107 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २२१ म अंक ०१ मार्च २०१७ (वर्ष १० मास १११ अंक २२१) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१. जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा लघु कथा २.जगदीश प्रसाद मण्डल- सतभैंया पोखैर (तेसर संस्करण) सँ १३ टा लघु कथा २.२.राजदेव मण्डलक जल भँमर उपन्यासक ऐगला कड़ी २.३.रवीन्द्र नारायण मिश्र- क्रोध २.४.१.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- आलेख- दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक प्रयोजन २. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार - किछु जोगीरा आ ३ टा गजल ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.३.१.राजीव रंजन झा- २ टा गजल २.महेश डखरामी- महेश पद्यावली -अनुरोध ३.४.प्रदीप पुष्प- २ टा गजल ३.५. पल्लवी मण्डल-अपना ले अपनहि लड़ए पड़त Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केलक अछि जकर संयोजक श्री दिनेश यादव जी रहता। अइ विशेषांकमे नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य केर मूल्यांकन रहत। अइ विशेषांक लेल सभ विधाक आलोचना-समीक्षा-समालोचना आदि प्रस्तावित अछि। समय-सीमा किछु नै जहिया पूरा आलेख आबि जेतै तहिये, मुदा प्रयास रहत जे एही साल मइ-जून धरि ई विशेषांक आबि जाए। उम्मेद अछि विदेहक ई प्रयास दूनू पायापर एकटा पूल जरूर बनाएत। विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा कएल जा रहल अछि। दोसर भागमे अइ बेर नीलमाधव चौधरी जीक रचना आमंत्रित कएल जा रहल अछि आ नीलमाधवजीक रचना ओ रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल कैलाश कुमार मिश्रजीकेँ आमंत्रित कएल जा रहल छनि। दूनू गोटाकेँ औपचारिक सूचना जल्दिये पठाओल जाएत। रचनाकारक रचना ओ आलोचकक आलोचना जखने आबि जाएत ओकर अगिला अंकमे ई प्रकाशित कएल जाएत। अइ शृंखलाक पहिल भाग कामिनीजीक रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही,जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर),जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.१. जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा लघु कथा २.जगदीश प्रसाद मण्डल- सतभैंया पोखैर (तेसर संस्करण) सँ १३ टा लघु कथा २.२.राजदेव मण्डलक जल भँमर उपन्यासक ऐगला कड़ी २.३.रवीन्द्र नारायण मिश्र- क्रोध २.४.१.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- आलेख- दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक प्रयोजन २. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति १. जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा लघु कथा २. जगदीश प्रसाद मण्डल रचित ‘सतभैंया पोखैर’ लघु कथा संग्रहक तेसर संस्करणसँ १३ गोट कथा १ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा लघु कथा स्मृति शेष तीस दिसम्बर, शुक्र दिन। 2016 ईस्वी। साँझक सात बजे ब्रह्मानन्द बाबा बीतैत दिनक साँझ आ ऐगला दिनक पैछला साँझमे अपन अराम-विश्राम करैबला जगहपर असगरे शोकाकुल बैसल छला। दिनुका पहिल उखड़ाहामे जे दूटा रोटी जलखैक रूपमे खेने छला, बस आजुक दिन भरिक ओतबे अहार भेटल छेलैन। नित्य एगारह बजेमे नहेनिहार आइ तीन बजेमे नहेला, जखन बच्चाक पार्थिव शरीरकेँ असमसान पहुँचौल गेल। ओना, दिनक भानस परिवारमे भऽ चुकल छेलैन, मुदा तेहेन बेर ओ घटना भेल जे ओ भानस कएल भोजन बरतनेमे पड़ल छल। नहेला पछाइत खेबाक इच्छा ब्रह्मानन्द बाबाकेँ जरूर भेलैन मुदा भोजन रोकबा-ले तेतेक दूत-भूत मनक चारूकातसँ ऐ रूपे घेर लइ छेलैन जे मनक इच्छा मनेमे घुरिया-फिरिया जानि, मुदा मुहसँ निकालैक साहसे ने होइन। साहसो केना होइतैन, एक दिस परिवारमे सभसँ ऊपर–उमेरो आ खाढ़ियोमे– होइक नाते जँ वएह नइ सहि सकता तँ दोसर केना सहि सकत। मुदा सहबो तँ सहब छी, एक अन्न-पानिक सहब भेल, दोसर बात-विचारक संग सुख-दुखक। तहूमे परिवारक रूदन आ समाजक जिज्ञासु रूदनक धार बहिये रहल छेलैन। चौकीपर बैसल ब्रह्मानन्द बाबा अपन बीतल, बीतैत आ अबैबला काल्हिक संध्या-बन्धन कऽ रहल छला, मुदा बान्हे कुबान्ह भऽ जाइन। कुबान्ह ई जे बीतल नअ घन्टा शोके-शोक, दुखे-दुखमे बीतल छेलैन आ अबैबला बीतैत रातिक भोजनक आशा सेहो नहियेँ छेलैन। काल्हिक एहेन कठिन समए पार कऽ सकब की नहि,से मने-मन ब्रह्मानन्द बाबा विचारि रहल छला। माने ई जे राति भरिक साहित्यिक कार्यक्रममे जवाबदेहक रूपमे पार करब छेलैन। जवाबदेही एहेन जे कहीं कार्यक्रमे ने भँसिया जाए। एहेन भार निमाहैले तँ कन्हो मजगूत चाही जे भोजनेसँ शरीरकेँ भेटत, सएह हेरा गेल अछि। गणितीय दौड़मे दुनू दिस ब्रह्मानन्द बाबाकेँ बाधा बाधित काइये रहल छेलैन। तैपर मन कुदि-कुदि अपन स्मृति दिस दौड़-दौड़ जाइन। जेकरा ब्रह्मानन्द बाबा शरीरान्त बुझि टारि कऽ बहटारए चाहै छला, वएह छिड़िया-छिड़िया मनकेँ चारूभरसँ घेर लैत रहैन। परिवारमे ओहन घटना भेल जइमे एकटा अचेत बाल-बोधक अन्त भेल। चूक केतए भेल ई जँ परिवारक लोक नहि गुणि लेत तँ आगूक गुणाधीश गुणातीत केना भऽ सकैए। मुदा बाबाक मनमे ईहो नचैत रहैन जे अखन ऐ बातकेँ माने ऐ घटनाकेँ विचारबसँ नीक ई हएत जे तत्काल वातावरणकेँ पहिने असथिर कएल जाए। जँ विचार-विमर्शक क्रममे कोनो मारूक विचार सोझामे आबि जाए आ चामेक मुँह छी, कहीं ओ विचार मनमे छड़ैप कऽ मुँह होइत निकैल गेल, तखन तँ ओ आरो मारूख हएत! तँए नइ विचारबे बेसी नीक...। मुदा लगले फेर बाबाक मनमे उठि गेलैन जे अनेको जिज्ञासु जिज्ञासा करए जइ घटनाक लेल आबि रहल छैथ आ घटनाक मर्म स्थलकेँ देखिए ने पाबि रहल छैथ, तखन तँ ओ अधे-छिधे जिज्ञासा ने भेल। ..असमंजसमे पड़ल ब्रह्मानन्द बाबा निश्चये ने कऽ पाबि रहल छला जे की नीक हएत। आँखिक सोझक जे घटना अछि ओकरा जेते नीक जकाँ अखन विचारि सकै छी, ओते बसियाएलमे थोड़े हएत। तहूमे कौल्हुका काज आरो जटिल अछि। एहनो तँ भाइए सकैए जे जहिना आइ परिवारक घटना भेल तहिना काल्हि समाजोमे भऽ सकैए, तखन तँ परिवारक विचारकेँ अगुयाएबो नीक नहियेँ हएत, तँए अखने विचारब बेसी नीक...। तही बीच ब्रह्मानन्द बाबाकेँ समाजक सरोकारी बहिन, जिनकर घर बगलेमे छैन, पहुँचली। अगवास, बाड़ी-झाड़ी खेत-पथार सेहो दुनू गोरेक एक्केठाम छैन। दिन-राति पड़ोसीक रूपमे दुनू आइ सत्तैर बर्खसँ संगे जिनगी जीबैत आबि रहल छैथ। ओना बिन्दा चारि मास ब्रह्मानन्द बाबासँ जेठ छथिन, मुदा दुनूक बीच वएह ‘रे-टे’बला सम्बन्ध तहियेसँ माने बच्चेसँ संगे आबि रहल छैन, जे अखनो पोता-पोतीसँ भरल घर रहितो, ओहने छैन। अपना संग बिन्दा स्टीलक थारीमे दस-बारहटा रोटी आ बाटीमे तरकारी नेने, ई सोचि पहुँचली जे दिनुका भानस ब्रह्मानन्दक परिवारमे कएले रहि गेल,शोकाकुल परिवार रहने अखनो माने रातियोमे भानस नहियेँ हेतैन आ काल्हियो कखन हेतैन तेकरो ठेकान नहियेँ अछि। सियान-चेतन सहियो सकैए मुदा परिवारमे जे दूटा बुढ़ आ तीनटा छोट-छोट बच्चा अछि ओ केना सहि सकत...। ओना ब्रह्मानन्द बाबा अपन कोठरीक केबाड़ अड़का कऽ असगरे बैसल विचारि रहल छला। तहीकाल बिन्दा केबाड़ खोलि कोठरीमे पहुँचली। अबिते बिन्दा परोसल थाड़ी आगू बढ़बैत बजली- “जे दिनक दोख छल से भेल, चिन्ता छोड़ह, खा लएह।” बिन्दाक मुहसँ खसिते ब्रह्मानन्द बाबा फफैक-फफैक कऽ कानए लगला- “हमर बेल केतए गेल, हमर बेल की भेल..!” ओना बिन्दो अनुमान केली जे ‘बेल’ पोताकेँ कहै छैथ। बजली- “किछ ने भेल, जहिना आएल तहिना गेल। ई दुनियॉंक रीति छिऐ, सभकेँ होइत आएल अछि, आगुओ होइत चलैत रहत।” एक बर्ख नअ मासक रोशनक प्राणान्त पानिमे कठुआ कऽ भेल। रातियेसँ चलि अबैत शीतलहरी अपन विकराल रूप पकैड़ नेने छल। भिनसुरका पहर। श्रमशील परिवार रहने परिवारक सभ अपन-अपन काजमे लगि चुकल छला। कियो अँगना-घरक काजमे तँ कियो माल-जालक पाछू। ओ बच्चा–बेल–जाड़क सभ वस्त्र पहीरने–माने जूत्ता-मौजा आ सुती कपड़ासँ लऽ कऽ ऊनी स्वीटर, कोट, टोपी सभ किछु पहीरने–हाथमे एकटा गिलास नेने चापाकलक आगू जे पानिक खाधि छै, तइमे गिलासमे पानि लिअ गेल। ओना जाड़ रहौ कि गरमी, थाल-पानिसँ ओइ बच्चाकेँ विशेष सिनेह छेलैहे। चंगला बच्चा तँए नजैरसँ ओझल होइते छल। गिलास नेने जे ऑंगनसँ निकलल, से दोसरो-तेसरो देखलक। मुदा सभ दिन कोनो-ने-कोनो वस्तु नेने निकैलते छल, तँए कियो किए ओहूपर विशेष नजैर दइत। पानि लिअ खाधिमे जखन गेल, भरिसक तहीकाल ओ पिछैड़ कऽ खाधिमे चलि गेल। ओना, खाधियोकेँ बहुत गहींर नहियेँ कहल जा सकैए, मुदा एक-डेढ़ हाथक बच्चाक लेल तँ गहींरगर छेलैहे। तहूमे जहिना बर्फ जकाँ समए तहिना पानि सेहो छेलैहे। परिवारजन रहितो कियो ओइ बच्चा दिस नइ तकलक। सदिकाल खुर-खुर करिते रहैत छल। तकैक कोनो शंको ने रहइ। दिन-दिनक वृत्ति छेलइ। किछुए कालमे बच्चा जाड़सँ तेना आक्रान्त भऽ गेल जे प्राणान्त भऽ गेलइ!जखन बच्चापर नजैर गेल आ ताक-हेर शुरू भेल तखनो ब्रह्मानन्द बाबाक मन गबाही दइते रहैन जे भरिसक कियो चोरा कऽ औनाबै दुआरे रखि नेने अछि। बच्चाक माइये खाधिसँ मुइल बच्चाकेँ निकालि आँगन आबि रखैत बजली- “हमर रोशन..!” ओना नीको समैमे आ अधलो समैमे तँ निसचिते मतो-पिता, भाइयो-बहिन आ ददो-दादीक नजैर ओइ बच्चापर रहिते छल मुदा पाँच दिन पहिने ब्रह्मानन्द बाबाक परिवारमे एहेन दुखद घटना भेल छेलैन जे खसैत-खसैत परिवार बँचलैन। मुदा घटनाक एहेन विकराल रूप छल जे मने नहि, केतेको गोरेक शरीरोकेँ नीक जकाँ आक्रान्त अखनो केनहि छल। होइतो अहिना छै जे परिवारे आकि समाजेमे जँ कोनो मारूख घटना घटैए तँ परिवारो आ परिवारजनकेँ सेहो झकझोरि दइते अछि। जइसँ परिवारक अनेको जरूरियात काज सभपर सँ नजैर हटिये जाइ छइ। तँए कहलो जाइ छै जे ‘विपत्ति असगरे नइ अबैए, एकक संग अनेको अबिते अछि।’ रोशन आ कृष्णा दुनू सहोदर भाए, ब्रह्मानन्द बाबाक तेसर बेटाक दुनू सन्तान। कृष्णा जेठ, जे साढ़े तीन बर्खक अछि आ रोशन छोट जे एक बर्ख नअ मासक छल। रोशनक मुँहमे ऊपर छह गोट दाँत आ निच्चाँ चारिटा दाँत सेहो जनैम गेल छल। दौड़ैत चलिते छल। बोली तँ साफ नइ भेल छेलै मुदा किछु शब्द साफ जरूर भाइए गेल छेलइ। कखनो ‘बा’ ब्रह्मानन्द बाबाकेँ कहै छेलैन, तँ कखनो सिखौलापर ‘बबा’ सेहो कहै छेलैन। ब्रह्मानन्द बाबा कृष्णाकेँ सिनेहसँ ‘बेल’ नाओं रखने छैथ। मास दिनसँ रोशन सेहो अपनाकेँ बाबाक बेल बुझए लगल छल, तँए बाबाक मुहसँ ‘बेल’ निकैलते रोशन बाजि उठैत छल- “ऐँ।” ‘ऐँ’ कहि दौड़ कऽ लगमे आबि हाथमे जे कोनो औजार वा खाइ-पीबैबला वौस देखै छल ओ छीन लइ छेलैन। खाली वौसेटा नइ छीनै छेलैन, संग लगि बाड़ी-झाड़ीक काज दिस सेहो विदा भऽ जाइ छेलैन। बच्चा पेब ब्रह्मानन्द बाबाक मनमे अपन जिनगीक सार्थकता सेहो नचिते रहै छेलैन। जिनगीक सार्थकता ई जे एक समए माने एक क्षण-पल जँ एकसँ ऊपर अनेक क्रियाक संग चलए। से ब्रह्मानन्द बाबाकेँ ‘बेल’ पेब होइ छेलैन। कहलो जाइ छै जे उमरदारक माने बुढ़-बुढ़ानुसक प्रथम काज भेल बाल-बोधक संग रहि किछु सिखाएब। से भेटिये जाइ छेलैन। ओना ब्रह्मानन्द बाबा खेत-पथारमे काज करैबला अपन हथियाएल औजार–हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, कुड़हैर, हथौरी, बैसला, आड़ी इत्यादि जीवनोपयोगी औजार अपना-ले तँ रखनहि छैथ, मुदा तँए बेल-ले नइ रखने छैथ सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। भोथियाएलो आ आकारोमे छोट अनेको औजार बेल-ले सेहो रखने छैथ। बेल चलि गेल मुदा ओ औजार जे बेलक छल, ओ तँ छैन्हे। ओना किछु एहनो तँ ऐछे जे बेल अपन औजार बाबाक हाथमे धड़बैत हुनकर हाथक छीन लइ छेलैन। मुदा ओहन बाल-बोधसँ जँ काज बाधित होइक सम्भावना हएत, तखनो तँ दूटा उपाय अछिए, एकटा जे ओइ हाथियारसँ भरिगर काज धड़ा थका दिऐ वा मने फुसला कऽ बहका दिऐ। ..ब्रह्मानन्द बाबा सएह करै छला। जखने पोता हाथक औजार छीनै छेलैन कि आड़िपर बैस गमछामे बान्हल पानक पोटरी खोलि डकै छला- “के पान खाएत?” जहिना घर-परिवारसँ हटलो गीत-नाद वा अन्य कोनो अवाज बाल-बोध जँ सुनैए तँ अपनो ओही अवाजक अनुकरण करए लगैए, तहिना बेलबो ‘पान’ सुनिते बाजि उठै छल- “हम।” बेलबाकेँ राजी होइते बाबा बजै छला- “जे सभ पान खाएत ओ सभ एतए औत।” ‘एतए औत’ सुनिते बेलबा हाथक छीनल हथियार ओतै रखि दौड़ल आबि पानक वौसकेँ उनटबए-पुनटबए लगैत छल। जेना-जेना देखैत तेना-तेना करबो करैत तँए बाबा पहिने पानक पात फाड़ि एक-टुकड़ी दऽ दइ छेलखिन। जखन जरदा बेर अबै छल तखन मुन्ना लगले जर्दाक शीशी मुँहमे झाँड़ि कहै छेलखिन- “आब चलै चलू।” ‘चलै चलू’ सुनिते बेलबा अपन औजार–खुरपी–पकैड़ आड़िपर खाधि खुनए लगै छल...। ब्रह्मानन्द बाबा चौकी पर बैसल तेते जोड़सँ फफकला जे आँगन तक कानवक अवाज पहुँच गेल। ओसार पर बैसल महिला समुदाय, जे भरि दिनक कानवक विराम नेनहि छेली आ बेलबेक चर्च करै छेली। बाल-बोध बेलबा, अचेत बेलबा, ओ केना जिनगीक मर्मकेँ बुझैत ओ केना बुझैत जे आगि-पानि जीवन दइतो अछि आ लइतो अछि। ओ केना बुझैत जे जहिना बाल-बोध-ले शीतलहरीक शीताएल पानि जनमारा अछि तहिना तँ आगियो अछि किने...। बाबाक कानवक अवाज सुनि महिला समूहसँ एक बजली- “भरि दिन बुड़हा कनिते रहि गेला!” दोसर बजली- “कहुन जे पोते लागल अपनो चलि जेता! अहिना सभ दिनसँ होइत एलैए। मेला-ठेलामे जहिना बाल-बोध खेलौना कीनैए आ खेलाइत-खेलाइत रस्तेमे फोड़ि लइए, सएह बुझथुन।” मुदा बीचमे बैसल, जे क्षने किछ पहिने मुँह बन्न केने छेली, ओ फफैक उठली- “आब, बाबाक कागत-पेन के छिनतै..!” बेल सिर्फ ब्रह्मानन्दे बाबाक नइ छेलैन। परिवारक सबहक छल। माइक ‘रोशन’, बापक ‘लल्ला’, दादीक ‘बौआ’, बड़की माइक ‘वौका’ इत्यादि सबहक अपन-अपन छल। सभ छल नहि, अखनो अछि। मालक घरमे दादीक बौआ ऐं-ऐं करैत गोबर-गोंत बुढ़िया माँकेँ देखैबते अछि, बिसरत ओइ दिन जइ दिन दुनियाँकेँ बिसैर अपने विदा हेती...। स्मृतो तँ स्मृति छी, ओ तँ कियो अपने जीता जिनगी धरिक ने गारंटी दऽ सकैए। हँ एहनो स्मृति तँ होइते अछि जे महाभारतक अभिमन्यु जकाँ बाल-बोधेक रूपमे ठाढ़ अछि। हमरो बेलक मृत्यु ओइ परिस्थितिमे भेल जइ परिस्थितिमे परिवार-समाजक बीच बेवस्थाक लड़ाइ फँसल छल। पोने दू बर्खक बेलबा किए माइक दुख बुझैत जे परिवारमे नारीक जिनगी अखन केते भुमकम जकाँ डोलि रहल अछि। मुदा बेलबो तँ बेलबा छी ओ तँ माएकेँ कहबे करत किने जे माए हम अचेत छेलौं जीवन-मरण नइ बुझलौं, तूँ सचेत हो जे भविस एहेन नइ हौउ। विस्मित ब्रह्मानन्द बाबाकेँ देख बिन्दा बजली- “खेलौना बनि आएल छल आ खेलौने जकाँ चलि गेल, तइले एते दुख-पीड़ा केलासँ की हेतह?” चारि मास जेठ बहिनक बात सुनि ब्रह्मानन्द बाबा बजला- “हमर बेलबा खेलौना नइ छल, ओ तँ दुनियाँक खेलक खेलाड़ी छल।” तैबीच ब्रह्मानन्द बाबाक पत्नी कृष्णाकेँ हाथ पकड़ने पहुँचली। कृष्णाक मनमे अपन प्रश्न छल आ किशोरीक मनमे अपन विचार छेलैन। तैबीच बिन्दा तरकारी-रोटी सजल थारी किशोरी दिस बढ़ौली। किशोरी हाथसँ पकैड़ लेलैन। पकड़िते ब्रह्मानन्द बाबा बजला- “पहिने बाल-बोधकेँ दियौ।” निच्चामे थारी रखि किशोरी एकटा रोटी आ तरकारी बेलबा दिस बढ़ौली। ओना देखा-देखी बेलबो घटनाक पछाइत अन्न नइ खेने छल, माने भात-रोटी नै खेने छल। मुदा बिस्कुट आ दोकानक चटपटौआ विन्यास खा मनकेँ थीर तँ रखनहि छल। हाथमे रोटी लइसँ पहिने बेलबा बाजल- “बाबा, अपन रोशन बौआ झंझारपुर डाक्टर ऐठाम गेल अछि किने?” कृष्णाक बात सुनि ब्रह्मानन्द बाबाक छाती दहैल गेलैन। कोनो अबोध बच्चाक प्रश्नकेँ काटता? ओहो तँ बच्चाक ओ दृश्य–पिताक हाथमे झाँपल बच्चा मोटर साइकिलसँ डाक्टर ऐठाम लऽ गेल छल–देखने रहए, तेकर पछाइत धिया-पुताक संग खेलेमे लगि गेल छल...। ब्रह्मानन्द बाबाकेँ मनमे उठलैन- अपना संग बच्चोकेँ दुख-सन्ताप देब नीक नहि, बजला- “हँ, रोशन बौआ झंझारपुर डाक्टर ऐठाम गेल अछि। खाधिमे बौआ डुमि गेल छेलै किने..!” अपन प्रश्नक उत्तर पेब बड़का बेलबा माने कृष्णा हाथमे रोटी लऽ खाए लगल। कृष्णाकेँ खाइत देख किशोरी बिन्दा बहिनकेँ लपटैत बजली- “घरक गारजन भऽ अहीं कनबै तखन और लोक चुप रहत। अहाँ मन थीर करू।” थीर होइते ब्रह्मानन्द बाबाक मनमे उठलैन- सुग्गा उड़ि गेल। आब केकरा पाकल लताम आ बैरक झाड़ परहक पाकल तिलकोर देब..! ◌ शब्द संख्या : 1944, तिथि : 6 जनवरी 2017 वर्थ डे चैत मरनासन होइते बैशाखक आगमन भऽ गेल। ओना, जहिना मासक जन्म भेने मास मरितो अछि आ जनैमतो अछि, तहिना ने मौसमोक मासुपन होइए। भिनसुरका समए। प्रखर मौसम रहने सूर्यक किरिणोमे प्रखरता आबिए गेल अछि। चौक-चौराहाक दोकान-दौरी जे जाड़क मासमे सिरसिराइत अबेर कऽ खुजै छल ओ जेना-जेना गरमी धबैत गेल तेना-तेना सबेर खुजए लगल, तँए आब चारि बजे सबेरगरेसँ चौकक दोकान खुजए लगैए। ओना, दोकानो-दौरीक अपन-अपन हिसाब अछि। किछु एहेन अछि जेकर गहिंकी चारि बजे भोरेसँ पहुँचए लगै छै आ किछु एहनो अछि जे आठ बजेक पछाइत खुजैए आ किछु एहनो तँ ऐछे जे दस बजेक पछाइत खुजैए। आने जकाँ जीवन काका सेहो चारि बजे भोरे चौकपर झूठ-साँच समाचारो सुनैले आ खेती-पथारीक गपो-सप्प करैले पहुँचबे करै छैथ। मौसमो अनुकूले रहै छैन। मौसम अनुकूल ई जे जहिना बारह मासक सालमे तीनटा मौसम रहने छहटा रीतु अछि, तहिना ने दिन-रातिक बीच सेहो दूटा मौसम अछि। तैसंग दूटा समरस सेहो अछिए। एकटा भेल राति-दिनक सीमानपर ‘भोरक’ आ दोसर भेल दिन-रातिक सीमानपर ‘साँझक’। ओना, दुनू मौसमक अपन-अपन गुण सेहो छइहे। जहिना पूर्बा हवा देहक ऊपरमे ठंढा लगैए आ देहक भीतर खौंतियबैए तहिना ने पछबा हवा ऊपरसँ खौंतियबैए आ भीतरसँ ठंढ बनबैए। खाएर ई तँ भेल हवाक बात, साँझ-भोरक अपन हिसाब अछि। जे दुनू दू गतिये चलैए। माने ई जे जखन हवा चलैत रहत, तखन एक रंगक भेल आ जखन हवा ठाढ़ रहत तखन दोसर रंगक भेल। मुदा से नहि, एक तँ शुरूक समए, जे अंगरेजीक बीतैत मार्च आ चढ़ैत अप्रीलक भेल, आ वसन्त रीतुक अधबेसू वसन्त भेल। चौक-चौराहाक हवा-पानि पीब जीवन काका घरपर एला। ओना माल-जालकेँ सेबेरे घरसँ निकालि बाहरक नादिमे बान्हि खाइ-पीबैले सानी-कुट्टी लगाइए गेल रहैथ, जे खा कऽ मालो-जाल अरामसँ बैस गेल छल। घरपर अबिते जीवन काका पहिने माल-जाल देखलैन। तीनू मालकेँ बैसल पौज करैत देख चोट्टे घुमि कऽ दरबज्जापर होइत आँगन गेला तँ देखलैन जे दछिनवरिया ओसारपर मन मारि पुतोहु बैसल छेली आ पछबरिया ओसारपर पत्नी दुनू पोती आ दूटा आन अँगनाक स्त्रीगणक संग चुपचाप बैसल छैथ आ मने-मन किछु विचारि रहल छैथ। दुनू ओसारपर नजैर खिरा जीवन काका तारतममे पड़ि गेला जे किए सभ एना ठकुआएल बैसल छैथ! अखन तँ भोरक समए छी, दिनक शुरूआतक समए, जे केतेको काज करैक समए छी, तखन किए सभ मन मारि बैसल छैथ? जँ भोरेमे लोकक काज हेरा जाए, माने नइ रहै तखन भरि दिन पानि डेंगोनाइ छोड़ि ओ करत की..? आँगन-दरबज्जाक बीच मुँहथैरपर ठाढ़ भेल जीवन काका दछिनवरिया ओसारपर बैसल पुतोहुपर नजैर देलैन तँ देखलैन जे पुतोहुक आँखिसँ नोरक बून छिटैक रहल छैन। नोरक बून देख मने-मन सोचए लगला जे किछु कारण जरूर अछि। मुदा जाबे ओ किछु बजती नहि, ताबे बुझबो केना करब..? पत्नी दिस नजैर दैत जीवन काका बजला- “किए सभ हड़ताल केने छी?” पत्नी तँ ‘हँ-हूँ’ किछु ने बजलैन। मुदा मिरमिराइत पुतोहुक मुहसँ निकलल- “रोशनक आइ वर्थ डे...।” ‘रोशनक वर्थ डे’ सुनि जीवन कक्काक मनमे जोरक धक्का लगलैन। धक्काक कारण भेलैन जे तीन मास पूर्वे रोशन दुनियाँ छोड़ि चुकल छल। माने कल लगक खाधिमे जइमे कलक पानि जमा होइत अछि, ओही खाधिमे खसि रोशन जाड़े कठुआ कऽ प्राणान्त कऽ चुकल छल। शरीरक तँ अन्त भऽ गेलै मुदा जिनगीक अन्त केना मानल जाए। किछुओ दिन तँ घरवास केनहि अछि। ओना, जहिना आन परिवारमे एक-एक बेकतीकेँ अनेको नाओंसँ पुकारल जाइ छै तहिना जीवनो कक्काक परिवारमे छैन्हे। जीवन काकाकेँ सेहो किछु गोरे‘जीवन काका’, तँ किछु गारे ‘मन्नु बाबा’ सेहो कहिते छैन तहिना रोशनोकेँ कियो ‘रोशन’ तँ कियो ‘बेल’ तँ कियो ‘बेलबा’ तँ कियो ‘छोटका बौआ’ सेहो कहिते अछि। पहिल बर्ख पुरलापर रोशनक वर्थ डे धुमधामसँ परिवारमे मनौल गेल छल, आइ दोसर साल छी। ऐ बिच्चेमे रोशन पौने दू बर्खक आयु पुरबैत दुनियाँ छोड़ि देलक। जहिना गाम समाजक बुढ़-पुरान जीवितकेँ मर्तलोक[1] आ मृत्युकेँ मृत्युलोक[2] बुझबो करै छैथ आ बजबो करै छैथ तहिना जीवन काका सेहो पुतोहु दिस तकैत बजला- “रोशन स्वर्गक सुख करैए, अपना सभ नर्कमे छी, तखन अनेरे जे घर-परिवारक काज छोड़ि सभ चिन्तित भेल बैसल छी से अनेरे ने। दिनक जे भावी छल ओ भेल। तइले अनेरे सोग-पीड़ा केने की हएत। जे धारलिऐ से केलिऐ। जानि कऽ वा अनजानमे चूक भेल हएत, से ओ माफ करत।” ओना बजैक क्रममे जीवन काका बाजि तँ गेला मुदा अपनो मन भीतरे-भीतर कानए-कलपए लगलैन। कानए-कलपए ई लगलैन जे रोशन तँ चेतनशील अछि नहि, तखन ओकर बुधि केना क्रियाशील हेतइ आ विचारत केना जे परिवारमे अहिना कनी कम-बेसी होइते छइ। तहूमे रंग-बिरंगक लोक सेहो रहिते अछि, तँए टुटी-फुटी कनी हेबे करैए। रंग-बिरंगक माने भेल जे एक वंशक वा एक कुल-खनदानक रहने लोकक शरीरक रंग-रूप, लम्बाइ-चौराइ किए ने एक रंग हौउ, मुदा बुधि-विचार केना एक हएत। ओ तँ भीतर-बाहर दुनूक बीचक शक्ति छी, ओ तँ उमेरोक हिसाबे आ गतिशीलतोक हिसाबे कम-बेसी हेबे करत। जीवन कक्काक मन ठमैक गेलैन। ठमैक ई गेलैन जे रोशन तँ ने आब ऐ धरतीपर आबि माइक दूध पीबत आ ने हमरे संगे हँसुआ-खुरपी नेने बाड़ी-झाड़ीमे खसैत-पड़ैत, कनैत-खिजैत जाएत, ओ तँ आब नइ रहल, ई तँ सभकेँ बुझए पड़तैन किने..? तैसंग ईहो ने बुझती जे रोशन देहसँ हटि गेल, मुदा देही वा शरीरीसँ थोड़े हटल। ओ आत्मा-स्वरूप चेतन शक्ति छी, पौने दू बर्खक रोशनक ओ शक्ति तँ अपन आत्म-स्वरूपमे मिलि गेल अछि। जइसँ पौने दू बर्ख, एक्कैस मास भऽ गेल। एक्कैस मास चौरासी सप्ताह भऽ गेल आ चौरासी सप्ताह, सात गुणे बेसी दिन भऽ गेल,इत्यादि-इत्यादि भाइए गेल अछि किने, तँए स्मृति सनेस नइ देत सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। अनायास जीवन कक्काक निराएल आँखिक बून एक-दोसरमे सटि-सटि टघार बनि गालपर होइत टघरैत रहबे करैन, तही बीच पुतोहुओ आ पत्नियोँक आँखि चढ़लैन, आँखि चढ़िते विचारक संतरण हुअ लगलैन। तैबीच साउस–सुदामा–संतरण होइते सामंजस करैत पुतोहुकेँ कहलखिन- “रोशन की तोरेटा छेलह जे हेरेलह आ तोरेटा दुख होइ छह, हमर पोता नइ हेराएल, बुड़हाक ‘बेल’ नइ हरेलैन! सबहक हेराएल! तँए आब सभ कियो अपन-अपन खेलौन[3] नेने अपन-अपन जिनगीमे नइ लगबह तँ काल्हि-दिन केना चलतह।” पत्नीक विचार सुनि जीवन कक्काक मन पघिल-पघिल कऽ गील हुअ लगलैन। बेलबाक रंग-रंगल रंग सबहक मनमे नाचए लगलैन। अँगनाक रूप बदलल। मन-चित्त दाबि सभ अपन-अपन दिनचर्या दिस बढ़ली। आँगनसँ दरबज्जापर अबैत-अबैत जीवन कक्काक मन घुमए लगलैन। अपन घुमैत मन देख जीवन काका सोचलैन जे या तँ ओछाइनपर पड़ि रही या नइ तँ बैसिये जाइ। किएक तँ जखन अपने मन बेसमहार भऽ जाएत तखन तँ आरो बेसी नोकसान हएत। दरबज्जाक ओसारक दछिनवरिया चौकीपर बैसते जीवन कक्काक मन पुतोहुक मुहसँ निकलल शब्द- ‘वर्थ डे’ पर गेलैन। कहाँसँ कहितैथ जे ‘जन्म साल’ छी,जन्म दिन तँ संभव नहि अछि। तारीख वा तिथिकेँ दिनक मिलान नइ होइए। वा ‘साल गीरह’ छी, यएह गीरह ने गोठिया कऽ गाँठ बनैए, जेकरा ‘वर्षगाँठ’ सेहो कहै छिऐ...। मुदा लगले जीवन कक्काक मन पाछू घुमलैन। घुमिते देखलैन जे परिवार-परिवारक लोक टी.वी.क संग आब मोबाइलोमे वर्थ डे मनबैत, थोपड़ी बजा-बजा वर्थ डे गबैत देखैए-सुनैए। कोन माइक इच्छा नइ हेतैन जे हमरा कोखिया गुहारि हुअए। जहाँ धरि ‘वर्थ डे’क प्रश्न अछि, ई शब्द छी, बेसी-सँ-बेसी पाँति भऽ सकैए, मुदा भाषा तँ भाषा छी, गंगा सदृश अछि, जइमे नीक-अधला सबहक समावेश होइते अछि। तँए पुतोहुक बात जीवन काकाकेँ अरूचिगर नहि रूचिगर लगलैन। ओना तीनू गोरे–माने जीवन काका, जीवन कक्काक पत्नी सुदामा आ पुतोहु श्यामा–तीन दिस नजैर बढ़ौलन, मुदा रोशनक ‘वर्थ डे’ किनको मनसँ सोल्हन्नी नइ हटलैन। हटबो केना करितैन। जहिना जीवन कक्काक मनमे तहिना सबहक रोशन बसले छल। भानसा-घरमे पएर दइते श्यामा चुल्हिकेँ गोड़ लगैत बजली- “हे चुल्हि, अहीं छी आ हमहीं छी जे लालक पहिल ‘वर्थ डे’क दिन केना जीबैत लहलह करैत रहलौं। पहिल सालक ‘वर्थ डे’मे ईबेर केत्ता कप चाह अतिथि-अभ्यागतक सेवामे लगा चुकल रही, मुदा आइ..!” अबैत-अबैत विचारक क्षेत्रमे आबि श्यामा ठमैक गेली। ठमैकते ठकमुरा गेली। ठकमुराइते जेना जिनगीमे लगल जंग छुटि-छुटि जगलैन। जगिते मनमे उपकलैन- यएह छी जिनगी आ जिनगीक लीला। सभ जनै छी जे जे देह रूपमे जन्म लेलक ओ अन्त करबे करत। मुदा देह तँ देहेटा नइ छी, जँ सोल्होअना ओकरा माटियेक मानि लेब सेहो तँ उचित नहियेँ हएत। चलबो-फिरब आ सोचबो-विचारब दिस ने देखए पड़त। एकाएक श्यामाक नजैर दौड़ैत रोशनकेँ दुनू हाथे पकैड़, कोरामे उठा, बीच आँगनमे ठाढ़, अपन छातीसँ लगौनेपर पड़लैन। जखन रोशन अपन पहिल साल गिरह पैरमे मौजा-जूतासँ लऽ कऽ देहमे शर्ट-पेन्ट, माथपर टोपी लगा मनौने रहए, ओइ संग परिवारो आ कुटुमो-समाज तँ भरि दिन रोशनेक विरुदावली गबैत रहला,मुदा अपन दोसर साल गिरह रोशन कहाँ देख पौलक! कहाँ हमहीं आकि ई चुल्हिये लहलहा रहल अछि..! मन-चित्त समेट श्यामा जीवनक दुख-धन्धामे लगि गेली। मनमे उठलैन- पौने दू बर्खक बेटा दुनियाँ छोड़लक, की ओकरा मनमे हमहूँ-सभ बसल हेबइ? नइ!हमरा सभ जकाँ ओ कहाँ रहल? ने ओ किछु बुझि पबैत हएत आ ने चिन्ह पबैत हएत। ने ओकरा बुझैक आ ने चिन्हैक किछु शेष हेतइ। ओकर सोचै-विचारैक जगहे मेटा गेल, ओ बिसैर गेल हमरा सभकेँ..! श्यामाक मन थरथराए लगलैन। पानि जकाँ थरथराइत मनकेँ थीर केली। मन थीर होइते मुहसँ बकार फुटलैन- “कोखिक सन्तान छल। अपना उकिते जे जनलिऐ से तँ करबे केलिऐ। आब बेसी-सँ-बेसी एतबे ने हएत जे अपन दिलक डायरीमे, सन्तानक संख्यामे लिखि कऽ राखब। जँ से नइ राखब तँ प्रसव पीड़ाक वेदना, मातृत्वक जे विशिष्ठता छी ओ हेरा जाएत। जइसँ नारीत्वक शक्तिमे कमी औत।” मालक घरक थैरमे सुदामा काकी गोबर उठबैले बैसबे केली कि आँगनसँ पछुअबैत रोशनक स्मृति रूप आगूमे आबि गोबरकेँ देखबैत कहलकैन- “ई-इ-इ..!” सुदामा दादी बुझि गेली जे नान्हिटा बच्चा गोबर उठबए कहि रहल अछि। सुदामा काकीक मनमे ठहैक एलैन जे की गोबरकेँ घृणाक नजरिये देखा रहल अछि आकि क्रिया स्वरूप? मुदा सुदामा काकीक सभ दिनक जे काजक अभियास छैन, ओइ अनुकूल बिना मनसँ जपनौं हाथ क्रियाशील भऽ गेलैन। जखने हाथ काजकेँ पकैड़ कजियबैत जिनगीकेँ कबजियबए लगैत अछि तखने जिनगी कबजियाइत कीर्ति दिस बढ़बे करैए, सुदामो काकीक हाथ बढ़लैन। आगू बढ़िते मनमे उपकलैन- ई तँ दुनियाँक लीला छी, जेते दिनक खातिर आ जेते भूमिका करैक भार लऽ कऽ रोशन आएल ओ करैत गेल। मनमे उठिते सुदामाक प्रशान्त मन उदिग्न मनकेँ शान्त करैत रोकैत कहलकैन- “करोड़ो तरेगनसँ सजल अकासमे साइयो जन्मो लैत आ टुटि-टुटि खसबो करैत, तँए कि अकासक शोभा-सुन्दरमे कमी होइए आकि विलीन होइए, नहि! ओ तँ रहबे करैए। अपनो परिवार ऐछे, तरेगने जकाँ ने बढ़बो करैए आ घटबो करैए। मुदा जैठाम बढ़ती-घटतीक समरूप रहत तैठाम घटवारि-बढ़वारि हेबे किए करत।” प्रशान्त चित्त होइते सुदामा काकीक मन सहमलैन। सहमलैन ई जे चेतने-अचेतनेक बीच ने दुनियाँ चलि रहल अछि। जखन अही दुनियाँमे अपनो छी तखन ओहीक देखा-देखी ने अपनो चलए पड़त। अपन जिनगीक तँ यएह ने लेखा-जोखा हएत जे जइ दिन धरतीपर पएर देलौं तइ दिनक परिवार की छल, समाज की छल आ आइ की अछि। अही बीच ने कम-बेसी अछि, जइमे लोक अपन हारि-जीत बुझैए। अनेरे मनकेँ वौअबै छी…। मुदा तैबीच पहिल गोबरक चोत सुदामा उठा नेने छेली आ दोसर चोत दिस हिया कऽ देख रहल छेली, तखने बुझि पड़लैन जे ऐसँ नमहर अछि। उठि कऽ ठाढ़ होइते मनमे उठलैन- रोशनो तँ अपने अमलदारीमे आएल। माने ई जे अपने जीता-जिनगीमे एबो कएल आ गेबो कएल। केना कोनो दादी अपन पोताकेँ बिसैर जाएत?