VIDEHA — Issue 216 / अंक २१६

Publication: VIDEHA · Issue: 216
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253 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २१६ म अंक १५ दिसम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०८ अंक २१६) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-राजस्थान केर मंडोवरमे रावण आ मंदोदरीक विवाह: लोक इतिहास केर मूर्त आ अमूर्त प्रमाण २.२.जगदीश प्रसाद मंडल- जीवन-मरण (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.३.जगदीश प्रसाद मंडल- जीवन संघर्ष (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.४.जगदीश प्रसाद मंडल- नै धाड़ैए (बाल उपन्यास- तेसर संस्करण) ३. पद्य ३.१.सुशान्त झा "अवलोकित"- कविता-नेनपन ३.२.आशीष अनचिन्हार- ३ टा गजल ३.३.राजेश मोहन झा "गुंजन" -बिनु राधाक ब्रज ३.४.अब्दुर रज्जाक-गजल ४.बालानां कृते- डॉ. शशिधर कुमर-३टा बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. 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साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित रचनाकारक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.डॊ कैलाश कुमार मिश्र-राजस्थान केर मंडोवरमे रावण आ मंदोदरीक विवाह: लोक इतिहास केर मूर्त आ अमूर्त प्रमाण २.२.जगदीश प्रसाद मंडल- जीवन-मरण (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.३.जगदीश प्रसाद मंडल- जीवन संघर्ष (उपन्यास- तेसर संस्करण) २.४.जगदीश प्रसाद मंडल- नै धाड़ैए (बाल उपन्यास- तेसर संस्करण) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र राजस्थान केर मंडोवरमे रावण आ मंदोदरीक विवाह: लोक इतिहास केर मूर्त आ अमूर्त प्रमाण डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती इतिहासक पैघ विद्वान छथि। कला इतिहासमे हिनकर PhD हार्वर्ड विश्विद्यालयसँ ओम्कारेश्वरपर छनि। ओरछा आ अनेको आर्कियोलॉजिकल साइटपर बहुत महत्वपूर्ण काज केने छथि। सफल आई.ए. एस.  अधिकारी रहल छथि। भारत सरकारसँ सचिव केर पदसँ रिटायर केने छथि। अपन कला प्रेम आ विद्वताक कारण डॉ. चक्रवर्ती इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय भोपाल केर निदेशक; इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली केर सदस्य सचिव; नेशनल म्यूजियम, दिल्ली केर महानिदेशक आ नेशनल म्यूजियम इंस्टिट्यूट ऑफ़ आर्ट हिस्टीरी, म्युजियोलॉजी ,आ कॉन्सेर्वशन केर वाईस चांसलर ; NEUPA केर वाईस चांसलर; दिल्ली विरासत संसथान, दिल्ली केर चीफ; आ ललित कला अकादमी केर अध्यक्ष पदके सुशोभित क चुकल छथि। डॉ. चक्रवर्ती सौम्य, मृदु आ सहज लोक छथि। ई अपना आपके विद्वान मानैत छथि प्रशासक नहि। गुफा चित्रकलाके वैज्ञानिकता, उद्भव, विकास, खोज, शोध आदिपर बहुत गंभीर आ विस्तृत काज केने छथि। लोक आ जनजातीय कलाके सब पक्षपर काज करबाक प्रबल इच्छा छनि। हमरा हिनका संगे बहुत काज करबाक अवसर भेटल अछि। हिनका संगे नालंदा, छत्तीसगढ़, असम, अरुणाचल, मणिपुर, सिक्किम, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, बंगाल, आदि शोध कारणे रहबाक आ भ्रमण करबाक मौका भेटल अछि। हिनकर जिज्ञासा अनंत छनि। हमेशा अपन डायरीमे जानकारी लेत रहैत छथि। कहैत रहैत छथि जे भाव इतिहास, भाव भूगोल,  लोक इतिहासके बिना भारतके नहि बुझल जा सकैत अछि। हिनका संगे कतेक सै सेमिनार, वर्कशॉप आदिके आयोजन केने छी सेहो पूर्ण बौद्धिक स्वतंत्रताके संग। एक बेर एहने प्रयोजनसँ 2001 मे जोधपुर गेल रही। ओत एक एहेन स्थान भेटल आ एहेन जानकारी भेटल जे एक बेर लोकमे कुनो मूर्त संरचनापर कतेक अमूर्त कथा एवं लोकइतिहास केर परत बनि जाइत छैक सेहो विलक्षण ताहिपर सोचबाक लेल बाध्य केलक। अगर हम कही जे हमरा संगे लंकापति रावण केर सासुर आ मंदोदरी केर नैहर चलु, हुनकर विवाहमण्डपके देखु,  कुलदेवीके दर्शन कए धन्य होउ त केहेन लागत?  दिनमे सपना जकाँ ने? मुदा दृष्टान्त किछु एहने सन अछि। प्रामाणिक आ अप्रमाणिक अलग बात छैक,  कनि लोक इतिहास आ आख्यान केर जाल केर निर्माण  देखु। एक संगे राम आ कृष्णके एकहि वेदीपर अलग अलग कालखण्डमे विवाह केर कथा आ किम्बदन्ति देखू। हमरा लेखनी संगे अहुँ यात्रा करु। नीक लागत। घुमबाक आ जानकारी विशेषरूपसँ लोक इतिहास केर संकलनके दृष्टिकोणसँ अनेक बेर राजस्थान जाइत रहैत छी। राजस्थान जेबाक अर्थ भेल सांस्कृतिक विरासत केर गर्भमे जेनाइ। एहि धरा केर मूर्त आ अमूर्त दुनू सांस्कृतिक सम्पदा प्रदेश केर गौरवपूर्ण इतिहास केर साक्षी अछि। चप्पा-चप्पा धरती वीर पुत्र आ वीरांगना केर पदचापसँ अभिमंत्रित अछि। राजा आ प्रजाकेर मध्य नीक आ अधलाह अनेक कथा जिवंत अछि। ई मीरा, महाराणा प्रताप,  बिक्रम आ नेरा केर धरती अछि। ई ओ धरा अछि जतय केर क्षत्राणी आ अन्य महिला अपन इज्जत आ आन,  बान आ शान केर रक्षाक हेतु सै सै केर संख्यामे आत्मदाह अथवा सामूहिक जौहर क लेलथि। अपना आपके जिबैत अग्निमे समर्पित केलि मुदा आक्रांताके अपन शारीर तकके हाथ नहि स्पर्श कर देलनि। राजस्थानके कुनो भागमे जाऊ, किछु ने किछु महत्वपूर्ण  इतिहास, परंपरा, केर भान भेटत, गढ़ आ गढ़ैया भेटत, ढ़नमनायल हवेली भेटत, राजाक कथा भेटत:  कतौ प्रजावत्सलताके त कतौ निरंकुशताके। मुदा भेटत जरूर। जोधपुरके बागलमे मंडोवर नामक एक बहुत पैघ प्राचीन नगर छलैक। बिखरल खंडहर,  प्रस्तर अवशेष एहि बातके साक्षी छैक। अगर स्थानीय लोकक बातके विश्वास करी त 24 कोसमे ई नगर व्याप्त छल। कतेक महल उल्टा लटकल जकाँ लागत। अगर ध्यानसँ देखब त ऐना बुझना जैत जेना कियोक पूराके पूरा नगरके उलटा लटका देने होइक। पहिने प्रवेशमे बुझा जैत जे जरूर बहुत रहस्यसँ भरल नगर छल हैत ई खँडहर। पूरा खण्डहर जेना बहुत पैघ रहस्य अपना गर्तमे नुका क रखने हो? खैर!  एक बहुत बुजुर्ग महिलासँ भेट भेल। ओ कहली : "बेटा, कांई फोटू लेवे है , आखी नगरी ही उलटी पड़ी है।" (बेटा, की कोनो फोटो ल रहल छी? ई त समस्त नगरी उलटा छैक"।) बात बहुत बिचित्र रहैक। ऐना मोनमे जिज्ञासा भेल जे जौं कियोक स्थानीय आदमी एहिपर किछु कहैत। एक युवक भेट भेल। ओ कहलक कुनो खास बात नहि छैक। अर्चेयोलॉजिस्ट्स आ प्रागइतिहास एहिपर मौन अछि। शायद कियोक स्थानीय लोक किछु बता पबथि। एतबेमे एक बुजुर्ग एला। करीब 80 वर्षक। पातर देह। गोर धप-धप। जिज्ञासाके देखैत कहला: "हमर पितामह किछु एहि शांत आ ढ़नमनयाल खण्डहरके गूढ़ रहस्य आ इतिहासके बारेमे कहने छला।अगर अहाँ लग समय हो आ सुनबाक धैर्य हो त हम बता सकैत छी।" हमरा ऐना लागल जेना सब किछु भेट गेल। हम झट दनि कहलियनि : "जरूर, अपने कहल जाओ। हम अपने सनहक़ लोकक तलाश करैत रही।" आब बूढ़ा एक पाथरपर बैस कहनाय प्रारम्भ केला: आईसँ सात हज़ार पाँच सै वर्ष पूर्व लंकापति रावण अही स्थानपर आबि मंदोदरीसँ विवाह केला। मन्दोदरीके स्थानीय लोक मंदोधरी कहैत छनि। हिनक पिताक नाम छल निमंदूजी। ओही नामसँ एहि स्थानक नाम मंडोवर पड़लैक। एकटा 10 खंभाके चँवर दिश इशारा करैत ओ बुजुर्ग कहलनि "यैह थिक ओ स्थान जतय रावण आ मंदोदरी केर विवाह मंडप केर वेदी छलैक।" ठीक ओकर बगलमे पाथरक कलात्मक भव्य आ उत्कीर्ण तोरण रहैक जे आब खण्ड-खण्ड भेल छैक। हालाँकि एक बेर एकरा देखलासँ सुधिजन सहजहि अनुमान लगा सकैत छथि जे ई विवाह कतेक शाही ठाठसँ भेल हेतैक आ ऐश्वर्यके प्रतीक छल हेतैक। कतेक कारिगर आ कलाकार राति-दिन एकर निर्माणमे लागल हेतैक। बेजुवान पाथर जेना अपन इतिहास केर गाथा सुनबैत हो। आब हमहु बुजुर्ग व्यक्तिके कहल सब बात के पाथर संगे जोड़ै लगलौं। अद्भुत अनुभव। अद्भुत सिनेह। राजस्थानके इंच इंच धरतीसँ पुनः आत्मिक लगाव होम लागल। आब बुजुर्ग एक ऊंच महलपर ल गेला। कहलनि जे ई ध्वस्त महल 24 खण्ड केर छलैक। दूमहलमे विभक्त, 12 खण्ड ऊपर आ 12 खण्ड निचा। निचा खण्ड केर तलघर एखनो बाँचल छैक आ सुरक्षित छैक। समस्त भवन आ दुनु खण्ड केर हरेक हिस्सामे सुरुज केर धुप इजोतक संग वसातआर्थत क्रॉसवेंटिलेशन केर गजब व्यवस्था छलैक। निचाके तहलखानामे गुप्त स्थानपर खजाना सेहो बनल रहैक। एक तहलखानामे त पूराके पूरा मंदिर दबल रहैक। मंदिर केर देबारपर रंगविरंगक उत्कीर्ण आकृति एखनो मनोहारी लागि रहल छलैक। तत्पश्चात ओहि स्थान लग गेलहुँ जतय राजघराना केर पुरुष रहैत छला, स्त्रीगण रहैत छलि। कुलदेवीकेर डीह केर दर्शन भेल। बिना कुलदेवीके विधिवत पूजा अर्चनाके घरक कोनो स्त्रीगण अथवा पुरुष भोजन नहि करैत छल। मंदोदरी केर महल देखल। बुजुर्ग सब स्थानक एक टूरिस्ट गाइड जकाँ विस्तारसँ जानकारी द रहल छलाह। एक एक शब्द नापल – ने कम ने अधिक। पूरा संतुलित। बुझना ऐना जाइत छल जेना रावण आ मंदोदरीके विवाहक पुजेगड़ी यैह होथि! भवन निर्माण कला उत्तम बुझना गेल। ओहि समयमे आर्किटेक्चर केर सम्बन्धमे ओतेक जानकारी नहि छल ताहि कोनो स्कूल अथवा स्टाइलसँ जोड़बामे असमर्थ रही। फ़ोटो बहुत सुन्नर नहि छल। जे छलो से समाप्त भ गेल। स्मरण शेष अछि। वैह लिख रहल छी। गढ़ल मुदा टूटल आ छत विछत पाथर केर हरेक भाग जेना किछु कहैत छल? पहिल बेर भेल जेना पाथर बजैत हो। मुदा जोरसँ नहि, कानमे नहु-नहु। फेर भेल, जे जकर विखण्डित पाथर केर ढ़ेर अतेक बजैत छैक ओकर साक्षात स्वरुप केहेन हेतैक? मोन त करैत छल जे इतिहासके कान पकड़ि पाछा क ली आ सब बात देख ली, छू ली, बुझि ली, आ लिख ली, एक साक्षात प्रत्यक्षदर्शीके रूपमे! मुदा इहो बुझल अछि जे ई सपनेटामे संभव अछि। बुजुर्ग देखेबो करथि आ विशद वर्णन सेहो केने जाथि। हुनकासँ इहो ज्ञात भेल जे रावण जतेक वलशाली छल ओतबे घमण्डी सेहो। रावण समस्त संसारके अपनामे समेट लेबाक प्रण केने छल। अहंकार ओकर अपन सीमा लाँघि लेलकैक। अतेक जे रावण अपन ससुर मेदूजीके सेहो कहि देलकनि जे ओहो ओकर अधिनस्त भ जाथि। जाति कुलसँ श्रेष्ठ मेदूजी भला एहि प्रस्तावके कोना स्वीकार क सकैत छला? अपन जमाय रावणके सम्मानपूर्वक मना क देलथिन। रावण छल धैर्यहीन। क्रोधसँ काँपे लागल। कुपित भेल तुरंत अपन भाय कुम्भकरण आ पुत्र मेघनादके बजा पूरा नगरके उलटि देलक। ध्वस्त क देलक। ताहिं आई ओई खण्डहर उलटा अछि। चँवरी लग रानीमहल, जनाना महल आदिक जीर्ण अवशेष देखल। किछु घर केर कमरा सब एखनो अनेक तरहक कलाकारी केर बेजोड़ गाथा कहैत छैक। रंग आ रूपविन्यास आईओ ओहिना छैक। संयोग नीक छल। हमर सूचनादाता बुजुर्ग संस्कृत आ इतिहासक नीक ज्ञाता छला। हुनकर ई मानब छलनि जे जनमानसमे प्राचीन इतिहासके सटीक ज्ञान नहि हेबाक कारण बहुत अनर्थ भ रहल अछि। हरेक बातक विवरण इतिहासमे नहि अंकित अछि। कुनो राजकीय सुखसँ संपोषित इतिहासकार मंडोवर केर इतिहास कियैक लिखैत? इतिहासकारके लिखक हेतु के पैसा देतैक? के ओकरा भग्नावशेष केरगर्तमे धसल इतिहासके पोर-पोर खोइंछा छोड़ा क कहतै? ताहिं बहुत रास बात, रहस्य, आदि कालके गालमे अथवा मंडोवर केर विशालकाय चट्टान्नमे धंसि क समाप्त जकाँ भ गेलैक। कतेक दबल अहि आशमे छैक जे उत्खनन कए कियोक तथ्यके उजागर करता। मुदा कहि नहि कहियों ई रहस्यसँ समाज आ विद्वान वर्ग लाभान्वित हैबो करता की नहि??? हमरा लोक निराई-आँगन, सभा मंडप हथिसार, घोड़सार, दासीगृह, आदि सब किछुके अपना आँखि आ बुजुर्ग केर ऐतिहासिक दिव्य आँखिसँ देखल, हुनकर अभूतपूर्व वाणीसँ सुनल। जिज्ञासा भेल जे बुजुर्गसँ रावणके संबंधमे आ लंकाके बारेमे जानकारी प्राप्त करी। पुछलापर कहलनि: "असली लंका त अथाह समुद्रमे डूबल अछि। ओहि लंका केर एक कोण तिरुपति बालाजी छथि। लंकापुरीमे राम 100 योजन केर बान्ह बनने छला। तिरुपति वैह स्थान अछि जतय राम आ विभीषण केर भेट पहिल बेर भेल छलनि। एहि मंडोवरमे निचामे 3 सुरंग छैक। एक अयोध्या, दोसर लंका आ तेसर द्वारका जाइत छैक। बुजुर्ग एक मारक बात कहलथि: "श्रीमान, ककर ध्यान छैक अहि पुरातन धरोहर दिस? सब विनाश केर प्रक्रियामे मग्न अछि। आ ई जे जोधपुर नगर देख रहल छी ओकर बहुत भागक निर्माण एतहि केर अवशेषसँ भेल अछि। नव्निर्माण लेल पुरातनके सब संहार क रहल अछि।" एक बात बुजुर्ग जे कहलनि से थोरेक चिंता आ शंशय दुनुके जन्म द देलक। ओ बात ई रहैक जे बुजुर्गक हिसाबे आईसँ करीब 3000 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण सेहो अतै आबि अपन विवाह केने छला। से कोना? ई विवाह भेल छलनि कृष्ण आ जामवंतीके बीच। दरअसल ई विवाह ओतेक योजनावद्ध तरीकासँ नहि संपन्न भेल रहैक जेना रावण आ मंदोदरीके समयमे भेल रहैक। अर्जुन संग कृष्ण मणि तकैत-तकैत एते आबि गेल छला कारण जे ओ मणि जामवंती लग छलनि। जामवंती मणिके महत्त्वसँ अनजान छली आ ओकरा कैंचा बुझि खेल खेला रहल छली। कृष्ण जामवंतीसँ ओ मणि मांगला। एहि बातपर जामवंती केर पिता गम्भीर होइत कहलथिन: "हे केशव, हम ई मणि अहाँके द देब' चाहैत छी, मुदा एक शर्त अछि? अगर अपने एहि शर्तके स्वीकार क ली त मणि तुरत भेट जैत." कृष्ण कहलथिन: "अहाँ अपन शर्त कहु। हम स्वीकार करब।" कृष्णसँ अस्वासन पाबि जामवंती केर पिता बजला: "मणि त हम तुरत्तेद' देब परंतु मणि सँग अपन पुत्री जामवंती केर हाथ सेहो अहाँके हाथमे सुपुर्द कर चाहैत छी अहाँक अर्धांगिनीके रूपमे।" कृष्ण तुरंत जामवंती केर पिताक निवेदनके स्वीकारि लेलनि आ अहि तरहेँ ओही दिन ओही स्थलपर कृष्ण सङ्गे जामवंती केर विवाह भ गेलनि। अतेक जानकारी प्राप्त करैत-करैत 2 घंटा लागि गेल। पता नहि चलल जे समय कोना बीत गेल। सब जानकारी रुचिकारक आ बहुत हद धरि प्रामाणिक सेहो भेटल। अंतहीन प्रश्न जे मोनके परेशान केने अछि ओ ई थिक जे एहि टूटल पाथर, भवन, अट्टलिका, आ स्थानके रहस्य कोना खुजत???? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जीवन-मरण- उपन्‍यास-जगदीश प्रसाद मण्डल पोथीकेँ (तेसर संस्करण) तत्‍खनात् व्‍यक्तिगत रूपे सोझहा आनल जा रहल अछि...। -लेखक समर्पण मिथिलाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलवाड़ी लगौनिहार संगे नव विहान अननिहारकेँ 1. छह बजे भिनसुरका ड्यूटी रहने डाक्टर देवनन्दन पाँचे बजे ओछाइन छोड़ि नितकर्मसँ निवृत्त भऽ कपड़ा पहिरते रहैथ‍, कि चाह नेने पत्नी आबि टेबुलपर रखि चोट्टे घुमि‍ पिता-ससुरकेँ चाह देमए गेली। पिता लग चाह रखि बजली- “बाबू, बाबू...।” कोनो सुन-गुन नहि देख‍‍ नाकक साँसपर हाथ दऽ अन्दाजए लगली। साँस रूकल देख‍ शीलाक मनमे उठलैन- पिता तँ तीन मास बिमारीसँ ग्रसित भऽ मरल रहैथ। मुदा हिनका तँ किछु ने भेलैन तखन किए साँस नै चलै छैन। असमंजसमे पड़ि गेली। मनमे फुरलैन अपने नै ने किछु जनै छी मुदा पति तँ डाक्टर छैथ। दिन-राति तँ यएह रमा-कठोलामे लगल रहै छैथ, पुछि लिऐन। फेर मनमे एलैन जे अखन शुभ-शुभ ड्यूटी जा रहल छैथ केना अशुभ बात कहबैन। फेर मनमे एलैन जे ड्यूटी तँ क्षणिक छी मुदा मृत्यु तँ स्थायी छी, तँए ऐ आगू ओकर तुलना करब बचपना हएत। पिता लगसँ झटैक कऽ पतिक कोठरी जा शीला धमकली। चाह पीब डाक्‍टर देवनन्दन कोठरीसँ निकलैक तैयारी करैत रहैथ। धड़फड़ाएल पत्नीकेँ देख‍ पुछलखिन- “किछु मन पड़ल की?” “नै किछु मन नै पड़ल।” “तखन?” “बाबू भरिसक मरि गेला। केतबो बाँहि पकैड़ डोलौलयैन‍ मुदा आँखि नै तकलैन।” पिताक मृत्युक बात सुनि देवनन्दन घबरेला नहि। बजला- “माए केतए छैथ?” “ओहो अपना कोठरीमे सुतले छैथ। जहिना सभ दिन पहिने बाबूकेँ चाह दइ छेलि‍ऐन तहिना दइले गेलिऐन आकि देखलयैन।” “चलू।” कहि देवनन्दन आगू बढ़लैथ। सासुकेँ उठबैले शीला दोसर कोठरी दिस‍‍ बढ़ली। कोठरीमे पहुँचते बजली- “माए!” “माए” सुनि सुभद्रा फुरफुरा कऽ उठली। तैबीच शीला चाह आनए गेली। रखल लोटाक पानिसँ सुभद्रा कुर्ड़ा करए लगली। कुर्ड़ा कऽ चाह पि‍लैन। देवनन्दन पत्नीकेँ सोर पाड़लैन। शीलाकेँ पहुँचते‍ कहलखिन- “बाबू मरि गेला।” अपना कोठरीसँ सुभद्रो सुनलैन। मृत्यु सुनि दौगले पति लग पहुँचली। मृत पतिकेँ देख‍ सुभद्रा घबरेली नहि। मन पड़लैन अपन जिनगी। जहिया दुनू गोरे एक बन्‍धनमे बन्हि दुनियाँक लीला-ले संगी बनलौं, तेकरा साठि बरख भऽ गेल। ओइ‍ बन्‍धनसँ पूर्ब ने हम किछु कहने रहि‍ऐन‍ आ ने ओ किछु कहने रहैथ। कहियो भेँटे नै भेल छला, तहिना बिना किछु कहनहि संग छोड़ि चलि गेला। मुदा तँए कि‍ साठि बर्खक संग मिलि कएल काजो चलि जाएत। जहिना अबै दिन परिवार भरल-पुरल छल, सासु-ससुर छला तहिना तँ आइयो बेटा-पुतोहु ऐछे, तहन सोग कथीक..! मुस्की दैत सुभद्रा बेटा दिस‍ तकलैन। तैबीच फुदकैत आशा आबि माएकेँ पुछलक- “माए, बाबा मरि गेलखिन?” आशाक बात सुनि सुभद्रा बजली- “बाबा गाम गेलखुन।” पिताक मृत्यु देख‍‍ देवनन्दन सोचए लगला। पिताक अपन समाज छेलैन। जैबीच रहि जिनगी बितौलैन। मुदा हमर समाज तँ अलग भऽ गेल अछि। तँए उचित हएत जे ऐठामक समाज छोड़ि हुनका अपना समाजमे पहुँचा दिऐन। मृत्युक कोनो कर्म ऐठाम नै कऽ हुनके समाजक अनुकूल करब बढ़ियाँ हएत। शीलाकेँ कहलखिन- “अहाँ तीनू गोरे ऐठाम रहू। गामेमे ऐगला सभ काज हेतैन। हम जोगार करए जाइ छी।” कोठरीसँ निकैल ऐगला ओसारपर अबिते ड्राइवरकेँ ठाढ़ देख‍‍ डाक्‍टर देवनन्‍दन कहलखिन- “अस्पताल नइ जाएब। पेट्रोल-पम्पपर सँ तेल भरौने आबह। गाम चलैक अछि।” बिना किछु बजनहि ड्राइवर गाड़ी लऽ निकैल गेल। डाक्‍टर देवनन्‍दन कोठरीमे आबि दुनू बेटाकेँ जनतब दइले मोबाइलमे नम्बर टि‍पलैन। दयानन्द जेठ आ धर्मानन्द छोट बेटा। दयानन्द फोर्थ इयरक विद्यार्थी आ धर्मानन्द फस्ट इयरक। दुनू एक्के मेडिकल कौलेजक छात्र। दयानन्दकेँ कहलखिन- “बच्चा, बाबू मरि गेला तँए दुनू भाँइ गाम आउ?” बाबाक मृत्युक समाचार सुनि दयानन्द कहलखिन- “ऐ-ले गाम किए जाएब। आब तँ तेहेन बिजलीबला शवदाह बनि गेल अछि जे आसानीसँ काज सम्पन्न भऽ जाइत अछि।” दयानन्दक विचार सुनि देवनन्दन बजला- “बच्चा, सभ जीव-जन्‍तुकेँ अपन-अपन जिनगी होइत अछि। जे जइ जिनगीमे जीबैत अछि, ओकरा-ले वएह जिनगी आनन्ददायक होइ छइ। जेना देखै छहक जे चीनीमे सेहो किड़ा फड़ैए, मिरचाइ आ करैलामे सेहो फड़ैए। तीनूक सुआद तीन तरहक होइ छइ। एक मीठ, दोसर कड़ू आ तेसर तीत। चीनीक किड़ाकेँ जँ मिरचाइ आकि‍ करैलामे देल जाए तँ सोभाविक अछि जे ओ मरत। मुदा की मिरचाइक किड़ा आकि‍ करैलाक किड़ाकेँ चीनीमे जीब सकत? कथमपि नहि। ओ किए मरत? ओ तँ अधलासँ नीकमे गेल? तहिना बाबू सेहो सभ दिन गाममे रहि जीवन-यापन केलैन। ई तँ संयोग नीक रहल जे तोहर माए सप्पत-किरिया दऽ बुड़हीकेँ ‘हँ’ कहौलैन। जइसँ दुनू गोरे मास दिन पहिने एला। सेहो एलाक तीनियेँ दिनक उत्तर गाम जाइले कच्छर काटए लगला। केते सप्पत दऽ-दऽ माए मास दिन घेरलखुन, नइ तँ तेसरे दिन चलि जइतैथ।” पिताक बात सुनि दयानन्द बाजल- “ई तँ बड़ आसचर्जक बात कहै छी, बाबू?” दयानन्दक जिज्ञासा देख‍‍ देवनन्दन बजला- “कोनो आसचर्ज नहि। गामक दोसर नाओं समाजो छिऐ। जे शहर-बजारमे नै अछि। समाजमे बन्‍धन अछि जइ अनुकूल लोक चलैए, जेकरा समाजिक बन्‍धन कहल जाइत छइ। ऐ बन्‍धनक भीतर धर्मक काज छिपल अछि, जेकरा सभ मिलि निमाहैत अछि। मुदा शहरमे से नइ छइ। कानून-कायदाक हिसावसँ चलैए जइमे दया-प्रेम नइ छइ। प्रतिदिन बुड़हाकेँ दस गोरेक जिनगीक बात सुनब आ दस मिनट बजैक जे अभ्यास लगि गेल छैन से ऐठाम केना हेतैन। एतए सभ अपने पाछू बेहाल रहैए। के केकर सुख-दुख, जीवन-मरण सुनत। भरि पेट नीक अन्ने-तीमन खुऔने लोकक मन असथिर थोड़े रहि सकैए, जाधैर आत्माक संतुष्‍ठी नै हेतइ?” पिताक बात सुनि दयानन्द हुँहकारी दैत बाजल- “कहुना-कहुना तँ तीन दिन पहुँचैमे लगत, ताधैर की कहब?” “अखनो गाममे एहेन चलैन अछि जे शरीरसँ पराण निकैलते जरबैक ओरियान हुअ लगैत अछि। अर्थी रखैक चलैन नै अछि। तोरा सभकेँ अबैसँ पहिने दाह-संस्कार कऽ लेब। काजो तँ लगले सम्पन्न नहि‍येँ होइत अछि। कहुना-कहुना तँ पनरह दिन लैगे जेतह।” “बड़बढ़ियाँ। सौंझुका गाड़ी पकैड़ दुनू भाँइ गाम आबि जाएब।” मोबाइल ऑफ कऽ मने-मन देवनन्दन हिसाव मिलबए लगला। कमसँ-कम पनरह दिनक काज अछि। उसारैयोमे किछु समए लगबै करत। मोटा-मोटी बीस दिन लगि जाएत। बीस दिनक आकष्‍मिक छुट्टीक दरखास लिखए लगला। दरखास लि‍ख टेबुलपर रखि पिताक कोठरी पहुँच देवनन्‍दन पत्नीकेँ कहलखिन- “गाममे बीस दिन लगत, तइ हिसावसँ सभ समान ओरिया लिअ। काजक समए अछि। तँए नीक-जकाँ तैयार भऽ चलैक अछि।” कहि माए लग बैस गेला। शीला उठि कऽ चीज-वौस ओरियाबए चलि गेली। सुभद्राक चेहरामे सोग नै सुख[1] उमड़ैत रहैन। विचारक समुद्रमे डुमल छेली। मने-मन खुशी होइत रहैन जे हुनका अछैत जँ हम पहिने मरितौं तँ मनमे लगले रहैत जे शेष दिन हुनकर केहेन बि‍ततैन। मुदा से भगवान सुनलैन। जहिना हाथ पकड़लैन तहिना पार-घाट लगा देलिऐन। हमरा आब की अछि, तेहेन भरल-पुरल फुलवाड़ी लगा देने छैथ जे केतौ हराएल रहब। उमेरोक हिसावसँ नीके भेल। चारि बर्खक जेठो छला...। माएकेँ विचारमे डुमल देख‍‍ देवनन्दन टोकलखिन- “माए..!” मुस्की दैत सुभद्रा बजली- “बौआ, एक्को मिसिआ दुख नै भऽ रहल अछि। ई तँ सृष्टिक नियमे छिऐ। तइले दुख कथीक?” ओमहर शीला कपड़ो-लत्ता सेरियबै छेली आ मने-मन मुस्‍कियाइतो छेली। अनका जे हौउ, हमरा तँ सात गंगा नहेला फल भेटल। जेना अनका देखै छिऐ, अनका की अपन पितियौते भाएकेँ देख‍लयैन जे मरै बेरमे काका केना घिनबथिन। से तँ नै भेल। जिनगीमे कियो एहेन ओंगरी तँ नै देखाएत! तैबीच ड्राइवर बाहरमे हौरन बजेलक। अवाज सुनिते देवनन्दन माएकेँ कहलखिन- “माए, लगले हम अबै छी।” कहि कोठरीसँ दरखास लऽ ड्राइवरकेँ ऑफिस दऽ अबैले कहलखिन। पुनः घुमि‍ कऽ पिताक गोरथारीमे बैस देवनन्‍दन, तैयारीक प्रतिक्षा करए लगला। आँखि माएपर पड़लैन। एक्को पाइ माइक मुँह मलिन नहि, सोचए लगला। जहिना आँगनसँ घरक ओसारपर जाइले बीचमे सीढ़ी बनल रहैए, तहिना तँ परिवारोमे अछि। मन पड़लैन बाबाक सुनौल माए-बापक बि‍आहक कथा। केना नव परिवार बनि दुनू गोरे बाबा-दादीकेँ जिनगीक पार लगौलैन। ओहने समए तँ आइ हमरो संग आबि गेल। माएकेँ किए मनमे कोनो तरहक अभाव औतैन। एते दिन पिताक आशपर जीलैन आब हमरा दुनू परानीपर आबि गेली। जहिना पत्नीक सहयोग पतिकेँ आ पतिक आशा पत्नीकेँ बनल रहैत, तहिना तँ पतिक परोछ भेने बेटाक भऽ जाइत। फेर मन पड़लैन गामक स्कूलमे अपन नाओं लिखौलहा दिन। नीक मनुख बनैले पिता चारि बर्खक अवस्थामे कान्हपर उठा भगवान रामक खिस्सा सुनबैत नाओं लिखा देलैन। ज्ञानक प्रति एते प्रेम केना कम पढ़ल-लिखल आदमीमे आएल? केना सभ माए-बापक हृदैमे सरस्वती बैसल रहै छथिन? भलेँ समाजिक कुबेवस्‍था आ सत्ताक लापरवाहीसँ नै भऽ पबैत अछि, जिनगीक मजबुरी अन्हारक काल-कोठरीमे धकैल दैत अछि। मुदा हमरा से नइ भेल। गामक स्कूलमे लोअर प्राइमरी धरि पढ़लौं। लोअर पास करिते मिड्ल स्कूलमे नाओं लिखबैले रूपैआ देलैन। चारि बर्खक पछाइत मिड्ल स्कूलसँ निकललौं। फेर हाइ स्‍कूलक खर्च देलैन चारि बर्खक उपरान्त हाइ स्कूलसँ निकललौं। संयोगो नीक रहल आर.के. कौलेज- मधुबनीमे,साइंसक पढ़ाइ शुरू भेल। जहिना उत्साह कौलेजमे नाओं लिखौने अपना रहए, तहिना नव-नव शिक्षक बनने प्रोफेसरो सभकेँ रहैन। ओना ताधैर शिक्षो विभागमे चोर-दरबज्‍जा खुजि गेलइ। मुदा अखुनका जकाँ बड़की गाड़ी पास होइ-जोकर नहि, छोट-छीन एकपेरिया। बहुत नीक विद्यार्थी तँ हमहूँ नहियेँ छेलौं मुदा बहुत भुसकोलो नइ छेलौं। जँ भुसकोल रहितौं तँ पास केना करितौं? कहियो फेल नै भेलौं। डाक्टर बनैक विचार तँ मनमे आएलो नै छल। विचार छल बी.एस.सी. केलाक उपरान्त हाइ-स्कूलक शिक्षक बनैक। चिकित्सा जगतमे बि‍र्ड़ो उठल। दरभंगामे अस्पताल खुजल आ डाक्टरीक पढाइयो शुरू भेल। आइ.एस.सी. पास केलहा संगी सभ मेडिकल कौलेजमे नाओं लिखबैक विचार हमरो देलक। पिताकेँ कहलयैन। पढ़बैक इच्छा पहिनैसँ रहैन। नाओं लिखबैक विचार दऽ देलैन। अगुआएल परिवारक, अधिक खेतबला परिवारक पढ़ि-लिख नोकरी करैक पक्षमे नइ रहैथ। गरीब परिवारक बच्चा, अभावमे पढ़ि नै पबैत रहए। जे लाभ हमरो भेटल। मुदा आब बुझै छी जे डाक्टर बनि गाम छोड़ब, परिवार-समाजकेँ छोड़ब भेल। जखन हम डाक्टर बनलौं। रोगक इलाज करब काज भेल तखन की गाममे रोग आ रोगी नै अछि...। जहिना अकास और पृथ्वीक बीचक सीमा होइत, जैठाम पहुँच चिड़ै-चुनमुनी लसैक‍ जाइए, तहिना डाक्‍टर देवनन्दनक बुधि लसैक गेलैन। ने आगूक बाट देखैथ‍ आ ने पाछू हटल होइन। मन घोर-घोर होइत रहैन। माए दिस‍‍, मुड़ी उठा तकलैन। माइक पजरामे बैसल आशाकेँ अपना धुइनमे मगन देखलैन। आशापर सँ नजैर ससैर दुनू बेटापर गेलैन। डाक्टरी पढ़ैत बेटापर नजैर पड़िते ऐगला पीढ़ी दिस‍‍ देखए लगला। जहिना हम माए-बाबूक सेवाक फल डाक्टर छी तहिना तँ ओहो दुनू भाँइ हमर हएत। मुदा जे सुख-सुविधा पाबि हम दुनू गोरेसँ अलग भऽ जीवन-यापन कऽ रहल छी, तहिना तँ ओहो दुनू भाँइ हमरासँ अलग भऽ जीवन-यापन करत। मुदा शरीरक तँ गति अछि- बालपन, युवापन आ वृद्धापन। ओ तँ सबहक लेल अछि। बालपन आ वृद्धापनमे एक-दोसरक जरूरत‍‍ सभकेँ होइत अछि। जेकरा अपन बुझि सभ सेवा करैत अछि ओ हजारो कोस दूर रहए लगैए। तखन सेवा केना हेतइ? अगर जँ दुनियाँ भरिकेँ अपन बुझि सेवा करी तँ एतेक खून-खच्चर,छीना-झपटी, चोरी-छिनरपन, लूट-खसोट किएक होइत अछि? विचित्र स्थितिमे देवनन्दन ओझरा गेला। मनमे एलैन हम डाक्टर छी। हमरा सन-सन केतेको डाक्टर अस्पतालसँ शहर धरि छैथ मुदा सेवा रहितो जाति आ दलालक कोन खगता‍ छइ। देखै छी जे जि‍नका जातिक आ दलालक अधार छैन ओ दिन-राति रूपैआ ठिकियबैत रहै छैथ आ जि‍नका क्षेत्रीय आकि‍ जातिक अधार नइ छैन, ओ सभ गुण रहितो माछी मारै छैथ। फेर मनमे उठलैन, जहिया हम डाक्टर बनलौं तहिया मात्र थर्मामीटर आ आला रहए। तहिना अस्पतालोक स्‍थित छेलइ। मुदा आइ अनेको यंत्र, औजार अस्पतालोमे भऽ गेल आ अपनो कीनलौं। जइसँ चिकित्सा असान भेल, आ आरो असान भऽ रहल अछि। मुदा केकरा-ले? की अखन दबाइ आ चिकित्साक अभावमे लोक नै मरैए? सभकेँ चिकित्साक सुविधा भेट गेल छइ? की रोग लोककेँ पुछि-पुछि होइ छइ? जँ से नहि, तँ हमरा स्वयं अपन सीमा-सरहद बूझक चाही। जँ से नइ बूझब तँ जहिना झाँट-बिहाड़िमे कीड़ी-मकौड़ीसँ लऽ कऽ चिड़ै-चुनमुनी नष्ट होइए, तहि‍ना भऽ जाएब। जँ सएह हएब तँ अनेरे एते बुधिकेँ किए रगड़ै छिऐ? वेचारी ओहिना खसल खेत जकाँ परती रहितैथ। जैपर धिया-पुता परो-पैखाना करैत आ खेलबो-धुपबो करैत..! तैबीच स्टाफ-सँ छात्र धरिक झुण्‍ड पहुँच कहलकैन- “डाक्टर साहैब, लहासकेँ की करए चाहै छिऐ?” आँखि उठा देवनन्दन सबहक चेहरा देख‍‍ मुस्‍कियाइत बजला- “गामेमे जरेबैन। ऐठाम सभ सुविधा रहितो हिनक विचारक प्रतिकूल रहत। तँए बीचमे हम अपन सिर दोख नै लेब। सौंसे जिनगी गाम आ समाजक बीच बितौलैन, तँए हमर फर्ज होइत अछि, हिनका लऽ जा समाजकेँ सुमझा दिऐन। हिनका निमि‍त्ते जे काज हएत ओ समाजक विचारानुसार हएत। जँ से नइ हएत तँ समाजक नजैरमे काँट बनि जाएब। जे नइ चाहै छी।” देवनन्दनक विचार सुनि सभ गुम्म भऽ गेला। तैबीच सीनियर डाक्टर सबहक झुण्ड सेहो पहुँचलैन। मुदा किनको मनमे सोग नहि। सबहक मन प्रफुल्लित। परिवारमे ने कहियो काल जन्म आ मृत्यु होइए मुदा अस्पतालमे तँ से नहि, सभ दिन जनम-मरण होइते रहैए। मुस्की दैत डाक्‍टर कृष्णकान्त देवनन्दनकेँ कहलखिन- “आगूक काज किए रोकने छी? पहिने शवदाहगृहमे फोन करि कऽ बुक करबए पड़त। जखुनका समए भेटत तइ हिसावसँ ने जाएब?” डाक्टर कृष्णकान्तक विचार सुनि देवनन्दन गुम्मे रहला। मनमे नाचए लगलैन जे स्टाफ आ जुनियर जे कहलैन हुनकर जवाब तँ दऽ देलिऐन। मुदा हिनका की कहबैन। जँ विचार कटबैन तँ मनमे दुख हेतैन। हमरासँ बेसी दिन दुनियाँ देखने छैथ। अपन विचारकेँ मनेमे रखि देवनन्‍दन बजला- “हम तँ बेटा छिऐन मुदा माए तँ जिनगीक संगी रहलखिन, तँए हुनकर विचार बूझब जरूरी अछि।” सभ कि‍यो माइक विचार सुनैले कान ठाढ़ केलैन। सुभद्रा बजली- “भलेँ ईहो घर-दुआरि अपने छी मुदा बनौल छिऐन देवक। हिनकर बनौल गाममे छैन। अपन गाछी-कलम छैन, जे पुस्‍तैनी छिऐन। मुइलहा-सुखलाहा गाछ सबहक जगहपर नवका गाछो लगौने छैथ। पतियानी लगा कऽ पैछला पुरखा सभ सजल छैथ, तँए हम ओइ‍ पतियानीकेँ छोड़ि अनतए केतौ दऽ अबिऐन, ई नीक नै बुझि पड़ैए। सि‍रि‍फ लहासे जरबैक प्रश्‍न तँ नै अछि अन्‍तिम क्रिया धरि निमाहैक अछि। मासे-मास, साल भरि छाया हेतैन। साले-साल, बरखी हेतैन तैपर सँ पितृपक्ष सेहो हेतैन।” सुभद्राक विचार सुनि सभ मुँह बन्न कऽ लेला। तैबीच ड्राइवर आबि बाजल- “गाड़ी तैयार अछि।” ड्राइवरक बात सुनि देवनन्दन कपड़ा बदलैले गेला। कपड़ा बदैल कऽ आबि गाड़ीमे लहासकेँ चढ़बैक विचार केलैन। सभ कियो रहबे करैथ‍ हाथे-पाथे लहासकेँ उठा गाड़ीमे चढ़ौलैन। लहासकेँ गाड़ीमे चढ़ा सभ कि‍यो अपनो बैस गाम वि‍दा भेला। गाड़ीमे बैसते देवनन्दनक मनमे एलैन उमेरक हिसावसँ पिताजीक मृत्यु उचिते भेलैन। अस्सी बरख धरि लोक बुढ़ होइत अछि आ ओइ‍सँ ऊपर भेलापर झुनकुट बुढ़ भऽ जाइए। जहिना पाकल धान कि‍ कोनो अन्न कटलापर अधिक छिजानैत नै होइत मुदा वएह जखन झुना जाइत तँ हवो-बि‍हाड़िमे आकि‍ ओहुना तुइ-तुइ खसए लगैए, तहिना तँ मनुखोक शरीर होइत अछि? अधिक बएस भेलापर, माने झुनकुट बुढ़ भेलापर शरीरक अंग सभ क्रियाहीन हुअ लगै छै, जइसँ रंग-बि‍रंगक बाधा सभ उपस्थि‍त हुअ लगैत अछि। बाधा उपस्थित होइते केतेको रंगक रोग-वियाधि आबि जाइत अछि। नीक भेलैन जे अखन धरि अपन सभ क्रिया-कलाप करैत रहला। सि‍रि‍फ प्राण-वायु शरीरसँ निकललैन। सुभद्राक मनमे खुशी ऐ दुआरे होनि जे अधपक्कू भऽ नै पूर्ण पकि कऽ पति दुनियाँ छोड़लैन। शीला आ आशा-ले धैनसन। बेसी-सँ-बेसी हम सभ हुकुम निमाहैवाली छी। परिवारक हानि-लाभसँ हमरा की। अखन धरि परिवारमे चारिम सीढ़ीपर छेलौं, आब तेसरपर एलौं। तहिना आशाक मनमे रहै जे हमर तँ कोनो हिसाबे ऐ परिवारमे नइ अछि आ ने रहत। जहिना घर आ आँगनक बीच सीढ़ी बनल रहै छै जइसँ लोक घर-सँ-बाहर होइए आ बाहरसँ घर जाइए, तहि‍ना। माइक चेहरापर देवनन्दन नजैर देलखिन तँ बुझि पड़लैन जे पैछला कोनो बात मन पड़ि गेल छैन, जइसँ चिन्तित जकाँ भऽ गेल छैथ। मनमे उठलैन, माइक चिन्ता मनसँ निकलतैन‍ केना? युक्ति सुझलैन जे आन कियो जँ किछु बाजत तइमे माइयक चिन्ता नै मेटाएत। भऽ सकैए जे ओइ‍ बातपर धियाने नै दैथ। तँए नीक हएत जे किछु पुछि दिऐन, जइसँ आन बात मन पाड़ैमे पैछला बात दबि जेतैन। नीक युक्ति फुरने मुस्की दैत पुछलखिन- “माए, जखन हम छीहे तखन तोरा चिन्ता किए होइ छौ?” ‘चिन्ता’ सुनि सुभद्रा बजली- “बौआ, पुरना बात मन पड़ि गेल छेलए तँए कनी चिन्ता आबि गेल।” बिच्‍चेमे लाड़ैन चलबैत शीला बजली- “बुढ़ोमे पुरना बात मने छैन?” “कनियाँ, अहूँ एक उमेरपर आब एलौं, तँए कहै छी, हमरा दादी कहने रहैथ जे जहिना माटिक कोठी बना लोक अन्न रखैए, जे बहुत दिन तक सुरक्षित रहैत, तहिना मनुखकेँ अपन जिनगीक कर्म-ले कोठी बना राखक चाही। सभसँ पहिने गणेशजी बनौलैन। जहिना अन्नक खढ़-भूस्सा, सूपसँ फटैक कऽ हटा दइ छिऐ तहिना जिनगीक कर्मक जे भूस्सा-भुस्‍सी अछि, ओकरा हटा कर्मकेँ मोन राखक चाही।” सुभद्रा बजिते छेली आकि बिच्‍चेमे आशा जोर दैत पुछलकैन- “कोन पुरना गप छिऐ?” आशाक मुँह देख‍‍ सुभद्रोक मुँहमे पुरना अँकुर फुटलैन। मुस्की दैत बजए लगली- “बुच्ची, बहू-दिनका कथा छी, अपने गाममे दू समुदायक छौड़ा-छौड़ीकेँ प्रेम भऽ गेलइ। बच्चेसँ दुनू झंझारपुर हाट माए-बापक संग जाइत-अबैत रहए। गाममे दुनूक सभ काज-उदम फुट-फुट रहइ। ने खेनाइ-पि‍नाइ एकठीन होइ आ ने पावैन-तिहार। मुदा खेती दुनू गोरेक एक्के रहइ। ..दुनू गोरे तरकारीक खेती करए आ हाटमे जा-जा बेचैत। गामेसँ दुनू गोरे संगे जाए आ हाटोपर एक्केठाम बैस तरकारी बेचए। जखन दुनूक बच्चा कनी चेष्टगर भेलै तँ कोनो-कोनो समान कीनि‍-कीनि‍ आनए लगलै। दुनू संगे जाइ। एकटाकेँ ने हराइक डर रहैत मुदा संगीक संग तँ बच्चा कम हेराइत अछि। बच्चेसँ दुनू गोरेकेँ वैचारिक मिलान हुअ लगलै। अपना सन-सन लोककेँ हँसी-चौल देखै-सुनै। देखा-देखी दुनू गोरेक बीच, हँसी-चौल हुअ लगलै। हाटमे तरकारी बेचैक लूरि आ खेतमे गोला-फोड़ैक, पटबैक, रोपैक, कमठौन करैक लूरि सेहो भऽ गेलइ। दुनूक नव दुनियाँ बनए लगलै, किएक तँ बाप-माएसँ पाँच-दस किलोक मोटा फाजिल उठबए लगल। जइसँ परिवारक काजो आ आमदनियोँ दोबरा गेलइ। बीचमे एकटा घटना घटलै।” बि‍च्‍चेमे फुदैक कऽ आशा पुछि देलकैन- “की घटना?” “बुच्ची, झूठ की साँच से भगवान जनथिन। मुदा गाममे चरचा चलए लगल। तना-तनी बढ़ए लगल। जहाँ-तहाँ गारि-गरौवैल आ पकड़ा-पकड़ी शुरू भऽ गेल। गामक जेते मुँहपुरुख छला सभकेँ अपने-अपने अपेछितसँ कहा-कही हुअ लगलैन। कखनो काल माथा ठंढा होइ, नइ तँ बेसी काल गरमाएले रहए लगलै। मुदा पनचैती के करत से पंचे ने एक्कोटा गाममे। सभ मुँहपुरुख अपनेमे कनफुसकी कऽ पनचैतीक समए निर्धारित कऽ दुनू गोरेक बापकेँ कहि देलखिन। हाट-बजारक लोक दुनू गोरे रहबे करए, जवाब देलकैन जे पंच हम हुनका मानब जे निष्पक्ष होथि। ..मुँहपुरुखक बीच दोसर उलझन ठाढ़ भऽ गेल। जँ एक समुदायक रहैत तखन तँ दोसर ढंगसँ पनचैती धरा कएल जा सकै छल मुदा से नहि, दू जाति दू सम्‍प्रादायि‍क बीचक विवाद छल! ..सभ मुँहपुरुखक माथ चकरा गेलैन। गाममे एक्को गोरे शेष नहि, जे एक पक्ष नै भऽ गेल होथि। तकैत-तकैत बुड़हापर नजैर पड़लैन। सभ दिन तँ बुड़हा अपन खेत-पथारसँ परिवार धरि रहला। गामसँ ओतबे मतलब रहैन जे मुरदा डाहए जाथि, बरियाती पुड़ैथ, भोज खाथि, केतौ अगिलग्गी होइ तँ जाथि। पर-पनचैतीक लूरि नहि, मतलबो नइ रहैन। आ कियो पुछबो ने करैन।” हँसैत शीला बजली- “एहेन सोहल-सुथनी बुड़हा छेलैन?” पुतोहुक बात सुनि सुभद्राक आँखिमे सिंहक ज्योति एलैन। उत्साहित होइत बजली- “कनियाँ, की-की लीला भेल से की कही। बुड़हाक भीर तँ कियो जाथि नहि, मुदा हमरा भरि-भरि दिन बरदबए लगल। अपन काज सभ खगए लगल। हमरा लग जे आबए तँ तेना कऽ अपन बात कहि दिअए जे हम ‘हँ’ कहि दिऐ। जइसँ हमर विचारे उधिया गेल। तखन बुड़हाकेँ कहलयैन। जखने कहलयैन आकि फरैक उठला जे गाममे की केतए होइ छै से हम नै देखै छी। खाइ-पीबै काल सभ एक भऽ जाएत आ जखन इज्जत-आबरूक बेर औत तँ पड़ा जाएत। एहेन गामसँ हटले रहब नीक। ‘जेकरा-ले चोरि करी सएह कहए चोरा।’ एहेन गामक कुचालिमे हमरा नै पड़ैक अछि। भने अपन नून-रोटीक ओरियानमे समए बि‍तबै छी आ शान्तिसँ रहै छी...। ..एक्के-दुइए सभ आबि-आबि कहए लगला। हारि कऽ हुनका बुझबैत-बुझबैत सुढ़िएलौं। मानि गेला। चारि बजेक समए निर्धारित भेल। सौंसे गामक लोक एकत्रित भेला। आँखिक देखलाहा तँ एकौटा गवाह नहि, मुदा दुनूक[2] क्रिया-कलापसँ साबित भऽ गेलइ। एक मतसँ सभ सहमत भऽ गेला जे दुनूक बीच सम्‍बन्‍ध अछि। जखन सम्‍बन्‍ध अछि तखन निराकरण हुअए...। ..गुन-गुनी फुस-फुसी बैसारमे शुरू भेल। चुपचाप बुड़हा सभ देखैत-सुनैत रहैथ। गुन-गुनी, फुस-फुसी जोड़ पकड़ए लगल। जोर पकड़ैत-पकड़ैत हल्ला हुअ लगल। दुनू दिस‍ गाम बँटा गेल। एक पक्षक कहब रहै जे एहेन-एहेन सम्‍बन्‍ध कोन समाजमे नै होइ छइ? कोनो कि अपने गामक पहिल घटना छी, आइ धरि की भेलइ। कहियो कोनो मुँह दुबराहाकेँ चारि थापर मारल गेलै तँ केकरो पाँच-दस रूपैआ जुरिमाना भेलइ...। ..दोसर पक्षक कहब रहै जे जाति-सम्प्रदायक बन्‍धन काँच-सूतक बन्धन छी। एक वृत्ति, एक उमेरक लड़का-लड़की जँ अपन जिनगीक निर्णए स्वयं करए चाहैए तँ समाजकेँ ओइ‍मे प्रोत्साहन करबाक चाही। ..दोसर विचार बुड़हाकेँ जँचलैन। अपनो निर्णए दऽ देलखिन। ले बलैया! एक पक्षकेँ तँ खुशी भेल मुदा दोसर पक्षक जे ऐगला-वाहन रहै, ओ बुड़हाक गट्टा पकैड़ कहलकैन जे बड़ पनिचैतियाक सार बनलैथ हेन! ..गट्टा पकैड़ते बुड़हाक नरसिंह तेज भऽ गेलैन। सभ बुझबो ने केलक। हाँइ-हाँइ कऽ बुड़हा चारि-पाँच थापर ओकरा मुँहमे लगा देलखिन। लगक लोक कियो एक थापर देखलक तँ कियो दू थापर। मुदा बुढ़ो आ मारि खेनिहारो पाँच थापर बुझलक। ..गाममे सना-सनी भऽ गेल। दौग-दौग कऽ सभ अपना-अपना अँगनासँ लाठी आनि-आनि दू साइड भऽ गेल। ..अपन-अपन घरबलाकेँ लाठी लऽ-लऽ जाइत देख‍‍ स्‍त्रीगणो सभ दौग-दौग आबए लगली। ओना मारिक डर सभकेँ होइते छइ। ..एक बेर 1942 इस्‍वीक एहने घटना पहद्दीमे भेल रहइ। जइमे लड़का-लड़कीकेँ आगि लगा घरेमे जरौल गेल रहइ। जेकर परिणाम हत्याक मोकदमा चलल आ एकतीस गोरेकेँ आजन्‍म कारावास भेल। ..गामक स्‍त्रीगण ढेरिया गेली। कियो बजै जे मनुखक जिनगीकेँ मनुखक जिनगी बना जीबैक चाही, तँ कियो बजै जे कुल-खानदानक नाक-कान कटौलक। कियो-किछु तँ कियो-किछु बजए लगल। सभ अपने-अपने बजैमे बेहाल। जहिना पुरुख तहिना स्‍त्रीगण। मुदा तत्खनात झगड़ा रूकि गेल। सभ पुरुखकेँ अपन-अपन घरवाली लाठी छीन-छीन बाँहि पकैड़-पकैड़ अपना-अपना आँगन लऽ गेली। गामक खेलौनाकेँ सरकारी खेलाड़ी पकड़लक। रंग एलइ। दुनू पक्षक जेते पंच पनचैतीमे रहै, सभकेँ कोट-कचहरीसँ लाट-घाट पहिनेसँ रहैन। नव खेलाड़ी-ले नव खेल आ नव फील्ड तैयार भेल। दुनू परानीकेँ मारि-पीटक मोकदमामे फँसा देलक। जे पच्चीस बर्खक पछाइत हाइ-कोर्टसँ फड़ियाएल।” आत्म विभोर भऽ सुभद्रा बेटा-पुतोहु आ पोतीकेँ अपन जिनगीक कथा सुनबैत रहथिन। जहिना एकाग्र भऽ देवनन्दन सुनै छला, तहिना शीलो। आशाक बुधिमे बात अँटबे ने करैत, तँए कखनो दादीक बातो सुनैत आ कखनो बाबाक अर्थियो दिस‍‍ देखैत। चौअन्नियाँ मुस्की दैत बिच्‍चेमे शीला सासुकेँ पुछलैन- “माए, जहलो देखने छथिन?” पुतोहुक प्रश्‍नसँ सुभद्राकेँ दुख नै भेलैन। मनमे एलैन जे भरिसक जिज्ञासा जागि रहल छैन। ओना देवनन्दनक नजैर सेहो माइयेपर अँटकल रहैन मुदा चुपचाप सुनैक इच्छासँ कान पथने छला। सुभद्रा कहए लगलखिन- “कनियाँ, बुड़हा-संग तँ हमहूँ हाइ-कोट धरि लड़लौं। मुदा हाकिमक आगू दुइए दिन जाइ छेलौं। जखन ममिला भेल तखन जमानत करबए जाइ आ जइ दिन पुछै जे गलती केलौं आकि‍ नहि, तइ दिन।” शीला पुछलकैन- “जहलमे की सभ होइ छै से तँ नै देखलखिन?” सुभद्रा बजली- “नै कनियाँ! झूठ केना बाजब। जे नइ देखलिऐ से केना कहब। भगवान सबहक देहमे रोइयाँ देने छथिन केकरो आगि किए उठेबै।” शीला- “बुड़हा, केतेक बेर जहल गेल छथिन?” बुड़हाक नाओं सुनि सुभद्राक मनमे खुशी एलैन‍। मुस्की दैत बजली- “अपने-मुहेँ एक्कैस बेर कहने छैथ। ओना देखिऐन तँ हमहूँ मुदा हमरा ठेकान नै अछि।” “भेँटो करए जाथिन?” “कहू, केना नै जैतिऐन। खाइ-पीबैक वौस मनाही केने रहैथ मुदा तमाकुल-चून दऽ दऽ अबिऐन।” “देख‍‍ कऽ कनबो करथिन?” “कनि‍तौं किए! कोनो कि नै बुझिऐ जे दस-पाँच दिनमे फेर निकलबे करता। तइले कनितौं किए। दस-पाँच दिन तँ लोक कुटमैतियोमे जा कऽ रहि‍ते अछि।” “बुड़हासँ झगड़ो होनि‍?” “झगड़ा किए होइतए। हँ, तखन घरक काजमे कहा-कही कहि‍यो काल हुअए। मुदा ओ हिसाव जोड़ि कऽ बुझा दैथ। मन मानि जाए। एक बेर अहिना भेल बौआ बि‍आह-ले।” ‘बौआक बि‍आह’ सुनि आशो चौकन्ना भेल आ शीलो देह-हाथ समैट‍ सुनैले कान ठाढ केलैन। मुदा देवनन्दनमे कोनो तरहक उत्सुकता नहि। “बौआक बि‍आह-ले की भेलैन?” “बौआ जखन पढ़िते रहए तखन विचार देलि‍ऐन‍, समाजमे बौओसँ छोट-छोट बच्चा सभकेँ बि‍आह होइ। जखन समाजमे रहै छी तखन तँ समाजक संग चलए पड़त। मुदा बुड़हाक विचार रहैन जे जखन देव पढ़ि कऽ अपना पैरपर ठाढ़ भऽ जाएत तखन बि‍आह करब। हमरा हुअए जे ऐ जिनगीक कोन ठेकान अछि, जँ बि‍आह केने बिना मरि जाएब तखन तँ अपनो मन लगले रहि जाएत। मुदा बुड़हाकेँ परिवारक खर्च जोड़ए पड़ैन। कहियो हाथमे साए-पचास रूपैआ नइ रहै छेलैन। परिवारमे एकटा-सँ-एकटा भूर हरिदम रहबे करै छल।” पत्नी आ माइक गप-सप्‍प सुनैत देवनन्दन विचारक दुनियाँमे डुमल रहैथ। मने-मन विचारैत रहैथ जे जहिना लंकामे विभीषण छला तहिना तँ अहू समाजमे अछि। हरिदम एक-ने-एक आक्रमण होइते रहैए। जइ समाजकेँ हम नीक बुझै छी,ओइ‍मे अन-पानिसँ लऽ कऽ बुधि धरिक चोर किए अछि? हरिदम लोक झुठे किए बजैए? अनका नीक देख‍‍ जरैत किए रहैए? दोसराक बोहु-बेटीक इज्जत किए लैत अछि? केकरो-कियो गारि-मारि किए करैत अछि? देवनन्दनक मन फाटए लगलैन। किएक तँ मनमे प्रश्‍न उठलैन‍ जे समाजमे अछूत के अछि जे कोनो ने कोनो रोगसँ ग्रसित नै हुअए? जँ सभ रोगीए अछि तँ समाज नीक केना भेल? जाधैर समाजक लोक समाजकेँ नीक नै बनौत ताधैर समाज नीक बनत केना? जइ गाममे एक गोरेकेँ हेजा होइ छै ओइ‍सँ सौंसे गाम रोग पसैर जाइ छइ। तहिना तँ आनो-आनो रोगक अछि। खास कऽ समाजक रोग..! अपनापर नजैर एलैन। अपनापर नजैर पड़िते अपनाकेँ डाक्टर देखलैन। मुदा केहेन डाक्टर, जे खाली शरीरक रोगक छैथ। मुदा रोग तँ एतबे नै अछि? शरीरक संग-संग मन-रोग आ परम्पराक-रोग सेहो अछि, जेकरा समाजक बेवहारक रोग सेहो कहि सकै छिऐ। जहिना तेज धाराक धारमे भट्ठासँ सीरा दिस‍‍ बढ़ब कठिन अछि मुदा असम्‍भव नहि? तहिना तँ समाजोमे अछि। जेमहर देखै छी ओमहरे केतौ झाड़ीक वोन, तँ केतौ तीत फलक गाछक वोन, तँ केतौ मीठो फलक गाछक वोन अछि। जे जिनगीक सैद्धान्तिक फलक वोन दिस‍‍ पहुँचबैत अछि..! तीत-मीठ फलक गाछ देख देवनन्‍दनक हृदैमे संतोषक अँकुर जन्‍म लेलकैन। संतोषक अँकुरकेँ उगिते दुनियाँक रंग बदलल बुझि पड़लैन। नजैर पितापर गेलैन। सिर दिस‍‍सँ निहारब शुरू केलैन, पएर लग अबैत-अबैत मन पड़लैन पिताक ओ रामकथा जे गामक स्कूलमे नाओं लिखबै दिन सुनौने रहैन। भगवान राम जंगल विदा भेला तँ अपन गामक समाज अरियातए संगे चलला। गामक सि‍मानपर पहुँचैत-पहुँचैत साँझ पड़ि गेल। समाजक आग्रह होनि जे अपने वोन नइ जा पुनः अयोध्या घुमि जाइ। मुदा राम अपन संकल्पपर दृढ़ छला जे पिताक आदेश नै काटब...। साँझ भेने सभ कियो रात्रि विश्राम करए लगला। जखन सभ सुति रहला तखन राम, लक्ष्मण आ सीता विदा भेलैथ। स्थल रस्तासँ नहि, स्थल छोड़ि अकासक रस्तासँ...। भोरमे जखन सबहक नीन टुटलैन तँ रामकेँ नै देखलैन। रस्ता दिस‍‍ बढ़ला तँ ने घोड़ाक टापक चेन्ह रहै आ ने रथक पहियाक। निराश भऽ सभ घुमि गेला! एहेन समाजमे पूर्ण जीवन पिता केना जीब लेलैन..? देवनन्‍दनक नजैर बढ़लैन जे समाजमे केते परिवारसँ दोस्ती अछि आ केतेसँ दुश्‍मनी। नजैर खिरबए लगला तँ वौआ गेला। माएकेँ पुछलखिन- “माए, आइ तँ समाजक काज पड़त। केते परिवारसँ बाबूकेँ दोस्ती छेलैन?” दोस्तीक नाओं सुनिते सुभद्रा हरा गेली। जेना शरीरसँ मन उड़ि गाममे वौआए लगलैन। मन पड़लैन संग मिलि गाएल कुमरम, बि‍आह, शामा आ घरक गोसाँइसँ लऽ कऽ दुर्गास्थान धरिक गीत। सासुकेँ एकाग्र होइत देख‍‍ शीला बजली- “बुड़ही तँ जनु नीन पड़ि गेली!” नीनक नाओं सुनि‍ते आँखि खोलि सुभद्रा बजली- “नै कनियाँ, नीन कहाँ पड़लौं हेन। मन पड़ि गेल आमक गाछीक धिया-पुता। भगवानो बड़ अनर्थ केने छथिन जे केकरो ढेरीक-ढेरीक चीज देने छथिन तँ केकरो ढेरीक-ढेरी खेनिहार। पाकल-पाकल आम जखन बच्चा सभकेँ दइ छिऐ आ ओकर हृदए जुड़ाइ छै तँ अपनो आत्मा जुरा जाइए...।” मुस्की दैत शीला बजली- “बुड़ही फेर ओंघा गेली।” बोलीमे जोर दैत शीला फेर बजली- “बेटा पुछै छैन, गाममे केते गोरेसँ दोस्ती छैन?” “एहेन गप किए पुछलह बौआ! ने कियो दोस अछि आ ने कियो दुश्‍मन।” देवनन्दन बजला- “जखन गाम पहुँचब तँ बाबूकेँ जरबैले तँ लोक सभकेँ कहए पड़त कि‍ने?” बेटाक बात सुनि सुभद्रा बजली- “छिया, छिया। मिथिलाक समाज छी। ऐ समाजमे मुरदा जरबैले, केकरो घरक आगि मिझबैले, केकरो-साँप-ताप कटने रहल आकि‍ गाछ-ताछपर सँ खसल रहल तेकर जिगेसा करैले केकरो कियो कहै नइ छइ। ई समाजिक काज छी, तँए अपन काज बुझि सभ अपने तैयार भऽ जाइत अछि।” माइक बात सुनि देवनन्दन नमहर साँस छोड़लैन। गामक सीमापर अबि‍ते सभ चुप भऽ गेला। अपन गाछी लग पहुँचते देवनन्दन गाड़ी रोकबौलैन। रघुवीर भायकेँ अबैत देखने रहथिन। एक बेर पच्‍छिमसँ कमला आ पूबसँ कोसीक बान्ह टुटि गेल। बरखो खूब होइत रहइ। नेपालक पहाड़सँ तराइ धरिक पानि सेहो टघैर-टघैर वेग बनि अबैत रहए। पानियोँ किए ने औत? आखिर ओकरो तँ समुद्रमे समेबाक लिलसा छइ। तहूमे मिथिलांचल बीच बाटपर अछि ओकरा किए ने होइत जाएत। गामक उत्तरसँ बाढ़िक पानि ढुकल आ एक दिस‍‍सँ पसरैत दच्‍छिन-मुहेँक रस्ता धेलक। जाधैर पानि वासभूमिसँ हटि बाधक रस्ता धरि रहल ताधैर केकरो चिन्ता नै भेलइ। मुदा जखन पानि मोटा कऽ अँगना-घर ढुकए लगल तखन सभकेँ चिन्ता हुअ लगलै। गामक एकटा टोल गहींरगरमे बसल, चारू दिस‍‍सँ पानि चढ़ैत-चढ़ैत अँगना-घर ढूकि गेल। एक तँ ओहिना, बरखामे टटघरो आ भीतघरो ढहिए-ढनमना गेल रहइ। तैपर सँ बाढ़िक वेग अबिते भीतघर खसए लगल, टटघर सभ मचकी जकाँ झुलए लगल। घर खसैत देख‍‍ टोलक सभ मालो-जाल आ चीजो-वौस आ धि‍यो-पुतोकेँ लऽ लऽ पोखैरक महार दिस‍‍ वि‍दा भेल। पच्चीस परिवारक टोल। बेदरा-बुदरी लगा एक साए तीस आदमी। चालि‍स-पैंतालीसटा गाए-महींस, पच्चीस-तीसटा बकरियो। मालो-जाल बाढ़िक पानि आ अवाज सुनि डरे थरथर कँपैत! कोनो-कोनोकेँ आँखिसँ नोरो खसैत। मुदा एक्कोटा ने खाइले डिरियाइत आ ने पानि पीबैले। सभ अपन-अपन माल जालक डोरी खोलि देलक। डोरी खुजिते आगू-पाछू जोरिया सभ पानिक वेगसँ ऊपर भेल। मुदा एकाएक पानि नै चढ़ल जइसँ एक्कोटा जान-मालक नोकसान नै भेल। टोलक समाचार सुनिते रघुनन्दन करिया काकाकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “एमहर आबह हौ बटु।” करिया काकाकेँ दुलारूसँ ‘बटु’ कहैत रहथिन। अबिते कहलखिन- “सुनै छी जे पुबाहि टोलमे बाढ़िक पानि चढ़ि गेलै हेन से चलह तँ देखिऐ?” बिना किछु बजने करिया काका संग भऽ गेलैन। थोड़े आगू बढ़ला तँ देखलैन जे चेतनसँ लऽ कऽ धिया-पुता धरि किछु-ने-किछु माथपर उठौने, भीजैत-ती‍तैत गामक ऊँचका जगह दिस‍‍ जा रहल अछि। मनमे उठलैन जेतए जा रहल अछि ओतए रहत केना? मुदा आँखि उठा कऽ तकैयोमे लाज होइन। जे जनिजाति कहियो सोझहामे बजबो ने करैत, ओ सभ साड़ीक फाँड़ बन्हने कियो अन्न, तँ कियो ओछाइन, तँ कियो बरतन-बासन नेने बच्चा सबहक पाछू-पाछू जा रहल अछि। लोकक दशा देख‍‍ करिया काकाकेँ कहलखिन- “बटु, सभकेँ अपना ऐठाम लऽ चलह, जहाँ धरि सकरता धरत तहाँ धरि पार लगेबै।” दुनू गोरे सभकेँ संग केने अपना घरपर एला। समस्या तँ देशक नै सि‍रि‍फ एक टोलक अछि मुदा पहाड़ोसँ नमहर। समाजक मनुखो तँ सभ रंगक अछि, कि‍यो अनका दुखकेँ अपन दुख बुझि कनैए, तँ कि‍यो हँसैए। जे विपैत‍ छै ओ एक गोरे बुत्ते केना मेटौल जाएत। जँ नै मेटौल जाएत तँ लोक मरैत केहेन परिस्थितिमे अछि? मनमे बुकौर लगि गेलैन, कोनो बाटे नै सुझैत रहैन‍। सभसँ पहिल समस्या अछि लोको आ मालो-जालकेँ पानिसँ बँचैले जगह। अपना घरे कएटा अछि। तहूमे सभ व्योतले अछि! अँगनाक घर अन-पानिसँ आ जारैन‍-काठीसँ भरल अछि। लऽ दऽ कऽ एकटा दरबज्‍जा खाली अछि। जे परिवारक प्रतिष्ठा छी, दोसराक आश्रम-स्थल। रघुनन्‍दनक मनमे नव आशा जगलैन जे जे विपैतमे पड़ल अछि ओ तँ अपन विपैतक मुकाबला करैले सेहो अछि। मुहसँ हँसी निकललैन। अँगनासँ दरबज्जा धरि सभकेँ ठौर धड़ौलैन। माल-जालकेँ तत्खनात तँ बान्हेपर, माने रस्तेपर खुट्टा गाड़ि-गाड़ि बन्हैले कहलखिन। खाइक ओते जरूरी नै बुझलैन जेते माल-जालक ठौरक। करिया काकाकेँ कहलखिन- “बटु, तत्खनात तँ सभ असथिर भेल। पहिने मनुखो आ मालो-जालकेँ खाइक ओरियान करह। तेकर बाद ऐगला काज देखबै।” खेनाइ बनबैले आगि आ चूल्हिक खगता‍ पड़त। चूड़ा तँ घरमे ओते अछि नहि, तहूमे ओ फँक्का-फुँक्की भेल, ओइ‍सँ काज नै चलत। जँ चाउर-दालि, तरकारी सभकेँ फुटा-फुटा देबै तँ ओते चूल्हिक बेवस्था केतए हएत। से नइ तँ पहिने नारक टालसँ नार खिंच कऽ सभ माल-जालकेँ दहक। आ लोक सभ-ले चारि गोरे एक्केठाम भानस करह। सएह केलैन। भानस हुअ लगल। रघुनन्दनो आ करियो काका गाममे घुमि-घुमि सभकेँ गर लगौलैन। बीस दिनक पछाइत सभ अपना-अपना ऐठाम गेल...। रघुनन्‍दनक समाचार कानमे पड़िते करिया काका दौड़ल एला, अबिते देवनन्दनकेँ कहलखिन- “डाक्टर साहैब, भैयाकेँ पहिने घरपर लऽ चलियौन। घरपर मृत्यु नै भेल छैन। अपनो परिवारक आ समाजोक लोक अन्‍तिम दर्शन करि लेतैन, तेकर बाद बरियाती साजि गाछी अनबैन।” करिया कक्काक विचार सुनि सबहक मनमे समाजक प्रति श्रद्धा जगलैन। देवनन्दनक मनमे एलैन, समाजमे पिताक कएल काज जे समाजक प्रतिष्ठाक कारण रहैन। करिया कक्काक बात देवनन्दन मानि, चारू गोरे गाड़ीसँ उतैर‍ गेलैथ। पछाइत ओहो तीनू गोरे– सुभद्रा, शीला आ आशा– उतैर जाइ गेली। तैबीच गाममे समाचार पसैर गेल। समाचार पसैरते जे-जेतइ सुनलैन ओ ओतइसँ देखैले दौगलैथ। धिया-पुता, बुढ़-बुढ़ानुससँ रस्ता अन्हरा गेल। गाड़ी केना आगू बढ़त से रस्ते नहि। मुड़ियारी दऽ दऽ रघुनन्‍दनक मुँह देखए चाहैन। मुदा मुँह झाँपल। तँए सभ चद्देर ओढ़ने सूतल आदमी देखैत। लोकक भीड़ चारू भरसँ गाड़ीकेँ घेरि नेने। ने आगू बढ़ैक बाट खाली आ ने कियो रघुनन्दनकेँ देख‍‍ पबैत। माटिक मुरूत जकाँ चारू गोरे निच्चाँमे ठाढ़ भऽ सबहक मुँह देखैथ। रंग-बि‍रंगक मुँह देख‍‍ पड़ैन‍। केकरो-केकरो आँखिमे नोरो आ मनमे सोगो देख पड़ैन आ केकरो-केकरो आँखिमे ने नोर आ ने सोग। मने-मन करिया काका विचारि बजला- “अहाँ सभ रस्ता छोड़ि दियौ। भैयाकेँ अँगना लऽ चलै छिऐन ओतै उतारि‍ कऽ रखबैन आ सभ दर्शन करब।” करिया कक्काक बात मानि रस्ता छोड़ि देलक। आगू-आगू गाड़ी पाछू-पाछू सभ घर दिस‍‍ बढ़ला। घरपर अबिते रघुनन्‍दनक मृत शरीरकेँ उतारि‍‍ उत्तर-सि‍रहौने सुता देलकैन‍। लगमे सुभद्रा, शीला आ आशा बैस गेली। देवनन्दनकेँ करिया काका कहलखिन- “बौआ, अहाँ दरबज्जापर बैसू। समाज सभ जिज्ञसो करए औता आ एमहर हम आगूक ओरियानो करै छी।” दियादीक सभ चूल्हि मिझा गेल। मुदा सबहक मनमे खुशी रहैन। सभसँ उमेरगर रघुनन्दने छला। ओना बेवहारिक रूपमे सबहक आँखिमे नोर रहैन मुदा मनमे दुख नहि। उत्तर-मुहेँ सुतौल रघुनन्‍दनकेँ नव वस्‍त्रसँ मुँह छोड़ि सौंसे देह झाँपल। सिरहौनामे रखल तुलसी गाछ आ गुगुलक सुगन्‍ध अँगनामे पसरैत। मर्द-औरतसँ आँगन भरल। मर्द सभ तँ दर्शन करि कऽ दरबज्जापर आबि जाइ छला मुदा स्‍त्रीगण सभ अँगनेमे बैस गप-सप्‍प करए लगैथ‍। छोटका-बच्चा सभ ओसारपर खेलए लगल। एक साए एगारह बर्खक रधिया दादी, बाँसक बत्तीक ठेंगा हाथे एली। झुनकुट बुढ़। ने मुँहमे एक्कोटा दाँत आ ने एक्कोटा केश कारी। चौड़गर मुँह। दहिना गालपर एकटा नमहर मसुहैर। जैपर इंच-इंच भरिक दूटा पाकल केश। सौंसे देहक चमड़ी ढील भऽ घोकैच-घोकैच गेल। चानिपर तीनटा रेघा जकाँ बनल। गालक ऊपरका भागमे सेहो रेघा जकाँ, मुदा निचला भागमे गाइक गरदैन जकाँ चमड़ी लटैक गेल। आँगनमे पएर दैते नवतुरियो आ सि‍यानो सभ दादी-ले रस्तो बनौलकैन‍ आ सुभद्रा लग बैसैक जगहो। मुदा दादीक आँखिक नोरमे बेथा रहैन। ओना अखन धरि नोर पुतलीसँ भीतरे छेलैन..। तखने पाँच बर्खक एकटा छौड़ा लुचबा, दादीक ठेंगा पकैड़ तीनू झुनझुनाकेँ जे तारक बना कऽ लाठीमे ठोकल रहैन–डोला-डोला बजबए लगल। अँगनाक सभ खढ़ू-मढ़ू लगमे जमा भऽ गेल। धिया-पुताकेँ देख‍‍ डाँटि कऽ सुबधी बाजल- “भने तँ तूँ-सभ ओसारपर खेलै छेलेँ, ऐठीन किए एलँ?” सुबधीक बात दादीकेँ नै सोहेलैन बजली-‍ “कनियाँ, बच्चा सभकेँ किए डाँटै छिऐ। अहाँ समरथ छी तँए नइ बुझै छिऐ, ई सभ अखन क्‍याँने गेल, जहिना जाड़क उत्तर गरमी मास अबैए आ गरमीक उत्तर बरखा, जे गरमीसँ शुरू भऽ जाड़मे ठेका दइ छै, तहिना तँ ई देहो अछि। हम तँ कातिक-अगहनक जाड़ भेलौं, ई बच्चा सभ तँ फागुन-चैतक जाड़ छी। मुदा सुरूज तँ वएह रहै छैथ। भलेँ कहियो उग्र तँ कहियो शीतल भऽ जाइ छैथ।” दादी बजिते रहैथ कि शीला उठि कऽ दहिना बाँहि पकैड़ आगू लऽ जाए लगलैन। रघुनन्दन लग पहुँचते दादीक आँखिसँ सौनक बरखा जकाँ नोर झहरए लगलैन। मुदा बेसी काल नै झहरलैन। मात्र ओतबे काल जेते काल अपन उमेरपर मन अँटकलैन। आगूसँ पाछू-मुहेँक रघुनन्दनक जिनगी दिस‍‍ नजैर बढ़िते दादीकेँ मुहसँ हँसी निकलए लगलैन। दादीक हँसी देख‍‍ आशा बाजल- “बाबीकेँ एक्कोटा दाँत नइ छैन। आब हेतैन?” आशाक बात सुनि दादी जोरसँ हँसली। बिनु दाँतक चौड़गर मुँह, जे तीन गोरेक मुँहक बरबैर लगैन। एक झोंक हँसि दादी सुभद्राकेँ कहलखिन- “दियादनी, अहाँ बच्चा छी तँए, कनी दुख होइते हएत। मुदा अहाँसँ कम्मे उमेरमे हमर स्वामी संग छोड़ि चलि गेलैथ। तइ आगू अहाँक विपैत छोट अछि। भगवान अहाँकेँ सभ किछु देने छैथ। भरल-पुरल परिवारमे श्रवणकुमार सन बेटा, लछमी सन पुतोहु आ एहेन सुन्नर खेलौना सन पोती अछि, तहन किए सोग करै छी। आब अपना सभ सृष्टिक ओहन बीज स्वरूप बनि गेल छी जइसँ अँकुरक सम्‍भावना नहि। जहिना कोनो अन्नक बीआ आकि‍ फलक बीआ साल भरिक उत्तर पुरान भऽ जाइए जइमे अँकुरक शक्ति झीण भऽ जाइ छै तहिना भऽ गेलौं। मुदा तँए कि‍ अन्ने फलक बीज जकाँ मनुखोक शक्ति साले भरिमे झीण भऽ जाएत? सबहक शक्तियो एक समान नै होइए?” तैबीच फुदैक कऽ आशा पुछलकैन- “बाबी, अहाँकेँ केते दिन भेल?” “हे गइ डकडरबा बेटी, तूँ हमरा दिन पुछै छेँ। साढ़े बाइस गाही बरख भेल अछि।” दादीक बर्खक हिसाव कियो नै बुझलैन। सभ अकबका गेली। सभ-सबहक मुँह देखए लगली। जे दादियो बुझलैन। मुस्‍कियाइत शीलाकेँ कहलखिन- “सासु सासु नहि, माए छैथ। हमर छोट दियादनी छैथ। जखन हमरा पाँच बरख ऐठाम एला भेल रहए तखन रघू बौआक जन्‍म भेलैन। एक बेरक खेरहा कहै छी, ता काकियो समरथे रहैथ मुदा हमरासँ उमेरगर रहैथ। माघ महि‍नाक मकरक मेला शुरू भेल। अपना गाम सबहक बेसी लोक हर्ड़ी जाइ छल। हमरा संग रघू बौआ हर्ड़ी गेल। हर्ड़ीसँ कनीए बेसी बि‍देसर अछि। मुदा बि‍देसरक मेला गड़बड़ हुअ लगलै। निरमलीसँ दरिभंगा धरिक रेलबे कातक जेते उचक्का अछि, सभ भोरुके गाड़ीसँ आबि उचकपन्नी शुरू कऽ देलक। जइसँ नीक घरक लोक विदेसर जेनाइ-एनाइ छोड़लक। ओना बि‍देसरो बाबा बड़ जगताजोर, तँए केतबो उचकपन्नी होइ तैयो मेला बढ़ले जाइत। अपना गाम सबहक लोक जेनाइ छोड़ि देलक। ओना क्षेत्रो नमहर छै, तैपर सँ स्थानक लग-पासक लोक सेहो कान्ह उठेलैन। जेकर फल भेलै जे स्थानसँ उचकपन्नी समाप्त भेल। हर्ड़ीक संग दूटा बाधा उपस्थित भेल। परसा धाममे सुरूज भगवानक मुरती उखड़लासँ नव स्थान बनल। ओना मुर्तियो दिव्य अछि। एक तँ सुरूज भगवानक, दोसर बेस किमती पाथरो अछि। मन्‍दिरो नीक। मुदा हालमे जे साम्प्रदायिक प्रभाव मदनेसरकेँ बढ़ौलक ओइ‍सँ परसो आ हर्ड़ियोकेँ नीक झटका लगलै। हर्ड़ीक महादेवो छैथ गहींरमे, जइसँ सभ दिन जल भरल रहै छैन।” बिच्‍चेमे सुभद्रा, दादी दिस‍‍ देखैत बजली- “बहि‍न केते दिन बौआ[3]केँ दूध पिऔने छिऐन?” दादी बजए लगली- “‍समरथाइमे हम खूब बुफगर रही। पहिल सन्तान भेले रहए। मनसम्फे दूध हुअए। काकी रोगा गेली। दूध टुटि गेलैन। हमरे दूध पीब-पीब बौआ जीअल। जखन बौआ साल भरिक भेला अन-तन सेहो खाए लगला, डेगा-डेगी चलौ लगला,बोलियो फुटलैन तखन काकी सिखा देलकैन दूधवाली माए कहैले। हमरो नीक लगए। बेटा तँ नै कहिऐन मुदा बच्चा कहैत रहिऐन। डेढ़ साल भेलापर हमरो दूध टुटए लगल। खाइ-पीबैमे तँ कोताही नै हुअए मुदा दोसर कारण भऽ गेल। मकरक मेला जाइत रही। काकी बच्चोकेँ नेने जाइले कहलैन। सभ साल ओतैसँ तरिपात कीनि‍-कीनि‍ आनी जे सालो भरि मसल्ला खाइ छेलौं। ओना हर्ड़ी मेलाक हरीष, माटिक नादि, टाड़ा-टाड़ी नामी रहए। सात-आठ बर्खक बच्चा रहैथ। गामक बहुत जनिजातियो आ धियो-पुतो रहए। अपनो बेटा आ बच्चोकेँ हमहीं नेने गेलिऐन। अरबा चाउरक रोटी आ सीम-भाँटाक तीमन बना लेलौं। गामोपर खा लेलौं।” बिच्‍चेमे आशा टोकलकैन- “खा कऽ महादेव दर्शन करए गेलिऐ?” आशाक बात सुनि दादी ठहाका दैत बजली- “हर्ड़ी मेला स्‍त्रीगणक मेला छी। पुरुखसँ बेसी स्‍त्रीगण आ धिया-पुता रहैए। दस बजेमे सभ खा-खा जाइत अछि आ दोसैर-तेसैर साँझ धरि घुमि-घुमि‍ अबैत अछि। अपना सबहक कुटमैतियो बेसी ओही भाग अछि। एक दिस‍‍सँ धीओ-बेटी अबैत आ दोसर दिस‍‍सँ माइयो-पितियाइन जाइत, जइसँ सभकेँ मेलामे भेँट-घाँट भऽ जाइत। जहिना ‘बड़ियाकेँ बान्ह नइ छै, जे मन फुरै छै से करैए’ तहिना तँ जनिजातियो आ बुड़िबकहो अछि। जे मन फुरतै से करत...। ..हँ, तँ कहै जे छेलियह, बच्चाकेँ नेने गेलिऐन। बेरहटिये पोखैरक महारपर बैस खाए लगलौं। बच्चोकेँ एक खाड़ा रोटी आ तरकारी देलिऐन। हम दच्‍छिन-मुहेँ, पोखैर दिस‍‍ घुमि कऽ खाए लगलौं। मुड़ी गोंतने रही, माथपर साड़ी लटकल रहए। तैबीच एकटा झुनझुनाबला घुमैत-घुमैत आएल। धिया-पुता सभ पाछू-पाछू रहइ। ताड़क पातकेँ गुलाबी रंगमे रंगि झुनझुना बनौने रहए। एकटा झुनझुना हाथसँ बजबैत रहै आ बाँकी पथियामे माथपर रखने रहए। आँएले-वाँएले बौओ रोटी खाइते पाछू धऽ लेलैन। हम बुझबे ने केलिऐ। धिया-पुता तँ खुरलुच्ची होइते अछि। झुनझुनाबला आगू बढ़ि गेल। बाटीमे पानि पीब जखन पानि दइले तकलौं तँ देखबे ने केलिऐन। ले बलैया! ओते लोकमे केतए ताकब? भारी पहपैटमे पड़ि गेलौं। हाँइ-हाँइ कऽ तरिपातो आ टाड़ो लेलौं आ तकैले वि‍दा भेलौं। एकटा झुनझुनाबला रहैत तखन ने ठेकना कऽ जइतौं। से तँ जेम्हरे देखिऐ ओम्हरे झुनझुनाबला रहए! मन हारि मानि लेलक। मनमे हुअ लगल जे काकीकेँ की जवाब देबैन। मुदा मने-मन चण्डेसर बाबाकेँ कहलयैन जे आन देवस्थानमे तँ कियो नै हेराइत अछि मुदा तोरा स्थानमे भऽ गेलह। अखनुका जकाँ ताबे धिया-पुताक चोरि देवस्थानमे नै हुअए। मुदा तैयो मनमे खुटखुटी रहबे करए। तेकर कारण रहै जे कहियो काल सुनिऐ फल्लाँ स्थानसँ फल्लाँक बेटा आकि‍ बेटी हरा गेलइ। तँए मनमे हुअए जे काकी की कहती? तहूमे रोगाएल छैथ। मने-मन समोह लगि गेल। मुदा फेर मनमे भेल जे जँ कहीं घुमि‍-फिर कऽ चलि आबैथ। थोड़े काल गुन-धुन कऽ एक हाथमे तरिपात आ दोसर हाथमे टाड़ा लऽ ताकए वि‍दा भेलौं। रस्ताक दुनू कात दोकानबला सभ दोकान लगौने रहै आ बीच देने लोक सभ चलइ...। ..मन्‍दिरक आगू एक्के बेर मन्‍दिरक फाटकसँ बहुत लोक निकलल। रस्तापर रेड़ा भऽ गेल। तखने माथपर सँ साड़ी ससैर गेल। आब की करब? दुनू हाथो बरदाएल रहए। माथपर साड़ी केना लेब। नै लेब तँ लोक की कहत। तैकाल दहिना हाथक टाड़ा छुटि गेल। फुटि गेल। झुटका-झुटका भऽ गेल। मुदा पहिने साड़ी ससारि कऽ माथपर लेलौं। एक गोरेकेँ पएरमे झुटकाक कान गड़ि गेलइ। ओ भिन्ने खिसियाइत कहलक जे ‘एहेन ढहलेल छह तँ मेला-ठेला किए अबै छह।’ मुदा अपन हारल रही, किछु नै कहलिऐ। ..चुपे-चाप रेड़ासँ बहरेलौं। बाहर अबिते आँखि उठा कऽ तकलौं आकि देखलौं जे उत्तरसँ दच्‍छिन-मुहेँ एकटा झुनझुनाबला अबैए। रस्ता कातमे ठाढ़ भऽ हिआ-हिआ ताकए लगलौं आकि पाछू-पाछू हिनको देखलयैन। देहो हल्लुके रहए। खाली एक्केटा हाथ बरदाएल रहए। दौग कऽ जा बाँहि पकैड़ कात केलिऐन। फेर जखन पोखैरक महारपर एलौं तँ केकरो नै देख‍लिऐ। सभ चलि गेल रहए। आनो-आनो गामक यात्री घरमुहाँ भऽ गेल छेलइ। हमहूँ ओही लाटमे विदा भऽ भेलौं।” मुस्की दैत शीला पुछलकैन- “तमसाएलमे फज्झैतो केलखिन?” सि‍नेहसँ भरल दादीक मुहसँ निकललैन- “राम-राम। अबोध बच्चाकेँ किए किछु कैहतिऐन‍। अबोध बच्चाकेँ तँ बुझा कऽ ने कहबै आकि मारि कऽ, मारलासँ बच्चा हेहरू भऽ जाइ छै किने...। ..हँ, तँ कहै जे छेलौं, गामपर एलौं तँ काकीकेँ कहलयैन जे एहेन-एहेन खुरलुच्ची बेदरा सेने कोनो मेला-ठेला नइ जाइ। काकी अकचका कऽ पुछलैन तँ सभ खेरहा कहलयैन। उमेरक अन्तर रहितो चौल करबे करै छेलि‍ऐन। जूरशीतलमे अछींनजलसँ असीरवाद दैते छेलि‍ऐन आ फगुआमे रंगो-रंग खेलाइ छेलौं...।” सुभद्रा दिस‍‍ देख फेर दादी बजली- “बहि‍न, अहाँक मालिकसँ कम्मे उमेरमे हमर मालिक संग छोड़लैन। करीब साठि बरि‍ससँ ऊपरे भेल हएत। अहाँ तँ एक बएसपर आबि गेल छी। भगवान कोनो चीजक परिवारसँ समाज धरि कमी देने छैथ जे सोग-पीड़ा करब। दुनियाँ फुलवाड़ी छिऐ। एक अबैत अछि, एक जाइत अछि। जहिना सालो भरि एकटा जन्म लैत अछि, एकटा जुआनीक आनन्द लैत अछि आ एकटा पकि कऽ सुखैत अछि। तहिना तँ मनुखोक होइ छइ। तहूमे भगवानक फुलवाड़ीक अजीब गति छैन। हुनका फुलवाड़ीमे सालक कोन, मासक कोन, दिनक कोन जे छने-छन एकटा अबैत अछि तँ दोसर जाइत अछि। हम अहाँ मनुख छी। असगर मनुख रहितो समाजिक सेहो छी, मुदा पहिने मनुख छी तखन किछु आर। मनुखकेँ मनुषत्‍व प्राप्त करब प्रमुख काज छी। जखने मनुखकेँ मनुषत्‍व प्राप्त भऽ जाइत तखने ओ दुनियाकेँ चिन्हए-जानए लगैत। अपन परिवारसँ समाज धरिक सम्‍बन्‍ध स्थापित कऽ लइत। जइसँ सम्‍बन्‍धक अनुरूप अपन दायित्व निमाहए लगैत। ओना बच्चा[4] हमरा आगूमे बच्चे छैथ। भलेँ समाजिक सम्‍बन्‍धमे भाए-भौजीक सम्‍बन्‍ध अछि। मुदा भगवान अनुचित केलैन। उचित ई होइत जे पहिने हमरा लऽ चलितैथ।” ई विचार मनमे अबिते रधि‍या दादीक दुनू आँखि ढबढबाए लगलैन! बचनू, चंचल, झोली, बौकू आ बतहू, देहक कपड़ा उतारि‍ खाली देहपर तौनी आ डाँड़मे धोती पहिरने, कान्हपर कुरहैर नेने पहुँचल। अँगना-सँ-दरबज्जा धरि जनिजाति, पुरुख आ बच्चासँ भरल। लोकक भीड़ देख‍‍ देवनन्दनक मन उड़ैत रहैन। अँगनासँ दरबज्जा धरि पिताक हँसैत आत्मा देखैथ। बिसैर गेला अपन जिनगी। मनमे हुअ लगलैन जे बिनु कहनौं समाज केना अप्पन काज बुझै छैथ। एहेन काज समाजक मात्र मृत्युए समए नहि, बेटा-बेटीक बि‍आहक संग अनेको समए होइत अछि। जँ संग मिलि‍ हँसी, संग मिलि कानी, संग मिलि गाबी आ संग मिलि नाची, तँ ऐसँ सुन्दर की होइत अछि। सुख केकरा कहबै? जइ सुख-ले लोक नीच-सँ-नीच काज करैत अछि मुदा पाबि नहि पबैत अछि। एक छिन्ना धोती पहिरने श्रीकान्त पहुँचला। श्रीकान्त मधुबनी कोर्टसँ बड़ाबाबूक पदसँ सेवा निवृत्त भेल छला। मुँह निच्चाँ केने सोझे आँगन पहुँच पएर छुबि गोड़ लागि एकटंगा दऽ ठोर पटपटबैत फुसुर-फुसुर बजए लगला- “काका, अहाँ परसादे जिनगी भरि कुरसीपर बैस सेवा निवृत्त भेलौं। जइसँ जहिना जिनगी चैनसँ बितेलौं तहिना ऐगला शेष जिनगी सेहो बिताएब।” सुभद्रा दिस‍‍ देख‍‍ श्रीकान्‍त फेर बजला- “काकी, हमहूँ अही समाजक बेटा छी। जहिना अहाँ देवकेँ बेटा बुझै छिऐन तहिना हमरो बूझब।” श्रीकान्तक बात सुनि सुभद्रोकेँ मन पड़लैन। मनमे उठलैन जे देखियौ कौल्हुका छौड़ा बुढ़ भऽ गेल। बुड़हा तँ सहजे झुनकुट बुढ़ छला। हवा-बिहाड़िमे टुटि कऽ खसबे करितैथ। एहेन मृत्यु भगवान सभकेँ देथुन। एहेन मृत्यु तँ धरमतमे सभकेँ होइ छैन। कोनो कि हमरेटा चूड़ी फुटल, सिन्नुर धुआएत आकि दुनियाँमे बहुतोकेँ होइ छइ। मुड़ी निच्चाँ केने श्रीकान्त अँगनासँ निकैल दरबज्जापर आबि देवनन्दनक बगलमे चुपचाप बैस गेला। किछु बजैक साहसे नै होइत रहैन। जेना जीह्वामे थरथरी आबि गेल रहैन। साहस बटोरि, आँखि उठा, देवनन्दनकेँ कहलखिन- “बाउ देव, ओना अहाँ बच्चा छी मुदा हमरासँ सभ तरहेँ ऊपर छी। अपन बात कहै छी। अखुनका जकाँ पहिने घरक स्थिति नइ रहए। बाबू बड़ मेहनती रहैथ। जहिना मनुखक किरदानी तहिना दैवीए प्रकोप सेहो सदिकाल चलिते रहै छल। एक दिस‍‍ बइमानी-शैतानी तँ दोसर दिस‍‍ पानि-बिहाड़ि, भुमकम-रौदी आ शीतलहरी होइते रहै छल। तैपर सँ रोग-वियाधि सेहो चलिते रहै छल। जखन टेस्ट परीछा दऽ पास केलौं तँ फार्म भरैक समए आएल। बाबू अस्सक रहैथ। कालाजार भऽ गेल रहैन...।” श्रीकान्‍तक आँखि सिमैस गेलैन। दुनू हाथे आँखि पोछए लगला। कालाज्वर सुनि डाक्‍टर देवनन्दनक मनमे एलैन जे सचमुच अपना इलाकामे कालाज्वर अखुनका केन्सरसँ कम नै छल। आँखि पोछि श्रीकान्‍त आगू कहए लगलखिन- “दिनानुदिन बाबूजीक देह हहरले जाइत रहैन। गुनाकरपुरसँ हाथीक लिद्दी आनि-आनि दिऐन। बच्चे रही तँए बुझबो कम करिऐ। माए जे कहए से कऽ दिऐ। फारम भरैले रूपैआ माएसँ मंगैक साहसे ने हुअए। भरि दिन तंग-तंग देखिऐन‍। दोसर-दोसर विद्यार्थी सभ फारम भरि लेलक। हमरा मनमे विचित्र उथल-पुथल होइत रहए। अन्‍तिम तारीख अबैत-अबैत आशा टुटि गेल। जेना विपैत‍ कपारपर आबि गेल हुअए तहिना बुझि पड़ए। दुनियाँक रंग बेद-रंग लगए लगल। अन्‍तिम दिनक चारि बजे, हेड मास्टर  साहैब एकटा विद्यार्थी दिअए समाद देलैन जे- काल्हि धरि हमरा लग फारम रहत तँए तूँ आबि कऽ फारम भरि लएह। कौल्हुका बाद भरब कठिन भऽ जेतह। ने कोनो काज नीक लगैत आ ने खेनाइ-पि‍नाइ...। ..मनमे आएल एक बेर रघुनन्दन काकाकेँ कहिऐन। सएह केलौं। आबि कऽ सभ बात कहलयैन तँ पुछलैन जे कहिया धरि काज छह..? ..कहलयैन आइ तँ आखिरी तारीक छी मुदा हेड मास्‍सैब एते दया केलैन जे काल्हि धरि समए देलैन अछि। ..दरबज्जेपर सँ काकीकेँ बक्सामे सँ रूपैआ नेने अबैले कहलखिन। जहिना बच्छाबला पैकार देने रहैन, तहिना आनि कऽ आगूमे रखि काकी कहलकैन जे घरमे एक्कोटा चाउर नै अछि...। ..जहिना काकी कहलखिन तहिना काका उत्तर देलखि‍न, एक-दू साँझ भूखलो रहि जाएब। मुदा एक जिनगीक प्रश्‍न अछि। तँए एहने सभ काजकेँ ने लोक धरम बुझैए। ..रौदियाह समए रहए। जइसँ गामक लोक कियो मरूआ रोटी, तँ कियो कोटाक जनेरक रोटी, कियो अल्हुआ तँ कियो खेसारीक उसना खाइत समए काटैत रहए। सेहो सभकेँ भरि पेट नै होइत। केते गोरेकेँ तँ साँझक-साँझ चूल्हि नै चढ़ैत रहइ...।” कहैत-कहैत श्रीकान्तक आँखिमे नोर टघरए लगलैन। जेते दुखक ताप श्रीकान्तक आँखिसँ टघैर-टघैर निच्चाँ खसैत, तेते देवनन्‍दनकेँ धरतीसँ उठैत हवासँ हृदए शीतल हुअ लगलैन। पुछलखिन- “अखन परिवारक केहेन स्थिति अछि?” धोतीक खूटसँ आँखि पोछैत श्रीकान्‍त बजला- “बाउ, बड़ सुखसँ जीबै छी। दुनू भाँइ बी.ए. पास कऽ नोकरी करैए। जेठका हाई स्कूलमे अछि आ छोटका ब्लौकमे। शनिए-शनि दुनू भाँइ अबैए आ सोमकेँ सबेरे खा-पी कऽ चलि जाइए। दुनू पुतोहुओ आ पाँचो पोता-पोतीसँ घर भरल अछि। अपनो पेन्शन भेटते अछि। भगवान बेटी नै देलैन। मुदा तैयो दुनू बेटाकेँ पढ़ा, रहैले छह कोठरीक मकान आ तीन बीघा खेत कीनलौं। चौमासमे एकटा कल गड़ा देने छिऐ, जइसँ तीमन-तरकारी कीनऽ नै पड़ैए। बाँकी खेत बटाइ लगा देने छिऐ। भरि दिन अनमेनामे लगले रहै छी। कखनो ई नै बुझि पड़ैए जे समए केना काटब। एते दिन तँ ऑफिसेक फाइल उघलौं मुदा आब दू-दू घन्‍टा रामायण, महाभारत पढ़ै छी। तइ लगल बच्‍चो सभकेँ पढ़ाइयो दइ छिऐ आ गोटे-गोटे खिस्सा सेहो रामाइनो आ महाभारतोसँ सुना दइ छिऐ। महिना भरिक हिसावसँ सालमे एक बेर देशाटन सेहो कऽ लइ छी। जइसँ तीर्थाटनो भऽ जाइए। अपनो तँ बहुत नहियेँ अछि, मुदा कक्काक बतौल बातकेँ अखनो कान धेने छी जे अपनासँ निच्चाँक जँ कियो किछु मांगए अबैत तँ नै पान तँ पानक डण्‍टियो लऽ जरूर सेवा करै छिऐ। मनमे कखनो कोनो चिन्ता नइ रहैए।” तैबीच किसुन लाल साबेक जुट्टी खोलि भिजौने आबि दलानक आगूमे बैस खर्ड़ए लगल। कान्हपर कुरहैर नेने सोधन सेहो आएल। आबि कऽ करिया काकाकेँ पुछलकैन- “भैया, बाँस कटबै?” “के सभ जाइ छह?” “कएटा कटबै?” “रौ बुड़िबक, ईहो पुछैक गप छी। खूब नमगर-चौड़गर चचरी बनबैक अछि। कोन चीजक कमी भैयाकेँ छैन जे मचोड़ि-सचोड़ि कऽ घर-सँ-बाहर करबैन। कमसँ-कम तँ चारिटा बाँस आनह। दूटा मुठबाँसी आ दूटा छिपगर लऽ आनह।” “कोन बीटमे कटबै?” “एना अनाड़ी जकाँ किए पुछै छह। तोरा कि नै देखल छह?” “से तँ सभटा देखल अछि। साले-साल काटि कऽ लऽ जाइ छेलौं तैयो ने देखल रहत। आकि आबे बि‍सैर जाएब। जहिना जेठ भैया जीबैतमे छला तहिना तँ आगूओ रहता कि‍ने। पाँचटा बाँस साले-साल सोझहोमे कटै छेलि‍ऐन परोछोमे कटबैन। मुदा से नइ कहलौं। कहलौं जे हरोथक बीटमे कटबै आकि चाभमे?” सोधनक बात सुनि करिया काका गुम्म भऽ सोचए लगला। मुदा बुझल-गमल काज, तँए सोचैमे देरी नै लगलैन। मुस्की दैत बजला- “हरोथ मरदनमा बाँस होइए, छाती धरि मोंछ-दाढ़ी रहै छइ। ओकरा चिक्कन बनबैमे देरी लगतह संगे एकटा आरो ओजार तीन दिन जहल चलि जाएत। काजक घरमे सभ चीजक काज बढ़ि जाइत अछि।” करिया कक्काक बात सुनि हँसैत सोधन बौकू दिस‍‍ बढ़ल। तखने धड़फड़ाएल दुनू परानी लेलहा आएल। अपनाकेँ अपराधी बुझि करिया कक्काक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। करिया काका बुझि गेलखिन जे भरिसक केतौ गेल रहए तँए पछुआ गेल। आगू चलैबला जँ पछुआ जाए तँ तेकर कारण पैछला काजो होइ छइ। मुस्‍कियाइत कहलखिन- “चेला, अखन धरि सुतले छेलह?” ठोर बि‍जकबैत लेलहा बजला- “काका, केतेक दिनक पछाइत आइ काज लगल। वएह करैले चलि गेल छेलौं।” “कोन काज करए गेल छेलह?” “घुरना भैयाकेँ आठ गो मझोलके शीशो गाछ छै ओकरे पाँगे-ले गेल छेलौं। एक तँ एहेन गाछ नै देखलौं। सदिकाल चुट्टी आ घोरन लड़ाइए करैत रहैए। मुदा आइ तँ अद्भुत देखलौं। चारिटा गाछपर ने चुट्टी आ ने घोरन छेलइ। मुदा एक भागक दूटा गाछमे लोहाड़ि रहइ आ दूटा गाछपर घोरन। तीनटा पाँगि नेने छेलौं कि सोनमा-माए दौड़ल आबि कऽ कहलक जे रघूदादा मरि गेलखिन। छिप्पी दिस‍‍सँ थोड़े पाँगि नेने रही। सोचलौं जे उतरैमे ओते घोरन कटबे करत से नइ तँ बँचले केते अछि पाँगियेँ ली...। ..