VIDEHA — Issue 220 / अंक २२०

Publication: VIDEHA · Issue: 220
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211 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २२० म अंक १५ फरबरी २०१७ (वर्ष १० मास ११० अंक २२०) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- सतभैंया पोखैर (तेसर संस्करण) सँ सात टा लघु कथा २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघु कथा - चहकल विचार २.३.रवीन्द्र नारायण मिश्र- बाल्यकाल २.४.बी.एन. लाल दास- चिचड़ी वाली भौजी मैथिली कहानी ३. पद्य ३.१.मुन्नी कामत केर सुखल मन तरसल आँखि‍ काव्‍य संग्रहक दोसर संस्‍करण ३.२.१.प्रदीप पुष्प- वैलेंटाइन स्पेशल...गजल सहित २टा गजल २. आशीष अनचिन्हार- ३टा गजल ३.३.राजेश मोहन झा ' गुंजन'- वसंत गीत ३.४.बृषेश चन्द्र लाल- तप ?! ४.बालानां कृते- मुन्नी कामत- तीनटा बाल कविता- जतरा/ अंकक मेल/ बहिन Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. 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रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखलाW १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- सतभैंया पोखैर (तेसर संस्करण) सँ सात टा लघु कथा २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघु कथा - चहकल विचार २.३.रवीन्द्र नारायण मिश्र- बाल्यकाल २.४.बी.एन. लाल दास- चिचड़ी वाली भौजी मैथिली कहानी श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक ‘सतभैंया पोखैर’ (तेसर संस्‍करणसँ) सँ सात गोट कथा- बिहरन जहिना बैशाख-जेठक लहकैत धरतीपर, अगियाएल वायु- मण्‍डलक बीच हवाकेँ खसने अनासुरती मेघक छोट-छोट चद्दैर सुरूज ओढ़ए लगैत, रेलगाड़ीक हूमड़ैत अवाज दौड़ए लगैत, रहि-रहि कऽ गुलाबी इजोत छिटकए लगैत जइसँ अनुमानित मन मानैले बेबस भऽ जाइत जे‍ पानि-पाथर आ ठनकाक संग बिहाड़ि आबि रहल अछि तहिना रघुनन्दन-सुलक्षणीक परिवारमे ज्‍योति कुमारीक जन्‍मसँ भेलैन‍। भलेँ आइ-काल्हि‍ बेटी जनमने माए-बाप अपन सुभाग्‍यकेँ दुर्भाग्‍य मानि मनकेँ केतबो किए ने कोसैत रहै छैथ जे परिवारमे बेटीक आगमन, हिमालयसँ समुद्र दिस निच्‍चाँ मुहेँ ससरब छी। मुदा से दुनू बेकती सुलक्षणी आ रघुनन्‍दनकेँ नै भेलैन‍। जहिना गद्दा पाबि कुरसी गदगर होइत तहिना खुशीसँ दुनू परानीक मन गदगद रहैन। से खाली परिवारे धरि नहि, सर-समाजसँ लऽ कऽ कुटुम-परिवार धरि सेहो छेलैन‍। ओना, आन संगी जकाँ रघुनन्‍दन नै छला जे तीनियेँ मासक पेटक बच्‍चाक दुश्‍मन बनि पुरुषार्थक मोँछ पिजैबतैथ, आ ने अपन रसगर जुआनी छोलनी धीपा-धीपा दगितैथ। दुनू परानी बेहद खुशी छला! किए नै खुशी रहितैथ‍? मन जे मधुमाछी सदृश मधुक संग मधुर मुस्‍कान दइ छेलैन‍। पुरुष अपन वंश बढ़बै पाछू बेहाल आ नारीकेँ हाथ-पएर बान्‍हि बौगली भरि रौदमे ओंघरा देब ई केते उचित छी?मुदा से नहि, दुनू परानीक वंश बढ़ैत देख दुनू बेहाल। मन तिरपित भऽ तरैप-तरैप नचैत रहैन। ओना तीन भाँइक पछाइत‍‍ ज्‍योतिक जन्‍म भेल, मुदा तइसँ पहिने बेटीक आगमनो नै भेल छेलैन‍ जे सुलक्षणी दोखियो बनितैथ‍। भगवानोक किरदानी की नीक छैन? नीको केना रहतैन‍, काजक तेते भार कपारपर रखने छैथ‍ जे जखन टनकी धड़ै छैन तखन खिसिया कऽ किछु-सँ-किछु कऽ दइ छथिन‍। मुदा से कियो मानतैन‍ थोड़े? जखन लोक अपने-अपने हाथ-पएर लाड़ि-चाड़ि जीबैए तखन अनेरे अनका दिस मुँहतक्कीक कोन जरूरत? किए ने कहतैन‍ जे जखन अहाँ निर्माता छी तँ तराजूक पलरा एक रंग राखू, किए केकरो जेरक-जेर बेटा दइ छिऐ आ केकरो जेरक-जेर बेटी! आ जँ देबे करै छिऐ तँ बुधि किए भंगठा दइ छिऐ जे बेटासँ धन अबै छै‍ आ बेटीसँ जाइ छइ। जइसँ नीको घरमे चोंगराक खगता‍ पड़ि जाइ छइ। उच्‍च अफसरक परिवार तँए परिवारिक स्‍तर सेहो उच्‍च। भलेँ माए-बापकेँ छाँटियेँ क‍ऽ किए ने परिवार होइन। खगल परिवार जकाँ सदैत गरजू नहि। परिवारक खर्च समटल, तइसँ खुलल बजारक कोनो असर नहि। सरकारी दरपर सभ सुविधा उपलब्‍ध, जइसँ खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ मनोरंजनक ओसार चकमकाइत। भलेँ जेकर अफसर तेकर बात बुझैमे फेर होनि, जइसँ महगी-सस्‍ती बुझैमे सेहो फेड़ भऽ जाइत होइन। मुदा परोछक बात छी चारू बच्‍चाक प्रति रघुनन्‍दनक सिनेह समान रहलैन‍। परिवारमे सभसँ छोट बच्‍चा रहने ज्‍योति सबहक मनोरंजनक वस्‍तु। मुदा गुरुआइ तँ ओहिना नै होइ छै, तँए सभ अपन-अपन महिक्का मनक टेमीसँ सदैत देखैथ, जप करैथ‍। आखिर के एहेन छैथ‍ जे ऐ धरतीपर ज्ञानदानी नै छैथ। भलेँ ओ अधखिजुए वा अधपकुए किए ने होथि। जहिना कोनो माइलिक बच्‍चा पिताक संग जामन्‍तो रंगक फूलक फुलवाड़ीमे जिनगीक अनेको अवस्‍था देख चमकैत तहिना भरल-पूरल परिवारमे ज्‍योतियोकेँ भेल‍। देखलैन‍ कलीमे जहिना अबैत-अबैत रंगो, सौन्‍दर्यो आ महको अबैए तहिना ने जिनगी छी। जँ मनुखकेँ डोरीसँ बान्‍हल जाए तँ डोरी तोड़ैक उपाइयो तँ हुनके करए पड़तैन‍। समुचित वातावरण रहने ज्‍योति कुमारी अपन संगी-साथीक बीच नीक श्रेणीमे आबि गेली। जहिना संगीक सिनेह तहिना शि‍क्षकोक सिनेह भेटए लगलैन‍। टिकट कटौल यात्री जहिना निश्चि‍न्‍तसँ गाड़ीमे सफर करैत तहिना समतल जिनगी पाबि ज्‍योति सेहो आगू बढ़ए लगली‍। जिनगीमे बाधा सेहो अबै छै मुदा तइसँ पूर्ण अनभिज्ञ ज्‍योति। जेना कर्मकेँ धर्म बना‍ जिनगीक बाट बनौने हुअए तहिना...। थम्‍हसँ निकलैत केराक कोसा जहिना अपन घौरक संग हत्‍थो आ छीमियोँक अनुमानित परिचए दैत, फूलक कोढ़ी फूलक दैत तहिना बच्‍चेसँ कुमारि ज्‍योति सुफल जिनगीक अनुमानित परिचए दिअ लगल। जेना-जेना बौद्धि‍क विकास होइत गेलैन‍ तेना-तेना तीनू भाँइयो बुझए लगला जे ज्‍योति तेहेन चन्‍सगर‍ अछि जे आगू किछु जरूर करत। जइसँ भैयारीए जकाँ ज्‍योतिक संग बेवहार करए लगला। ओना, लैंगिक प्रभाव ओतए ओतेक अधिक देख पड़ैत जेतए भाए-बहिन‍क बीच जेतेक बेसी दूरी रहल। मुदा से रघुनन्‍दनक परिवारमे नै छेलैन‍। दोसर कारण ईहो छल जे वैचारिक दूरी जेना आन-आन परिवारमे रहैत तेना सेहो नहियेँ जकाँ छेलैन‍। परिवारक सभ अपन-अपन दायित्‍व बुझि अपन-अपन काजमे दिन-राति लागल रहै छला। ज्‍योतिकेँ सभ अपना-अपना नजरिये देखबो करैथ। गुरुक रूप रघुनन्‍दन देखैथ तँ जगत-जननी जानकीक सुनैनापुर रूप सुलक्षणी देखैत रहथिन। जइसँ रघुनन्‍दन दुनू परानी एक-एक लूरि-बुधिकेँ धरोहर जकाँ ज्‍योति बेटीक बेवहारमे सजबैत रहलैथ। तहिना भाइक मन सामा-चकेबाक सम्‍बन्‍धमे ओझराएल रहैन। केना नइ ओझरैतैन? आइ धरिक इतिहासक दूरी जे मेटाइत देखैथ। केतेक प्रतिशत परिवार अखन धरि इतिहासक पन्नामे लिखाएल अछि जइमे भाए-बहिन‍क शि‍क्षाक दूरी समतल हुअए? तँए सबहक सिनेहक अपन-अपन कारण छल...। जनकपुरमे जहिना रामकेँ आ मथुरामे कृष्‍णकेँ देख‍ देख‍‍निहारकेँ भेलैन‍ तहिना रघुनन्‍दनोक परिवारमे ज्‍योतिकेँ देखते भेल। बाल-बोध जहिना अपन मनोनुकूल वस्‍तु पाबि छाती लगबैत, हृदैसँ खुशी होइत तहिना विज्ञान विषयसँ ज्‍योति सटि गेली। विज्ञान विषयमे नीक नम्‍बर आनि बिजलोका जकाँ ज्‍योति संगियो-साथी, शि‍क्षको आ मातो-पिताक नजैरमे चमकए लगली। हाइ स्‍कूलमे पएर दैते जेना अपन आँट-पेट बुझि कोनो विद्यार्थी साइंस तँ कोनो कामर्स तँ कोनो आर्ट विषय चुनि आगू बढ़ैत तहिना ज्‍योतियो साइंस चुनि नेने छेली। घरसँ बाहर धरि सर्वत्र बहारे-बहार बुझि पड़ैन। ऋृषि-मुनिकेँ जहिना दुनियाँ समतल बुझि पड़ैत तहिना स्कूलक शिक्षकक संग दू-दूटा भाए पाबि ज्‍योतियोकेँ दुनियाँ समतल बुझि पड़ैत। जइसँ कोनो तरहक असोकर्ज घर-सँ-बाहर धरि कखनो नहि बुझि पड़ैन। असोकर्ज तँ ओइठाम होइत जेतए एकपेरिया-चरिपेरियाक मिलन-भौक रहैए। आ भौक निर्भर करैए चलनिहारपर, जेतए जेहेन चलनिहार तेतए तेहेन भौक। ओना जैठाम बेसी चलनिहार रहैत ओतए कच्‍चियो सड़क पकी‍ए जकाँ सक्कत आ पकियो कच्‍चीए जकाँ बनि जाइत अछि। साइंस कौलेजमे सभसँ नीक नम्‍बरक संग ज्‍योति फिजिक्‍स विषयसँ नीक नम्‍वर पाबि एम.एस-सी. केली। जहिना अखराहापर लपटैत-लपटैत पहलवानक कश बनि जाइत तहिना ज्‍योतियोकेँ भेल‍। ‘नारी मुक्‍ति‍ संघ’क स्‍थापित अध्‍यक्ष होइक नाते पिताक– रघुनन्‍दनक–सिनेह ज्‍योतिपर आरो बेसी रहैन। ज्‍योतिकेँ कौलेज पहुँचैत-पहुँचैत तेसरो भाए नोकरी पकैड़‍ लेलैन‍, जइसँ आरो बेसी सुविधा ज्‍योतिकेँ प्राप्‍त हुअ लगल। ओना काजकेँ कर्म बना करैक अभ्‍यास सुलक्षणी बच्‍चेसँ लगबैत आएल रहैन। जइसँ घरक काजक जहैन‍ ज्‍योतिक जेहन तक पकैड़‍‍ नेने तँए जहिनगर। सदैत कर्मकेँ सहयोगी-प्रेमी जकाँ दुलरबैत, प्रेम करैत। तँए की‍ ज्‍योति सुलक्षणीक बेटी नहि?, परिवारक सभसँ बेसी सिनेही बेटी छिऐन। मुदा सुलक्षनीक मनमे सदैत एकटा कचोट कचोटिते रहैन जे कुल कन्‍याँ की? कुल तँ अनेको अछि जेना- गुरुकुल, पितृकुल, मातृकुल इत्‍यादि, जे प्रश्‍न अखनो धरि नै सोझरेलैन‍। एम.एस-सी. करिते दुनू बेकती–रघुनन्‍दन–केँ जहिना बिनु हवोक पीपरक पात‍ डोलए लगैत तहिना ज्‍योतिक प्रति सिनेह डोलए लगलैन‍। अनासुरती दुनू परानीक मनमे प्रश्‍न-पर-प्रश्‍न उठए लगलैन‍। बीस बर्खक बेटी भऽ गेल‍, बिआह करब माए-बापक कर्तव्‍य कर्म छी। कौलेजक अन्‍तिम सीढ़ीक आगू टपि चुकल‍ अछि इत्‍यादि। तैसंग ईहो जे पारदर्शी सीसा जकाँ ज्‍योतिक शरीर सेहो देखैथ जे जुआनीक रंग सगतैर‍‍ चमैक‍ रहल छइ...। ओना कौलेजक आन छात्रा जकाँ नहि, मिथिलाक धरोहैर‍ कुल-कन्‍याँ जकाँ। जे गुरुकुलमे विद्याध्‍ययन करैत। दुनू परानीक दायित्व बुझि रघुनन्‍दन पत्नीकेँ पुछलखिन- “ज्‍योति बिआहै-जोकर भेल जाइए से की विचार?” संयासिनी जकाँ सुलक्षणी उत्तर देलकैन- “अपन कोनो काज पछुआ कऽ नै रखने छी, जे बाँकी अछि ओ अहाँक छी। तैबीच हम की विचार देब?” पत्नीक उत्तर सुनि रघुनन्‍दन तिलमिला लगला। मनमे उठलैन- एहेन उटपटांग उत्तर किए देलैन‍? मुदा सोल्‍होअना अनुमानोसँ कोनो बात नै बुझल जा सकैए‍। नीक हएत जे पुन: प्रश्‍न उठा आगू बजबाबी। ई बात निसचित जे एको परिवारमे काजक हिसाबे सबहक सोचै-विचारै आ बुझैक ढंग फुट-फुट भऽ जाइ छइ। भलेँ सासुसँ ऊपर किए ने जेठ-सासु मानल जाए, मुदा सासु तँ सासु होइत। जहिना देवालयक कपाट लग ठाढ़ भक्‍त हाथ जोड़ि अपन दुखरा भगवानकेँ सुनबैत तहिना तरपैत रघुनन्‍दन पत्नीकेँ पुछलखिन- “संयासिनी जकाँ किए घरसँ पड़ाए चाहै छी! बिसैर रहल छी जे घरनी सेहो छी?” पतिक गंभीर विचारकेँ अँकिते सुलक्षणीक करेज कलैप‍ उठलैन‍। मुदा पानिक बहैत बेगमे जहिना गोरसँ गोरिया-गोरिया‍ गोर उठौल जाइत तहिना सुलक्षणी ज्‍योतिक जिनगीक धारामे ठाढ़ होइत बजली- “अहूँ कोनो हूसल नै छी, सभ माए-बाप बेटा-बेटीकेँ बच्‍चे बुझैए। मुदा एतए से बात नहि अछि। अहाँ लिए भलेँ ज्‍योति बच्‍चा हुअए मुदा ओ ओइ सीढ़ीपर पहुँच गेल अछि, जेतए मनुख अपन जिनगीक बाट चुनैक गुण प्राप्‍त कऽ लइए। तँए दुइए परानी नहि, बेटो-पुतोहुसँ विचारि लिअ।” सेन्‍ट्रल बैंकक ब्रांच मनेजर–भोगेश्वर–क संग ज्‍योतिक बिआहक बात पक्का भऽ गेल। जहिना ज्‍योति तहिना भोगेश्वर। दुनूक अद्भुत मिलानी। विषुवत रेखाक समान दूरीपर जहिना उत्तरो आ दच्‍छिनो समान मौसम, समान उपजा-वाड़ी होइत अछि तहिना। अलेल कमाइ तँए छिड़ियाएल जिनगी भोगेश्वरक। हजारो कोस हटि भोगेश्वर अपन परिवारसँ रहैत। नव-नव वस्‍तुसँ भरल बजार, जे दुनियाँक एक कोणसँ दोसर कोण पहुँचैत, भोगेश्वर चकाचौंधमे हेरा अपन माइयो-बाप आ भाइयो-भौजाइसँ दूर भऽ गेल। किए ने हएत? जखन सभकेँ अपन कर्मक फल भोगैक अधिकार छै तँ भोगेश्वरो किए ने भोगत। एक तँ दिन राति रूपैआक पेँच-पाँचक गुत्‍थी खोलैक क्षमता तैपर जेकरे माए मरै तेकरे पात भात नहि?’ नीक बर पाबि रघुनन्‍दन चन्‍दाक तिजोरी माने नारी मुक्‍ति‍ संघक कोष खोलि देलैन‍। कोनो अनचितो तँ नहियेँ केलैन‍। चन्‍दो तँ मुक्‍तीए लेल अछि। एक तँ मनी-ग्रुप अर्थशास्‍त्रसँ पी.चए-डी. तैपर सँ सेन्‍ट्रल बैकक शाखा-प्रबन्‍धक, किए नै भोगेश्वर अपन अधिकारक उपयोग करत। बिआहक दिन तँइ भऽ गेल। तैबीच ज्‍योतिकेँ, मास दिन पूर्व देल आवेदनक इन्‍टरभ्यूक चिट्ठी भेटलैन‍। तहूमे बिआहक दिनसँ तीन दिन पूर्वक दोहरी काज परिवारमे बजैर गेलैन‍। छोड़ैबला कोनो नहि। तैपर ज्‍योति सेहो बिआहकेँ माइनस आ इन्‍टरभ्यूकेँ पलसमे हिसाब लगबैत। एमहर बिआहक ओरियानक धुमसाही परिवारमे। मुदा ज्‍योति विपरीत दिशामे मुड़ि इन्‍टरभ्यू दइले अड़ि गेली। इन्‍टरभ्यू सेहो तँ लगमे नहियेँ जे दू-चारि घन्‍टा समए लगा पुरौल जा सकैए। दच्‍छिन भारत, जे लगमे नहि अछि। केतबो तेज दौड़ैबला गाड़ी भेल तैयो चौबीस घन्‍टासँ पहिने नै पहुँच‍ सकैए। तहूमे बिआह सन शुभ काजमे बर-कन्‍याँकेँ सुरक्षित रहब जरूरी अछि। तँए सीमा केना पार कएल जाएत। गाड़ी-सवारीक कोन ठेकान...। ज्‍योतिक प्रश्‍न परिवारकेँ स्‍तब्‍ध केने। जेठ भाय–प्रेम कुमार–क सिनेह ज्‍योतिपर उमैड़ पड़लैन‍। हिसाब लगबैत पिताकेँ कहलखिन- “बिआहक दिनसँ चौबीस घन्‍टा पहिने अबस्‍स पहुँच‍‍ जाएब। अहाँ सभ बिआहक ओरियान करू ज्‍योतिक संग अपने जाइ छी।” प्रेम कुमारक विचारसँ रघुनन्‍दन दुनू काज होइत देख खुशी भेला। मुदा सुलक्षणीक मन आरो बेसी करुआए लगलैन‍। मुदा खोलि कऽ बजती केना? एक तँ पुरुष-प्रधान परिवार तैपर सभ बापूतक एक विचार। स्‍त्रीगणक कोनो ठेकाने नहि। कहैले ने चारि गोरे परिवारमे छी मुदा ननैद‍-भौजाइक सम्‍बन्‍ध केहेन होइ छै से की‍ केकरोसँ छिपल अछि। नीक हएत जे पोल्हा कऽ बेटीए-सँ पुछि ली। मुदा विध-बेवहारपर नजैर‍ पड़िते सबहक मन भँगैठ गेलैन‍। बिनु विधि-बेवहारक बिआह केहेन हएत। रस्‍ते-पेरे तँ सेहो लोक बिआह कऽ लइए मुदा परिवार केहेन बनै छइ। आठो दिन तँ कम-सँ-कम विध-बेवहारमे लगबे करत। खाएर जे से...। ज्‍योतिक इन्‍टरभ्यूओ आ बिआहो भऽ गेलैन‍। अद्भुत बिआह तँए समाजमे चर्चाक विषय बनल। चर्चो मुँह देख मुंगबा परसैबला। जेहेन मुँह तेहेन मुंगबा। कियो बर-कन्‍याँक शिक्षाक चर्च करैत, तँ कियो युगक अनुकूल बर-कन्‍याँक जोड़ाक। कियो विध-बेवहारक लहासक चर्च करैत तँ कियो समाजक अगुआएल नारी जातिक चर्च करैत। तहिना केतौ भोज-भातक चर्च चलए लगल, तँ केतौ गमैया बरियातीक संग बजरूआ बरियातीक चर्च चलए लगल। मेल-पाँच बरियाती तँए सबहक बात दमगर। इनार पोखैरक घाटसँ लऽ कऽ दुआर-दरबज्‍जा धरि सौंसे गाममे जेना संसद चलए लगल। मुदा सबहक मन भोगेश्वर आ ज्‍योतिक वैवाहिक बन्‍धनपर जा कऽ अँटैक‍ जाइन। बिआहक तीन दिन पछाइत‍‍ भोगेश्वर दुरागमनक प्रस्‍ताव रखलैन। प्रस्‍ताव सुनि परिवारक सबहक मनमे सभ रंगक विचारक संग उत्तरो उठलैन‍। मुदा आगू बढ़ि कियो बजैले तैयार नहि। मने-मन सुलक्षणी सोचैथ जे बिआहक साल तँ बर-कनियाँक विध-बेवहार होइ छइ। जँ विधि-बेवहारक कारण नै होइ छै तँ किए सौन-भादो आ पूस-माघ बेटीक विदागरी नै होइए। बिनु विधि-बेवहारक बिआह तँ ओहने हएत जेहेन बिनु मसल्‍लाक तरकारी। कहैले ने लोक बजैए‍ जे फल्‍लां चीजक तरकारी खेलौं मुदा की‍ बिनु मसल्‍लेक बनल छेलइ? जँ मसल्‍लोक सागिरदीसँ तरकारी बनल तँ ओकर चर्च किए ने होइ छइ? तर-ऊपर मनकेँ होइतो कण्‍ठसँ निच्‍चे सुलक्षणी अपन विचारकेँ अँटका रखली। रघुनन्‍दनक मनमे भिन्ने विचार औंढ़ मारैत रहैन। मुदा गारजनक हैसियतसँ औगता कऽ बाजब उचित नै बुझि, सुरखुराइत मनकेँ रोकने रहला। मुदा तैयो होनि जे बिनु कहने बुझता केना? भीतरे-भीतर मन बजैत रहैन जे जहिना बीजू[1] गाछ कलमी डारिमे छीलि कऽ डोरीसँ बान्‍हि किछु मास जुटैले छोड़ि देल जाइत तहिना ने बिआहो छी। फागुनक कनियाँ जँ फागुनेमे सासुर चलि जाथि तँ समन जरैत देखब सासुरमे नीक हेतैन‍? चैताबरक टाँहि सासुरमे नव-कनियाँकेँ देब उचित हएत? तेतबे नहि, जँ से हएत तखन आमक गाछीक मचकीक बरहमासा आ सौनक राधा-कृष्‍णक कदमक गाछक झूलाक अर्थे की रहत? तहीले ने बिआह-दुरागमनक बीच समयक फाँक रहैए‍। भलेँ नै बनैबला रहत तँ पान साल आकि तीन साल नै निमहौ, मुदा सालो तँ टपबए पड़त। जँ से नै टपत तँ केना सासु-ससुर, सारि-सरहोजि, सार-बहनोइ आकि सर-समाजक बीच सम्‍बन्‍ध बनत? परिवारक बीच कम्‍मो दिनमे सम्‍बन्‍ध स्‍थापित भऽ सकैए, मुदा समाज तँ नम्‍हरो आ गहींरगरो होइ छइ। कोनो धारक पानिक पैमाना तँ तखन ने नीकसँ नपाएत जखन भादोक बढ़ल आ जेठक सटकल पेटक पानि नापल जाएत। तहिना ने समाजो छी। अपना गरजे लोक थोड़े जुड़शीतल आ फगुआ आन मासमे कऽ लेत। जँ से करत तँ चरि-टँगा आ दू-टँगामे अन्‍तरे कथी भेलइ? एतबे ने, जे बिनु सिंह-नाँगैरक रहत..? रघुनन्‍दन मन ममोड़ि कऽ चुप छला। अनेको कारण अनेको समस्‍या मनकेँ घेर‍ लेलकैन‍। ज्‍योतिक भाए-भौजाइ‍ अखन धरि धर्मसूत्र आ गृहसूत्र पढ़नहि ने छैथ, तँए हुनका सभकेँ कोनो चिन्‍ता मनमे रहबे ने करैन‍। नोकरिया रहने मनमे उठैत रहैन जे जेते जल्‍दी काज फरिया जाएत ओते जल्‍दी जान हल्‍लुक हएत। अनेरे सी.एल. दुइर भऽ रहल अछि। मुदा से सारे-सरहोजिक मनमे नै रहैन‍, भोगेश्वरक मनमे सेहो सएह रहैन। बैंकमे घन्‍टाक कोन बात जे मिनटोक महत अछि। हरिदम पाइयेक बर्खा, पाइयेक हिसाब-वारी। अनेरे पाभैर‍ खाइले दिन-राति सासुर ओगरब, कोन कबिल्‍ती हएत। स्‍त्रीए लऽ कऽ ने सासुर, आ जे संगे रहत तँ सभदिना सासुर नै भेल? जरूर भेल। अपना परिवारकेँ जँ सासुर बना सौंसे गाम जे ओझहे बनि जाएत तँ केकरा सोझहा जाइक आँखि-मुँह रहत? मुदा तीनू भाँइ प्रेम कुमार चुप्‍पी लादि लेलैन‍ जे अखन घरक गारजन माए-बाबू छैथ,‍ तँए किछु बाजब उचित नहि। मुदा तीनू भाँइक मनमे ई शंका जरूर होनि जे स्‍त्रीगणक सोभाव होइत अछि जे पुरुखक टीकपर चढ़ि कऽ मुरगीक बाँग देब। तैसंग समाजोक डर। समाज तँ ओहन शक्‍ति‍ छी जे बिनु डोरी‍-पगहाक रहनौं,चपरासीसँ लाट साहैब धरि सजौने अछि। हाकिम-हुकुम आ रिनियाँ-महाजन रहै वा नहि। भलेँ बिलाइ बाझकेँ खाए वा बिलाइकेँ बाझ...। जखनसँ जमाइबाबूक दुरागमनक प्रस्‍ताव परिवारमे आएल तखनसँ सभ सकदम! चुप्‍पा-चुप, धुप्‍पा-धुप परिवारमे पसैर गेल। जइसँ धारक पानि जकाँ बहैत बोल ठमैक कऽ‍ भौर लिअ लगल। ओना, सबहक बन्न मुँह रहितो आँखिक नाच जोर पकड़नहि छेलैन, मुदा सिरिफ मूक नाच। जेठुआ गरेक सूर-सार देखते जहिना सचेत लोक पहिने बाल-बच्‍चा आ माल-जालक उपाय सोचि आगू डेग उठबैए‍ तहिना रघुनन्‍दनकेँ अपन भार परिवारक बीच उठबैक विचार भेलैन‍। फुरलैन‍, ‘संग मिल करी काज हारने-जीतने कोनो ने लाज।’ जाधैर‍‍ नीक-अधलाक बीचक सीमा-सरहद नै बुझल जाएत ताधैर‍‍ हारि-जीतक चर्चे बचकानी। मुदा समाजो आ परिवारोक तँ चलैक रस्‍ता अछिए...। रघुनन्‍दनक मनमे खुशी उपकलैन‍, खुशी उपैकते मुँह कलशलैन‍। मुदा सुलक्षणीक मन महुराएले रहैन! किए ने महुराएल रहतैन‍? जेकरा मुँहमे ने थाल-कादो लगल अछि आ ने पसेनाक सुखाएल टघार अछि, ओ किए ने रूमालेसँ काज-चला लेत। मुदा जेकरा मुँहमे थालो आ तह-दर-तह सूखल पसेनोक टघार छै, ओ केना बिनु पानियेँ धोनौं चिक्कन हएत! की अपनो मन मानत? सहमत भऽ परिवारक सभ सदस्‍य सुलक्षणीकेँ बजैक भार देलकैन‍। सुलक्षणी बजली- “ओना तँ साल भरि, नइ तँ छह मास, जँ सेहो नहि, तँ तीनियोँ मास आ जँ सेहो नै तँ एको पनरहिया नै रूकता तँ केना हेतैन‍। जँ से नै मानता तँ हमहूँ नै मानबैन‍।” सासुक निर्णए सुनि अपन शक्‍ति‍क प्रयोग करैत भोगेश्वर बजला- “अपन अधिकार क्षेत्रसँ अनचिन्‍ह भऽ बाजि रहल छैथ। तँए..?” भोगेश्वरक बात सुनि ज्‍योतिक हृदैमे तरंग उठलैन‍। तरंगित होइते मुँह तोड़ि उत्तर दिअ चाहली। मुदा इन्‍टरभ्यू मन पड़िते ठमैक गेली। मुँह तँ बन्न रहलैन‍ मुदा मनमे तीन परिवारक टक्कर उठलैन‍- रूइया सदृश वादलक टक्करसँ जखन ठनका बनि सकैए, तँ तीन परिवारक तीन जिनगीक रग्‍गर केते शक्‍ति‍शाली भऽ सकैए! दिन-रातिक सीमा-सरहद तोड़ि ज्‍योति पतिकेँ कहलैन‍- “अधिकार आ कर्तव्‍य हर मनुखक धरोहर‍ सम्‍पैत‍ छिऐ, नै कि खास बेकती‍क खास।” ज्‍योतिक विचार सुनि भोगेश्वरक देह सिहैर‍ उठलैन। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत बजला- “साते दिनक छुट्टी अछि। एक तँ अहुना आन-आन विभागसँ कम छुट्टी बैंकमे होइ छै, तहूमे एते सुविधा भेटै छै जे काज केनिहार ओहो छुट्टी काजेमे लगबए चाहैए।” तैबीच ज्‍योतिक मोबाइलिक घन्‍टी टुनटुनाएल। अनभुआर नम्‍बर देख सावधानीसँ ज्‍योति रिसीभ करैत बजली- “हेलो।” “हेलो।” “अपने केतए-सँ बजै छी?” “विज्ञान शोध संस्‍थानसँ। सात दिनक भीतर आबि ज्‍वाइन कऽ लिअ। ओना, चिट्ठियो पठा देने छी।” ज्‍वाइनिंग-दे सुनि ज्‍योतिक मन ओहिना खिल उठलैन‍ जहिना कोनो कली कोनो वस्‍तुक तर दबाएल रहैए आ समए पाबि एकाएक फुरफुरा कऽ खिलैत फूलक रूपमे आबि जाइए...। अखन धरिक विचार ज्‍योतिक तर पड़ि गेलैन‍ आ नव दुनियाँक नव विचार मनक ऊपर चढ़ि एलैन‍। सभसँ पहिने पिता दिस तकैत बजली- “बाबूजी, अपन कर्तव्‍य जइ रूपे अहाँ निमाहलौं तेना बहुत कम लोक निमाहि पबैए। अपने महान छी। आग्रह करब जे केकरो जिनगीक रस्‍ताक बाधक नै बनिऐ।” ज्‍योतिक बात नै बुझि‍ जिज्ञासा करैत प्रेम कुमार प्रश्‍न उठौलैन‍- “की रस्‍ताक बाधा?” “भाय साहैब, अखन जवाबक उचित समए नै अछि। अखन एतबे कहब जे काल्हि‍ चलि कऽ हमरा शोध संस्‍थान धरि पहुँचा दिअ।” बेटीक बात सुनि सुलक्षणी बजली- “आइ तीनियेँ दिन बिआहक भेलह हेन, बहुत विध-बेवहार पछुआएल छह।” “जे पछुआएल अछि ओ पाछू हएत। मुदा कोनो हालतमे काल्हि जेबे करब, चाहे..!” ज्‍योतिक संकल्‍पि‍त विचार सुनि भोगेश्वर बजला- “भाय-साहैब, काल्हि‍ये हमहूँ चलि जाएब। सभ संगे चलब, हम हाबड़ामे उतैर जाएब आ अपने सभ आगू बढ़ि जाएब।” सएह भेल। ज्‍योतिकेँ शोध संस्‍थान पहुँचा तीनू भाँइ घुमि कऽ घर आबि गेला। उर्वर भूमिक बनल परतीमे जहिना जोत-कोर आ नमीक संग बीआ पड़िते, किछुए दिन पछाइत‍‍ हरिया उठैत तहिना ज्‍योतिक उर्वर शक्‍ति‍मे अनुसन्‍धानक नव-नव अँकुर पानिक हिलकोर जकाँ उठए लगल। तहूमे एक नहि, अनेक अँकुर। जहिना पोखैरमे झि‍झरी जकाँ पानिक हिलकोर चलैत तहिना ज्‍योतिक मनमे चलए लगलैन‍। जहिना भूखल बेकती‍केँ अपन अन्नक भण्‍डार भेने, वस्‍त्रहीनकेँ वस्‍त्र भेने, गृह विहीनकेँ गृह भेने विशाल जल-राशिक‍‍ नदी सदृश मन उफैन‍ जाइत तहिना ज्‍योतिक मन उफनए लगल। आइ धरिक दुनियाँ। नव दुनियाँ, नव-नव सुरूज-चान, ग्रह-नक्षत्र, नव-नव वस्‍तुसँ सजल दुनियाँ ज्‍योतिक आँखिक आगू नाचए लगल। ओ दुनियाँ जैठाम पहुँच‍‍ मनुख सृजन शक्‍ति‍ प्राप्‍त कऽ सृजक बनि सृजन करए लगैत...। ज्‍योति ज्‍योति नै सृजक बनि गेली। नन्‍दन बोनक माली जहिना अपन जिनगी ओइ बोनकेँ उत्‍सर्ग कऽ नव-नव फूल-फलक गाछ आन-आन जगहसँ जोहि आनि फुलवाड़ी सृजैत, जेकरा देख माली पुत्र अपन भविस बुझि एक संग छिड़ियाएल जामन्‍तो जिनगी लोढ़ि, फुलडाली सजा, देव मन्‍दिर लेल रखए चाहैत तहिना ज्‍योतियोकेँ श्रृंगी ऋृषि‍क विशाल उपवन भेट गेलैन‍। भेटिते ओइ माली पुत्र जकाँ अपन भविस देखए लगली। दू धारक बीच महारपर ठाढ़ भऽ, एक दिस तरा-ऊपरी गिरल मनुख तँ दोसर दिस जिनगीक खेलौना हाथमे नेने समुद्र दिस पीह-पाह करैत धारमे उधियाएल जाइत। उगैत-डुमैत ज्‍योति देखली जे कियो मात्र पति-पत्नीक जीवन लीलाकेँ जिनगी बुझि, तँ कियो अमरलत्ती सदृश वंश-वृक्षपर लतरबकेँ, कियो धार-समुद्रक बीच धरतीकेँ, तँ कियो अकास-पतालक बीचक विशाल वसुदेवकेँ...। देखैत-देखैत ज्‍योतिक मन बेसम्‍हार भऽ गेलैन‍। अपन जुआनीक खिलैत कलीक संग चढ़ैत तन, उफनैत मनकेँ सम्‍हारि धारमे कुदए चाहली। मुदा मनमे नचलैन‍ माए-बाप, धरतीक प्रथम गुरु। जहिना शि‍क्षक सिलेटपर खाँत लिखि शि‍ष्‍यकेँ सिखबैत तहिना शिष्‍य सेहो ने लिखि-लिखि शि‍क्षकसँ शुद्ध करबैत। शुद्ध होइते ओहो खाँत ने खाँत बनि जाइत...। सिनेमाक रील जकाँ ज्‍योति कुमारीक नजैर माता-पिताक सटले पतिपर पड़लैन‍। मुदा ओ किछुए क्षण धरि मनमे अँटकलैन‍। मनमे उठि गेलैन- बिआहक विधो तँ पछुआएले अछि..! लगले फेर माता-पिता आबि आगूमे ठाढ़ भऽ गेलैन। राति-दिन ज्‍योतिक मन सौनक मेघ जकाँ उमड़ए-घुमड़ए लगल। धारमे चलैत नाह जकाँ डोलि-पत्ता हुअ लगल। आँखि उठा तकली‍ तँ देखलैन‍ जे माता-पिता छोड़ि कहाँ कियो छैथ। फेर लगले मन घुमलैन‍ तँ सभ किछु देखली। की नै अछि? मातृभूमिक संग पितृभूमि सेहो अछि। मनमे खुशी एलैन‍। होइत भोर कागत-कलम निकालि ज्‍योति पिताकेँ पत्र लिखए लगली- “माता-पिता, सहस्‍त्र कोटि प्रणाम! एक जिनगीक आखरी आ दोसरक पहिल पत्र लिखैत मन उमैक‍ रहल अछि। तँए केतौ शुद्ध-अशुद्ध लिखा जाए, से माफ करैत सुधारि कऽ पढ़ि लेब। अपने लोकनिक सेवा, शि‍खर सदृश शि‍ष्‍य जकाँ शि‍रोधार्य केने रहब। जहिना वादलक बून धरतीपर अबिते धरिया धार होइत समुद्र दिस बढ़ैत तहिना अपने लोकनि धरिया देलौं। कुल-कन्‍याँ वा कुल-कलंकिनी बनब हमर कर्म छी। मुदा बेटी तँ अहींक छी। हमहूँ तँ एतै बसब। तँए ताधैर‍‍क छुट्टी असीरवादक संग दिअ जे बास बना बसए लगी। अहींक ज्‍योति” पत्र पहुँचते अह्लादसँ दुनू बेकती रघुनन्‍दन-सुलक्षणी अपन ज्‍योति बेटीक पत्र पढ़ैक सुर-सार केलैन‍। पत्रपर नजैर‍ दौड़ैबते दुनू बेकती अलिसा गेला। आगूमे अन्‍हार पसैर गेलैन‍। मुदा लगले मनक भक्क् खोलि रघुनन्‍दन पत्नीकेँ कहलखिन- “पत्रक उत्तर देब जरूरी अछि, मुदा की लिखब से फुरबे ने करैए।” गर्म-ठंढक बीच जेहने सीमा असथिर रहैत तेहने चित्ते सुलक्षणी पतिकेँ विचार देलखिन- “कोन लपौड़ीमे पड़ल छी। माए-बाप केकरो जन्‍म दइ छइ। जीबैले अपने ने रौद-वसात सहए पड़तै। आब अहीं कहू जे एहनो बात पत्रमे लिखि वेचारीकेँ पढ़ैक समए बरदेबै? रहल असीरवादक तँ एतैसँ दुनू परानी मिल दऽ दियौ।