रोशनक दादी हमहीं ने छिऐ, पोता हमरे ने छी, की मनमे जे डायरी विधाता देलैन ओइमे एतबो जगह खाली नै अछि जे अपना रोशनकेँ अपनो मनमे लिखि राखब?पौने दू बर्खक रोशन पौने दू बर्ख जहिना सबहक संग संगी बनि संगबे जकाँ रहल तहिना ने संगबे जकाँ चलबो करत। मालक घर आबि रोशन जहिना गोबर देखबै छल, नाइद-खुट्टा देखबै छल, घूर लग बैस आगियो तपै छल, संगे-संग खेबो करै छल तहिना ने मन-मन्दिरमे बास करैत ताधैर बसैत रहत जाधैर बसै छी। गोबर समेट कऽ उठा मालक घरसँ सुदामा काकी निकलली तँ चापाकलक चबुतरापर ठाढ़ श्यामापर नजैर पड़लैन। नजैर पड़िते आँखि उठा-उठा पुतोहु दिस देखए लगली तँ मन कहलकैन जे रोशन तँ हमर पोता भेल, असल तँ कोखिक रत्न जिनकर छेलैन हुनका मनमे की वरैस रहल छैन। लाल सागरसँ उठल वायु लाल बरखा करैत आकि काला सागरक कारी? मुदा तैकाल श्यामाक नजैर रोशनक ओ रूप देख रहल छेलैन जे दादीक आगू-आगू खेतक खाधिमे लग पहुँच देखबै छेलैन। ओना आगू-आगू रोशनकेँ बढ़ने[4] सुदामा दादीक भार[5] बढ़िते छेलैन मुदा तैयो रोशनकेँ ऐ दुआरे अगुएने चलै छेली जे बाल-बोध अछि, अखन हाथ-पएर असथिर नइ भेल छै, जँ अपने अपन भार कमबै दुआरे पोताकेँ पछुअबैत चलब, सेहो तँ नीक नहियेँ हएत। एक तँ जखने ओकरा पाछू करबै तखने ओ कानत, किएक तँ आगू केतए जाएब से ओकरा बुझले नइ छै, जँ देखलो-बुझल हेतै तँ चंग मन उचैंग गेल हेतइ। तैसंग ईहो तँ ऐछे जे अपनो आँखि (नजैर) अपने आगू ने देखत, जे पाछू रहत तेकरा केना देखत। तेकरा देखैक तँ उपाय यएह ने हएत जे ओकरा आँखिक आगू अपन आँखि राखब...। अपन बेथाकेँ श्यामा सुदामा दादीपर थोपैत बजली- “आब ने रोशन अछि आ ने रोशनक दुनियाँ। आब के बुढ़िया दादीक हाथक आँगुर पकैड़ पाछूओ-पाछू चलत आ आगूओ-आगू देखबैत चलत..!” पुतोहुक बात सुनि सुदामा काकी ठमैक गेली। ठमैक ई गेली जे जँ पुतोहुकेँ किछु कहबैन तँ ओ अनेरे अपन दैनंदिनक क्रिया रोकि समोहमे पड़ि जेती, तइसँ नीक जे किछु बजबे ने करब। अही अगदिगमे सुदामा काकीक मन पड़ल छेलैन। तही काल जीवन काका दरबज्जासँ ई सोचि उठि कऽ कल दिस बढ़ला जे जहिना अपन मन बेलबाक स्मृतिमे वौड़ा रहल अछि जइसँ कोनो काजमे नजरिये ने सन्हिया रहल अछि, तहिना तँ ने पत्नियोँ आ पुतोहुओकेँ होइत छैन। भानस घरसँ आगू बढ़िते जीवन काका देखलैन जे गोबरक पथिया माथपर नेने पत्नी, खेतमे खुनल गोबरक खाधि लग ठमकल माथपर भारी नेने ठाढ़ छैथ। तहिना पुतोहुओ कलक हेन्डिल पकड़ने सासुक उत्तरक आशा देख रहल छेली। पत्नियोँ आ पुतोहुओकेँ देख जीवन कक्काक मन मानि गेल छेलैन जे दुनू गोरे अपन-अपन जीवन क्रियामे लगि गेल छैथ। मुदा अपन मनक स्मृति जीवन क्रिया दिस बढ़ए नहि दैन। रंग-रंगक प्रश्न मनमे बर्खाक बुलबुला जकाँ उठैन आ लगले फुटि-फुटि विलीन होइत जाइन। मुदा बर्खोक तँ किछु बुलबुला एहनो होइते अछि जे लगले नहि फुटि पानिक टघारक संग किछु दूर धारा पकैड़ संग धरिया-धरिया बढ़ितो अछि। ओना, छी तँ पानियेँक बुलबुला जइमे स्थायित्व नहियेँ छै मुदा तैयो अपन जिनगी बँचबैत किछु दूर धरि तँ बहिते अछि। अनायास जीवन कक्काक मन परिवारसँ सर-समाजक ओइ असिरवादपर आबि अँटैक गेलैन जे रोशनकेँ आशीष रूपमे दैत देखने- सुनने छला। ओ विचार फुटि जीवन कक्काक मुहसँ निकललैन- “कहाँ रोशन दीर्घजीवी भऽ सकल! कहाँ ओ अपन भविसक भवितव्य देख सकल!” ओना जीवन कक्काक मुहसँ निकैल तँ गेलैन मुदा लगले प्रशान्त मन शान्त करैत कहलकैन- “ई तँ दुनियाँक खेले छी जे सभ अगिले आशा देख जिनगीकेँ क्रियाशील बनबैए।” प्रशान्त मनक शान्तचित्त चेतैबते जीवन कक्कक विचारक रूप बदललैन। विचारक रूप बदैलते मन कलशलैन। कलैशते नब टुस्सा जकाँ मन टुस्कियेलैन। टुस्कियाइते जहिना गाम-घरक पानि धारा बनि धार बना गंगामे मिलि गंगासागरसँ मुँह मिलैए तहिना जीवन कक्काक विचारमे सेहो एलैन। एलैन ई जे सबहक तँ बुझले-गमल, देखले-सुनल अछि जे खाली जीवनेक पोताक संग परिवारमे नहि, आनो-आन अनेको परिवारमे अहिना होइत आबि रहल अछि। एक बाबाक नहि सैयो-हजारो बाबाक पोताक अन्त अहिना भेल अछि, आगूओ हेबे करत। तइले अनेरे मनकेँ विघ्न करैत बेधै छी। जेते समए बेधैत रहत ओते तँ जिनगियेक क्रिया ने ह्रास करत। मन ठमकलैन। ठमैकते जीवन काका बुदबुदेला- “जेतबेटा औरुदा किए ने रोशनकेँ भेटल हौउ, मुदा छल तँ ओ बेदाग, तखन किए ओकर जिनगी एतबेटा भेल?” मनक उठल प्रश्न जीवन कक्काक मनेमे घुरिया लगलैन। मुदा उत्तर नहि भेट उत्तेजित होइत संकल्पित भेला। नहि! बेलबा हेराएल कहाँ अछि ओ तँ आँखिक सोझहेमे अछि जे खाली बेलबे नहि, हजारो-लाखो बेला जाड़क खाधिक पानिमे खसि-खसि अन्त करबे करैए। मनमे अबिते दरबज्जापर आबि बैस रहला। दरबज्जापर बैसल जीवन कक्काक मनमे उठलैन- रोशनकेँ पहिल ‘वर्थ डे’ दिन सभ कियो दीर्घजीवीक असिरवाद देलखिन, नीक भविसक शुभकामना सेहो देलखिन। मुदा रोशन अपन ‘वर्थ डे’ कहाँ देख पौलक..! जीवन कक्काक मन-मियादि उनटए लगलैन, मनकेँ चारू भागसँ अशान्ति घेर लेलकैन। जीवन-मृत्यु आगूमे आबि ठाढ़ भऽ गेलैन। पछाइत जीवन-मृत्यु स्वयं एक प्रश्न बनि शान्त केलकैन। ◌ शब्द संख्या : 2527, तिथि : 16 फरवरी 2017 [1] नर्क [2] स्वर्ग [3] रोशनक स्मृति स्वरूप [4] छोट पएर रहने छोट डेगे [5] गोबर भरल पथियाक भार रहने २ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल रचित ‘सतभैंया पोखैर’ लघु कथा संग्रहक तेसर संस्करणसँ १३ गोट कथा फॉगु कौआ डकैसँ पहिने केतौ-केतौ गाछपर पौरुकीक बोल फुटल कि रघुनी बाबाक नीन टुटलैन। जहिना अर्द्धचेत अवस्थामे किछु बजा जाइत तहिना मुहसँ निकललैन- “आइ फगुआ छी। राति भरिक हँसैत चानकेँ सुरूजक लालिमा अरियाति कऽ आबि चुकल अछि। केतेक सुन्दर राति दिनक संग मिलि रहल अछि। जे जीबए से खेलए फाउग...।” बजैत-बजैत रघुनी बाबाक चेतना चेत गेलैन। चेतते मन दोहरौलकैन- “जे जीबए से खेलए फाउग।” मुदा जीवित-मृत्युक बीच एहेन लट्टा-पट्टी अछि जे के मरल आ के जीबैए से बिलगाएब कठिन अछि। कियो जीवित-मृत्यु बुझबे ने करैत, तँ कियो बुझितो मानबे नै करैत। कियो जँ बुझबो करैत तँ काते हटौने रहैत। शिवजीक सीमा खिंचब कठिन अछि...। पौह फटिते जहिना सुरूजक आगमन हुअ लगैत तहिना रघुनी बाबाक अलिसाएल मन जिनगी दिस नजैर उठौलकैन। जहिना कोनो विद्यार्थीक पहिल कलम कोनो प्रश्नमे अँटैक जाइत तहिना रघुनी बाबाक मन अँटैक गेलैन। ओछाइनपर पड़ले-पड़ल कड़ फेरलैन। मनमे उठलैन, अनाड़ियो-धुनाड़ियो कोदारिसँ परती खेत तामि लइए। कहाँ ओकरा हर जकाँ लूरि सिखए पड़ै छइ। मुदा बिना लूरिये तँ कोदारियो नै पाड़ल जा सकैए। अँटकल मनमे फेर उठलैन- किछु लूरि देखियो कऽ भऽ जाइत, किछु हाथ पकैड़ सिखौलो जाइत आ किछु रगैड़-रगैड़ कऽ सिखए...। रघुनी बाबा ठमकला। पुन: मनमे एलैन- जहिना पानि माटिक ऊपर छिछैल धारा बनि आगू बढ़ैत तहिना तँ सुरूजोक किरिण छिछलैत पूब-सँ-पच्छिम चलैए। अँटकैत कहाँ अछि? हँ अँटकैए! खाधिमे पानि अँटकैए, तामल खेतक गोलामे सुरूजक किरिण अँटकैए। मनमे संचार भेलैन। दिनक सगुन उचाड़ए लगला। फगुआक दिन छी। फागुनक विदाइ सेहो छी। आइए रातिमे चैतक आगमन सेहो हएत। मन मधुएलैन। पाबैनक दिन छी। वसन्ती पाबैन। पुआ-मलपुआ खाएब, रंग-अबीर खेलब, होलीक संग विरहा वसन्त, ढोल-डम्फाक संग गेबो करब आ नचबो करब। मुदा मन पसीज गेलैन। पसीज ई गेलैन जे- ‘एक दिनक भोजे की आ एक दिनक राजे की।’ रघुनी बाबाक ठमकल मन पाछू बढ़लैन। वसन्तक मध्य, होली पाबैन। माघक इजोरिया-पंचमी होलीसँ एक मास बीस दिन पूर्व वसन्तक जन्म भेल। मुदा चैत-बैशाखकेँ वसन्त मानने तँ पूर्व पक्षे हेरा जाइत अछि। जँ मध्य मानब तैयो पचास-साठिक दूरी बनि जाइत अछि...। ओझराएल मन मुड़ैछ कऽ तुड़ैछ गेलैन। भने दस बर्खसँ होली मनाएबे छोड़ि देने छी। लऽ दऽ कऽ भोजने-टा शेष बँचैए। सेहो दिनेक फल छी। मुदा फलो तँ अनेक तरहक होइए- मिठो होइए, खट्टो होइए आ खट-मधुर सेहो होइए। तीनू संगो रहैए आ अलगो-अलगो रहैए। जामन्तो प्रकारक भोजनमे तीनूक अपन-अपन महत छइ। भोजमे जएह अचार अपन विशेष महत बनौने अछि, वएह असगरमे दाँतकेँ तेना कोतिया कात कऽ दइ छै जे काज करैसँ हनछिन करए लगैए। मनकेँ घुमिते उपकलैन- वसन्तक आगमनक दिन। आइए सरस्वती पूजा सेहो छी। आइए हरबाह गृहस्तक हर परतीपर ठाढ़ करत। ठाढ़े नै करत, अढ़ाइ मोड़ घुमबो करत। अढ़ाइए मोड़क बोइनो तहिना। सभ परानी खेबो करत आ जेते धानसँ हरक नास डुमतै तेते लैयो जाएत। पसारी भाथीक आगिमे धान-मरूआ लाबा फोड़ि सालक समए गुनत। मुदा सेहो होइ कहाँ छइ? हेबो केना करतै, गाए-महींसिक मास एक्कैस-बाइस दिनक होइ छै आ मनुखक भऽ जाइ छै तीस दिनक। जहन कि दुनू संगे रहैए। संगे लक्ष्मी बनैए, संगे ऐरावत। रघुनी बाबाक मनमे उठलैन- अनेरे कोन फेड़मे पड़ै छी। पाबैनक दिन छी, हँसी-खुशीसँ उठब खाएब-पीब मौज-मस्ती करब। जे गति सबहक से गति हमरो। तइले अनेरे एते मगज-मारी करैक कोन जरूरत? राम-श्याम करैत रघुनी बाबा ओछाइनसँ उठैक विचार केलैन। तखने गाम दिससँ ‘पीह-पाह’क अवाज कानमे पड़लैन। भोरहरबा नढ़ियाक अवाज जकाँ अकानए लगला जे की कहै छइ। रघुनी बाबाक मनमे उठलैन, ओह! अनेरे पाबैन छोड़लौं। जाबे जीबै छी ताबैये ने। मरि जाएब तँ के देखत आ केकरा देखब। मनमे फेर उपकलैन- किए नै पाबैन छोड़ी? जइ होली पाबैनक नाओंपर इज्जत-आबरू आ धन-सम्पैतक लूट हुअए ओ पाबैन किए करब? मुदा भुताहि गाछ बुझि कियो आमक गाछतर जाएब छोड़ि देत तँ आम केना खाएत? जामुनपर सहजे जम बैसले अछि। बेल फड़ने कौआकेँ की? खाएर जानह जअ जानह जात्ता...। गामक बात गौंआँ जानह। मुदा परिवार तँ अपन छी। परिवारक नीक-अधलाक तँ जवाब दिअ पड़त। मुहोँ चोरा कऽ रहब नीक नहि। केते दिन जीबे करब। आइसँ फेर फगुआ खेलब। मुदा खेलब केतए? परिवारक संग खेलब...। रघुनी बाबाक मन नीक जकाँ असथिरो नै भेल छेलैन कि दादी आबि टोकलकैन- “सौंसे गामक लोक हर-बिर्ड़ो करैए आ अहाँले भोरो ने भेल! आबो उठब की सुतले रहब?” जहिना नुनगर बिस्कुट खेलापर चाह पीबैक मन होइत तहिना रघुनी बाबाकेँ भेलैन। घोकचल भौंहुक बीचक करिया तीर तनैत बजला- “जखन अहाँ आबिए गेलौं तखन किए ने गाछक जड़िए-मे पानि ढारी जे डारि-पात सगतैर पहुँच जाएत। अहीं संग फगुआ खेलब।” बाबाक बात दादीक हृदैकेँ बेधि देलकैन। छटपटाइत उत्तर देलखिन- “अखन जे तीस-पैंतीस गोरेक फुलवाड़ी लगल अछि ओ केकर छिऐ? जहिना कृष्ण वृन्दावनमे फाउग खेलाइ छला तइसँ कि कम हमर अछि।” मुस्की दैत रघुनी बाबा बजला- “अखनो धरि मनमे बेइमानी ऐछे जे अपन कहलिऐ आ हमर छोड़ि देलिऐ?” अड़हुलक कली सदृश तीर साधि दादी दगलैन- “अहाँकेँ आन बुझै छी जे फुटा कऽ कहितौं।” “अच्छा छोड़ू ऐ सभकेँ। परिवारमे सभकेँ कहि दियौ जे दुपहर तक सभ कियो नहा-खा तैयार भऽ जाए। बेरू पहर दुनू गोरे केना जुआनी बितेलौं से सौंसे परिवारकेँ सुना देबइ।” बाबाक बात सुनिते दादीक आँखि मधुआ गेलैन। बजली- “आबक लोककेँ निमहतै। मन अछि की नहि जे दुरागमनक तेसरे दिन पटुआ काटए पू-भर गेल रही। ऐठाम रौदी भऽ गेल रहै आ डेढ़ बर्खक पछाइत आएल रही?” दादीक बात सुनिते रघुनी बाबा उठि कऽ बैसैत बजला- “औझुका लोकक मने बदैल गेल अछि। जेकर देखा-देखीसँ बालो-बच्चा प्रभावित भऽ रहल अछि।” बजैत-बजैत जहिना दादी-दुनियाँ बिसैर गेली तहिना सुनैत-सुनैत कथा-वक्ता-श्रोता जकाँ रघुनी बाबा अपन जिनगीक बोनमे बोना गेला। एक मन औनाए लगलैन तँ दोसर मन गाबए लगलैन- “सदा आनन्द रहे अही दुआरे मोहन खेले होरी हो...।” दादी दरबज्जासँ आँगन दिस गुनगुनाइत बढ़ली- “कियो लूटबए अपन महिमा।” जुआनीक रंगमे रंगि रघुनी बाबा गाम दिस विदा भेला। दरबज्जाक बाट टपि गामक बाटपर पहुँचते मनमे उठलैन- देखा चाही, केते नवतुरिया सभ देहपर रंग फेकैए आ केते जुआन-जहान अकाससँ अबीर उड़बैए। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन लोको लाज तँ किछु छी किने। धिया-पुता केना रंग देत। हँ तखन खेलाएत अपनामे मुदा छिच्चा उड़ि जँ पड़त तँ ओकरा की कहबै..? एका-एकी दादी परिवारक सभकेँ अपने मुहेँ कहलैन। माने बाबाक समाद दादी भरि मन बँटलैन। नीक-बेजाए दुनूक समीक्षा हुअ लगल। अन्तो-अन्त सभ यएह बुझलक जे कहियो ने से पाबैन दिन! बुढ़-पुरानक हुकुम छिऐन, तँए यादि स्वरूप सुनि लेब नीके हएत। के कहलक ऐगला होली देखता कि नहि देखता। जँ देखबो करता तँ के कहलक जे पाँखि तोड़ि कऽ देखता आकि ओछाइन धेने देखता, तेकर कोन ठेकान। मुदा ईहो बात मने-मन उठैत जे वएह देखता हमहीं नै देखिऐ? कम-सँ-कम तँ ई हएत किने जे सौंसे परिवार एकठाम बैस पाबैनक दिन बिताएब..। दादीकेँ पोती कहियो देलकैन जे आइ भानसो तोरे करए पड़तौं। समैसँ किछु पहिने परिवारक सभ कियो दरबज्जापर पहुँचल। बाबा-दादीक बात तँए महादेव-पार्वतीक फॉगु सबहक मनमे घुमैत, सबहक मुँह बन्न। सभ बाबा-दादीक बात सुनैले कान पाथि नजैर अँटकौने। रघुनी बाबाक मनमे उठलैन जे तिल-तण्डुल जँ फेंटा जाए तँ बिलगाएल जा सकैए मुदा जँ पानि-माटि फेंटा जाएत तखन केना बिलगौल जाएत? तीन खाढ़ीक बीच परिवार अछि। सबहक अपन-अपन स्तर अछि, अपन-अपन जिनगी अछि। जिनगीए-मे खुशियो अबैत-जाइत रहै छइ। मुदा जहिना लोक अपन नीक लेल सभ किछु करैए तहिना ने परिवारो लेल करैए। भलेँ परिवार पैघसँ छोटे किए ने भऽ गेल हुअए। फगुआ दिनक उमकीमे मन उमैक गेलैन। जहिना बरखाक पानिमे धिया-पुता उमकैए तहिना बबो-दादीक मन उमकए लगलैन। दादीकेँ बाबा टीप देलखिन- “जइ साल दुरागमन भेल रहए आ परदेश गेल रही, से मन अछि आकि बिसैर गेलौं?” बाबाक प्रश्नक उत्तर दादी केना नै देथिन। बाबाक रोच छैन मुदा परिवारक तँ गारजने छैथ। तेतबे नहि, निचलासँ ऊपर सेहो छथिए। सिनेमाक कलाकार जकाँ पोजमे बजली- “लोक सुख ने बिसैर जाइ छै मुदा दुख तँ मोने रहै छइ। किए ने मन रहत।” दादीक पोज देख छोटकी पोत-पुतोहु अपन हालक दुरागमन बुझि बाबाक प्रश्नपर जोर देलक। पुतोहुक टाँट बोली सुनि दादीक मनमे उठलैन जे मुँहजोर पुतोहु अछि, एकटा उत्तर देबै तँ दोसर दोहरा देत। मुँह नोचि कऽ खा जाएत। तइसँ नीक जे अपने मुहेँ कहए दिऐन। हारि मानैत देख रघुनी बाबा लपैक कऽ दादीक प्रश्न पकैड़ बाजए लगला- “कनियाँ, नव-कबरिये रही। मोँछ-दाढ़ीक पम्ह अबिते रहए। तीन सालसँ परदेश खटैत रही। जेठ मास रहइ, दुरागमन भेले रहए। दुरागमनक तेसरे दिन मेड़िया सभ पू-भर जेबाक समए बनौलक। अपनो घरमे चूड़ा-भुसबा रहबे करए, बटखरचा लऽ लेलौं। भाड़ा-भुड़ी लेल गोर लगाइबला रूपैआ सेहो रहबे करए। तेसरा दिन चलि गेलौं।” जिज्ञासा करैत पुतोहु पुछलकैन- “पएरे गेलखिन आकि गाड़ी-सवारीसँ?” जेना गुड़ घावसँ पीज निकलैकाल सुआस पड़ै छै तहिना बाबाक मनमे भेलैन। विह्वल होइत बजला- “निरमली तक रेलगाड़ीसँ गेलौं। तेकर बाद पूब दिसक रस्ता धेने कोसी घाटपर पहुँचलौं।” “धार केना टपलखिन?” “कनियाँ, जेठुआ समए रहइ। धारक पेट खाली भऽ गेल रहै मुदा तैयो अगम पानि तँ रहबे करइ। ओना धार फुलाइक समए भऽ गेल रहै मुदा फुलाएल नै रहए। बेसी नाव भदबरियामे डुमइ। एक बेर अहिना भेल जे अपने गौंआँक मेड़िया घुमैकाल डुमि गेलइ।” उत्सुक होइत पुतोहु पुछलकैन- “केते गोरे रहथिन?” “तेरह-चौदह गोरे अपना गामक रहैथ आ आर गोरे आन-आन गामक। चालिस-पैंतालिस गोरे नाहपर चढ़ल रहैथ।” “केते दिन पू-भर कमाइ लेल गेलखिन?” मन पाड़ैत रघुनी बाबा किछु कालक पछाइत बजला- “कनियाँ, तेकर ठेकान अछि। मुदा तैयो बीस-पच्चीस बर्ख तँ गेलै हएब।” “कए दिने पहुँचै छेलखिन?” “ओइबेर तीनियेँ दिनमे रंगैली पहुँच गेलौं। बजारसँ थोड़बे हटि कऽ काज पकड़ा गेल। चिन्हरबे गिरहत रहए।” “जँ ओइठीम काज नै पकड़ैतैन तखन की करितथिन?” पुतोहुक प्रश्न सुनि रघुनी बाबाक जुआनी मन पड़लैन। जोशमे बजला- “की करितिऐ! कोनो कि ओतबे देखल-सुनल रहए। मोरंगमे नै काज भेटैत तँ आगू बढ़ि जइतौं। सिलीगुड़ी, असाम, ढाका तक ठेका दैतिऐ। मुदा काज केने बिना नै अबितौं।” “कोन काज करै छेलखिन?” काजक नाओं सुनि बाबाक मन वौरा गेलैन। कहलखिन- “कनियाँ, काजक कोनो ठेकान अछि। गिरहस्तौआ सभ काजक लूरि अछि। ओना धन-रोपनी, धन-कटनी आ पटुआ कटैले जाइ छेलौं।” “केते दिन रहै छेलखिन?” “सालमे दू-बेर जाइ छेलौं। घुमा-फिरा कऽ छह मास लगि जाइ छेलए। धन-कटनीमे तँ एकलगना काज रहै छेलै, मुदा पटुआ काटैक समैमे काज छिड़िया जाइ छेलए।” मुँहपर एकटा आँगुर लैत पुतोहु फेर पुछलकैन- “एकलगना काज केकरा कहै छथिन?” पुतोहुक प्रश्न सुनि रघुनी बाबाक गुरुमन जगलैन। नजैर-पर-नजैर दैत बजला- “एकलगना काज ओ भेल जे क्रमबद्घ चलैए। एकक बाद एक काज अबैए। जेना भानस करैकाल चूल्हि पजारि बरतन चढ़बै छी। अदहन दइ छिऐ। पानि गरम होइए, तखन सिदहा लगबै छी। यएह क्रम एकगलना भेल। मुदा जखन रोटियो पकाएब रहत, तरकारियो बनाएब रहत आ भातो रान्हब रहत तखन ओ काज छिड़िया जाएत। छिड़ियाएल काजमे अधिक भनसियो आ चुल्हियोक जरूरत पड़ि जाइ छइ। नहि जँ भनसिया असगरुआ रहल तँ छिगड़ी-तानमे पड़ि गेल।” “एकलगना काज केना करै छेलखिन?” “पटुएक कहै छी। पहिने ओकरा कटलौं। काटि कऽ जमा कऽ देलिऐ। तीन-चारि दिनमे पत्ता झड़ि जाइ छेलइ। तखन ओकरा अँटियाहा बोझ बनबै छेलौं। पानि ठेकना उघि कऽ लऽ जाइ छेलौं। पानिमे बाँसक खुट्टी पाटि कऽ, तीन-चारि छल्ली लगा दइ छेलिऐ जइसँ एक-दोसराकेँ दबबो केलक आ ऊपरसँ माटिक चेका चढ़ा दइ छेलिऐ। पानिक तरमे सभ डुमि जाइ छेलइ। गोरलाक बीस-पच्चीस दिनमे सीझ जाइ छेलइ। तखन ओकरा मुंगरीसँ झाड़ि-झाड़ि साफ करै छेलौं।” “पटुआमे भरिगर काज की होइ छइ?” प्रश्न सुनि रघुनी बाबाक आँखि ढबढबा गेलैन। आँखि ढबढबाइते पानि पड़ल खौजरी जकाँ मन मधुर भऽ गेलैन। बजला- “कनियाँ, अखन अहाँ बाल-बोध छी। दुनियाँक तीत-मीठ नै बुझलिऐए मुदा कहै छी- काजे जिनगी छी। तँए काजसँ सटबाक कोशिश हरिदम करी। हरिदम करैक मतलब ई नइ जे भरि दिन देहे धुनी। जहिना राज मिस्त्री मकानक नक्शा बना मकान बनबैए तहिना काजोक छइ। छोटे-काज नमहर लग लऽ जाइ छै आ आगू मुहेँ टुस्कियेबो करै छइ।” बिच्चेमे पुतोहु बजली- “प्रश्न छुटि गेलैन बाबा?” “कनियाँ, की कहब। तरकारी तँ ओलो छी जे गाछमे एकेटा होइए, जा कऽ खट-दे उखाड़ि लेब। ओल उखाड़ैमे जेते समए लगल ओइसँ कम समैमे सजमैन तोड़ल जा सकैए। मुदा सैकड़ो फड़ैबला सजमैन बिना देखने-सुनने टेब केना सकै छी। टेबब असान तँ नहि। दूटाक तुलना करब छी, जे असान नहि, किएक तँ किछु एहेन होइत जे कमे उमेरमे फुफुआ कऽ नमहर भऽ जाइत आ किछु लुलुआ कऽ बौना भऽ जाइत। जँ छोट जानि, छोड़ैत जाएब तँ ओ तरेतर जुआ जाएत, मेहनत डुमि जाएत। तँए हल्लुको काज भारी होइए।” बिच्चेमे फेर पुतोहु टोकि देलखिन- “बाबा, फेर भँसिया गेलखिन?” “नै कनियाँ, भँसियाइ कहाँ छी। होइए जे हृदए फाड़ि अहाँ सबहक बीच छिड़िया दी आ अहाँ सभ तितिर जकाँ सभ पीब ली। मर्द बनि जखन काज करए निकललौं, तखन भरिगर की आ हल्लुक की। मुदा एकटा बात धियानमे जरूर रखक चाही जे कोन काजमे केते जोखिम उठबए पड़त। जइ काजमे जेते जोखिम होइ ओइमे ओते सतर्क रही। तर्के रस्ता बनबैए। पटुआक काजमे सभसँ भरिगर अछि पटुआ झाड़ि सोन बनौनाइ। जहिना एक-दोसर जिनगी पबैत तहिना डाँड़ भरि सड़ल पानिमे जोंक-ठेंगीक संग विषैला साँप सेहो रहैत। चानिपर टहटहौआ रौद, निच्चाँ डाँड़ भरि पानि। सर्द-गर्मक बीच शरीर रहैए। तैपर एकलगना ठाढ़ भऽ कखनो एकटँगा ठेहुन बना पटुआक जड़ि जोड़ल जाइत, तँ कखनो वामा हाथमे उठा दहिना हाथे मुंगरीसँ झाड़ल जाइत। माछी-मच्छरक तँ ठेकाने कोन।” सिनेहासिक्त होइत पुतोहु पुछलकैन- “केते दिनक पछाइत घुमलखिन?” “डेढ़ बर्खपर घुमलौं। ओइ साल रौदी भऽ गेल रहइ। रूपैआ पठा दिऐ आ अपने कमाय।” “अनदिना, बिना सिजनक समैमे कोन काज करै छेलखिन?” “कनियाँ, वएह समान सभ–पटुआ, तोरी, धान इत्यादि–जखन तैयार भऽ कऽ देहातसँ बजार अबै छेलै तँ बजारोमे काज बढ़ि जाइ छेलइ। पछाइत उट्ठा काज करै छेलौं।” ◌ शब्द संख्या : 2131 लफ साग गाममे खेतीक चर्च होइते लाल काकीक लफ सागक चर्च उठिए जाइत अछि। ओना चरचोक क्रम अछि, मुदा लाल काकीक अलग पहचान रहने उपजा-वाड़ीसँ उठैत चर्चक संग बेकतीत्वक चर्च रामायण-महाभारतक प्रमुख पद्यक चर्च जकाँ हुनको होइते छैन। चरचोक भिन्न-भिन्न क्रम, केतौ-केतौ खाली गहुमेक चर्च चलैत तँ केतौ अगबे धानक। केतौ खैहनक संग दलिहनोक चर्च चलैत तँ केतौ खैहन, दलिहन आ तेलहनक चर्च एक संग उठि जाइत। केतौ अन्नक संग तीमनो-तरकारीक चर्च उठैत तँ केतौ तीमन-तरकारीक संग फलो-फलहरिक। एतबे नहि, केतौ एहनो होइत जे खेतीक संग माछो आ दूधोक चर्च उठि जाइत। भनडाराक भजनमे जहिना केतौ साखीसँ भजन शुरू होइत तँ केतौ भजनक बीच-बीचमे साखी चलैत, आ केतौ साखीए-सँ विसर्जनो होइत अछि तहिना लाल काकीकेँ सेहो छैन। लफ सागक संग लाल काकीक सिनेह आ खाली सिनेहे नहि, जिनगियो ओहन छैन जेहेन वैवाहिक बन्धन होइत। जहिना कनाह-खोरसँ लऽ कऽ दिबड़ा भीड़मे बसैबलाक संग एकसँ एक देवसुन्नैर अपन जिनगी समरपित कऽ अपन कुल-खनदानक संग समाजक मुरेठा सम्हारि रखैत तहिना लालो काकी छैथ। जइ दिन लाल काकी सासुर एली तही दिन लफ साग सेहो संगे-संग एलैन। दुरागमन भेलापर जखन लाल काकी सासुर विदा हुअ लगली तँ सतरिया धान खोंछिमे दइले जे रखल रहैन तहीमे लफ सागक बीआ छिपा कऽ ओही धानमे ई सोचि मिला लेलैन जे जँ कागतक पुड़ियामे वा लत्तामे बान्हि राखब तँ खोंछि भरनिहारि देखिए जेती, जखने देखती तँ खोलबे करती। जखने खोलती आ सागक बीआ देखती तँ हो-ने-हो डाइन-जोगिनक फसाद ने कहीं उठि जाए। से नइ तँ निछोहैमे कनी समैये ने लगत मुदा कियो बुझत तँ नहि। सएह केलैन। सागक बीआ नैहरसँ सासुर अनैक कारणो रहैन। जहिना हजारोक भीड़मे प्रेमीक नजैर प्रेमिकापर रहैत तहिना लाल काकी अपन प्रेमी-साग-क संग छोड़ए नहि चाहैथ। ओना मनमे ईहो होइत रहैन जे अनेरे किए सागेक बीआ लऽ जाएब, जइ गाम जाएब तोहू गाममे तँ लफ साग होइते हेतै, मुदा मन नै मानलकैन। मनोक मानब तँ साधारण नहियेँ अछि। भलेँ साधारणो बात वा काज कहि मना लेब, ई अलग अछि। मुदा लाल काकीक मन ओहू दुआरे नै मानलकैन जे गाम-गाममे जहिना धानक खेती होइतो एकरंगाहो धान होइत आ नहियोँ होइत, तहिना ने सागोक अछि, केतौ मतौना-ढेकी साग होइत तँ केतौ पालक-ठढ़िया, केतौ ललका ठढ़िया तँ केतौ हरियरका, केतौ उजरा भुल्ला तँ केतौ सतरंगा...। तँए जहिना गाम-गामक पानि, तहिना वाणि, तहिना खेती, तहिना बाड़ी, तहिना झाड़ी, तहिना फुलवाड़ी तहिना ने आनो-आन होइत अछि। तँए कोनो जरूरी नहि, जे लफ साग ओहू गाममे होइते हेतइ। जँ नै होइत हेतै तँ लल्लो-विल्लो भऽ जाएब। लइए जाइमे की लागत, बुझब जे धाने छी। यएह सभ सोचि लाल काकी जहिना तीर्थस्थानक यात्री पनपीबा बरतनक संग सिदहो-समर संगे लऽ चलैत तहिना लफ सागक बीआ संगे लऽ अनली। लफ सागक गुण लाल काकीकेँ बुझल रहैन। किएक तँ नैहरोमे बेसीकाल खेबो करैथ आ उपजेबो करैथ। खेतियो हल्लुक। जखन सागक गाछ जुआ जाइत तखन ओइमे फड़ल बीआ सेहो रसे-रसे पाकि जाइत। जहिना बुढ़-बुढ़ानुसक विचार बिनु पुछनौं फुटि-फुटि झड़ए लगैत तहिना सागोक बीआ गाछक आशा छोड़ि खापैड़क लाबा जकाँ चनैक-चनैक बहरा जाइत। केतबो पानि-पाथर बरसौ आकि ठनका खसौ जहिना छह-मसुआ बच्चा माइक छातीमे सटि सूति रहैत तहिना सागोक बीआ पृथ्वीक कोरामे सूति रहैत अछि। मुदा अचेतन रहितो चेतन भऽ ओइ दिन फुरफुरा कऽ उठि जाइत जइ दिन उठैक समए अबैत। तँए कियो सागक बीआ जोगा समैपर खेतकेँ तामि-कोरि बाउग नहियोँ करैत तैयो ओइ खेतमे अपनो जनैम जाइत जइमे पैछला साल भेल रहैत। लफ सागमे लाल काकीक जहैनिक कारण छैन जे ओ जनै छैथ जे जैठाम लोक नून-भात आकि नून-रोटी खा जीवन बसर करैए तैठाम जँ चारिटा लफ सागक पत्ताकेँ एकलोटा पानिमे कनी नून दऽ मेरचाइक फोरनसँ फोरना देबै तँ तेहेन सिनेही भऽ भात-रोटीमे सटि ओहन गति पकैड़ लैत जेना खाली सड़कमे वाहन धड़ैत। चारिए पातक मेजनक संग अदहा किलो मीटर ससाइर लिअ। जिनगीक संग पुरनिहार साग अपन कथा-बेथा लाल काकी छोड़ि केकरा लग बाजत। जे ओकरा दिस घुमियो कऽ ने तकैए तेकरा कहिए कऽ की हेतइ। खेतक आड़िपर पहुँचते भुखाएल नेरू-पर्ड़ू जकाँ लाल काकीकेँ साग कहैत- “काकी, आइए नहि, हजारो बर्खसँ गेनहारी, बथुआ, नोनी इत्यादिक संगे-संग चलैत एलौं, कियो हवाइ जहाजपर भोज-भात करैए मुदा हमरापर किए ने केकरो नजैर पड़लै! जँ नजैर पड़ल रहितै तँ अहिना धरती धेने रहितौं?” सागक दुखनामा सुनि लाल काकी विह्वल भऽ कहलखिन- “बहिन, कियो अपना भागे-करमे जीबैए-मरैए। तइले अनेरे किए दुख करै छह। जइ दिन उपैट जेबह तइ दिन बुझिहक जे या तँ ई धरती नै रहए दिअ चाहैए वा ई धरती रहै-जोकर नइए।” साग बाजल- “लाल काकी, लोक बड़ कुभेला करैए। नै तँ, कहू जे सिमटीक आँगन-घर बना कऽ रहैए आ हमरो जँ अखाढ़मे कनी माटि छिड़िया सिमटीक अँगनोमे आकि छज्जियोपर लगा देत तँ की आसीन-कातिक तक भाँज नै पुरबै। मुदा आने साग जकाँ जे फुटा दइए जे ई गरमीक छी तँ ई जाड़क छी। भदवारिमे साग खेबोक नै चाही, से कहू जे ई होइ?” सान्त्वना दैत लाल काकी कहलखिन- “अइले किए दुख करै छह, तोहर तँ मान-मर्जादा एते छह जे बिनु तोरे अपन माइयो-बापक उद्धार नै कऽ सकैए। करह दहक जेते कुभेला करबाक छै से करह।” मिथिलांचलक भोज जहिना अदौसँ आइ धरिक भोजनक इतिहास अपना पेटमे समेटने अछि तहिना गामो ने समेटने अछि। एक दिस जहिना भात दालिक संग तरकारी, तैसंग-संग पानिमे बनल अदौरी, तेलमे बनल बर-बरी आ दही-चिन्नीक संग विसर्जन होइत। जे भोज्यक इतिहास प्रदर्शित करैत तहिना बाधमे बनल रखबारक खोपड़ीक संग बहुमंजिला मकानक बीच आदि मनुखसँ लऽ कऽ सभ्य मनुख माने आधुनिक मनुख तकक इतिहासक झलकी सेहो दैत अछि। जइ दिन लाल काकी सासुर एली तइ दिन ओ पनरहे-सोलहे बर्खक छेली। आने-आन जकाँ दुइए बर्खक पछाइत पतिकेँ मुइने विधवा भऽ गेली। दुइए बर्खक अभियन्तर ‘लाल भौजी’, ‘लाल काकी’, ‘लाल दादी’क माला समाज पहिरा देलकैन। एकोटा सन्तान नै भेल छेलैन। जइ दिन पति मुइलैन तइ दिन एहेन ओझरीमे लाल काकी ओझरा गेली जे भरि पोख कानियोँ नै सकली। ओझरी ई लगलैन जे जइ समाजमे वैधव्य बान्ह एतेक सक्कत अछि जे ता-जिनगी वैधव्य धारण केने रहैत,तैपर अशुभक उपराग ऊपरसँ। मुदा, की समाज ई भार लइए जे ओकर जिनगी इज्जतक संग केना चलतै। जे समाज केकरो जीवन नै दऽ सकैए की ओइ समाजकेँ केकरो ओंगरी बतबैक अधिकार छइ? विधवाक संग जे-जे किरदानी समाज करैत आएल अछि आ काइयो रहल अछि, की ओ समाज समाजिक बन्धन बनबैक अधिकार रखैए? नारी जागरण लेल ओकर सुरक्षाक पक्का बेवस्था सेहो हेबा चाही जँ से नहि, तँ ने ओ परिवारक संग अपन प्रतिष्ठा बँचा सकैए आ ने बाहरे केतौ बँचि सकतै। पतिक परोछ भेलापर माइयो-बाप आ सरो-समाज लाल काकीकेँ केतबो हिलौलखिन-डोलौलखिन मुदा लाल काकी अड़ि गेली जे समाजमे हमरा सन बहुतो छैथ, जहिना हुनका सबहक जिनगी कटतैन तहिना हमरो कटत। जेते भोग पारस छल तेते भोगलौं, आब माँ मिथिलाक फुलवाड़ी छोड़ि केतौ ने जाएब। जखन अपने हँसुआ, खुरपी आ कोदारि चलबैक लूरि अछि, तखन केतौ रहि जीवन-यापन कऽ सकै छी। अपन मान-मर्यादा अपने नइ बिगाड़ब। अस्सी बर्ख पार केलापर लाल काकीक नजैर ओइ दिस गेलैन जे-जे नजैरसँ देखने रहैथ। जहिना नजैर-सँ-नजैर मिलाएब आ टकराएब दुनू होइत तहिना लाल काकीक मनमे सेहो उठलैन। एहेन निचेनसँ जिनगीमे कहियो बैसबो ने कएल रहैथ जे बुझबो करितैथ आ सोचबो करितैथ जे जइ जिनगीमे बुधि-विचार जँ जिनगीक संग नै चलत ओ जिनगीए केहेन हएत। गुनधुनमे पड़ल एक मन कहलकैन- “हमरा सन-सन लोक लेल जे बेवहार चलि रहल अछि ओकर निमरजना के करत?” तँ दोसर मन उत्तर देलकैन- “जे निमरजना करैबला छैथ ओ जखन अपने चालिए ओंघराएल छैथ तखन अनका की देखथिन। पच्छिम मुहेँक गाड़ी पकैड़ पूब मुहेँ जाए चाहै छैथ, से केना हेतैन।” मनक घंघौज देख लाल काकी काल्हिये जे ओराहै-ले बदाम अनने छेली, ओराहैले विदा भेली। ◌ शब्द संख्या : 1206 तिलकोरक तरूआ जहिना नमहर दोकानमे प्रवेश करिते जीवनोपयोगी वस्तु देख मन हुअ लगैत जे ईहो कीनि लेब, ओहो कीनि लेब। मुदा पाइयो आ विचारो तँ ओतबे रहैए जेते पहिनेसँ विचार भेल अबैए। तहिना इच्छा रहितो किसुनलाल कोठरीमे डाइनिंग टेबुल नै लगा ओसारेपर अपनो दुनू परानी आ अतिथियो-अभ्यागतकेँ खुअबैत अछि। कम दरमाहा