एँह काका की कहब! पाँखिबला बड़का-बड़का घोरनक छत्ता रहइ। ओही पुरबैमे कनी अबेर भऽ गेल।” “अच्छा की हेतइ। अखन तँ ढेरो काज पछुआएल अछि। भने टेंगारियो अननहि छह। सोधनक संग जा बाँस काटि आनह।” “काका, कड़ची टाट बनबैले लऽ लेब। ताबे ओतै बोझ बान्हि कऽ रखि देबइ।” “बड़बढ़ियाँ।” “काका, मूजक काज तँ सेहो ने हएत।” “भने मन पाड़ि देलह, बिसरले छेलौं।” घरवालीकेँ लेलहा कहलक- “पहिने दुनू गोरे काकाकेँ दर्शन कऽ लिअ। तखन हम बाँस काटए जाएब आ अहाँ मूज नेने आउ। गठुलाक बत्तीमे खोंसि कऽ रखने छी। अदहा रखि लेब अदहा नेने आएब।” कहि लेलहा करिया कक्काक कानमे फुस-फुसा कऽ कहलकैन- “काका, थाकि गेल छी। पियासो लगि गेल अछि। पानि तँ पीब लेब मुदा अखन खाएब केना! एक बेर चीलमक भाँज लगा दि‍यौ।” लेलहापर करिया काका बिगड़ला नहि! सोधनकेँ आँखिक इशारासँ कहलखिन- “कुरहैर-टेंगारी लेलहो आ झोलीकेँ दऽ दहक आ हमर नाओं कहि बौकासँ पाँच रूपैआक गाँजा लऽ बँसबि‍ट्टीए-मे पीब लिहह।” काजक जुति-भाँति लगा करिया काका बँसवारि पहुँच गेला। तीनू गोरे गजो पीबैक तैयारी करैत आ दुनू बापूत–रघुनन्दन-देवनन्दनक बीच तुलनो करैत...। “देवनन्‍दन केतबो पैघ डाक्टर साहैब भऽ जेता मुदा तइसँ की, रघू कक्काक परतर हेतैन?” सोधनक बात सुनि करिया काका जिज्ञासासँ पुछि देलखिन- “से की?” “भरि दिन काका महादेव जकाँ लेन-देन करै छला। डाक्टर साहैब बुते से हेतैन?” चीलममे दम मारि, ऊपर-मुहेँ धुँआ फेकैत करिया काका बजला- “अपने बात सोधन कहै छिअ। भलेँ लोक हमरा माइयो-बापकेँ दोख लगा कहि दैत अछि जे जाबे माए-बाप, जन्मदाता-भगवान किछु गुण नै देखलखिन ताबे ‘करिया’ नाओं किए रखि देलखिन। कोनो कि‍ हमर देहक रंग कारी अछि? तँए, हम तँ समाजमे कलंके बनि जन्म नेने छी। केतबो लोककेँ बुझेबै तैयो हमर बात तरे पड़ि जाइए। जेकरा बुझा देबै ओ बुझि कऽ मुँह बन्न कऽ लेत। जेरक-जेर जे जनैम-जनैम कऽ नवका पीढ़ी बनबैत अछि ओ केना बूझत? मुदा तइले दुख कहाँ होइए। हम तँ ओहन समाजक लोक नै छी जे वित्तीय गामक सीमामे घर बना बुझैत अछि। हम तँ ओइ‍ समाजक छी जइमे जन्म-सँ-मृत्यु धरिक गाड़ी गुड़कैत अछि। पल्हैनक ऐठामसँ लऽ कऽ असमसान धरि!” जाधैर करिया काका बजैत रहैथ तइ बिच्‍चेमे लेलहा दू दम मारि लेलक। गहुमन साँपक बिख जकाँ लेलहाकेँ निशाँ चढ़ि गेल। सोधनक हाथमे चीलम दैत बाजल- “काका, एक बेर पटुआ काटए असाम गेलौं। अपना इलाकाक बहुत लोक साले-साल पटुओ आ धानो काटए मोरंग, असाम, ढाका धरि जाइ छल। मुदा हम पहिले-पहिल गेल रही। काकरभिट्टासँ बस पकैड़ सिलीगौड़ी होइत असाम गेलौं। एकटा बड़का धार देखलिऐ। बसक कण्‍डेक्‍टर ओंगरीसँ एकटा पहाड़ देखबैत बजलै जे ‘कामरूप कामाख्या मन्‍दिर’ ओही पहाड़पर छइ।” चीलम बढ़बैत सोधन पुछलक- “कोन कमख्या?” सोधनक बात सुनि ठहाका मारि हँसि लेलहा बाजल- “भैया, तहूँ अनठा-अनठा बजै छह। हौ वएह कमख्या जैठामसँ लोक जोग-टोन सीखि‍-सीखि‍ अबैए आ अपना इलाकामे मौगी सभकेँ ठकैए। कहतह जे सभसँ पक्का मन्‍तर हमर कोखिया गुहारिक अछि। शुक्रक बेरागनक दस बजे रातिमे गुहारि करए जेतह।” बिच्‍चेमे सोधन टोकलकै- “ओइ स्थानपर जा कऽ नै देखलहक?” लेलहा बाजल- “एँह, भैया तहूँ हद करै छह। जखन गौहाटी पहुँचिए गेलौं। तखन नै जइतौं? गेलौं तँ देखलिऐ जे चिड़ैसँ लऽ कऽ मनुख धरिक बलि होइए। हँ, तँ कहै छेलियह जे जखन बससँ उतरलौं तँ पानि पड़ैत रहइ। कनीए काल ओतए अँटकलौं आकि पानि छुटि गेल, चाह पीना बड़ी काल भऽ गेल रहए। चाह पीबैले मन लुस-फुस करैत रहए। किछु नीके ने लगए, चारू गोरे एकटा चाहक दोकानमे गेलौं तँ दोकानक सजाबट देख‍‍ कऽ किछु ने फूरल। अपना इलाकामे ओ सजाबट कहाँ अछि।” “केहेन सजाबट‍ रहइ?” ...सोधन पुछलकै। तैपर लेलहा बाजल- “दोकानदारेसँ पुछलिऐ तँ कहलक ई बाँसक कैमचीक बनौल छिऐ। ओकर बनाइ देख‍‍ आसचर्ज लगल जे केहेन-केहेन लूरिगर लोक सभ अछि। बाँसेक कुरसी, टेबुल आ गीरहक कप बनौने रहए। सिंह-दुआरि परहक मेहराउकेँ अदहा‍ घन्‍टा धरि देखैत रहलौं। पथिया-मौनी तँ अपनो इलाकामे लोक बनबैए मुदा ओहन कहाँ बनबैए। ने ओहन मेघडम्बर बनबैए आ ने ओहन मन्‍दिरनुमा घर..। ओम्हुरका बाँसो अजीब अछि। अपनो इलाकामे बीस-पच्चीस रंगक बाँस अछि। मुदा ओमहर तँ साइयो रंगक अछि। जेहेन कड़चीक दतमैन बनबै छहक तेहेनसँ लऽ कऽ भरि-भरि पाँजक देखबहक। पालकीमे जे बाँस देखै छहक, बीटक-बीट ओ बाँस अछि ओतए। छत्ताक बेँट बनबैबला सेहो अछि। पुरान-पुरान बाँसक बीट सभ फुलाएल-फड़ल सेहो अछि।” चीलमो सठल। उठैत करिया काका बजला- “बेसी देरी नै लगबिहह। हम ताबे आगू बढ़ै छी।” करिया कक्काक बात सुनि लेलहा बाजल- “काका, जहिना पानि‍ उतरल कोदारि, खुरपी, हँसुआ इत्यादिसँ काजो कम होइत आ भीरो बेसी, तहिना पनि‍उतरू पुरुख आ पनि‍चढ़ू पुरुखक काजमे होइ छइ। एते काल पनिउतरू छेलौं आब पानि चढ़ि गेल। अहाँ पहुँचबो ने करब तइसँ पहिनहि हमसभ पहुँच जाएब। मुदा एकटा बात कहि दइ छी, ‘रघूकाका गामक मेह छला!’ ई अन्‍तिम काज समाजक कान्हपर अछि, तँए नीक जकाँ होइन।” चारिटा बाँस काटि तीनू गोरे पहुँचल। दुनू मुठबाँसीक दूटा बल्ला बनौलक। बाँकी दुनू छिपगरहा फट्ठा बनबैले टोनए लगल। दू गोरे टोन बनबैत आ दू गोरे दू-दू फाँक कऽ फट्ठा बनबए लगल। रघुनन्दनक मृत्युक समाचार सुनि दियादीक बीच चूल्हि बन्न भऽ गेल। मुदा दि‍यादीमे एकरूपता नहि। जइक चलैत किछु चूल्हि बन्न भेल आ किछु जरिते रहल। गाममे सभसँ नमहर दियादी रघुनन्दनक छैन। से कोनो एकाएक आइए भेलैन से नहि। पहिनेसँ बढ़ैत आबि‍ रहल छैन। ओना, पहिलुका रूतबा आब नइ छैन मुदा तैयो गामक लोक मने-मन बुझैत अछि। पहिलुका रूतबा कमैक कारणो भेल। बेटीक बाढ़ि एने किछु परिवार तँ उपटिए गेल जे जहि‍यासँ सतना आ रमचन्द्रा भेल तहियासँ तँ आरो दियादी घिना गेलैन। दुनू एहेन भेल जे गामक कोन बात जे अपनो कुल-खनदानक बहि‍नकेँ बहि‍न नै बुझैए। जइसँ आनो-आनो आ अपनो परिवारक बुढ़-पुरान “छगरा गोत्र” कहए लगलैन‍। ऐ सभ दुआरे रघुनन्दनोकेँ दियादवादसँ ओते मेल नइ रहैन जेते सभ चाहैन। एकटा बात अखनो जरूर अछि जे आन दियाद आ आन जातिसँ कोनो तरहक झगड़ा-झंझटमे सभ एक भऽ जाइए। अखन धरि एते जरूर निमाहैत एला जे अर्थीकेँ अपने दियाद उठा कऽ अँगनासँ गाछी लऽ जाइत अछि। अखनो गाममे सभसँ अधिक पढ़ल-लिखल दियादी-परिवार देवनन्दनेक छैन। मुदा गुरु काका आ पढ़ुआ भैया ओछाइने धेने छैथ। जहिया दयाकान्त डाक्टरी पढ़ि नोकरी शुरू केलैन, तहिए-सँ धिया-पुताक संग गाम छोड़ि देलैन। तहिना उमाकान्तो इंजीनियरिंग पढ़ि केलैन‍। आब तँ सहजे एहेन चलैने बनि गेल, माने फैशने भऽ गेल अछि। साधारणो नोकरी केनिहार सभ गाम छोड़ि दइए। उमेरे तँ गुरुओ काका आ पढ़ुओ भाय बुढ़ नहियेँ भेला हेन, मुदा सोगे दुनू गोरे ओछाइन पकैड़ लेलैन। नीको मन रहै छैन तैयो घरपर सँ केतौ ने जाइ छैथ। अखुनका लोकक माने मर्द-औरतक जे छिछा-बिछा देखै छथिन तइसँ मन हरिदम खसले रहै छैन। नवका लोको तेहने भऽ गेल अछि जे नीक विचार, नीक काजकेँ शब्द मात्र बुझै छैथ ओकर बेवहारिक पक्षक गुणकेँ नै बुझै छैथ। बुझबो केना करता? जे कोनो फल काज केलाक उपरान्त भेटैत अछि, ओ बिनु केने केना भेट सकैए। दियादीक परम्पराकेँ निमाहैले सुखदेव देवनन्दन लग आबि बजला- “बौआ देव, अहाँ बच्चा छी तँए दियादीक परम्पराकेँ नै बुझै छिऐ। अखन धरि अपना दियादीमे चलैन रहल जे लहासकेँ आँगनसँ गाछी, अपन दियादीए-क समांग उठा कऽ लऽ जाएत।” सुखदेवक बात सुनि देवनन्दन किछु नै बजला। मुदा कातमे ठाढ़ करिया काका मुस्‍कियाए लगला। मनमे नचैत रहैन जे अखन गाममे छैथ तँए बेसी फुरै छैन। देह तेहेन बनौने छैथ जे अपन धोधि सम्हरबे ने करै छैन, डाँड़सँ धोती ससैर-ससैर खसैत छैन आ रूआब बब्बेबला छैन...। देवनन्दन दिस‍‍ देख‍‍ सुखदेवकेँ कहलखिन- “हओ सुखदेव, भाय-साहैब जाति-दियादसँ आगू बढ़ि समाजमे छैथ तँए कियो अपन करबह। जँ तोँ गाछीए लऽ जेबहुन तँ ऐमे अधला की। ईहो तँ एकटा काजे भेल। मुदा खाली बजनहिटा सँ तँ नै हेतह। तइले संगोरो करए पड़तह किने?” कहि करिया काका मुँह चुप कऽ लेला, मुदा मनमे उठिते रहैन- ‘जिनगी बि‍तलैन बोहुक संग सिनेमा देखैमे आ एला हेन अपनत्व बुझबै-ले। कोनो गत्रमे लाजो ने होइ छैन।’ मुदा ऐ गपकेँ मनेमे रखि बात बदलैत फेर बजला- “जाधैर हम सभ एमहुरका ओरियान करै छी, ताधैर तहूँ संगोर केने आबह।” तैबीच सुन्दर काका धड़फड़ाएल पहुँचला। दुनू ममियौत भाय परसू कपर-फोड़ोवैल कऽ नेने रहथिन, ओहीक जिज्ञासामे गेल छला। दुनू ममियौतक बीच डेढ़ कट्ठा घराड़ी छइ। बीच गाममे घर छैन। गामो गदाल अछि, तँए एक्को घूर घराड़ी कीनब असाध छैन। के अपन घर तोड़ि देतैन। ओना बाधमे पाँच बीघा खेत छैन मुदा धराड़ीक सुखे तँ असकरे बाधमे नै बसता। नानाक परिवार समटल रहने अइल-फइलसँ रहै छला। मालोक थैर आ नारक टालो बना लइ छला। इनारो अँगनाक कोणेमे रहैन। मुदा अपना परोछ होइते मनुखक बाढ़ि घरमे आबि गेलैन। दुनू भाँइ भिनौज कऽ लेलैन। करनाइयो नीक बुझि पड़लैन। करमी लत्ती जकाँ जेठका भायकेँ परिवार चतैड़ गेलैन। भगवानो दहिन भऽ सातटा बेटा आ छहटा बेटी देलखिन। पढ़बैक तँ कोनो समस्ये नहि, जे बि‍आहो-दान पछुआएले रहैन। मुदा तैयो घरक अभाव बुझि पड़ए लगलैन। अपने टी.बी.क रोगी। धिया-पुता जनमबैत घरोवाली तेहने छइ। मुदा जहिना क्रोध, तहिना जेठ हेबाक रूआब मनमे दुनू गोरेकेँ रहबे करैन। छोट भाएकेँ दूटा बेटेटा। तँए, कोनो तरहक अभाव नै बुझि पड़ैन। एक पीठिया पाँचो भाँइ लाठी उठौलक। समांगक पातर छोट भाए, कपार फोड़ा लेलैन। मुदा घरवाली बदला लाइए लेलखिन। पहिने भाइक चानिपर खापैड़ फोड़ि दियादनीपर कनखा पटकैत कहलखिन- “भरि दिन आहि-आलम करैत रहती आ रातिकेँ केहेन सुरखुरू भऽ जाइ छैथ..!” छोट दियादनीक गारि सुनि तँ उनटबए चाहलैन, मुदा ताबे टोलक लोक सभ आबि झगड़ा छोड़ा देलखिन। ओही झगड़ाकेँ निपटबैले सुन्दर काका गेल छला। मात्रिकेमे पता लगलैन जे रघुनन्दन भाय देश छोड़ि देलैन। पता चलि‍ते मामकेँ पनरह दिनक समए दऽ आबि गेला। गाम अबिते अँगा, चप्पल निकालि धोतीक खूट देहपर लऽ विदा भेला। अँगनासँ निकैलते पता लगलैन जे लहास अँगनेमे अछि, तँए गाछी दिस‍‍क रस्ता छोड़ि घरे दिस‍‍क पकड़लैन। डेढ़ियापर पहुँचते करिया काका सोझहामे पड़ि गेलखिन। देख‍‍ते पुछलकैन- “काज सुढ़ियाएल छह आकि पछुआएल?” नजैर घुमबैत करिया काका बजला- “एमहुरका काज तँ डोरियाएले अछि मुदा..?” “बड़बढ़ियाँ?” कहि सुन्दर काका आगू बढ़ि रघुरन्दन लग पहुँच, गोड़ लागि ठोर पटपटबैत फुसुर-फुसुर कहलखिन- “जिनगी भरि संगे रहलौं, तँए जँ किछु ऊँच-नीच भऽ गेल हुअए तँ बि‍सैर जाएब।” कहि सुभद्रा दिस‍‍ देख‍‍ मुस्‍कियाइत टोकलखिन- “भौजी।” सुन्दर कक्काक बोली सुनि सुभद्रा आँखि मिलबैत बजली- “बच्चा।” सुभद्राक-मुहेँ ‘बच्चा’ सुनि सुन्दर काका चोट्टे अँगनासँ निकैल देवनन्दन लग आबि बजला- “बाउ देव, दुनू भाँइमे तीने मासक जेठाइ-छोटाइ अछि। बच्चेसँ दुनू भाँइ संगे बितेलौं। सभ ओरियान तँ देख‍‍ रहल छी मुदा भजनियाँ सभ कहाँ अछि। मृत्यु सोगे ने खुशी सेहो होइत अछि। खुशी तँ तखन होइत जखन खुशीक काज होएत। भाय-साहैब अपनो रामायण, महाभारत गबै छला। संगे भजनियोँ-कीर्तनियाँक सेहो सुनै छला। आइ जखन दुनियाँ छोड़ि रहला हेन तखन पाँचटा भजनो किए ने संग कऽ दिऐन।” सुन्दर कक्काक विचार सुनि देवनन्दन अवाक् भऽ गेला। मने-मन विचारि बजला- “काका, सभ बात तँ समाजक बुझै नै छी, तहन तँ करिया काका जेना-जेना करै छैथ से देखै छी।” देवनन्दनक बात सुनि सुन्दर कक्काक मनमे भेलैन जे भरिसक किसुन लालकेँ नजैरमे नइ एलइ। मन लहरए लगलैन। जोरसँ तँ नहि, मुदा आस्तेसँ बजला- “सुआइत लोक ओकरा कन्हा कहै छइ। जेम्हरे देखत ओम्हरे बरिसत।” टाटक अढ़सँ किसुन लालो सुन्दर कक्काक बात सुनलैन। मुदा किछु टोक-टाक नै केलखिन। भजनियाकेँ बजबैले सुन्दर काका विदा होइत जोरसँ बजला- “किसुन, भजनियाँ ऐठाम जाइ छी, ताबे ऐठामक ओरियान करह।” किछु दूर आगू बढ़लापर मन पड़लैन आकि की, घुमि‍ गेला। सुन्दर भायकेँ घुमैत देख‍‍ किसुन लालकेँ भेलैन जे भरिसक किछु गंजन बाँकी रहि गेल, सएह करैले घुमला। किसुन लाल अपन डोलैत छातीकेँ असथिर केलैन। मुदा भऽ गेल उन्टा। जहिना किसुनलाक मन गंजन सुनैले मन्हुआएल तहिना सुन्दरो भाइक किसुन लालसँ पुछैले मन्हुआएल। लगमे आबि पुछलखिन- “किसुन, समरथाइमे तँ साज-बाजबला भजन-कीर्तन सुनै छेलौं मुदा आब तँ मने-मन गबै छी। अखन के सभ गबैया अछि?” अपन पुछब सुनि किसुन लाल उत्तेजित भऽ बजला- “आब की कोनो कमी छइ। एते दिन ढोल-पीपहीपर जीबछ भाय गबै छला। तहिना गुणापर छीतन आ रंगलाल सिङा बजबै छला। तीनूकेँ भाय-साहैबसँ अपेछा छेलैन। तीनू जीबते अछि, तँए तीनू गोरेकेँ कहि देब आवश्यक अछि।” दुनू गोरे गप-सप्‍प करिते रहैथ आकि बाँस-टेंगारी रखि लेलहा आबि बाजल- “काका, एक बेरक खिस्सा कहै छी। भैयाक बि‍आह रहैन‍। बाउ हमरा लोकनियाँ जाइले कहलक। अपन मन बरियाती जाइक नइ रहए। किएक तँ रजकुमराक बि‍आह रहइ। बच्चे रही। बिनु कहने बरियातीक पछोर लगि गेलौं। अखुनका जकाँ गाड़ी-सवारी थोड़ै रहै जे उतारि‍ दइत। घरवारी ऐठाम पहुँचलापर हमरो गिनती भऽ गेल। भूजल बदाम आ चूड़ा जलखै देलक। लुंगियाँ मिरचाइ तेहेन कड़ू रहै जे ओइ‍ लाटमे खूब खेलौं। रातियोमे खूब खेलौं। गद-पर-गद भऽ गेल। अफैर गेलौं। मन हुअए जे खूब फलिगर बि‍छान होइत तँ ओंघरा-ओंघरा सुतितौं। दलान छोट रहइ। ..चेतन सभकेँ तँ दलानपर अँटाबेश भऽ गेलै मुदा बच्चा सभकेँ जगहे नै भेलइ। पछाइत घरवारी मालक घरसँ मालकेँ निकालि बहरामे बान्हि देलक आ ओइ‍मे पुआर पसारि बिछान कऽ देलक। ओछाइन देख‍‍ मन खुशी भेल। एक कातमे पहिनहि जा कऽ जगह पकैड़ लेलौं। ..कत्तू रातिमे घरवारी छौंड़ा सभ आबि टीकमे चिड़चिड़ी आ देहमे कबछुआ पत्ता रगैड़ देलक। लगबै काल नै बुझलिऐ मुदा जखन चुलचुलाए लगल आकि नीन टुटल। बोरामे कसल धान जकाँ पेट रहए। कुरियबैबला हाथ दुइयेटा रहए, आ कुरियाए सगरे देह। उठि कऽ ठाढ़ भऽ निच्चासँ ऊपर कुरियाबए लगलौं आकि माथपर हाथ पड़ल। दुनू हाथ देलिऐ आकि सौंसे माथ मानी-चानी सुपारी जकाँ बुझि पड़ल। टोबैत-टोबैत ओंगरी टीकपर गेल आकि मौगीक खोपा जकाँ बुझि पड़ल। एक भागसँ चिड़चिड़ी टीकमे छोड़बी तँ दोसर दिस‍‍ पकैड़ लिअए। एमहर सौंसे देहो चुलचुलाइतो रहए। तैपर सँ हुअए जे पेट फाटि‍ जाएत! महाग मोसकिलमे पड़ि गेलौं। तामस उठि गेल। दुनू कान पकैड़ सप्पत खेलौं जे आइ दि‍नसँ बरियाती नइ जाएब। मुदा फेर मनमे आएल जे अगर हम नै केकरो बरियाती जेबै तँ हमरा के जाएत? जँ बरियाती नइ जाएत तँ बि‍आह केना हएत? कोनो कि केकरो फुसला कऽ मन्‍दिरमे जा करब आ पछाइत पनचैतीमे लाठी खाएब। बिनु बरियातीए बि‍आह केहेन हएत? बि‍आहक गवाह के हएत? कहियो कोनो झगड़ा हएत तँ पनचैती के करत...। ..एक तँ सगरे देह नोचैत रहए तैपर सँ बि‍आह मन पड़ि गेल। बि‍आह मन पड़िते मनमे उपकल जे जाबे दुख नै काटब ताबे बोहुक सुख केना हएत?” मुस्की दैत करिया काका बिच्‍चेमे टोकलखिन- “तोहूँ सभ दिनक ढहलेले-बकलेल रहि गेलँह। भैयाकेँ की कहै छहुन से ने कहबुहुन?” करिया कक्काक बात सुनि लेलहाक मन नोचनीसँ हटि भाइक बि‍आहपर पहुँचल, बाजल- “जखन बाउ कहलक जे लोकनियाँ जइहेँ, तखनेसँ आँगी-पेन्ट साफ करैक मन भेल। गामपर तँ फटलौ-पुरान आ मैलो-कुचैल‍ पीहिन लइ छी। बरियातीमे तँ छौड़ी सभ पीहकारीए मारत। उसराहा परतीपर सँ उस आनि, माएकेँ कहलिऐ खूब नीक जकाँ उसैन दइले। जखन उसैन देलक आ सरेलै तँ पोखैरक घाटपर जा कऽ खूब उज्जर करि कऽ खीचिलौं। दू ठीमन अँगा फाटल रहए। माएकेँ सी दइले कहलिऐ। काकीसँ सुइया आनि पुरना साड़ीक पाढ़िसँ डोरा निकालि सी देलक।” काजक धुमसाही देख‍‍ बिच्‍चेमे करिया काका कहलखिन- “अखन केतेक काज पछुआएल छह सेहो बुझै छहक। जे कहैक छह से झब-दे कहुन?” लेलहा बजए लगल- “हँ तँ काका, बि‍आहसँ दू दिन पहिने रघुनी काका आबि बाउकेँ कहलखिन जे जेहने बेटा-बेटी धनिकक तेहने तँ गरीबोक। माए-बाप तँ माइए-बाप होइत। सबहक हृदए तँ भगवान एक्के रंग बनौने छथिन। बेटा-बेटीक बि‍आहमे तँ सभकेँ एक्के रंग मनोरथ होइ छइ। गामेमे सिंगरिया बाजा अछि। एकटा सोहनगर बजो भऽ जेतह आ ओहो वेचारा[5] समाजक संग खेबो करत आ हँसि-बाजि कऽ बिताइयो लेत। ..कक्काक बात सुनि बाबू कहलकैन, सिङाबला तँ रूपैऔ लेत, से केतएसँ देबइ? ..तैपर रघुनन्दन काका कहलखिन, हमरा संगे चलह। कहि देबै जे समाजक काज छिऐ तँए नै पान तँ पानक डण्‍टियो लऽ कऽ काज सम्हारि दहक। रूपैआ नै ने हेतह मुदा खाइले तँ देतह। ..सएह भेलइ। दुआर लगैसँ पहिनहि रस्तेमे हमरा कहि देलक जे बौआ, नाच देखा देबौ। तूँ हमरे लग रहिहेँ। ..जखन बर दुआर लगल आकि सौंसे गामक बुढ़िया-सुढ़िया सभ चँगेरामे चरि-मुहाँ दियारी बाड़ने भैया लग गीत गबैत एली। जेते ढेरबा आ समरथकी सभ रहै ओ पाछूमे हाँ-हाँ, हीं-हीं करैत रहइ। चुपेचाप रंगलाल काका बीचमे सन्हिया गेलखिन। हमहूँ पाछू-पाछू गेलौं। अन्हार रहबे करै, एक्के-बेर खूब जोरसँ सिङा फूँकि देलखिन। तेते जोरसँ अवाज भेलै जे सभटा पड़ाएल। एक्के बेर जे पड़ाएल आकि एँड़ी-दौड़ी लगलै। एकटा खसल आकि ओइ‍पर भेड़ी जकाँ खसए लगल। जहिना अन्नक ढेरी लगबै काल पथिया-पथिये ऊपरसँ देल जाइ छै, तहिना भऽ गेल। हमहूँ बीचमे पड़ि गेलौं..! ..काका की कहब, दसटा सँ बेसीए ढेरबासँ अधबेसू धरि तरोमे रहै आ ऊपरोमे! तेते भारी लगै जे कनैए लगलौं।” मुस्की दैत करिया काका- “धुर्र बुड़ी, एहने पुरुख।” “ताबे तँ बच्चे रही कि‍ने...; मुस्की दैत- “से कि कोनो हमहींटा कनैत रही आकि तरमे पड़ल सभ कनैत रहए।” “आ ऊपरका?” “ओ सभ तँ खिखिर जकाँ हँसैत रहए। तँए काका, ओहो वेचारा आब चौथापनेमे अछि। आब तँ नवका-नवका बम्बैया बजन्‍त्री सभ भऽ गेल। ओकरो कहि दैतिऐ!” सुन्दर काका मुड़ी डोलबैत बजला- “अच्छा, तूँ सभ एमहुरका काज सम्हार हम ओमहर जाइ छी।” सुन्दर काका वि‍दा भेला आकि करियो काकाकेँ मन पड़लैन। बजला- “भाय, कनी सुनि लिअ। एक गोरे छुटि जाएत!” “के?” “छीतन भाय। एक दिनक बात मन पड़ल। अगहन मास रहइ। झुरझाड़ धन कटनी चलैत रहइ। एक्के ठीन हमहूँ रही आ भैयो रहैथ। हुनका जन रहैन, हम अपने कटैत रही। करीब बारह-एक बजे छिऐ। दुनू परानी छीतन भाय सुगर हहकारने खसलाहा खेतमे चरैले छोड़ि गुना नेने भाय-साहैब लग पहुँचलैन। काटल धान जे पसरल रहै, ओइ‍पर दुनू परानी बैस गुना टुनटुनबए लगल। भैया कहलैन- बटु, तमाकुल खा लएह। एलौं। खूब बढ़ियाँ जकाँ तमाकुल चुनेलौं। दुनू भाँइयोँ खेलौं आ छीतनोकेँ देलिऐ। छीतन घरवालीकेँ रघु भैया दिस‍‍ देखबैत कहलकै, जे भाय-साहैबक धानमे अपनो सबहक साझी अछि किने। पाँचटा गीत सुना दियौन। ..दुनू परानी गुनापर गीत गाबए लगल। से की कहूँ भाय, हुअए जे दुनू गोरेकेँ हाथसँ उठा माथपर लऽ ली। ओहन सिनेहसँ कहियो नै सुनने छेलौं, जेहेन सुनलौं। राजा भरथरी आ पिंगलाक गीत गौने रहए। वेचारा जीबते अछि। ओहू वेचाराकेँ कहि देबइ।” “बड़बढ़ियाँ” कहि सुन्दर काका आगू बढ़ला। जीबछक घर पहिने पड़ैत रहइ। जीबछक ऐठाम पहुँच जीबछकेँ कहलखिन- “भाय, रघूभैया दुनियाँ छोड़ि देलैन। अपन बाजाक संग चलह।” सुन्दर कक्काक बात सुनि घरवालीकेँ सोर पाड़ि जीबछ कहलक- “गिरहत बौआ मरि गेलखिन। छौड़ा सभकेँ सोर पाड़ियौ। सभ बापूत जाएब।” बेटा-भातिजकेँ बजबए मुनियाँ विदा भेल। सुन्दर काकाकेँ जीबछ कहए लगलैन- “भाय, एक दिनक गप कहै छी। माध मास रहइ। शीतलहरी चलैत रहइ। जहिना दिन तहिना राति। दिनोमे नै खेने रही। जाड़े बुझि पड़ए जे मरि जाएब। घूर-ले जरनो सधि‍ गेल। की डाहब से रहबे ने करए। बिछानमे पुआर देने रहिऐ, बस ओतबे रहए। मन हुअए जे ओकरे जरा ली, फेर हुअए जे जखन आगि मिझा जाएत तखन सूतब केतए। भुखे मन सेहो छटपटाइत रहए। दुनू परानी गिरहत बौआ ऐठीन गेलौं। रघुनन्दन बौआ करसीक बड़का घूर मालक घरमे लगौने रहैथ। अपनो बैसल रहैथ। हिनका लग पहुँचैक डेगे ने उठए। जी-जाँति कऽ खरिहाँनेसँ सोर पाड़लयैन। घूरे लगसँ कहलैन, एम्हरे आबह। ..गेलौं। खेबो केलौं आ माले घरमे घूरे लग बिछान बि‍छा सुतबो केलौं। जँ कनियोँ कानमे भनक लगल रहैत तँ अपने आबि जैतौं, मुदा अखन तक नै सुनने छेलौं। चलू-चलू पीठेपर अबै छी।” ढोल-पीपही लऽ जीबछ, गुना लऽ छीतन आ सिङा लऽ रंगलाल पहुँच, अपन-अपन बाजा बजबए लगल। जहिना बेटीक बि‍आहमे सोहनगर गीत गौल जाइत, तहिना बाजाक मुहसँ निकलए लगल। घरे-अँगना नै गामक वातावरण महमह करए लगल। बाजाक धुनपर कियो घुनघुनाइत, कियो नचैत, धिया-पुता उछलैत-कुदैत आ बुढ़-बुढ़ानुस सभ मने-मन रघुनन्दनकेँ स्मरण करैत टुटैट सम्‍बन्‍धपर विह्वल होइत। धड़फड़ाएल फोंच भाय आबि देवनन्दनकेँ कहलखिन- “डाक्टर साहैब, सभ किछु तँ ओरियान देखै छी मुदा सरर आ घी कहाँ अछि?” फोंच भाइक बात सुनि देवनन्दन बजला- “करिया काका आ सुन्दर काका सभ ओरियान कऽ रहल छैथ। हुनके ऊपर सभ भार छैन। बजा कऽ पुछि लियौन।” एकाएकी करिया काका, सुन्दर काका, लेलहा, बचनू देवनन्दन लग एला। करिया काकाकेँ अबि‍ते फोंच भाय पुछलखिन- “कारी भाय, सभ काज तँ समटाएले बुझि पड़ैए मुदा घी आ सरर, नै देखै छी?” फोंच भाय पाही जमीन्दारक मुँहलगुआ। ओना ने आब जमीन्दारी अछि आ ने जमीन्दार। मुदा एक साए पाँच बर्खक ढीलाबाबू जीबते छैथ। खेत-पथार तँ कमि गेलैन मुदा दरबारी चालि छैन्‍हे। अखनो भाँग पीसै, पान लगबै, मालिश करै, संगे टहलै आ भानस करैले नोकर रखने छैथ। वएह संगे टहलैबला फोंच भाय। फोंच भाइक गप सुनि करिया कक्काक मन नाचए लगलैन। सुन्दर काका मने-मन खुशी रहैथ जे भने हमरा नै पुछलैन। करिया काका मनमे आबए लगलैन जे आँखिक सोझमे देखै छी जे कियो लहासकेँ धारमे फेकैत अछि, तँ कियो धारक कातमे गाड़ैत अछि। कियो आमक लकड़ीसँ जरबैत अछि, तँ कियो बगुरसँ। कियो संठी-गोइठासँ जरबैत अछि, तँ कियो मुँहमे आगि छुबा गाड़ैत अछि। तैठाम सरर आ घीक कोन खगता‍ अछि? फोंच भाइक बात सुनि बचनू बाजल- “फोंच काका, अपन कएल काज कहै छी। नानी मरि गेल। ओना मरैसँ तीन दिन पहिनहिसँ दुनू माय-पुत ओतै रही। आँखिक देखल नानाक गाछी अछि। जइ साल अपन गाछी नै फड़ै छेलए। तइ साल चलि जाइ छेलौं। खूब मारि-धुसि कऽ डेढ़ मास खाइ छेलौं। तेसर साल जे कोसी नाश केलक ओइ‍मे मामाकेँ के कहए जे इलाकाक गाछी-कलम, बँसबारि उपैट गेल। अँगनाक सभ नानीकेँ मुइने कनैत रहए, आ मामा जरबैक लकड़ीले कनैत रहैथ। कानब दू रंग बुझि पड़ल। जहिना एक धुनक गीत भिन्न-भिन्न गबैयाक-मुहेँ एक्के स्वरमे गौल जाइत, तहिना तँ मरैयोक अछि। मामाक कानब सुनि लगमे जा पुछलयैन, तँ कहलैन जे भागिन माए मरि गेल तेकर दुख नै अछि। दुख तँ तखन ने होइत अछि जखन माए-बापक अछैत बेटा-बेटी मरैत। मुदा अपन जे पुबरिया गाछी छेलए ओ माइए-बाबूक रोपल छेलैन। बाल-बच्चा जकाँ दुनू गोरे सेवा करि लगौने रहैथ। उत्तरवारि भागसँ एक-पाँति सरही आम लगौने रहैथ, बाँकी सौंसे कलम कलमी रहए। मुदा सरही तँ सरहीए रहए। एकदम बड़बरि‍या। कनीए-कनीए-टा आम होइ। तहूमे गोटे-गोटे मीठ होइ नइ तँ सभ खट्टे। मुदा कलमी सभटा चुनल रहैन। अगते रोहैणसँ गुलाब खास आ डोमाबम्बै पकऽ लगए। जाबे सठबो ने करै ताबे कृष्णभोग, लड़ूबा पाकब शुरू भऽ जाइ। पीठेपर मालदह पाकए लगइ। मालदह सठबो ने करै आकि कलकतिया पाकए लगइ। कलकतिया सठिते फैजली, मोहर, ठाकुर आ राइर पाकए लगइ। ऐ हिसावकेँ देख‍‍ पुछलयैन तँ कहलैन, ‘बौआ सभ रंगक आमक खगता‍ होइ छइ। जखन जारैनक खगता‍ हेतह तँ कलमीक डारि कटैमे मासचर्ज लगतह। मुदा सरहीमे से नइ हेतह। हँ सरहियोमे तखन हेतह जखन कलमीए सन नम्हरो आ सुअदगरो रहतह। जारैन‍क जरूरत‍‍ चूल्हिओ आ मुरदो डाहैमे हेतह। मात्र जरबैयेक काजटा तँ नै अछि। मुइला पछाइत‍ गाछोक उत्सर्ग होइत अछि। तइले तँ बड़बरीए नीक अछि। काटि कऽ जरबैक बात तँ जँचल मुदा उत्सर्ग नै जँचल। हुनकर लगौल छेलैन। अपना विचारसँ लगौलैन। कोसीक बि‍कराल बाढ़िसँ पहिनहि नाना मरल रहैथ, तँए हुनका सुकाठ माने सरही आमक लकड़ीसँ जरौल गेलैन। एक-एकटा गाछ पुरहितो-पात्रकेँ देल गेल। हुनका तँ सोलहो-अना गाछी रोपैक फल भेट गेलैन। मुदा माएकेँ केना जराएब आ की दान देबइ। मामाक बात सुनि दुखो भेल आ तामसो उठल। जखन छल तखन भोगलौं। अखन नइए तँ कानब किए? कहलयैन- मामा जँ कनलासँ दुख भगैत आ सुख भेटैत तँ अहि‍ना ई दुनियाँ रहैत? अनेरे अँगनामे रखने छी आ कनै छी। चलू, हमरा सभ लूरि अछि। खाधि खुनि गोरहोसँ जरबैक लूरि अछि आ सनठियो-मनेजरसँ, सुकाठोसँ जरबैक लूरि अछि आ कुकाठोसँ आ अगबे बाँसो-कड़चीसँ।” बचनूक बात सुनि सभ ठमकला, मुदा फोंच भायकेँ तामस चढ़ि गेलैन। दाँत पीसैत बजला- “सौनमे जनमल गीदर, भादवमे आएल बाढ़िकेँ देखते कहलक जे एहेन बाढ़ि देखबे ने केलौं! देखैत-देखैत दाँत-पोन झड़ि गेल हमर आ सिखबै छेँ तूँ।” करिया काका सुन्दर काका दिस‍‍ तकलैन। सुन्दर काका पहिनेसँ करिया काका दिस‍‍ देखैत रहैथ। दुनू गोरेकेँ फोंच भाय दिससँ नजैर हटल देख‍‍ लेलहा फोंच भायकेँ चोहटैत बाजल- “फोंच भैया, अहाँकेँ ओतबे काल धरि भैया कहब, जेते काल अहूँ भाए बूझब। अहाँक देहमे हजार रूपैआक कपड़ा, हजार रूपैआक घड़ी आ दस हजारक मोबाइल अछि, मुदा हमरो दिस‍‍ देखू। रघूकाका आ देवभायसँ हमरो ओते अपेछा अछि जेते अहाँकेँ अछि। अहाँ कहने हम पड़ा जाएब से बात नहि। अन्‍तिम संस्कार काइए कऽ जाएब। काज ने अहाँ परिवारक छी आ ने हमरा परिवारक। काज करए ऐठाम एलौं हेन, घरवारी जेना आदेश देता तेना कऽ देबैन। अहाँकेँ फुचफुचेने की हएत?” लेलहाक बात सुनि फोंच भाय सहमला। भाषा बदलैत बजला- “एँह, खिशिया गेलह लेलहू। दस गोरे जखने एकठाम बैसलौं तखने दस रंगक गप चलत। तइले एते बिगड़ैक कोन काज अछि। एहेन-एहेन छोट-छीन गप-ले समाज टुटि जाइ छइ। जहिना सभ एकठाम रहैत एलौं हेन, तहिना आगूओ रहब कि‍ने।” वातावरण ठंढाइत देख‍‍ सुन्दर काका दरबज्जासँ उठि जीबछ लग पहुँच‍ बजला- “बटगवनीक समए आएल जाइए। धियान रखब।” कहि दरबज्जापर आबि करिया काकाकेँ कहलखिन- “किसुन, अखन बैसैक समए नै अछि। बैसलासँ काज पछुआएत।” “हँ-हँ, से तँ ठीके” कहैत करिया काका उठि गेला। करिया काकाकेँ उठिते एका-एकी केतेको गोरे उठि गेला। मने-मन फोंच भाय जरल जाइ छला। ठोर पटपटबैत बजला- “जेकरा जे मन फुरै छै से करैए। ने बजैक ठेकान आ ने बाप-दादाक कएल काजक।” दरबज्जापर सँ उठि फोंच भाय आँगन दिस‍‍ टहैल गेला। मनमे अन्हर उठल रहैन। भेल काज सभपर नजैर गड़ा-गड़ा देखए लगला जे केतए कथी गलती अछि। मुदा नजैर‍ गलतीक जड़िपर जाइते ने रहैन। जँ से जइतैन तँ ईहो बात बुझितैथ जे‘गलती ओहन बेवस्था पैदा करैत अछि जे चलैनमे रहैए नै कि आगूक बेवस्‍थामे।’ दरबज्जाक डेढ़ियापर चंचल चचरी बनबैत रहए आ बौकू साबेक जौर बँटै छल। आँखि गुड़ैर फोंच भाय चचरीक लम्बाई-चौड़ाइ देखए लगला। फट्ठा बैसबैत चंचल मुस्कियाइत कहलकैन- “नजैर नै लगा देबै, भैया?” चंचलक मुस्की फोंच भाइक छातीमे महुराएल तीर जकाँ लगलैन। किछु बोकरए चाहलैथ आकि तखने उत्तरवारि टोलमे जोरसँ हल्ला होइत सुनलखिन। जेतए जे कियो रहैथ, कान ठाढ़‍ कऽ ओतइसँ सुनए लगला। हल्लाक कारण रहै अढ़ुलिया-अपराजितक झगड़ा। रघुनन्दनक दियादक भगिनमान मनोहरक परिवार। तीन पुस्‍तसँ मनोहर ऐ गाममे। बब्‍बे आबि सासुरमे बसल रहैन। मुदा जे मनोहरो परिवारक छिऐ, ओहो दियादे जकाँ काज-उदममे संग-साथ दइत। पैछला लौफा-हाटमे मनोहर बीस हजारमे गाए बेचलक आ ओइ‍सँ नीक, बगलेक गाममे तीस हजारमे टोहिया गेलइ। पनरह दिनक समए बना रूपैआक ओरियान करए लगल। हिसाव जोड़ने जे बीस हजारमे गाए बिकाएल, बच्छोक पोसिन्‍दार कहलकै जे दुनू बच्छा बेच हमहूँ गाइये पोसब। बच्छा पोसब तँ ओइ‍ पोसिन्‍दार-ले अछि जे खेतियो करैत हुअए। जहिना सभ दिन, नवका कारमे बैसनिहारकेँ आनन्द होइत, तहिना नव बरद जोतनिहार हरबाहकेँ सेहो। ने गियर बदलैक काज आ ने स्पीड कम-बेसी करैक। रहबो किए करतै, अपन-अपन खेतक यात्राक बीचमे केतौ दुबट्टी-तीनबट्टी नै पड़ैत। जइ चालिमे जोतए चाहब, ओइ‍ चालिमे हर लादि दियौ। एक्के बेर खोलै बेरमे लदहा छिटकबैक काज। वेचारा पोसनिहारकेँ खेती नइ छइ। छोट पूजीकेँ पैघ बनबैक काज कऽ रहल अछि। मुदा ओही वेचाराकेँ की दोख देबै, जइतए तँ पैछले हाट मुदा बिमारीक चक्करमे तेना पड़ल अछि जे दुनू बच्छो हलि गेलइ। वेचाराक बड़ सुन्दर विचार छइ। अपन ढेनुआर गाए[6] भऽ जेतइ। समैक फेर देख‍‍ मनोहर बीसो हजार रूपैआ देवालमे तख्ता देल आलमारीक ग्रन्थमे रखि देलक। खुल्ला रैक। रैकपर सि‍रि‍फ भागवत, देवी भागवत, सुखसागर, योगवशिष्ट, कबीर मन्सुर, बाइबिल, कुरान आ कृष्ण-उद्धव संवाद रहइ। कृष्ण-उद्धव संवादमे बीसो हजारीक नोट पन्नामे दऽ दऽ सैंत कऽ राखने। काल्हि दिनमे सोहन आबि मनोहर माएकेँ कहि कृष्ण-उद्धव संवाद लऽ गेल। ग्रन्थ उनटा कऽ देखैक काजे नहि। अविश्वासक केतौ गन्‍धे नहि। साँझमे जखन मनोहर लालटेन नेस ग्रन्थ नि‍कालैले गेल तँ कृष्ण-उद्धव संवाद नै देखलक। मनमे शंका भेलइ। मुदा चोरिक शंका नै भेलइ। लगातार दुनू गोरेक बीच पोथीक लेन-देन होइत। माएकेँ पुछलक- “माए, सोहन भाय किताबो लऽ गेल छैथ।” “हँ।” “ओइमे किछु छेलैहो?” “खोलि कऽ कहाँ देख‍लिऐ।” मनोहर गुम्म भऽ गेल। मनमे एलै, अखने जा कऽ बुझि ली। फेर दोसर मन कहलकै, पाइयक ममिलामे राति-बि‍राति‍ नइ जाएब, नीक। आगूमे लालटेन रखि बैस गेल। मुदा मनकेँ अन्हार दाबए लगलै, सोग बढ़ए लगलै। माएकेँ कहलक- “माए, मन नीक नै लगैए। नै खाएब।” जोर करैसँ पहिने माइक मनमे एलै खेनाइ तँ नीक मनक छिऐ। अधला मनक तँ ओ...। सोचि पुतोहु-अढ़ुलियाकेँ कहलखिन‍- “कनियाँ, बौऔक मन दबे छै, हमरो खाइक मन नै होइए।” पुतोहु‍ झझकारि कऽ बजली- “चूल्हि लगमे जखन अधपक्कू भऽ गेलौं, तखन हिनकर मन खराब भेलैन। होइतए हमरा तँ भऽ गेलैन हिनके? एक ताउ लगतै तरकारियो भाइए गेल। रोटी पहिनहि पका नेने छेलौं। खइहैथ‍‍ भोरे, तखन मन नीक हेतैन।” मुदा फेर वेचारीक मनमे पत्नी आ पुतोहुक रूप आबि बैस गेल। जिनका-ले भानस केलौं से जखन खेबे ने करता तँ हमहीं...। ओहिना झाँपि कऽ सभ किछु रखि देबइ। सबेरे जखने मनोहर सुनलैन जे रघुनी भैया मरि गेला। तखने आबि दरबज्जापर मुड़ी झुका कातमे बैस गेल। सभकेँ होइत जे गाममे सभसँ बेसी दुख मनोहरेकेँ भऽ रहल छइ। असीम दुख! सेर-समांग दुनूक। माइयो पाछूसँ गेलखिन। खाली आँगन देख‍‍ अढ़ुलियाकेँ भुखे नइ रहल गेलैन। वेचारी चारिटा रोटी आ घेराक भुजिया लऽ खाए लगली। तखने अपराजित आबि अढ़ुलियाकेँ डेढ़िए-पर सँ हाक देलकैन- “कनियाँ, काकी गेलखिन?” मुँहमे घेरा-रोटी चिबबैत अढ़ुलिया बजली। मुँह भारी बुझि अपराजित ससैर कऽ आँगन आबि गेली, तँ देखलैन जे बीचे दोहैरपर केबाड़ लग बैस हाँइ-हाँइ खाइत अछि। जहिना करिया भेम्ह कटलासँ एक्के बेर सनसना कऽ बिख चढ़ि जाइए, तहिना अपराजितकेँ चढ़ि गेलैन। मुदा निधोखसँ अढ़ुलिया चपा-चैप चपने जाइत। जेते अढ़ुलियाक मुँह चलै, तेते अपराजितकेँ तरसँ खौंत चढ़ल जाइत। अढ़ुलिया बुझि गेली जे जँ कहीं सरेरा केलैन, तँ सीनेपर पकड़ा जाएब। से नइ तँ जाबे मुँह खोलैथ-खोलैथ ताबे थारी अखारि कऽ रखि लइ छी। बरदाससँ बाहर होइते झपटैत अपराजित बजली- “अँइ-गे निरविचारी, तोरा कोनो गत्तरमे लाज छौ कि नहि?” अखन धरि अढ़ुलिया मुँह नै खोललैन। थारी माँजि, अँठि फेरि हाथ धोइ, लोटा रखि उत्तर देलकैन- “हिनका बड़ लाज छैन। जे झूठ-मूठक बझा कऽ अबलट जोड़ै छैथ। हमरे नइ कोनो गत्तरमे लाज अछि। बुढ़ भऽ कऽ ई झूठ बजै छैथ से बड़बढ़ियाँ, हम बड़ निरलज्जी?” “अइँ गे तोरा एतबो ने विचार छौ जे जाबे अँगनासँ लहास नै उठलै ताबे मुँहमे अन्न किए देलौं। पहिने अँगना-घर करितेँ तखन ने भानस-भात करितेँ?” “हिनका दियादी छैन आकि हमरा। हम भगिनमान छी। लोकक सहोदरो भाए अनतए रहने बि‍रान भऽ जाइ छै, आ दूरोक लोक लगमे रहने अप्पन भऽ जाइ छइ। हमरा कोन अँगना-घर करैक काज अछि?” अढ़ुलियाक बात अपराजितकेँ बेसम्हार कऽ देलकैन। बजली- “जेहने कुल-खुट रहतौ तेहने ने बुइधो हेतौ?” कुल-खनदानक ऊपराग बुझि अढ़ुलियो बेसम्हार भऽ बाजल- “यएह जँ बड़ नीक कुल-खनदानक छैथ तँ कहाँ भेलैन जे मनुख जकाँ चुपचाप लगमे अबि‍तैथ। खाइत‍ देखितैथ तँ पुइछ‍ लितैथ जे कनियाँ एना किए करै छी। रातिमे नै खेने रही से बुझैक काज हिनका नै भेलैन। मुदा छुच्‍छे उपदेश दइले चलि एलौं। अपन काज आँखि-मूनि कऽ करैत रहितैथ, हमरा टोकैक जरूरत‍‍ किए भेलैन?” मुदा अपराजितो अपने सीमामे रहैथ, तँए बोलीमे गरमी रहबे करैन। अदहो बात अढ़ुलियाक नै सुनलैन, अपने बजैमे बेताल रहैथ। मुदा मनमे शंका उठलैन जे हो-न-हो अखन एकरे अँगनामे छी, कोनो दोखे लगा दिअए। ..रसे-रसे पाछू-मुहेँ डेगो उठबैत आ दूरीक हिसावसँ बोलियोमे जोर दैत वि‍दा भेली। मुदा भऽ गेलै केनादन। एक्के-दुइए टोलक धियो-पुता सहैट-सहैट आबए लगल, तहिना जनिजातियोक ढबाहि लगि गेल। चिपड़ी पथैत महिनाथपुरवाली सेहो गोबराएले हाथे पहुँचली। तहिना फूल तोड़ए जाइत नवानीवाली फुलडाली नेनहि पहुँचली। सभसँ कमाल ननौरवाली केलैन। खाइले बेटा कनैत रहै, ओकरा आरो चारि थापर ऊपरसँ लगा फनैकत पहुँचली। तहिना लखनौरवाली खिसिया कऽ बेटाक आगूमे भात-दालिक बरतने रखि, अपनाकेँ पछुआइत बुझि लफड़ल पहुँचली। वि‍‍चित्र भऽ गेलइ। सभ अपने-अपने फुरने अपन-अपन वि‍‍रोधीकेँ चिक्कारी दऽ दऽ गरियाबए लगल। कि‍यो केकरो बात सुनैले तैयार नहि। मुदा बजैत-बजैत मुँह दुखेने आकि बुधि जगने आस्ते-आस्ते हल्ला कम हुअ लगलै। कम होइत-होइत हल्ला सोलहन्नी शान्त भऽ गेल। मुदा तरे-तर केना-ने-केना दू पाटी बनि शब्दवाणक तैयारी चलए लगल। ओना, खलीफा केम्‍हरो नहि। अखन धरि पुवारिपारवाली दादी आ पछवारिपारवाली दादीकेँ सभ अपन-अपन अगुआ बुझैत। अगुआइ करैक बुइधो छैन। मुदा पुवारिपारवाली ऐ दुआरे नै पहुँचली जे चारिमे दिनसँ दुखित छैथ। आइ एकादशी केना छोड़ि‍तैथ। बि‍छानसँ उठैक होश नहि। तहिना पछवारिपारवाली अपना घरबलाकेँ डेढ़ बीघा जमीनक जिनगी बुझा दुनू परानी अपनो मालक गोबर आ बेरू-पहर एक बेर चारागाह जा एक छिट्टा आरो लऽ अनैत। सएह अनैले गेल रहए। जइसँ गामक किछु गोरे कुट्टी-चालि‍ करैत। मुदा दादियो पाछू घुमि‍ कऽ देखैवाली नहि। जखने कनियोँ भनक लगि जानि जे फल्‍लीं-चिल्‍लीं बाजल, तँ अँगना पहुँच उपराग दऽ अबैत। आब कहाँ कियो गोबरबिछनी कहै छइ। आँगनसँ टहलैत आबि‍ फोंच भाय चचरी लग पहुँच नजैर‍ दौगा-दौगा नाप-जोख करए लगला। मुदा काज अधखड़ुए, तँए गरे ने अँटैन। काजक दुनियाँमे अपन अँटाबेश नै देख‍‍ वाद-विवादक दुनियाँमे पहुँच बतहूकेँ पुछलखिन- “केतेटा चचरी बनत?” डोरी फट्ठेपर रखि आगूमे ओंगरीक नहसँ चेन्ह दैत बतहू बाजल- “ऐठीन तक।” “झुझुआन बुझि पड़ै छौ।” “से की?” “साढ़े तीन हाथ तँ यएह भेल। तेकर वाद जँ एक्को बीत आगू-पाछू नइ रहत से केहेन हएत?” फोंच भाइक बात सुनि बतहू गुम्म पड़ि‍ गेल। कातमे ठाढ़ भेल लेलहा सभ बात सुनैत। मुदा ऐ आशामे अखन चुप रहए जे जिनकासँ गप करै छैथ, पहिने हुनकर जवाब ने सुनि लेब। जँ अपने सक्षम वाद-विवाद कऽ सकैथ तँ सर्वोत्तम। नइ तँ जखन ऐठाम छी तँ ओते दूर धरि केना बतहा भैयाकेँ पाछू हुअ देब। बतहूकेँ चुप देख‍‍ लेलहा बाजल- “फोंच भैया, अहाँसे अधिक उमेरक बतहाभैया शरीर धुइन रहल छैथ, तैकालमे एतबो नै बुझलिऐ जे जिनका जइ काजक लूरि अछि ओ तइमे सहयोग करैथ। तैकालमे अपन कोनो कर्तव्य नै मुदा...। ..आइ धरि जिनगीमे केते चचरी बनेलौं आ केते मुरदा जरेलौं हेन? हँ! ई बात जरूर अछि जे गोटि-पंगरा जँ जरेनौं हएब तँ ओहन मुरदा, जिनका चचरीक जरूरते ने भेल हएत। पलंगपर उठा असमसान पहुँचै छैथ। चचरीक स्कूलमे पढ़लौं हम आ हिसाव बुझि गेलिऐ अहाँ?” लेलहाक बात सुनि फोंच भाय तिलमिलाए लगला। क्रोधसँ आँखिमे नोर एलैन आकि डरसँ, ई बात लेलहा नै बुझि सकल। ऐगला गप सुनैले कान पाथि देलक। मुदा कोनो प्रश्‍न नै अबैत देख‍, फेर बाजल- “पचासो ओहन मुरदा डाहने छी, गाड़ने छी जेकरा चारि गोरेक बदला दू गोरे पथियामे उठा सीक लगा बाँसक ढाठपर उठा अँगनासँ असमसान लऽ गेल छी। एहेन-एहेन केतेक की सभ केने छी से कहैक अखन समए नइ अछि। नइ तँ...।” आँगनसँ पटपटाइत दरबज्जापर आबि फोंच भाय देवनन्दनकेँ दुनू हाथ जोड़ि कहलखिन- “कठियारीमे हमरो हाजिरी।” “बेस-बेस। एतबे की कम छिऐ।” दरबज्जापर सँ फोंच भाय विदा तँ भऽ गेला, मुदा मनमे अन्हर-बि‍हाड़ि जकाँ उठए लगलैन। आगू-मुहेँ डेगे ने उठनि। पाछू घुमि‍ बेर-बेर तकैथ। एमहर अरथी उठबैले आ कठियारी जाइले घोल-फचक्का हुअ लगल। जनिजाति आ धिया-पुताक झुण्‍ड बाजाक लोभे आगू आबि-आबि ठाढ़ भऽ गेल। किछु गोरेक कहब रहैन, ‘अपन पत्नियोँ धरि असमसान नइ जाएत।’ तँ किछु गोरेक कहब रहैन, ‘जिनका बेटा नइ रहै छैन हुनका तँ पत्नीए आगि दइ छथिन तँए केना मनाही कएल जाएत? तहिना धिया-पुताक सम्‍बन्‍धमे सेहो प्रश्‍न उठैत जे ई तँ अन्तिम संस्कार-कर्म छी, जइमे खाधि खुनल जाएत, लकड़ी काटि जरौल जाएत। तइमे धिया-पुता अनेरे जा कऽ की करत? मुदा संस्कारे ने संस्कार पैदा करैत अछि। अरथीक मुँहमे आगि लगाएबो ने संस्कार छी। जेकर जरूरत‍‍ केकरा नइ छइ? आजुक धिए-पुते ने काल्हि जुआन बनि करत। तँए ओकरा काजसँ विमुख करब उचित नहि। मुदा काज[7] जेतेटा अछि,जेते लोकसँ कएल जाएत, तेतबे लोक ने चाही। तहन एते लोकक काज कोन छइ? फेर बाजा-बुजीक कोन काज अछि? काज मात्र मुरदे जराएबटा छी, आकि बेटी जकाँ एकठाम-सँ-दोसरठाम पहुँचेनाइयो छी। एमहर बाजा गनगनाइत! रंग-बि‍रंगक सोहर, रंग-बि‍रंगक दुआरि निकालि, वटगबनीक रिहलसल मने-मन चलैत। जहिना तरे-तर करिया काकाकेँ तहिना सुन्दर काकाकेँ छातीक पसीना गोलगलाकेँ भि‍जबैत, दुनूक मन घोर-घोर रहैन। अपन मन हारि मानि गेलैन। सहयोगीक जरूरत‍‍ पड़लैन, मुदा सहयोगी के? करिया कक्काक नजैर सुन्दर भायपर आ सुन्दर कक्काक नजैर किसुनपर। अपन-अपन जगहसँ उठि आँखिक इशारा चौमासक आड़िपर देलैन। आगू-पाछू दुनू गोरे चौमासक आड़ि दिस‍‍, चारि डेग बढ़ौलैन आकि पाछूसँ लेलहा टोकलकैन- “काका केतए ससरल जाइ छिऐ, काज अछि ऐठाम आ अहाँ विदा भेलौं बाध दिस‍‍?” लेलहाक बात दुनू गोरेक करेजकेँ जेना छेद देलकैन। छटपटाइत मन कहलकैन- “तेहेन उफाँटि टोकि देलक जे की वि‍चार हएत।” मुदा दरबारमे जहिना भिखमंगाक बि‍जकल मन रहैत, तहिना दुनू गोरेक रहैन। कठहँसी हँसि-हँसि दुनू गोरे संगे बजला- “जमात करे करामात! बौआ, तोहूँ इम्हरे आबह?” तीनू गोरे चौमासक आड़िपर बैस काजक समीक्षा करए लगला। मुदा मुरदा जराएब आ कठियारी जाएब, दू प्रश्‍न भेल। किछु गोरेकेँ लकड़ी कटैसँ खाधि धरि खुनए पड़त। किछु गोरे ओहिना मुड़ी गोंति कऽ सोग मनौता। सवा पहर मुरदा जरैमे लगै छै, तैपर सँ जारैन काटै-फाड़ैसँ लऽ कऽ अछिया सजाएब धरि अछि। घरोपर केते खटनी भेल अछि। ओहूना दू घन्‍टा खटला पछाइत‍ किछु खाइ-पीबैक मन होइ छइ। बिच्‍चेमे लेलहा टपकल- “ओइ जगहपर खाइक मन हएत?” सुन्दर लाल कहलखि‍न- “धुर्र बुड़ी, सभ दिन आड़िए-धूर आ गाछीए-बि‍रछीमे खाइ छेँ से बि‍सैर गेलही?” मुँह सकुचबैत लेलहाक मन लेलहाकेँ कहलक- “अनेरे बजलौं।” तीनू गोरे वि‍चारलैन जे पहिने घरवारीकेँ–जे जरबए नै जेती, जना दियौन जे कमसँ-कम दू बेर चाह आ लोकक हिसावसँ सूखल जलखै-पानि पठा दैथ। अपने सभ ने बारीक रहब, जेकरा जेते मेहनत हेतै ओकरा ओते अहगरसँ देबइ। मुदा नै लऽ गेने तँ एकटा आफद हएत, जाबे धि‍या-पुताक पेट भरल रहतै तबे तक ने नाचत। जखने पेट कुलकुलेतइ आकि घर दिस‍‍ विदा हएत। बिना हाथ-पएर धोनइ भनसा घर पहुँच जाएत। तँए ओकरो तँ घेर कऽ रखि नँचबैक अछि। हँ, किछु गोरे एहेन जरूर छैथ जे मुँहमे किछु नै लेता। लेबो केना करता। एक जिनगीक ओहन सि‍मान छी जे सोझहाक प्रश्‍न अछि, तँए हटल आकि‍ बाइस-तेबाइसकेँ आनबो उचित नहि। सुन्दर कक्काक मनमे उठलैन, ‘सि‍मानक वि‍वाद तँ दू खेत, दू गाम आ दू दुनियाँ भऽ जाइत अछि। कियो मृत्युकेँ खुशीसँ छाती लगबै छैथ, तँ कियो कानै-कलपै छैथ। शुभ काज तँ खाइत-पीऐत हएब नीक।’ मुहसँ हँसी निकललैन। तैबीच लेलहाक नजैर सुन्‍दर कक्काक मुँहपर पड़ल। मुस्की देख‍‍ अपनेपर शंका भेलै जे फेर ने तँ किछु हूसल। मुदा अहं जगलै, बाजल- “काका, जेते अबेर करब ओते अबेर हएत। अबेर भेने केतेको गोरे बि‍मार पड़त।” तीनू गोरे वाड़ीसँ दरबज्जापर आबि एक्के बेर बजला- “राम-नाम सत्य छी।” आहि रे बा! फेर चचरी लग हुज्जैत शुरू भेल। कि‍यो बजैत जे जीबैतमे कक्काक उपकारक बदला नइ दऽ सकलयैन, तँए हम उठाएब? किछु गोरेक कहब रहै, काका की बाबा आकि‍ भैया हमरो माए-बाबूकेँ उठौने रहैथ, तँए उठाएब। किछु गोरेक कहब जे बड़ बेरपर रूपैआ सम्हारने छला, तँए अपन कर्ज चुकाएब? आड़िपर गप सुनि लेलहोमे जेना पावर आएल। हुज्जैतयाकेँ दुनू हाथे इशारा दैत बाजल- “सुनै जाइ जाउ, कान्ही लगा कऽ उठबयौन नइ तँ एकभग्गु भेने दरद हेतैन।” लेलहाक विचार सभ मानि, चारि गोरे चचरी उठबए बाबा लग पहुँचल। चचरी लग पहुँचते जेना एक्के बेर सबहक मुँह चहा उठल- ‘रघुनन्दन नइ रघुनन्दनक अरथी उठि रहल छैन!’ सुभद्राक आँखि, कोसीक ओइ‍ धारा सदृश बहए लगलैन जे पहाड़क झरना होइत समतल जमीनपर आबि अनवरत चलैत रहैए...। आँगनसँ निकैलते एक दिस‍‍ “राम-नाम सत्य छी? तँ दोसर दिस‍‍ शहनाइपर बहि‍नक वि‍दाइक धुन..! यएह तँ सुख-दुख दुनू जगहक दुनियाँ छी। घरक मुहथैरपर एक दिस‍‍ करिया काका आ दोसर दिस‍‍ सुन्दर काका ठाढ भऽ अन्‍तिम प्रणाम कऽ आगू बढ़ौलैन। तइ पाछू देवनन्दक हाथमे आगि दऽ विदा केलैन। तइ पाछू बरियाती सजि गेल। सभ बरियातीकेँ निकलला पछाइत‍ सुभद्रा आ शीला रूकि गेली। समए पाबि करिया काका शीलाकेँ चाह-जलखै-पानिक बात कहि, रेलगाड़ीक गार्ड जकाँ पाछू-पाछू चलला। गाछीक कोणपर पहुँचते करिया काका आ सुन्दर कक्काक खोज हुअ लगल। मुड़ी-उठा देवनन्दनो तकलैथ। मुदा दुनू गोरेकेँ अदहे रस्तामे अबैत देखलैन। गाछी पहुँचते करिया काका आगू बढ़ि ओंगरीसँ इशारा दैत बजला- “ऐठाम भैया मचान-खोपड़ी बनबैत रहैथ‍।” दोसर दिस‍‍ माने उत्तर-पूरब कोणमे देखबैत फेर बजला- “आ ऐठाम बेसी काल बैसै छला। तँए नीक हएत जे बि‍‍च्‍चेमे दिऐन।” कहि लेलहाकेँ कहलखिन- “लेलहू, चलह। पहिने लकड़ी देखी।” करिया काका, सुन्दर काका, लेलहा, बचनू, चंचल सभ बढ़ला। एमहर जीबछो, छीतनो आ रंगलालो अपन-अपन जगह टेबि‍ बाजा उठौलक। एकछाहा मालदहक कलम, खाली चारू हत्तापर शीशो, जामुन, गमहाइर। एकोटा आमक गाछ सुरेब नहि। सभ अष्टावक्र जकाँ। तहूमे मृत्यु-ले जीबि‍तकेँ बलि देब उचित नै बुझि आमक गाछसँ नजैर हटा लेलक। गमहाइर दिस‍ नजैर दैते लेलहा बाजल- “गमहाइर महराज आ जामुन महराज तँ तेहेन छैथ जे अपना बुत्ते अपनो नै पार लगतैन, मरल देह हिनका बुत्ते जरौल हेतैन।” लेलहाक बात सुनि सुन्दरो काका आ करियो काका आँखि मिला मुस्कियाए लगला। मुदा लेलहाक बाजबसँ चंचलकेँ तामस पजरए लगल। खढ़क आगि जकाँ लगले पजैर गेल- “यौ सुनर काका, जहिना पनियाह जामुनक लकड़ी होइए, तहिना गमहाइरो होइए। ऐसँ नीक आमक हएत। कनी रूखो होइए। तहूसँ रूख इलचीक होइ छइ। अनेरे काजमे कोन भदबा लगौने छी। हइबए तँ देखै छिऐ, दछिनबरि‍या हत्ता परहक शीशो सूखल अछि। मुरदा जरबैले ओहन जारैन चाही जेकर धधड़ा करगर होइ।” सभ कियो दछिनबरि‍या हत्ता लग पहुँचला। दस-पनरहटा शीशो पैछला साल बिमारीमे सुखि गेल छेलइ। तीने चारिटा साइजक गाछ, नइ तँ सभ अनसाइजक। जे जरने भाव बिकाएत। पातर गाछ कटने चारिटा पाँचटा काटए पड़त। से नइ तँ ओहन दूटा गाछ काटि‍ लिअ, जइसँ सभ काज नीक जकाँ भाइयो जाएत आ थोड़-थाड़ डोमोले रहि जेतइ। मुदा लेलहाक नजैर तर चलि गेल। बाजल- “काका, केते लकड़ीसँ मुरदा जरै छइ?” करिया काकाकेँ सुनल तँ रहैन मुदा लिखल नहि पढ़ने रहैथ। प्रश्‍नक जवाबो नै देब उचित नहि। भलेँ कहि दिऐ, नै बुझल अछि। मुदा जे काज संगे मिलि एते केने छी तइमे हमहीं सोलहन्नी केना मूर्ख बनि जाइ। फरैक कऽ बजला- “अँइ रौ लेलहा, तोहर हम ठकदरूआ छियौ जे एहेन बात पुछलँह। एते मुरदा जे संगे जरौलौं से हम देखलिऐ आ तूँ आँखि मुनने रहँह।” करिया कक्काक बात सुनि दोहरी नजैर खसल। मनमे रहै जे काजक लकड़ी छी, बेसी जराएब उचित नहि, जँ जड़ि दिस‍सँ टोनि कऽ लऽ लेब तँ घरक केबाड़ी भऽ जाएत। से नइ तँ, पहिने टोनि कऽ कलमक सीमा टपा कऽ रखि दिऐ। पछाइत लऽ जाएब। से मंगैसँ पहिनहि करिया काका खिसिया गेला। अपन काजक रूखि खराब होइत देख‍‍ लेलहा सोचलक जे से नइ तँ सझिया करि कऽ बाजी। बाजल- “काका, दुनू भाँइ छी। बहुत लकड़ी अछि। निचका टोनि कऽ केबाड़ बनबैक विचार होइए?” मने-मन हिसाव जोड़ि करिया काका कहलखिन- “काज-जोकर निकालि कऽ सि‍रहौना-पटौना सौंसे रहह दिहक आ ऊपरका फाड़ि लीहह। ताबे हम ऐगला काज देखै छिऐ।” कहि कोदारि लऽ अछियाक खाधि नापि, खुनैले झोलीकेँ कहलखिन। झोली हँसैत बाजल- “भाय लोकैन, सुनि लिअ। हमहूँ बुढ़ाएले जाइ छी, मुदा जाबे बाँहिमे दम अछि ताबे समाजक भार, अछिया खुनब–उघैत रहब। एक साए पच्चीसम अपनासँ उमेरगरक अछिया खुनने छी। अपनासँ कम उमेरक खुनैक मौका नै भेटल।” कहि झोली अछिया खुनए लगल। तैकाल जीबछ शहनाइपर उठौलक- “मन सुमिरन करले रात-दिना, जगमे कोइ नै अपना...।” अछिया खुना गेल। शीशोक ओहन मोट लकड़ी सिरहौना-पटौनामे देल गेलैन, जेते मोटगर ओछाइनपर रघु जिनगीमे कहियो सूतल नै छला। एक-एक चेरा चढ़बैत छाती भरि ऊँच चेरा रघुनन्‍दन कक्काक संग जरैले तैयार भऽ गेल। सुन्दर काका देवनन्दनकेँ बाँहि पकैड़, धधकैत ऊक मुँहमे लगौलैन। मुँहमे ऊक पड़िते, बिजलोकाक इजोत जकाँ सबहक मनमे रघुनन्‍दन पहुँच गेलखिन। बाबा, काका, भैया, भाए, बौआ, बच्चा, नूनू इत्यादि हजारो रूप पटेरक फूल जकाँ उड़ए लगल। जहिना पटेरक एकटा डाँटमे हजारो-लाखो पूर्ण फूल निकलैत तहिना रंग-बि‍रंगक फूल बनि रघुनन्दन मने-मन उड़ए लगला। आँगनसँ अरियाति सुभद्रो आ शीलो रहि गेली। शीलाक मनमे चाह, जलखै पठबैक ओरियान करब रहैन। आ सुभद्रा सोचैथ‍ जे घरनिप्पो सुखाइए गेल अछि। मास दिन केना भीजल रहत। पुतोहुजनीकेँ ओरियाने-बात करैक छैन। तइमे नीक जे एक-गिलास पानि छीटि लाभर-जीभर बाढ़ैनसँ बहारि दिऐ। आब तँ चारिम दिनसँ सभ दिन घर-अँगना होइते रहत। सएह केलैन। चाह-जलखै-ले गाछीएसँ बौकू आ शीतला चलि आएल। दुनू गोरेकेँ सभ समान दऽ निचेन भेली। धिया-पुताक हल्होरिमे आशा सिंगरिया-बाजाबलाक पाछू-पाछू चलि गेल रहए। ताधैर सुभद्रो आँगन बहारि निचेन भेली। तखने शीला सुभद्राकेँ कहलखिन- “माए, केतौ बैस कऽ बुड़हाक बात कहौथ?” सुभद्रा कहए लगली- “हँ कनियाँ, जैठाम अपने सूतल छला तहीठाम चलू, भने तुलसियोक गाछ बगलेमे अछि।” दुनू गोरे बैसते छेली कि लोहनावाली दादी हहाएल-फुहाएल पहुँचली। लोहनावालीकेँ देख‍‍ते शीला कहलकैन- “आबौथ बाबी, अँगने आबौथ। अँगनामे दुइए गोरे छी।” अँगना-घर नीपल नै देख‍‍ लोहनावालीक मनमे तरे-तरे क्रोधक लहकी-लहकए लगल। मुदा क्रोधकेँ दबैत सुभद्राकेँ कहलखिन- “दियादनी, अहाँ तँ हमरासँ जेठ छी, मुदा सभ विध‍-बेवहार सभकेँ थोड़े मन रहै छइ। ऐमे एकटा विध‍ आरो होइ छइ।” “की?” “स्वामीक निमित्ते कपारमे पाथर लगाएब।” मुस्की दैत सुभद्रा बजली- “हँ, हँ, ई तँ हमरो मन अछि।” “अखन नै बैसब। जाइ छी।” कहि‍ लोहनावाली वि‍दा भेली। “बेस, बेस। जाउ।” कहि‍ पुन: दुनू सासु-पुतोहु बुड़हाक जगहपर जा बैसली, आँखिसँ नोर बि‍लाएल। मुस्की दैत शीला बजली- “माए, बुड़हासँ कहियो झगड़ो भेल छेलैन?” “बुड़हा नर्कसँ स्वर्ग गेला। हुनकर आगि नै उठेबैन। हमरो माए-बाप सिखा देने रहैथ। मुदा जेते माए-बाबू सिखौने रहैथ तइसँ बहुत बेसी बुड़हा सिखौलैन। हरिदम कहैत रहै छला जे जेकरा मनुख बुझै छिऐ ओ मनुखक हाड़-मांसक बनल एक ढाँचा मात्र छी जेकरा मनुख बनबै छै मन। मन जेहेन रहत तेहेन ओ मनुख बनत। जेहेन मनुख बनत तेते लोकक मनमे जगह भेटतै। जगहो दू तरहक होइ छइ। एक तरहक होइत अछि नीक आ दोसर अधला। मनुखकेँ हरिदम नीक विचार मनमे रखक चाही।” बिच्‍चेमे शीला टपैक गेली- “परिवारमे तँ घरहटो होइ छै, बि‍आहो होइ छै, पावैनो होइ छइ। ओ काज केना करै छेलखिन।” “कनियाँ, परिवारमे नमहर काज भेने चुल्‍होक काज बढ़िए जाइत अछि। मुदा हरिदम ई मनमे राखी जे अपन काज सम्हारि दोसरोक काज करी। जँ परिवारमे एहेन लोक बनि जाएत तँ जहिना बीटमे नवको आ तीन-सलियो-चरि-सलिया बाँस धरि एक संग समटल रहैए, जइसँ पातरो बाँसकेँ देखै छिऐ केते-केते नमहर होइए, कड़ची सभकेँ समैट कऽ रखैए– वएह कड़ची छी परिवारक अपनासँ बढ़ि दोसराक काजमे सहयोग करब– तहिना परिवारसँ-गाम आ गामसँ-राज्‍य-देस धरिमे समटल सम्‍बन्‍ध रहत नइ कि फल्‍लर। औझुका लोकक मन ढील भऽ गेल अछि। जेकर फलाफल सोझहेमे अछि।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 14981 2. खूब अन्हरगरे भोरमे सुभद्रा शीलाकेँ उठबैत कहलखिन- “कनियाँ, उठू झब-दे उठू।” सासुक औगताएल बोली सुनि शीला उठि कऽ बैसैत पुछलखिन- “की भेलैन जे एना अधनि‍नामे उठा देलैन?” “असथिरसँ बाजू। अखन गामक लोक नै उठल अछि। अपन काज आगू बढ़ाउ।” “कोन काज?” “जखने एक्के-दुइए लोक सभ जागए लगत आकि भूत सभ आबए लगत। अहाँ नव-नौताड़ि छी तहूमे शहर-बजारमे रहै छी। अहाँ गामक भूतकेँ नै चिन्हबै बुड़हा सभटा भूतकेँ चिन्हा देने छैथ। अखन एतबे सुनू। नइ तँ जिनगी हूसि जाएत। बुड़हा मरि गेला तँए कि‍ सभ ओइ‍ लगल मरि जाएब। सभकेँ अपन-अपन दाना-पानी अछि। मुदा फेर कहै छी। गप-सप्‍प करैले भरि दिन खालीए अछि। समाजक लोक सभसँ सभ बात पुछबैन आ बूझब। अखन जल्दी बि‍स्कुट डिब्बा निकालू आ चाह बनाउ। ताधैर हमहूँ बौआकेँ एकटा दतमैन दऽ अबै छिऐन। जाबे अहाँकेँ चाहो नै बनत ताबे ओ तैयार भऽ जाएत। चूल्हिमे तँ छाउर नै अछि, माटिए लऽ कऽ हाँइ-हाँइ दू घूसा दाँतमे दियौ आ कुर्ड़ा करि कऽ पानि पीब लिअ।” कहि सुभद्रा देवनन्दनकेँ उठबैले दलानपर गेली। जइ जगहक चौकीपर रघुनन्दन सुतै छला, ओही अखड़े चौकीपर देवनन्दन सूतल छला। देहपर हाथ दऽ आस्तेसँ डोलबैत बजली- “बाउ, बाउ उठू! लिअ दतमैन पहिने मुँह-हाथ धोइ लिअ।” मृत्यु-कर्मक विध‍ बुझि देवनन्दन किछु पुछलखिन नहि। माइक सोलहन्नी बात मानि दतमैन करए लगला। सुभद्रा अपनो मुँह धोइ कुर्ड़ा कऽ आँगनक ओसारपर बैसली। प्लेटमे चारिटा छोट साइजक बि‍स्कुट आ गिलासमे पानि नेने शीला पतिकेँ दइले चलली। शीलाक हाथमे गिलास-प्लेट देख‍‍ सुभद्रा बजली- “पौआही पाँउ-रोटी नै अछि तँ बड़का डिब्बा–चारि‍ साए ग्रामबला, बि‍स्कुटेक दऽ अबियौ।” शीला सएह केलैन। चाह पीऐत सुभद्रा कहए लगलखिन- “अपना सभमे तँ तेरहे दिनमे सभ कर्म भऽ जाइत अछि मुदा अपने गामक आन टोलमे केकरो पनरह तँ केकरो सतरह तँ केकरो महिना दिनपर कर्म सम्पन्न होइत अछि। हम किए एते भोरे उठा देलौं से बुझै छिऐ? आइ एक्के बेर बौआकेँ एक-भुक्‍त करए पड़तैन गोसाँइ लहसैत पहिने बुड़हाकेँ अरगासन दैत खेता। आब अहीं कहू जे जे आदमी बानर जकाँ किछु-ने-किछु हरिदम खाइत रहै छैथ ओ भरि दिन निराधार केना रहता? बुड़हा जिनगीक संगी छला मुदा बौआकेँ दस मास पेटमे पालने छी। ओ पालब हम नै बुझबै तँ पुरुखकेँ बूझब छिऐ। अखन कियो नै अछि कहि दइ छी। हमरा कोन, हमरा तँ हरिवासयक साधल देह अछि मुदा अहाँ दुनू परानी तँ से नइ छी। लोके भूत छी से बुझि लिअ। जखन अँगना खाली रहए आ खाइ-पीबैक मन हुअए तँ घरमे जा कऽ खा लेब। बुड़हाक क्रिया-कर्मक जे विधान अछि आ समाजमे रहै छी ओ तँ समाजेक विचारानुसार हएत। मुदा ईहो ने मनमे राखए पड़त जे एक तँ समांगक सोग मनमे अछि तैपर सँ खेनाइयो-पि‍नाइ छोड़ि देब तँ की बुड़हा लगल सभ चलि जाएब? जेते काल जीबै छला, सेवा-टहल केलिऐन वएह दायित्व भेल। एकटा खिस्सा कहै छी कनियाँ। खिस्सा नै आँखिक देखल घटना..।” ओंगरीसँ टोलकेँ देखबैत- “ओइ टोलमे फुसनाक घर छइ। बहुत दिन तँ नै भेलैए मुदा तैयो पच्चीस-तीस बरख भेल हेतइ। फुसनाक बाबा मुइलै। ओ पेटबोनिया रहए। मुइलाक पराते अरगासन की देत आ अपने एक-भुक्त की करत..! मुदा तैयो केकरो-केकरोसँ पैंइच लऽ लऽ पार लगलै। बिना आमदनीए परिवार केना चलतै। खाइ-बेतरे धिया-पुता सभ टौआइ। चिन्तासँ दुनू परानी तरे-तर सूखए लगल। धिया-पुताक मुँह देख‍‍ वेचारी फुसना-माइक करेज चहैक गेलइ। मरि गेल वेचारी! फुसना-गरदैनमे माइक उतड़ी आ बापक गरदैनमे बापक उतड़ी। तैपर सँ बीस दिन बाद मलेमास पड़ि गेल।” दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलै...। सुभद्राक आँखिसँ बहैत सरस्वतीक धारा देख‍‍ शीलाक मुहसँ अनासुरती निकलल- “वाह रे धैर्य! अपना सोगे नोरो नै अनका सोगे धार।” चाह पीब पान खा पढ़ुआ भाय पत्नीकेँ कहलखिन- “हमरा अबेरो भऽ सकैए। तैबीच जँ कियो खोज करैथ‍ तँ कहि देबैन जे देवनन्दन ऐठाम जिज्ञासा करए गेला।” “अखने किए जाएब?” “अहाँ जे सोचै छिऐ तइसँ हटि कऽ सोचए पड़त।” -कहि पढ़ुआ भाय डेग बढ़ौलैन। पत्नी पाछूसँ कहलखिन- “अच्छा जाउ।” रस्तामे पढ़ुआ भाय सोचए लगला जे अपने पढ़ल छी, पोथीक बात बुझै छिऐ। अनको कहै छिऐ। मुदा परिवारक जँ सभ नै बूझत तँ अपन बुझलाहा अपने केतेक पइठ हएत? खाएर.., जाधैर आँखि तकै छी, सोचै-विचारैक शक्ति अछि मात्र ताधैरक भार। जँ से नइ तँ की शास्‍त्र ओकरा-ले नइ जेकरा कियो अपन नइ छइ? मन ओझराए लगलैन। मुदा नजैर अहीठाम अँटैक‍ पत्नीक प्रश्‍नपर चलि गेलैन। मार्किन वस्‍त्रमे सजल असकरे देवनन्दन गुरुकुलक विद्यार्थी जकाँ चौकीपर दच्‍छिन-मुहेँ बि‍स्कुट खा पानि पीब चाह पीबते रहैथ कि शीला सिगरेटक डिब्‍बा आ सलाइ नेने आबि आगूमे रखि खाली गिलास लइले ठाढ़ भऽ गेली। तीन-चारि घोंट चाह गिलासमे रहबे करैन मुदा मन जे जबदाह छेलैन से आब हल्लुक भऽ गेल रहैन। शीला दिस‍ मुस्की दैत, डेढ़-बराह आँखिए तकलैन। शीलाक आँखिकेँ काजक बोझ दबने। पतिक मुस्की जेना मनक घूरकेँ एक मुट्ठी सुखलाहा खढ़मे सलाइ पजाइर देलकैन। मुदा धधराक लपटक संग काजे अगुआ गेल। बजली- “आइसँ समाजक लोक काजक विषयमे पुछैले एबे करता। हुनका सभकेँ खाइ-पीबैले नै देबैन से उचित हएत?” देवनन्दन कहलखिन- “कथमपि नहि।” मनक मुस्की, अपन नमहर ऋृण अदाए होइत देख‍‍ अठन्नियाँ हँसी बनि निकललैन- “घरमे की सभ अछि?” “चाह-पत्ती, चीनी, दूधक डिब्‍बा सिगरेट-सलाइ तँ अननहि छी, आरो किछु जोगार करए पड़त से तँ नै बुझल अछि।” अपन भार उतारैत देवनन्दन बजला- “गामक सभ बात तँ हमहूँ नहियेँ बुझै छी। करिया काकाकेँ बजा पुछि लइ छिऐन।” “अच्छा हौउ। कौआ डकल। झब-दे सिगरेट पीब लिअ। ने तँ अनेरे सिगरेटक सुगन्‍ध चलत। लोक जागत।” पत्नीक गतिगर गप बुझि गिलास हाथमे दैत देवनन्‍दन सिगरेट धरा सोंटए लगला। मनमे एलैन, अपने दुनू परानी ने बहरबैया भेलौं मुदा माए तँ सभ दिन गामेमे रहली। हुनका सभ विध‍-बेवहार तँ बुझले छैन। तही काल बि‍स्कुटक ढेकार भेलैन। मुँह लाड़ए-चाड़ए लगला। सिगरेटक ठुट्ठी फेकते रहैथ कि पढ़ुआ काकापर नजैर पड़लैन। नजैर पड़िते चौकीएपर सँ बजला- “आशा।” पतिक बात शीला बुझि गेली। गैस चूल्हिपर चाहक ओरियान करैत शीला आशाकेँ कहलखिन- “बुच्ची, दरबज्जाक कोणपर सँ देखने आबह जे केते गोरे छैथ?” दौगल आबि आशा पढ़ुआबाबाकेँ बैसल देख‍‍ घुमि‍ माए लग जा कऽ बाजल- “बाबू लगा दू गोरे।” पढ़ुआ काका आबि चुपचाप मौन धारण केलैन। दू मिनटक पछाइत आँखि खोललैन कि आशाकेँ चाहक कप बढ़बैत देख‍ते जहि‍ना रेलमे कटल बेकतीपर नजैर पड़िते बुधिक फाटक बन्न भऽ जाइत, तहिना भेलैन। तैबीच देखलैन जे देवनन्दन दू चुस्की मारि लेलैन। मनमे बि‍हाड़ि उठलैन ओना तँ नह-केश कटेलाक उत्तर नइ तँ कम-सँ-कम छौरझप्पी धरि तँ सोग मनेबाक चाही। मुदा बुढ़क मृत्युमे सोग मनेबाक चाही आकि हर्ष? जँ सोग मनाएब तँ की प्रकृतिक संग छेर-छार नै हएत?मुदा परम्परो तँ अपन महत रखैत अछि। अखन धरि कर्ताक संग परिवारो आ समाजोक संग किछु निअम बनल अछि। जेकर संचालक अपने सभ छिऐ। तैठाम की कएल जाए? तहूमे नवकबरिया डाक्टर छैथ, मनमे कचोट हेतैन...। मरै-हरैक तँ सीमो नहियेँ होइत। बुढ़ो मरैत, जुआनो मरैत आ बच्चो मरैत अछि‍। तखन तँ सभकेँ अपन-अपन जिनगीकेँ दीर्घायु बनबैक छइ। तहीले ने सभ अपन-अपन जिनगीकेँ लगौने रहैए। मुदा असकरे कोनो काज करैसँ पहिने दोसरो गोरेकेँ पुछि लेब आवश्यक अछि। मुदा लगमे के अछि जेकरासँ पुछबै। भरोसे रहब तँ चाहे दुइर भऽ जाएत! मुदा देवनन्दनकेँ पीऐत देख‍‍ भरोस भेलैन। चाहक चुस्की लैत सोचए लगला, अपना सबहक समाजमे तेरह दिनक कर्म डाहब-जराएबसँ लऽ कऽ द्वादसा-कर्म धरि‍ अछि। जहिना घरसँ निकालि गाछी लऽ जा गाछक संग कऽ देलिऐन। तहिना ओइ‍ठाम काज सम्पन्न कऽ घरपर लऽ अनलयैन। आब घरक काज शुरू हएत। फेर मनमे उठलैन जे काजक दौड़मे जिज्ञासो तँ होइत अछि? फेर मन ओझराए लगलैन। तेरह दिन हिसाव जोड़ैथ‍ तँ ठीके बैसैन‍। मुदा जिज्ञासा तँ तखनेसँ ने शुरू हएत जखनसँ आँगनमे लोह-पाथर छुबि लोक अपन-अपन घर चलि जाइए। समाजक तँ एक परकिरिया सम्पन्न भऽ गेल। एहनो तँ भऽ सकैत अछि‍ जे गाममे नै छला। जरौला पछाइत‍ एला। हुनका कखन समाजिक काजमे संग कएल जाए। जँ छौरझप्पीक पछाइत कएल जाए तँ संस्कारक संगी माने जरबैक संगी मानल जेता। मुदा जहिना माटि खुनैत-खुनैत केतेको रंगक माटि धरतीमे मिलैत तहिना माथ खोधैत-खोधैत चिक्कन माटि भेटलैन। छह-छह करैत पानियोँसँ बेसी छिछलाह! फुरलैन- समाजकेँ माने मनुखकेँ समैक अनुकूल बना चलक चाही। जहिना अनेको कारणसँ वायुमण्‍डल बदलैत अछि तहिना जँ मनुखो नै बदलत तँ गतिहीन भऽ जाएत। गतिहीन आ मृत्युमे अन्तरे की..? जेते पढ़ुआ काका सोचैथ‍ तेते मन ओझराएल जाइन‍। बजला- “बौआ, तीन दिन धरि जहिना बाधमे हरि‍यरी नइ रहने माल-जालकेँ बहटारि चरबाह अपने गुल्ली डन्‍टा खेलए लगैत तहिना छौरझप्पीसँ पहिने मन बहटारए एलौं। अखन जाइ छी। फेर आएब। मनमे चिन्‍ता नै करब। समाज समुद्र छी जइमे घोंघा-सितुआसँ लऽ कऽ बड़का-बड़का पानिक जानवर धरि प्रेम-भावसँ जीवन-यापन करैए। सभ शक्ति समाजमे छइ।” कहि पढ़ुआ काका रस्ता धेलैन। माथ उधारने, अदहा देह वस्‍त्रसँ झाँपल गुदरी पाछू-पाछू आ डाँड़मे ठेहुनसँ ऊपर धोती, कान्हपर तौनी नेने आगू-आगू हुलन आबि देवनन्दनकेँ ओसारक निच्चासँ प्रणाम केलकैन। शिष्टाचारकेँ देखैत डाक्टर देवनन्दन चौकीपर सँ उठि ओसारक निच्चाँ आबि, भुइयेँमे चुक्की-माली बैस दुनू परानी हुलनकेँ सेहो बैसैले कहलखिन। मुँह सकुचबैत हुलन कहलकैन- “सरकार, अहाँ लग हम केना बैसब? हम ठाढ़े रहै छी।” बजैत-बजैत दुनू परानीक आँखिसँ नोर टघरए लगल। गाल परहक नोरक टघार पोछैत हुलन बाजल- “गामक खुट्टा उखैड़ गेला। कक्काक अछैत कहियो चिन्ता नै भेल जे समाजसँ बाहर छी। आन जे अछि ओ हरिदम अगराहीए लगबैत रहैए।” “अच्छा, गामक बात पाछू कहिहह पहिने अपन काज कहह।” पतिकेँ दबारैत गुदरी बाजल- “बौआ डागडरबाबू, अहाँ देवता छी। कोनो बात नुका कऽ नइ रखब। हमरो काज बहुत अछि। एक दिन बीतिए गेलैन। दसे दिनपर नह-केश होइ छइ। ओइसँ पहिने सभ बरतन बना कऽ दिअ पड़त। बीचमे आठे दिन समए बँचलै। दुइए परानी काज करैबला छी। धिया-पुता सभ इसकूले जाइए।” स्‍त्रीगणक बोली सुनि अँगनासँ सुभद्रो आ शीलो दरबज्जापर एली। दरबज्जापर अबिते सुभद्रा गुदरीकेँ कलखिन- “कनियाँ, ओजार-पाती नै अनने छह? आब तँ सूपे-चालैनक काज पड़त। कनी ओकरा जोड़ि-जाड़ि दि‍तहक।” “नै काकी कहाँ किच्‍छो अनने छी। काल्हि बेरूपहर आबि करि कऽ देबैन। अखनी तँ काजेक बरतन बुझैले एलौं हेन।” “बेस-बेस। मुदा एकटा बात मन रखिहह जे जहिना बुड़हा मेघडम्बरक सिनेही छला तेहने बनबिहह।” मेघडम्बरक नाओं सुनि मुस्‍कियाइत हुलन बाजल- “काकी, जहिना भगवान विष्णु वामनरूपमे मेघडम्बर ओढ़ै छला तइसँ बीस कक्काक मेघडम्बर हेतैन। पाँच गोरेक परिवार तरमे अँटाबेश कऽ सकैए।” सुभद्रा देवनन्दनकेँ कहलखिन- “बाउ, अपने तँ गामक किछु बुझै नै छह, हम स्‍त्रीगणे भेलौं। मरदा-मरदीक काज छी। करियो बौआकेँ बजा लहुन।” सुभद्राक बात सुनिते गुदरी करिया काकाकेँ बजबए विदा भेल‍। देवनन्दन हुलनकेँ पुछलखिन- “कारोबार की सभ छह?” कारोबारक नाओं सुनि हुलन हरा गेल। मन पड़लै अपन सुगर। भड़भड़ाएल स्वरमे बाजए लगल- “भाय, गरीबकेँ कियो नीक केनिहार नहि। देवस्थानमे दोहाइ दइले गरीब अछि। जहिना केतबो दोहाइ देनौं गहुमन साँपक बिख नै उतरैए तहिना दीनदयाल भजने की हेतइ। यएह गाम छी धनेसर ऐठीन भोज रहइ। अपनो सभ अठि-काँठ समेटलौं आ अँइठारमे फेकल अँठिहा पातमे सुगरकेँ छोड़ि देलिऐ। धनेसरक बेटा तेहेन सेतानक चरखी अछि जे चोरा कऽ पोखैरक माछ मारैले इन्डोसेल अनने रहए। पातपर छीट देलकै। सभटा सुगर मरि गेल। तइ दिनसँ ने पूजी भेल आ ने फेर दुआरपर पशु।” देवनन्दन अकचकाइत पुछलखिन- “जखन खेतो ने छह, सुगरो सभटा मरिए गेलह तखन गुजर केना चलै छह?” देवनन्दनक प्रश्‍न सुनि हुलनक मनक आशा फुटि कऽ निकलल- “डाकदर साहैब, समाज जीबैत रहए...।” सुभद्रा दिस‍ देख‍- “भगवान काकीकेँ औरदा देथुन। काकीकेँ बुझले छैन जे बारहम-तेरहम मास हिनके दुनू परानीक असिरवादसँ गुजर करै छी।” हुलनक उत्तर सुनि देवनन्दनक मनमे सुनैक उल्लास जगलैन। भुखाएल जकाँ पुछलखिन- “से की?” रेगहाए कऽ हुलन कहए लगलैन- “बाउ, गरीब लोकक लि‍ए आसि‍न-कातिक सभसँ भारी होइए। मुदा सभ साल काका हमरा दूटा बाँस शुरूहे आसि‍नमे दऽ दइ छैथ। दुनू बाँस लऽ जाइ छी। ओकरा चिड़ि‍-फाड़ि कऽ बरतन बनबए लगै छी। ओना कोनियोँ-छिट्टाक बि‍करी दोगा-दोगी हुअ लगैए। मुदा फुलडालीक संग आरो-आरो समानक बि‍करी हुअ लगैए। जइसँ खूब नीक-नहाँति तँ नहियेँ मगर गुजर चलए लगैए। ई आशा अखनो ऐछे। जाबे काकी जीबैत रहती ताबे रहबे करत।” हुलनक बात सुनि देवनन्दन चौंक गेला। मनमे एलैन जे पिताक कएल कर्म-धर्मकेँ हम मेटा देब। कथमपि नहि। मुस्की दैत बजला- “बाबूक सभ किछु रहबे करथुन।” देवनन्दनक वि‍‍चार सुनि हुलनक आशा बनले रहल। करिया काका बजार जाइक तैयारीमे रहैथ, पत्नी बुझा-बुझा कहैत रहैन- “औझुका एक-भुक्तक सभ सरंजाम देबैन। बारह-तेरह दिन तँ सभ कियो हुनके काजमे लगि जाएब तँए आइए तेरह दिनक नोन-तेलक ओरियान नै कऽ लेब तँ बीचमे छुट्टी हएत?” पत्नीक बात करिया काका सुनबो करैथ‍ आ समान अनैक झोरा-झोरी आ रूपैआक हिसाव सेहो मने-मन जोड़ैत रहैथ। तैबीच गुदरी डेढ़ियापर सँ हाक देलकैन- “काका, काका?” टाटक दोगसँ मुड़ी उठा देखलैन तँ गुदरी-डोमिनपर नजैर पड़लैन। मनमे उठलैन- जतरा बिगैड़ खराब भऽ गेल। की हएत की नै। मन खसि पड़लैन। दोहरबैत गुदरी बाजल- “काका तँ अखन काकीमे ओझराएल छैथ। अनकर बात किए सुनथिन?” गुदरीक शब्दवाण करिया कक्काक छातीकेँ बेधि देलकैन। अँगनेसँ बजला- “कनी काजमे लगल छी। लगिचा गेल। अबै छी।” मुदा शब्द-वाण छाती बेधि कऽ मैल निकालि देलकैन। विचार जगलैन कोनो काजमे जाइसँ पहिने केकरो देखने केकरो जतरा किए भंगठत? ई मनक मैल छी। आदमी अपन जिनगी आ कर्मक मालिक स्‍वयं अछि। तखन केकरो दोख लगाएब कायरता छी। गुदरीकेँ सुनबैत पत्नीकेँ कहलखिन- “आब अपन काज ठमैक गेल ताबे अहाँ झोरा ओरिया कऽ रक्खू। पहिने डोमिनक बात बुझि लइ छिऐ।” आँगनसँ निकैल करिया काका दरबज्जापर आबि गुदरीकेँ पुछलखिन- “किए एते हलचलाएल छी?” मजबुरीक अवाजमे गुदरी कहलकैन- “काका, हम तँ हिनके सबहक लऽ लऽ छी। ई तँ बुझिते छथिन जे सराधमे डोमिनकेँ केते काज होइ छइ। एक दिन बीतिए गेलैन। दसे दिनपर नह-केश होइ छइ। नहे-केश दिन जँ सभ बरतन नै पहुँचा देबैन तँ येहे की कहता?” वि‍‍चित्र द्वन्द्वमे करिया काका फँसि गेला। एक मन कहैन जे सराधक काज तँ छौरझप्पीक पछाइत शुरू हएत आइ केना करब? फेर दोसर मन कहैन जे भात झँकैले कमसँ-कम चारिटा बड़का छिट्टा, चीज-वौस रखैयोले आ परसैयौले बीस-पच्चीसटा चँगेरो बनबए पड़तै। तैपर सँ सराधी-कर्मबला बरतन सेहो बनबए पड़तै। दिनो तँ गनले आठटा अछि‍। जइमे बाँस काटबसँ लऽ कऽ घरपर पहुँचबै धरिक छइ। छोट लोकक तँ दुर्भाग्यो छै जे दूटा जबानसँ तेसर एक-ठाम नइ रहए चाहत। भलेँ बाप-माए होइ आकि बेटा-बेटी। फेर मनमे एलैन सुआइत मौगी पुरुखाह आ पुरुख मौगियाह भऽ जाइए। मनमे हँसी एलैन। मुदा लगले पाकल जअमे पाथर खसलैन। एकरा जखने साय देबै तखने काज करैक अधिकार भेट जेतइ। अधिकारमे बाधा देब अनुचित हएत। जँ अखने नै साय दऽ देबै तँ बेसी समांग छै, हाथे-हाथ सम्हारि देतइ। मनुख तँ लोहाक मशीन नै छी जे बटम दाबि देतै आ ढेरक-ढेर बनबए लगत। कमसँ-कम चारि बाँसक काज छइ। काटत,फाड़त टोनत तखन कैमची बनौत, काड़ा बनौत आरो केते करए पड़तै। मौगी केतबो लट-लट करैए तँ पुरुख जकाँ बाँस तँ नै काटि सकैए। जँ काटियो लेत तँ झोंझसँ खिंचल केना हेतइ...। करिया कक्काक मन धोर-धोर हुअ लगलैन। आशा जगलैन। काज तँ देवनन्दनक छिऐन। हम समाज भेलौं। भलेँ दुनू गोरेक परिवार जोटल आम जकाँ आकि‍ जोटल फूल जकाँ अछि‍। मुदा मनुख होइक नाते मनुखक बात नइ मानिऐ ई समाजक संगे बेइमानी हएत। आँखि मूनि कोनो बात मानियोँ लेब ओ खाधिमे खसाएत। मनुख दोहरा कऽ ऐ धरतीपर नै अबैए भलेँ लोक साए बेर अबैक-जाइक बात बुझए। मुदा हमरा गरदैनसँ निच्चाँ नै उतरत। आगू-आगू फनकल गुदरी आ पाछू-पाछू करिया काका असथिरसँ रस्ता धेलैन। आगू बढ़ि उनैट कऽ गुदरी आगूमे ठाढ़ भऽ कहए लगलैन- “आब की ईहो जुआने-जहान छैथ जे नइ बुझथिन। काजक केते छिगरीतान अछि से नइ बुझै छथिन। ओछाइनपर सँ उठै छी आ काजमे लगि जाइ छी। जलखै बेरमे छौरसँ आकि‍ माटिसँ मुँह धोइ पानि पीऐ छी। धिया-पुताकेँ खुअबैत-पीअबैत, चरिया कऽ स्कूल पठबैत गोसाँइ कान सोझे चलि अबैए। हमरा-ले की दोहरा कऽ दिन उगत।” आगूमे बाँहि‍ फरका-फरका कहैत गुदरीक बातसँ करिया काका अकैछ कऽ बजला- “चलू.. बुझलिऐ..! जे अहाँक बात नै मानता ओ काजक भार लेथिन।” कहि‍ मने-मन सोचए लगला। काजक बेरमे वाय गौंगियाए लगै छैन आ हुकुम चलबै कालमे जएह मन फूरत सएह बाजि‍ देब। जहिना कोनो घर बनबैमे रंग-बि‍रंगक काज, रंग-बि‍रंगक समान, रंग-बि‍रंगक ओजारसँ लऽ कऽ रंग-बि‍रंगक बुधि लगैत तहिना मनुखक समाज बनबैले मनुखकेँ बुझए पड़त। दरबज्जापर अबि‍ते करिया काका देवनन्दनकेँ पुछलखिन- “किए बजेलौं?” देवनन्दनकेँ बजैसँ पहिने हुलन कि‍छु कहए लगलैन मुदा हुलनकेँ रोकैत करिया काका बजला- “रघुनी भैयामे हमरो साझी अछि तँए किनको बिगाड़ने अपन हिस्सा दुरि‍ नै हुअए देब। तोहर जे काज छह ओकर मालिक तूँ छह। जइ चीजक जरूरत‍‍ हुअ ओ कहि दएह।” हुलन बजला- “बाँस।” “बीट देखले छह। जेतेसँ काज हुअ काटि लिहह।” बिच्‍चेमे सुभद्रा शीलाकेँ कहलकैन- “कनियाँ, साय दऽ दियौ।” आँगनसँ शीला पँचटकही आनि गुदरीक हाथमे दऽ देलखिन। रूपैआ लैत गुदरी बाजल- “काल्हि बेरमे आबि सुपा-चालैन बान्हि देबैन काकी।” काज हल्लुक होइत करिया काका मने-मन सोचलैन जे अदहे घन्‍टा ने देरी भेल, कनी रेसेसँ चलि जाएब। नइ तँ कनी अबेरे हएत कि‍ने, काजक दौड़मे अहिना होइ छइ। तैबीच दुनू परानी हुलनकेँ अपनामे गप-सप्‍प करैत दू लग्गा आगू आगू-पाछू जाइत देखलैन। “किछु छिऐ तँ राज-दरबार छिऐ। मुँहमंगा। आब तँ नवका-नवका लोक सभ भऽ गेल किने। ने तँ बाउ कहै जे रघुनी भाइक बाबा जे रहैन‍ से बेटीकेँ खोंछिमे पाँच बीघा खेत देने रहथिन। से जँ नै देने रहितथिन तँ बाल-विधवाकेँ की दशा होइतै?” गुदरी अपना वि‍चारमे ओझड़ाएल तँए हुलनक बात सुनबे ने केलक। तैबीच करिया काका हुलनकेँ सोर पाड़ैत कहलखिन- “सिदहा नेने जा। बेरू-पहर बाँसो लाइए जइहह, काजमे बि‍थुत ने होइ।” सुभद्रा उठि आँगन विदा भेली। पाछूसँ शीलो गेली। हुलन दरबज्जाक आगूमे ठाढ़ रहल आ गुदरी सिदहा आनए आँगन गेली। हुलन करिया काकाकेँ कहलखिन- “करिया काका, जाबे जीबैत रहबै ताबे सम्‍बन्‍ध रहबे करत। ओना आब डाक्टरो भाय बाहरे रहए लगला, हमरो सबहक धिया-पुता अपन बेवसाय छोड़नहि जा रहल अछि।” हुलनक बातकेँ करिया काका बेवहारिक बुझलैन। मुदा देवनन्दनक नजैर अपन ऐगला जिनगीपर पड़लैन। मने-मन सोचए लगला, रविए-रवि तँ नहि आ ने मासे-मास मुदा तीनटा जे मौसम–जार, गर्मी आ बरखा होइ छै, कमसँ-कम तहूमे आबि जँ मौसमी दबाइक संग रोगक इलाज कऽ दिऐ तँ की हमर समाजिक सम्‍बन्‍ध बरकरार नै रहत? डाक्टर भाय, डाक्‍टर भैया, डाक्‍टर काका, डाक्‍टर बाबा नै कहत? जरूर कहत। समाजिक सम्‍बन्‍धकेँ यएह डोर बान्हि कऽ रखैत अछि किने...। जहिना सौन-भादोमे बाबा बैजनाथक डोर कँवरियाकेँ लगि जाइत। तहि‍ना डाक्‍टर देवनन्‍दनकेँ भेलैन‍। परिवारक सिदहा आ जारैन देख‍‍ गुदरी निचेन भऽ गप-सप्‍प पसारि देलक। घरक बेवहार बुझल तँए गुदरी चारि हाथक साड़ी फाड़ि कऽ बनौलहा टुकड़ा लाइए कऽ आएल छेली। जारैन‍क बोझ-ले बीड़बाक जरूरत‍‍ सेहो होइत तँए बीड़बो अनने। सुभद्राकेँ गुदरी कहलकैन- “काकी, हमरा सबहक अपलेशन डागडर बौआ करै छथिन?” गुदरीक बातकेँ मजाक बुझि सुभद्रा चुपे रहली मुदा शीला पुछि देलखिन- “केहेन अपरेशन?” “और कोन अपलेशन, उहए धिया-पुताबला।” “होइबला आकि नै होइबला? अपलेशन केने धिया-पुता हेबो करै छै आ नहियोँ होइ छइ।” “जहन अपलेशनसँ धिया-पुता होइ छै तहन पुरुखे लऽ कऽ की हेतइ।” कहि उठि कऽ ठाढ़ होइत फेर गुदरी बाजली‍- “काकी, आब तँ आबा-जाही लगले रहत। काजक अँगना छिऐ केते रंगक चीज-वौसक खगता हेतैन। नै कि‍छ तँ देह तँ ऐछे। लोकेक काज लोककेँ होइ छइ।” दुनू परानी मुस्‍कियाइत गाछी ठेकना सोझे विदा भेल। जहिना धारमे सुगरकेँ घाटक जरूरत‍ नै होइत मुदा जाएत सोझे हिआ कऽ, भलेँ केतेको बेर घुमि-घुमि ‍ आबए पड़इ। तहिना सुगर पोसनिहारोक चालि। केना नइ रहतै, जिनगी तँ सुगरे चड़बए पाछू रहल। शीशोक झाँखियो आ मोट-मोट गोटनो देख‍‍ दुनू परानी आनन्दसँ बैस गप-सप्‍प करए लगल। गुदरी बजली- “कहुना तँ पनरह दिन चलबे करत।” हुलन- “सुखलो ऐछे..!” करिया काका उठि कऽ विदा होइक विचार करिते रहैथ आकि कुसुमलाल पण्‍डितकेँ धड़फड़ाएल अबैत देखलैन। बुझि गेला जे आब बाजार गेल नै भेल। फरिक्केसँ कुसुमलालकेँ कहलखिन- “आबह-आबह पण्‍डित, तोरासँ बहुत बुझैक अछि। तूँ तँ बुझिते छहक जे काजक अँगना छी।” मुस्की दैत कुसुमलाल कहलकैन- “हँ, से तँ छीहे?” अँगना दि‍स‍ बढ़ैत, मने-मन करिया काका सोचए लगला- कमसँ-कम घन्‍टा भरि बजला पछाइत ‍ मन ठंढेतै। भलेँ कौल्हुके सभ गप किए ने दोहराबए। पाँच गोरेकेँ एकठाम बैसार बनिते बजैक समए निर्धारित हुअ लगैत। कुसुमलालो तँ पाँच गोरेक बैसारमे रहैए। तहूमे अखन तँ आरो फि‍रि‍सान अछि। घरवालीक गट्टा टुटि गेल छै, एकटा बेटा भीने छै तँए ओकर अधिकार कटि गेल छइ। दोसर बेटा जे साझी अछि ओ दिल्लीमे नोकरी करैए। पुतोहुकेँ आठम मास छि‍ऐ। तीनू जमाइयो परदेसीए तँए अपन घर-दुआर छोड़ि बेटियो केना देख‍त। तैपर धनकटनी, गहुमक बागु संगे बरदकेँ फाड़ लगि गेलइ। मुदा तँए कि‍ कुसुमलालक मन खुशी नइ रहै छइ? अपन दोख हटा बेटा-बेटीकेँ जानकारी दइए देने अछि। किए परिवारक कियो दोख लगौत। बि‍मार रहितो बुड़ही घरकेँ थतमारि कऽ रखने छैन। धनकटनी भाइए गेल। बुड़हीक पलश्‍तरो भाइए गेलैन। बीस दिन और बान्हल रहतैन तेकर बाद तँ दुनू बाल्टीन उठेबे करती। हिनका कोन टुटल छैन, अनका तँ जाँघ टुटि जाइ छै, छाती टुटि जाइ छइ। फेर ओकरा छुटै छै की नै? भगलाहि पुतोहु कखनो अपन माए-बापकेँ गरियबैत तँ कखनो पतिकेँ। सासु अपने रोगी। एतेक रहला पछाइतो कुसुमलालक मन हरिदम खुशी रहैत! जखन केतौ काज करए विदा होइत तँ पुतोहुक भगलपाना पर हँसैत, तँ कखनो बेटीक दिन-दुनियाँपर खुशी होइत। एते कम्मल आ ऊनी कपड़ा तँ बेटीए-जमाइक देल छी। तखन तँ तीनू बहि‍न आबि कऽ भेँट-घाँट काइए लेलक। इलाजो-ले पँच-पँच साए तीनू देबे केलक। तखन तँ जाबे थेहगर अछि, ताबे...। करिया काका घुमि‍ कऽ अँगनासँ आबि पुछलखिन- “अच्छा पण्‍डित, भनसियाक समाचार कहह?” “बीसम दिन पलश्‍तर कटि जेतइ। मुदा अखन हम धड़फड़ाएल छी काजे भरि गप करू।” “तोहीं बाजह?” “कर्मक बरतन तँ नापल अछि मुदा सभसँ झनझटिया दहीक तौलाक अछि कि‍ने। सरधुआ बरतनक दसम-एगारहम दिन काज हएत। मुदा दही तँ तीन-चारि दिन पहिनहि पौड़ल जाएत तहूमे एक दिन बीतिए गेल। पाँचम-छठम दिन तौलाक काज पड़ि जाएत। माटिक बनैमे तीन दिन टेम लगै छइ। तहिना पी‍टैयो-सुखबैमे तीन दिन लैगे जाइ छइ। पछाइत एक दिन आबा लगत। आब हिसाव जोड़ि कऽ देखियौ जे आइसँ जँ हाथ नै लगाएब तँ काज केना सम्हरत?” कुसुमलालक बात देवनन्दनकेँ ओजनगर बुझि पड़लैन। बजला किछु नहि, मुदा मुड़ी जे डोलबैत रहथिन से सुनैबला आकि मानैबला, ओ कुसुमलालकेँ बुझैमे एबे ने करैत। हँसैत करिया काका बजला- “पण्‍डित, तोहूँ जीवनीसँ अनाड़ी भऽ जाइ छह। रघू भैयाक काज अनकर बुझै छहक जे पुछैले एलह?” “नइ नै से तँ नहियेँ बुझै छी। तखन तँ काजे छिऐ चारि गोरेमे चरचा भेने छुटल-बढ़ल सभ बात सभकेँ नजैरपर आबि जाइ छइ। अखन जाइ छी...।” कहि‍ पुन: कुसुमलाल मुस्‍की दैत बाजल- “काजक तेहेन छिगड़ी-तान भऽ गेल अछि जे घरमे करू आकि समाजमे। सभ दिन सभ कियो एकठीन बैस कऽ जे हाँ-हाँ-हीं-हीं करैत रहलौं ओ जे आब ऐ अवस्थामे छुटि जाएत से केहेन हएत? की अखनेसँ मुरदा बनि घरमे ओझरा जाइ? के खुट्टा गाड़ि कऽ रहैले आएल अछि जे सभ दिन रहबे करत। तखन तँ जाबे घटमे पराण अछि ताबे ऐ दुनियाँक लीला देखै छी।” करिया काका टोकलखिन- “एँह, तूँ तँ तेहेन गप पसारि देलह जे चाहो पीब बिसैर गेलौं।” करिया कक्काक इशारा पानिकेँ आगू बढ़ाएब छेलैन। मुदा पानिक गति तँ हरिदम निच्चे-मुहेँ चलैए। देवनन्दन आशाकेँ सोर पाड़लखिन। अँगनामे शीला बुझि गेली। आशाकेँ कहलखिन- “बाउ, दरबज्जापर बाबूजी शोर पाड़लैन, सेहो बुझि लेब आ कए गोरे छैथ सेहो गनि आउ।” दरबज्जाक कोणपर आशा गैनिए रहल छल कि फाँड़ बन्हने, माथपर तौनी नेने राजेसरकेँ अबैत देख‍‍ करिया काका जोरसँ बजला- “आबह-आबह राजेसर। चाह छुटि जेतह?” चारि लग्गा फरिक्केसँ राजेसर बाजल- “करिया भैया, जहिना स्वाती नक्षत्रक अमृत रूपी जल सैकड़ो हाथ समुद्रक पानिमे टपैत सितुआक मुँहमे पहुँच मोती बनि जाइत तहिना जइ अन-पानिमे हमर अंश चलि गेल अछि ओ घुमैत-फिड़ैत हमरे लग चलि औत।” कहि‍ हाथ उठबैत फेर राजेसर बाजल- “दाना-दानामे लिखल अछि खेनिहारक नाओं।” “अच्छा आबह, तोहर काज तँ आइ भोरे छेलह?” करिया भैयाक बात सुनि‍ चानिपर उल्टा हाथ लैत राजेसर बाजल- “भाय साहैब, केते तील ऐ गामक खेने छिऐ से नइ कहि। लोको सभ तेहेन बिजकाठी भऽ गेल अछि जे झगड़ो करूँ तँ दिन-राति कखनो छुट्टी नइ भेटत। कियो कि एक्को मिनट चैनसँ केकरो रहए दिअ चाहै छइ। घर-सँ-बाहर घरि एक्के रमा-कठोला।” “अच्छा खिस्सा छोड़ह। काजक गप करह?” मुस्की दैत राजेसर बाजल- “भाय, एना आन जकाँ किए बुझै छी। जखने माया-जालमे पड़ल छी तखने तँ तबाही रहबे करत कि‍ने, तँए कि‍ समाजक काज छोड़ि देब। हमरा सबहक खुट्टा जहिना रघु भाय छला तहिना हुनकर अन्‍ति‍म काज सेहो खुट्टा जकाँ हेतैन।” राजेसरक बात सुनि देवनन्दन चौंकला। हिनका -पिता- सबहक दोहरी चालि जिनगीक छैन। जीवनक एक चालि छैन आ लोकक बीचक दोसर। जेना सौंसे गामक ठकदरूआ ई सभ होथि आ हिनका सबहक ठकदरूआ सौंसे गाम होनि‍..! मुदा साकांक्ष होइत तीनूक–करिया काका, कुसुमलाल आ राजेसरक–गप-सप्‍प धि‍यानसँ सुनए लगला। तखने शीला तस्तरीमे चारि कप चाह नेने पहुँचली। खाली चाह देख‍‍ कुसुमलाल मुस्की दैत बाजल- “आँइ यौ करिया भैया, कुम्हारक टेमकेँ अहाँ अहि‍ना बुझै छिऐ। जेते काल चाह दुआरे बैसलौं तेते कालमे तँ केते ने बैंक गढ़ि नेने रहितौं।” कुसुमलालक इशारा बुझि शीला तस्तरीकेँ पतिक आगू चौकीपर रखि चोट्टे आँगन घुमि‍ बि‍स्कुटक पॉकेट फाड़िते दरबज्जापर पहुँचली। बिस्कुट देख‍‍ करिया काका बजला- “कनियाँ, अहाँ पानि नेने आउ हम बिस्कुट बाँटि लइ छी।” सोलहो बि‍स्कुटमे सँ पँच-पँचटा कुसुमलाल आ राजेसरकेँ देलखिन। तीन-तीनटा अपने दुनू गोरे देवनन्दन सहित लऽ दुनू गोरे दुनू गोरे दि‍स‍ देखए लगला। स्वादिष्ट नमकीन बि‍स्कुट मुँहमे लइते राजेसर बाजल- “चारि बजे भोरेसँ भाय खटै छी। खाइयोक छुट्टी नै भेल। मुदा भगवानो तेहने अहारो देलैन। भऽ गेल भरि दिनका कोइला-पानि‍। दस बजे राति तलि‍क घुमि कऽ तकैयोक काज नहि।” एकटा बि‍स्कुट खा आ एक-गिलास पानि पीब राजेसर शीलाकेँ गिलासमे पानि भरैक इशारा दैत बाजल- “कनियाँ एक दिनक खिस्सा छी। पानियोँ बाँटू आ खिस्सो सुनियौ। एक गोरेकेँ नत-पता दइले छह कोस पएरे गेलौं। भिनसुरका चलल डेढ़-दू बजे दिनमे पहुँचलौं। थाकियो गेल रही आ भूखो लगि गेल रहए। मुदा बुड़ही जे रहथिन से महा-सोभावी! मुहसँ मधु चुबैन‍! जाइते गेलौं आकि अपने बि‍छानपर बैसैक इशारा करैत जजमान आ पसारीक गप पसारि देलैन। हमर मन तँ जरले रहए। तैयो घन्‍टा भरि जी-जाँति कऽ सुनलौं। तखन खिसिया कऽ कहलयैन- ‘हमरा घुमैमे अन्हार भऽ जाएत। जाइ छी।’ ..तखन औगता कऽ उठि पुतोहुकेँ कहलखिन- ‘कहुना भेला तँ कुटुमक गामक नौआ भेला। चाहो-पान नै खुएबैन-पि‍एबैन, से केहेन हएत...।’ मनेमे आएल जे ई सभ गामोमे परदेसीए छैथ। शहरमे रहैत-रहैत मूस जकाँ समाजोक जालकेँ काटि रहल छैथ। चाह पीब पान खा ओतै विचारि लेलौं जे झाड़ा-झपटा कमले पेटमे करब। किरिण डुमि‍‍ते जँ पुबरिया छहर टपि जाएब तँ दोसर-तेसर साँझ धरि गाम पहुँचिए जाएब। बटखर्चा-ले पाँचटा रूपैआ देने रहैथ भूखे छटपटी धेने रहए। कमला धारक ठंढेलहा पानिमे जहाँ पएर देलिऐ आकि पैखाना सटैक गेल। मुदा लघी लगि गेल। पुबरिया छहर टपि झंझारपुर बजारमे तीन रूपैआक छोला-मुरही खेलौं, पानि‍ पीलौं तखन जान-मे-जान आएल।” बिच्‍चेमे कुसुमलाल टोकलकै- “कोन गपमे बौआइ छह राजेसर भाय, काजक गप करह।” बि‍स्कुट खा पानि पीब चाहक गिलास हाथमे लैत राजेसर शीलाकेँ कहलैन- “कनियाँ, जँ बि‍स्कुटे खुएबाक छेलए तँ पहिने पानि बि‍स्कुट अनितौं। एक तँ वेचारी अपने बेइज्जत भऽ चाहसँ पानि भऽ गेल। तैपर सँ हमहूँ सभ केते बेइज्जत करबै।” राजेसरक बात सुनि एक लाड़ैन चलबैत देवनन्दन बजला- “बेइज्जतीक वोनमे नम्हरे बेइज्जतक इज्जत होइत!” काजकेँ देखैत करिया काका गपक रस्ता बदलैले बजला- “कनियाँ, राजेसरकेँ भाँड़ी जकाँ एहेन गिलासमे नहि पौआही गिलासमे चाह दैतिऐन। अच्छा, राजेसर आइ तँ गाछीएमे कर्म हेतइ?” अपन काज अगुआएल देख‍‍ राजेसर बाजल- “भाय, औझुका गप की कहूँ। एक तँ तेहेन-तेहेन सिफलाहि मौगी सभ गाममे चलि आएल अछि जे होइए जे झब-दे मरि जाइ जे एहेन-एहेन मनुख सभसँ पिण्ड छूटत।” “से की?” “की पुछै छी। पहिलुके नीन रहए। करीब एगारह-बारह बजे रातिक बात छी। गोपला घरमे आगि लगि गेलइ। ओकरे मिझबैमे दू-बाजि गेल। सौंसे देह थाल-कादो सेहो लगि गेल रहए। ओकरे धोइत-धाइत तीन बजि गेल। ओछाइनपर एलौं आकि औझुका काज सभ मन पड़ल। छुतकाबला केश कटैक अछि। खबैर दइले पुरहित-पात्र ऐठाम जाइक अछि। तैपर सँ परसुए जुगेसरा कहि देने रहए जे कनी केशो नीक जकाँ छाँटि दिहह आ बरियातियो चलिहह।” करिया काका टोकलखि‍न- “अखन लगन कहाँ छइ?” राजेसर बाजल- “अहाँ कोन जुग-जमानाक गप बजै छी भाय। कि‍यो जे कोटमे बि‍आह करैए से लगन देख‍‍ कऽ? तहूमे की जुगेसराक बि‍आह हेतै आकि चुमौन करत।” “केहेन कनियाँ छइ?” “एह हद भेल भाय। कन्याँ बच्चोकेँ कहल जाइ छै आ सासुरो बसनि‍हारि‍केँ। जुगेसराकेँ तेसर छिऐ आ कनियाकेँ चारिम।” “दुनू तँ उड़नबाजे बुझि पड़ैए?” “भाय, मनुखमे सभ गुण होइ छइ। पालतुओ चिड़ै वोनाए जाइ छै आ वोनेलहो चिड़ैकेँ पकैड़ पोसा बना लैत अछि।” चाहक गिलास हाथसँ पकड़ैत राजेसर शीलाकेँ कहलकैन- “कनियाँ, काकीकेँ सभ बुझले छैन। हुनका हमर नाओं कहि देबैन। डालीक ओरियान करती। जाबे तक छौरझप्पी नै हएत ताबे तक गाछीएमे पुजौल जाएत।” शीला आँगन जा सासुकेँ कहलैन। दरबज्जापर सभकेँ चुप देख‍‍ राजेसर देवनन्दनकेँ कहए लगलैन- “डाकदर साहैब, हमर काज, नौआबला काज पहीले दिनसँ शुरू भऽ जाइए। काजो दोहरी। एक दि‍स‍ पुजबैक परकिरियामे डाली सजौनाइ, दोसर दिस‍ कठियारीबला सभ परातेसँ केश कटबए लगैत अछि। ई तँ एकटा काज भेल। जँ गाममे एकटा काज हएत तखन, नै जँ दोहरा-तेहरा गेल तँ काजो दोहरा-तेहरा जाइए, तैपर सँ जन्मौटी छुतका भिन्ने। केते दिनसँ मनमे होइए जे एकटा नाङैर दुआरपर रखितौं से पारे लगब कठिन अछि। एमहर सराध-कर्ममे मात्र छहअना हिस्साक भागीदार छी। ऊपरसँ किछु निछौर– झलफाँफी धोती, माटिक बरतन आ किछु हथ-उठाइ भेटैए।” राजेसरक बात सुनि देवनन्दन तरे-तर सर्द हुअ लगला! आँखि उठा करिया काकापर देलैन। करिया काका राजेसरक मुँह दिस‍‍ तकैथ‍। जेना रसगुल्ला खसतै आ लपकता। रसगुल्ला तँ नै एलैन मुदा रसगुल्लाक रस जरूर आबि गेलैन। मुस्की दैत बजला- “राजे, जे बेसी मनुख-ले खटत आ कम-सँ-कममे अपन जिनगी चलौत ओकरासँ बेसी इमानदार ऐ घरतीपर के अछि? धरमक एकटा बाट तँ इमानो छिऐ किने!” मने-मन देवनन्दन तँइ केलैन जे पिताक कर्म करौनाइ हमर जिम्मा छी। जे कोनो काज हएत ओकर नीक-अधलाक भागी तँ अपने हएब। गाममे जेतए जे होइ छै हौउ। मुदा अपना ऐठाम एहेन अनुचित नै हुअ देब। फेर मनमे शंका उठलैन जे ऐ बातकेँ पुरबासय केना कएल जाइ? पूर्वाशयक अर्थ तँ पूर्ब+आशय होइत मुदा समाजक अधिकांश लोकक कानमे जे रहै छै ओकरा की मानल जाए..? रंग-बि‍रंगक तर्ककेँ मनमे उठैत देख‍‍ सोचलैन जे दुनू पार्टी माने पुरोहित-नौआक बीच काजक सम्‍बन्‍ध अछि। सझिया काजक फल तँ सझिया होइत। मुदा केते साझी आ तेकर की अधार? से नइ तँ दुनू गोरेमे करैथ। सोझक जे निर्णए दुनू गोरे करता तँ हमरा मानैमे की लगत। मन असथिर भेलैन। चारिम दिन। गाछीमे छौरझप्पीक पछाइत‍ कर्म सम्पन्न भेल। शंकरदेव गाछीएमे भोजन कऽ नेने छला। करिया काका हाथमे कोदारि नेने आगू-आगू आ पाछूसँ शंकरदेव, देवनन्दन आ तइ पाछू परिवारक सभ कियो–तीनू भाइयो-बहि‍न आ सासुओ-पुतोहु आँगन एली। आँगन अबिते सभकेँ बुझि पड़लैन जे जेना आगूए-आगू रघुनन्दन आबि गेला। हुनके बनौल घर-दुआर, पानिक चापाकल इत्‍यादि छिऐन। जेना सभ किछुमे सन्हिया गेल छैथ। जँ हुनकर घराड़ी स्मारक बनैन तँ सभ दिन ओइ‍ स्‍मारकमे दर्शन दैतैथ। मने-मन पिताकेँ स्मरण करैत देवनन्दन संकल्प लेलैन जे पिताक देल जे किछु अछि ओ ऐ समाजक छिऐ। हम तँ अपने तेते कमाइ छी जे गामो अबैक छुट्टी ने होइत अछि। बेटी सासुर जाएत। बेटो केतौ नोकरी करत। की बाप-दादाक देल सम्‍पैत‍ हम आनठाम दऽ अबि‍ऐ? तखन गामक मनुख अनतए जा भलेँ अपनाकेँ अगुआ लैथ मुदा गाम तँ तरका जाँत जकाँ पड़ले रहि जाएत! चलत कहिया? जँ दुनू-चक्की मिलक चक्की जकाँ चलए लगए तँ की गहुमक आँटा नै पीसल जाएत?जरूर पीसल जाएत। पिताक देल सम्‍पैतक जे आमदनी अछि ओकरा भोजमे आ अपना दिस‍‍सँ गरीब बच्चाकेँ पाँच हजार रूपैआक पोथी, पाँच हजार रूपैआक दबाइ समाजक बीच पिताक मृत्युक दिन उपहार स्वरूप देब। ओना, ऐसँ खुशीक बात ई हएत जे पिताक जन्‍मे दिनक तिथिपर साले-साल दिऐ जे बच्चा सबहक संग-संग सभ दिन खेलैत रहता। किएक हुनकर मृत्यु शरीरकेँ मृत्यु बुझिऐन? मुदा हुनकर जन्म-कुण्डली तँ नै भेटत? स्कूल गेबे नै केला। तखन की करब? मनमे नव उत्साह जगिते डाक्‍टर देवनन्‍दन करिया काकाकेँ कहलखिन- “काका अहाँ सभ एक-बतारी छी, हमरासँ बेसी देखने छेलि‍ऐन। अखने बैस कऽ ऐगला कर्मक विचार काइए लेब। शंकरो भाय छैथे।” देवनन्दनक बात सुनि, अपन आमदनी शंकरदेव देखलैन। मनमे गुद-गुदी लगलैन। पानक पीत फैकैत बजला- “बेजाए कोन। अखन सभ समटाएल छी फेर समटैमे समए लगत। तेते करिया काका ठेल-ठेल कऽ खुऔलैन जे आराम करैक मन होइए।” अपन चाबस्‍सी सुनि करिया कक्काक नजैरमे रघुनन्‍दन नाचि उठलैन। खेतक आँड़िपर बैस गपक संग-संग तमाकुलो खाथि...। मन पड़लैन गुनाक गीत। तहियाक छीतन आइयो संग-संग अछि...। मन पड़लैन समाज। आइ जे समाज एक भऽ भाय-साहैबकेँ विदाइ देलैन...। की ई उचित होइ जे गामसँ लऽ कऽ आन गाम धरिकेँ खाली अपन जातिकेँ भोज खुअबैए आ गामेमे ओहन समाजक बच्चा दिस तकबो ने करैए, कनैत छोड़ि दइए, जे बेर-विपैतमे हरिदम लगमे रहै छै..? ..जेते खुशी शंकरदेवक बात सुनि भेलैन तइसँ बेसी कचोट मनमे उपैक गेलैन। बजला- “जखन तेरहे दिनक बीच काज नापल अछि तखन तँ अधिक-सँ-अधिक समाजक उपयोग होएब जरूरी अछि। हम सुन्दर भायकेँ बजौने अबै छिऐन।” कहि‍ करिया काका वि‍दा हुअ लगला। आकि‍ देवनन्दन रोकलखिन- “अहाँ कोदारि पाड़ि कऽ एलौं हेन, आशाकेँ पठबै छिऐ।” देवनन्दनक बात सुनि करिया काकाकेँ हँसी लगलैन। बजला- “डाक्टर साहैब, आशा जा कऽ की कहतैन?” “बजबै छैथ।” “कथीले?” देवनन्‍दन चुप रहि‍ गेला। करिया काका बजला- “जँ भैया बुझैथ‍ जे कोनो छोट-छीन काज हेतै तखन तँ अपन नमहर काजकेँ सम्हारि औता। तँए अपने जाइ छी।” करिया काकाकेँ विदा होइते शंकरदेव दयानन्‍दकेँ कहलखिन- “बाउ, एक लोटा पानि पि‍आउ। हमरो अहाँक परिवार कोनो बाँटल अछि अहाँक मात्रिक बरियाती हमहूँ गेल रही। अहाँ सभ तँ परदेसी भेल जाइ छी। हमरा ओहिना मन अछि उपनयनसँ तीन दिन पहिने दालि-भात, तरूआ तरकारी, दही-चीनी खेने रही। अहीं सबहक अन्नपर हमहूँ सभ ठाढ़ छी...।” पानि पीब कऽ– “अखन दुइए गोरे छी, तँए कहै छी। पुजबैत-पुजबैत हमरा सबहक परिवार निच्चाँ-मुहेँ ससैर गेल। अपने बात कहै छी। राजविराजसँ तीन कोस आगू तक बाबूकेँ जजमैनका रहैन। जखन ओइ‍ इलाका जाइ तँ मास-मास दिन परदेशे जकाँ रहि जाइ। सेवा खूब हुअए। खेनाइ-पि‍नाइक कमी नहि। हमरा तँ एतएसँ नेपाल धरि ने धाँगल अछि। अपना सभ तँ कनी हटल छी तँए, नइ तँ जेना-जेना उत्तर-मुहेँ जेबै तेना-तेना बाजब-भुकब, खेती-वाड़ी, माल-जाल मिलल-जुलल देखबै। कथा-कुटमैती, भोज-काज ऐपार-ओइपारमे होइते अछि। सीमाकातमे ऐ भागक लोक ओइ भाग जा हाट-बजार करैत अछि आ ओइ भागक ऐ भागमे। हँ, तइसँ आगू जेना-जेना बढ़बै तेना-तेना पानियोँ आ बोलियोमे अन्तर बुझाएत। तेकर कारण अछि उत्तरबरि‍या पहाड़। बाबूकेँ खूब आमदनी होइन। भरि-भरि दिन भाँग खा दरबज्जापर बैस तास खेलल करी। “लघु-सिद्धान्त” पढ़ैमे एगारह बरख लगल रहए। मुदा बाबूक संग पुरैत-पुरैत अपन जीवि‍‍काक सभ लूरि भऽ गेल। पढ़ैमे मझिला भाए चन्सगर। खूब पढ़ि कऽ नीक नोकरी करै छैथ। कहि देलैन जजमैनकासँ हमरा कोनो मतलब नहि, हम मेहनत करब आ मेहनतक अन्न खाएब। तखन धिया-पुताक संस्कार तेज हएत। सभसँ छोटका बकनाएल अछि। दिल्लीमे भाए नोकरियो धड़ा देलकैन तँ तेते कमाथि जे पेटो ने भरैन। मुदा समाजमे प्रतिष्ठा बनौने छैथ।” प्रतिष्ठाक नाओं सुनि दयानन्दक मनमे भेलैन जे एक दिस‍‍ कहै छैथ जे बकना गेला आ दोसर दिस  प्रतिष्ठितो छैथ? मनमे अचरज भेलै आँखि-मे-आँखि‍ गड़ा पुछलकैन- “की प्रतिष्ठा?” दयानन्दक प्रश्‍नकेँ हल्लुक बुझि शंकरदेव बजला- “बौआ, अखनो अधिक खेनिहार लोककेँ प्रतिष्ठित मानल जाइत अछि। एते दिन ई प्रतिष्ठा भोज-काजमे भेटै छेलै, आब घरे-घर भऽ गेलइ। हम केतेक रूपैआ खेनाइपर खर्च करै छी, अहिक भीतर प्रतिष्ठा आबि गेल अछि। भलेँ हजार रूपैआ प्रतिदिन परिवारक भोजनमे खर्च किए ने करैथ मुदा समाजक लोक जँ डेरापर आबि जेता तखन या तँ गेट खोलि भेँटे नै देबैन आ जँ भेँटो देबैन तँ गामक- हाल-चाल पुछि कहबैन जे पत्नी नोकरीपर ड्यूटीमे छैथ तँए डेरामे चाहो पि‍आएब मोसकिल अछि। वेचारा हाले-चाल की कहतैन। ने जिनगीक भेँट आ ने एकठाम रहैबला...। ...हँ, तँ कहै छेलौं अपन भाइक विषयमे, साल भरिसँ महंथ भऽ गेल अछि। देखलिऐ तँ नै मुदा सुनै छी अपनो चिट्ठीमे केताक बेर लिखलक हेन। ओना भाए छी आगि नै उठेबै, नअ-दस माससँ लत्तो-कपड़ा आ हजार रूपैआ महिनो पठबैए। मुदा आफद की एकटा अछि। साल करीब भऽ गेलैन। कनियाँ एतै छथिन। एकटा बच्चो छैन। फोन केलिऐ जे दसो दिन-ले गाम आबि बालो-बच्चाकेँ असिरवाद दऽ दहक। आब तँ तोँ महंथ भऽ गेलह।” देवनन्दन दिस‍‍ मुँह घुमबैत शंकरदेव मुस्‍कियाइत बजला- “भाय, की जवाब देलक से बुझलिऐ, कहलक जे स्थानक की हमरा खतियान बनल अछि। भरि-दिन-भरि-राति केतौ रहू मुदा साँझ-भिनसर घड़ी-घण्‍ट बजा आरती गबै पड़त। मुदा आब चढ़ौआ सभ सेहो हुअ लगल हेन। भरि गाम-घरक स्‍त्रीगणसँ लऽ कऽ बजार धरिक जनीजाति सदिकाल अबिते रहैए।” देवनन्दन कहलखि‍न- “भावोओकेँ ओतै पठा दियौन।” शंकरदेव बजला- “से तँ अपनो लिखैए जे विदागरी करि कऽ नेने अबियौन। मुदा एकटा आफत रहए तब ने आफत-पर-आफत अछि। एक तँ कनियाँ जाइले नै गछै छैथ। केना उपकैर‍ कऽ घरसँ विदा कऽ दिऐन। मुदा बात एकेटा नै अछि दोसरो अछि। एक बेर बि‍आह-पंचमीमे नैहरक संगी-संगे जनकपुर गेली। लोकक ठठ्ठ, दिन-राति यात्री एमहरसँ ओमहर नचिते। एकठाम एकटा नंगा स्थान लग बिजली कटि गेलइ। जहाँ-तहाँ लोक अपन संगी छोड़ि यात्री सभमे हरा गेल। हमरो भावो हरा गेली। ले बँगौर! रौतुका हराएल दिनोमे ने गौंआँ भेटलैन हिनका आ ने ई भेटलखिन गौंआँकेँ। मुदा हेराएल नै छेली, वौआएल छेली। सभ यात्री तँ अपने इलाकाक रहै कि‍ने। नानी गामक संगी भेटलैन। जहिना धारमे बाँस आकि‍ रस्सी पकैड़-पकैड़ लोक पार होइए तहिना वेचारी नानी गामसँ मेहमानी करैत सात दिनक पछाइत गाम एली। से मन उड़ल छैन।” रस तकैत देवनन्‍दन पुछलखि‍न- “सभ स्‍त्रीगण शहर जाए चाहैत‍ अछि अहाँ उनटे कहै छी?” मुस्की दैत शंकरदेव- “एँह भाय! अहूँ अनाड़ी जकाँ बजै छी, अपन जे मिथिलांचल अछि ऐ क्षेत्रमे तँ केतौ लोक मैथिली बाजि जिनगी गूदस कऽ सकैए। मुदा जैठाम भाषाक दूरी अछि, जीवन-शैलीक दूरी अछि तैठाम की गिरगिट जकाँ सात बेर‍‍ जिनगी बदैल सकैए? रहल बात जीबाक उपाइक। तँ की जैठाम मनुख रहत ओइ‍ठाम कोनो वस्तुक उत्पादनक जरूरत‍ नै अछि? की हमरा सभकेँ शिक्षा आकि‍ दबाइक जरूरत‍ नइ अछि, भोजन-वस्‍त्रक जरूरत नइ अछि?  मनोरंजनक जरूरत‍‍ नइ अछि आकि कला-संस्कृतक जरूरत नइ अछि? मुदा ई के करत? जेकर छिऐ से बोहु लऽ लऽ शहर घुमैए तँ की सोझे सीते भूमि कहने अयोध्यासँ राम औता? मुदा छोड़ू दुनियाँ-जहानकेँ। अखन जे काज सोझहामे अछि पहिने तेकरा देखू...। हँ, तँ जाधैर करिया काका आ सुन्दर काका नै पहुँचला, तैबीच एकटा आरो कहि दइ छी। राज-विराजसँ तीन कोस उत्तर धरि हमरा बाबूकेँ जजमैनका छेलैन। लोकोक धारणामे सराध-कर्मक महत बेसी छल। जइसँ आमदनियोँ नीक होइन। अखुनका जकाँ जिनगियो फल्लर नै छेलइ। लोको बेसी बि‍सवासू। आँखि देखा कऽ केकरो कियो बेइमानी नै करैत। जहाँ-तहाँ बाबूओ अपन समान, बरतन-कपड़ा रखि देथिन, ओना कपड़ाक केते जरूरते परिवारमे रहै छल, जइसँ राजसी ठाढ़मे जीवन बितौलैन। जखन मुइला तखन चारू दिस‍‍सँ भूत पकैड़ लेलक। भाय कहलैन जे नोकरीए करब। अपन परिवार लऽ कऽ चलि गेला। काजे-उदममे पाहुन जकाँ अबै छैथ। दोसर, छोटजनक कहबे केलौं जे गामक फेदार मोरगंक दफेदार भऽ गेल अछि। सुनै छी जे भरि-भरि दिन नानीक सिखैलहा खिस्सा सभ मौगी सभकेँ सुनबैत रहैए। खाएर, किछु करह। हमरो तँ कपार नहियेँ चटैए। आब की भऽ गेल अछि‍ जे अल्लापुरक सभ जाति अपने-अपने पुजबए लगल। जजमैन‍का घटि गेल। अल्लापुरक देखौंस सीमो-कातक गाम सभ करए लगल हेन। रहैत-रहैत पाँच गाम बँचल अछि। ओना, आब नवका जजमान- मारवाड़ी सेहो बढ़ल हेन। पाइबला पार्टी।” बिच्‍चेमे देवनन्‍दन पुछलखिन- “ओ सभ अपन छोड़ि‍ देलक?” “अपनो धेनइ अछि। मुदा ऐठाम तँ सभ वेपारी भऽ गेला। पुजेगरी कहाँ अछि। एक बेर पान खुआउ...। ..गामक खेल-तमाशा देख‍‍ मन कनैत रहैए मुदा तैयो जे ठोरपर पछबा लहकी देखै छिऐ तँ तामसो उठैए। ओना, सभसँ भला चुप। ने किछु बजै छी आ ने केकरो किछु कहै छिऐ।” पान मुँहमे लऽ कनी काल गुलगुला कऽ पीत फेकैत शंकरदेव फेर बजला- “भाय, छह माससँ निचेन भऽ गेलौं। मुदा दियादवादक जे दशा-दिशा देखै छिऐ तइमे होइए जे भगवान हमरो ऊपरमे तकै छैथ।” बिच्‍चेमे देवनन्‍दन पुछि देलखिन- “से की?” ‘से की’ सुनिते शंकरदेव बजला- “भाय-साहैब सभ तेहेन रस्ता पकैड़ लेलैन जे चिन्ता मेटा देलैन। मझिला भाए जे नोकरी करै छैथ, ओ गामपर सभतूर आबि बलजोरी दुनू भाँइकेँ लऽ गेलखिन। की कैहतिऐन। अपनो बुझै छी जे दिनानुदिन जीवि‍‍का घटले जा रहल अछि। तहन तँ सभ दिन समाजक बीच रहलौं तँए आब ऐ उमेरमे केतए जाएब। जाधैर समाज जीबैए ताधैर कहुना-ने-कहुना बहिते रहब। मुँहपर तँ नइ मुदा पत्नी लग भावो बजली- ‘उसरागा खाइत-खाइत सभटा उसरन भेल जाइए। हमरा की लोक नै दुसत जे बाप-पित्ती बड़का हाकिम छथिन आ बेटा-भातीज दसखतो करै जोगर नै भेलखिन।’ कहि दुनू भाँइकेँ लऽ जा अपने लग अफसर सबहक जे स्कूल छै तइमे नाओं लिखा देलखिन। छोटका भाए हरिदम फोन करैत रहैए- ‘हमरा तेते चढ़ौआ होइए जे केतए रखब। उठा-उठा लऽ लऽ जाउ।’ मुदा गाड़ीमे चलैत डर होइए। तेते छिना-झपटी, निशाँ-खुऔनी हुअ लगल अछि जे हमरा बुत्ते तीस घन्‍टा गाड़ीमे बैस दिल्ली पहुँचल हएत। मुदा तैयो अनका-अनका दिआ तेते चीज पठबैत रहैए जे कोनो चीजक कमी नै अछि। संतोष एते भऽ गेल जे कियो अपन बाप-माइक किरिया-कर्म करैत अछि तैबीच हम किए डाक-डकौवैल करिऐ। पूर्वज सभ तँ तीन श्रेणीक सराध कर्म तँइयेँ कऽ गेल छैथ। जेकरा जइ तरहक विभव रहै छै ओ ओइ‍ तरहक कर्म करि एकलोटा पानि तँ पूर्वजकेँ दइए दइ छैथ। मुदा लोकोमे छल-प्रपंच छइ। जँ करै छी तँ श्रद्धापूर्वक करू नइ तँ ठकि कऽ पिण्‍ड कटौने नै हएत। तहिना हमहूँ करै छेलौं। दियादवाद अखनो करिते छैथ जइसँ दशो तेहने भेल जाइ छैन। गामेमे वेदान्ती काका छैथ। वेचारा अपन जिनगी अपना ढंगसँ बना नेने छैथ। ओना ओ लोअरे-प्राइमरी स्कूलमे गुरुआइ करै छैथ, गामेक स्कूलमे। मुदा अप्‍पन क्रिया-कलाप छैन। जहिना किसान काजकेँ दू उखड़ाहा–भिनसरसँ बारह बजे आ दू बजेसँ सूर्यास्त धरि, बँटने छैथ। तहिना स्कूलमे दुनू उखड़ाहा पढ़बै छथिन। दरमाहा भेटलैन आकि‍ नै तेकर कोनो चिन्ता नहि। किछु ऑफिसक किरानी ठकि कऽ खाइ छैन तँ किछु बैंकक, तहिना कहियो कियो नाँगट देह आ बच्चाकेँ पोथी-कॉपी देखा मांगि लइ छैन, तँ कहियो बैंकक चारू भाग मरड़ाइत लुच्चा सभ झोड़ा छीन लइ छैन। मुदा ने कहियो काकी मुँह उठा हिसाव मंगै छथिन आ ने अपने केकरो कहै छथिन। मन पुष्ट रहै छैन जे अपनो तँ जीबते छी, तहन अनेरे घरमे रखि कऽ की हेतइ। कातिक मासमे ‘कार्तिक महात्म्य’ बरहम स्थानमे बैस कऽ सभ साल सात दिन धरि समाजकेँ सुनबै छथिन, तइमे तेतेक कपड़ा भऽ जाइ छैन जे सालो भरि दुनू परानी बिनु सुइया भि‍रौल कपड़ा पहिरै छैथ। दूध खाइले गाइये पोसने छैथ। ओना खेती अपने नै करै छैथ। गाममे दू कट्ठा वाड़ी छोड़ि घराड़ीएटा छेबो करैन। पिता जजमैनका पुजबैत रहथिन। गामे-गामे जे जजमान दानमे खेत आ आमक गाछ देने छैन वएह तेते आबि जाइ छैन जे दू-सलिया-तीन-सलिया चाउर सेहो पथ्य-पानिले रहै छैन। आदतो तेहेन रखने छैथ जे केकरोसँ मंगैक काज नहि। आजुक छौड़ा सभ जकाँ नै ने जे- बाबा, कनी खैनी खुआउ। पचास गाछ तमाकुलक खेती अपने हाथे-बुधिए करै छैथ। काकी गाइयेक पाछू बेहाल रहै छथिन। जहिना एक बहि‍न दोसर बहि‍नक माथमे केश बिहिया-बिहिया ढीलो तकैत आ नीक-अधलाक गप्पो करैत तहिना गाइक संग काकी लगल रहै छैथ। जहिना तमाकुलो अपने हाथे उपजबै छैथ तहिना चूनो अपनेसँ बनबै छैथ। दियादमे जखन हुनकापर नजैर पड़ैए तँ स्‍वत: नजैर निच्चाँ भऽ जाइए। मुदा ओहीठाम दोसर छैथ जिनका घराड़ी दुआरे एक्के अँगनामे सोरेक-सोरे धि‍या-पुताक संग तीन भाँइ छथिन। भोर होइते तीनू महाभारत शुरू कऽ दइ छैन! तीनू दियादनियोँ तीन परगनाक छथिन। एकटा अल्लापुरक, दोसर भौरक आ तेसर– गंगा ओइ पारक, मगहक छथिन। तीनू जे तीन सुर-तानपर गारिक गीत गाएब शुरू करै छथिन, तखन बुझि पड़ैए वृन्दावनमे छी आकि लंकाक पुष्प-वाटिकामे..।” मुस्की दैत- “केते कहब भाय, अपने लाज होइए। एकटा छौड़ा अछि लक-लक पतरे। झोंटा जकाँ केश रखने अछि। सभ दिन मोछ-दाढ़ी कटैए। छींटबला घुट्ठी लग तक अँगा सिऔने अछि। पएरेमे सटल चुस्त पैजामा पहिरैत अछि। एक गोरेक काज रहए, देखलिऐ तँ धोखासँ कहा गेल के छिऐँ गे। से की पुछै छी जेना बिढ़नी छत्तामे गोला फेक देने होइऐ तहिना गनगनाए कऽ मुहेँ-काने की कहलक तेकर ठेकान नहि। सभसँ चोट एकटा बातक लगल कहलक मनुखक झर कहीं-के। मुदा लगले मुहसँ हँसी फुटलैन आगू बजला- “आँखि उठा कऽ देखै छिऐ ने भाय तँ बुझि पड़ैए जे सभटा बुड़ि-मुहाँ भँसि‍ भँसि आएल अछि। तेहेन-तेहेन कुरेर सभ जन्म लऽ लेलक हेन जे कुल-खानदानक नाक कटौत, की कान कटौत, की घराड़ीकेँ भँट्टाक खेत बनौत से नइ कहि। एकटा दियाद छैथ जिनकर लम्बाइ चारि फीट हेतैन आ चौराइयो तहिना। चँगेरा भरि चूड़ा, अधमन्नी तौला दहीकेँ एक्के सुरकानमे सीमा टपा दइ छथिन। चूड़ा-दही तेहेन चुहैट पेटकेँ पकड़ने छैन जे हरिदम पेटेटा सुझै छैन। घर गिर पड़लैन। केते खुशामद करि कऽ ‘इन्दिरा आवास’ दिआ देलिऐन। ले बँगौर ओहो चाटि लेलैन आ अखन खिचड़ी खाइ छैथ। केते कहब भाय।” सुन्दर काकाकेँ संग केने करिया काका पहुँचला। तखने‍ लेलहा सेहो कुरहैर लेमए आबि करिया काकाकेँ कहलकैन- “आब तँ तीन दिन कोदारि, कुरहैर, टेंगारी जहल कटलक। आबो छोड़बै की नै? साते दिनमे जारैनकेँ सुखाएबो छइ।” लेलहाक बात सुनि करिया काका चुपे रहला। मुदा सुन्दर काका लेलहाक मुँहक बात छिनैत बजला- “कारी, पढ़ुआ भायकेँ बजा अनियौन। गाममे सभसँ बेसी गुल्ली-पेंच वएह करै छैथ।” सुन्दर कक्काक बात सुनि करिया काका पढ़ुआ भाय ऐठाम विदा भेला। जखनसँ लेलहा सुन्दर कक्काक-मुहेँ ‘गुल्ली-पेंच’ सुनलक तखनसँ गुल्ली-पेंचक अर्थ बुझैले मन लुस-फुस करए लगलै। मुदा काजक गप सुनि अपन प्रश्‍नकेँ पेटमे दबने रहए। मुदा तैयो पेटमे उधकै। होइ जे कखन बाहर निकलब। बाँस भरि करिया काका आगू बढ़लैथ आकि‍ लेलहा पुछलकैन- “सुनर काका, ‘गुल्ली-पेंच’ केकरा कहै छइ?” लेलहाक प्रश्‍न सुनि सुन्‍दर कक्काक पेट-गोंगि‍याए लगलैन मुदा पहिले मुहराकेँ रोकैत शंकरदेव सम्हारि लेलैन। बजला- “देवनन्दन भाय, लेलहा समाजक खुट्टा छी। वेचाराकेँ ऐ उमेरमे कहीं एहेन देह रहितै। देखै छिऐ, जहिना कोसी बाढ़िमे नव-गछुली कलम-गाछी सभ पतझाड़ लऽ कऽ भऽ जाइए तहि‍ना वेचाराकेँ छुच्‍छे पतरका-पतरका डारि जकाँ देहक हाड़ झकझक करै छइ। समाज की? समाजरूपी घर की? समाजरूपी घर वएह जइमे सबहक सझिया होइ। आब प्रश्‍न उठैए काज-पर-काज तँ ढेरो तरहक अछि, समाजक काज की बुझल जाइ? ऐ प्रश्‍नक उत्तर विकास-परकिरियामे अछि। मुदा मूल प्रश्‍न अछि सभ मनुख मनुख छी तँए सबहक दुख-सुख सझिया हुअए।” शंकरदेवक बात सुनि सुन्दर काका उफैन पड़ला। जहिना रौद लगिते ताड़ी घैलमे फेना-फेना निच्चाँ खसैत तहिना सुन्दर कक्काक मुहसँ खसए लगलैन- “लेलहू, तूँ सभ लगले बि‍सैर जाइ छह मुदा हमरा तँ जुग-जुगक बात मन अछि। श्यामसुन्दर माइक सराधक भोजमे देखने रहक ने जे पच्चीस गामक पंच केना दरबज्जापर सँ लऽ कऽ अपना अँगना धरि गरियौलकैन। केकर केलहा रहए? वएह पढ़ुआ भाय भनसियाकेँ फुसला कऽ गाँजा पि‍आ, हकिमानी करए लगला। तरकारी-दालिमे जखन नोन दइक बेर भेलै तखन बोरे देखा देलखिन।” सुन्दर कक्काक बात सुनि ठहाका मारि लेलहा बाजल- “हँ, यौ काका। पाछू हमहूँ बुझलौं।” “धुर्र बुड़ी, तेहेन छुछुनैर छैथ जे ओतबे केलैन। देखने रहक किने जे पुलकितक बेटी-बि‍आहमे केहेन मारि करा देने रहथिन। कोनो अनकर किरदानी रहै, जे कि‍‍ ओही बीचमे घोघटाही साड़ीकेँ दुसि देलखिन। हुनके बातपर ने जनिजाति सभ झगड़ा ठाढ़ केलक। अन्तमे देखबे केलहक...। तँए एहेन-एहेन बुधिकनाह लोकसँ सम्हैरिए कऽ रही। कखन की कऽ देतह तेकर कोनो ठीक नहि। एहेन-एहेन लोक एतबो ने बुझैए जे अपन काज अनको-ले होइ। हरिदम अनकर हिस्सा अपनबैमे लागल रहैए। सोझहेमे तँ कुल-पुज बैसले छैथ। इएह बाजौथ?” सुन्दर भाइक प्रश्‍न सुनि शंकरदेव सकपकेला नै असथिरसँ बजला- “देखू, किछु दिन पहिने तक हमरो चालि ओहने छल मुदा आब ओ सभ छोड़ि देलौं। केकरो चुगली-चालि केने हमरा की भेटत? एतबे ने होइए जे नकलीसँ सावधान? मुदा आब जेते कालमे नकलीसँ सावधान करब तेते कालमे असलीएकेँ ने किए आरो असली बनाएब। सुन्दर भाय, जहियासँ भाए सभ कुल-खनदानक घराड़ीकेँ चिन्हलक, तहियासँ सभ दुख पड़ा गेल। किछु दिन पहिने धरि हमहूँ आन-आन सराध-कर्मक उदाहरण दऽ दऽ जजमानसँ अधिक झाड़ै छेलौं मुदा आब से सभ छोड़ि देलौं। सभ अपन-अपन भार उठा लेलैन जइसँ हमहूँ उठि गेलौं। आब बुझै छी जे जाबे कियो करै छैथ अपन बाप-माइक करै छैथ, तइमे किए जोर दिऐन? जहियासँ विचार बदलल तहियासँ जिनगियो बदलल। गारियो सुनब कमल। तेहेन-तेहेन झनाठी बच्छा सभकेँ दागि कऽ साँढ़ बनौल गेल जे गाइक खाढ़े चौपट्ट भऽ गेल। जइसँ ने नीक बच्छा आ ने नीक बाछी गाममे रहल। वाड़ी-झाड़ी चड़ैबला साँढ़ भऽ गेल अछि। हरिदम लोक नाओं धऽ धऽ सोझहेमे गरियबैए जे “हैया शंकरबाबा पहुँच गेला।” मुदा रच्छ रहल जे जहिना-जहिना नवका-नवका लोक सभ भेला, तहिना-तहिना नव-नव काजो कऽ रहला अछि। हिनके सबहक परसादे तँ एहेन-एहेन सुन्दैरो आ दूधगैरो गाए सभ गाममे आबि गेल। नवका-नवका मशीन सभ सेहो आबिए रहल अछि।” बिच्‍चेमे देवनन्दन दयानन्दकेँ कहलखिन- “बौआ, चाहो-ताहोक...।” दयानन्द आँगन जा माएकेँ कहलक। एमहर पढ़ुआ कक्काक संग करिया काका पहुँचला। पढ़ुआ काकाकेँ शंकरदेव हाथक इशारासँ अपने लग बैसैले कहलखिन। मुदा लेलहाकेँ अपन पैछला बात मनमे नाचए लगलै। बात ई जे गाछपर एकटा लुक्खी पकड़लक। जाधैर धड़ पकड़ने रहए ताधैर तँ लुक्खी हाथमे रहलै। मुदा नाङैर पकैड़ते लुक्खी पड़ा गेल। लेलहाक हाथमे नाङैरक रोइयेँटा बँचि गेलइ। पछाइत अपना नजैरेपर लेलहाकेँ शंका हुअ लगलै। कखनो बामा हाथसँ आँखि मिड़ै तँ कखनो दहिना हाथसँ। मुदा तैयो मन मानबे ने करै जे पढ़ुआ काका भीतरसँ छैथ आकि ऊपरे-ऊपर छैथ। मुदा मन बदललै। पाँच गोरेक बीच जखन रही तखन अपन बात दोसरकेँ कम-सँ-कम कही आ दोसराक बात बेसी सुनी। चाह आएल। सभ पिबए लगला। चाहक गिलास रखि पढ़ुआ काका शंकरदेव दिस‍‍ देखैत बजला- “भाय, आब की पहिलुका किछु रहल। पहिने केहेन बढ़ियाँ सभ मिलि भोज-काजमे संगे करबो करै छल आ संग मिलि सभ खेबो करै छल। आब तँ दरिभंगाक वेपारी आबि कऽ सराध बि‍आहक ठिक्के लऽ लैत अछि।” पढ़ुआ कक्काक बात सुनि शंकरदेव बजला- “हम अपने बात कहै छी। देनिहार बुझै छैथ जे हजार रूपैआक बरतन देलिऐन, मुदा हम की ओकरा घरमे चूरि‍-चूरि खाएब। केतौसँ अनै छी दोकानमे जा कऽ अधोरमे बेचै छी। कहैले तँ एते भेटल मुदा हाथ केते अबैए? तहन तँ आब बुझए लगलि‍ऐ जे मनुखक जिनगी मनुखताक योनि छी। सक्कत संकल्प-ले कठीन आ दृढ़ताक जरूरत‍‍ होइ छइ। मुदा भऽ गेल छी पेटगनाह। बीत भरिक पेटक खातिर सभ चौपट भऽ गेल अछि। अपन हारल बोहुक मारल के केकरा कहै छइ। तहन हम यएह कहब जे पाँच गोरे विचारि कऽ डेग उठाउ।” सभ कियो विचार-विमर्श कऽ आगूक रस्ता धेलैन- 1. घरवारीकेँ माने कर्ताकेँ जेना मन मानैन ओइ‍ अनुकूल कर्म हुअए। झरखंडी बाछाकेँ दागि साँढ़ बनबैसँ परहेज कएल जाए। 2. आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ परहेज कऽ गामक सभ जातिक पुरुख-स्‍त्रीगणकेँ खुऔल जाए। आन गामक कुटुम, दोस्त, दियाद तँ रहबे करता। अन्‍तमे देवनन्दन बजला- “जहिना पिताजीक शरीर नष्ट भेलैन मुदा आत्मा तँ छैन्‍हे तहिना साले-साल हुनका निमित्ते यथासाध्य कल्याणकारी काज करैत रहब।” इति शब्‍द संख्‍या : 7903 ◌ [1] सिनेह [2] लड़का-लड़की [3] रघुनन्‍दन [4] रघुनन्‍दन [5] रंगलाल [6] उत्‍पादित पूजी [7] मुरदा जराएब ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जीवन-संघर्ष उपन्‍यास जगदीश प्रसाद मण्डल पोथीकेँ (तेसर संस्करण) तत्‍खनात् व्‍यक्तिगत रूपे सोझहा आनल जा रहल अछि...।–लेखक समर्पण मिथिलाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलवाड़ी लगौनिहार संगे नव विहान अननिहारकेँ 1. काति‍कक अनहरि‍या। रौदि‍याह समए भेने जेठेक रौद जकाँ रौदो कड़गर, तैपर सँ जनमारा उम्‍मस। जहि‍ना छींच स्‍नानसँ देहपर पानिक टघार चलैत तहि‍ना पसेना देहपर टघरैत। दस बजेक पछाइत‍‍ बाध-बोन दिस आँखि नै उठौल जाइत, तेते झड़क! मुदा घरोमे चैन कहाँ? माथक पसेना नाकपर होइत टप-टप खसैत! देहक वस्‍त्र गन्‍हकैत! औल-बौल करैत सबहक मन..! आठमे दि‍न दियारी छी तहूमे काली-पूजा करैक वि‍चार सेहो सौंसे गौंआँ मि‍लि‍ कऽ केलैन‍। दुनू अमावसिये दिन हएत। ओना अदौसँ दि‍वाली एक दिना पावैन‍‍‍ होइत आएल अछि‍ मुदा काली-पूजा धूम-धामसँ मनबैक वि‍चार भेने, पाँचो दि‍न सभ अपन-अपन अँगनमे सेहो दीप जरबैक वि‍चार कऽ लेलैन‍। आठमे दि‍न पावैन‍‍‍क दि‍न, तँए सात-दि‍नक पेसतरे घर-अँगनाक टाट-फरक सेरिएनाइ, छाउर-गोबरक ढेरी हटौनाइ, दुआर-दरबज्‍जासँ लऽ कऽ अपन-अपन घर लगक बाटकेँ छि‍लनाइ-बनौनाइ इत्‍यादि, कनीए काज अछि‍! तैपर सँ आन-आन गामसँ अबैत सड़को सभकेँ तँ अपना सीमान धरि‍ मरम्‍मत करैए पड़त कि‍ने। गुण अछि‍ जे रौदी भेने खेत-पथारमे काज नइए। जँ रहैत तँ सबहक लटैक जाइत! गाममे काली-पूजाक पैघ आयोजनक वि‍चार अछि‍ तँए काजोक भरमार ऐछे। ओना, लोकक उत्‍साहे तेहेन अछि‍ जे कोढ़िलो बोझसँ हल्‍लुक बुझि‍ रहल अछि। मालो-जालक भार सभ स्‍त्रीगणेपर छोड़ि देलैन‍। सभ किछु होइतो आ रहि‍तो मुँहक चुहचुहीमे सेब-तड़क छैन‍‍। कारण धानक खेतीमे गामक कि‍सान बँटा गेल छैथ‍‍। ओना खेतक बुनाबट सेहो तेहेन अछि‍ जे बँटाएब सोभावि‍के। अधि‍क ऊँच, मध्‍यम ऊँच, नीच आ अधि‍क नीच रूपमे गामक खेत अछि। जइसँ पानि‍ आ रौदक एक-रंग असर नै होइए‍। जेकर सद्य: प्रभाव उपजापर पड़ि‍ते अछि। गामक कि‍सानो बँटा गेल छैथ‍‍। जिनका मध्‍यम आ ऊँच खेत छैन‍‍ हुनका-ले गरमा धानक खेती उपयोगी छैन‍‍। मुदा जिनकर खेत नीच आ अधि‍क नीच छैन‍‍, जइमे शुरूक बर्खासँ अगहन-पूस धरि‍ पानि‍ जमल रहैए‍, ओइ खेत-ले अगहनीए धानक खेती उपयोगी अछि। ओना वैचारि‍क भेद सेहो अछि। अखनो गरमा धानकेँ अशुद्ध बूझल जाइए‍। जइसँ किछु गोरे वि‍रोध स्‍वरूप कम उपजा खुशीसँ पबै छैथ‍‍। आइ धरि‍ बँसपुरामे ने कहि‍यो कोनो होम-यज्ञ भेल आ ने कोनो तेहेन दसगरदा उत्‍सवे। जइसँ परोपट्टाक लोक बँसपुराबलाकेँ अधरमी सेहो बुझैए‍..। ओना, गाम मेहनती कि‍सान-बोनि‍हारक छी। गाम भरिमे ने एक्कोटा कम्‍पनीक एजेंट अछि आ ने चोर-डकैत आ ने ठक-फुसि‍याह। मुदा तँए की बँसपुराबला धर्मक काज नै करै छैथ‍‍? बखूबी करै छैथ‍‍। साले-साले महावीरजी स्‍थानमे अष्‍टयामक संग रामनवमी मनैबते छैथ‍‍। समए नीक हौउ कि‍ अधला मुदा उत्‍सवमे कोनो बाधा नै होइत, भलेँ नै पान तँ पानक डण्‍टियोसँ काज चलि‍ते‍ अछि। तेकर अति‍रि‍क्‍तो बेकता-बेकती भनडारा, अगहनमे जनार, आसीनमे सलहेसक पूजा इत्‍यादि‍ करि‍ते‍ छैथ‍। रौदी सबहक मनकेँ हौंर रहल छैन‍‍ मुदा तैयो मनमे नव उत्‍साह जगले छैन‍‍। भि‍नसरसँ लऽ कऽ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ सभ पूजेक कोनो-ने-कोनो काजो करैत, नै तँ पूजेक जुति-भाँति‍क वि‍चारमे लगल रहै छैथ‍‍। डि‍हवारो स्‍थानक चलती आबि गेल। स्‍थानक सौंसे आँगनकेँ चिक्कैन‍ माटिसँ दुनू साँझ नीपलो जाइए‍ आ गामक पुतोहु आ ढेरबा बेटी-जाति‍ सभ, कमसँ कम पाँचटा उचि‍ती-वि‍नती सेहो सुनैबते छैन‍‍। कुमारि‍ भोजन तँ पावैन‍‍‍ दि‍न हएत। मुदा अनेको तरहक सुगन्‍ध अगरबत्ती आ सरर-धुमनक माध्‍यमसँ पसैरते अछि। केना नै पसरत? पहि‍ले-पहि‍ल गाममे पाँच दि‍नक मेला लागत। रंग-बि‍‍रंगक दोकानमे रंग-बि‍‍रंगक वस्‍तुक बिकरी गाममे हएत। सभ अपन-अपन जि‍नगीक अनुरूप कीनबो करत...। मेलाक प्रति‍ लोकक मन एतेक उड़ि‍ गेल अछि जे ने आन काज आ ने आन गप करैत नीक लगैत। घरक सोलहन्नी भार स्‍त्रीगणेपर पड़ि‍ गेलैन‍। मुदा तरे-तर रोगक एकटा किड़ी फड़ि‍ गेल। ओ किड़ी ई जे खि‍स्‍सकरक चलती आबि गेल। सुननि‍हारक कमीए नहि। बुढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ धि‍या-पुता धरि‍। खि‍स्‍सकरो रंग-बि‍‍रंगक, कियो कालीकेँ समैक गति‍ बुझि‍ बजैत तँ कि‍यो महादेवक छातीपर पएर देब कहैत। जहि‍ना अपन खेत छोड़ि किसान वसन्‍त-पंचमी दि‍न एक्के परतीकेँ बेरा-बेरी जोतैत तहि‍ना कालियोक चर्च करैत। अदौसँ दि‍वाली एकदि‍ना पावैन‍‍‍ होइत आएल अछि। संगे एक-लाटेमे गोधन पूजा, भरदुतिया, दवातक पूजा सेहो होइत आएल अछि। तैपर सँ पाँच दि‍नक काली पूजाक मेला सेहो हएत। गाममे गहगट मचि‍ जाएत। बि‍ना ब्‍लिचिंग पौडर छि‍टने पेशावक गन्‍ध मेटाएत? दोहरी पूजा भेने जेहने सबहक मनमे खुशी होइत तेहने काजक तबाही सेहो। एक-लखाइत दस-बारह दिन खटब असान नहि। के बिमार पड़त, केकरा रद-दस्‍त हेतै तेकर कोन ठेकान। तहूमे धि‍या-पुता अकड़-धकड़ खेबे करत। रोकने थोड़े मानत। तैपर सँ भरि‍ राति‍ नाचो-तमाशा देखबे करत। सोच‍नि‍हार सभकेँ तरे-तर सोगो होइत। तेतबे नहि, आरो सोग सभ एकाएकी मनमे अबैत जाइत। एक तँ ओहि‍ना दि‍ल्‍ली-कलकत्ता दुआरे भाए-बहि‍न‍क पावैन‍‍‍- भरदुति‍या- रोगा गेल अछि, तैपर सँ गामक मेला। जँ पूजाक हकारो देल जाएत तँ के एहेन अभागल हएत जे लक्ष्‍मी पूजा छोड़ि गाम औत? भलेँ ऊक पुरुखे फेड़त मुदा तम्‍मा तरमे दूबि-पाइ सिरा आगू तँ जनीजातिये रखै छैथ‍‍। ओ पुरुख केना करता? एहेन पावैन‍‍‍ छोड़ब केते उचि‍त हएत? गामक मेला सबहक मनकेँ बि‍र्ड़ोक झोंक जकाँ उड़बैत। तँए नीक-अधलापर नजैर‍ केकरो टिकबे ने करैत। तहिना काति‍कक जरैया बोखार आ पेट-झर्ड़ीपर नजैर‍ केकरो जेबे नै करैत। सभ उन्‍मत! सभ बेहाल! जहि‍ना फगुआ दि‍न भाँग पीब‍ गाममे नचैए‍ तहि‍ना सभ घरसँ गाम-धरि‍क लोक काजक पाछू नचैत। जहि‍ना घरक ओलतीक पानि‍ टघैर‍ कऽ अँगनासँ नि‍कलैत-नि‍कलैत पानि‍क बेग बनि‍ पोखैर‍ पहुँच‍‍ जाइत तहि‍ना बेकती‍ ससैर कऽ समाजमे मि‍लि‍ रहल अछि। गाममे काली-पूजा किए हएत? जे एते दि‍न नै भेल ओ ऐ सालसँ किए हएत? अनेरे खर्चाक उतड़ी गौंआँ गरदैनमे पहि‍रैले किएक तैयार भऽ गेल? तेकर कारण ई अछि जे बँसपुरासँ कोस भरि‍ सटले सि‍सौनीमे पच्‍चीसो बर्खसँ बेसीए दिनसँ दुर्गा-पूजा होइत अबैए‍। चरिकोसीक लोक दुर्गा-पूजा देखए सि‍सौनी जाइ छैथ। गामेक नहि, आनो-आनो गामक स्‍त्रीगण दुर्गा-स्‍थानमे साँझो दिअ अबै छैथ‍‍। कुमारि‍ भोजन सेहो करबै छैथ‍‍। कबुलाक छागर सेहो चढ़बै छैथ‍‍। बलि‍-प्रदानमे सि‍सौनीक जोड़ा जि‍लामे नै अछि। दुर्गा-पूजा होइसँ एक महिना पहि‍नेसँ बकरी पोसनि‍हारक चलती आबि जाइ छइ। तहूमे एकरंगापर तँ डाक-डकौबैल‍ भऽ जाइए। तेतबे नहि, पाठ केनि‍हार सभ सेहो अभ्‍यास करए लगैत। गाममे दुर्गा-पूजाक समए परीछाक समए बनि‍ जाइत। जे बेसीठाम सम्‍पूट पाठ केलैन ओ डिस्‍टिंग्‍सनक संग फस्‍ट डि‍वीजन घोषि‍त होइ छैथ‍‍। आमदनियोँ नीक आ डि‍पलोमो नमहर! ओना, केतबो कियो अभ्‍यास करैथ‍‍‍ मुदा छन्‍ठे पंडीजी फस्‍ट करता, ई सबहक मन बीस सालक अनुभवसँ मानैत आएल छैन‍‍। हद छैथ‍‍ ओहो। एक तँ ओहि‍ना तेज बोली छैन‍‍ तैपर सँ तेते स्‍पीडमे धड़ै छैथ‍‍ जे चौपाइक पहि‍ल शब्‍द आ अन्‍तिमो शब्‍द सुनि‍ पाएब कि नहि! ओना किछु हौउ मुदा किनुआँ सर्टिफि‍केट नै रखने छैथ‍‍। मेहनत कऽ कऽ अनने छैथ‍‍। ऐबेर‍ सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे एकटा घटना भेल। घटना ई भेल जे बँसपुराक एकटा अठारह-बीस बर्खक लड़की, जेकर पैछले साल बि‍आह भेल छेलै आ तीनियेँ मास सासुर बसल छल, केँ पूजा कमि‍टीक तीन गोरे फूसला कऽ भण्‍डार घर लऽ गेल। मेला-गनगनाइत। नाच-तमाशाक लोड-स्‍पीकर चरिकोसीक नीन उड़ौने। तीनू गोरे ओइ ‍लड़कीक संग दुरबेवहार केलक। बेवश भऽ ओ लड़की सभ किछु बरदास केलक। चारि‍ बजे भोरमे ओकरा सभ छोड़ि देलक। मेला भरि‍ ओ किछु ने बाजल‍। मुँह-कान झाँपि‍ मेलासँ नि‍कैल‍ सोझे गामक रस्‍ता धेलक। गामक सीमापर पहुँचते छाती चहैक‍ गेलइ। छाती चहैक‍ते हबो-ढकार भऽ कानए लगल...। भि‍नसुरका कानब सुनि‍ एक्के-दुइए गामक लोक घर-आँगनसँ नि‍‍कैल‍‍ रस्‍तापर आबि-आबि देखए लगल। टोल प्रवेश करि‍ते‍ एका-एकी लोक पुछए लगलै। ‍अपन बीतल घटना सुनबए चाहैत मुदा बजले ने होइ...।‍ बेटीकेँ कनैत देख, बिनु किछु पुछने माए छाती पीट-पीट कनैत दुनू हाथे पँजि‍या कऽ पुछलक- “की भेलौ, हम माए छि‍यौ, हमरा नै कहमे तँ केकरा कहबीही।” जेना-जेना माए बेटीक मुँहक बात सुनैत तेना-तेना देहमे आगि सुनगए लगलै। सुनैत-सुनैत बमैछ कऽ पति‍केँ कहलक- “जहि‍ना हमर बेटीक इज्‍जत सि‍सौनीबला लूटलक तहि‍ना सि‍सौनीक दुर्गास्‍थानमे मनुखक बलि‍ पड़त।” कहि‍ घरमे रखल झोलाएल फौरसा नि‍कालि‍, साड़ी समेट‍‍ कऽ बान्‍हि‍ सि‍सौनीबला सभकेँ गरि‍यबैत वि‍दा भेल‍। पत्नीक काली रूप देख पति सेहो तौनीक मुरेठा बान्‍हि‍ हरोथि‍या लाठी नेने गारि‍ पढ़ैत बढ़ल। बताहि‍ जकाँ माए ‍चिकैर-चि‍कैर गरियेबो करैत आ देवी-दुर्गा लगा-लगा सरापबो करैत। जेते डेग आगू-मुहेँ बढ़ै तेते तामसो ऊपरे-मुहेँ चढ़ल जाइ। एमहर भुमहुरक आगि‍ जकाँ तरे-तर गौंओँक करेजमे आगि लहैर गेल। सभसँ पहि‍ने सातो दि‍यादी परि‍वारक पुरुख, स्‍त्रीगण सहि‍त धि‍यो-पुतो, जेकरा जएह सोझमे भेटलै, से सएह लऽ कऽ सि‍सौनीक रस्‍ता धेलक। दि‍याद-वादकेँ आगू बढ़ैत देख टोलोक आ जा‍‍तियोक सभ वि‍दा भेल। गाम दलमलि‍त हुअ लगल। जेकरा जएह मनमे उठै से सएह जोर-जोरसँ बजैत सि‍सौनी दि‍स विदा भेल। बुधियार लोक सबहक मन दड़कए लगल जे दुनू गामक बीच खून-खरापी हेबे करत। एकरा कियो नै रोकि सकैए‍। मुदा तैयो आगि‍मे जरैसँ रोकैक परियासमे किछु लोक आगू बढ़ि‍ रस्‍ता रोकलक। कियो बात मानैले तैयारे नहि। दुनू परानी कुसुमलालकेँ माने लड़कीक माए-बापकेँ चारि-चारि‍ गोरे पकैड़‍ कऽ रोकलक। कुसुमलाल तँ ठमैक‍‍ गेल मुदा पवि‍त्री मानैले तैयारे नहि। चरि‍-चरि‍ हाथ कुदि‍ चारू गोरेक हाथ छोड़ा-छोड़ा आगू बढ़ि‍ बजैत- “सभ दिनसँ पुरुख स्‍त्रीगणपर अति‍याचार करैत आएल अछि‍ आ अखनो करैए‍। ऐ अति‍याचारकेँ के रोकत? पुरुख-पुरुख सभ एक छी। जहि‍ना गाएसँ गाए नै पाल खाइत तहि‍ना पुरुख बुते पपि‍याह पुरुखकेँ सि‍खौल हेतइ! आइ सिखा देबइ!” जहि‍ना भादवक वादलमे बिजलोको छिटकैत आ चारू भर अवाजो होइत, तहि‍ना हँसेरीक बीचसँ रंग-बि‍‍रंगक बात अकासमे उड़ए लगल- “सि‍सौनीमे आगि लगा लंका जकाँ जरा देब!” “इज्‍जत-आबरू लूटि, गाममे आगि लगा देब!” “चौराहापर अपराधीकेँ आनि‍ मुँहपर थूक फेक‍‍ देहमे आगि लगा देब!” “सि‍सौनीक बहु-बेटीकेँ पकैड़‍ लऽ आएब!” क्रोधक चि‍नगारी उड़ि‍-उड़ि‍ फुलझड़ी जकाँ अकासमे चमकए लगल। मुदा ई सभ विचार बेकता-बेकती होइत सामूहि‍क नहि। ने कियो केकरो बात सुनैले तैयार आ ने अपन मुँह रोकैले। मुदा तैयो बुधि‍‍यार सभ रस्‍ता छोड़लैन नहि। घरमे लगल आगि मिझबैमे हाथ-पएर झड़ैकते छइ। गाममे सभसँ बेसी उमेरक मनधन बाबा। जहिना नब्‍बे माघक जाड़ कटने छैथ‍, तहिना अनेको झाँट, पाथर, शीतलहरी, बि‍हाड़ि आ भुमकम सेहो देख-भोगि‍ चुकल छैथ‍‍। गामक लोककेँ एकमुहरी देख बाँसक फराठी नेने टुघरल-टुघरल मनधनो बाबा पहुँचला। पाछुएसँ देखलखि‍न तँ मन मानि‍ गेलैन जे सि‍सौनी आ बँसपुराक बीच मारि‍ हेबे करत। ब्रह्माक बापो नै बँचा सकै छैथ‍‍। केमहर के मरत, केतेक हाँड़-पाँजर टुटत, तेकर कोनो ठेकान नै रहत..! विचारैत-वि‍चारैत दुनू आँखि‍सँ नोरक टघार चलए लगलैन‍। छाती छहों-छीत‍ भऽ गेलैन‍। बुकौर लागि‍ गेलैन‍। देहक हूबा टुटि‍ गेलैन‍। बोम फाड़ि कानए लगला। गंगोत्रीक गंगा जकाँ दुनू आँखि‍सँ अनघोल करैत अश्रु अर्ड़ाहट‍ मारैत मुँहक बोल आ थर-थर कँपैत छातीसँ बेकाबू मनधन बाबा भऽ गेला। जहि‍ना कोसीक धारक बीच मोइनमे पाछुक पानि‍क धारा आबि घुमए लगैत तहि‍ना मनधनक वि‍चार घुमए लगलैन‍। हूबा करि कऽ उठि‍ आगू-मुहेँ ससरए लगला। आगू पहुँच‍‍ रस्‍तापर फराठीसँ चेन्‍ह दैत पड़ि रहला। मन थि‍रे ने होइन। कखनो आँखि‍क सोझमे दू गामकेँ नष्‍ट होइत देखैथ तँ कखनो पुश्‍त-पुश्‍तानिक दुश्‍मनी सेहो होइत देखैथ! मन पड़लैन जुड़शीतल पावैन‍‍‍क घटना। एकटा नढ़ि‍याक खातीर बेला आ मैनही गामक शि‍कार खेलनि‍हारक बीच मारि‍ भेल। धमगज्‍जर‍ मारि‍। परि‍स्‍थि‍‍तियो अनुकूले पड़लै। पावैन‍‍‍ मनबए सभ लाठी, सोहत, तीर-धनुष लऽ लऽ शि‍कार खेलए गेले रहए। ने लोकक कमी आ ने मारि‍ करैक वस्‍तुक। मुद्दो तेहने भारी, एकटा मुइल नढ़ि‍या। मुदा प्रति‍ष्‍ठाक प्रश्‍न तँ गामक रहबे करइ। अही प्रति‍ष्‍ठा लऽ कऽ केतेको लोकक कपार फूटल, केतेकोकेँ हाथ-पएर टुटल आ दुनू दि‍स एक-एकटा खूनो भेल। कि‍यो केकरो देखैबला नै रहल। जे जेतइ से तेतइ कुहरैत रहए। केकरा के उठा कऽ लऽ जाइत आ इलाज करबैत। हो-ने-हो तहि‍ना कहीं आइयो ने हुअए! फेर, मनधन बाबाक मनमे उठलैन जे सभकेँ मनाही करी मुदा सुनत के? विचि‍त्र स्‍थि‍तमे मन ओनाए लगलैन‍। आँखि‍ उठबैथ‍ तँ देखथि‍न जे जे स्‍त्रीगण सभदि‍न सोझमे मुड़ी नै उठबै छल, आइ ओहो सभ बताहि‍ जकाँ साड़ीक भरकौंच बन्‍हने लाठी फरका रहली अछि‍! सबहक मन मारि‍ए-पर टँगल छै! केना उतरत? मुदा तरे-तर खुशियो होइत रहैन‍ जे नीक वस्‍तुक कीमतो बेसी होइए‍। गुन-धुनमे फँसल मनधन बाबाक मन अपन दायि‍त्‍वपर पड़लैन‍। मुदा ऐ हँसेरीक बोनमे दायि‍त्‍वक मोजर के देत? मुदा तैयो एक भाग फराठीकेँ पकैड़‍ दोसर भाग उठा इशारासँ सभकेँ शान्‍त होइले कहलखि‍न। मुदा सभ अपने ताले, बेताल! गामक जेते कुकुर जेतए रहए ओ बान्‍हक नि‍च्‍चाँ खेते-खेत भूकैत आगू पहुँच‍‍ गेल। छह-मसुआ बच्‍चा सभ चारि बेर‍ भुकै आ कनी काल सुसता लिअ...। मनधन बाबाक मनमे उठलैन जे बँसपुराक लड़कीक संग जे दुरबेवहार सिसौनीबला लुच्‍चा सभ केलक ओ गामक इज्‍जतक संग जुड़ल सवाल अछि। इज्‍जत-ले जान देब पुरुखक काज छी। एकरा अधला के कहत? सभकेँ अप्‍पन-अप्‍पन इज्‍जत-आबरू बनबैले, बना कऽ नि‍माहैले, कटए-मरए पड़तै। से जँ नै रहत तँ कखन केकर इज्‍जत के लूटि‍ लेत तेकर कोन ठेकान अछि। भदबरि‍या बेंग जकाँ साले-साल तेते लुच्‍चा-लम्‍पटक जन्‍म भऽ रहल अछि‍ जे गामे-गाम सोहरल जाइए‍!मुदा गामक भीतर तँ एहेन-एहेन किरदानी सदिकाल होइते रहैए‍। तहन कहाँ ‍कियो कि‍छु बजैए‍? तैकाल साला सभ कहत जे धुर्र छौड़ा-छौड़ीक खेल छी...। दुनू बात मनमे उठि‍ते मनधन बाबाकेँ मुहसँ हँसी फुटए लगलैन‍। मुदा गामक लोकक रूखि‍ हँसीकेँ दा‍बि देलकैन‍। सोचए लगला जे एक्के रंगक काज-ले एकठाम लोक कटए-मरए चाहैए‍ आ दोसर ठाम धि‍या-पुताक[1]  खेल बना उड़बैए‍!अजीब अछि‍ लोकोक बुधि-वि‍चार! जहि‍ना सदिकाल एक पुरुख दोसर महि‍लापर नजैर‍ उठबैत रहैए‍ मुदा अपन पत्नीकेँ दोसरक संग बजैत देख आगि-बबुला भऽ किछु-सँ-किछु करैले तैयार भऽ जाइए तहि‍ना ने अखनो भऽ रहल अछि। जइ घटनाकेँ सामूहि‍क रूपे इज्‍जत बूझल जाइए‍ ओइ‍ इज्‍जत‍क रक्षो तँ समूहेकेँ करए पड़तै। जँ खेल बूझत तँ खेल जकाँ बुझह नै जँ इज्‍जत बूझत तँ इज्‍जत जकाँ सुरक्षि‍त राखह। नै जँ गुल-गुल बुझि‍ दुनू करत तँ इज्‍जत-आबरूक बाते करब छोड़ह...। मन सक्कत हुअ लगलैन‍। रस्‍तापर फराठीक नोकसँ डाँरि‍‍ दैत कहलखि‍न- “ऐ‍ डाँरि‍सँ ‍जँ ‍कियो एक्को डेग पएर बढ़ेबऽ तँ एतै पराण गमा देब। नै तँ अखन सभ शान्‍त भऽ जाह।‍ नहाइयो-खाइ बेर‍ भेल जाइए‍। भानसो-भात सबहक बन्ने छह। तँए अखन जाइ जाह। खा-पी कऽ चारि‍ बजे बरहम स्‍थानक आगूमे बैस आगूक रस्‍ता बना लि‍हऽ।” मनधन बाबाक विचार सभ मानि‍ घरमुहाँ भेल। तत्खनात झंझट ठमैक‍‍ गेल। मुदा मनक धधरा मिझाएल नहि। जहि‍ना चेराक धधकैत आगि‍मे पानि‍ ढारलासँ धधरा पझा जाइए मुदा ताउ रहबे करै छै, तहि‍ना लोकोक मनक आगिमे भेल। छोट-छोट टुकड़ी बनि‍ सभ विदा भेल। मुदा रस्‍तामे सभ क्रोध बोकैरते रहए। सभकेँ डोरि‍याइत घर दि‍स जाइत देख मनधन बाबाक मन थीर भेलैन‍। घर दिस घुमि‍ते मनमे उठलैन जे जखन गामक लोकमे एते आगि लगल अछि‍ तखन दुनू परानी कुसुमलालकेँ केते लगल हेतइ! से नइ तँ ओकरा ऐठाम जा बोल-भरोस दऽ अबि‍ऐ। अपन अँगनाक रस्‍ता छोड़ि‍ मनधन बाबा कुसुमलालक ऐठाम पहुँचला। दुनू परानी कुसुमलाल दुखक अथाह समुद्रमे उगि‍-डुमि‍‍ रहल अछि। दुनू ‍निराश। आशाक केतौ दरस नहि। दुनूक चेहराक रंग मलीन भेल। मनमे बेर‍-बेर‍ उठैत जे ‍बिनु इज्‍जतक जि‍नगी जीब‍‍ नै जीब‍ दुनू बरबैर‍‍! दुनू बेकतीकेँ देख मनधन बाबा चुपचाप मेह जकाँ डेढ़ि‍यापर ठाढ़। ने कुसुमलाल किछु बजैत आ ने बाबा। मनमे होनि जे कुसुमलाल हमरे सोलहन्नी दोखी बुझैत हएत। जहि‍ना प्रेमक अन्‍तिम सीढ़ी बि‍आह छी, तहिना तँ क्रोधक खूनो छी। हो-ने-हो कोनो उझट बात कहि‍ दि‍अए...। फेर‍ मनमे एलैन जे आएले तँ छी बोले-भरोस दइले। जीबठ बान्‍हि‍ कहलखि‍न- “बौआ कुसुम! हमरा आगू तूँ बच्‍चा छह। तोरासँ बहुत बेसी ऐ दुनि‍याँक चक्कर-भक्कर देखने छी। मनकेँ थीर करह। जे भऽ गेल ओ तँ नै घुमत। मुदा तइले की करी, केते करी, ई सभ बुझए पड़तह। एहेन तँ नै ने जे सभ कियो ओही लगल पराण गमा देब। तूँ दुनू गोरे तँ बापे-माए छहुन। दुखी भेनाइ उचि‍ते छह। मुदा आइ की देखलहक? देखलहक किने जे समुच्‍चा गामक लोककेँ असीम दुख भेल छइ। ई विचार मनसँ हटाबह जे हम्‍मर इज्‍जत चलि‍ गेल। गरीब लोकक सभसँ पैघ दुश्‍मन ओकर गरीबी छि‍ऐ। गरीबी केवल अन्ने-पानि‍ धरि‍ नै होइए, जि‍नगीक सभ पहलु-ले होइए‍। गरीबीक बान्‍ह ओइ रूपे बन्‍हने अछि‍ जइमे गारि‍-फज्‍झैतसँ लऽ कऽ धन-सम्‍पैत‍, माए-बहि‍न‍क इज्‍जत लुटै धरि‍ अछि। तहन जँ कियो हँसी-खुशीसँ जीविये लइए‍ वएह एक लाख। बौआ, गरीबीक ताला लोहोक तालासँ नमहर आ सक्कत अछि। लोहाक तालामे एक्केटा मुँह आ दाँत होइ छै जइमे कुन्जी घुमौलासँ भक-दे खुजि‍ जाइए‍। मुदा गरीबीक जे ताला अछि‍ ओइ‍मे अनेको मुँह आ अनेको दाँत अछि। एकटा खोलबह दोसर लगि‍ जेतह। सोझे लगबे टा नै करतह, पहिलुकासँ केते गुना कस-कसा कऽ लगि‍ जेतह। तँए, जहि‍ना कोनो आमक गाछ साले-साल रौद, बर्खा, पानि‍-पाथर, बिहाड़ि‍ जाड़ सहि‍ नमहर भऽ फड़ैए‍ आ ओ फड़ मनुखसँ लऽ कऽ अनेको जीव-जन्‍तु धरि‍ बि‍लहैए‍ तहि‍ना मनुखोक जि‍नगी छी। जखने गरीब घरमे जन्‍म लेलह तखने बुझि‍ जाहक जे आँखि‍ देखैले नै कनैले अछि, गारि‍ सुनैले कान अछि आ मारि‍ खाइले देह अछि। गरीबक आँखिमे जेते इजोत बढ़ैए तेते नोरक समुद्र दि‍स‍‍ जाइए आ जेते समुद्रक लग पहुँचैए तेते नोरक टघार अनवरतताक रूपमे बदलैए जइसँ अनवरत टघरैत रहैए! तोहर दुख समाजक दुख बनि‍ गेल अछि। समाज ओहन कारखाना छी जइमे देवतासँ लऽ कऽ छुतहर धरि‍ बनैए। तँए, ने केकरो कहने केकरो इज्‍जत अबैए‍ आ ने जाइए‍। लोककेँ अपने केने होइ छै आ गमौने जाइ छै...।” मनधन बाबाक बात सुनैत-सुनैत पवि‍त्री बोम फारि कानए लगली हुचैक‍-हुचैक बजली- “बाबा, ई तँ गामक मेह छथि‍न तँए हिनकर बात मानि‍ लेलि‍ऐन‍। नै तँ आइ सि‍सौनीमे आगि लगौने बिना नै छोड़ि‍ति‍ऐ। जखनसँ बेटी आएल‍‍ तखनसँ एक्को बेर‍ मुँह उठा नै तकैए। कनैत-कनैत दुनू आँखि‍ डोका जकाँ भऽ गेल छइ। सदि‍खन एक्केटा रट लगेने अछि जे जीविये कऽ की हएत। जखन इज्‍जत चलिए गेल तखन कोन मुँह समाजकेँ देखाएब।” पवि‍त्रीक बात सुनि मनधन बाबाक हृदए छँहोछीत भऽ गेलैन‍। आँखि‍मे नोर ढबढबा गेलैन‍। दुनू हाथसँ आँखि‍ पोछि‍ बजला- “कनि‍याँ, जेकरा अहाँ इज्‍जत जाएब बुझै छि‍ऐ ओ जाएब नै छी, जोर-जबरदस्‍ती छिऐ। जोर-जबरदस्‍ती मुँहक कहलासँ नै मेटाइ छइ। ओकरा शक्‍ति‍सँ रोकए पड़ै छइ। गरीबक बीच ओहन शक्‍ति‍ अखन नै भेल अछि, जखन हएत स्‍वत: रूकि जाएत। अखन जोर-जबरदस्‍ती केनिहार बलगर अछि‍ तँए सूझि‍-बूझिसँ चलए पड़त। इलाकामे कोन गाम एहेन अछि जइ गाममे एहेन-एहेन किरदानी नै होइ छइ। सभसँ पहि‍ने गरीबकेँ अपना पैरपर ठाढ़ हुअ पड़तै। जखन ओ ठाढ़ भऽ संगठि‍त हएत तखन शोषक संगे, जबरदस्‍ती केनिहारक संगे संघर्ष होएत। संघर्षोसँ समाज बदलैए समाज बदलने सभ किछु बदैल‍ जाइए तँए कानू-खीजू नहि। समाजक संग पएर-मे-पएर मिला कऽ चलू।” कहि‍ विदा भऽ गेला। घर दि‍सक बाट तँ मनधन बाबा धऽ लेलैन मुदा डेग उठबे ने करैन‍। तैयो बलजोरी बढ़ला। फराठी हाथे कहुना-कहुना कऽ घरपर आबि गेला मुदा देहमे आगि लगले रहलैन। जइसँ विचार ओझरा गेलैन‍। धरती-पहाड़क दूरी देख सोचैथ‍‍ जे कोनो आँगुर कटने अपने घा हएत। भलेँ अखन धरि ई घटना छौड़ा-छौड़ीक खेल बूझल जाइ छल मुदा आइ सही रस्‍तापर आबए चाहैए‍। तँए घटनाकेँ रोकब उचि‍त नै हएत। फेर मनमे उठलैन जे दू गामक बीचक घटना छी। एक गामक रहैत तँ कनी हल्‍लुको रहैत मुदा दू गामक बीच एहेन घटनाकेँ केते नमहर मानल जाए? मुदा छोड़नाइयो तँ उचि‍त नहि। अदौसँ पहाड़ी धार जकाँ नि‍च्‍चाँ-मुहेँ बहैत आएल अछि‍, जेकरा रोकनाइयो जरूरी अछि। जँ से नइ हएत तँ वैश्वीकरणक बि‍र्ड़ोमे उड़ि‍ कऽ अकास ठेक जाएत। मुदा जइ रूपे घटनाक जवाब बढ़ए चाहैए‍ ओ तँ आरो विनाशक अछि। जहि‍ना ऐ गामक लोक समाजि‍क प्रति‍ष्‍ठा बना कटै-मरैले तैयार अछि‍ तहि‍ना जँ कहीं सिसौनीबला सभ गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझि‍ ठाढ़ भऽ जाएत, तहन की हएत? ठाढ़ो होइक केते कारण भऽ सकैए‍। ओना सार्वजनि‍क स्‍थानक घटना होइतो गाम आबि लड़की बाजल। जेकरा गौंआँ मानि‍ रहल अछि। मुदा सही घटना रहि‍तो सिसौनीबला मानियेँ लेत सेहो जरूरी नै अछि। एक गाम दोसर गामपर बलजोरी केते काल कऽ सकैए‍? मनधन बाबाकेँ कोनो बाटे नै सुझनि‍। दू गामक बीच तँ विचारेसँ रोकल जा सकैए‍। मुदा जँ एहेन घटना रोकल नै जाएत तँ सार्वजनि‍क स्‍थानक महत्ते केते दि‍न टिकत? भुँइयेँमे दलानक ओसारपर कर बदैलते मनमे एलैन जे एहेन घटना समाजि‍क स्‍तरपर रोकब नीक हएत। मन असथि‍र भेलैन‍। बेरुका बैसारमे जाइ आकि नहि? मुदा बाजल तँ हमहीं छी। फेर‍ मनमे एलैन, चारि‍ बजे सौंसे गौंआँकेँ बैस कऽ विचार करैले कहलि‍ऐ आकि ई कहलि‍ऐ जे तोरा सभकेँ विचार सुना देबह। दस मिलि‍ करी काज, हारने-जीतने कोनो ने लाज। पाकल आम भेलौं, कखन छी कखन नै छी। ईहो कोनो जरूरी नै अछि‍ जे हम्‍मर विचार सभकेँ सोहेबे करइ। जँ नै सोहेतै तहन तँ औरो मनमे दुख हएत। तहूमे मूलत: ई घटना महि‍लाक छी। जे पुरुख हजारो बर्खसँ एहेन अपराध करैत आएल अछि‍ ओ सुहरदे-मुहेँ मानि‍ लेत? आन गामक घटना कहीं गामे दिस ने चलि‍ आबए। अखनो धरि‍ समाजमे एहेन कि‍रदानीकेँ लोक हँसीए-चौल बुझैए‍। फेर‍ मनमे उठलैन‍, अपनो तँ आब बलजोरीए जीब‍ रहल छी, नै तँ अपन बतारी कएकटा गाममे अछि। तँए कि समाजसँ हटि‍ जाइ? जँ हटब तँ मुइला पछाइत‍‍ डाहैले के औत? ओना, से देखबो करैले तँ नै आएब। अपनो परि‍वारमे देखै छी जे सि‍नेमा कलाकार आ खेलाड़ी सबहक कुल-खुटक नाओं जनैए‍ आ अपना कुल-खुटक जनि‍ते‍ ने अछि। एहेन तँ गँरिबहू गाम अछि‍! केकरा कहबै, स्‍त्रीगणो सभ तेहेन-तेहेन आबि गेल‍ अछि जे पुरुख सभकेँ गारि पढ़ि‍-पढ़ि‍ कहैए‍ जेहने छुतहर कुल-खुट रहत‍ह तेहने ने चालि‍ रहतह! आब कहू जे कुल-खुटक केन दोख छइ। नान्‍हि‍-नान्‍हि‍टा छौड़ा शि‍खर-पराग खाए लगल अछि‍, ऐमे केकर दोख? जीबैतमे एहेन-एहेन लीला देखै छी आ परोछ भेलापर हीरा सजौल मन्‍दिर बना देत? तैबीच पोती आबि कऽ टोकलकैन- “खाइले चलू ने बाबा? नहेबै नहि?” केचुआएल साँप जकाँ बाबा कहलखि‍न- “चलै-फीड़ैक होश नै अछि अहीठाम नेने आबह। पहि‍ने एक लोटा पानि‍ नेने आबह। कनी मुँह-हाथ धोइ लेब।” जहि‍ना गदगरल मन रहने खाइक इच्‍छा नै होइत तहि‍ना मनधनो बाबाकेँ बुझि‍ पड़ैन‍। मुदा तैयो जी-जाँति‍ कऽ खाए लगला। लाभर-जिभर चारि‍ कौर खा लोटो भरि‍ पानि‍ पीब‍ पोतीकेँ कहलखिन- “अन्न नै धँसैए‍। लऽ जाह।” हाथ मुँह धोइ मनधन बाबा चौकीपर ओंधरा गेला। मुदा जहि‍ना ज्‍वर-एलासँ कछमछी अबैए तहि‍ना चौकीपर एक करसँ दोसर कर घुमैथ‍। बेर टगल देख मनधन बाबा उठि‍ कऽ फराठी हाथे बरहम स्‍थान दि‍स‍‍ विदा भेला। तीनियेँ बजेसँ एका-एकी लोक बरहम स्‍थान पहुँचए लगल। चारि‍ बजेसँ पहि‍नहि‍ गामक लोक एकत्रि‍त भऽ गेल। मुदा एकटा नव घटना सेहो भेल। ओ ई भेल जे गाममे आइ धरि‍ कोनो पनचैती वा सार्वजनि‍क काजमे महि‍ला भाग नै लइ छेली से आइ‍ घरा-घरी सभ पहुँच‍‍ गेली। ओना आइ धरि‍ हुनका सभकेँ कहलो नै जाइ छेलैन‍। मुदा जखन सबहक बीच माने पुरुख-महि‍लाक बीच समए नि‍र्धारि‍त भेल तखन हुनको सभकेँ हौसला जगलैन‍। हौसला जगि‍ते टाट-फरकक परदा तोड़ि‍ घरसँ नि‍‍कैल‍‍ तीत-मीठक सुआद लइले नि‍कलली। अखन धरि‍ जे बुधि-वि‍चारक गाछ माटि‍क तर बीज रूपमे पड़ल छेलैन ओ एकाएक अँकुर गेलैन‍। नजैर नचलैन तँ देखली‍ जे अदौसँ आइ धरि‍ महि‍ला पुरुखक चारागाह छोड़ि‍ आर किछु नै रहली! जबकि बुधि-वि‍वेक आ हाथ-पएर तँ हमरो सभकेँ अछि। केवल नीन तोड़ि जगैक जरूरत‍ अछि। चरैत-चरैत पुरुख महि‍लाक सम्‍पूर्ण जिनगीकेँ, पाण्‍डु रोगी जकाँ नि‍रस बना देने अछि! बि‍आहसँ पूर्व शिक्षा-विहिन बच्‍चा जि‍नगी आ बि‍आहक पाँचे दि‍नक पछाइत‍ समाजक कलंकित वि‍धवाक जि‍नगी! जहि‍ना सामूहि‍क हत्‍याराकेँ जहलमे यातना भेटैत तहि‍ना महि‍लाक संग भेल अछि‍..! मुदा आइ बँसपुरामे नव सुरूजक उदय भेल। बैसारमे पुरुख-नारी तँ पहुँचली मुदा एक-संग नै बैस फूट-फूट बैसली। एक भाग पुरुख आ दोसर भाग महि‍ला। बिनु अनुशासक बैसार तँए दुनू बैसारमे सभ अपन-अपन पेटक बात बोकरए लगल जइसँ दुनू दिस अनधोल हुअ लगल। कियो केकरो बात सुनैले तैयार नहि। सभ अपने बजैमे बेहाल। मुदा पेटक बात सठि‍ते सभ पोखैरक पानि‍ जकाँ शान्‍त भऽ गेल। कातमे बैसल मनधन बाबा समाजक रूखि‍ चुपचाप अँकैत रहैथ‍‍। सभकेँ चानि‍पर पसेनाक टघार देखैथ‍। जइसँ बुझि‍ पड़लैन जे भीतरक गरमी नि‍‍कैल‍‍ रहल छैन‍‍‍। समस्‍याकेँ दू ढंगसँ समाधान करब सोचि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत मनधन बाबा बजला- “अनकर घेघ देखैसँ पहि‍ने अपन देखू। जँ से नइ देखब तँ ओहन दशा हएत जेहेन हँसि‍ कऽ बजलासँ गम्‍भीर वि‍चारक होइत। सभसँ जरूरी अछि‍ गामक बीच जे एहेन-एहेन कुचालि‍ सभ चलि‍ रहल अछि,‍ ओकरा बन्न करए पड़त। जँ से नइ करब, तँ आइ ओहन लकड़ीमे आगि धऽ लेलक जे एक गामक कोन बात जे साइयो गामकेँ जरौत। औझुका सूमा जे देख रहल छी ओ पुरुखसँ कम महि‍लामे नै अछि। तँए दू बैसारकेँ एक बनाउ।” एक बैसार सुनि‍ दुनू दि‍स‍ गल्‍ल-गुल्‍ल शुरू भेल। दू तरहक विचार दुनू दि‍स टकराए लगल। टकराहट‍ देख केते पुरुख उठि‍ कऽ वि‍दा हुअ लगला। मुदा बाबाक बात महि‍ला सभ मानि‍ अपन बैसार उसारि‍ पुरुखेक बैसारमे बैस चिकैर-चि‍कैर बाजए लगली- “बाबा, अहाँक पीठपर हम सभ तैयार छी, उठि‍ कऽ निर्णए दि‍यौ।” महि‍लाक अवाज सुनि‍ बाबाकेँ भेलैन जे ई अवाज शरीरक नै शरीरी[2]क छी। हृदैसँ सभ कल्‍याण चाहि‍ रहल छैथ‍‍। एकरा रोकब तँ असम्‍भव अछि मुदा मोड़ल जा सकैए‍...। एक तँ बुढ़ाड़ी दोसर मनमे आगि लगल, मनधन बाबा थर-थर कँपैत फराठी बले उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत बजला- “बाउ, हमरा आगू सभ बच्‍चे छह। जहन बच्‍चा बौआ आ बुच्‍ची बनैत तहि‍ए-सँ दूजा-भाव शुरू भऽ जाइए‍। मुदा हम सभकेँ बच्‍चे बुझै छिअ तँए कहै छिअ जे अपन कल्‍याणक बाट सभ पकैड़‍ चलह। अखन जइ घटना, जइ समस्‍या दुआरे सभ एकठाम भेल छी, ओ मात्र दू बेकतीक बीचक नै दू समाजक बीचक छी। दू बेकतीक बीचक जँ रहैत तँ ओकरा छोट मानल जाइत मुदा दू गामक समस्‍याकेँ छोट मानब गलत आँकब हएत। ई ओहन अछि‍ जे एक-सँ-अनेक रूपमे पसैर जाएत। जहि‍ना तूँ सभ कहै छहक जे सि‍सौनीमे आगि लगा देब, मारब, बेइज्‍जत करब तहि‍ना तँ ओहो सभ करतह। तहूँ सभ मारबहक ओहो सभ मारतह। तहूँ कपार फोड़बहक ओहो सभ फोड़तह। अखन ने बुझि‍ पड़ै छह जे सोलहन्नी हमहीं सभ मारबै आ ओ सभ मारि‍ खाएत। मुदा से केतौ देखलहक हेन। दुनू दि‍सक लोक मारबो करैए आ मारियो खाइए।” मनधन बाबाक वि‍चार सुनि‍ सभ मुड़ी डोला-डोला सोचए लगल। एक दोसर दि‍स तकबो करैत आ नजैर निच्‍चोँ कऽ लइत। सबहक मनमे मारि‍क गम्‍भीरता नाचए लगल। मुदा तैयो मनक गरमी पूर्ण शान्‍त नै भेलइ। वि‍चार गजपटाए लगलै। कखनो शान्‍तीक रस्‍ता मनमे जोर पकड़ै तँ कखनो उनैट‍ कऽ मारि‍-दंगाक रस्‍ता पकैड़‍ लइ। जे चढ़ैत-उतरैत वि‍चार मुँहक रूखि‍सँ साफ बुझि‍ पड़इ। लोकक रूखि‍ देख बाबा फेर ठाढ़ होइत बजला- “गामेमे देखै छहक जे कनी हूबगर अछि‍ ओ मुँहदुबराक संग केहेन बेवहार करैए? भलेँ अप्‍पन जातिए, दि‍यादे किएक ने होइ..!” बीचमे कनी काल चुप भऽ मनधन बाबा आगू बजला- “भीतरसँ अप्‍पन गाम फोंक छह। देखते छहक जे सभ अपन-अपन नून-रोटीमे दि‍न-राति‍ लगल रहैए‍। ने अपना पेटसँ छुट्टी होइ छै आ ने दोसराक आकि समाजक कोनो चि‍न्‍ता छइ। समाज की छि‍ऐ से लोक बुझबे ने करैए‍। अपने पेटक खाति‍र बेइमानी-शैतानी, चोरी-डकैती सभ करैए‍। सभ मिलि‍ समाजकेँ परि‍वार जकाँ ठाढ़ कऽ काज करी, से केकरो मनमे छैहे नहि। ओना सि‍सौनियो सएह अछि मुदा तैयो तँ अपना गामसँ कनी नि‍स्‍सन ऐछे। कम-सँ-कम तँ सभ मि‍लि‍ दुर्गा-पूजा तँ कइए लइए जखने दस-पनरह दि‍न सभ एकठाम भऽ एक काजक पाछू लगैए‍, तखने ने अपनामे गप-सप्‍प भेने साल भरि‍क छोट-छोट झगड़ा मेटाइए‍, जइसँ सामुहिक बल बढ़ै छइ। तँए समाजकेँ आगू बढ़बैले दसगरदा काज जरूरी अछि। जाधैर‍ लोकक मनमे दसनामा काजक प्रति‍ झुकाउ नै हेतै ताधैर‍ समाज आगू-मुहेँ केना ससरत? ऐ नजैरसँ देखबहक तँ बुझि‍ पड़तह जे अपना गामसँ थोड़े आगू सि‍सौनी बढ़ल अछि। सिसौनियोसँ आगू पछबारि‍ गाम ‘बरहरबा’ अछि। देखते छहक जे ओइ‍ गाममे दुर्गो-पूजा होइए‍ आ पढ़ै-लि‍खैले हाइयो स्‍कूल छइ। बरहरबोसँ अगुआएल दछि‍नबरि‍या गाम ‘कटहरबा’ अछि। कटहरबामे हाइयो स्‍कूल छै‍, अस्‍पतालो छै आ सालमे एक-बेर‍ सभ मिलि‍ चारि‍ दि‍नक मेला कालियो-पूजा लगा लइए‍। जइ गाममे जेते सार्वजनि‍क काज हएत ओ गाम ओते तेजीसँ आगू बढ़त। गाम अगुआइक माने संस्‍थे बनि‍ जाएब आ पूजे हएब नै बल्‍कि‍ आचार-वि‍चार-बेवहार-चालि‍-ढालि‍ सभ किछु बदलब होइत। जाधैर‍ कोनो गाम पछुआएल रहैए‍ ताधैर‍ ओइ‍‍ गाममे सदि‍खन राँड़ी-बेटखौकी, मारि‍-मरौबैल‍, हल्‍ला-फसाद होइते रहैए‍। जाधैर‍‍ लोक झूठ-फूस‍ बजैत रहत, छोट-छीन बात लऽ कऽ लड़ैत-झगड़ैत रहत, ताधैर‍‍ ओकर समैक कोनो मोल नै हएत। जखने मूल्‍यहीन जि‍नगी चलैत रहत तखने श्रमक कोनो महत नै रहत। जे श्रम सार छी, मनुखक पूजी छी ओ धूरा-गर्दा जकाँ उड़ैत रहत! भाग्‍य-तकदीर बनौनि‍हार चानी कटैत रहत। जइसँ लोकक कमाइ लूटाइत रहत आ आँखि‍केँ सदिकाल नोर दबने रहतै! जेकर आँखि नोरसँ झाँपल रहत ओ दुनि‍याकेँ केना देख सकत?” मनधन बाबा बजि‍ते रहैथ‍ कि सुननि‍हारक बीच गल-गुल शुरू भेल। लोकक गल-गुलसँ मनधन बाबाकेँ दुख नै भेलैन‍, खुशीए भेलैन‍। मनमे उठलैन जे भरि‍सक लोकक परती बुधिमे जोत-कोर भऽ रहल छइ। नजैर‍ खि‍रा-खि‍रा मरदो दि‍स‍‍ आ जनीजा‍तियो दि‍स देखए लगला। बैसले-बैसल जोगि‍न्‍दर जोरसँ बाजल- “दुर्गा-पूजा तँ आब पौरुकाँ हएत मुदा कालीपूजा तँ लगि‍चाएल अछि। तँए हम सभ आइए संकल्‍प लऽ ली जे हमहूँ सभ काली-पूजा गाममे करब।” जोगि‍न्‍दरक बातपर सभ थोपड़ी बजा समर्थन दऽ देलक। अही प्रति‍क्रि‍याक फल छी गाममे काली-पूजा। ओना रौदि‍याह समए भेने गामक किसानो आ बोनि‍हारोक दशा दयनीय अछि मुदा सि‍सौनीक घटना तेना उत्‍साहि‍त कऽ देलक जे सभ बिसैर गेल। उत्‍साहि‍त भऽ बोनि‍हारो सभ एकावन-एकावन रूपैआ चन्‍दाक घोषणा कऽ देलक। बोनि‍हारक उत्‍साह किसानकेँ झकझोड़ि‍ देलक। प्रति‍ष्‍ठाक प्रश्‍न सामनेमे उठि‍ गेलइ। तैपर सँ परदेसिया आरो रंग चढ़ा देलक। जेना एक दुखकेँ दबैले अनेको दबाइ आ पथ्‍य सामने आबि गेलइ। समाजक संग मिलि‍ चलैक अछि,‍ तँए बेकती‍गत दुखकेँ दाबए पड़त। सार्वजनि‍क काजमे पाछुओ हटब उचि‍त नहि। गामक बहु-बेटी आन गाम मेला देखए जाइत रहल, ओइ प्रति‍ष्‍ठाकेँ प्राप्‍त करब। सभसँ पैघ बात बदला लेबाक रस्‍ता बनि‍ रहल अछि। हमरा गामक लोककेँ जँ आन गामक लोक बेइज्‍जत करत तँ ओहू गामक लोककेँ हमसभ करबै। जइसँ आन गामक बरबैरमे‍ अपनो गाम औत। उत्‍साहि‍त भऽ प्रेमलाल उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ जोर-जोरसँ बाजए लगल- “भाय लोकैन‍! अपना गामक भाए-बहि‍न आन गामक मेलामे जा बेइज्‍जत होइए‍। एकर की कारण छइ? कारण छै जे अपना गाममे कोनो तेहेन सार्वजनि‍क काजे ने होइए‍। जखने अपनो सभ तेहेन काज करब तँ अनेरे आन गाम बलाकेँ दहसैत‍‍ हेतइ। वएह दहसैत‍ गामकेँ उजागर करत, प्रति‍ष्‍ठि‍त बनौत। गोसाँइ जी रामायणमे कहने छैथ‍‍, बिनु भय होइ न पीरिति‍।” प्रेमलालक मुँह तँ बन्न भऽ गेल मुदा बजैले मन लुसफुसाइते रहलै। मुदा, आगूक बात मनमे एबे नै करै आ बजले बात दोहरौनाइ उचि‍त नै बुझि‍, बैस रहल। प्रेमलालकेँ बैसते फेर‍ गल-गुल हुअ लगल। गल-गुल एते बढ़ि‍ गेलै जे जहि‍ना सौजनि‍याँ भोजमे होइत तहि‍ना भऽ गेल। गल-गुल देख अनुप उठि‍ कऽ हाथक इशारासँ शान्‍त करैत गरमा कऽ बाजल- “देखू, गल-गुल केने किछु ने हएत। सि‍सौनीबला सभकेँ एते गरमी किए चढ़ल रहै छै से बुझै छि‍ऐ? ओ सभ दस हजार रूपैआ खर्च कऽ कऽ दुर्गा-पूजा कए लइए‍! तँए ओकरा सबहक गरमी हेट करैक अछि। तँए हम सभ पचास हजार रूपैआ काली-पूजामे खर्च करब। जँ सबैया-डेढ़ा खर्च कऽ पूजा करब तँ ओ सभ मद्दि‍यो ने देत। तँए समधानि‍ कऽ हरदा बजबैक अछि। अखने पूजा कमि‍टी बना लिअ। ओना अखन बीस-बाइस दि‍न काली-पूजाक अछि। मुदा अखनेसँ गाम-सँ-आन गाम धरि‍ माहौल बनबैक अछि। पूजा समि‍ति‍मे सभ टोल आ सभ जाति‍क सदस्‍य बनाउ। जँ सभ टोल आ सभ जाति‍क सदस्‍य नै बनाएब तँ अनेरे अखनेसँ अनोन-बि‍सनोन शुरू भऽ जाएत। तेतबे नहि, सभ जाति‍क सदस्‍य बनौने काजो असान हएत। सभ अपन-अपन लूरि-बुधिसँ सहयोग करत।” अनुपक वि‍चारसँ सभ सहमति‍ भेला। समि‍ति‍ बनए लगल। सभ मिला एक्केस गोरेक समि‍ति‍ बनल जइमे पाँच महि‍ला। एक्कैसो गोरे उठि‍ कऽ ठाढ़ भेला तँ एक दि‍व्‍य स्‍वरूप चमकल। सभ नौजवान। एक्कैसोक मनमे खुशी जे समाजि‍क क्षेत्रमे आगू बढ़ि‍ रहल छी। समि‍ति‍क सदस्‍य एक भाग आ गौंआँ दोसर भागमे बैस वि‍चार आगू बढ़ौलैन‍। समि‍ति‍क संचालन-ले पदाधि‍कारीक जरूरत‍ होइत। कमसँ कम अध्‍यक्ष, उपाध्‍यक्ष आ कोषाध्‍यक्षक जरूरत‍ हेबे करैत। मुदा अध्‍यक्ष के बनत‍?गम्‍भीर प्रश्‍न। सभ सबहक मुँह देखए लगला। केकरो अनुभव नहि। ओना समि‍ति‍क अधि‍कांश सदस्‍यकेँ अध्‍यक्ष बनैक इच्‍छा मुदा अनुभव नै रहने डरो होइत। सभकेँ चुप देख रघुनाथ अपन पि‍ति‍यौत भाय देवनाथक नाओं अध्‍यक्ष-ले प्रस्‍ताव केलक। देवनाथक परि‍वार गाम भरिमे जा‍तियो आ पूजियोमे सभसँ बीस। देवनाथक नाओं सुनि‍ अधि‍कांश सदस्‍य धकमकए लगल। विरोधमे दोसर किनको नाओं नै सुनि‍ मंगल अपन नामक प्रस्‍ताव अपने केलैन। दू गोरेक नाओं अबि‍ते बैसारमे गुन-गुनी शुरू भेल। धनो आ जा‍‍तियोमे मंगल देवनाथसँ पछुआएल। मुदा जेहने बजैमे फरकोर तेहने इमानदार आ बी.ए. पास सेहो। जे सभ बुझैत। देवनाथ आ मंगल संगे-संग बी.ए. पास केने रहए। ओना पढ़ैमे मंगल चन्‍सगर मुदा रि‍जल्‍ट देवनाथक नीक रहलै। तेकर कारण रहै जे देवनाथ धुड़फन्‍दा शुरूहेसँ रहए। मंगलक नाओं सुनि‍ देवनाथो आ रघुनाथो आँखि‍क इशारासँ गप-सप्‍प करए लगल। कनीए कालक पछाइत‍‍ मंगलकेँ पलौसी दैत रघुनाथ बाजल- “भैया, हमरा लिये जेहने अहाँ तेहने भैया छैथ‍‍। अहूँ दुनू गोरे संगीए छी। आग्रह करब जे देवनाथ भैयाकेँ अध्‍यक्ष आ अहाँ उपाध्‍यक्ष बनि‍ काज चलाबी।” मंगलक मनमे केवल पूजे समि‍ति‍ चलाएब नहि, समाजकेँ आगू बढ़बैक वि‍चार सेहो। बच्‍चेसँ देवनाथक चालि‍-ढालि‍ मंगल देखैत आएल। मुदा समाज तँ पोखैर‍क पानि‍ सदृश होइए‍। जइमे हवा-बि‍हाड़िक लहैर सेहो उठैए आ लगले असथि‍र भऽ शान्‍त सेहो भऽ जाइए‍। मंगलक मनमे देवनाथक प्रति‍ एकटा आरो बात घुरि‍याइत रहैन। ओ ई जे एक दि‍न, करीब चारि‍ साल पहि‍ने एकटा गामेक लड़कीक संग छेड़खानी करैत देवनाथकेँ मंगल पकड़ने छला। हाटसँ अबैत मंगलकेँ देख ओ लड़की फफैक‍-फफैक‍ कानए लगल‍। साइि‍कल ठाढ़ कऽ सभ बात सुनलैन। तामसे बेकाबू भऽ गेला। देवनाथकेँ बिनु किछु पुछनहि‍ चारि‍-पाँच चाट मुँहमे लगा देलखिन। क्रोधो कमलैन। मुदा डरसँ देवनाथ थर-थर काँपए लगल। मंगल देवनाथकेँ कहलखिन- “बच्‍चा, अखन धरि‍क संगी छेलेँ तँए छोड़ि‍ दइ छि‍यौ। नै तँ समाजक बेटीक संग एहेन बेवहार करैबलाकेँ जि‍नगी भरि‍क पाठ पढ़ा दैति‍ऐ।” दुनू हाथ जोड़ि‍ देवनाथ, न्‍यायालयक अपराधी जकाँ मंगलक आगूमे ठाढ़ भऽ गेला। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍तमे मंगल उलैझ गेला। मनमे क्रोध आ दयाक बीच घि‍च्‍चम-घि‍च्‍चा हुअ लगलैन। कखनो दया दि‍स मन ससरैत रहैन तँ कखनो क्रोध दि‍स बढ़ि‍ जाइत रहैन। मनकेँ असथि‍र करैत कहलखिन- “अखन धरि‍क संगी होइक नाते छोड़ि‍ रहल छि‍यौ। नै... तँ...। कान पकैड़‍ कऽ बाज जे एहेन गलती फेर‍ केकरो संग नै करब! जाधैर‍‍ कोनो लड़कीकेँ बि‍आह-दुरागमन नै होइत ताधैर‍‍ माए-बापक सन्‍तान बूझल जाइत मुदा सासुर जाइते गामवाली माने गामक बेटी बनि‍ जाइए‍।” यएह बात मंगलक मनमे घुरि‍याइत रहैन। रघुनाथक बात सुनि‍ मंगल जवाब देलखिन- “बौआ रघू, दसगरदा काजक शुरुआत गाममे भऽ रहल अछि। मुदा समाज तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ छि‍ड़ियाएल अछि। तँए जरूरत‍ अछि‍ जे एक-एक टुकड़ीकेँ ओरि‍या-ओरि‍या पकैड़‍‍ दोसरमे सटबैक अछि। से जाधैर‍‍ नै हएत ताधैर‍‍ कोनो सार्वजनि‍क काज सफल हएब सन्‍दिग्ध बनल रहत। खण्‍डित भऽ जाएत। देखते छहक जे कोनो भोज होइ छै तँ दस कोस, पनरह कोससँ पंच आबि-आबि खाइए‍ मुदा भोजैतक घर लगहक परि‍वार भूखले रहैए‍। एहेन अन्‍यायी समाजमे न्‍याय कहि‍या औत आ के आनत? अखन जे समाजि‍क ढाँचा बनि‍ ठाढ़ अछि, ओ गँरि-मुराह अछि। जहि‍ना कोनो बोझ गँरि‍-मुराह भेने कखन माथपर सँ खसि‍ छि‍ड़ि‍या जाएत तेकर कोनो ठेकान नहि, तहि‍ना समाजोक अछि। तँए बोझे जकाँ समतुल्‍यपर बान्‍ह पड़ैक चाही। जइसँ कहि‍यो छि‍ड़ियेबाक शंका नै रहत। दसनामा काजमे समाजक बच्‍चा-बच्‍चाकेँ बरबैरक हिस्‍सा भेटक चाही। मुइल-टुटल कि‍यो किएक ने हुअए मुदा ओकरा मनसँ ई वि‍चार नि‍‍कैल‍‍ जेबा चाही जे ई काज हमर नै फल्‍लाँक छि‍ऐ। हम सोझे करैबला छी करबैबला नहि। केकरो बाप-पुरखा हर जोतैत आएल अछि‍, अखनो जोतैए‍ आ आगुओ जोतैत रहत। जँ से नइ जोतत तँ खेती केना हएत? मुदा ओहो समाजक ओहने अंग छी जहि‍ना पढ़ि‍-लि‍खि‍ कि‍यो करैए‍। अखन गामक सभ बैसल छी तँए पूजा-प्रकरणक सभ नि‍र्णए सबहक बीच भऽ जाए। सि‍सौनीमे अखनो देखै छी जे दुर्गास्‍थानमे सबहक पहुँच‍ नै अछि।‍” मंगलक बात सुनि‍ सभ स्‍तब्‍ध भऽ गेला। मनमे उठा-पटक हुअ लगलैन‍। ओना बहुतोक बुधिमे सभ बात अँटबो ने कएल मुदा जेतबे अँटल ओ आगिक लुत्ती जकाँ चमकए लगल। बेवहारि‍क जि‍नगी आ वास्‍तवि‍क जि‍नगीक बीचक दूरी बहुत बेसी भऽ गेल अछि। बेवहारिक जि‍नगीकेँ वास्‍तवि‍क जि‍नगी दि‍स‍‍ झुकौने चलए पड़त। जँ से नइ हएत तँ सदि‍खन चलैक रस्‍ता गजपट होइते रहत। परोछमे उचि‍त बात बजनि‍हारक कमी नै मुदा सोझहा-सोझही बजनि‍हार कि‍यो नहि! तेकरो केतेको कारण अछि...। गुन-गुन, फूस-फूस होइत देख मंगल बुझि‍ गेला। मनमे उठलैन बुद्धदेवक ओ बात जइमे कहने छैथ‍‍ जे वीणाक तारकेँ ओते ने कसि दिऐ जे टुटि जाए, आ ने ओते ढीले रहए दिऐ जे अवाजे ने नि‍कलै...। मंगल बजला- “अध्‍यक्ष पदसँ हम अपन नाओं आपस लइ छी। देवनाथे अध्‍यक्ष होथि‍। मुदा अखनसँ लऽ कऽ जखन तक‍ पूजाक प्रकरण चलैत रहत ताधैर‍‍ सभ काजक नि‍र्णए, समि‍ति‍क बीच हुअए।