँ सुमित्रा कहए लगलखिन- “जखन दुरागमन भऽ ऐठाम आएल रही तखन दू-तीन साल अँगनेमे रहलौं। सासु अँगनासँ बाहर नइ हुअ दैथ। बाहरक काज अपने सम्हारैथ। कातिक मासमे छठिक परातेसँ दुनू सासु-पुतोहु शामा गीत गाबी। समाजक सभ स्त्रीगण अपन-अपन अँगनामे सामाक गीत गबैत। ओ आगू-आगू गबथिन आ हम पाछू-पाछू। तीन साल अहिना बितल। चारिम सालक गप छी, शामा भँसौन दिन हुनकर मन खराब भऽ गेलैन। तेते जोर कफ आ उकासी होनि जे बजले ने होइन। भँसौन दिन रहने छोड़लो केना जइतै। बेरूए-पहर ओ एक पाँज धान काटि अनलैन। ओकरा मिड़लौं। अदनार धान तँए ताड़ै-भाड़ैक जरूरते नहि। सासु घानी लाड़ैथ हम उक्खैर-समाठ लऽ कूटी। चूड़ा कुटलौं। बाटीमे अरबा चाउर भीजैले दुपहरे दऽ देने रहिऐ। ओकर पीठार पीसलौं। गोसाँइ लुक-झुका गेल। काजो बहुत रहए तँए हाँइ-हाँइ करी। तहूमे सासुक मन खराबे रहैन मुदा तैयो संग-साथ दैथ। ने अखन धरि समा रंगने छेलौं आ ने वृन्दावनक चुगला झड़काबैले बनौने छेलौं। किएक तँ घरमे सोन रहबे ने करए। हाँइ-हाँइ शामा-चकेबा सभकेँ पीठारसँ ढोरलौं आ सुखैले चँगेरामे दऽ देलिऐ। शामा रंगैले एक्केटा पुड़िया गुलाबी रंग रहए। एके रंगसँ तँ रंगल ने जाएत। कम-सँ-कम लाल, हरिअर, पीअर आ कारी रंग तँ जरूर चाही। दुनू गोरे गुनधुनमे पड़ल रही। अनासुरती हुनका मनमे एलैन जे सीमक पात तोड़ि हरिअरका आ सिंगहारक फूलक डन्टीसँ पीअरका रंग बनौल जा सकैए। मन पड़िते ओ दस-बारहटा सीमक पात तोड़ि आनि हमरा पीसैले कहलैन आ अपने सिंगहारक गाछ लग जा बसिया फूल बीछि अनलैन। हम सीमक पात पीसए लगलौं आ ओ सिंगहारक डन्टी तोड़ए लगली। मनमे सवुर भेल। किएक तँ काजरसँ करिया रंगक काज चलि जाएत। रंग तैयार होइते दुनू गोरे रंगलौं। रंगल जखन भऽ गेल तखन हुनका मन पड़लैन जे झाँझी कुत्ता, ढोलिया आ लड़ुबेचा तँ बनेबे ने केलौं! आब की हएत? वीध तँ पुरबए पड़त।” कनी रूकि फेर बाजए लगली- “गुनधुन करैत सासु कहलैन- कनियाँ, कनी माटि सानि तीनू बना लिअ। मुदा धड़फड़मे सूखत केना? तैयो तीनू बनेलौं। काँच दुआरे ओकरा नै ढोरलौं आ ने रंगलौं। सभकेँ चँगेरामे सेरिया कऽ रखि भानसक जोगारमे लगि गेलौं। सासु मालक घरमे ओछरा दइले गेली आ हम भानस करए लगलौं। भानस भेलो ने छल कि उत्तरबारि टोलमे शामा-गीत शुरू भेल। बाबूओकेँ[1] आ हुनको[2] खुआ दुनू गोरे[3] खेलौं। थारी-लोटा, बरतन-बासन अखारि रखि देलिऐ आ दीप जरेलौं। दुनू गोरे गीत गबए बैसलौं। जहाँ ओ[4] गोसाउनिक गीत उठौलैन कि उकासी हुअ लगलैन। एक लखाइते बड़ी काल धरि खोंखी करिते रहली। उकासी बन्ने ने होइन। हम हुनकर छाती दाबि-दाबि ससारए लगलौं। तखन उकासी बन्न भेलैन। उकासी बन्न होइते कहलैन- कनियाँ, हमरा गौल नै हएत। आइ भँसौन छी तँए छोड़बो नीक नै हएत। जएह अबैए सएह गाबि वीध पुरा लिअ। ..सासुक आग्रह सुनि तरे-तर खुशी भेलौं जे हमरो लूरि देखती। पहिने तँ थोड़े नाकर-नुकर केलौं जे हमरा गीत नै अबैए मुदा फेर सोचलौं जे लूरिकेँ झाँपियो कऽ रखब नीक नहि। गाबए लगलौं। आगू-आगू हम कहिऐ आ पाछूसँ ओ धरैथ। उकासी दुआरे घुनघुनेबेटा करैथ। आँगनमे गोसाउनिक गीत गाबि चँगेरा उठा बटगबनी गबैत चौमास दिस विदा भेलौं। चौमास जाइत-जाइत गीतो खतम भेल। चौमासमे चँगेरा रखि शामा गीत शुरू केलौं। पहिल गीत समाप्त होइते सासु कहलैन जे लगले सूरे पाँचटा पुरा लीअ। पहिलुक गीत तँ हुनको अबैत रहैन तँए घुनघुनाइयो कऽ संग पुरि देलैन मुदा दोसर नै अबैत रहैन तँए कखनो घुनघुनाइथ आ कखनो चुप भऽ जाथि। हम देखियो कऽ अपना सूरे गबिते रहलौं। जहिना भरल कोठीक मुँह खोललासँ चाउर भुभुआ कऽ निकलैए तहिना हमरो हुअए। एक्के सूरे दस-बारहटा शामा गीत गाबि लेलौं। गामक जेते शामा खेलेनिहारि रहैथ सभ अपन-अपन शामा भँसा आँगन गेली। हमहूँ शामा भँसा सोहर गबैत अँगना विदा भेलौं। एक्के-दुइए गामक गीत गौनिहारि आबए लगली। पाछू-पाछू ओहो सभ भाँज पुरए लगली। एकटा सोहर गाबि दोसर उठेलौं। सासुक मन खराब रहैन तँए खिसिया कऽ ओ सुतैले चलि गेली मुदा पाँचटा सोहरो गौलौं। नवकी कनियाँ सभ मुँह दाबि-दाबि बजैत जे दीदी नाचमे रहै छेलखिन तँए हाथ चमका-चमका गबै छैथ। ओछाइनपर सँ कखनो-कखनो साउसो घुनघुना-घुनघुना गेबौ करैत आ चाबस्सियो दैथ। सोहरक पछाइत समदाउन उठेलौं। नवतुरिया सभकेँ भास चढ़बे ने करइ। घरेसँ माए कहलखिन, ‘ठी-ठी केने समदाउन गौल जाइ छइ? मनुख जकाँ मन असथिर कऽ कऽ गाओले ने होइ छैन।’ अपन कमजोरी मानि मंगली कहलक, भौजी समदाउन छोड़ि एकटा बरहमासा कहियौ। मंगलीक विचारकेँ सभ समर्थन दैत हुँहकारी भरलक। हम बरहमासा शुरू केलौं- रघुवर जुनि जइयौ मिथिला नगरसँ सिआ कोहवरसँ ना। अगहन सिआ के बिआह पूस सेजिया लगायब, माघ सीरक भरबाएब रघुवर क, सिआ कोहबरसँ ना। फागुन फगुआ खेलाएब चैत माला गाँथि लाएब बैशाख बेनिया डोलाएब रधुवर क, सिआ कोहवरसँ ना। जेठ तबे दिन-राति आषाढ़ बरसे दिन-राति सावन झुला झूला कऽ, सिआ कोहवर से ना। भादव राति अन्हार आसीन आस लगायब कातिक चलि जाएब मिथिला नगर से, सिआ कोहवर से ना...।” रूमा अपन सासुक बात धियानसँ सुनैत। पुतोहुकेँ धियानसँ सुनैत देख सुमित्रा आरो आगू बजली- “बरहमासा गबैत-गबैत रातियो बेसी भऽ गेलै आ ओससँ सबहक नुओ सिमैस गेल। मुदा तैयो उठैले कियो तैयारे ने होइत। हाँ-हाँ, हीं-हीं सभ करैत। अपनो थाकि गेलौं। तखन दुनू हाथ जोड़ि कहलिऐ, बड़ राति भऽ गेल। आब जाइ जाउ। काल्हिसँ आबि-आबि सुनबो करब आ सीखबो करब। तखन सभ गेल। हमहूँ सुतैले गेलौं। औझुका जकाँ ने पढ़ल-लिखल जनिजाति छल आ ने पढ़ै-लिखैक सुविधा छेलइ। एक-एकटा गीत सीखैमे कए-कए दिन लगि जाइ छेलइ। हमहीं जे सीखलौं ओ माएसँ सीखलौं। काजो करै काल सीखी आ रातिमे खेला-पीला पछाइत माएकेँ जँतैले जाइ तखनो सीखी। जखन गीत इयाद भऽ जाए तखन माएकेँ गाबि सुना दिऐ। ..दोसरे दिनसँ गीत सीखैले ढेरबासँ लऽ कऽ जुआन कनियाँ धरि आबए लगल। गामक बेटी सभ तँ जखन-तखन आबि जाए मुदा कनियाँ पुतोहु वर्गक दोसैर तेसर साँझमे आबै। अँगनाक काज बरदाइत देख सभकेँ कहि देलिऐ जे साँझू-पहरमे आबह। सएह भेल। छह मास धरि सभकेँ गीत सिखेलौं। जखन अपने[5] मरि गेला तखन घरक भार पड़ि गेल। दुनू बच्चा लिधुरिया। की करितौं। खेती-बारीसँ लऽ कऽ अँगना-घरक काज सम्हारए पड़ै छल। अपने काजमे तेना ओझराए गेलौं जे दोसराक सुधिए ने रहल। समाजमे केतौ बिआह होइ वा उपनाइन तँ हमरो हकार अबै छल। हमहूँ जा कऽ गोसाउनिक गीतसँ लऽ कऽ समदाउन तक गबै छेलौं। जे सभ छुटि गेल। अखनो ओ सभ जँ एमहर अबैए तँ जरूर भेँट करैए। मुदा आब तँ अपने सभकेँ बाल-बच्चा, नाति-पोता भऽ गेलइ। सभ अपने-अपने परिवारमे ओझराएल रहैए। हमहूँ बुढ़ भेलौं तँए पहिलुका जकाँ काजोमे नइ सकै छी। जाधैर गामक लोकसँ लाट रहै छल ताधैर सभ नीक-अधला बुझै छलिऐ। केकरा ऐठाम पाहुन आएल वा केकरा घरमे केते नून-तेल खर्च होइ छेलै सभटा बुझै छलिऐ। समए जिनगीकेँ छोट बना देलक। खाएर.., जाबे जीबै छी ताबे दोसराक भार नै बनिऐ तइले भरि दिन लुड़ु-खुड़ुमे लगल रहै छी। अखनो बाड़ी-झाड़ीमे तीमन-साजन उपजैबतै छी, भानसो करिते छी, अँगना-घर बहारिते छी, चिक्कैन माटिसँ घर नीपते छी। ..कखनो ई नहि बुझि पड़ैए जे अथबल भेलौं। जखने काजसँ हटब तखने जिनगी भार बुझि पड़त। जिनगी की छी। जिनगी तँ यएह छी जे हँसैत-खेलैत बिता ली। जे अखन धरि तँ निमहल, आगू बुझल जेतइ।” रूमा अपन सासुक बात धियानसँ सुनैत रहल। भोर भऽ गेल। चिड़ै चुनमुनी जुट बान्हि-बान्हि खोंतासँ निकैल अकासक रस्तासँ पराती गबैत जिनगीक लीला करए विदा भेल। ◌ शब्द संख्या : 1260 4. अँगना बहारि सुमित्रा दरबज्जा बहारए गेली। दरबज्जा बाहरैसँ पहिने बरदपर नजैर पड़लैन। डेढ़ियापर बाढ़ैन रखि मुँहपर हाथ दऽ बैस देखए लगली। बरदक दशा देख सुमित्राक दुनू आखिसँ नोर टघरए लगलैन। ताबे बचेलालो सुति उठि कऽ दरबज्जापर आएल मने-मन सुमित्रा सोचए लगली, जाबे बचेलालक पिता जीबै छला ताबे जोड़ा बरद खुट्टापर रहै छल। दुनू बरदकेँ खुआ-पीआ पट्ठा बनौने रहै छला। ने एकटा कुकुर माछी देहपर रहए दइ छेलखिन आ ने एकोटा अठगोरबा रहै छेलइ। जहिना लोक अपन बच्चाक सेवा करैए तहिना ओ गाए-बरदक सेवा करै छला। जखन अपने जीबै छला हमहूँ जुआन छेलौं। दुनू बेकती मिलि घर-अँगनासँ लऽ कऽ खेती-पथारी धरि सम्हारै छेलौं। आब बुढ़ भेलौं आब केना गाए-बरदक सेवा कएल हएत? जँ कहीं अनचोकमे लथारे मारि दिअए वा हूरपेटे दिअए तखन तँ हाथ-पएर तोड़ा घरमे कुहरैत रहब। तइसँ नीक जे ओकरा लग जेबे ने करी। भरि दिन बचेलालो स्कूलेक आइ-पाइमे लगल रहैए। पुतोहुओ जनी तेहेन घरसँ आएल छैथ जे गाए-बरदसँ कहियो भेँटे ने। घास-पात दुआरे खुट्टापर बरद कलपैए। ने एक मुट्ठी कियो घास देनिहार आ ने एक डोल पानि नमेनिहार। कखनो एक मुट्ठी घास आगूमे फेक देलिऐ तँ कखनो एक डोल पानि पिआ देलिऐ। ऐसँ गाए-बरद केना पोसल जाएत..? सुमित्रा सोचबो करैत आ आँखिसँ नोरो टघरैत। दलानक आगूमे बचेलाल दतमैनो करैत आ टहलबो करैत। अछेलालकेँ घरमे चुन नै रहने मुट्ठीमे तमाकुल नेने चुन मांगए आएल। सुमित्राक आँखिसँ नोर टघरैत देख बचेलाल पुछलकैन- “माए, कानै किए छँह?” सुमित्रा किछु नै उत्तर देलखिन। दुनू आँखिक नोर आँचरसँ पोछि बचेलाल दिस देखए लगली। हाथमे तमाकुल रखने अछेलालो चुपचाप ठाढ़। ने चुन मंगैक साहस होइ आ ने किछु बजैत। सुमित्राक मलिन चेहरा देख अछेलालोक आ बचेलालोक चेहरा मलिन हुअ लगल। त्रिकोण जकाँ तीनू गोरे। कियो ने किछु बजैत। कनी कालक पछाइत मिड़मिड़ा कऽ अछेलाल सुमित्रासँ पुछलकैन- “एते सोगाएल किए छी भौजी? कथीक दुख मनमे अछि?” फेर आँचरसँ नोर पोछैत सुमित्रा बजली- “एतै आउ। लगमे बैसू। कहै छी। बौआ बचेलाल, तोँहू मुँह-हाथ धोने आबह?” बचेलाल मुँह-हाथ धोइले कलपर गेल। अछेलाल लगमे आबि सुमित्राकेँ बाजल- “चुनक दुआरे तमाकुलो ने खेलौं भौजी। मन चटपटाइए। पहिने कनी चुन आनि दिअ।” “अच्छा बैसू। अँगनासँ नेने अबै छी।” कहि सुमित्रा आँगन विदा भेली। डेढ़िएपर सँ बचेलाल जोरसँ घरवालीकेँ चाह बनौने अबैले कहलक। दू घुस्सा दऽ अछेलाल तमाकुल चूना ठोरमे लेलक। दुनू गोरेकेँ सुमित्रा कहए लगलखिन- “एक समैक बात छी। हमरा नैहरमे एकटा गौड़ बाबू देने रहैथ। बड़ सुन्नर बाछी छेलइ। छह मास पोसलौं तखन पाल खेलक। ठीक नअ मास पुरिते बाछी तरे बिआएल। बड़ दूधगर गाए भेल। दू सेर भिनसर आ डेढ़ सेर बेरू-पहर-के दूध हुअए। गाए तँ गाइए छल। जखन बेगरता हुअए तखन पाभैर-आसेर दुहि ली। बड़ सहठुल छल। एगारह बिआन बिआएल। जहाँ तीन मास बिएना होइ कि पाल खा लिअए। पाल खेलापर छह मास लगबो करए। जखन तीन मास बिआइले बाँकी रहै छेलै तखन अपने दुहब छोड़ि दइ छेलिऐ। जहिना नाओं गाए तहिना सज्जनो। खाइयो पीबैमे कोनो चीज बगै नै छेलइ। लत्ती-कत्तीसँ लऽ कऽ तीमन तरकारीक छाँट-छूँट आगूमे दइते लप दे खा लैत रहए। तीन मास बिएना भेलै कि बड़ जोर दुखित पड़ल। गामक लोक सभ जे-जे दबाइ बतौलक सभ केलिऐ मुदा दुख घटैक बदला बढ़िते गेलइ। मनमे हुअए जे कोन जन्ममे पाप केलौं जे एहेन लागल फुलवाड़ी उजड़ि रहल अछि। दुनू परानीक आशा टुटि गेल। सोगे अन्नो-पानि नीक नै लगए। बच्चाकेँ देख दयासँ हृदए पधिल गेल। गाए अपने दुखसँ तबाह तँ बच्चाकेँ केना लगमे जाइ दैतै। जेना बच्चापर सँ सूर्ता हटि गेलइ। सिरियाक गाए बिआएल रहइ। ओकरेसँ पाभैर कऽ दूध ली आ बच्चाकेँ खुरचनसँ पीआबी। मुदा पाभैरसँ बच्चाकेँ की होइतै? फुलकीबला घास आ खिचड़ीक आदति रसे-रसे लगबए लगलौं। पड़ले-पड़ल गाए डिरियेबो करै आ चारू टाँगो पटकै। मनमे हुअए जे नैहरक गाए छी जँ मरि जाएत तँ नैहराक लोक कहत जे धारबे ने करै छइ। मुहसँ फुफरी उड़ए। हमरोसँ बेसी हुनके (पति) चिन्ता होइन। सोगे हदिघड़ी चौकीपर पेटकानो लधने आ कुही भऽ भऽ कनबो करैथ। बेर टगिते एकटा महात्मा जे दाढ़ी-केश बढ़ौने रहैथ, रस्ते-रस्ते केतौ जाइत रहैथ। महात्माक नाओं देवन छेलैन। गाइक डिरिएनाइ सुनलखिन। थोड़ेखान रस्तापर ठाढ़ भऽ हियासलैन। तखन ससैर कऽ दुआरपर एला। मुड़ी गोंति हम अथाह दुखमे डुमल रही। दुआरपर अबिते देवन निंगहारि-निंगहारि गाएकेँ देखए लगलखिन। कनी काल गुम्म भऽ पुछलैन, केते दिनसँ गाए अस्सक अछि?कँपैत मनसँ कहलयैन, सात दिनसँ। फेर पुछलैन, घरवारी कहाँ छैथ? हाथक इशारासँ चौकीपर देखा देलिऐन। हाथेक इशारासँ ओहो हुनका लग अबैले कहलखिन।” कनी रूकि कऽ फेर बाजए लगली- “लग अबिते मुस्कियाइत कहलखिन, गाए मरत नहि। दुनू बेकती मनसँ दुख हटाउ। कहि अपना झोरासँ कथुक जड़ि निकालि दऽ कहलखिन, एकरा सिलौटपर खूब हलसँ पीसने आउ। ओइ जड़ीकेँ धोइ सिलौटपर सँ पीसने एलौं। भरि गिलास पानिमे ओइ जड़ीकेँ घोरि गाएकेँ पीआ देलखिन। तीनू गोरे गप-सप्प करए लगलौं। कनीए कालक पछाइत गाइक डिरियाएब बन्न भेलइ। आँखि उठा कऽ गाए बच्चा दिस तकलक। बच्चापर नजैर पड़िते हुकरल। बच्चो बोली देलकै। बाछीकेँ खुजले छोड़ि देने रहिऐ। दौग कऽ बाछी गाए लग आबि ठाढ़ भऽ गेलइ। चारू टाँग समैट गाए ओरिया कऽ बैसल। गरदैन उठौलक। उठल गरदैन देख केतौसँ पराण आएल। मनमे खुशी भेल। अपने कहलैन, गाइक रोग छुटि रहल अछि। आब गाए बँचि जाएत। एते कहिते छला कि गाए उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलि। मुदा चारू टाँग थरथराइते रहइ। नेरू गाइक थन दिस बढ़ए लगल आकि अपने डोरी लगा देलखिन। घरसँ घास आनि हम आगूमे देलिऐ। गाए खाए लगल। हमर करेज चमैक उठल। जहिना जाड़क मासमे करिया पहाड़पर ओस पसरल रहैए आ सुरूजक रोशनी पड़िते चानी जकाँ चमकए लगै छै, तहिना भेल।” कनी रूकि कऽ फेर बाजए लगली- “तोहर पिता देवनकेँ कहलखिन, महात्माजी, अपने भोजन कऽ लेल जाउ। हँसैत देवन उत्तर देलकैन, भोजन जरूर करब मुदा ऐ गाइक दूधक खीर खाएब। ताबत एक लोटा जल पिआ दिअ। महात्माजीक बात सुनि दुनू परानीक मन बिहुँसि उठल। घरक काते-काते जे घास रहै ओकरा नोचि-नोचि हम गाइक आगूमे दिअ लगलिऐ आ अपने बाँसक पत्ता तोड़ए गेला। आहूल भरि घास गाइक आगूमे दिऐ आ ओ लप दे खा जाएत। पँजरामे पँजरा जे सटल रहै से अलगए लगलै। इनारसँ पानि भरि अनलौं। आगूमे दइते बाल्टीनो भरि पी लेलक। फेर एक बाल्टीन अनलौं, सेहो पी गेल। ताबे अपनो पात अनलैन। दुनू गोरे पात खोंटि-खेंटि दिअ लगलिऐ। अदहा बोझ पात खा गेल। तखन देवन कहलैन जे आब दुहि लीअ। थन लटैक कऽ ठेहुन लग चलि आएल रहइ। बच्चाकेँ डोरी छिटिका देलिऐ। दौग कऽ बच्चा पिबए लगलै। अपने दुहए लगला। बाल्टीन भरि गेल। दूध देख मनमे भेल जे दुखीत गाइक दूधो तँ दूषिते हेतइ। मुदा देवन-महात्माजी कहलैन जे दबाइक गुण तँ सेहो दूध तक पहुँच गेल हेतइ। तीन दिनक भूखल दुनू परानी रही। जाबे गाए दुखित रहए ताबेतक भूखो नै बुझिऐ मुदा अपनो भूख जगल। हम भानस करए गेलौं आ अपने देवनसँ गप-सप्प करए लगला। सभटा दूधक खीर रन्हलौं। पहिने माहात्माजीकेँ खुआ अपने दुनू बेकती खेलौं। ओइ गाइक जरोह ई बरद छी। जेकर दशा देख पैछला सभ बात मन पड़ि गेलि तँए आँखिमे नोर आबि गेलि।” रूमा चाह नेने आएल। सभ कियो चाह पिबए लगल। चाह पीब अछेलाल तमाकुल चुनबए लगल। तमाकुल चुना कऽ खा सुमित्राकेँ पुछलकैन- “तेकर बाद की भेलै?” सुमित्रा बाजए लगली- “खेला-पीला पछाइत देवन विदा हुअ लगला। हम झोरा पकैड़ कहलयैन कम-सँ-कम आइ भरि रहि जाउ। काल्हि चलि जाएब। मानि गेला। खा-पी कऽ रातिमे देवन अपन जिनगीक कथा कहए लगला। दुनू परानी सुनिनिहार रही आ ओ कहनिहार। कहए लगला, जखन हम दसे बर्खक रही तखने माइयो आ बाबूओ दुखित पड़लैथ। हम कमाइ-खटाइ जोकर नै रही। माए-बाबूजी कमाइसँ घर चलै छल। अनासुरती दुनू गोरे दुखित पड़ि गेलैथ। खाइले घरमे किछु रहबे ने करए। एक तँ दुखसँ दुनू गोरे अब-तब करैत रहैथ, दोसर पेटमे अन्न नहि। सिरिफ पानिटा दिऐन। हमहूँ हदिघड़ी लगेमे रहै छेलिऐन। हुनका सभकेँ छटपटाइत देखिऐन तँ हमरो दुख हुअए। मुदा की करितौं? कोनो रस्ते ने सुझैत। पाँचम दिन दुनू गोरे मरि गेला। जाबे दुखित रहैथ ताबे समाजक कियो ने अबै छल आ ने किछु मदैत करए। मुदा जखन मरि गेला तखन जिगेसा करए किछु गोटा एला हमहूँ केकरो ने किछु कहलिऐ। मनमे आएल जे जइ समाजमे कियो केकरो देखैबला नै ओइ समाजमे रहिए कऽ की करब। दुनू गोरे घरेक बिछानपर मुइला? हमरो हड़ल-ने-फूड़ल जेते अँगनाक टाट-फड़क रहए सभकेँ उजाड़ि घरमे दऽ देलिऐ। मनमे आएल जे जरबै काल नव-वस्त्र हेबा चाही। मुदा सोचलौं जे जीबैतमे तँ दुनू गोरे फाटल-पुरान कपड़ा पहिरलैथ मुदा जरैले नव वस्त्रक कोन जरूरी छइ। सभ समान जमा कऽ कऽ घरमे आगि लगा देलिऐ। जखन आगि पजरल तखन अँगनामे एकटंगा दऽ हाथ जोड़ि संकल्प केलौं जे ऐ समाजमे नै रहब। जइ समाजमे लोक अन्न बिनु काहि कटैए, वस्त्र बिनु नाँगट रहैए, दबाइ बिनु रोगसँ मरैए ओइ समाजमे एक्को क्षण रहब कायरता छी। आँगनसँ विदा भऽ गेलौं। जाबे गामक सिमानक भीतर रही ताबे घुमि- घुमि पाछुओ ताकि आगि देखिऐ मुदा जखन गामक सिमानपर पहुँच गेलौं तखन तक घरो जरि गेल छल। गामक सिमानेपर ठाढ़ भऽ दुनू हाथ जोड़ि पाँच ठोप नोर चुबा माए-बाबूक सराध कऽ विदा भऽ गेलौं। गामक सिमान टपिते मनमे हिलोर उठए लगल। एकटा फूलक गाछ रस्ताक बामामे भाग देखलिऐ। बड़ सुन्नर गाछ छेलइ। निच्चोमे हरिअर कचोर दूबि पसरल छेलइ। नीक जगह देख ओइ गाछक निच्चाँमे बैस गेलौं। मनमे भेल जे दुनू गोरे–माए आ बाबू- पछुएने आबि गाछपर चढ़ि गेला। आँखि उठा कऽ ऊपर तकलौं। किछु ने देखलिऐ। एकटा भोम्हरा उड़ि-उड़ि फूलक रस पीबैत रहए। सिहकी चलैत रहइ। ओइ सिहकीक लहैरमे किछु अवाज होइत रहइ। साकांच भऽ कानपर हाथ दऽ ओइ अवाजकेँ सुनए लगलौं। अवाज पिताक बुझि पड़ल। अवाज परेखि आरो धियानसँ सुनए लगलौं। बुझि पड़ल जे बाबू किछु कहि रहल छैथ। मुदा स्पष्ट बुझबे ने करिऐ।” कनी रूकि कऽ फेर बाजए लगली- “मने-मन कहलयैन, अपन पाँच बून नोर चुबा हम अपन कर्तव्य पुरा कऽ लेलौं। आब हम मुक्त छी। तखन अहाँ किएक पछुएने एलौं। ई सुनि ओहो कनैत-कलपैत स्वरमे कहए लगला, बौआ, तोहर अवस्था दसे बर्खक छह तँए तोहर कोनो दोख नहि। अखन तूँ खाइ-खेलाइ बला छह, कमाइ-खटाइबला नहि। तँए तोहर कोन दोख। बड़ इच्छा छल जे बेटाकेँ पढ़ा-लिखा मनुख बनाबी मुदा सभटा मनेमे रहि गेल। मुदा हमरो कोनो दोख नइ अछि। जँ जीबैत रहितौं तखन ने से तँ हमहूँ मरिए गेलौं। तोरा हम असिरवाद दइ छिअ जे जखन घर छोड़ि निकललह तँ दुनियाँ देखह। दुनियेँमे सभ किछु छइ। हदिघड़ी मनुखक बीचमे रहिहह। मनुखेक बीचमे सरस्वती बास करै छथिन। ओइ बीच रहि तूँ पण्डित भऽ जेबह। मुदा एकटा बात हदिघड़ी मन रखिहह जे अपना मेहनतसँ जीवन-यापन करिहह। केकरो एक्को पाइक कर्जदार नै बनिहह। पिताक असिरवादसँ हमरा नव ज्योति भेटल। नव शक्ति जगल। मनसँ चाउर मरूआक भेद मेटा गेल! मेटा गेल गंगाजल आ डबरा पानिक भेद!मेटा गेल सजल-धजल फुलवाड़ीक फूलक सुगन्ध आ जंगलक अनेरूआ फूलक भेद, मेटा गेल उज्जर-कारी मनुखक भेद! ..नव उत्साह जगिते उठि कऽ विदा भेलौं। विदा होइते माइक अवाज गाछपर सँ आबए लगल। रूकि कऽ सुनए लगलौं। माए कहैत रहैथ- ‘बेटा, बड़ इच्छा छल जे भरल-पूरल परिवार देखब। मुदा सभ मेटा गेल। जँ बेटा बनि जन्म भेल हेतह तँ दुनियाँ देखबे करबह नइ तँ तोरा सन-सन बहुतो वौआइत-ढहनाइत मरैए।’ ..भूखसँ देह जरै छल मुदा विवेक रूपी सारथी ओइ रूपे प्रेरित करै छल जेना नाँगर घोड़ा रथ घिचैए। जाइत-जाइत एकटा गाम पहुँचलौं। जाड़क मास छेलइ। गामसँ हटल एकटा परिवार बाधमे। भिनसुरका समए सुरूज उगि गेल रहए। ओइ परिवारमे दूटा बच्चा। दुनूक उमेर पाँच बरख सात बरख। दुनू नँगटे। दुनू घरक पछुआरमे खढ़ बिछ-बिछ घूर लगबैत। हम रूकि गेलौं। मनमे आएल जे हमहूँ घूर लगबैमे बच्चाक संग दिऐ। हमहूँ नार-पात बिछए लगलौं। एकटा बच्चा अँगनासँ आगि अनलक। घूर सुनगेलौं। तीनू गोरे आगि तापए लगलौं। देह गरमाएल। कनी कालक पछाइत ओइ बच्चाक माए छिपलीमे भात-तीमन नेने आबि आगूमे रखि देलकै। ओ औरत तीस-पैंतीस बर्खक मुदा देखैमे अधबेसू बुझि पड़ैए। हमरा बैसल देख ओ पुछलक, बौआ, कोन गाम रहै छह। हम कहलिऐ, ‘हमर कोनो गाम नइ अछि। माए-बाप मरि गेली। दुनियाँ देखैले जाइ छी। जाबे तक जीबैत रहब ताबे तक चलिते रहब। मुदा बिनु दुनियाँ देखने छोड़ब नहि।’ ..हमरा देख ओइ वेचारीकेँ दया लगलै। बच्चाक आगूक छिपली उठा अँगना गेल। भारामे जे भात-तीमन रहै काढ़ि कऽ नेने आएल। तीनू गोरे संगे-संग खेलौं। मुँह-हाथ धोइ कऽ पानि पीब विदा हुअ लगलौं। तँ ओ औरत कहलक, ‘आइ नै जो बौआ। जहिना दूटा बच्चा पोसै छी तहिना तोरो पोसबो।’ ..औरतक बात सुनि हम रूकि गेलौं। बौआ बचेलाल भरि राति देवन अपन जिनगीक बात कहिते रहल आ हम दुनू परानी सुनिते रहलौं। आब बेरो बहुत भऽ गेल। काजो उदम बहुत अछि। फेर कहियो ऐगला बात कहबऽ।” जहिना नीन टुटिते, सूतल आदमी विहान देखैए तहिना अछेलालो आ बचेलालकेँ भेल। दुनू गोरेक मुहसँ हँसी निकलए लगल। ओना दुनू गोरे आँखि गड़ा सुमित्रे दिस देखै तकै छल मुदा हृदैमे हिलकोर उठए लगलै। जहिना भुमकमक समए पोखैरक पानि हिलकोरसँ किनछैरमे ऊपरो चढ़ैत आ फेर टघैर अपना जगहपर चलि अबैत तहिना दुनू गोरेक मनमे हुअ लगल...। अछेलाल सुमित्राकेँ कहलक- “भौजी, आइ घरि एहेन खिस्सा नै सुनने छेलौं। औझुका खिस्सा सुनलासँ बुझि पड़ैए जेना तरको आँखि खुजि गेल।” अछेलालकेँ सुमित्रा किछु कहए लगलखिन कि बिच्चेमे पानि पीबैले बरद हुकरल। बरदक हुकरब सुनि बचेलालकेँ सुमित्रा कहलकखिन- “बौआ, बरद पियासल छह। अँगनासँ बाल्टीन आनि पानि पीआ दहक।” माइक बात सुनि बचेलाल आँगनसँ बाल्टीन आनि कलपर सँ पानि भरि कऽ आनि, बरदकेँ पीआबए लगल। सौंसे बाल्टीन पानि बरद पीब गेल। फेर दोसर बाल्टीन पानि आनैले बचेलाल कल दिस बढ़ल। पानि पीआ बचेलाल नादिमे कुट्टी लगौलक। नाइदमे कुट्टी पड़िते बरद हपैस-हपैस खाए लगल जहिना भूखल आदमी नूनगर-अनून नहि बुझैत तहिना बरदोकेँ भेलइ। बरदकेँ खाइत देख सुमित्राक मुहसँ हँसी निकललै। हँसैत सुमित्रा बचेलालकेँ कहलक- “बौआ, तोहूँ जुआन छह आ घरोवाली जुआन छेथुन। मुदा...।” अकचकाइत बचेलाल पुछलक- “मुदा की?” सुमित्रा बजली- “मुदा, यएह जे कनियाँ जे छेथुन ओ मेहनतसँ हटल रहए चाहै छथुन। हदिघड़ी आरामे करब मनमे रहै छैन। पुरुख-नारीक जे वैवाहिक सम्बन्ध अछि से नै बुझै छथुन। तोहूँ अनका पढ़बै छह मुदा अपन बात बुझबे ने करै छहक। एहेन बात हम ऐ दुआरे कहि रहल छिअ जे आइ चालीस बर्खसँ हम ऐ आँगनमे रहैत एलौं हेन। जइ रूपमे हमर जुआनी बितल ओइसँ बहुत दूर हटल कनियाँक छैन। हमरा खुशी होइए जे बेटाकेँ मास्टर बना ठाढ़ केलौं। तँए अपन मेहनतकेँ सार्थक बुझै छी। मुदा पुतोहु जनीक जे चालि-ढालि छैन ओइसँ भोगी-विलासीक परिवारक रूप-रेखा बनि रहल छह। मनुख तँ भोगी नै योगी होइए। हम बुढ़ भेलौं। केते दिन जीबे करब। मुदा परिवार देख अधमौगैत भऽ रहल छी। जाबे आँखि तकै छी ताबे घरक अधला केना देखल जाएत? मुदा की करब। हदिघड़ी रक्का-टोकी करब नीक हएत? तूँ असगरे केते करबऽ। लोहाक मशीन तँ नै छह। जेते खेत अखन छह तेतबे पहिनौं छेलह। जइसँ परिवार नीक नहाँति चलै छेलह। परिवारसँ आगू बढ़ि दुनू बेकती समाजसँ जुड़ल छेलौं। अखन दुख होइए जे बहुत निच्चाँ उतैर गेलौं मुदा तूँ दुनू परानी बुझै छहक जे आगू बढ़ि रहल छी। उन्नैत भऽ रहल अछि। अखन घरक आमदनीक दूटा रस्ता भऽ गेल छह- एकटा नोकरी, दोसर खेती। मुदा घुसैक रहलह हेन पाछू-मुहेँ।” बिच्चेमे बचेलाल बाजल- “माए, जेते तूँ बुझै छीही तेते हम थोड़े बुझै छिऐ?” मुस्कियाइत सुमित्रा उत्तर दैत कहए लगलखिन- “बौआ, आइ बुझि पड़ैए जे तोहर नजैर बदैल रहलह हेन किएक तँ जँ ई बात पहिने बुझितहक तँ सीखैक चेष्टा करितहक। मुदा जखने जागी तखने परात। जिनगीमे सभसँ पहिने सभकेँ अपन सीमा-सरहद बुझक चाही। जाघरि अपन परिचए लोककेँ नइ हेतै ताधैर गरथाहक जिनगीमे रहत। तोरा होइत हेतह जे हम बड़ गरीब छी वा बड़ धनीक छी मुदा जखन अपनासँ आगू-पाछू देखबहक तँ बुझि पड़तह जे हमरोसँ बेसी धनिक लोक अछि आ गरीबो अछि। जेना देखते छहक, जेतबो तोरा छह तेतबो अछेलालकेँ नइ छइ। भरल पेट रहने मनक विचारो नीक होइ छइ। जखन कि जरल पेटमे से केना औत?” नमहर साँस छोडै़त बचेलाल बाजल- “हूँ-उ-उ।” “हँ, ठिके बुझलहक। भूखल पेट मनकेँ जरबै छइ। जरल मनमे सिनेह केना औत? सिनेह तँ खाली बजने वा उपदेश सुनने नै औत। जाधैर दुनूक बीच सिनेहक पुल नै बनत ताधैर मनुख-मनुखक बीच द्वेष रहबे करतै। जाधैर द्वेष रहतै ताधैर छल-प्रपंच, बेइमानी-शैतानी, मारि-मरौवैल केना मेटाएत।” निरीह भऽ बचेलाल पुछलक- “तखन की करब? माए।” मुस्की दैत सुमित्रा बाजए लगली- “जहिना अछेलालक बेटाकेँ जनमै काल सेवा केलिऐ तहिना जिनगी भरि करबै। भगवान सभकेँ दूटा हाथ दूटा पएर, साढ़े तीन हाथक देह और सभसँ पैघ सम्पैत बुधिक खजाना सेहो देने छथिन। अपना ऐठाम सभसँ दुखद बात यएह अछि जे किछु गनल-गुथल लोक सम्पैत हथिया नेने अछि जइसँ गरीबी एते बढ़ि गेल अछि। कुम्हराक आबा जकाँ गरीब लोक भूखक आगिमे जरि रहल अछि। जइसँ दुनूक बीच बड़का पहाड़ ठाढ़ भऽ गेल अछि। वेचारा अछेलाल जेहने चीजसँ तेहने समांगसँ आ तेहने बुधियोसँ पाछू पड़ि गेल अछि। अखन धरि वेचारा उजड़ल-उपटल घरमे रहल तँए ज्ञान प्राप्त करैक अवसरे कहिया भेटलै। देवनक देखौल रस्ता हम जनै छी। तँए जहिना तोरा बेटा बुझै छिअ तहिना ओहूँ वेचराकेँ बुझै छी।” तारतम करैत बचेलाल पुछलक- “केना अछेलाल काकाकेँ अपन समांग बनाएब?” “अखनेसँ खेत-पथारसँ लऽ कऽ बरदक सेवा करैक भार अछेलालकेँ दऽ दहक। तूँ नोकरी करै छह मुदा खेती-पथारी तँ मरि गेल छह। अखन भार बुझि पड़तह मुदा नहि, मनुखक भीतर जे सूतल शक्ति अछि ओकरा जगबैक छह। जखने ओ जागि जाएत तखने मनुख अपन बदलल रूप देखए लगत। जे खेत परती अछि ओ सोना उपजए लगत। जइसँ अपनो परिवारक आमदनी बढ़त आ ओहू वेचाराकेँ परिवार हँसी खुशीसँ चलतै।” माइक बात सुनि बचेलाल अछेलालकेँ कहलक- “काका, आइसँ हमर आ अहाँक परिवार एक भऽ गेल। अखनेसँ खेत पथारक तरबदुत शुरू कऽ दिऔ। पाँच कट्ठा बाड़ी अछि, ओहीमे एक भागसँ घर बना लिअ आ बाँकीमे उपजा हेतइ। एकठाम घर रहने चोरो-चहारसँ रक्षा हएत। बच्चा सभकेँ पढ़बैत रहै छी जे एकटा ढेला छल आ एकटा पत्ता। दुनू जखन अपना जिनगी दिस तकैत तँ ढेलाकेँ बुझि पड़ै जे बरखा हएत तँ गलिए जाएब आ पत्ताकेँ बुझि पड़ै जे हवा उठत तँ उधिआइए जाएब। तँए दुनूक जिनगी अनिश्चिते बुझि पड़इ। दुनू सोचलक जे अगर दोस्ती कऽ लेब तँ दुनूक जिनगी हँसैत-खेलैत चलैत रहत। दुनू दोस्ती कऽ लेलक। जखन हवा उठै तखन ढेला पत्ता कऽ दाबि कऽ बँचा लैत आ जखन पानि होए तखन पत्ता ढेलाकेँ झाँपि बँचा लइत। तहिना तँ मनुखोक अछि?” बचेलालक बदलल विचार सुनि गदगद हृदैसँ अछेलाल कहलक- “बौआ, गरीबक हृदैमे छल-प्रपंच नै होइ छै आ ने मान-अपमान। कियो जँ हमरा अपमाने करत तँ हम ओकर की कऽ लेबै? हमरा की अछि जइसँ अपन मानक रक्षा करब...।” सुमित्रा दिस देख- “हमरो मनमे अछि भौजी जे जहिना अहाँ अपन बुझि बेटाबला बनेलौं तहिना अहूँकेँ माए बुझि सेवा करब।” ◌ शब्द संख्या : 2926 5. बचेलाल स्कूल गेल। घड़ी पावैन रहने स्कूल तँ खूजल रहै मुदा विद्यार्थी अनुपस्थित छल। पहिने तँ बचेलाल भकचकेमे रहला जे छात्र स्कूल किए ने आएल मुदा किछु कालक पछाइत एक गोरेसँ भाँज लगलैन जे पावैन छी। अपन दृढ़ता रखैत बचेलाल चारि बजेसँ पहिने स्कूल नै छोड़ैक विचार मनमे ठानि लेलैन। स्कूलक ओसारपर कुरसी लगा असगरे बैसल मने-मन अपन जिनगीक सम्बन्धमे सोचए लगला। अखन घरि सोचैक जे प्रक्रिया बचेलालक रहैन ओ माइक विचार सुनला पछाइत बदलए लगलैन। जइ ढंगसँ अखन धरि सोचै छला ओ ढंग बदलने किछु स्पष्ट बुझए लगला। आँखि उठा कऽ आगू दिस तकला तँ सभ किछु बदलल बुझि पड़लैन। माएपर धियान पहुँचते अनासुरती मुहसँ निकललैन- “माए साक्षात् सरस्वती छैथ। हुनकासँ बहुत किछु सीखैक अछि। जहिना मनुख अपन विशाल शक्तिक भंडार रहितो, अज्ञानवश नहि बुझि पबैत तहिना तँ हमहूँ छी। हर मनुखकेँ अपन लक्ष्य निर्धारित करि कऽ ओइ पाछू जान-पराणसँ लगि जेबा चाही तखने जिनगीक सार्थकता बुझि पड़तै। अखन धरि हमहीं जे बुझै छेलौं ओकरा इमनदारीसँ निमाहै छेलौं मुदा ओ असथिर चालि अछि। जहिना कोनो स्थानपर पहुँचैले कियो धीमी गतिसँ चलैए तँ कियो मध्यम गतिसँ मुदा तेज गतिसँ चलनिहारकेँ जल्दी सफलतो भेटैत आ दोसरो काज करैक मौका सेहो। चालि तेज केना हएत? ई मुख्य प्रश्न अछि। मुदा अपन चलब तँ जिम्मा ऐछे जे अनको बुझाएब ओहने जरूरी अछि जेहने अपना बूझब। मुदा पहिल दायित्व तँ अपन अपने अछि। हम शिक्षक छी। आठ घन्टा समए लगाएब आ बच्चा सभकेँ पढ़ाएब अछि जे चौबीस घन्टाक दिन-रातिमे एक तिहाइ भेल। अहिना पत्नियोकेँ देखै छिऐन...। छोटका बच्चाकेँ बेसी काल माइए रखै छैथ। बड़की बच्चिया स्कूलेमे बेसी काल रहैए। अँगना-घर बहारनाइसँ लऽ कऽ भानसोमे संग साथ माइए दइ छथिन। तखन जुआन औरतक काज केते बँचल? जरूर विचारमे केतौ कमी अछि। की पति-पत्नीक जिनगी सिरिफ बच्चेटा पैदा करब छी? की परिवारक खर्च जुटाएब सिरिफ मरदेक जिम्मा छी? की मरद दुनियाँक कोनो कोणसँ पसीना चुबा कमा कऽ अनैथ आ स्त्री घरक छहरदेबालीसँ नइ निकलैथ, यएह प्रतिष्ठा छी? औरत अपना पैरपर नै ठाढ़ होथि आ अइले पुरुखे दोखी छैथ, महिला नहि? की गुलामीक जिनगी सभ-ले कष्टकरे होइ छै सुखद नहि? ..एहेन ढेरो प्रश्न अछि जे सिरिफ वैचारिक समाधानसँ समाधान नहि हएत। किएक तँ प्रश्न समस्या बनि कार्यरूप धेने अछि। जेकर समाधान काजे कऽ सकैए। मुदा काजोकेँ तँ ढेरो बाधा अछि जे काजे ने हुअ दइ छइ। तखन की कएल जाए? ..एते विचार मनमे उठिते बचेलाल कुरसीपर सँ उठि विद्यालयक अँगनामे टहलए लगला। जहिना अधसुखू जारैनकेँ आगिमे देलासँ धुआँ बेसी होइत मुदा धधरा हेबे ने करैत तहिना बचेलालोक मनमे हुअ लगलैन। मुदा बिनु धधरा भेने इजोत केना हएत, अही बिचमे बचेलाल पड़ल छला।” अखन बचेलाल ने विद्यार्थीकेँ पढ़बैत शिक्षक छैथ आ ने घरवाली-ले पाँच साए नम्बर जर्दा-पत्ती कीनिनिहार। ने अखन किसान परिवार कहौनिहार छैथ आ ने ऑफिसक बड़ा बाबूक जमाए। अखन मनुखक ओइ सघन बोनमे माटिपर पसरल हरिअर-हरिअर दूबि जकाँ छैथ जे घाससँ लऽ कऽ विशाल-विशाल गाछक निच्चाँमे अपन अस्तित्व हँसैत-खेलैत मौजसँ रखने अछि। की ओइ दूबिकेँ अपन जिनगीसँ आनन्द नै छइ? जरूर छै! ओहो सजि-धजि पूर्ण जुआनीमे आबि अपन प्रीतमक प्रतिक्षामे दिन-राति तकैत रहैए जे हमर अखुनका जे पुष्ट शरीर अछि ओ छीलि कऽ लऽ जा ओइ गाइक भोजन बनौत जे दूध सन अमृत दइए। अमृतक सृजनकर्ता हम नइ छी? ..अनासुरती बचेलालक मनमे उठलैन- अखन हम ओ बतहा बबाजी ने तँ भऽ गेलौं जे शरीरसँ अलग भऽ नचैए? ..टहलल-टहलल बचेलाल कलपर जा मुँह-हाथ धोइ कऽ पानि पीलैन। जहिना धीपल लोहा पानिमे पड़िते सरा जाइए तहिना बचेलालोकेँ पानि पिबते भेलैन। पानि पीब धोतीक खूटसँ मुँह-हाथ पोछि बचेलाल घड़ी देखलैन, तँ चारि बजैत। कुरसी उठा कोठरीमे दऽ केबाड़ बन्न कऽ ताला लगा घर दिस विदा भेला। आन दिनसँ भिन्न मन। जहिना नसेरीकेँ निशाँ कम भेलापर भक् लगल रहैत तहिना बचेलालोकेँ होइन। रस्ताक कोनो सुधिए ने रहैन जे केतए पएर पड़ि रहल अछि। विचारक दुनियाँमे मन वौआइत रहैन। मनमे बेर-बेर उठैन जे हमर शक्ति सूतल अछि ओकरा जागाएब जरूरी अछि, मुदा ओ जागत केना? मनमे आबए लगलैन, डेढ़-डेढ़ घन्टा स्कूल अबै-जाइमे लगैए जँ साइकिल कीनि लेब तँ अदहा समैक बँचत जरूर हएत। अदहा समैक मतलब भेल डेढ़ घन्टा। तेतबे नहि, पाँच-दस मिनट देरियो भेने, तेजीसँ चलि कऽ समए पुरा लेब। नहाइ-खाइमे सेहो डेढ़-दू घन्टा लगि जाइए ओहूमे अदहा समए बँचा सकै छी। भोरू-पहर-के बिछानपर पड़ल रहै छी ओ पहिनौं उठि सकै छी। अगर सभ समैकेँ बँचा एकटा नव काज ठाढ़ कऽ लेब तँ खुशीसँ सम्हारि सकै छी। तेतबे नहि, फजिलाहा समैसँ जेते करब ओइसँ केते बेसी जीवनोपयोगी मशीनक उपयोगसँ हएत। तहूसँ बेसी काजक उत्साह एने सेहो हएत...। घरपर आबि बचेलाल घड़ी देखलैन तँ आन दिनसँ बीस मिनट पहिने आबि गेल छला। ई केना भेल? मन पाड़ए लगला तँ रस्ताक चलब मने ने पड़ैन। दरबज्जेक चौकीपर कुरता, गंजी निकालि कऽ रखि बिनु हाथ-पएर धोनहि चीत गड़े सुति दुनू बाँहि मोड़ि चाइनपर लऽ आँखि बन्न केने सोचए लगला। बाड़ीसँ अरुआ उखाड़ि सुमित्रा एक हाथमे खन्ती दोसरमे अरुआ नेने अबैत रहैथ। रस्तेपर सँ बचेलालकेँ देख चुपचाप आँगन चलि गेली। सुमित्रा मने-मन बुझि गेलखिन जे जहिना साइकिलपर सँ गिरल आदमी हाथ-पएर तोड़ि रोडपर चीते पड़ल रहैए सएह गति बचेलालोकेँ भेल अछि। मुदा अँगनाक टाटक भुरकी देने रूमा बचेलालकेँ देख मने-मन सोचैत जे आन दिन स्कूलसँ सोझे अपना कोठरीमे आबि कपड़ा निकालै छला मुदा आइ एना किएक केलैन। भरिसक रस्तामे किछु भऽ गेलैन। धड़फड़ाइत अँगनासँ निकैल रूमा बचेलालक लगमे आबि पुछलकैन- “किछु होइए?” आँखि खोलि बचेलाल रूमाकेँ देख फेर आँखि मूनि लेलैन। रूमाक करेजमे डर सन्हिया गेल। मुँह लग मुँह लऽ जा रूमा फेर पुछलकैन- “मन-तन खराब भऽ गेल?” आँखि खोलि बचेलाल मन्द स्वरे मुदा सक्कत शब्दमे बजला- “नहि! किछु ने होइए। अखन ऐठामसँ जाउ। मनमे समुद्रक लहैर उठि रहल अछि।” धड़फड़ाइत रूमा सासुकेँ कहैले आँगन गेली। माथपर सँ साड़ी सरकल रूमाक। सासु लग जा कहलकैन- “अखन अरुआ बनौनाइ छोड़ि देथुन। बेटाक मन खराब भऽ गेलैन। ने बजै छैथ आ ने मन उछटगर छैन। जेना मुँहक रंगो बदलल जाइ छैन। झब-दे चलौथु। देखथुन जे की भऽ गेलैन।” दुनू हाथसँ अरुआ पकैड़ कत्तामे लगौने सुमित्रा रूमा दिस देख बजली- “बच्चाकेँ किछु ने भेलैन। स्कूलसँ अबैमे थाकि गेल हेता।” हड़बड़ाइत रूमा बजली- “नहि माए! आनो दिन स्कूलसँ अबै छला कि आइए-टा पएरे एला। एना कहाँ आन दिन होइ छेलैन! केहेन बढ़ियाँ आन दिन देखै छेलिऐन!” सुमित्राक बाँहि पकैड़ रूमा घिचने-घिचने दलानपर अनलकैन। दरबज्जापर अबिते सुमित्रा रूमाकेँ कहलखिन- “अहाँ, झब-दे चाह बनौने आउ। हम अछेलालकेँ शोर पाड़ै छी।” रूमा चाह बनबए गेली। सुमित्रा अछेलालकेँ शोर पाड़ए गेली। जारैन-ले अछेलाल सूखल कड़ची टोनियबैत रहए, तखने एकटा कड़ची तौड़ै काल आँगुर कपा गेलइ। जइसँ छर-छर खून बहैत रहइ। ताबे सुमित्रो लगमे पहुँचली। खून बहैत देख सुमित्रा मखनीकेँ लत्ता नेने अबैले कहलखिन। लत्ता नेने मखनी दौगल आएल। मखनीक हाथसँ लत्ता लऽ सुमित्रा अछेलालक ओंगरीमे नुरिया कऽ बान्हि देलखिन। खून बन्न भऽ गेल। टोनियेलहा कड़ची समैट मखनी चुल्हि लग लऽ गेल। अछेलालकेँ संग केने सुमित्रा बचेलाल लग एली। ताबत रूमो चाह नेने एली। सभ कियो चाह पिबए लगला। चाहक चुस्की लैत बचेलाल अछेलालकेँ पुछलखिन- “काका, ओंगरीमे लत्ता किए लटपटौने छह?” “अखने कड़ची टोनियबै छेलौं कि काप लगि गेल। अपना टेंगारी नइए जइसँ छकैड़तौं, तँए हाथेसँ तोड़ै छेलौं। खून बहए लगल तँए लत्ता बान्हि देलिऐ।” बचेलालक गप सुनि-सुनि रूमाक मन असथिर होइत गेलैन। मुदा तैयो आँखि उठा-उठा बचेलाल दिस देखैत रहली। ..अछेलाल बचेलालकेँ कहलक- “बच्चा, छुच्छे अहाँ खेतीक भार देलौं। बिनु ओजारे खेती केना करब? ने हर अछि आ ने कोदारि, ने घरमे नीक हँसूआ अछि आ ने खुरपी। ने कुरहैर अछि आ ने टेंगारी। तखन छुच्छे हाथे केते काज चलत। गाममे देखते छी जे ने केकरो कियो कोनो चीज दइए आ ने गरीबी दुआरे सभकेँ सभ चीज छइ। तखन केना काज चलत?” अछेलालक बात सुनि बचेलालक मनमे उठलैन- जहिना साइकिलक दुआरे अपन समए नष्ट होइए तहिना ओजारक दुआरे अछेलाल कक्काक। ..मुस्की दैत सुमित्रा कहलखिन- “बच्चा, जहिना समाज परिवारकेँ आगू बढ़बैमे सहायक होइ छै तहिना बाधको अछि। ओना कहैले सभकेँ-सभ नीके बात कहैए मुदा बेवहारमे उनटा छइ। अखन जइ सिमानपर ठाढ़ छह पहिने ओते पहुँचैक उपए करह। बुझैमे नै अबैत हेतह मुदा छह ओइसँ बहुत निच्चाँ, तँए अपन सिमानसँ निच्चाँ कोन-कोन रस्तामे पछुआएल छह, पहिने ओ बुझि ओकरा पुरबए पड़तह। जखन औझुका सिमानपर ठाढ़ भऽ जेबह तखन आगू-मुहेँ डेग उठतह। एकभग्गू भऽ आगू डेग उठबए चाहबह तँ केतौ-ने-केतौ लसैक जेबह।” सुमित्राक विचार सुनि बचेलालक मनमे आशाक टेमी भुकभुकाए लगल। हृदैमे मद्धिम इजोत भेल। मुस्कियाइत बजला- “माए, तोहर बात मनमे गड़ि गेल। अखन काज करै जोकर चारि गोरे छी, दू परानी अछेलाल काका आ दू परानी अपने। तूँ तँ बुढ़ भेलँह। जखन स्कूलमे छेलौं तखन मनमे उठल जे सभ दिन पएरे चारि कोस अबै-जाइ छी तँए एकटा साइकिल कीनि लेलासँ अदहा समए बँचत। जे समए उगरत ओकर उपयोग आगूक काजमे करब। जाबे आगू बढ़ैक चेष्टा नै करब ताबे आगू केना बढ़ब?” मुड़ी डोलबैत सुमित्रा बजली- “बच्चा, अखन दूटा रस्ता पकड़ैक छह। नोकरी करै छह तँ नोकरियो आ दू बीघा खेत छह ओहूमे जान फुकैक छह। जँ दुनू सुढ़िया कऽ चलए लगतह तँ अनेरे घर उठैत देखबहक। बड़ चिक्कन बात अछेलाल बौआ कहलखुन। जाबे खेती करैक ओजार नै रहतह ताबे मुकाबला केना करबहक?” सुमित्राक बात समाप्तो ने भेल कि बिच्चेमे अछेलाल बाजल- “भौजी, काल्हि बेरू-पहर जुगाय आबि कऽ डेढ़ियापर बैस रहल। हम अँगनामे बिछानक टुटल डोरी जोड़ैत रही। कनी कालक पछाइत थूक फेकैले उठलौं कि जुगायकेँ बैसल देखलिऐ। चोट्टे आँगन घुमि चक्कापर सँ तमाकुल-चुन लऽ चुनबैत डेढ़ियापर गेलौं। जुगायक सूखल मुँह देख पुछलिऐ जे ‘भाय केमहर-केमहर एलह,बड़ मन्हुआएल देखै छिअ।’ किछु बजैक हिम्मते ने वेचारे के होइ। तमाकुल देलिऐ। अपनो खेलौं। तमाकुल मुँहमे लेला पछाइत जेना बजैक हूबा भेलइ। कहलक,‘अछेलाल भाय, कहैक तँ साहस नहियेँ होइए मुदा तोहूँ कोनो बिरान नहियेँ छह तँए कहै छिअ। देखबे करै छहक जे समए केते दुरकाल भऽ गेल अछि। लऽ दऽ कऽ चारि बीघा खेत छल। भगवान तीनटा बेटी देने छैथ। जेठकी बेटीक बिआह तँ बाबूए सोझहामे भेलइ। दूटा बँचल। मैझलीक बिआहमे सोमनसँ रूपैआ कर्ज लेलौं। आशा छल जे खेतक उपजासँ कर्जा सठा लेब। मुदा पैछला तीन साल केहेन भेल से तँ बुझले छह। रूपैआ नै देल भेल। एक दिन सोमन तेना ने बाजए लगल जे खीस चढ़ि गेल। मनमे आएल जे एक्को धूर खेत बँचाए वा नहि मुदा पाँच दिनक भीतर ओकर रूपैआ दऽ देबइ। मनमे तामस रहबे करए, डेढ़ बीघा खेत सस्तेमे बेच कऽ रूपैआ दऽ देलिऐ। आब अढ़ाइए बीघा खेत बँचल अछि। छोटकी बेटी पनरह-सोलह बर्खक भऽ गेल अछि। तँए बिआह केनाइ जरूरी भऽ गेल अछि। कथा ठेमाएल अछि मुदा बिनु खरचे दिन-ठेकान केना करब। तेहेन भूत लोककेँ लगल छै जे सभकेँ मचोड़ि-मचोड़ि खाइए। सूदी रूपैआ लैत डर होइए तँए तोरा लग एलौं जे रूपैआक कोनो जोगार लगा दएह।’ जुगायक बात हृदैकेँ पीघला देलक। मुदा गरीबक हृदए पीघलनहि की? अपने तँ तेरह दण्डक सकराँति बितैए तखन दोसरक मदैत की करबै। मुदा मनमे आएल जे बचेलाल तँ नोकरी करै छैथ तँए हुनकेँ कहबैन। समाजक बेटी आ अपना बेटीमे कि अन्तर होइ छइ। जाबे बिआह-दुरागमन नै भेल रहै छै ताबे माए-बापक समाजमे बेटी रहैए, तेकर पछाइत तँ सदा-सदा-ले चलि जाइए।” अछेलालक बात धियानसँ सुनि बचेलाल मुड़ी गोंति विचारए लगला। समाजमे हम नोकरी करै छी। रूपैआ कमाइ छी। समाजोक तँ आशा हमरा कमाइमे छइ। अगर रूपैआ हम नहियोँ देबै तैयो कोनो-ने-कोनो तरहेँ बिआह भाइए जेतइ। मुदा हमरा की बूझत? हमरा प्रति केते घृणा वेचाराकेँ हेतइ। जाबे जुआन बेटी केकरो घरमे रहै छै ताबे माए-बापक हृदए तिल-तिल कऽ जरैत रहै छइ। एहेन समैमे मदैत मदैत नहि जिनगीक पैघ बोझ उतारब हएत। हमर रूपैआ बैंकमे अछि। सुदिये केते देत? जेते सुइद देत तइसँ बेसी महगी बढ़तै जइसँ रूपैआक मोले कमत। तखन तँ मुरोसँ कम भेटत। ओइसँ नीक जे बिनु सुदिये रूपैआक मदैत कऽ दिऐ। ..एते बात मनमे अबिते बचेलाल मुड़ी उठा माए दिस तकलैन। सुमित्रो बचेलाले दिस तकैत। दुनू गोरेक विचार आँखिएसँ भऽ गेल। बचेलाल माएकेँ कहलक- “माए, चारू-भर तँ अभावे-अभाव देखै छी। अभावकेँ बिनु मेटौने लोक केना आगू-मुहेँ ससरत। बेकतीसँ लऽ कऽ परिवार आ परिवारसँ समाज धरि सभ अँटैक गेल अछि। केना ससरत? जहिना नीच जमीनमे बहैत पानि ऊँच जमीनमे नै चढ़ि पबैत, तोहूमे जँ माटिक आड़ि बनल रहए, तखन तँ आरो मोसकिल होइत तहिना तँ जिनगियोमे लोककेँ होइए। जिनगी तँ हवाक गतिसँ नइ चलि सकैए जे ऊपर-निच्चाँक भेद बिनु बुझने चलैत रहत।” मुस्कियाइत सुमित्रा बचेलालकेँ कहलखिन- “बड़ सुन्नर बात बच्चा कहलह। निच्चाँक पानि जखन जमा भऽ मोटाइए तखन ऊपर चढ़ैक आशा होइ छइ। बाधा रूपी आड़ि तोड़ैले साधनक जरूरत होइ छइ। अखन धरि समाजिक रीति-रिवाज, चालि-ढालि एहेन बना देल गेल अछि जे एकटा डेग उठाउ तँ दोसर लसकत आ दोसर उठाउ तँ तेसर लसकत। मुदा धैर्य आ साहसक आवश्यकता सभकेँ छइ। एक स्थानपर ठाढ़ भऽ वा बैस कऽ देखलासँ दूर धरि देख पड़ैत मुदा बातकेँ गौरसँ बुझए पड़त जे जहिना आँखिसँ निकलैत ज्योति पहिने लगसँ देखैत दूर तक देखैए तहिना सभसँ पहिने मनुखकेँ अपने देखए पड़तै, जखन अपनाकेँ देख लेत तखन दुनियाँ देखैक रस्ता भेटतै। जखने दुनियाँक रस्तापर चलब शुरू करत तखने थाल-खिचार छोड़ि सक्कत माटिपर पएर पड़तै। अखन तोरा सोझहामे तीन तरहक काज उपस्थित छह, पहिने अपना-ले साइकिल कीनि लएह जइसँ शरीरोक रक्षा हेतह आ समैयोक बचत आ दोसर खेतीक सभ समचा कीनि लएह।” माइक बात सुनि बचेलाल अछेलाल दिस देखैत बजला- “काका, काल्हि शनि छी। जँए एते दिन खगल तँए एक दिन आरो खगह। हमहुँ जँए एते दिन पएरे स्कूल गेलौं तँए एक दिन आरो जाएब। परसू रवि छी,छुट्टियो रहत। दुनू गोरे सबेरे जलखै कऽ बजार चलब। साइकिलो कीनि लेब आ खेतियोक सभ ओजार। जुगायोकेँ बेटीक बिआहमे मदैत कऽ देबइ। जे रूपैआ बैंकमे अछि ओ सभ उठा परिवारसँ समाज धरिमे उपयोग कऽ लेब। एक परिवारकेँ आगू बढ़ने तँ समाज नै अगुआएत। समाजकेँ अगुआइले सभ परिवारकेँ अगुआए पड़त। जहिना एकटा इंजन बड़का-बड़का कोठरीकेँ जोड़ि अपना गतिमे चलबैए तहिना जँ समाजोकेँ रस्तापर आनि घिचल जाए तँ ओहो ओइ गतिसँ जरूर चलत।” बचेलालक विचार सुनि सुमित्रा बजली- “बौआ, तूँ साइकिल कीनिबह। अपने तँ एक्के बेर स्कूल जेबह एबह। मुदा तेकर बाद तँ साइकिल घरेमे पड़ल रहतह तँए समाजमे केकरो साइकिलक जरूरी हेतै तँ ओकरो दिहक। अपनो काज चलतह आ दोसरोक चलतै। जहिना पहिलुका लोक पोखैर खुनबै छला जइसँ अपनो काज होइ छेलैन आ समाजोक होइ छेलइ। जाधैर समाजमे प्रेम नै बढ़त, एक दोसरकेँ मनुख बुझि मदैत नै करत ताधैर समाज लड़खड़ाइते रहत। जखन सभ- सभ-ले देहसँ लऽ कऽ चीज धरिसँ ठाढ़ हएत तखन समाज निश्चित आगू-मुहेँ ससरत जइसँ सबहक कल्याण हएत। जुगायक बेटीक बिआहमे रूपैआ जरूर दिहक। ओ जँ खेत भरना दिअ चाहतह तँ ओकरा कहि दिहक जे खेत बटाइ वएह करए। वेचारा सुदियोसँ बँचि जाएत आ उपजो हेतइ। ओकरो तँ परिवार छै, ओहो तँ अन्ने खाएत।” साँझू-पहर जुगाय अछेलाल ऐठाम आएल। अछेलाल सभ काज सहियारि पोखैर दिस जाइक विचार करिते छल कि जुगायपर नजैर पड़लै, नजैर पड़िते कहलक- “जुगाय भाय, तोहर काज सुतैर गेलह। जखनसँ तूँ कहलह तखनेसँ मनमे खुटखुटी पकैड़ लेलक। मुदा केकरोसँ कोनो बात करैक समए होइ छइ। समए पाबि बचेलालकेँ कहलिऐ। वेचारा मानि गेल। ओ तोरा रूपैआ सम्हारि देथुन। तूँ निश्चिन्त भऽ बिआहक दिन-ठेकान करह।” अछेलालक बात सुनि जुगाय बाजल- “भाय, अखनो दुनियाँमे नीक लोकक कमी नइ छइ। जे अनका बेरपर ठाढ़ हएत ओकरो बेरपर भगवान ठाढ़ हेथिन। हम तँ अपना-मुहेँ हुनका किछु ने कहलयैन तँए संगे चलह जे अपनोसँ बचेलालकेँ कहबैन।” “अखन तोरा कहैक काज नै छह। नीक हेतह जे परसू रवि दिन संगे बजार चलि रस्तेमे सभ गप करब।” अछेलालक बात सुनि मुड़ी डोलबैत जुगाय बाजल- “बड़बढ़ियाँ भाय।” ◌ शब्द संख्या : 2453 6. देवनकेँ पाबि दीनमा आ भुखनीकेँ वेहद खुशी भेल। भुखनीक मनमे आएल- कमाइबला बेटा भगवान पठा देलैन। मनमे एकटा पैछला बात एलै, हमरासँ एक दिन पहिने दुखनीक जन्म भेल, बच्चेसँ दुनू गोरे संगे रहबो करै छेलौं आ खेलबो करै छेलौं। जब कनी नमहर भेलौं तब संगे पत्तो बीछी, गोबरो बिछ-बिछ आनी आ चिपड़ियो पाथी। घासो छिलैले जाइ आ बकरियो चराबी। बाधमे रखबारक खोपड़ी लग बैस चैरखियो-चैरखी खेली। खेसारी मासमे अँगनेसँ नून नेने जाइ आ खेसारी मुड़ीक झक्खो बना-बना खाइ। आमक जखन टुकले होइ तखनेसँ बिछ-बिछ खाइ। अँगनेसँ चुन पत्तामे नेने जाइ आ खटहो आममे लगा दिऐ तँ ओहो खट्टा नै लगए। जब ढेरबा भेलौं तब माइए संगे दुनू गोरे धानो-गहुम काटी आ लोढ़बो करी आ खेसारियो मौसरीक बोइनो करी। किछु दिनक पछाइत धानो-मरूआ रोपए लगलौं। हमरासँ पाँच बरख पहिने दुखनीक बिआह भेल। ओ सासुर बसए लगल आ हमर बिआहो ने ताबे भेल। दुखनीक बेटो ढेरबा भऽ गेलै हमर लिधुरिये अछि। मुदा भगवान हमर दुख बुझलैन। कमाइबला बेटा अनासुरती पठा देलैन...। दीनमा बुझैत जे बाँहि पुरैबला समांग भऽ गेल। दुनू गोरे संगे खेतो तामब आ धानो-मरूआक रोपैन करब। एक जनक बोइन तँ बेसी हएत। जँ कहीं गिरहतबच्चा बुझि देवनकेँ काज नै अढ़ौत तँ ठीक्केपर काज लऽ लेब। अपने कनी बेसी भीर पड़त तँ पड़त, एकटा बोइनो बेसी हएत किने। तीनटा कमेनिहार भेलौं। आब कोनो चीजक दुख नै हएत। कपारमे जाबे दुख लिखल छल ताबे कटलौं। आब सुखक दिन आबि गेल। पूस-माघक जाड़ दीनमा आ भुखनी केना बितबैत रहए से देवन गौरसँ देखए लगल। ने घरमे सीरक आ ने एक्कोटा कम्मर। फाटल-पुरान साड़ी-धोती पहिर दुनू परानी दीनमा दिन बितबैत। पहिलुका गुदरी-चेथरी साड़ी-धोती सेरिया कऽ साटि, ओकरा सीबि सुजनी बनौने। वएह ओढ़ैत रहए। जइ दिन बेसी जाड़ होइ तइ दिन अखरे पुआरपर सुति बिछानो ओढ़ि लिअए। सात हाथक एक्केटा घर जइमे सभतूर हँसी-खुशीसँ रहैत। ओही घरमे भानसो होइत, चीजो सभ रखैत आ सभतूर सुतबो करैत। एक भाग भानस करैक चुल्ही, दोसर भाग बिछान आ बीचमे सूखल गोबर करसीक घूर लगबैत। ओना घर गरम रहैक नीक बेवस्था छेलै मुदा बिनु लेबल टाटक घर रहने, चारू दिससँ ठंढ आबि घरोकेँ पानि जकाँ ठंढा कऽ दइत। रातिमे जाबे भानस होइ ताबे धिया-पुताक संग दीनमा घूर तपैत। एक दिन भोरहरबामे पछिया हवा उठल। दीनमाक दुनू ठेहुनसँ निच्चाँ पएर उघारे रहइ। जड़ाएल हवासँ दुनू पएर कठुआ कऽ सुन्न भऽ गेलइ। दीनमाक निन टुटल। ओछाइनसँ उठि बाहर जाइक मन भेलइ। जहाँ उठए लगल कि पएर सोझे ने होइ। उठि कऽ बैस पएर टोबए लगल। ठेहुनसँ ऊपर तँ बुझै मुदा निच्चाँ किछु बुझबे ने करैत। मने-मन दीनमा सोचए लगल एना किए भेल। जँ ठेहुनसँ निच्चाँ पएर दुइर भऽ जाएत तँ चलब केना? डरे दीनमाक छाती धक-धक करए लगलै। घरवालीकेँ उठौलक। मुँह उधारि भुखनी कहलकै- “बड़ कन-कन्नी अछि, मुँह झाँपि कऽ सुइत रहू।” कहि भुखनी अपन मुँह झाँपि लेलक। मुँह झँपैत देख दीनमा जोरसँ बाजल- “हमरा पएरमे भरिसक साँप काटि लेलक, सुन्न बुझि पड़ैए।” साँपक नाओं सुनिते भुखनी धड़फड़ा कऽ उठल। उठि कऽ चुल्ही लग राखल छोलनी लऽ पएरमे भिरा पुछलकै- “केहेन लगैए? की भीरौने छी?” दीनमा जवाब देलकै- “आँखिसँ तँ छोलनी देखै छी मुदा भिरल किछु ने बुझि पडैए।” छोलनी रखि भुखनी बिठुआ कटैत पुछलकै- “केहेन बुझि पड़ैए?” दीनमा जवाब देलकै- “किछु बुझबे ने करै छी।” अखियास करैत भुखनी पुछलकै- “छुछुनैरो-तुछुनैरोक बोली सुनलिऐ?” मध्यम तामससँ दीनमा बाजल- “से कि हम जगले छेलौं। अखन नीन्न टुटल तँ उठिए ने भेल। तब बुझलिऐ।” भुखनीक मनमे उठलै- हे भगवान एहेन दूरकाल समैमे कोन दुख पठा देलह। दुखे पठबैक छेलह तँ दिन-देखार पठैबतह। एत्ती रातिमे हम की करबै, केना पार-घाट लागत।” भुखनीकेँ आहि-आलम करैत देख दीनमा बाजल- “अगियासी करू पछबा बहै छै, भऽ सकैए ठंढी लगि गेल हुअए।” ओछाइनपर पड़ल-पड़ल देवन सभ बात सुनैत रहए। चुल्हीसँ भुमहुर बला आगि निकालि भुखनी घूर पजारए लगल। शीताएल जारैन रहने घूर पजरबे ने करइ। धुइयेँ बेसी होइ। धुआँक दकसँ खोंखी करैत देवनो उठल। घरमे धुआँ भरि गेल। धुआँ दुआरे कोइ किछु देखबे ने करैत। देवन भुखनीकेँ कहलक- “मौसी, ओछाइनेक पुआर लऽ कऽ कनी घूरमे देही ने।” हँथोइर कऽ भुखनी एक मुट्ठी पुआर निकालि घूरमे देलक। धुआँ दुआरे भुखनीकेँ तेते खोंखी उठल जे फुकले ने होइ। तरे-तर दीनमाकेँ तामस उठइ। मनमे होइ जे ऐ मौगियाकेँ दू घरमेचा दुनू कनगोजमे लगा दी, हम उठैबला नइ छी तँए। ऐ मौगियाकेँ कोनो लूरिये ने छइ। मुदा फेर होइ जे एकटा दुख तँ लधले अछि, दोसर बेसाहब नीक नै हएत। तँए चुप्पे छल। घूर धधकलै। धुआँ सभ हवाकेँ चाटि गेल। घूर धधैकते शीशीसँ भुखनी तरहत्थीपर करूतेल लेलक। दुनू तरहत्थीमे मिला आगिक ताउ लगा-लगा दीनमाक ठेहुनमे रगड़ए लगल। कनी कालक पछाइत दीनमाकेँ ठेहुनक गिरह हल्लुक भेलइ। ठेहुन हल्लुक होइते दीनमा पएर मोड़लक। अपने हाथे पएरक गिरह टोबए लगल। पएर टोबि दीनमा भुखनीकेँ कहलक- “कनी डिबिया-तेल आ करूतेल मिला तरबा रगैड़ दिअ।” डिबिया तेल आ करूतेल मिला भुखनी पतिक तरबा रगड़ए लागलि। तरबा रगैड़ते दीनमाक झुनझुनी छुटि गेल। मन हल्लुक होइते दीनमा उठि कऽ बाहर भेल। बाहरसँ आबि भुखनीकेँ कहलकै- “जाड़क सुख धनीक लोककेँ होइ छइ। गरीब-गुरबाक हिस्सामे अनेरे भगवान जाड़ देने छथिन।” वसन्तक आगमन भेल। काल्हिए सरस्वती पूजा सेहो छी आ किसान सभ हर ठाढ़ सेहो करता। समए सेहो गरमाए लगल। छोट दिन रसे-रसे नमहर हुअ लगल। केते हरबाह गिरहत बदलैक विचार कऽ नवका गिरहत ठेमौलक। दीनमा ऐठाम सेहो कएटा गिरहत आबि हर जोतैले कहलकै मुदा दीनमा नइ गछलक। किएक तँ वसन्त पंचमीमे जे हरबाह जइ गिरहतक हर ठाढ़ करत ओकरा सालो भरि ओही गिरहतक हर जोतए पड़तै। बन्हुआ काज दीनमाकेँ पसिन नहि। छुट्टा रहने बोनिहार स्वतंत्र भऽ काज करैत। जैठाम काज करैक मन हेतै तैठाम काज करत आ बोइन लेत। अखन धरि गाममे यएह प्रथा चलैत जे हरबाहकेँ पाँच कट्टा खेत बटाइ करैले दऽ दैत आ भरि साल काज करबैत। मुदा ऐ बेर अदहा लोक पंजाब-दिल्ली चलि गेल तँए हरबाहक मंहगी भऽ गेलइ। हरबाहि करैबला सभ अपनामे विचारि लेलक जे हरबाहिक बोइन एक अढ़ैया कच्चीसँ बढ़ा पाँच किलो बोइन लेब नइ तँ हरबाहि नै करब। संगे बटाइ खेतक उपजा अदहा नै देबै, तिहाइ देबइ। तैपर जँ किसान तैयार हुअए तँ बड़बढ़ियाँ नइ तँ अपन-अपन हर अपने जोतह। दस बरिससँ भुटकुमरा राधाकान्तक हर जोतैत आबि रहल छल। ऐ बेर हर ठाढ़ करैसँ तीन दिन पहिनहि जवाब दऽ देलकै। हर ठाढ़ होइसँ एक दिन पहिने राधाकान्त भुटकुमरा ऐठाम आबि हर ठाढ़ करैले कहलखिन, तैपर भुटकुमरा हर ठाढ़ करैसँ इनकार करैत कहलकैन- “गिरहत पाँच किलो बोइन लेब। सभ हरबाह अपनामे बैस निर्णए केलक। जँ पाँच किलो हरबाही बोइन देबै तखन तँ हर ठाढ़ करब नइ तँ नै करब।” भुटकुमराक बात सुनिते राधाकान्तक आँखि लाल हुअ लगलैन। मुदा अपनाकेँ सम्हारैत बजला- “गामक जँ सभ गिरहत पाँच किलो बोइन तौलत तखन हमहूँ तौलब। जँ से नै देत तँ असगरे हमहीं किए देबइ।” राधाकान्तक बात सुनि भुटकुमरा बाजल- “आन गिरहत आ आन हरबाह जे करए मुदा हम पाँच किलो बोइन लेबे करब जँ से नै देब तँ हरबाहि नै करब।” ‘हरबाहि नै करब’ सुनि राधाकान्त आगि-बबुला होइत भुटकुमराकेँ कहलखिन- “अगर सभ गिरहत पाँच किलो देत तँ हमहूँ देबह। जँ नै देत हमहूँ नै देबह। मुदा काल्हि पावैनक दिन छी तँए हर ठाढ़ करबे करिहह।” भुटकुमराक मनमे एलै जे ई गिरहत सबहक चलाकी छी। जखने हर ठाढ़ करब तखने बन्हा जाएब। जखने बन्हा जाएब तखने पनचैती बैसा कऽ बलजोरी हर जोतेबे करत। तँए अखुनके फड़िछेलहा नीक रहत। मुँह चोरौने काज नै चलत। खुलि कऽ खेलाइये पड़त। दृढ़ भऽ भुटकुमरा बाजल- “कियो बोइन दइ आकि नै दइ मुदा हम पाँच किलो नेने बिनु हर ठाढ़ किनौं नै करब।” भुटकुमराक सक्कत बोली सुनि राधाकान्त अकैड़ कऽ बजला- “कियो किछु करै मुदा तोरा पुरने बोइनपर हर ठाढ़ करए पड़तह जँ नै करबह तखन बुझल जेतइ।” जहिना राधाकान्त कठोर होइत बजला तहिना भुटकुमरो कहलकैन- “ऐ भागक सुरूज ओइ भाग किए ने उगै मुदा भुटकुमरा अपन बात कोनो हालतमे नइ बदलत।” तेबर बदलैत राधाकान्त- “हर नै ठाढ़ करबह तँ हमर कर्जा चुका दएह। तोहूँ घर हमहूँ घर। जाबे कर्जा नै चुकेबह ताबे गट्टा पकैड़ हर जोतेबे करबह।” भुटकुमरा बाजल- “बहुत गट्टा पकड़निहारकेँ देखलिऐ जँ तोरा हिम्मत हुअ तँ गट्टा पकैड़ कऽ देख लिहह। मरदक गट्टा छिऐ मौगीक नहि।” राधाकान्त- “बड़बढ़ियाँ, हर नै ठाढ़ करैक मन छह तँ नै ठाढ़ करिहह। मुदा हमर कर्जा तँ देबह। चलह हमरा ऐठाम। बोहीमे जेते लिखल हएत तेते दऽ दिहह। तोहूँ घर हमहूँ घर।” राधाकान्तक बात सुनि भुटकुमराक मनमे एलै जे जँ कहीं ओइठाम जाएब आ सभ समांग मिलि मारए तखन तँ नाँहकमे मारि खा जाएब। गुनधुन करैत भुटकुमरा बाजल- “एतै बोही नेने आबह, जे बाँकी हैतै से दऽ देबह।” राधाकान्तक मनमे आएल जे जँ ऐठाम बोही लऽ कऽ आबी आ छीनि कऽ निशान फाड़ि दिअए तखन तँ सभ चौपट भऽ जाएत। दुनू गोरेमे बक-झक चलिते छल कि भुटकुमराक बेटा–गुलेतिया पंजाबसँ आएल। तीन साल पहिने गुलेतिया मामा गामक लोक सबहक संग दिल्ली गेल। दिल्लीमे नोकरी भेबे ने केलइ। पनरह दिन घुमि-फिर दिल्लीमे ठमौलक। मुदा केतौ गर नै देख पंजाब विदा भेल। गाड़िए-मे एकटा नवयुवक पंजाबी सरदारजी सँ भेँट भेलइ। सरदारजी दिल्लीमे पढ़ैत छल। ओही सरदारजीक संग गुलेतिया पंजाब गेल। सरदारजीक पिता सुभ्यस्त गिरहस्त। जहिना खेती-वाड़ी तहिना मालो-जाल। ओहीठाम गुलेतिया रहि गेल। पंजाब जाइ काल गुलेतिया कोनो चिन्हरबासँ भेँट नै केने रहए। अनका मने गुलेतिया हरा गेल। कियो कहै ‘गाड़ीमे चप्पा पड़ि गेलै’ तँ कियो कहै ‘चोरिमे पकड़ा गेल अखन जहलमे अछि’ तँ कियो कहै ‘गुलेतिया अरब चलि गेल’ तँ कियो कहै ‘दलाल ठकि कऽ बेच लेलकै’ तँ कियो कहै ‘क्रिमिनलक गैंगमे अछि’ तँ कियो कहै ‘पॉकेटमारी करैए’ मुदा भेँट केकरो ने होइ...। जेना-जेना दिल्लीक लोक गप उड़बै तहिना-तहिना गामोमे समाद आबि-आबि पसरैत। रंग-बिरंगक गुलेतियाक समाचार सुनि दुनू परानी भुटकुराक कान बहिर भऽ गेल। साल भरि गुलेतियाक कोनो चिट्ठी-पुरजी आ रूपैआ गाम नै ऐलै तखन माइयो-बाप छातीमे मुक्का मारि सवुर कऽ लेलक। जइ सरदार ऐठाम गुलेतिया रहै छल ओ साँझू-पहरकेँ गुलेतियाकेँ खिस्सा-पिहानीसँ लऽ कऽ खेती-पथारी, कुटुम-परिवार सबहक सम्बन्धमे कहइ। मने-मन गुलेतिया तँइ कऽ लेलक जे ने नोकरी करैले दोहरा कऽ आएब आ ने घर रूपैआ पठाएब। जइ दिन बुझि पड़त जे अपन कारबार ठाढ़ करै जोकर कमा लेलौं तइ दिन सभ हिसाब-बारी कऽ, रूपैआ लऽ गाम चलि जाएब। सएह केलक। ..गुलेतियाकेँ देख भुटकुमरा चिन्हियेँ ने सकल। देहमे पंजाबी पैजामा-कुरता आ हाथमे काड़ा पहिरने खूब नमहर-नमहर केश-दाढ़ी गुलेतियाकेँ रहइ। दरबज्जापर अबिते गुलेतिया बैग-एटैची रखि पिताकेँ गोड़ लगलक। माथ ठोकि भुटकुमरा आसिरवाद तँ दऽ देलकै मुदा चिन्हलक नहि। एक बेर मनमे एलै जे गुलेतिया ने तँ छी, फेर भेलै जे ओ तँ मरि गेल। राधाकान्त गुलेतियाकेँ देख ससैर गेल। ताबे गुलेतियाक माइयो अँगनासँ मुँह झँपने निकैल ओलती लग आबि ठाढ़ भऽ गेल। तरे-तर गुलेतिया हँसैत मुदा चुप-चाप ठाढ़। टोलक धिया-पुता सभ हल्ला करैत जे ‘हींगबला आएल, हींगबला आएल!’ हींगबलाक नाओं सुनि-सुनि आरो धिया-पुता जमा हुअ लगल। कनी कालक पछाइत अचताइत-पचताइत भुटकुमरा गुलेतियाकेँ पुछलकै- “बौआ, अदहा-छिदहा चिन्हबो करै छिअ आ नहियोँ चिन्है छिअ तँए ठीकसँ अपन चिन्हारे दएह?” मुस्कियाइत गुलेतिया बाजल- “गुलेतिया छिअ।” ‘गुलेतिया’ सुनिते भुटकुमरा हक्का-बक्का भऽ गेल। आँखिसँ नोर टघरए लगलै। माए दौगल आबि दुनू हाथे भरि पाँज कऽ पकैड़ छाती लगौलक। जेना तेज हवाक बीच घनघोर बरखा होइ काल ऊपरसँ ठनका खसैत आ पृथ्वीमे भुमकम होइत तहिना भुटकुमरा ऐठाम बुझि पड़ए लगल। गुलेतिया मात्र पाइयेटा कमा कऽ नै अनलक। ओ अनलक जिनगी जीबैक ढेरो लूरि, ओ अनलक संकल्प, ओ अनलक कठिन मेहनत करैक उत्साह, ओ अनलक परिवार रूपी मोटाकेँ ऊपर फेकैक उदेस। राधाकान्त सोझे घर दिस विदा भेला। मनमे एलैन, आइ बेइज्जत भऽ गेलौं। मुदा लगले दोसर मन कहलकैन- इज्जत तँ छिऐ धन तखन बेइज्जत केना भेलौं। जँ ओकरा अपना हाथसँ पाँच किलो बोइन तौल देबै तखन ने बेइज्जती हएत। मनमे हँसी उठलैन- भुटकुमरा कर्जा तरमे दाबल अछि। दाबल मात्र लेलहेमे नइ अछि,ओकर जिनगियो करजेक रस्तासँ चलैए। तखन पानिमे रहि मगरसँ बैर केते काल..! आन सालक हिसाबे ऐ साल दीनमा दोबर खेत-तमिया केलक। सरस्वती पूजा दिनसँ दीनमा खेत-तमनीमे हाथ लगौलक जे बैशाखक जानकी नवमी दिन धरि तमैत रहल। तमनी तँ किछु दिन आरो चलितै मुदा बिहरिया हाल नै भेने खेत सभ सक्कत भऽ गेलै तँए छोड़ि देलक। आन सालसँ बेसी गरमी ऐ बेरक बैशाखेमे पड़ए लगलै। दीनमाक घरसँ थोड़े हटि बीच बाधमे एकटा आमक गाछ रहइ। ओ गाछ जेहने नमहर तेहने झमटगर छल। सभतूर दीनमा ओही गाछक निच्चाँमे बैशाख-जेठक रौद बितबैए। अखार चढ़िते घनघनौआ बरखा भेल। बर्खाक आनन्द सभतूर दीनमा बाधेमे लेलक। बर्खाक आनन्द लइ काल दीनमाक मनमे एलै- अनेरे भगवानकेँ लोक बेइमान कहै छैन। जँ ओ बेइमान रहितैथ तँ एते आनन्द गरीब-गुरबाकेँ किए दैतथिन। असगरे देवन बैस मने-मन जोड़ए लगल, साल लगि गेल। आब ऐठाम एक्को दिन नै रहब। जँ एक्केठाम रहि समए बिताएब तँ दुनियाँ केना देख पएब। ..केकरोसँ किछु कहने बिना देवन नवटोलसँ विदा भऽ गेल। ◌ शब्द संख्या : 2017 7. नवटोलसँ टपि देवन रस्तो काटए आ मने-मन सोचबो करए जे ऐगला केहेन गाम हएत। दू तरहक विचार देवनक मनकेँ घेरने। पहिल ई जे आगूक मतलब‘नीकमे आगू’ आ दोसर ‘अधलामे आगू।’ फेर मनमे उठलै जे नीकोमे आगूक मतलब तँ दू तरहक अछि। एकटा होइत ‘देहक सेवामे’ आ दोसर होइत ‘आत्मा-बुधि-विवेकक सेवामे।’ फेर मनमे उठलै, आत्मा तँ प्रकाश स्वरूप होइत तखन बिनु प्रकाशे हएत की? तहिना अधलो दू तरहक अछि। जेकर आधार जाति, धरम आ धन अछि। जेना कोनो गाममे उच्च जातिक बोलबाला होइ छै जे नीच जाति-ले अधला भेल। तहिना नीच जातिक बोलबाला बला गाम उच्च जाति-ले अधला भेल। तहिना धरमो आ धनोक आधारसँ होइत। ..बच्चा देवन जेते सोचए चाहैत तेते ओझराएल जाए। उम्मस रहने जेना लोकक मन औल-बौल करैत तहिना देवनोकेँ हुअ लगल। रस्ता दिस धियाने ने रहलै। पैछला जेना सभ किछु बिसैर गेल आ ऐगलाक दरबज्जे बन्न देखइ...। देवन बैस रहल। मनमे कोनो विचार उठबे ने करइ। शरदक समए रहने सुरूजेक किरिणिक संग निनो आबि गेलइ। मनमे किछु रहबे ने करै तँए देह हल्लुके रहै आ निनोकेँ खुजल दरबज्जा भेटलै, देबनक देहमे घोंसिया गेल। रस्तेपर देवन सुति रहल। ..बुधि-विवेक तँ पहिनहिसँ बच्चे छल, माइक कोरामे सुरूजक गरमी भेटलै,निसभेर भऽ गेल। मुदा छोटके निन छेलइ। ज्ञान तँ जगलै मुदा देह पड़ले रहलै। जेना कियो ज्ञानकेँ कहलकै- “ऐ बटोही, सुतने रस्ता कटतह जे दुनियाँ देखबह। तेहेन बाधमे सूतल छह जे खेतक आड़ि सभमे साँपक बिल देखै छहक। जल्दी उठि कऽ रस्ता नापह नइ तँ साँप आबि कऽ धऽ लेतह। पड़ले रहि जेबह।” देवन उठि कऽ बैसल। चारू-भर आँखि उठा कऽ तकलक। निनाएल आँखि रहने साफ-साफ किछु ने देखलक। दुनू हाथसँ दुनू आँखि मीड़ि आँगुरसँ काँची निकाललक। काँची निकालिते फरिच्छ देखए लगल। उठि कऽ ठाढ़ भेल। आगू बढ़ल। किछु दूर आगू एकटा गाम नजैर पड़लै। कातेसँ हियासए लगल जे गाम नमहर अछि कि छोट। जेते गामक लग पहुँचैत जाए तेते आँखि झलफलाइत गेलइ। गाम नमहर अछि की छोट से बुझिये ने पड़इ। दछिनबारि भाग देखलक जे एकटा खूब नमहर कोठा झलकै छइ। खूब नमहर-नमहर तारक गाछ सभ सेहो छइ। एक टकसँ देख देवन उत्तरबारि भाग तकलक तँ देखलक केते खुलोमे आ केते गाछक निच्चोँ सभमे, दस-बारह हाथ नमती आ चारि-पाँच हाथ चौड़गर टाटकेँ मोड़ि-मोड़ि घर बनौल अछि। अदहा छिदहा खजूरक गाछ आ अदहा-छिदहा लताम, नेबो आ दारीमक गाछ बुझि पड़लै। देवन देखबो करए आ चलबो करए। गाम पहुँचल। गाम पहुँचते रस्ताक दहिना भागमे एकटा औरतकेँ देखलक जेकर बताहि जकाँ बगए छइ। ओ औरत पाँच बर्खक बेटाकेँ कहैत रहइ- “स्कूल जेमे की नहि?” तैपर कुही भऽ भऽ कनैत बेटा कहइ- “मरि जेबो मगर उसकूल नै जेबौ। माहटर सहाएब अपनोसँ नमहर ठेंगा लऽ कऽ मारैए।” बेटाक बातपर धियान नै दऽ माए पुचकाइर कऽ कहलकै- “बौआ, नै पढ़मे तँ बिआहो ने हेतौ।” “नइ हएत तँ नै हएत।” माए-बेटाक बात देवन धियानसँ सुनबो केलक आ सोचबो केलक। थोड़े कालक पछाइत रस्तासँ उतैर देवन ओकरे अँगनाक बाट धेलक। डेढ़ियापर पहुँचते ओ औरत देवनकेँ पुछलकै- “बौआ, केतए रहै छह?” परिचित जकाँ देवन बाजल- “हमरा गाम-ताम नइए। जतइ मन-फूरत रहि जाएब।” छगुन्तामे पड़ि ओ औरत सोचए लगल। कहैए गाम-ताम नइए! कोराक बच्चा झूठ बाजत! माए-बाप तँ जरूर हेतइ। फेर मनमे एलै जे मनुखो तँ माले-जाल जकाँ जिनगी बितबैए। बगए-बाणिसँ अनाथ बच्चा जकाँ बुझि पड़ैए! ने किछु खाइले छै आ ने भरि देह बस्तर देखै छी! फेर ओ औरत देवनकेँ पुछलकै- “माए-बाबू केतए छैथ?” निधोख भऽ देवन उत्तर देलक- “दुनू गोरे मरि गेल। असगरे छी।” असगर सुनि कहलकै- “ऐठाम रहबह?” मुस्कियाइत देवन कहलक- “हँ, रहब। मगर जहिया मन हएत तहिया चलि जाएब।” देवनक बात सुनि ओ मने-मन सोचए लगल- हमहूँ तँ असगरे छी। आदमीक जरूरी हमरो अछि। जँ कनी समरथ रहैत तँ खेतियो-पथारी करैत मुदा तैयो तँ पुरुखे छी। कहलकै- “बौआ, एतै रहि जाह।” देवनो रहैले तैयार भऽ गेल। देवनकेँ राजी देख पुछलकै- “रातिमे खेने छेलह की नहि?” देवन कहलक- “हँ, खेने छेलौं अखनी भूख नइए।” जहिना कोनो फूलक गाछक सभ पात बकरी खा लैत आ खाली डारि आ गोटे आधे फूलक कोढ़ी बचल रहैत जे समए पाबि खिल उठैत तहिना ओइ औरतक मनमे आशा जगल। घरसँ बिछान निकालि देवनकेँ बैसैले कहलक। देवन बिछौनपर बैस गेल। देवनकेँ बैसल देख ओ बच्चा सेहो आबि बैसल आ ओ औरत अँगनाक काजमे लगि गेल। देवन बच्चाकेँ पुछलकै- “बौआ, अहाँ अपनो नाओं कहू आ बाबूओक?” बच्चा उत्तर देलक- “हमर रमुआ छी आ माइक बुधनी। बाबू मरि गेल” रमुआक बात सुनि देवनक मनमे एलै जे बपटुगर जकाँ नहि बुझि पड़ैए। मुदा झूठ तँ नै कहने हएत। वासन-कुसन अखारि, चुल्हि लग जारैन रखि पानि भरि बुधनी देवन लग आबि बैस गेल। बुधनीकेँ ओछाइनपर बैसते देवन पुछलक- “अहाँक पति कहाँ छैथ?” पतिक नाओं सुनिते बुधनीक दुनू आँखि नोराए लगल। मुँहक बोलीकेँ सोग धकियबए लगल। दुनू चुप। ने देवन बजैत आ ने बुधनी। मुदा दुनूक चारू आँखि आगू-पाछू, ऊपर-निच्चाँ, दहिना-बामा भाग देखैत आगू बढ़ि एकठाम भऽ गेल। एकठाम होइते बुधनी कहए लगल- “बौआ, पौरुकाँ सालक गप छी। अखन तँ एकोटा नाँगैर नइ अछि। असगरूआ छी। खुट्टा परहक महींस उठल। बड़ दुधगर छेलए। अपनो सभतूर दूध खाइ छेलौं आ बेचबो करै छेलौं। हाथ-मुट्ठीमे दू-पाइ-चारि पाइ रहिते छेलए। गौंआँ सभ मिलि कऽ एकटा पारा पोसने अछि, हमहूँ पाँच रूपैआ बेहड़ी देने रहिऐ। बड़ सहठुल पारा छइ। महींस उठल तँ पारा लगि गेल। दुनू एक्केमे खेबो करै आ रहबो करइ। साँझ पड़ि गेल। अनहरिया पख। तँए दोसरे साँझसँ अन्हार गुप-गुप बुझि पड़इ। अन्हारेमे एकटा अनठिया पारा चलि आएल आ भैंसक घर पैस कऽ दुनू पारा लड़ए लगल। रमुआक बाप, एकटा भराठ लऽ कऽ अनठिया पाराकेँ भगबए चाहलैन। लड़ब छोड़ि पारा हुनकेँ खिहारि कऽ पटैक सींगसँ हूरा लिअ लगलैन। हम जोर-जोरसँ हल्ला करी- जे हौ लोक सभ रमुआ बापकेँ पारा खून कऽ देलकैन दौगै जा..., जाबे लोक सभ जुटल ताबे हुँनका अघमौगैत कऽ देलकैन। छातीक हाँड़ थोकचा-थोकचा भऽ गेलैन। राति रहइ। की करितौं? भरि राति हुनकेँ टहल-टिकोरामे बित गेल। गाममे डाकदर नहि। ओ कखनो कुहरबो करैथ आ कखनो निष्पराण भऽ जाथि। तखन हुअए जे पराण छुटि गेलैन। हाथसँ किछु-किछु करबो करी मुदा आँखिसँ तेते नोर खसल जे अँचरा भीज गेल। अपनो अहलदिल्ली पैस गेल। भोरे खाटपर उठा श्रीबाबू डाकदर लग गेलौं। जन्तर लगा-लगा डाकदर साहैब देख कहलखिन- “जेते दिन रोगी जीअत तेते दिन कष्टे हेतैन। नै बँचता। घरेपर लऽ जैयौन जाबे जीता ताबे सेवा करबैन। डाकदर साहैबक बात सुनि हमरा चौन्ह आबि गेल। भुइयेमे खसि पड़लौं। बड़ी काल तक किछु बुझबे ने केलिऐ। जखन मन नीक भेल तखन बुझलिऐ जे दू-चारि दिनमे मरि जेता। एक्केटा पिलुआ भेल छेलए। मुदा मन नै मानलक। लोको सभ कहलक जे मरथुन नहि। बड़का-बड़का ओझहा गुनी सभ अछि। बह्मोतरा बला ओझहा गाछ हँकैए। ओकरा ऐठाम केकरो पठाबहक। सएह केलौं। ओझहा आएल पूजा ढारलक, भाउ खेलाएल। कहलक जे ठीक भऽ जेतहुन। पान सात साए रूपैआ खर्च भेल। मुदा किछु ने भेलैन। अहिना-अहिना परोपट्टामे जेते धाइम, भगता, तांत्रिक अछि, सबहक ऐठाम गेलौं। मारे खरचो भेल आ छुटबो ने केलैन। सातम दिन मरि गेला। अपना ने खेती करैक लूरि अछि आ ने माल-जाल पौसैक। महींसो चलि गेल। गाछो-बाँस उपैट गेल। आब पनरह कट्ठा खेतेटा अछि। केना जिनगी चलत से बुझबे ने करै छी।” बुधनीक बात सुनि देवन सोचए लगल, हमहूँ तँ बच्चे छी। अनासुरती मनमे एलै, सिरिफ बुधनीटा तँ खेतवाली नइ अछि। गाममे बहुतो खेतबला अछि। अनको सभकेँ पुछि खेती करब। तइले चिन्ता की करब। समाज समुद्र छी। दोसराक सहारा लऽ पार-घाट लगाएब...। एते बात मनमे अबिते देवनक मुहसँ हँसी निकलल, उठि कऽ ठाढ़ भऽ बाड़ी दिस घुमैले विदा भेल आ चुल्हि पजाइर बुधनी भानस करए लगल। थोड़े कालक पछाइत घुमि-फिर कऽ आबि देवन चुल्हिए पाछूमे बैसल। भानस भेल। देवनकेँ बुधनी खाइले देलक। खाइते काल देवन बुधनीकेँ कहलक- “अहाँकेँ हम दीदी कहब आ रमुआकेँ ‘बच्चा’।” देवनक बात सुनि मुस्की दैत बुधनी बजली- “तोरा बेटा कहबौ। तीनू गोरेक सम्बन्ध स्थापित भऽ गेल। खेनाइ खेला पछाइत देवन बुधनीकेँ कहलक- “दीदी, जेते खेत अछि ओ बेरू-पहर हमरो देखा देब।” कनीए दिनमे देवनकेँ संग केने बुधनी अपन खेत देखबए विदा भेली। पनरह कट्ठा खेत जे तीन कोलामे बँटल। तीनू कोला देख दुनू गोरे घुमि कऽ आँगन आएल। आँगन आबि देवन बुधनीकेँ कहलक- “दीदी, हमरा खेत तामैक लूरि अछि। कोदारि अपना अछि की नहि।” देवनक बात सुनिते बुधनी घरसँ बीझहेलहा ठेँठी कोदारि निकालने एली। कोदारिकेँ देवन निंगहारि-निंगहारि देखए लगल। कोदारि रखि देवन सोचलक जे काल्हि भोरे सिलौटपर रगैड़ धरगर बना लेब। दुनू गोरे एक्के कोदारिसँ बेराबेरी तामब। भोर होइते देवन कोदारि पिजबए लगल आ बुधनी जलखै बनबए लगली। तीनू गोरे जलखै खा खेत विदा भेल। खेत पहुँच देवन तामए लगल। तमबो करैत आ गोलो फोड़ैत। थोड़े कालक पछाइत देवन थाकि गेल। देवनकेँ थाकिते बुधनी तामए लगली। जहिना-जहिना देवन तामि-तामि गोला फोड़ने, तहिना-तहिना बुधनियोँ करए लगली। थोड़े कालक पछाइत बुधनियोँ थाकि गेली कि देवन कोदारि लऽ पाड़ए लगल। दुनू गोरे मिला दस-बारह धूर खेत तामि, गोला फोरि अँगना विदा भेल। रस्तामे देवन बुधनीकेँ कहलकैन- “दीदी, कोदारियेसँ हरक काज कऽ लेब। जखन पानि हेतै तँ बीओ पाड़ि लेब।” देवनक विचार सुनि बुधनी सोचए लगली जे कहुना-कहुना खेती काइए लेब। जखने खेत अबाद भऽ जाएत तँ नहि सोलहन्नी तँ अठन्नियोँ-चैवन्नियोँ उपजा हेबे करत। अदहो-छिदहो उपजा भेने, नइ साल भरि तँ छओ मास गुजर चलबे करत। अँगना पहुँचली। अँगना अबिते बुधनी पैरपर एक चुरूक पानि लऽ घरसँ बिछान निकालि छाहैरमे बिछा देवनकेँ अराम करैले कहलक आ अपने भानसक जोगारमे लगि गेली। सभ दिन दुनू गोरे खेत तामए लगल। मासो ने लगलै सभ खेत दुनू गोरे मिलि तामि लेलक। जेठ मास। रौदसँ जमीन जरए लगल। गाछ- बिरीछक पत्ता पीअर भऽ-भऽ खसए लगल। इनार पोखैरक पानि किछु उड़ए लगल आ किछु अपन जान बँचबैले पतालक रस्ता पकड़लक...। तीन बर्खक पछाइत ऐ बेर आम फड़ल। टुकला बिछैले देवन रमुआकेँ संग कऽ गेल आ सभ गाछीक आम देखलक। आम देख देवन बुधनीसँ पुछलक- “दीदी, अहाँकेँ आमक गाछ नइए?” आमक गाछक नाओं सुनि बुधनीक आँखिमे नोर आबए लगल। जेहने दुख कमाइबला बेटा मुइने, उपजल जजात दहेने, ढेनुआर गाइक बच्चा मुइने होइत तेहने दुख फड़ैबला आमक गाछ सुखने वा बेचने होइत। करेज असथिर करैत बुधनी बजली- “बौआ, आमक गाछ तँ अपनो छल मुदा विपैत पड़ल तँ बेच लेलौं।” बुधनीक बात सुनि देवनक मनमे कचोट भेल मुदा किछु बाजल नहि। मने-मन सोचए लगल जे गाममे तेते आम फड़ल अछि जे मास दिन केतबो लोक खाएत तैयो उगरबे करत। जेकरा बेसी हेतै ओ बेचबो करत। ..देवन बाजल- “सभसँ बेसी आमक-गाछी केकरा छइ?” बुधनी बजली- “नसीवलाल काकाकेँ छैन।” “हुनका ऐठाम बेरू-पहर जाएब आ कहबैन जे दूटा आमक गाछ हमरा हाथे बेच लिअ। दूटा गाछ कीनने अपनो खाएब आ फजिलाहा बेच कऽ हुनकर दामो दऽ देबैन।” मेहनतक बले नसीवलाल काका बहुत किछु अरैज लेलैन। साले भरिक जखन छला तँ पिता मरि गेलैन। असगरे माएटा परिवारमे। छोट बच्चाक ममता माइक हृदैकेँ हिला देलकैन। वेचारी सासुरसँ नैहर चलि एली। बेटीक बगए देख माए बताहि जकाँ करए लगली। मने-मन भगवानकेँ गरियेबो करैन जे केहेन चण्ठ छैथ। अखन बेटी खाइ-खेलाइक उमेरक अछि, तखन ओ विपैतक पहाड़ गिरा देलखिन। मुदा पतिक बात मन पड़लैन- ‘जहिना बेटी हमरा घरमे जनमल आ सेवा केलिऐ तहिना जाबे जीब ताबे करबै।’ तखन मन असथिर भेलैन। नाना-नानीक छाहैरमे नसीवलालक पालन भेल। जहिना आगिमे धिपौल लोहा हथौड़ीक चोट खा नीक वस्तु बनैत तहिना नसीवलालोक जिनगीमे भेल। बच्चेसँ नानाक संग रहि काजक लूरि सीखए लगल। जुआन भेल। नाना-नानी मरि गेलैन। अपन मेहनत आ लगनसँ ओ गुजरो केलक आ खेतो कीनलक। खेतीक आमदनीसँ गाए कीनलक, घर बनौलक, गाछी लगौलक। दिन-राति अपन जिनगीक लीलामे रमि गेल। तीस बर्खक मेहनतसँ नसीवलाल आइ गामक सभसँ पैघ गिरहस्त छैथ। खेती-वाड़ीसँ समए बँचा कऽ पढ़बो-लिखबो करै छैथ। सदिकाल मनुखक बीच रहए लगला। हृदए एहेन विशाल भऽ गेलैन जे ढेरो मनुखक बीच रहनौं असगरे बुझि पड़ैन। जहिना मेघमे लाखो तरेगन रहनौं सुरूज अलग बुझि पड़ैए, तहिना..! देवन नसीवलाल ऐठाम पहुँचल। नसीवलाल अपराजित फूलक लत्ती टाटपर बान्हि-बान्हि सरियबैत रहैथ। अनभुआर देवनकेँ देख पुछलखिन- “तोरा चिन्हलिअ नै बौआ?” पएर छूबि गोड़ लागि देवन कहलकैन- “काका, आब हम अहीं गाममे रहै छी। अपना घर-दुआर नइ अछि।” चौंकैत नसीवलाल पुछलखिन- “ऐ गाममे केतए रहै छह?” “बुधनी ऐठाम। वेचारीकेँ चारि-पाँच बर्खक बेटाटा छैन और कियो ने।” नसीवलाल- “ऐठाम किए एलह?” “आमक मास छिऐ। वेचारीकेँ एक्कोटा आमक गाछ नै छैन तँए सोचलौं जे अहाँसँ दूटा गाछक आम मोल लऽ लेब, अपनो खाएब आ बेच कऽ दामो दऽ देब।” ऊपर-निच्चाँ देवनकेँ निंगहारि कऽ देख कहलखिन- “दरबज्जापर चलह। बैस कऽ निचेनसँ गप करब। तोहर माए-बाप केतए छथुन?” माए-बापक नाओं सुनि, देवन उदास भऽ कहलकैन- “दुनू गोरे मरि गेला। असगर बुझि घरसँ निकैल दुनियाँ देखैले विदा भऽ गेलौं। साल भरि नवटोलमे दीनमा-भुखनी ऐठाम रहलौं। साल पुरिते नवटोलसँ विकासपुर आबि बुधनी ऐठाम छी। वएह वेचारी अपनेक सम्बन्धमे कहलैन, तँए एलौं।” देवनक बात सुनि, नसीवलाल अपन जिनगीपर नजैर दौगबैत, गंभीर होइत बजला- “हँ, हमरा बहुत आमक गाछो अछि आ आमो। अगर ओइ वेचारीकेँ नै छै तँ चलह एकटा बरहमसिया आमक गाछी अछि ओ देखा दइ छिअ। बारहो मास फड़बो करैए आ खाइयोमे सुअदगर होइए। ओइमे जे तोरा पसिन हुअ। दूटा गाछ लऽ लिहह। ओकरे ओगरबो करिहह आ तामो-कोर करिहह। सालो भरि आम होइते रहतह।” नसीवलालक बात सुनि देवनक मन खुशीसँ नाचि उठल। आशाक दुनियाँमे देवन भ्रमण करए लगल। गाछी देखए दुनू गोरे विदा भेला। गाछी पहुँचते देवनकेँ बुझि पड़लै जे आमक ढेरीक बीच आबि गेलौं। नमगर-चौड़गर गाछी। मझोलका गाछक संग बड़को-बड़को गाछ। जहिना गाछ सबहक सुन्नर रूप तहिना आमसँ लदल गहना। एक-दोसर गाछमे एतेक सिनेह जे सभ अपन-अपन बाँहि समैट-समैट हटल। ने बड़का गाछ छोटकापर ओंगठल आ ने छोटका अपनाकेँ हीन बुझि दबाएल, जइ गाछमे जेते बुत्ता तेते बेसी फड़लौ। जहिना नसीवलाल बीच गाछीमे ठाढ़ भऽ हियासि-हियासि देखैथ तहिना देवनो घुमि-घुमि सगरे गाछी देखलक। देखला पछाइत देवन नसीवलालक लगमे आबि कहलकैन- “अपने धन्य छी काका, जे एते नमहर आ एते सुन्नर गाछी लगौने छी। हम तँ मोल लइक विचारसँ आएल छेलौं मुदा अपने ओहिना दइ छी तँए हम गाछीक ओगरवाहिये कऽ देब आ हमर मेहनतक जे मजूरी हएत तेतबे लेब।” देवनक जिज्ञासाकेँ अँकैत नसीवलाल बजला- “अखन तूँ बच्चा छह तँए गाछी लगौनाइ सीखह। ताबे एकटा गाछ ओहिना लऽ लएह आमो खेबह आ आँठीकेँ रोपि अपनो गाछी लगा लेबह। जखन फड़ए लगतह तखन अपन गाछीक सेवा करिहह।” नसीवलालक गप सुनि हँसैत देवन विदा भेल। घरपर आबि सभ बात बुधनीकेँ कहलक। दोसर दिनसँ देवन टुकला बिछैक विचार केलक। मनमे एलै जे टुकला बिछैले नीक झोरा चाही। मुदा से तँ नइ अछि। तँए दीदीकेँ एकटा झोरा सिबैले कहि दइ छिऐ आ आइ मौनीए लऽ कऽ जाएब। मौनी नेने देवन टुकला बिछए विदा भेल। गाछीमे टुकला पथार लागल। मने-मन देवन सोचलक जे अखन दोसर काजो ने अछि तँए जँ सभ टुकलाकेँ बीछि लेब आ सोहि कऽ आमील बनाएब। माइर पाइ हएत। मनमे अबिते देवन टुकला बिछए लगल। मौनी भरिते देवन विदा भेल। घरपर आबि बुधनीकेँ कहलक- “दीदी, गाछीमे टुकलाक पथार लगल अछि। अहूँ चलू आ रमुओ चलत। बड़का छिट्टा सेहो लऽ लिअ। मौनीमे बिछ-बिछ छिट्टामे रखब।” तीनू गोरे टुकला बिछए विदा भेल। टुकला देख बुधनीकेँ अचम्भा लगि गेलैन। भरि छिट्टा बुधनी, मौनीमे देवन आ दुनू हाथमे रमुआ टुकला नेने आँगन आएल। आबि देवन बुधनीकेँ कहलकैन- “दीदी, अहाँ अँगनाक काज करू आ हम टुकला सोहै छी।” देवन टुकला सोहए लगल। बुधनी भानस करए गेली। पनरहे दिनमे, धान-चाउरक पथार जकाँ आमिलक पथार अँगनामे भऽ गेल। आमील सुखा-सुखा बुधनी दू कोठी भरलक। अन्तिम जेठमे झमझमौआ बरखा भेल। धरतीक ताप आ पानिक ठंढकक बीच हाथा-पाइ हुअ लगल। हाथा-पाइ करैत दुनू अलिसा कऽ सुति रहल। पैछला सालक बात देवनकेँ मन पड़लै, बीआ बाउग करैक समए आबि गेल। मुदा कथीक बीआ बाउग हएत से बुझबे ने करैत। बुधनीए घर लग सजनाक घर। सजन गिरहस्त। देवनक मनमे एलै जे सजन गिरहस्त छैथ तँए हुनकेसँ पुछि लेब नीक हएत। सजन ऐठाम देवन गेल। हाल देख सजन हरक समान, गठुलासँ निकालि डेढ़ियापर झोल-झाल साफ करै छल। देवनकेँ देख सजन पुछलकै- “बौआ, केमहर-केमहर एलह?” देवन- “अहींकेँ पुछए एलौं जे पानि भेल हेन से कथीक बीआ अखन पाड़बै?” सजन बाजल- “बौआ, गिरहस्ती तँ हम जरूर करै छी, सभ काज करैक लूइरो अछि। मुदा पढ़ल-लिखल तँ छी नहि! तँए महिना लछत्तरक ठेकाने ने रहैए। अखन हरक सभ समान जोड़िया लइ छी आ बेरू-पहर नसीवलाल काका ऐठाम जा कऽ बुझि लेब। तोहूँ संगे चलिहह। जे बुझैक हेतह से पुछि लिहौन।” ‘बड़बढ़ियाँ।’ कहि देवन चलि आएल। बेर टगिते देवन सजनक संग नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। दरबज्जेपर बैस नसीवलाल बेटाकेँ बीआ बाउग करैक सम्बन्धमे कहैत रहथिन। तखने देवन आ सजन पहुँचल। दुनू गोरेकेँ देख नसीवलाल पुछलखिन- “दुनू गोरे केमहर-केमहर एलौं?” सजन कहलकैन- “काका, हम तँ अहींसँ पुछि कऽ खेती करै छी। आइ भिनसरे देवन हमरासँ पुछए आएल। तखन हम हरक समचा जोड़ियबैत रही तँए कहलिऐ जे बेरू-पहर दुनू गोरे चलि कऽ काकासँ बुझि लेब।” मुस्कियाइत नसीवलाल कहलखिन- “पहिने तमाकुल खुआबह तखन गप-सप्प करब।” कहि नसीवलाल चुनौटी निकालि सजनक हाथमे देलखिन। सजन तमाकुलो चुनबैत आ बजबो करैत- “तेहेन बरखा भेल जे मन खुशी भऽ गेल।” तैपर हुँहकारी भरैत नसीवलाल बजला- “छोट-छीन बरखा होइत तँ रस्ते-पेरे रहि जाइत मुदा झमकौआ बरखा भेने जमीनमे तेहेन हाल भेल जे गिरहत बीओ-बाइल खसा लेत आ दस दिन अफारो खेत धरि जोतत। घासो सभ, जे सूखा गेल छल ओहो पौनगत। जइसँ मालो-जालकेँ खोराकी बढ़तै।” चुटकीमे तमाकुल लऽ सजन नसीवलाल दिस बढ़ौलकैन। बामा तरहत्थीपर तमाकुल लऽ नसीवलाल दहिना औंठासँ दू बेर रगैड़ नाकमे औंठा भीरा नोइस लऽ तमाकुल मुँहमे लेलैन। नोइस लगिते छिक्का भेलैन। छिक्का होइते मन हल्लुक भेलैन। मन हल्लुक होइते बजला- “जेठ अन्त भऽ रहल अछि। बड़ सुन्नर हाल भेल। पुरना ढंगक गिरहस्तीमे मरूआ, गरमा धान आ नीचला खेतक अगहनी बीआ खसबैक समए आबि गेल। आँखि मूनि कऽ लोक बीआ पाड़त। हमरा तँ बोरिंग अछि तँए मकैयो तिलकैए आ गरमा धान सेहो काटै छी तैसंग बैशाखा तरकारी- सजमैन, रामझिमनी, झिमनी,ठढ़िया साग इत्यादि भरखैर निकलैए। महिना दिन आरो चलत। रामझिमनी बरसातियो होइ छइ। सजमैन झिमनी साग इत्यादि सेहो बरसातियो होइत अछि तँए ओहो सभ लगौल जाएत। मुदा सभसँ पैघ बात अछि जे सभ गिरहतो तँ एक रंग नइ अछि तँए फुटा-फुटा अपन-अपन बुझए पड़तह।” नसीवलालक बात सुनि सजन सन्तुष्ट भऽ गेल। मुदा देवनक मनमे अनेको सवाल उपैक गेल। बाजल- “काका, हमरा दीदीकेँ तँ पनरहे कट्ठा खेत अछि आ दुनू गोरे अनाड़ीए छी। हम केना की करब?” नसीवलाल- “तीन गोरेक परिवारमे बहुत जमीन अछि। जँ ढंगसँ उपजा हएत तँ सालो भरि गुजर कऽ कऽ उगरबो करत।” उगरब सुनि देवन उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। नसीवलाल देवनकेँ बैसबैत कहलखिन- “सभसँ पहिने देवन सालकेँ मनसँ निकालि लएह। तीन तरहक मौसम होइ छै आ तीनू मौसमक फसिल सेहो होइ छै तँए अखन तूँ गरमा धान जे चारि मासमे भऽ जाइ छै आ मरूआ आ तैसंग तीमन तरकारीक खेती शुरू करह। कम्मे समैमे तीमन-तरकारी फड़ए लगतह जइसँ गुजरो चलतह। जँ अपने भरि करबह तँ खेबेटा करबह, अगर जँ बेसी करबह तँ अपनो खेबह आ बेच कऽ गुजरो करबह।” देवन- “काका, बीआ केतएसँ आनब?” नसीवलाल- “सभ चीजक बीआ हम दऽ दइ छिअ।” देवन- “तीनटा कोली हमरा दीदीकेँ अछि। चारि कट्ठाक कोली गहींरगर अछि बाँकी दूटा कोली मध्यम आ भीठ छैन, अपने बुझा-बुझा कहि दिअ कोन कोलीमे कोन अनक खेती करब?” धियानसँ देवनक बात सुनि नसीवलाल बजला- “नीचला खेतमे छिपगर धान रोपए पड़तह। किएक तँ ओइमे बेसी पानि बसत। मुदा एमहर जे दूटा कोली बँचलह ओइमे सँ जे मध्यम छह तइमे गरमा धान करह, किएक तँ बहुतो किस्मक धान अछि जे ७० दिनसँ लऽ कऽ १५० दिनक होइए। जँ गरमा धान नीक-जकाँ उपजतह तँ पाँच कट्ठामे कहुना-कहुना सात क्विन्टल धान हेतह। एकटा कोलीमे मरूआ रोपि लएह। मरूआ कम्मे दिनमे होइ छइ। जँ सवारी समए बेसी बरखा हेतै तँ मरूआ काटि कऽ तीन-मासी गरमा कऽ लिहह आ जँ रौदियाह समए हएत तँ राहैर, तेबखा, कुरथीमे सँ कोनो दालि बाउग कऽ दिहक। बाड़ी-झाड़ी छह की नहि?” देवन- “घरे लग अछि। पहिने ओइमे दूटा आमक गाछ छेलै जे उपैट गेल।” नसीवलाल- “अगर दसो धूर हेतह तैयो सालो भरिक तीमन-तरकारी ओइमे उपैज जेतह। थोड़ेमे साग बाउग कऽ लिहह। थोड़ेमे रामझिमनी रोपि लिहह। एकटा लत्ती सजमैनक लगा लिहह।” देवन- “काका, एकटा लत्ती केते फड़त?” ‘केतए फड़त’ सुनि नसीवलालकेँ हँसी लगलैन। मुदा मनमे एलैन जे बच्चा अछि तँए नै बुझैए। बुझबैत कहलखिन- “बौआ, एकटा सजमैनक लत्ती जँ सम्हैर जाए तँ साए तक फड़त मुदा डेढ़ साए फड़बैले रोपनिहारोकेँ मुश्ताइज रहए पड़तै।” देवन- “की मुश्ताइज?” “जहिना लोक घर बनबैए तहिना ओकरा-ले बाँसक मजगूत खुट्टापर मचान बनबए पड़तह। कीड़ी-फतींगीक देख-भाल करए पड़तह। जइमे छाउर-गोबर,डी.ए.पी. खाद दिअ पड़तह। तेतबे नहि, जखने लत्ती ठमकै आकि यूरिया खाद, टौनिक दबाइ देमए पड़तह। फल नीक होइ दुआरे पोटाश सेहो देमए पड़तह।” नसीवलालक बात सुनि अपनाकेँ कमजोर आ पछुआएल उपजौनिहार बुझि देवन बाजल- “काका, अहाँक विचार तँ मनमे जँचैए मुदा अखन तँ हम सभ तरहेँ पछुआएल छी तँए अखुनका हमर स्थिति देख कऽ रस्ता बता दिअ।” “बौआ, भगवानो गरीबकेँ मदैत करै छथिन। भगवानक बास छैन माटि, पानि हवा आ आरो-आरो जगहमे, जैठाम जे जजात पहिले पहिल लगौल जाएत ओइले माटि, पानि, हवा आ रौद अपन खजानासँ शक्ति आनि कऽ दऽ दइ छथिन तँए, तूँ ठीक समैमे रोपि देख-भाल, कमठौन, आरो-ओरो जे जोगार छै, तेतबे करिहह। मुदा करह। जखने करए लगबह दुख पड़ाए लगतह। जेते करबह तेते दुख भगतह।” नसीवलालक विचार सुनि देवन खिलखिला कऽ हँसए लगल। देवनकेँ हँसैत देख नसीवलालक हृदए जहिना जुड़शीतल पावैनमे माए-बाप, बेटा-बेटीक माथपर जल दऽ जुड़बैत तहिना भेलैन। आँखि उठा दुनियाँ दिस देखए लगला। मनमे एलैन जे ई दुनियाँ तँ कर्मभूमि छी। देवन जरूर कर्मनिष्ठ बनत मुदा कर्मनिष्ठोक रस्ता[6] तँ ज्ञानेक संग केने चलैत। अखन धरिक जे अनुभव अछि ओ देवनकेँ जरूर बुझा देबइ...। देवनकेँ बीआ दैत नसीवलाल बजला- “बौआ, साग-तरकारीक बीआ अन्दाजेसँ आ धान मरूआक बीआ तौलल छह। पाँच-पाँच किलो धानक बीआ छह। एकरा पँच-पँच धूर खेतमे पाड़ि लिहह।” ‘पाँच धूर’ सुनि देवन पुछलकैन- “पाँच धूर केना बुझबै?” देवनक जिज्ञासा देख मुस्कियाइत नसीवलाल कहलखिन- “बौआ, ऐ गाममे साढ़े छह हाथक लग्गी अछि। एक लग्गी, एक लग्गी एक धूर खेत भेलइ। मुदा पुरुखा सभ तीन-डेग, तीन डेगकेँ एक धूर नपै छला।” देवन- “काका, सभ तरहक लोकक डेग तँ एक्के रंग नै होइए?” देवनक प्रश्न सुनि नसीवलालकेँ खराप नइ लगलैन, कहलखिन- “बड़ सुन्नर बात बौआ पुछलह। तीन डेगक मतलब, ओहन डेग जे दू हाथसँ कनीक बेसी होइ। दू हाथक डेगक माने ने बड़का धाप आ ने सासुरक डेग। दुनू पएरक दूरी डेढ़ हाथ होइ। किएक तँ एक बीतक पएर होइ छइ। दुनू पएरक नमती एक हाथ भऽ जाइ छइ। तँए डेगमे एक पएरक आ डेढ़ हाथ बीचमे।” नसीवलालक बात सुनि देवन उठि कऽ ठाढ़ भऽ खिलखिला कऽ हँसबो करए आ दुनू हाथे थोपड़ियो बजबए लगल। ..मने-मन नसीवलाल सोचए लगला जे एते खुशी देवन किए भेल। पुछलखिन- “बौआ, एना किए करै छह?” देवन- “काका, अहाँ हमरा धरती नपैक लूरि बता देलौं। आब हम जरूर दुनियाकेँ नापि लेब।” धान, मरूआ आ साग-तरकारीक बीआ लऽ देवन विदा भेल। रस्तामे सजन देवनकेँ कहलकै- “बौआ, तेहेन गामक लोक अछि जे केकरोसँ गपो करब मोसकिल भऽ जाइए। असगरे अपन दुख-धन्धामे लगल रहै छी तँए, नइ तँ कोन जालमे के कखन ओझरा देतह से बुझबे ने करबहक। आब तँ दू भाँइ भेलौं, दुनू गोरे निचेनमे गप-सप्प करब।” साँझू-पहर सजन टहलल-टहलल बुधनी ऐठाम आएल। बुधनी भानस करै छेली। एक्केटा डिबिया बुधनीकेँ, जे चुल्हि लग बड़ै छल। अँगना अनहार। अन्हारे अँगनामे देवन आ रमुआ बैस एक-दू-सँ-बीस तक गनैत रहए। सजनकेँ देख देवन बुधनीकेँ कहलक- “दीदी, डिबिया मोख लगमे दऽ दियौ। घरोमे इजोत हएत आ अँगनोमे हेतइ।” बुधनी डिबिया मोख लग रखि देलखिन। सजनकेँ बैसबैत देवन बाजल- “भैया, गाममे के केहेन लोक अछि से हमरो बुझा दिअ। किएक तँ आब हमहूँ अही गाममे रहब किने।” देवनक बात सुनि सजनकेँ मनमे भेलै जे देवन हमरा बेसी मानैए। अपन बड़प्पन बुझि सजन बाजए लगल- “पाँचिम बर्खक बात छी। जोगिन्दरक गाए बिआएल। बड़ सुन्नर पहिलोठे गाए छेलइ। जेहने रंग तेहने खाँड़। बसुलिया सींग मझोलका थुथुन। आगूसँ देखैमे तेते नीक लगै जे हुअए देखते रही। तहिना पाछुओसँ। ओना लोक कहै छै ‘बरदक आगू गाइक पाछू’, मुदा ओइ गाइक जेहने थन तेहने थुथुन। देशी गाए रहितो जरसीए जकाँ बुझि पड़इ। दूधो बढ़ियाँ होइ। सभतूर मिलि जोगिन्दर सेवा करै छेलइ। पहिलोठ गाए रहने दुहै काल गुदगुदी लगै तँए हनपटा जाइत। ने बच्चाकेँ पिबए दइ आ ने दुहह दइ। ..दोसर दिन जोगिन्दर ननुआकेँ कहलकै। ननुओ गाए पोसैत मुदा अछि नेतघट्टू। जोगिन्दरकेँ ननुआ तेहेन चीज पीयबैले कहलकै जे पीऐबते गाए बगैद गेलइ!ने घास खाइ आ ने पानि पिबइ। ने केकरो लगमे जाए देइ आ ने बच्चाकेँ देखए चाहै। जहिना दारू पीब मनुख करैए तहिना गाइयो करए लगलै। ..दुनू परानी जोगिन्दर हबो-ढकार भऽ भऽ कानल फिड़इ। बच्चा सेहो लर-ताँगर जकाँ भऽ गेल। एक-फुच्ची दूध रतनासँ उठौना केलक। मुदा एक फुच्ची दूधसँ बच्चाकेँ की होइतै। बड़ आशासँ वेचारा जोगिन्दर गाए पोसने छल जे बिआएत तँ दस दिन दूध खा बेच लेब, जइसँ बेटीक बिआहो कऽ लेब आ उगरत तँ एकटा बाछियो कीनि लेब। तेसर दिन जोगिन्दर बुझलक जे ननुआ अन्ट-सन्ट दबाइ दऽ गाएकेँ दुरि कऽ देलक। जोगिन्दर तँ बरदास केने रहल मुदा घरवाली ननुआकेँ गरियाबए लगल। ..घरवालीकेँ गरियबैत देख जोगिन्दर कहलकै, गाइयो दुरि भेल आ मारियो खाएब। चुप रहू। देखै नै छिऐ जे गाममे सभसँ जेरगर दियादी ननुआकेँ छइ। तेहेन-तेहेन हुरनेठगर समांग सभ छै जे...। मुँह बन्न करू नइ तँ अनेरे मारि खाएब।’ ..साए बीघा बाधक बीचमे दू-अढ़ाइ कट्ठाक एकटा परती अछि। परतीपर एकटा साहोरक गाछ। नमहर तँ बेसी नै मुदा सघन। छोट-छीन अछार लोक ओतै बिता लैत रहए। ओइ गाछपर ठनका खसलै। साहोरक गाछपर ठनका खसब सुनि नसीवलाल भोरे देखैले जोगिन्दरे घर लग देने जाइत रहैथ। दुनू परानी जोगिन्दरकेँ कनैत देखलखिन। ससैर कऽ नसीवलाल काका जोगिन्दर लग आबि पुछलखिन, किए दुनू परानी कानै छह? नसीवलाल कक्काक बात सुनि आरो हुचैक-हुचैक दुनू परानी कानए लगल। अँगनामे ढेरबा बेटी लुड़ुओ-खुड़ु करै आ आँखिक नोरो पोछैत रहइ। आ जोगिन्दरक बेटा जेठ बहिनकेँ कहै- ‘दाय कहए छेलै जे गाए बीएतै तँ दूध देबौ, से कहाँ दइए।’ ..छोट भाइक बात सुनि बहिनक हृदए बरफ जकाँ पीघलैत रहइ। मुदा वेचारी की करितए। मुँहपर हाथ सहलबैत कहलकै- ‘बौआ, अल्लू पका कऽ रखने छी। ओकरा सन्ना कऽ दइ छी। रोटी आ सन्ना खा लिअ। भगवान कोनो गाम गेलखिन। जब खुट्टापर गाए अछि तँ दूध खेवे करब।’ ..अँगनासँ लऽ कऽ दरबज्जा तकक दृश्य नसीवलाल काका देखैत रहैथ। आशा जगबैत नसीवलाल काका जोगिन्दरकेँ कहलखिन- ‘कनलासँ की हैतह? एहेन कोन दुख छै जेकर दबाइ नइ छइ। मुँह बन्न करह आ कहह जे की भेलह?’ ..तखन नसीवलाल कक्काक बाँहि पकैड़ जोगिन्दर गाइक-बच्चाकेँ देखबैत कहलकैन- ‘काका, पाँच दिन गाएकेँ बिएना भेल, एक्को चौठी दूध नै होइए। बच्चोकेँ थन तर नै जाए दइ छइ। पाभैर दूध रतनासँ उठौना लइ छी वएह पीआ कऽ बच्चाकेँ अखन धरि जीऔने छी। नइ तँ ईहो मरि गेल रहैत।’ ..मुँहपर हाथ दऽ नसीवलाल काका थोड़े काल गुम्म रहि, पुछलखिन- ‘बिएलापर की सभ केलहक?’ ..तखन जोगिन्दर कहलकैन- ‘थन तर गाए जाइए ने दिअए। तखन ननुआ भैयाकेँ पुछलिऐ। ओ एकटा दबाइ घरसँ आनि कऽ देलक आ कहलक जे एकरा पीआ दिहक। गाए ठीक भऽ जेतह।’ ..मने-मन नसीवलाल काका सोचि-विचारि कऽ कहलखिन- ‘नीक भऽ जेतह। दूधो हेतह। कानह नहि। हम बाधसँ साहोरक गाछ देखने अबै छी। तखन संगे डाक्टर ऐठाम चलिहह।’ ..कहि नसीवलाल काका बाध दिस विदा भेला। बाधक परतीपर जा साहोरक गाछ देखए लगलखिन। ठनकासँ साहोरक गाछ दू फाँक भऽ गेल छेलइ। दुनू फाँक दुनू भाग खसल। जहिना-जहिना ठनका निच्चाँ-मुहेँ गेल तहिना-तहिना गाछो झड़कल। मनमे एलैन जे अखन धरि सभ बुझैए जे साहोरक गाछपर ठनका नै खसै छै मुदा आँखिक सोझहामे देखै छी। गाछक बगलेमे बैस नसीवलाल काका सोचए लगला। थोड़े कालक पछाइत मनमे एलैन जे ई बात–साहोरपर ठनका नै खसब–गाछी-बिरछीमे भऽ सकैए जैठाम आन गाछ नमहर-नमहर रहै छै आ साहोरक गाछ छोट। मुदा एगच्छामे तँ भऽ सकै छइ। ऐ निष्कर्षपर पहुँच नसीवलाल काका घुमि कऽ घर दिस विदा भेला। दुनू परानी जोगिन्दर, डेढ़ियापर बैस, नसीवलालक प्रतिक्षा करैत रहए। दुरेसँ हिनका अबैत देख जोगिन्दर रस्तापर ठाढ़ भऽ गेल। जोगिन्दरकेँ देखते नसीवलाल काका कहलखिन- ‘अखने चलह। घरपर गेलासँ काजमे ओझरा जाएब।’ ..दुनू गोरे मवेशी डाक्टर ऐठाम विदा भेला। डाक्टर कमल एकटा महींसक इलाज कऽ कऽ आएले छला, दुनू गोरेकेँ देखते मातर हाँइ-हाँइ कलपर जा हाथ-पएर धोइ कऽ आबि नसीवलालकेँ गोड़ लगलकैन। दुनू गोरेकेँ बैसबैत, आँगन जा घरवालीकेँ चाह बनबैले कहलखिन। डाक्टर कमलक बेवहार देख जोगिन्दरकेँ आश्चर्ज लगइ। डाक्टर कमल नसीवलाल काका लग आबि पुछलखिन। जोगिन्दर सभ बात कहलकैन। अलमारीसँ दबाइ निकालि टेबुलपर रखि, बुझबैत कमल कहलखिन- “तीन दिनक दबाइ देलौं हेन। छोटका पुड़ियामे बच्चाक दबाइ छी। दुनू साँझ खुरचनमे घोरि बच्चाकेँ देबइ। आ दू रंगक दबाइ गाए-ले देने छी। रोटी संगे गाएकेँ खुआएब। दू खोराक देला पछाइत गाइक मन नीक हुअ लगत। काल्हि साँझसँ दुहबो करब। तीन-चारि दिनमे गाए नीक भऽ जाएत। अगर नै ठीक हुअए तँ फेर आएब।” ..फेर जोगिन्दर डाक्टर कमलकेँ पुछलकैन- ‘केते दाम भेल।’ ..मुस्की दैत कमल कहलखिन- ‘पाँच रूपैआ भेल।’ ..रूपैआ दऽ जोगिन्दर नसीवलाल कक्काक संग विदा भेल। घरपर अबिते गाइयो आ बच्चोकेँ दबाइ पिऔलक। जहिना-जहिना डाक्टर कहने रहथिन तहिना-तहिना गाए नीक हुअ लगलै। तेसर दिनसँ बढ़ियाँ जकाँ गाए दुहह देलकै। मास दिन सभ परानी जोगिन्दर दूध खा सात हजारमे गाए बेच लेलक। ओइ रूपैआसँ बेटीक बिआहो केलक आ एकटा डेढ़ सालक बाछी सेहो कीनलक।” आँखि मूनि देवन सजनक बात सुनैत रहल। जखन सजन चुप भऽ गेल तखन देवन आँखि खोलि बाजल- “भैया, अहाँ तँ हमर बन्न आँखि खोलि देलौं।” देवनक बात सुनि जोगिन्दर कहलकै- “बौआ, एहेन-एहेन खिस्सा सबहक अछि। हम जे केकरो दरबज्जापर नै जाइ छी से अही दुआरे। जखन सौंसे गामक लोकक किरदानी सुनबहक तँ हेतह जे सौंसे गाम लुच्चे-लफंगा अछि। ने कोइ एक्कोटा सत बजतह आ ने केकरो कोइ नीक करतह आ जँ केकरो किछु पुछबहक तँ तेहेन मीठ बोली बजतह जे बुझि पड़तह जे एहेन शुभचिन्तक गाममे दोसर नइ अछि। मुदा तेहेन घुरछी लगा देतह जे पेंपियाइत रहबह।” भानस कऽ बुधनियोँ आबि बैसल छेली। खिस्सा सुनि बुधनी सजनकेँ कहलखिन- “भैया, भानसो भऽ गेल आब खा लोथु तखन जइहैथ।” हँसैत सजन बाजल- “केतौ आनठाम छी। जहिना ई घर तहिना ओ घर।” देवन दिस घुमि सजन फेर बाजल- “बौआ देवन, एहेन-एहेन बहुत बात अछि। दोसर दिन आरो सुना देबह। अखन रातियो बेसी भऽ गेल। तोहूँ सभ खा-पीअ।” ◌ शब्द संख्या : 4807 8. अधरतीए-मे बचेलालक निन टुटि गेलैन। दू बेर खोंखी कऽ ओछाइनेपर पड़ल रहला। एक करोटसँ दोसर करोट उनैट मने-मन सोचए लगला, अखन धरि हमर जिनगी की रहल। जखन तीन बर्खक रही तखने पिताजी स्वर्गबास भऽ गेला। माइक ऊपर परिवारक भार पड़लैन। ओ जेना-तेना घर सम्हारि चलबए लगली। औरत होइतो परिवारकेँ सम्हारि दुनू भाए-बहिनकेँ पढ़ेबो केलैन। मैट्रिक पास करा हमरा शिक्षक बनौलैन। जे बहुत मर्दो बुते नै होइ छइ। एतइ प्रश्न उठैए जे की औरतकेँ मरदसँ शक्तिहीन बुझल जाए? कथमपि नहि। पुरुखसँ औरतकेँ कम बूझब नादानीक शिवा और की भऽ सकैए। हँ, ई बात जरूर अछि जे आइ धरिक जे जिनगी औरतक रहल, ओ कमजोर जरूर बनौलक। जइसँ पुरुख-औरतक बीच नमहर दूरी अबस्स भऽ गेल अछि। जेकरा समतल बनबैमे समए साधन आ श्रमक जरूरी अबस्स अछि। मुदा एकर अर्थ ई नहि जे समतल नै बनि सकत। जहिना पुरुखमे असीम शक्ति होइए तहिना औरतोमे होइए...। एते बात बचेलालक मनमे अबिते अपन पत्नी दिस नजैर दौगा कऽ देखलैन। रूमाक चालि-ढालि देख मनमे एलैन, अदहा कोन जे चौथाइयो मनुखसँ कम क्रियाशील छैथ। जँ ओ घर सम्हारि लोथु तँ हम नोकरीक संग किछु समाजो-सेवा करितौं। दरमाहासँ परिवारोक खर्च चलैत आ किछु समाजोक उपकार होइत। मुदा से कहाँ होइए...। एते बात मनमे अबिते बचेलाल देवालमे टाँगल घड़ी दिस चोरबत्ती बाड़ि कऽ देखलैन। रातिक एक बजैत। चोरबत्ती सिरमाक बगलमे रखि फेर सोचए लगला, आइ परिवा छी। परीब रातिक चाँन घसकट्टो हाँसूसँ पातर बुझि पड़ैए। मुदा जहिना-जहिना दिन बढ़ैत जाएत तहिना-तहिना चानो बढ़त। बढ़ैत-बढ़ैत वएह चाँन पुरनिमा दिन सुरूजे जकाँ विशाल भऽ रातिकेँ दिन जकाँ बना लैत अछि। तहिना तँ मनुखोकेँ भऽ सकैए। मुदा मनुखमे चाँनक गति नै भऽ पबैत। वएह चाँन पुरनिमाक परातसँ छोट हुअ लगैत आ छोट होइत-होइत अमावश्या दिन विलीन भऽ जाइए। आखिर ओ चाँन केतए चलि जाइए? जँ केतौ चलि जाइए तँ फेर परातेसँ अबैत केना अछि? की मनुखोकेँ ओहिना होइत? जहिना दुनियाँक बोध घटैत-घटैत बेकती लग पहुँच जाइ छै तहिना तँ शक्तियो कमैत-कमैत एते कम भऽ जाइ छै जे अस्तित्वो मृत्यु प्राय बनि जाइ छै...। फेर बचेलालक मनमे प्रश्न उठलैन, दुनियाँमे सभसँ श्रेष्ठ जीव मनुख मानल जाइए आ मात्र मानले नै जाइए। वास्तविक ऐछो। दुनियाँमे जेते जीव-जन्तु अछि ओइमे मनुखेटा केँ विवेक होइ छइ। आन-आन गुण तँ कमोवेश सभमे पौल जाइ छइ। ..आइ धरि मनुख विवेकक उपयोग जेते बजैमे करैए तेकर एकअन्नियो जिनगीमे नै कऽ रहल अछि। ई दुनियाँ कर्मभूमि छिऐ आ मनुख कर्मकार। मुदा से नहि बुझि उधिकांश लोक दोसराक श्रमकेँ लूटि अपन ऐश-मौजक जिनगी बनबै पाछू विवेककेँ ताकपर रखि दइए जइसँ मनुखक बोनमे हदिघड़ी आगि लगले रहैए। आ ओ आगि ताधैर धधकैत रहत जाधैर विवेकक सीमा मजगूत नै बनत। शुरूहेसँ जेना-जेना मनुख होशगर होइत गेल तेना-तेना अल्लढ़ मनुखकेँ जानवरक श्रेणीमे धकलैत गेल। धकलैत-धकलैत एहेन रस्ते बनि गेल जे सभ-सभकेँ निच्चेँ-मुहेँ धकलैए। धकलाइत-धकलाइत जे सभसँ नीचाँ पहुँच गेल अछि। ओकरा आगू-मुहेँ बढ़ैक कोन बात जे तकलो ने होइ छइ। तकबो केना करत? दुनियेँ उनैट गेल। जिनगीक सभ रस्ता उनैट गेल। उनैट गेल विवेक। जइसँ साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, दर्शन, एक्कोटा बाँकी नै रहल। जँ थोड़-थाड़ बँचलो अछि तँ ओहिना जेना लक्ष्मणकेँ शक्तिवाण लगलापर हनुमानकेँ सिर-सजमनि अनैले कहलकैन आ ओ सिर-सजमनि नै चीन्हि पहाड़े अनैले मजबूर भेला। ..सवाल उठैए जे बिनु अनुकूल दिशामे एने मनुखक कल्याण भऽ सकै छइ? कथमपि नहि भऽ सकैए। मुदा मनुखेक भीतर ओहन शक्ति अछि जे कऽ सकैए। जँ मनुख अपन शक्तिकेँ चीन्हि उपयोग करए, तखन। ई बात मनमे अबिते बचेलाल केबाड़ खोलि घरसँ निकैल आँगन आबि अकास दिस देखए लगला। सन-सन करैत अन्हार। आँगनसँ निकैल बाटपर आबि उत्तरसँ दच्छिन आ दच्छिनसँ उत्तर-मुहेँ जाइत रस्ताकेँ धियानसँ देखए लगला। एक्केटा रस्ता जैपर उत्तर-मुहेँ चललासँ उत्तरी ध्रुवपर पहुँचैत आ दच्छिन-मुहेँ चललासँ दछिनी ध्रुवपर। रस्ता तँ एक्के अछि मुदा दिशा बदलने स्थानो बदैल जाइए। अहिना तँ जिनगियोक रस्ता अछि। एक दिस गेने लोक पापी बनि जीबैए जखन कि दोसर-मुहेँ गेने धर्मात्मा बनि जाइए। मुदा प्रश्न उठैए, असगर चलब आ समूहक संग चलब। समूहक संग चलने बेवस्था बदलैत जखन कि असगर चलने बेवस्था नै बदलैत...। एते मनमे अबिते, बड़बड़ाइत बचेलाल घर आबि बिछानपर पड़ि रहला। अपने सवालो उठबैथ आ जवाबो तकैथ। ..रूमाक निन सेहो टुटि गेलैन मुदा पतिक बड़बड़ेनाइ सुनि गबदी मारि सुनए लगली। पतिक बोलीमे रूमा संकल्प, धैर्य, उत्साह देखैथ। ..जहिना आगिक धधरामे काँच वस्तु पकैत जाइत तहिना बचेलालमे साहस जगए लगलैन। साहसक संग धैर्य सेहो आबए लगलैन। आइ धरि जे बात रूमा पतिक-मुहेँ कहियो ने सुनने छेली ओ सुनए लगली। जिनगीक रस्ता केना बदलल जाए, ई बात बचेलालक मनकेँ झकझोड़ए लगलैन। बिनु रस्ता बदलने आगू बढ़ब कठिन। मुदा रस्तो बदलब तँ असान नहियेँ अछि। ..यएह गुनधुनी बचेलालक मनकेँ धोर-मट्ठा भेल पानि जकाँ केने रहैन। कछमछाइत बचेलाल कखनो पड़ि रहैथ तँ कखनो उठि कऽ बैस रहैथ। मुदा रस्ता देखबे ने करै छला। चीनक एकटा खिस्सा मन पड़लैन। चीनक एकटा पहाड़ी इलाकामे एक गोरे रहै छल। घरसँ निकैल बाहर जेबामे ओकरा एकटा पहाड़ टपए पड़ै छेलइ। एक दिन ओकरा मनमे एलै जे पहाड़ काटि रस्ता बनौलासँ चलबोमे सुगम हएत आ समैयोक बँचत हएत। ओ आदमी छेनी-हथौड़ीसँ पहाड़ काटए लगल। काटिते समए दोसर गोरे देखलक। पहाड़ कटैत देख ओ पुछलखिन- “एहेन पहाड़केँ केना काटि सकबह?” छेनी-हथौड़ी रोकि ओ उत्तर देलकैन- “जिनगी भरिमे जेते कटत ओते तँ असान भऽ जाएत। तेकर उपरान्त बेटा काटत एक-ने-एक दिन पहाड़ कटबे करत जइसँ सुगम रस्ता बनबे करत। जे अबैबला पीढ़ी-ले सुगम हएत।” खिस्साकेँ धियानसँ सोचि बचेलाल आगूक जिनगी-ले कार्यक्रम बनबए लगला। पतिक बोलीकेँ रूमा धियानसँ अँकैत रहैथ। कोनो बात निक्को लगैन आ कोनो अधलो तैसंग कोनो-कोनो बात बुधिक बखारीमे अँटबो ने करैन। रूमा मने-मन सोचए लगली, भरिसक हिनका कोनो बिमारी तँ ने भऽ गेलैन। मुदा बिमारीसँ जे बड़बड़ेनाइ होइ छै ओ तँ जेना-जेना रोगक धक्का कम-बेसी होइत तेना-तेना कमो-बेसी होइए जे हिनकामे नइ देखै छिऐन। एक रसमे बजै छैथ। ..अपन दहिना हाथ रूमा बचेलालक छातीपर दऽ धड़कन देखए लगली। छातीपर हाथ पड़िते बचेलाल पुछलखिन- “अहूँ जागि गेलौं?” अपन विचार छिपबैत रूमा बजली- “अखने नीन्न टुटल। अहाँ कखनसँ जागल छी?” गंभीर स्वरमे बचेलाल कहलखिन- “बारह बजे रातियेसँ जगल छी, निन्ने ने होइए।” “हमरो किए ने उठा देलौं?” “उठबैक मन भेल मुदा सोचलौं जे जाबे अपने नै जागब ताबे दोसरकेँ केना जगा सकब? तँए नै उठेलौं।” सुमित्रा उठि कऽ मोख लग राखल बाढ़ैनसँ अपन घर बहारि ओसार बहारए लगली। बहारैत-बहारैत सुमित्रा जखन बचेलाल घरक मुँह लग एली तँ बुझि पड़लैन जे घुनघुना कऽ बचेलाल किछु रूमाकेँ कहै छथिन। बाहरब छोड़ि सुमित्रा बोली अकानए लगली। बचेलाल रूमाकेँ कहैत रहथिन- “अपना परिवारमे दू गोरे जुआन छी। दूटा बच्चा अछि आ माए बुढ़ छैथ। जखन पिताजी मुइला तखन हम दुनू भाए-बहिन बच्चे रही। जेते खेत अखन अछि तेतबे ओेहू समैमे छल। असगरे माए दुनू भाए-बहिनकेँ पोसबो केलैन आ पढ़ेबो केलैन। बहिनकेँ मिड्ल तक पढ़ा बिआहो केलैन। हमरा मैट्रिक तक पढ़ा शिक्षक बनौलैन अपन बिआहमे माइक विचार हम कटलौं। हुनकर मन रहैन जे गिरहस्तक बेटीसँ बिआह करब, जखन कि हम नोकरिया परिवारमे बिआह केलौं। हमहूँ आगू-पाछू नै बुझिऐ। मुदा आब बुझै छी जे गलती केलौं। बिआह तँ सिरिफ लड़के-लड़कीक ने होइए। जहिना उमेरक खियाल लड़का-लड़की, बर-कनियाँमे देखल जाइ छै तहिना परिवारो आ समाजोक खियाल हेबा चाही। पुरुख-नारीक सम्बन्ध तँ सृष्टिक सृजनक एक प्रक्रिया छी। मुदा ऐसँ भिन्न जिनगी होइ छइ। जे बेकती-परिवार आ समाजसँ जुड़ल रहैए। हम पढ़ल-लिखल लहक-चहक परिवार बुझि बिआह केलौं मुदा परिवार आ समाज दिस नजैरे ने गेल। अखन धरि परिवार साधारण किसानक रहल जखन कि अहाँक परिवार तीन पुश्तसँ नोकरी करैत आएल अछि। नोकरिया परिवारक आ किसान परिवारक चलैक ढंग अलग-अलग होइत। दू तरहक चालि-ढालि, दू तरहक जीबैक ढंग दुनूक बीच होइ छै तँए आब बुझै छी जे माइक विचार नीक छेलैन...।” एते सुनिते गहुमन साँप जकाँ रूमा फूफकार कटैत ओछाइनसँ उठि ठाढ़ भऽ बजली- “हमर बाप-माए, खरचा दुआरे बोइर देलक, नइ तँ नीक शहरमे अफसरनी बनि ठाठसँ रहितौं। ऐ गाममे देखै छी जे ने एक्को बीत पीच सड़क अछि आ ने बिजली, ने एक्कोटा कोठा छै आ ने कोनो गाड़ी-सवारी। दम घोंटि कऽ कहुना-कहुना जीबै छी हम आ उल्टे ठका गेलौं अहाँ। वाह रे दुनियाँ!” बचेलालकेँ अपन गलती अपने मुहसँ स्वीकार करैत सुनि सुमित्राक मनमे उठलैन- आब बचेलालकेँ होश जगि रहल अछि। होश जगैएमे मनुखकेँ देरी होइए मुदा जगलापर तँ ओ अपन रस्ता बनबैत आगू बढ़ए लगैए। जहिना सलाइक काठीक छोट-छीन आगिक लौ अनुकूल स्थिति पाबि विराट रूपमे बदलए लगैए जे एक घरक कोन बात, गामक-गामकेँ क्षण-पलमे स्वाहा कऽ दइए। ..ई बात मनमे अबिते सुमित्रा ओसारसँ निच्चाँ उतैर अँगना बहारए लगली। ओमहर फूफकार भरल रूमाक बात सुनि बचेलाल बाँहि पकैड़ बुझबैत कहखिन- “बिगड़ू नहि, बुझू। अखन धरिक जिनगीक जे नीक-अधला भेल ओकरा बिसैर कऽ आबो होशसँ चलू।” तैपर रूमा बजली- “हँ, आब पोथी-पतरा उलटा कऽ जोतखी बनू, दिन गुनू आ तकदीर देखू।” “हँ, जिनगी-ले ज्योतिक ज्ञानक जरूरत सभकेँ होइ छइ। जाधैर मनुखमे ज्योति नै औत ताधैर अनभुआर बटोही जकाँ केतए वौआएत तेकर कोनो ठीक नहि। जाउ, घर-अँगनाक काज सम्हारू। हमरो बजार जाइक अछि। अछेलाल काका सेहो तैयार भेल हेता।” कहि बचेलाल घरसँ निकैल हाँइ-हाँइ अपन क्रिया-कर्ममे जुटि गेला। कनी कालक पछाइत अछेलालक संग जुगाय पहुँच गेल। सुमित्रा आँगन बहारि डेढ़िया बहारै छेली। दुनू गोरेकेँ देखते मुस्कियाइत सुमित्रा बजली- “भोरे-भोर दुनू गोरेकेँ बड़ बनल-ठनल देखै छी, की रातिमे नीन्न नै भेल?” अछेलाल आश्चर्जमे पड़ि गेल जे भौजी केना बुझि गेली जे रातिमे नीन्न नइ भेल! मुस्कियाइत बाजल- “बारह बजे रातियेमे निन टुटि गेल भौजी। मन पड़ि गेल जे बजार जाइले बचेलाल कहने छैथ। तखनसँ निनो ने भेल। जहाँ कनी निन आबए आकि चहा कऽ उठी जे भोर भऽ गेल। कौआ डकिते पर-पैखानासँ आबि तमाकुल चुनबैत रही कि जुगाइयो आबि गेल। काल्हिए जुगायकेँ कहि देने रहिऐ जे तोहूँ बजार चलिहह। रस्तेमे निचेनसँ गपो करब आ बजारक काजो करब। दुनू गोरे तमाकुल खा विदा भेलौं।” दुनू गोरेकेँ दरबज्जापर बैसा सुमित्रा चाहक जोगार करए लगली। जाबे बचेलाल धोती-कुरता पहिर तैयार भेला, ताबे चाहो बनि गेल। सभ कियो चाह पीलैन। चाह पीब तीनू गोरे बजार विदा भेला। गामक सिमान टपला पछाइत बचेलालकेँ अछेलाल कहलकैन- “बौआ, हम तँ मुरुख छी आ अहाँ पढ़ल-लिखल छी तँए अहाँ जकाँ केना बुझबै मुदा भौजीक गप सुनलासँ मने बदैल गेल। अखनो हुनका देखै छिऐन जे भोरे सुति उठि अपन काजमे लगि जाइ छैथ। सभ काज सम्हारि समैपर नहा-खा कऽ अरामो करि लइ छैथ। ने कोनो तरहक हरहर-खटखट आ ने कखनो मनमे क्रोध आकि चिन्ता रहै छैन। जखन देखै छिऐन तखन ठोरपर हँसीए रहै छैन। ने केकरोसँ मुहाँ-ठुठी होइ छैन आ ने केकरो अधला गप कहै छथिन। गाममे देखै छी जे हुनकर बतारी बुढ़िया सभ भोरेसँ गारि-गरौवैल, उकटा-उकटी शुरू कऽ दइए। गारि सुनैत-सुनैत जखन मन अकछा जाइए तखन भौजी लग आबि अपन दुख-धन्धाक गप-सप्प करए लगै छी।” अछेलालक बात सुनि बचेलाल पुछलखिन- “एना किएक होइ छइ? मनुख तँ कुत्ता-बिलाइ नइ छी जे एक-दोसरकेँ देखते आँखि गुड़ैर पटका-पटकी करए लगैए।” मुँह सकुचबैत अछेलाल बाजल- “बौआ, देखते छी धिया-पुता सभ खाइले कनैत रहै छै आ मौगी-मरदाबा सभ झगड़ामे लगल रहैए। आश्चर्ज लगैत रहैए। मुदा जँ केकरोसँ पुछबै तँ दोसर कहत जे फल्लाँ-फल्लाँकेँ चढ़बै छइ। तँए केकरो पुछबो ने करै छिऐ। तँए तेनाहे सन लोक सभसँ बज्जो-भुक्की अछि। हदिघड़ी अपन दुख-धन्धामे लागल रहै छी।” अछेलालक बात सुनि बचेलाल जुगायक उदास चेहरा देख कहलखिन- “जुगाय, अपनो दुनू परानी आ बेटो-बेटीक नाओंसँ बैंकमे रूपैआ जमा अछि। ओहीमे सँ उठा कऽ अहूँकेँ बेटीक बिआह निमाहि देब आ जँ आगुओ कोनो खगता हएत तँ ओहो सम्हारि देब तँए मनसँ चिन्ता हटा लिअ। एकठाम रहने अहिना सबहक काज सभकेँ होइ छइ।” बचेलालक बात सुनिते जुगायक मुहसँ हँसी निकलल। बिलाएल आशा मनमे पहुँचलै। जहिना केतौ जाइमे रस्ता बदलैत तहिना जुगायक जिनगीक रस्ता चौबट्टीपर पहुँच बदलए लगल। अपन मजबूरी देखबैत बचेलालकेँ कहलकैन- “भाय, पाइ दुआरे घरवालीकेँ डाक्टर लग नै लऽ जाइ छी। वेचारी तीन सालसँ दुखकेँ अँगेजने अछि। पाइक लार-चार नै देखैए तँए चुपचाप देह मारने अछि। मुदा अपने तँ देखते छी जे दिनो-दिन खिआइले जाइए। जेते काज वेचारी पहिने करै छल तेकर अदहो आब नै कऽ होइ छइ। मुदा की करब। खरचा दुआरे धिया-पुताकेँ स्कूलो ने जाइ दइ छिऐ। कहुना-कहुना दिन कटै छी। कर्जाक डर होइए। गाममे देखै छी जे तेहेन चण्ठ महाजन सभ अछि जे एककेँ तीन कहि घर-घराड़ी लिखौने जाइए। अखन थोड़े खेत अछि तँए दिके-कि-सिके गुजर कऽ लइ छी। जँ ओहो चलि जाएत तखन तँ अपनो आ धियो-पुतोकेँ भीख मांगए पड़त। गामेमे देखै छी जे जनकाकेँ पहिने जोड़ा बरद छेलइ। कर्जामे फँसि गेल। सभ सम्पैत बोहा गेलइ। अहिना मुनेसरा करजे दुआरे गामसँ भागि नेपालमे बसि गेल। मुदा हमरा कुल-खनदानक मोह लगैए। केना बाप-दादाक धराड़ीपर अनका हर जोतैत देखब। अखन तँ ईहो आशा अछि जे मरबो करब तँ अपन बाप-दादाक लगौलहा कलम-गाछीमे जरौल जाएब। मुइलहा सभ पुरखाक संग एकठाम रहब। जिनगी ने थोड़ दिनक होइत मुदा मृत्यु तँ बेसी दिनक होइए।” जुगायक बात सुनि बचेलालक मनमे आशा-निराशा आ सुख-दुखक हिलकोर उठए लगल। जहिना शिकारीक तीर लगलासँ कोनो चिड़ै गाछपर सँ छटपटा कऽ निच्चाँ खसैत तहिना बचेलालक विचार कल्पना लोकसँ यथार्थ लोकमे एलैन। यथार्थ लोकमे अबिते बचेलालक हृदए, मोम जकाँ, पीघलए लगलैन, दुनू आँखि उठा जुगायक मुँह देख बजला- “भाय, बजार लग आबि गेलौं? आब ओ सभ बात छोड़ू। बजारमे जे काज अछि से सभ मन पाड़ि लिअ नइ तँ काज छुटि जाएत। परिवारक गप करैले तँ दुआर-दरबज्जा ऐछे।” अछेलाल- “बौआ, स्कूल जाइ-अबैले पहिने साइकिल कीनि लेब। तखन खेती-वाड़ी-ले कोदारि, खुरपी, हँसुआ, कुरहैर, टेंगारी, पगहरिया कीनब। हमरा नजैरमे एतबे अबैए।” अछेलालकेँ चुप होइते धड़फड़ा कऽ जुगाय बाजल- “भाय, अपना टोलमे ने एक्कोटा लाइट अछि आ ने दरी। जखन कोनो नमहर काज बजड़ैए तखन अँगने-अँगनेसँ बिछान, लालटेम आ बरतन मांगि-मांगि काज चलैए, तँए ओहो सभ कीनब जरूरी अछि।” जुगायक बात सुनि मुड़ी डोलबैत बचेलाल बजला- “जुगाय भाय, अहाँ बड़ सुन्नर काज मन पाड़ि देलौं। मनमे अपनो छल। मुदा सोचै छेलौं जे सौंसे टोल मिला कऽ कीनब, नीक हएत। मगर सभ एक्के रंग तँ नइ अछि। कियो हूबगर छी तँ कियो खगल। तँए चुप्पे रहि जाइ छेलौं।” बचेलालक बात सुनि मुस्की दैत अछेलाल कहलकैन- “बौआ, सझिया चीज दू तरहक होइ छइ। एक तरहक जे अहाँ बजलौं। आ दोसर तरहक होइ छै जे असगरे कीनि समाजमे दऽ देब। जेकरा लोक धरम कहै छइ।” धरमक नाओं सुनिते उत्साहित भऽ बचेलाल बजला- “ओना हम रूपैआ जुगाय-ले अनने छी मुदा बिआहमे अखन देरियो अछि आ हमरो रूपैआ बैंकमे ऐछे तँए ई काज पाछू करब। अखन जइ समानक चर्चा केलौं से सभ कीनि लिअ।” बचेलालक बात सुनि अछेलालो आ जुगायोक मनमे खुशी भेल। बजार प्रवेश करिते तीनू गोरे साइकिल दोकानपर जा साइकिल कीनलैन आ साइकिले दोकानपर दूटा लाइटो कीनलैन। साइकिल गुड़केने लोहा-लक्कड़क दोकानपर एला। दोकानपर आबि सभ लोहाक समान कीनि, बोरामे रखि सुतरीसँ बान्हि साइकिलक कैरियरपर लादि, तीनू गोरे बरतनक दोकानपर गेला। बरतन दोकानमे दूटा पितरिया बरतन कीनि, दरी दोकानपर गेला। बीस हाथ नमती दरी कीनि,दोकानेमे रखि, कपड़ा दोकानपर जा ओही नापसँ जाजीम सेहो कीनलैन। सभ समान कीनि तीनू गोरे हलुआइ दोकानपर आबि जलखै केलैन। सभ समान घरपर केना जाएत। तीनू गोरे गर अँटबए लगला। अछेलालकेँ गर अँटि गेल। बाजल- “एकटा बरतन हम कान्हपर लऽ लेब आ एकटा जुगाय आ तैसंग एक-एकटा लाइटो दुनू गोरे हाथमे लटका लेब। बाँकी सभ चीज साइकिलपर लेब आ तीनू गोरे गप-सप्प करैत चलि जाएब।” जिनगीक नव रस्ता भेटने तीनू गोरे बचेलाल-अछेलाल-जुगायक मन उधियाइत रहैन। बचेलालकेँ होनि जे आइ रस्तापर एलौं। अछेलालकेँ मनमे होइ जे जाधैर मनुखकेँ काज करैक साधन नइ हेतै ताधैर लूरि-बुधि रहनौं बेकार रहत। मुदा हाथमे ओजार एने काजोक गति बढ़ैए आ सन्तोखो होइ छइ। ..जखन कि जुगायकेँ होइ जे जइ दुआरे अपनो आ परिवारो अँटैक गेल छल, ओ आगू ससरत। आइ धरिक दुख काल्हिसँ मेटा जाएत। जहिना अन्हार राति समाप्त होइते दिनमे सभ किछु देख पड़ैत तहिना तीनू गोरेकेँ होइत रहैन। घरपर अबैत-अबैत तेसर साँझ भऽ गेल। घरपर आबिते अछेलाल सुमित्राकेँ शोर पाड़ैत कहलकैन- “भौजी, लालटेन नेने आउ।” असगरक दुआरे सुमित्रा आँगन आ दरबज्जाक बीच ओलती लग बिछान बिछा, लालटेनकेँ पछबरिया घरक कोनचरमे टाँगि, बैसल छेली। कखनो-कखनो उठि कऽ रस्तापर आबि-आबि देखबो करैथ। अछेलालक अवाज सुनिते सुमित्रा लालटेन नेने दुआरपर एली। नव-नव समान देख सुमित्रा मने-मन सोचए लगली, जे काज आइ भेल ओ बहुत पहिनहि हेबा चाही छेलइ। मुदा देरियो भेने काज तँ भेल। लालटेन रखि चोट्टे घुमि कऽ आँगन जा पुतोहुकेँ कहलैन- “कनियाँ, बौआ आएल। झब-दे चाह बनाउ।” कहि दरबज्जापर एली। अछेलाल आ जुगाय ओसारपर बरतन आ लाइट रखि, साइकिल परहक समान उतारए लगल। बचेलाल कुरता-गंजी निकालि चौकीपर आ चप्पलकेँ चौकी तरमे रखि धोतीकेँ खोंसि फाँड़ बान्हि, गर लगा-लगा सभ चीज रखए लगला। ताबे रूमा चाह बनौने एली। रूमाक हाथसँ चाह लऽ सुमित्रा तीनू गोरेकेँ हाथमे दऽ पुछलखिन- “बौआ, पानियो पीब।” अछेलाल- “नहि भौजी, अखन तँ चाह नइ पीबतौं तँ नीक किए तँ गरमा गेल छी। जाबे दू डोल पानि देहपर नै ढारब ताबे ठंढाएब नहि।” कातमे ठाढ़ भऽ रूमा सभ समान देख-देख तरे-तर जेना जरै छेली। मनमे होनि जे साइकिल लेलैन से बड़बढ़ियाँ, मुदा आन-आन समान लऽ कऽ अनेरे पाइकेँ दुइर केलैन। ..ओना, खुलि कऽ तँ रूमा किछु नै बजली मुदा तरे-तर गुम्हरैत रहली। तामसे आँगन जा चुल्हि लग बैस अन्ट-सन्ट बाजए लगली। अछेलाल आ जुगाय, चाह पीब दरबज्जाक कोठरीमे सभ समान सेरिया कऽ रखि अछेलाल जुगायकेँ कहलक- “जुगाय जखन चाह पिबे केलौं तँ तमाकुलो खाइए लएह।” जुगाय तमाकुल चुनबए लगल। अछेलाल सुमित्राकेँ कहलकैन- “भौजी, जे मनमे छेलए से आइ पुरा भऽ गेल। भिनसरमे दरियो उघारि कऽ देखा देब। बड़ सुन्नर अछि। यएह दरी तँ केते दिन चलत।” सुमित्रा मने-मन खुशी होइ छेली। दुनू गोरे तमाकुल खा चलि गेल। बचेलाल धोती बदैल माए लग आबि बैस सामानोक चर्च करैथ आ दामोक। एक्के परिवारमे हर्ष-विषाद लड़ए लगल..! बचेलाल मने-मन सोचैथ जे परिवारमे कोनो नीक काज भेने, परिवारक सभ समांगकेँ एक्के रंग खुशी किए ने होइ छइ? हँ, ई बात जरूर जे खास बेकतीकेँ खास वस्तुक संग लगाव भेने बेसी खुशी जरूर होइ छै, मुदा दोसरकेँ ओइसँ जलन तँ नइ हेबा चाही। औझुका जे वस्तु अछि ओ तँ बेकतीगत नइ छी? जखन जेकरा जइ वस्तुक जरूरत हेतै से उपयोग करत। तइमे दुख केतएसँ चलि आएल..? रूमाक अवाज दुनू माय-पुत सुनैत रहैथ। मुस्की दैत सुमित्रा बचेलालकेँ कहलखिन- “बौआ, जहिना केकरो बिढ़नी काटि लइ छै आ दरदे छड़पटाइए तहिना कनियाकेँ भऽ रहलैन हेन। कमाएल पाइ तोहर खर्च भेलह हुनकर तँ किछु ने भेलैन। तोरा खुशी छह आ हुनका किए एते दुख भऽ रहलैन हेन?” सुमित्राक बात सुनि बचेलाल भखरल स्वरमे बजला- “माए, हमहूँ तँ यएह सोचि रहल छी जे हुनका किए एते दुख भऽ रहल छैन?” बचेलालकेँ बुझबैत सुमित्रा कहलखिन- “बौआ, यएह छिऐ सोभाव, मनुखक रोगक जड़ि। जेहेन जेकर सोभाव रहै छै ओ ओहने काजकेँ नीक बुझैए, भलेँ ओ अधले किए ने होइ। अखन तोहूँ थाकल छह। जँ नहाइक मन होइ छह तँ नहा लएह। जँ नहेबह नइ तँ देहे-हाथ धोइ लएह, मन चैन भऽ जेतह।” “नहाइक मन तँ अपनो होइए। भरि दिन ठाढ़े छेलौं। मुदा सभ काज भऽ गेल।” सुमित्रा आँगनसँ बाल्टीन आ लोटा आनि बचेलालकेँ देलखिन। बचेलाल नहाइले कलपर गेला, सुमित्रा लालटेनक इजोतमे खुरपी, हँसुआ देखए लगली। नहा कऽ बचेलाल सोझे अँगना जा खाइले बैसला। बचेलालकेँ ओसारपर देख रूमा जोर-जोरसँ अन्ट-सन्ट बाजए लगली। गौरसँ रूमाक बात सुनि बचेलाल पुछलखिन- “एना तामस किएक उठल अछि? कोन अधला चीज देखलिऐ जे एते तमसाएल छी?” बचेलालक बात सुनि रूमा गरजैत बजली- “जखन लोककेँ मति खराब भऽ जाइ छै तखन अहिना करैए।” मने-मन बचेलाल सोचए लगला जे जेते अपन पुरुषत्वकेँ दाबि रखने छी तेते ओ कण्ठपर चढ़ल जाइए। तँए, एक-ने-एक दिन मुँह खोलै पड़त। असथिर मुदा सक्कत शब्दमे बचेलाल रूमाकेँ कहलखिन- “बहुत सुनलौं। मुँह बन्न रखू। अपन सिमान टपब तँ बुझि लिअ हम पुरुख छी। जेते अहाँकेँ सिनेह केलौं तेते अहाँ हमरा कमजोर बुझैत गेलौं। आबो चेत जाउ!” बचेलालक बात सुनि रूमा चुप तँ भेली मुदा मुँह..! ◌ शब्द संख्या : 3125 9. अदहा अखाढ़ बित गेल। जेठुआ बर्खाक पछाइत बीचमे दूटा अछार भेल। सबहक बीआ रोपाउ भऽ गेल। अड़िया-नँघन बरखा भेल। पानि छुटिते गिरहस्त सभ कोदारि लऽ लऽ खेत दिस विदा भेला। कियो अपन खेतक आड़ि बन्हैत तँ कियो अपन खेतक पानि बहबैत। कियो आड़ि-कोण बनबैत तँ कियो हाँइ-हाँइ धानक बीआ उखाड़ैत। एक खेप सजन हरखाड़ा आ चौकी खेतमे रखि आएल आ दोहरा कऽ बरद आ कोदारि लइले गामपर आएल। अँगना अबिते घरवाली कहलकै- “रोटियो पाकिये गेल तँए जलखै काइए लिअ। हमहूँ पानि पीब बीआ उखाड़ए चलि जाएब।” सजन हाथ-पएर धोइ कऽ जलखै करए लगल। जलखैयो करैत आ घरवालीकेँ कहबो करैत- “तीनकठबा कोली रोपि लेब। हम जाइ छी, खेतो जोइत लेब आ कोणो-काण सेरिया देबइ। अहूँ जा कऽ चारि जोड़ा बीआ खीच लेब आ आबि कऽ भानसो कऽ लेब। अखन बीआ ऊपरेमे हएत तँए उखाड़ैमे देरियो नइ लगत। ओना खेत जोतले अछि तँए हमरो अबेर नहियेँ हएत। अखन जे कदबा आ बीआ उखैड़ जाएत तँ बेरू-पहर दुनू गोरे साँझ धरि रोपियो लेब।” जलखै कऽ सजन बरद जोड़ि खेत विदा भेल। दछिनबरिया बाध ऊँच तँए गामक बेसी गिरहस्त ओही बाधमे। हरक जोगार नै रहने देवन कोदारियेसँ खेत तैयार करैक विचार कऽ बुधनीक संग विदा भेल। बुधनीक खेत सजन-खेतसँ तीन कोला आगू, तँए सजनेक खेतक आड़िपर देने दुनू गोरे देवन-बुधनी जाइत। देवनक कान्हपर कोदारि देख सजन पुछलक- “देवन, तोहूँ अही खेतकेँ रोपबह?” “हँ भैया, पाँच कट्ठाक कोला अछि। दू-तीन दिनमे रोपि लेब।” सजन- “जा दुनू गोरे बीये उखाड़िहह। हमरो तीनियेँ कट्ठा खेत अछि। लगले भऽ जाएत। तोरो खेत तँ तमले छह। एकटा चास कऽ देबै तेहीमे कदबा भऽ जेतह। पहिल पानि छिऐ, एक रत्ती अबेरे ने हएत मुदा तोरो काज चलि जेतह। कदबा भेल रहतह निचेनसँ रोपैन करैत रहिहह। जखने खेतमे चौकी पड़ि जाइ छै आकि पानि सुखैक डर कम भऽ जाइ छइ।” सजनक बात सुनि बुधनी मने-मन सोचए लगली। जे नीक सगुनसँ निकललौं। अदहा काज ओहिना भऽ गेल। एक झोंक जे दुनू गोरे बीआ उखाड़ब तहीमे तँ अदहा खेतक बीआ उखाड़ि लेब। खेतो जोताइए जाएत। बीओ हल्लुके अछि, तखन तँ रोपनियेँ-टा ने रहत। बैस-उठि कऽ दू दिनमे रोपि लेब। ‘रोपि लेब’ बुधनीक मनमे अबिते, खुशीसँ नाचि उठलैन! सोचए लगली जे पाँच कट्ठा खेत अबाद भेने कहुना-कहुना तीन मासक बुतातक ओरियान तँ भाइए जाएत। तीन मासक बुतात-ले मेहनत केते भेल। अहिना पनरहो कट्ठा अबादैमे आठ-दस दिन लगल। दुनू गोरे आगू बढ़ल। सजनक खेतक आड़ि टपलापर देवन बाजल- “दीदी, भरिगरहा काज सम्हैर गेल।” खेतमे पहुँचते बुधनी साड़ी समैट कऽ खोंसि लेली आ बीआ उखाड़ैमे, भीर गेली। देवन कोदारिसँ खेतक कोण-कान तामए लगल। जाबे देवन तीनूटा कोण,एकटा कोणपर बीये रहै–बनौलक। ताबे बुधनी एक जोड़ा बीआ उखाड़ि लेली। आड़ि बना देवनो बीआ उखाड़ए ललग। हल्लुक बीआ देख बुधनी कहलखिन- “बौआ, उखाड़लो बीआ आठ दिन तक रहै छइ। अगर सभटा बीआ उखैड़ जाएत तँ रोपनाइयेटा ने रहत। एकटा काज तँ सम्पन्न भऽ गेल रहत। जँ सभ बीआ उखाड़ि लेब तँ खेतो खाली भऽ जाएत। जइसँ जोताइयो जाएत। नइ तँ पाछू तामि-तामि रोपए पड़त।” बुधनीक बात सुनि देवन बाजल- “हँ, ठीके कहै छी दीदी। जाबे सजन भैया अपन खेत जोतत ताबे अपनो दुनू गोरे सभटा बीआ उखाड़ि लेब।” दुनू गोरे बीओ उखाड़ैत आ गपो करैत। बेसी काज देख सजन बरद रेबारि कऽ हाँकए लगल। सजन हरो जोतैत आ मने-मन सोचबो करैत जे मनुखेक काज मनुखकेँ होइए। आइ जेकरा हम नीक करबै, एक-ने-एक दिन ओहो जरूर नीक करत। तोहूमे जे गरीब अछि ओ जँ नहियोँ बदला सठाएत तैयो गरीबक उपकारकेँ लोक धरम कहै छइ। काजो भरिगर नहियेँ अछि। पहिल दिन कदबा करैले एलौं हेन, बरदो सभ कोनो थाकल थोड़े अछि। जहिना खेत सहगर अछि तहिना बरदो जीराएले अछि। एकटा चास मेहीसँ कऽ लेब आ समाड़ै-बेरमे लाभरो-जिभर कऽ जोति लेब तैयो कदबा बनबे करत। तहूमे जरल जमीनमे बरखा भेल, खेत ओहिना माँड़-माँड़ भेल अछि। थोड़े काल बीआ उखाड़ि देवन बुधनीकेँ कहलकैन- “दीदी, ताबे अहाँ बीआ उखाड़ू हम सजन भैयाकेँ देखने अबै छी।” कहि देवन सजन लग आएल। देवनकेँ देखते सजन बाजल- “बौआ, केते बीआ उखाड़ैले रहलह हेन? हमरा लगिचा गेल।” चोट्टे देवन घुमि कऽ खेत आबि बुधनीकेँ कहलकैन- “दीदी, हाँइ-हाँइ बीआ उखाड़ू सजना भैयाकेँ कदबा लगिचा गेलैन।” दुनू गोरे हाँइ-हाँइ बीआ उखाड़ए लगल। जहाँ तीन गफ्फी बीआ भऽ जाइ आकि आँटी बान्हि लिअए। आँटी बन्हैत बुधनी बजली- “बौआ, जहिना सजन भैया कदबा कऽ देथुन तहिना हुनको कहिहौन जे आइ-काल्हि तँ अपने रोपब, जखन अपन खेत रोपा जाएत तँ अहूँकेँ सम्हारि देब। किएक तँ हुनका बेसी खेत छैन। जँ अपनो दुनू गोरे हुनका रोपैन सम्हारि देबैन तँ हुनको रोपैन अगते भऽ जेतैन।” अपन कदबा कऽ सजन चौकी लधले बरद आ हर कान्हपर नेने बुधनीक खेत पहुँचला। खेत पहुँच बरहा लगले चौकी खोलि, घिसियौने जा दोसर खेतमे रखलैन। हर लाधि सजन देवन लग आबि बजला- “बौआ, बीआ तँ भाइए गेलह। सभ आँटीकेँ आड़ि टपा कऽ रखि दहक, जोतैमे देरी नै हएत।” कहि सजन बैस कऽ तमाकुल चुनबए लगला। बीआ टपा बुधनी सजनकेँ कहलकैन- “भैया, हमरा तँ पनरहे कट्ठा खेत अछि जँ दू दिन सम्हारि दैथ तँ अगते काज हमरो ससैर जाएत। हिनका तँ बेसी खेत छैन, हमहूँ दुनू गोरे रोपि देबैन।” बुधनीक बात सुनि सजनक मनमे उत्साह बढ़लैन। ठोरमे तमाकुल लैत बजला- “कनियाँ, बेसियो खेत रहने रोपैनमे जन नइ लगबै छी, किए ने लगबै छी से बुझै छिऐ? तेहेन गामक जन सभ अछि जे सोल्होअना धियान ओकरा बोइनेपर रहै छइ। कहैले आँटी गनि कऽ उखाड़ैए मुदा रोपै काल मूठक-मूठ बीआ गाड़ि देत। गिरहत हुअए कि जन, ओकरा मनमे ई हेबा चाही ने जे खेती नीक नहाँति होइ। जखन खेती नीक नहाँति हएत तखने ने उपजो नीक हएत। उपजा नीक हएत तखने ने सबहक हालत सुधरत से केकरो नेतमे छैहे नहि।” बुधनी बजली- “भैया, सभ रंगक लोक सभ गाममे रहै छइ। ने सभ नीके होइत आ ने सभ अधले। तखन तँ लोककेँ अपने नीक-अधला देख चलए पड़तै। कियो किछु करह मुदा सभकेँ अपने नीक बनैक चेष्टा करबा चाही?” तमाकुल खा सजन हर जोतैले उठला, हरक लागैन पकैड़ जहाँ एक मोड़ घुमला कि देखलैन पुबरिया खेतमे, चारि कोला हटि– हरबाहकेँ पटाक-पटाक मारैत। पहिने तँ हरबाहकेँ कोनो शंके ने रहै जे हमरे मारैले फुसियाहा अबैए। मुदा जाबे किसुनमा हर ठाढ़ करै-करै ताबे मारि लगि गेलइ। किसुनमा बुफगर। हर ठाढ़ कऽ फुसियाहाकेँ पकैड़ खेतेमे पटकलक। पटैक कऽ छातीपर बैस किसुनमा मुहेँ-मुँह खूब चोटियेलक। सौंसे बाध हल्ला भऽ गेल। बीओ उखाड़निहार आ हरो जोतनिहार सभ जम्मा भऽ गेला। दुनू गोरेकेँ झगड़ा छोड़ा पुछए लगला। ताबे नवकी बीआ उखाड़ब छोड़ि घर दिस लफरल विदा भेल। नवकी टोलपर जा पहिने फुसियाहाक घरवालीकेँ कहलक- “कनियाँ, तूँ अँगनामे छह आ घरबलाकेँ किसुनमा खून कऽ देलकह।” कहि नवकी लफरल किसुनमा अँगना गेल आ किसुनमो भनसियाकेँ कहलक- “कनियाँ, घरबला खून भऽ गेलह!” “केना खून भेल?” –किसुनमाक घरवाली पुछलकै। “ऐँह की कहबह, फुसियाहा लाठी नेने गेल आ हाँइ-हाँइ देहपर चलबए लगलै!” फुसियाहाक घरवाली किसुनमाकेँ अँगनेसँ गरियबैत विदा भेल। तहिना किसुनमोक घरवाली गरियबैत टोलसँ निकैल, कनीए आगू बढ़ल, जेतएसँ एक्के रस्ता बाधक अछि– कि दुनूक रस्ता एक भेल। दुनूकेँ भेँट भऽ गेलइ। एक दोसरकेँ देखते आरो चिकैर-चिकैर कऽ दुनू गारि पढ़ए लगल। लग होइते दुनूकेँ पकड़ा-पकड़ी भऽ गेल। दुनू-दुनूकेँ झोंटा पकड़लक। घिचम-तीरा होइत-होइत दुनू खसि पड़ल। मुदा झोंटा दुनू-केँ-दुनू पकड़नेहि रहल। तरमे किसुनमाक भनसिया आ ऊपरमे फुसियाहाक। तरेसँ किसुनमाक भनसिया नाकेमे दाँत काटि लेलकै। छर-छर लहू फुसियाहा भनसियाकेँ बहए लगल। खून बहैत देख फुसियोहोक भनसिया गालेमे दाँत काटि लेलकै। ओकरो खून बहए लगलै। मुदा तैयो कियो-केकरो छोड़ैले तैयार नहि। अपना आँगन आबि नवकी भानस करए लगल। नवकीकेँ गामक लोक ऐ दुआरे ‘नवकी’ कहैत जे पौंरके वसुआसँ चुमौन कऽ ऐ गाम आएल। नवकीक वसुआ चारिम पति। नवकीक पहिल बिआह रतुआर भेल रहइ। तीनटा धियो-पुतो भेलइ। एक दिन पतिसँ झगड़ा भेलै पड़ा कऽ नैहर चलि आएल। धियो-पुतोकेँ छोड़ि देलक। साल भरिक पछाइत दोसर बिआह विसुनपुर केलक। नवकियोकेँ दोसर बिआह रहै आ घरोबलाकेँ। विसुनपुरोमे दूटा बच्चा भेलै, ओकरो छोड़ि कऽ पड़ा गेल। तखन तेसर केलक। तेसरोमे झगड़ा भेलै, छोड़ि कऽ पड़ाएल। ..