साधारण जिनगी। शहरमे रहितो गामक चालि-ढालि बेसी, कारणो स्पष्ट जे शहरी बनैले शहरी जिनगी बनबए पड़ैत। जे ओहिना नहि, पाइक हाथे बनैत। पाइयक काज मुहसँ थोड़े होइ छइ। भलेँ मुँहक आगू पाइक मोल जेहेन होइ। खास्ता कचौड़ी मुँहमे लाड़ैत-चाड़ैत गड़ लगबैत देवकान्त बजला- “आह! बुझलह किने किसुनलाल, किछु हौउ, दुनियाँ सात बेर किए ने उनटै-पुनटै मुदा अपना ऐठाम गामक जे तिलकोरक तरुआ अछि ओकर तुलना केतए हएत?” देवकान्त भाइक बात सुनि किसुनलालक मनमे कनियोँ हिलकोर नै उठलै। किएक तँ मनमे यएह नाच होइत रहै जे डेरामे गौंआँ एला हेन, तँए ई नै अजश हुअए जे खेनाइयोमे ठकि लेलक। नीक कि दब भरि पेट कहुना खाथि। जँ से नै हेतैन तँ दसठाम बजता जे खाइयो-ले भरि पेट नै देलक। तही बीच मनमे उठलै जे पुछि-पुछि खुआएब नीक। जे कम-सँ-कम पहिल बेर तँ कहता जे हँ इच्छापूर्ण खेलौं, आब कनी अराम करैक ओरियान करह आ तोहूँ सभ खा-पीबह, काज-उदम देखहक...। दैन्य दृष्टिए देख किसुनलाल बाजल- “भाय साहैब, खाइ-जोकर बनल अछि की नहि। कहाँ खाइ छिऐ, चारिटा आरो नेने आबी?” पहिल ढकार ढकरैत देवकान्त उत्तर देलखिन- “अँए हौ किसुनलाल, तूँ हमरा राक्षस बुझै छह जे आगूमे एते वस्तु ढेरिया देलह हेन आ तैपर सँ परसन लइले कहै छह?” जहिना डारिमे लागल मचकीक पहिल आस होइत तहिना, मनमे आस जगिते किसुनलाल बाजल- “भाय साहैब, कनियेँ-कनियेँ समान सभ परसैले घरवालीकेँ कहने छेलिऐन। जेना-जेना भोजन करैत जेता तेना-तेना परैस-परैस दैत जेबैन।” तहसाना जकाँ तहियाएल भोजन पाबि देवकान्त भाइक मन गदगदाएल रहबे करैन। किसुनलालक बात अन्तो ने भेल छेलै कि बिच्चेमे देवकान्त बजला- “अँए हौ किसुनलाल, तूँ अनठिया बुझै छह। अपन घर छी! जे खगत आकि बेसी खाइक मन हएत ओ मांगि कऽ लेब। तइले तोरा मनमे किए होइ छह जे भुखले उठि जेता। हम ओहन लोक नइ छी जे खाइयो लेब आ दुसियो देब।” तखने किसुनलालकेँ पत्नी–सिंहेश्वरी–हाथक इशारासँ शोर पाड़ि पुछलखिन- “तिलकोरक तरुआ-दे किछु कहलैन कि नहि?” “किए?” किसुनलाल पुछलक। “तिलकोरक साग आ चटनी तँ खाइ छी, बनबैयोक लूरि अछि, मुदा तरुआ नै खेने छी।” ओना सिंहेश्वरी देवकान्त भायसँ अढ़ भऽ पतिकेँ कहैत रहथिन मुदा बोलीमे एहेन टाँस देने जे देवकान्तो बुझथिन। साग आ चटनी सुनिते देवकान्तक मनमे उठलैन- साग तँ केते दिन खेने छी। तहूमे पेशाबमे गड़बड़ी रहने पथ्यमे यएह चलैए। मुदा चटनी तँ नै खेने छी। लाज-संकोच तँ ओकरा ने होइ छै जेकरा बुझि पड़ै छै जे भारी छी, मुदा हम कोन भारी छी जँ भारी रहितौं तँ बुझले रहैत। नै बुझल अछि तँ बुझि लेब कोन अधला हएत। जँ कहियो खाइयेक मन हएत तँ बुझलेहे ने काज देत...। अचार मुँहमे लैत देवकान्त मुँहक कर समेट कऽ घोंटैत बजला- “किसुन, ई की कोनो गाम-घर छी जे कनियाँ एते संकोच करै छैथ। एतै आबह कहुन, कनी एकटा बातो बुझैक अछि।” देवकान्तक बात सुनि किसुनलाल तँ ससैर कऽ लगमे आबि गेल, मुदा सिंहेश्वरी किछु आगू बढ़ि, किछु पाछू आबि कऽ ठाढ़ भेली। जहिना कोनो बच्चोसँ कोनो गप बुझै बेरमे रंग-रंगक प्रश्न पूरक प्रश्न पुछि संतुष्ट होइत अछि। तहिना देवकान्तोक मनमे हुअ लगलैन जे कोनो बात बुझैले सोझहा-सोझही नीक होइ छै। लजकोटर तँ बहुत बात छोड़िए दैत अछि आ बहुत बिसरियो जाइत अछि। दोखाह तँ दुनू भेल। अपने निच्चाँ उतैर सिंहेश्वरीकेँ ऊपर चढ़बैत देवकान्त बजला- “कनियाँ, आइ ने किसुनलाल दू-पाइ कमाएल हेन तँ फुलपेन्टो पहिरने देखै छिऐ, मुदा जखन गाममे छल तखन तँ वएह एकटा चरिहत्थी गामछा छेलइ। डाँड़मे लपेटने रहै छल। गप-सप्प करैमे कोनो लाज-धाक नै हेबा चाही। हम जे बुझै छिऐ से अहूँ पुछू आ जे नै बुझै छिऐ से हमहूँ किए ने पुछब। तइले लाज-संकोचक कोन काज छइ।” पत्नीकेँ चुप देख किसुनलाल बजला- “भाय साहैब, कहैले तँ गाममे नै छी मुदा गामे जकाँ एतौ छी। ने ओते कमाइ होइए जे होटल घुमब आकि ज्वेलरी घुमब। खाली डेरासँ कारखाना आ कारखानासँ डेरा अबै-जाइ छी। अठबारे छुट्टी दिन कनी-मनी घुमि लइ छी, सेहो पएरे।” पतिक बात सुनि सिंहेश्वरी पाछूसँ ससैर कनी आगू बढ़ि तिरछिया कऽ ठाढ़ होइत बजली- “की कहलखिन?” देवकान्त बजला- “कहलौं यएह जे तिलकोरक चटनी केना बनबै छिऐ?” सिंहेश्वरी- “भैया, हिनका कि कोनो नै बुझल हेतैन?” देवकान्त– “नइ कनियाँ, कोनो कि हमरा जँचैक अछि, धरमागती कहै छी नै बुझल अछि।” तैबीच सामंजस करैत किसुनलाल बाजल- “भाय साहैब, ओना हम तरूओ खेने छी, सागो खेने छी, आ चटनियोँ खेने छी आ धिया-पुतामे पाकल तिलकोरक फड़ सेहो खेने छी। जाबे माए जीबैत रहए ताबे आन दिन तँ नहियेँ मुदा जुड़शीतल पाबैनमे तिलकोरक तरुआ अबस्से तरए। बड़ खर्चाक चीज छी। ओतेक खर्च करि कऽ खाएब असान थोड़े छइ।” पतिक सह पबिते सिंहेश्वरी बजली- “भैया, हमर माए-बाप बड़ गरीब छला। भरि पेट अन्नो ने भेटै छेलैन, तखन जे तरुआ-बगहरुआक सेहन्ते करितैथ से पार लगितैन?” सिंहेश्वरीक बात सुनि मुड़ी डोलबैत देवकान्त बजला- “हँ, से तँ ठीके। हमहूँ की कोनो बेसी खेने छी। जहिया कहियो घरदेखीमे केतौ जाइ छी, तखन खाइ छी। सेहो आब उठाबे भेल जाइए। आब तँ सहजे लोक तेहेन चिकनिया भऽ गेल जे अल्लुएक पाँचटा पूरा लइए। नवका तूर तँ खाइक कोन गप जे बुझबो ने करैत हएत। पात-पुत कहि थोड़े खाएत। अच्छा छोड़ू ऐ सभकेँ, असल बात तँ छुटले अछि।” विचारक सामंजस पाबि सिंहेश्वरीक उत्साह जगलैन, बजली- “भैया, साग तँ बुझले हेतैन जहिना कदीमा पात आकि अरिकंचन पातकेँ कत्तासँ काटि भूजल जाइ छै तहिना तिलकोरो पातक होइ छइ।” हुँहकारी भरैत सिंहेश्वरीक बातकेँ मानि देवकान्त बजला- “हँ-हँ, तिलकोरक साग तँ केत्तादिन खेने छी। मुदा चटनी नहि।” जहिना नव काज केने, नव जगहपर पहुँचने वा नव लोकसँ दोस्ती भेने मनमे खुशी होइत तहिना दस बर्ख पहिलुका खेलहाक चर्च करैमे सिंहेश्वरीकेँ मनमे खुशी उपकलैन। मुस्कियाइत बजली- “भैया, जहिना अरिकंचन-पातकेँ कदीमा पात वा आन पातक तरमे दऽ पतौड़ा बना आगिमे पकौल जाइ छै, तहिना तिलकोरो पातकेँ पकौल जाइए। जखन उपरका पात झड़ैक जाइ छै तखन बुझि जाइयौ जे तिलकोरक पात सीझ गेल हएत। ओकरा चूल्हि सँ निकालि चाहे पानिक बरतनमे दऽ दियौ नै तँ कनीकाल सराइ-ले छोड़ि दियौ। जखन सरा जाएत तखन ओकरा पतौड़ासँ निकालि सिलौटपर थकुचि कऽ पीसि लिअ। बहुत मसल्लाक काजो नै पड़ै छइ। चसगरसँ नून मिरचाइ दऽ दियौ। बस भऽ गेल। ओना, लोक भातोमे खाइए मुदा रोटीक तँ बुझियौ जे जहिना भातक दालि छी, तहिना रोटीक तिलकोरक चटनी छी।” सिंहेश्वरीक बात सुनि तेसर ढकार करैत देवकान्त लोटा उठा पानि पीब बजला- “किसुनलाल, बहुत खेलियह समानक आगू खेनिहार थोड़े ठठत। बड़ ओरियान केने छेलह।” जहिना नीक विद्याथी बोर्ड वा युनिवर्सिटीमे टॉप केलोपर झुझुआइत जे दुइयो प्रतिशत नम्बर और रहैत तँ अस्सी प्रतिशत पूरि जइतए, तहिना किसुनलाल कहलकैन- “भाय साहैब, कनियोँ आर खाइयौ।” आग्रह सुनि देवकान्त बजला- “हम कि कोनो राक्षस छी जे केतबो खाएब तँ पेटे ने भरत। मनुखक जे भोजन छिऐ से तँ खेबे केलौं। तूँ नै अन्दाज केलहक जे लोक केते खाइए। पेटेक कोन बात जे मनो भरि गेल। अच्छा एकटा बात कहह जे अपन गौंआँ के सभ ऐठाम, रहै छैथ?” देवकान्तक प्रश्न सुनि किसुनलाल मने-मन सोचए लगल जे बम्बइ सनक शहरमे के केतए रहैए, ई भाँज तँ मात्र दुइए गोरेकेँ रहै छइ। पहिल जे काज नै करैए आ दोसर जे कोनो कम्पनीक एजेंसी करैत हुअए। बाँकीकेँ कोन जरूरत छइ। अठबारे छुट्टी होइए तइमे कि सभ करब, केते करब। कपड़ा-लत्ता खींचब आकि सप्ताह भरिक अधखरूआ नीन पुराएब, आकि दुनू परानी मिलि कोनो नव जगह देखए जाएब आकि भेँट-घाँट करब। तखन तँ ओहुना कियो-ने-कियो दर्शनीय जगहपर भेँट-घाँट भाइए जाइ छैथ। गाम-घरक हालो-चाल बुझि लइ छी आ संग मिलि चाहो-पान कऽ लइ छी...। अपन मजबूरीकेँ छिपबैत किसुनलाल बाजल- “भाय साहैब, अहूँक जेठजन तँ परिवारे लऽ कऽ रहै छैथ, हुनकासँ सभ भाँज लगि जाएत। तखन हम एते जरूर कहब जे जइ करखानामे काज करै छी तइमे तीन गोरे छी। कहैले तँ उठे काज अछि मुदा सभ दिन काजो लगैए आ एकेठाम सात दिनक पगारो भेटैए। जइमे रबि दिनक सेहो भेटैए।” देवकान्त- “औझुका तँ छुट्टी लिअ पड़ल हेतह?” “किए छुट्टी लिअ पड़त। कोनो कि ओकर दरमाहाबला नोकरी करै छिऐ। औझुका बदला रबि दिन काज कऽ देबइ। कोनो की स्कूल-आँफिस छी जे सोलहन्नी बन्न होइए। करखाना छिऐ, सभ दिन चलिते रहै छइ।” “परिवार किए गामसँ लऽ अनलहक ऐठामसँ कमे खर्चमे गामक परिवार चलैए?” “भाय साहैब, अहूँ अनठा कऽ बजै छी। गाम-घरक लोकक किरदानी नै देखै छिऐ जे ताड़ी-दारू पीब-पीब कि सभ करैए। अपन इज्जत अपने सोझहामे नीको होइ छै आ लोक बँचाइयो सकैए। तखन देखियौ, मनमे तँ ऐछे जे जखने गाममे रहै-जोकर, कोनो काज ठाढ़ करै-जोकर पूजी भऽ जाएत, तँ गामे चलि जाएब।” “केते महिना बँचै छह?” “एते दिन तँ बुझू जे कहुना कऽ गुजर केलौं मुदा आब छह महिनासँ गोटे मास हजार रूपैआ आ गोटे मास पनरहो सौ बँचि जाइए।” “बैंकमे जमा करैत जाइ छह किने?” “बैक जाएब से छुट्टी होइए। एजेन्ट-फेजेन्ट तँ ढेरी अबैए मुदा ओकरा सबहक भाँजमे नइ पड़ए चाहै छी।” “कमो पूजीसँ तँ गाममे काज चलै छै आ बिनु पूजियोक चलै छइ।” “हँ से तँ चलै छइ। जेकरा अपन कारोबार नै छै ओ दोसराक काज करैए। मुदा देखते छिऐ जे केते बोइन दइ छइ। तहूमे आब कहुना-कहुना दुनू परानीमे आठ हजार महिना उठबै छी, ऐठाम महगी अछि तँए कम बँचैए। मुदा गाममे तँ कम-सँ-कम ओते कमाइ हुअए जे जहुना गुजर कटै छी तहुना पूरा सकी।” “अपन की अन्दाज छह जे केते दिनमे पूरा लेबह?” “जँ भगवान नीकेना रखलैन तँ डेढ़-दू सालमे जरूर पूरि जाएत। अहाँक भाय-साहैब सबहक दोसरे दिन-दुनियाँ छैन।” ‘भाय साहैब’क नाओं सुनिते जहिना भरल पेटक गरमी होइ छै तहिना देवकान्तकेँ फुकि देलकैन। मुदा अपनाकेँ सम्हारैत बजला- “सुथनी भाय-साहैब! मन भेल जे कनी बम्बै देखी, दरभंगामे टिकट कटेलौं चलि एलौं। तोहर नाओं-ठेकान लऽ नेने रहिहह तँए तोरा डेरापर चलि एलौं। भाइए छिआ तँ की, ओइसँ सतरह-बर नीक तूँ छह। कम-सँ-कम समाज बुझि सुआगत तँ केलह।” अपन प्रशंसा सुनि किसुनलाल विह्वल भऽ गेल। बाजल- “भाय साहैब, ओते तँ कमाइए ने अछि जे अइल-फइलसँ खर्च करब, मुदा समाजक जँ कियो डेरापर औता तँ अनका जकाँ मुँह नै घुमा लेब।” किसुनलालक सह पबैत देवकान्त बजला- “किसुनलाल, जखन परिवारे सभ कोकैन गेल तँ समाज केहेन हएत। मुदा तँए सोल्होअना परिवार कोकनियेँ गेल सेहो बात नइए। जाबे धरतीपर धर्म नै छै ताबे चलै केना छइ।” किसुनलाल- “भाय साहैबक भेँट करबैन की नहि?” “मन तँ एको पाइ नइ अछि मुदा जखन ऐठाम आबि गेलौं तखन नहियोँ भेँट करब उचित नहियेँ हएत। तोरा तँ हुनकर मोबाइल नम्बर बुझल हेतह किने?” “हँ, से तँ लिखल अछि। मुदा मोबाइल अपना कहाँ अछि?” “बुथपर सँ तोहीं कहि दहुन जे देवकान्त गामसँ एला अछि। जँ गप करए चाहता तँ अपने कहथुन, नहि तँ जानकारी तँ भेटिये जेतैन।” भायपर बिगड़ल देख सिंहेश्वरी देवकान्तकेँ पुछलकैन- “भैया, एना खिसियाएल किए छथिन?” देवकान्त- “कनियाँ, की कहब! कहैले तँ पाइ-कौड़ीबला कहबै छैथ। तहिना घरक घरोवाली छथिन। अपना तँ कनी-मनी कुल-खनदानक लाजो होइ छैन मुदा घरवाली जे छैन ओ भगवानेक देल..!” सिंहेश्वरी- “जखन अपने नीक छैथ तखन हुनकर घरवालीसँ कोन मतलब छैन?” देवकान्त- “मतलब पुछै छी। की कहब, बजितो लाज होइए जे एके परिवारक छी तखन एना किए बजै छी। मुदा नहियोँ बाजब सेहो तँ गलतिये हएत। अपने जे भाय साहैब छैथ से ने मरदे छैथ आ ने मौगीए। बलिगोबना छैथ। जहाँ किछु बाजए लगता आ पत्नीक आँखिपर नजैर पड़तैन आकि बोलीए बदैल जाइ छैन।” ◌ शब्द संख्या : 1840 एकोटा ने पुरमपुर गाममे पुरन कक्काक परिवारकेँ गौंओँ आ अनगौंओँ पुनचन परिवारसँ जनै छैन। ओना अस्सियो बर्खक अवस्थामे कहियो पुरन काका कनमा-कनइ नै पढ़लैन मुदा कनमा-कनइक किरदानी देख-देख सदिकाल क्षुब्ध जरूर रहै छैथ। गड़े ने बैसै छैन जे जे वस्तु तराजूपर रखि बटिखाड़ासँ तौलल जाएत ओ जँ बँटाइत-खोंटाइत पौआ-कनमा होइत रत्ती-माशामे चलि जाएत। खाएर ओ तँ चलि जाह, मुदा दुनियाँक एते नमहर धरती केना बँटाइत-खोंटाइत कनमा-कनइ होइत फनइ दिस पहुँच जाइए? वादलक किरदानी की पतालक पानि सोंखि लेत? जँ सोंखउ चाहत तँ राखत केतए? हवा-बिहाड़ि केत्तेकाल अँटका कऽ रखि सकैए। खाएर जे हौउ मुदा करैला लत्तीक मचान जकाँ अपना परिवारकेँ पुरन काका बनौने छैथ। जहिना सक्कत-कड़गर बीआ धरती धारण करिते, दियारीक तेल-बाती जकाँ अपन तिल-तिल अर्पित करए लगैत अछि, तहिना ने करैलोक बीआ केने अछि। वएह अँकुर ने धरती धारण करैत ऊपर आबि लत्ती बनि लतड़ैए। भलेँ पातर-छीतर कड़चीक आलनक संग मचानपर किए ने पहुँचैए। तँए कि ओ अपन शरीरक रक्षा करैत, अपन मुँह बँचबैत नै पहुँचैए? जरूर पहुँचैए। पुरन कक्काक परिवारोक सभ तेहने छैन जे अपनामे जँ घंघौज होनि मुदा काकाकेँ लग पहुँचते सभ सकदम भऽ जाइ छैथ, किएक तँ सभ बुझै छैथ जे अगियाएलमे हँसियो हिहिया कऽ धड़ै छइ। तँए जहिना रस्तापर ऐंठैत-जुठैत चलैबला साँप बोहैरमे प्रवेश करिते सोझ भऽ जाइए तहिना कक्काक सोझहामे परिवारक सभ सदस्यक चालि-बेवहार सोझ भऽ जाइत अछि। ओना, बिनु पैरक चलैबला साँप माटिपर चलि केना सकैए। मन-चित्त मारि पुरनो काका राति-दिन परिवारेक पाछू लगल रहै छैथ। अखनो मनमे ओहिना ओ बात तरगरे छैन जे वीर भोग्या बसुंधरा.., माने जे ऐ धरतीसँ प्रेम करत ओकरे ई कखनो प्रेमी बनि तँ कखनो माए-बहिन बनि चुम्मा लेत। चेतनसँ बालबोध धरिक परिवार पुरन कक्काक छैन। सबहक बीच तालो मेल अजीव छैन। चेतन सभ जहिना पुरन काकाकेँ गारजन बुझि छुट्टी नेने रहै छैथ तहिना तँ बालो-बोध सभ अपन बाबा बुझि अपने सभ किछु बुझैए। परिवारक सभसँ छोट बच्चा चारि सालक छैन। तालो-मेल नीक छैन। अँगनाक सभ समाचारक समदिया रहितो संवाद-बाहकक काज बच्चा सभ करिते छैन। एहेन चेला भेटबो मोसकिल, मुदा से तँ छैन्हे। नवका दोस्तियारे तँए बेसीकाल एकठाम रहने चाहो-बिस्कुट संगे करै छैथ, खुशी रहै छैथ। पुरन काका ऐ दुआरे खुशी रहै छैथ जे अपन बात पहिने उसारि, भरि दिन गप सुनैले दिनमा तैयार रहैए। आ दिनमाक खुशीक कारण अछि जे आँखि-कान तँ तखने ने काजक बनतै जखन ओकरासँ काज कराएत। नइ तँ गमे-गमे गेड़ी बनि जाएत। मुदा से कहाँ होइ छै, एक काने सुनैए आ दोसर कान देने उड़ि जाइ छइ। उड़ैत-उड़ैत सुतली रातिमे सभटा उड़ि जाए छइ। वसन्तक आगमन भऽ गेल। किछु दिन पहिने तक जे मौसम जाड़सँ जड़ियाएल छल, पालासँ पलाएल छल, ओ आब फुरफुरा कऽ उठल। सुखाएल-सड़ल लत्ती आ कुमही जकाँ पबिते वसन्ती हवामे उड़ए लगल। बेदरंग भेल धरती, घर-आँगन जकाँ बाहरै-सोहरै लेल इशारा दिअ लगल। रसे-रसे रस भरल हवाक रमकी रमकए लगल। जहिना सेवा निवृत्तिक समए कोनो अफसरकेँ स्वर्ग सुझैत तँ कोनोक आगूमे नांगट नर्कक नाच होइत, तहिना शिशिर–सिरसिराइत समए–वसन्तक बीच हुअ लगल। मुदा से बात पुरन कक्काक परिवारमे नै छैन। कोल्हुक बरद जकाँ परिवारक सभ सदस्य अपने-अपने नाचक पाछू भरि दिन लागल रहै छैथ। दिन उगिते दिनमा, बाइस खा माटिक बनौल जत्ताक दुनू पट्टा दुनू हाथमे नेने दरबज्जाक आगूमे बैस, रस्ताक धूरा-गरदाकेँ जत्तामे पीसए लगल। बिनु देखनौं आशा बनले रहै जे बाबा दरबज्जेमे छैथ। सूतल छैथ कि जागल छैथ, तइसँ कोन मतलब दिनमाकेँ। ओ तँ अपन काजमे बेहाल अछि। मनमे रहबे करै जे चाहक बेर भऽ गेल अछि माए चाह आनि देबे करतैन, हमहूँ जा कऽ पीबे करब। दिनमाक एहेन बिसवास किए ने रहतै, परिवारक बोझसँ दबल थोड़े अछि जे नून नै अछि, तेल नइ अछि आकि केसक तारीखपर जाए पड़त...। जहिना तत्त्व-वेत्ता तत्त्व-चिन्तनमे रमल रहैत तहिना दिनमा अपन काजमे हेराएल रहैए। कोन मतलब ओकरा छै जे बुझत काजक हेराएल अधखरूआ रहि जाइए। माइक हाथमे चाह देखते दिनमा, जत्ता छोड़ि आगूए आगू दरबज्जापर ऊपर चढ़ल। दिनमापर नजैर पड़िते पुरन काका मुस्की दैत बजला- “की दिनबाबू, चाहो-ताहक बेर भेलै की नहि?” तैबीच चाह नेने पुतोहु पहुँच पुरन कक्काक लगमे गेलैन। दिनमाक नजैर देबालमे टाँगल हनुमानजीक छातीक रामपर पहुँच गेल। फोटो देख दिनमा बाजल- “बाबा, उ फोटो उतारि दिअ।” दिनमाकेँ पोल्हबैत पुरन काका बजला- “बौआ, पहिने चाह पीब लिअ पछाइत ई सभ हेतइ?” दिनमाकेँ जेना बुझले रहै तहिना बाजल- “पहिने अहाँ पीब ने लिअ, पाछू हम पीअब।” बहन्ना पकड़ाइत देख पुरन काका बजला- “अखन हमरा हाथमे गिलास अछि केना उतारल हएत?” चाह पीब, खिड़कीपर रखल खुरपी उतारि पुरन काका बाड़ी दिस विदा हुअ लगला। हाथसँ खुरपी छिनैत दिनमो आगू-आगू विदा भेल। दारीमक बाड़ी पहुँच पुरन काका हिया-हिया हियबए लगला तँ बुझि पड़लैन जे दारीमक जड़िमे पानिक अभाव अछि। मुदा गाछक डगडगी आ लदल फूल देख मन ललिया गेलैन। लाल-लाल फूलसँ लदल गाछ। सभ डारिमे फूल फुलाएल। खुरपी नेने दिनमा खाधि खुनैक जगह हियबैत रहए। आ पुरन काका फूल सभकेँ हिया-हिया देखैत हरियाएल-हरियाएल फड़ो सभपर नजैर पड़लैन। मन भेलैन जे जेतबे-तेतबे जड़ि सबहक खढ़ उखाड़ि दिऐ। मुदा नजैर दारीमक काँटपर गेलैन। डारिये काँट भऽ जाइए। ऊपर-निच्चाँ सगतैर काँट। जखने अपने खढ़ उखाड़ए लगब तखने दीनमो किछु-ने-किछु करइ लगत। तहूमे खुरपी हाथेमे छइ। तेहेन झाड़ी अछि जे सुगबा साँप जकाँ माथमे गड़तै कि गरदेनमे गड़तै तेकर कोन ठेकान। जखने काँट गड़तै की कानब शुरू करत। जखने कानत तखने ओकरा चुप करब आकि गाछक जड़िक खढ़ उखाड़ब...। समझौता करैत पुरन कक्काक सोझमे दोसर काज एलैन। काज ई जे फड़क गिनती कऽ ली...। हाथक खुरपी आड़िपर रखि दिनमाकेँ कोरामे उठा काका कहलखिन- “बौआ, अहाँकेँ नेने हम टहलब आ अहाँ फड़ गनब।” नव फड़क गिनतीक काज देख दिनमाक मन खुशीसँ आरो खुशिया गेल। मुदा मनमे एलै जे कट्टा भरि झाड़ीक बगानमे पचासोसँ ऊपर गाछक फड़ केना गनि लेब? तहूमे बीसे तक गनल होइए? तैबीच पुरन काका गाछक सभ फड़केँ अपने हिया-हिया देखए लगला। मनमे उठलैन- फड़क बीच कीड़ोक असर भेल अछि कि नहि, सेहो देख ली। एक्केटा गाछक फड़ देख काका अन्दाजि लेलैन जे केते हएत। जहिना गोल-गोल, किछु नमती नेने लाल-लाल फूल हरियर होइत अपन जिनगीक फल पकैड़ रहल अछि, तहिना तँ गोटि-पँगरा करुआएल आमक आकार सेहो पकैड़ रहल अछि। एकसँ दोसर गाछक फड़ गनैमे दिनमा बेर-बेर बिसैर जाए। कखनो गिनतिये छुटि जाइ तँ कखनो अंके बिसैर जाए। अनेको परियासक बीच एक्को बेर दिनमा बीससँ ऊपर नै बढ़ल। तैबीच काका पुछलखिन- “बौआ, केते फड़ भेलह?” बाबाक प्रश्न सुनि दिनमाक मुहसँ निकैल गेल- “दसटा।” “अच्छा बड़बढ़ियाँ। आबसँ एत्तै आबि कऽ खेलिहह। ओगरवाहियो भऽ जेतह आ खेलबो करबह।” नीक फसल भेलैन। खाइ-जोकर फल हुअ लगल। फड़ फल बनि गेल। ओना सजमैन फड़क-फड़े रहि जाइत अछि। मुदा दारीम, आम, लताम इत्यादि फड़सँ फल बनि जाइत अछि। अन्तिम अवस्था अबैत-अबैत तुबि-तुबि फल अपने खसए लगल। गाछक सभ फल समाप्त भऽ गेल। जहिना परसौती जनानीकेँ देख-भालक जरूरत पड़ैए तहिना ने वाड़ियो-झाड़ीक अछि। ई सोचि पुरन काका दिनमाक संगे दारीमक गाछ लग पहुँचला। पहुँचते देखलैन जे जे गाछ कहियो फड़-फूलसँ लदल छल ओ आइ सून-सून भेल अपन बेथा सुना रहल अछि..! बेथित मने काका दिनमाकेँ पुछलखिन- “बौआ, केते फड़ अछि?” विचलित होइत दिनमा बाजल- “एकोटा ने।” “ऐ लेल विचलित किए होइ छी। जहिना समए आएल छेलै तहिना फेर औत।” “केना औत?” “समए अनुसार एकर ताक-हेर करैत रहब तँ एबे करत।” ◌ शब्द संख्या : 1146 धोतीक मान जहिना तेहैया बोखार तरे-तर अबितो आ जाइतो गहियेने रहैत तहिना लाल काकाकेँ तीन दिनसँ विचित्र सोग गहि कऽ पकैड़ लेलकैन। ओना, जखन कोनो काजक अनमेनामे लगि जाइ छैथ तखन छोड़ियो दइ छैन। मुदा काज बदैलते पुन: आबि जाइ छैन। मुदा कहबो केकरा करथिन, घरेलू सोग छिऐन। सोगो तेहेन जे जहिना तिआरि जालमे माछ फँसि जाइत, जे ने बंशी जकाँ जे बोरक सुगन्धसँ फँसि जान गमबैत आ ने सहतक ठनका जकाँ मरैत। मुदा तैयो तँ घाउ लगले छैन। लाल कक्काक सोगक दोसरो कारण छैन। ओ ई छैन जे दुनू परानीक बीच ने कहियो वैचारिक संघर्ष भेल छेलैन आ ने रक्का-टोकी। मुदा आइ ओ सद्य: भऽ गेलैन। बात किछु ने, बुढ़िया फूसि। मुदा सोग तेहेन जे रोगेनहिटा नहि, सोगेनौं छैन। जइसँ कोनो काज करैमे मने ने लगए दइ छैन। तीन दिन पहिने जखन सढ़ुआरेसँ भरपूरा नोत, एलैन तखनेसँ सोगक आक्रमण लाल काकापर भेलैन जे गहिया कऽ धेने छैन। ने छोड़ैत बनै छैन आ ने पूरैत। साधारण जिनगी जीबैक अभ्यास तँए पाइ-पाइक हिसाब जोड़ि समुचित काज करैत जिनगी चैनसँ चलैत रहै छैन। मुदा गतिक अनुकूले आमद-खर्च रहने भातक उजरा आँकर जकाँ दाँत तर खटखटा रहल छैन, जे आँकरक संग भातो फेकए पड़तैन। नजैर उठा कऽ देखैथ तँ सोझहेमे देख पड़ैन जे भारमे धोतीक खर्च वाह्ययात अछि, किएक तँ धोतीक मान तँ ओइ समए सर्व-सम्मैत छल जखन एकाधिकार वेपार जकाँ छल, मुदा जैठाम दू साए रूपैआक धोती लऽ जाएब तैठाम कियो पहिरिनिहार नै अछि, मांगलिक काज छोड़ि धोती म्यूजियमक वस्तु बनि गेल अछि। अपन तँ दू दिनक कमाइ दहा जाएत। मुदा पत्नी तँ मानती नहि। अपना सीमामे सभ बताह होइए, भलेँ आन सीमामे नाँगैर पटपटबए आकि दाँत चिआरए। मानबो उचित नहियेँ। किएक तँ पत्नीक मान तँ परिवारमे दादीक छैन। बाबा-दादाक पकिया संगी। शुभ काजक शुरूहेमे खट-पट भेने कहीं अन्त धरि ने खटपटाइते रहि जाए, तेकर डरो रहैन...। मुदा तैयो विचारि लेब जरूरी बुझि लाल काकीकेँ पुछलखिन- “काल्हिये ने नोत पूरए जाएब। आइए ने सभ ओरियान-बात कऽ लेब?” लाल काकी कहलखिन- “घरक ओरियान ने हम करब, हाटो-बजारक हमहीं करब?” लाल काकीक चढ़ल तर्क देख लाल काका दोहरौलैन- “बजारक काज की सभ अछि?” “आर किछु ने अछि। खाली जोड़ भरि धोती आ अँगा-गमछा कीनि लेब।” लाल काकी आढ़ैत सुनि लाल काका मने-मन जोड़ैथ तँ देख पड़ैन जे कियो धोती पहिरिनिहारे परिवारमे नै अछि, जखन धोती नइ, तखन कुर्ता आ गमछा तँ सुखल नून-चूड़ा भेल। केतबो हएत तँ जलखैइए। मुदा रहैथ तँ बेवस। पुछलखिन- “आब कि कोनो भार-दौर चलै छै जे ई सभ लऽ जाएब?” लाल काकाकेँ चिलहोरि जकाँ झपटैत लाल काकी बजली- “एक तँ चाउर दहीक बदला रूपैये लऽ जाएब मुदा नव वस्त्रो नै लऽ जाएब से केहेन हएत?” बजैत लाल काकीक आँखिसँ नोर ढवढबए लगलैन। फटैत छातीक दरद बाँसक झाँझन जकाँ झनझनाए लगली- “बहिन मरमा मरिये गेल, मुदा अन्तमे मुँह नै देख पेलौं। भगवानो तेहेन छैथ जे सभटा दुख ओकरे घरमे देलखिन। चढ़ल जुआनी दुनू परानी मरल, अढ़ाइ बर्खक मइटुग्गर-बपटुग्गर बेटाक बिआह छिऐ, तेकरा पाँच हाथ वस्त्र हमहूँ नै देबै तँ दुनियाँमे के देतइ?” ◌ शब्द संख्या : 480 साझी गामक पहिल घटना तँए गाममे विचित्र हलचल भोरेसँ उठि गेल। उठबो केना ने करैत, अखन धरि तँ इतिहासो यएह कहलक आ समाजो सएह। मुदा घटना बदलने इतिहासक रस्तो बदैल जाइ छै आ बहिला समाज सेहो बाह पकड़ै छइ। विचित्र हलचलक कारण भेल विचित्र घटना। विचित्रक कारण भेल चित्र विचित्र बनि गेल, तँए गामक सबहक मनकेँ कुचित्र सुचित्र बनबए लगल। जेहेन जेकर रंग-गाढ़ तेहेन तेकर चित्र गढ़गर। तँए एक रंगाह नै भेने आरो बेसी हलचल। मनक प्रेम तँ तखन ने बढ़ै छै जखन अनुकूल प्रेमी भेटै छइ। प्रेमियो कि कोनो एक्के रंगक होइए जे ओहीपर नजैर पड़तै आ नजैर पड़िते धारक पानि जकाँ मोटाए लगतै। जँ से नइ हेतै तँ जेहो छै तइमे सँ किछु रौदमे उड़तै, किछु धरती पीतै आ किछु लोको घटौतै, जहिना बिलंबसँ चलैवाली गाड़ी टीशने-टीशन विलैमते चलैए, भलेँ कुमेल भेने रस्ता-बाटमे छोड़ि आन-आन दौड़ैत चलैए...। ओना, गामक विचित्र घटना देख सबहक मन उड़ैत मुदा जिनगीक काज पकैड़-पकैड़ हटबैत गेल। मुदा केतबो हटल तैयो तँ बाँकीए रहि गेल, सोलहन्नी नहियेँ हटल। नहियेँ हटल तँ की हेतइ? अदहासँ बेसी तँ रहिए गेल, तँए बहुमतेसँ ने समाज, देश सभ चलै छइ। तखन गामेमे कोन उनटन भऽ गेलै जे गाम-समाज नै चलतै। मुदा गामो तँ सोलहन्नी मरिये नै गेल अछि जे कियो नामो लइबला नै रहतै। से तँ अछिए। सेहो तेहेन अछि जे हजार कानकेँ एक्के बेर भरि देत। जहिना पूजा करब काज छी तइसँ कि हल्लुक काज फूल तोड़ब थोड़े छी। जखन नै छी तखन किए दुनू दू रंग हेतइ। चौबट्टी परहक इनारक चलती सभसँ बेसी भऽ गेल। नवकी पनिभरनी सभ थैर-गोबर छोड़ि-छोड़ि पहिने पानियेँ भरए इनारपर पहुँच गेली। मुदा तँए कि पुनियोँ दादी आ घुरनियोँ दीदी ओहने अगुताएल छैथ जे पहिने पानियेँ भरए पहुँचती। एक तँ बेटा-पुतोहुकेँ डाकैन देती जे ऐसँ निपुत्रे नीक, ने तँ ऐ चौथापनमे अपने घैल उठाबी। तहूमे नवका आगि गाममे पजरल। माघमे जँ अनको धधगर घूर भेटए तँ ओकरा छोड़ि देब बेवकुफीए छी, भलेँ अपनो धिया-पुता किए ने घरमे कठुआ जाए। ओना दुनू गोरेक घर इनारसँ बहुत हटल नहि, मुदा लग-दूर कोन बात भेल। लगोक बाटमे दसटा गप करैबला भेटल तँ बेसीए समए लगत आ नहियेँ भेटने दूरो लग भऽ जाइ छइ। सएह दुनू गोरे–पुनियोँ दादी आ घुरनियोँ दीदी–केँ भेलैन। जवाबदेहियो तँ कम नहियेँ छैन अनकर बातसँ ऊपर उठा अपन बात नै रखती तँ पुनियाँ दादी आ घुरनी दीदी कथीक। तइसँ नीक तँ नवकीए, जे कम-सँ-कम अपनो हित-अपेछित लग रसगर बात बजै छैथ। संजोग तँ संजोगे छी, चाहै काज करैक संजोग हुअए आकि भोज खाइक, नीके होइ छइ। भलेँ ओ चालि बदैल कुसंजोगे किए ने भऽ जाए। पूबसँ पुनियाँ दादी आ दच्छिनसँ घुरनी दीदी पहुँचली। पुनियाँ दादी घुरनी दीदीसँ जेठ। तँए जेठक आदर करैत घुरनी दीदी इनारपर चढ़ैसँ पहिने स्वागत करैत पुनियाँ दादीकेँ टुसि देलखिन- “जहिना पाबैन दिन परिवार हड़बड़ा जाइए तहिना दादीकेँ देखै छिऐन!” अपन स्वागत देख पुनियाँ दादीक मन खुशीसँ खुशिया गेलैन। टुटल दाँतक मुहसँ मुस्की दिअ लगलखिन। अखन धरि पुनियाँ दादीकेँ धेनहि जे गामक बात हमरा छोड़ि दोसर बुझबे ने करैए। भलेँ सात पुतोहु हाथे मारि-गारि किए ने खाइत हेती। खाएर.., पुनियाँ दादी पहिने आँखि उठा इनार दिस तकली तँ बुझि पड़लैन जे जिज्ञासु बेसी अछि। घुरनी दीदी दिस देखैत बजली- “गै घुरनी, कहुना भेलेँ तँ बेटीए भेलेँ, आइ-काल्हिक नव-नौतुक हमर-तोहर बात सुनतौ। देह देख सभ अपने मोटाएल अछि। मुदा तोरा नै कहबो से केहेन हएत...।” जिज्ञासा भरैत घुरनी दीदी मलसारि दैत बजली- “कोनो तेहेन गप छैन दादी?” पुनियाँकेँ सभ दादी कहैत आ घुरनीकेँ दीदी। ओना उमेरोक हिसाबसँ उचिते छइ। मुदा दुनू गामक पुतोहुए बनि गाम आएल छैथ। दीदीक आदरसँ दादी आरो अह्लादित होइत। जहिना संज्ञाक संग सर्वनाम, विशेषण आदि सभ अगुआ-पछुआ बनि रथकेँ खिंचैत तहिना दादीक मनमे सेहो उठलैन। सोझहे बजैसँ नीक बुझि पड़लैन जे अलंकार-छन्द बनबे किए कएल जखन ओकर बेवहारे नै हेतइ। अलंकार शैलीमे दादी गामक चौहद्दी बान्हि बाजए लगली- “एहेन अतहतह तँ एक गामक के कहए जे परोपट्टामे केतौ ने देखै छी, जे..?” दादीकेँ विह्वल होइत देख दीदीक जिज्ञासा तेज भेलैन। लपैक कऽ पुछलखिन- “से की, से की दादी?” जहिना आमक गाछक डारिमे पाकल आम देख झमाड़ि-झमाड़ि डोला पाकल आम खसबए चाहैत, मुदा डोलौनिहार ई नै बुझि पबैत जे पाकले खसत आ काँच नै खसत। हँ एहनो होइ छै जे बेसी पाकलक डण्टीक रस सुखने असानीसँ खसैत मुदा जे डमहा पाकल छै ओ तँ ओहिना छै जहिना डमहा काँच होइ छइ। तहिना दादीक मन छगुन्तासँ छनकैत रहैन जे एहेन तँ केतौ ने भेल से गाममे केना हएत। मुदा भऽ तँ गेल! भेल ई जे ज्ञानचन काकाकेँ तीन बेटा आ दू बेटी छैन। तीनू बेटा पढ़ि-लिखि कऽ आने जकाँ नोकरी करए गाम छोड़ि देलैन। भीन भऽ गेलखिन कि साझीए-मे से नै कहि, मुदा ज्ञानचन काकाकेँ एको पाइ मदैत नै केलखिन। ओना तीनू भाँइ ऊपरा-ऊपरी पढ़लो-लिखल छैथ आ नीक नोकरियो छैन। पहिल बेटी डाक्टर पतिक संग सेहो बाहरे रहै छथिन। छोट बेटी वैधव्य भऽ गेलैन। असमए बेटीकेँ विधवा भेने ज्ञानचन काकाकेँ जबरदस धक्का मनमे लगलैन। अपनोसँ बेसी काकीकेँ लगलैन। एहेन कोन माइक छाती हएत जे अपने सुहागिन आ बेटीकेँ वैधव्य देखए चाहत। मुदा उपाइये की! दुखक तँ सभसँ पैघ दबाइ नोर छी। जेते नोर झड़त तेते भारी दुख मेटाएत। जहिना रेहीक संग मक्खन, छालही मोहि आगिपर लोहियामे चढ़ा घी बरकौल जाइत से दादीकेँ बरकौले ने होनि तँए क्षुब्ध रहैथ। बजली- “आब तँ अपनो उमेर ढेरी भेल तैपर नाना-जनम एहेन काज नै देखने छेलौं से गाममे देखै छी।” दादीक बात सुननिहारकेँ आरो जिज्ञासा बढ़ा देलकैन। एक्के-दुइए सभ पनिभरनी एक्के बेर दादीपर जोर देलकैन। थकथकाइत दादी बजली- “ज्ञानचनक तीनू बेटा–रूपचन, गुनचन आ विचारचन–केँ जखन नोकरी छुटलैन तखन गाम आबि साझी भऽ गेलखिन।” दादीक उत्तरसँ दीदी संतुष्ट नै भेली, मुदा संतोष नै भेलैन तँए पूरक प्रश्न केलखिन- “तइसँ पहिनहि भीन भेल छेलखिन?” दीदीक प्रश्नसँ दादीकेँ क्रोध उठलैन, बजली- “जेना लोक केबाड़ चौकी काटि-काटि बँटबारा करैए तेना होइतै तखन बुझितहक। आकि मनुखकेँ इशारा होइ छइ। मझिला बेटा अपन बेटीक बिआहमे चालीस लाख रूपैआ खर्च केलकै मुदा छोटका भाएकेँ पाइ नै देलकै तँ नून-तेल लगा केलक। की यएह सझिया भैयारी छिऐ?” दीदी बजली- “तखन तँ कमाइयो ने सबहक सभ रंग हेतै, ओ केना मिलौत?” तैपर दादी बजली- “सएह ने देखहक। जेकरे बेसी छै सएह पहिने कहलकै जे हमरा एते अछि, सभ मिला कऽ परिवार चलौ।” ◌ शब्द संख्या : 999 सतभैंया पोखैर पोखैर कहिया खुनौल गेल आ के खुनौलैन ई मिथिलांचलक इतिहासे जकाँ अखन धरि हेराएले अछि, मुदा एते गामक सभ मानैए जे पोखैरक बतारी ने एकोटा गाछ-बिरीछ अछि आ ने आन कोनो चीज। ओना, पोखैर नमहर रहने रंग-बिरंगक खिस्सा-पिहानी अछिए। कियो दैंतक खुनल कहैए तँ कियो राजा-रजवारक। मुदा जे हौउ, हजार बर्खसँ ऊपरक पोखैर जरूर अछि, जे सभ मानैए। शुरूमे पोखैरक महार जेहेन रहल हुअए मुदा अखन झड़ि-झूड़ि गेल अछि आ पोखैरक पेटो गदियाह भऽ गेल अछि। गाममे एकेटा यएह पोखैर अछि, मुदा एहेन अछि जे एते सघन गाम रहितो पोखैरक अभाव गौंआँकेँ नै हुअ दइ छैन। चाकर-चौड़गर पेट अखनो ऐछे, मुनहर जकाँ दर्जनो ठेक-बखारी सदृश...। गाममे सभसँ पुरानो आ झमटगरो परिवार मात्र सतभैंयाकेँ रहलैन। पोखैरो हुनके सबहक छिऐन। केना भेलैन से तँ नीक जकाँ किनको नै बुझल अछि मुदा जहियासँ देखै छी तहियासँ हुनके सबहक कब्जामे रहलैन अछि। ओना पोखैर तँ गामे-गाम अछि मुदा आन गामक पोखैरसँ ऐ पोखैरक अलग पहचान अखनो अछिए। ने एते नमहर कोनो गामक पोखैर अछि आ ने चौबगली महारक घाट। एक्के घाट रहने पारो नहियेँ लगैत जेना आन-आन गामक पोखैरमे अछि। आन गामक पोखैरमे बड़ बेसी अछि तँ एकटा-दूटा घाट अछि। एकटा मरद आ दोसर जनाना लेल। तहूमे रंग-बिरंगक बेवहार बनल अछि, जइक चलैत जँ कहियो गाममे आगि-छाइ लगै छै तँ गामे सुन भऽ जाइ छै, मुदा एकोटा पोखैर रहने आइ धरिक इतिहासमे कहियो ऐ गाममे एना नै भेल अछि। ओना गामक बनाबटो आन गामसँ भिन्न अछि। केते गाम पूबे-पछिमे सूर्यमण्डल-गढ़ैनक बनल अछि जइसँ पूर्बा-पछबाक झोंकमे आगि लगिते धुआ-पोछा जाइए। बिनु जाठिक पोखैर रहने अनगौंआँ तँ पोखैर मानबे ने करैत मुदा पोखैरक सभ काजक पूर्ति तँ होइते अछि, तँए गौंआँ लेल धैनसन। कियो अनगौंआँक गपपर धियानो ने दइत। सभ यएह मानि चलैत जे कियो अपन मुँह दुइर करैए। नीककेँ अधला कहने थोड़े अधला भऽ जाएत आ अधलाकेँ नीक कहने थोड़े नीक भऽ जाएत। जँ एहेन बजनिहार अछि तँ ओ अपन मुँह दुइर करैए। सभकेँ अपन-अपन गुण-धर्म होइ छै, से तँ अछिए। चारू महार घाट रहने सबहक काजो चलिते अछि। तहूमे आन गाम जकाँ कोनो रोक-राक ऐछे नहि, जे ई घाट पुरुखक छिऐ तँ ई घाट जनानाक, ई फल्लाँक खुनौल छिऐन तँए दोसरकेँ नहाए देथिन कि नहि से हुनकर मन-मरजी छिऐन। कियो जाठि गाड़ि पोखैरक पहचान बनौने छैथ तँ छैथ। पोखैरक पहचान भलेँ जाठि हौउ, मुदा झील-सरोवर आकि धारमे जाठि कहाँ रहैए। तँए कि ओकरा कुमार कहि कात कऽ देबइ। आम खेनिहारकेँ आम चाही आकि ओ गाछ-गाछी गनत। हँ, ई बात जरूर जे आमक गाछ केना होइ छै, केना लगौल जाइ छै, केना ओकर सेवा कएल जाइ छै एकर जानकारी रहक चाही। जइ जाठि लऽ लऽ अनगौंआँ नचै छैथ ओ तँ ईहो कहता ने जे जाठिक काज की होइ छइ? जँ बीच पोखैरक पानिक नाप मानल जाए तँ जइ पोखैरक किनछैरेमे उपयोग करै-जोकर नहाइ-धोइक पानि रहत, ओकर बीचक नाप नपैक जरूरते की रहत? ओहन पोखैरक मानियेँ केते हएत जे एकटा घाट–जे भलेँ सिमटीए-ईटाक किए ने हौउ–बना बाँकी भागमे मोथी रोपि खेत बना लेब आ जँ कहीं गाममे आगि लागत तँ छूत-अछूत कहि गामे जरा देब, मुदा आगि लगबे ने करै से ने सोचब आ करब। जनियेँ कऽ पोखैरकेँ अघट बना दुइर कऽ लेब, नहाइ-धोइ-जोकर नै रहए देब तँ ओइमे दोख केकर?खाएर जे हौउ, मुदा चारू महार घाटो आ बिनु जाठिक पोखैरो तँ अछिए। शुरूहेसँ गामक सतभैंया परिवार जोतल-चौकियौल खेत जकाँ समतल रहल अछि। ओना, बीच-बीचमे बाढ़ि-भुमकममे थोड़-बहुत उभर-खाभर बनबो कएल तँ ओकरा पुन: सेरिया समतल बना लेल गेल। मुदा भविस दिस नै देख, भूते दिस देखने तँ भूत लगबे करै छइ। मुदा तेकरो भगबैक तँ उपाय होइते अछि। बाबेक अमलदारीसँ सतभैंया अपन परिवारक पहचान परोपट्टामे बनौने रहल अछि। ओना, सात भाँइक भैयारीमे तीन भाँइक परिवार नावल्द भऽ गेलैन जइसँ ऐगला पीढ़ी अबैत-अबैत सातसँ चारि भैयारी रहि गेल। सात भाँइसँ सतरह हेबा चाहै छल से नै भऽ चारिपर उतैर गेल, तेकर कारण भेल जे एक भाँइ बेटीक बाढ़िमे दहा गेला। ढेनुआर नक्षत्र जकाँ बेटीक आगमन जोड़ा-पल्ला जे आबए लगलैन से ठीके सातसँ सतरह तँ नहि, मुदा एकसँ एगारह जरूर भऽ गेलैन। मुदा एकसँ एगारह होइतो हुनकर मुँह कहियो मलीन नइ भेलैन। मनक विश्वास अन्त धरि बनले रहि गेलैन जे प्रकृतिकेँ अपन गति छै, ओ अपन निअम-निष्ठासँ चलैए। जँ से नहि, तँ एक कम्पनीक वस्तु एक रंग होइ छै मुदा तइमे ओहन मेल-पाँच केना भऽ जाइ छै जे मेल-पाँच भेलोपर चारि-पाँच वा पाँच-छहसँ आगू-पाछू नै होइत अछि। भऽ तँ ईहो सकै छल जे एक रंगाहे होइत वा एकसँ पाँचो होइत वा आरो अन्तर भऽ सकै छल। मुदा से कहाँ होइए? जहिना एकसँ साए धरि गनू आ साएसँ एक दिस गनू,पचास तँ बिच्चेमे रहत। तँए बेटा-बेटीक बाढ़ि अबौ आकि रौदी हौउ, मुदा अपन व्यासक अनुकूले रहैत आएल अछि आ रहबो करत। दोसर भाए जे बच्चेमे कुभेला भेलासँ गाम छोड़ि परदेश गेला से पुन: घुमि कऽ नहियेँ एला। बाल-बोधकेँ सेवाक जरूरत होइ छै, होइत एलैए आ सभ दिन होइत रहतै। मुदा जखन वएह बाल-बोध चेतन भऽ जाइ छैथ, तखन हुनक विवेक की कहै छैन से तँ आनक-आन नै बुझि सकत। ओ अपने अपन कर्तव्यकेँ निर्धारित कऽ जीवन-पथपर चलता। खाएर जखन धरतिये भूमि छी तँ जेतए बास करब ओकरे मातृभूमि बना लेब। तहूमे ओइ बच्चाक तँ अधिकार बनियेँ जाइ छै जेकर जन्म जेतए बनि गेल हुअए। मुदा प्रश्न तँ अहूसँ आगू अछि। जँ धरती स्वर्ग वा वैकुण्ठ बनए चाहए तखन अपनामे बँटि कऽ बनत आकि सम्मलित भऽ कऽ? जँ से नहि, तँ हम केतए छी ई तँ देखए पड़त? मुदा मिथिलांचलोक भूमि तँ वएह भूमि छी जे सभ दिन प्रकृति प्रदत्त रहल अछि, अखनो अछि आ आगूओ रहबे करत। जँ से नहि, तँ कहाँ अरब करोड़पर लटकल आ करोड़ लाखपर? सभ दिन जहिना रहल तहिना अखनो अछि। भलेँ केतौसँ हमहूँ कहिऐ जे छीहे। तेसर भाँइक परिवार ऐ लेल आगू नै बढ़लैन जे शरीरसँ निरोग रहितो मनसनक बच्चेसँ भऽ गेला। जइसँ ने बिआह केलैन आ ने कोनो भाँइक बात-विचारमे कहियो रहला। तहिना बाँकी भैयारी मिलि घरक मोजरे समाप्त कऽ देलकैन। मुदा तइले हुनको मनमे कहियो दुखो नहियेँ जन्म लेलकैन। जखन भाय सभ लगमे बैसैथ तँ गरैज-गरैज बजैथ जे ‘मने सभ किछु छी, जे मनक मालिक ओ सबहक मालिक।’ मुदा भाइयो सभ बिना किछु टोकारा देने चुपे-चाप सुनि लैत जे अनेरे टोकने आरो बरदियाएब। से नहि तँ एक झोंक बाजि नारद जकाँ वीणा हाथमे लेता आ जेमहर मन हेतैन तेमहर विदा हेता। असगरूआ परिवारमे एककेँ वौड़ने परिवारेक उसरन होइए मुदा गनगुआरि जकाँ एकटा टाँग टुटनहि की हएत। एक भाँइ तँ परिवार-टोलसँ लऽ कऽ समाज धरि गढ़ि लइए। हम सभ तँ कहुना तैयो चारि भाँइ बँचल रहबे करब। बाँझी लगने डारि फड़ै नइए मुदा तँए कि ओ गाछसँ हटल रहैए, एहेन तँ नै होइत। पिताक अमलदारीमे चाकर-चौड़गर, चौघारा घरक आँगन हथिसार सन दरबज्जा, चन्द्रकूप सदृश इनार, सरोवर सदृश बिनु जाठिक पोखैरक बीच सबहक जिनगियो संयमित रहैन तँए परिवारमे हर-हर खट-खटक प्रश्ने किए उठत। ओना सातो भाँइक सातो काज सात रंगक। जिनगी लेल सातो उपयोगी मुदा गुण-बेवहार आ उपयोगक हिसाबसँ छोट-पैघ। हर-हर खट-खट नै होइक कारण एकटा दोसरो छल जे अपन-अपन बुधिक उपयोग कऽ स्वतंत्र रूपसँ सभ अपन-अपन काज सम्हारै छला। एक काजमे ने करैक बखेरा ठाढ़ होइत–जे एना-हेतै, एना नै हेतइ–मुदा एक विचारमे तँ से नइ होएत। समटल बिछानक सुख जहिना सुतनिहारकेँ होएत, तहिना ने समटल परिवारोकेँ होएत। छोट ओसार रहत आ बच्चा बेसी रहत तँ ओंघरा-ओंघरा खसबे करत। खाइकाल भिन्ने छिपली-बाटी फुटत, जहिना वस्तु वेपारक सहायक छी तहिना वेपार उपयोगक। जइ वस्तुक जेते उपयोग जिनगी लेल होएत ओ वेपार ओते चतरल। मुदा प्रश्न अछि जँ सभ फूल फूले छी तँ देवताक बीच बँटाएल किए अछि? जँ देवताक परसाद परसादे छी तखन महादेव किए बाँतर छैथ? अखन धरि सतभैंया परिवारमे घराड़ीसँ लऽ कऽ बाध धरिक जमीनमे दुइए बेर बँटबारा भेल छेलैन जे खूटे-खूट भेल छेलैन मुदा ऐबेर रूप बदैल गेल। भितरिया गुमराहट आबि गेल। मुदा खुलि कऽ आगू भऽ बजैले कियो अपन डेग नै बढ़बए चाहैथ। जहिना सुखल जारैनक बीच आगि हवा पबिते धधैक उठैए तहिना पोखैरक लहैर जकाँ सतभैंया परिवारमे उठए लगलैन। कारणो अछि जे कहिया केतए जे कँचका ईटापर खपड़ा घर बनौलैन सएह अखनो धरि चलि आबि रहल छैन। निच्चाँ जहिना मुसहैनक माटि भरल तहिना अकासक तरेगन जकाँ फुटल खपड़ा लग इजोत होइत। शुद्ध किसानक घर। चाहे खेतमे काज करैकाल बरखा हुअए आकि सुतली रातिमे, अन्तर कोनो नहि। जहिना गोनैरक दुनू भाग एक्के रंग भेने उनटा-सुनटाक प्रश्ने नहि, पहिलुका चद्दैरक चारूभाग बराबरे होइ छेलै आ जे बँचल अछि ओ अखनो ऐछे, तहिना धोतियोक, मुदा आजुक जे सिंग-मांगबला चद्दैर वा अन्य जे वस्त्र अछि ओ एकभग्गुए नहि, संयुक्त परिवारक एकाकी रूप जकाँ बनि गेल अछि। जहिना जनमौटी बच्चा छोटसँ पैघ बढ़ैत सिरिफ मानवे नहि, महामानवो बनैत अछि मुदा वएह मनुख मृत्युक पश्चात अछियामे जखन जरबैले जाए लगैए तँ पैघसँ छोट बनैत-बनैत लोथरा जकाँ बनि जाइत अछि तहिना ने भऽ रहल अछि। ओना, खूटे-खूट जमीन बँटनौं जहिना छुतकाबला केश कटबैकाल सभ बरबरिये भऽ जाइ छैथ। तहिना बाधक जमीनमे कनी घटियो-बढ़ी भेलैन मुदा घराड़ी आ पोखैरमे कोनो तरहक कमी-बेसी नइ भेलैन, सभ अपन-अपन उपयोगक अनुकूल रहैत आएल छैथ। तँए सतभैंया परिवारकेँ गामक लोक एके परिवार बुझि ने कियो किछु बजैत आ ने किछु पुछैत। जइसँ पूर्बा-पछबाक कोनो लसैर नहियेँ लगल छेलैन। जखन लसैरे नै तँ असर किए। तेतबे नहि, ईहो बुझैत जे जहिना गाछक डारि फुटने फूल-फड़ थोड़े बदैल जाइ छै तहिना अनेरे देह रगड़ने तँ अपनो रगड़ा लगबे करत। मुदा से नै भेल, भऽ ई गेल जे सात भैयारीमे तीन भाँइकेँ सुखने गाछक डारि जकाँ चारिए-टा रहि गेलैन आ तहू चारिमे दूटा बँझियाइए गेलैन, तँए फल-फूलक आशे नै रहलैन। मुदा दुइयो भाँइ रहने चारि भैयारीक परिवार पसारै-जोकर तँ भाइए गेला। गड़बड़ एतबे भेलैन जे एक भाँइकेँ एक आ एक भाँइकेँ तीन बेटा भेलैन। एक रहितो मानवीय विचार आर्थिक विचारमे बदैल रगड़ा-रगड़ी शुरू भेल। जखने तीन भाँइ एक दिस हएत आ दोसर दिस कियो असगरे पड़त तँ निसचिते छह हाथ पैरक जगह दूटा हाथ-पएर झँपेबे करत। मुदा चद्दैर तँ ओइठाम ने झाँपि चारूकात अड़ियबैत जैठाम ओढ़निहारसँ डेढ़िया-दोबर होइत, से तँ परिवारमे भाइए गेल छैन। विचारवान परिवार सभ दिनसँ रहलैन जँ से नै रहलैन तँ आन-आन गाममे एहेन-एहेन परिवार मटियामेट भऽ गेल। मटियामेटे नहि, केते जहल भोगलक तँ केते अस्पताल, केते फाँसीपर लटकल तँ केते कपार फोड़ा मरल। मुदा विचारेक चलैत ने परिवारकेँ ने कहियो सम्प्रादायिक आ ने जातिक हवा कनियोँ डोलौलकैन। समैक प्रभाव तँ सभ किछुपर पड़िते अछि से तँ परिवारोमे भेलैन। ओना जेकरा समए कहै छिऐ–दिन-राति–ओइमे ओतेक बदलाव कहाँ आएल, किएक तँ अखनो बारहो मास आ छबो ऋृतु होइते अछि। अपन-अपन गुण-धर्म तँ बँचौनहि अछि। मुदा एकटा गड़बड़ तँ परिवारमे भाइए गेलैन। ओ ई जे एक भाँइक बेटा–श्याम–भैयारीमे असगरे छथिन। असगर भेनाइ तँ बड़ पैघ बात नहियेँ भेल, मुदा पिताक भैयारीमे छोट भाइक बेटा रहने किछु गड़बड़क सम्भावना तँ जनमियेँ गेलैन। बाबाक अमलदारीमे सातो भाँइक बीच बँटबारा भेलैन मुदा ओ पुन: समटा गेलैन। कारण ई जे शुरूमे तँ बँटबारा भेलैन मुदा तीन भाँइक परिवार घटने फेर समटा गेलैन। केना नै समटाइत, तीनूकेँ कियो पानियोँ देनिहार तँ नहियेँ रहलैन। चारू भाँइक बीच एहेन सम्बन्ध बनल रहलैन जे भीन-भीनौजीक परिस्थितिये पैदा नै लेलकैन। तेकर कारण भेल जे चारू भाँइक चारि तरहक कारोबार रहलैन। एक काजमे चारि गोरेकेँ रहने वैचारिक मतभेद होइक सम्भावना रहै छइ। किएक तँ एक्के काज केते ढंगसँ कएल जा सकैए। तहूमे जखन समैक मोड़ अबै छै तखन काजोमे मोड़ अबै छइ। सभठाम भलेँ नहि अबौ मुदा नहियेँ अबै छै सेहो नइ कहल जा सकैए। चारू भाँइकेँ परोछ भेने परिवारमे भीन-भिनौजक सम्भावना बनलैन। सम्भावनाक कारण भेलैन जे एक भाँइकेँ एकेटा बेटा, जखन कि दोसरकेँ तीनिटा भेलैन। दू भाँइ तँ मेटाइए गेला। छोट भाइक बेटा रहितो श्याम भैयारीमे सभसँ जेठ, खाली भैयारीए-मे जेठ नहि, पढ़ै-लिखै दिस सेहो विशेष झूकान रहैन। एक तँ पढ़ैक लगन दोसर सुभ्यस्त परिवार रहबे करैन। मुदा तीनू भाँइ घनश्याम खेलौड़िया बेसी। सदिकाल सिनेमे-पत्रिका आ खेले-पत्रिका उनटा-पुनटा देखैत। पढ़ैपर तँ ओतेक नजैर नहि, मुदा फोटोपर बेसी नजैर पड़ैत। अखन धरि श्यामक विचारमे कोनो दूजा-भाव नै आएल छेलैन जइसँ कोनो तरहक नीक-अधलाक प्रश्ने नै उठल छल। जे किछु कारोबार छेलैन सामूहिक छेलैन। तहूमे एकटा जबरदस गुण श्याममे छैन जे घरसँ बाहर धरिक जे कोनो काज होइ छैन ओ तीनू भाँइ–अपना लगा चारू–केँ जरूर जानकारीमे दैये दइ छथिन। मुदा भैयारीक संग दियादनियोँ तँ बरबैर भाइए जाइत अछि। एक बाप-माए वा सहोदर पित्ती-पितियाइनिक बीच जे सिनेह रहैत ओ तँ चारि गामक चारि दियादनीकेँ एने तँ किछु-ने-किछु गड़बड़ भाइए जाइत अछि। कारणो छै, मिथिलांचलेमे एक सीमा कातक गाम आ दोसर सीमा कातक गामक बीचक जँ दूरी अछि तइमे खान-पान, रहन-सहन, बोली-वाणी इत्यादिमे किछु-ने-किछु अन्तर बनले आबि रहल अछि। तहूमे जइ इलाकामे बाढ़िक उपद्रव कम छै आ जइ इलाकामे बेसी छै, दुनूक जीवन शैलीमे सेहो बदलाब अबै छइ। जखने जीवन-शैली बदलत तखने जीवन पद्धति बदलत। जखने जीवन पद्धति बदलत तखने जीवन लीला बदलए लगै छइ। तहिना गाममे अखड़ाहा रहने किछु-ने-किछु लूरि कुस्तीक भाइए जाइ छइ। तहिना मध्य मिथिलांचलक भाषामे पश्चिम–भोजपुरी सीमा–क्षेत्रक सुआसिन एने, भाषामे किछु-ने-किछु रूप बदलले रहै छै जइसँ भाषापर माने बोली-वाणीपर प्रभाव पड़ै छइ। तहिना पूवरिया इलाका वा दछिनवरिया इलाकाक प्रभाव सेहो पड़िते आबि रहल अछि। जहाँ धरि कुटुमैतीक प्रश्न अछि ओ तँ भागलपुरसँ मोतिहारी आ जनकपुरसँ सिमरिया धरि होइते आबि रहल अछि। एकाएक श्यामक मनमे भैयारीक प्रति सिनेह किछु कमए लगलैन। सिनेहमे कमी एने काजमे कमी आबए लगलैन। जेना शुरूसँ परिवारक काजक जानकारी सभकेँ दैत अबै छेलखिन तइमे किछु कमी आबए लगलैन। तीनू भाँइ खेलौड़िया सोभावक रहबे करैथ, तैबीच काजक आदेश कम पाबि आरो खेलौड़िया भऽ गेला। अखन धरि घनश्यामकेँ श्याममे कोनो कमी नै देख पड़ैन। तँए हिसाबक कोनो जरूरतो नहियेँ बुझैथ। श्यामक मनमे सिनेह कमैक कारण भेल जे पत्नी सदैतकाल कानमे घोरि-घोरि पियबैन जे सम्पैत अपन आ सुख-मौज दियाद सभ करैए! पहिने तँ श्याम पत्नीकेँ सेवक बुझैत आबि रहल छला, ई नै बुझै छला जे दियादनीसँ दियादियो ठाढ़ होइ छइ। मुदा विचारो तँ किछु छिऐ, अड़ि कऽ पत्नी पूजे करैकाल खिसिया-खिसिया बाजए लगलैन- “जइ पुरुखकेँ कोनो बात बुझैक ज्ञाने ने छै ओ पुरुख नहि, पुरुखक झड़ छी!” पत्नीक बात श्यामकेँ छातीमे धक्का देलकैन। मन कहए लगलैन जे ‘झड़’क अर्थ तँ ओ होइत जे कखन अछि आ कखन अपने झड़ि जाएत तेकर कोनो ठेकान नहि। जे पाछू दिस ससरत ओ पौरुष केना पाबि सकैए? मुदा अखन मुँह खोलैक तँ समए नै अछि सिरिफ सुनैक समए अछि...। जहिना बाल्टी भरि पानिमे नेबो आ चीनी रखिए देने तँ सरबत नै बनैए। नेबोकेँ काटि गाड़ि कऽ रस मिलौल जाइत अछि तहिना चिन्नियोक अछि। जहिना एक शब्द वा एक पाँति पढ़लासँ बुझिमे नै अबैत बल्कि दोहरा-दोहरा पढ़लासँ वा ऐगला-पैछला पाँतिक मिलानसँ बुझल जाइत अछि तहिना ऐगला बातक प्रतीक्षामे श्याम आँखि उठा पत्नीपर देलैन। नजैरक पानि देख पत्नी बुझि गेली जे ऐगला बात सुनैक प्रतीक्षा कऽ रहल छैथ। जहिना मधुमाछीक सभ छत्तामे एक्के रंग मधु नै रहैत, कोनोमे कम तँ कोनोमे बेसियो रहैत आ तइ संग-संग नव-पुरान–पहिलुका-पैछला–सेहो रहैत। तँए ठिकिया कऽ ओइ छत्ताकेँ पकड़ब बुधियारी छी जइमे डगडगी भरल नवका मधु रहैए। किएक तँ पुरना मधु दबाइ-दारू लेल नीक होइ छै, खाइले तँ नवके नीक हएत, तहिना वकील जकाँ अपन पक्ष रखैत पत्नी बजली- “अखन धरि अहाँ एतबो ने बुझै छिऐ जे चारू भाँइक बीच पनरहटा बाल-बच्चा आँगनमे अछि। पनरहोक खर्च तँ सागीरदेमे सँ चलैए। एके रंग लत्ता-कपड़ा, खेनाइ-पीनाइ अछि, मुदा ई बुझै छिऐ जे ऐमे अपन केते हएत आ दियाद-वादक केतबे छैन?” श्यामक नजैर धँसए लगलैन। पत्नीक विचारमे किछु तत्त्व बुझि पड़लैन मुदा से स्पष्ट नै भऽ सकल! प्रतीक्षाक नजैर उठा श्याम आगू दिस ताकए लगला। तैबीच अवसरक लाभ उठबैत पत्नी दोहरौकैन- “पनरहटा बाल-बच्चामे अपन तीनटा अछि। बाँकी बारह तँ भैयारीए-क भेल। तैसंग अपने दू परानी छी आ ओ छह परानी अछि। कनी जोड़ि कऽ देखियौ जे अदहा हिस्सामे अपन केते हएत आ केते हुनका सबहक हेतैन।” श्यामक मन सहमलैन। सहैमते उठलैन- जे पत्नी अक्षरस: सत्य कहि रहली हेन। सम्पैतक अर्थ सुख-भोग होइ छै, परसादी बाँटब नहि। पूजासँ उठि भोजन कऽ श्याम घनश्यामकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “घनश्याम, दुनियाँक तँ बेवहारे भैयारीमे भीन होएब रहल अछि। अपनो सभकेँ कम नै निमहल। गाममे देखै छिऐ जे केते छौड़ाकेँ मोँछक पम्हो ने आएल रहै छै आ बापसँ भिन भऽ जाइए अपना सभ तँ सहजे धीगर-पूतगर भेलौं। भीन भऽ जाह।” जेना घनश्यामो प्रतीक्षेमे रहए तहिना धाँइ-दे बाजल- “भैया, सभ दिन अहाँक आदेश मानैत एलौं, आइ नै मानब से उचित हएत। मुदा अहाँ जहिना जेठ भाय छी तहिना तँ रामो-बलराम अछि। भलेँ ओ दुनू छोट भाए छी, जे कहबै से करत। मुदा तैयो बिना पुछने किछु नै कहब।” “बड़ बढ़ियाँ, अखन जा कऽ पुछि लहक। सुति कऽ उठै छी तखन फेर गप करब।” घनश्याम उठि कऽ विदा भेल। तीनू दियादनियोँ आ दुनू भाइयोकेँ एकत्रित कऽ घनश्याम पुछलक- “सबहक बीचमे कहै छी। भैया बजा कऽ कहलैन जे भीन भऽ जाह। से की विचार?” बलराम कहलकैन- “विचार की भैया, ओ असगर छैथ तँ जीविए लेता आ हम तँ सहजे तीन भाँइ छी। हुनका जे मनो खराप हेतैन तँ ने कियो डाक्टरो ऐठाम लऽ जाइबला हेतैन आ ने बजारसँ दबाइ कीनि कऽ अनैबला हेतैन।” घनश्याम- “सबहक की विचार?” पहिल दियादनी- “अपन परिवार बुझि नौरी जकाँ दिन-राति खटै छी तैपर जे पाँचो मिनट चाहमे देरी हेतैन तँ साँढ़-पारा जकाँ गर्द करए लगता। भने नीक हएत। जानो हल्लुक हएत।” सुति उठि चाह पीब पान खा श्याम घनश्यामकेँ सोर पाड़लखिन। अबिते घनश्याम लगमे बैस कहलकैन- “जे विचार अहाँक अछि भैया, सएह हमरो अछि। अखने बाँटि लिअ।” घनश्यामक बोली सुनि श्याम सहमला। मनमे उठलैन, हम जे बुझै छिऐ तइसँ भिन्न ने तँ बुझैए। मुदा बात तँ आगू बढ़ि गेल आब जँ पाछू हटब सेहो नीक नहि। बजला- “बँटबारामे कोनो बेवधान तँ छहे नहि। सभ किछु अदहा-अदही भेलह। तखन बाप-पुरुखाक बनौल जेठौंस होइए से तँ तोहीं बजबह?” श्यामक विचार सुनि घनश्याम कहलकैन- “अहाँ पितासँ हमर पिता जेठ छला। संयोग नीक रहलैन जे भिनौजी नै भेलैन। जखन पिताक अधिकारक हिसाबसँ आइ बँटै छी तँ हुनकर जेठौंस केते हेतैन से तँ हमर हएत किने?” श्याम कहलकैन- “देखह, तमसा कऽ नै बाजह। सभ दिन अपन सतभैंया परिवार ‘विचारक परिवार’ मानल जाइत रहल अछि, तैठाम कनी-मनी चीज लेल झगड़ब नीक नहि।” घनश्याम मुड़ी डोलबैत बाजल- “बात तँ बड़ सुन्दर आ बड़ सोझगर कहलौं मुदा एक वंशक सभ रहितो अहाँ अइल-फइलसँ रही आ हम सभ बँटाइत-बँटाइत एते बँटा जाइ जे घसाएल सिक्का जकाँ सभ किछु रहितो चलबे ने करी, से केहेन हएत?” तैपर श्याम पुछलखिन- “तोहर की विचार?” घनश्याम कहलकैन- “तीनू भाँइक विचार अछि जे घर-सँ-घराड़ी, खरिहाँन-सँ-खेत धरि चारू भाँइ एकरंग कऽ लिअ। जँ से नहि, तँ...।” श्याम- “तँ की?” घनश्याम- “ई तँ माटिक चर्च केलौं। पोखैर सेहो तहिना बाँटब। जँ से दइले तैयार नै हएब तँ जमीनक फैसला जमीनपर हएत।” श्याम- “सएह।” घनश्याम- “हँ! सोलहन्नी सहए।” ◌ शब्द संख्या : 2998 न्याय चाही झूनाएल धान जकाँ पचासी बर्खक शम्भु काकाकेँ ओछाइन छौड़ैसँ पहिनहि मनमे उठलैन जे आब तँ चल-चलौए छी, से नहि तँ जिनगीक अपन हिसाब-किताब दैये दिऐ, सएह नीक। नै तँ शासनक कोन बिसवास केकरो दोख गारा मढ़ि सजा केकरो भेटै छइ। मुदा सोझहामे एते तँ जरूर हएत जे अपन बात अपने रखि सकै छी। तैपर जँ नहि मानत तँ हमहूँ नइ मानबै। लड़ि मरी कि सड़ि मरी; शेषे कथी बँचल अछि...। जहिना नमहर काजमे समैयो अधिक लगैए आ छोट काजमे थोड़ मुदा काज तँ दुनू कहबैए। कियो काहू मगन कियो काहू मगन, मगन तँ सभ अछिए। गंभीर प्रश्नमे ओझराएल शम्भु काका, तँए मन-चित्त आ देह एकबट्ट भेल रहैन। पत्नी कुमुदनीक मनमे उठलैन जे भरिसक सुतले तँ ने रहि जेता। लगमे पहुँच छाती डोलबैत पुछलकैन- “अखन धरि किए बिछान पकड़नहि छी?” पत्नीक स्वरलहरीमे लहराइत शम्भु काका हलैस बजला- “अखन धरि यएह बुझै छेलौं जे अपने केलहाक भागी कियो बनैए, मुदा..?” बजैत शम्भु काका ओछाइनपरसँ उठि जहिना उगैत सुरूजक दर्शन लोक दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम करैत करैए तहिना दुनू हाथ जोड़ि पत्नीक आगूमे ठाढ़ होइत दोहरा कऽ बजला- “माफी मंगै छी, गलती भेल अछि मुदा दोसराक गलती ऊपर मढ़ल गेल अछि।” अकचकाइत कुमुदनी, बिनु किछु सोचनहि बजली- “से की, से की, एना किए भोरे-भोर पाप चढ़बै छी?” “पाप नै चढ़बै छी जिनगीक जे घटल घटना अछि, तइ निमित्ते मांगि रहल छी।” “जखन एते कहबे केलौं तखन किए ने मनो पाड़ि देब। अहाँ तँ बुझिते छिऐ जे बसिया भात खेनिहारि बिसराह होइए मुदा रौतुका उगरल अन्न फेक देब नीक हएत?” पतालसँ अबैत बलुआएल पानि जहिना छन-छनाइत पवित्र भऽ अबैए तहिना कुमुदनीक विचार सुनि प्रोफेसर शम्भु काकाकेँ भेलैन, बजला- “अपना दुनू गोरेक एक जिनगी ऐ धरतीपर रहल अछि की नहि?” “हँ, से तँ रहले अछि। तँए ने अर्द्धांगिनी छी।” “हमर देहक अर्द्धांगिनी छी आकि जिनगीक?” “ई बात अहाँ बुझेलौं कहिया जे पुछै छी?” पत्नीक प्रश्न सुनि प्रोफेसर शम्भु काका सकदम भऽ गेला। मुदा लगले मनमे उठलैन जे टटको घटना बसिया जाइ छै आ बसियो घटना टटका भऽ जाइ छइ। ई निर्भर करैए कारीगरपर। जेहेन कारीगर रहत तेहेन टटकाकेँ बसिया आ बसियाकेँ टटका बनबैत रहत। खाएर जे हौउ। पत्नीकेँ पुछलखिन- “अपना दुनू गोरे एकठाम केना भेलिऐ?” “एना अरथा-अरथा किए पुछै छी? जे कहैक अछि से सोझ डारिये कहू। एना जे हरसीकार-दिरघीकार लगा-लगा बजै छी से नइ बाजू। जेकरा नीक बुझबै तेकरा नीक कहब आ जेकरा अधला बुझबै तेकरा अधला कहब। अहाँ लग जे कनी दबो-उनार भऽ जाएत तँ हारि मानि लेब सएह ने हएत, आकि छाउर-गोबर जकाँ छिट्टामे उठा बाध दऽ आएब।” जहिना पोखैरक पवित्र जलमे स्नान कऽ पूजाक मूर्ति गढ़ि मंत्र पढ़ैत दान कएल जाइत तहिना शम्भु काका बड़बड़ाए लगला- “जखन हम चौबीस बर्खक रही तखन अहाँ चौदह बर्खक छेलौं। दस बर्खक अन्तर। आइ धरि कहाँ केतौ देख पेलौं जे पुरुष-नारीक बीच उमरोक विभाजन भेल। जँ से नहि तँ..? जँ एको औरूदे दुनू गोरे जीब तैयो तँ अहाँ दस बर्ख विधवे बनि रहब। ऐ विधवाक सर्जक के? समाजमे कलंकक मोटरी देनिहार के? की ई बात झूठ जे जइ घरमे जेते कम वस्तु रहै छै आगि लगलापर ओतबे कम जरै छै आ जइ घरमे अधिक वस्तु रहै छै आगि लगलापर जरबो बेसी करै छइ? पचास बर्खक तपल-तपाएल जिनगीक अन्त केना हएत?” दुनू हाथ जोड़ि शम्भु काका पत्नीसँ माफी मंगलैन। मुदा जहिना बच्चाकेँ नव दाँत रहने अधिक-सँ-अधिक काज लिअ चाहैत, नव औजार हाथमे एने अधिक-सँ-अधिक काजो आ अधिक-सँ-अधिक समए सेहो संग मिलि बीतबए चाहैत तहिना कुमुदनीक सिनेह आरो जगलैन। बजली- “माँफी-ताँफी नै मानब? पति छी तँए पुछै छी। एहन गलती भेल किए, से जाबे नै कहब ताबे किछु ने मानब।” पत्नीक प्रश्न सुनि शम्भु काका स्तब्ध भऽ गेला। मन कछमछाए लगलैन। सत् बड़ कटु होइ छइ। मुदा जँ पत्नियोँ लग सत्यक उद्घाटन नै कऽ सकब तँ दुनियाँमे दोसरठाम कइए केतए सकै छी? शम्भु काका साँप-छुछुनैरक स्थितिमे पड़ि गेला। एहेन कोनो विचार मनमे उठबे ने करैन जइसँ मन मानि लइतैन जे ऐसँ पत्नी मानि जेती। अल्ल-बल्ल किछु बच्चाकेँ कहल जाइ छै, एक तँ सियान कि जे सियानोक ऐगला खाढ़ीमे पत्नी पहुँचल छैथ, दोसर अर्द्धांगिनी सेहो छैथ। कोनो विचारकेँ बलजोरी थोपि नै सकै छिऐन, जँ थोपियो देबैन तँ मानिए लेती सेहो नै कहल जा सकैए। जेते दवाब दऽ कऽ बजैक अधिकार हमरा अछि तेते हुनको तँ छैन्हे। जँ किछु नै कहबैन तखन तँ आरो स्थिति बिगैड़ जाएत। जहिना हुनका मनमे गेंठी जकाँ जनमगाँठ पड़ि जेतैन तहिना तँ अपनो मन नहियेँ बँचत। जँ से नै बँचत तँ आँखि उठा देख केना पेबैन? जँ से नै देख पाएब तँ पति कथीक? सिरिफ रंगे-रभसटा तँ पत्नीक सम्बन्ध नै छी? जँ ओतबे मानि बुझबैन तँ पति-पत्नीक सम्बन्ध बुझब थोड़े हएत। पति-पत्नीक सम्बन्ध तँ ओ छी, जहिना जनकक एक हाथ हवन-कुण्डमे आ दोसर पत्नीक करेजपर रहै छेलैन, मुदा जहिना नव जीवनक दिशा विपैतक अन्तिम अवस्थामे भेटैए तहिना शम्भुओ काकाकेँ भेटलैन। थालमे गड़ल मोती जहिना जहुरी हाथमे देखते नयन कमलनयन बनि जाइत तहिना कक्कोक नजैरकेँ भेलैन। मन मुस्किएलैन। पतिक मुस्की देख कुमुदनी मने-मन नमन केलकैन। जिज्ञासु छात्र जकाँ पत्नीक जिज्ञासु नजैरकेँ देख प्रोफेसर शम्भु बजला- “देखू, प्रश्न एकेटा नै घनेरो अछि, जँ एक-एक प्रश्नक उत्तरो दिअ लगब तँ प्रश्ने छुटि जाएत। जँ प्रश्ने छुटि जाएत तखन उत्तरे केना देब। तँए किछु नहि बुढ़िया फूसि।” पतिक विचार सुनि कुमुदनी अधखिल्लू कुमुदनी जकाँ जइ अवस्थामे भौंरा फरिच तँ देखैत मुदा अधखिल्लू कपाटसँ निकैल नै पबैत, तहिना कुमुदनी असमंजसमे पड़ि गेली। पत्नीकेँ असमंजसमे पड़ैत देरी प्रोफेसर शम्भुक मनमे उठलैन जे जहिना माटिक ढेपा, गोला, चेका जोड़ि-जोड़ि पैघसँ पैघ बान्ह बान्हल जाइए तहिना जँ बान्हि दिऐन तँ जरूर ठमैक जेती। मुदा मन मानलकैन नहि। पत्नीक बातमे तँ अखन धरि ओझराएल रहलौं। जरूर माए-बापक काज मानल जाएत। मुदा, की हमरे टा परिवारमे भेल आकि दोसरो-तेसरो परिवारमे? जँ एक समाज नहि, एक गाम नहि, अनेक समाज आ अनेक गाममे होइत अछि तँ जरूर दोषक जड़ि केतौ आरो छइ। अन्तए केतए छै से कहि देबैन, मानती तँ मानती, नहि तँ आगू कहबैन नेति-नेति। जहिना उगैत गुज्जर, उगैत कलशकेँ कहैत जे दुनू गोरे संगे-संग रहि दुनियाँ देखब तहिना प्रोफेसर शम्भु पत्नीकेँ कहलखिन- “सुनू, सभ बात सबहक नजैरपर सदिकाल नै रहै छै, भऽ सकैए जे जे बात दस-बीस बर्ख पहिने कहि देबाक चाहै छल, से नै कहलौं। अपनो धियानमे नै रहल। जहिना असगरे धान तौलनिहार गनि-गनि तौलबो करत आ उठि-उठि लिखबो करत तँ गिनती-गिनतीमे झगड़ा हेबे करतै, किएक तँ जे जोरगर रहतै ओ मन रहत आ जे अब्बल रहत ओ हेरा जाएत। तहिना ने अपनो दुनू गोरेक बीच अछि।” “दुनू गोरे” सुनि कुमुदनी कछमछेली। कछमछाइते पाछू उनैट-उनैट देखए लगली। प्रोफेसर शम्भु बुझि गेला जे शिकारीक वाण सटीक बैसल। जहिना बाल-बोधक उनटा-पुनटा काज देख सियानकेँ हँसी-लगैत तहिना प्रोफेसर शम्भुकेँ हँसी लगलैन। मुदा लगले मनमे उठलैन जे अपनो पैछला कएल काज मन पड़ने तँ से होइए। एकाएक मुँह बन्न भऽ गेलैन। आने-आन पुरुख जकाँ अपन पुरुषत्व देखबैत प्रोफेसर शम्भु बजला- “आइ धरि, अखन धरि कहियो हमरा मुहसँ फुटल जे हम न्यायालयसँ दण्डित भेल जिनगी जीब रहल छी? कियो एको दिन पुछाड़ियो करए आएल जे केना जीबै छी? समाजमे जाधैर बुढ़-बुढ़ानुसक पूछ नै हएत ताधैर समाजक पैछला पीढ़ी नाँगैर पकैड़ वैतरणी पार केना हएत। हँ ई जरूर जे साँपकेँ डोरी नै कही, मुदा विचार तँ हेबाके चाही किने।” घरमे चौंकल बरतनक ढनमनी जकाँ कुमुदनी ढनमनाइत बजली- “जखन अहाँ दुनियाँक नजैरमे दण्डित छी तखन..?” पत्नीक चिन्तासँ चिन्तित भऽ प्रोफेसर शम्भु बजला- “अखन धरि तँ छिपेने रहलौं जे अपन दोख अहाँकेँ किए दी।” पतिक बेथासँ बेथित कुमुदनी बजली- “कनी फरिछा कऽ कहू?” “सेवा-निवृत्त होइसँ छह मास पहिने प्रिंसिपल बनौल गेलौं। कौलेजक भार बढ़ल। परीक्षा विभाग सेहो छइ। सुननहि हेबे जे केते हो-हल्ला भेल। मामला न्यायालय चलि गेल। गोल-माल जरूर भेल रहइ, जानकारीमे नै रहए। मुदा तैयो जवाबदेहक रूपमे फँसलौं।” कुमुदनी- “अहाँक किछु दोष नै रहए?” प्रोफेसर शम्भु- “एकदम नहि।” कुमुदनी- “फैसला केना भेल?” प्रोफेसर शम्भु- “सेवा निवृत्त लग देख न्यायालय दोषी बना छोड़ि देलक।” कुमुदनी- “आ हुनका सभकेँ?” प्रोफेसर शम्भु- “कमो दोखबला बेसी सजा पौलक आ बेसियो दोखबला कम सजा पौलक।” तैपर कुमुदनी पुछलखिन- “एना किए भेल?” प्रोफेसर शम्भु बजला- “जँ पहिने बुझितौं तँ ऐ भीर जेबो ने करितौं, मुदा से नै भेल। जाधैर लिखित-मौखिक रूपमे बेवस्था चलत ताधैर अहिना हएत।” ◌ शब्द संख्या : 1311 पनियाहा दूध आँगन बहारि, बाढ़ैन धोइ कऽ पछबरिया दावा लगा रखि सुनयना दरबज्जा दिस तकलैन तँ बुझि पड़लैन जे मास्टर साहैब (पति) भरिसक सुतले छैथ, उठा देब उचित हएत मुदा मन ठमैक गेलैन। ठमैकते मन कहलकैन- ‘आठमे दिन गाम आएल रहैथ तँ चारि बजे भोरेसँ हरविर्रो केने रहै छला जे घरमे कोढ़ियाक बाढ़ि आबि गेल अछि, जे काजक बेरमे सूतल रहत ओकरा कहियो भाभन्स हेतइ? मुदा आठे दिनक दूरीमे एना किए देखै छी?’ फेर मन घुमि कहलकैन- ‘उमेरोक दोख होइ छइ। ओना सठिया तँ गेले छैथ।’ तत्-मत् करैत सुनयना दरबज्जा-आँगनक बीच ठकुआ कऽ ठाढ़ भऽ गेली, ने आगू डेग उठैत रहैन आ ने पाछूए ससरैत रहैन। ओना जीवानन्दक नीन समैपर टुटि गेल छल, एक तँ ओहुना उमेर बढ़ने खूनो पनियाए लगै छै आ नीनो पतराए जाइ छइ। जे जीवानन्दोकेँ भेले रहैन, नीन टुटिते मनमे उठलैन जे उठिए कऽ की करब? काजे कोन अछि जे तइ पाछू लागब। आँखि बन्न केने सोचैत रहैथ। जहिना चिन्तक चिन्तनक अवस्थामे निष्तेज भऽ जाइत तहिना जीवानन्द बिछौनपर निष्तेज छला। ओना आँखियो खुजैक आ बन्न होइक ढेरो कारण अछि मुदा हुनका से नहि रहैन। मनमे केतेको रंगक विचार टकराइत रहैन, तँए ऐगला रस्ता देखैमे एक-दिसाह भऽ गेल छला। आलमारीक किताब जकाँ रंग-रंगक विषय एकेठाम सैंतल रहैन, असल विचार परिवारमे गड़ल रहैन। मुदा परिवारसँ पहिने जे अपनापर नजैर पड़लैन तँ तेतइ गड़ि गेला। सेवा-निवृत्त भऽ गेलौं, जीवैक उपाय भलेँ जे हुअए मुदा काज तँ हेरा गेल! आब काजे की अछि जइ अनमेनामे समए गूदस करब? जखन काजे हेरा गेल तखन जिनगी केना चलत? जँ जिनगीए नइ चलत तँ जीवित-मृत्युमे अन्तरे की भेल? ई सभ बात जीवानन्द बाबूक मनपर लधले रहैन तैबीच दोसर उठि गेलैन जे करबो केकरा लेल करब? पैछला कियो छैथे नहि, ऐगलो उड़िए गेल। बीचमे अपनाकेँ पाबि मन दहैल गेलैन। सेवा-निवृत्तिक तँ एक अर्थ ईहो होएत ने जे काज करै-जोकर नै रहलौं? फेर मन ओझरा गेलैन। ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा’क पइर भऽ गेल! काजो तँ दू रंगक होइत अछि, एक शरीरक शक्तिसँ कएल जाइत अछि दोसर वौद्धिक शक्तिसँ। हम तँ शरीरक शक्तिसँ नै वौद्धिक शक्तिसँ करै छेलौं तखन किए नै करैबला रहलौं? आमक आँठी जहिना कोइलीसँ धीरे-धीरे सक्कत बनि सृजन शक्ति प्राप्त करैए, से कहाँ भेल? जँ वौद्धिक शक्तिकेँ शरीरक शक्तिक सीमांकन कएल जाएत तँ केहेन हएत? खाएर जे हौउ, ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना माथपर हाथ दइए। मुदा सेहो तँ नै भऽ रहल अछि। जे ठनका शरीरकेँ के कहए जे घरो-दुआर आ गाछो-बिरीछकेँ तोड़ि-फाड़ि दइए ओइ ठनकाकेँ हाथ केतेकाल बँचा सकैए? जीवानन्द बाबूक मन फेर ठमैक गेलैन। मुइल धार जकाँ परिवारो भऽ गेल अछि, की हमरा बँचौने बँचत? बँचबो केना करत, ने पैछला घुमि औता आ ने ऐगला आबए चाहत। लऽ दऽ कऽ दू परानी भेलौं, तहूमे तेहेन पाकल आम जकाँ भऽ गेल छी जे कखन तुबि खसब तेकर कोन ठेकान...। खाएर जे हौउ, जाबे आँखि तकै छी ताबे तँ जीबए पड़त आ जाबे जीब ताबे जीबैक उपाय सेहो करैये पड़त। अपने जीने जिनगी आ अपने मुइने मृत्यु..! गुन-धुनमे पड़ल जीवानन्दक मन समाज दिस बढ़लैन। समाजे लेल की केलिऐ जे हमरा लेल करत। जहिना देवस्थान दस गोरेक सहयोगसँ ठाढ़ो होइत आ चलबो करैत तहिना तँ समाजो अछि, मुदा से तँ किछु ने केलिऐ..! थकथकाएल मन कहलकैन- “की ओछाइने धेने रहब आकि उठबो करब?” मुदा लगले दोसर मन कहलकैन- “उठिए कऽ की करब?” मन आगू बढ़ि शिक्षक समाज दिस बढ़लैन। सेवा-निवृत्ति तँ सभ होइ छैथ, मुदा, की हमरे जकाँ सभकेँ हेतैन? भलेँ सभकेँ होनि वा नइ होनि मुदा किछु गोरेकेँ तँ हेबे करतैन। जखन सबहक जिनगी एक वृत्तमे बीतल तखन किए सभकेँ सभ रंग हेतैन? परिवारो आ समाजो तँ सबहक सभ रंग छैन। से तँ छैन्हे। दिनानाथ बाबूकेँ देखै छिऐन जे सेवा-निवृत्तिक उपरान्तो विद्यालय छोड़ि नै रहलैन अछि। जखन कि सुखदेव बाबू सेवा-निवृत्ति होइसँ तीन बर्ख पहिनहि जे ओछाइन धेलैन से अखनो धेनहि छैथ। परिवारमे जँ केकरो किछु अढ़बै छथिन तँ मुँह दुसि कहै छैन जे भरि दिन कौआ जकाँ कॉउ-कॉउ करैत रहै छैथ। मनुखकेँ जँ कौआ मानि लेल जाए तँ बोलकेँ की कहबै? जीवानन्दक मन आरो घुरिया गेलैन। फेर मनमे उठलैन जे अनेरे औनाइ छी। जेतबे रहए तेतबे टाँग पसारी नै तँ पओल जाएब। सुतले-सूतल पत्नीकेँ सोर पाड़लखिन- “कनी एमहर आउ?” आँगन-दरबज्जाक बीच ठाढ़ सुनयना पतिक हाक सुनिते डेग आगू डेग बढ़ौलैन। केबाड़ लग आबि हिया-हिया देखए लगली। पहिलुका माने सेवा-निवृत्तिसँ पूर्वक अपेक्षा पतिक रूप बदलल-बदलल बुझि पड़लैन। मन कहलकैन- एना केना भेलैन, अखन धरि तँ किछु कहबो ने केलैन, तखन किए पानि उतरल बुझि पड़ै छैन? केबाड़क एकटा पट्टा खोलि देने रहथिन आ दोसर ओहिना लागल रहइ। तही बीच जीवानन्दक मनमे उठलैन जे जाबे नोकरी करै छेलौं ताबे बाहरसँ कमा कऽ आनि पत्नीक हाथमे दइ छेलिऐन, आ अपने अपनाकेँ गारजन बुझै छेलौं, से तँ आब नै हएत! जँ से नै हएत तँ परिवार आगू मुहेँ केना ससरत? पाहुन जकाँ आठ दिनपर अबै छेलौं आ कमासुत बनि जाइ छेलौं। पतिक बदलल रूप देख सुनयनाक मनमे उठलैन जे अखन धरि किछु करबो ने केलैन हेन आ तरे-तर फटि रहल छैथ..! नवकवरियाक चुटकीक अवाज जकाँ सुनयनाक आगमन बुझितो जीवानन्दकेँ उठैक हूबा देहमे नै रहलैन। मनोक बोझ तँ माथकेँ ओहिना भरिया दैत जहिना कोनो वस्तुक बोझ भरियबैत। जीवानन्दक मनकेँ जिनगीक बोझ ऐ रूपे दबने जेना सवारी कसल घोड़ा वा खलीफा होइत। भरियाएल मनमे उठलैन- जाबे धरि बाहरसँ कमा घर अनै छेलौं, जइ बले परिवार ससरै छल ओ तँ टुटि गेल! ओहीपर ने अपनो आ घरो-परिवारक छहर-महर छल। मुदा से नइ भेने तँ ओहिना भऽ जाइ छै जहिना माटिक बनल रस्ताकेँ पानिक धार काटि अवरूद्ध कऽ दइ छइ। की कमाइएपर गारजनी छल? पत्नीए-केँ की सुख हमरासँ भेलैन? घर-गिरहस्ती सम्हारैमे दिन-राति एकबट्ट केने रहै छैथ। एक तँ मिथिलांचलक किसान परिवारक अजीव गढ़ैन अछि, जैठाम एलापर देवियो-देवता भोथिया गेला। सौंसे जनकपुरमे जनकेक दरवार जकाँ बुझि पड़लैन?नान्हिटा बात थोड़े छी? जैठाम गाम-गाम व्यास भागवत बचै छैथ, गाम-गाम कीर्तन-भजन, भोज-भनडारा होइत रहैए, तैठाम समाज विपरीत दिशामे बहि गेल, मुदा देखलैन कियो ने। दरबज्जाक सौभाग्य छल नीक-नीक बात-विचार करब, तैठाम दरबज्जा टुटि आँगन घरक कोठरी बनि गेल अछि! जैठाम कम-सँ-कम लोकक पैठ रहैत, जैठाम आनक सुख-दुख सुनैक आ सुख-दुखक दबाइ बुझैक अवसर नै भेटैत, तैठाम पति-पत्नीक सम्बन्धक आधार की बनि सकैए। देखा-देखीक दुनियाँमे चिन्ता–चिन्तन किए रहत। जँ से नै रहत तँ मनक सुखक दिशाक धारा किए ने बदलत। जीवित-मृत्युक निर्णए के करत? केना हएत? कोनो मुसरा गाछ होइ आकि लतियाएल लत्तीक होइ, ओकर बाढ़ि ताधैर समीचीन होइत जाधैर ओकरा अनुकूल वातावरण भेटैत रहैत। ओना, लाखो किड़ी-मकौड़ी कोमल-किसलयकेँ नष्ट करैबला अछि मुदा प्रकृतोक तँ गजब गढ़ैन अछि, एक-दोसरकेँ नष्ट करैबला सेहो मौजूद अछि। बिनु मुँहक गाछ वा लत्तीक दशा तँ ओहने होइ छै जेहने साँपक मुँह थकुचेला पछाइत होइ छइ। जीवानन्दकेँ एहसास भेलैन जे हमरापर नहि, पत्नीपर घर-ठाढ़ अछि। जँए घर ठाढ़ अछि तँए समाजक परिवार कहबैक लाली अछि। मुदा समाज तँ ओहिना नइ केकरो महत दैत, सेवाक अनुकूल केकरो महत दैत अछि। से हमरासँ की भेलइ? जखन किछु ने भेलै तखन केते महत हेबा चाही? मुदा जेकरा घर-परिवार आ गाम बुझै छी, तेकरा छोड़िए केना देब? मुदा ई प्रश्न तँ गामक छी, अपन नहि। परिवारमे जे छहर-महर भेल ओइमे हमरा कमाइसँ की भेल। यएह ने भेल जे बेटीक बिआह केलौं, बेटाकेँ पढ़ेलौं-लिखेलौं आ अन्तिम अवस्थामे अपन घर बनेलौं। मुदा बेटीक बिआह, पढ़ाइ-लिखाइ एते भारी किए अछि जे जिनगी भरिक कमाइसँ लोककेँ पारो ने लगै छइ। जँ एतबेमे सभ ओझरा जाएत तँ समाजक गति केहेन हएत? जँ समाज दुरगैतक चालि पकैड़ चलत तँ मनुखक पैदाइस केहेन हएत। जैठामक जेहेन मनुख तैठाम तेहने दुनियाँ...। करोट फेरते जीवानन्दक मनमे उठलैन जे हारि मानी झगड़ा फड़ियए। पत्नीसँ क्षमा माँगि लेब। जँ से नइ माँगब तँ हुनकर विचार छिऐन जे घरमे रहए दैथ वा नहि। समाजक संग तँ वएह रहली। पत्नीक प्रति जे प्रेम हेबा चाही से कहाँ कहियो भेल। क्षण-पलक सम्बन्ध रहल, जीवन-लीलाक सम्बन्ध कहाँ रहल! हुनकर दुनियाँ हमरासँ भिन्न रहलैन। मुदा आइ तँ ओही दुनियाँक जरूरत हमरो भऽ गेल अछि। खण्ड विकसित देशमे जहिना जनता-सरकारक बीच सम्बन्ध रहैत, तहिना ने भऽ गेल अछि। जेना पति रूपमे ओ सेवा केलैन तेना हम कहाँ केलिऐन। जँ से करितिऐन तँ ओ ओहिना ओत्तै अँटकल रहितैथ, जेतए नामो-गाम नै सीखि पेली। जतबो समए गाममे बितेलौं, हुनकर कमाइ खेलौं, तेतबो तँ हुनका नै कऽ सकलयैन। एतबे नहि, दरबज्जापर जे माल अछि, आ हुनका[1] देख भूख-पियास कहए लगै छैन मुदा हमरा देख घिरनी जकाँ नाचि भगबए चाहैए। अठबारैयो जँ अबैत रहलौं तैयो तँ अपन बुझि खाइ-पीबैले किछु ने केलिऐ! कोनो कि मनुख छी जे घड़ी-मोबाइल देख मिनट-सेकेण्ड बुझत, ओकरा लेल तँ अठबारैयो सटले-दिन भेल। तहिना तँ गाछियो-बिरछीक अछि। जुड़शीतल दिनसँ ओकरा जलढार हेबा चाही से अनका तँ कहलिऐ, मुदा अपना...। किए ओ अपन बुझत? जहिना सासुरमे जमाए सासु-ससुरक आगू लाड़-झाड़ करैत जे ई नै अछि तँ ओ नै अछि, तहिना जीवानन्द ओछाइनसँ उठि, बैसैत पत्नी दिस देख बजला- “एते दिनक जिनगीमे कहियो निठुर दूध नै खेलौं। आब अहाँक दरबारमे छी, जेना राखी।” पतिक बात सुनि सुनयना विह्वल भऽ गेली। अपन कर्तव्यक बोध भेलैन। मन कहलकैन- पतिक सेवा पत्नीक पहिल दायित्व छी। मुदा लटारम करैत सुनयना बजली- “एना संस्कृतमे नै कहू, भखियौटीमे कहू जे की कहै छी?” पत्नीक बात सुनि जीवानन्दक मन हेरा गेलैन। जैठाम सुग्गा-मेना संस्कृत-पाठ करै छल तैठाम मनुखक दूरी एते किए भेल? प्रश्नमे ओझराइते जीवानन्दकेँ बुकौर लगि गेलैन। बोली नै फुटलैन। आजुक शिक्षक जकाँ जीवानन्दक जिनगी नै रहलैन। शिक्षक समाजक प्रति समरपित छला। ओइ समाजक बीच पढ़ाइ-लिखाइ प्रतिष्ठाक मूल बिन्दु छल। ओ सभ मानै छैथ जे जइ विषयक जरूरत विद्यार्थीकेँ ट्यूशन पढ़बाक होइ छै ओइ विषयक पढ़ाइमे कमी छइ। विद्यार्थी लेल किछु सहज विषय होइत अछि किछु कठिन। मुदा जइ विषयक जे शिक्षक होइ छैथ हुनका लेल तँ ई समस्या नै भेल। जँ हुनकामे शिक्षणकलाक पूर्णता हेतैन तँ विद्यार्थीकेँ किए समस्या ग्रस्त रहए देथिन। की वजह छै जे अपना ऐठाम अदौसँ लऽ कऽ अखन धरि शिक्षण-संस्थानमे छड़ीक चलैन नै रहल] मुदा तँए कि कियो पढ़ि-लिखि विद्वान नै भेला? भेला। जइ हाइ स्कूलमे जीवानन्द शिक्षण कार्य करै छला ओइ विद्यालयकेँ अपन छात्रावास सेहो छइ। जइमे पचाससँ ऊपर छात्रो आ अदहासँ बेसी शिक्षको रहैत। मेसमे भोजन जएह विद्यार्थी लेल सहए शिक्षको लेल बनैत। ओना, शिक्षक सभ अलगसँ दूध कीनि रातिमे सुतै बेर पीबैथ। जहिना बाटमे हेराएल बटोही दोसरकेँ पुछैत, मुदा उत्तर देनिहारो तँ रंग-बिरंगक होइत अछि। कियो एहनो होइत जे अपने हरेबाक चर्च करैत, तँ कियो हेराएलकेँ आरो हेराएल बाट देखा दैत, आ कियो एहनो होइत जे कहैत जे संगे चलू। ओ ऐ आशाक संग चलैक बात कहैत जे जँ किछु नै कहबै तँ गोंग कहत, मुदा बिनु बुझलमे की जवाबो देल जा सकैए। ओ संग केने ताधैर चलैत रहैए जाधैर आँखिगर नै भेट जाइ छइ। तहिना अर्द्धांगिनी रूपमे सुनयना पुछलखिन- “की सुच्चा दूध कहलिऐ?” जीवानन्द बजला- “पैंतीस सालक नोकरीमे कहियो सुच्चा दूध नहि पीब सकलौं। पीलौं जरूर मुदा ओकरा अदहासँ बेसी थोड़े कहल जेतइ।” जहिना मृत्तासनपर चढ़ल राहीकेँ सर-समाजसँ लऽ कऽ आ कुटुम-परिवारक लोक आबि-आबि जिज्ञासा करैत जे ‘भैया’, कि ‘काका’, आकि ‘बाबा’ कथी खाइ-पीबैक मन होइए, तहिना सुनयना पुछलखिन- “एते दिन जेतए अहाँ छेलौं छेलौं आ हम छेलौं छेलौं। मुदा आब तँ ओत्तै अहूँ रहब जेतए हम छी।” पत्नीक विचारक गाम्भीर्यसँ जीवानन्द आँखि पड़ल अजगर साँपक सोझसँ पड़ा नहि पाबि, बजला- “कहलौं तँ बेस बात मुदा मनुख तँ मनुखक बीच किछु बन्धन निर्धारित कऽ रहैत अछि। डोरी-पगहाक जरूरत तँ पशु लेल होएत, मुदा बान्ह तँ एकमुड़िया नै भऽ सकैए। ओकरा लेल तँ जाधैर दू-मुड़िया नै लटपटौल जाएत, ताधैर गीरह केना पड़तै। जाधैर कुशियारक गाछ जकाँ गीरह नै बनत ताधैर रस-जल केना समटाएल रहत?” पत्नीक प्रश्न सुनि जीवानन्द जिनगीक ओझरी देखए लगला जे ई बन्धन छुटल कहिया। तरसैत मन पत्नीक करेजमे पहुँचलैन। जहिना निशाँएल लोक अपने अड़-दड़ बजैत तहिना जीवानन्द बाजए लगला- “कामिनी, सेविकाक रूप छोड़ि संगी कहिया बुझलयैन। ई दोख केकर? मुदा दोख तँ दुनू दिस देखए पड़त। पत्नी कोन रूप देखलैन। सभ दिन ओ पति बुझि सेवा करैत एली। कहियो किछु नै मंगलैन। अपन परिवारक स्तर बुझि अपनाकेँ सम्हारि रखली।” बड़बड़ाइत पतिकेँ देख सुनयना बजली- “हारि मानी झगड़ा फरियाए। एके बेर बाजि जाउ जे जे हूसल से हेराएल, जे जीबए से खेलए फॉगु।” मरैत रोगी जकाँ जीवानन्द बजला- “सुच्चा दूध आबो नै पीब सकै छी?” “पीब सकै छी। जखन गाए पोसैक लूरि अछि तखन किए ने पीब सकै छी। मुदा जैठाम दिन-राति लूटनिहार लूटि रहल अछि तैठाम थनक दूध कण्ठ लग पहुँचत कि नहि, तेकर कोन बिसवास?” पत्नीक प्रश्न सुनि जीवानन्द जी-जी कऽ उठला। बिसरल बात मन पड़लापर जहिना ओकर रूपो-रेखा सोझमे आबए लगैत तहिना भेलैन। बजला- “शुद्ध-अशुद्ध दूध ने एक परिवारक समस्या छी आ ने एक गामक। दूधमे पानि देब चलैन भऽ गेल अछि। ओना जे अपने गाए-महींस पोसि दूध खाइ छैथ,तिनकर संख्या कम अछि। जे बेचनिहार छैथ ओ दूध बेचि चाउर-दालि, तरकारी इत्यादि कीनै छैथ। खाली दूधेटामे पानि नै देखै छथिन। आनो-आनो तहिना अछि, तखन कएल की जाए। कुल-मिला कऽ देखलापर यएह ने देखा रहल अछि जे ताड़ी पीयाक, गांजा पीयाककेँ गारि पढ़ि कहैत जे फोकटिया अछि। अहिना एक-दोसरमे सटल सम्बन्ध अछि। सभकेँ सभ गारि पढ़ैए आ सबहक सभ सुनैए। तहूसँ टपि अपने मुहेँ गरिया अपने सेहो सुनैए।” विह्वल होइत सुनयना टोकलकैन- “तखन उपाय?” “उपाय एतबे जे जेते परिवारमे खर्च हएत कम-सँ-कम ओतबो उपारजन कऽ लेब तखन परिवारक पार लगि जाएत। तहिना गाममे जेतेक खर्च अछि ओते जँ गौंआँ मिलि उपारजन कऽ लेता तँ गामोक पार लगि जाएत। जइसँ समाजेक कल्याण नहि, देशक कल्याण सेहो हएत।” ◌ शब्द संख्या : 2153 कर्ज जमीन निलामीक नोटिश पाबि बरिसलालक सभ आशा ओहिना झड़ए लगल जहिना वसन्तसँ पूर्व गाछक पतझड़ होइत वा फलसँ पहिने फूल झड़ए लगैत। हलसैत जिनगीक आशा देख बैंकसँ कर्ज लऽ बोरिंग-दमकल करौलक। मुदा समैपर कर्ज अदा नै कए सकल, जइले कर्ज लेलक सएह हाथसँ निकलैत देख सोगसँ सोगाएल अखड़े चौकीपर पेटकान दऽ मने-मन सोचैत जे की करैत की भेल। सौनक मेघ जकाँ बरिसलालक दुनू आँखिमे नोर भरि गेल। बीसम शताब्दीक आठम दशकमे हरित-क्रान्तिक हवा घुसकैत-घुसकैत गाम धरि पहुँचल। नव हवाक सुगन्ध नाके-नाकसँ लऽ कऽ खेतो-खरिहाँनमे पहुँचल। गामक किसानक सीमांकन शुरू भेल। ओना सीमांकन नाम-मात्रेक भेल मुदा भेल तँ। नाम-मात्र ऐ लेल जे सैद्धान्तिक रूपमे तँ सीमांकनक रूप रेखा तैयार भेल, मुदा जमीनक ओझरी कँटहा बाँस जकाँ ओझराएल छल। जइमे कड़चीसँ बेसी काँट। एक-एक कड़चीमे साइयो काँट। सोरगर-मोटगर पाकल देख भलेँ आरीसँ जड़ि काटि दियौ मुदा झोंझसँ निकालब असान नहि। जइसँ बेवहारिक पक्ष कमजोर पड़ल। चारि श्रेणीक अन्तर्गत किसानकेँ रखल गेलैन। अढ़ाइ एकड़सँ निच्चाँ एक श्रेणी, चारि एकड़सँ निच्चाँ दोसर श्रेणी, दससँ निच्चाँ तेसर आ तइसँ ऊपर चारिम श्रेणी। निचला किसान लेल सरकारी खजाना खुजल। रंग-रंगक प्रोत्साहनक घोषणा भेल। सरकारी घोषणा, तँए सभले भेल जे बैंकक माध्यमसँ बोरिंग-दमकल भेटत। मुदा जइ माध्यमसँ बोरिंग-दमकल भेटत सएह नगण्य। एक दिस फौज जकाँ किसान तँ दोसर दिस जैठामसँ भेटत सएह नहि। मुदा तैयो गोटि-पँगरा तँ छेलैहे। सरकारी सुविधा सब्सिडीक रूपमे भेटत। तेकर कार्यालय भिन्न बनल। किसानक बीच प्रोत्साहनक घोषणासँ नव जागरणक संचार भेल। गाम-गाममे भी.एल.डब्लू.क माध्यमसँ काजक सूत्र तैयार भेल। आने किसान जकाँ बरिसलालोक डेग बढ़ल। एक-तिहाइ सब्सिडी सुनि बढ़बो केना ने करैत। जखने किसानक हाथ पानि औत तखने चौमसिया खेती बारहमसिया बनि जाएत। जखने बारहमसिया बनत तखने ने किसान डारि-डारि झूला लगा बरहमासा गौत। जँ से नहि, तँ छहमासे, चौमासा ने गबैत रहत। जे चौमास किसानक बखारी छी, तेहीमे ने भाँग-धुथुर उपजैए। वस्तुगत काज तँ नहि, मुदा चौरीसँ चौमास धरिक, चारि गुणा उपजाक नक्शा तँ किसानक मनमे बनबे कएल। बीघा-एकड़क हिसाब भलेँ अखनो धरि नै फरियाएल मुदा-एकड़-हेक्टेयर तँ आबिए गेल अछि। किछु एनए आ किछु ओनए करैत किसान अपन हिसाब तँ बैसाइए लेलक। अखन धरिक जे छोट आ मध्यम किसान महाजनीक कर्जमे डुमल छल ओइमे पूजीपतिक प्रवेशक दुआर खुजल। कम सुदिक बात तँ आएल, मुदा छह मासक पछाइत सुदि-मुरि बनि जाएत से एबे ने कएल। अखन धरि जे सुदिक सुदक प्रथा नै छल सेहो आएल। भलेँ केतौ महाजन सप्पत खा केकरो घराड़ी लऽ नेने होइ आकि केतौ सप्पत खा कर्जा डुमा देने होइ, ई अलग बात। औझुका जकाँ दहेजो ओते भारी नै छल जेते माए-बापक सराध। ओना दहेजोक जड़ि मजगूत बनि रहल छल, किएक तँ शहरक आमदनी गाम दिस आबए लगल छल। गाममे छोट पैघ किसानोक संख्या बेसी, मुदा बोनिहारक संख्यासँ कम अछि। ओना सभ गामक रूपो-रेखा एक रंग नहियेँ अछि। कोनो गाम एहेन अछि जइमे पाँच प्रतिशतसँ कम जनसंख्या गामक नबे-पनचानबे प्रतिशत जमीन पकड़ने अछि, तँ कोनो गाम एहेनो अछि जइमे दस-पनरह प्रतिशतक अन्तर छइ। ओना, एहनो किसान छैथे जिनका अपन जमीनक अता-पता नै बुझल तँ एहनो किसान जे अपने सबतूर मिलि खेती करै छैथ। तैसंग एहनो ऐछे जे खेतक आड़िपर पहुँच जूति-भाँति तँ लगबैत अछि मुदा अपने हाथे किछु नै करैए। गाछी, खरहोरि, बँसवाड़ि आ घराड़ी लगा बरिसलालकेँ पाँच बीघा जमीन अछि। जइमे दू बीघा बेख-बुनियादिमे फँसल छै, बाँकी तीन बीघा जोतसीम। एकटा बरद राखि सफटैती कऽ खेती करैत अछि। ओहू तीन बीघा जोतसीममे तीन मेलक जमीन छइ। पनरह कट्ठा चौरीमे छै, जेकर मलगुजारीक संग लगतो साले-साल डुमि जाइ छइ। मुदा छोड़ियो केना देत, आखिर खेत तँ खेत छी। रौदी भेने ओहीमे ने उपजा होइ छइ। बाँकी सवा दू बीघा मध्यमसँ भीठ धरिक जमीन छइ। दसो कट्ठा भीठमे मरूआ, भदै आ गदैरक संग कुरथी-तेबखा होइ छइ। गहुमक खेती तँ आबि गेल मुदा तइले तँ पानि चाही। पानिक साधन मात्र पोखैर अछि, जइमे करीन लगा किछु अगल-बगलक खेतक पटबन लोक करैए। लोकक बीच ने पढ़बै-लिखबैक जिज्ञासा रहै आ ने सुविधा। गनल-गूथल विद्यालय-महाविद्यालय। बरिसलालो दुनू बेटाकेँ गामक स्कूल धरि पढ़ा खेतीए-वाड़ीमे लगौने....। मिथिलाक किसान खेतक ओहन प्रेमी बनल रहला जेहेन पतिव्रता नारी जे बाल विधवा होइतो प्रतिष्ठाकेँ कमलक माला बना गरदेनमे लटका हँसि रहली अछि। जँ से नै रहल छैथ तँ भागि-पड़ा अर्थशास्त्री बनि किए अपन खेत-पथारकेँ सम्पैत नै बुझि प्रतिष्ठाक वस्तु बुझि रहल छैथ? की ओहिना खेतीकेँ उत्तम आ नोकरीकेँ मध्यमक विचार देलैन? जँ एकरा मुहावरा-कहावत बना देखब तँ मिथिलाक चिन्तनधारा धरि नै पहुँच पाएब। जैठाम खेतकेँ अपन अधिकारक वस्तु बुझि अपना हाथक हथियार बना अपन स्वतंत्रताकेँ अक्षुण्य रखैक विचार सेहो देलैन। ई तँ अपन-अपन विचार होइ छै जे कियो हथियारकेँ बम-बारूद बुझैत तँ कियो हाथक यार बुझि विचारक बाट बनबैक विचार व्यक्त करैत। तहिना अस्त्र–शस्त्र सेहो अछि। मध्यम किसान वा लघु किसानक जीबैक जिनगी ब्लौटिंग पेपर सदृश बनि गेल छैन। जेकरामे लालो आ कारियो रोशनाइकेँ सोंखैक शक्ति छै। बाढ़ि-रौदी एकैसम शताब्दीक ऊपज नहि, अदौसँ रहल अछि। भलेँ कहि सकै छी जे धार-धुरक बान्ह-छान्ह दुआरे हुअ लगल अछि, भऽ सकै छै, केतौ-होइत हेतै, मुदा प्रश्न धारेक पानिक नहि अछि, तहिना रौदियो रहल अछि। धारोक कटनी-खोंटनी कम नहि अछि। मिथिलांचलकेँ कोसी-कमला तेखार कऽ देने अछि। प्रश्न अछि बाढ़िक जड़ि। पहाड़ी धार छी, जे दुब्बरसँ धोधिगर धरि अछि। पानिक एक साधन भेल, दोसर बरखा भेल। ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि जे पनरह-पनरह दिनक ओरियान पहिनहिसँ कऽ कऽ पूर्वज रखै छला। हथिया मात्र एक नहि जेकरा बरखा ऋृतुक अन्तिम नक्षत्र कहि टारि देब। पनरह-पनरह दिन लधले रहै छल। ओना,बरखाक कोनो ठेकान नहि, माघोमे पाथर खसि उपजल उपजाकेँ नास करैत रहल अछि। अन्तिमक जन्म ताधैर नै होइत जाधैर आदि नै होइत, बरखा ऋृतुक आदि आद्रा छी। तँए ‘आदि आद्रा अन्त हस्त’ ई भेल बरखाक आँट-पेट। पूर्वज सभ स्पष्ट विचार देने छैथ जे बरखाक कोनो बिसवास नहि जे केते हएत। 1971 ई.मे बंगला देशक लड़ाइक लगभग सालो भरि बरखा होइते रहल, ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि जइमे साएक-साए घर खसैत रहल अछि। घरमे दबल बाल-वृद्ध, माल-जाल, धन-सम्पैत इत्यादि नष्ट होइत रहल अछि मुदा तैयो ब्लौटिंग पेपर जकाँ सभ किछुकेँ सोंखि ऐठामक किसान जीबैक बाट धेने आबि रहल अछि। दुनियाँमे ने साधकक कमी अछि आ ने साधना भूमिक, मुदा मिथिलांचल श्रेष्ठ किए? केतौ जाड़क साधना तँ केतौ तापक तप तपि तपस्या करैत, तँ केतौ पानिक तपस्या सौभरी ऋृषि बनि करैत। मुदा तैयो मिथिलांचल साधनाक फुलवाड़ी लगा रखने अछि जइ फुलवाड़ीक फूल मैथिलानी सीता सजबैत रहली अछि। ने मिथिलाक भूमि बदलल, आ ने बदलल ऋृतु ऋृतुराज, बदैल रहल अछि खाली बोतलक रस। घरक समस्या कहाँ? समस्या तँ तखन उठैत जखन रहैक घरसँ घर-भाड़ा असुलैक विचार जगैत। गाछक निच्चाँ सात हाथ, नौ हाथक घरमे जीवन-यापन कऽ वेद-पुराण सिरजलैन। की दुनियाँक देखनिहार मिथिलांचल छोड़ि देख रहला अछि? जँ से नहि तँ समस्याकेँ कोन रूपे देखलैन? यएह ने सरकारी योजना जहिना कागतपर औषधालय बना साले-साल मरम्मतक नाओंपर योजना लूटाइत रहह आ पान सालक बाद माटिपर खसा मलबा हटबैक खर्च होइत रहह। खेतसँ उपजल खढ़, बाँस आ साबेक घर बना समस्याक समाधान करै छला। ओ सभ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रखि स्वतंत्र जीवन बेतित करै छला। पढ़ै-लिखैक ओते समस्या नहि, किएक तँ जेहेन जिनगी रहत, तेतबे बुधिक ने जरूरत हएत। बेसी भेलासँ तँ लोक छड़ैप-छड़ैप अनको गाछक आम तोड़ए लगैए। भलेँ अपन पूर्वजक घराड़ीपर नढ़िया किए ने भुकए, मुदा दुनियाँकेँ मातृभूमि कहि सेवारत् रहै छी। ओही रूपक फूसिघर बना जिनगीक गारंटी केने छला। अखुनका जकाँ नहि,जे एक दिस लग्गी लगा भाँटा तोड़ैक बाट धेने छी आ दोसर दिस हजार-दस-हजार बर्ख जीबैबला ऋृषि-मुनिक दुहाइ दइ छी। एकैसम सदीमे कियो अपनाकेँ ऐगला पीढ़ीक नजैरक पुतली बना रहल छी। जहिना बरखा, तहिना जाड़ आ तहिना रौदक ताप तपैत लोक अपन बाल जीवनसँ लऽ कऽ वृद्ध तकक अनुभव करैत जिनगीकेँ असथिर बना नीक-नीक उमेर पबैत रहला अछि। प्रश्न उठैत जे की एहेन विचार मरि गेल आकि जीवित अछि? ने मरल आ ने स्वस्थ भऽ जीवित अछि। गाम-समाजमे लटपटाइत जीवित जरूर अछि मुदा...। जीवित ऐ रूपे अछि जे अखनो खेतीकेँ उत्तम मानल जाइत अछि। कृषि जिनगीकेँ थाहि चलबैए। तहूमे समाजिक स्तरपर तँ आरो थाहल अछि। जइ जिनगीमे दोसराक जरूरत नै हुअए तँ ऐ सँ नीक जीवन केकरा कहबै? आजुक हवा भलेँ जेतेक जोर मारए मुदा असथिर वस्तुकेँ कहाँ किछु बिगाड़ि पबैए। अनभुआर धारमे ने नमहर-नमहर जलचरक भय रहै छै किएक तँ धुमैत धार गहींर-गहींर मोइन फोरि लइए जइमे ने डुमैक डर रहै छै, जँ से नहि, तँ डुमैक डर केतए। तहिना ने धरतियोक बीच अछि। जहिना पानिमे गोहि, नकार आदि रहैए तहिना ने धरतियोपर बाघ, सिंहसँ लऽ कऽ नाग सेहो बास करैए। ..थाहल जिनगीक अर्थ ई जे जँ तीन बीघा वा दू बीघा जमीनमे समुचित बेवस्था कऽ खेती कएल जाए तँ युगानुकूल मनुख बनब बड़ भारी नहि। जिनगी तखन भारी बनैए जखन गरथाहमे पड़ि जाइत अछि। ओना, किसानक जिनगीकेँ पंगु बना देल गेल अछि। जँ से नहि, तँ किसान हितैषी कोन जरूरतक पूर्ति सरकारी बेवस्थामे नै भऽ पाबि सकैए। मुदा नीको-नीको परिवार माने दस बीघासँ ऊपरबला किसान परिवार ने अपना बेटाकेँ नीक शिक्षा दऽ पाबि रहल अछि आ ने जनमारा बिमारीक इलाज कऽ पाबि रहल अछि। जहिना सुति उठि ‘सीता-राम’, ‘राधा-कृष्ण’ वा ‘सतनाम’क नाम लेल जाइत तहिना ने आब ‘टाटा-पापा’ लैत उठै छी। मुदा, की हम सभ नढ़रा मकै सदृश जिनगी नै जीबै छी जे भोगर गाछ रहितो अन्नक केतौ पता नहि! कृषि तँ आमक बगीचा वा खीड़ाक लत्ती सदृश अछि। जहिना गाछक पल्लवक मुहसँ गिरहे-गिरहे पल्लव निकैल डारि बनैत रहैए, खीड़ा लत्तीक मुहसँ लत्ती बनि फुलाइत-फड़ैत रहैए तहिना ने जिनगियो छी जे धरतीसँ जनैम फुलाइत-फड़ैत विसरजन करत। खेत तँ ओहन सम्पैत छी जे जिनगीकेँ आगू-बढ़बैक शक्ति रखैए। केतबो शक्तिशाली किए ने आगि हुअए मुदा जँ ओइमे नव ज्वलनशील वस्तुक समागम नै हेतै, तँ केतेकाल ओ जीवित रहि सकैए। मुदा जाधैर धार टपनिहार वा सरोवरमे स्नान केनिहारकेँ पानिक थाह नै लगि जाएत, ताधैर धार टपब वा स्नान करब तँ अथाहे रहत। आ जाधैर अथाह रहत ताधैर शंका रहबे करत। जाधैर आशंका रहत ताधैर विचार प्रभावित हेबे करत। मुदा एतेकक बावजूद हम किए..?की हम नै जनै छी जे जाधैर कृषिकेँ सर्वांगिन विकासक प्रक्रियामे नै अपनौल जाएत ताधैर नचारी-सोहर केतेकाल सोहनगर हएत। हर आदमी आ हर परिवारकेँ ठाढ़ भऽ चलैक प्रश्न अछि, नै कि एक दोसराकेँ छिटकी मारि खसबैक...। पाँचटा किसानक संग बरिसलाल सेहो बोरिंग-दमकलक विचारकेँ आगू बढ़ौलक। प्रखण्ड कार्यालयसँ फार्म लऽ बैंकमे आवेदन देलक। संगीक जरूरत तँ पड़बे केलै, किएक तँ जिनगीमे पहिल खेप प्रखण्ड कार्यालय आ बैंक पहुँचैक अवसर भेटलै। नव योजनाक काज बैंकमे आएल। ओना गामक आ गामक किसानक हिसाबे बैंकक संख्या दूधक डाढ़िए छल, मुदा छल तँ। बरिसलालक आवेदन स्वीकृति करैत जमीनक बौन्ड बना माइनर एरिगेशनकेँ काज करैक भार देलक। बैंक-कर्जक सुदि शुरू भेल। माइनर ऐरिगेशनक आँट-पेट छोट। एकाएक काजमे बढ़ोत्तरी भेल। ने काज करैक औजार अधिक आ ने करैबला। तँए ठीकेदारीक चलैन। तहूमे एक अनुमण्डलक बीच एकटा कार्यालय। लेनिहार हजार हाथ, देनिहार एक हाथ। मुदा तैयो बरिसलालक आदेश पत्रकेँ फाइलमे लगा देल गेल। एक-तिहाइ सब्सिडी लेल सब्सिडी कार्यालयक जरूरत रहबे करइ जे जिलाक अन्तर्गत छल। दौड़-बरहा करैत बरिसलालकेँ खर्चक संग-संग साल बीति गेल। वरसातमे एक तँ धसना धँसैक डर दोसर लोक खेती कहिया करत। बोरिंगक काज छोड़ि बरिसलाल खेतीमे लगि गेल। पहिल साल बीतल, दोसर साल शुरू भेल। ताधैर बैंकक कर्ज चक्रवृद्धि ब्याजक दरसँ एते मोटा गेल जे सब्सिडी तहीमे उधिया गेल। दोसर साल, शुरूहेसँ बरिसलाल अपन काजक पाछू पड़ि गेल। मुदा आइ-काल्हि करैत माइनरो-एरिगेशनक काज आ सब्सिडियो ऑफिसक काज लटकले रहलै। चढ़ैत बैसाख बरिसलाल रघुनन्दनकेँ कहलक- “बौआ, छोड़ि दहक। बोरिंग नै भेल तँ करजो तँ नहियेँ भेल। बुझबै जे एते दिन घुमबे-फिरबे केलौं।” बैंकक प्रक्रिया रघुनन्दनकेँ बुझल। बरिसलालक बात सुनि अवाक् भऽ गेल। मन कलैप उठलै- बाप रे, सुदि-मुरि लदा गेलै, कोट-कचहरीक मुद्दा बनि गेलइ!