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 3300 (ई कथा, युवा साहित्‍यकार- श्री आशीष अनचिन्‍हार लेल) मायराम अमावस्‍याक राति, बारहसँ ऊपर भऽ गेल छल मुदा एक नै बाजल रहइ। डन्‍डी-तराजू माथसँ निच्‍चाँ उतैर गेल छल। सन-सन करैत अन्‍हार...। नित्‍य नअ बजेमे निन्न पड़ैवाली मायरामकेँ आइ आँखिक नीन निपत्ता छैन, रातिक एक बजैबला अछि। कछमछ करैत मायराम ओछाइनपर एक करसँ दोसर कर उनटैत-पुनटैत समय बीता रहल छैथ, अकैछ कऽ केबाड़ खोलि बाहर निकलली तँ काजर घोराएल रातिमे अपनो हाथ-पएर नै सुझि रहल छैन‍। जहिना करिछौंह दुनियाँकेँ आँखिसँ देखब कठिन होइत तहिना दसो दुआरि बन्न, मन खलियाएल बुझि पड़लैन‍। पुन: घुमि कऽ ओछाइनपर आबि ओंघरा गेली! दिन-रातिक बोध-विहीन मायरामक मन तड़ैप‍ उठलैन‍- “नैहर!” पहिल सन्‍तान होइते सुदामा (मायराम) बाइसे बर्खमे विधवा भऽ गेली। गत्र-गत्रसँ जुआनी, फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ छिटकैत रहैन। ओना सरकारी रजिष्टरमे जुआन भऽ गेल छेली मुदा बत्तीसीक अन्‍तिम दाना नै उगल रहैन‍। साँपक बीखसँ पतिक करियाएल देह देख अपनो मरनासन भऽ गेली। पथराएल आँखि टक-टक टकैत मुदा अन्‍हारसँ अन्‍हराएल। बगलमे डेढ़ बर्खक बेटा उठैत-खसैत अँगना-घर घुमैत-फि‍ड़ैत। तैबीच हहाएल-फुहाएल शंकरदेव आँखिमे यमुनाक धार नेने पहुँचला। बहिन-बहनोइक रूप देख शंकरदेव अपन आँखिक नोर पोछि भागिनकेँ उठा छाती सटा सुदामाकेँ कहलखिन- “बुच्‍ची, होश करू। दुनियाँक यएह खेल छिऐ। अहीं जकाँ नानियोँकेँ भेल रहैन। मुदा आइ केहेन भरल-पूरल परिवार छैन‍। एक-ने-एक दिन, ओहिना अहूँक परिवार दुनियाँक फुलवाड़ीमे फुलाएत।” शंकरदेवक बात सुनि सुदामाक आँखि तँ खुजलैन मुदा बकार नइ फुटलैन‍। नर-नारीक करेजो तँ दू धारक दू माटि सदृश होइत अछि। बहनोइक पार्थिव शरीरकेँ जरबैक ओरियानमे आँगनसँ निकैल शंकरदेव समाज दिस बढ़ला। पनरहम दिन बहिनकेँ संग नेने अपना गाम विदा भेला। गामक सीमानपर अबिते कन्नारोहट शुरू भेल। बच्‍चासँ बुढ़‍ धरि सुदामाकेँ छाती लगबए आगू बढ़ल। वेचारी निसहाय भेल ओहिना पड़ल छेली जहिना चोंगरा परहक घर खसल-पड़ल रहैए। मुदा ताधैर‍‍ गामक धरोहिक ऐगला अंक पहुँच‍‍ गेल। एक्के-दुइए ढेरो छाती सुदामाक छातीमे सटि, चारू दिससँ पकैड़‍‍ टोल दिस बढ़ल। सुदामाक मनमे उठलैन‍ जँ अपने कानब तँ समाजक कानब केना सुनबै? से नइ तँ समाजेक कानब सुनी‍‍ जे आगूक जिनगी केना जीब...। जहिना बीच आँगनमे माए ओंघरनियाँ दैत तहिना दरबज्‍जापर पिता भुइयेँमे पेटकान देने! अपन-अपन अथाह समुद्रमे सभ डुमल। के केकर नोर पोछत। दुनू पएर धोइ भतीजी गाराजोरी केने आँगन बढ़ली। दुरखापर पएर दैतै सुदामाक रूदनसँ बहराएल- “हे मइया...।” जहिना धड़सँ कटल अंग छटपटाइत तहिना माइक मन छटपटाइत रहैन। छटपटाइत कामिनीक मनमे प्रश्‍न-पर-प्रश्‍न उठए लगलैन‍। मुदा कोनो प्रश्‍नक सोझ रस्‍ता नै देख काँटक ओझरी जकाँ मन ओझराए लगलैन‍। एक ओझरी छोड़बैथ‍ आकि बिच्‍चेमे दोसर लगि जाइन। की‍‍ आगूक जिनगी लेल बेटीकेँ दोसर बिआह कऽ देब? मुदा फेर मन उनैट‍ जानि जे जिनगी लेल सहचर तँ आवश्यक अछि! की सहचर लेल पति आवश्यक अछि? मुदा जेते असानीसँ गुंथी खोलए चाहैथ ओते असानीसँ खुजबे ने करैन‍। तैबीच दोसर प्रश्‍न अकुँरि गेलैन- बेटीक संग नातियो अछि। जँ बेटी दोसर घरकेँ अपन घर बनौत तँ नातिक..? पुत्र हत्‍याक पाप केकर कपार चढ़त? की‍ कुत्ता जकाँ पछिलग्‍गू एहेन सुकुमार फूलकेँ बना देब? अखन ओ दूधमुँह अछि, की‍ बुझत? की अपन भूमि आ आनक भूमिक मर्जादा एक्के रंग होइत? की दोसरो घरमे ओहने ममता माइक भेटतै? मनुक्‍खेक क्रि‍या-कलाप ने कुल-खनदानक जड़िमे पानि ढारैए‍। कामिनीक घुरियाएल मनकेँ राह भेटलैन‍। सुफल नारी जिनगी तँ वएह ने छी जेकरा आँचरक लाल मातृत्‍व प्रदान करैए‍। जइसँ वीणाक झंकृत मधुर स्‍वर हृदैकेँ कम्‍पि‍त करैत रहै छइ। से तँ भेटिये गेल छइ। मुदा जहिना ठनकैत अकाससँ ठनका खसैत तहिना मनमे खसलैन‍- “मुदा समाज?” की‍ मनुख-पोनगैक स्‍थिति समाजमे जीवित अछि? सुदामाक सम्‍पन्न पितृ परिवार। अदौसँ श्रम-संस्‍कृतिक बीच पुष्‍पि‍त-पल्‍लवित परिवार। जइसँ रग-रगमे समाएल अपन संस्‍कृति। ओना सम्‍पन्नताक सीमा असीमित अछि, मुदा परिवार आँट-पेट देख अपन (परिवार) जिनगीक स्‍तर बना चलब सम्‍पन्नताक अनेको कारणमे एक प्रमुख छी। तँए सम्‍पन्न परिवार। ओना आर्थिक दृष्‍टि‍ए सुदामाक बिआह दब परिवारमे भेल छेलैन‍ मुदा बेवहारिक दृष्‍टि‍ए बरबैर‍‍मे छेलैन‍। कम रहितो गोरहा खेत छेलैन‍ जइसँ खाइ-पीबैक कोताही नहि। किछु आगूओ बढ़ि ससरैत। सालक तेरहम मासमे घरक कोठी-भरली झाड़ि इजोरिया दुतियासँ भागवत कथाक संग हरिवंश कथा सुनि, भोज-भनडारा कऽ सामा-चकेबा जकाँ आगू दिस बढ़ैत। बेटाक पालन आ धर्मक काज देख अपनो गाम आ चौबगलियो गामक लोक सुदामक नाओं ‘मायराम’ रखि देलकैन‍। बच्‍चासँ बुढ़ धरि ‘मायराम’ कहए लगलैन‍। रविशंकरक परिवारमे चूल्हि‍ नै पजड़ल। जखन सुदामा आएल तखन जे कन्नारोहट शुरू भेल, से भरि दिन होइते रहि गेल। कखनो बेसी तँ कखनो कम। चूल्हि‍ नै पजरने टोल-पड़ोसक परिवारसँ थारी-थारी भात, दालि एतेक आएल जे राति धरि चलैत रहल। सायंकाल रविशंकर आँगनक ओसरपर बैस, सुदामाक भावी जिनगी लेल पत्नियोँ आ बेटो-पुतोहुकेँ बैसा विचार करए लगला। विचारोत्तर निर्णए भेल जे काल्हिए शंकरदेव सुदामाक सासुर जा खेती गिरहस्‍ती ताधैर‍ सम्‍हारैथ‍ जाधैर‍ सुदामाक बेटा जुआन नै भऽ जाएत। तैसंग ईहो विचार भेल जे छह मास सासुर आ छह मास नैहरमे सुदामा रहत। अठारह बर्ख पुरिते राहुलक बिआह भऽ गेल। नव परिवार बनि ठाढ़ भेल। शंकरदेव अपना ऐठाम चलि एला। तीन सालक पछाइत‍ रविशंकर आ पाँच सालक पछाइत कामिनी मरि गेली। मुदा दुनू ठामक परिवारमे कोनो कमी नै रहल। हवाइ-जहाज जकाँ तेज गतिए तँ नहि, मुदा टायरगाड़ी सदृश असथिर सवारी जकाँ परिवार आगू मुहेँ ससरए लगल। मायरामक प्रति समाजक नजरिया सेहो बदलल। समाजक आन विधवा जकाँ नहि, जे कियो अशुभ बुझि कनछी कटैत तँ कियो पशुवत बेवहार लेल मरड़ाइत रहैत। बल्‍कि तीर्थस्‍थान जकाँ मायरामक परिवार बनि गेलैन‍। ‘भागवत कथा’क संग ‘हरिवंश कथा’ आ भोज-भनडारा कऽ समाजकेँ खुआ सालक विसर्जन साले-साल मायराम करए लगली। पाँच बर्खक पछाइत‍ मायरामक भरल-पुरल नैहर कोसीक कटनियासँ धार बनि गेल। गामक बीचो-बीच सनमुख धार बहए लगल। घटनो अजीब घटल। चारि बजे करीब बाढ़िक हल्‍ला गाममे भेल। किरिण डुमैत-डुमैत धारक कटनिया शुरू भेल। गामक सभ बाध नदिया गेल। उत्तर-सँ-दच्‍छिन मुहेँ बहए लगल। बाढ़िक बिकराल रूप देख गामक लोक माल-जाल, बक्‍सा-पेटीक संग ऊँचगर-ऊँचगर जमीनपर पहुँचल। नट-बक्‍खो जकाँ नव बास बनि गेल। बाढ़िक गुंगुआहैट सुनि-सुनि लोक सभ किछु बिसैर‍ अपन-अपन‍ परान बँचबैक गड़ लगबए लगल। चारू कात बाढ़ि पसरल। जइसँ ईहो डर होइत जे जँ कहीं अहूपर पानि चढ़त तखन की‍ हएत? अन्‍हरिया राति, हाथो-हाथ नै सुझैत। जीवन-मरनक मचकीपर सभ झूलए लगल। सबहक भूख-पियास मेटा गेल। जहिना दुखित नव बिआएल गाए-महींस बेथित आँखिए बच्‍चाकेँ देखैत तहिना सभ माए-बापक आँखि बाल-बच्‍चापर। मुदा मनुख तँ मनुख छी, जानवर तँ छी नहि जे हरियर घास देख बच्‍चो आगूक लूझि कऽ खा लइए‍। एना मनुख थोड़े करत। बाल-बच्‍चा लेल तँ मनुख अपन खूनकेँ पानि बनबैत, अपन सुआदकेँ छोलनी धिपा दगैत, अपन मनोरथ बच्‍चामे देखैए‍। अपन जिनगीकेँ बलिवेदीमे आहूत दइए‍। भोरहरबामे हल्‍ला भेल जे बीस नमरी पुल कटि कऽ दहा गेल! पुलक समाचार सुनि सबहक छाती डोलए लगल। पूव दिसक रस्‍ता बन्न भऽ गेल। किछुए कालक पछाइत‍ फेर हल्‍ला भेल जे बेटा संग रोगही पानिमे डुमि‍ गेल। किछु काल धरि तँ हल्‍लामे बाते नै फुटैत मुदा तोड़ मारि हल्‍लामे विहियाति-विहियाति समाचार विहिया गेल। भाँसि कऽ केते दूर गेल हएत तेकर ठेकान नहि, तँए कियो आगू बढ़ैक हूबे ने केलक। जहिना एक टाँग टुटने गनगुआरि नै नेंगराइत तहिना एक गोरेकेँ मुइने समाज थोड़े नेंगराएत। एना सभ दिन होइत एलै आ आगूओ होइत रहतै...। हल्‍ला शान्‍त होइते शंकरदेव पत्नीकेँ कहलखिन- “आब जान नै बँचत!” “एते अन्‍हारमे केतए जाएब। भने ऐठाम छी।” पत्नीक बात सुनि डेराइत शंकरदेवक मुहसँ निकलल- “जँ अहूपर बाढ़ि चढ़ि जाएत?” “सभ तूर संगे कोसीमे डुमि‍ जाएब। कियो बँचब तखन ने दुख हएत। जँ दुख केनिहारे नै रहब तँ दुख केकरा हएत।” पौरुकी घुटकल। आन-आन चिड़ै सुतले रहए। पौरुकीक अवाज सुनि शंकरदेवक मनमे दुबिक नव मुड़ी जकाँ, नव चेतना जगलैन‍। बजला- “भिनसर होइमे देरी नै अछि। जँए एतेकाल तँए कनीकाल आरो। दिन-देखार तँ असगरो लोक अमेरिका‍ चलि जाइए। अपना सभ तँ बाधक थोड़े रस्‍ता काटब।” किरिण उगैसँ पहिने‍ ऊँचकापर पानि चढ़ए लगल। चढ़ैत पानि देख हरविर्ड़ो भेल। गाए-महींस, बक्‍सा-पेटी छोड़ि‍ सभ अपन जान बँचबैक गड़ लगबए लगल। जहिना वैरागी दुनियाँकेँ मायाजाल मानि, छोड़ि‍, आत्‍म चिन्‍तनमे लगि जाइत तहिना माल-असबाव छोड़ि‍ अपन-अपन जान बँचाएब सोचए लगल। तही बीच बाँसक झोंझमे मैना सभमे तेना झौहैर उठल जेना केकरो वोनबिलाड़ि पकैड़‍‍ नेने होइ। पूब दिस फीक्का गुलावी जकाँ अकासमे पसरए लगल। मुदा बिलटैत जिनगी आ डुमैत सम्‍पैतक सोग एक-एक बेकतीक मनक अन्‍हारकेँ आरो बढ़बैत रहइ। सूखल जमीनपर पहुँचते छोट-छीन आशा शंकरदेवक मनमे जगलैन‍। मुदा चारू बच्‍चो आ पत्नियोँक मनमे दुधाएल चाटल दानाक खखरी जकाँ बेर-बेर शंका खिहारैत जे हो-न-हो, फेर ने कहीं आगूए-सँ बाढ़ि चलि आबए...। तैबीच मिरमिराइत पत्नी शंकरदेवक मुँह दिस तकैत बजली- “एते लोकक गाममे एक्कोटा संगी नै देख रहल छी!” “सभ अपने जान बँचबै पाछू अछि तखन के केकरा देखत।” “जाबे लोक, भरल-पूरल रहैए ताबे दुनियाँ हरियर बुझि पड़ै छइ। मुदा...।” “हँ, से तँ होइते छइ। मुदा...।” “हँ, ईहो होइ छइ। अखन माए जीबैए, केतए वौआएब। बच्‍चो सबहक मात्रि‍के भेल, अपनो नैहरे भेल आ अहूँक सासुरे।” पत्नीक बात सुनि शंकरदेव गुम भऽ गेला। मनमे चूल्हि‍पर खौलैत पानि जकाँ विचार तर-ऊपर हुअ लगलैन‍। बजला- “कहलौं तँ बड़बढ़ियाँ। मुदा सासुरसँ नीक बहिन ऐठाम हएत।” “केना?” “जइ दिन वेचारीक ऊपर विपैत आएल छेलै तइ दिन यएह देह अपन घर-परिवार छोड़ि‍ ठाढ़ भेल छेलइ। आइ की‍ हमरे गाम-घर मेटा रहल अछि आकि ओकरो नैहर।” “अहाँकेँ जे विचार हुअए।” “विचारे नहि, विपैतमे लोकक बुधि हेरा जाइ छइ। जइसँ नीक-अधलाक विचार नै कऽ पबैए‍। मुदा अहीं कहूँ जे सासुरमे कान्‍हपर कोदारि लऽ कऽ खेत-पथार जाएब, से केहेन हएत? अपन जे दुरगैत हएत से तँ हेबे करत, मुदा दुनू परिवारक की गति हएत?” बाढ़िक समाचार इलाकामे पसैर गेल। मायरामक कानमे सेहो पड़लैन‍। भाय-भौजाइक आशा-बाट तकैत मायराम बेटाकेँ संग केने आगू बढ़ली। मुदा किछु दूर बढ़लापर सोगसँ पथराएल पएर उठबे ने करैन‍। बाटक बगलक गाछक निच्‍चाँमे बैस बेटाकेँ कहलखिन- “राहुल, पएर तँ उठबे ने करैए। केना आगू जाएब? ता तूँ आगू बढ़ि कऽ देखहक।” छबो तूर शंकरदेव ऐ आशासँ झटकल अबैत जे जेते जल्‍दी पहुँचब ओते जल्‍दी बच्‍चा सभकेँ अन्न-पानिसँ भेँट हेतइ। रतुको सभ भुखाएले अछि। तैबीच राहुलक नजैर‍ मामपर आ मामक नजैर‍ भागिनपर पड़ल। नजैर‍ पड़िते राहुल दौड़ कऽ ठाढ़े मामाकेँ गोड़ लागि मामीक कोराक बच्‍चाकेँ अपना कोरामे लैत बाजल- “माइयो अबैए, मुदा डेगे ने उठै छेलइ। आगूमे बैसल अछि।” राहुलक बात सुनि मामी बच्‍चा सभकेँ कहलखिन- “भैयाकेँ गोड़ लगहुन।” बच्‍चाकेँ कोरामे नेने आगू-आगू राहुल आ पाछू-पाछू सभ कियो विदा भेला। सभसँ पाछू शंकरदेव अपने। मन पड़लैन‍ रतुका दृश्‍य। केना छनेमे छनाक् भऽ गेल! जिनगी भरिक जोड़ियाएल घरक वस्‍तु-जात आगि लगने आकि बाढ़ि एने केना लगले नास भऽ जाइ छइ! मान-प्रतिष्‍ठा, गुण-अवगुण, केना छनेमे केतए-सँ-केतए चलि जाइ छइ! ठीके लोक बजैए जे दिन धराबे तीन नाम। अपने छी जे एक दिन बहिनक रक्षक बनि ऐ गाममे छेलौं आ आइ..! एक दिन गाड़ीपर नाह आ एक दिन नाहपर गाड़ी! माटि-पानिक खेल छी। गंगा-यमुनाक बीच केतौ माटियो छै आकि खाली पानियेँ-पानि..! किछु फरिक्केसँ भाय-भौजाइकेँ अबैत देख मायरामक मन ओइ धरतीपर पहुँच‍‍ गेलैन‍ जे सात समुद्रक बीच अछि। एक ओद्रक रहितो एक भिखारी दोसर राजा!मनमे उठलैन- परोपट्टाक लोक सिनेहसँ ‘मायराम’ कहै छैथ‍ मुदा भैयाकेँ की कहतैन‍? की भैयाक कर्म बिगड़ल छैन? एक परिवारक बँचौल कर्म छैन‍। चान, सुरूज, धरती, ग्रह-नक्षत्र इत्‍यादि तँ अपना गतिए करोड़ो बर्खसँ नियमित चलि रहल अछि आ चलैत रहत, की मनुखोक गति ओहन भऽ सकैए, आकि चाने-सुरूज जकाँ मनुखोक चलैक एकबटीए अछि? ब्रह्मक अंश जीव‍ रहितो की फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ नै अछि? जेतए जेहेन जलवायु तेतए तेहेन उपजा-वारी! जँ केतौ वायु परानक रूपमे घट-घटकेँ आगू बढ़ैक प्रेरणा दैतो अछि, तँ वएह विषाक्‍त बनि परान नै लैत अछि? गोलाक चोटसँ जहिना पोखैरक पानिमे हिलकोर उठैत आ आस्‍ते-आस्‍ते असथिर होइत चिक्कन आँगन जकाँ सहीट बनि जाइत तहिना मायरामक मन सहीट हुअ लगलैन‍। मुदा लगले नजैर‍ उड़ि भतीजीपर गेलैन‍। भतीजीपर पहुँचते मन तरपए लगलैन‍। बाप रे बाप! एहेन दुरकालमे भैया केना इज्‍जत बँचौता? अपनो लग जमा किछु तँ नहियेँ अछि। साले-साल हिसाब फरिया लइ छी। हे भगवान! जँ केकरो दुखे दइ छिऐ आकि सुखे दइ छिऐ तँ तुलसी पात आकि दुबिक मुड़ी जकाँ खोंटि-खोंटि किए ने दइ छिऐ जे गुलाब-गेन्‍दा तोड़िए कऽ दऽ दइ छिऐ? लगले नजैर‍ मायराम छिप्‍पा जकाँ छिहैल‍ अपन मातृत्‍वपर पहुँच‍‍ गेलैन‍। केना बेटाकेँ पोसि-पालि ठाढ़ केलौं आ ई सभ...। लुधकी लागल एकटा गाछ फड़बे करत तइसँ गामक सबहक मुँहमे थोड़े जाएत। जेते मनुख अछि ओकरा तँ धरतीसँ अकास धरि चाहिए, तखन ने जीबैक आजादी भेटतै..? मुदा लगले जहिना पानि ठंढेने बर्फक रूप लिअ लगैत तहिना दूधसँ उपजैत दही जकाँ मायरामक मन सकताए लगलैन‍। साँस सुषुमा गेलैन‍। मनमे खौललैन‍- नैहर मेटा गेल तँए कि सासुरो मेटा गेल? जहिना भैया नैहरमे भैया छला तहिना अहूठाम भैया रहता। भगवान अपन कोखि अगते लऽ लेलैन‍ तँए की भतीजीकेँ अपन कोखिक नै बुझब? ऐठाम जे अछि ओ की भैयाक नइ छिऐन‍? खेत-पथार, घर-दुआरि चलि गेलैन‍ आकि हाथो-पएर चलि गेलैन? गुमे-गुम, जहिना मृत्‍युक अवसरपर गुम भऽ स्‍मरण कऽ निराकरणक बाट जोहल जाइत तहिना सभ कियो घरपर पहुँचला। ताधैर‍ पुतोहु माने रोहितक पत्नी हाँइ-हाँइ कऽ खिच्‍चैड़ आ अल्‍लूक सन्ना बना, बाट तकैत रहथिन। सबहक आँखि सभ दिस हुलैक-हुलैक वौआइत रहैन। तैबीच राहुलक कोरक छोटका बच्‍चा, घर देखते, बाजल- “दीदी, बड़ भूख लगल अछि?” बच्‍चाक बात सुनि मायरामक भक्क टुटलैन‍। अनासुरती मन पड़लैन बटोहीकेँ जहिना इनारपर ठाढ़े-ठाढ़ पानि पिऔल जाइत तहिना ने अखन ईहो सभ छैथ। नहाय-धोयमे अनेरे देरी किए लगाएब। बजली- “कनियाँ, भरि रातिक थाकल-ठेहियाएल सभ छैथ,‍ तँए पहिने किछु खुआ कऽ अराम करए दियौन। गप-सप्‍प पछाइतो‍ हेतइ। भोजन बादेक अराम तँ सोग कम करैक उपाय छी।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2102 गोहिक शिकार बच्‍चासँ सियान धरि जाबे‍ तीनू धाम–सिंहेश्वर, कुशेश्वर आ जनकपुर–नइ देखने छेलौं ताबे‍ अपनो बाबा आ समाजिको काका, बाबासँ सुनैत रहलौं जे तीनू धाम एक्के रंगक दूरीपर अपना सभकेँ अछि। ई भिन्न बात जे जैठाम पृथ्‍वीपुत्री सीता छैथ‍ तैठाम सिंह सदृश सिंहेश्वर बाबा सेहो छैथ। मुदा आब जखन तीनू धाम देखलौं तखन जँ विचारै छी तँ स्‍पष्‍ट दूरी बुझि पड़ैए। बान्‍ह-सड़कक अभावमे गामसँ गाड़ी-सवारी नहि, तँए नाहसँ कुशेश्वर, सिंहेश्वर आ जनकपुर पएरे गेलौं। भलेँ अकास मार्गसँ एक-रँगाह होइ मुदा जमीनी रस्‍तामे अन्‍तर अछि। कहैले तँ कोसियो धार टपै पड़ैए‍ मुदा सप्‍तकोसियोसँ बिकट रस्‍ता अछि। ओना, जखन जाए लगलौं तखन सात दिनक बटखरचाक संग धानक जुट्टी–चढ़बैले–लऽ नेने रही तँए चिन्‍ता नहियेँ जकाँ रहए। मुदा कोसीक लहैर देख मन डेराएल जरूर। जनकपुरक ठेही बाट, तँए कच्‍चियो रहने पएरे चलैमे सुगम अछि। जहिना छोट-छीन शब्‍द संगीक संग संयुक्‍त भऽ नमहर बनि ओझरी लगबैत जाइत तहिना कुशेश्‍वरक रस्‍ताक धार सभ केने अछि। कोन धार केतए मिलि अपनो बदैल गेल आ दोसरोकेँ बदैल गंगो-ब्रह्मपुत्रसँ विकराल रूप बना नेने अछि। जइसँ टपब समुद्र जकाँ भऽ गेल अछि। मुदा बिना टपने कुशेश्‍वर पहुँचब केना? संयोग नीक जे धार सबहक बीच मातृक अछि। कातिक बीतैत ममियौत भाय नाह बनबए गाम पहुँचला। किएक तँ पहिलुका नाह भँसियाएल अबैत एकटा ढेंगमे लगि फुटि गेलैन‍। हुनका सबहक ने गाछी-बिरछी बाढ़िक पानि एने सूखि गेलैन‍ मुदा अपना सबहक तँ बँचल अछि। अपने जामुन गाछ देखा देलिऐन‍। सुरेब गाछ देख भाइक मन मुस्‍किया गेलैन‍। हलैस‍ कऽ कहलैन‍- “बौआ, नाहो भऽ जाएत आ हरिस, पालो आ चौकीक संग साल भरिक जारैन सेहो भऽ जेतह।” ‘जारैन’ सुनि कहलयैन‍- “भैया, माले-जाल तेते अछि जे ने जारैनक दुख होइए आ ने खेत सभमे बजरूआ खादक।” भाय चुप भऽ गेला, पछाइत जलखै करैकाल बजला- “जखन लकड़ीक गड़ लगिए गेल तखन चलह बनौनिहारोकेँ कहि हाथ लगाइए देब।” कहलयैन- “हँ तँ बेजाइए कोन।” पान-सुपारी मुँहमे दैते डेग बढ़ौलैन‍। पाछू-पाछू विदा भेलौं। बरहीक घर लगेमे तँए पहुँचैयोमे देरी नहियेँ लागल। पहुँचते राजिन्‍दर पुछि देलक- “पाहुन कहाँ रहै छैथ‍।” कहि चौकीपर ओछाएल ओछानिकेँ हाथेसँ झाड़ए लगल। दुनू भाँइ बैसलौं। बैसते भाय पुछलखिन- “मिस्‍त्री, एकटा नाह बनाएब।” भैयाक मुँह दिस राजिन्‍दर ठकुआएल टकर-टकर देखए लगल। किछु फुरबे ने करै जे बाजत। ठेही परहक बरही, तँए हर-पालोक संग हँसुए-खुरपीटा बनौनाइ आ फाड़े पिटनाइ खाली बुझैत। राजिन्‍दरकेँ ठकुआएल देख राजिन्‍दरक पीसा जे दू दिन पहिने आएल छेलखिन, बजला- “केतेटा नाह बनाएब?” भाय कहलकैन- “तेरह हाथक।” “घरैया आकि घटवारिबला?” “घरैये।” मने-मन नाहक पेटक हिसाब जोड़ि पीसा कहलकैन- “पनरहिया लगि जाएत। दू दिन एनो भऽ गेल।” पीसाक बात सुनि राजिन्‍दक मन हलैस‍‍ गेल। जहिना हँसैत फूलक सुगन्‍धमे भाय वायुक संग वायुमण्‍डलमे विचरण करैथ तहिना हलसल मन राजिन्‍दरक बाजि उठल- “पीसा, एक पंथ दू काज। अहाँक पहुनाइयो सुतैर जाएत आ हमरो एकटा लूरि बढ़ि जाएत, उपकार तँ नफ्फामे हएत।” दुनूक बात सुनि अपनो मन कलैश गेल जे भरि आँखि बनैबतो देखब आ जाबे नाह रहत ताबे भैयौ गुण गबैत रहता, तँए स्‍टेशनक कुल्‍ली जकाँ, जे ‘हैयौ-हैयौ’करैत सिमटीक बनल पुलक पायाकेँ ठेलैत तहिना ठेलैत बजलौं- “भैया, अखन ठरपर छी, ऐठीन जे काज हएत से नीक हएत। अनभुआर जगहमे पच्‍चीसटा बिहंगरा होइ छइ?” तैबीच सह पाबि राजिन्‍दर फुदैक उठल- “पीसा, कमाइ अपन अपने राखब। खेनाइक चिन्‍ता नै करू।” कमाइ देख पीसा बजला- “भाय, जहिना अहाँ धारऽ कातक छी, तहिना हमहूँ छी। हम पूवारि पार रहै छी।” बनाइक गप-सप्‍प भेल। मुदा खेनाइक गप-सप्‍प भेबे ने कएल। किएक तँ हुनका दुनू गोरेकेँ बुझल। दोसर दिन जखन काज शुरू भेल तखन बुझलौं। दोसर दिन जामुनक गाछ खसा, पाँगि-पुँगि कऽ तेसर दिन चिराइमे हाथ लगि गेल। भरि दिन भैया गमछाक अराम कुरसी बना मिस्‍त्रीए लग बैस अपन देश-कोसक महाभारत सुनबए लगलखिन। आ अपने खन अँगना, खन खेत, खन भैया लग आबि-आबि हाजिरी पुरबए लगलौं। बारहम दिन नाहक सकल ठाढ़ होइते भैयाक मन जेठुआ बाढ़ि जकाँ फुलाए लगलैन‍। जहिना धार फुलेने चरो-चाँचरमे फूल पकैड़‍‍ लइ छै तहिना अपनो मन फुला गेल। पथिया नेने माए तख्‍ताक छोलैन अनैले पहुँचले छेली, कि पछबारि बाधसँ घुमि पहुँचलौं। मुस्‍की दैत भैया कहलैन- “बौआ, कुशेसर चलह।” भैयाक बात सुनि माए बजली- “बहू दिन गेना भऽ गेल।” भैयाक मनमे कि रहैन से तँ नीक नहाँति नै बुझलौं। मुदा अपना भेल जे भरिसक रस्‍तामे छीना-छीनी दुआरे बजला, संगीक जरूरत छैन‍। ओना, मनमे ईहो भेल जे जहिना नाहक सभ काज भेलैन‍ तहिना सुहरदेसँ, गामो पहुँचाएब जरूरी अछि। के कहलक रस्‍ता पेरामे नाहक संग जानो चलि जाइन। कहलयैन- “कए गोरेकेँ लऽ जेबैन‍?” “सभ तूर चलह।” ‘सभ तूर’ सुनि माए बजली- “बौआ, सभ तूर जे जाएब से बनत। कोनो कि नोकरिया-चकरियाक घर छिऐ जे ताला लगा दियौ आ विदा भऽ जाउ। चारिटा माल अछि, धानक लड़ती-चड़ती अछि, तखन?” बिच्‍चेमे भैया कहलखिन- “एको गोरे जँ पीठपोहू रहत तैयौ चलि जाएब।” कुशेश्‍वरेक रस्‍तामे मातृक अछि। माने मामाक घरसँ चारिये कोस दच्‍छिन- कुशेश्‍वर अछि। कहलयैन- “भने कुसेसरो बाबाक दर्शन भऽ जाएत आ दू दिन मात्रि‍कोमे रहि जाएब।” नाह बनि गेल। जेते छाँट-छूँट, तख्‍ता उगड़ल, सभ सेरिया कऽ रखि लेलौं। काल्हि‍ भोरमे जाएब। पुछलयैन‍- “भैया, रस्‍ता भँजियाएल अछि किने?” भाय हँसैत बजला- “तूँ सभ ठेही परहक छह तँए रस्‍ता तकै छहक। हमरा सभ लिए जेहने धार, तेहने डुमल खेत। पहिने सुपेन धार होइत गहुमा पहुँचब। गहुमासँ भुतही कमलामे चलि जाएब! जखने कमला पहुँचलौं तखने बुझह जे धाम पहुँच‍‍ गेलौं। घुमती काल सिरा रहत तँ एक गोरे गुन खिंचब दोसर गोरे नाहपर रहब।” माएकेँ कहलिऐ- “बटखर्चा ओरिया मोटरी बान्‍हि दिहैन। जाइ बेरक आशा नै रखिहेँ, हड़बड़मे कोनो चीज छुटि ने जाए।” माए कहलक- “तीन सालसँ घीओ रखल अछि, ऊहो नेने जैहह।” “बड़ बढ़ियाँ। मोटरीए-मे बान्‍हि दिहैन।” “हरा-तरा जेतह?” “से की अखन गरमी मास छी। ओ तँ अपने तेहेन जमल हएत जे बिना मुन्नोक काज चलि जाएत।” तैयो माए बजली- “मकैक नेरहाबला मुन्ना अछि। ओ छिछलाह होइए। कहीं नाहक झमारमे छिछैल‍ कऽ खुजि जेतह तखन तँ हेराइए जेतह।” मन खुशी रहबे करए, कहलिऐ- “अच्‍छा, दोसरे मुन्ना लगा दिहैन?” “बड़बढ़ियाँ। नेरहाबला बदैल‍‍ कटकटा कऽ कोढ़िला लगा देब। ओ थोड़े छिछलाह होइए।” जाड़क मास रहने भदबारि जकाँ ने धारे नचैत आ ने चरे-चाँचरक ओ रूतबा। भट्ठा दिस जाएब छल तँए मिसियो भरि भैयाकेँ थकान नै बुझि पड़ैन। जहिना ढलानपर गाड़ी तहिना सिरासँ भट्ठाक नाह। माथपर गोसाँइ देख कहलयैन- “भैया, पानि तँ अछिए, केतौ खा लिअ।” कहलैन‍- “गड़ लगा कऽ ने नाह लगाएब।” किछु दूर आगू बढ़लापर धारेकातमे एकटा पीपरक गाछ रहइ। खूब झमटगर। एक भाग, धार दिसक अदहासँ बेसी सिर अलगल रहइ। नाह बन्‍हैक सुविधा आ छाहैरो तहिना, धारक पेटेमे चहटी जकाँ, जैपर घास जनैम गेल छेलइ। पवित्र जगह देख भैया चपचपाइत बजला- “बौआ, नीक जगह अछि। थोड़ेकाल अरामो कऽ लेब।” गाछ लग पहुँच भैया कहलैन‍- “बौआ, तूँ नाहेपर रहह, हम बन्‍है छी।” कहि धाँइ-दे मांगिसँ कूदि रस्‍सी पकड़ने हाँइ-हाँइ कऽ गाछक सिरमे नाहक रस्‍सी लटपटौलैन। नाह ठाढ़ भेल। उतरलौं। ओइठाम धार भकमोड़ नेने। एतेकाल दच्‍छिन-मुहेँ छल, आब पच्‍छिम-मुहेँ भऽ गेल। उतैर कऽ आगू तकलौं तँ बुझि पड़ल जे मरकाठीक डेंगरी सभ छिड़ियाएल अछि। रहि-रहि कऽ गन्‍ह सेहो अबइ। कहलयैन- “भैया, ई तँ मुर्दघट्टीमे चलि एलौं! ऐठाम कन्ना रहब आ खाएब?” मुस्‍कियाइत भैया कहलैन‍- “ई सभ अधजरू डेंगरी नहि, गोहि सभ छी। रौद तापैले ऊपर आएल अछि।” भैयाक बात सुनि डरे मन डोलि गेल। आँखि उठा-उठा निहारि-निहारि देखए लगलौं। मन पड़ल कलकत्ताक चिड़िया खानाक गोहि। बाप रे! ई तँ जीविते लोककेँ गीर जाइए! माघक जड़ाएल बच्‍चा जकाँ देह डोलए लगल। मुदा भाय लेल धैनसन। ओइ भकमोड़पर खूब नमहर मोइन। जेहने नमहर तेहने गहींर। जेठोमे अगम पानि रहैत। तैबीच भुक-दे पारा जकाँ एकटा शोंश उगल आ लगले डुमि गेल। आरो डर बढ़ि गेल। कहलयैन- “भैया, नाह पार केना करब। ई तँ तेहेन-तेहेन पनियाँ जानवर सभकेँ देखै छी जे एक्के हुड़कान मारत तँ नाहे उनटा देत।” मुदा ओ मुस्‍किया कऽ रहि गेला। जेना-जेना डर बढ़ैत जाए तेना-तेना आँखि निड़ारि-निड़ारि देखए लगलौं। करीब पनरह कट्ठासँ बेसीए-रकबामे मोइन, जइमे धारक पानि चकभौर लइत! कखनो-कखनो बुल-बुला सेहो निकलै। तैबीच एकाएक पछिया हवाक संग दुरगन्‍ध पसैर गेल। कहलयैन- “भैया, कोनो जरैत मुरदाक गन्‍ध छी?” भैया कहलैन‍- “ऊँहू, भरिसक मलेछ छी।” अपन विचारकेँ मजगूत करैत पुछलयैन- “जँ मरचर नै छी, तँ मलेछ केतए-सँ आएल?” आब, जेना हुनको मनमे डर पैसलैन‍। बजला- “एक बेर सुहतरिया घाटमे मलेछ नाहे उनटा देलकै।” बजैकाल तँ बाजि गेला मुदा लगले बात बदैल‍‍ बजला- “बौआ, कोसि‍कन्‍हाक मलेछ की लोककेँ किछु कहै छइ। देखबहक जे अपियारी सभमे एक दिस लोक माछ बिछैत रहतह आ दोसर दिस मलेछ सभ। तोरा इलाकामे परसौती स्‍त्रीगणकेँ मलेछ बेसी हरान करैए।” अपनो मन मानि गेल, किएक तँ एक खुट्टापर गाए-बरद पटका-पटकी करैए, मुदा दोसर खुट्टापर संगी बनि दूधक धार बहबैए। तैबीच लोकक सुन‍-गुन पाबि गोहि सभ धाँइ-धाँइ पानिमे कूदल। मोइनसँ कनियेँ हटि एकटा पीरारक गाछ भीतापर रहइ। ओना, ओ गाछ बड़ नमहर तँ नहि,मुदा साहोरे जकाँ पकठाएल रहइ। ओही गाछक निच्‍चाँमे एक गोरे ठाढ़ रहइ। भैया कहलैन‍- “हैवएह मलेछ छी। ओकरे महक अबैए! अखने पीड़ारक गाछपर सँ उतरल।” डरो हुअए मुदा देखैयोक मन हुअए। लोके एतेटा। कहाँ दन लंकाक राक्षस जकाँ मलेछ बड़ी-बड़ी होइए। से कहाँ छइ? ओना भूत-परेतकेँ नै मानै छी। किएक तँ मनुखक आत्‍मा पंचतत्त्वमे विलीन भऽ जाइ छै आ शरीरकेँ या तँ जरा देल जाइ छै वा माटिक भीतर आकि बाहर किड़ी-मकौड़ी, चिड़ै-चुनमुनी खा लइए‍। तखन भूत जन्‍मत कथीक। दुनू भाँइ हिआसि-हिआसि ओकरा देखए लगलौं। मनमे उठल- लोक रहैत तँ दोसरो संगी रहितै। से कहाँ छइ? भूत-परेत तँ असगरो रहैए। ओकरा कि कोनो चीजक डर होइ छइ। मुदा ओ मोइन दिस बगुला जकाँ धियान लगौने। सहसा ओ मोइनकेँ गोड़ लागि पानिमे पैस गेल। रस्‍सीक एकटा भीड़ी डाँड़मे बन्‍हने आ हाथमे मोटका तारक काँकोर रहइ। रस्‍सीक एकओर गाछमे बान्‍हल छेलइ। मोइनमे डुमल। अनासुरती मनमे उठल जे भरिसक अहिना लंकाक मोती बाहर करैबला पनिडुब्‍बा, उत्तर सागरक सील ह्वेल आ बालरसक शि‍कारी जकाँ ईहो पानिक शि‍कारी छी। किछु क्षणमे ‘उक्-उक्’क अवाज उठलै आ ओ लपैक कऽ डारि पकैड़‍‍ ऊपर आबि गेल। ऊपर आबि दोहरा कऽ गोड़ लगलक। ताबे बिसवास भऽ गेल जे ओ आदमीए छी मलेछ नहि। मुदा एतेक गन्‍हकै कथी छइ! पातर साँस बना लगमे गेलौं तँ देखलिऐ जे ओ आदमी दुनू बाँहिमे गोहियेक खलड़ीक खोल बना पहिरने अछि। जाड़े थरथराइए! बेर-बेर हाँफी होइ छइ। जेना थाकल हुअए। “ओइ ओ! ओइ ओ”क अवाज तीन-चारि बेर लगौलक। अवाज सुनि लगले बीस-पच्‍चीस गोरे जमा भऽ गेल। जेना लगेक बोन-झाड़मे सभ नुकाएल रहल रहइ। जमा होइते सभ रस्‍सा पकैड़‍‍ खिंचए लगल आ बाजए लगल- “ले जवान!” “हइसा।” “आगू बढ़ैत!” “हइसा।” रस्‍सा-कस्‍सी शुरू भेल। मोइनमे जेना बिहाड़ि आबि गेल तहिना महजाल लगैबते माछ जकाँ सभटा तरपए लगल। करीब डेढ़-दू घन्‍टा रस्‍सा-कस्‍सी चलल। कखनो ऊपर दिस खिंचाइ तँ कखनो मोइन दिस। मोइन दिस खिंचाइते भड़भड़ा कऽ सभ खसि पड़इ। करीब दस-एगारह हाथक गोहि ऊपर भेल। ऊपर होइत तीन-चारिठाम बाँसक टोन दऽ चरि-चरि-पँच-पँच आदमी बैस गेल। गोहिक ठोंठमे रस्‍सा कसाएल रहइ!तरूआरि जकाँ एकटा तेजगर हथियारसँ एक गोरे हाँइ-हाँइ कऽ चीर देलक। मुदा अखनो धरि सभ दबनहि रहल। किछु कालक पछाइत‍ परान छुटि गेलइ। परान छुटिते बाँसक टोन हटा गोहिकेँ काटए लगल। काज अगुआएल देख लग जा पुछलिऐ- “केना-केना गोहि पकड़ै छहक?” अनभुआर बुझि ओ आदमी हाथक इशारासँ गाछक छाहैरमे चलैक इशारा केलक। गाछक छाहैरमे बैसते हमर नाओं पुछलक कहलिऐ, हमहूँ पुछलिऐ तँ बाजल- “भोला तीयर।” ‘भोला तीयर’ कहि गोहि केना पकड़ै छै से कहए लागल- “पानिमे पैस गोहि लग जाइ छिऐ। नमती अन्‍दाजि कऽ ओकर नाँगैरसँ बँचैत अपन केहुनी आगू केने रहलौं। आँखि ने तँ मुँह बौने रहल। जँ मुँह बौने रहल तँ हाँइ-हाँइ कऽ लोहाक काँकोर मुँहमे दऽ दइ छिऐ। लोकक देहक गन्‍ह गोहिकेँ मतिसून बना दइ छइ। खाली नाँगैरसँ अपन बँचाउ केने रहै छी। ओना सभ कमला माइक परतापसँ होइए, लोक बुत्ते थोड़े हएत।” हम पुछलिऐ- “एकरा की करबै?” भोला तीयर बाजल- “मौस खेबै आ खलड़ी बेचबै।” सुनि गुम्‍म भऽ गेलौं। देशक दृश्‍य आँखिपर लटैक गेल। देशमे कियो भरि दिन भोग करै पाछू बेहाल अछि, तँ कियो जानक कीमतपर दुरगन्‍ध मौसक पाछू बेहाल अछि। हाय रे हाय..! हमरा गुम्‍म देख ओ बाजल- “कोन गाँ रहै छी?” कहलिऐ- “बेला रहै छी।” कनी मन पाड़ि पुन: पुछलक- “रौदी तीयरकेँ चिन्‍है छिऐ?” कहलिऐ- “ममियौत भाइक गामक लोककेँ किए ने चिन्‍हबै। गाम की कोनो शहर-बजार छी जे अपनो समांग देख कऽ मुँह घुमा लेत।” “ओ साढ़ू छिआ।” “भैयारीए जकाँ अछि।” भैयारी नाओं सुनि बाजल- “तब केना जाए देब। गरीब छी तँए इज्‍जत नै अछि। एहेन शि‍कार केलौं आ अहाँ चलि जाएब। साढ़ू की कहता। हुनका पता लगतैन‍ तँ नै कहता जे खाइ डरे समाजसँ मुँह चोरबै छी। एकर मौस बड़ सुअदगर होइए, जहिना अण्‍डाएल रोहू, तेलाएल खस्‍सी होइए तहिना।” “मन तँ होइए, मुदा कुसेसरक घी संगेमे अछि। ओत्तै जाइ छी।” “तँ की हेतै काल्हि‍ चलि जाएब।” मने-मन डरो हुअए। तेतबेमे एक गोरे आबि कहलकै- “भोला कक्का, पेटसँ चानीक हँसुली आ पइत निकलल।” मुदा भोला लेल धैनसन। जेना कोनो नव बात नहि। मुदा मन मानलक जे भरिसक लोककेँ गिरने अछि। हमरा मुहसँ अनासुरती निकलल- “आब की करबै, एकरा?” “मौस बना, सोना कमला माइक पवित्र पानिमे धोइ लऽ जाएब। अमैनियासँ साँझू पहर रान्‍हब। झालि-मिरदंग बजा कमला माइकेँ मौस-भात-परसादी चढ़ाएब। सौंसे टोलक बाले-बच्‍चे मिलि-जुलि कऽ खाएब।” हम पुछलिऐ- “आ चमड़ाकेँ?” कहलक- “सुखा कऽ रखि लेब। जखन बेसी भऽ जाएत तखन वेपारीकेँ खबैर देबइ। गाड़ी नेने औत, गिनती कऽ कऽ सभटा कीनि लेत।” ओहो चलि गेल आ हमहूँ दुनू भाँइ नाहपर चढ़ि विदा भेलौं। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2152 मातृभूमि जिनगीक अन्‍तिम चरणमे आइ अपन मातृभूमिक दर्शन भेल। ओ भूमि जैठामसँ माए सदिछन नजैर‍ उठा-उठा देखैत रहैत, ओ प्‍यारी, सिनेही, प्रेमी, जीवन दायिनी, जीवन रक्‍छि‍नी भूमि, मातृभूमि। दर्शन पबिते कमल मन कलैप‍ उठल मुदा असीम उत्‍साहक संग उमंग संचारित भेल। काल्हि‍ धरिक जिनगी आँखिसँ छिपए लगल, ओझल हुअ लगल, मुँह नुकबए लगल। जइ दिन अपन जीवन दायिनी भूमिसँ विदा हुअ लगल रही, पूर्ण जुबा रही। नस-नसमे नव खूनक संचार होइत रहए। समुद्री जुआर जकाँ जुआनी उठैत रहए। आशा-अभिलाषाक संग पकड़ैले उत्‍साहित रहए। बाट नै‍ भेटने मातृभूमिक दर्शन लाखो कोस दूर दुर्गमे छिपल रहए। मुदा दर्शन पबिते सत्-चित्त-आनन्‍दसँ खेलैत देख‍‍, नमन केलिऐन‍। डाक्‍टरीक डि‍ग्री प्राप्‍त करिते बिआह भेल। नीक गाम, नीक कन्‍याँ, नीक कुल-मूलक संग नीक दहेजो भेटल। केना नै भेटैत, जइ डि‍ग्रीक मांग देश-विदेशमे अछि ओइमे बेकारी केतए-सँ औत। मुदा इंजीनियर जकाँ तँ नहि, जे डि‍ग्री पेलोपर काज नहि! तइले तँ साधनक जरूरत अछि से अछि केतए? जुआनीक उमंग उठिते गेल। संयोगो नीक रहल जे बाइस बर्खक अवस्‍थामे ओइ फ्रान्‍समे जइमे महान्-महान् दार्शनिक, तत्त्व-चिन्‍तक वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्‍यकार, देशभक्‍त जन्‍म नेने छैथ‍, काज करैक अवसर भेटल। रंगीनी दुनियाँक स्‍वर्ग, जेहेन ओतए सड़क तेहेन एतए घर नहि। बिसैर‍‍ गेलौं अपन भूमि, अपन मातृभूमि। ओना सोलहन्नी बिसैर‍‍ नै गेल रही, मुदा विचारक आलमारीक पोथीक जाकमे, तर जरूर पड़ि गेलैं। अखनो मन अछि, गामक विद्यालयक देश वन्‍दना। हृदैमे नइ पहुँचल छल गंगा सन पवित्र जलधाराक सरिता, नै जनै छेलौं माटिक सुगन्‍ध आ गाछी-बिरछीक फल-फूलक महमही...। अनुकूल हवा पाबि मन मोहित भऽ गेल। जी तोड़ि जिनगीक पाछू पड़ि गेलौं। कर्मेसँ जिनगी तँ हमरा किए नहि। नीक स्‍तरक परिवार बनेलौं, नीक बैंक बैलेन्‍स अछि। अपनोसँ बेसी खुशी परिवारक सभ रहै छैथ। कारणो स्‍पष्‍ट अछि, बाल-बच्‍चाक जन्‍मे भेल, पत्नी अनके घरमे रहैवाली। मुदा आइ मन बेकल किए लगैए। वौराइ किए अछि? एकाग्रचित्त सभ दिन रहलौं तखन बान्‍हल मन पड़ाए केतए चाहैए? की ‘आएल पानि गेल पानि बाटे-बिलाएल पानि!’ जइ मातृभूमिक गुणगान बच्‍चा, वृद्ध सभ करै छैथ,‍ तैठाम केतए छी? बढ़ैत-बढ़ैत जहिना धन बढ़ैए, गाछ-बिरीछ बढ़ैए तहिना ने विचारो बढ़ैए। मुदा एना किए भऽ रहल अछि जे आब ऐठाम, माने पेरिसमे नै‍ रहि अपन मातृभूमिक रजकण बनब? जहिना बाइस बर्खक वयसमे अपन गाम, समाज, भूमि-मातृभूमि छोड़ि पेरिस आएल रही, तहिना आब सभ किछु छोड़ि अपन प्रेमी मातृभूमि, सिनेही मातृभूमिक कोरामे विश्राम करब। मुदा नहियोँ बुझैत रही तैयौ अबैकाल जहिना सभसँ असीरवाद लऽ नेने रही तहिना तँ एतौसँ असीरवाद लाइए लिअ पड़त। जरूर लिअ पड़त मुदा केकरासँ? केकरोसँ नहि! एतए ने अपन गंगा-यमुनाक जलधारा, ने हिमालय-कैलाश सन पहाड़, ने गंगा-ब्रहमपुत्र सन धरती आ ने समुद्र सदृश हृदए अछि। जहिना पत्नीक संग आएल रही तहिना जाएब। जँ ओ नै जाथि तखन? ओ नै जाए चाहती तेकर कारणो तँ कहती? कहलयैन‍- “आब ऐठाम नै रहब।” पत्नी बजली- “तखन?” कहलयैन- “अपन मातृभूमिक दर्शन भऽ गेल, ओतए जाएब।” पत्नी उत्तर देलैन‍- “सभ अपन-अपन मालिक होइए। जँ अहाँ जाएब तँ जाउ।” पुछलयैन‍- “अहाँ?” बजली- “अपन कारोबार अछि। बेटा-पुतोहु दुनू फ्रान्‍सक भऽ गेल। दुनियाँक स्‍वर्गमे रहि रहल छी। तखन की?” मन पड़ल ओ दिन जइ दिन जिनगीक हिसाब जोड़ि आएल रही। पत्नी संगे छेली। मुदा आइ? जुग बीत गेल। जिनका सभसँ असीरवाद लऽ आएल रही भरिसक मरि-हरि गेल हेता, गेलापर के हृदए लगौता! तखन? तखन की? किछु ने! मुदा जाधैर‍‍ पहुँचब ताधैरक तँ उपाय चाही। विदा भऽ गेलौं। एक समुद्रसँ मिलैत दोसर समुद्रक विशाल जलराशि‍क बीच जहाजसँ मद्रास पहुँचलौं। मद्रासक बन्‍दरगाहमे उतैर अपन धरती, अपन देश, अपन मातृभूमिकेँ हृदैसँ नमन केलिऐन‍। मन पड़ल रामेश्वरम्। जखन मद्रास आबि गेल छी तखन बिनु दर्शने जाएब बचपना...। विदा भेलौं। धरती-समुद्रक बीच बनल रामेश्वरमक मन्‍दिर। एक दिस विशाल जल-राशि‍क समुद्र तँ दोसर दिस खिलैत-इठलाइत मातृभूमि आ ऊपर शून्‍य अकास। समुद्रेक लहैरमे स्‍नान कऽ दर्शन केलौं। मन्‍दिरसँ निकैलते खौजरीपर गबैत एकटा साधुक मुहेँ सुनलौं, “अवगुण चित्त न धरो।” जेना भूखकेँ अन्न, पियासकेँ पानि खिहारि दैत, तहिना मनमे भेल। जलखै कऽ गाम लेल गाड़ी पकड़लौं। जंगल, पहाड़, नदी, मैदानकेँ चिरैत गाड़ी गाम लग पहुँचल। जे गाम कहियो नन्‍दन वन सदृश सजल छल- लहलहाइत खेत, रस्‍ता-पेरा विद्यालयसँ सजल छल, धारक कटावसँ बीरान बनि गेल अछि। ने एकोटा सतघरिया पोखैर बँचल अछि आ ने पीपरक गाछक निच्‍चाँ विद्यालय। घराड़ी, खेत बनि गेल अछि आ पोखैर-झाँखैर घराड़ी। मुदा तँए की, ने गामक परिवार कमल, ने लोक आ ने गामक नाओं।‍ गामक दछिनवरिया सीमापर पहुँचते एकटा नवयुवककेँ पुछलयैन‍- “बाउ, की नाओं छी, अही गाम रहै छी?” नवयुवक बाजल- “हँ। रमेश नाम छी।” पुछलयैन‍- “गामक की हाल-चाल अछि?” प्रश्‍न सुनि रमेश ठमैक गेल। किए नै ठमकैत। नमती भलेँ नै बढ़ल हुअए मुदा रंग आ चौराइ तँ जरूर चतरिये गेल अछि। भरिसक चेहरा देख डरा गेल अछि। मुदा डर तँ ओतए बढ़ैए जेतए डरनिहारकेँ आरो डेराएल जाइत। से तँ नइ अछि। मधुआएल मन मुस्‍कियाइत मुँह खोलि निकलल- “बौआ, चालीस बर्ख पूर्व अही माटि-पानिक बीच डाक्‍टर बनि विदेश गेलौं...।” मधुर बोली सुनि रमेश बाजल- “गाममे के सभ छैथ‍?” कहलिऐ- “कियो नहि। जेहो हेता, हुनको छोड़ि देलिऐन‍। जखन छोड़ि देलिऐन‍ तँ वएह किए पकड़ता।” रमेश पुछलक- “रहबै केतए..?” बजलौं- “सएह गुनधुनमे छी।” रमेश कहलक- “हम तँ महींसवारि करै छी, आन किछु जनै नै छी। चलु वस्‍तीपर पहुँचा दइ छी।” वस्‍तीपर पहुँचा रमेश घुमि गेल। हम ठमैक गेलौं। तैबीच नजैर पड़िते पूबारि भागक घरवारी ओत्तैसँ पुछलैन‍- “केतए जाएब?” कहलयैन- “ब्रह्मपुर।” घरवारी कहलैन‍- “ब्रह्मपुर तँ यएह छी। एमहर आउ।” मनमे सबुर भेल। हूबा बढ़ल। अपन गामक चालि बढ़ल। लफैर कऽ दरबज्‍जापर पहुँचलौं। घरवारी कहलैन‍- “थाकल-ठेहियाएल आएल छी, पहिने पएर धोउ। चाह बनौने अबै छी, ताबत कपड़ा बदैल‍‍ अराम करू। आइ भरिक तँ अभ्‍यागत भेलौं, काल्हि‍क विचार काल्हि‍ करब।” कहि आँगन जा चाह अनलकैन। दुनू गोरे चाह पीबैत रही, कहलयैन- “हमहूँ अही गामक वासी छी। नोकरी करए बाहर गेल रही। अपन घराड़ियो अछि आ दस बीघा चासो।” ओ बजला- “हमहूँ आने गामक वासी छी। नानाक दोखतरीपर छी। तँए, ने गामक आँट-पेट जनै छी आ ने पुरना लोक सभकेँ जनै छिऐन।” कहलयैन‍- “हम डाक्‍टर छी।” ओ बजला- “तखन तँ गामक देवते भेलौं। जाबे अपन ठर नै बनि जाइए ताबे एतै रहू। अतिथि-अभ्‍यागतकेँ खुऔने आरो बढ़ै छइ।” ठौर पाबि मन खुशी भेल। जीबैक आशा देख पत्नीकेँ फोन लगेलौं- “हेलो..” पत्नी उत्तर देलैन‍- “हँ, हँ, हेलो।” कहलयैन‍- “गामसँ बजै छी। पुन: घुमि कऽ पेरिस नै आएब। अहूँ जँ आबए चाही, तँ चलि आउ।” पत्नी कहलैन‍- “चूक भेल जे संगे नै गेलौं। जाधैर‍‍ अहाँ छेलौं ताधैर‍क आ अखनमे जीवन-मृत्‍युक अन्‍तर आबि गेल अछि।” कहलयैन‍- “जखने मन हुअए तखने चलि आएब।” ओ बजली- “फोन रखै छी..?” ◌ शब्‍द संख्‍या : 1048 भबडाह चहकैत चिड़ै सबहक चलमली कानमे पड़िते नित्‍यानन्‍द कक्काक नीन छिटैक गेलैन‍। कोनो काज करैसँ पहिने तर्क-वितर्क ओहने महत रखैत जेहेन निरजन आँखिए दिनमे चलब होइत। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल नजैर‍ आजुक समैपर गेलैन‍। काल्हि‍ शनि, राखी पाबैन छी। परसू रबि, विदेश्‍वर स्‍थानमे ठसम-ठस मेला हएत। हएबो उचित, एक तँ बैद्यनाथ बाबा सौनक पूर्णिमा विदेश्‍वरमे बीतबै छैथ‍, दोसर कमलो उमड़ल अछि, एक संग दुनू काज...। भैयारी रहितो जहिना भविसद्रष्‍टा युगद्रष्‍टासँ ऊपरक सीढ़ी होइत, तहिना ने औझुकेपर काल्हि‍ ठाढ़ होएत। काल्हुक सुरूज केहेन उगत ई तँ प्रश्‍न अछिए। चारिम दिन पनरह अगस्‍त छी, भारतक स्‍वतंत्रताक चौसैठम वर्षगाँठ। साठि बर्खक उपरान्‍त अनाड़ियो-धुनाड़ी लोक वरिष्‍ठ नागरिकक उपहार पबैत तेहेन ठाम स्‍वतंत्रता की आ देश केतए! मुदा लगले मन घुमि गाम दिस बढ़लैन‍। हिन्‍दु-मुसलमानक गाम। एक पनरहियासँ जहिना हिन्‍दु राधा-कृष्‍णक झूलासँ लऽ कऽ भोला बाबाक जलढरीमे व्‍यस्‍त तहिना मुसलमानो दस दिन ऊपरेसँ रोजा-नवाजमे व्‍यस्‍त...। एको पाइ लोक नै बँचल जे धर्मक काजमे नै लागल हुअए। सभ धर्मक काजमे हृदैसँ जुटल...। जखन सोलहन्नी लोक पवित्र मने धर्मक काजमे जुटले छैथ‍ तखन निसचित गामक कल्‍याण हेबे करत..! प्रेमिकाक आगू जहिना प्रेमी दुनियाँकेँ निच्‍चाँ देख ऊपर भ्रमण करैत तहिना नित्‍यानन्‍द कक्काक मन कल्‍याणक संग टहलए लगलैन‍। उत्‍साह जगलैन‍! फुरफुरा कऽ ओछाइनसँ उठि कलपर जा माटिये-सँ चारि घूसा दाँतमे लगा, आँगुरेक जीभिया कऽ हाँइ-हाँइ चारि कुर्ड़ा मारि, चारि घोंट पानियोँ पीब लेलैन‍। आ आँखि उठा बाड़ी दिस तकला तँ पत्नीकेँ मचानपर चठैल तोड़ैत देखलैन‍। आँखि उतारि गाम दिस विदा भेला। दरबज्‍जापर सँ आगू बढ़िते हियौलैन‍ तँ बुझि पड़लैन‍ जे घर-दुआर छोड़ि लोक चौके दिस आबि गेल हेता, तँए नीक हएत जे चौके दिस जाइ। यएह सोचि नित्‍यानन्‍द काका आगू बढ़ैक विचार केलैन‍। डेग उठिते मन सिहरलैन‍। भाए-बहिनक ओहन पर्व काल्हि‍ छी जइमे दुनूक प्रगाढ़ प्रेमक सिनेह-सिक्‍त जलक उदय हएत। आशाक संग जिनगीक बिसवासो जगलैन‍। डेग बढ़ौलैन‍। पनरह-बीसटा डम्‍हाएल चठैल खोंइछामे नेने सुचिता काकी मुस्‍की दैत, गदगद होइत जे महिना दिन तँ चलबे करत, तेकर पछाइत‍‍ ने दौंजी हएत। सालमे जँ एक्को पनरहिया चठैलक तरकारी खा लेब तँ की चीनियाँ बिमारी हएत। लफड़ल आबि पछबरिया ओसारपर सूपमे चठैल उझैल पुतोहुकेँ पुछलखिन- “कनियाँ, दोकानोक काज अछि?” डि‍ब्‍बा-डुब्‍बी हड़बड़बैत पुतोहु कहलकैन- “हँ।” “की सभ लेब?” “नोन, हरदी।” पुतोहुक साँस सुचिता काकीकेँ किछु गर्म बुझि पड़लैन‍। मुदा तेकरा अनठा देलखिन। मनमे उठि गेलैन- नोनक पौकेट दस रूपैआमे देत, हरदियो की‍ कोनो सस्‍ता अछि। ओकरो पौकेट दस रूपैआसँ कममे कहाँ दइ छइ। हाथमे तँ पनरहेटा रूपैआ अछि। केना दुनू चीज लेब? मन फुनफुनेलैन‍। बड़बड़ाए लगली- “केहेन बढ़ियाँ खुदरा-खुदरी नून बिकाइ छेलै, जेतबे जेकरा सकरता रहै छेलै से तेतबे लइ छेलए। आब तँ तेहेन पोलिथिनक पौकेटमे रहैए जे कमो रहत तँ बनियाँ कहत जे घमि गेल हएत। खाएर एक चुटकी नूने ने कम देत। एक-ने-एक दिन सैरियत दिअ पड़तै।” जहिना बच्‍चा लगले कनैए, लगले हँसैए तहिना सुचिता काकीकेँ मन लहरए लगलैन‍। लहरैत मन कहलकैन- जे नून हाथीकेँ गला दइए ओ प्‍लास्‍टि‍ककेँ की नै गलबैत हएत। आब की कोनो नून खाइ छी आकि प्‍लास्‍टि‍कक रस पीबै छी। हे भगवान! तोरे हाथ-बाठ छह। जेते दिन जीबए दैक हुअ से जीबह दिहह, नै जे लऽ जाइक हुअ तँ लऽ जहिहह। कहू जे प्‍लास्‍टिकेक कलमे पानि पीबै छी, दोकानक चीज-बौस अनै छी, खाइ-पीबैक समान रखै छी। जूत्ता-चप्‍पल, कपड़ा-लत्ता पहिरै छी...। मुदा लगले मन पुतोहु दिस घुमलैन। कहू जे चारिटा गाछ घरोक दावापर हरदी रोपि लेब तँ साल भरि कीनए पड़त। जाबे माल-जाल नै छेलए ताबे बाड़ी-झाड़ी करै छेलौं। आब तँ मालोक नेकरमसँ नहाइयो-खाइयोक पलखति नै होइत रहैए। कनियाँ सहजे‍ कनियेँ छैथ। कोनो लूरि-ढंग बाप-माए सिखा कऽ पठौलखिन आकि सोल्‍होअना सासुरे भरोसे छोड़ि देलखिन। मुदा गलती बुड़होक छैन‍। कोन दुर्मतिया चढ़ि गेलैन‍ जे चरिकोसी पारक पुतोहु उठा अनलैन‍! एकेटा वस्‍तुक चरि-चरि, पँच-पँच तरहक विन्‍यास बनैए, जरूरतक हिसाबसँ रूप बदैल‍‍ उपयोग होइत। तैकालमे कहती जे खाली अल्‍लूक, तरुआ, भुजुआ, भुजिया टा बनबैक लूरि अछि..! अपसोच करैत सुचिता काकी बजली- “जा हे भगवान! जे पुत हरवाहि गेल देव-पितर सभसँ गेल! कोनो मनोरथ रहए देलह! जखन मनोरथे नै तखन सतयुग, त्रेता, द्वापरे की‍!” तैबीच मोख लागल ठाढ़ पुतोहु बजली- “आइ शुकरवारी छिऐ। जखन चौक दिस जाइते छैथ‍ तँ अंगुरो आ केरो फलहार-ले नेने अबिहैथ।” पुतोहुक बात सुनि सुचिता काकी छगुन्तामे पड़ि गेली। मनमे हुअ लगलैन जे एक हजार बात एक्केबेर कहि दिऐन‍ मुदा केतौ-केतौ नहियोँ टोक देब नीक होइत अछि। तँए, किछु बजैसँ काकी परहेज केली। मुदा, जहिना आगिपर चढ़ल पानिक बरतनमे ताउ लगिते तरसँ बुलकारा उठए लगैत तहिना मनमे उठए लगलैन‍। कहू जे अखन पनपिआइक बेर छै, पहिने तेकर ओरियान कऽ पुरुख-पात्रकेँ खुआएब, अपनो खाएब आकि सौझुका फलहारक ओरियान करब। बीचमे कलौ सेहो अछिए। भगवानो टेबिये कऽ पुतोहु देलैन‍। एहेन-एहेन गिरथानि बुते केते दिन घर-परिवार चलत..? काकीकेँ चुप देख पुतोहु दोहरबैत बजली- “नइ सुनलखिन। जखन चौक दिस जेबे करती तँ अंगुरो आ केरो नेनहि अबिहैथ।” पुतोहुक बात सुनिते काकीक मनमे जेना तरंग उठलैन‍, तहिना तरैंग‍ कऽ बजली- “अहाँ सभ कोन उपास करै छी जे सहैसँ पहिने‍ फलहारेक ओरियान करए लगै छी। कहुना-कहुना तँ सातटा हरिबासय केने छी। कहाँ कहियो पहिने फलहारेक ओरियान करै छेलौं।” शब्‍द-वाण जकाँ सासुक बात पुतोहुक हृदैमे लगलैन‍। तीर बेधल चिड़ै जकाँ छटपटाइत पुतोहु बजली- “अपना जे मन फुरै छैन सएह करै छैथ‍ से बड़बढ़ियाँ मुदा हमरा बेरमे भबडाह हुअ लगै छैन!” ‘भबडाह’ सुनि काकियोक मन बेसम्‍हार भऽ गेलैन‍। कहलखिन- “कनियाँ, हम भबडाहि नै छी जे केकरोसँ भबडाह करब। आँखि तकै छी तँए चिन्‍ता अछि। अखने आँखि मूनि देब, घर सम्‍हारए पड़त तखन अहूँ यएह बात बुझबै।” भण्‍डार कोणक जेठुआ गड़े जकाँ दुनूक बीच रसे-रसे अन्‍हर-विहाड़ि उठए लगल। कियो पाछू हटैले तैयार नहि। दुनूक सीमा-सरहद टुटि-एकबट्ट भऽ गेल। एक्के-दुइए धियो-पुतो आ जनीजातियो सभ आबए लगली। आँगन भरि गेल। चौकसँ किछु पाछूए नित्‍यानन्‍द काका रहैथ‍ कि मनमे उठलैन‍, चौरंगी हवा बहैक समए अछि। कखन कोन हवा केमहरसँ उठत आ घर-दुआर खसबैत केमहर मुहेँ चलि जाएत तेकर ठेकान नहि। ठोर बिदैक गेलैन‍। हुलकी दैत मुस्‍की बहरेलैन‍- “एह, अजीब-अजीब करामाती मनुखो सभ भऽ गेल। कनियेँ गलती विधातोक भेलैन‍ जे सींग-नाँगैर काटि लेलखिन।” तहीकाल लॉडस्‍पीकरक अवाज नित्‍यानन्‍द कक्काक कानमे पड़लैन‍। राधा-कृष्‍ण मन्‍दिरपर झूला चलि रहल अछि। अवाज सुनि मन पसीज गेलैन‍। सौन मास। सुहावन। मन भावन। विशाल वसुन्‍धरा, रंग-रंगक वस्‍त्र पहिर मधुमय वातावरणक बीच, बिहुँसि रहल अछि। कृष्‍णक कदम-सँ-कदम मिलबैत राधा बिहुँसैत झूला झूलए कदमक गाछ दिस जा रहल छैथ। असीम उल्‍लास। अदम्‍य साहस दुनूक बीच। कातेसँ गाछमे गोल-गोल, लाल-पीअर झुमका लगल फल-फूलसँ लदल देख राधा कृष्‍णकेँ पुछलखिन- “डोरी लगा डारिमे झूला लगाएब आकि डारियेपर बैस झूलब?” राधाक प्रश्‍न सुनि कृष्‍ण आँखियेक इशारासँ उत्तर देलखिन- “जेहेन समए तेहेन काज।” चौकक गनगनाइत अवाज, नित्‍यानन्‍द कक्काक धियान अपना दिस खिंचलकैन‍। तखने एकटा नवयुवककेँ स्‍कूलमे भेटल बहिनक साइकिलपर जाइत मुहसँ- ‘रेशम की डोर’ गुनगुनाइत सुनलैन‍। चिप्‍पी सजल विदेशी वस्‍त्रमे डुमल युवक। जहिना दिन-रातिक मध्‍य जाड़-गरमीक मध्‍यक संग जिनगियोक मध्‍य मधुआएल होइत तहिना कक्काक मनमे भेलैन‍। युवककेँ पुछि देलखिन- “बाउ, परिवारमे के सभ छैथ‍?” युवक कहलकैन- “बाबा, हिनका सबहक चरणक दयासँ सभ छैथ। माइयो-बाबू आ दूटा बहिनो अछि। एक बहिन सासुर बसैए, जेतए जा रहल छी आ दोसर पढ़ैए। सोलहम बर्ख छिऐ। दू-तीन साल बाद बिआहो करब।” काका पुछलखिन- “अपने?” युवक कहलकैन- “बाबा, ई देवतुल्‍य छैथ, झूठ नै बाजब। अपना खेत-पथार नहियेँ जकाँ अछि मुदा खेतबला सभकेँ बाहर गेने बँटाइ खेत पर्याप्‍त अछि। एक जोड़ा बरद रखने छी। बाबू-माए खेते-पथारमे खटै छैथ, अपने बम्‍बइमे रहै छी।” काका पुछलखिन- “राखी पाबैन तँ काल्हि‍ छिऐ, आइए किए जाइ छी?” युवक कहलकैन- “साल भरिपर बम्‍बइसँ एलौं हेन। एको दिन पहिने जँ बहिनक ऐठाम नै जाएब, से केहेन हएत? भगिनो-भगिनी-ले आ बहिनो-बहनोइ-ले सालो भरिक कपड़ा नेने जाइ छिऐन। काल्हि‍ बेरमे घूमब तखन छोटकी बहिनक हाथे राखी पहिरब। अच्‍छा अखन जाइ छी बाबा। काल्हि‍ फेर घुमती बेर भेँट करब।” काका कहलखिन- “काजे जाइ छी। जाउ?” जेना-जेना ओ युवक साइकिलसँ आगू बढ़ल जाइत तेना-तेना नित्‍यानन्‍दो कक्काक मन दौड़ए लगलैन‍। मनमे एलैन‍ पैछला सालक मोबाइलिक घटना। कनी मन खुशी भेलैन‍। बुदबुदेलैथ- “अजीब-अजीब मदारी सभ अछि। गड़ लगा-लगा नचबैए।” मन रूकलैन‍। पहिनेसँ ने लोक किए बुझैए जइसँ एहेन-एहेन घटनाकेँ बढ़ैये ने देत। मुदा मन ठमकलैन‍। घटना भेल। राखी पाबैन दिन, दस बजे रातिमे बम्‍बैसँ एक गोरेकेँ मोबाइलसँ समाचार आएल जे बौआ सबहक हाथक राखी जल्‍दी खोलि दियौ नै तँ अनहोनी घटना हएत! एमहर मुहेँ-मुँह समाचार पसरब शुरू भेल, ओम्‍हरसँ मोबाइलिक समाचार दिल्‍ली, कलकत्ता, बंगलोर इत्‍यादिसँ अकासमे गनगनाए लगल। हाँइ-हाँइ राखी हाथसँ उतरए लगल। भरि रातिक हलचल दिनक दस बजे धरि चलिते रहल। राति भरिक नीनो दिनेमे वौआ गेल। मुदा दस बजेक पछातिक तीखर रौद पाबि वातावरण शान्‍त भेल। नित्‍यानन्‍द काकाकेँ मनमे उठलैन‍ बाल-बच्‍चाक संग माए-बापक सम्‍बन्‍ध? ओतए केना मनुखक वंश आगू मुहेँ ससरत जेतए माइए-बाप दुश्‍मन बनि ठाढ़ भऽ रहल अछि? तहूमे जिनगीक अन्‍तिम बेलामे नहि, उदयक तीनियेँ मासमे हथियार लऽ आगूमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि..! मन तुरछए लगलैन‍। थूक फेक मन हल्लुक केलैन‍। मन पड़लैन‍ भाए-बहिनक ओ पुरान बात। भाए बहिन ऐठाम पहुँचल तँ बहिन भायकेँ कहलकैन‍- भैया जखन अकासक डगर उत्तरे दछिने हएत तखन आएब। मन पड़िते उठलैन‍ सालो भरि तँ प्राकृतिक संग खेल होइते रहैए‍, जिनगीसँ केतेक लग धरि सम्‍बन्‍ध बनि सकैए, तेतबे ने? जेना मेघौनमे हवाक सिहकी लगने घुसकैत-फुसकैत तहिना नित्‍यानन्‍द कक्काक मन घुसकलैन‍। देखलैन‍ जे चकेबा कोन तरहेँ बहिन समाकेँ जरैत वृन्‍दावनमे संग दऽ रहल छैथ। जे मनुख चित्ती-कौड़ी फेक नागसँ दोस्‍ती करैत बाघ, सिंह आ भाउल सहित गाए, महींस तथा बकरीक संग मुनियासँ हंस धरि प्रेमसँ एकठाम रहैत ओकरा मनुखसँ एते घृणा किएक छइ। जहिना धी-जमाए-भगिना लेल कहल जाइत, ओइमे कियो अपन नहि। तहिना भाए-बहिनकेँ महींसक सींग सदृश कहल जाइत। एक जातिक संहार कऽ बगीचाक काँट हटाएब कहल जाइत अछि। मन तरैंग गेलैन‍। तखने एकटा बेदरा आबि कहलकैन‍- “बाबा, अँगनामे बिर्ड़ो उठल अछि।” बेदरासँ किछु पुछब नित्‍यानन्‍द काका उचित नै बुझलैन‍। उड़ैत अकासमे कौआ अपन टाँहि थोड़े दोहरबैए। ओ तँ समैक घड़ी छी। ..मन आँगन पहुँचलैन‍। पत्नीपर नजैर‍ पड़िते विचार उठलैन‍। झगड़ी आकि रगड़ी ओहो छैथ। बुढ़ भेलौं, एतबो होश नै रहै छैन‍। होशो केना रहतैन‍ जइ परिवारकेँ फुलवाड़ी सदृश जिनगीक कमाइसँ बनौने छैथ तेकरा जँ कियो उजाड़ए चाहत से केना उजाड़ए देथिन। मुदा रगड़ी रहितो एकटा गुण तँ छैन्‍हे‍ जे ने रग्‍गड़ ठाढ़ करैमे देरी लगै छैन आ ने सीढ़ीक भीतर फरियबैमे। ..नजैर‍ पुतोहु दिस बढ़लैन‍ अजीब-अजीब लोको सभ फड़ि गेल। कहत जुगे बदैल‍‍ गेल। मुदा की‍ जुग बदलल से कहबे ने करत आ कहत जे जुगे बदैल‍‍ गेल!तहमे तेहेनठाम देखाएत जे अनेरे देहमे झड़क उठत। सासुकेँ उनटा-पुनटा पुतोहु कहथिन तैकाल जुग बदैल‍‍ गेल। मुदा सासुक लगौल फुलवाड़ीकेँ केते समृद्ध बनेलौं तइ काल..? जहिना अपन बाप-माए लगसँ कानि कऽ एलौं तहिना अहू परिवारकेँ कनाएब! अनठा कऽ नित्‍यानन्‍द काका चौकपर पहुँचला। चौकपर पहुँचते चाहक दोकानमे गदमिशान होइत देखलैन। चाह पीबनिहार अपना धुनिमे आ दोकानदार अपन धुनिमे। चाहबला आगि-अगोंरा होइत जे सभटा फोकटिया आबि बैस पूजी बुड़बै पाछू अछि। गिलासपर गिलास चाह ढारने जाइए आ पाइक कोनो पते नहि! मुदा खुलि कऽ ऐ दुआरे नै बजैत जे अखन दोकानपर सँ थोड़े चलि गेल जे बुझबै पाइ बुड़ि गेल। तँए दम कसि लिअए। ओना भीतर शंका पुन: उठि जाइ। चेहरा मिलानी करै तँ वएह चेहरा बुझि पड़ै जे अदहासँ बेसी ओहन अछि जे सौ-पचास पीब-पीब कऽ दोसर दोकान पकैड़‍‍ नेने अछि। किछु जे अछि ओकरासँ कोनो नै कोनो काज हेबे करत। तँए पहिलुके उपकार ने पछाइत‍‍ जुआ कऽ नमहर भऽ जाइए। तँए मुस्‍की दऽ दोकानदार मन माड़ि लिअए। मुदा चाह पीबनिहारक उत्‍साह भिन्ने रहए तँए चाहबला दिस कियो तकबे ने करैत। खाली एतबे कहैत जे दूध जरा कऽ स्‍पेशल बनाएब। गप्‍पोक धारा एहेन रहै जे जहिना जुलुशमे लोक पैरमे लगैत गन्‍दगीकेँ रस्‍तापर आरो चारि बेर रगैड़‍ आगू बढ़ैए तहिना। एक संग अनेको पर्व। लोक भलेँ लोकसँ जेते हटि जाए, मुदा पाबैन थोड़े हटत। कम-बेसी भलेँ भऽ जाए। अजीब-सिनेहक संग राधा-कृष्‍ण बाँहि-मे-बाँहि जोड़ि झूला झुलै छैथ। भाए-बहिनक बीच एहेन पर्व दोसर कहाँ अछि। भरदुतिया तँ भरदुतिये छी। कमलाक जल सेहो बैद्यनाथ बाबाकेँ विदेश्‍वरमे भेटबे करतैन‍। अजीब उमंग-उत्‍साहसँ हँसिते-हँसिते महिना दिनक संकल्‍प निमाहि लइ छैथ। नित्‍यानन्‍द काकापर नजैर‍ पड़िते प्रेम कुमार चाहेक दोकानपर सँ कहलकैन‍- “काका, एतै आउ। सभकेँ-सभ छैथ।” मुस्‍की दैत नित्‍यानन्‍द काका कहलखिन- “खाली लोकेटा नइ ने, फगुआक रमझौआ होइए। अइमे की सुनब आ की‍ बाजब। तइसँ नीक बाहरेमे आबह। चौसैठम स्‍वतंत्रता दिवसक बरखी छी, नइ पान तँ पानक डण्टियो लऽ कऽ सुआगत करबे करबैन‍।” तहीकाल अँगनाक समाचार नेने बेटा पहुँचलैन‍। हाथसँ आँखि मलि-मलि बल्‍लौसँ ललिया-करिया नोर बहबए चाहैत देख नित्‍यानन्‍द काका बेटाकेँ बजैसँ पहिनहि पुछि देलखिन- “किए मन मन्‍हुआएल छह?” “दुनू गोरे[2] अँगनामे झगड़ा करै छैथ।” “झगड़ा शान्‍त करितह आकि कहए एलह?” “हमर बात के सुनत?” मुस्‍की दैत नित्‍यानन्‍द काका घर दिस विदा भेला। जेते घर लग आएल जानि तेते झगड़ो नरमाएल जाइत रहइ। सुनै दुआरे कक्को छोटकी डेग बनबैत रहैथ‍। मुदा जहिना-जहिना डेग छोट होइत जानि तहिना-तहिना अछियाक मुरदा जकाँ झगड़ा शान्‍त भऽ गेल। दुआरपर पहुँचते नित्‍यानन्‍द काका देखलैन‍ जे जहिना भारी काज केलापर वा रौदाएल एलापर छाहैरमे ठाढ़ भऽ नमहर-नमहर साँस लैत तहिना अँगना-दलानक कोनचर लग ठाढ़ भऽ पत्नी साँस छोड़ि रहल छैथ। आगू आँखि उठा देखलैन‍ तँ पुतोहु थारी-लोटा मँजैबला ओचोना लग ठंठाइते साँस छोड़ि रहल छैथ। बजैत कियो नहि। जहिना मुकदमाक खलीफा मुद्दालह बनि लड़ैमे प्रतिष्‍ठा बुझैत, तहिना दुनू गोरेकेँ देख नित्‍यानन्‍द कक्काक मनमे उठलैन‍ केकरो प्रतिष्‍ठाक सीमामे नइ जेबाक चाहिऐ। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2105 परिवारक प्रतिष्‍ठा समाजमे सभकेँ छगुन्‍ता लगैत जे होइत भिनसर सौंसे गाम हड़-हड़-खट-खट शुरू भऽ जाइए मुदा कमला कक्काक परिवारमे एको दिन नै सुनै छी, तेकर की कारण? जहिना रंग-बिरंगक लोक समाजमे रहैए तहिना ने रंग-बिरंगक रोगो-बियाधि आ क्रि‍यो-कलाप रहैए। मुदा लंकाक विभीषण जकाँ यमुना काकी-कमला कक्काक परिवार केहेन हलसैत-फुलसैत कलशै छैन..! बहुत आँट-पेटक परिवार कमला कक्काक नहि। आने परिवार जकाँ अपन दसे कट्ठा जमीन। मुदा पनरह कट्ठा बँटाइयो करै छैथ। जइसँ सहि-मरि कहुना साल लगि जाइ छैन‍। ओना, आन परिवार जकाँ धिया-पुता झमटगर नहि, सिरिफ चारिये गोरेक परिवार छैन। दू परानी अपने आ बेटा-पुतोहु। हँ! मुदा डोरामे गाँथि जहिना फूलक माला बनैत तहिना परिवारोक डोरा सक्कत छैन। अपन-अपन सीमाक बीच चारू गोरे कोल्हुक बरद जकाँ चौबीसो घन्‍टा चलैत रहै छैथ। ओना गामक अदहासँ बेसी परिवारक समांग गाम-सँ-बाहर धरि रहि परिवार चलबैत, मुदा कमला काक्काक परिवारमे के बाहर जाएत तेकर अँटाबेशे ने होइत। कमला कक्काक मनमे रहैन जे एक्केटा समांग अछि जँ ओहो बाहरे चलि जाएत तँ बेर-कुबेरमे एक लोटा पानियोँ के देत? मौका-कुमौकामे कोटो-कचहरी के करत? तेतबे नहि, जँ कहीं किष्‍कारक समए बेमारे पड़ि जाएब तँ खेती-पथारी के सम्‍हारत? जनीजाति तँ जनीजातिये होइत, खेत केना जोताएत? आ जँ खेते नै जोताएत तँ खेती केना हएत? जँ खेतीए नै हएत तँ परिवार केना चलत? अपन की आब ओ समरथाइ रहल जे बलधकेलो किछु कऽ लेब...। जहिना कमला कक्काक मनमे अपन काजक ओझरी लगैत रहैन तहिना यमुनो काकीक मन ओझराएले रहैन। मनमे होनि जे मुँह झाड़ि पतिकेँ किछु तँ नहियेँ कहि सकै छिऐन मुदा पुतोहु लगा बेटाकेँ तँ कहि सकै छी। जखने बेटाकेँ कहबै तखने ओहो ने सुनता। कोनो की कानमे ठेकी थोड़े रहतैन‍। रधवाक मनमे तेसरे बात उठइ जे गिरहस्‍तीक काज बेसी वरसातमे होइए। मिरगिसरा-अद्राक पानि तेहेन होइए जे हाथ-पएर सड़ा दइए। एक तँ हाथ-पएर घबाह भऽ जाइए तैपर सँ काजो बढ़ि जाइए। तइसँ नीक जे परदेशे खटब। मुदा विचार लगले रधवाक मनकेँ बदैल‍‍ दइ। बरहम स्‍थानक भागवत कथाक एकटा बात मन पड़ि जाइ। ओना सुनने रहए पनरहो दिन मुदा एक्केटा बात मन रहलै। ओ ई जे ‘माए-बापक सेवा करब बेटाक सभसँ पैघ धर्म छी।’ पुतोहु लेल धैनसन। ‘कोउ नृप हौउ हमे का हानी।’ एकटा गारजनकेँ के कहए जे तीन-तीनटा गारजनक तरमे छी। जेहने दिन तेहने राति..! पिताक पीठपोहू बनि रधवा कमला कक्काक संग खेती-बाड़ीमे पुरैत। एते बात रधवा बुझि गेल रहए जे खेतीक भरिगर काजमे हरवाहि, कोदरवाहि आ करीनवाहि अछि। ओना, धनरोपनीमे सेहो डाँड़ दुखाइ छै तँए पिताकेँ ऐ सभ काजसँ फारकती दऽ देने रहैन। गिरहस्‍तियो तँ अमरलत्ती जकाँ सघन होइए। काजक इत्ता नहि। कलमसँ कोदारि धरिक काज। जेते समए तेते काज पसारि लिअ। तेतबे नहि, किछु काज एहनो होइत जइमे कम तरद्दुत होइत आ किछु एहनो होइत जे तीन-तीन बेर केलोपर गड़बड़ाएले रहैत। तैपर सँ मेठनियोँ बेसी। भरिगर काज रधवा सम्‍हारियो लैत रहैन तैयो कमला काकाकेँ सोहरी लागल काज रहबे करैन‍। जेते हाथ-पैरसँ करैथ‍ तइसँ कम बुधियोक नहि। महिना, ग्रह, नक्षत्रक काज सेहो रहबे करैन‍। कोन नक्षत्रक धानक बीआ निरोग होइए आ कोनमे पाड़ने कललग्‍गू भऽ जाएत, कोन नक्षत्रमे कोन चीजक बीआ पाड़ल जाएत आ कोन चीज रोपल जाएत इत्‍यादि, बारहो मासक हिसाब कण्‍ठस्‍थ रखने छैथ। जेकर खगता अखन धरि रधवाकेँ भेबे ने कएल। जेतेकाल काजमे लगल रहैत तेतबे बुझैत। बाँकी समए ने मारी माछ ने उपछी खत्ता। बिना धैन-फिकिरक वैरागी जकाँ चैनसँ रहैत। कमेनाइ-खेनाइ आ सुतनाइक जिनगी। तीनूक गतियो एकरंगाहे...। आँगनसँ बाहरक काज जहिना दुनू बापूत कमला कक्काक बीच अड़ियाएल चलैत रहैन तहिना अँगनाक भीतरक काज दुनू सासु-पुतोहुक बीच चलैत रहैन। चूल्हि‍-चीनमार बहारब-नीपब, घर-अँगना बहारबसँ लऽ कऽ थारी-लोटा धूअब, भनसा-भात करब धरिक भार पुतोहुक ऊपर। जे पुतोहुओ आ साउसो बुझैत, तँए ने केकरो चड़ियबैक जरूरत आ ने कियो अढ़बैक आशा करैत। तहिना यमुनो काकीक काज रहैन। कोठीक अन्न केना सुरक्षित रहत, तैठामसँ लऽ कऽ माल-जालक थैर-गोबर केनाइ, घास लौनाइ धरिक। ओना किष्‍कारोक समैमे आ कटनियोँ-दौनीक समैमे गिरहस्‍ती काजमे सेहो काकी हाथ बँटबैत रहथिन। चीनी मिलमे जहिना एकठाम कुशि‍यार बोझि‍ते, रेलबे टिकट लेनिहारक धाड़ी जकाँ रसे-रसे आगू बढ़ैत तहिना कमला कक्काक परिवार छैन। परिवारमे ने मुहाँ-ठुठी करैक कोनो जगह छैन आ ने कखनो से होइत। ओना गाम नीचरस जमीनमे बसल तँए ऊँचरस जमीनक बारहो-बिरहिणीक खेती नै होइत। माने, भीठ जमीन नै रहने भीठक उपजो नहियेँ। जइसँ गाममे बेख-बुनियादि सेहो कम आ गाछियो-खरहोरि तहिना। तीन हीसमे बास आ एक हीसमे खेत-पथारसँ लऽ कऽ वाड़ियो-झाड़ी धरि छैन। ओना तँ छह ऋृतु होइ छै‍ मुदा गिरहस्‍ती लेल मूलत: तीन मौसम होइत। ऋृतु दुइए मासपर बदलैत, जखन कि फसिल तीन मासक उपरान्‍ते बदलैत। किछु-किछु तीन माससँ कम्मो समैमे होइत मुदा बेसी तीन माससँ बेसीए-मे। तँए मोटा-मोटी जाड़, गरमी आ वरसाती फसिल होइत। तहूमे डन्‍डी-तराजू जकाँ वरसात डन्‍डी पकड़ने अछि आ तराजूक पलरा जकाँ जाड़-गरमी। एक-दोसराक दुश्‍मनो, किएक तँ रहत कोनो एक्केटा। सन्‍यासी जकाँ एक-दोसरकेँ नै सोहाइत। मुदा बीचमे जँ पंच नै रहत तँ झगड़ेमे दुनू लगि जाएत, आगू की बढ़त। सालक वरसाते मौसम एहेन होइत जे सालो-भरिक भाग-तकदीर निर्धारित करैत। जहिना बेसी बर्खा भेने दहार होइए तहिना नै भेने रौदी। जे दुनू, गिरहस्‍तीकेँ जान मारैए। हँ! एहनो होइए जे जइ साल समगम बर्खा भेल तइ साल सुभ्‍यस्‍त समए भेल। जइसँ निच्चाँ-ऊपर एक रंग फसिल उपजल। जहिना कृष्‍ण अर्जुनकेँ कहने रहथिन तहिना मौसमो होइए। जइ धरतीपर गंगा, सरस्‍वती आ यमुना सन धार एकठाम मिलि कुम्‍भ सजबैए‍ तैठाम दिन-दहार हत्‍या, बलात्‍कार अपहरण हुअए, बिनु बुधिक लोकक भरमार लगल रहए, मनुखकेँ मनुख नै बुझल जाए, तखन तीनूक संगमक कोन उपकार? नमगर-चौड़गर आँट-पेटक तीनू धार जे हँसैत-झि‍लहोरि खेलैत समुद्रमे समाहित होइत, तैठाम..? हमरा सभकेँ ईहो नै ओझल रखक चाही जे एकैसम सदीक स्‍वतंत्र प्रजातंत्रक बीच बास करै छी। अखन धरिक इतिहासमे एते सक्षम मनुख ऐ धरतीपर नै भेल छल। तँए, दायित्‍व बनैए जे युगक संग पकैड़‍‍ युग-युगान्‍तरक धाराकेँ स्‍वच्‍छ बना चलए दिऐ। काल मनुक्‍खेटा केँ नहि, सभ किछुकेँ प्रभावित करै छइ। जखने सभ किछु प्रभावित हएत तखने जीवन-पद्धतिमे धक्का लगत। ओइ धक्काकेँ निष्‍क्रिय करैले जीवन-शैलीमे बदलाव आनए पड़त। जहिना बीतल युग तहिना बदलल। माने सत्‍युगमे जे क्रि‍या-कलाप छल ओ त्रेतामे आबि सुधरल, जइसँ बदलाव आएल, युग-परिवर्त्तन भेल। तहिना त्रेतासँ द्वापर भेल। तँए जरूरी भऽ गेल अछि जे समयांकन इमानदारीसँ हुअए। कहैले तँ कमला काका परिवारक गारजन छैथ‍ मुदा अँगनाक सीमासँ अपनाकेँ बाहरे रखने छैथ। खेतक उपजावारी बाधसँ आनि पत्नीकेँ सुमझा दइ छथिन। यमुनो काकी कि आब नव-नौतारि छैथ‍ जे परिवारक धक्का-पंजा नै बुझथिन। जिनगीक धक्का-पंजा जीबैक बहुत किछु लूरि सिखा देने छैन‍। सुभ्‍यस्‍त समए भेने काकीक मनमे खुशीक कोढ़ी शुरूहे आद्रा नक्षत्रमे जे पकड़लकैन‍ से बढ़ैत-बढ़ैत अगहनमे भकरार भऽ फुला गेलैन‍। धान दौन होइते, आने साल जकाँ यमुना काकी उसनियाँ करैसँ पहिने‍ उपजाक हिसाब बेटो-पुतोहु आ पतियोक कानमे दऽ देब, आने साल जकाँ नीक बुझलैन‍। मने-मन बुदबुदेली- “केते धान भेल, तेकर केते चाउर हएत आ केते दिन चलत?” ‘केते दिन चलत’मे ओझरी लगि गेलैन‍। लोकक पेटक कोनो हिसाब अछि, देखैमे ने बिते भरिक बुझि पड़ैए मुदा हाथियो खा-पी कऽ पचा लइए‍। फेर मन घुमलैन‍। जखन अपने परिवारक बात अछि तखन एना अग्‍गह-विग्‍गह किए सोचै छी? देखले परिवार नपले सिदहा। मुदा लगले यमुना काकीक मन आगू घुसैक गेलैन‍। आन-आन परिवार जकाँ तँ अपन परिवार नै अछि। आन-आन परिवारमे आनो-आनो उपाय छै मुदा अपना तँ से नइ अछि। लऽ दऽ कऽ खेतियेक आशा अछि। तहूमे एते दिन घटबी पुरबैले गाम-गाम महाजनो छेलै मुदा आब तँ ओहो नइ अछि। ‘ने ओ देवी आ ने ओ कराह।’ महाजनी मरैक कारणो भेल। राजे रोग जकाँ ने बाढ़ियो-रौदी छी। जे जेहेन अछि तेकरा तही रूपे पकड़ै छइ। माने जे जेते कम आँट-पेटक ओकरा ओते कम आ जे जेते नमहर ओकरा ओते बेसी नोकसान करै छइ। तैसंग ईहो भेल जे गामक लोक बाहरसँ सेहो कमा-कमा आनए लगल। जइसँ महाजनीक बीच रोड़ा अँटकल। ओना बहरबैयो बाहरक बहुत बात तँ नहियेँ बुझैत मुदा जिनगीक किछु बात तँ जरूर बुझए लगल। नै बुझैक कारण रहै जे पढ़ल-लिखल नै रहने एको गोरेकेँ ने बैंकक नोकरी रहै आ ने करखन्नाक ऑडि‍टरी। जैठाम धनक कँकोड़बा बिआन होइत से कियो ने बुझैत। मुदा रिक्‍शा चलौनिहार, ठेला ठेलनिहार, गोदाममे बोरा उठौनिहारकेँ लगक महाजनसँ भेँट जरूर भेलइ। जहिना छोट बच्‍चा हाथक ओंगरी मुँहमे लैत-लैत बाँहियो पकड़ए लगैत तहिना खुदरा महाजन लग एने भेल। ओना छोट महाजनी रहने साले भरिक लेन-देन चलैत मुदा पच्‍चीस हजारक सहयोगी तँ भेटल। बेटा-बेटीक बिआह, घर-घरहट आ बर-बिमारीक आशा तँ भेटल। गामक महाजनीसँ सूदियो छोट। जेतए आसिन-कातिकक कर्ज एक्के-दुइए मासमे सवैया-डेढ़िया वृद्धि‍ करैत तैठाम दस प्रतिशत बियाजक बदला पच्‍चीस प्रतिशत दिअ पड़ैत, तेतबे ने। मुदा तैयो तँ असाने भेल। दोसर ईहो भेल जे आध-मन, एक-मन कर्ज लेल जे भरि-भरि दिन साबेक जौरी खर्ड़ए पड़ै छल सेहो बन्न भेल। दुनू बापूत–कमलो काका, रधवो–केँ यमुना काकी बुझबैत कहलखिन- “एते धान भेल। एकर एते चाउर हएत आ एते दिनक पछाइत‍‍ फेर ऐगला अन्न हएत। एते दिनमे एते साँझ भेल, एतेटा आश्रम अछि। दिनमे एते सिदहा लगैए।” यमुना काकीक हिसाब सुनि कमला काका विचारक दुनियाँमे वौआ गेला। जेहो सुनलैन‍ सेहो रसे-रसे बिसरए लगला आ जे नै सुनलैन‍ से तँ नहियेँ सुनलैन‍। अपन प्रस्‍तावक अनुमोदन लेल यमुना काकी आँखि नचबए लगली। नचैत आँखि कखनो पतिपर तँ कखनो बेटापर दैथ। आ उनैट‍ कऽ जखन पाछू तकैथ तँ टाटक अढ़मे बैसल पुतोहुपर नजैर पड़ि जाइन। सभ अपने-अपने दुनियाँमे वौआइत...। अपन प्रस्‍तावक उत्तर नइ पाबि यमुना काकी फेर दोहरबैत बजली- “अखन सोचै-विचारैक समए अछि, तँ कियो कान-बात नै दइ छिऐ आ जखन बेर पड़त तखन थुक्कम-थुक्का करैत घि‍नमा-घीन करब!” यमुना काकीक करुआएल बात सुनि कमला कक्काक भक्क खुजलैन‍। मनमे उठलैन‍ जे मुहोँ चोरौनाइ नीक नहि। बजला- “खेतसँ खरिहाँन आनि तैयार कऽ आँगन पहुँचा देलौं, आबो हमरे काज अछि। आकि ओकरा उसनब, रौद लगा कोठीमे राखब। की सेहो पुरुखे भरोसे छी।” कक्काक उत्तरसँ यमुना काकीकेँ घरक लक्ष्‍मी मन पड़लैन‍। खुशीसँ मन नाचि उठलैन‍। मुदा लगले, जेना घुरमी लगैए तहिना लगि गेलैन‍। बजली- “जोड़ भरि धोती आकि जोड़ भरि साड़ी तँ कियो साले भरि ने पहिरत। साल भरिक पछाइत‍‍ ओ थोड़े पहिरै-जोकर रहै छइ। एकर अर्थ ई नइ ने भेल जे वस्‍त्रक जरूरत मेटा गेल, साल भरि लेल मेटाएल, तोहूमे केते बिहंगरा अछि। कहीं चोरिये भऽ जाए आकि हेराइए जाए, आकि कुत्ते-बिलाइ दकैर दइ, आकि आगिए-छाइक प्रकोप भऽ जाइ।” यमुना काकीक बात सुनियोँ कऽ कमला काका अनठा देलैन‍। चुप भऽ गेला। मुदा मनमे ओंढ़ मारए लगलैन‍ जे माए-बापक अछैत बेटा-पुतोहुकेँ परिवारक चिन्‍ताक उत्तरी पहिराएब उचित नहि। ओना, काजक ढंग ओहन सिखा देब नीक, जइसँ जिनगीमे कहियो चिन्‍ता नै सतबै। आगूमे बैसल रधवा, जेना संस्‍कृत आकि अंग्रेजी सुनि कोनो बच्‍चाकेँ होइत, तहिना सुनबे ने केलक। मुदा तैयो रधवाक मनमे घुरिआइ जे जे-गति सबहक हेतै से हमरो हएत। तइले अनेरे माथ-कपार पीटब आकि धुनब नीक नहि। रमरटियासँ खढ़कटिये नीक..! भरमे-सरम रधवा चुपे रहल। मुदा अढ़मे बैसल पुतोहुक मन बजैले लुस-फुस करैत। लुस-फुस करैक कारण जे के नै घर आकि गामक मुख्‍यि‍यारी चाहैए? मुदा वेचारीकेँ कोनो एहेन गड़े ने भेटैत जे किछु बजितैथ। एक तँ नव-नौतुक कनियाँ, दोसर नैहरोमे माए भानसे-भात करैक लूरिटा सिखौने। घरक जुति-भाँतिक कोनो लूरि सीखेबे ने केलकैन। केना सीखेबो करितैथ‍? सभ गाम आ सभ परिवारमे किछु-ने-किछु भिन्नता होइते छइ। जहिना कोनो नट ओहने बोल्‍टमे नीकसँ लगैत जे समतुल्‍य रहैए। परिवारो तहिना ने होइ छइ। माइए-बापक परिवार जकाँ साउसो-ससुरक परिवार हएत, से कोनो जरूरी नहि। चाहियो कऽ वेचारी किछु ने बाजि सकल...। ओना धानक ढेरी देख कमला कक्काक मन उमड़ैत रहैन। जहिना पानिमे भीजने किताबक पन्ना एक-दोसरमे सटि जाइए तहिना कमलो काकाकेँ, परिवारक सभ हृदैमे सटि गेलैन‍। मन उमैड़ आगू बढ़लैन‍। पतिकेँ रहैत जँ पत्नीकेँ वा बाप-माएकेँ रहैत बाल-बच्‍चाकेँ कोनो तरहक चिन्‍ता-फिकिर हुअए, तँ जरूर केतौ-ने-केतौ माए-बापक दोख छिपल अछि। मुदा दोखक कारण मनमे एबे ने करैन‍। ओछाइनपर जहिना नीन नै एने कछमछी लगैत तहिना कमला कक्काक मन कछमछाइत रहैन। मुदा लगले, जहिना सुतली रातिमे ओछाइनपर सूतल माएकेँ देख जागल बच्‍चा सूति रहैत तहिना कमलो काका केलैन‍। पतिकेँ शान्‍त देख यमुनो काकी असथिर भऽ गेली। मनमे उठलैन‍ जे चारि गोरेक आश्रममे तीन गोरे तँ एक्के परिवारक छी, खाली कनियेँटा ने अखन दस-आना छह-आनामे छैथ। ओहो दू-चारि सालमे रिताइत-रिताइत रिता जेती। मुदा अखन तँ नैहरेक चालि-ढालि छैन‍। अखन थोड़े ऐ घरक तीत-मीठ पचौती। नैहर गेलापर जखन सखी-बहिनपा वा माए-पितियाइन पुछतैन‍ जे बुच्‍ची अन्न-वस्‍त्रक ने तँ दुख-तकलीफ होइ छह, तखन ओ थोड़े आगू-पाछू ताकि बजती। ओ तँ परिवारेक बँचौने बँचत। वएह ने परिवारक प्रतिष्‍ठा छी। जानियेँ कऽ तँ हमरा सबहक घरक छप्‍पर भगवानक डेङ्गेलहा छी, तेहीमे ने बँचि-खुचि कऽ घरक मर्यादाकेँ संगे लऽ कऽ चलैक अछि। अहीमे ने अपन इमान-धर्म बँचबैत परिवार चलाएब तखन ने समाजक संग कुटुमो-परिवारक प्रतिष्‍ठा ठाढ़ रहत। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1963 मनोरथ जहिना शोभा काका सभ छुट्टी गामेमे बीतबै छैथ तहिना सभ रबियो बीतबै छैथ। सुविधो छैन‍। पाँचे कोसपर विद्यालय छैन, साइकिल छैन्‍हे तँए अबै-जाइमे असोकर्जो नहियेँ होइ छैन‍। शनिकेँ स्‍कूलो अदहे होइ छैन, सेहो सुविधा भाइये जाइ छैन‍। आने शनि जकाँ सात बजे साँझमे शोभा काका गाम पहुँचला। पछबरिया घरक दाबा लगा साइकिल ठाढ़ कऽ कैरियरपर सँ झोरा उतारि आँगनमे पएर रखिते छला कि पत्नीपर नजैर‍ पड़लैन‍। जेठ-अखाढ़ मास तँए डि‍बिया नेसैक ओरियान सुगिया काकी करै छेली। ओना, डेढ़ियापर जखने साइकिल खड़खड़ाएब सुनलैन‍ कि बुझि गेली जे एहेन अवाज तँ अपने साइकिलक छी। आ आँखि उठैबते नजरियो पड़िए गेलैन‍। जेठ-अखाढ़ मास ऐ लेल जे पूर्णिमा भऽ गेल मुदा सकराँइत पछुआएले छल। मुदा काकीक संयोग नीक रहलैन‍ जे नजैर-मे-नजैर‍ नै मिललैन‍। जँ नजैर‍ मिलि जइतैन‍ तँ चूल्हि पजारि डिबिया नेसब बाधित भऽ जइतैन‍। तेकर लाभ सुगिया काकी उठेबो केली। लाभ ई उठौली जे पतिक आगत-भागतकेँ एक नम्‍बर काजक सूचीसँ निच्‍चाँ उतारि दू नम्‍बरमे रखि, कुशल कारीगर-कलाकार जकाँ एक काजकेँ विसर्जन करैसँ पहिने दोसरक संकल्‍प लऽ लेली। मने-मन विचारि लेली जे जाबे जारैनक धुआँ फरिच्‍छ हएत-हएत ताबे साँझो घुमा लेब। काजमे लगल देख शोभो काका बिनु किछु बजने कोनचरे लगसँ झोरा ओसारक चौकीपर रखि पानिक प्रतीक्षा करए लगला। केना ने करितैथ‍, जाधैर‍‍ घरबैया दिससँ पएर धोइले पानि नै पहुँचैत ताधैर‍‍ कारखाना जकाँ उपस्‍थिति केना बनैत। मुदा ईहो तँ भऽ सकैए जे अभ्‍यागतक सेवा योग्‍य परिवार नै हुअए? सुगिया काकीक मनमे ईहो उठैत रहैन‍ जे भाषणक कलाकारी होइत जे एतबे समैमे एतेटा बात बाजि देब मुदा काज तइसँ बहुत दूर होइत। ओना, चलनिहारकेँ पैरक गति रोकिनिहार सेहो बीचमे आबि सकैए। नहियोँ औत, तँए जइमे ‘हँ-नइ’ दुनूक संभावना होइ ओकर गारंटी शत-प्रतिशत नै कएल जा सकैए। तँए सुगिया काकीकेँ होनि‍ जे जैठाम दुविधा अछि तैठाम सावधानी नै करब तँ रेलबेक ट्रेन जकाँ एकठाम बिलंम भेने गन्‍तव्‍य स्‍थान धरि बिलैमते ससरब। तेतबे नहि, अदहा दिनक चलल छैथ‍, बाटमे केतए आ की देखने हेता, जँ कहीं एहेन समस्‍या देखने आएल होथि आ रस्‍तापर अमती काँटक झाँगैड़ जकाँ रखि दथि, तखन तँ जिनगीए ढंस भऽ जाएत! भोजनकाल जँ पानिक बरतने फुटि जाए तखन पानि केना परसब..? सभ काज सम्‍हारि सुगिया काकी हाथमे लोटा धरबैत शोभा काकाकेँ पुछलखिन- “हाल-चाल सभ आनन्‍द किने?” काकीक पुछब जेना शोभा कक्काक मनकेँ हौंर देलकैन‍ तहिना मन सहैम गेलैन‍ जे भरिसक कोनो आक्रोश छैन‍। मुदा अनुकूल समए नै पाबि, उत्तर देखखिन- “पुरबते।” शोभा कक्काक उत्तर सेहो सुगिया काकी तारि लेली। तँए उचित समए नै पाबि सुगिया काकीक मनमे भेलैन जे पएर धोइले दरबज्‍जापर जेबे करता तँ किए ने टिकमे चिड़चिड़ी लगा दिऐन‍ जे जाबे चिड़चिड़ी छोड़ौता-छोड़ौता ताबे चाह बना लेब। काज औगतेने तँ नै होइ छइ। बड़ भूख लागए तँ पातक बदला हाथे नै पसारि दिऐ..! बजली- “नीमक गाछमे गराड़ लगि गेल अछि से कनी देख लेब?” सुगिया काकीक बात सुनि शोभा काका बजला किछु नहि, मुदा मनमे उठलैन‍ जे नीमक गाछमे केतौ दिवार लगइ! एहेन बात किए कहलैन‍? गराड़केँ मीठ जड़ि पचै छइ? तीत केना पचत। मुदा फेर मनमे उठलैन‍ जे पुरुखक नाड़ी नारीक नाड़ीसँ भिन्न चलैए‍ तँए समए लगबै दुआरे जँ कहने होथि। मुदा से केना बुझब जे केते समए लगाएब? भऽ सकैए जे जेतबे समए जड़ि खोरि गराड़ देखैमे लगत तेते, मुदा से अपने केना बुझब? तइसँ नीक जे जाबे बजबए नै औती ताबे नै जाएब। पैछलो शनिमे जखन आएल रही तँ पएर धोलाक बाद चाह पिऔने रहैथ‍‍। तहिना चाहे बनबै दुआरे जँ टारने होथि। नीक हएत जे ताबे धरि कड़ची लऽ कऽ जड़ि खोरैत-खारैत रहब जाबे धरि बजबए नै औती। चाह छानि ओसारक चौकीपर रखि काकी दरबज्‍जा दिस बढ़ैत बजली- “जअ काटए गेलौं तँ सतुआइन केनहि एलौं! चाह सेरा कऽ पानि भऽ गेल। आ झूठे-फूसेमे लटकल छी!” ‘झूठ-फूस’ सुनि शोभा काका चौंकला, कहू जे अपने लटकल छी आकि हुनके किरदानीए लटकल छी? मुदा किछु बजला नहि। मनमे उठलैन‍ जे जइ शून्‍यक कोनो मोजर नै छै, सेहो घुमैत-फि‍ड़ैत केतए-सँ-केतए उड़ि जाइत अछि। मुदा ई तँ शब्‍दवाण छी, कागभुशुण्‍डी जकाँ समुच्‍चा दुनियाँ देखौत..! पुछलखिन- “केहेन चाह बनेलौं जे लगले पानि भऽ जाएत‍?” जहिना मन्‍दिरक बीच भक्‍त भगवानक आगू ठाढ़ भऽ दुनू हाथ जोड़ि अपन मनोरथ मनमे दाबि, पहिने स्‍तुति करैत तहिना मनक बात मनेमे रखि सुगिया काकी बजली- “तबधलमे तपते चाहक ने सुआद होइ छै जँ से नहि, तँ जहिना अधिक बोखारक आगू कम बोखार, बोखार नै रहि जाइत तहिना ने चाहो होइ छइ।” भूखलकेँ पहिल कौर आ पियासलकेँ पहिल घोंट जहिना सुखद होइ छै तहिना चाहक घोंट लगैबते शोभा काका बजला- “गाम-घरक की हाल-चाल अछि?” गाम-घरक हाल-चाल सुनि सुगिया काकीक मन उड़ए लगलैन‍। बजैसँ पहिने सोचए लगली जे किम्‍हरसँ बाजी। गाम दिससँ आकि परिवार दिससँ। सम्‍हारैत बजली- “गाममे तँ ऐबेर साक्षात् सरोसतिये आबि गेली। एकोटा विद्यार्थी फेल नै भेल।” सभकेँ पास सुनि शोभा कक्काक मन ओझरा गेलैन‍। जखन सभ पास केलक तखन सुशीलक केना बुझब जे केतेसँ नीक केतेसँ अधला केलक। पाशा बदलैत पुछलखिन- “केकरा कोन डि‍बीजन भेल?” काकीक मन पहिनहिसँ उड़ल रहबे कहैन, जहिना दौड़ैकाल पैरक ठेकान नै रहैत तहिना प्रश्‍नकेँ सुआदने बिना बजली- “सभसँ बेसी नम्‍बर अपने सुशीलकेँ अछि।” ‘सभसँ नीक सुशील’केँ सुनि शोभा काका बजला- “अपने जे हुअए मुदा सुशीलकेँ आगूओ पढ़ाएब।” आगूक नाओं सुनि सुगिया काकी भकरार फूल जकाँ बजली- “रिजल्‍ट निकललापर जखन सुशील संगी-साथी सभसँ भेँट कऽ आएल तखनेसँ मन खसल देखै छिऐ!” “से किए?” “कहैए जे आगू पढ़ैले सभ बाहर जाएत..?” सुगिया काकीक विचारकेँ शोभा काका विचारक अलमारीमे चौपेतैत बजला- “नीक हएत जे बौऔकेँ एतै सोर पाड़ि लियौ। परिवारक सभ मिलि कऽ किए ने परिवारक काजक विचार करब। केकरो मनोरथकेँ किए कियो दाबत?” शोभा कक्काक विचार सुनि सुगिया काकीक मन खापैड़क धान जकाँ ऐ भागसँ ओइ भाग करए लगलैन‍। मुदा पतिक बात बुझि हनछीन नै कऽ कन्‍हलग्‍गू बरद जकाँ जू गेली। सुशीलक संग आबि काकी अपन घरमे अभ्‍यागत जकाँ बजली- “बौआ, पहिने बाबूकेँ गोड़ लगहुन।” ओना सुशीलक मनमे अपनो रहबे करै जे अपन कर्त्तव्‍यक पालन केना केने छी से तँ पितेक बतौल रस्‍ता छिऐन‍, तँए ओइ पगक पग-सँ-पग टपलौं। तखन किए ने ओकरे हथियार बना जीवन-कर्म करब...। पिताकेँ गोड़ लागि सुशील मुँह उठा असीरवादक प्रतिक्षा करए लगल। सुशीलक माथपर हाथ रखैत शोभा काका पुछलखिन- “बाउ! आगूक की विचार होइए?” सुशील बाजल- “सभ बाहर जा-जा नाओं लिखौत।” शोभा काका कहलखिन- “मनोरथ अपनो अछि, माइयोक मन तेहने देखै छी। चारि-पाँच साल नोकरी रहल अछि। तैबीच देखबे करै छहक चारू भाए-बहिन पढ़ै छह, दिनो-दिन आगूए बढ़बह। जइसँ खरचो बढ़िते जाएत। केते कमाइ छी से केकरोसँ छिपल अछि। तखन तँ आमद-खर्च देख कऽ जँ परिवारक गाड़ी नै खिंचबह तँ केते दिन परिवार ठाढ़ रहतह।” पतिक बातकेँ अनसुन करैत सुगिया काकी बिच्चे‍मे टपैक‍ उठली- “हम केकरासँ थोड़ छी जे अपन मनोरथ पूरा नै करब। जहिना सबहक बेटा पढ़ैले बाहर जाएत तहिना हमरो सुशील जाएत।” पत्नीक विचारसँ शोभा काका सकपकेला नहि। अपनो मनोरथ, पत्नियोँक मनोरथ आ बेटोक मनोरथकेँ पानि-चिन्नी-नेबोक रस जकाँ घोड़ए लगला। मुदा मनक बात कहथिन केकरा। नजैर‍ उठा कखनो पत्नी तँ कखनो पुत्रपर दैत विचारए लगला। विचित्र स्‍थिति बनि गेल अछि। नोकरीक चाहमे लोक केतए-सँ-केतए भागि रहल अछि! किए ने भागत? जे हवा बनि गेल अछि आकि बनल जा रहल अछि तइमे जिनगीक ज्ञान पाछू पड़ि रहल अछि। नव तकनीक संग नव मनुख पैदा लऽ रहल अछि जेकर दूरी एते-बढ़ि रहल अछि जे चिन-पहचिन्‍ह तक समाप्‍त भऽ रहल अछि..! ◌ शब्‍द संख्‍या : 1162 [1] आँठी-सँ जनमल साल-दू सालक आमक गाछ [2] सासु-पुतोहु ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल लघु कथा चहकल विचार काल्‍हिये वरस्‍पैत काका हाइ स्‍कूलसँ सेवा निवृत्त भेला अछि। जिनगी भरिक नोकरीक भारसँ निवृत्त होइसँ पहिने मनमे खूब खुशी छेलैन जे बेटो-पुतोहु ठौर लगि कऽ जगरनाथेपुरीमे रहैए आ बेटियो सभ ठौरेपर अछि। जइ समैमे नोकरी शुरू केने रही तइ समैमे जेते मास दिन खटलापर दरमाहा भेटै छल तइसँ चारि गुणा बेसी (नव वेतनमान बनने) आब पेंशने भेटत। जहिना अखन धरिक जिनगीमे केकरो रोब-दाब नइ सहलौं तहिना भगवान आगूओ जिनगीक पार लगेबे करता। हाइ स्‍कूलक शिक्षणमे जिनगीक पैंतीसम बर्ख बीता वरस्‍पैत काका सेवा निवृत्त भेल छला। नीतिशास्‍त्रक विद्यार्थीसँ जे जिनगी शुरू केलैन ओ साठि बर्खक जिनगीक सीमानपर पहुँचा देलकैन। अखन धरि जइ घर-अँगनामे रहै छला ओ अस्‍थायी रूपे, मुदा आब स्‍थायी रूपे रहता, तँए दुनू परानीक ऐगला जिनगीक पहिल काज यएह स्‍थायित्‍व आनब छेलैन। तीन बजे भोरे नीन टुटिते वरस्‍पैत कक्काक मनमे एलैन जे अखन धरि दुनू परानीक बीच बिनु ठौर-ठेकानक जिनगी छल। कहियो गाए-महींस गनैक ड्यूटी करै छेलौं, तँ कहियो भोँटक बूथपर सवा किलो मिठाइ महावीरजी केँ कबुल, जाइ छेलौं। तहिना पत्नियोँक छेलैन। ओना बापक घरमे जीबैक सभ लूरि सीख नेने छेली। तेकर कारण छल जे पिता सदिकाल चरिया-चरिया कहैत रहै छेलैन जे अपन जिनगीक काज हर मनुखकेँ चीनहक चाही। हाथ-पएर सभकेँ छइहे, जखने ओकरा ओइ काजकेँ पकड़ैक लूरि भऽ जेतै तखने ढलानपर ढलकैत गाड़ी जकाँ जिनगी असानीसँ चलए लगत। ओना वरस्‍पैत कक्काक संग भेला पछाइत सुगिया काकी किसान परिवारक कन्‍याँसँ नोकरिहारा परिवारक कनियाँ बनि गेल छेली। तँए क्रियामे जहिना सभकेँ होइ छै तहिना सुगियो काकीकेँ भेले रहैन। तीन बजे भोरे वरस्‍पैत काकाकेँ नीन टुटिते पत्नीकेँ जगबैक विचारसँ बजला- “पैछला चालि-ढालि छोड़ू, एते दिन दोसरक हाथमे छेलौं तँए दोसर जिनगी छल, आइसँ स्‍वतंत्र भेलौं। तँए जिनगीक चालि-ढालि सेहो ने तोड़ए-जोड़ए पडत। तहूमे जखन हम केतौ आ अहाँ केतौ चिड़ै जकाँ छेलौं तखुनका आ आब एक्के घर-दुआरिमे दिन-राति मनुख जकाँ रहब, से तँ अपने ने विचार करैत चलब।” ओना सुगिया काकीक नीन सेहो टुटले छेलैन, मुदा चुपचाप अपन बुढ़ाड़ीक जिनगीक हिसाब लगबै छेली जे आब केतबो सींग कटा नेरू बनब से पार लागत। तहूमे दुनू परानी एक उमेरिये छी तँए रोगो-बियाधि  तँ ओहने ने धड़त। मने-मन सुगिया काकी वौआइते छेली कि वरस्‍पैत कक्काक अवाज सुनली। ओना वरस्‍पैत काका ओछाइन छोड़ि उठि गेल छला, तहूमे गाममे बिजली आबि गेने देहक पानिमे सेहो कनी-मनी करेन्‍ट आबिए गेल छेलैन। ओछाइनपर सुतले-सुतल सुगिया काका बजली- “दिन-रातिक वसन्‍त वेलमे किए औनाइ छी?” अपन मनक बाट पकैड़ वरस्‍पैत काका शेष जिनगीक दिशामे दिशा ताकए चाहै छला तँए पत्नीक बातकेँ नीक जकाँ अँगेज नइ सकला। अपने बेथे बेथाएल बेकती जकाँ वरस्‍पैत काका समाजिक जिनगीमे पएर रोपए चाहै छला। तँए विचारसँ लऽ कऽ समाजक सम्‍बन्‍धक क्रिया धरि संलग्‍न करबाक छैन। नोकरिहारा जिनगी रहने एते तँ भाइए गेल छेलैन जे गाममे नइ रहने छुतको केश आ सराधो-बिआहक भोज छुटि गेले छेलैन जइसँ समाजिक सम्‍बन्‍धमे सेहो कमी आबिये गेल छेलैन। वरस्‍पैत काका बजला- “औनाइ कहाँ छी, पौनाइ तकै छी। दुनू गोरेक बीचक जिनगीक बात अछि किने, तँए दुनू गोरे जँ विचारि नइ चलब तँ सदिकाल दुनू परानियोँमे खटपट होइते रहत।” जिनगीक अलिसाएल (माने अठबजिया सुति उठनिहारि) देह, मुदा पतिक विचार तँ सेहो दोसर पाशापर छेलैन्‍हे। अँघस-मँघस करैत सुगिया काकी उठली। उठि तँ गेली मुदा मनमे होनि जे कनीकाल आरो ओछाइन धेनहि रहितौं...। अपन ऐगला जिनगीक ओहन रूप वरस्‍पैत काका बनबए चाहै छला जेना समाजमे समाज बनि समाज रहैए। मुदा समाजो तँ समाज छी। सनातनी धारामे बहैत नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधलाकेँ अपन धारमे गलित-पचित करैत अनवरत बहैत आबि रहल अछि आ आगूओ बहैत रहत। भलेँ गदियाएल बेसी हुअए कि मटियाएल। मुदा वरस्‍पैत काका तँ नीतिशास्‍त्रक विद्यार्थी, विद्यार्थी जीवनसँ शिक्षक धरि रहला तँए मन बेसी ओम्‍हरे लटकल रहैन। ओना ई बात वरस्‍पैत काकाकेँ बुझल छैन जे नीति, रीति, गीत, मीत आ हित समए आ स्‍थानक अनुकूल चलैए। जँ से नइ चलैत तँ गीत गीते छी जे नीके लगैए मुदा समए-स्‍थानक भेद भेने किए कोइलीक स्‍वर कौआक भऽ जाइ छइ? ओछाइनपर पड़ल सुगिया काकीक मन अग-दिगमे पड़ल छेलैन। जँ उठै छी तँ अपन सुखक नीन जाएत आ जँ नइ उठै छी तँ पतिक पतिपना जाएत। तहूमे काल्‍हिये सेवा निवृत्ति भेला अछि, लगले कहता जे जाबे कमाइ छेलौं माने नोकरी करै छेलौं आ हाथमे हरियरका कड़कड़ौआ नोट दइ छेलिऐन ताबे कमासूत पति छेलिऐन आ सेवा-निवृत्त होइते बोल-कहल भऽ गेली! सामंजस करैत सुगिया काकी बजली- “अखन ऐ अधरतियामे केतए जाएब! आउ, अही ओछाइनपर बैस जिनगीक सूत्रधार जकाँ अपनो दुनू गोरे सुतियाउ।” ओना पत्नीक जे आग्रह छेलैन से वरस्‍पैत काका नइ बुझि पेला। तेकर कारण भेलैन जे पत्नीक पहिल शब्‍द जे ‘अधरतिया’ छेलैन, तेहीक वेद-भेद करैमे ओझरा गेल छला। जइसँ ओछाइन तक अबैत-अबैत धियाने हटि गेलैन। वरस्‍पैत काकाकेँ मनमे उठल छेलैन ‘अधरतिया’ की भेल? यएह ने भेल जे जँ छह बजे सुर्यास्‍त होइए आ दोसर दिन छह बजे सुर्योदय हएत, तेकर बीचला सीमान बाहर बजे राति भेल। बाहर बजे रातिक पछाइत ने राति छोट होइत जाएत जइसँ अधरतिया बनत। अखन तँ रातिये राति ने राति चलत। मुदा भोरक उदय आ रातिक अस्‍त सेहो तँ एकटा सीमाने भेल किने। तैबीच जखन राति खटिया कऽ आधापर औत तखनो ने अधरतिया औत..? मनक ओझराएल विचारकेँ सोझरबैत वरस्‍पैत काका बजला- “बड़बढ़ियाँ कहलौं। अहूँ उठि कऽ बैसू आ हमहूँ बैसै छी।” नइ चाहितो सुगिया काकी उठि कऽ बैसैत बजली- “अहाँ सिरमा दिस बैसब आकि गोरथारी दिस?” पौरुकी जकाँ जे तीन बजे भोरे घुटैक-घुटैक अपन मेदिनकेँ जगबैए आकि मेदिने घुटैक-घुटैक मेदकेँ जगबैए से तँ पौरुकीए जानए, मुदा वरस्‍पैत कक्काक मन अपन ऐगला जिनगीक सूत्रपात करैमे ओझराएल रहैन। बजला- “दुनू परानीक बीच जेहने सिर तेहने गोर, तइले अनेरे किए बातकेँ बतंगर बनबै छी।” बजैक क्रममे वरस्‍पैत काका बाजि तँ गेला, मुदा लगले मन पाछू घुमि छछाड़ी काटए लगलैन जे जेहने दुनियाँक रीति-प्रीत अछि तेहने तँ बेरीतो आ बेप्रीतो अछिए। किए कियो केकरो दस थापर मारि मनकेँ शान्‍ति दइए? जखन कि सभ बुझै छी जे विचारक मिलानसँ शान्‍ति अबैए, तहिना ने प्रेमी-प्रेमिकाक बीच प्रेम सेहो शान्‍ति दइए...। अपन विचारमे वरस्‍पैत काका डुमल रहैथ तँए मुहोँ बन्न रहैन आ ओछानिक कातमे ठाढ़ो रहैथ। पतिकेँ चुपचाप ठाढ़ देख सुगिया काकीक मनमे शंका भेलैन जे भरिसक मने-मन मन्‍हुआ ने तँ रहल छैथ। पति-पत्नीक बीच जँ पति मन्‍हुआ कऽ महुरा जाथि सेहो पत्नीक लेल उचित नहियेँ भेल। तखन तँ ई भेल जे पतिक अनुकूल पत्नी नइ छैथ वा पतिकेँ अनुकूल बनबैक कला पत्नीकेँ नइ छैन। अपनाकेँ पाछू दिस घुसकबैत सुगिया काकी बजली- “एकटा बात बुझलिऐ?” जिज्ञासा करैत वरस्‍पैत काका बजला- “की?” मुस्‍की दैत सुगिया काकी बजली- “स्‍वतंत्र जिनगीक पहिल राति दुनू परानीक छी?” ‘स्‍वतंत्र जिनगी’ सुनिते वरस्‍पैत कक्काक मनमे गंगा-लहरिक ओ मौज जे जमुना धार होइत बहैए, भेटलैन। मुस्‍कान भरैत वरस्‍पैत काका बजला- “सहए ने कहए चाहै छी!” कहि वरस्‍पैत काका पत्नी लगसँ सहटैत अपन ओछाइन दिस बढ़ला। ओछाइन लग अबिते औनाइत मनमे उठलैन जे जँ कियो जिनगीक सुत्रधारमे संगी होएत तँ जरूर जिनगीक दिशा निरंतर संग होएत। मुदा घरक जखन पत्नियोँ सएह छैथ तँ पड़ोसी आकि बहरबैया अखन भेटबे किए करता। ओहू वेचारा पड़ोसीक मनमे हेबे करतैन किने जे काल्‍हिये वरस्‍पैत गुरुजियाइसँ सेवा निवृत्त भेला अछि, धएल-उसारल लऽ कऽ एबे कएल हेता, जँ पेशावो करैकाल ओमहर ताकब तँ दुनू परानीकेँ मनमे हेबे करतैन जे रतिचर छी। जँ दुनू परानीक बीचक गप-सप्‍प रहैत तँ गोनू झाक चोरो पकड़ब होइत। मुदा सेहो नहियेँ अछि। ओछाइनिक कातमे ठाढ़ भेल वरस्‍पैत काका कुशेश्‍वर स्‍थान जकाँ हेरा गेला। माने ई जे जैठाम एक नइ अनेक धारक मिलान होइए। धारक पेट भलेँ हटलो-हटल किए ने होइ मुदा बाढ़िमे उफान एलापर सभ सभमे मिलिये जाइए। तँए कुशेश्‍वर स्‍थानक भवलोक तँ अगम अछिए। ओना, चण्‍डेश्‍वर स्‍थानमे सेहो सुपेन धार अछि, मुदा एक तँ जुति-भाँतिमे ओछ आ दोसर समूह नहि, असगरुआ अछि। तँए अपन ताले-मात्रा केते देखा सकैए। बड़ करत तँ धरतीसँ सटल ट्यूवेलकेँ डुमौत,मुदा पानियोँ पीबकेँ नहियेँ रोकि सकैए। धरतीसँ भरि छाती ऊपर उठा चबुतरा बना लोक पानिक जोगार काइए लेत आ चापाकलक पानि पीबे करत। मुदा कुशेश्‍वर स्‍थानमे धारक पानि बेराएब ओते असान अछि जे कोसी-सँ-कमला धरि आ करेहसँ तिलजुगा धरिक धारक पानिक संग मिलि हेलबो करैए आ समुद्री बाट पकैड़ चलबो करैए...। कछमछ करैत वरस्‍पैत काकाकेँ किछु फुरबे ने करैन जे की केने की हएत। अखन धरि किताबक ने कीड़ा बनि चटलौं मुदा समाजोक बीच तँ कीड़ा अछिए। ओकरा केना पकैड़ पएब..? अपन बीतल समय माने दुनू परानीक साठि बर्ख तँ वरस्‍पैत काकाकेँ आधा-छिधा मनो पड़ैन मुदा आगूक जे मृत्‍यु धरिक शेष जिनगी अछि, से बुझिए-मे ने अबैन। बुझबो धिया-पुताक धूरा-माटिक खेलो नहियेँ छी। ओना किताबी बोध भेने आगू-पाछू दुनूक नक्‍शा मन पड़ैन मुदा नक्‍शाक नक्‍शा केना बनत, जाबे नक्‍शा नै बनत ताबे नक्काशी केना आबि पौत? ऐठाम आबि वरस्‍पैत कक्काक मन घुरिया जाइन। तँए ने पुन: ओछाइनपर पड़ला आ ने आन दोसरसँ गपे-सप्‍प कऽ सकला। किरिणक लालिमा अकासमे पसरल। वरस्‍पैत काका बुझि गेला जे आब पौह फाटि रहल अछि, दिनक आगमन लगिचा गेल...। वरस्‍पैत काका पत्नी लग जा बजला- “आब की कोनो नोकरीक जिनगी रहल जे आठ बजे तक ओछाइने धेने रहब। जाबे हम मुँह-कानमे पानि लइ छी ताबे अहूँ चाह बनाउ।” ओना, सुगिया काकीकेँ सेहो चाह पीबैक इच्‍छा जगैत रहैन मुदा कोढ़िया लेल जहिना गंगा दूर अछि तहिना सुगियो काकीकेँ रहैन। तैयो वेचारी पतिक बातकेँ आदेश बुझि चाह बनबए उठली। चाह बनल। दुनू परानी चाह पीविते रहैथ कि पड़ोसीक एकटा दस-बारह बर्खक कन्‍याँ रस्‍ते-रस्‍ते दौड़लो जाइत आ बजबो करैत- “सुमित्रा बहिन सीमा कातमे बैसल छथिन।” ने ओ लड़की वरस्‍पैत काकाकेँ आकि सुगिया काकीकेँ किछु कहलकैन आ ने इहए दुनू गोरे किछु पुछलखिन। लड़कीक मनमे भेल जे भऽ सकैए जे जखन गामेमे बीआ-वान भेल अछि तखन माए-बापक कानमे केतौ नहि गेल होनि, सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। सुमित्रा वरस्‍पैत कक्काक बेटी। मुदा बेटीक रूपमे अखन तक वरस्‍पैत काका सीमा कातमे बैसल सुमित्रापर विचार नइ केने छला। तँए मनमे भेलैन- गामे छी,केतेको लोकक नाओं सुमित्रा हएत। दोसर, ईहो भेलैन जे बेटी-जातिक लेल ने नैहर-सासुर अबै-जाइक विधि-विधान अछि, तइसँ हटल सेहो अछिए, तँए अखन तक दुनू परानीक मनमे ई नइ उठल छेलैन जे हमरे बेटी सुमित्रा छी। ओना अखन धरि सुगिया काकी उड़न्‍ती सुनने छेली, तँए उड़न्‍तीकेँ घरनी रूपक भाँजमे छली। मनमे एहेन विचारो केना जगितैन जे एकटा प्रशासनिक अफसरक परिवारमे–माने वरस्‍पैत कक्काक ओ बेटी प्रशासनिक अफसरक पत्नी छथिन–एना हएत। तँए एहेन विचार मनमे अबै ने दैन। एबो किए करितैन, जे जिला-जवारक भार उठा चलैबला अछि ओ परिवारमे लुल्‍हो-नाँगर केना भऽ सकैए। तही बीच अलोधनी काकी जे सुगिया काकीसँ उमेरदार छथिन, आबि कऽ सुगिया काकी लग बजली- “कनियाँ, छोटकी बेटी आबि कहलक जे ‘वरस्‍पैत कक्काक सुमित्रा बेटी सासुरसँ अधरतियेमे निकैल माए-बाप ऐठाम आबि गेली.!” तैबीच टोलक दस-बारहटा अबोध-सँ-सबोध धरिक लड़की आँगन पहुँच गेली। आँगनक सीमामे सभकेँ प्रवेश करिते सुगिया काकीक नजैर पड़लैन। तैबीच सुमित्रा रस्‍तेसँ ठोह पाड़ि कनैत आबि रहल छेली। ओना गाम-घरमे कननिहारो कम नहियेँ अछि, कियो दुखे आ कियो सुखे मुदा कनैत तँ सभ अछिए। तँए कियो अनका कानबपर किए धियान देत। अहीं कहू जे‘कन्‍याँदान’ सन समाजक कृति, दान-दहेज बेर माने बेटीक बिआह काल सभ डिरिआइ छी, मुदा छुच्‍छे डिरियेनौं तँ नहियेँ हएत। पढ़ल-लिखलसँ बिनु पढ़ल-लिखल धरिक लोक, किए ने बुझि पेब रहल छैथ जे परिवार-समाजक संस्‍कारसँ जुड़ल प्रमुख समस्‍या अछि, जैपर परिवार-समाजक नीब ठाढ़ अछि? जहिना बाघक आँखिपर आँखि पड़ने बघजर लगि जाइए तहिना सुगिया काकीकेँ सुमित्रापर पड़िते भेलैन। बघजर लगिते सुगिया काकी अचेत भऽ खसि पड़ली। खसला पछाइतो मनमे बेर-बेर उठैत रहैन जे ई की भेल.! एना किए भेल..? ओना, ई सुगियो काकी आ वरस्‍पैतो काकाकेँ बुझल छेलैन जे दस बर्ख पूर्व जमाए दोसर बिआह कऽ नेने छला, जे अन्‍तर्जातीय छल। जहिना कानक गुज्‍जी निकालै-काल गोटे बेर रूइया कानेमे अँटैक जाइए आ कटकी निकैल जाइए, आ तखन वएह रूइया केते भारी कानकेँ लगै छै, से भुक्‍तभोगिये ने जनै छैथ मुदा रूइया सन हल्‍लुक वौस रहितो, एते भारी कानमे केना लगैए जे ठेकी जकाँ सुनबे बन्न कए दइए तहिना अँगनाक दृश्‍य भऽ गेल।