‍” मंगलक बात सुनि‍ देवनाथ सेहो ठाढ़ होइत बजला- “जि‍नगीमे पहि‍ल-पहि‍ल दि‍न समाजक काज करैक मौका भेट रहल अछि‍ तँए मनमे असीम खुशी अछि। सभ तँ अनाड़ी‍ए छी, जइसँ बिनु बुझलो केतेक गलती भऽ सकैए‍। मुदा ओइ‍‍ सभकेँ भुल-चुक मानि‍ सम्‍हारैक उपाय हेबा चाही। अखन सभ कियो छी तँए मुख्‍य-मुख्‍य काजक नि‍र्णए अखने भऽ जाए। ओना अखन दि‍नगर अछि‍ मुदा सबहक नजैरमे रहब बढ़ि‍याँ रहत।‍” देवनाथक विचार सुनि‍ सबहक मुहसँ नि‍कलल- “बहुत बढ़ि‍याँ, बहुत बढ़ि‍याँ।” कहि‍ समर्थन देलक। नि‍र्णए भेल- (१) गामेक कारीगर माने मूर्ति बनौनि‍हार मूर्ति बनबए। ओना एक-पर-एक कारीगर दुनि‍याँमे अछि‍ मुदा पूजाक मूर्तिमे कला नै देवी-देवताक स्‍वरूप देखल जाइए‍। दोसर जँ हम अपन बनौल मूर्तिकेँ अपने अधला कहब तँ गामक कलाकार आगू केना ससरत? तँए जे गामक कला अछि‍ ओकरा सभ मिलि‍ प्रोत्‍साहि‍त करी। (२) काली मण्‍डप गामेक घरहटि‍या बनबैथ‍‍। जि‍नका घर बनबैक लूरि‍ छैन‍‍ ओ मण्‍डप किए ने बना सकै छैथ‍‍। संगे ईहो हएत जे गामक अधि‍क-सँ-अधिक लोकक सहयोग सेहो होएत। (३) मनोरंजन-ले गामोक कलाकारकेँ अवसर भेटैन‍। संगे बाहरोक ओहन-ओहन तमाशा आनल जाए जेहेन ऐ परोपट्टामे नै आएल हुअए। (४) पूजा-ले, परम्‍परासँ अबैत ओहनो पुजेगरीकेँ अवसर भेटैन‍ जे पूजाक प्रेमी छैथ‍‍। (५) गामक जेते गोरे काज करैथ‍ ओइ‍‍मे नीक केनि‍हारकेँ पुरस्‍कृत आ अधला केनि‍हारकेँ आगू मौका नै देल जाइन। पाँचो निर्णए सर्वसम्‍मतिसँ भऽ गेल। बैसार उसैर गेल। खा-पीब‍ कऽ मंगल सुतैले बिछान बिछबैत रहैथ। राति‍क एगारह बजैत रहइ। सतरंजी बिछा दुनू हाथे जाजीम झारलखिन। तैबीच जोगि‍न्‍दर मंगलसँ भेँट करए आएल। जाजीमक अवाज सुनि‍ जोगि‍न्‍दर घबड़ा गेल। मनमे भेलै जे किम्‍हरौ थ्री-नट्टा ने तँ चलल! हि‍यासि‍-हि‍यासि‍ चारूकात ताकए लगल। मुदा केकरो सुनि‍-गुनि‍ नै पाबि‍ मन असथि‍र भेलइ। असथि‍र होइते मंगलकेँ सोर पाड़लक। कोठरीएसँ मंगल अवाज दैत बहरेला। बाहर अबि‍ते जोगिन्‍दरकेँ देख बजला- “आबह। आबह भाय। एती राति‍केँ किए एलह?” दुनू गोरे ओसारक चौकीपर बैस गप-सप्‍प करए लगला। जोगिन्‍दर कहलकैन- “भाय, आइ तक तोरा एना भऽ कऽ नै चि‍न्‍हने छेलिअ। मुदा तोहर औझुका वि‍चार सुनि‍ छाती बारह हाथक भऽ गेल। भाँइमे कियो दादा हुअए!” जोगि‍न्‍दरक बात सुनि मंगल बजला- “भाय, बहुत राति‍ भऽ गेल अछि, भोरे उठैओक अछि। किए एलह से कहऽ।” “अखन अबैक खास कारण अछि, तँए नि‍चेन बुझि‍ एलौं। तहूँ तँ देखते छहक जे अखन धरि‍ हम गाममे दहलाइते छी। ने रहैक बढ़ि‍याँ ठर अछि‍ आ ने जीबैक कोनो आश। मुदा...।” “मुदा की?” “मुदा यएह जे करोड़पति रहि‍तो कोनो मोजर गाममे नै अछि।” करोड़पति‍ सुनि‍ मंगल चौंकैत बजला- “करोड़ केतेक होइ छै, से बुझै छहक?” “हँ। सौ लाख।” “एते रूपैआ अनलह केतएसँ?” “ऐ बातकेँ छोड़ह। जहि‍ए-सँ दि‍ल्‍ली नोकरी करए गेलौं तहि‍ए-सँ रूपैआक ढेरी लग पहुँच‍‍ गेलौं। शुरूमे जे बोरामे कसल रूपैआ देखिऐ तँ हुअए जे छपुआ कागत छि‍ऐ। मुदा कनी दि‍न रहलापर रूपैआ हथि‍यबैक लूरि‍ भऽ गेल। अखन, दि‍न भरि‍मे लाख रूपैआ हौंसतब कोनो भारी कहाँ बुझै छि‍ऐ! मुदा ओइ काजसँ मन उचैट गेल। आब एक्केटा इच्‍छा अछि‍ जे मनुख बनि‍ गाममे रही।” “हमरा की कहए चाहै छह?” “अखन तँ सभ पूजामे ओझराइल छी। पूजाक पछाइत‍‍ मदैत कऽ दि‍हऽ। एक लाख रूपैआ अनने छी। अपन जे आदमी अछि जदी ओकरा जरूरी होइ तँ बिना सुइदेक सम्‍हारि‍ देबइ। खाली मूरक-मूर घुमा देत। संगे तोरो कहै छिअ जे रूपैआ दुआरे पूजामे कोनो कमी नै होइ।” जोगि‍न्‍दरक बात सुनि मंगलक मनमे बि‍र्ड़ो उठि गेलैन। एक मन कहैन जे रूपैआ दुआरे काज पछुआ जाइए। से आब नै हएत। तँ फेर‍ सोचैथ जे डकैत-तकैतक भाँजमे ने तँ पड़ल जाइ छी! जोगिन्‍दरकेँ अखन धरि‍ एकटा साधारण आदमी बुझि‍ परदेसिया बुझै छेलौं। परदेसमे की करै छेलै से तँ नै बुझै छेलौं। मुदा खतरनाक आदमी बुझि‍ पड़ैए। एसमगलर छी आकि हवालाक धन्‍धा करैए। तत्-मत् करैत मंगल पुछलक- “एते रूपैआ केना भेलह?” मंगलक प्रश्‍न सुनि‍ जोगि‍न्‍दर चौकन्ना भऽ चारू दि‍स‍‍ तकलक। केकरो नै देख घुन-घुना कऽ बाजल- “भाय, जैठीम नोकरी करै छेलौं ओ बड़ भारी कारोबारी अछि। हजारो नोकर-चाकर छइ। देखौआ कारोबारक संग चोरनुकबा कारोबार सेहो करैए। आन-आन देशक रूपैआ भजबैए। कोन-कोन देशक लोक कोन-कोन रंगक रूपैआ भजबैए से कि सभकेँ चिन्‍हबो करै छेलि‍ऐ। मुदा हमरापर सेठवाकेँ खूम बि‍सवास छइ। हरदम अपने लग रखैए‍। टहल-टि‍कोरासँ लऽ कऽ चाह-पान धरि‍ आनि‍-आनि‍ दइ छेलि‍ऐ। नि‍शि‍भाग राति‍मे एक आदमी गाड़ीपर अबै आ भरि‍ दिन जेते बाहरी रूपैआ भेल रहै छै ओ सभ लऽ जाइ छइ। आपस किछु ने करै छइ। खाली पास-बुकपर रूपैआ चढ़ा दइ छइ। सेठबाकेँ जखन जेते रूपैआक जरूरत‍ होइ, हमहीं बैंकसँ आनि‍-आनि‍ दइ छेलि‍ऐ।” जोगि‍न्‍दरक बात सुनि मंगलक भक्क जेना खूजि गेलैन। बिच्‍चेमे बजला- “दि‍ल्‍ली सनक शहरमे सी.आइ.डी. आ पुलि‍स किछु ने कहै छइ?” मुस्‍की दैत जोगिन्‍दर उत्तर देलक- “सभकेँ महिना बान्‍हल छइ।” जोगिन्‍दरक बात सुनिते मंगलक मनकेँ, नि‍राशाक कारी मेघ टोपर बान्‍हि‍ जेना चारू-भरसँ घेर लेलकैन, तहिना हतोत्‍साह भ‍ऽ गेला। मनमे उठलैन, केकरापर करब सिंगार पि‍या मोरा आन्‍हर रे..! जइ देशक शासन कमजोर रहत ओइ‍‍ देशक सुरक्षा भगवान छोड़ि‍ के कऽ सकैए..! मंगल भीतरे-भीतर डरा गेला। मुदा मनकेँ असथि‍र करैत पुछलखिन- “तूँ ओही सेठक संग रहै छह की..?” जोगिन्‍दर- “दस बरख ओइ‍‍ सेठबा ऐठीन रहि‍ सभ तरी-घटी देख लेलि‍ऐ। ओकरा ऐठीनसँ हटैक मन भऽ गेल। मुदा नोकरी नै छोड़लौं। कहलि‍ऐ, माए अस्‍सक अछि‍ तँए किछु अगुरवारो रूपैआ दिअ। जे इलाज कराएब। भरि‍ दि‍न दारूए पीऐत रहैए‍। सारकेँ लगबो करै छै कि नहि। एते भारी कारोबार केना सम्‍हारि‍ लइए‍। मनमे उठल जे जहि‍ना ई सार दुनि‍याकेँ ठकि‍ धन जमा केने अछि‍ तहि‍ना हमहूँ किए ने एकरे ठकी। दबाइक दोकानसँ एकटा कड़गर नि‍शाँबला दबाइ कीनि आनि‍ दारूक बोतलमे फेँट‍ देलि‍ऐ। आठ बजे साँझमे जखन दारू मंगलक तँ वएह बोतल दऽ देलि‍ऐ आ कहलि‍ऐ जे हमरा गाम दि‍सक गाड़ी चारि‍ बजे भोरमे अछि‍ तँए रातिए-मे चलि‍ जाएब। कहलक, बड़बढ़ि‍याँ। दारू पीलक। हम ससैर कऽ मलि‍काइन लग जा कऽ कहलि‍ऐ जे गाम जाएब। फेर‍ ओइठीनसँ थानापर चलि‍ गेलौं। सभकेँ कहि‍ देलि‍ऐ जे आइ गाम जाएब। सभ चिन्‍हरबे रहए। घुमि कऽ एलौं तँ देखलि‍ऐ जे सेठबा बेमत् अछि। खाइले गेलौं। खेलौं। खा कऽ आबि सिरमा तरसँ कुन्‍जी नि‍कालि‍ रूपैआबला कोठरी खोललौं। बाप रे! सौंसे कोठरी रूपैएसँ भरल। मझोलका बैगमे रूपैआ भरि‍ कोठरी बन्न कऽ कुन्‍जी रखि‍ देलि‍ऐ। अपन जे नेपलि‍या रैक्‍सीनबला बैग रहए ओइमे रूपैओक बैग आ कपड़ो-लत्ता लेलौं। बारह बजे राति‍मे जखन रोड खाली भेल तखन एकटा टेम्‍पूसँ ममियौत भाय लग चलि‍ गेलौं। भैया बड़ होशगर छैथ‍‍। कहलैन जे जहन रूपैआ हाथ आबि गेल तहन चलि‍ केना जाएत। वएह रूपैआ छी।” जोगि‍न्‍दरक बात सुनि‍ मंगल बजला- “अपन की अभि‍यन्‍तर छह?” “मनमे अछि‍ जे दस कट्ठा घराड़ी जोकर जमीन भऽ जाए आ पाँच बीघा घनहर। दसो कट्ठा घराड़ीकेँ छहरदेवालीसँ घेर‍ दिऐ। बीचमे डेढ़ कट्ठामे चौबगली घर-अँगना बना लेब। दू कट्ठा खुनि‍ भरियो लेब आ दुनू कट्ठामे माछो पोसब। दू कट्ठामे फल-फलहरीक गाछ लगा लेब। तीमन-तरकारीले चौमासो भइए जाएत। काजो-उदेम आ खरि‍‍हाँनो-ले आगूमे खस्‍ते रखि‍ लेब।” जोगि‍न्‍दरक विचार सुनि‍ मंगलक मनमे आश जगलैन। बजला- “देखते छहक जे बथनाहामे अवधि‍या सभ अछि। ओकरा सभकेँ बहुत जमीन छइ। ओइमे सँ एकगोरे बैंकमे नोकरी करैए। समांगोक पातर अछि। असगरे नोकरी करत आकि खेती करत। सभ खेत बटाइ लगौने अछि। दस बीधा जमीन अपना गाममे ओकर छइ। जँ इच्‍छा हुअ तँ दसो बीघा कीनि लएह। अखन धरि‍ ओकर जमीन ऐ दुआरे बँचल छै जे एक्केठाम बेचए चाहैए। नै तँ कहि‍या ने बिका गेल रहि‍तै। मुदा एकटा बात पुछै छिअ जे अखन धरि‍क जे तोहर जि‍नगी रहलह ओ हमरासँ वि‍परीत रहलह। तोंही कहऽ जे दुनू गोरेक बीच केते दि‍न नि‍महत?” मंगलक प्रश्‍न सुनि‍ जोगि‍न्‍दर अवाक् भऽ गेल। कनी कालक पछाइत‍‍ बाजल- “मंगल भाय, तोहर शंका सोलहन्नी सही छह। दस गोरेक बीच बजैबला मुँह बनौने छह। मुदा सप्‍पत-किरि‍या खा कऽ कहै छिअ जे अपनो अपना जि‍नगीसँ मन उचैट गेल अछि, सदि‍खन होइत रहैए कखन सड़कपर घुमै छी आ कखन जहल चलि‍ जाएब। ओना, रोडक सि‍पाहीसँ लऽ कऽ नीक-नीक पाइबला सभसँ चि‍न्‍हारे ऐछे मुदा ओ सभ पाइयक दोस छी। कहि‍यो काल जे सूतलमे सपनाइ छी तँ ओहि‍‍ना देखै छी जे आगू-पाछू बन्‍दूकक हाथे सिपाही घेरने अछि‍ आ हाथमे कड़ी लगौने जहल नेने जाइए! कखनो सोचै छी तँ बुझि‍ पड़ैए जे अपनाकेँ आगू-मुहेँ जाइत देखै छी, आ लगले होइए जे पाछू-मुहेँ तेजीसँ खसल जाइ छी! कखनो चैन नै रहैए..!” बजैत-बजैत जोगि‍न्‍दरक आँखि‍मे नोर ढबढबा गेल। दुनि‍याँक आकर्षण देख मंगलोक मन जेना पीघलए लगलैन। मनमे उठलैन मनुखमे एहेन अद्भुत शक्‍ति‍ होइ छै जे एकाएक बदैल‍ जाइए‍। डकैतसँ महात्‍मा बनि‍ जाइए आ महात्‍मासँ डकैत। तँए मनुखक सम्‍बन्‍धमे किछु नि‍श्चि‍त कहब असम्‍भव अछि‍, अनुपमेय अछि। मुदा तैयो एकटा नमहर खाधि‍ बुझि‍ पड़ैए। हमरा तपमे बि‍सवास अछि‍ जहन कि एहेन ‍जि‍नगी उनटा छइ। उम्रमे भलेँ बेसी अन्‍तर नै हुअए मुदा जिनगी तँ दु-दिसाह अछि..! मंगलकेँ अपन मात्रि‍कक एकटा बात मन पड़लैन। मात्रि‍क कोशिकन्‍हामे अछि। पूबसँ कोसी आ पच्‍छि‍मसँ कमला गामकेँ घेरने रहए। बि‍चला सभ धार एक-दोसरमे मिलल। ओइ‍‍ गाममे बाँसक बोन। बाँसक एकटा बीट गहींरगरमे छल। खूब सहजोर बाँस रहए। चालीस-चालीस हाथक बाँस ओइ‍‍मे। अगते धार फुला गेल। बाढ़ि‍ आबि गेल। गामक सभ माल-जालक संग गाम छोड़ि‍ कुटुमारे चलि‍ गेल। कातिकेमे घुमि कऽ औत। एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍मे मातृभूमि‍ केना स्‍वर्ग बनि‍ सकैए‍!ओइ‍‍ बाँसक बीटमे दस-बारह हाथ पानि‍ लगल रहए। ओइ‍‍ बीटमे दस-बारह हाथ ऊपरसँ सौंसे बीट कोंपर दऽ देलक। जे अपनो देखनहि रही...। मन पड़ि‍ते मंगल सोचलैन जे अगर जँ मनुख संकल्‍पि‍त भऽ जि‍नगी मोड़ए चाहत तँ जरूर मोड़ि सकैए‍। अपन परि‍वारक पाछू लोक चोरी-डकैती, बेइमानी, शैतानी सभ किछु करैए‍। हम तँ एकटा गिरल आदमीकेँ उठबए चाहै छी। मनमे खुशी उपकलैन। मुस्‍कियाइत बजला- “भाय, जहि‍ना तूँ दरबज्‍जापर आबि कहलह तहि‍ना तँ हमरो मदैत करब फर्ज बनैए‍। मुदा आइ धरि‍ अधला काज नै केलौं, तेकरो तँ नि‍माहैक अछि।” मंगलक बात मंगलक पि‍ता गणेशी सेहो सुनलैन‍। ओ लग्‍घी करए नि‍कलल रहैथ‍। हाँइ-हाँइ कऽ लग्‍घी कऽ लगमे दुनू गोरेक बीच आबि कहलखि‍न- “बौआ, तीस बरख पहिलुका एकटा खिस्‍सा कहै छिअ। ओइ‍‍ समए जुआने रही। मोछ-दाढ़ीक पम्‍ह अबि‍ते रहए। माइयो-बाबू जीबते रहैथ‍‍। अहि‍ना काति‍क मास रहइ। तीन बजे करीब बेरू-पहर माथपर मोटरी नेने नाना हहाएल-फुहाएल एला...। अबि‍ते माएकेँ कहलखि‍न- “दाइ, गंगा नहाइले जाइ छी। बहुत लोक गामक जाइ छइ। ओकरा सभकेँ कहने छि‍ऐ जे टीशनेपर भेँट‍ हेबह। ताबे कनी हमहूँ सुसता लइ छी आ तहूँ तैयार हुअ। खेबा-खरचा ऐछे तँए कोनो ओरि‍यान करैक नै छह...।” ..नानाक बात सुनि‍ माए ठर्रा गेल‍। एक दि‍न पहि‍ने गाए बि‍आएल रहए। ऐ सभमे माए बड़ सुति‍हारि‍। माइक मनमे दू तरहक बात टकरा गेलइ। ओमहर गंगा नहाइले जाएब आ एमहर जँ गाएकेँ किछु भऽ जाए? तहन तँ नअ मासक मेहनत डुमि‍‍ जाएत? दोसर होइ जे गौंआँ-घरूआकेँ छोड़ि‍ बाबू एला। गाड़ीए-सवारीक भीड़-भड़क्काक बात छी, जँ कहीं कि‍यो भेँट नै होनि, तहन की हेतैन? तँए गुम्‍म रहए। तैबीच बाबूओ आबि गेला। गोड़ लागि‍ ओहो कातमे ठाढ़ भऽ गेला। ने माए किछु बजैत आ ने ओ। नाना अपन बात बाजि‍ चुकल छला तँए ने किछु बाजैथ। तीनू गोरेकेँ चुप देख कहलयैन‍- “नाना पएर धुअ ने?” ओ कहलैन‍- “नै-नै, पएर-तएर नै धुअब। टेनक टेम भेल जाइए...।” सामंजस करैत माए बाजल‍- “बौआ, छोड़ैबला कोनो ने छह। नन्ना संगे तोंही जाह।‍” ...मन अपनो रहए मुदा बीचमे बाजब उचि‍त नै बुझि‍ चुप्‍पे रही। ओना भागवत सुनै काल एकटा खिस्‍सा सुनने रही जे गंगा तेहेन भारी धार अछि‍ जइमे सौंसे दुनि‍याँक मनुखसँ लऽ कऽ चुट्टी-पि‍परी धरि‍ अँटि‍ जाएत। तैयो पेट खालीए रहत। सएह देखैक जिज्ञासा रहए। नाना संगे विदा भेलौं। जखन गंगामे पैस दुनू गोरे नहाए लगलौं आकि नाना टोकलैन‍- “नाति‍, मने-मन गंगाकेँ कहुन जे आइसँ झूठ-फूस‍ नै बाजब।” सएह कहि‍ डुम लेलौं। दू सालक पछाइत‍‍ बाबू मरि‍ गेला। घरक गारजन बनलौं। बाबूक मुइला पछाइत‍ माइयो रोगा गेल‍। मुदा काज करैक सभ लूरि‍ रहए तँए कहि‍यो कोनो काजक अबूह नै लागए। अपन राजकाजमे सदि‍‍काल लगल रहै छेलौं। कहि‍यो झूठ बजैक जरूरते ने हुअए। दछि‍नबारि‍ टोलमे सरूप रहए। दस बीघा खेतो ओकरा रहइ। मुदा रहए फुर्र-फाँइबला आदमी ललबबुआ। भरि‍ दि‍न एमहरसँ ओमहर घुमल घुरइ। ताश जे खेलए लगै तँ बारह-दू बजे राति‍ धरि‍ खेलते रहइ। गामक लोककेँ टीक ओझरबैमे माहि‍र। तेतबे नइ, पर-पनचैतीमे तेहेन पेंच लगा दइ जे मारि‍-पीटि‍ भइए जाइत। कोट-कचहरीमे दलाली सेहो करइ। दस बीघा खेत रहि‍तो दुइयो मास घरसँ नै खाए। ने अपने कोनो काज करैए आ ने खुट्टापर बरद रखने रहए। जे सभ झड़-झंझटमे फँसल रहए ओकरे सबहक बरदसँ खेतियो करैए आ ओकरे सभसँ ठकि‍-फुसि‍या कऽ गुजरो करइ। जेकरासँ जे चीज लइ ओकरा घुमा कऽ दइक नामो ने लइत। एक दि‍न अपना ऐठाम आबि कहलक- “गणेश, सुनै छी तूँ चाउर बेचै छह?” हम कहलि‍ऐ- “हँ।” कहलक- “एक मन चाउरक काज अछि।” कहलि‍ऐ- “भऽ जाएत। केकरो पठा देबइ, नै तँ अपने नेने जाएब तँ नेने जाउ।” चाउर तौला कऽ कहलक- “तोरा तगेदा करैक जरूरत‍ नै छह। जखने हाथमे रूपैआ औत तखने दऽ देबह।” कहलि‍ऐ- “बड़बढ़ि‍याँ। छह मास बित गेल। ने तगेदा करि‍ऐ आ ने दिअए। साल बित गेल। दोसर साल फेर‍ ओहि‍ना केलक। तेसरो साल केलक। झूठ केना बजि‍तौं जे चाउर नै अछि। पाइयक दुआरे अपन काज खगैत रहए। काजकेँ बि‍थुत होइत देख मनमे आएल जे कमाइ छी हम आ खाइए ललबबुआ..! ई तँ सोझहा-सोझही गरदैनकट्टी भऽ रहल अछि‍! ओह, से नइ तँ आब कहत तँ गछबे ने करब। कहबै जे नइए। मुदा फेर‍ मनमे उठल जे बीच गंगामे पैस संकल्‍प केने छी, झूठ केना बाजब? वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ भऽ गेल। हारि‍ कऽ झूठ बाजए लगलौं। मुदा एते जरूर करै छी जे जे झुठ्ठा अछि‍ ओकरा लग झूठ बजै छी आ जे झूठ बजनि‍हार नै अछि‍ ओकरा लग सत्‍ बजै छी। तँए बौआ कहि‍ दइ छी जे अहाँ सभ जुआन-जहान छी सोचि‍-वि‍चारि‍ कऽ डेग उठाएब। जहि‍ना दुनि‍याँ बड़ीटा छै, बड़ लोक छै, खेत-पथार धार-धूर, पहाड़-पठार, समुद्र इत्‍यादि‍ की कहाँ छै, तहि‍ना मनुखो अछि। एक्के कुम्‍हारक बनौल पनि‍पीबा घैल सेहो छी आ छुतहरो छी मुदा देखैमे दुनू एक्के रंग होइए!” ◌ शब्‍द संख्‍या : 7699 2. अमावसिया दि‍न। आइए साँझमे दिवाली आ निशाँ राति‍मे कालीपूजा हएत। अखन धरि‍क जे काजक उत्‍साह सभमे रहै ओ ठमैक‍ गेल। काजो आखरी रूपमे आबि गेल। ओरा गेल। जहि‍ना साल भरि‍क अध्‍ययनक आखरी दि‍न परीछा दि‍न होइत, तहि‍ना। काल्हि धरि‍ काज गति‍सँ चलैत रहल। जइ दि‍न जेहेन काज तइ दि‍न तेहेन रफ्तार। मुदा आइ तँ आखरी दिन छी तँए काजक उनटा गिनती कऽ लेब जरूरी अछि। हो-ने-हो किछु छूटि गेल हुअए। जँ छूटि गेल हएत तँ पूजामे बिघ्न-बाधा पड़त। तइ दुआरे पूजा समि‍ति‍क बैसार सबेरे साते बजे बजौल गेल। आठे दि‍नमे गामक चुहचुहीए बदैल‍ गेल। जहि‍ना हरोथ बाँसक जड़ि‍ अधि‍क मोट रहि‍तो बीचमे भूर कम होइत मुदा आगू ओइ‍सँ पातर रहनौं भूर बेसी होइत तहि‍ना बँसपुरोमे बुझि‍ पड़ैत। जखन पूजाक दि‍न आगू छल तखन काज बेसी आ जखन लग आएल तँ कमि‍ गेल। काल्हिए-सँ गामक धी-बहि‍न‍ आबि रहल अछि। ओना, गामक सभ अपन-अपन कुटुमकेँ हकार पहिनहि देने मुदा अबैमे दि‍वाली बाधक बनल छेलइ। दि‍वाली दि‍न घरमे नै रहने भूतक बसेराक डर सबहक मनमे नचैत रहइ जे आगू आरो पहपैट‍ हएत। तँए गामक जे धी-बहि‍न‍ असगरूआ अछि‍ ओ भरदुति‍या ठेकना कऽ दि‍वालीक परात औत। मुदा जेकरा घरमे दि‍यादनी वा सासु अछि‍ ओ किए ने एक दिन पहिनौं औत। नैहर छि‍ऐ ने। केते दि‍न माए-बाप, भाए-भौजाइ आ गामक सखी-बहिनपासँ भेँट भेना भऽ गेल छइ। तहूमे जेकर नैहरक परि‍वार जेरगर छै ओ तँ साले-साल वा सालमे दुइयो-तीन‍ बेर‍ आबि जाइए‍ मुदा जेकर परि‍वार छोट छै, जइमे कम काज होइ छै, ओ तँ दस-दस सालसँ नैहरक मुँह-आँखि‍ नै देखलक। गामक सौभाग्‍य जे काली-पूजा शुरू भेल। मुदा एकटा अजगुत बात भऽ गेलइ। गामक धी-बहि‍न‍सँ बेसी सारि‍-सरहोजि‍ आबि गेलइ। बेसी साइर-सरहोजि‍ एलासँ गामक चकचकी‍ए बढ़ि‍ गेल। जइसँ छौड़ा-मारड़ि‍सँ लऽ कऽ बुढ़-बुढ़ानुसक मुँहमे सेहो चौअन्नियाँ मुस्‍की आबि गेलैन, तहूमे परदेसिया साइर-सरहोजि‍ आबि कऽ तँ आरो रंग बदैल‍ देलक। दुखक दि‍न गौंआँक कटि‍ गेल। सुखक दि‍न आबि रहल अछि किएक तँ आठ दि‍न जे बीतल ओ ओहन बीतल जइमे ने केकरो खाइक ठेकान रहलै आ ने सुतैक। मुदा आब तँ सभ पाहुन-परकक संग अपनो पहुनाइए करत। मरदक कोन बात जे जनीजा‍तियो खुशी! जे भनसि‍या आबि गेल। नीक-नि‍कुत खेनाइ, दि‍न-राति‍ तमाशा देखनाइ, ऐसँ सुखक दि‍न केहेन हएत। तहूसँ बेसी खुशी ई जे भरि‍ मेला ने केकरो पैंइच-उधार करए पड़तै आ ने दोकान-दौरीक झंझट रहतै। किएक तँ दू दिन पहि‍नहि सभ अपन-अपन काज सम्‍हारि‍ नेने छल। महाजनोक बोही-खाता बन्न रहत। मुदा दि‍वालीक बोहैनक दुख महाजनक मनकेँ जरूर कचोटै छेलइ। केतबो रेड़गड़ मेला किए ने हौउ मुदा दूध-दही, माछ-मौसक अभाव नै हएत। पाँच दि‍न पहिनहि‍ सुधा दूधक एजेन्‍ट आ माछ-माउसक वेपारीकेँ एडभांस दऽ देने अछि। तहूमे काली-पूजा छी। बिना बलि‍-प्रदाने पूजो केना हएत। बँसपुराक जनीजा‍तियो तँ ओते अनाड़ी नहि‍येँ अछि जे जोड़ा छागर कबुला नै केने हएत‍। पहि‍ल साल पूजाक छी। बिना नव वस्‍त्र पहिरने पूजा केना कएल जाएत आ धि‍या-पुता मेला केना देखत जँ से नइ हएत तँ की देवीक अपमान नै हेतैन? जइ जगहपर काली मण्‍डप बनल ओ आठे-दस कट्ठाक परती अछि। सेहो आम जमीन। जइसँ एकपेरि‍यासँ लऽ कऽ खुरपेरि‍या लगा सौंसे परती रस्‍ते बनल रहइ। ओइ परतीक पच्‍छि‍म-उत्तर कोणमे लोक फूटल-फाटल माटियोक बरतन आ पड़सौतीक कपड़ो-लत्ता फेकैत। पूब-उत्तर कोणमे धिया-पुता झाड़ा फि‍रैत। दच्‍छिन-पच्‍छि‍म भागमे घसबाह सभ घास-घास खेलाइ दुआरे केतेको खाधि‍ खुनने आ दच्‍छिन-पूब कोणमे कबड्डी आ गुड़ी-गुड़ीक चेन्‍ह दऽ घर बनौने। काली-पूजाक आगमनसँ सौंसे परती छील-छालि‍ एक-रंग बना देलक। जइ तरहक मेलाक आयोजन भऽ रहल अछि‍ ओइ‍‍ हिसाबसँ जगहो छुछुन लगैत। मुदा रौदि‍याह समए भेने परतीक चारू भागक खेतक धान मरहन्ना भऽ गेल, जेकरा काटि‍-काटि‍ सभ अगते माल-जालकेँ खुआ नेने छेलै, तँए मेला-ले जगहक कमी नै रहल। पनरह बीघासँ ऊपरे खेतक आड़ि‍-मेड़ तोड़ि चट्टान बना देलक। अगर जँ से नइ बनौल जाइत तँ मुजफ्फरपुरक ओहन नाटकक अँटावेश केना हएत? किएक तँ जइ पार्टीमे बाजा बजौनि‍हारसँ लऽ कऽ पुरुखक पाट खेलेनिहारि धरि‍ मौगीए कलाकार अछि, संगीतकार सेहो खालीए मौगीए अछि तइ पार्टीकेँ देखैले परोपट्टाक लोक उनैट‍ कऽ नै औत? ऐबे करत। तँए कमसँ कम पाँच बीघाक फील्‍ड देखनि‍हार-ले चाहबे करी। से तँ भइए गेल। तैपर सँ वृन्‍दावनक रास सेहो अछि, नाटकसँ कनियोँ कम नहि। एक-पर-एक कलाकार अछि। मोट-मोट, थुल-थुल देह, हाथ-हाथ भरि‍क दाढ़ी-केश लऽ लऽ पार्टो खेलत आ नचबो करत। तँए देखनि‍हारोक कमी नहि‍येँ रहत। मेल-फि‍मेल कौव्‍वालीक संग महींसोँथाक मलि‍नि‍याँ नाच सेहो अछि। एक-पर-एक चारू। किए ने धमगि‍ज्‍जर मेला लगत। पूजा-समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे खुशी होइत मुदा एकटा शंका सबहक मनमे रहबे करइ। ओ ई जे एते भारी मेलाकेँ सम्‍हारल केना जाए? केतबो गौंआँ जी-जान लगौत तैयो लफुआ छौड़ा सभ छह-पाँच करबे करत। पौकेटमारो हाथ ससारबे करत। मुदा की हेतै, मेला-ठेलामे कनी-मनी ई सभ होइते छइ। केकरा के देखत आ केकर के सुनत। तहूमे रौतुका मसिम रहत कि‍ने? दोकानो-दौरीक आयोजन सेहो बेजए नहि। दुनू ढंगक दोकान। पुरनो आ नवको। नवका समान-ले न्‍यू मार्केट एक भाग आ दोसर भाग पुरना बजार बसल। ओना अखन धरि‍ दोकान-दौरी नीक-नहाँति‍ नै सजल अछि मुदा बेर टगैत सभ सजि‍ जाएत। न्‍यू मार्केटक चाक्-चिक् दोसरे ढंगक अछि‍ जइमे बिनु देखलेहे समान बेसी रहत। दोकानदारो सभ बहरबैए रहत। एहेन-एहेन सुन्नर चूड़ी ऐ इलाकाक लोक देखनौं हएत, तेहेन-तेहेन चूड़ीक दोकान सभ आबि गेल अछि। देखनि‍हारोकेँ आँखि‍ उठि‍ जाएत। उठबो केना ने करत? एते दि‍न देखै छल जे चूड़ी स्‍त्रीगणेटा बेचै छेली, ऐबेर‍ देखत जे पुरुखो बेचैए। तइमे तेहेन-तेहेन फोटो सभ दोकानक भीतरो आ बाहरोमे लगौने अछि जे अनेरे आगूमे भीड़ लगले रहत। असली मनुख छी आकि नकली से सभ थोड़े बूझत। फोटोए टा नै गीतो गबैबला तेहेन-तेहेन साउण्‍ड-बॉक्‍स सभ सजौने अछि जे सभ किछु बिसैर जाएत। चूड़ी बजारक बगलेमे चेस्‍टरक दोकान लगल अछि। चूड़ी बजारसँ कम थोड़े ओहो वेपारी सभ सजौने अछि। काल्हिए-सँ एहेन-एहेन प्रचारक मशीन सभ लगौने अछि जे कियो थोड़े परखि‍ लेत जे आदमीक मुँह बजै छै आकि मशीन। परचारो कि हरही-सुरही छइ। समानक संग-संग पहि‍रैक लूरि‍ सेहो सिखबैए‍। धैनवाद ओइ बनौनि‍हारकेँ दी जे हाथी सन-सन मोट देहसँ लऽ कऽ खि‍रकि‍ट्टी देह धरि‍मे एक्के रंगक चेस्‍टरसँ काज चलि‍ जाएत। तहूमे तेहेन डि‍जेनगर सभ अछि‍ जे एकटा छोड़ि‍ दोसर पसीनो करैक जरूरत‍ नै‍ पड़त। जेकरा पाइ छै ओकरा एकेटासँ थोड़े मन भरत? ओ तँ गेठक गेठ कीनत। बिल्‍कुल औटोमेटि‍क। दामो कोनो बेसी नहि‍येँ रखने अछि‍ जे समानक बिकरी कम हेतइ। मात्र एगारहे रूपैआ। वेपारियो सभ तेहेन ओसताज अछि‍ जे पहि‍नहि पता लगा समान डि‍कने अछि। चेस्‍टरक दोकानक बगलेमे खेलौनाक बजार अछि। वाह रे! खेलौना बनौनि‍हार आ पूजी लगा वेपार केनि‍हार। दस रूपैआसँ लऽ कऽ हजार रूपैआ धरि‍क। बन्‍दूक, तोप, रौकेट, हवाइ जहाजक संग बम साइजि‍क खेलौना सभसँ दोकान भरने अछि। देखैमे असलीए बुझि‍ पड़त मुदा अछि‍ नकली। ओना असलेहे जकाँ गोलियो छुटैत, अवाजो होइत आ उड़बो करैए‍। तीन‍टा दाढ़ी केश बनबैबला बम्‍बैया शैलून सेहो आबि गेल अछि। तीनूमे महि‍ले कारीगर। मरदे जकाँ अपन रूप बनौने। मुदा मरदोसँ बेसी फुरीतगरो आ बजैयोमे चंगला। दाढ़ी कटबै काल बुझिए ने पड़त जे उनटा हाथ पड़ैए आकि सुनटा। हाथो मरदे जकाँ मुदा कनी गुलगुल बेसी। शैलूनक बगलेमे साड़ी-बजार। साड़ियो सभ अजबे टँगने अछि। पुरजीमे रेशमी लि‍खि‍-लि‍खि‍ सटने मुदा पटुआ जकाँ क्षल-क्षल करैए‍। केतौ ओचि‍ला नहि, एकदम पलीन। तेहेन-तेहेन पटोर सभ रखने अछि‍ जे बुझबे ने करबै ई भगलपुरि‍या रेशम छी आकि पटुआक। प्‍लास्‍टि‍कक मनुख बना तेहेन सजौने अछि‍ जे बुझि‍ पड़त आँखि‍क इशारासँ दोकानपर अबैले कहैए। राम-हि‍लोरा, मौत-कुआँ, हेलि‍केप्‍टर, हवाइ-जहाज, रेलगाड़ी, दिल्‍ली-चौकक चरि-पहि‍या, छह-पहि‍या गाड़ीक दौड़-बड़हा सभ अछि। जखन न्‍यू मार्केट घुमियेँ लेलौं तँ पुरनो बजार घुमियेँ ली। कि‍यो छपरीक दोकान बनौने तँ कियो फट्ठाक खुट्टापर बातीक कोरो बना प्‍लास्‍टि‍क दऽ घर बनौने अछि। कियो तिरपाल टँगने अछि, तँ कियो ओहि‍ना घैला-डाबा इत्‍यादि‍ माटि‍क बरतन पसारने अछि। दोकानदारो सभ सुच्‍चा ग्रामीण। अँइ! ई तँ चिन्‍हरबे दोकानदार सभ छी। पहिलुके दोकान झुनझुनाबला बुढ़बाक छी। चालि‍सो बर्खसँ बेसीएसँ झुनझुना बेचैए। आब तँ बुड़हा गेल। तैयो देखियौ, दुनू परानी दुनू दि‍स‍‍ बैस ताड़क पत्ताक झुनझुनो बना रहल अछि आ खजुरक पातक पटि‍या, बीऐन सेहो सजौने अछि! “तोरा तँ कनी कऽ चि‍न्‍है छिअ हौ झुनझुनाबला?” “बौआ चसमा लगौने छी तँए धकचुकाइ छह। पहि‍ने चसमा नै लगबै छेलौं। आँखियो नीक छेलए। दू साल पहि‍ने आँखि‍ खराप भऽ गेल, अही बेर लहानमे आँखि‍ बनेलौं।” मुदा झुनझुनावाली परेख‍ कऽ कहलक- “बौआ सोनमा रौ? जहि‍यासँ परदेस खटए लगलेँ तहि‍यासँ नै देखलियौ। तूँ हमरा चि‍न्‍है छेँ?” “नहि।” “तोहर मामाघर आ हम्‍मर नैहर एक्के ठीन अछि, अँगने-अँगने झुनझुनो आ बिऐनो-पटि‍या बेचै छी। अहीसँ गुजर करै छी। आब तँ भगवान सभ किछु दए देलैन‍। दूटा बेटा-पुतोहु अछि। सातटा पोता-पोती अछि। दुनू बेटा घर जोड़ैया करैए, राज मिस्‍त्री छी। खूब कमाइए। आब तँ अपनो ईटाक घर भऽ गेल। मुदा दुनू परानी तँ जिनगी भरि‍ यएह केलौं। आब दोसर काज करब से पार लगत। ओना दुनू भाँइ मनाहियोँ करैए। मगर हाथ-पर-हाथ धऽ कऽ बैसल नीक लगत। तँए जाबे जीबै छी ताबे करै छी। तोरा माएसँ बच्‍चेसँ बहि‍ना लगल अछि। जहि‍या तोरा घर दि‍स जाइ छी तहि‍या बि‍ना खुऔने थोड़े आबए दइए। माएकेँ कहि‍ दिहैन जे अपनो दोकान मेलामे अछि। तोरा कएटा बच्‍चा छौ?” “एक्केटा अछि।” “एकटा झुनझुना बौआ-ले नेने जाही।” “ओहि‍ना नै लेबौ मौसी। अखन हमरो संगमे पाइ नै अछि आ तहूँ दोकान लगैबते‍ छेँ। बिकरी बट्टा थोड़े भेल हेतौ।” “रओ बोहैनक सगुन ओकरा होइ छै जे इद-बि‍द करैए। हम तँ अपन पोताकेँ देब। तइले बोहैनक काज अछि। ले नेने जाही।” दोसर दोकान रमेसराक लोहोक समान आ लकड़ियोक समानक अछि। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुरहैर‍, खनती, चक्कू, सरौता, छोलनीक संग-संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम, बच्‍चा सबहक तीन पहि‍या गाड़ी इत्‍यादिक दोकान लगौने अछि। असगरे रमेसरा समान पसारि‍ खुट्टामे ओङैठ‍, टाँग पसारने‍ बीड़ी पीब रहल अछि! कहलिऐ- “रमेसरा रौ। सुनने रहि‍यौ जे तहूँ दि‍ल्‍ली धए लेलेँ?” “धुर्र बुड़ि, दि‍ल्‍ली हौआ छिऐ। जहि‍ना लोक कहै छै ने जे दिल्‍लीक लडू जेहो खाइए सेहो पचताइए आ जे नै खेलक सेहो पचताइए। दिल्‍लीसेट सभकेँ फुलपेन्‍ट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेडियो, उनटा बाबरी देख हमरो मन खुरछाँही काटए लगल। गामपर केकरो कहबो ने केलिऐ आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍[3]क ऐठाम नोकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपैआ महिना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तेते खटबै छेलए जे ओते जे अपने गाममे खटी तँ केतेक बेसी होइए। घुमि‍‍ कऽ चलि‍ एलौं। जहि‍या सुनलि‍ऐ जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पाँच हजारक समान अछि। कोनो कि सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बुझि‍ पड़ै छौ जे दिल्‍लीमे हुण्‍डी गाड़ल अछि। हम तँ एक्के मासमे बुझि‍ गेलि‍ऐ। जखन अपना चीज-वौस बनबैक लूरि‍ अछि तखन अनकर तबेदारी किए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ किए ने रहब। तूँ सभ ने अनके कोठा आ सम्‍पैत‍‍केँ अपन बुझै छीही। मुदा ई बुझै छीही जे धनिकहा सभ तोरे मेहनत लूटि‍ कऽ मौज करैए। अखन जो, कनी दोकान लगबै छी।” आगू बढ़लौं। अरे! ई तँ रौदि‍या भैयाक चाहक दोकान बुझि‍ पड़ैए। “अपने दोकान खोललह भैया?” “हँ, बौआ। गामक मेला छी। एकर भीड़-कुभीड़ तँ गौअँएपर ने पड़त। ओहि‍ना जे टहलैत-बुलैत रहि‍तौं तइसे नीक ने जे दू पाइ कमाइयो लेब आ मेलाक ओगरबाहियो करब।” “बेस केलह। बरतन-बासन अपने छेलह?” “नहि। रघुनाथ लग बजलौं तँ वएह अपन पुरना सभ समान देलक।” “रघुनाथक दोकान तँ बड़ स्‍टेण्‍डर भऽ गेलइ।” “चाहे दोकानक परसादे तीन‍टा बेटियोक बि‍आह केलक आ ईंटाक घरो बना लेलक।” “वाह! बड़ सुन्‍दर, बड़ बेस।” केते छोटका दोकानदार अखन छपड़ियो ने बनौने। काति‍क मास रहने ने बेसी गरमी आ ने बेसी जाड़। तहन किए अनेरे बाँस-बत्ती कीनि घर बनौत। दूटा बाँसक खुट्टा गाड़ि‍ ऊपरमे बल्‍ला दऽ देत। ओइ‍‍पर केराक घौर टाँगि‍‍‍ बेचत। तहिना कचड़ी-चप, पापड़-फोंफी-ले तँ माटि‍ए-मे चूल्हि‍ खुनि‍ लोहि‍या चढ़ा बनौत। मुरही पथियेमे रखि‍ डिब्‍बासँ नापि‍-नापि‍ बेचत। झि‍ल्‍ली बनबैक साँचा तँ सभकेँ रहि‍तो ने छै, जे बनौत। झंझारपुरक आ मधेपुरक दस-बारहटा दोकानदार आबि कऽ मेलाक चुहचुहीए बदैल‍ देलक। गहींकी सेहो चिन्‍हरबे आ दोकानदारो सएह। तँए सभसँ नीक कमाइ ओकरे सभकेँ हएत। नगद-उधार सभ चलतै। एक पाँतिसँ सभ दोकान बना रहल अछि। पि‍तोझि‍या गाछ लग के झगड़ा करैए! कनी ओकरो देख लि‍ऐ। अरे! ई तँ दुनू परानी ढोलबा छी! “एना किए ढोल भाय अबि‍ते-अबि‍ते ढोल जकाँ दुनू परानी ढबढबाइ छह?” अवाज दाबि‍ ढोलबा कहलक- “हौ भाय, देखहक ने ऐ मौगीयाकेँ, मेलासँ जेकरा जे हानि‍-लाभ हौउ मुदा हमरा तँ सीजि‍न पकड़ाएल अछि, आगूमे छठि‍ अछि। परोपट्टाक लोक तँ कोनि‍याँ, सूप, छि‍ट्टा, डगरी कीनबे करत। ओइ हि‍साबसँ ने समान बनबैत। से कहैए जे तीसे गो छि‍ट्टा-पथीया मिला कऽ अछि। अट्ठारह गो सूप आ गोर पचासे कोनि‍याँ अछि! तोहीं कह, ऊँटक मुँहमे जीरक फोरनसँ काज चलत?” कहलिऐ- “ऐले झगड़ा किए करै छह? फेर‍ लऽ अनि‍हऽ।” ढोलबा कनी गम खेलक मुदा झपैट‍ कऽ तेतरी बाजल‍- “ऐ मरदावाकेँ एक्को मिसिआ बुधि छइ। एतनो ने बुझैए जे आठे दि‍नमे केते बनैबतौं। दूटा ढेनमा-ढेनमी अछि, ओकरो सम्‍हारए पड़ैए। ई तँ भरि‍ दि‍न बाँस, बत्ती, कैमचीक जोगारमे रहैए। कोनो कि बजारक सौदा छि‍ऐ जे रूपैआ नेने जाइतौं आ कीनि अनि‍तौं।” ढोलबा बाजल- “तूँ नै देखै छीही जे महि‍नामे पनरह दि‍न काजक दुआरे नहेबो ने करै छी। तोहीं छातीपर हाथ रखि‍ बाज जे एक्को दि‍न टटका भात-तीमन खाइ छी? डेढ़-दू बजे हकासल-पि‍यासल बाँस आनै छी तखन गोटे दि‍न नहाइ छी ने तँ नहि‍येँ नहाइ छी आ धड़फड़ा कऽ खाइ छी फेर तुरन्ते काजेमे फेर लगि जाइ छी। नि‍चेनसँ बीड़ियो-तमाकुल नै खाए-पिबए लगै छी। खा कऽ अराम केकरा कहै छै से तँ दि‍न कऽ सि‍हि‍नते लगल रहैए। तूँ की बुझबीही जे बाँस टोनै, फारै आ गादि लइमे केते भीर होइ छइ। बैसल-बैसल बानि‍ चलबै छेँ तँ बुझि‍ पड़ै छौ अहि‍ना होइ छइ। ई थोड़े बुझै छीही जे उठ-बैठ करैत-करैत जाँघ चढ़ि‍ जाइए। ऐसँ हल्‍लुक साए बेर‍ डन्‍ड-बैसकी करब होइ छइ। एते काज केला बाद जा कऽ बैसारी काज अबैए। बैसियो कऽ कारा-कैमची बनैबते छी। गुण अछि‍ जे ताड़ी पीबै छी तँए मन असथि‍र रहैए आ मूड फरेश रहैए। तँए ने कोनो काज उनटा-पुनटा नै होइए। ने तँ केकर मजाल छि‍ऐ जे एक्के दि‍नमे एते रंगक काज सेरिया कऽ कए लेत। अच्‍छा हो, दोकान लगा। दोकान की लगेमे, कोनि‍याकेँ तीन‍ मेल बना ले। डगरी, सूप तँ एक्के रंग छौ आ छि‍ट्टाकेँ दू मेल बड़का एक भाग आ छोटका एक भाग के लगा ले। पाँच गो रूपैआ दे कनी ताड़ी पीने अबै छी।” “अखन रौद चरहन्‍त छइ। अखन जे ताड़ी पीबैले पाइ देबह से कि हमरा गारि‍ सुनैक मन अछि।” “आँइ गइ मौगिया, तोरा बजैत एक्को पाइ लाज नै होइ छौ, जे पुरुख रहि‍तो घरक भार सुमझा देने छियौ। संगियो-साथी सदिकाल किचारैत रहैए।” “अच्‍छा रूपैआ दइ छिअ मुदा फेर‍ बेरू-पहर नै मंगि‍हऽ। जाइ छह तँ जा मुदा झब-दे अबि‍हऽ। मेला-ठेला छिऐ असगरे हम दोकान चलाएब आकि‍ बेदरा-बुदरी सम्‍हारब।” “से कि हम नै बुझै छि‍ऐ मुदा दसटा दोस-महि‍म अछि। अगर भेँट-घाँट भऽ जाएत तँ की कुशलो-छेम नै करब।” बँसपुराक लड़कीक संग जे दुरबेवहार सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे भेल ओइ‍‍ घटनाक समाचार तरे-तर चारू भरक गाममे पसैर गेल छल। जेकर टीका-टिप्‍पणी गामे-गाम होइ छल। मुदा एक रूपमे नहि। अधि‍कतर लोक ऐ घटनाकेँ निन्‍दा करैत तँ कमतर मनोरंजन कहैत। किछु गोरे फैशन बुझि‍ पाछुसँ अबैत बेवहार मानि‍ बजबे ने करैत। मगर सभ किछु होइतो सिसौनीबला बँसपुराबलासँ सहमल। एहेन घटना आगू नै‍ हुअए तइले सि‍सौनीक बुधि‍‍जीवी सबहक मनमे खलबली मचि‍ गेल। सि‍सौनियेँक दयानन्‍द दरभंगा कौलेजमे प्रोफेसरी करै छैथ‍‍। गामक लोक तँ हुनका एकटा नोकरि‍हारा बुझै छैन‍‍ मुदा कौलेजमे छात्रोक बीच आ शिक्षकोक बीच प्रति‍ष्‍ठि‍त बेकती‍ छैथ‍‍। ऐ बेर ओ दुर्गा-पूजामे गाम नै आबि प्रोफेसर दयानन्‍द संगीक संग रामेश्वरम् चलि‍ गेल छला। मुदा बालो-बच्‍चा आ पत्नियोँ गाम आएल रहैन‍। वएह सभ रामेश्वरम् सँ एलापर घटनाक जानकारी देलकैन‍। घटना सुनि‍ प्रोफेसर दयानन्‍द मने-मन जरि‍ गेला। गुम्‍म-सुम्‍म भऽ सोचए लगला, ई कोन तमाशा भऽ गेल जे धर्मक काजक दौड़मे एहेन अधर्म भऽ गेल! केना लोकक मनमे धर्मक प्रति‍ आदर रहत! धर्मस्‍थलमे जँ एहेन-एहेन वृत्ति‍ हएत तँ कएक दि‍न ओ स्‍थल जीवि‍‍‍त रहत! केना केकरो माए-बहि‍न ‍घरसँ नि‍कि‍ल देवस्‍थान पूजा करए वा साँझ दिअ औत! प्रो. दयानन्‍द, जेते घटनाकेँ टोब-टाब करैथ‍‍ तेते पैघ-पैघ प्रश्‍न मनकेँ हौंरए लगलैन‍। मुदा जे समए ससैर गेल ओ उनैटो तँ नै सकैए‍। कोन मुहेँ ओइ‍‍ गाम पएर देब। लोक की कहत? ओहू गामक तँ अनेको वि‍द्यार्थी पढ़बो करैए‍ आ पढ़ि‍ कऽ नि‍कललो अछि। ओ सभ की कहैत हएत। मुदा आगू एहेन घटना नै हुअए तेकर तँ प्रति‍कार कएल जा सकैए‍। पाप तँ प्रायश्चितेसँ कटैए। तहूमे अगुरबारे बँसपुरासँ काली-पूजाक हकार-कार्ड सेहो आबि गेल अछि। तत्-मत् करैत प्रो. दयानन्‍दक मनमे एलैन जे एकटा बेंग मरलासँ लोक इनारक पानि‍ पीब तँ नै छोड़ि‍ दैत अछि। ओकरा नि‍कालि‍ गन्‍धकेँ मेटबैक उपाय करैए‍। बँसपुराक काली-पूजाक आरम्‍भ सेहो सि‍सौनियेँक घटनाक प्रति‍क्रि‍या स्‍वरूप भऽ रहल अछि। हो-ने-हो एकरे जवाबमे ओहो सभ ने घटना दोहरा दि‍अए? काली-पूजा शुरू होइसँ तीन दिन पहि‍ने प्रोफेसर दयानन्‍द गाम आबि, बि‍ना कोनो मान-रोख केने गामक पढ़ल-लि‍खल उमरदार सभसँ सम्‍पर्क कऽ कहलखि‍न। किछु गोरे गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझबो करै छला आ किछु गोरे बुझौलासँ बुझलैन‍। बुझला पछाइत‍ एकमुँहरी सभ गाममे बैसार कऽ एकर नि‍राकरण करैक विचार व्‍यक्‍त केलैन‍। सहमति सेहो बनल। दयानन्‍दक मनमे आगू डेग बढ़बैक साहस जगलैन‍। साहस जगि‍ते‍ कौलेजक विद्यार्थी सभकेँ बैसार करैक भार देलखि‍न। दू दिन समए बित गेल। जइ दिन काली-पूजा शुरू हएत तइ दिन भोरे सात बजे बैसार भेल। सात बजेसँ पहिनहि दुर्गेस्‍थानमे सभ एकत्रि‍त भेला। वैचारि‍क रूपमे गाम दू फाँक जकाँ भऽ गेल रहए। तँए अपन-अपन विचारकेँ मजगूत बनबैक विचार सबहक मनमे। जे सभ घटनामे शामिल रहए, ओ तीनू कार्यकर्ताक पि‍ता बैसारमे नै आएल। नै अबैक कारण विरोध नै लाज होइ। तहूमे जखनसँ प्रोफेसर दयानन्‍द दरभंगासँ आबि गाममे घटनाक चरचा चलौलैन तखनेसँ मुँह नुकबए लगला। मुदा मौलाएल घटना पुन: पोनैग‍ गेल। ओना गामक एक ग्रुप, जेकरा कुकर्मी ग्रुप कहि‍ सकै छि‍ऐ, बल प्रयोगक योजना तरे-तर बनौने रहए। जइसँ कोनो रस्‍ते ने गाममे खुजतै। मुदा गामक विशाल समूह, जे अधला काजसँ घृणा करैत, केँ एक रंगाह विचार। एक तरहक विचारक पाछू केते तरहक सोच अछि। किछु गोरेक सोच ई रहैन जे गाममे एकटा कुकर्मी समाज अछि‍ जे सदिकाल किछु-ने-किछु करि‍ते रहैए‍। परोछा-परोछी तँ एक-दोसरकेँ गारि पढ़ैए‍ मगर, बेर एलापर सभ एक-मुहरी भऽ जाइए‍। तँए घटना ओहन अस्‍त्र छि‍ऐ जइसँ ओइ समाजकेँ काटि‍-काटि‍ लतियौल जा सकैए‍। किछु गोरेक वि‍चार रहैन जे जहि‍ना तीनू गोरे दसगरदा जगहपर जुलुम केलक तहि‍ना समाजक बीच लतियौल जाए। ओना, किछु गोरेक विचार ईहो रहैन जे हम सभ मनुखक समाजमे रहै छी नै कि जानवरक समाजमे। तँए मनुखक समाज बनइ। भलेँ मनुखक समाज बनबैक जे प्रक्रि‍या होइए ओइ प्रक्रि‍याकेँ क्रि‍यान्‍वि‍त कएल जाए...। ललबाक विचार सभसँ भि‍न्न। किएक तँ जइ लड़कीक संग दुरबेवहार भेल छेलै ओ ओकर ममि‍यौत बहि‍न। ललबा कलकत्तामे ड्राइवरी करैए‍। दुर्गापूजामे गाम आएल। जइ दि‍न घटना भेल ओइ दि‍न ओ बुझबे ने केलक। जखनसँ बुझलक तखनसँ देहमे आगि लगि‍ गेलइ। मने-मन योजना बना नेने रहए जे धनि‍कक टेरही केना झारल जाइ छै से समाजकेँ देखा देबइ। नीक मौका हाथ लगल हेन। मुदा मनमे ईहो शंका होइ जे दयानन्‍द कक्काक आयोजन छि‍ऐन‍ जँ कहीं आगूमे आबि जेता तँ सभ वि‍चार चौपट भऽ जाएत। सोचैत-विचारैत तँइ केलक जे चाहे जे होइ मुदा बिना जुत्ति‍यौने नै छोड़बै। भलेँ जि‍नगी भरि‍ जहलेमे किए ने रहए पड़ए। गामक सभ टोलक लोक, गोटि‍-पँगरा छोड़ि‍, बैसारमे आएल। प्रोफेसर दयानन्‍द उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ बजला- “ऐ बेरक दुर्गा-पूजामे जे घटना गाममे घटल, ओ समाज-ले बड़का कलंक छी। ऐ घटनाकेँ जेते निन्‍दा कएल जाए ओते कम होएत। केते गोरे बुझैत हेबै जे अनगौंआँ लड़की छल मुदा ई बूझब हमरा सबहक पड़ाइनवादी विचार हएत। जइसँ रंग-बि‍‍रंगक अधलासँ अधला घटना होइत रहत आ हम सभ मुँह तकैत रहब। तँए एहेन-एहेन घटनाकेँ रोकए पड़त।” बि‍च्‍चे‍मे जे ग्रुप हंगामा करए चाहै छल उठि‍-उठि‍ हल्‍ला करए लगल। हल्‍ला देख सभ उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ विरोध करए लगल। ललबा प्रोफेसर दयानन्‍द दि‍स‍‍ तकलक। दयानन्‍दक मुँहक रूखि‍ तँ नै बदलल मुदा नोरसँ भरल-आँखि‍ करि‍या मेघ जकाँ लटैक‍ कऽ निच्‍चाँ-मुहेँ जरूर भऽ गेल छेलैन‍! बिजलोका जकाँ ललबा चमैक‍ कऽ फाँइट चलबए लगल। तीनूकेँ असगरे ललबा मारि‍ कऽ खसा देलक। जाबे सभ शान्‍त भेल ताबे तँ तीनूक गाल-मुँह फुइल गेल मुदा तैयो ललबाक गरमी कमल नहि। जहि‍ना खून केनि‍हारकेँ आरो खून करैक गरमी खूनमे आबि जाइए‍ तहि‍ना ललबोकेँ भेल। मुदा चारू दि‍ससँ सभ पकैड़‍ ललबाकेँ घि‍चने-घिचने कात लऽ गेल। दुनू हाथ पकैड़‍ दया बाबू फुसफूसा कऽ कहलखि‍न- “अगर समाजमे एक्कोटा बेटा अन्‍यायक खिलाफ अपनाकेँ उत्‍सर्ग कऽ देत तँ सैकड़ो बेटा धरतीमाताक गोदमे पैदा भऽ जाएत। मन थीर करह। ओना समाजक सभ तरहक समस्‍याक समाधान खाली मारि‍ए-टा सँ नै हएत आ ने केवल पनचैतीएसँ हएत। किएक तँ समस्‍या दू तरहक होइए‍। पहि‍ल घटना वि‍शेष परि‍स्‍थि‍तिक‍ होइ छै, जबकि‍ दोसर सत्ता-वि‍शेष वा बेवस्‍था विशेषक। अखुनका जे समस्‍या अछि ओ बेवस्‍था विशेषक छी तँए एहेन समस्‍याकेँ बलेसँ रोकल जा सकैए‍। नै तँ कोनो-ने-कोनो रूपमे चलि‍ते रहत, मरत नहि।” प्रोफेसर दयानन्‍दक विचार सुनि ललबा बाजल- “कक्का, अहाँ लग किछु बजैत-करैत संकोच होइए, नइ तँ तीनूक खून पीब लैति‍‍ऐ। भलेँ जिनगी भरि‍ जहले किए ने कटि‍तौं, फाँसीएपर किए ने चढ़ि‍तौं। की लऽ कऽ एलौं आ की लऽ कऽ जाएब। जखन मरनाइ ऐछे तँ लड़ि‍ कऽ किए ने मरब जे सड़ि‍ कऽ मरब।” ललबाक बात सुनि‍ मुस्‍कियाइत प्रोफेसर दयानन्‍द बजला- “अल्होमे लोक गबैए‍ ‘रनमे मरे दोख नै लागे।’ तहि‍ना महाभारतमे व्‍यासो बाबा कहने छथि‍न- ‘इन्‍द्रासनक अधि‍कारी वएह छी जे अन्‍यायक विरूद्ध रनक्षेत्रमे ठाढ़ भऽ अपन बलि‍ चढ़ौत।’ मुदा जे भेल से उचि‍त भेल। ऐ‍सँ आगू नै बढ़ह। अगर जँ ऐ‍सँ सुधैर‍ जाएत तँ बड़बढ़ि‍याँ नै तँ ओकर फल आन थोड़े भोगत। तूँ एतै रहऽ।” कहि‍ आगू बढ़ि‍ दयानन्‍द सोचए लगला जे समाजक अध्‍ययन नीक नहाँति‍ नै भेल अछि। लोकक जे रूखि‍ बनि‍ गेल अछि‍ ओ कखनो बेकाबू भऽ सकैए‍। तँए सभकेँ गामपर जाइले कहि‍ दि‍ऐ...। कहि‍ तँ देलखि‍न मुदा कियो मैदान छोड़ैले तैयार नै भेल। सभ अड़ल। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे अपनो पड़ि‍ गेला। मनमे नाचए लगलैन जे सभसँ पहि‍ने हमहीं केना मैदान छोड़ि‍ देब। मुदा रहनौं तँ लोक मानि‍ नै रहल अछि। दोहरा कऽ बजला- “सभ गोरेक परि‍वार आइए-सँ नै बहुत दि‍नसँ एकठाम रहैत एलौं आ आगुओ रहब। तँए सभकेँ मि‍ल‍-जुलि‍ रहैक अछि। केकरो संग कियो अधला करबै तँ झंझट हेबे करत। एक परि‍वारक झगड़ा गाम-समाजक झगड़ा बनि‍ जाइए‍। तँए झगड़ाकेँ रोकैक उपाय एक्केटा अछि‍ जे ओहेन कारणे ने उठै जइसँ झगड़ा हुअए।” कहि‍ प्रो. दयानन्‍द घर दि‍सक रस्‍ता पकड़लैन‍। मुदा सभ मैदानमे डँटले रहल। प्रोफेसर दयानन्‍दक विचारक असर तेनाहे सन लोकक मनपर पड़ल। किएक तँ एहेन-एहेन घटना पूर्वमे अनेको भऽ चुकल छेलइ। जे सबहक मनमे उपकए लगल। दयानन्‍द बाट धेने आगूओ बढ़ल जाइ छला आ पाछू घुमि‍‍-घुमि‍ देखबो करै छला जे फेर‍ ने तँ पटका-पटकी शुरू भेल। ओना केकरो हाथमे ने लाठी अछि‍ आ ने हथि‍यार मुदा देह तँ छइ। प्रो. दयानन्‍द पाँच बीघा आगू बढ़लापर लग्‍घी करैक लाथे बैस हि‍या-हि‍या देखैथ। जे कियो हाथ-पएर ने तँ फरकबैए। मुदा से नइ देखलैन। पहि‍ने मारि‍ खेलहा सभ मैदान छोड़लक। पाछूसँ सभ अपन-अपन रस्‍ता धेलक। ठंढाएल रूखि‍ देख अपनो उठि‍ कऽ वि‍दा भेला। घरपर आबि प्रोफेसर दयानन्‍द पत्नीकेँ कहलखि‍न- “बँसपुरा जाइक समए दसे बजेक बनौने छेलौं मुदा बैसारेमे बेसी समए लगि‍ गेल। तँए आब नहाए नै लगब। झब-दे खाइले दिअ। ताबे हाथ-पएर धोइ लइ छी।” पति‍क बात सुनि पत्नी किछु नै बजली। बूझल रहैन‍ जे एना केते दि‍न भेल अछि‍ जे काजक धड़फड़ीमे नहाइयो नै लगै छैथ‍‍। नअ बजैत। बगुरबोनीक भगत कफलाक संग बँसपुरा काली-स्‍थान पहुँचल। भगतजीक हाथमे लोटा आ जगरनथि‍या बेंत। डलबाह-मनटुनक हाथमे सि‍क्कीक चौड़गर चङेरी, जे मधुबनी बजारमे कीनने रहए। चङेरीमे फूल-अछत, अगरबत्ती आ सलाइ रखने रहए। नि‍रधनक कन्‍हामे मिरदंग लटकल। रवि‍या आ सैनियाँक हाथमे झालि‍। सोमना हाथमे एकटा बसनी; सरही आमक पल्‍लो आ पान-सातटा सूखल कूश। बुधबाक कान्हपर एकटा मुठबाँसी बाँस, जेकरा छीपमे आल रंगक पताका आ तीन हाथ जड़ि‍सँ ऊपर ओहने रंगक कपड़ाक टुकड़ा बान्‍हल। सभ एक-सूरे ‘काली महरानी की जय’क नारा लगबैत। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य बैस अपन काजक हिसाब लगबैत रहए। छलगोरि‍या मूर्तिक अन्‍तिम परीक्षण मण्‍डपमे करैत रहए। भगतजीक ‍क्रिया-कलाप देखैले एक्के-दुइए लोक जमा हुअ लगल। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य अपन हि‍साब-वारी रोकि‍ भगतजी सभकेँ देखए लगल। काली मण्‍डपक ओसारपर भगतजीक मेड़ि‍या सभ अपन-अपन समान रखि‍ हाथ-पएर धोइले बगलेक पोखैर‍ वि‍दा भेल। अछींजल भरैले सोनमा बसनी लऽ लेलक। भगतजीक हाथमे लोटा। हाथ-पएर धोइ सभ कियो काली मण्‍डपक आगू आबि एकटंगा दऽ दऽ गोड़ लगलक। गोड़ लागि नि‍रधन मि‍रदंग चढ़बए लगल। सैनि‍याँ आ रवि‍या झालि‍ बजबए लगल। पोखैर‍सँ आबि भगतजी हाथमे लोटा नेने ठोर पटपटबैत मण्‍डपक आगू ठाढ़ भऽ आँखि‍ बन्न कऽ सुमि‍रन करए लगला। बुधबा मण्‍डपक आगूमे, थोड़े हटि‍ कऽ धूजा गाड़ए लगल। बरसपैतिया भगैत उठौलक- “हे काली मैया...।” जेना सभ काजक बँटबारा पहि‍ने कऽ नेने रहए तहि‍ना। ठाढ़े-ठाढ़ भगतजी देह थरथरबए लगला। गोसाँइ आबि गेलखि‍न। भगतजीक आगूमे डलि‍बाह दुनू हाथे डाली पकड़ने। थोड़े कालक पछाइत‍‍ भगतजी चङेरीमे सँ फूल-अछत लऽ उत्तर-मुहेँ खूब जुमा कऽ फेकलैन। फेर‍ फूल-अछत लऽ गंगाजीक नाओं लैत दच्‍छिन-मुहेँ फेकलैन। चारि मुट्ठी चारू दि‍स फेक‍ पाँचम मुट्ठी ऊपर फेकैत जोरसँ बजला- “ओ... ओ...।” कहि‍ अपन परि‍चए कालीक नाओंसँ देलखिन। कालीक नाओं सुनि डलि‍बाह बाजल- “हे माए, किछु वाक् दि‍यौ?” भगत- “ऐ जगहक भाग्‍य चमैक‍‍ गेल। एकरा नि‍च्‍चाँमे साक्षात गंगाजी बहै छथि‍न। ई स्‍थान बनने गाममे कोनो डाइन-जोगि‍नक किछु नै चलत। एते दि‍न गामक लोक बड़ कलहन्‍तमे रहै छेलै मुदा आब सभ खुशीसँ रहत। कोनो कुशक-कलेप केकरो नै लगत।” गामक खुशहाली सुनि‍ पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे नव आनन्‍दक जन्‍म भेल। देवनाथ पुछलक- “हे माए, अहाँ की चाहै छी?” “ई स्‍थान हमर छी। अखन धूजा गाड़ि‍ पीरी बनेलौं। सभ दि‍न पूजो करब आ बेरागने-बेरागन गोसाँइ सेहो खेलब। जेकरा जे कोनो उपद्रव देहमे हेतै ओ डाली लगौत। फूल दइते छूटि‍ जेतइ।” धूजा गाड़ि‍, पीरी बना बुधबा तुलसियोक गाछ रोपि‍ देलक। समि‍ति‍क सभ चुपचाप भऽ देखैत रहए। केकरो मनमे कोनो शंके नै उठल। किएक तँ अनेको स्‍थानमे गहवरो रहैए‍। मुस्‍की दैत देवनाथ पुछलकैन- “हे मैया, अपन कोनो पहचान दि‍यौ?” झपैट‍ कऽ भगत-रूप काली बजली- “तूँ जे जानक बदला जान गछने रहऽ से देलह? जखन जान गड़ूमे रहऽ तखन के बँचौने रहऽ गड़ू मेटा गेलह तँ सभ किछु बि‍सैर गेलहक! अखनो धरि‍ जे बँचल छह से स्‍त्रियेक धरमे। जेहने तोहर स्‍त्री धरमात्‍मा छथुन तेहने तूँ पापी छह। हुनके धरमे अखन धरि‍ बँचल छह। नै तँ कहि‍या ने तोहर नाश भऽ गेल रहि‍तह।” भगतक बात सुनि देवनाथक मनमे लड़कीबला घटना ठनकल। जवाब नइ दऽ चुपचाप दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “हे माए, बिसैर गेल छेलौं भने मन पाड़ि‍ देलह।” देवनाथपर सँ नजैर‍ हटा भगत जोगि‍न्‍दरकेँ कहलक- “तूँ जे कबुला केलह से देलह? जखन जान उकड़ूमे फँसल रहऽ तखन केते बेर कहि‍ कऽ गछने रहऽ। ओना तोहर बारहअना ग्रह कटि‍ गेलह सि‍रि‍फ चारि‍-अना बँचल छह। तँए दान-पुन कऽ कऽ जल्‍दी ओकरो मेटा लएह।” जोगि‍न्‍दरकेँ ओइ‍‍ राति‍क घटना मन पड़ल जइ राति‍ रूपैआ लऽ सेठक ऐठामसँ पड़ाएल रहए। दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “हे मैया, ठीके बि‍सैर गेल छेलौं। जल्‍दीए तोहर कबुला पूरा करबह।” बीच-बचाव करैत डलि‍वाह बाजल- “आइ पहि‍ल दि‍न गोसाँइ जगबे कएल, ऐसँ बेसी आब कोनो काज ने हएत।” डलि‍बाहक बात सुनि भगत उत्तर-मुहेँ ठाढ़ भऽ दुनू हाथ उठा आँखि‍ मूनि‍ लेलक। काली देहसँ नि‍‍कैल‍‍ गेलखि‍न। सामान्‍ये आदमी जकाँ भगतो भऽ गेल। झालि‍-मि‍रदंग आ भगैत सेहो बन्न भऽ गेल। आँखि‍क इशारासँ भगत डलि‍बाहकेँ कहलैन- “काज सुढ़ि‍याएल अछि।” आँखि‍ए-क इशारासँ डलि‍वाह उत्तर देलकैन- “हँ।” समि‍ति‍क सदस्‍य भगत लगसँ हटि‍ पुन: बैसारमे आबि जाइ गेला। मुदा एकटा नव समस्‍या समि‍ति‍क सामने उपस्‍थि‍त भऽ गेल। समस्‍या ई जे कि गहबरो बनौल जाए आकि धूजा उखारि‍ कऽ फेक‍ देल जाए? मुदा दुनू तरहक वि‍चार उठि‍ गेल। किछु गोरे गहवरक समर्थनो केलक आ किछु गोरे विरोधो केलक। बीचमे मंगलकेँ किछु फुरबे ने करइ। मने-मन सोचैथ जे ई तँ बेर‍ परहक भदबा आबि गेल। जँ मनाही करब तँ शुभ काज अशुभेसँ शुरू हएत। जँ नै करबै तँ सभ दि‍ना भदबा ठाढ़ भऽ जाएत। भगतकेँ मंगल चिन्‍हतो नै रहैथ मुदा बगुरबोनीक भगतक विषयमे बूझल रहैन जे एकटा कोखि‍या गुहारि‍ केनि‍हार-भगत जहल गेल रहए। वएह भगत छह मास जहल काटि‍ हालेमे नि‍कलल छेलइ। बगुरबोनीक गहवरकेँ बदनाम बुझि‍ दोसर गहवर जगबए चाहैए‍। भगता जहल किए गेल? बगुरबोनीक भगता मथ-दुखीसँ लऽ कऽ कोखि‍या गुहारि‍ धरि‍ करै छल। एक दि‍न एकटा नोकरि‍या अपन घरवालीकेँ लऽ कऽ कोखि‍या गुहारि‍ करबए बगुरबोनी गहवर आएल। शुक्र दि‍न रहइ। तीनू बेरागनमे शुक्र सभसँ नीक बूझल जाइए‍। खूब डील-डालसँ डाली सजा अनने रहए। आन-आन कोखि‍या गुहारि‍मे कहालीक संग बूढ़‍-बुढ़ानुस स्‍त्रीगण सभ अबै छल,‍ तँए कहि‍यो कोनो रक्का-टोकी नै होइ। मुदा ओ बुड़ि‍चोन्‍ह नोकरि‍या अपन घरवालीक संग अपनो आएल। बुड़िचोन्‍ह एहेन जे कलकत्तामे नोकरी करि‍तौ अस्‍पताल देखले ने रहइ। पूजा ढारि‍ भगत ओकरा कहलकै- “गहवरक सीमासँ हटि‍ जाह।” सौंझका समए रहइ। अन्‍हारो भइए गेल रहइ। ओकरा मनमे शंका जगलै। ओ हटैले तैयारे ने भेल। दुनू गोरेक बीच रक्का-टोकी शुरू भेल। रक्का-टोकीक पछाइत‍‍ ओ गहवरसँ नि‍‍कैल‍‍ बहराक जाफरी लग चलि आएल। मुदा आँखि‍-कान ठाढ़ केने रहल। असगरे भगत आ ओ औरत गहवरक भीतर रहल। देह थरथरबैत भगत पहि‍ने औरतक देहपर हाथ देलक। औरत गुहारि‍ बुझि‍ किछु नै बाजल‍। जखन भगत ओकरा पीरीक आगुमे पड़ैले कहलक तखन ओ जोरसँ घरबलाकेँ सोर पाड़लक। घरवालीक अवाज सुनि दौग कऽ आबि सोझे भगतपर हाथ छोड़ए लगल। भगतोक अपन घर छेलइ। केना अपना घरमे मारि खा बरदास करैत। हल्‍ला सुनि‍ पान-सात आदमी पहुँच‍‍ गेल। सभ भगतेक लाइग-भाइगक। भगतकेँ कहि‍ते ओ सभ ओकरा थोपड़ा देलकै। दू-चारि‍ थापर मौगियोकेँ लगलै। वएह आदमी थाना जा दोसर दि‍न केस कऽ देलक। तेसरे दिन भगत जेल चलि‍ गेल। जखनसँ जोगि‍न्‍दर सुनलक जे चारि‍-अना ग्रह बाँकीए अछि‍ जे दान-पुन केलासँ कटत, तखनसँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि‍ गेलइ। मनमे होइ जे भगत ठीके कहलक। जखन रूपैआ लऽ टेम्‍पूपर चढ़लौं तखन ठीके कबुलो केलौं आ भरि‍ रस्‍ता गोढ़ि‍यबि‍तो गेल रहि‍ऐन‍‍। भरि‍ रस्‍ता काली माय, काली माय, सेहो जपैत गेल रही। एते बात जखन मिलि‍ गेल तँ चारि-अना ग्रह केना झूठ भऽ सकैए‍? दाने-पुन केलासँ ने ग्रह कटैए‍। मुदा दान-पुन करैक तँ केतेको रस्‍ता अछि। तहूमे फुटा कऽ किछु नै कहलक। कियो भोज-भनडारा करैए तँ कियो तीर्थ-स्‍थानमे धर्मशाला बनबैए, कियो-पोखैर‍‍-इनार खुनबैए तँ कियो स्‍कूल-कौलेज बनबैए। तहिना कियो अस्‍पताल बनबैए तँ कियो अन्न-वस्‍त्र दान करैए‍। दान-पुन करैक तँ अनेको जगह अछि! हम की करी? फेर मनमे एलै जे एते दिन केकरोसँ दोस्‍ती नै केने छेलौं, तँए अपने फुरने किछु करैत रहलौं। मुदा आब तँ मंगलसँ दोस्‍ती भऽ गेल अछि तँए हुनके पुछि‍ लेब जरूरी अछि। पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍य कालीए स्‍थानमे छल, किएक तँ औझुका काज सभसँ झनझटि‍या अछि। केतौ दोकान बनबैक तँ केतौ चन्‍दा-बेहरीक। मुदा तैयो जोगि‍न्‍दर मंगलकेँ बैठकसँ उठा कात लऽ गेल। कातमे लऽ जा कहलक- “भाय, भगतजी ठीके कहलैन जे तोरा चारि-अना ग्रह बाँकीए छह?” मंगल- “तोरा अपनो बि‍सवास होइ छह?” “हँ। केना नै बि‍सवास हएत। कोनो कि झुठे गोसाँइ खेलाइए?” जोगि‍न्‍दरक बात सुनि मंगल मने-मन सोचए लगला जे एक दिस दोस्‍ती भेल आ दोसर दि‍स दुश्‍मनीक रस्‍ता सेहो बनि‍ रहल अछि। अखन धरि‍ वएह ओझा-गुनी लोककेँ ओझरौने अछि‍, तैयो लोकक बि‍सवास जमले छइ। कोन जरूरी छेलै जे बिना कहनहि-सुननहि‍ अपने मने चलि‍ आएल। ठीके गोसाँइ जी कहने छथि‍न जे “भइ गति‍ साँप छुछुन्‍दर केरी।” अगर भगतकेँ भगा देबै तँ तेहेन बबंडर करत जे पूजा पूजे रहि‍ जाएत। जँ नै भगेबै तँ गहवर बना बड़का तमाशा ठाढ़ करत। सोचैत-विचारैत मंगल जोगिन्‍दरकेँ कहलखिन- “तोहर अप्‍पन की वि‍चार होइ छह?” जोगिन्‍दर- “भाय, जँ अपना मने करैक रहि‍तए तँ तोरा किए पुछि‍तिअ?” जोगि‍न्‍दक वि‍चार सुनि‍ मंगलक मन आरो ओझरा गेलैन। कनी काल गुम्‍म रहि‍ बजला- “भाय, तूँ केते दान करए चाहै छह। दान-पुनक अनेको जगह अछि।” जोगिन्‍दर- “जेते दान-पुनक जगह देखै छि‍ऐ ओ लगले थोड़े हएत। जे लगले हएत वएह करब।” मंगलक मनमे फेर‍ शंका उठल जे हो-ने-हो, ई ई ने कहि‍ दि‍अए जे ईंटाक गहवर बना देबइ। जँ से कहत तँ ने वि‍रोध करैत बनत आ ने समर्थने। चपाड़ा दैत बजला- “बड़ सुन्‍दर वि‍चार छह। हमहूँ यएह कहैले छेलिअ।” “मनमे होइए जे गाममे जेते विधवा, नि‍:सहाय मसोमात अछि‍ ओकरा सभकेँ मदैत कऽ दि‍ऐ।” मसोमातक नाओं सुनि‍ मंगलक मनमे खुशीक लहैर उठि गेलैन। हँसैत बजला- “बड़ चिक्कन बात बजलह। मुदा मसोमातक विषयमे कनी बुझह पड़तह।” “की?” “अपना ऐठाम दू तरहक मसोमात अछि। एक तरहक सरकारी अछि आ दोसर तरहक समाजक अछि।” “नै बुझलौं?” “सरकारी मसोमात ओ छी जे सरकारक देल सभ सुवि‍धा पबैए‍। आ समाजि‍क विधवा ओ छी जेकरा ने सरकार जनै छै आ ने ओ सरकारकेँ जनैए‍। किछु गनल सरकारी मसोमात अछि‍ जे ओकर पोसुआ छी। जे कोनो सरकारी सुवि‍धा मसोमात सभ-ले औत ओ ओकरे भेट‍तै। अजीब खेल सरकारो आ मसोमातोक अछि। ओही पोसुआ मसोमातकेँ इन्‍दि‍रा आवासक घरो छै आ बाढ़ि‍-बर्खामे घरखस्‍सीक रूपैआ सेहो भेटतै आ बाढ़ि‍सँ क्षति‍ फसलक क्षति‍पूर्तिक रूपैआ सेहो ओकरे भेटतै। तेतबे नहि, वृद्धावस्‍था पेंशन सेहो ओकरे भेटतै आ रोजगार चलबैक नाओंपर सब्‍सिडी सेहो ओकरे भेटतै। तँए सरकारी मसोमात छोड़ि‍ जे निरीह समाजक मसोमात अछि‍, जँ ओकरा जीबैक उपाय भऽ जाए तँ उपय केनि‍हारकेँ ऐसँ बेसी दान-पुनक फल केतए भेटतै। धैनवाद ओइ‍‍ माए-दादीकेँ दी जे सत्तैर‍-अस्‍सी बर्ख बितौलाक बादो जेठक दुपहरि‍या, भादवक झाँट आ माघक शीतलहरीमे, जी-जानसँ मेहनत करैए। धैनवाद ओइ‍‍ अस्‍सी बर्खक मैयाकेँ दी जे माथपर धान, गहुम, मकैक बोझ लऽ कऽ दुलकी चालि‍मे गीत गुनगुनाइत खेतसँ खरि‍हाँन अबै छैथ‍‍..। ..तँए, कहबह जे अखन तँ मेलाक धुमसाही अछि, मेलाक पछाइत‍ सभकेँ अपन रोजगारक उपय कऽ दि‍हक। काज करब अधला नहि मुदा ओ शरीरक शक्‍ति‍क अनुकूल काज हुअए। अखन तत्-खनात पाँच दि‍नक मेला भरि‍क बुतात, मेला देखैले किछु नगद आ एक-एक जोड़ साड़ी आ आङी दऽ दहक। मुदा बीचमे एकटा बात आरो छह, जे हमर मिथि‍लाक धरोहर सम्‍पैत‍‍‍ सेहो छी। ओ ई जे जे जिनगीक चारू पायासँ हारि‍ चुकल अछि‍, दुखक पहाड़क तरमे पि‍चाएल अछि मुदा आत्‍मबल एते सक्कत छै जे दान लइसँ आना-कानी करतह। तँए पहि‍ने जा कऽ ओइ‍‍ मैया सभकेँ गोड़ लागि कहि‍हक- ‘बाबी, समाजरूपी परि‍वारक अहूँ छी आ हमहूँ छी, तँए कमाइबलाक ई दायि‍त्‍व बनि‍ जाइए जे परि‍वारमे वृद्ध आ बच्‍चाक सेवा इमानदारीसॅँ होइ। हम अहाँकेँ मदैत सेवाक रूपमे दऽ रहल छी।’ ..तखन जरूर ओ वेचारी हँसि‍ कऽ लेथुन आ मनसँ असि‍रवाद देथुन।” मंगलक विचार सोझे जोगिन्‍दरक करेजमे घुसल। करेजमे घुसिते तिलमि‍ला गेल। जेना ओइ मसोमात सबहक हृदए जोगि‍न्‍दरक हृदैमे धक्का मारि‍ प्रवेश करए लगलै। मन पसीज गेलइ। ओना, जइ गाममे जोगिन्‍दरक जन्‍म भेल अछि ओइ गाममे अनेको मसोमात पहि‍नौं छल आ अखनो अछि। मुदा मसोमातक जे रूप जोगिन्‍दर आइ देखलक ओ पहिने नै देखने छल। कँपैत मनसँ मंगलकेँ कहलकैन- “भाय, जे कहलह से अखने कऽ लइ छी। मुदा ऐसँ मन नै मानि‍ रहल अछि। मेलाक पछाइत‍‍ नीक जकाँ विचारि‍ किछु करब।” प्रोफेसर दयानन्‍द, साइि‍कलसँ सोझे बँसपुरा वि‍दा भेला। गामक सीमा टपि‍ते देखलैन जे एकटा शि‍क्षक -जेकर बहाली शि‍क्षा मित्रमे डेढ़ हजार रूपैआपर भेल, बिच्‍चे रस्‍तापर साइि‍कल लगा मोबाइल कानमे सटौने रहए। मुदा किछु बजला नहि। मनमे भेलैन जे एक तँ अहि‍ना अबेर भेल अछि, तैपर जँ किछु कहबै आ रक्का-टोकी शुरू करत तँ अनेरे आरो समए लागत। मुदा मन असथि‍र नै रहलैन‍। सोचए लगला- अखन तँ दरभंगा कौलेजक लगेमे डेरा अछि। मुदा जहिया एम.ए. पास केने रही, तहिया अपना साइि‍कलो ने रहए आ डेरो दूरमे छल। पएरे डेढ़ कोस चलि‍ कौलेज पढ़बैले जाइ-अबै छेलौं। जहन कि देखै छी गामक शि‍क्षक गामेक स्‍कूलमे काज करैए‍ आ मोटर साइि‍कलसँ जाइ-अबैए! हजार रूपैआक नोकरी केनि‍हार तीन हजारक अपन जिनगी बनौने अछि। की ओइ‍‍ शिक्षकसँ पुछि‍ सकै छिऐन‍ जे अहाँ अपन जि‍नगीक सीमा बुझै छी? जँ नै बुझै छी तँ अहाँ पढ़ेबै की? बच्‍चा सभ अहाँसँ की सि‍खत? ई सभ सवाल मनमे उठि‍ते दयानन्‍दक मन उलैझ गेलैन‍। मनमे उठलैन जे जहि‍ना खरहोरि‍मे पैसैले दुनू हाथसँ खढ़ हटबए पड़ै छै तहि‍ना सभ उलझनकेँ मनसँ हटबैत बँसपुराक सम्‍बन्‍धमे सोचए पड़त। सिसौनीक बैसारक समाचार बि‍र्ड़ो जकाँ लगले चारू भागक गाम सभमे पहुँच‍‍ गेल। बँसपुराक काली-पूजा समि‍ति‍क बैसारमे सेहो सि‍सौनियेँक चर्च चलैत। प्रोफेसर दयानन्‍दकेँ देखते‍ मंगलो आ देवनाथो उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम केलकैन‍। प्रणाम कऽ मंगल दयानन्‍दक हाथसँ साइि‍कल पकैड़‍ मण्‍डपक बगलमे लगा देलक। साइि‍कल ठाढ़ कऽ मंगल दया बाबूक हाथ पकैड़‍ बैसारमे लऽ गेलैन‍। समि‍ति‍क बि‍च्‍चे‍मे एक-साए-एक रूपैआ चन्‍दा दैत प्रोफेसर दयानन्‍द बजला- “एकाएक अहाँ सबहक मनमे काली पूजा केना आएल?” प्रोफेसर दयानन्‍दक प्रश्‍नमे रहस्‍य छिपल छल। तँए कि‍यो किछु उत्तर देबे ने केलकैन‍। सि‍सौनियेँक दुर्गा-पूजाक घटनाक प्रति‍क्रि‍या-स्‍वरूप भऽ रहल अछि। जइ बातकेँ छि‍पबैत कियो किछु नै बाजल। मुदा दयानन्‍दक प्रश्‍न ऐ‍सँ अलग छेलैन‍। हुनकर प्रश्‍न छेलैन जे दुर्गा-पूजा तँ शक्‍तिक पूजा छी जे संगठनक होइत, जखन कि काली-पूजा कालक छी, माने समैयक। प्रश्‍न उठैए जे शक्‍ति‍क संचयमे समैक की योगदान होइत अछि। मुदा अपन रहस्‍यमय विचारकेँ छिपबैत दयानन्‍द बजला- “बड़ सुन्‍दर काज अहाँ सभ केलौं। ऐ‍सँ समाजमे नव चेतनाक उदय होइ छइ। जे सभ समाज-ले जरूरीए अछि।” प्रोफेसर दयानन्‍द आ बँसपुराक काली-पूजा समि‍ति‍क सदस्‍यक बीच गप-सप्‍प चलि‍ते छल आकि‍ दयानन्‍दकेँ तकैत बरहरबा गामक प्रोफेसर कमलनाथ मोटर-साइि‍कलसँ पहँचला। प्रोफेसर दयानन्‍दकेँ कनडेरीए आँखि‍ए कमलनाथ नि‍च्‍चासँ ऊपर माने पएर-सँ-माथ धरि देख बजला- “दयाबाबू, हम तँ अहींकेँ भँजि‍यबैत घरपर होइत एलौं हेन।” कमलनाथक बातक उत्तर नै दऽ दयानन्‍द मुस्‍की दैत बजला- “भाय साहैब, कनीए काल ऐ‍ठाम देख लइ छी, तखन दुनू भाँइ संगे चलब। अपने पढ़ौल शि‍ष्य सभ पूजाक आयोजन कऽ रहल छैथ।” देवनाथो आ मंगलो, कौलेजमे दयानन्‍दसँ पढ़ने छल। तँए दयानन्‍दकेँ विशेष सिनेह रहैन‍। प्रोफेसर कमलनाथ सेहो बि‍च्‍चे‍मे बैस गप-सप्‍प सुनए लगला। पूजाक सभ बेवस्‍था बुझि‍ दयानन्‍द मंगलकेँ कहलखि‍न- “अखन तँ ओहि‍ना बुझै दुआरे आएल छेलौं मुदा राति‍मे, परि‍वार सहि‍त सभ कियो देखैले आएब। कनी काल आरो थम्‍हि‍तौं मुदा भाय साहैब कमल बाबू आबि गेल छैथ‍‍। भाय साहैबकेँ तोँ सभ नै चि‍न्‍हैत हेबहुन। हमर गुरु भाय छैथ‍‍। चारि‍ बरख हि‍नकासँ पढ़ने छी। दस बर्ख पहि‍ने कौलेजसँ सेवा-निवृत्त भेला। अपने पड़ोसिया सेहो छैथ‍‍। बरहरबे घर छिऐन‍।” प्रोफेसर दयानन्‍दो आ प्रोफेसर कमलनाथोक आगमनसँ देवनाथो आ मंगलोक मनमे चारि‍-बर उत्‍साह बढ़ि‍ गेल। दुनूक मनमे जेना नव खुशी भेल, जइसँ शरीरमे नव शक्‍ति‍क संचार हुअ लगलैन। प्रोफेसर कमलनाथ एक-साए-एक्कैस रूपैआ चन्‍दा देलखि‍न। दुनू गोरेकेँ आग्रह करैत मंगल कहलकैन- “गुरुदेव, आब अपने सभ केतए जाएब। रहि‍ए जाइऔ। कि‍यो औता अहाँ सभ आएले छी।” मंगलक बात सुनि प्रोफेसर कमलनाथ बजला- “बौआ, अखन धरि‍ तूँ सभ नइ चिन्‍है छेलह। जहन कि एक अरि‍या-पटि‍या छी। महि‍नामे कमसँ कम पाँच बेर‍ ऐ गाम होइत अबै-जाइ छी। औझुका संयोग नीक रहल जे सभसँ भेँट‍ भेल। सिरिफ भेँटे नै चि‍न्‍हा-परि‍चए सेहो भऽ गेल। सभ एक्के अरि‍या-पटि‍या छी तँए एकठाम बैस सभ गामक उत्‍थान-ले विचार-विमर्श कऽ आगू बढ़ैत रहब। ओना तँ हम बुढ़ भेलौं मुदा तैयो दौनक मेहौता बरद जकाँ जाधैर‍‍ जीबै छी ताधैर‍‍ संग-साथ दैत रहबह। गामकेँ आगू बढ़बैले दू तरहक काज करैक जरूरत‍ अछि। पहि‍ल, मनुखकेँ जीबैले मूल आवश्‍यकता की-की अछि‍ ओ बुझि‍ ओकर पूर्ति करैक आ दोसर पाछूसँ अबैत क्रिया-कलापकेँ ढंगसँ देख अधलाकेँ छोड़ि नीकक अनुशरण करैक। अखन तहूँ सभ नमहर काजमे लगल छह ओकरा नीक-नहाँति‍ सम्‍हारि‍ लएह तेकर पछाइत‍ बूझल जेतइ।” कहि‍ कमलनाथ दयानन्‍दक संग किछु बगैल‍ कऽ‍ गप-सप्‍प करए लगला। कमलनाथकेँ दयानन्‍द पुछलखि‍न- “अपनेकेँ बड़ हलचल देखलौं। किछु खास बात छै, की?” मुस्‍कियाइत कमलनाथ कहलखि‍न- “खास बात तँ अहीं कहब। करीब साढ़े नअ बजे भाति‍ज आबि कऽ कहलक जे दयाबाबूक गाममे बैसार छेलैन जइमे किछु गोरे हुनका गरियेबो केलकैन आ मारबो केलकैन‍। से कहाँ धरि‍ की बात छि‍ऐ?” कमल बाबूक बात सुनि दयानन्‍द अवाक् भऽ गेला। मने-मन सोचए लगला जे बैसारमे तँ कियो आन गामक नै छल, तहन केना बात उड़ि‍याएल। फेर‍ भेलैन जे इलाकाक सभ गाम एक-दोसरसँ जुड़ल अछि। कर-कुटुमैतीसँ लऽ कऽ आबा-जाही, हाट-बजार धरि‍क सम्‍बन्‍ध रहैए‍। परि‍वारक काज ने साधारण ढंगसँ चलै छै‍ मुदा समाजि‍क काज तँ बि‍र्ड़ो जकाँ उड़ैत चलैए। भरि‍सक सएह भेल। फेर‍ मनमे उठलैन, जँ किछु अधला बात उड़बे कएल तँ ओइ‍‍ संग घटनो उड़ल हएत। जखने घटना उड़ल हएत तखने विरोध स्‍वरूप चरचा भेल हएत। से तँ अधला नै भेल। ओ तँ नीके भेल। अन्‍यायक विरोध करब तँ धर्मक रक्षा करब छी। जहि‍ना अन्‍यायक विरोध केलासँ रामायणि‍क बालि‍मे दोबर शक्‍ति‍क संचार भऽ जाइ छल तहि‍ना तँ भरि‍सक ईहो भेल। अन्‍यायि‍क बीच जरूर दहसैत‍ बढ़ल हएत। ई तँ जिनगी-ले पैघ उपलब्‍धि‍ छी। मुस्‍की दैत दुर्गा-पूजाक घटल घटनाकेँ दोहरबैत प्रो. दयानन्‍द बजला- “सभ गाममे दस-बीसटा लुच्‍चा-लम्‍पट रहि‍ते अछि। जे सदि‍‍काल किछु-ने-किछु उकठ-पाकठ समाजमे करि‍ते रहैए, ताड़ी-दारू पीब अनेरे केकरो गरि‍यबैत रहैए। माए-बहि‍नकेँ देख पीहकारी भरैत रहैए‍। तेतबे नहि, झूठ-फूस‍ सिखा लकठी सेहो लगबैत रहैए। ओहन-ओहन वृत्ति‍ केनि‍हारक वृत्ति‍केँ रोकब समाजक दायि‍त्‍व बनि‍ जाइए किने। हमहूँ सएह केलौं। जँ दुर्गा-पूजामे रामेश्वरम् नै गेल रहि‍तौं तँ एहेन घटना थोड़े गाममे होइत। जइ गाममे हजारो बर्खसँ अनेको पीढ़ी-खुशीसँ रहैत आएल अछि‍ ओइ‍‍ गाममे एहेन-एहेन घटना भेने समाजमे आगि लगत आकि शान्‍ति‍ रहत। जाधैर‍‍ समाज शान्‍ति‍सँ नै रहत ताधैर‍‍ आगू-मुहेँ ससैर केना सकैए। यएह सभ सोचि‍ गाममे बैसार केलौं। बैसारेमे किछु चक-चुक भऽ गेलइ। समाजोकेँ धैनवाद दी जे गलत काजक विरोधमे एकजुट भऽ ठाढ़ भेल। मुदा गलतियो केनि‍हार तँ बेवस्‍थेक फूल-फड़ छी, तँए ओहो कमजोर नहि‍येँ अछि।” प्रोफेसर दयानन्‍दक बात सुनि प्रोफेसर कमलनाथ बजला- “देखि‍यौ, कोनो स्‍थानपर पहुँचैले रस्‍तो अनेक आ सवारियो अनेक तरहक होइ छै, मुदा चलनि‍हार जँ यएह सोचैत रहि‍ जाए जे ई नीक कि उ, तहन ओ पहुँच‍‍ केना सकैए? अपना इलाकाक दुर्भाग्‍य रहल अछि‍ जे विचारक क्षेत्रमे पैघ-पैघ वि‍चार कऽ लइ छी मुदा कर्मक बेर‍मे शि‍थि‍ल भऽ जाइ छी। कोनो विचार ताधैर‍‍ महत्तक नै बनत जाधैर‍‍ कर्मरूपमे नै औत। कहैले तँ सभ कियो अपना बच्‍चाकेँ सि‍खबै छैथ‍‍ जे बौआ अधला काज नै करिहेँ, मुदा केला पछाइत‍ गबदी मारि‍ दइ छैथ‍‍। ऐ‍सँ केना अधला काज मेटाएत। खएर जे किछु मुदा अहाँक प्रसन्नतासँ हमहूँ प्रसन्न छी। आगूक बात हेतइ। चलू।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 6539 3. नीन टुटिते दुखनीक मनमे, ओछाइनेपर उपकल- आइए दीयोबाती छी आ गाममे काली-पूजाक मेलो। बेटी मन पड़लै। एना कऽ श्‍यामाकेँ समाद देने छेलि‍ऐ जे एक दि‍न पहिनहि धि‍या-पुताकेँ नेने अबि‍हेँ, से कहाँ आएल‍। ओहो वेचारी की करत? अन-पानि‍ घरमे हेतै मुदा तीनू तूर जे मेला देखत तइले तँ दसो-बीस चाही। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे से नइ होइ तेकरो इंजाम ने करए पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरि‍यान नै भेल होइ। हँ, हँ, भरि‍सक सएह भेल हेतइ। ओना आइ भरि‍ अबैक समैयो छै, बेरो धरि‍ एबे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैआ नेने आएत मुदा जारैन‍‍ तँ नै आनत। अखन धरि‍ हमहूँ तँ जारैन‍‍क कोनो ओरि‍यान नहि‍येँ केलौं हेन। आब कहि‍या करब? भने मन पड़ि‍ गेल। सोचने छेलौं जे श्‍यामा औत तँ घर-अँगनाक काज सम्‍हारि‍ देत सेहो नहि‍येँ भेल। भरि‍ए दिनमे की सभ करब। घरो छछारैले अछि, ओलतियो ओहि‍ना पड़ल अछि। केना असगरे एते काज सम्‍हरत? ओलतीमे माटि‍ भरब, आकि घर छछारब आकि जारैन‍ आनब..? काज देख दुखनीकेँ अबूह लगि‍ गेलइ। अस-कताइत मने बि‍छानसँ उठि‍ ओलती देखलक। मुदा रौदि‍याह समए रहने माटि‍ देब जरूरी नै बुझि‍ पड़लै। काज हल्‍लुक होइत देख मनमे खुशी एलइ। ओलतीएमे ठाढ़ भऽ ओसार हियासलक। केतौ चुबाट नै देख सोचलक जे छछारबो जरूरी नहि‍येँ अछि। खाली बाढ़ैन‍‍सँ झोल-झार झाड़ि‍ देबइ। आरो मन हल्‍लुक भेलइ। मन हल्‍लुक होइते बाढ़ैन‍ लऽ घर-ओसारक झोल-झार झाड़ि‍, अँगनो बहारलक। बाढ़ैन‍‍ रखि‍ घैला नेने कलपर गेल‍। छाउरेसँ मुँह धोइ कुर्ड़ा कऽ घैल भरने आँगन आएल‍‍। पानि‍ पीब‍ तमाकुल नि‍कालि‍ सोचलक जे एकजुम खाइयो लेब आ दू जुम बान्‍हि‍ कऽ बाधो नेने जाएब। सएह केलक। ओना दुखनी पहि‍ने तमाकुल नै खाइ छलि‍, हुक्का पीबै छलि‍। मुदा जहि‍यासँ लबहदक मिल बन्न भेल तहि‍यासँ छूआ भेटनाइए बन्न भऽ गेल। जइसँ पीनी महग भऽ गेलइ। घर बन्न कऽ कान्‍हपर लग्‍गी नेने दुखनी मारन बाध वि‍दा भेल। बाधक अदहा भाग नि‍च्‍चाँ दि‍ससँ खेती होइत बाँकी ऊपर दिससँ गाछीए कलम अछि। बड़बड़ि‍या आमक गाछक नि‍च्‍चाँमे ठाढ़‍ भऽ सूखल ठहुरी सभ हियासए लगल‍। रौदि‍याह समए रहने मनसम्‍फे जारैन देखलक। जारैन देख मन चपचपा गेलइ। आँचरक खूट खोलि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ एक चुटकी मुँहमे लेलक आ फेर‍ बान्‍हि‍ लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते मन पड़लै जे ऊक बनबैले खढ़ कहाँ अछि! आन साल लोक आसि‍न-काति‍कमे खरहोरि‍ कटबै छेलै ओइमे सँ दू मुठ्ठी रखि‍ लइ छेलौं। जइसँ सालो भरि‍ बाढ़ैनो भऽ जाइ छेलए आ ऊको बना लइ छेलौं। मुदा जेहेन बाढ़ैन‍‍ चौड़काँटूक होइए तेहेन राड़ीक थोड़े होइए। मुदा हारल नटुआ की करत? तेते ने लोक बकरी पोसि‍ नेने अछि‍ जे केतौ एकोटा चौड़‍काँटू रहए दैत अछि। तहूमे तेहेन रौदि‍याह समए भेल जे घसवाह सभ चोरा-चोरा घासेमे काटि‍ खरहोरियो उपटा देलक। कथीक ऊक बनाएब? ऊक नै हएत तँ पावैन‍‍‍ केना हएत। गाम कि कोनो शहर-बजार छि‍ऐ जे ने लोक घरमे सीर-पाट रखैए आ ने ऊक फेड़ैए। सोझे छुरछुरी-फटक्कासँ पावैन‍‍‍ करैए। नजैर‍ खि‍रा खढ़ भँजि‍याबए लगल‍। भँजि‍यबैत गंगबापर नजैर‍ गेलइ। बुदबुदाएल- “त: अनेरे एते मन औनाइ छेलए। घरे लग पोखैर‍‍क महारपर खढ़क जाक लगौने अछि ओहीमे सँ लऽ आनब।” मुँहमे खैनी घुलि‍ते थूक फेकलक। खढ़क ओरि‍यान देख मन सनठीपर गेलइ। बिना सनठीए ऊक केना बनाएब? मनमे खौंझ उठलै। खौंझा कऽ बाजल‍‍- “सभ खेतबला पटुआ उबजौनाइ छोड़ि‍ देलक। आब अपनो ऊक बना लिअ। हमसब तँ सहजे गरीब छी, अपना खेत-पथार नै अछि। मुदा खेतोबला ऊक फेड़ि‍ लिअ! माल-जालकेँ ठेका-गरदामी बना लिअ! आनह आब बजारसँ कीनि कऽ प्‍लास्‍टि‍कक डोरी! अपने मालकेँ डोरीक रगड़ा लगतै, चमड़ी उड़तै आ माछी असाइ देतै, घा हेतै, मरतै। तखन बुझत जे पटुआ नै उबजेने केहेन भेल।” बजैत-बजैत दुखनीक तामस कमल। बिनु सनठीए जँ ऊक बनाइयो लेब तँ भोरमे सूप कथी लऽ कऽ बजाएब? लक्ष्‍मी दिन छी जँ सूप बजा दरि‍दराकेँ नै भगाएब तँ ओ किन्नौं भागत? अपने गप-सप्‍प करए लगल‍‍- “कोनो की हमरेटा सन्‍ठी नै हएत आकि गामेमे केकरो नै हेतै?” “अनका भेने हमरा की? कियो अपन दरि‍दरा भगौत आकि दोसराक?” “जँ कोनो जोगार कऽ सभ सन्‍ठीक ओरि‍यान कऽ लेत आ हमरा नै हएत तखन तँ सबहक भागि‍ जेतै आ हमरे रहि‍ जाएत!‍” दुनू हाथ माथपर लऽ सन्‍ठीक चि‍न्‍तामे दुखनी डुमि‍‍ गेल। रसे-रसे हूबा टुटए लगलै। मन औनाए लगलै। जहि‍ना कोनो भारी चीज आँगुरपर पड़ि‍ गेलासँ छटपटाइत तहि‍ना सन्‍ठीक सोगसँ दुखनीक मन छटपटाए लगलै। तरे-तर नजैर‍ गाममे टहलाबए लगल‍‍। एक बेर‍ टहला कऽ देखलक तँ केतौ ने सन्‍ठी अभरलै। फेर‍ दोहरा कऽ टहलेलक। फेर‍ ने केतौ अभरलै! मन कहै जे बिनु सन्‍ठीए ऊक अशुद्ध हएत। अशुद्ध ऊक गोसाँइक आगूमे केना फेड़ब। ओहो की बुझता। फेर‍ मनमे भेलै गरीब लोककेँ अहि‍ना सभ चीजक खगता रहै छै मुदा कहुना तँ जीविये लइए। देवतो-पि‍तरकेँ बुत्ता नै छैन‍ जे अपनो पावैन‍‍‍-ति‍हारक ओरि‍यान करता। सन्‍ठी ताकब छोड़ि‍ डि‍हबार स्‍थानक भागवत मन पड़लै। भागवत मनमे अबि‍‍ते महाभारतक कृष्‍णकेँ कुरुक्षेत्रमे शंख फुकैत देखलक। मुदा जखन व्‍यासजी अर्थ बुझबए लगलखि‍न कि तखने खैनी खाइक मन भेलइ। आँचरक खूटसँ खैनी नि‍कालि चुनबए लगल‍‍। अर्थ सुनबे ने केलक। भागवतक कम्‍मे बात छेलै, मनसँ नि‍‍कैल‍‍ गेलइ। फेर‍ सन्‍ठीएपर मन आबि गेलइ। पटुआक सन्‍ठीक बदला चन्नी आ सनैपर नजैर‍ पहुँचलै। सनै आ चन्नीपर नजैर‍ पहुँचते मने-मन अपसोच करए लगल‍ जे अनेरे गिरहत सभकेँ दुसलि‍ऐ। पटुआक खेती तँ वेपारी सबहक दुआरे छोड़लक। मेहनैतो आ लगतो लगा गिरहत सभ उबजबै छेलै आ वेपारी सभ गरदैन‍-कट्टी कऽ लइ छेलइ। नीक केलक जे पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। अपना जेते डोरी-पगहाक काज होइ छै ओ तँ सनैयो आ चन्नियोसँ कइए लइ छइ। मुदा वेपारियो सभकेँ भाभन्‍स कहाँ भेलइ। जहि‍ना गिरहतक गरदैन‍ काटि‍ धन ढेरि‍यौलक तहि‍ना प्‍लास्‍टि‍क आबि सभटा खा गेलइ। बड़का-बड़का करखन्ना सभ ओहि‍ना ढन-ढन करैए! चन्नी मन पड़ि‍ते दुखनीक मनमे खुशी उपकल। खूटसँ तमाकुल नि‍कालि‍-मुँहमे लेलक। पटुओ-सन्‍ठीसँ मोट-मोट सन्‍ठी चन्नीक होइ छइ। सूपो बजबैमे नीक हएत। खूब जोरसँ बजाएब जे दोसरे दिन दरि‍दरा पड़ा जाएत। चन्नी मन पड़ि‍ते घुरनापर नजैर‍ गेलइ। बान्‍हे कात खेतमे ओकरा खूब चन्नी भेल छेलइ। सोनो सुन्‍दर मुदा पटुआक सोन जकाँ सक्कत नै होइ छइ। खएर जे होइ छै मुदा काज तँ सम्‍हैर जाइ छै किने। घुरनाक घरवाली ऐछो बड़ आबेशी। जखने कहबै तखने बेसीए करि कऽ देत। जयललबाक बौह जकाँ धौंछ थोड़े अछि जे सोझोक वस्‍तु लाथ कऽ लेत। अनकर चीज लइ बेर‍मे धौंछीक मुँह केहेन मीठ भऽ जाइ छै, जेना मुहसँ मौध चुबैत होइ! भगवान करौ जे सभ चीज बि‍ला जाइ। तामसपर दुखनी सरापि तँ देलक मुदा लगले अफसोच करए लगल‍ जे अनेरे किए सरापि देलि‍ऐ..! कहुना भेलौं तँ माइए-पि‍ति‍याइन भेलौं किने? माइए-बापक सराप ने धिया-पुताकेँ पड़ै छइ। जेहेन चालि‍ रहतै तेहेन फल अपने हेतइ। बीस बर्खसँ कहि‍यो थूको फेकए गेलि‍ऐ। अपना आगिए-पानिए नि‍महै छी। ..