दोख केकरा लगतै? कोन मुँह लऽ कऽ समाजमे रहब! ग्लानिसँ रघुनन्दनक मन बिसाइन भऽ गेलइ। साहस बटोरि बाजल- “काका, जँए एते दिन तँए दू मास आरो। बैसाख-जेठ बँचल अछि। काल्हि चलू, या तँ अपन काज आपस लेब वा हाथ पकैड़ काज कराएब। तइले जे हेतै से देखल जेतइ।” रघुनन्दनक बात सुनि बरिसलाल ठमैक गेल। बाजल- “बौआ, हम तँ तोरेपर छी, आगिमे जाइले कहह आकि पानिमे, तोरासँ बाहर थोड़े हएब।” बरिसलालक विचार सुनि रघुनन्दनक मनमे उत्साह जगल। दोसर दिन दुनू गोरे माइनर एरिगेशनक कार्यालयसँ बोरिंग गाड़ैक सामान नेने आएल। गाड़ैक दिन तकबए गेल तँ आगूमे भदबा पड़ैत रहइ। जोड़-घटाउ करैत आठ दिन पछाइत बोर करब शुरू भेल। सिरिफ ठीकेदारेटा आएल बाँकी सभ काज गामेक मजदूर करत। ओना बोरिंगक काजमे गामक मजदूर अनाड़ीए छल मुदा अनाड़ियो तँ केते रंगक होइ छइ किने। जेते काज तेते जीवनी आ तेते अनाड़ी। जखने काजक लूरि भऽ गेल तखने जीवनी, आ जाधैर नै भेल रहल ताधैर अनाड़ी। तेतबे नहि, एक काजक जीवनी दोसर काजक अनाड़ी सेहो होइते अछि। तँए जीवनी-अनाड़ीक भेद करब कठिन। ओना, काजक भितरो जीवनी-अनाड़ी होइत अछि। जहिना एकपर साए खड़ा अछि तहिना कहैले तँ ‘एक’ पहिल सीमा भेल आ ‘साए’ दोसर सीमा, मुदा दुनूक बीच अन्तर ओतेक अछि जेते एक प्रतिशत आ साए प्रतिशत होइए। तहिना काजोक अछि। एके काजक भीतर साइयो रंगक काजक अंश होइत अछि। किछु अंशक बादे जीवनी मानल जाए लगैत अछि मुदा लूरिगर होइतो पूर्ण लूरिगर नहियोँ मानल जाइत। पूर्ण लूरिगर तखन मानल जाएत जखन काज एक समए-सीमाक भीतर होइत अछि। ओना, काजोक सीमाक निर्धारन व्यास पद्धतिक अनुकूल होएत। जँ से नै होएत तँ किछु एहनो काज केनिहार छैथ जे समैयो-सीमासँ पहिनहि कऽ लइ छैथ आ किछु एहनो छैथ जे काज तँ कऽ लइ छैथ मुदा समए-सीमा टपा कऽ। तँए कि ओकरा अनाड़ी कहल जेतइ? मुलाइम माटि रहने सबा साए फीट बोर आठे दिनमे भऽ गेल। लेयरो बढ़ियाँ, चालीस फीट लेयर। ओना जँ नीक लेयर होइत तँ पनरहो फीटमे पाँच हार्स पावरक इंजन पूर्ण पानि पकड़ैत, मुदा लेयरोक तँ ठेकान नहि, नीक-अधला संगे अछि। कोनो बाउल–जेना सौतबी–एहेन होइत जइमे पानिक मात्रा पनरह प्रतिशतक आस-पास रहैत आ कोनो एहेन होइत जइमे अस्सी प्रतिशत तक पानि रहैत। मुदा बरिसलालक बोरक लेयरक स्थिति किछु भिन्न छल। निच्चाँक तीस फीट लेयरमे अस्सी प्रतिशत पानि छल आ ऊपरकामे कम। तँए ठीकेदार बाजल- “बरिसलाल बाबू, अहाँक तकदीर नीक अछि। कहियो बोरिंग- भथन नै हएत। किएक तँ तेहेन निचला बाउल अछि जे सभ दिन पानि दनदनाइते रहत। तँए नीक हएत जे जहिना भीत-घरमे ठेमा-ठेमा रद्दा पड़ैए तहिना किछु दिन जे बोर ठेमा जाएत तँ धँसना धँसैक सम्भावना समाप्त भऽ जाएत। ओना क्रेसिंग-पाइपसँ बोर कएल अछि, पाइप लोड करैमे कोनो दिक्कत हेबे ने करत, मुदा अहीं हितमे कहै छी।” ठीकेदारक मुहसँ ‘तकदीर’ सुनि बरिसलालक मन उधिया गेल। ठीकेदारक ऐगला बात नीक नहाँति सुनबे ने केलक। अन्तिममे ‘हित’क चर्च सुनि बाजल- “ठीकेदार साहैब, अहाँ कि कियो बीरान थोड़े छी जे अधला करब। अहाँ तँ सद्य: इन्द्र भगवान छी, जेमहर ताकि देबै तेम्हरे ताड़ि देबइ। जेना-जेना अहाँ कहब तेना-तेना करैले तैयार छी।” ठीकेदार बाजल- “हमरो गाम गेना बहुत दिन भऽ गेल। अखन ऑफिसक छुट्टीक काजो ने अछि। किएक तँ बोर करैक सीमा जेते अछि तइ पूरैमे एकबेर गामसँ घुमि आएब। अहूँक काज नीक हएत आ अपनो काज भऽ जाएत।” कहि ठीकेदार गाम चलि गेल। पनरह दिन बीति गेल। जेठ चलए लगल। रोहैण नक्षत्रक आगमन भऽ गेल। संयोगो नीक रहल जे अगते विहड़िया हाल सेहो भऽ गेल। जहिना भक्त भगवानक मिलन होइत तहिना बरिसलालक मनमे उठल- अपनो हाथ पानि आबि गेल, ऊपरसँ भगवानो देता। पानिक धनिक बनि जाएब...। जहिना टिकुली अपन पाँखिक होश केने बिना हवामे उड़ैत-उधियाइत ओतए तक पहुँच जाइए जेतए ओकर पाँखि बेकाबू भऽ टुटि जाइ छै, माने माटिक चुट्टी वा गाछक घोड़नकेँ पाँखि होइते जहिना मरैक दिन लगिचा जाइ छै, मुदा बुझि नै पबैत अछि तहिना बरिसलालोकेँ हुअ लगल। मुदा रोहणियाँ हाल जहिना धरतीक शक्तिमे नव उर्जा दैत तहिना बरिसलालोक मनमे आएल। पत्नियोँ आ दुनू बेटोकेँ शोर पाड़लक। लगमे अबिते तेल विहीन बच्चाक मुँह लाली धरैत अनरनेबा जकाँ हरियरसँ लाल होइत देखलक। तहिना पत्नियोँक ओ दिन मन पड़लै जइ दिन हाथ पकैड़ जिनगीक भार उठौने छल। किए ने लोक भार उठौत। जखन एकटा नव शब्द ताधैर संग पूरैत जाधैर ओकर मथन होइत। नै तँ संगे किए रहत, बड़ीटा दुनियाँ छै केतौ वौड़ जाएत। पत्नीक नव रूप देख बेटाकेँ सम्बोधित करैत बरिसलाल बाजल- “बौआ, तोरा सभकेँ जहिना कोरा-काँखमे खेलेलियह तहिना हँसी-खुशीसँ जीबैक ओरियान सेहो कऽ देलियह।” पतिक बात सुनि सुशीलाक मन पहाड़क झरनासँ झड़ैत पानिक चमकैत रेत जकाँ चमकए लगलैन। बजली- “सोझहे दीक्षा देने नै हाएत। एक-एक दिन, एक-एक क्षणक काजक बात बुझा दियौ तखन हएत?” अखन धरि बरिसलाल कोट-कचहरी करैत बहुत किछु सीख नेने छल। गाम-गामक खेती-पथारी, फल-फलहरी, तीमन-तरकारीक संग गाम-गामक माल-जालसँ लऽ कऽ माछ पोसब इत्यादि सभ किछुकेँ देख-सुनि चुकल छल। जहिना मिडिल स्कूलक बच्चा हाइ स्कूलमे प्रवेश करैत नव-नव पोथी देख ललाए लगैत तहिना बरिसलालक दुनू बेटाक जिज्ञासा जगल। जिज्ञासा देख बरिसलाल बाजल- “बौआ, माटिमे धन छिड़ियाएल छै खाली बीछिनिहार चाही।” अखन धरि दुनू भाँइ आमक टुकलासँ लऽ कऽ पाकल आम धरि बीछि चुकल छल, तँए बीछैक बात सुनिते जेठका बेटा–महावीर–पुछलक- “केना बिछबै बाबू?” बरिसलाल बेटाक प्रश्न सुनि खुशिया गेल। आजुक बेटा जकाँ नहि, जे नोकरियो करैत आ नोकरो रखैत। जखन अपने काज अछि तखन अपनासँ जे समए बँचत सहए ने दोसरकेँ देब। बाजल- “बौआ, अखन तूँ सभ भारी काज करै-जोकर नै भेलह हेन। ओना, कनी-कनी जँ हेन्डिल मारब सीख लेबह तँ दमकलो चलाएल भाइए जेतह। मुदा जँ दस कट्ठामे सालो भरि तरकारीक खेती करबह तँ ओते कोन परदेशिया कमाएत। हँ समए बदलने लोक रंग-बिरंगक वृत्तियो बदैल लेलक हेन। जइसँ किछु अनाप-सनाप सेहो भऽ रहल छइ। मुदा बुधिक संग पूजी आ पूजीक संग बुधि नै चलत तँ अनेरे दब-उनार होइत रहत।” जेठक पूर्णिमा दिन बोरिंग लोड भेल। लोड होइसँ तीन दिन पहिने अपन ऊषा मशीन आबि गेल रहइ। बोरिंग लोड कऽ ठीकेदार-मजदूर मिलि माछक भोज खा, सोलह घन्टा पानि चला काज सम्पन्न केलक। अखाढ़ चढ़िते मानसून उतैर गेल। पहिलुके दिन तेहेन बरखा भेल जे खेत-पथारमे पानि लगि गेल। नीचला खेती बुड़ैक लक्षण धऽ लेलक। तेसरे दिन बाढ़ि चलि आएल। पोखैर-झाँखैर, चर-चाँचर भरि गेल। पानिपर पानि आ बाढ़िपर बाढ़ि केते बेर आबि गेल। दहार भऽ गेल। एहेन दहार भेल जे नवान पाबैनोकेँ लोक बिसैर गेल। मुदा कातिक अबैत-अबैत रब्बी-राय छीटब शुरू भेल। गहुमक खेती नै भऽ सकल। किएत तँ अन्नमे गहुमक खेती सभसँ महग खेती होइत। मुदा धान नै भेने किसानक स्थिति बिगैड़ गेल। एक तँ ओहिना बरिसलालक स्थिति दू सालक दौड़-बरहामे बिगड़ले छेलै तैपर दाही आरो बिगाड़ि देलकै। सालो भरि बोरिंग-दमकल बैसल रहि गेलइ। तरकारी खेतीक ओहन दशा बनि गेल जेकर बजार नहि। कच्चा सौदा, नष्ट होएत। देखैत-देखैत सतासीक बाढ़ि आ अठासीक भुमकम आबि गेल। जर-जर बरिसलाल फड़-फड़ करैत फड़फड़ा रहल छल। तही बीच बैंकक पक्षसँ जमीन-निलामीक नोटिश भेटलै। ◌ शब्द संख्या : 2943 परदेशी बेटी उबाइन होइते घटक काका दाँत पीसैत काकीपर बिगड़ैत घर छोड़ि विदा भेला। मनमे उठलैन- एहेन पड़ाइन पड़ा जाइ जे दोहरा कऽ ने घरक मुँह देखी आ ने घरेवालीक। मुदा ओहन क्रोधे आकि हँसबे कि जे दोसरपर नै बिसाए। एक तँ घरक बात तहूमे पति-पत्नीक बीचक, तँए अनका बजबो उचित नहि। दुनियाँमे केकरो कियो ने कहै छइ। भलेँ बिनु कहनौं दुनियाँ किए ने बुझिते हौउ...। मने मन घटक काकाकेँ पकिया निर्णए भऽ गेलैन। लोकोकेँ कोन मतलब छै जे बताह जकाँ अनेरो अनका देख हँसि देब आकि बिनु मतलबो-के घन्टा भरि केतौ सोखर पसारि देब। ओना, घटको काका आन जकाँ नहि, जे आँगनसँ निकैलते डेढ़िएपर-सँ पाछू घुमि-घुमि देखए लगितैथ, देखबो केना करितैथ? कोनो कि अदी-गुदी विचारक चोट लागल छैन, पुरुखे छिआ जे अखनो धरि बरदास केने छैथ, नहि तँ मूसक दबाइ पीब नेने रहितैथ। एक तँ ओहुना अखन घटक काकाकेँ टोकैक लग्न नहि, कारण लगनक समए नै छी, लगनक समैमे ने पतियानी लागल काज रहै छैन, कुसमैमे तँ दुनियाँक निअमे छै जे अपनो लोक पुछैले तैयार नै होइत अछि, घटक काका तँ सहजे विदाइ लेनिहार छैथ। बिनु रेटक आमदनी। जेहेन मुँह तेहने आमद। ओना, नइ टोकैक ईहो कारण अछि जे मध-असरेसक गिरहस्ती चलैए, आइ-काल्हि जेते समए लोक केकरोसँ गप करत तेतेकाल जँ देहे कुरिया लेत तँ ओइसँ बेसी नीक। भगवान केकरो अधला बना पठबै छथिन, भलेँ रोगे-बियाधि किए ने हौउ। जँ सभ अधले रहैत तँ किए कियो देह कुरियबैले सोनाक सिक्का बना-बना आगूमे रखैत। ओहिना पैघ शैरीकार कहै छैथ- “न हौहैठमे मजा है, न कलकैल में मजा है, खुदा ने दिया खुजली खुजलाने में मजा है।” खाएर जे हौउ। ओना किष्कारक समए रहने देवियो देवता अखन छुट्टी लऽ नेने छैथ, चौड़चनक पछाइत ज्वाइन करता। जहिना फुलही थारीमे जेतेकाल दही रहैत ओते बेसी कसाइन होइत तहिना घटक कक्काक मन कसाइन भेल जाइत रहैन। जहिना भरल पेटक प्रेम-गीतक स्वर आ जरल पेटक प्रेम-गीतक स्वरमे मात्राक भेद होइत तहिना घटक कक्काक मनमे उठैत रहैन जे आइ धरि कहियो नइ उठल छेलैन। केना नै उठितैन? सभ दिन दस गोरेक बीच हँसि-बाजि समए खटियबैत रहला आ आब जखन शिव लिंगक, फूल जकाँ वा नारियल-ताड़ जकाँ फड़ैबला भेला तँ आनक कोन गप जे जाँघतर बसैवाली पत्नियोँ दुतकारि देलकैन। ई तँ हिनके चाबस्सी होनि जे जहर-माहुरक कोन गप जे केकरो लग बजौ नै चाहै छैथ। कसाइन बीच बिसाइन भेल घटक कक्काक मनमे उठलैन। जिनगी भरि घरे बसबैक काज करैत एलौं मुदा..? बेटा, प्रेमसँ चाहे बिगैड़ कऽ आकि पड़ा कऽ परदेश चलि गेल तँ चलि गेल। सबहक बेटी सासुर बास करैए, ओहो करह। मुदा पत्नी तँ पत्नी छी। जँ घरे नहि, तँ घरवाली की, आ घरेवाली नहि, तँ घर केहेन। भाड़ाक घर जँ अपना घर सन होइतै तँ मूसे किए घरमे घर बनबैत। ओकरो तँ पानियेँसँ आ पाथरोसँ ने जान बँचबैक छइ। मुदा किए? अपन घर कियो अपना विचारे अपन आँट-पेटक अनुकूल लम्बाइ-चौड़ाइ नापि कऽ बनबैए तँए बेसी सुरक्षित होइ छइ। मुदा गणेशजी अपन वाहनकेँ ई बात ने किए बुझा देलखिन जे लोकक घरमे जे घर बनबै छेँ, से अपने-जोकर बनबिहेँ। जइ भीतपर घर ठाढ़ अछि ओकरे किए जंजल बना दइए। जखन भीते जंजल भऽ जाएत तखन हथियाक झाँट केना बरदास करत! घर खसत घर बन्हनिहारक मुदा मूस तँ बीलेमे अन्नक ढेरीपर अरामसँ पड़ल रहत। ओकरा थोड़े किछु हेतै, ओ तँ अपन घर पताल दिस बनौने अछि, आ घर खसत धरतीपर। किए ने ओकर जान बँचले रहतै..? तैबीच घटक कक्काक मनमे एकटा घटकैती आबि गेलैन। मन पड़िते ठोरपर तेना मुस्की आबि गेलैन जे ठोर बरदास नै कऽ सकलैन। खापैड़क तीसी जकाँ चनचना उठलैन। कहू जे बेंगबा सन छौड़ाकेँ इन्द्रक परी सन कनियाँ केकरा किरतबे भेलइ। मुदा कलयुगक उपकार हत्या बरबैर। जँ से नहि, तँ ओकरा जँ अपन उपकार मन पाड़ि देबै तँ कि ओ नै कहत जे पाँचो टुक कपड़ा आ दैछना कथीक नेने रहिऐ। ओ खुशनामा देने रहए आकि काज करैक बोइन। मन घुमि कऽ पत्नीक कहल बातपर आबि अँटैक गेलैन। कहू ई केहेन भेल जे मुँह फोड़ि दुसैत पत्नी कहलैन जे अहाँ आगू-पाछू किछु सोचै नै छी, जहाँ कोसीकातक बकेनमा दूधक दही आ तिलकोरक तरुआ आगू पड़ैए आकि बुधिए बिगैड़ जाइए! जइ परिवार लेल जिनगी भरि झूठ-फूस बाजि, नीक-अधला काजक विचार नै केलौं तइ परिवारमे एहेन गंजन हुअए तँ मनुख केतए रहत? घटक कक्काक खौंझ आरो तेज भेलैन। खौंझाइत मन कहलकैन- पत्नी रस्तामे रोड़ा अँटकौनिहार के? दस गाम घूमै छी, दस लोकमे रहै छी हम आ उपदेश देती ओ! जे सभ दिन जाँघक निच्चाँ रहली ओ छड़ैप कऽ छातीपर चढ़ि मुक्का देखौती; एहेन पुरुष हम नै छी। जहिया जे हेतै से हेतै अखन घरसँ नै पड़ाएब। घटक कक्काक भक् खुजलैन तँ देखलैन जे आब तँ किलोमीटर भरि हटि दोसर टोल लग पहुँच गेल छी, घुमि कऽ आँगन केना जाएब? केतबो किछु भेल तँ भेल मुदा पुरुष अपन पुरुखपना केना छोड़ि देत? नेरौल थूक केना चाटत? मुदा अपने फुरने घुमबो केहेन हएत? मरदक बात वाण समान होइए जे धनुषसँ निकैल गेल निकैल गेल..! बड़बड़ाइत घटक काका अपन दुनू हाथक तरहत्थी माथपर लऽ बैस रहला। जहिना किसान, बिनु खुरपियोक गाछक जड़ि लग बैस चुटकीए-सँ खढ़ उखाड़ि कमठौन करए लगैत तहिना घटक काका घुमैक ओरियान सोचए लगला। मुदा लगले मन तुरुछए लगलैन। ई तँ धोबियो कुकुरसँ टपब हएत, जे ने घरक आ ने घाटक रहब। जँ बलजोरी घरमे रहौ चाहब तँ पत्नी केते मोजर देती। मन घुमलैन। हमरो एते नै अगुतेबाक चाही छल। गलती अपनो भेल। एना जे लोक छोट-छोट बातपर घरसँ पड़ाएत तँ कहियो कुकुर-बिलाइ जकाँ अपन घर हेतइ। साँझू पहर, जखन लोक बाध-बोनसँ अबैए तखन केकरा घरमे ने हर-हर-खट-खट होइ छै, मुदा कहाँ कियो हमरे जकाँ रूसि-फुलि कऽ पड़ा जाइए। जँ एकरत्ती दब-उनार बात पत्नी कहबे केलैन तँ की हेतइ। कोनो कि जड़ि भीरा कऽ टिक काटि लेलैन। अर्द्धांगिनी छैथ, बाल-बच्चा आ परिवारपर जेते अधिकार पतिक होइत तइसँ की कम पत्नियोँक होइत अछि। बेटा-बेटी तँ दुनूक छी। ई तँ समैक दोख छी जे कखनो गरमी आनि गरमा दैत अछि तँ कखनो ठंढी आनि ठंढा दैत अछि। सौंझुका झगड़ा राति खसैत-खसैत मेटाइए जाइए किने। आकि हमरे जकाँ दिन-राति धेने रहत। भोर होइते दुनू परानी घर-अँगनाक काजमे लगि जाइए। कहाँ एको मिसिया मान-रोख मनमे रखैए। जहिना डिक्शनरीमे नवका शब्द अबितो अछि आ जाइतो अछि तहिना ने घरोमे किछु-ने-किछु अबितो रहत आ किछु-ने-किछु जाइतो रहत। मन आगू घुसकलैन। आगू घुसैकते घटक काकाकेँ मन पड़लैन अपन बिआहक दिन समाजक बीच सरियाती-बरियातीक बीच तँ हमहीं ने हाथ पकैड़ जिनगी भरि संगे रहैक वादा केने रही, से की भेल? जहिना कटही गाड़ी कुगरक रस्तामे कनी दब-उनार भऽ उनटिये जाइए तँए कि गाड़ीवान गाड़ी रखनाइए छोड़ि देत। जँ छोड़ि देत तँ आगू केना घुसकत? औगुताइमे एहेन भारी गलती नै करक चाही। कोन दुर्मतिया चढ़ि गेल जे एना केलौं। एकोरत्ती उम्रोक लेहाज-विचार केलौं? जुआन जकाँ निर्णए केलौं। कहू जे आब हमर उमेर अछि जे संगी छोड़ि असगरे रही। कोनो कि संयासी छी जे दोसर नै सोहाएत। अपने दिन-राति घीमे डुमल रहब मुदा दोसरकेँ कुत्ता जकाँ पचैये ने देब। भरि दिन शनियाही गुड़-चाउर चिबबैत रहब आ अनका देखबे ने करब। जँ केतौ जाएब तँ पेटो संगे जाएत। पेटक आगि जेहने परिवारमे तेहने तीर्थ-स्थानोमे जगितै अछि। ओकरा तृप्ति करब आवश्यक होइत। जँ से नहि, तँ भूखे भजन किए ने होइत। खाइले के देत? जँ देबो करत तँ एक मुट्ठी देत। एक दिन खेलासँ जिनगीक भूख मेटाएत? जँ से होइत तँ डिबियो लऽ कऽ तकलापर एकोटा भिखमंगा नै भेटैत...। मन घुमलैन। हारि मानी झगड़ा फरियाए। जहिना बाढ़िक तेसरा दिन पानि ठाढ़ भऽ उनटा-पुनटा दिशा पकड़ए लगैत तहिना घटक कक्काक मनमे हुअ लगलैन। अपन विचारक अनुकूल बात केकरा अधला लगै छइ। संयोगो नीक रहलैन। मुदा मनमे खरोँच लगलैन। समाजो तेहेन भऽ गेल अछि जे केकरा के पुछत? जहिना भोजक जएह बारीक मिठाइ परसैए सएह माछो-मौसु। कहू ई केहेन भेल? सभ तरहक पनचैती बड़के काका करता। जमीनोक पनचैती आ दुनू परानियोँक झगड़ा हुनके चाही। जँ जमीनक पनचैती अमीन नै करत, अहिना सभ गुणक आधारक से आदमी नै करत तँ खीर-खिचड़ीमे कोनो भेद रहत..! ई सभ गप घटक कक्काक मनमे नचिते रहैन, तखने सुन्दरलाल टोकलकैन- “भाय साहैब, अहीं ऐठाम जाइ छी?” ‘अहीं ऐठाम जाइ छी’ सुनि घटक काका औनाए लगला। अपन ठौर केतए अछि जे जाएत। की कहबै? से नइ तँ भरमे-सरम आँखि मुनि लइ छी जे बुझत हवामे अलिसा गेल छैथ। उत्तर नै पाबि सुन्दरलाल दोहरा देलकैन- “भाय साहैब भकुआएल छी, भक् खोलू।” अकचकाइत घटक काका बजला- “नइ, नइ! कनी आँखि लागि गेल। की कहलह?” सुन्दरलाल कहलकैन- “घरपर चलू। निचेनसँ बुझा देब, रस्ता-पेराक गप नै छी।” एक तँ राकश दोसर नौतल। घटक काका हरे-हरे कऽ घर दिस विदा भेला। मनमे उठलैन जे कोनो विचार दोहराइयो कऽ होइत अछि, किए ने दुनू परानी मिलि फेरसँ विचारि लेब...। घर दिस विदा होइते घटक काका सुन्दरलालकेँ कहलखिन- “गपो शुरू करह। जेते भेल रहत ओते तँ काजे ने भेल रहत।” क्षुब्ध होइत सुन्दरलाल कहलकैन- “देखियौ भाय, बिआह भेल केकरो आ जहलमे अछि हमर बेटा!” अकचकाइत घटक काका पुछलखिन- “से की, से केना?” ‘से की, से केना?’ बाजि घटक काका मने-मन महावीरजी केँ गोड़ लागि निसाँस छोड़ैत, सोचए लगला- बाप रे एकटा काजमे जँ एना भेल, हम तँ जिनगी भरि यएह केलौं! खुनी केसमे बेसी दिनक सजा होइ छइ। मुदा खुदरो-खुदरी केस मिला तँ ओहूसँ बेसियाइए जाइ छइ। हे भगवान, रच्छ रखलह! आबो छोड़ि देबाक चाही! घटक कक्काक मन जेना ठमकए लगलैन। ठमकैत मनमे उठलैन- जइ इंजीनियरकेँ जइ मशीनक बोध भऽ गेल अछि, जँ ओइ मशीनक तकनीक बदैल जाएत,तखन की हएत? दोसर काजक लूरि कहिया भेल जे करब। हे भगवान, जनिहह तूँ..! तैबीच सुन्दरलाल कहलकैन- “भैया देखियौ, हमरे बेटा फुलबाक बिआह बंगलोरमे करा देलकै। ओहन-ओहनकेँ गाममे के पुछै छइ। मुदा ट्रन्सपोर्टमे नोकरी भेने दिन-दुनियाँ बदैल गेलइ। भषो सीखि लेलक। अलगर्जा कमाइ हुअ लगलै। बी.ए. पास लड़कीक संग बिआह करा देलकै।” घटक काका- “बी.ए. पास लड़की गछलकै केना?” सुन्दरलाल- “केहेन गप करै छी। जखने लोक कमाए-खटाए लगैए तखने ने सर्टिफिकेटक ओरियान करए लगैए। एम.ए. पासक सर्टिफिकेट कीनि नेने अछि।” घटक काका- “लड़कीबला केतए-के छिऐ?” सुन्दरलाल- “नवटोलीक छिऐ। तीस-पैंतीस बर्ख पहिने गामसँ पड़ा कऽ गेल। नोकरी करए लगल। ओत्तै परिवारो रखैए, घरो-दुआर बना लेलक। अपन इलाकाक जाति बुझि कुटुमैती कऽ लेलक।” घटक काका- “आब की भेल?” सुन्दरलाल कहलकैन- “बिआहक बाद लड़की जोर केलक जे गाम जाएब। एबो कएल। मुदा जहिना पढ़ल सुग्गा बौक होइत तहिना वेचारीकेँ भऽ गेलइ। पनरहे दिनमे नाकोदम भऽ गेलइ। जहिना सासु अल्हैर कहए लगलै तहिना ससुरो माथा पीटए लगलै। सर-समाजक तँ चर्चे छोड़ू। ने भाषाक ताल-मेल बैसै आ ने खाइ-पीबैक वस्तुक।” बिच्चेमे घटक काका बजला- “ई तँ भारी जुलुम भेल! तखन की भेलइ?” सुन्दरलाल- “लड़की पड़ा कऽ दरभंगामे गाड़ी पकैड़ बंगलोर चलि गेल। हमरा बेटापर केस कऽ देलक। जेलमे पड़ल अछि।” डेढ़ियापर अबिते घटक काका बजला- “एहेन खच्चरपन्नी गाममे चलतै। अच्छा कनी ओहू पार्टीक बात बुझि लेब तखन कहबह। अखैन जाह, कनी हमहूँ औगुताएले छी।” दरबज्जापर गल-गूल सुनि रेखा आँगनसँ आबि खरिहाँनक मेह जकाँ बीचमे ठाढ़ भऽ सोचए लगली- केहेन पुरुख छैथ जे थूक फेक पड़ाएल रहैथ जे घुमि कऽ ऐ घरक मुँह नै देखब, से सालक कोन गप जे दिनो भरि नै निमाहि सकला! मुदा मन ठमकलैन। सप्पत-किरिया लोककेँ थोड़े टिक पकैड़ उखाड़ै छै, जँ से उखाड़ितै तँ भरि दिन लोक किए सभ बातमे ‘जय गंगाजी’ बाजि आकि माटि उठा-उठा सप्पत खाइए। जहिना लोक भात-रोटी खाइए तहिना ने सप्पतो-किरिया खाइक वस्तु भेल। खेलक पचलै, फेर खेलक फेर पचलै। रसे-रसे एहेन पचान पचि जाइ छै जेहेन झूठ-सच्चमे पचल अछि आ सच्च-झूठमे। जँ तुकबन्दी करैक लूरि भऽ जाए तँ शायर-कवि बनबे करब आ जँ झूठ-सच्च पचबैक लूरि भऽ गेल तँ वक्ताकेँ के कहए सेसर ‘अनुभवी वक्ता‘ बनबे करब। तहिना तँ हिनको जिनगी तेहने रहल छैन। तहूमे समाज तेहेन लाइसेंस दऽ देने छैन जे साले-साल थोड़े रिनुअल करबए पड़तैन, ता-जिनगी लेल बनि गेल छैन। आँखि उठा घटक काकापर देलैन तँ देखलैन जे मुँह धुआँ केने लटकौने छैथ आ जहिना कोयलाक धुआँमे चमकैत बिजली बनैत तहिना उपदेश झाड़ि रहल छैथ। रेखाक मन रोषा गेलैन। घरे परिवारक लोक किए ने होथि मुदा जहिना गलत, गलत छी तहिना सहियो सेहो सही छीहे। गलतीक की कोनो पारावार छइ? रावण जकाँ लाख-सबा लाख धिया-पुता जहिना त्रेतामे छेलै, जे घटि कऽ द्वापरमे साए-सैंकड़ापर चलि एलै तहिना ने अखनो अछि। तहूमे कलयुग छी। पापेक युग। देवतो सभ पड़ा कऽ उनीकुटी चलि गेल छैथ। जाए तँ चाहलैन समुद्र दिस मुदा भोर होइते लाजे सभ रस्तेमे रहि गेला...। रोषाएल रेखा झपैट कऽ बजली- “बौआ, अहीं सभ ने सर-समाज छी। जेहने समाज रहैए तेहने लोक काजो-उदेम करैए?” रेखाक बात सुनि सुन्दरलालक मनमे पंचक एहसास भेलइ। पंचक एहसास होइते अपन बात बिसैर गेल। बिसैर गेल बेटाक जहलक उपाय। दमकलक चक्का जकाँ पहियाक रूप बदैल एक सुरे मुड़ी डोलबैत बाजल- “हँ, से तँ छीहे। केकरो कटने समाज कटै छइ। तेहेन लस्सा बनल छै जे केतबो कटतै तैयो सटिते रहतै।” सुन्दरलालक बात रेखा नइ बुझि बजली- “नइ बुझलौं अहाँक बात।” जहिना नमहर नाँगैर नमहर जानवरक पहचान छी तहिना ने काजक नाँगैर मनुखोक पहचान होइ छइ। जँ से नहि, तँ रावणसँ पैघ आसन हनुमान कथीक बनौलैन। ओही नाँगैरक बले ने सौंसे लंका जरा देलखिन आ अपना किछु ने भेलैन। बुझल-बिनु-बुझल दुनियाँमे केहेन हएत जे नै हएत। कोनो प्रश्नक उत्तर दुनूक एक भऽ सकैए। मुदा से होइ छइ। बुझनिहार संग बुझनिहार रहैत तँ बिनु बुझनिहारोक संग तँ बिनु बुझनिहार हेबे करतै...। जइ काजमे सुन्दरलाल अपने ओझराएल छल तही काजक ओझरी छोड़बैक भार लैत बाजल- “भौजी, अहाँ-हमरामे कोन भेद अछि। नीक-अधला सभ गप तँ दिअर-भौजाइमे होइते छइ। से कि कोनो आइए आकि अदौसँ होइत आबि रहल अछि। देखियौ, जहिना करोटन फूलक पत्ता-पत्तामे गाछ पैदा करैक शक्ति अछि, तहिना ने समाजोकेँ बनबै-मेटबैक दुनू शक्ति छइ।” सुन्दरलालक विचारक सूरमे अपन विचारक सूर मिलबैत रेखा बजली- “बौआ, पहिने कनी भैयाकेँ बुझा दियौन जे रूसि कऽ जे भगला से कोन अनचित बात कहलयैन।” नमहर झगड़ा देख सुन्दरलालकेँ नमहर पंचक एहसास भेल। जहिना नमहर लीब जाइत, तहिना सुन्दरलाल लीबैत बाजल- “भौजी, केना कहबैन हम। सँए-बहुक झगड़ामे लबड़ेटा पड़ैए। अहाँ जे कहलौं से तँ भाइयो-साहैब सुनबे केलैन।” जहिना एक चुरुक जलसँ सौंसे घरक वस्तु पवित्र बनि जाइत तहिना घटक काका अपन गनजन सम्हारैत बजला- “हौ सुन्दरलाल, जहिना तूँ छोट भाए भेलह तहिना ईहो घरेवाली भेली। तँए बजैमे थोड़े कोनो धरी-धोखा हएत। जुआनमे मौगी घरसँ पड़ाइत अछि आ उमेर बढ़ने पुरुख। तोहीं कहह जे कोन गलती केलौं?” मुड़ी डोलबैत सुन्दरलाल बाजल- “से के कहैए जे अहाँ अधला केलौं।” पाशा बदलैत देख रेखा बजली- “बौआ, नौंए-कौंए कऽ भगवान एकटा बेटा देलैन। अपने दुनू परानी ने सोचब जे केहेन पुतोहु एने घरक गाड़ी ससरत। सिनेमा-नाटक जकाँ थोड़े मनुखक जिनगी क्षणे-क्षण बदैल सकैए आकि क्षणे-क्षण आगू-पाछू भऽ सकैए।” रेखाक बात सुनि, मुड़ी डोलबैत सुन्दरलाल बाजल- “हँ, से तँ होइते छइ। अहीं कहू भौजी, केकरा चलैत हमहीं एते तबाह छी। उहए छौड़ा माने हमरे बेटा एहेन किरदानी किए केलक? जहिना बिआह भेने अनेरे लोक घटक बनि जाइए तहिना किए बनल? नै बनल तँ जहलमे किए अछि?” रेखा- “अहाँ अपनापर नै लिऔ। बेटा केलहा काजक दोखी बाप नै होइए मुदा माए-बापक...। काल्हि भऽ कऽ जे कोनो दोख लगा बेटाकेँ कहबै तँ ओ नै मुँह दुसैत कहत जे केकर केलहा छिऐ। जहिना अपन बेटीकेँ पोसि-पालि बिआह करै छिऐ तहिना ने सभ करैए। मुदा घरक मिलानी जँ नै करबै तखन पढ़ल सुग्गा बौक नै हेतइ।” पत्नीक बात सुनि घटक काका सहमला। पाछू घुमि तकलैन तँ बुझि पड़लैन जे केते घुर-बहुर काज भेल अछि। र्इहो हएत। यएह ने दस गोरेमे बजलौं। कोनो कि इएहटा बात बजलौं। सदिकाल तँ एहेन-एहेन बात चलिते रहैए। बड़ हएत तँ बाजब जे पत्नीक विचार नै भेलैन। तहूमे के एहेन छैथ जे पत्नीक बात काटि सकै छैथ। मन झिलहोरि खेलए लगलैन। जहिना पघिलल कटहर गाछसँ खसिते छँहोछित भऽ छिड़िया जाइए तहिना घटक कक्काक मन छँहोछित भऽ छिड़िया गेलैन। ◌ शब्द संख्या : 2515, तिथि : 25 जून 2012 मान तराजूक दुनू पलराक बीच जहिना डन्डी लागल रहैत, जइ सहारासँ वस्तु-जातक ओजन मानल जाइत तहिना जिनगीक बीच सेहो डन्डी होइत अछि। कमल फूलक डण्टीक सहारासँ जहिना फूलक सभ अंग समान रूपे खिल-खिल खिलैत तहिना जिनगियोक होइत, मुदा से कहाँ होइए? जिनगीक तराजूक पलरा दू रंगक होइए, एक पुड़ल दोसर घटबी। पलराक घटी-बढ़ी भेने तराजू पसगाँह भऽ जाइए जइसँ घटैत-बढ़ैत जिनगी जीवनक दू धारामे प्रवाहित होइत चलए लगैए। एक महिना अखाढ़ रहितो दू नक्षत्रमे विभाजित होइत, ओना एक पूर्ण होइत दोसर अपूर्ण भेने बीच-बीचमे तेसरो चलि अबैत। तैबीच आद्रा नक्षत्र अपन पूर्ण जिनगी बितबैए। भलेँ अखाढ़क पहिल भाग हो वा मध्य वा अन्त। पनरह दिन अन्हार बीति आठ इजोरिया मास टपि गेल। हाजरी भुकबैले मौसम जोगार लगा नेने अछि मुदा आद्राक उपस्थिति दर्ज नै भेल अछि। ओना कहैले सालक पाँच बरखा भऽ चुकल अछि मुदा तैयो आद्रक जगह उम्मस अपन पूर्ण जुआनीमे जगमगा रहल अछि। गोनूझाक हरवाहिक जलखैक खीर जकाँ हाल धरतीकेँ छुछुओने अछि। दिन उगिते जहिना दिनानाथक दर्शन होइत तहिना किसानक बीच नव दर्शन आएल। ओ छी श्री-विधिसँ खेती करब। मास दिन पूर्व धानक बीआ, जैविक खाद आ किटनासक दबाइ इत्यादिक बँटबारा, पैछला हिसाबे ऐबेर इमानदारीसँ भेल। इमानदारी ऐ लेल जे जहिना बैंकक कर्जकेँ लोक चौक परहक भुज्जा खा सठा दैत तहिना अखन धरिक बीआ-बालिक हिसाब रहल। वैचारिक रूपमे बीआ पाड़ि खेती करैक समए सेहो पौलक। संयोगो नीक रहल जे एकटा बरखा सेहो भेल। बरखा हाथ लगने किछु गोरे बीआ खसौलैन। देखबामे बरखा भेल, मुदा बीआ पाड़ैबला नै भेल। जइसँ बीआ अदहा-छिदहा जनमल। किछु गोरे कलसँ आ घैलसँ पटा डुमा हाल बना बीआ खसौलैन। जनम्बैमे ओ सभ जीतला। मुदा किछु गोरे अखनो बीआ घरेमे आद्राक आशापर रखने छैथ। ओना, अद्रोसँ रोहैण नक्षत्रक बीआकेँ निरोग मानल गेल अछि। मुदा रोहैण नक्षत्रक पछाइत हिसाबकेँ अनदेखी केने बीराड़ेमे बीआ जरबो करैत। खेतीक एक उपाय तँ हाथ आएल मुदा मूल उपाय–पानि–नै आएल। एक पाशापर भगवान बैसल, दोसर 2008 ई.क कोसीक विभिषिका नहरकेँ खा गेल, तइ लगल 1987 ई.क बाढ़ि आ 1988ई.