, जे बच्‍चा-सँ-सियान आ चेतन-सँ-बुढ़ धरिसँ भरिया गेल छल। जेते मुँह तेते बोल...। वरस्‍पैत काकाकेँ सुमित्रा बेटी लग पहुँचैक साहस नहि भेलैन जे किछु पुछितथिन। ओसारक खाम्‍ह लगा ओंगैठ कऽ बैस अपन जिनगीकेँ निहारए लगला। भूल केतए भेल आ चूक केतए भेल? जा भूल-चूक नइ भेल ता एहेन दृश्‍य उपस्‍थित किए भऽ रहल अछि। ओना वरस्‍पैत कक्काक मन समस्‍याक हिसाबे भरियाएल नहियेँ रहैन, तेकर कारण ई जे मनो तँ मन छी, अधमनीसँ डेढ़ मनी धरि होइत अछि...। ओहन मन ने बेसी भरिया जाइए जे समस्‍याक भारीपनकेँ बेसी देखैत हुअए, मुदा जे ओइ भारीपन के देखबे ने करत, ओ ओकर भारीपन बुझिए केना पाबि सकैए। वरस्‍पैत कक्काक जिनगीमे ओहन परिस्‍थितिये ने बनल जे ओइ गहराइक तह तक पहुँच पेबतैथ। खाम्‍हमे ओंगठल वरस्‍पैत कक्काक नजैर सुमित्रापर गेलैन। पैंतीस बर्ख पूर्व सुमित्राक जन्‍म दोसर सन्‍तानक रूपमे भेल। ओना गाम-गामक अपन-अपन समाज चलिये आबि रहल अछि। कोनो गामक समाजमे कोनो जातिक वाहुल्‍य अछि तँ कोनोमे कोनो जातिक, जइ समाजक माने जइ जातिक वरस्‍पैत काका छैथ, ओ अल्‍पसंख्‍यक जातिक समाज अछि। एक-दू घर दसटा गाममे गनि-गूथि कऽ अछि। समाजक सम्‍बन्‍धक एकटा कारण ईहो ऐछे जे जेतेक दूरमे बेटा-बेटीक बिआह-दान होइए ओतेकक बीच समाजिक सम्‍बन्‍धक एक रूप-रंग सेहो बनियेँ जाइए। तँए सनातनी धारामे अबैत समाज टुट-नफा होइतो बहिये रहल अछि। जइ समाजक वरस्‍पैत काका छैथ, ओइ समाजमे दस बर्खक कन्‍याँ होइते बिआहक योग्‍य मानल जा रहल अछि। समुचित पद्धतिक अनुकूल लड़का-लड़कीक उमेरक हिसाबमे सेहो एकरूपता हएब जरूरी अछिए। जँ से नइ हएत तँ विधवाक बाढ़ि जोर पकड़बे करत। ओना विधवाक बाढ़ि जोर पकड़नहि अछि तेकर कारण आन-आन, अछि। तेरह बर्खक सुमित्राक बिआह सत्तरह बर्खक दीनबन्‍धुक संग भेल छेलैन। ओना कौलेजमे पढ़ैत दीनबन्‍धुक मनमे तत्खनात्‍ बिआह करैक विचार नइ रहैन, मुदा देखो-देखी आ समाजक चलैनक अनुकूल सेहो दीनबन्‍धु विरोध नइ कऽ सकल। बिआहक तीन सालक पछाइत दुरागमन भेलैन, तइ बिच्‍चेमे दीनबन्‍धु नोकरी लेल प्रतियोगिताक परीक्षाक तैयारी सेहो पूरा कऽ लेलैन। परीक्षामे नीक रिजल्‍ट भेलैन, प्रशासनिक अफसरक बाट प्रशस्‍त भेलैन। दुरागमनक पछाइत सुमित्रा सासुर एली। एक तँ किसान परिवार, दोसर पाछूसँ अबैत परम्‍पराक बीच सुमित्रा अपन जिनगी बितबए लगली। ओना दीनबन्‍धुक प्रेमक अँकुर विलासनीक संग ट्रेनिंगे समैमे अँकुर गेल रहैन। मुदा ओ प्रेम, संगी-साथीक रूपक छेलैन। ट्रेनिंग केला पछाइत एक्के जिलामे दीनबन्‍धुओ आ विलासनियोँ पदस्‍थापित भेलैथ। पदस्‍थापित भेला पछाइत दुनूक बीच संगीक रूप छल। दुनूक जातियो दू अछि। अखन धरिक अबैत विचारमे जातिक दूरी मनमे बनले छेलैन। ओना जइ जातिक दीनबन्‍धु छैथ, ओइ जातिमे एकसँ बेसियो बिआह करैक चलैन जकाँ बनियेँ गेल अछि। माने ई जे जेते गाममे दीनबन्‍धुक जाति छैन, प्राय: सभ गाममे एकाध गोरे एहेन छैथे जे दू-तीन-चारि-पाँच बिआह केनहि छैथ। ओना परम्‍परानुकूल एक-पुरुखकेँ एक नारीक संग बिआहक चलैन अदौसँ आबि रहल अछि, मुदा पुरुखक लेल एकसँ बेसी बिआह करब एक्‍की-दुक्की अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। तइसँ भिन्न विलासनी जातिक अछि। विरले एहेन अछि जे एकसँ बेसी बिआह केने छैथ। ओना, परिवार चलैक लेल केतौ-केतौ एकसँ बेसी बिआहक खगतो अछिए। जेना पहिल पत्नी माने बिआही कनियॉं जँ कोनो कारणे निसन्‍ताने मरि गेली, वा बाँझपन छैन वा कोनो एहेन रोगसँ ग्रसित छैथ, जइसँ जिनगीक भरोस उठि रहल अछि। एहने-एहने कारणे विलासनीक जातिमे विरले एकसँ बेसी बिआह होइत अछि। नव परिवेशमे जातिक सम्‍बन्‍धमे किछु ढील-ढीली, छुटपन आबिये गेल अछि। गामो-समाज तँ गाम-समाज छी, प्रेमक सेहो अपन आँखि होइते अछि। ओना आँखियो तँ आँखि छी, जे केतौ छिछड़पन अछि तँ केतौ गढ़पन सेहो अछि। छिछड़पन भेल उमेरक उमंगमे बहब आ गढ़गर भेल गुण-विशेषक आकर्षण। जहिना दीनबन्‍धु बी.ए. ऑनर्स अर्थशास्‍त्र विषयसँ केने छैथ तहिना विलासनी सेहो अर्थशास्‍त्रेसँ बी.ए. ऑनर्स छैथ। विषयो विषयक तँ अपन छाप पड़िते अछि। एक रंग हाइयो स्‍कूल वा कौलेजोमे रहितो विषयवार-प्रभाव नइ पड़ैए सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। ओना भाषाक रूपमे साहित्‍य सेहो दुनू गोरे कौलेज तक पढ़ने, मुदा भारतीय साहित्‍यक अपेक्षा अंगरेजी साहित्‍य बेसी। ओना अंगरेजी साहित्‍य पढ़ैक पाछू दुनूक मनसा यएह रहैन जे प्रशासनिक परीक्षा पास करब। ओना अर्थशास्‍त्रक प्रभाव दुनूक मनकेँ बेसी पकड़ने रहैन। जइ दुआरे प्रतियोगिता परीक्षामे पूर्णरूपेण अर्थशास्‍त्रो रखनहि रहैथ। गनले-गूथल प्रशासनिक अफसर जिलामे अछिए। तहूमे जे लगक रहता हुनकेसँ ने भेँटो-घाँट आ गपो-सप्‍प हएत। ओना, सरकारी सेवामे काजोक सम्‍बन्‍ध बनियेँ जाइए। सएह सभ कारण दीनबन्‍धुओ आ विलासनियोँक बीच भेबे कएल। आजुक परिवेशमे देशक बहुतो जगह एहेन ऐछे जइमे प्रशासनिक सेवाक रूपे बदलल जा रहल अछि आ वेपारीक रूप बढ़ल जा रहल अछि। साधारणो अफसरक लेल करोड़क खेल चलिये रहल अछि। नव पीढ़ीक उदीयमान शक्‍ति जे अनेको विषयक अध्‍ययन कऽ रहल अछि, ओकर इतिहास देख रहल अछि। तैठाम मनुखेक इतिहास छुटि जाए, सेहो तँ संभव नहियेँ अछि। विकास प्रक्रियामे आजुक परिवेशक इतिहास की कहि रहल अछि, ओ प्रशासनिके अफसर नइ बुझैथ तँ दोसर बुझिये के सकैए? दीबन्‍धुओ आ विलासनियोँ एक-उमेरिया घोड़ा जकाँ सरपट चालिमे दौड़ए लगलैथ। ओना दीनबन्‍धुक बिआह आ दुरागमन दुनू भऽ गेल छेलैन, मुदा किसान परिवार आ नोकरिहारा परिवारक बीचक जे खाधि सभ अछि, ओइ खाधिमे एकटा ईहो तँ ऐछे जे जँ पच्‍चीस बर्खक बेटा-पुतोहु अपन घर बसौता आकि माता-पिताक घरवास करता? प्रश्‍न तँ अछिए। खाएर जे अछि, मुदा दीनबन्‍धु अखन तक परिवारक संग माने पत्नीक संग नइ रहला। ओना विलासनियोँक उम्र चढ़ि कऽ डम्‍हा गेल छेलैन मुदा छेली अविवाहित। प्रश्‍न एहेन उठि गेल जे कन्‍याँ-जोकर बरे ने भेटैए। सरकारियो शासन कमजोरे अछि जे गनि-गनि ओकरा जोड़ा लगबै ने अबै छइ। अपन रंगीन भविस देख दुनू बिआह कऽ लेलैन। ओना जातीय संस्‍कार दीनबन्‍धुक सोल्‍हैनी नइ मेटाएल छेलैन मुदा घोड़ा हौउ कि घोड़ी, लगाम तँ लगौले जाइए। तइ सीमामे दीनबन्‍धु छिछैल जाइ छला। जइसँ लगाम विलासनियेँक हाथमे रहलैन। तहूसँ जबरदस दीनबन्‍धुक मनकेँ ई दबने रहैन जे जइ वादाक संग विलासनीक संगी बनल छी तइ वादाक अनुकूल तँ सुमित्राकेँ बिनु पतिक सासुरे बसए पड़तैन..! खाएर.., भेबो सएह कएल। मुदा समाजो तँ समाज छी। दीनबन्‍धुक पिता–सोनाइ–केँ समाज सलाह देलकैन जे अखन अपनो दुनू परानी हट्टा-कट्ठा छीहे मुदा नारीक तँ ई उम्र नारीत्व प्राप्‍त करक छिऐन। तँए अपने पुतोहुकेँ बेटाक डेरा पहुँचा दियौन। एक तँ जुआनीक लहैर, तैपर कुरसीक धाह दीनबन्‍धुकेँ रहबे करैन, पत्नीक संग पिताकेँ सेहो देखलैन। ओना अखन तक दीनबन्‍धु विलासनी लग ई चोरौने रहला जे सुमित्राक संग विवाहित छी। तँए चोटाएल गहुमन साँप जकाँ आँत ममोड़ि चुप भऽ गेला। एक नारीक जिनगीकेँ देख विलासनी ससुरकेँ कहलैन- “जखन अपन लोक छैथ तखन किए ने रहती?” ओना विलासनीक विचार सोझगर छेलैन, मुदा मनमे रहैन अपनाकेँ चुल्‍हि-चौकाक कारिखसँ बँचाएब। सोनाइक नजैर दीनबन्‍धुपर पड़िते विलासनीपर चलि जाइन। नजैर जाइते मनमे खौंझ उठि जानि, अपन परिवारक ई गति। एक तँ समरथाइयोमे कियो केकरो भार नइ लिअ चाहैए, तैठाम तँ हम पचास टपि गेल छी। जिनगीक टुटैत धारमे सोनाइक टुटैत विचार भँसिया रहल छेलैन। अन्‍हार, दुनियाँक चारूकात अन्‍हार, की यएह छी मनुखक जिनगी..? जिनगीक पछाड़मे पछड़ैत सोनाइ विलासनीकेँ कहलखिन- “परिवारक रत्न पैदा करैवाली सुमित्रा छैथ, नोकरनियोँ बनि जँ रहती तैयो अपन परिवारक सुख हेबे करतैन।” धीरे-धीरे लोकक भीड़ कमए लगल। जेना-जेना लोकक भीड़ कमल तेना-तेना सुगिया काकीक मन सेहो हल्‍लुक हुअ लगलैन। अन्‍तो-अन्‍त टोलबैयासँ ऑंगन खाली भेल। खाली होइते सुमित्रा वरस्‍पैत काका लग पहुँच, पएर पकैड़ कानैत बजली- “पिताजी, हमर नारीत्‍व नइ भेटत?” वरस्‍पैत कक्काक दुनू आँखिसँ अन्‍हार रातिक वरिसैत वादल जकाँ नोरक टघार चलिते रहलैन। मुदा उपाइए की? अपन दोख मेटबैत वरस्‍पैत काका बजला- “हमर कोन दोख।” बाजैक क्रममे वरस्‍पैत काका बाजि गेला। मुदा लगले मन रोकैत कहलकैन- “तखन दोख केकर?” जिनगी भरि वरस्‍पैत काका नीतिशास्‍त्रक विद्यार्थी, शिक्षक रहला मुदा समाज जे घृणित अनीतिमे बहि रहल अछि, ओकराकेँ सम्‍हारत। मुदा मनुख एक रहितो विचारो आ बेवहारोमे हटल-हटल अछिए। वरस्‍पैत काका विद्यालयमे शिक्षण वृत्तिसँ जुड़ल रहला तँए समाजक रीति-नीतिसँ हटल नइ रहला सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। जहिना हवामे कखनो-कखनो झोंक अबैए तहिना वरस्‍पैत कक्काक मनमे रहि-रहि कऽ झोंक उठैत रहैन, मुदा अपना लग अबैत-अबैत झोंकक झोंकी झूकि जाइन। फेर झोंकाएल मनक नजैर पड़लैन- समाजक दर्पण अपन साहित्‍यपर। यएह दर्पण साहित्‍य छी? अही साहित्‍यसँ सबहक हित हएत? मुदा अपना लग अबैत-अबैत वरस्‍पैत कक्काक अपने मन दुतकारि दैन जे समाजक सन्‍तान रहनौं समाजसँ दूर रहलौं, जँ समाजक संग रहितौं तँ केतौ-ने-केतौ हमरो जगह तँ रहबे करैत। समाजक बुधिजीवी श्रेणीक रहितो हम केतए छी? नीक जकाँ वरस्‍पैत कक्काक मन थीरो ने भेल छेलैन कि दोसर उमकी चढ़लैन। उमकी चढ़िते मुँह फुटलैन- “समाजेक सन्‍तान ने हमहूँ छी आ हमरो ने समाज छी, तैठाम हमरा सन लोकक विचारक अँटावेशो तँ समाजे ने करत?” वरस्‍पैत कक्काक आगूमे ठाढ़ पैंतीस बर्खक नि:संन्‍तान बेटी अपन जिनगी देख रहल अछि। मने-मन वरस्‍पैत काकाकेँ कूहि होइ छेलैन, मुदा के कूहि रहल अछि आ के कुहा रहल अछि से वरस्‍पैत कक्काक मनमे एबे ने करैन। अनमनस्‍यक भेल वरस्‍पैत काकाकेँ देख सुमित्रा टोकलकैन- “बाबूजी, पिता तँ अहीं छी किने! अपन बेथा केकरा कहब?” ओना वरस्‍पैत काका बजैमे पीछराह सभ दिन रहला, तँए बजैक क्रममे कहियो नहि चुकला। तहूमे बेथाएल-सोगाएल पैंतीस बर्खक ओहन बेटी जे नारीत्‍वसँ हारि रहल छैन, संग-संग जिनगीक पछाड़ सेहो छैन्‍हे। बेटी छी से विधाताक डायरीमे सेहो अंकित अछि, मनुखक जीवनक सार्थकता सेवासँ होइ छै, माए-बापक सेवासँ पैघ धर्म ओहन नारीक लेल नहि अछि जे पतिव्रतसँ वंचित हुअए। वरस्‍पैत कक्काक भाव-विचार देख-सुनि सुमित्राक मन जेना पुलकित भेल। पुलकित होइते पुलैक कऽ बजली- “पिताजी..?” ‘पिताजी’ सुनि वरस्‍पैत कक्काक मन चौंकलैन। बजला- “बेटी, चरेवेति-चरेवेति वेदवाक्‍य अछि। जे जिनगी चलायमान रहल वएह जिनगी जिनगी छी। जाबे जीब ताबे तोरा बिसरबह नहि।” सुमित्रा जइ मने बाजल होथि, मुदा वरस्‍पैत कक्काक मनमे भेलैन जे बड़का धसनाक तरमे पड़ि गेलौं। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे कोनो सन्‍ताप मनुखकेँ जीते जिनगी होइ छै, तँए कोनो सन्‍तापसँ तखने बँचि सकै छी जखन ओइ सन्‍तापितकेँ ता-जिनगी पकड़ने रही जा जिनगी रहए। समयक हवा कखनो आगूओ दिस झोंकैत आ कखनो पाछूओ दिस, जइसँ ओकर गति-विधिमे उतार-चढ़ाव अबिते अछि। मुदा मनुख तँ मनुख छी। हवा-बिहाड़िकेँ अनुकूलो बना सकैए आ ओकरा मोड़ियो सकैए। मुदा प्रश्‍न तँ सामूहिक छी। सामूहिक समस्‍याक समाधान तँ समूहे ने कए सकैए। जँ ओकरा बेकतीगत रूपमे कएलो जाएत तँ ओ समूहक बीच हेराएले रहत। जँ से नहि रहैत तँ की हमरा सिर जे बरिसल अछि ओ दोसराक सिर नहि बरिसत, सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए...। विह्वल होइत वरस्‍पैत काका सुमित्राकेँ पुछलखिन- “बुच्‍ची, सत-सत कहह जे जिनगीक सुखसँ वंचित छह आकि जिनगीक सुख भेट रहल छह?” पिताक प्रश्‍नसँ सुमित्रा तिलमिला गेली। तिलमिला ई गेली जे जिनगीक सुख की? जहिना गाछो-बिरीछ आ लत्तियो-फत्तीमे एके गाछमे हजारो मुड़ी रहैए, सभ मुड़ीकेँ अपन-अपन खगता छै, जइसँ ओ लहटगर बनि बढ़बो करैए आ फुलेबो-फड़बो करैए। तहिना ने मनुखोक जिनगी अछि। ओना कहैले मनुखकेँ एकेटा मुड़ी होइ छै मुदा से नहि। जिनगीक बढ़ैत क्रममे हजारो-लाखो मुड़ीक सृजन होइ छै आ ओकर भरण-पोषनक पाछू लोक हाल-बेहाल रहैए...। पिताकेँ की उत्तर सुमित्रा देती, से स्‍पष्‍टे ने भऽ रहल छैन। तैबीच सुगिया काकी सेहो आँखिक नोर आँचरसँ पोछैत वरस्‍पैत काका लग पहुँचली। माएपर नजैर पड़िते सुमित्राक नजैर निच्‍चाँ उतैर अपन मातृत्‍वपर गेलैन। मुदा समाजो तँ समाज छी। मर्यादा अमर्यादाक विचार करैबला। लड़खड़ाइत-लटपटाइत सुमित्राक मुहसँ निकलल- “बाबूजी, नैहर-सासुरमे किछु अन्‍तर तँ अछिए?” सुमित्राक बात सुनिते वरस्‍पैत काका सहमला। सहैमते मनमे उठलैन, बेकती-बेकती मिललासँ समाज बनबो करैए आ हटलासँ टुटबो करैए, जेहेन समाज निरमित हएत तेहने ने ओकर आचार-विचार आ बेवहारो बनत। मुदा से बनाएब ओतेक असान कहाँ अछि? जैठाम प्रतिदिन विकृति मनुखक निर्माण होइए तैठाम सुशिष्‍ट समाज केना बनि पौत? ओना बोली-चालीक क्रममे वास्‍तविक जिनगी किए ने सटल हुअए मुदा बेवहारिक रूपमे हजारो कोस हटल नइ अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। मन-वचन-कर्मक एक सूत्रवाक्‍य किए ने हुअए मुदा तीनूक दूरी अकासो-पतालसँ बेसी हटल अछिए। अकास-पतालक बीच वौआइत वरस्‍पैत कक्काक मन अँटैक गेलैन। अँटैकते मन कलशलैन। कलैशते बेटी सुमित्रापर नजैर पड़लैन। नजैर पड़िते बुझि पड़लैन जे यमुना धार जकाँ जमुनियाँ नोर बेटीक नयनसँ निकैल पितासँ किछु याचना करए आएल अछि। मन पघिल गेलैन। पघिलते फुटलैन- “जहिना हम मनुख छी, तहिना ने सुमित्रो अछि। सबहक अपन-अपन जिनगी आ अपन-अपन जिनगीक लीलाक संग विचारो-विवेक अछि, तैठाम बलउमकी बलबा सेहो नीक नहियेँ अछि, मुदा प्रश्‍नो तँ जिनगियेक छी। जँ मनुखकेँ जिनगीए नहि तखन ओ पशुवत छोड़ि ऐछे की?” वरस्‍पैत कक्काक मन जे अखन तकक जिनगीमे घोड़-दौड़ रूपे चलै छेलैन ओ एकाएक ठमैक गेलैन। ठमैकते बुझि पड़लैन जे मुरदा जकाँ अस्‍सी मन पानि शरीरमे आ नबे मन जारैन शरीरपर लदि गेल अछि। मुदा उपाइये की अछि? ठमकल मनसँ ठीठैक कऽ विचार निकललैन- “मनुख-मनुखक सहयोगी तँ भाइये सकैए। मुदा जेतबे धरि अपन सीमा अछि तेतबे धरि ने नाचत। हमहीं सुमित्राक पिता छिऐ, जँ हमरे हाथ-पएर टुटि जाएत तँ सुमित्रे की हमर देहक दुख छीन सकैए? ओ तँ अपने ने भोगए पड़त? अखन आँखि तकै छी तँए सन्‍ताप बुझि पड़ैए, आ जँ आँखि बन्न रहैत तखन देखबे की करितिऐ?” मुदा लगले वरस्‍पैत कक्काक मनमे ईहो उठलैन जे जँ बेटीक दर्द बाप नइ बुझै आ बापक दर्द बेटी नइ बुझै तखन दुनूमे सामंजसे केना भऽ सकैए? रहल अपन कर्तव्‍य से तँ काजेसँ देखल जाएत। ओकर क्षेत्र तँ खाली विचारे धरि नइ अछि। ओ तँ बेवहारमे सेहो अछिए। ..भटकैत विचारक बोनमे वरस्‍पैत काका अँटकैत बजला- “बेटी, जहिना अखन धरिक जिनगी घर-सँ-बाहर बीतल मुदा तैयो परिवारक सेवा करैत रहलौं, तहिना आगूओ ताधैर करैत रहब जाधैर तोरा सन जिनगी समाजमे बेटीकेँ भेटैत रहत।” बजैक क्रममे वरस्‍पैत काका एकसूरे बाजि गेला मुदा बजला पछाइत जखन पाछू उनैट तकलखिन तँ बुझि पड़लैन जे जहिना अपने बिनु सींग-नॉंगैरक छी तहिना तँ समाजो अछि। केकरा कहबै के सुनत? लोको तँ लोके छी। बेटाक बिआहमे राजा बनि जाइए आ बेटीक बिआहमे भीखमंगा जहिना बनि जाइए तहिना ने केतौ जातिक समाज तँ केतौ गामक समाज सेहो बनिते अछि। बेथासँ बेथित पतिक मुँह देख सुगिया काकी सामंजसमे बजली- “जइ सोगे सोगाएल छी आकि जइ बेथे बेथाएल छी ओ ने कोनो सोग छी आ ने बेथा। जाबे आँखि तकै छी ताबे आँखिक सोझमे सुमित्रो रहत। जिनगीक कोनो ठेकान अछि जे पहिने के आँखि मूनब।” पत्नीक विचार सुनि वरस्‍पैत कक्काक मन कनी खनियेलैन। खनियाइते मनमे सुमित्रा सन बेटीक पौराणिक कथा सभ नाचए लगलैन- पतिक सेवा, नारी-धर्मक वृतान्‍त छी तैठाम जँ सुमित्राक जान बकैस देलैन, ई तँ ओइसँ बहुत नीक भेल! बेटीक बात सुनि वरस्‍पैत कक्काक मनमे जेना कनी हूबा जगलैन, जेतेक हूबा जगलैन तेतेक मनसूबा सेहो जगलैन। पत्नीकेँ कहलैन- “बेटी, कखन घर छोड़ि निकलल हएत कखन नहि, तँए पहिने चाह पिआउ। पछाइत खाइ-पीबैक ओरियान करब।” सुगिया काकी बजली- “सुमित्रा घरक बेटी छी आकि पाहुन जे अपने ओरियान करब? ओकर घर छिऐ, लिअ अपन घर। खाइ-पीबैले देत तँ देत, नइ देत तँ नइ देत!” माइक विचार सुनि सुमित्रा बिहुँसए लगली। मुदा बजली किछु ने। ◌ शब्‍द संख्‍या : 4173, तिथि : 20 जनवरी 2017 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रबीन्‍द्र नारायण मिश्र बाल्‍यकाल घरक आगूमे कनीटा जगह छेलइ। ओइ जगहमे हमर फुलवाड़ी छल। केतौसँ तीरा फूलक बीआ आनि कऽ रोपि दिऐ आ लगले माने प्राते भेनेसँ बाबाकेँ पुछए लगिऐन- “बाबा! फूल तँ नहि फुलेलै?” हमर बात सुनिते बाबा हँसि दैथ। रोज भोरे उठिते यएह काज...। कएक बेर तीराक बीआसँ कनियोँटा पम्‍ह निकलै आकि फेर दौड़ी बाबा लग। बाबा फेर हँसए लगैथ। कएक दिन जखन अहिना बाबाकेँ तंग करिऐन तखन कहैथ- “समय लगै छै, एक्के-दिने थोड़े फूल फुलाइ छइ।” फेर बाट ताकी। पानिसँ पटाबी। क्रमश: बीआ गाछ बनबाक दिशामे अग्रसर होइत छल। आठ-दस दिनक बाद, जखन तीराक गाछ बढ़ि जइतैक तँ फेर बाबा लग चल जाइ आ हुनका पकैड़ कऽ आनि तीराक गाछ लग लऽ जा देखा दिऐन। गाछक स्‍थिति देख बाबा मुड़ी डोलबैत बजैथ- “हँ! आब फूल आबि जाएत। अहिना पानिसँ पटबैत रहियौ।” किछु दिनमे रंग-बिरंगक तीराक फूलक कोढ़ी अबै आ रोज भोरे फेर जिज्ञासा भरल आँखिसँ फूलक कोढ़ीकेँ देखैत रही। फूलकेँ कोढ़ीसँ स्‍फुटित होइत देखैत रही। केतेक आनन्‍द होइत रहए, केतेक आनन्‍दित भऽ जाइत रही, तेकर वर्णन हठात्‍ करब संभव नहि। हमर पितामह अपना समयमे पहलवान छला। लोक बजैथ जे ओ असगरे चार चढ़ा लइ छला। खेती-वाड़ी जमि कऽ करैत छला। छह फूट लम्‍बा, मजगूत कद-काठी आ घोर परिश्रमी व्‍यक्‍तित्वक लोक हमर पितामह छला। ओ भोरे उठैथ आ जन-मजदूर सभकेँ अढ़बए सिनुआरा टोल जाथि, जन लऽ कऽ खेतपर जाथि। जन सबहक पनपियाइ पहुँचाबैथ इत्‍यादि काज एकसूरे कऽ लथि। ६५ सालक उमेर तक हुनका घोर परिश्रम करैत हम देखिऐन। पोखरिक पुबरिया भीत्तापर ओलार छल। मीआजान चरबाहकेँ घरेपर सँ अवाज दैथ- “महींस पनहा गेल अछि...।” बाबाक एकटा महींस हुनके हाथे लगैत छल। जखन कखनो ओ केतौ चलि जाथि तँ आफत भऽ जाइत रहए। महींस चुकैर-चुकैर कऽ जान दइपर उतारू भऽ जाइत छल मुदा लगैत नहि छल। कर्मठताक संग-संग ओ आस्‍तिक एवम्‍ संस्‍कार सम्‍पन्न लोक छला। बाबाकेँ एकटा डमरू रहैन जे ओ बजबैत रहैत छला। कहैथ जे ओ डमरू हुनका महादेव देने छैन। हमरा लोकनिक जन्‍मसँ पूर्वेसँ ओ डमरू हुनका लगमे छल। बादमे ओइ डमरूकेँ महादेवक मन्‍दिरपर लेने गेला आ सायंकाल नचारी गबैतकाल एवम्‍ महादेवक आरतीक समय ओ डमरू कखनो बाबा स्‍वयं वा कखनो-कखनो आर बुढ़ सभ बजबैत छला। बच्‍चा सभकेँ बाबासँ बहुत सिनेह होइते अछि। हमरो हुनकासँ बड़ सिनेह छल। सदिखन बाबासँ सटल रही। कर्मठताक संगे ओ बड़ तमसाह छला। तथापि हमरापर ओ कहियो, एक्को बेर नइ तमसेला। मुदा हमर अनुज कएक बेर बाबासँ मारि खा जाइत छला। ओना, तमसपर बाबा मारि तँ दैन मुदा पछाइत अपने कानए लागैथ। गाममे सुसम्‍पन्न परिवारक नायक छला- हमर बाबा। हुनकर बिआह समस्‍तीपुरक आसपासमे सोतीसलमपुरक शीलानाथ झाक पाँजिमे, ओइ समयक पाँच साए चानीक सिक्का दऽ कऽ भेल रहैन। बादमे ओ सभ जनाढ़मे बसि गेल रहैथ। बाबाक सार सभ गाहे-वगाहे अबैत रहै छला आ बहुत सम्‍मान पूर्वक बहुत-बहुत दिन धरि हमरा ओइठाम ओ लोकनि रहितो छला। बाबाक हेतु छोट-मोट उपहार जेना- ‘चक्कू’, ‘सरौता’ इत्‍यादि नेने अबथिन। देवोत्‍थान एकादशी दिन भगवानकेँ जगौल जाइत छल। पीढ़ीपर रंग-बिरंगक अरिपन बना चारूकात दीप जरौल जाइत छल, आ चारि गोटे चारूकातसँ मन्‍त्रोच्‍चारक संग भगवानक ऊपर ...... जाथि आ फेर धीरे-धीरे निच्‍चाँ आबि जाथि। पूजा पाठ होइत, प्रसाद वितरण होइत। बाबा ऐ पूजाकेँ बहुत श्रद्धा पूर्वक करैत छला। अनन्‍त चतुर्दशीक दिन भगवानक पूजा हमरा ओइठाम सभ साल होइ छल। सभ अपन-अपन घरसँ अनन्‍त आनैथ, प्रसाद आनैथ आ ओकर पूजा विधि पूर्वक बाबा करैत रहथिन। “किं मथसि, क्षिर निधि प्राप्‍तो त्‍वंया, प्राप्‍तो मया।” उपरोक्‍त श्‍लोक कहि कऽ अनन्‍त सबहक पूजा होइत छल। व्रह्मस्‍थानमे लखराम महादेवक पूजा होइत आ घरे-घरे लोक माटिक महादेव बना कऽ लऽ जाइत छल। दिन भरि पूजा होइत रहै छल। गाममे समय-समयपर नवाह, अष्‍टजाम सेहो होइत रहै छल। ऐ सभसँ बालक सभमे नीक संस्‍कार पड़ैत छल। हमर पितामह इलाकाक प्रतिष्‍ठित जमीन्‍दार छला। डॉ. सुभद्र झाजी कहैथ जे ओ जखन घोड़ापर चढ़ि कऽ कर्ज-वसूलीक हेतु नागदह जाथि तँ लोक डरे नुका रहैत छल। परिवारक आर्थिक सामर्थ्‍य बढ़बैमे हुनक जबरदस्‍त योगदान छल। हमर गामक बिच्‍चेमे एक पोखैर अछि। पोखरिक पछवरिया भीरसँ कनिक्के हटि कऽ हमरा लोकनिक घर अछि। पोखरिक पुवरिया भीरपर ओलार छल जैठाम माल-जाल बान्‍हल जाइत छल। घरेसँ केतेको बेर बाबा चिकैर कऽ ओलारपर चरबाहकेँ निर्देश दैथ। घरक शुद्ध दूध, दही प्रचूर मात्रामे उपलब्‍ध करबामे ओलार आ ओइठाम दिन-राति खटैबला चरबाह–मियाँजान–क बहुत योगदान छल। धिया-पुता सभकेँ हमरा घरमे बहुत हिफाजत होइत छल। बाबू असगरे छला। तँए परिवारमे नब बच्‍चा स्‍वागत योग्‍य होइत छल। ऐ तरहेँ हम सभ ९ भाए-बहिनक पैघ परिवारक अंग भेलौं। हमर गाममे पीच सड़क छेलै, चौबटिया छेलै, जेकरा ओइ समयमे ‘कमाल चौक’ कहल जाइत छल। कारण पुवारि टोलक कमाल नामक एक बेकती ओइठाम पानक दोकान खोलने रहैथ। तैसंग चाह आ मधुरक दोकान स्‍व. सुखदेव साहुक छल। ऐ दोकान सबहक अतिरिक्‍त ठेलापर दूटा आर दोकान क्रमश: खूजल। कनिक्के हटि कऽ किछु आर दोकान छल। चाह, मधुर ओतौ उपलब्‍ध छल। केतेको गोटे ओइठाम बैस कऽ गप्‍प मारि समय कटैत छला। छोट-मोट क्‍लब जकाँ ओ काज करैत छल। ओइठामक गप-सप्‍प विषय बदलैत रहै छल। एकबेर जबरदस्‍त विवादक विषय छल जे हमर गामक नाम ‘अड़ेरु डीह’ छिऐ आकि ‘अड़ेर डीह?’ ..हमहूँ ओतए ई चर्च सुनैत रही। बच्‍चामे हमरा होइत छल जे ई सभ अपन समय व्‍यर्थ बरबाद कऽ रहला अछि, मुदा आब ओकर उपयोगिता बुझा रहल अछि। सही मानेमे ओ बुढ़ सभकेँ जीबाक बड़का सहारा छल। कनियेँ दूर हटि कऽ बुध आ रबि दिन हाट लगैत छल। तरह-तरह केर तीमन-तरकारी ओतए उपलब्‍ध रहै छल। चारूकात किछु स्‍थायी दोकान सभ छल। हम सभ हाट करि अपन घरक हेतु झोड़ा भरि-भरि तरकारी अनैत छेलौं। गाम दऽ कऽ दूटा बस चलैत छल। एकटा एकटा उजरी बस जे लाहरघाटसँ मधुबनी आ दोसर हरलाखीसँ मधुबनी जाइत छल। दुनू बस बेनीपट्टी, धकजरी,अड़ेर, रहिका होइत मधुबनी जाइत छल। ई दुनू बस जँ छुटि गेल तँ सिवाय रिक्‍शाक आर कोनो सवारी नहि छल। रिक्‍शा द्वारा गाम-घरक गरीब सबहक गुजर होइत छल। रिक्‍शो चलब धिया-पुताक मनोरंजन छल। कएटा बच्‍चा सभ रिक्‍शापर पाछासँ लटैक जाइत छल आ दूर तक रिक्‍शाक पछोर करैत छल बे-लजूलक तंग केनाइ छल आ रिक्‍शाबला सभ कए बेर तंग भऽ कऽ झगड़ापर उतारू भऽ जाइत छल। हमर गाम बस पकड़ए हेतु दूर-दूरसँ लोक अबैत छल। जमुआरी, एकतारा, नगवास आदि गामसँ लोक अड़ेर आबि कऽ बस पकड़ै छला। क्रमश: बसक संख्‍या बढ़ल। सरकारी बस सभ चलए लगल। सीतामढ़ीबला रोडक बस चलि गेलाक बाद तँ बसक संख्‍यामे बहुत वृद्धि भेल आ आब तँ अड़ेर छोट-छीन शहरक सुविधा सम्‍पन्न भऽ चूकल अछि। सड़कक काते-काते सभ रंगक सैकड़ो दोकान खुजि गेल अछि। बैंक, ए.टी.