आगि‍-पानि‍पर नजैर‍ पड़िते श्‍यामा मन पड़लै। एना कऽ समाद देने छेलि‍ऐ जे एक दि‍न पहि‍ने चलि‍ अबि‍हेँ। अनका जकाँ कि तूँ असगरे छेँ। हथिनी सनक सासु छेथुन तखन तोरा घरक कोन चि‍न्‍ता छौ। फेर‍ मनमे उठलै, लक्ष्‍मी पावैन‍‍‍ छी कि‍ने। सभ ने अपना-अपना घरमे पूजा करत। भरि‍सक तही दुआरे नै आएल‍‍। तमाकुल खाइक मन भेलइ। अँचराक खूट खोलि‍ तमाकुल देखलक तँ एक्के जुम बुझि‍ पड़लै। एक्के जुम देख सोचलक जे एकरे दू-जुम बना लेब। मुदा टुटल दाँतक गहमे तँ हराएले रहत। पछाइत‍‍ एक्के जुम बना मुँहमे लेलक। तमाकुल लइते बेटापर मन गेलइ। बेटा मन पड़ि‍ते दुखनी सोचए लगल‍‍ जे सालो भरि‍ परदेसमे नै रहत तँ कमाएत केतए? अन्‍दाजे मनमे एलै जे चारि‍-पाँच मास गेना भेल हेतइ। मुदा चारि‍-पाँच मास झुझुआन बुझि‍ पड़लै। फेर‍ मन पाड़ि‍ हिसाब जोड़ए लगल‍‍। ठेकना कऽ मन पाड़लक जे आसि‍नमे गेल रहए। हँ, हँ आसि‍नेमे! खान-पीन‍ चलैत रहइ। हमहूँ पोखैर‍‍मे तेल-खैर चढ़ा कऽ आएल रही। अखन काति‍क छी। अँइ, तब तँ बरखोसँ बेसी भऽ गेल। ओह! नै, पैछला आसि‍न नै छी किएक तँ ओकरा गेलापर नाइतक जन्‍म भेल। ओहो छौड़ा दौगैए। कहुना-कहुना दू बरख भेल हेतइ। आँगुरपर हिसाब जोड़ए लगल। दू बरख आ एक बरख तीन बरख ने भेल। तीन बरख मनमे अबि‍ते चौंक गेल। ने एकोटा पाइ पठौलक आ ने एको बेर आएल? मनमे खुशी उपकलै। छौड़ा फुटि‍ कऽ जुआन भऽ गेल हएत। कोनो कि खाइ-पीबैक दुख हेतइ। आब तँ चि‍न्‍हलो ने जाएत। दाढ़ी-मोँछ सेहो भऽ गेल हेतइ। औत तँ बि‍आहो कइए देबइ। असगरे नीक नै लगैए। बिनु धि‍या-पुताक अँगना कोनो अँगना छी। लोके ने लक्ष्‍मी छी। मगन भऽ दुखनी आँखि‍ बन्न कऽ अपन फड़ल-फुलाएल परि‍वार देखए लगल‍। जहि‍ना पोखैरमे नावपर चढ़ि‍ झि‍लहोरि खेला उतैर‍‍ कऽ महारपर अबैत तहि‍ना दुखनियोकेँ भेल। देखते वि‍चार बदलए लगलै। मनमे उठलै जे जँ कहीं छौड़ा ओनइ बि‍आह-तिआह कऽ नेने हुअए आ गाम नै आबए, तखन की करब? गामोमे तँ केते गोरेकेँ देखबे केलि‍ऐ हेन। अखन धरि‍क खुशीक मनमे एकाएक पानि‍ पड़ि‍ गेलइ। निराश मने सोचए लगल‍‍ जे जुगे-जमाना तेहेन भऽ गेल जे केकरा के की कहतै। आब केकरो बेटा-बेटी थोड़े पाँजमे रहै छइ। जेकरा जे मन फुरै छै से से करैए। छौड़ा सभ जहाँ बौह देखलक आकि माए-बाप बिसैर जाइए। मने उनैट‍ जाइ छइ। दुखनीक आँखि‍मे नोर ढबढबा गेल। आँचरसँ नोर पोछलक। नोर पोछि‍ते मनमे उठलै, जाबे पैरूख अछि‍ ताबे तक ने केकरो पमौजी केलि‍ऐ आ ने करबै। जइ दि‍न पैरूख घटि‍ जाएत तइ दि‍न बूझल जेतइ। जि‍नगियो तँ तहि‍ना अछि, कोनो कि ठीक अछि जे पैरूख घटलेपर मरब, पहि‍नौं मरि‍ सकै छी तइले सोगे की करब। बेटा जँ उरहैरिये जाएत तँ उरहैर‍ जा। बेटापर सँ नजैर‍ हटि‍ बेटीपर गेलइ। बेटीपर नजैर‍ पड़िते मनमे आशा जगलै। आशा जगि‍ते‍ मुँहमे हँसी एलइ। सात घर दुश्‍मनोकेँ भगवान हमरा सन बेटी देथुन। साक्षात् लक्ष्‍मी छी। अपने फेरल नुआ किए ने दि‍अए मुदा कहि‍यो ओढ़ैसँ पहि‍रै धरि‍ वस्‍त्रक दुख अखन तक भेल हेन। ओकरे परसादे तीनटा कम्‍मर घरमे अछि। जमाइयो तेहने छैथ‍‍ जे अपने माथपर उठा कऽ अन्नो-पानि‍ दइए जाइ छैथ‍‍। आश जगि‍ते‍ दुखनी जारैन तोड़ए उठल। आँखि‍ उठा गाछमे सूखल ठहुरी हि‍यासलक। रौदि‍याह समए भेने मनसम्‍फे सूखल ठहुरी गाछमे रहबे करइ। जारैन देख मन खुशीसँ नाचि‍ उठलै। मनमे गामक सुख नाचए लगलै। अखनो गाम गामे छी। शहर बजारमे तँ लोक जारैन‍‍ कीनैत-कीनैत तँ तबाह रहैए। मन पड़लै सिंहेश्वर स्‍थानक मेला। एक्के साँझ भानस केलौं तइमे दस रूपैआ जरनेमे चलि गेल। ई तँ गुण रहए जे सात-आठ गोरे रही जे सबे रूपैआ हिस्‍सा लगल। नै तँ सवा रूपैआक जारैन‍‍ चूल्हि‍‍ए पजारैमे लगि‍ जाइत। एक-सूरे दुखनी दूटा गाछमे लग्‍गीसँ ठहुरी तोड़लक। जारैन देख अबूह लगि‍ गेलै, जे कहुना-कहुना तँ पाँच बोझसँ बेसीए भऽ जाएत। उगहौ पड़त ने। घरो कि कोनो लगमे अछि। पाँच बेर‍ उघैत-उघैत दुपहर भऽ जाएत। मुदा भीरो हएत तँ कहुना-कहुना पनरह दि‍न नि‍चेनो रहब। फेर‍ मनमे उठलै जे जँ कहीं ऐ बीचमे श्‍यामा आबि गेल हएत तँ अँगने-अँगने खोज-पुछारि‍ करैत वौआइत हएत। मुदा छोड़ियो कऽ केना जाएब। सभटा लोक लाइए जाएत। से नइ तँ सभटाकेँ बोझ बान्‍हि‍ लइ छी आ एकटा लऽ कऽ जाएब। देखि‍यो सुनि‍ लेबइ। जँ नै आएल‍‍ हएत तँ सभटा उघिए लेब। ओना जँ आएल‍‍ हएत तँ कि ओहो मानत। दुनू माए-बेटी दुइए बेर‍मे उघि‍ लेब। मन असथि‍र होइते तमाकुल खाइक मन भेलइ। आँचरक खूटपर नजैर‍ पड़िते मन पड़लै जे तमाकुल तँ तखने सठि‍ गेल! मुदा पथार लगल जारैन देख मनमे एलै जे पावैन‍‍‍क दि‍न छी। बेसी अंहोंस-मंहोंस करब तँ सभ काज दुरि‍ भऽ जाएत। अँगनोमे मारि‍ते रास काज अछि। जारैन बि‍छैले उठल। गाछक चारू भाग नजैर‍ देलक तँ बीचमे एकटा घोरनक छत्ता सेहो खसल देखलक। छत्तासँ नि‍‍कैल‍‍-नि‍‍कैल‍‍ घोरन पसैर गेल। पाँखि‍बला घोरन देख दुखनी डरा गेल। बाप रे! ई तँ डकूबा घोरन छी, दुइयोटा काटत तँ पराणे लऽ लेत। मुदा छोड़ियो केना देबइ। से नइ तँ लग्‍गीएपर उठा कातमे फेक‍‍ जारैन बीछब। मुदा छोटका सभ तँ सौंसे पसैर गेल अछि। जीबठ बान्‍हि‍ छत्ताकेँ कातमे फेक‍ दुखनी जारैन बीछए लगल‍‍। फेर‍ मनमे एलै जे ठहुरियो तँ दू रंगक अछि। मोटको अछि आ पतरको अछि। से नइ तँ दुनूकेँ फुटा-फुटा रखि, बोझ बान्‍हब। सएह करए लगल। ठहुरी बिछते रहए कि मन पड़लै, हाय रे बा! बान्‍हब कथीपर, जुन्ना तँ ऐछे नहि। अग-दि‍गमे पड़ि‍ गेल। पहि‍ने जँ से मन पड़ैत तँ अँगनेसँ जुन्नो नेने अबि‍तौं मुदा सेहो ने मन रहल। छोड़ि‍ देबै तँ सभटा आने लऽ जाएत! एते बेर‍ उठि‍ गेल, किछु खेनौं ने छी। मुदा जारैन देख मनमे खुशी होइ जे कहुना-कहुना एक पनरहि‍या तँ चलबे करत। जँ दू-चारि‍ दि‍न आरो तोड़ि‍ लेब तँ भरि‍ जाड़क ओरि‍यान भऽ जाएत। आँखि‍ उठा घसबहि‍नी सभ दि‍स तकलक जे कि‍यो भेटत तँ ओकरे हाँसू लऽ कड़चीए नै तँ राड़ीए काटि‍ जुन्ना बना लेब। मुदा सेहो ने केकरो देखै छि‍ऐ। हिया कऽ करजान दि‍स विदा भेल। मुदा ओहो केराक सूखल डपोर तँ बिना हँसुए काटल नै हएत। करजान पहुँचते देखलक जे करजानबला केरा घौड़ काटि‍ भालैर‍ आ थम्‍होकेँ काटि‍ छोड़ि‍ देने अछि। जुन्ना देख दुखनीक मनमे खुशी भेलइ। पान-सातटा जुन्ना लऽ आबि बोझ बान्‍हलक। पाँच बोझ। चारू बोझ गाछे लग छोड़ि‍ एकटा नेने आँगन आएल‍‍। आँगन आबि सोचए लगल‍ जे किछु बना कऽ पहिने खा लइ छी। फेर‍ मनमे भेले जे जखने आँगनक काजमे ओझड़ाएब तखने जारैन बाधेमे रहि‍ जाएत। तत्-मत् करैत पानि‍ पीलक। घरसँ तमाकुल नि‍कालि‍ चुनबैत विदा भेल। पाँचो बोझ उघि‍ लेलक। काठी जकाँ डाँड़ो आ गरदैनो तानि‍ देलकै। देहो-हाथमे दरद हुअ लगलै। हाथो-पएर नै धोलक, ओसारेपर भुँइयेँमे ओंघरा गेल। थाकल-ठेहि‍याएल देह ओंघराइते नि‍न पड़ि‍ गेल। बेर‍ टगि‍ गेल। घरक छाहैर‍ अँगनामे दू हाथ ससैर गेल। डेढ़ि‍यापर सँ जोगि‍न्‍दर सोर पाड़ए लगल- “काकी, काकी?” दुखनीक नि‍न नै टुटल। डेढ़ि‍यापर सँ ससैर जोगि‍न्‍दर आँगन गेल तँ देखलक जे भुँइयेँमे काकी नि‍नभेर‍ अछि‍! फेर‍ बाजल- “काकी, काकी?” ठाढ़ भेल‍ जोगि‍न्‍दरक मनमे उठल जे हमहूँ तँ पाइएबला ऐठीन रहलौं मुदा सभ सुख-सुवि‍धा रहि‍तो ओकरा सभकेँ एहेन नि‍न कहाँ होइ छइ। देखै छी जे पेट खपटा जकाँ खलपट छै, भरि‍सक खेबो केने अछि कि नहि। तहूमे पएरो धूराएले देखै छि‍ऐ, भरि‍सक केतौसँ काज करि कऽ आएल‍‍ अछि। अखन जे घरक सभ कुछ उठा कियो लऽ जाइ तँ बुझबो ने करत। एकरा सबहक कोन दुनि‍याँ छइ। जहि‍ना चीनीक कीड़ाकेँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाए तँ ओ मरि‍ जाएत। जे सोभावि‍के छइ। मुदा की मि‍रचाइक कीड़ा चीनीमे जीब‍ सकत? विचि‍त्र स्‍थि‍ति जोगि‍न्‍दरक मनमे उठि‍ गेल। मुदा काजक धुमसाही वि‍चारक दुनि‍यासँ खिंच हड़बड़ा देलकै। फेर‍ काकी, काकीक अवाज देलक। मुदा नि‍न नै टुटल देख कपड़ाकेँ ओसारेपर रखि जोगिन्‍दर दुखनीक घुट्ठी दाबए लगल। घुट्ठी दाबि‍ते दुखनीक नि‍न टुटल। आँखि‍ मुननहि‍ बाजल- “अँइ गे शामा! काल्हि किए ने एलँह?” दुखनीक अवाज सुनि जोगि‍न्‍दरक मनमे भेल जे भरि‍सक काकी सपनाइए। घुट्ठीकेँ हिलबैत बाजल- “काकी, काकी..?” आँखि‍ खोलि‍ दुखनी उठि‍ कऽ बैसल। हाफी कऽ जोगि‍न्‍दर दिस तकलक। मुदा किछु बाजल नहि। मोटरी खोलि‍ जोगि‍न्‍दर जोड़ भरि‍ साड़ी, साया, एकटा आँगीक संग दसटा दसटकही आगूमे रखि‍ बाजल- “अखन धरि‍ काकी अहाँ नहेबो ने केलौं हेन।” जहि‍ना आम बि‍छनिहार गाछक नि‍च्‍चाँमे खसल आम देख उजगुजा जाइत, तहि‍ना दुखनी उजगुजाएल। बाजल‍- “बौआ, जारैन‍‍ नै छेलए वएह तोड़ए भि‍नसरे चलि‍ गेलौं। ओकरे सम्‍हारैत-सम्‍हारैत दुपहर भऽ गेल। किछु खेबो ने केने छी। अराम करए लगलौं आकि आँखि‍ लगि‍ गेल।” दुखनीक बात सुनि जोगि‍न्‍दर बाजल- “काकी, अखन धड़फड़ाएल छी तँए नै अँटकब। पूजा उसरला पछाइत‍ नि‍चेनसँ आबि आरो गप्‍पो करब आ कोनो कारोबार करैले मदैत सेहो कऽ देब। अखन मेला देखैले कपड़ो आ रूपैओ देलौं हेन। जाइ छी।” जोगि‍न्‍दर उठि‍ कऽ विदा भऽ गेल। मने-मन दुखनी हिसाब जोड़ए लगल‍‍ जे अदहा रूपैआक चाउर कीनि लेब आ अदहा हाथ-मुट्ठीमे रखि‍ लेब। मेला-ढेलाक समए छी, कखन कोन भूर फूटि‍ जाएत। फेर‍ मनमे एलै जे बेटियो तँ अबि‍ते हएत। ओहो चाउर अनबे करत। किएक तँ जखन अनदि‍नो नेने अबैए, अखन तँ सहजे पावैन‍‍‍ छी। दुनू नाइत-नाति‍न सेहो एबे करत। ओकरो हाथकेँ दू-चारि‍ रूपैआ नै देबै से केहेन हएत। हम केतबो गरीब किए ने छी मुदा नानी तँ छि‍ऐ। साड़ी खोलि‍ दुखनी देखए लगल‍। साड़ी देख बुदबुदाएल- “एहेन साड़ीक कोन काज अछि। कोनो कि नव-नौतारि‍ छी जे एहेन छपुआ पहि‍रब। ऐसँ नीक तँ तीनकाजू मारकि‍न दैत जे केतबो मारि‍-धूसि‍ कऽ पहिरतौं तैयो साल भरि‍ चलबे करैत। सायाक कोन काज अछि। आब तँ सहजे बुढ़ भेलौं। जहि‍या जुआन छेलौं तहि‍यो तँ डेढ़ीए पहि‍रै छेलौं। कोनो कि मँगै-ले गेल छेलि‍ऐ मुदा जखन घर पसि‍ कऽ दऽ गेल, तखन तँ जे देलक सएह नीक। बेटी एबे करत ओकरे पुरना लऽ लेब आ ई दऽ देबइ।” साड़ी-साया, आँगी समेट‍‍ कऽ रखि‍ दुखनी रूपैआ गनए लगल‍‍। फेर बुदबुदाएल- “सभटा दस-टकहीए छी। दसटा अछि। दसटा दसटकही कए बीस भेल।” दू-दूटा कऽ फुटा-फुटा रखि‍ गनलक। पाँच बीस भेल। मनमे खुशी एलइ। फेर लगले मनमे भेलै जे आइ पावैन‍‍क दि‍न छी अखन धरि‍ खेलौं हेन कहाँ। ‘सभ दि‍न खैहह पवनी‍ ललैहह!’ सएह भऽ गेल। मुदा भि‍नसरसँ तँ गाछीए-बिरछीमे रहलौं। सारा-गारा नंघलौं, बिना नहेने केना भानस करब? सुरूज दि‍स तकलक। माथसँ निच्‍चाँ देख सोचलक आइ उपासे कऽ लेब। जाबे नहा कऽ भानस करए लागब ताबे तँ साँझे पड़ि‍ जाएत। साँझमे लक्ष्‍मी पूजा करब आकि अपने खाए-पीअ लगब। तहूमे अखन धरि‍ ने खढ़ अनलौं आ ने सन्‍ठी। जाबे से नइ आनब ताबे ऊक केना बनाएब। दियारियो बनबए पड़त। करू तेलो आनए पड़त। घरमे जे तेल अछि ओ अँइठ भऽ गेल अछि, केना दियारीमे देबइ। काज देख दुखनीकेँ अबूह लगि‍ गेल। पावैन‍‍क सभ किछु बिसैर गेल। नजैर‍ बेटीपर गेलइ। बेटीपर नजैर‍ पहुँचते मनमे खौंझ उठले। बाजल- “एना कऽ समाद पठौलि‍ऐ, किए ने आएल‍?” दुखनी असमंजसमे पड़ि‍ गेल। तैबीच नवानीवाली बान्‍हेपर सँ सोर पाड़ि‍ बाजल‍- “काकी! काकी! दैया आगू अबैले कहलकैन‍ हेन। उत्तरबरि‍या पोखैर‍पर दुनू बच्‍चो आ मोटरियो लऽ कऽ बैसल छैन‍‍।” श्‍यामा-दे सुनि धड़फड़ा कऽ उठि‍ घरमे कपड़ा रखि‍ आँचरमे रूपैआ बान्‍हि‍ दुखनी विदा भेल‍। तीन‍-चारि‍टा धि‍या-पुता सेहो संग लगि‍ गेलैन‍। लग पहुँचते दुखनीकेँ श्‍यामा उठि‍ कऽ गोड़ लगलक। गोड़ लगैत बेटीपर तरैंग कऽ बाजल‍- “अँइ गे, तोरा जानक काज नै छौ जे एते लदने एलेहेँ?” माइक बातकेँ अनसून करैत श्‍यामा दुनू बच्‍चाकेँ कहलक- “नानीकेँ गोड़ लाग।” नातिनकेँ देख दुखनी जेना हरा गेल, सभ बात बि‍सैर गेल‍। आँचरक रूपैआ नि‍कालि‍ एक-एकटा दस-टकही दुनू बच्‍चाकेँ हाथमे दऽ बाँकी अस्‍सियो रूपैआ श्‍यामा दि‍स‍‍ बढ़ौलक। रूपैआ देख श्‍यामाक मनमे उठल। भरि‍सक बौआ पठौलके हेन। मुस्‍की दैत माएकेँ पुछलक- “बौआ पठेलकौ?” बौआक नाओं सुनि दुखनीक मन फेर‍ औना गेल। नजैर‍ बेटापर गेलइ। बेटापर नजैर‍ पहुँचते मनमे तामस उठलै। बाजल- “केतए छौड़ा हराएल-ढराएल अछि‍ तेकर कोन ठेकान। अखन धरि‍ ने कहि‍यो चि‍ट्ठी-पुरजी पठेलक आ ने एक्कोटा छि‍द्दी। ओम्‍हरे केतौ कोनो मौगी सने उरहैर गेल कि की, से की कोनो पता अछि।” माइक बात रोकैत श्‍यामा बाजल- “एना किए बजै छेँ। माए छीही कनी ठर-ठेकानसँ बजमेँ से नहि।” बेटीक बात सुनि माइक मन बेटासँ हटि‍ बेटीपर आबि गेल। बाजल‍- “दुनू बच्‍चो आ मोटरियोकेँ केना आनल भेलौ?” मुस्‍कियाइत श्‍यामा बाजल‍- “अपने एतए तक पहुँचा गेलखि‍न।” जमाए-दे सुनि दुखनी बाजल- “एक डेग आगू घर नै देखल छेलैन जे घुरि गेलैथ‍?” श्‍यामा- “नै माए, से बात नइ अछि। गाममे मेलो होइ छै किने आ पावैनो छि‍ऐ, तँए कहलखि‍न जे घरपर गेने ओझरा जाएब। चारि‍ थान माल असगरे माए बुते सम्‍हारल नै ने हेतइ। परसू एथुन।” परसू सुनि दुखनीक मन थीर भेल। छोटका बच्‍चाकेँ कोरामे लऽ जेठकीकेँ आगू करैत विदा भेल। घरसँ कनी पाछुए छल कि दच्‍छिनसँ एक गोरेकेँ अबैत दुनू गोरे देखलक। फुलपेन्‍ट-शर्ट पहिरने, मुदा कियो चि‍न्‍हलक नहि। बदलल चेहरा भुखनाक। भुखनो अँगने दि‍स‍‍सँ अबैत आ दुनू गोरे दुखनियोँ अँगने दि‍स बढ़ैत। घर लग आबि भुखना दुखनीकेँ कहलक- “माए।” ‘माए’ दुखनी सुनलक मुदा अनठि‍या बुझि‍ अनठा देलक। किछु बाजल नहि‍। मुदा श्‍यामा चीन्‍हि‍ गेल। बाजल‍- “बौआ हौ!” ‘बौआ’ सुनि दुखनियोँ चौंकली। ताधैर‍‍ भुखना लग आबि माएकेँ पएर छुबि‍ गोड़ लगलक। दुखनी अवाक् भऽ गेल‍। आँखि‍मे नोर ढबढबा गेलइ। निच्‍चासँ ऊपर धरि‍ भुखनाकेँ निंगहारए लगल। करेज दहैल‍ गेलइ। वामा बाँहि‍सँ नाति‍केँ दबने आ दहि‍ना तरहत्‍थीसँ आँखि‍ पोछि‍ विह्वल होइत बाजल- “आँइ रौ बौआ, तूँ तँ समरथ भऽ गेलेँ! चि‍न्‍हबे ने केलि‍यौ! आँगे-समांगे नीक रहै छेलँह कि‍ने। एते दि‍नपर किए एलँह। की बुझि‍ पड़ै छेलौ जे घरमे कियो ने अछि। कोनो कि हम मरि‍ गेलि‍यौ। रूपैआ नै कमेलँह तँ नै कमेलँह मुदा छुच्‍छो देहो तँ अबि‍तँह। अखन तँ हम अपने थेहगर छी।” श्‍यामाक माथ परहक मोटरी पकड़ैत भुखना बाजल- “दाइ, तोहर माथ अगि‍या गेल हेतौ। ला।” “नै-नै कथीले तूँ लेबह। आब कि अँगना कोनो बड़ दूर अछि।” मुदा बलजोरी भुखना बहिनक माथपर सँ मोटरी उतारि अपना माथपर लेलक। आद्र स्‍वरे दुखनी बाजल‍- “बौआ, रस्‍ता तँ भुखले आएल हेबह।” “नै गइ। खाइत-पीऐत एलौं की।” “बौआ, अँगनो गेल छेलहक आकि रस्‍तेसँ रस्‍ता छह?” “अँगनामे बेग रखि‍ देलि‍ऐ। घर बन्न देखलि‍ऐ तँ तमोरि‍यावाली भौजीकेँ पुछलि‍ऐ। वएह कहलैन जे दायकेँ आनए काकी आगू गेल छैथ‍‍।” भुखनाक बात सुनि‍ दुखनीकेँ तामस उठल। बाजल‍- “आँइ रौ छौड़ा, अँगना गेलेँ तँ गोसाँइकेँ गोड़ लगलेँ की नहि?” “घर बन्न देखलि‍ऐ तँ बेगकेँ ओसरेपर रखि तोरा तकैले विदा भेलौं।” “हम कोनो बिलेँत गेल छेलौं। ताबे तूँ हाथ-पएर धो कऽ अँगनेसँ गोसाँइकेँ गोड़ लागि लइतेँ से तोरा बुते नै होइतौ। जाबे हमरा तकैले एलेँ ताबे जँ कि‍यो बेग चोरा लेतौ, तब की करबीही।” “हमरा देखते मारे धि‍यो-पुतो आ जनीजा‍‍तियो सभ आबि गेल। ओते लोकमे के बेग चोरौत।” फुसफूसा कऽ माए बेटीकेँ पुछलक- “दाइ, कि‍छु खाइयोबला सनेस छौ। देखै छीही छौड़ाक मुँह केहेन सुखाएल छइ।” “हँ। असगरे दुआरे केते अनि‍ति‍यौ। पाँच गो दलि‍पुड़ी अछि।” “अच्‍छा, बड़बढ़ि‍याँ। हम तँ अखन धरि‍ नहेबो ने केलौं हेन।” “किए? पावैन‍‍क दि‍न छि‍ऐ तैयो ने नहेलेँ।” “छुट्टियो ने भेल। भि‍नसरेसँ जारैन‍‍क ओरि‍यानमे लगल छेलौं। बोझ उघैत-उघैत मन ठेहि‍या गेल। असकता गेलौं। ने भानसे केलौं आ ने नहेबो केलौं हेन। ओहि‍ना ओसारपर ओंघड़ेलौं कि नीन आबि गेल। जोगि‍न्‍दरा आबि कऽ उठौलक। नै तँ सूतले रहि‍तौं। देखही जे साँझ लगि‍चाएल जाइ छै, ने अखन तक ऊकक ओरि‍यान भेल हेन आ ने साँझ-वातीक।” आँगन अबि‍ते दुखनी-भुखनाकेँ कहलक- “बौआ, पहि‍ने पएर-हाथ धो कऽ सि‍रा आगूमे गोड़ लागह। तखन किछु करि‍हऽ।” भुखना सएह केलक। श्‍यामा सेहो घैलची लग जा घैला झूका एक चुरूक पानि‍ नि‍च्‍चाँ खसा ओइ‍‍मे दुनू पएरक तरबा भीजा ओसारेपर सँ गोसाँइकेँ गोड़ लगलक। सौंसे अँगना धि‍यो-पुतो आ जनीजा‍‍तियो सभ कच-बच करैत। छोटका बच्‍चा सभ फुटे काँइ-किचिर करैत। तैबीच जुगेसराक बेटा, रवि‍याक बेटाकेँ पाछूसँ पोनमे बिठुआ काटि‍ दोगे-दोग घुसैक गेल। छि‍लमि‍ला कऽ रवि‍याक बेटा पाछू तकलक तँ शि‍बुआक बेटीकेँ देखलक। भेले जे यएह छौड़ी बिठुआ कटलक। हाँइ-हाँइ कऽ दू मुक्का लगा देलकै। मुक्का लगि‍ते शि‍बुआक बेटी चि‍चि‍या कऽ कानए लगल‍। शि‍बुआक घरवाली सेहो पछबारि‍ कात ठाढ़ छलि‍। बेटीकेँ कनैत देख कोरामे उठबैत पुछलक। ओ छौड़ी रवि‍याक बेटा नाओं कहलक। ओकरो हरलै-ने-फुरलै ओइ‍‍ छौड़ाकेँ कान ऐंठि‍ एक थापर लगा देलकै। तखने रवि‍याक घरवाली सेहो अबै छल‍। बेटाकेँ देख पुछलक। ओंगरीक इशारासँ छौड़ा शि‍बुआक घरवालीकेँ देखा देलक। शि‍बुआक घरवालीकेँ देखैबते रवि‍याक घरवाली लगमे जा झोंट पकैड़‍ मुँहपर थूक फेक‍‍ देलक। सौंसे आँगन हड़-बि‍र्ड़ो मचि‍ गेल। एक दिस छोटका धि‍या-पुता डरे पड़ाए लगल, तँ दोसर दिस हल्‍ला सुनि-सुनि आन-आन अबौ लगल। दुखनीक बकारे बन्न। जहि‍ना-जहि‍ना शि‍बुआक घरवाली गारि‍ पढ़ै तहि‍ना-तहि‍ना रवि‍याक घरवाली उनटबैत जाइ। किए तँ, स्‍त्रीगणक झगड़ाक ई विशेषता अछि जे जे पाछू धरि‍ गरियौत ओकर जीत हेतइ। अँगनाक दृश्‍य देख भुखनो आ श्‍यामो दुनूक बाँहि‍ पकैड़‍-पकैड़‍ ठेल-ठालि‍ कऽ अपना-अपना अँगना दऽ आएल। भागलाहा धि‍या-पुता सभ पुन: आबए लगल। जनीजा‍‍तियो आ धि‍यो-पुतोमे पाटी बनि‍ गेल। किछु गोरे शिबुआक घरवालीक पक्ष लऽ कऽ आ किछु गोरे रवि‍याक घरवालीक पक्ष लऽ कऽ झगड़ाकेँ शान्‍त केलक। एक दोसराक दोख लगबैत अपना पक्षकेँ नि‍र्दोष साबि‍त करए लगल। मुदा जहि‍ना पोखैरमे गोला फेकलापर पानि‍मे हि‍लकोर उठैए जे धीरे-धीरे शान्‍त भऽ जाइत, तहि‍ना शान्‍त भऽ गेल। तत्-खनात तँ दुखनीक आँगन शान्‍त भऽ गेल। मुदा अँगनासँ बाहर रस्‍तो आ आनो-आनो जगहपर गुद-गुद-फुस-फुस होइते रहल। जहि‍ना कोनो गाम वा घरमे आगि‍ लगलापर पानि‍ देने मि‍झा जाइत मुदा आगि‍क गरमी रहबे करैत, तहि‍ना भेल। आन सभ तँ आँगनसँ नि‍कैल‍‍ गेल, शान्‍त भेल मुदा दुखनीक मनमे जेना एकाएक आगि पजैर गेलइ। श्‍यामा दि‍स देख जोर-जोरसँ बाजए लगल‍‍- “हम केकरो बजबैले गेल छेलि‍ऐ जे आबि पावैन‍क दि‍न अँगनामे झगड़ा केलक! पावैन‍ कि कोनो एक दि‍न-ले होइ छै‍ आकि सालो भरि‍ले होइए! सालो भरि‍ अँगनामे झगड़ा होइते रहत! तहूमे जे कियो डोरी बाँटि‍ घरक पछुऐत बान्‍हि देत तखन तँ आरो सालो भरि‍ झगड़ा होइते रहत!” माइक बोली बन्न करै दुआरे थोम-थाम लगबैत श्‍यामा बाजल- “अनेरे तूँ किए आफन तोड़ै छेँ। तोरा अँगनामे छेबे के करौ जे साल भरि‍ झगड़ा हेतौ।” बेटीक बात सुनि दुखनी दम कसलक। मुदा तैयो मनमे आगि‍ लगले रहलै। घरसँ बि‍‍छान नि‍कालि‍ श्‍यामा अँगनामे बि‍छा अपन मोटरी खोललक। एक धारा चाउर, सेर तीनिए-क खेसारीक दालि‍, पाँचटा दलि‍पुड़ी संगे अपनो आ बच्‍चो सबहक कपड़ा नि‍कालि‍ रखलक। पाँचो पुड़ीमे सँ दूटा भुखनाकेँ आ एकटा कऽ सरस-नि‍रस तोड़ि‍ दुनू बच्‍चाक हाथमे देलक। एकटा अपना-ले आ एकटा माए-ले फुटा कऽ रखलक। बैग खोलि‍ भुखना रूपैआक गड्डी नि‍कालि‍ माएकेँ दैत कहलक- “माए, यएह कमा कऽ अनलि‍यौ।” रूपैआ देख माइयो आ बहि‍नो बाजल- “झाँपह! झब-दे झाँपह! लोक देख लेतह!” रूपैआ झाँपि‍ भुखना दू जोड़ साड़ी, आँगी आ सायाक कपड़ाक संग दुनू बच्‍चा-ले शर्ट-पेन्‍ट नि‍कालि‍ आगूमे रखलक। कपड़ा देख दुखनी विस्‍मि‍त भऽ गेल। मने-मन सोचए लगल‍‍। जे ढहलेलो अछि‍ तैयो तँ बेटे धन छी। मन पड़लै पति‍। भगवान केकरो अधला करै छथि‍न। मने-मन पतिकेँ गोड़ लागि दुखनी बाजल- “अही दुनू बेटा-बेटीक आशपर ने अपन वएस गमा कऽ रहलौं। संतोखे गाछ ने मेवा फड़ै छइ।” माएकेँ वि‍स्‍मि‍त देख भुखना बि‍स्‍कुटक डिब्‍बा नि‍कालि‍ माइक हाथमे दैत बाजल- “माए! ई मक्‍खनबला बि‍स्‍कुट छी, तोरेले अनलि‍यौ हेन।” हाथमे बि‍स्‍कुटक डिब्‍बा लऽ उनटा-पुनटा कऽ दुखनी देखए लगल। दुनू बच्‍चो आ श्‍यामोक नजैर‍ डि‍ब्‍बापर अँटैक‍ गेल। तैबीच देहमे लगबैबला दूटा गमकौआ साबुन, दूटा कपड़ाक साबुन आ पौआही नारि‍यल तेलक डि‍ब्‍बा नि‍कालि‍ दुखनीक आगूमे रखलक। चीज-वौस देख दुखनीक मन उधि‍या गेल। मनमे हुअ लगलै जे अकासमे उड़ि‍ गेलौं आकि नरक-सँ-सरग चलि‍ गेलौं आकि सपना देखै छी। अपनाकेँ संयत करैत दुखनी बाजल- “पावैन‍‍क दि‍न छी, पहि‍ने सभ कियो खा लइ जाइ जाह। हम अखन नै खाएब। दि‍नो खटिआइए गेल अछि, आब साँझ-बाती दइए कऽ खाएब।” फेर मनमे एलै जे गोसाँइ डूमैपर अछि, अखन धरि‍ पावैन‍‍क तँ कोनो ओरि‍यान भेबे ने कएल! ने ऊक बनबैले खढ़-सन्‍ठी अनलौं, ने दियारी बनेलौं, ने दियारीक टेमी बनबैले साफ सुती कपड़ा तकलौं आ ने दोकानसँ तेले अनलौं। तहूमे दुनू भाए-बहि‍न आएल अछि‍, दुइयोटा तीमन-तरकारी नै करब से केहेन हएत। एक तँ लक्ष्‍मी पावैन‍‍ छी, तहूमे एते दि‍नपर छौड़ा आएल अछि‍! पुड़ी खा पानि‍ पीब‍ श्‍यामा माएकेँ कहलक- “चि‍कनी माटि‍ सानि‍ कऽ दियारी बना लइ छी। तूँ दोकानक काज झब-दे केने आ नै तँ किरि‍ण डुमलापर दोकानोक काज नै हेतौ। ओहो पूजा-पाठमे लगि‍ जाएत।” बेटीक बात सुनि दुखनी बाजल- “आँइ गइ दैया, दोकान-दौरीक काजमे ओझरा जाएब तँ खढ़-सन्‍ठी कखन आनि‍ ऊक बनाएब?” काजक भरमार देख भुखना माएकेँ कहलक- “तोँ दोसरे काज कर, हम दोकानक काज कऽ लइ छी।” बेटाक बात सुनि दुखनी बाजल- “अनठि‍या बुझि‍ दोकानबला ठकि‍ लेतौ!” माइक बात सुनि भुखनाकेँ हँसी लगल। मनमे उठलै- शहर-बजार घुमै छी हम आ गामक बनि‍याँ ठकि‍ लेत हमरे! मुदा किछु बाजल नहि। माएकेँ रोकैत श्‍यामा कहलक- “आब जे केकरो ऐठीन खढ़-सन्‍ठी मांगए जेबही से देतौ। पूजा बेर‍ भऽ गेलइ। काल्हिए किए ने मांगि‍ अनलेँ। नै तँ आइए दुपहरसँ पहिनहि मांगि‍ अनि‍तेँ। आब लोक अपन-अपन चीज-वौस समेट कऽ‍ घर आनत आकि तोरा खढ़-सन्‍ठी देतौ?” बेटीक बात सुनि दुखनी नि‍राश भऽ गेल। ऊकक आशा टुटि‍ गेलइ। बाजल- “हम तँ बुढ़ भेलौं। आब कि कोनो पावैन‍‍-ति‍हारक ठेकान रहैए।” माइक टुटल आशा देख श्‍यामा सम्‍हारैत बाजल- “खढ़-सन्‍ठी छोड़ि‍ दही। ऊक नै हएत तँ की हेतइ। गोसाँइ बाबाकेँ कहि‍ देबैन जे एते ति‍रोट भऽ गेल। नै पान तँ पानक डण्‍टियो सँ तँ पूजा करबे केलौं।” सामंजस करैत दुखनी बाजल- “अच्‍छा हो, खढ़-सन्‍ठी छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ। तूँ चि‍कनी माटि‍क दियारी बनाले। कनी रूखे कऽ माटि‍ सनिहेँ। नै तँ आब नै सुखतौ। दि‍नो खटि‍आइए गेल। रौदो ठंढा गेल। दोकानेक काज केने अबै छी।” तैबीच भुखना बाजल- “माए, तूँ अँगनेक काज सम्‍हार। दोकानक काज केने अबै छी।” “आँइ रौ, शुभ-शुभ कऽ तूँ गाम एलेहेँ, तोरा केना दोकान जाए देबौ। लोक की कहत?” “लोक की कहतौ?” “की कहत! तुरन्‍ते लोक खि‍धांस करए लगत जे फलनीक खापैड़‍ केहेन तबधल छै जे अखने बेटा परदेससँ एलै आ बेसाह अनैले दोकान पठौलक।” “कि‍यो ने किछु बाजत। कोनो अनकर काज छि‍ऐ जे कियो किछु बाजत। बाज कथी सबहक काज छौ?” “एक रूपैआक नून, दू गो तीमनो-तरकारी करब तँए पाँच रूपैआक करू तेल सेहो लऽ लि‍हेँ। आठ-अनाक जीर-मरीच, आठ-अनाक हरदी आ आठ-अनाक मि‍रचाइ सेहो लऽ लि‍हेँ। अल्‍लुओ घरमे नहि‍येँ अछि, तरैबला अल्‍लू सेहो लऽ लिहेँ। दूटा पापड़ो लऽ लि‍हेँ। आइ लक्ष्‍मी पूजा सेहो छी तँए आठ-अनाक मखान आ आठ-अनाक चीन्नी सेहो लाइए लि‍हेँ। आ हँ! भरि‍ राति‍ डि‍बि‍या जरत, तइले मटिया तेल थोड़े-कऽ लऽ लिहेँ।” “आरो किछु?” मन पाड़ि‍ दुखनी बाजल- “आब तँ लोक धुमनक धूपो देनाइ छोड़िए देलक तँए एकटा धुपकाठीए लाए लि‍हेँ।” श्‍यामा दियारी बनबैले चिक्कैन‍ माटि लोढ़ीसँ फोड़ए लगली। भुखना दोकान वि‍दा भेल। दुखनीक मन असथि‍र भेल। मन असथि‍र होइते बेटीकेँ कहलक- “बुच्‍ची, आब हम नहाइले जाइ छी। किरि‍णो लुकझुकाइए गेल।” “बौआ जे साड़ी अनलकौ सएह लऽ ले।” ‘बेटाक आनल साड़ी’ सुनि दुखनी जेना हरा गेल‍। मनमे नाचए लगलै बेटाक कीनल पहि‍ल साड़ी! जहि‍यासँ अपने मुइला तहि‍यासँ कहि‍यो नव साड़ीक नसीव नै भेल। ओना बेटी अपन पहि‍रल साड़ी साले-साल दइते रहल तँए कहि‍यो कपड़ाक दुख नहि‍येँ भेल...। रोडेक कि‍नछैरमे गाड़ल सरकारी कलपर दुखनी पहुँचल। कलपर पहुँचते मन पड़लै। साड़ी-लोटा कलेपर रखि‍ चोट्टे घुमि कऽ आँगन आबि बेटीकेँ कहलक- “दाइ, एकटा बात मन पड़ि‍ गेल। बिसैर जाइतौं तँए कहैले एलि‍यौ।” अकचकाइत श्‍यामा पुछलक- “कोन बात मन पड़लौ?” दुखनी बाजल- “बच्‍चा जे दोकानसँ औत तँ कहि‍ दिहैन जे ऐगला चौमास बिकरी अछि, दुइए कट्ठा छैहो। कीनि लेत। हमरा ने एक्कोटा घरसँ काज चलि जाइए मुदा नै ऐ साल तँ ओहू साल बि‍आह कइए देबइ। बाल-बच्‍चा हेतइ। लघियो करैले केतए जाएत। लोक बढ़ने मालो-जाल पोसबे करत, से केतए बान्‍हत।” श्‍यामा- “अच्‍छा जो, पहि‍ने नहाले। बौआ दोकानसँ आएत तँ मन पाड़ि‍ देबौ।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 4703 4. (क) आइ धरि‍क इति‍हासमे बँसपुराक एहेन रूप कहियो नै बनल छल जेहेन आइ देखैमे आबि रहल अछि। ओना किछु अनुभवी बुढ़-पुरानक कहब छैन‍ जे आइक बँसपुरा दोबरा कऽ बसल गाम छी। हुनका सबहक कथनानुसार करीब साइठ‍-सत्तैर‍ बरख पहि‍ने ऐ गाममे कोसी प्रवेश केलक। तइमे पहि‍ने जे गाम छल ओकर रूप-रेखा दोसर तरहक छेलइ। आइक जे मुख्‍य बस्‍ती अछि ओ पहि‍ने बाध छेलै आ जे बस्‍ती रहै ओ अखन बाध बनि‍ गेल अछि। जेकर अनेको परमान अखनो भेटैए। अखनो बाधमे केतौ-केतौ पि‍त्तैर‍ आ तामक बरतन भेट‍ जाइए। पहिलुका बस्‍तीमे गाछी-बि‍रछी भरपुर छेलइ। मुदा अखुनका जकाँ ने एते लोक आ ने एते परि‍वार। जखन पहि‍ल बेर कोसीक बाढ़ि‍ आएल तँ लोककेँ बि‍सवासे ने होइ जे कोसीक पानि‍ छी। मुदा किछु अनुभवी लोक पानि‍क रंग देख परेख‍ लेलैन‍। किएक तँ कमला पानि‍ जकाँ घोर-मट्ठा-मटि‍याएल पानि‍ नै रहइ। पाँकक कोनो दरसे नहि। पहि‍ल साल एतबेपर रहि‍ गेल। एक तोड़ बाढ़ि‍ आएल आ दस-बारह दि‍नक पछाइत‍ सटैक‍ गेलइ। दोहरा कऽ नै आएल। दोसर साल जे बाढ़ि‍ आएल ओ छोटकी धार जकाँ, नासी जकाँ गामक बीचो-बीच बना देलक। ओइ‍‍ साल गामक लोककेँ ई आभास नै भेलै जे एना धार गाममे बनि‍ जाएत। सभ गामेमे रहल। बाधक ऊँचका जमीनमे घर बना लेलक। केना नै बनबैत? एक तँ पुश्‍तैनी गामक सि‍नेह आ अपन सम्‍पैतो तँ छेलइ। छह मासक पछाइत‍ धार सुखि‍ गेल। मुदा उपजो-वाड़ी आ गाछो-बिरीछ अदहा-छिदहा भऽ गेल। किछु गोरेक मालो-जाल नष्‍ट भेल। अनरनेबा, धात्री, लताम, कटहर इत्‍यादि‍क गाछ उपैट‍ गेल, दूटा पोखैर‍ आ पाँचटा इनार धारक पेटमे समा गेल। जइसँ लोकक मनमे डर पैसए लगल। गामक माटि‍-पानि‍क सि‍नेह सेहो कम हुअ लगल। बि‍सवासू जि‍नगी अनि‍श्चि‍तता दि‍स बढ़ए लगल। किछु गोरे आन गाम जा बसैक बात सोचए लगल। मुदा जेकरा खेत-पथार रहै ओ करेजपर पाथर रखि‍ रहैले मजबूर भऽ गेल। तेसरा साल बाढ़ि‍ सभसँ भयंकर रूपमे आएल जइसँ गामक खेतो-पथारक रूप नष्‍ट भऽ गेल, गाछो-बिरीछ नष्‍ट भऽ गेल आ लोकोक जान अवग्रहमे फँसि‍ गेल। छातीमे मुक्का मारि‍ सभ गाम छोड़ि‍ देलक। सन्‍मुख कोसी गाम होइत बहए लगल। तीस बर्ख तक, एक रफ्तारमे बँसपुरा होइत कोसी बहैत रहल। गामक सभ आन-आन गाम जा बोनि‍हार बनि‍ गेल। जेकरा-जेतए जीबैक गर लगलै ओ ओतए चलि गेल। अधि‍कतर लोक नेपाल पकैड़‍ लेलक। जाधैर‍‍ लोककेँ अपना पूजी रहै छै ताधैर‍‍ ने किसान वा कारोबारी रहैए मुदा पूजी नष्‍ट भेने तँ खाली-हाथ बँचि‍ जाइए। बँसपुराक सभ बोनि‍हार बनि‍ गेल। कोसी एलासँ पूर्वक जे समाजि‍क सम्‍बन्‍ध बँसपुराक छल ओ राँइ-बाँइ भऽ गेल। पहिलुका समाज नष्‍ट भऽ गेल। बँसपुराक सभ सुख लोक बिसैर गेल। मातृभूमि केकरा कहै छै से बँसपुराक लोक-ले परि‍भषे मेटा गेल। मातृभूमि‍ आ दुनि‍याँमे की अन्‍तर अछि..? ...जँ जन्‍मभूमि‍केँ मातृभूमि‍ मानल जाए, तखन तँ ओकरा सबहक मातृभूमियेँ नष्‍ट भऽ गेलइ, जे सभ बँसपुरामे जन्‍म नेने छल। किए तँ ओ सभ आन-आन गाममे रहि‍ रहल अछि। जँ कहि‍यो फेर‍ बँसपुरा जगतै तँ ओ फेर‍ आबि देखत कि‍ने‍। तहि‍ना जे घुमि‍‍ कऽ औत ओ सभ तँ आने-आने ठाम जन्‍म नेने रहत, तहन ओकर मातृभूमि कोन भेलइ? जँ देशकेँ मातृभूमि‍ मानल जाए, तँ देशो वि‍भाजि‍त भऽ जाइ छइ। जे दू नाओं धारण कऽ लैत अछि, तहन तँ देशोकेँ केना मातृभूमि‍ मानल जाए? जँ से नहि, जइ धरतीपर लोक जन्‍म लैत अछि ओकरा मानल जाए, तँ दुनि‍याँक जेते देश अछि सभ धरतीएपर अछि तहन किए मातृभूमिकेँ छोट आकारमे मानै छी। किए ने दुनि‍याकेँ मातृभूमि‍ मानल जाए? कोसीक धार हटलापर जखन बँसपुरा जागल तँ रूपे बदैल‍ गेल। मुलाइम माटि‍ बाउल भऽ गेल। गाछ-बिरीछक जगह कास-पटेर, झौआ लऽ लेलक। अपन पुश्‍तैनी गाम बुझि‍ पुन: लोक सभ आबए लगल। ने केकरो जमीनक सबूत, खति‍यान-दस्‍ताबेज इत्‍यादि‍ रहलै आ ने जमीनक ठर-ठेकान। मुदा गाम तँ हेतइ। जहि‍ना अदौमे माने साबीकमे जंगल-झाड़ तोड़ि‍ लोक बसो-बास आ उपजाउ भूमि बनौलक आ रेन्‍ट फि‍क्‍स कऽ सरकारो जमीनक अधि‍कार देलकै, तहिना बनौल गाम बँसपुरा छी। जहि‍ना कहि‍यो बँसपुरा पानि‍सँ दहा गेल छल तहि‍ना पानि‍क अभाव गाममे भऽ गेल। ने एकोटा पोखैर‍-इनार रहल आ ने बाढ़ि‍क पानि‍ अबैत। पोखैर‍-इनार खुनब छोड़ि‍ लोक कलसँ पानि‍क काज चलबए लगल। बर्खा पानि‍सँ खेती हुअ लगलै। चापी जमीनकेँ बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ लोक पोखैरोक सेहन्‍ता मेटबए लगल। जइमे माछ-मखान, सिंगहार सेहो होइए। ओही बँसपुरामे आइ दि‍वालियो आ कालियो पूजाक उत्‍साह लोकक रग-रगमे दौग रहल अछि। आन-आन गामसँ अबैबला देखनि‍हार-ले, अपन सीमा भरिक चारू भागमे जेते टुटान-कटान छेलै सभकेँ भरि‍-भरि‍ कऽ गौंआँ-सभ सहीट बना देलक। जेतए केतौ बोन-झार छेलै सेहो सभ काटि‍-खोंटि साफ केलक। ओना सरकारो दि‍ससँ बान्‍ह-सड़कपर माटि‍ पड़ैत मुदा दूधक डाढ़ी जकाँ पड़ने बरसातमे भँसि‍ जाइत। जइसँ जहि‍नाक तहिना। मुदा ऐ बेर‍ गौंआँ अपन सम्‍पैत‍‍‍ बुझि‍ नीक जकाँ मरम्‍मत केलक। खाली बान्‍हे-सड़कटा धरि‍ नहि, गामक जेते पानि‍ पीबैक साधन अछि‍ सबहक मरम्‍मत सेहो केलक। ओना बैसाख-जेठ जकाँ लोक थोड़े पानि पीत‍ मुदा तैयो पानि‍ तँ पीबे करत। गाम-ले सभसँ आश्चर्य ई भेल जे एकाएक सभ अपन जि‍म्‍मा केना बुझलक। केवल पानियेँक प्रबंधटा नै पाहुन-परकसँ लऽ कऽ हराएल-भौथि‍आएल देखनि‍हार-ले सेहो रहैक बेवस्‍था केलक। जेकरा दुआर-दरबज्‍जा छै ओकर तँ कोनो बाते नहि, जेकरा नहि‍योँ छै, ओहो सभ सभ जोगार केलक। मोटका प्‍लास्‍टि‍क आनि‍-आनि‍ घरे जकाँ बना लेलक। सबहक मनमे गदगदी जे आबह केते पाहुन-परक अबैए। सुतैले मोथीक बिछान सेहो बेसीए कऽ कीनि-कीनि रखि‍ लेलक। अखन ने अनगौंआँ-ले कीनलक मुदा पूजाक पछाइत‍‍ तँ अपने सूतबो करत आ अन्नो-पानि‍ सुखौत। ओना जे मेला देखए औत ओ सूतत आकि मेला देखत। मुदा जे भरि‍ राति‍ मेला देखत ओ तँ दि‍नोमे सूतबे करत। रघुनाथोकेँ धैनवाद दिऐ जे खाइ-पीबैक सभ समान- चाउर, दालि‍, तरकारीसँ लऽ कऽ जारैन‍‍-काठी धरि‍क तेहेन कारोबार पसारि‍ लेलक जे केतबो लोक कीनत-बेसाहत तैयो ने सठतै। एक्के मेलाक कमाइमे ओहो धनि‍क भऽ जाएत। पूजियो तँ वएह ने लगौने अछि। तेहेन ओकर बोहुक बोली मीठ छै जे एक्कोटा गहिंकीकेँ घुमए देत। सदि‍खन दोकानमे भीड़ लगले रहै छइ। कहबियो छै ने, ‘जेकरा भगवान दइ छथिन छप्‍पर फारि‍ कऽ दइ छथि‍न।’ भने दोकान घरेपर केने अछि। जँ मेलामे केने रहैत तँ गौंआँकेँ समाजकेँ घीनेबे करैत, किएक तँ पाहुन-परकक सोझमे केना लोक चाउर-दालि‍ बेसाहत। मुदा आश्चर्य भेल। बाप रे! गाममे एते पाहुन-परक केना उनैट‍ कऽ चलि‍ आएल जे बुझि पड़ैत जेना केकरो कोनो अपना काजे नै छइ। तहूमे मरदक तिगुना स्‍त्रीगण आबि गेल। स्‍त्रीगणोमे बेसी ओहन जे पनरह-सँ-पच्‍चीस बर्खक अछि। सेहो एक मेलक आकि चालि‍-ढालि‍क रहैत तब ने, चारि‍-पाँच मेलक छइ। केना ने गामक हवामे खतरनाक कीड़ा फड़त। बम्‍बैया सभ जे अछि, ओ सि‍रि‍फ छौड़े-मारड़िटाकेँ थोड़े धरत, बुढ़ो-बुढ़ानुसकेँ धरबे करत। जहि‍ना कोनो अनठि‍या चि‍ड़ैकेँ गाममे एलासँ गामक सभ देखए जाइत तहि‍ना ने बम्‍बैइयो चि‍ड़ैकेँ देखत। मुदा नहि‍योँ देखत तँ अनुचि‍ते हएत किने। आखि‍र ओहो ओहन रूप किए बनौने अछि। लोके देखैले किने। जँ से नइ मनमे रहि‍तै तँ एहेन पाँखि‍ बनबैक काज कोन छेलइ। मनुख तँ मनुख छी कि‍ने? तइले एहेन हवा-मिठाइ बनैक कोन जरूरत‍ छइ। तहूमे जखन बनि‍ गेल आ लोक नै देखै तँ बनैक मोले की? मोल तँ तखने हेतै किने जखन लोक ओकरा निहारि-निहारि तर-ऊपर देखत। तँए की ओकर चरौर गाम-देहातमे नै छइ? जरूर छइ। बम्‍बईए कलाकार सभ ने गामोक लोककेँ सिनेमाक माध्‍यमसँ सि‍खौलकै हेन। लोकक मनो अजीब छइ। जँ कनियोँ ऊपर उड़त तँ बुझि‍ पड़ै छै जे जमीनक सभ किछु हम देखै छी मुदा हमरा कियो देखबे ने करैए! तहि‍ना ने जमीनो परहक लोककेँ बुझि‍ पड़ै छइ। मुदा भ्रम तँ दुनूकेँ छइ। ऊपर उड़नि‍हार जँ जमीनक ऊपरका भाग देखैए तँ जमीनो परहक ने ओकर नि‍चला भाग देखैए। चारि बजैत-बजैत मेला देखनिहारक भीड़ काली-स्‍थानमे उमड़ल। ओना बुढ़-बुढ़ानुस अपन-अपन घर-अँगनाक ओरि‍यानमे रहैथ। सिरपर सूर्यास्‍त होइते दीप जरौनाइसँ लऽ कऽ ऊक फेरनाइ सबहक सि‍रपर रहैन। मुदा आन गामसँ आएल लोककेँ कोन काज छैन‍,‍ ओ तँ मेले देखैले आएल छैथ‍‍। सभसँ खूबी तँ ई अछि जे मेला देखनि‍हारे मेला देखैक वस्‍तु बनि‍ गेल अछि। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍यक ऊपर जवाबदेही रहने सभ जी-जानसँ नि‍गरानीक संग-संग बेवस्‍थामे जुटल। सौंसे मेला पी-पाह होइत। ओना पूजाक प्रक्रि‍या नि‍शाँ राति‍मे शुरू हएत मुदा ओरि‍यान तँ पहिनहिसँ करए पड़त। एहेन नै ने जे एक दि‍स पूजा शुरू हएत आ दोसर दि‍स समान जुटले ने रहत। पूजा काल जइ वस्‍तुक जरूरत‍ हेतै ओ तखन बेवस्‍था करत। तँए पुजेगरियो आ पुरोहि‍तो अपन सभ वस्‍तु-पुरजीसँ मिला-मि‍ला सैंत-सैंत रखि रहल छला। ओना मेलाक आनन्‍द तँ तखन होइ छै जखन पूजा शुरू होइए‍‍। नाचो-तमाशा तँ तखनेसँ ने शुरू होइ छइ। मुदा तैयो सोलहन्नी नै तँ अदहो-छिदहो मेलाक आकर्षण तँ बढ़ि‍ए गेल छइ। सभसँ अजीब तँ ई भऽ गेल अछि‍ जे दर्शक गजपट भऽ गेल अछि। तेहेन ने बजारू रूप बनि गेल अछि जे लड़का-लड़कीक भेदे मेटा गेल छइ। चश्‍मा खोलि‍-खोलि‍ बुढ़ो-पुरान सभ आँखि‍ मलि‍-मलि‍ देखैत जे ई छौड़ा छी आकि छौड़ी। मुदा तैयो आँखि‍ ठीकसँ काजे नै कऽ रहल छैन‍‍। सभ अपन-अपन धुइन‍मे मस्‍त। तैबीच ‘फटाक’-‘फटाक’क अवाज हुअ लगलै। फटाक-फटाकक अवाज सुनि‍ सबहक कान ठाढ़ भेल। जे जेतै रहै ओ ओतैसँ अवाज अकानए लगल। मुदा दोकान-दौड़ी तइ ढंगसँ सजल रहै जे सोझहा-सोझही अवाज नि‍कलबे नै करैत रहइ। लगमे जे रहै ओ तँ अवाजो सुनै आ मारियो होइत देखइ। किछु लोक बाहरो दि‍स‍‍ भगै आ किछु लोक दौग-दौग एबो करइ। उत्तर दि‍ससँ देवन आ पच्‍छि‍मसँ मंगल सेहो दौड़ल आबि भीड़केँ चीरैत आगू पहुँचला। आगू पहुँचते देखलैन जे बीस-पच्‍चीस बर्खक दूटा छौड़ा चेस्‍टरक दोकानक आगूमे थापर-मुक्का कऽ रहल अछि। फाँटि देख देवनो आ मंगलो सहैम‍ गेला। तैबीच जोगि‍न्‍दर दौड़ल आबि दुनू हाथ धुमबैत, दुनू छौड़ाकेँ गट्टा पकैड़‍ मारि छोड़ौलक। हल्‍लो शान्‍त भेल। एकटा छौड़ाकेँ देवन पुछलखिन- “बौआ, अखन पूजा-पाठक समए छै, किए मारि केलह?” मुदा जइ छौड़ाकेँ देवन पुछलखिन ओ किछु विशेष मारि खेने रहए, तँए जाबत किछु बजै-बजै तइसँ पहिनहि दोसर बजए लगल, मुदा ओइ‍‍ छौड़ाकेँ चोहटैत जोगि‍न्‍दर बाजल- “तूँ चुप रहऽ। पहि‍ने जेकरा पुछलिऐ से बाजत।” मुदा जोगि‍न्‍दरक बातक असर एक्को पाइ ओइ‍‍ छौड़ापर नै भेलइ। दुनू गामक पाहुन। तँए बि‍कट संकट समि‍ति‍क सदस्‍यक बीच भऽ गेल। विचि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे सभ पड़ि‍ गेला। अधि‍कतर लड़को आ लड़कियो परदेसीए, तँए मारि‍क डर केकरो हेबे ने करैत। लड़की सभ जोर दैत बाजल‍- “ब्रेशि‍यरक दोकानपर लड़का सभकेँ अबैक कोन खगता छइ। ई तँ स्‍त्रीगणक सौदा छी?” मुदा लड़को सभ लड़कीक बात मानैले तैयार नहि। तेसर छौड़ा बाजल- “लड़कीक उपयोगक वस्‍तु छी एकर माने ई नै ने जे एकर जरूरत‍ लड़का सभकेँ नै छइ।” “लड़काकेँ की जरूरत‍ छइ?” एकटा लड़की पुछि देलकै। बाजल- “अपनो परि‍वार छै आ हितो-अपेक्षि‍‍त तँ छैहे।” लड़का-लड़कीक बीचक गप, गजपट होइत देख देवन कहलखिन- “अखन सभ शान्‍त हौउ। मेलाक पछाइत‍‍ एकर नि‍बटारा हएत। शान्‍तिसँ सभ मेला देखू।” सूर्यास्‍तक समए। सुरूज तँ पूर्ण-रूपेण नै डुमल मुदा नि‍च्‍चाँ उतैर‍‍ गेलासँ लोकक आँखि‍सँ ओझल भऽ गेल। गामक धि‍यो-पुतो आ चेतनो स्‍त्रीगण फुलडालीमे दियारी, सलाइ, अगरबत्ती आ खढ़क ऊक लऽ कऽ गामक जेते देवस्‍थान अछि‍, सभ दि‍स‍‍ विदा भेल। जेना धरोहि‍ लगि‍ गेल। कियो डि‍हबार स्‍थान दि‍स जाइत तँ कियो महादेव मन्‍दिर दि‍स। तहिना कियो धर्मराजक गहवर दि‍स तँ कियो हनुमानजीक स्‍थान दि‍स। गाममे पाँचेटा पुरना देवस्‍थान। छठम, काली स्‍थान बनबे कएल। ओना ठकुरवारी पहि‍ने बेकतीगत छल मुदा महंथजीक मुइलापर ओहो दसगरदे भऽ गेल। सभ स्‍थानमे दीप जरा, धुप दऽ सभ अपन-अपन आँगन आबि घर-आँगनमे दीप जरबैत माल-जालक थैर, इनार आ कलपर सेहो जरौलक। किछु गोरे कुम्‍हारक बनौल माटि‍क डिबि‍या तँ किछु गोरे दबाइ पि‍लहा शीशी सबहक डिबिया बना जरौलक। सौंसे गाम इजोतसँ जगमगा गेल। काली स्‍थानक चारू जेनरेटर चलए लगल। जइसँ अन्‍हरिया रहि‍तो गाम दि‍ने जकाँ भऽ गेल। ओना दि‍नमे मेघ जेते ऊपर रहैए‍, राति‍मे अन्‍हार दुआरे तेते निच्‍चाँ उतरल बुझाइए। दि‍वाली पावैन‍‍सँ गाम नि‍चेन भऽ गेल। स्‍त्रीगण सभ भानस-भात करैमे लगि‍ गेली। समए पाबि‍ पुरुख सभ मेले दि‍स टहैल‍ गेला। मेलाक आकर्षण देख किनको घरपर अबैक मने नै होइत रहैन‍। मुदा भरि‍ राति‍ तँ नाच-तमाशा चलि‍ते रहत, तँए बिना खेने-पीने रहबो कठि‍न बुझि‍ अपन-अपन घर-अँगनाक रस्‍ता धेलैन‍। काली- मण्‍डपमे पुजेगरी पूजाक ओरि‍यानमे व्‍यस्‍त छला। मुजफ्फरपुरक जेहने नाटक तेहने मंचो बनल। एहेन मंच, आइ धरि‍ ऐ इलाकाक लोक नै देखने रहैथ‍‍। जेहने फइल स्‍टेज तेहने सुन्‍दर-सुन्‍दर रंगीन परदो लगौल गेल रहइ। तेहने ऊँचगरो। केतबो देखनि‍हार रहत तैयो देखबे करत। अजीब ढंगसँ बिजलियो लगौल गेल। बजोक तेहने बेवस्‍था। मुजफ्फरपुरक मंचसँ कनियोँ उन्नैस वृन्‍दावनक रासक नहि। मुदा दुनूमे अन्‍तर साफ-साफ बुझि पड़ैत। जेहने आधुनि‍कताक प्रदर्शन मुजफ्फरपुरक स्‍टेज करैत, तेहने प्राचीनताक प्रदर्शन वृन्‍दावनक मंचसँ होइत। कौव्‍वालीक मंच तँ ओते लहटगर नै बुझि‍ पड़ैत मुदा मेल-फिमेलक दुनू स्‍टेज सटल रहने अपन आकर्षण बढ़ौने। महिंसोंथाक मलिनियाँ नाचक मंच सभसँ दब। मात्र चारि‍-पाँचटा चौकी नि‍च्‍चाँमे जोड़ने आ चारि‍टा खुट्टा गाड़ि‍ ऊपरमे आल रंगक चनवा आ एकटा परदा लगौने अछि। मंच दब रहि‍तो मलिनियाँ नाचक कलाकार सबहक मनमे वि‍शेष उत्‍साह, जे सभकेँ उखारि‍ देब। ओकरा सबहक मन गदगदाएल ऐ दुआरे रहै जे छुच्‍छे टीप-टापसँ काज चलै छइ। जे मौलिकता हमरा कलाकारमे अछि‍ से अनकामे नै छइ। संगे जेते देखनि‍हार हमर अछि, ओते दोसराक नै छइ। जहि‍ना बजारमे अनेको दोकान रहि‍तो सोना-चानी कीनिनि‍हार, सोने-चानीक दोकानपर पहुँचैए, किताब कीनिनिहार किताबे दोकानपर पहुँचैए, तहि‍ना ने नाचो-तमाशाक छइ। नअ बजैत-बजैत मंच सबहक आगू देखनि‍हारक ठट्ठ पड़ए लगल। केना ने पड़ैत? लगसँ देखब आ दूरसँ देखबमे अन्‍तर होइते छै किने। मुदा समि‍ति‍क सदस्‍य सभ वि‍चारि‍ नेने रहए जे आगूमे अनगौंआँकेँ बैसाएब। गौंआँ तँ ठाढ़ो-ठाढ़ पाछुओसँ देख सकैए‍। तहूमे अनगौंआँकेँ कोनो ठीके नै अछि‍ जे सभ दि‍न देखए एबे करत। मुदा गौंआँक तँ अपन मेला छि‍ऐ तँए एबे करत। कलाकार सभ मेक-अप करबो ने केने रहए आकि देखनि‍हार सभ पिक्की मारब शुरू केलक। केना नै मारैत? लोक देखैले आएल आकि बैसैले। कमसँ कम बजोबला सभ तँ मंचपर आबि सम बान्‍हऽ। समो बन्‍हैमे एकाध घन्‍टा लगबे ने करतै। पैसा लऽ कऽ आएल अछि कि कोनो मंगनियेँ आएल अछि जे समए ससरल जाइ छै आ अखन धरि‍ स्‍टेज खाली रखने अछि। जनसेवा दलक सदस्‍य सभ कखनो मंचपर जा कऽ शान्‍त करैत तँ कखनो मर्द-स्‍त्रीगणक गजपट भीड़केँ सुढ़ियबैत। चारू मंच बाजाक अवाजसँ गनगनाए लगल। देखनि‍हारोक मन बाजाक धूनमे शरबत बनए लगल। कियो मने-मन गुनगुनाए लगल तँ कियो हाथक ओंगरीसँ पोनोपर आ कियो-कियो ठेहुनोपर ताल मि‍लबए लगल। पूबसँ पुरबा हवाक संग एक चिड़की मेघ[4] उठल। हवाकेँ उठि‍ते देखनि‍हारक औल-बौल मन शान्‍त हुअ लगल। धीरे-धीरे हवो तेज होइत गेल। करि‍या मेघ सेहो नमहर हुअ लगल। एकाएकी तरेगन डुमए लगल। जेना-जेना वादल पसरैत गेल, तेना-तेना हवो तेज हुअ लगल। काली- मण्‍डपमे पुजेगरी घड़ी देख-देख पूजाक प्रक्रि‍याकेँ आगू बढ़बए लगला। माए-बहि‍न‍ गीत‍ शुरू केलैन‍। जोरसँ मेघ बोली देलक। हवो बिहाड़ि‍क रूप पकड़ए लगल। बुन्‍दा-बुन्‍दी पानि‍ पड़ए लगल। मुदा पानि‍क शंका केकरो मनमे नहि। किएक तँ रौदि‍याह समए रहने सभ नि‍श्चि‍‍न्‍त जे ऐ बेर मेघमे पानियेँ नै छै जे बरि‍सत। तहूमे जँ शुभ काजमे बुन्‍दा-बुन्‍दी हुअए तँ ओ आरो शुभ छी। तँए सबहक मन खुशी। मुदा पानि‍क बूनसँ मंचक आगूमे बैसल देखनि‍हार एका-एकी उठए लगल। तरतरा कऽ बर्खा शुरू भेल। बिजलोका सेहो तड़ाक-तड़ाक छि‍टकए लगल। जेते बिजलोका छि‍टकै तेते मेघो गरजए लगल। गामक लोक घर दि‍सक रस्‍ता धेलक। मुदा अनगौंआँ असमंजसमे पड़ि‍ गेल जे आब भीजबे करब। मुदा बिहाड़ि‍ तँ जान नै छोड़त। हारि कऽ अनगौंआँ स्‍टेजक ऊपरो आ तरोमे पहुँच‍‍ पानि‍सँ बँचैक गर अँटबए लगल। इंजन बिगड़ै दुआरे जेनरेटरबला जेनरेटर बन्न कऽ देलक। सौंसे मेला अन्‍हार पसैर गेल। जहि‍ना पानि‍ तहि‍ना बिहाड़ि‍ अपन भीमकाय रूप बना नाचए लगल। सौंसे मेला ‘साहोर-साहोर’क अवाज हुअ लगल। मुदा सुनैले ने बिहाड़ि‍ तैयार आ ने बर्खा। बिहारि‍ तँ उड़ि‍ कऽ पड़ा गेल मुदा मुसलाधार बर्खा सवा-घन्‍टा धरि‍ बरिसते रहल। दोकान सबहक छप्‍पर उड़ने सभ समान तीत‍-भीज‍ गेल। उड़बो कएल। केकरा के देखत। सभ अपने जान बँचबै पाछू पड़ल। तैकाल एकटा स्‍टेज दि‍ससँ कनै-कुहरैक अवाज उठल। तेते लोक स्‍टेजक ऊपर चढ़ि‍ गेल रहै जे बल्‍ले सभ टुटि‍ गेल, खसि‍ पड़ल! स्‍टेजक नि‍च्‍चाँमे जे लोक सभ बैसल रहइ ओकरा ऊपरेमे। केकरा की भेलै से तँ अन्‍हारमे देखियो ने पड़इ, मुदा कानै-कुहरैक अवाज निकलए लगल। छबेटा सिपाही ड्यूटीमे रहए। वएह वेचारा की करत। केकरा दोख लगाएत। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य आ सिपाही मिलि‍ गर लगौलक। देवन आ जोगि‍न्‍दर राती-राती पड़ा गेल। खेला-पीला पछाइत‍ सजना पिताकेँ कहलक- “बाउ, पाँच दिनक मेला छइ। एकदि‍ना रहैत तखन ने देखैक धड़फडियो रहैत से तँ नै अछि। सोल्‍होअना घर-आँगन छोड़ि‍ जाएबो उचि‍त नहि। किएक तँ जेते लोक मेला देखए आएत ओ सभ की कोनो मेलेटा देखए औत। कियो छौड़ा-छौड़ीक खेल करए औत, तँ कियो चोरी-चपाटी करए औत। के की करए औत से के कहलक। तँए अखन हम दुनू परानी जाइ छी आ अधरति‍यामे आबि तोरा उठा देबह, तखन तूँ जैहऽ।” बेटाक बात दुनियाँ लालकेँ जँचल। मने-मन मानि‍ लेलक। बेटो आ पतियोक बात सुनि तेतरी बाजल- “राति‍-विराति‍केँ देखए हम नै जाएब। साँझू पहरकेँ जाएब। काली-महरानीकेँ साँझो दऽ देबैन आ गोड़ो लागि‍ लेबैन।” माइक बात सुनि सजना किछु बाजल नहि। मेला देखए वि‍दा भेल। किछु कालक पछाइत‍‍ सजनाक पत्नी–सितिया– सेहो स्‍त्रीगणक संग गेल‍। पानि‍-बि‍हाड़ि‍ उठि‍ते सजना भागल। मुदा तैयो घर लग अबैत-अबैत नीक जकाँ भीज‍ गेल। अँगनाक पानि‍ जे नि‍कलैत रहै तैठाम डेढ़ि‍या लग आबि पिछैड़ कऽ खसि‍ पड़ल। सौंसे देह थालो लगि‍ गेलै आ ठेहुनमे चोटो लगलै। मुदा हूबापर उठि कऽ पानि‍मे थाल धोइ आँगन आएल। अखन धरि‍ ने दुनियाँ लाल सूतल छेलै आ ने तेतरी। किएक तँ हवा देख तेतरी चूल्हि‍ आ मालक घरक घूरक आगि‍ मिझा ओछाइनपर आएले रहए। हवाक रूखि‍ देख दुनियाँ लाल पत्नीकेँ कहलक- “तेहेन हवा अछि‍ जे भरि‍सक घरो ने ठाढ़ रहत। तहूमे एक्कोटा खुट्टा लकड़ीबला नै अछि। सभटा बाँसक अछि। बड़ गलती भेल जे चारि‍ए-टा खुट्टा बदललौं। सभ खुट्टाक जड़ि‍ सड़ि‍ गेल अछि।” तैबीच पछुऐतक तीनू पुरना खुट्टा कड़कड़ा कऽ टुटि‍ गेलइ, खाली नवका खुट्टा नै टुटलै। उत्तरबरि‍या-पुबरि‍या कोण सेहो लटैक गेलइ। मुदा खसलै नहि। जाड़सँ थरथराइत सजना ओसारपर आबि माएकेँ कहलक- “माए, भीज गेलौं। जाड़ो होइए। कनी लूँगी आ चद्दैर नि‍कालि‍ दे?” घरेसँ माए कहलकै- “भीज‍लेहे धोतीक खूटक पानि‍ गाड़ि‍ सौंसे देह पोछि‍ ले। लूँगी आ चद्दैर दइ छि‍यौ।” हाथक ओंगरी सजनाक कठुआएल। मुदा तैयो कहुना-कहुना कऽ धोतीक पानि‍ गाड़ि‍, अँगा नि‍कालि‍ सौंसे देह पोछलक। तेतरी डि‍बि‍या नेसए लगल। मुदा सलाइ सिमैस गेने बरबे ने कएल। अन्‍हारेमे हँथोरि‍-हँथोरि लुंगियो आ चद्दैरियो निकालि कऽ दैत बाजल- “घूरो कऽ दैति‍ऐ से सलाइए ने बरैए। तोंही टा एलँह आ कनि‍याँ?” “कहाँ केतौ देखलि‍ऐ। पानि‍क दुआरे केतौ अँटैक‍ गेल हएत।” दुनू माय-पूत गप-सप्‍प करि‍ते रहए आकि रूप लालक घर कड़कड़ा कऽ खसल। रूप लाल दुनियाँ लालक छोट भाए। रूप लाल घरेमे रहए। दू-चारी घर। घरक दुनू चारक ओलती माटि‍ पकैड़‍ लेलक आ दुनूक मठौठ ठाढ़े रहलै। पजराक दुनू टाट टुटि‍ कऽ लीब‍ गेल, दुनू भाग घेरने रहल। ओइ बीचमे दुबकल रूप लालक जान जीवन-मृत्‍युक बीच अवग्रहमे पड़ल रहइ। खूब जोर-जोरसँ हल्‍ला करए लगल, मुदा झाँट-पानि‍क दुआरे कियो सुनबे ने करइ। एक तँ झाँट-पानि‍, दोसर बान्‍हल-घेराएल अवाज सुनबो केना करैत। किछु कालक पछाइत‍ मुनेसरी, जे दोसर घरमे रहए, सुनलक। अवाज सुनि‍ते मुनेसरी केबाड़ खोलि‍ ओसारपर आएल‍‍ कि बिजलोकाक इजोतमे घर खसल देखलक। खसल घर देखते बेटोकेँ उठौलक। दुनू गोरे जोर-जोरसँ हल्‍ला करए लगल। मुनेसरीक अवाज सुनि दुनियाँ लाल सजनाकेँ कहलक- “रौ सजना, रूपललबाक घर खसि‍ पड़लै। दौग कऽ जो, देखही जे कियो दबेबो केलै?” जाड़सँ कठुआएल सजनाकेँ बर्खामे नि‍कलैत अबूह लगइ। मुदा की करैत। मनमे द्वन्‍द्व सेहो उठि‍ गेलइ। एक दिस पि‍त्तीक मोह, आ दोसर दिस पि‍ति‍याइनि‍क बेवहारसँ कुपि‍त मन। मुदा एहेन समैमे तँ जानक प्रश्‍न अछि। दोस्‍ती-दुश्‍मनी तँ जीबैतमे रहै छइ। मन मसोसि‍ कऽ सजना लूँगीक फाँड़ बान्‍हि‍ नि‍कलल। हवो कमि‍ गेल, मुदा बर्खा होइते रहइ। पाछूसँ दुनियाँ लाल आ तेतरियो गेल। रूप लालक दछि‍नबरि‍या घर खसल रहइ। सजना पि‍ति‍याइनकेँ कहलक- “काकी, एकटा इजोत आ हँसुआ नेने आउ। जाबे नीक-नाहाँति‍ देख नै लेब ताबे केना किछु करब।” हाँसू नि‍कालि‍ कऽ दैत पि‍ति‍याइन बाजल- “बौआ, चोरबत्ती तँ पि‍त्तीए लग अछि।” हाँसू लैत सजना जोरसँ बाजल- “कक्का हौ, कनी टॉर्चक इजोत दहक?” घरक तरसँ रूप लाल बाजल- “चोरबत्ती तँ सि‍रमे लग रखने छेलौं। ठाठक तरमे पड़ि‍ गेल अछि।” “चोटो-तोटो लगलह?” “नै बौआ।” “अच्‍छा, तूँ चि‍न्‍ता नै करह। हवो कम भेल आ बुन्नियोँ पतड़ाएल जाइए।” सजनाकेँ बुझबैत दुनियाँ लाल कहलक- “बौआ, धड़फड़ नै करह।” हाथक इशारा दैत भावौकेँ- “कनि‍याँ डि‍बि‍या नेसू।” मुनेसरी डि‍बि‍या नेसलक। इजोत होइते दुनि‍याँ लालो आ सजनोँ टाट हटबैक गर अँटबए लगल। ओलतीक खुट्टा जे टुटि‍ कऽ कात भऽ गेल रहै, ओकरा टाट देने घोसि‍यबैत कहलक- “कक्का, ऐ दुनू टोनकेँ पकैड़‍ दुनू ठाठमे सोंगर लगा दहक। जइसँ ठाठ एमहर-ओमहर नै डोलतह।” एकाएकी दुनू सोंगर दुनू ठाठमे रूप लाल लगौलक। सोंगर लगि‍ते सबहक मनमे खुशी एलइ। सजनाकेँ दुनियाँ लाल कहलक- “सौंसे टाट हटबैक जरूरत‍ अखन नै छौ। दोग जकाँ बना पहि‍ने आदमीकेँ बँचा, तखन बूझल जेतइ।” हाँसूसँ तीन‍-चारि‍टा टाटक बनहन काटि‍ सजना दोग जकाँ बनौलक। दोग बनि‍ते रूप लाल बाजल- “बौआ, नि‍कलै जोकर भऽ गेल। तूँ दुनू हाथे दुनू ठाठकेँ पकड़ने रहह।” घरसँ नि‍‍कैल‍‍ते दुनियाँ लालक पएर पकैड़‍ रूप लाल कनैत बाजल- “भैया, अपन समांग दुनि‍याँमे सभसँ पैघ होइ छइ। अखन जे तूँ दुनू बापूत नै रहितह तँ घरेमे मरि‍ जैतौं।” भरोष दैत दुनियाँ लाल कहलक- “एना ढहलेल जकाँ किए बजै छेँ। अपन-बीरान लोक अपने बनबैए। तूँ तँ जानियेँ कऽ छोट भाए छँह। समाज बड़ीटा होइ छइ। गरीब लोक कोनो सुखे जीबैए। तखन तँ जाबे दुनि‍याँक दाना-पानी लिखल रहै छै ताबे काहियो काटि‍ कऽ जीबे करैए। मन थीर कर। जे होइ कऽ छेलै से भेलइ। थरथर किए कँपै छेँ?” मुदा दुनियाँ लालक बातक असर दुनू परानी रूप लालपर नहि‍येँ जकाँ पड़ल। भीतरसँ करेज डोलैत रहइ। मनमे होइ जे फेर‍ ने घरक तरमे दबा जाइ। आँगन डेरौन लागए लगलै। जेना किछु झपटैत होइ तहि‍ना बुझि‍ पड़इ। मिरमि‍रा कऽ रूप लाल बाजल- “भैया, होइए जे सुति‍ रहब तँ फेर‍ दोसरो घर खसि‍ पड़त।” दुनियाँ लालक मनमे एलै जे भरि‍सक डरे एना होइ छइ। बोल-भरोस दैत कहलकै- “घर तँ गि‍रमा-गि‍रि‍ये पड़लौ। आब कि दोहरा कऽ खसतौ। जे घर बँचल छौ ओकर भीत मजगूत छै, ओ थोड़े खसत। तहूमे झाँटो-पानि‍ बन्ने भेल। नै तँ चल हमरे लग सुति‍हेँ। कनि‍याकेँ पुछि‍ लहुन जे घरमे सूतब आकि अहूँकेँ डर होइए। जँ डर होइ छैन तँ सजने माए लग सुति रहती।” दुनियाँ लालक वि‍चार सुनि रूप लाल बाजल- “भैया, सगरे देह झोल-झाल आ थाल-कादो लगि‍ गेल अछि। ओकरा पहि‍ने धुअ पड़त।” ओना सभकेँ थाल-कोदो लगल रहइ। सभ कियो कलपर जा सगरे देह धोलक। कलपर सँ आबि मुनेसरी घर बन्न केलक। दुनू माय-पूत तेतरीक संग आ रूप लाल दुनियाँ लालक संग धेलक। पुबरि‍या घरमे दुनियाँ लाल भुँइयेँमे ओछाइन ओछौने रहए। चौकी नै रहइ। ओछाइनपर बैस सि‍रमा तरसँ चुनौटी नि‍कालि‍ रूप लालकेँ दैत बाजल- “पहि‍ने तमाकुल चुना।” सकरीकट तमाकुलक डाँट बिछैत रूप लाल बाजल- “भैया, आइ तँ मरि‍ गेल रहि‍तौं। जेना हड़हड़ा कऽ घर खसल तेना जँ ओछाइन छोड़ि‍ सतरकी नै करि‍तौं तँ चाहे मरि‍ जैतौं नै तँ अंग-भंग भऽ गेल रहि‍तए। मुदा माए-बापक धर्मे कुशप-कलेप नै लगल। नै तँ दुनि‍याँ अन्‍हार भऽ जाइत।” रूप लालक वि‍चारकेँ अँकैत दुनियाँ लाल बाजल- “ई देहे तँ कुम्‍हारक बनौल काँच बरतन जकाँ अछि। जहि‍ना कँचका बरतन एकरत्ती धक्का लगने फुटि जाइए, तहि‍ना ने देहो छी। मुदा से लोक बि‍सैर दँति‍या कऽ पकड़ने रहैए। जँ ई बात सभ बुझि‍ जाए जे जि‍नगीक कोनो ठेकान नै अछि,‍ तखन अनेरे किए झूठो-फूस बाजत आ अधला-सँ-अधला काजो करत। तँए जेतबे दि‍न जीबै छी ओतबे दि‍न इमानदारीसँ कमा कऽ पेटो भरी आ जहाँ धरि‍ भऽ सकए,‍ अनको उपकार करि‍ऐ। उपकारे ने धर्मो छी आ मुइला पछातिक जिनगियो जि‍नगी छी।” मुँह बाबि‍ रूप लाल पुछलक- “भैया, फेरोसँ एक बेर कहक। ठीकसँ नै बुझलौं।” रूप लालक प्रश्‍न सुनि‍ दुनियाँ लाल मने-मन सोचए लगल जे भरि‍सक एकरा ज्ञानक उदए भेल जा रहल छइ। ओना, कोनो बेर पड़लापर अहि‍ना लोकक मनमे नीक वि‍चार जगै छै, लगले रूकियो जाइ छै...। रूप लालकेँ बुझबैत दुनियाँ लाल बाजल- “बौआ, अगर जँ लोक ई बुझि‍ जाए जे ऐ देहक कोनो ठेकान नै अछि। कखन छी कखन नै छी, तइले केकरो बेजए किए करबै। आ ओइ हि‍साबसे अपन चालि सुधारि‍ लि‍अए तखन केकरो अधला हेतइ। एक तँ ओहि‍ना लोक‍ समस्‍या सभसँ रेजानि‍स-रेजानि‍स रहैए‍, तैपर सदि‍‍काल लोको किछु-ने-किछु गड़बड़ करि‍ते रहै छइ। केना कियो कखनो चैनसँ रहत। तोंही कह जे केहेन बढ़ि‍याँ दुनू भाँइ जखन जड़मे छेलौं तखन तोरा कोनो भार छेलौ? खाली संग मि‍लि‍ कमाइ छेलँह। आकि नहि? तखन भीने किए भेलँह। जखन भीन भेलँह तखन जँ किछु कहि‍ति‍यौ तँ कनि‍याँ कहिथुन जे भैया घर फुटबै छैथ‍‍। तहूले झगड़ा होइतौ। तइमे नीक ने जे भरमे-सरम मुँह बन्न केने रहलौं। तहूँ बात थोड़े सुनि‍तेँ। जे कनि‍याँ कहि‍थुन सएह मानितेँ। ई की कोनो हमरे-तोरेमे होइए से तँ नहि, सभकेँ यएह गति‍ छइ।” पछबरि‍या घरमे तेतरी सुतैत। पुबरिया झटक भेने सौंसे ओसारो आ मुँह सोझे घरोमे पच-पच करैत। मुदा तैयो तेतरी चूल्हि‍क छाउर छीट‍ घरकेँ रूख बनौलक। जेठ रहि‍तो वेचारी मुँह-सच्‍च मुदा छोट रहि‍तो मुनेसरी मुँहजोर। सदि‍खन अपन बात दोसरपर चढ़ाइए कऽ रखैत। जइसँ जखन कखनो दुनू दियादि‍नीमे कोनो गप होइ तँ मुनेसरी चोहैट‍ लइ। मुदा आइ बि‍लमे जाइत साँप जकाँ मुनेसरीक मन सोझ भऽ गेल। जेना सभ ताउ मरि‍ गेलइ। हत्‍याराक खूनमे ताधैर‍‍ गरमी रहै छै जाधैर‍‍ फाँसीपर नै लटकैए‍। मुदा जहिना फाँसीपर लटैकते सवितासँ सुरूजक उदए जकाँ ज्ञानक उदए होइए तहि‍ना आइ मुनेसरियोकेँ भेल। तेतरियेक बिछानपर दुनू माय-पूत मुनेसरियो सूतल। दुनियाँ लालक बात सुनि रूप लाल गुम्‍म भऽ गेल। एक तँ दुनियाँ लालक वि‍चार रूप लालक मनकेँ झकझोड़ि देलकै, तैपर सँ गि‍रल घरक सोग सेहो दबनहि रहलै। कनी काल गुम्‍म रहि‍ मुड़ी डोलबैत बाजल- “हँ, ई तँ सत्ते कहलह भैया।” अपन किरदानीपर पचताइत देख दुनियाँ लाल बाजल- “आब तोंही कह जे जखन दुनू भाँइ एकठाम छेलौं तखन तोरा घरक कोनो भार छेलौ। जानियेँ कऽ तँ गरीब घरमे अपना सबहक जनम भेल अछि। केहेन बढ़ि‍याँ दुनू भाँइ संगे बोइन-बुत्ता करै छेलौं आ मिलानसँ रहै छेलौं। अपना केते खेते अछि। लऽ दऽ कऽ सात-सात कट्ठा बाधमे आ घराड़ी अछि। जेकरा बीघा-बीघे छै ओकरो हजार टा भूर सदि‍काल फूटले रहै छै, जइसँ मन घोर-घोर भेल रहै छइ। जेकरा नै छै ओ तँ सहजे भूरेमे घोंसियाएल रहैए‍।” दुनियाँ लालक वि‍चार सुनि रूप लालक मन केराक भालैर‍‍ जकाँ डोलए लगलै। ढेरो प्रश्‍न मनमे उठए लगलै। बेवसीक स्‍वरमे बाजल- “की नीक, की अधला से बुझबे ने करै छी। लोकक मुहेँ जे सुनै छी से मानि‍ करै छी।” रूप लालक हारल मन देख दुनियाँ लालक मन वि‍चारक रस्‍तापर आबि अँटैक‍ गेल। मनमे हुअ लगलै जे की‍ कहि‍ऐ। एक दि‍स भाइक ममता दबैत रहै आ दोसर दि‍स स्‍त्रीगणक झगड़ासँ मन अकच्‍छ छेलइ। बिना किछु बजनहि, दयासँ भरल दुनियाँ लालक आँखि रूप लालकेँ पढ़ए लगल...। पछबरिया घरमे दुनू दियादनी, एक वामा करे आ दोसर दहि‍ना करे पड़ल छेली। बीचमे मुनेसरीक बेटा चीते पड़ल रहए। दुनूक मनकेँ पानि‍-बिहाड़ि‍क घटना दबने छेलइ। जइसँ नीन नि‍पत्ता रहइ। अनासुरती मुनेसरीकेँ नैहरक एकटा घटना मन पड़लै। घटना मनमे अबि‍ते बाजल- “तेसराँ, हमरा नैहरमे एक गोरेक घर अहि‍ना बिहाड़ि‍मे खसि‍ पड़लै। घरवारी घरेमे रहए। वेचाराकेँ चोटो खूम लगलै। डेनो टुटि‍ गेलै आ कपारो फुटि‍ गेलइ। मुदा रहए कपारक जोरगर जे मरल नहि। कपारक घा तँ छूटि‍ गेलै मुदा डेन नै जुटलै। ओहि‍ना लर-लर करइ। बड़ कष्‍ट वेचाराकेँ होइ छइ। अपना खेत-पथार नै रहने बोइन करै छेलइ, मुदा समांग खसने बोहुओ छोड़ि‍ कऽ पड़ा गेलइ। हारि‍-थाकि कऽ वेचारा भीख मंगैए।” मुनेसरीक कथा सुनि‍ तेतरीक मनमे दया उपकल। दुनूक मन आरो डरा गेल। जहिना‍ कठि‍यारीसँ घुमै बेर सभ ‘राम-राम सत् है, सबका यही गति‍ है’, बजैत आँगन अबैए, तहि‍ना तेतरियोकेँ नैहरक घटना मन पड़ल। बाजल- “एक बेर‍ हमरो नैहरमे बड़का बाढ़ि‍ आएल रहइ। एहेन बाढ़ि‍ कहि‍यो ने देख‍‍ने रहि‍ऐ। जलखै बेर‍मे एक गोरे बजलै जे बाढ़ि‍ अबै छै, रोटी पकबैत रही, माए घास करए गेल रहए, रोटी पकाएलो ने भेल आकि घर लग पानि‍ चलि‍ आएल। चूल्हि‍ तरसँ उठि‍ बान्‍हपर गेलौं आकि देखलि‍ऐ जे चानी जकाँ बाढ़ि‍ पीटने अबैए! धाँइ-धाँइ भीतघर सभ खसए लगलै। लूटना बाध गेल रहए। बाधेसँ दौड़ल आबि घर पैसल। चाउरक कोठीमे लत्तामे बान्‍हि‍ कऽ रूपैआ रखने रहए, कोठीसँ जहाँ रूपैआ नि‍कालए लगल आकि देहेपर कोठी खसि‍ पड़लै। माटि‍क गोड़ा भीज‍ कऽ ढील भऽ गेल रहइ। कोठीए तरमे लूटना पड़ि‍ गेल! तरेसँ हल्‍ला करए लगल। जाबे लोक सभ अबै-अबै ताबे घरो खसि‍ पड़ल। वेचारा तरेमे छटपटा कऽ मरि‍ गेल!” तेतरीक खि‍स्‍सा सुनि‍ मुनेसरी आरो डरा गेल। दुनू दि‍यादि‍नीक देह थर-थर काँपए लगलै। नीन आरो दूर चलि‍ गेलइ। डरे दुनू बिछानेपर एक कड़सँ दोसर कड़ लगले-लगले उनटए-पुनटए लगल, कियो किछु बजैत नहि। थोड़े कालक पछाइत मुनेसरी बाजल‍- “दीदी, हमरा डर होइए।” मुनेसरीक बात सुनि तेतरियो समर्थन करैत बाजल- “हँ हइ कनि‍याँ, हमरो डर होइए। चलह पुबरि‍ये घर। जँ मरबो करब तँ सबतूर संगे मरब।” कहि‍ उठि‍ कऽ बैस गेल। मुनेसरियो बेटाकेँ उठबए लगल। बेटो जगले रहै, फुड़फुड़ा कऽ उठल। बिछान समेट‍ तेतरी पाँजमे लेलक आ मुनेसरी बेटाकेँ कन्‍हा-लगा पुबरि‍या ओसारपर पहुँचल। ओसारपर पहुँचते तेतरी जोरसँ बाजल- “कनी घर खोलू?” घरेसँ दुनियाँ लाल पुछलक- “किए, की भेल?” “ओइ घरमे डर होइए। अही घरमे सभ सूतब।” “ऐ घरमे हम दुनू भाँइ छी, तखन अहाँ दुनू गोरे केना सूतब?” “बेर‍-वि‍पैत‍‍मे ई सभ लोक नै बुझै छइ। पहि‍ने घर खोलू।” फटक खोलि‍ रूप लाल अपन बि‍‍छान घुसकौलक। मोख लग डिबि‍या रखि मुनेसरी बिछान बि‍‍छौलक। तखने सि‍ताहल नढ़ि‍या जकाँ सजनाक स्‍त्री सेहो आँगन पहुँचली। एकटा बि‍छानपर दुनू भाँइ दुनियाँ लाल आ दोसर बिछानपर दुनू दियादनी तेतरी बच्‍चा संग सुतैक ओरि‍यान केलक। दुनियाँ लाल तँ सिरमापर माथ रखि‍ पड़ि‍ रहल मुदा बाँकी गोरे बैस‍ले रहल। बच्‍चा सेहो सुति‍ रहल। दुनू परानी रूप लालक मनसँ डर हटबे ने करइ। होइ जे फेर ने कहीं देहेपर घर खसि‍ पड़ए। एक बेर‍ बड़का भुमकम भेल। भुमकम तँ अढ़ाइए-तीन मि‍नट रहलै मुदा घर-दुआर, गाछ-बिरीछकेँ तँ खसेबे केलक जे केते लोको दबा-दबा मरल। तीन‍ दि‍न धरि‍ रहि‍-रहि‍ केते बेर‍ धरती डोलल। तहि‍ना होइ जे बड़का झाँट-बिहाड़ि‍ ने चलि गेल,मुदा कहीं छोटका सभ ने फेर‍ घुमि‍-घुमि‍‍ आबए। कोन ठेकान, जँ छोटकेसँ बड़को चलि‍ आबए। तँए दुनू गोरेक मन डेराएल छेलइ। ओना, तेतरीक मन सुतैक होइ मुदा सोचए जे पुरुख बैसल रहत आ अपने केना सुति‍ रहब। तहूमे डिबि‍या जरि‍ते अछि, डि‍बियो केना मि‍झाएब? बेर‍-वि‍पैत‍‍मे इजोते मदैतगार होइए‍। दुनियाँ लालकेँ तमाकुल दैत रूप लाल कहलक- “भैया, आइ बुझि‍ पड़ल जे  अपन सहोदर केहेन होइ छइ?” ओछाइनपर सँ उठि‍ दुनियाँ लाल आँगनमे थूक फेक‍‍ मुस्‍की दैत उत्तर देलक- “तखन भीन किए भेलँह? तोंही कह जे अपना दुनू गोरे सहोदर भाए छी कि‍ने। जखन सहोदरमे मिलान नै रहत तखन आन तँ आने छी। मनुखमे एते बुधि होइ छै, तखन तँ ई गति‍ छै जे भाए-भाएमे दुश्‍मनी भऽ जाइ छइ। अगर जँ अहि‍ना सभ मनुखमे होइ तखन ओहन मनुखसँ उपकारक कोन आश। ऐसँ नीक तँ गाइए-बरद। जे दूधो दइए आ हरो बहैए।” दुनियाँ लालक वि‍‍‍चार सुनि‍ रूप लाल उठि‍ कऽ आँगनमे थूक फेक‍ कऽ आबि बाजल- “भैया, धरमागती बात कहै छिअ। दुरागमनक पछाइत‍‍ जे वि‍दागरी करबैले पठौने रहऽ, ओइ दि‍नक बात कहै छिअ। अपनो सासु आ टोलोक मौगी सभ आबि कऽ लगमे बैसल‍। अपना बुझि‍ पड़ए जे जहि‍ना वृन्‍दावनमे कृष्‍ण गोपी सबहक संग बैस कऽ गप-सप्‍प करै छला तहि‍ना हमहूँ छी। एक-मुहरी सभ स्‍त्रीगण कहए लगल जे अहाँक भाए बड़ छनकट अछि। केतबो कमाएब तँ भाभन्‍स हुअ देत। अहाँ दुनू परानी कमाएब आ ओ कोसल करत। जखन हाथ-मुट्ठी गरमा जेतै तखन भीन कऽ देत। अखन दुनू परानी जुआन छी, कमाइ-खटाइ छी। अखन नै किछु बना लेब तँ जखन धि‍या-पुता हएत खरचा बढ़त, तखन कएल हएत। तँए नीक कहै छी जे अखने भीन भऽ जाउ। नै तँ पाछू पचताएब।” रूप लालक बात सुनि दुनियाँ लाल ठहाका मारि‍ हँसल। हँसैत ओछाइनपर सँ उठि‍ मुँहक तमाकुल आँगनमे फेक‍‍ कऽ आबि बुझबैत बाजल- “कि‍यो जे तोरा किछु कहलकौ आ तूँ मानि‍ गेलेँ से अपन बुधि केतए गेल छेलौ। तूँ नै देखै छेलही जे दुनू भाँइ संगे बोइन करैले जाइ छेलौं आ आँगनमे भौजाइ भरि‍ दि‍न अँगना-घरक काज सम्‍हारि‍ जारैन‍‍-काठीक ओरि‍यान करै छेलखुन। तैपर एकटा नाङैरक घास-भूसा, खुऔनाइ-पीऔनाइसँ लऽ कऽ आश्रमी भानस-भात कऽ बरतन-बासन धरि‍ मँजै छेलखुन, से सभ अपना आँखि‍ए नै देखै छेलही। तोंही कह जे सत् बात की छेलै आ मौगी सबहक कान भरने तूँ की बुझलीही!” अपसोच कऽ मुड़ी डोला रूप लाल मि‍रमि‍राइत बाजल- “हँ भैया, ई तँ ठीके कहै छह।” “अपने आँखि‍सँ जे देखै छेलही से झूठ बुझि‍ पड़लौ आ जे झूठ बात सुनलेँ ओकरा सत् मानि‍ लेलही। एकरे कहै छै मौगयाही भाँज। तोरे जकाँ आनो-आन मौगयाही भाँजमे पड़ि‍ कुल-खानदानक नाक-कान कटबैए। नैहरसँ सासुर जाइ काल जे मौगी सभ कानि‍-कानि‍ बजैए से की कहै छै से बुझै छीही? ओ कहै छै जे जहि‍ना बाप-माइक घराड़ीपर हम कनै छी, तहि‍ना बाप-दादाक घराड़ीपर घरबलाकेँ कनाएब। अरे! एतबो ने बुझै छीही जे दुनियाँमे सभ कुछ मि‍लि‍ सकैए मुदा सहोदर भाए नै मि‍लै छइ। भाइक खाति‍र लक्ष्‍मण स्‍त्री, परि‍वार आ समाज सभ छोड़ि‍ देलखि‍न मुदा भाइक संग अन्‍तिम समए धरि‍ रहलखि‍न। आइ तोरा के काज दइले एलौ। कनियोँ जँ हमरा मनमे पाप रहैत तँ तोरा घरेमे मरैले नै छोड़ि‍ दैति‍यौ। नै तँ झीक‍-झाकि‍ कऽ ठाठ देहेपर खसा दैति‍यौ। नइ मरितेँ मुदा हाथो-पएर तँ टुटबे कैरतौ।” नमहर साँस छोड़ैत रूप लाल अपन सिमसल आँखिकेँ मिड़ैत बाजल- “भैया, आइ बुझि‍ पड़ैए जे सभ ठकि‍ लेलक!” “कान पाथि‍ कऽ सुनि-‍ले। जहि‍ना मनुख सभसँ पैघ जीव ऐ धरतीपर अछि‍, जे बड़का-बड़का चमत्‍कारी काजो करैए‍, तहि‍ना छुतहरो अछि। देखबीही जे जेकरा कनी बुधि-अकील छै ओ सदिकाल बुड़ि‍बक सबहक कमाइ ठकि‍-ठकि‍ मौजसँ खाइए, खेबेटा नै करैए‍ ओकर बोहु-बेटीक संग कुत्ता-बि‍लाइ जकाँ इज्‍जतो संग बेवहार करैए।” “भैया, आइ बुझि‍ पड़ैए जे हमर बाप मरल नै जीबते अछि।” पि‍ताक रूपमे अपनाकेँ पाबि‍ दुनियाँ लालक हृदए पसीज गेल। बाजल- “बौआ, जे समए बित गेल ओ आब थोड़े घुमि‍ कऽ औत। मुदा जाबे जीबैत रहब, तैबीच जे समए अछि‍ ओ तँ बँचल अछि। हमरा तूँ मोजर दे आकि‍ नै दे मुदा अपन सीमा तँ हमहूँ बुझै छी किने। अपन कमाइ खाइ छी, अपने औरूदे जीबै छी। तइले दोसराक कोन आश। अपन काज दुसैबला नै करब। जँ केकरो नीक कएल नै हएत तँ अधले किए करबै। तोरा प्रति‍ जे काज अछि‍ सएह ने करब।” “भैया, आब ओंघी पि‍पनीपर आबि गेल। रा‍‍तियो बेसी भऽ गेल। तहूँ सूतह आ हमहूँ सुतै छी।” मुनेसरीक उनटैत-पुनटैत मन थीर भइए ने पबैत। एक दि‍स अपन पैछला जि‍नगीक बाट टुटैत देखए, तँ दोसर दि‍स नव बाटक बोध नै रहने बोनाह बुझि‍ पड़इ। मुदा दुनियाँ लालक वि‍चार सुनि झलफलाइत बाट जरूर देख पड़ए लगलै, जइसँ मनमे किछु बदलाउ एलइ। जँ नैहरक स्‍त्रीगणक नीक सि‍खौल रहैत तँ नीक होइत, से तँ नै भेल..! मोम जकाँ मुनेसरीक मन पीघलए लगल। मुदा कि‍छु बजैक साहसे ने होइ। जहि‍ना मालती फुलक सुगन्‍धसँ वि‍षधर साँप लत्तीमे लटपटाइत चेतन शून्‍य भऽ जाइए, तहि‍ना मुनेसरियोँक हुअ लगल। मने-मन गलती कबूल करैत तेतरीकेँ कहलक- “दीदी, ई सुतौथ जाँति‍ दइ छि‍ऐन‍।” मुनेसरीक बातसँ जेना तेतरीकेँ खौंझ उठल, बाजल‍- “तोरा एक्को पाइ लाज-सरम नै छह, जे जइ घरमे पुरुख-पात छैथ‍‍ तैठाम तूँ जँतबह। एक तँ भगवान वि‍पैत‍ देलैन जे सभ कियो एक घरमे सुतैले एलौं। डि‍बि‍या मि‍झा दहक जइसँ कनी परदा भऽ जाएत आ तहूँ सुति‍ रहऽ।” ‘डिबिया मि‍झाएब’ सुनि‍ मुनेसरीक मन तत्-मत् करए लगल जे इजोतमे तँ देखबो करै छी, अन्‍हारमे की हएत की नै से देखबो करब। मुदा तैयो उठि‍ कऽ डि‍बि‍या मि‍झा कले-बल पड़ि‍ रहल। ◌ शब्‍द संख्‍या : 5532 4. (ख) काल्हिए, दि‍वालीसँ एक दि‍न पूर्व, ‍ओठर होइत देख अनुप काली पूजाक हकार दिअ गेल। बहि‍नोक सासुर, अपनो सासुर आ मात्रि‍को एक्के डोइरमे। कनी घुमौन रहि‍तो सोचलक जे पहि‍ने बहि‍न ऐठाम पहुँच‍‍ हकारो दऽ देबै आ अबैयोले कहि‍ देबइ। मुदा ओइठीन अँटकब नहि। झलफल होइत-होइत सासुर चलि‍ जाएब। राति‍मे अँटैक‍ जाएब। किएक तँ अखनो बुड़हीकेँ छैन‍‍ जे केतबो धड़फड़ाएल रहब तैयो नहि‍येँ आबए देती। काल्हि भोरे मात्रि‍क होइत चलि‍ आएब। छोड़ैबला एक्कोटा ने अछि, एक तँ ओहुना बहि‍नक मनमे होइत हएत जे जाधैर‍‍ माए-बाप जीबै छला ताधैर‍‍ ने नैहर छल मुदा भाए-भौजाइ केकर होइ छै जे हम्‍मर हएत। मुदा हमर बात थोड़े बुझैत हएत जे दू थान महींस अछि‍ ओकरे पाछू भरि‍ दि‍न तबाह रहै छी। ओहुना तँ सालमे एक दू-बेर‍ अनबे करै छि‍ऐ आ जेबो करिते छि‍ऐ। मुदा तैयो मनमे होइते हेतै जे बि‍सैर गेल, तँए पहि‍ने ओकरे ऐठाम जाएब। दोसर दिन दस-एगारह बजे घुमि कऽ अबिते अनुप देखलक जे महींस पाल खाइले बो-बाँ करैए। एक तँ रस्‍ताक थाकल तैपर सँ महींसकेँ डि‍रि‍याइत देख मन तमसा गेलै मुदा लक्ष्‍मी पावैन‍‍ मन पड़िते लगले मनमे खुशी एलइ। हाँइ-हाँइ कऽ खेलक आ महींस लऽ कऽ पारा लग वि‍दा भेल। गाममे पारा नै रहने बगलक गाम पहुँचल। ओतए पहुँचते पता लगलै अखने एकटा महींसक संग दच्‍छिन-मुहेँ गेल। फेर ओइ‍‍ गामसँ दोसर गाम विदा भेल। दोसरो गाममे पता लगलै जे दच्‍छिन-मुहेँ गेल। जाइत-जाइत चारि‍ बजेमे एकटा गाछीमे महींसमे पाराकेँ लगल देखलक। जेहने देखैमे पारा भारी तेहने नमहर-नमहर सींगो। मरखाहक दुआरे महींसबला महींसकेँ गाछमे बान्‍हि‍ हटि‍ कऽ बैसल रहए। फरिक्केमे अनुपक महींसकेँ देख पारा दौड़ल। पाराकेँ अबैत देख अनुप हाँइ-हाँइ कऽ एकटा गाछमे महींसकेँ बान्‍हि‍, दोसर गाछपर चढ़ि‍ गेल। तैबीच पहिलुका महींसबला अपन महींसक डोरी खोलि‍ ससैर गेल। लग आबि पारा अनुपक महींसकेँ गछाड़ि‍ लेलक। लगले-लगले तीन-चारि‍ मूठ देलकै। मूठ सुतरैत देख अनुपक मन खुशीसँ नाचि‍ उठल। मुदा पारा डरे गाछपर सँ उतरबे ने करए। महींस‍ लग पारा बैस रहल। मुदा महींस‍ ठाढ़े रहल। अनुपक मनमे होइ जे जँ महींसो बैस जाएत तँ ढड़ैक जेतइ। जइसँ पाल सुतरबे ने करत। साँझ पड़ि‍ गेल। अमावसिया दि‍न रहने दोसैर साँझ होइत-होइत अन्‍हार भऽ गेल। अनुपो गाछपर सँ उतैर‍‍ हटि‍ कऽ बैस गेल। अन्‍हार देख अनुपक मनमे होइ जे असगरे छी, केना गाम जाएब। तहूमे तेहेन पारा शेतान अछि‍ जे छोड़बो ने करैए। राति‍क दस बजि‍ गेल। हवो उठल आ बुन्‍दा-बुन्‍दी पानियोँ शुरू भेल। पानि‍ पड़ि‍ते पारा महींसकेँ छोड़ि‍ गाम दि‍स वि‍दा भेल। हवो आ पानियोँ तेज हुअ लगल। एक तँ अन्‍हरि‍या राति‍ तैपर सँ पानि‍-हवा जोर पकड़ने जाइत। महींसक संग अनुप गाम दि‍स वि‍दा भेल। कनियेँ आगू बढ़ल आकि झाँट-पानि आरो‍ जोर पकड़ैत गेल। अदहा रस्‍ता अबैत-अबैत मुसलाधार बरखो आ बि‍हाड़ियो जोर पकैड़‍ लेलक। अवग्रहमे अनुप पड़ि‍ गेल। अवग्रहमे पड़ल अनुप सोचए लगल जे आइ नै बँचब। अपटी खेतमे महींसो आ अपनो मरि‍ जाएब। हाथो-हाथ ने सुझैए‍। ने केतौ एकोटा लोक देखै छी आ ने अपना कोनो इजोत अछि। बीच पाँतरमे केना जाएब? तहूमे अंगो ने पहिरने छी। देहमे जेहो कपड़ा अछि‍ सेहो भीजिए गेल अछि। जाड़ो होइए। अनुपकेँ जेना जिनगीक आश टुटि गेल। मन मानि‍ गेलै जे आइ नै बँचब। जखन अपने नै बँचब तखन महींसे कोन काज देत। बुकौर लगि‍ गेलइ। मुदा कानबो के सुनत? बिजलोका देख होइ जे देहेपर ने खसि‍ पड़ए। हवा बन्न भेल। बन्न होइते मनमे आशा जगलै मुदा घनघनौआ बर्खा होइते रहइ। गाम पहुँचैत-पहुँचैत बरखो बन्न भेल। घरपर आबि थरथराइत अवाजमे अनुप घरवालीकेँ कहलक- “हाथ-पएर कठुआ गेल अछि। कनी घूर करू।” नसीवलाल महींस बान्‍हलक। भुलि‍या अनुपकेँ कहलक- “जाबे अहाँ धोती फेड़ब ताबे घूरक ओरि‍यान कऽ दइ छी।” घरवालीक बात तँ अनुप सुनलक मुदा जाड़े-कठुआ कऽ खसि‍ पड़ल। जाड़सँ देह सर्द-सर्द भेल। बोली बन्न भऽ गेलइ। हाँइ-हाँइ कऽ भुलि‍या फुटलाहा लोहि‍यामे गोरहा-गोइठा तोड़ि‍-तोड़ि‍ कऽ दऽ मटि‍या तेल ढारि सलाइ खड़ैर‍ कऽ लगौलक। घूर धधकल। सुनरीकेँ भूलि‍या कहलक- “बुच्‍ची, झब-दे करौछमे चारि‍ ढेकरी थकुचि कऽ लहसुन आ करूतेल ला। अही घूरपर गरमा कऽ सौंसे देह मालि‍स कऽ देबैन।” माइक बात सुनि सुनरी चारमे टाँगल लहसुनक मुट्ठीमे सँ एकटा ढेंसर नि‍कालि‍, दाना छोड़ा सि‍लौटपर थकुचलक। शीशीसँ करौछमे तेल निकालि‍ घूरपर गरमाबए लगल। तीनू गोरे– पत्नी, बेटा, बेटीक मनमे होइ जे भरि‍सक कठुआ कऽ मरि‍ गेल। मुदा साँस चलैत देख आशा बनल छेलइ। रसुनतेलासँ तीनू गोरे दुनू तरबो आ दुनू तरहत्‍थियोकेँ हाथसँ रगड़ए लगल। पान-सात मि‍नट तक रगड़लापर अनुप आँखि‍ खोलि‍ बाजल- “जाड़ कनी कम भेल।” अनुपक बाल सुनि आरो हाँइ-हाँइ तीनू गोरे रगड़ए लगल। तरहत्थी रगड़ब छोड़ि‍ नसीवलाल चानि‍ रगड़ए लगल। मन हल्‍लुक होइते अनुप बाजल- “जाड़े छाती दलकैए। कनी चाह बनाउ। जाबे भीतर नै गरमाएत ताबे जाड़ नै छूटत।” पति‍क बात सुनि भुलिया चाह बनबैक ओरि‍यान करए लगल‍‍। चाह-पत्ती तँ घरमे रहै मुदा चि‍न्नी घरमे रहबे ने करइ। एते राति‍ आ एहेन समैमे दोकानसँ चीनी केना आनैत। पतिकेँ भुलिया कहलक- “चाह पत्ती तँ घरमे अछि‍ मुदा चि‍न्नी नइए।” पत्नीक बात सुनि अनुप कहलक- “चीनी नै अछि‍ तँ नूने दऽ कऽ बना लिअ। एहेन समैमे केतएसँ आनब।” भुलिया चाह बनबए लगली। बेटाकेँ अनुप कहलक- “बौआ, कनी थम्‍हि जा, धोती फेड़ लइ छी।” कहि‍ उठि‍ कऽ धोती बदैल‍ गंजी पहिरलक। चाहो बनल। स्‍टीलि‍या गि‍लासमे भरि‍ गि‍लास चाह करीब २५०एम.