क भुमकम बीस-पच्चीस बर्ख पहिने बोरिंगकेँ खा गेल छल। जुड़शीतलक चलती कमने पोखैरक उड़ाही सेहो रूकिये गेल जइसँ ओ अपने तेना रोगा गेल अछि जे जान-ले रबिक संग एकादशियो करैए। मनुखक जन्म-संस्कार ओतए पनपब शुरू होइत जेतए ओकर जन्म होइत अछि। ई दीगर बात जे केतौ पेटक बच्चाक सेवा पोनगैसँ पहिनहि हुअ लगैत आ केतौ रस्ते-पेरे जन्मो लैत आ पाललो-पोसल जाइत। आद्राक कर्त्तव्यक लापरवाहीसँ जन-जनक बीच तबाही तँ ऐछे, जे श्रमक घटबी सेहो बेसियाइए गेल अछि। मुदा किछुओ किए ने हौउ आखिर वसन्तक उनाड़ियो मास तँ छीहे। तँए किए ने बाग-बगीचामे बगवार वसन्तक संग चैतावर आ बरहमासा गाएत। आमक संग-संग जमुनिया धार सेहो बहिते अछि। टोलक पाँच गोरेक गाछी एकठाम छैन। साधारण परिवार तँए छोट-छोट गाछी छैन। मुदा कलमी-सरही सभ रंगक आम लुबधल अछि। सभ मिला कऽ करीब पच्चीस तीस गाछ पाँचो परिवारक जीवन-शैली एक रंग कऽ देने अछि तँए विचारोमे एकरूपता छैन। एते जरूर छैन जे बिनु कहने कियो कोनो गाछपर ने ढेपा फेकैत आ ने हाथसँ तोड़ैत। मुदा खसल आमक कोनो रोक नहि। जइसँ चेतन तँ अपन-आनक ठेकान जरूर बुझैत मुदा बाल-बोध नहि। पाँचो परिवारक धिया-पुता एकेठाम खेलबो करैत आ आम खसलापर पबैले दौड़बो करैत। ओना अबोध बच्चा रहने, अवाजकेँ ठीकसँ नै अकानि कियो केम्हरो कियो केम्हरो दौड़ जाइत मुदा केकरो भेटलापर एते खुशी सभकेँ जरूर होइत जे हेराएल भेटल। रातिक दू बजैत। उमस भरल दिनक संग अदहा रातियो बीति गेल। एक बजेक बाद पूर्बाक लहकी उठल। दिन भरिक गुमराएल मन नीन दिस दौड़ल। दुनू बेटाकेँ संग केने गुलजारी आमक गाछी विदा भेल। अष्टमीक चान लुप्त भऽ गेल छल। जइसँ अन्हारक साम्राज्य पसैर गेल छल। आठ गोरेक परिवार गुलजारीक। तीनू बापूत मिला आठटा पाकल आम भेटलै। आँगन आबि डिबियाक इजोतमे आठो आम गनि छोटका बेटा बाजल- “जेते गोरे घरमे छी सभ-ले एक-एकक हिसाबसँ आमो अछि।” राधेश्यामक बात सुनि गौरीशंकर बाजल- “जहिना छोट-पैघ आम अछि तहिना तँ घरमे लोको अछि, तँए...।” “भैया, अखन माएकेँ रखैले दऽ दहक। अपना सभ खाइबेर-मे खाएब।” राधेश्याम बाजि कऽ चुप भऽ गेल। ◌ शब्द संख्या : 646 मनोरथ जहिना शोभा काका सभ छुट्टी गामेमे बितबै छैथ तहिना सभ रबियो बितबै छैथ। सुविधो छैन। पाँचे कोसपर विद्यालय छैन, साइकिल छैन्हे तँए अबै-जाइमे असोकर्जो नहियेँ होइ छैन। शनिकेँ स्कूलो अदहे होइ छैन, सेहो सुविधा भाइए जाइ छैन। आने शनि जकाँ सात बजे साँझमे शोभा काका गाम पहुँचला। पछबरिया घरक दाबा लगा साइकिल ठाढ़ कऽ कैरियरपर सँ झोरा उतारि आँगनमे पएर रखिते छला कि पत्नीपर नजैर पड़लैन। जेठ-अखाढ़ मास तँए डिबिया नेसैक ओरियान सुगिया काकी करै छेली। ओना, डेढ़ियापर जखने साइकिल खड़खड़ाएब सुनलैन कि बुझि गेली जे एहेन अवाज तँ अपने साइकिलक छी। आ आँखि उठैबते नजरियो पड़िए गेलैन। जेठ-अखाढ़ मास ऐ लेल जे पूर्णिमा भऽ गेल मुदा सकराँइत पछुआएले छल। मुदा काकीक संयोग नीक रहलैन जे नजैर-मे-नजैर नै मिललैन। जँ नजैर मिलि जइतैन तँ चूल्हि पजारि डिबिया नेसब बाधित भऽ जइतैन। तेकर लाभ सुगिया काकी उठेबो केली। लाभ ई उठौली जे पतिक आगत-भागतकेँ एक नम्बर काजक सूचीसँ निच्चाँ उतारि दू नम्बरमे रखि, कुशल कारीगर-कलाकार जकाँ एक काजकेँ विसर्जन करैसँ पहिने दोसरक संकल्प लऽ लेली। मने-मन विचारि लेली जे जाबे जारैनक धुआँ फरिच हएत-हएत ताबे साँझो घुमा लेब। काजमे लगल देख शोभो काका बिनु किछु बजने कोनचरे लगसँ झोरा ओसारक चौकीपर रखि पानिक प्रतीक्षा करए लगला। केना ने करितैथ, जाधैर घरबैया दिससँ पएर धोइले पानि नै पहुँचैत ताधैर कारखाना जकाँ उपस्थिति केना बनैत। मुदा ईहो तँ भऽ सकैए जे अभ्यागतक सेवा योग्य परिवार नै हुअए? सुगिया काकीक मनमे ईहो उठैत रहैन जे भाषणक कलाकारी होइत जे एतबे समैमे एतेटा बात बाजि देब मुदा काज तइसँ बहुत दूर होइत। ओना, चलनिहारकेँ पैरक गति रोकिनिहार सेहो बीचमे आबि सकैए। नहियोँ औत, तँए जइमे ‘हँ-नइ’ दुनूक सम्भावना होइ ओकर गारंटी शत-प्रतिशत नै कएल जा सकैए। तँए सुगिया काकीकेँ होनि जे जैठाम दुविधा अछि तैठाम सावधानी नै करब तँ रेलबे-ट्रेन जकाँ एकठाम बिलंम भेने गन्तव्य स्थान धरि बिलैमते ससरब। तेतबे नहि, अदहा दिनक चलल छैथ, बाटमे केतए आ की देखने हेता, जँ कहीं एहेन समस्या देखने आएल होथि आ रस्तापर अमती काँटक झाँगैड़ जकाँ रखि दैथ, तखन तँ जिनगीए ढंस भऽ जाएत! भोजनकाल जँ पानिक बरतने फुटि जाए तखन पानि केना परसब..? सभ काज सम्हारि सुगिया काकी हाथमे लोटा धरबैत शोभा काकाकेँ पुछलखिन- “हाल-चाल सभ आनन्द किने?” काकीक पुछब जेना शोभा कक्काक मनकेँ हौंर देलकैन तहिना मन सहैम गेलैन जे भरिसक कोनो आक्रोश छैन। मुदा अनुकूल समए नै पाबि, उत्तर देखखिन- “पुरबते।” शोभा कक्काक उत्तर सेहो सुगिया काकी तारि लेली। तँए उचित समए नै पाबि सुगिया काकीक मनमे भेलैन जे पएर धोइले दरबज्जापर जेबे करता तँ किए ने टिकमे चिड़चिड़ी लगा दिऐन जे जाबे चिड़चिड़ी छोड़ौता-छोड़ौता ताबे चाह बना लेब। काज औगतेने तँ नइ होइ छइ। बड़ भूख लागए तँ पातक बदला हाथे नै पसारि दिऐ..! बजली- “नीमक गाछमे गराड़ लगि गेल अछि से कनी देख लेब?” सुगिया काकीक बात सुनि शोभा काका बजला किछु नहि, मुदा मनमे उठलैन जे नीमक गाछमे केतौ गराड़ लगइ! एहेन बात किए कहलैन? गराड़केँ मीठ जड़ि पचै छइ? तीत केना पचत। मुदा फेर मनमे उठलैन जे पुरुखक नाड़ी नारीक नाड़ीसँ भिन्न चलैए तँए समए लगबै दुआरे जँ कहने होथि। मुदा से केना बुझब जे केते समए लगाएब? भऽ सकैए जे जेतबे समए जड़ि खोरि गराड़ देखैमे लगत तेते, मुदा से अपने केना बुझब? तइसँ नीक जे जाबे बजबए नै औती ताबे नै जाएब। पैछलो शनिमे जखन आएल रही तँ पएर धोलाक बाद चाह पिऔने रहैथ। तहिना चाहे बनबै दुआरे जँ टारने होथि। नीक हएत जे ताबे धरि कड़ची लऽ कऽ जड़ि खोरैत-खारैत रहब जाबे धरि बजबए नै औती। चाह छानि ओसारक चौकीपर रखि काकी दरबज्जा दिस बढ़ैत बजली- “जअ काटए गेलौं तँ सतुआइन केनहि एलौं! चाह सेरा कऽ पानि भऽ गेल। आ झूठे-फूसेमे लटकल छी!” ‘झूठ-फूस’ सुनि शोभा काका चौंकला, कहू जे अपने लटकल छी आकि हुनके किरदानीए लटकल छी? मुदा किछु बजला नहि। मनमे उठलैन जे जइ शून्यक कोनो मोजर नै छै, सेहो घुमैत-फिरैत केतए-सँ-केतए उड़ि जाइत अछि। मुदा ई तँ शब्दवाण छी, कागभुशुण्डी जकाँ समुच्चा दुनियाँ देखौत..! पुछलखिन- “केहेन चाह बनेलौं जे लगले पानि भऽ जाएत?” जहिना मन्दिरक बीच भक्त भगवानक आगू ठाढ़ भऽ दुनू हाथ जोड़ि अपन मनोरथ मनमे दाबि, पहिने स्तुति करैत तहिना मनक बात मनेमे रखि सुगिया काकी बजली- “तबधलमे तपते चाहक ने सुआद होइ छै, जँ से नहि, तँ जहिना अधिक बोखारक आगू कम बोखार, बोखार नै रहि जाइत तहिना ने चाहो होइ छइ।” भूखलकेँ पहिल कौर आ पियासलकेँ पहिल घोंट जहिना सुखद होइ छै तहिना चाहक घोंट लगैबते शोभा काका बजला- “गाम-घरक की हाल-चाल अछि?” गाम-घरक हाल-चाल सुनि सुगिया काकीक मन उड़ए लगलैन। बजैसँ पहिने सोचए लगली जे किम्हरसँ बाजी। गाम दिससँ आकि परिवार दिससँ। सम्हारैत बजली- “गाममे तँ ऐबेर साक्षात् सरोसतिये आबि गेली। एकोटा विद्यार्थी फेल नै भेल।” सभकेँ पास सुनि शोभा कक्काक मन ओझरा गेलैन। जखन सभ पास केलक तखन सुशीलक केना बुझब जे केतेसँ नीक केतेसँ अधला केलक। पाशा बदलैत पुछलखिन- “केकरा कोन डिबीजन भेल?” काकीक मन पहिनहिसँ उड़ल रहबे करैन, जहिना दौड़ैकाल पैरक ठेकान नै रहैत तहिना प्रश्नकेँ सुआदने बिना बजली- “सभसँ बेसी नम्बर अपने सुशीलकेँ अछि।” ‘सभसँ नीक सुशील’केँ सुनि शोभा काका बजला- “अपने जे हुअए मुदा सुशीलकेँ आगूओ पढ़ाएब।” आगूक नाओं सुनि सुगिया काकी भकरार फूल जकाँ बजली- “रिजल्ट निकललापर जखन सुशील संगी-साथी सभसँ भेँट कऽ आएल तखनेसँ मन खसल देखै छिऐ!” “से किए?” “कहैए जे आगू पढ़ैले सभ बाहर जाएत..?” सुगिया काकीक विचारकेँ शोभा काका विचारक अलमारीमे चौपेतैत बजला- “नीक हएत जे बौऔकेँ एतै सोर पाड़ि लियौ। परिवारक सभ मिलि कऽ किए ने परिवारक काजक विचार करब। केकरो मनोरथकेँ किए कियो दाबत?” शोभा कक्काक विचार सुनि सुगिया काकीक मन खापैड़क धान जकाँ ऐ भागसँ ओइ भाग करए लगलैन। मुदा पतिक बात बुझि हनछीन नै कऽ कन्हलग्गू बरद जकाँ जू गेली। सुशीलक संग आबि काकी अपन घरमे अभ्यागत जकाँ बजली- “बौआ, पहिने बाबूकेँ गोड़ लगहुन।” ओना सुशीलक मनमे अपनो रहबे करै जे अपन कर्त्तव्यक पालन केना केने छी से तँ पितेक बतौल रस्ता छिऐन, तँए ओइ पगक पग-सँ-पग टपलौं। तखन किए ने ओकरे हथियार बना जीवन-कर्म करब...। पिताकेँ गोड़ लागि सुशील मुँह उठा असीरवादक प्रतिक्षा करए लगल। सुशीलक माथपर हाथ रखैत शोभा काका पुछलखिन- “बाउ! आगूक की विचार होइए?” सुशील बाजल- “सभ बाहर जा-जा नाओं लिखौत।” शोभा काका कहलखिन- “मनोरथ अपनो अछि, माइयोक मन तेहने देखै छी। चारि-पाँच साल नोकरी रहल अछि। तैबीच देखबे करै छहक चारू भाए-बहिन पढ़ै छह, दिनो-दिन आगूए बढ़बह। जइसँ खरचो बढ़िते जाएत। केते कमाइ छी से केकरोसँ छिपल अछि। तखन तँ आमद-खर्च देख कऽ जँ परिवारक गाड़ी नै खिंचबह तँ केते दिन परिवार ठाढ़ रहतह।” पतिक बातकेँ अनसुन करैत सुगिया काकी बिच्चेमे टपैक उठली- “हम केकरासँ थोड़ छी जे अपन मनोरथ पूरा नै करब। जहिना सबहक बेटा पढ़ैले बाहर जाएत तहिना हमरो सुशील जाएत।” पत्नीक विचारसँ शोभा काका सकपकेला नहि। अपनो मनोरथ, पत्नियोँक मनोरथ आ बेटोक मनोरथकेँ पानि-चिन्नी-नेबोक रस जकाँ घोड़ए लगला। मुदा मनक बात कहथिन केकरा। नजैर उठा कखनो पत्नी तँ कखनो पुत्रपर दैत विचारए लगला। विचित्र स्थिति बनि गेल अछि। नोकरीक चाहमे लोक केतए-सँ-केतए भागि रहल अछि! किए ने भागत? जे हवा बनि गेल अछि आकि बनल जा रहल अछि तइमे जिनगीक ज्ञान पाछू पड़ि रहल अछि। नव तकनीक संग नव मनुख पैदा लऽ रहल अछि जेकर दूरी एते-बढ़ि रहल अछि जे चिन-पहचिन्ह तक समाप्त भऽ रहल अछि..! ◌ शब्द संख्या : 1162 [1] पत्नी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्डलक जल भँमर उपन्यासक ऐगला कड़ी 17. कुलानन्दक पएर बढ़ि रहल छल आ मनमे पिता धर्मलालक कहल एक-एकटा बात आबि रहल छेलइ। “कुकरम केलौं तँ डण्ड भोगैले तैयार रहू। भाग्यक बली छी जे रजेसरा गाममे नहि अछि, नहि तँ एके मिनटमे पता चलि जाइत। डेढ़हथीसँ माथ फोड़ि देने रहैत। रजेसरा नहि छै तँ की भेलइ। नीताक बाप मटरूवा तँ गामेमे छइ। आगि लगौलौं तँ मुझेबाक उपाय खोजू। कोनो रस्ता नहि भेटत तँ झड़ैक कऽ मरब।” ई बात सुनलाक बाद कुलानन्दकेँ छड़पटी बढ़ि गेल छेलइ। केतेक पडयंत्र ओकरा मनमे जन्म लैत छल आ केतेक मरि जाइत छल। एक गलतीसँ बँचबाक लेल लोक हजारो गलती करैत अछि। अन्तत: पछताइत जिनगी बीत जाइत अछि। कुलानन्द मने-मन भँजियाबए लगल जे मटरूवासँ गाममे केकरा-केकरा झगड़ा भेल छइ। ओ सभ कोन तरहेँ हमरा पक्षमे रहत। सुआरथी आ लोभी तँ सभ होइते अछि। केकरो टका-पैसाक लोभ देलक तँ केकरो आन चीजक। ऐ तरहेँ नीता घरक आस-पासक लोककेँ अपना पडयंत्रक जालमे फँसा लेलक। अपन बँचाउक सभ रस्ता बना लेलक। मटरूवाक अपन जातियो कुलानन्दे दिस बजए लगलै। जखन कुलानन्द घर दिस घुरल तखन ओकरा मुँहपर मुस्की नाचि रहल छेलइ। ऑंखिमे भरल छेलै पडयंत्रक छॉंह। ◌ 18. सामूहिक धक्का बड़ जोरगर होइ छइ। बिहाड़ि सन। केतेको घर-परिवार ओइ धक्कासँ उजैर कऽ नाश भऽ जाइ छइ। मुदा जे छली-परपंची अछि ओ समाजक धक्काकेँ चुटकी बजा कऽ उड़ा दइ छइ! आइसँ नहि पहिनौंसँ अहिना होइत आएल अछि जे समाजक धक्का दीन-हीन आ दबल बेकतीकेँ बेसी लगै छइ। पैघ आ मुँहगर लोक तँ एहिसँ बँचले रहै छइ। कारण ओ सभ छल-परपंच रूपी कवच पहिरने रहैत अछि। धरमलाल समाजक पैघ लोक। परपंची जाल फेकैमे बेसी तेजगर। तँए बेटोमे ऐ गुणक मात्रा पूर्ण। कुलानन्द पहिने पता लगा लेलक जे भूमासँ मटरूवाकेँ झगड़ा रहै छइ। मटरूवाकेँ पड़ोसिया भूमा। दुनू एके जाति। कुलानन्द टोह लैत भूमाक दुआरिपर बैस रहल। भूमा केतौसँ घुमि-फिर कऽ आएले छल। कुलानन्द ओकर कान भरए लगल। नीताक विषयमे जेतेक धरि भऽ सकल अकट-बकट कहैत रहल। सँगे पाँच साए टाका हाथमे चुपेचाप धरा देलकै। अन्तमे ईहो कहलकै जे सँग-साथ देबाक लेल तोरा जातियेक आर लोक तैयार रहतौ। केते गोरेसँ गप्प भऽ गेल छौ। भूमा दुसमनीक कारणे मटरूवापर बिगड़ले रहै छल। ऊपरसँ पाँच साए टाकाक लोभ ओकरा आरो उत्साहित कऽ देलक। उठैतकाल कुलान्नद ईहो कहि देलकै- “रौ भूमा, तोरा जातिक सवाल छौ। जातिक बेटी। तेकर इज्जत। ओइ इज्जतकेँ दोसर जातिक छौड़ा नाश कऽ देलकौ। पौभरिक रजेसरा। जातिकेँ लाजे नहि छौ। तूँ आब जान। तोरा जे कहैक छेलौं से कहि देलियौ।” भूमा डेढ़हत्थी हाथमे लैत फड़कैत बजल- “अहाँ जाऊ ने यौ। आखिर जातिक सवाल छइ किने। मटरूवाकेँ कारिख-चुन नहि लगाबी तँ हमर नाम भूमा नहि। ई बेशरमी खेल-खेलता तँ जातिसँ निकालि देबैन।” कहैत ओ मटरूवाक घर दिस विदा भऽ गेल। कुलानन्द कुटिल मुस्की दैत चलि देलक। ◌ 19. झलफल अन्हार भऽ गेल छल। धरमलाल बाटक कातमे बैसल सोचि रहल छल- कोन चालि चलब जे ‘साँपो मरि जाए आ लाठियो ने टुटए।’ ऐसँ पहिने ओ तीन बेर मटरूवाक बारेमे पता लगबैले गेल छल। मुदा मटरूवासँ भेँटे नइ भेलइ। कारण मटरूवा बजार चलि गेल छेलइ। धरमलाल सोचि रहल छल जे पहिने मटरूवासँ गप्प कऽ ली। बाप-बेटीक बीच जँ गप्प भऽ जेतै तँ हमर कुचालिकेँ बुझि जाएत। तँए मटरूवाक कान बाटेमे भरि दी से ठीक होएत। उचितमे साथ दइबला पिता तँ होइते छइ। अनुचितोमे साथ दइबला पिता होइ छइ। बापक जाल अलग बेटाक जाल अलग। मुदा उदेस एकेटा। किछुकालक बाद मटरूवा कपारपर मोटा लादने ओही बाटे आबि रहल छल। धरमलाल ठाढ़ होइत बाजल- “रौ मटरूवा! कनीकाल ठाढ़ हो। तोरासँ एकटा गप करैक अछि।” “हे यौ, अखैन तँ कपारपर भारी समान अछि।” “एकेरती ठाढ़ ने रह। दू टपकीए गप छइ।” मटरूवाकेँ अनसोहाँत लगलै। मुदा धरमलाल बाबूक बात केना टारत। बढ़ल पएर घुमा लेलक। लगमे जा कऽ पुछलक- “कहू, की कहबाक अछि? सुनै छी हमर जमाइयो गामपर गेल अछि। पानियोँ-बैसक कियो ने देने हेतइ।” कनीकालक लेल धरमलाल चुप भऽ गेल छल। जेना प्रपंचक तीर मनमे तैयार कऽ रहल होइ। फेर माथ कुड़ियबैत बाजल- “रौ, कहबाक इच्छा तँ नहि होइत अछि। मुदा नइ कहबो तँ बनत केना। जेहने तोहर बेटी तेहने हमर बेटी। बेटी तँ पूरा गामक होइ छइ।” मटरूवा चौंकैत पुछलक- “यौ गिरहत, साफ-साफ कहू ने। नीतियासँ की कोनो गलती भऽ गेलइ?” “हे रौ, तूँ एकरा गलतीए कहै छी। तोहर बेटी तँ समाज आ जातिक नाक काटि रहल छौ।” “की बात भेलै? हमरा तँ किछो ने बुझल अछि।” “हेतौ की। नीतियाक चालि-चलन खराब भेल जाइ छौ। किछ-दिन पहिने तँ रजेसरा आ नीतियाक विषयमे हो-हल्ला भेले छेलौ।” “ऊ बात झूठे छेलै गिरहत। बुझै नहि छिऐ। समाजमे तँ हित आ मुद्दै सभकेँ छइ। तिलकेँ ताड़ बना देलकै।” “तूँ सभकेँझूठे बुझै छीही। मुदा ऐसँ सभ बात थोड़े झँपा जेतौ। किछु एहनो बात भऽ गेल छौ जे झँपा नइ सकै छौ। पुछबीही तब ने पता चलतौ।” मटरूवाकेँ तामससँ मुँह लाल भऽ गेलै तेकरा दबैत ओ बाजल- “अहाँ केना बुझै छिऐ?” “बुझल छै तब ने कहै छियौ। आइ तँ आर विचित्रे बात देखलियौ।” “की विचित्र बात?” “कहबाक विचार तँ नइ छल, मुदा कहबौ नहि तँ बुझबीही केना। आइ कुलानन्दक सँगे ओ कोनो अधला गप्प करै छेलौं। दू चमेटा लगा ओ नीतियाकेँ भगा देलकौ। हम दुआरिपर सँ सभ किरदानी देखै छेलियौ।” मटरूवाकेँ माथपर सँ मोटा ससैर गेलइ। ओकरा सम्हारए लगल। धरमलाल जाइसँ पहिने फेर बाजल- “अखनो समे छौ। समैट-ले अपन धिया-पुताकेँ। समाज जँ बिगड़तौ तब बुझबीही।” मटरूवा अपना टोलमे धाख बनौने छल। जरूरतसँ किछ बेसीए कमा-खटा कऽ जमा कऽ लैत छल। परिवारो छोटे छेलइ। स्त्री चारि बरिस पहिने मरि गेल छेलइ। दूटा बेटी मात्र रहइ। जेठकी बेटी बिआह-दुरागमनक बाद नहियेँ अबै छेलइ। बाप आ बेटीक छोट-छीन परिवार कमा-खटा कऽ चलि रहल छल। मटरूवाक आस-पड़ोसमे हरदम झगड़ा होइते रहै छल। सभटा फसादक फैसला मटरूवे करै छल। तँए ओ अपनाकेँ इज्जत-प्रतिष्ठाबला बुझै छल। मुदा धरमलालक गप सुनला पछाइत आइ ओकरा बुझि पड़लै जेना चारूभरक धरती हिल रहल अछि। बनल बनाएल इज्जत जेना खण्ड-पखण्ड भऽ रहल अछि। तामसे ओकर सौंसे देह थर-थरा रहल छेलइ। माथक मोटाकेँ सम्हारैत मटरूवा लपकैत घर दिस विदा भऽ गेल। ◌ 20 अपन टोल लग आबि मटरूवा बड़ीकाल तक सोचैत रहल। जइ बरदकेँ पानि नहि ऊ कोनो बरद छी। जइ मरदकेँ आनि नहि ऊ कोनो मरद छी। नीतिया सभ इज्जत-पानि उतारि देलक। लोक सभ कहबे करत- ‘इह, पंच बनल छल। आब करौ अपन पंचैती। लोक लग कोन मुहसँ बजब? के बाजए देत? किए बजए देत? सोचैत-विचारैत जाबे घर लग पहुँचल ताबे राति भऽ गेल छेलइ। ओकर पड़ोसिया भूमाक दुआरिपर लोक सभ बैसल छल। आपसमे घोल-फचक्का भऽ रहल छेलइ। लालटेनक भुकभुकाइत इजोतमे कीड़ा-फतिंगा फानि रहल छल। ओहिठाम ओकर जमाय मुँह लटकौने बैसल छल। मटरूवाकेँ देखते एक गोरे टोकलक- “ओनए अँगना दिस केतए जाइ छिऐ। एनए आऊ चोटपर।” मटरूवाक टाँगमे जेना पथ्थल बन्हा गेलइ। रसे-रसे लग आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। भूमा ओकरा नहि देखलकै।ओ जोर-जोरसँ बाजि रहल छल- “ई बेहयापन हम अपना जातिमे नहि हुअ देबइ। केयो खुश रहै वा नाखुश। एनामे तँ लोकक कथा-कुटमैती सभटा मारल जेतै ने। यो डिगडिगिया भाय, बजै नहि छिऐ।” डिगडिगिया एहेन लोक जे मालिक-मालिक कहि कऽ केकरो ठकि लैत अछि। ओइ टोलपर मुँहपुरखी करबाक ओकर पहिनेसँ इच्छा छेलइ। मुदा कहियो पंचैतीमे जोरसँ बाजि कऽ पंच बनबाक कोशिश करै छल तँ मटरूवा ओकरा मुहेँपर चट-दे कहै छेलइ- “रौ लवपर बबाजी भेल तँ दालिकेँ कहलक- बेकुंठी।” ई सुनिते बेचारेक मुँहक बात मुहेँ रहि जाइ छेलइ। आइ सौभाग्यसँ समए भेटल छल। मटरूवा आइ मुँहपर केना बजत। डिगडिगिया जोरसँ बजल- “ठीके कहै छिऐ भूमा भाय। हम अपना जातिकेँ बिना लगामक नहि रहै देबइ। दोसरा टोलक छौड़ा सभ तब ने कहै छै जे ऐ टोलक इज्जतकेँ कोनो ठेकान नहि। हम तँ कहै छी जे अखनी एकरा बेटीकेँ ऐ टोलपर सँ निकालि दियौ। ई तँ जेकरा संगे रहतै ओकरा खराप करतै।” कहैत डिगडिगिया जेबीमे हाथ देलक। कुलानन्दक देल टका हाथमे ठेकलै तँ फेर बाजल- “यौ, अहाँ सभ बजै किए नहि छिऐ?” जुबक सभ एके साथ डिगडिगिया आ भूमाक समर्थन करए लगल।बुढ़बो सभकेँ हामी भरए पड़लै। “बातकेँ नहि मानत तँ मटरूवाक मुँहमे कारिख-चुन लगौल जेतइ। से बुझि लिअ।” मटरूवाकेँ तँ पहिनेसँ मर्माहत चोट लगले छेलइ। ओइठामक स्थिति देख ओ अर्द्धविक्षिप्त जकाँ भऽ गेल। माथ परक मोटा एक कात रखि थुस-दे बैस रहल। ओकरा देखते भूमा कहुनीसँ इशारा केलक। डिगडिगिया पाछू मुहेँ तकलक आ मटरूवाकेँ देखते बाजल- “की हौ मटरूवाकाका, बजै ने किए छहक?” मटरूवा ओकरा दिस तकैत बाजल- “कहबीही तब ने। की कहै छी?” डिगडिगिया लोक दिस तकैत बाजल- “हे लिअ आब। कहै छै ने- सौंसे रमायण सुना देलौं आ सुननिहार छल बहीरा।” बातकेँ काटैत भूमा कहलक- “एना झँपने-तोपने काज नहि चलत। सभ गप खोलि कऽ कहियौ।” डिगडिगिया एकबेर मटरूवाक जमाए दिस तकलक। ओकरा जमाइक आँखि लाले-लाल भऽ गेल छेलइ। ओ मुड़ी गोंतने छल। कुटुमक सोझहामे मटरूवाक बेइज्जती होइत देख भूमाकेँ खुशी भेलइ। ओ बजल- “यौ मटरूवा काका! हम तँ किछ दिन पहिने चेता देने रहूँ जे नीतियाक चालि-चलन खराप भऽ गेल अछि। ओकरा हम रजेसराक अँगनासँ रातिकेँ निकलैत देखने रहिऐ। ओइ दिन तँ सभ गोरे हमरा लुलकारि देलिऐ। आइ लिअ ने, सभटा पाप डिरियाइत देखार भऽ गेल। आब झँपनेसँ कोन बात झाँपल जाएत।” भूमाकेँ चुप होइते डिगडिगिया टपकल- “हे यौ, आइयो कहॉंदन कुलानन्द सँगे कोनो अधलाह गप्प भेलइ। लिअ ने, केते सम्हारब।” भूमा बजल- “हँ यौ, कुलानन्द तँ अपने हमरा कहैले आएल छल। आइ धरि हमरा सभ चुप रहलौं मुदा आब नहि रहब। आब टोलमे मटर काका रहए वा हमरा सभ रहब। मानिजन एकर निरनय अखनी दिअ।” सभ ऐ बातक समर्थन करए लगल। बड़ीकाल धरि धमर्थन होइत रहल। अन्तमे निर्णए सुनौलक- “सुनै जाउ। हमर निर्णए ई भेल जे मटरूवा अपना बेटीकेँ ममहर वा कोनो आन सम्बन्धी लग भेज दौ। ऐ टोलपर नीतिया रहतै तँ देखा-देखी दोसरोक बेटी ओकर चालि-चलन सीख लेतइ। तँए ऐ टोलपर नहि रहि सकै छइ। आने गामसँ ओकर बिआह-सादी कऽ दौ। जँ नीतिया घुरि कऽ मटरूवाक अँगना औत तँ मटरूवोकेँ कारिख-चुन लगा कऽ जातिसँ बाहर करि देबइ।” मानिजनक निर्णए सुनि सभसँ बेसी खुशी भूमा आ डिगडिगियाकेँ भेलइ। किएक नहि हेतै,दुनूक जेबीमे पँच-पँच साए टाका कड़कड़ा रहल छेलइ। मटरूवाक जमाए फनैक कऽ विदा होइत बजल- “हम आब ऐठाम अन्नजल नहि कऽ सकै छी। जा रहल छी- गाम।” “एना धड़फड़ाउ नहि।” मटरूवा मुड़ी गोंतने बैसले छल। तामस आ लाजसँ ओकरा मुँहक विचित्र स्थिति बनल छेलइ। भूमा ओकरा लगमे जाइत बाजल- “पंचक निरनय तँ सुनि लेलिऐ। आबो ओइ कुलछनीकेँ निकालबै की नहि?” मटरूवाक जमाय जाइत-जाइत उनैट कऽ बाजल- “जइ मरदकेँ लाजे ने छै ओ तँ...।” मटरूवाक क्रोधमे जमाइक बात जेना आगिमे तेलक काज केलक। सम्बन्ध, सिनेह आ बेवहार सभटामे जेना क्रोधक आगि लगि गेलइ। बुधि आ विचारक विनाश भऽ गेलइ। डुबैत इज्जत-प्रतिष्ठा देख ओकरा आँखिक आगू अन्हार सन लगलै। ओ फड़कैत उठल। एक गोरेक काँखतर सँ डेढ़हत्थी घींच लेलक आ धम-धमाइत अँगना दिस विदा भऽ गेल। नीता भूखल-पियासल घरमे दुबकल छेलइ। जखनसँ कुलानन्दक अँगनासँ आएल तखैनसँ नोर बहि रहल छेलइ। मुदा नोर पोछत के? केकरा दिलक बात कहत? एने तँ एहेन षडयंत्रक जाल फैला देने छेलै जे केकरा कहतै, जे सुनतै सएह लतियेतै। एहेन समैमे तँ सहारा एक मात्र बापेटा छेलइ। सेहो गामपर नहि छल। तँए अपनाकेँ बेसहारा बुझि एकटा कोनमे बैसल कानि रहल छेलइ। सोचने छेलै- जे बाबूकेँ अबिते सभटा गप्प खोलि कऽ कहि देबइ। गरीबक पास इज्जत नहि होइ छइ। आइ सभटा धनिकपना घोंसाइर देबइ। पंचैती बैसा कऽ बेदशा करबा देबइ। मुदा ओकरा की पता छेलै जे ओनए दोसरे नाटक रचल जा रहल छइ। टोलपर होइत हल्ला-गुल्लासँ अनभिज्ञ ओ घरमे नोर बहा रहल छेलइ। एनए डेढ़हत्थी नेने मटरूवा केबाड़ लग पहुँच गेल छल। पिताकेँ अबैत देख नीता जोरसँ कानए लगल। अत्यधिक दुखमे कोनो आत्मीय जनकेँ देखते वेदना आर उफान मारए लगै छइ। ऑंखिसँ स्वत: नोर बहए लगै छइ। नीताकेँ तँ एक मात्र सहारा बापेटा छेलइ। बापकेँ देखते ओ बोम पाड़ि कऽ कानए लगल- “बाबू यौ बाबू।” मुदा नीताक कानब मटरकेँ ढाल पसारब सन बुझेलै। ओकरा माथपर तँ क्रोधक भूत नाचि रहल छेलइ। इज्जत-प्रतिष्ठा दाउपर लगल छेलइ। समाज कुटुम सभ छुटि रहल छेलइ। ओ तामसे तेतेक आन्हर भऽ गेल छल जे नीताक बातो नहि सुनै लगल। ‘फटाक-फटाक’ डेढ़हत्थी नीता देहपर बजाड़ए लगल। कोमल देहपर वज्र सन डेढ़हत्थीक चोट! करूण क्रंदन करैत नीता। चोटसँ केतेको जगह चमड़ी फाटि गेलइ।बुझबे नइ केलक वेचारी जे आखिर बात की छइ। किए डेढ़हत्थीक चोट ओकरेपर गिर रहल छइ। तैयो अपनाकेँ सम्हारैत पुन: बजैक कोशिक केलक- “कोन गलती भेलै यौ बाबू?” किन्तु फेर मटरूवा डेढ़हत्थी देहपर गिरबैत बजल- “गै कुलबोरन! तूँ हमरा केतौ नहि रखलेँ। जँ बुझितियौ एहेन हेबेँ तँ नून चटा कऽ जनैम्ते मारि दैतियौ।” नीता अवाक् भेल बापक मुँह दिस ताकि रहल छल। मारिसँ देहक तेहेन दशा भऽ गेल छेलै जे उठनाइ असंभव। मटरूवा डेढ़हत्थीसँ हूड़ मारैत फेर बाजल- “गै कुलछनी, ममहर चलि जो। जल्दी निकल घरसँ। नहि तँ समाज हमरा निकालि देत। जो डुमि कऽ मरि जइहेँ।” कहैत-कहैत मटरूवा कनै लगल। आ कानैत बजल- “जल्दी निकैल जो हमरा सोझासँ। बुझही तोहर बाप मरि गेलौ। तूँ मरि गेलेँ हमरा लेल। जँ घुरि कऽ एबही तँ हमरा मरल देखबेँ।” कहैत मटरूवा डेढ़हत्थी अँगनामे पटैक देलक।आ तेजीसँ बहरा दिस चलि देलक। बड़ीकाल धरि नीता बदहवाश भेल पड़ल रहल। जाबे ओकर मन थिर भेलै ताबे आधा राति बीत गेल छेलइ़। ओ कुहरैत उठि कऽ बैसल। चारूभर तकलक। केतौ कियो नहि। फेर नजैर आसमान दिस गेलइ। अकासमे भुकभुकाइत तरेगन देखलक। सौंसे टोल निशबद भऽ गेल छेलइ। केतौ-केतौ कुता कानि रहल छेलइ। बाधमे नढ़िया ‘हुआ हुआ’ करै छेलइ। चारूभर जेना अन्हारक चद्दैर तना गेल छल। ओ उठि कऽ ठाढ़ भेल साँस छोड़ैत घर दिस देखलक। केबाड़ लगल छेलइ। अँगना शून्य। केतौ कियो नहि। ओ घर दिस डेग उठौलक। बापक कहल बात चट-दे मन पड़ि गेलै- ‘बुझही तोहर बाप मरि गेलौ। तूँ मरि गेलेँ हमरा लेल! जँ घुरि कऽ एबही तँ हमरा मरल देखबेँ।’ नीताक मनमे आएल। हम केतए जाएब? बापक सिवा हमर के? जनमदते घरसँ किए निकालि देलक? कोन कुकरम केलिऐ? कोन बातक दण्ड? केकरोसँ सिनेह नहि कऽ सकै छै कियो? प्रेम भेनइ की केकरो वशमे छइ? अनेको प्रश्नक बीच नीताक मन औनाए लगलै। औनाइत नीताक कान लग पिताक कहल दोसर वाक्य सनसनेलै- ‘जो डुमि कऽ मरि जइहेँ।’ ओ सोचलक- जे ओकरा रहलासँ सभकेँ दुखे-तकलीफ छै तँ मरि जाएब से नीक होएत। मुक्तीए भेट जाएत। सोचैत ओ विदा भऽ गेल। डेग बढ़बैत गामसँ बाहर भऽ गेल। घुरि कऽ एकबेर गाम दिस तकलक। मोहक एकटा लहैर मनमे उठलै। मुदा अपमान आ पीड़ाक चोटसँ मोहक लहैर तुरन्ते उड़ि गेलइ। आँखिक नोरकेँ पोछलक आ शीघ्रतासँ विदा भऽ गेल बाध दिस। धारमे खूब जोरगर बाढ़ि आएले छेलइ। चारूभर पानि हड़हड़ा रहल छल। ओ सोचलक- अही धारमे डुमि कऽ मरि जाएब। तखैने पाछूसँ किछ अवाज सन बुझेलै। ‘छपर... छपर...।’ ओ घुरि कऽ तकलक। मुदा किछो नहि देखाए पड़लै। मनक भ्रम बुझि फेर आगू बढ़ल। आगूमे हुहुआइत धार। उफान मारैत पानि। काँट-कुश, गाछ-पात दहाइत भँसैत...। धारक कछेरपर किछुकाल तक ठाढ़ रहल नीता। राजेसरक सिनेह ओकरा मन पड़ि गेलइ। मुदा ओ तँ बहुत दूर छल। लचारीक नोर ओकरा आँखिसँ टघैर गेल। मरैतकाल मनमे केतेक विचित्र चित्र सभ अबैत रहै छइ। तहूमे जेकरा मन अपन खास लोक बुझै छै तेकर स्मरण भेनाइ सोभाविके अछि। राजेसरक यादि अबिते नीता भीतरसँ हिल गेल। नोर पोछैत बाजल- “अहाँक आ हमर सिनेह केकरो नहि सोहेलै। तँए हम जुल्मी दुनियासँ जा रहल छी। सँग-साथ नहि देलौं। माफ कऽ देब।” ओ डुबैक उदेससँ साड़ीकेँ समेट धारमे कुदबाक चेष्टा केलक। तखैने कियो पाछूसँ भरि पाँजमे पकैड़ लेलक। नीता घुरि कऽ तकलक। सिमानपुरवाली राजेसरक भौजाइ जेकरा लोक बतही कहै छेलइ। ओ नीताकेँ पाँजमे पकड़ने छेलइ। सिमानपुरवालीक आँखिसँ नोर बहि रहल छल। ठोर फड़फड़ा रहल छेल। जेना किछु बजैक कोशिश कऽ रहल होइ। नीता सिमानपुरवालीकेँ देखते कानए लगल। सिमानपुरवाली सेहो ओकरा गला-मे-गला जोड़ि बोम पाड़ि कऽ कानए लगल। नीताक एकटा बातसँ अचरज भऽ रहल छेलइ। सिमानपुरवाली जहियासँ बताहि जकाँ करए लगले तहियासँ ओकरा कियो कानैत-बजैत नहि देखने रहइ। मुदा आइ एतेक परिवर्तन केना भऽ गेलइ! ओकरा मुँह दिस तकैत नीता कनैत बाजल- “हमरा मरए दिअ। आब हम जीविये कऽ की करब? ऐ दुनियाँमे हमर के अछि?” कहैत ओ बन्धनसँ छुटबाक कोशिश केलक। सिमानपुरवालीक फड़फड़ाइत ठोरसँ स्वर निकलल- “हम अखनी जिअत छी। जाबे हम छी ताबे अहाँक मरए नहि देब। हमरा सभटा बातक पता लगि गेल अछि। अहाँ किछोक चिन्ता नहि करू।” “हमरा लेल मरनाइ नीके होएत। आब हम केतए रहबे? जखैन बापे हमर नहि भेल तँ दोसर के सहारा देत।” अपनासँ बेसी दुखित बेकतीकेँ देखलासँ सोभाविक रूपे लोककेँ अपन दुख घटि जाइ छइ। ऐ कारणसँ सिमानपुरवालीमे एतेक परिवर्तन भऽ गेल छेलइ। ओ नीताकेँ अपना दिस घिंचैत बाजल- “अहाँ जँ मरि जेबै तँ हमर दिअर कथी लऽ कऽ धीरज बान्हते। हम की जवाब देबइ ओकरा। चलू अहाँ हमरा घर-अँगनामे रहब।” “समाज द्वारा हमहूँ तँ प्रतारिते छी। सभ तँ बारने अछि। देखबै,जे हमरा रोकैले के अबै छइ। हमहूँ ओकरा अपन तागत देखा देबइ। बजनिहारकेँ मुँह नोचि लेबइ। हम कमजोर नहि छी।” नीता फेर जोर-जोरसँ कानए लगल। सिमानपुरवाली अपना आँचरसँ ओकर नोर पोछैत बड़ीकाल धरि बोल-भरोस दैत रहल। सिनेह स्पर्शसँ नीताक अपन माए मन पड़ि गेलइ। केतेक काल तक दुनू प्रेम रसमे डुबल रहल पता नहि चललै। दुनू गोरे जखैन घर दिस विदा भेल ताबे भोरुकवा तारा उगि गेल छेलइ। मटरूवा बाधे-बोन बड़ीकाल धरि वौआइत रहल। जखैन ओकरा माथपर सँ तामस किछ निच्चाँ उतरल तब नीताक विषयमे सोचए लगल- केतए गेल हेतै केतए नहि, एहेन बेवहार नइ करबाक चाही। आखिर अछि तँ बेटी। फेर बापक सिनेहअन्तरमे जन्मए लगलै। जेना किछ भीतरमे औंढ़ मारलकै। आँखिमे नोर भरि गेलइ। फुरफुरा कऽ ठाढ़ भऽ गेलइ। घर-अँगनामे खोजलक। केतौ किछु पता नहि। अन्तमे पछताइत बाध दिस विदा भेल। ताबे सिमानपुरवालीक संग नीता आबि रहल छल। नुका कऽ मटरूवा दुनूक गप्प सुनलक। सुनि कऽ मन थीर भऽ गेलइ। सोचलक- एगो रस्ता लगि गेलै से नीके भेल। कम-सँ-कम चैनसँ रहि तँ सकैत अछि। मरत तँ नहि। समए एलापर सभ किछु ठीक भऽ जेतइ। समए सभ किछुकेँ ठीक कऽ दइ छइ। मटरूवा संतोषक साँस लेलक आ चुपेचाप अन्हारमे नुका रहल। अन्हार सभ किछु देखैत-सुनैत चुप रहल। ◌ 21 समए बीत रहल छल। समए तँ बितते रहै छइ। सिमानपुरवालीक बतहपनी छुटि गेल छेलइ। नीता आब ओकरे ओइठाम रहि गेल छल। सिमानपुरवाली आ नीता दुनू गोरे काज-उदम करैले दोसर गाम चलि जाइ छेलइ। कमा-खटा कऽ साँझ तक किछु लऽ अनै छल। राजेसरक प्रतीक्षामे राति कटि जाइ छेलइ। गौंआँ सभ कए बेर हुड़दंग मचौलक जे नीताक गामसँ बाहर निकालि देल जाए। मुदा बुढ़-पुरान रोकलक आ कहलक- ई बात अनुचित होएत। ओ आखिर आगि-पानि ढाठल परिवारमे रहि रहल छइ। तैयो एक दिन जुवक सभ डेढ़ियापर जा कऽ हड़कम्प मचौलक। मुदा सिमानपुरवाली हँसुआ लेने आगूमे अड़ि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ओकर रौद्र रूप देख गारि-बात दैत सभ आपस भऽ गेल। आखिर ढाठल-बान्हल परिवारमे ऐसँ बेसी की कऽ सकै छल। डरो छेलै जे बात बेसी बढ़ेलासँ कोनो घटना नहि घटि जाए। राजेसरक घरमे नीताक महिनासँ बेसी बीत गेल छल। किन्तु रातिकेँ एतेक कछमछाहट कहियो नइ भेल छेलइ। पहर राति बीत गेल छेलइ। बरसातक समए। टिप-टिपाइत पानिक बून। चभच्चा सभमे बेंगक टर्र टर्र...। ओइ स्वरसँ मिलैत झिंगुरक संगीत। ठरल बसातक झोंकसँ सिहरैत देह। ओना तँ सुतैतकाल राजेसरक यादि अबै जाइ छल मुदा आई