एम., थाना, हाइ स्‍कूल इत्‍यादि सभ भऽ गेल। आसपासक आन गाम-सभमे पक्का रोड बनि गेल अछि आ अड़ेर चौकक महत्‍व बढ़िते जा रहल अछि। गामक पूबसँ कमला नहरसँ जोड़ल धार बहैत छल। ओइमे तखने पानि अबै जखन जयनगरक आसपास बनल फाटकसँ पानि छोड़ल जाइत। भदवारिमे जखन चारूकात बाढ़ि आबि जाइ तँ ओहूमे पानिक दर्शन होइत। ओइ समयमे हम सभ धारमे खेलाइत छेलौं। चौकसँ आगाँ बनल पूल, जैपर लोहाक घेराबा देल छल,ओइपर सँ बच्‍चा सबहक देखा-देखी कुदि जाइत रही। सचमुच ई भयाबह छल मुदा सभ बच्‍चा देखसीमे एना करैत छल। कएक गोटाकेँ ओइमे चोटो लगैत रहइ। पुलक निच्‍चाँ पानिक झड़ना छल। ओइमे तेजीसँ पानि ऊपर-सँ-निच्‍चाँ खसैत छल। ओइमे फाटक लगबैक सेहो बेवस्‍था छल जइसँ जरूरत भेलापर पानिक बहाव नियंत्रित कएल जा सकए। ओइ झड़नामे अपन गामक बच्‍चा सबहक संगे हमहूँ कुदि जाइत रही। ओतए पानिक बहाव बहुत तेज रहैत छल आ कएबेर बच्‍चा सभ गोंता खेला बाद ५-६ मीटर दूर धरि बहि जाइत छल। एकबेर हमरे गामक खुरलुच्‍च पैघ बच्‍चा हमरा झड़नाक ऊपरसँ धकेल देलक, जइसँ हमर वामा आँखिसँ ऊपर माने भाँउ लगक कपार फुटि गेल। तेकर बाद जे उपरागा-उपरागी भेल से की लिखू। गाम-घरमे चेचकसँ बँचबाक हेतु पाच कएल जाइत छल। ओइ समयमे एकरा धार्मिक क्रिया बुझल जाइत छल। शीतला माइक आराधनाक स्‍वरुपमे झालि बजा-बजा कऽ पचनियाँ गीत मसहूर छल। बहुत नेम-टेमसँ घरक लोक रहैत छल। कार्यक्रमक अन्‍तिम दिन तेल चढ़ैत छेलइ। पचनियाँकेँ चढ़ौना देल जाइत छल। अखनो धरि ई दृश्‍य हमरा मोन पड़ैत रहैत अछि। वामा बाँहिपर दूटा नमगर-नमगर चेन्‍ह अखनो धरि विद्यमान अछिए। पचनियाँ सभ सरकारी कर्मचारी होइत छला जे लोकक धर्मिक भावना एवं अज्ञानताक फैदा उठबैत पैसाक उगाही करैत छला। ओइ समयमे ग्रामोफोन हएब बड़का बात छेलइ। हमरा गाममे प्राय: तीन गोटेकेँ ग्रामोफोन रहइ। ओइमे गीतक रेकर्डगोल-गोल चक्का सन चढ़ा कऽ ग्रामोफोनक सुई चला दइ तँ गाना-बजाना होइक। बच्‍चा सभकेँ कहल जाइक जे भोपूमे आदमी नुकाएल अछि। आ हम सभ ओइ आदमीकेँ तकै छेलौं। हमरो ओइठाम एकटा ग्रामोफोन रहैक। ओकर पार्ट सभकेँ खोलि ओइमे नुकाएल आदमीकेँ तकैत रहै छेलौं। एक दिन जेना-तेना किछु पाइक इन्‍तजाम कऽ मधुबनी जा कऽ दूटा ग्रामोफोनक रेकार्ड कीनलौं, जइमे एकटा छल ‘तेरी प्‍यारी प्‍यारी सूरत को किसी को नजर ने लगे’ ससुराल फिल्‍मक गाना छल। सन्‍दुकमे राखल ग्रामोफोनकेँ खोलि ओइमे रेकर्डकेँ बजबैत कियो देख लेलक। बात बाबू तक पहुँचल। मुदा कनी-मनी डाँट-फटकारक बाद छोड़ि देल गेलौं। हमरा गाममे दाहा अबैत छेलइ। बच्‍चा सभ ओइमे बड़ा आनन्‍दित रहैत छल। हम सभ दाहाक नकल करी। करचीमे फूल आ आर किछु खोपि दिऐ आ सभ बच्‍चा अपनामे संगोर करि कऽ अँगने-अँगने घुमी आ ‘दमदलियाक दाहा हुसे..।’ कहि-कहि संगे सभ बच्‍चा चिचिआइत खूब आनन्‍दित होइत रही। छोट-छोट बात सभसँ बच्‍चामे केतेक आनन्‍द होइत छल, तेकर ई उदारहण अछि। बरखा, थाल-कादो, रौद, पानि-बिहाड़ि इत्‍यादि सभमे बच्‍चा आनन्‍द ताकि लैत अछि। सच कही तँ वाल्‍यावस्‍था ईश्वरत्‍वक बहुत समीप रहैत अछि। अन्‍दक आनन्द यत्र, तत्र, सर्वत्र प्रस्‍फुटित होइत रहैत अछि। हम सभ दरबज्‍जापर बैसल रहितौं, सिलेट लऽ कऽ लिखैक अभ्‍यास करैत, कि एकटा पगला अबिते बड़बड़ाइत- “जलखै, जलखै...।” किछु-ने-किछु ओकरा कियो-ने-कियो खेनाइ दऽ दइ आ ओ चल जाइत। बहुत दिन तक ओ क्रम चलल रहइ...। बालमनपर जे गड़ि गेल से गड़ले अछि। अर्द्धनग्न शरी, माटि, थाल-कादो सटने, बकर-बकर बजैत ओ अबैत-जाइत रहैत छल। कहि नइ ओ के छल आ ओकर की अन्‍त भेल...। भूतकालक घटनाकेँ मोन पाड़ैत अनायास ओइ शिक्षकपर धियान चल जाइत अछि जे हमरा सबहक घरक सटले बच्‍चा सभकेँ पढ़बैत छला। बच्‍चा जँ कोनो गलती केलक, किंवा सबक नहि रटि सकल, तँ घोरनक छत्ता विद्यार्थी-सभपर छोड़ि दैथ। बाप-बाप चिचिआइत बच्‍चा सभक स्‍मरण करैत अखनो रोमांचित भऽ जाइत छी। सोचल जा सकैत अछि जे ओइ बच्‍चा सबहक की भविस रहल हेतइ। एक्कोटा बच्‍चा ओइमे सँ नहि पढ़ि सकल। बच्‍चाक माए-बाप सभ अपन बच्‍चा सबहक कल्‍याणक कामनासँ मूक दर्शक बनल रहल। आ सभ बर्वाद भऽ गेल। “ई बसुधा काइ को नाही...।” “ऐ पछवरिया घरवारी। ऐ पुबरिया घरवारी...।” ई टनक अबाज छल एकटा भिखमंगाक। साए वीघा खेतक हमहूँ मालिक छेलौं। “ई वसुधा काहु कि नाही...।” कएक बेर ओ ई बात चिचिआ कऽ कहैत। हाथमे छड़ी, आँखिपर टुटल-फुटल चश्‍मा, धोती पहिरने, ओकरे ओढ़ने। ओ हमरे गामसँ सटल बेलौजाक छला। हमर पितियौत बाबी ओही गामक रहैथ। तँए हुनकासँ बेसी ओ अपेक्षा रखैत छल। ओकरा एक तम्‍मा चाउर देल जाइत तखने लैत, मुट्ठी भरि नहि। जौं मुट्ठी भरि देबाक कियो चेष्‍टा करैत तँ ओ चिकरैत-भोकरैत चल जाइत। मास-दू-मासमे एकबेर अबैत आ भरि तम्‍मा भीख भेटलाक बाद ओइ दिन दोसर घर नहि जाइत। एहेन कड़क अबाज, बेवहारक ओ भीखमंगा। अन्‍दाज ओकरा ओइ अवस्‍थामे अलग पहचान दैत छल। कहि नहि की भेल जे ओकर एहेन आर्थिक पतन भेल। निश्‍चय ओ एकटा अलग व्‍यक्‍तित्वक लोक छल। स्‍कूलक रस्‍तेसँ अल्‍हाक ढोलकक थाप सुनाइत छेलइ। होइत जे दौड़ कऽ रस्‍ता तँइ कऽ अल्‍हा सुनए पहुँच जाइ। घर पहुँचते बस्‍ता रखितौं आ भागितौं। माय कहैथ- “पहिने किछु खा तँ लिअ।” माइक गप सुनिते कहि दिऐन- “आबि रहल छी।” आ अल्‍हा सुनए पहुँच जाइ। हमरा गाममे अल्‍हाक बहुत रेवाज छेलइ। दुपहरिया कटबाक ई उत्तर साधन छल। भरि गामक लेाक सभ जमा होइत आ ओ जोशा-जोशा कऽ ढोलकपर थाप मारैत आ गबैत अल्‍हा-रुदलक अनेकानेक प्रकरण सुनबैत- “बाबू सुनो हमारी बात, एक दिन की नहीं लड़ाई गाबत बीत जाय बारहम मास...।” ऐ तरहक पाँति सभसँ गीतमय कथानक रूचिगर छल। बच्‍चा सबहक हेतु ओ अद्भुत आकर्षण छल। बेरा-बेरी केतेको दरबज्‍जापर अल्‍हाक आयोजन होइत रहै छल। ओ नट हमरा गाममे बहुत प्रसिद्ध भऽ गेल छल। गाम-घरमे सामान्‍यत: लोककेँ ऐ तरहक मनोरंजन उपलब्‍ध छल। औझुका जकाँ टेलीवीजन नहि रहैक तहिया। रेडियो सेहो केकरो-केकरो गाममे रहइ। तँए किछु तँ चाही। ◌ भाग- २ गाममे सामान्‍यत: लोक भोरे उठि जाइत अछि। हमर बाबा तँ भोरे उठि कऽ सभ काज कऽ जन अढ़ा कऽ आबि जाइत छला, तखनो चहल-पहल कमे रहैत छल। हमहूँ नित्‍य नियमित नवका पोखैरमे स्‍नान करी। ओइठाम भगवान शिवक पंचमुखी मूर्ति छल, पूजा करी, जल ढारी, व्‍यायाम करी, तखन घर आबी। स्‍नान करए जाइत रस्‍तामे रस्‍तामे हारमोनियमपर भजन गबैत मधुर अबाज सुनैमे अबैत रहैत छल। गामसँ उत्तर-पच्‍छिम मन्‍दिरपर ओ पुजारी छला। सिघिंऔन गामक। हुनक स्‍वरक मधुरता समस्‍त वातावरणमे अद्भुत आनन्‍द भरि दैत छल। सूर्योदयसँ पूर्व हमर स्‍नान भऽ जाइत छल। पोखैरमे धराधर डुबकी लगाबी। जाड़क मासमे तँ यैहले-वैहले स्‍नान भऽ जाइत छल। गर्मीमे कनी-मनी हेलानाइ सेहो भऽ जाइत छल। ओइ समयमे कुट्टीपर आरतीक घड़ी-घण्‍ट टनाटन करए लगैत छल जे बड़ीकाल धरि चलैत रहै छल। कुट्टी परहक बाबा बहुत संग्रही रहैथ। ओ बहुत रास गाए पोसैथ। मुदा एक राति चुप्‍पे मन्‍दिरसँ समान सभ लऽ चलि गेला। सन्‍ १९६१मे सम्‍पूर्ण रामायण सिनेमा आएल छल। लॉडस्‍पीकर-पर गामक गाम प्रचार होइ- ‘देखना मत भुलियेगा, शंकर टॉकिज- मधुबनीकेँ विशाल पर्दे पर सम्‍पूर्ण रामायण...।’ गाम-गामक लोक उनैट गेल छल। ओ सिनेमा केतेक चलल से नहि गनल जा सकैत अछि। हमरो गामसँ केतेको लोक सम्‍पूर्ण रामायण देखए गेला। हमहूँ बाबूजीकेँ केतेक बेर कहने हेबैन- “बाबूजी, सम्‍पूर्ण रामायण देखए चलू।” ओ आइ-काल्‍हि करैत रहला आ हम सम्‍पूर्ण रामायण सिनेमा नहि देख सकलौं। ओइ सिनेमाक गीत सभ अखनो हम सुनै छी तँ स्‍वत: अपन वाल्‍यावस्‍थामे विलीन भऽ जाइ छी। “बदलो बरसो नयन की ओर से...।” आ “हम रामचन्‍द्र की चन्‍द्रकला से...।” ई दुनू गीत तँ हमर बेर-बेर सुनैत रहै छी। मोन होइत रहैए एकबेर ई गीत अहूँकेँ सुना दी। चलू फेर कखनो। जखन कखनो ई गीत सुनै छी तँ स्‍वत: आँखि नोरसँ भरि जाइत अछि। सीता-जन्‍म वियोगे गेल, दुख दुख छोड़ि सुख कहियो ने भेल। जगतजननी मैथिली-सीतामैयाक दुखक वर्णन करैत ई गीतमे भावनाक अद्भुत विस्‍फोट अछि। समाजिक कुबेवस्‍था एवं सामन्‍तवादी सोचक विद्रोह स्‍वरुप अपन सन्‍तान द्वारा अन्‍यायक प्रतिवाद करैत ई गीत- “हे राम तुम्‍हारी रामायण तब तक होगी सम्‍पूर्ण नहि...। जब तक राज्‍य के निर्माता, धोबी के बाद में आयेगे, भारत भविष्‍य की माता को धोखे से वनमे ठुकराऐंगे...।” ऐ गीतक एक-एक शब्‍द रोमांचित करैत अछि। केतेक अन्‍याय सहए पड़ल मिथिलाक ओइ यशस्‍वी सन्‍ताकेँ। खाएर चलू आगू बढ़ी...। जीवन यात्रामे एहेन केतेको दृश्‍य अछि, जे मोनमे गड़ि जाइत अछि। जानकीक संग एना किए भेलैन। सोचैत-सोचैत रहि जाएब। मुदा उत्तर नहि भेटत। बाबूजी कएक बेर बजैत रहैथ- “विधि वाम की करनी कठिन, जश सियहि किन्‍है बाबरो...।” यद्यपि  समय बहुत आगाँ बढ़ि गेल अछि, लोकक विचारो बदलल अछि, तथापि सीता सदृश अनेको मैथिलानी अखनो चौबटियापर न्‍यायक बाट तकैत देखल जाइ छैथ। धिया-पुताक छोट-टोट बात ओकर भावी जीवनक दिशा निर्देश करैत अछि। हमरा बच्‍चामे खेलबाक बहुत जतन रहए। आस-पासक बच्‍चा सभकेँ पकैड़-पकैड़ कऽ खेलक हेतु इकट्ठा करी। कएक तरहक खेल होइत रहइ, बिनु खर्चक आ बिनु कोनो झंझटक- जेना कबड्डी, विट्टू, फूटबॉल, बालीबॉल आदि। कबड्डी तँ हमरा दरबज्‍जेपर होइत रहइ। स्‍कूलसँ अबिते देरी भीर जाइत रही। फूटबॉल हमरा गाममे बहुत प्रचलित छल। विष्‍णुपुर टोलसँ सटल खेलक मैदान छल, जइमे बरोबैर खेल होइत रहइ। बादमे हाई स्‍कूल बनि गेलाक बाद ओकरे मैदानमे खेल हुअ लगलै। पुरना समयमे हमर गामक फूटबॉल टीम बहुत प्रसिद्ध छल। हमर बाबू सेहो बढ़ियाँ खेलाइत छला। ओ कहैथ जे खेलक चक्करमे पढ़ाइ चौपट्ट भऽ गेल। वाट्सन स्‍कूल- मधुबनीक छात्र रहैथ आ गेनखेलीमे जेतए-तेतए चल जाइत रहैथ। हुनका केतेको मेडल भेटल रहैन। जँ आजुक समय रहैत तँ बाते अलग रहैत। शायद हुनका अपसोच नहि करए पड़ितैन। मुदा ओइ समयमे तेहेन परिस्‍थिति नइ रहइ। कलकत्ता गेल रहैथ तँ मोहनबगानमे गेनखेलीमे चुनाव भऽ गेल रहैन मुदा थोड़बे दिनक बाद गाम आपस चल एला। लोक सभ बुझेलकैन जे गाममे कोन कमी अछि जे अहाँ कलकत्ता एलौं, आदि-आदि अनेको बात कहलकैन। पछाइत गेनखेलीसँ हुनका तेतेक परहेज देखिऐन जे जँ हम कहियो खेलैत देखा जइतौं तँ पकैड़ कऽ लऽ अबैथ। जेना खेलकेँ पढ़ाइक शत्रु मानए लगला। परिणाम भेल जे हम खेलक मामलामे चौपट्ट भऽ गेलौं आ सदा-सर्वदाक लेल खेल-धूपसँ विरत रहि गेलौं। एकबेर केना-ने-केना पैसाक जोगार कऽ बड़का गेन किनलौं। बच्‍चा सभ मिलि ओइमे हवा भरलौं। आ कुट्टीक भीरपर खेलए गेलौं। ओ जगह गामसँ कनियेँ हटल अछि। तँए मनमे ई आशा रहए जे पकड़ल नै जाएब, मुदा केना-ने-केना बाबू ओत्तौ पहुँच गेला, हमरा देखते तमसाए लगला। खेल बन्‍द भऽ गेल। एवं प्रकारेण धीरे-धीरे हम ई सभ निठ्ठाहे छोड़ि देलौं आ सोलहन्नी कितावसँ चिपकए लगलौं। ओना, ऐसँ पढ़ाइमे फैदा भेल, मुदा खेल-धूपसँ हटि जेबाक कारण कएकटा क्षति सेहो भेल। हमरा हिसाबे ई ठीन नहि भेल, मुदा समय-समयक बात होइत अछि। ओइ समयमे जे भेलै से भेलइ। आब लोकक दृष्‍टिकोण बदैल रहल छइ। खेलक प्रति लोकक सकारात्‍मक रूखिसँ बच्‍चाक सर्वांगीण विकास होइत अछि। समाजिक पक्ष मजगूत होइत अछि एवं ओकर सोभावमे शहनशीलता ओ सामंजस्‍य करबाक भावना बढ़ैत छइ। परीक्षामे नम्‍बर आनि लेबे सभ किछु नहि अछि। ओइसँ हटियो कऽ जीवनक अनेक पक्ष अछि, जैपर धियान देबाक जरूरी अछि, जइसँ जीवन बेसी सुखी ओ शान्‍त रहि सकैत अछि। ई निश्‍चय जे माता-पिताक मनमे सन्‍तानक कल्‍याणक कामना रहैत अछि मुदा ओकरा अपन आकांक्षा किंवा मनोरथक प्रतिविम्‍ब बनबैक परियास कएक बेर बच्‍चाक विकासमे बाधक भऽ सकैत अछि। भगवानक दृष्‍टिमे सभ मनुख एक अद्भुत रचना अछि आ सभ किछु-ने-किछु विशेषता, विशेष क्षमता लऽ कऽ अबैत अछि। परिवार एवं विद्यालयक दायित्‍व अछि जे ओकर विशेषताकेँ बुझए आ ओइ दिशामे ओकरा विकासक समुचित सुविधा सेहो दइ। डाक्‍टर, इन्‍जीनियर बनि जाए, एतबे जीवनक अन्‍तिम सत्‍य नहि भऽ सकैत अछि। हमरा गामसँ उत्तर-पूबमे चौकसँ कनिक्के हटि कऽ एकटा मन्‍दिर अछि। जेकरा कुट्टी सेहो कहल जाइत अछि। ओइठाम सावनमे सभ साल झूला जोर-सोरसँ मनौल जाइत छल। भजन-कीर्तनक गायन होइत छल। आस-पासक गामक लोक झाँझमे ओइठाम एकट्ठा होइ छला। कार्यक्रमक अन्‍तमे प्रसाद वितरण होइत छल। कुट्टीपर बाबाकेँ बहुत रास गाए छेलैन। ओही गाइक दूधसँ प्रसाद बनौल जाइत छल, जइमे पर्याप्‍त मात्रा दूध आ मुट्ठीपर चाउर दऽ दऽ पायस बनौल जाइत छल। धिया-पुताकेँ ओ पायस खेला बाद स्‍वर्गक आनन्‍द भेटैत छल। बड़का थाड़मे पायस राखि कऽ बाँटल जाइत छल। मुदा लोककेँ पायस बहुत कम मात्रामे देल जाइत छल। मुँहमे पायस जाइते देरी लगैत जे गलि गेल। स्‍वादिष्‍ट, मधुबर एवं मनमोहक। बच्‍चा सभ पायस लेबाक हेतु बारंबार परियास करैत छल। धक्का-मुक्की होइत छल। वारिक (परसनिहार) हमरे टोलक रहैत छला। ओ सदिखन ऐ बातक धियान रखैत छला जे अपना-ले पर्याप्‍त मात्रामे पायस बँचि जाए, मुदा लोकक आक्रमण देख ओ परेशान भऽ जाइत छला। एक बेर तँ पायसक बट्टा लेने ओ पोखैरमे कुदि गेला आ अन्‍दर पानिमे जा कऽ ताबरतोर पायस सुरकए लगला। चारूकात गामक धिया-पुता ओ युवकगण ऐ दृश्‍यकेँ देखैत रहि गेला। हमहूँ पोखैरक कातमे आन-आन बच्‍चा सबहक संगे ऐ दृश्‍यकेँ देखैत रहि गेल रही, जे अखनो धरि नहि बिसराएल। बाबू साइकिलसँ मधुबनी जाइत रहैत छला। कहियो-काल किछु-किछु फरमाइस कऽ दिऐन। एकबेर पेन अनबाक हेतु कहलयैन। सड़कक कातमे ठाढ़ भेल बड़ीकाल तक बाट तकैत रही जे बाबू पेन लऽ कऽ आबि रहल छैथ। जेतेक साइकिल देखा पड़ैत, देखते होइत छल जे वएह आबि रहल छैथ। केतेको काल धरि बाट तकलाक बाद बाबू साइकिलपर अबैत देखेलैथ। थाकल, अपसियाँत भेल बाबूजीकेँ साइकिलसँ उतैरते पुछलयैन- “बाबू, पेन अनलौं?” बजला- “जा! बिसरा गेल..!” सुनिते देरी बहुत निराशा भऽ गेल रही। पछाइत वौसबाक हेतु बाबू अपन हाथसँ धड़ी निकालि कऽ हमरा हाथमे पहिरा दैथ। शर्त ई जे घड़ी देख कऽ पढ़ब। मधुबनीमे सर्कस आएल छल, राति-के फोकस लाइट छोड़ल जाइत छल जे दूर-दूर तक देखल जाइत छल। बाबूकेँ खुशामद कएल गेल। हम आ बाबू सर्कस देखलौं। तरह-तरहक व्‍यायाम, खेल, धूप आदि ओइ सर्कसमे देखौल गेल। तेतबे नहि, बाघक संग सर्कसमैनक खतरनाक खेल सेहो देखौल गेल छल। गाम-गामसँ सर्कस देखबाक लेल महिनो भरि लोकक ढवाहि मधुबनीमे लागल रहैत छल। सर्कस देख कऽ स्‍वर्गक आनन्‍द भेल रहए। तरह-तरह केर व्‍यायाम ओ खतरनाक खेल सभ एकट्ठे देखबाक एहेन अवसर गाम-घरमे कम अबैत छल। हम सभ बच्‍चा रही तँ हमरा गामक एक महान संत श्रपति श्वामीक चर्चा होइत रहै छल। ओ गौर वर्णक ओजस्‍वी व्‍यक्‍तित्वक लोक छला। सन्‍यासी रहैथ। हाथमे दण्‍ड-कमण्‍डल रहैन। माय कहैथ जे गीता पढ़ैत-पढ़ैत हुनका मोनमे वैराग्‍य उत्‍पन्न भऽ गेल आ ओ जवानियेँमे सन्‍यास लऽ लेला। ओ कहियो काल गाम अबैत छला आ अपन शिष्‍यक ओइठाम रहैत छला। गामक पुस्‍तकालय एवं नवका पोखैरपर लोक सबहक संग ओ धर्म चर्चा करैत छला। ओइ समयमे गामक प्रतिष्‍ठित बेकतीमे ओ गनल जाइत छला। गामक पुस्‍तकालयपर तरह-तरह केर खेलक सामग्री सभ सेहो लागल छल। किछु दिनक बाद एक-एककेँ ओ सभ टुटैत गेल आ क्रमश: नष्‍टभऽ गेल। पुस्‍ताकलयमे थोड़ेक समय तक बहुत गहमा-गहमी रहैत छल। अखबार, रेडियो अथबा पुस्‍तक सभ सेहो ओइमे छल। १९६२ ई.मे, जे चीन युद्धक समय छल, रेडियोसँ समाचार सुनबाक हेतु लेाकक भीड़ लागि जाइत छल। ऐ सभमे हमर गामक स्‍व. विश्‍वम्‍भर झाजीक गंभीर योगदान छल। दुर्भाग्‍यवस ओ बेसी दिन नहि रहि सकला। सन्‍१९६९ मे कमे उमेरमे हुनकर देहावशान भेलाक बाद ई सभ गतिविधि नष्‍ट भऽ गेल। गाम-घरक आस-पास एक-सँ-एक प्रतिभाशाली बच्‍चा सभ छल। केकरो स्‍वर अद्भुत छेलइ तँ कियो पहलमानीमे निपुण छल। कियो मधुर गायन आ वाद्ययंत्रक प्रति आकर्षित छल तँ कियो किछुमे...। मुदा परिवार वा स्‍कूलमे ऐ सबहक विकासक संभावना नगण्‍य छल। परीक्षामे रटि-फटि कऽ नीक नम्‍बर अनलौं तँ बड़ नीक अन्‍यथा सभ व्‍यर्थ..! एहेन बच्‍चाकेँ नकारा घोषित कऽ देल जाइत छल। परिणामत: कएटा बच्‍चा जे जीवनक केतेको क्षेत्रमे अग्रगामी भऽ यशस्‍वी भऽ सकैत छला,मुदा ओ विषादपूर्ण जीवन जीबैले मजबूर भेला। हमर गामेक एहेन कएटा बच्‍चा छल जिनकामे गेबाक अद्भुत सामर्थ्‍य छेलैन।  बिना कोनो प्रशिक्षण लेने जे ओ मैथिली गीत सभ गबैथ से बुझू सुनिते रहि जइतौं। मुदा हुनका सभकेँ कोनो प्रकारक संरक्षण, प्रशिक्षण नहि भेल। सभ कलान्‍तरमे गाँजाक सोंट लगबैत अपन-अपन स्‍वरकेँ नष्‍ट केलैन..! बच्‍चामे हमरो हारमोनियम सीखबाक ललक जगल। जेना-तेना पैसाक प्रवन्‍ध कऽ मधुबनी जा कऽ अपनेसँ एकटा हारमोनियम कीनि अनलौं। गाममे एक गोटे हारमोनियम बजाएब जनैत छला। हुनकासँ हारमोनियम सीखए लगलौं कि गामक बुझनुक लोक सभ हमरा बाबूजीकेँ आबि शिकाइत केलकैन। शिकाइतो एना केलकैन जे ‘ई बच्‍चा तँ दुरि भऽ रहल छैथ। केहेन बढ़ियाँ पढ़ैत छला। आ तैपर सँ धियान हटि गेलैन..!’ परिणाम भेल जे हम हारमोनियम सीखब छोड़ि देलौं। हलाँकि थोड़-बहुत जे हारमोनियम सीखि सकलौं, ओ अखनो अबिते अछि। मुदा तेतबे...। जे कि किछु लय निकालि सकैत छी। मुदा अखनो धरि हम ई नइ बुझि सकलौं से कोन तरहेँ हारमोनियम सीखब खराप होइत। खाएर, लोकक सही सोचक अभाव छल जे बच्‍चा सबहक भविस हेतु कएक बेर बहुत अहितकर भेल। खाएर जे हौउ, मुदा बेटाकेँ पढ़बै-लिखबैमे हमर बाबूकेँ बहुत रूचि रहैन, जे कि हरिदम उत्‍साहित करैत रहैत छला, आ से मात्र हमरे नहि, गामक आनो-आन बच्‍चा सभकेँ। पिताजी जइले प्रेरित करैत रहैथ, तेकर फैदा तँ भेबे कएल आ भाइए रहल अछि। परीक्षा सभमे लगातार हमरा नीक नम्‍बर आएल। मुदा कहक माने जे परीक्षाक नम्‍बर अनबाक अतिरिक्‍त जीवनक अन्‍य आयाम थिक जेकर बुझबाक, विकासक गाम-घरमे कोनो जोगार ने तहिया छल आ ने आइये भऽ सकल। ‘भाग्‍ये ललति सर्वत्र, न विद्या न च पौरुष:’ कहल जाइत अछि जे विधाता जन्‍मसँ पूर्वे मनुखक भाग्‍य लिखि कऽ पठा दइ छैथ। हमर स्‍कूलक प्रयोगशाला कक्षमे उपरोक्‍त पाँति मोट-मोट अक्षरमे लिखल छल। जीवन यात्राक क्रममे घटित नाना प्रकारक घटना एवं अनका-अनका जीवनक तथ्‍य दिस देख, सुनि ई कथन एकदम सत्‍य लगैत अछि। एक आदमी जनैमते जीवनक समस्‍त सुख-सुविधा सम्पन्न भऽ जाइत अछि, दोसर तरफ केतेको एहेन लोक छैथ जे जीवन भरि जीबाक हेतु संघर्ष करैत रहि जाइत अछि। तेकर माने ई नहि जे भाग्‍यपर छोड़ि कऽ आदमी कर्तव्‍यहीन भऽ जाए, आ कामना करैत रहि जाए जे जे भाग्‍यमे हेतै से हेतइ। परियास तँ करब उचिते अछि, मुदा ई बात मानि कऽ चलू जे सभ किछु अपने मोनक नहि भऽ सकैत अछि। जँ अपना मोनक हो तँ नीक आ जँ अपना मोनक नहि हो तँ आर नीक। कारण ओइमे ईश्वरक इच्‍छा सम्‍मिलित रहैत अछि। बेचैन रहलासँ बढ़ियाँ अछि जे निमतिकेँ स्‍वीकार कए मनकेँ शान्‍त राखल जाए, कारण शान्‍त मनमे विकासक अनन्‍त सम्‍भावना रहैत अछि। बच्‍चाक दुनियाँ माए-बाप, चाचा-चाची किंवा आस-पासक अन्‍य निकट सम्‍बन्‍धीक इर्द-गिर्द सिमटल रहैत अछि। ओकर सम्‍पूर्ण व्‍यक्‍तित्वक निर्माणमे परिवार एवं परिवारिक परिस्‍थितिक गंभीर प्रभाव होइत अछि। आस-पासमे रहनिहार लोक एवं परिवेश सेहो ओकरा प्रभावित करैत अछि। निश्चित रूपसँ हम ऐ मामलामे भाग्‍यवान रही। माता-पिता एवं पितामहक अद्भुत सिनेह एवं समर्थन हमरा भेटल। ९ भाए-बहिनक पैघ परिवारमे कखनो ई नहि भेल जे कियो किनकोसँ कम महत्‍वपूर्ण छल। सभपर बरोबैर धियान देल गेल। हमरासँ ज्‍येष्‍ठ पाँचटा बहिन छेली। हुनका लोकनिक बिआह-दान एकटा दीर्घकालीन घटना क्रम छल। १०-१२ वर्ष लगातार घरमे बिआह, कोजागरा, मधुश्रावणी, द्विरागमन सहित नाना प्रकारक विध-बेवहार होइत रहैत छल। एतेक भारी परिवारिक जिम्‍मेदारीक अछैत माय-बाबू बहुत आशावादी एवं आस्‍थावान छला। हमरा निरन्‍तर आगू बढ़बाक हेतु प्रेरित करैत रहला। गामक लोकक एवं परिवेशक सकारात्‍मक रूखि सेहो हमरा उत्‍साहित करैत रहल। ओ सभ प्रणम्‍य छैथ, जिनकर स्‍मरण करैत-करैत हम ओइ गामसँ दूर रहितो सदिखन अपनाकेँ ओहीठाम अनुभव करैत रहै छी। ◌ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बी.एन. लाल दास- चिचड़ी वाली भौजी मैथिली कहानी *************** लाल काकी , नामि के कहैत रहथिन्ह जे एतेक टा छः घरवासी वाला आंगन में चिचड़ीवाली कनिया के त्याग आओर बलिदान याद राखय योग्य अछि। नामि पुछलखिन्ह - माँ , की केलखिन्ह,भाभी। लाल काकी बड्ड पुरान घटना सभके कहँ लगलखिन्ह- जे चिचड़ी वाली कनिया एहि परिवार में आब सं पूर्ब विधवाक जिंदगी जी रहल रहैथ। वोकर नाम जस्सी रहैंह। एक दिन लाल कका ककरो सिद्धान्त में गेल रहथिन्ह। हाल चाल पुछैत समय पता चललैन्ह ,जस्सी के बारे में, ज़े कतेक कठिन सा जीवन बिता रहल छैक। जस्सी के पिताजी, एतबे कहलथिन्ह - ओकरा भाग्य में इहा लिखल रहैक। जिंदगी भार बनि गेलैक। हम ककरा की कबैक जे हमर विधवा बेटी के हाथ पीला करू। दालानों पर बैस नहीं देत। एक लोटा पानि त बहुत दूरक बात अछि। लाल कका काफी सुलझल आओर उदार विचारधारा के एक सम्मानित लोक छैथ। ई सुनि हुनक ह्रदय हहैर गेलैन्ह। सामाजिक व्यवस्थाक आओर सोच पर तरस ऐलैन्ह। हम सभ 21 वी सदी में छी,समाजक सोच 19वी सदी के छैक। हम अपने घर सं शुरू करब विधवा बिबाह। हम अपन घर में विधवा के बियाहब। हमर भातिज सं बढ़िया के हेतैक। लाल काकी ई सुनि स्तब्ध भ गेलिह। लाल ककाक ई निर्णय पर गाम में खलबली मैच गेल। भात भतबरी के निर्णय समाज द्वारा सुनाओल गेल। लाल काका टस सा मस नहि भेलाह। पंचायत लागल,लाल कका स्पस्ट कहलखिन्ह - अहाँ सभ भात-भतबरी करू,कोनो बात नहि। हमरा सभ के बारि दि अ, कोनो बात नहि, मुदा एक विधवा के नया जीवन दें मं में कोनो कमि नहि रह देबैक। हमर इहा प्रार्थमिकता अछि। पारिवारिक सभ लोक फगुआ में जमा भेल। बैभव सेहो आयल रहैत।लाल कका विना लैप लपट के पुछलखिन्ह, बैभव , अहाँक की विचार? बिना संकोच केने बैभव अपन विचार प्रकट केलखिन्ह- अहाँ सभ जे करबैक,हमरा सहर्ष मंजूर अछि। विवाह शुभ मुहूर्त में भय गेलैन्ह। आईं वो चिचड़ी वाली कनिया छैथ। चिचड़ी वाली कनियाक नया जीवन शुरू भेल काफी साल बीत गेलैन। सभक साथ केना मिल क रहल जाइत छैक,केना प्रेमक गंगा परिवार,समाज में बहै, वो इक मिशाल मानल जाइत अछि। बैभव के नीक नौकरी नहीं रहैंह, एक स्कूलक नौकरी। परिवार मुश्किल से चलैत रहें। लाल काकी के नहीं याद रहैंह जे कहियो किछु मांगने हेतैन्ह। जे रहैं, भगवानक प्रसाद मानि चलैत रहथिन। बैभव के याद छैन्ह जे छोट बहिनक बिबाह में जस्सी अपन सभ गहना गुरिया के बेच क नीक बिबाह में सहयोग केने रथिन्ह। आई हुनका कोनो गहना गुरिया,किछु नहीं छैन्ह।गोल्डप्लेटेड गहना हुनक सौन्दर्य बढ़ा रहल छैन्ह।वाहि ठाम नामि के गहनाक कोई कमी नहि। कोनो ईर्ष्या, जलन के नामो निशान नहि। जिंदगी सा कोनो शिकवा- शिकायत नहि। बैभवक आंगन में दू बच्चा सभ के दिल जीतने रहैछ। समाजक कोनो प्रकारक बीमारी,हॉस्पिटल के कोनो काज महिला के होइनिन्ह,जस्सी राति भरि समय द क लोक सभक दिल जीतने रहथिन्ह। जस्सी अपन आभार लाल काकी,लाल कका आओर पूरा परिवार के दैत नहीं थाकैत छैथ। आई समाज में इज्जत, सम्मान सभ लाल कका के उच्च विचारक परिणाम छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.मुन्नी कामत केर सुखल मन तरसल आँखि‍ काव्‍य संग्रहक दोसर संस्‍करण ३.२.१.प्रदीप पुष्प- वैलेंटाइन स्पेशल...गजल सहित २टा गजल २. आशीष अनचिन्हार- ३टा गजल ३.३.राजेश मोहन झा ' गुंजन'- वसंत गीत ३.४.बृषेश चन्द्र लाल- तप ?! मुन्नी कामत केर सुखल मन तरसल आँखि‍ काव्‍य संग्रहक दोसर संस्‍करण (पहिल संस्‍करण : 2014, दोसर संस्‍करण : 2017) काव्‍य क्रम समरपि‍त होइत बेटी/18 नव जीवनक निर्माण/19 घर-घर बढ़ल अति‍याचार/20 संकल्प/21 दहेजक बिहाड़ि/22 एहेन समाज/26 सुरज दादा/27 सियान भेल हमर खेल/28 महगाइक खेल/29 सुखद अछि ई मिलाप/30 सान हमर मिथिला/31 विरह/33 देशक राजनीति/34 विदेशी चालि‍/35 बेटी किए बनेलहक विधाता!/36 दुनियाँ तबाह भऽ गेल/37 अन्‍हार भेल जाइए देश अपन/39 बाबू हम सिपाही बनबै/39 आगमन अहाँक/40 हरल जाइए जननि/41 कौआक दुलार/42 कोइस रहल छी जन्‍मकेँ/43 गाम-घर/44 मलार/45 मुनगा/45 सगरे इजोत हमर मिथिला/46 अरिकंचन/47 हमर मिथिला हमर परान/48 नारी/49 जट-जटिन/50 सुखल मन तरसल आँखि/53 मनुखक सौदा/54 अनमोल-बोल/55 चलाकक दुनियाँ/56 बून-बून बँचाबी हम/57 जि‍नगीक मरीचिका/58 तकैत जिनगी कड़कटक ढेरमे/60 संकल्प-2/61 ठमकल शब्द/62 दहेजक बिहाड़ि/63 हराएल हमर रूप/64 विदाइ/65 बेटी/67 दहेजक आगि/68 ओइ पार/69 नेताजी/70 पहिल बरखा/71 किसान/72 समाजक वि‍डम्‍बना/73 दर्दक टीस/74 रोकू कियो ऐ बाढ़िकेँ/75 नोराएल आँखि/‍76 कि‍ए छी हम अछूत/77 भ्रष्टाचारक परसाद/78 तब हँसत तुलसी/79 शिल्पकार/80 यादि‍ गामक/81 आशाक किरण/82 नारीक पहचान/83 आजाद गजल-1/84 आजाद गजल-2/85 बौआ देखहक चान्‍दकेँ/86 भोरक सनेस/87 बेटी-लहास/88 बाल-श्रम/89 फगुआ/90 आन्‍हर कानून/91 बूनक मोल/91 करी मिथिलासँ पहचान/93 करिझुमड़ी कोसी/94 नइ लेब आब हम दहेज/95 मिथिलाक दादा/96 पाहुनक माछ/96 हमरा पागल कहैत अछि लोक/97 सगरे अन्‍हार अछि/98 माइक रूदन/99 अपना दिस निहारू/100 नचार किसान/101 स्वच्छ समाज/102 माए एक चुटकी नून दऽ दे/103 बेटी/104 कारी-बजार/106 शब्दक खेल/107 माए बता तूँ एगो बात/108 अन्‍हार घरमे हत्या/109 बेटी/110 भेल पूर आस/111 भाइक सिनेह/112 अल्हर मेघ/113 सिया तोरे कारण/114 जाड़/115 बन्‍दिश/117 टाकासँ बिआह/118 काँच बाँस जकाँ लचपच उमेरिया/119 मनक वेदना/120 सरहद/121 जतरा/123 अंकक मेल/123 बहि‍न/125 ◌ समरपि‍त होइत बेटी जहि‍या एकर जन्‍म भेल तहिए डिबिया मिझा गेल, सभ कहलक कलंक एलौ छठिहारोसँ गीत हरा गेल। जँ-जँ ई नमहर भेल समाजक बोझसँ दबैत गेल गामक लाज, बाबूक पगड़ी पकैड़‍ बेटी सियान भेल। एक जन्‍म बीतल, दोसर जन्‍म लऽ तैयार भऽ गेल केकरो नै किछु कहलक हरिदम समरपित होइत गेल जुबान रहितो मूक बनि‍ सभ दुख सहैत गेल। बेटी बनि गेल समर्पण आ तियागक मूर्ति तैयो एगो कलंक एकरा माथ पर किए लगि गेल किए कहैए हमर समाज की बेटी जनैमते दू हाथ धरती तर चलि‍ जाइत छइ। ◌ नव जीवनक निर्माण ब्रह्माक छी सन्‍तान हम ब्रह्रमा बनि‍ आएल छी जेकर कर्म अछि नित नव निर्माण करब हम केना ई बिसरल जाइ छी। अछि हमरा बाँहिमे बल मस्तिष्कमे अपार ज्ञान फेर किए हम सुस्त बनि‍ अपन मनोबल घटेने जाइ छी। एक्के माटि आ एक्के साँच अछि परमात्मा ले जइसँ ओ सभ मनुखक निर्माण करैत अछि एक्के ज्ञानक सारसँ ओ सभपर बरसा करैत अछि। फेर अहाँ किए पछुआएल छी अपनापर बिसवास रखू आत्मबल मजगूत करू असगर चलु राहपर केकरो नै बाट देखू लक्ष्‍य अहाँक आगू अछि पाछू मुरि नै कमजोर बनू ब्रह्माक सन्‍तान अहाँ छी तँए ब्रह्मा बनू नित नव गुण, संस्कार आ नव जीवनक निर्माण करू। ◌ घर-घर बढ़ल अति‍याचार घुमि‍ आउ सरहदक लाल ओतए रहनाइ अछि बेकार सीमाक परवाह छोड़ू देखियौ अपन देशक हाल। बिसैर गेल सभ मर्यादा अपन मान-सम्मान संस्कृति अपन धर्म-मानवता भेल बेकार बढ़ि‍ रहल अछि अति‍याचार। बाहरबलासँ नै आब घरबलासँ खतरा अछि मूस बाघ बनल गीदर बनल अवारा अछि। दुश्मनक डेरा ओइ पार नै घर-घर ओकर बसेरा अछि पाँच सालक बेटी बेइज्‍जत हुअए की यएह हमर परम्परा अछि? मनुख, मनुखक दुश्मन बनल नै केतौ कोनो भैयारी अछि सभ सम्‍बन्‍ध खण्डित भेल आइ देख रहल छी भवि‍स अपन केतेक कारी सियाह अछि। ◌ संकल्प बान्‍हि लिअ मनकेँ कर्तव्यक डोरसँ कहीं मनक चंचलता बेलगाम ने बना दिअए हूंकार भरि ई अहंकार कहीं अहाँकेँ शैतान ने बना दिअए। गि‍रैसँ पहिले अगर सम्‍हैर जाए तँ चोट नै लगत, निश्चय होइ सच्चा तँ अकासकेँ झुकबैत कोनो देर नै लगत। एना तँ घटि-घटि कऽ चान एक दिन पूर्ण होइ छै ढलैत सुरूजक संसार इजोत करैक वचन दिया दइ छइ। नै हारिक संकल्प रखू मनमे तँ पूसक कपकपाइत ठण्‍ढमे गरमाहट एगो जुगनु ओ दइ छइ। ◌ दहेजक बिहाड़ि माए- “नाँघि एलौं सासुरक चौकैठ‍, कलंकित तूँ हमर कोइख केलँह ओनइ केतौ डुमि‍ मरितेँ मोलि‍ चुनर ओढ़ि‍, किए आँगन एलँह।” बेटी- “माए हम आन नै, अहींक खून छी नै बनाउ हमरा बीरान, ईहो तँ हमरे घर छी।” माए- “बेटी बीरान बिआहे दिन भऽ जाइ छै, माइक आँचर माथसँ उठि‍ जाइ छै, वएह दिन ओ दू कुलक लाज रखैक सप्‍पत खाइ छै, मर्यादाक