एल; छानि‍ भुलिया अनुपकेँ देलक। जेहने जड़ाएल देह, तेहने मुँह रहने चाह गर्म बुझिए ने पड़इ। पानियेँ जकाँ घोंटे-घोंट पिबए लगल। अदहा गिलास पीऐत-पीऐत देह गरमेलै। देह गरमाइते हुहुआ कऽ बोखार आबए लगलै। चाह पीऐत-पीऐत बोखार आबि गेलइ। जाड़ हुअ लगलै। ओछाइनेपर पड़ि‍ बेटाकेँ कहलक- “बौआ, बड़ जाड़ होइए, कनी कम्मर नि‍कालि‍ कऽ ला।” कम्‍मर ओढ़ि‍ अनुप पड़ि‍ रहल। मुदा जाड़ कमैक बदला बढ़ले जाइत रहइ। पुन: अनुप बाजल- “एकटा कम्मरसँ जाड़ नै कमत। आरो ओढ़ाबह।” घरक तीनू कम्‍मर ओढ़ि‍ते देह गरमेलै। देह गरमाइते बाजल- “बौआ, देहसँ खौंत फेकैए।” ‘खौंत’ सुनि भुलिया बाजल- “सरद-गरम भऽ गेल! एती राति‍मे डाकडरो ऐठीम केना पठेबे। तेहेन दुरकाल समए अछि‍ जे ओहो औत आकि नहि।” नि‍राश होइत अनुप बाजल- “जँ औरूदा हएत तँ जीबे करब, नै जे रसीद कटि‍ गेल हएत तँ डाक्‍टरो बुते थोड़बे बाँचब।” भुलि‍या- “महींसक पाछू जे जान गमबै छी तइसँ नीक जे महींसे बेच लेब।” आशा भरल स्‍वरमे अनुप बाजल- “अही महींसक बले तँ दूटा पाइयो देखै छी आ गुजरो करै छी। जँ एकरे बेच लेब तँ जीब‍‍ केना। जि‍नगीमे अहि‍ना नीक-अधला समए अबै-जाइ छै, तइले कि‍ काजे छोड़ि‍ देब। मरैक कोनो ठेकान छइ। चलि‍तो काल लोक खसि‍ पड़ैए आ मरि‍ जाइए। तइले महींस‍ किए उपटाएब।” अही‍ औज-कौल पौरु-साल गाममे कि‍सान गोष्‍ठी भेल रहए। ओइ‍‍ गोष्‍ठीमे जि‍लोक कृषि‍-पदाधि‍कारी आ ब्‍लौकक पदाधि‍कारी सभ सेहो आएल रहैथ‍‍। ओना गाम-ले पहि‍ल गोष्‍ठी छेलए। जइमे कि‍सानक दुख-दर्दकेँ लगसँ देखल गेल रहइ। ओइ‍‍ दि‍न गामोक किसानकेँ सरकारमे अपन भागीदारी बुझि‍ पड़लै। किएक तँ अखन धरि‍ गामक लोक सरकारक माने कोटाक चीनी आ मटि‍या तेल धरि‍ बुझै छल। ओना, गोटे-गोटे साल खराँतक गहुमो आबि जाइ छेलइ। मुदा तइमे बदलल रूप गोष्‍ठीमे रहए। किएक तँ किसानकेँ चारि श्रेणी- लघु, सीमान्‍त, मध्‍यम आ पैघ, किसानक रूपमे विभाजि‍त कऽ सभ-ले सरकारी सुवि‍धाक चरचा भेल। सीमान्‍त किसानकेँ एक-ति‍हाइ माने ३३ प्रति‍शत सरकारी सहायताक घोषणा भेल। एक-ति‍हाइ मदैतसँ लोकमे भरपुर उत्‍साह जगलै। खेतीक सभ वि‍धा पशुपालन, माछ-पालन तरकारीक खेती, फल-फलहरीक खेतीक संग-संग उन्नैतशील धान, गहुम इत्‍यादि‍ अन्नक खेतीमे सेहो मदैतक चरचा भेल। एक ति‍हाइ, माने ३३ प्रति‍शत सुवि‍धा पाबि‍ पैघ किसान आ मध्‍यम कि‍सान-ले छोट-छोट कारोबार आ गाइयो-महींस पोसैक बाट खुजलै। गोष्‍ठीक किछुए दि‍नक पछाइत‍‍ पंजाब-हरि‍याणासँ ट्रकक माध्‍यमसँ बारहटा जर्सी गाए गाममे आएल। ओइ‍‍मे सँ एकटा कारी रंगक गाए राजेसर सेहो दस हजारमे कीन‍लक। चारि‍ मास धरि‍ गाए नीक-जकाँ आठ किलो दूध दैत रहलै। मुदा बादमे, चारि‍ मासक पछाइत‍ एकसंझू भऽ गेलइ। जाधैर‍‍ आठ किलो दूध गाएकेँ होइत रहलै, ताधैर‍‍ दुनू परानी राजेसर सेहो हि‍आ खोलि‍ मेहनैतो करए। ओना दूधारू घासक खेती नै केने रहए। ने सुधा-दाना आ ने कोनो तरहक पौष्‍टि‍क आहारक दोकान इलाकामे रहइ। मुदा तैयो राजेसर पुरने ढंगसँ मौसरी आ मकैक दर्रा थोड़-थाड़ गाएकेँ खुअबैत रहए। छह मास बीतैत-बीतैत गाए बिसैक‍ गेल। बच्‍छा तरे गाए रहै, तँए गाइयक संख्‍या तँ नै बढ़लै मुदा जेतबे दि‍न दूध भेलै ओइ‍‍सँ गाइक प्रति‍ आकर्षण जरूर बढ़ि‍ गेलइ। किएक तँ अखन धरि‍ गाममे एक्कोटा ओहन गाए नै भेल रहए जेकरा सेर भरि‍सँ बेसी दूध होइ। ओना गामक गाइक वंश दि‍नानुदि‍न बि‍गड़ैत गेल। तेकर अनेको कारणमे एकटा कारण ईहो रहइ जे श्राद्ध-कर्ममे तेहेन-तेहेन दब बच्‍छाकेँ दागि‍ साँढ़ बनौल जाइत रहल जे गाइयक खाढ़े नष्‍ट होइत गेल। बिसकला पछाइत‍ गाए उठबे ने कएल। आठ मास बीतैत-बीतैत राजेसर नि‍राश भऽ गेल। लोककेँ पुछै तँ कियो-करूतेल पि‍अबैले कहै, तँ कियो मेनक गोभी खुअबैले कहइ। मुदा गाए उठलै नहि। हारि‍-थाकि‍ कऽ मधेपुर मबेशी डाक्‍टरसँ सम्‍पर्क केलक। गर्भाशय साफ करबैक विचार डाक्‍टर साहैब देलखिन। दिवाली दिन राजेसर गाए नेने मधेपुर मबेशी अस्‍पताल पहुँचल। एकटा बिमार महींस‍ देखैले डाक्‍टर साहैब भगवानपुर गेल रहैथ‍‍। गाएकेँ ढाठमे बान्‍हि‍ राजेसर अस्‍पतालक ओसारपर तौनी बिछा, पड़ि‍ रहल। सूर्यास्‍त भेलापर डाक्‍टर भगवानपुरसँ एला। डेरा अबि‍ते पत्नी कहलकैन‍- “एक गोरे दुपहरेसँ भुखे-पि‍यासे गाइक संग बैसल छैथ‍, पहि‍ने ओ देख लि‍यौ।” दुपहरक नाओं सुनि‍ते डाक्‍टर चौंक‍ला। साइकि‍ल रखि‍ पत्नीकेँ कहलखि‍न- “तेहेन बेमारीक भाँजमे पड़ि‍ गेलौं जे छोड़ियो नै सकै छेलौं। मुदा जखन महींस पाउज धऽ खढ़ उठौलक तखन अपनो संतोष भेल आ महींसोबला कहलैन जे आब महींस‍ बँचि‍ गेल। तँए एते अबेर भऽ गेल। मन गरमा गेल अछि‍ पहि‍ने एक लोटा पानि‍ पि‍आउ आ चाह बनाउ। ताबे कपड़ा बदैल लइ छी।” चाह पीब‍ डाक्‍टर राजेसर लग पहुँच‍,‍ गाएकेँ देख कहलखि‍न- “जँए एते काल बैसलौं तँए अदहा घन्‍टा आरो समय लगत।” आशा भरल स्‍वरमे राजेसर कहलकैन‍- “तइले नै कोनो मुदा गाममे तमाशो छी आ अन्‍हरि‍या राति‍ सेहो, तँए कनी..।” ढढीमे गाएकेँ बन्‍हबा डाक्‍टर साफ केलैन‍। साबुनसँ हाथ धोइ एकटा इन्‍जेक्‍शन देलखि‍न। चारि‍ खोराक गोटी दऽ कहलखि‍न- “काज तँ भऽ गेल मुदा आब गाम नै जाउ। एतै रहि‍ जाउ, भोरे दि‍न-देखार चलि‍ जाएब।” फीस दैत राजेसर कहलकैन‍- “डाक्‍टर साहैब, अबेरो भेने तँ काज भइए गेल। गाममे मेलो-तमाशा छी तँए चलिए जाएब।” एक तँ करि‍या कम्मर जकाँ अन्‍हार, दोसर कारी खुट-खुट गाए, मने-मन राजेसर सोचलक जे हो-ने-हो कहीं हाथसँ डोरी छूटि‍ जाएत तँ गाए हेराइए जाएत। तँए छोड़मे ससरफानी दऽ अपन गट्टामे बान्हि‍‍ आगू-आगू गाए आ पाछू-पाछू अपने विदा भेल। थोड़े दूर आगू बढ़ल आकि बुन्‍दा-बुन्‍दी पानियोँ आ हवो रसे-रसे जोड़ पकड़ए लगल। हवाक संग-संग घनघनौआ बरखो हुअ लगलै। घरपर अबैत-अबैत जहि‍ना राजेसर तहि‍ना गाइयो जाड़े कठुआ गेल। राति‍ ढहल। गाए टाँग पटकए लगलै। लगले-लगले उठबो-बैसबौ करइ आ बो-बाँ सेहो। समए तेहेन भऽ गेलै जे पुन: डाक्‍टर ऐठाम जाइक साहसे ने भेलइ। ने अपना गाममे मबेशी डाक्‍टर आ ने लग-पासक कोनो गाममे। हारि‍ कऽ करूतेल-मटि‍या तेल मि‍ला, सौंसे देह औंस‍ बोराक नूरी बना दुनू परानी गाएकेँ ससारए लगल। थोड़े काल ससारि‍ मरीच पीस‍ करूतेलमे मिला काँइरसँ पिऔलक। मुदा गाइक रोग हटलै नहि। धीरे-धीरे बढ़ि‍ते गेलइ। भोरहरबामे खूब जोरसँ डि‍रि‍या कऽ गाए मरि‍ गेल। गाएकेँ मरि‍ते दुनू परानी राजेसर कानए लगल। भोरहरबाक कानब सुनि‍ दुनू परानी डोमन दौग कऽ आएल। अबि‍ते राजेसरकेँ डोमन पुछलक- “भैया, की भेलह?” डोमनक प्रश्‍नक उत्तर नै दऽ राजेसर कनि‍ते रहल। लगमे अबि‍ते डोमन देखलक जे चारू पएर छि‍ड़िएने गाए मरल अछि। मुँहपर तरहत्‍थी दऽ डोमन बाजल- “भैया, चुप हुअ। कमाइबला बेटा मरलापर लोक सवुर करि‍ते अछि‍, ई तँ सहजे नाङैर‍ छी।” डोमनक बात सुनि राजेसर बाजल- “गाए मरि‍ गेल तेकर दुख ओते ने अछि‍ जेते बैंकक करजाक अछि। एक तँ सरकार लोककेँ मदैत करैए आकि गरदैनमे फाँस लगबैए। जखन गाए नै नेने रही तखन कहलक जे तेकरी सरकार देत आ बाँकी दू हि‍स्‍सा बैंकसँ करजा भेटत। काज सुगम देख लेलौं। बुझबे ने केलि‍ऐ जे गरदैनमे फँसरी लगबैए। छूट-ले बैंकबला कहलक जे मधमन्नीसँ कागत आनि‍ कऽ दिअ तखन ओइ रूपैआक मि‍नहा लोनमे भऽ जाएत। जाबे तक ओ कागत नै देब ताबे तक सोल्‍होअना रूपैआक सूदि‍‍ चलैत रहत। अपने देखल-सुनल नहि। कोटक मंशीकेँ जा कऽ सभ बात कहलि‍ऐ तँ ओ तैयार भऽ कऽ ओइ ओफि‍स गेल। पाछूसँ अपनो गेलौं। ..ओफिस जखन गेलौं तँ कहलक जे पान साए रूपैआ लगत, तखन कागत देब। अहि‍ना दौड़-बड़हा करैमे हजारसँ ऊपरे खर्च भऽ गेल। रूपैआक किस्‍त नै देने छेलि‍ऐ। बैंकमे जखन हिसाब करबए लगलौं तँ कहलक जे छह मासक सूदि‍ मूरमे जमा भऽ गेल, आब ओकरो सूदि‍ लगत। तैबीच गाइयो मरि‍ गेल! आब की करब?” ◌ शब्‍द संख्‍या : 1944 4. (ग) दि‍वालीकेँ शुभ दि‍न बुझि‍ सुरति‍या भोरेसँ दुनू परानी खपड़ाक भट्ठा लगबए लगल। बीस हजार खपड़ाक भट्ठाक मनमे खुशी रहइ। बीचमे थोपुआ आ चारू कात नड़ि‍या खपड़ाक भट्ठा लगौलक। थोपुआ खपड़ा मोट होइ छै तँए कातमे लगौलासँ नीक जकाँ नै पकैए। आमदनीक खुशी मनकेँ तेना खुर-खुरा देने रहै जे दुनू परानीकेँ काजक भीड़ बुझिए ने पड़इ। दुनि‍याँक सभ किछु बि‍सैर मन आमदनी देख तरे-तर हँसइ। जहि‍ना कोनो कनैत बच्‍चाकेँ गुदगुदी लगौलासँ हँसीक लाबा फुटैत,तहि‍ना दुनू परानी सुरतियोकेँ होइ। भट्ठा लगि‍ गेल। एक तँ सुखार-रौदि‍याह समए, दोसर काति‍क मास। काति‍क मासमे चैत-बैशाख जकाँ ने हवा-बिहाड़ि‍क शंका आ ने झाँट-पानि‍क। तँए ने भट्ठाक ऊपर छाँही देलक आ ने कातमे टाट लगौलक। पहि‍ल साँझ ऊक-बाती फेर‍ सुरति‍या भट्ठा लग बैस निंगहारि-निंगहारि देखए लगल जे केतौ किछु छूटि‍ तँ ने गेल। फुलेसरी भानस करए गेल। चूल्हि‍ पजाइर‍ अदहन दइते मनमे उठलै जे अधि‍क लटारम करैमे बेसी देरी लगत, तइसँ नीक खि‍चड़ी आ अल्‍लू चोखा बना लेब। बैसारी लोक ने तरूआ-बगहरूआ बना जीहक चस्‍की पुरबैए। पावैने दि‍न छी तँ की छी। कोनो कि पावैनेकेँ सीमा-नाङैर छै, जेकरा रहै छै ओ सभ दि‍न खाइए। खाइए पाछू जे समए बीता लेब तँ खाइक ओरि‍यान केना हएत। फेर‍ मनमे उठलै, जे अपने फुरने नै करब हुनको पुछि‍ लइ छिऐन‍। चूल्हि‍ तरसँ उठि‍ फुलेसरी पति‍ लग आबि पुछलक- “ओना आइ तँ लक्ष्‍मी दि‍न छी, सभ तरूआ-बगहरूआ बनौत, से की वि‍‍‍चार।” सुरति‍या मने-मन बीस हजार खपड़ाक दाम जोड़ैत रहए। बारह हजार थोपुआ अछि, जेकर दाम बारह हजार भेल। साए-पचास फुटियो जाएत तैयो, नइ बारह हजार तँ पौने बारहे हजार रहह, आ आठ हजार नड़ि‍या अछि‍ जे आठ साए रूपैए बीकत। ओहूमे पच्‍चीस-पचास अधपक्कू रहत आकि फुटि‍-भांगि जाएत, तैयो नइ चौसैठ‍ साए तँ छह हजार हेबे करत। कहुना-कहुना तँ सतरह-अठारह हजार हेबे करत...। बाजल- “बुढ़ भऽ गेलौं आ नाक लगले अछि। एतबो नै बुझै छि‍ऐ जे भट्ठा लगौने छी, आगि‍ देबै तँ भरि‍ राति‍ ओगैर‍ कऽ रहए पड़त। जगरनामे अधपेटे खेनाइ नीक होइ छै आकि चढ़ा कऽ। जाउ खि‍चड़ी आ अल्‍लू चोखा बना लेब।” अपन विचारसँ पति‍क वि‍‍‍चार मिलि‍‍ते फुलेसरीक मन खुशीसँ नाचि‍ उठल। मुस्‍कियाइत बाजल- “पावैन‍‍‍क दि‍न छी, तखन..?” “जाउ-जाउ। जेकरा रहै छै ओकरा लिये सभ दि‍न होलीए-दि‍वालीए रहै छै आ जेकरा नइ रहै छै ओकरा लिये सभ दि‍न एकादसीए।” खा-पी कऽ फुलेसरी बच्‍चा सभकेँ सुता देलक। राति‍क साढ़े नअ बजैत रहइ। सुरति‍या भट्ठामे मौसरी-दालि‍ छि‍टैत बाजल- “जेहेन मौसरी-दालि‍ लाल तेहेन भट्ठा लाले-लाल..!” कहि‍ आगि देलक। सुखार समए धुधुआ कऽ आगि‍ पजैर‍‍ गेल। आगि‍क पजरब देख सुरति‍या पत्नीकेँ कहलक- “ऐ बेरक खपड़ासँ पूजी बढ़ा लेब। दू आदमीकेँ आरो रखि लेब। कहुना-कहुना जँ दसो भट्ठा हाथ लगल तँ लाखक कमाइ भइए जाएत। पूजीए ने पूजी बढ़बै छइ। गाममे देखते छि‍ऐ जे जेकरा दस बीघा जमीन छै ओ अपनो साल भरि‍ खाएत से नइ होइ छइ। हम तँ सहजे नंगा-फरोस छी। तहन तँ लुरिए-बुधि तेहेन अछि‍ जे...।” फुलेसरीक बुधिमे पति‍क बात नै अँटल। छोट बुधिमे पैघ बात केना अँटैत। मुदा पति‍-पत्नी‍क बीच कि कोनो शास्‍त्रार्थ होइए, सुयोग कवि‍क कवि‍ता जकाँ तुक मिलौबैल‍ होइए। विषय-वस्‍तु किछु रहौ वा नै रहौ मुदा तुकबन्‍दी जँ नीक रहल तँ ओ श्रेष्‍ठ कवि‍ताक श्रेणीमे आबिए जाइए। पति‍क प्रश्‍नक उत्तर दैत फुलेसरी बाजल- “ऐ बेर‍ अपनो घरपर खपड़ा दैये देब।” ‘अपन घर’ सुनि सुरति‍याक मनमे उठलै, जहि‍ना घर बनौनि‍हारकेँ अपना रहैले घर नै रहै छै तहि‍ना तँ हमरो अछि। जाबे वि‍राटनगरमे नोकरी करै छेलौं ताबे पेटो चलैमे कोताहिये होइ छेलए। मुदा आब जँ बेसी कमाइ हुअ लगल तँ घरो बनाइए लेब! बुन्‍दा-बुन्‍दी पानियोँ आ संग-संग हवो उठल। मेघ दि‍स देख सुरति‍या बुदबुदाएल- “मेघो कहाँ देखै छि‍ऐ। एकटा छोटका टुकड़ी बुझि‍ पड़ैए। नै औत बर्खा। मुदा हवा ने एकभग्‍गू कऽ दि‍अए। जँ हवा जोर भेल तँ एक भाग काँचे रहत आ दोसर भाग झाम बना देत।” हवा तेज होइत गेल आ मेघो पसरैत गेल। पूबसँ वादल आबि-आबि सघन हुअ लगल। जहि‍ना-जहि‍ना बर्खा बढ़ए लगल, तहि‍ना-तहि‍ना हवो बढ़ए लगल। तरतरा कऽ जोरगर बरखो आ बिहाड़ियो आबि गेल। झाँट-पानि‍ देख सुरति‍याक आशा राइ-छि‍त्ती भऽ गेल। मास दि‍नक मेहनतक संग-संग पूजियो[5] नष्‍ट भऽ गेल। टुटल मने पत्नीकेँ कहलक- “सभ किछु दुइर भऽ गेल!” पति‍क बात सुनि फुलेसरी गौंआँकेँ दोख लगबैत बाजल- “ई सभ कि‍रदानी गौंआँ सबहक छिऐ। जखन गाममे काली-पूजाक अरघेना[6] केलक तँ पहि‍ने भगता बजा पूजा कऽ काली-महरानीसँ वाक् लऽ लैत, से करबे ने केलक आ अपने फुरने पूजा शुरू कऽ देलक! ओकरा सभकेँ की बि‍गड़लै। देत कियो हरजाना!” फुलेसरीक जोर-जोरसँ बाजब सुनि सुरति‍या डपटैत कहलक- “यएह सभटा बुझै छइ। राजा-दैवक कोनो ठेकान छइ। केकरो हाथमे छै जे केकरो दोख लगबै छि‍ऐ। कोनो कि अपनेटा नोकसान भेल। केते लोकक घर खसल हेतै, चीज-वौस दुइर भेल हेतै आकि अपनेटा भेल?” पति‍क बात सुनि फुलेसरीक तामस गौंआँपर सँ हटि‍ पड़ोसनीपर पहुँचल। पड़ोसनीकेँ गरि‍याबए लगल‍‍- “तेहेन मरमी मौगी सभ अछि‍ जे अनकर नीक सोहाइ छइ। बेटा दऽ दऽ डानि‍ सीखने अछि‍ आ अनकर गरदैन‍ कटैए। जहि‍ना हमर भट्ठा नोकसान भेल तहि‍ना ओकरो सातो पुरखाकेँ उड़ाहि‍ देबइ।” सुरति‍याक घरक बगलेमे एकटा मसोमातक घर। जेकरा सभ स्‍त्रीगण डाइन बुझैत। ओकरे ठेकना-ठेकना फुलेसरी गरि‍यबैत। गारि‍ तँ ओहो मसोमात सुनैत मुदा नाओं नै सुनि कान ठाढ़ केने रहए, जखने नाओं लेत तखने देखा देबइ। केहेन घनि‍कपन्ना होइ छै से सभ नि‍कालि‍ देबइ। पत्नीक क्रोध देख सुरति‍या सोचलक जे एक तँ जे नोकसान भेल से भेबे कएल तैपर सँ अनेरे झगड़ा सेहो ठाढ़ हएत। हमरासँ कि कमजोर ओ मसोमात अछि। दि‍यादियो बेसी छै आ अपनो दुनू बेटा बुफगर छइ। हो-ने-हो कहीं आबि कऽ मारि ठानि‍ दिअए। तखन तँ पूजियो गेल आ ऊपरसँ मारियो खाएब। पत्नीकेँ पोल्हबैत कहलक- “की हेतै, कियो कपार लऽ लेत। भगवान जे भोग-पारसमे देने हेता ओ हेबे करत। जे नै देने हेता से अपनो केने थोड़े हएत। तइले एते आगि‍-अंगोरा होइक कोन काज छइ। नोकसाने की भेल, खपड़ा गलि‍ कऽ माटि‍ हएत, ओकरा फेर‍ खपड़ा पाथि‍ सुखा कऽ भट्ठा लगा लेब। जरनो भीजबे ने कएल ओकरो सुखा लेब। गि‍रहत सभकेँ देखै छि‍ऐ हर-जन लगा खेती करैए आ बाढ़ि‍मे दहा जाइ छै तँ की ओ मरि‍ जाइए आकि खेती छोड़ि दइए। तहि‍ना हमरो भेल। भगवान समांग देने रहैथ। सभ कि‍छु फेर‍ भऽ जाएत।” पति‍क बात सुनि फुलेसरीक मन थीर भेल। मुदा तैयो मन खौंझाएले रहइ। बाजल- “भगवानो दुष्‍टे छैथ‍‍। जानि‍-जानि‍ कऽ गरीबे लोककेँ सतबै छथि‍न। जहि‍ना ओ करै छथि‍न तहि‍ना ने हमहूँ सभ करै छिऐन‍। ने एकोटा उपास करै छी आ ने एको दि‍न पूजा करै छिऐन‍।” पत्नीक बात सुनि मुस्‍की दैत सुरति‍या बाजल- “अच्‍छा आब भऽ गेल। जहि‍ना ओ[7] केलैन तहि‍ना अहूँ करि‍ते छिऐन‍। सधम-बधम भऽ गेल।” मछुआ सोसाइटी बनने किछु गोरे उठि‍-बैसल आ किछु गोरे गोपलखत्तामे चलि‍ गेल। ओना सोल्‍होअना पोखैर‍ सोसाइटीमे अखनो धरि‍ नै गेल अछि मुदा जे गेल ओकर मुआबजा तँ पोखैरबलाकेँ नै भेटल। सोसाइटी बनने नव पनिदार मालि‍कक जन्‍म जरूर भऽ गेल। किएक तँ एक गोरेक हाथमे अंचल भरि‍क पोखैर‍ आबि गेल। जइसँ पर्याप्‍त उत्‍पादि‍त पूजी हाथ लगि‍ गेलइ। संग-संग सरकारी खजानाक लूट सेहो शुरू भेल। मनमाना ढंगसँ सोसाइटीक सचि‍व आ सरकारी तंत्र, दुनू मि‍लि‍ कऽ गामक अमूल्‍य पूजी लूटब शुरू केलक। ओइ‍‍ सोसाइटीसँ एकेटा पोखैर‍ आ एकटा खानगी पोखैर‍ डेढ़ हजार सलि‍याना-किस्‍तपर फुदना माछ पोसैले लेलक। सोसाइटीबला पोखैरक महार, बि‍नु देख-रेख भेने ढहि‍-ढुहि‍ कऽ सहीट भऽ गेल छेलइ। मुदा रामधनबला पोखैरक महार, नीक मुँह कान रहने, जीअ‍त छइ। शुरूहे अखाढ़मे फुदना एकटा वेपारीसँ गंगाक जीरा कीनि सैरातबला पोखैरमे देलक। आ दोसर पोखैरमे तमुरि‍याक हेचरीसँ जीरा कीनि कऽ आनि‍ देने रहए। गंगाक जीरा रौहु, नैन, भाकुर रहै आ तमुरि‍याक जीरा, सि‍ल्‍वरकाफ रहए। सि‍ल्‍बरकाफ साले भरि‍मे दू-दू-तीन‍-तीन किलोक भऽ जाइत, जखन‍ कि रौहु-नैन तँ कम बढ़ै छै मुदा भाकुरक बाढ़ि‍ अधि‍क होइ छइ। पानि‍क सतहक हिसाबसँ तीनू माछ रहै छै, तँए तीनू मिला कऽ देल जाइए। शुरूहे अखाढ़ेमे जे आद्रामे बर्खा भेल रहै, ओइ‍‍मे दुनू पोखैर‍ भरि‍ गेल रहए। पोखैरक पानि‍ आ जीराक सुतरब देख दुनू परानी फुदनाक मन चपचप करैत रहइ जे भगवान दुख हेरलैन‍। कहुना-कहुना तँ बीस हजारसँ ऊपरेक आमदनी हएत। जहि‍ना खूब फड़ल आमक गाछी, खूब उपजल खेत आ खूब दुधगरि गाए बिएलासँ खुशी किसानकेँ होइत, तहि‍ना फुदनो दुनू परानीक मनमे होइ। जइसँ दुनू परानी बेरा-बेरी तीन‍-तीन बेर‍ पोखैरक घाटपर घन्‍टा-घन्‍टा भरि‍ बैस माछक बच्‍चाकेँ एमहर-सँ-ओमहर हेलैत देखए। घरपर अबैक मने ने होइ। माछक कारोबारसँ फुदनाक परि‍वार पहि‍लेसँ जुड़ल। मखान खर्ड़ब, माछ मारि बेचब, परि‍वारक जीवि‍‍‍का रहइ। मुदा तीन-सलि‍या रौदी भेने फुदना कण्‍ठी लऽ लेलक। माछक रोजगार कोन जे माछ खाएबो छोड़ि‍ देलक। माछक गन्‍ध फुदनाकेँ पहि‍ने नीक लगै मुदा आब जी ओकि‍ऐ लगै छइ। गामक कीर्तन मण्‍डलीमे शामिल भऽ अष्‍टयाम, नवाहमे कीर्तन करैले सेहो जाए लगल आ भनडारा सेहो पुरए लगल। लाट लगने एक हाथ हरमुनियाँ आ ढोलक बजौनाइ सेहो सीख लेलक। पाछू-पाछू कीर्तन गबैत-गबैत गौनाइयो सीख लेलक। दाढ़ियो-केश बढ़ा लेलक आ पतलखरीक चानन सेहो करए लगल। समैयो संग देलकै। नव रोजगार ठाढ़ भेल। कीर्तन मण्‍डलीक सट्टा सेहो हुअ लगलै। काजो हल्‍लुक आ प्रति‍ष्‍ठाक संग-संग खेनाइयो नीक भेटै आ पाइयोक आमदनी नीक भऽ गेलइ। मुदा घरवाली साकठे रहल‍। जहि‍ना माछक विन्‍यास बनबैमे सि‍ति‍या लूरिगर तहि‍ना खाइयोमे जीवि‍लाहि। गामक छौड़ा सभ आ जनिजा‍‍तियो सभ, ओकरा बगुला भगत कहैत। घरमे एक्केटा थारी-लोटा रहइ। जहीमे फुदनो खाए आ सि‍‍‍तियो। एते बात जरूर रहै जे कहि‍यो फुदना घरवालीकेँ माछ खाइसँ मनाही नै केलक। फुदना देखबो करै जे नैहरसँ सनेसमे माछे अबै छइ। नहि‍योँ-नहि‍योँ तँ तीन‍-चारि खेप मासमे आबिए जाइ छइ। सि‍ति‍याक पि‍ता माछक कारोबारी छथिन। पोखैरोबला सभसँ आ मधेपुरोक वेपारीसँ माछ कीनि-कीनि आनि आ नफ्फा लगा कऽ गामे-गामे घुमि‍ कऽ बेच लइ छैथ। जइसँ नीक कमाइ होइ छैन। खेत-पथार तँ नै कीन‍लैन मुदा नीक जकाँ गुजर करैत घरो नीक बनौने छैथ। एक दि‍न फुदनाक सार टुनटुनमा दू किलोक अण्‍डाएल रौहु नेने एलैन। नमहर-नमहर कुट्टि‍या काटि सि‍ति‍या माछ तरए लगल। माछक सुगन्‍धसँ फुदनाक मन मचकी जकाँ डोलए लगलै। जहि‍ना शरीरमे पुरन रोग समए पाबि जगि‍ जाइए, तहि‍ना फुदनोकेँ भेल। गरदैनसँ कण्‍ठी नि‍कालि‍ लाचारीक मुस्‍की दैत पत्नी लग आबि बाजल- “दूटा कुट्टि‍या आ चूड़ा भूजि‍ कऽ नेने आउ?” पति‍क बात सुनि व्‍यंग करैत सि‍ति‍या बाजल‍- “तीन सालमे केते घाटा भेल से बुझै छि‍ऐ? रौहु माछ खेनि‍हारकेँ कहि‍यो आँखि‍क ज्‍योति‍ कमै छइ। बुढ़ाड़ियो तक ओहि‍‍ना चक-चक देखैत रहैए। अखन चूल्हि‍ तरसँ केना उठब। घरमे चूड़ा नै अछि। दोकानसँ अदहा किलो नेने आउ। ताबे हम अण्‍डाकेँ तरै छी।‍” जहिना चोरकेँ गरपर रूपैआ देखने देहमे तेजी आबि जाइ छै, तहि‍ना फुदनोकेँ आबि गेल। जेबीसँ दसटकही नि‍कालि‍ दोकान गेल। सात रूपैआमे अदहा कि‍लो चूड़ा कीनि कऽ आबि चूल्हि‍‍ए लग बैस पत्नीकेँ कहलक- “ताबे एकटा लाउ।” सि‍ति‍याक इच्‍छा रहबे करइ। अनेरे दुनू परानी दु-दिसाह भेल छी। जइसँ अनेरे सदि‍‍काल रक्का-टोकी होइत रहैए। तरल अण्‍डा आ चूड़ाक भूजा सि‍ति‍या पति‍केँ देलक। जहि‍ना कोनो वस्‍तु अधि‍क दि‍नक पछाइत‍‍ भेटलासँ आनन्‍द अबैत तहि‍ना फुदनाकेँ माछ-चूड़ा खाइमे आबए लगल। फुदना सासुर गेल। ससुरक घरमे धड़ैनपर एकटा छोटका घुमौआ जाल सैंत‍ कऽ रखल देखलक। जाल देख मनमे एलै जे अनेरे ई जाल रखले-रखले दुरि‍ भऽ जाएत, तइसँ नीक जे नेने जाइ। छोटका सारकेँ जाल उतारि‍ देखबैले कहलक। जाल मांगि‍ गाम नेने आएल। गाममे केकरो बुझले नै रहै आ ने केकरो लग बजबे कएल। ओजार देख फुदना तरे-तर खुशी रहए। तेसरे-चारि‍मे दि‍नसँ ओ पोखैर‍ सभमे साँझू पहरकेँ चोरा-चोरा माछ मारए लगल। अपनो खाए आ उगरै तँ बेचियो लि‍अए। पोखैरबला सभ धपबए लगल। होइत-होइत एक दि‍न फुदना पकड़ा गेल। तत्‍काल तँ पोखैरबला किछु नै कहलकै, खाली जाल छीन लेलक। दोसर दि‍न भोरे पोखैरबला पनचैती बैसौलक। पूर्वासायक जरूरते ने रहै किएक तँ जाले गबाह रहइ। पंच सभ पच्‍चीस बेर‍ कान पकैड़‍ कऽ उठै-बैसैले आ एक साए रूपैआ दण्‍ड केलक। मुदा जाल घुमा देलकै। आँगन अबि‍ते पत्नी मुहेँ-काने खुब दुत्कारलक। पत्नीक बातसँ फुदनाकेँ जानसँ ऊपर ग्‍लानि‍ भेल। कान पकैड़‍ बाजल- “आइ दि‍नसँ कहि‍यो एहेन काज नै करब।” पति‍क बात सुनि सि‍ति‍या अपन हौंसली दैत कहलक- “लिअ, एकरा बन्‍हकी लगा माछ पोसैले एक-दूटा पोखैरक बनोबस कऽ लिअ। अपन कारोबार रहत, जेते मन हएत खेबो करब आ गुजरो करब।” दि‍वाली दि‍नक घनघोर बर्खासँ सैरातबला पोखैरक माछ दहा गेल। बाधक पानि‍क सलाढ़ पोखैरमे लगि‍ गेल। बर्खा छुटला पछाइत‍ दुनू परानी फुदना टॉर्चक हाथे माछ देखए गेल। पोखैरक सलाढ़ देख फुदनाकेँ बघजर लगि‍ गेल। बकार बन्न भऽ गेलइ। दुनू हाथ माथपर लऽ महारपर बैस रहल। टॉर्च नेने सि‍ति‍या घाटपर जा बारलक तँ एक्कोटा माछ नजैरपर पड़बे ने केएल। माछ नै देख सकदम भऽ गेल‍। मने मन सोचए लगल जे सभ केलहा डुमि‍‍ गेल। मुदा गलती अपनो भेल जे महारकेँ बन्‍हलौं नहि। जँ मोटगर आड़ियो जकाँ मुहकेँ बान्‍हि‍ देने रहि‍ति‍ऐ तँ एहेन दि‍न नै देखितौं। मुदा आब सके कोन। जे चलि‍ गेल ओ फेर‍ घुमि‍‍ कऽ थोड़े औत। घुमि‍‍ कऽ पति‍ लग आबि चुपचाप ठाढ़ भऽ गेल‍। फुदना सोचैत, लोक कमा कऽ स्‍त्रीकेँ गहना-जेबर कीनि-कीनि दैत अछि‍ आ हम एहेन करमघट्टू छी जे जेहो गहना छेलै सेहो पानि‍मे बोहा देलि‍ऐ। एक तँ माछ भाँसल, तैपर सँ हौंसलियो चलि‍ गेल...। फुदना कि‍छु बजबे ने करैत। पति‍केँ देख सि‍ति‍या बाजल- “माथा-हाथ देलासँ थोड़े माछ घुमि औत। तखन तँ आगू की करब से सोचू। चलू ओहू पोखैरकेँ देखि‍ऐ जे ओहो भँसि‍ गेल आकि‍ बँचल अछि।” मने-मन फुदना सोचलक, हमर बाजब उचि‍त नै हएत। कि‍एक तँ जनीजाति‍ बेटोसँ पैघ गहनाकेँ बुझैत अछि। तँए वएह कि‍‍ बजैए सएह सुनी। आगू-आगू टॉर्च नेने सि‍ति‍या आ पाछू-पाछू चुपचाप फुदना दोसर पोखैर‍ देखए विदा भेल। पोखैरक चारू महार घुमि‍ कऽ देख मुस्‍की दैत सि‍ति‍या बाजल- “जीरासँ जे कि‍छु आमदनी होइत से तँ नहियेँ हएत। मुदा एक्को पोखैर‍ जँ बँचि‍ गेल तँ अहीसँ दुनू पोखैर‍ अबाद भऽ जाएत।” पत्नीक बात सुनि फुदना बाजल- “पहि‍ने तँ भेल जे जहि‍ना ओ पोखैर‍ दहा गेल तहि‍ना ईहो दहा गेल हएत। मुदा भगवान रच्‍छ रखलैन जे एकटा बँचल अछि। तेते ने जीरा सुतरल अछि‍ जे एकटाकेँ के कहए जे एकटा आरो पोखैर‍ भऽ जाएत, तेकरो अबादि‍ लेब। जेते छेहर बच्‍चा रहै छै ओते बेसी बाढ़ि‍ होइ छइ।” फुदनाक बात सुनि सि‍ति‍याक मनमे एकटा नव विचार जगलै। मने-मन सोचए लगल जे भने दहार भऽ गेल। कोनो कि‍ हमरेटा पोखैर‍ दहाएल, एहेन-एहेन केते गोरेक दहाएल हेतइ। आब सोसाइटीबला आ पोखैरबला अगधाएत थोड़े, तेहेन पूजी अछि‍ जे पोखैरबला सभ खुशामद करए औत। सस्‍तेमे दोसरो पोखैर हाथ लगि‍ जाएत। भगवान जहन दइपर होइ छथि‍न तँ अहि‍ना ने छप्‍पर फारि‍ कऽ दइ छथि‍न। बाजल- “गलती अपनो सबहक भेल जे पोखैरक मुँह मजगूतसँ नै बान्‍हि‍ देलि‍ऐ। जँ से बान्‍हल रहैत तँ एहेन दि‍न थोड़े देखतौं। काल्हि‍‍ भोरे पाँचटा टल्लाबला जन कऽ कऽ मजगूतसँ मुँह बान्‍हि‍ देबइ। अखन काति‍के छी बहुत समए अछि। बैशाख-जेठमे मछहैर‍ हएत। भने पोखैर उपो-उप भरि‍ गेल।” पत्नीक बात सुनि फुदना बाजल- “जँए एते पूजी लगेलौं तँए थोड़े आरो लगा देबइ। दू मन खैर आनि‍ कऽ सेहो दइए देबइ। ओना देखै छि‍ऐ जे केते गोरे खादो दइए। मुदा अपना तँ ओते ओकाइत नइए। ऐ साल कहुना-कहुना कऽ लिअ। ऐगला सालसँ नीक जकाँ करब। कोनो की अग्‍गह-बि‍ग्‍गह पोखैरे जोतलासँ थोड़े होइ छै, जेतबे करब नीक जकाँ करब।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2373 4. (घ) कालीपूजा समि‍ति‍क सदस्‍य होइक नाते भोला भोरेसँ स्‍थानक काजमे जुटल रहए। केना नै जुटैत? जे परि‍वारसँ उठि‍ समाजक काजकेँ अपन काज बुझैत अछि ओ केना ओकरा छोड़ि‍ सकैए‍। जहि‍ना ब्रह्मक अंश जीव होइत तहि‍ना ने बेकती‍ समाजक अंग छी। स्‍थानक काजक दुआरे जलखैयो करए भोला घरपर नै आएल। नहेबो नै केलक। हाथ-पएर धोइ खेलक आ पुन: वि‍दा होइत पत्नीकेँ कहलक- “हमर कोनो ठेकान नै अछि तँए मालो-जाल आ पावैनोक सभ ओरि‍यान कऽ लेब।” पानि‍-बि‍हाड़ि‍ जखन आएल तखन भोला आ मंगल वृन्‍दावनक रासक आगूमे ठाढ़ भऽ हि‍यासि‍-हि‍यासि देखै छला जे केतौ कोनो गड़बड़ी तँ नै भऽ रहल अछि। मुदा तेहेन भयंकर रूपमे पानि‍-बि‍हाड़ि‍ आएल जे मनक सभ वि‍चार सबहक मनेमे सड़ि‍ गेल। मंचक घटना सम्‍हारि भोला घरपर आबि बीरार देखए गेल। बीरारमे बिहैनक दशा बिगड़ल देख नि‍राश भऽ गेल। आमदनीक आशा टुटि‍ गेलइ। जहि‍ना भोला छोट कि‍सान तहि‍ना छोट कारोबारियो। पनरहे कट्ठाक आँट-पेटक किसान। मुदा दुनू परानी एहेन मेहनती जे सात गोरेक परि‍वार हँसी-खुशीसँ चलबैत। ओना चारि‍टा बच्‍चा लि‍धुरि‍या रहै मुदा जेठका बारह बर्खक। बलदेब मि‍ड्ल स्‍कूलमे पढ़बो करैत आ घर-गि‍रहस्‍तीक काजमे संगो-साथ दइत। स्‍कूलोक दशा तेनाहे सन। पाँच साए वि‍द्यार्थीक स्‍कूलमे तीनिटा शि‍क्षक। तहूमे एकटा नेतागिरिये करैत। पढ़बै-लि‍खबैसँ ओते मतलब नहि, जेते आँफि‍सक दौड़-बड़हासँ। सि‍रि‍फ लोकेक काजे ऑफि‍स नै जाए, बल्‍कि‍ स्‍टाफो[8] सबहक काज करैत। जइसँ आमदनियोँ नीक आ पैघ लोकक बीच बैस समैयो गूदस करैत। स्‍कूलसँ ओतबे मतलब जे मासो दि‍नक हाजरी बना दरमाहा उठबैत। समाजमे केकरो कि‍छु कहैक साहसे नहि। थाना-बहानासँ लऽ कऽ कोट-कचहरी धरि‍क धुड़फन्‍दा लोक, तँए कि‍यो आँखि‍ केना उठा सकैए। तहूमे सरकारी पार्टीक नेतागि‍री करैत। स्‍कूलक ढील-ढालसँ भोला खुशीए रहए। कि‍एक तँ बलदेब माल-जालक पूरा भार उठा नेने। कुट्टी काटब, खाइले देब, पानि‍ पि‍याएब, घर-बाहर करब, थैर खर्ड़ब, गोबर उठाएब बलदेवक बान्‍हल ड्यूटी‍। अइले ने पिताकेँ अढ़बैक जरूरत‍ आ ने कोनो चि‍न्‍ता। मुदा तँए की बलदेव पढ़ए नहि? पढ़बो करए। भरि‍ दि‍न ने माल-जालक नेकरम करै मुदा बारह घन्‍टाक राति‍ तँ बँचइ। दोसैर साँझ होइते भोला मुस्‍तैज भऽ धि‍या-पुता लग बैस नजैर‍ रखैत। पढ़ैमे बलदेव ओते चन्‍सगर नहि, रहबो केना करैत? जखन स्‍कूलेकेँ केन्‍सर धेने रहत, तखन हाथ-पएर केते क्रि‍याशील रहत। मुदा तँए कि बलदेव सोलहन्नी भुसकौले रहए से नहि। इमानदारीक छह घन्‍टाक मेहनतसँ कि‍यो इंजीनि‍यर तँ कि‍यो डाक्‍टर, कि‍यो ओकील, तँ कि‍यो प्रोफेसर बनि‍ जाइए‍, तँ तीन‍ घन्‍टाक मेहनतसँ बलदेव किए ने पास करत। साले-साल किलास टपि‍ते रहए। भोलो खुशी, किएक तँ बच्‍चेमे बाबाक मुहेँ सुनने रहए जे- ‘उत्तम खेती’। नोकरी आ गुलामीमे की अन्‍तर छइ। कमा कऽ जि‍नगी जीबैक लूरि‍ जँ भऽ जाए तँ ऐ‍सँ बेसीक जरूरते की‍। जहि‍ना राजतंत्रमे रजेक बेटा राजा होइत तहि‍ना ने प्रजातंत्रोमे मंत्रियेक बेटा मंत्री आ हाकि‍मेक बेटा ने हाकि‍म बनत। तइले आनक सेहन्‍ता, सेहन्‍ता नै तँ आरो की भऽ सकै छइ? पनरहे कट्ठा खेत रहि‍तो भोला गामक किसानक गि‍नतीमे अबैत। खेती करैक अपन ढंग। खाली बरसातेक मसिममे धानक खेती करए, बाँकी समैमे तरकारीक खेती करए। ओना बरसातोक मसिममे पाँचो कट्ठा चौमासमे तरकारीए उपजबैत रहए। बाँकी दसो कट्ठामे कति‍का धान करैत रहए। पि‍ताक अमलदारीमे ओइ‍‍ दसो कट्ठामे रोहनियाँ-मरूआक बीआ पाड़ि‍ रोपैत आ मरूआ काटि‍ अगहनी धान रोपैत। मुदा मरूआक बि‍सवासू खेती नै रहइ। गोटे साल पचता पानि‍ भेने बीये बुड़हा जाइ, गोटे साल बेसी बर्खा होइ तँ दहाइए जाइ। कि‍एक तँ मरूआ पनि‍सहू नै होइए मुदा जइ साल समगम समए होइ तइ साल दसो कट्ठामे दस मन भऽ जाइ। मरूआकेँ किसान पवि‍त्र अन्न मानैए‍ किएक तँ ओइमे सूरा-फाड़ा नै लगै छइ। ओना, आन-आन पावैन‍‍‍मे मरूआ अशुद्ध अन्न मानल जाइए‍ मुदा जि‍ति‍या पावैन‍‍मे शुद्ध भऽ जाइए‍। जहि‍ना कुमारि‍ कन्‍या बि‍आहमे पवि‍त्र मानल जाइए‍ मुदा चुमौनमे बालो-बच्‍चावाली अपवि‍त्र बनि‍ जाइए। पावैन‍‍‍क जोड़ो मनुखे जकाँ अछि जहि‍ना कुमार बर-कन्‍याक बि‍आहक संग-संग दोती बर-कन्‍याक बि‍आह सेहो होइते अछि, तहि‍ना मरूआक रोटी आ साग, चाहे माछक मि‍लानसँ जिति‍या पावैन‍ होइए। ओना आन-आन पावैन‍मे मरूआ, साग आ माछ बर्जित अछि। धानोक वएह हालत होइत। जइ साल रौदी होइ तइ साल मरहन्ना भऽ जाइत आ जइ साल बेसी बर्खा होइ तइ साल दहा जाइत। समगम समए भेने दसो कट्ठामे दस मन धान भऽ जाइत। अन्नक खेतीकेँ भोलाक पि‍ता जुआ बुझि‍ खेतियो बदललक आ बीआक कारोबार बढ़ौलक। ओना रामझि‍मनी, झि‍मनी, भाटा, मेरि‍चाइ, सजमैन, घेरा, कदीमा आ सागक बीआ तँ अपने बना लिअए मुदा कोबीक बीआ बनौल नै होइ। हाटो-बजारमे कोबीक गोट्टा-बीआ नै बि‍‍काइत रहए। एक बेर‍‍ हरि‍हर क्षेत्रक मेला गेल तँ हाँजीपुरमे कोबीक गोट्टा-बीआ बिकाइत देखलक। दोकानदार लग बैस कोबी बीआक भाँज बुझए लगल।  दोकानदार रघुनीकेँ माने भोलाक पि‍ताकेँ कोबी बीआ बनबैक लूरि बता देलक। नीक किस्‍म बुझि‍ रघुनी सभ कथूक बीआ कीनि लेलक। बीआ कीन‍ला पछाइत‍‍ दोकानदार “लक्ष्‍मी सीड” कम्‍पनीक नाओंसँ पाँचटा पोस्‍ट-कार्ड दैत बाजल- “जइ चीजक बीआ कीनैक हुअए ओकर नाओं आ ओजन लि‍खि‍ कऽ पठा देब। ऐठामसँ हम पार्सल कऽ देब।” रघुनीक जि‍नगीमे नव मोड़ आएल। ओइ‍‍ सालसँ बिहैनक कारोबार करए लगल। पिताक संग-संग भोलो सीख‍ लेलक। पछाइत अपनो तरकारी-खेती आ बीओक कारोबार, करए लगल...। कृषि‍ मंत्री आ प्रधानमंत्री शास्‍त्रीजीक नेतृत्‍वमे खेतीमे हरि‍त क्रान्‍ति‍क कार्यक्रम बनल। कार्यक्रम बनैक कारण रहै देशक भूख मेटबैले अमेरि‍कासँ गहुम कर्ज लेब। औझुका जकाँ ओइ‍‍ समए जनसंख्‍यो नै रहै मुदा तैयो पेट भरैमे मकमकीए रहए। जइ देशक माटि‍क जोड़ा दुनि‍याँक कोनो कोणमे नै छै, श्रमशक्‍ति‍ भरपुर छै, मसिम अनुकूल छै, तैठाम केते लाजि‍मी बात छी जे ओइ‍‍ देशक लोक अन्न बि‍ना मरए। जे बात शास्‍त्रियोजी आ जगजीवनो बाबू बुझि‍ “जय-जवान, जय कि‍सान”क नारा देलैन‍। खाली नारेटा नै देलैन खेती-ले योजना बना क्रि‍यान्‍वि‍त सेहो केलैन। अदौसँ अबैत खेतीमे नव जागरण भेल। हरक जगह ट्रेक्‍टर, करीनक जगह दमकल-बोरिंगक संग-संग नव-नव औजार कि‍सान तक पहुँचल। नव-नव बीआक अनुसन्‍धान भेल। कृषि‍क महत बढ़ने शि‍क्षाक वि‍कास भेल। उपजा-ले रासायनि‍क खाद, कीट-नाशक दवाइ इत्‍यादिक उपयोग शुरू भेल। जइसँ खेतीक उत्‍पादनमे आश्चर्यजनक वृद्धि‍ भेल। देशक कि‍सानमे नव चेतनाक सि‍रजन भेल। मुदा भारत सनक देशमे जेते आ जइ गतिए वि‍कास हेबा चाही से नइ भेल। ओना, जइ राज्‍यक सरकारोक नजैर‍ आ किसानोक नजैर‍ खेती दि‍स बढ़ल ओ जरूर वि‍कास प्रक्रि‍याकेँ पकड़ने रहल। मुदा जइ राज्‍यमे से नइ भेल ओइ‍‍ राज्‍यक कृषि‍ पुन: ठमैक‍ गेल। ओना मि‍थि‍लांचलक संग आरो-आरो संकट छइ। जइ कारणेँ वि‍कास-प्रक्रि‍या आगू बढ़ैक कोन बात, ठमकैक कोन बात जे पाछुए-मुहेँ ससरए लगल। जेकर कारण छेलै बाढ़ि‍क वि‍भीषि‍का। एहेन-एहेन पहाड़ी‍ धार सभ अछि जे खाली पानिएसँ नाश नै करैत बल्‍कि‍ खेतक माटि‍ काटि‍-काटि‍ नव-नव धारो बनबैत अछि‍ आ उपजाउ माटि‍केँ सेहो भँसा-भँसा बाउलसँ भरैए। जइसँ खेतक उर्वराशक्‍तिये चौपट कऽ दैत अछि। नव धार बनने गामो घर उजैर‍ जाइए‍। खेत-पथार सेहो नष्‍ट भऽ जाइए, तँए जरूरी अछि‍ धारक ऐ उपद्रवकेँ नि‍यंत्रि‍त करब। जाधैर‍‍ से नइ हएत ताधैर‍‍ बि‍सवासू खेती मात्र कल्‍पना बनि‍ रहत। पचास-साइठ‍ वर्ष पूर्व कोसीक पुलमे फाटक लगा दुनू दिस माने पूवो आ पच्‍छि‍मो, नहरक योजना बनल। मुदा अखनो धरि‍ जइ रूपे ओकर उपयोग हेबा चाही से नइ बनि‍ सकल अछि, तेकर अतिरिक्‍तो सरकारी-उदासीनताक चलैत एहेनबेवस्‍था बनि‍ गेल अछि जे कोसीए इलाकाक-इलाका दहाइत रहैए। ओना, कोसीक पुबरियो आ पछबरियो भागमे मुख्‍य नहर बनल। ओइ‍‍सँ नहरक‍ शखो सभ सोलहन्नी तँ नै मुदा थोड़-थाड़ सेहो बनि‍ गेल। मुख्‍य नहरक भीतर सीमेंट-ईंटाक जोड़ाइयो भेल। मुदा बनौनि‍हारक, ठीकेदारक बदनीयतीसँ तेहेन काज भेल जे जहाँ-तहाँ ढहि‍-ढहि‍ नहरकेँ भरि‍ देने अछि। नहर‍क मुख्‍य बहाव बन्न भेने आ बाढ़ि‍क प्रकोपसँ मुख्‍य नहर जहाँ-तहाँ टुटि‍तो अछि। ओना, साले-साल मरम्‍मतो होइत अछि आ टुटि‍तो अछि। मुदा तैयो थोड़-थाड़ लाभ कि‍सानकेँ होइते छइ। जेतए-जेतए पानि‍क सुवि‍धा उपलब्‍ध अछि, ओइ‍‍-ओइ‍‍ इलाकाक कि‍सानक जि‍नगीमे क्रान्‍ति‍-कारी बदलाउक सम्‍भावना बनि‍ गेल अछि। मुदा सरकारी-तंत्रक चलैत जेते लाभ हेबा चाही से नइ भऽ पबैत अछि। ओना शाखा-नहर पूर्णरूपेण तैयारो नै भेल अछि। तहूसँ दुर्भाग्‍य ई भेल जे पैछला साल कुसहामे पुबरि‍या बान्‍ह टुटने पुबरि‍या इलाका तँ नाश भइए गेल, जे नहरक रूपे-रेखा चौपट भऽ गेल। जइसँ पूर्वतते स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल अछि। कोसीए नहर‍ जकाँ बोरिंग-दमकलक योजनाक दशा सेहो अछि। छोट कि‍सान-ले नब्‍बे प्रति‍शत सब्‍सिडीमे बोरिंग आ ति‍हाइ सब्‍सिडीमे दमकल देब शुरू भेल। मुदा सीमि‍त दायरामे योजना समटा गेल। जइसँ गामक पाँचसँ दस प्रति‍शत खेत धरि‍ पानि‍ पहुँचैक सुवि‍धा भेल। मुदा वेपारीक चालि‍सँ घटि‍या बोरिंगक पाइप आ घटि‍या दमकल किसानक हाथ आएल। जे तीन‍-साल बीतैत-बीतैत सभ बि‍गैड़‍ गेल। ने एक्कोटा बोरिंग काजक रहल आ ने दमकल। मुदा बैंकक कर्जक बोझ किसानपर लदले रहल। जे चक्रवृद्धि‍क दरसँ सुदि सहित मूलधनक असुलीमे कि‍सानक सि‍रि‍फ गाइए-महींस‍ नै खेतो-पथार बीकैत अछि। खेतीक उपजाक कोन बात जे लोकक खेतो हाथसँ नि‍कैल‍‍ रहल अछि। जहि‍ना कि‍सान पानि‍-ले पहि‍ने लल छेलए तहि‍ना फेर‍ भऽ गेल। पानि‍क चलैत खेतियो पाछुए-मुहेँ ससैर गेल। जे कि‍सान अपन पूजी लगा बोरिंग-दमकल कीनि खेती करै छैथ‍ ओ खादक वेपारी आ बीआ वेपारीक हाथक खेलौना बनि‍ गेल छैथ‍। घटि‍या खाद आ घटि‍या बीआक चलैत हुनको खेतीक हालत आरो चौपट भेल छैन। गोटे साल नीक खाद भेटल तँ बीआ लऽ कऽ डुमि‍‍ गेल नै जँ बीआ नीक भेटल तँ खाद लऽ कऽ डुमि‍‍ गेल। खेती चौपट भेने गामक लोक पड़ा कऽ पंजाब, दि‍ल्‍ली, बम्‍बई, कलकत्ता चलि‍ गेल जइसँ गामक-गाम सून भऽ गेल अछि। ओना पाछू घुमि‍ कऽ देखलापर नै बुझि‍ पड़ैत जे मि‍थि‍लांचलमे पहि‍नेसँ कम जनसंख्‍या अखन अछि, मुदा श्रमशक्‍ति‍क अभाव जरूर भऽ गेल अछि। तहि‍ना उपजाउ माटि‍क सेहो ह्रास भऽ गेल अछि। नीक माटि‍ बाउलमे बदैल‍ गेल अछि। सोलहन्नी तँ नै मुदा अदहा नै तँ ति‍हाइक दशा जरूर बि‍गैड़‍ गेल अछि। जे गाम कहि‍यो अन्नक बखारी छल ओ आइ राजस्‍थान सदृश मरूभूमि‍ बनि‍ गेल अछि। गाछ-वृक्षसँ सजल गाम वस्‍त्र-विहीन नारी सदृश बेनग्न भऽ गेल अछि। ओना जेहो बँचल अछि तहूमे पानि‍क अभाव, खाद बीआक गड़बड़ीसँ नर-कंकाल जकाँ गामक सकल बनि‍ गेल अछि। सभ कि‍छु होइतो भोला चैनसँ गृहस्‍ती करैत अछि। आ गृहस्‍तक गौरवसँ मण्‍डि‍त अछि। किएक तँ जेते खेतबला पड़ाइन केलक ओ अपन खेत-पथार तँ नै लऽ कऽ गेला। खेत तँ गामेमे रहल। भोला सन-सन खेति‍हरकेँ स्‍वर्ण-अवसर भेटल। अखन धरि‍ जे बटाइ प्रथा छल ओइ‍‍मे सुधार भेल। पहि‍ने बटेदारकेँ उपजाक अदहा बँटबारा होइ छेलइ। जइसँ बटेदार सदि‍काल‍ घाटामे रहै छला। घाटाक खेती देख बटेदार बटेदारी छोड़ि‍ बोइने-बुत्ताकेँ नीक बुझए लगला। मुदा बटाइमे सुधार भेने मनखपक चलैन भेल। धानक बँटबारा पनरह किलो प्रति‍ कट्ठा जमीनबलाक हिस्‍सा आ बाँकी बटेदारक। तहि‍ना गहुमोक उपजाक बँटबारा हुअ लगल अछि। तरकारीक खेती सेहो तहि‍ना हुअ लगल अछि। दुइए बेकती भोला, तँए केते खेती करत। मुदा तैयो एक बीघा बटाइ खेती करैत अछि। ओना अपनो पनरह कट्ठा खेत छइहे। ओइ‍‍ एक बीघा खेतमे गरमा धान काटि‍ अगते गहुमक खेती कऽ लैत अछि। गहुमो अगते भऽ जाइ छइ। गहुम काटि‍ खेत पटा “पूसा बैशाखी” खेरही कऽ लैत अछि। यएह ओकर फसल चक्र छइ। सालो भरि‍ मारि‍-धूसि‍ खेबो करैत अछि आ खेतबलाकेँ सेहो दैत अछि। तरकारीक खेतीमे सेहो सुधार केलक। आब ओ हाँजीपुरक बीआ मंगाएब छोड़ि‍ हाइब्रीड बीआ नामी-गामी कम्‍पनी सभसँ मंगा अपनो खेती करैत अछि आ बिहैन सेहो बेचैत अछि। जइसँ सभ दि‍ना काज सेहो रहै छै आ आमदनियोँ बढ़ि‍याँ होइ छइ। गाममे काली पूजाक मेलाक अन्‍दाजसँ पनरह घूरमे बीआ पाड़लक। कि‍एक तँ इलाकाक लोक भोलाक बीआकेँ जनैत अछि। सभ जनैत अछि जे भोलाक बीआ सन कोनो वेपारीक बीआ नै होइ छइ। नीक बीआ रहि‍तो आन वेपारीसँ सस्‍तेमे बेचबो करैत अछि। मुदा ऐ बेर वेचाराकेँ गरदैनकट्टी भऽ गेलइ। तेहेन बर्खा भेल जे चौमासमे दनार फोड़ि‍ देलकै जइसँ सौंसे बीरार माटि‍सँ भरि‍ गेलइ। बीआक दशा देख भोलाकेँ ठकमुड़ी लगि‍ गेल। मुदा नि‍राश नै भेल। एते आशा रहबे करै जे एक बेरक ने नष्‍ट भेल। फेर पाड़ि‍ लेब। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1793 4. (ङ) दोकानक छि‍जानैत देख दुनू परानी ललि‍तक मन वि‍चलि‍त भऽ गेल। साल भरि‍क मेहनतकेँ नष्‍ट होइत देख सुरजी तुरैछ‍ कऽ पति‍केँ कहलक- “जेकर बनरी सएह नचाबे। कोन दुरमति‍या अहाँकेँ कपारपर चढ़ि‍ गेल जे मि‍ठाइक दोकान केलौं। हलुआइक काज जे आन जाति‍ करत तँ अहि‍ना हेतै कि‍ने।” एक तँ पूजी नष्‍ट होइत ललि‍त देखए दोसर पत्नीक गनजन सुनि मन थरथर कँपए लगलै। करुआएल मने बाजल- “कोनो काज कोनो जाति‍क बान्‍हल नै छइ। जेकरा जे लूरि‍ रहतै से किए ने ओ काज करत। कोनो की अपनेटा बेरबाद भेल आकि सबहक भेलइ।” “सबहक किए ने हेतइ। गौंआँ सभ ने अकरहर केलक। बिना काली महरानीक वाक् नेनहियेँ गाममे पूजा किए ठानि‍ देलक। पहि‍ने भगताकेँ बजा पूजा ढारि‍ वाक् लऽ लैत। से तँ केलक नहि। देवियो-दुर्गाकेँ हँसीए-ठट्ठा बुझलक। तँए ने एना भेल।” पत्नीक बात सुनि ललि‍त मुँह बन्न कऽ चुप्‍पे रहल। चारि साल पहि‍ने ललि‍त नोकरी करैले बि‍राटनगर गेल। हलुआइक दोकानमे नोकरी भेलइ। पहि‍ने तँ कोनो मि‍ठाइ बनबैक लूरि‍ नै रहै मुदा रहैत-रहैत सभ मिठाइयो आ आनो-आनो चीज बनबैक लूरि‍ भऽ गेलइ। दू सालक पछाइत‍‍ मनमे एलै जे जखन सभ लूरि भऽ गेल तखन अनेरे किए नोकरी करै छी। से नइ तँ गामेमे जलखैयो आ मि‍ठाइयोक दोकान खोलब। गाम आबि सोचलक तँ मनमे एलै जे ऐठाम मि‍ठाइ दोकान चलैबला नै अछि। कहि‍यो काल कि‍यो-कि‍यो मि‍ठाइ कीनैए। तइमे दोकान थोड़े चलत। एकटा चाहक दोकान छै ओकरो देखै छि‍ऐ जे सभ दि‍न उधारी-दुआरे गहिंकी सभसँ झगड़े होइत रहै छइ। फेर‍ घुमि‍‍ कऽ वि‍राटेनगर जाइक मन भेलइ। मुदा नोकरी करैबला परि‍वार सबहक दशा देख मन नै मानलकै। मासे-मास रूपैआ पठबैत रहू मुदा घरक कोनो ठर-ठेकान नहि। ने धिया-पुता स्‍कूल जाइए आ ने घरेवाली कोनो काज करैए। अपने गाममे रहब तँ सभ किछु सुढ़ि‍या जाएत। गामोमे की काजक कमी छइ। फेर‍ मनमे उठलै जे आब तँ गामोमे तेते भोज-काज होइए जे उठो काज करब तैयो परदेससँ बेसीए कमा लेब। पहि‍ने जकाँ की आब लोक थोड़े भतभोज करैए। आब तँ हर्हियो-सुर्हियो बरि‍यातीकेँ पुड़ी-मि‍ठाइ खुअबैए आ श्राद्धोक भोज मि‍ठाइयेक होइ छइ। हजार-हजार, डेढ़-डेढ़ हजार रूपैआ मि‍ठाइ बनौनि‍हार लइ छइ। बि‍आह ने सीजनल होइए। मुदा सराधक तँ कोनो सि‍जीन नै होइ छइ। दोसरो काज ठाढ़ कऽ लेब आ जइ दिन काज भेटत तइ दिन काजो कऽ लेब। पच्‍चीसो-पचास काज सालमे पकड़ाएत तैयो पच्‍चीस-पचास हजारक कमाइ भइए जाएत। पावैनो आ भारो-दौरमे लोक मि‍ठाइक चलैन केने जा रहल अछि। अखन शुरूआती समए अछि। तँए अबूह बुझि‍ पड़ैए। मुदा जखन काज शुरू करब तखन अनेरे काज बढ़ए लगत। पहिलुका जकाँ तँ आब लोकक हालतो गड़बड़ नहि‍येँ छइ। पहि‍ने लोककेँ भरि‍ पेट खेनाइयो ने होइ छेलै मुदा आब तँ से बात नै रहल। जेना-जेना हालत सुधरतै तेना-तेना खेनाइयो-पीनाइ आ आनो-आन काज सुधरतै। तहूमे की सभ गाममे थोड़े हलुआइ अछि। जखने लोक बूझत आकि‍ आनो-आनो गामबला सभ आबि-आबि काज करैले कहत। सोचैत-वि‍चारैत ललि‍त, गामेमे रहि अपन कारोबार करैक नि‍र्णए कऽ लेलक। नि‍र्णए करिते‍ मि‍ठाइ बनबैक सँचो आ बरतनो-जात कीनलक। पाँचे दि‍नक पछाइत‍ फागुनक लगन पकड़ा गेलइ। बाप रे! एहेन लगन कोनो साल नै भेल छेलइ। पनरह-सोलहटा बि‍आहक दि‍न। बुढ़-ठेंर सभ उठि‍ जाएत, तहूमे की कोनो सरकारी नोकरी छी जे जेते दरमाहा तँइ भेल ओतबे रहत। जखने काजक धुमसाही हेतै तखने कारीगरक कमाइ बढ़तै। जहि‍ना कम वस्‍तु रहने दाम बढ़ैत अछि आ बेसी वस्‍तु भेने दाम घटैत अछि तहिना, ने कम काज रहने रेट कमत आ बेसी काज भेने रेट बढ़त। टोटल-नफा मि‍ला कऽ ने मासक हि‍साब हएत। सोलहो लगनमे ललि‍त चौबीस हजार रूपैआ कमाएल। तैपर सँ अपूछ खेनाइ-पीनाइक संग किछु-कि‍छु उगरहला समानो भेलइ। मासो दि‍न व्‍यस्‍त रहल। मुदा कमाइक संग एकटा रस्‍तो भेट‍लै। ओ ई जे अन्‍तिम लगनक काज करए गेल तँ घरवारी घरपर नहि। बरि‍यातीक भोजन बनबै आ खुअबै-पि‍अबैक बरतन भाड़ापर आनए गेल रहए। गप-सप्‍प करैक समए ललि‍तकेँ भेटल। गप-सप्‍पक क्रममे बुझलक जे दू हजार रूपैआ बरतन-बासनक भाड़ा लगतै। ललित बाजल तँ कि‍छु ने मुदा मने-मन हि‍साब बैसौलक जे जेते दू दिनक मेहनतमे कमाएब ओते तँ बरतने-बासन कमाइत अछि। मनमे जँचि‍ गेलइ। सभ बरतनक हि‍साब जोड़लक तँ बुझि‍ पड़लै जे जेते पूजी लगाएब ओते नमहर कारोबार हएत। तत्‍काल तँ ओते पूजियो नइ अछि आ ने समान रखैक जगह। से नइ तँ पहि‍ने एकटा घर बनाएब जरूरी अछि। जखन घर भऽ जाएत, तखन बहुत तँ नइ मुदा एक बरि‍याती जोकर सभ बरतन-बासन ताबे कीनि लेब, फेर‍ बूझल जेतइ। जेना-जेना पूजी होइत जाएत तेना-तेना कारोबार बढ़बैत जाएब। नव कारोबार देख ललितक मनमे खुशी एलइ। खुशी अबि‍ते नजैर‍ दौगलै इजोतपर, जेनरेटरपर। मुदा टेन्‍ट आ जेनरेटर-ले समांग सेहो चाही। असगरूआ बुते केना हएत। अपने कारीगिरी करब आकि ओइ‍‍मे बरदाएब। सोचैत-सोचैत मन घुरि‍याए लगलै। फेर‍ मनमे एलै जे टेन्‍ट-जेनरेटरमे ने अपन रहब जरूरी अछि मुदा बरतनमे तँ से नइ हएत। गि‍नती कऽ कऽ देबै आ लेबइ। साल भरि‍क उत्तर ललि‍त दोसरो काज ठाढ़ कऽ लेलक। दोहरी कमाइ हुअ लगलै। ललि‍तक आमदनी आ काज देख गामक लोक बाजए लगल जे ललि‍तक कपार जगि‍ गेलइ। केना नै जगैत? सूतल कपार माने बुधिकेँ जगौलासँ ने जगै छइ। जँ से नइ जगाएब तँ ओहि‍ना ने सूतले रहत। दोहरी कारोबार भेला पछाइतो ललि‍तकेँ कि‍छु समए बैसारी बुझि‍ पड़लै। बैसारी-ले सोचए लगल जे एकरा केना काजमे आनब। अपना खेत-पथार नहि। मुदा संयोग नीक रहल। एक गोरेक माए दुखि‍त पड़ल। वेचाराकेँ लहेरि‍यासराय इलाज करबए जाइक रहैक। ललि‍तक आमदनी गामक सभ बुझए लगल। अपन लाचारी देखबैत मकशूदन ललित लग आबि बाजल- “भाय, वि‍पैत‍मे पड़ि‍ गेल छी। माएकेँ तेहेन बेमारी भऽ गेल अछि जे लहेरि‍यासराय लऽ जाए पड़त। तमोरि‍याक डाक्‍टरकेँ बेमारी जँचैक मशीने ने छैन‍‍। तँए कहलैन जे बि‍ना लहेरि‍यासराय गेने इलाज नै भऽ सकत।” मकशूदनक बात सुनि ललि‍त बाजल- “हमरा की कहै छी। जँ देहक काज हुअए तँ अखने संगे चलब।” “नहि, समांगक काज नै अछि ललि‍त भाय, रूपैआक जरूरत‍ अछि।” फेर‍ ओंगरीसँ देखबैत मकशूदन बाजल- “अहाँक घरे लगहक दसो कट्ठा खेत भरना दऽ देब। पनरह हजार रूपैआ सम्‍हारि‍ दिअ।” मकशूदनक मजबुरी देख ललि‍तक मनमे एलै जे बेमारी, आ बच्‍चा सभकेँ पढ़ैले रीणो-पैंच कऽ कऽ मदैत करैक चाही। एहेन समैक मदैत सि‍रि‍फ लेने-देन नहि, घरमक काज सेहो छी। घरसँ पनरहो हजार रूपैआ नि‍कालि‍ कऽ दऽ देलक। रूपैआ लैत मकशूदन बाजल- “भाय, कागत बना लएह?” कागतक नाओं सुनि‍ ललि‍त अवाक् भऽ गेल। मने-मन सोचए लगल जे कोनो की केबाला लेलौं हेन जे लि‍खा-पढ़ी कराएब। भरना-ले लि‍खा-पढ़ीक कोन जरूरत‍ छइ। समाजमे केतबो छल-प्रपंच आबि गेल मुदा अखनो समाज समाजे छी। गाममे एहेन-एहेन लोक छैथ‍ जे दोसराक बच्‍चाकेँ पढ़ैमे, इलाजमे, माए-बापक क्रि‍या-कर्ममे ओहुना मदैत कऽ दइ छथिन, तहन कागत-पत्तर बनबैक कोन जरूरत‍ अछि। जँ मनमे बेइमानी औतैन तँ नै देता। मुदा जमीन तँ हमरो कब्‍जामे रहत। समाज की ऐ बातकेँ नै बुझता। जँ समाजमे बेइमानी-शैतानी बढ़ि‍ गेल अछि तँ ईहो बात तँ छि‍पल नै अछि जे केतेको गोरे माइयो-बापकेँ खाइ-पीबैमे तकलीफ करैए। भीन कऽ दैत अछि, ई बेइमानी-इमानदारी तँ आदमी-आदमीक बीचक वि‍चार अछि। ऐ नजैरसँ देखलापर मकशूदनकेँ बेइमान केना कहबैन‍। अपन मुँहक अहार काटि‍ कऽ माइक इलाज करबए जा रहल छैथ‍। जइ आदमीमे एते इमानदारी छैन‍, हुनकासँ कागत बनाएब जरूरी नहि। अखनो गाममे ढेरो भरना एहेनअछि जेकर लि‍खा-पढ़ी नै भेल अछि। जँ बेइमानीए करता तँ अपन माए-पि‍ति‍याइन बुझि‍ बूझब जे समाज सेवा केलौं। जँ रजि‍ष्‍ट्री कराएब तँ अदहा खर्च हमरो हएत आ अदहा हुनको हेतैन। बेर-बेगरतामे एक पाइक महत, एक लाखक बरबैर‍‍ भऽ जाइए। सोचि‍-वि‍चारि‍ ललि‍त बाजल- “भाय, अहाँ माएकेँ इलाज करब‍यौन। लि‍खा-पढ़ीक जरूरत‍ नै अछि।” हाथमे रूपैआ अबि‍ते मकशूदनक मनमे बि‍सवास जगि गेल जे माइक इलाज हेबे करत। काजोक एहेन संयोग होइए जे नीक होइक रहत तँ कोनो काजमे बाधा नै हएत। मुदा अधला होइक रहत तँ अनेरो काज सभमे ओझरी लगैत रहत। दस कट्ठा जमीन हाथमे एने ललि‍तक मन खुशीसँ गदगद भऽ गेल। तैबीच सुरजी आबि बाजल‍- “जँ फेनो‍ रूपैआ माङैथ‍ तँ फेन‍ देबैन।” पत्नीक बात सुनि ललि‍तक मन आरो खुशी भऽ गेल। बाजल- “किए?” “अहाँ खेत-पथारक बात नै ने बुझै छि‍ऐ। कनीए-कनीए देने जखन बेसी भऽ जाएत तखन कबल्‍ले लि‍खा लेब।” पत्नीक बात सुनि एकाएक ललि‍तक मनमे अस्‍सी मन पानि‍ पड़ि‍ गेल। बुदबुदाएल- “देखू ऐ दुनियाँक रीति‍। एक घर कानै एक घर गीत।” तुरैछ‍ कऽ बाजल- “जखन किछु बुझैक हएत तखन पुछि‍ लेब। जाउ, अँगना-घरक काज देखू गऽ।” सुरजी चलि‍ गेल। ललित सोचए लगल जे पहि‍ने अनका खेतमे काज करै छेलौं, जे अढ़ा दइ छल से कऽ दइ छेलि‍ऐ। काजक ने लूरि अछि मुदा काजेक लूरि‍ भेने तँ लोक गिरहस्‍त नै ने बनि‍ जाइए। गि‍रहस्‍ती-ले काजक लूरिक संग कोन समए कोन चीजक खेती हएत सेहो बूझब जरूरी अछि। तेतबे नहि, केहेन समए भेने केहेन खेती कएल जाएत। केतेको प्रश्‍न अछि। फेर‍ ललितक मनमे एलै जे खेत तँ बड़ सुन्‍दर अछि, घरे लग अछि आ बगलमे बोरिंगो छइ। तँए एहेन खेती करब जे अधि‍क-सँ-अधिक उपजा हएत। बारह मासक साल होइ छइ। साल भरि‍पर मसिम बदलैए। जहि‍ना-जहि‍ना मसिम बदलत तहि‍ना-तहि‍ना खेतियो माने फसलो बदलब। नीक हएत जे पहि‍ने गरमा धानक खेती कऽ लेब, जे चारि‍ मासमे भऽ जाएत। धान काटि‍ अल्लुक खेती कऽ लेब, जे तीन मासमे भऽ जाएत। अल्‍लु उखारि‍ पिऔज कऽ लेब, जे बैशाख अबैत-अबैत भऽ जाएत। कमो खेत रहने बेसी उपजा हएत। संगे आरो कारोबार सभ अछि, कारीगरो छी, बेसी समैयो ने बँचैए। गाममे मेला भेने ललि‍त मि‍ठाइक बढ़ि‍याँ दोकान केलक। मुदा झाँट-पानि‍क दुआरे बनौल मि‍ठाइयो आ समानो सभ दुइर भऽ गेलइ। मुदा सबहक क्षति‍ देख ललितक मन घबड़ाएल नहि। कोनो की कर्जा लऽ कऽ दोकान केने छी जे एक दि‍स सभ नोकसान भेल आ दोसर दि‍स महाजन कपारपर चढ़त। भरि‍ राति‍ दोकानेक चीज-वौस सम्‍हारैमे दुनू परानीकेँ लगि‍ गेल। पाँच दि‍न पहि‍ने ललि‍त दसो कट्ठामे कुफरी अलंकार अल्‍लु रोपने रहए। समस्‍तीपुरसँ बीआ अनने रहए। भोरमे जखन खेत देखलक तँ ठेहुन भरि‍ पानि‍ खेतमे, देखते निराश भऽ गेल। एक तँ दोकानक पूजी नष्‍ट भऽ गेलै, दोसर खेतियो डुमि‍‍ गेल। सभ अल्‍लू माटि‍ए तरमे सड़ि‍ जाएत। तेते पानि‍ लगल अछि जे मास दिन जोतैयो जोकर नै हएत जे दोहराइयो कऽ रोपि‍ लेब। खेतसँ आबि ललित पेटकान लाधि‍ देलक। मनमे एलै, छह मासक कमाइ डुमि‍‍ गेल। मुदा फेर‍ हूबा केलक जे अही सबहक संग की अपनो पराण गमा लेब। जहि‍ना सभकेँ भेल, तहि‍ना हमरो भेल। जहि‍ना सभ दिन काटत, तहि‍ना हमहूँ काटब। तइले अनेरे सोगा कऽ की हएत। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1609 5. भरि राति‍ जहि‍ना गामक लोक जगले रहि‍ गेल तहि‍ना मेलो देखनि‍हार आ दोकानो-दौरी केनि‍हार जगले रहल। मुदा अपनापर सभकेँ अचरज लगै जे राति‍ सुतैबला छी ओइमे केना दि‍नोसँ बेसी काज केलौं। अन्‍हार गुप-गुप राति‍, ने इजोत आ ने चान। अमावसियो ओहन जइमे घनघोर करिया-वादल आबि आरो अन्‍हार कऽ देने। आध पहर रातिए-सँ दोकानदारो आ नाचो-तमाशाबला भागए लगल। ओना, गाड़ी-सवारीक अभाव गाममे मुदा मोबाइल जे ने करए। राता‍-राती केतएसँ ओते गाड़ी आबि भोर होइत-होइत कदबा कएल खेत जकाँ बना देलक से नै कहि। गौंओँ-अनगौंओँ सभ अपन-अपन जान बँचल देख खुशी छल। अपन-अपन समांगक गि‍नती करै काल कि‍यो-कि‍यो खुशियो आ कि‍यो-कि‍यो समांगसँ लऽ कऽ आनो-आनो चीजक नोकसान देख कम-सँ-बेसी धरि‍ दुखियो छल। मुदा दैवक डांग देबाक शक्‍ति‍ नै बुझि‍ अपन-अपन भाग्‍यकेँ कोसि‍ कने-मने बेथितो छल। वृन्‍दावनक रास, मुजफ्फरपुरक नाटक, मेल-फिमेल कौव्‍वाली आ महिंसोंथाक मलिनियाँ नाच पार्टी, चारू पार्टी अदहा-अदहा रूपैआ पहि‍नहि, माने सट्टे बनबै काल लऽ नेने रहए, तँए कमि‍टि‍क भेँट करब जरूरी नै बुझि‍ अनरोखे डेरा तोड़ि‍ लेलक। कारण रहै जे स्‍टेजबला घटना सभकेँ थरथरी पैसैने छेलइ। जखने घटना भेल तखने थाना-बाहानक‍ दौग-धूप शुरू हएत। जखने दौग-धूप शुरू हएत तखने जे फाँटि‍पर पड़त, जहलक हवा खाएत..! तइमे नीक जे कनी थाले-खि‍चार ने छै, जान बँचत तँ देहेक साबुनसँ कपड़ो खीचि लेब। मुदा ऐठामसँ पड़ाएबे नीक हएत...। तहिना बनियोँ-बेकाल सोचैत, एक तँ पूजी गेल तैपर सँ अनेरे कोट-कचहरीमे जे बरदाएब, तइसँ नीक जे बँचल रहब तँ कमा लेब। अनगौंआँक-तँ-अनगौंआँ बुझए मुदा गामक गि‍नतीमे देवनाथ आ जोगि‍न्‍दर कमैत रहए। रातिए दुनू मरि‍ गेल आकि‍ पड़ा गेल, ई बात मंगलक मनकेँ झकझोड़ैत रहैन। गाममे जेते पाहुन-परक आएल रहैथ‍‍ सबहक मनमे होइत रहैन‍ जे केतए एलौं तँ केतौ नहि। तैपर सँ जहि‍ना झाँट-पानि‍मे गाछपर रहैबला चि‍ड़ै-चुनमुनीकेँ होइत, तहि‍ना पहुनाइ करैबला पाहुन सभकेँ होइत रहैन‍ मुदा कहथिन केकरा आ सुनतैन के? लोक अँगना-घरक टाट-फरक सोझरौत आकि‍...। ओना जेठक रौदमे तपल धरतीपर बि‍हड़ि‍या हाल भेने जेहेन सुगन्‍ध माटि‍सँ निकलैत तेहेन नहि। कोन दोग देने जाड़ो चलि‍ आएल सेहो ने कि‍यो देखलक। जहि‍ना जवानीक आगमनसँ शरीर सभ अंगक सौन्‍दर्य छि‍टका अपना दि‍स आकर्षित करैत, तहि‍ना धरतियोक पियाससँ जरल मन छाँक भरि‍ पानि‍ पिबते शक्‍ति‍ पाबि‍ आलिंगन-ले दुनू बाँहि‍ पसारि‍ अपन प्रियतमकेँ[9] बरहमासा सुनबए लगल। पि‍याससँ सुखाइत कि‍सानोक कण्‍ठ पानि पिबते तृप्‍त भऽ प्रियतम दिस आँखि उठा-उठा देखए लगला। देखए लगल जे अखन धरि‍ पि‍याससँ मरनासन्न भऽ गेल छेली, एकाएक आब ओ केते शक्‍ति‍वान भऽ गेली जे नव सि‍रजनक शक्‍ति‍सँ लऽ कऽ सुखाएल-जरल जजात तकमे जान फूकि‍ देलैन‍। अखन धरि‍ गामक किसान धानक खेतीमे बँटाएल छैथ‍। बँटेबाक अनेको कारणमे दू कारण प्रमुख अछि। पहि‍ल, खेतक बनाबट आ मनक सोच। दोसर, साबीकसँ अबैत खेती, उपजबैक ढंग आ आधुनि‍क वैज्ञानि‍क ढंग। जैठाम अदौसँ अबैत खेती रासायनि‍क खाद, समुचित पानि माने पटबन आ उन्नत बीआक संग नव तकनीकक माने नव लूरिक अभावमे पाछुए-मुहेँ लुढ़कैत गेल अछि, ओकरा आगू-मुहेँ केना बढ़ौल जाए, ई मूल प्रश्‍न सबहक सोझहामे ठाढ़ ऐछे। देशक बढ़ैत जनसंख्‍या की खाएत, ई वि‍चार तँ खेतक मालि‍के माने कि‍सानेकेँ करए पड़तैन। मुदा कि‍सानो तँ खेतकेँ खति‍याने-दस्‍ताबेज धरि‍ बुझै छैथ‍..! जखन कि, एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍मे हमरा की ‍करए पड़त, ई ने बुझए पड़तैन। ओना, नै बुझैक अनेको कारणमे एकटा ईहो अछि जे चाहे जे कोनो प्रचार माध्‍यम् हुअए वा प्रवचन देनि‍हार‍, ओ अखन धरि‍ कि‍सानक स्‍वरूपकेँ झाँपि‍ कऽ रखने छैथ‍। जेकरा इमानदारीसँ कि‍सानक बीच रखए पड़त। जँ से नइ तँ छह साए बरख पूर्व, जे लगभग पच्‍चीसो पीढ़ी होएत, तुलसीदास ‘वि‍नय पत्रि‍का’मे समाजक दशा देखलैन‍- ‘खेती न कि‍सान को..।’ जँ कि‍सानक खेती मरि‍ जाए, वेपारीक वेपार तँ भि‍खमंगोकेँ के भीख दऽ सकत? जँ भि‍खारीकेँ भीख नै भेटैन‍ तँ पार्वती महादेव सन भि‍खमंगाक संग कए दि‍न रहती? प्रश्‍न मात्र खेतियेक नै जीवनक छी। आइक जेहेन समए भऽ गेल अछि ओइ‍‍ अनुकूल जाधैर‍‍ अपनाकेँ नै बनाएब, समैक संग नै चलब ताधैर‍‍ बच्‍चा जकाँ लुढ़ैक-लुढ़ैक‍ खसि‍ते रहब। मुदा समैक संगो हएब धिया-पुताक खेल नहि। धरतीपर सभसँ श्रेष्‍ठ जीव मनुख रहितो एक-दोसरसँ करोड़ो कोस हटल छी। जहि‍ना वि‍शाल बोनमे लाखो-करोड़ो प्रकारक गाछ-बिरीछसँ लऽ कऽ झार-झूरसँ लऽ कऽ माटि‍मे सटल घास धरि‍ रहैए तहि‍ना मनुखोक बोनमे अछि। एक दि‍स अज्ञानक अन्‍तिम छोड़पर रहनि‍हार तँ दोसर दि‍स चानपर बास करैबला। मुदा जहिना बोनमे छोटसँ छोट जन्‍तुसँ लऽ कऽ बाघ, सिंह, हाथी धरि‍क भोजनो आ रहैयोक बेवस्‍था अछि, तहि‍ना ने मनुखोक बोनमे अछि। अनेको तरहक बाट आ वि‍‍‍चार अदौसँ अबैत रहल अछि। एक पुरुख-नारीक सम्‍बन्‍धकेँ धर्मक श्रेणीमे रखनि‍हार अपनहि नि‍अम तोड़ि‍ नि‍आमक छैथ‍‍। जि‍नकर देखा-देखी बढ़ि‍ते गेल अछि। जइसँ सदिकाल नव-नव वि‍चारक संग नव-नव बाट बनि‍ रहल अछि। मुदा जहि‍ना समुद्रमे अमूल्‍य रत्नसँ लऽ कऽ घोंघा-सि‍तुआ-धरि‍ आनन्‍दसँ रहैए, तहि‍ना ने समाजोमे अछि। मुदा तँए की सघन खरहोरिमे चलनि‍हार नै छैथ‍‍? जरूर छैथ‍‍। जे खरहोरि‍मे एक इंच खाली जगह नइ रहनौं खढ़क गाछकेँ दुनू हाथे बि‍हि‍या-बि‍हि‍या एक भागसँ दोसर भाग पार करिते‍ छैथ‍! आइक सघन जि‍नगी एहने भऽ गेल अछि। मुदा प्रश्‍न उठैत जे सीना तानि‍ आगू-मुहेँ बढ़ल जाए आकि पीठ देखा पाछू-मुहेँ ससरल जाए? जाधैर‍‍ सीना तानि‍ आगू-मुहेँ नै बढ़ब ताधैर‍‍ असीम शान्‍तिक गाछ लग केना पहुँचब? जँ से नइ पहुँचब तँ अनेरे किए अन-पानि‍केँ दुइर करै छि‍ऐ। जि‍नगीक सफलताक सर्टिफि‍केट सि‍रि‍फ कठि‍न साधनासँ भेटै छै, नै कि‍ कट-पीस रस्‍तासँ। जाधैर‍ असीम शान्‍ति‍ नै पाएब ताधैर‍ जि‍नगीक सफलताक सर्टि‍फि‍केट केना पाबि‍ सकब? मेघौन रहने सुरूज अबेर कऽ ओछानि‍ छोड़लैन‍। मुदा तँए की अकासमे उड़ब चि‍ड़ै बि‍सैर गेल। गोसाँइकेँ जगबैत ढोलि‍या गोवर्धन पूजा करबए गाम दि‍स विदा भेल। मनमे खुशी। कि‍एक नै खुशी रहतै, खेत जोतनिहार-किसानसँ लऽ कऽ गाए पोसनि‍हार कि‍सान धरिकेँ‍ ऐ‍ठाम जेबाक छै किने। आमदनियोँ नमहर तँ मेहनैतो कम नहि। गोवर्धन पूजा-ले कि‍यो करमी लत्त‍ीक भाँजमे तँ कि‍यो ठेका-गरदामीक ओरि‍यानमे जुटल। कि‍यो दोकानसँ रंग आनि‍ गरदामी रंगैत तँ कि‍यो रंग-बि‍रंगक गाछ-पात-बुट्टीक ओरि‍यान, सोनहाउन-ले करैत। स्‍त्रीगण सभ भि‍ने बताहि‍ भऽ गोधन महराजक संग-संग धान-मरूआक बखारी बनबैत। मुदा मनमे एकटा शंका रहबे करैन‍ जे ढोलि‍या ने कहीं पहिनहि आबि जाए। वेचाराकेँ सौंसे गाम घुमए पड़तै आकि‍ कोनो हमरे ऐठाम भरि‍ दि‍न रहने पेट भरतै। कि‍यो खरि‍‍हाँन बनबै पाछू बेहाल तँ कि‍यो जन-बोनि‍हार मि‍लि‍ चाह-पान करैत। ओना समैक फेर‍मे पड़ि‍ कि‍यो भोरमे सूप नै बजौलैन‍। हो-ने-हो दरि‍दरा कहीं निर्विरोध सालो भरि‍ले फेर‍ ने रहिए जाए। मुदा साले-साल सूप बजा-बजा भगेनौं तँ रहिए जाइए, जहि‍ना परशुराम क्षत्रि‍यकेँ मेटबैले दर्जनो बेर‍ सामुहि‍क हत्‍या केलैन मुदा तैयो क्षत्रिय रहिए गेला। हो-ने-हो कहीं एहने जि‍बठगर दरि‍दरोहो ने तँ अछि..? झाँट-पानि‍क चलैत काली-पूजाक जे दशा भेल ओ तँ भेबे कएल जे केतेको समस्‍या समाजक बीच आनि‍ कऽ रखि‍ देलक। जहि‍ना घर बन्‍है काल एक-एक वस्‍तुक ओरि‍यान करए पड़ैत तहि‍ना घरक करइ पड़त। साइकि‍ल उठा मंगल काली-पूजा समितिक बैसार करैले समि‍ति‍क सदस्‍य-सबहक ऐठाम विदा भेला। सभसँ पहि‍ने देवनाथ ऐठाम पहुँचला। देवनाथकेँ दरबज्‍जापर नै देख जोरसँ सोर पाड़लैन- “देवनाथ जी, औ देवनाथ जी..?” मुदा कारकौआ धरि‍क कुचरब नै सुनि‍ पुन: दोहरौलैन- “देवनाथ जी, यौ देवनाथ जी..?” देवनाथक नाओं सुनि‍ पत्नी आँगनसँ नि‍‍कैल‍‍, बजली- “काल्हि‍ बेरू पहर जे घरपर सँ नि‍कलला ओ अखन धरि‍ कहाँ एला हेन। कालीए स्‍थानमे छैथ‍।” काली स्‍थानक नाओं सुनि मंगल चौंकैत बजला- “कालीए स्‍थानमे बैसार छी, वएह कहैले आएल रहौं। जँ ओतै हेता तँ भेँटे भऽ जेता नै जँ घरपर आबि जाथि‍ तँ कहि‍ देबैन।” कहि‍ मंगल जोगि‍न्‍दर ऐठाम एला। ओकरो पता नहि। बीसो सदस्‍य ओइठाम पहुँच‍ मंगल घरपर आबि साइकि‍ल रखि‍ काली स्‍थान वि‍दा भेला। एका-एकी एगारह गोरे काली स्‍थान पहुँचला। गप-सप्‍प शुरू भेल। जीबछ मंगलकेँ पुछलखिन- “सिंहेसर भाय किए ने एला?” जीबछक बात सुनि मंगल बजला- “ओ तँ घरोपर नै छला। घुरए लगलौं तँ माए भेटली। पुछलयैन तँ वएह कहलैन- ‘आध पहर रातिए खाटपर टाँगि‍‍ दुखाकेँ डाक्‍टर ऐठीन लऽ गेलइ।” “की भेलै दुखा काकाकेँ?” “वएह कहलैन जे ओहो मेले देखए गेल रहए। जखन पानि‍-बि‍हाड़ि‍ आएल तँ घरपर पड़ाएल। रस्‍तामे एकटा घुच्‍चीमे पएर पड़ि‍ गेलै, खसि‍ पड़ल। ठेहुने टुटि गेलइ।” ‘ठेहुन टुटब’ सुनि अपसोच करैत जीबछ बजला- “बाप रे! जुलुम भऽ गेलइ। वेचाराकेँ ने अपना बेटा छै आ बेटियो सासुरेमे रहै छइ। घरोवाली हफ्सियेक रोगी छथिन। हे भगवान! तहूँ बड़ अन्‍यायी छह। जेकरा दुख दइ छहक ओकरा मुरदा जकाँ एक-एकटा चेरा चढ़ैबते रहै छह। हम तँ बुझबे ने केलि‍ऐ नै तँ इलाजक खर्च मदैत कऽ दैति‍ऐ। नीक केलक सिंहेसर। एहेन-एहेन बेर‍पर जे बेटा समाजमे ठाढ़ हएत, वएह ने भारत माताक सपूतक प्रथम श्रेणीमे औत।” मंगल- “जीबछ भाय, हमहूँ तँ बहुत नहि‍येँ पढ़ने छी, कि‍एक तँ स्‍कूल-कौलेजमे लोक परीछा पास करैले पढ़ैए। ज्ञानक पाठ तँ जि‍नगीमे उतरला बाद पढ़ैए। जे काज सिंहेश्वर भाय करए गेला ओ आइक समाजक मांग छी। मुदा एहेन-एहेन काज करैबला बेटा अदौसँ जन्‍म लैत आएल अछि। समाजक मुख्‍य सेवा[10]मे एहेन-एहेन काजकेँ रखल गेल अछि। जे सेवा अदौसँ चन्‍दनक गाछ जकाँ जन्‍म लऽ बढ़ैत-बढ़ैत फुलाइत-फड़ैत रहल ओ ठमैक‍ कऽ मौला रहल अछि, सुखि‍ रहल अछि। सुखिए नै रहल अछि ऐ गतिए सुखि‍ रहल अछि जे कि‍छु दि‍नक पछाइत कोकैन कऽ उकैन जाएत!” मंगलक बात जीबछ दुनू कान ठाढ़ केने आँखि‍ चिआरि कऽ मुँह बौने‍ सुनै छला। जहि‍ना मुहसँ नीक वस्‍तु खेलापर मनमे खुशी होइत, कानसँ सुनलापर मुहकेँ हँसेबो करैत आ हृदैकेँ गुदगुदेबो करैत, आँखि विवेकक आँखिकेँ सेवा करए पहुँच जाइत, तहि‍ना जीबछोकेँ मंगल बातसँ भेल। बाजल- “भाँइमे कि‍यो दादा हुअए! बच्‍चा, भलेँ उमेरमे बेसी छिअ मुदा भऽ गेलिअ बगुरक गाछ जकाँ, जे जहिए-सँ जनमलौं तहि‍ए-सँ काँट-कूशमे गना गेलौं। गि‍नतीए हि‍साबसँ काजो भेल। मुदा आब समाजक एक खुट्टाक रूपमे जि‍नगी बिताएब। जइ स्‍थानकेँ भगवान[11] मारि‍ देलखिन, ओइ स्‍थान[12]पर बैसल छी। अपना सबहक पुरना राजा[13] केहेन छेलखिन।” मंगल बजला- “ओ ओहन राजा छला जे एक-एक आदमीक जि‍नगीमे पैसल रहैथ। एते सि‍पाही रखने छला जे समैक हि‍साबसँ कि‍यो आगू-पाछू नै हुअए तैपर सदि‍‍काल आँखि‍ गड़ौने रहै छला।” “हुनकर फुलवाड़ी केहेन छेलैन‍?” “हुनकर फुलवाड़ीक जोड़ा दुनि‍याँक कोनो राजा नै लगा सकला। ओना, कि‍छु राजा जरूर अपन धन, बल, जन लगौने छैथ‍‍।” “फुलवाड़ीक गाछ सभ केहेन छइ?” “फुलवाड़ीक बीचमे वि‍वेकक गाछ छइ। वि‍वेकक बगलेमे मन आ बुधिक गाछ छइ। तेकर काते-कात सेवाक गाछ छै, जे सदिकाल हरीक हरि‍अरीपर नजैर‍ रखैए।” मंगलक बात सुनि भुवन बजला- “मंगल, काल्हि धरि‍ समाजक जइ काजमे लगल छेलौं, नीक आकि‍ बेजए, सम्‍पन्न भऽ गेल। अखन जे गाम तहस-नहस भऽ गेल अछि, पहि‍ने ओकरा देखैक अछि। जखने झाँट आएल तखने कि‍छु-ने-कि‍छु सभकेँ झँटनहियेँ हएत। सतनाकेँ सेहो नहि‍येँ देखै छि‍ऐ?” “रस्‍ते कातमे ओकर जामुनक गाछ छेलै सएह रस्‍तेपर खसि‍ पड़लै। रस्‍ते बन्न भऽ गेल छै, तेकरे काटै-खोंटैले गेल।” “नि‍रधन किए ने आएल?” “ओकरा तँ आरो बड़का फेड़ा लगि‍ गेलइ। चारि‍ए कट्ठा अपना खेत छइ। जइमे कति‍का धान केने अछि। गहींरगर खेत छै धान सुतैर‍ गेलइ। कालीए पूजा दुआरे पाकल धान खेतेमे रहलै, नइ कटलक। एक तँ बौना धान, दोसर ऊपरका खेत सबहक पानि‍ ओलैर‍‍ कऽ चलि‍ गेल। निपुआंग धान डुमि‍‍ गेलइ। पानियोँ बहैबला नहि‍येँ छइ। तहूमे अगहनी धान तँ कनी डँटगरो होइ छै मुदा गरमा तँ गरमे छी।” “झोलि‍या किए ने आएल?” “एक्केटा घर छै सेहो खसि‍ पड़लै। घरक सभ कि‍छु भीज गेल छइ। ओकरे सम्‍हारैमे लगल अछि।” एक्के बेर‍ सभ बाजल- “जेतबे गोरे आएल छी ओतबे गोरे वि‍चारि‍ लिअ। जे सभ नै एला,‍ हुनका सभकेँ कहि‍ वि‍‍‍चार बुझि‍ लेब।” साठिक दशक। कि‍सानक बीच भारी भुमकम भेल। जहि‍ना अनुकूल वातावरण बनने भारी बर्खा, भुमकम आ अन्‍हड़-तूफान अबैत तहि‍ना खेतपर ठाढ़ रहैबलाक बीच भेल। एक दि‍स आजादीक दि‍वाना गाम-गाम जन्‍म लऽ अंग्रेज भगौलक तँ दोसर दि‍स समाज सेवा करए आगू सेहो आएल। देश भक्‍त सि‍पाही पर्याप्‍त देशक भीतर तैनात भऽ गेला। अंग्रेज भगौलहा-फलक गाछ सोझमे छेलैन‍। केना नै दोसरो-तेसरो गाछ रोपैले तैयार होएब? दुनियाँक जेते जीव-जन्‍तु अछि। सभ सुखसँ जि‍नगी बितबए चाहैए। मनुख तँ सहजे मनुख छैथ‍, सभ जीवसँ ऊपर। ओ की नै बुझै छैथ‍ जे प्रशान्‍त सुख पाबि‍‍ लोक आध्‍यात्‍मिक पुरुष बनि‍ सकैए। के नइ चाहता जे मातृभूमि‍ स्‍वर्गोसँ सुन्‍दर बनए। एक दि‍स जमीन प्रति‍ष्‍ठाक मूल अधार बनि‍ चुकल अछि तँ दोसर दि‍स राजा-रजबारक अन्‍त भेने मालगुजारीक शासन समाप्‍त होइतिक फल सोझमे आबि गेल। राजशाही अन्‍त भेने रसीदक माध्‍यमसँ औना-पौना दाममे जमीन बीकए लगल। बकास्‍त जमीनक लड़ाइ गाम-गाममे शुरू भेल। एक जबरदस भूखण्‍डमे बटाइदारी आन्‍दोलन- ‘जे जमीनकेँ जोते-कोड़े ओ जमीनक मालि‍क छी’क नारा अकासमे उठल। धरती अपन जीवन-ले बलि‍ मंगै छैथ‍‍, से भेल। सि‍कमी बटाइक कानून बनि‍ लागू भेल। जेतए बटेदार तैयार भेल ओतए बटाइदारी हक भेटल। जेतए तैयार नै भेल ओतए अखनो लटकले अछि। आम जमीन सभपर दसनामा संस्‍था सभ ठाढ़ हुअ लगल। स्‍कूल, अस्‍पताल बनए लगल। मनुखक मूल समस्‍या दि‍स जनमानसक नजैर‍ दौड़ल। जइसँ ति‍याग-भावनाक जन्‍म भेल। लोअर प्राइमरी स्‍कूलसँ लऽ कऽ मि‍ड्ल, हाइ स्‍कूल धरि‍ बनए लगल। गोटि‍-पँगरा कौलेजो बनल। सरकारोक धि‍यान शि‍क्षा दि‍स बढ़ल, जइसँ पढ़ै-लिखैक वातावरण बनए लगल। तैबीच भूदान आन्‍दोलन सेहो शुरू भेल। दानकेँ धरम बुझि‍ जमीन दान हुअ लगल। गाम-गाममे भूदान कमि‍टीक गठन भेल। जइ गाममे कमि‍टी सक्रि‍य भऽ काज केलक ओइ‍‍ गामक जमीन भूमि‍हीनक बीच आएल, मुदा जइ गाममे सक्रि‍य रूपमे काज नै भेल ओइ‍‍ठाम लड़ाइक अखड़ाहा बनल अछि। जइ भूदान आन्‍दोलक उदेस ‘देशक छठम हि‍स्‍सा जमीन भूमि‍हीनक बीच आबए’ अखनो सरकार चारि‍ डि‍समि‍ल बास-भूमि‍ दइक शक्‍ति‍ नै रखने अछि। गामक लोकक पड़ाइन भेने गाममे रहि‍ खेती केनि‍हारकेँ स्‍वर्ण-अवसर भेटल। जमीनोक रूप बदलल। प्रति‍ष्‍ठाक वस्‍तु बूझल जाइबला जमीन रूपैआमे बदैल‍ गेल। बैंकक सूदि‍क हि‍साबसँ जमीनक उपजा बूझल जाए लगल। उपजाक अदहाबला बँटाइदारी प्रथा ढील भेल। मनखप, पट्टा, मनहुन्‍डा इत्‍यादि‍क जन्‍म भेल। पनरह कि‍लो कट्ठा धानक उपजा आ दस-सँ-पनरह कि‍लो कट्ठा गहुमक उपजा बँटाए लगल। कोसी नहर‍ आ नव-नव सड़क बनने चौक-चौराहाक संग-संग बोनि‍हारकेँ काजो बढ़ल। मुआबजाक रूपैआ सेहो सहायक भेल। शि‍क्षा मि‍त्रक बहालीक संग एन.एच.डब्‍लू. सेहो कि‍छु मदैत केलक। सड़क बनने गाड़ी-सवारीक धन्‍धा सेहो जन्‍म लेलक। मि‍थि‍लांचलमे एक नव वर्गक जन्‍म भेल, कि‍सान वर्ग। मुदा ऐ वर्गक क्षेत्र छि‍ड़ि‍याएल अछि। हरि‍त-क्रान्‍ति‍ एने जमीनक, माने खेतक भाग्‍य चमकल। मुदा जइ रूपमे चमकबाक चाही तइ रूपमे नहि। जँ एक रूपमे चमकैत तँ जहि‍ना कहि‍यो मि‍थि‍ला दुनि‍याँक गुरु मानल जाइ छल तहि‍ना फेर प्रति‍ष्‍ठि‍त भऽ जाइत। तइमे कमी अछि। देशमे अखनो कम क्षेत्र अछि जइमे मि‍थि‍लांचल एते इंजीनि‍यर, डाक्‍टर, वैज्ञानि‍क, साहि‍त्‍यकार इत्‍यादि‍ अछि। दुर्भाग्‍य ई जे ओ लोकैन‍ मि‍थि‍ला छोड़ि‍ दुनियाँ भरि‍मे छि‍ड़ि‍याएल छैथ‍‍। बाध्‍यतो छैन‍, ने कल-कारखाना अछि जे इंजीनि‍यर ओइ‍‍मे काज करता, आ ने स्‍वास्‍थ-ले समुचि‍त जगह अछि जइमे डाक्‍टर अपन अँटावेश करता। ने वि‍ज्ञानक शोध संस्‍था अछि जइमे वैज्ञानि‍क अपन चमत्‍कार देखौता आ ने पढ़ै-लि‍खैक समुचि‍त बेवस्‍था अछि जइमे साहि‍त्‍यकार अपन प्रति‍भाकेँ नि‍खारता। गंगा ब्रह्मपुत्र मैदानी इलाका रहैत मिथिलांचल अनेको नदीसँ सकबेधल अछि। नदि‍यो ओहन-ओहन उपद्रवी अछि जे इलाकाक इलाकाकेँ सदिकाल रूप बिगाड़िते रहैए। लोकक जि‍नगी एहेन दुब्‍बर बनि‍ गेल अछि जे जएह लोकैन मि‍थि‍लांचलमे ठाढ़ छैथ‍‍ ओ धैनवादक पात्र छैथ‍‍। कि‍सान वर्ग बनने जाति‍वादक बन्‍हन ढील भेल। केतेको एहेन धन्‍धा, खेतीसँ लऽ कऽ लघु उद्योग धरि‍, अछि जे खास जातिक सीमामे बान्‍हल छल ओ टुटि‍ कऽ कोनो धन्‍धा कोनो जाति‍येक बीच नै रहल। मुदा जहि‍ना कोसीमे डुमल इलाका पुन: कहि‍यो जागि‍ चहटी रूपमे जन्‍म लइए आ पुन: ओइ‍‍पर बसि‍ मनुख पूर्ववत गाम बना लइए, तहि‍ना करैक जरूरत‍ अछि। जातिगत पेशा बदैल‍ जाति‍-बेवस्‍थाकेँ ढील जरूर केलक मुदा राजनीति‍क कुचक्र समाजमे नव समस्‍याक रूपमे ठाढ़ भऽ वि‍कासकेँ बाधि‍त कऽ रहल अछि। अनेको तरहक नव-नव बाधा उपस्‍थि‍त भऽ रहल अछि। मुदा तँए की मि‍थि‍ला मरूभूमि‍ भऽ गेल जे कर्मयोगी पैदा करब छोड़ि‍ देलक। कथमपि‍ नहि। सम्‍मि‍लि‍त रूपमे तँ नै मुदा छि‍ट-फुट रूपमे एहनो-एहनो कि‍सान छैथ‍‍ जे लाख आफत-आसमानीसँ मुकाबला करैत सोनाक स्‍तम्‍भ बनि‍ चमैक‍ रहला अछि। नि‍श्चि‍त क्षेत्र तँ नि‍र्धारि‍त नै कएल जा सकैए, कि‍एक तँ सीमा-विहीन अछि, मुदा ऐ बातकेँ नकारलो नहियेँ जा सकैए जे खेतमे ओते धान उपजा रहला अछि जे जापानसँ मुकाबला करैले ठाढ़ छैथ‍‍। तहि‍ना गहुमो, दालियोक आ फलोक अछि। अखनो हजारो ट्रक आम बाहर जाइए। एक इलाकाक तरकारी दोसर इलाका जाइए। हजारो ट्रक मसाला आन-आन राज्‍य जाइए। एक इलाकाक दूध दोसर-तेसर इलाका धरि‍ बि‍काइत अछि। अखन धरि‍क अनौपचारि‍क बैसक जे समाजमे होइत रहल अछि ओ प्रोफेसर दया बाबू आ पूर्व प्रोफेसर कमल बाबूकेँ एलासँ औपचारि‍क रूपमे बदलए लगल। काली स्‍थान पहुँचते कमल बाबू बजला- “अखन धरि‍क समाजक, गाम-गामक, इति‍हास हराएल अछि, ओकरा पहि‍ने पकड़ू। तँए जरूरी अछि जे एकटा रजि‍ष्‍टर कीनि लि‍खि‍त रूपमे काज करू।” कमल बाबूक बात सुनि मंगल सोचलैन जे लगले रजि‍ष्‍टर केतएसँ आनब, से नइ तँ आइक बैसक कागतक पन्नेपर कऽ नि‍चेनसँ रजि‍ष्‍टर आनि‍ ओइ‍‍पर लिखि देबइ। तेकर कारण मनमे नचैत रहैन जे दुनू गोरे, दयोबाबू आ कमलोबाबू, बेसी काल अँटकता नहि, जोरो केना करबैन। जँ जोरो करबैन तँ पट-दे कहि‍ देता जे गाम-समाज अहाँक छी, अपना ढंगसँ चलाउ। मुदा गामक लोक तेहेन गँरि-मुराह अछि जे धरमेक काज स्‍कूलो आ माइयो-बापक सेवाकेँ कहता आ अपने भरि‍ दि‍न बैस झूठ-फूसमे समए बर्बाद कऽ समाजकेँ तनो-भगन करैत रहता। अन्‍यायक अखाड़ा समाज बनि‍ गेल अछि। एहेन परि‍स्‍थि‍तमे खाली “समाजि‍क न्‍यायि‍क” नारा देलासँ समाज सुधैर‍ जाएत..? मुस्‍की दैत मंगल प्रोफेसर दया बाबूकेँ कहलखिन- “श्री मान्, अपने तँ चारि साल पढ़ौने छी तँए अपनेपर अधि‍कार अछि जे जे नै बुझै छी ओ अखनो पुछि‍ सकै छी। मुदा बाबाकेँ कि‍छु पुछैक अधि‍कार तँ नै अछि। भलेँ ओ अपने हमरा मनक सभ सवालक जवाब दऽ दैथ‍।” मंगलक पेटक बात जेना कमल बाबू बुझि‍ते रहैथ‍‍ तहि‍ना बड़बड़ाए लगला- “रौतुका घटना सुनि हृदए पाथरपर खसल ऐना जकाँ चूर-चूर भऽ गेल अछि। ...आँखि‍क नोर पोछैत- “मुदा दोख केकर लगौल जाएत। कि‍छु दोखी अहूँ सभ छी जे बादमे कहब। अखन एतबे कहब जे काल चक्रकेँ रोकब असान नहि। ई कालचक्र छल। तँए प्राश्चि‍‍त कऽ लेब जरूरी अछि। दू मि‍नट सभ उठि‍ हुनका लोकैनक क्षति‍क स्‍मरण कऽ लिअ। रजि‍ष्‍टरक पहि‍ल पाँतिमे शोक प्रस्‍ताव लि‍खि‍ काजकेँ आगू बढ़ाउ।” शोक व्‍यक्‍त कऽ बैसते कमल बाबू पुछलखि‍न- “समि‍ति‍ केते गोरेक बनौने छेलौं?” “एक्कैस गोरेक?” “एक तरहक अछि। अखन केते गोरे छी?” “एगारह गोरे।” “आरो गोरे?” “दू गोरे हराएले छैथ‍‍, एगारह गोरे हाजि‍रे छी, आठ गोरे दोसर-दोसर जरूरी काजमे लगल छैथ‍‍।” “हूँ, रौतुका झाँट तँ सभकेँ झँटनहि‍ हेतैन।” कहि‍ एकाएक कि‍छु सोचैत पुन: बजला- “बाउ मंगल आ अनुज दयाबाबू, जहि‍ना हम खुशीसँ जीवन-यापन कऽ रहल छी, तहि‍ना चाहब जे अहूँ सभ जीबी, ओहूसँ नीक जि‍नगीक बाट बना आगूक पीढ़ि‍-ले दि‍ऐ।” कमल बाबू बजि‍ते रहैथ‍‍ आकि‍ नेंगरो आ बौनो एक्के बेर बाजल- “जहि‍ना दयाकक्का पढ़ल छैथ‍‍ तहि‍ना मंगलो कौलेजक सीढ़ि‍ होइत कोठरी तक पहुँचल छैथ‍,‍ मुदा हम सभ तँ जि‍नगी भरि‍ कोदारि‍ये कि‍लासमे पढ़ैत रहलौं तँए...।” ठहाका मारि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत प्रोफेसर कमलनाथ समि‍ति‍केँ सम्‍बोधि‍त करैत बजला- “नेंगरा आ बौकूकेँ हमर बधाइ। जे अपन सीमा देखलक। बाउ नेंगर आ बौकू, बधाइ ऐ दुआरे दुनू गोरेकेँ देलौं जे समाजक जबरदस समस्‍याक जड़ि‍ पकड़लौं। अपना समाजमे ई भारी समस्‍या अछि जे कि‍यो अपने सीमा-सरहद नै बुझए चाहै छैथ‍, तखन ओ धारक रेत जकाँ चलैत समैसँ केना जुटि‍ सकता। जहि‍ना पानि‍क रेतमे ठाढ़ भेने अपनो जान अवग्रहमे रहै छै जे रेतमे खसि‍, भँसि‍या कऽ मरि‍ ने जाइ। तैठाम जँ कि‍यो दस-बीस सेरक मोटरी माथपर रखने हुअए, ओकर गति‍ ओइ‍‍ रेतपर केहेन हेतै? तँए जहि‍ना अट्टालि‍का बनबै काल सभसँ पहि‍ने ईंटाकेँ देख लेल जाइ छै, जँ से नइ देखल जाएत तँ नकटेरहीपर जहि‍ना सभ लट्टू होइए तहिना ने हएत।” कमल बाबू बजि‍ते रहैथ‍‍ आकि दुनू गोरे, नेंगरा आ बौका आँखि‍मे आँखि‍ मि‍ला हँसए लगल। आँखि‍ उठा सभापर सभ नजैर‍ दौगौलैन‍। कि‍यो गम्‍भीर तँ कि‍यो मुँह बाबि‍ बुझैक परियास करैत। मुदा दुनूक हँसी हँसा देलकैन‍। मन पड़लैन‍ हुगली नदी‍। अपना इलाकाक जेते धार अछि ओ उत्तरसँ दच्‍छिन-मुहेँ बहैए भलेँ गंगाक ओइ कातक दच्‍छि‍नेसँ उत्तर-मुहेँ बहैत हुअए। मुदा हुगली, जे समुद्रसँ जुड़ल अछि, सोलह घन्‍टा एक दिसा-सँ-दोसर दिसामे बहैए आ आठ घन्‍टा वि‍परीत दिसामे। तहि‍ना बाबाक आत्‍मा आ कोदारिक कि‍लासमे पढ़नि‍हारक आत्‍मा, मिलि कऽ शि‍वलिंग सदृश नव परमात्‍माक मन्‍दिर बना रहला अछि। नेंगरा आ बौकू मुस्‍कियाइत मुड़ी नि‍च्‍चाँ कऽ लेलक। दया बाबू आ मंगलकेँ गम्‍भीर देख‍ प्रोफेसर कमलनाथ बजला- “रौतुका घटना दुखद भेल। मुदा ओ तँ काल्‍हुक भेल। कालक तीन‍ गति‍ छै- बीतल, वर्तमान आ अबैबला। जे समए बित गेल वएह समए वर्तमान आ भविसक रस्‍ता देखबैए। एक हि‍साबे रौतुका घटना अहाँ सभकेँ एक सीमापर आनि‍ कऽ छोड़ि‍ देलक। ढंगसँ एकरा बुझैक जरूरत‍ अछि।” आँखि‍ उठा मंगल पुछलकैन- “कनी सोझरा कऽ कहि‍यौ?” “देखू अपन समाजमे केतेको पावैन‍‍‍-ति‍हार अछि। नीको आ अधलो अछि। नीककेँ पकैड़‍ चलैक अछि। कोनो रातिए-टा धर्मक काजमे समए बाधा उपस्‍थि‍त केलक, एहेन बात नै अछि। परि‍वारो सभमे देखै छी जे पावैन‍‍‍क सभ ओरि‍यान भेला उत्तर कोनो अप्रि‍य घटना घटलासँ पूजो-पाठ आ खाइयो-पीबैमे बाधा उपस्‍थि‍त भऽ जाइए। मुदा की देखै छि‍ऐ? ..यएह ने देखै छि‍ऐ जे पावैन‍‍‍क काजकेँ उसारि‍ आगूमे उपस्‍थि‍ति‍ घटनामे लोक लगि‍ जाइए। तहि‍ना परि‍वारि‍क पावैन‍‍‍ नै बुझि‍ समाजि‍क बुझि‍ सोग कम करू। एहेन-एहेन समाजि‍क काज- कालीपूजा, दुर्गापूजा इत्‍यादि‍ सभ गाममे होइते अछि सेहो बात नै अछि। कोनो-कोनो गाममे होइतो छै आ कोनो-कोनोमे नहि‍योँ होइ छइ। समाज-ले, गाम-ले अनि‍वार्य नै अछि। मनक शान्‍ति‍-ले होइए। ..अखन अहाँ सभ ओइ‍‍ सीमापर ठाढ़ छी जैठामसँ दूटा रस्‍ता फुटैए। पहि‍ल, ऐगलो साल करब की नहि? समाजक वि‍‍‍चार देखए पड़त। ऐ प्रश्‍नपर समाज बँटा गेल छैथ‍‍। अधि‍कांश लोकक मनमे ई हेतैन जे गाममे पूजा नै धारलक। तँए आगूओ नै हेबा चाही। मुदा कि‍छु गोरे एहनो हेता जे चाहि‍तो हेता। प्रश्‍न उठैए, जँ अहि‍ना ऐगलो साल हुअए, तहन? फेर प्रश्‍न उठैए पूजा ओरि‍याने भरि‍ रहल संकल्‍पि‍त नै भेल। ..ओना, ऐ‍ठाम दूटा वि‍‍‍चार अबैए, पहि‍ल समाजक संकल्‍प आ दोसर पूजा प्रक्रि‍या शुरू होइत समैक संकल्‍प। जे नै भेल। तँए आगू-ले वि‍‍‍चारक मुद्दा बनि‍ गेल अछि। फेर‍ प्रश्‍न उठैए जे बेकती‍गत रूपमे सभ घरे-घर वा मने-मन तँ करिते‍ छैथ‍। ओना, समाजि‍को स्‍तरपर हएब जरूरी अछि मुदा कोन रूपे हुअए, ई वि‍चारणीय प्रश्‍न अछि। अखन धरि‍ जइ तरहक सार्वजनि‍क मेलाक रूप रहल ओ आइ-ले, माने वर्तमान-ले केते नीक अछि, ऐ‍पर वि‍‍‍चार करए पड़त। पहि‍ने कहि‍ देलौं जे गामक इति‍हास लि‍खल जाएत। जे अखन धरि‍ रजे-रजबारक सुरा-सुन्‍दरीसँ लऽ कऽ कहि‍यो-कहि‍यो खेत-पथार-ले तँ कहि‍यो मनोरंजन-ले होइत रहल। एक राजा-रानी राजगद्दीक सुख भोगैथ‍ आ बाँकी‍ सभ सीढ़ीपर ठाढ़ भऽ-भऽ एक-दोसरकेँ रोकबो करैत आ पाछू-मुहेँ धकेलबो करैत। यएह इति‍हास अपना सबहक रहल अछि। ..तँए अपन समाजकेँ जेते नीक रस्‍तासँ आगू लऽ जाए चाहब, ओ अहाँ सबहक काज छी। मुदा समाज जेकरा बुझै छि‍ऐ ओ मनुखक समाज नहि, साबेक बोझ सदृश अछि। जहि‍ना साबेक जौरसँ घर तँ बान्‍हल जाइत मुदा अपन नमहर बोझ बन्‍हैमे केते बदमासी करैए ओ तँ बन्‍हनि‍हारे सभ बुझैत हेता। तहि‍ना लोकोक अछि। एक दि‍स समटब दोसर दि‍स छि‍ड़ि‍याएत आ दोसर दि‍स समटब तेसर दि‍स छि‍ड़ि‍याएत। ऐमे ओहू वेचाराक दोख नै छइ। कि‍यो पेटक पाछू वौआ रहल अछि,तँ कि‍यो मलि‍कानाक पाछू। मलि‍काना केहेन तँ हम विधाता बनि‍ बजै छी! अहाँकेँ आदेश मानै पड़त? वाह! वाह! भाय, वि‍धाता बनैसँ पहि‍ने अपन रजि‍ष्‍टर सार्वजनि‍क करू जे हमहूँ अपना समाजक इति‍हास रजि‍ष्‍टरमे लि‍खि‍ देखब जे केते गोरेक सवारी हवाइ जहाज छी, केते गोरेक ए.