चारिम सासुरमे अखन नवकी अछि। ई चुमौन चालिस-पैतालिस बर्खक उमेरमे भेलैए। तँए गामक लोक सभ ‘नवकी’ कहैत। फुसियाहा आ किसुनमा दुनू भजैत। दुनूकेँ एक-एक्केटा बरद। खेतो कम्मे। अखाढ़क बरखा तँए सबहक खेतो खसले आ बीओ रोपाउ। भोरहरबामे पानि भेल तँए खेत रोपैक जोगार कियो ने केने। सभ दिन अपन-अपन भाँजमे खेत जोतैत। पानि देख फुसियाहा भोरे बरदकेँ घरसँ निकालि, कुट्टी लगा, बीआ उखाड़ए दुनू परानी खेत गेल। किसुनमोक खेत पनिआएल। हर खोलै बेरमे किसुनमा बरद आनए फुसियाहा ऐठाम गेल। फुसियाहा घरपर नहि तँए दुनू गोरेमे भेँट नै भेलइ। भजैती बुझि किसुनमा बरद नेने चलि आएल। घरपर आबि अपना बरदमे जोड़ि कदबा करए खेत गेल। थोड़े बीआ उखाड़ि फुसियाहा हर लइले घरपर आएल तँ बड़दे नहि! हाथमे हरवाही पेना रहबे करइ। किसुनमा ऐठाम आएल। ने बरद ने किसुनमा घरपर। घरपर भाँज लगा फुसियाहा किसुनमाक खेत गेल। खेतमे किसुनमाकेँ हर जोतैत देखलक। बिनु किछु कहने-सुनने किसुनमापर पेना बरिसाबए लगल। जाबे किसुनमा हर ठाढ़ करै-करै ताबे फुसियाहा सात-आठ पेना लगा देलकै। थाले-पानिमे फुसियाहाकेँ पटैक किसुनमा खूब चोटियेलक। आन-आन हरबाह सभ दुनूकेँ छोड़ौलक। झगड़ा छुटला पछाइतो दुनू-दुनूकेँ अनधुन गरियबैत रहल। दुनूकेँ सभ बुझा-सुझा, हर खोलि विदा केलक। अपन बरद लऽ कऽ फुसियहा घर दिस विदा भेल आ किसुनमा ओत्तै बरदकेँ चरैले छोड़ि देलक। घरपर अबिते फुसियाहा घरवालीकेँ सौंसे देह खून लगल देखलक। मुदा नाकक खून बन्न भऽ गेल रहइ। घरोवाली फुसियाहाकेँ सौंसे देह थाल लगल देखलक। दुनू अँगनाक ओसारपर बैस एक-दोसरकेँ दुनू परानी देखैत रहल। मने-मन फुसियाहा सप्पत खेलक जे किसुनमासँ बरदक भजैती नै रखब। दुनूक भजैती छुटि गेल। गामक सभ अपन-अपन खेती करए लगल। ने एक्को धूर फुसियाहा धान रोपलक आ ने किसुनमा। किएक तँ एकटा बरदसँ हर केना जोतैत?” साँझू-पहर सजन बुधनीक ऐठाम एला। भरि दिनक मेहनतसँ बुधनियोँ आ देवनो थाकल। अँगनामे बिछान बिछा बुधनी पड़ल आ देवन पएरसँ जँतैत। सजनकेँ देखते देवन बाजल- “आउ-आउ, भैया!” देवनक बात सुनिते बुधनी फुर-फुरा कऽ उठि देहक साड़ी सेरियबैत सजनकेँ कहलखिन- “आबौथ भैया। भरि दिन तेते भीर भेल जे देह दुखाइए तँए देवनकेँ जँतैले कहलिऐ।” सजनो बाजल- “आइ रोपैनक पहिल दिन छल तँए देह दुखाइए। जखन दू-चारि दिन एकलखाइत रोपैन करबै तखन अभियास भऽ जाएत तब देह नै दुखाएत।” बुधनी- “भैया, हमरा तँ कम्मे खेत अछि, हिनका तँ बेसी छैन। आइ जे कदबा कऽ देलैन काल्हि तक ओकरे रोपब। अहिना जँ दू दिन आरो सम्हारि देता तेहीमे हमर सभ खेती भऽ जाएत। अपन खेत जखन भऽ जाएत तँ हिनको जाबे हेतैन ताबे हमहूँ दुनू गोरे रोपि देबैन। अगते खेती दुनू गोरेक भऽ जाएत।” “देखियौ कनियाँ, अगर लोक मिलानसँ काज करत तँ सबहक काज असान भऽ जेतइ, मुदा से नै ने होइ छइ। आइए फुसियाहा आ किसुनमाकेँ देखलिऐ।” बिच्चेमे देवन सजनकेँ कहलकैन- “भैया, ओइ दिन जे खिस्सा कहैत रहिऐ आ कहलिऐ जे दोसर दिन आगू कहब से कहियौ।” देवनक बात सुनि सजन अखिहासए लगला। मन पड़िते हँसैत बजला- “अच्छा सुनह...।” हाथक इशारासँ देखबैत सजन- “ओ रवियाक घर छिऐ। तूँ अनभुआर छह तँए चिन्हा दइ छिअ। रविया आमक गाछी लगबैक विचार केलक। गाछ तँ पहिनौं रहै मुदा सभटा गाछ बुढ़हा गेल रहै, कएटा सुखियो गेल रहै आ कएटा बेचियो लेलक। सिरिफ एक्केगो पुरना गाछ बँचल रहइ, ओहो पुरना गेल छेलै जे कोनो साल फड़ै आ कोनो साल नइ फड़इ। ..ओ हमरा आबि कऽ पुछलक जे ‘कोन-कोन आमक गाछ रोपी?’ ..आमक गाछ रोपब सुनि हमरा खूब खुशी भेल। खुशी ऐ दुआरे भेल जे समाजमे केकरो गाछी भेलासँ गामेमे आम बेसी हएत। अपनो खएत आ दोसरो खेतै। हमरो धिया-पुता टुकला बिछत। हम कहलिऐ- ‘रवि, नीक-नीक आमक गाछ जे मीठो होइ आ नम्हरो रोपिहह।’ ..ओ कहलक- ‘गाछ केतएसँ आनब?’ ..हम कहलिऐ- ‘अगर बजारमे कीनिबह तँ ठका जेबह। कहतह ‘कलमी’ आमक गाछ दइ छी आ भऽ जेतह ‘सरही’,तँए आमेक दोकानमे जा चुनि-चुनि कऽ नमहरका आम कीनि लिहह आ गुद्दा खा कऽ सुआद देख लिहक। जे नीक बुझि पड़तह ओकर आँठी रोपि दिहह। पनरहे दिनमे पिपही जनैम जेतह। आमक गाछकेँ पिपही लोक ऐ दुआरे कहै छै जे आँठीक तरमे जे गुद्दा जकाँ रहै छै ओकरा लोक सिलौटपर रगैड़ पिपही बनबैए, तँए ओकरा पिपही कहै छइ। पिपहीकेँ ताक-हेर करैत रहिहह जे बकरी-छकरी ने खा। नमहर गाछकेँ जँ बकरी खेबो करै छै तँ निच्चासँ कनोजैड़ चलै छै मुदा पिपहीबला गाछकेँ खेने सूखि जाइए। जखन पिपही कनी नमहर हेतह तखन उखाड़ि कऽ ओकर मुसरा निच्चाँ दबा कऽ काटि फेर रोपि दिहक। साले भरिमे डेढ़-हाथ-दू-हाथक भऽ जेतह। तखन ओकरा थल्ला काटि दिहक। तीनियेँ सालमे फड़ए लगतह।’ ..रविया सएह केलक।” देवन धियानसँ सुनै छल। सजन अपन आँगुरक इशारासँ छठुआक घर देखबैत आगू बजला- “ओ छठुआक घर छिऐ। छठुआ की केलक तँ रवियाक आमक गाछ पहिने गनि लेलक, बारहटा गाछ रहैक– आ अपन बाड़ीमे जनमल अनेरूआ बारहटा गाछ उखाड़ि कऽ साँझमे रखि लेलक। रातिमे रवियाक बारहोटा गाछ उखाड़ि अपनामे रोपि लेलक आ अपन रवियामे रोपि देलकै। रविया अनाड़ी, बुझबे ने केलक। तीन सालक पछाइत जखन आम फड़ए लगलै तखन रविया तजबीज करए लगल जे जेहेन आमक आँठी रोपने रही तेहेन तँ एक्कोटा ने अछि! एना किएक भेल? ..छठुआ अपन आमक बड़ाइ जेतए-तेतए करए लगल। रवियाकेँ सेहो छठुआक आम देख मनमे एलै जे जेहने आमक आँठी रोपने रही तेहने बुझि पड़ैए। मुदा कहबै केना। ..रवियाक आँगनवाली आमक गाछ रोपैए कालमे कबुला केने जे ‘पहिल बेरक फलसँ ब्राह्मण भोजन बरहम स्थानमे कराएब।’ जखन आम पाकए लगलै तखन सभ गाछक आम मिला कऽ दू चँगेड़ा सैंत कऽ रखलक आ एक मटकुरी दहियो पौरलक तैसंग एक अढ़ैया धानक चूड़ा सेहो कुटलक। बेरागन बुझि शुक्र दिनक नँत पुरहितकेँ दऽ देलकैन। ..सबेरे आठ बजेमे पुरहित स्नान-पूजा कऽ माथमे त्रिपुण्ड केने पहुँच गेलखिन। बरहम स्थानक आगूमे सभ समान–चूड़ा, दही, चीनी, अँचार,आम, रखलक। पुरहितक नजैर आमपर पड़िते झुझुआ गेलैन, मुदा दही आ चूड़ा देख सवुर भेलैन। रविया सभ चीज परसलक। पुरोहित सभ आमकेँ बागि देलखिन जे खट्टा अछि। ‘खट्टा’ सुनिते दुनू परानी रविया तामसे आगि भऽ गेल। मुदा की करैत। ..चारि सालक मेहनत रविया चोरकेँ उसरैग छातीमे मुक्का मारि लेलक। फेर रविया ओइ गाछीकेँ उपटा दोहरा कऽ रोपैक विचार केलक। हमरा आबि कऽ पुछलक। हम कहलिऐ जे नसीवलाल काका ऐठाम चलि जा ओ सुतिहार छैथ। ओ जेना-जेना कहथुन तेना-तेना करिहह। रविया नसीवलाल काका ऐठाम पहुँच, पहिने पैछला खिस्सा कहलकैन। तखन गाछी लगबैक बात पुछलकैन। नसीवलाल काका रवियाकेँ बुझबैत पुछलखिन- ‘केते खेतमे गाछी लगेबह?’ ..रविया कहलकैन- ‘बहुत खेतबला तँ हम नहियेँ छी, पाँचे कट्ठा ऊँचगर खेत अछि जइमे गाछी लगौने छेलौं, ओहीमे लगाएब।’ ...नसीवलाल कहलखिन- ‘बड़बढ़ियाँ। छअटा कलमी– एकटा बम्बइ, एकटा रोहनियाँ एकटा जरदालू, एकटा मालदह, एकटा फैजली आ एकटा राइर–लगाबह। ऐ आमकेँ रोपलासँ अदहा जेठसँ अदहा सौन धरि बेराबेरी चलैत रहतह। ई छबो आमक गाछ हम दऽ देबह। पाइ-कौड़ी नइ लेबह। पाँचटा सरही सेहो रोपि दिहक तैसंग एकटा बेल, दूटा धात्री, एकटा गुलजामुन आ दूटा लतामक गाछ सेहो रोपिहह। सभ मिला कऽ बढ़ियाँ बगीचा भऽ जेतह। जँ सभटा कलमीए आम रोपबह तँ मौका-कुमौकामे जखन जारैनक काज हेतह तँ दिक्कत भऽ जेतह।’ ..नसीवलाल कक्काक बात सुनि रवियाक मन खुशी भऽ गेलइ। गाछ लऽ जा रोपलक आ सभ गाछमे बेरही सेहो लगा देलक। दुनू परानी रविया गाछक ताक-हेरि करए लगल। वएह गाछी अखन छइ। दू सालसँ फड़बो करै छइ।” सजनक बात सुनि देवन बाजल- “भैया, आरो किछु कहियौ?” देवनक जिज्ञासा देख सजनक मुहसँ मकइ लाबा जकाँ हँसी निकललैन। हँसीकेँ कम करैत हाथक इशरासँ तेतराक घर देखबैत कहलखिन- “ओ तेतराक घर छिऐ। वेचारा बड़ मुँहसच्च अछि। मुदा काज करैमे भूते छी। जहिना करीन पटबैमे तहिना कोदरवाहि करैमे। काज करैमे तेहेन पीतमरू अछि जे ओकर जोड़ा गाममे नइ छइ। घरोवाली तेहने होशगर। खानदानी घरक बेटी। ओना, देखैमे पिरशियामे अछि मुदा रिष्ट-पुष्ट देह पाँच हाथक नमगर-छरगर। घर-आँगनसँ लऽ कऽ खेत पथारक सभ काजक लूरि। घरक जुइत अपने हाथमे रखने अछि। तेतरो निधैन रहैए। घरवाली जएह करैले कहलक सएह केलक। वेचारी घरक लक्ष्मी छी। खुट्टापर चारिटा माल रखने अछि। मालक सेवा तेहेन करैए जे अनका सेहन्ता लगै छइ। जखन ओकरा बथानपर जेबहक तँ हेतह जे ओत्तै बैस रही। ने एक्को चोत गोबर कखनो थैरमे देखबहक आ ने थाल-खिचार। चानी जकाँ थैर चमकैत रहै छइ। माल-जाल पोसि कऽ वेचारी सबा बीघा खेतो कीनलक, तीनटा घरो बनौलक आ दुनू बेटीक बिआहो केलक। बेटियो सभ तेहेन लूरिगर छै जे नीक-नाहाँति गुजर करैए। गामक कियो ने कहि सकैए जे तेतरा हमर एक्को-पाइ ठकने हएत आ ने केकरो-कहियो गारि पढ़ने हेतइ। मुदा भगवानो कहियो वेचाराकेँ अधला नै केलखिन। अगर केतौ जाइत रहत आ नजैर पड़तै तँ सहैट कऽ लगमे आबि तमाकुल खुऔत। ऐ तीन-कोसीमे जँ केतौ नाच हेतै आ ओकरा भाँज लगतै तँ आबि कऽ कहत। खेला-पीला पछाइत रातिमे घरवालीकेँ कहतै जे सजना भैयाक मन खराप भऽ गेलै तँए ओ कहलक जे एतइ आबि कऽ सुतिहह। तँइ ओतै जाइ छी। ..वेचारी घरोवाली मन खराब सुनि मानि जाइ छइ। दुनू गोरे नाच देखए जाइ छी। जैठाम नाच देखए जाइ छी तैठाम बिपटा आ नटुआकेँ एक्को-दू रूपैआ देबे करत। ..बरख आठम छिऐ, सजमैनिया टोलक रूपलाल चौरी खेतक मोटका धानक बीआ सासुरसँ अनलक। वास्तवमे धानो नीक छेलइ। सौंसे गामक गिरहस्त ओइ धानक परसंशा केलकै। पाँच मोनक कट्ठा उपजबो केलइ। ई गाम– विकासपुर, राघोबाबूक जमीनदारीमे पहिने छल। राघोबाबू अपन बेटीकेँ खोंइछमे ई गाम दऽ देलखिन। जइ दिनसँ खोंइछमे बेटीकेँ देलखिन तइ दिनसँ उपजाक सेखिये चलि गेल। केहनो सुन्नर खेत आ केहनो सुन्नर धान होइ मुदा कट्ठा मनसँ बेसी हेबे ने करइ। नइ तँ आध मन, छअ पसेरी, पाँच पसेरी कट्ठा होइ। मुदा जखन रूपलाल पाँच मोनक कट्ठा उपजौलक तखन गिरहतक मनमे सुनगुनी एलइ। तहियासँ गिरहत खेतमे खाधो देमए लगल। आ जोतो-कोर बेसी करए लगल। बेसी उपजनमा धानक बीओ लोक आन-आन गामसँ आनए लगल। मुदा गामक बनाबटो अजीव अछि। जेते धनहर खेत अछि ओ तीन किस्मक अछि। अधहा खेत गहींर अछि, जेकरा चौरी कहै छिऐ,छह-अना खेत उपराड़ि अछि आ दू-अना निचरस, जइसँ की होइ छै जे बेसी बरखा भेल तँ ऊपरका खेत उपैज जाइत आ निचला दहा जाइत। तहिना जँ कम बरखा भेल तँ निचला खेत उपैज जाइत आ ऊपरका मरहन्ना भऽ जाइइ। मोटा-मोटी अदहा उपजा गिरहतकेँ होइत। मुदा तैयो किसान, भगवानक लीला बुझि, हँसैत-खेलैत समए बिता लिअए। ..रूपलालक धानक उपजा देख तेतरा अपन स्त्रीकेँ कहलक। लड़ुवती अपन पनरहो कट्ठा चौरी खेत-ले पनरह सेर धान बदैल अनलक। ओइ धानकेँ तेतरा नारक झट्टाक मोइर बना रखि लेलक। फागुन-चैतमे जखन चौरी खेत उखड़लै तखन खूब महिया कऽ जोइत धान बाउग केलक। बड़ सुन्नर धानक गाछ जनमलै। सभ दिन तेतरा दुनू परानी बेरा-बेरी जा-जा देखैत। बीत भरि-भरिक जखन गाछ भेलै तखन दुनू परानी आठ दिनमे खुरपीसँ कमठौन केलक। बैशाखमे एकटा बिहड़िया हाल भेलइ। कच्चे-बच्चेकेँ धान चलल। खेत भरि गेल। अखाढ़मे डुमौआ बरखा भेल। आठे दिनमे धानक गाछ सरैक कऽ भरि-भरि जाँघक भऽ गेल। ..दुनू परानी तेतरा विचारलक जे सुर्रा कमठौन करब। परात भने दुनू गोरे कमाइले गेल। आड़िपर ठाढ़ भऽ दुनू परानी हियासि-हियासि धान देखए लगल। धान देख लड़ुवती तेतराकेँ कहलक, तेहेन धान अछि जे थारी छिछैल जाएत।’ ..तेतरोक मन गदगद रहै, खिलखिला कऽ हँसए लगल। अपन खेत-देख तेतरा अनको-अनको खेतक धान देख अपन धानसँ तुलना करए लगल। जेहेन धान तेतरा खेतमे छल ओहन आड़ि-पाटिमे केकरो नहि। हँसैत तेतरा लड़ुवतीकेँ कहलक- ‘ऐ बेर लक्ष्मी महरानी खुशीसँ तकलैन।’ ..तेतराक बातमे अपन बात जोड़ैत लड़ुवती कहलकै- ‘जब, भगवान दइपर होइ छथिन तँ छप्पर फाड़ि कऽ दइ छथिन!’ ..कहि दुनू परानी हँसए लगल, हँसिते दुनू गोरे कमठौन करए खेतमे पैसल। कमठौन शुरू केलक। कनीए कालक पछाइत दुनू गोरेकेँ ठेंगी पकैड़ लेलकै। बुझलक कियो ने। खून पीब जखन ठेंगी लटकल तखन तेतराक नजैर पड़लै। नजैर पड़िते तेतरा फानि कऽ खेतक आड़िपर ठाढ़ भऽ जोरसँ लड़ुवतीकेँ कहलकै- ‘सभटा खून ठेंगी पीने जाइए। झब-दे छोड़ाउ नइ तँ जेहो देहमे खून बँचल अछि सेहो पीब लेत!’ ..तेतराक बात सुनि लड़ुवती खेतसँ ऊपर हुअ लगल कि अपनो बाँहिमे ठेंगी लटकल देखलक। बाँहिमे ठेंगी लटकल देख धड़फड़ा कऽ ऊपर हुअ लगल कि धानमे साड़ी लटपटा गेलै, लटपटाइते आड़िपर गिर पड़ल। फेर उठि लड़ुवती पहिने अपन ठेंगी छोड़ौलक,ठेंगीकेँ छोड़ैबते छर-छरा कऽ खून बाँहिसँ बहए लगलै। चुटकीसँ माटि लऽ दाढ़मे लगौलक। खून बन्न भेलइ। ताबे तेतरो अपन ठेंगी छोड़ा खेतमे फेकलक। फेर कमाइले खेतमे पैसए लगल आकि देखलक जे खेतमे ठेंगी सह-सह करैए। कमठौन छोड़ि दुनू गोरे घर दिस विदा भेल। ..ऊपरका खेत सभ किसान अवादए लगला। पनरहे दिनमे सौंसे गामक खेत अवाद भऽ गेल। खेत तँ अवाद भऽ गेल मुदा बरखो बन्न भऽ गेलइ। ऊपरका खेत सभ सुखए लगलै। जेहो पानि खेतमे छेलै ओहो बहि-बहि निचुलका खेतमे जमा भऽ गेल। जहिना जे गब किसान खेतमे रोपने छल ओहिना ओ लगि कऽ ठाढ़! मने-मन सभ किसान सोचए लगला जे समए रौदियाह भऽ गेल। खेत सभमे दरारि फाटए लगल। धानक निचला पात पीअर भऽ-भऽ सूखए लगल। मुदा चौरी खेतक धान किसानक मुहकेँ हरिअर रखने। ..दुर्गापूजासँ पाँच दिन पहिने एकटा अछार भेल। मुदा ओ पानि रस्ते-पेरे रहि गेल। मात्र चौरीए खेतटा मे ठेहुन भरि पानिक सलाढ़ पकड़ने। आब जँ आगू बरखा नहियोँ हएत तैयो चौरी उपजबे करत, ई बात सभ गिरहस्तक मनमे। हर्ष-विषादक बीच गामक सभ किसान। मुदा जइ गिरहस्तक बेसी खेत चौरीमे रहैन ओ बेसी खुशी छला आ जिनकर कम खेत ओ कम। तेतरा आ लड़ुवतीकेँ बेसी खुशी। दुनू परानी तेतराकेँ ऐ दुआरे बेसी खुशी जे आन सालसँ बेसी धान हएत। डेढ़ बीघा खेत तेतराकेँ रहइ। पनरह कट्ठा उपराड़ि आ पनरह कट्ठा चौरी। कोनो साल बीस मनसे बेसी धान नै होइ मुदा ऐ बेर नवका धानक आशा। चौरी खेतक धान, दुनू परानी तेतराकेँ नव उत्साह आ नव सिनेह बढ़ए लगल। जखन दुनू एकठाम बैस परिवारक गप करए तँ पहिने चौरीए धानक चर्च उठि जाइत। ..गभहा सकराँतिक दिन। आइ गामक सभ गिरहत अपन-अपन खेत जा कहत- ‘उक्खैर सनक बीट, समाठ सनक सीस।’ ..दुपहरेसँ दुनू परानीक बीच तेतराकेँ रक्का-टोकी हुअ लगल। रक्का-टोकीक कारण छल जे तेतरा कहैत जे ‘हम चौरी जा कहबै।’ आ लड़ुवती कहै जे ‘हम जा कऽ कहबै।’ तेतराक कहब रहै जे पुरुख खेतमे जा कहैत तँए हम जाएब। आ लड़ुवती कहैत जे ‘घरक गारजन जा कऽ कहै छै तँए हम कहबै।’ ..मुँह दुब्बर तेतरा, खिसिया कऽ लड़ुवतीकेँ कहलकै- ‘जाउ, अहीं जा कऽ कहियौ-गे।’ ..मने-मन लड़ुवती सोचए लगल जे पनरहे कट्ठा खेत अछि तँए घुमि-घुमि सौंसे खेत कहबै। तँए अँगनाक सभ काज सम्हारि लड़ुवती खेत विदा भेल। मनहूस भेल तेतरा दुआरपर बैस, बीड़ी पिब-पिब मनकेँ शान्त करए लगल। मन शान्त होइते तेतरा कुट्टी काटए लगल। ..घरक गोसाँइकेँ गोड़ लागि लड़ुवती सोचलक जे जँ कियो रस्तामे टोकबो करत तँ उनैट कऽ जवाब नइ देबै, नइ तँ वीध भंग भऽ जाएत।” बिच्चेमे देवन बाजल- “तब की भेलै?” सजन कहलखिन- “सुनहक ने, समतोलिया आ अँगुरिया, दुनू माय-धी रस्ते कातमे मरहन्ना धान काटैत रहए। लड़ुवतीकेँ देख समतोलिया कहलकै- ‘ऐ बेर हिनके बाजी सुतरल छैन। हमरा सबहक कपारमे आगि लगि गेल!’ ..समतोलिया बातक जवाब नै दऽ लड़ुवती मुँह घूमा आगू बढ़ि गेली। जखन दस लग्गी आगू बढ़ल तखन अँगुरिया माएकेँ कहलकै- ‘एक्को बेर काकी बजबो ने कएल!’ ..सन्तोष दैत समतोलियाकेँ कहलकै- ‘बुच्ची, धने एहेन चीज छिऐ जे लोककेँ टेँढ़ बना दइ छै, भाए-भाएमे गरदैन कटौवैल करा दइ छै, स्त्री-स्वामीमे गरमेल करा दइ छै तेतबे नहि, बापो-बेटामे खून करा दइ छइ। तइले दुख किए करै छँह। दस कट्ठा अल्हुआ रोपने छी। कहुना-कहुना तँ साए मन हेबे करत। केते खेमे। अदहा बेच कऽ धान कीनि लेब। एक साँझ भात आ एक साँझ अल्हुआ उसैन कऽ चाहे रोटी पका कऽ खाएब। कोनो की सबहक दिन कटतै आ हमर नै कटत?’ ..खेतक चारू आड़ि घुमि लड़ुवती धानकेँ गोड़ लगि खेतमे धँसल। तरे-तर गम्हरा धानमे होइत रहइ। आँगुर सन-सन मोट। एकदम पोछल-पाछल शाही काँट जकाँ। तरे-तर लड़ुवती खुशीसँ गदगद। चारि फेरा खेतमे लगा खेतसँ निकैल मने-मन गोड़ लागि लड़ुवती विदा भेल। अबैकाल रस्तेमे जखन रहए तँ मनमे उठलै जे घरमे एक्कोटा नमहर कोठी नइ अछि, एते धान केतए रखब। से नइ तँ अखन महिना दिन धान होइयोमे लगत तँए अखनियेँ एकटा नमहर ढक बनबा लेब। अँगना अबैत-अबैत लड़ुवती तँए कऽ लेलक जे काल्हिए ढक बनौनिहारकेँ कहि देबइ। सूर्यास्त भेने तेतरा मालऽ घरक ओसारक खुट्टा लगि बैसल छल। मुस्की दैत लड़ुवती तेतराक लगमे आबि कहलकै- ‘चौरीक धान तँ फाटि कऽ उपजल अछि। घरमे एक्कोटा नमहर कोठी नइ अछि तँए एकटा नमहर ढक बनबा लिअ।’ ..लड़ुवतीक बात सुनिते तेतराक दिनका तामस जगि गेलइ। खिसिया कऽ बाजल- ‘ढक बनाउ की बखारी तइले हमरा की पुछै छी? हमहूँ कोनो मनुखे छी? बहिया-खबास जकाँ रहै छी आ रहब।’ ..तेतराक करुआएल बात सुनि कनडेरिये आँखियेँ लड़ुवती तेतराक आँखिमे आँखि गड़ा दहिना हाथ माथपर दऽ पुचकाइर कऽ कहलक- ‘एना जँ भैंसा-भैंसीक कनारि दुनू परानीमे लोक करए लगत तखन तँ भऽ गेल। खेते देखैक मन अछि तँ काल्हि जा कऽ देख आएब। खेत केतौ पड़ाएल जाइ छइ। तइले एते तामस किए केने छी।’ ..लड़ुवती अपन गलती अपन आँखिएसँ मानि लेलक। तेतरोक आँखि गलती माफ करैत अपन बड़प्पनक आनन्द महसूस केलक। मुस्की दैत तेतरा बाजल- ‘छोटे-छोटे दूटा ढक बना लेब। एकटा बनौलासँ गड़बर भऽ जाएत। एकछाहा ओते धान हएत तब ने। जँ से नै हएत तँ मोटका धानमे महिक्का धान केना रखब?’ ..मुड़ी डोलबैत लड़ुवती बाजल- ‘कहलौं तँ ठीके। जेकरा बेसी खेत रहै छै ओकरा बेसी धानो होइ छै तँए नमहर-नमहर ढक वा बखारी बनबैए। मुदा जे जेहेन गिरहस्त अछि ओ तँ ओहने कोठी आकि ढक बनौत ने। गरीब-गुरबा भुरकुरी वा घैलेमे अन-पानि रखैए।’ ..दोसर दिन भोरे तेतरा ढक बनबै-दे कहैले लेलहा ऐठाम गेल। लेलहा गछि लेलक। दोसर दिन आबि लेलहा चारिटा भौर परहक अधपक्कू बाँस कटलक आ दू दिनमे लेलहा चारू बाँसकेँ चीर-फाड़ि, छील-छालि कऽ तैयार केलक। तेसर दिन ढक बनौनाइ शुरू केलक। बिच्चेमे लेलहा ऐठाम जा लड़ुवती कहलक- ‘भैया, एकटा मनही ढकिया सेहो बना दिहैथ। छठिमे घाटो परहक काज कऽ लेब आ धान-तानक लरती-चरती हएत तँ धानो रखब।’ ..मने-मन लड़ुवती छठि-मायकेँ हाथियो कबुल देलक।’ ..अगहन आएल। धनकटनी शुरू भेल। ऊपरका खेतमे तँ धान तेनाहेँ सन रहै मुदा तैयो जरलो-मरल धान काटि-काटि लोक आनए लगल। पनरह अगहनसँ चौरी खेतमे हाथ लागल। तेतराक खेत बीचमे तँए पहिने किन्हैरक धान कटत तखने रस्ता बनतै। रखबार किन्हैरबला गिरहत सभकेँ धान काटैले कहलक आ बीचक खेतबला केँ मनाही कऽ देलक। आठ दिनक कटनीक पछाइत तेतरा-खेतक रस्ता खुजल। साँझेमे आबि रखबार तेतराकेँ कहि देलकै जे खेतक रस्ता भऽ गेलह। भोरे लड़ुवती भानस कऽ दुनू परानी खेलक आ धान काटै लऽ विदा भेल। जाइसँ पहिने माल-जालकेँ खुआ-पीआ लेलक। शीतलहरी दुआरे पानियोँ ठरल। रौदक पता नहि। आड़िपर पहुँच दुनू परानी तेतरा धानकेँ निंगहारि-निंगहारि देखए लगल। धानक सीस ठारहे मुदा दाना एक्कोटामे नहि! लड़ुवतीक मनमे एलै जे भरिसक लोक चोरा कऽ सुरैर लेलक। रखबारकेँ ताकए लगल। ..कनीए कालक पछाइत मनमे एलै जे कतका ने सुररलक मुदा बीचला तँ नै सुररने हएत। पानिमे पैस कऽ धान देखलक। बीचोमे एक्कोटा धान नहि! झड़ल सीस देख लड़ुवती हतास भऽ गेल। मनमे उठलै- एना भेल किए? ..एमहर तेतरो चारू आड़ि घुमि-फिर देखलक तँ एक्के रंग बुझि पड़लै। ठकुआ कऽ दुनू परानी आड़िपर ठाढ़ भऽ गेल। ने किछु तेतरा बजैत आ ने लड़ुवती। दुनूक देहमे जेना थोड़बो लज्जैत नै रहल। एक तँ खेतक ठरल पानि दोसर धानक सोग, कठुआ कऽ लड़ुवती खेतेमे खसि पड़ल। जेना अचेत भऽ गेल। ..लड़ुवतीकेँ गिरल देख तेतरा पँजिया कऽ कोरामे उठौलक। मुड़ी उठा-उठा लोककेँ देखैत जे शोर पाड़बै। मुदा लगमे कियो नहि। कहुना-कहुना तेतरा लड़ुवतीकेँ उठा सुखलाहा खेतमे अनलक। लड़ुवती लर-ताँगर भेल, जेना एक्को-पाइ होशे नहि। मने-मन तेतरा सोचए लगल जे आब की करब? किछु फुरबे ने करइ। अनासुरती मनमे एलै जे पएरक दुनू तरबा रगड़ने देहमे गरमी औतै तखन उठि कऽ ठाढ़ हएत। लड़ुवतीक तरबा तेतरा रगड़ए लगल। ..थोड़े कालक पछाइत लड़ुवती आँखि तकलक। आँखि तकिते साड़ी सेरिया चुक्की माली भऽ बैसल। देह गरमाइत-गरमाइत गरमाएल। तखन दुनू गोरे आँगन विदा भेल। अँगना अबिते तेतरा घूर पजारलक। दुनू परानी भरि मन आगि तपलक। ..बेरू-पहर तेतरा हमरा ऐठाम आबि कहलक- ‘भैया, गरदैन कटि गेल। एक्कोटा धान खेतमे नइ अछि। जेना कियो सुरैर नेने हुअए तहिना बुझि पड़ैए।’ ..हम पुछलिऐ- ‘धान सुररने छह कि झड़ल छह?’ ..कहलक- ‘अगर सुररने कियो रहितए तँ अदहो-छिदहो तँ बँचल रहैत से एक्कोटा ने बँचल अछि।’ ..हम कहलिऐ- ‘तोहर बीये खराब छेलह। अपने घरक बीआ छेलह कि केकरोसँ नेने छेलह?’..कहलक- ‘रूपलालसँ नेने छेलौं।’ ..कहलिऐ- ‘वएह तोरा ठकि लेलकह। उ चोट्टा औझुका ठक छी। गाममे केकरो नीक देखए चाहैए। ओते जे चीज ढेरियौने अछि से सभटा अपने कमेलहा छिऐ। मुँह दुब्बर लोक डरे किछु कहबे ने करै छै तँए छजल जाइ छइ। जेहने चोट्टाक मुँह छुटल अछि तेहने लठिघरो अछि तँए कियो किछु कहबे ने करै छइ। आब की करबह। सवुर करह।’ ..टुटल आशा, विचलित मन, कनैत आँखि तेतराक देख किछ ने फुरैत रहए। कहलक- ‘भैया, एक्को कनमा धान नहि भेल, भरि साल की खाएब?’ ..आशा जगबैत हम कहलिऐ- ‘तोरा अपन सम्पैतक पते नै छह। बहुत धन छह। एकटा बच्छा बेच लेबह तेहीसँ छह मासक बुतात चलि जेतह। तेकर बाद बुझल जेतइ। ताबे छह महिना कि कोनो हाथपर हाथ धऽ बैसल रहबह। चिन्ता नै करह।’ ..कहलक- ‘जाइ छी भैया?’ ..कहलिऐ- ‘तमाकुल खा लएह तब जइहह।’ ..कहलक- ‘तमाकुल खाइक मन नै होइए।’ ..कहलिऐ- ‘मन असथिर करह। कमाइबला बेटा लोकक मरि जाइ छै, सेहो सवुर लोक करिते अछि। तोरा तँ खेतक उपजा गेलह। खेत छह तँ फेर ओइसँ नीक उपजा देखबहक।’ ..अँगना जा तेतरा सभ बात लड़ुवतीकेँ कहलकै। लड़ुवतीक आँखि लाल भऽ गेलै, जोर-जोरसँ बाजए लगल- ‘रूपललवा गरदैनकट्टा छी। जेहने फौतिबा अपने अछि तेहने बौहु छै! अहाँ अँगनेमे रहू, हम ओइ रूपललबाकेँ सराध-बिटारि केने अबै छी। जाबे ओकरा सिरा आगू थूक नै फेकबै ताबे नै बूझत।’ ..विचित्र असमंजसमे तेतरा पड़ि गेल। कखनो होइ जे अनेरे घरवालीकेँ कहलिऐ। तँ कखनो होइ जे दुनू गोरे जा कऽ रूपलालक दरबज्जापर गरियाबी। फेर होइ जे रूपलाल समंगर अछि, बिनु मारने छोड़त नहि। धनो गेल आ नाँहकमे मारियो खाएब। अन्तमे सोचलक जे भने अँगनेसँ घरवाली गरियबैए। लड़ुवती अँगनासँ रूपलालकेँ गरियबैत रस्तापर चलि आएल। तेतरा आगूमे ठाढ़ भऽ बाँहि पकैड़ लेलक। जेते तेतरा लड़ुवतीक बाँहि पकैड़ रोकैत तइसँ बेसी लड़ुवती कुदि-कुदि आगू बढ़ैक चेष्टा करैत। आ चिकैर-चिकैर गरियेबो करैत। ..रस्ता धेने रूपलाल केतौसँ घर दिस अबै छल। लड़ुवतीक गारि सुनि चौंक गेल मुदा आँखि निच्चाँ केने अपना ऐठाम चलि आएल। हल्ला सुनि हमहूँ गेलौं। तेतराक घरवालीकेँ देह परहक साड़ी उड़ियाएल, केश खुजल, आँखि लाल, गरैज-गरैज गारि पढ़ैत सुनि कहलिऐ- ‘कनियाँ, चुप रहू। धैनवाद अहींकेँ दइ छी जे रूपलालकेँ मुँहपर गरियेलौं। की करबै? जाबे अपना चीज नइ अछि ताबे अहिना ठक सभ ठकत। देखबे केलिऐ जे रवियाक आमक गाछ छठुआ उखारि कऽ रोपि लेलकै। चुप हउ, चुप हउ।’ ..हमर बात सुनि वेचारी साड़ी सरियौलक, माथ झँपैत घुनघुना कऽ बाजल- ‘हिनका पैघ बुझै छिऐन भैया, तँए बात मानि लेलिऐन नइ तँ आइ ओइ डकूबाकेँ खापैड़सँ चानि तोड़ि दितिऐ।’ आँखि मूनि देवन धियानसँ सजनक खिस्सा सुनैत रहए। ‘चानि तोड़ि दितिऐ’ सुनि आँखि खुजलै। मने-मन देवन सोचए लगल जे रूपलालकेँ जेते सजा हेबा चाही से नै भेलइ। किए ने भेल? शायद एकर यएह कारण रहल हएत जे समाजोमे शासक आ शासित लोक अछि। शासकक गलतीक जवाब दइबला कियो ने अछि। मुदा गरीब-गुरबाक गलतीकेँ उचितोसँ बेसी सजा देल जाइ छइ। कनी काल गुम्म रहि देवन सजनकेँ कहलकैन- “अहाँ गियानक बखारी रखने छी।” हँसैत सजन बजला- “बौआ, रातियो बेसी भऽ गेल आ भरि दिनक थाकल सेहो छी। तोहूँ खा कऽ अराम करह आ हमहूँ जाइ छी।” ◌ शब्द संख्या : 4937 10. भोर होइते एका-एकी टोलक लोक बचेलालक ऐठाम आबए लगल। लोककेँ अबैत देख सुमित्रा आँगन बहारब छोड़ि दरबज्जापर आबि सभकेँ बैसैले कहए लगलखिन। सबहक मनमे जेहने खुशी तेहने जिज्ञासा। लोकक गल-गुल सुनि बचेलालो बिछानसँ उठि बोलीकेँ अकानए लगला जे केतौ किछु भऽ ने तँ गेलइ। मुदा गल-गुलक तेहेन बाढ़ि जे कोनो बात साफ-साफ बुझाइए ने पड़ैत रहैन। आँखि मीड़िते बचेलाल दरबज्जापर आबि देखलैन। किछु गोरे चौकियोपर बैसल, किछु ठाढ़ो आ किछु गोरे रस्ते-रस्ते अबितो। सबहक मन खुशी तँए मुँहमे हँसी। बचेलालकेँ सुमित्रा कहलखिन- “बच्चा, काल्हि जे दरी-लाइट-बरतन कीनि कऽ अनलह वएह देखैले समाज सभ एलखुन हेन।” सुमित्राक बात सुनि बचेलाल कलपर जा माटिए-सँ चारि घूसा दाँतमे लगा कुरुर कऽ आबि दरबज्जाक कोठरी खोलि, सभ समान निकाललैन। दरी आ जाजीमकेँ खरिहाँनमे बिछा सभकेँ बैसबैत बचेलाल बजला- “हम सिरिफ कीनिलौं मुदा छी अहाँ सबहक। जिनका जाहिया काज हुअए, लऽ जाएब। ऐ दरी, जाजीम, लाइट आ बरतनकेँ अपन बुझि उपयोग करब।” बचेलालक बात सुनि सभ थोपड़ी बजौलक। अछेलाल सेहो आएल। सुमित्रा चाहक ओरियानमे आँगन गेली। लोकक हिसाबे हुनका गरे ने अँटैन जे कथीमे चाह बनाएब आ पीबैले कथीमे देब। घरमे चाहो-चीनी आ दूधो कम्मे अछि, ऐसँ पारो ने लागत। विचित्र असमंजसमे सुमित्रा। मुदा मनमे ईहो होइत रहैन जे दरबज्जापर आएल समाजकेँ जँ चाहो ने पिएबैन तँ घरक की रहत...। अँगनेसँ सुमित्रा हाथक इशारा दैत अछेलालकेँ बजौलैन। सहैट कऽ अछेलाल सुमित्रा लग एला। सुमित्रा कहलखिन- “बौआ, आइ पहिल दिन समाज दुआरपर एला आ अगर चाहो नै पिएबैन से केहेन हएत।” हुँहकारी भरैत अछेलाल कहलकैन- “हँ, ई तँ बड़ पैघ अपमान समाजकेँ हेतैन आ समाजोसँ पैघ अपन घरक प्रतिष्ठाक हएत। सभ चीज तँ ऐछे तखन प्रतिष्ठाकेँ मंगनीमे किए जाए देब। हम दूध नेने अबै छी। चाह-चीनी दोकानसँ लऽ आनब। चाह बनबैले बड़का बरतन ऐछे। पीबैले जँ कप-गिलास नइ अछि तँ दोकानेसँ सैकड़ा हिसाबसँ प्लास्टिकक गिलास कीनि आनब। कनी करैये पड़त ने मुदा असम्भव काज तँ नइ अछि। जुगायोकेँ शोर पाड़ै छिऐ, ओ दोकानक काज करत आ अहाँ चुल्हि पजाइर बरतन चढ़ा दियौ। जाबे बरतन सेरियाएब आ चुल्हि पजारब ताबे ईहो दुनू काज भऽ जाएत।” सुमित्रा बजली- “हँ! जुगायकेँ शोर पड़ियौ।” जुगायकेँ अछेलाल शोर पाड़ि कहलक- “जुगाय, तूँ कनी दोकान जा। चाह, चीनी, गिलास, तमाकुल, बीड़ी आ सुपारी कीनने आबह। हौ भागमन्ते ऐठाम दस गोरे अबैए।” जुगाय दोकान गेल आ अछेलाल दूध-ले। एमहर सुमित्रा हाँइ-हाँइ गिलासमे पानि लऽ चुल्हिकेँ शुद्ध करैले छीटए लगली। ओसारपर बैस रूमा गुम्हरैत मुदा बजैत किछु नहि, जेना बिनु आगिए मन छन-छन जरैत रहैन। होनि जे सभ जान मारैपर लगल अछि। खुशीसँ बचेलालक मन ओहिना दहलाइत रहैन जेना पानिक ऊपरका चीज हवा पेब दहलाइत रहैए। चाह बनल। सभ कियो चाह पीलैन कियो तमाकुल तँ कियो बीड़ी तँ कियो सुपारीक टूक मुँहमे दऽ जूट बान्हि-बान्हि विदा भेला। जहिना पुरुखक जुटान बचेलालक दरबज्जापर तहिना टोलक बुढ़-बुढ़ानुसक जुटान परती परहक जामुनक गाछक निच्चाँमे। ढेरबा बच्चिया सबहक बैसार पोखैरक मोहारक कनैलिक फूलक गाछक निच्चाँमे..। सभ अपना-अपनामे मस्त। जेना केकरो घर-आँगनमे कोनो काजे ने होइ, तहिना। ठीठर, डोमन, कुजाइ आ बोतल संगे चारू गोरे ठीठरक दलानपर बैसल। सबहक मन खुशी। आइ धरि जे टोल भानस करैक बरतन, इजोत आ बिछान-ले दुख भोगैत आएल ओ दुख पड़ा गेल। डोमन बोतलकेँ कहलक- “बोतल भाय, अपनो सबहक ऊपरमे किछु जिम्मा आबि गेल। ओना तँ गामक चीज भेल मुदा मुख रूपसँ अपना टोलक तँ भेबे कएल। अपना सबहक जिम्मा भेल जे एक लगनमे दू या दूसँ बेसी काज नै करब। किएक तँ समान कम अछि। तँए एक लगनमे एक्केटा बिआह करब नीक हएत।” डोमनक बात सुनि बोतल तँ नइ बाजल मुदा ठीठर कहलकै- “बेस कहलहक डोमन। जेतबे नुआ रहए तेतबे पएर पसारी। ओहो तँ बचेलालेकेँ धैनवाद दी जे एतबो केलक। कमाइ तँ बहुत लोक गाममे अछि मुदा केकरो एहेन बुधि किए ने भेल। ‘वन राखे सिंह आ सिंह राखे वन।’ जहिना वेचारा बचेलाल समाजक कल्याण-ले डेग उठौलक तहिना अपनो सभ डेग-मे-डेग मिला कऽ चलह। ओइ वेचाराक परिवार लटपटा गेलै, मसोमाती कारोबार भऽ गेलै मुदा तैयो ओइ मसोमातकेँ धैनवाद दी जे घर थथमारि कऽ रखलक।” खेनाइ-पीनाइ, काज-उदम जेना सभ बिसैर गेल। चारू गोरे गप-सप्प करिते रहल। नअ बाजि गेल। बचेलाल, अछेलाल आ जुगाय, तीनियेँ गोरे दरबज्जापर रहल। जुगायकेँ बचेलाल कहलखिन- “जुगाय भाय, हम स्कूल जाइ छी आ ओइ बेरमे अहाँ दुनू परानी डाक्टर ऐठाम पहुँच जाएब। स्कूलसँ हमहुँ सोझे डाक्टर ऐठाम आएब। जाबे आँखि तकै छी ताबे ई दुनियाँ, जखने आँखि मूनि लेब दुनियाँ बिला जाएत। तँए शरीरक रोगकेँ मजाक नहि बुझि दुश्मन बुझए पड़त। अखन अहाँक उमेरे की भेल हेन तखन तँ गरीबी लोककेँ अछैते औरुदे मारि दइ छइ। अखन अहूँ सभ जाउ, घर परहक काज देखियौ, हमहूँ नहा-खा कऽ स्कूल जाइ छी।” जुगाय उठि कऽ विदा भेल। अछेलाल बचेलालकेँ कहलकैन- “बौआ, जहिना भुमकम भेलापर गाम दलमलित भऽ जाइ छै तहिना आइ बुझि पड़ल।” बचेलालक मन खुशीसँ गदगद रहबे करैन, हँसैत बजला- “काका, जहिना अहाँ असगर छी तहिना तँ हमहूँ छी। जखन स्कूल चलि जाइ छी तखन दुआर-दरबज्जा भकोभन रहैए तँए एहेन काज ठाढ़ कऽ लेलासँ काजो चलत आ दरबज्जो सून नै रहत। अहूँकेँ एक्केटा घर अछि आ कम्मे घराड़ियो। तँए एत्तै घर लऽ आनू। एकठाम घर भेलासँ दुनू गोरेक रक्षो हएत आ मालो-जालक सेवा हएत। खुट्टापर जे गाए अछि ओ पुरना नश्लक अछि, जइसँ दूधो कम होइए, तँए एकटा नीक जरसी गाए सेहो कीनि लेब। अपन चीज रहलासँ कोनो बेर-बेगरता नै खगत। एते दिन आन्हर जकाँ छेलौं जइसँ परिवार समाजकेँ नै बुझै छेलौं। आब जखन नजैर खुजल तखन ई सभ बुझए लगलिऐ। हमरे रूपैआसँ बड़का-बड़का उद्योगपति कमा कऽ मोट भेल जाइए आ जे कमाइए ओ बेटे-बेटीक पढ़ौनाइ-लिखौनाइसँ लऽ कऽ बिआह-दुरागमन करैत-करैत जिनगी समाप्त कऽ लइए। हमरो साइकिल भाइए गेल। जेते समए बँचत ओइमे टोलक बच्चा सभकेँ पढ़ा देबइ। स्कूलमे दरमाहा भेटते अछि तँए केकरोसँ एक्को पाइ नइ लेबै। खेती करैक लूरि नइए मुदा पढ़ै-पढ़बैक लूरि तँ अछि, तँए खेतीक किताब पढ़ि, रेडियो सुनि खेती करैक लूरि अपनो सीखि लेब आ अहूँ सभकेँ नव ढंगक खेतीक जानकारी देब। आब अपनो बुझए लगलौं जे शिक्षक भेनौं जिनगी जीबैक ज्ञान नइ अछि। जहियासँ स्कूल छोड़लौं आ शिक्षक भेलौं तहियासँ बड़ पढ़ै छी तँ साँझू-पहर-के दू-चारि पाँति रामायण वा महाभारत। सेहो पढ़ै नइ छी गाबि लइ छी। ओकरामे जे गूढ़ विषय छिपल छै से बुझबे ने करै छी जइसँ जिनगी अन्हराएलक अन्हराएले रहि जाइए। जाबे सभ मनुखकेँ जिनगी जीबैक ढंग नइ हेतै ताबे जिनगी अपन कोनो माने नै राखत। आब समैयो भऽ गेल, हमहूँ स्कूल जाइ छी, गप्पेमे लगल रहब तँ देरी भऽ जाएत, अहूँ जाउ।” साढ़े चारि बजे बचेलाल डाक्टर ऐठाम पहुँचल। दुनू परानी जुगाय तइसँ पहिनहि पहुँच चुकल छल। सौंझुका समए भेने डाक्टर ऐठाम रोगियोक बेसी भीड़ नहि। बचेलालकेँ देख डाक्टर पुछलखिन- “मास्टर साहैब, अपने देखाएब कि कियो रोगी छैथ?” जुगायकेँ देखबैत बचेलाल बजला- “डाक्टर साहैब, हिनके पत्नीकेँ देखबैक अछि।” डाक्टरक कुरसीक बगलमे एकटा स्टूल राखल छेलै, ओइपर जा जुगायक पत्नी बैसली। डाक्टर आला लगा जाँचि कऽ सभ किछु बुझि बचेलालकेँ कहलखिन- “तीन-चारि तरहक जाँच करबए पड़त। जाँचक रिपोट देखला पछाइत दबाइ लिखि देबैन। अखन ताबे दू खोराक दबाइ दऽ दइ छिऐन, काल्हि बाजाप्ता लिखि देब। पनरहसँ बीस दिनमे मरीज नीक भऽ जेती।” डाक्टरक बात सुनि जुगायक मनमे घरवालीक नव जिनगी नाचए लगल। नचबो केना ने करत, वेचारा जुगाय घरवालीक आशा तोड़ि चुकल छल। जहिना पानिक वेगमे भँसैत चुट्टीकेँ खढ़ोक सहारा भेटने जिनगीक आश जगैए, तहिना जुगायोकेँ जगल। रूमाक दाबल क्रोध मिझाएल नहि, तरे-तर धधैकते रहल। साँझू-पहर बचेलाल टहैल-बुलि कऽ आबि, हाथ-पएर धोइ दरबज्जापर बैसला। सुमित्रो एली आ जरैत लालटेनकेँ तेज कऽ देलखिन। तखने रूमा चाह नेने आबि बगलमे रखि कऽ विदा हुअ लगली कि बचेलाल कहलकैन- “देखू, अखन तीनियेँ गोरे छी। तीनू गोरे एक्के परिवारक सेहो छी। परिवार एकटा संस्था होइत, जेकरा अहाँ मन्दिरो, देवस्थानो कहि सकै छिऐ। जहिना पुजेगरी मन्दिरकेँ जीवित रखैले दिन-राति लगल रहैए तहिना परिवारोकेँ जीवित रखैले परिवारक सभकेँ ओइ रूपमे लागि कऽ करए पड़त। परिवारमे एक गोरे मेहनत करी आ दोसर गोरे बैस कऽ रहए चाहबै तँ ओ घर कए दिन ठाढ़ रहत। प्रश्न पजेबा आकि खढ़-बाँसक नइ अछि, प्रश्न अछि मनुखक। जेकर पहिल मापदंड अछि जे मनुख केहेन हेबा चाही? नजैर उठा कऽ देखबै तँ बुझि पड़त जे अनेको चालि-ढालिक मनुख अछि मुदा से नहि, जखन मनुखक मापदंडकेँ आगूमे रखि विचार करब तखन बुझि पड़त। सभ मनुखक दायित्व होइत जे मनुख बनि जिनगी जीबी। आब कोनो बच्चा नइ छी। जँ कोनो काज वा बात अपने नहि बुझैत होइ तँ दोसरसँ बुझैमे कोनो मान-अपमानक बात नहि होइत।” जुगायक पत्नीक रोग रसे-रसे कमए लगल। जेना-जेना रोग कमलै तेना-तेना काजो करै दिस शक्ति बढ़लै आ अन्नो दिस रूचि बढ़लै। पत्नीक हालत सुधरैत देख जुगाय दबाइक संग पथ्य लेल गाइक दूध सेहो उठौना कऽ लेलक। आठ दिन बितैत-बितैत धनमाक देह चिष्टा गेल। स्त्रीकेँ टनगर होइत देख जुगायक टुटल आशा जागए लगल। अखन धरि रूमाक नजैर सासुक प्रति जेहेन हेबा चाही से नै भऽ ‘कियो छी’ छेलैन। सासुक प्रति पुतोहुक केहेन बेवहार हेबा चाही? से जेना रूमा बुझिते नहि आकि बुझियो कऽ अनठबै छेली से तँ ओ जनती। जँ किछु करैले सुमित्रा पुतोहुकेँ अढ़बैत रहथिन तँ सुनिते-देरी रूमा बड़बड़ाए लगैत, करब तँ दूरक बात। देखैत-देखैत सुमित्रा अढ़ौनाइए छोड़ि देलखिन। मनमे यएह छेलैन जे जँ हम केकरो गारजन नइ छी तँ हमरो गारजन कियो ने अछि। मने-मन बजैत जे सासु-ससुरक प्रति वा बेटा-बेटीक प्रति जे कर्तव्य होइए ओ तँ नीक नहाँति निमाहि चुकल छी तँए कियो जिनगीमे आँगुर उठा कए नै देखा सकैए। पुतोहु अप्पन कर्तव्य करती आ बेटा अपन करत। जँ बेटा-पुतोहु नहियेँ सेवा करत तँ नै करह। जाधैर अन्न खाइ छी, देहमे सक्क अछि ताधैर आँखि निच्चाँ केना कऽ लेब, कोनो कि फेर दोहरा कऽ जन्म लेब। सभ मनुख अपन कर्मसँ मनुखता प्राप्त करैए आ जेकरा मनुखता प्राप्त भऽ जाइ छै, ओकरा देहक सुख-दुख थोड़े पथभ्रष्ट कऽ सकत। हँ! भऽ सकैए जे पुतोहु हमरा बैधव्य बुझि निःसहाय मानैत होथि। मुदा ई तँ जिनगीक क्रम छिऐ। की सभ महिला पुरुखक अछैते मरै छैथ? एकदम नहि। मरैक कारण भिन्न अछि आ परिवारिक सम्बन्ध भिन्न। भऽ सकैए जे ओ अपन नैहरमे कोनो बैधव्य महिलाकेँ कष्टमय जिनगी देखने होथि वा पुतोहुक बेवहार सहन करैत देखने होथि...। ..एते बात सुमित्राकेँ मनमे अबिते जेना आँखि लाल हुअ लगलैन। निर्भीक स्वरमे बुदबुदेली- “आन महिला हमरा नै बुझौथ, हम जिनगीकेँ जनै छी तँए जीबैक अप्पन ढंग अछि। पुतोहु जे हमरा माए तुल्य बुझती तँ हमहूँ बेटी तुल्य बुझबैन नइ तँ अपन मनक मालिक जँ छैथ तँ हमहूँ अपना मनक मालिक छी।” मुदा किछु दिनसँ रूमाक बदलल रूप सुमित्रा देखए लगली। मने-मन तारतम करए लगली जे देखबैले करै छैथ वा जिनगीमे सुधार एलैन। मुदा सुमित्राक मन पुतोहुक दोषकेँ ओते महत नै दऽ बेटाकेँ बेसी बुझैत रहैन। किएक तँ आन घरक मनुख आन घरमे आबि एते केना बढ़ि सकत। बढ़ैक तँ कारण होइ छइ। ओना,कारणो तँ अनेक होइए मुदा सभसँ महतपूर्ण कारण अछि पुरुखक दुर्बलता। जे पुरुख हाथी सन अबोध जानवरकेँ बसमे कऽ लैत, की ओकरा बुते एकटा सबोध स्त्रीकेँ मनुख बनौल नइ हेतइ..? किछु दिन पहिने तक रूमा, आँगनमे सभसँ पाछू सुति कऽ उठै छेली जे आब सभसँ पहिने उठए लगली। उठि कऽ बिनु मुँह-कान धोनहि आँगन-घर बहारि,चीनमार नीपि आ बरतन-बासन धोइ कऽ अपन क्रिया-कर्ममे लगि जाइ छैथ। तेतबे नहि, सासुकेँ माए तुल्य सेहो बुझए लगली। माने माइक प्रति पुतोहुक जे कर्तव्य होइत ओ कर्तव्य पूर्ति हेतु रूमा जे अपने बुझैत से करए लगली। जे काज नहि बुझैत ओ सासुसँ सीखि-सीखि करए लगली। ..सुमित्रो, पुतोहुक बदलैत रूप देख,बुझा-बुझा कहए लगलखिन- “कनियाँ, आइ धरिक जे अनुभव हमरा अछि ओ सीखि जिनगीमे उतारू तैसंग नैहरोसँ जे सीखि कऽ आएल छी तहूमे नीक-अधलापर नजैर रखैत विचारि-विचारि अधलाकेँ छोड़ि नीककेँ पकैड़ चलू। अखन धरिक जे परिवारक बेवहार रहल आ आइ जे समयानुकूल बदलाउ आबि रहल अछि ओइपर धियान दऽ आगू बढ़ू,तखने समैक संग चलि सकब। जे कियो ऐसँ अलग भऽ जीबए चाहत ओकरे मन सदिछन उत्तेजित रहतै आ चैन मनसँ पड़ाएल रहतै।” सासुक विचारकेँ रूमा अँगीकार करए लगली। पावैनक दिन। स्कूल बन्न। मुदा बचेलाल पहिलुका जकाँ नहि, चारि बजे उठि गेला। उठि कऽ अछेलालकेँ शोर पाड़लैन। जाबे अछेलाल आबैथ तइसँ पहिने सुमित्रो दरबज्जापर आबि गेली। तीनू गोरे गप-सप्प करए लगला। बचेलाल अछेलालकेँ पुछलकैन- “काका, आब तँ खेती-वाड़ीक काज असानीसँ करैत हएब?” बचेलालक बात सुनि अछेलाल बजला- “बौआ, ऐठामक गिरहस्तक जे रूपरेखा अछि ओ नीक कम आ अधला बेसी अछि। गिरहस्तक जिनगी आ खेतीक ढाँचा बदलैले बहुत किछु करए पड़त। जाबे से नै करब ताबे जे चाहै छी से नै हएत। ओना, हम सभ बात बुझतो नहियेँ छी। अखन तक हम बोनिहार रहलौं तँए गिरहस्ती जिनगीकेँ नीक-नहाँति केना बुझब। मुदा भौजी तँ नैहरसँ ऐठाम धरि गिरहस्ते परिवारमे रहबो केली आ बहुत दिन गिरहस्तियो केलैन तँए हिनका बेसी अनुभव छैन।” अछेलालक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचए लगली- अछेलाल तँ ठीके कहलक। मुदा हमहूँ तँ आब बुढ़ भेलौं तँए बहुत किछु बिसैरियो गेलौं किएक तँ काजो बहुत छुटि गेल आ छोड़ियो देलौं। मुदा बिनु माटिपर ठाढ़ भेने ने मनुख रस्तापर औत आ ने परिवार। जाबे मनुख जमीनपर ठाढ़ नै हएत ताबे आगू-मुहेँ केना ससरत। हँ, ई भऽ सकैए जे हवा-बिहाड़िमे उड़ि कियो बहुत आगू चलि जाए, मुदा ओ अनिश्चित जिनगी हेतइ? भऽ सकैए एक पीढ़ी बहुत आगू चलि जाएत मुदा ऐगला पीढ़ी ओइसँ आगू बढ़त कि पाछू हएत, ई कहब तँ कठिन अछि। किएक तँ जेते ऊपर जे चलि जाएत ओ ओतइ लसैक जाएत। ने ओकरा जमीन पकड़ैक बोध हेतै आ ने आगू बढ़ैक रस्ता भेटतै। किएक तँ दू विचारधारा आ दू रस्ताक संघर्ष चलैए आ आगू आरो मजगूत भऽ चलत। तँए जाधैर दुनू रस्ताकेँ बिनु बुझने जँ कियो आँखि मूनि चलए चाहत तँ ओ निश्चित लटपटेबे करत। मुदा प्रश्न अछि जहिना मनुख समैक संग चलैत आएल तहिना चलैक। जे कठिन अछि...। एते बात मनमे अबिते सुमित्रा बाजए लगली- “बौआ, कोनो परिवार ताबे तक नीक नहाँति नै चलि सकैए जाबे तक परिवारक सभ आदमी रस्ता धऽ नै चलत। अपने परिवार छह, तूँ भरि दिन अपसियाँत रहै छह मुदा पुतोहुजनी-ले धैनसन। जहिना ओ भरि दिन काजसँ छिटकैत रहै छैथ तहिना जँ तोहूँ छोड़ि दहक तखन घरक दशा की हेतह? मुदा जहिना तूँ नोकरी करि कमा अनै छह तहिना जँ ओहो घरेपर काज करैथ तँ घरक उन्नैत हेतह की नहि। तँए परिवारमे जे जेहेन रहए ओकरा ओही रूपमे मेहनत करैक चाही। परिवारक जे गारजन होथि हुनको आदमी देख काज ठाढ़ करक चाहिऐन जइसँ घरक आमदनियोँ बढ़त आ बेकारियो भागत। अहिना देखै छी बाढ़ि-रौदीक दुआरे सभ परिवार निच्चे-मुहेँ जा रहल अछि। मुदा बारह मासक सालमे चारि मास बरसातक होइए वएह चारि मास सालकेँ संचालन करैत। तज्जुब लगैए जे बरसातक चारि मास छोड़ि शेष आठ मासक कोनो महत्ते ने अछि। सभसँ दुखद बात तँ ई अछि जे ऐ आठ मास-ले गिरहस्त किछु सोचबे ने करैए। खेतीक मुख्य चीज पानि छी। जेकरा दिस लोक तकबे ने करैए। अगर खेत पटबैक उपाए लोक कऽ लिअए तँ जहिना उपजामे बढ़ोतरी हएत तहिना फसिलोमे। जखन कियो पानि-खाद आ नीक बीआ नै बुझै छल तखनो गिरहस्ती चलै छल। अपन खेत एक बध्धु छह, एकठाम नै छह मुदा थोड़े हटि-हटि कऽ तँ छेबे करह। अगर बोरिंग गड़ा पटबैक जोगार कऽ लएह तँ की बुझि पड़ै छह जे जहिना उपजा अखन खेतसँ अनै छी तहिना औत? जहिना चौबिसे घन्टाक दिन रातिमे देखै छहक जे रातिमे केहेन अन्हार रहैए आ दिन होइते केहेन इजोत भऽ जाइ छै, तहिना सभ चीजक अछि। अखन दू परानी तूँ छह आ दू परानी अछेलालो अछि। चारि गोरे तँ समकस काज करैबला छह मुदा काज केते होइ छह? ई हिसाब जोड़ि कऽ काज शुरू करए पड़तह। आ ई नहि जे अनाड़ी-धुनाड़ी जकाँ कहबह ‘कोन काज ठाढ़ करब?’ ..आँखिक सोझहामे छह जे खेतमे पानिक सुविधा बनौने, खेतमे सालो भरि फसिल लहलहेतह। खाद देबहक, नीक बीआ रहतह तँ तेते उपजा हेतह जे घरमे रखैक जगह नै रहतह। नारो-पात तेते हेतह जे दूटा चारिटा माल हराएले रहतह। माल पोसबह तँ दुघो खेबह आ बेसी हेतह तँ बेचबो करबह। जेते घरक आमदनी बढ़तह तेते ने आगू-मुहेँ ससरबह।” माइक बात सुनि बचेलालकेँ भक खुजलैन। भक खुजिते माएकेँ कहलखिन- “माए, आइ धरि ऐ दिस नजैरे ने गेल छल। मुदा आब देखै छी काज केनिहार लोक हँसी-खुशीसँ जिनगी बिता सेकैए। काका, सभसँ पहिने एकटा बोरिंग आ दमकलक जोगार करैक अछि। आइ तँ छुट्टी नइ अछि। परसू रवि छी। दुनू गोरे बजार चलि पहिने बुझि लेब। तखन जे जेना गर लागत से करब।” अछेलाल- “बौआ, बैंकोबला सभ बोरिंग दमकल दइ छइ। ओकरा साले-साल बिआज लगा रूपैआ दैत जेबै तैयो भऽ जाएत।” बचेलाल- “जखन अपने एते दरमाहा अछि तखन कर्जा किए लेब। अखन जे रूपैआ जमा छल से सठि गेल। मुदा ऐगला सोमे दिन तँ दस हजार रूपैआ भेटत। जँए एते दिन बितल तँए आठ दिन आरो बीतह। मुदा बिनु उपारजनक साधन बनौने तँ बेकारी नइ भागत।”◌ भोरे सुमित्रा उठि दलानपर आबि बाढ़ैन लऽ दरबज्जा बाहरैक ओरियान करितै रहैथ आकि अछेलालो एला। अछेलालक चुनौटीमे चुन नहि, तँए चुन लिअ एला। आन दिन अछेलाल निन टुटिते ओछाइनपर सँ उठि, लोटामे रौतुके राखल पानि लऽ दू बेर कुर्रा करै छला आ जे पानि बँचैत रहैन ओ पीब तमाकुल खा पराती गबै छला। मुदा आइ चुनक दुआरे पराती नै गाबि चुन-ले एला। आँगनसँ चुन आनि कऽ सुमित्रा देलखिन। चुन लऽ अछेलाल तमाकुल चुनबए लगला। तेही बीच दुनू गोरेमे गप-सप्प सेहो हुअ लगलैन। दुनू गोरेक गप-सप्पकेँ अकानि बचेलाल सेहो लगमे आबि कऽ ठाढ़ भेला। सुमित्रा अछेलालकेँ कहैत रहथिन- “बौआ, जहिया अपन घर भरल-पूरल छल साउसो-ससुर जीबै छला। तखन हम जुआन छेलौं। गामक चुनल गीतहारि रही। गाममे जेतए केतौ कोनो काज होइ तँ हमरा हकार अबिते छल। हमहूँ राति-दिन किछु बुझबे ने करिऐ। अपन अँगना-घरक काज सम्हारि हकार पुरए जाइ छेलौं। हमर नैहर पचही परगनामे पड़ैए। ओइठामक गीत-नाद, बोली-वाणी, चालि-ढालि अल्लापुर परगनासँ नीक अछि। मुदा अपना गाममे बेसी अल्लेपुरक सुआसिन बसैए, गोटि-पँगरा भौरो परगनाक अछि। पचही आ भौरक तँ बहुत किछु मिलबो-जुलबो करै छै मुदा अल्लापुरक दोसरे रंगक छइ। हँ, एकटा बात जरूर छै जे अल्लापुरक सुआसिन बेसी कमासुत होइए। मरदे जकाँ साड़ीक फाँड़ बान्हि लेत आ भरि-भरि दिन खेते-पथारमे काज करैत रहत। रौद-बसात किछु बुझबे ने करत। एक बेरक गप कहै छी। नैहरमे, हमरा घरे लग पण्डित कक्काक घर सेहो छैन। पण्डित काका इलाकाक सभ संस्कृत विद्यालयमे पढ़ौनी केने छला। ओ तेते निअम-निष्ठाबला छेलखिन जे कोनो विद्यालयमे शिक्षक सभसँ पटबे ने करैन। जाबे कियो टोकैन नहि ताबे ओहो केकरो नै टोकै छेलखिन आ ने बिनु काजे केकरो ऐठाम जाइ छेलखिन। ओना हुनका कखनो निचेनसँ बैसल नै देखिऐन। सदिछन कोनो-ने-कोनो काजमे लगले रहै छला। एक दिन पछबरिया इलाकाक एकटा पण्डित एलखिन। ओहो बड़ भारी पण्डित। भिनसरे दुनू गोरे पूजा-पाठ करि कऽ दू-दू छिमैर केरा खेलैन आ शास्त्रार्थ करैले बैस गेला। पण्डित काका की कहथिन आ ओ कि कहैन से आन कियो बुझबे ने करैत। गप-सप्पमे दुनू अपस्याँत। बड़ी कालक पछाइत पण्डित काका तीन बेर थुक माटिपर फेक देलखिन। ओइ पछबरिया पण्डितक मुँह कनै-कनै सन भऽ गेलैन। दुपहरमे खूब नीक नहाँति खुआ-पीआ कऽ बेरूपहरमे धोती-कुरता-चद्दैर-पाग दऽ अरियाति कऽ विदा केलखिन। ..हँ कहै छेलौं- सौंसे गाम हकार पुरै छेलौं...। जखन अपने मरि गेला तहियासँ हकार पूरब छोड़ि देलौं। अखुनका आ पहिलुका लोककेँ मिलबै छी तँ अकास-पतालक अन्तर बुझि पड़ैए। हमरे दूटा बच्चा भेल, ने एकोगो सुइआ लेलौं आ ने एकोटा गोटी खेलौं, तैयो कोनो रोग कहाँ दबलक। पहिल सन्तानक बेरमे, सासु हाटपर सँ सठौरा कीनि अनलैन, सएह खेलौं। अखन देखै छी जे हाट-बजार घुमै बेरमे, सिनेमा-सरकस देखै बेरमे, मेला-ठेला घुमै बेरमे निरोग रहैए मुदा काजक बेरमे जेते दुनियाँमे रोग छै से सभटा ओकरे दाबि दइ छइ। ..जाइ जाउ आब काजोक बेर भऽ गेल।” भिनसुरका चाह पीब, सभ दिन बचेलाल टोलक बच्चा सभकेँ पढ़बए लगला। जाबे स्कूल जाइक समए होइत ताबे धरि पढ़बैत रहथिन। केकरोसँ एक्को पाइ नै लैथ। टोलक सभ धिया-पुता पढ़ैमे सुढ़िया गेल जइसँ बचेलालक अपनो प्रतिष्ठा बढ़ए लगलैन। बचेलालक काज देख सुमित्रा मने-मन खुशी होइत रहैथ। ◌ शब्द संख्या : 3127 11. शिवकुमार आ रामनाथ फस्ट डिवीजनसँ मैट्रिक पास केलक। बिर्ड़ो जकाँ रिजल्टक प्रचार भऽ गेल मुदा ने स्कूलमे रिजल्ट आएल आ ने अपने आँखियेँ दुनूमेसँ कियो अखबारमे देखलक। ..शिवकुमार बचेलालक बेटा आ रामनाथ अछेलालक। रिजल्टक समाचार तँ सबहक कानमे पहुँच गेलै मुदा बिनु अपने देखने सोलहन्नी बिसवास केना कएल जाएत। ..शिवकुमारकेँ शोर पाड़ि बचेलाल कहलखिन- “बौआ, आन दिन तँ आठे बजे अखबार दऽ जाइ छल मुदा आइ एबे ने कएल। तँए झंझारपुर जा कऽ अखबार कीनने आबह।” दुनू गोरे–शिवकुमार आ रामनाथ साइकिलसँ झंझारपुर अखबार आनए विदा भेल। ..बचेलाल मने-मन तारतम करए लगला जे बिनु रिजल्ट निकलने लोक केना बुझलक। जे अखबारबला सभ दिन अखबार बेचए अबै छल ओकर अखबार रस्तेमे विद्यार्थियो आ गारजनो कीनि नेने हएत। तँए भरिसक अखबार नै बँचलै जे अपन गहिंकीकेँ दइत...। स्कूलमे सेहो विद्यार्थी सभ रिजल्ट देखैले पहुँचए लगल। मुदा हेडमास्टर अखबारसँ अपन रजिष्टरमे लाल रंगक पेनसँ, प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी आ तृतीय श्रेणीक चेन्ह लगा बहरामे रिजल्टक कटिंगकेँ टाँगि देलखिन। ..अछेलाल मने-मन खुशी होइत रहैथ। खुशीक कारण रहैन जे एकटा मुरुखक बेटा, जे सभ तरहेँ विपन्नताक जिनगी जीबैत आएल से पास केलक। सुमित्राक मन ऐ दुआरे खुशी जे जेकरा जन्मसँ लऽ कऽ अखन धरि सेवा केलौं ओ आइ एक सीढ़ी पार केलक। रूमा तँ खुलि कऽ नइ बजैथ मुदा मनमे अपन बेटाकेँ मैट्रिक पास केने ओते खुशी नइ होइत रहैन जेते रामनाथक पास केने दुख। रामनाथ आ शिवकुमार ओइ बुक स्टालपर पहुँचल जे अखबारक होलसेलर अछि। ओहूठाम सभ अखबार सठि गेल छेलइ। दुनू गोरे अचताइत-पचताइत बजार गेल। बजारमे एकटा दोकानमे अखबार देखलक। शिवकुमार ससैर कऽ दोकानदार लग जा बाजल- “अहाँ तँ अखबार पढ़ि लेलौं। हमरा एकर काज अछि। ऐमे मैट्रिकक रिजल्ट निकलल छै तँए हमरा दऽ दिअ। जे दाम अखबारक छै ओ हम दऽ दइ छी।” दोकानदार राजी भऽ गेला। मुदा आँखि लाल करैत बेटा कहलकैन- “दू रूपैआमे अखबार नै दियौ। आइ एकर दाम पचास रूपैआ हेतइ।” बेटाक बात सुनि पिता जवाब देलखिन- “बौआ, कमाइ-ले तँ एतेटा दोकान छहे, तखन एहेन काज किए करबह?” तरैंग कऽ बेटा कहलकैन- “बाबू, जँ अहाँ एहेन दयालु छी तँ लौका-तुम्मा लऽ कऽ वृन्दावन चलि जाउ।” ‘लौका-तुम्मा’ सुनि पिताकेँ नरसिंह तेज भऽ गेलैन। बाघ जकाँ झपटैत बेटाकेँ कहलखिन- “जिनगी भरिक कमाइक ई दोकान छी। ऐ चारि कोसीमे हमरा सभ इमानदार बनियाँ बुझैए तेकरा हम माटिमे मिला देब।” गद्दीपर सँ अखबार उठा, शिवकुमारक हाथमे दैत बजला- “बच्चा लऽ जाउ, एक्को पाइ दाम नइ लेब।” अखबार लऽ दुनू गोरे अपन-अपन रिजल्ट देखलक। रिजल्ट देख दुनूक हृदैमे खुशीक हिलकोर उठए लगलै। साइकिल पकैड़ विदा भेल। रस्तामे होइ जे हवाइ जहाज जकाँ उड़ि कऽ घर पहुँची। दुइएटा विद्यार्थीकेँ प्रथम श्रेणी भेल छेलइ..। एकटा शिक्षक अखबार नेने बचेलाल ऐठाम आबि दुनू गोरेकेँ कहैले एलखिन। ओइ शिक्षकक अपनत्व देख बचेलालक मनमे उठलैन, अखनो नीक लोकक कमी नइ अछि। मास्टर साहैब जलखै कऽ चाह पिबते रहैथ आकि दुनू विद्यार्थी आएल। दुनू गोरे गुरुदेवकेँ प्रणाम केलकैन।” सुमित्राक मन गदगद। बचेलाल लग आबि बजली- “बौआ मास्टरो साहैब छैथे। जेते बच्चाकेँ घरपर पढ़बै छह सभकेँ नोत दऽ दहक। जहिना तोहर बेटा तहिना हमरो तँ पोते छी, खुशनामामे भोज कए कऽ सभकेँ खुआबह।” बीस बरख पहिने, ग्रामीणक सहयोगसँ एकटा हाई स्कूल खुजल। तीन-चारि साल धरि मात्र दुइए साए विद्यार्थी स्कूलमे छल। शिक्षको सभ पचासे रूपैआ दरमाहापर शिक्षण करैथ। देहातमे पढ़लो-लिखलक संख्या कम्मे रहइ। मुदा सभ शिक्षकक मनमे ई धारणा बनल जे इलाकामे शिक्षाक प्रसार हुअए। तँए किछु कष्ट उठेनौं जँ स्कूल चलै तँ किए ने चलत। सभ शिक्षक अपन-अपन घरेसँ अबैत-जाइत स्कूल चलबैत रहला। लगमे स्कूल भेने शिवकुमारो आ रामनाथो नाओं लिखौलक। स्कूलक पढ़ाइयो नीक। अठमेसँ शिवकुमार फस्ट करैत आ रामनाथ सेकेण्ड। जे मैट्रिकक टेस्ट परीछा धरि करैत रहल। शिवकुमार साइंस रखने आ रामनाथ आर्ट। नवमा धरि बचेलाल दुनू गोरेकेँ घरोपर खूब मेहनत करबथिन। पढ़ैक रस्ता दुनू सीखि लेलक। हिसाबमे जेहने तेज शिवकुमार तेहने तेज भूगोलमे रामनाथ। वार्षिक परीक्षामे साए-क-साए अँक शिवकुमार हिसाबमे अनैत तहिना दू-चारि नम्बर कम रामनाथ भूगोलमे अनैत। सालमे एक्को दिन स्कूल दुनू गोरे नागा नै करैत। दुनू गोरे स्कूल जाइ काल पँच-पँचटा अंग्रेजी शब्द अपन तरहत्थीमे लिखि रटैत जाइत। स्कूल पहुँचैत-पहुँचैत दुनू, दुनूकेँ सुना दइत। स्कूल लग पहुँच दुनू गोरे अपन तरहत्थी कलपर जा घोइ लइत। फेर छुट्टी भेलापर पँच-पँचटा शब्द लिखि घरपर अबैत-अबैत यादि कऽ लइत। ओना तँ जाड़क मासमे दिनो छोट होइत मुदा जाड़क कारणे विद्यार्थी बिलम्मोसँ स्कूल पहुँचैत तैयो हेडमास्टर साहैब, समैकेँ बुझि हाजरी बना दइ छेलखिन। ई सोचि जे कनी बिलम्मोसँ तँ विद्यार्थी स्कूल अबैए, तँए विद्यार्थीक बीच काफी प्रतिष्ठा रहैन। शिक्षको सभकेँ ओ बरबैर कहैत रहै छेलखिन- ‘पढ़बैसँ बेसी छात्रमे पढ़ैक जिज्ञासा पैदा करू। जइ छात्रमे पढ़ैक जिज्ञासा जगि जाएत ओ निश्चित पढ़बे करत। जइसँ हमरो-अहाँकेँ पढ़बैमे सहोलियत हएत।’ ..जइ विद्यार्थीकेँ किताब नै रहै वा देहपर मैल-कुचैल कपड़ा देखथिन, ओकरा ऑफिसमे बजा परिवारक दशा पुछि, मदैत सेहो करै छेलखिन। ओना हेडमास्टर सुखी सम्पन्न परिवारक मुदा जहिना गरीबो मनुखक देहमे धनिकक बुधि धोंसिया जाइत तहिना हुनका सुभ्यस्त रहनौं गरीबक दया देहमे घोंसियाएल रहैन। स्कूलमे रिजल्टक कॉपी आ मार्कसीट आबि गेल। सभ विद्यार्थी अपन-अपन मार्क-सीट आनए स्कूल जाए लगल। शिवकुमारो आ रामनाथो गेल। दुनू गोरेक नम्बर, एक टकसँ हेडमास्टर देख दुनू गोरेकेँ पुछलखिन- “बौआ, आगू नाओं लिखेबह किने। अगर जँ कोनो दिक्कत हुअ तँ कहिहह। अखन मार्कसीट नेने जा काल्हि दुनू गोरे अपन-अपन पिताकेँ बजेने अबिहौन।” दुनू गोरे अपन-अपन अंक पत्र लऽ विदा भेल। हेडमास्टर–दिनेशबाबूक योगदान स्कूल बनबैमे अग्रगण्य छेलैन। ओ अपनाकेँ सिरिफ शिक्षके नै बुझैथ। आजुक शिक्षक जकाँ सदिछन दरमहेपर गिद्ध-दृष्टि नै राखैथ। ओ सोचैथ जे जहिना अपन बेटा-बेटी तहिना छात्र-छात्रा। माए-बाप बेटा-बेटीकेँ जन्म दैत, पालैत-पोसैत मुदा गुरु तँ ओ ब्रह्मस्वरूप कुम्हार छैथ जे मनुखकेँ चाकपर गढ़ैत। अपन परिवारोसँ दिनेशबाबू बेहद खुशी रहै छैथ। दिनेशबाबूक पिता लोअर प्राइमरी स्कूलक शिक्षक छेलखिन। हुनकेँ पढ़ौल आ रस्ता देखौल दिनेशबाबू। जइसँ बी.ए. पास कऽ हाइ स्कलमे शिक्षक बनला। जखन दिनेशबाबूक बेटा–शुशील सेहो एम.ए. पास कऽ कौलेजमे प्राध्यापक भेलखिन, तखन दुनू परानीक हृदए ओहन सरोवर जकाँ बनि गेलैन जइमे हजारो कमल फुलाइत रहैए आ रंग-बिरंगक चिड़ै-चुनमुनी ओइमे विहार करैत रहैए। जहियासँ दिनेशबाबूक बेटा सुनील नोकरी शुरू केलैन तहिए-सँ ओ अपन दरमाहा गरीब विद्यार्थीकेँ देमए लगलखिन। बचेलाल आ अछेलाल दुनू गोरे दिनेशबाबूसँ भेँट करए विदा भेला। दुनू गोरे शिवकुमारो आ रामनाथोकेँ संग कऽ लेलैन। दिनेशबाबू सेहो दुनू गोरेक प्रतीक्षेमे रहैथ। दुनू गोरे दिनेशबाबूकेँ प्रणाम कऽ आफिसमे बैसला। बचेलाल पुछलखिन- “शिवकुमार आ रामनाथक माध्यमसँ अपने बजेलौं?” दिनेशबाबू- “हँ। बजबैक कारण अछि जे दुनू विद्यार्थी पढ़ैबला अछि तँए दुनूकेँ नाओं बढ़ियाँ कौलेजमे लिखा दियौ।” “विचार अपनो अछि। स्कूलक सभ कागजात भेटलापर जेते जल्दी भऽ सकत ओते जल्दी नाओं लिखा देबइ।” “स्कूलक सभ कागजात आइए दऽ दइ छी। जँ सम्हैर जाए तँ काल्हिए नाओं लिखा दियौ, नइ तँ परसू।” “हमहूँ तँ प्राइमरी स्कूलमे काज करै छी। काल्हि जा कऽ परसूका छुट्टी लऽ लेब आ परसू जा कऽ नाओं लिखा आएब।” दिनेशबाबू किरानीकेँ बजा सभ काज कऽ देलखिन। सभ कियो विदा भऽ गेला। दोसर दिन बचेलाल स्कूल जा छुट्टीक आवेदन दऽ एला। साँझू-पहर सुमित्राकेँ कहलखिन- “माए, काल्हि शिवकुमारो आ रामनाथोक नाओं लिखबैले मधुबनी जाएब।” कौलेजमे पोताक नाओं लिखाएब सुनि सुमित्रा कहए लगली- “बच्चा, शिवकुमार तोहर बेटा छिअ मुदा पोता तँ हमरो छी। रामनाथोकेँ जनमेसँ सेवा करैत एलौं तँए ओकरो मदैत करब उचित भऽ जाइ छह। वेचारा अछेलाल मुरुख अछि मुदा समांग जकाँ तँ ओहो अछि। जब तूँ मैट्रिक पास केलह तब हमरो मनमे छेलए जे तोरा कौलेजमे नाओं लिखा दिअ। मुदा घरक जरजर हालत देख मनक बात मनेमे रहि गेल। ओना तइले बहुत दुखो ने भेल। किएक तँ दुख तखन होइत जखन पिता हाइ स्कूल धरि पढ़ने रहितथुन। हम अबला रहितो बहुत केलियह। मुदा आइ तोरा-ले अनिवार्य भऽ जाइ छह जे कम-सँ-कम बी.ए. तक बेटाकेँ पढ़ा दहक। ओना रामनाथ-ले से भार नै छह मुदा ओकरो तँ बेटे बनौने छी। काल्हि जखन मधुबनी जेबह तँ अछेलालोकेँ संग कऽ लिहह। किएक तँ एहेन-एहेन काज लोककेँ जिनगी भरि मन रहै छै जे सिरिफ अछेलालेटाकेँ नै रामनाथोकेँ मन रहतै।” निर्मलीसँ जयनगर जाइवाली गाड़ी पाँचे बजे निर्मलीसँ खुजैए तँए अपन स्टेशन–तमुरिया साढ़े पाँच तक पहुँच जाइक अछि। ई बात बचेलाल मने-मन सोचैत रहैथ। साढ़े नअ बजे मधुबनी गाड़ी पहुँच जाइए। दस बजे कौलेजक ऑफिसो खुजैत हएत तँए दस बजे ऑफिस पहुँच शुरूहेमे अपन काज केलासँ साढ़े तीन बजे धरि स्टेशन चलि आएब। जइसँ वएह गाड़ी, जयनगर-निर्मलीवाली फेर पकैड़ लेब आ सबेर-सकाल घरपर चलि आएब। जाइ कालमे गाड़ीसँ उतैर टीशने कातक होटलमे सभ खा लेब आ रिक्शा पकैड़ चलि जाएब। ई बात बचेलाल विद्यार्थियो आ अछेलालोकेँ कहि देलखिन। साढ़े चारिए बजे बचेलाल उठि तीनू गोरेकेँ उठा देलखिन। पर-पैखानासँ आबि स्नानो कऽ लेलैन। अछेलालो तैयार भऽ गेला। एमहर शिवकुमारो आ रामनाथो नहा कऽ तैयार भऽ गेल। पौने पाँच बजे गाड़ी पकड़ैले चारू गोरे विदा भेला। छअ बजे गाड़ी तमुरिया पहुँच गेल। चारू गोरेक टिकट शिवकुमार कटा नेने छल। सभ कियो गाड़ीमे बैस गेला। बचेलाल छोड़ि कियो ने मधुबनी देखने। तँए तीनूक मनमे रंग-बिरंगक बात अबै छल। मने-मन बचेलाल अपन काजक हिसाब जोड़ैथ जे कोन काज पहिने आ कोन काज पाछू करब। ..तहिना अछेलालो मनमे उठैत रहैन जे गाममे झगड़ा-झंझट कऽ मधुबनीए आबि लोक केस-फौदारी लड़ैए। आइ हमहूँ कोट-कचहरी देख लेब, जहलो देखबै जे केहेन होइ छइ। फेर कहिया जाएब कहिया नहि तँए जब मधबन्नी जाइए रहल छी तँ सभ देखने आएब। साढ़े नअ बजे गाड़ी मधुबनी पहुँच गेल। गाड़ीसँ उतैर चारू गोरे विदा भेला। टीशने कातक होटलमे चारू गोरे खेनाइ खेलैन आ थोड़े कालक पछाइत रिक्शा पकैड़ आर.के. कौलेज विदा भेला। ऑफिस जा अपन सभ कागज-पत्र किरानीकेँ देलखिन। सभ कागज-पत्र देख किरानी लगले नाओं लिखि रसीद दऽ देलकैन। बचेलाल रूपैआ निकालि दऽ देलखिन। किताबक सूची दैत किरानी कहलकैन जे पनरह तारीखसँ पढ़ौनी चलत। एगारहे बजे सभ कौलेजसँ विदा भऽ गेला। बजार आबि किताबक दोकानपर पहुँचला। दोकानपर जाइते किताबक सूची दोकानदारकेँ दऽ सभ किताब दिअ कहलखिन। बचेलालकेँ दोकानक भीतरे बैसा दोकानदार एक-एक विषयक तीन-तीन-चरि-चरि लेखकक किताब निकालि आगूमे देमए लगलैन। मने-मन बचेलाल सोचैथ, ओते तँ समए नइ अछि जे पढ़ि-पढ़ि कऽ किताब चुनब तँए सभ किताबक संस्करण देख-देख छँटियबए लगला। जइ विषयक दूटा किताब पसिन होनि ओ दुनू लऽ लैथ। कोर्सक किताब कीनि एकटा हिन्दी शब्दकोष आ एकटा अंग्रजी शब्दकोष सेहो कीनलैन। सभ विषय-ले कॉपी सेहो कीनलैन। बचेलालक विचार देख दोकानदार मने-मन खुशी होइत। ओ नोकरकेँ चाह-पान अनैले पठौलक। चाह पीबैत बचेलालकेँ दोकानदार पुछलकैन- “अपनेक की जीविका अछि?” मने-मन बचेलाल सोचए लगला जे हमरा जीविकासँ दोकानदारकेँ कोन मतलब छइ। मुदा जब पुछलक तँ नहियोँ कहब नीक नहि। मुस्कियाइत बचेलाल बजला- “लोअर प्राइमरी स्कूलमे शिक्षक छी।” शिक्षकक नाओं सुनि दोकानदार एकटा `अष्टावक्र गीता' ओहिना दैत कहलकैन- “जहिया मधुबनी आबी तहिया हमरो भेँट जरूर दी।” ‘बड़बढ़ियाँ।’ कहि बचेलाल किताबक दाम दऽ चारू गोरे विदा भेला। किताबक एकटा थाक शिवकुमारक हाथमे आ एकटा रामनाथक हाथमे आ अखबारमे चौपेत कऽ बान्हल गीता बचेलालक हाथमे। बचेलालक मनमे उठलैन जे जखन आएले छी आ अढ़ाइ-तीन घन्टा समैयो ऐछे तँ डेरो किए ने ठीक काइए ली। अखन अपनो छी। जँ डेरा ठीक भेल रहत तँ फेर नइ आबए पड़त। नवका-नवका, मोट-मोट किताब देख शिवकुमार मने-मन सोचैत जे सभ विषयक कॉपियो भाइए गेल, खूब मेहनतसँ पढ़ब। दस-दसटा अंग्रेजी आ हिन्दी शब्द सभ दिन रटब। ओना सभ विषयक अपन-अपन शब्द होइ छै ओहो यादि करए पड़त। जाबे कौलेज खुजत ताबे सएह सभ शब्द सीखि लेब जइसँ क्लासमे बुझैमे परेशानी नै हएत। सभ विषय पढ़ैले समए बाँटि लेब नइ तँ एकभग्गू पढ़ब भऽ जाएत। महत तँ सभ विषयक छै आ पासो तँ सभमे करए पड़त, तखने ने पासो हएब। नइ तँ कोनो विषयमे खूब नम्बर औत आ कोनोमे फेल भऽ जाएब तँए पहिने सभ विषयक तैयारी ओइ रूपे करए पड़त जे पास नम्बर सभ विषयमे आबए। तखन ने बेसी नम्बर आ नीक डिवीजन औत...। रामनाथ व्याकरणक किताब खोलि कऽ दोकानेपर देखने छल। जइमे वएह सभ देखलक जे हाइयो स्कूलमे पढ़ने छल, थोड़े विस्तारसँ अछि, तँए कम्मे नव चीज पढ़ए पड़त। तँए मने-मन खुशी होइत। चारू गोरे आगू-पाछू स्टेशन दिस अबै छला आकि एक गोरे आगूमे साइकिल रोकि बचेलालकेँ प्रणाम केलकैन। मुड़ी निच्चाँ केने बचेलाल चलैत रहैथ। प्रणाम सुनि मुँह उठा कऽ दुनू हाथ जोड़ि प्रणामक जवाब देलखिन। प्रणामक जवाब तँ दऽ देलखिन मुदा चिन्हलखिन नहि। तँए ओइ आदमी दिस तकैत जेना किछु मन पाड़ए लगला। ओ आदमी बुझि गेल जे भरिसक नै चिन्हलैन। धाँइ-दे ओ कहलकैन- “मास्सैब, हम रमेसरा छी। ऐठाम कोओपरेटिव बैंकमे नोकरी करै छी।” रमेसराक बात सुनिते बचेलालकेँ धक-दे मन पड़लैन जे ई तँ पढ़ौल विद्यार्थी छी। मुस्कियाइत बजला- “बौआ, चेहरा देख तोरा चिन्हबे ने केलियह। एक चेराक देह छेलह जे अखन हाथी जकाँ भऽ गेलह। परिवारो एतै रखै छह?” बिहुँसैत रमेसरा कहलकैन- “अपन घर बना नेने छी। आइ एतै पहुँनाइ करए पड़त। हमर सौभाग्य जे अहाँ एतए आएल छी। हमहूँ गाम कम्मे जाइ छी। तोहूमे धड़फड़ाएल गेलौं आ धड़फड़ाएले एलौं। तँए किनको भेँटो-घाँट करए नै जा होइए।” बचेलाल- “बाल-बच्चा कएटा छह?” रमेसरा- “दूटा अछि। दू परानी अपने छी। चारि गोरेक परिवार अछि। अपने केमहर-केमहर आएल छलिऐ?” “दुनू बच्चाकेँ कौलेजमे नाओं लिखबए आएल छेलौं। आब रहैले डेराक भाँज लगबैक अछि।” जँ नजैरपर केतौ एकान्त डेरा बुझल हुअ तँ ठीक कऽ दएह।” जखन हम ऐठाम रहै छी तखन अपनेकेँ डेरा नै हएत। पहिने चाह पीब लेल जाउ। तखन आगूक गप-सप्प हेतइ।” रमेसरा एकटा होटलमे सभकेँ लऽ गेलैन। सभकेँ जलखै करा चाह पिऔलकैन। पान खुऔलकैन। पाँचो गोरे रेलबे स्टेशन दिस विदा भेला। मुसाफिरखाना आबि रमेसराकेँ बचेलाल कहलखिन- “अखन बैंकक समए अछि, तूँ जाह?” “मास्सैब, आब बैंक नहियोँ जाएब तैयो ने किछु हएत। बैंके काजसँ एक गोरे ऐठाम नोटिश दइले गेल छेलौं, तँए अखन बाहरेक काजमे छी। काल्हिए जवाब देबइ।” “अखन गाड़ी अबैमे देरी अछि। ताबे डेराक भाँज लगा दएह। अच्छा एकटा बात कहह जे होस्टल नीक हएत कि लाउज?” मास्सैब, ने होस्टल नीक हएत आ ने लाउज। मधुबनीक हवा एहेन अछि जे विद्यार्थी सभ पढ़नाइ छोड़ि-छोड़ि भरि दिन जातिवादी गुट बना-बना झंझटे-फसादमे रहैए। पढ़ैबला विद्यार्थी अपन-अपन अंगीतक ऐठाम रहि-रहि पढ़ैए। हमरो डेरामे चारिटा कोठरी अछि। तीनियेँ कोठरीसँ अपन काज चलि जाइए। एकटा कोठरी पड़ले रहैए।” “भाड़ा केना की लेबहक?” मुस्कियाइत रमेसरा कहलकैन- “अपनेसँ भाड़ा नइ लेब। अहींक परसादे हम नोकरी करै छी। अहाँक विद्यार्थी तँ हमरो भैयारीए भेला किने?” “दस-पाँच दिनक बात रहैत तँ ठीक छल मुदा से तँ नइ अछि।” “भाड़ाक सम्बन्ध मे हम किछु ने कहब। एते जरूर कहब जे दुनू बच्चाकेँ रहैले डेरा जरूर देब।” असमंजसमे पड़ल बचेलाल अछेलालकेँ कहलखिन- “काका, अहीं भाड़ा कहियौ?” धड़फड़ा कऽ अछेलाल पचास रूपैआ महिना कहि देलकैन। दुनू गोरे सहमत भऽ गेला। सहमत होइत बचेलाल रमेसराकेँ पुछलखिन- “खाइ-पीबैक जोगार केना हेतइ?” “चाउर-दालि गामसँ पठा देबइ। अपनो परिवारमे खेनाइ बनिते अछि, ईहो दुनू गोरे ओहीमे खेता।” “चाउर-दालिक अतिरिक्तो तँ नून-तेल-तीमन-तरकारीमे खर्च हएत। तइले साए रूपैआ महिना सेहो देबह।” “बड़बढ़ियाँ।” सभ जोगार लगि गेलैन। बचेलाल अछेलालकेँ कहलखिन- “काका अहाँ सभ जा कऽ डेरा देख लियौ। हम एत्तै अराम करै छी।” तीनू गोरेकेँ संग केने रमेसरा विदा भेल। स्टेशनक पूबारि भाग– चकदहमे रमेसराक घर। एकान्त जगह। सभ कियो डेरा देख लगले घुमि कऽ आबि गेला। गाड़ीक टिकट कटौलैन। थोड़े कालक पछाइत गाड़ी आएल। चारू गोरे गोसाँइ उगले अपना स्टेशन पहुँच गेला। तमुरियासँ गाम अबैक रस्तामे अछेलाल बचेलालकेँ कहलखिन- “बौआ, औझुका दिन बड़ सगुनिया छल।” बचेलाल- “से की?” “एक्के दिनमे केते काज भेल। हमरा तँ होइ छल जे कए दिन लगत कएक दिन-ने। जाइए कालमे हमरा होइ छल जे धोती, चद्दैर लऽ लइले कही, मुदा नै कहलौं।” “काका, काज करैक ढंग होइ छइ। ओना संयोगो होइ छइ। जेकरा काज करैक ढंग रहै छै ओ कम्मे समैमे बहुत काज कऽ लइए। आ जेकरा ढंग नै होइ छै ओकरा कम्मो काजमे बेसी समए लगै छइ। संयोग ऐ दुआरे कहलौं जे जेना कौलेज गेलौं आ किरानीए नै रहैत। चाहे किरानियोँ रहैत आ कोनो कागजे नै रहितै। चाहे जेबा कालमे गाड़ीए छुटि जाइत। इहए सभ कुसंयोग छिऐ।” शिवकुमारक आ रामनाथक मन चटपट करैत जे कखन घरपर पहुँच किताब देखब। रामनाथ अखबारक विशेषांक सभ गत्ता लगबैले रखने छल। किएक तँ बिनु गत्ता लगौल किताबक ऊपरका पन्ना गन्दो भऽ जाइ छै आ ओदरबोक डर रहै छइ। स्टेशनसँ घरक दूरी चारिए किलोमीटर, तँए अबैमे बेसी देरियो नइ लगलैन। तहूमे घरमुहाँ पहर। घरपर अबिते शिवकुमार हाथ-पएर धोइ, अँगा निकालि दलानक चौकीपर बैस दादीकेँ शोर पाड़लक। दादीकेँ अबिते किताब सभ देखबए लगल। किताब देख सुमित्रा कहलखिन- “बौआ मन लगा कऽ पढ़िहह। औझुका दिन तोरा जिनगीक एकटा चौबट्टीपर पहुँचा देलकह। ऐठामसँ जिनगीक आगूक रस्ता खुलतह। अखन, ने तोरा कोनो घरक भार छह आ ने आन कोनो। मात्र पढ़ैक छह। अखन जेते मेहनत कऽ कऽ पढ़बह ओते अपने गुण करतह। मैट्रिक धरि बापो पढ़ल छथुन, तँए ओते धरि सरस्वतीक बास घरमे भऽ गेल छह। आब आगू केना रहथुन ई तँ तोरेपर छह। भगवान केकरो अधला थोड़े करै छथिन, ओ तँ सभकेँ नीके करै छथिन। तोरे अधला किए करथुन। रामनाथोकेँ अपन सहोदरे भाए जकाँ बुझिहक।” शिवकुमारकेँ सुमित्रा बुझैबते छेली आकि अछेलालो एला। अबिते सुमित्राकेँ कहए लगलैन- “भौजी, एते उमेर बित गेल मुदा आइ मधमन्नी देखलौं। बाप रे! बड़ीटा बजार छइ। बड़का-बड़का दोकानो सभ छइ। जाइ कालमे तँ नीक-नाहाँति नै देखलिऐ किए तँ रिक्शापर चढ़ल रही। मुदा अबै कालमे देखलिऐ। बड़कीटा कौलेज छइ। मारे मास्टर आ मारे चटिया देखलिऐ। बचेलाल दुनू गोरेकेँ नाओं लिखबैत रहए आ हम घुमि-घुमि देखबे करी। बड़का-बड़का कोठा। एकटा घरमे मारे साइकिल देखलिऐ। ओते गनलो ने होइत। एक गोरे ओइ ठीन बैठल रहै ओ हमरा कहलक-‘भायजी, तमाकुल खाइ छी।’ ..हमहूँ बुझलौं जे किए ने तमाकुले लाथे किछु बुझियो ली। हम कहलिऐ- ‘हँ।’ ..ससैर कऽ ओकरा लग गेलौं। मुदा वेचाराकेँ एक्केटा कुरसी रहै, जैपर उ बैठल रहए। हम बगलेमे ईंटा-सिमटीक बनौल कम्मे खड़ा देवाल रहै ओहीपर बैसलौं। दुनू गोरे गप-सप्प करए लगलौं। ओ कहलक- ‘अपना जिलाक सभ गामक विद्यार्थी ऐ कौलेजमे पढ़ैए।’ ..एह! केते कहब भौजी, ओते कि मनो अछि।” ◌ शब्द संख्या : 2834 12. विकासपुर एला देवनकेँ साल लगि गेल। साल भरिक समैयो नीक रहलै। ने बेसी बरखा भेल आ ने कम। जँ बेसी बरखा होइत तँ दहार आ जँ नहियेँ होइत तँ रौदी। एहेन समए गोटे-गोटे साल संयोगसँ होइए। किएक तँ अखन धरिक जे समए होइत आएल अछि ओ अहिना होइत आएल अछि। गोटे साल बेसी बरखा भेल तँ गोटे साल जरूरतसँ कम। समए नीक भेने उपजो नीक भेलै तँए सबहक मन हरिअर। चारिए मास–अखाढ़सँ लऽ कऽ आसिन धरि, सालक ताला-कुञ्जी रखैत। मुदा आठ मास–कातिकसँ लऽ कऽ जेठ–धरिक कोनो मोजरे ने होइत। यएह, अपन मिथिलाक किसानक इतिहास रहल। ..सालो भरि देवन नसीवलाल काकासँ खेतीक लूरि सीखि-सीखि खेती करैत रहल। देवनकेँ नसीवलाल काका खेतीक लूरियो सीखबैत रहलखिन आ बीओ-बाइल दैत रहलखिन। नसीवलाल कक्काक बतौल रस्ता आ मदैतसँ बुधनीक टुटल मन जागृत भऽ ऐगला सालमे हँसी-खुशीसँ प्रवेश केलक। एक मनसँ ऊपरे टुकला बीछि कऽ बुधनी आमील बनौने छेली जे बहरबैया वेपारी हाथे पाँच रूपैए सेर बेचलैन। दू साए रूपैआ भेलैन। जइसँ तीनू गोरेकेँ माने बुधनी, देवन आ रमुआकेँ नुआ-वस्तर भऽ गेल। दुनू आमोक गाछमे तेते आम भेलै जे माइर-धुइस कऽ खेबो केलक आ तीन साए रूपैआक बेचबो केलक। पनरह सेर अम्मटो बेचलक। पाँच सेर अपनो लऽ रखलक। जे कहियो काल खेबो करब आ मातृनवमी, जितिया-ले रखबो करब। आमक आँठी फकुआ बनबैले दुनू घरक चारपर अदहा फेकलक आ अदहा गाछ जनमइले बाड़ीमे जमा केलक। जखन पिपहीमे हरिअरी धेलकै कि सभकेँ उखाड़ि-उखाड़ि बाड़ीमे एक-एक हाथपर रोपि देलक। आठे-नअ मासमे डेढ़-दू हाथक गाछ भऽ गेलइ। बैशाखमे माटियो सक्कत भेलै आ गाछ रोपैक समैयो आबि गेल। सभ गाछक थल्ला काटि-काटि देवनो आ बुधनियोँ उखाड़ि लेलैन। धानक नारक खोंचैढ़ बना सभ थल्लाकेँ बान्हि लेलक। मधुबनीक एकटा वेपारी जे नर्सरी खोलने अछि, आबि पँच-पँच रूपैए छबो साए गाछ कीनि लेलकैन। तीन हजार रूपैआ एक्केठाम भऽ गेल। अपनो-ले देवन दसटा गाछ रोपि लेलक। मोटगर आमदनी देख बुधनी देवनकेँ कहलखिन- “बौआ, चरि-कठबा खेतमे चापाकल गड़ा लएह। ओइ दिन तूँ बजलो रहह जे नसीवलाल काका कहलैन जे कम्मो खेत किए ने हुअए मुदा पानिक जोगार भेने खेतक हस्तियो बढ़ि जाइ छै आ उपजो।” घरक छप्परपर जे आमक आँठी फेकने रहए ओ सूखि गेल। कातिकमे सभ आँठीकेँ उतारि लेलक। दुनू गोरे सभटा आँठीकेँ सिलौटपर लोढ़ीसँ फोरि फकुआकेँ एक भाग रखलक आ बखलोइयाकेँ दोसर भाग। बखलोइयाकेँ चुल्हिमे जरा लेलक आ फकुआकेँ जत्तामे पीसि चिक्कस बना रोटी पका कऽ खाइले रखि लेलक। थोड़े फकुआकेँ देवन फोरि-फोरि सुपारी टूक जकाँ बना मलसीमे रखि लेलक। जखन-जखन काज करए जाइत तँ पान-सातटा टुक डाँरमे खोंसि कऽ नेने जाइत आ सुपारीए जकाँ खाइत। बारहे साएमे कल गड़ा गेल। अठारह साए रूपैआ बँचिये गेलैन। ओइ अठारह साएमे सँ, चारि साए रूपैए कट्ठा चारि कट्ठा खेत अपने खेतक आड़िमे कीनि लेलैन। डेढ़ साए रूपैआ रजिष्ट्रीमे खर्च भेलैन। कल गड़ौलासँ आठ कट्ठा खेतमे धान पटबैक ओरियान भऽ गेलइ। अखाढ़मे बुधनी अपन पनरहो कट्ठा खेत रोपने छेली। ओना खेतमे जोत-कोर तेनाहे सन भेल रहै मुदा तैयो बीआ आ समैक परसादे डेढ़ मोनक कट्ठा धान भेलैन। जँ खेतमे नीक-जकाँ जोत-कोर, ढकिया-पथिया आ खाद पड़ल रहैत तँ दोबरोसँ बेसी धान होइत मुदा से नै भेल। साढ़े बाइस मन धान देख बुधनीक मनमे जीबैक आशा जागि गेलैन। पतिक मुइने बुधनीकेँ जीबैक आशा टुटि गेल छल। अगर बेटा नै रहितै तँ वेचारी या तँ जहर-माहूर खा मरि गेल रहैत वा चुमौन कऽ दोसर घर चलि गेल रहैत। मुदा खेतक उपजा आ अपन मेहनतक हूबासँ जीबैक भरपुर आशा बुधनीक मनमे जगि गेलैन। बरसात खतम भऽ गेल। धानो सभ आसिने-कातिकमे कटि गेल। देवनकेँ नसीवलाल काका कहि देने रहथिन जे कम खेतबलाकेँ तरकारी खेती जरूर करक चाही। एगारह कट्ठामे गहुम बाउग केलक आ चारि कट्ठामे तरकारी-खेती। एगारहो कट्ठामे गहुमक गाछ तँ नीक जनमलै मुदा पटबैक कोनो आशा रहबे ने करइ। जइ बाधमे बुधनीक खेत ओइ बाधमे एक्केटा बोरिंग जे बुधनीक खेतसँ बहुत हटि कऽ अछि। ने नाला ने पाइप। पटबैले देवन औना-पौना कऽ रहि गेल मुदा नहियेँ पटलै। संयोगसँ पूसमे एकटा बरखा भेल। बर्खाक पानि पिबते गहुमक गाछ हुहुआ कऽ उठलै। बियानो खूब केलकै। ओसो खूब गिरइ, तँए हाल बेसी दिन धरि धेने रहलै। ओही हालपर गहुम गम्हरा गेल। गहुमक गम्हरा देख बुधनीकेँ मनमे आशा जगलैन। पटौलहा गहुम जकाँ तँ नहियेँ भेलैन मुदा तैयो एक-तरहक भेलैन। हरा-हरी पान-छह पसेरी कट्ठा गहुम उपजल। सभटा मिला कऽ साढ़े छह मन गहुम भेलइ। नसीवलाल काका देवनकेँ कहने रहथिन जे चैतक-अन्हरियामे बाउग खेरही बढ़ियाँ होइ छै तँए चारिए दिनमे दुनू गोरे एगारहो कट्ठाकेँ तामि-कोरि खेरही बाउग कऽ लेलक। अदहा जेठमे खेरही पाकए लगल। दुनू गोरे–बुधनी आ देवन, खेरही बिछ-बिछ तोड़ए लगल। अन्तिम जेठ धरि सभटा खेरही तैयार कऽ लेलक। तरकारी खेती-ले जे चारि कट्ठा रखने रहए, ओइ खेतक धान कटिते, तैयार करए लगल। अदहा कातिक अबैत-अबैत खेत तैयार कऽ लेलक। नसीवलाल काका देवनकेँ कहने रहथिन जे तरकारी उपजबैले पानिक ओरियान करए पड़त। जेकरा पोखैर छै ओ पोखैरसँ पटबैए आ जेकरा बोरिंग छै ओ बोरिंगसँ पटबैए। मुदा जेकरा ने पोखैर छै आ ने बोरिंग आ ने चापाकल ओ की करत? मुदा नसीवलाल काकाकेँ अपन जिनगीक अनुभव छेलैन, ओ देवनकेँ कहने रहथिन जे चारि कट्ठामे जँ दूटा कूप खुइन ली आ गर लगा कऽ खेती करी तँ काज चलि सकैए। खेत तैयार कऽ देवन दूटा कूप, खेतक दूटा कोणपर खुइन लेलक। कुपो खुनैमे देवनकेँ बेसी भीर नहियेँ भेल। दुइए दिनमे एकटा कूप खुइन लिअए। छबे-साते हाथ खुनलासँ पानि छुटि जाइ। मुदा सभसँ कठिन बात ई अछि जे तरकारीमे तँ एक्के रंग पटौनियोँ नै लगैत। किछु चीजक खेतीमे बेसी पटौनी लगैत आ किछुमे कम। बोरिंग जकाँ तँ पानियोँ कूपमे नहियेँ होएत मुदा दुनू बेर-भिनसर आ साँझ-मिला कऽ दस धूर तक खेत जरूर पटि जाइत। दुनू कूपमे बाँसक खुट्टा गाड़ि दूटा ढेकुल गाड़ि पटबैक ओरियान देवन कऽ नेने रहए। तरकारी खेती देवन दू हिसाबसँ केलक। पहिल अपन परिवार-ले आ दोसर आमदनी-ले। गिरहस्त-ले कातिक धरम मास होइत किएक तँ जेते रंगक अन, जेते रंगक तरकारी आ जेते रंगक फलक खेती कातिकमे लगौल जाइत, ओते सालक कोनो मासमे नै लगौल जाइए। मसल्लोक खेती करैक मुख्य मास कातिके छी। परिवारमे सभ कथुक जरूरत होइत जेना- अन, तीमन, तरकारी, फल, मसल्ला इत्यादि। ..नोकरिया वा वेपारीक परिवार तँ पाइ कमाइत आ सभ चीज कीनि-बेसाहि कऽ काज चला लइत। मुदा किसान जँ नै करत तँ ओ औत केतएसँ। ई सोचि देवन सभ वस्तुक खेती करैक विचार केलक। जे किसान जेते नमहर अछि ओ ओते बेसी करैत आ जे जेते छोट अछि ओ ओते कम करैत। संगे जइ किसानकेँ बेसी खेते छै आ अपने नोकरी करैए वा खेते छै मुदा ने पानिक जोगार छै आ ने होशगर अछि ओ तँ पछुएबे करत। मुदा जे किसान लूरिगर आ हिम्मतगर अछि जँ ओकरा अपन साधनक, कमियो छै तैयो ओ आगू बढ़िए जाइए किएक तँ अपना इलाकाक सौभाग्य रहल जे पोखैरकेँ धर्मक वस्तु मानल गेल आ एहेन-एहेन धरमात्मा सभ भऽ चुकल छैथ जे गाहीक-गाही पोखैर खुनौने छैथ। एहनो-एहनो गाम सभ अछि जइमे अठारह गण्डासँ ऊपरे पोखैर अछि। तेतबे नहि, उत्तरसँ दच्छिन-मुहेँ दरजनो नदी बहि रहल अछि। तेतबे नहि, गामो सबहक जे बनाबट अछि जइमे एक-चौथाइसँ लऽ कऽ तीन चौथाइ धरि गहींर खेत अछि माने चौरी खेत, जे अपना पेटमे जेठ-अखाढ़ धरि पानि भरने रहैए। तैपर सँ बोरिंग, नहर वा आन-आन सेहो साधन मौजूद अछि। तहिना माटिक आछि। दुनियाँमे जेते किस्मक नीक माटि अछि ओ मिथिलाक धरोहर छी। इन्द्रो भगवान कहियो काल खिसिआइ छैथ, बेसी काल खुशीए रहै छैथ। जीव-जन्तु आ चिड़ै-चुनमुनी ऐ रूपे भरल अछि जे सदिछन मनुखक सेवा लेल तैयार अछि, सतत् धरती माताक गोदमे रहि रक्षा करैए। नसीवलाल कक्काक विचारकेँ मनमे अरोपि देवन तरकारी खेतीमे जी-जानसँ लागि गेल। अपन परिवार-ले एक कट्ठामे तीमन-तरकारी आ साग लगौलक, जेना- मुरै, गाजर, कोबी, अल्लू, मटर, टमाटर आ ठढ़िया, पालक, लफ इत्यादि लगौने रहए। तहिना दस धूरमे मसल्ला-ले सेरसो, धनियाँ, लसुन, जमाइन, मेथी मिरचाय आ पिऔज सेहो लगौने रहए। आमदनी-ले- कोबी, टमाटर अल्लू फुट्टे लगौने। ..फागुन अबैत-अबैत बन्धा कोबी आ टमाटर छोड़ि सभ कटि गेल। ओना टमाटर माघेसँ तोड़ब शुरू केने रहए मुदा अखनो माने फागुनोमे मनसम्फे अछि। तरकारीक आमदनीसँ बुधनी एकटा घर बनौली। ओना, वेचारीक मनमे रहैन जे एकटा बरद कीनब। मुदा घरक जरजर हालत देख विचार बदैल लेलैन। बुधनी ऐठाम देवनकेँ एला बरख दिन भऽ गेल। बरखे दिनमे देवन बहुत किछु सीखबो केलक आ विकासेपुरमे किछु दिन आरो रहैक विचारो केलक। मुस्की दैत देवन बुधनीकेँ कहलकैन- “दीदी, बड़ सुन्नर गाम अछि। जइ गाममे नसीवलाल काका सन ज्ञानी आ खेतिहर सजन सन इमानदार आ बेर-बेगरतामे ठाढ़ रहनिहार लोक हुअए ओ गाम किए ने नीक हएत।” अपन दुखड़ा सुनबैत बुधनी देवनकेँ कहलखिन- “बच्चा, जहिया रमुआक बाप मरि गेलखिन तहिया हुअए जे हमहूँ हुनकेँ लगल मरि जाइ। किएक तँ ने कोनो लूरि छल आ ने कियो कमा कऽ खुऔनिहार, दुख काटब छोड़ि दोसर रस्ते की छल। खेते बेच-बेच कए दिन खैतौं। मुदा रमुआकेँ देख आँखिसँ नोरो खसए आ देहो भुटैक जाए। मनमे आएल जे अखन ने रमुआ बच्चा अछि मुदा पाँच बर्खक पछाइत तँ नोकरी-चाकरी करै जोकर भाइए जाएत। ताबे कुटौन-पिसौन कऽ कहुना-कहुना गुजर करब। जँ केतौ चलि जाएब वा जहर-माहूर खा मरि जाएब तखन तँ वंश-खनदान सभटा उपैट जाएत। मुदा तोरा पाबि आ नसीवलाल कक्काक देखौल रस्ता आ मदैतसँ आब बुझि पड़ैए जे हँसी-खुशीसँ जिनगी काटि लेब। पैछला सुख ने भगवान छीनि लेलैन मुदा ऐगला सुख तँ भगवान देबे करता।” दोसर दिन भोरे देवन जलखै खा बुधनीकेँ कहलक- “दीदी, जेते बीआ-बाइल नसीवलाल काका देलैन, ओकर सबाइ लगा सभ चीज दऽ दिअ, हुनका सभ किछु घुमा देबैन, जइसँ आगूओक रस्ता बनल रहत। नइ तँ मने-मन कहता जे देवन बेइमान अछि।” देवनक बात सुनि बुधनी घरसँ धान, गहुम आ खेरही निकालि ओसारपर रखलक। हिसाब जोड़ि-जोड़ि देवन तीनू चीज लऽ मोटा बान्हलक। तीमन-तरकारीक तँ बीआ नै रहै तँए अन्दाजेसँ ओइ सबहक दाम जोड़ि रूपैआ लेलक। माथपर मोटा लऽ देवन नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। नसीवलाल दरबज्जापर बैस बेटाकेँ बुझबैत रहथिन- “बौआ, मनुखक समरथाइ जे होइ छै वएह जिनगीक सार अवस्था छी। ऐ उमेरक सदुपयोग करैक चाही, माने घरमक काजमे लगेबाक चाही। ऐ उमेरमे जे जेते कठिन मेहनत करत ओकर जिनगी ओतेक सुन्नर बनतै। सुन्नरे जिनगी महामानवक जिनगी होइए। जेते मेहनत कएल हुअए ओइमे कंजूसी नै करी। कंजूसी केलासँ लोक चढ़ाइक रस्तासँ भटैक जाइए। तँए इमानदारीसँ मेहनत करह। जँ अपनासँ बेसी उपारजन हुअए तँ ओकरा बाँटि दी। बँटबाक प्रवृति बड़ पैघ वस्तु छी। किएक तँ बँटलासँ जमा नै होइत। संगे, जे अपने बँटनिहार अछि ओ दोसराक वस्तुक लोभे किएक करत। लोभ तँ ओकरा होइ छै जे संचय करए चाहैए मुदा जेकरामे संचयक प्रवृति जगबे ने करतै ओकरामे लोभ आएत कोन रस्ते।” नसीवलाल बेटाकेँ कहिते रहथिन कि माथपर मोटरी नेने देवन पहुँचल। देवनकेँ देख नसीवलाल हँसैत पुछलखिन- “देवन, बड़का मोटा माथपर देखै छी। की आइ विकासपुरसँ विदा भऽ गेलिऐ?” नसीवलालक आगूमे मोटा रखि देवन कहलकैन- “काका, साल भरिसँ जे ऐठामसँ मोटरी बान्हि-बान्हि बहुत चीज लऽ गेलौं, वएह दइले आइ एलौं।” नसीवलाल- “अच्छा, पहिने बैसू। भारी मोटा उठौने एलौं हेन तँए सुसता लिअ। तखन आगू गप-सप्प करब।” देवन बैस कऽ पसीना पोछए लगला। पसीना पोछि उठि कऽ कलपर जा भरि पेट पानि पीलक। पानि पीब कऽ आबि बाजल- “काका, अहाँक असिरवादसँ बुधनी दीदीक हालत एते सुधैर गेल जे हँसैत जिनगी जीब रहल अछि। हमरा तँ अहाँसँ बहुत आशा अछि तँए पैछला लेलहा दइले एलौं आ आगू जे लेब ओ आगू देब।” नसीवलाल- “बौआ, तोरा हम कोनो कर्जा देने रहिहह जे तूँ घुमबैले एलह। हम अपन काज केलौं जइसँ तोरा लाभ भेलह। मोटा घुमौने जा। ई कखनो, मनमे नै अनिहह जे काका खिसिया गेला तँए आब किछु नै देता। सभ मनुखकेँ अपन-अपन कर्तव्य होइत। जेकरा करब ओकर धरम होइत। जे हमहूँ केलौं। तोरो अपन कर्तव्य छह जे तोरा करए पड़तह। जहिना हम तोरा बुझेबो केलियह आ थोड़-थाड़ मदैतो केलियह, तहिना तोहूँ करह।” मोटा नेने देवन अपना ऐठाम चलि आएल। मोटा घूमल देख बुघनी बजली- “बौआ, मोटा किए घुमौने एलह?” ओसारपर मोटा रखि देवन बाजल- “दीदी, काका कहलैन जे कोनो हम कर्जा देने छेलिअ जे घुमबए एलह। हम अपन कर्तव्य केलौं, तोहूँ जा अपन कर्तव्य करह।” असगरे नसीवलाल दरबज्जापर बैस, मने-मन सोचैत रहैथ जे चालीस बर्खसँ हम विकासपुरमे रहि अनबरत अपनो आ समाजोक उन्नैत-ले सोचबो आ करबो करैत एलौं जइसँ अपने तँ आगू जरूर बढ़लौं मुदा समाज ओते नै बढ़ि सकल जेते चाहै छेलौं! सवाल साधारण रहितौ जटिल अछि। जेना पोखैरमे नमहर गोला फेकलासँ पानिमे हिलकोर उठैए मुदा धीरे-धीरे असथिर होइत-होइत ओहिना-के-ओहिना भऽ जाइए, जेना पहिने रहैत। एना किए होइए? समाजक तरमे एहेन कोन शक्ति छिपल अछि जे पानिक हिलकोरकेँ शान्त करैत फेर ओइ रूपमे लऽ अबैए..? ◌ शब्द संख्या : 1980 13. चारि बर्खक पछाइत शिवकुमार हिसाबमे आ रामनाथ भूगोलमे आनर्स केलक। दुनूकेँ आनर्समे सत्तैर प्रतिशतसँ ऊपरे अंक एलइ। कौलेजोमे पढ़ाइ नीक चलै छेलइ। अरुण कुमार दत्त प्रिसिपल रहथिन। ओ अपनो गणितक जानल-मानल विद्वान। दत्त साहैब मात्र विद्वानेटा नहि बल्कि एक कुशल शासक आ कुशल अभिभावक सेहो। अपने बच्चा जकाँ विद्यार्थियोक संग बेवहार करै छेलखिन। जइ विद्यार्थीकेँ कोनो वस्तुक अभाव देखै छेलखिन ओकरा भरपूर मदैत सेहो करै छेलखिन। सदिछन मनमे रहै छैन जे हमरा कौलेजक विद्यार्थी केना नीक नहाँति पढ़त। आन शिक्षक जकाँ हुनकामे एक्को पाइ जाति-पातिक भेद-भाव नहि। रिजल्ट निकलला पछाइत शिवकुमारो आ रामनाथो जा कऽ दत्त साहैबसँ भेँट केलकैन। दुनूकेँ देखते दत्त साहैब वेहद खुशी भेला। हँसैत दुनू गोरेकेँ कहलखिन- “बौआ, आब अहाँ सभ देशक सुयोग्य नागरिक भेलौं, अहीं सभपर देशक भविस निर्भर करैए। तँए एक सुयोग्य नागरिकक जे दायित्व होइ छै, ओकरा अपन लगन आ इमानदरीसँ पुरा करब। परिवारसँ लऽ कऽ समाज होइत देश भरिक भार अहाँ सबहक कन्हापर अछि, तँए ओकरा नीक नहाँति निमाही, यएह हमर असिरवाद अछि।” दत्त साहैबक विचारसँ शिवकुमारो आ रामनाथोक आँखिमे सिनेहक नोर आबि गेल। भरभराएल अवाजमे शिवकुमार दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “गुरुदेव, अपनेक असिरवादकेँ जिनगी भरि निमाहैक चेष्टा करब।” बचेलाल, अछेलाल आ सुमित्रा– तीनू गोरे दरबज्जापर बैस कऽ शिवकुमारो आ रामनाथोक सम्बन्धमे गप-सप्प करैत रहैथ। तीनूक हृदए खुशीसँ गदगद रहैन। मुदा आगू की करब से किनको मनमे अबिते ने रहैन। बचेलाल बजला- “काका, दुनू गोरे बी.ए. पास तँ कऽ लेलक मुदा आगू की करबै?” बिनु कोनो लागि-लपट केने अछेलाल कहलकैन- “बौआ, हम तँ मुरुख छी, पढ़ै-लिखैक बात बुझबे ने करै छी तँए की कहब।” सुमित्रा दुनू गोरेकेँ शोर पाड़लखिन। शिवकुमारो आ रामनाथो आएल। अबिते सुमित्रा कहलखिन- “बौआ अहाँ दुनू गोरेक पढ़ाइसँ हमर छाती जुड़ा गेल। जखन बचेलालक पिता मुइला तखन हमरो हृदैमे छल जे बेटाकेँ खूब पढ़ाबी। मुदा सभ तरहेँ दुखी रही तँए मैट्रिके धरि पढ़ा सकलौं। मुदा आइ ओ इच्छा पुरि गेल। आब अहूँ दुनू गोरे पढ़ल-लिखल भेलौं तँए आगू की करैक विचार अछि से तँ अहीं सभ सोचब।” शिवकुमार बाजल- “दादी, काल्हि ललित मास्टर साहैब कहलैन जे मड़वाड़ी कौलेज दरभंगामे टीचर्स ट्रेनिंगक पढ़ाइ दू सालसँ होइ छइ। दस मासक कोर्स छइ। हमर मन होइए जे ट्रेनिंग कऽ ली। जखन ट्रेण्ड भऽ जाएब तँ कोने-ने-कोनो हाइ स्कूलमे नोकरी भाइए जाएत।” शिवकुमारक बात सुनि बचेलालक मनमे हूबा जगलैन। गुम्म भऽ किछु मन पाड़ए लगला। किछु कालक पछाइत मन पड़लैन जे बरख पाँचम धनश्यामपुर गेल रही। चुनावक समए रहइ। ओइठाम मड़वाड़ी कौलेजक उप प्राचार्य देवीदत्त पौद्दार सेहो चुनावी प्रचारमे आएल रहैथ। देवीदत्त समाजिक कार्यकर्ता। मड़वाड़ी रहितो अलग चालि-ढालिक लोक। एक्को मिसिया मड़वाड़ी जकाँ नहि बुझि पड़ैत। घुमैत-घुमैत, जेतइ हम रही ओतै ओहो चारि-पाँच गोरेक संग एला। जीप स्कूलेपर लगा देने रहथिन आ पएरे गाममे घुमैत रहैथ। जइ चौकीपर हम बैसल रही ओहीपर ओहो आबि बैसला। हुनक नाओं सुननहि रही मुदा चेहरासँ नै चिन्हैत रहिऐन। साधारण बगए-बाणि। मड़वाड़ी रहितो धुर-झार मैथिली बजैथ। चौकीपर बैसते कहए लगलखिन- “जाधैर अपना देशमे समाजवादी शासन नै हएत ताधैर किछु गनल गूथल धनीक पूजीपति बहुसंख्यक गरीबकेँ लूटिते रहत आ ऐश-मौज करिते रहत। १९४७ ई.मे अपना सभकेँ आजादी भेटल मुदा ओ पूर्ण आजादी नहि, नेँगड़ा आजादी भेटल। मोटा-मोटी यएह बुझू जे अंग्रेज भारतक गद्दीपर सँ उतरल। कोनो देश कानून-कायदासँ चलैए। अपना ऐठाम अखनो अंग्रजेक बनौल कानूनसँ शासन चलैए! तँए सभ गरीबकेँ एकजुट भऽ ओइ बेवस्थाकेँ तोड़ए पड़त।” ओ बजिते रहैथ कि हम पुछलयैन- “समाजवाद केकरा कहै छइ?” जेना सभ बात हुनका जीएपर रहैन तहिना हमर प्रश्न सुनिते देवीदत्त पौद्दार धाँइ-धाँइ कहए लगला- “उत्पादनक जे साधन अछि ओइपर बेकतीगत नै सामूहिक अधिकार समाजवाद होइत। जेना खेत, खान आ कारखाना अछि। अखनो देखै छी जे एक-एकटा जमीनदार छैथ जे साए कोन, हजार कोन जे लाख-लाख बीघा जमीन हथियौने छैथ। दोसर दिस देखै छी जे जोतैले कोन बात जे घरो बन्हैक जमीन नइ छइ। तहिना खानोक अछि। खानसँ अमूल्य वस्तु सभ निकलैए। ओहो किछु गनल-चुनल लोकक पल्लामे अछि। तहिना कारखनोकेँ देखै छी। एक-एकटा कारखानामे लाखो-लाख मजदूर काज करैए मुदा ओकरा केते दरमाहा भेटै छइ।” एते कहि उठि कऽ ठाढ़ होइत कहलैन- “अखन चुनावी दौड़मे छी तँए समैक अभाव अछि।” हुनका संग हमहूँ उठि कऽ ठाढ़ भेलौं। परिचए पुछलैन। हम कहलयैन- “एतए कुटुमैतीमे आएल छी। हमर घर ऐठामसँ तीस-पैंतीस किलोमीटर उत्तर मधुबनी जिलामे अछि।” तखन ओ कहलैन- “हम मड़वाड़ी कौलेजमे उप-प्राचार्य छी। जँ कहियो कोनो काज हुअए तँ भेँट करब।” एते बात मन पड़िते बचेलाल नमहर साँस छोड़ैत शिकुमारकेँ कहलखिन- “बौआ, काज भऽ जेबा चाही, काल्हि हम भोरूके गाड़ीसँ दरभंगा जा पहिने बुझि अबै छी तखन जे-जेना हएत से एला पछाइत कहब।” दोसर दिन भोरे गाड़ी पकैड़ बचेलाल दरभंगा विदा भेला। नअ बजे, गाड़ी दरभंगा पहुँचल। मुदा बचेलालकेँ कौलेज देखल नहि। स्टेशनसँ निकैल दोकानमे जलखै करए गेला। दोकानदारेकेँ कौलेजक सम्बन्धमे पुछलखिन। दोकानदार कहलकैन- ‘अहाँ देहातक छी वौआ जाएब। तँए नीक हएत जे रिक्शा पकैड़ लिअ, पहुँचा देत।’ बचेलालो सएह केलैन। रिक्शाबला कौलेजक गेँटपर बचेलालकेँ उतारि देलकैन। संयोगसँ देवीदत्त पौद्दारो तखने पहुँचला। दुनू एक-दोसर दिस ताकए लगला। चेहरा चिन्हार दुनू गोरेकेँ बुझि पड़लैन। बचेलाल देवीदत्त पौद्दारकेँ पुछलखिन- “हमरा देवीदत्त बाबूसँ भेँट करैक अछि।” ओ कहलखिन- “कोन काज अछि? हमहीं छी।” प्रणाम कऽ बचेलाल कहलखिन- “टीचर्स ट्रेनिंगमे दूटा विद्यार्थीकेँ नाओं लिखबैक अछि।” देवीदत्त- “विद्यार्थी कहाँ छैथ?” बचेलाल- “आइ बुझैले एलौं हेन, जँ भऽ जाएत तँ काल्हिए तैयार भऽ कऽ आएब।” देवीदत्त- “जाउ, भऽ जाएत। काल्हि निश्चित चलि आएब।” लगले बचेलाल घुमि कऽ स्टेशन आबि बारह बजे गाड़ी पकैड़ लेला। दोसर दिन दुनू विद्यार्थीक संग बचेलाल जा नाओं लिखा देलखिन। दस मासक उपरान्त रामनाथो आ शिवकुमारो प्रशिक्षित शिक्षक भऽ गेला। जइ हाइ स्कूलमे शिवकुमार आ रामनाथ पढ़ने छला, ओही हाई स्कूलमे पहिलुका बैचक चारि गोट शिक्षक मासे दिनक अन्तरमे सेवा निवृत्त भेला। सुदूर देहातमे स्कूल। चारू शिक्षकक जगहपर नव शिक्षकक नियुक्ति-ले भेकेन्सी भेल। अखबारोमे निकलल। मुदा एहेन हवा बहि गेल अछि जे नवयुवक गामक वातावरणमे रहए नै चाहैत। इलाकाक जे पढ़ल-लिखल युवक अछि ओ अधिकांश बम्बइ, कलकत्ता, दिल्ली जा कियो कारखानामे तँ कियो सेठ-साहुकारक दोकानमे तँ कियो सड़कपर रिक्शा चलबैत शहरमे रहैए। गाममे मात्र बुढ़-बुढ़ानुस आ धिया-पुता रहि गेल छैथ। फलत: किसान परिवार दिनानुदिन टुटि-टुटि निच्चे-मुहेँ ढुलैक रहल अछि। ने मेहनत करैबला आ ने आधुनिक ढंगक खेती करैबला लोक गाममे अछि। जइसँ ग्रामीण सम्पदा दिनानुदिन नष्ट भऽ रहल अछि। जाधैर देहातमे पढ़ल-लिखल आ कर्मठ लोक जी-जाँति कऽ नै रहत ताधैर गामक उत्थान मात्र कल्पना बनि रहत। शहर-बजार देहातेक श्रम-शक्तिसँ गन-गनाइत आगू-मुहेँ बढ़ि रहल अछि जखन कि गामक देश कहैबला भारत पाछू-मुहेँ तेजीसँ ससैर रहल अछि। शिक्षकक बहालीसँ पनरह दिन पहिने विज्ञापन निकलल। अखबारोक माध्यमसँ प्रसारित भेल। स्कूलक हेड-मास्टरकेँ बुझल जे शिवकुमार आ रामनाथ प्रशिक्षित अछि। हेडमास्टर एकटा पत्र शिवकुमारकेँ लिखि चपरासीकेँ पठौलखिन। प्रिय शिष्य शिवकुमार, अहाँकेँ बुझले हएत जे स्कूलमे चारि गोट शिक्षक सेवा निवृत्त भेलाहेँ। हुनका जगहपर नव शिक्षकक बहाली अछि तँए अहाँ दुनू गोर–शिवकुमार आ रामनाथ- अबस्स आवेदन दी। अहाँ दुनू गोरे छात्र रहि चुकल छी, संगे घर लग स्कूलो अछि। बहालीक पूर्ण आश्वासन तँ हम नै दऽ सकै छी किएक तँ कमिटीक माध्यमसँ बहाली हएत। मुदा एते जरूर आश्वासन दइ छी जे अनुचित बहाली नै हएत। -प्रधानाध्यापक। प्रधानाध्यापकक चिट्ठी देख शिवकुमारक मनमे पूर्ण बिसवास भऽ गेलैन जे हमरा दुनू गोरेकेँ बहाली जरूर हएत। पराते भने दुनू गोरे, अपन सभ कागजात नेने स्कूल पहुँचला। ऑफिससँ फारम लऽ ओकरा भरि, अपन सभ कागजातक नकल लगा दुनू गोरे आवेदन देलखिन। आवेदन देनिहारक रफ्तार बहुत मन्द। पहिल-पहिल आवेदन शिवकुमारे आ रामनाथे केलैन। आवेदनक रफ्तार मन्द रहैक कारण छल जे गाम-घरमे बेसी पढ़लो-लिखल नहि। शहर-बजारक लोक गाममे नोकरी नै करए चाहैत। बहालीमे चारि दिन बँचल। अखन धरि मात्र दुइएटा आवेदन पड़ल। स्कूलक सचिव स्कूल आबि प्रधानाध्यापककेँ पुछलखिन- “अखन धरि केतेक दरखास्त पड़ल?” प्रधानाध्यापकोकेँ नीक नहाँति नै बुझल रहैन। ओ किरानीकेँ बजा पुछलखिन। किरानी दुइएटा दरखास्तक नाओं कहलकैन। हेडोमास्टर आ सेक्रेट्रियो गुम्म। दुनू गोरेक मनमे यएह होइत जे एते बेरोजगारी रहनौं आवेदन किए ने भऽ रहल अछि। मुदा दुनू गोरे गुम्मे-गुम्म रहि गेला। अन्तिम दिन तीनटा दरखास्त पड़ल। नियुक्तिक तिथि पुर्ब निर्धारित छल, तँए हेबे करत। सभ उम्मीदवार नियुक्तिक दिन पहुँचल। तीन गोरेक समिति बनल। हेडमास्टर, सेक्रेट्री आ जिला शिक्षा पदाधिकारी ओइ समितिक सदस्य छला। बिनु कोनो झड़-झमेलक नियुक्ति भऽ गेल। एक गोरे अनट्रेन्ड छला तँए हुनका नै भेलैन। हाथक-हाथे चारू गोरेकेँ चिट्ठियो भेट गेलैन। घरपर आबि शिवकुमार दादीकेँ गोड़ लागि सभ बात कहलकैन। गोड़ लागि रामनाथ पँजरामे चुपचाप ठाढ़। रामनाथकेँ सुमित्रा कहलखिन- “बेटा रामू, तोरा देख हमरा एते खुशी भऽ रहल अछि जेकर पारावार नइ अछि। शिवूक तँ बापो मास्टर छथिन मुदा तूँ तँ उस्सर खेतक आमक गाछ जकाँ भेलह।” ◌ शब्द संख्या : 1359 14. शिवकुमारकेँ नोकरी होइते बचेलाल स्कूलमे तियाग पत्र दऽ एला। बचेलालक तियाग पत्रसँ सौंसे गाम टीका-टिप्पनी चलए लगल। किछु गोरेकेँ दुख ऐ दुआरे होइत जे बेर-बेगरतामे पाइसँ मदैत भऽ जाइत। किछु गोरेकेँ खुशियो होइत। किएक तँ भने आमदनी बन्न भऽ गेलैन। मुदा सुमित्राकेँ ने हरख आ ने विस्मय। किएक तँ ओ नीक नहाँति बुझै छथिन जे जेते मनुखक भीतर कमाइक शक्ति छै, ओते नोकरीमे नहियेँ होइत। आ ने जिनगी भरिले होइत। जाधैर लोक जुआन रहैए मात्र ताधैर नोकरी। मुदा जखन शरीरक शक्ति कमए लगै छै तखन नोकरी छुटिए जाइत। नोकरी छुटलापर दरमाहाक अदहोसँ कम पेंशन भेटैत। जखन कि उमेर बेसी भेने शरीरक सभ अँग धीरे-धीरे कमजोर हुअ लगैत, जइले नीक-निकुत भोजन आ दबाइक जरूरत होइत। पेंशन कम भेटने सभ खर्चक पुरती नै भऽ पबैत। जइसँ जिनगी बोझ बनि जाइत। संगे गिरहस्त परिवारमे जे काज चलैत ओकर लूरियो नै भऽ पबैत। जइसँ नोकरिया लोक अथबल भऽ जिनगी जीबैत। ..आब प्रश्न उठैए जे नोकरी केतए करी? चाहे तँ सरकारमे वा पूजीपतिक ऐठाम। ई बात सत्य जे प्रजातंत्र शासनमे सरकारो अपने होइत तँए शासन पद्धति चलैले सहयोग करब अनिवार्य अछि, नइ तँ शासन चलत केना। मुदा जँ सरकारो गनल-गूथल लोकक सेवा करैबला होइ आ विशाल जनसमूह-ले मात्र जहलेटा होइ,तेहेन शासनमे कोन रूपे सहयोग कएल जाए? दोसर बात अछि कारखाना। कल-कारखानामे नोकरी केनिहारक संग जे बेवहार होइ छै ओ की गुलामीसँ कम होइ छइ। अगर स्वतंत्र देशक नागरिककेँ गुलामीक जिनगी जीबए पड़ै तखन आजादीक महत्ते की? जे देश गामक देश कहबैए, आ गामक सम्पदा या तँ ठमकले रहै वा पाछुए-मुहेँ ससरैत जाए तखन देशक उन्नैत कल्पना छोड़ि आर की हएत? तँए जरूरत अछि जे गामक सम्पदा– खेत, पोखैर-नदी इत्यादिक समुचित बेवस्था दुनू दिससँ–सरकारो दिससँ आ गामोक श्रम शक्तिसँ- कएल जाए। ई के करत? हम गाममे रहनिहार जँ गाम छोड़ि बजार दिस पड़ाइ छी तखन केना हएत? ऐ सभ बातपर तर्क-वितर्क करैत बचेलाल नोकरीसँ तियाग पत्र देलैन। साँझक समए। अन्हारक तृतीया रहने बेसी अन्हारो नहि। बचेलाल, खेतसँ रिंच-हथौड़ीक झोरा आ अछेलाल पटबैबला प्लास्टिकक पाइप आ कोदारि नेने घरपर अबै छला। अबेर भेने रूमा दलानक आगूमे ठाढ़ भऽ दच्छिन-मुहेँ रस्ता देखैत रहथिन। आगू-आगू बचेलाल आ पाछू-पाछू अछेलालकेँ अबैत देख रूमा ससैर कऽ थोड़े आगू बढ़ि बजली- “भगवान हमरो दुनू परानीपर खूब खुशी छैथ। एक परानी गोबर पाथै छी आ दोसर परानी डीजल-मोबीलसँ देह-हाथ रंगै छी।” रूमाक बात सुनि अछेलाल भभा कऽ हँसला मुदा किछु बजला नहि। मुस्की दैत बचेलाल बजला- “अगर भगवान खुशी नै छैथ तँ जीबैले एते लूरि आ करैक शक्ति केना देने छैथ। काजकेँ खेलौना बना कर्मशीले टा खेलैए।” बजैत दरबज्जापर पहुँच गेला। दरबज्जापर अबिते सभ समान रखि साबुन लऽ स्नान करए कलपर गेला। सुमित्रा लालटेन नेस, चारक बत्तीमे लटका देलखिन। रूमा चाह बनबए गेली। जाबे बचेलाल नहा कऽ दरबज्जापर एला ताबे रूमो चाह बना लेलैन। चाह बना दरबज्जापर आबि बचेलालक आगूमे रखि देलकैन। ताबे अछेलालो नहा कऽ आबि गेला। तीनू गोरे चाह पिबए लगला। एक घोंट चाह पीब बचेलाल रूमाकेँ कहलखिन- “अही रूपे काज केलासँ परिवार आगू-मुहेँ ससरैए। अखने देखियौ, जाबे हम नहेलौं ताबे अहाँ चाह बनेलौं। माए लालटेन नेस लेलक। दसे मिनटमे केते काज भऽ गेल। अगर जँ अहलाइत-महलाइत सभ करितौं तँ केते समए लगैत।” तीनू गिलास लऽ रूमा भानस करए आँगन विदा भऽ गेली। अछेलाल तमाकुल चुनबए लगला। बचेलाल माएकेँ पटौनीक सम्बन्धमे कहिते छेलखिन आकि ताबे गोनर आबि अछेलाल लग बैसल। अछेलाल अपनो तमाकुल खेलैन आ गोनरोकेँ देलखिन। तमाकुल मुँहमे लैत गोनर अछेलाल दिस तकैत बाजल- “भाय, ऐ सालसँ दुख पड़ा गेल।” उत्सुक भऽ अछेलाल पुछि देलकैन- “से की?” गोनर बाजल- “भाय, जहियासँ मोन अछि तहियासँ आइ धरि नदी कातक खेतमे एते धान कहियो नै भेल छल जेते ऐ बेर भेल। बारह कट्ठाक कोला अछि, जइमे पनरह मनसे बेसी धान कहियो ने भेल छल मुदा ऐ बेर बारह क्विन्टल धान भेल। जे खेत फागुनसँ अखाढ़ धरि परती बनल रहै छल। गैवार-महींसबार सभ गाइयो-महींस चरबै छेलै आ गुल्लियो-डन्टा खेलैत रहै छल। ओइमे एते उपजा भेल जे सालो भरिक बुतात भेल। घरवाली कहै छेली जे ऐबेर घरमे लक्ष्मी एली। तँए पाँचो मुरते साधूकेँ चूड़ा-दहीक भनडारा करब।” गोनर बजिते छल कि एका-एकी टोलक लोक आबए लगल। जेना बरियातीमे हँसी-मजाक होइत तहिना अपनामे सभ करए लगल। हँसी-चौल समाप्त होइते एका-एकी अपन-अपन भरि दिनुका काजक गप शुरू केलक। अपन-अपन हूसलाहा काजक चर्च अपने-मुहेँ कऽ अपनो हँसैत आ दोसरोकेँ हँसबैत। एक हरफी सभ अपन-अपन बात बाजि चुकल। सबहक बात सुनि बचेलाल समूहकेँ पुछलखिन- “आगू की करैक विचार केने छी?” बचेलालक सवाल सुनि धनिकलाल बाजल- “भाय, एकटा नवका धानक बीआ मामा गामसँ अनलौं हेन। हमरे सोझहामे दाउन भेलइ। ममियौत भाय जोखलैन। जोखि कऽ कहलैन जे चारि कट्ठामे छह क्विन्टल धान भेल।” गोनर पुछलक- “देखैमे धान केहेन अछि?” धनिकलाल- “नमगर-नमगर, खूब मेही, उज्जर-उज्जर धान अछि। गमकबो करैए।” “भात केहेन होइ छइ?” “एह भैया! जखने थारी आगूमे औतह कि गम-गम करए लगतह। ओना हम तँ टटके धानक चाउर कुटा कऽ भात खेलौं मुदा तैयो की कहबह।” “केते बीआ अनलह?” “एक्के पसेरी अनलौं ऐसँ पाँच कट्ठा रोपाएत। ऐगला साल तँ सभकेँ बीआ देबइ।” “तूँ तँ एक्केटा खेतमे रोपबह। मुदा दू-दू आँटी जँ आनो बाधबलाकेँ देबहक तँ ओइसँ आनो बाधमे जँचा जाएत। किएक तँ सभ धान सभ तरहक माटिमे एक्के रंग नै धड़ै छइ। ओहो जाँच भऽ जाएत।” धनिकलाल- “बड़बढ़ियाँ बात कहलह। जँ दस आँटी बीआ देलासँ सभ बाधक उपजा जँचा जाएत तँ ओहो नीके हएत।” गाममे सिरिफ खेत पटबैक सुविधा भेलासँ गामक रूप-रेखा बदलए लगल, गृहस्तमे नव उत्साह जगल, अनिश्चितताक खेती निश्चिततामे बदलए लगल...। जखन कि खेती-ले पानि सिरिफ एकटा साधन छी। नीक बीआ, खाद, जोतै-कोरै-ले नीक ओजार, नव ढंगक खेती करैक लूरि इत्यादि सभ बाँकीए अछि। सिरिफ एकटा साधन भेलासँ उपजामे दोबर-तेबर वृद्धि भेल, गृहस्तक बीच प्रेम-भाव सेहो बढ़ल। खेतीक जिज्ञासा सेहो बढ़ए लगल। जइ किसानकेँ गरीबी कखनो मुँहमे हँसी नइ आबए दैत ओइ किसानक मुँहमे सदिछन हँसी आबए लगल। खाइ-पीबै राति भऽ गेल। दरबज्जा खाली देख शिवकुमार आ रामनाथ आएल। दुनू गोरेकेँ देख बचेलाल पुछलखिन- “बौआ, पढ़बैमे मन लगै छह किने?” दुनू गोरे कहलकैन- “हँ।” दुनू गोरेकेँ प्रसन्न देख बचेलाल बजला- “बौआ, मनमे कखनो ई नै अनिहह जे दरमाहा लइ छिऐ तँए पढ़बै छी। सभ बच्चाकेँ अपन छोट भाए बुझि पढ़बिहह। ओ केना पढ़त तैपर हदिघड़ी धियान रखिहह। बच्चा सबहक जिनगी ओइ अवस्थामे होइ छै जइ अवस्थामे उगैत सुरूजक होइत। उगैत सुरूजक समैमे जँ मेघ लगि जाइ छै तँ रातिये जकाँ दिनो बुझि पड़ए लगै छै ने, तँए जेते शक्ति अछि ओइमे एक्को मिसिया कलछप्पन पढ़बैमे नै करिहह। अखन तक तूँ दुनू गोरे एक-पेरिया रस्तासँ चलैत एलँहेँ मुदा आब चौबट्टीपर पहुँच गेलह। तँए चारू दिस देख कऽ चलए पड़तह। जेना पहिल भेल नोकरीकेँ इमानदारीसँ निमाहब, दोसर भेल परिवार, तेसर भेल माए-बाप आ चारिम भेल समाज। एकरा संग-संग अपन अध्ययन सेहो अछि। आइ हाइ स्कूलक शिक्षक भेलह तँए कि एतबेमे अपनाकेँ समैट कऽ रखि लेबह? आगूक डिग्री प्राप्त कएलासँ कौलेजोक शिक्षक भऽ सकै छह। जिनगीमे सतत चलैत रहैक चेष्टा करक चाही। सतत चलनिहारे जिनगीक महत बुझैए। हमहीं शिक्षक छेलौं। स्कूलसँ तियाग पत्र दऽ गृहस्तीक जिनगीमे प्रवेश केलौं। पहिनेसँ कनियोँ कम आनन्दित अखन नै छी। नव-नव काजक लूरि सेहो सीखि रहल छी आ नव-उत्साहक संग जिनगी सेहो बितबै छी मुदा तैयो एकटा अभाव जिनगीमे अखन धरि रहिये गेल ओ अभाव छी देशाटन। धुमब-फिरब सेहो जिनगी-ले बड़ पैध काज छी। बिनु घुमने-फिरने दुनियाकेँ देख केना सकब। कोन ठामक मनुख केहन अछि, केना रहैए, कोन तरहक जिनगी जीबैए। से तँ घुमला पछाइते बुझबै। अनेको पहाड़, अनेको पठार, अनेको झील, अनेको टापू, अनेको सागर, अनेको झरना, अनेको जंगल आ अनेको रंगक माटिक इलाकाक देश भारत अछि। अनेको तरहक प्राचीनसँ अद्यतन सभ्यता-संस्कृतिसँ सम्पन्न देश, बिनु देखलासँ केना बुझल जाएत। पहाड़क ऊपरसँ लऽ कऽ समुद्रक किनछैर धरिमे बसैबला लोक, हजारो रंगक फल-फूलसँ सजल देशकेँ बिनु देखलासँ केना कियो बुझि सकैए। तँए देशक भ्रमण सभ-ले ओहने जरूरत अछि जेहने जिनगीक दोसर-तेसर जरूरत। तँए जे समए बित गेल ओ तँ घुमि कऽ नै औत मुदा जे बँचल अछि ओइमे जहाँ धरि सम्भव भऽ सकत ओ तँ पुरबैक चेष्टा करब।” ◌ शब्द संख्या : 1278 15. फागुन मास। मौसमक बदलल रूखि। समुद्री तूफानक चलैत सौने जकाँ मेघो लटकल आ हवो चलैत। कखनो-कखनो बुन्दा-बुन्दी पानियोँ पड़ैत आ हवो कम-बेसी होइत। कखनो काल तेज बरखो आ तेज हवो बहए लगैत जइसँ सभ जाड़े सिड़सिड़ाइए लगैत। समैक रूखि देख, बाध-बोनक काज छोड़ि सभ घरे-अँगनाक आइ-पाइमे लागल। कियो-कियो घूर पजाइर आगि तपैत तँ कियो चद्दैर ओढ़ि पड़ल। ..देवन मने-मन सोचैत जे फागुन सनक मासमे एना किए होइए। मौसमोक कोनो ठेकान नइ छइ। जहिना लोकक कोनो ठेकान नहि जे बजत किछु आ करत किछु, तहिना भगवानोक कोनो ठेकान नहि। कहू जे फागुन सनक सुन्नर मासमे एना किए होइए। एते हवा केतए जमा छै जे एते बहि कऽ पच्छिम-मुहेँ चलि गेल मुदा अखनो धरि सठल नहि! कहू जे केते आशा लगा कऽ लोक मौसरी, केराउ, खेसारी आ आनो-आन जिनिसक खेती केने छल जे उखाड़ि-उखाड़ि सभ घर अँगनासँ लऽ कऽ खरिहाँन धरि सुखैले पसारने अछि आ ई पानि सभकेँ सड़ौत। ने भुस्सी मालक खाइ जोकर रहत आ ने दाना। सभ दाना पानिमे भीज-भीज सड़त। कनी-मनी जे जाड़ो चलि गेल छल सेहो घुमि कऽ चलि औत। ..फेर मनमे एलै जे भने हमहीं केने छी जे खेसारी-मौसरीक खेतीए ने केने छी। गहुमक लेखे तँ सोना बरैस रहल अछि। ऐ बेर एक्कोटा दाना मिरहिन्नी नै हएत। नसीवलाल कक्काक हिसाब ठीके छैन जे ‘कतिका धान, गहुम आ खेरही एक खेतमे करी।’ फगुनियाँ हाल भेल मन खुशी कऽ देलक। आठे दिनक पछाइत गहुम काटि लेब आ खेरही बाउग कऽ देबइ। पटबीए खेत जकाँ खेरही भुभुआ कऽ जनमत। फँकलो-फूँकल बीआ जनमियेँ जाएत। मुदा पिऔजमे गरदैन कटि जाएत। काल्हिए पटेलौं तैपर सँ तेहेन बरखा होइए जे पनरहो दिनमे खेत फरहर नै हएत जइसँ सड़त। मुदा की करबै। लोक अपनो भरि ने सोचि कऽ करैए मुदा अनहोनीकेँ के रोकत...। असगरे देवन मालक घरक दलानमे बैस सोचैत रहए। एक्केटा घर अदहामे माल बन्हैत आ अदहामे बैसै-उठैले दरबज्जा बनौने। असगरे देवनकेँ बैसल देख बुधनियोँ एली। बुधनीकेँ बैसते देवन बाजल- “दीदी, आब हम छबे मास रहब। किएक तँ एगारह बरख छअ मास भऽ गेल। तँए जहियासँ हम एलौं तहियासँ कोन-कोन काज भेल आ कोन-कोन पछुआएल अछि से दुनू गोरे हिसाब जोड़ि लिअ।” देवनकेँ नै रहब सुनि बुधनीक मनमे धक्का लगलैन। उदास भऽ बुधनी बजली- “बौआ, तोरा पाबि हमरा बहुत भेल। हमरा सन-सन केते लोक वौआ-ढहना कऽ मरैए। मुदा तूँ हमरेटा नहि हमरा कुल-खनदानकेँ जीआ कऽ रखलँह...।” बुधनी देवनकेँ कहिते छेली कि सजन सेहो चद्दैर ओढ़ने एला। सजनकेँ चौकीपर बैसबैत देवन पुछलकैन- “भैया, अखन कोन काज करै छेलह जे हाथ-पएरमे थाल लागल देखै छिअ?” सजन- “बौआ कि कहिह, मालक घर छाड़ैले खढ़ अँटिया कऽ रखने छेलौं। ओहो भीज गेल आ घरो खूब चुअल। बरदक देह परहक झोली भीज गेल। वएह हटा कऽ सुखलाहा बोरा देहपर देलिऐ। थैरमे पानि अँटैक गेल छेलै, ओकरे खड़ैर कऽ बहार केलौं। सएह थाल लागल अछि।” अदहा मुँह झँपने मुस्की दैत बुधनी बजली- “भैयाक जेहने बरद मोटाएल छैन तहिना दीदियो मोटाएल जाइ छैन।” बुधनीक बात सुनि सजन खुशियो भेला आ मने-मन सोचौ लगला जे एहेन बात किए कहलैन। कनीए काल चुप रहि बाजल- “कनियाँ, भनसिया मोटाएल जाइए कि फुलैए से अपनो मनमे अबैत रहैए। आन चीज तँ नै देखै छिऐ मगर अल्लू बड़ खाइए। जनु अल्लुऐ कोनो करामत तरे-तर करै छइ।” बात बदलैत बुधनी बजली- “आइ तँ हमरा बड़का पहपैट भऽ गेल। कुसमैमे बरखा होइए, एक्कोटा सूखल जारैन-काठी घरमे नइ अछि। कथी लऽ कऽ भानस करब? गोरहो मचानेपर अछि आ चिपरी पाथि-पाथि सुखा-सुखा जे भानस करै छेलौं सेहो सभटा भीजिए गेल।” सजन- “हमरो तँ सएह भेल, मुदा एकटा सूखल ढेंग छेलै ओकरे फाड़ि कऽ चुल्हि लगमे दऽ भनसियाकेँ कहलिऐ जे आइ खिच्चैड़े आ अल्लूक सन्ना बनाउ। हुअए तँ सेरसोक चटनी सेहो बना लेब।” बुधनी- “सेरसोक चटनी केना बनबै छथिन?” “से नै बूझल अछि! बड़ सुन्नर चटनी होइ छइ। जेते गोरे-ले बनाबी ओइ हिसाबसँ सेरसो लऽ ली। ओइ हिसाबसँ लसुन सेहो लऽ ली, जँ जमिरी नेबो हुअए तँ बड़बढ़ियाँ नइ तँ कागजियो नेबोसँ काज चलि जाइ छइ। हिसाबेसँ नून आ मिरचाय सेहो लऽ ली। सेरसो, लसुन, नून- मिरचायकेँ खूब हलसँ पीसि कऽ ओइमे नेबो गाड़ि दियौ, भऽ गेल चटनी।” “बाह, ई तँ सबदिना चटनी हएत!” ..सजन आ बुधनीक बातकेँ विराम दैत देवन बाजल- “भैया, भने दुनू गोरे छी। ऐठाम एला हमरा साढ़े एगारह बरख भऽ गेल। छअ मास पुरिते हम चलि जाएब। तीनू गोरे छी तँए कहि देलौं, जँ नै कहितौं आ चलि जैतौं, तँ अहूँ सभकेँ खटैकतए जे बिनु कहने-सुनने किए चलि गेल।” देवनकेँ प्रशंसा करैत सजन बजला- “तोरा पाबि वेचारीकेँ सभ किछु भऽ गेलइ। खेतो-पथार भऽ गेलै, मालो-जाल भऽ गेलै, घरो-दुआर भऽ गेलइ। रमुआ सेहो बिआह करै जोकर भाइए गेल। हमरा बुझने आब वैहटा काज पछुआएल अछि।” सजनक बात सुनि देवन बाजल- “भैया, अपनो मनमे अछि मुदा मन अचताइ-पचताइ छी। किएक तँ इलाका-इलाकाक कन्याँक अलग-अलग चालि ढालि आ जिनगी छै, तँए कोन इलाका कुटुमैती करी, ई बड़ भारी सवाल अछि। ओना समाजमे नवका हवा लगने किछु बदलबो कएल। मुदा अखनो ग्रामीण इलाकामे सत्तैरसँ अस्सी प्रतिशत वएह छइ। अपना इलाकाक कुटुमैती, पूबमे भागलपुर, पच्छिममे मुजफ्फरपुर, दच्छिनमे गंगाकात आ उत्तरमे नेपालक तराइ इलाका धरि होइए। मुदा सभ जातिक नहि। राजपूत, भूमिहारक कुटुमैती पच्छिम आ दच्छिन बेसी होइत, जे भोजपुरी आ मगही भाषाक इलाका छी। जइसँ ऐठामक भाषापर बहुत बेसी प्रभाव पड़ैत। किएक तँ ओइ इलाकाक सुआसिनक संग भाषो आ बेवहारो चलि अबैत, तहिना ब्राह्मणक कुटुमैती भागलपुर दिस होइत जइसँ अन्तिका बोली आ भगलपुरिया बेवहार सेहो चलि अबैत। मुदा पछुएलहा जातिक कुटुमैती नेपालक तराइसँ लऽ कऽ अल्लापुर, धरमपुर, पचही, नारे दिगर, भौर परगनामे बेसी होइत। पचही परगनाक बोली आ बेवहार अल्लापुर परगना आ नेपालक तराइ इलाकाक बोली आ बेवहारसँ बहुत नीक अछि। मुदा जे मेहनती कन्याँ अल्लापुरक, नेपालक आ कोसी इलाकाक होइत ओ पचही, नारेदिगर आ भौरक नै होइत। तँए गरीब लोक-ले अल्लापुर, कोसी इलाका आ नेपालक नीक होइत।” देवनक बात धियानसँ सुनि बुधनी मुस्कियाइत बजली- “हमरो नैहर भौरे परगनामे पड़ैए। दुरागमनसँ पुर्ब जाबे नैहरमे छेलौं ताबे घास छीलब छोड़ि ने दोसर काज केलौं आ ने लूरि भेल। हँ, अँगना-घरक काज नीपनाइ, बहारनाइ, कोठी पाड़नाइ, चुल्ही पाड़नाइ, भानस-भात केनाइ माए जरूर सिखा देलक। मुदा जिनगी जीबैले तँ कमाइक लूरि जरूरी होइत, से नहि भेल। मुदा अहीठीन देखै छी जे अल्लापुरवाली अछि, पुरुखोक कान कटैए। हर जोतनाइ छोड़ि एहेन एक्कोटा काज नइ अछि जेकर लूरि ओकरा नइ छइ।” बुधनीक बात सुनि सजन मुड़ी डोलबैत बजला- “कनियाँ, हमरा-अहाँ घरमे कमासुते कनियाँ चाही।” बुधनी- “हँ भैया, ढोरबा काकाकेँ देखै छथिन, दान-दहेजक लोभे केहेन चमचिकनी पुतोहु उठा कऽ लऽ अनलैन जइसँ घरमे हदिघड़ी मुहेँ फुल्ला-फुल्ली होइत रहै छैन। ओहन पुतोहु हम नइ करब। हमरा दान-दहेजक लोभ नइ अछि। पुतोहु कमासुत हुअए।” चारि मास बित गेल। रमुआक बिआहो भऽ गेल। जेहने पुतोहु बुधनी चाहै छेली तेहने पुतोहु भेलैन। मुदा समाज अखनो बुधनीकेँ उपराग दइते छैन जे एहेन दब खेनाइ बरियातीमे केतौ ने खेने छेलौं। जहिना खेनाइ देलक तहिना सुतैले पटेरक पटिया आ नारक आँटीक सिरमा देलक। मुदा दही ओहन खुऔलक जे जिनगीमे नै खेने छेलौं।” परसू देवनकेँ बारह बरख पुरि जाएत। एक दिस विकासक प्रक्रियामे आगू बढ़ैत समाजक मोह तँ दोसर दिस दुनियाँ देखैक जिज्ञासा। देवनक मनमे विचित्र द्वन्द उत्पन्न कऽ देलक। तर्क-वितर्क करैत देवन ऐ निष्कर्षपर आबि गेल जे आर्थिक विकासक प्रक्रिया गाममे चलि रहल अछि मुदा दुनियाँ देखैक जिज्ञासा तँ बौद्धिक विकासक प्रक्रिया छी। विकास तँ ओहो छी। बिनु बौद्धिक विकास भेने आर्थिको विकास तँ रस्ता धऽ कऽ नहियेँ चलत। किएक तँ जेतबे ऊँचाइपर बुधि रहत तेतबे तक ने आर्थिक विकास हएत। जइसँ जिनगीक विकास अवरूद्ध भऽ जाएत। मनुख, समाज आ दुनियाँ केते आगू तक बढ़त ई तँ अखन अनुमानेसँ कहल जा सकैए,जे सहियो आ गलतियो भऽ सकैए, तँए दुनियाँ देखब जरूरी अछि...। जहिना बौद्धिक विकास-ले देवनक मन छटपटाइत तहिना आर्थिक विकासक सुख सेहो शरीरकेँ अपना दिस घीचैत। किएक तँ जइ देवनकेँ बच्चासँ लऽ कऽ किछु दिन पुर्ब तक ने भरि पेट अन्न भेटल आ ने भरि देह वस्त्र, ने नीक घरक सुख भेटलै आ ने बिसवासू जिनगी। ..अही बिचमे देवनक मन आ शरीरक घिचा-तीरी करैत कखनो एमहर झुकैत तँ कखनो ओमहर। मुदा जिनगीक संकल्प मनुखकेँ सिद्धान्तनिष्ट बनबैत। ..ई विचार मनमे अबिते देवन बुधनी ऐठामसँ जाइक विचार पक्का कऽ लेलक। फेर देवनक मनमे एलै जे विकासपुर छोड़ैसँ पहिने नसीवलाल काकासँ भेँट कऽ लेब जरूरी अछि। किएक तँ हुनकेँ पाबि हम ऐ गाममे बारह बरख हँसी-खुशीसँ बितेलौं, खाली जिनगीए नै बितेलौं बल्कि बहुत किछु अनुभवो भेल आ सिखबो केलौं। दोसर दिन भोरे सुति-उठि कऽ देवन नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। गाएकेँ सानी लगा, हाथ धोइ नसीवलाल दरबज्जापर आबि चौकीपर बैस मने-मन सोचैत रहैथ जे मनुख खूब पढ़ि-लिखि लिअए, खूब समृद्धिशाली बनि जाए, परिवारसँ लऽ कऽ देशो समृद्धिशाली बनि जाए, मुदा की तेतबेसँ जिनगीमे शान्ति आ चैन आबि जाएत? की मनुख मनुखकेँ मनुख बुझए लगत? की मनुखक बीचसँ अपराध मेटा जाएत? की मनुखक बीचसँ भोगक प्रवृत्ति समाप्त भऽ जाएत..? ऐ तरहक ढेरो प्रश्न नसीवलालक मनमे उपकैत रहैन। जहाँ कोनो प्रश्नपर गौरसँ विचार करए लगैथ कि घौंदा जकाँ प्रश्न-पर-प्रश्न मनमे आबि जाइन। आइ अमेरिका सभसँ समृद्धिशाली आ शिक्षित देश अछि। अनेको देश ओकरासँ कर्जा लऽ कऽ अपन विकास कऽ रहल अछि। मुदा की अमेरिकामे चोरी, डकैती, लूट,हत्या, बलात्कार नै होइ छइ? की अमेरिकामे भिखमंगा नै अछि? की अमेरिकामे सभ मनुखकेँ मनुख बुझल जाइ छै आकि जानवरोसँ बदतर बुझल जाइ छइ? की अमेरिकामे माए-बहिनक इज्जत-आबरू सुरक्षित अछि..? मन जेते दौगैत तेते समस्याक बोनमे नसीवलाल औनाइत रहला। ने सोझ रस्ता देखैथ आ ने भेटैन। मन असथिर करै दुआरे चुनौटीसँ चुन आ तमाकुल निकालि चुनबए लगला। तमाकुल चुना मुँहमे लेलैन। मन बहटै दुआरे उठि कऽ टहलए लगला। टहलैत-टहलैत थूक फेकैले मुँह उठौलैन कि देवनकेँ अबैत देखलखिन। देवनपर नजैर पड़िते मनमे उठलैन जे एहेन-एहेन बच्चा, प्रतिदिन केते मरैत हएत तेकर कोनो ठेकान नहि। मुदा धैनवाद दी ऐ बच्चाकेँ जे एते पैघ संकल्पक संग हँसी-खुशीसँ जीब रहल अछि। आब तँ जुआन भेल। आब तँ ओहन शक्ति ओकरा भीतर जागि चुकल छै जे किछु कऽ सकैए। ..एते बात नशीवलाल मने-मन विचारिते रहैथ आकि देवन लगमे आबि पएर छूबि गोड़ लगलकैन। असिरवाद नसीवलालक मनमे घुरियाइत रहैन आ आँखि देवनक जिनगीकेँ पढ़ए लगलैन। ने किछु देवन बजैत आ ने नसीवलाल बाजैथ। दुनू अपन-अपन दुनियाँमे। देवनक मन अन्तिम असिरवाद तकैत आ नसीवलाल देवनक पुरुषत्वकेँ देखए लगला। ..उत्साहित मन,विचलित करेजसँ देवन कहलकैन- “काका, काल्हि हम ऐ गामसँ चलि जाएब, तँए आइ अन्तिम असिरवाद लइले एलौं हेन।” नसीवलाल कलखिन- “बौआ, तोरा हम अन्तिम असिरवाद अखन केना देबह। अखन तोरो नमहर जिनगी जीबैक छह आ हमहूँ अखन मरब नहि। एकटा दुनियाकेँ खण्ड-पखण्ड कऽ लोक देश, राज्य, गाम, टोल बना नेने अछि। मुदा अछि तँ एक्केटा धरती। अही धरतीपर तोहूँ केतौ रहबह आ हमहूँ केतौ रहब। दुनियाँक कोनो कोणमे चाहे तूँ रहह आकि हम, हमहूँ तोरा देखबह आ तोहूँ हमरा देखबह।” बिच्चेमे देवन बाजल- “काका, हम जे असिरवाद लइले एलौं ओ दैहिक छी। बारह बर्खसँ दुनू गोरे एकठाम रहलौं, आब कनी हटि कऽ रहब। वएह जे कनी हटब अछि तइले असिरवाद मंगै छी।” देवनक बात सुनि नसीवलाल मुस्की दैत बजला- “असिरवाद कि कोनो मुहक बोलीसँ होइ छै ओ तँ हृदैक उद्गार छी। तोहूमे तूँ हमरासँ असिरवाद मांगह आ हम परसादी जकाँ दऽ दिअ से कहूँ भेलैए। जखन कौल्हुका नियार कऽ नेने छह तँ जरूर जइहह। मुदा आइ ऐठाम रहह, खा-पीअ, भरि मन गप करब तखन साँझमे चलि जइहह।” सभतूर बुधनी सुतले छेली। गामोक सभ सुतले। सूर्योदयसँ पहिनहि देवन उठि कऽ उत्तर-मुहेँ विदा भऽ गेल। जेतबे वस्त्र पहिरने छल, बस ओतबे। ने किछु खाइले लेलक आ ने कोनो आन वस्तु। ज्ञानक भूख देवनकेँ एते लागल जे कोनो आन वस्तुक सुधिए ने रहइ। मुदा जिनगी जीबैक लूरि ओ सीखि नेने छल। ..गामक सिमानपर पहुँच देवन मने-मन सोचए लगल जे गामो-घर देख लेलिऐ आ गाम-घरक लोककेँ देख लेलिऐ तँए आब देव स्थान दिस जाइ। एते बात मनमे अबिते देवन देव स्थान दिस विदा भेल। जाइत-जाइत जखन बहुत दूर गेल तखन देखलक जे साइयो मन्दिर, साइयो मस्जिद आ साइयो गिरिजाघर अछि! देख कऽ अबूह लगि गेलै जे केते देखब। जँ सभकेँ देखए लगब तँ केते बरख लगि जाएत। मनुखक औरुदे केते होइ छइ। ठाढ़ भऽ देवन सोचलक जे छोटका स्थान सभकेँ रस्ते-रस्ते देख लेब आ बड़का-बड़का स्थानकेँ भीतर जा-जा देखब। मन्द-मन्द हवा सिहकैत। रौदोमे ओते गरमी नहि। मुदा बेसी चललासँ थाइक गेल। रस्ता कातेमे एकटा खूब झमटगर गाछ। गाछकेँ ऊपरसँ निच्चाँ धरि देखलक तँ अनठिया गाछ बुझि पड़लै। गाछक निच्चाँमे दूबि पसरल। हरिअर कचोर दूबि। मनमे भेलै जे जेमा तँ जेबे करब मुदा थोड़ेकाल ऐठान सुसता ली...। गाछक निच्चाँमे देवन बैस रहल। कनीए काल बैसल आकि मन अलिसाए लगलै। दुभिएपर पड़ि रहल। पड़िते निन आबि गेलइ। कनीए काल पड़ल कि चहा कऽ उठल। निन टुटि गेलइ। मनमे दू तरहक विचार उठए लगलै। एकटा विचार होइ जे थाकल छी तँए भरि मन अराम कऽ ली। दोसर विचार होइ जे जँ सुतिए कऽ समए बिता लेब तँ देखब कथी? उठि कऽ ठाढ़ भेल। आगू तकलक तँ झल बुझि पड़लै। दुनू हाथसँ दुनू आँखि मीड़ि कऽ पोछलक। आँखि पोछिते साफ-साफ देखए लगल। मुदा सभ किछु बदलैत बुझि पड़लै। जहिना चाउरसँ भात बनैए, दूधसँ दही बनैए, तहिना दुनियाँक सभ किछु तेज गतिसँ आगू-मुहेँ बढ़ैत देखलक। ठाढ़ भऽ देवन हियाबए लगल जे कियो खाधि दिस आँखि मूनि कऽ दौगल जाइए तँ कियो काँटक बोन दिस तहिना कियो आगि दिस दौगल जाइ तँ कियो सुन्नर फुलवाड़ी दिस...। देवनक मनमे द्वन्द उठल। पहिल विचार भेलै जे बिनु खाधिमे खसने खाधिक अनुभव केना हएत आ बिनु आगिमे गेने आगिक ताप केना बुझब? फेर मनमे उठलै जे जँ खाधिमे खसि पड़ब तँ ऊपर केना हएब? आ जँ आगिमे झड़ैक जाएब तँ जीब केना? जँ मरिये जाएब तँ दुनियाँ केना देखब? ..असमंजसमे पड़ल देवन फेर बैस रहल। बैसले-बैसल मनमे उठए लगलै जे मृत्युक रस्तामे जीवन छै आकि जीवनक रस्तामे मृत्यु? सुखक रस्तामे दुख छै आकि दुखक रस्तामे सुख?पापक रस्तामे पुण्य छै आ कि पुण्यक रस्तामे पाप..? विचित्र सवाल देवनक मनमे आबए लगल, गुलाबक फूल तोडै़ काल हाथमे काँट गड़िते अछि। रस्तापर चलनिहार पिछैर कऽ खसिते अछि। मुदा की काँट गड़ैक डरे लोक गुलाब फूल नै तोड़त? पिछैर कऽ खसै दुआरे लोक चलबे ने करत..? अजीव प्रश्न देवनक मनमे उठए लगल। जिनगीए पाछू तँ मृत्युओ छाँह जकाँ सदिछन चलिते अछि। मुदा सबहक पाछू संकल्प छै...। जे कियो गुलाबक फूल तोड़ैक संकल्प कऽ लेत, ओ काँट गड़ैक चिन्ता नै करत। जे आगिक गुण बुझि आगिमे जाएत ओ झड़कैक परबाह नै करत, तहिना हमरो दुनियाँ देखैक संकल्प मनमे अछि तँए जाबे जीब ताबे चलिते रहब, भलेँ रस्ता केतबो कठिन किए ने हुअए। ..