बछिया पहिर, अपन सासुरकेँ स्वर्ग बुझि हर कर्त्तव्य निमाहैत ओत्तै जीवन समपन्न करै छइ।” बेटी- “माए हम नै कोनो पाप केलौं, नै अहाँक कोइखकेँ कलंकि‍त केलौं, हमरा सभ प्रतिज्ञा याद अछि, अपन मर्यादाक अभास अछि। पर हमहूँ तँ एगो जान छी, न कि कोनो वस्तु, जेकर बेर-बेर सौदा होइत अछि।” अहीं कहू जहियासँ अहाँ हमर बिआह केलौं सभटा खेत, जेवर-जत्था बेचि‍ देलौं, आब ई घरो गीड़बीपर अछि, तैयो नै ओकर पेट भरैत अछि।” माए- “हमरा शरीरमे जब तक जान अछि हम ओकर मांग पूरा करैत रहब जब तक ओकर भूख शान्‍त नै होइ हम खून बेचि‍ ओकरा तृप्त करैत रहब।” बेटी- “कि‍ए अहाँ अन्‍हारमे छी, हमरा बेटी होइपर शर्मसार करै छी, तँए आइ बिछिया हम उतारि एलौं, सभ सम्‍बन्‍ध तोड़ि एलौं दऽ एलौं हम तलाक हारि एलौं दहेजक वाक।” माए- “चुप रह नि‍रलज! ई की बात बजै छँह, हिन्दू भऽ मुस्लिम रीत चलबै छँह, एक बेर ई डोर बन्‍हैए मरन तक नै गाठ खुलैए ई दहेजक आगि‍ हमरेटा नै घर-घर लगै छइ।” बेटी- “माए दहेज लेनाइ-देनाइ दुनू पाप अछि, तलाक नर्ककेँ स्वर्ग बनबैक मार्ग अछि, एगो सुयोग जीवन-साथी हर बेटीक अधिकार अछि। माए- “चारि आखर पढ़ि‍ तूँ हमरा सिखाबए चललँह, युग-युगसँ चलैत आएल परंपरापर तूँ ओंगड़ी उठबए लगलँह। एक बेर जे छोड़ि दइ पतिकेँ ओ राँर कहाबै छै, एहेन पापिनी तँ नरकोमे नै जगह पबै छइ। नै बाज कि‍च्‍छो, तोरा वाणी सँ दुषित पूरा गाम हेतै, जो डुमि‍ मरिहँ केतौ, हमर कोइखक उद्वार हएत।” बेटी- “माए तुहों तँ एगो बेटी छीही? फेर अपन बेटीक दर्द किए नै बुझै छीही, नारी बनि‍ किए नारीकेँ असहाय करै छीही। जे परम्परा जीवैक अधिकार छीनि‍ लइत ओकर हाथ किए पकड़ै छीही। जइ बेटीक खुशीले तूँ दहेजक दलदलमे फँसल छँह, आइ वएह बेटीकेँ मरैक श्राप करै छीही। तूँ सच-सच बता दे माए, हमर खुशीले तूँ निलाम भेलँह आकि‍ अपन परम्परा प्रतिष्ठाले। तोरे जकाँ माए-बाप दहेजक बिहाड़ि‍ उठेलकै एकबेर देखि माए, ई बिहाड़ि केतेक बेटीकेँ जिनगी उजारलकै। ई कोनो प्रतिष्ठा नै, पाप छिऐ जेकर जननी कियो ने माए-बाप छिऐ। आबो बन्‍न करू मुट्ठी तबे मिलत बेटीक श्रापसँ मुक्ति।” माए- “बेटी हम नीन्नसँ सूतल छेलिऐ, घोर अन्‍हारमे डुमल छेलिऐ नै चिनहलिऐ ऐ दानवकेँ नित सेवा करि नमहर केलिऐ आइ देखलौं ऐ भोंकारकेँ, खोइल ई परम्पराक पट्टा दहेज मुक्त बनाएब अपन समाजकेँ। बताएब जन-जनकेँ की, पुरुख सत्तात्मक समाजमे महिलोकेँ अधिकार छै जब पुरुख कऽ सकैए पुनर्विवाह तँ महिलो लेल नै कोनो रिति-रिवाज छइ। स्वतंत्रता हर बेक्‍तीकेँ जन्मसिद्ध अधिकार छइ।” ◌ एहेन समाज घुमि‍ एलौं पूरे संसार तैयो रहलौं घरसँ अंजान! 62 बर्खक बाबा केलक चुमौन 15 बर्खक नवालिकसँ कहू केहेन भेल मन। करियाक बिआहक भेल चारि साल! सात गो खून केलक नै भेल कोनो केस-फोदारी गर्भेमे मारैत गेल बेटीक गला घोटैत गेल ई दुगो हर साल। मास्टर-साहैब अपन दुनू बेटीकेँ घरमे बैठा चुल्हा-चौका करबैत अछि अपन घर अन्‍हार करि केना दोसरक घर इजोत करैत अछि। ई कोनो एक जगहक नै हर कोणक दृश्य अछि हमरे ऐ अगल-बगलमे घटित भऽ रहल यथार्थ अछि। ◌ सुरज दादा बाल-कविता माए केहेन ई सुरज-दादा छै कि‍ए नै ई कोनो स्‍कूल जाइ छइ। जब प्राणीकेँ कष्ट देनाइ पाप छै तँ फेर ई कि‍ए पाप करै छइ। जाड़मे नुकाएल रहै छै गुमारमे जड़बै छइ। माए तुहीं एकरा समझाबिही ई कि‍ए नै केकरो बात मानै छइ। चन्‍दा मामा जकाँ ईहो कि‍ए नै काज करै छै? माए- बौआ नै तूँ बुझबहक अखैन‍ ई राज धैन ई दादा जे चलैत अछि सभ काज। पढ़ि‍-लिखि‍ जब तूँ नमहर हेबहक सभ गुत्‍थी अपने सुलझेबहक। असिम शक्ति छै हिनका लग अपार गुण हिनकामे विद्यमान छै तँए तँ पहिल अर्घ हिनका दऽ कऽ जग नत-मस्तक होइ छइ। ◌ सियान भेल हमर खेल अँगना-अँगना ढोल बजैए सभ खुशीमे झुमैए-गबैए बाबू हमहूँ अपन गुड़ियाक बिआह करब ईहो नमहर भेल जाइए। आजन-बाजन हम मँगाएब गहना-जेबर गड़हएब लहंगा पहिरा अपन खुशीकेँ हम दुलहन बनाएब। गाम-गमाति‍ न्योंत पठाएब। अँगना-अँगना ढोल बजैए सभ खुश सभ धी-सुआसिनकेँ मंगाएब सोहर-समदौन गाबि कऽ अपन दुलारीकेँ सासुर पठाएब। पर बाबू केकरा संगे हम एकर बिआह रचाएब ऐ लोभी समाजमे केना एकरा दहेजसँ बँचाएब। नै लगाएब हम सियाकेँ मेहदी कोनो बेपारिक रंगसँ नै उठाएब हम सुहागक चुनरी जे रंगल होइ दहेजक कलंकसँ। ◌ महगाइक खेल टमाटर अपन रंग देखा सभकेँ ललचबैए पिऔजक बात की कहूँ भाग तँ छिलके तैयो कनाबैए। बढ़ल जाइए दूधक दाम धानक खेत भेल बीरान गरीबक रोटीपर अखरे नून ओंघराइए। केतौ बंजर तँ केतौ दहार नै अछि खुशी नअ केतौ बहार। रूपैआ तँ आब झुटका भेल कऽ रहल अछि सभ नेता ई खेल। देख कऽ देशक समस्या मन गरमाइए, सोचि‍ कऽ देशक भवि‍स जी घबराइए। ◌ सुखद अछि ई मिलाप पागलपनसँ सुसज्जित प्रेमक गाथा देखलौं अम्बरकेँ झुकबैत समुद्रक आगू माथ। ई प्रेमक हर्ष अछि या मि‍लनक उत्तेजना जँ उफनैत अछि लहर झुमैत अछि हर एक बून चुमैले ओइ अनन्‍त अकासक अँगना। ठाढ़ समुद्रक कछेरमे बहुत दूर-दूर तक देख रहल छी आनन्दमय दृश्य हम। झूमि‍ रहल अछि जलपरि हर्षित अछि सुरूज पहिरा कऽ अपन रंगक ओढ़नी साक्षात् भेल ऐ प्रेमकेँ देख रहल छी ई मनमोहक दृश्य समुद्र आ अकासक मिलाप हम। ◌ सान हमर मिथिला हम मिथिला वासी पहचान हमर मैथिल छी हमर संस्कार सीता भक्ति हमर उगना छी। कहैए दुनियाँ हमरा तूँ तँ उज्जर बालुमे सिमटल छँह नै छौ कोनो सुख-सुविधा तूँ तँ पाइ-पाइले तरसल छँह। ने नीक स्‍कूल छौ ने कौलेज तूँ तँ रोजगार ले भटकै छँह जे कि‍छु छौ तोरा ले सेहो भ्रष्टाचारमे घिरल छौ। पर हम यएह कहै छी की हमर मिथिलाक संसारमे पहचान अलग छै करोड़ोक बीचमे ठाढ़ ओकर सान अलग छइ। एकर कला-कृति विदेशमे सराहल गेल एकर सभ्यता-संस्कार देशमे सम्मानित भेल। हमर मेहनत‍क आगू दुनियाँ नत्मस्तक भेल जब उज्जर रेतमे हरियरी लहलहा गेल। असुविधाक बादो केतेक विद्वानक जन्‍म भेल नै छी पाछू कि‍च्‍छोमे नून-रोटी खाइ छी दिन-राति‍ कमाइ छी बाल-बच्चा परिवार संग गर्वसँ स्वर्गमे जीवन-यापन करै छी। ◌ विरह प्रेम संगे विछोह कि‍ए रहै छै सौन अबैत केतेक झूला सुन्न परि जाइ छइ। कोनो घर हंसै छै तँ कोनो नोरसँ डुमै छइ। केतौ धरती तरसै छै तँ केतौ मन तरपै छै ने सजनीक मन साजन समझै छै ने धरतीक पियास बादल बुझै छइ। कहने छै कोनो कवि “सौनो कहियो प्रेम केने छेलै अपन प्रेमीक नाओं बादल रखने छेलै जब कनै छेलै दुनू एक-दोसरक वियोगमे तँ लोग ओकर नाओं वर्षा देने छेलइ।” पर जखन वियोगक अग्निमे झुलसए लगलै धरती तँ लोग ओकर नाओं उज्जर रीत रखलकै अकाल, बंजर, सुखार रखलकै। मुदा ऐ वियोगकेँ की नाओं देल जाए प्रीतमक प्रतीक्षामे भऽ रहल छै पाथर मन एकरा कोन आस देल जाए। आब तँ ई सौन चिढ़ाबए लगलै कारी मेघ हँसए लगलै मिलनक आसमे गहन लगलै बज्जर पूरा देह भेलै कान्हा जबसँ गेलै केतेक गोपी बौक भऽ गेलइ। ◌ देशक राजनीति‍ दिन-राति‍ फेक रहल छी पासा तैयो नै खेलक बोध अछि, ई अहाँक नै शासनक दोष अछि। नि‍त लड़ै छी झगड़ै छी अपन एकता छीटै छी जब-जब घरमे भेदिया पोषैत अछि तब लंका जकाँ स्वर्ण भवन छौरक ढेर बनैत अछि। कहियो पूब, कहियो पच्‍छिम कहियो उत्तर, कहियो दक्षिण मुँह बौने ठाढ़ अछि कहि फेर हुअए ने कैद चिड़िया पिंजरा चारुकात अछि। नै अछि आइ बापू कियो न अम्बेदकर, न पटेल न कियो निस्वार्थ राष्ट्रवाहक अछि, खण्डित भऽ रहल देश अछि टुकड़ा-टुकड़ामे बसैत अहंकार अछि। आबो समझू राजनीतिक राज मेटाउ आपसमे कलह-विकार नै तँ अहिना पार्टी-पार्टी बँटैत जाएत सभ अपनेमे मरैत जाएत वंशहीन भऽ जाएत ई समाज सगरे उज्जर साड़ी फहराइत जाएत। राजनीति बहुत पेचेदार अछि कुर्सीक लालच बढ़बैत अति‍याचार अछि। ◌ विदेशी चालि‍ की कहब शहरक हाल देशी मुर्गीक भेल विदेशी चालि। जेकरा माइक दर्जा मिलल अछि जेकरा बिनु नै होइए कोनो शुभ काज ओइ माइक दशा देख होइए पूरे देह लाज। कॉट-झार एतए हरियरी भरैए पर माए तुलसी पानि‍ बिनु सुखल जाइए। ससुर-भैंसुरसँ भेल बेपर्दा आँखि‍क लाज हराएल जाइए। साड़ी-सूटक बात छोड़ू टीसर्ट-स्कर्ट पहिराबा भेल बढ़ैत महगाइ जकाँ कपड़ा छोट होइत गेल। पहिरन अछि सभ एतए नकाब केतेक करब हम बखान की कहब शहरक हाल देशी मुर्गीक भेल विदेशी चालि। ◌ बेटी किए बनेलहक विधाता! पजेब अछि पैरमे जेकर घ्वनि मघुर अछि मुदा पकर बहुत मजगूत कहैत अछि कि तूँ अजाद छँह पर अछि सिमान; कदम-कदमपर। एगो एहेन देवालक जे बनल अछि; बिनु बालु-सिमेन्‍टसँ सोचक देवाल! चाहे असमानमे उड़ी हम पर ओइ देवालक ऊँचाइ नै समाप्त होइत अछि आखिर केतेक जन्‍म तक पाछू करत ई देवाल! आ कखैन‍‍ तक हम कहब बेटी किए बनेलहक विधाता। ◌ दुनियाँ तबाह भऽ गेल बाबू कि‍ए एहेन समयक घारा बदलैए सच्चे कहै छेलै मुसहरु काका दू हजार बारहमे दुनियाँ तबाह भऽ जेतै! नि‍त एतए अन्याय होइ छै मनुख-मनुखकेँ मारने फिड़ै छै आन गोरेक बात छोड़ह भाए भाएकेँ आ बेटा बापकेँ कोदारिसँ काटने फिड़ै छइ। अपने घरमे सभ हराएल रहै छै पड़ोसी जकाँ सभ घोंसियाएल रहै छै नै छै केकरोसँ मेल-मिलाप घर-घर नाचि‍ रहल छै कोन अभिशाप। अँगनामे तुलसी सुखाएल जाइ छै नारीक लक्ष्‍मी रूप हराएल जाइ छै नै डरै छै कियो भगवानसँ नि‍त गिरै छै अपने इमानसँ। ईमानदारी लुप्त भऽ बेइमानी उजागर भेलै झूठक खेती पनपैत गेलै मनसँ मन दूर भेलै सच देखहक बाबू यएह छिऐ ठीके दुनियाँ तबाह भऽ गेलइ। ◌ अन्‍हार भेल जाइए देश अपन राम राज भेल खतम रावण राज अछि चरमपर, देखियौ यो भलमानुस सभ अछि ऐ करमसँ। गरम हाथ बजबैए ताली नरम हाथ मसुआएल अछि, पर ताण्डव दुनू दिसन कियो उन्‍चास तँ कियो पचास अछि। सभ कहैए कि हम उत्तम, हम इमानदार, हम सर्वश्रेष्ठ छी। मुदा कियो नै छी केकरो सभ-क-सभ भ्रष्टाचारी कुष्ट छी। अपने माएकेँ बेचि‍ खाइबला अछि सभ ऐ संसारमे, नि‍त बढ़ि‍ रहल अछि महगाइ केना जिन्दगी कटत अन्‍हारमे। ◌ बाबू हम सिपाही बनबै बाबू जहिया हम नमहर हेबह देशक बेटा बनबह बन्‍दूक लऽ कऽ सीमापर दुश्‍मन संगे लड़बै। बाबू हमरा एगो बर्दी सिआ दिअ फौजीबला स्‍कूलमे नाओं लिखा दिअ। जे अखैनसँ हम सीखबै तब ने असली हिरो बनबै। जनगणमण नित गाबि कऽ माताक चरणमे नतमस्तक हेबै नै हेतै कम कखनो हमर सान बढ़ेबै हम अपन देशक मान। ◌ आगमन अहाँक अहाँक आगमनसँ अशान्त मन शान्त भेल हर्षित भेल घर-आँगन खुशी सगरे पसैर गेल। उदास हमर मन-मन्‍दिरमे अहाँक प्रतीक्षा छल सुनैले ई किलकारी एक-एक पल पहाड़ छल। कमल नयन, चन्द्र मुस्कान माखनसँ बेसी नाजुक छी अहाँ बिनु अपूर्ण छेलौं हम हमर पूर्णताक अहाँ पहचान छी। सुरूज जकाँ प्रकाशमान वायु जकाँ गतिमान ज्ञानक सभटा सार मिलए सुख-समृद्वि आ सम्पन्नता सगरे अहाँकेँ सम्मान मिलए। जुग-जुग जीबए‍‍ हमर लाल पूरा होइ सभ अभिलाषा मीलै सभ खुशी एकरा दिअ यएह माए हमरा अहाँ वरदान। ◌ हरल जाइए जननि जइ पुरुखकेँ स्‍त्री जन्‍म देलक आइ वएह गहुमन बनि‍ फुफकारैए ई आन्‍हर 3 सालक बच्‍चियोकेँ डसने जाइए। जे औरत मर्दकेँ रूप, आकृति, पहचान देलक अपन खूनसँ सींच प्रकाशक राह दखेलक आइ वएह औरतक जिनगी अन्‍हार करैए ओकरा बजार आ कोठाक राह देखबैए। जइ आदमीकेँ आँगुर पकैड़‍ कऽ चलनाइ नारी सिखेलक आइ वएह नारीकेँ पएर तोड़ैए घरक 4 दीवारमे ओकर अवाज दफन करैए। जे आँचर ओकरा शीतल छाँह देलक आइ वएह आँचरमे नोर उझैल‍ देलक। ◌ कौआक दुलार कियो दुष्ट कियो करिया तँ कियो पपियाहा कहि‍ ऐ कौआकेँ बजबैए पर एकर निःस्वार्थ प्रेम देख हमर आँखि‍ डबडबाइए। चुइन-चुइन दाना लाइब सभ बच्चाकेँ खिआबैए ओ नै बुझैत बेटा-बेटी एकर तँ दुनू अपने सन्‍तान अछि हमरा मानवसँ केतेक ऊँच देखियौ ऐ करियाक विचार अछि। जन्मक संगे हम माए बनि‍ पर अन्याय करै छी बेटीकेँ पराइ आ बेटाकेँ वंशक मान बुझै छी झूकि‍ जाइए मन हमर बाँटि लइ छी प्रेम अपन जब माइक प्रेम नै मिलल एक रंग तब कियो केना देत बेटीक संग। ◌ कोइस रहल छी जन्‍मकेँ तीन सालक उमेर छल तुतना लगल बोल छल गुड्डा-गुड़िया हमर सहेली दिन-राति‍ करैत रही बाबा संग अठखेली। अ-आ अखैन जननौं ने छेलौं पएर अखैन‍ तिति खेलैले उठेनौं ने छेलौं की बधि‍ गेल ऐमे घुँघरू। की दोख छल हमर जे राति‍क अनहरियामे छोड़ा कऽ माइक आँचर पकड़ा देलक बाइयक आँगुर सीमासँ सिमाबाई बनलौं बेटी छेलौं कहियो आइ तँ वाइफ बनलौं। केना कहब समाज लूटलक हमरा केलक बे-आबरू बजारमे जब अपने कातिल भेल हमर तँ कि करब शि‍कायत केकरोसँ हम। अपने हालपर कनै छी बेटी छेलौं तँए आइ अपन जि‍नगीकेँ कोसै छी। ◌ गाम-घर कदिमा, भुजिया, तिलकोरक तरूआ भँट्टा-अल्‍लूक झोर यौ मन पड़ैए ओ पटुआ साग-चटनीक मेल यौ। आमक टुकला पिऔजक गोला बसिया भात आ माछक मुड़ा आब बुझाइए सबहक मोल यौ। मखानक लाबा बाबाक पनबटिया ओरहा-डाढ़ीक खेल यौ। मन पड़ैत अछि गामक बतिया दिन छल ओ केतेक अनमोल यौ। ◌ मलार आँखि‍ तोहर मटरक दाना ठोर कमलक पंखुड़ि गाल मथल मक्खन सन मुस्कान तोहर चाँद रे। मुट्ठीमे भाग मुनने तूँ भाँपि‍ रहलेँ जोगी सन बन्न आँखि‍सँ देखैत छेँ तूँ सगरे संसार रे। चला रहल छह पएर आगु बढ़ैले बुझि‍ रहल छी तोहर तोहर मनक चंचलता संगे मनक सवाल रे। ◌ मुनगा घौरछे-घौरछे झुलैए जजमान देखैमे लगैए सुगबा साँप भरि गाछ गछारने छै भुआ कियो कहैए सोहिजन तँ कियो कहए मुनगा एलै जुरशीतल हेतै हलाल मुट्ठीए-मुट्ठीए परसेतै भरि गाम मुनगा तीमन ठण्डा होइ छै आँखि‍क ज्योति‍ से बढ़बै छै फुलक तरूआ अछि लाजवाब गाछक नै होइ छै कोनो काज मुदा मिथि‍लामे छै एकर राज। ◌ सगरे इजोत हमर मिथिला गेल रही हम हिमांचल भेटल एगो बाबा मांजल कहलखिन छी गर मैथिल अहाँ तँ करू व्‍याख्‍या मिथि‍लाक सत्‍कार अछि कि‍ए महान? कहलौं हम जे अछि अतिथि हमरा लेल भगवान जकाँ। पहिले लोटामे पानि लेने पखाड़ब आ आचमनक रिवाज अछि भात-दालि‍, तरकारी, भुजिया तैपर तरूआ, हमर पकवान अछि। दही-चूड़ा संगे अँचार जानैए सभ संसार पान-मखान विदाइक बेला करैए अपन बखान। छोट-नमहरकेँ सम्मान देखेने हमर दलान अछि जड़िकेँ शीतलता देने अछि सिखेने हमर संस्कार अछि। सुनि‍ कऽ कहलखिन बाबा अलगे छौ तोहर संस्‍कार धन्य तोहर मिथिलाक संसार जेतए उपजैए एहेन नेक विचार। ◌ अरिकंचन खत्ता-खुत्ती, कछेर-छापर सुखलोमे हरिया जाइ छै चाकर-चाकर होइ छै पत्ता पानि‍ ओइपरसँ ओंघरा जाए छइ। दूगो जाइत छै एकर हरियर बेसी आ ललका कम कबकबाइ छइ। नै छै कोनो जी अंजान मिथि‍लामे घर-घर एकरा सभ स्वादसँ खाइ छइ। अनेरबे ई जनमैए एतए तँए बुझाइए अरिकंचन नाओं छै तीमन एकर बड़ सुअदगर माछसँ कम नै सान छइ। की करी हम बखान एकर सोचि‍ओ कऽ गाल गुदगुदाइ छइ। ◌ हमर मिथिला हमर परान हमर मिथिला, हमर जननि हमर ई परान अछि देखलौं बर दुनियाँ आगू मुदा मिथि‍ले हमर जान अछि। एतुक्का माटिमे सुगन्‍ध संस्कारक जे नै बुझैत केकरो आन अछि आनोकेँ अपना बनबैए यएह मिथिलाक पहचान अछि। एतए गोबरक होइत अछि पूजा बगराकेँ मिलैत दुलार अछि एहेन पावन धरती हमर एतइ जननिक धाम अछि। जे एला एतै बैसि गेला कखनो राम तँ कखनो उगना छला, देवतो करैत ऐ माटिसँ दुलार अछि एहेन पावन हमर धरती एहेन सुन्दर हमर गाम अछि। ◌ नारी निर्मल अछि ओ ममता अछि निर्मल हुनकर दुलार ओ नारी अछि ऐ समाजक जइमे रचल-बसल अछि संसार। नै मिल अनुकूल परिवेश हुनका नै ज्ञानक सार तैयो हेरान छी देख कऽ केतेक उच्च आ आदर्श अछि हिनकर विचार। सभ युगमे दबबैत आएल नारीक कुटनीतिक ई संसार। तैयो कहि रहल अछि आइ नारी जननी छी हम समाजक हमहीं बदलब एकर सोच-विचारि कऽ पैदा करब अपन कृतिसँ एतए मानवताक निश्छल संस्कार निर्मल रहब हम ममता रहब बाँटब जन-जनमे सिनेह। ◌ जट-जटिन जटिन- “छोड़ि मिथिला नगरिया बान्हि‍ अपन ई पोटरिया तूँ केतए जाइ छँह रे..! जटबा केतए जाइ छँह रे...! छोड़ि अपन सजनियाँ ति‍याग कऽ सभ खुशियाँ तूँ केतए जाइ छँह रे जटबा केतए जाइ छँह रे...!” जट- “जाइ छियौ गे जटिन देश-गे-विदेश जटिन देश-गे-विदेश भऽ गेलैए गैर आब अपन प्रदेश! साड़ी अनबौ गे जटिन गहना अनबौ गे...। साड़ी अनबौ गे जटिन गहना अनबौ गे बौआ-बुच्ची ले सेहो नव अंगा अनबौ गे!” जटिन- “नै लेबो रे जटबा विदेशक सनेस नै लेबो रे जटबा विदेशक सनेस हमरा तँ चाही जटबा तोहर संग आ सिनेह!” जाट- “नै रोक गे जटिन हमर तूँ डेग कमेबै नै तँ केना भरब सबहक पेट! बौआ कनतौ गे जटिन बुच्ची ललेतौ गे बौआ कनतौ गे जटिन बुच्‍च्‍ी ललेतौ गे जरतौ जे पेट जटिन कोइ नै सोहेतौ गे।” जटिन- “घुर-घुर रे जटा सुन-सुन रे जटा जि‍द्द छोड़ रे जटा कोइ नै ललेतौ रे जटा हरे जटबाऽऽऽ रे मेहनत‍ करि नून रोटी खेबै मुदा संगे मिथि‍लेमे रहबै रे जटा..! चल-चल रे जटा अपन देश रे जटा अपन खेत रे जटा मरूआ रोटी रे जटा नून रोटी रे जटा हे रे जटबाऽऽऽ तूँ धान रोपीहेँ हम जलखै लऽ कऽ एबौ रे जटा...!” जटा- “सुन-सुन गे जटिन हमर सजनी तूँ जटिन घरक लक्ष्मी तूँ जटिन हमर जि‍नगीक गाड़ी तूँ जटिन हमर ज्ञानक खान तूँ जटिन हे गे जटनी ई ई ई...। तूँ जीतलँह हम हारलौं गे जटिन छोड़ि अपन देश नै केतौ जाएब गे  जटिन रहतै मिथि‍लेमे सदैव अपन बास गे जटिन हे गे जटनी ई ई ई...। गै दुनू गोरा मिलि‍ मेहनत‍ करबै तँ जि‍नगी स्वर्ग हेतै गे जटिन।” जटिन- “हमर साजन तूँ जटा तोहर सजनी हम जटा हे रे जटबाऽऽऽ...। दुनू गोरा हँसैत अहिना जि‍नगी काटब रे जटा...।” ◌ सुखल मन तरसल आँखि‍ एगो सहारा छल गरीबक, अखरा रोटीपर मेल पि‍औजक! ऊहो सुआद छिनाएल जाइए खेतसँ पिऔज हराएल जाइए। सभटा अंगोरा गरीबेपर ढराएल सुखल रोटी तेल ले ललाएल तैपर सँ पिऔज गुल खेलाएल। बान्‍हए परतै जुन्ना आब पेटमे, केकरो किछु कहैसँ तँ नीक छै यएह की बज्जर खसाबी अपने मुँहमे। ◌ मनुखक सौदा लाख-दू-लाख पाँच-पाँच लाख पर बात होइ छै, तिमन-तरकारी जकाँ मनुखोक आब सौदा होइ छइ। मास्टरकेँ दू-लाख इंजीनि‍यरकेँ पाँच लाख डाक्टरकेँ दस लाख भाव छै, जेहेन सौदा लेबहक हो बाबू तेहेन माल दइक रिवाज छइ। लक्ष्‍मी लग लक्ष्‍मी जाइ छै, गरीबक घर बज्‍जर खसै छै, कन्यादान बिखाएल जाइ छै, पहिले तँ खाली बेटीए छल, आब बापोक लहास पोखैर‍-इनारमे ढेरीआएल जाइ छइ। दानक नाओंपर प्राण मंगै छै हमर समाज निःसंकोच ई पाप करै छै, कहिया एकर बुधि‍ खुलतै, अन्‍हार घरसँ इजोतमे एतै, जल्‍दी मुझाउ ई दहेजक आगि‍ नै तँ जरए पड़त सभकेँ अइमे आइ-ने-काल्हि‍। ◌ अनमोल-बोल (बाल कवि‍ता) जलसँ शीतल मुस्कान मिसरीसँ मीठ बोल! सभ कष्ट दूर होइ जे करैए एकर मोल। कम बाजी उचित बाजी नै बाजी कोनो अनरगल बोल! जीवनमे आनि नीक आचरन जे अछि अनमोल। करूआ बोल कटुता बढ़ाबैए अपनेकेँ अपनासँ दूर भगाबैए! नै कही केकरो तितगर बोल जे नाश करैए जिनगी ओइ पिटारकेँ नै कहियो खोल। ◌ चलाकक दुनियाँ आउ सुनाबी एगो बात पुरानी जंगलमे छल एगो लोमड़ी सियानी चलाकी आ बुद्विमानीकेँ ओ खान छल सभकेँ चकमा देनाय ओकर काम छल। एकबेर खाइ छल रोटी बौआ झपैट कऽ भागल रोटी कौआ जा कऽ बैठल लोमड़ी आगाँ देख कऽ रोटी लोमड़ी लोभाएल! भरि-भरि मुँह ओकरा पानि‍ आएल पबैले रोटीकेँ चलाबी कोन तीर ऐ बुद्धूपर। कहलक जेतेक सोहनगर रंग तोहर कौआ ओहोसँ मीठ तोहर बोल रे, कान हमर तरैस रहल यऽ सुना तूँ कोनो राग अनमोल रे। मुर्ख कौआ फुइल गेल अपन प्रशंसा सुनि‍ सभ भूलि‍ गेल। जखने कहलक काँव-काँव रोटी कहलक हम जाँव-जाँव ओकर भूखल पेटकेँ तृप्त काँव-काँव। ◌ बून-बून बँचाबी हम एलै गुमार चढ़लै खुमार जरलै धरती फटलै दराड़ि‍। बून-बून-ले फेर सभ तरसतै हेतै सभकेँ सभ बिमार। सुन रमुआ, चल डोमरा करी हम एगो काज अखनेसँ हम बरखा पानि‍ जमा कऽ बुझाबी हम धरतीक पियास। तब नै ई दराड़ि फटतै नै कोनो अपदा घटतै आइएसँ हम अपन काल्‍हि बनाएब, अपन देशकेँ सुखारसँ बँचाएब। ◌ जि‍नगीक मरीचिका लटैक रहल छल घौरछा गाछमे रसभरल मीठ आमक लोभी मन ललचाइत जी कहलक तोड़ि खाइ एकरा मुदा कि करी भय छल पहरुक। मन नै मानलक पाइन मुँहमे भरि गेल फेर सोचलूँ बस एगो तोड़ू तँ डर केहेन यएह तँ निअम अछि संसारक। सभ खाइत अछि नुका कऽ कखनो घरमे तँ कखनो बाहरमे ऊँच, नीचसँ बनैए एतए सभ अपन अही पथपर तँ चलैत अछि सभक सभ। पर सच जे अनभिग अछि सभसँ ई अछि ई मीठ फल नै जहर अछि कोनो जे बदलि रहल अछि हमर विचार आ हमर संस्कार जे दऽ कऽ अपन मिठासक लालच झोंकि रहल अछि धधकैत भट्ठीमे। जि‍नगीक बाटमे ऐत नित्तहु केतेक मरीचिका पर सीखब हम अकरेसँ संघर्षक रोज नव तरीका। ◌ तकैत जिनगी कड़कटक ढेरमे देह सुखल पेट हाड़ी आँखि दुनू लाल छल। टुकुर, टुकूर ताकैत छल हमरा दिस ओ ओकरा मुँहपर अनंत सवाल छल। पटनाक रेलवे लाइन पर ठाढ़ निर्बोध बच्चा फटल पुरान लटकौने टाँगने छल एगो बोरा अपन पीठ पर देखि कऽ ओकरा एना लागल जेना ताकि रहल अछि अपन जि‍नगी गन्‍दाक ढेरमे। पर नै जानि केतेक निर्बोध अहिना जनमैत अछि ऐ संसारमे। नित ताकैत अछि अपन मंजिल, अपन भविष्य अहिना कड़ा कड़टक ढेरमे। ◌ संकल्प- 2 छोड़ि जाएत माझी पतवार उफनैत जि‍नगीक राहमे अछि हसरत हुनकर कि, थामैए पतवार हुनके अंश ऐ मजधारमे। छी गर अहाँ कृति हुनकर तँ राही बनू ऐ राहक उठाउ पतवार आ माझी बनू जि‍नगीक अपन राहक। आएल छी अहाँ जेतए तक ओइसँ आगुक कल्पना करू देख रहल अछि राह लक्ष अहाँक मुस्‍कियाइत ओइ पारमे। छोड़ि कऽ मोह वट वृक्षक समना करू हवा आ पानिक तब बनत बेक्‍तीत्‍व अहाँक अहाँक नामसँ ऐ संसारमे। अहाँ अगर अंश छी हुनकर तँ बुझाइ नै कहियो ई दीप जे छोड़ि गेल अपन सभ कि‍छु बस एगो अहींक बिसवासमे। ◌ ठमकल शब्द रूकि जाइत ई हवा ई दृश्‍य ई बहार, दुनियाँक हम भऽ जाएब विलीन केतौ रूकि जाइत ई कलम आर हरा जाइत शब्द केतौ। नै उठत वेदना मनमे नै उमड़त भावना कोनो। जब जाएब चुपचाप एतएसँ तँ मेटौ जाएत सभ इच्‍छा मनक ने आएब हम याद केकरो ने करब हम याद किनको ओइ अज्ञात सफरमे नै मिलत संगी कोनो बरसैत मेघ, चिलमिलाइत धूप सबहक बीचमे रहब हम असगर ठाढ़ ने लऽ जाएब, ने छोड़ि जाएब किछो बस एगो डिबिया जे जरत ऐठाम सदखन, सबहक मनमे हएत ओ हमर कृति, हमर करमक ज्योति‍। ◌ दहेजक बिहाड़ि कहिया तक रहबै हम समान यौ भैया कहिया मिटतै ई अभिशाप यौ हमरो तँ परमतमे भेजलक मुदा अबैत ऐ संसारमे सभ हेय कऽ देखलक कियो कुलक्‍छनी तँ कियो कलंकनी कहलक। भैयाकेँ दुलार केलक हमरा धुतकारि कऽ माए भगौलक दिन-राति‍ हम माइक हाथ बँटाएब बाबू-दाइक सेवा करै छी तैयो किए ई फटकार सुनै छी! सुनि रहल छी सबहक मुँहसँ दहेज बिनु नै हएत हमर बिआह जे थामत हाथ हमर बाबू भरत पहिले जेबी ओकर। हम बेटी छी आ कि समान जे गाम-गामसँ औत लोक करैले हमर दाम। आब सजबए पड़त सभ बेटीकेँ अपन आत्मदाहक समान आरो कहिया तक पिसाइत रहतै बेटीक समाज। ◌ हराएल हमर रूप जब एलौं तँ रुइया छेलौं कोमलताक सागरमे डूबल छेलौं सिनेहसँ छुबै छल सभ हमरा हम सपनामे सूतल छेलौं। अंजान छेलौं दुनियाँक साँचसँ ऐ घोल-फचक्का, ऐ धधकैत भट्ठीसँ छीनि‍ गेल ओ स्वरूप देलक दुनियाँ हमरा नव रूप। देख कऽ दुनियाँक रंग काँइप रहल अछि हमर अंग छल, कपट, धोखाधरी सभ अछि सबहक संग। केतेक अरब रामक आबए पड़तै करैले एतएसँ पापक अन्‍त देख कऽ ई हम छी दंग, आइ सबहक मनमे बसल अछि हजारो रावणक अंग। ◌ विदाइ जो गे बेटी, आब कि निहारि रहल छेँ नोराइल आँखिसँ केकरा ताकि रहल छेँ। एतए तक लिखल छेलै संग अतै तक छेलियौ हम तोहर बाप। एक जन्‍म तूँ एतए गमेलेँ हमरा संगे सभ सुख दुख हँसि कऽ बितेलेँ अहिना तूँ ओतौ रहिहेँ खुशीक दीप जरइहेँ केलियौ आइ हम तोरा पराइ मन कनैत अछि ठोर हंसैत अछि कऽ रहल छी आइ तोहर विदाइ। जड़ैत ज्योति माए गे, केतेक दिन तक हम बच्चा रहबै बकरी संगे खेलैत रहबै हमरो दुनियाँकेँ जानैक एगो मौका दऽ दे माए हमरा बस्ता दिया दे। छै छोट हमरासँ मालिकक बेटा अंगरेजियेमे फटर-फटर करै छै हम नै बुझै छी आ-आ सन कोनो अक्षर माए गे, हमरो स्कूल जाए दे। मालिकसँ जा कऽ तूँ कहि दही नै चरेबै आब हम भैंस हुनकर नै खेबै तरकारी, रोटी हमरा नूने रोटी खाए दे मुदा माए गे, हमरा तूँ पढ़ैले जाय दे। पढ़ि लिख हम अफसर बनबै तोरा-ले नब साड़ी अनबौ बाबूक बुरहक सहारा बनि हम दुनियाँमे नाम करबै माए गे, आब हमरा अपन भविष्य बनाबए दे हमरा जिनगी समारऽ दे। ◌ बेटी बेटी अभिशाप नै वरदान अछि। तिलकक बिहारिसँ बेटीकेँ नै बहाबू ई छी घरक लक्ष्मी हमरा नै समान बनाबू। नै अछि ई बोझ नै अभागी शक्तिक ई प्रतिरूप अछि एकरा नई शापित बनाबू। दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती संगे सीतो अइमे समाइल अछि बेटीए-क आँचरमे मनुखक काल्हि अछि हमरा नै कलंकित बनाबू। ◌ दहेजक आगि‍ सुनथुन यै सासु-माए हमहूँ छी किनको बेटी हमहूँ किनको दुलारी छी हमहूँ 9 महिना किनको कोइखमे आस आ ममतासँ भीचल छी। नै बुझियौ आन हमरा हमहूँ एगो माइक अंश छी लऽ कऽ आइल छेलौं आश एगो कि, माएकेँ छोड़ि, माए लग जाइ छी। बाबू छोड़ि बाबू लग यएह अभिलाषा बनेलौं हम सपना सहेजने एलौं हम। बाबू हमर अछि गरीब बेटीक कन्यादान कऽ कए तँ राजा जनको भऽ गेल छल फकीर जब हृदयक टुकड़ी सोंपि देलकैन तँ कि आगाँ चाह रखैत छी। दहेजक खातिर केतनो बेर अहाँ हमरा जरैब तैयो नै अहाँ अपन एक बितक पेटक अग्निकेँ बुझा पएब छोड़ू ई लालच, मोह अहूँ तँ केकरो बेटी छी। आइक नै तँ काल्हिक चिंता करू घरमे बेटी अछि अहूँक जवान अपन नै तँ ओकर चिन्‍ता करू। ◌ ओइ पार तूँ बता रे खेवैया कि छै ओइ पारमे माए, बाप, भाय, बहिन अपन, पराया सभ नाता, रिश्ता मिलतै ओइ संसारमे। सुनै छिऐ राजा हुअए या रंक छोड़ऽ पड़तै सभकेँ ई देहक संग तूँ बता रे माझी बिन देहक वएह मलार मिलतै ओइ संसारमे। नै मंजिलक अछि खबर नै रस्ताक पहचान तूँ बता रे खेवैया अन्हार रस्‍तापर चलैत हम कोनो रस्‍ता बना पेबै ओइ पारमे। ◌ नेताजी सफेद कुर्तामे हमर नेताजी हाथ जोड़ि, नतमस्तक नेताजी जुबान खामोश, अबोध नेताजी देखियौ आइल हमर गाम हमर पालन हार, नेताजी। मंगैले भीख आश लगौने नेताजी भिखक नाम पर खून मॉंगैत अछि, नेताजी। केतेक सालसँ हम सभ चुसाइत छी आब बस पाइन अछि देहमे यौ नेताजी। बुझि रहल छी करतूत अहाँक धप-धप वस्‍त्रक भीतर कारी मन अहाँक नेताजी। केतनो खाइ छी तैयो दैतक खूनल पेट नै भरैत अछि अहाँक नेताजी। जँ फेर पकड़ा देब बन्‍दूक हवलदार बनि हमरे सभपर दहारब अहाँ यौ नेताजी। ◌ पहिल बरखा छुबि हमर मनकेँ गुदगुदेलक ओ प्रेमसँ छुलक हवाक झोका हमरा अपन शीतलताक मलारसँ। छीट रहल छल चॉंद-चॉंदनी जे थपथपैलक हमरा गालकेँ अपन ममतामय दुलारसँ। झमैक कऽ आएल कारी मेघ नहा कऽ गेल ऐ संसारकेँ अपन होठक मिठाससँ। छुबि कऽ हमर अंग-अंगकेँ चुइम कऽ धरतीक कण-कणकेँ पुचकारलक सहलैलक अपन सिनेहक बरखासँ। ◌ किसान होइत भिनसरे अजबे ओरियान छै हमरा गामक कियो पकैड़ बरदक जुआ कियो खाइए रोटीक संग नून दौड़ल अपन काम पर। सभ परानी माइट संगे अपन जीवन बीतबैए बच्चा तँ बच्चा बड़को अहिना पोसाइए। दिन-राति‍ मेहनत करि ई धरतीक कौइखसँ अन्न उपजाबैत अछि नै कोनो थकान एकरा नै केकरोसँ शिकाइत अछि। एहेन निर्मल अछि हमर किसान जिनकर दान आ संतोषे संस्कार आ पहचान अछि। ◌ समाजक वि‍डम्‍बना देख कऽ ई समाजक वि‍डम्‍बना बिआहब आब हम धि‍या केना चारपर खढ़ नै‍ पेटमे अन्‍न नै‍ नै अछि संगमे एक्‍को अना! मांग भेल ड्राइवरकेँ लाख मास्‍टर आ डाक्‍टरक नै पुछूँ बात दि‍नक उजयारि भेल कारी, भेल घनघर राति! ई हमरेटा नै‍ जन-जनक खिस्‍सा अछि बेटी‍बला केँ मलिन छै बेटाबलाकेँ हँसैत मुखरा अछि नन्‍हि‍टा धि‍या हमर भेली आब सयानी ति‍लकक ऐ युगमे बिआहव केना बिटिया रानी बहि‍ रहल यऽ अभिलाषा सभ, जेना मुट्ठीमे पानि‍। ◌ दर्दक टीस पहाड़ जकाँ दु:ख देलक पहाड़ एहेन एबकी आएल अखाड़ सगरे मचल हाहाकार। केतए गेल सभ देव केतए