सी. कार आ केते गोरेकेँ चरणबाबूक टेक्‍सी। ..तँए जहि‍ना अदौमे कोनो गाम जे बसल ओइमे पहि‍ले-पहि‍ल एक-दू-तीन-चारि‍ परि‍वार आएल। जे अखन देखते छी, केहेन झमटगर भऽ गेल अछि, तहि‍ना असगरोक चि‍न्‍ता नै कऽ आगूक...।” बि‍च्‍चे‍मे बौकू बाजल- “बाबा, छौड़ा सभ भोरे माछ पकड़ैले बाध दि‍स गेल से कनी ओकरा सभकेँ देखैक अछि जे माछे पाछू अपनो डुमल आकि‍ बँचल आएल?” बौकाक बात सुनि ठहाका मारि‍ बाबा बजला- “बौकू, जि‍नगीमे सभसँ पैघ सुख प्राप्‍त करब होइए। जेकरा सुख भेट गेलै ओकरा भगवान भेट गेलखि‍न। मुदा सुख केकरा कहबै से अखन नै कहबह। तहूँ धड़फड़ाएल छह। एहेन समैमे तोरा रोकब उचि‍त नै बुझै छी। मुदा एतबे बुझि‍ लएह जे दुख भागब सुखक आएब छी।” आँखि‍ उठा मुस्‍की दैत दयानन्‍द बजला- “भाय साहैब, इति‍हास लि‍खैक वि‍‍‍चार तँ देलखि‍न मुदा पैछला इति‍हास बूझल छैन‍ की नहि, से कहाँ कहलखिन?” “दयाबाबू, हरि‍ अनन्‍त हरि‍ कथा अनन्‍ता। अखन जइ समैमे सभ बैसल छी ओ बैसैक नै करैक समए छी। केते लोकक घर खसल हेतै, केतेकक माल-जाल नष्‍ट भेल हेतै, केतेकेँ हाथ-पएर टुटल हेतै, एहेन समैमे हाथपर हाथ दऽ वि‍‍‍चार करैक नै अछि। जेतए जे नीक गर लागए, ओतए ओइ‍‍ गरे दलमलि‍त भेल गामकेँ असथि‍र करू, सभ पड़ोसी‍ए छी। समैयो बदलत। समुद्रसँ उठल केहनो वादल रहैए मुदा ओहो रसे-रसे बदैले जाइए। ..तँए अन्‍तिम बात यएह कहब जे आशाक संग जि‍नगीकेँ आगू-मुहेँ ठेलैत पहाड़पर चढ़ा अकासमे फेक‍ दि‍यौ।”◌ इति शब्‍द संख्‍या : 3811 [1] छौड़ा-छौड़ीक [2] आत्‍मा [3] बरही [4] वादल [5] गाड़ीक भाड़ा, जनक बोइन, जारैन‍‍क दाम इत्‍यादि। [6] आराधना [7] भगवान [8] सरकारी पदाधि‍कारी [9]  किसानकेँ [10] समाज सेवाक मुख्‍य कर्तव्‍य [11] झाँट-पानि [12] श्‍मशान महादेवक साधना स्‍थल [13] पौराणि‍क राजा जनक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नै धाड़ैए उपन्‍यास जगदीश प्रसाद मण्डल पोथीकेँ (तेसर संस्करण) तत्‍खनात् व्‍यक्तिगत रूपे सोझहा आनल जा रहल अछि...।–लेखक समर्पण भाव घरे-घरे ज्‍योति‍ दीप गाम अन्‍हार पड़ल छै घरे-घर समाज कहि‍-कहि‍ अध-मरल गाम पड़ल छै इति‍हास मि‍थि‍ला कहि-सुनि‍ पुर जनक धाम बनल छै वक्र आठ गीत गबिते ज्‍योति‍रमान जगल छै बनि‍-कनि‍याँ-पुतरा-पुतरी मूक नाच नचैत रहै छै राति‍-दि‍न एकबट बरहबट बनि‍ नाचि‍ नाच नचैत रहै छै घरे-घरे ज्‍योति‍ दीप गाम अन्‍हार पड़ल छइ। ••• •• • 1. मैट्रीक परीक्षासँ तीन मास पूर्ब कोठरीमे बैस राधामोहन अपन दिन-दुनियाँक सम्बन्धमे सोचैत रहए। ओना परीक्षाक तैयारी-ले बैस कऽ पढ़ैत रहए मुदा किछु कालक पछाइत‍, जखन पढ़ैसँ मन उचैट गेलै, अनायास जिनगीक बात मनमे उठलै। परीक्षाक फारम भरला पछाइत‍ स्कूल आएब-जाएब बन्न भऽ गेल छेलइ। राधामोहनक मनमे रंग-रंगक विचार उठए लगलै। मुदा उठै बर्खा-पानिक बुलबुला जकाँ जे उठै आ फुटि जाइ। कोनो असथिर विचार ने मनमे उठै आ ने अँटकैत रहइ। कोनो विचारकेँ ने ठीकसँ पकैड़ पबैत आ ने सोचि पबैत। किछु कालक पछाइत‍ मनकेँ असथिर कऽ अपन भूत-भविसपर नजैर अँटका गौर करए लगल तँ तीन तरहक विचार अभरलै। ओ ई जे अखन धरि साले-साल स्कूलक परीक्षा स्कूलेमे होइतो रहल आ आगूओ बढ़ैत गेल। मुदा आब तँ से नै हएत। सरकारी देख-रेखमे परीक्षो हएत आ रिजल्टो निकलत। जँ फेल करब तँ दोहरा कऽ फेर ऐगला साल परीक्षा दिअ पड़त आ जँ पास करब तँ आगू..? आगू तँ पढ़ि नै पएब। जँ पढ़ि नै पएब तखन की करब? साधारण चारि बीघा जमीनबला परिवारक राधामोहन। चारि बीघा माने अस्सी कट्ठा। अस्सी कट्ठाक माने सोलह साए धूर। ओना, दुनियाँक मानचित्रमे भिन्न-भिन्न देश आ भिन्न-भिन्न जमीनक महत अछि। जँ जापानक बेस किमती तँ साइबेरियाक से नहि। मुदा मनुख तँ दुनूठाम ऐछे आ रहबे करत। खएर जे हौउ, ने जापानक चर्च भऽ रहल अछि आ ने साइबेरियाक। चर्च तँ मिथिलांचलक भऽ रहल अछि तँए मिथिलांचलक जमीन देखए पड़त। सबहक जिनगियो सभ रंगक अछि। पैंतालीस बर्ख अबिते-अबिते राधामोहनक पिता नन्दलाल पूर्ण रोगी बनि चुकल छला। तीन बर्ख पूर्व धरिक जिनगी जखन नन्दलालक मनमे आबैन तँ अपनो नै बिसवास होनि जे हमहूँ जोड़ा बरदबला किसान छेलौं, आ मस्तीक किसानी जिनगी बितबै छेलौं..! जइ साल सुभ्यस्त समए होइ छेलै तइ साल जेहने घरक कोठी भरै छल तेहने पोखैरक महारपर नारक टाल लगबै छेलौं। मुदा आब ओहन दिन-दुनियाँ थोड़े देखब। अछैते खेत रहितो थोड़े हएत। करबो के करत,जखन केनिहारे नै तखन हएत केना। दुनियाँक माटि-पानि तँ सभ दिनसँ रहलै आ सभ दिन रहत। मुदा जइ समए जेहेन मनुख रहत तइ समए दुनियाँक रंगो-रूप तँ ओहने रहत किने...। जाधैर नन्दलालक शरीरमे रोगक आगमन नै भेल छेलैन तइसँ पूर्व दुनू परानी अपन खेत-पथारमे, कहियो गरदामे तँ कहियो थालमे लेटाइत रहै छला। काजक एहेन सूत्र बनल छेलैन जे आगू-पाछू सोचै-विचारैक बात मनमे उठबे ने करैन। ओना साले-साल बरहम स्थानक भागवतमे कातिक मास सुनै छला जे ‘जिनगी क्षणभंगुर छी, तँए समैकेँ बिना गमौने समरपित भऽ किछु कऽ ली।’ ..मुदा से भागवते धरि रहि जाइ छेलैन। भरि पेट भोजन भेटिए जाइ छेलैन तँए ने घटबी बाट मनमे उठै छेलैन आ ने दुआर-दरबज्जा भरल देखै छला जइसँ बढ़ती बात उठै छेलैन। भागवतोकेँ धर्मस्थानक धर्मक बात बुझि घर्मस्थानमे सुनि लइ छला। गामपर अबिते घरक चक्कीमे जुटि जाइ छला। अपन खेत, अपने केनिहार तँए अपना मनोनुकूल खेती-गिरहस्ती करै छला। जइ वस्तुक जेते जरुरत अछि, पहिने ओते पुरा लेब तखने ने अनका दिस ताकब। जँ से नइ तँ आँखिक खच्चरपन्नीसँ अनके सभ किछु देखैत रहब आ अपन देखबे ने करब। नन्दलालक विशाल रूप जहिना बुधनी देखै छेली तहिना बुधनीक विशाल रूप नन्दलाल देखै छला। कोठरीक राधा-रानीक जिनगी नहि, विशाल दुनियाँक मंचपर नट-नटी बनि दुनू-परानी कखनो खेतक गोला कोदारिसँ फोड़ैत, तँ कखनो संग मिलि धान रोपैत। तहिना, कखनो माल-जालक थइर-गोबर करैत, तँ कखनो इच्छानुसार खाइ-पीबैक ओरियान करैत। जिनगीक लीला तँए लजाइ-धकाइक कोनो प्रश्‍ने नहि। तीन सालक बीच नन्दलाल तेना रोगा गेला जे मन मानि लेलकैन ‘आब नै जीब! चल-चलौक बाटपर आबि गेलौं!’ ..मुदा एते दिन तँ अही समाजमे समाज बनि जिनगी गुदस केलौं, जँ किछु अनकर नै केलिऐ, तँ  केकरो भारो तँ नहियेँ बनलिऐ। मेहक बरद जकाँ किसानक संग खेत-पथारमे बहबे केलिऐ। तैबीच ठेहुनक गीरह कचैक उठलैन। कचैक एतेक जोरसँ उठलैन‍ जे बुझि पड़लैन सौंसे देहक बुत्ताकेँ छिन्न-भिन्न कऽ देत। मुदा ई तँ भेल देहक रोग, मनकेँ तइसँ कोन मतलब। ओकर तँ अपन सभ किछु छइ। मुदा शरीरक पीड़ाक कष्ट तँ मनोकेँ प्रभावित कैये देने रहैन। पीड़ाएल मन आ शरीरक बेथा देख नन्‍दलाल अपन बोरिया-विस्तरकेँ हाँइ-हाँइ समटैत बुदबुदेला- “जखन दुनियाँ छोड़िए रहल छी तखन किए ने अन्‍तिम बात कहिए दिऐ जे, भाय जे केलियह से खेलियह, किछु जमा तँ रहल नहि, जे देने जेबह। एकरा गलती बुझि छोड़ि दाए आकि जवाबदेही बुझि द्वारिका छाप दऽ दाए।” नन्दलाल ऐठाम पण्‍डाक बगे बनौने एक गोरे एला। बम्बैया सम्पन्न मंचक कलाकार जकाँ बनल-ठनल हुनकर चेहरा रहैन। नन्दलालक दरबज्जापर अबिते कामरूप कामाख्याक शंख फुकि घरवारीकेँ सूचना देलखिन। दरबज्जापर आएल अभ्यागतक आगमन बुझि बाड़ीसँ नन्दलाल आ आँगनसँ बुधनी पण्‍डाजीक आगूमे उपस्थित भऽ हुनक देव-रूप देख ओसारक चौकीकेँ देह परहक तौनीसँ झाड़ि-पोछि‍ बैसैक आग्रह केलखिन। दरबज्जापर आएल अभ्यागतक सेवा करब किसानी संस्कारक मुख्य अंग अदौसँ रहल अछि। बैसते पण्‍डाजी जोगी-फकीर जकाँ अपने बड़बड़ाए लगला- “ऐ जमीनक भाग कहै छै जे साक्षात लक्ष्‍मीक बास छी, दोबर-तेबर गतिए परिवार आगू मुहेँ बढ़त, मुदा..?” लक्ष्‍मीक बास सुनि दुनू परानी नन्दलालक मनमे खुशीक ज्वार उठलैन। मुदा पण्‍डाजीक बोल रहैन एकभग्गू। एकभग्‍गू ई जे जेते प्रशंसा बुधनीक केलखिन तेते नन्दलालक नहि, जइसँ नन्दलालक मनमे किछु अनोन-विसनोन जरूर भेलैन, मुदा पत्नियोँ तँ आन नहियेँ छैथ, विचारकेँ दबलैन। पण्‍डाजी हाथक रेखा देखैक विचार व्यक्त केलैन। ‘हाथक रेखा’ सुनि दुनू परानी अपन-अपन हाथ आगू बढ़ौलैन। ..चलाक खेलाड़ी जकाँ, जे पहिने दोसरकेँ खेलबैत पछाइत सवारी कसैत तहिना पण्‍डाजी सेहो केलैन। हाथ देखबैसँ पहिने बुधनीक मनमे उठलैन जे जँ पतिक अछैत मृत्यु भऽ जाइत तँ ओ पत्नी..? मुदा परोछ भेने..? बुधनीक मन पतिपर एकाग्र भऽ गेलैन। शुभ समाचार सुनैले बुधनी बिहुँसैत पण्‍डाजीक आगू हाथ पसाइर बजली- “ई हमर पति छैथ, जाबे जीबै छैथ ताबे हमहूँ जीबै छी तँए जँ केतौ कोनो गड़बड़ होइ से कहि दिअ। समए अछैत ओकर प्रतिकार करब।” बुधनीक बात सुनि पण्‍डाजीक मन चपचपा गेलैन। गोटी सुतरैत देख, चौकीक निच्चाँ लटकल पएरकेँ समैट पल्था मारि ऊपर बैसला। बैसते बुधनीक हाथ देख खुजल आँखि बन्न कऽ ठोर पटपटबैत बुदबुदेला। फेर आँखि खोलि चारू दिशा दिस देख ऊपर तकलैन। जेना कियो किछु बजैले उत्साहित केलकैन तहिना बजला- “परिवारक पछुलका गति तँ नीक छल मुदा बीचमे ग्रह केर आगमनसँ गड़बड़ा गेल अछि! ओना अखन धरि तेहेन गड़बड़ नै भेल अछि जे बुझि पड़ैत मुदा आगू जखन जुआ जाएत तखन बुझबे-टा नहि, देखबो करबै। ओना ऐ घरक साक्षात लक्ष्‍मी अहीं छिऐ जैपर अखनो घर ठाढ़ अछि, मुदा..!” आगूमे बैसल नन्दलालक मनमे उठैत जे परिवारक गार्जन हम छी, जँ हमर हस्त-रेखा नीक रहत तँ अनकर अधलो भेने की हेतइ। मुदा लगले विचार बदलए लगलैन जे पत्नियोँ तँ अर्द्धांगिनीए होइ छैथ तँए हुनको छोड़ब नीक नहियेँ हएत!पत्नीकेँ कहलखिन- “पहिने पण्‍डाजी केँ चाह पिअबियौन। पछाइत सभ गप हेतइ।” पतिक बात सुनि बुधनी चाह बनबए गेली। तैबीच पण्‍डाजी नन्दलालकेँ पुछलखिन- “ऐ गाममे देवस्थान कएटा अछि?” पण्‍डाजीक प्रश्‍न नन्दलाल नीक जकाँ नै बुझि सकला, तँए पुछलखिन- “की देवस्थान?” नन्दलालकेँ अनाड़ी बुझि पण्‍डाजी बजला- “बरहम स्थान तँ हेबे करत। तेकर बादो महावीरजी, शिवजी, धर्मराज इत्यादि-इत्यादि आरो केते स्थान हएत किने?” नन्दलाल- “हँ, से तँ ऐछे। तीनटा महादेव मन्‍दिर अछि, दूटा महावीरजी स्थान अछि, एकटा धर्मराज, एकटा सलहेस आ एकटा ठकुरवारी सेहो अछि।” तही बीच बुधनी चाह नेने आबि पण्‍डाजीकेँ आ नन्दलालोकेँ देलखिन एक घोंट चाह पीविते पण्‍डाजी बजला- “चाह तँ चाहे अछि! बड़ सुन्‍दर चाह पिएलौं!” चाह पीब हाथ धोइ पण्‍डाजी नन्दलालक दहिना हाथ देख बजला- “अहाँकेँ तीनटा बिआह आ सातटा सन्तान लिखैए। ई काएम बिआह छी?” तीनटा बिआह सुनि बुधनीक मनमे जलन उठलैन। मुदा किछु बजली नहि। नन्दलाल बजला- पहिल जे बिआह भेल सएह छी। सन्तानो एकेटा बेटा अछि।” पाशा पलटैत देख पण्‍डाजी पुनः हाथक रेखापर अपन आँगुर दैत बजला- “ई रेखा ऐठामसँ आबि एकरा काटि देलक। जइसँ दूटा पत्नियोँ कटि गेल आ छहटा सन्तानो।” पुनः नन्दलालक हाथ छोड़ि बुधनीक हाथ देखए लगला। बुधनीक हाथक रेखा देखैत बजला- “पति-सुख अहाँकेँ पूर भऽ रहल अछि, मात्र किछु दिन आरो अछि। मुदा..?” पण्‍डाजीक बात सुनि नन्दलालक मनमे उठलैन, भरिसक ई मौगियाहा पण्‍डा छी। मुदा अखन तँ दरबज्जापर छैथ किछु बाजब उचित नहि हएत। पण्‍डाजी आगू बजला- “अहाँक पतिकेँ शनिक ग्रह केर आगमन भऽ गेल छैन जे अहूँक रेखा इशारा करैए।” बुधनीक हाथ छोड़ि पुनः नन्दलालक हाथ देखैत बजला- “अहाँकेँ शनिक ग्रहक आगमन भऽ गेल अछि। मुदा अखन तँ शुरूआती अवस्थामे अछि तँए किछु नै बुझि पड़ैए मुदा तीन मास बितैत-बितैत उपद्रव शुरू भऽ हएत।” पतिक ग्रह सुनि बुधनी ओहिना तड़पली जहिना कोनो स्‍त्री अपन निर्दोष पतिकेँ सिपाही हाथे जहल जाइत देखैए। ..तरसैत-तलपैत बुधनी पण्‍डाजीकेँ कहलखिन- “अपने साक्षात देवता छिऐ। जे चाहबै से हेतइ। कोनो धरानी हिनका ग्रहसँ छुटकारा करा दियौन।” गोटी लाल होइत देख पण्‍डाजी बजला- “केहेन-केहेन राहू-केतुकेँ तँ जिनगीमे भगा चुकल छी आ ई कोन माल-मे-माल अछि! एकरा तँ छन-पलमे केतए-सँ-केतए दऽ आएब तेकर ठीक नहि!” पण्‍डाजीक बात सुनि दुनू परानी नन्दलालकेँ जान-मे-जान आएल। बुधनी बजली- “खर्च-बर्चक चिन्ता नहि, मुदा काज पक्का होइ।” घूसक मोट रकम देख जहिना घूसखोरक मन चपचपा जाइत तहिना पण्‍डाजीक चपचपेलैन। बजला- “देखियौ, ऐ काज-ले अनुष्ठान करए पड़ै छै तँए सभठाम करब आकि कराएब सम्‍भव नहि अछि।” बुधनी- “तखन?” पण्‍डाजी- “तइले चिन्ता किए करै छी। हाकिमक दसखत जेहने आँफिसमे तेहने डेरापर। तखन तँ आँफिसमे अनचोकमे आबि कियो देख ने लिअए तेकर कनी.., जे डेरामे नै होइत अछि।” नन्दलाल- “नै बुझलौं अहाँक बात पण्‍डाजी।” कबुला छागर जकाँ नन्दलालक मन कँपैत रहैन। तँए आँखिक सोझमे अपन अनुष्ठान देखए चाहैथ। पण्‍डाजी- “देखियौ, हिमालयसँ लऽ कऽ समुद्र धरिक वस्तुक जरूरत अनुष्ठानमे पड़ै छइ। ओते लऽ कऽ चलब सम्‍भव अछि? ऐठाम सभ वस्तु उपलब्ध नै हएत। अहाँ सन-सन केतेको भक्त छैथ जे हमरा लिए तँ सभ बरबैर छैथ।” नन्दलाल- “तखन?” पण्‍डाजी- “विधिवत सभ खर्चक मूल्य दऽ दियौ। जहिना अनन्त पावैनमे माने अनन्तक पूजामे एक गोरे पूजा करै छैथ आ टोल-पड़ोसक लोक अपन-अपन अनन्द-फनन्दक पूजा करा लइ छैथ, तँए की ओ अशुद्ध नइ भेल। अशुद्ध तँ होइत अछि फनन्द जेकर गीरह-बनहनक गिनती कम होइ छइ।” हिमालयसँ लऽ कऽ समुद्र धरिक बात सुनि बुधनीक मन चकभौर काटए लगलैन। बाप रे! केतए हिमालय अछि आ केतए समुद्र! तइसँ नीक जे जे कहता सएह करब असान हएत। देववाणी कोनो कि नुनछराह होइ छै, उनटा हौउ कि सुनटा,कहुना हएत मुदा हएत तँ मधुरे-मधुर किने। ..बजली- “केना की खर्च-बर्च पड़त?” पण्‍डाजी- “खर्च-बर्च की हाथी-घोड़ाक पड़त, तखन तँ अनुष्ठाने छी कनियोँ-कनियोँ करब तैयो तँ...।” ‘कनियोँ-कनियोँ’ सुनि बुधनी फेर बजली- “नै पान तँ पानक डन्‍टियोसँ काज चला लिअ।” पण्‍डाजी आ बुधनी दुनू गोरेक बात सुनि नन्दलाल परीक्षा लेल कबुलाक छागर जकाँ थर-थर कँपैत रहैथ। किएक तँ एक दिस जिनगी आ दोसर दिस मृत्यु देखै छला। मनमे उठलैन- ग्रह-नक्षत्रक किरदानीकेँ की मनुख रोकि सकैए? ..मुदा उठल मनमे ईहो उठलैन- जे मनुख माटियोकेँ देवता बना सकैए ओ तँ किछु कऽ सकैए। मुदा दुनू गोरेक अनुकूल विचार सुनि नन्‍दलाल किछु बजला नहि, चुपे रहला। हुन्डे अनुष्ठानक खर्च लऽ पण्‍डाजी सगुनियाँ डेग दैत विदा भेला। मनमे ईहो बात उठैत रहैन जे जँ चारियो-पाँच एहेन सुतरल तँ साल-माल लगिए जाएत। मुदा जे हौउ, यात्रा नीक रहल। तीन मास बि‍त गेल। ने पण्‍डाजी अपन परीक्षाक रिजल्ट बुझए घुमि‍ कऽ एला आ ने दुनू परानी नन्दलालक मनमे कोनो तरहक आशंका भेलैन जे पण्‍डाजी की केलैन की नहि। मुदा शैनी-ग्रहक आगमनक नाओं जे कहने रहैन ओ दिन नन्दलालकेँ मने रहैन। सौनक पूर्णिमाक दिन।  पूर्णिमा मन पड़िते महिनाक हिसाव जोड़लैन तँ जोड़ा गेलैन जे आइए पूर्णिमा छी। हौआइत हाथकेँ कुड़ियबैत नन्‍दलालक मनमे अबिते पोखैरक माछ सदृश पूर्णिमा चाल देलकैन। ओह!भरिसक हाथ हौआएब शुरू भऽ गेल। बामा हाथक हौआएब छोड़ि दहिना हाथसँ तरबा कुरियौलैन तँ सुआस पड़लैन। ओह! जाबे ग्रहक आगमन नै भेल ताबे पएर-हाथ कुड़ियौनी किए मंगैए..? पत्नीकेँ कहलखिन- “राधामोहनक माए, भरिसक ग्रहक आगमन भऽ गेल!” ‘ग्रहक आगमन’ सुनि बुधनीक मनमे उठलैन जे बहुत रोगी ओहनो होइए जे रोगकेँ देहमे रखनौं रहैए, दबाइयो खाइत रहैए आ काजो करिते रहैए। मुदा रोगीकेँ ओछाइन धड़ा आराम देब सेहो तँ होइए। तहूमे सर्दी-बोखार नइ छी जे नूनपनियाँ पीब लेब आ भानसो-भात करब। देवलोकक ग्रहक आगमन छी, एक अलग श्रेणीक रोग..! कहुना भेल तँ राजे रोग भेल किने..! बिच्‍चेमे नन्दलाल बजला- “आब चलब केना हाथो हौआइए आ पएरो, दुनू दिससँ तँ रोग आबि गेल!” बुधनीक मनमे उठलैन, पथ-परहेज की सभ करए पड़त। सर्दी-बोखारक तँ बुझल अछि जे पोड़ो साग नै खाएत मुदा एहेन रोगसँ तँ पहिले-पहिल भेँट भेल। खौंझाइत बड़बड़ेली- “जे भगवान सभकेँ बुधि देलखिन ओ एक-रंग करि कऽ किए ने देलखिन, जे रोगमे पड़ल छी आ पथ-परहेज बुझले ने अछि। एहेन रोगीसँ की लोक हाथ धोइ लिअ?” ‘हाथ धोइ लिअ’ मुहसँ निकैलते चमकैत शीशा जकाँ मन चनैक‍ उठलैन। जँ रोगीसँ हाथ धोइ लेब तँ माथक सिनूरक की हएत..? असोथकित जकाँ बुधनी थकमका गेली। जइ जिनगीकेँ खेल बुझै छी ओ खेल नै छी, जँ खेल रहैत तँ अमेरिकोसँ केतेक ऊपर रहितौं। ओछाइन पकैड़ते नन्दलाल रोगाए लगला। श्रम नै केने अरुचि, पड़ल रहने देहक अकड़नसँ जोड़-जोड़क दर्द बढ़ए लगलैन, बढ़ैत-बढ़ैत छह मासक पछाइत भिनसुरका नटुआ जकाँ मोटरी माथपर नेने नन्‍दलाल चल-चलाउ बनि गेला। असगरे बुधनी काजमे तेना ओझरा गेली जे काजे मानव आ काजे दानव बनि गेलैन। काज तेते छिड़िया गेलैन जे जहिना उड़ैत फनिगाकेँ गिरगिट पकड़ैए तहिना भऽ गेलैन। काजे काजकेँ खेबो करैत आ गीरबो करैत...। साँझू पहर जखन काजसँ निचेन भऽ बुधनी पएर मोड़ैथ आ भरि दिनक काजक हिसाव मनमे अबैन तँ मानि लइ छेली जे सभटा कर्मक खेल छी। कियो खेल खेलि खेलाड़ी बनि जाइए तँ कियो खेल बनि खेलाइत जाइए। डाक्टर ऐठाम जखन पतिकेँ लऽ जाइ छिऐन तँ सभ रोगक जड़ि भरि दिन पड़ल रहब कहै छैन। जइसँ सौंसे देहक जोड़ पकैड़ लेलकैन। फेर जिनगी ठाढ़ हेतैन एकर कोन भरोस। तखन तँ माइयो-बापक लिलसा पूरा कैये देलिऐन जे एकक नाति दोसराक पोता बनि ठाढ़ छैन, की पति-धर्ममे कनियोँ कमी रहल? जँ नइ तँ पति-विहिन नारीकेँ समाज किए कलंकित केने छैथ? पतिपर सँ बुधनीक नजैर उतैर‍ बेटापर एलैन। लोकक धिया-पुता शहर-बजारमे जा रहबो करैए, सिनेमो देखैए आ पढ़बो करैए। मुदा, से हमरा राधामोहनक संग गरदैनकट्टी भेल। खएर.., मुदा हमहीं की करबै जइ घरमे एकटा विद्यार्थी आ एकटा रोगी रहत ओइ परिवारक गाड़ी घिचब महिला-ले सचमुच चुनौती अछि। खिस्‍सा-पिहानी ढेरो लोक लोककेँ सुनबैए मुदा पतिव्रता परिवार-ले के केतेक समरपित छैथ, ऐ दिस सेहो देखक चाहिऐन। ई नहि जे टीक एक बोझ रखनै छी आ पनरह-पनरह दिनक बिनु धुअल पेन्ट पहिर प्रवचन करै छी। राधामोहनपर नजैर पड़िते वेचारी बुधनी विस्‍मित भऽ गेली। मन कहलकैन- भगवान सभटा विपैत ओही छौड़ाकेँ देलकै। मुदा तैयो कहुना कऽ गोठगो धरि बनेलौं अछि। आब कि ओ धीगर-पुतगर नै भेल। जँ धीगर-पुतगर भेल ओकरा बुते घर चलौल नै हेतइ। ..बुधनीक मनमे सवुर भेलैन। भगवान पति हरने जा रहल छैथ मुदा जुआन बेटा तँ सोझमे ऐछे। फेर मन उनैट राधामोहनपर एलैन, जेतबो सुख माए-बापक घर केलिऐ तेतबो उमेर तक हम कहाँ दऽ सकलिऐ। ओही वेचाराकेँ धन्यवाद दी जे खेने-बिनु-खेने पढ़बो करैए आ संग-साथ दऽ काजो करैए। संग साथ मनमे उठिते बुधनी विह्वल भऽ गेली। संगे-साथ ने सभ किछु छी। मनुख तँ अबैत-जाइत रहत मुदा जे परिवार संग-साथ अछि वएह ने जिनगी छी। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2359 2. देखले दिनमे नन्दलालक परिवार केतए-सँ-केतए ससैर कऽ पाछू चलि आएल, यएह छी जिनगी। समए आगू मुहेँ ससरैत अछि आ जिनगी पाछू मुहेँ, तखन समए संग केना चलब? समाजक बीच नन्दलाल परिवारक चर्च अहू रूपमे होइत। प्रश्‍न अछि जे समाजक केतेक लोकक बीच एहेन विचार उठैए। परीक्षामे एक शब्दक भूलसँ प्रश्‍नोत्तर गलत भऽ जाइए जेकर परिणाम असफल होइत अछि। मुदा वएह एक शब्द भेटने परीक्षार्थी सफलो तँ होइते अछि। की तहिना जिनगियोक शूत्र शब्द अछि? ओना समाज तँ समाज छी, अथाह समुद्र कहियौ आकि सघन बोन। कियो नून घोरि नूनपनियाँ बना कऽ पीब-पीब रोग भगबैए, तँ कियो नुनाएल पानिक नुनगरी हटा स्वच्छ बना पीबै जोग बनबैए, तँ कियो दुरगन्‍ध-सुगन्‍धक बीच लक्ष्मण रेखा खींच जीवन-यात्रा करैए, तँ कियो नरकोमे ढाही मारि-मारि आरो गर्त दिस बढ़ैए। समाजमे एहनो लोकक संख्‍या कम नहि जे बुधनीक दशा-दि‍शा देख चाबस्सियो दैत आ हँसबो करैत। मुदा केहेन चाबस्सी आ केहेन हँसी? ..खुशीसँ जँ हँसी अबैए तँ केकरो दीन-दशापर किए उठैए? मुदा तैसंग समाजमे एहनो कहनिहार तँ ऐछे जे कहैए जे धन्यवाद ओही वेचारीकेँ दिऐन जे एक संग पतिसँ पुत्र धरिक सेवा अपन बाँहु-बलसँ कऽ रहल छैथ। एक परिवारक खेती-पथारीसँ लऽ कऽ पढ़ाइ-लिखाइ, बर-बेमारीक सामना असगरे करै छैथ! की हुनका जिनगीकेँ चक्की उनटौनिहार नै कहबैन? जखन कि मिथिलांचलक गौरव-गाथाक एक इतिहास रहल अछि। मुदा तैसंग ईहो कम दुर्भाग्यक बात नहि जे जिनगीकेँ समाजिक जालमे ओझरा अपन करम-भागकेँ दोषी बनबैत रहल.., आ एहनो कहनिहारक कमी नहि जे कहैत पीसलक मड़ुआ तँ उठौत गहुमक चिक्कस...। प्रश्‍न उठैए जे बुधनीक की दोख जे एहेन शब्दसँ वेचारीकेँ दागल जाइए? मुदा एहनो शब्द तँ ओही समाजमे फड़ैत-फुलाइत अछि जे कहैत वेचारी बुधनीक अखन उमेरे केते भेल अछि। अधोसँ कम जिनगी टपल हएत, बेसी बाँकीए हेतइ। ई केहेन निसाफ भगवानक भेलैन जे सौंसे जिनगी नै दऽ अधोसँ कमेपर अधसुखू बना देलखिन। पति-पत्नीक बीच जे रहैए तेकर तँ ओ गति छै जेकरा मनुखक श्रेणीसँ निच्चाँ बुझल जाइ छै आ जेकरा नै छै ओकर गति की हएत! कियो राँड़ कहि राँड़िन बनौत तँ कियो यात्राक भदवा कहि दुतकारत...। ओना, एहेन गति अखन धरि बुधनीकेँ नै भेल छैन, कारण जे रोगाएलो पति जीबैत तँ छैन्‍हे। भलेँ परिवारक गाड़ीक जुआ असगरे किए ने घिचैत होइथ। मुदा जहिना समाजक बीच, मकानक पजेबा जकाँ एक-एक परिवारक ऊपर समाजक भारो रहैत आ जीबैक अजादियो रहैत तहिना परिवारक बीच एक-एक बेकतीक सेहो होइत अछि। शरीर अलग-अलग रहनौं, पानिक बीच जेहेन सम्बन्ध रहैत, से तँ रहिते अछि। मुदा बुधनी तँ जालमे ओझराएल छैथ। दस बजे पुर्वाहनमे जे बेटा स्कूल जाइ छैन ओ चारि-पाँच बजे अपराहनमे घुमि‍ कऽ घरपर अबै छैन, तैबीच रोगाएल पतिकेँ छोड़ि बुधनीकेँ केतौ बाहर जाएब उचित हएत? मुदा बाधो-बोन नै जाएत से हेतइ? तँए कि बुधनीक विचारक सागर सूखि गेलैन जे एक-बोल पतिसँ नै बाजि पाबैथ? जँ एक दिस गाछक डारि टुटि  रहल अछि तँ दोसर दिस राधामोहन सन, अनपढ़  पतिक जगह पढ़ल-लिखल बेटा तँ भेटिए रहल छैन। उत्साहमे मिसियो भरि कमी बुधनीमे नै आएल छेलैन, जहाँ धरि काजक[1] सफलताक पछाइत जे मन खुशिया जानि तँ अनेरे बमकए लगैन। सौंसे गामक लोक बताह भऽ गेल, बाप बेटाकेँ दोखी बना भरि दिन गरियबैत रहैए तँ बेटा बापकेँ गरियबैत रहैए, साला बुढ़ाड़ीमे घी ढारी करैए! सासु-पुतोहुकेँ दोख दैत जे अपढंगहीं घर आएल, तँ पुतोहु बापकेँ गरियबैत जे कोन नटिनियाँ घरमे बोरि देलक। ..मुदा अनेरे अनकर गाछी देखने की फेदा, कियो तेतैरक बोन लगौने अछि तँ कियो बगुरक, केकरो गाछीमे तुइन फुलाइ छै तँ केकरोमे आम। अनेरे भरि दुनियाँ वौआइक कोन काज अछि। अपन धन्‍धाक दुखक भागी ने छी आकि अनेरो हमर माए मरल तँ अहाँ बुझबो ने केलिऐ आ अहाँक माए मरत तेकर जिगेसा करब हमर दायित्व बनल। मन ठमैक गेलैन। जिनगीक दशा-दिशा देख बुधनी ठकुआ गेली। जहिना धारक वेगमे कियो भँसि कऽ जान गमबैए, तँ कियो गाछपर सँ खसि जान गमबैए, तहिना कियो घरमे लगल आगि मिझबैमे जान गमबैत तँ कियो ओछाइनपर पड़ल इछानिक गन्‍धक बीच जान गमबैत, तँ कियो कन्हापर घैलिक भार उठा फुलबाड़ी पटबैत जान गमबै छैथ, तँ की सभ एक्के भेल? एक नै भेनौं एक्के भेल? केना भेल? लत्ती जकाँ लतरल अछि सभ किछु समाजमे, मुदा जहिना लत्तीक गिरहपर फूलो फुलाइ छै आ फड़ो फड़ै छै, जे ओइ लत्तीक फूल फल भेल। तहिना हरेक मनुखकेँ अपन-अपन जिनगीक समस्या ताधैर उठैत रहत जाधैर जिनगी जीबै छी। एहेन स्थितिमे की हएत, ओ हएत जिनगीक हर समस्याकेँ अपन तालाक कुंजी बना खोली। रहल बात जे सभ जँ सएह करत तँ मनुखक समाज केना बनत? समाज बनैक अपन सूत्र अछि जइसँ बनैए। ऐठाम प्रश्‍न बेकतीगत अछि, सभकेँ अपन-अपन बुधि-विवेक छैन। की नीक, की अधलाक विचार तँ अपने करए पड़तैन। वएह भेला पछाइत स्वतंत्र जिनगीक रस भेटैए। बेटा राधामोहनपर नजैर गड़ा बुधनी देखए लगली। वेचाराकेँ गरदैनकट्टी करै छिऐ! अनका-अनका देखै छिऐ बड़का-बड़का शहर-बजारक स्कूलमे बेटाकेँ पढ़बैए आ..? मुदा से हमरा सन लोककेँ सम्‍भव अछि। जैठामक शिक्षा गलत दिशा पकैड़ झकझोड़ि रहल अछि तैठाम की कएल जाए, ई तँ नान्हिटा प्रश्‍न नै अछि। मुदा ओही वेचाराकेँ धन्यवाद दिऐ जे खेने-बिनु-खेने स्कूल नै छोड़ैए। ..बेटाक धर्म-कर्म देख बुधनीक मन तड़पल। आब छौड़ा गोठगो भऽ गेल। भगवान एते रच्छ रखलैन जे आब जे अपनो (पति) मरबो करता तँ एकटा खुट्टा देने जेता। मुदा जइ वेचाराकेँ बच्चेमे माए-बाप छोड़ि दैत, भगवान ओइ बच्चाकेँ केना ठाढ़ करै छथिन। सभ की ठाढ़े भऽ जाइए। किछु ठाढ़ो होइए आ किछु नहियोँ होइए। आगू आब राधामोहनकेँ नै पढ़ा पएब। तखन तँ जँ अपने अपन पढ़ैक भार उठा लिअए तँ रोकबो नै करबै। यएह ने जे नै पढ़त तँ काजमे मदैत करत, पढ़त तँ से नै हएत। नै हएत तँ नै हएत, जँए एते दुख कटै छी तँए किछु दिन आरो काटब। मेघक तरेगन जहिना अपन-अपन जगहसँ टक लगौने देखैत रहैए तहिना राधामोहन जिनगीक बाट दिस देखए चाहैत मुदा बेँतक बोन जकाँ तेते-ओझरी लगल देखैत जे अन्हार छोड़ि इजोत भेटबे ने करइ। मुदा मूल प्रश्‍न तँ मनमे उठिए जाइत रहइ। तीन मास पछाइत परीक्षा हएत, तेकर पछाइत? की आजुक जे शिक्षा-पद्धति बनि रहल अछि तइमे आगू बढ़ि पएब? ..स्कूल लगमे अछि, गामेपर सँ जाइ-अबै छी। मुदा घरसँ बाहर भऽ शहर-बजारक खर्च जुटा पएब? जँ से नइ तँ मैट्रिक पासकेँ के पुछै छै, आँफिसो आ करखन्नोक चौकीदारी बी.ए, एम.ए. करैए। ..काँच मन राधामोहनक पिघलए लगल। बाप-माइक दशा देख मन बेकाबू भऽ गेल। ओह! अनेरे तीन मास परीक्षाक आशामे बैसल रहब, जेते पढ़ने छी तेतबेकेँ ने घोंकैत रहब। किछु करक चाही। मुदा केतए करक चाही? शहर-बजार जा नोकरी करी आकि परिवारक संग गाममे किछु करी? जँ शहर-बजार जाएब तँ माता-पिताकेँ के देखनिहार हएत? सभकेँ अपने अछि, तखन? तखन तँ दुइए-टा उपाय अछि जे या तँ परिवारकेँ सुधारि, माने परिवारक काजकेँ सुधारि चली चाहे परिवारकेँ तोड़ि कऽ चली। ..विचारमे राधामोहनकेँ डुमल देख बुधनी बजली- “बौआ, अखन खुट्टा बनि ठाढ़ छिअ, तूँ चिन्ता किए करै छह?” आशुतोष दैत बुधनी राधामोहनकेँ कहलैन। मनमे अपन खुशी ई रहैन जे जँ पति मरिए जेता तैयो एकटा खुट्टा तँ गाड़नहि जेता। मुदा मनमे ईहो उठैत रहैन जे किछु छैथ तैयो पुरुख कहुना पुरुखे भेला, मौगी कहुना मौगीए भेल। ओना, तेसरो तँ होइते अछि जे पुरुखो मैगियाह होइए आ मौगियो पुरुखाह। हँ से तँ होइते अछि...। माइक बोल-भरोससँ राधामोहनक मनमे किछु आशा जरूर जगल मुदा जेतेक जरूरत छल तेतेक नहि जगल। ..राधामोहनक ठमकैत मनमे उठलै, गामेमे देखै छी जे पनरह-सोलह बर्खबला सभकेँ केरा-पौंच जकाँ पौंच निकलै निकलए लगै छै, तखन हमहीं की जुआन नै भेलौं? मनुख बाँस थोड़े छी जे समैए पाबि कोंपर देत। माए-बापक सेवा बेटा-बेटीक पुनीत कर्तव्य छी। पुनीते काज ने धर्म छी। ..पानिक टघार जकाँ राधामोहनक मनक विचार आगू मुहेँ ससरल। की हमरे भरोसे दुनू गोरे बैसल रहता। तहूमे पिताक एहेन स्थिति छैन जे सालक कोन बात जे दिन-महि‍ना गनि रहला अछि। परीक्षा देने एतबे ने हएत जे मैट्रिक पासक सर्टिफिकेट भेट जाएत। सर्टिफिकेट लऽ कऽ की धोइ-धोइ चाटब! सर्टिफिकेटक जरूरत ओकरा होइ छै जे नोकरी करए चाहैए। जिनगी-ले तँ ज्ञान चाही, काजक लूरि चाही...। तत्-मत् करैत राधामोहनक मनमे उठल, परिवारमे जँ किछु करए चाहै छी तँ हुनको[2] सबहक विचार सुनि लेब नीक हएत। जँ एहेन काज होइ जेकर जड़ि हुनका सबहक जिनगीमे रोपा गेल होइ, मुदा कोनो कारणवश ओ सूखि गेल होइ। ई तँ नहि जे बाधक एगच्छा जकाँ कोनो ओहेन काज करए लगी जे जेते हवा-विहाड़ि, ठनका-पाथर आकि झाँट-पानि हेतै, सभटा ओहीपर खसए...। राधामोहनक मनमे उठल- जखने इच्छाकेँ अनुभवसँ भेँट होइ छै तखन जे बाट भेटै छै ओ जिनगीमे बेसी नीक होइ छइ। से नइ तँ दुनू गोरेक बीच अपन विचार राखब। हुनका सबहक की विचार होइ छैन सेहो तँ सोझहा आबिए जाएत। संगे माए-बाबूक मनमे सेहो हेतैन जे बेटा आज्ञाकारी अछि, एहनो दशामे बिना पुछने आगू डेग नै बढ़बए चहैए।  अपनाकेँ पुछै-जोकर जिनगी बना लेब,  सफलताक मुख्य सोपान छी। रावणक दरबारमे हनुमानक आसन नमहर ऊँच हेबाक कारण भरिसक सएह रहइ। ..माता-पितासँ पुछि लेब राधामोहन जरूरी नै अनिवार्य बुझलक। अनिवार्यक कारण मनमे छाप पड़लै। ओ ई जे किछु-ने-किछु जिनगीक सच्चाइ जरूर भेटत। माइलिक श्रम सिरिफ ओतबे नै होइत जेते गाछ फूल दइत। बल्कि ओहो होइत जे फुलाइसँ पहिने, कोनो कारणे गाछ सुखए नहि। प्रश्‍न उठैत जे की ओइ गाछकेँ ठाढ़ करैमे, बिआसँ गाछ बनबैमे ओकर श्रम नइ लगल। श्रमक उचित श्रमिक, श्रम केनिहारकेँ जखन भेटै छै तखन मनमे खुशीक अंकुर उठै छै जे अपन कर्मक फल भेटल। ..राधामोहनक मनमे एकटा नव प्रश्‍न उठि गेल। ओ ई जे दुनू गोरेसँ[3] फुट-फुट विचार करब नीक हएत आकि एकठाम? नीक-अधला जे हुअए मुदा एकटा तँ हेबे करत जे काजक गवाह एको गोरे हेबे करता। जाधैर काजक जानकारी दोसरकेँ नै रहत ताधैर काजक महतमे कमी-बेसी रहबे करत। गोसाँइ डुमि गेल मुदा अन्हार नै भेल छल। बाहरक सभ काज सम्हारि बुधनी गठुलासँ जारैन आनि चुल्हि लग रखली। रौतुका भानस करैक ओरियानमे जुटैक सुर-सार करए लगली। तैबीच दिनक काजक हिसावपर मन गेलैन। कोन काज सभ छेलै आ कोन-कोन भेल। ..ओसारपर बैसल बुधनी हिसाव जोड़ए लगली आ ओछाइनपर पड़ल नन्‍दलालक मनमे उठलैन- जखन भानसक ओरियान भाइए रहल अछि तखन रातियो ठीके-ठाक रहत। भगवानकेँ मने-मन गोर लागि कहलखिन- “भगवान, जहिना राति अराम करैले बनेलौं मुदा जँ खाइक ओरियान भेल रहए, तखन ठीके बनेलौं। मुदा अहींसँ पुछै छी जे बिनु पाइक सरलाहियो वेश्या केकरो पुछै छइ?” नीन तँ नीने छी, खाउ-पीबू निनियाँ देवीक पूजा करू। मुदा की ओहो भुखाएल पेटकेँ पुछै छै आकि छोड़ि कऽ पड़ा जाइ छइ। खएर जेतए जे हौउ, मरितो-मरितो तँ सुख भोगाइए जाएत...। अनुकूल समए देख राधामोहन माए लग आबि बाजल- “माए, किछु करैक मन होइए। घरक जे दशा देख रहल छी, ओ निच्चाँ दिस ढरैक रहल अछि। आइ करी-कि-काल्हि-करी मुदा करए तँ हमरे पड़त। तइसँ नीक जे बँचल समैकेँ हाथसँ नै जाए दी।” बेटाक बात सुनि जहिना बुधनीक मनमे आशाक बीआ खसल तहिना नन्दलालक मनमे भेलैन। मुदा लगले मन विसाइन हुअ लगलैन। ओह! वेचाराकेँ जखन पढ़ैक बेर एलै, भगवान हाथ-पएर तोड़ि घरमे बैसा देलैन। जँ अनके जकाँ हमहूँ पढ़ा सैकतिऐ तँ की राधामोहन बड़का लोक[4] नइ बनैत, की ओ पजेबाक बड़का घर बना रहैक ओरियान नै करैत। एते तँ दोखी बेटा लग छिहे, मुदा से केना? जँ निरोग रहितौं तखन जे काजसँ देह चोरैबतौं तखन ने, से तँ अपना मनो ने अछि जे जानि कऽ कहियो कोनो काजसँ देह चोरौने हेबइ। मुदा तैयो ओकरे दुनू माय-पुतकेँ धैनवाद दिऐ जे तीन सालसँ ओछाइन धेने छी आ सभ नेकरम करैए। भगवान अहीले ने परिवार दइ छथिन जे असगरे लोक अपन जिनगी जानवर जकाँ नै जीब सकैए। जँ से होइ, माने कियो असगरे हुअए आ ओकर माए मरि जाइ तँ वेचारा की करत। काज तँ तीन गोरेक छइ। एक गोरे बजारसँ कफनक कपड़ा आनत, दोसर गोरे जरबैक ओरियान करत तँ तेसर गोरे कनबो करत किने। बेटाक विचार सुनि नन्दलाल ओछाइनेपर उठि कऽ बैसैत बजला- “बौआ, आब की तोहू कोनो नान्हिटा बच्चा थोड़े छह जे नै किछु कएल हेतह। तूँ तँ कहुना चफलगरो भऽ गेलह,देखै छी चरि-चरि-पँच-पँच बर्खक बेदरा सभ गाए-महींसक चरवाहि करैए। जखन कि ओते पैघ जानवरक चरवाहि करैबला ओ अछि नहि। मैट्रिक पास करैमे तोरा कोनो भांगठ नइ छह, मरियो जाएब तँ तोरा माइएकेँ चाबस्सी दी जे कहुना-कहुना परिवारकेँ ठाढ़ केने रहलह। आब तहूँ जुआन भेलह। नहियोँ कहुना तँ केतेको विषयक बात पढ़नहि हेबह। आइ एते संतोष अबस्से मनमे भऽ रहल अछि जे मरितो काल पुछै-जोकर छी। तोहर बेटाकेँ ऐगला जिनगीक बाट हम नै घेरबह। बेटा धन छह, एतेटा दुनियाँमे जिनगी नै बितौल हेतइ।” नन्दलालक विचारसँ राधामोहनक मन फरीच नै भेल जे बाबू की कहलैन। मुदा दोहरा कऽ पुछब, थेथारब हएत। एक तँ ओहन रोगसँ पीड़ित छैथ तैपर बेसी बजबयैन से नीक नहि। मुदा अपना जनैत प्रश्‍नक उत्तर तँ दइए देलैन, भलेँ बुझैमे नै आएल। बुझैमे नै आएल ई कमजोरी केकर भेल, बजनिहारक आकि सुनिनिहारक? एते बात राधामोहनक मनमे अबिते नव-पुरानक बीचक दूरीपर नजैर गेल। नव केकरा कहबै आ पुरान केकरा कहबै वा पुरान की आ नव की भेल? देखै छी जे किशोरी बाबाक गाछी तीन-चारि पुश्‍त पहिलुका लगौल छिऐन। गाछीक आड़ापर जे शीशोक गाछ लगौलैन, माटि भलेँ ढहि कऽ सहीट किए ने भऽ गेलैन, मुदा एक-एकटा गाछक दाम तीस-तीस-चालीस-चालीस हजार होइ छइ। से की कोनो शीशोए-टाक अछि आकि आमो गाछ सभ एहेन-एहेन अजोध भऽ गेल छैन आ फड़बो तेते करै छैन जे परिवारमे अपुछ बनौने रहै छैन। मुदा तैयो एकटा प्रश्‍न उठबे करत जे तैबीच (गाछीक जिनगी) की गाछक डारि नै सुखलैन आकि शीशोक पँगियाँ नै भेलैन? जरूर भेलैन। अकासक चिड़ै सभ सेहो बाँझीक लस्सा लोलमे लगौने आबि-आबि डारिपर बैस लोल रगैड़ लस्सा लगा बाँझियोक गाछ रोपिते रहलैन। आइयो ओ गाछी ओहिना लहलहाइत अछि, जहिना शुरुक जुआनीमे लहलहाइ छल। भलेँ गहुमन साँपक लहलही नै हौउ मुदा पनि‍याँ-दरादक तँ ऐछे, किन्‍तु ओकर भय कहाँ केकरो होइ छै, होइ छै गाम-घरक गहुमनक। जे जमीन आम-शीशोक कोन बात जे चन्दन सन वस्तु दैत रहल अछि, तेकरा छोड़ि जँ कियो मरूभूमिमे बसि खुशी मनबै छैथ ओ...। भलेँ देहक मना लैथ किन्‍तु मनसँ नै मना सकै छैथ। किशोरी बाबापर सँ राधामोहनक नजैर अपना परिवारपर उतरल। खेत सभ समुचित करै दुआरे परती भेल जाइए। परतियो की कोनो एके रंगक अछि। केतौ उपजैक शक्ति क्षीण ऐछे तँ केतौ शक्तिकेँ क्षीण कएल जाइए! बिनु पानियेँक खेत केते दिन अपन सेवा दऽ सकत। रौद-जाड़सँ तपैत कहुना अपन अस्तित्व बना रखने अछि। मुदा मूल प्रश्‍न ऐठाम अछि जे जइ समैमे हम सभ जीब रहल छी, समयानुसार कृषि केना औद्योगिक कृषि बनत ई मूल प्रश्‍न अछि। अंकुरक रूपमे राधामोहनक विचार जगलैन जे जे पूजी अछि ओइमे पशुपालन करी। मुदा पशुओ तँ केते रंगक अछि। हाथियो अछि, बकरियो अछि आ घोड़ो अछि। मुदा जहिना हाथी तँ उत्पादित छी वा नहि, तहिना घोड़ो अछि। तँए दुनू सवारी बनि गेल। जैठाम पेटक समस्या अछि ओ थोड़े ऐसँ चलत? महींस छीहो तँ ओ मरदा-मरदीक काज अछि। अखनो गाम-घरमे तीन-तीन दिन लोक वौआ-वौआ बाह[5]  कराबैए, तइसँ नीक गाए। जे किछु थोड़-थाड़ विकास भेल ओइमे गाइक पाल सेहो समायानुकूल भेल अछि। तेतबे नहि, जँ गाए-महींस पोसब तँ ओकर चाराक ओरियान सेहो करए पड़त। जे सबहक साधक बात नइ अछि। ..जइ-जोकर जिनका छैन ओ ओइ-जोकर काज सम्हारि सकै छैथ, तँए भीतरे-भीतर राधामोहन ऐ भाँजमे जे जँ घासक लूरि‍ माएकेँ हएत तँ एते तँ उपकारे भेल। तैबीच बुधनी आ नन्दलालक बीच कहा-कही हुअ लगल। खिसिआ कऽ बुधनी पतिकेँ कहि देलखिन- “बड़ बुधियार छेलौं तँ ओ पण्‍डाबा केना रूपैऔ ठकि लेलक आ देहमे रोगो पैसा देलक?” बुधनीक बात नन्‍दलालकेँ लगलैन नहि। पत्नीक गुरु स्वरूपा रूप सोझहा आबि गेलैन। ..तीन सालक कष्ट नन्दलालकेँ जिनगीक बहुत अनुभव करा देने छेलैन। अनुभव ईहो करा देने छेलैन जे अखन उमेरे की भेल। लोक साए-साए बर्ख जीबैए हम अधोसँ कमेमे जा रहल छी। जइ स्‍त्री आ बेटाक सेवा हम कैरतिऐ से दिन-राति हमरे पाछू हरान रहैए। जे हमरे पाछू हरान रहत ओ अपना-ले की करत आकि सोचत। सबहक जिनगी हम तोड़ि देने छिऐ! जइक चलैत परिवारक गाड़ी पाछू मुहेँ ढरैक रहल अछि। अपन हारि कबूल करैत नन्दलाल पत्नीकेँ कहलखिन- “राधामोहनक माए! अहाँ ठीके कहलौं जे पण्‍डाबा ठकि लेलक। दोख तँ हमरे भेल। पुरुख भऽ कऽ घरक खुट्टा तँ हमहीं भेलिऐ। मुदा एहेन ठकेनिहार हमहीं-टा छी आकि आरो लोक अछि। परिवारमे एते गलती जरूर भेल मुदा...।” पिता मुँहक इमानदारीक बोल राधामोहनक हृदैकेँ हिलोरि देलक। बच्चा मन सूप जकाँ फटैक तँ नै पेलक मुदा हिलोरमे नीक-अधलाक सीमा जरूर बना देलकै। बाजल- “माए, हम तँ स्कूले धेने छी, बाबू बेमारे छैथ तैबीच तूँ केते दिन बगियाक बग्गी बना दौड़ा पेमे?” बेटाक बात सुनि बुधनी लजबिजी जकाँ आँखि मूनि विह्वल होइत बजली- “बौआ, कोनो की लिखए-पढ़ए अबैए जे लिखि-लिखि रखितौं। मुदा एते मन जरूर गवाही दइए जे जे बनि पएल से करैत रहलौं। नीक-अधला तँ उपरबलाक छी।” माइक विचारकेँ पकैड़ राधामोहन लत्ती जकाँ ऊपर मुहेँ उठए चाहलक मुदा एहेन कोनो-गिरह आकि अखुँए ने पकैड़ पबैत जैठाम सँ सोंगर पकड़ैत। नजैर उठा देखलक तँ समुद्र जकाँ झलकैत सभ किछु बुझि पड़लै, मुदा नहेबाक गर केतौ नहि! ..गुरुक आगू जहिना शिष्य सिर-सिरा कऽ जनैले प्रश्‍न पुछैत तहिना राधामोहन पुछलक- “माए, किच्‍छो तँ फरिछा कऽ कह?” राधामोहनक प्रश्‍नक कारक अपन रहै, मुदा बुधनी अपना कारके बजली- “बौआ, कोनो अनकर घर-दुआर छी जे बाजब, अपन छी, अपन केलौं, तइले तोरा सभकेँ उपराग देब नीक हएत! अपन पति, बेटा, समाज, देश-दुनियाँ सभ किछु तँ अपने छी तखन कि कियो ऐसँ अलग भऽ करैए जे दोसराकेँ कहत। जइ करैले धरतीपर एलौं, जहाँ धरि सक्क लगल तहाँ धरि करै छी। जखन नीक-अधला देखनिहार कियो और छैथ तखन की करबह।” माइक बात सुनि राधामोहनक मनमे उठल- ओह गड़बड़ भऽ गेल। तेहेन लाड़-झाड़मे पड़ि गेलौं जे अपन बाटे बटिया गेल। भरियो दिन जँ बाट तकैत रहब तैयो ऐ डगरमे थोड़े डगहैर सकब! से नइ तँ ठिकिया कऽ वएह प्रश्‍न राखी जैठाम वौआइतो बटोही किछु-ने-किछु अँटकैए। बाजल- “माए, अखन दुनू गोरे–बाबूओ आ अहूँ- वीर्तमान छी, तँए एहेन रस्ता देखा दिअ जइ पकैड़ कऽ हमहूँ ताधैर चलैत रहब जाधैर ओइसँ नीक आ सक्कत रस्ता नै भेट जाएत। आँखिक सोझमे यज्ञक संकल्प सबहक माए-बापक इच्छा रहैत अछि तँए..?” राधामोहनक प्रश्‍न जहिना नन्दलालकेँ तहिना बुधनीकेँ आरो भँसिया देलकैन। नन्दलालक मनमे उठैलैन- जँ बेटा उठि जिनगी उठबए चहैए, तइमे हम छुटि कहाँ रहल छी, जे बापक सेवा नै करत! किछु करैक मन होइ छै। मुदा किछु माने की, सभ किछु आकि किछु नहि? मुदा किछु विचार जँ बेटाकेँ नै देब, सेहो हीक लगले मरब..! मनक बात कहि दइ छिऐ। बजला- “बौआ, दुनियाँमे कियो ने अपना-ले करैए आ ने अनका-ले, हथियार बनि धरतीपर आएल अछि, ओकर उपयोग केते के केलक ओकरे लेखा-जोखा धर्मराजक घर होइ छइ। कियो धर्मराजक घर बास करैए कियो यमराजक। बेटा बनि धरतीपर जनम लेलह। ई केना कहबह मरदक बेटा छह, मुदा एते तँ कहबे करबह जे मरद बनि मरदक बेटा कहबैत रहिहह।” पिताक बात राधामोहनक मनकेँ ओहेन बना देलक जेहेन बकरीक काँच दूधमे साहोरक दूध मिल कऽ लगले दही बना दइत। मने-मन राधामोहन चौकन्ना होइत चारू दिस ताकए लगल। गुमा-गुमी देख बुधनी धड़फड़ाइत बजली- “बौआ, भानसक अबेर भऽ जाएत। तहूमे पथ-पानिक ओरियान तँ अपना सभसँ फुट करए पड़ैए। केना पटुआ-झोर बापक आगूमे पथ बना देबहुन। तखन तँ तोरो बड़ जिद लगल छह मुदा माए भऽ कऽ की कहबह। यएह ने कहबह जे हाथ-पएर भगवान दुरुस देने रहथुन तँ दनदनाइत आगू मुहेँ दौगैत रहिहह।” कहि झपटल उठि बुधनी भानस करए चुल्हि दिस बढ़ि गेली। ◌ शब्‍द संख्‍या : 3037 3. रातिक पौने नअ बजैत। गामक शिवालयो आ ठकुरवारियोमे सौंझुका शंखो आ डमरूओ बाजि गेल। जारैन नीक रहने बुधनीक भानसो आन दिनसँ किछु पहिनहि भऽ गेलैन। मुदा गामक देवालयक धूप-आरतीसँ पहिने लोक खाए केना लैत!आ जँ खाइए लेत तँ कि भऽ जाएत? ..ऐ विचारमे चुल्हिए लग बैस खोंरनाक जराएल मुँह दिससँ चुल्हिए आगू लिखए लगली। लिखल-पढ़ल तँ बुधनीकेँ नै होइत मुदा सभ दिनक आरतीक स्तुति सुनि पढ़ै-गुनैक लूरि तँ भाइए गेल छेलैन। कियो अपन अक्षर चित्रे घीचि बनौत तइसँ अनका की...। तैबीच ठकुरवारीमे स्तुति शुरु भेल- “भए प्रगट किरपाला दीन दयाला...।” ओना बुधनी सभ दिन स्तुति सुनैत, मुदा आइ खोंरना हाथमे रहने चुल्हिए आगू लिखौ लगली। स्तुति केतौ बतियाइत,बुधनीक कान केतौ सुनैत आ हाथक खोंरनी केतौ चलैत। एक बाट नइ रहितो धारक धारा जकाँ अपना-अपनीकेँ सभ दौगैत...। स्तुति समाप्त होइते जना बिजलीबला इंजन बिजली लाइन कटने जे जेतए गेल रहल ओ ओतै रूकि जाइत तहिना बुधनीकेँ भेल। दुनू हाथो आ कानो अपने रूकि गेलैन। रूकिते मन औनाए लगलैन। मुदा आगूमे भानसक बरतन आ खाइक समए, तँए मन परिवारे दिस समटा कऽ घेरा गेलैन। मन पड़लैन राधामोहनक प्रश्‍न। ओह! वेचाराकेँ कहाँ किछु उत्तर देलिऐ। कहुना तँ माए-बाप अखन हमहीं ने छिऐ, सोझहे असिरवाद देने थोड़े होइ छै, आ असीरवादी सेहो दिअ पड़ै छै किने। ..अपसोच करैत बुधनीक मन ठमकलैन। ठमैकते उठलैन जे नै किछु विलगा कऽ कहलिऐ तँ मनाहियोँ तँ नहियेँ केलिऐ। बीचमे भूमकमो तँ नहियेँ भेल, जे उनटन भऽ जाइत। की हेतै खाइए काल बौआकेँ बुझा-बुझा कहबै। नअ बजिते बुधनी पहिने पतिकेँ भोजन करौलैन। पछाइत अपनो आ राधामोहनो खाइले बैसली। मुँहक अन्न मुहेँमे बुधनीकेँ घुरियाइत रहैन कि बिच्‍चेमे अपन जिनगी मन पड़लैन। केतए जनम भेल, माए-बाप ऐठाम केते दिन रहलौं,पछाइत दुनू गोरे नव लोककेँ पति बना हाथ पकड़ा देलैन। पतिक संग जिनगी भरिक शर्त्त छल से भगवान कलछपन केलैन। जे अखन देखैबला छला तिनके तेना कऽ मचोड़ि देलकैन जे देखनिहारकेँ स्वयं देखनिहारक जरूरत भऽ गेलैन। खएर.., कोनो कि दाम्पत्य जीवन नै रहल। माइयो-बाप आ साउसो-ससुरक इच्छा तँ पुराइए देलिऐन। आब कि राधामोहन बच्चा अछि। ओ कि घरक मोटरी उठा नै चलि सकैए। जहिना पतिक आशा तहिना ने बेटोक...। बजली- “बौआ, तखन केना पुरुखक सोझ अपन विचार कहितिअ। कहुना भेला तँ स्वामीए भेला किने। जाबे आँखि तकै छैथ ताबे आँखि उठाएब नीक थोड़े हएत, तँए तखन किछु ने कहलिअ।” जिज्ञासा भरल माइक बात सुनि राधामोहन अपन चित्त असथिर करैत बाजल- “कोन बात माए बिसैर गेलौं।” मुँह-कान चमका जहिना माए बच्चाकेँ चमकब सिखबैए तहिना बुधनी मुँह चमकबैत बजली- “तोहूँ बाले-बोध जकाँ बुधि-बिसरू छह। आब धीगर-पुतगर होइमे बाँकी छह।” बिनु नाविकक नाह जहिना झीलमे हवाक संग अपने झिलहोरि खेलाइत तहिना बुधनीक मन खेलए लगलैन। ..विस्‍मित होइत माएकेँ देख राधामोहन बाजल- “माए, तेते ने कहै छेँ जे एकोटा मन रहत। सभटा बिसरैए-बला बजै छेँ। कोन बात तखुनका कहए लगलेँ से ने कह?” बुधनी बजली- “बौआ, तखन जे कहने छेलह जे किछु करैक मन होइए। से करैसँ मनाही करबह। बड़ करबह तँ अपन कएल सुना देबह।” माइक बातमे राधामोहनकेँ आशाक अंकुरक सम्‍भावना बुझि पड़ल। पियासल बटोही जकाँ माइक आगू राधामोहन चुपचाप भऽ गेल। बुधनी बजली- “बौआ, जुग-जमाना तेहेन आबि गेल जे..?” अधबोलिया बाजि बुधनी चुप भऽ गेली। मुदा राधामोहनकेँ बुझि पड़लै भरिसक कोनो दोसर बात मन पड़ि गेलैन। ओना नै हएत, अपन कएल काजक बड़ाइ सभकेँ नीक लगै छै, तँए प्रश्‍नकेँ सोझरा कऽ राखब नीक...। बाजल- “माए, एहेन कोनो काज कह जे खुशी मनसँ कएल हौ?” राधामोहनक प्रश्‍न सुनि बुधनी ठमैक कऽ बुदबुदेली- “केकरा खुशीसँ कएल कहब आ केकरा नै कहब। एके काज केकरो लिए खुशीक होइए आ केकरो लिए नाखुशीक भऽ जाइए। भानस करैक लूरि‍ माए सिखौलक, केना अधला भेल। मुदा ओकर जरुरत तँ बेटीकेँ होइ छै, राधामोहन तँ बेटा छी। भाए-बाबू गाए पोसै छला। गिरहत तँ नमहर नहियेँ छला मुदा सूर्यवंशी दिलीपक बाट जरूर पकड़ने छला। गाए तँ देशीए पोसै छला मुदा जेहने गाइक रंग-रूप तेहने दूधो छेलइ...।” बुदबुदाइत बुधनीकेँ जेना एकाएक भक खुजलैन तहिना बजली- “बौआ, तोहू जमानामे बाबूक खुट्टापर तेहेन-तेहेन गाए रहै छेलैन जे...।” बिच्‍चेमे बुधनी तेना चुप भऽ गेली जेना किछु मन पड़लैन। मुदा तूक नै बैसने ठमैक गेली। माएकेँ चुप देख राधामोहन पुछलकैन- “माए, गाएकेँ की सभ करै छेलही?” अपन काजक चर्च सुनि बुधनीक वृत्ति चित्त जगलैन। जहिना कोठीक निचला-मुह खुजिते अन्न भुभुआए लगै छै तहिना जिनगीक मुँह खुजिते बुधनी भुभुएली- “बौआ, माए-बापक घर बड़ सुख केलिऐ, जेतबो उमेर धरि सुख केलिऐ तेतबो तोरा कहाँ देल भेल। तखन तँ‘अनेर गाइक धरम रखबार!’ माइए-बापक धर्मे अखनो ठाढ़ छी।” बुधनीकेँ फेर धारमे भँसियाइत देख राधामोहन जालक जौड़ पकैड़ बाजल- “माए, सएह ने पुछै छियौ जे माए-बाप कोन धरम केलखुन जे अखनो ठाढ़ छेँ?” अपनाकेँ हिलोरैत बुधनी बजली- “बौआ, बिआह होइसँ पहिनहि माए संग भानसो-भात सिखलौं, खेतियो-पथारीक काज सिखबो केलौं आ करबो करै छेलौं आ माल-जाल-ले घास-भूसा सेहो करै छेलौं। ऐठाम तँ ओ काजे बिसैर गेलौं।” राधामोहन- “ऐठाम की सभ सीखलिही?” राधामोहनक प्रश्‍न सुनि बुधनी लजाए लगली। मनमे उठए लगलैन जे केना बेटाकेँ कहब जे बौआ स्‍त्रीगणो भऽ कऽ कोदारि पाड़ब, धान रोपब एतइ सीखलौं। की कहत? ओना, करैत तँ देखबे करैए मुदा नैहरसँ सासुरकेँ केना दुसि देब। कहुना भेल तँ पराए घर भेल किने। माएकेँ तत्-मत् करैत देख राधामोहन बाजल- “माए, गाइयक की सभ करै छेलँह?” बुधनी- “माइक संगे घासो अनै छेलिऐ, कुट्टियो काटै छेलिऐ। गोबर-हटौनाइ, थइर खड़रनाइ, नमेनाइ-ओगारनाइ सभ किछु करै छेलिऐ।” राधामोहन- “गाएकेँ दुहबो करै छेलही।” दूहब सुनि बुधनी चमैक उठली- “से कि भाए-बाप नै छलए जे दुहितौं। केतए-कहाँ सुनै छी जे पंजाबमे मौगियो गाए दुहैए।” राधामोहन- “जखन गाए पोसैक लूरि‍ तोरा छौ, तखन खुट्टापर गाए कहियो कहाँ देखलियौ। नाना-नानी नइ देने छेलखुन?” राधामोहनक प्रश्‍न सुनि बुधनीक मन नाचि उठल। आइ जँ खुट्टापर गाए रहैत तँ यएह दिन-दुनियाँ रहितए। भगवानकेँ मंजूर नै भेलैन। जेहो छल सेहो हेरि लेलैन। बजली- “बौआ, बिआहमे तेहेन गाए बाप-माए देलक जे ओकरा जरहकेँ सम्हारि नइ पबितौं, मुदा दैवक डाँग लागि गेल!” राधामोहन- “की दैवक डाँग लगलौ?” बुधनी- “पहिलोठ गाए, बच्छा-तरे बाबू देने रहैथ। जाबे लगैत रहल ताबे दूध-दही परिवारमे चलैत रहल, मुदा दोसर बेर जखन गाए उठल तखन तेहेन खुनियाँ साँढ़क भाँजमे पड़ि गेल जे गाइयक टाँगे टुटि गेल।” राधामोहन- “टाँग टुटि गेलै तँ ओकरा डाक्टरसँ नै देखौलही?” बुधनी- “लोक सभ कहलक जे बलियारिमे एकटा लत्ती होइ छै, उ आनि कऽ बान्हि दियौ, छुटि जेतइ। सएह केलौं मुदा नै सम्हरल गाए। खुट्टे उसैर गेल।” राधामोहन- “माए, मन होइए जे गाइए पोसितौं?” विस्‍मित होइत बुधनी- “बौआ, अपना परिवारमे गाए कहाँ धाड़ैए।” राधामोहन- “फेर दोहरा कऽ गाए नै भेलौ?” धड़फड़ा कऽ बुधनी बजली- “बौआ, जइ काजमे खौटक लगि गेल से केना करितौं?” धड़फड़ा कऽ बुधनी बाजि तँ गेली, मुदा मनमे उठलैन जे दोहरा कऽ गाए पोसबो तँ नइ केलौं। पोसबो केना करितौं? ...सोझहा-सोझही दुनू तरहक विचार मनमे दुनू दिससँ भऽ गेलैन। बीचमे ठाढ़ बुधनी छटपटाए लगली। माइकक छटपटाइत नजैर देख राधामोहन प्रश्‍नकेँ मोड़ैत बाजल- “एके बेर एहेन विचार किए भेलौ जे खौटका लगि गेल तँ दोहरा कऽ नै पोसब।” निरुत्तर होइत बुधनी बजली- “से कि अपने दुनू परानीक विचार भेल आ कि..?” राधामोहन- “की, आ कि?” बुधनी- “बौआ, अपना तँ देखले अछि जे नैहर अही परसादे भरि गाममे ओहन परिवारक रूपमे अछि जे परिवारक गाड़ी[6] दनदनाइत चलैए। तेतबे नहि, मौका-कुमौका दोसरोकेँ उपकार होइ छेलइ। तेहेन गाए छल जे मुइला पछाइतो नै उतरल अपना चित्तसँ। मुदा अपने मुँह मारि लेलैन। एक्केठाम मनमे रोपि लेलैन जे आब ई काज नहि करब।” राधामोहन- “बाबू मुँह मोड़ि लेलखुन तँ दोसर-तेसर लगबा कऽ किए ने कहबौलहुन?” जहिना पँकाएल धारमे टपैकाल केतौ-केतौ हेराएल चिक्कनि माटि भेट जाइत जइसँ किछु बिलमैक आश जगैत तहिना जोरसँ ठेलैत बुधनी बजली- “बौआ, एक मुँहकेँ के कहए जे साइयो मुँह रोकि देलक।” माइक स्पष्ट विचार राधामोहन नै बुझि सकल। मनमे हौंरए लगलै जे ओ साए मुँह केतएसँ आबि गेल? ..बाजल- “ई नै बुझलिऐ जे साए मुँह की कहलिही?” जहिना थकान भेला पछाइत नाकक संग मुहोँसँ साँस लिअ लगैत तहिना बुधनीकेँ भेलैन। राधामोहनक प्रश्‍न समाप्तो ने भेल छल तइ बिच्चेमे टप-टप बुधनीक मुहसँ चुबए लगल- “बौआ, एक तँ अपनो विचार रहबे करैन तैपर एकोरत्ती सह पाबि जाथि तँ आरो मन सकता जाइन। जखने मन सकताइन आकि झिझैक कऽ कहए लगै छला जे आब गाए नै पोसब।” राधामोहन- “केकर सह पबै छला?” बुधनी- “अड़ोसिया-पड़ोसियाकेँ के कहए जे समाजोक लोक कहैन जे तोरा खुट्टापर गाए नै धाड़ै छह, अनेरे एहेन फेड़मे नइ पड़ह!” राधामोहन- “जेकरा खुट्टापर गाए छेलै तेकरासँ नै पुछै छेलखिन। किएक तँ हुनका एहेन तीत-मीठ घटनासँ भेँटो तँ भेले हेतैन।” बुधनी- “से कि संगे जाइ छेलौं जे देखतिऐ। हँ! एक दिनक सोझहाक बात कहै छिअ। एकटा पण्‍डा आएल। ओकरा जेना कियो कहि देने होइ तहिना दरबज्जापर अबिते अपने फुरने बाजए लगल जे ऐ डीहपर ग्रह चढ़ाइ केने छह। सम्‍पैतक क्षय हएत। ‘सम्पैतक क्षय’ सुनि आँखि ढबढ़बा गेल। केना जीब। जखन पेटे ने भरत तँ भुखले केते दिन जीब। केना बाल-बच्चा हएत आ केना पतिपाल हएत। अपने तँ ढबकल आँखिक नोरकेँ ब्लौटिन पेपरसँ सोखबो करैत रही मुदा हुनका नै सम्हार रहलैन। दहो-बहो नोर गालपर देने टघैर-टघैर निच्चाँ खसए लगलैन...।” बजैत-बजैत बुधनीक आँखि नोरा गेलैन। बोली भरभराइत देख खखास करए लगली। ..राधामोहनक आँखिमे सेहो नोर आबि गेल। मुदा आँखिक अश्रुकण रहितो सुषुमाएल छल। जहिना दर्दक निवारण सुसुम पानि करैए तहिना परिवारक दर्दक निवारण राधामोहनक मनमे जागल। तरे-तर राधामोहनक मनमे संकल्प उठल जे जीवनोपयोगी कोनो काजक जँ सर्वांगीन लूरि‍ भऽ जाए तँ ओही काजक सम्पादन परिवारक अंग बनै छै तँए..? राधामोहनकेँ चुप देख बुधनी आँचरसँ आँखि पोछैत बजली- “बौआ, गाइयक संग पगहो गेल। पण्‍डाबा से ठकि कऽ लऽ गेल।” माइक टुटैत मन देख राधामोहन बाजल- “गामक लोक सभकेँ किए ने खुट्टापर गाए छैन?” अपनाकेँ पुछै-जोकर पाबि बुधनीक मनमे खुशी आएल। जहिना हरमुनियाँक पुरने पटरी चैताबरक टाँहि दैत तहिना बुधनी टाँहि देलैन- “बौआ, बड़-बड़ लीला छइ। केते कहबह। एक-बेर कि-ने-कि सरकारकेँ फुरलै, गामे-गाम बड़का जरसी साँढ़ देलकै। सेहेन्ते लोक पाल खुआबए लगल, किछु तँ जरूर सुतरलै मुदा बेसी गाइक डाँड़े-टाँग टुटलै जइसँ भरि गाममे उपटनियाँ लगि गेल।” बातक रस पबैत राधामोहन बाजल- “की कहलिही बड़-बड़ लीला..?” बुधनी- “सरधुआ साँढ़ तेहेन भऽ गेल जे गाए सभ बकरी जकाँ भऽ गेल। गरीब पोसिन्‍दारक पछाइत तेहेन गरदैनकट्टी भेल जे पोसनाइए छोड़ि देलक।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 1633 4. परीक्षाक मास दि‍न पहि‍नहि प्रोग्राम नि‍कलल। ओना अखबारो सभमे रहै मुदा असल वि‍द्यालयमे जे आएल छल ओकरे बुझि‍ राधामोहन वि‍द्यालय वि‍दा भेल। सुनबामे ईहो एलै जे अंगरेजी विषयक परीक्षा तँ हएत मुदा पास-फेलक कोनो महत नइ रहत। एक तँ परीक्षाक जि‍ज्ञासा दोसर अंगरेजी उठावक खुशी मनमे रहबे करइ। अंगरेजी उठावक दसो दुआरि‍ भगवतीक आगमनसँ खुजि‍ जाएत, अंगरेजी सभसँ बेसी समए वि‍द्यार्थीक खा लैत अछि‍। जि‍नगीक दशो दुआरि‍ खुजैक परीक्षा, जइमे दसो वि‍षयक पढ़ाइयो होइत आ परीक्षो होइत। ओना जइ हि‍सावसँ अंगरेजी वि‍द्यार्थीक समए खाइए तइ हि‍सावसँ आपसी नहि‍येँ होइ छै मुदा सोलहन्नी नै होइ छै सेहो बात नहि। अक्षत कम देवता बेसी रहने बँटाइत-बँटाइत वेचारी मैथि‍लीकेँ हि‍स्‍से कम भऽ जाइ छैन। मुदा तँए कि‍ वेचारी नि‍राश छैथ‍? नहि। नि‍राशाक तँ प्रश्‍ने मनमे नै उठै छैन। कारणो स्‍पष्‍टे अछि‍। एक तँ गनल कुटि‍या नापल झोर जकाँ स्‍कूलो-कौलेज अछि‍, तहूमे कि‍छु-ने-कि‍छु मैथि‍लीकेँ सेहो भेटिए जाइ छैन‍, मुदा अधि‍कांश मैथि‍ल तँ स्‍कूल-कौलेज देखबे ने करैत अछि‍। आखि‍र, ओहो सन्‍तान तँ माँ मैथि‍लीए-क छिऐन‍। ओना, जे कुभेलो करै छैन‍ तेकरो-ले मनमे कुभेला नहि‍येँ छैन‍, हेबो केना करतैन, अपन कर्तव्‍यसँ-च्‍युत भऽ बेटा-कुबेटा बनि‍ सकैए मुदा अपन कर्तव्‍य पुरौनि‍हारि‍ धरती सन धीरज रखैवाली माए केना कुमाए बनि‍ सकै छैथ। ओना हाइ-स्‍कूल अबैत-अबैत बच्‍चा ढेरबा भऽ जाइए, तइसँ पहिनहि वि‍षय रूपी गुरु अपन-अपन शि‍ष्‍य चुनि‍ लेने रहै छैथ। मुदा जहि‍ना जेठुआ बर्खाक गति‍ तहि‍ना बाल-बोधक। मुदा हाइ-रे-हाइ, कुबेवस्‍थाक चलैत फि‍जि‍क्‍सक एम.ए. रेल-बसक टि‍कट कटनि‍हार बनि‍ जीवन-यापन करै छैथ! ज्‍योति‍ष पढ़ि‍ पुलिसक लाठी‍ चलबै छैथ‍। तैठाम जि‍नगीक बि‍सवासे केते। जखन जि‍नगीए-क बि‍सवास नहि तखन जि‍नगी जीनि‍हारेक बि‍सवास केते। खएर जे हौउ...। प्रोग्रामक उमकी राधामोहनक मनमे उमकले रहए, साढ़े दस बजे स्‍कूल खुजैए, पूर्वाहनेक काज नीक बुझि‍ वि‍दा भेल। अन्‍ति‍म फागुनक समए, मास दि‍नसँ ऊपरेक वसन्‍त भऽ गेल छल। फगुआक उमकीमे जहि‍ना उमकैक वि‍चार मनमे उठै छै तहि‍ना राधामोहनक मनमे सेहो दशो दुआरि‍क दीप जरबैक उमकी रहबे करइ। मुदा घरसँ निकैल‍ डेगे-डेग जेते आगू बढ़ैत ओते मन पाछू दि‍स ससरए लगलै। मनकेँ पछुआइत देख‍ उमकियो पाछूए दि‍स मुड़ि‍ गेलइ। राधामोहनक मनमे उठलै जि‍नगी आ परीक्षा आकि‍ जि‍नगीक परीक्षा? शुद्ध पानि‍ ने इनार-पोखैरमे असथि‍र रहैए मुदा जखन ओकरा चीनी वा नूनसँ दुषि‍त करबै भलेँ ओ जीवनोपयोगी‍ए किए ने हुअए मुदा दुषि‍त तँ भेबे कएल? राधामोहनक वि‍चारमे दू दल अपन-अपन वि‍चार लऽ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। घन्‍टो लक्कर-झक्कर भेलो पछाइत‍ नइ फड़ियाएल जे बुधि‍यो ज्ञान छी आकि‍ ज्ञान आनैक बाट? ..विचित्र स्‍थि‍‍ति‍मे राधामोहन ओझरा गेल। जि‍राएल आदमी जहि‍ना पहि‍ल झोंकमे बेसी दूर दौर लगा लइए मुदा धीरे-धीरे उत्‍साहमे कमी हुअ लगै छै तहि‍ना राधामोहनोकेँ भेल। उत्‍साह कमि‍ते देहमे थकथकीक आगमन भेलै जेना-जेना थकथकी बढ़ैत गेलै, तेना-तेना थकाएल बुझि‍ पड़ए लगलै। अदहा रस्‍ता तँ टपि‍ चुकल छल मुदा अदहा टपब भारी बुझि‍ पड़लै। गाछीक छाहैर‍ टोहि‍या कोनैला बड़बड़ि‍या गाछ लग पहुँच बैस रहल। एक तँ ओहुना पुरान पत-धारी माने नव-नव पत-धार बड़बड़ि‍या गाछक सेखी रहबे करइ। तैपर कनी सि‍हकी सिहैकते रहै, फागून रहने मजर संग टुकलो रहइ। ..रौद गरमेने दोहरी बोझ राधामोहनक माथपर चढ़ि‍ गेल रहइ। मुदा गाछक छाहैर‍ जेना राधामोहनक कोहि फेरलक। नजैर गाछी दि‍स बढ़लै। बड़बड़ि‍या आमक गाछक सटले पतियानीमे फैजली आमक गाछ। बड़बड़ीए गाछक जड़ि‍ लगसँ देखए लगल। दुनू आमेक गाछ छी मुदा एना किए अछि‍ जे एकटा कि‍लो भरि‍क आ दोसर कि‍लोमे पचास चढ़ैत? प्रश्‍नक ठेहसँ राधामोहन ठेहि‍याए लगल। मन घुमि‍ कऽ समए दि‍स ससरलै। चौबीस घन्‍टाक भीतर दि‍न-राति‍मे केते अन्‍तर होइ छइ! बारह बजे दि‍नमे लोक दुनि‍याँक कोण-कोण देख सकैए आ बारह बजे राति‍ ओछाइनसँ उठि‍ पेशाबो करैले जाइ काल संगीक जरूरत पड़ैत अछि‍। मुदा फागुन मासमे सूर्योदय आ सूर्यास्‍त केना एके रंग मनोरम बनि‍ जि‍नगीक बाट पकड़ैए, भलेँ एकटा अन्‍हार दि‍स बढ़ैत दोसर इजोत दिस? बड़बड़ि‍या-फैजलीक बीच राधामोहन लटैक‍ गेल। कि‍छु फुरबे ने करै जे गाछ-बिरीछ लोकक देल छि‍ऐ, ई तँ सुच्‍चा भगवानक देल छिऐन‍। लोक ओकर सेवा करैए आ गाइक दूध जकाँ अमृत खाइए। मुदा ई तँ अद्भुत अछि‍ जे दुनू आम रहि‍तो एना अकास-पतालक अन्‍तर किए अछि! भगवान तँ केकरो ने अधला करै छथि‍न आ ने अधला सोचै छथि‍न। सोचबो केना करता अपने शक्‍ति‍सँ ने सोचैक शक्‍ति‍ दइ छथि‍न। तहि‍ना हाथ-पएर थोड़े रखने छैथ‍ जे कोनो काज करता..! ई तँ जरूर लोकक करतुत छी। तैबीच बड़बड़ि‍या आ फैजलीक बीच कहा-कही हुअ लगल। फल देख‍ फैजली बाजल- “रे बड़बड़ि‍या, हमर कि‍लो तोरा नानासँ नमहरे हएत।” फैजलीक बात सुनि‍ बड़बड़ि‍या गरमाएल नहि, अखन धरि‍ अपनो मन मानै छेलै जे फैजलीक आगू हम किछु छि‍हे नहि। जहि‍ना बनि‍याँ दोकानक मंगनी वौस, तहि‍ना छी। मुदा एकटा गुण तँ हमरोमे ऐछे जे अनको-आन गाछक आम लेलो पछाइत‍ झगड़ा नै हुअ दइ छि‍ऐ। मुदा एकटा फैजली आम, एक छर कुशि‍यार, एक पुड़ा मखान केतेकेँ कपार फोड़ौने अछि‍। ..मनमे खुशी रहने बड़बड़ि‍या बाजल- “धरमागती बाज जे जेहन सोझ-साझ हमर शीलो आ डारियो अछि‍ तेहेन तोहर छौ! केकरो संग कि‍यो जाएत नहि। बाज?” फैजलीकेँ चुप होइते बड़बड़ि‍या रेबाड़ि‍ कऽ फेर बाजल- “सुनि‍ ले, हमरे भाए-भाति‍ज तोरा डारि‍मे सटि अपन मुड़ी कटा हृदए देने छौ, जैपर तूँ ठाढ़ छेँ।” दुनूक झगड़ा देख राधामोहन अपन काज–स्‍कूल जा प्रोग्राम लि‍खब–बि‍सैर गेल। जि‍रेला पछाइत‍ गाछ तरसँ उठि‍ वि‍दा भेल। ख-खाएल मन रस्‍ते बि‍सैर गेल जे केतए जाइ छेलौं। थकथकाइत राधामोहन घरमुहेँ भेल। जहि‍ना हेराएल-ढेराएल गाए-महींसक बच्‍चा साँझू पहर डि‍रियाइत घर दि‍स अबैत तहि‍ना राधामोहन जेतेक घर दि‍सक बाट टपैत तेतेक जोर-जोरसँ मनमे हुँहकारी उठइ। गाछी आ घरक आधा बाट टपैत-टपैत राधामोहनक भक खुजल। जेना ओंघाएल, निशाँएल, भकुआएल इत्‍यादि‍क भक खुजैत तहि‍ना रस्‍ताक भकमोड़ी लग आबि‍ राधामोहनक भक खुजलै। मन पड़लै हाइ रे बा! जाइ छेलौं परीक्षाक प्रोग्राम लि‍खैले आ आबि‍ केतए गेलौं? ओना चारि‍ बजे तक स्‍कूलक काज चलै छै मुदा ई बारह बजेक रौद अनेरे खाइले जाएब। नै जाएब तँ परीक्षा केना देब? नै परीक्षा देब तँ पास केना करब? ..दोसर दि‍स मनमे उठै जे पासे करि कऽ की करब। जखन आगू पढ़ैक आशे नइ अछि‍ तँ मैट्रि‍क पासकेँ मोजरे केते होइ छै जे बेसी फड़त। जेतबे मोजर तेतबे ने फलो। एम.ए-बी.ए तँ ऑफि‍स-कारखानामे दरमानी करैए आ मैट्रि‍ककेँ के पुछै छइ। तहूमे जेते पढ़लौं तेते तँ ज्ञान भाइए गेल अछि‍ तखन अनेरे एकटा कागत-ले[7] हरान हएब। ..द्वन्‍द्वमे पड़ल राधामोहनक मनमे उठल- काजक परीक्षा नै जि‍नगीक परीक्षा असल परीक्षा छी। मुदा जि‍नगी की? जंगलमे जहि‍ना हजारो-लाखो रंगक गाछ-बि‍रीछ रहै छै, जे हजारो रंगक फूल-फड़ दइ छै आ नहि‍योँ दइ छइ। तहूमे कि‍छु फूल एहेन होइत अछि जे सुगन्‍धि‍तो होइए, सुन्नरो होइए मुदा फड़क कोनो दरसे ने होइ छइ। तहि‍ना कि‍छु फड़ो एहेन होइ छै जे बि‍ना फूलेक फड़ि‍ जाइए! आ कि‍छु फड़ एहनो होइ छै जे फूलसँ पहि‍ने फड़िए जाइए। तँ कि‍छु फड़ो एहेन होइ छै जे संगे-संग गाछमे नि‍कलै छइ। कि‍छु फूल-सँ-फड़ होइ छै तँ कि‍छु एहनो होइ छै जे फूल केतौ फुलाइ छै आ फड़ि‍ केतौ जाइए। तहि‍ना ने मनुक्‍खोक जि‍नगी अछि‍। जेते मनुख तेते रंगक फूल-फड़। जहि‍ना बर्खाक उपरान्‍तो आ होइतो-खि‍न बून-बून मि‍लि‍ धारा बनबैए। भलेँ एक-दोसरमे मि‍लैत गहींरगर बाट बना गहींर दि‍स वि‍दा भऽ जाइए। जइसँ चरो-चाँचर आ नीचरस खेतो आ पोखैरो-झाँखैर‍केँ भरबो करैए‍ आ नहि‍योँ भरैए‍। भरबो तँ अजीबे अछि‍। केतेसँ भरब कहब सेहो कठि‍न अछि‍। कि‍एक तँ जँ साढ़े तीन हाथक मनुखकेँ अदहा कि‍लो दि‍न-राति‍ भोजन मानि‍ लेब तँ पँच-पँच साए रसगुल्ला केना पेटमे अँटै छइ! दस-दस कि‍लो माछ आ दू-दू तौला दही केना पचबैए! ..राधामोहनक मनमे उठलै- अनेरे वौआइ छी। काज छोड़ि‍ जखने मन वौआएत तखने बहपनी आबए लगत। जखने बहपनी औत तखने धार-सँ-धारा बनए लगत। मुदा धारोक तँ ठेकान नहि। एक तँ ओहुना धारक धारा जकाँ जि‍नगीक बहान नइ अछि‍। कि‍छु एहेन होइए जे जुग-जुगसँ एके स्‍थानपर बोहैत‍ आएल अछि‍ आ कि‍छु एहनो अछि‍ जे दोसरमे मि‍लि‍ अपन अस्‍ति‍त्‍वे मेटा लेलक। मुदा तेतबे नहि, एहनो तँ कोसी-कमला जकाँ ऐछे जे सालमे तीन-तरपान तरपैए! जेते राधामोहन पताल दि‍स वा अकास दि‍स नजैर दौगबैत तेते रंगक दुनि‍योँ आ पतालो मनमे अबैत जाइत रहइ। अकास दि‍स तकै तँ देखै जे फनि‍गा धरतीसँ उठि‍ कूदि‍-कूदि‍ अकास दि‍स ऊपर चढ़ए चहैए, घोरन-चुट्टी मरैक पाँखि‍ पहिर उड़ैए...। तहि‍ना पताल दि‍स तकैत तँ एक्के पोखैरमे सत-रंगा माछक जीवन-यापन सुख-चैनसँ होइत देखैत। थालक गैंची गैंचि‍या-गैंचि‍या थालमे बि‍आह-दुरागमन कऽ पत्नीक लगमे राखि‍ जीवनो-यापन करैए आ कुल-खनदानक धुजा गाड़ि‍ बालो-बच्‍चाक उपार्जन सेहो करैए। तहि‍ना पानि‍येँमे माटि‍सँ ऊपर रेहु-नैन-भौंकरी सेहो अपन-अपन सीमा रेखा खींच‍-खींच अपन घरो-दुआरि‍ बनबैत आ परि‍वार संग मि‍लि‍ वंशोकेँ जीवि‍त रखने अछि...। बाल मन राधामोहनक जेमहरे नजैर दौगबैत तेम्‍हरे डाभ-कुशमे ओझरा जाए। जहि‍ना चाणक्‍य छैथ‍ नहि छला आ तहि‍याक नालन्‍दा वि‍श्ववि‍द्यालय जे कुश उपटाएब शुरू केलक ओ कुश अखनो धरि‍ गामे-गाम ऐछे, वेचारे असकरे केतेक गामक उपटौत। तहूमे ओहन समाजमे जे सदैत‍ जमीनदारीए वा जागीरदारीए बनबै पाछू लगल रहैए। एक्के रंगक जागीरदारीक बीच समाज थोड़े अछि‍। सौन-भादोक वायुक गति‍ भलेँ मंथर भऽ जाए मुदा चैती-फुहा, फुहराम हवा तँ केतौ-सँ-केतौ उड़ि‍ते अछि‍। राधामोहनक मन ओही फुहराम हवाक संग उड़ि‍ पुरुषोत्तम लग पहुँच गेल, बीचमे केतौ मुदा अँटकल नहि। दरबारमे बैसैसँ पहि‍ने मनमे उठि‍ गेलै जे त्रेता-जुगक जुआन-जहान राम चारू भाँइ भेला मुदा समाजक बुढ़-बुढ़ानुसक वि‍चार पि‍ताक वि‍चारक आगू किए ने मानलैन‍। समाजक जेते बुढ़-बुढ़ानुस छेलखि‍न ओ अपनामे वि‍चार किए ने केलैन‍ जे राम सन परब्रह्म समाजक अंग बनल रहए। नइ कि‍ बनलोहो बि‍गैड़‍ जाए। तइसँ नीक जे हुनके (रामेक) वृद्ध पर-पि‍तामह–दि‍लीप छैथ‍ ति‍नके दरबार जा अपन उचि‍ती-वि‍नती किए ने करी जे अपना राजमे बासो देबे करता। ..जेना कानमे कोनो दि‍शासँ कोनो तरहक अवाज अनासुरती प्रवेश कऽ मनकेँ जगा दैत तहि‍ना राधामोहनक मनमे जगल। अपन संकल्‍पक संग अपन जि‍नगी बना जीब। जँ से नइ तँ हारि‍ की‍ भेल? जाधैर‍ मनुख दोसराश्रि‍त रहत –वैचारि‍क छोड़ि– ताधैर‍ पर्यावरणमे कमी हेबे करत। जि‍नगीक पहि‍ल वि‍चार जखन मनमे उठल तँ की ओ अधला उठल? जँ नहि तँ किए ने पालन-पोसन करब?जाबे धरि‍ दूध पैदा करैक शक्‍ति‍ मनुखमे नै औत ताबे धरि‍ हंसक बास केना भऽ सकै छइ? ..जेतए दूध रहत तेतइ ने हंसोक बास रहत। मुदा दूध-पानि‍ बेरौनि‍हार हंस मनुखक देल पानि‍ बेरबैए‍ आकि‍ भगवानक देल जे गाए-महींसक पेटेमे फेँटल रहैए‍ तेकरो बेरबैए‍? बाल-बोध बच्‍चा जहि‍ना चलै-जोकर टाँग होइते पछोर धऽ चलए चाहैत मुदा चालि‍क गति‍ पछुआ दोसर बाट सेहो धड़ा जाइत, मुदा बाट तँ बाटे छी तहिना राधामोहनक मन बाटक आशा बाट पकैड़‍ वौआए लगल। मन पड़लै अपन पहि‍ल बाट- गाइक पालन-पोसन। मनमे उठि‍ते उठि‍ गेलै- ‘परि‍वारमे गाए नै धाड़ैए। तँ धाड़ैए की? धार-साज तखन बनै छै जखन ओइमे मन मधुरस आबि‍ मनकेँ पकड़ै छइ। पशुपालनक अंग भेल गाए पोसब आ पशुपालन कृषिक अंग रहल अछि‍। कि‍सानक देशक वि‍कास बि‍ना कि‍सानी प्रक्रि‍यासँ सम्‍भव अछि? अपना लि‍ए अपन दुनि‍याँ बना-बना बैस जीवन-यात्रा भरि‍सक सभसँ नीक होइ छइ। जइ बीच नि‍वास करैत अपन तन-मन-धनक एकाग्र करैए‍। ..राधामोहनक जिज्ञासा आरो बढ़ल। मनमे उठलै लि‍खि‍त-अलि‍खि‍त वि‍चार पकड़ब। केता दि‍न अखबारक पन्नामे पशुपालनक लेख देखै छि‍ऐ, मुदा ओकरा पढ़ै कहाँ छी? कि‍यो पढ़ै छी जे भारत-अमेरि‍कासँ केते रणसँ जीतलक तँ दोसर कोनो पछुएलहा देशसँ केते रणसँ हारल। तँ कि‍यो पढ़ैए पूरा इलाकामे बैंकक की कारोबार छै, तँ कि‍यो पढ़ैत चोरी-डकैती केते भेल। तँ कि‍यो पढ़ैत रेलक भाड़ा बढ़ि‍ गेल आब लोक गाड़ीमे केना चलत। ..ई सभ सच्‍चाइ सामने अबि‍ते राधामोहनक मन वौआए लगलै। अफसोच करैत मन अखबारसँ रेडि‍योपर आबि‍ गेलइ। जे भाषा बुझै छी तइमे सैंकड़ो कार्यक्रम प्रति‍दि‍न कृषि‍क अछि‍। अखबार हूसल तँ हूसल आइएसँ रेडि‍योक कार्यक्रम सुनब। मन आगू बढ़लै। कृषि‍ कौलेज पूसापर गेलइ। पूसामे कि‍सान मेला लगैए जइमे कृषि‍ सम्‍बन्‍धी अधि‍क-सँ-अधि‍क जानकारी भेटै छइ। सत संगेसँ ने संगैत‍ सुधरबो करै छै आ बि‍गड़बो करै छइ! अनेरे मन वौआबै छी, जखन वि‍श्ववि‍द्यालय ऐछे तखन आरो की चाहबे करी। मन ठमकलै। वि‍श्ववि‍द्यालय-ले उन्नत खेतीक जरूरत अछि,‍ तैठाम जँ कौलेज कम रहै तहूमे सीमि‍त पढ़ाइ होइ, आ ओहू सीमि‍तमे कि‍ताबीए शि‍क्षा धरि‍ समटा जाए तखन वि‍कास केना हएत? जरूरत‍ अछि‍ कृषि‍ शि‍क्षाकेँ खुला वि‍श्ववि‍द्यालय बना सभ स्‍तरक कि‍सान पैदा करैक। जँ से नहि तँ की मन संग कर्म आ वचन समतुल्‍य भऽ सकत? आकि पुरना लोक नवका कम्‍पनीक अंगुरक रस पीब बेसी भँसि‍या कहलैन‍? ओझराएल बाट देख-देख राधामोहनक मन आरो ओझरा गेल। हृदए सुखए लगलै, मन तरसए लगलै, बकार बन्न हुअ लगलै। मुदा की हमहीं सभ ऐ देशक भविस छि‍ऐ, जेकर अपने ठेकान नइ छइ! कहब असान छै जे नवयुवककेँ भरमबैले कहल जाइ छै मुदा केहेन युवक पैदा भऽ रहल अछि‍? लगले उड़ि‍ हंस बनि‍ जाएब आ लगले मोड़नीक चालि‍ धऽ लेब आ लगले गाछपर बैस उल्‍लू जकाँ मुँह दुसए लगबै। जहि‍ना बेर-विपैत पड़लापर संगी संग छोड़ि‍ दइ छै तहि‍ना राधामोहनक मनक सभ संगी संग छोड़ए लगलै। मुदा ओहनेठाम सत-संगो भेटै छइ। जहि‍ना नीन नि‍पत्ता तहि‍ना बुधि‍यो बि‍ला जाइ छइ। जइसँ ने देहमे सक रहै छै आ ने अक चलै छइ। जँ अके नै चलतै तँ बक केना चलत आ जँ बके नै चलत तँ बत्तक जकाँ माटि‍-पानि‍ एके केना बुझब! ..अधमड़ू अवस्‍थामे राधामोहन रेडि‍यो खोललक। बि‍हारक पहि‍ल समाचार- “सातम दि‍न पूसा मेला आरम्‍भ हएत!” सुनि‍ते राधामोहनक ठेहियाएल मन उबियाएल। सातम दि‍न कृषि‍ मेला छी। जरूर जाएब। दूरे कोन अछि‍। पहि‍लका जि‍ले तँ छी। असकरो जा सकै छी, नहि जँ संगबे भेट गेल तँ आरो नीक। ओना जे मनमे अछि-‍ ‘गाए पोसब’ ओहन मन केकरो कहाँ देखै छि‍ऐ। जखन मने नहि तखन काजे की आ संगबे केतए। तँए संगियोक कोन आश। ओना चौक-चौराहापर चर्च कऽ देबइ। सवारीक सुवि‍धा भाइए गेल अछि‍ तहूमे डेढ़ बजे मेलाक उद्घाटन हएत, भि‍नसुरको बस पकड़ने काज चैलिए जाएत। तीन दि‍नक मेला छी तीनू दि‍न रहब। गरमी मास छिहे, खाइ-पीबैक दोकान-दौरी हेबे करतै...। दृढ़ता अबि‍ते राधामोहन संयोगकेँ नीक बुझलक। मनमे एलै- संयोग कोनो कि‍ अपने अबै छै आकि‍ काज अनै छइ। जँ काजे नइ तँ संयोग कथीक? जहि‍ना कोनो अबोध बच्‍चा आमक लालचमे नि‍सभेर अनहरियो राति‍मे माए-बाप लगसँ उठि‍ ठेकल आमक गाछ लग पहुँच जाइत तहि‍ना राधामोहन बस पकैड़‍ पूसा कृषि‍ मेला वि‍दा भेल। मेला तँ मेले छी। मुदा मेला की? वएह ने जे वि‍देशी खेल-तमाशा आ ललि‍चगर वस्‍तु आनि-आनि लोक‍ अपन जे पुरना मेला छल ओकरा नष्‍ट कऽ रहल अछि‍। सुधार जरूरी अछि‍ मुदा अपनकेँ सोल्हनी दुसि‍ अनकर अपना लेब की नेनमति‍ नै भेल? कोनो वस्‍तुक संग परि‍वार जुटल छै, ओकर जीवि‍का छि‍ऐ, ओइ जीवि‍काकेँ तोड़ैसँ पहि‍ने ओहन जीवि‍का अनि‍वार्य होइत जे समैक संग चलि‍ सकए। बि‍नु हाथ-पएरक जोंक-ठेंगी जहि‍ना दोसर गर पकैड़‍ आगू बढ़ैए‍ तहि‍ना जैठामक कि‍सानी जि‍नगीक हाथ-पएर टुटल अछि‍ तैठाम उपाय केहेन होइ? उद्घाटनक समए जहि‍ना दि‍ल्‍लीसँ गाम धरि‍क लोक तहि‍ना रंग-रंगक रेडि‍यो-अखबारबला दन-दन करैत। मुदा सि‍पाही कम। तहूमे बेसी ओहने जे उद्घाटनक पछाइत‍ चैलिए गेल। क्षेत्रीयता जँ केतौ अधला होइ छै तँ केतौ नीको छै, जरूरत‍ अछि‍ क्षेत्रीय कृषि‍ ज्ञानक। मि‍थि‍लांचलक अन्‍हरो-दि‍ठरा बुझैए‍ जे छहटा ऋृतु होइ छै आ छबो रीतुक छह सीमा होइ छै आ सीमापर कि‍छु दि‍न मेला लगै छइ। ओइ मेलाकेँ वएह सजा पौत जे ओइ तेजीसँ चलत। एके अन्न एके फल आ एके तरकारी कि‍छु कमो दि‍नक होइत तँ कि‍छु बेसियो दि‍नक। हमर स्‍थि‍ति‍ की अछि‍ ओकरा पकड़ब अछि‍। जे आन-आन राज्‍यक स्‍थि‍ति‍सँ भि‍न्न अछि‍। कि‍ताबी दौड़मे देशकेँ जानब असान अछि‍ मुदा भोगोलि‍क दौड़मे कठि‍न अछि‍। भलेँ कठि‍न अछि‍ मुदा जीवन-दाता तँ वएह छी, छोड़ि‍ केना जीब? उद्घाटन भाषण सुनि‍ राधामोहनक मन शीशा जकाँ चमैक‍ गेल। पाथर गिरल काच जकाँ चनचना कऽ चनैक‍ गेल। दुनि‍यासँ लऽ कऽ बलुआहा माटि‍ धरि‍क बात सुनलक। दोखड़ो बालु सोना पैदा करैए‍ से तँ राधामोहन पहि‍ल दि‍न सुनलक। ओना पहिनौं सुनने रहए जे बालुसँ तेल भले निकैल‍ जाउ मुदा बातसँ हटि‍ नै सकै छी। मुदा ओकरा कहबीए बुझै छल। नि‍अमि‍त तौरपर ग्रुप-ग्रुपमे बँटि‍ कार्यक्रम शुरू भेल। एक संग अनेको ग्रुप। केतौ अन्नक खेतीक तँ केतौ तरकारीक, केतौ फूलक तँ केतौ फलक, तहिना केतौ पशुपालनक तँ केतौ मुर्गी पालनक। ..जहि‍ना मेलामे प्रेमि‍काकेँ देख आरो मेलाक चुहचुही बढि‍ जाइत तहि‍ना राधामोहनकेँ सेहो चुहचुही भरल मेला बुझि‍ पड़ल। मनमे एलै- बीचक जे अदहा घन्‍टा समए खाली अछि‍ तइमे खा-पी लेब नीक रहत, चारि‍ घन्‍टाक गोष्‍ठी अछि‍। पशुपालन गोष्‍ठीमे राधामोहन बैसल। तीन शि‍क्षकक बीच गोष्‍ठी संचालि‍त भेल। मुदा राधामोहनकेँ बैसारक गप-सप्‍पसँ बुझि‍ पड़ए लगलै जे भरि‍सक अपना इलाकाक असकरे छी। कि‍एक तँ मनुखक पहि‍ल परि‍चए भाषे कहबै छइ। बेगूसराय आ बकसरि‍या बेसी बुझि‍ पड़लै। मुदा असकरोमे असगर नै बुझि‍‍ पड़इ। कहनि‍हार शि‍क्षक छैथे, सुननि‍हार जहि‍ना सभ तहि‍ना हमहूँ रहब...। तीनू शि‍क्षक पशुपालन-ले पशुक देख-रेख, बेमारीक इलाज आ नश्‍लक चर्च केलैन‍। चारि‍ घन्‍टाक गोष्‍ठीमे तीन-चौथाइ समए निकैल‍ गेल। शेष समैमे ओ सभ[8] समस्‍या सुनैक समए देलखि‍न। एका-एकी समस्‍यापर चर्च हुअ लगल। मुदा अनकर भोज, सुननहि‍ की जे नअ सलि‍या अँचार छल...। राधामोहनक मनमे प्रश्‍न उठए लगल। गुलछि‍या जकाँ घौंदे-घौंदा। मुदा बाल मन राधामोहनक थकथका गेल। हि‍न्‍दीमे सवाल जवाब चलै छल। भाषाक गलती वस्‍तुक (वि‍षयक) गलती बना दैत अछि‍। अष्‍टम सूचीमे मैथि‍ली रहि‍तो मि‍थि‍लांचलक कोट-कचहरीसँ लऽ कऽ स्‍कूल-कौलेजमे हि‍न्‍दीए चलैए। अपन धि‍या-पुताकेँ अंगरेजिया बनाएब अगुआएल जि‍नगीक लक्षण बुझल जा रहल अछि‍। जरूरत अछि‍ जगत-जीव-ईश्वरकेँ जानब। ..राधामोहन अपन मनक बात मनेमे रखि‍ लेलक। संयोग भेल। तीनू शि‍क्षक अन्‍ति‍म पाँच मि‍नटमे के केतएसँ आएल छी, पुछलखि‍न। क्षेत्र सुनि‍ राधामोहनकेँ हूबा भेल। अपन देश अपन भेष अपन भाषा तँ संगी ऐछे। ओ अपन परि‍चए मधुबनी जि‍लाक नाओंसँ देलक। ..पड़ोसी गामक एकटा शि‍क्षक। ओ मैथि‍लीएमे राधामोहनकेँ पुछलखि‍न- “अहाँक गाम?” गामक नाओं सुनि‍ते ओ कहलखि‍न- “अहाँक पड़ोसी छी तँए तीनू दि‍न अपने डेरापर रहब।” डेराक नाओं सुनि‍ दोसर शि‍क्षक हुनका आँखि‍-पर-आँखि‍ देलकैन‍। आँखि‍ए-क इशारामे जवाब देलखि‍न- “मि‍थि‍लाक धर्म।” सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम होइसँ पहि‍ने धरि‍क ड्यूटीमे पी.एन. बाबू छला। ओना गोष्‍ठीक तीनू शि‍क्षकक डेरा सटले-सटल सेहो छैन्‍हे। तीनूक एकठाम डेरा रहने साँझ-भोर एकठाम बैस चाहो पीबै छैथ‍ आ अपन-अपन देश-कोसक गपो-सप्‍पो करै छैथ। बीचक एक घन्‍टा समए बि‍तबैक क्रममे पी.एन. बाबू राधामोहनकेँ कहलखि‍न- “राधामोहन, अहूँ मेला देखए एलौं, घुमि‍-फि‍र देख लि‍यौ आ हमहूँ ड्यूटी समाप्‍त कऽ लेब।” “बड़बढ़ि‍याँ।” कहि‍ राधामोहन मेला दि‍स बढ़ल आ पी.