ई बात देवनक मनमे अबिते फेर उठि कऽ विदा भेल। उत्तर दिसक रस्ता देवन धेलक। थोड़े आगू बढ़लापर काँटक बोन देखलक। बोन देख देवन हियाबए लगल जे केना ऐ बोनमे जाएब। चिक्कन रस्ता तँ अछि नहि! हियबैत-हियबैत देखलक जे ने चिक्कन रस्ता अछि आ ने चौड़गर, मुदा खुरपेड़िया रस्ता जरूर अछि जइ देने मालो-जाल आ चरबाहो अबै-जाइए। अपना दिस देवन देखलक। देखलक जे हमरो तँ किछु अछि नहि, मात्र देहेटा अछि। मनमे बिसवास जगलै जे हमहूँ टपि सकै छी। आगू बढ़ल। थोड़े आगू गेलापर देवन देखलक जे काँटक बोन पूबे-पछिमे नमती तँ बेसी अछि मुदा चौराइ कम छइ। बोन टपि गेल। रस्तामे केतौ किछु खेने नइ तँए भूखो लगि गेलइ। मुदा ऐ बोनमे भोजन की भेटत। ..भूखकेँ दबैत आगू बढ़ल। आगू बढ़िते देखलक जे फेर दोसर बोन अछि। बड़का-बड़का गाछ-बिरीछ ओइ बोनमे मुदा काँट नहि, फलक बोन। अनेरूआ फलक गाछ तँए सभ रंगक फलक गाछ, एकछाहा नहि। ..हिया कऽ देवन फल सबहक गाछ देखए लगल। रंग-बिरंगक फलसँ लदल गाछ देख मन शान्त भेलइ। शान्त चित्तसँ देवन सोचए लगल जे अखन तँ छोटके बोनमे प्रवेश केलौं हेन, तखन तँ एते रंग-बिरंगक फल चकचकाइए, जँ अहूसँ आगू बढ़ी तखन तँ ओहूसँ बेसी नम्हरो आ सुन्दरो-सुन्दरो फल भेटत। तँए जँ पैघ फल प्राप्त करए चाहै छी तँ ऐ छोटका फलक बोनकेँ टपि आगू बढ़ए पड़त। ..फेर मनमे एलै जे चौबेसँ छबे नइ भऽ कहीं दुबे बनि जाएब, तखन तँ सभ गुड़ गोबर भऽ जाएत। मुदा नहि! जिनगीमे कोनो वस्तुक प्राप्ति दू तरहेँ होइए। एक- वस्तुक प्राप्ति आ दोसर- विचारक प्राप्ति। ओना, कखनो काल दुनूक प्राप्ति सेहो भऽ जाइ छै आ कखनो काल विचारक प्राप्ति होइत मुदा वस्तुक नहि। तँए जिनगीमे कखनो ऐ बातक चिन्ता नै करक चाही जे प्राप्ति हएत आकि नहि। सतत् मनुखकेँ आगू बढ़ैक उत्साहक संग कर्म करैले डेग उठबैक चाही। जिनगीमे हारि केकरा कहबै आ जीत केकरा कहबै? अन्धकार-प्रकाशक लड़ाइ तँ हदिघड़ी मनुखक भीतर चलिते रहैए, जँ एक रूपमे अन्धकार हारैए तँ दोसर अहूसँ पैघ रूपमे आगू आबि ठाढ़ भऽ जाइए। सुरूज सन प्रकाशमान सेहो अन्धकारक चद्दैरमे झँपा जाइए। हमरा सबहक बीच सेहो एकटा जबरदस भ्रम पसरल अछि जे पैछला जनमक केलहा ऐ जन्ममे भेटै छइ। मुदा अहू प्रश्नकेँ दू दृष्टिए देखल जा सकैए। पहिल, पैछला जन्म जे विकासक प्रक्रियामे एक-दोसरमे बदलैत जाइए आ दोसर, अही जन्मक पुर्बक समए। जेना अफसरक पुर्ब समए विद्यार्थीक होइत, डाक्टरक पुर्ब समए सेहो विद्यार्थीक होइत। मुदा हमरा सबहक बीच पहिल बातकेँ मानल जाइए, तँए ई जबरदस भ्रम अछि। जेते बात देवन सोचैत तेते मन घोर-मट्ठा होइते जाइत। खिसिया कऽ देवन उठि कऽ विदा भऽ भेल। मुदा विदा होइते तामस मुझा गेलइ। शरीरमे नव शक्तिक संचार भेलइ। अपन संकल्पकेँ माथपर उठा साहससँ डेग उठबैत आगू बढ़ल। देवनक पेटक भूख तँ मिझा गेल मुदा मनक भूख बढ़िते गेलइ। जाइत-जाइत जखन किछु दूर गेल तँ एकटा विशाल आमक गाछ देखलक। रस्ताक बामा भाग ओ गाछ। गाछमे काँच-सँ-पाकल धरि फल लटकल। निच्चोमे खसल। ..गाछ लग ठाढ़ भऽ देवन सोचए लगल जे ई गाछ अनेरूआ छी आकि लगौल अछि?चारूकात देवन आँखि उठा-उठा देखए लगल। देखैत-देखैत पिताक सुनौल एकटा खिस्सा मन पड़लै। पिताकेँ अपना एक्को धूर खेत नहि जे गाछी-कलम लगा दितिऐ। तीरथ-बरथ करैले पाइ नहि, पूजा-पाठ करैक लूरि नहि मुदा धरमक काज तँ सभकेँ होइ छइ। तँए रस्ता कातमे पाँचटा आमक गाछ रोपि देलिऐ। ..कहीं ओहने रोपनिहार तँ ने ईहो रोपने अछि। पाँचटा पाकल आम बीछि देवन गाछक अलगलहा सिरपर बैस खाए लगल। आम स्वादिष्ट। पाँचो आम खा देवन सोचलक जे आइ एतै रहि जाएब। दुबिमे हाथ पोछि, हाथेसँ मुहोँ पोछि लेलक। पानिक जरूरते नहि। असगरे देवन ओइ गाछक छाहैरमे पड़ि रहल। गाछक ऊपरमे अनेको रंगक चिड़ै-चुनमुनी पकलाहा आमो खाइत आ अपनामे गपो-सप्प करैत आ चोरो-नुक्की खेलैत आ हँसियो-चौल करैत। रंग-बिरंगक चिड़ै रहनौं सभ अपन-अपन डारिपर बैस अपना जिनगीक गप करैत। ..चीत गरे देवन पड़ल छल तँए गाछक ऊपर सभ चिड़ैकेँ देखैत रहए। ऐगला-पैछला सभ जिनगी बिसैर देवन चिड़ै सबहक दुनियाँमे पहुँच गेल। किरिण डुमि गेल। आनो-आनो गाछ परहक चिड़ै सभ ओइ गाछपर आबए लगल। जेना सभकेँ बुझले रहै तहिना सभ अपन-अपन ठौर धऽ लेलक। किछु काल धरि, जाबे मौसम साफ रहै, सभ गप-सप्प करैत रहल आ जेना-जेना अन्हार पसरैत गेलै तेना-तेना ओहो सभ गबदी मारैत गेल। तेसर साँझ होइत-होइत सभ चिड़ै सकदम भऽ गेल। देवनकेँ ओ गाछ कल्प वृक्ष जकाँ बुझि पड़लै। नव-नव विचार, नव-नव जिनगी जीबैक ढंग देवनक मनमे आबए लगलै। विचारेक दुनियाँमे विचरण करैत देवनकेँ कखन निन एलै से अपनो ने बुझलक। पोह फटिते एकटा चिड़ैकेँ नीन्न टुटलै। निन टुटिते ओ सभकेँ जगबए लगल। धीरे-धीरे फरिचो होइत गेलै आ चिड़ैयो सभ जागि गेल। जगिते सभ चिड़ै अपन-अपन जिनगीक करम-लीलामे उड़ि-उड़ि विदा भेल। चिड़ैकेँ उड़ैत देख देवनो उठल। उठि कऽ अपन सौंसे देह देखलक। पानि तँ रहै नहि जे मुँह-कान धोइतए मुदा हाथेसँ आँखि-कान पोछि विदा भेल। उभर-खाभर रस्ता। केतौ सोझ, केतौ टेँढ़, केतौ भौक तँ केतौ खाइध। मगन भऽ देवन तेजीसँ सरासर आगू बढ़ए लगल। रस्तामे जानवरक कमी नहि मुदा मनुख एक्कोटा नहि। मुदा तैयो देवनक मनमे ने शंका आ ने कोनो घबराहट। असगरे देवन आगू बढ़ैत गेल। किछु दूर गेलापर बजार जकाँ देखलक। देवनक मनमे सवुर भेल जे आब मनुखसँ भेँट हएत। मुदा ओ बजार नै कसबा छल। छोट-छोट कारोबार चलैत। दुनू भाग घर बीच देने रस्ता। गोटे-गोटे घर पुरने ढंगक मुदा गोटे-गोटे टिपटापसँ सजल। मनुखोक वएह रूप। मुदा अकसरहाँ लोक रूढ़िवादी विचारसँ ग्रसित। किछु गोरे पुरान रूढ़िसँ जकड़ल तँ किछु नवका रूढ़िसँ। रूढ़िवादी रहितो सभमे मिलान नहि! एक दोसरकेँ गरियबैत। सभ-सभकेँ कहैत- “तूँ गलत तँ तूँ गलत।” रस्ता धेने देवन आगूओ बढ़ैत आ लोकक करतूतो देखैत। थोड़े दूर आरो आगू बढ़लापर देवन एकटा पैघ पीपरक गाछक निच्चाँमे नमहर मन्दिर देखलक। मन्दिरक आगूमे यात्री सभकेँ रहैले एकटा धरमशालो छेलइ। खाइ-पीबैक सभ बेवस्था ओइ धरमशालामे। मन्दिरक चारूकात फुलवाड़ी। छोटका-छोटका फूलक गाछक संग बड़को-बड़को फूलक गाछ। जहिना रंग-बिरंगक गाछ तहिना रंग-बिरंगक फूलो। ..पहिने तँ देवन रस्तेपर ठाढ़ भऽ कातेसँ देखलक मुदा मनमे भेलै जे छहरदेबालीक भीतर जा कऽ देखिऐ। अनभुआर जकाँ भीतर प्रवेश केलक। रस्ताक बगलेमे इनार। पानि भरैले ढेकुलमे डोल बान्हल। डोलमे लोहाक जिंजीरक उगहैन बान्हल। इनारपर जा देवन डोलमे पानि भरि हाथो-पएर धोलक, देहपर एक चुरूक छिटियो लेलक आ दोसर डोल पानि भरि पीबो लेलक। पानि पीब देवन पहिने मन्दिर दिस बढ़ल। मन्दिरक ओसारपर महंथजीकेँ एक गोरे ताड़क पातक बनौल बड़का पंखाकेँ पएरक ओंगरीमे डन्टाक निचला भाग लगा, ठाढ़े-ठाढ़ डोलबैत। दोसर गोरे महंथजीक पसारल पएरमे कड़ु-तेलसँ मालिश करैत आ तेसर गोरे महंथजीक बाँहिमे तेल लगा ओम्ठैत-ससारैत। ..महंथजी आँखि बन्न केने असुआएल पड़ल...। देवन महंथजीकेँ देख मने-मन सोचए लगल जे पकिया साधक जकाँ बुझि पड़ै छैथ। किएक तँ सए-बरिखा गाछक सील जकाँ देह, हाथी पएर जकाँ दुनू जाँध आ क्विनटलिया बोरा जकाँ पेट महंथजीक। लालबुन्द शरीर, दाढ़ी-केश नमहर-नमहर। तीस-पैंतीसटा अगरबत्ती एक्केठाम जरैत। रंग-बिरंगक सेन्टक शीशी,गमकौआ तेलक शीशी महंथजीकेँ पजराक खिड़कीपर राखल। देवनक मनमे एलै जे जखन ऐठाम धरि आबिए गेलौं तखन भगवानक दर्शन आ महंथोजीकेँ प्रणाम काइये लेबैन। ..ओसारसँ आगू बढ़ि दर्शन कऽ महंथजीकेँ ठाढ़े-ठाढ़ प्रणाम केलकैन। प्रणाम सुनि महंथजी आँखि तकलैन। एक टकसँ देवनकेँ देख महंथजी मने-मन गुम्हरए लगला, जे पएर छूबि किए ने गोड़ लगलक..! देवन अपना ढंगक लोक, मने-मन विचारए लगल जे हमरा कोनो ऐठाम रहैक अछि जे खुशामद रहत। राही छी रस्ता धऽ कऽ एलौं, कनी कालक पछाइत चलि जाएब। मने-मन महंथजी गुम्हैरते रहैथ ताबए देवन बाहर चलि आएल। महंथजी पुजेगरीकेँ शोर पाड़ि कहलखिन- “अखन जे एकटा दर्शनार्थी आएल छल, ओ हमरा उचक्का बुझि पड़ल तँए ओकरा जल्दी हातासँ निकालू।” महंथजीक आदेश सुनि पुजेगरी देवनकेँ ताकए लगल...। मन्दिरक चारूकात जे फुलवाड़ी लगौल छेलै, ओइ फुलवाड़ीमे देवन घुमि-घुमि कऽ देखै छल। ..पुजेगरी धरमशालामे तकैत एकटा अनठिया बबाजीकेँ पुछलक- “अखन कियो अनठियो आएल छल?” ओ वेचारे एक टकसँ पुजेगरी दिस ताकि, बिनु किछु बुझनहि-सुझनहि, बजला- “जे आएल छला से चलियो गेलैथ। नवका एक्को गोरे नै छैथ। हम तँ परसूऐ एलौं आ आरो जे सभ छैथ ओ पहिनेसँ छैथ।” चोट्टे पुजेगरी घुमि महंथजी लग जा कहलकैन- “ओ चलि गेल।” एमहर देवन फुलवाड़ीमे फूल सभकेँ तजबीज करैत। किछु फूल सुगन्धित आ किछु बिनु सुगन्धक। किछु देशी फूल आ किछु विदेशी फूल। सौंसे फुलवाड़ी देख देवन मन्दिरक पाछूमे जे पीपरक गाछ रहए, ओकरा देखए लगल। गाछ पुरान बुझि पड़लै। किएक तँ मोटका-मोटका डारि सभ, खूब नमहर गाछ। मुदा गाछक एक भाग सूखल आ दोसर भाग हरिअर। देवन सोचए लगल जे एना किए छै, जे अदहा सूखल अछि आ अदहा जीअल। छगुन्तामे पड़ि गेल। तत्-मत् करैत देवन गाछक जड़ि लग पहुँचल। गाछक जड़ियोमे बुझि पड़ै जे एक भागसँ सूखल छै आ एक भागसँ जीवित। मुँहपर हाथ लऽ देवन विचारए लगल। किछु कालक पछाइत देवनक मनमे एलै जे भरिसक गाछक जड़िमे गराड़ लगल छइ। गराड़ मनमे अबिते ओ एकटा सूखल मजगूत ठौहरी लऽ जड़िमे खोधियाबए लगल। चारिए आँगुर खोधियेलक कि एकटा मोटगर गराड़केँ देखलक गाछक खोंइचा खाइत। देखते देवनक मनमे खुशी एलइ। खुशी अबिते देवन ओही ठौहरीसँ गराड़केँ निकालि कातमे फेकलक। माटिपर खसिते गराड़केँ कौआ लऽ कऽ मन्दिरेक गुम्बजपर बैस कऽ खाए लगल। ..देवन फेर गाछक जड़िकेँ खोधियाबए लगल। मुदा जड़िक माटियो आ गाछक सिरो सभ सक्कत रहए तँए ठौहरीसँ खोधियाएले ने होइत। हारि-थाकि कऽ छोड़ि देवन इनारपर जा हाथ-पएरमे लगल माटिकेँ धोलक आ इनारपर सँ सोझे आबि धरमशालामे बैस गेल। कनीए कालक पछाइत रसोइया आबि, धरमशालामे बैसल आदमी सभकेँ, गनए लगल। नृद्वन्द्व देवन। कोनो गम नहि। बगलमे बैसल दाढ़ी-केश बढ़ौने बबाजीकेँ पुछलक- “अहाँ केते दिनसँ बबाजी छी?” देवनक मुँह देख ओ बबाजी कहए लगल- “बौआ, अहाँ तँ जुआन-जहान छी। मुदा जखन पुछलौं तँ कहबे करब। हम गिरहस्त परिवारक छी। चारिटा बेटा अछि। सभकेँ बिआह-दुरागमन करा देलिऐ। सभकेँ धियो-पुतो छइ। हमर स्त्री मरि गेल। चारू बेटा बरबैर कऽ खेत बाँटि लेलक। हमरा सझीए रखलक। साल भरि तँ बड़बढ़ियाँ तीन-तीन मास खुऔलक। मुदा दोसर साल चढ़िते सभ अनठा देलक। कियो खाइले देबे ने करए। दू-चारि दिन, अपन जे हित-अपेछित सभ रहए ओकरे ऐठाम खेबो केलौं आ बेटाक किरदानी कहबो केलिऐ। ओहो वेचारा सभ आबि-आबि कहलकै। मुदा केकरो बातक मोजर नै देलकै। घरसँ निकलैत मोह लगए मुदा की करितौं। गामेक एकटा बबाजीक संग धऽ लेलौं। घुमैत-घामैत ऐठाम छी।” देवन- “ऐठाम केते दिन रहबै?” “जाबे रहए देत ताबे रहब। जखन भगा देत तखन कोनो दोसर असथानपर चलि जाएब।” देवन चुप भऽ गेल। मुदा मनमे ढेरो सवाल उठए लगलै। ओइठामसँ उठि इनारपर जा कऽ बैस रहल। इनारक लहरामे ओंगैठ मने-मन सोचए लगल जे सिरिफ एहेन परिस्थिति अही वेचाराटा केँ नहि भेल, बल्कि एहेन परिस्थिति तँ सभ गाममे होइ छइ। तँए एहेन समस्या-ले समाजकेँ सोचए पड़त। सिरिफ सोचैए नै पड़तै बल्कि समाधान-ले किछु करैयो पड़तै। गामे-गाम निःसहाय औरत, निःसहय पुरुख आ अपलांग-विकलांग सेहो सभ अछि, जे अछैते औरुदे काहि कटैए। तँए सभ गाममे एहेन-एहेन लोक-ले सार्वजनिक तौरपर बेवस्था करए पड़त...। ऐ समस्याक बीच देवनक मन ओझरा गेल। सोचैत-सोचैत सुति रहल। खेबो ने केलक। रातिक बारह बजे। हवाक सिहकी चललै। हवाक सिहकीसँ देवनकेँ जाड़ हुअ लगलै। जाड़ होइते निन टुटि गेलइ। निन टुटिते इनारपर सँ उठि धरमशालाक कोणमे आबि कऽ बैस गेल। हवा जोरे होइत गेलइ। देवन धरमशालासँ निकैल बाहर आबि अकास दिस तकलक। अकास दिस देखते बुझि पड़लै जे अन्हड़-बिहाड़ि औत तँए धरमशालासँ नीक बहरेमे रहब हएत। फेर इनारक निचला लहरापर आबि कऽ बैस गेल। महंथजी, पुजेगरी मन्दिरमे सूतल। हवाक ठंढसँ महंथजीकेँ निन आरो गाढ़ भऽ गेलैन। किएक तँ मन्दिर तीन भागसँ घेरल, मात्र एक्के भाग अबै-जाइले खुजल। फोंफ कटैत महंथजी आ पुजेगरी। संयोगसँ कर घुमैकाल महंथजीक बामा हाथ छातीपर चलि आएल तँ सपनाए लगल। सपनामे महंथजी देखैत रहैथ जे हम रथपर चढ़ि स्वर्ग जा रहल छी। देवलोकक रथ। बड़का-बड़का घोड़ा ओइ रथमे जोतल। अप्सरा सभ नचैत। देवलोकक दूत सभ रथक आगू-पाछू अरियातने चलि रहल अछि...। तखने जबरदस अन्हड़-बिहाड़ि उठल। महंथजी आरो निनभेर भऽ गेला। बिहाड़िमे मन्दिरक पैछला पीपरक गाछक सुखलाहा भाग टुटि कऽ मन्दिरपर गिरल। ओना, माटिक तर तक गाछ सूखल छेलै मुदा गाछक जड़ि चिराएल नहि। दू फेड़ा लगसँ टुटल। विशाल डारि। मन्दिरपर डारिकेँ खसिते पहिने मन्दिरक गुम्बज टुटल तेकर पछाइत सौंसे मन्दिर टुटि कऽ खसि पड़ल। पुरान मन्दिर तँए टुटैमे देरियो नै लगलै। महंथजी निनभेर तँए मन्दिरकेँ खसैत बुझबे ने केलैन। तरमे महंथजी आ पुजेगरी तइ ऊपर मन्दिरक ओसाराक छत आ तइ ऊपर गाछक मोटका डारि। महंथजीक ऊपर जखन सभटा टुटि कऽ लदा गेलैन तखन निन टुटलैन। मुदा निन टुटनहि की? थोकचा-थोकचा देह, मात्र साँसेटा चलैत रहैन। कनीए कालक पछाइत साँसो अवरूद्ध भऽ गेलैन। दुनू गोरे पराण तियाग केलैन। मुदा तैयो अन्हड़ कमल नहि। ओना, आन दिनक अन्हड़ ओहन होइ छल जे अबै छल आ लगले चलि जाइ छल। मुदा औझुका अन्हड़ बड़ी खान धरि रहल। धरमशाला मन्दिरसँ थोड़ेक हटल। चारूकातसँ खूजल तँए हवाक झोंक एक भागसँ पइसे आ दोसर भागसँ निकैल जाइ। धरमशाला गिरल नहि, बँचि गेल। इनारपर बैसल-बैसल देवन सभ किछु देखैत मुदा ने हल्ला केलक आ ने उठल। अन्हड़ चलि गेल। मुदा पानि-पाथर नै खसलै। अन्हड़केँ जाइते धरमशालाक सभ निकैल हल्ला करए लगल जे मन्दिर खसि पड़लै। महंथजी आ पुजेगरी ओइ तरमे दबाएल छैथ। मुदा अन्हड़ तँ सिरिफ स्थाने भरि नइ आएल छल, सभ अपन-अपन उड़ियाएल घर-अँगना सम्हारैमे लागल रहए तँए कियो ने आएल। पोह फटिते देवन विदा हुअ चाहलक मुदा फेर मनमे एलै जे जाइसँ पहिने कनी महंथजीक अन्तिम दर्शन कऽ लेब उचित हएत। रूकि गेल। मुदा अन्हारक दुआरे ने अखन धरि मन्दिरक छज्जीपर सँ गाछक डारि हटौल गेल आ ने महंथजी छज्जी तरसँ निकालल गेल। किएक तँ डारियो छोट-छीन नहि जे दू-चारि गोरे धींच कऽ कात कऽ दइत। बिनु कुरहैरसँ कटने डारि हटैबला नहि। सेहो अन्हारमे केना होएत। डारिक तरमे मन्दिरक छज्जी आ मन्दिरक छज्जी तरमे महंथजी आ पुजेगरी। फेर देवनक मनमे एलै जे जइ महंथजी आ पुजेगरीकेँ देखैले अँटकल छी, ओ जीवित हेता आकि मुइल? ..तर्क-वितर्क करैत देवनक मनमे एलै जे जखन मन्दिरे खसि पड़ल तखन महंथ आ पुजेगरी केना बँचत। अनेरे हम कोन भाँजमे पड़ल छी। ऐठामसँ रबाना भऽ जाइ। ऐठाम जेते काल रहब तेते काल असमसानमे रहनाइ हएत। असमसानमे रहि अनेरे किए जिनगी गमाएब। ओह! जेते जल्दी हुअए तेते जल्दी ऐठामसँ विदा भऽ जाइ। देवन विदा भऽ गेल। ..रस्तामे थोड़े दूर गेलापर देवनक मनमे उपकल जे मृत्यु की छी? आइ धरि देवनक मनमे एहेन प्रश्न कहियो ने उठल छेलइ। उठबो केना करितै अखन धरि आँखिसँ जे मृत्यु देखै छल, ओकरे मृत्यु बुझैत रहए। मुदा आइ महंथजीक मृत्यु देखलापर, देवनक मनमे ऐ दुआरे प्रश्न उठल जे लोकक मुँहक सुनल बात झूठ बुझि पड़लै। लोकक-मुहेँ सुनैत आएल छल जे जे जेहेन करत ओकर मृत्यु ओहने हेतइ। मुदा महंथजी आ पुजेगरी तँ भरि दिन भगवानेक मन्दिरमे रहि, हुनकेँ टहल-टिकोरा करैत, तखन एहेन मृत्यु..! ‘मृत्यु’ छिऐ कथी ऐ प्रश्नपर देवन सोचए लगल जे मृत्युकेँ जीवनक पुर्ब पक्ष कहबै आकि उत्तर पक्ष? पुर्ब पक्ष ऐ दुआरे जे नीक विचारक जन्म होइते पुरान विचारक मृत्यु भऽ जाइ छइ। तहिना नव जीवक जन्म होइते पुरना जीवन समाप्त भऽ जाइ छइ। ऐ द्वन्द्वमे देवनक मन नीक नहाँति ओझरा गेल। फेर दोसर प्रश्न मनमे उठलै जे संगीत शास्त्री लोकैन सभ, गीतकेँ अवसर विशेषक आधारपर गीतक निर्माण केलैन मुदा ‘सोहर’ आ ‘समदाउन’केँ किएक जन्मोत्सवोमे आ मृत्योत्सवोमे मानि लेलखिन? जखन कि दुनू दू अवसर छी? ..देवनक मन घोर-मट्ठा भऽ गेल। जहिना नसेरी अपने धुनियेँ रस्ता कटैत तहिना देवनो आगू बढ़ैत जाइत। चलैत-चलैत देवन बिनु खेने-पीने, दुपहर तक चलिते रहल। ने भूख दिस मन जाइ छेलै आ ने पियास दिस। जेना कोनो सुधिए ने रहलै। जाइत-जाइत देवन एकटा फूलक गाछ लग पहुँचल। फूलक गाछ लग पहुँचते देवनक भक खुजलै। रूकि गेल। ओइ फूलक गाछकेँ निंगहारि-निंगहारि देखए लगल। फूलक गाछ देख देवनक मुहसँ अनासुरती निकलल- “एहेन फूल तँ आइ धरि नै देखने छेलौं!” सुन्नर आ सुडौल गाछ। जगह-जगह डारि फुटल। जेहने गाछक धड़ चिक्कन तेहने डारि। हरिअर-हरिअर, चौड़गर-चौड़गर पात नमहर-नमहर, लाल-लाल फूल। मखानी गुलाब जकाँ फूलसँ लदल गाछ। एकान्त जगह। फुलक गाछ देख देवन मने-मन सोचलक जे अखन भरि-दुपहर एतै रहब। रहैक विचार कऽ गाछक निच्चाँमे बैस रहल...। मन्द-मन्द शीतल हवा बहैत बारह बजेक समए। तेज धूप। गरमीसँ वायुमण्डल गर्म होइत जाइत। राही-बटोही, जहाँ-तहाँ रूकि-रूकि, दुपहर बितबैक ठौर पकैड़ लेलक। भूख-पियास देवनक मेटा गेल। गाछक निच्चेमे ओ चीत गरे सुति फूल सभकेँ देखए लगल। आँखि फूलेपर रहै मुदा मन अपन जिनगीक उदेसपर पहुँच गेलइ। जिनगीक उदेसपर मनकेँ पहुँचते देवन सोचए लगल जे मनुखक जिनगीक रस्तामे कहियो फुलवाड़ी भेटैत तँ कहियो काँटक बोन। दुनूक बीच होइत जिनगी चलैत। मुदा काँटक बोन देख मनुख घबड़ा जाइत जखन कि फुलवाड़ीमे सतत रहैक चेष्टा करैत। मुदा फूलेक गाछमे काँटो होइत आ काँटेक गाछमे फूलो, तखन मनुख केना अगबे फुलवाड़ीमे रहि पौत? चारि बजि गेल। राही-बटोही अपन-अपन रस्ता-बाट धऽ चलए लगल। राही-बटोहीकेँ देख देवनोक मनमे एलै जे सुतलासँ तँ नै हएत, जँ किछु हएत तँ चलनहि। जँ आइ चलि कऽ ऐ फूलक गाछ लग नै पहुँचल रहितौं तँ एहेन फूलक गाछक दर्शन केना होइतए। उठि कऽ बैस देवन हियाबए लगल आकि एकटा बटोहीकेँ उत्तरसँ दच्छिन-मुहेँ अबैत देखलक। बटोहीकेँ देख देवनक मनमे एलै जे भरिसक हमरे जकाँ ईहो बटोही अछि, किए तँ ने देहमे अँगा देखै छिऐ आ ने माथपर कोनो वस्तु। सिरिफ हाथमे एकटा छोट-छीन मोटरी लटकौने अछि। मुदा उत्तरसँ आबि रहल अछि तँए उत्तर दिशाक रस्ता तँ हिनका जरूर बुझल हेतैन। किएक तँ हमरो ओम्हरे जेबक अछि। अबैत-अबैत बटोही ओइ फूलक गाछ लग आबि रूकि गेला। बटोहीक नजैर देवनपर आ देवनक नजैर बटोहीपर पड़ल। मुदा दुनूमे कियो केकरो नै टोकैत। दुनू मगन। अपना-अपना तालमे दुनू बेहाल। मुदा देवनक मनमे एलै जे हम हिनका आगूमे बच्चा छी तँए हमर पूछब उचित हएत। देवन ओइ बटोहीकेँ पुछलक- “दादा, हमरा उत्तर-मुहेँ जेबक अछि तँए अपने रस्ताक सम्बन्धमे किछु बता दिअ?” देवनक बात गौरसँ बटोही सुनि बजला- “बौआ, तूँ भूखल बुझि पड़ै छह, किएक तँ तोहर मुँह सुखाएल छह, तँए पहिने खा लएह। हमरो ई मोटरी भारी लगैए। तोरो पेट भरि जेतह आ हमरो जान हल्लुक भऽ जाएत।” बटोहीक बात सुनि देवन किछु नै बाजल। बटोही बुझि गेलखिन जे वेचारा भूखल अछि। खाइक इच्छा भऽ रहल छै तँए ने किछु बाजल। ..उठि कऽ देवन लग आबि मोटरी आगूमे दऽ देलखिन। देवन मोटरी खोलकक तँ देखलक जे खाइ-पीबैक ओहन-ओहन विन्यास सभ अछि जे आइ धरि खाइक कोन बात जे देखनौं ने छेलौं! भरि पेट खा देवन फेर बाजल- “दादा, अपने उत्तर दिशाक रस्ता बता दिअ?” बटोही- “आगूक रस्ता बुझि कऽ कि करबहक?” “दादा, दुनियाकेँ देखैक लिलसा मनमे अछि तँए घरसँ निकलल छी।” मुस्कियाइत बटोही कहए लगलखिन- “दुनियाँ किछु ने छी। माटि, पानि, अकास आ हवाक बनल एकटा गोला छी। अही सभसँ जनैम-जनैम, जइ दुनियाकेँ देखै छहक से ठाढ़ भेल अछि। मुदा सौंसे एक रंग नै भऽ एक-भगाह भऽ गेल अछि। एक भाग निरोग अछि आ दोसर भाग सड़ल। तहूमे सभसँ अजीब बात ई अछि जे दुनियाँक बीचो-बीच एकटा रेखा घिचल अछि, जेकरा लोक विषुवत रेखा कहै छइ। रेखा पूबे-पछिमे अछि। रेखाक दुनू भाग समान दूरीपर एक्के रंग रौद-वसात आ उपजा-बाड़ी-ले मौसम होइ छइ। गाछो-बिरीछ एकरंगाहे अछि। मुदा सभ किछु एक रंग रहितो, मनुख दू रंगक अछि। एक भागक अगुआएल अछि आ दोसर भागक पछुआएल। तहिना देखबहक जे दुनियाँक मनुखो दू दिस भऽ गेल अछि। एक भागक खूब पछुआएल अवनतिक शिखरपर अछि। मुदा सभ किछुमे विषमता रहितो एक चीजमे समता अछि। ओ छी नंगापन। जे अगुआएल मनुख अछि ओ देखैमे दूध जकाँ उज्जर धप-धप, गाए-महींस जकाँ ओकर देह आ हाथ-पएर छइ। खाइयो-पीबैक आ रहैयोक बेवस्था नीक छइ। मुदा ओ महिला सभ जे कपड़ा पहिरैए से ओहन झकझकौआ मेही होइ छै जे देखलासँ बुझि पड़तह जे कपड़ा पहिरनहि ने अछि। ओहिना सौंसे देह देखबहक। तहूमे जँ केतौ देखैमे झल बुझि पड़ह तँ चश्मा लगा लिहह। ..तहिना दोसर दिस देखबहक जे मनुखकेँ गरीबी ओइ रूपे जकड़ने अछि जे ने भरि पेट अन्न भेटै छै आ ने देहमे वस्त्र। तँए अभावे ओ सभ नाँगट रहैए। ने खाइक ठेकान आ ने रहैक। ने वस्त्रक कोनो उपए, तँए नाँगट रहैए। देहक हाड़ चारि लग्गी हटलेसँ गनि लेबहक। कंकाल जकाँ देह, कारी खट-खट रंग, साबे जकाँ केश वेचारी सबहक रहै छइ। ..मनुखक समाजमे वस्त्रकेँ परदा मानल गेल अछि आ अहीसँ इज्जत-आबरू देखल जाइ छइ। मुदा एकटा सवाल पुछै छिअ, कहह जे दुनू औरतमे केकर इज्जत-आबरू बँचल छै आ केकर नहि?” बटोहीक बात सुनि देवन धड़फड़ा कऽ बाजल- “जेकरा देहपर वस्त्र छै ओ इज्जतदार।” बटोही- “धुर्र बुड़ि! एतबो ने बुझै छहक। अच्छा कोनो बात ने। तूँ अखन बच्चा छह तँए नै बुझै छहक। देखहक, लोके-लाज दुआरे ने लोक कपड़ा पहिरैए किएक तँ मनुखमे बुधि-विवेक होइ छै। तँए किछु अँगकेँ गुप्त अँग मानल गेल अछि। जेकरा देहपर वस्त्र छै ओकरापर आँखि गड़ा कऽ देखनिहारो बेसी अछि। मुदा जेकरा देहपर वस्त्र नइ छै, नरकंकाल जकाँ अछि ओकरापर नजैरे केकर पड़त जे लोक-लाजक प्रश्न उठतै। आब कहह जे केकर इज्जत-आबरू बँचल अछि। जेकर बँचल छै सएह ने इज्जतदार।” बटोहीक बात सुनि देवन मुड़ी डोलबैत हुँहकारी भरलक। हुँहकारी पेब बटोही बजला- “आब दोसर बात सुनह। दुनियाँमे जेते मनुख अछि, सभ मनुख छी। सभकेँ एक्के रंग सभ अँग छइ। हाथ, पएर, मुँह, नाक, कान इत्यादि। सभ अन्न खाइए,पानि पीबैए, कपड़ा पहिरैए आ रौद-वसात, पानि, पाथर आ जाड़सँ बँचै दुआरे घरमे रहैए। अस्सक पड़लापर दबाइक जरूरत होइ छइ। बुधिक दुआरे पढै़ए। मनोरंजनक दुआरे नचबो करैए आ गेबो करैए। तँए सभ-ले एक रस्ता हेबा चाही। नीक रस्ताकेँ धर्मक रस्ता मानल गेल अछि आ अधला रस्ताकेँ पापक। तखन आब तोँही कहह जे भदबरिया बेंग जकाँ एते सम्प्रदाय किएक अछि? एक काज-ले रस्ता अनेको भऽ सकैए मुदा सभसँ नीक रस्ता तँ एक्केटा हएत। जखन एक्केटा रस्ता नीक हएत तखन एते रस्ताकेँ कोन जरूरत। तइले लोक एते मारि-मरौवैल, गारि-गरौवैल किए करैए?” मुड़ी डोला देवन समर्थन केलक। देवनक मुड़ी डोलौनाइ आ मुँहक रूखि देख बटोहीक मनमे खुशी होइत रहैन। मनमे खुशी ऐ दुआरै होनि जे हम्मर बात देवनक हृदैमे चुभि रहल अछि। औरो आह्लादित होइत बटोही कहए लगलखिन- “बौआ, अजीव अछि दुनियाँ। कहए तँ बहुत चाहै छी मुदा तोहूँ अनतए छह आ हमहूँ अनतए छी। तोहूँ केतौ जा रहल छह आ हमहूँ बाटेमे छी। मुदा तैयो जेतबे समए अछि तेहीमे किछु बुझि लएह, जिनगीमे काज औतह। तहूमे अखन तूँ बच्चा छह बहुत दिन ऐ धरतीपर जीबैक छह। जहिना घर बान्हैले एक्के ढंगसँ अनेको घर बनैत, एक्के किताब पढ़लासँ अनेको लोककेँ ज्ञान होइत तहिना तँ जिनगीक आवश्यकता-ले एक्के लूरिसँ काज चलि सकैए। तखन एते रंग-बिरंगक चालि किए महंथ–सम्प्रदाय चलौनिहार–धरबैए? केते अजगूत बात अछि जे कियो खा कऽ पूजा करैले कहैए तँ कियो भूखले। तहिना कियो दाढ़ी-केश बढ़ा पूजा करैए तँ कियो दाढ़ी-केश कटा कऽ। कियो माटिक भगवान बना, तँ कियो पाथरक तँ कियो ओहिना, बिनु मूर्तियेक। तहिना कियो मन्दिर बना, तँ कियो मस्जिद बना, तँ कियो गिरिजाघर बना कऽ पूजा करैए। ..नहि जानि केते रंगक देवालय होइत। तँ कियो ओहिना, बिनु मन्दिरे, मस्जिदेक- कियो भगवानकेँ परसाद चढ़बैत तँ कियो बिनु परसादेक पूजा करैत। कियो ताड़ी-दारू पीब, माछ-मौसु खा पूजा करैत तँ कियो ओकरा अधला कहि निन्दा करैत। कियो नारीकेँ मुक्तिक मार्गक बाधा बुझैत तँ कियो नारीए पूजाकेँ उद्धारक रस्ता बुझैत। अजीव अछि ई दुनियाँ आ अजीव अछि ऐ दुनियाँक लोक। कियो वेश्याकेँ अधला बुझैत तँ कियो पूजा करैकाल वेश्या नचबैत। कियो-ढोलक-झालि, मजीरा बजा कीर्तन-भजन करैत तँ कियो ओहिना बिनु साजे-बाजक।” जहिना कोनो खेलौना वा पढ़ै-लिखैक कोनो वस्तु-ले बच्चा सभ अपनामे छीना-छीनी करैत तहिना देवनक मनमे, हुअ लगल। देवनक मुँहक बिजकब देख बटोही मने-मन सोचए लगला। जे वेचारा द्वन्द्वमे पड़ि गेल अछि। कखनो मन गुड़ैक कऽ एमहर तँ कखनो ओमहर भऽ रहल छइ। मन असथिरे ने भऽ रहल छइ। कनी काल बटोही गुम्म भऽ देवनक भावनाकेँ अँकए लगला। देवनक मन कखनो खुश होइत तँ कखनो चिन्तित भऽ जाइत। कखनो मुहसँ हँसी निकलैत तँ कखनो कानै सन भऽ जाइत। ओना, बटोही मने-मन हँसैत रहैथ मुदा मुहसँ बाहर हँसीकेँ निकलए नइ दैत रहथिन। बटोहीक मनमे एलैन जे आब विषय बदैल दी। बजला- “बौआ, देखै छहक ने जे केकरो घरमे अन्न सड़ैए तँ कियो भूखले रहैए। केकरो गामक-गाम खेत छै, तँ केकरो घरो बन्हैले ने छइ। केकरो धरमे कपड़ा सड़ै छै तँ कियो नँगटे रहैए। कियो कोठाक भीतर कोठा बनौने अछि तँ कियो गाछक निच्चाँमे रहैए। केकरो बोरे-बोरा नून तँ केकरो रोटियोपर ने होइत। कियो दबाइकेँ सड़ा-सड़ा पानिमे फेकैत तँ कियो दबाइ बिनु मरैए। केते कहबह पहिनहि कहि देलियह जे ऐ दुनियाँक एक भाग निरोग अछि तँ दोसर भाग सड़ल छइ।” देवनक चेहरा उदास हुअ लगल। मुँह मलीन आ आँखिक ज्योति बदलए लगल मुदा ज्ञानक भूख मनमे आरो जागए लगलै। मने-मन देवन सोचलक जे जखन एतबे दूर एलापर एतेक भेटल तँ ऐसँ आगू गेलापर केते भेटत। ई बात मनमे अबिते देवन बटोहीकेँ कहलकैन- “दादा, जखन एते दूर आबिए गेलौं तँ ऐगलो रस्ता बता दिअ, ओहो देखिये कऽ घूमब।” मुस्कियाइत बटोही आगूक अनुभव बाजए लगला- “ऐठामसँ कोस भरिपर मनपुर अछि। जखन ओइठाम पहुँचबह तँ देखबहक जे किछु गोरे पल्था मारि बैसल अछि आ मने-मन जिनगीक हिसाब जोड़ैए जे जेते समए खटै छी ओइसँ जे उपारजन होइए, ओहिक भीतर अपन जिनगीकेँ रखि जीबी। आ सएह करबो करैए। मुदा भेड़िया-धसान लोककेँ देखबहक जे खड़क बैलून जकाँ हवामे उड़ैए जइसँ केते फुटिए जाइत अछि आ केते गिरबो करैए, जेकर कोनो ठेकानो ने छइ। तँए तूँ ओइ बैसलाहा लोक सबहक दर्शन करिहह। ओकर दर्शन सीखि जिनगी बनबिहह। जिनगी की छी? जिनगी तँ वएह छी जे मनुख बनि जिनगी जीब लेब छी। ..मनपुरसँ कोस भरि आगू बुधिपुर अछि। जखन बुधिपुर पहुँचबह तँ देखबहक जे ऐठाम जेते लोक अछि सभ जुआरी अछि। भरि दिन, भरि राति जुए खेलाइए। ओ जुआ खेलाइक पासा तीन तरहक अछि। एक तरहक पाशा अछि जइमे बाप-बेटा खेलाइए। खेलाइत-खेलाइत अपनामे गारि-गरौवैल करए लगैए। बाप बेटाकेँ कहै छै, ‘सार तूँ बेइमान छँह।’ तहिना बेटो बापकेँ कहै छै, ‘सार, तूँ बेइमान छह।’ ..देखबहक जे बाप-बेटा सार-बहानचो करैए। मुदा ओइठाम बेसी नै अँटकिहह। देख कऽ आगू बढ़ि जइहह। किएक तँ ओ सार दुनू चोट्टा छी। जहिना छोटका माछक बोर दऽ बंशी खेलेनिहार, बड़का माछ मारि लइए तहिना ओ सभ छोटका गारि देखा फंसा लेतह आ गारि पढ़तह। तँए देख कऽ तुरन्त हटि जइहह। ..दोसर पासा देखबहक जे भाए-भैयारी आमने-सामने बैस जुआ खेलाइए। खेलाइत-खेलाइत देखबहक जे दुनू एक-दोसरकेँ बेइमानी करए लगैए। जइसँ गारि-गरौवैल, मारि-मरौवैल करए लगैए। मुदा ओहो दुनू नमरी चोट्टा छी। तँए ओकरो देख कऽ लगले हटि जइहह। जँ अँटकबह तँ धोखामे पड़ि जेबह। ..तेसर पासा जे देखबहक ओ असली पासा छी। ओइमे देखबहक जे दू परिवारक लोक जुआ खेलाइए। कसमकस खेल ओइ पासापर होइ छइ। दुनू खेलाड़ी सभ तरहक शक्ति लऽ कऽ खेलाइए। गारिक जवाब गारिसँ, मारिक जवाब मारिसँ, लाठीक जवाब लाठीसँ आ बम-बारूदक जवाब बम-बारूदसँ देल जाइ छइ। ओइ पासाकेँ देख मनमे हेतह जे हमहूँ एक भाँज खेलि ली। ओइठाम अँटैक जइहह। जेते दिन देखैक मन हुअ तेते दिन ओतै रहिहह...।” बटोहीक बात सुनि देवनकेँ मनमे खुशी भेलइ। मुस्की दैत पुछलक- “ओइठिनसँ कियो भगौत तँ ने?” बटोही- “हँ! एक पासाक खेलाड़ी भगौनिहार अछि मुदा दोसर रखनिहार। जे बचेनिहार हेतह। ओकरा ‘भाय’ बुझि पिठपर रहिहक। ओ जे जीतत तइसँ तोरो लाभ हेतह। ओ सिरिफ अपनेटा लऽ नै खेलैए तोरोले खेलैए, सभ-ले खेलैए।” बटोहीक बातकेँ गौरसँ सूनि देवन मुड़ी डोला सोचिते छल आकि फेर बटोही बजला- “ओइठाम देख आगू बढ़ि जइहह। ओइठामसँ कोसे भरि आगू विवेकपुर अछि। जखन बुधिपुरसँ आगू बढ़बह तँ विवेकपुर लगे बुझि पड़तह। जाइ कालमे सेहो नहि बुझि पड़तह। मुदा बिनु विवेकपुर गेने आपस नै घुमिहह। जखन विवेकपुर पहुँच जेबह तखन विवेक बाबासँ भेँट हेतह। विवेके बाबाकेँ लोक ज्ञानेश्वर, धर्मगुरु,जगत पिता सेहो कहै छैन। ओइठाम देखबहक जे रंग-बिरंगक ढेरो घोड़ा अछि। एक-सँ-एक सुन्नर, एक-सँ-एक तेज दौड़ैबला। केकरो बान्हल नै देखबहक। ओहिना बिनु बन्हले सभ रहैए। विवेके बाबाक टहलू हम छी। टहैल-टहैल दुनियाँ देखै छी।” ‘विवेक बाबाक टहलू सुनि बिच्चेमे देवन पुछि देलकैन- “ऐठाम किए आएल छेलौं?” बटोही- “अही फुलक गाछकेँ देखैले आएल छेलौं। हँ, जे कहै छेलियह से सुनह। ओइठाम पहुँचते विवेक बाबा भेँट भऽ जेथुन। घोड़ा सभ हिहियाइत देखबहक। अनेरे लगमे आबि-आबि चारूभरसँ घोड़ा सभ घेर लेतह।” देवन- “घोड़ा बदमाशियो करै छइ?” बटोही- “नहि। हँ! तखन एकटा बात जरूर छै जे गोटे-गोटे घोड़ा एहेन अछि जे घोड़ी देख कऽ थोड़े रस्ता काटि दइ छै, मुदा घुमि कऽ फेर रस्तापर चलि अबैए।” साँझ पड़ि गेल। मुदा अन्हार नहि बुझि पड़ैत। बजैत-बजैत बटोही केमहर चलि गेला से देवन देखबे ने केलक। देवनो तँ असगरे चलनिहार तँए मनमे कोनो शंको नहियेँ भेलइ। एक मन कहै जे आइ एतै रहि जाइ छी आ दोसर मन कहै जे जेते रस्ता काटि लेब ओते तँ अपने असान हएत, किएक तँ जेते चाहै छी ओ तँ केनहि हएत। दोसर दिन भोरे देवन विदा भेल। पहिलुका जकाँ देवन आब नै रहल। सोलहन्नी तँ नै मुदा अठन्नी जरूर बदैल गेल। रस्तामे मन्दिरपर नजैर पड़ै तँ आँखि निच्चाँ केने आगू बढ़ि जाइत रहए। भिनसुरका समए तँए रौदो बेसी तीख नहि। हवाक सिहकी चलैत तँए चलैमे बेसी मन लगैत। जाइत-जाइत देवन एकटा बड़का मन्दिर देखलक। शंखमरमरसँ बनल। हालेमे रंग-टीप भेने विशेष आकर्षक। मन्दिरक चारूभाग छहरदेबाली। साइयो बीघासँ ऊपर मन्दिरक अगवास। छहरदेबालीक भीतर एकटा नमहर पोखैर, करीब दस बीघाक कलम, जइमे अगबे बम्बइ आम। हजारोसँ ऊपर नारियलक गाछ। कमोवेश सभ फल। पोखैरक मोहारपर धरमशाला। नहाइले पोखैरमे सिमटीक घाट बनौल। रस्ताक तर देने बिजली तार। एक्केटा रस्ता। जइमे लोहाक फाटक लगल। फाटकमे खूब नमहर पितरिया ताला झूलैत। चारि बजे भोरमे फाटक खुलैत आ आठ बजे साँझमे बन्न भऽ जाइत। फाटक बन्न भेलापर ने बाहरक लोक भीतर आबि सकैत आ ने भीतरक बाहर जा सकैत। ई महंथजीक कड़गर आदेश छेलैन। इलाकाक लोक महंथजीकेँ जेहने कड़गर बुझैत तेहने चरित्रवान, तँए विशेष इज्जत। मन्दिर लग पहुँचते देवनक मन डोलि गेलै जे कनी भीतर जा कऽ देखिऐ। थोडे़ काल रस्तापर ठाढ़ भेल। बाहरोक लोककेँ भीतर जाइत देखलक आ भीतरोक लोककेँ बहराइत देखलक। देवन सेहो भीतर गेल। भीतर पहुँच देवन हियासि-हियासि मनुखोकेँ आ मन्दिरक बेवस्थोकेँ देखए लगल। बड़ सुन्नर बेवस्था बुझि पड़लै। चकचक करैत मन्दिर। मन्दिरक आगूमे पानिसँ धुअल अग्नेय। अगरबत्तीक सुगन्धसँ मन्दिरक चारू भाग मह-मह करैत। फुलडालीमे फूल लेने कियो तमही लोटामे तँ कियो पितरिया लोटामे जल लऽ पूजा करैले जाइत। तँ कियो पूजा कऽ घुमितो। मन्दिरक आगूमे ठाढ़ भऽ देवन गोड़ लगलक। गोड़ लगिते देवनकेँ बुझि पड़लै जे जहिना ई तीर्थ स्थान अछि तहिना तँ मनुखक देहो छइ। एकाकार भऽ गेल। अपना देहेमे तीर्थ स्थान बुझि पड़लै। मन्दिरसँ निकैल देवन धुमए लगल। फुलवाड़ीक फूल देख मन गदगद भऽ गेलइ। फुलवाड़ीसँ निकैल सोझे धरमशालामे पहुँचल। धरमशालाक निच्चाँमे ठाढ़ भऽ स्थानोक बबाजी आ बाहरोसँ आएल यात्रीकेँ हियासि-हियासि देखए लगल। मन्दिरक बाबाजी आ यात्री दू रंग देवनकेँ बुझि पड़लै। दुनू तरहक लोकमे दू रंग विचार आ काज देखलक। दू रंग देख देवन आरो लगमे जा देखए लगल। बाहरक जे यात्री रहै, ओकर मन आ हृदए पवित्र बुझि पड़लै। छल-प्रपंचसँ दूर। भगवानक प्रति श्रद्धा। ..यात्री सभपर सँ नजैर हटा देवन स्थानक बबाजी सभपर गड़ा कऽ देखलक। मन्दिरक जे बबाजी सभ छल, ओकर चालियो-चलन आ मनो अशुद्ध बुझि पड़लै। बबाजी सभ अपन-अपन रूप बना रहल अछि। कियो सौंसे देह भष्म लगा-लगा, कियो डाँरमे मात्र चारि आँगुरक बिस्टी पहिर रहल अछि तँ कियो सोलहन्नी सौंसे देह छाउर ओंसि नंगे तैयार भऽ रहल अछि। कियो रेशमी धोती कुरता पहिर साधारण तिलक लगा तैयार भऽ रहल अछि, तँ कियो भिखमंगाक रूप बना रहल अछि। रूप बना-बना कियो गांजा पीब,कियो अफीम खा, कियो दारू पीब तँ कियो भाँग खा तैयार भेल। सबहक आँखि तरेगन जकाँ चमकए लगल। अपन-अपन सभ समान ओरिया कऽ धरमशालामे रखि निकलए लगल। धरमशालामे मात्र बाहरक जे यात्री छल ओतबे रहल। ओहो सभ अपन-अपन मोटरी सम्हारि जाइक तैयारी करए लगल। रंग-बिरंगक रूप देख, देवनक मनमे सबहक करतूत बुझैक जिज्ञासा जोर मारलक। मुदा कहत के? मने-मन देवन सोचए लगल जे के एहेन लोक भेटत जेकरासँ पुछिऐ। ..गुन-धुन करैत देवन धरमशालाक भनसिया लग पहुँचल। भनसिया सभ बरतन-बासन मँजैत। एकटा बरतन लऽ देवनो मँजए लगल। अनठिया देवनकेँ देख एक गोरे पुछलकै- “भाय, तूँ केतए रहै छह?” भनसियाक बात सुनि देवनमे सन्तोष भेलै जे एकरासँ सभ बातक भाँज लगि जाएत। उत्तर देलकै- “भाय, हम तँ बहुत दूर देहातमे रहै छी। बहू दिनसँ ऐ स्थानक विषयमे सुनै छेलौं। मुदा ने बटखर्चा होइ छलए आ ने अबै छेलौं। ऐ बेर खरचाक जोगार भऽ गेल तँ आबि गेलौं।” भनसिया- “केते दिन रहबह।” देवन- “जेते दिन मन लागत।” भनसिया- “बड़बढ़ियाँ, हमरे सभ संगे भंडारमे रहह। कोनो-कोनो काजो करिहह आ जे मन हेतह से खेबो करिहह।” देवन- “बड़बढ़ियाँ।” देवनकेँ बात बुझैक जोगार भऽ गेलइ। जोगार देख देवन मने-मन खुश होइत पुछलक- “भाय, अखन जे बबाजी सभ निकलल ओ कखन घुमि कऽ औत?” “किरिण डुमैत।” “भरि दिन केतए रहत आ की करत?” देवनक प्रश्न सुनि हँसैत एक गोरे कहलकै- “कियो स्थानक नाओंसँ चन्दा करत, कियो हाथ देख-देख दैछना लेत, कियो भीख मांगत इत्यादि। जेतए जेकरा जेहेन गर भेटतै से करत।” “जखन सभकेँ खाइले भेटते छै तखन चन्दा, दैछना आ भीख की करत?” “जे भीख मांगत ओ एक्को पाइ स्थानमे जमा नै करत मुदा जे रसीद काटि चन्दा करत ओ अदहा-अदही स्थानमे जमा करत।” “बाँकी रूपैआ लऽ कऽ की करतै?” देवनक बात सुनि सभ भनसिया ठहाका मारलक। एक गोरे हँसिते-हँसिते बाजल- “भने ऐठाम एलह। दू-चारि दिन रहह तखन सभ किरदानी आँखिएसँ देखबहक। मुहसँ कहलापर किछु बिसवासो हेतह आ किछु नहियेँ हेतह।” “महंथजी कोन मकानमे रहै छैथ?” ओंगरीसँ देखबैत कहलकै- “ओ दू महला कोठा देखै छहक, ओकर निचला हन्नामे स्थानक राशन-पानी रहै छै आ ऊपरका हन्नामे आठ गो कोठली छइ। आठो कोठली असगरे रखने अछि।” “ओइमे सभकेँ जाए नै दइ छै, कनी हमहूँ जा कऽ देखतिऐ?” “नहि। ओइमे सभ नै जाइए। अगर देखैक मन हुअ तँ भिनसुरका पूजा समाप्त भेलापर कातमे ठाढ़ भऽ कऽ देखिहक।” “की सभ होइ छइ?” “पूजाक पछाइत सभ अपन-अपन ठौरपर चलि जाइए। तेकरा पछाइत लीला शुरू होइ छइ। मुदा बेसी नै कहबह। ओइ कोठा छोड़ि सौंसे सभ घुमि सकैए। तँए जलखै खा लएह आ सौंसे देख आबह।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि देवन जलखै खा धुमैले विदा भेल। दच्छिन-मुहेँ देवन विदा भेल। दछिनबारि भाग बजार जकाँ बनल। कनी हटि कऽ देखलापर छोटे बुझाइ मुदा भीतर पसिते खूब नमहर देख पड़लै। उत्तरे-दछिने रस्ता। रस्ताक दुनू बगल डेरानुमा घर। पानि, बिजली सौंसे। घरक ओसारपर गद्दीदार कुरसी लागल। साइयोसँ ऊपरे डेरा, जइमे ढेरबा लड़कीसँ लऽ कऽ अधवयसू औरत धरि। मरदक नामो-निशान नहि। वेश्यावृत्तिसँ लऽ कऽ गान विद्यामे सभ निपुण। स्थानक धूप-आरतीसँ लऽ कऽ अपन वृत्ति धरि सबहक काज। रस्ते-रस्ते देवन आगूओ बढ़ैत आ दुनू बगली देखबो करैत। जाइत-जाइत देवन दछिनबरिया छोर लग पहुँचल। डेरा सबहक रूप-रंग देख देवनक मनमे एलै जे किछु दिन ऐठाम रहब जरूरी अछि। बिनु रहने नीक-नहाँति नहि बुझि सकब। जखन ऐठाम आबि गेलौं तखन सेरिया कऽ बुझने बिना चलि जाएब बचपना हएत। फेर मनमे होइ जे अबैत-अबैत केतए आबि गेलौं। लोक अधलासँ नीक दिस बढ़ैए आ हम अधले दिस चलि एलौं। फेर मनमे होइ जे अधला जगह होइ छै, अधला काज होइ छै, अधला विचार होइ छै, मुदा ओहो तँ ज्ञान रूपमे होइए, तँए ज्ञान अरजन करब तँ अधला नइ छी। तोहूमे अधला काज केनिहारो तँ कम नइ अछि। अगर जँ हम अधला काजकेँ नै जानब तँ ओइकेँ अधला बुझि परहेज केना करब...। तत्-मत् करैत देवन दछिनबरिया छोरपर ठाढ़ भऽ आँखि उठा-उठा चारू भाग देखए लगल। पूबारि भागक डेराक ओसारपर एकटा शील भंग जुआन लड़की देवन दिस छल। ओइ लड़कीकेँ अपना दिस देखैत देवनो ओकरे दिस ताकए लगल। दुनू दुनूकेँ दखैत मुदा आँखिमे आँखि मिलिते लड़की आँखि निच्चाँ कऽ लइत। देवनोक मनमे ओइ लड़कीक प्रति उत्सुकता जगलै। मुदा धड़फड़ा कऽ पूछत की? बड़ीकाल धरि देवन ओतै ठाढ़ रहल। डरो होइ तँए मुँह सूखल जाइ। देवनक उतरैत चेहरा देख ओ लड़की पुछलक- “किनको तकै छिऐन?” देवन- “तकै नै छिऐन। देखैले एलौं हेन।” “आउ, ऐठाम आबि कऽ बैसू।” ‘बैसू’ सुनि देवन ससरैत आगू बढ़ल। बेर-बेर ओ लड़की देवनो दिस मुड़ी उठा कऽ देखैत आ फेर मुड़ी निच्चो कऽ लइत। जहिना कियो आन मुलुकक जहलमे जिनगी भरिक सजा कटैत, जैठाम ने अपना मुलुकक एकोटा लोक रहैत आ ने घुमि कऽ अपना मुलुक अबैक आशा रहैत, वएह दशा ओइ लड़कीकेँ मने-मन होइत। ..देवन आबि कऽ ओसारक कुरसीपर बैसल। देवनक सूखल मुँह देख ओ लड़की मने-मन सोचलक जे भरिसक भूखल अछि। मुदा देवनक मुँह भूखसँ नहि, डरसँ सूखल छेलइ। ओ लड़की पुछलकै- “किछु खाएब?” देवन- “अखने खेलौं हेन। खाइक इच्छा नइ अछि।” “ऐठाम अहाँ किएक एलौं? ई जगह मनुखक नइ छी।” लड़कीक बात सुनि देवन चौंक गेल। मुदा अपनाकेँ सम्हारि कऽ पुछलक- “अगर मनुखक रहैक जगह नइ छी तँ अहाँ केना रहै छी?” देवनक बात सुनि शान्तीक दुनू आँखिमे नोर आबि गेल। मनक सिमानेपर बोली अँटैक गेलइ। चकभौर कटैत चिड़ै जकाँ आँखि घुमए लगलै। ऊपरसँ नीचा धरि देवनकेँ निंगहारए लगल। बड़ीकाल धरि शान्तीक आँखि देवनकेँ देखैत रहल आ मन जिनगीक समुद्रमे उग-डूम करए लगलै। ने किछु शान्ती बजैत आ ने देवन। दुनू दुनूकेँ पढ़ैत। बड़ीकालक पछाइत शान्ती देवनकेँ कहलक- “अहाँक प्रश्नक जवाब हम अखन नै देब। भानसो नै केलौं हेन। अहूँ आएल छी, तँए अखन भानस करए जाइ छी। निचेनमे अहाँक सवालक जवाब देब। ताबे अहूँ नहा लिअ।” देवनकेँ शान्ती भीतर लऽ गेल। भीतरमे आँगन जकाँ बनल। चारू भरसँ छहरदेबाली। बाहरक केबाड़ शान्ती बन्न कऽ देलक। भीतरेमे सभ कथुक बेवस्था। नहेबोक, भानसोक। छोटे आँगन तइमे टहलबोक बेवस्था। शान्ती भानस करैले चुल्हि पजारलक। देवन अँगा निकालि नहाइक जोगारमे लगि गेल। मुदा, जेना शान्तियोक मन आ देवनोक मन एक-दोसरकेँ शोर पाड़ए लगलै। टंकीपर देवन ठाढ़ आ चुल्हि लग शान्ती बैसल। मुदा दुनू एक दोसर दिस देखैत। जहिना अजेगर साँपक आँखि-सँ-आँखि मिललापर ओकर आँखिक आकर्षण मनुख वेवस भऽ हटि नहि सकैत तहिना देवनो आ शान्तियोक बीच भऽ गेल। ..टंकीपर सँ ससैर देवन चुल्हि लग आबि गेल। खुला देह। सिरिफ धोतीएटा पहिरने। शान्तियो देहक आंगी निकालि सिरिफ सये-साड़ीटा पहिरने। देहक चिन्ता ने देवनकेँ आ ने शान्तीकेँ। जहिना बच्चामे भाए-बहिन नँगटे खेलाइत तहिना दुनू भाए-बहिन जकाँ एकठाम बैस जिनगीक गप-सप्प करए लगल। शान्ती- “अहाँ ऐठाम किए एलौं?” देवन- “बहिन, दुनियाँ देखैक खियालसँ घरसँ निकलल छी तँए ऐठाम एलौं। मुदा अहाँ किए एहेन बात पुछलौं?” देवनक बात सुनि शान्तीक हृदए दहलए लगलै। मन विचलित भऽ गेलइ। बोली थरथराए लगलै। नमहर साँस छोड़ैत शान्ती कहलक- “भैया, जँ अहाँ ऐठाम पहुँच गेलौं तँ नीक केलौं। किएक तँ बिनु देखने दुनियाकेँ बुझबै केना। जइ जगहपर आबि गेल छी, तैठाम दिनक क्रिया-कलाप भिन्न छै आ रातिक भिन्न। तँए दिनुका जे देखबै, ठीक ओकर विपरीत रौतुका देखबै। ओना, जँ अहाँ देखैले आएल छी तँ दिनुको आ रौतुको दुनू देख लिअ। मुदा तइ सभसँ पहिने हमर जिनगी सेहो..।” शान्तीक बात सुनिते देवनक मनमे जुआर-भाटा उठए लगल। शरीर काँपए लगलै। जहिना तेज हवा, ठाढ़ भेल मनुखकेँ अपन झोकासँ ठेलि दैत तहिना देवनक मन शान्तीक बातसँ घुसकए-फुसकए लगल। लाख परियास केलौपर देवनक मन डोलिते रहल। जहिना रथमे जोतल घोड़ा जखन अपन चालि पकैड़ लैत आ सहीस जँ केतबो छोर खींच काबू करए चाहैत तैयो किछु-ने-किछु दूर घोड़ा बेकाबू भऽ बढ़िए जाइत, तहिना देवनोक मन भऽ गेल। मुदा, मनकेँ काबू करै दुआरे देवन मुँह बन्न कऽ आँखिएसँ अध्ययनो आ गपो करए लगल। जहिना शान्तीक मनमे विचित्र स्थिति पैदा लऽ लेलक तहिना देवनोक मनमे। दुनू दुनूकेँ निंगहारि-निंगहारि देखए लगल। ने किछु शान्ती बजैत आ ने देवन। जेना दुनूक मन, एकठाम भऽ धारक रेतमे भँसियाएल जाइत। बड़ीकाल पछाइत देवनक मन असथिर भेल। ताबे चुल्हिक आगि सेहो मिझा गेल। जहिना गाइक बच्चा, देहपर हाथ सहलेलासँ आँखि बन्न कऽ असुआ जाइत तहिना शान्ती सभ सुधि-बुधि बिसैर गेल। मन असथिर होइते देवन पुछलकै- “अहाँक जिनगी!” “हँ, हम्मर जिनगी!” विस्मित भऽ देवन पुछलकै- “कहू।” शान्ति बाजए लगल- “हमर जन्म एकटा सुभ्यस्त किसान परिवारमे भेल। जखन सात-आठ बर्खक छेलौं तखन माइक संग मेला देखए गामसँ दू कोस हटि गेलौं। सहस्र चण्डी यज्ञ होइत रहइ। नअ दिनक यज्ञो आ मेलोक कार्यक्रम रहइ। तीन दिन तक तँ मात्र यज्ञेक कार्यक्रम चललै, चारिम दिनसँ नाच-तमाशा शुरू भेल। बड़का रास, थियेटर,नाच सभ रहइ। दिनमे खाली यज्ञक प्रक्रिया, विषय कीर्तन आ छकरबाजी चलै मुदा रातिक मेला जबरदस होइ। इजोतक एहेन बेवस्था रहै जे जहिना दिन तहिना राति बुझि पड़इ। दोकानो-दौड़ी तहिना पतियानी लगा कऽ सजल रहइ। बगलमे पच्चीस-तीस बीघाक आमक गाछी रहै जइमे मेला लागल छेलइ। पाँचम दिन, हमरा गामक लोक सभ मेला देखए गेल। हमहूँ माइक संग गेलौं। सौंसे मेला एक्के बेर घुमैत-घुमैत पएर दुखा गेल। सभ कियो जा कऽ एकटा आमक गाछक निच्चाँमे बैस गेलौं। सबहक विचार भेल जे रौतुको मेला देखनहि जाएब। खाइ-पीबैक कोनो कमीए ने रहए। ढेरो दोकान रहइ। आठ बजे रातिमे रासो आ थियेटरो शुरू भेल। दुनूक ऊँचगर मंच बनल रहै, तँए केतौ-सँ-केतौक लोक असानीसँ देखैत रहए। इजोतक नीक बेवस्था रहइ। दर्जनो जेनरेटर चलैत रहइ। लोकोक तेहने भीड़ छेलइ। मरद-मौगी मिझराएले। ..करीब दस बजे, एक्के बेर सभ जेनरेटर बन्न भऽ गेलइ। बिजली गुम्म होइते सौंसे मेला हल्ला हुअ लगलै। तैबीच एक गोरे हमरा उठा लेलक आ दोसर गोरे मुँह दबने, भीड़सँ निकैल गेल। हम जे किछु बजबो करी ओ बोली निकलबे ने करए। तहूमे तेतेक हल्ला होइत रहै जे के सुनत। दुनू गोरे एकटा जीपमे बैसा देलक। जीपोमे अन्हार। तँए नीक नहाँति देखबो ने करिऐ। तीनटा जीप आगू-पाछू लगल। तीनू एक्के बेर खुजल। ..मेलासँ करीब अदहा मील जीप गेल तखन मेलामे इजोत भेलै आ हल्लो कम भेलइ। जीपक इजोतो बड़ल। ..जखन जीपमे इजोत भेल, तखन आठटा आरो लड़कीकेँ जीपमे देखलिऐ। मन उड़ि गेल। डर हुअए जे केतौ मारि कऽ फेक देत। अबधारि लेलौं जे आइ मरले छी। मन पड़ल अपन गाम, अपन परिवार आ अपन कुटुम-परिवार। मुदा की करितौं।” शान्तीक मुहसँ एते बात निकैलते शान्तियोक दुनू आँखिसँ आ देवनो आँखिसँ दहो-बहो नोरो खसए लगलै आ दुनू बोम फाड़ि कानए लगल। देवनक मनमे अपन मरल माए-बाप एलै आ शान्तीक मनमे जीवित माए-बाप। दुनूकेँ देहमे, जेना एक्को पाइ लज्जैत नहि रहल। जेना मुइला पछाइत मुरदा लर-ताँगर होइत तहिना गारा-जोड़ी कऽ दुनू छातीमे छाती लगा, कानए लगल। आँखिसँ नोर टघरै, मुहसँ दुख निकलैत आ छातीमे छाती सटौने पैछला जिनगीक अन्त आ ऐगला जिनगीक रूप-रेखा बनए लगलै। मुँह-मे-मुँह सटा, दुनूक मन अपन-अपन शेष बात एक-दोसरकेँ कहए लगलै। बड़ीकाल धरि दुनू एक-दोसरसँ सटल रहल। ताधैर दुनू सटल रहल जाधैर दुनूक मनक सभ बेथा नै निकैल गेल। जहिना अन्हार रातिमे दुनियाँक सभ किछु अन्हारक चद्दैर ओढ़ि सटि जाइए तहिना देवनो आ शान्तियो सटि गेल। मुदा सुरूजकेँ उगिते सभ अलग-अलग भऽ जाइत तहिना सभ बेथा कहला पछाइत दुनू हटि गेल। दुनू हाथसँ दुनू आँखि पोछि देवन शान्तीकेँ कहलक- “ऐठामसँ निकलैक कोन उपए अछि?” शान्ती- “जखन फाटकक ताला खुलि जाइ छै तखन बहराइक उपए अछि। मुदा किछु लऽ कऽ नहि, छुच्छे देहे।” देवन- “आब पहिने ऐठामसँ निकैल चलू तखन आरो गप-सप्प।” चारि बजे भोरमे फाटकक ताला खुजल। ताला खुजलाक अदहा घन्टाक पछाइत लोकक आबाजाही शुरू भेल। पाँच बजे दुनू गोरे दस लग्गा आगू-पाछू विदा भेल। देवनो चारूभर तकैत जे कियो देखै तँ ने अछि आ शान्तियो। मुदा देखियो कऽ कियो किछु ने पुछलकै। फाटक टपिते शान्ती नव दुनियाँ देखलक। दुनियाँक सभ किछु नव। दुनू सोझे दच्छिन-मुहेँ विदा भेल। ने देवन शान्तीकेँ किछु पुछैत आ ने शान्ती देवनकेँ। जाइत-जाइत दुनू मनपुर पहुँच गेल। मनपुर पहुँचते दुनूक मनमे शान्ती एलइ। दुनू एक दोसरसँ किछु पुछए चाहलक आकि तैबीच ओइ पैछला बटोहीकेँ अबैत देखलक। धियानसँ ओइ बटोहीकेँ देखते देवनक मुहसँ हँसी निकलल। ताबे ओहो लग आबि देवनकेँ पुछलक- “बौआ, तूँ अखन धरि एतै छह! हम तँ विवेकपुरसँ घुमि, दोहरा कऽ एलौं!” देवन- “दादा, रस्तामे शान्ती भेट गेल तँए गप-सप्प करैमे समए लगि गेल।” बटोही- “बड़ सुन्दर। भने दुनू गोरे एक संग भऽ गेलह। जे देखैक मन छेलह से आब नीक नाहाँति देखबह। अखन हम काजे जा रहल छी तँए नै अँटकबह, जाह।” देवन- “दादा, जेते काल ऐठाम छी तेते कालमे किछु कहि दिअ।” देवनक बात सुनि मुस्की दैत बजला- “बौआ, सबहक इच्छा रहै छै जे हमर बात बेसीसँ बेसी लोक सुनए। मुदा ओइ सुनने हेतै कथी। जेते मनुख अछि सभकेँ अपन-अपन जिनगी छै, सभ तँ एक्केठाम ठाढ़ो नइ अछि जे एक्के बात सुनने सरपट चालि पकड़त। जँ से होइतै तँ सभ दौगैत रहितए, से कहाँ छइ। ..तँए जरूरी अछि जे सभसँ पहिने अपने उठि कऽ मनुखक रस्तापर ठाढ़ भऽ चली। जखन मनुखक रस्तापर ठाढ़ भऽ चलए लगब, तखन जे गिरल मनुख अछि ओकरा उठबैक चेष्टा करक चाही। उठबैक दुनू उपाए अछि, केकरो बाँहि पकैड़ घींच कऽ, तँ केकरो पाछूसँ धक्का लगा ठेल कऽ। ..यएह जिनगीक जीत छी जे हमरा केने केते मनुख मनुख बनल। हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता।” ◌ शब्द संख्या : 9314 [1] ससुर [2] पति [3] सासु-पुतोहु [4] सासु [5] पति (बचेलालक पिता) [6] साधना ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। उत्थान-पतन उपन्यास जगदीश प्रसाद मण्डल तेसर संस्करण : अगस्त- 2016 एकसत्तैर- आमुख/ 08 एक- ‘क’/ 12 ‘ख’ / 17 ‘ग’ / 19 दू / 23 तीन / 38 चारि / 59 पाँच / 73 छह / 85 सात / 93 आठ / 104 नअ / 116 दस / 132 एगारह / 141 बारह / 153 तेरह / 168 चौदह / 185 पनरह / 201 आमुख नाटककार, कथाकार आ उपन्यासकारक रूपमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी मैथिली साहित्यमे नूतन उर्जाक संग उपस्थित भेल छैथ। हिनक जन्म 1947 ई.मे भेल। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे हिनक कथा, प्रेरक कथा उपन्यास सेहो प्रकाशित भऽ चुकल अछि। ऐ ‘उत्थान-पतन’ उपन्यासमे लेखक गामक जिनगीक यथार्थक नव-नव रूप उपस्थित केने छैथ। गामक जड़ता, रीति-रिवाज, पावैन-तिहार, मूर्खता, विद्वता, अड़ि जाएबला भाव आ सहज सोभाव आदि सहज रूपमे आबि गेल अछि। तत्वक दृष्टिसँ देखल जाए तँ सर्वप्रथम कथावस्तु धियानकेँ आकृष्ट करैत अछि। कथावस्तु तँ सशक्त आधार अछि जैपर उपन्यासक केतेको रंगक प्रसाद ठाढ़ होइत अछि,जइमे जिनगीक श्वास रहब आवश्यक। उत्थान-पतनमे गंगानन्द, यमुनानन्द, पण्डित शंकर, सुधिया, ज्ञानचन्द, भोलिया, बिशेसर, भोलानाथ, सुकल, नीलमणि, मोहिनी, रीता, महंथ रघुनाथ दास, लीला, दीनानाथ,गुलाब आदि अनेक पात्रसँ सज्जित भऽ अंचलक मार्मिक चित्र उपस्थित भेल अछि। कथावस्तुमे विच्छिन्न होइत गाम-घर आ टुटैत बेकती सबहक समस्याकेँ मार्मिक ढंगसँ अभिव्यक्ति कएल गेल अछि। उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि- “गामे-गाम केतौ अष्टयाम-कीर्तन तँ केतौ नवाह, केतौ चण्डी यज्ञ तँ केतौ सहस्र-चण्डी यज्ञ होइत। किएक तँ एगारहटा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हएत की नै हएत कहब कठिन। एकटा बालग्रह भेने तँ सुखौनी लगि जाइत अछि आ जैठाम एगारहटा ग्रह एकत्रित अछि तैठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नाओंसँ गदमिसान होइत। जअ-तील आ घीक गन्धसँ हवा सुगन्धित। सबहक हृदैमे भगवानक स्वरूप बिराजैत। सभ व्यस्त। सभ हलचल। खर्चक कोनो इत्ता नहि। जेना निशाँ लगलापर बेहोशी होइत तहिना। जाधैर लोक कीर्तन मण्डलीक संग, मण्डपमे कीर्तन करैत ताधैर घरक सभ सुधि-बुधि बिसैर मस्त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबिते कियो भूखल गाए-महींसक डिरियाएब सुनि चिन्तित होइत तँ कियो बच्चाकेँ बाइस-बेरहट-ले ठुनुकब सुनि बेथाकेँ दबैत तँ कियो आँखिक नोर होइत बहबैत।” समाजिक उत्थान करैबला बेकतीकेँ गामक ऐ परम्परा आ धार्मिक आडम्बरसँ संधर्ष करए पड़ैत अछि। लेखक अपना पात्रक द्वारा अन्धविश्वासकेँ तोड़ि जनकल्याणकारी परिवर्तन अनबाक प्रयास केने छैथ। साहित्यक भाषा हेबाक चाही जन-भाषा। जेकरा साधारण जन सहज-रूपसँ पचा सकए। ऐ उपन्यासक भाषा गाम-घरक बोलचालक भाषा अछि। जेकरा प्रयोग करैत काल सहजे नव-नव शब्दक निर्माण भऽ गेल अछि। साधारण जनक बोली आ नूतन शब्दक प्रयोग ऐ उपन्यासमे प्रचुरताक संग देखल जा सकैत अछि। कथोप-कथनमे सहजता संक्षिप्तता और स्वभाविकता अछि। जेना ऐ कथोप-कथनपर दृष्टिपात कएल जा सकैत अछि- “अगर दसखत कएल नै होइत हुअ तब?” “तब की? औंठा निशान दऽ देतइ” “भाय, दूटा समाँग आएल अछि। दुनूकेँ काज कऽ दहक।” “अच्छा थमहह, किरानी बाबूसँ गप्प केने अबै छी।” कथोपकथन उपन्यासमे वर्णित जिनगीक अनुकूल अछि। दौड़ैत-पड़ाइत संसारमे बृहताकार उपन्यास पढ़ैले समैक अभाव रहैत अछि। किन्तु भाषा आ शौलीमे जँ आकर्षणक गुण रहैत अछि तँ ओ जनमानसकेँ पढ़बाक लेल अपना दिस घींच लैत अछि। जइ गुणसँ भरल-पूरल ऐ उपन्यासक चित्रात्मक शैलीक एकटा उदाहरण देखल जा सकैत अछि- “गोर वर्ण, रिष्ट-पुष्ट शरीर, घनगर मोँछ, बरदक आँखि सन नमहर-नमहर आँखि। कोठीक गेँटपर कान्हमे बन्दूक लटका ठाढ़ ड्यूटी सेठक करैत।” एक्के वाक्यमे बहुत बात कहि देब लेखकक विशेषता अछि। जेना- “माथपर छिट्टा नेने आँगन विदा भेली। माथपर छिट्टा लऽ दुनू हाथसँ दुनू भाग छिट्टाकेँ पकैड़ दुलकी डेग बढ़बैत गुलाब ‘सैंयाँ भेल किसनमा’ घुनघुनाइत आँगन दिस लफरल चलली।” केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। ऐ दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा केलैन अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम छी। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भेसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि। समाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहै छैथ जे टुटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जइसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतै आ गामक सम्पूर्ण विकास हेतइ। सबहक संगे समाजिक न्याय हेतइ। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जइसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। ऐ माध्यमसँ लेखक देखबए चाहै छैथ जे अपनो गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करए तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नै जाए पड़तै आ पड़ाइन रुकि जेतइ। अखनो गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नै पहुँच सकल अछि। तइ कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध केने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजे ऐ उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। ऐ तरहेँ देखै छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित केने छैथ, संगे आदर्श रूप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि। ◌ राजदेव मण्डल 1. (क) गामे-गाम केतौ अष्टयाम-कीर्तन तँ केतौ नवाह, केतौ चण्डी यज्ञ तँ केतौ सहस्र-चण्डी यज्ञ होइत। किएक तँ एगारहटा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हएत की नै हएत कहब कठिन। एकटा बालग्रह भेने तँ सुखौनी लगि जाइत अछि आ जैठाम एगारहटा ग्रह एकत्रित अछि तैठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नाओंसँ गदमिसान होइत। जअ-तील आ घीक गन्धसँ हवा सुगन्धित। सबहक हृदैमे भगवानक स्वरूप बिराजैत। सभ व्यस्त। सभ हलचल। खर्चक कोनो इत्ता नहि। जेना निशाँ लगलापर बेहोशी होइत तहिना। जाधैर लोक कीर्तन मण्डलीक संग, मण्डपमे कीर्तन करैत ताधैर घरक सभ सुधि-बुधि बिसैर मस्त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबिते कियो भूखल गाए-महींसक डिरियाएब सुनिचिन्तित होइत तँ कियो बच्चाकेँ बाइस-बेरहट-ले ठुनुकब सुनि बेथाकेँ दबैत तँ कियो आँखिक नोर होइत बहबैत। चारि सालक रौदीक चलैत पोखैरक पानि सूखि गेल। नमहर-नमहर दराइर खेतसँ लऽ कऽ पोखैर धरिमे फाटि गेल। इनारक मटियाएल पानि भरि-भरि सभ घैलमे रखि फरिछा-फरिछा लोटा-गिलासमे लऽ लऽ पीबैत। लोक की करत। केतए जाएत। मृत्युक मुँह छोड़ि दोसर रस्ते की? औझुका कोलकाता ओ कलकत्ता नहि जैठाम अकाल आ समुद्री तूफानसँ ढेरो लोक मरै छल। जेकरा आइ अपन दोसर घर बुझि लोक जीवन-यापन करए जाइए। औझुका पंजाब ओ पंजाब नहि जैठाम आन-आन राज्यक लोक जा खेत-खरिहाँनसँ कारखाना धरि खटि कऽ परिवारक भरण-पोषन करैए। पंजाबक ओ दशा छल, जैठाम कल-कारखानाक कोन गप जे खेतक माटि गेउर रंगक कंकर मिलल, बरखासँ भेँटो ने होइ छलइ। साइते-संयोग सालमे कहियो बरखा भऽ जाइत रहइ। ओतुक्का लोक पड़ा-पड़ा आन-आन राज्य जा हड़तोड़ मेहनत कऽ जीविका चलबै छल। बम्बई, औझुका मुम्बई नहि। ने सिनेमा उद्योग छल आ ने कल-कारखाना आ नहियेँ अखुनका जकाँ कारोबार...। गंगानन्दकेँ तीस बीघा जमीन। तीन भाँइक भैयारी आ सतरह गोरेक आश्रम। जइ साल सवारी समए होइत ओइ साल आश्रम चला आ मालगुजारी दैयो कऽ अन्न उगैड़ जाइछेलैन, जेकरा दु-सलिया-तीन-सलिया पुरान बना खाइत। सबाइयो लगबैत। पहिल सालक रौदी गंगानन्दकेँ बुझिए ने पड़लैन। घरमे धान-चाउर परियाप्त रहैन संगे गाइयो-महींस-ले बड़का-बड़का दूटा नारक टाल रहबे करैन। पहिलुके जकाँ गंगानन्दकमन हरिअर। दोसर साल घरक धान-चाउर लगिचा गेलैन। रौदमे, जहिना गाछक तोड़ल फूल मौलाए लगैत तहिना गंगानन्द मौलाए लगला। कुटुमो-सम्बन्धीक आबा-जाही बढ़ि गेलैन। गंगानन्दक जेठकी बेटी रीता सासुर बसैत। चारि बेटी आ एक बेटाक संग रीता सेहो आबि गेलैन। रीताक जेठकी आ मैझली बेटी बिआह करै जोकर भऽ गेल। जँ कहियो रीता कोनो काजमे नैहर अबैत तँ काजक पराते सासुर जाइले धूम मचा दइत। किएक तँ सासुरक सभ भार रीते दुनू परानीपर। भैयारीमे जेठ रहने घरसँ बाहर धरिक सभ तरद्दुत करए पड़ैत। रौदीक चलैत रीता धिया-पुताक संग छबो गोरे नैहर एली। मासोसँ ऊपरे भऽ गेल मुदा सासुर जाइक नाओंए ने रीता लइत। बाप-माए केना मुँह फोड़ि बेटीकेँ सासुर जाइले कहत। भरियाएल खर्चसँ गंगानन्द तेरे-तर कुहरैथ। मने-मन सोचैथ, एक तँ साल खेपब कठीन अछि, तैपरसँ कुटुम-परिवारक धुमसाही..! मुदा कहथिन केकरा। बरखाक केतौ पता नहि। उपजा-बाड़ीक कोनो आशा नहि...। मने-मन रीता सोचैत जे जँ सुमनक बिआहक चर्च माए करत तँ ओकरे माथपर पटैक देबइ। अपना बुते पार लगाएब कठिन अछि। सभ दिन गंगानन्द साँझू पहरमे भूजल चूड़ा फँकै छला। बीस मनिया कोठीटा मे चाउर बँचल। धान पहिने सठि गेल। धानक दुआरे चूड़ा कथीक कुटौल जाएत। पार्वती पतिक आदत बुझि चाउरे भूजि छिपलीमे लऽ दरबज्जापर नेने एलखिन। भूजल चाउर देख गंगानन्द मने-मन बुझि गेला जे धान सठि गेल। पुरान चाउर रहने भूजा पथरा गेल तँए सक्कत। पहिलुके फक्का मुँहमे लैत गंगानन्दक दाँत सिहैर उठलैन। दाँत सिहैरते गंगानन्द लोटाक पानि मुँहमे लऽ गुल-गुला कऽ घोंटलैन। मुँहक चाउर घोंटि छिपली आगूसँ घुसका देलखिन। मने-मन पार्वती अन्दाजलैन जे सक्कत दुआरे भूजा नै खेलैन। मुदा उपए की..? गंगानन्दकेँ तामस नै उठल। जँ घरमे धान रहैत तँ चूड़ा कुटौल जाइत मुदा नै रहने कएल की जाएत। जहिना लकड़ी जड़ि कऽ राख बनि शक्तिहीन भऽ जाइए तहिना गंगानन्दक दशा भऽ गेलैन। गिलासमे चाह नेने गंगानन्दक नातिन आएल। दुनू परानीक नजैर सुमनपर पड़ल। चाह रखि सुमन आँगन चलि गेल। लग्गी भरि हटल पार्वतीकेँ हाथक इशारासँ गंगानन्द लग अबैले कहलखिन। पार्वती बैसले-बैसल घुसैक कऽ लग एली। फुस-फुसा कऽ गंगानन्द कहलखिन- “रीताक दुनू बेटी बिआहै जोकर भऽ गेल। जँ कहीं ऐ साल एकोटा बिआह ठानत तँ इज्जत बाँचब मुसकिल भऽ जाएत। हमहूँ तँ नने छिऐ।” अखन धरि पार्वती अँगनासँ दलान धरि अबै-जाइ छेली। ऐसँ अधिक ने देखैक समए भेटलैन आ ने घरक नीक अधला बुझैक। नातिनक बिआह बुझि अह्लादसँ पार्वती बजली- “यज्ञो केकरो बाँकी रहै छइ। यएह तँ भगवानक लीला छैन जे गरीबसँ लऽ कऽ अमीर धरिक काज कहुना-ने-कहुना भाइए जाइ छइ।” केचुआएल साँप जकाँ गंगानन्दक दशा। दिन ससरब कठिन। तैपरसँ पत्नीक चढ़ल बात आरो केचुआ चढ़ा देलकैन। मुदा जहिना केचुआ छोड़ैत साँपक साँस तेज भऽ जाइततहिना नमहर साँस छोड़ैत गंगानन्द बजला- “एहेन दुरकालमे जीनाइ कठिन अछि, तैपर बिआह सनक यज्ञ...। तहन तँ जेकरा सिरपर काज अबै छै, कोनो-ने-कोनो धरानी पार लगैबते अछि। दू सालक रौदीक झमारसँ घर फोंक भऽ गेल अछि। अखनो धरि पानिक कोनो आश नहि अछि। तँए, पहिने जीअब पार लगत तखन ने किछु। बिआह तँ एक-दू साल आगूओ बढ़ौल जा सकैए।” ओलती लग ठाढ़ भऽ रीता माए-बापक फुसराहैट सुनैत। गप मोड़पर अबिते रीता आगू बढ़ि माए लग आबि ठाढ़ भऽ गेल। अपन बातकेँ छिपबैत गंगानन्द कठ हँसी हँसि पत्नीकेँ कहए लगलखिन- “रीतोक बेटी बिआह करै जोकर भेल जाइ छइ?” मुँह निच्चाँ केने रीता बजली- “बाबू, दुनू बहिन तरे-ऊपरे भऽ गेल अछि। मुदा घरक जे दशा भऽ गेल अछि तइसँ अखन बिआह पार लगब कठिन अछि। जखन समए-साल सुधरत तखन बुझल जेतइ।” मने-मन गंगानन्द सोचैथ जे घरक भार पड़लासँ सभ आगू-पाछू देख किछु करैए। मुड़ी डोलबैत गंगानन्द कहलखिन- “हँ, से तँ ठीके। अखन बिआह करैक अनुकूल समैयो ने अछि। सिरिफ हमरेटा घरमे नै समाजमे बहुतोकेँ घरमे बिआहै जोकर बेटी अछि। सबहक पार तँ भगवान लगेबे करथिन।” पिताक बात सुनि रीताक मनमे शान्ति एलइ। अपन परिवारक चर्च करैत रीता बाजए लगली- “बाबू घरक हालत बड़ खराप भऽ गेल अछि। एक तँ दू-अढ़ाइ बर्खक रौदी, दोसर एक्कोटा समाँग उहिगर नहि! कियो कमाए-खटाए नइ चाहैए। भरि दिन, गप-सप्प लड़बैत समए बितबैए। घरक कोनो धैन-फिकिर नहि। भैयारीमे जेठ रहने दुनू परानी काजक पाछू भरि दिन अपसियाँत रहै छी।” मास पुरैमे दू दिन बँचल। मालगुजारीक अन्तिम सूचना दिअ राजक सिपाहीकेँ पटवारी पठौलक। सिपाही आबि गंगानन्दकेँ कहलकैन- “परसू तक जँ मलगुजारी नै देबै तँ जमीन निलाम भऽ जाएत। पटवारी अपन जाति-बेरादर बुझि चुपचाप पठौलैन। नइ तँ कानून-कैदासँ काज हएत।” जहिना कोनो राजाकेँ राज छीनि कऽ भगा देलापर मनमे धक्का लगैत तहिना सिपाहीक समाचार सुनि गंगानन्दक मनमे एहेन धक्का लगलैन। छाती धकधकाइत, कण्ठ सुखैतगंगानन्द सिपाहीकेँ कहलखिन- “अखन जे दशा अछि तइमे मलगुजारी देब असम्भव अछि। दोसर कोनो रास्ते ने देखै छी।” गंगानन्दक मजबुरी बुझैत सिपाही कहलकैन- “एकटा उपए अछि।” गंगानन्द कऽ सुखाइत कण्ठसँ बहरेलैन- “की?” कने घुसैक कऽ लग आबि सिपाही कहलकैन- “पटवारीकेँ बिआहै जोकर बच्चिया छैन। अहाँ अपन बेटाक बिआह कऽ लिअ। देबो-लेब नीक भेटत। हुनके हाथक काज छैन, जमीनक रसीद सेहो दऽ देता। कियो बुझबो ने करत आ काजो भऽ जाएत।” ◌ शब्द संख्या : 1105 1. (ख) बचनाक अवाज सुनि फुलिया जत्ता चलाएब छोड़ि एक हाथसँ हथरा पकड़ने आगू तकलक। बचनाक मन, जेना धिया-पुताक हाथसँ कौआ रोटी लपैक उड़ि जाइत तहिना सोगाएल। पत्नीसँ नजैर मिलते बचना बाजल- “लछमीपुर जाइ छी जँ कोनो गर रूपैआक लगि जाएत तँ लगौने आएब।” नैहरक नाओं सुनि फुलियाक मनमे गुदगुदी लगल। मुदा विपैतक चद्देर ऊपरेसँ झाँपि देलकै। सोगाएल मने फुलिया बाजल- “जाउ, कपार तँ फुटले अछि मुदा तैयो अपना भरि परियास करू। कपार तँ उनटबो-पुनटबो करै छइ। जँ कहीं नीके गरे उनैट जाए। कनीए थमि जाउ। रोटी पका दइ छी। खा कऽ जाएब।” मन्हुआएल बचना ठोर पटपटबैत बाजल- “बड़ बढ़ियाँ। तुरन्ते हमहूँ दूटा दारही खोखरौने अबै छी। नहाइयो लेब।” बचना दाढ़ी कटबए विदा भेल। फुलिया जत्ता लगक चिक्कस समेट मुजेलामे उठौलक। मुजेला लऽ जा कऽ चुल्हि लग रखलक। चिक्कस रखि कोठीपर सँ चिक्साही सूप आनि गठूलासँ जारैन आनए गेल। हाँइ-हाँइ चुल्हि पजाइर रोटिपक्का घीपैले चुल्हिपर चढ़ौलक। मुजेलासँ लप लऽ लऽ चिक्कस निकालि सूपमे रखलक। पानि दऽ हाँइ-हाँइ सानए लगल। जाबे रोटिपक्का धिपलै ताबे रोटियो ठोकि लेलक। हाथपर ठोकल रोटी रोटिपक्कामे दऽ पकेलक। नौआ गाममे नहि। मूड़नक पता लऽ कऽ सुखेत गेल छल। बिनु दाढ़ी कटौनहि बचना घुमि कऽ आबि गेल। अलगनीपर सँ धोती लऽ नहाइले विदा भेल। जाबे बचना नहा कऽ आएल ताबे फुलिया थारीमे भाँटाक सन्ना आ रोटी परोसि कऽ रखने। हाँइ-हाँइ बचना खा कऽ अँगा पहिर, हाथमे छाता लऽ सासुर विदा भेल। बचना रस्तो चलए आ मने-मन ‘जय महावीरजी, जय महावीरजी’ घुनघुनेबो करए। लछमीपुर लग पहुँचते मने-मन महावीरजीकेँ गोड़ लगि, सबा रूपैआक चीनी कौबला केलक। कौबला करिते जेना बचनाक मनमे संतोख भेल जे काज हेबे करत। लछमीपुर पहुँचते बचना सबहक मन खसल देखलक, जेना केते भारी विपैतमे सभ पड़ल हुअए। करेजपर पाथर रखि बचना सरहोजिकेँ पुछलक- “किए सभ अनून-बिसनून जकाँ छैथ?” नोराएल आँखिए सरहोजि कहलकैन- “पाहुन, की कहबैन खेतक मलगुजारी दू साल पछुआ गेलै तँए परसू सभटा खेत लिलाम भऽ जाएत।” सरहोजिक बात सुनि बचना अवाक् भऽ गेल। मनमे उठलै- के केकर दुख हरत! सबहक गति तँ एक्के रंग अछि! बचना पएरो ने धुअ लगल, चोट्टे गाम घुमि आएल। ◌ शब्द संख्या : 332 1. (ग) बिशेसर घरक आगूमे रस्तापर लोक सभ ठाढ़। रौदाएल बिशेसर हर जोति कऽ अबिते छल। हाथमे हरबाही पेना आ माथमे गमछाक मुरेठा बन्हने। फरिक्केसँ बिशेसर सुनलक जे कचहरीक सिपाही बलजोरी बाड़ीमे कदीमा तोड़ि लेलक। बिशेसरक पत्नी केतबो मनाही केलकै मुदा सिपाही नै मानलक। मोहिनी आ सिपाहीक बीच रक्का-टोकी होइते छल,कदीमा सिपाहीक हाथेमे। लग अबिते बिशेसर सिपाहीकेँ चारि-पाँच पेना लगा कदिमा छीनि लेलक। आ अनधुन गरियबैत सिपाहीकेँ कहलक- “बापक बाड़ी बुझि कदीमा तोड़लेँ। तूँ सिपाही कचहरीक छीही की हमर?” चारि-पाँच गोरे बिशेसरकेँ पकड़ने मुदा तैयो जोशमे हुरैक-हुरैक मारैक कोशिश करैत। लोकक कहलासँ शान्त भेल। मुदा तामसे ठोर पटपटाइते रहलै। शान्त भऽ बाजल- “अहाँ समाज मिलि पकड़लौं तँए चुप भऽ गेलौं मुदा पच्चीस बेर सिपाहीकेँ कान पकैड़ उठाउ-बैसाउ, चाहे थूक फेक कऽ चटाउ। जे फेर एहेन गलती नइ करए। ई चोर छी!लालिश कऽ देबइ। जहलसँ कहियो निकलए नइ देबइ। ई राँड़-मसोमात हमरा बुझलक!” बिशेसरकेँ मात्र दू कट्ठा घराड़ीए-टा। सेहो बेलगान। दुइए गोराक आश्रमो। बेटा-पुतोहु भीन। एकटा तेरह हाथक घर जइमे दूटा हन्ना बनौने। एकटा मे अपने दुनू परानी रहैत आ दोसरमे बेटा-पुतोहु। कनीए-टा अँगना जइमे तीनू भागसँ टाट लगौने। बाँकी डेढ़ कट्ठा बाड़ी बनौने। मोहिनी अपन बाड़ीमे सभ दिन राशि-राशि कऽ तरकारी उपजबैत आ बिशेसर दुनू उखराहा बोइन करैत। दुनू परानीक मिलानक चर्च सौंसे गाममे होइत। अपन-अपन काज बँटने। कोनो हरहर खटखट नहि। दू-सेर-चारि-सेर अन्न घरोमे रहैत। साठि बर्खक बिशेसरक जुआन जकाँ तन दुरूस। ने एकोगो दाँत टुटल आ ने केश पाकल। जेना दोसर-तेसर बोनिहार पचास बरख पुरैत-पुरैत झुनकुट बुढ़ जकाँ भऽ जाइत, तेना नहि। नियमित जिनगी बना दुनू परानी बिशेसर जीबैत। डेढ़ो कट्ठा बाड़ीमे मोहनी कोदारिक काजसँ लऽ कऽ खुरपी हसुआँ धरिक काज अपना हाथसँ करैत। लत्ती-फत्ती-ले छोट-छोट मचानो अपने बना लइत। तरकारीक गाछ रोपैसँ लऽ कऽ ताक-हेर-पटौनी-कमौनी सभ मोहिनीए करैत। अँगने जकाँ चिक्कन बाड़ियो बनौने। दस हाथक एकटा लग्गी बनौने जइसँ गाछक सूखल ठौहरी सभ तोड़ैत। बिशेसर तमाकुल खाइत आ मोहिनी हुक्का पीबैत। अमलो असान। एक्को पाइ खरच नहि। कातिकमे मोहिनी साए गाछ तमाकुलक रोपि लइत। जेकरा सभ तरद्दूत कऽ दइत। माघ अबैत-अबैत गाछ जुआ जाइत। गाछक रंगो बदलए लगैत। गाछकेँ जुआइते काटि लइत। ओइमे बीचला पात बाँछि खाइले रखैत आ निचला पातकेँ, कनोजरिकेँ पीनी कुटैले रखि लइत। जे सालो भरि दुनू बेकतीकेँ चलैत। बिशेसरक बेटा भोलिया जाबे छोट छल ताबे माइक संग घर-आँगनक काजसँ लऽ कऽ जारैन धरि तोड़ि अनै छल। जखन नमहर भेल तँ पिताक संग बोइन करए लगल। बिआहो भेलइ। मुदा छौड़ा-मारड़िक संगतमे पड़ि भाँग पीबए लगल। बाड़िए-झाड़ीमे भाँगक गाछ। ओकर फूलो झाड़ि-झाड़ि आ जट्टाबला डारियो काटि-काटि सूखा-सूखा रखैत...। बिशेसरकेँ कोनो जनतब नहि। मुदा माए देखै। भिनसरू पहरकेँ जखन बिशेसर काज करए विदा हुअए तँ भोलिया सुतले। दू-चारि दिन बिशेसर खिसिया कऽ ‘छौड़ा अवारा भऽ गेल’, ‘मौगियाह भऽ गेल’ कहि अपने काज करए चलि जाइत। भोलिया घुमिते-घामिते रहि जाए। एक दिन खिसिया कऽ बिशेसर कहलकै- “तूँ बेटा छँह एकर माने ई नइ जे तूँ मालिक भऽ गेलँह! दू परानी तोहूँ छँह। बिनु कमेने खेमे की? भीन रह आकि साझी मुदा कमाइए पड़तौ। जो आइसँ फुटे भानस कर।” कहि बिशेसर भोलियाकेँ भीन कऽ देलक। साँझू पहरकेँ बिशेसर सभ दिन डेढ़ियापर बिछान बिछा, जाबे भानस होइ, भजन-कीर्तन करैत। असगरे बिशेसर खौजरियो बजबैत आ भजनो गबैत। ने दोसर कोनो साज आ ने कियो संगी। अपने गबैया अपने बजनियाँ आ अपने सुननिहार। पाँचेटा भजन बिशेसरकेँ अबैत। जएह सभ दिन गबैत। जखन भजन करए बैसए, तखन एक झोंक खूब झमाझम कऽ ‘जय सतनाम जय सतनाम जय सतनाम जय-जय सतनाम गबैत...।’ चुल्हि लग मोहिनी भानसो करैत आ घुनघुना-घुनघुना सतनामो-सतनाम करैत। ‘सतनाम’क पछाइत ‘साँझ भयो नै आयो मुरारी’ बड़ी अह्लादसँ बिशेसर गबैत। अड़ोस-पड़ोसक सभ पाँचो भजन सीख नेने। जहाँ बिशेसर भजन शुरू करै आकि सभ अपना-अपना अँगनामे घुनघुना-घुनघुना गबैत। ‘साँझ’ गौला पछाइत बिशेसर विनती गबैत। विनती गबै काल तेते तन्मय भऽ जाइत जे बुझि पड़ैत जेना भगवान हृदैमे बैस गेलखिन। विनती समाप्त होइते खौजरी रखि तमाकुल चुना कऽ बिशेसर खाइत। मोहिनियोँ चुल्हिए लग हुक्का भरि पीबैत। तमाकुल फेक कुरुर कऽ कृष्णक रूपक वर्णन शुरू करैत। रूप वर्णनक समए बिशेसरकेँ बुझि पड़ै जे अन्तर्ज्ञानसँ ब्रह्माण्ड देख-देख गबै छी। गबैत-गबैत बिशेसर उठि कऽ ठाढ़ भऽ खौजरियो बजबैत आ ठुमकी चालिमे झुमि-झुमि नचबो करैत...। असगर रहितो बिशेसरकेँ बुझि पड़ैत जे हजारो-लाखो लोकक बीच नाचि-गाबि रहल छी। कखनो हँसबो करैत तँ कखनो मुस्कियेबो करैत, तँ कखनो आँखिसँ नोरो झहरए लगैत। पछाइत तौनीसँ मुँह-हाथ पोछि बिशेसर सोहर शुरू करैत। सोहर गबैत-गबैत, भरि दिनक ठेही उतरल बुझि पड़ैत। अन्तमे समदाउन गाबि भजन समाप्त कऽ लइत। ◌ शब्द संख्या : 709 2. रोहितपुरक दानोक चर्च बुड़हो-बुढ़ानुस आश्चर्जसँ करैथ जे एहेन अन्हड़ जिनगीमे नै देखने छेलौं। खेतमे हवा उठल। खढ़-पात उड़ए लगल। गोलियाइत हवा पहिने सुरुंगा ऊपर-मुहेँ–अकास दिस बढ़ल। बढ़ैत-बढ़ैत पसरए लगल। जे हवा खेतमे उठल ओ दौगैत टोलमे प्रवेश केलक। टोलमे प्रवेश करिते अन्हड़ घर-दुआरक छप्परकेँ उड़बैत, क्षणेमे हजारो घरकेँ खसा-पड़ा देलक। सभ चकित! जे नर्तकी जकाँ नचैत हवा कनीए कालक पछाइत एहेन भयंकर रूपमे बदैल गेल जे गामकेँ उजाड़ि-पुजाड़ि कऽ एकबट्ट केलक। दुपहरक समए तँए गामक लोको छिड़ियाएल आ मालो-जाल बाधमे। अन्हड़ समाप्त होइते जे जेतए छल, दौगल गामपर आएल। कियो बच्चा सभकेँ ताकए लगल, तँ कियो माल-जालकेँ। गाममे एकोटा एहेन घर नहि बँचल जेकरा कोनो नोकसान नइ भेल होइ। समुच्चा गामक लोक विपैतमे डुमि गेल। के केकर नोर पोछत! सभकेँ अपने खसैत! जहिना सुरूज डुमला पछाइत अन्हारमे सभ किछु कारीए बुझि पड़ैत तहिना गामक माल-जालसँ लऽ कऽ मनुख धरिक दशा भऽ गेल। रतनाक स्त्री नैहरमे रहैन। बेर झुकि गेल रहए। गाएकेँ पानि पीआ खाइले आगू ओगाड़ि, अन्हार होइ दुआरे चोरबतीकेँ गमछामे लपेट, काँख तर लऽ बच्चो आ स्त्रियोकेँ आनए सासुर विदा भेल। मुँह सूखल, छाती धकधक करैत मुदा तैयो रतना आगूओ बढ़ैत आ पाछुओ घुमि-घुमि तकैत। मनमे होइ जे फेर ने कहीं अन्हड़ दोहरा कऽ चलि आबए। मनमे ईहो होइ जे ओमहर सासुर जाइ छी आ एमहर गाममे जँ अन्हड़ चलि औत तब तँ आरो पहपैटमे पड़ि जाएब...। गामक सीमा टपिते रतना खूब झोंकसँ कखनो दौगबो करैत आ कखनो असथिरोसँ चलैत। रस्तामे बिशेसर भेँट भेलइ। भेँट होइते बिशेसर कुशल पुछलकै। कुशलक उत्तर दैत रतना बाजल- “पाहुन, की कहब नाश भऽ गेल! सबहक घर अन्हड़मे गिर पड़लै। धड़फड़ाएल छी अखन नै रूकब। राता-राती बच्चा सभकेँ लऽ कऽ गाम घूमब।” ‘अन्हड़’ सुनि बिशेसर बाजल- “जाउ-जाउ। एहेन विपैतमे रोकबो उचित नहि।” रतना आगू बढ़ल। बिशेसर आँगन आएल। मोहिनी आँगनमे नै छेली मुदा नैहरक समाद जरूरी बुझि बिशेसर जोरसँ पत्नीकेँ शोर पाड़लक। पतिक अवाज सुनि मोहिनी धड़फड़ाएले एली। मोहिनीकेँ देख बिशेसर बाजल- “नैहर उजैड़ गेल। रतना कहलक।” चौल बुझि मोहिनी हँसैत बजली- “नैहर उजड़तै हमरा दुश्मनकेँ, हमर किए उजड़त। अहूँक मुहसँ दुरभक्खे निकलैए आकि सासुर अकछ लगैए?” समाचारकेँ सत बनबैत बिशेसर बाजल- “एहनो चौल होइ छइ। हँसी-चौल हमरा अहाँक बीच हएत कि गामक अधला बजने हएत।” बिशेसरक बातसँ मोहिनीक मुँह मलिन हुअ लगल। आँखिमे नोर अबए लगलै। आरो अधिक समाचार बुझैक जिज्ञासा सेहो बढ़लै। मुदा बिशेसरकेँ जेतबे गप भेल ओतबे बूझल, तँए ओइसँ आगू किछु कहबे ने करैत। दुनू चुप। कनी कालक पछाइत मोहिनी बजली- “कनी रोहितपुर जा कऽ देख अबियौ। नइ तँ हमहीं जाइ छी।” बुझबैत बिशेसर कहलक- “ओहिना जा कऽ देखलासँ की हएत। जखन जाएब तँ किछु मदैत करबै। देखै छिऐ ने जेकर घर जरै छै ओकर सभ किछु जरि जाइ छइ। मुदा कुटुम-परिवार छुच्छे हाथे आबि-आबि खाली जिज्ञासा करै छइ। की हमहूँ-अहाँ ओहिना करबै। काल्हि भोरे दुनू परानी चलब। घरमे जे अन-पानि अछि सेहो लऽ लेब। अपनो लत्ता-कपड़ा लऽ लेब। जेते दिन रहलासँ हेतै ओते दिन रहि घर बान्हि देबइ।” पतिक विचार सुनि मोहिनीक मन बदलल। पतिक कर्मठता देख मोहिनीक हृदैमे नव सिनेह सेहो जगल। मधुर स्वरमे पतिकेँ कहलखिन- “हम तँ रोहितपुरक बेटी छी सभ काज कऽ देबै मुदा अहाँ तँ गामक जमाए छिऐ अहाँ केना..?” बिशेसरक मन मदैतक अछि जखन कि मोहिनीक बेवहार आ प्रतिष्ठाक...। हँसैत उत्तर देलक- “जखन नीक समए रहै छै तखन ने सासुर आ जमाए। अखन तँ सभ विपैतमे पड़ल अछि। दोस-महीम-कुटुम-परिवारक परीक्षा तँ एहने-एहने समैमे होइ छइ। जे कुटुम-परिवार वा दोस-महीम बेरपर ठाढ़ नै हएत, ओहन लऽ कऽ की लोक नाचत।” सालक आखिरी मास। राजक सभ ऐमला-फैमला आमद-खर्चक हिसाब करैमे लागल। तीन रूपैआ महिनाक नोकरी बराहिल करैत। जे सालक अन्तमे एक्के बेर दरमाहा उठबैत। दरमाहा की उठबैत बखसीश उठबैत। दरमाहा तँ मासे-मास भेटै छै जइसँ लोक गुजर करैए मुदा राजक बराहिल तँ सैयो बीघा जमीनपर हुकुम चलबैत। खेती तँ अपने नहियेँ करैत मुदा एक बटेदारसँ दोसर बटेदारक बीच जमीन दइ-लइक अधिकार बराहिलेक छल। तैसंग धान-मरूआक सबाइ लगौनाइ, असुलनाइ सेहो ओकरे हाथक काज छल। केकरो बेइमान वा इमानदार बनाएब बराहिलक बामा हाथक खेल छल। राजक कचहरीमे गामेक बराहिल मुदा गुमश्ता अन्तुका छल। आमदनीक खल दुनूकेँ फुट-फुट। धन कटनी, मरूआ कटनी वा रब्बी-राइक आमदनी बराहिलक। तैसंग खरिहाँनक खरिहाँनी सेहो बराहिलेक खल छल। गामक बराहिल रहने मालिक आ गौंआँक बीचक कड़ी सेहो। जखन बराहिल कलम-गाछी वा बाध घुमए जाइत आ एक बेर जोरसँ बजैत तँ सौंसे बाधक लोक बुझि कऽ सतर्क भऽ जाइत। जे सतर्क नै होइत ओकरा अनेरे दू-चारिटा गारि सुनए पड़ैत। गाममे ताड़ी पीआकक मेड़िया बराहिल बनौने। ताड़ीक खरच बराहिलक होइ। कमियोँ नहियेँ। मलिकाना पोखैरक माछ, बँसबिट्टीक बाँस इत्यादि बेच लइत। गुमश्ता गाममे कम बुलैत। कचहरीएमे बैसले-बैसल सभ किछु करैत। सभ दिन बराहिल एक डाबा ताड़ी गुमश्ताकेँ पहुँचा दइत। असगरे गुमश्ता भिनसरसँ साँझ धरिमेजखन मन होइ चारि गिलास पीब लिअए। गुमश्ता सेहो गामक दू गोरेकेँ मिला कऽ रखने। दुनू गोरेक खाइ-पीबैक जोगार गुमस्ते करैत। एक गोरे गामक जुआन लड़की सभकेँ फुसला-फुसला अनैत। आ दोसर आम-कटहरसँ लऽ कऽ आनो-आनो चीज गाड़ीपर लादि गुमश्ता ऐठाम पहुँचबैत। बराहिल ताड़ी खूब पीबैत मुदा समाजक बेटीकेँ अपन बेटी बुझि केकरो दिस आखि नै उठबैत। गुमश्ताक किरदानी बराहिल बुझैत तँए जखन मन होइ तखने दसटा गारि बराहिल दऽ दइत। जइसँ बराहिलक धाक गुमश्ताकेँ होइ। धान-मरूआ सबाइ लगबै काल गुमश्ता बोहीए-मे जोड़-घटाउ कऽ हाथ मारि लइत। जइसँ बढ़ियाँ आमदनी भऽ जाइत। सालमे पनरह दिन पटवारी आबि कचहरीक सभ हिसाब-किताब करैत। पटवारीकेँ अबिते बराहिल गाममे सबहक ओइठाम जा-जा मालगुजारी दैक सूचना दइत। कचहरी आबि-आबि किसान रसीद कटबैत। निलामी जमीनक बन्दोबस्त करब पटवारीक काज। गुमश्ता अपन आमदनीक चौथाइ भाग पटवारीकेँ दऽ सालो भरिक हिसाबक मुँह-मिलानी कऽ लइत। पटवारी तीनटा बिआह केने। तीनू स्त्रीकेँ साए-साए बीघा जमीन दऽ तीन गाममे घर बनौने। पोखैर-इनार, कलम-गाछी तीनूकेँ देने। जाबे पटवारी कचहरीमे रहैत ताबे गुमश्ता खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ ऐश-मौजक वस्तु जुटेबैमे परेशान रहैत। बिशेसर बोनिहार रहितो केकरो बान्हल नहि। सभ काज करैक लूरि बिशेसरकेँ। जे गिरहस्त पहिने आबि बिशेसरकेँ कहैत, ओकरेमे बिशेसर काज करए जाइत। भोर होइते बिशेसर मोहिनीकेँ चरिआ भानस करैले कहि अपने घरक अन्न निकालि मोटरी बान्हए लगल। अनक मोटरी बान्हि अपन दुनू बेकतीक नुआ-बिस्तर चौपेत-चौपेत रखलक। भानस होइते दुनू परानी खा रोहितपुर विदा भेल। आगू-आगू बिशेसर माथपर मोटरी नेने आ पाछू-पाछू मोहिनी विदा भेल। रोहितपुरक दच्छिनबरिया बाधमे पहुँचते दुनू परानी रोहितपुरक दुर्दशा देखए लगल। दुर्दशा देख दुनू परानीकेँ जेना पएरमे जत्ता बन्हा गेलै तहिना डेग उठबे ने करइ। ठकुआ कऽ दुनू गोरे आमक गाछ तर बैस रहल। घरपर जाइक साहसे ने होइ। मोहिनी मने-मन सोचए लगली जे एहेन अन्याय कहियो ने देखलिऐ। जखन कि बिशेसरक मनमे उठलै- दुओ मासमे सबहक घर बनत की नहि! जेकरा सभ समचा छै ओ तँ लगले घर बना लेत मुदा जेकरा किछु ने छै ओ तँ पछुआ जाएत! बिनु घरे रहत केतए..? दुनू परानीकेँ रंग-बिरंगक बात मनमे उठए लगलै। तमाकुल चुना कऽ बिशेसर खेलक। तमाकुल खाइते मनमे एलै जे तत्खनात जे उजड़ल-पुजड़ल घरक समान हएत ओकरे काटि-छाँटि कऽ खोपड़ी जकाँ बना लेत। दू मास जे बोइन-बुता करत ओइसँ बाँसो आ खढ़ो कीनि पछाइत घर बान्हि लेत। ततमत करैत दुनू परानी उठि कऽ विदा भेल। नैहर बुझि मोहिनी मोटरी माथपर लेलक। आगू-आगू मोहिनी आ पाछू-पाछू बिशेसर चलल। मोहिनीक भाइयो बोनिहार। एक्केटा घर मोहनाकेँ। मोहनाक घरक चार अन्हड़मे उड़ि कऽ एकटा केरा गाछपर लटकल, एकटा चार गाछपर अँटकल आ दोसर बाड़ीमे खसल। केरो गाछक मुड़ी सभ टुटि-टुटि निच्चाँ-मुहेँ लटकल। आँगन पहुँचते मोहिनीक माथपरसँ भौजाइ मोटरी उताइर ओसारपर रखलक। मोहना ठाठक बन्हन काटि-काटि एक दिस कोरो रखैत आ दोसर दिस बत्ती। झोलाएल घर रहने दुनू परानी मोहना झोलसँ कारी खटखट भेल। बचनी मोटरी रखि अँगनेमे बिछान बिछा, बिशेसरकेँ बैसैले कहि लोटा लऽ कलपर सँ पानि आनए गेल। बिशेसर धोती-अँगा बदैल पानि पीब हाँसू लऽ ठाठक कोरो बत्तीक बन्हन काटि-काटि छँटियाबए लगल। मोटरी खोलि बचनी चाउर निकालि भानसक सुर-सार करए लगली। छोट खुट्टीक बचनी, मेघदूती रंग, दोहरा देह, नमहर केश, करजनी सन गोल-गोल दुनू आँखि। जेहने बजैमे चरफर तेहने काजोमे पिच्छर। मुस्कियाइत बचनी मोहिनीकेँ कहलक- “भगवानो खूब होरी खेलेलैथ! एक्के क्षणमे सौंसे गामक घर उजाड़ि कऽ फेक देलखिन।” जहिना दुनू सारे-बहनोइ– बिशेसर आ मोहना, घरक ठाठ तैयार करैमे भीड़ल तहिना बचनी आ मोहिनी भानसमे। हाँसूसँ बन्हन कटैत बिशेसरक नजैर कोरोक दोगमे बगराक खोंतापर पड़लै। दुनू बगरा मुइल आ थौआ-थाकर अण्डा। बगराकेँ खाइले जे साँखर साँप अबै छल, ओहो खोंताक बगलेमे मुइल पड़ल। बन्हन काटब छोड़ि बिशेसर हँसुआक नोकसँ बगड़ो आ साँपोकेँ उनटा-पुनटा देखए लगल। कनी काल देख दुनूकेँ हँसुआसँ हटा काज करए लगल। एगारहक अमल भऽ गेल। रौदो खड़ा गेल। दुनू ठाठक कोरो-बत्ती सेहो तैयार भऽ गेल। सड़ल कोरो आ सड़ल बत्तीकेँ छाँटि जारैन-ले रखि लेलक। रौदमे काज करब कठिन बुझि बिशेसर लतामक गाछक छाहैरमे ठाठ बैसबए लगल। मने-मन हिसाब जोड़ि बिशेसर दू हाथ छोट ठाठ बैसौलक। मोहनाकेँ अपना बाँस नहि, तँए पुरने कोरो-बत्तीसँ काज चलबए चाहलक। ठाठ बैसा दुनू गोरे हाथ-पएर धोइ खाइले गेल। खा कऽ कनी काल लोट-पोट केलक। पछाइत दुनू गोरे ठाठ बान्हए लगल। सोझका ठाठ तँए चारि बजैत-बजैत दुनू तैयार भऽ गेल। ठाठ बन्हिते दुनू गोरे नओटा खुट्टा गाड़ए लगल। नओ खुट्टा गाड़ि ठाठ चढ़ेलक। मोहनी आ बचनी कुड़कुट, बत्तीक टुकड़ी आ सड़लाहा कोरो सभ समेट कऽ जारैन-ले रखि लेलक आ नीकहा खढ़ सभकेँ समेट अँटियबैले बेरा कऽ रखलक। दुनू गोरे खर्ड़ासँ सौंसे खररलक। काज लगिचाएल देख मोहना बिशेसरकेँ कहलक- “पाहुन आब छोड़ि दियौ। काल्हि कऽ लेब। कोनो की भादो मास छी। काज चलै जोकर तँ भाइए गेल।” हँसैत बिशेसर बाजल- “जेहने कोंढ़ि अहाँ छी, तेहने भुटिया घरवाली छैथ। टहटहौआ इजोरिया अछि। दुनू ननैद-भौजाइ नमहर-नमहर आँटी बान्हत। अहाँ चारपर फेकब हम ऊपरेमे सेरिया-सेरिया छाड़ैत जाएब। खाइ-पीबै राति धरि मठौतो मरा जाएत।” मोहना तरे-तर खुशी होइत जे काल्हि घर गिरल आइ बनि गेल! मुदा रौतुका जगरनासँ मोहनाक देह भँसियाइत। भरि राति दुनू परानी मोहना आ बचनी जगले रहि गेल छल। एकटा ठाठ जखन छड़ा गेलै तखन बिशेसर मोहिनीकेँ कहलक- “आब अहाँ दुनू गोरे नहाउ-सोनाउ गे। भानसो करए पड़त। ताबे हम दुनू गोरे काज करै छी।” मोहिनी आ बचनी नहाइले चलि गेल। नहा कऽ आबि भानस करए लगल। घरो छड़ा गेल। चारपर सँ उतैर बिशेसर मोहनाकेँ कहलक- “आइसँ सीख लीअ जे जेते नमहर विपैत आबए तइसँ बेसी अपन हिम्मत करी। जेते हिम्मत करब तेते असानीसँ काज हएत। अपन काज तँ लगिचाइए गेल, खाली टाट छुटल अछि। चारि बजे भोरे जाबे कौआ-डकतै-डकतै टाटो बैसा लेब। किरिण फुटैत-फुटैत ओहो बान्हि लेब। तइले भरि दिन किए बरदाएब।” कहि दुनू गोरे नहाइले गेल। दुनू गोरे नहा कऽ आबि अँगनेमे बिछानपर बैसल। राति बेसी भेनौं बिशेसर थोड़े काल भजन केलक। पछाइत मोहनाकेँ कहलक- “कनी रवियाकेँ शोर पाड़ियौ?” रविया मोहनाक पितियौत भाए। भरि दिन रविया दुनू परानी ठाठक बन्हन कटलक मुदा तैयो रहिए गेलइ। अबिते रविया पहिने बिशेसरकेँ आ पछाइत मोहिनीकेँ गोड़ लागि बाजल- “पाहुन, किए शोर पाड़लौं?” मुस्की दैत बिशेसर कहलक- “रवि, हम सिरिफ मोहनेक बहनोइ नइ, अहूँक छी आ समाजोक छिऐ। तँए जाबे गामक सबहक घर नै बनि जाएत ताबे रहि सभकेँ मदैत करबै। भरि दिन काज करबै दुनू साँझ खेबइ। एक्को पाइ केकरोसँ बोइन नइ लेबइ।” बिशेसरक बात सुनि रवियाक मन खुशीसँ गदगद भऽ गेलइ। बाजल- “मोहना-भैयाक घर भऽ जेतै तखन ने हमर घर बान्हब?” बिशेसर कहलक- “मोहनक घर बनि गेल। सिरिफ टाटेटा लगबैले अछि जे घड़ी-पहर बान्हि लेब। काल्हि दुनू गोरे अहींक घर बान्हब।” नमहर साँस छोड़ैत रविया बाजल- “पाहुन, ठीके कहबी छै- ‘एक गरूकेँ बहत्तैर आशा।’ हमरा होइ छेलए जे घरमे बोइन नै अछि। अपनो बोइन नै करब तँ खाएब की?” आशा दैत बिशेसर बाजल- “रवि, हम बोइन करए नै एलौं। जँ बोइन करैक रहैत तँ बड़ीटा दुनियाँ छइ। केतौ करितौं, तइले सासुरे किए अबितौं। दस सेर दस टाका तँ अछि नहि जे तइसँ केकरो मदैत करबै मुदा देह तँ अछि। ऐ देहसँ जेते जेकर मदैत हेतै, करबै।” रविया- “पाहुन घरक सभ चीज बाहरेमे छिड़ियाएल अछि। रौतुका समए छिऐ। अखन जाइ छी।” रविया चलि गेल। भुरूकबा उगल। मुर्गी वाँग दिअ लगल। फरीच जकाँ होइते छल कि बिशेसर मोहनाकेँ उठौलक। दुनू गोरे बत्ती-कड़ची जोड़िया पछबरिया टाट बैसौलक। जाबे सुरूज उगल ताबे टाट बान्हि पच्छिमसँ घरमे सटा देलक। टाटकेँ सोझ-साझ कऽ तीनू खुट्टामे चारि-चारिटा बन्हन दऽ देलक। रविया ऐठाम बिशेसर विदा भेल। मोहना बीड़ी पीबै दुआरे पछुआ गेल। बिशेसरकेँ पहुँचते, रवियाक स्त्री सौंसे मुँह झोल लगा देलकै। बिशेसरकेँ कोनो गम नहि। धैनसन। मुनेसरी, जेहने बजैमे हलबलिया तेहने मुहोँ चमकबैमे। कनडेरिए आँखिए मुस्की दैत मुनेसरी बिशेसरकेँ कहलक- “पाहुन, अहाँसँ हम बाजी लगाएब। जँ अहाँ हमरा काजमे हरा देब तँ हम अहीं सेने चलि जाएब, नइ तँ अहाँ..?” मुँहक कारीख तौनीसँ पोछि बिशेसर जवाब देलक- “अहाँमे हम केना सकब। अहाँ दू दाँतक बछौर छी, हम बुढ़ भेलौं। बाजी लगा हम जान गमाएब।” चारू गोरे मिलि भरिए दिनमे घर ठाढ़ कऽ केलक। टाटो लगा लेलक। बिशेसर नहाइले गेल आ रविया दुनू परानी सौंसे खरड़लक। पहिने खर्ड़ासँ खड़ैर, पाछू बाढ़ैनसँ बहारलक। आँगन-घर तँ कारीए रहलै मुदा खढ़-पात साफ भऽ गेलइ। नहा कऽ आबि बिशेसर खौजरी निकालि भजन करए लगल। परसू घरि रोहितपुर भकोभन लगै छल मुदा गोटि-पँगरा घर ठाढ़ भेने किछु-किछु चुहचुही आबि गेल। कचहरीक गुमश्ता आ बराहिल रोहितपुर आबि सगरे गाम घुमि-फिर कऽ देखलक। सौंसे गामक गिरल घर लिखि गुमश्ता राजक मदैत-ले पटवारी ऐठाम जा मुहोसँ कहलक आ गिरल घरक सूचियो देलक। आफद-असमानीमे राज मदैत करैत। पटवारी गुमश्ताक सभ बात सुनि कागत तैयार कऽ मनेजर लग जा सभ बात कहलक। मनेजर, हजारटा बाँस,हजार बोझ खढ़, हजार बोझ खरही आ हजार मुट्ठी साबे बँटैक आदेश दऽ देलक। आदेशक चिट्ठी पटवारीकेँ दैत फुसफुसा कऽ कानमे कहलक- “अदहा बेच हमरा दऽ देब आ अदहा गाममे बाँटि देबइ।” मनेजरक हिसाब सुनि पटवारी अपन हिसाब मने-मन जोड़ि पनरह दिनक समए लऽ लेलक। दोसर दिन कचहरी आबि गुमश्ताकेँ आदेशक चिट्ठी दैत कहलक- “अढ़ाइ-अढ़ाइ साए सभ चीज बाँटि देबै, बाँकी साढ़े सत-सत-साएकेँ बेच कऽ दस दिनक भीतर पठा देब।” जाबे पटवारी गुमश्तासँ गप-सप्प केलक ताबे बराहिल गंज बजारसँ ताड़ियो मंगौलक आ पोखैरसँ माछो ऊपर करबौलक। अण्डाएल अनेरूआ रौह माछ, खूब नमहर-नमहर कुटिया बना तड़बौलक। तीनू गोरे माछक चखना आ ताड़ी भरि-भरि मन खेलक-पीलक। खा-पी कऽ पटवारी चलि गेल। गुमश्ता बराहिलकेँ पटवारीक हुकुम सुनौलक। चिट्ठियो देखए देलकै। बराहिलकेँ ताड़ीक निशाँ चढ़ि गेल रहइ। ललैक कऽ बाजल- “एक-एक हजार समानमे साढ़े सत-सत साए बेचिए कऽ जँ आपसे कऽ देबै तँ गामक लोककेँ की देबै आ अपना दुनू गोरेक हिस्सा की हएत? जेकर घर उजड़लै दुख ओकरा होइ छइ। हम गौंआँ छी। गामक मरद-मौगी तँ हमरे मुँह नोंचत। एहेन काज हम किनौं नै करब। जाइ छी।” गुमश्ता बराहिलसँ डरितो। बराहिलक विचारो ओजनदार। गम्भीर होइत गुमश्ता बराहिलकेँ कहलक- “अखन हमरो निशाँ लगि गेल अछि, अखन जाउ। निचेनमे काल्हि भिनसर गप करब।” बराहिल कचहरीसँ विदा भऽ गेल। कचहरीसँ निकैलते, गुमश्ता-पटवारीक सातो पुरुखाकेँ गरियबैत घरपर आएल। घरपर आबि चौकीपर बैस आरो जोर-जोरसँ दुनू गोरेकेँ गरियाबए लगल- “सभटा चोर अछि! जेकर घर खसलै ओ वेचारा त्राहि-कृष्ण कऽ रहल अछि आ हिनका सभकेँ मोजेक-मोजे जमीन! तीन-तीनटा बहु। दहाइक-दहाइ बेटा-बेटी, तैयो सवुर नहि! हम समाजमे रहै छी। समाजक सुख-दुखकेँ अपन सुख-दुख बुझै छी। कोठरीक पंखा तरमे बैसनिहार गरीबक दुख की बूझत?” बराहिलक गरियबैत देख-सुनि गौंआँ-घरूआ जमा भऽ गेल। जेते लोककेँ बराहिल देखैत ओते तामस चढ़ल जाइत। भरि मन खूब गरियौलक। निशोँ रसे-रसे उतरए लगलै। सबेरे आठ बजे बराहिल कचहरी पहुँचल। गुमश्ता, भिनसुरका खोराक ताड़ी पीब नेने छल। बराहिलकेँ देखते गुमश्ता आग्रह करैत कहए लगल - “आबह-आबह बराहिल! साँझखन जहिना तोहर मन खराब भऽ गेल रहह तहिना पटवारीक हुकुम सुनि हमरो भऽ गेल रहए। ऐठाम तँ हमहीं-तोहीं रहै छी। ऐठामक नीक-अधला तँ हमरे-तोरे सोचए पड़तह। मुदा एक दिस समाजक बीच रहै छी दोसर दिस राजक नोकरी सेहो करै छी। तँए दुनूकेँ मिला चलए पड़तह। जइसँ साँपो मरै आ लाठियो ने टुटइ।” कहि गुमश्ता घरसँ ताड़ीक डाबा निकाललक। चारि गिलास अपनो आ चारि गिलास बराहिलोकेँ पिऔलक। ताड़ी पीबते बराहिलक मन शान्त भेल। बराहिलक सभ तामस ताड़ी तरमे दबा गेल। मुस्कियाइत गुमश्ता बराहिलकेँ कहलक- “हजार बाँस, हजार बोझ खढ़, हजार बोझ खरही आ हजार मुट्ठी साबे बँटैक जे आदेश भेल अछि, ओ तँ हमहीं तोहीं बँटबै। कियो तँ देखैले नै औत। जे मन फूरत से करब। तोहर की विचार?” गुमश्ताक विचार बराहिलकेँ जँचल। मुड़ी डोलबैत बराहिल बाजल- “हौउ, गुमश्ता साहैब अहाँ अनतए रहै छी। हम तँ गामक छी। हमरा तँ दुनू देखए पड़त।” “हँ, बिल्कुल ठीक कहलह।” “केना मिला कऽ चलब?” गुमश्ता- “सभ वस्तुकेँ डेढ़िया कऽ दहक। साढ़े सात-सात साइक हिस्सा आगू पठा देबइ। अदहामे दू-दू साए सभ वस्तु बाँटि देबइ। बाँकी बेच कऽ दुनू गोरे अदहा-अदहा बाँटि लेब।” बराहिल- “हँ, ई एकतरहक विचार अछि। ई करब कन्ना?” गुमश्ता- “पाँचो जातिक मैनजनकेँ बजा लाबह। एक-एक साए सभ चीज पाँचू मैनजनकेँ दऽ देब। एक-एक साए तूँ अपन मेलुआकेँ दऽ दिहक। मैनजनेकेँ भार दऽ देबै जे कचहरीक हुकुम अछि आदहा-अदहा दाम सभ वस्तुक लगत।” बराहिल मानि गेल। समान लेबालक कमी नहि। खाँहिस सभकेँ। केकरो बाँसक जरूरी तँ केकरो खढ़क। बाँसक बीट-लग जा बराहिल बाँस कटबए लगल। अदहा दाम लैत जाए आ बाँस कटबैत जाए। किछु गोरे उधारियो लैलक। खढ़, खरही, साबे सेहो अनधुन बराहिल बेचए लगल। जखन सभकेँ मंगनी, मोल, उधारी बाँस, खढ़, खरही आ साबे भेटलै तखन रोहितपुरबलाकेँ राजक एहसास भेलइ। आफत-असमानीमे राज मदैतो करैए! रोहितपुरक सभ बोनिहार घरहटिया नहि। तँए काज रहनौं बोनिहार बेकार बैसल। बोनिहारकेँ बैसारी देख बिशेसर सभकेँ बजौलक। एका-एकी बिशेसर सभकेँ पुछए लगल- “अहाँकेँ बाँस काटल हएत?” ‘हँ’ ‘बत्ती चीरल हएत?” ‘हँ’ ‘बत्ती छिलल हएत?” ‘हँ’ ‘बन्हन देल हएत?” ‘हँ’ ‘खढ़ अँटियौल हएत?” ‘हँ’ ‘खरौआ जौर बाँटल हएत?” ‘हँ’ ‘टाट बान्हल हएत?” ‘हँ’ “जखन सभ काज करैक लूरि ऐछे तखन बैसल किए छी?” जेकर-जेकर घरहट बाँकी छल, सबहक ओइठाम बिशेसर जा-जा कहलक- “अनेरे अहाँ सभ घरहट पछूएने छी। जहिना बड़का भुमकम भेने छोट-छोट झटका अबैत रहैए तहिना जँ अन्हड़ोक होइ तखन तँ पहपैटमे पड़ि जाएब। तँए जेते जल्दी भऽ सकए ओते जल्दी घरहट कऽ लिअ। समानो ऐछे। बनौनिहारो ऐछे। तखन अनेरे पछुएलासँ की लाभ।” मुदा गामक लोक तँ अखन धरि यएह बुझैत जे पाँचे-छअ गोरे घरहटिया अछि जे काज करिते अछि। बेरे-बेरी ने हएत। बिशेसर सभ बोहिहारकेँ बजा कहलक- “अपन-अपन सभ मेड़िया बना-बना सभसँ काज कराउ। काजो अधिक हएत आ बोनिहार सभकेँ बैसारियो नइ हएत?” लाटमे काज केलासँ सभ सीखबो करत आ रोजियो चलतै।” बिशेसर बढ़ियाँ घरहटिया जे सभ बुझैत। अखन धरि गाममे बिनु कोनो कारणे, एक-दोसरक बीच कटुता, दुश्मनी जे छल ओ बिहाड़िक विपैतमे उड़ए लगल। भाए-भैयारी जकाँ सम्बन्ध बढ़ए लगल। नव विचारक जन्म समाजमे भेल। हँसी-मजाक, खिस्सा-पिहानिक बीच सभ काज करए लगल। साँझ पड़िते सभ काज छोड़ि, अपनामे सभ विचार करैत जे केकर-केकर घरहट आइ भेल आ केकर-केकर बाँकी रहल। अखन धरि जे जातीय कटुता, धरमक उन्माद सबहक मनमे छेलै ओ धीरे-धीरे कमए लगल। छुआ-छूत, ऐगली-पैछलीक विचार ढील हुअ लगल। सभ मनुख छी, सबहक देहमे एक्के रंग खून अछि तँए सभ एकरंग छी। बिशेसरक चर्च सौंसे गाममे चलए लगल। जैठाम बिशेसर काज करै छल तहीठाम रहि खेबो करए आ साँझू पहर खौजरी बजा भजनो करए। अमृतलाल बड़ धनीक तँ नइ मुदा मध्यम रहलासँ समाजमे प्रतिष्ठित बूझल जाइत। हुनको दूटा घर गिरल आ दूटाक कोनचर उजड़ल रहैन। अमृतलाल बिशेसरकेँ कहलखिन- “पाहुन, बजैत तँ लाज होइए मुदा विपैतमे पड़ल छी। काल्हिसँ हमरो घरहट कऽ दिअ? हँसैत बिशेसर उत्तर देलकैन- “जिनगीमे अहिना आपैत-विपैत अबैत-जाइत रहै छै आ अबैत-जाइत रहत। जहियासँ मनुख अछि तहिएसँ हजारो-लाखो बेर अन्हड़-तूफान, पानि-पाथर आ भुमकम होइत आएल तँए कि मनुख मेटा गेल? जहिना हमर-अहाँक पुरखा सभ विपैतकेँ झेललैन तहिना हमहूँ सभ झेलब। तइले निराश किए हएब। अखन हमहीं-अहाँ छी तँए अखन हमरे-अहाँकेँ सामना करए पड़त। आगू-ले ऐगला पीढ़ी करत।” बिशेसरक विचार अमृतलालक हृदैमे चुभि गेलैन। कनी काल गुम्म रहि बजला- “पाहुन, अहाँ गरीब रहितो देहसँ मदैत करए एलौं। ऐसँ पैघ की भऽ सकैए। अखन अहूँ भजन करैले सुढ़ियाएल छी आ हमरो बहुत काज सभ अछि। जाइ छी।” अमृतलाल चलि गेला। बिशेसर भजन करए लगल। आँगन पहुँच अमृतलाल पत्नीकेँ बिशेसरक सम्बन्धमे कहलखिन। नैहरमे सावित्रीक घर एकटा पण्डितक घर लग छैन। बच्चेसँ सावित्री पण्डितजीक अचार-विचारसँ प्रभावित। सावित्री बजली- “यएह छी मनुखक महानता। जे विपैतमे समाँग जकाँ मदैत करए। खेनाइ तँ घरोक लोक खाइए। मुदा अपनो खनदान दिस तँ तकबै, जँ मंगनी कोनो समान भेटत तँ ढेरिया लेब। गामोक बोनिहार तँ बोइन-जलखै लैते अछि मुदा बिशेसर-पाहुन तँ खेबेटा करता। गामक जमाए छैथ, ईहो तँ बुझए पड़त। जहिना ओ हमर घर बनौता तहिना तँ हमरो सोचए पड़त।” अमृतलाल- “हँ, ई तँ ठीके कहलौं। अहाँक की विचार?” सावित्री- “जखन घरहट भऽ जाएत, तखन हुनका धोती पहिरा विदा करबैन। खेनाइ तँ अनको-आन दइए।” भोरे बिशेसर मेड़ियाक संग अमृतलाल ऐठाम आएल। अमृतलाल घरक समचा जोड़ियबैत रहैथ। अबिते बिशेसर धोती-अँगा बदैल पुरना धोतीक टुकड़ा पहिर अमृतलालकेँ कहलखिन- “पहिलुके जकाँ घर बनाएब आकि ओइसँ छोट-पैघ?” अमृतलाल- “घर तँ ओतबेटा बनाएब। मुदा कोरो-बत्ती नव-पुरान मिला कऽ देबइ।” बिशेसरकेँ देख सावित्री मने-मन सोचए लगली- बिशेसर गरीबक सकलमे साक्षात् महादेव छैथ। तँए अनका ऐठाम जेहेन खेनाइ-पिनाइ भेल होइन मुदा हमरो तँ प्रतिष्ठाक प्रश्न अछि। जहिना अपन जमाए तहिना तँ समाजोक। मासे दिनमे, उजड़ल गाम पुनः नव बनि गेल। दुनू परानी बिशेसर अपना गाम विदा भेल। रोहितपुर सिरिफ घरेटा सँ नै विचारोसँ नव बनि गेल। ◌ शब्द संख्या : 3349 3. रोहितपुरसँ सटले लालपुर। घनगर बस्ती, सभ जातिक लोक बसल। परोपट्टामे सभसँ पुरान गाम। घनगर तेहेन जे बहुतो गोरे बेटा-बेटीक बिआह गामेमे केने। बस्तियो तेहेन गदाल जे आइ तक कियो नै सौंसे गामकेँ भोज खुआ सकल। ओना, सभ जातिक बीच जबार, सौजनी आ सभैती भोज आइ धरि अपन-अपन आन-आन गामसँ चलैत। शुरूमे गामउत्तरे दछिने बसल। मुदा परिवारो बढ़लासँ आ आनो-आनो गामक लोककेँ आबि बसलासँ गामक नक्शे बदैल गेल। जहिना उत्तरे-दछिने पहिने छल गाम तहिना आब पुबे-पच्छिमे भऽ गेल। जे कियो आन-आन गाम जा कऽ पढ़लक मात्र ओतबे पढ़ल-लिखल लोक गाममे। ने रोहितपुरमे स्कूल आ ने लगे-पासक कोनो गाममे। गाममे एकटा हकीम जे मात्रिक-अलीनगरमे जा पढ़ने। ओइ हकीमक माम बढ़ियाँ हकीम जे अपने लग रखि भागिनकेँ पढ़ौने। पढ़ल-लिखलमे एकटा दीनानाथो जे वैदागिरी करैत। परोपट्टामे एकेगो वैद दीनानाथ। बच्चेमे दीनानाथ घरसँ पड़ा गेल रहए। पड़ाइक कारण भेलै जे जखन आठे-नअ बर्खक रहए तहिए माए मरि गेलइ। पिता दोसर बिआह कऽ लेलखिन। पिता तँ दीनानाथकेँ बेटे जकाँ मानथिन मुदा सतमाए फुटलो आँखिए नै देखए चाहथिन। हदिघड़ी दीनानाथकेँ दू-चारिटा बात-कथा कहिते रहथिन। माइक बातसँ तंग आबि दीनानाथ घरसँ पड़ा गेल। लालपुरोक आ लगो-पासक गामक पच्चीस-तीस गोरे पटुआ काटए मोरंग-दिनाजपुर जाइत रहए। ओही मेड़ियाक संग दीनानाथ धऽ लेलक। भोरुके गाड़ी पकड़ैक विचार सबहक भेलै, किएक तँ तमुरियासँ निर्मली जाइक गाड़ी तीन बजे भोरमे रहइ। जँ ऐ गाड़ीसँ नै जाएब तँ पछाइत दस बजे दिनमे गाड़ी तमुरियासँ निर्मलीक अछि। जेकरा पकड़ने बारह-एक बजे निर्मलीए पहुँचब। जइसँ गेलापर कोसियो धार पार भेल हएत की नहि? ई शंका सबहक मनमे रहइ। मुदा तीन बजे भोरुका गाड़ी पकड़ने साढ़े पाँच-छअ बजे निर्मली पहुँच जाएत। जइसँ गेलापर लोक असानीसँ सबेर-सकाल कोसीपार भऽ आठ नअ बजे राति होइत-होइत बथनाहा पहुँच जाइए। बथनाहासँ जोगबनी जाइक अन्तिम बस साढ़े-दस बजे रातिमे तँए ओकरा ठेकानि कऽ सबहक संग दिनानाथो विचारि लेलक जे भोरुका गाड़ी पकैड़ विदा हएब। ने माएकेँ किछु कहबैन आ ने पिताकेँ। चुप-चाप विदा भऽ जाएब। जँ माए-बाबूकेँ कहबैन तँ जाइए-कालमे अट्ठाबज्जर खसत। तँए ने दीनानाथ कपड़ा-लत्ता साफ केलक आ ने बटखरचा-ले केकरो कहलक। मने-मन दीनानाथ विचारि नेने जे माएबला चानीक पाइत आ सोनाक छक जे चोरा कऽ रखने छी, ओ लऽ लेब आ निर्मलीमे बेच बटखरचोक ओरियान कऽ लेब आ पेंटो-गंजी कीनि लेब। नाहक खेबाइ आ बसक भाड़ा सेहो भाइए जाएत। रातिए-मे पटुआ कटनिहार सभ खा-पी कऽ गाड़ी पकड़ैले तमुरिया विदा भेल। किएक तँ एक-दू गोरे तँ छी नहि। पच्चीस-तीस गोरेक संगोर करैमे गाड़ीए छुटि सकैए। सबेर-सकाल टीशन पहुँचने ओतै मुसाफिर खानामे कनी काल सुतियो रहब आ भोरमे गाड़ियो असानीसँ पकड़ा जाएत। दीनानाथो पाइत आ छक लऽ संग लगि गेल। तमुरिया स्टेशन पहुँच सभ अपनामे विचार केलक जे भाड़ा-भुड़ीक पाइ एकठाम जमा कऽ लिअ। किएक तँ सभ जँ अपन-अपन दिअ लगबै तँ हूलि-मालि हुअ लगत। ई सोचि तीन-तीन रूपैआ सभ कियो बौआजी लग जमा केलक। बौआजी सबहक मेट। साले-साल पटुआ काटैले, धान रौपैले आ धान काटैले मोरंग जाइत-अबैत। दीनानाथ तमुरियामे टिकट नइ कटौलक किएक तँ पाइए ने रहइ। भोरमे गाड़ी अबिते सभ चढ़ि गेल। निर्मली पहुँचैत-पहुँचैत भिनसर भऽ गेलइ। गाड़ीसँ उतैर दीनानाथ बौआजीकेँ कहलक- “कक्का, हमरा एकजोड़ चानीक ‘पाइत’ आ एकटा सोनाक ‘छक’ अछि। ओकरा बेच दिअ। जइसँ बटखरचो भऽ जाएत आ कपड़ो नइ अछि सेहो कीनि लेब।” दीनानाथक बात सुनि बौआजी पुछलक- “बौआ, तूँ जे हमरा सबहक संग जाइ छह से तोरा बुते पटुआ काटल हेतह। पटुआ काटैमे बड़ भीड़ होइ छइ। तहूमे मोटका-मोटका जोंक सेहो पकड़ै छइ।” दीनानाथ तँ घरसँ तंग आबि भागल, तँए जीबठ बान्हि बाजल- “हम केतौ नोकरीए धऽ लेब। नै बहुत दरमाहा देत तँ नै देत। कम-सँ-कम खाइयोले तँ देत।” दीनानाथक बात सुनि बौआजी गुम्म भऽ गेल। सभकेँ मुसाफिर खानामे बैसाए दीनानाथकेँ संग केने बजार विदा भेल। दोकानो सभ बन्ने। सोना-चानीक दोकानदार नहा कऽ पूजा करैत। बौआजीकेँ देख रूपचन पुछलक- “हमरा दोकानक काज अछि?” “हँ, एक जोड़ पाइत आ एकटा छक बेचैक अछि।” आमदनी देख रूपचन हाँइ-हाँइ पूजा कऽ दोकान लगौलक। भिनसुरका समए। तँए रूपचन सोचलक जे कम्मो नफ्फापर समान कीनि लेब। जँ गहिंकी घुमि कऽ चलि जाएत तँ भरि दिन खटपट होइते रहत। दुनू वस्तुकेँ जोखि सेठजी आठ रूपैआ दाम सुनेलकै। आठ रूपैआ सुनि दीनानाथ मने-मन खुशी होइत जे बहुत भेल। आठो रूपैआ लऽ दीनानाथ एक रूपैआकेँ चूड़ा-मुरही, दू आनाक गुड़, एक रूपैआमे एकटा तौनी, एक रूपैआमे एकटा गंजी आ आठ आनामे एकटा झोरा कीनलक। झोरामे सभ समान रखि गंजी पहिर लेलक। टीशनपर आबि सबहक संग दीनानाथो विदा भेल। निर्मलीसँ सोझे पूब-मुहेँ सभ विदा भेल। पाँच कोस पूब कोसी धार। तीनटा नमहर-नमहर धार सटले-सटल। जइ तीनूमे नाहसँ पार हुअ पड़ैत। पहिल धारक कात पहुँचैत-पहुँचैत दस बजि गेलइ। धारक कातमे ठीकेदार खोपड़ी बनौने। जैठाम तीनू धारक खेबा लइत। सभ कियो ओइ खोपड़ीमे बैस जलखै करए लगल। जलखै खा सभ कोसीए-क पानि पीलक। धारक पानियोँ हरिअर कचोर। पानि देख सभकेँ नहाइक मन होइ मुदा रस्ता काटै दुआरे कियो ने नहाएल। घाटक ठीकेदार छपरिया। जे खूब मनमानी घाटपर करैत। सुखलो धारक खेबा खिहारि-खिहारि ओसलैत। जँ कियो खेबा नै दिअ चाहै तँ ओकरा गरिएबो करैत आ मारबो करैत। मुदा बिनु खेबा नेने किनौं नइ छोड़ैत। घुमती नाह अबिते सभ चढ़ल। नाह खुगलै। पानिक वेग देख दीनानाथकेँ डर हुअ लगलै। बाँकी गोरे साले-साल पार होइत तँए सभकेँ बूझल। दीनानाथक मनमे होइ जे जँ कहीं बीच धारमे नाह डुमत तँ एक्को गोरे ने बँचब। तँए दीनानाथ मने-मन ‘कोसी महरानी की जाय’ जपए लगल..। तीनू धार पार होइत-होइत बेर झुकि गेल। नाहसँ उतैरते दीनानाथ कोसी धारकेँ गोड़ लगि सबहक संग विदा भेल। बथनाहा पहुँचैत-पहुँचैत गोसाँइ डुमि गेलइ। भूखो सभकेँ लगि गेलइ। बस अबैमे देरी बुझि सभ अपन-अपन मोटरी खोलि चूड़ा निकालि खाए लगल। जाबे बस एलै ताबे सभ चूड़ा फाँकि-फाँकि पानि पीलक। बस अबिते बौआजी कन्टेक्टरकेँ सभ आदमीक गिनती करा चढ़ौलक। दीनानाथक अदहा मासुल आ सबहक पूरा मासुल जोड़ि बौआजी कन्टेक्टरकेँ दऽ देलक। बस चलल। जोगबनी जाइत-जाइत रातिक आठ बजि गेल। जोगबनी आ बिराटनगरक बीच नेपाल भारतक सीमा। सीमापर एकटा पाथरक पीलर गाड़ल। रतिगर बुझि सभ सोचलक जे एतै राति बिताएब नीक हएत। बिजलीक इजोतो रहइ। बस स्टेण्डमे सभकेँ बैसा बौआजी रहैक जगह टेबए लगल। बिजलीक इजोतसँ दिने जकाँ बुझि पड़ैत। बस स्टेण्डसँ बीघा भरि दच्छिन एकटा वैदक घर। घरक बगलेमे एकटा अशोकक गाछ। अशोकक गाछक निच्चाँमे ईटा-सिमटीक चबुतरा बनल। चबुतरा देख बौआजीक मनमे एलै जे बड़ सुन्दर जगह अछि, एतै राति बिता लेब। चबुतराक बगलेमे एकटा चापा-कलो। बौआजी चबुतरा देख घुमि कऽ आबि सभकेँ कहलक। सभ अपन-अपन मोटरी लऽ विदा भेल। चबुतरापर सभ अपन-अपन मोटरी रखि कलपर हाथ-पएर धुअ लगल। हाथ-पएर धोइ सभ अपन-अपन मोटरी खोलि रोटी आ अल्लुक भुजिया निकालि-निकालि खाइक सुर-सार करए लगल। भरि दिन सभ फँके-फुँकी खा रस्ता काटने तँए सभकेँ जोरगर भूख लगल। दीनानाथकेँ रोटी नहि, तँए चूड़ा-गुड़ निकालि खाइक विचार केलक। चूड़ा-गुड़ देख बौआजी दीनानाथकेँ कहलक- “बौआ, फाँक्का-फुँक्कीसँ पेट थोड़े भरै छइ। चूड़ा रखि लएह। हमरा तीन दिन खाइ जोकर रोटी अछि। तोहूँ रोटीए खा।” दीनानाथ चूड़ा रखि लेलक। बौआजी तीनटा रोटी आ भुजिया देलकै दीनानाथ खाए लगल। सभ कियो रोटी आ भुजिया खा भरि पेट पानि पीलक। पानि पीबते सभकेँ ओंघी लगलै। पतियानी लगा सभ सुति रहल। भरि दिनक सभ थाकल। एक्के निने राति बित गेलइ। भोरे वैद टहलैले निकलला तँ दीनानाथकेँ कलपर मुँह-हाथ धोइत देखलैन। एकटकसँ वैद दीनानाथकेँ देख लगमे जा पुछलखिन- “बौआ, केतए रहै छह?” दीनानाथ बाजल- “मधमन्नी जिला रहै छी।” “केतए जाइ छह?” “नोकरी करए जाइ छी।” नोकरीक नाओं सुनि, कनी काल गुम्म भऽ वैद पुछलखिन- “एतै रहबह?” दीनानाथ- “हँ, रहब।” वैद- “मेड़ियाक मेट के छिअ?” दीनानाथ बौआजीकेँ ओंगरीसँ देखा देलक। बौआजी लग जा वैद कहलखिन- “ऐ बच्चाकेँ ऐठाम रहए दियौ। कोनो दिक्कत नइ हेतइ।” बौआजी दीनानाथकेँ पुछलक- “बौआ, एतै रहबह?” दीनानाकेँ मनमे रहै जे केतौ ठर लगत तँ रहि जाएब। बाजल- “हँ।” दीनानाथ रहि गेल आ मेड़ियाक संग बौआजी पटुआ काटए विदा भेल। सुशील अयुर्वेदिक वैद। दुइए परानी। दुनू परानी वैदागिरी करैथ। दीनानाथकेँ पाबि दुनू परानी सुशील हृदैसँ खुशी भेला। बेटा जकाँ दीनानाथकेँ मानए लगलखिन। दीनानाथो अपने माए-बाप जकाँ सेवा करए लगल। हदिघड़ी सुशील अपने संग दीनानाथकेँ राखए लगलखिन। सुशील जड़ी-बुटीक दवाइयो बनबैत रहैथ आ इलाजो करैथ। अपने बाड़ीमे सैयो किस्मक लत्तीसँ लऽ कऽ गाछ धरि लगौने। मासमे एक दिन उत्तरबरिया पहाड़पर सँ पहाड़ी जड़ी-बुटी आनए जाथि। दीनानाथोकेँ संग नेने जाथिन। पहाड़ो बेसी दूर नहि। छबे सात कोसपर। भिनसरे दुनू गोरे जलखै खा बस पकैड़ लैथ आ बेर धरि घुमि कऽ चलि अबैथ। शुरूमे तँ दीनानाथकेँ जड़ी चिन्हबए पड़लैन मुदा किछुए दिनक पछाइत दीनानाथो जड़ी चिन्हए लगल। साँझू पहरकेँ जखन रोगी एनाइ पतरा जाइत तखन सुशील दीनानाथकेँ पढ़ेबो-लिखेबो करै छेलखिन। दीनानाथ एते तल्लीन भऽ रहए लगल जे घरक सुधि-बुधि सभ बिसैर गेल। दस बरख दीनानाथ सुशील वैद लग रहल। दसे बर्खमे दीनानाथ वैद बनि गेल। रोग चिन्हैसँ लऽ कऽ दवाइ देनाइ, दवाइ बनौनाइ सभ सीख लेलक। बच्चा दीनानाथ जुआन भऽ गेल। बिआह करै जोकर भऽ गेल। सुशीलक विचार रहैन जे दीनानाथकेँ अहीठाम बिआह करा दिऐ, मुदा दीनानाथकेँ घरक सोह घींचए लगलै। बिसरल माए-बाप, सर-समाज मन पड़ए लगलै। एक दिन दीनानाथ सुशीलकेँ कहलकैन- “बाबूजी, हम गाम जाएब। बहुत दिन माता-पिता आ समाजक लोककेँ देखना भऽ गेल।” दीनानाथक विचार सुनि सुशील बजला- “बौआ, दुनियाँ बड़ीटा छइ। सभ मनुखकेँ चाही जे केतौ रहि मनुखक सेवा करी। यएह सभसँ पैघ धरम छी।” दीनानाथ सिरिफ दवाइए-दारू नै सीखलक बल्कि जिनगीक नीक-अधला सेहो सीखलक। बाजल- “बाबूजी, मनुखक सेवा जरूर धरम होइत मुदा जैठामक लोक अधिक पछुआएल अछि ओकर सेवा तँ अगुआएल मनुखक सेवासँ पैघ होइत। ऐठाम देखै छी जे लोक बहुत अगुआएल अछि मुदा जैठाम हमर घर अछि, ओइठामक लोक बहुत पछुआएल अछि तँए ओकर सेवा करब हम पैघ बुझै छी।” दीनानाथक विचार सुशीलक हृदैमे चुभि गेलैन। अपन सहमत दैत कहि देलखिन। दीनानाथ गाम चलि आएल। गाम अबिते दीनानाकेँ देखैले गामक लोक उनैट गेल। अखन धरि सबहक मनमे यएह रहै जे दीनानाथ बौड़ गेल। मुदा बदलल दीनानाथ, गामक एक इंसान बनि, परिवारिक नहि समाजिक लोक बनि गाम आएल। एक सुयोग्य वैद बुझि गौंआँ-सभ अपन-अपन समाँग बुझए लगल। सभ मने-मन सोचए लगल जे जइ दुखक चलैत परेशान रहै छेलौं ओइ परेशानीकेँ मेटबैबला आब गामेमे दीनानाथ भऽ गेल। लालपुरमे सात पुश्तसँ लेलहाक घर। शुरूएमे लेलहाक पूर्वज जेतए घर बनौने छल ओतए बारह कट्ठा जमीन बनौलक। बीचमे घर आ चारूकात किछु बाड़ियो आ किछु धनखेतियो। लेलहाक परिवार एक-पुरखिया। खनदानमे बेटी तँ बेसियो होइत मुदा बेटा एक्केटा। लेलहोकेँ एक्केटा बेटा गुलबा। गुलबा लताम तोड़ए गाछपर चढ़ल। गाछेपर देह झुनझुनाए लगलै। पहिने तँ गुलबा बुझलक जे ऊँच-नीचमे पएर पड़ल तँए देह झुनझुनाएल मुदा झुनझुनी बढ़िते गेलइ। झुनझुनी बढ़ैत देख गुलबा धड़फड़ा कऽ गाछपर सँ उतैर अँगना आबि माएकेँ कहलक- “माए, सौंसे पीट्ठी झुनझुनाइए।” झुनझुनी सुनि माए आँगनमे बिछान बिछा गुलबाकेँ सुतैले कहलक- आ घरसँ करूतेलक शीशी आनि मालिश करए लगल। मुदा तइसँ एक्को मिसिया झुनझुनी कमल नहि। झुनझुनी बढ़ैत देख गुलबा कानए लगल। कानब देख गुलबाक माए-तेतरी पतिकेँ बजबए विदा भेल। दछिनबरिया बाधमे लेलहा गाए चरबैत। फरिक्केसँ तेतरी, लेलहाकेँ गाए चरबैत देख, जोरसँ शोर पाड़ए लगल। मुदा पछबा हवा दुआरे लेलहा सुनबे ने करैत। तेतरी सोरो पाड़ैत आ आगू-मुहेँ बढ़लो जाइत। जखन तेतरी कनी और लग पहुँचल तखन लेलहा सुनि पुछलक- “किए एते हल्ला करै छी। कनी फरिछा कऽ कहूँ।” “गुलबाकेँ लतामक गाछपर भूत लगि गेलइ! चलू गामपर!” भूतक नाओं सुनिते लेलहाक देह थरथराए लगलै। गाए हँकने घर दिस विदा भेल। तेतरी चोट्टे घुमि आएल। तीनू माल– गाए, गौड़ आ एकटा बच्छाकेँ हँकने लेलहा घरो दिस अबैत आ मने-मन विचारबो करैत जे अही बेर दशमीमे दूटा नवकी कनियाँ डाइन सीखलक। ओही दुनू मौगियामे केकरो किरदानी छी। भरिसक मन्तर पक्का बनबै दुआरे गुलबाक जान लेत। घरपर आबि लेलहा तीनू मालकेँ बान्हि एक आहूल घास आगूमे दऽ गुलबाकेँ देखए अँगना आएल। टोलक लोकसँ अँगना भरल। लेलहाकेँ देख एकटा बुड़ही, जिनका सभ दादी कहैत, बजली- “गुलबाकेँ भूत लगल छौ। झब-दे ढोरबाकेँ बजौने आ। माथाहाथ देतै, लगले छुटि जेतइ।” दादीक बात सुनि तेतरी डपटैत घरबला-केँ कहलक- “बकर-बकर मुँह तकने हएत। जल्दी ढोरबा भैयाकेँ बजौने आउ?” डरे लेलहाक देह थर-थर कँपैत। भूतक ओते डर लेलहाक मनमे नै होइत जेते गुलबा मरने वंशक अन्त होइक। दौगल लेलहा ढोरबा ऐठाम विदा भेल। ढोरबा घरपर नहि। बाँस काटैले बँसबारि गेल छल। ढोरबाक घरपर लेलहा पहुँच भाँज लगबए लगल। मुदा घरपर कोनो भाँजे ने लगलै। बड़ी काल एमहर-ओमहर ताकि ढोरबाक भनसियाकेँ पुछलक। ढोरबाक भनसिया बाँस काटैक नाओं कहलकै। चोट्टे लेलहा ढोरबाक बँसबारि दिस विदा भेल। तीन सलिया पाकल बाँस ढोरबा कटने, जे घींचले ने होइ। असगरे ढोरबा अपसियाँत-अपसियाँत भेल। सगरे देह पसेनासँ भीजल। चारूकात आँखि उठा ढोरबा तकैत जे केकरो देखबै तँ शोर पाड़ि बाँस घींच लेब। लेलहाकेँ अबैत देख ढोरबा बैस कऽ तमाकुल चुनबए लगल। जाबे लेलहा लग आएल, ताबे ढोरबो तमाकुल चुना अपनो मुँहमे लेलक आ लेलहो हाथमे देलक। लेलहाक कँपैत देह देख ढोरबा पुछलक- “एना कँपै किए छह?” मिरमिरा कऽ लेलहा बाजल- “भैया, की कहबह। छौड़ाकेँ लतामक गाछपर भूत लगि गेलै तँए तोरा बजबैले दौगल एलौं। जल्दी चलह।” लेलहाक बात सुनि ढोरबा बाजल- “अहीले एते अपसियाँत छह! जखन आबि गेलह तँ भूत कि भूतक बापो रहत तँ छोड़ि कऽ भागए पड़तै। बाँस झोंझमे ओझरा गेल अछि, पहिने ओकरा उताइर दैह तखन चलब।” लेलहा- “ताबे बाँस छोड़ि दहक। पहिने चलह। पछाइत बाँस उताइर कऽ लऽ जैहह।” “झार-फूकक बात तूँ नै ने बुझबहक। गामपर जा कऽ पहिने हाथ-पएर धोअब, देहपर गंगाजल छीटब, तखन ने घरक गोसाइकेँ गोड़ लागि, देह बान्हि विदा हएब। एक-पर-एक दाय-माय आ एक-पर-एक करामाती डाइन-जोगिन छैथ। जँ कहीं उनटे चोट कऽ दैथ! तखन?” दुनू गोरे बाँस घींचए लगल। केतबो जोर दुनू गोरे दइ मुदा बाँस निकलबे ने करैत। पात तोड़निहार बाँसक छिपकेँ कड़चीसँ गछाड़ि देने रहइ। ढोरबा हियासि कऽ बाँस देखए लगल तँ मुड़ी गछारल नजैर पड़लै। तखन ढोरबा बाँसपर चढ़ि गछरलाहा कड़चीकेँ काटलक। कड़ची काटि कऽ उतैर जहाँ दुनू गोरे एक्के जोर देलक कि बाँस हरहरा कऽ निकैल गेल। बाँस उतारिते ढोरबा हाँइ-हाँइ पाँगए लगल। लेलहा कड़ची बीछए लगल। कड़चीक बोझ बान्हि लेलहा लेलक आ ढोरबा बाँस कान्हपर लऽ विदा भेल। घरपर अबिते ढोरबा इनारपर जा हाथ-पएर धोइ, आँगन जा गंगाजल छीटि, गोसाइकेँ गोड़ लगि, देह बान्हि निकलल। दुनू गोरे विदा भेल। लेलहाक आँगनमे लोकक करमान लगल। लेलहा ऐठाम पहुँचते ढोरबाकेँ तेतरी कहलक- “भैया, झब-दे देखथुन। गुलबाकेँ जी घींचने जाइ छइ।” ढोरबा टीक खोलि लेलहाकेँ कहलक- “दूटा कुश लाबह।” लेलहा बाजल- “भाय की कहबह, ऐ बेर तेहेन बाढ़ि आएल जे कुशो दहा गेल। गाममे कियो ने कुश उखाड़लक। एक्को दिन बाप-दादाकेँ जलो ने देलिऐ। केतएसँ कुश आनब।” लेलहाक बात सुनि ढोरबा कहलक- “नै कुश भेटतह तँ चौड़काँटू बाढ़ैनमे सँ दूटा नेने आबह।” तेतरी बाढ़ैनमे सँ दूटा चौड़काँटू निकालि ढोरबाक हाथमे देलक। ढोरबा झार-फूक करए लगल। झाड़ैत-फुकैत जेते मन्तर ढोरबाकेँ अबैत रहै ओ सभटा ठोर पटपटबैत पढ़ि गेल। मंत्र पढ़ि मुहसँ फूकि गुलबाकेँ पुछलक- “बौआ, मन केहेन लगै छौ?” कुहरैत गुलबा बाजल- “ओहिना लगैए।” ढोरबा तेतरीकेँ कहलक- “सभकेँ अँगनासँ हटा दियौ। मनतर काजे ने करैए।” सभकेँ अँगनासँ हटौला पछाइत ढोरबा जोर-जोरसँ मनतर पढ़ए लगल। मुदा तैयो गुलबाक कनकनी असान नइ भेल। कनी काल गुम्म भऽ ढोरबा बाजल- “कनी पंचमीक माटि लाउ।” पंचमीक माटि लेलहाकेँ अपना नहि, दशमीएमे चिक्कैन माटि नै रहने ओहीसँ घर नीपि लेलक। पड़ोसिया-आँगनसँ तेतरी पंचमीक माटि आनि, सिलौटपर लोढ़हीसँ फोड़िचँगेरीमे देलक। बाढ़ैनक खढ़ रखि ढोरबा पंचमी माटिसँ झारए लगल। बीच-बीचमे गुलबाकेँ पुछबो करइ- “मन केहेन लगै छौ, हल्लुक लगै छौ किने?” जखन ढोरबा झारि कऽ निचेन भेल तखन फेर गुलबाकेँ पुछलक- “आब बाज केहेन लगै छौ?” गुलबा बाजल- “ओहिना लगैए। एक्को मिसिया दुखेनाइ नै कमल।” खिसिया कऽ ढोरबा विदा होइत लेलहाकेँ कहलक- “नवटोल गहवरसँ भगता बजा लाबह। हमरा बुते नै छुटतै।” ढोरबाकेँ विदा होइत देख तेतरी घौना पसारि कनबो करए आ बजबो करए- “हे बरहम बाबा हम कोन अपराध केलियह जे एते सतबै छह।” लेलहोक आँखिमे नोर ढबढ़बा गेल। दुनू हाथ माथपर लऽ मने-मन सोचए लगल- आब गुलबा नै बँचत..! कनी काल गुन-धुन कऽ लेलहा नवटोल जाइले तैयार भेल। कोसे भरिपर नवटोल। भगतजीकेँ बजबए लेलहा नवटोल विदा भेल। रस्तामे लेलहा मने-मन कौबला केलक जे ‘अगर गुलबाकेँ दुख छुटि जाएत तँ जोड़ भरि छागर बरहम बाबाकेँ चढ़ाएब।’ चलबो करए आ मने-मन लेलहा ‘जय बरहम बाबा, जय बरहम बाबा’ जपबो करए। नवटोल पहुँच लेलहा गहवरक भगताकेँ भँजियाबए लगल। भगता गाममे नहि। उजानमे हैजा भेल ओतै गेल। सोगाएल मन लेलहा रहबे करइ। असोथकित भऽ गहवरक आगूक अशोकक गाछक निच्चाँमे बैस भगताक रस्ता देखए लगल। उजानक चारू सीमा बान्हि भगता नवटोल विदा भेल। थोड़बे कालक पछाइत पहुँचल तँ एकरा बैसल देखलक। चिन्हैत नहि। भगते लेलहाकेँ पुछलक- “किए बैसल छी?” सिमसल आँखि लेलहाक, पोछैत बाजल- “भगतजीसँ काज अछि।” “केहेन काज अछि, हमहीं छी।” भगताक बात सुनि जेना वादलसँ झँपाएल सुरूज हवाक सिहकीसँ वादलकेँ छँटिते भुक-दे उगैत तहिना लेलहाकेँ भेल। मुस्कियाइत लेलहा भगतजीकेँ कहलक- “भगतजी, हमरा बेटाकेँ लतामक गाछपर भूत लगि गेल तँए बजबए एलौं।” “हम तँ बेरागन दिनकेँ भाउ करै छी। आइ तँ बेरागन नै छी। डाली लगा दियौ शुक्र दिन आएब।” बेवसीक अवाजमे लेलहा बाजल- “भगतजी, कोनो उपए करियौ। अहीं केने सभ हेतइ। बड़ आशासँ आएल छी। ओहिना केना घुमि जाएब?” देरी होइत देख तेतरी एक गोरेकेँ नवटोल पठौलक। धड़फड़ाएल आबि ओ लेलहाकेँ पुछलक- “तोरे आशा-वाटी सभ तकै छह तूँ आबि कऽ ऐठाम बैस रहलक?” मन्हुआएल लेलहा, बाजल- “भगतजी नै छेलखिन तँए देरी भऽ गेल। अखने एलखिन तँ कहलयैन।” ताबेमे भगतजी एकटा फूल नेने आबि दैत कहलखिन- “गमछाक खूटमे बान्हि लिअ। घरपर पहुँचते कहालीकेँ खुआ देबइ। लगले छुटि जेतइ।” फूल लऽ दुनू गोरे विदा भेल। रस्तामे होइ जे गुलबाकेँ की भेल हएत की नहि! मुदा करैत की। घरपर अबिते लेलहा गुलबाकेँ फूल खुऔलक। फूल खुएलाक कनीए कालक पछाइत लेलहा गुलबाकेँ पुछलक- “मन केहेन लगै छौ?” गुलबा कुहरैत बाजल- “ओहिना लगैए” गाममे अनेको रंगक बात चलैत। कियो बजैत- “गुलबाकेँ डाइन केने छइ।” तँ कियो कहैत- “गुलबाकेँ देवी लगल छइ।” कियो बजैत- “मोतिया बेटी- जे मरि गेल, तेकरे संग ने हदिघड़ी खेलाइत रहै छल। वएह लगि गेल छइ। बिनु लऽ गेने थोड़े छोड़तै।” बिच्चेमे गुलटेनमा आबि लेलहाकेँ कहलकै- “एकटा गुनी कटहरबामे अछि, नेपालक सीख छी, ओकरा बजा आनह। जरूर छोड़ा देतइ” कटहरबा लालपुरसँ सटले पच्छिममे कनीए-टा टोल अछि। कटहरक गाछ अधिक रहने ‘कटहरबा’ नाओं पड़लै। दौग-बड़हा करैत-करैत लेलहा असोथकित भऽ गेल। मुदा की करत। केतौ जाइक साहसे ने होइ मुदा विपैते तेहेन पड़ल छै मरितो दम तक छोड़त केना? लेलहा कटहरबा विदा भेल। कटहरबा जा गुनीकेँ भँजियौलक। गुनीसँ भेँट होइते लेलहा सभ बात कहलक। लेलहाक बात सुनि गुनी कहलकै- “हम तँ खाली जनिजातिये-टाकेँ झार-फूक करै छी। पुरुखक मनतर नै अबैए। हम जा कऽ की करब। जँ जनिजाति रहैत तँ गारंटी दऽ छोड़ा दैतौं। केतेकोकेँ छोड़ेलौं। केहेन-केहेन भुतलग्गूकेँ जे बताह जकाँ करै छल, छोड़ेलौं।” गुनीक नाओं भालेसर। कमाइले भालेसर नेपाल गेल। बिराटनगर पहुँच भालेसर उत्तर-मुहेँ विदा भेल। जाइत-जाइत धरानसँ तीन किलोमीटर पाछुऐ रहै कि गोसाँइ डुमि गेल। जंगली-पहाड़ी रस्ता। आगू बढ़ैक हिम्मते ने भेलइ। रस्ताक पच्छिम एकटा दू महला काठक घर देखलक। ओइठाम जा भालेसर घरवारीकेँ कहलक जे राति-बीच रहब। खाइक समान हमरा अपने अछि। सिरिफ रहैले दिअ। घरवारी एकटा मौगी। ओइ मौगीक पति काठमाँडूमे नोकरी करैत। तीस-चालीस बीघा जमीन जे ओ मौगीए सम्हारैत। ओ मौगी गुनी सेहो। दूटा छोट-छोट बेटा-बेटी। दू घर एतए दू घर ओतए, अहिना गाम। सभकेँ दू महला-तीन महला काठक घर। घरक नीचला हन्नामे मोटका-मोटका सखुआक लकड़ीसँ घेर माल-जाल बान्हैत आ ऊपरमे अपने रहैत। ऊपर-निच्चाँ भालेसरकेँ देख ओ गुनी बजली- “एतए नोकरी करब?” नोकरीक नाओं सुनि भालेसर ‘हँ’ कहलक। एक मास पहिनहि पहिलुका नोकर गाम गेलै से अखन धरि घुमि कऽ नै आएल। औत आकि नै औत सेहो ठीक नहि। यएह बात सोचि गुनी भालेसरकेँ दू महलापर लऽ गेल। एकटा चौकीपर समानो रखैले आ बैसैयो-ले गुनी भालेसरकेँ कहलक। अखन धरि भालेसरकेँ कोनो चिन्ता मनमे नहि। मुदा जखन बुझलक जे मरद घरमे नइ छै, तखनसँ भालेसरक मनमे डर पैसए लगलै। गामक बात मन पड़लै जे लोक सभ बजैए जे पूभर मौगी सभ पुरुखकेँ भेड़ा बना खेतमे चरैले ठोकि दइ छइ। जँ कहीं हमरो तहिना करए, तखन तँ गामक बाल-बच्चा सभ बिलैट जाएत! एलौं कमाइले आ भऽ जाएत किछु-सँ-किछु! मुदा आब अन्हारो भऽ गेल जँ जेबो करब आ रस्तामे बाघ सिंह खा गेल तखन तँ आरो चौपट भऽ जाएत! एते बात मनमे अबिते भालेसरक मन उड़ि गेल। किछु बजबे ने करए। चौकीएपर पड़ि रहल। अभ्यागत बुझि गुनी भालेसरकेँ आगत-भागत करए लगली। पहिने चाह बना पिऔलक। चाह पीला पछाइत मुरही आ चारिटा अण्डा तड़ि कऽ जलखै करैले देलक। जेते गुनी सुआगत करैत तेते भालेसरक मन उड़ल जाइत। रातिमे हाँसक तीमक आ बासमती चाउरक भात खाइले देलकै। भालेसर रहि गेल हर जोतैसँ लऽ कऽ गाए-बरदकेँ खुआएब-पीआएब धरि काज। दू-तीन दिन धरि दुनूक बीच नोकर-मालिकक सम्बन्ध रहल, तेकर बाद दुनूक बीच सम्बन्ध बदलए लगल। हाट-बजार सेहो दुनू संगे जाए-अबए लगल। ओही गुनीसँ भालेसर गुण सीखने। भालेसर ऐठामसँ लेलहा अबिते छल तखने टोलेक एक आदमी दौगल लेलहा ऐठाम आएल। ताबे लेलहो पहुँचल। लेलहाकेँ तेतरी पुछलक- “की भेल?” टुटैत आशाक स्वरमे लेलहा बाजल- “गुनी कहलक जे हम मरदनमा मनतर नै जनै छी, हम जा कऽ की करब।” जे आदमी दौगल आएल छल ओ तेतरीकेँ कहलक- “भौजी, एकटा मालि झाँप बेचए आएल अछि, ओ कहलक जे हम छोड़ा देबइ। ओकरा हम अपना ऐठाम बैसौने छी। मुदा ओ कहलक जे बिनु घरवारी कहने नै जाएब।” ओइ आदमीक संग लेलहा विदा भेल। मालिकेँ देख, दुनू हाथ जोड़ि लेलहा बाजल- “एक्केटा बेटा अछि, जँ मरि जाएत तँ निपुत्र भऽ जाएब। सिरिफ निपुत्रेटा नै हएब खानदाने खतम भऽ जाएत। कहुना गुलबाकेँ भूत छोड़ा दियौ। बड़ गुन मानब।” लेलहाक बात सुनि मालि कहलकै- “एक्कैसटा रूपैआ लगत। जे कोनो अपना खाइले नै लेब। तेते देवी-देवताक पूजा-पाठ करए पड़ैए, ओहीमे खर्च हएत।” छगाएल मन लेलहाक, गछि लेलक। मालिकेँ संग केने घरपर आएल। आँगन आबि लेलहा तेतरीकेँ कहलक- “एक्कैसटा रूपैआ मालि लेत तखन किछु करत।” एक्कैस रूपैआ सुनि तेतरीक मन उड़ि गेल। हाथमे एक्को पाइ नहि। जखन कि बिनु पाइ नेने मालि किछु करबे ने करत। मुदा छोड़बो केना करत। दरबज्जापर मालिकेँ बैसा दुनू परानी लेलहा रूपैआक भाँज लगबए लगल। मुदा केतौ रूपैआक भाँज नइ लगलै। अन्तमे निराश भऽ लेलहा खुट्टा परहक बियाएल गाए, गामेक पैकारक हाथे बेच लेलक। एक्कैस रूपैआ माइलिक हाथमे जाइते, मालि बाजल- “डालीमे मूसक माटि आ पंचमीक माटि नेने आउ।” चँगेरीमे माटि नेने आबि तेतरी माइलिक आगूमे रखि देलक। दहिना हाथ चँगेरीक माटिमे गोरियबैत मालि ठोर पटपटबैत मंत्र पढ़ए लगल। मंत्र पढ़ि मालि लेलहाकेँ कहलक- “कनी काल और नै अबितौं तँ बच्चा मरि जाइत!” माइलिक बात सुनि दुनू परानी लेलहा आशा-निराशाक बीच उगए-डुमए लगल। मालि कहलकै- “बच्चाकेँ पूब-मुहेँ चद्देर ओढ़ा कऽ सुता दियौ आ ऐ माटिकेँ घर-आँगन सहित अगुआर-पछुआर छीटि दियौ। अँगनासँ सभ देखनिहारकेँ हटा दियौ। हम जाइ छी। जखन सीमा पार भऽ जाएब तखन बच्चाकेँ उधारि देबइ। ओ बच्चा अपने टहलए-बुलए लगत आ कहत जे छुटि गेल।” लाठीमे टँगल झाँप लऽ मालि विदा भेल। अँगनासँ लेलहा सभकेँ हटा चँगेरी माटि छीटए लगल। रस्तामे मालि घुमि-घुमि पाछुओ-मुहेँ देखैत आ नमहर-नमहर डेग दैत आगूओ बढ़ैत। कनी कालक पछाइत जखन तेतरी गुलबाक देह परहक चद्देर हटौलक तँ देखलक ओहिना कुहरैत। गुलबाकेँ कुहरैत देख तेतरी पतिकेँ कहलक- “कहाँ छुटलै?” हृदैमे आशा रखैत-लेलहा उत्तर देलक- “कम होइत-होइत ने छुटतै आकि एक्के बेर हरहरा कऽ छुटि जेतइ।” दुनू परानी लेलहा ओसारपर बैस गप-सप्प करए लगल। कनी कालक पछाइत पुनः गुलबाकेँ तेतरी देखलक। कनियोँ उन्नैस नै होइत देख हलचलाइत तेतरी बाजल- “मालिबा ठकि लेलक। गाइयो चलि गेल आ गुलबा ठीको नै भेल!” लेलहाक मुँह दिस तेतरी तकैत आ तेतरीक मुँह दिस लेलहा। आशा-निराशा, जीवन-मरण आ सुख-दुखक बीच दुनू परानी उगए-डुमए लगल। दोसैर साँझ भऽ गेल। भानसक बेर भऽ गेल। सोगसँ दुनू बेकती मन्हुआएल। जेकरा-ले भानस हएत ओ खेबे ने करत आ जे खाइबला अछि ओकरा अन्न धँसबे ने करतै। तेतरी भानस छोड़ि देलक। गुलबाकेँ उठा ओसारपर देलक। दुनू परानी गुलबे लग बैस गप-सप्प करए लगल। एते काल सिरिफ बेटाक सोग रहै आब बियाएल गाइक सोग सेहो हुअ लगलै। भोर भेल। गामोमे एकटा भगत। केते गोरेक-मुहेँ लेलहा सुनने जे गामक जे भगत अछि ओ केतेको भूतकेँ लोहाक मोटका काँटीसँ पीपरक गाछमे ठोकने अछि। अचताइत-पचताइत लेलहा गामक भगत ऐठाम पहुँच, सभ बात कहलक। लेलहाक बात सुनि भगत अपन मेड़िया– डलबाह, मिरदंगिया, भगैत गौनिहार सभकेँ बजौलक। सभ मिलि पूजा ढारैक सामग्रीक लिस्ट बनौलक। आठ गोरेक खेनाइ लगा दू साए रूपैआक खर्च भगत लेलहाकेँ सुनौलक। दुपहर तक रूपैआ बन्दोबस करैक समए भगत लेलहाकेँ देलक। आँगन आबि लेलहा तेतरीकेँ कहलक। तेतरी लेलहाकेँ कहलकै- “एक साए रूपैआ गाएबला अछि, बाँकी साए रूपैआ केतएसँ औत?” दुनू परानी चिन्ताक समुद्रमे डुमि गेल। दुनूमे सँ केकरो ने अक चलै आ ने बक। देहक शक्ति कमए लगलै। निराशाक अन्तिम सीमापर पहुँच लेलहा पत्नीकेँ कहलक- “अगर खेतो बेच कऽ दऽ देबै आ जँ नै छुटै तखन जीब केना?” बेटाक ममता तेतरीक हृदैकेँ झकझोड़ैत रहइ। एक मन तेतरीक कहै जे खेत रखि बेटाकेँ मरए दिऐ ओहो उचित नहि। दोसर मन कहै जे बेटो चलि जाएत आ खेतो, तखन अपन बुढ़ाड़ी केना चलत? फेर मनमे एलै जे बेटाक सोग बरदास हएत आ खेतक सोग नहि! देखल जेतै बुढ़ाड़ीमे। जँ कमाइक शक्ति नै रहत तँ भीखे माँगब। मुदा अछैते चीजे बेटाकेँ छोड़ि केना देब। साहस करैत तेतरी लेलहाकेँ कहलक- “की करबै, खेत भरना लगा कऽ दऽ दियौ। कियो ई नै ने कहत जे खेतक लोभे बेटाकेँ मारि देलक।” जहिना केकरो चारूकातसँ दुश्मन हथियार लऽ घेर लइत। तहिना दुनू परानी लेलहाक मनमे हुअ लगल। खुट्टापर बान्हल गौड़[1] भूखे-पियासे जोर-जोरसँ डिरियाइत। मिरदंगक बद्धी मूस काटि देने। मिरदंगियाँ-बद्घी कीनए कमलपुर गेल। बिशेसरसँ मिरदंगियाकेँ चिन्हारे तँए बद्धी कीनि भेँट करए गेल। बिशेसर हरबाहि कऽ आबि खाइत रहए आकि डेढ़ियापर सँ मिरदंगियाँ शोर पाड़लकै। खाएकेपर सँ बिशेसर अँगने अबैले कहलकै। आँगन आबि मिरदंगियाँ बिशेसर लग बैसल। दुनूक बीच कुशल-झेम भेलइ। बिशेसर मोहिनीकेँ कहलक- “खाइ बेर छइ। थारीमे नेने आउ।” जाबे मोहिनी थारी सँठलक ताबे मिरदंगिया हाथ-पएर धोलक। हाथ-पएर धोइ बिशेसरे लग बैसल। दुनू गोरे खेबो करए आ गप्पो करए। लेलहाक सभ बात मिरदंगिया बिशेसरकेँ कहलक। मने-मन बिशेसर सोचलक जे जँ एहेन बात छै तँ लगमे जा कऽ हमहूँ देखब। मिरदंगियाकेँ बिशेसर कहलकै- “हमहूँ अहींक संग चलि कऽ गुलबाकेँ देखबै।” खा कऽ दुनू गोरे विदा भेल। लेलहा ऐठाम आबि बिशेसर देखलक जे दुनू परानी पेटकान लधने अछि। बेटाक सोग, धनक सोग आ खनदानक सोगसँ दुनू परानी लेलहा मरनासन्न अछि। गुलबाकेँ देख मने-मन सोचए लगल जे जाधैर मनुखकेँ जीबै जोकर बुधि नै भऽ जाएत ताधैर अहिना दुखक पहाड़ तर दबि-दबि कुहरैत रहत। भगवानोक लीला अजीव छैन। बुधिक बखारी मनुखकेँ दऽ एहेन बड़का ताला लगा देने छथिन जे सभ-बुते खुगबो ने करैए। जेकरा बुते खुगबो करैत ओ अपने बखारी भरै पाछू जिनगी भरि अपसियाँत रहैए। केकरा के देखत। सभ अपने ताले बेताल अछि। समाज रूपी जंगलमे मनुख रूपी गाछ एहेन अछि जइमे मीठ फल फड़ैबला गाछ झँपा गेल अछि आ कँटहा गाछ एहेन भोगर बनि गेल अछि जे अनाड़ी-धुनाड़ी वौआ जाइए। जइसँ छल-प्रपंची समाजपर हाबी भऽ गेल अछि। एते बात बिशेसरकेँ मनमे अबिते मनमे उठलै- दुखक अन्तिम अवस्थाक उपरान्ते नव जिनगी शुरू होइत...। बिशेसर लेलहाकेँ पुछलक- “एते सोगाएल किए छी?” बिशेसरक बात सुनि लेलहाक मनमे आशाक मेही ज्योति अबए लगल। नोरसँ भीजल आँखि.., बेथित हृदए...। बाजल- “भाइ साहैब, बड़ आशा छल जे एहेन सुन्दर दुनियाँमे बाबा-दादीक कोरासँ माए-बापक कोरा होइत जिनगी शुरू भेल। आशाक गाछ नमहर होइत गेल। अदहा रस्तामे आबि बेटाकेँ कोरामे लेलौं मुदा आब पोताकेँ कोरामे नै लऽ सकब दुख एकरे अछि। ‘हम केहेन अधरमी खनदानमे भेलौं जे अन्त भऽ रहल अछि।” मुस्कियाइत बिशेसर बाजल- “अधरमीसँ धरमात्मा बनब बड़ कठिन नहि अछि सिरिफ रस्ता बदलैक अछि। अखनेसँ धरमक रस्ता धरू सभ आशा पूर भऽ जाएत।” बिशेसरक बात सुनि लेलहाक हृदैमे जेना अमृतक बून पड़ि गेल। उत्साहित भऽ तेतरीकेँ हाथक इशारासँ शोर पाड़ैत बाजल- “बिशेसर भाय जे कहै छथिन से सुनू। सभ दुख मेटा जाएत।” दुनू बेकती बिशेसरक मुँह दिस तकैत ऐगला गप सुनैले कान पाथि देलक। बिशेसर बाजल- “अहाँ बेटाकेँ भूत नै लगल अछि। हवा रोग लगल अछि। अखन धरि अहाँ सभ भूत छौड़ौनिहारकेँ बजा-बजा अनलौं। रोग छोड़ौनिहारकेँ नै बजेलौं। चलू हमरा संगे।” दुनू हाथ जोड़ि तेतरी बिशेसर दिस देखैत पतिकेँ कहलक- “जाउ, जेतए भैया जाइ छैथ। जिनगीमे कहियो केकरो अधला नै केलिऐ, तखन भगवान एहेन विपैतमे केना दऽ देलैन।” बिशेसर तेतरीकेँ कहलक- “जाऊ, अहाँ भानस करू-गे। पहिने बाछीकेँ खाइ-पीऐले दियौ। भूखे परान गमौने की हएत। अँगनाक काज सम्हारू। हम दुनू गोरे जाइ छी।” करिछौन भेल तेतरीक ठोर अनासुरती बदैल कऽ लाल हुअ लगल। देहक सूतल शक्ति पुनः जागए लगल। अँगना-घर बहारि तेतरी बाछीकेँ पानि पीआ खाइले देलक। लेलहाकेँ संग केने बिशेसर दीनानाथ वैद ऐठाम पहुँचल। दुनू गोरेकेँ देख दीनानाथ पुछलखिन- “केमहर एलौं?” लेलहाकेँ देखबैत बिशेसर कहलकैन- “हिनकर बेटा लताम तोड़ैले गाछपर चढ़ल। गाछेपर देह झुनझुनाए लगलै। जनिजाति सभ भूत कहि ओझा-गुनी बजबए कहलकैन। दुनू परानी वेचारे ओही पाछू पड़ि गेला। अपने चलि कऽ देखियौ।” दीनानाथ रोग बुझि गेलखिन। दवाइक बैग लऽ गप-सप्प करैत लेलहा ऐठाम चलला। रस्तामे बिशेसर दीनानाथकेँ पुछलखिन- “अपने वैदागिरी केना सिखलौं?” हँसैत दीनानाथ अपन सभ खिस्सा भरि रस्तामे बिशेसरकेँ सुना देलखिन। लेलहा ऐठाम आबि गुलबाकेँ वैदजी देख कहलखिन- “रोग कोनो असाध नइ छइ। दुइए दिनमे छुटि जेतइ।” कहि दू दिन-ले चारि खोराक दवाइ दऽ देलखिन। एक खोराक अपना सोझहेमे खुआ दीनानाथ लेलहाकेँ कहलखिन- “दस मिनटक उपरान्ते रोग कमए लगत आ सौझुका खोराक खुऔला पछाइत बुझि पड़त जे अदहा रोग छुटि गेलइ। चिन्ताक कोनो बात नहि।” ◌ शब्द संख्या : 4651 4. मिडिल पास केला पछाइत ज्ञानचन गामेमे रहैक विचार केलक। गामसँ दस-बारह कोस हटि ज्ञानचनक पिता नोकरी करैत। दुरस्तक दुआरे प्रकाशचन्द बालो-बच्चाकेँ संगे रखैत। माए-बाप मरि गेने आश्रमो छोट। बहिन सासुर बसैत। गाममे कियो नहि जइसँ घरो गिर पड़ल। गौंआँ-घरूआ सभ घरक ठाठ उजाड़ि जरा लेलक। घराड़ी छोड़ि एक्को बीत जमीन फाजिल नहि। घर गिरने घराड़ियो ढिमका जकाँ बनि गेल, जैपर अनेरूआ गाछ सभ जनैम गेल। घराड़ी बेलगान तँए बँचलो। पिताक मेहनतसँ प्रेरित भऽ ज्ञानचन गामेमे रहि मेहनतक बले जीबैक संकल्प मनमे रोपलक। गाम आबि ज्ञानचन एकटा घर बना गामेमे रहि बच्चा सभकेँ पढ़बैक जोगारमे जुटि गेल। गरीब आ मझोलका किसानक गाम। गामक मुख-मुख आदमीकेँ बैसा अपन विचार रखलक। बच्चाकेँ पढ़बैक इच्छा सभकेँ मुदा पढ़ौनिहारोकेँ तँ परिवार छइ। तर्क-वितर्क करैत सभ ऐ निर्णएपर पहुँचला जे, जे किसान परिवार अछि ओ एक विद्यार्थीपर एक सेर चाउर, मासमे देत आ गरीब परिवार शैने-शनि शनिचरा देत...। ऐ विचारपर गौंआँ आ ज्ञानचनो सहमत भऽ गेल। बच्चा सभकेँ ज्ञानचन पढ़बए लगल। सुभ्यस्त समए रहने दू साल तक तँ बेवस्थित ढंगसँ पढ़ौनी चलल मुदा तेसर साल तेहेन बाढ़ि एलै जे अदहासँ अधिक लोकक घर गिर पड़ल। खेतक फसिल दहा गेल। तीन मास धरि घर-घराड़ी छोड़ि सौंसे गाम पानिमे डुमले रहल! काजक अभाव भेने गरीब लोक, जन-बोनिहार पड़ा-पड़ा परदेश जाए लगल। अनक अभाव आ घास-भूस्साक अभावमे धियो-पुता, बुड़हो-बुढ़ानुस आ मालो-जाल अदहासँ बेसी मरि गेल। घरक दुआरे बहुतो लोक गाम छोड़ि आन-आन गाम जा कर-कुटुमक ऐठाम रहए लगल। ज्ञानचनक दशा एहेन भऽ गेल जे मृत्युक रस्ता छोड़ि जिनगीक दोसर कोनो बाँकी नै रहल। करेजपर पाथर रखि गाम छोड़ैले तैयार नहि। अन्न बिनु दुनू परानीकेँ सात साँझ भऽ गेल। भूखे अँतरी ऐंठैत, पेटमे बगहा लगैत। सुधियाक सूखल मुँह ज्ञानचन देखैत आ ज्ञानचनक मुँह सुधिया देख आँखि निच्चाँ कऽ लइत। थरथराइत मने सुधिया पतिकेँ कहलक- “गामक दशा बड़ रद्दी भऽ गेल आब जीनाइ कठिन अछि। चुपचाप हाथपर हाथ धऽ बैसलासँ नै हएत।” कनी काल बिलैम ज्ञानचन बाजल- “कहलौं तँ ठीके मुदा करब की। देखते छी जे साँझक-साँझ लोक भूखल रहैए। जैठाम पेट पहाड़ बनि रहत तैठाम बच्चाक पढ़ाएब मात्र कल्पना हएत। पेटक आगि सभकेँ जरा दइ छइ। बुधि-विवेककेँ नष्ट कऽ दइ छइ। हमरा बुझने एक्केटा उपए अछि जे दुनू बेकती बाबू लग चलू। ओहीठाम किछु दिन रहब, जखन समए बदलत तखन बुझल जेतइ।” सुधिया- “अखन पितोजी लग जाएब कठिन अछि। भूखल पेट एते दूर केना जाएब? घरमे थारी लोटा छोड़ि तँ किछु ऐछो नै जेकरा बेच कऽ वा बन्हकी लगा कऽ पेटक ओरियान कऽ जाएब।” ज्ञानचन- “लोटाक काज तँ रस्तो-पेरा हएत तँए ऐ बिनु नै बनत। मुदा थारीक तँ तत्काल ओेते जरूरी नै अछि, पातोसँ काज चला लेब। थारी लाउ ताबे बन्हकी लगा बटखरचाक ओरियान कऽ लइ छी आ ओमहरसँ घुमि कऽ एलापर बन्हकी छोड़ा लेब।” सुधिया घरसँ थारी निकालि ज्ञानचनकेँ दऽ देलक। थारी नेने ज्ञानचन दोकान जा बन्हकी लगा बेसाहने आएल। सुधिया भानस केलक। दुनू परानी खा घर बन्न कऽ पिता लग विदा भेल। मिडिल पास केलाक तीन सालक पछाइत ज्ञानचनक बिआह सुधियाक संग भेल छल। बिआहक समए सुधियाकेँ मनमे बेहद खुशी छेलै जे पढ़ल-लिखलसँ बिआह भऽ रहल अछि। बिआहो आकर्षित वातावरणमे भेल छेलइ। बिआहक समए गीत गौनिहारि एहेन आकर्षित वातावरण अपन गीतक माध्यमसँ बनौने रहैथ जेना वसन्तक आगमनक समए प्रकृति बनबैत। ऐ मोहक वातावरणमे ज्ञानचनक मन आ सुधियाक मन जेना शरीरसँ हटि एकठाम बैस भावी जिनगीक लीला रचए लगल। अलग-अलग योजना रहितो एकठाम जा मिलि जाइत। जिनगीक अन्तिम छोड़ धरिक संगी नचैत-गबैत सुख-दुखक रस्तासँ चलैक समझौता केलक। मुदा आइ ओ वसन्ती जिनगी ग्रीष्मक प्रखर रौदसँ झड़कए लगल। जहिना नदी-सरोवरक शीतल जल रौदमे अपन जिनगीक आहूत दैत तहिना ज्ञानचन आ सुधिया दिअ लगल। जिनगीक रस बेरस हुअ लगलै। मुदा आगिमे तपैत जिनगीमे सोनाक ओ रूप आबि जाइत जे आगिमे जरि शेष रहैत। यएह छी जिनगीक लीला। अहीक बीच जिनगी हँसैत-कनैत चलैए। पिता लग जाइक रस्तामे ज्ञानचनक मन विषादसँ भरैत गेल। मनमे ढेरो प्रश्न उठलै। की हम जिनगीसँ हारि मानि ली? की हम अपन संकल्प बदैल ली? की हम अपन उगैत ज्ञानकेँ नष्ट कए ली? की हमर ज्ञान एते दुर्बल अछि जे जिनगीक छोट-छीन झोंककेँ नै सहि सकैत..? ऐ सभ प्रश्नक बीच ज्ञानचनक मन भारसँ ऐ रूपे दबाएल जाइत जेना पहाड़क तरमे पड़ि गेल हुअए। मुदा ज्ञानचनक छटपटाइत मन हारि मानैले तैयार नहि! जेना दू सेनाक बीच लड़ाइ होइत तहिना ज्ञानचनक मनमे हुअ लगल। देहसँ पसेना निकलए लगल। संकल्प सक्कत रूपमे बदलए लगलै। हर्ष-विषादक बीच ज्ञानचन आगू बढ़ैत गेल...। सुधियाक मन अपनो आ भगवानोकेँ कोसैत। की हम नारी बनि ऐ धरतीपर जन्म लऽ मातृत्व प्राप्त नै कऽ सकै छी? की भगवान हमरा ओइले जन्म देलैन जे फुलाइसँ पहिने नष्ट भऽ जाइ? ज्ञानचन आ सुधियाकेँ पहुँचते प्रकाशचन्द बुझि गेलखिन। मुदा बिनु किछु कहनहि पत्नीकेँ इशारा केलखिन- “पहिने दुनू गोरेकेँ खाइले दियौ।” जाबे ज्ञानचन हाथ-पएर धोलक ताबे ज्योति दूटा थारीमे चूड़ा भीजैले दऽ देलखिन। घरमे दही नहि तँए चूड़ा आ चीनी दुनू गोरेकेँ खाइले देलखिन। ज्योति हाँइ-हाँइ चुल्हि पजाइर बरतनमे पानि गरम करए लगली। जाबे दुनू परानी ज्ञानचन खेलक ताबे इनहोरो भऽ गेल। हाथ-मुँह धोइते दुनू परानीकेँ कहलखिन- “बौआ, दूरसँ एलौं हेन तँए इनहोरसँ पएर ससारि लिअ। थाकैन दूर भऽ जाएत। बाटीमे इनहोर निकालि पहिने ज्योति ज्ञानचनकेँ ठेहुनसँ निच्चाँ ससारि देलखिन। पएर ससारिते ज्ञानचनक थाकैन कमि गेल। बाटीमे इनहोर लऽ सुधियाकेँ अढ़मे लऽ जा ज्योति पएर ससारैक ओरियान करए लगली।” मुदा सासुक हाथ पकैड़ सुधिया कहलकैन- “माए, हम अपने पएर ससारि लइ छी। ई केना हमर पएर छूती?” सुधियाक बात सुनि ज्योति बजली- “एना किए कहलौं कनियाँ! जखन नीक रहब तखन हम सासु आ अहाँ पुतोहु। मुदा दुखमे अहाँक सेवा हम नै करी, हमर सेवा अहाँ नै करी तखन हम अहाँक केना भेलौं।आ अहाँ हमर केना भेलौं? रस्ताक थाकल छी, देह-हाथ दुखाइत हएत तँए हमर सेवा करब उचित हएत किने?” ज्योति सुधियाक दुनू पएर इनहोरसँ ससारि देलखिन। ज्योतिक सेवा देख ज्ञानचन मने-मन सोचए लगल जे यएह छी माए-बाप आ बेटा-पुतोहुक सम्बन्ध। जँ एहेन विचार परिवारमे बनल रहत तँ किए परिवारमे बिखण्डन हएत। परिवार कम लोकक हुअए आकि बेसी लोकक, अगर सभ अपन-अपन सीमा बुझि जीबैक कोशिश करत तँ परिवार टुटतै किए...। रस्ताक झमारसँ दुनू बेकती ज्ञानचन आ सुधियाकेँ ओंघी लगैत आ देहे भँसियाइत। देह भँसियाइत देख ज्योति दुनू गोरेकेँ सुति रहैले कहलखिन। दुनू बेकती ज्ञानचन सुति रहल। किरिण डुमि गेल। प्रकाश सेहो काजपर सँ एला। लालटेन नेस ज्योति ओसारपर दऽ ओछाइन ओछा चाह बनबए लगली। कपड़ा बदैल प्रकाश हाथ-पएर धोइ कऽ ओछाइनपर बैसला। ज्योति चारि गिलास चाह बना एक गिलास प्रकाशकेँ दऽ अपनो आ बेटो-पुतोहुकेँ देलखिन। चारू गोरे चाह पीब एक्केठाम बैसला। ज्ञानचनक चेहरा देख प्रकाश आँकि नेने रहैथ। मुदा कोनो गम्भीर बात पुछैसँ परहेज करैत बजला- “बौआ, सालभरि हमरो नोकरी रहल तेकर बाद तँ गामेमे रहब। तँए आब घर बनाएब जरूरी भऽ गेल अछि। जाबे घर बना रहए नै लगब ताबे जीबैले कोनो काजक सृजन सेहो नै कऽ सकै छी।” अपन समस्या ज्ञानचन रखैत बाजल- “बाबूजी, गामक एहेन दशा भऽ गेल अछि जे रहनाइ कठिन अछि।” बेटाक बात सुनि प्रकाशचन्द अनुभवक बात बुझबैत बजला- “बौआ, जहिना ऐ शरीरक विचित्र स्थिति अछि तहिना ऐ संसारोक छइ। देखबहक जे, जे आदमी अधिक शारीरिक श्रम करैबला अछि ओ जइ दिन नै खटत तइ दिन ओकरा देह-हाथ दुखेतै। ठीक एकर विपरीत, जे आदमी देहसँ श्रम नै करैए ओ जइ दिन भारी काज करत तइ दिन ओकरा खूब देह-हाथ दुखेतै। तहिना ऐ संसारोकेँ छइ। विचित्र शक्ति ऐ संसारमे छइ। जहिना नाश करैक अद्भूत शक्ति देखै छहक तहिना सृजनो करैक छइ। तँए जे मनुख सृजनशील अछि वएह ऐ दुनियाँक आनन्द उठा सकैए।” प्रकाशचन्दक बात सुनि ज्ञानचनकेँ नवज्योति भेटलै। अखन धरि जे ज्ञानचन सोचने छल जे दस दिन पिता ऐठाम रहब, मुदा पिताक विचार सुनिते सौंसे देह सुनगुनी पैस गेलै जे अखने गाम घुमि कऽ चलि जाए। एक दिस ज्ञानचनक मनमे बाढ़िक विकराल रूप नचैत तँ दोसर दिस बाढ़िक रूपसँ मुकाबला करैक उत्साह मनमे जागए लगलै...। तखने सासु पुतोहुकेँ कहलखिन- “कनियाँ, अपन घर नै रहने ऐठाम बहुत रास वस्तु छिड़ियाएल अछि जेकरा अपना ऐठाम लऽ जेनाइ अछि। एक्के बेर तँ सभ वस्तु लऽ गेल नै हएत तँए थोड़े-थोड़े-के लऽ जाएब नीक हएत। घरमे माइर पुरान थारी, लोटा, बरतन-बासन आ कपड़ा-लत्ता अछि। ओइमे सँ जेते लऽ गेल हएत ओते नेने जाएब।” ज्योतिक बात सुनि सुधियाक मनमे एलै जे एकटा थारी छल ओहो बन्हकीए लगा देलौं मुदा ऐठाम तँ तेते अछि जे एक बेरमे लैओ ने गेल हएत। कपड़ो-लत्ताक सएह हाल अछि। बरतन आ कपड़ा-ले मन कलहन्त रहै छल, आ से एतए तेते अछि जे जिनगी भरिमे सठबो ने करत। तँए मने-मन सुधिया खूब खुशी होइत। तेसर दिन ज्ञानचन पिताकेँ कहलखिन- “बाबू, हम चलि जाएब। गाममे की भेल हएत की नहि, चिन्ता भऽ रहल अछि।” ज्ञानचनक बात सुनि प्रकाशचन्द बजला- “बौआ, ईहो तँ अपने घर छिअ तखन जाइले एते किए धड़फड़ाइ छह?” ज्ञानचन- “भरि दिन एतए बैसले रहै छी, गाम गेलापर किछु करबो करब।” प्रकाशचन्द- “बड़बढ़ियाँ। काल्हि चलि जैहह।” दोसर दिन भोरे ज्ञानचन आ सुधिया गाम जाइक तैयारी करए लगल। बरतन आ कपड़ाक मोटरी देख सुधिया मने-मन सोचए लगली जे एते दूर एते लऽ कऽ केना जाएब। मुदा अभावक जिनगीसँ गुजरल सुधिया, साहस बटोरि कऽ मोटरी लऽ जाइले तैयार भेली। ज्ञानचनकेँ प्रकाश साए रूपैआ देलखिन। दुनू परानी गाम विदा भेल। गाम आबि ज्ञानचन थारियो बन्हकी छोड़ौलक आ पाँच दिनक बुतात सेहो कीनलक। दू दिन धरि ज्ञानचन गामेमे रहि आराम केलक। तेसर दिन भोरे जलखै खा ओसारपर बैस मने-मन हियाबए लगल जे कोन-कोन गाममे स्कूल नै अछि। मुदा अकसरहाँ गाम तेहने। कोनो-कोनो गाममे खानगी शिक्षक परिवारमे पढ़बैत। मुदा आम लोक-ले स्कूल नहि। जेते हियासि-हियासि ज्ञानचन गाम सभकेँ देखैत तेते विचित्र स्थितिमे पड़ल जाइत। मनमे रहै जे गरीब-गुरबा बच्चा सभकेँ पढ़ाबी। सुभ्यस्त परिवारक बच्चा सभ तँ कोनो-ने-कोनो रूपे पढ़िए लैत मुदा खगल परिवारक बच्चा सभ छुटि जाइत। जखन कि पढ़ब सभले जरूरी छइ। अही गुन-धुनमे ज्ञानचनक दू दिन बित गेल। तेसर दिन सुधिया बजली- “जाबे घरमे बुतात अछि ताबे जँ कोनो जोगार नै कऽ लेब तखन तँ फेर दिक्कत हएत।” पत्नीक बात सुनि ज्ञानचन बाजल- “कहलौं तँ ठीके मुदा विचित्र उलझनमे पड़ल छी। एक दिस संकल्प अछि दोसर दिस पेट।” झगड़ौआ सुभ्यस्त गाम। नमहरो। सभ तरहक परिवार गाममे। मुदा पचभैंया परिवार सभसँ सम्पन्न। पाँचू भाँइ मिलि शिक्षक रखने। पाँचू भाँइक बच्चा सभ तँ पढ़ैत मुदा गामक आन परिवारक बच्चा छूटल। पाँचू भाँइ सागीरदे। एकटा नमहर दरबज्जा, जैपर शिक्षक पढ़ेबो करैत आ रहबो करैत। नमहर परिवार रहने नमहर दरबज्जा बनौने, किएक तँ जखन बिआह, मूड़न, श्राद्ध वा कोनो नमहर काज परिवारमे होइत तखन तेते अधिक सर-कुटुमसँ लऽ कऽ दोस-महीम सभ अबैत जे छोट-छीन दरबज्जामे अँटावेशे ने होइत। ओइ पचभैंया परिवार छोड़ि गामक सभ परिवार शिक्षासँ अलग। ने गाममे स्कूल आ ने दोसर परिवारक बच्चाकेँ पचभैंया अपना ऐठाम पढ़ए दइत। गुरुजीकेँ खेनाइक संग दू मन धानो मासमे दइत। शिक्षको समाँगे जकाँ बच्चा सभकेँ पढ़बैत। गरीब लोक बच्चाकेँ पढ़ाएबकेँ जरूरीए ने बुझैत। सभकेँ बुझले जे जखन बच्चा ढेरबा हएत तखन गाए-महींस चरौत नइ तँ केकरो ऐठाम नोकरी करत। जखन जुआन हएत,बिआह-दुरागमन हेतै तखन बोइन करत। ने शिक्षाक महत बुझैत आ ने नोकरी मनमे। बच्चो सभकेँ जीबैक लूरि बापक संग काज करैत-करैत तँ भाइए जाइत। झाँपल ज्ञान झाँपल विचार। ओना, मध्यम किसान परिवारक लोक बच्चाकेँ पढ़बए चाहैत मुदा भीतरिया मन-मोटाउ सबहक बीच। अनेरे एक-दोसरसँ मुँह-फुलौने। एक जातिक लोककेँ दोसर जातिक लोकसँ भैंसा-भैंसीक खानदानी कनाइर। जातियोक बीच कुल-गोत्र टौहकी लगौने, जइमे माछे जकाँ सभ फँसि छटपटाइत। ने कियो केकरो नीक करैत आ ने नीक देखए चाहैत। अनेरे एक दोसरक भरि दिन निन्दा करैत। झगड़ौआक पहिलुका नाओं सुन्दरपुर छल। मुदा गौंआँक बीच हदिघड़ी मारि-झगड़ा भेने आन-आन गामबला ‘झगड़ौआ गाम’ कहए लगल। जइसँ गामक नाओं ‘झगड़ौआ’पड़ि गेल। झगड़ौआमे सभसँ रूआबी चुनचुन। मध्यम किसान, दस बीघा खेत। अकसरहाँ चुनचुनकेँ दोसरसँ गारि-गरौवैल आ मारि-पीटि होइते रहैत। जइसँ दस-बीस मोकदमा सभ दिन लधले रहैत। एक दिन केसक तारीख करए मधुबनी गेल। घुमती काल टीशनपर गाड़ीक प्रतीक्षामे बैसल छल तखने एक आदमी लगमे आबि बेंचपर बैसल। कनी काल दुनू गोरे चुप्पे रहल मुदा पाछू गप-सप्प हुअ लगलै। गप-सप्पक क्रममे ओ आदमी चुनचुनकेँ कहलक- “हम हाइ स्कूल तक पढ़ल छी। नोकरी करए जाइ छी।” पढ़ल-लिखल सुनि चुनचुन बाजल- “हमरा ऐठाम चलू। तीनटा बच्चा अछि ओकरा पढ़ा देबै आ अहाँकेँ दू मन धान महिना देब।” चुनचुनक संग ओ आदमी झगड़ौआ आएल। दोसरे दिन सगरे गाम हल्ला भेल जे चुनचुन मास्टर अनलक। पचभैंया परिवारमे सेहो समाचार पहुँचल। साँझू पहर सभ समाँग बैस विचार केलक जे चुनचुनमो आ मासटरोकेँ तेहेन विदाइ देब जे फेर एहेन काज नै करत। सएह भेल। दोसर दिन सभ समाँग पचभैंया आ चारिटा लठैतो आबि चुनचुनमो आ मास्टरोकेँ तेहेन मारि मारलक जे मास्टर तखने पड़ा गेल आ चुनचुनमा थाना जा केस केलक। पचभैंयाक एक समाँग हाकिम, जे सभकेँ बूझल तँए थनोक कियो नै आएल आ केसे ने बढ़ेलक। ओइ दिनसँ चुनचुनमाक मन टुटलै। तखन गामक लोकसँ मेल करए चाहलक। मुदा सभ छनगल। किएक तँ चुनचुनमाक खचरपन्नी सभकेँ बूझल। तँए कियो चुनचुनमासँ सटए नइ चाहैत। चुनचुनमाक दशा गाममे ओहन भऽ गेल जेना कोनो बड़का डकैत जहलमे जा दाढ़ी बढ़ा बबाजी बनि जाइत। चुनचुनमाक मारि चुनचुनमा सन लोकक हृदैकेँ झकझोड़ि देलक। अखन धरि जइ विषयक चर्चा लोक करितो नै छल ओ चरचाक प्रमुख विषय बनि गेल। अज्ञानक चद्देरसँ झाँपल बुधि बहराइले पाँखि फड़फड़बए लगल। जहिना माटिक तरमे कोनो बीआ चुपचाप पड़ल रहैत मुदा समए पबिते अंकुरित भऽ ऊपर चलि अबैत तहिना। जे विद्या दान-ले अमूल्य बूझल जाइत ओइले समाजमे विस्फोट भऽ सकैए। चुनचुनमाक दियाद-वाद, दोस- महीम, कुटुम-परिवार अपनामे विचारि पुनः मास्टर रखि बच्चाकेँ पढ़बैक निर्णए केलक। मुदा एहेन विचार किछु गनल परिवार धरि रहल। आम आदमी, जे समाजमे बहुसंख्यक अछि, काते रहल। ने ओकरासँ पूछल गेल आ ने ओ उत्साहित भेल। चुनचुनमाक घटना ज्ञानचनकेँ बूझल। ओना ज्ञानचनक विचार चुनचुनमाक काजक अनुकूल, किएक तँ शिक्षा एकसँ पाँचो दिस तँ बढ़ल। मुदा समाजक बीच तँ खाढ़ी बनले रहैत। एकाएक ज्ञानचनक मनमे आएल जे झगड़ौआ नै जा कमलपुर जाएब। कमलपुर जाइक विचार ज्ञानचन मनमे ठानि पत्नीकेँ कहलक- “काल्हि भोरे कमलपुर जाएब। जँ ओइठाम रहैक जोगार भऽ गेल तँ ओतै रहब नइ तँ परसू तक घुमि जाएब। ओना मन कहैए जे कमलपुरमे जरूर जोगार भाइए जाएत।” पतिक बात सुनि सुधिया बाजल- “जिनगीमे अहिना चढ़ा-उतरी होइ छइ। मुदा ऐसँ धड़फड़ेबाक नइ चाही। एकटा कमलपुरे नै ढेरो गाम अछि जैठाम पढ़ै-लिखैक कोनो बेवस्था नइ छइ। करेज मजगूत कए कऽ जाउ भगवान केतौ-ने-केतौ गर लगाइए देता।” पत्नीक विचार सुनि ज्ञानचन कनी गुम्म भऽ बाजल- “समाजक विचित्र लीला अछि। पढ़लासँ ज्ञान होइ छइ। ज्ञान मनुखकेँ नीक रस्ता चलैले प्रेरित करै छइ। मुदा समाजमे एहेन मुँहगर-कनगर लोकक कमी नै जे बीचमे बाधक बनि ठाढ़ रहैए। आ वएह सभ अपनाकेँ समाजक हितैषी कहि ढोल पीटैए। हमरा-ले धन पैघ नहि विचार पैघ अछि।” सुधिया- “जइ रूपक समाजक बात अहाँ कहलौं, ओइसँ अलग भऽ सोचए पड़त। जँ से नै सोचब तँ जीब केना। आ जँ जीबे ने करब तँ सिरिफ सोचलेसँ की हएत?” ज्ञानचन- “अहाँक बात मानलासँ समाजमे कटुताक जन्म हएत। मनुख-मनुख छी। कियो केकरोसँ ने पैघ अछि आ ने छोट। हँ ज्ञानक स्तर आगू-पाछू भऽ सकै छइ। मुदा जे अगुआएल छैथ हुनका तँ पछुऐलहाक बाँहि पकैड़ आगू-मुहेँ बढ़ेबाक चाहिऐन। जँ से नै करै छैथ तँ ओकरा बेइमानी छोड़ि की कहबै? बेइमाने मनुख ने नीच मनुखक श्रेणीमे अबैए। जे ज्ञानक संग छेड़-छाड़ करब भेल। धनसँ मनुखकेँ नापब, सोना तौलैबला निकटीपर माछ तौलब हएत। जे बेवसाय हम करै छी ओइले एहेन तराजू चाही जैपर एक्के बैटखारासँ सभ तौलल जाए। जे अध्ययन करत ओ चाहे गरीबक बेटा हुअए आकि अमीरक, जरूर विद्वान बनत।” दोसर दिन भोरे ज्ञानचन जलखै कऽ कमलपुर विदा भेल। जहिना समुद्रमे पहुँचैले नदीक पानि अनवरत गतिसँ चलैत तहिना ज्ञानचन्दो कमलपुर जाइक रस्ता कटैत रहल। कमलपुर पहुँचते ज्ञानचनकेँ बुझि पड़लै जे आन-गामसँ भिन्न ऐ गामक लोकक चालि-ढालि अछि। पहिले-पहिल ज्ञानचन देखलक जे जेते मेहनत ऐ गामक लोक करैए ओते मेहनत आन गामक नै करैए। मान-सम्मानक मर्यादा सेहो ऐ गामक लोक आन गामक अपेक्षा अधिक बुझैए। रस्ते-पेरे ज्ञानचन ऐ बातकेँ आँकि विहारी ऐठाम पहुँचल। तीस पैंतीस परिवारक टोलमे विहारीक घर। विहारीक दरबज्जापर सिलेब बरदक जोड़ा आ एकटा महींस बान्हल। कँचके ईंटासँ बनल आ खढ़सँ छारल दरबज्जा। नीक कारीगरक जोड़ल देबाल आ नीक छारनिहार छारने तँए दरबज्जा सुन्दर। दरबज्जाक ओसारमे एक भाग एकटा कोठली बनल। टोलमे जे बरियाती अबैत ओही दरबज्जामे रहैत। टोल तँ गरीबे लोकक मुदा अपनामे खूब मिलान सभकेँ। दरबज्जाक ओसारपर राखल चौकीपर अपन झोरा रखि ज्ञानचन घरबैयाकेँ शोर पाड़लखिन। .पछबरिया घरक केबाड़क उखड़ल बिलैयाकेँ विहारी ठीक करै छल। अनठियाक अवाज सुनि रूखान-बैसला अँगनामे रखि दरबज्जापर आएल। नव चेहरा देख, विहारी डेढ़ियापर सँ चोट्टे घुमि आँगनसँ एक लोटा पानि नेने दरबज्जापर आएल। ज्ञानचनकेँ हाथमे लोटा पकड़बैत विहारी कहलकैन- “पहिने पएर धोउ, तखन गप-सप्प हेतइ।” ज्ञानचन पएर धुअ लगल आ विहारी आँगन जा पत्नीकेँ कहलक- “एकटा अभ्यागत एला हुनको भानस करब।” कहि दलानपर आबि विहारी ज्ञानचनसँ परिचए-पात करए लगल। पढ़ौनीक चर्चा सुनि विहारीक हृदैमे उत्साहक बिर्ड़ो उठि गेल। ऐगला गपकेँ तोपैत ज्ञानचनकेँ कहलक- “गुरुजी, थाकल हएब अखन आराम करू। ताबे हमहूँ अपन काज सम्हारि लइ छी। गप-सप्प निचेनसँ करब।” आँगन आबि विहारी बिलैया ठोकए लगल। बिलैयो ठोकैत आ मने-मन विचारबो करैत जे तीनटा बेटा-बेटी अछि ओकरा पढ़बैमे एक गोरेक खेनाइ की छी। टोलक लोक गरीब अछि मुदा हमरा तँ दू सेर दू टाका अछि। जेकरा रहै छै ओ स्कूल केना बना दइ छइ। विहारीक मनमे एते उत्साह जगि गेल जे असगरो खरच करैले तैयार। साँझू पहर विहारी ज्ञानचनकेँ संग केने बिशेसर ऐठाम पहुँचल। बिशेसर भजन करै छल। भजन अदहापर आबि गेल रहइ। मगन भऽ बिशेसर आँखि बन्न केने गबै छल। बिशेसरकेँ मगन देख दुनू गोरे–विहारी आ ज्ञानचन–बिछानपर बैस गेल। भजन समाप्त होइते, आँखि खोलि बिशेसर विहारीकेँ पुछलक- “पाहुन कहाँ रहै छैथ?” विहारी उत्तर देलक- “भैया, हिनकर नाओं ज्ञानचन छिऐन। पढ़ल-लिखल छैथ। गामक बच्चा सभकेँ पढ़बए चाहै छैथ।” जहिना माटिक तरमे गाड़ल रूपैआक तमघैल भेटलापर खुशी होइत तहिना ज्ञानचनक चर्चा सुनि बिशेसरकेँ भेल। हँसैत बिशेसर बाजल- “बहुत दिनसँ मनमे छेलए जे बच्चा सभकेँ पढ़ैक जोगार करी मुदा गरीबीक चलैत नै भऽ पबै छल। ई तँ सौभाग्यक बात छी। जहिना घर आएल लक्ष्मीकेँ लोक जाए नै दिअ चाहैत तहिना तँ आएल सरस्वतीकेँ सेहो पकड़ैक अछि।” बिशेसरक बात सुनि कँपैत विहारी पुछलक- “भैया, जेना झगड़ौआमे चुनचुनकेँ भेल तेना तँ ने हएत?” कनी काल गुम्म रहि बिशेसर चुनचुनक घटनापर नजैर दौगबैत बाजल- “चुनचुन अधला रस्ता धऽ नीक काज करए चाहलक तँए फल अधला भेलइ। हम सभ नीक काज करैले नीक रस्तो पकड़ब।” अखन धरि ज्ञानचन चुपचाप सुनैत। बिशेसरक बात सुनि ज्ञानचन बाजल- “बिल्कुल ठीक। जाधैर मनुख मनुखक संग नै चलत ताधैर एहेन-एहेन दुखद घटना होइते रहत।” विहारी मुँह बाबि ज्ञानचन आ बिशेसरक बात सुनैत। ज्ञानचनक बात सुनि विहारी बाजल- “गुरुजी, हम मुरुख छी। खेती छोड़ि दुनियाँ-दारीक किछु ने बुझै छी। जहिया कहियो कोनो तेहेन काज भेल तँ बिशेसरे भैयासँ पुछि करै छी।” विहारीक बात सुनि ज्ञानचन बाजल- “शुरूमे कोनो गाम जे बनल ओ ऐ रूपे बनल– हमर-अहाँक पुर्वज परती जंगल तोड़ि खेत बनौलैन। गामोमे सभ तरहक लोकक जरूरत होइ छइ। जेना बड़ही, कुम्हार,नौआ, धोबि, चमार इत्यादि। जिनका पसारी बूझल जाइए। ओ सभ खेती नै कऽ कियो खेतीक सामान हर, कोदारि बनौलक तँ कियो माटिक बरतन। मुदा जखन छल-प्रपंचक कारोबार शुरू भेल तखन खेतक छीना-झपटी हुअ लगल। अधिक लोक गरीब बनैत गेल आ कम लोक अमीर। समाजक कल्याण बास्ते धरमक आश्रय लेल गेल। मनुखो आ मालो-जाल-ले इनार-पोखैर खुनौल जाए लगल। चलैले रस्ता बनल। मुदा बादमे दसनमो चीज खानगी बनए लगल। ‘ई हमर छी’ एहेन विचार लोकमे आबि गेल। जइसँ द्वेष पनपल। हमर पुर्वज ऋृषि-मुनि ज्ञान आ कर्मक माध्यमसँ समाजक कल्याण-ले निअम बनौलैन। मुदा सभ छल-प्रपंचक अखाड़ा बनि गेल।” ज्ञानचनक विचार सुनि बिशेसरक उत्साह बढ़ल। उत्साहित भऽ विहारीकेँ कहलक- “अखन तँ तीनिए गोरे छी। काल्हि बेरूपहर टोलक सभकेँ बैसार करह। ओइ बैसारमे बच्चाकेँ पढ़बैक विचार सभकेँ पूछब। कियो तँ नै नहियेँ कहत मुदा सबहक विचार लऽ लेब जरूरी अछि। गुरुओजी तैयारे छैथ।” विहारी- “भैया, तूँ जे कहबहक तइसँ हम थोड़बे पाछू हएब। गुरुजीकेँ खेनाइ आ एक धारा चाउर घरो-परिवार-ले देबैन। मुदा कोनो तरहक भीड़ जँ पड़त तइले तूँ आगू रहिहह।” बिशेसर- “विहारी, तूँ हमरा छनकट आदमी बुझै छह जे बाजब किछु आ करब किछु। जहिना मरद जकाँ कहै छिअ तहिना निमाहब। हम अपन मालिक अपने छी। कियो एक साँझक बुतात जोड़ैए जे तेकर हुकुम मानबै। जे आँखि देखौत ओकर आँखि निकालि लेबइ।” मुस्कियाइत विहारी आ ज्ञानचन विदा भेल। रस्तामे विहारी झगड़ौआक चुनचुनक खिस्सा ज्ञानचनकेँ कहैत घरपर तक आएल। दोसर दिन टोलक लोकक बैसार विहारी केलक। गुरुजीक नाओं सुनि टोलक चेतन लोकसँ बेसी धिए-पुते बैसारमे आएल। बच्चा सभकेँ पढ़बैक नाओंपर सभ सहमत होइत दुनू हाथ उठा समर्थन केलक। सबहक समर्थन देख बिशेसर बाजल- “अगर कोनो आपैत-विपैत औत तँ सभ मिलि ओकर सामना करब।” बिशेसरक विचारकेँ सभ थोपड़ी बजा समर्थन दैत बाजल- “जखन गाममे सरस्वतीक आवाहन भऽ गेल तखन फेर जाए नै देब। सभ शनिकेँ एक पौआ चाउर शनिचरा कहि गुरुजीकेँ देबैन।” ज्ञानचन- “काल्हि हम गाम जा परिवारमे जनतब देब। परसूसँ बच्चा सबहक पढ़ौनी शुरू कऽ देब।” ज्ञानचन गाम जा पत्नीकेँ सभ बात कहलक। अखन धरि जे सुधिया ग्रीष्मक गरमीसँ जरै छेली ओ बरखाक बून पड़िते जेना कलशए लगली। ◌ शब्द संख्या : 3359 5. चैत-बैशाखक आड़िपर जुड़शीतल पावैन। ओना अपना ऐठाम अनेको तारीख आ साल चलैए। जेना साल भेल- विक्रम संवत, हिजरी, लक्ष्मण संवतक संग अंग्रेजियोक। चैतक रान्हल बैसाखमे खाएब तँए आध पहर रातिए-सँ भनसिया सभ भानसमे जुटि गेल। संक्रान्तिक हिसाबसँ जुड़शीतल पावैन होइत तँए पूर्णिमाक महत क्षीण भऽ जाइत। भोर होइते स्त्रीगण सभ घर-आँगनसँ लऽ कऽ रस्ता-पेरा धरिमे पानि छीटैत। बुढ़-बुढ़ानुस लोटामे पानि लऽ धिया-पुतासँ जुआन धरिक माथपर एक चुरूक दऽ असिरवाद दइत। छौड़ा-मारड़िसँ जुआन धरि भाँगक ओरियानमे जुटि गेल। कियो भाँग पीसैमे मस्त तँ कियो दोकानसँ चीनी-गुड़ आनि बाल्टीनमे घोड़ैमे मस्त। किसानो सभ अपना-अपना काजमे व्यस्त। कियो घरक केबाड़ खोलि धोइमे तँ कियो गाछ सभ पटबैमे, तहिना कियो गाए-बरदकेँ नहबैमे, तँ कियो इनार उराहैमे। पावैनक उत्साह सिरिफ लोकेटा मे नै बल्कि गाछो-बिरीछमे देख पड़ैत जे अपन पुरना वस्त्र तियागि नवका वस्त्र पहिर-पहिर उमंगमे झुमैत। दस बजैत-बजैत सभ अपन-अपन घरक काज सम्हारि एकत्रित भऽ भाँग पीब महादेव-पार्वती बना ‘जय शिव जय शिव’ गबैत गाममे घुमए लगल। महादेवोक रूप अजीब। भाँग-धुथुरक गाछसँ सजल महादेवक रूपसँ पार्वतियो बेहद खुशी। कखनो संग छोड़ैले तैयार नहि। थाल-कादो गोबरसँ कियो डराइत नै बल्कि महादेवक रंग बुझि अपनो आ दोसरोसँ देह ढोरेने। जेहने महादेव तेहने हुनकर संगी। सभ मस्त। यएह छी जुड़शीतल पावैनक भिनसुरका उखड़ाहा। दुपहर होइते धिया-पुता सभ अपन-अपन पिचकारी रखैत तँ कीर्तनियाँ ढोलक-हरमुनियाँ। पोखैरमे सभ नहा-नहा घरपर आबि खाइ-पीबैमे लगि गेल। बेर टगिते शिकार खेलैक तैयारीमे जुटि गेल। कियो भाँग हाँइ-हाँइ पीसैत तँ कियो नवका लाठी बनबैत। कियो पुरने लाठीक झोल झाड़ैत तँ कियो लाठीमे करुतेल लगबैमे व्यस्त। कियो सिलौटपर भाला पिजबैमे व्यस्त तँ कियो तीर पिजबैमे। भाँग पीब लाठी, भाला, तीर लऽ लोक शिकार खेलए विदा भेल। घरसँ निकैलते ललकारा दैत सभ बाध दिस चलल। गाममे जेतेक खरहीक खेत, खरहोरि, बोन-झाड़ सभ अछि तेकर तलाशी आइ हएत। गामक ढेरबा बच्चासँ लऽ कऽ बुढ़-बुढ़ानुस धरि लाठी लऽ शिकार खेलए विदा भेल। चारि कट्ठाक एकटा खरही-खेतकेँ चारू-भरसँ घेरलक। पाँच-सात गोरे लाठी नेने खरहीमे पैसल। घेरनिहारो हल्ला करैत आ झोरनिहारो। एकटा नढ़िया खरहीसँ निकैल दोसर खरहीमे नुका रहल। नढ़िया देख सभकेँ जोश बढ़लै। हल्ला करैत सभ ओइ खरहीक खेतकेँ घेरलक जइमे नढ़िया पड़ा कऽ आबि नुकाएल। किछु गोरे खरहीमे ढूकि नढ़ियाकेँ ताकए लगल। खरहीक एकटा बीटमे बैस नढ़िया आँखि गुरैड़ कऽ तकैत रहए। एकटा झोरनिहारकेँ देख नढ़िया जान बँचबैले पड़ाएल। खरहीसँ निकैलते हल्ला करैत सभ खिहारलक। नढ़िया भगैत एकटा झाड़ीमे तेना नुका रहल जे कियो देखबे ने करैत। तिलकोरक लत्ती तेना ओइ झाड़ीपर चतरल जे तरमे अन्हार बुझि पड़ैत। हारि कऽ शिकारी सभ आगू बढ़ि गेल। नढ़िया बँचि गेल। शिकरी सभ आगू बढ़ि झाड़ीक बोन घेरलक। बोन घेर ललकारा दिअ लगल। ललकरेपर ओइ बोनसँ एकटा हरिण आ एकटा नील गाए निकैल तेते जोरसँ पड़ाएल जे केकरो पबैए ने देलक। सभ ठाढ़ भऽ मुँह तकैत रहि गेल। शिकारी सभ अपनामे गप-सप्प करए लगल जे आब एक्केटा खरहोरि बँचल अछि जँ अहिना भेल तँ पावैनक महौते की? नव उत्साहसँ शिकारी सभ खरहोरि लग पहुँचल। खरहोरिकेँ चारू-भरसँ घेर तीरबला सभ पैसल। जोड़ा खढ़िया खरहोरिसँ निकैल पच्छिम-मुहेँ पड़ाएल। खढ़ियाक ऐगला दुनू पएर छोट आ पैछला दुनू नमहर। अठ-अठ हाथ छरपैत। शिकारी सभ खिहारलक। खढ़िया भगबो करैत आ पाछू घुमि-घुमि तकबो करैत। किछु दूर भगलापर दुनू खढ़िया दू दिस भऽ गेल। खिहारनिहारो सभ राइ-छित्ती भऽ गेल। खिहारैत-खिहारैत शिकारी सभ अपसियाँत-अपसियाँत भऽ गेल मुदा खढ़िया पकड़ए नै देलक। दोसर गामक शिकारी सेहो खढ़ियाकेँ अबैत देखलक। सीमा टपि खढ़िया दोसर गामक सीमामे चलि गेल। शिकारी सभकेँ दूर देख खढ़िया बड़का आड़िक बिलमे ढूकि गेल। एक दिस प्रेमनगरक शिकारी दोसर दिस रूपनगरक शिकारी। प्रेमनगरक शिकारीकेँ बुझि पड़लै जे रूपनगरबला खढ़िया मारि लेलक आ रूपनगरबला शिकारीकेँ बुझि पड़लै जे प्रेमनगरबला मारि लेलक। खढ़िया चौंकले छेलए आँखि उठा-उठा देखबो करए। दुनू गामबला-केँ एक-दोसरपर शंका हुअ लगलै जइसँ कहा-कही शुरू भेल। एक तँ शिकारक निशाँ दोसर ताड़ी-दारू-भाँगक सेहो रहबे करइ। जमातो रहबे करै आ हाथमे लाठियो रहबे करइ। जहिना चैत मासमे खरिहाँने-खरिहाँन खुगल गहुमक बोझ रहैत, पच्छिया हवा बहैत रहैत आ तखने कियो बदामक ओरहा बान्हपर करए लगए तँ आगि किए ने लगतै, तहिना लड़ाइक सभ साम्रगी अनुकूल तँए जेते काल मारि नै फँसल ओते देरीए होइत। कहा-कही गारि-गरौवैलमे विकसित भेल। बुढ़बा सबहक गारि तँ मारिक जोश नै चढ़बैत मुदा छौड़ा-मारड़ि जे बुढ़बाकेँ गरियबैत ओ मारिक अनुकूल समए बनबए लगल। ताबे पाछूसँ एकटा छौड़ा ईंटाक रोड़ी लऽ दोसर दिस फेक देलकै। ओ रोड़ी एक गोरेक कपारपर गिरल। कपारमे रोड़ीक कोण गड़ि गेलइ। जइसँ छर-छर खून बहए लगलै। पैछला लोक हल्ला करए लगल जे कपार फोड़ि देलकै! एक दिस हल्ला होइत दोसर दिस लाठी चलए लगल। धमगिजर मारि भेल। दुनू दिससँ करीब साएक लगभग घाइलो भेल। केकरो डेन टुटलै तँ केकरो घुट्ठी। केकरो कपार फुटल तँ केकरो कन्हा टुटलै। दुपहरसँ अखन धरिक गरमी ठंढा गेल। कन्हेठ-कन्हेठ लोक घाइलकेँ उठा-उठा लऽ जाए लगल। दुनू गामबला अपन-अपन आदमीकेँ उठा-उठा अपना-अपना गाम लऽ गेल। दुनू दिस इलाज चलए लगल। बिनु पार्टीकेँ कहनौं थानासँ दरोगा दू दर्जन फोर्स लऽ कऽ पहुँच गेल। पहिने एकटा गामक घाइलकेँ देख नाओं लिखलक पछाइत दोसर गाम जा सबहक नाओं लिखि केस आगू बढ़ौलक। सभपर केस भऽ गेल। मुदा दरोगा एते जरूर केलक जे जेतबे घाइल भेल रहै ओतबे आदमीपर केसो लिखलक। इलाजसँ लऽ कऽ जमानत करबै धरि तीन मास दुनू गामबला-केँ लगलै। मुदा भुमहुरक आगि जकाँ विवाद मिझाएल नहि। इलाकामे वीरपुरकेँ लोक बदमाश गाम बुझैए। जइसँ ने लग-पासक गामबला कियो ओइ गाममे कुटुमैती करैए आ ने खेनाइ-पिनाइ। परोपट्टामे वीरपुरबला-केँ कुटुमैती नै भेने इलाकासँ बाहर जा-जा कुटुमैती करए पड़ैत। वीरपुरमे बाहरसँ सुआसिन ऐने परिवारमे विचित्र घाल-मेल भऽ गेल। किछु सुआसिन भोजपुरी इलाकाक तँ किछु मगही इलाकाक तँ किछु अन्तिका इलाकाक तँ किछु अवन्तिका इलाकाक। तँए, ने बोलीमे एकरूपता आ ने समाजिक रीति-रिवाजमे। जहिना बोली तहिना भोजन बनबैमे आ तहिना ओढ़ब-पहिरबमे। गाम रहितो वीरपुरमे शहरे जकाँ अनेको बोली गाममे चलैत! जखन कोनो परिवारमे बिआह-मूड़न आकि पूजा-पाठक अवसरपर जे गीत-गौनिहारि एकत्रित भऽ गोसाउनिक गीत शुरू करैत तँ सुननिहार सभ हँसबो करैत आ व्यंगो करैत। जँ कहियो कोनो काजमे लाउडस्पीकर लगा गीत गबैत तँ चारूकातक जनिजाति सभ एकत्रित भऽ-भऽ सुनबो करैत आ हँसैत-हँसैत लोट-पोट भऽ ताना सेहो मारैत। ओना वीरपुरबला अपनाकेँ लड़ाकू बुझैत। साले-साल जुड़शीतल दिन अपन शक्तिक प्रदर्शन सेहो करैत। गामसँ पूब एकटा परती अछि, जेकरा सभ कुरुक्षेत्रक मैदान कहैत। वीरपुर गाममे पुबे-पच्छिमे, बीचो-बीच ऊँचगर बान्ह अछि। बान्हक दुनू भाग गाम बसल अछि। गाममे दूटा दियादी पट्टी एहेन जे अदहा गाम पसरल। दुनू पट्टी बान्हक दुनू भाग बसल। जुड़शीतल दिन-ले सौंसे गौंआँ बेहरी कऽ एकटा नमहर खस्सी कीनैत। जुड़शीतल पावैन दिन ओइ खस्सीकेँ बीच परतीपर खुट्टा गाड़ि बान्हि दइत आ बेर टगिते सौंसे गामक लोक गाँजा, भाँग, ताड़ी, दारू पीब मस्त भऽ जाइत। चारि बजेसँ अदहा गामक लोक एक भाग आ अदहा गाम दोसर भाग भाला, फरसा लऽ जमा हुअ लगैत। जखन सौंसे गामक लोक जमा भऽ जाइत तखन ढोलिया कसि कऽ एक झोंक ढोल बजबैत। ढोल बन्न होइते सभ तैयार भऽ जाइत। जखन दुनू दिसक लोक तैयार भऽ जाइत तखन ढोलिया तीन बेर ढोल बजबैत। ढोल बजिते नवजुबक सभ सन-सन करए लगैत। एकटा नवजुबक जे गोर वर्ण रिष्ट-पुष्ट शरीर बी.ए. पास छल। अही बेर फागुनमे बिआहो भेल छेलै, ओ खस्सी खोलए आगू बढ़ल। खस्सी लग जा डोरी खोलए लगल। डोरीए खोलै काल दोसर पाटीक एक गोरे कपारपर सोझे फरसा मारलक। दुनू एक्के हाइ स्कूलसँ मैट्रिक पास केने। दियाद सेहो। ओइ जुबकक कपार दू फाँक भऽ गेल। फरसा मारिते दुनू दिस हल्ला हुअ लगल। जाबे हल्ला शान्त होइ-होइ ताबे ओ जुबक मरि गेल। मनोरंजनक विकृत रूप मैदानमे उपस्थिति भऽ गेल। रूपनगर आ प्रेमनगर एकबधू। ओना आनो-आनो बाधमे दुनूक खेत मुदा एकटा बाधमे दुनू गौंआँक खेत। जखन रूपनगरबला खेत जोतए अबैत तँ धपा कऽ प्रेमनगरबला पकैड़ मारबो करैत आ हरो-बरद छीनि लइत। तहिना रूपोनगरबला करए लगल। ढेरो मोकदमा दुनू गौंआँक बीच फँसि गेल। पनरहे दिनमे रविया, भोलबा, अनुपा, गोसैमा, रूपना आ मेथराक हर-बरद छीनि लेलक। तहिना प्रेमनगरक चंचलबा, फकीर, सिंहेश्वर, भैयेजी, सुकल आ सोनेलालक हर-बरद छीना गेल। मुदा दुनू गौंआँ अखन धरि बरबैरेमे रहल। किएक तँ सात गोरे रूपनगरबला आ सात गोरे प्रेमोनगरबला मारियो खेलक आ हरो-बरद छिनौलक। मुदा गौंआँमे कैबलत्ती एलै जे जेकर-जेकर हर-बरद छिनाएल रहै ओकरे सभकेँ भेटलै। मुदा बरबैर रहनौं प्रेमनगरबला नफ्फामे रहल। तेकर दू कारण- पहिल जे नीक बरदक जोड़ा पड़ि लगलै आ दोसर जे प्रेमनगरक जे कियो मारि खेलक ओ जुआन जहान छल तँए अस्पताल जाइक काज नै पड़लै। मुदा रूपनगरक तीनटा अधवयसू मारि खेलक। जेकरा एक महिना डाक्टरी इलाज करबए पड़लै। एक दिन सौंसे रूपनगरक लोक एकठाम बैसल। सभ मिलि तँइ केलक जे भोरगरे दू बोझ लाठी बाधमे रखि आएब आ जेते लोकक खेत ओइ बाधमे अछि ओ सभ अपन-अपन हर लऽ कऽ ओइ बाधक खेत जोतब। बढ़ियाँ विचार बुझि सभ मानि लेलक। मगर बुधना मने-मन विचार केलक जे जेहने नफगर विचार भेल तइसँ केते घाटा छै ओइ दिस केकरो नजैरे ने गेल। हम जे बजबो करब तँ छौड़ा-मारड़ि बुझि सभ दुसबो करत आ बुढ़बा सभ गरिएबो करत। तइसँ नीक अपने बुधिए काज करब। जखन सभ बैसारसँ उठि विदा भेल तखन बुधना बाजल- “हमहूँ हर लऽ कऽ ओइ बाध जाएब मुदा हमरा बजारसँ दवाइयो अनैक अछि। ओना हम भोरे जा हर जोतै बेर तक आबि जाएब, जँ कहीं अबेर भेल तँ कियो ई नै कहिहह जे बुधना धोखेबाज अछि।” बुधनाक बात सुनि सभ हल्ला करैत बाजल- “ठीक अछि। ठीक अछि। बड़ देरी हएत तँ जलखै बेर हएत। सएह ने।” मने-मन बुधना बुझलक जे दाउ सुतैर गेल। बजारे छिऐ कएटा चिन्हारए भेटत। की ओकरासँ कुशल-छेम नै करब। चाह-पान नै करब। अबेर हेबै करत। बुधियार सभ केते अछि जे पाँच गामक लोककेँ बजा पनचैती नै करत। जाएत चैत-बैसाखक रब्बी बनैले..! भोरे सभ संगोर कऽ एक्के संगे हर लऽ विदा भेल। सभ अपन-अपन खेत जोतए लगल। प्रेमनगरक अधिकलाल सेहो ओही बाध हर-बरद लऽ खेत जोतैले अबैत रहए। फरिक्केसँ रूपनगरबला-केँ जेरगर देख घुमि गेल। गामपर आबि हल्ला कऽ कऽ कहए लगलै जे रूपनगरबला सभ खेत जोतैए। तेते जेरगर अछि जे कहीं अपन-अपन खेत जोति अपनो सबहक ने जोइत लिअए। एक तँ दुश्मनीक क्रोध आ दोसर खेत जोतैक डर। सभसँ बेसी डर होइ जे जँ कहीं अहिना सभ दिन आएत आ अपन जोति-कोरि कऽ अबादि लेत आ हमरा सबहक परतीए रहि जाएत! सौंसे गामक लोक सभ लाठी लऽ विदा भेल। रूपनगरबला मने-मन खुशी जे हमहूँ सभ तैयारे छिऐन। मुदा जखन लोकक करमान देखलक तखनसँ सबहक करेज डोलि गेल। ओना कमजोरीक कारण ईहो रहै जे रूपनगरक सिरिफ किसानेटा रहै तँए कमजोर। मुदा जँ भागियो जाइ आ एमहर प्रेमनगरबला गाम हूलि जाए, तखन तँ मरद-मौगीक कोनो ठेकान नै रहत! ओना, आशा ईहो रहै जे गाम हूलत तँ गामक मरद-मौगी तैयार भऽ जाएत आ हमहूँ सभ बीच्चे गाममे घेर मरम्मत कऽ देबइ। प्रेमनगरक किछु गोरे बरद खोलए गेल आ किछु गोरे बाता-बाती करए लगल। सभ बरदकेँ खोलि हरो आ बरदो एकठाम केलक...। एमहर, ऐ बातक दृढ़ बिसवास रूपनगरबला-केँ भऽ गेलै जे आइ सभ हर-बरद चलि जाएत। तँए अपन इज्जत बँचबै दुआरे अगुआ कऽ मारि ठनलक। खूब लाठी चललै। किछु लोक भागि गेल आ किछु गोरे मारि खा खेतमे ढेंग जकाँ बेहोश भऽ पड़ल। एकतरफा मारि खेलक। ..सभ चिन्तित जे मारियो खेलौं, हरो बरद गेल आ कहीं खेतो ने जोइत लिअए। तेतबे नइ, सबहक लाठियो लऽ लेलक आ हरो-बरद अगुआ लेलक! हँसैत-पिहकारी दैत प्रेमनगरबला गामपर आएल। एक दिस मरद सभ आ दोसर दिस मौगी सभ कुदि-कुदि गरियबैत। जखन रूपनगरबला-केँ घरपर लऽ गेल तखन स्त्रीगण सभ कनैयो लगल आ सरापि-सरापि गरिएबौ लगल। गामपर आबि प्रेमनगरबला, बीस सेर चिन्नी चालिस-पचासटा नेबो आनि शरबत बनबए लगल। जेते कालमे शरबत बनलै तेते कालमे लाठी चलौनिहार सभ अपन मारिक कथा सुनेलकै। मुदा मारिक डर दुनू गौंआँकेँ भीतरे-भीतर होइत। ओना, डरे ने फेर रूपनगरबला ओइ बाध आएल आ ने प्रेमनगरबला। गामक बगलबला खेत दुनू गोरे अबादलक आ बीचला बाधक खेत छोड़ि देलक। रूपनगर आ प्रेमनगरक बगलमे, कोस भरि हटि सोनपुर हाट लगैत। सप्ताहमे दू दिन- मंगल आ शुक्रकेँ बेरूपहरमे। हाट तँ तीनिए-चारि घन्टाक होइत मुदा इलाकाक नामी हाटमे गनल जाइत। हाटमे बजरूआ समान-कपड़ा, बरतन, सोना-चानीक बिकरी तँ नै होइत मुदा देहाती चीज- बरद, गाए, लकड़ीक बनल कुरसी, चौकी, हँसुआ, खुरपीसँ लऽ कऽ तीमन-तरकारी, अन-पानिक बिकरी खूब होइत। तरकारी आ मसल्ला उपजैक इलाका तँए बाहरोक वेपारी आबि-आबि कीनैत। रूपोनगरक वेपारी आ प्रेमोनगरक वेपारी हाटमे खरीद-बिकरी करैत। मुदा जइ दिनसँ दुनू गामक बीच मारि भेलै तहियासँ दुनू गामक वेपारी हाट करब छोड़ि देलक। डर दुनू गामक वेपारीकेँ होइत। जुड़ेशीतलक साँझमे दुनू गामक मारिक जनतब बिशेसरकेँ भेल। समाचार सुनिते देहमे आगि लगि गेलइ। मने-मन बिशेसर सोचए लगल जे दुनू गामक लोक मनुख छी आकि मनुखक नकल। कहू जे नढ़िया, खढ़िया दुआरे कहीं एहेन मारि हुअए! तीन मास धरि दुनू गामक लोककेँ केते नोकसान भेल आ केते शरीरमे कष्ट! प्रेमनगरमे बिशेसरक समधियौर आ रूपनगरमे ममियौत बहिन बसैत। एहेन घटनाक पछाइत जिज्ञासा करब बिशेसर जुरूरी बुझलक। मुदा खढ़िया-ले झगड़ा भेल तँए तामसे ने रूपनगर जा कऽ जिज्ञासा केलक आ ने प्रेमनगर। प्रेमनगरक भार उताइर बिशेसर बेटाकेँ पठा देलक मुदा अपने नै गेल। रूपनगर तँ अपने जेनाइ जरूरी मुदा तामसे सभ जरूरी बिशेसरक आगिमे जरि गेल। लड़ाइ बेसिएलोपर तामस ओहिना तरगर रहइ। चारू दिससँ बिशेसरकेँ उपराग अबए लगल। पहिल उपराग ममियौत बहिन दिससँ एलइ तँ दोसर बहनोइ दिससँ एलइ। तहिना तेसर समैध दिससँ तँ चारिम समधीन दिससँ। एक्को एहेन दिन बाँकी नै रहै जइ दिन उपराग नै अबइ। मुदा उपराग सुनि बिशेसरकेँ तामसोमे नवका पानि चढ़ि जाइत। छह मास बित गेल। मुदा बिशेसरकेँ तामसमे कमी नै आएल। मने-मन विचारए लगल जे की करब उचित हएत। गुनधुन करैत माथपर हाथ दऽ बैसल बिशेसरकेँ एकटा जुक्ती फूरल। फुरिते बिशेसर रूपनगर जाइले तैयार भऽ गेल। जुक्ती यएह फुरलै जे जिज्ञासाकेँ भार नै बुझि भेँट करब बूझब। पत्नीकेँ बिशेसर कहलक- “हम कनी रूपनगरसँ भेल अबै छी।” रूपनगरक नाओं सुनि हँसैत मोहिनी बाजल- “आइ केमहर सुरूज भगवान उगलखिन जे मन बदलल!” “मन-तन नै बदलल, तेते उपराग अबैए जे नइ गेलासँ दोखी भऽ जाएब। वएह दोख मेटबैले जाइ छी।” बिशेसर असथिरसँ बाजि रूपनगर विदा भेल। रस्तामे ओइ जुड़शीतल दिनक घटनाक सम्बन्धमे सोचए लगल। अदहासँ अधिक रस्ता कटि गेलै, तखन मनमे एकाएक एलै जे नै जाएब। एतैसँ घुमि जाएब। ने एक्को डेग बिशेसर आगू बढ़ैत आ ने पाछू। बीच रस्तापर ठाढ़ भऽ जेबीसँ तमाकुल-चुन निकालि चुनबए लगल। तमाकुलो चुनबैत आ मने-मन सोचबो करैत जे आब जँ घुमि जाएब तँ घरवाली ताना मारती। तहूसँ बेसी जे जँ औरो गोरे लग बाजि देने हएत तखन केतेकेँ मुँहमे जवाब देब। तमाकुल खा बिशेसर आगू बढ़ल। बहिन ऐठाम पहुँचते बहनोइ दरबज्जापर सँ उठि रस्ता दिस टहैल देलकैन। बिशेसर बुझि गेल जे तामसे एना केलैन। मुदा मान-अपमान बहिनक ओइठाम नै होइत। तँए पोल्हा कऽ हमहीं किए ने पुछिऐन। थोड़े आगू बढ़ि बिशेसर बहनोइकेँ पुछलक- “पाहुन, एना मन किए उड़ल अछि। कोनो केसमे वारन्ट-तारन्ट भऽ गेल की?” गुम्हरैत बहनोइ उत्तर देलखिन- “गनू झा ठीके कहने छथिन जे ‘एक्के बेर मुइने माइयोकेँ चिन्हलौं।’ सभ दिनसँ कुटुम छेलौं बेर पड़ल तँ अहूँ छोड़ि देलौं।” चुपचाप बिशेसर सुनैत रहल। हँ, हूँ किछु नै बाजल। तरे-तर हँसियो लगै जे- ‘गदहा खसल मेघसँ तँ रूसि रहल सौंसे गौआसँ।’ हँसीकेँ दाबि बिशेसर कहलकैन- “वएह सभ बुझैले तँ एलौं हेन जे की केना भेल। आऊ एकठाम बैस सभ बुझा दिअ। बूझल रहत तखन ने किछु सोचब।” ताबे अँगनासँ बहिन निकैल डेढ़ियापर आबि ठाढ़ भऽ गेल। बिशेसरसँ छोट बहिन। गोड़ नै लागब देख बिशेसर बुझलक जे दुनू गोरे एक्के रंग तमसाएल अछि। हमहूँ तँ गप्पे करए एलौं। तँए जे भऽ रहल अछि ओ सभ नीके। बहनोइ- “भैया! गामक इज्जतक सवाल भऽ गेल। जँ अछैते जिनगी गामक इज्जत चलि जाइत तँ जीविए कऽ की करितौं।” बहनोइक बात सुनि बिशेसर मने-मन हँसबो करैत जे बड़ इज्जत बचेनिहार छैथ। मुदा हँसीकेँ दबैत बिशेसर बाजल- “इज्जत बँचा लेलौं ई तँ बड़का काज केलौं। हमहूँ धड़फड़ाएले आएल छी, रहब नहि तँए एकटा बात कहू जे अखन नीक छी किने?” बिशेसरक बात जेना बहनोइकेँ हृदैमे धक्का मारलकैन तहिना मन तिलमिला गेलैन। बोलीक कठोरता बदैल नरम हुअ लगलैन। अपशोच करैत बजला- “भैया की कहबैन, छह माससँ जे दशा भऽ रहल अछि ओ तँ अपने हृदए जनैए। एक्के बीघा खेत अछि। जइमे पनरह कट्ठा खसले रहि गेल। पाँच कट्ठाक उपजासँ की हएत। एकटा जे बरदो छल ओहो प्रेमनगरबला छीनियेँ लेलक। खुट्टापर गाए छल ओहो दवाइ-दारूसँ लऽ कऽ केसक खर्चमे बिका गेल। गुजर करब मुसकिल भऽ गेल अछि।” बहनोइक बात सुनि बिशेसरक मन तामसे आगि भऽ गेल। मुदा किछु बाजल नहि, चुपचाप उठि विदा भऽ गेल। बाध खसल रहने घास उपजल। मुदा घसबहिनियोँ सभ डरे घास छिलए नै जाइत। ने रूपनगरक घसबहिनी बाध जाइत आ ने प्रेमनगरक। एक दिन आठ-दसटा रूपनगरक घसबहिनी घास छिलए बीचला बाध गेल। प्रेमनगरक घसबहिनी देखलक। ओ चुपचाप गाम आबि पनरह-बीसटा छरे-छाँट घसबहिनीक संगोर कऽ बाध दिस चलल। थोड़े दूर गेलापर सभ छिड़िया कऽ बढ़ैत गेल। रूपनगरक घसबहिनी घास छिलैमे मस्त। चारू-भरसँ प्रेमनगरक घसबहिनी रूपनगरक घसबहिनीकेँ घेर लेलक। जखन प्रेमनगरक घसबहिनी रूपनगरक घसबहिनीक लग आएल तखन रूपनगरक घसबहिनीक नजैर पड़लै। प्रेमनगरक घसबहिनीकेँ देख रूपनगरक घसबहिनी डरल नहि। आठो-दशो घसबहिनी साड़ीक फाँड़ बान्हि, हाथमे हाँसुआ-खुरपी लऽ ठाढ़ भऽ गेल। प्रेमनगरक घसबहिनीमे एकटा अधवयसू, जेकरा सभ झगड़ाउ दादी कहैत, दुनू गामक घसबहिनी दू दिस ठाढ़ भऽ झगड़ा करैले तैयार भऽ गेल। तैबीच झगड़ाउ दादी बाजल किछु नइ मुदा हँसुएसँ इशारामे कहलक जे आँखि निकालि लेबौ। दादीक इशारा देखते रूपनगरक घसबहिनी गारि पढ़ब शुरू केलक। दुनू दिससँ गारि चलए लगल। रूपनगरक देवसुनरी प्रेमनगरक माधुरीकेँ कहलक- “गे मोटकी, तोरा की होइ छौ जे हम हाथी छी। सभकेँ पीच देबइ। सूढ़ जे नमरल छौ ओकरा जड़ि भिरा कऽ काटि लेबौ।” देवसुनरीक बात सुनि माधुरी बाजल- “हे गइ ठोरनमरी, देखै छीही हँसुआ! दुनू ठोर सहित नाक काटि लेबउ।” माधुरीक बात सुनिते रूपनगरक घसबहिनी आगू बढ़ि प्रेमनगरक घसबहिनीकेँ झोंटा पकड़ैले लगमे चलि आएल। प्रेमनगरक घसबहिनी बेसी छलि। दू-दू, तीन-तीन गोरे मिलि एक-एकटा रूपनगरक घसबहिनीकेँ कियो झोंटा पकड़लक तँ कियो गट्टा। रूपनगरक घसबहिनीकेँ लिड़ी-बिड़ी कऽ पटकए लगल। दुनू गामक घसबहिनीक बीच मुक्का-मुक्की चलए लगल। मारि तँ प्रेमोनगरक घसबहिनी सेहो खेलक मुदा बेसी रूपनगरक घसबहिनी खेलक। रूपनगरक झगड़ाउ बुढ़िया सबहक हँसुआ, पथिया समेट गाम दिस विदा भेल। साल भरिक झगड़ा-झंझटसँ दुनू गामक लोक पस्त भऽ गेल छल। बिशेसर पाँच गामक पंचकेँ बैसा दुनू गामकेँ मिलान करौलक। ◌ शब्द संख्या : 2869 6. दलानक चौकीपर देबालमे ओङैठ उत्तर-मुहेँ गंगानन्द बैस आँखि बन्न कऽ दुखक अथाह सागरमे उगैत-डुमैत। मनमे यएह होइ जे खेत निलाम होइपर अछि, जँ समैपर मालगुजारी नै दऽ सकब तँ निलाम भाइए जाएत। जँ खेत चलि जाएत तँ जीब केना। अखन धरि जे समाज आ कुटुमक बीच प्रतिष्ठित बुझल जाइ छी ओ केतए चलि जाएत...। फल-फूलसँ लदल जहिना कोनो बगीचा हवाक सिहकी पाबि झुमैत रहैत आ एकाएक अन्हड़-तूफान आबि सभटा गाछ-बिरीछकेँ खसा-पड़ा दैत, वएह स्थिति तँ हमरो भऽ रहल अछि...। चकभौर लैत गंगानन्दक मनमे उठलैन- एते रहलापर जखन हमर ई गति भऽ रहल अछि तखन जेकरा कम छै, ओकर गति की हेतइ। हमरे खेत जखन निलाम भऽ जाएत तखन हमहीं की करब। तीन भाँइक भैयारी अछि। परिवारो नमहर अछि। अखन धरि सभकेँ अपन बुझि दिन-राति सेवा करैत रहलौं। मुदा जेतेक अपन बुझि करैत रहलौं तेते भाए-भावो आलसी बनैत गेल। सिरिफ खाइ-पीबै आ आरामसँ रहैक चिन्ता सभकेँ रहलै। जँ जमीन निलाम हएत तँ सिरिफ हमरेटा नै हएत, सबहक हेतइ। निलामी-ले किछु समए बँचल अछि तँए ई अन्तिम परियासमे दुनू भाएकेँ पुछि लेब उचित अछि। मने-मन गंगानन्द सोचबो करैथ आ निलामीक डरे करेजो थरथड़ाइत रहैन। आँखिक आगूमे झल-अन्हार बुझि पड़ैन। पतिकेँ गुम-सुम बैसल देख पार्वती आबि पुछलखिन- “मन-तन खराब अछि जे एते मन्हुआएल छी। मुँहक सुरखी उतरल बुझि पडै़ए!” अपन बेथाकेँ दबैत गंगानन्द बजला- “नहि, मन तँ खराप नै अछि मुदा परिवारक जे भविस देखै छी तइ चिन्तासँ मन घेराएल अछि। कोनो रस्ते ने सुझैए।” गंगानन्द आ पार्वतीक बीच होइत गप-सप्प सुनि रीतो लगमे आएल। जहिना गंगानन्द भाइक क्रिया-कलापसँ दुखी तहिना रीतो दुनू परानी। पिताक समैमे जहिना गंगानन्दक परिवार चैनसँ चलैत तहिना रीतोक। अखुनका जकाँ ने अन्ट-सन्ट खरच परिवारमे आ ने एते नमहर परिवार, तँए रौदी-दाही भेनौं दिक्कत नै होइत। जन-बोनिहारक हाथे सभ काज चलि जाइत। गंगानन्द रीताकेँ कहलखिन- “दाय, कनी काका सभकेँ बजौने अबहुन?” रीता उठि कऽ यमुनानन्द आ श्यामानन्दकेँ बजबए गेल। तीनटा समस्या गंगानन्दकेँ तीनू दिससँ घेड़ने। पहिल, खेत निलामीक। दोसर, आइ धरि दुनू छोट भाएकेँ बेटा जकाँ सेवा करैत आएल छला जे बिगैड़ कऽ गाराक घेघ भऽ गेलैन आ तेसर, रीताक दुर्दशा। मने-मन गंगानन्द सोचैथ जे जँ रीता बेटा रहैत तँ ऐ सम्पैतक हिस्सेदार तँ ओहो रहैत, मुदा से नै भेलासँ कि ओ कष्ट काटए आ हम चुपचाप देखैत रही। वेचारीकेँ चारि-चारिटा बेटी छै, केना बिआह-दान पार लगतै! जँ केतौ गरीब-गुरबा घरमे बेटीक बिआह करत तँ जिनगी भरि वेचारी नातिन सभकेँ दुख हेतइ। रीता अँगनेमे रहि गेली यमुनानन्द आ श्यामानन्द दरबज्जापर आबि गंगानन्दक लगमे बैसल। दुनू भाँइ यमुनानन्द आ श्यामानन्द एते मन्हुआएल गंगानन्दकेँ कहियो नै देखने जेते आइ देख रहल छैथ। मने-मन दुनू भाँइ सोचए लगल जे भरिसक कोनो नमहर मुसीबतमे भैया फँसल छैथ। मुदा किछु बाजल नहि। आइ धरि गंगानन्द जोरसँ कहियो किछु भाए सभकेँ नइ कहने, तँए बजैत संकोच होइत। मुदा करेजपर पाथर रखि गंगानन्द दुनू भाँइकेँ पुछलखिन- “बौआ, दू सालक रौदी घरकेँ तोड़ि देलक। एक्को सेर उपजा-बाड़ी नै भेल। खरच तँ परिवारमे हेबे करत। केना पार लगतह? मलगुजारी से पछुआ गेल अछि जइसँ खेत निलाम होइक स्थितिमे आबि गेल छह। की करबहक?” गंगानन्दक बात सुनि दुनू भाँइ ठर्ड़ा गेल। मुड़ी निच्चाँ कऽ लेलक। जहिना जड़ि काटल गाछ अर्ड़ा कऽ जमीनपर खसैत तहिना यमुनानन्द आ श्यामानन्दक चढ़ल मन झमान भऽ खसल। गंगानन्द सेहो तरे-तर आगिपर चढ़ल घी जकाँ पघिलैत रहैथ। मुदा जिनगी ओहन मोड़पर पहुँच गेल छैन जे भैयारीक सिनेह आइ शीशा जकाँ चूर-चूर भऽ रहल छैन। एक परिवार तीन परिवारमे विभाजित भऽ जाएत! दुनू भाएकेँ चुपचाप मुड़ी गोंति बैसल देख दोहरा कऽ गंगानन्द बजला- “बौआ, चुप रहने काज नै चलतह। भारी विपैतमे परिवार फँसि गेलह। जँ ओइ विपैतकेँ मेटबैक कोशिश नै करबह तँ दू दिनक पछाइत सभ चीज हराएल बुझि पड़तह तँए अखन समए अछि बँचैक जोगार करह।” मिरमिरा कऽ यमुनानन्द बाजल- “भैया, अखन धरि तँ हम ने परिवार बुझलिऐ आ ने कोनो चिन्ता कहियो भेल। निलामसँ बँचैक जोगार तँ अहीं करबै।” यमुनानन्दक बात सुनि गंगानन्द बजला- “रौदी तँ अपने परिवारटा-ले नै भेल, सभले भेलैए। जँ एकटा परिवारमे कोनो बेर-बेगरता होइ छै तँ समाजमे काज चलि जाइ छइ। मुदा से तँ नै अछि। केकरा के सम्हारत। सभ तँ अपने तबाह अछि।” यमुनानन्द- “तखन की करबै?” गंगानन्द- “खेत बँचैक एकटा उपए हमरा नजैरमे अबैए। ओ ई जे घरमे जेते गहना-जेबर अछि ओ बन्हकी लगा मलगुजारी अदाइ कऽ दिऐ आ पछाइत बन्धक छोड़ा लेब। किछु सुइदे ने लगत मुदा खेतो बँचि जाएत आ गहनो-जेबर।” गंगानन्दक विचार सुनि श्यामानन्द बाजल- “बड़ सुन्नर विचार अछि मुदा स्त्रीगण सभ अपन गहना दइले तैयार हेती तहन ने। अगर जँ ओ गहना दइले तैयार नै होथि, तहन की करबै?” गंगानन्द- “एक बेर जा बुझा कऽ कहुन, अगर नै मानती तँ खेत जेतैन।” यमुनानन्द आ श्यामानन्द उठि कऽ आँगन जा अपन-अपन पत्नीकेँ सभ बात बुझा कहलखिन। मुदा जमीनक सुख-दुखसँ अनभिज्ञ आ गहनाक सिनेही औरत, ने यमुनानन्दक बात मानलकैन आ ने श्यामानन्दक। दुनू भाँइ दरबज्जापर आबि गंगानन्दकेँ कहलकैन। दुनू भाँइक बात सुनि गंगानन्द गुम्म भऽ गेला। आँखि नोरा गेलैन। मने-मन गंगानन्द सोचलैन जे जँ खोलि कऽ दुनू भाँइकेँ नै कहि देबै तँ पछाइत हमहीं दोखी हएब। करेजपर पाथर रखि गंगानन्द दुनू भाँइकेँ कहलखिन- “सतुआ संगे घून पीसब उचित नहि। तीस बीघा जमीन अछि। दस-दस बीघा तीनू भाँइक हिस्सा हेतह। तँए अपन-अपन हिस्सा बँचाबह वा बुड़ाबह। सभ बुड़बैइए पाछू लगल छह तँ सभ किछु बाँटि लएह। जेठ भाय होइक नाते हम कहि देलिअ।” तीनू भाँइक बीच घरोक वस्तु-जात आ खेतोक बँटवारा भऽ गेल। बँटवाराक पछाइत यमुनानन्दोक पत्नी आ श्यामानन्दोक पत्नी तरे-तर खुशी। मुदा दुनू परानी गंगानन्द दुखसँ बेथित। किरिण उगिते पटवारी छोटकी चौकीपर बैस आगूमे ऐना आ पोडरक डिब्बा रखि ब्रुशसँ दाँत मजैत रहए। तेसर स्त्रीकेँ, जे वएसमे पटवारीक बेटी जकाँ बुझि पड़ैत, ओहो लगेमे रहैन आ तीनू सन्तान– जेठ बेटी आ छोट दुनू बेटा घरमे रहैन। तखने लूँगी-गंजी पहिरने दतमैन करैत सिपाही-दुखन सेहो आएल। सिपाहीकेँ अबिते पटवारी पत्नीकेँ कहलक- “चाह बनाउ?” पत्नी चाह बनबए गेली। पटवारियो आ सिपाहियो कुड़ुर कऽ ओसारपर आबि कुरसीपर बैस गप-सप्प करए लगल। आँगनसँ पटवारीक बेटी दूटा प्लेटमे, चारि-चारिटा नमकीन बिस्कुट आ चारि-चारि फाँक सेब आनि दुनू गोरेक आगुमे रखि पानि अनैले भीतर गेली। जाबे चाह बनल ताबे दुनू गोरे सेब आ बिस्कुट खा पानि पीलक। पानि पीबते पटवारीक पत्नी चाह नेने एली। लीलाकेँ देख सिपाही गुलाबी मुस्की दैत बाजल- “पटवारी साहैब, अहाँक हुकुम पूरा केने एलौं।” हुकुम पूरा करैक बात सुनि लीलो ठाढ़ भऽ गेली। आँखि गुरैड़ मुँह बाँबि लीला सिपाही दिस देखए लगली। बेटी बिआहक जिज्ञासासँ पटवारी सिपाहीकेँ पुछलक- “केहेन परिवार गंगानन्दक छैन?” घटकक ढंगसँ सिपाही बाजल- “भगवानकेँ जँ नीक करैक रहै छैन तँ अपन रंग-बिरंगक लीला पसारि दइ छथिन। अहाँकेँ नीक हेबाक अछि तँए रौदियाह समए आ मालगुजारीक विपैत गंगानन्दक कपारपर आएल। नइ तँ ओहन कुल-शील घरमे कुटमैती होएब असम्भव अछि।” ‘कुल-शील’ सुनिते लीलाक हृदैमे गुदगुदी लगलैन। चौअन्नियाँ मुस्की दैत लीला सिपाहीकेँ पुछलखिन- “नीक खनदान छैन?” गंगानन्दक बराइ करैत सिपाही बाजल- “अपना इलाकामे एक्केटा वंश एहेन अछि जे सभसँ पैघ बूझल जाइत। ओइ वंशक गंगानन्द छैथ। सिरिफ वंशेटा पैघ नै छैन हुनका सबहक बेवहार आ विचार सेहो तेहने छैन। जखन हुनका ऐठाम जाएब तँ बुझि पड़त जे मनुखक नै देवताक घर एलौं। जुआन-जहानक कोन गप जे अस्सी बर्खक बुड़हो स्त्रीगण हदिघड़ी मुँहपर साड़ी रखने रहै छैथ।” सिपाहीक बातसँ लीलाक दिल धड़कए लगलैन। मनमे हुअ लगलैन जे, जे बिआह काल्हि हएत से आइए भऽ जाए। उत्तेजित भऽ लीला सिपाहीकेँ कहलखिन- “खरच जे होइ तेकर एक्को पाइ चिन्ता नै करब। धन भेलापर सभ इज्जत बनबैए। अवसर हाथ लगल अछि छोड़ब मुरुखपना हएत। आइए जाउ आ बात पक्का-पक्की केने आउ।” लीलाक उत्सुकता देख सिपाही बाजल- “मेम साहैब, दुखन सिपाही ओते कच्चा खेलाड़ी अछि जे फँसल शिकार छोड़ि देत। जखन डेग उठेलौं तँ काज कइए कऽ छोड़ब। काल्हिए फेर जा कऽ दिन-ठेकान तँइ केनहि आएब।” खुशामदी बोलीमे लीला बजली- “जँ ओइ खनदानमे कुटुमैती भऽ गेल तँ अहाँकेँ मुहमंगा इनाम देब।” मने-मन सिपाही बुझैत जे जहिना पनहाएल गाए औंढ़ मारैए तहिना लीलो अछि, तँए मौकाक लाभ उठा ली। लीला आँगन गेल। सुनयना दरबज्जा दिसक खिड़की लग ठाढ़ भऽ सभ बात सुनैत मने-मन पाँच साल उपास कऽ दुर्गास्थानमे साँझ देवाक कबुलो केलक। आँगन आबि लीला भगवती आगू जा आँचर पसारि, कुमारि भोजन कौबुला केलैन। घरसँ निकैल लीला अँगनाक कुरसीपर बैस सोचए लगली जे हम सभ तँ करतबे करब, भाग्य तँ संग सुनयनेक देत। पटवारीक तेसर स्त्री लीला। जखन पटवारीक उमेर पचास बर्खसँ टपि गेल तखन पनरह बर्खक लीलाकेँ फुसला कऽ बिआह केलक। धन देख लीला, उमेरक परवाह बिनु केने पटिया गेली। पटवारीक पहिल बिआह जे पिता करौने रहैन से अपने जातिमे भेल रहैन। जइ स्त्रीसँ दू बेटा आ दू बेटी। चारू जुआन। नाति-नातिन आ पोता-पोती सेहो। बाप-दादाक घर-घराड़ीक अतिरिक्त, साए बीघा निलामी जमीन सेहो गाममे बनौने। दोसर स्त्रीमे एकटा बेटा आ तीनटा बेटी छैन। चारूक बिआह-दुरागमन भऽ गेल। बेटी सासुर बसैत आ बेटाकेँ सेहो दोसर गाममे पचास बीघा जमीन, गाछी-कलम, पोखैर, इनार, घर-दुआर सभ किछु बना देने। जैठाम दोसर स्त्री आ बेटा-पुतोहु रहैत। तेसर बिआह कचहरीक नोकरानीक बेटीसँ केने। जइ स्त्रीक बेटी सुनयना छी। वएह सुनयनाक बिआहक गप-सप्प चलैत। हीन जातिक बेटी रहने पटवारीकेँ छाती धकधक करैत जे जँ कहीं गंगानन्द बुझि जेता तँ कुटुमैती भङैठ जाएत। पटवारी दुखन सिपाहीकेँ कहलक- “दुखन, अहाँसँ तँ कोनो बात छिपल नहियेँ अछि मुदा जातिक भाँज गंगानन्दकेँ ने लगैन से ओरिया कऽ गप-सप्प करब।” पटवारीक बात सुनि दुखन सिपाही हँसैत बाजल- “हम ओते अनाड़ी छी जे गंगानन्द पेटक बात बुझि जेता पहिलुका सासुरक कुल-मूलक पता देबैन किने।” सिपाहीक बात सुनि पटवारीक मन असथिर भेल। दुखन सिपाहीकेँ पोल्हबैत बाजल- “अहाँक हम छोट भाए बुझै छी। अहूँ जे जेना कहब से हम करब। मुदा कुटुमैती हूसए नहि।” दुखन बिसवासमे लैत बाजल- “हाकिम, रसीदक एकटा सादा जील्द अपन दसखत कए कऽ दऽ दिअ। पहिने रसीद दऽ गंगानन्दकेँ हाथमे लऽ लेब। जखन पकड़मे चलि औत तखन अनेरे काज सुढ़िया जाएत। आइए अहाँ एकटा जील्दमे दसखत कए कऽ दऽ दिअ काल्हि भोरे हम जाएब।” ओसारपर सँ उठि पटवारी कोठरी जा एकटा रसीदक जील्दमे अपन हस्ताक्षर करए लगल। पचास रसीदक एकटा जील्द। सौंसे जील्दमे हस्ताक्षर कऽ पटवारी दुखनकेँ दऽ देलक। जील्द हाथमे अबिते दुखन तरे-तर चपचपाए लगल जे आमदनी भेट गेल..! तखने आँगनसँ लीला आबि एक भरि सोनाक चेन दैत दुखनकेँ कहलक- “ई नेने जाउ। बिआहक बात पक्का करैत बरक हाथमे सगुन दऽ देबैन।” रसीदक जील्द आ सोनाक चेन लऽ दुखन अपना डेरामे आएल। डेरामे आबि रसीदकेँ उघारि-उघारि देखए लगल। पचासो रसीद देख दुखन जील्दकेँ अढ़मे झाँपि कऽ रखलक। गदगद मने चौकीपर बैस सोचए लगल जे हमहूँ तँ गरीबेक बेटा छी। जमीन्दारियो जाइए रहलै हेन। तँए हमरासँ जेते गरीबकेँ उपकार भऽ सकतै से करब। जँ किछु कमाइयो-खटाइ भऽ जाएत तँ सेहो कऽ लेब। राष्ट्रीय आन्दोलन पूर्ण जवानीमे आबि चुकल छल। 1940 ई.क पछाइत राजा-महराजा आ जमीन्दार बुझए लगल छल जे आब हमरा जाइक बेर आबि गेल। देशक आन्दोलन दू दिशामे बढ़ि रहल छल। गाम-गाममे बकास्त जमीनक लड़ाइ शुरू भऽ गेल। जमीन्दार आ जमीन्दारक लगुआ-भगुआ सभ अपन हाथ ससारैमे लगि गेल। जेकरा जेतए जे फबै ओ हथियाबए लगल। मुदा जमीन्दारक जे पैछला बेवहार रहलै ओइसँ किसान डराइते छल। राष्ट्रीय आन्दोलनमे जइ तरहेँ जन-समर्थन भेट रहल छल ओइ तरहेँ जनतामे जागरूकता नै आबि सकल छल। पैछला जे जमीन्दारक शोषण आ क्रिया-कलाप छल ओइसँ किसान त्रस्त रहए। मुदा जमीन्दारक लगुओ-भगुओ आ जमीन्दारो सभ बुझि रहल छल जे जमीन्दारी अन्तिम अवस्थामे आबि गेल। बकास्त जमीनक लड़ाइ आम जनताक बीच पहुँच गेल छल जइसँ किसानोक बीच नव-चेतना जगि रहल छल। ऐ लड़ाइ सँ मिथिलांचलो अलग नहि। मिथिलांचलोमे गाम-गाम बकास्तक लड़ाइ पकैड़ नेने छल। मुदा‘बटाइदारी’ आ ‘हदबन्दी’ कानून नै बनि सकल छल। ◌ शब्द संख्या : 1842 7. दलानक ओसारक एकजनियाँ कोठरीमे बैस गंगानन्द परिवारक दुर्दशाक सम्बन्धमे सोचै छला। जहिना वसन्त आ ग्रीष्मक बीचक सिमानपर मौसम रहैत तहिना सुख-दुखक बीच परिवार अछि। अखन धरि जे परिवार समाजमे सुभ्यस्त, इज्जतदार बूझल जाइ छल ओ जमीन निलाम भेने टुटि कऽ केतए चलि जाएत। समाज आ सम्बन्धीक बीचक सम्बन्ध की भऽ कऽ रहत? जइ जमीनक कोरामे अखन धरि खेलेलौं आ ओहीक उपजासँ जिनगी चलैत रहल से जमीन निलाम भेलापर सभ चलि जाएत! हम केहेन करमजरू भऽ गेलौं जे देखते-देखते सभटा जा रहल अछि! धिया-पुताक कपारमे विधाता की लिखि पठौलखिन जे गुजर-बसरसँ लऽ कऽ बिआह-दुरागमन होएब कठिन भऽ गेल अछि। जे परिवार गरीब-गुरबासँ लऽ कऽ भूखल-पियासल तककेँ एक मुट्ठी अन्न खाइले दइ छल ओ आइ अपने केतए जा रहल अछि..! मने-मन गंगानन्द सोचबो करैथ आ दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोरो टघरैत रहैन। सूखल मुँह, करुआएल आँखि आ करिछौन भेल ठोर गंगानन्दक देख पार्वती आगूमे ठाढ़ भेली। आइ धरि जइ सिनेहक नजैरसँ गंगानन्द पार्वतीकेँ देखै छला आ पार्वती गंगानन्दकेँ देखैत रहैन ओइमे दुनूकेँ बदलल रूप बुझि पड़ए लगलैन। ने गंगानन्द किछु बजैथ आ ने पार्वती। जेना दुनू गोरे अपन-अपन बेथाकेँ घोंटि रहल छल। जेना दुनू गोरेकेँ जिनगीक आशा तिले-तिल कम हुअ लगलैन। जेना अथाह पानिक वेगमे दुनू उगैत-डुमैत। तरे-तर दुनूक हृदैमे बुकौर लगैत। गंगानन्दकेँ होइन जे बोम-फाड़ि कऽ कानि सभ बेथा कऽ आँखिक नोरक संग बहा ली, मुदा समैक गतिकेँ के रोकि सकैए...। दहिना हाथसँ आँखिक नोर पोछैत पार्वती बजली- “दुख केलासँ की हएत। जखन भगवानक यएह लीला भऽ गेलैन तखन मनुखकेँ कनने की। हरिश्चन्दक कथा बुझले अछि। जइ दिन जेते दुख होइक अछि ओ तँ हेबे करत।” आँखि उठा गंगानन्द पार्वतीकेँ देख पुनः आँखि निच्चाँ कऽ मने-मन सोचए लगला। सहोदर भाए, जेकरा बेटा जकाँ बुझै छेलौं से दियाद बनि गेल! समटल परिवार राइ-छित्ती भऽ रहल अछि..! धीरक पातर टेमीक ज्योति गंगानन्दक मनमे आएल। आशाक कोमल अंकुर अंकुरित भेल। साहसक लालिमाक रंग आँखिक आगूमे बिजलोका जकाँ छिटकल। दुनू हाथसँ दुनू आँखिक नोर पोछि उठि कऽ ठाढ़ भेला। पार्वती मुड़ी गोंतने बैसल। जहिना कियो किछु पबैले देवताक गुहाड़ि लगबैत तहिना गंगानन्द नचारीक नजैरसँ पार्वतीकेँ गुहाड़ि लगबैत बजला- “आइ भरि समए अछि। भैयारीमे भिनौज भाइए गेल मुदा अखन धरि दुनू भाएकेँ बच्चा जकाँ पोसलौं, एहेन समैमे छोड़ब उचित नै हएत। अहाँ अपन सभ गहना दिअ। अगर बन्हकी लगौलासँ काज सम्हैर जाएत तँ बन्हकीए लगा लेब नइ तँ बेच लेब। जँ से नै करब तँ सभ खेत-पथार चलि जाएत। खेत बँचत आ समए-साल नीक हेतै तँ उपजा बेच कऽ छोड़ा देब नइ तँ किछु खेते बेच कऽ छोड़ा देब।” एते बात बजैत-बजैत गंगानन्दक देह थरथर कँपए लगलैन। मुदा भलमानुस घरक बेटी पार्वती, पतिक बेथाकेँ अपन बेथा बुझि मुस्किया कऽ बजली- “गहना कोनो हमरेटा छी आ अहाँक नहि छी आकि धिया-पुताक नइ छिऐ। सबहक छिऐ। ओ तँ बेरे-बेगरता-ले रहै छै किने।” पार्वतीक बात सुनि गंगानन्दक मन हल्लुक भेलैन। मुस्कियाए लगला। गहना अनैले पार्वती आँगन गेली। निराशाक समुद्रसँ गंगानन्द आशाक छोट-छीन पोखैर दिस मुड़ला। गहनाक पेटी नेने पार्वती दुआरपर आबि गंगानन्दक आगूमे रखि देलकैन। पेटी देख गंगानन्दकेँ मनमे भेलैन जे कहीं खिसिया कऽ तँ नै आगूमे रखलैन। मुस्कियाइत बजला- “पेटी खोलब तखन ने अन्दाजसँ देख गहना लेब। ओना केना बुझबै।” पार्वती पेटी खोलि सोनाक गहना एक भाग आ चानीक एक भाग रखैत बजली- “जेतेसँ काज सम्हरत ओते लऽ लिअ।” अखन धरि गंगानन्द पार्वतीक गहना नै देखने छल। गहना देख गंगानन्द क्षुब्ध भऽ गेला। सोचलैन जे दुओटा सँ काज चलि सकैए। अगर दूटा बोहाइयो जाएत तैयो बहुत रास गहना रहबे करतैन। दूटा सोनाक गहना छाँटि इशारा करैत शेष सभ गहनाकेँ रखि लइले कहलखिन आ दुनू गहनाकेँ रुमालमे बान्हि गंगानन्द बजला- “कनी झब-दे जलखै बना दिअ बजार जाएब। कखन आएब कखन नइ, तँए किछु खेने रहब तँ बढ़ियाँ रहत।” सभ गहनाकेँ पेटीमे रखैत पार्वतीक मनमे उठलैन- जँ दूटा बोहाइयो जाएत तैयो बहुत रहबे करत। चुल्हि पजाइर पार्वती जलखै बनबए लगली। गंगानन्द लोटा-बाल्टी लऽ नहाइले कलपर गेला...। दुनू परानी यमुनानन्द घरक पलँगपर बैस गप-सप्प करैत। गपक क्रममे यमुनान्द पत्नीकेँ पुछलक- “भीन भेलासँ खुशी अछि कि दुख?” मुस्कियाइत पत्नी कहलकैन- “खुशी तँ एते अछि जइसँ ऊपर हुअए नहि। जहिए बाबू मुइला तहिए जँ भीन भऽ गेल रहितौं तँ बेसी नीक होइत। किएक तँ अखन धरि जे दुख कटलौं ओ नै काटए पड़ैत।” यमुनानन्द- “की दुख कटलौं?” पत्नी- “अखन धरि नोकर-चाकर जकाँ घरमे रहलौं। जेना हमर किछु ऐ सम्पैतमे रहबे ने करए। ने घरमे एक्को पाइ मोजर छेलए आ ने कोनो काजमे पूछ-आछ। आब अपन सम्पैत भेल, जे मन फूरत से करब। कियो हाकिमो-महाजन तँ नै रहत।” घटक बनि दुखन सिपाही गंगानन्द ऐठाम आएल। सिपाहीकेँ देख गंगानन्दक हृदए हर्ष-विषादक बीच लटैक गेलैन। दुखन सिपाहीक बोलीमे मलिकाना ताउ नै बल्कि घटकक मधुआएल अवाज। दुखनकेँ कुरसीपर बैसा गंगानन्द आँगन जा पत्नीकेँ चाह बनबए कहलखिन। आँगनसँ दरबज्जापर आबि गंगानन्द दुखनसँ गप-सप्प करए लगला। फुसफुसा कऽ दुखन कहलकैन- “अखन दुइए गोरे छी। कोठरीमे चलू, किछु खास गप करब। बहरामे जँ कियो गपक बीचमे औत तँ गड़बड़ हएत, एकांती गप अछि।” सिपाहीक हाव-भावसँ गंगानन्दक जरल मन शीतल भेलैन। दुनू गोरे कुरसीसँ उठि ओसारेक कोठरीमे जा गप-सप्प करए लगला। गंगानन्दकेँ पोल्हबैत सिपाही कहलकैन- “हम तँ सिपाही छी। हमरा बुते जेते उपकार भऽ सकत तेते जरूर करब। पत्नियोकेँ बजा लियौन। परिवारिक गप छी।” आँगनसँ पार्वती चाह नेने एली। चाहक गिलास रखि गंगानन्दक पाँजरमे ठाढ़ भऽ गेली। एक घोंट चाह पीब दुखन टेबुलपर गिलास रखि, झोरासँ चद्देरमे लपेटल रसीदक जील्द निकालि बाजल- “पैछला जे रसीद अछि ओइसँ खाता खेसरा आ रकबा मिला कऽ ऐ रसीदमे चढ़ा लिअ।” रसीदक जील्द देखते दुनू परानी गंगानन्दक दिल धड़कए लगलैन। मनक सभ क्लेश निकैल कऽ उड़िया गेलैन। मुरझाएल चेहरा एकाएक खिल उठलैन। हँसैत गंगानन्द बजला- “बहुत पैघ उपकार अहाँ केलौं। जीवनमे कहियो अहाँक उपकार नै बिसरब।” गंगानन्दक हाथमे जील्द पकड़बैत सिपाही बाजल- “अहाँ पटवारीजीसँ कुटुमैती जोड़ि लिअ। अहाँक जेहने बेटा भव्य छैथ तेहने पटवारीजीक बेटी छैन। राजक अंग सेहो छैथ। केतौ तँ बेटाक बिआह करबे करब मुदा ओइठाम कुटुमैती केलासँ कोनो चीजक कमी नै रहए देता।” सिपाहीक बात सुनि गंगानन्द दुनू परानीकेँ स्वर्गक सुखक एहसास भेलैन। मने-मन गदगद होइत गंगानन्द कनडेरिये आँखिए पार्वती दिस देख आँखिएसँ जेना किछु पुछलखिन। पार्वतियो आँखिएसँ स्वीकृति दऽ देलकैन। दुनू परानीकेँ चुप देख सिपाही सोनाक चेन निकालि पार्वतीक हाथमे दैत बाजल- “एकरा रखू। सगुनक रूपमे पटवारीजी देलैन।” सोनाक चेन लैत पार्वती आरो गदगद भऽ गेली। मुस्कियाइत गंगानन्द तखने कहलखिन- “कुटुमैतीक पहिल दिन छी तँए बिनु भोजन करौने सिपाहीजीकेँ केना जाए देबैन। जाउ, भानसक ओरियान करू।” पतिक बात सुनि पार्वती चेनकेँ समेट भानस करए गेली। सिपाहीकेँ गंगानन्द पुछलखिन- “पटवारीजीक कुल-मूल केहेन छैन?” सतकेँ छिपबैत सिपाही घटकक शैलीमे कहलकैन- “ऐँह, कुल-मूलक की गप करै छी। कुले-मूलक चलैत एते पैघ कुरसीपर छैथ किने। राजक बिसवासू लोक छैथ। जेहने कुल-मूल तेहने परिवारक आचार-विचार आ बेवहारो छैन। भागमंते घरमे ओहन-ओहन कनियाँक आगमन होइ छइ।” भोजन कऽ दुखन सिपाही बिशेसर ऐठाम पहुँचल। बिशेसरकेँ ओही दिनसँ जनैत जइ दिन बिशेसर सियाराम सिपाहीकेँ कदीमा दुआरे मारने छल। हर जोति कऽ आबि बिशेसर नहा कऽ खाइले आँगन पहुँचल कि दुखन रस्तेपर सँ शोर पाड़लक। अनठिया अवाज सुनि बिशेसर आँगनसँ निकैल डेढ़ियापर आबि सिपाहीकेँ पुछलक- “कोन काज अछि?” सिपाही कहलक- “अहाँसँ किछु खानगी गप करैक अछि, तँए एलौं।” ‘खानगी गप’ बुझि बिशेसर सिपाहीकेँ कहलक- “आउ, अँगने आउ। गरीब लोकक दरबज्जा-अँगना एक्के होइ छइ। खाइ बेर छै जे किछु साग-सत्तू भेल अछि, दुनू गोरे मिलि-बाँटि कऽ खेबो करब आ गपो करब।” बिशेसरक संग दुखन आँगन आबि बाजल- “हम अखने गंगानन्दजी ऐठाम खेलौं। अहाँ खाउ, हम बैसै छी।” बिशेसर खेबो करए आ मने-मन सोचबो करए जे हमरासँ राजक सिपाहीकेँ कोन काज हेतइ। हमरा की कोनो खेत-पथार अछि जे राजसँ मतलब रहत। लऽ दऽ कऽ घराड़ी अछि सेहो बेलगाने। दुखन बिशेसरकेँ गहराइसँ पढ़ैत जे एकटा अदना आदमी राजक सिपाहीपर हाथ उठौलक ई नान्हिटा गप नै भेल। आखिर एकरा भीतर कोन शक्ति छिपल छै जे एते साहसी अछि। बिशेसर खा कऽ उठल। मोहनी ओसारेपर बिछान बिछा देलक। दुनू गोरे बिछानपर बैस गप-सप्प करए लगल। सिपाही बिशेसरकेँ पुछलक- “अहाँकेँ केते खेत अछि?” मुस्कियाइत बिशेसर बाजल- “हमरा खेत-पथार नै अछि। खाली घराड़ीए-टा अछि। कमाइ छी खाइ छी। मस्तीमे जिनगी बितबै छी।” बिशेसरक बात सुनि सिपाही चकित भऽ गेल। बिशेसर केते मेहनती अछि जे सिरिफ दूटा हाथ-पएरक बले एते साहसी आ खुशीसँ जिनगी बितबैए..! चकित होइत दुखन बाजल- “बिशेसर भाय, हमर नाओंएटा दुखन नै छी आ ने राजेक सिपाहीटा छी। जिनगीमे एकटा व्रत केने छी जे गरीब-गुरबाकेँ जहाँ धरि भऽ सकत सेवा करब। जे अखन धरि निमाहैत एलौं। आब तँ सहजे राज जाइए रहल अछि। किछु दिनक नोकरी अछि। तँए जहाँ धरि जे उपकार भऽ सकत ओ गरीब-गुरबाकेँ करबै। अखनो ओहने काजसँ आएल छी।” जिज्ञासासँ बिशेसर पुछलक- “केहेन काज?” “ऐ गाममे बहुतो गोरेकेँ मलगुजारी दइ दुआरे जमीन निलाम होइपर अछि। ओ हमरा बचेने बँचि जाइत। तँए ओकरा सभकेँ बजाउ। हम मंगनियेँ रसीद दऽ देबइ।” ‘रसीद’ सुनि बिशेसर चौंक गेल। मुदा अपनाकेँ सम्हारि बिशेसर गप-सप्प आगू बढ़ौलक। दुनूक बीच आत्मीयता सेहो बढ़ए लगल। जइ बाटक बटोही बिशेसर ओही बाटक चलनिहार सिपाहियो। मुदा तैयो बिशेसरकेँ मनमे भेलै जे जँ कहीं रसीद चोरा कऽ अनने हुअए तखन तँ सभ धोखामे पड़ि जाएत। मुदा फेर मनमे उठलै जे रसीदक पाइयो तँ नहियेँ लगैत। बुझल जेतइ...। ततमत करैत बिशेसर बचनाकेँ बजबैले भोलियाकेँ पठौलक। भोलिया संगे बचना आएल। सिपाहीकेँ देखते बचनाक करेज कँपए लगलै। बचनाक स्त्री फुलिया सेहो पाछू-पाछू नुका कऽ आबि बिशेसरक घरक कोनचर लग ठाढ़ भऽ गेली। बिशेसर बचनाकेँ कहलक- “बचन, दुखन सिपाही अपन हितैषी छैथ। बिनु पाइयेक तोरा सभ खेतक रसीद दऽ देथुन।” ‘मंगनी रसीद’ सुनि बचनाक छाती सूप सन भऽ गेलइ। मनसँ जमीन निलामीक डर सेहो पड़ा गेलइ। सदे रसीद बचनाकेँ दैत दुखन बाजल- “सभ जमीनक रकबा जोड़ि कऽ चढ़ा लेब।” रसीद मोड़ि बचना मुट्ठीमे लऽ विदा भेल। काते-कात फुलिया दौगल आगूमे जा बचनाकेँ पुछलक- “की भेल?” हँसैत बचना बाजल- “चुप्पेचाप चलू। विपैत टरि गेल।” एकाएकी बिशेसर एक्कैस गोरेकेँ रसीद दिया देलक। निलामीक पहाड़ गाममे ढहि गेल। सौंसे गामक किसानक बीच खुशीक हड़बिर्ड़ो मचि गेल। सबहक सुखाएल चेहरा हरिअर भऽ गेल। जखन बाइली लोकसँ बिशेसरक आँगन खाली भेल तखन दुखन सिपाही बिशेसरकेँ पुछलक- “बिशेसर भाय, अहाँ गाममे राजक परती-पराँत गैरमजरूआ जमीन केते हेतइ?” आँखि उठा बिशेसर परतीपर नजैर दौगबए लगल। मुदा सभ परती तँ नजैरमे नै एलै खाली एकटा परती जे पोखैरक दछिनबरिया महारक एक-डेढ़ बीघाक एलइ। अबिते बिशेसर कहलक- “एक-डेढ़ बीघाक परती एकटा छइ।” एक-डेढ़ बीघा सुनि सिपाही बाजल- “डेढ़ बीघा जमीनक बन्दोबश्ती रसीद दऽ दइ छी। हम काल्हि जाएब। जाइसँ पहिने ओइ जमीनक दखल करा देब। बरद तँ अपना नहियेँ हएत, पाँच-छहटा हरक भाँज लगा लिअ। भाँजो असानीसँ लगि जाएत। जेकरा सभकेँ मदैत केलिऐ ओ एक दिन हर नै देत।” सिपाहीकेँ गाँजाक तलक लगल। झोरा खोलि पित्तैरसँ मेढ़ौल चीलम, नेपलिया जट्टाबला गाँजा आ सरेसाक बड़की तमाकुलक पात निकालि दुखन चीलमक जोगार करए लगल। गाँजा देख भोलियोक मन चटपटाए लगलै। दुखन बुझि गेल। भोलयाकेँ देख सिपाही बिशेसरसँ पुछलक- “भोलिया भीन अछि कि साझी?” बिशेसर बाजल- “देखियौ जे पच्चीस सालक छौड़ा अछि तखन केहेन झखरल बुझि पड़ैए। बेहूदा गाँजा-भाँग पीब सोन सन शरीरकेँ माटि बना लेलक!” गाँजाक सोंट मारि, कनी काल मुँहमे धुँआ रखि दुखन ऊपर फेकलक। फेर एक सोंट मारि दुखन कनी काल हाथमे चीलम रखि बिशेसरकेँ कहलक- “बिशेसर भाय, गाँजा-भाँग जोगी-फकीरक थोड़े छी। एतेटा उमेरमे हम कहियो ताड़ी-दारू मुँहमे नै लेलौं। जहिया कहियो राज-दरबारमे कोनो उत्सव होइ छै तहिया खाइ-पीबै तँ सबहक संगे छी मुदा अंग्रेजिया-दारू आइ धरि मुँहमे नै लेलौं। बड़ तलक लगल तँ गाँजा पीब लेलौं।” दोसर दम मारि दुखन तरैंग कऽ भोलियाकेँ कहलक- “रे, तूँ जे गाँजा-भाँग पीबै छँह से किए? जखन अपना ओते ओकाइत नै छौ जे दूध-दही-घी खेमे आ ने अपना खुट्टापर गाए-महींस रखने छँह। तखन गाँजा किए पीबै छेँ। तूँ हमरा नै चिन्हलेँ हम राजक सिपाही छी। अखने, बापेक सोझहामे एक साए लाठी मारि गाँजा-भाँग छोड़ा देबौ आ पकैड़ कऽ लऽ जा छअ मास जहलमे बन्न कऽ देबौ, तूँ की बुझै छीही!” सिपाहीक बात सुनिते भोलियाक देह कँपए लगल। कँपैत दुनू हाथसँ दुखनक पएर पकैड़ बाजल- “सरकार, आइ दिनसँ गाँजा-भाँग नै पीअब।” “कनने-खिजने नै हेतौ। दुनू कान पकैड़ पचास बेर उठ-बैठ आ सप्पत खा कऽ कह जे कहियो गाँजा नै पीब।” डरे भोलिया दुनू कान पकैड़ उठए-बैठए लगल। पनरहे बेर उठल-बैसल कि दुनू जाँघ लोथ भऽ गेलइ। आगू उठिए-बैस ने होइ। दुनू आँखिसँ नोर टघरए लगलै। घरक भुरकी देने भोलियाक स्त्री कान पकैड़ उठैत-बैसैत देखैत। अढ़ेमे ओ मुँहपर आँचर नेने खूब हँसैत। हँसबो करैत आ बजबो करैत- “खूब होइ छैन! अनेरे सभ दिन साँझू पहरकेँ गरियबैत रहै छैथ। तैकाल जँ जवाब देबैन तँ चारि लाठी लगाइयो दैता। भने नीक होइ छैन। जेहेन चालि छैन तेहने दशो होइ छैन।” जेकरा सभकेँ दुखन खेतक रसीद देलक ओ सभ घरमे रसीद रखि एका-एकी बिशेसर ऐठाम अबए लगल। सबहक मनमे खुशी। सभ अपनामे हँसी-चौल करैत। हँसैत बेंगबा कुरहरियाकेँ कहलक- “दोस, जँ खेत लीलाम भऽ जैतौ तखन तोरा कातिक मासक अपियारीक कबै माछ खेनाइ निकैलतौ।” उत्तर दैत कुरहरिया कहलकै- “हमरेटा निकलैत आ तूँ जे हाटपर माछ बेच कऽ ताड़ी पीबै छँह, से अपन कह तोरा की होइतौ?” सभकेँ चुप करैत सिपाही पुछलक- “केते गोरेकेँ हर-बरद छह?” केकरो एकटा बरद जे दोसरसँ भजैती लगौने। केकरो दूटा बरद जे हरबाह रखि जोतबैत। केकरो एकोटा नहि, जे अनके हर जोति अपनो धूरहा हर लऽ खेती करैत। सभ अपन-अपन बात सिपाहीकेँ कहलक। सबहक बात सुनि सिपाही बाजल- “जे हरबाहि करै छी ओ शरीरसँ आ जेकरा बरद अछि ओ बरदसँ, काल्हि भोरे आबि पोखैर लगक परती बिशेसर भायकेँ जोइत दियौ। ओ परती हम बिशेसर भायकेँ बन्दोबस कऽ देलौं।” जहिना एक गामक लोककेँ दोसर गामबलासँ झगड़ा भेलापर गामक धिया-पुतासँ लऽ कऽ बुढ़-बुढ़ानुस धरि लाठी, भाला, फरसा लऽ कऽ पहुँच जाइत तहिना भोर होइते कियो हर-बरद, कियो कोदारि तँ कियो छुछे देहे बिशेसरक खेतमे पहुँच गेल। लोकक उजैहिया देख बिशेसर सोचए लगल जे सभकेँ जलखै कराएब केना पार लगत। केकरा जलखै खाइले देबै आ केकरा नै देबइ। तहूमे धिए-पुते बेसी अछि...। दुनू हाथ माथपर लऽ बिशेसर कातमे बैस गुनधुनमे पड़ल। दुखन बिशेसरक चिन्ता बुझि गेल। बिशेसर लग आबि बाजल- “बिशेसर भाय, एक्के घन्टामे खेतकेँ चीर-फाड़ि दखल कऽ लिअ। हम सभकेँ कहि देबै जे हमहूँ जाइ छी आ अहूँ सभ जाइ जाउ।” दुखनक विचारसँ बिशेसरक मन हल्लुक भेल। सौंसे परतीकेँ खेत जकाँ चीर-फाड़ि सभ हर खोलि देलक। ◌ शब्द संख्या : 2278 8. गंगानन्दक बेटा–सुमनक बिआह सुनयनाक संग भऽ गेल। जहिना पनियाहा मेघ लटैक कऽ धरतीक लग चलि अबैत तहिना पटवारीसँ कुटुमैती भेने गंगानन्द धनक लग आबि गेला। सोना-चानीक गहना, फूल-पित्तैर आ स्टीलक बरतन, सूती-उन्नी आ रेशमी कपड़ा पटवारी टाएर गाड़ीपर लादि गंगानन्द ऐठाम पठौलक। बेटीक खोंइछमे पटवारी गामक सटले दोसर गाममे पचास बीघा जमीन सेहो देलक। ओ जमीन तेसरे-साल निलाम कऽ अपना नाओंसँ पटवारी बन्दोबस केने। दू जोड़ सिलेब रंगक बड़का बरद, दूटा बड़की गाए आ जमाएकेँ चढ़ैले एकटा बड़का घोड़ा सेहो देलक। समाँगक पातर रहने गंगानन्दकेँ तीनटा नोकर जे माल-जालक सेवासँ लऽ कऽ खेती करै तक-ले पठौलक। एकटा खबासिनीकेँ सेहो सुनयनाक सेवा-टहल-ले पठौलक। चौघारा घर, तीनू भाँइक बीच गंगानन्दकेँ। तीनू भाँइक बीच भिनौज भेने एक-एक अलंग हिस्सा भेल। आबाजाही कम रहने एक अलंगक घर मूसक माटिसँ भरल। देवालक पलश्तर सेहो झड़ि-झड़ि खसलो आ खसितो। दरबज्जा आ मालक घर तीनू भाँइक साझीए। पाहुने-परक एलापर यमुनानन्द आ श्यामानन्दकेँ दरबज्जाक काज होइत नइ तँ अँगने घरसँ काज चलैत। सिरिफ गंगानन्देटा दरबज्जापर रहबो करैत आ चीजो-बौस रखैत। मालक घर नमहर। मुदा माले कम तँए कोनो भाँइकेँ अभाव नै खटकैत। समधियौरमे जे समान गंगानन्दकेँ भेटल ओ परिवारमे रखैक समस्या ठाढ़ कऽ देलक। कपड़ा, बरतन तँ घरमे अँटि गेलैन मुदा गाए-बरद केतए बान्हल जाएत। तत्-खनात बाँसक खुट्टापर तिरपाल टांगि गाए-बरद आ धोड़ा बन्हैक जोगार कऽ लेलैन। यमुनानन्द आ माला दुनू परानी सुमनक बिआहक सरमजान देख मने-मन जरए लगल। झगड़ाक जोगार माला ताकए लगली। समाजक स्त्रीगण कनियाँ देखैले अबए लगली। घरसँ ओसार धरि गंगानन्दक भरल। तँए बैसैयोक जगह नहि। जे कियो कनियाँ देखए अबैत ओ यमुनानन्दक खाली ओसार देख बैस जाइत। स्त्रीगणक बीच हाँ-हाँ, हीं-हींसँ लऽ कऽ हँसी-मजाक धरि होइत। लोकक हाँ-हाँ, हीं-हीं सँ मालाक देह जरैत...। गाममे एकटा नवकी दादी। नवकी दादी विधवा। ओना उमेरो साठिसँ ऊपरे, बेटा-पुतोहु आ पोता-पोतीसँ घर भरल। नवकी दादी, जेहने बजैमे चरफर तेहने शुद्ध सोभावक सेहो। दरद ससारैक लूरि नवकी दादीकेँ। गाममे जेकरा केकरो पेटमे दरद उखरैत ओ नवकी दादीकेँ बजा अनैत। करुतेलसँ नवकी दादी तेना ससारैत जे लगले दरद ठीक भऽ जाइत। दरदे ससारि नवकी दादी दसनामा लोक बनि गेली। ने केकरोसँ एक्को पाइ लैथ आ ने केकरो काज खगए देथिन। अपन केहनो हलतलबी काज रहैन मुदा जँ कियो बजबए आबैन तँ अपन काज छोड़ि संगे ओकरा ऐठाम जा दरद ससारि देथिन। तँए समाजो हुनका बजैक अधिकार देने। केकरो उचित बात कहैमे नवकी दादी नै चुकैथ। ठाँइ-पठाँइ मुहेँपर नवकी दादी कहि देथिन। मालाक ओसारपर गामक बेटी जातिसँ लऽ कऽ नव-पुरान स्त्रीगण सभ बैस गंगानन्दक समैध-समधीनक कुट्टी-चालि करैत। गंगानन्दक परिवारोक लोक आ समाजोक सभ नवकी दादीक गपसँ आनन्दित होइत। मुदा माला भीतरे-भीतर जरैत। मालाक रुष्ट मुँह आ बोलीकेँ अकानि नवकी दादी बजली- “जेहने हूरार बाप छह तेहने ने ओकर कुलो-खुट हेबह।” नवकी दादीक बात सुनि माला मुँह बन्न कऽ लेलक मुदा मनमे क्रोध बढ़िते गेल। कनियाँ देख-देख सभ चलि गेल। यमुनानन्द दोकान गेल छल ओहो आएल। यमुनानन्दकेँ आँगन अबिते माला कहलखिन- “जखन सभ भाँइ भीन भेलौं, सभ किछु बँटलौं तखन आँगन आ मालक घर किए ने बँटलौं?” यमुनानन्दक हृदैमे परिवाक ममता तँए मालाक बात उत्कट लगलैन। मुदा जोरसँ किछु उत्तर देब उचित नै बुझि मिरमिरा कऽ कहलखिन- “सभ भऽ जेतइ। अखन काजक घर अछि, पाहुन-परकसँ लऽ कऽ समाज धरिक लोक आँगन अबै-जाइ छैथ, नजैर नै अछि जे बताहि जकाँ बगए बनौने छी आ चिचिआइ छी।” यमुनानन्दक बातकेँ अनसून करैत चोटाएल साँप जकाँ फुफकार कटैत माला बाजल- “हम अपन घर-अँगना भैयाकेँ दऽ दिऐन आ हुनकर जे घर भरलैन से हुनकर छिऐन! अगर अहाँ बुते नै हएत तँ बाजू। हम देखा दइ छिऐन जे केहेन बापक बेटी हमहूँ छी। आइए जँ अँगनामे छहरदेबाली नै घींच दिऐन तँ फेर ओ कहता। जइ लोकक लाज अहाँकेँ होइए ओ सभ नै बुझै छै जे तीनू भाँइ भीन छी।” कोहवरक कोठरीसँ सुनयना मालाक सभ बात सुनैत। दोसर कोठरीसँ गंगानन्द आ पार्वती सेहो सुनैथ। मालाक ऐगला बात सुनैले सभ कान पथने। कखनो गंगानन्द आँखि उठा पार्वतीकेँ देखैत तँ कखनो पार्वती गंगानन्दकेँ देखैन। तरे-तर गंगानन्दक मनमे उठलैन- “की अही प्रतिष्ठा-ले एते केलौं? की भाएसँ भाए एते दूर भऽ सकैए? की हमर बेटा-पुतोहु यमुनानन्दक नै छिऐ? की समाजक नजैरमे तीनू सहोदर भाए नै छी? अगर भैयारीमे एहेन बेवहार हएत तँ दोसर-तेसरक संग केहेन हएत? अनेरे सभ किए ऐ जंजालमे पड़ल अछि?” बिनु किछु बजने गंगानन्द घरसँ निकैल मुँह निच्चाँ केने दुआर दिस विदा भेला। डेढ़िया लग पहुँचते पाछूसँ पार्वती घुनघुना कऽ कहलकैन- “जेना भाए-भावोक सेवा केलौं ओना जँ दोसरकेँ केने रहितौं तँ एहेन बात नै सुनितौं।” अपन मनक बेथाकेँ छिपबैत गंगानन्द पार्वती दिस देख मुस्कियाइत दरबज्जापर चलि गेला। कोहवरक घरमे सुनयना मने-मन सोचैत जे एक तँ हम नव छी, दोसर ससुर आ पतिकेँ रहैत किछु बाजब उचित नहि। नइ तँ देखा दतिऐन जे माए केते दूध हुनका पिऔने छैन। दछिनबरिया घरसँ श्यामानन्दक स्त्री गुलाब सेहो सभ बात सुनलैन। केतौसँ धड़फड़ाएल श्यामानन्द आबि पत्नीकेँ कहलखिन- “कनी खाइले दिअ, आनठाम जाइक अछि।” गुलाब थारी धुअ लगली। श्यामानन्द लोटामे पानि लऽ हाथ-पएर धुअए डेढ़ियापर गेला। हाथ-पएर धोइ घर आबि खाइले बैसला। थारी परोसि गुलाब पतिक आगूमे दऽ बगलमे बैस कहए लगलैन- “अहाँ तँ अँगनामे नै छेलौं। भैया तँ चुप्पे रहैथ मुदा मैझली-दीदी गरैज-गरैज कहै छेलखिन जे अँगनामे छहरदेबाली घींच देब।” पत्नीक बात सुनि श्यामानन्द बजला- “भैया-भौजी जे करैथ मुदा हुनके जकाँ की हमहूँ करब? अखन धरि घरक कोनो भार नै बुझलौं। खाइ-खेलाइमे जिनगी बीतल। तीस बीघा जमीनमे दस बीघा अपन हिस्सा भेल। मात्र तीन गोरेक परिवार अछि, तइले गारि-गरौवैल कऽ खनदानक नाक कटाएब।” श्यामानन्दक विचारसँ सहमत होइत गुलाब बजली- “भागमे जे लिखल हएत से हेबे करत। तइले नीच काजपर उतैर जाए, ई नीक नहि।” श्यामानन्द खा कऽ उठि बाहर जाएब छोड़ि पलँगपर बैस अपन जिनगीक सम्बन्धमे विचारए लगला। अखन धरि भगवानक भरोसे खेती चलैत रहल, जइसँ अछैत खेत रहनौं अन-पानिक दिक्कत होइत रहल। जँ कोनो साल सम-गम बरखा भेल तँ उपजा नीक भेल नइ तँ रौदी वा दाही भेल। अढ़ाइ-तीन सालसँ रौदी अछि, मुदा रौदी-दाहीसँ बँचैक उपए आइ धरि नै सोचलौं। बारह मासक साल होइए। जइमे सिरिफ चारिए मास बरसातक अछि। जइमे बेसी बरखा भेने दहार होइए आ कम भेने रौदी। मुदा बँचल आठ मास अछि तहूपर तँ नहियेँ किछु सोचल जाइए। ओना, अखन धरि हमहूँ यएह बुझै छेलौं जे पानि सिरिफ मेघेटा सँ होइए। माटिक तरोमे पानि छै जेकरा ऊपर आनि खेती-बाड़ी कएल जा सकैए, से बुझबे ने करै छेलौं। ओना इनार-पोखैरमे जरूर देखै छेलिऐ मुदा तैयो किछु करै नइ छेलौं खाएर जे भेल मुदा आब तरका पानि ऊपर अनैले बोरिंग गड़ाएब। अखन हाथमे रूपैआ नै अछि घरमे गहना, खेत आ बड़का-बड़का गाछ सभ तँ अछि। तँए चाहे गाछ बेच कऽ वा खेत बेच कऽ वा गहना बेच कऽ सभसँ पहिने बोरिंग जरूर गड़ाएब। जखने बोरिंग भऽ जाएत तखने खेती हाथमे चलि औत। जखने हाथमे खेती चलि औत तखने अन, तीमन-तरकारी उपजए लगत। एक बीघा खेत गाछी-बिरछी, घर-घराड़ीमे फँसल अछि। नअ बीघा तँ उपजैबला अछि। नअ बीघाक उपजासँ तँ पचास गोरेक परिवार हँसी-खुशीसँ चलि सकैए। हम तँ तीनिए गोरे छी, तहूमे एकटा बच्चे अछि...। पानि हाथ एलासँ रौदियो मेटा जाएत, खाली कोनो-कोनो साल बाढ़िक खतरा रहत। सेहो मात्र चारिए मास। अन, तीमन-तरकारीक ढेरी लगि जाएत। जेते परिवारमे खरच हएत ओतबे ने, बाँकी फजिलाहा बेच कऽ जिनगीक विकासमे लगाएब। अखन धरि कोढ़ि बनि भाँग-गाँजाक पाछू समए बेरबाद केलौं मुदा आबो जँ चेती तँ बहुत-किछु कऽ सकै छी। एते विचार श्यामानन्दक मनमे अबिते उठि कऽ ठाढ़ भेला। जेना-जेना मनमे विचार चलैत रहैन तेना-तेना चेहरामे मलिनता अबैत गेलैन। गम्भीर विचार श्यामानन्दकेँ गम्भीर चेहरा बनबैत गेलैन। श्यामानन्दक गम्भीर चेहरा देख गुलाबक मनमे उठलैन, भरिसक परिवारक बोझ हिनका चिन्तित कऽ रहल छैन...। मुदा कनीए कालक पछाइत इन्द्रधनुषी आँखि, गुलाबी मुस्कानसँ श्यामानन्द पत्नीकेँ टोकलखिन- “जिनगी बहुत कठिन होइए, मुदा नहि! बहुत असान होइत। सिरिफ चलैक ढंग बदलब जरूरी अछि। जँ सभ चलैक ढंग सीख लिअए तँ चैनक जिनगी सहजे-सहज बनि जाएत।” अखन धरिक जिनगी दुनू बेकती श्यामानन्दक अल्हर-अबोधक रहल जे बदलैत नीक दिशा दिस बढ़ए लगल। मुस्की दैत गुलाब पतिकेँ पुछलखिन- “केतौ किछु हरा गेल की? जे एना अनून-बिसनून जकाँ मुँह लटकौने छी?” गम्भीर स्वरमे श्यामानन्द बजला- “हँ, हरेबो कएल आ भेटबो कएल। आइ धरिक जिनगी छोड़ि नव जिनगी बनबए चाहै छी। अहूँकेँ कहै छी जे आइसँ संगी बनि संगे चलू।” संगीक नाओं सुनि गुलाब चौंकैत बजली- “अखन धरि संगी नै छेलौं?” सामंजस्य करैत श्यामानन्द बजला- “हँ छेलौं, मुदा जहिना कोनो धारमे नाह भट्ठा[2] दिस बढ़ैत रहैए तहिना, जे भँसियाएब छल। मुदा शिरा[3] दिस चलब, चलब भेल। सिरा दिस चलैमे पुरुषत्वक जरूरत होइए जे वास्तविक जिनगीक दिशा दइए। चढ़ाइक जिनगी ओकरे कहल जाइ छइ। चढ़ाइले संघर्ष आ शक्तिक जरूरत होइत, तइले संगीक जरूरत पड़ैत।” श्यामानन्दक विचार गुलाब नीक-नहाँति नै बुझि सकली। मुदा मनमे एकटा हड़बड़ाएल विचार एलैन, जे मरद-औरत मिला कऽ बिआहक रूपमे संकल्पित होइत। जइसँ सृष्टिक सृजन होइत। मुदा जिनगी तँ बहुत नमहर होइ छै, जइमे भूख-पियास, आपैत-विपैत-सुख-दुख इत्यादि गाड़ीक पहिया जकाँ घुमैत रहैए। तँए, अइले संगीक जरूरत होइए। जे एक-दोसरक मदैतगार बनि जिनगी दुरूस कऽ चलत। एते बात मनमे अबिते गुलाब उछैल कऽ बजली- “संगी-ले संगी अपन सभ किछु न्योछाबर कऽ सकैए। हम आज्ञाकारी छी। जखन जे कहब ओ करैले अन्तिम साँस तक कोशिश करब।” अखन धरि श्यामानन्द खेत बेच कऽ बोरिंग-पम्पसेट कीनब मनमे रखने छल मुदा पत्नीक सहयोग देख गतिशील आ गतिहीन सम्पैतपर नजैर पड़लैन। देखते विचार बदलए लगलैन। घरमे पड़ल गहना-गुरिया, सोना-चानी जे गतिहीन बनि पड़ल अछि ओकरा किए ने गतिशील बना काज करी। मुदा श्यामानन्दक मनमे शंको होइत रहैन जे मालगुजारीक बेरमे पत्नी गहना नै देने रहैथ। ऐ शंकाक समाधान-ले श्यामानन्द गुम्म भऽ सोचए लगला तँ बुझि पड़लैन जे पत्नीक बदैल रहल छैन। परीक्षा करैक खयालसँ श्यामानन्द पत्नीकेँ कहलखिन- “अहाँ अपन गहना दऽ दिअ, घरमे ओ पड़ले रहत आ भऽ सकैए जे जँ कहियो चोर-चहार आबि गेल तँ ओहो चलि जाएत। ओकरा बेच कऽ बोरिंग-पम्पसेट कीनि लेब। जखन खेतीक साधन बढ़त तखन उपजो-बाड़ी बढ़त। जइसँ हालतो सुधरत जखन हालत सुधैर जाएत तखन जँ गहनो लेबाक मन हएत तँ कीनि लेब।” श्यामानन्दक विचार सुनि गुलाब हँसैत अपन गहनाक मोटरी अलमारीसँ निकालि आगूमे रखि देलखिन। पत्नीक सहयोग देख श्यामानन्दक हृदैमे खुशीक उफान उठल। हृदैक खुशी मुहसँ हँसी बनि लिकलए लगलैन। हँसैत श्यामानन्द बजला- “अखन गहना रहए दियौ। हम बजार जाइ छी, पहिने बोरिंग-पम्पसेटक दाम बुझब तखन सोनरा दोकान जा सोना-चानीक दाम पता लगाएब। दुनूकेँ बुझि ओइ हिसाबसँ गहना बजार लऽ जा बेचब।” गंगानन्दक खेती करैले पटवारी रामदेवकेँ पठौने। रामदेवकेँ खेती करैक नीक लूरि। ओना रामदेव राजक नोकर मुदा किछु दिन-ले पटवारी ओकरा पठौने। बालगोविन्द आ चंचलकेँ गाए-बरद आ घोड़ाक देखभाल करैले पठौने। अखन धरि गंगानन्दक परिवारमे सवारी-ले साइकिल आ टायरगाड़ी छल। धोड़ाक आगमन पहिले-पहिल भेल। सुमनकेँ तँ घोड़सवारी चंचल सिखा देलक। गंगानन्द असमंजशमे पड़ल छला। असमंजशक कारण रहैन, बेटाक सवारीपर बाप केना चढ़त..। मुदा सवारीक घोड़ा रहैत साइकिलसँ चलब ईहो एकटा पैघ द्वन्द्व...। कखनो-कखनो गंगानन्दकेँ होनि जे घोड़ापर चढ़ि दस गाम घुमि लोककेँ देखा दिऐ। मुदा बेटाक सवारी। अगर जँ हम दोसर घोड़ा कीनि चढ़ब तँ बेटा-पुतोहुकेँ जलन हेतैन। मने-मन ओ सभ कहत जे केहेन स्वार्थी अछि। विचित्र स्थितिमे गंगानन्दक मन औनाए लगलैन। दोसर दिन भिनसरे चंचल फुलौल बदाम अपना-ले बाटीमे रखि घोड़ाकेँ खाइले नाइदमे दऽ अपनो खाइत रहए। बुलैत-बुलैत गंगानन्द आबि चंचल लग ठाढ़ भऽ गेला। आगूमे गंगानन्दकेँ ठाढ़ देख चंचल मुँह बन्न कऽ हाँइ-हाँइ मुँहक बदाम घोंटए लगल। मुँहक बदाम घोंटि बाजल- “मालिक! अहूँ घोड़ा चढ़ब सीख लिअ?” चंचलक बात सुनि गंगानन्द कनी काल गुम्म रहि, कहलखिन- “कहलौं तँ ठीके, मुदा ऐ घोड़ापर हमर चढ़ब उचित हएत?” “किए ने हएत! ई तँ सवारी छिऐ।” गंगानन्द बजला- “बेटाक सवारीपर बापक चढ़ब उचित नहि।” गिलास उठा पानि पीब चंचल कहलकैन- “जइ दिन बेटा वा पुतोहुक मन खराब हएत, बजारसँ दवाइ अनैक वा डाक्टर ऐठाम जाइक जरूरी हएत, तखन की करबै?” चंचलक बात सुनि गंगानन्द गुम्म भऽ बैस मने-मन सोचए लगल। ओना, चंचलक बात दमगर बुझि पड़लैन। बात बदलैत बजला- “आब हमर उमेर घोड़ापर चढ़ैबला अछि? हो-ने-हो जँ कहीं गिर पड़ी आ हाड़-पाँजर टुटि जाए तखन तँ लोको दुसत आ अपनो कष्ट हएत।” गंगानन्दक बातकेँ चंचल टारब बुझि कहलकैन- “ई घोड़ा कोनो बोनैया छी जे अपने सूढ़िये चलत। सिखौल घोड़ा अछि।” चुप्पे-चाप गंगानन्द उठि कऽ दरबज्जापर आबि बैस रहला। मुदा चंचलक बात गंगानन्दक मनकेँ पकड़ने रहलैन, तँए गुन-धुनमे पड़ल रहैथ। ताबे आँगनसँ खबासिनी चाह नेने एलैन। रामदेव सेहो आबि गंगानन्दक लगमे बैसल। दुनू गोरे चाह पीबए लगला। चाह पीब रामदेव बौगलीसँ तमाकुल निकालि चुनबए लगल। तमाकुलक चुन झाड़ि गंगानन्दोकेँ देलकैन आ अपनो मुँहमे लेलक। थूक फेक गंगानन्द रामदेवकेँ कहलखिन- “एकाएक पसार भेलासँ काज सम्हारब कठिन भऽ रहल अछि। कखनो मन चैन नै रहैए। हदिघड़ी एमहर-ओमहर देखैत–सम्हारैत परेशान रहै छी।” गंगानन्दक बात सुनि रामदेव कहलकैन- “अगर पसार बेसी बुझि पड़ैए तँ आदमी रखि लिअ। सम्पैत भेलासँ लोक सुख करैए आ अहाँ बेचैने रहै छी। अपने केते करब। दसटा कुटुम-परिवार भेला तैपरसँ समाज छैथ आ तहूसँ बेसी कारोबार भेल। असगरे केना सम्हारब?” गंगानन्द- “कहलौं तँ ठीके मुदा छोड़ियो देलासँ तँ नै हएत। कामतपर घर नै अछि, ओहूठाम घर बनौनाइ जरूरी भऽ गेल अछि।” रामदेव- “कामतपर अपन लगक लोककेँ भार दऽ दियौन। जँ से नै करब तँ आने-आने सभटा लूटि कऽ खा जाएत। तीन भाँइ छी, एक भाँइकेँ कामतक भार दऽ दियौन। अगर खेबो-पीबो करता तँ अपने भाए ने। जखन धनक पसार भेल आ तखन जँ समाजक काजमे आगू नै हएब तहन प्रतिष्ठा केना भेटत। तँए सालमे दू-चारिटा उत्सव समाजमे ठाढ़ करब जरूरी अछि।” गंगानन्द- “कोन तरहक उत्सव ठाढ़ करब?” रामदेव- “ऐँ, उत्सवक कमी छइ। पैछला जे पावैन-तिहार अछि ओकरो मेला रूपमे ठाढ़ कऽ सकै छी, चाहे नवको ठाढ़ कऽ सकै छी।” रामदेवक बात गंगानन्दकेँ जँचलैन। नातिनकेँ कहलखिन- “दाइ, कनी श्याम नन्नाकेँ बजौने आबह?” नातिन दौगल अँगना जा श्यामानन्दकेँ बजौने आएल। दरबज्जापर अबिते श्यामानन्द गंगानन्दकेँ पुछलखिन- “भैया, अहाँ बजेलौं?” गंगानन्द- “हँ, आबह ऐठाम बैसह। एकटा विचार पुछैक अछि।” श्यामानन्द बैसल। गंगानन्द बजला- “बौआ श्याम, तूँ कामतक काज सम्हारि दाए।” श्यामानन्दक आत्मबल जागि चुकल छल। इनकार करैत श्यामानन्द उत्तर देलकैन- “भैया, हमरा हाथमे खेती-ले बोरिंग-दमकल आबि गेल। पहिलुका जिनगीकेँ नव जिनगी बनबए चाहै छी। आब लोहाक रिंच-हथौड़ी हाथसँ चलबए चाहै छी। तँए कामतक काज सम्हारब हमरा बुते केना हएत?” श्यामानन्दक बात सुनि गंगानन्द गुम्मे रहि गेला। श्यामानन्द उठि कऽ अँगना चलि गेल। पुनः गंगानन्द नातिनकेँ यमुनानन्दकेँ बजा अनैले कहलखिन। नातिन यमुनानन्दकेँ बजौने आएल। यमुनानन्दकेँ अबिते गंगानन्द पुछलखिन- “बौआ जामुन, हमरा तँ घरेपर सँ छुट्टी नै होइए, तूँ कामतक काज सम्हारि दैह?” अराम तलब काज बुझि यमुनानन्द गछि लेलक। यमुनानन्द उठि कऽ आँगन जा पत्नीकेँ सभ बात कहलखिन। पचास बीघाक आमदनी उपजा-बाड़ी बुझि माला हँसैत कहलकैन- “दियाद केहनो दुश्मन होइ तैयो दियादे होइए। जइ गाछक बखलोइया रहै छै ओहीमे लगै छइ।” टटाएल खेत, दराइर फाटलमे जजात केना लगौल जाएत? तँए श्यामानन्द सबेरेसँ पम्पसेटसँ पटबए विदा भेला। डोरीबला पेन्ट तैपरसँ करिया गमछा लपेट श्यामानन्द कोदारि आ रिंच-हथौड़ीक झोरा लऽ खेत पहुँचला। खेत पहुँच मने-मन हिसाब जोड़ए लगला जे डेढ़ बीघा खेत पटबैमे कम-सँ-कम सात-आठ घन्टा लगत। पट ठीक कऽ श्यामानन्द पम्पसेट स्टार्ट केलैन। नव बोरिंग आ नव मशीन रहनौं पानिक रफ्तार कम। पानिक कम रफ्तार देख श्यामानन्द मने-मन सोचए लगला जे भरिसक पम्पसेटमे कोनो गड़बड़ी अछि। किएक तँ बोरिंगमे कोनो पाट-पुरजा छइहे नै जे ढील-ढाल वा टुटल-फुटल हएत...। ..अनासुरती श्यामानन्दकेँ मन पड़लैन जे रौदी दुआरे पानि कम अबैए। खेतमे तेहेन-तेहेन दराइर फाटल जे पानि आगू-मुहेँ ससरबे ने करैत। मुदा बाढ़ि जकाँ नालाक पानि देख श्यामानन्दक मनमे सवुर भेलैन जे खेत जरूर पटत। कोदारि लऽ खेतमे पानि चालए लगला। कनीए कालक पछाइत, करीब एक कट्ठा खेत पटल हएत, तइमे बगुला अबए लगल। पहिने तँ एक्केटा बगुला आ एकटा मेना आएल। मुदा तेकर पछाइत जेरक-जेर बगुला,मेना आ कौआ आबि गेल। जेमहर-जेमहर खेतमे पानि बढ़ैत तेमहर-तेमहर बगुलो मेना बढ़ि पिलुआ, कीड़ी, फनिगा बिछ-बिछ खाए लगल। जखनसँ श्यामानन्द कोदारि आ रिंचक झोरा लऽ खेत दिस विदा भेला तखनेसँ गुलाबोक इच्छा होनि जे हमहूँ खेत जा देखिऐ। मुदा परिवारिक प्रथा- खेत जाइसँ गुलाबकेँ रोकि दैन। जलखै खा गुलाब पलँगपर पड़ि मने-मन सोचए लगली। विचित्र द्वन्द्वमे गुलाबक मन उलैझ गेलैन। कखनो मनमे उठैत रहैन जे हमरा खेत-पथार अछि तँ घरसँ बाहर नै जाएब। मुदा जे कियो नोकरी करत ओ की करत? ..फेर दोसर प्रश्न मनमे उठलैन जे हमरा खाइ-पीबै जोकर सम्पैत अछि मुदा जेकरा किछु ने छै आ भीख माँगए पड़ै छइ? गुलाबक मनमे प्रश्नो उठैन आ जवाबो...। गुनधुन करैत गुलाब घरसँ निकैल खेत विदा भेली। खेत पहुँच गुलाब देखलैन जे पति खेतमे केतौ दहिना पएरसँ पानि उपैछ पटबै छैथ तँ केतौ बामा पएरसँ। श्यामानन्द खेत पटबैक धुनिमे, तँए गुलाबपर नजैरे ने पड़लैन। श्यामानन्दक लग पहुँचते गुलाबकेँ हृदैक हँसी फुटलैन। गीत गबैत पतिकेँ इशारामे कहलखिन- “पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा...।” पति-पत्नीक बीच श्यामानन्द आ गुलाबक प्रेम जे आइ धरि छल ओइसँ बदलल प्रेम दुनूक बीच आइ बुझि पड़ए लगलैन। अखन धरिक प्रेममे मान्सलता प्रमुख छल मुदा आइ कर्मक उपजल प्रेम दुनूक बीच आबए लगलैन...। जे गुलाब सौंसे देह वस्त्रसँ झाँपब नीक बुझै छेली ओ साड़ीकेँ छाबासँ ऊपर डाँरमे खोंसि, सूखल खेत सभमे दुनू हाथे पानि उपछए लगली। ने श्यामानन्दकेँ बुझि पड़ैन जे गुलाब पत्नी छैथ आ ने गुलाबकेँ श्यामानन्द पति बुझि पडै़न। दुनू एक दोसरक सहयोगी बनि काजमे जुटल। जेरक-जेर मेना, बगुला आ कौआ कीड़ी-मकौड़ी बिछ-बिछ खाइत। एक जोड़ा मेना एकठाम बैस एक-दोसरक लोलमे लोल मिला अपन प्रेमक कथा सुनबैत। साँझ पड़ि गेल। मात्र जलखैए खेने श्यामानन्दो आ गुलाबो खेत पटबैत रहला। खेतो पटब लगिचाएले तँए छोड़ि कऽ जएबो उचित नै बुझि दुनू परानी खेतेमे...। दोसैर साँझ होइत-होइत डेढ़ो बीघा खेत पटि गेल। काजक खुशी दुनू परानी श्यामानन्दक भूख हेर लेलक। खेत पटिते श्यामानन्द दमकल बन्न कऽ बोरिंगक आगूमे जे पानि जमा छल, ओहीमे देह-हाथ धुअ लगला। दुनू परानी देह-हाथ धोइ कऽ सभ सामान लऽ आँगन विदा भेला। ◌ शब्द संख्या : 2822 9. श्यामानन्दक बोरिंगक चरचा सौंसे गाम हुअ लगल। दमकल चलै काल गामक बुढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ धिया-पुताक मेला लगि जाइत। पम्पसँ निकलैत पानिक फब्बारा देख सभ अचम्भित होइत जे लोहामे एते पानि केतएसँ अबैए। ..बरखा आ बाढ़िक पानि तँ सभ देखने मुदा बोरिंगक पानि पहिले-पहिल देखैत। नब्बे बर्खक बुढ़िया दादी–सोन सन उज्जर धप-धप केश, मधुमाछीक छत्ता जकाँ देहक चमड़ा लड़-लड़ करै छैन। नमगर-छड़गर दोहरा देह घोकैच कऽ मौकनी हाथी जकाँ–लुदुर-लुदुर चलि कऽ दमकल लग आबि कातेसँ अवाज अकानए लगली। पहिले दादीकेँ भेलैन जे भरिसक रेलगाड़ी अबैए मुदा जखन दमकल लग पहुँचली तखन दमकलक अवाज बुझलखिन। ठेंगा रखि बुढ़िया दादी दुनू हाथ जोड़ि दमकलकेँ गोड़ लगली आ आगूमे पम्पसँ गिरैत पानिकेँ चुरूकमे लऽ सौंसे देह छिटलैन। पानिक पवित्रता देख बुढ़िया दादी चारि चुरूक पीबो केलैन आ पानिक पह देखैत-देखैत खेत धरि जा देखबो केली। पानिक वेग देख दादी मने-मन करीनक पानिसँ तुलना करए लगली। खेतकेँ पटैत देख दादी सोचलैन जे तेते पानि अबैए जे एक्के दिनमे सगरे बाध पटि जाएत। कनी काल ठाढ़ भऽ दादी खेत पटैत देख घुमि कऽ दमकल लग एली। दमकल लग अबिते दादीक मनमे भेलैन जे बड़ चिक्कन पानि छै तँए नहा लितौं। मुदा फेड़ैबला साड़ी नै रहने नइ नहेली। जहियासँ डेढ़ बीघा खेत बिशेसरकेँ भेल तहियासँ बिशेसर एक उखड़ाहा बोइन करए जाइत आ एक उखड़ाहा अपने खेतमे काज करैत। डेढ़ो बीघा खेतकेँ चारि कोला बना लेलक। दूटा कोला दस-दस कट्ठाक आ दूटा पँच-पँच कट्ठाक। तीन कोला–पच्चीस कट्ठा–क ऊपरका माटि उठा पाँच कट्ठाकेँ भीठ जमीन बना लेलक। बेर टगैत सुति उठि कऽ बिशेसर मुँह-हाथ धोइ कऽ तमाकुल चुनबए लगल। तमाकुलो चुनबैत आ मने-मन सोचबो करैत जे जाबे खेतमे पटबैक जोगार नै हएत ताबे खेतक कोनो मोल नहि। पानि तँ खेतीक मुख्य अंग छी। मुदा पानिक जोगार करब तँ हँसी-ठट्ठा नइ छी। बोइन करैबला जँ बोरिंगक बात सोचए तँ ओ मात्र मनक उड़ाने हएत। मुदा जरूरी तँ अछि...। गुनधुनमे पड़ल बिशेसरक मन तमाकुलो चुनाएब बिसैर गेल। अनासुरती बिशेसरक मनमे आएल जे हम ने गरीब छी, खेतो कम अछि मुदा हमरा खेतक आड़िएमे तँ बचनू आ बचनाक बेसी खेत छइ। तँए दुनू गोरेकेँ बुझा कऽ बीचमे बोरिंग गरबैले कहिऐ। एते दिन ने बोरिंगक गुण नै बुझै छल मुदा श्यामानन्दक उपजा देख तँ सभकेँ नजैर खुगलै...। एते बात मनमे अबिते बिशेसर हाँइ-हाँइ तमाकुल चुना मुँहमे लऽ कनीए कालक पछाइत तमाकुलक सिप फेक मोहिनीकेँ कहलक- “हम एकटा काजे जाइ छी, साँझ धरि आएब।” कहि बिशेसर बचनू ऐठाम विदा भेल। एक्के टोलमे बिशेसर, बचनू आ बचनाक घर। बचनूक घर पहिने पड़ैत तँए बिशेसर पहिने बचनू-ऐठाम पहुँचल। दुनू बापूत बचनू महींस लऽ कऽ पारा तकैले भोरे निकलल जे अखन धरि घुमि कऽ नै आएल रहए। बचनूक दलानपर जा बिशेसर चारू दिस बचनूकेँ ताकए लगल। मुदा केकरो देखबे ने करैत। बचनूक ढेरबा बेटी पानि आनए अँगनासँ कल दिस निकलल कि बिशेसरपर नजैर पड़लै। डोल रखि रेखा आँगन जा माएकेँ कहलक- “बिशेसर दादा दूरापर ठाढ़ छथिन।” रेखाक बात सुनि माए कहलकै- “जा कऽ पुछि लहुन जे कोन काज छैन?” आँगनसँ रेखा दलानपर अबिते छलि कि बचनूकेँ महींसक संग अबैत बिशेसर देखलक। आगू-आगू बचनू आ पाछू-पाछू महींसपर चढ़ल बेटा। भूखे-पियासे दुनू बापूत लहालोट। बचनूकेँ देख बिशेसर पुछलक- “अखन धरि बासिये-मुहेँ छह?” भूखसँ बचनूक पेट खलपट। मुदा महींसकेँ पाल खेलासँ मन खुशी, तँए भूखकेँ बिसरैत बचनू बाजल- “की कहिहह भैया। तीन बजे रातिएसँ महींस अर्र-बौं करए लगल। बिछानपर सँ उठि कऽ देखिऐ तँ गुप्प-गुप्प अन्हार। जेते समए बितैत जाइ तेते महींस जोर-जोरसँ डिरिआइ। तखनेसँ जागल छी। ओंघीसँ देहो भँसियाइए। मुदा राजाजीक कृपासँ महींस पाल खा लेलक। पाँच रूपैआक गाँजा हुनका कौबला केलिऐन। भीड़ो भेल तँ काजो भेल। केमहर-केमहर एलह हेन?” जिज्ञासाक नजैरसँ बिशेसर बचनूकेँ कहलक- “नमहर काजसँ आएल छेलौं मुदा तोहू तँ थाकले छह। ताबे बचना ऐठाम जाइ छी। नहा-खा कऽ तोहूँ ओतए अबिहह।” बिशेसर आगू बढ़ि गेल। आँगन जा बचनू ओसारपर खुट्टा लागि कऽ बैस घरवालीकेँ कहलक- “राजाजी दहिन छेला। पारा देखते महींसमे लगि गेल। मुदा तेना घेरौर करए लगल जे आबै ने दिअए। हम ताबे नहाइ छी अहाँ एक आहूल घास लऽ जा कऽ महींसक आगूमे दऽ दियौ आ ओतइ बैस महींसकेँ तकैत रहब जे बैसए नहि।” बिशेसर बचना ऐठाम पहुँचल तँ देखलक जे दुनू परानी रक्का-टोकी करैए। आँगनक टाट[4] उजाड़ि बचना सरल कड़ची छँटिया कऽ एक भाग रखैत आ नीक कड़ची दोसर भाग आ बचनाक घरवाली–फुलिया अँगनेसँ जोर-जोरसँ बजैत जे भदबामे टाट किए बन्है छी। घरवालीक बातपर धियान नै दऽ बचना टाटक कड़चियो सेरियबैत आ असथिरसँ कहबो करैत- “अँगनाक मुँह परहक टाट छी। जखन उजाड़ि देलौं तँ बन्हबे करब।” “टाट उजाड़लौं किए जे बेपर्द भेल! चारि दिनले की होइतै?” पत्नीक प्रश्न सुनि जवाब दैत बचना बाजल- “हमरा कि भदबा बूझल रहए जे टाट नै उजाड़ितौं। अगर अहींकेँ भदबा बूझल छेलए तँ किए ने टाट उजाड़ैसँ पहिनहि कहलौं! जखन टाट उजाड़ि देलिऐ तखन बन्हबे करब।” दुनू बेकतीक रक्का-टोकी सुनि बिशेसर मने-मन हँसैत। बिशेसरपर नजैर पड़िते बचना डाँटि कऽ फुलियाकेँ कहलक- “दरबज्जापर बिशेसर भैया छैथ आ अँगनामे अहाँ तूफान उठौने छी। चुप रहू!” ‘बिशेसर भैया’ सुनि फुलिया चुप भऽ ओलतीमे आबि दुआर दिस तकलक तँ बिशेसरकेँ देख मुँह झाँपि लेलक। बिशेसरकेँ बचना कहलक- “चौकीपर बैसह भैया। हमर हाथ मटियाह अछि। कनीए कड़ची सेरियबैले अछि तखन हाथ धोइ निचेनसँ गप करब।” बिशेसर बचना लग आबि टाटक जगह नाइप, माटिपर कड़चीसँ चेन्ह दऽ बचनाकेँ टाटक बत्ती बैसबैले कहलक। दूटा बाँसक टोन बत्तीक तरमे दऽ बचना चारिटा बत्ती बिछौलक। ताबे बचनू सेहो लफरल आएल। तीनू गोरे टाट बान्हि, तीनटा खुट्टा गाड़ि देलक। तीनू खुट्टा लगा टाट बान्हि बचना पत्नीकेँ कहलक- “टाट भऽ गेल। पहिने खर्ड़ासँ कुरकुट-मुरकुट खड़ैर लिअ तखन बाढ़ैनसँ बहारि लेब।” तीनू गोरे कलपर जा हाथ-पएर धोइ दरबज्जापर आबि चौकीपर बैसल। दुनू हाथ गमछासँ पोछि बचना तमाकुल चुनबए लगल। बचनू अपन महींसक बात बचनाकेँ कहलक। दुनू गोरे बिशेसर आ बचनूकेँ तमाकुल दऽ बचना अपनो मुँहमे लेलक आ बिशेसर दिस घुमि पुछलक- “कोन काजे भैया आएल छेलह?” थूक फेक बिशेसर दुनू गोरेकेँ कहए लगल- “अपना तीनू गोरेक खेत एकठाम अछि। तँए विचार भेल जे एकटा बोरिंग तीनू गोरे मिलि कऽ गड़ा लएह। श्यामकेँ देखै छहक जे अवारा जकाँ भरि दिन वौआइत रहै छेलै से केहेन गिरहस्त भऽ गेल। गाममे कियो हाथ मिलबैबला छइ। जेहने अपने मेहनती अछि तेहने पत्नियोँ छइ। साले भरिमे दुआरपर बखारी बना लेलक।” बिशेसरक विचार सुनि बचनू आ बचना गुम्म भऽ सोचए लगल जे ओते रूपैआ केतएसँ औत जे बोरिंग गड़ाएब। बड़का-बड़का गिरहत बुते तँ होइते ने छैन आ हम सभ कोन मालमे माल छी...। दुनू गोरेकेँ चुप देख बिशेसर बाजल- “जहिना तूँ दुनू गोरे अनाड़ी छह तहिना तँ हमहूँ छी। मुदा श्यामानन्द तँ बोरिंगक तरी-घटी जनैए, तँए तीनू गोरे श्यामक ऐठाम चलि कऽ पहिने बुझि लएह।” श्यामानन्दक बात सुनि बचनू बाजल- “बड़ सुन्नर विचार भैया अहाँ कहलिऐ। श्यामक घर कि कोनो दूर अछि, तीनू गोरे चलू। अगर काज सम्हरैबला हएत तँ करब नै तँ नइ करब। तइले कि कोनो डाँर-बान्ह छइ।” तीनू गोरे श्यामानन्दक ऐठाम विदा भेल। श्यामानन्द घरपर नहि। घरपर पता लगलै जे ओ खेतमे छैथ। तीनू गोरे खेत दिस चलल। खेतमे श्यामानन्द ओराहैबला मकइ-बालि बिछ-बिछ तोडै़त। एक छिट्टा कोबी काटि कऽ आड़िपर रखने। दू-दू, अढ़ाइ-अढ़ाइ किलोक कोबीक फूल। फरिक्केमे तीनू गोरेकेँ अबैत देख श्यामानन्द आगू बढ़ि, दुनू हाथ जोड़ि बजला- “गोड़ लगै छी भाय-साहैब। जखन ऐ बाध दिस एलौं तँ कनी हमरो खेती देख लियौ।” मुस्कियाइत बिशेसर श्यामानन्दकेँ कहलखिन- “बौआ श्याम, अहींक खेती देखैले आ किछु विचार करैले तीनू गोरे एलौं हेन।” आगू-आगू श्यामानन्द आ पाछू-पाछू बिशेसर, बचना आ बचनू चलल। कोबीक छिट्टा लग ठाढ़ भऽ श्यामानन्द कहलखिन- “बिशेसर भाय, आइ पनरहम दिन छी। पनरह दिनसँ एक-छिट्टा दू-छिट्टा कोबी रोज काटै छी।” बिशेसर- “कोबी बिकाइ केना अछि, श्याम?” “भाय की कहूँ। घरेपर सभ कोबी बीकि जाइए। हमहूँ एते केने छी जे हाट-बजारसँ दू रूपैआ किलो कम दइ छिऐ। लेबालोकेँ असान आ अपनो असान, संगे समाजक लोक खाइए ईहो खुशी।” आगू-आगू श्यामानन्द आ पाछू-पाछू तीनू गोरे आड़िए-आड़ि घुमि खेत सभ देखए लगला। बीघा भरि मकइ। पँच-पँच हाथक हरिअर-हरिअर फुलाएल गाछ। तीन-तीन,चारिटा बाइल गाछमे झुमैत। जेना जुआन कनियाँ अपन जुआनीक गुणसँ झुमैए तहिना मकइ-गाछ झुमि-झुमि एक-दोसरसँ लट्टा-पट्टी करैत। मकइ आड़ि टपिते दू बीघा फुटल गहुम। दुनू बीघाक एक रंग गहुम, जेकरा देखलासँ बुझि पड़ैत जे जँ ऊपरसँ थारी फेकल जाए तँ ऊपरे-ऊपर छिछलैत केतौ-सँ-केतौ चलि जाएत। जहिना पोखैरक पानिपर झुटका फेकलासँ होइत तहिना। गहुमक सटले पूवारि भाग बीघा भरि अल्लू। अल्लुक गाछ जुआ कऽ लटुआएल। पाँत सभमे दराइर फाटि-फाटि गेल। आड़िक कातेक एकटा गाछकेँ बिशेसर खोधिया कऽ देखलैन तँ बुझि पड़लैन जे किलोसँ बेसीए गाछमे अल्लु अछि। अल्लू देख बिशेसर श्यामानन्दकेँ पिठ ठोकि बजला- “तोरे सन-सन जुबक जखन गामक खेत पकड़त तखन अनेरे सबहक उद्धार हेतइ।” अल्लू खेतक बगलेमे पाँच कट्ठामे टमाटरक खेती। पाँचो कट्टाक टमाटर गाछ फड़सँ लदल। गोटि-पँगरा गाछमे पकितो। जहिना मेघमे तरेगन देख पड़ैत तहिना पाकल टमाटर खेतमे। टमाटर खेत टपिते कागजी-जमीरी नेबोक दू कट्ठामे बगान। साले भरिक गाछ रहनौं गोटे-आधे फड़ पकड़ने। जुआनी पकड़ैले गाछ तेजीसँ डेग बढ़ौने। गाछक जड़िमे पटबैले दड़ी बनौल। एकोटा घासक दरस गाछक जड़िमे नहि। निंगहारि-निंगहारि बिशेसर आ बचनू गाछ सभकेँ देखैत। एकटा गाछमे एकटा सूखल डारि देख श्यामानन्द गाछक लग जा ओइ डारिकेँ काटि बिशेसर लग नेने आबि डारिकेँ हाँसूसँ चीर आँगुर भरिक कीड़ा निकालि सभकेँ देखौलकैन। आगू बढ़ि श्यामानन्द बिशेसरकेँ कहलैन- “भाय साहैब, बीस गाछ दारीम, पनरह गाछ अनरनेबा, पाँच गाछ धात्री, दस गाछ लताम, पनरह गाछ मद्रासी आम, पचास गाछ अनारस, तीनटा मचान बना तीन रंगक छोटका-बड़का अंगुर, आठ गाछ बेल, चारि गाछ शरीफा, चारि गाछ आँता आ चारि गाछ सपाटू[5]क लगा पाँच कट्ठामे रोपने छी। पाँच कट्ठामे सिंगापुरी, बंशीबट, मरीचमान,भोस, गौरिया, बरहरी, दूधी, बागनर, दूधमुंगर, झुरकुटिया इत्यादि किसिम-किसिमक केरा रोपने छी। जइमे अखन तीस-पैंतीसटा घौर लटकलो अछि। जाड़क मास दुआरे जुआएल तँ नइ अछि मुदा कोशा काटि देने छिऐ।” किरिण डुमल देख गुलाब आँगनसँ खेत आबि कातेसँ मुड़ी उठा-उठा श्यामानन्दकेँ तकैन। मुदा मकइ दुआरे देखबे ने करैथ। कोबीक छिट्टा लग आबि गुलाब ठाढ़ भऽ गेली। कनी कालक पछाइत चारू गोरेकेँ टमाटर खेत दिससँ अबैत देखलैन। लग अबिते गुलाबकेँ श्यामानन्द पुछलखिन- “अनेरे किए धड़फड़ाएल एलौं। बिशेसर भाय सभ आबि गेला। हुनके सभकेँ घुमा-घुमा देखबए लगलौं तँए कनी अबेर भऽ गेल।” बिनु संकोच केनहि गुलाब श्यामानन्दकेँ कहलखिन- “कोबी कीनिनिहार सभ आबि आँगनमे बैसल छैथ, तँए एलौं। अहाँ जखन आएब तखन आएब ताबे हम कोबीक छिट्टा नेने जाइ छी। कनी अलगा दिअ।” श्यामानन्द कोबीक छिट्टा गुलाबकेँ उठा देलखिन। गुलाब माथपर छिट्टा नेने आँगन विदा भेली। माथपर छिट्टा लऽ दुनू हाथसँ दुनू भाग छिट्टाकेँ पकैड़ दुलकी डेग बढ़बैत गुलाब ‘सैंयाँ भेल किसनमा’ घुनघुनाइत आँगन दिस लफरल चलली। बिशेसर श्यामानन्दकेँ पुछलखिन- “बौआ श्याम, खेती करैक एते लूरि केना सिखलौं?” बिशेसरक बात सुनि श्यामानन्द मने-मन हँसैत बजला- “भाय, अपनो छगुन्ता लगैए जे की छेलौं आ की छी। हमर सार पूसा कृषि कौलेजसँ पढ़ने छैथ। ओ खेतीक विशेषज्ञ छैथ। मुदा हमरा कहियो हुनकासँ खेतीक गप नै भेल छल। चारि बरख धरि ओ पढ़लैन। विद्यार्थियो नीक रहैथ आ मेहनतो खूब करैथ तँए फस्ट डिवीजनसँ पासो केलैन। पास करिते नोकरियो भऽ गेलैन। एक दिन हम सासुर गेलौं तँ अलमाड़ीमे भरल किताब देखलिऐ। किताब देख मनमे आएल जे दिवारे-दिम्मक सभ किताब खाइए जाएत, तइसँ नीक जे हमहीं एक मोटा साइकिलपर लादि लऽ जाइ। सासुरे छल तँए केकरोसँ किछु पुछैक जरूरते नहि। एक मोटा किताब अपना ऐठाम लऽ अनलौं। सभ किताबकेँ नीक जकाँति सेरिया कऽ रखलौं। मुदा पढ़ी कहियो नहि। किएक तँ भरि दिन गजे-भाँगमे बित जाइ छल। मुदा जखन बोरिंग गड़ेलौं तखन खेतीक किताब सभ छँटिया कऽ निकाललौं। अनक खेतीक एकटा किताब, तरकारी खेतीक किताब, फलक खेतीक किताब निकालि-निकालि पढ़ए लगलौं। थोड़-थाड़ खेतीक लूरि तँ देखियो कऽ भऽ गेल छेलए मुदा कोन मासमे कोन चीजक खेती हएत, कए बेर पटौल जाएत, कोन-कोन खाद केते-केते पड़तै, नीक बीआ केतए भेटत, ई सभ बात किताब पढ़ि कऽ बुझलौं। जखन सभ बात बुझि गेलौं आकि खेती दिस आरो बेसी मन दौगल। बोरिंग गड़ाइए नेने रही।” झलफल भऽ गेल। हाँइ-हाँइ श्यामानन्द बारहटा मकइ बाइल आ तीनटा कोबीक फूल लऽ तीनू गोरेकेँ देलक। खेतक आड़िए-पर पतियानी लगा चारू गोरे बैस गप-सप्प करए लगला। बिशेसर श्यामानन्दकेँ पुछलखिन- “बौआ, बोरिंग-दमकलमे केते खरच भेल?” बोरिंगक चर्चा सुनि श्यामानन्द उन्मत्त भऽ बाजए लगला- “भाय अहाँ लग बजैत लाज होइए। पहिने जखन बोरिंगक विचार मनमे उठल तखन हुअए जे केते लागत लगत केते नहि। किएक तँ लोकक मुहेँ पोखैर खुनबैक खरच सुनने रहिऐ तँए हुअए। मुदा जखन किनैले गेलौं तँ साढ़े चारि हजारमे सात गेज टाटाक नबे फुट पाइप, पैंतीस फुट पितरिया फिल्टर आ ऊषा मशीन भऽ गेल। छोट-छोट आरो कएटा समान होइ छै से सभ आ गड़ाइक खरच मिला कऽ पाँच साएमे भऽ गेल। कुल मिला कऽ पाँच हजारमे बोरिंग-दमकल भऽ गेल।” बिशेसर- “बोरिंग गड़बैक विचार मनमे केना उठल?” मुस्कियाइत श्यामानन्द- “जखन परिवारमे भिनौज भऽ गेल तखन तँ अपना ऊपर अपन परिवारक भार पड़ल। जखन भार पड़ल तखन सोचए लगलौं जे पहिलुका जकाँ जिनगी बितौलासँ भीख माँगए पड़त वा दोसर अपराधीक काज करए पड़त जे दुनू मनुख-ले अधर्मे छी। अनासुरती मनमे आएल जे हमहूँ मनुख छी। खेत छोड़ि दोसर अवलम्ब नै देख खेती दिस धियान गेल। तखन खेतीक सम्बन्धमे सोचए लगलौं। जखन खेतीक सम्बन्धमे सोचए लगलौं तखन खेती-ले पानिक महत नजैरपर आएल। जखन पानिक महत बुझए लगलिऐ तखन पानिक जोगारक उपए सोचए लगलौं। जखन पानिक उपए सोचए लगलौं तखन बोरिंग दिस धियान गेल। जखन बोरिंग दिस धियान गेल तखन बोरिंग गड़बैक उपय सोचए लगलौं। बोरिंग गड़बैक विचार करिते रही आकि मनमे एकटा नव विचार जगल। ओ नव विचार छल सम्पैतक सम्बन्धमे। सम्पैत दू तरहक होइत, पहिल क्रियाशील आ दोसर ठमकल। क्रियाशील पूजी ओ छी जइसँ उत्पादन होइत आ गतिहीन पूजी ओ छी जे चलायमान नै अछि। एते बात मनमे अबिते अपन सम्पैत दिस तकलौं, तँ दुनू तरहक पूजी पर्याप्त बुझि पड़ल। दस बीघा जमीन भैयारीमे हिस्सा भेल छल जइमे आठ बीघा उपजाउ बुझि पड़ल आ दू बीघा घराड़ी, परती, गाछी-बिरछी, बँसबाड़ि इत्यादि मिला कऽ देखलिऐ। ओना गाछी, बँसबाड़ि तँ थोड़-थाड़ क्रियाशीलो अछि मुदा परती आ पाकल सूखल बाँस, गाछ सेहो बहुत बुझि पड़ल। ओना परतियोकेँ तोड़ि कऽ क्रियाशील बनौल जा सकैत मुदा तत्काल तँ ओ मारे अछि। परती आ सूखल-पाकल गाछपर नजैर अँटैक गेल। बोरिंगक उपय देख मनमे खुशी उपकल। मनमे खुशी अबिते एकटा आरो बात धियानमे आएल। ओ बात ई जे घरवालीक गहना अनेरे घरमे पड़ल अछि। अखन ओकरा बन्हकी लगा बोरिंग गड़ा ली आ उपजा-बाड़ी भेलापर छोड़ा लेब। बेसी-सँ-बेसी एतबे हएत ने जे छह महिना साल भरिक सूदि लागत। ई बात मनमे अबिते घरवालीकेँ पुछलयैन। घरोवाली मंथरा जकाँ नै द्रोपदी जकाँ मानि गेली। पेटीसँ गहनाक मोटरी निकालि आगूमे रखि देलैन। गहना देख क्षुब्ध भऽ गेलौं। दूटा गहना निकालि छह हजारमे बन्हकी लगेलौं। पाँच हजार बोरिंग-दमकलमे खरच भेल आ एक हजार खेती करैले रखि लेलौं।” सुनि बिशेसर मुड़ी डोलबैत बजला- “हमरो तीनू गोरेक खेत एकठाम अछि। तीन बीघा बचनूक, दू बीघा बचनाक आ डेढ़ बीघा हमर। हमहूँ तीनू गोरे मिला कऽ बोरिंग गड़बए चाहै छी।” बिशेसरक बात सुनि श्यामानन्द अचम्भित भऽ गेला। खुशीसँ छाती फुलए लगलैन। मुस्की दैत बजला- “भाय, हाथमे पानि एलासँ गिरहस्तक जिनगी बदैल जाइ छइ। हमरे लोक अवारा कहै छेलए, मुदा आइ लोक प्रणाम करैए।” श्यामानन्दक बात सुनि उत्साहित होइत बचनू बाजल- “बिशेसर भैया, अहाँ गरीब छी मुदा हम आ बचन भाय तँ चीजबला छी। तीन हजार हम जोगार करब आ दू हजार बचन भाय करह। काल्हिए श्यामकेँ संग केने बजार चलू।” सहानुभूति दैत श्यामानन्द बचनकेँ कहलखिन- “दोकानदारसँ हमरा कारोबार चलैए तँए अधो-छिधो रूपैआक भाँज लगि जेतह तैयो काज चलि जाएत।” चारू गोरे बजार जाइक समए बना लेलैन। शुभ काजमे बिलम नहि। बिशेसर श्यामानन्दकेँ कहलखिन- “बौआ, भिनसर अहाँ अपने चलि आएब समदिया भरोसे नै रहब। हम सभ अखनेसँ रूपैआक ओरियानमे लगि जाइ छी।” बिशेसरक बात सुनि श्यामानन्द बजला- “नइ-नइ, समदिया भरोसे हम नइ रहब। भोरे किछु पानि पीब चलि आएब।” सभ कियो उठि कऽ विदा भेला। श्यामानन्दकेँ घरपर अबिते पत्नी पुछलकैन- “एते अबेर केतए भऽ गेल?” कहलखिन- “बिशेसर भाय बोरिंग गड़ौता ओही गप-सप्पमे समए लगि गेल।” बोरिंगक नाओं सुनिते गुलाब बजली- “जँ बिशेसर भैया बोरिंगक विचार अहाँसँ पुछैले एला तँ अहुँक फर्ज भऽ जाइए जे रूपैआ-पैसा दुआरे काज बिथुत ने होइन। गाममे तँ बहुत लोक छै अनकासँ पुछैले किए ने गेलखिन। जँए अहाँपर बिसवास भेलैन तँए ने।” रस्तामे बचनू बिशेसरकेँ कहलकैन- “भैया, अहाँक खेत ऊँचगर अछि आ हमरा दुनू गोरेक नीच तँए ऊँचगरपर बोरिंग गड़ाएब नीक हएत।” बचनूक बात सुनि हँसैत बिशेसर बजला- “सभ कियो रहबे करब। जेतइ नीक हएत तेतै गड़ाएब।” भोरे श्यामानन्द दतमैन करैत बिशेसर ऐठाम पहुँचला। बिशेसर सेहो बचनू ऐठामसँ आबि नहाइक ओरियानमे रहैथ। श्यामानन्दकेँ देख बजला- “अखन धरि घुमिते छह श्याम?” “हमरा मनमे भेल जे कोनो बाधा-ताधा ने त..। तँए आबि गेलौं।” श्यामानन्द चोट्टे घुमि कऽ घरपर आबि हाँइ-हाँइ नहा कऽ जलखै खा बिशेसर ऐठाम एला। बचनू आ बचना पहिनहि आबि गेल छल। चारू गोरे बजार विदा भेला। बजार पहुँच बोरिंगक पाइप, दमकल आ आरो-आरो समान सभ कीनि, टाएर गाड़ी भाड़ा कऽ सभ सामान लदलैन। दाम जोड़ि दोकानदारकेँ दऽ देलखिन। श्यामानन्द बचनूकेँ संग केने आगू बढ़ि मिस्त्री ऐठाम एला। एक किलोक रौह माछ कीनि मिस्त्री पोलिथीनक झोरामे नेने घरपर पहुँचले छल कि श्यामानन्द शोर पाड़लकैन। आँगनसँ निकैल मिस्त्री श्यामानन्द लग आबि पुछलकैन- “केमहर-केमहर एलौं?” मुस्कियाइत श्यामानन्द कहलखिन- “एकटा आरो बोरिंग गड़बैक अछि। सएह कहैले एलौं। टाएर गाड़ी अही देने अबैए तँए गाड़ैक सभ समान लादि दियौ। काल्हि भोरेसँ हाथ लगा देबइ।” श्यामानन्दक बात सुनि मिस्त्री बाजल- “समान तँ पठा देब मुदा हाथ काल्हि नइ लगत। किएक तँ हमर सभ आदमी दोसर बोरिंग गाड़ैले गेल अछि।” श्यामानन्द- “दोसर कोनो उपए नइ छइ?” मिस्त्री- “हँ, छइ। हम तँ रहबे करब। जँ काज करैबला तीनटा आदमी भऽ जाए तँ काल्हियो लगि सकैए।” बचनू- “आदमीक कमी नै अछि। अखन समान नेने चलू आ जेतए बोरिंग गाड़ल जेतै तेतए बाँस-ताँस ठाढ़ कऽ खाधिक चेन्ह दऽ देब, हम सभ से खुनि लेब। जेते काज भेल रहत ओते समए काल्हि बँचि जाएत।” टाएर आबि गेल। सभ सामान लादि गप-सप्प करैत सभ कियो विदा भेला। थोड़े आगू बढ़लापर बिशेसर मिस्त्रीकेँ पुछलखिन- “अहाँ पढ़लो-लिखल छी?” ‘पढ़ल-लिखल’ सुनि मिस्त्री चौंक बाजल- “हम पढ़ल-लिखल नै छी। जखन बारहे-तेरहे बर्खक रही तखने बाबू मरि गेला। चारि भाए-बहिनमे दू बहिनक बिआह-दुरागमन बाबूए सोझाँमे भऽ गेल छल। दू भाए-बहिन कुमार छेलौं। घराड़ी छोड़ि एक्को धूर बाधमे खेत नै छल। मुदा माए जेहने लूरिगर तेहने जिबटगर। दोकानसँ तेबखा, खेरही आ मसल्ला कीनि आनए आ अदौरी-पापड़ बनबए। हमहूँ पापड़ बेली आ रौदमे सुखाबी। छोटकी बहिन आ माए अदौरी खोंटै। साँझू-पहर झोरामे लऽ हम जा कऽ बेच आबी। ओइसँ गुजर करी। बहिनक बिआहो केलौं। बहिनक बिआहक साल भरिक पछाइत अपनो बिआह केलौं। फागुनक समए रहै, धुर-झार लगन चलैत रहइ। कपड़ा दोकानदार-रामफलक नोकर पड़ा गेलइ। हम जखन पापड़ बेचए गेलौं तँ रामफल शोर पाड़लक। गेलौं। हमरा कहलक ‘नोकरी करबह?’ हम गछि लेलिऐ। दोसर दिनसँ नोकरी करए लगलौं। भरि दिन दोकानमे काज करी आ साँझमे अपना ऐठाम चलि आबी। गामपर आबि खाइ-पीबै राति धरि पापड़ बेल-बेल राखी। दिनमे माए ओकरा सुखबै। आमदनी बढ़ि गेल। मुदा जेते मन अपन काजमे लगए तेते नोकरीमे नहि।” बिच्चेमे बिशेसर पुछि देलखिन- “मिसतिरियाइ केना सिखलौं?” मुस्कियाइत मिस्त्री कहलकैन- “मामा गाम गेलौं। ममियौत भाए चापाकल गाड़ैले जाइत रहैथ। हमरो चलैले कहलैन। हमहूँ गेलौं। जैठाम कल गाड़ैत रहैथ तैठाम हमहूँ कातमे बैस देखए लगलौं। सरा-सैर पाइप गड़ैत जाए। हमरा काज हल्लुक बुझि पड़ल। कमाइयो बढ़ियाँ। कल गड़ौनिहारक पतियानी लगल। दोसर दिनसँ हमहूँ काज करए लगलौं। दसे दिनमे मिस्त्री भऽ गेलौं। गाम अबै काल ममियौत, पुरना सभ औजार हमरा दऽ देलैन। गाम आबि हमहूँ कल गाड़ए लगलौं। नोकरी छोड़ि देलिऐ, कल गाड़ए लगलौं। जखन बैसारी हुअए तखन पापड़ बनाबी...। तीन साल चापाकल गाड़ैत-गाड़ैत बोरिंग गाड़ैक सभ औजार कीनि लेलौं। जखन सभ औजार भऽ गेल तबसँ बोरिंगक काज शुरू केलौं।” मिस्त्रीक बात सुनि बिशेसर हँसैत पिठ ठोकि देलकैन। दिन उगले सभ घरपर आबि गेला। घरपर अबिते गाड़ीपर सँ सभ सामान उताइर, गाड़ीबला-केँ पचास रूपैआ भाड़ा दऽ देलखिन। श्यामानन्द सेहो घर होइत एला। अबिते बिशेसर कहलकैन- “श्याम, अखन सभ कियो छी। चलै चलू बोरिंग-ले जे जगह नीक हेतै से ठेमा लेब।” बिशेसरक बात सुनि सभ कियो जगह देखैले विदा भेला। खेत पहुँच सभ बिशेसरक खेतकेँ ऊँच बुझि बोरिंग गाड़ैक जगह ठेमा लेलैन। सभ राजी भैला। बिशेसर भोलियाकेँ खनती आनए कहलखिन। बचनू बाँसक टोन अनलक। बचना कोदारि आनि खाधि खुनए लगल। झलफल होइत-होइत बोरिंग गाड़ैक सभ जोगार लगि गेल। मिस्त्री चलि गेल। दोसर दिन भोरे मिस्त्री आबि भोलियाकेँ कहलक- “जेते औजार अछि सभकेँ गनि लएह आ धिया-पुतापर नजैर रखने रहिहह नइ तँ औजार गड़बड़ कऽ देत।” सभ औजार गिनती कऽ झोरामे रखि भोलिया कान्हपर लऽ विदा भेल। खेतमे झोरा रखि भोलिया आ बचनू पोखैरसँ पानि आनि-आनि खाधि भरए लगल। अखन धरि बचनाक केतौ पता नहि। मुड़ी उठा-उठा बिशेसर बचना घर दिस तकैत जे अखन धरि किए ने आएल। बचनाकेँ नै अबैत देख बिशेसर बजबैले विदा भेला। बचनाक घरपर पहुँच बिशेसर देखलैन जे गाइयो-बरद घरेमे छै! ने बचनाक पता आ ने बचनाक घरेवालीक। दरबज्जापर ठाढ़ भऽ चारूकात ताकए लगला। मुदा केतौ नजैरपर पड़बे ने केलैन। बिशेसर घुमि कऽ चलि एला। बोरिंग गाड़ब शुरू भेल। श्यामानन्द झोरामे कोबी, टमाटर, अल्लू नेने पहुँचला। श्यामानन्दकेँ बिशेसर कहलकैन- “बौआ, जाबे बोरिंग गाड़ल जाएत ताबे अहूँ एतै रहू।” किरिण उगैसँ पहिने बचनूक पत्नी हाथ-पएर धोइ, गोसाँइ घर जा, गोसाँइक आगूमे एक-टंगा दऽ दुनू हाथ जोड़ि फुसफुसा कऽ गोसाँइकेँ कहलखिन- “हे गोसाँइ बाबा, अगर शुभ-शुभ कऽ बोरिंग भऽ जाएत तँ सवा सेर लड़ु चढ़ेबह।” कहि घरसँ निकैल उपास करए लगली। सबहक भानस आ जलखै बचनूए ऐठाम होइक विचार भेल छल तँए बचनूक पत्नी ओइ जोगारमे लगि गेली। बिशेसर आ श्यामानन्द बगलमे बैस देखबो करैथ आ गप्पो-सप्प करैथ- “बिशेसर भाय, जखन बोरिंग गड़ेलौं तखन लोक-सभ बाजए जे बोरिंगक पानिसँ उपजा थोड़े हएत। बरखा पानि भगवानक पानि छिऐन आ बोरिंगक पानि तँ लोहा पाइपसँ अबैए तँए जजात जरिये जेतइ!” श्यामानन्दक बात सुनि बिशेसर ठहक्का मारि हँसए लगला। बिशेसरकेँ हँसैत देख श्यामानन्द आगू बजला- “एतबे नै भैया, खाद आनि जखन खेतमे देलिऐ तखन बाजए जे हाड़क खाद बनै छइ। हिन्दु केना खाएत।” दुनू गोरे गप-सप्प करिते छल कि बचना धड़फड़ाएल पहुँचल। बिशेसरपर नजैर पड़िते बाजल- “मौगीक फेरीमे पड़ि गेल छी भैया। जखनसँ घरवाली बोरिंगक नाओं सुनलक तखनसँ जेना भूत लगि गेलइ! भरि राति ने अपने सूतल आ ने हमरा सुतए देलक। भरि राति की कहलक की नै कहलक से ओते मनो ने अछि। अधरतिएमे पड़ा कऽ केतए-दन चलि गेल। भोरेसँ तकैत-तकैत तबाह भऽ गेलौं मुदा केतौ ने भेटल। बोरिंगक दुआरे ताकब छोड़ि चलि एलौं। मालो-जाल अखने बाहर केलौं हेन।” बचनाक बात सुनि बिशेसर कहलखिन- “जे भेलै से भेलै, काजमे लगि जाह। पाछू बुझल जेतइ।” भरि दिनमे अस्सी फूट बोर भेल। अस्सी फूटपर जा कऽ लस्साबला माटि पकड़ा गेलइ। आगू पाइप धँसबे ने करैत। जेना पहाड़ी इलाकामे होइत। सबहक बाँहि आ जाँघ सेहो दुखाए लगलै। सबहक थाकैन देख मिस्त्री काज छोड़ि देलक। सभ समान सेरिया कऽ रखि मिस्त्री बचनू आ भोलियाकेँ कहलक- “इनहोर पानिसँ नीक जकाँति बाँहि आ जाँघकेँ ससारि लेब नइ तँ काल्हि काज कएल नै हएत।” दोसर दिन, भोरेसँ सभ काजमे जुटि गेल। पहिलुके तोरमे दसो फुट लस्साबला माटिसँ आगू बढ़ि बाउलपर पहुँच गेल। पैंतीस फुट मोटका बाउल भेटलासँ मिस्त्रीक मन गदगद भऽ गेल। चारि बजैत-बजैत बोरिंग गड़ि गेल। खुट्टा-खुट्टी उखाड़ि मिस्त्री दमकल लगा बोरिंग चला देलक। ◌ शब्द संख्या : 3719 10. बिशेसर बोनिहार नै आब छोटका किसान भऽ गेल। अपन बदलैत जिनगी दिस नजैर दौगबैत बिशेसर मने-मन सोचए लगला जे कम-सँ-कम एकटा बरद जरूरी अछि। डेढ़ बीघा खेती कोदारिसँ तत्काल तँ भऽ सकैए। मुदा बिनु बरदे काज चलब कठिन अछि। अगर केकरो हर जोति जँ हर-बरद लेब तँ तीन दिन जोतब तखन एक हरक काज हएत। ऐ बेर तँ समाज मदैत केलक तँए खेती भऽ गेल। मुदा सभ दिन तँ से सम्भव नै अछि। तखन एकटा उपए अछि जे अदहा-छिदहा काज कोदारियोसँ कऽ लेब आ अदहा-छिदहा हरो मोल लऽ कऽ कऽ लेब। जखन पाइ-कौड़ी हएत तखन बुझल जेतइ। फेर बिशेसरक मनमे आएल जे जँ कियो बरद पोसियाँ लगौत तँ सएह लऽ लेब। अपन जुतिक काज रहत, केकरो जुतिमे नै रहब। मुदा केकरा पुछबै जे बरद पोसियाँ लगेबह? समाजमे तँ यएह देखै छी जे कियो गाए वा बरद पोसियाँ लगबैए वा खेत भरना लगबैए तँ सुराक लगा काज होइ छइ। दू-चारि गोरे लग बजबै तँ अपने भाँज लगि जाएत। जखन बरद हएत तखन हरो बनबए पड़त। तत्काल जँ हर नहियोँ हएत तैयो साल-दू साल काज चलि सकैए किएक तँ बेसी किसान ओहन अछि जे दू-दूटा हरखाड़ा आ पालो रखने अछि। जेना-जेना उपए होइत जाएत तेना-तेना चीजो बनबैत जाएब। मुदा सभसँ जरूरी अछि जे जखने बरद भेट जाएत तखने ओकरा रहैले घरोक जरूरी हएत। घर नै अछि। एकटा बरद रखैले बड़ भारी समस्या तँ नहियेँ अछि मुदा समस्या तँ ऐछे। भनसे घर लगा कऽ एकचारी बान्हि ठाढ़ कऽ लेब। चारि-पाँचटा खुट्टा, एकटा पाढ़ि आ आठ-नअ हाथक ठाठ लागत। तीन-चारिटा बाँस कीनि लेब तहीसँ सभ काज भऽ जाएत। बिशेसर सोचिते छला कि मोहिनी आबि पुछलकैन- “किए मन्हुआएल बैसल छी?” पत्नीक बात सुनि बिशेसर बाजल- “भने अहूँ आबि गेलौं, आउ ऐठाम बैसू। अखन धरि तँ बोइने करै छेलौं, ने माल-जाल खुट्टापर छल आ ने बेसी असार-पसार तँए एक्कोटा घरसँ काज चलि जाइ छल। मुदा आब खेतो भेल आ पानियोँक उपए भऽ गेल। जखन खेत आ पानि भऽ गेल तखन उपजो बढ़बे करत। तेतबे नहि, जखन उपजा-बाड़ी बढ़त तँ ओकरा रखैले घरमे कोठियो चाही,नार-पात रखैले जगहो चाही। ओना घराड़ीक कमी नै अछि मुदा ओकरा बेवस्थित ढंग धड़बए पड़त।” मुड़ी डोलबैत मोहिनी बजली- “हँ, से तँ करैये पड़त।” बिशेसर- “अखन धरि गाछी-बिरछीसँ जारैन तोड़ि अनै छेलौं, पत्ता बीछि अनै छेलौं तखन भानस होइ छल। मुदा जाबे जारैनक ओरियान नै कऽ लेब ताबे तँ अनके गाछी-बिरछीक आशा रहत। तँए विचार अछि जे एकटा बरद पोसियाँ लऽ ली। बरद रखलासँ जरनोक ओरियान भऽ जाएत आ खेतो जोतैक। मुदा बरद रखैसँ पहिने घर बान्हए पड़त। घर जे बान्हब से अपना बाँसो-लकड़ी नहियेँ अछि।” मोहिनी- “चारिटा हाट भोलिया केलक जइसँ दू साए रूपैआ कमाएल। तँए हमर विचार अछि जे भोलियाकेँ साझी कऽ लियौ। आइ जँ दू-चारि भाँइ भोलिया रहैत तँ एकटा बातो मुदा से तँ नहियेँ अछि। लऽ दऽ कऽ असगर अछि।” मोहिनीक बात सुनि बिशेसर गुम्म भऽ गेला। थोड़े कालक पछाइत बजला- “बजलौं तँ ठीके मुदा ओकरा भीने किए केलिऐ। बेहूदा छौड़ा-मारैरक भाँजमे पड़ि दुइर भऽ गेल तँए ने तामस उठल आ भीन केलिऐ। यएह उमेर ने कमाइ-खटाइबला होइ छइ। अखन जे काजसँ देह चोरौत तँ कमाएत कहिया?” मुड़ी डोलबैत मोहिनी कहलकैन- “कहलिऐ तँ ठीके मुदा जहियासँ दुखन सिपाही रेबाड़लकै तहियासँ भाँग-गाँजा छोड़ि देलक!” मुस्कियाइत बिशेसर बजला- “छुतहरक चालि छोड़ि जँ मनुखक चालि धड़त, तखने ने इज्जत-आबरू हेतइ। हमरा कि कोनो ओकरासँ दुश्मनी अछि। शोर पाड़ियौ दुनू परानीकेँ।” मने-मन खुशी होइत मोहिनी आँगन जा दुनू परानी भोलियाकेँ बजौने एली। पिता लग अबैत भोलियाकेँ छाती धकधकाइत, मुदा तैयो आबि पिताक आगूमे बैसल। भोलियाक पत्नी-मेना सेहो बगलमे ठाढ़ भेली। बिशेसर भोलियाकेँ कहलखिन- “रौ भोलिया, भाँग-गाँजा पीबै दुआरे तोरा भीन केने छेलियौ जँ आब छोड़ि देलेँ तँ आइसँ साझी भऽ जो। हमहूँ दुनू परानी दिनोदिन बुड़हे होइत जाएब मुदा तूँ दुनू बेकती तँ जुआन छेँ। जेते मेहनत करमे ओते अपने ने सुख हेतौ। एते दिन खेतो ने छल, बोइन करै छेलौं। मुदा आब तँ खेतो भऽ गेलौ आ पटबैले बोरिंगो। तँए मन लगा खेती कर। बड़बढ़ियाँ छोट-छीन रोजगारो शुरू केलेँ। परिवार अगुअबैले बहुत मेहनत आ बहुत चीजक जरूरत होइ छइ। पाइक काज तँ पाइए करत। घर लग जे डेढ़ कट्ठा खेत अछि तइमे आँगन, घर, दुआर, मालक थैर आ अगवास बना-ले आ तीमन-तरकारी बोरिंगे लग करब।” पतिक बात सुनि मोहिनी बजली- “एते दिन सोलहो आना बोइनेपर गुजर करै छेलौं, पाइक कोनो आमदनी नइ छल मुदा आब तँ थोड़-थाड़ पाइयोक आमदनी भाइए गेल। समाजमे पैंचो-पालट ओकरे भेटै छै जेकरा आमदनी रहै छइ। एक्के बेर जे सभ काज करए चाहब से तँ नइ हएत मुदा किछु नगदो आ किछु उधारियो लऽ कऽ एक-एकटा करैत जाएब तँ सभ काज भऽ जाएत।” पत्नीक बात धियानसँ सुनि बिशेसर बजला- “अहाँक विचार एक तरहक अछि मुदा एतेटा जिनगीमे केकरोसँ किछु मंगलौं नहि, आब ऐ बुढ़ाड़ीमे केना माँगब?” बिशेसरक विचारमे छिपल संकल्पकेँ मोहिनी बुझि गेली। सामंजस्य करैत बजली- “अपने दुनू परानी बुढ़ भेलौं। पाकल आम जकाँ कखन छी आ कखन गिर पड़ब तेकर कोन ठेकान। तँए भोलियाकेँ घर-दुआर सुमझा दियौ। जाधैर कियो घरक भार उठा नै चलैत ताधैर अबोधे-अनाड़ी रहि जाइत। करैत-करैत कियो सीखैए।” मोहिनीक विचार बिशेसरकेँ जँचलैन। मुदा मनमे द्वन्द्व जगि गेल। द्वन्द्व ऐ दुआरे जगलैन जे अपना ढंगसँ परिवारोक रस्ता आ समाजोक बीच रहैक बनौने छैन...। एक टकसँ बिशेसर आगू-मुहेँ देख सोचए लगला। तैबीच बचनू आएल। बचनूकेँ देखते बिशेसर हाथक इशारासँ ओछाइन देखबैत कहलखिन- “आबह, आबह बचनू। ऐठाम बैसह।” ओछाइनपर बैस बचनू बिशेसरकेँ कहलक- “भैया, बड़ चिन्तित देखै छिअ?” बचनूक बात सुनि बिशेसर बिनु कोनो लागि-लपैटिक कहलक- “चिन्ता कोनो तेहेन नै अछि। परिवारेक सम्बन्धमे किछु मनमे आबि गेल।” परिवारक नाओं सुनिते बचनू बाजल- “परिवारेमे ने भैया सभ सुख-दुख भोगैए। तँए चिन्ता तँ करै पड़तह।” “कहलह तँ ठीके मुदा हमर चिन्ताक कारण दोसर अछि। एते दिन बोइन करै छेलौं, गुजर करै छेलौं। मुदा आब अपना खेतो भऽ गेल, खेत पटबैले पानियोँक जोगार भऽ गेल। तँए आब उपजा-बाड़ी सेहो बढ़त। ओइ खेतकेँ जोतै-कोड़ैले बरद चाही, हर-कोदारि चाही आ आरो औजारो चाही। बरद रखैले घरो चाही। नार-पात रखैले जगहो चाही। एते दिन तँ एक्केटा घरसँ काज चलि जाइ छल मुदा आब से हएत? अपना तँ डेढ़ कट्ठा घराड़ी छोड़ि किछु अछि नहि। यएह चिन्ता मनमे घुरियाइए।” बचनू कहलकैन- “भैया बजलह तँ सभ ठीके मुदा समाज समुद्र होइए। तोरा अपना बुझि पड़ै छह जे किछु ने अछि मुदा गाममे तँ सभ किछु अछि। तइले एते चिन्ता किए करै छह। जाबे तोरा अपना बरद नै भऽ जेतह ताबे हम अपन बरदसँ खेती सम्हारि देबह। घर बन्हैले बाँस आ लकड़ी सेहो सम्हारि देबह। जखन उपजा-बाड़ी हेतह तखन हमरा ओकर दाम दऽ दिहह। तोरा पाबि हम एते करै छी आ तोहीं लटपटा जेबह।” बचनूक बात सुनि बिशेसर कहए लगल- “हम तँ पढ़ल-लिखल नै छी बचनू, मुदा आँखि तँ अछि। अपने गामटा मे नहि आनो गाममे देखै छी जे हमरा-तोरा सन जे पछुआएल परिवार आ लोक अछि ओकरामे किछु एहेन दुरगुन अछि जेकरा सुधारने बिना अगुआएब कठिन अछि।” बिशेसरक बात सुनि बचनू चौंकैत पुछलक- “से की भैया?” “सएह तँ कहै छिअ। अपनो गाममे देखै छहक ने जे अनेरे छोट-छीन कारणे भरि-भरि दिन लोक गारि-गड़ौवैलमे, झगड़ा-झंझटमे समए बिता लइए, जइसँ परिवारक काज मारल जाइ छइ। जखन परिवारक काज मारल जाएत तखन ओ परिवार आगू-मुहेँ केना ससरत?” मुड़ी डोलबैत, मुँह बौने बात सुनि बचनू बाजल- “हँ, ई तँ ठीके कहलक।” बिशेसर आगू बजला- “एतबे नै बचनू, आरो बात अछि। हमरा-तोरा परिवार सन परिवारमे देखबहक जे जेकरा ऊपरमे घरक भार रहै छै ओ भरि दिन काजसँ लऽ कऽ आरो तरहक जोगारमे तंग-तबाह रहैए मुदा घरक आन गोरेकेँ धैनसन। जेना एक्के गोरे-ले कमाइक भार छै आ दोसर-तेसरकेँ सिरिफ खाइक। तेतबे नहि, आरो देखबहक जे कमाइ-खटाइबला जे अछि ओ भरि-भरि दिन भाँगे-गाँजाक पाछू वौराएल रहैए।” बचनू- “हँ, ईहो बात ठीके कहलह भैया” बिशेसर- “जाधैर कोनो परिवारमे, परिवारक सभ सदस अपन परिवार बुझि नै लगि जाएत ताधैर कोनो परिवारकेँ आगू बढ़ब कठिन अछि। जखने परिवारक सभ आदमी अपन शक्तिक अनुरूप श्रम करए लगत तखने ओ परिवार धुधुआ कऽ आगू बढ़ए लगत। अखन धरिक जे अपन सबहक परिवारक दिशा रहल ओ एहेन बनि गेल अछि जइमे जिनगीक महतकेँ छोड़ि कल्पनामे चलि रहल अछि। तँए सभ कष्टकर जीवन बना कल्पित जिनगी जीब रहल अछि।” एते बात सुनिते बचनू बिशेसरकेँ कहलक- “भैया, हम एकटा काजे आएल छेलौं।” “कोन काज?” “फगुआक समए लगिचा गेल। पानिक दुआरे गहुमक खेती करबे ने केलौं। किएक तँ अपना बाधमे ने एक्कोटा बोरिंग छल आ ने पोखैर। लऽ दऽ कऽ एकटा पोखैर अछि, जँ ओहू पोखैरक पानि उपैछ गहुमे पटा लितौं तँ गाए-महींस केतए पानि पीबैत। तेतबे नहि, आगि-तागिक दुआरे सेहो किछु पानि रहब जरूरी अछि। मुदा आब तँ अपन बोरिंग भऽ गेल। खेतो सभ खाली भऽ गेल। मौसरी-खेसारी सभ उखैर गेल। अखन कोनो खेती करैक समए अछि की नहि? सएह पुछैले आएल छेलौं।” बचनूक बात सुनि बिशेसर बुझबैत कहलखिन- “खेती तँ बारहो मास होइ छै, बचनू। एते दिन अपना हाथमे पानि नै छल तँए नै होइ छल। जखने जागी तखने परात। दमकल बोरिंगमे लगा जेते खसल खेत छह, सभकेँ पटाबह। हमहूँ पटा लेब। बचनोकेँ आइए कहि दहक। तीनू गोरे सभ खेत पटा खेरही, मकइ आ तेल-ले सुर्जमुखी फूल बाउग कऽ लेब।” मकइ आ सुर्जमुखीक नाओं सुनि बचनू बाजल- “भैया, खेरहीक बीआ तँ अपनो घरमे अछि मुदा मकइ आ सुर्जमुखी-बीआ केतएसँ आनब?” बिशेसर- “कोन कमी छइ। बजारमे सभ कथुक बीआ भेटै छइ। पहिने खेत पटा कऽ जोत-कोर तँ करह। जखन बीआ आनए बजार जाए लगिहह तखन गरमा धानक आ तीमन-तरकारीक बीआ सेहो नेने अबिहह।” बचनू- “बेस कहलह भैया। आइएसँ मुसताइज भऽ जाइ छी। मुदा एकटा बात तँ पुछबे ने केलियऽ। पाछू कऽ मन पड़ल, खएर..। पहिने ई कहह, तीमन-तरकारीक जे खेती-ले जे कहलह से तँ बड़बढ़ियाँ मुदा गामक लोक तँ किचारत नइ जे तरकारी खेती कोइर-कुजरा करैए?” बचनूक बात सुनि बिशेसर ठहक्का मारि हँसैत कहलखिन- “धुर बुड़िबक कहीं-के! कम-सम तरकारी खेती तँ सभ करैए, तखन लोक किए हँसतह। जइ चीजक खर्च सभ परिवारमे होइए ओइकेँ उपजबैमे लोक किए हँसत।” बचनू- “तेसर सालक एकटा किस्सा कहै छिअ। हमर तमुरियाबला कुटुम पानक खेती केलक। वेचारा गरीब अछि। बोइन करैए। पान उपजबैक सभ लूरि वेचारा सीखने अछि। पानक आमदनी देख एक कट्ठा खेती केलक। बड़ सुन्नर पान उपजलै। एक्के-दुइए गामक सभ बुझलक। जखन बुझलक तँ एका-एकी लोक सभ आबि-आबि देखए लगल। देखला पछाइत गामक सभ बरइ चौगामा बरइक पनचैती बैसौलक। पनचैतीमे सभ मिलि निर्णए केलक जे तीन दिनक भीतर ओ बरैब उजाड़ि लिअ नइ तँ बलजोरी बरैब उजाड़ि देबइ। पान उपजाएब हमरा सबहक पुश्तैनी खेती छी, दोसर जाति किए उपजौत। वेचारा कुटुम बरैब उजाड़ि लेलक।” बचनूक बात सुनि, आरो जोरसँ ठहक्का मारि बिशेसर बजला- “एहेन-एहेन घटना मुरूखपनाक चलैत भेलै, आब एहेन घटना थोड़े हएत।” दुनू गोरे बिशेसर आ बचनू गप-सप्प करिते छला कि श्यामानन्द सेहो बजारसँ घुमैत एला। श्यामानन्दकेँ देखते बिशेसर कहलखिन- “आबह-आबह बौआ श्याम। अखन हम दुनू गोरे खेतीए-क गप करै छेलौं। भने तोहूँ आबि गेलह।” श्यामानन्द- “भैया, अखन हमहूँ धड़फड़ाएल छी। निचेनमे कखनो फसल-चक्रक गप करब। भोलियाकेँ कहि दिहक जे टमाटर आ फुलकोबी दुइर भेल जा रहल अछि तँए काल्हि भोरे आबि कऽ जेते दुइर होइबला अछि ओकरा कौल्हुके हाटमे बेच लेत। दुइर भेलासँ की फल। कनी बेसी मेहनत हेतै मुदा पाइयो तँ हेतइ। अखन जाइ छी।” ‘अच्छा ठीक छै’ कहैत बिशेसर श्यामानन्दकेँ विदा कऽ बचनू संगे गप करए लगला- “बचनू, जहिना सभ रंगक किसान अछि– खेतक हिसाबे, केकरो दू बीघा खेत छै, केकरो तीन बीघा, केकरो दस बीघा। तहिना खेतियो अलग-अलग ढंगसँ करए पड़त। ने एक रंग खेत सभ किसानकेँ अछि आ ने एक रंग खेती केलासँ काज चलत। ओना, सभ किसानक परिवार एक रंगाहे अछि। चारि गोरेसँ लऽ कऽ सात-आठ गोरे तक। मुदा खेत तँ कम-बेसी छै तँए परिवारक हिसाबसँ खेती करए पड़त। दोसर बात अछि जे कोनो परिवारमे अधिक खेत अछि मुदा काज केनिहार- श्रमिक कम अछि। तहिना कोनो परिवारमे खेत कम अछि आ खटनिहार अधिक अछि। तहिना उपजोक अछि, कोनो फसिलमे कम श्रम लगैए आ कोनो फसिलमे अधिक। लाभोक दृष्टिये तहिना छइ। तँए सभ हिसाब मिला कऽ किसानकेँ चलए पड़त।” ◌ शब्द संख्या : 1923 11. अबेर कऽ उठि महंथ रघुनाथ दास डोलडालसँ आबि स्नान करै छला। बारह बजे राति धरि जगल रहने अबेर कऽ निन टुटलैन। फुलचन दास बाल्टीनमे जल भरि महंथजीक पीठक मैल छोड़बैत रहैन...। भोरे गंगानन्द नित्यकर्मसँ निवृत्त भऽ चाह पीब, पान खा महंथजीसँ भेँट करए स्थानपर पहुँच मन्दिरक आगूमे पजेबा सिमटीक बनल चबुतरापर बैसल छला। गंगानन्दकेँ बैसल देख महंथ रघुनाथ दास हाँइ-हाँइ स्नान कऽ, कमण्डलमे जल भरि मन्दिर जा पूजा करए लगला। महंथजीक फेरल लँगोटा आ खौरकी फुलचन दास खीचि कऽ ढाठपर पसारि मन्दिरपर जा महंथजीक संग अस्तुति गाबए लगल। पूजा बिसरजन कऽ महंथजी गंगानन्द लग आबि पुछलखिन- “केमहर-केमहर एलौं?” चौअन्नियाँ मुस्की दैत गंगानन्द कहलकैन- “अपनेसँ एकटा विचार करए एलौं हेन। चारू-भरक गाममे धरमक काज जोर-शोरसँ भऽ रहल अछि, केतौ अष्टयाम कीरतन तँ केतौ यज्ञ तँ केतौ पूजा होइए। मुदा बीचमे अपन गाम छुटल अछि। सुनैमे आएल अछि जे ऐ बेर एगारहटा ग्रह एकठाम जम्मा भऽ रहल अछि। तँए की हएत की नहि, तेकर कोन ठेकान! तँए...।” गंगानन्दक विचार धियानसँ सुनि रघुनाथ दास बजला- “बहुत दिनसँ हमरो मनमे छेलए मुदा गामक लोकक मन देख अनठा दइ छेलिऐ। आइ जँ अहाँक मनमे धरमक रूचि जगल तँ हमहूँ तैयार छी। जहाँ धरि जे भऽ सकत तन-मन-धनसँ सहयोग करब।” महंथजीक विचार देख गंगानन्द सुकलकेँ बजबैले फुलचन दासकेँ कहलखिन। फुलचन दास सुकलकेँ बजबए विदा भेल। फुलचन दासकेँ विदा होइते हुँहकारी भरैत महंथजी बजला- “हँ-हँ गौंआँक सहयोग तँ जरूरी अछि। बिनु समाजक सहयोगे एहेन काज होएब कठिन अछि।” मेरियाक संग बैस सुकल चाहक दोकानपर गाँजा पीबै छल। सात-आठ गोरेक मेड़ियामे। रस्तेपरसँ फुलचन दास हिया कऽ सुकलकेँ देख लगमे जा ठाढ़ भऽ गेल। फुलचन दासकेँ लगमे ठाढ़ देख सुकल बाजल- “बाबा तूँ किए ठाढ़ छह, बैसह। बड़ सुन्दर वसन्ती माल छइ।” कहि सुकल कनी अपनो घुसैक गेल आ मोहनोकेँ हाथक इशारासँ घुसकौलक। बीचमे फुलचन दास बैस गेल। एक चीलम गाँजा एक्के-एक्के दम सभकेँ होइत। विचित्र मिलान गाँजा पीआकक। एक-एक दम मारि चीलम आगू बढ़ा दइत। चीलम आगू बढ़ि गेल छल तँए फुलचन दासकेँ नै भेल। दोहरा कऽ अबैत-अबैत गाँजा सठि गेलइ। सठिते रूपना आगूमे रखल पुड़ियासँ निकालि बामा तरहत्थीपर लऽ दहिना औंठासँ मलए लगल। सोधन टाटक खरौआ जौर तोड़ि, गिरह बान्हि गुल बनौलक। बिच्चेमे चाहबला चाह बढ़ौलक। गाँजा मलि रूपना प्रेम कटारी लऽ गुलाब-तख्तीपर गाँजा काटए लगल। सकरी कट तमाकुल तँए काटैक जरूरते नहि। हाँइ-हाँइ चाह पीब सोधना गुल जरबए चाहक चुल्हि लग गेल। जाबे रूपना गाँजा-तमाकुल मिला चीलममे भरलक ताबे सोधनो गुल जरा अनलक। अखन धरि गाँजाक एक्के दम सुकल मारैने छल मुदा फुलचन दासकेँ एलासँ सुकल फुलचने दास दिस बढ़ौलक। फुलचन दास दहिना हाथमे चीलम लऽ दुनू आँखि बन्न कऽ ठोर पटपटा कसि कऽ चीलममे दम मारलक। तेते जोरसँ दम मारलक जे चीलमसँ धधरा उठि गेल। धधरा उठैत देख मुस्कियाइत सुकल बाजल- “नीक माल छै ने बाबा?” चीलम आगू बढ़बैत, मुहसँ धुँआ फेक फुलचन दास कहलकै- “बहुत दिनक पछाइत एहेन माल भेटल।” तीन-चारि चीलम आरो गाँजा पीब सुकल फुलचन दासकेँ पुछलक- “केमहर-केमहर बाबा सवारी एलै?” “तोरे बजबैले एलौं। महराजी आ गंगानन बैसल छैथ वएह कहलैन।” दुनू गोरे उठि कऽ स्थान दिस विदा भेल। फरिक्केमे दुनू गोरेकेँ अबैत देख महंथजी गंगानन्दकेँ कहलखिन- “कनी असथिरसँ गप कऽ किछु खाइ-पीबैले दऽ देबइ। सभ काज सुढ़िया जाएत।” स्थानपर पहुँचते सुकल दुनू हाथ जोड़ि मुड़ी झुका महंथजीकेँ प्रणाम केलकैन। प्रणामक जवाब महंथ माथ झुका कऽ दैत आग्रहसँ कहलखिन- “आबह-आबह सुकल। बहुत दिन जीबह। तोरे चरचा दुनू गोरे करै छेलौं।” जहिना आँखि लाल सुकलक तहिना फुलचनोक। दुनू गोरे चबुतरापर बैसल। गंगानन्द आ महंथजी विचार केने रहैथ जे फागुनक समए नीक होइ छै, ने बेसी जाड़ आ ने गरमी। ने पानि-पाथरक डर आ ने अन्हड़-बिहाड़िक। गंगानन्द सुकलकेँ कहलखिन- “सुकल, जहिना महंथजी स्थानक काजमे व्यस्त रहै छैथ तहिना हमहूँ माया-जालमे ओझड़ाएल छी। एक्को क्षण छुट्टी नै होइए। एमहर दौग तँ ओमहर ताक। खरचाक चिन्ता तोरा नहि, हमहूँ जोगार करब आ महंथोजी करता। गाममे एहेन मेला हुअए जे चारू-भरक मेलाकेँ दाबि दइ। तूँ दसटा काजकर्ता बनाबह जे गाममे चन्दो करत आ मेलोक बेवस्था।” महंथजी सुकल दिस देख मुस्कियाइत अपन समर्थन देलखिन। अपन बढ़ैत इज्जतकेँ देख सुकल हँसैत बाजल- “हम की कोनो अहाँ सभसँ बाहर छी, जेना जे कहबै से हेतइ।” सुकलकेँ राजी देख, मने-मन महंथोजी आ गंगानन्दो खुशी भेला। खुशीक कारण छल चाइल सुतरब। रघुनाथ दासक मन्दिरक आगुएमे अढ़ाइ-तीन बीघाक परती। जैपर गाए-महींस चरैत। गामक धिया-पुता गुल्ली-डन्टा, कबड्डी, गुड़ी-गुड़ी इत्यादि खेलाइत। वएह परतीपर मेला लगबैक विचार तीनू गोरे तँइ केलैन। स्थानक चुनाव कऽ बैसार समाप्त भेल। बेरूपहर गामक जुबक सभकेँ सुकल बैसार केलक। बैसारमे सुकलक सभ गजेरीक संग गोटि-पँगरा बैलियो जुबक जमा भेल। सबहक बीच मेलाक चरचा करैत सुकल जनसेवा दलक चुनाव केलक। गाममे बड़का मेला, चारि दिनक होएत तँए सभ जुबक खुशी। गामक चन्दोक भार जनसेबे दलपर तँए आमदनियो। जाधैर मेला सम्पन्न नै हएत ताधैर सभ अपन-अपन घरक काज छोड़ि, ऐ काजमे लगि जाए। हाथ उठा सभ अपन सहमत देलक। काल्हिसँ सभ दिन सबेरे सात बजे सभ एकठाम जमा भऽ काजक बँटवारा कऽ अपन-अपन काजमे जुटि गेल। जहिया बुढ़बा महंथ गरीब दास मुइला तहियासँ रघुनाथ दास महंथ भेला। स्थानक सभ भार रघुनाथे दासपर आबि गेलैन। महंथ बनैसँ पहिने रघुनाथ दास परिवारिके लोक छला। रघुनाथ दासक पिता धान चाउरक खरीद-बिकरी करै छेलखिन। जइसँ परिवारक गुजर-बसर चलै छेलैन। भैयारीमे रघुनाथ असगरे तँए माए-बापक दुलारू। भरि दिन ओ एमहर-ओमहर घुमि समए बितबैत। काज-उद्यमसँ कोनो सरोकार नै तँए महाग-कोंढ़ि भऽ गेल। रघुनाथक पिता अपन दायित्व बुझि बेटाक बिआह-दुरागमन कऽ देलक। जाधैर रघुनाथक माए-बाप जीबैत रहथिन ताधैर रघुनाथ मौजक जिनगी बितौलक। दुनियाँ रूपी कन्याक सुन्नरताकेँ रघुनाथ हृदैसँ चाहैत मुदा ओ मिसियो भरि देखए नइ चाहैत। मुदा दुनियाँ तँ अमृतसँ लऽ कऽ बिख धरि, सुन्दरसँ लऽ कऽ कुरूप धरि, महात्मासँ लऽ कऽ दुरात्मा धरि, पण्डितसँ लऽ कऽ मुरूख धरिक भार उठौनिहार ऐछे जे रघुनाथोक भार उठौने। मुदा माए-बापकेँ मरिते रघुनाथक मौज ससरए लगल। एक दिन रघुनाथ साँझू पहरकेँ नाच देखए गेल। घरमे खाइक कोनो वस्तु नै जे रघुनाथक स्त्री भानस करैत। भूखसँ वेचारीकेँ बरदास नै भेलैन। अपन नैहरक थारी-लोटा आनुआँ-वस्त्रक मोटरी बान्हि घरसँ विदा भऽ गेली। अधरतियामे रघुनाथ नाच देख कऽ आएल। सुन्न आँगन-घर देख पत्नीकेँ ताकए लगल। पहिने तँ बुझि पड़लै जे ओ केतौ नुका रहल अछि। मुदा बड़ी काल धरि तकलापरजखन नै मिललै तखन निराश भऽ सुति रहल। सुति तँ रहल मुदा निने ने होइ। भरि राति जगले रहि गेल। भोर होइते अड़ोस-पड़ोसक आँगनमे घरवालीकेँ ताकए लगल। मुदा केतौ नै भेटलै। गाममे केतौ नै भेटलापर सासुर जाइक विचार केलक। मुदा एक तँ रौतुका जगरना, दोसर भूखल देह। एक्को रत्ती हूबे ने बुझि पड़इ। ओसारपर बैस मने-मन सोचए लगल जे आब की करी..? जहिना धुनि लगलापर किछु नै देख पड़ैत तहिना सोगसँ रघुनाथोकेँ किछु सुझबे ने करैत। तहिना रघुनाथकेँ किछु सुझबे ने करैत। गुनधुनमे पड़ल। अनासुरती मनमे एलै जे माया-मोह छोड़ि बबाजी भऽ जाइ। माँगि-चाँगि कऽ खाएब आ जेतइ मन फुरत तेतै रहि जाएब। मुदा आत्महत्या करैक विचार मनमे नै एलइ। ओहनो हालतमे रघुनाथकेँ जीबैक आशा रहबे करइ। मुदा स्त्रीक सोग मनसँ हटबे ने करइ। गाड़ीक पहिया जकाँ विचार मनमे उनटैत-पुनटैत। फेर मनमे एलै जे पिते जकाँ हमहूँ धान-चाउरक खरीद-बिकरी कऽ गुजर करब। मुदा तइले रूपैआ चाही। फेर रघुनाथक मनमे एलै जँ सासुर जा घरवालीकेँ जवाब दऽ दिऐ ओहो कायरता हएत...। जेना-जेना रघुनाथक पेटमे भूखक आगि धधकै तेना-तेना विचारो अदलै-बदलै। फेर मनमे एलै जे घरक सभ किछु बेच चलि जाइ। मुदा जेकरा हाथे बेचब ओ पुनः ऐ घरमे कहियो आबए नै देत..! तत्-मत् करैत दुपहर भऽ गेल। जोशमे आबि घरसँ निकैल गरीब दासक स्थानपर पहुँचल। महंथ गरीब दास भोजन करए बैसल। रघुनाथकेँ देख हाथक इशारासँ गरीब दास शोर पाड़लखिन। लगमे अबिते रघुनाथकेँ खाइले देलखिन। नमहर स्थान। तीस बीघा जमीन। गाछी-कलम, पोखैर-इनार सभ भगवानक नाओंसँ। गामोक लोक किछु-ने-किछु जमीन साले-साल दइते। जइसँ स्थान मोटाइते जाइत। गाममे जे निपुत्र भऽ जाइत वा कोनो झंझटिया जमीन होइ, ओ स्थानमे दऽ दइत। रघुनाथ गरीब दासक चेला बनि स्थानमे रहए लगल। दुनू साँझ रघुनाथ गरीब दासकेँ खाँटी करु-तेलसँ मालिश करैत। कपड़ा खिचैत। रघुनाथक सेवा देख गरीब दास अगुआ चेलाक उपाधि दऽ देलखिन। ओना गरीब दासकेँ अनेको चेला रहैन, मुदा मन्दिरमे पूजा करैक अधिकार रघुनाथे-टाकेँ देने।◌ सिपाहीक नोकरी सुकल दिल्लीमे एकटा सेठक ओइठाम पहिने करैत। गोर वर्ण, रिष्ट-पुष्ट शरीर, घनगर मोँछ, बरदक आँखि सन नमहर-नमहर आँखि। कोठीक गेँटपर कान्हमे बन्दूक लटका ठाढ़ ड्यूटी सेठक करैत। सेठक बड़की बेटीक बिआह बम्बईक एकटा कपड़ा वेपारीक संग भेल। धनक अमार मुदा लड़का एड्सक रोगी। नोकरे-चाकर हाथे सभ कारोबार करैत। बिआहक समए ई बात डोलीक माए-बापकेँ नै बूझल। तँए बिआह केलक। जखन डोली सासुर बसए लगली तखन बिमारीक भाँज लगलैन। पतिक बिमारीसँ डोली मने-मन कानए लगली। अपन मुरझाएल जिनगी देख डोली सासुरसँ भगैक भाँजमे। एक दिन रोगक बहाना बना डोली इलाज करबए नैहर-दिल्ली चलि एली। डोलीक सोगाएल मन देख माए-बाप पुछलखिन। मुदा अपन बेथाकेँ झँपैत डोली केकरो किछु ने कहलकैन। दाम्पत्य जीवनसँ निराश डोली, जिनगीक आशा देख सुकलसँ तरे-तर प्रेम करए लगली। सठियाएल सुकल डोलीक चलाकी नै बुझि प्रेम करए लगल। जेतए डोलीक प्रेमक कारण काम तृप्तिक छल तेतए सुकलक जवानीक अल्हरपनक। एक सुसम्पन्न परिवारक तँ दोसर उजड़ल-उपटल घरक। प्रेमक डोर केते मजगूत होइत से दुनूमे सँ कियो ने बुझैत। उमेरक बलउमकी दुनूमे तँए बुझबो केना करैत। एक दिन दुनू गोरे–डोली आ सुकल सिनेमा देखए गेल। बालकोनीक टिकट कटा दुनू हॉलमे बैसल। सिनेमा शुरू भेल। शुरू होइते बगलक एकटा जुबक जे निशाँमे बुत्त छेल,तिलमिला कऽ डोलीक देहेपर गिरल। डोली चिचिआ उठल। डोलीकेँ चिचिआएबसँ सुकलक क्रोध बेकाबू भऽ गेल। उठि कऽ सुकल ओइ जुबकक कालर पकैड़ दहिना हाथक ठुस्सासँ नाकपर जोरसँ मारलक। नाकक चोट बरदास नै कऽ ओ जुबक तिलमिला कऽ निच्चाँमे गिरल। हॉलमे हल्ला भेल। सिनेमा बन्न भऽ गेल। लगले थानाक दरोगा पाँचटा सिपाहीक संग पहुँच गेल। हल्लाकेँ भँजियबैत दरोगा घटना स्थलपर पहुँचल। अचेत जुबककेँ देख दरोगा सुकलकेँ पकैड़ लेलक। अचेत जुबकेँ अस्पताल भेज देलक। अस्पताल पहुँचैत-पहुँचैत ओ जुबक दम तोड़ि देलक। हत्याक मोकदमामे सुकल जहल गेल। ने कियो पैरबी करैबला सुकलक आ ने कियो पुछनिहार। जहल काटए लगल। एकान्तमे बैस सुकल मने-मन सोचए लगल जे दू-पाइ कमाइले दिल्ली एलौं जे माए-बापक सेवा करब मुदा मकड़ा जकाँ अपने बनौल जालमे फँसि गेलौं!हदिघड़ी डोली कहै छलै जे सुख-दुखमे संग देब मुदा एक्को दिन खोजो-पुछारि करए ने आएल। जेकरा-ले अपन जिनगीकेँ बलि चढ़ेलौं ओकरा कोनो गम नहि। यएह छी धनिक-गरीबक प्रेम। जहियासँ सुकल गाम छोड़ि दिल्ली गेल तहियासँ परिवारमे आशाक किरण फुटल। जाधैर सुकलक कमाइ माए-बापकेँ नै होइ छल ताधैर गाछी-बिरछीक पात बीछि, सूखल ठौहरीक जारैन तोड़ि, खेतसँ धान लोढ़ि, रब्बीक मासमे खेसारी, मौसरी, तीसी, गहुम बीछि, अल्हुआ चालि, संग-संग बोइन-बुत्ता कए कऽ गुजर करै छल। मुदा सुकलक दरमाहा पाबि भरि पेट अन्न खाए लगल छल। बेटाक कमाइसँ दुनू परानीक मनमे रंग-बिरंगक कल्पना अबए लगल। बेटाक बिआह करब, घर बनाएब, सुखसँ बुढ़ाड़ीक दिन बिताएब। मुदा जहिया सुनलक जे जिनगी भरिले बेटा जहलेमे रहत तहियासँ जिनगीक आशा टुटि गेलइ। अधमरू भऽ जिनगी बितबए लगल। काज करैक शक्ति देहमे नै रहलै। मुदा ऐ दुनियाँक आकर्षण जहरो पीबैसँ मनाही करए लगलै। अन्तमे दुनू परानी, सुकलक माए-बाप भीख मंगए लगल। किछु दिनक पछाइत दुनू ऐ दुनियाकेँ छोड़ि देलक। चौदह बरख दिल्लीक जहलमे बिता सुकल सोझे गाम विदा भेल। गाड़ी, बसमे टिकटक जरूरीए ने रहै किएक तँ जहलक मोहर बाँहिमे छापल रहइ। आशा-निराशाक बीच जिनगी, तँए भूखो ने लगइ। गाम आबि सुकल घर बसबए चाहलक मुदा घर-बसाएब ओते हल्लुक नहि। गाममे जखन सुकल टहलै-बुलैले निकले तखन गामक लोककेँ बुझि पड़ै जे बोनसँ हूरार चलि आएल। फरिक्केमे सुकलकेँ अबैत देख जनिजाति सभ अपन बच्चा लऽ लऽ घर चलि जाइत, ढेरबा-धिया-पुता नुका रहैत आ मरदा-मरदी मुँह घुमा लइत। जहलमे रहि सुकल आनो-आनो कैदीसँ गप-सप्प करैत आ अपनो एकांतमे बैस जिनगीक सम्बन्धमे सोचैत मुदा हजारो-लाखो किसिमक जिनगीक रस्तामे सुकल वौआइते रहि गेल। सही जिनगीक रस्ता भेटबे ने केलइ। जहिना फुलवाड़ीमे काँटक गाछ फुलेनौं काँटे कहबैत तहिना दिल्लीक अपराधी सुकल गामोमे अपराधीए जकाँ बुझि पड़ैत। अपन दशा देख सुकलकेँ अपने दुनियाँ बनाएब हल्लुक बुझि पड़लै। ओ दुनियाँ छी अपराधीक। रघुनाथ दास मन्दिरकेँ चुनेठ, रंगसँ रंगि देलक। गामक चन्दा मेड़ियाक संग सुकल करए लगल। आन-आन महंथानासँ रघुनाथ दास मोट-मोट चन्दो मंगबए लगल आ मेला देखैक हकार-नोत सेहो पठबए लगल। समधियौरसँ पर्याप्त धन पाबि गंगानन्द अपन प्रतिष्ठा बनबैक भाँजमे, तँए चन्दा करैक जरूरते नहि। मेला शुरू होइसँ दस दिन पहिनैसँ सभ मेलाक तैयारीमे जुटि गेल। मेलाक तैयारी अद्भुत। जहिना दोकान-दौरीक बेवस्था तहिना नाच-तमाशाक। जहिना स्थानक सजाबट तहिना इजोत। मेला शुरू भेल। रंग-बिरंगक बबाजी सभ अबए लगला। कियो हाथीपर चढ़ि रेशमी पोशाकमे तँ कियो ऊँटपर चढ़ि धप-धपौआ सुती वस्त्रमे। कियो लँगोटा-खौरकी पहिर तँ कियो वस्त्र-विहीन, नंगटे। सभकेँ अपन-अपन कफला। सभ कफलामे अपन-अपन साजो-समान। कियो नबका चालिमे तँ कियो पुरनामे। एक कफला एक समियानाक भीतर। दोसर दोसर समियानाक भीतर। एक-दोसरमे जाए नै दइत। खाइ-पीबैक ओरियान सेहो फुट-फुट। बेवस्था करैमे महंथ रघुनाथ दास पानि-पानि भेल। एक महंथ दोसर महंथक खुल्लम-खुल्ला निन्दा करैत। तालमेल बैसबैमे महंथ रघुनाथ दासकेँ पएर पकड़ैत-पकड़ैत तबाही। मने-मन वेचारे सोचैत जे कोन दुरमतिया कपारपर चढ़ल जे एहेन काज केलौं। पतियानी लगल दोकान। सभ रंगक समानक अलग-अलग बजार। राति-दिनमे अन्तरे नै बुझि पड़ैत। मेलाक चारू कोणपर नाचक स्टेज बनल। एक कोणपर थियेटर,दोसरपर रास, तेसरपर यात्रा-पार्टी आ चारिमपर अल्हा-रूदल। परोपट्टाक लोक उलैट कऽ मेला देखैले दिन-राति अबैत। गंगानन्द ऐठाम तेते पाहुन-परक आबि गेलैन जे घरपरसँ कखनो मेला स्थलपर गेले ने होइन। दुनू परानी चाह-पानसँ लऽ कऽ खुअबै-पिअबैमे पश्त छला, दिन-राति एक्के रंग तबाही...। दिन-रातिक खटनीसँ सुकल दोसरे दिन अस्सक पड़ि गेल। एक साए तीन डिग्रीसँ कखनो बोखार कम्मे ने होइत। कखनो-कखनो ज्वरक तापसँ बड़बड़ेबो करैत। सिरिफ रघुनाथे दास, गंगेनन्द आ सुकलेटा परेशान नहि, सौंसे गामक लोक पाहुन-परकसँ परेशान। मेलाक पहिल राति एकटा आठ-नअ बर्खक बच्चिया, दोसर राति दूटा आ तेसर राति चारिटा बच्चियाक चोरि भऽ गेल। पहिने तँ बच्चियाक माए-बापकेँ भेलै जे गामे घरमे भुतलाएल अछि जे एक-दू दिनमे भेटिए जाएत। मुदा मेला उसरला बादो नइ केकरो भेटलै। तेसर दिनक दूटा लड़की एक्के परिवारक। दुनू बच्चिया जेहने देखैमे सुन्दर तेहने माए-बापक दुलारू। एगोक नाओं ‘लछमी’ आ दोसर ‘सरस्वती’। लछमीक पिता जिलाक कार्यालयमे अफसर आ माम सी.आइ.डी. विभागमे अफसर। लछमी, सरस्वतीकेँ चोरि होइते माए टेलीफोनसँ पति आ भाएकेँ जनतब दऽ देलखिन। दुनू सारे-बहनोइ अपनामे सम्पर्क कऽ छुट्टी लऽ सोझे गाम विदा भेला। रस्तेमे दुनू गोरेक भेँटो भेलैन। दरभंगा स्टेशन पहुँच लछमीक पिता महेन्द्र घरपर एबाक जनतब सेहो परिवारमे दऽ देलखिन। झंझारपुर स्टेशन पहुँचैसँ पहिनहि महेन्द्रक छोट भाए, स्टेशन पहुँच, प्रतीक्षामे। गाड़ी अबिते दुनू गोरे गाड़ीसँ उतैर निच्चाँमे बैग रखिते रहैथ कि महेन्द्रक छोट भाए-दिनेशकेँ नजैर पड़लै। लगमे आबि दिनेश दुनू गोरेक बैग दुनू हाथमे लऽ प्लेटफार्मक कुरसीपर जा रखलक। घटनाक जनतब दुनू गोरेकेँ देलकैन। बच्चियाक चोरिक चर्चा होइते महेन्द्र हबोढकार भऽ कानए लगला। महेन्द्रकेँ चुप करैत सार दिनेशकेँ कहलखिन- “अहाँ दुनू बैग नेने घरपर चलि जाउ। हम दुनू गोरे कनी कालक पछाइत आएब।” रिक्शासँ दिनेश घर दिस विदा भेल। दुनू गोरे घरपर नै जा सोझे थाना पहुँचला। दुनू गोरे अपन परिचए दैत दरोगाकेँ घटनाक जनतब देलखिन। केस लिखि दरोगा छहटा सिपाहीकेँ संग केने जा महंथ रघुनाथ दास, गंगानन्द आ सुकलकेँ पकैड़ जहल पठा देलक। घटनाक छानबीन हुअ लगल।◌ गंगानन्दक कामतपर यमुनानन्द मौजसँ रहैत। ने खाइ-पीबैक कोताही आ ने कोनो चिन्ता। भरि दिन यमुनानन्द गजो पीबैत आ ताशो खेलैत। गामक बीचमे कामत रहने दू-चारिटा फालतू जुबक हदिघड़ी कामतपर रहैत। कामतक सटले घुरनीक घर। घुरनीकेँ सातटा बेटी, बेटा नहि। जेठकी आ मैझली बेटी बिआहै जोकर भऽ गेल। जुआनीक सभ गुण आ विशेषता दुनूमे आबि गेल छल। हदिघड़ी घुरनी आ राघवकेँ करेज टुटैत। एक दिस सातो बेटीक बिआह आ गुजरक चिन्ता दोसर दिस गरीबीक राक्षस जमि कऽ पकड़ने। दुनू साँझ भरि पेट खेनाइयो ने होइत। घुरनी यमुनानन्दकेँ कहि सरिताकेँ भानस करैले कामतमे रखौने। चोरा-नुका घुरनी कामतपर सँ अन-तीमन-जारैन उठा-उठा लऽ जाइत। तइसँ कोनो तरहेँ दुनू साँझ चुल्हि पजरै एक दिन घुरनी राघवकेँ बिगैड़ कऽ बेटीक बिआह करैले कहलक। बिआहक खर्चक कोनो उपए नै देख राघव सोगसँ मूसक दवाइ खा ओसारपर सुति रहल। कामातूर यमुनानन्द, सरितासँ सिरिफ चौकेक काजटा नै करबैत बल्कि इच्छा-पूर्ति सेहो करैत। भूखल-नाँगट, पशु-तुल्य मनुख देहक क्रियाकेँ इज्जत नै बुझि पेट भरैक उपए बुझैत। पेटक भूख मनक भूखसँ प्रवल आ कठोर होइते अछि तँए सरिता इज्जत नै गमा पेटक आगिकेँ शान्त करैत। जाधैर मनुखकेँ पेटक आगि जरौत ताधैर इज्जत-आबरूक बात सोचब आ बूझब कठिन ऐछे। तहूमे जे हजारो बर्खसँ गुलामीक जालमे फँसल रहैत आएल अछि ओकरा-ले तँ आरो कठिन बात छी। हर मनुखकेँ ऐ दुनियाँ आ धरतीक एहेन आकर्षण होइत जे नीच-सँ-नीच कर्म केलोपरान्त जीबए चाहैए। ओकर जीवन्त उदाहरण सरितो छी। कुमारि सरिताक शरीर त्वरित गतिसँ फुलाए लगल। जइसँ गामक जनिजाति इनार-पोखैरक घाटपर सरिताक सम्बन्धमे चरचा करैत। जे बात घुरनीक कान धरि सभ दिन अबैत। मुदा घुरनी ओहन ठूठ गाछ जकाँ भऽ गेल छेली जइमे ने एक्कोटा जीवित पात आ ने जीवित डारि। गामक जुबकक बीच सेहो सरिताक चर्चा चलए। किछु जुबक हँसी-मजाकक विषय सरिताकेँ बनौने तँ किछु जुबक भुमहुरक आगि जकाँ मने-मन जरैत। सरिताक प्रति रमेशक आगि एते प्रवल भऽ गेल जे ओ अपन जानसँ खेलैले आगू बढ़ल। मने-मन रमेश संकल्प कऽ लेलक जे यमुनानन्दकेँ गामसँ भगा सरिताकेँ आदर्श नारी बनाएब। घरसँ निकैल रमेश टोलक जुबक सभकेँ संगोर केलक। पाँच-सात जुबक रमेशक संग पुरैले तैयार भऽ गेल। सभकेँ संग केने रमेश यमुनानन्द लग पहुँचल। संगीक-संग रमेशकेँ देख यमुनानन्द डरल नहि बल्कि बाघ जकाँ गरैज कऽ बाजल- “की रौ रमेशबा केतए ऐलेँ?” एक तँ ओहिना रमेशक हृदैमे आगि लगल, तैपरसँ यमुनानन्दक करूआएल बात सुनि मुहसँ बोली नै फुटल। तामसे सगर देह काँपए लगलै। बिनु किछु बजनहि यमुनानन्दक कण्ठ पकैड़ पटैक देलक। माटिपर खसिते रमेश लतियाबए लगल। यमुनानन्दकेँ लतियबैत देख रमेशक संगी सभ सेहो लतियाबए लगल। साइयो लात खा यमुनानन्द रमेशक दुनू पएर दुनू हाथे पकैड़ कनैत बाजल- “भाय, हमर जान छोड़ि दाए। अखने हम ऐठामसँ चलि जाइ छी।” यमुनानन्दक बात सुनि रमेश सभकेँ रोकि, छोड़ि देलक। छुटिते यमुनानन्द निछोह पड़ाएल। सभ जुबक यमुनानन्दकेँ ताधैर देखैत रहल जाधैर अढ़ नै भेल। सरिता कातमे ठाढ़ भऽ सभ देखैत। एक्के-दुइए सौंसे गामक लोक हल्ला सुनि पहुँच गेल। सौंसे गामक लोक एकठाम बैस अपनामे विचार केलक जे बहरबैयाक जे जमीन-जत्था अछि ओ छीनि लिअ। गामक जेते जे चीज–खेत-पथार, पोखैर-झाँखैर इत्यादि अछि ओ गौंआँक छी। जँ कियो बहरबैया औत तँ सौंसे गौंआँ मीलि ओकरा भगाएब। चाहे अइले मारि हुअए, मोकदमा हुअए वा जहल जाए पड़ए। हाथ उठा सभ सहमत भेल। ◌ शब्द संख्या : 2887 12. डाक्टर नीलमणि सेन कलकत्तासँ एम.बी.बी.एस. कऽ सोझे मिथिला चलि एला। बंगला आ अंग्रेजी छोड़ि आन कोनो भाषा नै जनैत। मिथिलाक गाम-घरमे एलोपैथिक इलाजक चलैन नहि। रोगक इलाज झार-फूक आ जड़ी-बुटीसँ होइत। रोगोकेँ लोक भूत, हवा वा देवी-देवताक प्रकोप बुझैत। डाक्टर नीलमणि सेनक घर बंगला देशक सीमासँ सटले बंगालमे। डाक्टर सेनक पिता प्रोफेसर ज्योतिमणि सेन दर्शनशास्त्रक नामी विद्वान। सम्पन्न आ सुभ्यस्त परिवार ज्योतिमणिक। अंग्रेजी हुकुमतक अन्तिम समैमे हिन्दू-मुसलमानक बीच जमि कऽ लड़ाइ बंगालोमे भेल। पहिल दिन डेढ़-दू साए हिन्दू भाला, फरसा, तरुआरि लऽ सड़कपर आबि सैयो मुसलमानक हत्या केलक, घर जरौलक, चीज-बौस लूटलक। गाम सुनसान भऽ गेल। जे किछु लोक बँचल ओ भागि-पड़ा कऽ अपन कुटुमक ओइठाम चलि गेल। मुदा घटना कमल नहि। जहिना गहुमन साँपकेँ लाठीक चोट खेलापर होइत तहिना तरे-तर मुसलमानक हृदैमे आगि धधकए लगल। सात दिनक पछाइत हजारो मुसलमान हथियारक हाथे बदला लेमए निकैल गेल। अनेको गामक हिन्दू मृत्युक मुँहमे समा गेल। प्रोफेसर ज्योतिमणिक परिवार सेहो समाप्त भऽ गेल। प्रोफेसर ज्योतिमणि सेन आ प्रोफेसर जफर एक्के कौलेजमे प्रोफेसर। सैयो बर्खसँ दुनू परिवारक बीच दोस्ती चलि अबैत। जहिया कहियो कोनो उत्सव प्रोफेसर सेनक ओइठाम होइत तहिया प्रोफेसर जफर सपरिवार आबि उत्सव मनबैत। तहिना प्रोफेसर जफरक परिवारमे प्रोफेसर सेनोक उपस्थिति होइत। एकठाम बैस दुनू गोरे खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ जिनगीक नीक-अधला सभ गप करैत। ने प्रोफेसर सेन प्रोफेसर जफरकेँ आन बुझैत आ ने प्रोफेसर जफर प्रोफेसर सेनकेँ। तहिना घरक स्त्रीगणक बीच सेहो सम्बन्ध। बाल-बच्चाकेँ तँ बुझिए ने पड़ैत जे दुनू परिवार दू धर्मक छी...। हिन्दु-मुसलमानक बीच तनाव देख शिक्षण-संस्था सभ बन्न भऽ गेल तँए दुनू गोरे गामेमे रहैथ। प्रोफेसर ज्योतिमणिक परिवाक समाचार प्रोफेसर जफर सुनलैन। पहिने तँ एक्को पाइ बिसवासे ने भेलैन मुदा सत्-सत् पता लगिते कुरसीपर अचेत भऽ लुढ़ैक कऽ निच्चाँमे मुहेँ-भरे गिर पड़ला। दुखसँ हृदए विदीर्ण भऽ गेलैन। कोठरीमे असगर रहने पहिने तँ परिवारक कियो ने देखलकैन मुदा चाहक कप नेने जखन पत्नी एलैन तँ देखलखिन। निच्चाँमे पड़ल पतिकेँ देख हसीना कप रखि छाती पीटैत हल्ला करए लगली। हल्ला सुनि अपनो परिवारक आ अड़ोसियो-पड़ोसियो दौगल एलैन। साँस तँ प्रोफेसर जफरक चलैत रहैन मुदा चेतन-शून्य छला। लगले डाक्टर बजौल गेल। हसीना पंखा हौंकए लगली। पहिने डाक्टर प्रोफेसर जफरक मुँहपर पानिक छिच्चा देलखिन। पानिक छिटका पड़िते जफर आँखि खोललैन। आँखि खुलिते डाक्टर आला लगा कऽ देखलकैन। आला रखि दूटा सूइया लगेलखिन। सूइया पड़िते प्रोफेसर जफर होशमे एला। मुदा तेतेक दुख प्रोफेसर जफरक हृदैकेँ पकैड़ नेने रहैन जे फेर अचेत भऽ गेला..! दवाइक प्रभावे प्रोफेसर जफर होशमे अबैथ आ हृदैक दुखसँ पुनः बेहोश भऽ जाइथ। होश-बेहोशक बीच पतिकेँ देख हसीनो अचेत भऽ गिर पड़ली। एते काल डाक्टर सिरिफ प्रोफेसर जफरेक इलाज करै छला मुदा हसीनाक दशा देख हुनको इलाज करए लगला। आठ बजे रातिक पछाइत दुनू परानी प्रोफेसर जफर नीक जकाँ होशमे एला। जखन दुनू गोरे बिस्कुट आ चाह खेलैन-पीलैन तखन परिवारक सभकेँ बिसवास भऽ भेल जे आब नीक भऽ गेला। आराम करैले दुनू गोरेकेँ पलँगपर छोड़ि सभ सभ दिस भऽ गेल। एगारह बजेक घन्टी घड़ीमे टुनटुनाएल। घन्टी सुनि प्रोफेसर जफर पत्नीकेँ पुछलखिन- “जगले छी?” “हँ।” “अपने दुनू बेटा मित्र-ज्योतिमणि आ हुनक परिवारक हत्या केलक! हत्यारा-बेटाक बाप बनि जीअबसँ नीक मरब। अहाँकेँ जँ ऐ परिवारक बेटा-पुतोहुसँ सिनेह हुअए तँ जीबू मुदा हम एक्को क्षण जीब पाप बुझै छी।” कहि प्रोफेसर जफर गरदैनमे फँसरी लगबए लगला। पतिकेँ गरदैनमे फँसरी लगबैत देख हसीना अचेत भऽ पलँगसँ लुढ़ैक निच्चाँमे गिर पड़ली। प्रोफेसर जफर फँसरी लगा प्राण तियागि लेलैन...। जखन हसीनाकेँ होश एलैन तँ पतिकेँ फँसरी लागल झुलैत देखली। झुलैत देख दुनू मित्रक बीचक सिनेह हसीनाक मनमे एते ग्लानि पैदा कऽ देलकैन जे ओहो वेचारी फँसरी लगा मरि गेली। जखन नीलमणि पढ़िते रहैथ तहिए सोचि नेने छला जे हम शहरमे नै गाममे रहब। सभ तरहेँ गाम शहरसँ नीक। ने प्रदूषणक दोष आ ने चोर-उचक्काक डर। भूखलकेँ एक टुकड़ी रोटी देलासँ मन जुड़ाइत मुदा जैठाम सभ किछु भरल-पूरल रहै छै तैठाम एक टुकड़ी रोटीक महत्ते की हएत। विशाल मानव रूपी बोनमे तपस्या करैक विशाल क्षेत्र होइत, तँए जैठाम वृक्षकेँ माटि-पानिक अभाव होइत तैठाम रहि सेवा करब विशेष महत रखैत। की गमलाक सजौल फूल बोनक पानि-पाथर खेलहा फूलक बरबैर भऽ सकैए? एम.बी.बी.एस.क डिग्री लऽ डाक्टर नीलमणि अपन सभ सामान सेरिया, गाम जाइक कार्यक्रम बना संगी-साथी सभसँ भेँट-घाँट करए लगला। अपन अन्तरंग मित्रसँ लऽ कऽ आत्मीय गुरूक ओइठाम जा-जा नीलमणि अपन भविसक संकल्प व्यक्त करैत असिरवाद लेलैन। दोसर दिस, गाममे, हिन्दू-मुसलमानक बीच धार्मिक वा जातीय लड़ाइ शुरू भऽ गेल। संगी-साथी सभसँ मिलि जुलि डाक्टर नीलमणि कोठरीमे बैस अपन जिनगीक सम्बन्धमे मने-मन विचारए लगला। रेडियो बजैत बगलमे राखल। रातिक आठ बजैत। सवा आठ बजेक समाचारमे हिन्दू-मुसलिमक लड़ाइक चर्चा भेल। स्पष्ट समाचार नहि। मुदा जइ इलाकामे नीलमणिक घर छैन ओइ इलाकाक गामक चर्चा समाचारमे आबि गेल छल। पहिल बेरक समाचार सुनि नीलमणिकेँ भेलैन जे सुनैमे धोखा भेल। मुदा कनीए कालक पछाइत समाचार दोहरौल गेल। समाचार सुनिते डाक्टर नीलमणिक हृदैमे जोरसँ धक्का लगलैन। जहिना पहाड़क निच्चाँक आदमीक ऊपरमे पहाड़पर सँ लुढ़कैत पाथरक टुकड़ा खसलासँ होइत तहिना डाक्टर नीलमणिकेँ भेलैन। कुरसीपर सँ उठि बाहर आबि सड़क दिस देखए लगला। सड़कपर गाड़ी-बस चलैत। मुदा पएरे लोकक चलब पतरा गेल छल। गोटि-पँगरा कियो-कियो चलैत। सही ढंगसँ समाचार बुझैक इच्छा डाक्टर नीलमणिक मनकेँ झकझोडै़त रहैन। ओना, अखन धरि डाक्टर नीलमणि ओते चिन्तित नहि, किएक तँ इलाकाक समाचार सुनने छला। नअ बजि गेल। कोठरी बन्न कऽ डाक्टर नीलमणि खेनाइ खाइले होटल विदा भेला। कोठरीसँ निकैलते जेना कियो किछु कहि देलकैन, एकाएक मनमे डर प्रवेश कऽ गेलैन। डर समाइते आँखि उठा-उठा चारू दिस ताकए लगला। सुनसान राति। सन-सन करैत अन्हार। थोड़े काल ठमैक डाक्टर नीलमणिक मन असथिर कऽ होटल दिस बढ़ला। होटल पहुँचते मुँह-हाथ धोइ एकटा खाली टेबुल लगक कुरसीपर चुपचाप बैस, आन-आन गोरेक मुँहक बात सुनए लगला। टी.बी. चलैत। गौरसँ टी.बी.क समाचारपर कान रखने। होटलक नोकर थारीमे खेनाइ परोसि डाक्टर नीलमणिक आगूमे देलकैन। खाए लगला। मुदा जहिना बहैत पानिमे माटिक वा कोनो आन वस्तु पड़लासँ पानिक बहाउ अवरूद्ध होइत तहिना भोजनक अन्न नीलमणिकेँ कण्ठसँ निच्चाँ उतरबे ने करैन। खेनाइ छोड़ि हाथ-मुँह धोइ होटलबला-केँ पाइ दऽ सोझे अपन कोठरी चलि एला। कोठरी आबि पलँगपर पड़ि रहला। मुदा निनक केतौ पता नहि। कछमछ करैत डाक्टर नीलमणि एक करसँ दोसर कर घुमैत रहला। भोर हेबाक प्रतिक्षामे डाक्टर नीलमणि। देवालमे टँगल घड़ी दिस नजैर उठा-उठा तकैथ। रातिक एगारह बजैत। पलँगसँ उठि केबाड़ खोलि डाक्टर नीलमणि बाहर निकलला। सड़कपर गाड़ी-बस चलब बन्न भेल। आँखि उठा कऽ अकास दिस तकलैन। डण्डी-तराजू उगि गेल मुदा सप्तर्षिक केतौ पता नहि। पुनः डाक्टर नीलमणि कोठरी आबि पलँगपर पड़ि रहला। भोर होइते डाक्टर नीलमणि पलँगसँ उठि, नलमे कुरुर कऽ चाहक दोकान दिस विदा भेला। चाहक दोकानपर, उट्ठा काज करैबला मोटिया, रिक्शा चलौनिहार सभ बैस चाहो पीबैत आ रेडियो समाचारक चरचा करैत। किछु गोरे, हिन्दू-मुसलमानक लड़ाइक, निन्दो करैत तँ किछु गोरे बाहबाहियो करैत। किछु गोरे मोरचापर जा लड़ैयो-ले सन-सन करैत। चुपचाप बैस डाक्टर नीलमणि चाहो पीबैथ आ गप्पो सुनैथ। चाह पीब डेरा आबि कपड़ा पहिर डाक्टर मुकुल ऐठाम विदा भेला। डाक्टर मुकुल कुरसीपर बैस मुँहपर हाथ दऽ कौल्हुके घटनाक सम्बन्धमे सोचैत रहैथ। डाक्टर नीलमणिकेँ देखते कहलखिन- “अहाँ गाम नै जाउ। सौंसे इलाकामे तनाव बनल अछि। निश्चित समाचार तँ अखन धरि नइ बुझि सकलौं मुदा रूप रंगसँ बुझि पड़ैए जे लड़ाइ बन्न नै हएत आरो बढ़त।” डाक्टर मुकुलक बात सुनि डाक्टर नीलमणिक हृदए थर-थर काँपए लगलैन। गाममे रहैक विचार सेहो चूर-चूर हुअ लगलैन। मुदा परिवारक सोग उत्तेजित करैत रहैन। तीन दिनक पछाइत इलाका शान्त भेल। डाक्टर दलक कार्यक्रम इलाका-ले बनल। दलक संग डाक्टर नीलमणि सेहो विदा भेला। डाक्टर नीलमणिक आग्रहसँ दल नीलमणिक गाम शान्तिपुर पहुँचल। शान्तिपुरमे एक्कोटा घर दुरूस नहि। सभ आगिमे जरल। जीवित आदमीक पता नहि। जहाँ-तहाँ लाश छिड़ियाएल। हजारो कौआ-कुकुर आ गीध पसरल। अपन घर लग पहुँचते डाक्टर नीलमणि अपन माए-बापक लाश आ जरल घर देख अचेत भऽ गिर पड़ला। कम्पाउण्डर सभ नीलमणिकेँ उठा मेडिकल भानमे दऽ इलाज शुरू करबेलैन। कनीए कालक पछाइत डाक्टर नीलमणि होशमे एला। नीलमणिकेँ होशमे अबिते डाक्टरक दल आगू बढ़ि गेल। मुदा डाक्टर मुकुल नीलमणिपर धियान रखि मने-मन सोचैथ जे नीलमणि ऐ दुखद घटनाकेँ सहि नै सकता। एक मनुख होइक नाते डाक्टर मुकुल मने-मन संकल्प केलैन जे जाधैर नीलमणिकेँ दुख सहैक शक्ति नै आबि जेतैन ताधैर छोड़ब उचित नहि। डाक्टरक दल घुमि कऽ आबि गेल। डाक्टर नीलमणिकेँ अपने ऐठाम डाक्टर मुकुल रहैक बेवस्था कऽ देलखिन। रसे-रसे डाक्टर नीलमणिक हृदए असथिर हुअ लगल मुदा माए-बापक पीड़ा मनसँ मेटाएल नहि। सात दिनक पछाइत डाक्टर नीलमणि बैंकसँ रूपैआ निकालि कलकत्तासँ सोझे दरभंगा आबि गेला। मिथिला अबैक कारण छेलैन, पिताक मुहेँ सुनल मिथिलाक गुणगान। दुनियाँक स्वर्ग मिथिला। जेहने माटि तेहने पानि। जेहने हवा तेहने वातावरण। रंग-बिरंगक गुणसँ भरल मिथिलाक गाछ-बिरीछ सभ समैमे फुलाइत-फड़ैत...। दरभंगा स्टेशनपर उतैर डाक्टर नीलमणि प्लेटफार्मपर बनल ब्रेंचपर बैसला। अनभुआर जगह, मनमे उठलैन- आब केतए जाइ..? डाक्टर नीलमणिकेँ एक दिस माए-बापक सोग पकड़नहि रहैन तँ दोसर दिस अपन बेठेकान जिनगी..। ऐठामक भाषासँ सेहो अनभुआरे छैथ। अंग्रेजी बजनिहार एकोटा ने देखैत...। जइ ब्रेंचपर नीलमणि बैसल छला ओही ब्रेंचपर जगह देख दुनू परानी पण्डित शंकर सेहो बैसला। दुनू परानी शंकर अस्पताल आएल छला। डाक्टर नीलमणि दुनू परानी– पण्डित शंकरक गप-सप्प अँखिहासि कऽ सुनए लगला। मुदा मैथिली नै बुझि किछु बुझबे ने करैथ। पण्डित शंकर झोरामे सँ लोटा निकालि पानि आनए कल दिस विदा भेला आ पत्नी झोरामे रखल चूड़ा, गुड़ आ छिपली निकालए लगली। पएर-हाथ धोइ कऽ लोटामे पानि नेन पण्डित शंकर एला। पतिक हाथसँ लोटा लऽ पत्नी छिपली धोइ कऽ चूड़ा-गुड़ निकालि देलखिन। ब्रेंचपर बैस पण्डित शंकर हाथमे छिपली लैत डाक्टर नीलमणिकेँ आग्रह केलखिन- “बौआ, अहूँ खाउ?” पण्डितजीक बोली तँ नीलमणि नै बुझलैन मुदा आगू बढ़बैत छिपली देख मुस्कियाए लगला। पण्डित शंकर डाक्टर नीलमणिक सूखल मुँह देख आग्रह केलखिन मुदा भाषाक विशाल समुद्र बीचमे रहने सिनेहमे आड़ि देने। हाथसँ बढ़ौल छिपली पण्डित शंकर आ डाक्टर नीलमणिक बीच अँटकल। पण्डित शंकर बुझि गेलखिन जे हमर सादगी देख डाक्टर नीलमणि अंग्रेजी नै बाजि रहल छैथ मुदा हम तँ जनै छी। तँए हमहीं पहिने बाजी। अंग्रेजीमे पण्डित शंकर डाक्टर नीलमणिकेँ अपन पता पुछलखिन। धाराप्रवाह अंग्रेजी बजैत डाक्टर नीलमणि अपन जिनगीक बहुत बात पण्डित शंकरकेँ कहलकैन। दुनू गोरे चूड़ा-गुड़ खा पानि पीब, निर्मलीक गाड़ी पकैड़ लेलैन। गाड़ीमे बैस डाक्टर नीलमणि आ पण्डित शंकर–दुनू गोरे मिथिला आ बंगालक विषयमे गप-सप्प करए लगला। दुनू गोरेक बीचक विचार उदेसक लग पहुँच गेल। गाड़ीसँ उतैर तीनू गोरे पएरे गाम एला। गाम आबि पण्डित शंकर डाक्टर नीलमणिक रहैक बेवस्था अपने ऐठाम कऽ देलखिन। दू-चारि दिन तँ नीलमणिकेँ अनभुआर जकाँ बुझि पड़लैन मुदा जिनगीक ठर भेटलासँ हृदैमे खुशी बढ़ैत गेलैन। नीक लगए लगलैन। टो-टा कऽ मैथिलियो बाजए लगला। अखन धरि मिथिलाक गाममे रोगक इलाज जड़ी-बुटीसँ लऽ कऽ झार-फूक धरि होइत। ने एलोपैथिक ढंगसँ इलाज केनिहार आ ने लोक बुझैत। एक तँ नव ढंगक इलाज दोसर नव लोक केनिहार। तँए कठिन। डाक्टर नीलमणि तँ बच्चा रहैथ तँए मिथिला समाजक सम्बन्धमे किछु ने बुझैथ। मुदा पण्डित शंकर तँ मिथिलाक समाजकेँ नस-नस जनैथ। आठ बजेक भिनसुरका समए। पण्डित शंकर आ डाक्टर नीलमणि चाह पीब गप-सप्प करै छला। डाक्टर नीलमणि पण्डित शंकरकेँ पुछलखिन- “दादा, ऐठाम रोगक इलाज कोन रूपे कएल जाइ छइ?” डाक्टर नीलमणिक प्रश्न सुनि कनी काल गुम्म भऽ पण्डित शंकर कहलखिन- “ऐठाम, मिथिलांचलमे रोगक इलाज करैक अनेको पद्धैत चलि रहल अछि। ओना, मुख्य रूपसँ लोक जड़ी-बुट्टीक उपयोग कऽ रोगक इलाज करैए, जे बहुत पहिनेसँ चलि आबि रहल अछि। इलाजो बिसवासू अछि। आयुर्वेद नाओंसँ ऐ इलाजकेँ जानल जाइए। पैघ-पैघ ज्ञानी पुरुख सभ ऐ इलाजकेँ खोजि-खोजि समृद्ध आ विकसित केलैन। दोसर तरहक अछि झार-फूक, जे मंत्रक माध्यमसँ चलैए। तेसर तरहक अछि भगताइ, जे देवस्थानमे खास बेकती-द्वारा देवी-देवताक नाओंपर होइत। ऐ तरहेँ आरो केतेको रस्तासँ रोगक इलाज ऐ इलाकामे चलैत आबि रहल अछि।” पण्डित शंकरक बात सुनि नीलमणि पुछलखिन- “की एलोपैथक चलैन नै अछि?” “अखन धरि नै अछि। मुदा बिनु एलोपैथी इलाजसँ आइक समैमे रोगक इलाज असम्भव भऽ गेल अछि। किएक तँ बहुतो एहेन रोग अछि जेकर सटीक निदान ने होमियोपैथमे अछि आ ने आयुर्वेद आकि यूनानी इत्यादिमे ऐठाम अछि।” पण्डित शंकरक बात सुनि मुड़ी डोलबैत डाक्टर नीलमणि पुछलखिन- “जखन ऐठामक लोक एलोपैथ जनितो ने अछि तखन इलाज केना कराएत?” पण्डित शंकर बजला- “अइले वैचारिक आ बेवहारिक संघर्ष करए पड़त। हमरा ओहिना मन अछि जे जखन लहेरियासराय अस्पताल बनल आ अंग्रेजी दवाइक माध्यमसँ इलाज शुरू भेल तखन गाममे एहेन वातावरण बनि गेल जे अंग्रेजी दवाइ गाइक खून आ सुगरक चर्बीसँ बनैए। जेकर असर भेलै जे हिन्दुओ आ मुसलमानो अंग्रेजी इलाजसँ बिमुख हुअ लगला। मिथिलांचलक ई इलाका जाति आ धर्मसँ ओइ रूपे बँटि गेल अछि जे कोनो नीक काज बिनु संघर्षे सम्भव नै अछि।” डाक्टर नीलमणि- “तखन की करब?” पण्डित शंकर- “हँ उपए अछि। हम अहाँकेँ रस्ता बता दइ छी। अहाँ बंगाली छी जइसँ जाति आ घर्म दुनू झँपाएल अछि। ऐठाम मोटा-मोटी हिन्दूमे तीन वर्ण अछि। पहिल अगुआएल जाति, जेना सोति, ब्राह्मण, राजपुत, भूमिहार इत्यादि। दोसर पनिचल्ला जाति- जेना यादव, धानूक, कियोट, अमात, बरइ, कोइर इत्यादि आ तेसर अछि हरिजन। जेकरा समाजमे अछोप जाति कहल जाइ छै, जेकर पानि उच्च जातिक लोक नै पीबै छैथ। ने पानि पीबै छैथ आ ने छुअल अन्न खाइ छैथ।” डाक्टर नीलमणि- “अरे बाप रे! तब तँ समाज टुकड़ी-टुकड़ीमे बँटल अछि?” पण्डित शंकर मुस्कियाइत बजला- “यएह मिथिलाक विशेषता छै जे सभ सभ जाति आ धर्मसँ बँटल अछि मुदा समाजिक सम्बन्ध सेहो मजगूत अछि। जखन कखनो कोनो आफद-असमानी अबैत तखन सभ एक भऽ सहयोग करैत। तेतबे नहि, जखन कोनो धार्मिक काज होइत तखन सभ एकजुट भऽ सहयोग करैत।” कनी काल गुम्म भऽ पुनः डाक्टर नीलमणि पुछलखिन- “तखन तँ अजीब गति अछि?” हँसैत पण्डित शंकर फेर बजला- “जेते जातिक चर्चा केलौं ओइमे आब फुटा-फुटा कऽ सुनू। एक जातिक भीतर, कुल-मूल आ गोत्रक आधारपर अनेक विभाजन अछि। जे एक जातिक रहनौं, ने दोसरक अन्न खाइए आ ने कथा-कुटुमैती करैए। ‘हम पैघ तँ हम पैघ’ ऐ उलझनमे सभ अपनाकेँ पैघ बुझि मस्त भेल अछि। जातिक रूआब, पैघत्व आ बुधियारीक रूआब सभमे छइ। मुदा ऐ सभ ओझरीमे अहाँकेँ नै जाइक अछि। आइए हम सभ वर्गक पढ़ल-लिखल नौजवानकेँ बजबै छी, ओहो सभ बेरोजगारो अछि आ लोककेँ रोगक उचित इलाज सेहो नइ भऽ पबै छै, जइसँ रोगी मरबो करैए आ रोगग्रस्त भऽ जिनगियो जीबैए।” डाक्टर नीलमणि- “एहेन परिस्थितमे केना डेग आगू बढ़ौल जाए?” पण्डित शंकर- “आइ धरिक इतिहास यएह कहैए जे जहिया कहियो समाजमे जखन कोनो कल्याणकारी काज शुरू कएल गेल तखन समाजक बहुसंख्यक लोक ओकर विरोध केलक। मुदा केतबो विरोध भेल तैयो काज आगू बढ़बे कएल। जे बादमे सभ मानि करए लगल आ आइ चलैए। जइसँ सभकेँ लाभ भऽ रहल छइ। तँए एक्को पाइ चिन्ता नै करक चाही। एलोपैथी इलाजक प्रति जे विरोध ऐठाम अछि ओ शक्तिक विरोध नै अज्ञानताक विरोध छी। लोकक बीच जेना-जेना ज्ञानक ज्योति प्रखर होएत तेना-तेना लोकक झुकाउ एलोपैथी इलाज दिस बढ़त। आइए हम अपनो गामक आ अगलो-बगलो-गामक सभ रंगक जातिक पँच-पँचटा नवजुबककेँ जे कम्मो पढ़ल-लिखल हएत, बजबै छी। अहाँ ओइ जुबक सभकेँ किछु दिन पढ़ा रोग चिन्हैसँ लऽ कऽ उपचार धरिक ढंग बुझा देबइ। वएह सभ अहाँक परचारो करत आ छोट-छीन इलाज करैत सहयोगियो बनत।” पण्डित शंकरक विचार डाक्टर नीलमणिकेँ जँचलैन। मनमे संतोख भेलैन। संतोखक जन्म होइते मुस्कियाइत बजला- “अपने परिवारमे दुइए परानी छी और कियो नै छैथ?” डाक्टर नीलमणिक बात सुनि पण्डित शंकर हँसैत कहलखिन- “परिवार बहुत नमहर अछि, पढ़लो-लिखल अछि। दूटा बेटा आ तीनटा बेटी अछि। पाँचोक बिआह-दुरागमन भऽ गेल अछि। दुनू बेटो आ तीनू जमाइयो नोकरी करै छैथ। जहिना दुनू बेटा अपन बाल-बच्चाक संग बाहरे रहै छैथ तहिना तीनू बेटियो-जमाए बाहरे रहै छैथ। हमहूँ संस्कृत महाविद्यालयमे शिक्षकक काज करै छेलौं। चारि साल पहिने नोकरीसँ सेवा निवृत्त भेलौं। दर्शनशास्त्र आ साहित्य पढ़बै छेलौं। जखन नोकरीएमे रही तखने बच्चा सभ नोकरी करए लगल। जखन सेवा निवृत्त भेलौं तखन दुनू बेटा कहलैन-‘आब अहाँ बुढ़ भेलौं, घरपर असगर रहब नीक नहि। आब अहाँकेँ सेवा-टहलक जरूरत पड़त, जइले लगमे आदमी चाही। हम सभ केतौ रहब अहाँ केतौ, ओइसँ कष्ट हएत।’ दुनू भाँइक विचार अपनो जँचल मुदा जिनगी भरि तँ अपनो किताबेमे सन्हियाएल रहलौं। अपन कर्तव्य दिस जखन नजैर उठा कऽ देखलिऐ तखन मनमे आएल जे मनुख सिरिफ माइए-बापक बेटा नै होइत बल्कि समाजोक छी। माए-बापक ऋृण तँ चुका चुकलौं मुदा समाजक ऋृण तँ बाँकीए अछि। छठिहारे राति समाजक दाइ-माइ कोरामे लऽ अपन बेटा बनौने रहैथ तँए हुनकर ऋृण चुकबैले जिनगीक शेष समए हुनका बीच रहि चुकेबैन।” पण्डित शंकरक बात सुनि डाक्टर नीलमणिक हृदैमे बिसवास जगलैन। मनमे एलैन जे सभ आदमीकेँ कर्तव्यनिष्ठ हेबा चाही। जखने सभ अपन-अपन कर्तव्य बुझि कर्म करत तखने सबहक कल्याणो हएत आ मनुखक बीच प्रेम सेहो बढ़त। डाक्टर नीलमणिक चर्चा पँचकोसीमे चलए लगल। कियो ‘डाक्टर नीलमणि’ तँ कियो ‘सेन साहैब’ तँ कियो ‘बंगाली बाबू’ तँ कियो ‘डाक्टर साहैब’ कहि सम्बोधित करए लगलैन।◌ तीन सालक बेटा कपिलदेवकेँ। जन्मेसँ बच्चाकेँ तुतली लगल। साल भरि तँ बच्चाक तुतलीपर माए-बापक नजैरे ने पड़लैन। मुदा साल भरिक पछाइत दुनूक नजैर पड़लैन जे बच्चाक बोली गड़बड़ अछि। बोली सुधारैले कपिलदेव पहिने गहवर जा डाली लगौलक। तीन मासमे बच्चाक बोली नीक भऽ जाएत ई आश्वासन गहवरक भगता कपिलदेवकेँ देलखिन। भगताक असिरवाद सुनि दुनू परानी कपिलदेव बेरागने-बेरागने गहवर जा डाली लगबैत रहल। मनमे सोलहन्नी बिसवास रहै जे बच्चाक बोली सुधरबे करत मुदा मास दिनक उपरान्तो जखन बच्चाक बोलीमे मिसियो भरि सुधार नै भेलै तखन रसे-रसे दुनू परानीक बिसवास गहवरपर कमए लगल। तीन मास बित गेल मुदा बच्चाक तोतराएब नइ सुधरलै। पछाइत गहवरक आशा तोड़ि झार-फूकक रस्ता धेलक। सुकनकेँ इलाकामे सभसँ नीक झार-फूक केनिहार बुझैत। केहनो साँप धेलहाकेँ मनतरेसँ छोड़ा दइत। ओना गोटे-गोटे मरबो करैत मुदा अधिक बँचबे करैत। दुनू बेकती कपिलदेव सुकन ऐठाम पहुँचल। बच्चाकेँ देख सुकन कपिलदेवकेँ कहलक- “ई तँ बामा हाथक खेल छी, मुदा एकाबन रूपैआ पूजा-पाठ करैले पहिने जमा करए पड़तह।” एकाबन रूपैआ पहिने जमा करैक बात सुनि कपिलदेव बाजल- “अखन तँ संगमे ओते रूपैआ नै अछि मुदा अखनसँ ऐ बच्चाकेँ झार-फूक शुरू कऽ दियौ काल्हि भोरे एकाबनो रूपैआ दऽ देब।” कपिलदेवक बात सुनि सुकन बाजल- “झार-फूकक बात अहाँ नै बुझबै। पहिने पूजाक सभ सामान कीनि पूजा करब। पूजा केला पछाइत देवता हुकुम देता तखन ने झारब। बिनु देवताक हुकुम नेने जँ होइत तखन तँ सभ झारि लैत।” सुकनक बात सुनि दुनू परानी कपिलदेव विचारलक जे अखन चलू रूपैआक व्योंत कऽ काल्हि आएब। दुनू परानी विदा होइत सुकनकेँ कहलक- “अखन जाइ छी काल्हि ने तँ परसू आएब।” कपिलदेवकेँ विदा होइत देख सुकन कहलक- “अखन जँ अदहो-छिदहो रूपैआ जमा कऽ दी तँ हम काजकेँ जोरियबए लगब।” सुकनक बात सुनि कपिलदेव कहलक- “संगमे नइए, घरोमे जँ रहैत तँ अखने आनि दैतौं मुदा घरोमे नइ अछि। जोगार करए पड़त।” “बड़बढ़ियाँ, अखन जाउ। अगर एकाबन रूपैआक जोगार नै हुअए तँ कम-सँ-कम एक्कैसो रूपैआक जोगार अबस्स केने आएब। ओना हम आइए पूजा करै काल देवताकेँ नोत दऽ देबैन। तँए काजमे बिथुत ने हुअए। जँ बिथुत हएत तँ उन्ना-सँ-दुन्ना दुख भऽ जाएत। तखन सम्हारब कठिन भऽ जाएत।” बच्चाकेँ नेने दुनू परानी कपिलदेव घर दिस विदा भेल। रस्तामे घरवालीकेँ कहलक- “एक बेर दीनानाथ बाबासँ बच्चाकेँ देखा दितिऐ?” कपिलदेवक विचार सुनि घरवाली बाजल- “बड़ बढ़ियाँ कहलौं। केते दुखताहकेँ दीनानाथ छोड़ौलखिन। भगवान केलैन जँ अपनो बच्चाकेँ छुटि जाए।” इलाकामे दीनानाथ नामी वैद। जड़ी-बुटीसँ रोगक इलाज करैत। कम्मे रोग एहेन होइ जेकरा दीनानाथ वैद नै छोड़ा पबैथ बाँकी सभकेँ छोड़ा देथिन। बच्चाकेँ नेने कपिलदेव दीनानाथ ऐठाम पहुँचल। बच्चाकेँ देख दीनानाथ कहलखिन- “बच्चाकेँ तुतली लगल अछि जे ऑपरेशन केलासँ ठीक हएत। हम ऑपरेशन नै करै छी। अहाँ सेन साहैब ऐठाम चलि जाउ। ओ ऑपरेशनसँ ठीक कऽ देता। रोग साधारण अछि तँए बेसी खरचो-बरचो नहियेँ हएत।” दीनानाथक विचार सुनि कपिलदेव दुनू परानी बच्चाकेँ नेने डाक्टर नीलमणि ऐठाम आएल। डाक्टर नीलमणि एकटा कम्पाउण्डरकेँ ऑपरेशनेक सम्बन्धमे बुझबैत रहथिन। कपिलदेवकेँ देख डाक्टर नीलमणि पुछलखिन। कपिलदेव बच्चाक सम्बन्धमे कहलकैन। बच्चाक मुँह खोलि देखलखिन। जीह आ निचला तालुक बीच मौस जुटल। बच्चाकेँ कोठरीमे चौकीपर सुता कैंचीसँ काटि, दवाइ लगा बाहर आनि कपिलदेवकेँ कहलखिन- “साधारणे ऑपरेशन छल, जाउ ठीक भऽ गेल।” कपिलदेव विदाहो ने भेल छल आकि दू आदमी खाटपर टाँगि एकटा रोगीकेँ नेने आएल। डाक्टर नीलमणि तुरन्त उठि कऽ देखलखिन। ओइ आदमीक दहिना पएरक हड्डी टुटल देख डाक्टर नीलमणि रोगीक समाँगकेँ कहलखिन- “हिनकर पएरक हाड़ टुटल छैन, पलश्तर करए पड़त। बिनु पलश्तर केने पएर ठीक नै हेतैन।” समाँग कहलकैन- “डाक्टर साहैब जखन अहाँ ऐठाम एलौं तँ जे केलासँ पएर चलैबला हेतै से कऽ दियौ।” समाँगक बात सुनि डाक्टर नीलमणि अलमारीसँ पलश्तरक सभ समान लऽ पलश्तर कऽ देलखिन। यएह दुनू इलाज डाक्टर नीलमणिक जिनगीमे चारिचान लगा देलक। चौगामामे, बिहाड़ि जकाँ डाक्टर नीलमणि सेनक गुण पसैर गेलैन। गुण पसैरते सभ दिन पनरह-बीस रोगी अबए लगल। जइसँ डाक्टर नीलमणिकेँ कमाइ हुअ लगलैन आ परोपट्टामे सर्जरीक इलाजो पसरल। चारिक अमल। सुरूज पच्छिम दिस झुकि गेल जइसँ रौदमे तीखरपनो कमल। पण्डित शंकर डाक्टर नीलमणि लग एला। डाक्टर नीलमणि किताब पढ़ैत रहैथ। पण्डित शंकरकेँ देख किताब मोड़ि टेबुलपर रखि पण्डित शंकरक मुँह दिस देखए लगला जे किछु बजता। विचार दैत पण्डित शंकर कहलखिन- “डाक्टर साहैब, आब अहाँले दूटा काज करब जरूरी भऽ गेल। पहिल, अखन धरि दरबज्जापर रहि इलाज करै छी से अलग बेवस्था करब आ दोसर बिआह करब।” पण्डित शंकरक विचार सुनि डाक्टर नीलमणि बजला- “अपनेक विचार तँ बड्ड उत्तम अछि मुदा अरचन तँ दुनूमे अछि। पहिल, घर बनबैले घराड़ी आ समानक जरूरत हएत। आ दोसर, हम तँ बंगालक रहनिहार छी, ऐठाम बिआह केना हएत?” डाक्टर नीलमणिक प्रश्न सुनि पण्डित शंकर हँसैत कहलखिन- “अहाँक प्रश्न उचित अछि मुदा दमगर नै अछि। घर-घराड़ी-ले हम छी। बाड़ीमे घर बना देब। जे रोड-साइडमे सेहो अछि आ बीच टोलोमे अछि जइसँ चोरो-चहारक कोनो डर नै रहत। आ दोसर प्रश्न बिआहक अछि, ओहो कोनो बड़ पैघ समस्या नहियेँ अछि। ई मिथिला छिऐ। ऐठाम अदौसँ जाति-प्रथा नै रहल। ओना, समाजकेँ गलत रस्ता दिस बढ़बैले समाज-विरोधी शक्ति जाति-धर्मक कबच बना अपन उल्लु सोझ करैत रहल, तँए जाति-धर्म एते बुझि पड़ैए। ऐठाम स्वयंवरक चलैन अदौसँ रहल। स्वयंवरक अर्थ होइ छै स्वयं बड़केँ चुनि बिआह करब, जे जाति-पाँजिसँ अलग अछि। ◌ शब्द संख्या : 3467 13. कलकत्तामे एकटा वेपारी ओइठाम गणेशी नोकरी करैत। बीसो बर्खसँ ऊपरेसँ जीप चलबैत। आजादीक आन्दोलनक दौरान बियालीस ईस्वीमे रेलक पटरी उखाड़ल गेल, पोस्ट ऑफिस जरौल गेल, टेलीफोनक तार काटल गेल। असहयोग आन्दोलनक सहयोगमे ढेरो आदमी नोकरी छोड़लक। रेल, पोस्ट ऑफिस आ आनो-आनो संस्थाकेँ चलब मुसकिल भऽ गेलइ। जमालपुरमे त्रिवेणी उट्ठा[6] नोकरी रेलबेमे करैत। आदमीक अभावक दुआरे पछाइत स्थायी नोकरी रेलबैएमे भऽ गेलइ। रेलबेमे बहाली होइत देख त्रिवेणी अपन भाए–बंगटकेँ तार पठा जमालपुर अबैले कहलक। गणेशी बंगटक दोस। बच्चेसँ दुनू गोरेक दोस्ती चलि अबैत। घरो एक्केठाम। शुरूएसँ दुनू गोरे संगे नाचो-तमासा देखए जाए आ भरि दिन ताशो खेलए। परोपट्टामे जँ केतौ डंका पड़ै वा कोनो मेला लगै तँ दुनू गोरे संगे जा कऽ देखए। बेरूपहरकेँ सभ दिन दुनू गोरे लाल काका ऐठाम पीसुआ भाँगो पीबए। पोस्ट ऑफिससँ तार पहुँचते बंगट गणेशीक संग जा मास्टर साहैबसँ पढ़ौलक। समाचार सुनि बंगट गणेशियोकेँ जमालपुर चलैले कहलक। घरपर आबि दुनू गोरे खरचोक ओरियान केलक आ कपड़ो-तत्ता खिचलक। दोसर दिन गाड़ी पकैड़ दुनू गोरे विदा भेल। बंगटक रस्ता त्रिवेणी तकैत। भागलपुर जाइ वाली गाड़ीसँ दुनू गोरे जमालपुर पहुँचल। रातिमे दुनू गोरे त्रिवेणीक डेरामे रहल। भोरे तीनू गोरे कलकत्ताक गाड़ी पकड़लक। किएक तँ रेलबेक हेड ऑफिस कलकत्तेमे। जइ ऑफिससँ रेलबे कर्मचारीक बहाली होइत। तीनू गोरे हाबड़ा स्टेशनमे उतैर रेलबेक हेड ऑफिस भँजियाबए लगल। तीनूमे केकरो अक्षर-ज्ञान नइ रहने ऑफिसक भाँजे ने लगइ। अनठिया केकरोसँ पुछबोमे दिक्कते, सभ बंगलामे बजैत। तीनू गोरे बाटपर ठाढ़ भऽ गुनधुन करैत रहए। एकटा रिक्शाबला-केँ अबैत देख त्रिवेणी मने-मन सोचलक जे एकरेसँ पुछबै। रिक्शोबला दरभंगीए। लगमे रिक्शाकेँ अबिते त्रिवेणी हाथक इशारासँ रोकैले कहलक। रिक्शा रोकि रिक्शाबला पुछलकै- “भाय, केतए जेबह?” रिक्शा लग आबि त्रिवेणी बाजल- “भाय रेलबेक हेड ऑफिस जाएब।” हाथक इशारासँ देखबैत रिक्शाबला कहलकै- “है-वएह उ देखै छहक, उहए रेलबेक हेड ऑफिस छिऐ, तइले रिक्शा किए करबह।” तीनू गोरे विदा भेल। ऑफिसक आगूमे करीब दू कट्ठाक परती। जइमे सात-आठटा अशोक, यूक्लिपटश आ बोतलक गाछ। अशोकक गाछक छाहैरमे बंगट आ गणेशीकेँ बैसा त्रिवेणी ऑफिस दिस बढ़ल। ऑफिसक गेँटपर चपरासी बैसल। चपरासी लग जा त्रिवेणी बाजल- “भाय, हम जमालपुर रेलबे टीशनक इस्टाप छी, एते दिन उठा काज करै छेलौं। आब सालतनि भऽ गेल। वएह चिट्ठी लइले एलौं हेन। कनी किरानी बाबूकेँ देखा दाए।” चपरासी कहलकै- “बीड़ी पीबै छह। पहिने बीड़ी पिआबह तखन संगे नेने जा काज करा देबह।” जेबीसँ त्रिवेणी दूटा बीड़ी आ सलाइ निकालि दुनू बीड़ी लगौलक। एकटा चपरासी हाथमे देलक आ दोसर अपने पीबए लगल। बीड़ीक धुँआ फेकैत चपरासी बाजल- “समाँग सभ गाममे नै छह? अखन धड़हल्लेसँ बहाली होइ छइ। सभकेँ नोकरी भऽ जेतह।” त्रिवेणी- “खरचो-बरचो पड़तै।” चपरासी- “पाँच रूपैए आदमी खरच हेतह। दू रूपैआ किरानी बाबू लेतह, दू रूपैआ साहैब आ एक रूपैआ हमर हिस्सा होइए।” त्रिवेणी- “भाय, करए की सभ पड़तै।” चपरासी- “किछु ने करए पड़तह। पाँच रूपैआ लाबह। तूँ एत्तै बैसह। ऑफिसेमे फारम छइ। खाली अपन नाम-गामक ठेकान कहि दाए। ओइठाम फारम लऽ किरानी बाबूसँ भरा देबह। खाली हमरा सोझहामे दसखत करए पड़तह।” “अगर दसखत कएल नै होइत होइ तब?” “तब की? औठा निशान दऽ देतइ” “भाय दूटा समाँग आएल अछि। दुनूकेँ काज करबा दहक।” “अच्छा थमहह, किरानी बाबूसँ गप केने अबै छी।” कोठरी जा चपरासी किरानीकेँ कहलक। आमदनी देख चपरासीए संगे बाहर निकैल तीनू आदमीकेँ देख आँखिक इशारा दैत चाहक दोकान दिस विदा भेल। चपरासी त्रिवेणीकेँ कहलक- “बड़े बाबूक संग जाउ। चाह-पान करा देबैन। सभ काज लगले भऽ जाएत।” किरानीक पाछू त्रिवेणी धऽ लेलक। ऑफिसक कम्पाउण्डसँ निकैलते त्रिवेणी किरानीकेँ कहलक- “हाकिम, तीन बर्खसँ हम उट्ठे काज करै छी। ऐ बेर सालतनि भेल। वएह कागत-ले एलौं।” किरानी- “आरो जे दूटा समाँग छह ओकरो नोकरी दिएबहक?” त्रिवेणी- “हँ हुजूर। बड़ गरीब सभ छइ। नोकरी भऽ जेतै तँ कहुना-कहुना गुजर कऽ लेत।” किरानी- “आब दोकान लग एलौं। नोकरी-चाकरीक गप बन्न करह।” दुनू गोरे चाह पीब पान खा गप-सप्प करैत ऑफिस आएल। ऑफिसक मुँहपर अबिते किरानी गेँटकीकेँ कहलक- “हिनका सबहक काज जल्दी करा दहुन।” कहि किरानी भीतर चलि गेल। बंगट आ गणेशीक नाओं-पता लिखि चपरासी त्रिवेणीसँ पनरह रूपैआ लऽ भीतर जा तीनू गोरेक चिट्ठी नेने आबि त्रिवेणीकेँ हाथमे दैत कहलक- “हिनका दुनू गोरेकेँ एतै गैरेजमे काज भऽ गेलैन। अखने गैरेज चलि जाउ आ इंचार्जक हाथमे चिट्ठी दऽ देबैन। औझुके दिनक बहाली भऽ जाएत। काल्हिसँ काज करत।” तीनू गोरे गैरेज गेल। त्रिवेणी दुनू गोरेक चिट्ठी इंचार्जकेँ दऽ दुनू आदमीकेँ देखा देलक। इंचार्ज नाओं-ठेकान पुछि, बोहीमे लिखि, काल्हिसँ काज करए अबैले बंगट आ गणेशीकेँ कहलक। काज भरिगर। भरि दिन[7] लोहाक रड, नट-बोल्ट, चदराक टुकड़ा, शीलपट इत्यादि एक ठामसँ उठा दोसर ठाम राखए पहुँचबैत-अनैत। सरकारी नोकरी बुझि बंगट साहससँ करैत मुदा गणेशीकेँ मने ने लगैत। अट्ठाइस दिन, दुनू गोरेकेँ काज करैत पूरि गेल। दू दिन महिनामे कम छल। दुनू गोरेकेँ इंचार्ज बजा दरमाहा दऽ चारिम दिनसँ काज करए अबैले कहलक। अहिना सभ मास होइ। पैंतालिसे रूपैआक नौकरी। कलकत्ता सन जगहमे रहब। केतबो काटि-छाँटि कऽ जिनगी बितबैत तैयो बीस-पचीस रूपैआ खरचे भऽ जाइत। पाँच रूपैआ जम्मेमे कटि जाइ,बाँकी पनरह-बीस बँचइ। गणेशी मने-मन सोचए लगल जे असगरमे पच्चीस रूपैआ खरच भऽ जाइए आ गाममे तँ तीन गोरे अछि, पनरह रूपैआसँ की हेतइ? सालो भरिपर तँ गाम जेबे करब, गाड़ीमे टिकट नै लगत मुदा सभले कपड़ा-लत्ता, सनेस आ दुओ चारि साए रूपैआ लऽ कऽ नइ जाएब तँ केहेन हएत। मुदा ओहो दू-चारि साए औत केतएसँ। जाबे गाममे छेलौं ताबे टुटलो घरमे गुजर कऽ लइ छेलौं मुदा आब तँ सरकारी नोकरी करै छी। आबो जँ घर-दुआर नै बनाएब तँ कहिया बनाएब। जेते बात गणेशीक मनमे अबैत तेते मन खिन्न भेल जाइत। डेरासँ निकैल गणेशी चाहक दोकान दिस विदा भेल। चाहक दोकानक बाहरेक ब्रेंचपर गणेशी बैस चाह पीबए लगल। कनीए कालक पछाइत एकटा वेपारी मोटर साइकिलसँ उतैर गणेशीक बगलेमे बैस चाह पीबए लगल। चुपचाप दुनू गोरे चाह पीबैत रहए। वेपारी चाहो पीबैत आ गणेशीकेँ ऊपरसँ निच्चाँ धरि निंगहारबो करैत। चाह पीब गणेशी उठल कि ओ वेपारी पुछलकै- “नोकरी करबह?” नोकरीक नाओं सुनि गणेशी पुछलक- “कोन तरहक काज अछि?” वेपारी- “काज तँ बहुतो अछि मुदा अखन कपड़ा दोकानमे जरूरत अछि।” हल्लुक काज बुझि गणेशी बाजल- “दरमाहा केते देबइ?” वेपारी- “चालीस रूपैआ, खेनाइ आ रहैले क्वाटर देबह।” गणेशी- “अहाँ एतै रहू। हम अपन कपड़ा-लत्ता डेरासँ नेने अबै छी।” गणेशी डेरा पहुँच बंगटकेँ सभ सुमझा अपन सभ समान लऽ आबि गेल। वेपारीए-क मोटर साइकिलपर चढ़ि गणेशी वेपारीक घर पहुँचल। घरपर पहुँचते गणेशीकेँ एकटा कोठरी सुमझा देलक। अपन सभ समान रखि गणेशी काज करए लगल। दिल खोलि गणेशी मेहनत करैत। चारि बजे भोरे उठि वेपारीक दुनू गाड़ीकेँ, जीपो आ कारोकेँ चिक्कनसँ साफ करैत आ सात बजेसँ पहिनहि नहा कऽ जलखै खा, कपड़ा दोकानपर चलि जाइत। बारह-एक बजे खाइले अबैत। खा कऽ फेर दोकानपर चलि जाइत। पाँच बजे बजारसँ तीमन-तरकारी आनए जाइत। फेर भिनसरे गाड़ी धुअबसँ काज शुरू करैत रहए। गाड़ी साफ करैत-करैत गाड़ी चलाएबो सीख लेलक। साल भरिक पछाइत गणेशी ड्राइवर भऽ गेल। दोकानदारीक संग गणेशी ड्राइवरियो करए लगल। गणेशीक मेहनत आ इमानदारी देख वेपारी अपन समाँग बुझए लगल। जखन जे रूपैआ गणेशी घर पढ़बैले मंगैत, वेपारी दऽ दइत। सिरिफ काजक नाओं पुछि लइत। ऐ तरहेँ गणेशीकेँ बीस बरख कलकत्तामे भऽ गेल। गाममे गणेशीक परिवार स्त्री चलबैत। सालमे एक बेर गणेशी एक मास-ले गाम अबैत। पाँचटा बेटा आ एकटा बेटी गणेशीकेँ। पहिल बेटी, बाँकी चारू बेटा। छओ भाए-बहिनकेँ गणेशी पढ़ैक खर्चा जोड़ए। बेटी मैट्रिकक परीक्षा देलक। साल भरिसँ गणेशी बेटी बिआहक ओरियान करैत। परीक्षे दुआरे बेटीक बिआह रूकल। दू मासक छुट्टी लऽ गणेशी गाम आएल। पाँच भाँइक बीच एकटा बहिन तँए दिल खोलि कऽ खरच करैले गणेशी तैयार। कुटुमैती ठेमबए लगल। केतौ नीक घर भाँजपर अबै तँ लड़का दब आ केतौ लड़का बढ़ियाँ भेटै तँ घर दब। ऐ तरहेँ पनरह दिन बित गेल। सोलहम दिन एकटा लड़काक भाँज लगलै। पितियौत भाएकेँ संग केने गणेशी लड़का देखए विदा भेल। अढ़ाइ कोस हटि ओ गाम, घर-बर देख गणेशीकेँ पसीन भऽ गेलइ। मझोलका गिरहस्तमे सोनेलालक गिनती गाममे होइत। साठि-सत्तैर मन धान, बीस-पच्चीस मन मरूआ, आठ-दस मन दलिहन उपजबैत। जइसँ किछु बेचियो लैत आ परिवारोमे सालो भरि चलैत। ग्रामीण चालि-ढालिक सोनेलालक परिवार तँए खरचो कम। दलानपरसँ उठि, गणेशी दुनू भाँइ विचार केलक जे समए कम अछि तँए बेसी लटारम नै करब। लटारम ई जे हम दुनू भाँइ बर देखलौं। आब कनियाँ देखैले हिनका सभकेँ कहबैन। दू-चारि दिनक पछाइत कनियाँ देखता। तखन फेर अपना सभ लड़ुपान चढ़बैले आएब। तखन फेर ई सभ कनियाकेँ असिरवाद दइले जेता। अही सभमे पनरह-बीस दिन लगि जाएत। तेकर बाद कुटुम सभकेँ नोत-पिहानसँ लऽ कऽ जोगार-पाती सभ करए पड़त। फेर बिआहक पछाइत बर-विदागरीक झमेल भऽ जाएत। भाड़-दौर करैत कहुना-कहुना मास दिनसँ ऊपरे लगि जाएत। तँए नीक हएत जे बिआहसँ पहिलुका प्रक्रियाकेँ छोड़ि दिऐ। किएक तँ बिआहसँ पहिनौं दोस- महीमसँ लऽ कऽ हित-अपेछित, कुटुम-परिवारकेँ नोत-हकार दिअ पड़त। बरियातीक बेवस्थासँ लऽ कऽ समान जुटाएब आदि ढेरो काज अछि। अगर देखे-सुनीमे समए लगा देब तखन काजमे पहपैट भऽ जाएत। दलानपर आबि गणेशीक पितियौत भाए–रामकिसुन सोनेलालकेँ कहलक- “समैध, हमर भाय नोकरिया छैथ, दुइए मासक छुट्टी लऽ कऽ एला हेन। तहूमे पनरह दिनसँ बेसी बितिये गेलैन। जहिना बिआहसँ पहिने जोगार-पाती, नोत-पिहानमे समए लगैत तहिना तँ बिआहक बादो बर-विदागरी आ भाड़-दौरमे लगैए। जखन हमर अहाँक दिल मिलि गेल तखन अनेरे आडम्बरमे किए पड़ब। लड़का-लड़कीक भागमे जे लिखल हएत ओ हेबे करतै। हमरो एक्केटा भतीजी अछि। भैयाक विचार छैन जे जहिना बेटा-तहिना बेटी। जेते बेटा-ले करबै ओते बेटियो-ले करब। जहिना बेटीकेँ पढ़ेलौं तहिना सम्पैतोमे जेते हिस्सा हेतै तेते देबइ। तँए कोनो लटारममे नइ पड़ब अहूँकेँ नीक हएत आ हमरो।” रामकिसुनक बात सुनि, सोझमतिया-सोनेलाल बाजल- “अहाँ की कहए चाहै छी?” रामकिसुन- “ओनो हम सभ तैयार भऽ कऽ नहियेँ आएल छी मुदा लड़काकेँ गोरलगाइ दऽ जमाए बनाइए कऽ जाएब।” सोनेलाल- “कोनो हरज नहि। मुदा बिनु खान-पीन केने जमाए केना बनाएब?” रामकिसुन- “बड़बढ़ियाँ। जाउ, भानस करबाउ। मुदा बेसी असार-पसार नै करब। जाबे भानस हएत ताबे अहूँ चारिटा समाजक लोककेँ बजा लिअ। बरियातीक गप-सप्प कइए लेब।” सोनेलाल आँगन जा घरवालीकेँ कहलक- “बिआहक गप-सप्प पक्का भऽ गेल। झब-दे अहाँ भानस करू ताबे हम चारिटा समाजकेँ बजा आनि, बरियातीक गप-सप्प कऽ लइ छी।” पतिक बात सुनि सुधीरा झपैट कऽ बजली- “ई कोन बिआह भेलै? ने घरदेखी भेल, ने लड़काकेँ दूबि-धान पड़ल, ने लड़की देखलौं आ ने घर-दुआर देखलौं। चुपेचाप चोर जकाँ बेटाक बिआह करए चाहै छी। कोन एहेन माए-बाप हएत जेकरा बेटा-बेटीक बिआहक मनोरथ नै हेतइ। लोक की कहत।” सोनेलाल- “अहीले तँ समाजकेँ बजबै छी। अहाँ झब-दे भानस करू।” कहि सोनेलाल सौंसे टोलक लोककेँ बजा अनलक। चाह-पान, बीड़ी-सिगरेट तमाकुल चलए लगल। बरियातीक गप-सप्प शुरू भेल। सोनेलालक भातीज मंगला। मंगला बम्बईमे लूम चलबैत। बम्बैया हवासँ प्रभावित तँए बजैमे फड़कोर। सोनेलाल कातमे खुट्टा लगल बैसल। गणेशी सेहो चुपचाप बैसल। समाजक लोक ऐ भाँजमे जे पहिने घरवारी बजता तखने ने किछु बाजब। तँए सभ चुप। मंगला अबैसँ पहिनहि एक शीशी ब्राण्डी पीब नेने, किएक तँ लोकक बीच जाइ छी, मूड बनल रहत। सभकेँ चुप देख मंगला बाजल- “कुटुम जखन लड़ुपान आ तिलक नै केलौं तखन तीनटा काज भेल। तँए दू साए बरियाती आएब। नाचो रहबे करत, अंग्रेजी बाजा सेहो रहत। दू साए बरियाती-ले दूटा मैक्सी आ चारिटा कार जाएत। तीन साँझ खाएब। एक साँझ भात, दोसर साँझ पक्की आ तेसर साँझ चूड़ा-दही। माछ-मौस खुअबैए पड़त। ऐ गाममे बम्बैया छौड़ा सभ अछि ओ सभ इग्लिश पीबे करत। लेन-देन जे करब से अपन दुनू कुटुम जानी।” मंगलाक बात रघुवीर बाबाकेँ अनसोहाँत लगलैन। बजला- “रे मंगला, तूँ जे एना अलगटेँट जकाँ फर्र-फर्र बजै छेँ से तोरा एक्को पाइ जेठ-छोटक विचार नइ छौ। तूँ की बुझबिही जे समाज केना चलै छइ। दू साए बरियाती जे कुटुमकेँ कहलहुन से कह तँ दू साए बरियाती गाममे केकरा-केकरा गेलइ। जे मनमे अबै छौ बकैत जाइ छेँ। गाममे की सभसँ मातवर सोनेलाले आछि। सभसँ बेसी अजगजबला तँ मोतियेलाल अछि। बेटा बिआहमे सवा साए बरियाती लऽ गेल रहए। लड़का जाइले एकटा कार आ बरियाती जाइले टाएर गाड़ी रहइ। खाइए-पीबै दऽ जे कहलिही माछ-मौस आ ताड़ी-दारू, से आइ तक समाजमे केतए देखलिही। हम सभ वैष्णो छी तँए माछ-मौस आ ताड़ी-दारू समाजक काजमे नै हुअ देबइ। जेकरा खाइ-पीबैक मन होइ अपन घरमे खा-पीबह। कियो ओकरा रोकतै।” रघुवीर बाबा बजिते रहैथ कि मंगला उठि कऽ चलि गेल। सभ कियो विचारि कऽ तँइ केलैन जे एक साए बरियाती, एकटा कार, एकटा मैक्सी, एकटा नाच, अंग्रेजी बाजा जाएत। खाइ-पीबैमे ने माछ-मौस चलत आ ने ताड़ी-दारू...। गणेशी मानि लेलक। बिआहक दिन तँइ भऽ गेल। सभ किछु तँइ होइते सोनेलाल आँगन जा देखलक तँ भानसो भाइए गेल रहइ। समाजक सभ चलि गेल सिरिफ रघुवीर बाबाटा बँचल छला, किएक तँ सोनेलाल कुटुमक संगे खाइले कहि देने रहैन। खेला-पीला पछाइत समैधकेँ पहिरबैले दू जोड़ धोती नेने सोनेलाल दुआरपर आएल। धोती देख गणेशी सोनेलालकेँ कहलखिन- “समैध, बेटी ऐठाम धोती पहिरब उचित नहि। तँए अहाँ सुआगत केलौं, बड़बढ़ियाँ। मुदा धोती नै पहिरब, लऽ जाउ।” गणेशीक बात सुनि सोनेलाल रघुवीर बाबा दिस देखए लगल। रघुवीर बाबा बुझि गेलखिन। बजला- “कुटुमक विचार ठीके छैन। लऽ जा धोती।” घरपर आबि गणेशी बिआहक सरंजाममे लगि गेल। कलकत्ता फोन कए कऽ बैण्ड पार्टी आ नाटक पार्टीक सट्टा बना लेलक। लड़का-लड़की-ले वस्त्र-आभूषणसँ लऽ कऽ बरतन, कुरसी पलँग धरिक ओरियान सेहो कऽ लेलक। बरियातीकेँ रहैले टेन्ट, समियाना, कुरसी-टेबुल सभ दरभंगासँ भाड़ापर ठीक केलक। बिआहसँ एक दिन पहिने कलकत्तोसँ बेण्ड पार्टी, ड्रामा पार्टी आ दरभंगोसँ टेन्ट-समियानाबला गणेशीक ऐठाम पहुँच गेल। बरियातीक भानस-ले दरभंगेसँ भनसियो आबि गेल। बिआहक दिन भोरेसँ सभ बेवस्थामे जुटि गेल। सात बजे साँझमे बरियाती आबि गामक स्कूलपर रूकल। बरियातीक दू आदमी अनभुआर बनि गणेशी ऐठाम पहुँच सभ किछु देखलक। सभ किछु देख, घुमि कऽ बरियाती लग जा सभ समाचार सुना देलक। स्कूलपर सँ बरियाती गणेशी ऐठाम विदा भेल। बैण्ड बाजा बजए लगल। बम्बैया छौड़ा सभ बाजाक संग डान्स करैत बढ़ल। छुड़छुड़ी-फटक्का शुरू भेल। बरियाती एबाक अवाज सुनि कलकत्ताक बैण्ड पार्टी अपन कलकतिया पोशाक लगा आधुनिक कलाक धून शुरू केलक। गणेशीक अँगनाक मुँहपर कलकत्ताक बैण्ड पार्टी आ बरियातीक संग सोनेलालक बैण्ड पार्टी अपन-अपन नाच-गान शुरू केलक। बरियातीक बैण्ड पार्टीक संग जे छौड़ा सभ डान्स करै छल ओ नचबो करए आ पिहकारियो दइ। गामोक जे नवजुबक सभ छल ओकरो नै रहल गेलै, ओहो सभ कलकतिया बैण्ड पार्टीक संग नाचए लगल। बरियातीक कार, जैपर बर बैसल छला ओ मैक्सी पाछू पड़ि गेल आ बैण्ड पार्टी आगू भऽ गेल। घरबैयोक बैण्ड पार्टी थोड़े आगू बढ़ल। एक भाग बरियातीक बैण्ड पार्टी आ दोसर भाग घरवारीक। देखनिहार लोकक करमान लगि गेल। देखनिहारे सभदुनू बैण्ड पार्टीकेँ चुप करा कहलक जे बेराबेरी दुनू पार्टी बजाउ।” सएह भेल। मुदा कलकतिया बैण्ड पार्टीक आगूमे बरियातीक बैण्ड पार्टी कमजोर पड़ि गेल। जे बरियातियो आ समाजो मानि लेलक। बरियातीक बैण्ड पार्टी बन्न भऽ गेल मुदा डान्सर सभ घरबैयाक बैण्ड पार्टीमे मिलि डान्स करए लगल। ड्रामा पार्टीक डान्सरकेँ नै देखल गेलइ। ओहो दुनू अपन पोशाक लगा डान्स करए लगल। बरियातीक डान्सपर पीहकारी पाड़ए लगल। तँए ओहो सभ आबि-आबि मैक्सीमे बैस गेल। दुइए-अढ़ाइ घन्टामे कलकत्ताक बैण्ड पार्टी परोपट्टामे दलमलित कऽ देलक। बैण्ड बाजा बन्न भेल। बरियाती सभ बैसारमे आबि बैसला। चाह-पान चलए लगल। जनिजाति सभ चँगेरामे दुबि-धान आ दीप लऽ बरकेँ दुआर लगबए लगली। चाह-पान होइते बरियातीक बीच जलपान चलए लगल। बरियातीक बैण्ड पार्टीक सभ कलाकार एकठाम मन्हुआएल, अपन कलापर अपशोच करैत। मुदा कलकत्ताक बैण्ड पार्टीक कलाकारकेँ जीतैक कोनो खुशी नहि। किएक तँ ओ सभ बुझैत जे ग्रामीण कला शहरी कलासँ पछुआएल अछि। दस बजि गेल। चौगामाक लोक नाच देखैले अबए लगल। रस्ता-पेरासँ लऽ कऽ नाचक मैदान धरि, देखनिहार सभ पीह-पाह करैत। एकटा नमहर परतीपर नाचक बेवस्था गणेशी करबौने। एक भाग कलकत्ताक ड्रामा पार्टीक स्टेज आ दोसर भाग मनचलक नाच पार्टीक। कलकत्ता पार्टीक स्टेज शहरी ढंगसँ बनल जखन कि मनचलक स्टेज ग्रामीण ढंगसँ। नाच-नाटक शुरू होइसँ पहिने मनचलक स्टेज लग बेसी देखनिहार। किएक तँ मनचलक पार्टीक प्रतिष्ठा इलाकामे अधिक। जखन कि कलकत्ताक ड्रमा पार्टी अनभुआर। देखनिहारो तँ बच्चे। किएक तँ कलाकेँ कला नै बुझि मात्र मनोरंजन बुझैत। मनचलक स्टेजपर नँगेड़ा बाजब शुरू भेल। नँगेड़ाक गड़गड़ाएब सुनि सभ देखनिहार सभ मनचलक स्टेज दिस भऽ गेल। सम्म बन्है काल मनचल कातमे ठाढ़ भऽ सभ किछु देखैत। दर्शक आ संगीतकारक बीच साजक अवाज जेना तार जोड़ि देलक। कातमे ठाढ़ भेल मनचल मने-मन चपचप होइत जे आइ हमर पार्टी जरूर ऊपर हएत। सम्म बान्हब समाप्त भेल। मनचल मेकप रूपमे गेल। मनमे बेहद खुशी तँए अपन मेक-अप ढंगसँ करए लगल। कलकत्ताक ड्रामा पार्टी बिजली चालित साज सजा साउण्ड-बॉक्स ठीक कऽ टेप खोललक। एकटा नर्तकी आबि मूक डान्स शुरू केलक। जेहने मधुर बाजाक अवाज तेहने शास्त्रीय नाच। शुरू होइते जेना वृन्दावनमे राधिका सभ कृष्णक प्रेममे विभोर भऽ नचैत तेहने दृश्य बनि गेल। सभ देखनिहार कलकत्ताक ड्रामा दिस घुमि गेल। मनचलक स्टेज दिस एक्को आदमी ने रहल...। हरमुनियाँ मास्टर उठि कऽ जा मनचलकेँ कहलक। मनचल अदहा मेकप केने। स्टेजपर आबि मनचल देखलक। अपन नाचसँ बिमुख होइत दर्शककेँ देख मनचलक दुनू आँखि नोरा गेलइ। बजंतत्रीसँ लऽ कऽ नाचक पार्ट खेलनिहार धरि, सभ कियो स्टेजपर बैस कलकत्ता पार्टीक नाटक देखए लगल। अपन नाच पार्टीक दुर्दशा देख सोनेलाल मनचल लग आबि बाजल- “मनचल भाय, ई तँ बरियाती-घरवारीक बीचक बात छी। समाज तँ देखबे करैए। हमरा-तोरा बीच समाजिक सम्बन्ध अछि तँए तूँ दुख नै करह। जेतेमे तोहर सट्टा छह ओ देबे करबह। आब तूँ सभ नटुआ नहि, बरियाती भेलह।” एक तँ भरि राति नाटक चलैत, दोसर बरियातीक धुमशाही। मुदा ऐ सभसँ फराक कारणे मनचलकेँ निन नै होइत। मने-मन मनचल सोचैत जे जिनगी भरिक प्रतिष्ठा आइ चलि गेल। बिनु प्रतिष्ठाक आदमी आ मुरदामे कोन अन्तर, दुनू बरबैर! मुदा ऐठाम जे प्रतिष्ठा गेल ओ कि सभ ठामक आकि सभ दिनक चलि गेल? कथमपि नहि। काल्हिए जँ हम दोसर ठाम नाचब तँ की ओ प्रतिष्ठा पुनः नै आबि जाएत, जरूर आएत। तखन एते मनमे दुख किए होइए। अनेरे। हमरा सभकेँ ओकर अनुकरण करबा चाही, दुख नहि। सीखक चाही। हम सभ ठमकल छी। हमर सिरिफ कलेटा नहि ठमकल अछि बल्कि समाजिक बेवस्था सेहो ठमकल अछि जइसँ लोकक बुधि आ नजैर[8] सेहो ठमैक गेल छइ। समैक गतिकेँ जानि समैक संग सभकेँ चलब उचित चलब भेल। भोरे बैण्ड पार्टी आ नाच पार्टीक अगुआ–मनचल आ विदेसर बरियाती सभसँ अलग भऽ कातमे बैस अपन-अपन पछुआएल कलाक सम्बन्धमे गप-सप्प करैत। जहिना अपन परिवारकेँ अपन सोझहामे नष्ट होइत देख मनमे होइत तहिना मनचल आ विदेसरकेँ होइत। दुनूकेँ जेना शरीरसँ शक्ति निकैल गेल होए तहिना शक्तिहीन बुझि पड़ैत। मुँह मलिन,चेहरा उदास। दुनू गोरेकेँ कातमे उदास बैसल देख रघुवीर बाबा लगमे जा कहलखिन- “बौआ, तूँ दुनू गोरे एते उदास किएक छह। जिनगीमे अहिना नीक-अधला होइ छइ। सभ दिन नीके होइत रहलह आइ जँ कनी अधले भऽ गेलह तँ की हेतइ। तूँ सभ जुआन-जहान छह जिनगी बड़ीटा होइ छै तँए मनसँ दुनू गोरे एकरा हटा लएह। धैर्य आ साहस करह। हम अपन जिनगीक घटल घटना कहै छिअ। तहिया हम पचास बर्खक छेलौं,बरद कीनए बसौली हाट चारि-पाँच गोरे गेल रही। हम सभ ओमहर गेलौं एमहर बाढ़ि चलि आएल। एहेन बाढ़ि आएल जे ढेरो लोकक घर खसलै, माल-जाल भँसलै, खेती-पथारीक तँ कोनो चर्चे नहि। हमर दुनू बच्चा, एकटा बेटा एकटा बेटी आ घरवाली सेहो डुमि गेल। ओतइ सुनलिऐ जे बड़-जोर बाढ़ि अपना इलाकामे आबि गेल। विचारलौं जे जँ बरद कीनब तँ लऽ केना जाएब। बरद कीनब छोड़ि देलिऐ। सभ कियो घुमि गेलौं। अबैत-अबैत जखन कमला छहर लग एलौं तँ देखलिऐ जे पुबरिया छहर पान-सात ठाम टुटल अछि। सौंसे पानि झलाक-झलाक करैत। सेहो ठाढ़ पानि नहि, कड़गर वेग। गाम अबैक साहस नै भेल। छहरक सटले रामखेतारीमे सभ रहि गेलौं। भरि राति निन नै भेल। हुअए जे कहीं अही सोझहे जँ छहर टुटि जाएत तँ दहाइए जाएब। भोर भेलइ। मुदा अढ़ाइ दिन बाढ़िकेँ पूरि गेल छेलै तँए धारक पानि कोर लेलक। बाढ़ियो कमल। धारमे नावपर पार भेलौं आ पएरे विदा भेलौं। गाम अबैसँ पहिनहि पता लगल जे हमर परिवारे नास भऽ गेल। मुदा मन नै मानलक। मनमे भेल जे उड़ंतीए गप छिऐ कहीं झूठे होइ। मुदा मनमे खुटका भाइए गेल। गाम एलौं तँ देखलिऐ बात ठीके। मनमे अदंक पैस गेल। बुधि जेना उड़ि गेल। थाल-पानि सौंसे रहबे करै, केतए बैसब सेहो जगह नहि। घर-अँगनामे पानि चलि आएल छल। एक्केटा घर ठाढ़ बाँकी दुनू गिरल। घरक बगलेमे इनार। इनारक लहरा ऊँचगर देख ओहीठाम जा थालकेँ साफ केलौं। कनीए कालक पछाइत लहरा सुखि गेल। ओतइ रहए लगलौं। तीन दिनक पछाइत जखन सौंसे सूखल तखन अपना घर एलौं। चारि दिनक पछाइत सासुरसँ खबैर भेल जे ससुरो आ साढ़ूओ डुमि गेला। दुनू गोरे भादबक पूर्णिमामे कुशेसर स्थान गेल छला। किएत तँ हुनका बूझल रहैन जे बैजनाथ बाबा भादवक पूर्णिमामे विदेसर आ कुशेसर स्थान, देवघर छोड़ि कऽ चलि अबै छैथ। सासुरक समाचार सुनिते अनेरे मुहसँ हँसी निकलए लगल। बड़ी काल धरि हँसिते रहलौं। तखन अपने मनमे भेल जे लोक बताह भऽ जाइ छै तँ अहिना हँसै छइ। जनु हमहूँ तँ ने बताह भऽ गेलौं। मने-मन सोचए लगलौं जे बताह छी की नै छी।” मुस्कियाइत विदेसर बिच्चेमे टोकि देलकैन - “एते भारी दुख सहि अहाँ बुलंदीसँ जीबै छी, हमरा दुनू गोरेकेँ तँ खाली ग्लानि भेल हेन। आगू की भेल, से कहियौ?” “छह मास धरि मन उचटल रहल। कहियो हुअए जे बबाजी भऽ घरसँ निकैल जाइ, के ऐ माया-जालमे पड़ल रहत। मुदा फेर मनमे आबए जे बड़का-बड़का महंथ सभ केना परिवारसँ अलग रहि व्रह्मचर्य जिनगी जीबैए। फेर मनमे आबए जे बड़का-बड़का ऋृषि-मुनि सभ केना जंगलमे रहि तपस्या केलैन। अहिना छह मास धरि मन वौआइत रहल। पछाइत धीरे-धीरे मन असथिर हुअ लगल। घटनाक सभ बात बिसैरतो गेलौं। छह मासक पछाइत सासु समाद पठौलैन जे हम बड़ दुखित छी तँए कनी आबि मुँह देखा जाथु। समाद सुनि मनमे आएल जे आब ओ हमर के छैथ जे भेँट करबैन। जाधैर स्त्री छल ताधैर ओ हमर सासु छेली। मुदा फेर मनमे भेल जे बिमारी अगिलगी वा कोनो पैघ घटना भेलापर बिनु कहनौं जाइक चाही। तँए अचता-पचता सासुर गेलौं। सासुर गेलापर देखलौं जे ओ बिमार नइ छैथ मुदा सोगाएल जरूर छैथ। किएक तँ पति, जमाए, नाति-नातिन आ बेटी एक्के बेर मुइलैन तँए चिन्तित हएब सोभाविके। मुदा हमर आगत-भागत पहिनेसँ बेसी होइत। हम बुझबे ने करिऐ जे ई उलटल गंगा किए बहैए। मने-मन तारतम करी। एक दिन ओहिना बित गेल। सिरिफ हम गोड़ लगलयैन आ ओ असीरवाद देलैन। दोसर दिन हम कहलयैन जे चलि जाएब। तखन जिनगीक नव प्रक्रिया शुरू भेल। जलखै बेरमे चूड़ा,दही, चिन्नी, केरा, कलकतिया आमक खूब नमगर अचार, लुँगीयाँ मिरचाइ आ नुन थारीमे पड़ोसि आगूमे देलैन। मनमे आएल जे कलौओ खाइक जरूरत नै रहत, एक्के बेर खूब दमसा कऽ चढ़ा ली। जहाँ दू-चारि कौर खेलौं कि सासु कहलैन- “पाहुन, हमर तँ घरे बिलैट गेल। आब केना फेर ओहन फड़ल-फुलाएल घर देखब?” हम निक-नहाँति बुझबो ने केलिऐ। मुदा एते बात हमरा मुहसँ जरूर निकैल गेल- ‘अहाँ तँ हमर माए तुल्य छी जे कहबै, हम करब।’ सासु कहलैन, दूटा बेटी छल दूटा जमाए भेल। दूटा नाइतो-नातीन छल। सभ मिला छह गोरे छेलौं। जइमे दू गोरे छी, एकटा बेटी, एकटा जमाए। घर एक्कोटा ने भेल। तँए अहाँ साइरसँ बिआह कऽ लिअ। दुनू गोरे ठरो धऽ लेब आ दू परिवारमे एकटा तँ फड़त-फुलाएत।’ साइरो लगेमे बैसल छेली। सासुक मधुआएल गपक संग चूड़ा-दही भोजन आगूमे तँए हमरो मन दहलाएल। हमहूँ किछु तर्क-वितर्क नै करए लगलिऐ, सोझे ‘हँ’ कहि देलिऐन। ‘हँ’ कहिते जेना साउसोकेँ आ साइरोकेँ मन हरिअर भऽ गेलैन। पितियौत सरहोजि सेहो लगेमे बैसली। चौअन्नियाँ मुस्की दैत सरहोजि बजली- ‘शुभ काजमे बिलम की।’ लगले हमर सासु, आठ-दसटा जनिजातिकेँ बजा अनलैन। ताबे हमहूँ खा कऽ उठि गेलौं। गीत-नाद शुरू भेल। दिनेमे चुमौन भऽ गेल। ने बरियाती आ ने आजा-बाजा। आइ देखते छहक जे अस्सी बर्खक उमेरमे हम केहेन थेहगर छी। दूटा बेटा, दूटा पुतोहु, सातटा पोता-पोती अछि। अपन खिस्सा हम ऐ दुआरे सुनेलियह जे मनुखकेँ कखनो निराश नै हेबा चाही। आशाक जिनगी स्वर्गक जिनगी आ निराशाक जिनगी नरकक जिनगी होइत। तँए तोहूँ दुनू गोरे मनसँ चिन्ता हटाबह आगूक उपाइ सोचह।” रघुवीर बाबाक बात सुनि विदेसर मनचलकेँ कहलक- “भाय, अखन अपनो दुनू गोरेक पार्टी अछि आ कलकत्तोक दुनू पार्टी अछि। ओइ दुनू पार्टीकेँ बजाबह आ अपनो दुनू पार्टीक कलाकारकेँ जामा करह। कलकत्ता पार्टीकेँ गुरु मानि आग्रह करबैन जे एक-एकटा कलाकार दुनू पार्टीक रहि जाउ। हमरा सभकेँ सिखा दिअ। जखन हम सभ सीख लेब तखन अहाँ चलि जाएब।” मनचल- “बड़बढ़ियाँ।” कहि विदा भेल।” दुनू गोरे चारू पार्टीक कलाकारकेँ बजौलक। पहिने तँ किछु काल हँसी-मजाक चललै, पछाइत काजक गप-सप्प चलल। गप-सप्पक पछाइत दूटा कलकत्ताक कलाकार दुनू पार्टीकेँ सिखबैक आश्वासन दैत रहि गेल। ◌ शब्द संख्या : 3847 14. अंग्रेजी शासनक संघ्यावेला। मिथिलांचलमे केतौ-केतौ संस्कृत विद्यालय, केतौ-केतौ गोटि-पँगरा संस्कृत महाविद्यालय आ एकटा संस्कृत विश्वविद्यालय, जइमे संस्कृत भाषाक माध्यमसँ पढ़ाइ होइत। मुदा शिक्षा जनोपयोगी कम, सेहो आमजन-ले उपलब्ध नहि। ग्रामीण इलाकामे कियो-कियो खानगी शिक्षक रखि अपन-अपन बेटाकेँ पढ़बैत। लड़कीकेँ पढ़ाएब सेहो बर्जिते जकाँ। कोनो-कोनो गाममे, गौंआँ अपन सहयोगसँ लोअर-प्राइमरी स्कूल चलबैत। हाई स्कूल आ कौलेज नगण्ये जकाँ। सेहो बजारक इलाकामे। तँए ग्रामीण इलाकामे आगू पढ़ैक कोनो उपाइए नहि। किछु गनल-गूथल सुभ्यस्त परिवारक विद्यार्थी पढ़ैत ओहो बाहर जा-जा। ओना, मिथिलांचलमे जमीन्दारीक विरोधमे जन-आन्दोलन शुरू भेल जमीनक लड़ाइ जोर पकड़लक। अपन कमजोरी जमीन्दारो बुझैत मुदा अंग्रेजी हुकुमतक जन-विरोधी शासनक लाभ उठा ओहो सभ माने जमीन्दारो सभ आम जनक विरोधे करैत। गोटि-पँगरा जमीन्दार आम-जनक संग सहानुभूति रखैत। मुदा तैयो जन-आन्दोलन बढ़िते गेल कमल नहि माने दबल नहि। भाषा आ संस्कृतिक दृष्टिये समाज दू भागमे बँटल। एक भाग पढ़ल-लिखल पण्डित लोकैनक बीच संस्कृत आ परिनिष्ठित मैथिली चलैत तँ दोसर दिस टुटल-फुटल मैथिली–जनभाषा चलैत। जेकरा पढ़ल-लिखल लोक गमार आ असभ्य बुझैत। आम-जनक जिनगियो पछुआएल। आम जनक जिनगी पछुआइक अनेको कारण छल, जेना- जमीन्दार खेतक मालगुजारी लइ छल जे दू-साल नै देलापर किसानक जमीन निलाम कऽ लेल जाइत। जइसँ आइक किसान काल्हि बोनिहार बनि जाइत। जइसँ उपजा-बाड़ीमे अबैत गेल। काज पतराइत गेल। सभ दिन काज नै रहने लोक कर्जामे डुमि जाइ छल जइसँ दिनानुदिन ओकर हालत निच्चे-मुहेँ होइत जाइ छल। तैपरसँ प्राकृतिक आफद सेहो होइते रहै, जइसँ कहियो बाढ़ि तँ कहियो रौदीक चपेटमे चटपटाएब निश्चित छल। समाजक बीच स्पष्ट दू तरहक जिनगी चलैत। जइसँ स्पष्ट दू तरहक कला-संस्कृति चलैत रहल। एक दिस परिनिष्ठित संस्कृति बढ़ि रहल छल तँ दोसर दिस टुटल-फुटल संस्कृति, लोक संस्कृति, सेहो चलि बढ़ि रहल छल। भोलानाथक सुभ्यस्त परिवार। भैयारीमे असगरे। साठि बीघा जमीन। निःसन्तान भोलानाथ। सन्तानक दुआरे तीनटा बिआह केलक मुदा एक्कोटा सन्तान नै भेलइ। साले-साल कामौर लऽ-लऽ बीस बर्खसँ देवघर जाइत-अबैत रहल। इलाकाक एक्कोटा डाक्टर, वैद, हकीम, ओझा-गुनी नइ बँचला जिनका ऐठाम भोलानाथ नै गेल। जेते तीर्थस्थान अछि सभठाम जा कौबलो केलक मुदा तैयो निःसन्ताने रहल। सन्तानक दुआरे भोलानाथ हदिघड़ी चिन्तित रहै छल। मुदा अपना बसक काज नै बुझि धीरे-धीरे सवुर करैत। बच्चेसँ खुशीलाल भोलानाथक संगी। भोलानाथकेँ नि:सन्तान देख खुशीलालो चिन्तित। एक दिन खुशीलाल कहलकै- “दोस, जँए तीनटा स्त्री केलह तँए एकटा आरो करह। लोकक भाग्य सभ दिन एक्के रंग नै रहै छै, के कहलक जँ चारिम स्त्रीक भाग्यमे सन्तान लिखल हुअ।” सन्तान दुआरे भोलानाथक मन जरल। तँए खुशीलालक बातसँ मनमे खुशी भेलइ। आह्लादित होइत भोलानाथ खुशीलालकेँ कहलक- “दोस, लोक कहै छै जे अधला काज केने अधला फल होइ छै मुदा हम तँ कहियो अधला काज नै केलौं, तखन एना किए भेल। अखनो देखै छी जे तीनू स्त्री अपने-अपने हाथे फूल तोड़ि निअम-निसठासँ पूजा करैए मुदा तैयो नीक फल कहाँ होइ छइ। दुख अखुनका ओते नै अछि जेते मुइला पछाइतक होइए। किएक तँ जाबे जीबै छी ताबे तँ कहुना कटिए जाएत मुदा मुइला पछाइतक दुख ऐ दुआरे होइए, पोथी-पतराक बात थोड़े झूठ हएत। अपने आँखिए तँ नै पढ़ने छी मुदा पढ़निहार सभ कहै छथिन जे बिनु बेटाक आदमीकेँ कोनो गति नै होइ छइ। मुइला पछाइत ओ जहाँ-तहाँ वौआइए। तँए बेसी चिन्ता मुइला पछाइतक अछि। निचेनमे जखन असगरे रहै छी, तखन यएह बात मनमे घुरियाइत रहैए जे खेत-पथारक की हएत। ऐगला पीढ़ीक लोक सभ सेहो कहत जे समाजमे सभसँ बेसी पापी भोलबे छल जे तीन-तीनटा बौह केलक मुदा तैयो एकोगो मुसरियो ने भेलइ।” भोलानाथक बात सुनि खुशीलाल बाजल- “अही दुआरे ने दोस कहै छिअ। कखन केकर भाग्य बदलत से कोइ जनैए।” भोलानाथ- “दोस, आब हमरासँ कोन बेटीबला बेटीक बिआह करए चाहत। पचपन-साठिक उमेर भेल।” मुस्की दैत खुशीलाल बाजल- “सम्पैत देख कोन कन्याँगत अपन बेटीक बिआह नै करए चाहत। बड़ करत तँ बिआहक खर्च लेत। किछु बेसीए दऽ देबइ। मुदा बिआह नै हएत, केहेन बात बजै छह।” भोलानाथ- “दोस, सभ तीर्थ स्थान जा-जा गुहारि लगेलौं मुदा किछु ने भेल। सिरिफ एकटा तीर्थ-स्थान बँचल अछि, पहिने ओइठामसँ भऽ अबै छी तखन तोहर बात करब।” खुशीलाल- “कोन स्थान?” “उनीकुटी। उनीकुटी त्रिपुरामे अछि। एमहर जेते तीर्थस्थान अछि सभ खुदरा देवस्थान छी। मुदा उनीकुटीमे करोड़मे एक कम देवी देवता अछि। तँए मनमे अबैए जे सभकेँ एक्के बेर किए ने कहिऐन। जँ किछुकेँ नहियोँ मन हेतैन तैयो सभ बेपाटे भऽ जेता, से तँ नहि।” भोलानाथक बात सुनि खुशीलाल बाजल- “अपने सभ परानी मिलि सभ देवताकेँ तँ कहबे केलहुन मुदा हमहूँ तँ दोस छिअ। तँए हमहूँ जेबह। दोसक काजे होइ छै दोसक नीक-अधलामे संग देब।” आसीन मास। सौन-भादो भरि मन बरिसल। झाँटो-बिहाड़ि अपन हिस्सा नीक जकाँति पुरा लेलक। केतेको उझुम बाढ़ि मुड़ीयारी देलक। बेरूपहरकेँ भोलानाथ खुशीलाल ऐठाम पहुँचल। खुशीलालक घर झाँटमे गिर पड़ल रहइ, ओकरे सुढ़ियबैत रहए। लगमे बैस भोलानाथ अपन दुख आ खुशीलालक दुखकेँ तुलना करए लगल। मने-मन सोचए लगल जे जहिना हम धिया-पुता दुआरे दुखी छी तहिना तँ खुशीलालो अन्न वस्त्र आ घर-ले दुखी अछि। हमहीं दुनू दोस दुखी छी सेहो बात तँ नहि। समाजोमे देखै छी कियो कोनो दुखमे पड़ल अछि तँ कियो कोनो दुखमे मुदा अछि तँ सभ दुखीए। बच्चेसँ दुनू गोरे संगे खेलेलौं, मेला-ठेला देखलौं मुदा गरीबीक चलैत खुशीलाल मनुखक जिनगी कहियो ने जीब सकल। वेचारोकेँ सातटा सन्तान भेल मुदा तरद्दुतक चलैत पाँचटा मरि गेलइ। सिरिफ दुइएटा बेटा बँचल छै, जेकरो देखै छी जे ने देहपर वस्त्र छै आ ने भरि पेट अन्न भेटै छइ। तहिना स्त्रियोकेँ देखै छी जे वेचारी रोगसँ ग्रसित अछि, ने भरि पेट खेनाइ भऽ रहलैए आ ने दवाइ-दारू। मुदा तैयो वेचारी जिनगीमे हारि नै मानि रहल अछि। अखनो देखै छी जे भरिगर-सँ-भरिगर काज करैमे दोसकेँ संग दइए। वाह रे औरत..! एते बात मने-मन भोलानाथ सोचिते छल कि खुशीलाल टोकलकै- “दोस, दुख-सुख तँ जिनगीमे लगले रहै छै आ लगले रहत मुदा ऐ बेरक दुख जिनगी भरि मन रहत।” जिज्ञासासँ भोलानाथ पुछलक- “से की?” जहिना कियो मृत्युक मुहसँ बँचि सुखक जिनगी पाबि खुशीसँ बजैत तहिना खुशीलाल बाजल- “दोस, पैछला मासक जे अन्तिम झाँट रौतुका रहह ओइ दिनक घटना कहै छिअ। एक्केटा घर अछि, ओहीमे एकचारी दऽ गाए बन्है छी आ अपनो सभतूर रहै छी। बरतनो-बासन आ आनो-आनो चीज-बौस रखै छी। सुतली रातिमे पहिने पानि हुअ लगल। पानि होइते छल कि पुरबा हवा उठल आ उठिते तेज हुअ लगल। तेज होइत-होइत खूब तेज भऽ गेल। पहिने मालक एकचारी गिरल। एकचारी गिरते गाए डिरियाए लगल। अपनो सभ एकचारी गिरैक अवाज सुनलिऐ। ठाठो हल्लुके रहै तँए गाए ठाढ़े रहल। गाइक देहपर ठाठ पड़ल। अन्हार गुप-गुप। बेसुमार पानि झहरैत। हवो कहै जे आइ छोड़ि काल्हि नै बहब। समए देख गाएकेँ बँचबैक हिम्मते ने हुअए। अग-दिगमे सभ पड़ल रही। गुल्लियाक माए कहलक- “गाइक देहपर चार गिरल अछि ओ मरि जाएत। अगर जँ गाए मरि जाएत तँ धनो जाएत आ पतियो लगत तँए दुनू परानी चलू आ गाएकेँ निकालि अही घर लऽ आउ।” कहि घरवाली साड़ीक फाँड़ बान्हि घरसँ निकैल गेल। घरसँ निकलैत देख हमहूँ धोतीकेँ बान्हि निकललौं। एकचारीक मुँहपर जाइते गाइक नजैर पड़लै। अखन धरि जे गाए डिरियाइ छल ओ दोसर स्वरमे मुदा पहुँचलापर जे डिरियाएल ओ बदलल स्वरे, बुझि पड़ल जे वेचारी कनैए। गाइक अवाज सुनि जेना देहमे दस हाथीक बल चलि आएल। सोझे हाथसँ चार अलगा, गाए लग पहुँच माथपर चार उठा लेलौं। गाए देह चाटए लगल। गुल्लिया माए गाएकेँ खोलि घर लऽ अनलक। हम असथिरसँ चारकेँ रखि निकैल गेलौं। निकैल कऽ घर अबिते घरक खुटा कड़कड़ाएल। मनमे भेल जे ईहो घर गिरत। पुबरिया चारक दूटा कोरो हम पकैड़ निच्चाँ-मुहेँ बल दिऐ आ पछबरिया चारमे गुल्लियाक माए। दुनू बच्चा आ गाए बीचमे ठाढ़। जाबे धरि झाँट रहलै ताबे धरि पकड़ने रहलौं। बुझि पड़ए जे दुनू डेन टुटि जाएत। मुदा की करितौं। ओते रातिमे आ ओहन झाँट-पानिमे केतए जइतौं। सबहक तँ एक्के गति। ओही झाँटमे किसुनमा सभतूर मरि गेल।” खुशीलालक बात सुनि भोलानाथक आँखिमे नोर आबि गेल। मने-मन सोचए लगल जे जिनगी भरिक दोस दुखसँ त्रस्त अछि मुदा हमरा तँ कोनो चीजक कमी नइए, तबो कहियो दोसक दुख नै बुझलिऐ। धैनवाद ऐ वेचाराकेँ दिऐ जे कहियो किछु नै मंगलक। लोककेँ दोसक जरूरी ऐ दुआरे ने होइ छै जे सुख-दुखमे संग रहए, मुदा हम तँ दोसक दुखमे कहियो संग नै देलौं। बहुत पैघ गलती हमरासँ भेल। एक दोसक अछैते धने दोसर दोस गरीबीक चक्कीमे पिसाइत रहल। जँ भगवान हमरा निःसन्तान बनौने छैथ तँ उचिते केने छैथ। अनेरे हम एते तीर्थ केलौं। ओना, उनीकुट्टी तँ जेबे करब मुदा ओइसँ पहिने दोसकेँ रहैक घर आ जीबैले धनक उपए कऽ देबइ। मुस्की दैत भोलानाथ खुशीलालकेँ कहलक- “दोस, एकटा बात पुछै छिअ?” “की?” “तोहर दशा देख हमर मन बदैल गेल। एक दिस हमरा धन अछि तँ भोगनिहार नहि आ दोसर दिस तोरा भोगनिहार छह तँ धन नहि। अखन कहुना कऽ घर मरम्मत कऽ लएह, किएक तँ परसू उनीकुट्टी जाइक विचार कऽ नेने छी। ओमहरसँ जखन घुमि कऽ आएब तखन चारि बीघा खेत आ घर बन्हैले सभ किछु देबह।” भोलानाथक बात सुनि खुशीलालक हृदए चमैक गेल मुदा मनमे हुअ लगलै जे कहीं आवेगमे ने बाजि गेल हुअए आ पछाइत कहए जे ‘ओहीना बाजि गेलौं।’ खुशीलाल पुछलक- “दोस, के सभ जेबह?” भोलानाथ- “अपने चारू बेकती तँ जेबे करब जे तोरो संगे चलए पड़तह।” खुशीलाल- “दोस तोरा तँ बुझले छह जे सभ दिन कमाइ छी तखन गुजर चलैए। हम जँ चलि जाएब तँ गाइयो आ धियो-पुतो मरि जाएत। गुल्लिया माएकेँ देखते छहक जे देहमे कोनो हब छइ।” “काल्हि भोरे दोस्तिनीकेँ डाक्टर ऐठाम लऽ चलह। जे खरच हेतै से हम देबह आ डाक्टरोकेँ कहि देबै जे सभ दिन अहाँ दुनू साँझ देखैत रहबै। अपनो सबहक खाइले आ गाइयोकेँ खाइले सभ किछु अखने चलि कऽ लऽ आनह। बच्चासँ आइ धरि हमरा-तोरा बीच सिरिफ मुँहक दोस्ती छल मुदा आइसँ असल दोस्ती हएत।” कहैत भोलानाथ उठि कऽ खुशीलालक दहिना बाँहि पकैड़ कऽ उठबैत आगू बाजल- “आइ हमर मन जेना चमैक रहल अछि, चलह, अखने चलह। असगरे सभ किछु आनल नै हेतह तँए दोस्तिनियोकेँ संग कऽ लएह। बच्चा सभ ताबे एतै रहतह।” दुनू परानी खुशीलालो आ भोलानाथो विदा भेल। घरपर जा भोलानाथ नारक टाल देखबैत बाजल- “ऐमे सँ नार घीचि लिहह।” कहि आँगन जा भोलानाथ कोठीसँ चाउर-दालि निकालि खुशीलालकेँ देलक। दोसर दिन भोरे भोलानाथ खुशीलाल ऐठाम जा चारियबैत बाजल- “दोस, डाक्टर ऐठाम सबेर गेलासँ नीक रहतह, किएक तँ डाक्टरोकेँ खटैत-खटैत मन पीता जाइ छै जइसँ पैछला रोगी सबहक इलाजो नीक जहाँति नै भऽ पबै छै तँए अखने चलह।” भोलानाथक बात सुनि गुल्लियाक माए भोलानाथकेँ सुनबैत गुल्लियाकेँ कहलक- “बौआ, दोसकाकाकेँ कहुन ने चाह पी लेता तब जइहैथ।” दोस्तिनीक गप सुनि भोलानाथक मनमे उठल- दुनियाँमे प्रेम केतौ झँपाएल नै अछि ओ तँ सौंसे छिड़ियाएल अछि। सिरिफ देखै आ करैक जरूरत अछि। मने-मन भोलानाथ सोचिते छल कि गुल्लिया चाह नेने भोलानाथक हाथमे देलकैन। एक घोंट चाह पीब भोलानाथ दोस्तिनीकेँ कहलक- “झब-दे चाह पीबू आ चलू। सवेर घुमि कऽ आएब तखन ने कौल्हुका ओरियान करब।” दुनू परानी खुशीलाल आ भोलानाथ, तीनू गोरे डाक्टर ऐठाम विदा भेल। रस्तामे खुशीलाल भोलानाथकेँ कहलक- “दोस, गरीबो रहैत, भगवान हमरा स्त्री देलैन! हम तँ दुनू उखराहा बोइन करए जाइ छी। एमहर धिया-पुतासँ लऽ कऽ माल-जाल, भानस-भात, कुटौन-पीसौन सभ सम्हारैए। एहनो दशा छै तैयो एक्को क्षण बैसल नै देखबहक। कखनो काल अपनो मनमे होइए जे जखन तोहर दोस्तिनी मरि जेतह तखन हमर की गति हएत। मुदा सवुर ऐ दुआरे होइए जे दुनू बेटो भगवान हमरे चुनि कऽ पठौलैन। एतबे-एतबे अछि मुदा कखनो मुँह मलिन नै देखबहक। भरि दिनमे पान सेर कच्ची धान बोइन होइए। ओहीमे सँ नूनो-तेल करै छी। ई तँ भगवानेकेँ जश देबैन जे अनेरूआ साग बाधमे उपजबै छथिन जे तीमनो खाइ छी, नइ तँ सेहो ने खइतौं।” आइ धरि जे जिनगी भोलानाथ नै देखने छल ओइ जिनगीसँ भेँट भेल। डाक्टर ऐठाम पहुँचैत-पहुँचैत भोलानाथक हृदए मोम जकाँ कोमल भऽ गेल। डाक्टर ऐठाम पहुँचते भोलानाथ अपन दोस्तिनीकेँ देखबैत डाक्टरकेँ कहलैन- “डाक्टर साहैब, पाइ कौड़ी दुआरे इलाज कमजोर नै करबै। जे खरच हेतै हम देब तँए इलाज नीक जकाँ कऽ दियौ।” गुल्लिया माएकेँ जाँच-पड़ताल कऽ डाक्टर बजला- “रोग कोनो जब्बर नै छैन मुदा अनक दुआरे रग-रग बैस गेल छैन। तँए रोगी मरती नै मुदा तनदुरुस होइमे किछु समए लगतैन। खाइ-पीबैक नीक बेवस्था सेहो कऽ देबैन आ दवाइयो चलतैन।” डाक्टर ऐठामसँ तीनू गोरे विदा भेल। थोड़े दूर आगू आबि भोलानाथ खुशीलालकेँ कहलक- “दोस, जखन बजार आएले छी तखन कपड़ो दोकानक काज केनहि जाएब। जखन तीर्थ-स्थान जाइक तैयारीमे छी तखन सभले नव-वस्त्र सेहो कीनियेँ लेब।” कपड़ा दोकान जा भोलानाथ दोकानदारकेँ कहलक- “तीनटा हमरा स्त्री अछि आ एकटा दोस्तिनी छैथ चारू गोरेले एक्के रंग साड़ी, आँगी आ दुनू दोस-ले एक्के रंग पाँचो-टुक कपड़ा दिअ।” भोलानाथक आदेश सुनि दोकानदार एक्के दामक, एक्के रंग कपड़ा सभले निकाललक। कपड़ा देख भोलानाथ दोकानदारकेँ दाम जोड़ैले कहलक मुदा खुशीलालक बेटा मन पड़िते नइ-नइ करैत बाजल- “दूटा ढेरबा बच्चा-ले सेहो दू जोड़ा पेन्ट, दूटा गंजी, दूटा अँगाक खत आ दूटा चरिहत्थी चद्दैर सेहो दिअ।” दोकानदार सभ कपड़ा दऽ बाजल- “आरो किछु?” दोकानदारक बात सुनि भोलानाथ खुशीलालकेँ पुछलक- “आब तँ कियो बाँकी नै ने रहल। किएक तँ अखन दोकानपर छी, कीनि लेब।” मुड़ी डोलबैत खुशीलाल बाजल- “नहि।” बाजारसँ विदा भऽ रस्तामे भोलानाथ खुशीलालकेँ कहलक- “दोस, दोस्तिनीकेँ कहि दहक जे समए-समैपर दवाइ खाथि। एहेन ने हुअए जे कहियो तीन खोराक दवाइ एक्के बेर खाथि आ कहियो तीन दिनपर।” गुल्लियाक माए सेहो भोलानाथक गप सुनलैन। किछु काल गुम्म भऽ मने-मन सोचए लगली जे भलेँ हम नै करी मुदा एहनो लोक तँ ऐछे जे दवाइ खाइमे एना करैए। मुस्कियाइत गुल्लिया-माए भोलानाथकेँ सुनबैत बजली- “मनुख जँ अपन देखभाल अपने नै करत तँ आन केते काल कऽ सकतै। तखन तँ भूखल-नाँगट आ खगल लोककेँ मतिये बगैद जाइ छै तँए लोक अन्ट-शन्ट कऽ लइए।” गाम पहुँचते भोलानाथ अपन कपड़ाक मोटरी लऽ अपना ऐठामक रस्ता पकड़लक आ दुनू परानी खुशीलाल अपना ऐठामक। आँगन अबिते खुशीलालक दुनू बेटा हाथसँ मोटरी लऽ ओसारपर रखलक। दुनू परानी खुशीलाल पएर धोइले कलपर गेल। कलक हेन्डिल पकैड़ खुशीलाल पत्नीकेँ कहलक- “आउ, पहिने अहाँ हाथ-पएर धोइ लिअ, चला दइ छी।” पतिक बात सुनि रेशमाकेँ मनमे जिनगीक आशा जगलैन जे जहिना पतिक सेवा पत्नी करैत तहिना कुसमए पाबि पत्नियोँक सेवा पतिकेँ करक चाहिऐ। तखने परिवारक गाड़ी आगू-मुहेँ हँसैत-खेलैत चलैत रहत। दुनू बेकती हाथ-पएर धोइ आँगन आएल। रेशमा घरसँ बिछान आनि आँगनमे बिछौलैन। खुशीलाल कपड़ाक मोटरी खोलि पहिने दुनू बेटाकेँ गंजी-पेन्ट दैत बाजल- “बौआ, दुनू भाँइ पहिर लएह आरो कपड़ा सभ छह।” दुनू भाँइ धरिया खोलि पेन्ट पहिरते छल कि रेशमा बजली- “बौआ, धरियाकेँ टाटपर रखि दहक घरनीपा बना लेब।” आइ धरि खुशीलालक परिवारमे एतै खुशी कहियो नै भेल छल। परिवारमे सभकेँ एक बेर सुन्दर नव वस्त्र देहपर आएल। आइ धरि जे बच्चा जाड़मे आगि तापि, बरखामे बोराक घोघही ओढ़ि बितबै छल ओइ बच्चाकेँ जँ भरि देह कपड़ा, बरखामे छत्ता भेटलै तँ खुशीक अन्त रहतै केना। मुदा बहुतो लोक तँ घरोमे बर्खाक समए छत्ता लऽ बितबैए आ भरिपेट अन्न भेट जाइ तँ किए ने कनैत मन हँसत। खुशीलालक परिवारमे आइ टाट तोड़ि कऽ ओहन हँसी आबि गेल जे कहियो ने आएल छेलइ। दोसैर साँझ। धड़फड़ाएल भोलानाथ खुशीलालक ऐठाम आबि दोस-दोसक अवाज लगौलक। रेशमा सिलौटपर मसल्ला पीसै छेली आ खुशीलाल चुल्हि लग बैस आँचो दैत आ दुनू बच्चोकेँ कहैत- “बौआ, काल्हि हम दोसक संग तीर्थ करैले जेबह। बीस-पच्चीस दिन लगत। माए दुखिते छह तँए दुनू भाँइ गाइयोकेँ खुअबिहह आ माइयोक काज कऽ दिहक।” भोलानाथक अवाज सुनि रेशमा लोढ़ी चलाएब रोकि उठि कऽ घरक ओलती लग आबि बेटाकेँ जोरसँ कहलक- “बौआ, दोसकाका बाटपर सँ गर्द करै छथुन।” रेशमाक बात सुनि खुशीलाल चुल्हि लगसँ उठि बाहर निकलल। बाहर आबि भोलानाथकेँ कहलक- “दोस, बाटपर किए छह अँगने आबह।” आँगन आबि भोलानाथ बाजल- “दोस अखन नै रूकबह, तीन बजे भोरे गामसँ निकलबह तखने चरिबजिया बस पकैड़ सकब। किएक तँ कोस भरि जाइयो पड़तह। सएह कहैले एलिअ हेन। दोसर बात जे हमरो ऐठाम तँ कियो रहत नहि, तँए दोस्तिनीकेँ कहि दहुन जे भोरे अपन गाइयो आ दुनू बच्चोकेँ ओतै लऽ जेती। ओतै रहती, खेती-पीती आ अपन गाइयोकेँ खुऔती-पीऔती। अखन जाइ छिअ। बहुत जुति-भाँति लगाएब बाँकीए अछि।” खुशीलाल- “केते दिन लगतह?” भोलानाथ- “एक तँ घरसँ निकैल नै होइए, जखन निकलब तँ रस्तामे जे सभ देखैबला अछि से सभ देखनहि आएब किने। जेना ऐठाम गाड़ी पकैड़ लोकहा जाएब आ ओतएसँ बस धरब। आगू गेलापर कोसी पुल पार भेलापर बराहक्षेत्रक रस्ता अछि जाइ काल ओ छोड़ि देबइ। आगू बढ़ब। नेपालक बीचे-बीच बसक रस्ता अछि। उतरवारि भाग जंगल-पहाड़ देखबह आ दछिनबारि भाग धार-धूर, खेत-पथार, गाम-घर देखबहक। आगू इटहरी चौक अछि। जैठाम अपना सभ पूब-मुहेँक बस पकैड़ काकड़भिट्टा जाएब। मुदा चौकसँ दच्छिन-मुहेँ गेलापर बिराटनगर अछि आ उत्तर-मुहेँ गेलापर धरान आ धनकुट्टा अछि, से घुमती कालमे देखब। काकड़भिट्टा तक नेपालक बस चलैए। ओतै उतैर कऽ मेची धार पार हएब। धार पार भेलापर अपन देशक बस भेटत। ओइ बसपर चढ़ि नक्सलबाड़ी होइत सिलीगुड़ी जाएब। सिलीगुड़ीसँ एकटा रस्ता असाम जाइ छै जे अपना सभ पकैड़ कऽ जाएब। ओना, ओहूठामसँ देखैबला बहुत जगह अछि जेना- दार्जिलिंग, सिक्किम, भूटान। मुदा जाइ काल केतौ ने अँटकब। अबै काल सभ देखैत-सुनैत आएब। एकटा बात मन पड़ि गेल। जखन सिक्कम जेबहक तँ देखबहक जे जेना सौंसे सिक्कम फुलवाड़ीए अछि। किछु फूल अपनो इलाकाक देखबक मुदा बेसी फूल अनठीए बुझि पड़तह। दुनियाँमे एते रंगक फूल केतौ ने अछि। से तँ जखन देखबहक तखन अनेरे बिसवास हेतह। फूलेटा किए, चाहोक खेती देख असम्भय लगतह। सिलीगुड़ीमे बस पकैड़ असाम जाएब। ओतै अँटकब आ रातिमे यात्रपाटी-विदेशिया नाच देखब। भोरमे त्रिपुरा-ले बस पकैड़ लेब। ओना असामोमे बहुत चीज देखैबला छइ। जेना ब्रह्मपुत्र धार, कामरूप कामाख्या, काजीरंगा,शिवसागर, केते कहबह...। ..