नुकाएल दुःख हरता कुहरा कऽ जन-जनक धि‍यान मग्न भेल रक्षण कर्ता। माइक सुन भेल आंचर केतौं हराएल नुनुक बोल असगर छोड़ि बुढ़ बापकेँ बिछुरि गेल बेटा अनमोल। बाबा-बाबा करैत गेल केतेक प्राण कि‍ए ने बचेलौं हे बाबा अपन भक्तक अहाँ जान। ◌ रोकू कियो ऐ बाढ़िकेँ और केतेक जानक बलि‍ देबै यो महा मनुख, किया बनैले चाहै छी भगवान देखियौ अहींक करनीसँ समसान बनल उत्तराखण्ड प्रान्त। पहाड़क छाती चीर कऽ ओकरा घाइल अहीं केलि‍ऐ नदीकँ हाथ-पएर काटि कऽ ओकरा अपाहिज सेहो बनेलि‍ऐ गाछ-बिरीछ काटि कऽ छत हीन माए धरतीकेँ केलिऐ शुरू केलिऐ अहाँ विनासक लिला सभ ताण्डव ठाढ़ अहीं केलिऐ। आब प्रकृतिसँ खेलवारि करैक सजाए देखियौ नदीक हुहंकार सुनियो बून-बून-ले केतौ तरसैत धरती तँ केतौ वएह बूनमे डुमैत जान देखियौ। ऐ असंतुलिताक कारण अहाँ छी कि‍ए अहाँ बनैले चाहैए महान छी आबो खोलू अपन केवाड़ कहि पूरा दुनियाँ ने बनि‍ जाए श्‍मशान-घाट। ◌ नोराएल आँखि‍ उजरल घरमे पोखैरक पानि‍ पीब रहल अछि अखनो लोक पुछि रहल अछि निर्बोध बच्‍चा कहि‍या तक भोगबै हम ई सोग। केना उजरल घर बसतै केना एकर नोर सुखतै और केतेक दि‍न अहि‍ना भोगतै ई भोग। सबहक दाता वएह एगो माता जि‍नकर अछि समान पूत कियो कहाबए हि‍न्‍दू-मुस्‍लि‍म आ कियो अछूत। भाय-भायकेँ जाति‍मे बाँटि धुतकारैत देखैत छी समाजमे की कहब हम ई वि‍डम्‍बना केतेक चोट लगैत अछि कोढ़मे। ◌ कि‍ए छी हम अछूत वएह वि‍धना हमरो बनौलक वएह रँग-रूप-गुण देलक पर अबिते ऐ संसारमे परजाति‍ कहि‍ कऽ सभ धुतकारलक। पहि‍ले जाति‍ बारि कऽ गाम बँटलक मनक संग पाइनो बँटलक नै कियो बुझलक हमरा मनुख देख कऽ सभ मुँह फेरलक। कहू मुदा हे बुधि‍जीवी हमरेसँ सभ उद्धार होइए हमर बनेलहा दौरा देवताक माथपर चढ़बैए! एक्के धरतीपर सभ जन्‍म लेलौं वएह माटिपर सभ ठाढ़ छी तँ हम कि‍ए अछूत कहाइ छी!! ◌ भ्रष्टाचारक परसाद एगो खेल खेलैत देखलौं स्कूलमे हरा गेल छल खिचरी सभ प्लेटमे। देख कऽ भेल अचम्भा पुछलौं सर ई कोन अछि जादू-टोना सर कहलखिन कि कहब हम केहेन अछि भ्रष्टाचारक मारि अबैए तँ यऽ भरल प्लेट मुदा मिलैत अछि यएह जादूक खेल। एक मुट्ठी बड़का बाबू एक मुट्ठी छोटका बाबू दू मुट्ठी अफसर साहैब आ झपटैत अछि तीन मुट्ठी कलर्क बाबू देखते-देखते गाममे फकाइत अछि मुट्ठी-मुट्ठी अहिना बँटैत अछि। जेकरा देखू टक लगेने अछि कहै छैथ हमरा दिअ ई तँ सत्यनरायण भगवानक परसाद अछि। ◌ तब हँसत तुलसी हम एक पुरुखक बेटी छी एक पुरुखक बहिन एक पुरुखक पत्नी तँ एक पुरुखक मॉं हर पग-पग पर हरेक संघर्षक बीच हरेक सुख-दुखमे हरेक रूपमे हम पुरुखक संगे ठाढ़ छी हमरो मुँहमे वएह जिह्वा अछि हमरो दृष्टि वएह देखैत अछि हमरो दिमाग वएह सोचैत अछि हमरोमे वएह साहस या हौसला अछि आइ पुरुखक संगे चलैमे हम समर्थ छी तँ फेर किए आइयो कए साए-मे सँ पचहत्तैर महिला घरेलू हिंसाक शिकार अछि ई हमरा लेल नै हे बद्धिजीवी अहाँले लाजक बात अछि। आबो जागु हे मानुस विकसित अपन विचार करू नारीकेँ परितारित करनाइ छोड़ू नव युगक निर्माण करू। जेतए नै हएत नारिक इज्जत ओइ समाजक केना विकास हएत केना रहत हँसैत तुलसी केना आँगन खिलखिलाइत माइक पूजा पहिले करि नतमस्तक भऽ मन झुकाए देखयौ फेर काल्हि अपन केतेक सुन्दर अछि हँसैत खेलाइत। ◌ शिल्पकार आइ हम देखै छी जइ दिस वएह दिस ठाढ़ एगो शिल्पकार अछि दौड़ रहल यऽ सभक सभ ऐ रेसमे लऽ कऽ अपन औजार कहि रहल अछि देब हम संसारकेँ नव रूप रंग आकार। मुदा केकरो नै टोहैत देखै छी अपनाकेँ नै निखारैत अपन प्रतिभा आ गुणकेँ। ई संसार तँ परिपूर्ण अछि लोभ मोह आ भयसँ अछि दूर तखन एकरा हम की देब अकार रूप रंग आ प्रकार। बनबैक यऽ तँ बनाउ अपन प्रतिमा अपन ओजारसँ निखारू मानवता खुदमे अपन उच्च विचारसँ। ◌ यादि‍ गामक गामक बर मन पड़ैए पिपरक गाछ पुरबा बसात पिअर सरसो मन पड़ैए। लटकल आम मजरल जम गमकैत महुआ मन पड़ैए। धारक खेल कदबा खेत रोटी-चटनी मन पड़ैए। बाधक झिल्ली मुठिया धान पुआरक बिछौन मन पड़ैए। घुरक आगि पकैल अल्‍हुआ ओ गपशप मन पड़ैए। गामक बर मन पड़ैए। ◌ आशाक किरण अखार बीतल सौन बीतल बीतल जाइए भादबक फुहार सुइख गेल सभ इनार-पोखैर नै बरसल ऐ बेर एको अछार। बज्‍जर भेल मॉं धरती कारी सभ गाछ-पात कोन पाप भेल हमरा सभसँ आबो तँ बताबह हौ सरकार। नै खाइले अन्न आ ने मिझबैले तरास एना कहिया तक बिताएब और केतेक मास आब समटऽ अपन भाभट दए हमरा सभकेँ जीबैक अधार हे भगवान तूँ बरसाबए पानिक बौछार। ◌ नारीक पहचान देख कऽ चिड़ै-चुनमुन मन होइत छल कि हमहूँ उड़ी अकासमे। जा कऽ देखी घरक बाहर की अछि ऐ संसारमे। भैया संगे हमहूँ जाइतौं स्कूल ओझराएल रहितौं किताबमे। मुदा जब निहारै छी अपन दिस छल बानहल जंजीर पैरमे। माए कहलक हमर मान आ बाबूक पगरी छौ दुनू तोरे हाथमे। नैनटा हमर उछलैत मन मरि गेल विडम्बनाक ऐ संसारमे। सपना देखैसँ पहिले जगा देलैन सुनि माइक वचन बहुत कचोट भेल मनमे। हम बेटी छी आकि अवला जे चुप रहैक यएह इनाम मिलैत अछि पुरुख सत्तातमक ऐ समाजमे। ◌ आजाद गजल- 1 मनमे आस सफर लम्बा अन्‍हार बहुत पनैप रहल अछि मनमे सुविचार बहुत नै डर अछि मिटै कऽ हमरा एको रती बढ़ैत ने रहए चाहे ई अति‍याचार बहुत माथ उठा कऽ चलैत रहब हम सदिखन मनमे अछि घुमि रहल धुरझार बहुत बेदाग रहत चुनरी सीताक बुझल अछि से देहमे अछि अखनो प्राण आ इनकार बहुत चिरैत रहब अन्‍हारक कलेजा छी ठनने मुन्नीकेँ मिलत अइसँ आगू प्रकार बहुत। ◌ आजाद गजल- 2 मुदत्ते बाद महफिलसँ मुँह झाम निकलल बेकार छल निकलल जेना काम‍ निकलल हरा गेल भीड़मे आबि कऽ ताकी निङ्गहारि नतीजा जे छेलै निकलबाक सरे-आम निकलल छीन‍ गेल सरताज हमर खाली माथ हँसोंति बेबस बनि लाचार शर्मसार अवाम निकलल फेर सत्तामे अबैक उम्मीद नै एक्को रती घुरब नै फेर आइ ओइ देने पैगाम निकलल सच तँ ई अछि राजनीतिमे दाग लागल मुन्नी अपने करमसँ कत्लेआम निकलल। ◌ बौआ देखहक चान्‍दकेँ चन्‍दा मामा दूर छै देखहक केतेक मजबूत छै नित कटै-छँटै छै तैयो हंसैत छै केतेक अटल निर्भय छइ। बौआ तुहो अहिना बनिहक दुखसँ कहियो नहि घबरैहक गिरबहक तबे तँ चलनाइ सीखबहक लगतह चोट तँ सम्‍भरनाइ सीखबहक देखह ऐ चान्‍दकेँ जे घटैत-घटैत मेटा जाइ छै तैयो एक बेर नै घबड़ाइ छै धीरे-धीरे फेर आगा बढ़ि परिपूर्ण भऽ कऽ पुनः अकासमे खिलखिलइ छइ। ◌ भोरक सनेस उठह हौ बौआ उठू यइ बुच्चिया देखियौ दृश्‍य भिनसरकेँ। भागल अनहरिया भेल इजोत करू स्वागत दादा सूरजक। जतेक भिनसर उठबहक बौआ ओतेक नमहर हेतह दिन कुल्ला-आचमन करि कऽ लए आशीष अपन नमहरक। भिनसरे नहेलासँ मन तरो-ताजा हेतह निरोग बनल रहब अहाँ नै दरकार हएत कोनो डाक्टरक। खुब पढ़ि-लिख बौआ -बुच्ची आगू-आगू दौड़ैत चलू अछि अहींक कन्‍हापर भार अपन देशकेँ। ◌ बेटी-लहास एक-एक दिन बीतल पुरल एक मास, अन्‍हार घरमे सूतल छेलौं हम नअ मास। देखै‍क बहुत जिज्ञासा छल हमरा ऐ घरक मालिककेँ जे नअ मास तक बिनु कहले मेटबैत अएल हमर सभ भूख पि‍यास। आइ भेटत रौशनी हमरा देखब हम संसारक चेहरा, लेब हम आइ नव जीवनक साँस पूरा हएत हमर आइ सभ आस। आँखि‍ बन्‍द अछि किछो देख नै सकै छी हम मुदा महसुस भऽ रहल-ए एगो बज्र हाथ, जे दबौचि‍ रहल अछि हमर कण्‍ठकेँ एगो अवाज जे बेर-बेर हमरा कान तक पहुँच रहल अछि बेटी छिऐ मारि दहि‍न! बस रूकि‍ गेल हमर साँस बनि‍ गेलूँ हम लहास। ◌ बाल-श्रम कुड़ा-कड़कट बीछ कऽ बाबू नै हम कोनो पाप करै छी, अहाँकेँ गन्दगी पहिले साफ करि फेर अपन पेटक जोगार करै छी। बाल-श्रम अछि जुलुम बड़का-बड़का पोस्‍टरमे पढ़लौं पर अफसर आ नेतेक घरमे नित काज करैत एलै जब पेटक आगि‍ धधकैत अछि तब ने कोनो कागज-कलम सोहाइत अछि। चोरी-चपाटीसँ तँ नीक मेहनत‍ करि दूगो रोटी खाइ छी। ◌ फगुआ सभ मिलि‍ करैए हमजोली कान्हा संग गोपी खेल रहल अछि होली। नील-पियर, लाल-हरियर अछि सभ रंग सुनेहरा, आइ बेरंग नै रहैए कियो चाहे धोती होइ या घाघड़ा। दादी चाउरक पुआ बनेतै माए दही आ खीर खियेतै बाबू देतै आशीष, रंगा-रंग होइ सबहक जिनगी जिबैए सभ लाख बरिस। ई अवसर नित अबैत रहैए ई मेल-मिलाप बनल रहैए नै हइय केकरोसँ झगड़ा सभकेँ बधाइ दिवस सुनहरा। ◌ आन्‍हर कानून देश-देशसँ एलै अवाज तैयो नै बदलल हमर समाज। नै होइए एकरा दरद कोनो नै देखैए ई कोनो पाप किएक तँ बानहल अछि एकरा आँखि‍पर कारी साँप। जे डसि रहल अछि हमर संस्कारकेँ हमर नीककेँ करा रहल अछि हमरासँ नि‍त पाप। ◌ बूनक मोल फाटल धरती जरल घास एक बून पानि बिनु अछि सभ उदास। नै बुझलौं हम प्रकृतिक निअम कानै पड़त आब केतेक जनम। आइ बुझितौं मोल जे पाइनकेँ तँ एना पियासल नै मरैतौं जाइन कऽ। बहुत नाच नचेलौं छन्नी-छन्नी धरतीकेँ केलौं अपन सुविधा खातिर धरतीकेँ सिमेन्‍टसँ झँपलौं वएह अपमानक बदला छी ई लागए नै पैरमे माटि तेकरे जमाना छी ई आब तँ नोरोमे नहि पानि अबैए जेकरा पीब हम पियास बुझाबी बुझा रहल यऽ आइ ओइ एक बूनक मोल छल हमरा-ले ओ केतेक अनमोल। ◌ करी मिथिलासँ पहचान चलू मिथिला, सुनियौ मैथिली केतेक मीठ ई बोल यौ मिसरी घुलल अछि हर शब्दमे करियौ एकर मोल यौ। सीताक नैहर एतए उगनाक ई प्रिय स्थान यौ ऋषि-मुनिक भूमि ई अछि एतए विद्वानक खान यौ। होइत भिनसर सुगा सीता-राम पढ़ैत अछि बौआ नुनु कहि सभ बात बजैत अछि करियौ ऐ भूमिक पहचान यौ। एतए कऽ माछ-पानक दुनियाँ करैए बखान यौ धोती-कुरता आ पाग अछि पुरुखक पोषाक यौ। ऐ धरतीपर हम जन्‍मलौं अछि ओइ जन्‍मक कोनो नीक काज यौ फेर-फेर हम एतै जनमी अछि एतबे विनती भगवान यौ। ◌ करिझुमड़ी कोसी दू-चारि दिन नहि आइ सात दिनसँ ऊपर भेल कोसी करिझुमड़ी सभ लेने चलि गेल। नै खाइले अन्न अछि नै पीबैले पानि ऊ डसिनिया सभ ढेकरैत लऽ गेल। बाउ हराएल अछि भाय ढिस भऽ पड़ल अछि राइते-राति‍ आएल एहेन निरलज्जिया जे कुहरा कऽ चलि गेल। नै बँचल एक कनमो किछो नै भाय-बाप नै सम्‍बन्‍धी कियो असगर ठाढ़ छी कछारिमे ई कोसी करिझुमड़ी असहाय छोड़ि हमरा हँसैत चलि गेल। ◌ नइ लेब आब हम दहेज दहेजक खातिर गिर गेलौं हम मानवताक समाजमे। कि कहब आब अपन दुखरा कि लिखल छल कपारमे। धोती-कुरता पहिर कऽ बाबू ठाठसँ चिबबैत पान अछि हमरा बना कऽ पापी आब ओ कात अछि। पढ़ि-लिख हम बानर बनलौं बाबूक बातमे एलौं दहेज लऽ कऽ केहेन काज केलौं। नै बुझलौं नारीक शक्ति नै ओकर सम्मान केलौं, कि कहब आब हम कि केतेक घिनौन कुकर्म केलौं। ◌ मिथिलाक दादा खेत बेच मन कारी झाम मुदा खाइए माछ भिनसर-साँझ। जमीनक मोल नै जानैए ई पुरखा अरजलहा बेचैमे लागैए की। बैठल-बैठल ताल करैए पटुआ धोती पहिर घुरैए। चुप रहि कऽ सभ नाच नचाबैए हुक्का गुरगुड़बैत अपन काज सलटियाबैए। फाटल जेब मुदा ऊँच शान देखियौ मिथलाक एगो ईहो पहचान। तैयो खुआबैए ई सभकेँ नित पान मखान। ◌ पाहुनक माछ एलखिन पाहुन लऽ कऽ माछ भदवरियामे नै अछि सुखल कोनो गाछ। माए हम करबै आब कोन काज केना रखबै मान केना सजेबै साज। सुनू कनियाँ हमर बात छानि उजारू करू ई काज। नै केना बना कऽ देबै रामकेँ केना उपासल रखबै। छानि उजरतै तँ फेर बनेबै मुदा रूसल पाहुन केना मनेबै। पजारू चुल्हा पड़लैए साँझ लगाउ आसन परसू तिमन संगे तरल माछ। ◌ हमरा पागल कहैत अछि लोक लरखड़ाइत पएर थरथड़ाइत ठोर नसाबाज हम नै, अछि जालिम सभ लोक। चोरी केलौं नै मुदा चोर कहेलौं पर डकैती करि बाइज्जत घुमि रहल अछि लोक। एक मु़ट्ठी अन्न-ले तरैस रहल छी देखियौ गोदामक-गोदाम अन्न सड़ि रहल अछि लोक। हम मेहनतो करि नै अपन पेट भरि पाबै छी पर हमर सरकार भरल पेट अरबोक घोटाला करैत अछि आब सोचियौ सभ लोक। ◌ सगरे अन्‍हार अछि भ्रष्ट आ भ्रष्टाचारसँ भरल पूरा संसार अछि कियो नै बँचल एतए सौंसे ओकरे राज अछि। कियो देखा कऽ लुटैए कियो चोरा कऽ लुटैए तँ कियो लजाए कऽ लुटैए लूटिक एतए बजार अछि। के कहत केकरा एतए सभ एक प्रकार अछि गर्भमे सिखैए भ्रष्टाचार यएह नव युगक संस्कार अछि। कदम-कदमपर घूस दैत मानव ऐ दुनियाँमे अबैए आगुओ घूसे दैत घुसकौल जाइए मोर-मोरपर देखबैत यएह नाच अछि घूस दइबला सभसँ बड़का बइमान अछि। ◌ माइक रूदन सोचलौं बेटा बेटी भेल रोपलौं आम बगुर उगि गेल। बढ़ि‍ रहल अछि समाजक अति‍याचार केना बचैब हम 18 बर्ख एकर लाज। ई हमर बोझ नहि हमर अंश छी जेकरा हम नैनामे बसाएब, मुदा केना कऽ सियाही भरल घरमे अपन चुनरी बचैब। कलंक बेटी नहि ई समाज अछि जे युग-युगसँ उज्जर चुनरीमे लगबैत दाग अछि। चारू दिस छल लक्ष्मण रेखा तैयो हरण भेल सीता सुलेखा। कऽ रहल अछि नचार हमरा बेटीसँ दूर हमरा। शूल बनि मनमे गड़ैए बेटी तँए गर्भमे चुभैए बन्‍द करू आब अति‍याचार बसाबए दिअ हमरा बेटीक संसार। ◌ अपना दिस निहारू बड़ केलौं उक्टा पेंची अक्कर खिद्यांस ओकर धेंस कहियो तँ आंगुर अपनो दिस उठाउ अपन मनकेँ बुझाउ। उठैए जे एगो आंगुर केकरो दिस तीन आंगुर देखबैए यऽ अपने दिस। मारू ऐ साँपकेँ निकालू मनक ऐ काँटकेँ जतेक साफ मन रखबै दुनियाँ ओतेक सुन्दर देखबै। बहुत भटकलै खोजैले भूत दुबैक कऽ बैठल छल ओकरे करेजमे बनि कऽ सूत। ◌ नचार किसान बाबू केना हेतै आब पाबैन-तिहार। बीसे-बीस दिनपर हेतै खर्चाक भरमार नै अगहनक करारीपर देतै कियो पैंच उधार बाबू केना हेतै आब पाबैन-तिहार। छुच्‍छे छाँछी रहि जेतै अबकी चौरचनमे मरूआ भेल अलोपित आब मिथिलामे केना कि उपाय करिऐ केतएसँ करिऐ हम जोगार बाबू केना हेतै आब पाबैन-तिहार। जतरामे धिया-पुता लव कपड़ा मंगै छै दिवालीमे फटक्का-ले कनै छै छट्ठी मैयाक की अरग देबै ऐबेर बाबू केना हेतै आब पाबैन-तिहार। ◌ स्वच्छ समाज छोड़ि जाइ छी एगो चेन्‍ह हम। निस्प्राण भऽ गेलौं मुदा हमर दरद सदि‍ जीबैत रहत, हम चुपचाप जा रहल छी मुदा हमर चिख अहाँकेँ हरिदम झकझोरैत रहत। दोष हमर नहि, अहाँक मानसिकताक छल बुराइ हमरामे नहि अहाँकेँ संस्‍कारम छल। बेजुबान हम नहि अहाँकेँ बना कऽ गेलौं खामोश भऽ कऽ अपन अवाज बुलंद करि गेलौं। अगर अछि अहाँमे जिंदा कनियोँ मानवता तँ बचाउ दोसर ‘दामिनी‘क लाज, यएह हमर इच्‍छा अछि निस्‍पाप हुअए अपन समाज, करू नै समर्पित हमरापर फूल आ मोमबत्ती गाड़ि देब हमरा सहि श्रर्द्धाजलि‍ तँ करू संकल्प! बनाएब अहाँ नारीकेँ जीऐले एगो स्वच्छ समाज। ◌ माए एक चुटकी नून दऽ दे आइ हम जनलिऐ बेटी आ बेटामे कि भेद होइ छै, गर्भमे बेटी कि‍ए गरै छइ। नारीक दुःख नारिये जनै छै, तँए तँ सभ माए बेटी जन्‍माबैसँ डरै छइ। जइ बेटीकेँ माए जीवन दइ छै, वएह बेटीकेँ समाजक अति‍याचार करि मरैले नचार करै छइ। बेइज्‍जत भऽ कऽ मरैसँ तँ नीक माए इज्जत कऽ तूँ मृत्‍यु दऽ दे ई पुरुख सत्तात्मक समाज छीऐ माए जनैमते तूँ हमरा एक चुटकि नून दऽ दे। ◌ बेटी छोड़ऽ काका बेटा-बेटी कऽ अन्‍तरक खेल। सोचऽ तूँ एक बेर बेटा-बेटी मे की फरक भेल। बेटा कनेतह पर बेटी पोछतह नोर बेटा एक कुल मुदा बेटी दू कुल करतह इजोर। थाकि-हारि कऽ जब तूँ केतौसँ एबहक काका सिनेह बरसाबैले आगु जेतह बेटी। कि‍छु दिन कऽ मेझमान बनि ई तोरा घर आइल छऽ तोहर दुलार आ आशीष लऽ कऽ चुप-चाप चलि जेतह बेटी। तब फटतह तोहर कोंढ़ आ अन्‍तर-मनसँ एतए एगो अवाज कि अगला जन्‍म तूँ फेर ऐ आँगनमे अहियहन बेटी। ◌ कारी-बजार कारी-धन कारी-बजारी कारी चादरसँ लिपटल हमर देश अछि। केना बेदाग करब एकरा सगदर कारी-स्याह अछि। निचाँ-निचाँ की देखब जब ऊपरे अन्‍हार अछि कोनो दोसर नै रंग एतए सगदर कारी-बजार अछि। राष्ट्रपति होए या प्रधानमंत्री सभ कऽ सभ दरिद्र अछि कि कहब बेशर्मी केतेक हद तक एकरा देहमे समाएल अछि। भगाबू ऐ दिम्मक कऽ अपन घरसँ नै तँ ई हड्डी तक खाइले तैयार अछि सोचू-विचारू अपनामे अहीं कऽ हाथमे काल्‍हिक सरकार अछि। ◌ शब्दक खेल चुन्नु- “अ सँ अनार आ सँ आम रटैत जी थोथरा गेल, आब नै खेलब हम ई शब्दक खेल।” माए- “तँ चलू उराबए चलि पतंग हरियर अपन लाल ओकर पिअर भैया कऽ आब कहू सभ मिला कऽ केतेक उड़ि रहल अछि पतंग।” चुन्नु- “एतौ तँ अछि सवालक जाल माए हमरा पहिले ई बता दिअ एक सँ आगाँ केतेक होइ छै सुलझा दि‍अ ई महाजाल।” माए- “पहि‍ले कहू आब कहियो नै उबबै ऐ खेलसँ, नै उलझबै अंकक जालसँ तब हम अहाँकेँ सभ सिखाएब। सभ सबालक जवाब अहाँकेँ बनाएब।” ◌ माए बता तूँ एगो बात माए बता तूँ एगो बात खोल तूँ ई मेघक राज के सभ रहै छै ओतह कि छै ओकरा सबहक काज। भोरक सुन्दर सुरज दुपहर कऽ किए जरबै छै साँझ पड़ैत फेर केतए हरा जाइ छइ। राति‍ कऽ अबै छै मामा सजा कऽ मोतीक थार कि ओतौ छै बहुत बड़का संसार। कहियो देखै छी कनियेँ कहियो बेसी कहियो तँ साफे नै देखाइए तूँ बता माए मामा एना किए नुका-छुप्पी कऽ खेल खेलैए। सुनू बौआ हमर बात बिना पढ़ने नै खुलत ई राज जेना-जेना अहाँ पढ़ैत जाएब सभ भेदकेँ भेदैत जाएब। ◌ अन्‍हार घरमे हत्या हम बेटी छी तँ हमर कोन दोष हमहूँ तँ एगो जान छी हमरो आँखि यऽ कान यऽ मुँह यऽ हम नै निष्प्राण छी। नै चलाबू एना कैंची हमर मन डराइए देखियौ हमर कटल हाथसँ लाले खून बहराइए। अन्‍हार घरसँ तँ निकलए दिअ एक बेर तँ हमरो ऐ निष्ठुर संसारकेँ देखए दिअ। केना लेलक एतए जन्म सीता ओइ रहस्यकेँ जानऽ दिअ हमरा नै मारू जेकरा लोक पुजै छै ओइ माइक मुँह देखए दिअ। ◌ बेटी जन्‍म भेल तँ कहलक दाइ भेल दू हाथ धरती तर कियो नै‍ सोचलक हमहूँ जान छी कहलक दही नून तरे-तर। बावू कपार पीटलैन माए भेल बेहोश जँ हम जनि‍तौं तँ नै‍ अबितौं ऐ लोक ऑंखि‍ अखैन‍ खुलल नै‍ कान अखैन‍ सुनलक नै‍ आ बना देलक हमरा आन कहलक कोनो अट्ठारह बर्ख रखबिहि‍ एकर मान। ने केकरो कि‍छु लेलौं हम ने केकरो कि‍छु देलौं हम जे माए हमरा जन्‍म देलक ओकरो मुँह नै‍ देख पबलौं हम अजब दुनि‍याँ अछि ई अछि गजबक लोक कि‍एक करैत अछि एना कि‍एक भेजैत अछि बेटीकेँ परलोक अबैत ऐ धरतीपर इजोतसँ पहि‍ल भेल अन्‍हार हमहूँ डुमि‍‍ गेलौं आ डुमि‍‍ गेल संसार समाज बनल हत्‍यारा बाप बनल जल्‍लाद बसैसँ पहि‍ने उजारि देलैन बेटीक संसार। ◌ भेल पूर आस उमरल आएल देखि कारी मेघ चलि गेल धानी पुबरिया खेत। बंजर भूमि आब पनिया जेतै, मेटतै आब अपनो दुख सगरे अन्न उझला जेतइ। बुच्ची-ले लब आंगी अनबै तोरा-ले लव साड़ी अबकी जतरामे निर्मली बजारक खेबै पकौरी। आइ पुबारि बाध रोपबै काल्हि पछवारि परसू उत्तरवारि आ दक्षिणवारि चारू दिस लहलहेतै खुशीए-खुशी सुख-सम्पन्न हम सभ भऽ जेबइ। ◌ भाइक सिनेह जब छोट छेलौं तँ केतेक सिनेह करै छल हमरा भैया हमर एगो नोरपर केतेक रूप बदलै छल भैया हाथी घोड़ा भालू बनि कऽ मनबै छल हमरा भैया। पहिलुक कर हमरा खिया कऽ फेर सुगा मैना कऽ हिस्सा सेहो खियाबै छल भैया। पर आब एगो अलगे रूप बदललखिन भैया भिन-भिनौजक खेल खेला रहल छथिन भैया। केतनो कनै छी तैयो नै देखैले अबैए भैया। आब हम नै खेलबै ई खेल रहि नै सकबै भैयासँ करि कऽ झगड़ा भगवान हमरा फेरसँ बच्चा बना दइए हमरा भैयासँ ओ सिनेह मंगा दइए। ◌ अल्‍हर मेघ बजबैए मेघ तबला ढोल बरसाबैए पानि टिपिर-टिपिर झमर-झमर राग अनमोल। सन-सन-सन हवा सनसनाय तन-मन केँ ओ थिरकाबैत उड़ि जाए। झमकि कऽ आबैए कारी मेघ चुमैले धरतीक चरनकेँ तृप्त भऽ ई अल्हर मेघ हँसैत खिलखिलाइत फेर अकासमे मेघ अलोपित भऽ जाए। ◌ सिया तोरे कारण जनक दुलारी सिया सहैत एलौं सभ दरद अहाँ कि‍ए? रानी भऽ वनमे रहलौं पतिक खातिर सभ सुख ति‍यागलौं पग-पगपर संघर्ष केलौं सभ परीक्षामे खड़ा उतरलौं तँ फेर ई समाज नै अहाँकेँ अपनेलक कि‍ए? जइ पति ले सभ किछु अहाँ ति‍यागलौं वएह अहाँकेँ ति‍यागलक कि‍ए? कि‍ए ने विद्रोह अहाँ केलौं नारीक हित ले अवाज उठेलौं। सदि‍खन सुनै छी हम एक्के बात। एहेन सति सीता नै बँचलै तँ केना बँचतौ तोहर लाज? जौं एगो सीता जे अवाज उठैइतै, तँ फेर कोनो सीता नै परतारित होइतै। चुप रहैक ई सजा मिलैए, केतेक सीता नित वनवास भोगै छइ। ◌ जाड़ एलैए जाड़ लऽ कऽ दुखक पहाड़। केना कटत दिन-राति‍ केना बीतत ई जाड़क कड़ार‍। उजरल छौइन टुटल अछि टाट नै अछि कोनो ओहार घरक चारू कात अछि बाटे-बाट। पुआरक ओढ़ना पुआरक बिछौना केकरा कहै छै लोक कम्‍मल केना कहै छै होइ छै जाड़ सुहाना। कहियो घरसँ निकैल‍ कऽ देखियौ एक राति अतए बीता कऽ देखियौ ठिठुरि कऽ मरैए लोक नित केतेक जेना। गरीबेकेँ तँ भगवानो मारै छै अगर नहि! तँ फेर पत्थरक देह बना कि‍ए नै भेजै छइ। जे ढाहि‍ दइ सरकारक भीखकेँ अनुदानक नाओंपर भेटैत मजाकक इन्‍दि‍रा-अवास आ सरकारी राहत कोषकेँ। ◌ बन्‍दिश हाथ-पएर दुनू अछि पर नै चलि पबै छी नै किछु करि पबै छी जीह अछि मुदा बौक बनल छी बस आँखिसँ देख रहल छी कानसँ सुनि रहल छी वेदनाक भट्ठीमे अपन देह झुलसा रहल छी जिंदा लहास बनि जी रहल छी केकरासँ कही केकरा बुझाबी कि हमहूँ एगो जान छी कही ओइ बेवस्थासँ कि बेवस्था बनबैबला लोकसँ कि स्वयंसँ। सहज ई मानि ली कि हम चुप रहैले बाध्य छी किएकि हम लड़की छी। ◌ टाकासँ बिआह काका घरमे बाजै बधैया होइ छै बुचिया कऽ बिआह यौ चारि बहिन हमहूँ छी चारू कऽ चारू कुमार यौ। दिन-राति मेहनत करि रोटीए-टा कऽ करि पबै छी जोगार यौ छी हम महगाइ आ गरीबी कऽ मारल अछि बाबू हमर किसान यौ। दिदियो कऽ देखै लेल आएल गाम-गामसँ केतेक ने बरतुहार यौ पसिन करि खाइयो कऽ गेल सबटा तरूआ आ पान यौ। तैयो अछि बैसल दीदी 25 सालसँ कुमार यौ। कहलक सभ बरतुहार बिना दहेजक केना चलत काम यौ हम छी बेटा बाला अपन पैसा खर्चा करि नै करब बिआह यौ। ऐ युगमे लड़की सँ नै टाकासँ होइत अछि बिआह यौ। ◌ काँच बाँस जकाँ लचपच उमेरिया काँच बाँस जकाँ लचपच उमेरिया डगमगैत अछि डेग यौ केना भरब हम गगरी केना चलब डगर यौ। किया जन्‍मलौं ऐ धरतीपर की छल हमर कसर यौ माए-बाबू नीकसँ बाइजो नै पाबलौं बनलौं अपने हम माए यौ। ज्ञान, पोथीक दुनियाँसँ रहलौं जे अनचिनहार यौ की कहब केहेन अछि हमर जिनगी भेल संसार अन्‍हार यौ। ◌ मनक वेदना रहि-रहि एगो हुक उठैए सउँसे देह दगद भेल जाइए आब नै बँचत मान भऽ रहल छी हम निष्प्राण। जिनगी बनि गेल धुँआ हवा कऽ मलारोसँ काँपि उठैए सभ रूआँ। अछि सभ रस्ता अंजान झामर भेल मनक अभिलाषा। केतए ठाढ़ छी केतए जा रहल छी नै अछि हमरा किछो ज्ञान पर बुझैत छी हम अतेक कि जि‍नगीक अन्‍तिम यात्रा लऽ जाइत अछि समसान। ◌ सरहद ई सरहद, ई सीमा कथी-ले? जमीन बॉंटैले! पर जमीनक संगे मन बँटाइत अछि मनुखकेँ मनुखसँ अलग करैत अछि। हम एक जाति छी मानव जाति! फेर किए नै कियो ई बुझैत छी जाति-पाति-ले किए लड़ै छी? सरहद कऽ नाओंपर भाय-भाय कऽ बाँटै छी धिक्कार अछि हमरा अपन मानवतापर जे ऐ सरहदक सीमा मे बैंध गेल छी हमरासँ नीक तँ ई हवा, पानि आ चिड़ै-चुनमुनी अछि जे स्वतंत्र भऽ ऐ कातसँ ओइ कात तक अपन संगी बनबैत अछि। मुदा हम ऐ देवालक बिच घेराएल छी जखन लगैत अछि जे आब सीमा मिटा जाएत भाय-भायसँ गला मिलत तब ई देवाल और मजबूत भऽ अकासकेँ छुबए लगैत अछि। आखिर कहिया ई सरहद हटत? कहिया ई मनक देवाल गिरत? हमर अबैबला पीढ़ी अही देवालमे कैद रहत? ◌ ◌ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.प्रदीप पुष्प- वैलेंटाइन स्पेशल...गजल सहित २टा गजल २. आशीष अनचिन्हार- ३टा गजल १ प्रदीप पुष्प वैलेंटाइन स्पेशल... गजल १ पीआरक सीजन हिट भ' गेल पागो धोतीमे फिट भ' गेल बहलै सगरो लवमय बसात देसी कलचर एक्जिट भ' गेल छौंड़ा छौंड़ी बनलै भजार जे नइ सेहो परमिट भ' गेल नबका नबका गिफ्टक लगान टाका टोटल डेबिट भ' गेल पीयो फेंको भेलै पिरीत बिजनिस अजुका डिफनिट भ' गेल (२२२२२२१२१ सब पाँतिमे| २ के की कहलक की कहू के की ठकलक की कहू हमरो उजरे रंग छ'ल के की दगलक की कहू भेलै साधू आब सब के की चिखलक की कहू माया बड़का पैघ ई के की रचलक की कहू अखनो नै छी पास हम के की जँचलक की कहू  (२२२२२१२ सब पाँतिमे २ आशीष अनचिन्हार ३ टा गजल 1 मंच माला आ गर्जना भेटत घोषणा छुच्छे घोषणा भेटत मेहनति हेड़ा ने सकत कत्तौ साध्य बनि गेने साधना भेटत प्रेम छै देहक नेह छै मोनक वासना केने वासना भेटत रीत छै सभहँक एहने एहन मान केने अवमानना भेटत जज बनल अनचिन्हार लग खाली एहने सन संभावना भेटत सभ पाँतिमे 212+22+212+22 मात्राक्रम अछि 2 सरकार केकरो नै दरबार केकरो नै बकलेल जान दैए बुधियार केकरो नै जे बेचि देत एहन अधिकार केकरो नै जयकार छै छिनार जयकार केकरो नै हटले रहू बहुत दूर चिन्हार केकरो नै सभ पाँतिमे 2212+122 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ छूटक तौरपर लेल गेल अछि 3 नेह लगाबैए कियो कियो भाग बनाबैए कियो कियो आँखि बला भेटल बहुत मुदा नोर लुटाबैए कियो कियो आब तँ छै बेपार चोट केर दर्द नुकाबैए कियो कियो बात सुनाबैए सगर नगर बात बुझाबैए कियो कियो देह छुआबै आदमी बहुत मोन छुआबैए कियो कियो सभ पाँतिमे 21-1222-12-12 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश मोहन झा ' गुंजन' वसंत गीत (धुन:- सूफ़ियाना) ************ राखि वसंतक मान रे, घर पिया मोर औथिन। भोरे आंगन कुजरय बायस, मधुकर गाबथि गान रे, घर पिया मोर औथिन। महुआ रस मे उपवन गमकय, भेलै मधुमास जुआन रे,घर पिया मोर औथिन। बाम नयन रहि रहि क' फड़कै, लागल हुनके धियान रे, घर पिया मोर औथिन। स्वागत मे तों गाबह कोयली, गान वसंतक शान हे, घर पिया मोर औथिन। राखि वसंतक मान रे, घर पिया मोर औथिन ॥ ******** ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बृषेश चन्द्र लाल तप ?! कहाँदोन तप ! कथीलेँ ?! अनेरे जान भफाबएलेल ? बेसाहि आओर पीडा अपनाकेँ उलाबएलेल ?! ब्रह्म कोनो ‘राज्य’ छथि जे चाटुकारसँ फुलि जएताह ? सुनि स्तुति अपन मस्त भ’ ओ झुलि जएताह ? हास्य आ विनोदसँ प्रिय जकाँ की खुलि जएताह ? वा अहाँक जीद्दपर मिसरी बनि घुलि जएताह ?! ‘जीवन’ कोनो कैद नहि जे ‘मोक्ष’लेल मरैत फिरी ! ‘कर्म’केँ कात कए ल’ नाम धर्म सरैत फिरी !! तप जौँ संघर्ष अछि तँ आऊ अपन फाँड बान्हू, लक्ष्यकेर भोगलेल कर्मेटा अछि ‘धर्म’ मानू ! बाँहिं जखन कैसि जाएत स्वेद श्रमेँ झरि जाएत अमृतेँ गर तर हएत ‘रहस्य’क से तथ्य जानू !! २६ माघ,२०७३ फेब्रुअरी 9, 2017 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक मुन्नी कामत- तीनटा बाल कविता- जतरा/ अंकक मेल/ बहिन जतरा बाबू आबि रहल अछि जतरा लेब अहाँसँ लब कपड़ा घुरैले जाएब अहाँ संगे मेला देखब ओतए कठपुतलीक खेला कीनब हम एगो उड़न जहाज तैपर बैस घुमब सगरे संसार। ◌ अंकक मेल चलू खेलब आइ हम एगो खेल जइमे एक संगे करब केतेक अंकक मेल। 1-2-3-4-5-6-7-8-9-दस अइसँ आगू चलत एगो बस। छुक-छुक नहि ई तेज दौड़ैए एक-पर-एक एग्यारह भऽ जाइए। एक-पर-दू बैस 12 एक-पर-तीन बैस 13 एक-पर-चारि बैस 14 एक-पर-पाँच बैस 15 एक-पर-छअ बैस 16 एक-पर-सात बैस 17 एक-पर-आठ बैस 18 एक-पर-नअ बैस 19 दूपर बैस जिरो बीस भऽ गेल पहिले एक असगर छल आब उन्नीसटा भऽ गेल! अहिना एकता अपन जीवन मे अहूँ लाउ मिल कऽ अपन शक्ति बढ़ाउ। बहि‍न माए हमरा एगो बहिन आनि दे। चल बजार उ बजैबला गुड़िया कीनि‍ दे। जे हमरा भैया कहत सभ साल हमरा हाथ पर राखी बान्हत उ चुलबुलिया मुनिया आनि दे। किए तूँ हमरा असगर रखने छेँ हमरासँ बहिनक सिनेह छीनने छेँ तूँ हमर कान्हाकेँ राधा आनि दे माए हमरा एगो बहिन आनि दे। केकर भय तोरा सतबै छउ कोन बात छै जे तोहर आँखि भरै छउ तूहों तँ केकरो बहिन छी तँ फेर किए हमरा बहिन-ले कंश बनल छेँ हमरा तूँ एगो मौका दऽ दे माए हमरा बहिनक जिनगी बकैस दे ई सोन चिड़ैया चिड़ियाँ आनि दे माए हमरा एगो बहिन आनि दे। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २२० म अंक १५ फरबरी २०१७ (वर्ष १० मास ११० अंक २२०)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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