एन. बाबू ऑफि‍स दिस बढ़ला। ऑफि‍स पहुँचते अपना ग्रुपक चर्च उठल। गोष्‍ठीक नीक कार्यक्रम रहल। बैगकेँ ऑफि‍समे रखने राधामोहनक देहो हल्‍लुक भेल। आगू बढ़ि‍ते लोक दि‍स ठि‍कि‍या कऽ तकलक तँ बुझि‍‍ पड़लै जे ओहने लोक बेसी छैथ‍ जे बम्‍बैया कलाकार जकाँ जेहने ‘जोकर’ तेहने ‘हीरो’ जकाँ छैथ। नारद भगवान जकाँ जेतए स्‍मरण करब तेतइ वीणाक संग पहुँचल पेबैन। कचहरीसँ लऽ कऽ गामक भोज-काजक वारीकसँ नेने-नेने दशनामा काज होइत सरकारी भण्‍डार लग पहुँचलाहाक बाहुल्‍य! कि‍सान कम। खास कऽ मेहनत करैबला। मुदा, ऐठामक जे कृषि‍क प्रति‍ष्‍ठा बनल रहल ओ तँ रग-रगमे पकड़नहि, जइसँ कि‍सान परि‍वार आ कि‍सानक ठेकान अमेरि‍को-इंग्‍लैंडमे दैते छैथ। तँए समैक भूख अछि‍ जे कि‍सानक परि‍भाषा आधुनि‍क कएल जाए। सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम शुरू भेल। राधामोहनकेँ संग केने पी.एन. बाबू डेरा दि‍स बढ़ैक वि‍चार केलैन‍। ओना वि‍श्ववि‍द्यालये कैम्‍पसमे डेरा। तैसंग पान-सात कट्ठाक बाड़ियो झाड़ी छैन। पी.एन. बाबूक घर मधुबनी जि‍लाक भगवानपुर गाम, सुरेन्‍द्र बाबूक घर धर्मपुर नवादा जि‍ला आ दीनानाथ बाबूक बक्‍सर जि‍ला। तीनूक तीन भषे क्षेत्र नहि भौगौलि‍क क्षेत्र सेहो। एग्रीकल्‍चरसँ जुड़ल तीनू गोरे तँए तीनू क्षेत्रक जानकारी तीनू गोरेकेँ रहबे करैन‍। ओना भाषाक बीच कोनो वि‍वाद नै रहैन‍, कारणो स्‍पष्‍टे अछि‍। गाम-गामक आ घर-घरक लीला अछि‍ जे मैथि‍ली भाषीकेँ मगहियो आ भोजपुरियो क्षेत्रमे कथा-कुटुमैती होइत आबि‍ रहल अछि‍। कोनो घरक पुरुष मैथि‍ल तँ भोजपुरनी घरवाली आ भोजपुरि‍या घरबलाक मगहीनी घरवाली। ओना शब्‍दक कर्कशपन मगहीक अपेक्षा मैथि‍ली-भोजपुरीमे कम अछि‍। कम जवाबदेही रहने पी.एन. बाबू समैपर ऑफिस‍सँ निकैल‍ डेरा दि‍स बढ़ैक वि‍चार केलैन‍। मुदा सुरेन्‍द्र बाबू जवाबदेहीमे आ दीनानाथ बाबू रि‍पोट दइमे पछुआएले रहि‍ गेला। दि‍नक एक गाड़ी वि‍लम भेने दि‍न भरि‍क गाड़ी बि‍लैमते चलत। मुदा तैयो पी.एन. बाबू दुनू गोरेकेँ कहि‍ देलखि‍न- “गौंआँ आएल छैथ। कि‍छु हाल-चालक समाचार तँ आबि‍ए गेल हएत। लेटो-फेट एकठाम बैस चाह पीबे करब।” आगू बढ़ि‍ते जेना पी.एन. बाबू राधामोहनक गौंआँ भऽ गेलखि‍न। पुछलखि‍न- “राधामोहन, अहाँ गामक पजरेमे सुखेत अछि‍, ओत्तै हमर सासुर छी।” गाम सासुर सुनि‍ राधामोहनक मनमे घनि‍ष्‍ठता जगल। एकबधू गाम, एक उपजा एक खान-पान...। उगैत उगना जकाँ वि‍भोर होइत राधामोहन बाजल- “श्रीमान्, अपने लोकैन‍ तँ सभ तरहेँ पैघ भेलि‍ऐ, अपनहि‍ सबहक ने बाँहि‍ पकैड़‍ आगू बढ़ब।” राधामोहनक बात समाप्‍तो ने भेल छल, बिच्‍चेमे पी.एन. बाबू टपकला- “जहि‍ना अहाँ अखन नवतुरि‍या छी तहि‍ना जखन हमहूँ रही तही दि‍नसँ जनै छी जे एक-दोसराक बाँहि‍ पकैड़‍ गरा-जोड़ी कऽ जीवन-यात्रा करब नीक होइ छइ। मुदा से नै भऽ पबैए‍। दि‍न-राति‍ देखै छी जे ठक ठकि‍ बाँहि‍ पकैड़‍ धकेल-धकेल गरगोटि‍या दइए, तैठाम केकरो बाँहि‍ पकैड़‍ लेब छौड़ा-छौड़ीक खेल नै ने छी।” पी.एन. बाबूक वि‍चारक गम्‍भीरताकेँ राधामोहन नै परेख‍ सकल मुदा मनमे तँ ओहन खुशी जागि‍ए गेल रहै जे भरि‍ पेट भोजन, राति‍-बीच रहैक जगह देलैन‍ ओ जरूर नीक बोलो देबे करता। साढ़े सात बजे तीनू गोरे–पी.एन. बाबू, सुरेन्‍द्र बाबू आ दीनानाथ बाबू–एकठाम भेला। डेराक छतेपर बैसार। एक दि‍स सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक पीह-पाह तँ दोसर दि‍स गाम-घरक कुशल-समाचार। चाह चलि‍ते पी.एन. बाबूक पत्नी सेहो चाह पीब बैसारमे शामि‍ल भऽ गेली। ओना जइ दि‍न दीनानाथ बाबूक मुहेँ मि‍रचाइकेँ तीत सुनलैन‍ तइ दि‍नसँ जेना हि‍नका देख‍ते वएह मन पड़ि‍ जाइ छैन‍‍ जइसँ अनेरे हँसी निकैल‍ जाइ छैन। चाह पीब दीनानाथ बाबू बजला- “सभसँ कम उपस्‍थि‍ति‍ मि‍थि‍लांचलेक रहल?” स्‍वीकारैत पी.एन. बाबू बजला- “हँ, से तँ छल। अपन तीनू गोरेक क्षेत्र तीन रंगक अछि‍। माटि‍क (क्षेत्रक) असथि‍रता जइ रूपे अहाँ दुनू गोरेक क्षेत्रक अछि‍ ओइसँ भि‍न्न मि‍थि‍लांचलक अछि‍। एक तँ माटि‍ नरम छै‍ तैबीच तेज धारक कटावक संग जोरगर बर्खाक संग भुमकमो क्षेत्रकेँ नष्‍ट करैत रहल अछि‍।” पी.एन. बाबूक जवाबक पछाइत‍ चुपा-चुपी पसैर गेल। अका-अकी, बका-बकी सभ सबहक मुँह देखए लगला। खढ़ि‍या बच्‍चा जकाँ राधामोहन आँखि‍-कान-मुँह ठाढ़ केने, जे सीखैक समए भेटल कि‍छु सीखब। ..पी.एन. बाबू गुम जे अपन इलाकाक उखाही करब उचि‍त नहि, तँए चुपे रहब नीक। मुदा दीनानाथ बाबू जेहने काज करैमे चरफर तेहने बजैयौमे फरकोर। मनमे उठलैन‍ जखन पी.एन. बाबूक गौंआँ एलैन‍, ओना हुनका अपनो गाम छोड़ना पचीस बर्खसँ बेसीए भेल हेतैन‍, तखन वएह ने अपन बात उठौता। तैबीच हम सभ अपन क्षेत्रक गप करी ई बुड़ि‍पना हएत। बुड़िपना ऐ लेल जे तीनू शि‍क्षकक बीच एकटा दूधमुहाँ बच्‍चाक चाराक ओरि‍यान नै कऽ अपने सभ सभ-दि‍ना गप जे ऐ स्‍कीममे एते सुतरल...। पूर्णिमा दि‍नक नौत दइ छी...। नइ तँ सासुरक अमराक अँचारक गप करब। नै तहूसँ तँ मि‍रचाइकेँ तीत कहि‍ गृहि‍णीसँ मुँह दुसा लेब उचित नहि। ..सभ कि‍छु सम्‍हारैत दीनानाथ बाबू बजला- “भाय, गोष्‍ठीमे जे आँखि‍क इशारा केलौं से अपन अनुभवक अधारपर, तँए एकरा अपना ढंगसँ नै लेबइ।” पी.एन. बाबू पुछलखि‍न- “की‍ अपना ढंगसँ?” दीनानाथ बाबू- “हमरो पत्नी ओमहुरके छैथ। तेते पूजा-पाठ आगत-भागत करै छैथ‍ जे घरक जुति‍ए सुमझा देलि‍ऐन‍। हाटे-बजारक दौर-बरहा तेते करैबै छेली जे कमेलहो कि‍ खा कऽ पचए दैथ‍। तइसँ नीक जेते कमाइ छी, पॉकेट खर्च काटि‍ कऽ दऽ दइ छि‍ऐन। आ कहि देने छिऐन जे तैबीच कर्जा केलौं तँ अपन जानी, नइ जँ महाजनी केलौं सेहो अपने जानी।” मुस्‍की दैत बिच्‍चेमे पी.एन. बाबू टि‍पलैन‍- “तखन तँ सोल्‍होअना हि‍साव घरसँ बेरा नेने छी?” दीनानाथ बाबू- “नै ने बेराएल होइए, हुनका लाटक जे कि‍यो अबै छैथ‍ ओ तँ सासुरेक पट्टी भेला कि‍ने, कि‍छु-ने-कि‍छु बजा जाइते अछि‍। जइसँ घुमा-फिरा कऽ दोखी भाइए जाइ छी। से सभ छोड़ि‍ कऽ।” पी.एन. बाबू गम्‍भीरतासँ प्रश्‍न दोहरौलैन‍। प्रश्‍नक गम्‍भीरताकेँ देखैत दीनानाथ बाबू बजला- “देखि‍यौ भाय साहैब, अपनो वि‍चार ओहने अछि जेहने पत्नीक छैन तँए अभ्‍यागती परि‍वारमे बेसी बढ़ि‍ गेल। मुदा आइक समैमे जे बि‍गड़ाउ आबि‍ गेल अछि‍ ओ तँ सोझहा-सोझही सामनेमे ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। नव पीढ़ीक बोलमे केते झूठ फेँटा गेल अछि‍ जे सत बुझब कठि‍न भऽ गेल अछि‍। जेना-जेना अभ्‍यागती बढ़ैत गेल तेना-तेना घरक वस्‍तु बि‍ड़हाइत गेल, तँए इशारा केलौं।” दीनानाथ बाबूक उत्तरक पछाइत फेर सबहक बीच गुमा-गुमी पसैर गेल। सुरेन्‍द्र बाबू ऐ-ताकमे रहैथ जे अपन प्रवास लगसँ पी.एन. बाबू प्रश्‍न उठौता भलेँ राधामोहनक जनमसँ पहि‍नहि गाम छोड़ि‍ देने होथि‍, मुदा जएह सएह। ..पी.एन. बाबूक मनमे उठि‍ गेलैन‍ जे सोझहा-सोझही तीन क्षेत्रक तीनू गोरे छी तँए हुनका सभकेँ प्रश्‍न उठेबाक चाहि‍ऐन‍ जइमे हम बीचक कड़ीक काज करब...। दीनानाथ बाबू गर लगबैत राधामोहनकेँ पुछि‍ देलखि‍न- “भरि‍ मेला रहब कि‍ने?” आग्रह देख राधामोहनक वि‍चारक बान्‍ह टुटि‍ते भुभुआ गेल- “श्रीमानक सासुर आ हमर गाम एक्केठाम अछि‍। एकबधूए छी। हि‍नकर ससुर सबहक पुबरि‍या बाध हमरा गामक पछबरिया बाध छी।” ई गप सुनि‍ते बगलमे बैसल सुरेखाक हृदैमे अपन नैहरक दुर्गापूजा देखब मन पड़ि‍ गेलैन‍। केना संगी सबहक हेँजमे चारिए बजे दि‍आरी लऽ कऽ साँझ दइले जाइ छेलौं से दोसर‍-तेसर‍ साँझमे घुमि‍ कऽ अबै छेलौं। सतमी-सँ-दसमी धरि‍ तँ ठेकाने ने रहै छल जे कखन अँगनामे छी आ कखन दूर्गा-स्‍थानमे। मुदा अखन कि‍छु जँ बाजब तँ बाते अबला-दबला भऽ जाएत। से नइ तँ नि‍चेनमे जखन गर लगत तखन गप करब। कि‍यो कि‍ आन छी नैहरक भाए-बोन छी। हमरा सबहक कि ओ युग-जमाना छल जे नैहरेसँ यार भँजि‍एने सासुर अबै छेलौं। समाजक कि‍यो छी भाए-बोन छी...। दीनानाथ बाबू प्रश्‍न दोहरबैत बजला- “पुबरि‍या या पछबरिया बाध कथी कहलि‍ऐ?” राधामोहन- “एक रंग खेत रहने, माने माटि‍क सतह एक रंग रहने एके रंगक उपजो-बाड़ी होइ छै आ रौदियो-दाही। ओही बाधमे पनरह कट्ठा खेत अपनो अछि‍। अपने खेतक बगलमे आन सभ घासोक खेती करै छैथ, तँए वि‍चार भेल जे पूसा मेला जाइ छी, जहाँ धरि‍ जे हएत बूझि‍-सूझि‍ आगू करब।” उत्तरक आशामे राधामोहन चुप भऽ गेल। मुदा तीनू गोरे–पी.एन. बाबू, सुरेन्‍द्र बाबू आ दीनानाथ बाबू-क बीच प्रश्‍नक गड़ उनटा-सुनटा पकड़ा गेलैन। एक दि‍स देशक स्‍थि‍ति‍क चर्च उठल तँ दोसर दि‍स गामक आ तेसर दि‍स एक-एक कि‍सान परि‍वारक। प्रश्‍ने-प्रश्‍न उत्तरे-उत्तर गँरि‍-मुड़ि‍या हुअ लगल। गपे-सपक क्रममे एहेन गँरि‍-मुड़ि‍या भऽ गेल जे तीनू गोरे अपने उबाइन‍ हुअ लगला। मुहसँ बोल निकैलते जहाँ नजैर उठबैथ आकि‍ अपने हीआ हारि दैन जे ओ गड़बड़ भऽ गेल। ..एकाएकी तीनू गोरेक मुँह बि‍धुआ लगलैन। बैसारक रसे समाप्‍त भऽ गेल। दोहरा कऽ चाहो पीब उचि‍त नहि, हमरे सबहक दुआरे भरि‍सक घरवारि‍नी भानसो करए नै जाइ छैथ‍, तहूमे भरि‍ दि‍नक ठाढ़ ड्यूटी केनि‍हार सेहो छथि‍न। तइसँ नीक जे बैसारे तोड़ि‍ देल जाए। मुदा तीनू गोरेक बीचक कटौझ तँ राधामोहनो सुनलक। ओइ वेचाराक मनमे की उठतै?खएर.., बाढ़ि‍क टुटल बाट होइ आकि‍ टाट लगौल रस्‍ता, टपब‍ तँ कठि‍न ऐछे। सुरेन्‍द्र बाबू आ पी.एन. बाबूक अपेक्षा दीनानाथ बाबूक चपचपी कम रहैन। मन गवाही दैन‍ जे कहुना भेला तँ दुनू गोरे सुरेन्‍द्रो बाबू आ पी.एन. बाबू सेहो सीनि‍यरे भेला कि‍ने। गलती तँ सभसँ होइ छइ। हमरोसँ भेल हएत जे अपने प्रश्‍नक जवाबमे अपने ओझरा गेलौं। मुदा कि‍छु बाजबो तँ घापर नुने छीटब हएत कि‍ने। एक तँ ओहि‍ना दुनू गोरेक मन रब-रबाइत हेतैन‍ तैपर कि‍छु बाजि‍ आरो भक-भका दिऐन से नीक नहि। ..मुदा बगलमे बैसल मैथिलानी सुरेखा तीनू गोरेक दशा देख बीचमे गंगाजल छीटब उचि‍त बुझि‍, दि‍ओरक लेहाजसँ गरगोटियबैत दीनानाथकेँ कहलखि‍न- “मेहनत‍ करि कऽ पढ़ने छी आकि रूपैआ-पैसा दऽ कऽ?‍” दि‍ओर-भौजक गप-सप्‍पक क्रममे दीनानाथ बजला- “पाइ-कौड़ी तँ खर्चा नै केने छी मुदा दहेजक बदला ससुरसँ नीक रि‍जल्‍ट आ नोकरी जरूर लेने छी।” दीनानाथक उत्तर सुनि‍ सुरेखा बजली- “अखन बैसार तोड़ू भरि‍ दि‍न खटलौं हेन, फेर काल्हि‍ सेहो औझुके जकाँ खटए पड़त। तँए सबेर-सकाल ओछाइनपर चलि‍ जाएब नीक रहत।” ‘एक तँ राकश दोसर नौतल’ हरे-हरे कऽ तीनू गोरे मानि‍ गेला। सुरेखा भानस करए बढ़ली। राधामोहन आ पी.एन. बाबू छतपर सँ नि‍च्‍चाँ उतैर‍ कोठरीमे बैस गप-सप्‍प करए लगला। राधामोहन बाजल- “श्रीमान्, केते दि‍नसँ ऐठाम छि‍ऐ?” राधामोहनक प्रश्‍न सुनि‍ पी.एन. बाबू विस्‍मित हुअ लगला। मन पड़लैन‍ नोकरीक पहि‍ल दि‍न, कौलेजक पढ़ाइ, हाइ-स्‍कूलक पढ़ाइ, पालन-पोसन इत्‍यादि‍। सि‍नेमाक रील जकाँ जि‍नगी पाछू मुहेँ ससरलैन‍। ओही जि‍नगीक फल ने अखन धरि‍ भोगि‍ रहल छी। मुदा..? जे गाम-समाज हमरा सन मनुख बना ठाढ़ केलक ओकरा-ले हम की केलि‍ऐ? प्रति‍ष्‍ठि‍त कि‍सान परि‍वारक बेटा रहि‍तो कि‍ ओइ प्रति‍ष्‍ठाक हकदार बनि‍ पौलि‍ऐ? ..भक खुजलैन‍। मनमे एलैन‍ समस्‍या तँ अहि‍ना सभठाम ओझराएल अछि‍ मुदा गामसँ आएल नवतुरि‍या बच्‍चाकेँ जँ आबो संगतुरि‍या नै बनाएब तँ सेवा-नि‍वृत्ति‍क पछाइत‍ केतए जाएब! मनमे अबि‍ते पी.एन. बाबूक मुँहमे मुस्‍की एलैन‍। जेना अनवरत चलैत साँसक जगह जोरसँ साँस लेला पछाइत‍ नाभी‍ तक गति‍मान भऽ जाइत तहि‍ना पी.एन. बाबूकेँ भेलैन‍। बजला- “राधामोहन, साल भरिक पछाइत‍ सेवा-नि‍वृत्त भऽ रहल छी, गामेमे रहब। अखनो गाममे एते खेत-पथार अछि‍ जे जँ ओकरा सरि‍या कऽ करी तँ नोकरीसँ बेसी हएत। मुदा की‍ करि‍तौं। गाम-समाजक कटू-चालि‍ बोल सुनि‍ पढ़ल-लि‍खल नौजवानकेँ गाम छोड़ैक अनेको कारणमे एकटा कारण ईहो अछि‍ जे जँ कि‍यो एग्रीकल्‍चर ग्रेजुएट खेतक गोला फोड़ि‍ तरकारी खेती करैथ‍‍ तँ समाजक लोक कि‍चाड़ि‍ कऽ समाजसँ भगा देतैन‍। कि‍यो कोइर तॅँ कि‍यो कुजरा कहए लगतैन‍। भलेँ ओ बेरोजगारीक सूचीमे नाओं लि‍खा दि‍ल्‍लीमे कुल्‍लीए-कबाड़ीक काज किए ने करैथ‍।” पी.एन. बाबूक वि‍चार सुनि‍ राधामोहन मुड़ी डोलबैत कि‍छु मानबो करैत आ कि‍छु नहि‍योँ मानैत। मुदा मुँह बन्न केने रहने पी.एन. बाबू नै परेख‍ पौलैन‍ जे मनसँ केते मानलक। तैबीच सुरेखा आबि‍ कहलकैन‍- “अपने सभ ने राति‍केँ रोटी खाइ छी मुदा पर-पाहुनकेँ खुआएब नीक हएत। मन असकताइए तँए अपनो दुनू गोरे भाते खा लेब।” भातक नाओं सुनि‍ पी.एन. बाबूक मनमे खौंझ उठलैन‍ जे एक तँ भरि‍ दि‍न एमहर-ओमहर करैमे देह-हाथ बथा गेल तैपर भात खुआ भरि‍ राति‍ उठ-बैठ करौती! मुदा तेसर लग बाजबो केहेन हएत तँए पाशा बदलैत बजला- “अहाँ जे एहेन छी से सबेरे किए ने कहलौं जे चाहे माछे लऽ अनि‍तौं कि अण्‍डे।” बीचमे राधामोहन बाजल- “खाइले अनेरे रक्का-टोकी करै छी, जे सभ दि‍न परि‍वारमे चलैए सएह हमहूँ खाएब। अखन जुआन-जहान छी अखन नै सभ चीज पचाएब तँ कहि‍या पचाएब।” सह पाबि‍ अपन गोटी घुसकबैत सुरेखा आगू बढ़ली। गैस-चुल्हि‍क भानस, गप-सप्‍प ओराएलो नै छल की तैयार भऽ गेल। खेनाइ तैयार होइते कोठरीमे लगल गोल मेजपर सभ वस्‍तु रखि‍ पति‍केँ सुरेखा कहलखि‍न- “चलू, पहि‍ने भोजन कऽ लिअ।” एके टेबुलपर तीनू गोरे बैस खेनाइ खाए लगला। राधामोहनकेँ नव बेवहार बुझि‍ पड़ल। कि‍छु बाजब उचि‍त नै बुझि चुप्‍पे रहल मुदा ओंघराइत मनमे उपकलै जे आरो जे हौउ मुदा सोझहामे खेने तँ लूँगी मि‍रचाइ आ अँचारक उपद्रव तँ कमि‍ते अछि‍। तैसंग ईहो तँ होइते अछि‍ जे सोझहा-सोझही सबहक खाएब नपाइते अछि‍। वएह नाप ने काजो नापत आकि‍ खाइले दालि‍-भात आ..? प्रात भने आठ बजि‍ते पी.एन. बाबूकेँ कार्यक्रमक तैयारी-ले वि‍दा होइसँ पहि‍ने मनमे उठलैन‍ जे अखन अनेरे राधामोहनकेँ किए संग नेने जाएब। बारह बजेसँ कार्यक्रम शुरू हएत। ..डेरासँ नि‍कलैत राधामोहनकेँ कहलखि‍न- “राधामोहन, अखन अहाँ नै जाउ। बारह बजेसँ गोष्‍ठी चलत, तइमे शामि‍ल हएब।” परि‍वारक भीतर ने खाढ़ी हि‍सावसँ भाए-बहि‍न, बाप-पि‍त्ती, दादा-दादी, नाना-नानी बँटल अछि‍ मुदा समाज थोड़े परि‍वारक वि‍चारकेँ ऊपर मानत ओ तँ वहए मानत जे समाजक कल्‍याणार्थ होइ। ओ तँ उमेरे हि‍सावसँ ने मानत। केश-दाढ़ी पाकल दादा-बाबाक श्रेणीमे एलौं समरथ-सकरथ रहने बाप-पि‍त्तीक श्रेणीमे एलौं, एक उमरि‍या रहने भाए-बहि‍न, संगी, बहि‍ना, मीत-यार, भजार इत्‍यादि‍क श्रेणी अबैत तइसँ नि‍च्‍चाँ बौआ-दैया अबैत। ..पचास-पचपन बर्खक सुरेखा आ पनरह-सोलह बर्खक राधामोहन। तहूमे राधामोहनसँ दोवर उमेरक बाल-बच्‍चा सेहो छैन्‍हे। ओना राधामोहनकेँ अपने संग जलखै करा पी.एन. बाबू संतुष्‍ट भऽ गेल छला जे नहि‍योँ रहने पाहुन भूखल नहि‍येँ रहत। अराम करैक बेवस्‍था छैहे जे नीक लगतै से करत। सुरेखाक बात सुनि‍ राधामोहन बाजल- “खेत-पथार केकरो जि‍म्‍मामे नै देने छि‍ऐ?” “देने किए ने रहब। मुदा एतबो तँ ओही वेचाराकेँ कहि‍ऐ जे कहियो काल जे अबैए तँ गोटे कि‍लो महींसक घीए नेने आएल, गोटे मटकूर दहीए नेने आएल...।” सुरेखाकेँ भँसियाइत देख‍ राधामोहन बाजल- “अहाँ गामसँ हमर गाम बहुत पछुआ गेल।” “की पछुआ गेल अछि‍?” राधामोहन- “हमर गौंआँ तँ तेहेन रगड़ाउ-झगड़ाउ भऽ गेल अछि‍ जे सदि‍खन झगड़े-झाँटी करैत रहल आ उपजाक कोन गप जे खेतो-पथार बेच कोट-कचहरीकेँ दैत रहल। मुदा एकटा धरि‍ भेल अछि‍ जे जइ जहलकेँ आन समाजक लोक पाप बुझैए ओइ व्‍याकरणकेँ उनटा, धरम बना देलक। जे एको बेर जहल नै गेल ओ अधरमी ऐ दुआरे बुझल जाइत जे धर्म प्राप्‍त करैक एको सीढ़ी ऊपर नै उठल अछि‍।” राधामोहनक बात सुनि‍ सुरेखाक नजैर राधामोहनकेँ संगतुरि‍या जकाँ नजरए लगलैन‍। सतरह बर्खक अवस्‍थामे बि‍आह भेल रहए, तइसँ पहि‍ने तँ राधामोहने जकाँ ने बाप-माइक बीच हमहूँ छेलौं। उमेरोक तँ कि‍छु गुण-धर्म छइ। जँ से नै छै तँ किए मेलामे एक उमेरिये लोक बेसी रहैए...। विस्‍मित होइत सुरेखा बजली- “बौआ, एक दि‍नक घटना ओहि‍ना मन अछि‍।” घटना सुनि राधामोहनक जि‍ज्ञासा जगल। मुँह बाबि‍ बाजल- “से की?” सुरेखा- “तोरा गाममे दुर्गापूजा तहि‍यो होइ छेलह, अखनो होइते छह। झगड़ाउ तोहर गौंआँ सभ दि‍नेक। दुर्गापूजाक मेला एतए हुअए कि‍ ओतए हुअए, अहीले झगड़ा भऽ गेल। कोनो गाममे एकोठाम पूजा नै होइ छै मगर तोरा गाममे दूठाम शुरूहेसँ पूजा होइ छइ। एकबधू हमर गाम, जहि‍ना पंचायतक गाम सबहक दूरी होइ छै तइसँ लगे हमर गाम अछि‍। एक्को मि‍सि‍या ने बुझि‍ पड़ए जे दू गाम छी, दोसर छी, अपन गाम नइ छी। खेतो-पथारमे ऐ गामक लोक ओइ गाम आ ओइ गामक लोक ऐ गाममे काज करि‍ते अछि‍। जबार, सौजनि‍याँ, मैनजनी, इत्‍यादि भोजो-भातक सम्‍बन्‍ध ऐछे।” सुरेखाकेँ भँसियाइत देख राधामोहन बाजल- “कि‍दैन‍ घटना कहए लगलि‍ऐ?” जहि‍ना धक-दे‍ आगि‍ फुटै छै, हवा-वि‍हाड़ि‍ उठै छै तहि‍ना सुरेखाक मनमे उठल। बजली- “बौआ, भरि‍सक नि‍शाँ पूजाक दि‍न रहइ। नाच-तमाशा शुरू होइते रहै आकि‍ धुक-दे पच्‍छिमसँ वि‍हाड़ि‍ उठलै। पानि‍-पाथर सेहो संगे एलै। मेलामे हूड़ भऽ गेल। जह-पटार लोक जेमहर-तेमहर पड़ाएल। अपना गामक तीन गोरे रही। गामे दि‍स पड़ेलौं, मुदा दसो डेग आगू नै बढ़लौं आकि‍ पाथर तड़-तड़ा गेल। भेल जे जान नै बँचत,कपार फुटि‍ जाएत, तेहेन-तेहेन पाथर रहए। रस्‍ते कातक एक गोरेक मालक घर चलि‍ गेलौं। हवा तेहेन तेज रहै जे बुझि पड़ै घरक चार उधि‍या देत! मुदा तीनू गोरे चारक बत्ती पकैड़‍ लटैक‍ गेलौं। कहुना जान बँचल। ..किदैन बाजल छेलह जे अहाँक गाम नीक अछि‍?” सुरेखाक प्रश्‍न सुनि‍ राधामोहन ओहि‍ना अक-बका गेल, जहि‍ना कि‍यो बजि‍ते-बजि‍ते बि‍सैर जाइत। ओना दुनू गोरेक गप-सप्‍प जुगो पाछू घुसैक‍ चलि‍ गेल छल जे एकक भोगल दोसराक खिस्‍सा बनि‍ चलि‍ रहल छल मुदा प्रश्‍न-उत्तर ओकरा ससारि‍ अनलक। पाछू उनैटते राधामोहनक मनमे सुरेखाक प्रश्‍न धब-दे खसल। बाजल- “हँ, हँ, कहै छेलौं जे अहाँक गामक कि‍सानी हमरा गामसँ अगुआ गेल अछि‍।” अगुआ-पछुआ सुनि‍ सुरेखा दोहरबैत पुछलखि‍न- “एकठाम दुनू गोरेक गाम अछि‍, एकबधूए खेतो अछि‍, एक रंग उबजा-बाड़ी तखन किए एना भेल?” सुरेखाक प्रश्‍न सुनि‍ राधामोहन अपनाकेँ टटोलए लगल तँ बुझि‍ पड़लै जे प्रश्‍नक उत्तर ढंगसँ नै दऽ पएब, मुदा आत्‍माराम कहलकै‍ जे नै पान तँ पानक डन्‍टियो आकि‍ गाछोक डन्‍टीसँ काज चलि‍ते अछि‍। तखन जँ उत्तरक लगलो-भीड़ल जवाब भऽ सकत तैयो तँ कि‍छु-ने-कि‍छु तात्वि‍क बात आबियो जाएत। पहि‍ने तत्व तखन ने एकत्‍व आकि‍ समत्‍व। ..बाजल‍- “दीदी, अगुआएल-पछुआएल तँ खेनाइ-पीनाइ, ओढ़नाइ-पहिरनाइ आकि‍ घरे-दुआर देखने ने बुझै छी।” सुरेखो अपन मनकेँ, गोधूलि‍ बेला जकाँ बहटारि‍ राधामोहनक वि‍चार लग ठाढ़ केलैन‍। जहि‍ना गुरु-शि‍ष्‍यक बीच एक-दोसराकेँ उकटा-पैंची होइत तहि‍ना सुरेखा पुछलखि‍न- “जखन दुनू गामक लोक खेतीए करै छैथ तखन किए भगवान दू रंग बना देलखि‍न?” सुरेखाक प्रश्‍न राधामोहनकेँ ओहि‍ना भरियाएल बुझि‍ पड़ल जहि‍ना युनि‍वर्सिटी वा बोर्ड परीक्षामे प्रथम स्‍थान पबैबला छात्र कि‍छु प्रश्‍नसँ नि‍रुत्तर होइत देख अपनाकेँ अलग कऽ लइए, तँए कि‍ ओकरा भुसकौल कहबै सेहो तँ उचि‍त नहि‍येँ हएत। हलैस‍ कऽ हीय खोलि‍ राधामोहन बाजल- “दीदी, आन चीज तँ नजैरपर नै चढ़ैए मुदा एकटा चढ़ैए।” नजैरपर चढ़ैबला बात सुनि‍ सुरेखाकेँ मन कहलकैन नजैरपर चढ़ैबला बातकेँ जँ नजैर चढ़ा नै चढ़ाएब तँ ओ ढलानपर छि‍छैले जाएत। तँए एकत्‍व भऽ सुनए पड़त। बजली- “बौआ, हमरा-तोरा बीच कोन लजेबा-धकेबाक बात अछि‍। हम जेठ बहि‍न माइए-दाखि‍ल भेलियह, तूँ भाए-बोन बाप-दाखि‍ल सीमा परहक सि‍पाहीए जकाँ जि‍नगीक भेलह। तखन किए धकमकाइ छह।” सुरेखाक भाव देख राधामोहन भवलोक पहुँच गेल, अथाह भवसागर देख बाजल- “दीदी, अहाँक गामक बेसी कि‍सान एकाजू छैथ। खेती करै छैथ, गाए-महींस पोसै छैथ‍ इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍ मुदा हमरा गामक बेसी जोतदार दू-दि‍सि‍या काज करै छैथ। अनो-पानि‍क खेती करै छैथ‍ आ समाजि‍क बन्‍हनक बीच सेहो केते काज करै छथि‍न। बन्‍हने ने समाजकेँ बान्‍हि‍ बेकतियोकेँ बन्‍हैए‍। अपना काजक समए समाजक काजमे लगबै छैथ‍ तइसँ खेतीक उचि‍त देख-भाल नै कऽ पबै छैथ। जइसँ कम आमदनीक जि‍नगी बनि‍ गेल छैन। मुदा अहाँ गामक कि‍सानी बाट मजगूत बनि‍ गेल अछि‍।” राधामोहनक बात सुनि‍ सुरेखाकेँ मामा मन पड़लैन‍। मामा मन पड़ि‍ते मन पड़लैन‍ बाड़ी-झाड़ी आ माए संग मामाकेँ भाए-बहि‍नक ओ रूप जे दुनू मि‍लि‍ जि‍नगी-ले ठाढ़ छैथ। की मामा पाहुन नहि जे माइक बाड़ी-तामि‍-कोरि‍ तीमन-तरकारीसँ फल-फलहरी धरि‍क गाछ-बि‍रीछ लगा दइत। राधामोहन कि‍यो आन छी, जँ करजानमे केराक घौर पाकल हएत तँ चारि‍ छीमी खुआइयो देबै आ दू हत्‍था गामो नेने जाइले कहबै। दू परानी केते खाएब, पचीस-पचीस-तीस-तीस हत्‍थाक केरा घौर अछि। जे तीने दि‍नमे दुरियो भऽ जाइए। बजली‍- “बौआ, चलह। गाम जकाँ तँ बीघा-बीघे बाड़ी-झाड़ी आकि‍ गाछी-बि‍रछी नहि‍येँ अछि‍ मुदा जेतबे अछि‍ से चलि‍ कऽ देखहक जे अपना-जोकर दुनि‍याँ बनौने छी कि नहि। बाड़ी-झाड़ीक नाओं सुनि‍ राधामोहनक मन आरो चमकल। खोलि‍यापर राखल हँसुआ हाथमे नेने सुरेखा आगू-आगू आ पाछू-पाछू राधामोहन डेरासँ निकैल‍ बाड़ी पहुँचल। जहि‍ना मकरमे हर्ड़ी-बि‍देसरक मेला पहुँच यात्री फरि‍क्केसँ हि‍या कऽ देखैए जे केतए कोन तरहक रूप छै तहि‍ना बाड़ीक टाट खुजि‍ते राधामोहन हि‍या कऽ देखलक तँ अजीव दुनि‍याँ बुझि‍ पड़लै। पानि‍क नालीक बगलमे पाँच बीट केरा पाँच रंगक देखलक। गाछेमे एकटा पकलो। बीटक ऊपर जाल लगल। चि‍ड़ैक कोनो डरे नहि जे चोरा कऽ खाएत। सूखल डपोरकेँ हासूसँ कटैत सुरेखा बजली- “बौआ, कहुना भेलह तँ तूँ पुरुखे पात्र भेलह कि‍ने ओरि‍या कऽ ओइ घौरकेँ काटह।” पाकल केरा घौर काटब सुनि‍ते राधामोहन चपचपा गेल, कहुना तँ पहुनाइमे छिहे ने। उचि‍त-उपकार दुनू। बाजल- “दीदी, हँसुआ दिअ आ अहाँ हटि‍ जाउ, केराक पानि‍ बड़ खराब होइ छै, कपड़ामे एहेन दाग लगा दइ छै जे कपड़ा फटि‍ जाएत मुदा छुटत नहि।” राधामोहनक रक-छक वि‍चार सुनि‍ सुरेखा बजली- “तखन फेर लोक ओइ दागकेँ छोड़बै केना छइ?” जहि‍ना परीक्षा भवनमे पहि‍लुक प्रश्‍नकेँ हल्‍लुक बुझि‍ते ऐगलो बि‍सैर हाँइ-हाँइ परीक्षार्थी लि‍खए लगैत तहि‍ना राधामोहन बाजल- “दीदी, दुनि‍याँमे एहेन कोन दुख अछि‍ जेकर दबाइ नइ छै, तखन तँ...।” डोलैत घरमे जहि‍ना घरवारी सोंगर लगा-लगा ठाढ़ रखए चाहैत तहि‍ना सुरेखा अपन जि‍नगीक संग राधामोहनकेँ खुट्टा नै सोंगरे बनए चाहली। मुदा राधामोहनक चटपटाइत मुँह देख बजली- “हँ तँ किदैन कहै छेलह?” ठेंठीकेँ ठेंठीए कोदारि‍ भार थम्‍है छइ। बड़का मुरैछ‍ जाइ छइ। तहि‍ना ने केरो दागक दबाइ अछि‍। बाजल- “दीदी, केहनो दाग किए ने होइ, मुदा दबाइयो संगे छइ।” संगे दबाइ सुनि‍ सुरेखा बजली- “से की?” “आन जीवि‍त गाछमे ने दूध आकि‍ लस्‍सा होइ छै, मुदा केरा तँ छी गाछक झड़, तँए एकरा एकरे सूखल डपोर जे छै, ओकरा आगि‍मे जरा कऽ ओही छाउरसँ रगड़लापर दाग छुटै छइ।” केराक घौर काटि‍ थम्‍हकेँ सेहो काटि‍-खोंटि‍ कात कऽ देलक। हँसुआमे लगल पानि‍ माटि‍पर रगैड़‍ साफ केलक। आगू बढ़ि‍ते कट्ठा भरि‍क फलक गाछो आ झाड़ियो देखलक। गमैया आम-जामुनक गाछ जकाँ तँ एकोटा फलक गाछ नहि,मुदा कामधेनु जकाँ सालो भरि‍ फल दइबला सभ। आब कहू जे फड़ैक भार जेकरा नहि‍योँ छै तहू गाछ सभमे फड़ लटकल छइ! अनेरे मन घुरियाएल अछि‍। मुदा नहि, गाछोमे अनरनेवा पण्‍डि‍त ऐछे। फूल भलेँ हौउ, फड़ब पाप बुझि‍ते अछि‍। मुदा तँए कि‍ धात्रीम सन सावि‍त्री थोड़े अछि‍ जे बि‍नु सत्‍यवाने फड़बे ने करत। हँ से तँ ऐछे भलेँ टाट-फरक, आड़ि‍-धूर आकि घाट-बाट दुआरे माटि‍क बाट किए ने बन्न हौउ, मुदा अकासक बाट तँ खुजल छैहे तँए ने कहै छै जे हे प्रि‍यतम देह भलेँ तीन कोस हटले किए ने होइ मुदा मन तँ दुनू गोरेक संग मि‍लि‍ रचि‍ते-बसि‍ते अछि...। समुचि‍त भोजन-ले जहि‍ना आन-आन वस्‍तुक महत अछि‍ तहि‍ना ने फलोक अछि‍। मुदा फलक दुर्दशा मनुखक जि‍नगीकेँ सुदशा दि‍स बढ़ए देत। जे मि‍थि‍लांचल कुकाठ-सुकाठक संग चानन सन वृक्ष पैदा करैक उर्वर शक्‍ति‍ संयोगने अछि‍, की ओइ शक्‍ति‍केँ पूजा केने बि‍ना कल्‍याणक असीरवाद भेट जाएत? जँ मुखौटे होइतै तँ काँच माटि‍क एकटा दि‍आरी नेस‍, हाथ-जोड़ि नि‍होरा केलासँ भेटतै तँ अदौसँ होइत आएल आ मि‍थि‍लांचल निच्‍चे-मुहेँ धँसैत गेल। सालो भरि‍ चलैबला फल जैठाम छै, तैठाम..? खीराक लत्ती देख राधामोहन बाजल- “दीदी, खिरो-लत्ती बीचमे देखै छी?” राधामोहनक जि‍ज्ञासाकेँ सुरेखा परेख‍ गेली। जहि‍ना छोट-बच्‍चाकेँ माए-बाप-भाए-बहि‍न ओंगरीक इशारासँ कौआ-मेना देखा ओकर नाओं सि‍खबैत तहि‍ना सुरेखा राधामोहनकेँ सि‍खबैत बजली- “बौआ, खीरो फले छी, फलेक गुण ओकरोमे छै, मुदा अपन परि‍वारि‍क जि‍नगी तेहेन बना नेने अछि‍ जे तीमन-तरकारी-सँ-फलाहार धरि‍ पुरबैए‍।” सुरेखाक बात राधामोहनकेँ छुछुन बुझि‍ पड़लै। छुछुन ई जे माटि‍पर पसरल लत्ती आ लत्तीक फड़ केना फलाहार हेतइ। हँ एते तँ देखै छि‍ऐ जे करेला-झिमनी-सजमैन‍ जकाँ फड़ैए, सजमैनसँ भलेँ छोट हुअए मुदा करैला-झिमनीक तँ संग-तुरि‍या ऐछे। खीराकेँ तरकारी मानल जा सकैए। तरकारीकेँ केना फल मानि‍ लेब, फड़ तँ तरकारियो फड़ैए। ..मुदा लगले मन पलैट‍ महकारी लग पहुँच गेलइ। ओकर तरक बीआ जेते तीत होइए ओते तँ करैलोक ने होइ छइ। कहाँ राजा भोज कहाँ भजुआ तेली। करैलाक गुद्दा-रस भलेँ तीत हौउ मुदा ओइसँ पालल-पोसल बीआ कहाँ तीत होइ छइ! दुनूमे अकास-पतालक अन्‍तर अछि। गोल-गोल, हरि‍अर-हरि‍अर, लाल-लाल फड़क बीच महकारीक बीआ खाइ-काल खेलहोकेँ बोकरा दइए, से केना करैलाक परतर करत। ऊँट जकाँ भलेँ देह उबर-खाबर हौउ, रसो आ गुद्दो ति‍तौंस किए ने हौउ, गलि‍-पचि‍ अपने किए ने सड़ि‍ जाए मुदा ओहन बीआ तँ दैते अछि‍ जे संगी-साथी जकाँ मनुखक भोज्‍य बनि‍ चलैत आबि‍ रहल अछि‍ आ आगूओ चलैत रहत...। खेलौना दोकानपर, रंग-रंगक खेलौना देख जँ बच्‍चा गुमकी लाधि‍ दि‍अए तँ कि‍छु कारणक आशंका होइते छइ। स्‍वर्ग सदृश बाड़ी-झाड़ी रहि‍तो राधामोहनकेँ अपन वि‍चारक दुनि‍याँमे वि‍चड़ैत देख सुरेखाक मनमे भेलैन‍ जे भरि‍सक रोड़ा-रोड़ीक ठेंस ने लगि‍ गेलइ। बजली- “बौआ, की‍ करब जेतबे छुट्टी रहत तेतबे-टा ने दुनि‍योँ बसाएब। इच्‍छा केकरा ने होइ छै जे इन्‍द्रासनक आसनपर बैसी, मुदा इच्‍छे भेने थोड़े होइ छइ। अही सुखक लोभमे ने एकटा बौना आबि‍ हरि‍श्चन्‍द्रकेँ राज-पाट ठकि‍ लेलकैन‍। अखुनका वि‍यतनाम राज थोड़े छी जे सालक-साल, दशकक-दशक रगड़ैत रहत। कहू जे जइ राजाकेँ एतबो दया नहि जे आमजनक राजकेँ अपना स्‍वार्थमे केना लगा देबइ।” ओना सुरेखा राधामोहनक मन बहटारए चाहली मुदा जिद्दयाह गाए-बरद जकाँ गाछक मुड़ीए-पर राधामोनक नजैर अँटकल। बाजल- “दीदी, अहाँ तँ खीराकेँ फल कहै छि‍ऐ, एते तक मनेमे शंका नै अछि‍ जे फड़ नै होइ छै, मुदा फड़ तँ फड़ भेल आ आमोक गाछक फड़े भेल भलेँ कोशा धरि‍केँ फड़े कहि‍ऐ। जि‍नगीक नीक फल सभ चाहैए आकि‍ नीक फड़ कदीमोसँ नहमर चाहैए?” जहि‍ना बाल मन वा जुही फूल आकि परोड़ इत्‍यादि‍ कोनो नव गाछक सराइर‍ सदृश सर-सरा कऽ आगू धरि‍ बढ़ि‍ जाइत तहि‍ना राधामोहनक प्रश्‍न आगू बढ़ल, मुदा ओरि‍या कऽ मुड़ीकेँ मोड़ि‍ सुरेखा बजली- “बौआ, खीराक तरमे तीन फाँक होइ छै, मुदा होइ छै तीनू बरबैर‍। ऊपरका जे आवरण होइ छै ओ ओहन होइ छै जे दि‍ठा-दृश्‍य देखए नै दइ छइ। ओकरा हटौला पछाइते देख पड़ै छइ। मुदा जँ ओकरा कत्तासँ गोल-गोल काटल जाइ छै तँ कहाँ तीनूमे सँ कि‍यो कहैत जे कम छी।” कहि‍ सुरेखा सोचए लगली जे भरि‍सक राधामोहनक मन उचैट‍ गेल अछि‍। जाबे तक दोसर दि‍स नै तकाएब ताबे तक नजैर नै घुमतै। तँए दोसर दि‍स तकाएब नीक हएत। दोहरबैत बजली- “बौआ, मेलो जाइक समए लगि‍चा गेलह। नहाइत-खाइत समए भाइए जाएत। हमहूँ जाएब कि‍ने?” दोसर दि‍नक साँझ। शि‍क्षण प्रक्रि‍याक समाप्‍ति‍। काल्हि‍ विसर्जन छी। भोज-भात आ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम रहत। राधामोहन आ पी.एन. बाबू गाइक घरक थैड़ देखैत रहैथ‍। मच्‍छरक धनधनाएबसँ बुझि‍ पड़लैन‍ जे घूरक जरूरत अछि‍। दुनू गोरे गाइए घरमे रहैथ‍ तखने सुरेन्‍द्रो बाबू आ दीनानाथो बाबू संगे पहुँचला। पहुँचते सुरेन्‍द्र बाबू पुछलखिन- “गाइक घरमे अखन किए छी?” ई गप सुनि‍ पी.एन. बाबूकेँ संकोच नै भेलैन‍। ओना तीनू गोरेक डेरो एकेठाम छैन आ बाड़ियो-झाड़ी एकरंगाहे छैन तँए प्रश्‍न बेवहारि‍के छल। पी.एन. बाबू कहलखिन- “तीन-चारि‍ दि‍नसँ एते व्‍यस्‍तत्ता बढ़ि‍ गेल जे अपन जि‍नगीए छि‍ड़ि‍या-बि‍‍ति‍या गेल। बुझि‍ पड़ैए जे तीने-चारि दि‍नक बीच तेते मच्‍छर बढ़ि‍ गेल जे अवधात करत। मुदा आइयो तँ आब करैक समए नहि‍येँ अछि‍। काल्‍हि‍ बुझल जेतइ‍।” दीनानाथ बाबू- “काल्हियो की‍ भरि‍ दि‍न छुट्टी हएत, भोज-भात आकि‍ नाच-तमाशा देखनिहार-खेनि‍हार-ले ने, मुदा वि‍दाइ-समारोह सेहो छी कि‍ने?” “हँ से तँ छी। मुदा भोज-भात पछाइते ने हएत तैबीचक तँ समए बँचबे करत‍।” कलपर हाथ-पएर धोइ सभ कियो पहुँचबे केला कि‍ ओमहरसँ सुरेखा चाह नेने एली। ठाढ़े सभ कि‍यो चाह पीबए लगला। चाह पीबैत दीनानाथ बाबू राधामोहनकेँ कहलखि‍न- “कौल्हुका नोत-हकार दइ छी। खेबो करब आ देखबो करब।” दीनानाथ बाबू गप तँ चालि‍ देलैन‍ मुदा भोजैत तँ नै छला। भोजैत तँ सुरेन्‍द्र बाबू छैथ। मुदा जहि‍ना घाटपर चेल्हबाक चालि‍मे भुन्नो फँसि‍ जाइए, तहि‍ना बगलमे बैसल सुरेन्‍द्र बाबूकेँ भेलैन‍। दीनानाथ बाबू तँ पठौल नै छेलखि‍न जे मद्दी हेतैन‍। अपनो मुँह खोलए पड़तैन‍, भलेँ राधामोहन नै बुझि‍ पबैत मुदा दुनू परानी पी.एन. बाबू तँ छैथे। पुलि‍सक आगू अनेरे पड़ाएब नीक नै होइ छै, खिहारि‍ कऽ पकैड़‍ खढ़ि‍या मोर मारि‍ पकैड़ि‍ए लेत आ जँ पकैड़‍ लेत तँ सभ ठेही झाड़ि‍ देत। राज-भोज छि‍ऐ, जेते खाएत तइसँ बेसी छि‍ड़ियाएत। बजला- “राधामोहन सझि‍या नौतहारी हेता।” जहि‍ना भोज-काजमे पहि‍ले योजना बनैत आ पछाइत‍‍ हि‍साव-वारी होइत। मुदा बैसार दुनू दि‍न चलैत। एक तँ बैसारमे नौतक बँटवारा तखन नौतहारीक चर्च नहि! मुदा दोसराक पाहुनकेँ ईहो पुछब उचि‍त नहि जे केमहर एलौं। मुदा जहि‍ना परि‍वारक छोट भाएकेँ अनको कोहवरक रस्‍ता खुजले रहै छै तहि‍ना दीनानाथ बाबू। जेठ लग जेहने गलती तेहने सही। जँ सही अछि‍ तँ मुड़ी झुलौता नहि जँ गलती अछि‍ तँ सुधाइर देता। ..पुछलखिन- “राधामोहन, अहाँ पढ़बो करै छी?” दीनानाथ बाबूक प्रश्‍नसँ राधामोहन ठमैक‍ गेल। केना कहबैन‍ जे परीक्षाकेँ अखन छोड़ि‍ आगू बढ़ा देलि‍ऐ, आ अखन घरक पाछू पड़ए चाहै छी। मुदा उत्‍सुक मन राधामोहनक, बाजल- “पढ़ि‍तो छी आ परि‍वारक जे दशा अछि‍ ओकरा जँ नै रोकब तँ केते दूर ढरैक कऽ चलि‍ जाएब तेकर कोनो ठीक नहि। तँए कि‍छु करैक वि‍चार सेहो अछि‍।” राधामोहनक सह पाबि‍ दोहरबैत दीनानाथ बाबू पुछलखि‍न- “परि‍वार केतेटा अछि‍?” “ओना कहैले तीन गोरे छी मुदा...।” “मुदा की?” “पि‍ता अन्‍ति‍म अवस्‍थामे छैथ, अब-तब करै छैथ, कखन छैथ‍ कखन नै तेकर कोनो ठीक नहि।” “केते उमेर हेतैन‍?” “सेहो नीक जकाँ नै बुझै छी। झुर-झुर शरीर भेल छैन। तइसँ तँ अस्‍सीसँ ऊपरेक कहबैन‍, मुदा माइक जे गति‍शीलता देखै छी तइसँ बुझि‍ पड़ैए जे घरक चीनवारेक खुट्टा टुटि‍ गेल। आइ करी कि‍ काल्हि‍, करए तँ हमरे पड़त। सएह सभ मन हौंर-हाँरि‍‍ देने अछि‍। तँए गाए पोसैक वि‍चार करै छी।” आँखि‍क इशारा सुरेन्‍द्र बाबूक देखते दीनानाथ बाबू चुप भऽ गेला। सुरेन्‍द्र बाबू पुछलखि‍न- “राधामोहन, वि‍चार तँ नीक अछि‍, मुदा कि‍छु प्रश्‍नक उत्तर बुझब जरूरी अछि‍। भने मेलेमे एलौं। भोज-भात खेनि‍हार सभकेँ खाए दियौ। मुदा, कहब जे जाधैर अपन मन काज करैले ने मानि‍ जाए ताधैर‍ रहू। जँ जीवनमे एकोटा काजक लोक भेट जाए तँ जरूर ओइ जि‍नगीकेँ सार्थक मानल जेतइ‍।” सुरेन्‍द्र बाबूक मुँह खुजल देख सुरेखो अपन बातकेँ राखब उचि‍त बुझि‍ बजली- “दीनाबाबू, जखन राधामोहनसँ गप भेल तँ कहलक जे हमरा गामसँ अहाँक गाम नीक अछि‍। पचीस बर्खसँ नैहर गेबो ने केलौं हेन, अठारह बर्खक अवस्‍थामे छोड़ने रही तँए जाएब तर पड़ि‍ गेल अछि‍। तँए सेहो कनी कखनो दुनू भाए-बहि‍नक बीच कहि‍ देब।” सुरेखाक प्रश्‍नसँ सुरेन्‍द्र बाबू घबरेला नहि, मुदा दि‍न भरि‍क देहक थकान, तैबीच काल्हि‍ वि‍दाइ समारोह सेहो छी। एहेन ने हुअए जे औगताइमे प्रोफेसर साहैबक जैकेट प्रिंसि‍पल साहैबक डालीमे चलि‍ जानि‍ आ प्रिंसि‍पल साहैबक प्रोफेसर साहैबमे, तँए मन बोझि‍ल, जे केना एहेन सुराग भेट जाएत जे, जे जेतै-क अछि‍ से तेते चलि‍ जाए। मुदा परि‍वारो तँ परि‍वारे छी। परि‍वारकेँ चैन रखने बि‍ना एको छन चैन भेटब कठि‍न होइ छइ...। दीनाबाबूकेँ सम्‍बोधि‍त करैत सुरेन्‍द्र बाबू बजला- “दीनाबाबू, एना करू जे एकेटा उत्तरमे दुनू प्रश्‍न आबि‍ जाए।” हुँहकारी भरैत दीनानाथ बाबू बजला- “हँ-हँ! बढ़ि‍याँ! बढ़ि‍याँ! हनुमानजी जकाँ पहाड़े चलि‍ औत, अपन-अपन सभ ताकि‍ लेब। मुदा भाय-साहैब एकटा बात पुछब हमरो रहि‍ गेल अछि।” सुरेन्‍द्र बाबू- “कथी, ओहो राखि‍ए दियौ।” दीनानाथ बाबू- “राधामोहन, एकटा बात कहू जे परि‍वारमे बाहरक लोटा दूध अबैए आकि‍ घरक लोटा बाहर जाइए?” दीनानाथ बाबूक प्रश्‍न सुनि‍ पी.एन. बाबूकेँ नै रहल गेलैन‍ बजला- “दीनूबाबू, की‍ कहब! बि‍सैर गेलौं रमझि‍मनी आकि रामझुमनी। भिन्‍डीक माला जपि‍-जपि‍ भाषाक जान बँचबै छी। मुदा क्षेत्रो तँ कि‍छु छी।” एक संग अनेको प्रश्‍न उठैत देख सुरेन्‍द्र बाबू वि‍चारलैन‍ जे नीक हएत सभ प्रश्‍नकेँ बहटारि‍ काल्हि‍-ले राखि‍ ली आ कि‍छु मनोवि‍नोदक संग बैसारक उसार कऽ ली। ..चौअन्नि‍याँ मुस्‍की दैत दीनानाथ बाबूकेँ पुछलखि‍न- “अँए हौ दीनू, उद्घाटन बेर किए हँसए लगल रहह?” टटके बात तँए बि‍सरैयौक बहन्ना तँ नहि‍येँ कहल जा सकैए। मुदा एकटा जवाबदेहक प्रश्‍न छी। की‍ कहबैन‍। हम सभ कहुना भेलौं तँ घरवारीए भेलौं कि‍ने, किए ने खोलि‍ कऽ सभ गप करब। ..मुस्‍कीक जवाबमे ठहाका दैत दीनानाथ बाबू बजला- “भाय! लाबा जकाँ छि‍ड़ियाएल नहि, मुदा छि‍ड़ियाइबला बात तँ रहबे करै ने।” दुनू गोरेक बीचक बातमे सुरेखा लाड़ैन‍ लाड़लैन‍- “उद्घाटने जखन हँसा गेल, तखन बाँकी‍ए कथी रहल!” सुरेखाक प्रश्‍नसँ सुरेन्‍द्र बाबू थकमकेला। थकमकाइत देख पी.एन. बाबू सम्‍हारैत बजला- “बात भेल कि‍छु ने आ अनोन-वि‍सनोन हुअ लगल!” अपन भाँज बुझि‍ दीनानाथ बाबू बजला- “भेल ई रहै जे चारि‍ गोरेकेँ चरि‍मुखी दीप नेस उद्घाटन करक रहइ। एकटा मोमबत्ती नै ने जे तीन गोरे डाँट पकड़ू आ एक गोरे सलाइ नेस‍ लगाउ। चरिमुखी दीपमे तँ बाँटल चारू गोरेक। सभकेँ दीप जराएब छेलैन। पहि‍ल बेकती जखन सलाइ खड़ैर‍ एकटा दीप नेस‍ देलखि‍न तखन दोसर-तेसरकेँ सलाइ खर्ड़ैक कोन प्रयोजन। सलाइ काठीकेँ तँ दीपेमे नेसब असान होइतै। से नै केलैन‍, केलैन‍ ई जे तेसर बेकती जे रहैथ‍ ओ राशि‍मे राशि‍ नै काटि‍ सलाइ खर्ड़ए लगला आकि‍ मसल्‍ला उड़ि‍ कऽ कुर्तापर पड़ि‍ गेलैन‍! कुर्तो तेहेन जे ओतबेमे दगा गेल। सएह हँसी लगल रहए। अहूँ तँ मंचेपर रहि‍ऐ। अहाँ नै देखलि‍ऐ?” दीनानाथ बाबूक बातसँ सुरेन्‍द्र बाबूकेँ दुख नै भेलैन‍। बजला- “तूँ छुट्टा छह, हम बान्‍हल छी तँए कि‍छु...।” “अच्‍छा जे हौउ, कौल्हुका-उगरल वस्‍तु-जात हएत ओ भोजो हएत आ राधामोहनकेँ मेलाक दर्शन सेहो करा देबैन‍। अखन जाए दिअ, दू घन्‍टा दुनू कातक चेकिंग बेवस्‍था करैमे लागत। तहूमे तीन-तीन चेकिंगमे चोरकट रस्‍ता रहि‍ए जाइ छइ।” राजसी भोज रहि‍तो तेहेन चोरकट बाट पकड़ा गेल जे ने भोज खेनि‍हार आ ने भोजैत बुझि‍ सकला जे भरि‍पेट्टा छी आकि‍ टी-पार्टी। जहि‍ना केकरो घर लूटै-काल जेकरा जे हाथ लगैत से सएह पार कऽ सवुर करैत तहि‍ना एते तँ सतर्की तीनू गोरे–सुरेद्रबाबू, पी.एन. बाबू आ दीनानाथ बाबू–काइए नेने छला जे मझोलका टप रसगुल्‍ला, अँचारक बोयाम आ नि‍मकीक पैकेट फुटा कऽ दोगमे रखि‍ए लेलैन। केतए गेल तीन दि‍नक मेलाक चुहचुही। चारि‍ दि‍नक चान फेर अन्‍हराइए गेल। खएर जे हौउ। रि‍क्‍शापर चढ़ा रसगुल्‍लाक टप सुरेन्‍द्र बाबू ऐठाम पहुँच गेलैन‍। जखन चाह बनि‍ राखल अछि‍ तखन अनेरे फकचोदमे समए बिता चाह सरा लेब बुड़ि‍बकी नइ तँ की हएत। समैसँ एक घन्‍टा पहि‍नहि‍ सुरेन्‍द्र बाबू पी.एन. बाबूकेँ आ दीनानाथो बाबूकेँ कहि‍ देने छेलखि‍न- “अनेरे चौचंगमे पड़ल छी। चलू, डेरेपर।” घरमुहेँ होइ काल पी.एन. बाबू दीनाबाबूकेँ टि‍प देने छेलखि‍न- “दीनूबाबूक चलती बेस नीक रहलैन‍।” पी.एन. बाबूक प्रश्‍नकेँ गोड़ियबैत सुरेन्‍द्र बाबू कहि‍ देलखि‍न- “भाएमे कि‍यो दादा होइथ, बात बरबैरे। दीनूबाबू कि‍यो आन छैथ। मुदा एकटा बात नै बुझि‍ सकलौं जे एहेन चलती अनभुआर जगहमे केना बनि‍ गेलैन‍।?” सुरेन्‍द्र बाबूक प्रश्‍न सुनि‍ दीनानाथ बाबू जोरसँ ठहाका मारलैन‍। मकैया लाबा जकाँ कि‍छु उड़ि‍ कऽ छि‍ड़ि‍येबो कएल आ कि‍छुकेँ मुहेँमे गोड़ि‍यबैत दीनानाथ बाबू बजला- “मुड़जनमा लग पहुँच की‍ कहलि‍ऐ से कहि‍ दइ छी। कहलि‍ऐ, वि‍श्ववि‍द्यालय प्रति‍नि‍धि‍ छी तँए चेहरा चीन्‍हि‍ लिअ।” मुस्‍की दैत पी.एन. बाबू दोहरौलैन‍- “ओ की‍ कहलैन‍?” “कहता की! हमरा कि‍ कोनो नै बुझल छेलए जे ओ खानक इंजीनि‍यर छैथ। खेत-पथारक मेलामे हमहीं ने सम्‍हारबैन‍। तैठाम जँ एनए-ओनए करता तँ दसटा गामो-घरक लोक ने छै धान कटैक ओजार ‘कोदारि’‍ कहा देबैन‍ आ खेत तामैक ‘हुँसुआ’।” मुस्‍की दैत सुरेन्‍द्र बाबू पुछलखि‍न- “आरो कि सभ गप भेल?” “गप की होएत, केम्‍हरोसँ आबि‍ जहाँ नजैर दि‍ऐ आकि‍ हाँइ-हाँइ कऽ टेबुल परहक पएर नीचाँ उतारि‍ समधाइन‍ कऽ बैस जाइथ। मुदा हमरो कोन जरूरत‍ जे अनेरे नजैर अँटकौने रहि‍तौं। कहुना भेल तँ अपन मेला भेल कि‍ने, कनी-मनी टुटो-नफा तँ सहैए पड़त।” दीनाबाबूक बोहैत धारकेँ रोकैत सुरेन्‍द्र बाबू बजला- “छोड़ू, मेलाक गप। जे भेल सएह ने नीक। कागतपर तँ भेबे कएल। लाइव टू लैंड होइ या नै होइ। कागजे ने सभ कि‍छु छि‍ऐ। तीन मन तीन साए मन बनै छइ। आ तीन साए मन तीन कि‍लो। जेहने कागत तेहने ने रोशनाइयो आ हाथक कलमो। आब लोक थोड़े गीधक पाँखि‍क कलम बनबैए।” सुरेन्‍द्र बाबूक वि‍चारमे हुँहकारी भरैत दीनानाथ बाबू बजला- “बेस कहलौं, कौआ कान नेने जाइए तँ पहि‍ने अपन कान देखब आकि‍ कौएकेँ खि‍हारब! छोड़ू दुनि‍याँ-दारीक गप। अपन भोजक योजना बनाउ।” पी.एन. बाबू बजला- “केते गोरे भेलौं से पहि‍ने जोड़ि लिअ। आरो कोन-कोन वि‍न्‍यास बनए आ के बनौती आ के परैस कऽ खुऔती से वि‍चारि‍ लिअ।” “वि‍चार की‍ करब? जेना-जेना दीनाबाबू कहता तेना-तेना करब, सएह ने सुरेन्‍द्रो बाबू कहलैन।” हि‍साव जोड़ैत दि‍नानाथ बाबू बजला- “राधामोहन लगा सात गोरे भेलौं। तहूमे अपना सभ तँ घरवारीए भेलौं, असल पाहुन तँ राधामोहने भेला। भोजक नौतहारी सुरेन्‍द्रे भाय भेला, बँचलौं हम। हम दू-दि‍सि‍या बनि‍ दुनू दि‍स सम्‍हारि‍ देब। सएह ने।” “एना झाँपल-तोपल नक्‍शा बनौने काज नै चलत, खोलि‍-खोलि‍ सभ वि‍चारकेँ जोड़ियाबए पड़त।” “हँ-हँ, सएह तँ कहै छी। असल पाहुन माने भेल मि‍थि‍लाक राधामोहन। अहाँ मगाहे भेलौं हम भोजपुरीए, तँए असल भनसीया भेली सुरेन्‍द्र बाबूक पत्नी- सुचि‍ता भौजी। वएह ने खजो खुऔथि‍न। बेसी होइ वा नहि, मुदा एक-एक पीस तँ हेबाके चाहिए।” सुरेन्‍द्र बाबू समर्थन करैत बजला- “बहुत बढ़ि‍याँ, आगू?” “आगू यएह जे हमर परि‍वार वि‍न्‍यास वस्‍तुक सूची बना नजैर रखती जे कोनो वस्‍तु कम-बेसी तँ ने होइ छइ।” “बहुत बढ़ि‍याँ।” “सुरेखा भौजी वारीक हेती। कि‍एक तँ मन अछि‍ कि‍ने, बरी पहि‍ने परसा गेलै आ अदौरी पछाइत‍,‍ तहीपर ने सुरेखा भौजी हँसि देने रहथि‍न। केतबो पी.एन. भाय डँटलखि‍न तैयो मुँह सापुट लेलकैन‍?‍” “अच्‍छा ठीक छै। आ काजक नि‍गरानी?” “सेहो करब। पी.एन. भाय हेता, अपने वक्‍ता भेलि‍ऐ हमरा सुनने नइ सुनने हेबे की करतै।” “एना किए, खि‍शि‍या कऽ बजलौं?” “खि‍शि‍या कऽ कहाँ बजलौं। बजलौं ई जे नीक लागत मानि‍ लेब नइ नीक लागत नै मानब।” पाँचू गोरे गोल-मोल बैसला। चाह चलल। राधामोहन दि‍स देखैत सुरेन्‍द्र बाबू बाजए लगला- “बौआ, अहाँ नवतुरि‍या छी, अहीं सभ भविस छि‍ऐ। कहलौं जे गाए पोसैक वि‍चार होइए से नीक वि‍चार अछि‍। मुदा एतबेसँ काज नै चलत। दुनि‍याँक आन-आन मुलुकमे सुनै छि‍ऐ गाए-महींसकेँ एते दूध होइ छै, ओते दूध होइ छइ। सत् बात छइ। मुदा ओइ सत्‍यक पाछू बहुतो कारणो छइ। ओकर जलवायु केहेन छै, ओकर सालो भरि‍क मौसम केहेन होइ छइ इत्‍यादि। अपना ऐठाम मोटा-मोटी तीन मौसमक सामना पशुपालककेँ करए पड़ै छैन। जाड़, गर्मी आ बरसातक। जाड़-गर्मी दुनू पशु-ले अहि‍तकर अछि‍। ऐ अहि‍तकरकेँ हि‍तकर केना बनौल जाए ई मूल प्रश्‍न अछि‍। ओना, केतबो कहल जाए जे दूधक धार बहै छल अपना ऐठाम, मुदा..? दूध-दही जइ स्‍तरक भोज्‍य–पदार्थ छी ओइ स्‍तरक समाज अखन धरि‍ नै बनि‍ सकल अछि‍, मुदा एका-एक अचानके तँ हेबो नै करत। तँए पढ़ल-बि‍नु पढ़ल कि‍सान परि‍वार-ले नीक बेवसाय पशुपालन छी। अच्‍छा ई कहू जे परि‍वारमे खेत केते अछि‍?” राधामोहन- “ठीक-ठीक तँ नै बुझै छी मुदा अनदाजन तीन-चारि‍ बीघा हएत।” ‘तीन-चारि‍ बीघा’ सुनि‍ सुरेन्‍द्र बाबूक मुँह बि‍जैक‍ गेलैन‍। मनमे उठलैन‍ जे जँ तीन-चारि‍ बीघाक समुचि‍त खेती कएल जाए तँ प्रर्याप्‍त अछि‍। मुदा खेतियो करब तँ जटि‍ल ऐछे। किएक तँ तीन-चारि‍ बीघा खेत पचास टुकड़ीमे बँटि‍ सौंसे गाम छि‍ड़ियाएल हेतइ। ..संयमि‍त होइत पुछलखि‍न- “सभ खेत एकरंगाहे अछि‍ आकि‍ भीन-भीन?” सुरेन्‍द्र बाबूक प्रश्‍न राधामोहन नै बुझि‍ सकल। नै बुझैक कारण भेल जे घरमे खतियान, दस्‍ताबेजसँ लऽ कऽ बन्‍दोवस्‍त रसीदक संग सभ खेतक मालगुजारियोक रसीद ऐछे। कागजे ने असल पहचान खेतक छी, तहूमे रैयती मालगुजारी छिहे, एकरंगाहे अछि‍। ब्रह्मोत्तर-शि‍वोत्तर रहैत तँ मालगुजारीक जगह शेषेटा लगैत, सेहो तँ नहि‍येँ अछि‍। ..राधामोहनक मन जमीनक गुत्‍थीक गि‍रह खोलिए ने पबै छल, जइसँ बाजबे की‍ करैत। ओना तीनू गोरे बुझि‍ गेला जे राधामोहन प्रश्‍नकेँ नीक जकाँ नै बुझलक। नै बुझैक कारण नहि‍योँ सुनब होइ छै से नहि, प्रश्‍नक गहराइकेँ नै छुबि‍ सकल। .. सुरेन्‍द्र बाबू प्रश्‍न दोहराबए नै चाहैथ‍, दोहरेबे की‍ करि‍तैथ‍। वएह ने रामाकठोला। वएह बात वएह शब्‍द। दीनानाथ बाबू बीचमे ऐ दुआरे नै टपकैथ जे सुरेन्‍द्र बाबूक सोभावसँ परिचि‍त। जँ कहीं रधेमोहन जकाँ भँसिआ जाएब तँ दोसर लग हमरा-ले थोड़े औत आ वएह लगा चला देता। तँए अनकर टेटर अपना सि‍र सहेजब नीक नहि, तँए चुप। मुदा पी.एन. बाबू अपन मैदान देख‍ मुँह बन्न राखब उचि‍त नै बुझि‍, बजला- “सुरेन्‍द्र बाबू, भरि‍सक राधामोहन भाषा भेदक चलैत प्रश्‍न नै बुझि‍ सकल। बुझा दइ छि‍ऐ।” पी.एन. बाबूकेँ मनमे उठलैन‍। जेकरा हमसभ एक्के गाममे ‘अमधुर’ कहै छि‍ऐ ओकरे कि‍छु गोरे ‘अमरूद’ कहै छैथ, मुदा मि‍थि‍लांचल तँ भि‍न्न अछि‍, जैठाम ‘लताम’ कहल जाइ छइ। ..मन मानि‍ गेलैन‍ जे भरि‍सक भाषे दोष छी। बजला- “अपना सभ समाजक प्रवुद्ध वर्ग छि‍ऐ कि‍ने, जे पछुआएल जि‍नगीसँ पीड़ि‍त अछि‍ ओ कि‍आँ-ने गेल अगुआएल जि‍नगीक पद्धति‍। जँ से होएत तँ अल्‍लू घर-घर चलैए‍ ओइ घरमे मि‍ठाइयो तँ चलि‍ सकै छल। कि‍एक तँ तैंतीस-चौंतीस रंगक जँ ओकर तरकारियो होइ छै तँ ओइसँ बेसी पैंतीस रंगक मि‍ठाइयो तँ होइते छइ। मुदा जँ लाट साहैबक ऑफि‍समे भाषेक दूरी बनल रहत तँ समस्‍याक समाधान सुलझत आकि‍ आरो उलझत। एक तँ भाषाक दूरी दोसर भाषाक अपन शब्‍दक दूरी तँ ऐछे।” सह पाबि‍ दीनानाथ बाबू टि‍पलैन‍- “हँ-हँ भाय साहैब, अहाँक वि‍चारसँ हम बि‍ल्‍कुल सहमत छी जे एके तरकारीक नाओं क्षेत्रक कोन बात जे गामोमे भि‍न्न-भि‍न्न अछि‍। मि‍थि‍लांचलक घेरा झारखण्‍डमे ‘नेनुआ’ आ ‘परोड़’ बनि‍ जाइए तँ भोजपुरमे सोल्हनी नेनुआ बनि‍ जाइए। तेतबे नहि, नेपालक राजवि‍राज क्षेत्रमे झींगा नाओं रखने अछि‍।” बैसार अनुकूल भेल। पी.एन. बाबू राधामोहनकेँ पुछलखि‍न- “राधामोहन, सुरेन्‍द्र बाबूक प्रश्‍न बहुत नमहर भऽ गेलैन‍, कि‍एक तँ अपना ऐठाम एक-दोसर जमीनक दूरी बहुत अछि‍। केतौ बाड़ी-घराड़ीक मूल्‍य बेसी अछि‍ तँ केतौ चर-चाँचरक कम। तहि‍ना पानि‍क लाट अछि‍ तँ केतौ बि‍नु पानि‍क। कोनोक माटि‍ नीक अछि‍ तँ कोनोक दोखरा बालु। तहि‍ना केतौ ऊँचरस रहने रौदीक सम्‍भावना बेसी रहैत तँ केतौ दाहीक। दाहीक कारण खाली बाढ़ि‍ए नहि, बर्खा सेहो होइ छइ। ऊपरका पानि‍ नीचाँक फसलकेँ दहा दइ छइ।” महजाल जकाँ जलियाएल प्रश्‍न देख‍ सुरेन्‍द्र बाबू राधामोहनपर नजैर अँटकबैत बजला- “राधामोहन, अखन तँ अहाँकेँ माइयो आ बाबूओ जीवि‍ते छैथ हुनको सभसँ वि‍चारि‍ नेने छी ने, किएक तँ वि‍चार लैक पहि‍ल ई कारण जे जँ हुनक अनुकूल वि‍चार छैन‍ तखन काजमे सुवि‍धा एहत। जँ प्रति‍कूल वि‍चार हेतैन‍ तँ ओ ऐ काजसँ अवगत‍ नै हेता जइसँ सुनाड़ी जि‍नगीक लाभ नै अनाड़ीक नोकसान हएत।” अवसर पाबि‍ दीनानाथ बाबू टिपलैन‍- “जैठाम कोनो नव काज शुरू कएल जाइत अछि‍ ओइठाम तँ सभ अनाड़ीए भेल कि‍ने?” मुस्‍की दैत सुरेन्‍द्र बाबू बजला- “औगताइमे कहि‍ सकै छि‍ऐ। मुदा से नहि, ऐठाम नव किश्‍मक जर्सी गाएसँ पूर्वक देशी गाए तँ ऐछे। दूधारू जानवर दुनू भेल। जि‍नगीक सभ आवश्‍यकता दुनूकेँ छइ। मुदा ओकर खाँढ़ बदैल‍ गेलै जइसँ दूधक शक्‍ति‍ बदैल‍ गेल जाएत। तँए ओकरा ओइ अनुकूल केना बना कऽ राखल जाए से मूल भेल। मुदा एकरा-ले जरूरी अछि‍ जे ओइ पाछू समए केते लगै छै आ परि‍वारक लोककेँ समए केते अछि‍ तही हि‍सावसँ ने नीक हएत।” समैकेँ ससरैत देख‍ प्रश्‍नकेँ मोड़ैत सुरेन्‍द्र बाबू बजला- “राधामोहन, जइ परि‍स्‍थि‍ति‍मे अहाँ छी, अछैते पूजीए लल-बेकल छी। बहुत पूजी अछि मुदा ओइ पूजीमे गति‍ आनैले बहुत मेहनतो आ सूझो-बूझक जरूरत अछि‍। जे अखन अहाँ-ले कठि‍ने नहि भारियो अछि‍।” सुरेन्‍द्र बाबूक प्रश्‍न सुनि‍ राधामोहन ओहन ठमकान नै ठमकल जे चारूकात अन्‍हराएले बाट देखैत, ओहन ठमकल जे चारूकात बाटे-बाट देखैत। एक्के गाछक कोन जड़ि‍ छी आ कोन छीप परहक बड़क सीर ओ बि‍लगाएब कठि‍न अछि‍। मुदा बि‍नु बि‍लगौनौं काजो तँ नहि‍येँ चलत। बाजल- “श्रीमान्, अखन एते पसार देखा देब तँ ओकरा समैट‍ कऽ उसारब कठि‍न भऽ जाएत। तखन एना कऽ जरूर देखा दिअ जे फेर केकरोसँ पुछैक जरूरत‍ नै हुअए।” राधामोहनक प्रश्‍न सुनि‍ सुरेखा टि‍पलैन‍- “बड़-बड़ धान खेलेँ रे बगड़ा ऐबेर पड़लौं मरदसँ रगड़ा...।” महावीरजी जकाँ एकटा जड़ि‍ नै पहाड़े उठा कऽ आनए पड़त! ..सुरेखाक चपचपी देख‍ सुरेन्‍द्र बाबू गम्‍भीर होइत चपचपाइत बजला- “राधामोहन! अखन अहाँक जि‍नगी लटकल भँट्टा जकाँ झुलैए। तँए नि‍श्‍तुकी काज-ले निसचित समए चाही, से नै देखै छी। कहै छी जे पि‍ता अब-तबक स्‍थि‍ति‍मे छैथ। अहाँ गाए खुट्टापर बान्‍हि‍ लेब हुनका असपताल लऽ जाइक जरूरत‍ हएत तँ की‍ करबै। समैपर गाएकेँ खाइ-पीबैले नै देबै तँ दुरि भऽ जाएत आकि‍ दुरूस रहत?” राधामोहन- “तखन?” सुरेन्‍द्र बाबू- “तैयो बहुत सम्‍भव अछि‍।” राधामोहन- “थोड़बोक चर्च कऽ दियौ। जे सूटगर हएत ओइठामसँ जि‍नगीक क्रि‍या शुरू करब।” प्रश्‍नक गम्‍भीरता अँकैत पी.एन. बाबू मुँह बि‍जका मुड़ी डोलबए लगला। मुदा अपनाकेँ पूरक प्रश्‍नकर्ता बनब नीक बुझलैन‍। अपने-आपकेँ अपना नजैरिए देखब आ अनका नजैरिए देखैमे कि‍छु-ने-कि‍छु अन्‍तर तँ आबि‍ए जाइ छै, तँए नीक हएत जे दुनू नजैरक समावेशी दि‍शा होइ। तँए ई नीक हएत जे सुरेन्‍द्र बाबूक सोच-वि‍चार आ अपन सोचमे की अन्‍तर भऽ रहल अछि‍। तैसंग राधामोहनकेँ दुनूमे की अनुकूल बनि‍ पड़त। मनमे अबि‍ते पी.एन. बाबू अपन ठोरक केबाड़क बि‍लैया ठोकि‍ कान ठाढ़ केलैन‍। कान ठाढ़ करब ऐ लेल जरूरी बुझि‍ पड़लैन‍ जे एहेन ने हुअए जे मूलेमे मन केम्‍हरो भँसैक जाए। राधामोहनकेँ हजारो प्रश्‍न उठबैक अधि‍कार छै, अनसुनियोँसँ काज चलि‍ सकै छै, मुदा हमरा सेने से तँ नै हएत। एक तँ घरवारी छी, दोसर अपना क्षेत्रक प्रश्‍न छी, तेसर कि‍छु हेतै तँ राधामोहन उपरागे कि‍नका देतैन‍। ..नमहर गोष्‍ठीक अध्‍यक्षता जकाँ भारी तँ बुझि‍ पड़लैन‍ मुदा दोसर तँ जवाबदेहो नहि‍येँ छैथ, जि‍नका सुमझा सकै छिऐन‍। मुदा, खएर जे हौउ...। दीनानाथ मने-मन सोचैथ‍ जे, जे शोध सुरेन्‍द्रेबाबूक अन्‍दरमे कऽ रहल छी, ओही प्रश्‍नक उत्तर श्रीमुखसँ सुनब। अवसर‍ भेटल। जँ साकांछ भऽ नै सुनि‍-बुझि‍ लेब तँ पछाइत‍‍ अपने भारी हएत। ..सुरेखा-ले धनि‍सन। मरदा-मरदी गप छी, अनेरे बीचमे पड़ब मगजमारी हएत। मुदा लगले मन बदैल‍ अपन प्रश्‍नपर पहुँच गेलैन‍। ‘हमरा गामसँ अहाँक गाम नीक अछि‍।’ के कहने छला। संगे-संग जवाब देब। आब कहू जे सतंजामे एकटाकेँ बेराएब केहेन हएत। जँ आँखि‍ नि‍रारि‍ कऽ नै ताकब तँ भेटत केना..? तही बीच सुरेन्‍द्रो बाबूक पत्नी आ दीनानाथो बाबूक पत्नी आबि‍ बैसली। मौका पाबि‍ दीनानाथ बाबू पी.एन. बाबूकेँ पुछलखि‍न- “भाय यौ, ति‍लासकराँइतमे एकटा ति‍ल खेने तँ बेटा-बेटी जि‍नगीक मोटा उठा लइए आ सुरेन्‍द्र भाइक बनौल ति‍लकूट जे सालो भरि‍ लोक पनपियाइ करैए से की हेतइ।” सुरेन्‍द्र बाबू तँ चुपे रहला मुदा हुनक पत्नी सेहो ओमहुरके, तँए वएह नैहरक पक्ष लैत बजली- “से तँ बुझि‍ते हेबइ।” समैकेँ अनेरे बोहैत देख‍ राधामोहनकेँ सुरेन्‍द्र बाबू कहलखि‍न- “बौआ, अखन अहाँ बालबोध छी, जि‍नगीक धक्का-पंजासँ भेँट नै भेल अछि‍। अपने उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ जाएब धि‍या-पुताक खेल नै छी, तँए छोड़ियो देब उचि‍त नहि। अहाँ अपन दि‍शाहीन परि‍वारकेँ दि‍शा दऽ सकै छि‍ऐ, मुदा ओहूमे कठि‍नाइक सामना करए पड़त। वैचारि‍क दौड़मे पहि‍ल संघर्ष समाजमे होइ छइ। जखने आगू दि‍स बढ़ए चाहब तखने रूढ़ि‍वादी वि‍चार, जे समाजक कोढ़ रहल अछि‍, अपन सोल्हन्नी शक्‍ति‍सँ वि‍रोध करए लगत। मुदा तेकर चि‍न्‍ता नहि। जहि‍ना सूरसाक मुहसँ हनुमान सुरक्षि‍त निकैल‍ आगू बढ़ि‍ गेला तहि‍ना टपान अछि‍, टपि‍ जाएब। जाबे धरि‍ कोनो परि‍वारक आमदनी खर्चासँ कम रहतै, ओ परि‍वार पाछू मुहेँ ढरकबे करत। अहाँ तँ सहजे त्रि‍काल–काँच अवस्‍था, पुरुष वि‍हि‍न परि‍वार आ परि‍वारमे ओहन रोगी जे मृत्‍युक करीब पहुँच गेल अछि‍–मे पड़ल छी। तँए अपन खेनाइक संग घोड़ाक दनोक जोगार करैत मोछमे तेल लगा सवारियो करैक अछि।” बीचमे सुरेन्‍द्र बाबूकेँ पी.एन. बाबू टोकलैन‍- “हरि‍ अनन्‍त हरि‍ कथा अनन्‍ता अछि‍। ओते वृहतमे एका-एक जाएब नीक नहि। नमहर-सँ-नमहर गाछक बीआ कनियोँ माटि‍मे रोपि‍ कऽ जनमौल जाइ छइ।” पी.एन. बाबूक इशारा पाबि‍ सुरेन्‍द्र बाबू घोड़ाक मुखाड़ी खींच बजला- “राधामोहन, कि‍सानी परि‍वारमे जनम भेल अछि‍ तँए कि‍सानी जि‍नगीकेँ कनियोँ बुझि‍ लिअ। अहाँक प्रश्‍न भारी नै अछि‍। खण्‍डियो कऽ कऽ सोझराइए देब।” सोझराएब सुनि‍ राधामोहनक मनमे खुशी उपकल। सुरेखा समैकेँ गमौने बि‍ना सुरेन्‍द्र बाबूपर आँखि‍ फेकलैन‍। ..सुरेन्‍द्र बाबू बुझि‍ गेलखि‍न जे भरि‍सक अपन प्रश्‍न मन पाड़ि‍ रहली अछि‍। भने नीक हएत जे पहि‍ने हुनके उत्तर दऽ दिऐन...। बजला- “देखि‍यौ, राधामोहन बजला जे हमरा गामसँ अहाँक गाम नीक अछि‍। मुदा बाल-बोध अछि‍ औगताइमे बाजि‍ गेल। सभ गाम कुकुर-कटौझमे लगल अछि‍। खेबो करैए आ भूकबो करैए।” विचारक रस पाबि‍ दीनानाथ बाबू मुँह चटपटबैत पुछलखि‍न‍- “से की, से की! भाय कनी फरिछा दियौ।” मुस्‍की दैत सुरेन्‍द्र बाबू सुरेखा दिस तकैत बजला- “सभ सभकेँ गरि‍येबो करैए आ मुँह मि‍लानियोँ रखने अछि‍। कि‍यो बजैत जे ‘असकर बरसपतियो फूसि’‍, तँ कि‍यो बजैत- ‘दि‍न-राति‍ आत्‍मा रामक तीमन खा आ चि‍ड़ैसँ बाँतर कहि‍ वि‍वेकबान बाबू बनह।’ ..खएर जे हौउ। खेती-बाड़ीक उपजासँ अहाँक गौंआँ कोठो-कोठी बनौलैन‍ आ खेबो-पीबो नीक करै छैथ, तइ खि‍यालसँ राधामोहन बाजल। मुदा पढ़ल-लि‍खल लोक राधामोहनक गाममे बेसी अछि‍ तँए के नीक के बेजाए से कहब कठि‍न अछि‍।” सुरेखा दिससँ नजैर हटा सुरेन्‍द्र बाबू राधामोहनकेँ कहलखिन- “राधामोहन आगू बाजू?” राधामोहन- “दबाइयो कीनैमे आ दूधो उठौना लइमे तंग-तंग भऽ गेल छी, तँए गाए पोसैक वि‍चार मनमे आएल।” राधामोहनक प्रश्‍न सुनि‍ सुरेन्‍द्र बाबूक मनमे भेलैन‍ जे राधामोहनकेँ ओकर सम्‍पैतकेँ बि‍ना जनौने कारोबार जनाएब नीक नहि। बजला- “देखि‍यौ, जे खेत अछि‍ ओकरा समुचि‍त बेवस्‍था केने अहाँ नीक गि‍रहस्‍त बनि‍ सकै छी। पूजी दू रंगक अछि‍, एक श्रम आ दोसर धन। दुनूक मि‍श्रि‍त दि‍शा जि‍नगीक बाट भेल। गि‍रहस्‍तीक बहुतो डारि‍ छइ। तइमे गाइयो पोसब एकटा छी। मुदा जखन अपन सम्‍पैतक असल रूप हनुमान जकाँ बुझब तखने ने नमहर छलांग लगाएब। बड़बढ़ि‍याँ। केते गाए पोसैक वि‍चार अछि‍?” राधामोहन- “मन तँ अछि‍ जीवि‍का बनबैक मुदा अखन जे पार लगत सएह ने। एकेटा पोसैक वि‍चार अछि‍।” सुरेन्‍द्र बाबू- “बड़ बढ़ि‍याँ, सभसँ पहि‍ने ओकर खेनाइ-पीनाइक जोगार कऽ लिअ। कोनो दूधारू घास एक माससँ पहि‍ने नै उपजा सकै छी, तँए गाम जा कऽ पहि‍ने घासक खेती कऽ लिअ। खेती केला पछाइत‍‍ रखैक जोगार, घर आ थैरक सेहो कऽ लेब। अखन अकसरहाँ कि‍सान अगबे एसबेस्‍ट्सक घर बनौने छैथ‍। से नहि, बरसात-ले एसबेस्‍ट्स नीक अछि‍ मुदा जाड़ो आ गर्मियो-ले उपयुक्‍त नै अछि‍। ओकरा तरमे मोटगर छाड़ दऽ देलासँ उपयुक्‍त बनि‍ जाइ छइ। ई दुनू काज केने आउ, तखन अहीठामसँ, पुसेसँ एकटा दुधारू गाए कीनि‍ संगे चलब आ दूधक पहि‍ल भोज खाएब।” पी.एन. बाबू राधामोहनकेँ कहलखि‍न- “सालक पछाइत‍‍ तँ हमहूँ गामे अबै छी। जँ चारियो-पाँच गामक लोक गाए पोसलैन‍ तँ ओते दूरक बीच जि‍नगियो बनले रहत।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 10284 5. समए पाबि‍ राधामोहन पूसा मेला तँ चलि‍ गेल मुदा परि‍वारमे बि‍नु कहने। आने मेला जकाँ टटके दर्शन कऽ घुमि‍ जाएब, मनमे रहै से गड़बड़ा गेलइ। पाँच दि‍न समए लगने बुधनीकेँ अन्‍देशा हुअ लगलैन‍ जे कहीं छौड़ा वौर-तौर तँ ने गेल! नव कवरि‍या अछि‍ होहा-मे ने केतौ पड़ि गेल। मुदा पि‍ता-नन्‍दलाल छाती लगा मारि‍ लेलैन‍ जे जहि‍ना दुनि‍याँक सभ कि‍छु छुटिए रहल अछि‍ तहि‍ना बेटो गेल!मुर्दापर जेहने अस्‍सी मन लाद तेहने नब्‍बे मन, आरो की...। हहाएल-फुहाएल राधामोहनकेँ अबि‍ते देख‍ यशोदा मैया जकाँ बुधनीक छाती सूप जकाँ भऽ गेलैन‍। काजक भूखल-पि‍आसल चेहरा देख‍ बुधनी बजली- “बौआ, थाकल-ठेहियाएल एलह-हेन तँए पहिने कि‍छु पानि‍ पीब लएह।” माइक बात सुनि‍ राधामोहनक मन ओइ यात्री सन भऽ गेल जे छहराइ-ले आमक गाछक नि‍च्‍चाँमे बैसैए आ तखने पाकल आम धब-दे आगूमे खसै छइ। ..उत्‍साहि‍त मने राधामोहन बाजल- “माए, भने कनी जि‍राइयो लेब आ मेलोक गप-सप्‍प सुना देबौ।” जहि‍ना कोनो परि‍वारक हेराएल बच्‍चा हाथमे कि‍छु नेने अबैत जेकरा देख‍ माए-बापक मन खुशी होइत तहि‍ना दुनू बेकती बुधनी आ नन्‍दलालोकेँ भेलैन‍। पानि‍ पीब राधामोहन बाजल- “माए, जहि‍ना कि‍यो मनकामना नेने देवस्‍थान पहुँचैए तहि‍ना भेल।” तरसैत मनमे जहि‍ना तृष्‍णा तरपैत तहि‍ना माइक तरसैत मनपर राधामोहन आँखि‍ गड़ा देखए लगल। जि‍ज्ञासु मन माइक। बेटाकेँ अपन तृष्‍णा केना कहती। केकरा नै मन होइ छै जे नीक खेनाइ खाइ, नीक शरीर लऽ कऽ नीक घरमे रही,प्रति‍कूल मौसमकेँ अनुकूल बना शान्‍तसँ नि‍वास करी। मुदा माइक बात जँ बेटा बुते नै पुरौल भेल तँ ओकरो मन कानि‍-कानि‍ बाजत जे माइक मन लगलै रहि‍ गेल। तइसँ नीक ओकरे सुनब हएत। बजली- “की सभ मेलामे देखलहक?” मेला सुनि‍ राधामोहन विस्‍मित हुअ लगल। दहि‍ना हाथ उठा चानि‍ ठोकि‍ बाजल- “माए, एक जि‍नगीकेँ के कहए जे पुश्‍त-पुश्‍तैनीक जि‍नगीक बाट भेट गेल। भगवान दहि‍न भेला जे मेलाक जड़िएमे पहुँच गेलौं। तेहेन-तेहेन वि‍चारक सभसँ दोस्‍तियारे भऽ गेल जे गुरु मानि‍ लेलि‍ऐन‍। केतौ हमरा वौआइ-ढहनाइक जरूरत‍ नै अछि‍। जखन जे जरूरत हएत एक लपकन चलि‍ जाएब आ सीख लेब। जइ हि‍सावसँ कहलैन‍ तही हि‍सावसँ काजो करब। एकेटा गाए पोसब। बेसी नै सम्‍हारल हएत। मुदा एकोटा पोसब तँ तीन के कहए जे तेरहक मुकाबला करत।” बेटाक उत्‍साह देख‍ बुधनीक मन उत्‍साहसँ धधैक‍ गेलैन‍। जहि‍ना केतौ कोनो घरमे आगि‍ लगने भोंकाँर फुटैत तहि‍ना माइक मन देख‍ राधामोहन बाजल- “माए, अपना सभ बुझै छी जे गरीब छी कोनो आए-उपए नइए, मुदा से नहि, तेते अछि‍ जे सम्‍हारले ने हएत। हाथमे रूपैआ नै अछि‍ मुदा खेत-पथार तँ अछि‍। ओना, खेतो तेतेक अछि‍ जे नीक जकाँ गि‍रहस्‍तो बनि‍ सकै छी, मुदा जखन मनमे जि‍नगीक पहि‍ल काज गाइए पोसब जागल तँ यएह करब। सीमा कातक जे खेत अछि‍, जेकरा दुनू गामक लोक हगनार बनौने अछि‍ ओइ बारहो कट्ठाकेँ बेच‍ लेब। दस हजार रूपैए ओइ बाधक जमीनक दाम छइ। हगनार बुझि‍ पाँच-दस हजार कमे दि‍अए मुदा बेचब ओकरे। ओइसँ एको कनमा उबजो नहियेँ अबैए।” राधामोहन बजि‍ते छल कि‍ बिच्‍चेमे नन्‍दलाल ओछाइने‍पर सँ बजला- “बौआ, खतियानी चीज छी तँए पहि‍ने बन्‍दोबस्‍ती, दस्‍ताबेजी बेची। लोक की कहतह!” राधामोहन चुप्‍पे रहल मुदा बुधनी झपैट‍ बजली- “दि‍नोमे तरेगन देखै छी से होशे ने अछि‍ आ बेटा जे कि‍छु करए चाहैए तँ आगूसँ ठेहुन गड़ा दियौ। ओकर सभ कि‍छु छि‍ऐ, राखए आकि‍ बोहाबए तेकर नीक बेजाए ओकरे हेतइ। अन्न बि‍ना मरब आकि‍ भीख मांगि‍ खाएब, कौल्हुका दि‍न लोक ओकरे ने थूक देतइ। तइले हम किए रोकब।” बेटा दि‍स मुँह ताकि‍ बुधनी फेर बजली- “हँ, और की करबहक?” दूमे एकक सह पाबि‍ राधामोहन बाजल- “दस कट्ठा खेतमे दूधारू घास लगाएब। अपना बोरिंग नै अछि‍, एकटा कले खेतमे गड़ा लेब आ छोटके इंजि‍न लऽ लेब। ओना अखन एक्केटा गाए आनब तँए एके गाए-जोकर घरक काज अछि‍ मुदा से नै करब, तेना कऽ बानाएब जे तीन-चारि‍टा गाइक अँटाबेस भऽ जाएत। अखन ताबे गहुमक भूसी कीनि‍ कऽ रखि‍ लेब।” मास दि‍न बितैत-बितैत घरो बना लेलक आ बीत-बीत भरि‍क दूधारू घासो उपजा लेलक। पचास हजार रूपैआ हाथमे बँचलै रहै पूसा वि‍दा भेल। चि‍न्‍हरबे लोक, चि‍न्‍हरबे घर-दुआर। साढ़े पाँच बजे साँझमे राधामोहन पी.एन. बाबूक डेरापर पहुँचल। दुनू बेकती बजार गेल रहैथ‍। तैबीच बगलेक डेरासँ सुरेन्‍द्र बाबूक पत्नी देखलखिन। देखते लगमे आबि पुछि‍ देलखि‍न- “गाम-घरक की हाल-चाल अछि‍ राधामोहन?” राधामोहन- “सभ आनन्‍दि‍त अछि‍। साहैब सभकेँ नइ देखै छिऐन‍?” राधामोहनक बात सुनि‍ सुचि‍ता बजली- “साहैब सभ सहाएबे छैथ‍ कि‍ने, रौद-बसात लगबैक समए भऽ गेलैन कि‍ने सएह लगबए किम्‍हरो गेल हेता।” दुनू गोरेक बीच गप-सप्‍प चलि‍ते छल कि‍ दुनू बेकती रक्का-टोकी करैत पी.एन. बाबू पहुँचला। रक्का-टोकीक कारण छेलैन राति‍-ले माछ किनब। चसगर खेनि‍हार पी.एन. बाबू तँए माछपर जोर देने। एक तँ माछक अड़सट्ठा तेहेन भारी अछि‍ जे खाइ-बेर तक लधले रहैए, तइसँ नीक अपन गाइक दूध किए ने। कोनो बेसी तरद्दुत नहि। माछक छातीपर बैसैक दम ओकरा नै छइ। तखन तँ वेचारा ओहुना कहू जे दू गोरेक भानसमे जँ चारि‍ घन्‍टा समए लगाएब केहेन हएत। दूधकेँ की छै, बथनि‍याँ जकाँ दूहि‍ कऽ चुल्हियोपर कटिया चढ़ा देबै आ गरमे-गरम खाइ बेर थारीमे उझैल देब। एक संगे दुनू काज भऽ जाएत, माने कटि‍यो सोन्‍हा जाएत आ दूधो औंटा जाएत। ओना, माछ कीनि‍ए नेने रहैथ‍। राधामोहनकेँ देखते पी.एन. बाबू पुछलखि‍न- “गाम-घरक की‍ हाल चाल अछि‍ राधामोहन?” “बड़बढ़ि‍याँ अछि‍। जहि‍ना-जहि‍ना कहने रही तहि‍ना-तहि‍ना करबो केलौं।” राधामोहनक जवाब सुनि‍ पी.एन. बाबूक मन फुला गेलैन‍। बजला- “अहू ठामक जतरा नीके अछि‍, माछ अनलौं-हेँ।” बजैकाल तँ बाजि‍ गेला मुदा लगलै मन रोकि‍ कऽ अँटका देलकैन‍। रोकि‍ देलकैन‍ जे माछ खाइ छैथ‍ ति‍नका-ले ने आ जे नै खाइ छैथ‍ ति‍नका-ले केना जतरा नीक भेलै? तैसंग ईहो जे भोज्‍य पदार्थक तुलनामे माछ महगो अछि‍, जेतए सस्‍ता वस्‍तु भेटब भारी अछि‍ तैठाम की‍ कहल जाए? खएर जे हौउ, मि‍थि‍लाक पहचान तँ छिहे। भलेँ पोखैर‍ बाढ़ि‍मे मरने भऽ गेल हुअए, गढ़ि‍या गेल हुअए, खरहा गेल हुअए आकि‍ भोंथि‍या गेल हुअए, मुदा झण्‍डा झूकाएब नीक हएत। झुकबाको नै चाही। से जँ झूकि‍ गेल तँ की एहेन देह-दशा लऽ कऽ मुरै उखाड़ब। वि‍चारमे पी.एन. बाबू मगने रहैथ‍ आकि‍ तखने सुरेन्‍द्रो आ दीनानाथो बाबू ललका-ललकी करैत पहुँचला। ओना ठोर दुनूक पटपटाइते रहैन‍ मुदा राधामोहनक सोझहामे अपन उलझन राखब नीक नै बुझलैन‍...। पाशा बदलैत दीनानाथ बाबू राधामोहनकेँ टोकलखि‍न- “बड़ चपचपी देखै छी राधामोहन! इन्‍दि‍रा अवासक पाइ गाए कीनैले भेटल आकि‍ दारू भट्ठी जाइले से भाँज कनी कहू।” सुरेन्‍द्र बाबू आ दीनानाथ बाबूक बीच जे ललका-ललकी रहैन ओ ई रहैन‍ जे जँ दूधक पैदावार गाममे बढ़ि‍ जाएत तँ ओकर बजार केहेन हएत? नीक प्रश्‍न रहि‍तो दुनू गोरे ओझरा ओतए गेल रहैथ‍ जे बजार केना बनै छइ। दि‍न उगले सभ एकठाम बैसला। तैबीच सुरेखा माछकेँ धो-धा तेलमे कर लगा नेने छेली। संयमि‍त सोच रहने कि‍यो अपन रमाकठोला नै पसाइर‍ राधामोहनेक बात सुनैले खढ़ि‍या जकाँ कान ठाढ़ केने रहैथ‍। से जँ नै करतैथ‍ तँ नढ़ि‍यो तँ नहि‍येँ छैथ‍ जे सोझहे भुकबे करि‍तैथ‍‍। तखन पुछतैन‍ के। अपन जि‍नगीक मांसक रक्षा तँ वेचारा खढ़ि‍योकेँ अपने करए पड़ै छै,नइ तँ जेकरे आँखि‍क सोझ पड़त मारि‍ कऽ खा जेतइ‍। जहि‍ना कि‍छु लोक एहनो होइ छै जे मुदालह बनि‍ लड़बकेँ प्रति‍ष्‍ठा आ मुद्दैकेँ अप्रति‍ष्‍ठा बुझै छैथ, कारण जे हौउ, तहि‍ना काज पुरौल राधामोहनक मन प्रश्‍न सुनैक जि‍ज्ञासा-ले उत्तर मनमे रखने तँए फुलैत जे कि‍छु पुछता तँ प्रश्‍नक नीक उत्तर देबैन‍। बिच्‍चेमे सुरेखा टपकली- “दूध नीक आकि‍ माछ?” दीनानाथकेँ भेलैन‍ जे चि‍कारीमे भरि‍सक हमरे कहलैथ‍, कि‍एक तँ हुनका दुनू गोरेसँ तँ धकाइते छैथ‍। अवसरक चुकल बाण जहि‍ना सौंसे दुनि‍याँ बौआ-ढहना अबैए तहि‍ना बुझि‍ पड़ैए हएत। हमहीं बुझलि‍ऐ आ ओ सभ नै बुझलैन‍, की ओ सभ अन्न नै खाइ छैथ‍ जे नै बुझने हेता। ..सुरेखाक आँखि‍-पर-आँखि‍ दऽ दीनानाथ उत्तर देलखि‍न- “जे भेटए से नीक।” अनेरे समैकेँ ससरैत देख‍ सुरेन्‍द्र बाबू राधामोहनकेँ पुछलखि‍न- “की सभ अखन धरि‍ केलौं?” जहि‍ना कोनो वि‍द्यार्थी राति‍मे कोनो कवि‍ता वा गीत रटलक आ भि‍नसुरका परीक्षाक प्रश्‍न पबि‍ते अह्लादि‍त भऽ कागतपर उतारए लगैए तहि‍ना राधामोहन अह्लादित होइत बाजल- “श्रीमान्, एक लाख दस हजार रूपैआमे खेत बेचलौं। सबा क्‍विन्‍टल मासक हि‍सावसँ पाँच क्‍विन्‍टल गहुमक भूसी कीनि‍ लेलौं। दस कट्ठामे घास लगौने छी, चारि‍ थान रहैबला घर बनेलौं। पचास हजार बँचल अछि‍ जे लऽ कऽ अपने लोकैनक शरणमे आएल छी।” राधामोहनक जवाब सुनि‍, जहि‍ना कोनो देवालयमे गेट परहक हनुमानजी सभसँ पहि‍ने असीरवाद दइ छथि‍न तहि‍ना दीनानाथ बाबू सुरेन्‍द्र बाबूकेँ कहलखि‍न- “भाय साहैब, अपनेबला गाए दऽ दियौ।” दीनानाथ बाबूक वि‍चार सुनि‍ सुरेन्‍द्र बाबू ठमैक‍ गेला। ठमकैक कारण भेलैन एक संग अनेको प्रश्‍न मनमे उठब। अपना खुट्टा परहक गाए छी, बच्‍चेसँ देखैत एलौं। अखन गाए अछि‍। पनरह कि‍लो दूध होइ छइ। की सभ खाइले दइ छि‍ऐ आ केतेक बेर पानि‍ पीअबै छि‍ऐ, केहेन घर बना रखने छि‍ऐ..। सभ तँ बुझल-गमल अछि‍। जँ गाए देबै तँ तैसंग ईहो सभ तरद्दुतो कहि‍ देब नीक हएत। तैसंग दोसर प्रश्‍न ईहो उठि‍ गेलैन‍ जे लाख रूपैआ दरमाहा उठबै छी, एकटा बोनाएल नवयुवककेँ उठैले तीस-चालीस हजार दऽ नै सकै छी। गाइक दाम नै लेब। ..मुदा तइ बिच्‍चेमे दीनानाथ बाबू दाम खोलैत बजला- “तीस हजार गाइयक दाम भेल, गाड़ी भाड़ा अपने लागत।” दीनानाथ बाबूक वि‍चारकेँ समर्थन करैत सुरेखा टि‍पलैन‍- “हँ-हँ, दाम ठीके कहलि‍ऐ। तइमे आशीक जे देथि‍न।” दुनूक गप सुनि‍ सुरेन्‍द्र बाबू बजला- “गाइक दाम नै लेब।” मंगनी सुनि‍ राधामोहन चौंकैत बाजल- “श्रीमान्, जहि‍ना मंगनी कि‍ताब पढ़ने लाभ होइ छै तहि‍ना मंगनी बौसौक होइ छै, तँए मंगनी नै लेब।” राधामोहनक प्रश्‍नसँ सुरेन्‍द्र बाबू आरो उलैझ गेला। मनमे उठलैन‍ एक तँ जीवनी-सँ-अनाड़ीक हाथ वौस जा रहल अछि। काँच वौस भेल। जँ कहीं दस-बीस दि‍नक बीच कि‍छु भाइए जाइ! गामे-घर छी साँपो-कीड़ा रहि‍ते अछि‍, तखन ओइ वेचाराकेँ की दशा हेतइ? मुदा मंगनियोँ नै लिअ चाहैए! दाम कम करि कऽ दि‍ऐ, सेहो तँ उचि‍त नहि‍येँ हएत। काल्हि‍-दि‍न जखन बेचए चाहत तँ लेबाल कहबै करतै ने जे एतबेमे किनने रहअ। बजला- “दाम दीनेबाबूक भेलैन‍ मुदा छह मास धरि‍ पाइ अपने हाथ राखू, केते तरहक बेर-बेगरता हएत। जखन अहीं सबहक इलाकाकेँ अपन जीबैक इलाका बना रहल छैथ तखन भाय-बन्‍धु सिरैज किए ने पावैनो-ति‍हार गामे-घरमे मनाबी।” दोसर दि‍न गाइक संग सुरेन्‍द्रो बाबू आ दीनानाथो बाबू राधामोहनक ऐठाम आबि‍ सभ कि‍छु देख‍-सुनि‍ पायस पारस पाबि‍ चारि‍ बजेक घुमती बस पकैड़‍ लेलैन‍। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1590 [1] दिनक काज [2] माता-पिता [3] माता-पितासँ [4] डाक्टर-इंजीनियर [5] पाल [6] भोजन, वस्‍त्र, अवासक संग दबाइयो-दारू आ पढ़ाइयो-लिखाइ [7] सर्टिफि‍केट-ले [8] तीनू शिक्षक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.सुशान्त झा "अवलोकित"- कविता-नेनपन ३.२.आशीष अनचिन्हार- ३ टा गजल ३.३.राजेश मोहन झा "गुंजन" -बिनु राधाक ब्रज ३.४.अब्दुर रज्जाक-गजल सुशान्त झा "अवलोकित" कविता नेनपन मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। बाबू केर कनहा, मइयाँ केर मालिश। बाबाक पढ़ल श्लोक फेर सँ सुनि आय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय।। नानी केर खिस्सा, नाना केर दुलार, मामा केर थोपड़ी,मामी केर मल्हार। हाथ महक चुसनी,पैर महक फुदना, मोन होइया फेर सँ भेट जायत आय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय, माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। नहि भोजन केर चिन्ता,नहि ओछौन'क झमेला। हम नहि बिसरलौं घुआं मुआं वाला खेला। जार'क रौद में , बीचे आंगन में, कपड़ा वाला झूला में फेर सँ झूलि जाय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। हे यौ #भोला बाबा,हे यौ #औघड़दानी । माँग'य अहाँ सँ "अवलोकित" अज्ञानी। जँ किछु देब त' द' दिअ #नेनपन, फेर सँ एक बेर हम नेना भ' जाय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार ३ टा गजल 1 आँखिमे बहार छै हाथमे उधार छै भिन्न भिन्न गाँहके एकटा बजार छै बेरपर अलग अलग ओहने भजार छै एकबाल केहनो जल्दिये उतार छै डोल केर दोस्त ओ तेहने इनार छै सभ पाँतिमे 212+12+12 मात्राक्रम अछि सुझाव सादर आमंत्रित अछि 2 केखनो उठा देलकै केखनो खसा देलकै देवता बना केकरो नोरमे भसा देलकै डारि पात छै ओकरे बात से बुझा देलकै पानि छै बहुत दूर तँइ आगि ओ लगा देलकै सोचने रहै अपने सन आन सन बना देलकै सभ पाँतिमे 212+12+212 मात्राक्रम अछि अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि सुझाव सादर आमंत्रित अछि 3 हुनके चूड़ा हुनके पिज्जा कोन अजादी पुछितो लज्जा गठरी बान्हल किनकर हिस्सा खूब हँसोथब सभहँक इच्छा अनचिन्हारक किछु ने पक्का सभ पाँतिमे 22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश मोहन झा "गुंजन" -बिनु राधाक ब्रज ************* कतबो जप तप जोग बखानी, नेहक आखर बिनु सभ अज्ञानी। पद पंकज आनन घन मोहक, बिनु राधा निष्प्राण तन जानी। मोर मुकुट चानन केर रेखा, वंशी धुन करि रहल गुमानी। पायल नहि देखब कोन दामिनि, धीपल साओन जेठ समानी। दहकय मधुवन पनघट सूखल, मसान बूझि गोकुल सखा मसानी। कुसुम तेजि सभ शूल निहारथि, उजड़ल उपवन जे छल धानी। गरल भरल यमुना जल देखल, नहिं भाबय कोयली केर वाणी। पूनीमक राति चान मुरझायल, बिलखथि ब्रज बिनु ब्रजरानी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अब्दुर रज्जाक-गजल देश अहाँ संगे ,प्रदेश अहाँ संगे  जे बीतल ओ पल बेश अहाँ संगे दिलमे रहलौ एना दिलस नै जाइछि   किछ रहलय जैन शेष अहाँ संगे बाजूने किछ आबो कहूने किछ   लगैत रहैय चलैत ठेस अहाँ संगे मोन हमरो होइय उइर जैतो गगन हार्ली हम स्नेहमे बस रेश अहाँ संगे रही-रही कते कहू फेर कोना कहू  पल भरके झलकमे संदेश अहाँ संगे अब्दुर रज्जाक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॉ. शशिधर कुमर ३टा बाल कविता 1 अबोध बच्चा टुकुर-टुकुर ओ ताकि रहल अछि । आँखिसँ दुनिञा नापि रहल अछि । एहि जग केर जगमगकेँ निहारैत, जग केर माया भाँपि रहल अछि ।। बाल-गोपाल  स्वरूप छी बच्चा । सृष्टिक  कोमल रूप छी  बच्चा । छी  अबोध,  पर  बोध  कराबैछ,  भगवानक छवि-रूपकेँ बच्चा ।। बच्चा नञि बस अगबहि बौआ । बच्चा  माने  बुच्ची आ बौआ । नेन्ना कोमल, कोमल नेनपन, देखि कऽ बिहुँसए आङ्गन कौआ ।। 2 ईद छै कि होली छै ईद   छै   कि   होली   छै । दुर्गा − छठि − दिवाली  छै । हमरा लए हर दिन सुन्नर, कारण इस्कूलमे छुट्टी छै ।। कक्कर पाबनि, के मनबै छै । कहाँ बात से  एतेक फुरै छै । हमसभ खुश छी इएह सोचि कऽ, आबै बला छुट्टी छै ।। ककर जन्म आ कक्कर बरषी । सभटा   सरकारक  मनमर्जी । हम बच्चासब इएह सोचै छी, एक दिन फेरो छुट्टी छै ।। रौद छै कड़गर, लूऽऽ चलै छै । बर्खा - बुन्नी,  शीतलहरी छै । एतेक प्रखर हो हर मौसिम जे, होअए घोषणा - छुट्टी छै ।। 3 हमहूँ पढ़बै मैथिली हे ऐ बहिनजी, यौ मास्टरजी, हमहूँ      पढ़बै     मैथिली । हिन्दी, ईंग्लिश, जर्मन सीखबै, पर  ने  बिसरबै  मैथिली ।। मैथिली बाजथि  दादा - दादी, नाना - नानी      मैथिली । बाहर जा कऽ माम बिसरलाह, मामी बिसरलीह मैथिली ।। कक्का - काकी जखन बजै छथि, हिन्दी   फेंटल   मैथिली । बौआ - बुच्चीक मोन होइछ पर, सीखितहुँ हमहूँ मैथिली ।। तेँ  टीचरजी   हमरा   पढ़बू, हम्मर    भाषा    मैथिली । आनो  भाषा  नीक लगए, पर मीठगर छी बड़ मैथिली ।। गणित - ज्ञान - विज्ञानक भाषा, जखनहि होयत मैथिली । बुझबामे  भाङ्गठ  नञि  होयत, अप्पन भाषा मैथिली ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  'विदेह' २१६ म अंक १५ दिसम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०८ अंक २१६)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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