जखन गौहाटीसँ बस पकैड़ दच्छिन-मुहेँ विदा हेबहक, तखन रस्तेमे मेघालय भेटतह। एकटा बात तँ छुटिए गेलह। गौहाटीएसँ मिजोरम बस जाइ छै, ओतौ जाएब। मुदा घुमती कालमे। मिजोरममे पहाड़-जंगल देख कऽ मन भरि जेतह। मिजोरममे जे आदी देखबहक तँ आश्चर्ज लगि जेतह। अपना सबहक ऐठाम जे आदी अछि ओ तँ कनगोरियो ओंगरीसँ पातर होइए मुदा ओइठामक जे आदी होइए ओ औंठोसँ मोट। तहूमे ओइठामक आदीमे सोन नइ होइ छै..।” ‘सोन’क नाओं सुनि बीच्चेमे रेश्मा बजली- “दोस भाँग-ताँग पीब कऽ एला हेन तँए एना बजै छैथ। कहू जे जइ आदीमे सोन नै रहत ओ आदी केहेन हएत।” दोस्तिनीक बात सुनि भोला बाजल- “हम सभ तँ जाइते छी, अबै काल एक किलो कीनने आएब। जखन अपना चसमसँ देखबै तखन तँ बिसवास हएत। तिला संक्रातिक खिचड़ी-ले थोड़े रखियो लेब। हँ तँ दोस कहै छेलिअ जे गौहाटीएसँ मणिपुर सेहो बस जाइ छइ। देखैबला जगह अछि मणिपुर। ओइठाम विष्णु भागवानक मन्दिर, गोविन्दजीक मन्दिर आ सभसँ नीक देखैबला अछि हेलैत उद्यान। मुदा ओहूठाम घुमतीए काल जाएब। ओतैसँ नागालैंड सेहो बस जाइ छइ। ओहो देखब। अरुणाचल सेहो ओही रस्तामे अछि, सेहो देख लेब। अरुणाचलमे दोसरे हिसाबसँ खेती करैत देखबहक। ओ सभ अपना खेतीकेँ झूम सिस्टम कहै छइ। बुद्धदेवक बहुत पुरान मन्दिर तवांगमे देखबहक। हँ तँ कहै छेलिअ जे गौहाटीसँ जखन मेघालय जाएब तखन बुझि पड़तह जे ई राज पहाड़ेक छिऐ आ पहाड़ेटा किए, खूब गहींर-गहींर धार सभ सेहो देखबहक। पहाड़ेपर शिलौंग सेहो अछि। ऊपरसँ जे देखबहक तँ बुझि पड़तह जे हजारो हाथसँ गहींर ओठामक धार सभ अछि। से की एगो-दुगो मारे। सभटा मनो ने अछि मुदा जे मन अछि से कहै छिअ। कृष्णई, कालु, भुगइ, दरेंग, सिमसांग इत्यादिपनरह-बीसटा धार अछि। अखन जाइ छिअ। काल्हिसँ तँ संगे रहबह। भरि रस्ता गप-सप्प होइते रहत।” दोसर दिन भोरे बस पकैड़ पाँचू गोरे–तीनू स्त्रीक संग भोलानाथ आ खुशीलाल–उनीकुट्टी विदा भेल। तीन दिनक बसक सफर। किरिण डुमैत बससँ उनीकुट्टी उतरल। उनीकुट्टी पहुँच पाँचू गोरे हियाबए लगल जे ने अपन इलाका सन इलाका अछि आ ने बोली। बड़का-बड़का, ऊँचगर-ऊँचगर पहाड़ अछि, बोन-झाड़ अछि। अपना सभकेँ देखल नै अछि आ लोकक बात बुझै नै छिऐ। ने हमर बोली ओ सभ बुझैए आ ने ओकर हमसभ। विचित्र स्थिति। बिनु देखने घुमियो जाएब सेहो केनादन हएत। आब की करब। बसे स्टैण्डमे पाँचू गोरे रूकल। भोलानाथ खुशीलालकेँ पुछलक- “दोस, की करबह?” खुशीलाल बाजल- “दोस, चाह-पानक दोकानदारसँ भाँज लगि जेतह। किएक तँ टीशनक कातक दोकानमे सभ मुलुकक लोक अबै छै किने। हम जा कऽ पुछै छिऐ।” मुसाफिर खानासँ हटि बाहरमे पानक दोकान। खुशीलाल बाहर निकैल पानक दोकान लग जा ठाढ़ भेल। दोकानदारे खुशीलालकेँ पुछलकै जे की लेब। मुदा दोकानदारक बोली खुशीलाल नै बुझलक। दोकानदार बुझि गेल जे आन ठामक यात्री छी। आँखिक इशारासँ दोकानदार पुछलक। खुशीलाल बाजल- “भाय, परदेशी छी।” बोली सुनि दोकानदार बगलक हलुआइक दोकानक नोकरकेँ शोर पाड़लक। नोकर मिथिलांचलेक। नोकरक नाओं बिलट। बिलट अबिते खुशीलालसँ गप कऽ दोकानदारकेँ कहलक। दोकानदार अपना ऐठाम लऽ जा चारू गोरेकेँ नल देखौलक। चारू गोरे बेराबेरी नहा चूड़ा-दही भरि पेट खा सुति रहल। दोसर दिन बिलटकेँ संग कए सभ कियो देखैले विदा भेल। चारिअनामे भोलानाथ ‘ऊनीकुट्टीक महात्म’ नामक किताब कीनलक। घुमैले जाइसँ पहिने उनीकुट्टीक महात्म भोलानाथ पढ़ि लेब नीक बुझलक। सभ कियो पाथरक टुकड़ापर बैस भोलानाथसँ उनीकुट्टीक कथा सुनए लगल- “द्वापर, युग अन्तिम दिन गनैत। कलियुग लग आबि गेल। कलियुग अधला युग होइत तँए सभ देवी देवता राता-राती पड़ा कऽ समुद्रमे बास करए विदा भेल। ऊनीकुट्टी लग जाइत-जाइत भोर भऽ गेलइ। चिड़ै-चुनमुनी चह-चहाए लगल। दिनक आगमन बुझि सभ देवी-देवता ओतइ रहि गेल। वएह छी उनीकुट्टी। नमगर-चौड़गर इलाका। छोट-पैघ सैयो पहाड़। ऊँच-ऊँच पहाड़सँ पानि झहरैत। जे अपन-अपन रस्ता बनौने। पैघ-पैघ अनभुआर गाछ-बिरीछ। जहाँ-तहाँ टुटल-टाटल देवी-देवताक मूर्ति। एक दिनमे सगरे घुमि कऽ देखब सम्भव नहि। बीचमे एकटा साधुक स्थान। छोटेटा घर। आगूमे चबूतरा जकाँ पाथरक टुकड़ा। साधु भोलानाथसँ परिचए पुछि, एबाक कारण पुछलखिन। भोलानाथ सविस्तार कहि सुनौलकैन। हँसैत साधु कहलखिन- “ऐ दुनियाँमे ने कियो अपन अछि आ ने आन। सभ अपन। जइ बेटा-बेटीक इच्छा मनमे अछि ओ क्षणिक छी। जेतेकेँ अपन बुझै छी ओतबो अपन नै छी। मनुख खिआइत-खिआइत एते खिया गेल जे मनुखकेँ अपन नै बुझि दू-चारि गोरेकेँ बीच समटा गेल। जहिना कियो चलैत बसमे भीड़ देख नै चढ़ि, छोड़ैत-छोड़ैत एते छुटि जाइए जे अपन गन्तव्य स्थान धरि पहुँचिए नै पबैए तहिना समैक गति रूपी गाड़ीसँ छुटि तेते पाछू पड़ि गेल जे समयक संग पकड़ब कठिन भऽ गेल अछि। सभ मनुखक दायित्व होइत जे अपनासँ आगू बढ़ि आनो-आनकेँ सेवा करए। जेतेक अधिक मनुखक सेवा ऐ शरीरसँ भऽ सकत ओते अधिक धर्म होएत।” साधुक विचार सुनि भोलानाथक हृदए गंगाजल जकाँ पवित्र हुअ लगल। अनासुरती सिनेह भरल हँसी भोलानाथक मुहसँ निकलए लगल- “हम जे तकै छेलौं से भेट गेल। ई अन्तिम तीर्थाटन छी। गाम पहुँच अपन सभ सम्पैत बच्चा सभकेँ पढ़ाइमे लगा देब। सभ बच्चा, बच्चा छी।” सौंसे उनीकुट्टी देखैमे पाँच दिन समए लगलै। उनीकुट्टीसँ नीरमहल जा कऽ सेहो सभ चीज देखलक। नीरमहलसँ डबूर झील देखैत कमल सागर देख सभ विदा भेल। रस्तामे चाहक खेती केतौ-सँ-केतौ देखए गेल। डाँड़ भरि ऊपरसँ गाछ छपटल पतियानी लगौल रोपल। खेतमे जुआन आ ढेरबा लड़की सभ घघड़ा पहिर पीठपर बेंतक बोको नेने चाहक पात तोड़ि-तोड़ि रखैत। गठल देह पुष्ट ललाट फूलक झाबा केशमे खोंसि पातो तोड़ैत आ मस्तीसँ गीतो गबैत। तहिना छाती भरि-भरि ऊपरमे रबड़क गाछसँ दूध बहैत सेहो देखलक। भोलानाथ कमलसागरक महारपर जा काली मन्दिरक ओसारपर बैस सभ कियो गाम घुमि जाइक विचार केलक। दोसर दिन भोरे गाड़ी पकैड़ विदा भेल। चारिम दिन गाम आबि भोलानाथ खुशीलालकेँ कहलक- “दोस, आब बिआह नै करब। जे खेत अछि आ घरमे राखल गहना-गुरिया आ बरतन-बासन अछि ओ सभ रखि कऽ की करब? चौगामा लोकक बच्चाकेँ पढ़ैले स्कूल बना देब। अखन धरि जे अनपढ़ लोकक समाज अछि ओ पढ़ल-लिखल लोकक समाज बनत। जइसँ समाज आगू-मुहेँ बढ़त।” समर्थन दैत खुशीलाल बाजल- “दोस, काल्हिसँ चारू-पाँचू गाम जा-जा सभकेँ कहि बैसार करब। बैसारेमे अपन सभ बात कहिहक।” ◌ शब्द संख्या : 3709 15. भोलानाथ आ खुशीलाल जलखै खा कमलपुर विदा भेल। जहिना अनभुआर जंगल पार होइमे डर होइत तहिना भोलानाथ आ खुशीलालकेँ हुअ लगल। जिनगीमे परिवारसँ आगू बढ़ि कहियो कोनो काज नहि केने। पहिने दुनू गोरे बिशेसरक ऐठाम पहुँचल। बिशेसर दहिना हाथमे हाँसू, खुरपी आ बामा हाथमे कोदारिक बेँट पकैड़ कान्हपर नेने खेत जाइ छला। रस्तेमे बिशेसर भेँट भऽ गेलैन। भेँट होइते खुशीलाल बाजल- “बिशेसर भैया, तूँ बहु-दिन जीबह। तोरे चर्चा हम दुनू गोरे करै छेलौं। एकटा विचार तोरासँ पुछए एलौं?” बिशेसर कहलखिन- “खेते दिस चलह हमर खेतियो देखिहक।” तीनू गोरे संगे जा बोरिंगक एकचारीमे बैस गप-सप्प करए लगला। बिशेसरक इमानदारी आ कर्मठताक चर्चा परोपट्टामे होइत। हृदए खोलि भोलानाथ बिशेसरकेँ कहलक- “बिशेसर भाइ, भगवान सन्तान नै देलैन। धन-सम्पैतक तँ कमी नै अछि मुदा भोगनिहार नहि। मनमे आएल जे सभ सम्पैत बच्चा सभकेँ पढ़ैले स्कूलमे दऽ दिऐ।” मुड़ी डोलबैत बिशेसर कहलक- “बड्ड निक विचार भोला केलह। हमरा तँ देह छोड़ि किछु अछि नै मुदा देहसँ जे काज हुअ अखनेसँ तैयार छिअ। जाधैर स्कूल बनत ताधैर संगे खटबह। पहिने एकटा बैसार समाजक करह।” ‘यएह सभ सोचि तोरासँ पुछए एलौं।” तर्क-वितर्क करैत-तीनू गोरे चारू-भरक गामक सभकेँ बैसौनाइ नीक नै बुझि खाली शिक्षा-प्रेमीकेँ बैसाएब उचित बुझलैन। बिशेसर अपना गामक शिक्षा-प्रेमीक संग लालपुरक शिक्षा-प्रेमीकेँ भार लेलक। पछबारि गामक भार खुशीलालकेँ दऽ दछिनबरिया गामक भार भोलानाथ अपने लेलक। परसू चारि बजे बैसारक समए बना तीनू गोरे अखनेसँ काजमे जुटि जाइक विचार कऽ लेलैन। एक बेर सगरे खेत घुमि देखब उचित बुझि बिशेसर आड़िए-आड़ि सभकेँ घुमबए लगलखिन। गहुमक कोला टपिते भकरार फुलाएल दारीमक गाछपर बिशेसरक नजैर पड़लैन। लाल-लाल फूल जेकर पाछूसँ हरिअर फड़ अबैत आ आगूसँ फूल झड़ैत। मधुमाछी एकपर सँ उड़ि दोसरपर बैस रसपान करैत। संगे अपन कोमल स्वरसँ गीतो सुनबैत आ फूलो खाइत। बिशेसर ठाढ़ भऽ तीनू गाछपर आँखि गड़ा-गड़ा देखए लगला। एकटा गाछमे पहिलुका फुलाएल फूल झड़ि फड़ बनि गेल छल। गोल-मोल हरिअर। ऊपरसँ चिक्कन-चुनमुन। फूलक पत्ती झड़ि निच्चाँमे मौला गेल। दर्जनो फूल गाछमे फुलाएल। फड़केँ हाथसँ छुबि-छुबि बिशेसर मने-मन खुशीसँ गदगद होइत सोचैथ जे हमरा सन गरीब-गुरबाकेँ जिनगीमे नसीब नै होइबला चीज मेहनतक कृपासँ केतेको खाएब..!” कोदारि, हाँसू, खुरपी लऽ बिशेसर आँगन गेला। मोहिनी अरबा-खुद्दी पीसि रोटी ठोकि रोटिपक्कामे दऽ कर उनटबै छेली। चुल्हि लग मोहिनीकेँ देख बिशेसर सहैट कऽ कहलखिन- “एकटा जरूरी काज उपस्थिति भऽ गेल तँए खेतक काज छोड़ि श्यामानन्द ऐठाम जाइ छी।” रोटिपक्कासँ रोटी उठा हाथक आँगुरसँ टोबि कऽ देख फेर रोटिपक्कामे रखि बजली- “रोटी सीझ गेल। नून-मिरचाइ सिलौटपर पीसि दइ छी। जाबे अहाँ हाथ-पएर धुअब ताबे भऽ जाएत। घुमि कऽ कखन आएब कखन नहि। जलखै कऽ लिअ।” थतमतमे बिशेसर ठाढ़। एक दिस समाजक काज मनकेँ घिचैत रहैन तँ दोसर दिस शरीरक रक्षा-ले खाएबो जरूरी बुझाइत रहैन। ओसार परसँ लोटा उठा हाथ-पएर धुअ इनार दिस बढ़ला। हाथ-पएर धोइ लोटामे पानि भरने आबि जलखै केलैन। जलखै कऽ चुनौटीसँ चुन-तमाकुल निकालि चुनबैत श्यामानन्द ऐठाम विदा भेला। श्यामानन्द जलखै कऽ ट्रेक्टरपर बैस गरमा, सीता धान कटल, खेत जोतैले विदा होइत रहैथ। बिशेसरकेँ देखते ट्रेक्टर परसँ उतैर श्यामानन्द दलानपर आबि बिशेसरकेँ बैसबैत अपनो बैसला। कुशल-क्षेम केला पछाइत पुछलखिन- “सबेरे-सबेर केमहर ऐलह?” “बौआ श्याम, हमहूँ काज छोड़ि एलौं। भोलानाथ भिनसरे आबि कहलक जे हमरा ढेर सम्पैत अछि आ भोगनिहार कियो ने अछि तँए अपन सभ सम्पैत बच्चा सभकेँ पढ़ैले स्कूल बनबैमे दऽ देब।” बिशेसरक बात सुनि खुशीसँ श्यामानन्द उठि कऽ ठाढ़ भऽ आँगन जाइत बजला- “भैया कनी रूकह आब हमहूँ खेत जोतए नै जाएब।” आँगन जा गुलाबकेँ कहलखिन- “दोसर काजमे जा रहल छी। जाबे ओइ काजमे हम रहब ताबे घरक काज अहाँ सम्हारू।” मुँह बाबि, सुनि अचम्भित भऽ गुलाब बजली- “कोन एहेन काज आबि गेल जे सभटा भार हमरा देने जाइ छी?” आगू बढ़बैत डेग रोकि श्यामानन्द बजला- “भोलानाथ अपन सभ सम्पैत स्कूल बनबैले दऽ रहल अछि ओही काजे जा रहल छी।” बिशेसर श्यामानन्द संगे लालपुर विदा भेला। कमलपुरक सटले लालपुर, दुनू एकबधु गाम। लालपुर पहुँच दुनू गोरे मुनीलालक ऐठाम पहुँचला। मुनीलाल दरबज्जेपर मोथीक बिछान लाधि बीनै छला। दुनू गोरेकेँ देख हाँइ-हाँइ परतानसँ ठोकि उठि कऽ आबि श्यामानन्द आ बिशेसरकेँ बैसौलकैन। चौकीपर बैस श्यामानन्द मुनीलालकेँ कहलखिन- “भाय कोनो चेष्टगर बच्चाकेँ शोर पारि कहियौ जे गामक पढ़ल-लिखल नौजवानकेँ बजा लौत।” मुनीलाल बेटाकेँ शोर पाड़लैन। बेटा आठमामे पढै़त। मुनीलाल दरबज्जे परसँ कारी, डोमी, कप्पल आ गुनमाकेँ शोर पाड़ि बेटाकेँ रघुनाथक टोल पठौलखिन। स्कूलक बात सुनि सभ जुबकमे नव उत्साह पैदा लेलक। दशो-बारहो जुबक आएल। सभकेँ बैसा श्यामानन्द कहलखिन- “बौआ, अपन चारू-पाँचू गाममे एकोगो स्कूल नइ अछि। अवसर भेटल, भोलानाथ अपन सम्पैत दऽ रहल छैथ। हमसभ जे नवजुबक छी जी-जानसँ पड़ि लोअर स्कूलसँ लऽ कऽ हाइ स्कूल तक बनबैमे जुटि़ जाए। बेसी परिवार गरीबे अछि। बाहर खरचा दऽ बच्चाकेँ पढ़ौत से सम्भव नइ छइ। लगमे स्कूल भेलासँ गामपर सँ खा स्कूल जा पढ़त। परसू चारि बजे बरहमस्थानक ऐगला मैदानमे बैसार हएत तइमे सभ अबिहह।” गप-सप्प करैत दुपहर भऽ गेल। बिशेसर आ श्यामानन्द विदा हुअ लगला। मुदा खाइक बेर देख मुनीलाल दुनू गोरेकेँ बाँहि पकैड़ कहलखिन- “बिनु खेने नै जाए देब?” मुनीलालक आत्मीय सिनेहकेँ दुनू गोरे नै काटि सकला। पाँचू गामक लोक चारि बजेक बदला दुपहरेसँ जमा हुअ लगला। श्यामानन्द आ बिशेसर कलौ खा विहारी आ बचनाकेँ संग केने बैसारमे पहुँचला। चारि बजेक समए आगू नै घुसैक पाछुऐ घुसैक दुइए बजेसँ बैसार शुरू भेल। बैसारक बीच भोलानाथ ठाढ़ भऽ बाजए लगला- “भाइ लोकैन! अपन इलाका पढ़ै-लिखैमे बड़ पछुआएल अछि जइसँ सभ तरहेँ पछुआ गेल अछि। हमर सम्पैतकेँ कियो भोगनिहार नै अछि तँए हम चाहै छी जे अपन सभ सम्पैत दऽ हाइ स्कूल तक बनाबी। साठि बीघा जमीन अछि तैसंग घरोमे फुल-पीत्तैरक बरतन, गहना-जेबर इत्यादि ढेर अछि। पिताजी अपने अमलदारीमे बन्हकी नेन छला। तैसंग गाछी-कलम बाँस सेहो अछि। अहाँ सबहक बीच कहै छी जे अखनसँ ओ सभ चीज अहाँ सबहक भेल जइसँ बच्चा सबहक उद्धार-ले स्कूल बना दियौ।” थोपड़ी बजा सभ कियो भोलानाथक विचारमे समर्थन देलक। श्यामानन्द ठाढ़ भऽ बजला- “जाधैर स्कूल बनि पढ़ौनी शुरू हएत ताधैर हम दिन-राति अहाँ सबहक संग खटब।” श्यामानन्दक पछाइत पण्डित शंकर उठि कऽ बजला- “जाधैर हम कौलेजमे अध्यापकक काज केलौं ताधैर समाजसँ अलग रहलौं। जाधैर नोकरीमे रहलौं एक तरहक लोकक समाजमे रहलौं। जेकरा आइ नदी जकाँ समाज बुझै छी। बीस बरख अध्यापन केलासँ अध्यापक भेलौं, साइठ बर्खमे सेवा निवृत्ति भेला पछाइत जखन गाम एलौं तखन बुझलिऐ जे आइ धरिक समाज नदी जकाँ छल आब समुद्र रूपी समाजमे एलौं। तँए नौजवानक शक्ति हमरा शरीरमे प्रवेश केलक। आइ हम ओइ समाजमे छी जइमे प्रकाण्ड पण्डित, महान वैज्ञानिक, दार्शनिक, इंजीनियर, डाक्टर,कानूनवेतासँ लऽ कऽ महामुर्ख धरि रहैए। जहिना समुद्रमे बड़का-बड़का जानवरसँ लऽ कऽ छोट-सँ-छोट कीड़ि-मकोड़ी बास करैत। जइ समाजमे स्वस्थ खलीफासँ लऽ कऽ अथबल धरि रहैत। जइ समाजमे महानसँ महान डाक्टर होइत ओइ समाजमे विकटसँ विकट रोगक रोगी रहैत। आइ ओइ समाजमे हमहूँ छी। अखन धरि पेट-ले नोकरी करै छेलौंजे जिनगी भरिक जोगार भऽ गेल। आब पेट-ले नहि कल्याण-ले सेवा करब। जखन सेवा निवृत्त भऽ गाम अबैत रही तखन रस्तामे मने-मन कचोट हुअए जे जइ समाजमे जन्म लेलौं ओ जिनगीमे बहुत देलक। जेकर हम ऋृणि छी। तँए अहाँ सबहक बीच कहै छी जे मरै काल धरि अहाँ सबहक बाँहि पकैड़ चलैत रहब।” पण्डित शंकरक वक्तव्यक बीच केतेक बेर थोपड़ी बजल। पण्डित शंकरकेँ बैसते डाक्टर नीलमणि सेन ठाढ़ होइत बजला- “हमहूँ अहीं सबहक बीच बसि जिनगी बिता रहल छी आगूओ बिताएब। हम एकटा अदना डाक्टर छी, जहाँ धरि बनि पड़ैए अहाँ लोकैनक सेवा करै छी। भोलानाथ अपन सभ सम्पैत समाज-ले लगा रहल छैथ तँए हुनका हृदैसँ धैनवाद दइ छिऐन आ हमहूँ अपन आधा समए अहाँ लोकनिक सेवामे देब आ आधा समए पेट-ले लगाएब।” डाक्टर नीलमणिकेँ बैसते ईंटा बनौनिहार रामधन उठि कऽ ठाढ़ भेल। रामधनकेँ ठाढ़ देख सभ टकटकी लगा देखए लगल। जेकरा एको अक्षरक बोध नहि, सभ दिन माटि बना पजेबा गढ़लक ओ पाँच गामक लोकक बीच ठाढ़ भऽ अपन विचार रखए चाहैए। सभकेँ एकरे जिज्ञासा। ठाढ़ भऽ रामधन कहलक- “हम सभ अठारह गोरे पजेबा बनबै छी। अठारहो गोरेक विचार अछि जे स्कूलक पजेबा हम सभ अदहा मजदूरी लऽ बनाएब। अदहा स्कूलक मदैतमे देब।” रामधन थोपड़ी अवाजमे अपन विचार सम्पन्न कऽ बैसल।” रामधनकेँ बैसते मनचल उठि ठाढ़ भऽ बजला- “जाधैर स्कूल बनत ताधैर गामे-गाम घुमि नाटक करि कऽ स्कूलक प्रचार करब आ जे आमदनी हएत ओ चन्दामे देब।” आइ धरि गामक उत्थान-ले एते गामक एते लोक एकठाम बैस कहियो नै विचार केने छल। अखन धरि सभ जाति, सम्प्रदाय, ऊँच-नीचक आड़िक भीतर वौआइ छल। अनेरे एक-दोसरसँ जरैत रहै छल, छोट-छीन झगड़ा ठाढ़ कऽ उलझल रहैत छल जइसँ समाजक पतन होइत रहल। औझुका बैसारसँ सबहक मनमे खुशी आएल, आपसमे प्रेम जगल। भायचारा आ पड़ोसिपनक उदय भेल। सबहक जिज्ञासा, तियाग आ प्रेमक माध्यमसँ नव समाजक निर्माणक बीज लोकमे पड़ल। ..पण्डित शंकर पुनः ठाढ़ भऽ बाजए लगला- “भाइ लोकैन भोलानाथक सम्पैत सबहक भऽ गेल। एकरा खजाना बुझियौ। हमर-अहाँक जिम्मा बनैए जे खजाना भरल रहए तँए एकरा मेहनतसँ भरबाक जरूरत अछि। पाँच-गामक लोक बैसल छी। सभ बड़का-बड़का राक्षसक चालिमे पड़ल छी। आइ हम सभ संकल्प ली जे बिआह-श्राद्ध इत्यादिमे धन लूटबै छी ओकरा बन्न कऽ समाजक कल्याणमे धन लगाबी। बिआह, श्राद्ध तँ आइए नै अदौसँ होइत रहल आ आगूओ होइत रहतै। दहेज रूपी दानव पहिने नै छल जे अखन सैयो हाथीक बलक बरबैर भऽ गेल अछि। बिआह तँ सृष्टि निर्माणक प्रक्रिया छी, हेबे करत, जँ नै हएत तँ सृष्टि रूकि जाएत। मुदा जे श्राद्धमे जे भोज करि कऽ घर-घराड़ी बेच लूटा दइ छिऐ जैपर सभकेँ धियान दिअ पड़त। तहिना छोट-छोट बातक झगड़ा बढ़ि विकाराल रूप धारण कऽ लइए। जेकरा चलैत कोट-कचहरीक चक्करमे पड़ि सभ निच्चाँ-मुहेँ जा रहल छी। ने अपन जिनगीक महत बुझै छिऐ आ ने दोसरक।” हाथ उठा सभ जोरसँ बाजल- “पण्डित बाबा बढ़ियाँ विचार देलैन।” पण्डित शंकर दुनू हाथसँ सभकेँ शान्त करैत आगू बजला- “भाय लोकैन! पाँच गामक लोक बैसल छी। पाँचू गामक सभ संकल्प लिअ जे हम अपन बेटा-बेटीक बिआह ऐ पाँचू गामक बीच करब। दहेज नै लेब। जरूरी काज जे अछि ओतबे करब। देखै छी जे अदहासँ अधिक परिवारमे दुनू साँझ भरि पेट अन्न नै भेटै छै, देहपर कपड़ा नइ छै, रहैले घर नइ छइ। आइ बच्चाकेँ पढ़ैले विचार कऽ रहल छी,नीक बात।” कहि पण्डित शंकर बैस गेला। पण्डित शंकरेक अध्यक्षतामे समाज उत्थान समिति बनल जेकर सदस पाँचू गामक पच्चीस नौजवान भेल आ आगू-ले योजनावद्ध ढंगसँ कार्यक्रम सेहो तँइ भेल।◌ इति शब्द संख्या : 1640 [1] बाछी [2] जेमहर पानिक वेग जाइत [3] जेमहरसँ पानिक वेग अबैत [4] परदा [5] चिक्कू [6] टेमप्रोरी [7] आठ घन्टा [8] दृष्टिकोण ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मौलाइल गाछक फूल उपन्यास जगदीश प्रसाद मण्डल पोथीकेँ तत्खनात् व्यक्तिगत रूपे सोझहा आनल जा रहल अछि...। -लेखक मिथिलाक वृन्दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलबाड़ी लगौनिहार एवं नव विहान अननिहारकेँ समरपित... तेसर संस्करण : सितम्बर- 2016 अनुक्रम दू शब्द/7 अप्पन बात/8 एक /10 दू /18 तीन /27 चारि /46 पाँच /61 छह /76 सात /86 आठ /95 नअ /107 दस /123 एगारह /131 बारह /143 तेरह /156 दू शब्द जगदीश प्रसाद मण्डल शिल्पी छैथ, कथ्यकेँ तेना समेट लइ छैथ जे पाठक विस्मित रहि जाइत अछि। मुदा हिनका द्वारा कथ्यकेँ (कथा, उपन्यास, नाटक, प्रेरक-कथा सभमे) उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह आ क्षमता हिनका मैथिली साहित्यमे ओइ स्थानपर स्थापित करैत अछि, जेतए-सँ मैथिली साहित्यक इतिहास “जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व” आ “जगदीश प्रसाद मण्डलसँ” ऐ दू खण्डमे पाठित होएत। समाजक सभ वर्ग हिनकर कथ्यमे भेटैत अछि आ से आलंकारिक रूपमे नै वरन अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर एबाक समान अछि। हिनकर कथ्यमे केतौ अभाव-भाषण नै भेटत, सभ वर्गक लोकक जीवन शैलीक प्रति जे आदर आ गौरव ओ अपन कथ्यमे रखै छैथ से अद्भुत। हिनकर कथ्यमे नोकरी आ पलायनक विरूद्ध पारम्परिक अजीविकाक गौरव महिमा मण्डित भेटैत अछि। आ से प्रभावकारी होइत अछि हिनकर कथ्य आ कर्मक प्रति समान दृष्टिकोणक कारणसँ आ से अछि हिनकर बेकतीगत आ समाजिक जीवनक श्रेष्ठताक कारणसँ। जे सोचै छी, जे करै छी; सएह लिखै छी तइ कारणसँ। यात्री आ धूमकेतु सन उपन्यासकार आ कुमार पवन आ धूमकेतु सन कथा-शिल्पीक अछैत मैथिली भाषा जनसामान्यसँ दूर रहल। मैथिली भाषाक आरोह-अवरोह मिथिलाक बाहरक लोककेँ सेहो आकर्षित करैत रहल आ ओइ भाषाक आरोह-अवरोहमे समाज-संस्कृति-भाषासँ देखौल जगदीशजीक सरोकारी साहित्य मिथिलाक समाजिक क्षेत्रटामे नै वरन आर्थिक क्षेत्रमे सेहो कान्ति आनत। विदेहमे हिनकर विभिन्न विधामे अनेको गद्य एवं पद्य ई-प्रकाशित भऽ विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीकेँ दलमलित करैत मैथिली साहित्यक एकटा रिक्त स्थानक पूर्ति कऽ देने अछि। गजेन्द्र ठाकुर सम्पादक- विदेह ( www.videha.co.in) अप्पन बात जहिया एम.ए.क विद्यार्थी रही तहिए नोकरीसँ विराग भऽ गेल। आठ बीघा जमीन रहए। खेतीसँ जीवन-यापन करैक बिसवास भऽ गेल। बिनु गार्जनक–पुरुष गार्जनक–परिवार 1960 ईस्वीमे भऽ गेल। पिताक स्वर्गवास भेला पछाइत दू भाँइ पिसियौत रहै छला। तत्काल गार्जनी हुनके दुनू भाँइपर। कोसीक उपद्रवसँ भागल पीसा बेरमे माने सासुरेमे बसि गेल रहैथ। पिताक मृत्युक समए तीन बर्खक हम आ छह बर्खक जेठ भाय छला। पिसियौत भाए 1960 ईस्वीमे अपन गाम ‘हरिनाही’ चलि गेला। दुनू भाँइ 1964-65 ईस्वीमे गामक स्कूलसँ निकैल अपर प्राइमरी स्कूल कछुबीमे नाओं लिखौने रही। 1960 ईस्वीसँ परिवारक बोझ पड़ल। पुरुष विहीन भेनौं माए ओहन परिवारक छेली, जइ परिवारमे नाना 1942 ईस्वीमे अंग्रेजक गोली खा चुकल छला। साहसी माए। अपन गहना, जमीन बेच देल बच्चाकेँ पढ़बै खातिर। पैंतीस साल धरि समाज सेवा कऽ हहरैत शरीर देख किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल। 2002 ईस्वीमे डॉ. तारानन्द ‘वियोगी’जीक सम्पादनमे देशज पत्रिका निककल। पोथी हाथमे आएल। पढ़लौं। तइसँ पहिनहि किछु-किछु लिखब शुरू केने रही। फोनपर वियोगीजी सँ सम्पर्क भेल। मुदा ढीले-ढाल। जखन मधुबनी एला आ सामने-सामनी बैस गप्प भेल तखन काफी प्रेरित भेलौं। तइसँ पहिने पटनामे उमेशक माध्यमसँ किछु उपन्यास आ किछु कथा संग्रह ऊपरे-झापड़े देखने रहैथ। पहिल भेँट तँए गप्पे करब जरूरी बुझलैन। सएह भेल। रहुआ (मधेपुर)मे ‘सगर राति दीप जरय’ (8.11.2008) कथा गोष्ठीमे भाग लइले कहलैन। ताधैर नइ जनैत रही। लक्ष्मीनाथ गोसाँइक स्थानमे कार्यक्रम भेल। सिद्धपीठ। ओना, केतेक बेर राजनीतिक मंचपर रहुआमे बाजि चुकल छेलौं, कर्म क्षेत्र छल तँए कथा वचैमे संकोच नइ भेल। ओना एकर दोसरो कारण छल। ओ कारण छल किनको चिन्हैत नै रहिऐन। भिनसरु पहर डॉ. अशोक अविचलजी सँ पुरना चिन्हारेक नवीकरण भेल। गाड़ी दुआरे लग रहितो पाछू गेलौं। कथा पाठ केलौं। सभ प्रशंसा केलैन। डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’जी ओ कथा मांगि लेलैन। किछुए मासक उपरान्त ‘घर बाहर’ पत्रिकामे प्रकाशित केलैन। सिद्ध पुरुषक स्थानमे प्रतिष्ठा भेटल। डायरी-कलम भेटल। चादैर-पाग भेटल। लक्ष्मीनाथ गोसाँइक मुर्ति सेहो भेटल। मैथिली साहित्यक लेल ‘सगर राति दीप जरय’ कथाकारक ट्रेनिंग कौलेज सदृश अछि। विद्वान कथाकार सबहक गाइड-लाइन। नव पीढ़ी-ले ऐसँ उपयोगी भऽ की सकैए...। मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्वीमे लिखल पहिल अपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो गोरेकेँ छैन से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटक लावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी। ओइसँ पहिलुका कथादिक ठौर-ठेकान नइ अछि। घर बाहरमे भैंटक लावा आ बिसांढ़ छपल आ फेर मिथिला दर्शनमे ‘चुनवाली’ कथा पढ़िते अनेको बधाइ फोन आएल जेना- पञ्जीकार विद्यानन्द झाजीक। एकटा महत्वपूर्ण फोन श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक रहल। हिनकर फोन सुनिते जिनगीक ओहन चौबट्टी टपि गेलौं जे चौबीस घन्टाक खुशी मनमे आबि गेल। जहिना बाल्यकालमे हनुमान सूर्यकेँ ग्रहण (बाल समय रवि भक्ष लियो) कऽ नेने छेला तद्सदृश गजेन्द्रोजीक टीम छैन। नवयुवक सभ छैथ, हम तँ बेसी-सँ-बेसी यएह ने कहि सकै छिऐन जे हमरो औरदा लऽ अहीं सभ जीबू। अन्तमे, तीनू भैंयो (सुरेश, उमेश, मिथिलेश) आ समाजोकेँ कहि दिअ चाहै छिऐन जे मिथिला अहाँक देश छी। ऐठामक माटि-पानिसँ लऽ कऽ साहित्य-कला धरिक विकास करब सबहक दायित्व छी। ऐठाम एतबे। आगाँ, आगू...। -जगदीश प्रसाद मण्डल बेरमा 1. दू सालक रौदीक उपरान्तक अखाढ़। गरमीसँ जेहने दिन तेहने राति। भरि-भरि राति बिऐन हौंकि-हौंकि लोक सभ समए कटैत। सुतली रातिमे उठि-उठि पानि पीबए पड़ैत। भोर होइते घाम अपन उग्र रूप पकैड़ लइत। जहिना कियो केकरो मारैले लग पहुँच जाइत तहिना सुरूजो लग आबि गेला। रस्ता-पेराक माटि जमल सिमेंट जकाँ सक्कत भऽ गेल। चलै बेर पएर पिछड़ैत। इनार-पोखैरक पानि अपन अस्मिता बँचबैले पतालक रस्ता पकैड़ लेलक। दू सालसँ एक्को बुन्न पानि धरतीपर नै पड़ने धरतीक सुन्दरता धीरे-धीरे नष्ट हुअ लगल। पानिक चलैत दुबि सभ पाण्डु रोगी जकाँ पीअर भऽ-भऽ परान तियागि रहल अछि। गाछ-पात बेदरंग भऽ गेल अछि। लताम,दारिम, नारिकेल इत्यादि अनेको तरहक फलक गाछ सूखि रहल अछि। आम-जामुन-गमहाइर-शीशो इत्यादि गाछक निच्चाँ पातक पथार लगि गेल। दसे बजेसँ बाधमे लू चलए लगैत। नमहर-नमहर दराड़ि फाटि धरतीक रूपे बिगाड़ि देलक। की खाएब। की पीब। केना जीब। अपनामे सभ एक-दोसरासँ बतियाइत। घास-पानिक दुआरे मालो-जाल सूखि कऽ संठी सन भऽ गेल। अनधुन मरबो कएल। अनुकूल समए पाबि रोगो-बियाधि बुतगर भऽ गेल। माल-जालसँ लऽ कऽ लोको सबहक जान अवग्रहमे पड़ि गेल अछि। खेती-बाड़ी चौपट्ट होइत देख थारी-लोटा बन्हकी लगा-लगा लोक मोरंग, दिनाजपुर, ढाका भागए लगल। जएह दशा किसानक वएह दशा बोनिहारोक। कहिया इन्द्र भगवानक दया हेतैन, ऐ आशामे अनधुन कबुला-पाती लोक करए लगल। तीन दिनसँ अनुपक घरमे चुल्हि नै पजरल। नल-दमयन्ती जकाँ दुनू परानी अनुप दुखक पहाड़क तरमे पड़ल एक-दोसराक मुँह तकैत। केकरो किछु बजैक साहस नहि। बारह बर्खक बौएलाल बोरापर पड़ल माएकेँ कहलक- “माए, भूखे परान निकलल जाइए। पेटमे बगहा लगैए। आब नइ जीबौ।” बेटाक बात सुनि दुनू परानी अनुपक आँखिमे नोर आबि गेल। मुँहक बोल बुताए लगलै। लगमे बैसल रधिया उठि कऽ डोल-लोटा लऽ इनार दिस विदा भेल। इनारोक पानि निच्चाँ ससैर गेल छै, जइसँ डोलक उगहैनो छोट भऽ गेल। केतबो निहुड़ि-निहुड़ि रधिया पानि पेबए चाहैत, मुदा डोल पानिसँ ऊपरे! रधियाक मनमे एलै, जखन अधला होइबला रहै छै तखन अहिना कुसंयोग होइ छइ। बौएलाल नै बँचत! एक तँ पाँचटा सन्तानमे एकटा पिहुआ बँचल, सेहो आइ जाइए। हे भगवान! कोन जन्मक पापक बदला लइ छह..? इनारसँ डोल निकालि लहरेपर छोड़ि रधिया उगहैन जोड़ैले डोरी आनए आँगन आएल। रधियाक निराश मन देख अनुप पुछलक- “की भेल?” टुटल मने रधिया बाजल- “की हएत, जखन दैवेक डाँग लगल अछि तखन की हएत। उगहैन छोट भऽ गेल तँए जोड़ैबला जौड़ी लइले एलौं।” रधियाक बात सुनि अनुप घरक ओसारेक बनहन खोलि देलक। खड़ौआ जौड़ लऽ रधिया इनारपर जा उगहैन जोड़लक। उगहैन जोड़ि पानि भरलक। पानि भरि लोटामे लऽ रधिया आँगन आबि बौएलालकेँ पीबैले कहलक। पड़ल बौएलालकेँ उठिए ने होइ। ओसारपर लोटा रखि रधिया बौएलालकेँ बाँहि पकैड़ उठा कऽ बैसौलक। अपने हाथे रधिया लोटासँ चुरुकमे पानि लऽ बौएलालक आँखि-मुँह पोछलक। बौएलालक देह थरथर कँपैत। बौएलालक थरथरी देख रधियोकेँ थरथरी पैस गेल। लोटा उठा बौएलालक मुँहमे लगबए लगल आकि थरथराइत हाथसँ लोटा छुटि गेल, पानि बोरापर पसैर गेल। दुनू हाथे छाती पीटैत रधिया जोरसँ चिचिया उठल- “आब बौएलाल नै जीत! जइ घड़ी, जइ पहर अछि!” रधियाक बोल सुनि अनुप जोरसँ कानए लगल। अनुपक कानब सुनि टोलक धियो-पुतो आ जनिजातियो एक्के-दुइए आबए लगल। सबहक मुँह सुखाएले। के केकरा बोल-भरोस देत। सबहक एक्के गति। अनुपक कानब सुनि रूपनी अँगनेसँ कानैत दौगल आएल। रूपनी अनुपक ममियौत बहिन। रूपनी बौएलालकेँ देख बाजल- “भैया, बौआकेँ परान छेबे करह। किए अनेरे दुनू परानी कानै छह। जाबे शरीरमे साँस रहतै ताबे जीबैक आशा। चुप हुअ!” कहि रूपनी बौएलालकेँ समैट कोरामे बैसौलक। तरहत्थीसँ चाइन रगड़ए लगल। बौएलाल आँखि खोलि बाजल- “दीदी, भूखसँ पेटमे बगहा लगैए।” बौएलालक बात सुनि रूपनी बाजल- “रोटी खेमे?” “हँ।” बौएलालक ‘हँ’ सुनि रधिया घरमे धएल फुलही लोटा–जे रधियाकेँ दुरागमनमे पिता देने रहैन–निकालि अनुपकेँ देलक। लोटा नेने अनुप दोकान दिस दौगल। लोटा बेच गहुम किनने आएल। अँगना अबिते रधिया हबड़-हबड़ चुल्हि पजाइर गहुम उलौलक। दुनू परानी जाँतमे गहुम पिसए लगल। एक रोटी-जोकर चिक्कस होइते रधिया समैट कऽ रोटी पकबए आबि गेल। बाँकी गहुम अनुप पिसए लगल। रोटी पका रधिया बौएलाल लग लऽ गेल। अपनेसँ रोटी तोड़ि खाइक साहस बौएलालकेँ नहि। छाती दाबि-दाबि रधिया बौएलालकेँ रोटी खुआबए लगल। सौंसे रोटी बौएलाल खा लेलक। रोटी खाइत-खाइत बौएलालोकेँ हूबा जगलै। अपने हाथे लोटा उठा पानि पीलक। पानि पीबते हाफी भेलइ। भुइँएमे ओंघरा गेल। जाँत लगक चिक्कस समैट रधिया चुल्हि लग आनि सूपमे सानए लगल। जांघपर पड़ल चिक्कस अनुप तौनीसँ झाड़ि, लोटा-डोल नेने इनार दिस बढ़ल। हाथ-पएर धोइ, लोटामे पानि लऽ आँगन आबि खाइले बैसल। छिपलीमे रोटी आ नून-मेरचाइ नेने रधिया अनुपक आगूमे देलक। भुखे अनुपकेँ होइ जे सौंसे रोटी मोड़ि-सोड़ि कऽ एक्के बेर मुँहमे लऽ ली, मुदा से नै कऽ तोड़ि-तोड़ि खाए लगल। छिपलीक रोटी सठिते अनुप रधिया दिस देखए लगल मुदा तीनियेँटा रोटी पका रधिया चिक्कसक मुजेला कोठीपर रखि देलक। रधियाकेँ देख अनुप चुपचाप दू लोटा पानि पीब उठि गेल। दिन अछैते नथुआ दौगल आबि हँसैत अनुपकेँ कहलक- “गिरहत काका बड़की पोखैर उराहथिन। काल्हिसँ हाथ लगतै। तोहूँ दुनू गोरे काज करए चलिहह।” नथुआक बात सुनिते रधियाकेँ जेना अशर्फी भेट गेलै तहिना खुशी भऽ गेल। अनुपोक मुहसँ हँसी निकलल। अनुपक खुशी देख नथुआ फेर बाजल- “अपने मुसना काका मेटगीरी करत। वएह जन सबहक हाजरी बनौत।” नथुआ, अनुप आ रधियाक बीच गप-सप्प होइते छल कि बिच्चेमे मुसनो धड़फड़ाएल आबि गेल। मुसना दिस देख नथुआ बाजल- “मुसनो काका तँ आबिए गेला। आब सभ गप फरिछा कऽ बुझबहक।” मेटगीरी भेटलासँ मुसनाक मन तरे-तर गदगद होइत। ओना, कहियो मुसना मेटगीरी केने नहि, मुदा गामक बान्ह-सड़कमे मेट सबहक आमदनी आ रोब देखने, तँए खुशी। मने-मन सोचैत जे जेकरा मन हएत तेकरा जनमे रखब आ जेकरा मन नइ हएत तेकरा नइ रखब। ई तँ हमरे जुतिक काज रहत किने। जेकरा मन हएत ओकरा बेसियो कऽ हाजिरी बना देबइ। पावर तँ पावर होइए। जँ पावर भेटए आ ओकर उपयोग फाजिल करि कऽ नै करी तँ ओहेन पावरे लऽ कऽ की? जँ से नै करब तँ मुसना आ मेटमे अनतरे की हएत। लोक की बूझत..! मुस्कियाइत मुसना अनुपकेँ कहलक- “भैया, काल्हिसँ बड़की पोखैरमे काज चलतै, तोंहू चलिहह। दू सेर धान आ एक सेर मरुआ भरि दिनक बोइन हेतह। तेतेटा पोखैर अछि जे कहुना-कहुना रौदी खेपिए जेबह। सुनै छी जे आनो गामक जन सभ अबैले अछि मुदा ओकरा सभकेँ माटि नै काटए देबइ।” मुसनाक बात सुनि बौएलाल फुरफुरा कऽ उठि बाजल- “काका, हमरो गिनती कऽ लिहह। हमहूँ माटि काटए जेबह।” “बेस बौआ, तीनू गोरे चलिहह। हमरे हाथक काज रहत। दुपहरमे भानस करैले भौजीकेँ पहिनहि छुट्टी दऽ देबइ।” कहि मुसनो आ नथुओ चलि गेल। दोसर दिन भोरे माने पोखैरमे हाथ लगैसँ पहिनहि चौगामाक जन सभ, कियो कोदारि-टाला तँ कियो पथिया-कोदारि लऽ पोखैरक महारपर पहुँच थहाथही करए लगल। मेला जकाँ लोकक करमान लगि गेल। जेते गामक जन तइसँ कए गुना बेसी आन गामक। जनक भीड़ देख मुसनाक मनमे अहलदिली पैस गेल। तामसो आ डरोसँ देह थरथर कापए लगलै। मुसनाक मनमे उठलै- हमर बात के सुनत?माथपर दुनू हाथ लऽ बैस गेल। किछु फुरबे ने करइ। ठकमुड़ी लगि गेलइ। सौंसे पोखैर गौंआँ-सँ-अनगौंआँ धरि, जगह छेक-छेक कोदारि लगा टल्ला ठाढ़ केने। सोचैत-सोचैत मुसनाक मनमे एलै जे गिरहत काकाकेँ जा कऽ सभ बात कहिऐन। सएह केलक। उठि कऽ रमाकान्त बाबूसँ भेँट करए विदा भेल। तैबीच गौंआँ-अनगौंआँ जनमे रक्का-टोकी शुरू भेल। अनगौंआँ सभ जोर-जोरसँ बजैत- “कोनो भीख मंगैले एलौं। सुपत काज करब आ सुपत बोइन लेब।” तहिना गौंआँ जनसभ कहइ- “हमरा गामक काज छी तँए हम सभ अपने करब।” सुखेतक भुटकुमरा आ गामक सिंहेसरा एक्केठाम पोखैरक माटि दफानने। दुनूक बीच गारि-गरौवैल हुअ लगलै। सभ हल्ला करैत तँए केकरो बात कियो सुनबे ने करए। सभ अपने बजैमे बेहाल। गारि-गरौवैल करिते-करिते भुटकुमरो सिंहेसर दिस बढ़ल आ सिंहेसरो भुटकुमरा दिस। दुनूक बीच गारियो-गरौवैल होइत आ पकड़ो-पकड़ी भऽ गेल। एक-दोसरकेँ पटैक छातीपर बैसए चाहैत। दुनू बुतगर। पहिने तँ भुटकुमरे सिंहेसराकेँ पटकलक किएक तँ सिंहेसराक पएर घुच्चीमे पड़ि गेलै, जइसँ ओ धड़फड़ा कऽ खसि पड़ल। मुदा सिंहेसरो हारि नै मानलक। हिम्मत करि कऽ उठि भुटकुमरोकेँ छिटकी लगा खसौलक। दरबज्जापर बैस रमाकान्त बाबू बखारीक धान-मड़ूआक हिसाब मिलबै छला। हलचलाएल मुसनाकेँ देख रमाकान्त पुछलखिन। मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे ने करैत। मुदा तैयो मुसना कहए लगलैन- “काका, तेते अनगौंआँ जन सभ आबि गेल अछि जे गौंआकेँ जगहे ने हएत। केतबो मनाही केलिऐ कोइ मानैले तैयारे नै भेल। कनी अपनेसँ चलि कऽ देखियौ।” कागत-कलम घरमे रखि रमाकान्त विदा भेला। आगू-आगू रमाकान्त आ पाछू-पाछू मुसना। पोखैरसँ फरिक्के रहैथ कि पोखैरमे हल्ला होइत सुनलखिन। मन चौंक गेलैन। मनमे हुअ लगलैन जे अनगौंआँ सभ बात मानत की नहि! अगर काज बन्न कऽ देब तँ गौंओक कमाइ मरत। जँ काज बन्न नै करब तँ अनगौंओ मानबे ने करत! ..विचित्र स्थितिमे रमाकान्त पड़ि गेला। निअरलाहा सभ गड़बड़ भऽ रहल छेलैन। पोखैरक महारपर रमाकान्तकेँ अबिते चारूभरसँ जन सभ घेर लेलकैन। सभ हल्ला करैत जे जँ काज चलत तँ हमहूँ सभ खटब। ततमतमे पड़ल रमाकान्त बाबू अनगौंआँ सभकेँ कहलखिन- “देखू, रौदियाह समए अछि। सभ गाममे काजो अछि आ करौनिहारो छैथे। चलै चलू अहाँ सबहक संगे हमहूँ चलै छी आ हुनको सभकेँ कहबैन जे अपना-अपना गामक बोनिहारकेँ अपना-अपना गाममे काज दियौ।” अनगौंआँ सभ अपन-अपन कोदारि, छिट्टा, टल्ला नेने विदा भेल। रमाकान्तो संगे विदा भेला। किछु दूर बढ़िते रमाकान्त मुसनाकेँ इशारामे कहि देलखिन जे जखन आन गामक लोक निकैल जाएत तखन गौंआँ जनकेँ काजमे लगा दिहक। तैबीच कियो जा कऽ सिंहेसराक घरवालीकेँ कहि देलक जे पोखैरमे तोरा घरबलाकेँ ओंघरा-ओंघरा मारलकौ। घरबलाक मारिक नाओं सुनिते सिंहेसराक घरोवाली आ धियो-पुतो गामेपर सँ गरियबैत पोखैर दिस विदा भेल। मुदा तइसँ पहिनहि अनगौंआँ सभ चलि गेल छल। पोखैरमे मटि-कटिया शुरू भेल। तीनू गोरे अनुप एक्केठाम खत्ताक चेन्ह देलक। कोदारिसँ माटि काटि-काटि अनुप पथियामे भरैत आ रधिया दुनू माय-पुत माथपर लऽ लऽ महारपर फेकए। बारह बाजि गेल। रमाकान्त घुमि कऽ आबि पोखैरक पछबरिया महारपर ठाढ़ भऽ देखए लगला। नजैर पड़िते मुसना दौग कऽ रमाकान्त लग पहुँचल। मुसनाकेँ पहुँचते रमाकान्त आँगुरक इशारासँ बौएलालकेँ देखबैत पुछलखिन- “ओ के छी। ओकरा साँझमे कहिहक भेँट करैले।” कहि रमाकान्त घर दिसक रस्ता पकड़लैन। बारह बर्खक बौएलालक माटि उघब देख सभकेँ छगुन्ता लगैत। जाबे दोसर कियो एक बेर माटि फेकैत ताबे बौएलाल तीन बेर फेक अबैत। बौएलालक काज देख अनुप मने-मन सोचए लगल जे बोनियातीसँ नीक ठिक्का होइतए। मुदा हमरे सोचलासँ की हएत...। ताबे मुसनो रमाकान्तकेँ अरियाति घुमि कऽ अनुप लग आबि कहलक- “भैया, मालिक दुनू बापूतकेँ साँझमे भेँट करैले कहलखुन हेन।” ‘मालिकक भेँट करब’ सुनि अनुपक हृदैमे खुशीक हिलकोर उठए लगल। मुदा अपनाकेँ सम्हारि अनुप मुसनाकेँ कहलक- “जखन मालिक भेँट करैले कहलैन तँ जरूर जाएब।” सुरूज पच्छिम दिस एकोशिया भऽ गेला। घुमैत-फिरैत मुसना अनुप लग आबि रधियाकेँ कहलक- “भौजी, अहाँ जाउ। भरि दिनक हाजरी बना देने छी। भानसोक बेर उनैह जाएत।” रधिया आँगन विदा भेल। अनुप आ बौएलाल काज करिते रहल। चारि बजे सभ गोरे काज छोड़ि देलक। गामपर आबि अनुप दुनू बापूत नहा कऽ खेलक। कौल्हुके गहुमक चिक्कसक रोटी आ अरिकंचन पातक पतौरा बना-पका चटनी बनौने छल। खा कऽ तीनू गोरे–अनुप, बौएलाल आ रधिया–ओसारपर बैस गप-सप्प करए लगल। अनुप रधियाकेँ कहलक- “भगवान बड़ीटा छथिन। सभपर हुनकर नजैर रहै छैन। देखियौ एहेन कहात् समैमे कोन चक्कर लगा देलैन।” गप-सप्प करिते गोसाँइ डुमि गेल। झलफल होइते अनुप दुनू बापूत रमाकान्त ऐठाम विदा भेल। रस्तामे दुनू बापूतकेँ ढेरो तरहक विचार मनमे उठैत आ खतम होइत। ओना, दुनू बापूतक मन गदगद। दरबज्जापर बैस रमाकान्त मुसनासँ जनक हिसाब करबैत रहैथ। मुसना जनक गिनतियो केने आ नामो लिखने। मुदा अपन नाओं छुटल तँए हिसाब मिलबे ने करैत। अही घों-घाँमे दुनू गोरे लागल। तैबीच दुनू बापूत- अनुप पहुँचल। फरिक्केसँ अनुप दुनू हाथ जोड़ि रमाकान्तकेँ गोड़ लगि बिछानपर बैसल। बौएलालो गोड़ लगलकैन। बौएलालकेँ देख रमाकान्त बिहुँसैत अनुपकेँ कहलखिन- “अनुप, तोँ अपन ई बेटा हमरा दऽ दएह।” मने-मन अनुप सोचए लगल जे ई की कहि देलैन! कनी काल गुम्म रहि अनुप बाजल- “मालिक, बौएलाल की हमरेटा बेटा छी, समाजक छिऐ। जखैन अपनेकेँ जरूरत हएत लऽ लेब।” अनुपक उत्तर सुनि सभ छगुन्तामेँ पड़ि गेला। मास्टर साहैब अनुपकेँ निंगहारि-निंगहारि देखए लगलखिन। एकटा युवक जे दू दिन पहिने भाग्यक मारल आएल छल, ओहो आशा-निराशामे डुमि गेला। ओइ युवककेँ तीन बर्ख कृषि विज्ञानक पढ़ाइ पूरा भेल छेलैन, एक बर्ख बाँकी रहैन। अपन सभ खेत बेच बेमार पिताक इलाज करौलैन मुदा ठीक नइ भऽ मरि गेलखिन। कर्जा लऽ पिताक श्राद्ध-कर्म केलैन। खरचा दुआरे पढ़ाइयो छुटि गेलैन आ जीबैक कोनो उपैयो ने रहलैन। जिनगीक कठिन मोड़पर आबि युवक निराश भऽ गेल छला। साल भरि पहिने बिआहो भऽ गेलैन। एक दिस बुढ़ माए आ स्त्रीक भार, दोसर दिस जीबैक कोनो रस्ता नहि। सोगसँ माइयोक देह दिने-दिन निच्चे-मुहेँ हहरल जाइत रहैन। रमाकान्त बाबूक उदार विचार सुनि ओ युवक आएल रहए। सभ दिन रमाकान्त चारि बजे पिसुआ भाँग पीबै छैथ। दोसर-तेसर साँझ होइत-होइत रमाकान्तकेँ भाँगक निशाँ चढ़ि जाइ छैन। भाँगक आदत रमाकान्तकेँ पितासँ लागल छेलैन। रमाकान्तक पिता न्यायशास्त्रक विद्वान। ओना, गाममे कम्मे-सम्म रहै छला, बेसी काल बाहरे-बाहर। हुनके प्रभाव रमाकान्तक ऊपर। तँए रमाकान्त जेहने इमानदार तेहने उदार विचारक सेहो। पोखैरक चर्चा करैत रमाकान्त मुसनाकेँ कहलखिन- “काल्हिसँ बौएलालकेँ दोबर बोइन दिहक।” ‘दोबर बोइन’ सुनि मुसना गुम्म भऽ गेल। कनी कालक पछाइत बाजल- “मालिक, एक गोरेकेँ बोइन बढ़ेबै ते दोसरो-तेसरो जन मांगत। ऐसँ झंझट शुरू भऽ जाएत। झंझट भेने काजो बन्न भऽ जाएत।” काज बन्न होइक बात सुनि रमाकान्त उत्तेजित होइत बजला- “काज किए बन्न हएत! जे जेतेक काज करत ओकरा ओते बोइन देबइ।” रमाकान्तक विचारकेँ सभ मुड़ी डोला समर्थन कऽ देलकैन। समर्थन देख गदगद होइत रमाकान्त फेर बजला- “अखन बौएलालकेँ बोइन बढ़ेलौं, बादमे दू बीघा खेतो देबइ। मास्टर साहैब, अहाँ राति-के बौएलालकेँ पढ़ा दियौ। सिलेट-किताबक खरच हम देबइ।” खेतक चर्चा सुनि मुसना रमाकान्तकेँ कहलकैन- “विपन्न तँ बौएलालेटा नहि, गाममे बहुतो अछि?” मुसनाक प्रश्न सुनि रमाकान्तक हृदैमे सत्-जुगक हरिश्चन्द्र पैस गेलैन। उदार विचार, इमानमे गम्भीरता, मनुखक प्रति सिनेह,रमाकान्त बाबूक विवेककेँ घेर लेलकैन। अखन धरि ने सुदिखोर महाजनक चालि आ ने धन जमा करैबला जकाँ अमानवीय बेवहार प्रवेश केने छेलैन। नीक समाजमे जहिना धनकेँ जिनगी नइ बुझि, जिनगीक साधन मानि उपयोग कएल जाइए तहिना रमाकान्तोक परिवारमे रहलैन। जखन रमाकान्तक पिता गाममे रहै छला आ कियो किछु मांगए अबैन तँ खाली हाथ किनको घुरए नै दइ छेलखिन, जे रमाकान्तो देखने। सदिखन पिता कहथिन जे जँ किनको ऐठाम पाहुन-परक अबैन आ ओ किछु मांगए अबैथ तँ जरूर देबैन। किएक तँ ओ गामक प्रतिष्ठा बँचाएब छी। गामक प्रतिष्ठा बेकतीगत नै सामूहिक होइत अछि। तैठाम जँ कियो सोचत जे गाम सबहक छिऐ हमरा ओइसँ कोन मतलब, ओ सोलहन्नी गलती हएत। गाममे अधिकतर लोक गरीब आ मुरुख अछि, ओ ऐ प्रतिष्ठाकेँ नइ बुझैए तँए जे बुझनिहार छैथ हुनकर ई खास दायित्व बनि जाइ छैन। ऐ धरतीपर जेतेक जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ मनुख धरि अछि, सभकेँ जीबैक अधिकार छइ। तँए, जे मनुख केकरो हक छिनए चाहैए ओ ऐ भूमिपर सभसँ पैघ पापी छी। जनकक राज मिथिला छिऐ तँए मिथिलावासीकेँ जनकक कएल रस्ताकेँ पकैड़ चलक चाही। जइसँ ओ प्रतिष्ठा सभदिन बरकरार रहत। ◌ शब्द संख्या : 2338 2. सुखी-सम्पन्न रमाकान्त जेहने उदार तेहने इमानदार समाजमे बुझल जाइ छैथ। मरौसी जमीन तँ बेसी नहि मुदा पिताक अमलदारीमे जत्था बहुत भेलैन। पितो किनने तँ नहियेँ रहथिन मुदा पुरस्कार स्वरूप पैघ-पैघ दरबार सभसँ भेटल छेलैन। मधुकान्त अध्यात्म, वैयाकरण आ न्यायशास्त्रक विद्वान छला। बच्चेसँ मधुकान्तक झूकाउ अध्ययन दिस देख पिता बनारस पढ़ैले पठौलखिन। बनारसमे अध्ययन कऽ मधुकान्त तीन बर्ख काशीक एकटा न्यायशास्त्रक पण्डित ऐठाम अध्ययन केने रहैथ। अध्ययनोपरान्त मधुकान्त पूर्णरूपेण बदैल गेल रहैथ। अध्ययन-अध्यापनक असुविधा दुआरे गाममे मन नै लगैन। ने अपन मनोनुकूल लोक भेटैन आ ने क्रिया-कलापमे सामंजस होइन। तँए जिनगीक अधिक समए गामसँ बाहरे बितबैत रहैथ। जेहने प्रतिष्ठा मधुकान्तकेँ अपना राज्यमे तेहने आनो-आनो राज्यमे रहैन। भारतीय चिन्तनकेँ बुनियादी ढंगसँ व्याख्या करब मधुकान्तक खास विशेषता रहैन। समाजिक बेवस्थाक गुण-अवगुणक चर्च अनेको लेखमे उद्धृत केने छला, जे असुविधाक चलैत अप्रकाशिते रहलैन। तगमा, प्रशस्ति-पत्र टाँगि दरबज्जाक शोभा बढ़ौने छला। जखन गाममे रहै छला तखन सबहक ऐठाम जा-जा समाजिक बेवस्थाक कुरीति बुझबथिन। खास कऽ कर्मकाण्डक। समाजमे सभ चाहैन। अपनो जिनगीक बात दोसरकेँ कहथिन आ दोसरोक जिनगीक अध्ययन करैत रहै छला। छल-प्रपंचक मिसियो भरि गन्ध मधुकान्तक जिनगीकेँ नहि छुलकैन। समाजमे मनुख केना मनुखक जिनगीमे बाधा बनि ठाढ़ अछि आ ओइसँ केना छुटकारा भेटतै, नीक-नहाँति मधुकान्त बुझथिन। सत्तैर जाड़ ऐ धरतीपर कटलैन। सभ दिन चारि बजे रमाकान्त भाँग पीब, पान खा टहलैले निकैल दोसर साँझ धरि घुमि कऽ घरपर अबै छला। घरपर अबिते हाथ-पएर धोइ कऽ दरबज्जापर बैस दुनियाँ-दारीक गप-सप्प करै छला। टोल-पड़ोसक लोक एका-एकी आबि-आबि बैसए। रंग-बिरंगक गप-सप्पक संग चाहो-पान आ हँसियो-मजाक चलैत। मास्टर साहैब–हीरानन्द–आ युवक–शशि शेखर–सेहो टहैल-बुलि कऽ एला। चाह पीब रमाकान्त शशि शेखरकेँ पुछलखिन- “बौआ, अहाँ की चाहै छी?” मजबूरीक स्वरमे शशि शेखर कहलकैन- “एहेन दल-दलमे हम फँसि गेल छी जे एकटा पएर निकालै छी तँ दोसर धँसि जाइए। ऐसँ केना निकलब?” कृषि कौलेजमे प्रवेशक प्रतियोगितामे सफल होइते शशि शेखरकेँ सुखद भविसक ज्योति भेटलैन। बेटाक सफलता सुनि पिताक उत्साह हजार गुना बढ़ि गेलैन, जेते जिनगीमे कहियो नै भेल छेलैन। जहिना काँटक गाछमे अमर-फल[1] फड़ैए, गुलाबक फूल फुलाइए तहिना पछुआएल परिवारमे शशि शेखर भेला। शशि शेखरक पिता मनमे अरोपि लेलैन जे बीत-बीत कऽ खेत किएक ने बीकि जाए मुदा बेटाकेँ कृषि वैज्ञानिक बना कऽ छोड़ब। शशि शेखरोक मनमे पैघ-पैघ अरमान आबए लगलैन। कृषि वैज्ञानिक होएब, नीक नोकरी भेटत, माए-बापक सिहन्ता कमा कऽ पूरा करब। सिरिफ परिवारेक नहि, जहाँ धरि समाजोक भऽ सकत सेवा करब। मुदा बिच्चेमे समए एहेन मोड़पर आनि देलकैन जे सभ अरमान हवामे उड़ि गेलैन। जहिना बीच धारमे नाह चलौनिहारक हाथसँ करूआरि छुटि गेलापर जहिना खेबनिहारक संग नाहपर सवार यात्रीकेँ होइत तहिना शशि शेखरोकेँ भेलैन। चारि सालक कोर्समे तीन साल पुरला पछाइत पिता दुखित पड़लखिन। चारिम सालक पढ़ाइ छोड़ि शशि शेखर पिताक सेवामे जुटि गेला। एक दिस पिताक इलाज तँ दोसर दिस परिवारक बोझ पड़ि गेलैन। आमदनीक कोनो स्त्रोत नहि,मात्र खेतेटा। खेतो बहुत अधिक नहि। तहूमे अदहासँ बेसी बीकिए गेल छेलैन। शशिकेँ बचपनाक बुधि। जिनगी आ दुनियासँ भेँट नहि। छोट बुधिसँ पैघ समस्याक समाधाने नै होइ छेलैन। अन्तमे निराश भऽ खेत बेच-बेच परिवारो आ पितोक इलाज करबए लगला। बीत-बीत कऽ खेत बीकि गेलैन। जहन कि दुनू समस्या[2] बरकरारे रहलैन। पछाइत पितो मरि गेलखिन। वेवश शशि कर्ज करि कऽ पिताक श्राद्ध-कर्म केलैन। दुनियाँमे केतौ इजोत देखबे नै करैथ। सौंसे दुनियाँ अन्हारे-अन्हार लगए लगलैन। बेवस भेल शशि मने-मन सोचए लगला जे हम ट्यूशनो पढ़ा कऽ आगू पढ़ए चाहब मुदा परिवारक की दशा होएत। ओतेक तँ ट्यूशनोसँ नहि कमा सकै छी जे अपनो काज चलाएब आ परिवारो चला लेब। अधिक कमाइले अधिक समैयो लगबए पड़त जे सम्भव नइ अछि। अगर जँ सभटा समए ट्यूशनेमे लगा देब तखन अपने कखन पढ़ब आ क्लास केना करब? जहियासँ पिता मुइला तहियासँ माइयोक देह सोगसँ हहरले जा रहल छैन। एक तँ बुढ़ छैथ दोसर सोगसँ सोगाएल सेहो। मनुखमे जन्म लेलापर कियो माए-बापक सेवा नै करए तखन ओ मनुखे की। मनुखक मात्र नकल छी। हम से नै करब। चाहे दुनियाँक लोक नीक कहए वा अधला तेकर हमरा गम नइ अछि। डिग्री लऽ कऽ हम नीक नोकरी करब। नीक दरमाहा भेटत। जइसँ खाइ-पीबै, ओढ़ै-पहिरै आ रहैक सुविधा तँ भेटत, मुदा जिनगी तँ ओतबे-टा नइ अछि। जिनगी-ले ज्ञान, कर्म आ बेवहारक जरूरत सेहो होइए। जिनगी पाबि जँ मनुख प्रतिष्ठित नहि बनि सकल तँ ओ जिनगीए की। आइ जँ हम माएकेँ छोड़ि दिऐन आ हुनका जे कष्ट हेतैन ओइ कष्टक भागी के बनत? दिन-राति हुनका सेवाक जरूरत छैन,उठौनाइ-बैसोनाइसँ लऽ कऽ खुऔनाइ-पिऔनाइ धरि। हम सभ ओइ धरतीक सन्तान छी जैठाम श्रवणकुमार सन बेटा जन्म लऽ चुकल छैथ। यएह विचार शशि शेखरक पढ़ाइ छोड़ौलकैन। दुनियाँमे कोनो सहारा नै देख शशि रमाकान्त ऐठाम एला। अपन जीवनक सभ बात हीरानन्दकेँ कहलखिन। शशिक बातसँ हीरानन्दक हृदए पघिल गेल छेलैन। हीरानन्द मने-मन सोचैत रहैथ जे जे नवयुवक देश सेवामे एकटा खुट्टाक काज करत ओ अपने नष्ट भऽ रहल अछि, तँए ओहेन युवककेँ सोंगर लगा ठाढ़ करैक जरूरत अछि। सोझमतिया रमाकान्त दोहरबैत शशिकेँ पुछलखिन- “नीक जकाँ अहाँक बात हम नइ बुझि सकलौं?” बिच्चेमे मास्टर साहैब रमाकान्तकेँ बुझबैत बजला- “शशि महाग संकटमे फँसि गेल छैथ। हिनका अहींक मदैतक जरूरत छैन तखने ई उठि कऽ ठाढ़ हेता।” मास्टर साहैबक बात सुनि धाँइ-दे रमाकान्त बजला- “अगर हमर मदैतसँ शशिकेँ कल्याण हेतैन तँ जरूर करबैन।” रमाकान्तक अश्वासनसँ शशिक हृदैमे भोरक सुरूज देख दिनक आशा जगलैन। शशिक मुहसँ हँसी फुटलैन। जिनगीक आमावश्या पूर्णिमामे बदलए लगलैन। गम्भीर भऽ हीरानन्द शशिकेँ कहलखिन- “शशि, चिन्ता छोड़ू। नव जिनगी दिस डेग उठाउ। ई कर्मभूमि छिऐ। ऐठाम कर्मनिष्ठे लोक मनुखक जिनगी पाबि सकैए।” हीरानन्दक विचार सुनि शशि उठि कऽ ठाढ़ भऽ हुनक हाथ पकैड़ जिनगी भरिक मित्रताक व्रत लैत बजला- “जहिना कोनो रोगाएल गाछकेँ माली तामि-कोरि पानि दऽ पुनः नव जिनगी दइए तहिना अहाँ दुनू गोरे हमरा देलौं। तइले हम ऋणी छी। जहाँ धरि भऽ सकत सेवा करैत रहब।” शशिक विचार सुनिते रमाकान्तक हृदैमे कर्णक रूप सन्हिया गेलैन। खुशीसँ गदगद होइत बजला- “बौआ, हम तँ पढ़ल-लिखल नइ छी। पिताजी गाममे नै रहै छला तँए परिवार सम्हारए पड़ै छल। ओना, कोनो वस्तुक अभाव जिनगीमे ने पहिने भेल आ ने अखन अछि। जहिया पिताजी गाम अबै छला तहिया बुझा-बुझा कऽ कहै छला। अखनो मनमे वएह विचार अछि।” रमाकान्तकेँ दूटा बेटा, दुनू डाक्टरी पढ़ि मद्रासमे नोकरी करै छैन। कहियो काल दू-एक दिन-ले गाम अबै छैन। दुनू भाँइ मद्रासेमे बिआहो कऽ नेने छथिन। दुनू पुतोहुओ डाक्टरे छथिन। एक परिवारमे चारि डाक्टर, तँए आमदनियो नीक छैन। दस बर्खक नोकरीमे कमा कऽ ढेर लगा नेने छैथ। अपन तीन मन्जिला मकान मद्रासेमे बनौने छैथ। चारिटा गाड़ी सेहो रखने छैथ। अपन क्लिनिक सेहो बनौने छैथ। बेटा लग जाइक विचार रमाकान्त बहुत दिनसँ करै छैथ मुदा दुरस्तक दुआरे निआरिए कऽ रहि जाइ छैथ। पुनः रमाकान्त बजला- “पोखैरोक काज सुढ़िआइए गेल अछि ओकरा सम्पन्न कऽ कऽ मद्रास जाएब। मद्राससँ एला पछाइत अहाँक सभ जोगार कऽ देब। ताधैर अहाँ पत्नियोँ आ माइयोकेँ अहीठाम लऽ अबियौन आ एतै रहू।” बेरू पहर हीरानन्द आ शशि शेखर टहलैले निकलला। दरबज्जाक सोझे पोखैरक महारक निच्चाँ, उत्तर-पूब कोणमे एकटा भरिगर सरही आमक गाछ अछि। दुनू गोरे ओइ गाछक निच्चाँक दुबिपर बैस गप-सप्प करए लगला। हीरानन्द अपन खेरहा कहए लगलैन- “मैट्रिक पास केला पछाइत मास्टरी-ले इन्टरभ्यू दइले गेलौं। जखन ओइठाम गेलौं आ देखलिऐ तँ बुझि पड़ल जे इन्टरभ्यू मात्र देखाबा अछि। मोल-जोल तेजीसँ चलैत रहइ। मुदा सोझे घुमियो जेनाइ उचित नइ बुझि रूकि गेलौं। मनमे आएल जे मोल-जोलक विरोध करी। संगी भँजियाबए लगलौं। मुदा मोल-जोलक पाछू सभ लागल। एक्को गोरे संग दइबला नहि, मनकेँ असथिर केलौं। फेर भेल जे विरोध कऽ हंगामा ठाढ़ कए दिऐ। मुदा दुनू पक्ष एक दिशाहे, सिरिफ हमहींटा कातमे। तामसे देह थरथर कँपैत छल। लाभ-हानिक हिसाब जोड़ी तँ हानियेँ बेसी बुझि पड़ल। मुदा मन तैयो मानैले तैयार नै हुअए। हुअए जे जे बहालीक ऊपरका सीढ़ीपर जे अछि ओकरा चारि धौल लगा दिऐ। दस दिन जहलेमे रहब। फेर हुअए जे जखन डिग्री आ योग्यता अछि तखन एहेन-एहेन नोकरी केतेको आएत जाएत। फेर हुअए जे हजारो नवयुवक देशक आजादी-ले खून बहौलैन। हमरा बुते एतबो ने हएत। ..समुद्रक लहैर जकाँ मनमे संकल्प-विकल्प उठैत आ शान्त होइत रहल। सभ कियो चलि गेल। हम असगरे रहि गेलौं। अचता-पचता कऽ विदा भेलौं। डेगे ने उठै छल मुदा तैयो घरपर एलौं। घरपर अबिते पत्नी बुझि गेली। मुदा आशा जगबै दुआरे लोटामे पानि नेने आगू आबि कहलैन- “थाकि गेल हएब। हाथ-पएर धोइ लिअ, थाकैन कमि जाएत। जलखै नेने अबै छी।” ..जाबे हम पएर-हाथ धोलौं ताबे थारी नेने पत्नी पहुँचल छेली। पहिनहिसँ जलखैक ओरियान करि कऽ रखने रहैथ। जलखै खा,दरबज्जेक चौकीपर कुरता खोलि कऽ रखि देलिऐ आ बाँहिक सिरमा बना पड़ि रहलौं। पड़िते मनमे ढेरो रंगक विचार सभ आबए-जाए लगल। मुदा दू तरहक विचार सोझमे आबि गेल जेना ठाढ़ भऽ गेल। पहिल जे शिक्षकेक बहालीटा-मे घूसखोरी छै आकि सभ विभागमे अछि? ..आँखि उठा-उठा सभ दिस देखए लगलौं तँ बुझि पड़ल जे अहूसँ बेसी आन-आनमे अछि। जखन सभ विभागमे घूसखोरी अछि तखन देश आगू-मुहेँ केना ससरत? निच्चासँ ऊपर धरि एक्के रोग सगतैर पकड़ने अछि! ..मन औना गेल। औनाइत मनमे दोसर विचार उपकल। मनकेँ असथिर केलौं कि अनासुरती आएल- जहिना पुरबा-पछबा हवा धरतीसँ अकास धरि बहैए तहिना ई बेवस्थाक हवा छी। तँए एकरा बदलैक एक्केटा रस्ता अछि बेवस्था बदलब। मुदा बेवस्था बदलब छौरा-छौरीक खेल नइ छी। कठिन काज छी। बेवस्था सिरिफ लोकक चालिए-ढालि धरि सीमित नइ अछि। ओ अछि मनुखक चालि-ढालिसँ लऽ कऽ ओकर बुधि-विचार, संगे विवेक धरिमे। मनुखकेँ जेहेन बुधि रहै छै ओहने विचार मनमे अबै छै आ जेहेन विचार मनमे अबै छै तेहने ओ काज करैए। तँए जाधैर मनुखक बुधि नहि बदलत ताधैर ओकर क्रिया-कलाप नहि बदैल सकैए। जाधैर क्रिया-कलाप नहि बदलत ताधैर बेवस्था बदलब मात्र बौद्धिक व्यायाम हएत। तँए जरूरत अछि मनुखमे नव बुधिक सृजन कऽ नव क्रिया-कलाप पैदा करब। नव क्रिया-कलाप एलापर नव रस्ता बनत। नव रस्ता बनला बादे कियो नव स्थानपर पहुँचत। नव जगह पहुँचलापर मनुख मनुखक बराबरीमे औत, छोट-पैघ-धनीक-गरीब आ ऊँच-नीचक खाधि समतल हएत। ..तखन भक्क खुगल। भक्क खुजिते हाइ स्कूलक शिक्षक देवेन्द्र बाबू मन पड़ला। देवेन्द्र बाबू, सदिखन छात्र सभकेँ कहथिन- “मनुखकेँ कखनो निराश नै हेबा चाहिऐ। जखने मनुखमे निराशा अबै छै तखने मृत्यु लग चलि अबै छइ। तँए सदिखन आशावान भऽ जिनगी बितेबाक चाहिऐ। कठिनसँ कठिन समए किएक ने आबए मुदा विवेकक सहारा लऽ कऽ सदिछन आगू डेग उठबैत रहक चाहिऐ।” ..देवेन्द्र बाबूक विचार मन पड़िते संकल्प लेलौं, जहन शिक्षक बनैले डेग उठेलौं तँ शिक्षक बनि कऽ रहब। चाहे जेते विघ्न-बाधा आगूमे उपस्थित हुअए। ..जखन देवेन्द्र बाबू कौलेजमे पढ़ैत रहैथ तखन आजादीक आन्दोलन देशमे उग्र रूप धेने छल। पाँच-सातटा संगीक संग देवेन्द्र बाबू पोस्ट ऑफिसमे आगि लगा देलखिन। पोस्ट-ऑफिस जरि गेलइ। तीन दिनक पछाइत हुनका पुलिस पकैड़ लेलकैन। मारबो केलकैन आ जहलो लऽ गेलैन। जहल जाइसँ पहिने कनी डरो होइ छेलैन। लोकक मुहेँ सुनने रहथिन जे जहलमे खाइले नै दइ छइ। ऊपरसँ दुनू साँझ मारबो करै छइ। मुदा जहलक भीतर गेलापर देखलखिन जे हजारो देशप्रेमी-क्रान्तिकारी जहलमे छैथ। हुनका सभ-ले जेहने घर तेहने जहल। एक बर्ख ओहो जहलमे रहला। ओइ बर्ख दिनमे ओ बहुत सिखलैन। जिनगीए बदैल गेलैन। आब देवेन्द्र बाबू सिरिफ अपने आ अपना परिवारेटा-ले नइ सोचै छैथ, बल्कि ओ बुझि गेला जे देशक अंग समाज आ समाजक अंग बेकती वा परिवार होइए। तँए, सभकेँ अपनासँ लऽ कऽ देश धरिक सेवा करैक चाहिऐ। जहलसँ निकैल बी.ए.क फार्म भरलैन। बी.ए. पास केलापर हाइ स्कूलक शिक्षक बनला। हाइ स्कूलमे बहुतो शिक्षक छला मुदा हुनकर जिनगी भिन्न छेलैन। खानगी पढ़ौनीकेँ पाप बुझि किलासमे तेना पढ़बै छला जे विद्यार्थीकेँ ट्यूशन पढ़ैक जरूरते ने रहै छेलइ। स्कूलक पजरेमे टटघर बना असगरे रहै छला। महिनामे एक दिन गाम जा बालो-बच्चाकेँ देखैथ आ दरमहो उठा परिवारमे दऽ अबथिन।” चौकीपर हीरानन्द पड़ले रहैथ आकि एकटा अनठिया आदमी पहुँचला। ओ नै चिन्हलखिन। मुदा दरबज्जाक लाज रखैले आँगनसँ एक लोटा पानि आनि पएर धोइ कऽ बैसैले कहि आँगन जा पत्नीकेँ कहलखिन- “एकटा अतिथि एला हेँ, तँए झब-दे चाह बनाउ।” दरबज्जापर आबि हीरानन्द ओइ आदमीक नाओं-गाओं पुछलखिन। नाओं-गाओं पुछि काजक गप उठैबते रहैथ कि आँगनसँ पत्नी हाथक इशारासँ चाह लऽ जाइले कहलकैन। गपकेँ विराम दैत हीरानन्द दुनू हाथमे चाहक गिलास लऽ दरबज्जापर आबि दहिना हाथक गिलास अतिथिकेँ देलखिन आ बामा हाथक गिलास दहिना हाथमे लऽ अपनो पीबए लगला। गप्पो चलैत आ चाहो पीबैत रहैथ तँए पीबैमे देरी लगलैन। चाह सठलो ने छेलैन कि आँगनसँ पत्नी जलखैक इशारा देलखिन। पत्नीक इशारा देख हाथेक इशारासँ थोड़े काल बिलैम जाइले कहलखिन। ..चाह पीब लगले जलखै करब नीक नै होइए। हँ, चाह पीबैसँ पहिने जलखै नीक होइ छइ। चाह पीब पान खा दुनू गोरे गप-सप्प करए लगला। अतिथिकेँ हीरानन्द पुछलखिन- “केमहर-केमहर अहाँ एलौं?” “एकटा बुढ़ हमरा गाममे छैथ। समाजिक सम्बन्धे दादी हेती। बिधवा छैथ। बेटो नै छैन। हुनक विचार भेलैन जे बच्चा सभकेँ पढ़ैले एकटा स्कूल बनाबी। चारि बीघा खेत छैन। समाजोक सभ आग्रह केलकैन जे सम्पैत तँ राइ-छित्ती भाइए जाएत, तइसँ नीक जे स्कूल बना दियौ। अखन ओ दू बीघा खेत स्कूलमे देथिन आ दू बीघा अपना-ले रखती। जखन दादी मरि जेती तखन चारू बीघा स्कूलेक हेतइ।” धियानसँ अतिथिक बात सुनि मुस्कियाइत हीरानन्द बजला- “बडड् नीक विचार छैन।” “ओइ स्कूलकेँ चलबैले अहाँकेँ कहए अएलौं।” “जरूर जाएब। राति एतै बीता लिअ। भोरे चलब।” “कोसे भरि तँ अछि दोसर साँझ धरि पहुँच जाएब?” “एते धड़फड़ाउ नहि, हमहूँ थाकल छी। भोरे चाह पीब दुनू गोरे चलब।” हीरानन्दक आग्रह अतिथि मानि गेला। अँगनाक टाट लगसँ पत्नी दुनू गोरेक सभ बात सुनैत रहथिन। दुनू गोरे तमाकुल खा लोटा लऽ मैदान दिस विदा भेला। घुमैत-फिरैत साँझमे घरपर एला। घरपर आबि दरबज्जापर बैस दुनू गोरे गप-सप्प करए लगला। भानस भेल, दुनू गोरे खा कऽ सुति रहला। चारि बजिते दुनू गोरेक नीन टुटि गेलैन। जाबे पैखानासँ आबि दतमैन केलैन ताबे आरती[3] चाह बनौलैन। चाह पीबते रहैथ कि सुरूजक उदय भेल। औझुका सुरूजमे एक विशेष रंगक आकर्षण तीनू गोरेकेँ बुझि पड़लैन। सुरूजक रोशनीमे विशेष आकर्षण छल आकि सबहक हृदैमे छेलैन..? ..आरतीक मनमे होइ छेलैन जे पति नोकरी करए जा रहल छैथ तँए विशेष आकर्षण। हीरानन्दक हृदैमे जिनगीक एक सीढ़ी बढ़ैक आकर्षण रहैन आ अतिथि-मटकन-क हृदैमे अपन बेटाक पढ़ैक आकर्षण। चाह पीब हीरानन्द झोरामे धोती-तौनी लऽ दुनू गोरे गप-सप्प करैत विदा भेला। गप-सप्पक क्रममे बुझि पड़लैन जे स्कूल बनबैमे रमाकान्तक विशेष हाथ छैन। तँए गाम पहुँचते मटकनकेँ कहलखिन- “पहिने रमाकान्तसँ भेँट कऽ लेबैन तखन दादी ऐठाम जाएब।” दुनू गोरे रमाकान्त ऐठाम पहुँचला। साठि वर्षीय रमाकान्त गाइक नादिमे कुट्टी-सानी लगबैत रहैथ। दलानपर दुनू गोरेकेँ देख हाँइ-हाँइ हाथ धोइ लग आबि, बैसैले कहलखिन। हीरानन्द चौकीपर बैसला मुदा मटकन ठाढ़े रहल। मटकनकेँ रमाकान्त कहलखिन- “तूँ आगू बढ़ि जाह। हम दुनू गोरे पाछूसँ अबै छी। जहन मास्टर साहैब दुआरपर एला तँ बिना जलखै करौने केना जाए देबैन..?” मटकन आगू बढ़ि दादी लग पहुँच सभ समाचार सुनौलक। समाचार सुनि दादीक मन खुशीसँ नाचि उठलैन। मनमे हुअ लगलैन जे आब गामक बच्चा अन्हारसँ इजोत दिस बढ़त। जलखै कऽ चाह पीब रमाकान्त आ हीरानन्द दादी ऐठाम विदा भेला। दादीक घर थोड़बे हटल। रस्तामे रमाकान्तक मनमे आबए लगलैन जे स्कूल तँ बेकतीगत संस्था नइ छी। समाजिक छी। समाजिक संस्थामे सबहक सहयोग हेबा चाही। धैनवाद भौजीकेँ दइ छिऐन जे अपन सभटा सम्पैत समाजकेँ दऽ रहल छथिन। मुदा हमरो सबहक तँ किछु दायित्व बनैए। तँए अइले किछु करब जिम्मा भऽ जाइए। मास्टर साहैबक भोजन आ रहैक जोगार हम कऽ देबैन। दरमाहा रूपमे खेतक उपजा हेतैन आ समाजक सभ मिलि कऽ जँ स्कूलक घर बना दइ तँ सर्वोत्तम होएत। ..एते बात मनमे नचिते छेलैन कि दादी ऐठाम पहुँच गेला। दादीकेँ रमाकान्त भौजी कहै छथिन। किएक तँ समाजिक सम्बन्धमे दादीक पतिसँ भैयारी रहैन। दादियो मास्टर साहैबक रस्ता तकै छेली। ..भौजी ऐठाम पहुँचते रमाकान्त मटकनकेँ कहलखिन- “मटकन, स्कूल गामक एक पैघ संस्था छी। तँए समाजो-लोककेँ खबर दहुन। सभ मिलि कऽ विचारि आगूक डेग उठाएब। ओना,भौजीक तियागक प्रशंसा जेते कएल जाए कम हएत। जइ सम्पैत-ले लोक नीच-सँ-नीच काज करैले उतैर जाइए ओइ सम्पैतक तियाग भौजी कऽ रहली अछि। जखन मास्टर साहैब आबिए गेल छैथ तखन हड़बड़ करैक जरूरत नहि। पहिने सौंसे गाममे सभकेँ कहि दहुन आ बेर-मे सभ कियो एकठाम बैस विचारि लेब।” बेर टगि गेल। समाजक सभ एका-एकी आबए लगला। सबहक मनमे जिज्ञासा रहैन तँए सभ विशेष उत्सुक छला। सबहक बीचमे रमाकान्त बजला- “समाजक सभ जनिते छी जे भौजी अपन सभटा सम्पैत बच्चा सभ-ले दऽ रहल छैथ। जइसँ हमरे अहाँक कल्याण हएत। मुदा हमरो अहाँक दायित्व बनैए जे हमहूँ सभ किछु भागीदार बनी। जाधैर हम जीबैत रहब ताधैर शिक्षकक रहैक आ भोजनक प्रबन्ध करैत रहबैन। अहाँ सभ स्कूलक घर बना दियौ।” रमाकान्तक विचारकेँ सभ थोपड़ी बजा समर्थन कऽ देलखिन। मुस्कियाइत हीरानन्द बजला- “घर बनैमे किछु समए लगत, तैबीच अहाँ सभ अपन-अपन बच्चाकेँ पठाउ। हम पढ़ाइ शुरू कऽ देब।” मास्टरो साहैबक विचारकेँ सभ थोपड़ी बजा समर्थन कऽ देलकैन। थोपड़ी बन्न होइते दुखिया ठाढ़ भऽ अपन विचार रखैत बाजए लगल- “खेती करैले केतए-सँ ओते हर-जन अनता। जेते बोनिहार छी सभ मिलि कऽ खेती कऽ देबैन। किएक तँ जहिना मास्टर साहैब हमरा सबहक सेवा करता तहिना तँ हमहूँ सभ मिलि कऽ हुनकर सेवा करबैन।” ◌ शब्द संख्या : 2694 3. छह माससँ सोनेलालक स्त्री अस्सक छथिन। परोपट्टाक डाक्टर, बैद, हकीम आ ओझा-गुनी थाकि गेल मुदा सुगियाक रोग एक्कैसे होइत गेलै जे उन्नैस नइ भेल। फेदरैत-फेदरैतमे सोनेलाल पड़ल। दिन-राति एक्को क्षण मन चैन नहि। कखनो डाक्टर ऐठाम तँ कखनो दबाइ आनए बजार दौड़ैत रहला। कखनो बच्चा-ले दूध आनए जाथि तँ कखनो माल-जालकेँ खाइ-पीबैले दइ छला। अपन खाइयो-पीबैक सुधि नै रहलैन। कखनो मनतरियाकेँ बजा अनैथ, तँ कखनो साँढ़-पाराकेँ रोमैले खेत जाइ छला। स्त्री मरैक ओते चिन्ता नहि जेते तीन बेटीपर सँ भेल चारिम बेटाक रहैन। कोरैले बेटा जनमै काल सुगियाकेँ दुख पकैड़ लेलकैन। बच्चा जनमै काल तेहेन समए भऽ गेल छेलै जे सोनेलाल डाक्टर ऐठाम नै जा सकला। एक तँ जाड़क मास, दोसर अनहरिया राति। कनी-कनी पछिया हवा सिहकैत। बर्खाक बुन्न जकाँ टप-टप गाछ सभपर सँ पालाक बुन्न खसैत। समए देख सोनेलाल बेवस भऽ गेला। पल्हैनक घर लगमे रहितो बजबए गेल नहि भेलैन। डरो होइत रहैन जे हम ओमहर जाइ आ एमहर हिनका किछु भऽ जाइन। गुप-गुप अन्हार। हाथ-हाथ नइ सुझैत। विचित्र संकटमे सोनेलाल पड़ि गेल छला। जहियासँ बच्चाक जनम भेलै आ स्त्री बिमार पड़लैन, तहियासँ सोनेलालक कोनो दशा बाँकी नै रहलैन। मुदा सोनेलालो हिम्मत नै हारला। जे कियो जे दबाइ वा प्रतिकारक कोनो वस्तुक नाओं कहैन ओ आनि सोनेलाल सुगियाकेँ देथिन। अन्तमे पाँच कट्ठा खेत पाँच हजारमे भरना लगा लहेरियासराय जाइक विचार कऽ लेलैन। बच्चो सभ छोट-छोट तँए घरो आ बाहरो सम्हारैले आदमीक जरूरत भेलैन। घर सम्हारैले सारि आ लहेरियासराय जाइले बहिनकेँ बजौलैन। स्त्रीक दूध सुखि गेलैन तँए बच्चाकेँ बकरीक दूध उठौना केने छला। बहिनक छोटका बच्चा नमहर भऽ गेल छेलै तँए ओकरो दूध सुखि गेल। मुदा बच्चाक दशा देख बहिन मौसरी दालिक झोड़ो पीबए लगल आ बच्चोकेँ छाती चटबए लगल, जइसँ कनी-कनी दूध पोनगए लगलै। लहेरियासराय जाइक तैयारीमे सोनेलाल लगि गेला। मालक घरमे टाँगल खाटकेँ उताइर झोल-झाल झाड़ए लगला। खाटक झोलो साफ केलैन आ केतौ-केतौ जे जौड़ टुटल रहै ओकरो जोड़ि-जोड़ि बन्हलैथ। बहिनकेँ सोनेलाल कहलखिन- “दाइ, नुआ बिस्तर आइए खिंच लएह, भोरके गाड़ी पकैड़ कऽ चलैक छह। दस दिन-जोकर चाउरो-दालि लैये लेब। चाउर तँ कोठीएमे छह, खाली दालि दर्ड़रए पड़तह। सभ ओरियान आइए कऽ कऽ रखि लएह।” बहिन कहलकैन- “भैया, तोहर कोन-कोन कपड़ा साफ कऽ देबह?” “दाइ, एक जोड़ धोती, अँगा आ चद्दैर हम्मर आ तूँ अपनो कपड़ा खिंच लीहह। अखन तँ एकटा धोती पहिरनहि छी। अलगन्नीपर धोती छह, ओकरा अखने खिंच दहक जइसँ नहाइ बेर तकमे सुखि जाएत। नहा कऽ ओकरा पहिर लेब आ पहिरलहा धोतीकेँ खिंच लेब।” सोनेलालक सारि सेहो लगेमे ठाढ़। सारिकेँ कहलखिन- “अहाँ दुआर-दरबज्जासँ केतौ बाहर नै जाएब। अँगने-घरमे बच्चो सभकेँ रखब आ मालो-जालकेँ खाइ-पीबैले देबइ। समए साल खराप अछि, तोहूमे ऐ गाममे देखते छिऐ जे नव-कबरिया छौरा सभ भाँग-गाँजा पीब लेत आ अनेरो लोककेँ गरियबैत रहत। जँ कियो उकट्ठे कऽ दिअए।” बहिन कोठीसँ मौसरी आ चाउर निकालि अँगनेमे बिछानपर सुखैले देलक। नवकुटुए चाउर तँए सूरा-फाड़ा नहियेँ लगल छेलइ। बहिन कपड़ा खिंचए गेल आ सारि मौसरी दर्ड़ए लगली। सोनेलाल खाट ठीक कऽ दूटा बरहा दुनू भागक पाइसमे बन्हलैन। कपड़ा खिंच बहिन सोनेलालकेँ पुछलकैन- “भैया, केते चाउर-दालि लऽ जेबहक?” “दाइ, दुइए गोरे खेनिहार रहब ने, तइ हिसाबसँ चाउरो आ दालियो लऽ लेब। तीमन-तरकारी ओतै किनब।” बहिन- “भैया, नून तँ ओतौ कीनि लेब मुदा मिरचाइ, हरदी आ करुतेल एतैसँ नेने जाएब। एकटा थारी, एकटा लोटा आ दुनू छोटकी डेकची सेहो लैये लेब। डेकचीए-मे सभ समान लऽ लेब, किएक तँ फुट-फुट कऽ लेलासँ अनेरे नमहर मोटरी भऽ जाएत। खाइयोक चीज-वौस रहत आ लत्तो-कपड़ा रहत मुदा तैयो मोटरी नम्हरे भऽ जाएत।” सोनेलाल- “मोटरी नम्हरे हएत तँ की करबै। जखन गाड़ामे ढोल पड़ल अछि तखन तँ बजबै पड़त किने।” लहेरियासराय जाइक तैयारी करैत बहिन मने-मन सोचैत जे भगवान भारी विपैतमे भैयाकेँ फँसा देलखिन। जँ कहीं भौजी मरि जेतै तँ भैया फटो-फन्नमे पड़ि जाएत। असगरे की करत। बच्चो सभ लिधुरिए छइ। केना खेती सम्हारत, धिया-पुताकेँ देखत आकि माल-जालकेँ देखत! हे भगवान! एहेन विपैत सात-घर मुद्दैयोकेँ नै दिहक। हमहीं की करबै। हमहूँ तँ असगरूए छी। हमरो चारिटा धिया-पुता आ माल-जाल अछि। छी ऐठीम आ मन टाँगल अछि गामपर। मुदा एहेन बेरमे जँ भैयोकेँ नै देखबै तँ लोक की कहत। लोके की कहत, अपने मनमे केहेन लगत..! साँझ पड़िते सोनेलाल टीशन जाइले दूटा जन ताकए गेला। ओना तँ अपनो दियाद-वाद छैन मुदा बेरपर केकर के होइ छइ। अचताइत-पचताइत सोनेलाल फुद्दिया ऐठाम पहुँचला। फुद्दियाक जेहने नाओं तेहने काज। सोनेलालकेँ देखते पुछलकैन- “केमहर-केमहर एलह, भाय?” “तोरेसँ काज अछि।” “की?” “काल्हि, भोरका गाड़ी पकड़ब। रेखिया माएकेँ लहेरियासराय लऽ जेबइ। अपनेसँ चलैयो-फिरैवाली ने अछि, खाटपर लऽ जाए पड़त। तँए दू गोरेक काज अछि।” फुद्दिया बाजल- “तोरा जँ हमर खूनक काज हेतह तँ हम सेहो देबह। तोहर उपकार हम जिनगी भरि नै बिसरब। हमरा ओहिना मन अछि जे बेटी विदागरी करैले तीन दिनसँ जमाए बैसल रहैथ आ कपड़ा दुआरे विदागरी नै करिऐ। मगर जहिना आबि कऽ तोरा कहलियह तहिना तोहूँ रूपैआ निकालि कऽ देने रहह। एहेन उपकार हम बिसैर जाएब।” सोनेलाल- “समाजमे अहिना सबहक काज सभकेँ होइ छै आ होइत रहतै। जँए तोरापर भरोस छल तँए ने एलौं। भोरेमे गाड़ी छइ। गाड़ी अबैसँ एक घन्टा पहिने घरपर सँ विदा हएब।” “बड़ बढ़ियाँ, चारिए बजेमे हमरा सभ दिन नीन टुटि जाइए। हम दुनू भाँइ चलि एबह। तोहूँ अपन तैयारीमे रहिहह। भऽ सकैए जे कहीं नीन नै टुटए तँए एक लपकन चलि अबिहह।” फुद्दी ऐठामसँ आबि सोनेलाल बहिनकेँ कहलखिन- “दाइ, सभ चीज एकठीन सेरिया कऽ रखि लएह, नहि तँ जाइ काल हड़बड़मे छुटि जेतह।” सोनेलालक बात सुनि बहिन मने-मन सोचए लगल जे कोनो चीज छुटि तँ ने गेल। गुनधुन करैत बाजल- “भैया, एक बेर फेरसँ सभ चीजक नाओं कहि दएह। अखने मिला कऽ सेरिया लेब।” दुनू भाए-बहिन एक-एक करि कऽ सभ वस्तुक नाओं लेलैन। सभ वस्तु देख सोनेलाल बहिनकेँ कहलखिन- “दाइ, चारि बजे उठैक अछि जँ भानस भऽ गेलह तँ अखने खाइले दऽ दएह।” हाथ-पएर धोइ कऽ सोनेलाल खाइले बैसला। चिन्तित मन, तँए खाएले ने होनि मुदा तैयो जी-जाँति कऽ कहुना-कहुना चारि कौर खेलैथ। खा कऽ मालऽ घर गेला। माल-जालकेँ खाइले दऽ आबि कऽ सुति रहला। बहिनो खा कऽ बच्चाकेँ छाती लगा सुति रहल। सुतले-सुतल बहिन भौजाइकेँ पुछलक- “भौजी, मन नीक अछि किने?” “हँऽऽ।” ओछाइनपर पड़ल सोनेलालकेँ नीने ने होइन। विचित्र द्वन्द्वमे पड़ल छला। एक दिस भोरे उठै दुआरे सुतए चाहैथ तँ दोसर दिस पत्नीक चिन्ता नीनकेँ आबै ने दैन। कछ-मछ करैत सोनेलालकेँ केत्ता-रातिमे हाँफी भेलैन, नीन एलैन। मुदा लगले चहा कऽ उठि बहिनकेँ पुछलखिन- “दाइ, भोर भऽ गेल?” बहिनो जगले छल, बाजल- “भैया, अखने तँ खा कऽ कड़ देलौं हेन। लगले भोर केना भऽ जेतइ?” तीन बजे दुनू भाँइ फुद्दिया आबि डेढ़ियापर सँ सोर पाड़लक- “सोनेलाल भाय? हौ सोनेलाल भाय? अखन तक सुतले छह? उठह-उठह, भुरूकबा उगि गेलह!” फुद्दियाक अवाज सुनि दुनू भाए-बहिन धड़फड़ा कऽ उठल। आँखि मिड़िते सोनेलाल बाहर निकैल फुद्दीकेँ कहलखिन- “की कहियह, बड़ी रातिमे नीन भेल। भने तूँ आबि कऽ जगा देलह। हम चीज-वौस निकालै छी आ तूँ खाटकेँ सुढ़ियाबह।” अन्हारक दुआरे बहिन दूटा डिबिया नेसलक। एकटा डिबिया ओसारक खुट्टा लग रखलक आ दोसर- घरमे। खाट निकालि फुद्दी पाइसमे बान्हल बरहाकेँ अजमा कऽ देखलक जे सक्कत अछि किने। दुनू कात पाइसमे बान्हल बरहाकेँ देख फुद्दी सोनेलालकेँ कहलकैन- “भाय, बरहा तँ ठीक अछि। बाँसक टोन कहाँ छह?” बाँसक टोन घरक पँजरेमे राखल। टोनकेँ ओंगरीसँ देखबैत सोनेलाल कहलखिन- “हइ-वैह छह।” टोन आनि फुद्दी डिबियाक इजोतमे देखए लगल जे गिरह सभ छीलल छै कि नहि। छीलल छेलइ। खाटपर बिछबैले सोनेलाल एक पाँज पुआर आनि बजला- “फुद्दी, तोरा अँटियबैक लूरि छह कनी पुआर सेरिया कऽ चौरस कऽ कऽ बिछा दहक।” पुआरकेँ सेरिया, फुद्दी बाजल- “भाइ, ऐपर बिछेबहक की?” सोनेलाल घरसँ शतरंजी आ सिरमा आनि फुद्दीकेँ देलखिन। बिछान सेरिया फुद्दी बाजल- “भाय, रस्तामे कान्ह बदलै काल कहीं भौजी गिर-तिर ने पड़ैथ तँए पँजरोमे दुनू भागसँ डोरी बान्हि देबइ?” फुद्दीक विचार सोनेलालकेँ जँचलैन। कनी गुम्म भऽ बजला- “की कहियह फुद्दी, दुख पड़लापर मनो वौआ जाइ छइ। तोहूँ की अनाड़ी छह जे नइ बुझबहक। जे नीक बुझि पड़ह, से करह।” खाटपर रोगीकेँ चढ़ा दुनू भाँइ फुद्दी कान्हपर उठौलक। कान्हपर उठैबते सोनेलालकेँ मन पड़लैन, बजला- “फुद्दी, घरमे तँ धिए-पुते रहत, कियो चेतन नहियेँ अछि। सारि सेहो आएल अछि, ओहो अनठीए अछि तँए तूँ राति-के एतै खैहह आ सुतिहह।” ‘बड़ बढ़ियाँ’ कहि फुद्दी आगू बढ़ल। चाउर-दालि आ बरतन-बासनक मोटरी माथपर लऽ सोनेलालो निकलला। बच्चाकेँ छाती लगौने बहिनो निकलली। डेढ़ियापर अबिते सुगिया खाटेपर सँ बजली- “कनी अँटैक जाउ।” फुद्दी ठाढ़ भऽ पुछलकैन- “किए रोकलौं?” खाटेपर सँ सुगिया बजली- “हे साधु-गुरु, अगर निकेना घुमि कऽ आएब तँ पचास मुरतेक भनडारा करब।” फुद्दी खाट उठा विदा भेल। रस्तामे कियो किछु ने बजैत। मने-मन सभ, सभ रंगक बात सोचैत। फुद्दी सोचैत जे भगवानो केहेन बेइमान अछि जे सोनेलाल भाय सन सुधा आदमीकेँ एहेन विपैत देलखिन। सोनालाल सोचैथ जे तीन बेटीपर बेटा भेल, जँ घरवाली मरि जाएत तँ बेटो हाथसँ चलि जाएत। चुमौन जँ करबो करब तइसँ बेटाक कोन गारंटी। जँ कहीं बेटीए भेल तखन तँ खनदानोक अन्त हएत आ जिनगी भरि अपनो बिआहे दानक बनर-फाँसमे पड़ल रहब…। बहिन सोचैत जे जँ कहीं भौजी मरि जेती तँ जिनगी भरि भैयाकेँ दुखे-दुख होइत रहतै। स्टेशन पहुँच सोनेलाल मोटरी रखि गाड़ीक भाँज लगबए गेला। टिकट कटैत देख बुझि पड़लैन जे गाड़ी अबैमे लगिचा गेल अछि। हमहूँ टिकट कटाइए लइ छी। टिकट कटौलैन। कनीए कालक पछाइत गाड़ी आएल। तीनू गोरे मिलि कऽ सुगियाकेँ गाड़ीमे चढ़ौलैन। सोनेलाल गाड़ीए-मे रहला। मोटरी उठा कऽ फुद्दी देलकैन। मोटरी रखि सोनेलाल बहिनक कोरासँ बच्चाकेँ अपना कोरामे लेलैन। बहिनो चढ़ल। गाड़ी खुजिते दुनू भाँइ फुद्दी खाट उठा घर दिस विदा भेल। गाड़ी दरभंगा पहुँचल। छोटी लाइन दरभंगे तक चलैए। दू घन्टाक पछाइत फेर घुमि कऽ गाड़ी निर्मलीए जाएत। गाड़ीसँ यात्री सभ उतरए लगल। मगर सोनेलाल सबतूर बैसले रहला। मनमे कोनो हड़बड़ी नहियेँ रहैन जखन सभ यात्री उतरल तखन सोनेलाल सीटपर सँ उठि बहिनकेँ कहलखिन- “दाइ! तूँ एतै रहह, हम कोनो सबारी भँजियौने अबै छी।” कहि सोनेलाल गाड़ीसँ उतैर प्लेटफार्मक बाहर एकटा टेम्पू लग पहुँचला। ड्राइवर निच्चाँमे ठाढ़ भऽ पसिंजर सभकेँ तकै छल। सिरसिराइत सोनेलाल ड्राइवरकेँ कहलखिन- “भाय, हमरा डाकडर ऐठाम जेबाक अछि, चलबह?” सोनेलालक बोलीसँ ड्राइवर बुझि गेल जे देहाती आदमी छी तँए एना बजला। मुदा सोनेलालक प्रति ड्राइवरक आकर्षण बढ़ि गेलैन। असथिरसँ पुछलखिन- “रोगी कहाँ छैथ?” “गाड़ीए-मे।” “बजौने अबियौन।” “अपने पएरे अबैवाली नै छैथ। पकैड़ कऽ आनए पड़त।” गाड़ीकेँ सोझ कऽ ड्राइवर सोनेलालक संग प्लेटफार्मपर एला। गाड़ी लग पहुँच ड्राइवर रोगी आ समान देख मने-मन विचारलैन जे एक आदमीक काज आरो पड़त। प्लेटफार्म दिस नजैर उठा कऽ हियाबए लगला। गाड़ी साफ करैले दू गोरेकेँ अबैत देख सोर पाड़ैत बजला- “भैया?” भैया सुनि झाड़ूबला आँखि उठौलक तँ ड्राइवरकेँ देखलक। ड्राइवरकेँ देखते लफैर कऽ लगमे आबि बजला- “की?” ड्राइवर बजला- “भाय, एकटा दुखित महिला ऐ कोठलीमे छैथ, हुनका उताइर कऽ टेम्पूमे बैसा दियौन।” झाड़ू रखि दुनू झाड़ूओबला आ ड्राइवरो सुगियाकेँ उताइर टेम्पू दिस बढ़ला। सोनेलाल मोटरी लेलैन आ बहिन बच्चाकेँ कन्हा लगा विदा भेल। सुगियाकेँ चढ़ा कऽ झाड़ूबला गाड़ी साफ करैले घुमए लगल। दुनू झाड़ूबलाकेँ रोकि सोनेलाल एकटा दसटकही निकालि दिअ लगलखिन। रूपैआ देख, अधबेसू झाड़ूबला कहलकैन- “भाय, हमहूँ रेलबेमे सरकारी नोकरी करै छी। दरमाहा पबै छी। अहाँक मदैत केलौं। अखन जइ मोसीबतमे अहाँ छी, ओइमे हमरा देहो आ रूपैओसँ मदैत करक चाही। मुदा गरीब छी, कहुना-कहुना कमा कऽ गुजर कऽ लइ छी। किएक तँ अहूँ बुझिते हेबै जे सभ दुख गरीबेकेँ होइ छइ। धनीक लोक सोनाक मुरूतकेँ खोआ-मलाइ चढ़ा धरम करैए। हमर भगवान यएह मरल-टुटल लोक छैथ। हम सेवा केलौं। भगवान करैथ जे हँसी-खुशीसँ अहाँ घर जाइ।” झाड़ूबलाक बात सुनि सोनेलाल अचम्भित भऽ गेला जे जेकरासँ लोक छूत मानैए ओकर आत्मा केतेक पवित्र अछि! टेम्पू आगू बढ़ल। थोड़े दूर गेलापर सोनेलाल ड्राइवरकेँ कहलखिन- “डरेबर साहैब, हम अनभुआर छी। कहियो ऐठाम नै आएल छी। अहाँ एतए रहै छी, सबटा बुझल-गमल अछि। तेहेन डाकडर लग चलू जे हमरा रोगीकेँ छुटि जाए।” ड्राइवर कहलकैन- “बड़ बढ़ियाँ।” मने-मन ड्राइवर सोचए लगला- अस्पतालमे भरती करौनाइ नीक नै हेतैन। एक तँ अस्पतालमे बेवस्थो बढ़ियाँ नै छै, दोसर जेकरे लागि-भागि छै तेकरे सभकेँ सभ सुविधो भेटै छइ। तँए सभसँ बढ़ियाँ डाक्टर बनर्जी लग लऽ चलिऐन। डाक्टर बनर्जी रिटायर भऽ अपन घरो आ क्लिनिको बनौने छैथ। डाक्टरो नीक आ मनुखो नीक छैथ। बारह बाजि गेल। डाक्टर बनर्जीक पहिल पाली आठ बजे भिनसरसँ बारह बजे तक आ दोसर पाली चारि बजेसँ सात बजे साँझ धरि होइ छैन। सभ रोगीकेँ देख डाक्टर बनर्जी डेरा जाइक तैयारी करिते रहैथ, टेम्पूकेँ ड्राइवर सोझे फाटकसँ भीतर ओसार लग लऽ गेल। टेम्पू देख डाक्टर बनर्जी फेर बैस रहला। टेम्पू रोकि ड्राइवर उतैर कऽ सोझे डाक्टर बनर्जी लग जा कहलकैन- “डाक्टर साहैब, रोगी अपनेसँ चलै-फिरैवाली नै छैथ, तँए पहिने एकटा डेरा दियौन।” आँखिक इशारासँ डाक्टर बनर्जी कम्पाउण्डरकेँ कहलखिन। बगलेमे अपन डेरा रहैन। कम्पाउण्डर जा कऽ एकटा कोठरी खोलि कुँन्जी सोनेलालकेँ दऽ देलकैन। कम्पाउण्डर घुमि कऽ आबि, नोकरकेँ संग कऽ स्ट्रेचरपर सुगियाकेँ लऽ जा दुजनियाँ चौकीपर सुता देलकैन। स्ट्रेचर रखि कम्पाउण्डर डाक्टर बनर्जीकेँ कहलकैन- “सभ बेवस्था कऽ देलिऐन।” डाक्टर बनर्जी आगू-आगू आ कम्पाउण्डर, ड्राइवर आ सोनेलाल पाछू-पाछू लगमे गेला। सुगियाकेँ देखते डाक्टरकेँ रोग परखमे आबि गेलैन, मुदा आरो मजगूती लेल किछ-किछ पुछए लगलखिन। हतास मन सोनेलालक। मुँह सुखाएल। आँखि नोराएल। बहिनक आँखिसँ नोरक ठोप खसैत। डाक्टर बनर्जी कम्पाउण्डरकेँ सूइ लगबैले कहलखिन। कम्पाउण्डर सूइ आनए गेल। सोनेलाल डाक्टर बनर्जीकेँ पुछलखिन- “डागडर साहैब, रोगीक दुख छुटतै किने?” सोनेलालक प्रश्न सुनि डाक्टर बनर्जीक हृदए पघिल गेलैन। उत्साह दैत सोनेलालकेँ कहलखिन- “चौबीस घन्टाक भीतर रोगी टहलए-बुलए लगती। अखन एकटा सुइया दइ छिऐन। पाँच बजे तक सूतल रहती। उठेबैन नहि। अपने नीन टुटतैन। नीन टुटलापर कुर्ड़ा-आचमन करा चाह बिस्कुट देबैन।” ताबे कम्पाउण्डर आबि सुगियाकेँ सूइ लगौलक। सूइ पड़िते सुगियाकेँ नीन आबि गेल। डाक्टर बनर्जी सोनेलालकेँ कहलखिन- “आब अहाँ सभ खाउ-पीबू-गे।” डाक्टर चलि गेला। ड्राइवर सोनेलालकेँ किछ-किछ बुझबैत कहलखिन- “पानिक कल बगलेमे अछि। भानस करैले चुल्हो ऐछे। अपने भानस करब। बाहर चलू, दोकान देखा दइ छी। ऐसँ बाहर नै जाएब। लुच्चे-लम्पट बेसी अछि। जेबीसँ पाइ निकालि लेत, तँए जेतबे काज हुअए तेतबे पाइ मुट्ठीमे नेने जाएब आ सामान कीनि लेब। आब हम जाइ छी। ऐठाम कोनो चीजक डर नै करब। सभ भार डाक्टर साहैबकेँ छैन।” पाँच बजिते सुगिया आँखि खोलली। सुगियाक लगेमे सोनेलालो आ बच्चाकेँ कोरामे नेने बहिनो बैसल। आँखि खोलिते सुगिया सुतले सूतल बजली- “किछु खाइक मन होइए।” सुगियाक बात सुनिते सोनेलालकेँ मन पड़लैन जे डाक्टरो साहैब कहने रहैथ। उठि कऽ चाह-बिस्कुट आनि सुगिया लग रखलैन। कलपर सँ लोटामे पानि आनि कऽ कुर्ड़ा करैले देलखिन। बैसले-बैसल सुगिया कुर्ड़ा करि चाहेमे डुमा-डुमा बिस्कुट खेलैन। चाह-बिस्कुट खा मुँह पोछलैन। सुगियाकेँ मुँह पोछिते सोनेलाल पुछलखिन- “मन केहेन लगैए?” “कनी हल्लुक लगैए।” सोनेलालो आ बहिनोक मनमे खुशी आएल। मने-मन बहिन भगवानकेँ कहए लगल- “हे भगवान, कहुना भौजीकेँ नीक कऽ दियौन!” सुगियाकेँ सुधार हुअ लगल। तेसर दिनसँ बुलए-टहलए लगली। दिनमे दू बेर डाक्टरो साहैब आबि-आबि देखैत रहथिन। सभ तरहक तरद्दुत सोनेलाल करैले हरिदम तैयार। दसम दिन सुगियाकेँ डाक्टर साहैब छुट्टी दऽ देलखिन। सोनेलाल कम्पाउण्डरसँ सभ हिसाब केलैन। जेते हिसाब सोनेलालकेँ भेलैन तइसँ पाँच साए रूपैआ अधिक लऽ डाक्टर साहैबक आगूमे रखि देलकैन। रूपैआ गनि डाक्टर साहैब फजिलाहा पाँचो साए रूपैआ घुमबैत बजला- “गनैमे पाँच साए बेसी आबि गेल। ई पाँचो साए रखि लिअ।” डाक्टर साहैबक बात सुनि सोनेलाल कहलकैन- “गनैमे गलती नै भेल, पाँच साए अहाँकेँ खुशनामा दइ छी।” ‘खुशनामा’ सुनि डाक्टर बनर्जी गुम्म भऽ गेला। मनमे एलैन, वेचाराक बगए-वाणि कहैए जे पैंच-उधार करि कऽ आएल हएत तखनो देखू उद्गार! हमरा कोन चीजक कमी अछि जे ऐ वेचाराक फाजिल पाइ छुबै? मन पड़लैन, जमीनदारीक समैक पुनाह...। जमीनदार सभ सालमे एक बेर पुनाह करै छला। जमीनदारक कचहरीमे पुनाह होइ छेलइ। पुनाह होइसँ पनरह दिन पहिनहि रैयत सभकेँ जानकारी दऽ देल जाइ छल। जमीनदार दिससँ मोती-चूड़ बनौल जाइ छेलइ। एक रूपैआमे एक लड्डू देल जाइ छेलइ। रैयतोमे दू विचारक, एक ओ छल जेकरा खाली अन्नेक आमदनी छेलइ। ओइ तरहक रैयतक हालत कमजोर छेलइ। मगर दोसर तरहक जे रैयत होइ छल ओकरा अन्नक संग-संग नगदो आमदनी छेलइ। जेना कोनो-कोनो जातिकेँ दूध-दहीक, तँ कोनो-कोनो जातिकेँ तीमन-तरकारीक आ कोनो जातिकेँ पानक तँ कोनो-जातिकेँ छोट-छोट कौल्ह इत्यादि..। पुनाह धर्मसँ जोड़ल शब्द अछि। धार्मिक भावना सबहक मनमे रहै छेलै तँए एक-दोसरकेँ निच्चाँ देखबैले मने-मन प्रतियोगिता करै छल। एकटा लड्डूक दाम मोसकिलसँ दू पाइ होइत हेतइ। किएक तँ आठ अने चिन्नी आ रूपैआमे चारि सेर खेरही वा आन कोनो अन्न, जेकर लड्डू बनै छेलइ। प्रतियोगिता दू तरहक होइ छेलइ। पहिल, बेकती-विशेषमे आ दोसर, जाति-विशेषमे। लोक खूब खुशी रहै छल। गामे-गाम मालगुजारीसँ बेसी, पुनाहमे जमीनदार रूपैआ असुल कऽ लइ छला। जइ समाजमे मालगुजारीक चलैत लोकक खेत निलाम होइ छेलै, ओइ समाजमे पुनाहक नाओंपर लूट सेहो चलै छेलइ। वएह बात डाक्टर बनर्जीकेँ मन पड़लैन। हँसैत डाक्टर बनर्जी सोनेलालकेँ कहलखिन- “अहाँ, खुशी भऽ ऐठामसँ जा रहल छी यएह हमर खुशनामा भेल। भगवान करैथ परिवार फड़ए-फुलए।” तीनू गोरे गामक रस्ता धेलैन। बच्चाकेँ सुगिया कोरामे नेने आ बहिन बरतनक मोटरी माथपर नेने आ खालीए देहे सोनेलाल। सभ कियो दरभंगा स्टेशन आबि गाड़ी पकड़लैन। अपना स्टेशनमे उतैर तीनू गोरे हँसी-खुशीसँ गाम दिसक रस्ता धेलैन। रेलबे कम्पाउण्डसँ निकैल सुगिया सोनेलालकेँ कहलकैन- “दरभंगा जाइत काल पचास मुरते साधुक भनडारा कबुला केने रही। कबुला-पाती उधार नै रखक चाही। काल्हिखन ओहो कबुला पुराइए लेब।” सोनेलालोक मन खुशी रहैन। चाउर-दालि घरेमे अछि। रूपैओ किछु उगरले अछि। मुस्कियाइत सुगियाकेँ कहलखिन- “काल्हिए भनडारा नै सम्हरत। दही पौरैक अछि, हाटसँ तीमन-तरकारी, नून-तेल आनए पड़त। चारि-पाँच दिनमे भनडारा कए लेब। अखन दाइयो आएले अछि।” दाइक नाओं सुनि बहिन बाजल- “भैया, तेहने गड़ूमे पड़ि गेल छेलह तँए अपन सभ किछु छोड़ि कऽ छिअ। तूँ नइ बुझै छहक जे हमरो कियो दोसर करताइत नइए। काल्हि हम चलि जेबह।” सोनेलालक मन गदगद रहबे करैन। जहिना चुल्हिपर चढ़ौल पानि देल बरतनमे निच्चासँ आगिक ताउ लगिते निचला पानि गर्म भऽ ऊपर-मुहेँ उठैए तहिना सोनेलालक मन खुशीसँ नचैत रहैन। स्टेशनसँ निकैल बजला- “अहाँ दुनू गोरे ऐठाम बैसू। लगले हम चीज-वौस किनने अबै छी।” सुगियो आ बहिनो, रस्ते कातमे आमक गाछक निच्चाँमे बैसली। सोनेलाल स्टेशन दिस विदा भेला। स्टेशने कातमे आठ-दसटा दोकान छेलइ। एकटा दोकान माछक, दोसर मुरगी आ अण्डाक, एकटा सुधा दूधक, एकटा चाहक, एकटा पानक आ पान-छहटा तरकारीक। ..सोनेलालक मनमे एलैन जे पान-सात रंगक तरकारियो, दूधो आ राहैरक दालियो कीनियेँ लेब। किएक तँ छह माससँ ने भरि पेट अन्न खेलौं आ ने कहियो मन असथिर रहल। तँए आइ राति अपनो सभ परिवार आ फुद्दियो दुनू भाँइकेँ नौत दऽ खुआ देबइ। रेलबेक कम्पाउण्डमे जे तरकारी, दूध, माछ इत्यादिक दोकान छेलै ओ स्थायी नहि। साधारण छपरी टाँगि-टाँगि दोकान चलबैत। कियो दोकानदार रेलबेसँ दोकानक पट्टो नहि बनौने। स्टेशनेक स्टाफ, दोकानदारकेँ दोकान लगबए देने छै, जइसँ बट्टीक बदला सभकेँ परिवार-जोकर तरकारी सभ दिन भऽ जाइ छइ। जहिया कहियो रेलबेक अफसरक आगमन होइत, तइसँ पहिनहि स्टाफ दोकानदार सभकेँ कहि दइ छेलइ। अपन-अपन छपरी सभ हटा लइ छल। दोकान आ रेलबेक बीच मोड़पर ठाढ़ भऽ सोनेलाल सोचए लगला जे दोकानमे जे राहैरक दालि बिकाइए ओ अरबा रहैए। तँए दालिकेँ उलबए पड़त। घरमे तँ लोक पहिने राहैर उला लइए। बिनु उलौल राहैरक दालि तँ खेसारीए जकाँ होइए। मुदा उलौला पछाइत आमील देल राहैरक दालि तँ दालिए होइए! सभसँ नीक...। लटखेना दोकान पहुँच सोनेलाल एक किलो राहैरक दालि आ अदहा किलो चिन्नी किनलैन। दुनूक दाम दऽ तरकारीबला लग आबि सात-आठ रंगक तरकारी सेहो किनलैन। तड़ै-जोकर गोलका भाँटा-भाँटिन, गंगाकातक बड़का परोर, हैदराबादी ओल टेबि कऽ किनलैन। दू किलो सुधा दूध सेहो लेलैन। सभ समानकेँ गमछामे बान्हि, हाथमे लटकौने घुमि कऽ सुगिया लग एला...। गमछामे बान्हल समान देख बहिन पुछलकैन- “भैया, की सभ कीनि लेलहक?” बहिनक मनमे भेलै जे धिया-पुता सभ-ले भरिसक लाइ-मुरही कीनि लेलैन। मुदा मोटरी नमहर तँए पुछलकैन। बहिनक बात सुनि सोनेलाल हँसैत बाजला- “दाइ, खाइ-पीबैक समान सभ किनलौं। आइ सभ परानी मिलि नीक-निकुत खाएब। वेचारा फुद्दियो, नोकर जकाँ राइत-के घरक ओगरबाही करैत हएत। तँए ओकरो दुनू भाँइकेँ नौत दऽ खुआ देबइ। तीमन-तरकारी, दूध आ दालि कीनि लेलौं। भानस करैले तोहूँ तीन गोरे[4] छेबे करह। एक्को दिन तँ तोरो सबहक मेजमानी हुअए। दाइ, जेते अनका भाइयोसँ सुख नै होइ छै, तइसँ बेसी तोरासँ भेल। तोहर उपकार जिनगीमे नै बिसरब। भगवान तोरा सन बहिन सभकेँ देथुन।” सोनेलालक बात सुनि गदगद होइत बहिन उत्तर देलकैन- “भैया, हम अपन काज केलौं। तोहर उपकार की केलियह। एहेन बेरपर जे तोरा नै देखितौं तँ हमरा सन बहिन केकरो रहिए कऽ की हेतइ?” ननैदक बात सुनि सुगिया पति दिस तकैत बजली- “दाइ तँ औगुताइए। कहैए जे काल्हि भोरे चलि जाएब। एकोटा धराउ घरमे साड़ियो ने अछि जे देबैन। बिना साड़ी देने केना जाए देबैन, केहेन हएत?” भौजाइक बात सुनि मुस्कियाइत ननैद बाजल- “भौजी, चारू बेटा-बेटीक बिआहमे तँ हमरा चारि जोड़ साड़ी रखले अछि। एहेन बेरमे साड़ीक कोन काज छइ। अपने तँ भैया पैंच-उधार लऽ कऽ काज चलौलक। तैपर सँ हमरो-ले करजा करत। हमरा जँ दियौ चाहत तँ नइ लेबइ।” घरपर अबिते परिवारसँ गाम धरि खुशीक बर्खा बरिसए लगल। तीनू बच्चा सुगियाक गरदैनमे लटपटा गेल। सुगिया बच्चाकेँ कोरामे लऽ लऽ मुँह चुमए लगल। जहिना जाड़क मासमे गाछ-बिरीछ पालाक मारिसँ ठिठुइर जाइए मुदा गरमी धबिते नव रूप धारण करैए तहिना सभकेँ भेलइ। छह मासक तबाही, सोग, निराश सोनेलालकेँ छोड़ि पड़ा गेल। पास-पड़ोसक जनिजाति सभ आबि-आबि सुगियाकेँ देखबो करैत आ बिमारीक समैक खिस्सो सुनैत। एक्के-दुइए सौंसे अँगनासँ धियो-पुतोक आ जनिजातियोक भीड़ हटल। तीनू गोरे भानसक जोगारमे लगि गेली। केते दिनसँ सोनेलाल भरि इच्छा नहाएल नै छला। साबुन लऽ कऽ नहाएले गेला। भानस भेल। सभ कियो भरि मन खेलैन। खाइते सभकेँ ओंघी आबए लगलैन। सभ जा-जा कऽ सुति रहला। पत्नीक संग सोनेलालकेँ लहेरियासराय जाइते गाममे चर्च चलैत। एक दिस जनिजाति सभ सोनेलालक बाहवाही करैत, तँ दोसर दिस मरदा-मरदीक बीच इलाजक खर्चाक चर्च चलैत। सबेरे स्कूलमे छुट्टी दऽ खसल मने हीरानन्द चलि एला। हीरानन्दकेँ आएल देख रमाकान्त पुछलखिन- “सबेरे स्कूल बन्न कए देलिऐ?” ओना, रमाकान्तोकेँ सोनेलालक सम्बन्धमे बुझल छेलैन मुदा जइ गम्भीरतासँ हीरानन्द सोचै छला ओइ गम्भीरतासँ ओ नै सोचने छला तँए मनमे कोनो तेहेन विचार नइ रहैन। हीरानन्द उत्तर देलखिन- “बच्चा सभकेँ पढ़बैमे मन नै लगै छल तँए छुट्टी दऽ देलिऐ।” “किए नै पढ़बैमे मन लगै छल।” चिन्तित हीरानन्द बजला- “एक तँ बाढ़िक मारल वेचारा सोनेलाल तैपर सँ बिमारीक तेहेन चपेटमे पड़ि गेला जे कोनो कर्म बाँकी नै छैन। यएह बात मनमे घुरियाए लगल। पढ़बैमे एक्को रत्ती नीके ने लगैत रहए।” सोनेलालक बात सुनिते रमाकान्तक मन मौलाए लगलैन। मौलाइत-मौलाइत जहिना हीरानन्दक मन रहैन तहिना भऽ गेलैन। पएरमे ठेँस लगलापर जहिना कियो मुँह-भरे खसैए जइसँ छातीमे चोट लगैत तहिना रमाकान्तक हृदैमे मनक चोट लगलासँ भेलैन। मुदा जोरसँ नहि, चुप्पेचाप कुहरए लगला। मनमे एलैन, जइ गाममे चारि-चारिटा डाक्टर छैथ ओइ गामक लोक रोगसँ कुहरए ई केतेक दुखक बात छी। एहेन डाक्टरकेँ लोक भगवान बुझि पुजैन से कहाँ धरि उचित छी..? जइ पढ़ल-लिखल लोककेँ अपना गामसँ सिनेह नहि, अपन कुटुम्ब परिवार सर-समाजसँ सिनेह नहि, आ खाली अपने सुख-भोगक पाछू बेहाल रहता। हुनका अनेरे दाइ-माइ किए छठियार दिन छातीमे लगा जीबैक असीरवाद देलकैन। ..फेर मोनमे एलैन, जहिना माल-जालकेँ डकहा बिमारी होइ छै तहिना तँ मनुखोकेँ चटपटिया बिमारी होइ छइ। जे छने-मे-छनाँक कऽ दइ छइ। चारिटा बेटा-पुतोहु डाक्टर हमरे छैथ, जँ कहीं अपने कि महेन्द्रक माइएकेँ वएह चटपटिया बिमारी भऽ जाइन तँ की करता ओ सभ हमरा..? रमाकान्तक मन घोर-घोर भऽ गेलैन। तेना सकदम भऽ गेला जेना बाके हरण भऽ गेलैन। तीन दिनक पछाइत सोनेलाल भनडाराक कार्यक्रम बनौलैन। खाइ-पीबैक सभ ओरियान दिल खोलि कऽ केलैन। तुलसीफुलक अरबा चाउर, राहैरक दालि, एगारहटा तरकारी, तैसंग दही-चिन्नीक नीक बेवस्था केलैन। गाममे दू पंथक साधू। पहिल पंथक महंथ रमापति दास आ दोसर पंथक गंगा दास। राम-जानकी मन्दिर रमापति दास बनौने छैथ। दुनू साँझ पूजा करै छैथ। मुदा गंगा दासकेँ से सभ नइ छैन। ओना, गामसँ लऽ कऽ आनो-आन गाममे सेवकान धरि दुनूकेँ छैन..! सोनेलालक मनमे छल-प्रपंचक मिसियो भरि लसि नहि, तँए पच्चीस मुरते साधुक दल रमापति दासकेँ देलकैन आ पच्चीस मुरतेक दल गंगा दासकेँ। दल देला पछाइत सोनेलाल दुआर-दरबज्जा चिक्कन-चुनमुन करए लगला। भानस करैक बरतन सभ माँजि-मूजि तैयार केलैन। खाइले केराक पात काटि चिक्कनसँ धोइ कऽ रखलैन। एक गाममे रहितो दुनू पंथक बीच अकास-पतालक अन्तर अछि। पहिल पंथमे ऊँच जातिक बोलबाला जखन कि दोसर पंथमे ऊँच जातिक कम मुदा निम्न जातिक बेसी। छूत-अछूतक कोनो भेद नहि। दिनुके समैमे भनडारा हएत। दोसर पंथक साधु सभ सबेरे आबि चरण पखारि भजन शुरू केलैन। भजन शुरू होइते टोल-पड़ोसक जनिजातियो आ धियो-पुतो सभ आबए लगल। सौंसे खरिहाँन भरि गेल। खरिहाँनेमे बैसारो केने रहैथ। तीनटा भजन समाप्त भेला पछाइत रमापति दास चेला सभकेँ संग केने पहुँचला। फरिक्केसँ दोसर पंथक साधुकेँ देख रमापति दास मने-मन जरए लगला। मुदा क्रोधकेँ दाबि दरबज्जापर एला। दरबज्जापर अबिते रमापति दास सोनेलालकेँ कहलखिन- “हमरा सबहक बैसार फूटमे करू।” रमापति दासकेँ प्रणाम कऽ सोनेलाल दलान दिस इशारा दैत कहलकैन- “अपने सभ दरबज्जेपर बैसियौ।” सोनेलालक विचार सुनि रमापति दास मने-मन सोचए लगला जे जँ अखन दोसरठाम बैसार बनबैले कहबै तँ औगताइमे सम्भव नै हेतइ। जँ झगड़ा करै छी तँ केकरासँ करूँ। वेचारा घरवारी की करत। घरवारी-ले तँ जहिना हम सभ दल पाबि एलौं अछि, तहिना तँ ओहो सभ आएल अछि। तँए जेहने हम सभ तेहने ओहो सभ। अगर ओहो साधु सभसँ कहा-कही करै छी तँ दू धार्मिक पंथक बीच विवाद उठत। मुदा ऐठाम तँ भनडारा छी, पंथक नीक-अधलाक विवेचनक मंच नहि। जँ अपनाकेँ उन्नैस मानि लइ छी तखन तँ सोलहन्नी कायरता हएत..! ..विचित्र स्थितिमे रमापति दास पड़ि गेला। गुम्म-सुम्म भेल रमापति दास दरबज्जा आ खरिहाँनक बीच खुट्टा जकाँ ठाढ़ रहैथ। ने डेग आगू बढ़ैन आ ने पाछू। मनमे उठलैन- जेते गोरे हमरा संग आएल छैथ जँ हुनका सभसँ विचार पुछबैन आ ओ सभ हमरा मनक विपरीत विचार दैथ तखन की करब? आइ धरि तँ सेहो नै केलौं। करब उचितो नहि। गुरु-चेलाक अन्तर समाप्त भऽ जाएत। रमापति दासक मन औनाए लगलैन। चाइनपर पसेनाक रूप चमकलैन। ताबे कान्हपर रखनिहार हरमुनियाँबलाक कान्ह अगिया गेलै, ओ आगू बढ़ि ओसारक चौकीपर हरमुनियाँ रखि देलक। हरमुनियाँ रखैत देख ढोलकियो ढोलक रखि देलक। अहिना एका-एकी सभ अपन-अपन कमण्डल-गिलास धरि रखि देलक। मुदा बैसल कियो नहि। तेकर कारण छेलै जे बिना चरण पखरबौने बैसब केना। आ जाबे गुरु महाराज नइ बैसता ताबे हम सभ केना बैसब। ..सभकेँ अपन-अपन सामान[5] रखैत देख रमापति दासकेँ गर भेटलैन। विक्षिप्त मने बजला- “जखन सबहक मन अछि तखन किएक ने दरबज्जेपर बैसल जाए, घरवारियो तँ आदर करिते छैथ?” एक दिस रमापति दासकेँ मन जरैत रहैन, दोसर ईहो खुशी होइत रहैन जे चरण पखरबाक स्वागतक संग घरवारी हमरे बेसी महत देलैन। सभ कियो चरण पखरबा कऽ बैस जाइ गेला। बिढ़नी जकाँ सुगिया नाचैत। कखनो घर जा दही देख अबैत, जे कहीं बिलाइ ने आबि कऽ खा लेलक। तँ लगले ओसारपर रखल सामान सभकेँ देखैत जे कौआ ने आबि कऽ छूता देलक। फेर लगले अँगनामे राखल टौकना, कराह आ बाल्टिनोकेँ देखैत जे धिया-पुता ने गन्दा कऽ दइ। तँ लगले आबि दलानक पाछूमे ठाढ़ भऽ टाटक भुरकी देने दरबज्जो दिस देखैत जे लोकसँ भरल दरबज्जा-खरिहाँन अछि,कहीं मारिए ने शुरू भऽ जाइ। सुगियाक मनमे अहलदिली पसि गेल। तहिना मगज परहक पसेना केशक तर देने गरदैनपर होइत सोनेलालक धोतीकेँ भिजबैत रहैन...। भजन सुननिहारमे धिया-पुतासँ लऽ कऽ गामक स्त्री-पुरुष धरि बैसल। मोतिया-माए जे पचास बर्खक बुढ़ छैथ। भजन बन्न भेल देख बुचाइ दासकेँ कहलखिन- “हे यौ बुचाइ दास, बिना भजन गौने जे पङ्गहैत करबै तँ पाप नै लिखत?” मोतिया माइक करूआएल बात सुनि बुचाइ दास उत्तर देलखिन- “बड़ी काल गाजा पीना भऽ गेल तँए कनी पीब लइ छी। तखन नाचो देखा देब आ कबीर साहैब की कहलखिन सेहो सुना देब। कनीए काल और छुट्टी दिअ। हुअ हौ रघुदास, जल्दी गुल दहक।” बिना साजे बाजक, घुन-घुना कऽ गाबए लगला- “हटल रहियौ सन्तो बिलइया मारे मटकी...।” बुचाइ दासक पाँति आ मुँहक चमकी देख धियो-पुतो आ जनिजातियो सभ, खापैड़मे देल जनेरक लाबा जहिना भर-भरा कऽ फुटैए तहिना सभ हँसल। दलानोमे आ खरिहाँनोमे भजन शुरू भेल। दोसर पंथक बैसारमे ढोलक, झालि, खौजरीक संग थोपड़ियो बाजए लगल। मुदा पहिल पंथ दिस पखौज, झालर, हरमुनियाँक संग सितार बाजब शुरू भेल, संगे एक सूर एक लय आ एक तालमे भजनो आरम्भ भेल- “केशव! कही न जाए का कहिए..!” मुदा दोसर पंथ दिस भजन तेते जोरसँ होइत जे पहिल पंथक भजन सुनाइए ने पड़ै छल। महंथ रमापति दास बाहर निकैल घुमबो करैथ आ भजनो सुनैथ। रमौथ भजनक अवाज दलानक घरसँ बाहर निकलबे ने करै छल। जइसँ रमापति दास तामसे माहुर भेल छला। मने-मन भनभनेबो करैथ। सोनेलालकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “ई कोन बखेरा ठाढ़ करबा देलिऐ?” थरथराइत दुनू हाथ जोड़ि सोनेलाल उत्तर देलकैन- “सरकार, हम अनाड़ी छी। नइ बुझलिऐ जे एना होइ छइ। जे भऽ गेलै से तँ भाइए गेलइ। अपने तमसाइयौ नहि। जँ कनी गलतीए भऽ गेल तँ माफ कऽ दिअ। अपने समुद्र छिऐ। नीक-अधला पचबैक सामर्थ्य छै अपनेमे। अखन धरि भोजन बनबैक अहरियो ने खुनल गेल अछि, आदेश दियौ।” तरैंग कऽ रमापति दास बजला- “हमर जेते साधु छैथ ओ फुटेमे अहरियो खुनता आ भोजनो बनौता। तँए बरतनसँ लऽ कऽ चाउर-दालि, तरकारी धरि सभ किछु हमरा फुटा दिअ।” ‘बड़ बढ़ियाँ’ कहि सोनेलाल सभ किछु दू भाग कऽ देलकैन। चारि-चारि गोरे भानसक जोगारमे लगि गेला। दूटा अहरी, हटि-हटि कऽ खुनल गेल। सोनेलाल सभ बरतनो आ चाउरो-दालि आनि-आनि दुनू अहरी लग रखि देलकैन। दलानक भजन बन्न भऽ गेल। मुदा खरिहाँनक भजन चलिते रहल। बुचाइ दास अगुआ मुरते। भजनियाँ सभ गोल-मोल भेल बैसल, तँए बीचमे जगह खाली रहए। ओइ खाली जगहमे बुचाइ दास ठाढ़ भऽ आगू-आगू भजनक पाँतियो गाबए आ नाचबो करए। बीच-बीचमे पाँतिक अर्थ सेहो अर्थाबए। रमापति दास सोनेलालकेँ हाथक इशारासँ सोर पाड़ि कहलखिन- “बड्ड अनघोल होइए। भजन बन्न करबा दियौ।” बुचाइ दास लग आबि सोनेलाल बाजल- “गोसाँइ साहैब, भजन बन्न कऽ दियौ। महंथजीकेँ तकलीफ होइ छैन।” सोनेलालक आग्रह सुनिते, के छोट के पैघ सभ एक्के बात कहए लगलैन जे हम सभ बिना भजन गौने पङ्गहैत नइ करब। सोनेलाल अवाक भऽ गेला। सौंसे देह केराक भालैर जकाँ डोलए लगलैन। मुदा की करितैथ। कियो तँ बिनु दले नै आएल छैन। तँए सभ साधुक महत बरबैर बुझैथ। अँगनाक टाट लग ठाढ़ भेल सुगिया मने-मन सोचै छेली जे जँ कहीं साधु सभ अपनामे झगड़ा कऽ बिना भोजन केने चलि जेता तखन तँ हमर कबुला पूरा नइ हएत। कबुला नै भेने दुखो घुमि कऽ आबि सकैए। आब जँ दुखित पड़ब तँ जीब की मरब तेकर कोन ठेकान। हे भगवान साधु सभकेँ मति बदैल दियौन जे असथिर भऽ जेता। मने-मन साधु-साधुक जाप करए लगली। दू बजैत-बजैत निर्गुण पंथ दिस भोजन बनि कऽ तैयार भऽ गेल। भोजन तैयार होइते गंगा दास सोनेलालकेँ कहलखिन- “भोजन बनि गेल। आब भोजनक जगह तैयार करू।” गंगा दासक आढ़ैत सुनि सोनेलालक करेज आरो थरथर काँपए लगलैन। ई केहेन हएत। एक दिस साधु सभ भोजन करता आ दोसर दिस बनिते अछि। एक तँ जखनेसँ साधु सभ दरबज्जापर एला तखनेसँ झंझट होइए। कहुना-कहुना अखन धरि पार लगल, मगर आब आखरी बेरमे ने कहीं झगड़ा फँसि जाए। ..बाढ़ैन आनै लाथे सोनेलाल आँगन गेला। आँगन जा बाढ़ैन तकै लाथे बैस रहला। बैसैक कारण रहैन, समए लगाएब। कनीए कालक पछाइत सुनलैन जे हिनको सबहक भोजन तैयार भऽ गेलैन। बाढ़ैन नेने सोनेलाल अँगनासँ निकैल खरिहाँन आबि बाहरए लगला। खरिहाँन बहारि सोनेलाल पानिक छिच्चा मारलैन। छिच्चा दऽ खरही बिछौलैन। खरही बिछैबते साधु सभ हरे-हरे कऽ उठि खरहीपर बैसला। खरहीपर बैसते पात उठल। पातक बँटबारा शुरू होइते रमापति दास अपन सत्तैरमे घुमि-घुमि जय-जयकार करए लगला। दोसर दिस भजन मंगल शुरू भेल। सभ साधु भोजन केलैन। भोजन कऽ सभ उठला। दोसर पंथ दिसक सत्तैरमे एक्कोटा अन्न वा कोनो वस्तु पातपर छूतल नहि। जखन कि पहिल पंथक सत्तैरमे बरियातीक भोजन जकाँ छूतल। सभकेँ उठिते चारूभरसँ कौआ-कुकुर आबि-आबि खाए लगल। भोजन कऽ दोसर पंथबला सभ ढोलक-झालि लऽ विदा हुअ लगला। मुदा रमौथ दिससँ दछिनाक तगेदा भेल। अनाड़ी सोनेलाल सिक्कीक चङेरीमे पान-सुपारी लऽ बीचमे ठाढ़ रहैथ। हाथक इशारासँ रमापति दास सोनेलालकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “आब हम सभ चलब तँए झब-दे दछिना लाउ।” सोनेलाल- “केना की दछिना..?” रमापति दास आदेश दैत कहलखिन- “एक साए एकाबन स्थानक चढ़ौआ, एक साए एक हमर, साधु सभकेँ एकाबन-एकाबन आ भोजन बनौनिहारकेँ एकासी-एकासी दऽ दियौन।” भोजन बनौनिहारक आ महंथजीक दछिना तँ सोनेलालकेँ जँचल मुदा...। गंगा दास आ बुचाइ दास सेहो सभ देखैत-सुनैत रहैथ। आँखिक इशारासँ गंगा दासकेँ बुचाइ दास कहलखिन- “अधिकार अधिकार छी। जेते दछिना रमापति दासकेँ हेतैन तइसँ एक्को पाइ कम हमहूँ सभ नै लेब।” हिसाब जोड़ि सोनेलाल अँगनासँ रूपैआ आनि रमापति दासक हाथमे दऽ देलकैन। रूपैआ ठीकसँ गनि रमापति दास सोनेलालकेँ असिरवाद दैत उठि कऽ विदा भेला। रमापति दासक पाछू-पाछू सोनेलालो अरियातने किछु दूर धरि गेला। फेर घुमि कऽ आबि गंगा दास लग ठाढ़ भऽ पुछलकैन- “गोसाँइ साहैब, अहाँकेँ दछिना केते हएत?” सोनेलालक कलपैत मोनकेँ गंगा दास अँकलैन। दयासँ हृदए बरफसँ पानि बनए लगलैन। मुहसँ बोली नै फुटैन। सोनेलालकेँ की कहथिन से फुरबे ने करैन। बुचाइ दास दिस देख बजला- “की यौ बुचाइ दास, अहूँ तँ अगुआ मुरते छी, बिना अहाँ सबहक विचार नेने हम केना जवाब देबैन। किएक तँ ऐठाम दूटा प्रश्न अछि। पहिल दू पंथक अधिकारक सवाल अछि, जइसँ दोसर पंथकेँ निच्चाँ-मुहेँ जेनाइ हएत। आ तेसर, सोनेलाल कबुला पुरबैले भनडारा केलैन। एक तँ बिमारीक फेड़मे पड़ि पश्त भेल छैथ, तैपर सँ हमहूँ सभ भार दिऐन, ई हमरा नीक नइ बुझि पड़ैए।” गंगा दासक प्रश्न सुनि दोसर पंथक सभ साधु गुम्म भऽ मने-मन सोचए लगला जे की कएल जाए? मुदा सोचबोक रस्ता अलग-अलग होइ छइ। एक्के प्रश्नक उत्तर पबैले वैरागीक रस्ता अलग होइए, जहन कि रागीक विचार अलग। भलेँ दुनू गोरे एक्के रंग विद्वान किएक ने होइथ। तेतबे नहि, आध्यात्मिक चिन्तक आ भौतिकवादी चिन्तकक बीच सेहो अहिना होइए। जहन कि निष्पक्ष चिन्तकक अलग होइए। पंथक बीच बँटल समाजमे निष्पक्ष चिन्तक होएब कठिन अछि। किएक तँ पंथ खाली वैचारिकेटा नहि, बेवहारिक सेहो होइए। जे परिवार आ समाजसँ जोड़लो रहैए। जइसँ जिनगीक गाड़ी चलै छइ। कोनो विषयपर गम्भीर चिन्तन करैले एकटा आरो भारी उलझन अछि। ओ अछि भूखल आ पेट भरल शरीरक मन। मनकेँ बहुत अधिक प्रभावित करैए शरीरक इन्द्रिय। इन्द्रियकेँ संचालित करैए शरीरक उर्जा। उर्जाक निर्माण करैए उर्जा पैदा करैक वस्तु। ओ वस्तु अबैत भोजनसँ। मुदा सिरिफ भोजनेटा-सँ उर्जा पैदा नै होइत। उर्जा पैदा करैक दोसरो वस्तु अछि जेकर भोजन शरीरक भोजनसँ अलगो होइए। बीच-बचाउ करैत बुचाइ दास गंगा दासकेँ विचार देलखिन- “गोसाँइ साहैब, हमहूँ सभ अपना पंथक सिपाही छी, तँए मरै-दम तक पाछू हटब धोखाबाजी हएत। पवित्र धर्मक रक्षा करब सेहो हमरे सभपर अछि, तँए सोनेलाल जेते रूपैआ रमापति दासकेँ देलखिन, तेते हमरो सभकेँ दऽ दौथ। छह मासक दुख-तकलीफ हम सभ सोनेलालक सुनबे केलौं तँए हुनकर दुखमे हमहूँ सभ शामिल भऽ रूपैआ घुमा दिऐन।” सएह भेल। सभ कियो हँसी-खुशीसँ भनडारा सम्पन्न कऽ जय-जयकार करैत विदा भेला। ◌ शब्द संख्या : 5466 4. मद्रास स्टेशन गाड़ी पहुँचते रमाकान्त नमहर साँस छोड़लैन। दू राति आ तीन दिनसँ गाड़ीमे बैसल-बैसल रमाकान्तो, श्यामो आ जुगेसरोकेँ देह अकैड़ गेल छेलैन। गाड़ीकेँ रूकिते रमाकान्त हुलकी मारि प्लेटफार्म दिस तकलैन तँ दोसरो-तेसरो लाइनपर गाड़ीए सभकेँ ठाढ़ भेल देखलखिन। अपना सबहक स्टेशन जकाँ नहि जे कखनो काल गाड़ियो अबैत आ भीड़-भाड़ नै रहने पुलोक जरूरत नहि, सगतैर रस्ते। जेमहर मन हुअए तेमहर विदा भऽ जाउ। गाड़ियो छोट आ लाइनो तहिना। गाड़ीमे रमाकान्तकेँ अनभुआर जकाँ नइ बुझि पड़लैन किएक तँ बिहारेक गाड़ी आ बिहारेक पसिंजरो। गाड़ीसँ यात्री सभ उतरए लगल। तीनू गोरे रमाकान्तो अपन झोरा-मोटरीक संग उतैर, थोड़े आगू बढ़ि पुलपर चढ़ए लगला। पुलपर लोकक करमान लगल मुदा अपना सभ स्टेशन जकाँ एँड़ी-दौड़ी नै लगैत। जेकरा हियासि कऽ रमाकान्त अपनो चेत गेला आ श्यामो-जुगेसरकेँ कहि देलखिन। अखन धरि स्टेशनमे दुनू कात गाड़ीए देख पड़ैन मुदा पुलपर जेना-जेना ऊपर चढ़ैत गेला तेना-तेना आनो-आनो चीज सभ देखए लगला। पुलक सीढ़ीपर चलैत-चलैत श्यामो आ रमाकान्तोक जांघ चढ़ि गेलैन। पुलक ऊपर पहुँचते रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- “जुगे, मोटरी कतबाहिमे रखि दहक आ कनी तमाकुल लगाबह। ताबे हमहूँ कनी सुस्ता लइ छी।” जुगेसर मोटरी भुइयेँमे रखि तमाकुल चुनबए लगल। गाड़ीक जेते चिन्हार पसिंजर रहैन, सभ हेरा गेल। नव-नव लोककेँ पुलोपर आ निच्चोमे देखए लगला। खाली लोकेटा नव नहि, ओकर पहिराबो आ बोलियो। तमाकुल खा झोरा-मोटरी उठा तीनू गोरे पुलपर सँ उतैर हियाबए लगला जे केकरोसँ पुछि लिऐन। मुदा केकरो बाजब बुझबे नै करैथ। रमाकान्तो लोक सभकेँ देखैथ आ लोको सभ रमाकान्तकेँ देखैन। जेना तमाशा दुनू बनल रहैथ। रमाकान्त आ जुगेसरक धोती पहिरब देख ओइठामक लोक निंगहारि-निंगहारि देखैत आ रमाकान्तो तीनू गोरे ओइठामक मरदो आ मौगियोक कपड़ा पहिरब देख मने-मन हँसबो करैथ। अनुभवी लोक सभ तँ बुझि जाइ छला जे बिहारी छैथ। मुदा जेकरा नइ बुझल छल ओ सभ ठाढ़ भऽ भऽ तजबीज करैन। एक जेर मौगी रस्ता धेने गप-सप्प करैत जाइ छेली, ओ सभ अपने सबहक मरद जकाँ ढेका खोंसने। मौगी सबहक ढेका देख श्यामा मुस्कियाइत रमाकान्तकेँ कहलखिन- “देखियौ ऐठामक मौगी सभकेँ ढेका खोंसने!” श्यामाक बात सुनि रमाकान्त हँसला, मुदा किछु बजला नहि। रमाकान्त आँखि उठा-उठा चारू दिस ताकि मने-मन सोचैथ जे वाह रे ऐठामक सरकार! केते सुन्दर आ चिक्कन-चुनमुन बनौने अछि! केतौ बैस जाउ..! केतौ सुति रहू..! सरकार बनौने अछि..! अपना सभ दिस कोनो स्टेशन एहेन नइ अछि जैठाम भरि ठेहुन गन्दगी नहि। प्लेटफार्मेपर केराक खोंइचा, पानक पीक, चिनियाँ बदामक खोंइचा, कागतक टुकड़ी, रंग-बिरंगक गुटखा सबहक पन्नी छिड़ियाएल रहैए। तेतबे नहि, जेरक-जेर भिखमंगा, पौकेटमार, उचक्का सेहो रेलबे स्टेशनसँ लऽ कऽ बस स्टेण्ड धरि पसरल रहैए। मुदा ऐठाम तँ एक्कोटा नजैरिए ने पड़ैए। गाड़ीक झमारसँ तीनू गोरेक देह भँसियाइ छेलैन। मुदा की करितैथ। जुगेसर तमाकुल चुनबैत रहए। मने-मन रमाकान्त सोचैथ जे बड़का फेरामे पड़ि गेल छी। की करब। किछु फुरबे नै करै छेलैन। बड़ी काल धरि उगैत-डुमैत रहला। जइ गाड़ीसँ गेल रहैथ ओइ गाड़ीक भीड़ छँटल। लोक पतराएल। तैबीच एक गोरे मोटर साइकिलसँ आबि रमाकान्तेक आगूमे गाड़ी लगौलक। रमाकान्त ओइ आदमी दिस ताकए लगला आ ओहो आदमी रमाकान्त दिस। जेना नजैरेसँ दुनू गोरेक बीच चिन्हा-परिचए भऽ गेल होइन। ..रमाकान्त उठि कऽ ओइ आदमी लग जा, जेबीसँ पुरजी निकालि देखए देलखिन। पुरजीमे पता लिखल देख ओ आदमी एकटा टेम्पूबलाकेँ हाथक इशारासँ सोर पाड़लक। टेम्पूबलाकेँ अबिते पता बता लऽ जाइले कहलखिन। तीनू गोरे टेम्पूमे बैस विदा भेला। मुदा ड्राइवर ने हिन्दी जनैत आ ने मैथिली। तँए ड्राइवरक संग कोनो गप-सप्प रस्तामे नै होइ छेलैन। स्टेशनक हातासँ निकैलते रमाकान्त आँखि उठा-उठा बजारो दिस देखैथ आ लोको सभकेँ। बजारमे ओते अन्तर नइ बुझि पड़ैन जेते लोक आ बोलीमे। मने-मन रमाकान्त अपना इलाकासँ इलाका मिलबए लगला। अपना ऐठाम पिंड-श्याम आ गोर वर्ण एकरंगाह अछि मुदा ऐठाम पिंड-श्याम वर्णक लोक अधिक अछि। लोकक बाजबो दोसरे रंगक छइ। जेना मधुमाछी भनभनाइए, तहिना। मुदा अपना ऐठामक लोक जकाँ ठक ऐठाम नइ बुझि पड़ैए...। बजारक रस्तासँ जाइत रहैथ तँए गरीबी-अमीरीमे अन्तर बुझिए नै पड़ैन। मुदा अपना इलाकाक बजारसँ ओइठामक बजार बेसी चिक्कन-चुनमुन आ सुन्दर बुझि पड़ैन। गन्दगीक केतौ दरस नहि। मुख्य मार्गसँ निकैल पूब-मुहेँ एकटा रस्ता गेल अछि। ओही रस्तामे डाक्टर महेन्द्रक घरो आ क्लिनिको छैन आ जइ अस्पतालमे महेन्द्र नोकरी करै छैथ ओ मुख्य मार्गमे अछि। ..ओही गलीक मोड़पर टेप्पूक ड्राइवर तीनू गोरेकेँ उताइर भाड़ा लऽ आगू बढ़ि गेल। सड़कक दुनू भाग बड़का-बड़का मकान सभ। मोड़पर तीनू गोरे मोटरी रखि बैस रहला। गाड़ीक झमारसँ तीनूक देह-हाथ तेतेक बथैत रहैन जे ठाढ़ रहले ने होइन। जहिना अमावस्याक रातिमे वादल पसैर आरो अन्हार कऽ दइए तहिना रमाकान्तोकेँ होइ छेलैन। एक तँ अनभुआर जगह दोसर बोलीक भिन्नता, बोली मनुख मनुखक बीच केते दूरी बनबैए ई बात रमाकान्त आइए बुझलैन। श्यामा मने-मन सोचैथ जे हे भगवान केहेन जगह अछि जे अछैते मनुखे हम सभ हेराएल छी! तीनू गोरे निराशाक समुद्रमे डुमल। मने-मन रमाकान्तकेँ होनि जे आब की करब? आइ धरि जिनगीमे एहेन फेरा नै पड़ल छल। अपन सभटा बुधि-अकील हेरा गेल अछि...। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- “जुगेसर, मन घोर-घोर भऽ गेल अछि। कनी तमाकुल लगाबह।” जुगेसर तमाकुल चुनबए लगल। सभ सबहक मुँह देख नजैर निच्चाँ कऽ लइ छला। तैबीच रमाकान्तक जेठ बेटा डा. महेन्द्र फिएट कारसँ अस्पतालसँ घर अबैत रहैथ कि सड़कक कातमे तीनू गोरेकेँ बैसल देखलैन। पहिने तँ थोड़े धखेला मुदा चिन्हल चेहरा तँए मेन रोडसँ गाड़ी बढ़ा अपन रस्तापर लगौलैथ। गाड़ीसँ उतैर लगमे आबि पिताकेँ गोड़ लगलैन। पिताकेँ गोड़ लागि माएकेँ गोड़ लगलैन। गोड़ लागि पिताक हाथक झोरा लऽ गाड़ीमे रखैले बढ़ला। पाछूसँ ईहो तीनू गोरे उठि गाड़ी दिस बढ़ला। जुगेसरो अपना हाथक मोटरी गाड़ीमे रखलक। चारू गोरे गाड़ीमे बैस आगू बढ़ला। महेन्द्र अपने ड्राइवरी करैथ। महेन्द्रकेँ गाड़ी चलबैत देख माए पुछलकैन- “बच्चा, मोटर अपने हँकै छह?” “हँ।” “डरेबर नै छह?” माइक प्रश्न सुनि महेन्द्र मुस्कियाइत बजला- “जखन गाड़ीमे रहै छी तखन दोसर काजे कोन रहैए जे डरेबर राखब। अनेरे खरचो बढ़त।” घरक आगू गाड़ी पहुँचते महेन्द्र हौरन बजेला। गाड़ीक अवाज सुनि भीतरसँ नोकर आबि गेटक ताला खोलि देलकैन। महेन्द्र गाड़ी भीतर लऽ गेला। गाड़ी ठाढ़ कऽ उतैर गाड़ीक तीनू फाटक खोलि तीनू गोरेकेँ उतारलैन। गाड़ीसँ उतैरते रमाकान्त मकान दिस तकलैन। तीन-तल्ला बड़का मकान। आगूक फुलवाड़ी देख रमाकान्त मने-मन सोचए लगला जे सम्पैत तँ गामोमे बहुत अछि मुदा एहेन घर अपन कोन जे परोपट्टामे एहेन मकान केकरो नइ छइ। मनमे उठलैन जे अपन कमाइसँ महेन्द्र एहेन घर बनेलक कि बैंक-तैंकसँ करजा लऽ कऽ आकि भाड़ामे नेने अछि? ओना, कहने छेलए जे जमीन कीनि कऽ मकान बनेलौं। मुदा एहेन घर बनबैमे पचास लाखसँ ऊपरे खरच भेल हेतै, एतबे दिनमे केते कमा लेलक! आगू-आगू महेन्द्र आ तइ पाछू तीनू गोरे मकानमे प्रवेश केलैन। मकानक सिमेंट एहेन जमौल जे पएर पिछड़ैत। सभसँ ऊपरका तल्लामे लऽ जा एकटा कोठरी रमाकान्त आ जुगेसरकेँ दोसर माएकेँ सुमझा देलैन। ताबे नोकर जलखै आ पानि नेने पहुँच गेलैन। हाथो-पएर नै धोलैन आ रमाकान्त पलँगपर पड़ि रहला। पंखा चलैत। दूटा पलँग कोठरीमे लगौल। दूटा टेबूल, एकटा नमहर ऐना, देवी-देवताक फोटो सेहो देबालमे टाङ्गल। नील रंगसँ कोठरी रंगल। दूटा अलङा सेहो देबाल दिस राखल। खूब मोटगर गद्दीदार ओछाइन पलँगपर बिछौल। मसनद सेहो दुनू पलँगपर राखल। पानिक टँकी सेहो कोठरीक मुहेँपर केबाड़क बगलमे। पलँगसँ उठि रमाकान्त कुरुर कऽ जलखै करए लगला। दू कौर खा पानि पीब चाह पीबए लगला। जुगेसरो जलखै खा कऽ चाह पीबए लगल आ महेन्द्रो हाथमे कप लेने ठाढ़े-ठाढ़ चाह पीबए लगला। ..चाहक चुस्की लैत रमाकान्त महेन्द्रकेँ पुछलखिन- “बौआ, मकान अपने छी?” “हँ।” “बनबैमे केते खरच भेल?” खर्चाक नाओं सुनि मुस्कियाइत महेन्द्र बजला- “बाबू, खरच तँ डायरीमे लिखल अछि तँए बिना देखने नीक-नाहाँति नै कहि सकै छी मुदा तीन लाखमे जमीन किनलौं से मन अछि। जखन जमीन भऽ गेल तखन चारू गोरे कमेबो करी आ घरो बनबी। तँए ठीकसँ बिना डायरी देखने नै कहि सकै छी।” टेबुलपर कप रखि रमाकान्त बजला- “चारि दिन नहेना भऽ गेल, देहमे एक्को रत्ती लज्जैत नइ बुझि पड़ैए तँए पहिने नहाएब-खाएब आ भरि मन सूतब।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि महेन्द्र कोठरीसँ निकैल नोकरकेँ कहलखिन- “तीनू गोरेकेँ फोनसँ कहि दहक जे बुड़हा-बुड़ही एला अछि।” नोकरकेँ कहि पिता-लग आबि महेन्द्र कहलखिन- “चलू, नहाइक घर देखा दइ छी।” आगू-आगू महेन्द्र आ पाछू-पाछू रमाकान्त आ जुगेसर चलला। स्नान घरक केबाड़ खोलि महेन्द्र बजला- “दूटा जोड़ले कोठरी अछि, दुनू गोरे नहाउ।” कहि दुनू कोठरीक बौल जरा देलखिन। कोठरीकेँ निंगहारि-निंगहारि दुनू गोरे देखए लगला। पानिक झरना, टँकी, साबुन रखैक चक्का, कपड़ा रखैक अलगनी इत्यादि सभ किछु...। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- “जुगे, चाह तँ पीलौं मुदा तमाकुल खेबे ने केलौं। मन लुलुआएले अछि। जा पहिने तमाकुल नेने आबह।” जुगेसर स्नान घरसँ निकैल कोठरी आबि, तमाकुल-चुन लऽ आबि चुनबए लगल। तमाकुल चुना रमाकान्तोकेँ देलकैन आ अपनो ठोरमे लेलक। थूक फेकैत रमाकान्त बजला- “जुगे, गाममे हमहूँ सम्पैतबला लोक छी मुदा आइ धरि एहेन पैखाना कोठरी आ नहाइक घर नै देखने छेलिऐ। सभ दिन खुल्ला मैदानमे पैखाना जाइ छी आ पोखैरमे नहाइ छी।” “काका, अपना सभ गाममे रहै छी ने। ई सभ शहर-बजारक छिऐ। जँ शहर-बजारक लोक गाम जकाँ चाहबो करत से थोड़े हेतइ। ऐठाम लोक बेसी अछि आ जगह कम छै तँए लोककेँ एना बनबए पड़ै छइ। मुदा पोखैरमे लोक पानिमे पैस कऽ नहाइए आ ऐठाम पानि ढारि कऽ नहाइए जहिना अपना सभ कहियो काल लोटासँ पानि ढारि कऽ नहाइ छी तहिना। मुदा पानिमे पैस कऽ नहेलासँ जे संतोख होइ छै से ऐमे नै हेतइ।” “एहेन जिनगी जीनिहारकेँ गाममे रहब पार लगतै, जुगे?” “से केना लगतै।” “बाबू हमरा बेसी काल कहै छला जे मनुखक शरीर देखैमे एक रंग लगनौं जीबैक जे ढंग छै ओ दू रंग बना दइ छइ।” “अहाँक गप हम नइ बुझलौं, काका?” “देखहक, जे आदमी भरिगर काज सभ दिन करैए ओकरा जइ दिन भरिगर काज नइ हेतै तँ देहो-हाथ दुखैतै आ अन्नो रुचिगर नै लगतै। तहिना जे आदमी हल्लुक काज करैए आ जँ ओकरा कोनो दिन भरिगर काज करए पड़तै तँ ओकरो देह-हाथ ओते दुखेतै जे अन्नो ने खा हेतइ।” “हँ, से तँ होइ छइ, हमरो कए दिन भेल अछि।” “तहिना गामक लोक जे शहर-बजारमे आबि जिनगी बदैल लइए, ओ फेर गाम अही दुआरे नै जाए चाहैए।” “काका, गामक लोक गरीब अछि, खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ ओढ़े-पीनहै, रहइ आ दबाइ-दारूसँ लऽ कऽ पढ़ै-लिखैक सभ चीजक अभाव छै, तँए लोक नै रहए चाहैए गाममे।” महेन्द्र पिताकेँ स्नानघर पहुँचा घुमि कऽ अपना कोठरी आबि पत्नी, भाए आ भावोकेँ माने डाक्टर रविन्द्रकेँ, डाक्टर जमुनाकेँ आ डाक्टर सुजाताकेँ फोनसँ कहि देलखिन जे गामसँ माए-बाबू आ जुगेसर एला हेन। तीनू गोरेकेँ जानकारी दऽ अपने भंसा घर जाए मने-मन सोचए लगला जे ऐठामक जे खान-पान अछि ओ हुनका सभकेँ पसिन हेतैन की नहि? तँए गामक जे खान-पान अछि, सएह बनौनाइ नीक हएत। मुदा भनसिया तँ ऐठामक छी, बना पौत कि नहि। तँए अपनेसँ बनाएब। ओना, भात-दालि आ रसगर तरकारी तँ भनसियो बना सकैए। खाली तेतैर परहेज करैक अछि। तेतैरक अलगसँ खटमिट्ठी बना लेब। जँ तरूआ तरकारी नहि बनाएब तँ पिता अपमान बुझता। ओना, दूधो-दही जरूरी अछि। मुदा एक्कोटा चीजसँ काज चलि सकैए। दहियो तँ घरमे नहियेँ अछि। लगक दोकान सबहक दही दब रहै छै तँए रविन्द्रकेँ कहि दिऐन जे दरभंगाबला होटलसँ दही किनने औत। ई बात मनमे अबिते महेन्द्र मोबाइलसँ रविन्द्रकेँ कहलखिन। रविन्द्र अस्पतालसँ सोझे दरभंगाबला होटल विदा भेला। महेन्द्र अपनेसँ तिलकोरक पात, परोर, झिंगुनी, भाँटा आ आलू तड़ए लगला। गैस चुल्हि, तँए लगले सभ किछु बनि गेलैन। पैखाना जाइसँ पहिनहि रमाकान्त हाथ मटियबैले माटि ताकए लगला। मुदा माटिक केतौ पता नहि। नहाइसँ लऽ कऽ हाथ धोइ तकमे साबुनेक बेवहार। रमाकान्त जुगेसरकेँ पुछलखिन- “जुगेसर, बिना माटिए हाथ केना मटियाएब?” रमाकान्तक बात सुनि मुस्कियाइत जुगेसर बाजल- “काका, जेहेन देश ओहेन भेस बनबए पड़ै छइ। गाममे तँ भरि दिन माटिए-पर रहै छी मुदा ऐठाम तँ माटिसँ भेँटो मोसकिल अछि। देखते छिऐ जे माटि तरमे पड़ि गेल अछि। ने माटिक घर अछि आ ने रस्ता-पेरा। साबुनो तँ गमकौए छी। की हेतै साबुनेसँ हाथ धोइ लेब।” “कहलह तँ ठीके मुदा हाथ धुअब आ मनकेँ मानब दुनू दू बात अछि। हाथ धोइए लेब मुदा मन नै मानत तँ ओ हाथ धुअब केना भेल?” “हँ काका, ई बात तँ हमहूँ मानै छी मुदा गन्दगी साफ करैक सवाल छै किने से तँ हएत। मनकेँ बुइधे चलबै छै तँए मनकेँ बुधि मना लेत।” “तोहूँ तँ आब बच्चा नै छह जे नइ बुझबहक। एकटा बात कहह जे लोक पेटमे खाइए, पेट भरै छै, तखन लोक किए कहै छै जे भरि मन खेलौं वा पेट भरला पछाइतो कहै छै जे मन नै भरल?” “अपना सभ काका मिथिलामे रहै छिऐ ने। मिथिलाक माटियो पवित्र छइ। मुदा ई तँ मद्रास छी, तँए ऐठामक लोक जे करैत हुअए सएह करब उचित।” “बड़ बढ़ियाँ।” कहि दुनू गोरे अपन क्रिया-कलापमे लगि गेला। रमाकान्त आ जुगेसर स्नाने घरमे रहैथ, तैबीच रविन्द्र, जमुना आ सुजाता तीनू गोरे अपन-अपन गाड़ीसँ आबि गेलैथ। सबहक मनमे अपन-अपन ढंगक जिज्ञासा रहैन तँए गाड़ीसँ उतैरते कियो पिता रमाकान्त, ससुर रमाकान्तकेँ देखैले उताहुल। मुदा कोठरी अबिते पता चललैन जे ओ नहाइ छैथ। नहाएब सुनि सभ अपन-अपन कपड़ा बदलए अपना-अपना कोठरीमे प्रवेश केलैन। पेन्ट-शर्ट खोलि रविन्द्र लुंगी पहिरते माइक कोठरी दिस बढ़ला। कोठरीमे पहुँचते माएकेँ गोड़ लागि आगूमे ठाढ़ भऽ गेला। रविन्द्रकेँ माए चिन्हलकैन तँ नइ मुदा गोड़क जवाब बिन चिन्हनहि दऽ देलखिन। ..रविन्द्र मुस्कियाइत रहैथ। मुदा अनचिन्हार जकाँ माए बेटाक मुँह दिस टकर-टकर तकैत। तैबीच जमुना आ सुजाता सेहो आबि श्यामाकेँ गोड़ लगलकैन। दुनू पुतोहुओकेँ सासु असिरवाद देलखिन। रविन्द्र बुझि गेला जे माए नइ चिन्हलैन। मुस्कियाइत बजला- “माए, हम रविन्द्र छी!” ‘रविन्द्र’ सुनिते श्यामा हक्का-बक्का भऽ गेली। अनासुरती मुहसँ निकललैन- “रविन्द्र।” चारि सालसँ रविन्द्र गाम नै आएल छला। पहिने रविन्द्रक देह एकहारा छेलैन। खिरकिट्टी जकाँ। जे अखन मस्त-मौला भऽ गेला अछि। पुष्ट देह भेने रविन्द्रक रूपे बदैल गेलैन। कोरैला बेटा होइक नाते माइक ममता बाढ़िक पानि जकाँ उमैड़ गेलैन। मुँहक बोली पड़ा गेलैन। खाली आँखिए-टा क्रियाशील रहलैन जेहो अश्रुधारासँ सिमैस गेलैन। ..आँचरसँ नोर पोछिते श्यामाकेँ ओ दिन मनमे नचए लगलैन जइ दिन रविन्द्र ऐ आँचरमे नुकाएल रहै छल। सौझुका तरेगन जकाँ श्यामाक हृदैमे सुखद जिनगीक मनोरथ सभ चमकए लगलैन। हाथक इशारासँ माए दुनू पुतोहुकेँ बैसैले कहलखिन। दुनू पुतोहु माइक दुनू भाग बैसली। दुनू कान्हपर दुनू हाथ दऽ सासु ओइ दुनियाँमे वौआए लगली जइ दुनियाँमे दुखक कोनो जगह नै होइत। मुदा सुखोक तँ दूटा दुनियाँ अछि। एक दुनियाँ श्यामाक आ दोसर रविन्द्रक। जे दुनियाँ श्यामा दुनू परानीक भेल जाइ छेलैन ओ तियाग, करूणा आ दयाक सवारीसँ वैरागक मन्जिल दिस बढ़ैत जाइत रहैन। जखन कि दुनू भाँइ रविन्द्रक जिनगी अधिक-सँ-अधिक धनक उर्पाजन कऽ दैहिक सुख दिस बढ़ि रहल छेलैन...। रमाकान्त आ जुगेसर नहा कऽ कोठरी एला। नहेला पछाइत दुनू गोरेक देहक थाकैन मेटा गेलैन। नव-नव स्फूर्ति आ ताजगी आबि गेलैन। नव ताजगी अबिते भूखो जगलैन। रविन्द्र कोठरीसँ निकैल पिताक कोठरी दिस बढ़ला। ताबे महेन्द्र सेहो पिता लग आबि भोजन करैक आग्रह केलकैन। एमहर सासु लग दुनू पुतोहु बैस एक-दोसराक खनदान, परिवार आ मानवीय सम्बन्ध बनबैले वस्तु-जात एकत्रित करए लगली। गामक देहाती जिनगी बितौनिहारि पचपन बर्खक सासु आ बजारू जिनगी जीनिहारि दुनू पुतोहु, तीनूक मन अपन-अपन जिनगीक रस्तासँ भ्रमण करैत रहैन। मुदा सासु-पुतोहुक रस्तामे केतौ सम्बन्ध नै रहनौं मानवीय संवेदना आ जिनगीक बेवहारिक प्रक्रिया तीनूकेँ लग आनि सटबैत रहैन। बितल जिनगी तँ स्मृति आ इतिहास बनि जाइए मुदा अबैबला जिनगीक रूप-रेखा तँ अखने निर्धारित होएत। एककेँ जिनगीक पचपन बर्खक अनुभव तँ दोसर-तेसर आधुनिक शिक्षासँ लैश। सोचमे दूरी रहनौं, सभ एक्के परिवारक छी, ई विचार सभकेँ बलजोरी खींच कऽ एकठाम सटबैत रहैन। श्यामाक मनमे प्रश्न उठैत रहैन जे हम हजारो कोस हटि कऽ बेटा-पुतोहुसँ दूर रहै छी तखन हमरा पुतोहुक सुख केते हएत? समाजमे देखै छी जे अस्सी बर्खक बुढ़-पुरानसँ लऽ कऽ पेटक बच्चा धरि एकठाम रहि हँसी-खुशीसँ जिनगी बितबैए। खाएब-पीब कोनो वस्तु नइ छी। किएक तँ जेकरा हम नीक वस्तु बुझै छिऐ ओहो भोज्य-पदार्थ छी आ जेकरा दब वस्तु बुझै छिऐ ओहो भोज्ये-पदार्थ छी। हँ, ई विषमता समाजमे जरूर छै जे कियो नीक वस्तु थारीमे छूता कऽ उठैए जेकरा कुकुर खाइए आ कियो भूखल सुतैए। मुदा हम देखै छी हजारो किसिमक भोज्य-वस्तु घरतीपर पसरल अछि जेकरा ने सभ चिन्हैए आ ने उद्यम कऽ आनए चाहैए...। जखन कि जमुना आ सुजाता सोचैत जे परिवारकेँ आगू बढ़बैले सन्तान जरूरी अछि। नोकर-दाइक सहारासँ छोट बच्चाक पालन तँ हएत मुदा सेवा नहि, किएक तँ माए अपन बच्चाकेँ दूधो नै पीआबए चाहैत। बच्चा जखन स्कूल जाइ-जोकर होइत तखन आवासीय विद्यालयमे भरती करा शिक्षा-दीक्षा दइत। शिक्षा प्राप्त केला पछाइत कमाइक जिनगीमे प्रवेश करैत। जिनगीक एक चक्र ईहो छी। जहिना जमुना आ सुजाताक मनमे चकभौर लइ छेलैन। श्यामाक मन अपन खनदानी परिवारक फुलवाड़ीमे औनाइ छेलैन। ने आगूक रस्ता देखै छेली आ ने पाछूक। आगूक रस्ता कठिन अछि आकि सघन आकि संवेदन रहित वा सहित? एक-दोसर मनुखक सम्बन्ध हेबा चाहिऐ, ओ जरूरीए नइ अनिवार्य आ आवश्यक सेहो अछि। जे मनुख ऐ धरतीपर जन्म लेलक, ओकरो ओतेक जीबैक अधिकार छै जेते दोसरकेँ छइ। जँ से नइ अछि तँ लड़ाइ-दंगाकेँ कोन शक्ति रोकि सकैए? मुदा प्रश्न जटिल अछि, आइ धरिक जे दुनियाँक मनुखक जिनगी बनि गेल अछि ओ एतेक विषम बनि गेल अछि, जे सामूहिक मनुखक कोन बात, दू सहोदर भाइक बीच समता रहब कठिन भऽ गेल अछि, तँए..? भोजनालय। नमगर-चौड़गर कोठरी। देबालपर बहुरंगी फूलक चित्र बनौल। सुन्दर हल्का गुलाबी रंगसँ कोठरी रंगल, एअरकण्डीशन लागल। गोलनुमा नमगर-चौड़गर खेनाइ-खाइक टेबुल। जेकर चारूकात खेनिहार-ले पनरहोसँ बेसीए कुरसी लगल। देबालक खोल्हियामे साउण्ड बॉक्स। जइसँ मधुर स्वरमे गीतक ध्वनि बहराइत। भोजन करैक बाजारू बेवस्थाकेँ महेन्द्र अपनौने। मुदा माता-पिताक एलासँ धर्म-संकटमे पड़ि गेला। मने-मन सोचए लगला जे हम दुनू भाँइ आ दुनू दियादनी चारू गोरे तँ एक्के टेबुलपर खाइ छी मुदा माए तँ बाबूक सोझमे नै खेती। तेतबे नहि, हमरा दुनू भाँइक संगे तँ ओ खेता मुदा दुनू पुतोहुक संग तँ नै खेता। अगर जँ जोर करबैन तँ कहीं बिगैड़ ने जाथि। जँ बिगैड़ जेता तँ आरो विचित्र भऽ जाएत। ..की करब नीक हएत? गुनधुनमे महेन्द्र। मुदा अनासुरती मनमे एलैन जे माएसँ विचार पुछि लिऐन। माए लग जा पुछलखिन- “माए, हमसब तँ एक्के टेबुलपर खाइ छी मुदा..?” महेन्द्रक बात सुनि श्यामा बुझबैत बजली- “बौआ, हमरो उमेर पचास-साठि बर्खक भेल हएत। आइ धरि जइ काजकेँ अधला बुझलिऐ ओ आब केना करब। केते दिन आब जीबे करब। तइले किए अपन बाप-दादाक बतौल रस्ता तोड़ब। एहेन बेवहार सिरिफ अपनेटा परिवारमे तँ नइ अछि, समाजोमे छइ। जाधैर ऐठाम छी ताधैर, मुदा गाम गेलापर तँ फेर वएह बेवहार रहत। तइले एहेन काज करब उचित नहि। गामक जिनगीक अनुकूल चलैन अछि। कोनो चलैन समाज आ जिनगीक अनुकूल बनैए जे जिनगी-ले नीक होइए। भलेँ दोसर तरहक जिनगी जीनिहारकेँ ओ अधला लगौ।” माइक विचार सुनि महेन्द्र दू तोरमे खाएब नीक बुझलैन। पहिल तोरमे अपने, जुगेसर आ पिता तथा दोसर तोरमे बाँकी सभ कियो। भोजन करिते रमाकान्त हफुअए लगला। जुगेसर सेहो हफुअए लगल। हाथ-मुँह धोइ कऽ दुनू गोरे सुति रहला। एक तँ तीन रातिक जगरना, तैपर अन्नक निशाँ सेहो लगले रहैन। एक्के बेर चारि बजे रमाकान्तकेँ नीन टुटलैन। नीन टुटिते, सुतले-सुतल रमाकान्तक नजैर देबालक घड़ीपर गेलैन। चारि बजैत। भाँग पीबैक बेर भऽ गेल रहैन। भाँगक आदत रमाकान्तकेँ पहिनहिसँ छैन। तँए मद्रास अबैए काल झोरामे भाँगक पत्ती लऽ नेने छला। श्यामो बुझि गेली जे हुनका भाँग पीबैक बेर भऽ गेलैन। भाँगक मेजन–मरीच, सोंफ–अननहि छी। सिरिफ पीसैक जरूरत अछि। पलँगपर सँ उठि झोरा खोलि भाँगक सभ समान निकालए लगला। तैबीच सुजाता ब्राण्डीक किलोबला बोतल आ गिलास नेने सासु लग आबि ठाढ़ भऽ गेली। खाइए बेरमे सासु पुतोहकेँ कहि देने रहथिन जे बुढ़ा सभ दिन चारि बजे पीसुआ भाँग पीबै छैथ। भाँगक सम्बन्धमे सुजाता अनाड़ी रहैथ। किछु ने बुझल रहैन। मुदा ब्राण्डीक सम्बन्धमे तँ बुझल रहैन। सुजाता, श्यामा आ रमाकान्त सभ अपन-अपन ढंगसँ साकांच रहैथ। रमाकान्त जुगेसरकेँ जगा टँकीपर मुँह-हाथ धोइले गेला। खट-खुटक अवाज सुनि श्यामा बुझि गेली। बोतल लऽ सुजाता तैयारे रहैथ। मुदा सुजाताक मनकेँ मिथिलाक संस्कृति झकझोड़ैत रहैन। किएक तँ मिथिलाक संस्कृतिक बेवहारिक पक्ष नै जनै छेली तँए जहिना अनभुआर जंगलमे कोनो जानवर औनाइत तहिना सुजातो औनाइ छेली। मने-मन सोचैथ जे ऐठाम जहिना पुतोहु ससुरक बीच बेवहार होइए तहिना मिथिलोमे होइत हएत की नहि? दोसर प्रश्न उठैन जे पढ़ल-लिखल समाजमे तँ पुरान बेवहारो बदैल नव रूप लऽ लइए...। सुजाता अपना हाथमे ब्राण्डीक बोतल आ गिलास रखने वैचारिक दुनियाँमे वौआइ छेली। रमाकान्तकेँ भाँग पीबैक समए भऽ गेल छेलैन तँए विचारमे मधुरता आबि गेल रहैन। तखने लगमे आबि श्यामा बजली- “अखन भाँग नै पिसलौं हेन। पुतोहुजनी एकटा बोतल रखने छैथ से की कहै छिऐन?” भाँग नै पिसब सुनि रमाकान्तक मनमे क्रोध आबए लगलैन मुदा बोतलक नाओं सुनि दबि गेलैन। मुस्कियाइत बजला- “बेटी आ पुतोहुमे की अन्तर छइ। जहिना बेटी तहिना पुतोहु। तहूमे छोटकी पुतोहु, ओ तँ कोरैला बेटी सदृश होइत। एक तँ दुनियाँमे कोनो सम्बन्ध अधला होइते ने छै मुदा तखन जखन ओ सीमामे रहए। जखन सीमाक उल्लंघन लोक करए लगैत तखन लाज आ परदाक जरूरी भऽ जाइ छइ। जे परम्परा बनि आगूमे ठाढ़ भऽ गेल अछि। मुदा ओहनो पैछला बेवहार निपुआंग मरि नहियेँ गेल अछि। तँए नीक बेवहार जिनगीमे धारण करब अधला तँ नहि।” रमाकान्तक बात सुजातो सुनै छेली। मने-मन खुशियो होइ छेली जे ज्ञानवान ससुर छैथ। मुदा बिना सासुक सहमतिसँ आगू बढ़ब उचित नहि। तँए बोतल-गिलास नेने सुजाता अढ़मे ठाढ़ छेली। रमाकान्तक विचार सुनि श्यामा सुजाताकेँ कहए आगू बढ़ली। पर्दाक अढ़मे सुजातोकेँ ठाढ़ देख बजली- “जाउ, भगवान अहाँकेँ भोलेनाथ ससुर देने छैथ। मुदा ससुर जकाँ नहि पिता जकाँ बेवहार करबैन।” बामा हाथमे बोतल आ दहिना हाथमे गिलास नेने सुजाता ससुर लग आबि मुन्ना खोललैन। मुन्ना खुलिते सौंसे कोठरी महक पसैर गेल। महकसँ हवोमे मस्ती आबि गेल। एक गिलास पीब रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- “जुगेसर, तोंहू एक गिलास पीबह।” जुगेसर बाजल- “काका, अहाँ लग बैस केना पीब?” “अखन, ने तूँ छोट छह आ ने हम पैघ छी। सभ मनुख छी। मनुख तँ मनुखे लगमे रहि ने जिनगी बितौत।” तैबीच सुजाता गिलास जुगेसरो दिस बढ़ौलैन। जुगेसर एक्के सुढ़िमे भरल गिलासक पीब गेल। पेटमे ब्राण्डी पहुँचते गुदगुदबए लगलै। दोसर गिलास पीबते रमाकान्त सुजाताकेँ कहलखिन- “बेटी, किछु नमकीन सेहो लाउ?” रमाकान्तक आढ़ैत सुनि सुजाता गिलास-बोतलकेँ टेबुलपर रखि कीचेनसँ मद्रासी भुजिया दूटा पलेटमे नेने एली। एकटा पलेट रमाकान्तक आगूमे आ दोसर जुगेसरक आगूमे रखली। ..दू-चारि फँक्का भुजा फाँकि रमाकान्त फेर दू गिलास ब्राण्डी चढ़ा लेलैन। ओना,भाँगक निशाँ रमाकान्तकेँ बुझल जे पीलाक घन्टा-दू-घन्टाक पछाइत निशाँ चढ़ैए मुदा ब्राण्डीक निशाँ तँ पीबते चढ़ि गेलैन। ओना, जुगेसर दुइए गिलास पीलक मुदा तहीमे मन उनैट गेलइ। सौंसे बोतल पीबते रमाकान्तकेँ ढकार भेलैन। ढकार होइते सुजाताकेँ कहलखिन- “बेटी, इलाइची देल पान खुआउ?” सासु पतिक खान-पानक सम्बन्धमे सभ बात कहि देने रहथिन। तँए सुजाताकेँ बुझल रहबे करैन। दू खिल्ली पान, सुअदगर तेज जरदाक डिब्बा, इलाइची आ सेकल सुपारीक कतरा पलेटमे नेने सुजाता आबि ससुरक आगूमे रखि देलखिन। शराबक रंगमे जहिना रमाकान्त तहिना जुगेसर रंगि गेला। बजैले दुनूक मन लुसफुसाइत रहैन। पान मुँहमे लैत रमाकान्त सुजाताकेँ पुछलखिन- “बेटी, अहाँ डाक्टरी केना पढ़लौं?” ससुरक सवाल सुनि सुजाता बगलक कुरसीपर बैस संकुचित भऽ कहए लगलैन- “बाबू जी! हमर पिता आ माए अपन महल्लाक कपड़ा साफ करैथ। सभ-दिना काज छेलैन। ऐसँ जेना-तेना गुजर चलै छेलैन। एक्केटा घर रहए। अनके कलपर नहेबो करै छेलौं आ पानियोँ पीबै छेलौं। पिता ताड़ी पीबैथ। एक दिन साँझू पहरमे ताड़ी पीब अबैत रहैथ। बहुत बेसी निशाँ लगि गेल रहैन। रस्तापर एकटा खाधि रहै, ओइ खाधिमे ओ खसि पड़ला। तखने एकटा ट्रक, बिना इजोतेक पास करैत रहए। ट्रक हुनका ऊपरे देने टपि गेलै कुड़कुट-कुड़कुट सौंसे शरीर हड्डी सहित भऽ गेलैन। हम सभ बुझबो ने केलिऐ। दोसर दिन भिनसरमे हल्ला भेलै तखन हमहूँ माए, भाए तीनू गोरे देखए गेलौं। देहक दशा देख चिन्हबो ने केलिऐन। मुदा कपड़ा आ चप्पल देख मन खुट-खुट करए लगल। तीनू गोरे दुनू वस्तुकेँ चिन्हि गेलिऐ। तखन हुनका उठा कऽ आनि जरौलयैन। बिच्चेमे जुगेसर बाजि उठल- “अरे बाप रे!” जुगेसरक ‘अरे बाप रे’ सुनि सुजाताक आँखिमे नोर आबि गेलैन। सुजाताक बात रमाकान्त आँखि मूनि कऽ सुनैत रहैथ। जुगेसरक बात सुनिते आँखि खोललैन। हृदए पसीज गेल रहैन। ताड़ी पीआकक बात सुनि रमाकान्तक मनमे उठैत रहैन जे निशाँपान तँ हमहूँ करै छी मुदा ऐठामक जिनगी आ गामक जिनगीमे बहुत अन्तर अछि। तेतबे नहि, पेटबोनियाँ आदमीक सवाल सेहो अछि। हमरा सबहक ग्रामीण जिनगी शान्तिपूर्ण अछि। धनक अभाव तँ जहिना एतौ छै तहिना गामोमे अछि। ऐठाम किछु गनल-गूथल उद्योग आ बेपारी-कारोबारी अछि जे समृद्धशाली अछि। मुदा पेटबोनियोँ ओकरे देखौंस करए चाहैए जइसँ ओकर जिनगी अशान्त भऽ जाइ छइ। ओइ अशान्तिकेँ शान्त करै दुआरे लोक सड़ल-गलल निशाँपान करैए। जइसँ जिनगी बाटेमे टुटि जाइ छै...। एते बात मनमे अबिते रमाकान्त पलँगसँ उठि पीक फेकैले निकलला। बाहरक नालीमे पान थुकैड़ कऽ फेक, टँकीमे कुरुर कऽ कोठरी आबि सुजाताकेँ कहलखिन- “बेटा, चाह पिआउ?” आँचरसँ आँखि पोछैत सुजाता चाह बनबैले किचेन गेली। रमाकान्तक हृदैमे सुजाताक प्रति विशेष आकर्षण बढ़ि गेल रहैन। जेना हनुमानक हृदैमे राम-लक्ष्मण बैसल तहिना सुजातो रमाकान्तक हृदैमे एकटा छोट-छीन घर बना लेली। रमाकान्तक प्रति सुजातोक हृदैमे तस्वीर बनए लगलैन। आइ धरि जे बात सुजातासँ कियो ने पुछने छेलैन से बात सुनि ससुरक हृदए पघिल गेलैन। जरूर रमाकान्तक हृदैमे सुजाता अपन जगह बना लेलैन। चाह आनि सुजाता रमाकान्तो आ जुगेसरोकेँ देलैन। हाथमे चाह लइते रमाकान्त अपन अस्तित्व बिसैर गेला। सुजाताक आँखिमे अपन आँखि दऽ एक-टकसँ देखए लगला। आर्द्र भऽ रमाकान्त सुजाताकेँ कहलखिन- “ओइ समैक जिनगी ओहिना मन अछि आकि बिसरबो केलौं?” “बिसरब केना! ओ घटना तँ हमर जिनगीक इतिहासक एक महतपूर्ण कालखण्ड छी!” “तेकर बाद की भेल?” “हम, दू भाए-बहिन छी। एगारह बर्खक हम रही आ आठ बर्खक भाए। दुनू गोरे स्कूल जाइत रही। महल्लेमे स्कूल। भाए तँ छोट रहए तँए कोनो काज नइ करै मुदा हम माइक संग कपड़ो खिंची आ परतीपर सुखेबो करी, संगे लोहो दिऐ आ माइक संग महल्लासँ कपड़ा आनबो करी आ दैयो अबिऐ। ओइसँ जे कमाइ हुअए तइसँ गुजर करी। पढ़ल-लिखल परिवारसँ लऽ कऽ बनियाँ-बेकाल धरिक परिवारमे आबा-जाही रहए। पढ़ल-लिखल परिवारमे जखन जाइ तँ फाटल-पुरान किताब मांगि ली। ओइसँ पढ़ैले किताब भऽ जाए। खाइक जोगार कमाइएसँ भऽ जाए। ऐ तरहेँ मैट्रिक फस्ट डिविजनसँ पास केलौं। जखन मैट्रिकक रिजल्ट निकलल रहए, तखन महल्ला भरिक लोक बाहबाही केलक। हमरो उत्साह बढ़ल। मनमे अरोपि लेलौं जे बी.एस.सी. करब। ओइ समए हमरा मनमे डाक्टरक विचार रहबे ने करए। रहबो केना करैत। जेतबे बुधि छल, जएह साधन छल तही हिसावे ने सोचितौं। खएर.., कौलेजमे एडमीशन शुरू भऽ गेल छल। महेन्द्र भैयाक कपड़ा दइले हम तीनू गोरे भिनसुरके पहरमे एलौं। भैया ताबे अस्पतालेक क्वाटरमे रहैत रहैथ। तखन ओसारपर बैस दाढ़ी बनबै छला। माए कपड़ाक मोटरी रखि जमुना दीदीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “मलिकाइन, कपड़ा लिअ।” ..हम-दुनू भाए-बहिन ठाढ़े रही। कोठरीसँ निकैलते दीदीक नजैर हमरापर पड़लैन। जमुना दीदी माएकेँ कहलखिन- “बेटी पास केलक, मिठाइ खुआउ।” ..जमुना दीदीक बात सुनि महेन्द्र भैया दाढ़ी बनेनाइ छोड़ि हमरा दिस मुड़ी उठा कऽ तकलैन। बिना किछु बजने थोड़े काल देख, फेर हाँइ-हाँइ दाढ़ी काटए लगला। दाढ़ी काटि, सभ समान सैंत कऽ रखि सोर पाड़लैन। हमरा मनमे कोनो तरहक विचार उठबे ने कएल। किएक तँ तेसरा-चारिम दिनपर बरबैर अबिते-जाइते रही। दीदीकेँ भैया कहलखिन- “कनी चाह बनाउ।” भैयाक बोली हम नइ बुझलयैन मुदा दीदी बुझि गेलखिन। ओ पाँच कप चाह बनौलैन। दू कप अपने दुनू परानी आ तीन कप हमरा तीनू गोरेकेँ देलैन। पहिल दिन हम भैयाक डेरामे चाह पीने रही। भैया, नाओं पुछलैन, हम कहलयैन। मैट्रिकक रिजल्टक सम्बन्धमे पुछलैन। सेहो कहलयैन। भैया नाओं लिखबैसँ लऽ कऽ किताब-कॉपी धरिक भार उठबैत माएकेँ कहलखिन- “स्कूल-कौलेज तँ लगेमे अछि, माने महल्लेमे अछि तँए बाहर जा कऽ पढ़ैक समस्ये ने अछि। घरेपर रहि पढ़ि सकैए। तखन स्कूल-कौलेजक खर्चसँ लऽ कऽ पढै़क सभ सामग्री धरिक खर्च आइसँ दुनू भाए-बहिनक हम देब।” ..भैयाक बात सुनि खुशीसँ हमर मन नाचि उठल। हम बड़ी काल धरि टकर-टकर भैयाक मुँह दिस तकिते रहि गेलौं। जाधैर डाक्टर बनलौं ताधैर भैया सभ खरच दैते रहला।” सुजाताक बात सुनि रमाकान्तक मनमे एलैन जे जँ कनियोँ मदैत गरीबकेँ कएल जाए तँ जिनगीक उद्धार भऽ सकैए। पितो बहुत केलैन। बेटो केलक। बीचमे हम तँ किछु नै केलौं..! ओना, दोसरा-ले रमाकान्तो बहुत किछु केनौं रहैथ आ करबो करैथ। मुदा सभ केलहा बिसैर गेला। रातिक आठ बजि गेल। एका-एकी तीनटा गाड़ी आएल। महेन्द्र अपन गाड़ीसँ उतैर कोठरीमे आबि कपड़ा बदललैन आ सोझे पिता लग एला। महेन्द्रकेँ देखते रमाकान्त कहलखिन- “बौआ, हम बेसी दिन नै अँटकब। हम तँ दस गोरेमे समए बितबैबला छी। ऐठाम असगरमे नीक नै लागत।” महेन्द्र- “गाड़ीक झमारल छी तँए पहिने चारि दिन अराम करू। तेकर बाद देख-सुनि कऽ जाइक विचार करब।” ◌ शब्द संख्या : 4454 5. मद्रास एला रमाकान्तकेँ आइ दस दिन भऽ गेलैन। दस दिन केना बितलैन से बुझबे ने केला। ऐ दस दिनक बीच महेन्द्र अपने गाड़ीसँ तीनू गोरेकेँ उदकमण्डलम्, कोडाइकनाल आ एकडि हिलस्टेशन सहित शुचीन्द्रम, रामेश्वरम्, तिरुचेंदूर, मदुराइ, पलनी,तिरुचिरापल्ली, श्रीरंगम, तंजोर, कुम्बकोणम, नागोर, वेलांकण्णि, वैत्तीश्वरन कोइल, चिदम्बरम्, तिरुवण्णामलै, कांचीपुरम, तिरुत्तणि आ कन्याकुमारी घुमा देलकैन। मुदा अपना सभसँ भिन्न रीति रेवाज, बेवहार आ जीबैक ढंग ओइठामक लोकक बुझि पड़लैन। तैसंग ईहो जरूर बुझि पड़लैन जे अपना सभसँ ऐठामक लोक अधिक मेहनतियो आ इमानदारो अछि। भारतक आजादीक उपरान्त राज्य-पुनर्गठन अधिनियमक अन्तर्गत चौदह जनवरी उन्नैस साए उनहत्तैरमे मद्रास राज्यक नाओं तमिलनाडु राखल गेल। पुरना केरलक किछु हिस्सा आ आन्ध्र प्रदेशक किछु हिस्सा जोड़ि कऽ ऐ राज्यक निर्माण भेल। तमिलनाडु द्रविड़ सभ्यताक केन्द्र अदौसँ रहल अछि। ई.पू. चारिम शताब्दीमे चोल, पाण्ड्य आ चेर राजवंशक समैमे द्रविड़ सभ्यता अपन चरम सीमापर फुलाएल-फड़ल। तेरहमी शताब्दीक आरंभमे ऐठाम काकतीयक शासन रहल। तेरह साए तेइस ईस्वीमे दिल्लीक तुगलक सुल्तान काकतीय शासककेँ भगौलक। गोलकुंडाक कुतुबशाही सुल्तान अखनुका हैदरावादक न्यों लेलक। सम्राट औरंगजेब सुल्तानकेँ हेरा आसफजा-केँ गवर्नर बना देलक। मुगल शासनक आखिरी समैमे आसफजा अपनाकेँ निजामक उपाधि धारण कऽ स्वतंत्र शासक घोषित कऽ लेलक। सोलह साए उनचालीस ईस्वीमे ईस्ट इंडिया कम्पनीक पएर मद्रासमे जमि गेल, ताधैर देशक अधिकांश भागमे अंग्रेजक अधिकार भऽ गेल छेलइ। तमिलनाडुक पूबमे बंगालक खाड़ी, दच्छिनमे हिन्द महासागर, पच्छिममे केरल आ उत्तरमे कर्नाटक आ आन्ध्रप्रदेश अछि। पैछला राति गप-सप्प करैत सभकेँ डेढ़ बजि गेलैन। गपक विषैयो नमहर, सात दिनक देखल मद्रास...। अढाइ बजे भोरमे एकठाम गाड़ी दुर्धटना भऽ गेलइ। चारू गोट डाक्टरकेँ फोन एलैन जे जल्दी दुर्घटनाक जगहपर अबिऐ। फोन सुनि महेन्द्र तीनू गोरे–रविन्द्र, जमुना आ सुजाता–केँ जानकारी दैत कहलखिन- “जल्दी-जल्दी तैयार भऽ चलै चलू।” एक्के गाड़ीसँ चारू गोरे विदा भेला। दुर्घटनाक जगहपर पहुँच महेन्द्र देखलखिन जे गाड़ी एकटा सड़कपर राखल रौलरसँ टकरा गेल अछि। जइसँ सभ कियो थौआ-थाकर भेल अछि। ..गाड़ीमे एक्के परिवारक आठ गोरे सवार छला। उद्योगपतिक परिवार। दू गोरेक हालत बड़ खराप छेलइ। एकटा बुढ़क माथ फटि गेल रहैन, जइसँ ओ अर्र-दर्र बजै छला आ दोसर महिलाक छाती टुटि गेल रहैन। मुदा वायपर कखनो-कखनो बजबो करै छली। एकटा जुआन महिलाक दुनू जांघ टुटि गेल रहैन। दूटा ढेरबा बचियाक एक-एकटा आँखि फुटि गेल रहैन आ एक-एकटा डेन टुटि गेल रहैन। अबोध बच्चाकेँ किछु नै भेल छेलइ। डॉ. महेन्द्रकेँ पहुँचते धाँइ-धाँइ अस्पतालक आनो-आनो डाक्टर,नर्स आ स्टाफो सभ आबए लगला। थाना पुलिससँ लऽ कऽ जिला पुलिस धरि सेहो पहुँच गेल। डाक्टर सभ रोगी सभकेँ देख विचार केलैन जे अस्पताले लऽ जेनाइ नीक होएत। डाक्टर सबहक संगमे सिरिफ अलेटा। ने कोनो दबाइ आ ने कोनो औजार रहैन। आठो गोरेकेँ उठा-पुठा कऽ अस्पताल आनल गेल। अस्पतालमे जाँच-पड़ताल होइते समए दू गोरेक मृत्यु भऽ गेलैन। साढ़े पाँच बजे चारू गोरे डेरा पहुँचला। गाड़ीक हरहरेनाइ सुनि रमाकान्तोक नीन टुटि गेलैन। सुतैक समए नै देख चारू गोरे गाड़ीसँ उतैर अपन-अपन नित्य-कर्ममे लगि गेला। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल रमाकान्त सोचए लगला जे आइ एगारहम दिन छी मुदा एक्को-टा पोता-पोतीक मुँह नै देख सकलौं! जइ परिवारमे पाँच-पाँचटा पोता-पोती रहत ओइ परिवारक बच्चासँ भेँट नै हुअए, ई केतेक दुखक बात छी। माए-बाप, दादा-दादीक सिनेह बच्चाक प्रति की होइ छै तेकर कोनो नामो-निशान नै देख रहल छी। जइ बच्चाकेँ माए-बापक सिनेह नै भेटतै ओइ बच्चाकेँ माता-पिताक प्रति केहेन धारणा बनत। हँ, ई बात जरूर जे दुनियाँक सभ मनुख-मनुख छी तँए सबहक प्रति सभकेँ सिनेह हेबा चाही। मुदा जइ परिवेशमे हम सभ जीब रहल छी, जैठाम बेकतीगत सम्पैत आ जवाबदेहीक बीच मनुख चलि रहल अछि, तैठाम सिनेह तँ खण्डित होइए। मनुखक जिनगी स्थायी नहि अस्थायी होइए। उमेरक हिसाबसँ शरीर क्रियाशील रहैए। जहिना बच्चाक उत्तरदायित्व माए-बापपर रहै छै तहिना रोगसँ ग्रसित वा अधिक वयस भेलापर जखन शरीरक अंग शिथिल हुअ लगै छै, तखन माइयो-बापक उत्तरदायित्व तँ बच्चापर होइ छइ। जँ से नै होइ तखन जिनगी कष्टमय हेबे करत। लोक एक राज्यसँ दोसर राज्य, एक देशसँ दोसर देश कमाइले जाइए, किएक? अहीले ने जे अपनो आ परिवारोक जिनगी चैनसँ चलत...। रंग-बिरंगक प्रश्न सबहक बीच रमाकान्त पड़ल छला। महेन्द्रकेँ तीन आ रविन्द्रकेँ दू सन्तान। दुनू मिला कऽ पाँच भाए-बहिन। महेन्द्रक जेठ बेटा हाइ स्कूलमे पढ़ैत, बाँकी चारू नर्सरीमे। महेन्द्रक जेठ बेटाक नाओं ‘रमेश’, जे हाइ स्कूलक होस्टलमे रहैए आ बाँकी चारू आवासीय स्कूलमे। महिना दू महिनापर महेन्द्र अपनेसँ जा कऽ खरचा पहुँचबै छैथ। बाबा-दादीक जोर केलापर बच्चा सभकेँ भेँट करैक कार्यक्रम महेन्द्र बनौलैन। रबि दिन स्कूलो बन्न रहत, तँए भेँट-घाँट करैमे सुविधा सेहो होएत। सात बजे डेरासँ चलबाक कार्यक्रम बनल। रमाकान्त, श्यामा आ जुगेसर समैसँ पहिनहि तैयार भऽ गेल छला मुदा भरि रातिक जगरना दुआरे महेन्द्र पछुआएल रहैथ। ओंघीसँ देह भँसियाइत रहैन। मुदा नीन तोड़ैक दबाइ खा पिता लग आबि बजला- “बाबू, हम तँ भरि राति जगले रहि गेलौं। जखन ओछाइनपर गेलौं, नीन पड़लो ने रही कि फोन आबि गेल जे एकटा गाड़ीक दुर्घटना भऽ गेलै, जइमे सवार एक्के परिवारक आठ गोरे छला, ओ पैघ उद्योगपति परिवार छल। हुनके सभकेँ देखैत-सुनैत भोरमे एलौं।” बिच्चेमे जुगेसर बाजल- “मरबो केलइ?” “हँ! जे दुनू मुख्य कारोबारी छला ओ मरि गेला। एक गोरेकेँ ब्रेन हेम्रेज भऽ गेलैन। आब ओ सभ दिन पगलाएले रहती। एक गोरेकेँ छातीक हड्डी थौकचा भऽ गेल छैन, ओ दू-चारि मासक मेहमान छैथ। तीनटा अधमरू भऽ कऽ जीता। एकटा चारि सालक बच्चाटा सुरक्षित रहल।” रमाकान्त महेन्द्रक बातो सुनैथ आ मने-मन सोचबो करैथ जे यएह छी जिनगी। अहीले लोक एते नीच-सँ-नीच काजपर उतैर मनुखकेँ मनुख नइ बुझैए। मुदा अनका बुझबैले धरमक नाटक रचि पूजा-पाठ-कीरतन-भजन करैए। तैसंग हजारो-लाखो रूपैआ खरच कऽ पाथरक मूर्ति सेहो स्थापित करैए, नीक-नीक प्रसाद चढ़बैए। मुदा जइ मनुखकेँ पेटमे अन्न नहि, देहपर वस्त्र नहि, रहैक घर नहि आ जीबैक कोनो ठेकान नहि, ओकरा देखनिहारो कियो नहि! यएह छी कर्मकाण्डक आडम्बर आ चक्रव्यूह! रमाकान्तकेँ गम्भीर देख मुस्कियाइत महेन्द्र बजला- “नोकरीक जिनगीए एहेन होइ छइ। एक रातिक कोन बात जे एकलखाइत पाँचो राति जगल रहब तैयो किछु नइ बुझबै। एहेन-एहेन दबाइ सभ अछि जे खाइत देरी नीन निपत्ता भऽ जाइए। जाबे अहाँ सभ चाह-पान करब ताबे हमहूँ तैयार भऽ जाइ छी।” कहि महेन्द्र उठि कऽ तैयार होइले अपना कोठली चलि गेला। चारू गोरे कारमे बैस विदा भेला। दुनू स्कूल एक्केठाम। एक दोसरसँ थोड़बे हटल। चारू गोरे पहिने रमेशक होस्टल पहुँचला। छहरदेवालीक बीचमे होस्टल अछि। अबै-जाइक एक्केटा दरबज्जा, जइ दरबज्जामे लोहाक फाटक लागल, ओतए एकटा दरमान बैसल। दरमान महेन्द्रकेँ चिन्हैत रहैन। किएक तँ मासे-मास ओ अबै छैथ। चारू गोरे भीतर गेला। भीतरमे गार्जन सभ-ले एकटा खुला घर अछि, जइमे चारूकात कुरसी सजल। चारू गोरे ओइ घरमे बैसला। महेन्द्र रमेशकेँ समाद देलखिन। रमेश आबि पिताकेँ गोड़ लागि ठकुआ कऽ आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। ने रमेश बाबा दादीकेँ चिन्हैत आ ने बाबा-दादी रमेशकेँ। ठकुआएल ठाढ़ देख रमेशकेँ महेन्द्र कहलखिन- “बौआ, बाबा-दादीकेँ गोड़ लगहुन ने!” महेन्द्रक कहलापर रमेश तीनू गोरेकेँ गोड़ लगलकैन। शिष्टाचार निमाहैत तीनू गोरे असिरवाद देलखिन। मुदा रमाकान्तक मनमे तूफान उठि गेलैन। सोचए लगला- जे पोता चिन्हबो ने करैए ओ सेवा की करत? पढ़नाइ-लिखनाइ, सभ मनुख-ले जरूरी अछि। ऐसँ ज्ञान होइ छै, जे जिनगी जीबैक ढंग सिखबैए। मुदा जँ बच्चाकेँ परिवारसँ अलग जिनगी बना पढ़ौल-लिखौल जाए तँ ओ परिवारकेँ केना चिन्हत आ परिवारक दायित्वकेँ केना बुझत? परिवारोक तँ सीमा छइ। एक परिवार पैछला पीढ़ीकेँ जोड़ि बनैए, जे संयुक्त परिवार कहबैए। संयुक्त परिवार मिथिलाक धरोहर छी। आ दोसर अपने लगसँ आगू बढ़ि बनैए, जे एकल परिवार कहबैए। जइमे लोक बापो-माएकेँ बीरान बुझि कुभेला करैए। जँ ऐ तरहक परिवारक संरचना हुअ लगत तँ बापो-माएकेँ धिया-पुतासँ कोन मतलब रहतै। तखन समाजक की दुर्दशा हेतै? जँ से हेतै तँ मनुख आ जानवरमे अन्तरे की रहत? अखने देख रहल छी जे अपन खून रहितो बुझि पड़ैए जे जहिना हाट-बजार वा मेला-ठेलामे हजारो मनुख देखलोपर अनचिन्हारे-अनचिन्हार बुझि पड़ै छै, तहिना भऽ रहल अछि। ऐसँ नीक जे जखन मनुखक समूहसँ परिवार बनैत आ परिवारक समूहसँ समाज तखन समाजेक सदस्यकेँ किएक ने अंगीकार कएल जाए, जइसँ जिनगी हँसैत-खेलैत बितैत रहत...। पिताकेँ गुम्म देख महेन्द्र बजला- “बाबू, ऐठामसँ चलू। ऐठाम सभ बच्चाक रुटिंग बनल छइ। अगर अपना सभ बेसी समए अँटकबै तखन बच्चाक रूटिंग गड़बड़ा जेतइ।” ममता भरल मनकेँ मारि रमाकान्त उठि कऽ ठाढ़ होइत बजला- “हँ, हँ, चलू। ओहू बच्चा सभकेँ देखैक अछि।” रमेशो चलि गेल आ ईहो चारू गोरे गाड़ीमे बैस बढ़ला। नर्सरी विद्यालय लगेमे, लगले सभ कियो पहुँचला। महेन्द्रकेँ दरमान चिन्हिते, तँए कोनो रोक-राक नहियेँ भेलैन। चारू बच्चाकेँ दरमान बजा अनलक। चारू बच्चा आबि महेन्द्रकेँ गोड़ लगलकैन। गोड़ लागि चारू गोरे ठमैक गेल। हाथक इशारासँ रमाकान्त आ श्यामाकेँ देखबैत बच्चा सभकेँ महेन्द्र कहलखिन- “बौआ, बाबा-दादी छथुन। गोड़ लगहुन।” महेन्द्रक कहलापर चारू बच्चा तीनू गोरेकेँ गोड़ लगलकैन। रमाकान्तो आ श्यामोक मन तरे-तर टुटए लगलैन। मुदा की करितैथ। सोचए लगला जे की सोचि ऐठाम एलौं आ की देख रहल छी। आब एक्को दिन ऐठाम रहब उचित नहि, मुदा जखन आबि गेलौं तखन तँ बेटे-पुतोहुक विचारसँ ने गाम जाएब। किछु देखैले बाँकी सेहो अछि। टुटल मने रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- “बच्चा सभकेँ देखिए लेलौं, आब ऐठामसँ चलू। गामक सुरता घीचि रहल अछि। जल्दीए चलि जाएब।” पिताक बात महेन्द्र नइ बुझि सकला। जाधैर महेन्द्र गाममे रहला विद्यार्थीए छला। डाक्टर बनला पछाइत मद्रासे चलि एला। जइसँ मद्रासेक परिवेशमे ढलि गेला। बेर टगिते चारू गोरे ब्रह्मचारी आश्रम विदा भेला। बह्मचारी आश्रममे मन्दिर नहि। मात्र दूटा घर। एकटा घर धर्मशाला जकाँ सार्वजनिक आ दोसर घरमे ब्रह्मचारीजी अपने रहै छला। एक भागमे सुतबो करैथ आ दोसर भागमे भानसो-भात। तैसंग बरतनो-बासन सभ रखैथ। ब्रह्मचारीजी मिथिलेक छिआ। अद्वैत दर्शनक प्रकाण्ड पण्डित छैथ। ब्रह्मचारीजीक नस-नसमे अद्वैत दर्शन समाएल छैन। ब्रह्मचारी आश्रम लगमे रहितो महेन्द्र नै जनै छला। मुदा जखन रामेश्वरम् गेल छला तँ ओतै एकटा पुजेगरी कहलकैन। मुख्य मार्गसँ ब्रह्मचारीक आश्रम दस लग्गी पच्छिम। एकपेड़िया रस्ता तँए महेन्द्र मुख्य मार्गक कतबाहिमे गाड़ी लगा, चारू गोरे आश्रम दिस बढ़ला। आश्रमक सीमापर पहुँचते रमाकान्तो आ महेन्द्रो आँखि उठा-उठा तजबीज करए लगला। ने कोनो तरहक तरक-भरक आ ने लोकक भीड़-भाड़ आश्रममे। घर तँ ईंटाक बनल मुदा धर्म स्थान जकाँ नइ बुझि पड़ैत। साधारण गिरहस्तक घर जकाँ आश्रम। मुदा एकटा नव चीज दुनू गोरेकेँ बुझि पड़लैन। बुझि पड़लैन जे हम सभ मद्रासक जमीन छोड़ि मिथिला चलि एलौं अछि। ब्रह्मचारीजी करजानमे हाँसू लऽ कऽ केरा गाछक सूखल डपौर सभ कटैत रहैथ। केरा गाछक अढ़मे, तँए ने ब्रह्मचारीजी रमाकान्त सभकेँ देखलखिन आ ने रमाकान्त सभ ब्रह्मचारीजीकेँ देखैथ। मुदा गाड़ीक अवाज ब्रह्मचारीजी सुनने छला। ओना, गाड़ी तँ सदिखन चलिते रहैए, तँए गाड़ीक अवाजपर ब्रह्मचारीजी धियाने नै देलैन। अपन काजमे मस्त छला। करीब एक बीघा जमीन आश्रम हएत, जइमे सभ किछु बनल अछि। दू कट्ठामे दुनू घर, आँगन आ गाइक थैर सेहो छैन। चारि कट्ठाक एकटा छोटेटा पोखैरो अछि आ करीब पाँच कट्ठामे गाछी-कलम सेहो हएत। दू कट्ठामे गाए-ले घासऽ खेती आ सात कट्ठामे अन्न उपजबै छैथ। सभसँ पहिने चारू गोरे पोखैर घाटपर पहुँचला। पोखैर घाट पजेबा-सिमटीसँ बनल अछि। घाटपर ठाढ़ भऽ चारू गोरे पोखैरकेँ हियासि-हियासि देखए लगला। पोखैरक किनछैरमे पान-सातटा मिथिलेक बौगुला चरौर करैत रहए। एक टकसँ रमाकान्त बौगुलाकेँ देख सोचए लगला जे जहियासँ ऐठाम एलौं, आइए अपन इलाकाक बौगुला देखलौं। ओना, बौगुला तँ एतौ अछि मुदा मिथिलाक बौगुला तँ दोसरे चालि-ढालिक होइए। ..बौगुलापर सँ नजैर हटा पोखैर दिस देलैन। पोखैरमेँ दस-बारहटा कुमहीक छोट-छोट समूह फूल जकाँ छिड़ियाएल, जे हवाक सिहकीमे नचैत। तैबीच दूटा पनिडुम्मी भुक-दे जागल, जेकरा अपना सभ पिहुओ कहै छिऐ। पिहुआकेँ तजबीज करिते रहैथ कि एक जेर सिल्ली उड़ैत आबि पोखैरमे बैसल। तैबीच जुगेसर बाजल- “काका, ई तँ अपने इलाकाक पुरैन गाछ छी। फूलो ओहने बुझि पड़ैए।” जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मुड़ी उठा पुरैनकेँ देख बजला- “हँ हौ जुगेसर, छी तँ कमले।” हाथ-पएर धोइ कऽ चारू गोरे घाटक ऊपरका सीढ़ीपर आबि ब्रह्मचारीजीकेँ हियाबए लगला। ब्रह्मचारीजीकेँ नै देख रमाकान्त सोचए लगला जे भरिसक केतौ गेल छैथ। तैबीच जुगेसरक नजैर करजान दिस गेल। करजानमे ब्रह्मचारीजीकेँ देख जुगेसर बाजल- “काका, एक गोरे करजानमे काज कऽ रहल अछि। हम जा कऽ पुछिऐन जे ब्रह्मचारीजी केतए छैथ?” जुगेसरक बात सुनि रमाकान्तो आ महेन्द्रो आँखि उठा कऽ देखलैन। मुदा ओइ बेकतीक छुछुन चेहरा देख रमाकान्तकेँ भेलैन जे कियो जन-मजदूर काज करैए। तैबीच हनको कानमे रमाकान्तक अवाज पहुँचलैन, कानमे अवाज पहुँचते हाथक हँसुआ नेनहि पहुँचला। ब्रह्मचारीजी अनेको भाषा आ बोलीक जानकार, चारू गोरेकेँ देखते बुझि गेला जे ई मिथिलेक छैथ किएक तँ जुगेसर आ रमाकान्तकेँ मिथिलेक ढंगसँ धोती पहिरने देखलैन। मुदा महेन्द्रकेँ देख तत-मतमे पड़ल छला। श्यामाक साड़ी पहिरब देख ब्रह्मचारीजीक मन मानि गेलैन जे ई सभ मिथिलेक छैथ। ..तैबीच रमाकान्त पुछलखिन- “ब्रह्मचारीजी केतए छैथ?” ब्रह्मचारीजी साधारण धोती पहिरने रहैथ। सेहो फाँड़ बन्हने। देहपर अंगपोछा रहैन। ने बाबरी छटौने आ ने दाढ़ी रखने। ने गरदैनमे कण्ठी-माला आ ने देहमे जनेउ...। मुस्कियाइत ब्रह्मचारीजी उत्तर देलखिन- “अहाँ सभ मिथिलासँ एलौं। एना-ठाढ़ किए छी। चलू बैस कऽ गप-सप्प करब। ब्रह्मचारीजी अपने आबि जेता।” कहि पोखैर घाटपर हाँसू रखि हाथ-पएर धोइ कऽ अँगनेमे मोथीक बिछान बिछौलैन। चारू गोरेकेँ बैसा घरसँ एक घौर केरा निकालि अनलैन। ..केराक रंग-रूप देख रमाकान्त बुझि गेला जे ई तँ मिथिलेक गौरिया-मालभोग छी, अँठियाहा नइ छी। घौरो नमहर। गछपक्कू,अँठि-अँठि जुआएल अछि। सुआदो नीक हेतै, अपनेसँ पूर्ण जुआ कऽ पाकल अछि। धुकलाहा नइ छी। केराक घौर बीचमे राखल आ सभ कियो हाथ बगने। जुगेसर सोचैत जे तेते खेने छी जे पेटमे जगहे ने अछि, नहि तँ सौंसे घौर खा जैतिऐन। रमाकान्त ब्रह्मचारीजीकेँ कहलखिन- “अखने, एक घन्टा पहिने भोजन केलौं, तँए खाइक क्षुधा नइ अछि। मुदा ब्रह्मचारी आश्रमक परसाद छी तँए दू छीमी जरूर खाएब।” कहि दूटा छीमी ऊपरका हत्थासँ तोड़ि खेलैन। रमाकान्तकेँ देख महेन्द्रो आ जुगेसरो दू-दू छीमी तोड़ि खेलैन। श्यामा हाथ बगने चुपचाप बैसल छेली। श्यामाकेँ हाथ बागल देख ब्रह्मचारीजी बजला- “बहिन, अहाँ जइ दुआरे हाथ बगने छी ओ हमहूँ बुझै छी। मुदा अपन मिथिलामे दुनू चलैन अछि। पति आगूमे पत्नीकेँ नै खाएब आ बिआहक प्रकरणमे समाजक माए-बहिन मिलि मौहक करै छैथ, जइमे पति-पत्नीकेँ संगे खुऔल जाइए। तँए अहूँकेँ लजेबाक नै चाही। ई तँ सहजे आश्रम छी। दोसर धर्म स्थान सेहो छी।” ब्रह्मचारीजीक विचार सुनि श्यामाक मन डोललैन, मगर बेवहार मनकेँ रोकिते छेलैन। तैबीच असमंजसमे श्यामाकेँ देख जुगेसर फनैक कऽ बाजल- “काकी, जखन हमरा घरनीकेँ हाथ ढेकीमे कटि गेल रहैन, तखन हम अपने हाथे खुअबै छेलिऐन। अहाँ तँ सहजे वृद्ध भेलौं।” जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मुड़ी झूका लेलैन। दू छीमी केरा श्यामो खेलैन। चारू गोरे केरा खा हाथ-मुँह धोलैन। ब्रह्मचारीजी रमाकान्तकेँ पुछलखिन- “ऐठाम अपने केना-केना एलिऐ?” महेन्द्रकेँ देखबैत रमाकान्त बजला- “ई जेठ बेटा छैथ। डाक्टरी पढ़ि नोकरी करए ऐठाम चलि एला। सालमे एक बेर अपनो गाम जाइ छैथ। बाल-बच्चा आ स्त्री आइ धरि गाम नइ गेलखिन। ओहो सभ अहीठाम रहै छैथ। दुनू परानीक मनमे आएल जे देशो-कोस आ बच्चो सभकेँ देख आबी तँए एलौं?” महेन्द्र दिस देख ब्रह्मचारीजी बजला- “केते दिनसँ ऐठाम छी?” कनी कल गुम्म रहि समए मन पाड़ि महेन्द्र बजला- “ई बाइसम बर्ख छी।” “एते दिनसँ ऐठाम रहै छी मुदा कहियो भेँट-घाँट नै भेल?” अपन विबसता देखबैत महेन्द्र उत्तर देलखिन- “एक तँ नोकरी करै छी, तैपर डाक्टरी एहेन पेशा अछि जे भरि मन कहियो अरामो नै कऽ पबै छी। घुमनाइ-फिरनाइक कोन बात। मुदा तैयो कहुना समए निकालि ऐबो करितौं से बुझले ने छल।” “आइ केना एलौं?” “चारिम दिन रामेश्वरम् गेल रही, ओइठाम एकटा पुजेगरी अपनेक सम्बन्धमे कहलैन।” महेन्द्रक बात सुनि ब्रह्मचारीजी मुस्कियाइत बजला- “मासमे एक बेर हमहूँ रामेश्वरम् जाइ छी। समाज-रूपी समुद्रक कातमे स्थापित रामेश्वरम लग जा समुद्रमे उठैत लहैरकेँ धियानसँ देखबो करै छी आ विचारबो करै छी। दुनू तरहक लहैर समुद्रमे उठैए- नीको आ अधलो। नीक लहैर देख मन प्रसन्न होइए आ अधला देख मन जरए लगैए। मुदा तैयो सोचैत रहै छी जे अधला लहैर बेसी उग्र नै हुअए आ नीक लहैर सदिखन उठैत रहए।” ब्रह्मचारीजीक विचार जेना महेन्द्रक सूतल बुधिकेँ जगा देलकैन। अनासुरती महेन्द्रक मनमे उठलैन- अन्हार-सँ-इजोतमे आबि गेलौं, कि इजोते-सँ-अन्हारमे चलि गेलौं? विचित्र स्थितिमे महेन्द्र पड़ि गेला। जइ रूपमे माए-बाप आ जुगेसरकेँ अखन धरि देखै छला ओ बदलए लगलैन। बीचसँ उठि महेन्द्र गाछी दिस टहैल गेला। ब्रह्मचारीजी बुझि गेलखिन। तैबीच रमाकान्त ब्रह्मचारीजीकेँ पुछलखिन- “अपने मिथिला छोड़ि ऐठाम किए आबि गेलौं। जखन कि ई इलाका दोसर धर्म, दोसर संस्कृति आ दोसर जातिक छी?” मुस्कियाइत ब्रह्मचारीजी कहए लगलखिन- “कोनो जाति, पंथ आकि संस्कृतिक अधार होइ छै जिनगी। जिनगीक अधार होइ छै मनुखक बुधि, विचार आ कर्म। जखने मनुख अपन सुपत कर्मसँ जिनगी ठाढ़ करैए तखने धर्म, संस्कृति, विचार आ आचार सभ किछु बदैल, सही मनुखक निर्माण करैए। जेकरा हम महामानव, धर्मात्मा आ उच्च कोटिक मनुख बुझै छी, जे मिथिलांचलमे क्षीण भऽ रहल अछि! ओना, सोलहन्नी मरल नइ अछि मुदा दबाइत-दबाइत दुब्बर भऽ गेल अछि। मिथिलाक जे मूलबासी छैथ हुनका सभकेँ अभिजात वर्ग वा कही तँ परजीवी वर्ण वा बाहरी लोक आबि सभ किछुकेँ बदैल एहेन समाजिक ढाँचामे ढालि देलकैन जे अदौसँ अबैत संस्कृतिकेँ दाबि अभिजात-संस्कृतिकेँ बढ़ा देने अछि। जिनगीक सच्चाइकेँ दाबि बनौआ जिनगीमे बदैल देने अछि। जइसँ लोकक जिनगी वास्तविकतासँ हटि वौआ गेल अछि। ओना, निर्मूल नष्ट नै भेल अछि मुदा एतेक क्षीण जरूर भऽ गेल जे नीक-अधलाकेँ बेराएब कठिन अछि। हम सभ मनुखकेँ मनुख बुझै छी। ने कियो कारी अछि आ ने कियो गोर। मुदा जिनगीक ढाँचा एहेन बनि गेल अछि जे स्पष्ट रूपमे एक-दोसरसँ पैघ आ छोट बनि गेल अछि आ बनलो जा रहल अछि। ओना, देखबै तँ बुझि पड़त जे सभ एक दोसरसँ पैघ आ एक-दोसरसँ छोट अछि। मगर मकड़ा जकाँ अपने पेटसँ सूत निकालि अपनेसँ जाल बुनि, ओइमे सभ ओझरा गेल छैथ।” ब्रह्मचारीजी आँखि बन्न केने बजिते छला कि बिच्चेमे रमाकान्त पुछि देलखिन- “अपने तँ प्रकाण्ड पण्डित छी तखन मिथिलाकेँ किएक छोड़ि ऐठाम चलि एलौं?” रमाकान्तक दोहराएल प्रश्नपर ब्रह्मचारीजी गम्भीर होइत बाजए लगला- “अहाँक बात हम मानै छी, मुदा पढ़ल-लिखलसँ मुरुख धरिक विचार एहेन बनि गेल अछि जइमे नीक विचारकेँ सन्हिआइए नै देल जाइए। कहलो गेल छै जे ‘असगर ब्रहस्पतियो फूसि।’ तेतबे नहि, जेकरा कल्याणक जरूरत अछि ओहो नीक रस्ता धड़ैले तैयारे नहि!‘जेकरा-ले चोरि करी सएह कहए चोरा।’ की करबै जँ सिरिफ वैचारिके स्तरपर संघर्ष होइ तँ संघर्ष कएल जा सकैए मुदा तेतबे नइ अछि। जिनगीक क्रियामे उपद्रव जे करैए से तँ करबे करैए जे जानोसँ खेलबार करैमे नै चुकैए। अभिजात वर्ग एते सशक्त बनि गेल अछि जे जहिना कोनो साँढ़-पारा पाँकमे चलै काल फँसि जाइए आ परोपट्टाक नढ़िया, कुकुरक संग गीध, कौआ आबि-आबि जीबतेमे आँखि फोड़ि-फोड़ि खाए लगै छै, तहिना इमानदार मनुखोक संग होइए। मुदा हारि मानैले ने हम तैयार छी आ ने मानब..! मुदा जहिना नव सुरूजक संग नव दिनक शुरूआत होइत तहिना नव मनुख नव जिनगी बनबैक दिशामे बढ़ैए, तँए संतोख अछि।” रमाकान्त- “अपनेक परिवारमे के सभ छैथ?” ब्रह्मचारी- “पिता गिरहस्त छला। पनरह बीघा खेत रहैन। ओइ खेतकेँ माता-पिता दुनू परानी उपजबै छला, जइसँ परिवार नीक जकाँ चलै छेलैन। ओना, रौदी-दाही होइते छेलै मुदा तैयो सहि-मरि कऽ ओहीसँ गुजर करै छला। हम दू भाँइ छी। घरे लग नवानी विद्यालयमे हम पढ़लौं, किछु दिन लोहना पाठशालामे सेहो पढ़लौं। हमर छोट भाए बच्चेसँ पिताजीक संग खेती करै छला। नै पढ़लैन। माइयो आ बाबूओ मरि गेला। हम बिआह नै केलौं। भाएकेँ बिआह करा सभ किछु छोड़ि अपने घरसँ निकैल गेलौं। मनमे छेलए जे जइ कुरीति, कुबेवस्था आ कुचालिमे मिथिलाक समाज फँसल अछि ओकरा सुधारि सुरीति, सुबेवस्था आ सुचालि दिस लऽ चली। तइ पाछू लगि गेलौं। मुदा वेबस भऽ छोड़ि चलि एलौं। कारण ओइठामक निआमक आ निआमकक पाछू पढ़ल-लिखल लोक छैथ जे अपनाकेँ बुधियार बुझै छथिन तिनका लगा अभिजात लोकैन सभ, मनुखक साँचकेँ ओहन बना देने छैथ, जइसँ कुपात्र छोड़ि सुपात्रक निर्माणे ने होइत। जेकरा चलैत छीना-झपटी, बलतकारी, चोरी, छिनरपनी, जातीय उन्माद, धार्मिक उन्माद वा ई कहियौ जे मनुख बनैक जेते रस्ता अछि ओ सभटा नष्ट भऽ गेल अछि! सबहक जड़िमे सम्पैत घुइस कऽ काज कऽ रहल अछि। जइ पाछू पड़ि सभ बताह भऽ गेल अछि। सभसँ दुखद बात तँ ई अछि जे नीक-सँ-नीक, पैघ-सँ-पैघ आ विद्वान-सँ-विद्वान धरि बजता किछु आ करता किछु! जइसँ समाजक बीच सत बजनाइए मेटा गेल अछि! एहेन समाजमे नीक लोकक रहब केना सम्भव हएत? तँए छोड़ि कऽ पड़ा गेलौं। देहक सुखक पाछू सभ आन्हर भऽ गेल अछि।” ब्रह्मचारीजीक बात सुनि रमाकान्तकेँ धनक प्रति मोह भंग हुअ लगलैन। सोचए लगला जे हमरो दू साए बीघा जमीन अछि, ओते जमीनक कोन प्रयोजन? जँ ओइ जमीनकेँ निर्भूमि-गरीबक बीच बाँटि दिऐ तँ केते परिवार आ केते लोक सुख-चैनसँ जिनगी जीबए लगत। जेकरा-ले जमीन रखने छी ओ तँ अपने तेते कमाइ छैथ जे ढेरी लगल छैन। अदौसँ मिथिला तियागी महापुरुषक राज्य रहल, किएक ने हमहूँ ओइ परम्पराकेँ अपनए पुनर्जीवित कऽ दिऐ? ...एते बात मनमे अबिते रमाकान्त ब्रह्मचारीजीकेँ पुछलखिन- “अपने ऐ जिनगीसँ संतुष्ठ छी?” रमाकान्तक प्रश्न सुनि हँसैत ब्रह्मचारीजी बजला- “हँ, बिल्कुल संतुष्ट छी। ऐसँ नीक जिनगी की भऽ सकै छइ। दुनियाँक जेते भाषा अछि, ओइ भाषाक उद्भव, विकास आ साहित्यक सभ पोथी पुस्तकालयमे रखने छी। तेतबे नहि, दुनियाँमे जेते धार्मिक सम्प्रदाय अछि ओकरो पुस्तक रूपमे रखने छी आ अध्ययन करै छी। वेद, उपनिषद, ब्राह्मण संहिता, स्मऋ़ित, ज्योतिष, पुराण, रमायणक संग बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रन्थ सेहो रखने छी। सभ दर्शनक पोथी सेहो अछि। शरीर निरोग रखै दुआरे किछु समए शारीरिक श्रम करै छी, बाँकी समए अध्ययन आ चिन्तन-मननमे लगा रमल रहै छी। मासमे एक दिन सभ धार्मिक सम्प्रदायिक पण्डित सभकेँ बजा, अपन-अपन सम्प्रदायपर व्याख्यान करबै छी। एक दिन राजनीतिक व्याख्यान, एक दिन साहित्यिक व्याख्यान मासमे करबै छी। ऐ सबहक अतिरिक्त बेरा-बेरी किसान गोष्ठी, चिकित्सा गोष्ठी,विज्ञान गोष्ठीक संग आइक वैश्वीकरणक दुनियाँमे विज्ञानसँ नीक-अधलापर विचार-विमर्श करबै छी। समए केना खटि जाइए से बुझबे ने करै छी।” ब्रह्मचारीजी बजिते रहैथ कि महेन्द्र सेहो आबि गेला। उन्मत्त पागले जकाँ महेन्द्रक चेहरा बुझि पड़ैन। रमाकान्तो बाहरी दुनियासँ निकैल भीतरी दुनियाँक बाट पकैड़ नेने छला। चारू गोरे ब्रह्मचारीजीकेँ पएर छुबि गोड़ लागि चलैक विचार केलैन। चारू गोरेकेँ अरियाति ब्रह्मचारीजी गाड़ीमे बैसा अपने घुमि गेला। गाड़ीमे कियो केकरोसँ गप-सप्प नै करए चाहैत। सभ अपने-आपमे डुमल। डेरा अबिते रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- “बौआ, आब हम एक्को दिन नै अँटकब। गामक सुरता घीचि लेलक, तँए जेते जल्दी भऽ सकए विदा कऽ दिअ?” “बड़बढ़ियाँ। आइए टिकट बनबा लइ छी। ऐठामसँ दरभंगाक गाड़ी सप्ताहिक अछि तँए अपना औगतेने तँ नै ने हएत। अगर टिकटो बनि जाएत तैयो पाँच दिन रहै पड़त।” आठ बजे रातिमे सभ कियो एकठाम बैस अपन गामक सम्बन्धमे गप-सप्प करए लगला। गाममे अपन बितल दिनक चर्चा करैत महेन्द्र बजला- “की जिनगी छल आ अखन की अछि, ऐ विषयपर अखन धरि विचारैक अवसरे नै भेटल। जहिना अकासमे चिड़ै-चुनमुनी उन्मुक्त भऽ उड़ैए तहिना बच्चामे छेलौं। ने कोनो चिन्ता आ ने फिकिर छल। जहिना मध्यम गतिसँ गाड़ी-सवारी चलैए तहिना छल। ने कोनो प्रतियोगिता परीक्षा-ले चिन्ता आ ने नोकरीक जिज्ञासा रहए। साधारण गतिसँ आई.एस.सी. पास केलौं आ मेडिकल कौलेजमे नाओं लिखा डाक्टर बनलौं। डाक्टर बनला पछाइत नोकरी आ पाइक भूख जागए लगल। जइसँ अपन गाम, अपन इलाका छोड़ि हजारो कोस दूर आबि गेल छी। ऐठाम आबि बजारू समाज आ संस्कृतिमे फँसि अपन परिवार, समाज सभ छुटि गेल। जेते पाइ कमा सुख-भोगक कल्पना करै छी ओते काजक बोझ बढ़ल जाइए। सुख-भोग-ले समए कहाँ बँचैए! ..समैक एते अभाव रहैए जे केता दिन अखबारो ने पढ़ि पबै छी। अखन धरिक जे विचार जिनगीक सम्बन्धमे छल, आइ बुझै छी जे भ्रमक छल। एते दिन अपने सुखटा-केँ सुख बुझैत रहलौं मुदा आब बुझि पड़ैए जे अपने सुखटा सुख नइ छी। हर मनुखकेँ जिनगी चलैक जे आवश्यक वस्तु अछि ओ पूर्ति हेबा चाहिऐ तखने सभ कियो चैनसँ जिनगी बिता सकैए। मनुखसँ परिवार बनै छै आ परिवारसँ समाज। मनुखोक कर्तव्य बनै छै जे सभसँ पहिने ओ अपना पैरपर ठाढ़ भऽ परिवारकेँ ठाढ़ करए। परिवार ठाढ़ भऽ जाएत तखन समाज स्वतः ठाढ़ भऽ आगू बढ़ए लगत। ओना, सुख की छी? सभसँ पहिने ऐ बातक विचार कऽ लेबक चाही। पंचभौतिक शरीर आ आत्माक संयोगसँ मनुख बनैए। सुख-दुख, नीक-अधला आत्माक अनुभूति छी नइ कि शरीरक। ओना, दुनियाँमे जेते मनुख अछि सभकेँ एक स्तरसँ चलक चाहिऐ मुदा से तँ नइ अछि। दुनियाँ देशमे बँटल अछि आ देशक शासन बेवस्था आ समाज खण्ड-पखण्ड भेल भिन्न-भिन्न भाषा, भिन्न-भिन्न संस्कृति आ भिन्न-भिन्न जातिमे बँटल अछि, जइसँ खान-पान,रीति-रेबाज, चालि-ढालिमे भिन्नता छइ। कहैले तँ हमहूँ मनुखेक सेवा करै छी मुदा पाइक दुआरे हम पाइबलाक सेवा करै छी। बिनु पाइबलाक सेवा कहाँ भऽ पबै छै। जखन कि ओकरा सभसँ बेसी जरूरत छइ। अभावमे ओ खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ घर-दुआर, कपड़ा-लत्ता, दबाइ-दारू, सभसँ बन्चित रहि जाइए। जइक चलैत गरीब लोकक जिनगी जानवरोसँ बत्तर बनि गेल अछि। ओ सभ मनुखक शकलमे जानवर बनि जीबैए। जइ मनुखक जरूरत ओकरा सभकेँ छै ओ अपने पाछू तबाह अछि।” डाक्टर महेन्द्रक बात सभ कियो धियानसँ सुनलैन। रमाकान्त बजला- “बौआ, जइ गाममे तोहर जन्म भेलह आ जइ माटि-पानिमे रहि डाक्टर बनलह, ओइ गामक लोक उचित इलाजक दुआरे मरि जाए, ई केते दुखक बात छी?” रमाकान्तक प्रश्न सुनि सभ कियो गुम्म भऽ गेला। कियो किछु नै बाजि पबैथ। सभ सबहक मुँह देखैथ। हजारो कोसपर गाम अछि। केना ऐठामसँ ओइठाम इलाज भऽ सकै छइ? सबहक मनमे सवाल नचै छेलैन। बड़ी कालक पछाइत महेन्द्र मुँह खोललैन- “बाबू, सवाल तँ एहेन भारी अछि जे जवाबे ने फुरैए। मुदा एकटा उपाय मनमे आएल।” “की?” “अहाँ गाम जाएब तँ दू गोरेकेँ माने एकटा लड़का, एकटा लड़कीकेँ जे कम्मो पढ़ल लिखल हुअए, तेकरा ऐठाम पठा दिअ। ओइ दुनू गोरेकेँ ऐठाम रखि छह मास पढ़ा पठा देब। जे तत्काल इलाज करब शुरू कऽ देतइ। संगे हम सभ चारि गोरे सालमे एक-एक मास-ले जाइत रहब आ जहाँ धरि भऽ सकत तहाँ धरि इलाज करैत रहब। तैबीच जँ कोनो जरूरी रोग उपैक जाएत तँ फोनसँ कहि सेहो बजा लेब। नहि तँ लहेरियासराय ऐछे।” महेन्द्रक विचार रमाकान्तकेँ जँचलैन। मुस्कियाइत बजला- “बौआ, गामक लोक तँ गरीब अछि, ओ केना इलाज करा सकत?” गरीबक नाओं सुनि धाँइ-दे रविन्द्र उत्तर देलकैन- “बाबू, हम सभ बहुत कमाइ छी। जेते इलाजमे खरच हेतै से देबइ। तेतबे नहि, अखन अहाँ जाउ, पहिने दू गोरेकेँ पठा दिअ। ऐगला मासमे गाम आबि एकटा स्वास्थ्य केन्द्र बनाएब। जइमे सबहक इलाज हेतइ।” रविन्द्रक विचारसँ सबहक ठोरपर हँसी एलैन। रमाकान्तक मनमे उठलैन, हमरे दू साए बीघा जमीन अछि मुदा छी कए गोरे! जँ इमनदारीसँ देखल जाए तँ की हमहीं चोर नहि? महाभारतोमे कहल गेल छै जे जे जरूरतसँ बेसी सम्पैत रखने अछि ओ चोर छी। जे बात पितोजी बरबैर कहैत रहै छला। ओना, अनका जकाँ हम बेइमानी कऽ कऽ खेत नइ अरजने छी मुदा ढेरिया कऽ तँ रखनहि छी...। गप-सप्प करैत साढ़े दस बजि गेल। भानसो भेल। सभ कियो गप-सप्प छोड़ि खाइले बैसला। दोसर दिनसँ चारू गोरे विदाइक जोगारमे लगि गेला। केतेको गोरेसँ दोस्ती चारू गोरेकेँ, जेकरा सबहक काज उद्यममे ईहो सभ नौत पुरने छैथ। तँए सभकेँ जानकारी देब उचित बुझि चारू गोरे अपन-अपन अपेछितकेँ जानकारी दिअ लगलखिन। अपनो सभ फुट-फुट माता-पिताक विदाइमे जुटि गेला। ऐ चारि दिनक बीच रमाकान्त टहलब-बुलब छोड़ि, दिन-राति आत्मनिष्ठ भऽ सोचमे डुमल रहए लगला। चाह पीबै बेर चाह पीब पान खा, भोजन बेर भोजन कऽ, भरि दिन पलँगपर पड़ल-पड़ल जिनगीक सम्बन्धमे सोचैत रहला। अखन धरि एक्केटा दुनियाँ बुझै छेलिऐ जे आब दोसरो दुनियाँ देखै छी। एक दुनियाँ बाहरी, जेकरा ऊपरका आँखिसँ देखै छी, दोसर दुनियाँ शरीरक भीतर अछि, जइ दुनियाकेँ अखन धरि नै देखै छेलौं। बाहरी दुनियासँ भीतरी दुनियाँ फुलवाड़ी जकाँ सुन्दर अछि। जइमे आशाक जंगल पसरल अछि। पाँच बजे साँझमे मद्रास स्टेशनसँ दरभंगाक गाड़ी खुजैए। आरक्षित टिकट तँए मनमे बेसी हलचलो नहियेँ छेलैन। गाड़ी पकड़ैक हलचल तँ ओइ यात्रीकेँ होइत जे साधारण बोगीमे टटका टिकट कटा सफर करत। मुदा आरक्षित बोगीमे तँ गनल सीट आ गनल टिकट होइए। बाइली यात्रीकेँ तँ चढ़ैये ने देल जाइए। दुइए बजेसँ सभ समान अटैची आ काटुनमे सैंत तैयार केलैन। रस्ता-ले फुटसँ एकटा झोरामे खाइक सभ सामान सेहो दऽ देलकैन। दस लिटरा गैलेनमे पानि, थर्मसमे चाह, पनबट्टीमे पान आ तैसंग एक काटुन विदेशी शराब सेहो, जे डाक्टर सुजाता रमाकान्तकेँ आँखिक इशारासँ कहि देने रहैन। चारि बजे, परोठा-भुजिया खा तीनू गोरे नव वस्त्र पहिर तैयार भऽ गेला। स्टेशनो लगेमे तँए विदा हेबामे हड़बड़ियो नहियेँ। मुदा सामान बेसी तँए गाड़ी खुजैसँ पहिनहि स्टेशन पहुँचब जरूरी अछि। ओना, गाड़ी मद्रासेसँ बनि कऽ चलैत तँए सामानो रखैमे परेशानी नहियेँ रहैन। सबा चारि बजे सभ डेरासँ निकैल गाड़ी पकड़ैले चलला। ◌ शब्द संख्या : 4396 6. छुट्टीक दिन रहितो हीरानन्द गाम नइ गेला। ओना, लगमे गाम रहने शनियेँ-शनि जाइ छला आ स्कूल खुजबासँ पहिने सोमे-सोम चलि अबै छला। मुदा रमाकान्त अपने नै रहने, परिवारक सभ भार देने गेल छैन। गोसाँइक धाही निकैलते हीरानन्द नहा कऽ चाह पीब बौएलाल ऐठाम विदा भेला। मने-मन यएह होनि जे रमाकान्त बाबू कहने छला जे मद्रास जाइ छी, धिया-पुताकेँ देख-सुनि लगले घुमि जाएब मुदा आइ पनरहम दिन भऽ रहल अछि अखन धरि किएक ने एला?ओना, दुरसो छै आ परिवारोक सभ तँ ओतै छैन तँए बिलम्मो भेनाइ तँ सोभाविके...। रस्तामे जे मास्टर साहैबकेँ धिया-पुता देखैन तँ हाथ जोड़ि-जोड़ि प्रणाम करैन। हीरोनन्द सभकेँ असिरवाद दैत आगू बढै़त जाइ छला। बौएलालक घरसँ थोड़े पाछूए रहैथ कि बौएलाल देखलकैन। देखते आगू बढ़ि, प्रणाम कऽ, संगे-संग अपना ऐठाम लऽ गेलैन। हीरानन्दकेँ पाबि बौएलाल बहुत किछु सिखबो केलक आ सुधरबो कएल। अपन एकचारीबला बैसकीमे मास्टर साहैबकेँ बैसा पानि आनए आँगन गेल। आँगनसँ लोटामे पानि नेने आबि पएर धोइले कहलकैन। लोटामे पानि देख हीरानन्दक मनमे मिथिलाक वेबहार नाचि उठलैन। सोचए लगला जे पूर्वज केते विचारवान छला जे एते चलौलैन..! पएर धोइ कऽ हीरानन्द चौकीपर बैसला। बौएलाल चाह बनबए आँगन गेल। माएकेँ चाह बनौल नै होइ छेलइ। तैबीच अनुपो बाड़ीएमे खुरपी छोड़ि, मटियाएले हाथे आबि मास्टर साहैबकेँ प्रणाम कऽ चौकीक निच्चाँमे, एकचारीक खुट्टा लगा बैसल। मटियाएल हाथ देख मास्टर साहैब पुछलखिन- “कोन काज करै छेलौं?” मटियाएल हाथ रहितो अनुपकेँ संकोच नै होइ छेलइ। निःसंकोच भऽ उत्तर देलकैन- “बाड़ीमे गेनहारी साग बौग केने छी ओहीमे तेते मोथा जनैम गेल अछि जे सागकेँ झाँपि देने अछि, ओकरे कमठौन करै छेलौं।” सागक कमठौन सुनि हीरानन्द बजला- “चलू, जाबे बौएलाल अबैए, ताबे कनी हमहूँ देख ली।” कहि उठि विदा भेला। मास्टर साहैबकेँ ठाढ़ होइत देख अनुपो ठाढ़ भऽ आगू-आगू विदा भेल। धूर दुइएमे साग बौग केने। साग देख हीरानन्द बजला- “जिनगीमे आइए हम एहेन गेनहारी देखलौं! ई तँ अद्भुत अछि! किएक तँ एक रंगक पत्ताबला गेनहारी तँ अपनो उपजबै छी मुदा ई तँ फूल जकाँ लगैए! अदहा पात लाल आ अदहा हरिअर छै! केतए-सँ ई बीआ अनलौं?” मास्टर साहैबक जिज्ञासा देख खुशी होइत अनुप कहलकैन- “हम सढ़ुआरए नौत पूरए गेल रही। ओतै देखलिऐ। देख कऽ मन हलैस गेल। ओतैसँ अनलौं। करीब दस बर्खसँ सभ साल करै छी। खाइत-खाइत जहन डाँट जुआ जाइ छै, तहन छोड़ि दइ छिऐ आ ओहीमे तेते बीआ भऽ जाइए जे अपनो बौग करै छी आ जे मंगलक तेकरो दइ छिऐ।” “ऐ बेर हमरो थोड़े देब।” “बड़बढ़ियाँ।” दुनू गोरे घुमि कऽ आबि पुनः एकचारीमे बैसला। तैबीच बौएलालो चाह बनौने आएल। दुनू गोरेकेँ चाह दऽ आँगन जा, अपनो लेलक आ माइयोकेँ देलक। चाह पीब बौएलालक माए घोघ तनने दुआरपर आबि मास्टर साहैबकेँ गोड़ लगलकैन। सूखल शरीर, पाकल केश आ धँसल आँखि रधियाक। रधियाक देह देख मास्टर साहैबक मन तरे-तर बाजि उठलैन- ‘हाय, हाय-रे गरीबी! आगियोसँ तेज धधड़ा!! पैंतीस-चालिस बर्खक शरीरक ई दशा बना दइए!’ मुस्कियाइत एकटा आँखि उघारि रधिया बाजल- “आइ हमर भाग जगि गेल जे मास्टर-साहैब एला। बिनु खेने-पीने नै जाए देबैन। जे कन-सागक उपाय अछि से बिनु खुऔने नै जाए देबैन।” रधियाक सिनेह भरल शब्द सुनि हीरानन्दक आँखि सिमैस गेलैन। दुनू तरहत्थीसँ दुनू आँखि पोछैत बजला- “ओना, तँ घुमैक विचारसँ आएल छेलौं मुदा अहाँ सबहक सिनेह बिना खेने जाइए नै दिअ चाहैए। जरूर खाएब।” घरमे सुपारी नै रहने बौएलाल सुपारी आनए दोकान गेल। तैबीच मास्टर साहैब अनुपकेँ पुछलखिन- “अहाँक पुरखा केते दिनसँ ऐ गाममे रहैत आएल छैथ?” हीरानन्दक प्रश्न सुनि अनुप छगुन्तामे पड़ि गेल। मने-मन सोचए लगल, एहेन बात तँ आइ घरि कियो ने पुछने छला! मास्टर साहैब किए पुछलैन? ..मुदा मास्टर-साहैबक उपकार अनुपक हृदैमे ऐ रूपे बसल अछि जे हिनका, आत्माक दोसर रूप बुझैए। हुनके पाबि बेटा दू आखर पढ़बो केलक आ मनुखोक रस्ता सिखैए। हँसैत अनुप कहए लगलैन- “मास्टर साहैब, हमरा बाउकेँ अपना घराड़ियो ने रहइ। अनके जमीनमे घरो बन्हने रहै आ अनके हरो-फाड़ जोतइ। अनके खेतमे रोपैन-कमठौन सेहो करइ। हम धानोक शीश आ रब्बी-राइक मासमे खेसारियो-मौसरी लोढ़ी। अनके गाइयो पोसियाँ नेने रहइ। सालमे जेते पावैन-तिहार होइ आ अनदिनो जे करजा-बरजा लिअए ओ ओही गाइक दूधो बेच कऽ आ लेरू जे होइ, ओहो बेच कऽ करजा सदहाबै। एक दिन बाउक मन खराप रहइ। गिरहत आबि कऽ बेटी ओइठाम फोकचाहा भार दऽ अबैले कहलकै। बाउक मन बेसी खराब रहै तँए जाइसँ नासकार गेल। तैपर ओ बेटाकेँ सोर पाड़लकै। बेटा एलइ। दुनू बापूत हमरा बाउकेँ गरियेबो केलकै आ अँगनाक टाट-फरक उजाड़ि कऽ कहलकै जे हमर घराड़ी छोड़ि दे। हमर बाउ केतेक गोरेकेँ कहबो केलकै मुदा सभ ओकरे दिस भऽ गेलइ। तखन हमर बाउ की करैत, आखीरमे माटिक तौला-कराही छोड़ि, थारी-लोटा, नुआ-बसतर, हाँसू-खुरपीक मोटरी बान्हि, माए-बाबू आ हम तीनू गोरे ओइ गामसँ भागि गेलौं। गामसँ निकैल, बाधमे एकटा आमक गाछ रस्तेपर रहै, ओइठिन जा कऽ बैसलौं। बाउकेँ बुकौर लगइ। दुनू आँखिसँ दहो-बहो लोर खसइ। माइयो कानए। थोड़े-खान ओइठिन बैसलौं। तखन फेर विदा भेलौं।” बजैत-बजैत अनुपक दुनू आँखिमे नोर आबि गेल। अनुपक नोर देख हीरानन्दोक आँखिमे नोर आबि गेलैन। रूमालसँ नोर पोछि पुनः पुछलखिन- “तब की भेल?” अनुपक हाथ मटियाएल रहै तँए गट्टासँ नोर पोछि पुनः बाजए लगल- “ई मात्रिक छी। नाना जीबते रहए। हुनका एक्केटा बेटी रहैन, हमरे माएटा। जखन तीनू गोरे ऐठाम एलौं तँ ननो आ नानियोँ अँगनेमे रहए। नानी आ माए दुनू बाँहि दुनू गरदैनमे जोड़ि कानए लगल। बाउओ कानए लगल। नाना हमरा कोरामे उठा लोर पोछैत अँगनासँ निकैल डेढ़ियापर बुलबए लगल। थोड़े-खान नानी कानि, मोटरीकेँ घरमे रखि हाँइ-हाँइ चुल्हि पजारलक। मुदा माए कनिते रहल।” बिच्चेमे हीरानन्द पुछलखिन- “नाना गुजर केना करै छला?” हीरानन्दक प्रश्न सुनि अनुप गुदगुदाइत बाजल- “अहाँसँ लाथ कोन माहटर साहैब, महिनामे आठ-दस साँझ भानसो ने होइ। हम बच्चा रही तँए नानी बाटीमे बसिया भात-रोटी रखि दिअए। सएह खाइ छेलौं।” अनुपक बात सुनि हीरानन्दक हृदए जेना पघिल गेलैन, अनुपकेँ कहलखिन- “जाऊ, काजो देखियौ। बौएलाल तँ आबिए गेल।” मास्टर साहैबक कहलासँ अनुप पुन: साग कमाइले चलि गेल। बौएलाल आ हीरानन्द रमाकान्तक चर्चा करए लगला। बौएलाल बाजल- “करीब पनरह दिनक धक लगि गेल हएत, अखन धरि बाबा किए नै एला? बाजि कऽ गेल रहैथ जे आठ दिनक भीतरे चलि आएब?किछु भऽ ने तँ गेलैन?” हीरानन्द- “अखन धरि कोनो खबैरो नै पठौलैन जे बुझितिऐ।” दुनू गोरे उठि कऽ बाड़ी दिस टहलैले विदा भेला। अनरनेबाक गाछकेँ हीरानन्द हिया-हिया कऽ देखए लगला। पहिल खेपक फड़,तँए नमहर-नमहर रहइ। गोट दसेक नमहर, बॉंकी जेना-जेना फड़ ऊपर होइत गेल रहै तेना-तेना छोटो आ खिच्चो। पान-सातटा फड़ छिटकल। जइमे एकटाकेँ लाली पकैड़ नेने रहइ। हीरानन्द बौएलालकेँ ओंगरीसँ देखबैत बजला- “बौएलाल, ओ फड़ तोड़ि लएह। खूब तँ पाकल नइ अछि मुदा खाइ-जोकर भऽ गेल आछि। हम सभ तँ दँतगर छी किने।” गाछ बेसी नमहर नहि। हाथेसँ बौएलाल ओइ फड़केँ तोड़ि, डन्टीसँ बहैत दूधकेँ माटिपर रगैड़ देलक। दुनू गोरे घुमि कऽ आबि हीरानन्द चौकीपर बैसला आ बौएलाल अनरनेबा रखि आँगन गेल। आँगनसँ कत्ता आ एकटा छिपली नेने आएल। कत्तासँ अनरनेबाकेँ सोहि टुकड़ी-टुकड़ी कटलक। छिपली भरि गेल। भरलो छिपली बौएलाल हीरानन्दक आगूमे देलकैन। भरल छिपली देख हीरानन्द बजला- “एते हमरे बुते खाएल हएत। पान-सातटा खण्डी खाएब। बाँकी आँगन लऽ जाह।” बौएलाल सएह केलक। अनरनेबा खा पानि पीब हीरानन्द बौएलालकेँ कहलखिन- “चलू, थोड़े टहैल आबी?” दुनू गोरे रस्ते-रस्ते टहलए लगला। जाधैर दुनू गोरे टहैल-बुलि कऽ एला ताधैर रधिया अरबा चाउरक भात, माछक तीमन आ तरूआ बनौलक। भानस कऽ रधिया चिक्कैन माटिसँ ओसार नीपि, हाथ धोइ, कम्मल चौपेत कऽ बिछौलक। थारी, बाटी, लोटा आ गिलासकेँ छौरसँ माँजि धोलक। लोटा-गिलासमे पानि भरि कम्मलक आगूमे रखि बौएलालकेँ बजौने आबैले कहलक। आँगन आबि हीरानन्द कम्मलपर बैस मने-मन सोचए लगला। भोजनसँ तँ पेट भरैए मुदा मन तँ सिनेहेसँ भरैए जे भरि रहल अछि। तैबीच बौएलाल घरसँ थारी निकालि आगूमे देलकैन। गम-गम करैत भात तैपर माछक नमहर-नमहर तरल कुटिया। जम्बीरी नेबोक खण्ड। बाटीमे तीमन। भोजन देख, मुस्कियाइत हीरानन्द रधियाकेँ कहलखिन- “अलबत्त ढंगसँ भोजनक बेवस्था केने छी। देखिए कऽ पेट भरि गेल!” मास्टर साहैबक बात सुनि खुशीसँ रधियाकेँ नै रहल गेलै, बाजल- “माहटर बाबू, अहाँ पैघ छी। देवता छी। हमर भाग जे हमरा सन गरीब लोकक ऐठाम भात खाइ छी।” रधियाक बात सुनि हीरानन्द बुझि गेलखिन जे भातकेँ अशुद्ध बुझि बजली। मुदा ओइ विचारकेँ झँपैत बजला- “बौएलाककेँ छोट भाए बुझै छिऐ आ परिवारकेँ अपन परिवार बुझै छी। तखन भात-रोटी खाइमे कोन संकोच?” हीरानन्दक विचार सुनि रधियाक हृदए सौनक मेघ जकाँ उमैड़ गेल। मनमे हुअ लगलै जे अपन जिनगीक सभ बात कहि सुनबयैन। उत्साहित भऽ बाजए लगल- “माहटर बाबू, एहनो दुख कटने छी जे एक दिन पिसियौत भाए आएल रहए। घरमे एक्को तम्मा चाउर नहि! चिन्ता भऽ गेल जे भाएकेँ खाइले की देब। तीन-चारि अँगना चाउर पैंच आनए गेबो केलौं मुदा सबहक हालत खराबे रहइ। अपने ने रहै तँ हमरा की दइत। हारि कऽ मरुआ रोटी आ सीम-भाँटाक तीमन रान्हि कऽ खाइले देलिऐ आ अपनो सभ खेलौं। मुदा अखन तँ रमाकान्त कक्काक परसादे सभ किछु अछि।” थारीमे बाटीसँ झोर ढारैत हीरानन्द बजला- “पहिलुका आ अखुनकामे केते फरक बुझि पड़ैए?” “माहटर बाबू, अहाँसँ लाथ कोन! ओइ हिसाबे अखन राजा भऽ गेलौं। पहिने कल्लर छेलौं। हरिदम पेटेक चिन्ता धेने रहै छेलए।” मुँहक भात आ माछ चिबबैत रहैथ कि दाँतक गहमे एकटा काँट गड़ि गेलैन। भात घोंटि आँगुरसँ काँट निकालि थारीक बगलमे रखि हीरानन्द बजला- “पहिने जेते खटै छेलौं तइसँ अखन बेसी खटै छी आकि कम?” “पहिने बेसी खटै छेलौं। बोइन करि कऽ आबी तखन अँगनाक काजमे लगि जाइ। अँगनाक काज सम्हारि भानस करी। भानस करैत-करैत बेर झूकि जाइत रहए, तखन खाइत रही।” ओसारपर बैसल अनुप रधियाकेँ चोहटैत बाजल- “मास्टर साहैबकेँ भोजन करए देबहुन आकि नहि।” अनुपक बात सुनि हीरानन्द टोकलखिन- “अहाँ तमसाइ किए छिऐन। भोजनो करै छी आ गप्पो सुनै छी। जे बात काकी कहै छैथ ओ बड्ड नीक लगैए।” मास्टर साहैबक समर्थन पाबि रधियाक मनमे आरो उत्साह जगि गेलइ। होइ जे जेते बात पेटमे अछि सभटा मास्टर साहैबकेँ सुना दिऐन। बाजल- “माहटर बाबू, बर्खमे अदहासँ बेसी दिन सागे रान्हि तीमन खाइ छेलौं। माघ-फागुनमे जखन खेसारी-मौसरी उखाड़ै छेलौं आ बोइन जे हुअए तइ दिनमे खाली दस-पाँच दिन दालि खाइ नहि तँ बाड़ी-झाड़ीमे जे तीमन-तरकारी हुअए, से खाइ। बेसी काल सागे। खेसारी मासमे महिना दिन दुनू साँझ चाहे खेसारी साग खाइ नहि तँ बथुआ।” खेसारी सागक नाओं सुनि हीरानन्द पुछलकैन- “खेसारी साग केना बनबै छी?” मास्टर साहैबक प्रश्न सुनि अनुपोकेँ पैछला बात मन पड़लै। मन पड़िते खुशी जगलै। मुस्कियाइत बाजल- “मास्टर साहैब, राँड़िन बुते केतौ खेसारी साग रान्हल हुअए..!” अनुपक बातकेँ धोपैत हीरानन्द बजला- “खेसारी सागमे कँचका मिरचाइ आ लसुनक फोरन दऽ हमरो कनियाँ बनबै छैथ। हमरा बड़ सुन्दर खाइमे लगैए।” व्यंगक टोनमे अनुप बाजल- “अहाँ सबहक कनियाँक परतर राँड़िनकेँ हेतइ। हमहीं छी जे एहेन लोकक गुजर चलै छइ। नहि तँ..?” व्यंगक भाव बुझि हीरानन्द चुप्पे रहला। मुदा फनैक कऽ रधिया एक लाड़ैन चलबैत बाजल- “नहि तँ सासुरमे बास नै होइतए।” अनुप- “मन पाड़ू जे जइ दिन ऐठीम आएल रही तइ दिन कोन-कोन लूरि रहए। जँ सासु नै सिखबैत तँ कोनो लूरियो होइत?” पासा बदलैत रधिया बाजल- “माए आ सासुमे अन्तरे कथी होइ छइ। जहिना अपन माए तहिना घरबलाक माए। सिखलौं तँ हमहीं!” रधिया अनुप दिस तकैत आ अनुप रधिया दिस। मुदा दुनूक मनमे क्रोध नै सिनेह भरल। तँए वातावरण मधुर छल। ..हीरानन्द सागक सम्बन्धमे बाजए लगला- “अपना सबहक पूर्वज बहुत गरीब छला। अखुनका जकाँ समैयो नइ छल। बेसी काल ओ सभ सागे खाइ छला।” जेहने भोजन बनल, तेहने पवित्र बरतन छेलै आ तहूसँ नीक बैसैक जगहक संग ऐतिहासिक गप-सप्प। जेते वस्तु हीरानन्दक आगूमे आएल छेलैन, रसे-रसे सभ खा लेला। पानि नहि पीलैन, किएक तँ ने गाड़ा लगलैन आ ने बेसी करु। भोजन कऽ बाटीएमे हाथ धोइ कऽ उठैत बजला- “एते कसि कऽ आइ धरि भोजन नै केने छेलौं।” आँगनसँ निकैल एकचारीमे आबि मास्टर साहैब सोझे पड़ि रहला। पड़ले-पड़ल अनुपो आ बौएलालोकेँ कहलखिन- “अहूँ सभ भोजन करै जाउ। हमरा सुतैक मन होइए।” हीरानन्द असबिस करै छला। लगले-लगले करौट फेरए पड़ैन। मने-मन सोचए लगला जे एतबे दिनमे अनुप केते उन्नैत कऽ गेल। उन्नैतक कारण भेलै सही ढंगसँ परिवारकेँ बढ़ाएब। जे परिवार जेते सही दिशामे चलत ओ ओते तेजीसँ आगू बढ़त। मुदा जिनगीक रस्ता तँ बाँस जकाँ सोझ अछि नहि, टेढ़-टूढ़ अछि। जइमे लोक वौआ जाइए। जिनगीक रस्तामे डेग-डेगपर तिनबट्टी-चौबट्टी अछि। जइमे लोक भटैक जाइए। तहूमे जेकरा रस्ताक आदि-अन्तक ठेकान नै रहल ओ तँ आरो ओझरा जाइए। एहेन-एहेन ओझरी सभ जिनगीक रस्तामे अछि जइमे ओझरा कियो बताह भऽ जाइए तँ कियो घर-दुआरि छोड़ि चलि जाइए। जइसँ क्षणिक सुखक खातिर स्थायी सुखक रस्ता छुटि जाइ छइ। क्षुद्र सुख पैघ सुखक रस्ताकेँ धकेल एहेन पहाड़ जकाँ ठाढ़ भऽ जाइ छै, जेकरा पार करब मोसकिल भऽ जाइ छइ। जिनगीक रस्ता एक नइ अनेक अछि मुदा पहुँचैक स्थान एक अछि। जेते मनुख तेते रस्ता अछि। एक मनुखक जिनगी दोसरसँ भिन्न होइए। अनभुआरो आ बुझनिहारो, अज्ञानियोँ आ ज्ञानियोँ लगले माने जिनगीक शुरूमे ऐकेँ नहि बुझि पबै छैथ जे कोन रस्ता पकड़लासँ सही जगहपर पहुँचब आ नै पकड़ने छुटि जाएब। मनुखक उद्धारक बात तँ सभ सम्प्रदाय, किस्सा-पिहानी बना कहैए मुदा रस्तामे घुच्ची केते छै जैठाम जा लोक खसैए, से बुझैएमे ने अबै छै। मुदा ईहो तँ सत अछि जे निष्कलंक जिनगी बना ढेरो लोक ओइ स्थानपर पहुँच चुकल छैथ आ ढेरो जा रहल छैथ जे जरूर पहुँचता। भलेँ हुनका भरि पेट अन्न आ भरि देह वस्त्र नइ भेटैत होइन। सूखल गाछ रूपी समाजकेँ जाधैर गंगाजल सन पवित्र पानिसँ नहि पटौल जाएत ताधैर ओइमे केना कलश कलशत आ फूल फुलाएत। अगर जँ समए पाबि कलशबो करत तँ किछुए दिनमे मौला जाएत। दुखो थोड़ दिनक नइ अछि, जड़ियाएल अछि। अनेको महान बेकती ऐ दिशाकेँ देखबैक कोशिश अदम्य साहस आ शक्ति लगा केलैन मुदा जड़िसँ दुख कहाँ मेटाएल? सभ कियो मातृभूमिक सन्तान छी, सबहक दायित्व बनैए जे माइक सेवा करी। छठिआरे राति समाजक माए-बहिन कोरामे लऽ छाती लगौलैन मुदा ओकरा बिसैर केना जाइ छी? की सभ बीराने छैथ? अपन कियो नहि?” बेर खसैत हीरानन्द चलैक विचार करए लगला। बौएलाल चाह पीबैक आग्रह केलकैन। मुदा भरियाएल पेट दुआरे हीरानन्द चाहक इनकार करैत बजला- “खाइ बेरमे पानि नै पीने छेलौं, खाली एक लोटा पानि पिआबह।” आँगनसँ लोटामे पानि आनि बौएलाल देलकैन। लोटो भरि पानि पीब हीरानन्द बाजला- “बुझि पड़ैए जे अखने खा कऽ उठलौं। चाह नै पीबह, सिरिफ एक जूम तमाकुल खुआ दएह।” अनुप तमाकुल चुनबए लगल। तैबीच हीरानन्द बौएलालकेँ कहलखिन- “तूँ तँ आब धुरझार किताब पढ़ए लगलह। आब तोहूँ पड़ोसीक बच्चा सभकेँ, जखन समए खाली भेटह, पढ़ाबह। ऐसँ ई हेतह जे कखनो बेकारी सेहो नइ बुझि पड़तह आ थोड़-थाड़ बच्चो सभ पढ़ै दिस झूकत।” पढ़बैक नाओं सुनि अनुप बाजल- “मास्टर साहैब, केकरा बच्चाकेँ बौएलाल पढ़ौत!” ओंगरीसँ देखबैत अनुप आगू बाजल- “देखै छिऐ, ओ तीन घर कुरमी छी। ओकरासँ खनदानी दुश्मनी अछि। ने खेनाइ-पीनाइ अछि आ ने हकार-तिहार।” फेर ओंगरीसँ देखबैत बाजल- “तहिना ओ घर देखै छिऐ, मलाहक छी। भरि दिन जाल लऽ कऽ चर-चाँचरसँ लऽ कऽ पोखैर-झाँखैरमे मछबारि करैए। जेकरा बेच कऽ गुजरो करैए आ ताड़ी-दारू पीब कऽ औत आ झगड़ा-झाटी शुरू कऽ देत। तहिना ओ कुजरटोली छी। अछि तँ सभटा गरीबे मुदा बेवसायी अछि। स्त्रीगण सभ तरकारी बेचै छै आ पुरुख सभ पुरना लोहा-लक्करक कारोबार करैए। जातिक नाओंपर सदिखन अराड़िये करैत रहैए। तहिना हम दस घर धानुक छी। हमहींटा गरीब रही, बोइन करै छेलौं। आब तँ अपनो रमाकान्त बाबूक देल दू बीघा खेत भऽ गेल तँए खेती करए लगलौं, नहि तँ सभ खबासी करैए। जुआन-जहान बेटी सभकेँ माथपर चँगेरा दऽ आन-आन गाम पठबैए। तँए ओकरा सबहक एकटा पाटी छै आ हम असगरे छी। ने खेनाइ-पीनाइ अछि आ ने कोनो लेन-देन। आब अहीं कहू जे केकरा बच्चाकेँ बौएलाल पढ़ौत?” अनुपक बात सुनि हीरानन्द गुम्म भऽ गेला। मने-मन सोचए लगला जे समाजक विचित्र स्थिति अछि। एहेन समाजमे घूसब महाग-मोसकिल अछि। ..कनी काल गुम्म रहि हीरानन्द बजला- “कहलौं तँ ठीके अनुप, मुदा ई सभ बिमारी पहिलुका समाजमे बेसी छेलइ। ओना, अखनो थोड़-थाड़ ऐछे मुदा बदैल रहल अछि। आब लोक गाम छोड़ि शहर-बजार जा-जा कल-कारखानामे काज करए लगल अछि। संगे गाममे चाह-पानक दोकान खोलि-खोलि जिनगी बदैल रहल अछि। खेती-बाड़ी तँ मरले अछि तँए ऐमे ने काज छै आ ने लोक करए चाहैए। करबो केना करत। गोटे साल रौदी तँ गोटे साल बाढ़ि आबि सभटा नष्ट कऽ दइ छइ। जहिना गरीब लोक मर-मर करैए तहिना खेतोबला सभ। खेतोबला सभकेँ देखते छिऐ बेटीक बिआह, बिमारी आ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ, बिना खेत बेचने नइ सम्हरै छइ। ओना, सबहक जड़िमे मुरुखपना छै, जे बिना पढ़ने-लिखने नै मेटाएत। धिया-पुताकेँ पढ़बैक इच्छा सभकेँ छै मुदा ओ मने भरि छइ। बेवहारमे एको पाइ नहि। ईहो बात छै जे जेकरा पेटमे अन्न नहि आ देहपर वस्त्र नइ रहत ओ केना पढ़त?” हीरानन्द आ अनुपक सभ गप बाड़ीमे टाटक पुरना कड़ची उजारैत सुमित्रा सेहो सुनै छल। ..बारह-तेरह बर्खक सुमित्रा अछि। अनुपक घरक बगलेमे ओकरो घर छइ। तमाकुल खा हीरानन्द विदा भेला। हीरानन्दकेँ अरियातने पाछू-पाछू बौएलालो बढ़ै छल। थोड़े दूर आगू बढ़लापर हीरानन्दकेँ छोड़ि बौएलाल घुमि गेल। जाबे बौएलाल घुमि कऽ घरपर आएल ताबे सुमित्रो जरनाक कड़ची आँगनमे रखि बौएलाल लग आएल। ओना, परिवारक झगड़ासँ धिया-पुताकेँ कोन मतलब। धिया-पुताक दुनियाँ अलग होइए। सुमित्रा बौएलालकेँ कहलक- “हमरा पढ़ा दे।” बौएलाल किछु कहैसँ पहिने मने-मन सोचए लगल जे हमर बाबू आ सुमित्राक बाबूक बीच केते दिनसँ झगड़ा अछि, दुनूक बीच केता दिन गारि-गरौवैल होइत देखै छी, तखन केना पढ़ा देबइ। मुदा हीरानन्दक विचार मने रहै तँए गुनधुन करए लगल। कनी काल गुनधुन करैत सुमित्राकेँ कहलक- “पहिने माएसँ पुछि आ।” सुमित्रा दौग कऽ आँगन जा माएकेँ कहलक- “माए, हम पढ़ब?” माए- “केतए पढ़मे?” “बौएलाल लग।” बौएलालक नाओं सुनि माए मने-मन विचारए लगली जे हमरासँ तँ कम्मो-सम्म मुदा हुनकासँ तँ बौएलालक पिताकेँ झगड़ा छैन..! कनी काल गुनधुन कऽ माए कहलकै- “जँ बौएलाल पढ़ा देतौ तँ पढ़।” खनदानी घरक बेटी सुमित्राक माए। आन-आन घरक बेटियो आ पुतोहुओ चँगेरा उघैए मुदा सुमित्राक माए केतौ नै जाइत। अपने राम प्रसाद भार उघैए। मुदा स्त्री नहि। जहिया कहियो अनुप आ राम प्रसादक बीच भार उघैक सवालपर झगड़ा होइत, तँ सुमित्रा माइक विचार अनुप दिस रहैत। मुदा मरदक झगड़ामे केना विरोध करैत। तँए चुपचाप आँगनमे बैस मने-मन अपने पतिकेँ गरियबैत जे कोन कुल-खनदानमे चलि एलौं..! घुमि कऽ सुमित्रा आबि बौएलालकेँ कहलकै- “माइयो कहलक।” “ठीक छइ। मुदा पढ़मे कखैन कऽ, भरि दिन हमहूँ काजे उदममे लगल रहै छी आ साँझू पहरकेँ अपने पढ़ैले जाइ छी।” दुनू गोरे गर लगबैत तँइ केलक जे काजक बेरसँ पहिनहि भोरमे पढ़ब। ◌ शब्द संख्या : 2906 7. तीन बजे भोरमे हीरानन्दक नीन टुटलैन। नीन टुटिते बाहर निकैल झल-अन्हार देख पुनः ओछाइनपर आबि पड़ि रहला। अनुपक बात मनकेँ झकझोड़ै छेलैन, समाजमे ऐ रूपे कटुता, विषमता पसैर गेल अछि जे घर-घर, जाति-जाति आ टोल-टोलमे भैंसा-भैंसीक कनारि पकैड़ नेने अछि। एहेन स्थितिमे केना समाज आगू बढ़त? समाजकेँ आगू बढ़ैले एक-दोसरक बीच आत्मीय प्रेम हेबा चाहिऐ। से केना हएत..? प्रश्नकेँ जेते सोझराबए चाहै छला तेतेक ओझरा जा छेलैन। विचित्र स्थिति हीरानन्दक आगू बनि गेलैन। अनेको प्रश्न मनमे उठैत रहैन आ तर्क-वितर्कक बीच अन्त होइत-होइत ओझरा जाइ रहैन। जेना विवेक काजे ने करैन। तैबीच पूबारि भागमे चिड़ैक चहचहेनाइ सुनलैन। चिड़ैक चहचहेनाइ सुनि कोठरीसँ निकैल हीरानन्द पूब दिस तकलैन तँ मेघ ललिआएल बुझि पड़लैन। घड़ीपर नजैर देलैन तँ पाँच बजैत देखलैन। कोठरी आबि लोटा लऽ मैदान दिस विदा भेला। मुदा मनकेँ एहेन गछाइर कऽ सवाल पकड़ने रहैन जे चलैक सुधिए ने रहलैन। जाइत-जाइत बहुत दूर चलि गेला। खुला मैदान देख, लोटा रखि टहलबो करैथ आ प्रश्नो सोझरबैक कोशिश करैत रहैथ। मुदा तैयो निष्कर्षपर नै पहुँच सकला। पुनः घुमि कऽ घरपर आबि, दतमैन कऽ मुँह हाथ धोइ चाह बनबए लगला। ओना, चाहक सभ समान चुल्हियेक ऊपरका चक्कापर रखल रहै छैन, मात्र केतली पखारब, गिलास धोअब आ ठहुरी-जारैन डेढ़ियापर सँ आनए पड़लैन। सभ किछु सेरिया हीरानन्द चाह बनबए बैसला मुदा मन वौआइते छेलैन। असथिरे नै होइ छेलैन। असगरे चाह पिबनिहार, मुदा भरि केतली पानि दऽ चुल्हिपर चढ़ा देलैन। जखन चाह खौलए लगल तखन मनमे एलैन जे अनेरे एते चाह किए बनबै छी? फेर केतली चुल्हिपर सँ उताइर दू गिलास दूध मिलौल पानि कातमे राखल गिलासमे रखि, बाँकी दूध मिलौल पानि केतलीमे दऽ चुल्हिपर चढौलैन। मन वौआइते छेलैन। आँच लगबैत गेला मुदा चाह पत्ती केतलीमे देबे ने केलखिन। आगिक तावपर दुनू गिलास पानि जरि गेल,तखन मन पड़लैन- जा! चाह पत्ती केतलीमे देबे ने केलिऐ..! हाँइ-हाँइ कऽ डिब्बासँ तरहत्थीपर चाह पत्ती लऽ हीरानन्द केतलीक झँप्पा उठौलैन। नजैर केतलीक भीतर गेलैन तँ पानियेँ नहि!सभटा पानि जरि गेल! तरहत्थी परहक चाह पत्ती डिब्बामे रखि पुनः केतलीमे पानि देलैन। चाह बनल। भिनसुरका समए तँए दू गिलास पीलैन। एक तँ ओहिना हीरानन्दक मन समाजक समस्यामे ओझराएल छेलैन तैपर सँ चाह आरो ओझरी लगा देलकैन। खाएर.., चाह पीब दरबज्जापर बैस विचारए लगला। मुदा चाहक गर्मी पाबि मन आरो बेसी वौआए लगलैन। जहिना केकरो कोनो वस्तु हेरा जाइ छै आ ओ खोजए लगैए तहिना हीरानन्द समाजक ओइ समस्याक समाघान खोजए लगला जे समस्या समाजकेँ टुकड़ी-टुकड़ी कऽ देने अछि। लगमे दोसर कियो ने छेलैन जिनकासँ तर्क-वितर्क करितैथ। असगरे हीरानन्द ओझराएल रहला। अपने मनमे सवालो उठैन जवाबो खोजैथ। अध्ययनो बहुत अधिक नहियेँ छैन। सिरिफ मैट्रिक पास छैथ। मुदा तैयो समस्याक समाधान तकिते रहला, छोड़लैन नहि। जहिना पथिककेँ बिनु देखलो पथ हेराइत-भोथियाइत भेटिए जाइ छै तहिना हीरानन्दोकेँ भेटलैन। अनासुरती नजैर मिथिलाक चिन्तन-धारा आ मिथिलाक समाजक बुनाबटिक ढाँचापर पड़लैन। चिन्तनो-धारा आ समाजिक ढँचो, दुनूपर नजैर पड़िते मनमे एकटा नव ज्योति बिजलोकाक इजोत जकाँ मनमे चमकलैन। बिछानपर सँ उठि ओसारेपर आबि टहलए लगला। टहैलते अनासुरती मुहसँ निकललैन- “वाह रे मिथिलाक चिन्तक! दुनियाँक गुरु! जे ज्ञान हजारो बर्ख पहिने मिथिलाक धरतीपर आबि गेल छल, वएह ज्ञान उन्नैसम शताब्दीमे मार्क्स कठिन संधर्ष करि कऽ अनलैन, जइसँ दुनियाँक चिन्तनधारा बदलल। मुदा मिथिलाक दुर्भाग्य भेलै जे समाजक निआमक धूरतइ केलक। जे चिन्तक मनुखकेँ सभ मनुख मनुख छी एक रूपमे देखलैन, ओइ रूपकेँ निआमक, शासनकर्ता टुकड़ी-टुकड़ी कऽ काटि देलैन! आइ जरूरत अछि ओइ सभ टुकड़ीकेँ जोड़ि-जोड़ि एक रूप बनबैक। जे नान्हिटा काज नइ अछि। तेतबे नहि, अखनो टुकड़ी बनौनिहारक कमी नइ अछि। जखन कि भेल टुकड़ीकेँ स्वयं ओ चेतना नइ छै जे टुकड़ी भेल कातमे पड़ल छी आ कौआ-कुकुर खाइए..!” एहेन विचार हीरानन्दक मनमे उपैकते मन असथिर भेलैन, मनमे नव स्फूर्ति, नव चेतना आ नव उत्साह जगलैन। नव ढंगसँ सभ वस्तुकेँ देखए लगला। तैबीच शशि शेखर सेहो टहलैत-बुलैत लगमे एलैन। हीरानन्दपर नजैर पड़िते शशि शेखरकेँ बुझि पड़लैन जेना अखने नहा कऽ पोखैरसँ ऊपर भेला अछि। हीरानन्दक मन विचारमे डुमले रहलैन। मने-मन सोचैथ जे जहिना पटुआक सोन, सन्नैक सोन वा रूइक रेश महीन होइत मुदा कारीगर ओइ रेशकेँ टेरुआ वा टौकरीक सहारासँ समैट कऽ सूत वा सुतरी बना कपड़ा वा बोरा वा मोटगर रस्सा बनबैए, तहिना समाजोक टुटल मनुखकेँ जोड़ि समाज बनबए पड़त। तखने नव समाजक निर्माण होएत। जे अद्दी-गुद्दी काज नहि बल्कि कठिन काज छी। कठिन काज-ले कठिन मेहनतक जरूरत अछि। सिरिफ कठिन मेहनते केलासँ सभ कठिन काज नइ भऽ सकैए। कठिन मेहनतक संग, सही समझ आ सही रस्ताक बोध सेहो जरूरी अछि। तँए कठिन मेहनत, गम्भीर चिन्तन आ आगू बढ़ैले काज करैक अदम्य साहस सेहो सभमे हेबा चाही। तैसंग मजगूत संकल्प सेहो होएब जरूरी अछि। विचारक संग-संग हीरानन्दक मनमे कठिन कार्यक संकल्प सेहो अपन जगह बनबए लगल। भिनसुरका समए तँए लाल सुरूजमे ठंढपन सेहो रहबे करए। एक टकसँ सुरूज दिस देखैत हीरानन्द अपन विचारकेँ संकल्प लग लऽ जा दुनूकेँ हाथ पकैड़ दोस्ती करौलैन। दुनूक बीच दोस्ती होइते मनक नव उत्साह शरीरमे तेजी आनए लगलैन। दरबज्जाक आगुए देने उत्तरे-दच्छिने रस्ता। हीरानन्द शशि शेखरकेँ कहलखिन- “चलू, कनी बुलियो-टहैल लेब आ एकटा गप्पो करब।” दुनू गोरे दरबज्जापर सँ उठि आगू बढ़ला आकि उत्तरसँ दच्छिन-मुहेँ तीनटा ढेरबा बच्चाकेँ जाइत देखलैन। तीनूक देह कारी खटखट। केश उड़ियाइत। डोरीबला फाटल-कारी झामर पेन्ट तीनू पहिरने। देहमे केकरो कोनो दोसर वस्त्र नहि। तीनूक हाथमे पुरना साड़ीक टुकड़ाकेँ चारू कोण बान्हल झोरा। तीनू गप-सप्प करैत उत्तरसँ दच्छिन-मुहेँ जाइत। तीनूक गप-सप्प सुनैले हीरानन्द कान पथलैन। ..मुस्कियाइत बेंगबा बजैत रहए- “रौतुका बसिया रोटी आ डोका तीमन तेते ने खेलियौ जे चललो ने होइए। पेट ढब-ढब करैए।” दहिना हाथ बढ़बैत फेर बाजल- “हे सुंहीं, हमर हाथ केहेन गमकै छै! जेना बुझि पड़तौ जे कटुक-मसल्ला लगल छइ!” हाथ समैट बाजल- “तूँ की खेलँह गै रोगही?” सिरसिराइत रोगही बाजल- “हमरा माए कहलक जे जो डोका बीछि कऽ ला-गे। ताबे हमहूँ मड़ूआ उला-पीसि कऽ रोटी पकेने रहबौ। डोका चटनी आ रोटी खइहेँ।” रोगहीक बात सुनि बेंगबा कबुतरीकेँ पुछलक- “तूँ गै कबुतरी?” “काल्हि जे माए डोका बेचैले गेल रहै तँ ओमहरेसँ मुरही किनने आएल। सएह खेलौं।” कबुतरीक बात सुनि बेंगबा पनचैती केलक जे तोहर जतरा सभसँ नीक छौ। आइ तोरा सभसँ बेसी डोका हेतौ। सभसँ बेसी तोरा, तइसँ कम हमरा आ सभसँ कम रोगहीकेँ हेतइ।” बेंगबाक पनचैतीक विरोध करैत रोगही बाजल- “बड़ तूँ पण्डित बनै छँह। तोरे कहने हमरा कम हएत आ तोरा सभकेँ बेसी। हमरा जकाँ तोरा दुनू गोरेकेँ डोका बीछैक लूरि छौ? घौदियाएल डोका केतए रहै छै से बुझै छीही?” मुँह सकुचबैत बेंगबा पुछलक- “केतए रहै छै से तोंहेँ कह?” “किए कहबौ। तूँ जे खेलेँ से हमरा बाँटि देलेँ?” बेंगबा- “बाँटि दैतियौ से हम अगरजानी जननिहार भगवान छी। तूँ कहलेँ हेन अखनी आ बाँटि दैतियौ अँगनेमे?” बेंगबाक बात सुनि रोगही निरूत्तर भऽ गेल। हीरानन्द आ शशि शेखर तीनूक बात चुपचाप ठाढ़ भऽ सुनलैन। ताधैर तीनू गोरे हीरानन्दक लग पहुँच गेल रहए। हाथक इशारासँ तीनू गोरेकेँ हीरानन्द सोर पाड़ि पुछलखिन- “बौआ, तूँ सभ केतए जाइ छह?” हीरानन्दक प्रश्न सुनि बेंगबा धाँइ-दे बाजल- “डोका बीछैले!” “डोका बीछि कऽ की करै छहक?” “अपनो सभतूर खाइ छी आ माए बेचबो करैए। बाउ कहने अछि जे डोका बेच कऽ पाइ हेतौ तइसँ अँगा-पेन्ट कीनि देबौ। घुरना बिआहमे पिहिन कऽ बरियाती जइहेँ।” बेंगबाक बात सुनि हीरानन्द रोगहीकेँ पुछलखिन- “बच्चा तूँ?” रोगही- “हमहूँ डोके बीछैले जाइ छी। माए कहलक जे डोकासँ जे पाइ हेतौ, तइसँ शिवरातिक मेलामे महकौआ तेल, महकौआ साबुन,केश बन्हैले फीता आ किलीप कीनि देबौ।” मुस्कियाइत हीरानन्द बातक समर्थनमे मुड़ियो डोलबै छला आ मने-मन विचारबो करैथ जे केतेक आशासँ गरीबोक बच्चा जीबैए। शशि शेखर दिस देख आँखिक इशारासँ कहलखिन- “एकरा सबहक बगए देखियौ आ आशा देखियौ!” तेसर बचियाकेँ पुछलखिन- “बौआ, तूँ?” हीरानन्दक आँखिमे आँखि गड़ा कबुतरी कहलकैन- “हमरा माए कहने अछि जे डोका-पाइसँ सल्बार-फराक कीनि देबौ।” काजक समए दुइर होइत देख हीरानन्द तीनूकेँ कहलखिन- “जाइ जाह।” हीरानन्द आ शशि शेखर घुमि कऽ दरबज्जापर एला। ओ तीनू बच्चा गप-सप्प करैत आगू बढ़ल। थोड़े आगू बढ़लापर कबुतरी बेंगबाकेँ पुछलक- “बेंगबा, तूँ बिआह कहिया करमेँ?” बिआह सुनि बेंगबाकेँ मनमे खुशी भेलइ। हँसैत बाजल- “अखनी बिआह नै करबै। मामा गाम गेल रहिऐ तँ भैया कहलक जे कनी और बढ़मेँ तँ तोरा भिबन्डी नेने जेबौ। ओतै नोकरी करबै। जखन बहुत रूपैआ हेतै तब ईंटाक घरो बनेबै आ बिआहो करबै।” बिच्चेमे रोगही कहलकै- “तोरा सनक ढहलेल बुते बौह सम्हारल हेतौ?” बौहुक नाओं सुनि बेंगबाक हृदए खुशीसँ गदगद भऽ गेल। हँसैत बाजल- “आँइ गे रोगही, तूँ हमरा पुरुख नइ बुझैछेँ। हम तँ ओहेन पुरुख छी जे एगोकेँ के कहए, तीन गो बौहुकेँ सम्हारि लेब!” कबुतरी- “खाइले की देबही बौहकेँ?” बेंगबा- “भिबन्डीमे जब नोकरी करबै तँ बुझै छीही जे केते कमेबै? दू हजार रूपैआ एक्के महिनामे हेतइ।” हँसैत रोगही बिच्चेमे टिपलक- “दू हजार रूपैआ गनलो हेतौ?” “बीस-बीस कऽ गनबै। रूपैआ हेतै तँ फुलपेन्ट सिएबै, खूब चिक्कन अँगा किनबै, घड़ी किनबै, रेडी किनबै, मोबाइल किनबै,डोरीबला जुत्ता किनबै..; तब देखयहैन जे बेंगबा केहेन लगै छइ।” “तोरा नोकरी के रखतौ?” “गामबला भैया नोकरी रखा देतइ। कहलक जे जही मालिक ऐठीम हम रहै छिऐ तही मालिक ऐठीम हमरो रखा देतइ। बड़ धनीक मालिक छइ। मारिते नोकर छइ। हम जे मामा गाम गेल रही तँ भैयो गाम आएल रहए। ओ कहै जे हम मालिकक कोठीमे रहै छिऐ। दरमाहा छोड़ि कऽ बाइलियो खूब कमाइ छइ। मालिककेँ एकटा बेटी छइ। उ बड़का स्कूल-कौलेजमे पढ़ै छइ। अपनेसँ हवागाड़ी चलबै छइ। सभ दिन हमर भैया ओकरा स्कूल संगे जाइ छइ। उ पढ़ै छै आ हमर भैया गाड़ी ओगरै छइ। जखनी छुट्टी भऽ जाइ छै तखनी दुनू गोरे संगे अबै छइ। उ मलिकाइन हमरा भैयाकेँ मानबो खूम करै छइ। संगे-संग सिलेमा देखैले जाइ छइ। बजार घुमैले जाइ छइ। बड़का दोकान-होटलमे दुनू गोरे खूम लड़ू खाइए। अना तँ बड़का मालिक सभ नोकरकेँ दीयाबत्तीमे चिकनका कपड़ा दइ छै, हमरो भैयाकेँ दइ छइ। छोटकी मलिकाइन अपने दिसनसँ निकहा-निकहा फुलपेन्ट, निकहा-निकहा अँगा कीनि-कीनि दइ छइ। रूपैओ खूम दइ छइ...।” तीनू गोरे बाध पहुँच गेल। बाध पहुँचते तीनू तीन दिस भऽ गेल। तीन दिस भऽ तीनू गोरे डोका बीछए लगल। ऊपरे सभमे डोका चरौर करैले निकलल रहए। डोका बीछि तीनू गोरे घुमि गेल। दरबज्जापर आबि हीरानन्द शशि शेखरकेँ पुछलखिन- “शशि, की सभ ओइ बच्चा सभमे देखलिऐ?” मुँह बिजकबैत शशि बजला- “भाय, ओइ बच्चा सभकेँ देख क्षुब्ध छेलौं। ओकरा सबहक बगए देखै छलिऐ आ मनक खुशी देखै छलिऐ! जेना दुनियाँ-दारीसँ कोनो मतलब नहि, एकदम निर्विकार। अपने-आपमे मगन छल।” हीरानन्द- “कहलौं तँ ठीके मुदा एकटा बात तर्कक छल। अपना सबहक समाज तेते नमहर अछि जइमे भिखमंगासँ राजा धरि बसैए। एक दिस बड़का-बड़का कोठा अछि तँ दोसर दिस खोपड़ी। एक दिस औझुका विकसित मनुख अछि तँ दोसर दिस आदिम जुगक मनुख सेहो अछि। एते पैघ इतिहास समाज अपना पेटमे रखने अछि, मुदा ने ओइ इतिहासकेँ कियो पढ़निहार अछि आ ने बुझनिहार।” “ठीके कहलौं भाय!” “आइ धरि, हम सभ समाजक जइ रूपकेँ देखै छी ओ ऊपरे-झापरे देखै छी। मुदा देखैक जरूरत अछि ओकर भीतरी ढाँचाकेँ। जहिना समुद्रक ऊपरका पानि आ लहैर तँ सभ देखैए मुदा ओइक भीतर की सभ अछि से देखनिहार कए गोरे अछि?” सभ दिन भोरमे बौएलाल अपनो पढ़ैत आ सुमित्रोकेँ पढ़ा दइत। जाधैर टोल-पड़ोसक लोक सुति कऽ उठैत ताधैर बौएलाल आ सुमित्रा एक-डेढ़ घन्टा पढ़ि लिअए। एक तँ चफलगर, दोसर पढ़ैक जिज्ञासा सुमित्रामे तँए एक्के दिनमे अ-आ-सँ-य-र-ल-व तक सीखि गेल। कब्बीरकाने सीखि सुमित्रा बाल-पोथी पढ़ब आ खाँत सिखब शुरू केलक। सुमित्राकेँ पढ़ैत देख माए-बापकेँ खुशी होइ। ओना, माइयो आ बापोक मनमे शुरूहेसँ रहै जे बच्चा सभकेँ पढ़ाएब मुदा समैक फेर आ परिवारक विपन्नताक चलैत मनक सभ मनोरथ मनेमे गलि कऽ विलीन भऽ गेल रहइ। मुदा जहियासँ सुमित्रा पढ़ए लगल तहियासँ ओ मनोरथ अंकुरित हुअ लगलै। मनुखक जिनगीक गति मनुखक विचारो आ बेवहारोकेँ बदलैए। अनुपक प्रति जे कटुता आ दुर्विचार राम प्रसादक मनकेँ गहिया कऽ धेने छेलै ओ नहुँए-नहुँए पघिलए लगलै। सुमित्राक माए अनुपक आँगन जाइ-अबै छेली। तीमन-तरकारीक लेन-देन पतिसँ चोरा कऽ सेहो करिते छेली। मुदा तैयो राम प्रसादक मनमे पैछला दुश्मनी नीक-नहाँति मेटाएल नइ छेलइ। जहिना बरसातमे सुखाएल धारमे पानि अबिते जीवित धारक रूप-रेखा पकैड़ लैत तहिना विद्याक प्रवेशसँ रामप्रसादोक परिवारक रूप-रेखा बदलए लगल। भाए-भैयारीमे भैंसा-भैंसीक दुश्मनी बदलए लगलै। मिरचाइ, तरकारी आ चुन कीनैले अनुप हाट गेल रहए। कोसे भरिपर कछुआ हाट अछि। तैबीच राम प्रसाद केता बेर अनुपक डेढ़ियापर आबि-आबि अनुपक खोज केलक। राम प्रसादक मनमे अधला विचारकेँ धिक्कारि नीक-विचार अपन जगह बना लेलक। दोसर साँझमे अनुप हाटसँ घुमि कऽ रस्तेमे अबै छल आकि राम प्रसाद फेर तकैले पहुँचल। अनुपपर नजैर पड़िते राम प्रसाद कठ हँसी हँसि कहलक- “बहुत दिन जीबह भैया। बेरूए पहरसँ केतए हेरा गेल छेलह?” राम प्रसादक बदलल चेहरा आ बदलल विचार देख-सुनि अनुप मने-मन तारतम करए लगल जे आइ सुरूज केमहर उगला। जिनगी भरिक दुश्मनी एकाएक एना बदैल केना गेल? पैछला गप अनुपकेँ मन पड़लै। अखन धरि रमपरसदबाक संग हमरा दुश्मनी ओकर अधले काजक दुआरे ने छल। मुदा ताराकान्तकेँ धैनवाद दिऐ जे वेचारा मारियो खा, जहलो जा गाममे खबासी प्रथा मेटौलक। जाबे रमपरसदबा अधला काज करै छल ताबे जँ दुश्मनी छल तँ ओहो नीके रहए। किएक तँ हमहूँ अपना डारिपर छेलौं...। मुदा आब जँ ओ ओइ काजकेँ छोड़ि देलक तँ हमरो मिलान करैमे हरज कथी। कालोक गति तँ प्रबल होइ छइ। समैयो बदैल रहल अछि। एक तँ पहिलुका जकाँ भारो-दौर लोक नै दइए, दोसर पहिने लोक कान्हपर भार उघै छल आब गाड़ी-सवारीमे लऽ जाइए। तेतबे नहि, आब सबहक समांग परदेश सेहो खटए लगल अछि। गामक मालिको-मलिकानाक पहिलुका रूतबा कमले जाइ छइ। राम प्रसादक बात सुनि अनुप बाजल- “हाट जेनाइ जरूरी छेलए। घरमे ने मिरचाइ छल आ ने चुन। जे चुनवाली चुन बेचए अबै छेलए ओकर सासु मरि गेलइ। ऐ साल एक्को दिन कटहरक आँठी देल खेरही दालि सेहो नै खेने छेलौं तँए मन लगल छेलए।” कहि अनुप सोझे आँगन जा ओसारपर आँठी आ मेरचाइक मोटरी रखि, कोहीमे चुन रखलक। एकचारीमे बैस राम प्रसाद तमाकुल चुनबैत छल। चुनक कोही खोल्हियापर रखि अनुप बाहर आबि राम प्रसादकेँ कहलक- “ताबे तमाकुल लगाबह, कनी हाथ-पएर धोइ लइ छी। एक तँ कच्ची रस्ता तहूमे तेते टेक्टर सभ चलै छै जे भरि ठेहुन गरदा रस्तामे भऽ गेल अछि। जहिना लोकक पएर थाल-पानिमे धँसै छै तहिना गरदोमे धँसै छइ।” कहि अनुप इनारपर जा हाथ-पएर धोइ कऽ आबि राम प्रसाद लग आबि बैसल। अनुपकेँ तमाकुल दैत राम प्रसाद बाजल- “भैया, दुपहरेसँ मनमे आएल जे तोरो बरदक भजैती आन टोलमे छह आ हमरो अछि। दुनू गोरे ओकरा छोड़ा कऽ अपनेमे लगा लएह। जइसँ दुनू गोरेकेँ सुविधा हेतह।” थूक फेक अनुप कहलै- “ई बात तँ केते दिनसँ बौएलाल कहै छेलए जे जेते काल बरद अनैमे लगै छह ओते कालमे एकटा काज भऽ जेतह।” मुड़ी डोलबैत राम प्रसाद बाजल- “काल्हि जा कऽ तोहूँ अपन भजैतकेँ कहि दहक आ हमहूँ कहि देबइ। परसूसँ दुनू गोरे एक्केठीन जोतब।” आँगन बहारब छोड़ि रधियो आबि कऽ टाटक कातमे ठाढ़ भऽ गेल छेली। किएक तँ बहुतो दिनक पछाइत दुनू गोरेकेँ मुँहा-मुँही गप करैत देखलक। ..बरदक भजैतीक गप कऽ अनुप राम प्रसादकेँ कहलक- “अबेर भऽ गेल। अखन तोहूँ जाह, हमहूँ पर-पैखाना दिस जाएब।” जहिना सड़ल-सँ-सड़ल पानिमे कमल फुलेलासँ भगवानक माथपर चढ़ैक अधिकारी भऽ जाइए तहिना बौएलालक सेवा सभ-ले हुअ लगल। जइसँ गाममे बौएलाल चर्चाक पात्र बनि गेल। हीरानन्दक असरा पाबि बौएलाल रामायण, महाभारत, कहानी, कविता पढ़ब सीखि लेलक। जइ गाममे लोक भरि-भरि दिन ताश खेलैत, जुआ खेलैत तइ गाममे बौएलालक दिनचर्या सभसँ अलग बितए लगल, जइसँ बौएलालक जिनगीक रस्ता बदैल गेलइ। अधिक काल हीरानन्द बौएलालकेँ कहथिन- “बौएलाल, गरीबक सभसँ पैघ दोस्त मेहनत छी। जे कियो मेहनतकेँ दोस्त बना चलत वएह गरीबी रूपी दुष्टकेँ पछाइर सकैए। तँए सदिखन समैकेँ पकैड़ सही रस्तासँ मेहनत केनिहार जे अछि, वएह ऐ धरती आ दुनियाँक सुख भोगि सकैए।” ◌ शब्द संख्या : 2465 8. रौतुके गाड़ीसँ रमाकान्त तीनू गोरे अपना टीशनमे उतरला। अन्हार राति। भकोभन स्टेशन। खाली दुइए गोरे, स्टेशन मास्टर आ पैटमेन स्टेशनक घरमे केबाड़ बन्न केने जगल रहए। लेम्प जरैत रहइ। ने एक्कोरती इजोत प्लेटफार्मपर आ ने मुसाफिरखानामे। अन्हारेमे रमाकान्त तीनू गोरे अपन सभ समान मुसाफिरखानामे रखि, जाजीम बिछा बैसला। गाड़ीक झमारक संग दू रातिक जगरनासँ तीनू गोरेक देह ओंघीसँ भँसियाइत रहैन। प्लेटफार्मक बगलमे ने एक्कोटा चाहक दोकान खुगल आ ने एक्कोटा दोकनदार जगल रहए। ने कोनो दोकानमे इजोत होइ छेलै आ ने गाड़ीसँ एक्कोटा दोसर पसिंजर उतरल। नीन तोड़ै दुआरे रमाकान्त चाह पीबए चाहैथ मुदा कोनो जोगार नै देख कखनो समान लग बैसैथ तँ कखनो उठि कऽ टहलए लगैथ। श्यामा सुति रहली आ जुगेसरो सुति रहल। मुदा रमाकान्तक मनमे होनि जे जँ कहीं सुति रहब आ सभ समान चोरि भऽ जाए तखन तँ भारी जुलुम हएत। ओना, नीन तोड़ैक एकटा नीक उपाय ढाकीक-ढाकी मच्छर रहबे करैन। तँए जुगेसरो आ श्यामो अपन-अपन चद्दैर ओढ़ि मुँह झाँपि कऽ सूतल रहैथ। प्लेटफार्मपर पनरह-बीसटा अनेरुआ कुकुर एमहर-सँ-ओमहर करैत रहए। प्लेटफार्मक पछबारि भागक माल-जालक हड्डीक ढेरीसँ गन्ध से अबैत रहइ। सकरीक एकटा बेपारी हड्डीक कारोबार करैए। गाम-घरमे जे माल-जाल मरैत ओकर हड्डी गामे-घरक छोटका बेपारी,भारपर उघि-उघि अनैए ओही बेपारी ऐठाम बेच-बेच गुजर करैए। जखन बेसी हड्डी जमा भऽ जाइ छै, तखन ओ मालगाड़ीक डिब्बामे लादि बाहर पठबैए। जाधैर हड्डी प्लेटफार्मक बगलमे रहैए ताधैर अनेरुआ कुत्ता सभ ओइ हड्डीकेँ चिबबै पाछू तबाह रहैए। दिन रहौ कि राति, जेते टीशनक कातक कुकुर अछि सभटा ओही इर्द-गिर्द मर्ड़ाइत रहैए। ओना, आनो-आनो गामक कुकुर अपन गाम छोड़ि ओतए रहैए। ..एकटा पिल्ला एकटा पिल्लीक संग प्लेटफार्मक पुबारि भागसँ अबिते छल कि एकटा दोसर कुत्ताक नजैर पड़लै। बिना बोली देनहि ओ कुकुर दौग कऽ ओइ पिल्ला-पिल्ली लग पहुँच गेल। आगू-आगू पिल्ली आ पाछू-पाछू पिल्ला नाङैर डोलबैत जाइत रहए। ओ (दोसर कुकुर) पिल्लीक मुँह सूँघलक। सुँघिते पिल्ली मुँह चियारि कऽ ओइ कुत्तापर टुटल। पिल्लीकेँ टुटिते पैछला पिल्ला जोरसँ भुकलक। कुत्ताक अवाज सुनिते, जेते अनेरुआ कुकुर प्लेटफार्मपर रहए, सभ भुकैत दौग कऽ ओइ पिल्लीकेँ घेर लेलक। सभ सभपर भूकए लगल। मुदा पिल्ली डेराएल नहि। रानी बनि हस्तिनीक चालिमे पच्छिम-मुहेँ चलल। अबैत-अबैत टिकट घरक सोझमे बैस रहल। पिल्लीकेँ बैसते सभ पिल्ला पटका-पटकी करए लगल। प्लेटफार्मक पछबारि भाग, कदमक गाछक निच्चाँमे मघैया डोम सभ डेरा खसौने रहए। तखने एकटा छौड़ा एकटा छौड़ीक संग,डेरासँ थोड़े पच्छिम जा लट्टा-पट्टी करैत रहए। ..कुत्ताक अवाज सुनि एक गोरेकेँ नीन टुटलै। नीन टुटिते आँखि तकलक कि पछबारि भाग दुनू गोरेकेँ लट्टा-पट्टी करैत देखलक। ओ केकरो उठौलक नहि। असगरे उठि कऽ ओइ दुनू लग पहुँचल। ओहो दुनू देखलकै। छौरा ससैर कऽ झाड़ा फीड़ैले कातमे बैस गेल। मुदा छौड़ी चलाक। फरिक्केसँ ओइ आदमीकेँ कहलकै- “काका?” ‘काका’ सुनि ओ किछु बाजल नहि, मुदा घुरबो नै कएल। आगुए-मुहेँ ससरैत बढ़ल। छौड़ियो ओकरे दिस ससरल। लगमे पहुँचते छौड़ी कन्हापर दहिना हाथ दैत फुसफुसा कऽ कहलकै- “काका..!” कान्हपर हाथ पड़िते कक्काक मन बदलए लगलैन। जहिना शिकारीकेँ दोसराक शिकार हाथ लगलापर खुशी होइत तहिना कक्कोकेँ भेलैन। ओहो अपन दहिना हाथ छौड़ीक देहपर देलखिन। देहपर हाथ पड़िते छौड़ी हल्ला केलक। छौड़ो देखैत। उठि कऽ ओहो हल्ला करए लगल। हल्ला सुनि सभ मघैया उठि-उठि दौगल। स्टेशनक टिकट घरमे टिकट मास्टर पैटमेनकेँ कहलक- “रघू, प्लेटफार्मपर बड़ हल्ला होइ छै जा कऽ देखहक तँ!” पैटमेन जवाब देलकैन- “टीशन छिऐ। सभ रंगक लोक ऐठाम अबै-जाइए। जँ हम ओमहर देखैले जाइ आ एमहर घरमे चोर चलि आबए तखन असगरे अहाँ बुते सम्हारल हएत। भने केबाड़ बन्न छइ। दुनू गोरे जागलटा रहू, नइ तँ सरकारी समान चोरि भेने दुनू गोरेक नोकरी जाएत। कोनो कि सुरक्षा गार्ड अछि जे चोरिक दोख ओकरा लगतै।” पैटमेनक बात स्टेशन मास्टरकेँ नीक बुझि पड़लैन, बजला- “ठीके कहलह।” दुनू गोरे गप-सप्प करए लगला। लेम्प जरिते रहइ। केबाड़क दोग देने पैटमेन प्लेटफार्म दिस तकलक तँ देखलक जे कुत्ता सभ पटका-पटकी करैए। अन्हार दुआरे मघैया सभकेँ देखबे नै केलक। एक दिस कुत्ता सबहक झौहैर आ पटका-पटकी तँ दोसर दिस मघैया सबहक गारि-गरौवैल प्लेटफार्मकेँ गदमिशान केने। ..रमाकान्त सोचैथ जे भने भऽ रहल अछि। लोकक हल्लासँ हमर समान तँ सुरक्षित अछि। जुगेसरकेँ उठबैत कहलखिन- “जुगे, कनी आगू बढ़ि कऽ देखहक तँ कथीक हल्ला होइ छइ?” जुगेसर उठि कऽ बाजल- “काका, कोन फेरामे पड़ै छी! बस-स्टेण्ड आ रेलबे स्टेशनमे अहिना हरिदम झूठो-फूसि-ले हल्ला होइते रहै छइ। अपन जान बचाउ। अनेरे केतए जाएब।” भोर होइते टमटमबला सभ आबए लगल। थोड़े हटि कऽ उत्तरबारि भाग, ठकुरबाड़ीमे घड़ी-घण्ट बाजब शुरू भेल। घड़ी-घण्टक अवाज सुनि रमाकान्त नमहर साँस छोड़लैन। जुगेसरकेँ कहलखिन- “ओंघीसँ मन भकुआएल अछि। चाहो दोकानपर लोक सभकेँ गल-गुल करैत सुनै छिऐ। कनी चाह पीने अबै छी। ताबे तूँ समान सभ देखैत रहह।” रमाकान्त उठि कऽ कलपर जा कुरुर केलैन। पानि पीलैन। पानि पीब चाहक दोकानपर पहुँच चाह पीलैन। चाह पीब पान खा घुमि कऽ आबि जुगेसरकेँ कहलखिन- “आब तोंहू जाह। चाह पीब दूटा टमटम सेहो केने अबिहह।” जुगेसर उठि कऽ कलपर जा पहिने कुरुर केलक। कुरुर केला पछाइत सोचलक जे अखन भिनसुरका पहर छी। तोहूमे तीनियेँ-चारिटा टमटमबला आएल अछि। जँ कहीं चाह पीबैले चलि जाइ आ एमहर टमटमबला दोसर गोरेकेँ गछि लइ तखन तँ पहपैट भऽ जाएत। तइसँ नीक जे पहिने टमटमेबलाकेँ कहि दिऐ। ..टमटमबला लग पहुँच जुगेसर बाजल- “भाय, टमटम खाली छह?” “हँ।” “चलबह?” “हँ, चलब।” पहिल टमटमबलाक घरवाली दुखित छइ। दस बजेमे डाक्टर ऐठाम जेबाक छइ। एक्कोटा पाइ नइ रहने भोरे स्टेशन पहुँच गेल जे एक्को-दूटा भाड़ा कमा लेब तँ औझुका जोगार भऽ जाएत। किएक तँ कम-सँ-कम पचास रूपैआ दबाइ-दारू, तेकर बाद घरक बुतात,घोड़ाक खरचा आ दस रूपैआ बैंकबलाकेँ सेहो देबाक अछि। ..टमटमबला मने-मन सोचए लगल, भिनसुरका बोहैन छी तँए एकरा छोड़ब नहि। साला टमटमबला सभ जे अछि ओ उपरौंज करैत रहैए। कहैले अपनामे युनियन बनौने अछि मुदा बान्ह कोनो छैहे नहि। लगले बैसार कऽ कऽ विचारि लेत आ जहाँ दस रूपैआ जेबीमे एलै आ ताड़ी पीलक आकि मनमाना करए लगैए। अपनामे सभ विचारने अछि जे बर-बिमारी सन बेगरतामे सभ-सभकेँ सहयोग करब, चन्दा देबइ। मुदा हमरे कएटा पैसा चन्दा देलक? पनरह दिनसँ घरवाली दुखित अछि, जइ पाछू रेजानिस-रेजानिस भऽ गेल छी। ने एक्को मुट्ठी घोड़ाकेँ बदाम दइ छिऐ आ ने अपने भरि पेट खाइ छी। धिया-पुता सभ से अन्न बेतरे टौआइत रहैए। तखन तँ धैनवाद ओही बच्चा सभकेँ दिऐ जे भूखलो-दूखल माइक सेवा-टहल करैए। अपनो घोड़ाक संग-संग टमटम घिचै छी। जँ से नै करब आ सोल्होअना घोड़े भरोसे रहब तँ ओहो मरि जाएत! यएह तँ हमर लक्ष्मी छी। एकरे परसादे दू पाइ देखै छी। घोड़ाकेँ केना छोड़ि देब। तहिना घरोवाली कमजोर अछि। जिनगी भरि तँ ओकरे संग सुखो केलौं, छोट-छोट बच्चोकेँ तँ वएह थतमारि कऽ रखलक। हम तँ भरि दिन बोनाएले रहै छी। घर तँ ओही वेचारीक परसादे चलैए..! टमटमबला सोचिते छल, तैबीच जुगेसर पुछलकै- “केते भाड़ा लेबहक?” भाड़ाक नाओं सुनि टमटमबला सोचलक- एक तँ भिनसुरका बोहैन छी, दोसर डाक्टरो ऐठीम जाइक अछि। जँ भाड़ा कहबै आ ओते नै दिअए तखन तँ बक-झक हएत। जँ कहीं दोसर टमटम पकैड़ लिअए तखन तँ ओहिना मुँह तकैत रहि जाएब। तइसँ नीक जे पहिने समानो आ पसिंजरो चढ़ा ली...। एते बात मनमे अबिते बाजल- “जे उचित भाड़ा हएत सएह ने लेब। हम तोरा एक हजार कहि देबह तँ की तूँ दाइए देबह?” टमटमबलाक बात सुनि जुगेसर बाजल- “अच्छा ठीक छइ। पहिने चाह पीब लएह।” दुनू टमटमोबला आ जुगेसरो दोकानपर जा चाह पीलक। चाह पीब तीनू गोरे तमाकुल खेलक। चाहबलाकेँ जुगेसरे पाइ देलकै। तीनू गोरे रमाकान्त लग आबि समान सभ उठा-उठा टमटमपर लादलक। एकटा टमटमपर श्यामा, जुगेसर चढ़ल आ दोसरपर असगरे रमाकान्त समानक संग बैसला। किछु दूर आगू बढ़लापर टमटमबलाकेँ पुछलखिन- “घोड़ा एते लटल छह। खाइले नै दइ छहक?” रमाकान्तक बात सुनि टमटमबला बेवशी-आँखिए रमाकान्त दिस ताकि उत्तर दिअ चाहैत मुदा कानैत हृदए मुहसँ बकारे नै निकलए दइ। टमटमबलाक आँखि-पर-आँखि दऽ रमाकान्त पढ़ए लगला। तैबीच टमटमबलाक आँखिमे नोर ढबढबा गेलइ। कान्ह परहक तौनीसँ आँखि पोछि टमटमबला बाजल- “सरकार, यएह टमटम आ घोड़ा हमर जिनगी छी। अहीपर परिवार चलैए। जइ दिनसँ भनसिया दुखित पड़ल तइ दिनसँ जे कमाइ छी से दबाइए-दारूमे खरचा भऽ जाइए। अपनो बाल-बच्चाकेँ आ घोड़ोकेँ खेनाइक तकलीफ भऽ गेल। की करबै! कहुना परान बँचेने छिऐ। परान रहतै तँ मौसु हेबे करतै।” टमटमबलाक बेवशी आ धैर्य देख रमाकान्तक हृदए पघिल कऽ इनहोर पानि जकाँ पातर भऽ गेलैन। बिना किछु बजने मने-मन सोचए लगला जे एक तरहक मजबूर ओ अछि जे किछु करबे नै करैए आ दोसर तरहक ओ अछि जे दिन-राति खटैए मुदा ओकरा प्रकृतिसँ लऽ कऽ मनुख धरि ऐ रूपे संकट पैदा करै छै जइसँ ओ मजबूर अछि। ई टमटमबला दोसर श्रेणीक मजबूर अछि, तँए एहेन लोकक मदैत करब धर्मक श्रेणीमे अबैए। जरूर एहेन लोकक मदैत करक चाहिऐ। मुदा मेहनतकस आदमीक मन एते सक्कत होइ छै जे दोसरसँ हथउठाइ नै लिअ चाहैए। मुदा हम किछु मदैत करए चाहिऐ आ ओ लइसँ नासकार जाए तखन तँ मनमे कचोट हएत! ..असमंजसमे रमाकान्त पड़ि गेला। कोन रूपे एकरा मदैत कएल जाए? सोचैत-सोचैत सोचलैन जे हम अपने नै किछु कहि एकरेसँ पुछिऐ जे अखन तूँ जइ संकटमे पड़ल छह ओइमे केते सहयोग भऽ गेलासँ तोरा पार लगि जेतह। ..ई विचार मनमे अबिते रमाकान्त पुछलखिन- “अखन तोरा केते मदैत भऽ गेलासँ पार लगि जेतह?” रमाकान्तक बात सुनि टमटमबलाक मनमे संतोखक छोट-छीन रेगहा घिचा गेल। मने-मन सभ हिसाब बैसबैत बाजल- “सरकार, अगर अखन पाँच दिनक परिवारोक आ घोड़ोक बुतात आ एक साए रूपैआ भऽ जाए तँ हम अपन जिनगीकेँ पटरीपर आनि लेब। जखने जिनगी पटरीपर आबि जाएत तखने जिनगी अपन सरपट चालि पकैड़ लेत। स्त्रीक इलाज, परिवार आ कारोबार तीनू काज एहेन अछि जे एक्कोटा छोड़ैबला नइए।” टमटमबलाक बोलीमे रमाकान्तकेँ मदैतक आस बुझि पड़लैन। आशा देख मनमे खुशी एलैन। खुशी अबिते फुरलैन- अगर पाँच दिनक बदला दस दिनक बुतात आ साए रूपैआक बदला दू साए रूपैआ जँ मदैत कऽ देबै तँ विरोध नै करत। संगे जखने समस्यासँ निकलैक आशा जगि जेतै तँ काजो करैक साहस बढ़ि जेतइ। मुदा असगरे तँ नइ अछि, दूटा टमटमबला अछि। की दुनू गोरेकेँ मदैत करब आकि एकरेटा। ..ई प्रश्न रमाकान्तक मनमे ठाढ़ भऽ गेलैन। सोचए लगला- मुसीबत तँ ऐ वेचारेकेँ छइ। दोसर टमटमबाला सँ तँ गप नै भेल जे बुझितिऐ। मुदा एकर तँ बुझलिऐ। तँए एकरा मदैत करबै। दोसर टमटमबलासँ पुछि लेबै जे तोहर भाड़ा केते भेलह। जेते कहत तेते दऽ देबइ। मुदा सोझमे एकठाम कम-बेसी देनाइयो तँ उचित नहि, तँए पहिने ओकरा भाड़ा दऽ विदा कऽ देबै आ एकरा रोकि पाछू कऽ सभ किछु दऽ विदा करब। गरीबक हृदैकेँ जुड़ाएब बड़ पैघ काज होइत। एते सोचैत-विचारैत रमाकान्त घरपर पहुँचला। घरमे ताला लगा हीरानन्द पैखाना गेल रहैथ। दुनू टमटम पहुँच दलानक आगूमे ठाढ़ भेल। टमटम ठाढ़ होइते सभ कियो उतरला। टमटमोबला आ जुगेसरो सभ समानकेँ उताइर दरबज्जाक ओसारपर रखलक। ताबे हीरानन्दो बाध दिससँ आबि पोखैरक पुबरिया महार लग पहुँचला। महार लग अबिते दरबज्जापर टमटम लागल देखलैन। टमटम देख बुझि पड़लैन जे रमाकान्त आबि गेला। ..हाँइ-हाँइ कऽ दतमैन-कुरुर कऽ लफरल दरबज्जापर आबि घरक ताला खोलि देलखिन। हाथे-पाथे तीनू गोरे सभ सामानकेँ कोठरीमे रखलैन। दोसर टमटमबलाकेँ भाड़ा पुछि रमाकान्त दऽ देलखिन आ पहिल टमटमबलाकेँ आँखिक इशारासँ थम्हैले कहलखिन। दोसर टमटमबला चलि गेल। पहिल टमटमबलाकेँ दू साए रूपैआ आ दस दिनक बुतात–दू पसेरी बदाम आ तीन पसेरी चाउर–दऽ कऽ विदा केलैन। टमटमपर चढ़ि मने-मन गदगद होइत टमटमबला गीत गुनगुनाइत विदा भेल- ‘सबहक सुधि अहाँ लइ छी यौ बाबा हमरा किए बिसरल छी यौ...।” पसेनासँ गन्ध करैत कुरता-गंजी निकालि रमाकान्त चौकीपर रखलैन। भकुआएल मन रहैन। मुदा नीकेना घर पहुँचलासँ मन खुशी होइत रहैन। हीरानन्दक किछु पुछैसँ पहिनहि रमाकान्त बजला- “गाम-घरक हाल-चाल बढ़ियाँ अछि किने?” “हँ।” हीरानन्द पुछलखिन- “यात्रा बढ़ियाँ रहल किने?” “ऐंह, यात्राक सम्बन्धमे की कहू! अखन तँ मनो भकुआएल अछि आ तीन दिनसँ नहेबो ने केलौं हेन तँए पहिने नहाइले जाए दिअ। तखन निचेनसँ यात्राक सम्बन्धमे कहब।” जुगेसरकेँ जे विदाइ मद्रासमे भेटल छेलै ओ चारिटा काटुनमे छल। ओ चारू काटुन जुगेसर फुटा कऽ ओसारेपर रखलक। जुगेसरक घरवाली आ धिया-पुता सेहो आबि गेल। चारू काटुन जुगेसर अपन घरवालीकेँ देखबैत बाजल- “ई अपन छी अँगना नेने चलू।” ‘अपन’ सुनि घरोवाली आ धियो-पुतो चपचपा गेल। चारू काटुन लऽ आँगन विदा भेल। रमाकान्तक अबैक समाचार गाममे बिहाड़ि जकाँ पसरल। धिया-पुतासँ लऽ कऽ चेतन धरि देखैले आबए लगला। दरबज्जापर लोकक भीड़ बढ़ए लगल। रमाकान्त नहाएब छोड़ि जुगेसरकेँ कहलखिन- “जुगे, सनेसबला काटुन एतै नेने आबह।” सनेसमे डाक्टर महेन्द्र टुकड़ी बनौल दू काटुन नारियल देने रहैन। जुगेसर कोठरी जा एकटा काटुन उठौने आएल। जहियासँ रमाकान्त ब्रह्मचारीजीक आश्रम गेला तहियासँ विचारे बदैल गेलैन। अपन सुख-दुखकेँ ओते महत नै दिअ लगला जेते दोसराक। दरबज्जापर लोक थहा-थही करए लगल। जेना लोकक हृदए रमाकान्तक हृदैमे मिझर हुअ लगलैन आ रमाकान्तक हृदए लोकमे। अपन नहाएब, दतमैन करब आ आँखिपर लटकल ओंघी, सभटाकेँ बिसैर जुगेसरकेँ कहलखिन- “चेतनकेँ दू-दूटा टुकड़ी आ बाल-बोधकेँ एक-एकटा टुकड़ी बाँटि दहक। दरबज्जापर आएल एक्को गोरे ई नै कहए जे हमरा नै भेल।” काटुन खोलि जुगेसर नारियलक टुकड़ी बिलहए लगल। हाथमे पड़िते, की चेतन की धिया-पुता, नारियल खाए लगल। एक काटुन सठि गेल मुदा देखनिहार, जिज्ञासा केनिहार नै ओराएल। दोसरो काटुन जुगेसर खोललक। दोसर काटुन सठैत-सठैत लोको पतरा गेल। लोकक भीड़ हटल देख रमाकान्त नमहर साँस छोड़ैत जुगेसरकेँ कहलखिन- “आब तोहूँ जा कऽ खा-पीअ-गे। हमहूँ जाइ छी।” आँगन आबि जुगेसर अपन चारू काटुन खोललक। मद्रासमे काटुनक भितरका समान नै देखने छल तँए देखैक उत्सुकता रहइ। एक-एकटा काटुन चारू गोरे–डॉ. महेन्द्र, रविन्द्र, जमुना आ सुजाता–देने रहथिन। महेन्द्रक देल पहिल काटुनमे, एक जोड़ धोती, एकटा कुरता-कपड़ाक पीस, एकटा आङीक पीस, एकटा चद्दैर, एकटा गमछा आ एक जोड़ जुत्ता जुगेसर-ले आ एक जोड़ साड़ी, जोड़ भरि साया-ब्लौजक कपड़ा, एक जोड़ चप्पल घरवाली-ले। दुनू बच्चाले पेन्ट-शर्टक संग तीन साए रूपैआ रहइ। अहिना तीनू काटुनमे सेहो रहइ। चारू काटुनक समान देख जुगेसरक परिवारमे जेना खुशीक बिहाड़ि उठि गेल। दुनू बच्चा अपन कपड़ा देख खुशीसँ एक-एकटा पहिर आँगनमे नाचए लगल। कपड़ाक एहेन सुख जिनगीमे पहिल दिन भेटल छेलइ। दुनू परानी जुगेसरकेँ सेहो खुशीसँ मन गदगद भऽ गेल। जुगेसर हिसाब जोड़ए लगल- जँ ओरिया कऽ पहिरब तँ दुनू गोरेकेँ जिनगी भरि पार लगि जाएत। एहेन चिक्कन कपड़ा आइ धरि नसीब नै भेल छेलए...। एक आँखि जुगेसर समानपर देने आ दोसर आँखि घरवालीक आँखिपर देलक। दुनू गोरेक आँखिमे जेना जिनगीक वसन्त आबए लगल। अपन बिआह मन पड़लै। जुगेसरकेँ होइ जे घरवालीकेँ दुनू बाँहिसँ पजिया कऽ छातीमे लगा ली आ घरवालीकेँ होइ जे घरबलाक कोरामे बैस एकाकार भऽ जाइ। मुदा तीन दिनक गाड़ीक झमारसँ जुगेसरक देहो भँसियाइत आ ओंघी सेहो आँखिक पिपनीकेँ झलफलबैत, जुगेसर घरवालीकेँ कहलक- “पहिरैले एक-एक जोड़ कपड़ो आ जुत्तो बाहर रखू आ बाँकीकेँ खूब सेरिया कऽ रखि लिअ, दुरि नै हुअए।” बेर टगि गेल। जुगेसर नवका धोती आ गंजी पहिर कान्हपर गमछा नेने रमाकान्त ऐठाम पहुँचल। दरबज्जापर रमाकान्त सुतले छला। आँगन जा श्यामाकेँ देखलक तँ ओहो सुति उठि कऽ मुँह-हाथ धोइ छेली। जुगेसरकेँ देख, श्यामा एक टकसँ निंगहारि कऽ मुस्कियाइत पुछलखिन- “आइ तँ अहाँ दुरगमनियाँ वर जकाँ लगै छी जुगेसर?” हँसैत जुगेसर उत्तर देलकैन- “काकी, महिन्दर भाइयक देलहा छी।” महेन्द्रक नाओं सुनि श्यामा बजली- “भगवान भोग दैथ! और की सभ बच्चा देलैन?” जुगेसर बाजल- “अहाँसँ लाथ कोन काकी, तेते कपड़ा-लत्ता आ जुत्ता-चप्पल चारू गोरे देलैन जे जिनगी भरि केतबो धाँगि कऽ पहिरब तैयो ने सठत।” बेटा-पुतोहुक बड़ाइ सुनि श्यामाक हृदए उमैड़ गेलैन, अह्लादित भऽ बजली- “पाइयो-कौड़ी देलैन आकि कपड़े-लत्ताटा?” “रूपैआ तँ गनलिऐ नहि, मुदा बुझि पड़ल जे दस-पनरहटा नमरी अछि।” “बाह! मालिक देखलैन की नहि?” “ओ तँ सुतले छैथ। हुनके देखबैले पहिर कऽ एलौं।” “हम ताबे चाह बनबै छी। दरबज्जापर जा कऽ उठा दियौन।” “बड़बढ़ियाँ।” ‘बड़बढ़ियाँ’ कहि जुगेसर दरबज्जापर आबि रमाकान्तकेँ उठबए लगल। आँखि खोलि रमाकान्त देबालक घड़ीपर नजैर देलैन। चारि बजैत। पड़ले-पड़ल सुतैक हिसाब जोड़लैन। हिसाब जोड़ि घुनघुना कऽ बजला- “एहेन नीन तँ जुआनियोँमे ने आएल छल!” ओछाइनपर सँ उठि जुगेसरकेँ कहलखिन- “कनी चाह बनौने आबह। अखनो बुझि पड़ैए जे नीन आँखिए-पर लटकल अछि। ताबे हमहूँ कुरुर कऽ लइ छी।” कहि रमाकान्त पहिने लघी करए गेला। लघी करै काल बुझि पड़ैन जे चाहोसँ धीपल लघी होइए। तेतबे नहि, जेते लघी चारि बेरमे करै छी, तोहूसँ बेसी भऽ रहल अछि...। लघी कऽ कलपर आबि रमाकान्त आँखि-कान पोछि, कुरुर कऽ दमसा कऽ भरि पेट पानि पीलैन। पानि पीबते बुझि पड़लैन जे अदहा नीन पड़ा गेल। जुगेसर चाह अनलक। रमाकान्त चाह पीबते रहैथ आकि हीरानन्दो स्कूलसँ आबि गेला। शशि शेखरो एला। हीरानन्द जुगेसरकेँ पुछलखिन- “जात्रा बढ़ियाँ रहल किने?” हँसैत जुगेसर बाजल- “जाइ काल टेनमे बड़ भीड़ भेल। जाबे गाड़ीमे रही ताबे ने एक्को बेर झाड़ा भेल आ ने सुतलौं। किएक तँ रिजफ सीट रहबे ने करए। जइ डिब्बामे बैसल रही ओइमे लोकक करमान लगल रहइ। तैपर सँ जइ टीशनपर गाड़ी रूकै सभ टीशनमे एगो-दूगो लोक उतरै आ दस-बीस गोरे चढ़ि जाए। मुदा भगवानक दयासँ कहुना-कहुना पहुँच गेलौं। जखन मद्रास टीशनपर उतरलौं तँ दोसरे रंगक लोक देखिऐ। अपना सभ दिस अछि किने जे सभ रंगक लोक मिलल-जुलल अछि, से नै देखिऐ। बेसी लोक कारीए रहइ। गोटे-गोटे लोक उज्जर बुझि पड़इ। जखन डेरापर पहुँचलौं तँ मकान देख बिसबासे ने हुअए जे अपन छिऐन। बड़का भारी मकान, कोठलीक कमी नहि।” “भरि मन देखलौं किने?” “ऐंह, की कहू मास्टर साहैब, महिन्दर भाय अपने मोटरसँ भरि-भरि दिन बुलबैत रहैथ। मोटरो तेहेन जे जहाँ बैसी आ खुगै आकि ओंघी लगि जाए। केतए की देखलौं से मनो ने अछि।” मद्राससँ रमाकान्तक एनाइक समाचार सुनि महेन्द्रक स्कूलक संगी सुबुध सेहो एला। सुबुध हाइ स्कूलमे शिक्षक छैथ। महेन्द्र आ सुबुध हाइ स्कूल धरि, संगे-संग पढ़ने। महेन्द्र साइंसक विद्यार्थी आ सुबुध आर्टक। बी.ए. पास केलापर सुबुध शिक्षक भेला आ महेन्द्र डाक्टरी पढ़ि डाक्टर बनला। महेन्द्रक कुशल-छेम बुझला पछाइत सुबुध रमाकान्तकेँ पुछलखिन- “अपना ऐठामक लोक आ मद्रासक लोकमे की अन्तर देखलिऐ?” दुनू ठामक लोकक तुलना करैत रमाकान्त बजला- “ओत्तुका आ अपना ऐठामक लोकमे अकास-पतालक अन्तर अछि। ओइ ठामक लोक अपना ऐठामक लोकसँ अधिक मेहनती आ इमानदार अछि।” बिच्चेमे शशि शेखर प्रश्न केलकैन- “की मेहनती?” “मनुखक तुलना करैसँ पहिने अपन इलाका आ मद्रासक माटि-पानिक तुलना सुनि लिअ। जेहेन सुन्नर माटि अपना सबहक अछि, देखते छिऐ जे केते मुलाइम आ उपजाऊ अछि, पानियोँ केते बढ़ियाँ अछि। एहेन मद्रासमे नइ छइ। ओतए अपना सभसँ बेसी गरमियो पड़ै छइ। ..जहाँ धरि लोकक सवाल अछि। अपना ऐठामक लोक अधिक आलसी अछि, समैकेँ कोनो महत नै दइए वा ई कहियौ जे ऐठामक लोक समैक महत बुझबे नै करैए। कियो बुझबो करैए तँ ओ परजीवी बनि जिनगी बितबए चाहैए। हँ! किछु गोरे एहेन जरूर छैथ जे मर्यादित मनुख बनि जिनगी जीब रहल छैथ। जे पूजनीय छैथ मुदा समाजिक बेवस्था सदिखन हुनको झकझोड़िते रहै छैन। ओइठामक लोक समैक संग चलैए जइसँ कमजोर इलाका रहितो नीक-नहाँति जिनगी बितबैए। ओइठामक लोक भीखकेँ अधला बुझि नै मंगैए मुदा अपना ऐठाम लोक उपार्जनक स्त्रोत बुझैए।” बिच्चेमे सुबुध पुछलकैन- “पढ़ाइ-लिखाइ केहेन छइ?” “स्कूल, कौलेज, युनिवर्सिटी सभ देखलौं। लड़का-लड़कीक स्कूल शुरूहेसँ अलग-अलग अछि। मुदा तैयो दुनूकेँ संगे-संग पढ़ैत सेहो देखलौं। अपना ऐठामसँ बेसी लड़की ओइठाम पढ़ैए। अपना ऐठाम लड़के पछुआएल अछि तँ लड़कीक कोन हिसाब। गाड़ी, ट्रेन, बसमे सेहो अलग-अलग बेवस्था छइ। जखन कि अपना ऐठाम सभ संगे-संग चलैए।” सुबुध- “खाइ-पीबैक केहेन बेवस्था छइ?” “गरीब लोकक खान-पान दब होइते छइ। मुदा एक हिसाबसँ देखल जाए तँ अपना सबहक नीक अछि। कपड़ो-लत्ता पहिरब अपना ऐठाम नीक अछि।” बिच्चेमे आँखिक इशारासँ रमाकान्त जुगेसरकेँ एक बोतल ब्राण्डी अनैले कहलखिन। जुगेसर उठि कऽ भीतर गेल आ एकटा बोतल नेने आएल। दरबज्जापर आबि चाहेक गिलासकेँ धोइ, सभमे शराब दऽ सबहक आगूमे देलकैन। आगूमे पड़िते रमाकान्त गट दऽ पीब गेला। मुदा हीरानन्दो, शशि शेखरो आ सुबुधोकेँ पीबैत डर होइ छेलैन। कहियो पीने नै छला। ..दोहरी गिलास पीबैत रमाकान्त सभकेँ कहलखिन- “पीबै जाइ जाउ, फलक रस छिऐ। कोनो अपकार नै करत।” मुदा तैयो सभ-सबहक मुँह तकैत रहला। दोहरा कऽ फेर रमाकान्त सभकेँ कहलखिन। मने-मन सुबुध सोचलैन जे कोनो जहर-माहूर थोड़े छिऐ जे मरि जाएब। अगर मरबो करब तँ पहिने कक्के ने मरता। बुझल जेतइ। आगूमे राखल गिलास उठा आस्तेसँ दू घोट पीब, गिलास रखि हीरानन्दकेँ कहलखिन- “पीबू, पीबू मास्टर साहैब। सुआद तँ कोनो अधला नहियेँ बुझि पड़ैए।” सुबुधक बात सुनि हीरानन्दो आ शशि शेखरो गिलास उठा कऽ पीब गेला। ताबे तेसरो गिलास रमाकान्त चढ़ा लेलैन। तेसर गिलास पीबते आँखिमे लाली आबए लगलैन। मन हल्लुक सेहो हुअ लगलैन आ बजैक ताउ चढ़ए लगलैन। ..जहिना आगिपर चढ़ल पानिक बरतनमे ताउ लगलापर निच्चाँक पानि गर्म भऽ ऊपर उठैत रहैए तहिना रमाकान्तकेँ हुअ लगलैन। धीरे-धीरे रंग चढ़ैत-चढ़ैत नीक जकाँ चढ़ि गेलैन। हीरानन्द, सुबुध आ शशि शेखरक आँखि सेहो तेज हुअ लगलैन। तेज होइत नजैरसँ सुबुध पुछलखिन- “काका, महेन्द्र भाय मस्तीमे रहै छैथ किने?” बजैक वेग रमाकान्तकेँ रहबे करैन तैपर सँ महेन्द्रक मस्ती सुनि आरो बढ़ि गेलैन। बाजए लगला- “मेहनत आ कमाइ देख क्षुब्ध भऽ गेलौं। अपन बड़का मकान, चारिटा गाड़ी, बजारमे अइल-फइल बास। तैपर सँ बैंकोमे ढेरी रूपैआ जमा केने अछि। ऐठामक सम्पैतक ओकरा कोनो जरूरत नइ छइ! किएक रहतै? जेकरा अपने कमाइ अम्बोह छै...।” बिच्चेमे सुबुध टोकलखिन- “तखन ऐठामक खेत-पथार गरीब-गुरबाकेँ दऽ दियौ?” बिना किछु आगू-पाछू सोचने रमाकान्त बजला- “बड़ सुन्नर बात अहाँ कहलौं। अनेरे हम एते खेत-पथार रखने छी। यएह खेत जे गरीबक हाथमे जेतै तँ उपजबो बेसी करत आ सबहक जिनगियो सुधैर जाएत।” जहिना धधकल आगिमे हवा सहायक होइत तहिना रमाकान्तोकेँ भेलैन। एक तँ ब्राण्डीक निशाँ, दोसर परिवारमे चारि-चारिटा डाक्टरक कमाइ, तैपर सँ अपार सम्पैत देख मन उधियाइते रहैन। समाजक सिनेह सेहो बढ़िए गेल छेलैन। तेतबे नहि, अद्वैत दर्शन हृदैकेँ पैघ सेहो बना देने रहैन। ..हँसैत रमाकान्त सबहक बीच, बजला- “अखन धरि हम गुल्लैरक किड़ा बनल छेलौं मुदा आब दुनियाकेँ देखलिऐ। दू साए बीघा जमीन अछि। अनेरे किए हम एते रखने छी। एकटा जमीनदारक खेतसँ सैकड़ो गरीब परिवार हँसी-खुशीसँ गुजर कऽ सकैए। जखन कि ओतेक सम्पैतक सुख एकटा परिवार करए, ई केते भारी अनुचित छी! सभ मनुख मनुख छी। सभकेँ सुख-दुखक अनुभव होइ छइ। कियो अन्न बेतरे काहि कटैए तँ केकरो अन्न सड़ै छै। घोर अन्याय मनुख मनुखक संग करैए!” कहि जुगेसरकेँ कहलखिन- “जुगे, इलाइची देल पान लगाबह?” जुगेसर पान लगबए गेल। तैबीच बौएलाल सेहो आएल। रमाकान्तकेँ गोड़ लागि कातमे बैसल। ..बौएलालकेँ बैसते रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहलखिन- “मास्टर साहैब, महेन्द्र कहने छल जे एकटा लड़का आ एकटा लड़की, दू गोरेकेँ मद्रास पठा दिअ। ओइ दुनू गोरेकेँ अपना संग रखि छोट-छोट बिमारीक इलाज केनाइ सिखा देबइ। गाममे इलाजक बड़ असुविधा अछि। तेतबे नहि, गरीबीक चलैत लोक रोग-बियाधिसँ मरि जाइए मुदा इलाज नइ करा पबैए। तँए एकटा छोट-छीन अस्पताल सेहो बना देब, जइमे लोकक मुफ्त इलाज हेतइ। तइले जेते दबाइ-दारूमे खरच हएत से हम देब। हम सभ चारि गोरे छी। बेरा-बेरी चारू गोरे सालमे एक-एक मास गाममे रहब आ लोकक इलाज करब। तैबीच छोट-छोट बिमारी-ले सेहो दू आदमीकेँ तैयार कऽ देबाक अछि। जँ कहीं बीचमे नमहर बिमारी केकरो हेतै, तेकरो इलाजक खरच देबइ...। तँए दू आदमीकेँ मद्रास पठा दियौ, मासुल हम देबइ!” रमाकान्तक बात सुनि सभ कियो बौएलाल आ सुमित्राकेँ मद्रास पठबैक विचार केलैन। बौएलालकेँ हीरानन्द कहलखिन- “बौएलाल, सबहक विचार तँ तूँ सुनियेँ लेलह। काल्हि तूँ आ सुमित्रा दुनू गोरे मद्रास चलि जाह।” ◌ शब्द संख्या : 3633 9. कछ-मछ करैत हीरानन्द भरि राति जगले रहि गेला। कखनो मनमे होनि जे रमाकान्तक देल जमीन समाजक बीच केना बाँटल जाए, तँ कखनो हुनक उदार विचार नाचि उठैन। कखनो होनि जे निशाँक झोंकमे बजला मुदा निशाँ टुटलापर जँ कहीं नठि जाथि? बात बदलब धनीक लोकक जन्मजात आदत छी। मुदा हम तँ शिक्षक छी, शिक्षकक प्रति आदर आ निष्ठा सभ दिनसँ समाजमे रहलै आ रहतै। ऐ विचारक बीच जेते गोरे छेलौं ओइमे हम आ सुबुध शिक्षक छी। आन कियो तँ कम्मो मुदा हम दुनू गोरे तँ बेसी घिनाएब! कोन मुँह लऽ समाजक बीच रहब..? विचित्र स्थितिमे हीरानन्द रहैथ। फेर अपनेपर शंका भेलैन जे हमहूँ शराबेक निशाँमे ने तँ वौआइ छी? ई बात मनमे उठिते, उठि कऽ बाहर निकैल चारूभर तकलैन। अन्हार गुप-गुप, सन-सन करैत राति, हाथ-हाथ नइ सुझैत। मुदा अकास साफ। सिंगहारक फूल जकाँ तरेगन चकचक करैत। हवा तँ कोनो नहियेँ बहैत रहै मुदा राति ठंढाएल रहए। पुनः बाहरसँ कोठरी आबि हीरानन्द बिछानपर पड़ि रहला। मुदा नीनक केतौ पता नहि। मनसँ जमीन हटबे ने करैत रहैन। पुनः उठि कऽ कोठरीसँ निकैल लघुसंका करैले कातमे बैसला। भरि-पोख पेशाब भेलैन। पेशाब होइते मन हल्लुक भेलैन। मन हल्लुक होइते ओछाइनपर आबि पड़ि रहला। ओछाइनपर पड़िते नीन आबि गेलैन। सुबुध सेहो भरि राति जगले बितौलैन। मुदा हीरानन्द जकाँ ओ ओझरीमे ओझराएल नै छला। समाजशास्त्रक शिक्षक होइक नाते स्पष्ट सोच आ समाज चलैक स्पष्ट दिशा छेलैन तँए मन दृढ़ संकल्प आ सक्कत विचारसँ भरल रहैन। सभसँ पहिने मनमे उठलैन जे जहिना आर्थिक दृष्टिसँ टुटल समाजकेँ रमाकान्त कक्काक सहयोगसँ मजगूत बल भेटत तहिना तँ ओइ बलकेँ चलबैक मजगूत रस्तो भेटक चाही? जे रमाकान्त काका बुते नै हेतैन। इमानदारी आ उदार सोभावक चलैत तँ ओ सम्पैतक तियाग करता। मुदा ओ सम्पैत आगू-मुहेँ बढ़त केना..? जहिना मनुखक परिवार दोबर, तेबर, चारिबरक रफ्तारसँ आगू-मुहेँ बढ़ैए तहिना तँ सम्पैतोक गति हेबा चाहिऐ। मुदा सम्पैतमे ओ गति तखने औत जखन ओइमे श्रमक इंजिन लगौल जाएत। ओना, श्रमक इंजिन लगौनिहार श्रमिक सेहो पर्याप्त अछि मुदा ओकरा श्रमकेँ कोन रूपमे बढ़ौल जाए। एक रूप ई होइत जे सोझे-सोझी ओकरा नव कार्यक ढाँचामे ढालल जाए, नव काज देल जाए, जे सम्भव नइ अछि। किएक तँ नव औजार आ नव तरीका बिना नव ज्ञाने सम्भव नइ अछि, जे नइ अछि। दोसर जे लूरि आ औजार अछि, ओकरे धारदार बना आगू बढ़ौल जाए। जे सम्भबो अछि आ उपयुक्तो होएत। मुदा अहु-ले पथ-प्रदर्शकक जरूरत होएत। जेकर अभाव अछि। हमहूँ तँ नोकरीए करै छी। सात दिनमे एक दिन रबिए-रबि गाममे रहै छी, बाँकी छह दिन गामसँ बाहरे रहै छी। तइसँ काज केना चलि सकैए। किएक तँ समाजो नमहर अछि आ समस्यो ढेर अछि, तैसंग हर समस्याक समाधानक रस्तो फराक-फराक। जेना बुद्धदेव कहने छैथ जे दुश्मनकेँ सूइयाक नोको बरबैर जँ सुराक भेट जाएत तँ ओहू देने हाथी सन विशाल जानवरकेँ प्रवेश करा लेत। समाजक समस्यो तँ ओहने अछि..! अनासुरती सुबुधक मनमे उपकलैन- जहिना रमाकान्त काका अपन सभ सम्पैत समाजकेँ दइले तैयार छैथ तहिना हमहूँ नोकरी छोड़ि अपन ज्ञान समाजकेँ देब। सभ किछु बुझितौं सड़ल-गलल रस्ता अपन अरामक दुआरे धेने चलि रहल छी। सात बीघा जमीन अछि,एकटा पोखैर अछि, दस कट्ठा गाछी-कलम आ खढ़होरि सेहो अछि। जइसँ पिताजी नीक-नहाँति गुजरो केलैन आ हमरो पढ़ौलैन। मुदा हम नोकरियो करै छी, खेतो-पथार ओहिना अछि मुदा केते आगू-मुहेँ बढ़लौं? हँ, एते जरूर भेल अछि जे घरोवालीकेँ आ बेदरो-बुदरीकेँ धनिकक मन्दिरक मुरती जकाँ नीक-नीक परसाद, नीक-नीक सजाबटसँ सजा काहिल बनौने छी! की हम ई नै देखै छी जे झक-झक करैत छातीक हाड़बला मनुख रिक्शा घिचैए, साठि बर्खक महिला चिमनीमे पजेबा उघैए, मरैबला पुरुख बरदक संग हर ठेलैए, अन्नक बोझ उघैए..! की ओकर देह लोहाक बनल छै आ हमरा सबहक कोढ़िलाक बनल अछि? ई सभ सभटा धन आ बुधिक करामात छी। आइ धरिक समाज आ समाजक निआमक एकरे पोसक रहला जे सुधारैक अछि। नहि तँ मनुख आ जानवरमे की अन्तर रहतै? जइ समाजमे मनुख जानवरक जिनगी जीबए ओइ समाजक प्रबुद्ध लोककेँ चुरुक भरि पानिमे डुमि कऽ नै मरि जेबाक चाहिऐन..? एते बात मनमे अबिते सुबुध तँइ केलैन, जे सभसँ पहिने काल्हि स्कूलमे तियागपत्र देब। आइ धरि जे जिनगी जीलौं, जीलौं। मुदा काल्हिसँ नव जिनगीक सूत्रपात करब। ..अही संकल्प-विकल्पक बीच सुबुधक मन घुरियाइत रहलैन। भोर होइते सुबुध ओछाइनपर सँ उठि मैदान दिस विदा भेला। हाथमे लोटा मुदा मन ओही विचारमे डुमल छेलैन। थोड़े दूर गेलापर गाममे गल्ल-गुल होइत सुनलैन। रस्तेपर ठाढ़ भऽ अकानए लगला जे कथीक गल्ल-गुल भऽ रहल अछि। सोझमे केकरो नै देखैथ जे पुछियो लैतैथ। मने-मन अनुमान करए लगला जे भरिसक रातिमे केतौ कोनो घटना घटि गेल। या तँ केकरो साँप-ताँप काटि लेलकै वा केतौ चोरि भऽ गेल। मुदा से सभ नहि छेलइ। साँझमे जे विचार रमाकान्त व्यक्त केलैन ओ राता-राती बिहाड़ि जकाँ सगरे गाम पसैर गेल। रस्तेसँ घुमि सुबुध कड़चीक दतमैन तोड़ि दाँत मजैत घरपर एला। घरपर अबिते देखलैन जे सुकना बैसल अछि। मुदा सुकनाक नजैर सुबुधपर नै पड़ल, किएक तँ ओ अँगनाक दुआरि दिस तकैत रहए। सुबुध सुकनाकेँ पुछलखिन- “भोरे-भोर केमहर सुकन?” सुबुधक बात सुनि अकचकाइत सुकन चौकीपर सँ उठि, दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “मालिक, अहाँ तँ जनिते छी जे कोनो काज-उदममे सभ तूर मिलि सम्हारि दइ छी। गरीबोपर नजैर रखबै।” सुबुधकेँ सुकनक बातक कोनो अर्थे ने लगलैन। पुछलखिन- “सुकन भाय, तोहर बात हम नइ बुझलियह” “लोक सभ कहलकहेँ जे रमाकान्त काका अपन सभ खेत गरीब-गुरबाकेँ देथिन, जे अहीं बँटबै...।” सुकनक बात सुनि सुबुध मने-मन सोचए लगला जे जमीन-जयदादक सवाल अछि। धड़फड़ा कऽ केना किछु बाजब। जँ आम लोकक बीच विचार कएल जाएत तँ हो-हल्ला हेतइ। हो-हल्ला भेने काजो बिगैड़ सकैए। तँए असथिरसँ विचार करैक जरूरत अछि। मुदा अखन जँ सुकनकेँ ई बात कहबै तँ दुख हेतइ। तँए आशाक बात कहक चाही। बजला- “सुकन भाय, जखन गरीबक बीच खेतक बँटबारा हएत तँ तोहूँ गरीबे छह। तखन तोरा किएक ने हेतह। अखन जाह।” सुकन विदा भेल। कलक आगूमे ठाढ़ भऽ सुबुधक मनमे उठलैन- अजीव स्थिति भऽ गेल। एक दिस गरीबक सवाल अछि। जँ कनियोँ चूक हएत तँ जिनगी भरि बदनामीक मोटरी माथपर चढ़ि जाएत। तँए इमानदारीक जरूरत अछि। मुदा इमानदारी दिस तकै छी तँ अपनोमे बेइमानी घूसल अछि। परिवारोमे तहिना देखै छी आ समाजोमे तँ ऐछे। गरीबोमे देखै छी, जे मेहनती अछि ओ बहुत किछु कमा कऽ बनाइयो नेने अछि। जेना रहैक घर, पानि पीबैक कल, जीबैले बटाइ खेतीक संग पोसियाँ मालो-जाल खुट्टापर रखने अछि। जखन कि जे आलसी अछि ओकरा सभ कथूक अभावे छइ। तेतबे नहि, जँ हम इमनदारियोसँ विचार रखए चाहब तैयो उलझन होएत, हमहींटा तँ नइ छी आरो लोक रहता। सबहक नेत सबहक प्रति एक्के रंग हेतैन, सेहो बात नइ अछि। जँ कियो मुँह देख मुंगबा बँटता, सेहो भऽ सकैए। ओइठाम जँ हुनका कहबे करबैन तँ हमरे बात मानि लेता सेहो सम्भव नहियेँ अछि। जँ रमाकान्त काका केकरो बेसी दिअ चाहथिन तँ की कहबैन, सम्पैत तँ हुनके छिऐन...। विचारक जंगलमे सुबुध वौआए लगला। दतमैनक घुस्सा कखनो चलैन आ कखनो बन्न भऽ जाइन। एक तँ भरि रातिक जगरना तैपर सँ अमरलत्ती जकाँ ओझरीकेँ सोझराएब असान नइ बुझि पड़ैन, कनियोँ किम्हरो जोर पड़त तँ टन दऽ टुटि जाएत। तँए जँ समाजक मूल रोगकेँ जड़िसँ नहि पकड़ल जाएत तँ सभ गूड़ गोबर भऽ जाएत। ..तैबीच मुनमा डाबामे दूध नेने सुबुधक आँगन जा डाबा रखि, लगमे आबि दुनू हाथ जोड़ि कहलकैन- “भाय, अबलोपर दया करबै।” एक तँ सुबुधक मन अपने घोर-घोर भेल रहैन, तैपर सँ लोकक पैरबी आरो घोर कऽ देलकैन। मन मसोसि कऽ बजला- “अखन जाह। जखन जमीनक बँटबारा हुअ लगतै तँ तोरो बजा लेबह।” दतमैन करि मुँह-हाथ धोइ कऽ सुबुध आँगन जा पत्नीकेँ पुछलखिन- “डाबामे मुनमा कथी नेने आएल छल?” “दूध।” “दाम देलिऐ।” “नहि।” “किएक?” “हमरा भेल जे अहीं पठेलौं।” पत्नीक जवाब सुनि सुबुधक मनमे आगि लगि गेलैन। खिसियाइत बजला- “झब-दे चाह बनाउ। स्कूल जाएब।” पत्नी- “अखने किए जाएब? आन दिन खा कऽ जाइ छेलौं आ आइ भोरे जाएब?” “रौतुका खेलहा ओहिना कण्ठ लग अछि तँए नै खाएब।” कहि सुबुध लुंगी बदैल धोती पहिरए लगला आकि पत्नी चाह नेने एलखिन। कुरता पहिर चाह पीब विदा भेला। जिनगी भरिमे रमाकान्तकेँ एहेन नीन कहियो नइ भेल छेलैन जेहेन रातिमे भेलैन। समैक अन्दाजसँ जुगेसर आबि खिड़की देने हुलकी देलक तँ देखलक जे रमाकान्त ठर्र पाड़ै छैथ। रमाकान्तकेँ सूतल देख जुगेसर जोरसँ केबाड़ ढकढकौलक। केबाड़क अवाज सुनि रमाकान्त आँखि मिड़ैत उठला। जुगेसर रमाकान्तकेँ उठा चाह आनए आँगन गेल। रमाकान्तो उठि कऽ कलपर जा कुरुर केलैन। ताबे जुगेसरो चाह नेने आबि गेल। रमाकान्त चाह पीबते रहैथ, तखने मनमे एलैन जे बाबा चाणक्य ठीके कहने छथिन जे ‘धन केकरा-ले रक्खी।’ हमरो तँ पितेजीक अरजल छी। जाधैर ओ जीबै छला, हमरा कोनो मतलब नै छल। मुदा हुनका मुइने तँ सभटा हमरे भेल। दुनू बेटा तेते कमाइए जे ऐ धनक ओकरा जरूरते ने छइ। हम केते दिन जीबे करब। तहन तँ सभ धन ओहिना नष्ट भऽ जाएत। कौआ-कुकुर लूझि-लूझि खाएत। तइसँ नीक जे समाजक गरीब-गुरबाकेँ दऽ दिऐ। जहिना तिब्बतक 8म-9म शताब्दीक राजकुमार चेन्पो अपन सभ सम्पैत लोकक बीच बाँटि देलखिन तहिना हमहूँ बाँटि देब। ऐसँ समाजमे भाए-भैयारीक सम्बन्ध सेहो मजगूत बनत। आइ जँ व्यास बाबा जीबैत रहितैथ तँ ओ जरूर बिना कहनौं आबि कऽ असिरवाद दैतैथ। अगर स्वर्ग जाइक रस्ता तियागो होइए तँ हमहूँ किएक ने जाएब। धैनवाद सुबुध आ हीरानन्द मास्टर साहैबकेँ दिऐन जे हमर अज्ञानताक केबाड़ खोललैन। बेटा-पुतोहु सभ जखन सुनत तँ मने-मन खूब खुशी हएत। की हमर कएल धरम ओकरा नै हेतइ? चाह पीब, पान खा लोटा लऽ रमाकान्त गाछी दिस विदा भेला। कृष्णभोग आमक गाछ तर लोटा रखि, टहैल-टहैल गाछ सभकेँ निंगहारि-निंगहारि देखए लगला। गाछक जे रूप आइ रमाकान्त देख रहल छैथ ओ रूप आइसँ पहिने कहियो ने देखने छला। गाछ देख बुझि पड़ैन जे पत्ता-पत्ता हँसि रहल अछि। धरतीक शक्ति पाबि ऐश्वर्यवान बनल अछि। दोसराक सेवा-ले उत्साहित अछि…। एक टकसँ गाछक रूप देख रमाकान्तक हृदए गदगद भऽ गेलैन। लोटा उठा पैखाना दिस बढ़ला। तैबीच जय-जयकारक अवाज सुनलैन। अवाज दूरमे रहै तँए स्पष्ट तँ नहि मुदा सुनै जरूर छला। रसे-रसे अवाज लग अबैत गेलैन। पैखानासँ उठि अवाजकेँ अकानए लगला। जय-जयकारक संग अपनो नाओं सुनाइ छेलैन। अपन नाओं सुनि आरो चौकन्ना भऽ कानक पाछूमे हाथक तरहत्थी रखि अकानए लगला। लोकक समूह जेते लग अबैत जाइत तेते अवाज स्पष्ट भेल जाइत। हाँइ-हाँइ कऽ लोटा नेने पोखैरक घाटपर आबि कुरुर कऽ घर दिस विदा भेला। अपन नाओंक संग जय-जयकार सुनि रमाकान्तक मनमे उठलैन- की बात छिऐ? किएक लोक जय-जयकार कऽ रहल अछि? रमाकान्तक छातीक धुकधुकी तेज हुअ लगलैन, मनमे गुदगुदी लगए लगलैन। उत्साहसँ छाती फुलैत जाइन। जाबे लोकक जुलुस घर लग पहुँचल, तइसँ पहिनहि दरबज्जापर आबि रमाकान्त देखए लगला। हीरानन्द आ शशि शेखर सेहो दलानक आगूमे ठाढ़ भऽ देखै छला। की बुढ़, की जुआन, की बच्चा, सभ एक्के सुरमे। सभ मस्त! सभ उत्साहित! सभ नचैत! सबहक मुहसँ हँसी छिटकैत..! दरबज्जाक आगूमे जुलुस आबि कऽ रूकल। जुलुसक आगूमे पाँच गोरे घोड़ाबला नाच करैत, पाँचो घोड़े जकाँ दौगैत! कखनो हीं-हीं करैत तँ कखनो पाछूसँ चौतालो फेकैत! तइ पाछू डफरा-बौसलीक धून वसन्तक बहार छिड़ियबैत। तइ पाछू लोको सभ नचबो करैत आ जय-जयकारो करैत...। रमाकान्त सेहो अपन उत्साहकेँ रोकि नै सकला। दलानक ओसारसँ उतैर सोझे जुलुसमे सन्हिया नाचए लगला। के छोट, के पैघ, के बुढ़, के जवान, सभ बाढ़िक पानि जकाँ उधियाइत रहए। घर-घरसँ स्त्रीगण सभ सेहो आबि चारूकात पसैर गेल। आँगनसँ श्यामा आबि दरबज्जाक आगूमे ठाढ़ भऽ नाचो देखैथ आ रमाकान्तोपर आँखि गड़ौने छेली। रमाकान्तकेँ नचैत देख मने-मन सोचए लगली जे एना किए भऽ रहल अछि? लोक सभकेँ कोनो चीजक खुशी हेतै तँए नचैए, मुदा हिनका की भेटलैन जे एना बुढ़ाड़ीमे कुदै छैथ? छोट बुधि श्यामाक, तँए बुझबे ने करैथ जे धार जखन समुद्रमे मिलए लगैए तखन दुनूक पानि अहिना नचै छै, किएक तँ एक दिस नदीक पानि जे गतिशील रहल तँ दोसर दिस समुद्रक पानि जे असथिर रहल जइमे सिरिफ लहैर उठै छइ। अखन धरिक जुलुस आ नाच गामक उत्तरबारि टोलसँ आएल। मुदा आब दछिनबारि टोलसँ दोसर जुलुस, मोर-मोरनीक नाचक संग सेहो पहुँचल। दुनू नाचक बीच सौंसे गामक लोक हृदए खोलि कऽ नचैत...। कातमे ठाढ़ भेल हीरानन्द, शशि शेखरकेँ कहलखिन- “अखन जे आनन्द अछि ओ समाजमे सभ दिन केना बनल रहत?” हीरानन्दक प्रश्नक उत्तर शशि शेखरकेँ किछु नै फुरलैन। मुदा प्रश्नक पाछू मन जरूर दौगलैन। ..गम्भीर प्रश्न अछि, तँए धाँइ-दे उत्तरो देब शशि शेखर उचित नइ बुझि चुप्पे रहला। मुदा एते बात जरूर मनमे उठलैन जे जँ सुकर्मक रस्तासँ मनुख उत्साहित भऽ चलैत रहत तँ जरूर एहने आनन्द जिनगी भरि बनल रहतै। जुलुसक बीच रमाकान्त नचैत-नचैत घामे-पसीने तर-बत्तर भऽ गेला। मुदा तैयो मन नचैले उधैकते रहैन। एकटा छौरा जे अखरहो देखने, ओ नचैत-नचैत लगमे आबि रमाकान्तकेँ दुनू हाथे पँजिया कऽ उठा कन्हापर लऽ नाचए लगल। रमाकान्तकेँ उठेने नचैत देख सभ कियो दुनू हाथे थोपड़ी बजबैत जय-जयकार करए लगल। कातमे ठाढ़ भेल हीरानन्दकेँ भेलैन जे कहीं रमाकान्त बाबू खसि-तसि नै पड़ैथ, तँए लफैर कऽ बीचमे जा रमाकान्तकेँ डाँड़ पकैड़ निच्चाँ केलकैन। निच्चाँ उतैरते रमाकान्त दुनू हाथे थोपड़ी बजबैत फेर नाचए लगला। दुनू हाथ उठा कऽ हीरानन्द सभकेँ शान्त होइले कहलखिन। हाथक इशारा देख सभ शान्त भऽ गेल। धोतीक खूटसँ रमाकान्त पसेना पोछि कहए लगलखिन- “अहाँ सबहक बीच कहै छी, जे खेत-पथार आइ धरि हम्मर छल, अखनसँ ओ अहाँ सबहक भऽ गेल।” रमाकान्तक बात सुनि सबहक मुहसँ धानक लाबा जकाँ हँसी भरभरा गेल। जे समाज आर्थिक विपन्नताक चलैत अखन धरि मौलाएल छल ओइमे खुशीक नव फुल फुलाए लगल। सभ कियो हँसी-चौल करैत अपन-अपन घर दिस विदा भेल। घरसँ निकैल सुबुध सोझे अपन डेरा गेला, डेरा पहुँच तियाग-पत्र लिखलैन। मेसबलाकेँ सभ हिसाब फरिछबैत स्कूल आबि प्रधानाध्यापककेँ तियाग-पत्र दैत कहलखिन- “मास्टर साहैब, आइसँ सेवामे सहयोग नै कऽ सकब!” कहि ऑफिससँ निकलए लगला। ऑफिससँ निकलैत देख कुरसीसँ उठि प्रधानाध्यापक बजला- “सुबुध बाबू, कनी सुनि लिअ।” हेडमास्टरक आग्रह सुनि सुबुध रूकि कऽ मुस्कियाइत बजला- “की कहलौं मास्सैब?” हेडमास्टरक छातीक धड़कन तेज भेल जाइ छेलैन तँए बोलीक गति सेहो तेज हुअ लगलैन। बजला- “सुबुध बाबू, अहाँ जल्दीबाजीमे निर्णए कऽ लेलौं। अखनो कहब जे अपन कागत आपस लऽ लिअ।” निशंक आ गम्भीर स्वरमे सुबुध बजला- “मास्सैब, आइ धरि अहाँ सबहक संग रहलौं मुदा आब हम वैरागीक संग जा रहल छी तँए एक्को क्षण एतए अँटकैक इच्छा नइ अछि। एक्को पाइ हमरा दुख नइ भऽ रहल अछि। बेकतीगत जिनगी बना अखन धरि जीलौं मुदा आब समाजिक जिनगी जीबैले जा रहल छी। अपनौसँ आग्रह करब, जे असिरवाद दिअ।” एक दिस सुबुधक मुखमण्डल नव ज्योतिसँ प्रखर होइत रहैन तँ दोसर दिस हेडमास्टरक मुखमण्डल मलिन होइत गेलैन...। सुबुधक तियाग पत्रक समाचार शिक्षकक बीच सेहो पहुँचल। सभ शिक्षक अपना कोठरीसँ उठि हेडमास्टरक चेम्बरमे पहुँचला। दुनू हाथ जोड़ि सुबुध सभकेँ कहलखिन- “भाय लोकैन, आइ धरिक जिनगी संगे-संग बितेलौं, तैबीच जँ किछु अधला भेल हुअए, ओ बिसैर जाएब। आइ धरि किताबी ज्ञानक बीच ओझराएल छेलौं मुदा आब ओइ ज्ञानकेँ बेवहारिक धरतीपर उतारैले जा रहल छी।” जहिना सूर्योदयसँ पूर्व थलकमल उज्जर रहैत मुदा सुरूजक रोशनी पाबि धीरे-धीरे लाल हुअ लगैत तहिना सुबुधक हृदए समाजक प्रखर रोशनीक प्रवेशसँ बदैल गेलैन। तेज गतिए स्कूलक ओसारसँ निच्चाँ उतैर गेला। सुबुधक तेज चालि देख विवेक बाबू सेहो नमहर-नमहर डेग बढ़बैत सुबुध लग आबि कहलखिन- “सुबुध भाय, अहाँ जे किछु केलौं अपन विचारक अनुकूल केलौं। तँए ओइ सम्बन्धमे हमरा किछु नै कहक अछि। किएक तँ जहिया स्कूलमे नोकरी शुरू केलौं आ जेते बुझै छेलिऐ, ओइसँ बेसी आइ जरूर बुझै छी, तँए ओइ दिन ओइ दिनक विचारक अनुरूप केलौं आ आइ औझुका विचारक अनुकूल कऽ रहल छी। मुदा हमर अहाँक सम्बन्ध सिरिफ शिक्षकेक नइ अछि बल्कि विद्यार्थीक सेहो अछि।” सुबुध आ विवेक हाइये स्कूलसँ संगी। हाइ स्कूलसँ कौलेज धरि दुनू संगे-संग पढ़ने। मुदा विवेकसँ सुबुध तीन दिनक जेठ छैथ। जे बात सुबुधोकेँ आ विवेकोकेँ बुझल छैन। स्कूलोमे आ कौलेजोमे सुबुध विवेकसँ नीक विद्यार्थी रहला। विवेकसँ अधिक नम्बरो परीक्षामे सुबुधकेँ अबैत रहैन। ओना, दुनू गोरे एक्के डिवीजनसँ पास करै छला मुदा अंकमे किछु तरपट रहै छल। विवेक सुबुधकेँ सीनियर बुझै छैथ। जेकर उदाहरण अछि जे जइ दिन दुनू गोरेक बहाली स्कूलमे भेल, ओइ दिन सभ कागजात विवेकक अगुआएल रहितो स्वेच्छासँ विवेक सुबुधकेँ तीन नम्बर शिक्षक आ अपनाकेँ चारि नम्बर शिक्षक-ले हेडमास्टरकेँ कहने रहथिन। जेकरा चलैत सुबुधक बहालीक चिट्ठीक समए बदैल हेडमास्टर रजिस्टर मेनटेन केने छेलैन। विवेकक प्रति सुबुधक हृदैमे वएह सिनेह छैन। सुबुधक संगे विवेक अपना डेरा एला। डेरामे अबिते विवेकक पत्नी चाह बना, दुनू गोरेक आगूमे दऽ बैठकखानासँ निकैल खिड़की लग जा ठाढ़ भऽ गेली। एक जिनगीक टुटैत सम्बन्धसँ कँपैत हृदए विवेक बाबूक रहैन तँए थरथराइत स्वरमे पुछलखिन- “एक्को दिन पहिने तँ ई बात नै बाजल छेलौं। अनासुरती एहेन निर्णए केना कऽ लेलिऐ?” मुस्कियाइत सुबुध उत्तर देलखिन- “पहिनेसँ निआर नै छल। ऐबेर जे गाम गेल छेलौं तखन भेल। जहिना देव-असुर मिलि समुद्र मथन केने छला तहिना समाजक मथनक परिस्थिति बनि गेल अछि। जइले हमरो जरूरत समाजकेँ छइ। समाजक पढ़ल-लिखल लोक तँ हमहूँ छी। तँए अपन दायित्व पूरा करैले नोकरी छोड़लौं अछि...। महान जिनगी लेल सेवा जरूरी होइत अछि। जँ नोकरीकेँ सेवा कहल जाए तँ खेतमे काज करैबला बोनिहारकेँ की कहबै? किएक तँ बोइन-मजूरी लेल ओहो काज करैत अछि आ नोकरियो केनिहार। मुदा पेटक लेल तँ कमाएबो जरूरी अछि, जँ से नइ करब तँ खाएब की आ दोसरकेँ खुएबै केना? भूखलकेँ भोजन चाही। चाहे ओ अन्नक भूखल हुअए आकि ज्ञानक। तँए चाहे नोकरी होइ वा आन कोनो उपार्जनक काज; ओइकेँ इमानदारीसँ निमाहैत आगू बढ़ि किछु करब–चाहे ज्ञानक क्षेत्र होइ वा जीवनक खगता- भोजन, वस्त्र, आवास,चिकित्सा, शिक्षा आदि–ओ सेवा होइत। ज्ञानक सेवा ताधैर अपन महत्वक स्थान नहि पबैत जाधैर ओ जीवनसँ जुड़ि कर्मक रूप नै लैत अछि। सिरिफ वैचारिके धरातलसँ होइत तँ मिथिलामे महान-महान विचारक, मनुखक उद्धार-ले रस्ता बतौलैन। मुदा अखनो समाजमे ओहेन मनुख ऐछे जे हजारो बर्ख पूर्वमे छल। हँ! किछु आगुओ बढ़ल, ईहो सत अछि। मुदा जे कियो बौद्धिक, आर्थिक क्षेत्रमे आगू बढ़ला ओ पछुआएलक डेन पकैड़ आगू-मुहेँ घिंचलैन वा पाछू-मुहेँ धकेललैन? जँ बाँहि पकैड़ आगू-मुहेँ घिंचए चाहितैथ तखन एतेक जाति,सम्पद्राय, कर्मकाण्ड पैदा करैक की प्रयोजन? राजसत्ता आ समाजसत्ता- दुनू पछुआएल लोककेँ आरो पाछूए-मुहेँ धकेललक!” एते कहि सुबुध उठि कऽ ठाढ़ होइत फेर बजला- “आब एक्को क्षण ऐठाम नै रूकब। हमर बाट रमाकान्त काका तकैत हेता।” सुबुधकेँ दुनू बाँहि पकैड़ बैसबैत विवेक पत्नीकेँ कहलखिन- “झब-दे थारी साँठू सुबुध भाय जाइले धड़फड़ाइ छैथ।” भोजन कऽ सुबुध विवेकक डेरासँ विदा भऽ गेला। दुनू हाथ जोड़ि विवेक कहलकैन- “हमरोपर धियान रखब।” गामक सीमामे प्रवेश करिते सुबुध घरक सुधि बिसैर गेला। सौंसे गाम परिवारे जकाँ बुझि पड़ए लगलैन। एक टकसँ खेत-पोखैर-गाछी-कलम- खढ़होरि इत्यादि देख मने-मन सोचए लगला- जँ ऐ सम्पैतकेँ ढंगसँ आगू बढ़ौल जाए, विकसित ढंगसँ कएल जाए तँ निसचित गामक लोकमे खुशहाली ऐबे करत। अखन धरि जहिना खेत मरनासन्न अछि तहिना पोखैर-झाँखैर सेहो। सभसँ पैघ बात तँ ई अछि जे लोको दबैत-दबैत एते दबि गेल अछि जे सिरिफ मनुखक ढाँचा मात्र रहि गेल अछि। तँए सभमे नव चेतना, नव ढंग आ नव तकनीकक नव औजारक उपयोग आवश्यक अछि। तखने शिशिरक सिकुरल रूप वसन्तक विकसित रूपमे बदैल सकैए...। सोचैत-विचारैत सुबुध राजिन्दरक घर लग पहुँचला। राजिन्दरक घर देख रस्ता छोड़ि रूकि गेला। राजिन्दरकेँ तीनटा घर। अँगनाक एकभागमे टाट लगौने। दछिनबरिया घरमे मालो बन्हैत आ अपनो बैसार बनौने। बैसारमे दूटा चौकी देने। एकटापर अपने सुतैत आ दोसरकेँ पाहुन-परक-ले रखने। सुबुधकेँ देख राजिन्दर चौकीपर सँ उठि, दुनू हाथ जोड़ि बाँहि पकैड़ चौकीपर बैसौलकैन। सुबुधकेँ चौकीपर बैसा घरवालीकेँ दरबज्जेपर सँ कहलखिन- “मास्टर साहैब एला हेन, झब-दे एक लोटा पानि नेने आउ?” पतिक बात सुनि गुलबिया लोटामे पानि नेने आबि ओलती लग ठाढ़ भऽ गेली। मुँह झँपने। ..स्त्रीकेँ ठाढ़ देख राजिन्दर बजला- “हिनका नै चिन्है छिऐन, सुबुध भाय छैथ! मुँह किए झँपने छी?” राजिन्दरक बात सुनि सुबुध मुस्कियाइत बजला- “गाममे रहितो हम अनगौंआँ भऽ गेल छी! जहियासँ नोकरी शुरू केलौं, गाम छुटि गेल! सप्ताहमे एक दिन अबै छी जइसँ गाममे घुमियो-फिर नहि पबै छी तँए नै चिन्है छैथ। मुदा आब गाममे रहै दुआरे नोकरी छोड़ि देलौं। आब चिन्हती।” सुबुधक बात सुनि राजिन्दर स्त्रीकेँ कहलखिन- “सुबुध भाय पैघ लोक छैथ। जखन दुआरपर पएर रखलैन तखन बिना किछु खुऔने-पीऔने केना जाए देबैन। जाउ बाड़ीसँ ओरहाबला चारिटा मकइ बालि तोड़ि ओराहि कऽ नेने आउ।” पतिक बात सुनि गुलबिया मुस्कियाइत विदा भेली। राजिन्दर सुबुधकेँ पुछलकैन- “भाय नोकरी किए छोड़ि देलिऐ?” राजिन्दरक प्रश्नक सही उत्तर देब सुबुध उचित नइ बुझि बजला- “नइ मन लगल। अपनो खेत-पथार अछि आब खेतीए करब।” चारू ओराहल बालि आ नून-मेरचाइ थारीमे नेने गुलबिया आबि सुबुधक आगूमे रखि अपने निच्चाँमे बैस गेली। मकैक ओरहा देख सुबुध तिरपित भऽ एकटा बालि हाथमे लऽ गौरसँ दाना देखए लगला। सुभर बालि। एक्कोटा दाना भौर नहि। बालिकेँ देख सुबुध बजला- “बड़ सुन्नर मकइ अछि! अपना ऐठामक गिरहत तँ उपजैबते ने अछि, जँ उपजौल जाए तँ खूब हेतइ। बेगूसराय, सहरसा आ मुजफ्फरपुर इलाकामे देखै छिऐ जे मकैक उपजासँ गिरहस्त धनिक भऽ गेल अछि। सालो भरि मकैक खेती होइ छइ। जहिना खेती तहिना उपजा। पाँच मन छह मन कट्ठा मकइ उपजैए। खाइयोमे नीक। रोटी, सतुआ, भुजा, ओरहा सभ किछु मकैक बनैए। बदाम आ मकैक सतुआ तँ बुझू जे बिनु दाँतोबला-ले अमृते छी।” वामा हाथमे बालि दहिना हाथक ओंगरीसँ दाना छोड़ा मुँहमे लैत सुबुध पुछलखिन- “राजिन्दर भैया, बाल-बच्चा कएटा अछि?” सुबुधक प्रश्न सुनि राजिन्दर चुप्पे रहला मुदा गुलबिया बजली- “तीन भाए-बहिन अछि। जेठकी सासुर बसैए। बड़ बढ़ियाँ गुजर चलै छइ। दोसरोक बिआह केलौं। मुदा जमाए वौर गेल। दिल्लीमे नोकरी करैत रहै, ओतैसँ वौरल, ने एक्कोटा चिट्ठी-पुरजी पठबै आ ने रूपैआ-पैसा। छह मास बेटीकेँ सासुरमे रहए देलिऐ, तेकर बाद अपने ऐठाम लऽ अनलिऐ। दिल्लीसँ जे कोइ आबै आ पुछिऐ तँ कोइ कहए दोसर बिआह कऽ लेलक, तँ कोइ कहए अरब चलि गेल। कोइ कहए मलेटरीमे भरती भऽ गेल तँ कोइ कहए उग्रवादी भऽ गेल। कोनो भाँजे ने लगल। आखिरिमे चारि बरिस अपना ऐठीम बेटीकेँ रखलौं। मुदा गामोमे तेहेन लुच्चा-लम्पट सभ अछि जे अनका इज्जतकेँ कोनो इज्जत बुझैए।” हाथक इशारा सँ देखबैत- “उ घर देखै छिऐ, ओइ अँगनाक एकटा छौरा कहियो माछ कीनि कऽ नेने आबए तँ कहियो फोटो खिंचबैले संगे लऽ लऽ जाइ। हम दुनू परानी बाध-बोनमे भरि-भरि दिन रहै छेलौं। गाम परहक खेल-बेल बुझबे ने करै छेलिऐ। जखन गामक लोक कुट्टी-चौल करए लगल तखन बुझलिऐ। ..जेठकी बेटी आएल रहए। ओकरा कहलिऐ। ओ अपने संगे नेने गेलइ। दोसर बिआह ऐ दुआरे नै करिऐ जे जँ कहीं जमाए जीबते हुअए। पछाइत जेठके जमाए-सँ बिआह कऽ लेलक। दुनू बहिन एक्के घरमे रहैए। दुनूकेँ सखा-पात सेहो छइ। छोट बेटा अछि। ओकरो बिआह-दुरागमन कऽ देलिऐ।” मुस्कियाइत सुबुध पुछलखिन- “दान-दहेजमे की सभ देलक?” दान-दहेजक नाओं सुनि गुलबिया हँसैत बजली “समैध अपने एला। संगमे लड़कीक माम सेहो रहथिन। दुआरपर अबिते भोला बापक पुछारि केलैन। हम नुआँक फाँड़ बान्हि चिपरी पाथैत रही। माथ परहक साड़ी ससैर कऽ गरदैनपर रहए आ दुनू हाथो गोबराएले छल। केना गोबराएल हाथे साड़ी सम्हारितौं। तँए ओहिना चिपड़ी पथिते रहि गेलौं। कोनो की चिन्हैत रहिऐ। ओहो तँ हमरा नहियेँ चिन्हैत रहैथ। अनठिया ओहो आ अनठिया हमहूँ रही। ओहो मनुखे छैथ आ हमहूँ मनुखे छी, तखन बीचमे कथीक लाज?” गुलबियाक बात सुनि दाँत पिसैत राजिन्दर बिच्चेमे कहलखिन- “आबो एक उमेरक भेलौं तैयो समरथाइक ताउ कम्म नै भेल? जे मनमे अबैए बकने जाइ छी..!” राजिन्दरक बातकेँ दबैत गुलबिया बजली- “कोनो की झूठ बात बजै छी जे लाज हएत। मास्टर बौआ की कोनो अनगौंआँ छैथ जे रस्ते-रस्ते ढोल पीटता?” बीच-बचाव करैत सुबुध बजला- “तेकर बाद की भेल?” “ताबे ईहो एला। दुनू गोरेकेँ चौकीपर बैसा गप-सप्प करए लगला। हमरो गोबर सठि गेल। आँगन चलि एलौं। हाथ-पएर धोइ कऽ पछबरिया टाट लग ठाढ़ भऽ गप-सप्प सुनए लगलौं। लड़कीक माम तँ उचक्का जकाँ बुझि पड़ैथ मुदा बाप असथिर। वेचारा बड़ सुन्नर गप बजलैथ। ओ कहलकैन जे देखू अहाँक बेटा छी आ हम्मर बेटी। दुनियाँमे जेते लोक अछि ओ अपने बेटा-बेटी-ले सभ किछु करैए। जहिना अहाँ छी तहिना तँ हमहूँ छी। जहिना अपन नून-रोटीमे अहूँ गुजर करै छी तहिना हमहूँ करै छी। कौआसँ खैर लूटाएब मुरुखपना हएत। हमरे एकटा पितियौत सार अपन बेटाक बिआह केलक। एक लाख रूपैआ नगद नेने रहइ। तेते लाम-झामसँ काज केलक जे अपनो जे बैंकमे साठि हजार रूपैआ रहै सेहो सठि गेलइ। हम ओहेन काज नइ करब। बेटी-जमाएकेँ एकटा चापाकल गड़ा देबइ, दू कोठरीक मकान बना देबइ आ एक जोड़ा गाए ली वा महींस, से देब। तैसंग दुनू गोरेकेँ लत्ता-कपड़ा, बरतन-बासन, लकड़ीक सभ आवश्यक सामानक संग बिआहक खरच करब। अहाँकेँ ऐ दुआरे नै खरच कराएब जे जे खरच भऽ जेतै ओ तँ ओही दुनूक जेतै किने। ..हमरा पसिन भऽ गेल। मन कछ-मछ करए लगल जे सूहकारि ली। मुदा पुरुखक बीच गप चलैत रहइ। मनमे ईहो हुअए जे जँ कहीं कोनो बाते दुनू गोरेमे रक्का-टोकी भऽ जेतैन तखन तँ कुटुमैतियो नइ हएत। तँए मन कछ-मछ करए लगल। एक बेर खोंखी केलौं जे ओ अपने अबैथ मुदा से नै भेल। तखन दुनू हाथे थोपड़ी बजेलौं। तैयो सएह। आब की करितौं। काज पसिनगर अछि मुदा जँ कहीं कोनो बाधा उपस्थित भऽ गेल तखन तँ सभ नाश भऽ जाएत। पछाइत मुँह उघारनहि हम दुआरपर गेलौं। आगूमे ठाढ़ भऽ हिनका कहलयैन- “भैया! बड़ सुन्नर बात समैध कहै छथुन, भोलाक बिआह कऽ लएह।” ..कहि चोट्टे घुमि कऽ आँगन आबि शरबत बनेलौं। अपनेसँ जा कऽ तीनू गोरेकेँ देलिऐन। कुटमैती पक्का भऽ गेल। ऐगले लगनमे बिआहो भेल।” तैबीच चारू बाइलो सुबुध खा लेलैन आ गपो-सप्प सम्पन्न भेल। पानि पीब घर दिसक रस्ता पकड़लैन। थोड़े दूर आगू बढ़लापर सुबुधक मनमे उठलैन- घरपर जाइ आकि रमाकान्त काका ऐठाम? दुबट्टी लग ठाढ़ भऽ सुबुध गुनधुन करए लगला। एक मन होनि जे भरि दिनक थाकल छी, कनी अराम करब जरूरी अछि। तँए घरेपर जाएब नीक। दोसर मन होनि जे ऐ जुआनीमे जँ अराम करब तँ जिनगी छूटत। गुनधुनमे पड़ल सुबुधक मनमे एलैन- नोकरी छोड़ैक समाचार घर पहुँचेनाइ जरूरी अछि। तत्-मत् करैत रमाकान्त घर दिसक रस्ता छोड़ि मलहटोलीबला एकपेड़िया पकैड़ घर दिस बढ़ला। घर लग अबिते सभ किछु बदलल-बदलल बुझि पड़लैन। जेना सभ किछु खुशीसँ मस्त हुअए। दरबज्जाक चुहचुही सेहो नीक बुझि पड़लैन। दुआरपर आबि कुरता खोलि चौकीपर रखि पत्नीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “कनी एक लोटा पानि नेने आउ, बड़ पियास लगल अछि।” पतिक अवाज सुनि किशोरी लोटामे पानि नेने एली। हाथसँ लोटा लऽ लोटो भरि पानि पीब सुबुध बजला- “आइसँ नोकरी छोड़ि देलौं, विद्यालयमे तियागपत्र दऽ देलौं।” पतिक बात सुनि किशोरी चौंक गेली। मुदा पति-पत्नीक बीच मजाको चलिते अछि। किशोरीकेँ सोलहन्नी बिसबास नहि भेलैन। मुस्कियाइत बजली- “नीक केलौं। आठ दिनपर जे भेँट होइ छेलौं से दिन-राति भेँट होइत रहब। हमरो नीके।” किशोरीक बात सुनि सुबुधक मनमे भेलैन जे भरिसक मजाक बुझलैन। दोहरबैत बजला- “अहाँ मजाक बुझै छी। सत बात कहलौं।” जेबीसँ तियागपत्रक नकल निकालि कऽ देखबैत कहलखिन- “हे देखियौ कागत!” तैबीच मंगल सेहो आएल। मंगलकेँ देख किशोरी ससैर गेली। मुस्कियाइत सुबुध मंगलकेँ कहलखिन- “काका, नौकरी छोड़ि देलौं। आब गाममे रहि खेतियो-पथारी करब आ जहाँ धरि भऽ सकत समाजक सेवा सेहो करब।” सुबुधक बात सुनि मंगल कहलकैन- “बौआ, हम तँ उमेरेमे ने अहाँसँ जेठ छी मुदा अहाँ पढ़लो-लिखल छी मास्टरियो करै छी तँए नीके जानि कऽ ने नोकरी छोड़ने हएब।” मंगलक बात सुनि सुबुधक मनमे सवुर भेलैन। मुस्कियाइत बजला- “काका जाधैर पढ़ल-लिखल लोक समाजमे रहि समाजक क्रिया-कलापकेँ आगू-मुहेँ नै धकलत ताधैर समाज आगू केना बढ़त।” सुबुध आ मंगल गप-सप्प करिते छला कि किशोरी आँगनमे अर्ड़ाहैट मारि कानए लगली। सुबुध बुझि गेला तँए असथिरसँ बैसले रहला। मुदा अकलबेराक कानब सुनि टोलक जनिजाति दौग-दौग आबए लगली। सौंसे आँगन जनिजातिसँ भरि गेल। ..नवानीवाली किशोरीकेँ पुछलखिन- “कनियाँ की भेल जे एना अकलबेरामे कानै छी?” मुदा किछु उत्तर नै दऽ किशोरी आरो जोर-जोरसँ कानए लगली। टोलक जेते बहिना, फुल, पान, गुलाब, कदम, चान, पार्टनर किशोरीक छेलैन सभ कियो एक्केटा प्रश्न पुछैत रहलैन- “की भेल?” मुदा जेते संगी-साथी सभ किशोरीसँ पुछै छेलैन तेते किशोरी जोर-जोरसँ कानै छेली। केकरो कोनो अर्थे नै लगैत। मुदा अनुमानक बजार तेज भेल जाइ छल। कियो किछु बुझैत तँ कियो किछु। दरबज्जापर बैसल-बैसल सुबुध मने-मन खुशी होइत रहैथ। मनमे होनि जाधैर पुरना चालि-ढालिक लोकक–चाहे मरद हुअए वा स्त्रीगण–चालि नहि बदलत ताधैर नव समाज केना बनि सकैए? ई प्रश्न तँ सिरिफ समाजे-ले नै परिवारो-ले अछि, आ परिवारे किए,मनुखो-ले ऐछे। तँए सुबुध किछु बजबे ने करैथ। अकलबेराक समए रहबे करए। बाध दिससँ गाए, महींस, बकरी चरि-चरि अबैत रहए। घसबहिनी घासऽ पथिया नेने अबै छेली आ गोबर बीछनिहारि सभ गोबरक छितनी माथपर नेने अबै छेली...। बुधनी आ सोमनी, घासऽ छिट्टा माथपर नेने जखन सुबुधक घर सिके एली कि सुबुधक अँगनामे कानब सुनली। दुनू गोरे अकाइन कऽ बुझलैन जे सुबुधक पत्नी कानै छथिन। सोमनी बुधनीकेँ कहलक- “बहिन, छिट्टा रखि कऽ चल देखैले।” तैपर बुधनी बजली- “गै बहिन, ऐ चमचिकनी सबहक भभटपन सुनि कऽ की करबीही। भरि दिन चाह-पान घोंटैत रहैए, बुझैए जे एहने दुनियाँ छइ। मरदकेँ किछु हुअए, मौगी सभ रानी छी। जाबे एतए बरदेमे ताबे गामेपर चलि जेमे। घास-भूसा झाड़ब, जरना-काठी ओरियाएब। थैर खर्ड़ब, बासन-कुसन धुअब आकि ऐ भभटपनवालीक भभटपन सुनब। चल।” सोमनी मुड़ी डोलबैत बाजल- “बेस कहलेँ बहिन, जेकरा जेते सुख होइ छै ओ ओते कनैए। अपने सभ नीक छी जे कमाइ छी खाइ छी आ चैनसँ रहै छी। ऐ ललमुहीं सबहक किरदानी सुनबीही तँ हेतौ जे मुहेँपर थुकि दिऐ।” ◌ शब्द संख्या : 4580 10. भरि दिन सुबुधक मनमे यएह खुटखुटी धेने रहलैन जे जइ गामक लोकमे एते उत्साह बढ़ल अछि, ओइ गाममे जँ बिहाड़िक पूर्व हवा खसै तँ लोकक मनमे अनदेसो बढ़ि सकैए। समाज छिऐ, के की बाजत, नै बाजत तेकर कोन ठेकान। कियो सोचि सकैए जे जेते विचारक सभ अछि ओ पाइ-कौड़ीक भाँजमे कहीं टौहकी ने तँ लगबैए। मुदा लोकक धाराकेँ रोकलासँ खतरो उपस्थित भऽ सकैए। जहिना अधिक रफ्तारसँ चलैत गाड़ीमे एकाएक ब्रेक लगौलासँ दुर्घटनो भऽ सकैए तहिना काजमे ढील-ढाल भेलापर भऽ सकैए। ओना, भरि दिन तँ अपने चक्करमे फँसल रहलौं, से के बूझत। गामक लोक तँ गामक काजे भेलासँ बुझता...। अचताइत-पचताइत सुबुध रमाकान्त ऐठाम विदा भेला। मुन्हारि साँझ भऽ गेल छेलइ। थोड़े दूर आगू बढ़लापर रस्ताक पछबारि भाग, सुरतिया घरक आगूमे पान-सात गोरे बैस गप-सप्प करैत रहए। “खेतक बँटबाराक ढोल तँ रमाकान्त काका पीटि देलखिन मुदा बँटै कहाँ छथिन! धनक लोभ केकरा नइ छइ। ओ थोड़े खेत बँटथिन! ई सभटा धनिक लोकक चालबाजी छिऐ।” “लोक थोड़े नीक-अधलाक विचार करैए, जे सुनलक ओ कौआ जकाँ कौंउ-कौंउ करैत सगरे गाम बिलैह दइए। मुदा तइसँ की,अगर जँ ओ खेत नहियेँ बँटथिन तँ की लोक मरि जाएत!” “जे अपने ठकि-फुसिया कऽ एते धन जमा केलक ओ सुहरदे मुहेँ लोककेँ जमीन दऽ देतइ! तखन तँ गरीबक कपारेमे जे दुख लिखल छै ओ तँ ओकरा भोगै पड़तै। केहेन निरलज्ज जकाँ रमाकान्त नाचि-नाचि लोककेँ कहलकै..!” रस्तापर ठाढ़ भऽ सुबुध सुनैत रहला। सुनला पछाइत सुबुधक मनमे जेना आगि लगि गेलैन। मुदा मनमे उठलैन, भरि दिन तँ हमहूँ अनतए छेलौं, गाममे किछु भऽ ने तँ गेल..! बिना किछु बजने सुबुध आगू बढ़ि गेला। रमाकान्त ऐठाम पहुँचला। सुबुधकेँ देखते हीरानन्द बजला- “जिनकर चरचा करै छेलौं ओ आबिए गेला।” रमाकान्त सुबुधकेँ कहलखिन- “केता बेर तोरासँ गप करैक मन भेल मुदा तोँ तँ भरि दिन निपत्ते रहलह। केतौ गेल छेलह की?” रमाकान्तक बात सुनि सुबुध बजला- “भरि दिन एते व्यस्त रहलौं जे अखन फुरसत भेल। घरसँ बहार धरि परेशान-परेशान दिन भरि होइते रहलौं।” रमाकान्त- “की परेशान?” “काल्हि रातिमे जखन ओछाइनपर गेलौं तँ अहाँक कहलाहा बात मन पड़ल। मन पड़िते पेटमे घुरियाए लगल। बड़ी काल धरि सोचैत-विचारैत रहलौं। नीनो ने हुअए। अन्तमे यएह मनमे आएल जे जहिना अहाँ अपन सभ सम्पैत समाजकेँ देलिऐन तहिना हमहूँ नोकरी छोड़ि देहसँ समाजक सेवा करब। जहिना गाड़ी इंजिनक बले चलैए तहिना तँ समाजोमे इंजिनक जरूरत अछि। तैबीच एकटा इतिहासक घटना मन पड़ल।” ‘इतिहासक घटना’ सुनिते उत्सुकतासँ हीरानन्द सुबुधकेँ पुछि देलखिन- “कोन घटना मन पड़ल?” सुबुध- “तिब्बतमे एकटा राजकुमार चेनपो नामक भेला। ओ अपना राज्यमे धनीक-गरीबक बीच खाधि देखलैन। ओइ खाधिकेँ पाटैले अपन सभ सम्पैत प्रजाक बीच बाँटि देलखिन। मुदा किछुए दिनक उपरान्त फेर ओहिना-क-ओहिना भऽ गेल। माने धनिक धनिक बनि गेल आ गरीब गरीब! राजकुमार क्षुब्ध भऽ गेला जे एना किए भेल?” खिस्सा सुनि बिच्चेमे शशि शेखर पुछि देलकैन- “एना किएक भेलइ?” “हम समाजशास्त्रक विद्यार्थी छी तँए ऐ बातकेँ जनै छी। जाधैर बेवस्था नहि बदलत ताधैर मनुखक जिनगी नइ सुधरत। तँए हम अपन दायित्व बुझि नोकरी छोड़लौं। गामक गरीबसँ लऽ कऽ अमीर धरि आ बच्चासँ लऽ कऽ बुढ़ धरि, गाम सबहक छिऐ। तँए हम तिब्बत जकाँ हूसल काज नइ करब।” पहिलुके प्रशंसा सुनि रमाकान्तक मन उड़ि गेलैन, राजकुमारक पुरा खिस्सा सुनबो ने केला। मुदा हीरानन्दोक आ शशि शेखरोक धियान ओइ खिस्सामे घुमए लगलैन। तैबीच जुगेसर चाह अनलक। सभ कियो चाह पीबए लगला। चाह पीब रमाकान्त बजला- “देखू, हम अपन सभ खेत समाजकेँ दऽ देलिऐ। आब हमरा कोनो मतलब ओइ खेतसँ नइ अछि। मुदा एकटा बात जरूर कहब जे कोनो तरहक गड़बड़ी समाजमे नै हुअए। सभकेँ खेत होइ।” रमाकान्तक बात सुनि शशि शेखर अपन विचार रखलैन- “गाममे गरीब-लोकक परिवार जेते अछि ओकरा जोड़ि लिअ आ खेतकेँ जोड़ि एक रंग बाँटि दियौ।” शशिक विचार सुनि हीरानन्द नाक मारैत बजला- “उँ-हूँउ।” मुँहपर हाथ नेने सुबुध मने-मन सोचैत रहैथ, कियो एहनो अछि जेकरा घराड़ियो ने छै आ कियो एहनो अछि जेकरा घराड़ीक संग दू कट्ठा धनखेतियो छइ। तहिना केकरो पाँचो कट्ठा छइ। जँ जमा सम्पैतमे एक्के रंग देल जाए तँ सभकेँ एक रंग केना हेतइ। ..ऐ ओझरीमे सुबुध पड़ल छला! हीरानन्द सोचैत रहैथ, गरीबो तँ सभ एक रंग नइ अछि। कियो मेहनती अछि तँ कियो नमरी कोइढ़। कियो निशाँखोर अछि तँ कियो सात्विक। गरीबोक स्थिति तँ विचित्र अछि। लेकिन मूल प्रश्न अछि समाजकेँ ऊपर उठबैक। सभकेँ गुम्म देख रमाकान्त मुँहमे पान लऽ जरदा फँकैत बजला- “एना सभ गुम्म किए छी? हम समाजक दाउ-पेंच तँ नइ बुझै छिऐ मुदा अहाँ सभ तँ पढ़ल-लिखल होशगर छी। तखन कियो किछु किए ने बजै छी?” अपन बुधिक कमजोरी व्यक्त करैत हीरानन्द सुबुधकेँ कहलखिन- “भाय, जे सोचै छी ओ ओझरा जाइए तँए अहीं सोझरबैत किछु कहियौ।” गम्भीर भऽ सुबुध कहए लगलखिन- “अपन समाज बहुत पछुआएल अछि। पछुआएल समाजमे घनेरो समस्या, समाढ़ जकाँ पकड़ने रहैए। जे बिना समाधान केने आगू नै ससरए देत। मुदा समाधानो तँ कागतपर नक्शा बनौने नइ हएत। समस्या लोकक जिनगीकेँ चुरीन जकाँ पकड़ने अछि। जहिना चुरीन लोकेक देहमे घोंसिया अपन करामात करैए तहिना समस्यो अछि। तँए अखन मात्र दूटा सवालकेँ पकड़ू। पहिल, सभकेँ एक रंग खेत होइ आ दोसर, खेतक संग-संग आरो जे पूजी अछि ओकरो उपयोग ढंगसँ हुअए।” सुबुध बजिते रहैथ कि बिच्चेमे जुगेसर टपैक गेल- “मास्सैब, कनी बिकछा कऽ कहियौ। एना जे पौतीमे राखल जिनिस जकाँ झाँपि कऽ कहबै तखन हम सभ केना बुझब?” जुगेसरक बातसँ सुबुधकेँ तकलीफ नहि भेलैन। मुस्कियाइत बजला- “ठीके अहाँ नइ बुझने हएब जुगे। नीक जकाँ बिकछा कऽ कहै छी। देखियौ, सिरिफ खेते रहने उपजा नइ भऽ जाइ छइ। ओकरा उपजबए पड़ै छइ। पहिने तामि-कोरि कऽ तैयार करए पड़ै छइ। बर्खा होइ वा पटा कऽ बीआ पाड़ए पड़ै छइ। बीआ जखन रोपाउ होइ छै तखन उखाड़ि कऽ रोपल जाइ छै, कमठौन कएल जाइ छै इत्यादि। से सभ करत तखन ने उपजा हएत। खेतक संग-संग मेहनत जे होएत सेहो ने पूजी भेल। मेहनत करैले ओजारोक जरूरत होइए। ओजारोक नमहर इतिहास रहल अछि। शुरूमे लोक साधारण औजारसँ काज करै छल। जेना-जेना औजारो उन्नैत करैत गेल तेना-तेना लोकक हालतो सुधरैत गेल। अखन अपन गाम बहुत पछुआएल अछि, तँए नव औजारसँ काज करब सम्भव नहि। नव औजार-ले अधिक पैसोक जरूरत होइत, जे नइ अछि। अखन साधारणे औजारसँ काज चलबए पड़त। जेना-जेना हालत सुधरैत जाएत तेना-तेना औजारो सुधरैत जाएत।” सुबुधक बात सुनि जुगेसर भक-दे निशाँस छोड़ि बाजल- “हँ, आब बुझलौं। सुआइत लोक कहै छै जे पढ़ि-लिख कऽ जँ हरो जोतब तँ सिरौर सोझ हएत..!” हीरानन्द बजला- “बड़ सुन्दर बात कहलिऐ सुबुध भाय। आब खेतक बँटबाराक सम्बन्धमे कहियौ।” कनडेरिए आँखिए हीरानन्दक चेहरा दिस ताकि सुबुध बजला- “हीरा बाबू, गाममे जेते एक बीघा खेतसँ निच्चाँबला गरीब लोक छैथ हुनका सभकेँ एक-एक बीघा खेत भऽ जेतैन। सिरिफ रमाकान्ते काकाबला जमीन नहि, हुनकर अपनो जमीन ओइमे जोड़ा जेतैन। जेना देखियौ, किनको घराड़ियो नै छैन, हुनका बीघा भरि खेत दिअ पड़त। मुदा जिनका पाँच कट्ठा छैन हुनका पनरहे कट्ठा दिअ पड़त। तेतबे नहि, जिनका ओहूसँ बेसी छैन, हुनका आरो कम दिअ पड़त।” सुबुधक बात सुनि रमाकान्त ठहाका मारि बजला- “बड़ सुन्नर, बड़ सुन्नर। बड़ सुन्नर विचार सुबुधक छैन। आब रातियो बेसी भऽ गेल। खाइयो-पीबैक बेर उनैह जाएत। रोटी गरमे-गरम खाइमे नीक होइ छइ, तँए आब गप-सप्प छोड़ू। काल्हि भोरे ढोलहो दिआ सभकेँ बजा लेबैन आ सबहक बीचमे अपन निर्णए सुना खेत बँटैक भार सेहो हुनके सभपर छोड़ि देबैन। नहि तँ अनेरे हो-हल्ला करता।” भोरे ढोलहो पड़ल। एक तँ ओहिना सबहक कान ठाढ़ रहबे करैन, तैपर ढोलहो सुनि घरा-घरी सभ पहुँचला। जहिना केस लड़निहार फैसला सुनैले उत्सुक रहैए तहिना बैसारमे सभ उत्सुक छला। अस्सी बर्खक सोनेलाल बाबा सेहो आएल छैथ। ओना, सोनेलाल बाबाकेँ अपने अढ़ाइ बीघा खेत छैन मुदा गाममे नव उत्सवक उत्साहसँ आएल छैथ। बैसले-बैसल ओ मुड़ी उठा कऽ देख बजला- “कोनो टोलक कियो छुटलो छैथ? सभ अपन-अपन टोलक लोककेँ गनि लिअ।” सोनेलाल बाबाक गप सुनि सभ अपन-अपन टोलक लोककेँ घरा-घरी मिलबए लगल। सिरिफ बौका आ गोसैमा बैसारमे नै आएल छला। दुनू टोलक दू आदमीकेँ पठा ओहू दुनूकेँ बजौल गेलैन। दुनू आदमीकेँ देखते सोनेलाल बाबा पुछि देलखिन- “तोरा दुनू गोरेकेँ ढोल्होक अवाज कानमे नै पहुँचल छेलौ?” बौका बाजल- “ढोलहो तँ बुझलिऐ। मगर नोकरी करै छी ने, ने माए-बाप अछि आ ने बौह, तखन खेत लऽ कऽ की करब। बिआहो होइते ने अछि। लोक ढहलेल बुझैए, तखन अनेरे किए अबितौं?” बौकाक बात सुनि सोनेलाल बाबा मुड़ी डोला स्वीकार केलैन। आब दोसर, गोसैमा बाजल- “हम दुनू परानी तँ बुढ़े भेलौं, बेटा ऐछे नहि। लऽ दऽ कऽ एकटा ढेरबा बेटी अछि। ओकरो बिआह ऐ बेर कइए देबइ। बिआह हेतै, अपन घर जाएत। भोगनिहार के रहत जे अनेरे हम खेत लेब?” गोसैमोक विचार सुनि सोनेलाल बाबा मुड़ी डोला स्वीकार केलैन। दुनू गोरेक बात सुनि सोनेलाल बाबाक मनमे एलैन जे समाजमे दूटा परिवार कमि जाएत। दुनू परिवारकेँ बँचौल तँ नै जा सकैए मुदा जँ दुनूकेँ जोड़ि कऽ एकटा परिवार बनाबी ओ तँ सम्भव ऐछे। बजला- “बौका तँ सिरिफ नामक अछि। केहेन बढ़ियाँ बजैए। गोसैमाक बेटी आन गाम चलि जेतइ। जइसँ बाप-माए–दुनू गोरे–केँ बुढ़ाड़ीमे दुख हेतइ। तँए बौकाक बिआह गोसैमाक बेटीसँ करा देने एक परिवार भऽ जाएत।” सोनेलाल बाबाक विचार सुनि अदहासँ बेसी लोक समर्थन कऽ देलक। मुदा किछु गोरे विरोध करैत बजला- “एक गाममे लड़का-लड़कीक बिआहक चलैन तँ नइ अछि। जँ हएत तँ अनुचित हएत!” धड़फड़ा कऽ उठैत लखना जोरसँ बाजल- “कोन गाम आ कोन समाज एहेन अछि जइमे छौरा-छौरी छह-पाँच नै करैए। चोरा कऽ छह-पाँच केलासँ बड़ बढ़ियाँ मुदा देखा कऽ करत से बड़ अधला हेतइ?” लखनाक विचारक सभ सहमति दऽ देलैन। दुनूक बिआहक बात पक्का भऽ गेल। सुबुधक मनमे फेर एकटा प्रश्न उठि गेलैन जे बौका आ गोसैमाक दुनू परिवारकेँ एक मानि जमीन देल जाए वा दू माइन? ..तर्क-वितर्क करैत, मिला कऽ एक परिवार मानि हिस्सा दैक सहमति बनल। फेर प्रश्न उठल जे जमीनक नाप-जोख के करत? रमाकान्त कहि देलखिन जे अपनेमे अहाँ सभ बाँटि लिअ।” सुबुधोक मनमे भेलैन जे रमाकान्त काका ठीके कहलैन। काजकेँ बाँटि कऽ नै करब तँ गलती हएत। सभ काज जँ अपने करए चाहब तँ एते गोरे जे समाजमे छैथ ओ सभ की करता। जँ कहीं कोनो गलतियो हएत तँ जल्दीए सुधैर जाएत। बजला- “खेत नपैक लूरि केते गोरेकेँ छह। किएक तँ जँ अमीन लऽ कऽ बँटबारा करब तँ बहुत खरच हएत। जे खरच बँटैमे करब ओइ पैसासँ दोसरे काज किए नै कऽ लेब। पैसाक काज तँ बहुत अछि, तँए अन्ट सन्ट खरच नै कऽ सुपत-सुपत खरच करब नीक होएत। देखते छिऐ जे जहिना देशक संविधान ओकीलकेँ सालो भरि हरिअरी देने रहैए तहिना तँ सर्वेओ अमीनकेँ अछि। कौआसँ खैर लूटाएब नीक नहि। जहिना अहाँ सभकेँ मंगनीमे खेत भेट रहल अछि तहिना सही-सलामत हाथमे चलि जाए। जँ अमीन सबहक भाँजमे पड़ब तँ ओहिना हएत जहिना लोक कहै छै ‘जेतेमे बौह नै तेतेमे लहठी..!” सुबुधक बात सुनि, जोशमे बिलटा उठि कऽ ठाढ़ भऽ बाजल- “माघसँ लऽ कऽ जेठ धरि हम सभ खेत तमिया करै छी। से कोनो एक्के साल नहि, सभ साल। सेहो कोनो आइए-सँ नहि जहियासँ ज्ञान-परान भेल तहिए-सँ। कोन अमीन आ कमिश्नर नपैले अबैए। अपन गामक कोन बात जे चरिकोसीमे तमनी करै छी। तेतबे नहि,नेपालो जा-जा तमै छी। तेतबे नहि, साले-साल नपैत-नपैत तँ सौंसे गामक खेत जनै छी जे कोन कोला केतेक अछि। नपैक जरूरतो नइ अछि। मुँहजुआनीए कहि देब जे कोन कोला केते अछि। खाली एक गोरे कागतपर लिखि लिअ जे केकरा केते खेत देबइ। हमरा कहैत जाएब, हम कोला फुटबैत जाएब। एकटा पण्डीजी बड़ बढ़ियाँ नाओं कहने रहथिन मुदा मन नइ अछि, जे ओ तीनियेँ डेगमे दुनियाकेँ नापि नेने रहैथ। तहिना हमहूँ तीन डेगक लग्गी बना, एक गामक कोन बात जे परोपट्टाक जमीन नापि देब।” बिलटाक बात सुनि रमाकान्त बजला- “बड़ बढ़ियाँ, बड़ बढ़ियाँ।” सभ कियो उठि-उठि विदा भेला। बेर झूकिते सौंसे गामक स्त्रीगण, ढेरबा बचिया, छोटका-छोटका ढेन-बकेन चिकनी माटिक खोभार दिस विदा भेल। सबहक हाथमे खुरपी-पथिया..! सभकेँ हाथमे खुरपी पथिया नेने जाइत देख श्रीचन मने-मन सोचए लगल जे एना किए लोक कऽ रहल अछि, दसमियो तँ अखन नै एलै हेन! कोनो पावैनो-तिहार नहियेँ छिऐ! तहन स्त्रीगणमे एना उजैहिया किए उठि गेल? कोन बुढ़िया-जादू तरे-तर गाममे पसैर गेल जे मरद बुझबे ने केलक आ मौगी सभ बुझि गेल? अनकर कोन अपनो घरवाली रमकल जाइए..! जेते श्रीचन सोचैत ओते ओझरीए लगल जाइत। तत्-मत् करैत रूदल ऐठाम विदा भेल। घरो लगेमे। श्रीचने जकाँ रूदलो छगुन्तामे पड़ल रहए मुदा श्रीचनकेँ देखते पुछि देलकै- “आँइ हौ श्रीचन भाय, मौगी सभकेँ कथीक रमकी चढ़लै जे एते रौदमे माटि आनैले जाइ जाइए?” रूदलक बात सुनि श्रीचन आरो छगुन्तामे पड़ि गेल। मनमे एलै जे हम गामपर नै छेलौं तँए नइ बुझलिऐ। मगर ई तँ गामेपर रहए। किए ने बुझलक? फेर सोचलक जे जखन घरवाली माटि लऽ कऽ औत तँ पुछि लेबइ। मन असथिर भेलइ। मुदा रूदलक मुँहक रंगसँ बुझि पड़ै जे केते भारी काज स्त्री बिना पुछिनहि कऽ लेलकै..! भीतरसँ खुश मुदा ऊपरसँ गम्भीर होइत श्रीचन रूदलकेँ कहलक- “आँइ हौ रूदल भाय, तोरा भनसियासँ मिलान नै रहै छह जे बिन पुछनहि चलि गेलखुन?” श्रीचनक मनक बात नइ बुझि खिसिया कऽ रूदल बाजल- “की कहियह भाय, मौगीपर बिसबास नइ करी। जखन अपन काज रहतै तँ हँसि-हँसि बजतह मुदा जखन तोरा कोनो काज हेतह तँ कहतह जे माथ दुखाइए!” मुँह दाबि श्रीचन मने-मन खूब हँसैत मुदा रूदल तामसे भेर भेल जाइत। विदा होइत श्रीचन बाजल- “जाइ छिअ भाय। मौगी सबहक किरदानी देख हमरा किछु फुरबे ने करैए।” सह पाबि रूदल गरैज उठल- “बड़ बुधियार मौगी सभ भऽ गेल। जब एतेक बुधियार अछि तँ चलए तँ हमरा संगे कोदारि पाड़ैले, तखन बुझबै!” थोड़े दूर आगू बढ़ि श्रीचन रूकि कऽ बाजल- “भाय की करबहक, आब मौगीए सबहक राज भेलइ।” “हमरा कोन राज-पाटसँ मतलब अछि, हर जोतै छी, कोदारि पाड़ै छी, तीन सेर कमा कऽ अनै छी, खाइ छी। एते दिन पुरुखे चोर होइ छेलए, मुदा आब मौगियो चोरनी हएत। भने जहल जाएत आ पुलिसबासँ यारी लगौत!” श्रीचन बढ़ि गेल मुदा रूदल अपन दुनू हाथ माथपर लेने सोचिते रहल। सभ कियो माटि आनि-आनि अपन-अपन अँगनाक माटिक ढेरीपर रखलैन। घामे-पसीने सभ जनानी तर-बत्तर। कनी काल सुसतेला पछाइत दिआरी बनबैले मुंगरी, लोढ़ीसँ माटि फोड़ए लगल। मेहीसँ माटि फोड़ि, इनार-कलसँ अछींजल भरि-भरि आनि माटिमे दऽ सानए लगल, सूखल माटिमे पानि पड़िते सोन्हगर सुगन्ध सौंसे गाममे पसैर गेल। गामक हवे बदैल गेल। जहिना साँझू पहरमे सिंगहार-रातिरानी फूलसँ वातावरण महमहा उठैत तहिना माटि-पानिसँ जन्मल सुगन्ध गामकेँ महमहा देलक। माटि सानि, छोट-छोट दिआरी सभ बनबए लगल। दिआरी बना, पुरान साफ सूती वस्त्रकेँ फाड़ि-फाड़ि दहिना हाथक तरहत्थीसँ जाँघपर रगैड़-रगैड़ टेमी बनौलक। टेमी बना दिआरीमे करुतेल दऽ टेमी सजौलक। दिआरी सजा कियो फुलडालीमे तँ कियो चङेरीमे, तँ कियो छिपलीमे, तँ कियो केरा पातपर रखलक। दिआरी रखि सभ नहाएल, अजीव दृश्य! नव उत्सव! नव जिज्ञासा! नव आशा सबहक मनमे। सुरूज डुमबो नै कएल मुदा निच्चाँ जरूर उतैर गेल छल, गाछो सभ परहक रौद बिला गेल छल, सभ अपन-अपन गोसाँइ घर जा सिरा आगूमे दिआरी नेसलक, दिआरी नेस एकटँगा दऽ आराधना करए लगल जे आएल लक्ष्मी पुनः पड़ाए नहि। गोसाँइकेँ गोड़ लागि सभ गामक देव स्थान दिस विदा भेल। अपन-अपन आँगनमे तँ सभ असगरे-असगर छल मुदा आँगनसँ निकैलते, माने देवस्थान दिस विदा होइते, संगबे सभ भेटए लगलै। संगबे मिलते सभ कियो जइ स्थान दिस जाइत रहए ओइ देवताक गीत गाबए लगल। सौंसे गामक सभ रस्तामे एक नहि अनेक समूह गीत गबैत मगनसँ देवस्थान पहुँचै गेल। सबहक मनमे जमीनक खुशी तँए सभ देवतोकेँ मुस्कियाइत देखैत। सबहक मनमे नचैत जे एकसँ एक्कैस हुअए...। खेत पाबि गामक सभ गरीब-गुरबाक मनमे दिआरीक इजोत जकाँ आशाक दीप बरए लगलैन। हजारो बर्खसँ पछुआएल गरीबीमे एकाएक आड़ि पड़ि गेल। सभ कियो नव-नव योजना मनमे बनबए लगला। जइसँ जिनगी दुखक बेड़ीकेँ टपि सुखक सीमामे पएर रखलक। नव जिनगी जीबैक उत्कंठा सबहक मनमे जागि गेल। ◌ शब्द संख्या : 2478 11. खेत भेटलासँ भजुआ-परिवारक सभ समांगक विचारो बदलल। नबो बापूत बैस विचार करैत रहए जे जहिना रमाकान्त काका हमरा सभकेँ रखि लेलैन तहिना हमहूँ सभ समाजक एक अंग बनि कऽ रहब। सभसँ पहिने रमाकान्त काका, सुबुध, शशि शेखर आ मास्टर साहैबकेँ अपना ऐठाम भोजन करेबैन। मुदा अखन धरिक जे हमरा सबहक चालि-ढालि रहल अछि, ओकरा तँ अपने बदलए पड़त। अँगना-घर आ दुआर-दरबज्जाक जे छिछा-बिछा अछि से नीक लोकक बैसै-जोकर नइ अछि। सभ दिन अपना सभ एहनेमे रहलौं तँए रहै छी मुदा नीक लोक एहेन जगहमे केना औता। देखिये कऽ मन भटैक जेतैन, तँए पहिने सभ समांग भोरेसँ दुआर-दरबज्जा आ अँगना-घरकेँ चिक्कन-चुनमुन बनाबह। मरदो आ मौगियो जे भदौस जकाँ नुआ-बस्तर बनौने रहै छी, ओकरो बदलह। जखन अपन काज करै छी तखन जँ फटलो-पुरान आ मैलो-कुचैल कपड़ा पहिरै छी तँ बड़ बढ़ियाँ। मुदा जखन किनको नौत दऽ कऽ खाएले बजेबैन तखन एहेन बगए-बानिसँ काज नइ चलत। भजुआक जेठ बेटाक सासुर दरभंगा बेला मोड़पर अछि। जखन ओ सासुर जाइत आ ओइठामक रहल-सहन, बात-विचार देखैत तँ मन जरूर आगू-मुहेँ बढ़ैक कोशिश करै मुदा गामक जे गरीबीक अवस्था छै ओ सभ विचारकेँ दाबि दइ छेलइ। मुदा तैयो दरभंगाक देखल परिवार नजैरमे तँ रहबे करइ। भजुआक जेठ बेटा–झोलिया, सातो भाँइक भैयारीमे सभसँ जेठ अछि। तँए सभ भाँइ झोलियाक बात मानैए। झोलिया बाजल- “सातो भाँइक बीच रमाकान्त बाबा सात बीघा जमीन देलखुन। पाइ तँ एक्कोटा ने लेलखुन। दुनियाँमे केकरा के एना दइ छइ। जँए हुनका मनमे हमरो सबहक प्रति दया एलैन तँए ने। तहिना हमहूँ सभ हुनका ओते पैघ बुझि आदर करबैन। गामेमे भाड़ापर कुरसी, समेना,शतरंजी, जाजीम, सिरमा सभ भेटैए। जहिना बरियाती-ले लोक भोजनसँ लऽ कऽ रहै तकक, सभ बेवस्था करैए तहिना हमहूँ सभ करब।” झोलियाक विचार सुनि छबो भैंयो आ बापो-पित्ती, सभ कियो मुड़ी डोला समर्थन कऽ देलक। झोलिया फेर बाजल- “बाउ, तूँ रमाकान्त बाबा ऐठाम चलि जैहह। हुनका चारू गोरेकेँ नतो दऽ दिहौन आ संगे-संग बजेनौं अबिहौन। दू भाँइ भाड़ापर सभ समान आनि जोगार करिहह। दू समांग बजारसँ खाइक सभ समान कीनि अनिहह। सभ सभ काजमे भोरेसँ लगि जैहह।” दलानपर बैस रमाकान्त आ हीरानन्द चाहो पीबैत रहैथ आ गामेक गपो-सप्प करैत रहैथ। गामक गप-सप्प करैत रमाकान्तक नजैर बौएलाल आ सुमित्रापर गेलैन। गिलास रखि रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहलखिन- “महेन्द्र बौआ कहने रहैथ जे छअ मास सिखा-पढ़ा दुनू गोरेकेँ पठा देब मुदा अखन धरि किएक ने आएल..?” हीरानन्द बजला- “कोनो कारण भेल हेतै तँए ने अखन धरि नै आएल। ओना, चिकित्सा कठिन विद्या छी। सुढ़िआइमे तँ किछु समए लगबे करतै।” दुनू गोरे गप-सप्प करिते रहैथ आकि भजुआ आबि रमाकान्तकेँ गोड़ लगलकैन, रमाकान्तकेँ गोड़ लागि हीरानन्दोकेँ लगलकैन। हीरानन्दकेँ गोड़ लगिते ओ असिरवाद दैत पुछलखिन- “भजू भाय, नीके रहै छह किने?” “हँ मास्टर बौआ! हमरा तँ गामसँ भागैक नौबत आबि गेल छेलए!” रमाकान्त दिस देख- “मुदा, काका नै भागए देलैन।” हलचलाइत रमाकान्त पुछलखिन- “से की, से की?” गाममे बसैक खिस्सा भजुआ कहए लगलैन- “ऐ गाममे पहिने हम्मर जाति नै रहए। मुदा डोमक काज तँ सभ गाममे जन्मसँ मरन धरि रहै छइ। हमरा पुरखाक घर गोनबा रहइ। पूभरसँ कोसी अबैत-अबैत गोनबो लग चलि आएल। अखार चढ़िते कोसी फुलेलै। पहिलुके उझूममे तेहेन बाढ़ि चलि आएल जे बाधक कोन गप जे घरो सभमे पानि ढुकि गेल। तीन दिन तक ने माल-जाल घरसँ बहराएल आ ने लोके। पीह-पाह करैत सभ समए बितौलक। मगर पहिलुका बाढ़ि रहै, तेसरे दिन सटैक गेल। हम्मर बाबा दुइए परानी। ताबे हम्मर बाउ नै जन्मल रहइ। बाढ़िक पानि सटैकते दुनू गोरे दसोटा सुगर आ घरक समान लऽ गामसँ विदा भऽ गेल। जखन गामसँ विदा भेल तँ दादी बाबाकेँ कहलकै, अनतए केतए जाएब। हमरो माए-बाप जीबते अछि, ओतै चलू। बबो मानि गेल। दुनू परानी अही गाम देने जाइत रहइ। गाममे अबिते सुगरकेँ चरैले छोड़ि देलकै आ अपने दुनू परानी सुसतए लगल। ऐ गाममे डोम नै तँए गामक बेदरा-बुदरी सभ सुगर देखैले जमा भऽ गेल। गामोमे हल्ला भऽ गेलइ। गामक बाबू-भैया सभ आबि हमरा बाबाकेँ कहलकै जे अही गाममे रहि जा। हमर बाबा रहि गेल। गामक कातमे एकटा परती रहइ। ओही परतीपर सभ बाबू-भैया एकटा घर बना देलकै। ओइ दिनमे परती नमहर रहइ। मगर चारू भाग जोता खेत रहइ। चारू भागक खेतबला सभ परतीकेँ छाँटि-छाँटि खेतमे पियाबैत गेल। परती छोट होइत गेलइ। रहैत-रहैत घर-अँगना आ खोबहारे भरि रहलै। मगर तैयो दिक्कत नै होइ। हमर बाउओ भैयारीमे असगरे। मुदा हम दू भाँइ भेलौं। जखन दुनू भाँइ भीन भेलौं तँ घराड़ियो बँटा गेल आ गिरहतो। मुदा तैयो गुजरमे दिक्कत नै हुअए। अखन दुनू भाँइक बीच सातटा बेटा अछि। चारिटा हमरा आ तीनटा भाएकेँ। गुजर तँ कमा कऽ सभ कऽ लइए मुदा घरक दुख तँ सभकेँ होइते छइ।” भजुआक खिस्सा सुनि रमाकान्त बजला- “आब तँ बहुत खेत भेलह?” “हँ काका, केते पीढ़ी आनन्दसँ रहब! अखन घर तँ नहि बन्हलौं मुदा खेती केनाइ शुरू कऽ देलिऐ।” बिच्चेमे हीरानन्द पुछलखिन- “सबेरे-सबेरे केमहर चललह, भज्जु भाय?” भजुआ- “रातिमे सभ समांग विचारलक जे जहिना रमाकान्त काका सभकेँ समाजक अंग बना खेत देलैन तहिना हमहूँ सभ हुनका नौत दऽ कऽ खुऐबो करबैन आ धोती पहिरा विदाइयो करबैन। सहए नौत दइले एलौं हेन?” नौतक नाओं सुनिते रमाकान्त कहलखिन- “कहियाक नौत दइ छह? ईहो तीनू गोरे -सुबुध, शशि आ हीरानन्द- जेथुन। हिनको सभकेँ कहि दहुन।” “हँ काका, अहींटा केँ थोड़े लऽ जाएब। हिनको सभकेँ लऽ जेबैन। ऐठाम तँ अहीं दू गोरे छी। शशि भाय आ सुबुध भाय नै छैथ। ताबे अहाँ दुनू गोरे नहाउ-सोनाउ, हम ओहू दुनू गोरेकेँ बजौने अबै छिऐन।” हीरानन्द- “औझुके नौत दइ छह?” “हँ, मास्टर साहैब!” रमाकान्त बजला- “बड़ बढ़ियाँ! शशि तँ पोखैर दिस गेलखुन, अबिते हेथुन। ताबे सुबुधकेँ कहि अबहुन।” भजुआ सुबुध ऐठाम विदा भेल। चाह पीब सुबुध दुनू बच्चाकेँ पढ़बै छला। भजुआकेँ देखते पुछि देलखिन- “भज्जु भाय, केमहर-केमहर?” प्रणाम करैत भजुआ कहलकैन- “भाय, अहीं ऐठाम ऐलौं हेन। रमाकान्तो काकाकेँ कहि देलिऐन आ अहूँकेँ कहैले एलौं हेन।” “की कहैले एलह?” “नौत दइले एलौं।” “कोन काज छिअ?” “काज-ताज नइ कोनो छी। ओहिना अहाँ चारू गोरेकेँ खुअबैक विचार भेल।” भजुआक बात सुनि सुबुधक मनमे द्वन्द्व उत्पन भऽ गेलैन। मनमे प्रश्न उठलैन, भजुओ तँ अही समाजक अंग छी। जहिना शरीरमे नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधला अंग अछि, जइसँ शरीरक क्रिया चलैए तहिना तँ समाजोमे अछि। मुदा शरीर आ समाजकेँ तँ एक नै मानल जाएत। समाजकेँ जाति आ सम्प्रदाय ऐ रूपे पकैड़ नेने अछि जे सभ सभसँ ऊपरो अछि आ निच्चो अछि। एक दिस धर्मक नाओंपर सभ हिन्दू छी मुदा रंग-बिरंगक जाति भीतरमे अछि! एक जाति दोसर जातिक ने छूअल खाइए आ ने कथा-कुटमैती करैए! तेतबे नहि,हिन्दूक जे देवी-देवता छैथ ओहो बँटाएल छैथ! जइ देवी-देवताकेँ एक जाति मानैए! दोसर नै मानैए। जँ मानितो अछि तँ ने हुनकर पूजा करैए आ ने परसाद खाइए! भरिसक हृदैसँ प्रणामो नहियेँ करैए। देवतोकेँ मने-मन अछोप, शूद्र इत्यादि बुझै छैथ! जँ ई प्रश्न हल्लुक-फल्लुक रहैत तँ कोनो बात नहि, मुदा अछि तँ प्रश्न जड़ियाएल! एहेन ने हुअए जे नान्हिटा प्रश्नक चलैत समाजमे विस्फोट भऽ जाए। समाजक लोक ऐ दुनू प्रश्नक बीच तेना ने बन्हाएल अछि, जे जिनगीक सभसँ पैघ वस्तु एकरे बुझै छैथ। जहन कि, छी नहि। मुस्कियाइत सुबुध भजुआकेँ कहलखिन- “ताबे तूँ रमाकान्त काका ऐठाम बढ़ह, हम नहेने अबै छी।” भजुआ विदा भेल। मुदा सुबुध मने-मन सोचिते रहला जे की कएल जाए। तर्क-वितर्क करैत सुबुधक मन धीरे-धीरे सक्कत हुअ लगलैन। अन्तमे ऐ निष्कर्षपर पहुँच गेला जे जाधैर ऐ सभ छोट-छीन बातकेँ कड़ाइसँ पालन नै कएल जाएत ताधैर समाज आगू-मुहेँ नै ससरत। समाजकेँ पछुआइक ईहो मुख्य करण छी! तँए एकरा जेते जल्दी हुअए तोड़ि देनाइ उचित हएत। ई बात मनमे अबिते सुबुध नहाइले गेला। नहा कऽ कपड़ा पहिर रमाकान्त ऐठाम विदा भेला। जाबे सुबुध रमाकान्त ऐठाम पहुँचैथ ताबे रमाकान्त शशि शेखर आ हीरानन्द नहा कऽ कपड़ा पहिर तैयार रहैथ। सुबुधकेँ पहुँचते हीरानन्द बजला- “सुबुधो भाय आबिए गेला। आब अनेरे बिलम करब उचित नहि।” सुबुध बैसबो नै केला। सभ कियो विदा भऽ गेला। आगू-आगू रमाकान्त पाछू-पाछू सभ। थोड़े दूर आगू बढ़लापर हीरानन्द भज्जुकेँ पुछलखिन- “कथी सबहक खेती केलह हेन भज्जु?” मजबूरीक स्वरमे भज्जु कहए लगलैन- “भाय, अपना बरद नइ अछि। कोदाइरो ने छेलए मुदा छौड़ा सभ जोर केलक आ दस गो कोदारि कीनि अनलक। सभ बापूत भोरे सुति कऽ उठै छेलौं आ खेत तामए चलि जाइ छेलौं। पनरह दिनमे सभ खेत तामि लेलौं। बड़ बढ़ियाँ जजाति सभ अछि। ऐ बेर हएत तँ बरदो कीनि लेब।” “जखन खेत भेलह तँ बरद किए ने कीनि लेलह?” “एक्केटा दिक्कत नै ने अछि। बरद कीनितौं तँ बान्हितौं केतए? खाइले की दैतिऐ? जँ सभ काज–बरद कीनिनाइ, घर बनौनाइ, खाइक जोगार केनाइ–एक्के बेर शुरू करितौं तँ ओते काज पार केना लगैत? तँए एका-एकी सभ काज करब!” “बड़ सुन्दर विचार केलह!” गप-सप्प करैत सभ कियो भजुआ ऐठाम पहुँचला। घरक आगूमे दू कट्ठा जमीन। ओइमे समियाना टँगने। एक भाग कुरसी लगौने। दोसर भाग शतरंजी, जाजीम, तकिया लगौने। मरदसँ मौगी धरि, भजुआक सभ समांग नहा कऽ नवका वस्त्र पहिरने। जहिना केतौ बरियातीक बेवस्था होइ छइ। तहिना बेवस्था केने। बेवस्था देख चारू गोरे रमाकान्त क्षुब्ध भऽ गेला। किनको बुझिए ने पड़ैन जे डोमक घर छिऐ। चारू गोरे चारू कुरसीपर बैसला। कुरसीपर बैसते भजुआक एकटा बेटा शरबत अनलक। सभसँ पहिने रमाकान्त दू गिलास शरबत पीब ढकार करैत बजला- “आब पान खुआबह।” शरबत बँटाइते छल कि बिच्चेमे भजुआक पोती चाह नेने आबि गेली। हाँइ-हाँइ कऽ शशि शेखर शरबत पीलैन। स्टीलबला कपमे चाह। शुद्ध दूधक बनल। ने अधिक मीठ आ ने फिक्का। चाहक रंगो तेहने। तैपर कॉफी चक-चक करैत। चाह पीबैत-पीबैत रमाकान्तक पेट अफैर गेल। भरियाएल पेट बुझि रमाकान्त बजला- “ई तीनू गोरे कुरसीपर बैसता, हम ओछाइनेपर पड़ब।” कहि उठि कऽ ओछाइनपर जा रमाकान्त पड़ि रहला। पान आएल। सभ कियो पान खेलैन। मुँहमे पान सठबो नै कएल छेलैन आकि जलखै करैक आग्रह भजुआ केलकैन। भजुआक आग्रह सुनि रमाकान्त कहलखिन- “हम ओछाइनेपर खाएब। हुनका सभकेँ टेबुलपर दहुन, मुदा कनी कालक बाद।” भजुआक सभ समांग दासो-दास। जखनसँ चारू गोरे एला तखनसँ भजुआक परिवारमे नव उत्साहक लहैर उमरल। की मरद की स्त्रीगण सभ उत्साहित। ..जे स्त्रीगण सदिखन झगड़ेमे ओझराएल रहै छल, सबहक मुँहमे हँसी छिटकैत। मनुखे ऐ दुनियाँक सभसँ पैघ कर्ता-धर्ता छी किने। ई विचार सबहक मनमे नाचए लगलैन। भजुआक पोती, जेकर मात्रिक दरभंगा छिऐ आ ओतै बेसी काल रहबो करैए, हाइ स्कूलमे पढ़बो करैए, ओकर संस्कार आ काज करैक ढंग देख सुबुध आ हीरानन्द, दुनू गोरे आँखिए-क इशारामे गप करए लगला। आँखिए-क इशारामे सुबुध हीरानन्दकेँ कहलखिन- “जँ मनुखकेँ नीक वातावरण भेटै तँ ओ किछु कऽ सकैए, चाहे ओकर जन्म केहनो गिरल परिवारमे किएक ने भेल होइ।” सुबुधक बात सुनि हीरानन्द कहलखिन- “ई सभ ढोंग छी जे लोक कहैए जे पूर्व जन्मक कर्मक फल लोक ऐ जन्ममे पबैए। हँ, जँ एकरा ऐ रूपे मानल जाए जे ऐ जन्मक पूर्व पक्षपर पछातिक जिनगी निर्भर करैए तँ एक-तरहक विचार हएत। देखियौ जे यएह बचिया, भजुआक पोती कुशेसरी केते बेवहारिक अछि। अही परिवारमे तँ एकरो जन्म भेल छै मुदा अगुआएल इलाका आ अगुआएल परिवारमे रहने केते अगुआएल अछि। की पैघ घरक बेटीसँ कम अछि?” चूड़ा, दही, चिन्नी, केरा, अचार, डलना तरकारीक संग पाँचटा मिठाइ सेहो जलखैमे आएल। चारू गोरे भरि मन खेलैन। खेला पछाइत अस-बीस करए लगला। हाथ धोइ कऽ रमाकान्त बिछानेपर ओंघरा गेला। मुदा गप-सप्प करै दुआरे सुबुधो आ हीरानन्दो कुरसीएपर बैसल रहला। सभ समांग भज्जुओ जलखै कऽ सरियाती जकाँ बैसल। ..सुबुध पुछलखिन- “जखन एते समांग छह तखन माल-जाल किए ने पोसने छह?” नबो समांगमे झोलिया सभसँ होशगर। अपनो सभ समांग झोलियाकेँ गारजन बुझैत। सुबुधक सवालक उत्तर झोलिया दैत बाजल- “मास्सैब, अखन धरि हमरा सबहक परिवारमे सुगर पोसल जाइत रहल अछि। मुदा सुगर सिरिफ खाइक जानवर छी। आन काज तँ ओकरासँ होइ नइ छइ। ने हर जोतल जाइ छै आ ने दूध होइ छइ। छोट जानवरक दुआरे गाड़ियो नहियेँ जोतल जेतइ। जेकरा नूनो-रोटी नै भेटै छै ओ मौसु केतए-सँ खाएत। तैयो हम सभ पोसै छी। अपन पोसल रहैए तँए पावैन-तिहारमे कहियो काल खाइयो लइ छी। खेनिहारक कमी दुआरे नेपाल जा-जा बेचै छेलौं। नेपालमे अपना ऐठामसँ बेसी लोक खाइए। किएक तँ सुगरक मौसु खस्सी-बकरीसँ बेसी गरम होइ छइ। अपना ऐठामक मौसम सेहो गरम अछि। सुगर मुख्यतः ठंढ इलाकाक खेनाइ छी। मुदा तैयो सुग्गरे पोसै छेलौं, किएक तँ गाए-महींस जँ पोसबो करितौं तँ हमरा सबहक दूध के कीनैत?” झोलियाक बात सुनि सुबुध पुछलखिन- “सेहो तँ नै देखै छिअ?” झोलिया- “पहिने जेरक-जेर सुगर रहै छेलए। पोसैयोमे असान होइ छेलए। एक्के गोरेकेँ बरदेलासँ साए-पचास सुगर पला जाइ छल। भोरे किछु खा कऽ सुगरकेँ खोबहारीसँ निकालि चरबैले चलि जाइ छेलौं। घरपर खुअबै-पिअबैक कोनो जरूरते नहि। साल भरि पोसै छेलौं आ सालमे एक बेर नेपाल लऽ जा बेच लइ छेलौं। पौंरुकाँ साल डेढ़ साए सुगर लऽ कऽ बाउओ आ कक्को नेपाल गेल। ओइठिन एकटा मंगलक हाट लगै छइ। जइ हाटमे सभसँ बेसी सुगर बीकै छइ। बड़का-बड़का पैकार सभ ओइ हाटमे रहैए। हाटक एक भागमे हमरो सुगर छल। एक भाग बाउ बैसल आ दोसर भाग काका। एकटा पैकार पान-सात गोरेक संग आएल। दाम-दीगर हुअ लगलै। दाम पटि गेलइ। सभ सुगरक गिनती करि कऽ, एकटा पैकार रहल आ बाँकी गोरे सुगर हाँकि कऽ विदा भेल। ओ पैकार हमरा बाउओ आ कक्कोकेँ कहलक जे चलू पहिने किछु खा-पी लिअ। हमरो बड़ भूख लगल अछि। एकटा दोकानमे तीनू गोरे गेल। जलखै करए लगल। जलखैमे किछु मिला देने छेलइ। खाइते-खाइते दुनू गोरेकेँ निशाँ लगि गेलइ। लटुआ कऽ दुनू गोरे दोकानेमे खसि पड़ल। तैबीच की भेलै से बुझबे ने केलक। दोसर दिन नीन टुटलै तँ ने ओ पैकार आ ने दोकान। किएक तँ दोकान हाटे-हाटे लगैत रहइ। दुनू भाँइ कानैत-खिजैत विदा भेल। ने संगमे एकोटा पाइ आ ने खाइक कोनो वस्तु। भूखे लहालोठ होइत, कहुना-कहुना कऽ डगमारा आएल। डगमारा अबैत-अबैत दुनू भाँइ बेहोश भऽ गेल। डगमारामे हम्मर एकटा कुटुम अछि। दुनू भाँइक दशा देख ओ कुटुम गुम्म भऽ गेला। किछु फुरबे नै करैन। बड़ी कालक पछाइत दुनू भाँइकेँ होश भेलइ। होश अबिते दुनू भाँइ पानि पीलक, जखन कनी मन नीक भेलै तँ नहाएल। नहा कऽ खेलक। खा कऽ सूतल। सुति कऽ उठला बाद आरो मन नीक भेलइ। दू दिन औतै रहल। तेसर दिन गाम आएल। ओइ दिनसँ सुगर उपैट गेल।” सुबुध- “अपना घरमे रूपैआ-पैसा नै छह?” झोलिया- “थोड़बे रूपैआ अछि जे बाबा बाउकेँ देने रहै आ कहने रहै जे जब हम मरब तँ ऐ रूपैआसँ भोज करिहेँ। रूपैआ गनल नइ अछि। बाँसक चोंगामे, सुगरक खोबहारीमे राखल अछि।” हलचला कऽ रमाकान्त कहलखिन- “नेने आबह तँ। देखिऐ केते रूपैआ छह?” सातो चोंगा भजुआ सुगरक खोबहारीसँ निकालि रमाकान्तक आगूमे रखि देलकैन। फोंकगरहा बाँसक पोरक चोंगा, एक भाग गिरहेसँ बन्न आ दोसर भागमे कसि कऽ लत्ता कोंचने। सातो चोंगाक लत्ता निकालि रमाकान्त आगूमे रूपैआ निकालि-निकालि रखलैन। एकटा रूपैआ उठा रमाकान्त निंगहारि कऽ देखलैन तँ चानीक रूपैआ रहए। रूपैआक ढेरीपर सभ अपन-अपन आँखि जे जेत्तै रहैथ से तेत्तैसँ गड़ौने। रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहलखिन- “मास्सैब, ऐ रूपैआकेँ गनियौ तँ।” कुरसीपर सँ उठि हीरानन्द रूपैआ लग आबि गनए लगला। सातो चोंगामे सात साए चानीक रूपैआ। सात साए चानीक टाका सुनि सुबुध मने-मन हिसाब जोड़ए लगला जे एक रूपैआक कीमत पचहत्तैर रूपैआ होइए। एक साएसँ पचहत्तैर साए भेल। सात साएसँ बाबन हजार पाँच साए हएत। अगर एक जोड़ बरद किनत तँ पाँच हजार लगतै। एकटा बोरिंग-दमकल लेत तँ पनरह हजारमे भऽ जेतइ। जँ तीन नम्बर ईंटा लऽ ओकरा गिलेबापर जोड़ि, ऊपरमे एसबेस्टस दऽ कऽ सात कोठरीक घर बनौत तँ पच्चीस-तीस हजारमे भऽ जेतइ। अपनो सभ समांग कमाइते अछि आ सात बीघा खेतोक उपजा हेतइ। साले भरिमे बढ़ियाँ किसान-परिवार बनि जाएत। जे अछैते पूजीए लल्ल अछि! सभ कथूक दिक्कत छै..! विचित्र स्थिति सुबुधक मनमे उठि गेलैन। एक नजैरसँ देखैथ तँ खुशहाल परिवार बुझि पड़ैन आ दोसर दिस देखैथ तँ ने रहैले घर आ ने खाइ-पीबैक समुचित उपाय..! मुदा एकटा गुण भजुआक परिवारमे सुबुध जरूर देखलैन, आन गामक डोम जकाँ ताड़ी-दारूक चलैन परिवारमे नइ छइ। सिरिफ बुझैक आ बुझबैक जरूरत परिवारमे छइ। नमहर साँस छोड़ैत सुबुध भजुओ आ भजुआक सभ समांगोकेँ कहए लगलखिन- “भजु भाय, हम सभ समाजकेँ हँसैत देखए चाहै छी, कनैत नहि। तँए केकरो अधला होइ से नै सोचै छी। सबहक नीक होइ,सबहक परिवार हँसी-खुशीसँ चलैत रहइ। सबहक बेटा-बेटीकेँ पढ़ै-लिखै आ रहैक नीक घर होइ, दबाइ-दारू दुआरे कियो मरए नहि, तँए हम कहब जे ऐ रूपैआकेँ रस्तासँ खरच करू। ओना, बाबू श्राद्धक भोज-ले कहने छैथ, सेहो थोड़-थाड़ कऽ लेब, जँ एते दिन नै केलौं तँ किछु दिन आरो टारू। पहिने घर, बरद आ बोरिंगमे खरच करू तखन जे उपजा बाड़ी हएत तँ भोजो कए लेब।” सुबुधक विचारक समर्थन करैत रमाकान्त कहलखिन- “बड़ सुन्दर विचार सुबुध देलखुन भज्जु। जिनगीकेँ बुझह जे जिनगी केकरा कहै छै आ केना बनतै। से जाधैर नै सिखबह ताधैर अहिना वौआइत रहि जेबह।” भजुआ तँ चुप्पे रहल मुदा झोलिया टपाक-दे बाजल- “बाबा जे कहलैन ओ गिरह बान्हि लेलौं। अहाँ सभ हमरो छोट भाए बुझू। जाबे हमर परिवार रहत आ हम सभ रहब, ताबे अहाँ सबहक संगे-संग चलैत रहब।” झोलियाक विचार सुनि हीरानन्द खुशीसँ झूमि उठला। हँसैत बजला- “भज्जु भाय, अहाँ तँ आब बुढ़ भेलौं तँए नवका काज दिस नजैर नहियोँ जाएत मुदा बेटा-भातीज सभ जुआन अछि, नव काज दिस बढ़ए दियौ। जाधैर लोक समैक हिसाबसँ नव काज दिस नहि बढ़त ताधैर समैक संग नै चलि पौत। नहि तँ बाढ़िक पानि जकाँ समए आगू बढ़ैत जाएत आ खढ़-पात जकाँ मनुख आरा लगल रहत। तँए समैकेँ पकैड़ कऽ चलैक कोशिश करू। आब अपनो सभ भाँइ मिला कऽ सात बीघा खेत भेल। सात बीघा खेतबला बढ़ियाँ गिरहस्त तखने बनि सकैए जखन कि खेती करैक सभ जोगार कऽ लिअए। पानिक बिना जजाति नै उपैज सकैए। तहिना बरदोक जरूरी अछि। खेतक महत तँ तखने हएत जखन कि ओकरा उपजबैक सभ जोगार कऽ लेब। बहुत रास रूपैआ अछि, ऐ रूपैआक उपयोग जिनगी-ले करू।” गप-सप्प चलिते छल कि हहाएल-फुहाएल डाक्टर महेन्द्र आ बौएलाल पहुँच गेला। महंथ जकाँ रमाकान्त ओछाइनपर पँजरा तरमे सिरमा देने पड़ल छला। महेन्द्रकेँ देखते सभ अचम्भित भऽ गेला। महेन्द्र आ बौएलाल सोझे रमाकान्त लग पहुँच गोड़ लगलकैन। महेन्द्रकेँ असिरवाद दैत रमाकान्त बजला- “ऐठाम किएक एलह। कनीए कालक पछाइत तँ हमहूँ सभ ऐबे करितौं। गाड़ीक झमारल छह, पहिने नहैतह-खैतह अराम करितह। हम कि केतौ पड़ाएल जाइ छेलौं जे भेँट नै होइतियह” महेन्द्र डाक्टरक नजैरसँ चुपचाप पिताकेँ देखै छला। पिताकेँ देख मने-मन अपशोच करए लगला जे गलत समाचार पहुँचल। मुदा किछु बजला नहि। तैबीच महेन्द्र आ बौएलाल दिस इशारा करैत भजुआ झोलियाकेँ कहलक- “बौआ, पहिने दुनू गोरेकेँ खुआबह।” महेन्द्रो आ बौएलालोकेँ खुअबैक ओरियान झोलिया करए लगल। ओरियान तँ रहबे करइ। लगले परैस दुनू गोरेकेँ खुऔलैन। दुनू गोरे खा कऽ घर दिस विदा भेला। पाछूसँ कुशेसरी महेन्द्रकेँ सोर पाड़ि कहलकैन- “चाचाजी, पान-सुपारी लऽ लिअ।” कुशेसरीक आग्रह सुनि दुनू गोरे रस्तेपर ठाढ़ भऽ गेला। झटैक कऽ कुशेसरी, तस्तरीमे पान-सुपारी नेने, लगमे पहुँचल। लगमे पहुँच अपना हाथे पान सुपारी नै दऽ तस्तरीए महेन्द्रक आगूमे बढ़ौलकैन। पान सुपारी देख महेन्द्र बजला- “बुच्ची, हम तँ पान नै खाइ छी। अगर घरमे इलायची आ सिगरेट हुअ तँ नेने आबह।” कुशेसरी चोट्टे घुमि कऽ आँगन आएल। आँगन आबि सिगरेटक पौकेट, सलाइ आ इलायची नेने पहुँचल। उत्तर-मुहेँ घुमि महेन्द्र ओरिया कऽ सिगरेट लगौलैन जे कहीं पिताजी ने देख लैथ। दुनू गोरे गप-सप्प करैत विदा भेला। कुशेसरीकेँ देख महेन्द्र अचम्भित नै भेला। किएक तँ मिथिलाक गाम-ले कुशेसरी अचम्भित लड़की भऽ सकै छेली मुदा मद्रास-ले नहि। पछुआएल जातिमे कुशेसरी सन-सन ढेरो लड़की अछि। महेन्द्रकेँ गामसँ एकटा गुमनाम पत्र गेल रहैन। ओइमे लिखल छेलै जे पिताजी बताह भऽ गेला! अन्ट-सन्ट काज गाममे कऽ रहल छैथ! तँए समए रहैत हुनका इलाज नइ करेबैन तँ निच्छछ पागल भऽ जेता..! पत्र पढ़िते महेन्द्र घर अबैक विचार केलैन। भाए रविन्द्रसँ विचारि लेब जरूरी बुझि महेन्द्र एक दिन रूकि गेला। दोसर दिन महेन्द्रक भाबो सुजाता, महेन्द्र, बौएलाल आ सुमित्रा, चारू गोरे गाड़ी पकैड़ गाम विदा भेला। गाम अबिते महेन्द्र पिताकेँ नै देख मने-मन आरो सशंकित भऽ गेला। माएकेँ पिताक सम्बन्धमे पुछलैन। माएकेँ मात्र एतबे पुछलैन जे ‘बाबू केतए छैथ?’। माए कहलखिन। एटैची रखि महेन्द्र बौएलालक संग सोझे भजुआ ऐठाम चलला। डाक्टर सुजाता घरेपर रहि गेली। गामक परम्पराकेँ बुझबैत सासु सुजाताकेँ मनाही कए देलखिन जे अहाँ नै जाउ। चारि बजि गेल। खाइक इच्छा ने रमाकान्तकेँ आ ने आरो किनको रहैन। भानस भऽ गेलइ। जेते बिलम होएत ओते वस्तु सुआदहीन बनत। तँए भजुआ चाहै छल जे गरम-गरम खेनाइ सभ कियो खाइथ। मुदा भूख नै रहने चारू गोरे टाल-मटोल करए लगला। असमंजसमे भजुआ रमाकान्तकेँ कहलकैन- “काका, भानस भऽ गेल अछि। जएह मन मानए सएह...।” ढकार करैत रमाकान्त उत्तर देलखिन- “जखन भोजन बना लेलह तँ नै खाएब तँ मुँहो छूताइए लेब। मुदा सच पुछह तँ एक्को रत्ती खाइक मन नै होइए।” भजुआ कहलकैन- “जेतबए मन मानए तेतबे...।” चारू गोरे उठि कऽ आँगन गेला। सौंसे आँगन चिक्कैन माटिसँ टटके नीपल, तँए माटिक सुगन्धसँ अँगना महमह करैत। आँगन तँ छोटे मुदा बेसी लोकक दुआरे पैघ बुझि पड़ैत। कम्मल चौपेत कऽ बिछौल। जेना आइए कीनि कऽ अनने हुअए तेहने थारी, लोटा, बाटी, गिलास चमचम करैत। भोजनक विन्यास देख रमाकान्त क्षुब्ध भऽ गेला। की पवित्रता! की सुआद! मने-मन रमाकान्त सोचैथ जे अगर खूब भूख लागल रहैत तँ खूब खइतौं। मुदा भूखे ने अछि तँ की खाएब। भोजन कऽ चारू गोरे विदा हुअ लगला। विदा होइसँ पहिने झोलिया रंगल चँगेरामे चारि जोड़ धोती आनि चारू गोरेक आगूमे रखि देलकैन। धोती देख रमाकान्त कहलखिन- “झोली, तूँ सभ गरीब छह। अपने-ले घोती रखि लएह। तूँ पहिरौलह हम पहिरलौं भऽ गेलइ।” ◌ शब्द संख्या : 3365 12. मद्रासमे महेन्द्र चारि बजे भोरे उठि जाइ छला आ अपन जिनगीक लीलामे लगि जाइ छला मुदा गाममे पाँचो बजेमे महेन्द्रकेँ कड़गरे नीन पकड़ने छैन। एना किए भेल? ..रमाकान्त सुति-उठि कऽ महेन्द्रक कोठरीमे जा कऽ देखलखिन जे ओ ठर्र पाड़ैत घोर नीनमे सूतल अछि। नै उठेलखिन। मनमे एलैन जे बापक राजमे बेटा अहिना निसचिन्त भऽ रहैए। लोटा लऽ कलम दिस विदा भऽ भेला। छह बजे भिनसरमे महेन्द्र जगला। जगिते मनमे प्रश्न उठलैन एते कड़गर नीनक की कारण? की मिथिलाक माटि, पानि, हवाक गुणक प्रभाव छी वा काजक कमी रहने एना भेल? ..अही गुनधुनमे पड़ल छला महेन्द्र। रमाकान्त टहैल-बुलि, दिशा-मैदानसँ होइत अपन घरक रस्ता छोड़ि टोलक रस्ता पकैड़ घुमला। टोलमे प्रवेश करिते, रस्ता कातेक चापाकलपर मुँह-हाथ धुअ लगला। कलक बगलेमे मंगलक घर। रमाकान्तकेँ मंगल देख चुपचाप अँगनासँ बेंतबला कुरसी आ टेबुल आनि डेढ़ियापर लगौलक। मुँह-हाथ धोइ कऽ रमाकान्त अपना घर दिस चलला कि रस्ता कटैत देख मंगल टोकलकैन- “काका, कनी एक रत्ती अहूठाम बैसियौ।” मंगलक बातकेँ कटलैन नहि, मुस्कियाइत आबि कुरसीपर बैसला। कुरसीपर बैसते मंगलकेँ कहलखिन- “बड़ सुन्नर कुरसी छह! कहिया बनौलह?” “आठम दिन छौड़ा दिल्लीसँ आएल। वएह अनलक।” मंगलक बेटा रबिया, अँगनामे चाह बनबैत रहए। चाह बना तस्तरीमे बिस्कुट, नमकीन भुजिया आ चाहक गिलास नेने अबि रमाकान्तक आगूमे टेबुलपर रखि, गोड़ लागि कहलकैन- “बाबा, कनी चाह पीब लियौ।” रबियाक बात सुनि रमाकान्त सोचए लगला जे यएह मंगला छी जे बिहाड़िमे जखन घर उधिया गेल रहै तँ सात दिन अपनो सभतूरकेँ आ मालो-जालकेँ अपना मालक घरमे रहैले देने रहिऐ। मुदा आइ वएह मंगला छी जे केहेन सुन्दर घरो बना लेलक आ कुरसियो टेबुल कीनि लेलक। वाह..! मुस्कियाइत पुछलखिन- “बेटा केतए नोकरी करै छह, मंगल?” “दिल्लीमे काका। बड़ बढ़ियासँ रहैए।।” रमाकान्त भुजिया, बिस्कुट खा पानि पीब चाह पीबैत रहैथ आकि तैबीच रबिया आँगन जा जर्मनी मेड एकटा पौकेट रेडियो नेने आबि रमाकान्तक आगूमे रखैत कहलकैन- “बाबा, ई अहींले अनलौं हेन।” रेडियो देख रमाकान्त बजला- “ऐ सबहक सख आब ऐ बुढ़ाड़ीमे की करब। रखि ले। तूँ सभ अखन जुआन-जहान छँह, छजतौ। हम लऽ कऽ की करब।” दहिना हाथसँ रेडियो आ बामा हाथे रमाकान्तक गट्टा पकैड़ हाथमे दैत रबिया कहलकैन- “बाबा, अहींले किनने आएल छी।” रमाकान्त चाह पीब, कुरसीपर सँ उठि घर दिसक रस्ता पकड़लैन। आगू-आगू रमाकान्त पाछू-पाछू मंगल हाथमे रेडियो नेने घरपर तक चलि आएल। एक बाँस सुरूज ऊपर उठि गेल। महेन्द्र दलानक ओसारपर बैस, ब्रश करैत रहैथ। तखने पान-सातटा बचिया माथपर पथिया आ हाथमे लोटा नेने पहुँचल। महेन्द्र ब्रशो करै छला आ चुपचाप सभकेँ देखबो करै छला। लोटा पथिया ओसारपर रखि एकटा बचिया महेन्द्रकेँ पुछलकैन- “बाबा कहाँ छथिन?” बचियाक प्रश्नक उत्तर महेन्द्र नै देलखिन, किएक तँ नइ बुझल रहैन। सबहक पथिया आ लोटाकेँ निहारि-निहारि देखए लगला। कोनो पथियामे कोबी, कोनोमे टमाटर, कोनोमे करैला तँ कोनोमे भँट्टा, तैसंग लोटामे दूध देख महेन्द्र सोचए लगला जे ई की भऽ रहल अछि! किए ई सभ ऐठाम अनलकहेँ..? महेन्द्र गुनधुनमे पड़ि गेला। कोनो अर्थे ने लगैन। मन घुरियाए लगलैन। कनी कालक पछाइत पुछलखिन- “बौआ, ई सभ किए अनलह?” एकटा ढेरबा बचिया जे बजैमे चड़फड़, कहलकैन- “बाबा अपन सभ खेत हमरे सभकेँ दऽ देलखिन। अपना-ले किछु ने रखलखिन तँ खेथिन की? तँए..!” बचियाक बात सुनि महेन्द्र गुम्म भऽ गेला। सोचए लगला जे हम बेटा छिऐन। हुनकर चिन्ता हमरा हेबा चाही। सुआइत कहल गेल अछि जे ‘जेहेन करब तेहेन पएब..!’ मुँहपर हाथ नेने महेन्द्रक मनमे उठलैन- अनेरे लोक अपन आ दोसर बुझैए। जेकरा-ले अहाँ करबै, ओ अहूँ-ले करत। चाहे अपन हुअए आकि आन। सोचिते रहैथ कि पिताजीकेँ अबैत देखलैन। पिताकेँ देखते उठि कऽ कुरुर करए कल दिस बढ़ि गेला। रमाकान्तपर नजैर पड़िते सभ बचिया ओसारपर सँ उठि गोड़ लागए आगू बढ़ल। रमाकान्तक नजैर लोटामे दूध आ पथियामे तरकारीपर पड़लैन। तरकारी देख बजला- “बच्चा, एते किए अनलह। अच्छा आनियेँ लेलह तँ आँगनमे रखि आबह।” सभ बचिया अपन-अपन पथिया-लोटा लऽ जा कऽ आँगनमे रखि आएल। महेन्द्रक अबैक जानकारी गाममे सभकेँ भऽ गेलैन। एका-एकी लोक आबि-आबि अपन-अपन रोगक इलाज करबए चाहलक। मुदा महेन्द्र तँ निआरि कऽ नै आएल छला तँए ने जाँच करैक कोनो यंत्र अनने रहैथ आ ने दबाइ। मुदा तैयो बौएलाल आ सुमित्राकेँ बजा अनैले जुगेसरकेँ कहलखिन। जुगेसर बौएलालकेँ बजबए गेल। जेते जाँच-पड़ताल करैक यंत्र, चीड़-फाड़ करैक औजार बौएलाल आ सुमित्राकेँ कीनि देने रहथिन ओ सभ सामान नेने दुनू गोरे पहुँचल। बौएलाल महेन्द्र लग बैसल आ सुमित्रा सुजाताक संग दरबज्जाक पाछूक ओसारपर। जनिजाति सुजाता लग जाँच करबैले जाए लगली आ पुरुख महेन्द्र लग। चारिए-पाँच गोरेकेँ महेन्द्र जाँच केलैन कि चारि-पाँचटा रोगी खाटपर टाँगल अबैत देखलखिन। ओ सभ दोसर गामक छेलइ। खाट देख महेन्द्रकेँ भेलैन जे भरिसक हैजा-तैजा भऽ गेलइ। ओसारपर सँ उठि महेन्द्रो आ बौएलालो निच्चाँमे ठाढ़ भऽ गेला। खाटोबला आबि गेल। सभ कुहरैत रहए। केकरो कपार फुटल तँ केकरो डेन टुटल आ केकरो मारिक चोटसँ देह फुलल। अपना लग कोनो दबाइ महेन्द्रकेँ नै रहैन। हाँइ-हाँइ महेन्द्र बौएलालकेँ ड्रेसिंग-पलश्तरक सभ समान आ दबाइक पुरजी बना बजारसँ जल्दी अनैले कहलखिन। साइकिलसँ बौएलाल खूब रेसमे विदा भेल। रमाकान्त रोगी लग आबि एकटा खाट उठौनिहारकेँ पुछलखिन- “केना कपार फुटलै?” डरसँ कँपैत ओ कहलकैन- “मारिसँ कपार फुटलै।” सुनिते रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- “बौआ, सबहक इलाज नीक जकाँ कऽ दहुन।” कहि ओसारपर बिछौल बिछानपर बैस, खाट उठौनिहार सभकेँ सोर पाड़लखिन। सभ कियो लगमे आबि बैसलैन। पुछलखिन- “मारि कखन भेलह?” “खाइ-पीबै रातिमे।” “तब तँ खेनौं-पीनौं नै हेबह?” “नहि।” भूखल बुझि रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- “पहिने सभकेँ खुआबह।” पनरह-बीस गोरेक जलखै तँ घरमे छेलैन नहि। जुगेसर सुमित्राकेँ सोर पाड़ि कहलक- “बुच्ची, काकी तँ बुढ़े छैथ आ कनियाँ अनभुआरे। झब-दे बड़का बरतन चढ़ा कऽ खिचड़ी बना। वेचारा सभ रौतुके भूखल अछि। हम सभ समान जोड़िया दइ छियौ। तोरा सभ किछु बुझल छौ।” जहिना जुगेसर सुमित्राकेँ कहलक तहिना सुमित्रो भानसमे जुटि गेल। सुजातो संग दिअ लगलखिन। जहिना बौएलाल निछोह साइकिल हाँकि बजार गेल तहिना लगले सभ समान कीनि चलियो आएल। बौएलालकेँ अबिते महेन्द्रो आ बौएलालो सभ रोगीकेँ पहिने दरदक सुइया देलखिन। सूइ पड़िते कनीए कालक पछाइत, सभ कुहरनाइ बन्न केलक। खिच्चैर-तरकारी बना सुजातो आ सुमित्रो रोगी लग एली। मन शान्त होइते, सबहक खून लगलाहा कपड़ा बदैल, खिच्चैड़ खुआ इलाज शुरू भेल। तीन गोरेकेँ कपार फुटल रहै आ दू गोरेकेँ डेन टुटल रहइ। सुजाता आ सुमित्रा दुनू गोरेक पलश्तर करए लगली। महेन्द्र कपारमे स्टीच करैत रहैथ। बौएलाल दौड़-बड़हामे लागल रहए। कखनो किछु अनैत तँ कखनो किछु। दू घन्टाक पछाइत सभ निचेन भेला। रमाकान्त पुछलखिन- “मारि किए भेलह?” नोर पोछैत जोखन कहए लगलैन- “मकशूदनक बेटी सितिया भाँटा बेचए हाट गेल रहइ। सतरह-अठारह बर्खक उमेर हेतइ। नमगर कद। दोहरा देह। चाकर मुँह। गोल आँखि ओकर छइ। पौंरुके साल दुरागमन भेलइ। ओना, हाट ओकर माए करै छै मुदा पान-सात दिनसँ ओ दुखित अछि। डेढ़ कट्ठा खेतमे भाँटा केने अछि। खूब सहजोर फड़लो छइ। भाँटाकेँ जुआइ दुआरे सितिया छाँटि-छाँटि कऽ नमहरका भाँटा तोड़लक। एक छिट्टा भेलइ। भँट्टोकेँ बेचब आ माए-ले दबाइयो कीनब जरूरी छेलइ। दबाइक पुरजी साड़ीक खूटमे बान्हि लेलक जे घुमै कालमे दबाइ किनने आएब। हाटमे भँट्टा बेच दोकानमे दबाइ कीनि कऽ असगरे विदा भेल। गोसाँइ डुमि गेल रहइ। खूब अन्हार तँ नहि, मुदा झलफल भऽ गेल छेलइ। धीरे-धीरे रस्तो चलनिहार पतराए लगल छल। हाट गेनिहार तँ साफे बन्न भऽ गेल छेलइ। मगर हाटसँ घुमनिहार गोटे-गोटे रहबे करए। पाँतरमे जखन सितिया आएल तँ पाछूसँ ललबा आ गुलेतिया सेहो साइकिलसँ अबै छल। गुलेतिया ललबाक नोकर छी। ललबा बापक असगर बेटा अछि बीस-पच्चीस बीघा खेत छइ। बच्चेसँ बहसल तँ ऐछे। दुनू गोरे दारू पीब अन्ट-सन्ट बजैत घर दिस अबैत रहए। जखन दुनू गोरे सितियाक लगमे आएल तँ ललबा बाजल- “गुलेती, शिकार फँसलौ!” ..ललबाक बात सुनियोँ कऽ सितिया किछु नै बाजल। मुदा मनमे आगि सुनगए लगलै। आरो डेग नमहर केलक। आगू बढ़ि ललबा साइकिलसँ उतैर, रस्ताकेँ घेर साइकिल ठाढ़ कऽ देलकै। साइकिल ठाढ़ कए जेबीसँ सिगरेट आ सलाइ निकालि, लगा कऽ पीबए लगल। सितियाक मनमे शंका भेलै मुदा डेराएल नहि। साइकिल लग आबि रस्ताक बगल देने आगू टपि गेल। आगूमे ललबो आ गुलेतियो ठाढ़ भऽ सिगरेटो पीबैत आ चढ़ा-उतरीक गप्पो-सप्प करैत फेर आगू बढ़ल। मुँहमे सिगरेट रखि ललबा साए रूपैआक नोट ऊपरका जेबीसँ निकालि सितिया दिस बढ़ौलक। रूपैआ देख सितियाक देह आगिसँ लह-लह करए लगलै। मुदा ने किछु बाजल आ ने रूकल। लफरल आगू बढ़ैत रहल। सितियाकेँ आगू बढ़ैत देख ललबो पाछूसँ हाथमे रूपैआ नेने बढ़ल। दुनू गोरेकेँ पछुअबैत देख सितिया ठाढ़ भऽ गेल। माथ परहक छिट्टाकेँ दहिना हाथे आरो कसिया कऽ पकैड़ सोचलक जे छिट्टेसँ दुनूकेँ चानिपर मारब। तामसे भीतरे-भीतरे जैरते छल सितिया। ..ललबा दहिना हाथे नोट सितिया दिस फेर बढ़ौलक। लगमे ललबाकेँ देख, मौका पाबि सितिया तेना कऽ रूपैआपर थूक फेकलक जे रूपैआपर तँ कम्मे मुदा ललबाक मुँहपर बेसी पड़लै। मुँहपर थूक पड़िते ललबा सितियाक बाँहि पकैड़ खिंचए चाहलक। पहिनहिसँ सितिया छिट्टाकेँ पकैड़ अजमेने रहबे रहए। धाँइ-धाँइ दू छिट्टा ललबाकेँ लगा देलक। दुनू गोरे दुनू बाँहि पकैड़ सितियाकेँ घिंचलक। छिट्टा नेनहि सितिया रस्ताक निच्चाँ, खेतमे खसि पड़ल। खेतमे खसिते हिम्मत कऽ उठि दहिना तरहत्थीक मुक्का बान्हि, मुक्को आ दहिना पएरो अनधुन चलबए लगल। मारिक डरसँ गुलेतिया कात भऽ गेल। मुदा ललबा नै मानलक। ओहो अनधुन मुक्का चलबए लगल। गुलेतियाकेँ कातमे देख सितियोक जोश बढ़लै। ललबा दारू पीनहि रहए, तिलमिला कऽ खसल। जहाँ ललबा खसल आकि सितिया एँड़े-एँड़ मारए लगल। तही-बीच हाटसँ तरकारी बेचनिहारिक जेर अबैत रहइ। तरकारी बेचनिहारिक चाल-चुल पाबि सितियाक जोश आरो बढ़ि गेल। एक तँ समरथाइक शक्ति सितियाक देहमे, दोसर इज्जत बँचबैक प्रश्न, बाघ जकाँ सितिया मारैत-मारैत ललबाकेँ बेहोश कऽ देलक। ताबे तरकारियो बेचनिहारि सभ लगमे आबि गेली। सितियाक काली रूप देख हसीना पुछलकै- “बहिन, की भेलौ?” ..सितिया बाजल- “अखन किछु ने पुछ। ऐ छुतहरबाक खून पीब लेबइ।” ..बजबो करैत आ अनधुन एँड़ो देहपर बरिसबैत रहल। चारि गोरे सितियाकेँ पकैड़ कात करए चाहलैन। मुदा चारूकेँ झमारि सितिया पुनः आबि कऽ दस लात ललबाकेँ फेर मारलक। फेर चारू गोरे हसीना, जलेखा, रेहना आ खातून घेर सितियाकेँ पँजिया कऽ पकैड़ घिंचने-तिरने विदा भेली। ..अबैत-अबैत जखन गामक कात आएल कि सितिया फेर चारू गोरेकेँ झमारि, अपन डेन छोड़ा फेर ललबाकेँ मारए दौगल। मुदा रेहना आ खातून दौग कऽ सितियाकेँ आगूसँ घेरलक। हसीना आ जलेखा सेहो दौग कऽ आबि पकड़लक। सितियाक मन क्रोधसँ उफनैत रहइ। मनमे होइ जे ललबाक खून पीने बिना नै छोड़ब, चाहे फाँसीपर किए ने चढ़ऽ पड़ए। चारू गोरे सितियाकेँ पकड़ने घरपर पहुँचल। सौंसे गाम घटनाक समाचार बिहाड़ि जकाँ पसैर गेल। गाम डोल-माल करए लगल। तनावक वातावरण बनि गेल। राति भारी भऽ गेल। गामक बुढ़बा चोट्टासँ लऽ कऽ नवका चोट्टा धरिक चलती बढ़ि गेलइ। ..तैबीच चारि गोरे ललबाकेँ खाटपर टाँगि सेहो अनलक। ललबाक बेहोशी तँ टुटि गेलै मुदा कुहरनी धेनहि रहइ। ललबाक पितियौत भाए डाक्टर बजा ललबाक इलाज करबए लगल। स्लाइन लगा डाक्टर बगलमे बैस पानिक गति देखैत रहए। तैबीच ललबाक पितियौत भाए गाममे लाठीक संगोर करए लगल। जेते गामक मुँहगर-कन्हगर लोक सभ छल से सभ ललबाक पक्ष लेलक। अपन मजगूत पक्ष देख ललबाक बाप बाजल- “जखन इज्जत चैलिए गेल तँ समपैते रखि कऽ की करब।” ..‘दुर्गा-महरानी की जय’ कहि पनरह-बीसटा गामक हुरदंगहा, लाठी लऽ सितिया ऐठाम विदा भेल। रस्तोमे सभ जय-जयकार करैत रहए। ..मकशूदनक टोल मात्र बारह परिवारक। गरीब घरक टोल तँए समांगो सभ मरदुआरे। मुदा तैयो जेते पुरुख रहै, लाठी लए-लए गोलिया कऽ बैस विचारलक जे इज्जतक खातिर मरि जेनाइ धरम छी, तँए जे हेतै से हेतै मुदा पाछू नइ हटब। दोसर दिस टोलक सभ जनिजाति सेहो तैयार होइत निर्णए केली जे जाधैर पुरुख ठाढ़ रहत ताधैर अपना सभ कातमे रहब। मगर पुरुखकेँ खसिते अपनो सभ लाठी उठाएब। एक तँ सितियाक देहमे आगि लगले रहै आरो धधैक गेलइ। बाजल- “जेते जुआन बेटी छँह आ जुआन पुतोहु, सभ अपन-अपन साड़ीकेँ कसि कऽ बान्हि ले आ माथोमे साड़ीए-क नमहर मुरेठा कसि कऽ बान्हि ले, जइसँ कपार नै फुटौ। बुढ़िया सभकेँ छोड़ि देही। मरुआ बीआ पटबैबला जे पटै घरमे छौ से निकालि कऽ एकठाम सभ रख। आ देखैत रही जे की सभ होइ छइ। जहिना सभ बहिन मिलि मरब तहिना संगे संगे सभ बहिन जनमो लेब।” ..टोलक जेते छोट बच्चा रहै, सभकेँ घरक बुढ़-बुढ़ानुस लए-लए टोलसँ हटि गाछीमे चलि गेल। दोसर हँसेरी टोलक लग आबि बोली देलक। बोली सुनि सितियाकेँ होइ जे असगरे सभसँ आगू जा हँसेरीकेँ रोकी। मुदा लड़ाइमे अनुशासन आ निर्णयक महत बढ़ि जाइ छइ, तँए सितिया आगू नहि बढ़ि ठाढ़े रहल। टोलक लोक, अपना तागत भरि हँसेरीकेँ रोकलक। अनधुन लाठी दुनू दिससँ चललै। मुदा पछैर गेल। पाँच गोरे घाइलो केलक मुदा हँसेरी घुमल नहि बल्कि धन आ इज्जत लूटैक खियालसँ आगू बढ़ल। अपन समांगकेँ खसल आ हँसेरीकेँ आगू बढ़ैत देख मुरेठा बन्हने आगू-आगू सितिया आ तइ पाछू टोलक सभ स्त्रीगण पटै लऽ हँसेरीकेँ रोकलैन। की बिजलोका चमकै छै तहिना गामक बेटी अपन चमकी देखौलैन! वाह रे मिथिलाक धी..! ..मिथिला सिरिफ कर्म भूमिए आ धर्म भूमिए नहि, वीर भूमि सेहो छी। चारि आदमीक कपार असगरे सितिया ढाहलक। चारू खसलै। खूनक रेत चललै। हँसेरीमे हूर भेलइ। सभ पाछू-मुहेँ पड़ाएल। ईहो सभ भागल हँसेरीकेँ रेबाड़लैन। मुदा किछु दूर रेबाड़ि घुमि गेली। ..अपन सभ समांगकेँ उठा-उठा सभ अनलक। मुदा दोसर दिसक लोककेँ अपन समांग अनैक साहसे नै होइ छेलइ। होइ जे कहीं हमहूँ सभ अनैले जाइ आ हमरो सभकेँ ओहिना हुअए। बड़ी कालक पछाइत चोरा कऽ अपना समांग सभकेँ ओहो सभ लऽ गेल। गाममे दुइयेटा डाक्टर। सेहो डिग्रीधारी नहि, गमैया प्रेक्टिश्नर। सेहो दुनू ललबे ऐठाम रहैथ। रातिमे केतए जइतौं। दोहरा कऽ आक्रमणक डर सेहो रहए। सभ तत-मतमे पड़ल रही। मुदा जेहो सभ घाइल छल ओकरो मुँह मलिन नै छेलइ। मनमे खुशी होइत रहइ। तँए दर्दकेँ अङैजने रहए। इन्होर पानि करि कऽ सभकेँ स्त्रीगण सभ ससारए लगली, कपारक फाटल जगहमे सिन्नुर दए-दए कपड़ासँ बान्हि खून बन्न केलक। भरि राति कियो सूतल नहि। जहाँ-तहाँ अहीक चरचा बेसी काल चलैत रहैए। भिनसरमे डाक्टर महेन्द्रक जानकारी भेल जे गाममे छैथ। तँए एलौं।” जोखनक बात सुनि रमाकान्त बमैक उठला। ठाढ़ भऽ जोर-जोरसँ बाजए लगला- “जदी कियो अपन इज्जत-आबरू बँचबैले हमरा कहत तँ हम अपन सभ सम्पैत ओइ पाछू फुकि देब। मुदा छोड़बै नहि। बौआ, जेते तोरा हूनर छह तइमे कोताही नै करिहक। खेनाइ-पीनाइ, दबाइ-दारू सभ कथुक मदैत कऽ दहक। फेर ऐ धरतीपर जन्म लेब। ई कर्मभूमि छिऐ। मनुख किछु करैले धरतीपर अबैए। सिरिफ अपनेटा नै आनो जे कर्मनिष्ठ अछि, ओकरो जहाँ धरि भऽ सकत मदैत करबै। जोखन, जे भऽ गेल से भऽ गेल मुदा सुनि लएह जहिया-कहियो कोनो भीड़ पड़ह, हमरो एक बेर खोज करिहह। जाधैर घटमे परान अछि ताधैर जरूर मदैत करबह।” बेर टगैत चारिटा बचिया अपना आदमी सभ-ले खाएक लऽ कऽ पहुँचली। एक कठौत भात बड़का डोलमे दालि आ छोटका डोलमे तरकारी लेने, तैसंग खाइ-ले केराक पात आ दूटा लोटा सेहो अनने छेली। चारू बचियाकेँ देख रमाकान्त पुछलखिन- “बुच्ची, खाएक किए अनलह।” रमाकान्तक बात सुनि सितिया कहलकैन- “बाबा, हमरा सभकेँ नइ बुझल छेलए तँए अनलौं।” “अच्छा, अनलह तँ सभकेँ पुछि लहुन जे खाएब आकि घुरौने जाएब।” सितियाक संग रमाकान्त गप-सप्प करिते रहैथ कि बिच्चेमे जोखन कहलकैन- “काका, यएह सभ बचिया मारि कऽ ओइ पाटीकेँ भगौलक।” अकचकाइत रमाकान्त बजला- “आँइ! यएह सभ छी! वाह-वाह! तोरे सभ सन-सन बेटी ऐ धरतीक मान रखि सकैए।” बिहाड़ि जकाँ जोखनक बात, रमाकान्तक दरबज्जा आ आँगनसँ लऽ कऽ गाम धरिमे पसैर गेल जे सितिया सभ मरदक हँसेरीकेँ अनधुन मारबो केलक, कपारो फोड़लक आ गामक सीमान धरि खिहारबो केलक। ई समाचार सुनि गामक स्त्रीगण मरद सभ उनैट कऽ ओइ बचिया सभकेँ देखैले आबए लगल। अजीव दृश्य बनि गेल। श्यामा आँगनसँ सुमित्रा दिया समाद पठौलैन जे कनी ओइ बचिया सभकेँ अँगना पठा दियौ जे हमहूँ सभ देखब। दरबज्जापर आबि सुमित्रा रमाकान्तकेँ कहलकैन। अँगनाक समाद सुनि रमाकान्त चारू बचियाकेँ कहलखिन- “बेटी, कनी आँगन जाइ जाह।” चारू बचियाकेँ संग केने सुमित्रा आँगन विदा भेल। ओसारपर ओछाइन ओछा श्यामो आ सुजातो बैसल छेली। आगू-आगू सुमित्रा आ पाछू-पाछू चारू बचियो आएल। चारू बचिया श्यामा आ डाक्टर सुजाताकेँ गोड़ लगलकैन। एकाएकी गामक स्त्रीगण आ गामक बेटी सभ सेहो अँगने जा-जा सितिया सभकेँ देखए लगली। अपने लगमे चारू बचियाकेँ श्यामा बैसौने रहथिन। सुजाता निहारि-निहारि चारूकेँ ऊपरसँ निच्चाँ धरि, देखैत रहली। ..अजीव शक्ति चारूक चेहरामे बुझि पड़ैन। चारू बचियो आँखि उठा-उठा कखनो श्यामापर तँ कखनो गामक स्त्रीगण सभपर दइ छेली। सबहक मनमे खुशी रहितो, मुहसँ हँसी नै निकलै छेलैन। जेना खुशीक पाछू अदम्य उत्साह, अदम्य साहस आ जोश सबहक चेहरापर नचैत रहैन। चारूक विशेष आकर्षण सभकेँ अपना दिस घिचै छल। जेहो स्त्रीगण कनी हटि कऽ ठाढ़ भऽ देखै छेली, ओहो सहैट-सहैट सितियाक लगमे आबए चाहैथ। श्यामा सुमित्राकेँ कहलखिन- “सुमित्रा, एहेन लोककेँ आँगनमे कहिआ देखबीही, तँए बिना किछु खिऔने-पिऔने नै जाए दहुन।” श्यामाक बात सुनि सुजाता उठि कऽ अपन आनल मद्रासी भुजियाक डिब्बा घरसँ उठेने एली। भुजियाक डिब्बा देख सितिया बाजल- “बाबी, लगले खा कऽ विदा भेल छेलौं। एको-रत्ती खाइक छुधा नइ अछि।” तैबीच रमाकान्त चारू गोरेकेँ बजबैले जुगेसरकेँ अँगना पठौलखिन। जुगेसर अँगना आबि सभकेँ कहलक। उठि कऽ चारू गोरे श्यामाकेँ गोड़ लागि विदा हुअ लगली। असिरवाद दैत श्यामा कहलखिन- “भगवान हमरो औरदा तोरे सभकेँ देथुन जे हँसैत-खेलैत जिनगी अहिना बितैत रहह।” चारू गोरेकेँ अँगनासँ निकैलते सभ विदा भेल। चारिक अमल। रौदक गरमियो कमए लगल। डॉ. महेन्द्र जोखनकेँ कहलखिन- “ऐठाम रोगी सभकेँ रखैक जरूरत नइ अछि। घरेपर साँझ-भिनसर सभ दिन बौएलाल जा-जा कऽ सूइया दऽ-दऽ औत। गोटी सेहो लगातार चलबैत रहब। पनरह-बीस दिनमे पूरा ठीक भऽ जाएत।” पएरे सभ विदा भेल...। साँझू पहर, रमाकान्त आ जुगेसर दरबज्जापर बैस मद्रासेक गप-सप्प शुरू केलैन। मुस्कियाइत जुगेसर कहलकैन- “काका, एक बेर आरो मद्रास चलू।” नाक मारैत रमाकान्त बजला- “धुर बुड़िबक! गाड़ीमे लोक मरि जाइए। ऐठाम केहेन निचेनसँ रहै छी। ओमहर ने गाड़ी-बसमे शान्ती आ ने रस्ता-पेराक ठेकान। सड़क धऽ कऽ चलू। तहूमे सदिखन लोकेक धक्का लगैत रहत। केहेन सुन्दर अपना सबहक गाम अछि जे रस्ताक कोन बात जे आइरे-धुरे, खेते-पथारे जेतए मन हुअए तेतए जाउ। ने गाड़ी बसक धक्काक डर आ ने पएरमे काँटी-शीशा गड़ैक। जेकरासँ मन हुअए तेकरासँ गप करू,कुशल-समाचार पुछि लिऔ। ओइठाम तँ जेना मुँहमे बकारे नै रहए तहिना बौक भेल रहै छेलौं।” व्यंग करैत जुगेसर कहलकैन- “केहेन ठंढा घरमे रहै छेलौं। ने नहाएले केतौ जाए पड़ै छेलए आ ने पर-पैखाना-ले?” रमाकान्त- “धुर बुड़ि! ओइठाँ जँ दुइयो मास रहितौं तँ कोढ़ि भऽ जइतौं। उठैयो-बैसैयोमे आसकैते लगैत रहए। सच पुछ तँ एते दिन रहलौं मुदा ने कहियो भरि मन पानि पीलौं आ ने झाड़ि कऽ पैखाना भेल। सभ दिन जेना कब्जियते बुझि पड़ैत रहए। जखने पानि मुँह लग लऽ जाइ कि मन भटैक जाइ छेलए।” फेर मुस्कियाइत जुगेसर कहलकैन- “अंगुरक रस पीबैमे केहेन लगैत रहए! बिसैर गेलिऐ?” अंगुरक रस सुनि थोड़ेक असथिर होइत रमाकान्त बजला- “लोक कहै छै जे अंगुरमे बड़ तागत छै मुदा अपना सबहक जे केरा, आम, बेल, लताम इत्यादि अछि, ओते तागत अंगुरमे केतए-सँ औत। अंगुरेक शराब बनैए मुदा अपना ऐठामक भाँगक परतर करतै। अंग्रेजिया शराब सनसना कऽ मगजपर चढ़ियो जाइ छै आ लगले उतैरियो जाइ छइ। मुदा अपन जे भाँग अछि ओ रइसी निशाँ छी। ने अपराध करैले सनकी चढ़ौत आ ने एको मिसिया चिन्ता आबए दइ छइ।” रमाकान्त आ जुगेसरक गप-सप्प सुजातो अढ़सँ सुनै छेली। दुनू गोरेक गप्पो सुनै छेली आ मने-मन विचारबो करै छेली। तखने हीरानन्द आ शशि शेखर सेहो टहलैत-बुलैत एला। दुनू गोरेकेँ बैसते रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहलखिन- “मास्सैब, खेतक झंझट तँ सम्पन्न भेल। बड़ बढ़ियाँ भेल। एकटा बात कहू जे जेते लोक गाममे अछि सभ अपन गाम कहैए किने?” हीरानन्द- “हँ। ई तँ कोनो नव नइ अछि। अदौसँ कहैत आएल अछि आ आगूओ कहैत रहत।” “जखन गाम सबहक छिऐ तँ गामक सभ किछु ने सबहक भेलइ?” “तइमे थोड़े गड़बड़ अछि। हँ! गड़बड़ ई अछि जे अखन धरि जे बनैत-बनैत समाज आ गाम अछि ओ टुटैत टुटैत खण्ड-पखण्ड भऽ गेल अछि। तँए एक-एककेँ जोड़ि कऽ समाज बनबए पड़त जे लगले नइ भऽ सकैए।” हीरानन्द बजिते रहैथ कि उत्तर दिससँ सुबुध आ दक्षिण दिससँ महेन्द्र आ बौएलाल सेहो आबि गेला। रमाकान्त बौएलालकेँ कहलखिन- “बौएलाल, आब तँ तूँ डाक्टर बनि गेलेँ मुदा तैयो ऐठाम सभसँ बच्चा तोँही छँह। जो, चाह बनौने आ।” डाक्टरक नाओं सुनि महेन्द्रो आ हीरानन्दो मने-मन खुश भेला। किएक तँ दुनू गोरेक पढ़ौल बौएलाल छिऐन। मुस्कियाइत बौएलाल चाह बनबए विदा भेल। रमाकान्त सुबुधकेँ कहलखिन- “सुबुध, जमीनक ठौर तँ लगि गेल, खाली पोखैर बँचल अछि। शशि नौजवानो छैथ आ पढ़लो-लिखल छैथे आ लूरियो छैन्हे। पोखैरमे माँछ पोसथु।” सुबुध- “बड़ सुन्दर विचार अपनेक अछि काका। हमहूँ यएह सोचै छेलौं जे गाममे तँ दुइयेटा चीज- माटि आ पानि अछि। तँए दुनूकेँ एहेन ढंगसँ उपयोग कएल जाए जे जहिना एक गोरेकेँ पाँचटा बेटा भेने पाँच गुना परिवार बढ़ि जाइ छइ। ..तहिना खेतो आ पानियोँक हुअए। ढंगसँ मेहनत आ नव तरीका अपनौल जाएत तँ मनुखे जकाँ ओहो पाँचो गुनाक रफ्तारसँ किएक ने आगू बढ़त। जँ एहेन रफ्तार पकैड़ लिअए तँ गामकेँ बढ़ैमे केते देरी लगत। बीस बीघासँ ऊपरे गाममे पानि अछि जे बैशाखो-जेठमे नइ सुखैए। अगर जँ महाग-अकालो पड़ि जाएत तैयो बोरिंगक सहारासँ उपैज सकैए। ..अखन धरि सभ पोखैर ओहिना पड़ल अछि। सौंसे पोखैरकेँ केचली-घास छारने छइ। ने नहाइ-जोकर अछि आ ने माछ-मखान उपजबै-जोकर। जे इलाका माछ-मखानक छी, ओइ इलाकाक लोककेँ माछ-मखान नै भेटै, केते लाजक बात छी। ऐ लाजक कारण की हम सभ नै छिऐ? जरूर छिऐ। भलेँ हरसी-दीरघी लगा अपनाकेँ निर्दोष साबित कऽ ली मुदा...। देखै छी जे किछु सुभ्यस्त परिवारकेँ तँ माछे-मखानक कोन बात जे अहूसँ नीक-नीक वस्तु भेटैए, मुदा विशाल समूहक गति की छइ? खाली जितिया पावैनमे माछसँ भेँट होइ छै आ कोजगरामे दूटा मखान देखैए! तँए मनुखकेँ खुशहाल बनैले वस्तुक परियाप्तता जरूरी अछि। जँ वस्तुक कमी रहत तँ खुशहाली औत केना?” सुबुध बजिते रहैथ कि बौएलाल चाह नेने आएल। चाह देखते कियो कुरुर करए उठला तँ कियो तमाकुल थुकरैले। जुगेसर चाह बँटए लगल। एक घोंट चाह पीब हीरानन्द महेन्द्रकेँ पुछलखिन- “डाक्टर साहैब, केते दिनक छुट्टीमे आएल छी?” हीरानन्दक प्रश्न सुनि महेन्द्र असमंजसमे पड़ि गेला। मने-मन सोचए लगला जे केना चिट्ठीक चरचा करब। चिट्ठीक बात तँ सोलहन्नी झूठ निकलल। जँ बेसी दिनक छुट्टीक चरचा करब तँ सेहो झूठ हएत। धड़फड़ाएले आएल छी। की कहिऐन आकि नइ कहिऐन। विचित्र स्थितिमे महेन्द्र पड़ि गेला। मुदा बिच्चेमे जुगेसर बाजल- “ऐंह मास्सैब! डाकडर साहैब तँ आला भऽ गेला। कोनो चीजक कमी नै छैन। जखन अपना गाड़ीमे चढ़ा कऽ बुलबै छला तँ बुझि पड़ै छल जे इन्द्रासनमे छी।” हीरानन्दक बात तर पड़ि गेलैन। मने-मन सोचलैन जे महेन्द्र भरिसक पिता दुआरे गुमकी लधने छैथ। सभ कियो चाह पीब-पीब गिलास बौएलालकेँ देलखिन। सभटा गिलास लऽ बौएलाल अखारैले कलपर गेल। तैबीच सुबुध महेन्द्रकेँ कहलखिन- “महेन्द्र भाय, गामक लोककेँ जे देह देखै छिऐ तइसँ की बुझि पड़ैए? बुझि पड़ैए ने जे किछु-ने-किछु रोग सभकेँ पछारने छइ। तँए सभकेँ जाँचि कऽ इलाज कए दियौ।” सुबुधक प्रश्न महेन्द्रकेँ जँचलैन, बजला- “अपनो विचार अछि। चारि-पाँच दिन जँचैमे लगत। सभकेँ जाँचि, जहाँ धरि भऽ सकत तहाँ धरि इलाजो कइए देबइ। आइ तँ भरि दिन दोसरे ओझरीमे ओझरा गेलौं मुदा काल्हिसँ ऐमे लगि जाएब।” शशि पुछलकैन- “डाक्टर साहैब, बुड़हा जे अपन सभ खेत बाँटि देलैन तइले अपनेकेँ..?” शशि शेखरक बात सुनि महेन्द्र मुस्कियाइत बजला- “दू भाँइ छी। दुनू भाँइकेँ पिताजी डाक्टर बना देलैन। ऐसँ बेसी एक पिताकेँ पुत्रक प्रति की बाँकी रहि जाइए जे किछु कहबैन।खेतक बात अछि, हम थोड़े खेती करए आएब। तखन तँ जे खेती करैबला छैथ जँ हुनका हाथमे गेलैन तँ ऐसँ बेसी उचित की होएत। बाबाक अरजल खेत छिऐन, जेकर हकदार तँ पितेजी छैथ। जँ अपन सम्पैत लूटाइए देलैन तइसँ हमरा की। ओनाहितो वैरागी पुरुषकेँ रागी बनाएब पाप छी।” पुनः शशि शेखर पुछलखिन- “मद्रासमे केहेन लगैए?” जेना किछु मन पाड़ए लगला तहिना थोड़ेक रूकि कऽ महेन्द्र बजला- “जहिया डाक्टरीक शिक्षा पेलौं तहिया नीक बुझि मद्रास गेलौं। मुदा अखन गामक सिनेह हृदैकेँ तेना पकैड़ लेलकहेँ जेना छातीमे लगल तीरसँ चिड़ै छटपटाइए तहिना छटपटाइ छी, होइए जे मद्रासक सभ किछु छोड़ि-छाड़ि अहीठाम रही। मुदा केतए-सँ जिनगीक लीला शुरू कएल जाए, ई गम्भीर प्रश्न अछि। ऐ प्रश्नक बीच मन ओझरा गेल अछि। स्पष्ट उत्तर नै भेट रहल अछि। किएक तँ ऐ प्रश्नक उत्तर दृष्टिकोणक मुताबिक भिन्न-भिन्न भऽ जाइए।” ◌ शब्द संख्या : 3770 13. गामक दुखताहक दुख जाँचि दबाइ देबाक समाचार गाममे पसैर गेल। काल्हि भिनसरसँ सभ टोलक दुखताहकेँ बेरा-बेरी जाँचो होएत आ दबाइयो देल जाएत। भिनसर होइते ओइ टोलक लोक आबए लगला जइ टोलक पार छेलैन। मरदक जाँच डाक्टर महेन्द्र करैथ आ स्त्रीगणक डाक्टर सुजाता। डाक्टर महेन्द्रक सहयोगी बौएलाल आ सुजाताक सुमित्रा। तीन दिनमे सौंसे गामक रोगीक जाँच भेलैन। दबाइयो भेटलैन। लोकक बीच एहेन खुशी दौग आएल जेना गामसँ बिमारीए पड़ा गेल होइ। सबहक मनक खुशी एक्के रंगक रूप बना नाचए लगल। मनमे एहेन खुशी जे आब ने हमरा देहमे कोनो रोग अछि आ ने मरब। खुशीक नाच एहेन छल जेना रोग देखिए कऽ भागि गेल होइ। मुदा जिनगीमे तँ इहेटा रोग तँ नहि, आरो बहुत तरहक अछि। मुदा ई तँ मनक बात छल। जँ ई मनक बात छी तखन वास्तविक बात की अछि, ओ तँ लोकेमे देखए पड़त। सभ दिन भलेसराकेँ देखै छेलिऐ जे दुखताहे अछि जइसँ काज-उद्यम छोड़ि देने छल मुदा आइ बड़का छिट्टामे छौर-गोबर नेने खेतमे फेकैले जाइत रहए। रस्तामे सोनमा पुछलकै तँ बाजल- “आब देहमे कोनो दुख नइ अछि। जाइ छी छाउरो फेक लेब आ गरमा धानो काटि कऽ नेने आएब।” तहिना तेतरो बहिंगामे गाँथि दूटा धानक बोझ कन्हापर उठेने अबैत रहए। सोनमाक मनमे नाचए लगलै जे एना केना भेलइ? देखै छिऐ जे लहेरियासराय असपतालमे छअ-छअ मास रोगीकेँ लोहाबला खाटपर रखि, सुइयो पड़ै छै आ गोलियो खाइले देल जाइ छै, तैयो मरि जाइए। मुदा ऐ गामक दुखताहक दुख केना एते असानीसँ पड़ा गेल!अजीव भेल! ओह! भरिसक दुख केकरा कहै छै से बुझबे ने करै छी। गुनधुनमे पड़ल सोनमाक मनमे उठल- जब अपने बुझबे नै करै छी तब बुझब केना। अपने सोचौ चाहब आ जँ गलतीए सोचा जाए तखन तँ गलतीए बुझब। गलती बुझब आ नइ बुझब, दुनू एक्के रंग। बिनु बुझलो काज लोक करए लगैए आ गलतियो करबे करैए। भलेँ दुनूक फल अधले होइ मुदा करै तँ ऐछे। एहेन स्थितिमे की करब? जेकरा बुझै छिऐ जे फल्लाँ बुझनिहार अछि जँ ओकरो नइ बुझल होइ आ झूठे अन्ट-सन्ट कहि दिअए। तेतबे नहि, जे बुझनिहारो अछि आ ओकरा पुछिऐ आ जँ ओ गलतीए कहि दिअए, तैयो तँ ओहिना रहि जाएब। मुदा तोहूमे तँ एकटा बात अछि जे ओ कहै आ हम करी आ तेकर फल जँ गलती होइ तखन दोखी के हएत? तब की करब? आब उमेरो ने अछि जे स्कूलोमे जा कऽ पढ़ब। धिया-पुता सभ स्कूलमे पढ़ैए...। गुनधुन करैत सोनमाक मन कहलकै- जखन स्कूल जाइबला रही तखन किए ने पढ़लौं? पढ़लौं केना नहि, स्कूलमे नाओं लिखौने रही। पाँच किलास तक तँ पढ़बो केलौं। तखन छोड़ि किए देलिऐ? छोड़लिऐ आकि मास्टर मारि कऽ छोड़ा देलक? मास्टर मारि कऽ किए छोड़ा देलक? जखन छअ किलासमे गेलौं आ अंग्रेजी मास्टर आबि कऽ पढ़बए जे बी.यू.टी. ‘बट’ आ पी.यू.टी. ‘पुट’, तहीपर ने कहने रहिऐ जे अहाँ गलती पढ़बै छिऐ। कोनो गलती कहने रहिऐ। जब गलती नै कहने रहिऐ तब ओ मारलक किए। नै पढ़बैक मन रहै तँ ओहिना कहितए जे तोरा नै पढ़ेबौ, स्कूलसँ चलि जो। मारलक किए? जँ मारबो केलक तँ हमरा मनकेँ तँ बुझा दइतए। अपन मन मानि लइत। मन मानि लैत, भऽ गेलइ। से तँ नै केलक। तँए ने हम मुरुख रहि गेलौं। नहि तँ हमर की हाथ-पएर कोनो पातर-छितर अछि जे दरोगा नहि बनलौं। हमर जे दरोगाक नोकरी गेल से ओ मास्टर हमरा देत जे मारि कऽ स्कूल छोड़ा देलक? धिया-पुतामे सएह भेल, चेतनमे तहिना देखै छी। आब केना जीब? तर्क-वितर्क करैत सोनमाकेँ शंका भेलै- भरिसक हमरो ने तँ बतहा दुख पकैड़ लेलकहेँ मुदा केकरासँ पुछबै, के कहत, सभकेँ तँ सएह देखै छिऐ। की हम भरि जिनगी हरे जोतैत रहब, घोड़ापर चढ़ि कऽ शिकार खेलैले कहिया जाएब..? दुनू हाथ माथपर लऽ सोनमा गाछक निच्चाँमे बैसल गुनधुनमे पड़ल सोचैत-विचारैत रहए, जहिना आमोक गाछ रोपल जाइ छै तहिना तँ खएरो-बगुरक रोपल जाइ छइ। जइसँ आममे मीठहा फल फड़ै छै आ खएर-बगुरमे काँट होइ छइ। मुदा रोपैक इलम तँ एक्के होइ छइ। ओना, अनेरुओ होइ छइ। आमोक गाछ अनेरुओ होइ छै आ खएरो-बगुरक। साते दिनक छुट्टीमे महेन्द्र गाम आएल छला जे आठ दिन पहिनहि बीति गेलैन। मद्रास अबै-जाइक रस्ता सेहो पाँच दिनक अछि। छुट्टी बढ़बए पड़तैन। काल्हि भोरका गाड़ीसँ चलि जेता, ई बात सुबुधोकेँ बुझल छेलैन। तँए सुबुधक मनमे एलैन जे महेन्द्र बच्चेक संगी छी मुदा भरि मन गप एक्को दिन नै केलौं। काल्हि भोरमे चैलिए जाएत। तँए आइए भरि समए अछि। ..ई सोचि सुबुध अपन सभ काज छोड़ि महेन्द्रसँ गप करए एला। दरबज्जापर बैस महेन्द्र पिताकेँ कहैत रहथिन- “बाबू, गामक जेते रोगीकेँ जँचलौं ओइमे एक्को गोरे पैघ रोग जेना टी. वी., कैंसर, एड्स इत्यादिसँ ग्रसित नइ अछि। आश्चर्य लगैए जे बिमारी शहर-बजारमे धरहल्लेसँ होइए, ओइ रोगक नामो-निशान गाममे नइ अछि। बहुत खुशीक बात छी।” महेन्द्रक रिपोर्ट सुबुधो सुनलैन। ‘खुशीक बात’ सुनि रमाकान्त पुछलखिन- “तखन जे एते लोक बिमार अछि ओकरा कोन रोग छइ?” मुस्कियाइत महेन्द्र बजला- “साधारण रोग। जे बिना दबाइयो-दारूसँ ठीक भऽ सकै छइ। अगर ओकर खान-पान सुधैर जाइ तँ ई सभ रोग लोककेँ नै हेतइ। अदहासँ बेसी रोगी ओहेन अछि जेकरा कोनो रोग नहि, सिरिफ शंका छइ। मुदा जँ ओकरा दुइयो-चारिटा गोली नै दितिऐ तँ मन नै मानितै। तँए पुरजो बना देलिऐ आलासँ छातियो जाँचि लेलिऐ आ दू-चारिटा गोलियो दऽ देलिऐ। महेन्द्रक बात सुनि रमाकान्तो आ सुबुधो मने-मन हँसए लगला। हँसी रोकि सुबुध महेन्द्रकेँ पुछलखिन- “महेन्द्र भाय, काल्हि तँ तूँ चलि जेबह, फेर कहिया भेँट हेबह कहिया नहि, तँए तोरेसँ गप-सप्प करैले अपन सभ काज छोड़ि एलौं। जिनगीक तँ ढेरो गप होइत मुदा तोँ डाक्टर छिअ आ हम शिक्षक छेलौं, जे आब नइ छी। मुदा रोगक कारण बुझैक जिज्ञासा तँ जरूर अछि। तँए अखन रोगेक सम्बन्धमे किछु बुझए चाहै छी।” “की?” “पहिल सवाल बताहेक लएह। जखन बताह दिस तकै छी तँ बुझि पड़ैए जे जेते मनुख अछि सभ बताह अछि।” धड़फड़ा कऽ रमाकान्त बिच्चेमे पुछि देलखिन- “से केना?” सुबुध कहलकैन- “काका, जे एक नम्बर प्रशासक छैथ, जे एक इलाकासँ लऽ कऽ देश भरिक शासनमे दक्ष रहै छैथ, ओ परिवारक शासनमे लटपटा जाइ छैथ। तहिना देखै छी जे जे बड़का-बड़का हिसाबी गणितज्ञ छैथ ओ जिनगीक हिसाबमे फेल भऽ जाइ छैथ। तहिना देखै छी, जे बड़का-बड़का इंजीनियर छैथ ओ परिवारक नक्शा बनबैमे चूकि जाइ छैथ। नेताक तँ कोनो बाते नहि। किएक तँ जहिना गोटे साल मानसुन अगते उतैर खूब बरसैए जइसँ बेंगक वृद्धि अधिक भऽ जाइ छै तहिना ओकरो छइ। मुस्कियाइत रमाकान्त बजला- “हँ, ठीके कहै छहक!” “तेतबे नइ काका, कियो ताड़ी-दारू पीबै पाछू बताह अछि, तँ कियो धनक पाछू। कियो पढै़क पाछू बताह रहैए, तँ कियो ऐश-मौजक पाछू। कियो खाइ पाछू बताह, तँ कियो ओढ़ै-पहिरै पाछू। कियो काजेक पाछू बताह रहैए, तँ कियो अरामेक पाछू। कियो खेले-कुदक पाछू बताह रहैए, तँ कियो नाचे-तमाशाक पाछू। एते बताहक इलाज केतए हएत? तेतबे नहि, एक रंगक बताह दोसरकेँ बताह कहै छै आ दोसर तेसरकेँ। तहिना कियो शरीरक रोगसँ दुखित वा रोगी कहबैए तँ कियो अन्नक अभावसँ, तँ कियो वस्त्रक अभाव वा घरक अभावसँ दुखी अछि। तहिना कियो कोनो उकड़ू बात सुनलासँ दुखी भऽ जाइए। ऐ दृष्टिए जँ देखल जाए तँ केते लोक निरोग अछि? तेतबे नहि, जँ एक-एक गोरेमे देखल जाए तँ कए-कएटा रोग धेने छइ। मुदा ई सभ ऊपरी बात भेल। मूल प्रश्न अछि जे वसन्त-ऋृतुक गुलाब जकाँ जिनगी सभदिन फुलाइत रहए, जे...।” ‘गुलाबक फूल जकाँ जिनगी केना फुलाइत रहत’ सुनि डाक्टर महेन्द्र नमहर साँस छोड़लैन। आँखि उठा सुबुधक आँखिपर देलैन। सुबुधक नजैरसँ नजैर मिलते जेना महेन्द्रकेँ बुझि पड़लैन जे अथाह समुद्रमे सुबुध हेल रहला अछि। आ हम छोट-छीन पोखैरमे उग-डुम कऽ रहल छी। ई बात मनमे अबिते महेन्द्र माए-बापसँ लऽ कऽ अपन भैयारी होइत धिया-पुता दिस नजैर दौड़ौलैन। केते आशासँ पिताजी हमरा दुनू भाँइकेँ पढ़ौलैन मुदा हम हुनकासँ केते दूर हटि कऽ रहै छी। एते दूर हटल रहलापर केना हुनका सेवा कऽ सकबैन। आब हुनका सेवाक जरूरत दिनो-दिन बेसीए होइत जेतैन। उमेरो अधिक भेलैन आ दिनानुदिन बढ़िते सेहो जेतैन। जेते उमेर बढ़तैन तेते शरीरक अंग कमजोर होइत जेतैन। जेते अंग कमजोर हेतैन तेते शरीरक क्रियामे रूकाबट औतैन। जइसँ केतेको नव-नव रोग शरीरमे प्रवेश करतैन। जेते रोग शरीरमे प्रवेश करतैन तेतेक कष्ट हेतैन...। की ओइ कष्टक जिम्मेदार हम नै हेबइ? हएब। मुदा तइले करै की छी? किछु नहि!अखन हम सभ दुनू भाँइ आ दुनूक पत्नी जुआन छी मुदा किछु दिनक उपरान्त तँ हमहूँ सभ हुनके जकाँ बुढ़ हएब। कोनो जरूरी नइ अछि जे हमरो सबहक बेटा हमरे सभ लग रहत। अखन तँ हम देशेमे छी। अन्तर एतबे अछि जे देशक एक छोरपर माए-बाबू छैथ आ दोसर छोरपर अपने छी। मुदा आइक जे हवा बहि रहल अछि जे आन-आन देश जा लोक नोकरी करैए आ जीवन-यापन करैए। जँ कहीं हमरो संगे सएह हुअए तखन की हएत..? महेन्द्रक चेहरा उदास हुअ लगलैन। मन वौआए लगलैन। देहसँ पसेना निकलए लगलैन। बुझि पड़ए लगलैन जे देह शक्ति विहीन भऽ रहल अछि। एक्को पाइ लज्जैत देहमे ऐछे नहि। ..पसेनासँ तर-बत्तर होइत महेन्द्र सुबुधकेँ कहलखिन- “सुबुध भाय, जिनगीक अजीव रस्ता अछि। जेते मनुख ऐ धरतीपर जन्म नेने अछि, ओकरा तँ जिनगी बितबए पड़तै। मुदा जिनगीक रस्ता एहेन पेंचगर अछि जे बिरले कियो-कियो बुझि पबैए, बाँकी सभ औनाइते रहि जाइए।” मुस्कियाइत सुबुध बजला- “महेन्द्र भाय, अहाँ तँ डाक्टर छी। पढ़ल-लिखल लोकक बीच सदिखन रहबो करै छी। अहाँ किए एहेन बात कहि रहल छी? हम तँ जाबे मास्टरी केलौं ताबे धिया-पुताकेँ पढ़ेलौं आ जखन नोकरी छोड़ि गाममे रहै छी तखन जेहेन समाजमे रहै छी से देखबे करै छी।” महेन्द्र- “भाय, अहाँ जे बात कहलौं ओ तँ आँखिक सोझमे जरूर अछि मुदा अहाँमे मनुख चिन्हैक आ ओकर चलैक रस्ताक लूरि जरूर अछि। अहाँ अपनाकेँ छिपा रहल छी।” महेन्द्रक बात सुनि रमाकान्तकेँ मनमे उठलैन- जे आदमी घरसँ हजारो कोस दूर हटि कमा कऽ एते बनेलक ओ अपनाकेँ एते कमजोर किए बुझि रहल अछि? मुदा दुनू संगीक बीच नै आबि रमाकान्त गुम्मे रहला। बैसले-बैसल एक नजैर महेन्द्रकेँ देखैथ आ एक नजैर सुबुधकेँ। अपनाकेँ छिपाएब सुनि सुबुध बजला- “महेन्द्र भाय, जइ प्रश्नक बीच अहाँ ओझरा रहल छी ओ प्रश्न ओतेक ओझराएल नइ अछि। मुदा असानो नइ अछि। सिरिफ आँखिमे ज्योति आनि देख-देख कऽ चलैक अछि।” दलानक आँगन दिसक भितुरका कोठरीमे बैस सुजाता खिड़की देने सभकेँ देखबो करै छेली आ गपो-सप्प सुनै छेली। कखनो मनमे खुशियो अबै छेलैन तँ कखनो मन करुएबो करैन। मुदा किछु बाजैथ नहि। बाजब उचितो नइ बुझै छेली। ओना, पढ़ल-लिखल रहने,कखनो-कखनो बजैक मन जरूर होइ छेलैन। मुदा किछुए दिनमे सासु मिथिलाक रीति-रेवाज आ बेवहारक सम्बन्धमे तेना कऽ बुझा देलकैन जे ‘मद्रासक सुजाता’, ‘मिथिलाक सुजाता’ बनि गेली। जइसँ मुँहपर नुआ रखब तँ उचित नइ बुझैथ मुदा बाजब-भुकबपर नजैर जरूर रखए लगली। किनकासँ कोन ढंगे बाजी, केते अवाजमे बाजी, कोन शब्दक प्रयोग करी, ऐ सभपर नजैर अबस्स रखए लगली। तँए सुजाताक बोली संयमित भऽ गेल रहैन। ओना, ऐठामक चालि-ढालि पूर्ण रूपे अंगीकार नै कऽ सकल छेली मुदा अंगीकार करैक पूर्ण चेष्टा तँ करिते छेली। सुबुधक ऊट-पटाँगों बातसँ महेन्द्रकेँ दुख नइ होइ छेलैन। हल्लुको बातमे ओ गम्भीर रहस्यक अनुमान करए लगला। भलेँ ओ गम्भीर नहि, हल्लुके किएक ने होइ। महेन्द्रक गम्भीर मुद्रा देख सुबुधकेँ बुझि पड़लैन जे आब ओ गम्भीर बात बुझैक चेष्टामे उताहुल भऽ रहल छैथ तँए जिनगीक गम्भीर बातकेँ खोलि देब उचित होएत। बजला- “महेन्द्र भाय, अपना गाममे सभसँ अगुआएल परिवार अहाँक अछि। चाहे धन-सम्पैतक हुअए वा पढ़ाइ-लिखाइ। मुदा कनी गौर करि कऽ देखियौ जे एतेक धन-सम्पैतक उपरान्तो धनेक पाछू घरसँ हजारो कोस हटि कऽ रहै छी। अहीं कहू जे केते धन भेलापर मनमे संतोख होएत। मुदा ऐ प्रश्नक दोसरो पक्ष अछि, ओ अछि, ‘विश्व-बन्धुत्व’क विचार। अपनो ऐठामक महान-महान चिन्तक ऐ विचारकेँ सिरिफ मानबे नै केलैन बल्कि बनबैक प्रयासो केलैन। ओना, सैद्धान्तिक रूपमे विश्व-बन्धुत्वक विचार महान अछि मुदा जेते महान अछि ओइसँ कनियोँ कम बेवहारिक बनबैमे असान नइ अछि। लोक गामक वा आन गामक देवस्थानमे दीप जरबैसँ अर्थात् साँझ दइसँ पहिने अपना घरक गोसाँइ-आगूमे दीप जरबैए, जे उचिते नहि गम्भीर विचारक दिग्दर्शन सेहो छी। तहिना सभकेँ अपना लगसँ जिनगीक लीला शुरू करक चाहिऐ। अपनासँ आगू बढ़ि समाज, समाजसँ आगू बढ़ि इलाका, इलाकासँ आगू बढ़ि देश-दुनियाँ दिस बढ़ैक चाहिऐ। जँ से नै कऽ कियो परिवार-समाज छोड़ि आगू बढ़ि करैए तखन केतौ-ने-केतौ गड़बड़ जरूर हेतइ। जहिना दुनियाँमे समस्याग्रस्त मनुख असंख्य अछि तहिना तँ ओइ समस्यासँ मुकबलो करैबला मनुख असंख्य छैथ। एक्के आदमीक केलासँ तँ दुनियाँक समस्या नै मेटा सकत। तँए, जे जेतए जन्म नेने छैथ ओ ओतइ इमानदारी आ मेहनतसँ कर्ममे लगि जाइथ।” सुबुधक प्रश्नकेँ स्वीकार करैत महेन्द्र बजला- “हँ! ई दायित्व तँ मनुखमात्रक छी।” सुबुध- “जखन ई दायित्व सभ मनुखक छी तखन अपने गाममे देखियौ- ऐ सालसँ, जखन सभकेँ खेत भेलै, थोड़-बहुत खुशहाली गाममे आएल। मुदा ऐसँ पहिने तँ देखबे करै छेलिऐ जे ने सभकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छेलै, ने भरि देह वस्त्र आ ने रहैले सुरक्षित घर छेलइ। ओना, अखनो नै छै आ ने रोग-बियाधिसँ बँचैक सुरक्षित उपाय। बाजू, छेलै की नै छेलइ?” धीमी स्वरमे डाक्टर महेन्द्र बजला- “हँ से तँ ठीके।” “आब अहीं कहू जे हमर-अहाँक जन्म तँ अही समाजमे भेल अछि। की हम ओते कमजोर छी जे गाम छोड़ि पड़ा जाइ, पड़ाइक मतलब जेतए पेट भरत ओतए जाएब। जँ कियो पड़ाइए तँ ओकरा कायर-कामचोर छोड़ि की कहबै? मुदा तैयो लोक जाइ किए अछि?एकरो कारण छइ। एकर कारण छै अधिक पाइ कमाएब वा कम मेहनतसँ जिनगी जीब। मुदा कम मेहनत आ असानीसँ जिनगी जीनाइ ताधैर सम्भव नइ अछि, जाधैर मेहनतसँ देशकेँ समृद्धिशाली नहि बना लेब। अगर जँ किछु गोरेकेँ समृद्धशाली भेने देशकेँ समृद्धशाली बुझब तँ ओ बुझनाइ नेने-नेने गुलामीक जीनजीरमे बान्हि देत। कोनो देश गुलाम नै होइए, गुलाम होइए ओइ देशक मनुख आ गुलाम होइ छै ओकर जिनगीक क्रिया। पाइबला सबहक जादू समाजमे ओइ रूपे चलि रहल अछि जे जहिना हम-अहाँ पोखैरमे कनी बोर दऽ बनसी पाथि दइ छिऐ आ नमहर-नमहर माछ खेनाइक लोभे फँसि जाइए तहिना मनुखोक बीच चलि रहल अछि। जेकरा नजैर गड़ा कऽ देखए पड़त।” सुबुधक विचारकेँ महेन्द्र मुड़ी डोला मानि लेलैन। मुदा मुड़ी डोलौला पछाइतो मनमे किछु शंका रहबे करैन। जे मुँहक हाव-भावसँ सुबुध बुझि गेलखिन। पुनः अपन विचारकेँ आगू बढ़बैत सुबुध बजला- “अपना ऐठामक दशा देखियौ। जेकरा अपना सभ क्रीम ब्रेन कहै छिऐ, ओ छी वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाक्टर इत्यादि। ओ सभ आन-आन देश जा अपन बुधिकेँ पाइबलाक हाथे बेच लइ छैथ। भलेँ किछु अधिक पाइ कमा लैत हेता मुदा ओ ओइ धनिककेँ आरो धन बढ़बै छैथ जे नव-नव मशीन, नव-नव हथियारक अनुसंधान कऽ कऽ पछुएलहा देशपर आक्रमण कऽ वा बेपारिक माल बेच आरो पछुअबैए। एकटा सवाल आरो मनमे अबैत होएत। ओ ई जे अपना देशमे ओतेक साधन नइ अछि जे ओ अपन बुधिक सदुपयोग कऽ सकता। तँए अपन बुधिक सदुपयोग करैले आन देश जाइ छैथ। मुदा हमरा बुझने ऐ तर्कमे कोनो दम्म नइ अछि। आइ धरिक जे दुनियाँक इतिहास रहल ओ यएह रहल जे सम्पन्न देश सदिखन कमजोर देशकेँ माने पछुआएल देशकेँ लूटैत रहलै। चाहे लड़ाइक माध्यमसँ होइ वा बेपारक माध्यमसँ। जइसँ जेहो सम्पैत-साधन ओइ देशकेँ रहत, ओहो लूटा जाइए। जखन ओ लूटा जाएत तखन आगू-मुहेँ केना ससरत?” माथ कुड़ियबैत महेन्द्र बजला- “तखन की करक चाही?” सुबुध- “आँखि उठा कऽ देखियौ जे दुनियाँमे कियो बिना अ-आ पढ़ने विद्वान बनि सकल। वा बनि सकै छैथ? जँ से नहि, तखन पछुआएल देश वा लोक केना बिना कठिन मेहनत केने आगू बढ़ि सकैए? ..तँए पछुआएल देशक लोककेँ ऐ बातकेँ बुझए पड़तैन। जँ से नइ बुझि अगुएलहाक अनुकरण करता तँ पुनः गुलामीक बाटपर चढ़ि जेता। केते लाजिमी बात छी जे हम अपने बनौल हथियारसँ अपने घाइल होइ। आब दोसर दिस चलू...।” डाक्टर महेन्द्रक चेहरा दिस देखैत पुन: सुबुध बाजए लगला- “अपना ऐठाम जे परिवारिक ढाँचा अदौसँ रहल ओ दुनियाँमे सभसँ नीक रहल अछि। आइक चिन्तनमे दुनियाँ परिवारवाद दिस बढ़ल अछि। जे हमरा सबहक संयुक्त परिवारक धरोहर रूपमे अछि। मनुखक जिनगी केतेटा होइ छै, ऐपर नजैर दियौ। तीन अवस्था तँ सबहक होइ छइ। बच्चा, जुआनी आ बुढ़ाड़ीक। ऐमे दू अवस्था बच्चा आ बुढ़ाड़ीमे सभकेँ दोसराक मदैतक जरूरत पड़ै छइ। जे एकाकी परिवारमे नइ भऽ पाबि रहल अछि। आइक जे एकाकी परिवार बनि गेल अछि, ओ कुम्हारक घराड़ी जकाँ भऽ गेल अछि। जहिना कुम्हारक घराड़ी बेसी दिन धरि असथिर नै रहैत तहिना भऽ रहल अछि। बाप-माए केतौ, बेटा-पुतोहु केतौ आ धिया-पुता केतौ रहए लगल अछि। मानवीय सिनेह नष्ट भऽ रहल अछि। सभ जनै छी जे काँच बरतन जकाँ मनुख होइए। कखन की ऐ शरीरमे भऽ जाएत तेकर कोनो गारंटी नहि। स्वस्थ अवस्थामे तँ मनुख केतौ रहि जीब सकैए मुदा अस्वस्थक अवस्थामे तँ से नइ भऽ सकैत अछि। तखन केहेन कष्टकर जिनगी मनुखक सामने उपस्थित भऽ जाइ छइ। तोहूपर तँ नजैर दिअ पड़त।” सुबुधक विचार महेन्द्रकेँ झकझोड़ि देलकैन। देहमे कम्पन आबि गेलैन। बोली थरथराए लगलैन। कनी काल धरि असथिर भऽ मनकेँ थीर केलैन। मन थीर होइते महेन्द्र बजला- “सुबुध भाय, भलेँ हाइ स्कूल धरि संगे-संग पढ़लौं मुदा जिनगीकेँ जइ गहराइसँ अहाँ चिन्हलौं ओ हम नै चीन्हि सकलौं। सच पुछी तँ आइ धरि अहाँकेँ साधारण हाइ स्कूलक शिक्षक मात्र बुझै छेलौं मुदा ओ भ्रम छल। संगी रहितो अहाँ गुरु छी। कखनो काल, जखन एकांत होइ छी, अपनो सोचैत रहै छी जे एतेक कमाइ छी, मुदा तैयो दिन-राति खटैत-खटैत बेचैने किए रहै छी, कखनो चैन किए ने भऽ पबै छी। कोन सुखक पाछू बेहाल छी से बुझिए ने रहल छी। टी.भी. घरमे अछि मुदा देखैक समए नइ भेटैए। खाइले बैसै छी तँ चिड़ै जकाँ दू-चारि कौर खाइत-खाइत मन उड़ि जाइए, जे फल्लाँकेँ समए देने छिऐ, नै जाएब तँ आमदनी कमि जाएत। तहिना सुतैयोमे होइए। मुदा एते फ्रिसानीक लाभ की भेटैए तँ सिरिफ पाइ। की पाइए जिनगी छी..?” महेन्द्रक बदलल विचार सुनि, मुस्कियाइत सुबुध बजला- “भाय, पाइ जिनगी चलबैक मात्र साधन छी, नइ कि जिनगी। पाइक भीतर एते पैघ दुर्विचार छिपल अछि जे मनुखकेँ कुकर्मी बना दइए। कुकर्मी बनलापर मनुषत्व समाप्त भऽ जाइ छइ। जइसँ चीन-पहचीन सेहो समाप्त भऽ जाइ छै। तेतबे नहि, अपराधिक वृत्ति सेहो पनपए लगै छइ। अपराधिक वृत्ति मनुखमे एलापर पैघ-सँ-पैघ अपराधमे स्वत: धकला जाइए। तँए अपन जिनगीकेँ देखैत परिवार आ समाजक जिनगी देखब जिनगी छी। ओना, मनुख मात्रक सेवा-ले सेहो सदिखन तत्पर रहक चाही, जहाँ धरि भऽ सकए, करबो करी। मुदा कर्मक दुनियाँ बड़ कठिन अछि। एतेक कठिन अछि जे कर्मठ-सँ-कर्मठ लोक रस्तेमे थाकि जाइ छैथ। मुदा ओ थाकब हारब नहि, जीतब छी। जे समाज रूपी गाछ मौला गेल अछि ओइ जड़िमे तामि-कोरि-पटा कऽ नव जिनगी देबाक अछि। जइसँ ओ अनवरत फुलाइत रहत। ऐ काजमे अपनाकेँ समरपित कऽ देबाक अछि।” सुबुधक संकल्पित विचारसँ महेन्द्रक विचार सक्कत बनए लगलैन। आँखिमे प्रखर ज्योति आबए लगलैन। दृढ़ स्वरमे पितो आ सुबुधोकेँ कहलखिन- “दुनू गोरेक बीच बजै छी जे सालमे एक्को दिन ओहेन नै बँचत जइ दिन हमरा चारू गोरेमे सँ कियो-ने-कियो ऐठाम नै रहब। ओना,मद्रासोमे अज-गज बहुत भऽ गेल अछि, ओकरो छोड़ब नीक नै होएत मुदा परिवारो आ समाजोकेँ नइ छोड़ब। मद्रासक कमाइ परिवारो आ समाजोमे लगाएब। अखन तँ ओते अनुभव नइ अछि मुदा चाहब जे समाजमे बिमारी-ले जे खरच हएत ओ पूरा करब। जहिना पिताजी समाजकेँ खाइक ओरियान कऽ देलखिन तहिना हमहूँ स्वस्थ्य-ले ओरियान जरूर करब। समाजकेँ कहि दियौन जे जिनका किनको कोनो रोग बिमारी होइ ओ आँखि मूनि कऽ ऐठाम चलि अबैथ। हुनकर इलाजक सेवा जरूर हेतैन। ऐ बेर बिना निआरे गाम आएल छेलौं तँए किछु लऽ कऽ नहि एलौं। मुदा कहै छी जे जहाँ धरि रोग जँचैक औजारक जोगार भऽ सकत ओ मद्रास जाइते पठा देब। तत्काल अखन भाबो गामेमे रहती। बौएलाल आ सुमित्रा सेहो रहबे करत। आब जे आएब ओ बेसी दिन-ले आएब। आ ऐठाम आबि अधिक-सँ-अधिक गोरेकेँ चिकित्साक ज्ञान करा गामसँ रोगकेँ भगा देब। समाज हम्मर छी आ हम समाजक छिऐ।” ◌ शब्द संख्या : 3095 (2004 ईस्वी) [1] बेल [2] परिवार आ इलाज [3] हीरानन्दक पत्नी [4] बहिन, स्त्री आ सारि [5] बाजा, लोटा, गिलास ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविता (अनुवाद-भावानुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) ३.२.आशीष अनचिन्हार- ३ टा गजल ३.३.१. जगदीश चंद्र ठाकुर- गजल- २. लालदेव कामत- कविता- उर्फ नाम ३.४.१. राम प्रीत पासवान- कविता- भूतक बाप पिशांच उर्फ आशारामक जोड २. किशन कारीगर- इस्कूल पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविता (अनुवाद-भावानुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) प्रस्तुत अछि पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविताक अनुवाद-भावानुवाद। एहन समय जखन कि अधिकांश वर्तमान कविता नमहर, रसहीन ओ रीढ़हीन भेल जा रहल अछि ओतहि पंकज जीक मात्र किछु शब्दक कविता लीखि चमत्कार आनि दै छथि। एकटा पाठकक दृष्टिसँ देखी तँ कम शब्दक कविता नमहर कविताक अपेक्षा बेसी प्रभावकारी रहैत छै। तँइ पुरान आचार्य सभ महाकाव्यमे दोहा, सोरठा ओ अन्य छोट छंदक प्रधानता दैत छलाह जाहिसँ विविधता अबै छलै आ पाठक बान्हल रहैत छल। पंकजजीक कविता प्रकरांतरसँ मुक्त छंदमे रहितों कथित मुक्त छंदक कवितासँ बेसी लयबद्ध ओ समयबद्ध दूनू अछि। विदेहक पाठककेँ अनिवार्य रूपसँ एहन कविता सभ पढ़बाक चाही तँइ ई अनुवाद हम अनलहुँ। पहिने हिनक डायरीक अनुवाद दऽ रहल छी आ तकर बाद कविताक एनासँ कविताक प्रभाव दुगुन्ना भऽ जाएत से हमरा विश्वास अछि कारण पंकजजीक डायरी सभ आत्मकथ्य सन अछि आ पाठक ओकरे सहारे कविताक मर्म धरि पहुँचताह से हमरा उम्मेद अछि (आशीष अनचिन्हार) डायरी खंड डायरी--1 रचनाकारकेँ आलोचना आ भूमिगत आलोचना दुन्नूक सामना करबाक चाही। डायरी--2 सार्थक कविकेँ कोनो आन कवि या गुटसँ नै खाली अपने कवितासँ खतरा होइत छै। डायरी--3 आलोचनामे अनिवार्य रूपसँ धार हेबाक चाही। मिरचाइ जँ कड़ुगर नै हो तँ लगै छै जेना दूभि चिबा रहल होइ। डायरी--4 जँ जिम्मेदारी हो तँ आलोचना कठिन काज थिक आ जँ जिम्मेदारी नै हो तँ आलोचनासँ हल्लुक काज कोनो नै। डायरी--5 कोनो समाद जँ बेसी मिठगर हो तँ बूझि लिअ जे कोनो सचकेँ झाँपि देल गेल अछि। डायरी--6 तर्कसँ संचालित प्रशंसा आलोचना थिक। डायरी--7 समर्थ आलोचक अपन रचनाकार ताकि लै छै मुदा असमर्थ आलोचक रचनाकारक भीड़मे फँसि जाइत छै। डायरी--8 मारए बलाकेँ मोनमे कोनो लाज-संकोच नै होइ छै। ने मारए काल ने ओहन परिस्थिति तैयार करबा काल। डायरी--9 अहाँक खिद्धांससँ कियो छोट नै भऽ सकैए हँ कनी काल लेल अहाँक विशालताक लग ओ छोट बुझा सकैए। डायरी--10 साहित्यमे कहियो देरी नै होइ छै मने जे अहाँ कोनो समय साहित्यक कोनो बिंदुपर पहुँचि सकै छी। डायरी--11 यांत्रिक मार्क्सवादक प्रतिक्रियामे जन्मल उत्तर यांत्रिक मार्क्सवाद बेसी खतरनाक अछि। कविता खंड 1 इच्छा संबंधक साँझमे ओहने इजोत रहए जेहन छल संबंधक भोरमे (मूल शीर्षक-हसरत) 2 इमरजेंसी आबिए जाइ छै इमरजेंसी आ कहै छै हम ओहन नै छी जे केने रहै बदमाशी केने रहै जीवनक चक्का जाम आबि गेलहुँ हम अइ बेर अहाँक संगे प्रेम करबाक लेल (मूल शीर्षक-इमरजेंसी) 3 दुख असहमति नै भेटए कतहुँ से चाहै छै सत्ता देशकेँ दुख होइ छै किए अपनाकेँ सौंपि देलहुँ एहन लोक लग (मूल शीर्षक-अफ़सोस) 4 मतलब जखन कोनो अपराधी कहै छै जे ओकरा मोनमे देशक कानून, संविधान लेल आदर छै तखन बुझू जे ओ साफ-साफ कहैए जे कानून ओकरा छोड़ेबामे मदतिए नै करतै छोडियो देतै (मूल शीर्षक-आशय) 5 इशारा प्रजा पुछलकै- अहाँ की सभ देब हमरा राजा उत्तर देलकै- हमर मानब अछि जे छीनिए कऽ देल जा सकैए किछु हम तोहर खेत छीनि कऽ कारखाना बलाकेँ दऽ देलियै तेनाहिते तोरा लेल हम बगल बला देशसँ छीनि कऽ देबौ ओना ई युद्धक इशारा छल मुदा प्रजा ई जानि राजाक जैकार केलक जे राजा प्रतापी थिकाह युद्धसँ हमरे भलाइ करता (मूल शीर्षक-इशारा) 6 उदारवादी राजाकेँ अपन राज्यक खराप व्यवस्थाक ओतेक चिंता नै छलै जतेक ऐ बातक छलै जे प्रजा विरोध करैए अंतमे ओ घोषणा केलक हम उदारवादी छी हम सभहँक विरोधक स्वागत करै छी व्यवस्था ओहने रहि गेल (मूल शीर्षक-सदिच्छा) 7 पराक्रमी कलाकार लोकतंत्रमे शासन करबाक एकटा एहनो तरीका छै कि शासन आ शिकार करबामे कोनो फर्क नै रहए मने मारू आ नुका जाउ पापक भागी देखए बला ऐठाम मारब पराक्रम भेल आ नुका जाएब कला आ जे एहन कऽ सकथि से पराक्रमी कलाकार (मूल शीर्षक-तरीका) 8 कहियो-कहियो कहियो-कहियो विपक्ष सेहो सत्ताक लग-लगीचमे रहैत छै आ सत्ता विपक्षक उप मने जे लगीचमे तँ हो मुदा ठीक ओहने नै हो जेना नगरक लगीचमे उप-नगर प्रधानमंत्रीक लगीचमे उप-प्रधानमंत्री ओनाहिते उप-सत्ता सेहो रहैत छै आ उप-विपक्ष सेहो (मूल शीर्षक-इतिहास में कभी-कभी) 9 जाँचि लेब जँ सत्ता अहाँक स्वागत कि प्रशंसा करए तँ जाँचि लेब जे अहाँ ओ जनताक माँझ कतेक दूरी बढ़ि गेल अछि ओना हमरा बूझल अछि जे अहाँ लेल देश जनता नै कोनो भू-खंड अछि (मूल शीर्षक-देखना) 10 उम्मेद अहाँ हमर लिखलसँ सहमत हेबे करब तइ लेल नै लीखै छी हम ओहू दुआरे लीखै छी जे हमर लिखल चाँछैत चलि जाए जँ हमर लिखल आलोचनासँ अहाँकेँ दुख पहुँचल तँ हमरा लग ई उम्मेद अछि जे एखनो बचि सकैए सर-समाज (मूल शीर्षक-प्रत्याशा) 11 जन्मदिन जन्मदिनक खुशी अइ लेल होइ छै जे जतेक दिन जीबऽ देलक सएह बहुत (मूल शीर्षक-जन्मदिन) 12 विपत्ति सौंदर्य कि सौंदर्य-बोधक अभाव लेल प्रयास नै करऽ पड़ैत छै ई तँ अपना-आपमे एकटा विपत्ति छै जे चारू दिशा उनचासो पवन संग आबि जाइत छै (मूल शीर्षक-विपत्ति) 13 अमानुषिकताक संबंध जखन शासकक मूँहपर एकै संग देखै छी शांति आ चिंता तँ हम बुझै छी जे ओकर अमानुषिकताक संबंध धर्मशास्त्र ओ इतिहासक ओइ पोथी सभसँ छै जे किछु दिनक बाद लिखल जेतै (मूल शीर्षक-शासक का चेहरा) 14 माए गै माए बड़का-बड़का मुद्दासँ शुरू केने छलही अध्याय बीचमे चाह अंतमे गाए माए गै माए (मूल शीर्षक-हाय) 15 अपन प्रजा मचल छलै हाहाकार काहि काटि कऽ मरि रहल छल लोक तखनो मंत्री कहै छलै- "अपन प्रजा खुशहाल अछि" आब राजा खुश छल जे ई कननाइ ओइ प्रजाक अछि जे हमरा नै चुनलक (मूल शीर्षक- मुद्रा के अभाव में) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार ३ टा गजल 1 सेज सजिते इजोरिया एलै घोघ उठिते इजोरिया एलै मूँह हुनकर अतेक सुंदर जे बात बजिते इजोरिया एलै आँखि झुकलै इजोरिया भागल आँखि उठिते इजोरिया एलै शब्द उपजल अलग अलग ढ़ंगसँ अर्थ बुझिते इजोरिया एलै मोन देहक इजोत बहुरंगी ध्यान लगिते इजोरिया एलै सभ पाँतिमे 2122-12-1222 मात्राक्रम अछि इजोरिया शब्दक बहुरंगी अर्थ छटा लेल हम जनआनंद मिश्र जीक आभारी छी 2 ताड़ी लेने एलै पासी हमरे लेल लबनी देने गेलै पासी हमरे लेल नहिएँ चाही फुनगी भुनगी अपना लेल हमरे सदिखन ठेलै पासी हमरे लेल हमरा हिस्सामे छै खाली फेने फेन केहन निष्ठुर भेलै पासी हमरे लेल हाथक कादोकेँ हीरा बुझलहुँ तँइ आब उगना सन हेरेलै पासी हमरे लेल हमरा एम्पायर घोषित केलक तइ बाद हमरे पिचपर खेलै पासी हमरे लेल सभ पाँतिमे 222-222-222--221 मात्राक्रम अछि 3 बेबाक लिखू बिंदास लिखू बात सधारण या खास लिखू अन धन लछमी मिठगर भेने दुरदिन रहितो मधुमास लिखू शब्द बहुत लिखलहुँ आब अहाँ अइ खिच्चा ठोरक आस लिखू हम बूझै छी नीक अहाँकेँ अपने दाबल इतिहास लिखू असगर रहनाइ कठिन नै छै तँइ भीड़ भरल बनबास लिखू सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि "बिंदास" कूल ड्यूड सभहँक शब्द छनि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश चंद्र ठाकुर- गजल- २. लालदेव कामत- कविता- उर्फ नाम १ जगदीश चंद्र ठाकुर गजल छल प्रपंच सभटा धुरफंदी जानि गेल ओ पाइ कमायब लक्ष्य जीवनक मानि गेल ओ पटकि आएल माए बाबूकें बिरधाश्रममे श्रद्धा आ ममता सन देबालकें फानि गेल ओ कंस जकाँ निरमल ज्ञानी दुरजोधन सन जहिया आयल अपने कीर्ति बखानि गेल ओ रखने हजारटा मूड़ी बाँहि आ पयर सेहो सभटा रस्ता अपनहि लेल दफानि गेल ओ ककरो संग मुन्नी भागि गेलै अधरतियेमे नै भेटलै पोखरि इनार सभ छानि गेल ओ जिनगी भरि सूतल टाका केर तोषकपर काल्हि पुछलियै कहू कुशल त कानि गेल ओ वर्ण -17 २ लालदेव कामत कविता उर्फ नाम एकटा रहथि मसोमात शान्ति हिनक काज छलनि अशान्ति जाहि दिन किनकोसँ झगड़ नहि हुअ से दिन अशुद्धे रहि जाइक ई भाय लगाकए क्रिया-शपथ खाथि आ गारि फज्जति सेहो भाइये लगाकऽ दैन्ह कोनो गप्प सरक्कामे सेहो बजैत-बजैत कहथिन भैखौकी नीक वार्तालापमे सेहो कईबेर बाजथि भैखौकी भरि गामक लोक जनिजाति आ पुरुखो हुनका देखतहि बाजि उठैत- भैखौकी। नीक वार्तालापमे सेहो कएक बेर बाजथि- भैखौकी। आब ई हिनका मादे रेबाज रूा रीयाज भऽ गेल गेल छल। सभ कियो हुनका मुहोँपर करए सम्बोधन हेयै भैखौकी आब हुनका कियो अलोलावाली नहि चाल पारय, हेगै भैखौकी...। हुनक प्रसिद्ध उर्फ नाम आ उपनाम भऽ गेल रहनि भैखौकी। हुनक मृत्यु भोजमे तिमन चिख्खा पंचो बजला आ बारिको बाजल- “भैखौकीक भोज नीक बनल, बड़ नीक।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. राम प्रीत पासवान- कविता- भूतक बाप पिशांच उर्फ आशारामक जोड २. किशन कारीगर- इस्कूल १ राम प्रीत पासवान कविता भूतक बाप पिशांच उर्फ आशारामक जोड़ा लगले भूत पिशांच प्रेत पता नइ छल कोन देवी आएल गुनी ओजहा वैद्य बौरहवा जोगी। देल माथपर हाथ कानमे पोरो डॉंट भगलै गै छुतहरी पकैड़ कए ठोकबौ कॉंटी। देलक भूत झमारि मोचारि पकड़लक गट्टा। पीठपर ऐँठ घुमाय बजल करियौ की पढ़ा। ओजहा भेल अवाक् दृश्य भऽ गेलै अचम्भा सौंसे गामक लोक देखलक भूतक दंगा। भुइयॉं देलक पटैक देमए लगलै गरदनियॉं। एमहर-ओमहर देख भूत मारै पटकनियॉं। भूतक देख अदङ्क घुसैर गेल तंतर-मंतर। दौड़ै जा हओ बाप काज नइ केलकए जंतर। मोटका लाठी हाथ नेने संग आएल भँगीवा। भूतक देख आतंक खूब तमसाएल भँगीवा। कसि कऽ पटकल डॉंग जेना हो हमरे लागल बाप-बाप चिचियाएल लोक छहोँ-छित्ते भागल। भूतक बाप पिशांच छिऐँ तूँ चिन्हले हमरा। नइ भगवेँ तूँ आब तखन हम कटबौ चमरा। भेल भूत स्तब्ध भँगीवा गट्टा पकड़लक। लेनहि चलि गेल घर तखन बिलैया ठोकलक। कोय बजै छल वाह भँगीवा बड़ मंतरिया कोय कहै भक लड़ि भँगीवा छै दिवगढ़िया। ढोरियाक मंतर नै कहियो सियाय भँगीवा झारए लागल भूत बिलैया ठोकि भँगीवा। घन्टा बीतल बाद तखन बहराएल भँगीवा नर्रा खोलैत निकसल बाहर आएल भँगीवा। भूत छेलै बड़ ढीठ मोँछ टेरैत बाजल नै केकरो वस बात तखन हमरेसँ भागल। भगलै भूत प्रेत घरसँ निकसल कनियॉं तनने नमहर घोघ पैरमे बजैए पैजनियॉं। निकैसते लगलक गोर खुश भऽ गेलै भँगीवा ठोकलक माथा हाथ तूँ कनियॉं जुग जुग जीवा। छौड़ा केतए नरहेर रहि-रहि व्यंग कसै छल तोहर जनौ भितुरका गप मुँहकेँ देख हँसै छल। भँगीवा भेल महंथ बनि गेल मुँर्खक ओजहा एनए गामक कृष्ण बजत के ओकरा सोझहा..? बेसी भेल समर्थक चेला जर-जनानी भँगीवा मस्त निधोख केतौ नै आना-कानी। भँगीवा चलै बाट पुक्की मरै केतए छौ भेल भँगीवा भगवान आशारामक जोड़ा। २ किशन कारीगर इस्कूल इस्कूल जाइत छी हम झोड़ामे कॉपी किताब नेने स्कूल बैगमे टिफिन रखने कूदैत फंगैत हँसैत-गबैत स्कूल जाइत छी हम. टेम-टेमपर पढ़ब-लिखब अ आ आ ई हम सीखब पैरे-पैरे, स्कूल गाड़ीमे बैसि हमहूँ आई स्कूल जाएब. अपने मने कहियो भिंसरे उठब सभ सं पहिने मुहँ हाथ धोअब भूख लागत त' जलखै करब फेर कनि कल पढ़ै लेल बैसब. इस्कूलक घंटी हमरा शोर पारै मास्टरजी कतेक नीक खिस्सा सुनाबैथ नहा-सोनाक' छी हम तैयार मम्मी डैडी हमरा स्कूल द' आबै. किताबमे कतेक नीक डाँरी पारल सीलेट भट्ठापर लिखब नीक लागल देखि देखि हम डाँरी परलौहं रंग भरल स्केच केहेन हँसी लागल. मास्टरजी हमरा कानमे कहलैन पढ़ बौआ अ आ, सी डी ई आई हहूँ अक्षर सिखलौहं हँसी लागल केहेन खी खी खी आई कतेक लोक इस्कूल एलै धिया-पूता सभ हँसले-कनलै सभ मिली फेर पढ़ै लगलै मास्टरजी के कतेक नीक लगलै. इस्कूलमे नबका ज्ञान सीखब पढहब-लिखब आ खेलब-धूपब दोस महिम संग सलाह आ झगड़ा कतेक नीक किताबी ककहरा. जखैन जेहेन नीक लागल फेर खेलेबो धूपबो करैत छी हम अपने मने आ की होमवर्क बनने इस्कूल जाइत छी हम. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक बाबा बैद्यनाथ आजाद बाल गजल कियै करै छी देरी बाबा लागल भोगक ढेरी बाबा मंत्र पढ़ि उत्सर्ग केने जाउ भगतक बेरा-बेरी बाबा मद्यनिषेधक प्रवचन करता पीबैत भांग, गजेरी बाबा गांजा केर व्यापार करै छथि मंदिर केर पुजेरी बाबा अहाँक इशारापर जुटि जाइछ हेजक हेज हंसेरी बाबा जाति-धर्म केर बात ने पूछी कुर्मी, कोइर, गड़ेरी बाबा घरमे फुटहा फांकि रहल छथि भोजक बेरि पसेरी बाबा आबहु तँ संतोष करू किछु भेल उपाति चंगेरी बाबा दही-चुड़ामे रूचि नहि, खेता मुरगा, माछ, बगेरी बाबा स्वार्थेमे आन्हर भऽ उमड़त मंदिरमे जनु भेड़ी बाबा ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २१५ म अंक ०१ दिसम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०८ अंक २१५)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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