बेसी...। नीताक निन्न आइ बैरिन भऽ गेल छल। ओ डेढ़ियापर आबि कऽ बैस गेल छल। दिनुका गप्प रहि-रहि कऽ ओकरा मनकेँ चोट पहुँचा रहल छेलइ। बाधक एकपेड़िया धेने ओ आबि रहल छल। दू-तीनटा औरतिया रस्ताक कातमे ठाढ़ छेलइ। नीताकेँ देखते ओ सभ आपसमे आँखि मटकबए लगल। मुदा ओतबेसँ ओकरा सभकेँ सतोख नइ भेलै तँ एकटा बाजल- “आ गै दाय गै दाय। एहेन दिदगर। बाप निकालि देलकै तँ बिन बियाहले साँयक घर चलि गेलइ। गै देखही, एकोरत्ती लाज-धाख होइ छइ!” दोसर औरतिया टोन देलक- “हे ऐ काकी, लाज-धाख होइतै तँ जीविते रहितै। हमरा एहेन दशा भेल रहैत तँ बिख खा कऽ मरि गेल रहितौं। लोकक सोझहा निकलै छै केना!” तेसर आँखि नचबैत बाजल- “जातिक लोक सभ तँ बड़ हुड़दंग मचौने रहै, मुदा सिमानपुरवाली, ऊ डनियाही अड़ि गेल रहइ। ओकर गुड़रल आँखि देख सभ दुआरिपर सँ भागि गेलइ।” पहिल औरतिया फेर बाजल- “भागितै नहि तँ की करितै? अनका खातिर मरि जइतै? कोन ठेकान, ऊ मौगिया कहीं जादू-टोना चला दइतै। देखलीही पहलमान सन साँएकेँ चिबा गेलइ।” दोसरकेँ फेर बाजए पड़लै- “हे ऐ काकी, हमरा तँ बुझि पड़ैत अछि जे नीतियोक डायन-मंतर सिखा देने हेतइ। देखबै, कहियो रजेसरोकेँ चिबा कऽ खा जेतइ।” ई गप-सप्प जखैनसँ नीता सुनने छल तखैनसँ ओ बेचैन भऽ गेल छल। पुन: ओइ दिनक घटना ओकरा स्मरण भऽ गेलै- जहिया बाप मारि-पीट कऽ घरसँ भगा देने रहइ। ओ मनमे सोचए-विचारए लगल- केहेन बेदर्द भऽ कऽ बाबू मारने रहइ। की भऽ गेल रहै ओइ दिन। हमर गप्पोटा सुनैले तैयार नहि रहए। निसचिते छै जे कुलानन्द कोनो जाल फैलेने हेतइ। ठीके कहैत रहै ओ- “तोहर जिनगी बेरवाद कऽ देबौ नीता।” मुदा हमर बाबू ओकरा जाल-फरेबकेँ नइ बुझलकै। छनेमे लोक केतेक बदैल जाइ छइ। बाप-बेटीक मजगूत बन्धन छनेमे केना टुटि जाइ छइ। आइ जँ हमर माए रहैत तँ एहेन दिन नइ देखए पड़ैत। ओ जरूर हमरा बातकेँ सुनैत। कहियो जँ बेमार पड़ि जाइ छेलिऐ तँ माए भरि-भरि राति जागि कऽ ओगरने रहै छल। आखिर दुलरुआ बेटी छेलिऐ किने। मुदा पुरुखक हृदय केतेक कठोर होइ छइ। आखिर हमर बाबूओ तँ एकटा पुरुखे अछि। ओ अपना आँखिसँ बहैत नोरकेँ पोछलक आ पुन: सोचमे डुमि गेल। “ठीके कहै छल- गियानावाली। वास्तवमे बिनु बिआहल एना अनका घरमे रहनाइ केतेक अधला गप्प छइ। ठीके हमरा लाज-धाख एकोरत्ती नहि अछि। दोसर गोरे रहितै तँ मरि गेल रहितए। हम बड़ कठजीव छी। ओ जँ घुरि कऽ गाम औता तँ हम केना जेबे सोझहा? की कहत ओ मनमे? अखैनो तँ हम बोझे बनल छिऐ- सिमानपुरवालीपर। भरि दिन वेचारी परेशान रहै छइ।” तखैने ओकरा देहपर हाथक हल्लुक स्पर्श सन बुझेलै। ओ चौंकैत ओम्हरे ताकलक। हाथमे बड़ीटा झोरा नेने राजेसर ठाढ़ छेलइ। नीताकेँ सपना सन बुझेलै। ओ आँखि मिड़ैत फेरसँ देखलक। भरम दूर भऽ गेलइ। रसे-रसे ओ उठि कऽ ठाढ़ भेल। राजेसर एकटक ओकरे निहारि रहल छल। ओकरा मुहसँ निकलल- “नीतू! अहाँ..?” नीता जेना स्वप्न लोकसँ निच्चाँ उतरल होइ। बहुत दिनसँ पियासल मनकेँ जेना स्वच्छ सरोवर भेट गेल होइ तहिना मनमे एकटा उफान सन एलइ आ आँखिसँ झमझमा कऽ नोर खसए लगलै। ओ आगू बढ़ि राजेसरकेँ पाँजमे पकैड़ लेलक आ जार-जार कानए लगल। राजेसरोक आँखि भीजल छल तैयो ओ नीताकेँ रसे-रसे हँसोतैत बोल-भरोस दऽ रहल छल। नीता किछ बात कहबो केलक आ किछ नहियोँ कहलक मुदा राजेसर सभटा बुझि गेल। जेना एक-दोसराक आँखिक मिलन सभ किछु समझा-बुझा देलकै। कनीकालक पछाइत राजेसर पुछलकै- “माए आ भौजी कहाँ अछि?” अवाज सुनलासँ सिमानपुरवालीकेँ निन टुटि गेल छेलइ। लग आबि दुनूक मिलन देखलक तँ ओकरो आँखि खुशीक नोरसँ भरि गेलइ। राजेसरक माए लाठी टेकैत पाछूसँ पहुँचल। बेटाकेँ देखते जेना किछ भीतरसँ उमड़लै। सूप सन कलेजा भऽ गेलइ। सिनेहक नोर हाहा कऽ झहड़ए लगलै। दुखक समुद्रमे दहाइत-भँसियाइत सुखक कनियोँटा सहारा मनमे आशाक संचार काइये दइ छइ। लगैत रहै छै जे सभ किछमे परिवर्तन भऽ गेल छइ। घर-परिवार आ सर-समाजक स्थितिक विषयमे सभ गोरे राजेसरकेँ सुनबैत रहली। बिच्चेमे एकबेर राजेसरक माएकेँ बाजए पड़ल- “हौ बौआ, समाज तँ मानतै नहि। मुदा भगवानक नजैरमे तँ सभ बरबैर छइ। भोरमे मन्दिर चलि जा आ नेम-धरमसँ नीताक सिनुरदान कऽ दिहक आ असिरवाद लैत आपस घर नेने अबिहक।” गप-सप्प होइत-होइत राति बीत गेल छल। राजेसरक संगी भुखना घरक आगू होइत जा रहल छेलइ। राजेसरक अवाज सुनि भुखनाकेँ मिलैक इच्छा भेलइ। मुदा डर होइ जे कियो देख लेत तँ जुरमाना ने लगि जाए। तँए आगू-पाछू देखए लगल। केकरो नइ देखलकै। निश्चिन्त भऽ कऽ अँगना गेल। ओकरा देखते राजेसर सत्कार करैत ओसारपर बैसौलक। दुनू गोरेमे जाति आ समाजक स्थितिक बारेमे गप्प हुअ लगल।गप्प करैत-करैत भुखना बिच्चेमे बाजल- “जल भँवर जकाँ समाजोक एकटा जाल होइ छै जइमे अहाँ फँसि गेलौं। एकरा तोड़ैले अहाँकेँ लड़ए पड़त।” राजेसर थिर भऽ बाजल- “लड़ाइक बदला शान्ति नइ भऽ सकै छइ? अपकारक बदला उपकारसँ नइ देल जा सकै छइ? नहि तँ एकर अन्त केना हएत?” “सभ किछु भऽ सकै छइ। मुदा..?” दुनू गोरे गप्प करिते रहल। तैबीच पूबमे नवका किरिण उगि गेल छल। ◌ 22 भादो मास अपन रंग आ ताल देखौनाइ शुरू कऽ देने छल। ऐ बेर बरखो तँ किछ बेसीए भेल छेलै। तँए पहिनेसँ पोखैर-झाँखैर, डबरा-इनार, नदी-नाला सभटा डबडबाएल, पानिसँ भरल। धनरोपनीक बाद गामक लोक सभ निचेन जकाँ भऽ गेल छल। काज नीकसँ पूरा भेला बाद जँ फुरसैत होइ छै तँ मनमे खुशी होइते छइ। काजक सुफल भेटैक आशा रहै छै, तँए फुरसैतक पल हँसी-खुशीसँ बितै छइ। मुदा जँ काज ठीकसँ नइ होइ छै तँ बेचैनी बढ़ि जाइ छइ। गरहतीक चुकल तँ साल भरिक बादे ने सुधार भऽ सकै छइ। बैसारीमे गामक लोक अपना-अपना खेतक फसलकेँ देख खुश होइत अछि वा आपसमे गप हाँकैत अछि। साँझ-प्रात एकठाम जना होइते गपपर गप चलबे करतै। “हौ, रजेसरा गाम एलै तँ केना की केलकै?” “हमहूँ तँ गाममे नहियेँ छेलौं। सुनै छी जे राजेसर आ नीताक बिआह मन्दिरेमे भऽ गेलै। रजेसरा अपना संगी-साथीकेँ भोजो खुऔलकै।” “ढाठल पहिवारक भोज के सभ खेलकै यौ?” “धुर, कियो देखलकै। जे देखलकै सेहो भोज खेलकै। गवाही के देत?” “इजोतमे होइते तब ने। अन्हारमे सभ किछ नुका कऽ भेलै। के सभ छेलै। केना बुझितै।” “ठीके, केकरा ओतेक फुरसैत छै जे भँजियौने घुरतै। सभ अपना-अपना काज-धन्धामे लगल रहै छइ।” “लेकिन दोसर भोज वा पंचैती हेतै तहिया सभटा झंझट उखैड़ कऽ सोझा एतइ।” “हँ-हँ, चाउर सिझा कऽ पहपैट। देखने छी, केतेकठाम। एने भेाजनतैयर रहै छै आओनए पंचैती होइत रहै छइ।” “की हेतइ। केते पलिवारमे तँ ऐसँ बड़का बात सभ भेलइ। कहाँ किछो भेलइ। कुम्हड़ेपर सितुआ चोख होइ छइ।” “आन्ही-बिहाड़ि केतेकाल रहै छइ। कनीकालक बाद समए फेर ठीक भऽ जाइ छइ।” “हँ यौ, आब रजेसराक बेवहारोमे अन्तर आबि गेल छइ।” “ठीके कहै छी। हम सोचै छेलिऐ जे गाम अबिते कूद-फान करतै। कुलानन्दसँ झगड़-झाँटि हेतइ। मुदा से सभ किछो नहि भेलइ। बड़ी शान्तिसँ सबहक संगे बात-विचार करै छइ। जेना किछो भेबेने केलइ।” “हँ यौ, अँगूलीमाल जकाँ लोक बदैल सकैत अछि। परिवर्तन तँ संसारक नियम अछि। तँए प्रकृति हरक्षण बदलैत रहै छइ।” “साँझ पड़ल जाइ छै यौ। घरो दिस चलू ने। आकि चौबटियेपर गप छाँटैत रहब।” “मनधता केतए दौगल जाइ छै यौ? हौ की बात छइ?” मनधता अपसियाँत होइत बाजल- “हे यौ, धारमे पानि बड़ीजोरसँ बढ़ि रहल छइ। बुझि पड़ै छै कसगर बाढ़ि एतइ।” “अच्छा, फेर पानि घटि जेतइ। केतेक बेर एना होइ छइ। ई कोनो बड़का बात थोड़े छइ।” “नहि हौ, स्थिति समान्य सन नहि बुझि पड़ै छइ। पानिक रूखसँ बुझि पड़ै छै जे गामक स्थिति खराप करतह।” “तँ की करबाक चाही?” “हम तँ कहै छी- घर-दुआरिकेँ छोड़ि दियौ। इसकूलक ऊँचका जगहपर चलू।” “हौ बाबू, केतौ जेबहक, कपार जेतह संगे। घर छोड़ि घरमुड़िया खेलब। जे हेतै, देखल जेतइ। लोक संकटकालमे घर दिस भगै छै आ हम बाहर जाएब।” “ठीके छइ। पानिसँ घेरा जाएब तँ औना कऽ घरेमे मरब। पहिने जान बँचा लिअ। जान बँचए तँ लाख उपाय।” “हौ, तूँ सभ ऐठाम बतकट्टी करैत रहबहक। ओनए अँगना-घरमे बाढ़िक पानि ढुकि गेलह। माल-जालक बोमी सुनै छहक।” सभ अपना घर दिस दौगल। बाढ़िक पानि दुआरिपर पहुँचल। फेर अँगनामे हुलकी मारलक आ देखते-देखते घरमे जबरदस्ती ढुकि गेल ओकरा के रोकत? ओना, ओतेक वेगकेँ रोकलो केना जेतइ। दुआरि-बथान,अँगना-घर सभटा पानिसँ एकटार। भीतर-बाहर पानि भरलासँघर टाट, दिवार जँहिपटार ओंघरा-ओंघरा कऽ गिरए लगल। लगै छेलै समुंद्र उधिया गेल होइ। सभ किछोकेँ पानि गिरने जा रहल छेलइ। अन-पानि सभ भाँसए लगल। समान सभ जेते ऊपरमे राखै ओते ऊपर तुरन्तेमे पानियोँ पहुँच जाइ। जे हाथ से साथ। टोलक लोक अपन-अपन समान लऽ कऽ भागए लगल। पहिने कागज-पत्तर आ छोट धिया-पुताकेँ लाधि कऽ भागल। फेर माल-मवेशीकेँ ऊँचका स्थलपर पहुँचा आएल। सभ अपने समांगकेँ बँचबैमेअपसियाँत। जेकरा पानिकअन्दाज रहै आ पानिसँ डुमल बाट भँजियौल रहै से सभ गामक पच्छिम होइत स्कूलक ऊँचका जगह दिस भागल। जेकरा नहि बुझल रहै ओ पूब होइत निकलल आ वेगयुक्त धारक पानिमे भँसियाइत कऽ पार भेल। पार होइते घरक देवताकेँ सुमिरन करैत सुखल जगह दिस भागल। कथी-ले कियो आनो गोरे दिस ताकत आ दोसरो गोरेक जान बँचौत। एकमात्र राजेसर दोसरोकमदैत कऽ रहल छल। तँए लोको सभ एहेन विकट समैमे राजेसरेकेँ सोर पाड़ै छेलइ। राजेसर अपना समांगकेँ पहिने स्कूलक ऊँचका जगहपर रखि आएल छल। नीता बुढ़िया सभकेँ हाथ पकैड़ पार उतारै छल आ राजेसर बुढ़, बेदरा, नेंगराक ऊपर रखि-रखि अबै छल। राजेसरकेँ देह-हाथक कोनो सोह-बोह नहि। ओ जी-जानसँ लोककेँ बँचबैमे लगल छल। सौंसे देह थाल-कादो सटल रहइ। देह-हाथमे खोंच लगल। कपड़ा-वस्तर फटल। बून-बून खून निकलैत रहइ। कपारमे थाल लगल रहइ। ठोर सुखि कऽ फाटि गेल छेलइ। तैयो कमजोर लोककेँ रेतसँ पकैड़ ऊपर लऽ जाइ छल। पानिक ऊपरमे अन्हार पसरए लगलै। चारूभर जले-जल। स्कूलकअँगनीक अलावे चारूकात जलमग्न। लगै छेलै जेना जलप्रलय होइ।महासंमुद्रक मध्य अँगनीकस्थलभाग सन लगै छेलइ। जलक बिछौनापर अन्हार सन-सना रहल छेलइ। बाढ़िक पानि संगे हरहरा रहल छेलइ। मेघसँ टप-टप चुबैत बून। लगै छेलै- महाविनाश आबि गेल होइ। इजोत करबाक प्रयासमे हवा अवरोधक बनि रहल छल। कनियोँटा भुकभुकाइत रोशनीकेँ देखते अन्हार दौगैत छल आ अजगर जकाँएकेबेर ढप-दे गिर लइ छल। लोक सभ अपना-अपना देवताक नाओं लऽ लऽ सुमैर रहल छल। लेाक देखा-देखी जीबैत अछि आ संघर्षो करैत अछि। एक-दोसराकेँ देखलासँ डरो भागि जाइत अछि। संगे सभकेँ डेराएल देखलासँडर उपस्थितो भऽ जाइत अछि। हिम्मतगर लोक सिरिफ बातसँ नइ बल्कि कर्मसँ संकटकालमे नायक बनै छैथ। तौलैबला नजैर देखैत रहैत अछि जे केकर मानसा-वाचा आ कर्मणा एक रंगक अछि। अबैबला लोक सभ आबि गेल छल्। जे बाँकी बँचल छल, ओ सभ हेलैत-डुमैत आबि रहल छल। राजेसर दू-तीन संगीक संग अखैनो फिरिशान रहबे करए। जे कमजोर छेलै तेकरा रस्सा पकड़ा कऽ पानिक वेगसँ बाहर निकालै छल। नीतोसँ जेतेक मदैत संभव छेलै ओ कऽ रहल छल। अखैने ओ धरमलालक बेटी सुलेखाकेँ कँखियौने आएल छल आ दोसर दिस निकैल गेल। सुलेखा बोम पाड़ि कऽ कानि रहल छेली। वेचारी- अंशकासँ घेराएल छेली। साले भरि पहिने सुलेखाक पति कार एक्सीडेन्टमे मरि गेल छेलइ। पाँच बर्खक बेटापर सन्तोष धेने जीवि रहली अछि। जखनीसँ बाढ़िक हो-हल्ला भेलै तखनीसँ ओहो बेटा नहि भेट रहल छेलइ।घरक दिवाल जखैन गिरलै तखैन सभ गोरे घरसँ बाहर निकैल गेल छेलए। तखनी धरमलाल नातिक ताका-हेरी केने रहइ। केते गोरेकेँ पुछनौं रहइ। नहि भेटलापर बेसी गोरेक यएह अनुमान रहै जे केकरो संगे स्कूलक ऊँचका जगहपर चलि गेल होएत। मुदा एतौ जे नहि भेटलै तँ सबहक परान उड़ि गेलइ। सुलेखाकेँ कनैत-कनैत हालत खराप भऽ गेल छेलइ। कुलानन्द ताकैत-ताकैत अपसियाँत। बेटीक हालत देख धरमलालोक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहि रहल छेलइ। बजैतकाल मुहसँ अवाज निकलैमे कष्ट भऽ रहल छेलइ। विपैतकालमे लेाककेँ हित आ मुदैक अनुभव होइ छइ। अपन कएल क्रिया-कलापक प्रतिफलो भेटै छइ। समाज आ सामुहिक शक्तिक अनुभव तँ संकटेकालमे होइ छइ। लोकमे हड़कम्प मचले छेलइ।सभ अपने सेर-सम्पैत, माल-जाल आ सर-समांगकेँ बँचबैमे तवाह। धरमलालक बात के सुनत। ओ जोर-जोरसँ कानए लगल। राजेसरक धियान ओनए गेलै। लगमे जा कऽ पुछलक- “अहाँ किए कनै छी?” धरमलाल मनकेँ थिर करैत बाजल- “हौ, हमरा बेटीक एकमात्र सहारा छेलइ। सेहो हमर नाति नहि भेट रहल छइ। केना कऽ हमर बेटी धीरज धरतै हौ।” धरमलाल कानि-कानि सभटा बात राजेसरकेँ बुझबए लगलै। अन्तमे राजेसर कहलकै- “एतेक अन्हारमे पानिसँ घेराएल टोलपर जेनाइ कठिन छइ। मुदा हम जाएब। अहाँ आशा राखू। जँ बौआ केतौ हेतै तँ हम निश्चिते ओकरा नेने आएब।” कहैत ओ तेजीसँ विदा भऽ गेल। धरमलाल सोचए लगल- सुआरथमे डुमल लोक केते नीच कर्म करए लगै छइ। गौंआँ-घरूआ, अड़ोसी-पड़ोसी, भाय-भैयारीक बीच जे रिश्ता-नाता रहै छै तेकरा छनेमे तोड़ि लइ छइ। ईहो बिसैर जाइ छै जे फेरो एकेठाम रहए पड़त। एक-दोसराक आवश्यकता पड़बे करता। रजेसराकेँ केतेक कष्ट देलिऐ। हमरे कारणे केते बेर आनो लोकसँ दुख पहुँचलै।आइ ओ सभटा बिसैर हमरा लेल केना तैयार भऽ गेल। जान हाथमे लऽ कऽ हमरा नातिकेँ बँचेबा-ले गेल अछि। अखैनो सबहक मुँहपर डर नाचि रहल छल। के कथी बजै छेलै तेकर कोनो पता नहि चलि रहल छेलइ। मुदा यंत्रवत सबहक हाथ-पैर चलि रहल छल। रहि-रहि कऽ कियो केकरो सोर पाड़ए लगै छल। कानब आ बाजब दुनू मिश्रित भऽ कऽ एकटा तेसरे स्वर निकैलरहल छल। ओही बीचमे बुझेलै जे किछु लोक राजेसरक जय-जयकार कऽ रहल छइ। बेसी हल्लासुनि लोकक संगे धरमलालो नजदीक गेल तँ देखलक राजेसरक कपारसँलहू बहि रहल अछि। तैयो अपना पीठपरधरमलालक नातिकेँ लादने आबि रहल अछि। एकगोरे पुछलकै- “हौ राजेसर, कपार केना फुटि गेलह?” “हे यौ, टुटलाहा दिवार लग बच्चा बेहोश पड़ल छेलइ। उठबैतकाल ऊपरसँ एगो ईंटा हमरा कपारेपर खसि पड़ल।” “अच्छा, कहुना एकरा बँचा कऽ लऽ अनलहक इएह पैघ बात।” “धुर की कहब। आफते-पर-आफत। अबैतकाल जलभँवरमे फँसि गेल छेलौं। कहुना लपैक कऽ गाछक डारि पकड़लौं। कनछी काटि कऽ भँवरसँ निकललौं। नहि तँ परान चलि जाइत।” “हे यौ, बच्चा ठभ्क अछि आकि नहि।” गमछा खोलि बच्चाक पीठसँ उतारैत राजेसर बाजल- “हँ यौ, बच्चा ठीके छै। कनी डेरा जरूर गेल छेलइ।” धरमलालक मुहसँ बोल नहि फुटि रहल छल। ओ बच्चाकेँ भरि पाँजमे उठा सुलेखाक कोरामे रखि देलक। सुलेखाक आँखिमे नोर भरल छेलइ। तैयो भरल आँखिये नजैरेसँ राजेसरकेँ धन्यवाद दऽ रहल छलइ। सभ गोरे राजेसरक जय-जयकार करए लगल। तैबीच धरमलाल हाथ उठा कऽ बाजल- “गामक असली नेता राजेसर छैथ। जे एहेन विकट समैमे सबहक रक्षा केलक।” केतेक गोरे एके साथ स्वीकार करैत बजला- “गामक ऐगला मुखिया राजेसरकेँ बनौल जेतइ। सभ एकसाथ हाथ उठा कऽ भोँट देब।” फेर सभ एके साथ राजेसरक जय-जयकार करए लगल। राजेसर हाथ उठा कऽ सभकेँ चुप करैत बाजल- “सुनै जाउ,ईहमर समाज नहि, बल्कि हमर परिवार छी। तँए ने पलिवारे जकाँ समाजोमे केकरो ‘काका’ कहै छी, केकरो ‘भैया’ कहै छी, केकरो ‘दाय’ कहै छी आ केकरो ‘दादी’। अपना पलिवारक रक्षा केनाइ हमर परम कर्तव्य छल। जे हम केलौं। एकरा बदलामे अहाँ सभ हमरा नेता बनाएब। हमरा लाभ देबै तँ हम इहए बुझब जे अहाँ सभ हमरा काजक मत नहि देलौं। हम सुआरथमे डुमि कऽ काज नहि केलौं। हमरा एकर बदलामे किछ नहि चाही। हमरा खुशी भेल जे हम समाजक ऋृणसँ उऋृण भेलौं। हमरा अहाँ सबहक असीरवाद चाही। हम चाहै छी जे अहाँ सबहक संग प्रेमसँ रहि सकी।” उपकारी राजेसरकफेर जय-जयकार भेल। तखैने राजेसरक कानमे एक गोरे फुस-फुसा कऽ किछु कहलकै। ओकर बात सुनिते राजेसर पच्छिम-मुहेँ विदा भऽ गेल। पछबरिया कोणपर एकान्तमे एकटा गाछ छेलइ। ओही गाछतर नीता औंघहा रहल छल। नीताक लगमे जा कऽ राजेसर ओकर बाँहि पकैड़ैत बाजल- “सुतल छी आकि जागल?” अँगैठी करैत नीता बाजल- “छी तँ जगले मुदा निन्नसँ आँखि भारी भेल जा रहल अछि।” “हमरो देह ठेहिया कऽ भारी भेल जा रहल अछि। मन होइत अछि किछुकाल सुति रही।” “आउ ने, किछ देर देह-हाथकेँ सोझ कऽ लिअ।” एक-दोसराक देहपर हाथ दऽ दुनू गोरे सटि कऽ बैस गेल छल। रसे-रसे दुनू निन्नमे डुमि गेल। राजेसर सपनाक संसारमे चलि गेल छल। सपनामे देखलक जे ओ अन्हार घरमे बन्न अछि। जेम्हरे जाइ ओम्हरेसँ ठोकर लगै। ओ लोक के मदैतक लेल सोर पाड़ैत अछि, मुदा कियोनहि अबैत अछि। अन्हारमे असगरे औना रहल अछि। तखैने भयंकर अवाजक संग इजोत होइत अछि। इजोत होइते लगेमे घरक खुगल दुआरि देखैत अछि। गड़गड़ाहटक स्वर सुनि राजेसरक निन्न टुटि गेल छल। अकासमे हेलीकप्टर चकभौर मारि रहल छेलइ। साइत नेता वा मंत्री बाढ़ि पीड़ितक रक्षा लेल आबि रहल छला। लोकक मुखपर आशाक किरिण पसैर गेल छल। ◌ समाप्त ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रबिन्द्र नारायण मिश्र -आलेख- क्रोध मनुख भावुक प्राणी होइत अछि। दैहिक आवश्यकताक पूर्तिक संगहि संग ओकर मनोवैज्ञानिक आवश्यकताक पूर्ति सेहो आवश्यक अछि। जखन कियो केकरो दैहिक वा मानसिक कष्ट दैत अछि तँ ओकरा मोनमे क्रोधक प्रादुर्भाव होइत छइ। अतएव क्रोधक हेतु आवश्यक थिक जे कियो केकरो कष्ट पहुँचबैक संगहि ईहो आवश्यक जे कष्ट पहुँचेनिहारक पता होइक। अज्ञात बेकती द्वारा उत्पन्न कष्ट किंवा स्वयं अपनेसँ भेल कष्टपर क्रोध नहि होइत अछि। उदाहरण स्वरूप अगर दाढ़ी बनबए-काल गालक चमरी कटि जाए, खून बहि जाए वा हाथक लोढ़ा धोखासँ पैरपर खसि पड़ए आ पैरक आँगुर थकुचा जाए तँ क्रोध नहि होएत अपितु पश्चाताप होएत जे एना बेसम्हार दाढ़ी नहि काटक छल वा लोढ़ाकेँ सम्हारि कऽ रखबाक चाही छल। किंतु जँ कियो आन हमरा पाथरसँ मारए किंवा मारबाक उपक्रमो करए तँ तामस धड़ दय भय जाएत। क्रोधक भोजन थिक विवेक। विवेके रहलासँ मनुख जानवरसँ फराक अछि। मनुख सोचि सकैत अछि। नीक-बेजाए केर विचार कए सकैत अछि। किन्तु ई सभ काज विवेकसँ उत्पन्न होइत अछि। मुदा जाहि मनुखक विवेक नष्ट भऽ जाइत छै ओ बहुत रास अनुचित कथा बजैत अछि एवम् कर्म आ अकर्मक बीच भेदभाव बिसैर जाइत अछि। क्रोध अबिते नीक-सँ-नीक लोककक विवेक मरि जाइत छइ। आकृति बिगैड़ जाइ छै एवम् रक्तचाप बढ़ि जाइ छइ। क्रोधावेगमे मनुख गड़बड़ काज कऽ लैत अछि। अर्थ-अनर्थक भेद बिसैर जाइत अछि आ तँए सोभाविक रूपेँ विनास दिस अग्रसर भऽ जाइत अछि। क्रोधक प्रवल वेगमे मनुख ईहो नहि सोचि पबैत अछि जे ओकरा जे कष्ट पहुँचौलक तेकरा एहेन अभिप्राय रहइ वा नहि। ऐप्रकारक सभसँ नीक दृष्टान्त चाणक्यक ओइ आचरणमे भेटैत अछि जखन किओ कुश गड़ि जेबाक कारणेँ सभ कुशकेँ उखारि ओकरा जरिमे धोर देबए लगला। केतेक बेर एहेन होइत अछि पाथरसँ चोट लगलासँ लोक पाथरेपर चोट करए लगैत अछि। एहेन क्रोधकेँ जड़क्रोध कहल जाइ अछि। कारण क्रोधीकेँ एतबो अन्दाज नहि रहै छै जे ओगलत स्थानपर गलत रूपेँ क्रोध कऽ रहल अछि। क्रोधक जन्म कष्टसँ होइत अछि। सोभाविक अछि जे जेकरामे सहनशीलता जेतेक बेसी हेतै तेकरा क्रोध तेतेक कम हेतइ। वर्तमान समयमे बढ़ैत महत्वाकांक्षा एवम् वैज्ञानिक विकासक कारणेँ पारस्परिक टकरावक संभावना सेहो बढ़ि गेल अछि। जखन एक्के वस्तुक हेतु कएक गोटे प्रयत्नशील हेता तँ संघर्ष अनिवार्य भऽ जाइ छइ तथा असफल रहनिहार बेकतीकेँ क्रोध होएब सोभाविक। क्रोधमे लोकक आत्मसंयम समाप्त भऽ जाइ छइ। ऐ अवस्थामे लोक बहुत रास अन्ट-सन्टबाजि जाइत अछि। परिणामस्वरूप पुरान-सँ-पुरान सम्बन्ध ओ मित्रता नष्ट भऽ जाइ छइ। तँए उचित जे तामसमे गुम्म भऽ जाइ। जँ कियो तमसाएल अछि तँ ओ अन्ट-सन्ट बाजि सकैत अछि, जे सुनि हमहूँ उत्तेजित भऽ सकैत छी। परिणामत: मारि-पीट वा एहने कोनो अशुभ काज भऽ सकैत अछि। तँए उचित जे जेतए उत्तेजना होइक तैठामसँ ससैर जाइ जइसँ अनर्गल कथा ओ काज देख हमरो उत्तेजना नहि भऽ जाए। क्रोधक सीमित ओ संयत प्रयोग लाभकारी भऽ सकैत अछि। मानि लिअ जे कियो गोटे अहाँक टका रखने अछि आ लाख प्रयासक अछैतो ओ टका आपस नहि कए रहल अछि तखन क्रोधक प्रयोग केलासँ भऽ सकैत अछि ओ बेकती टका आपस कए दिए। परन्तु एहेन लाभकारी क्रोधकरबामे आत्मसंयमक प्रयोजन होइत अछि कारण क्रोध करैत-करैत जँ सीमाल्लंघन भऽ गेल, बहुत रास तामस भऽ गेल तँ परिणाम अनिष्टकारी भऽ सकैत अछि। टका तँ बुड़िये जाएत संगे ऊपरसँ मारियो लागि सकैत अछि। क्रोधक प्रयोग प्रतिकारक हेतु सेहो होइत अछि। जँ ट्रेनसँ यात्रा करैत कियो धक्का मारि दैत अछि किंवा ट्रेनसँ धकिया कए निच्चाँ खसा दैत अछि तँ ओकरापर कसि कऽ तामस भऽ जाइत अछि। परिणामस्वरूप हमहुँ ओकरा कोनो-ने-कोनो दण्ड देबए चाहैत छिऐ। यद्यपि ऐ बातक कोनो संभावना नहि रहैत छै जे ओइ आदमीसँ दुबारा कहियो भेँट होएत वा नहि। क्रोधक प्रयोगयदा-कदा आत्मस्वार्थ सेहो होइत अछि। कारण जँ कियो बेकती अहाँकेँ कोनो प्रकारक क्षति पहुँचा दैत अछि तँ अहाँक सोभाविक इच्छा रहैत अछि जे दुबारा फेर एहने क्षति नहि हो। तँए ओइ बेकतीपर क्रोधक प्रयोग कए घटनाक पुनरावृत्तिकेँ रोकबाक प्रयास कएल जाइत अछि। ऐ प्रकारसँ कएल गेल क्रोधमे आत्म रक्षाक भाव बेसी होइत अछि। क्रोधक शिकार नीक-सँ-नीक लोक भऽ जाइत अछि। कोनो आवश्यक नहि जे अहाँ कोनो गलती केनहि होइ आ तही कारणेँ अहाँकेँ कोपभाजन होमए पड़ल हो। असल बात तँ ई थिक जे क्रोधित मनुखक दृष्टिमे जँ अहाँ कोनो प्रकारसँ क्षति पहुँचेबाक चेष्टा कएल अछि तँ ओ क्रोधित भऽ जाएत। एहेन परिस्थितिमे क्रोधसँ बँचबाक एक मात्र साधन सहनशीलता थिक। क्रोध दुखक चेतन कारणक साक्षात्कार वा परिज्ञानमे होइत अछि। अतएव जेतए कार्य कारणक सम्बन्धमे त्रुटि होएतैक ओतए क्रोधमे धोखा भऽ सकैत अछि। दोसर बात जे क्रोध केनिहार लोक जेमहरसँ क्रोध अबै छै तेम्हरे देखैत अछि। अपना दिस नहि देखैत अछि। क्रोधक ई प्रवल इच्छा होइ छै जे जे बेकती ओकरा कष्ट देलक अछि ओकर नाश होइक मुदा ओ कखनो ई नहि सोचि सकैत अछि जे ओ जे कऽ रहल अछि से अनुचित छै, किंवा तेकर की परिणाम हेतइ। कखनो-कखनो लोक क्रोधमे अपने माथ पटकए लगैत अछि। तेकर कारण जे हुनकर ऐ काजसँ हुनक निकट सम्बन्धी, जिनकासँ ओ क्रुद्ध रहै छैथ, हुनका कष्ट होइ छैन। तँए हेतु क्रोधमे जँ कियो अपन माथ पटकए किंवा स्वयंकेँ कहुना कष्ट दिअए तँ बुझी जे ओ कोनो अपने बेकतीपर कुद्ध अछि। कोनो बातसँ खौंझाएब क्रोधक एकटा रूप छिऐ। एहेन बेकती मानसिक रूपसँ रोगग्रस्त होइ छैथ। ओ सामान्यत: छोट-मोट गड़बड़ी भेलासँ खौंझा जाइ छैथ। केतेको बुढ-बुढानुसकेँ अहाँ कोनो गप्प कहियौ, सुनिते देरी ओ ठेंगा लऽ कऽ दौग जाएत। ..क्रोधक ई रूप सामान्यत: वृद्ध वा रोगीमे देखना जाइत अछि। चाहे जे हो एतबा तँ निर्विवादे जे क्रोधक परिणाम बिरले नीक होइत अछि। सामान्यत: क्रोधमे समस्याक समाधान हेबाक बजाय नव-नव समस्याक प्रादुर्भाव भऽ जाइत अछि। क्रोधक आवेगमे कएल गेल गलती केतेको-बेर मरण-पर्यन्त पश्चातापक कारण भऽ जाइत अछि। अतएव क्रोध सबहक लेल घातक होइत अछि। ऐसँ अध्यात्मिक प्रगतिमे व्यवधान तँ होइते अछि संगे सांसारिक विकास सेहो अवरूद्ध भऽ जाइत अछि। अस्तु क्रोध अवश्य त्याज्य थिक। दिनांक- २४.०१.१९८८ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- आलेख-दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक प्रयोजन २. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति १ डॉ. शिव कुमार प्रसाद- आलेख- दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक प्रयोजन साहित्य तँ साहित्ये होइ छइ। गद्य वा पद्य जतबा रचना अछि वा सिरजल जा रहल अछि तइमे कोनो एक विषयकेँ फुटकाएब ने तँ असान अछि आ ने हमरा बुझने उचित। शीर्षक दऽ देब बड़ असान छै परन्तु जखन विषय-वस्तुक अनुसन्धानमे डूमए पड़ै छै तखन बुझना जाइ छै जे एक दृष्टिकेँ रखबापर दोसर दृष्टि, आ दोसर रखलापर तेसर दृष्टिक प्रति अत्याचार हुअ लगै छइ। साहित्यमे जखन स्वार्थक वर्चस्व बढ़ए लगै छै तँ भाँति-भाँतिक बोल वा नारा ऊपर उठए लगैत छइ। दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक प्रयोजन आइ किएक भऽ रहल छइ? हिन्दी साहित्यमे सेहो ई आन्दोलन उठल रहइ। किछु मुट्ठी भरि लोक साहित्यक मंचपर अपन नाओं कमाइले ऐ तरहक प्रयास कएला। स्थिति एतए तक पहुँच गेलै जे कथासम्राट प्रेमचन्दोक रचना जरा देल गेल। “प्रेमचन्द दलित साहित्य नहि लिखला, ओ दलितकेँ अपमान केला।” ऐ तरहक अनेकानेक घटना आ वक्तव्य मिडियामे अबैत रहल। कोनो-कोनो निष्पक्ष रचनाकारकेँ ऐ हल्लामे शामिल कऽ लेल गेल। मुदा आइ हिन्दीमे केतौ ‘दलित विमर्श’क नाराक प्रयोजन देखबामे नइ आबि रहल अछि। साहित्य राजनीति नै छिऐ। साहित्यमे राजिनीति विषय-वस्तु भऽ सकै छै मुदा राजनीतिकेँ साहित्यमे प्रवेश भेने साहित्य मरि जाइ छइ। धनिया आ पालकक कियारी नै छी साहित्य..! साहित्यक विस्तृत संसार छइ। ऐ साहित्यकेँ बाभन, कायस्थ, राजपूत, भूमिहार वा पिछड़ा, अत पिछड़ा, अनुसूचित जाति आदिक साहित्यमे विभाजित नहि कएल जा सकैत अछि। तँए हमरा बुझने दलित साहित्यकेँ फुटकेबाक कोनो प्रयोजन नहि। मैथिली साहित्यक एकटा सभसँ बड़का दुर्भाग्य रहल अछि छिजे किछु लोक साहित्यकेँ अपन खानगी सम्पैत बुझि लेलखिन। हुनका सभकेँ भेलैन जे जँ कहीं ई भाषा अनका हाथमे चलि जाएत तँ हमर हाथे हेरा जाएत। परिणाम भेलै जे उमेरक हिसाबसँ मैथिली दुबराइत रहली। पजरा सटैत गेलैन, डाँर झूकैत गेलैन। ऐ रूपे भाषाकेँ पकड़निहार सबहक पीढ़ी-दर-पीढ़ीक हाथमे नचार भऽ बिलखैत रहली। भाषा पौती-मौनीक वस्तु नहि। आकि मुनहर कोठी वा बखारीक जिनिस नहि। ई किनको मरौसी डीह वा खेत नहि। भाषा साहित्य तँ झड़-झड़ बहैत झड़ना थिक। साहित्यक धार होइत अछि जे मात्र अपन किनछैरेटा मे नहि वरन् किनछैरक संग-संग अपन बान्हकेँ तोड़ैत केतौ-सँ-केतौ धरि हृदय रूपी भूलोककेँ आप्लावित कऽ दैत अछि। भाषाकेँ सुनब, पढ़ब, लिखब आकि बाजबपर जे एकाधिकार बुझैत छला ओ हमर मैथिलीकेँ मात्र जीआ कऽ रखने छला। कागजक किछु पन्नामे सिकुड़ल प्लाष्टि साड़ी जकाँ जीवित भाषाकेँ स्त्री विमर्श, वा नारी विमर्श, दलित साहित्य वा दलित विमर्श, पिछड़ल साहित्य वा पिछड़ल विमर्श अथवा कोनो जाति वा बेकतीक विमर्शमे बाँटलासँ साहित्यक विकास अवरूद्ध भऽ सकैत अछि। दलित विमर्शकेँ फुटकेबाक आधार की? (क) जे दलित आक-धथूर लिखने जाइ छैथ सभकेँ साहित्य मानि लेल जाए? (ख) जे दलित, दलित पात्रक चित्रण साहित्यिक दृष्टिसँ कऽ रहल छैथ ओकरेटा दलित साहित्य मानल जाए? (ग) साहित्यक विविध विधा यथा- नाटक, एकांकी, उपन्यास, कथा, कविता, आलोचना, समालोचनादि सभकेँ अलग-अलग दलित साहित्यक खानामे राखि देल जाए? (घ) उच्च वर्गक रचनाकार द्वारा दलित चिन्तनकेँ दलित विमर्शमे राखल जाए? (ङ) उच्च वर्ग द्वारा लिखित साहित्यकेँ दलित साहित्यमे कोनो स्थान नहि देल जाए? (च) उच्च जातिकजे दलित पात्र छैथ, हुनकासँ सम्बद्ध साहित्यकेँ दलित साहित्यमे राखल जाए अथवा नहि? ऐ तरहेँ दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक लेल अनेक विवादित विमर्श उपस्थित भऽ सकैत अछि। ओना एकटा विद्वान दलित विमर्शक मादे किछु नामक अनुशंशा केला अछि जे निम्नवत अछि[1]- “विलट पाससान विहंगम, डॉ. बुचरू पासवान, डॉ. महेन्द्र नारायण राम, डॉ. फूलो पासवान, डॉ. तारानन्द वियोगी, डॉ. सुभाष चन्द्र यादव, डॉ. सत्य नारायण मेहता, डॉ. राजाराम प्रसाद, डॉ. लालपरी देवी, डॉ. अमोल राय,डॉ. रविन्द्र कुमार चौधरी, डॉ. जयनारायण यादव, डॉ. अशोक कुमार मेहता, डॉ. मेघन प्रसाद, डॉ. देव नारायण साह,डॉ. राम सेवक सिंह, श्रीमती विभा रानी, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री उमेश मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, डॉ. भुवनेश्वर गुरमैता, श्री राम भरोस कापड़ि भ्रमर, डॉ. रामावतार यादव, डॉ. अभय कुमार, सुश्री मंजू कुमारी, डॉ. ओम प्रकाश भारती, श्री कपिलेश्वर यादव, श्री विरेन्द्र कुमार यादव, श्री मोहन यादव, श्री नन्द विलास राय, श्री कपिलेश्वर राउत, श्री उमेश पासवान, श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’, श्री राम प्रवेश मण्डल, श्री संजय कुमार मण्डल, श्री अच्छेलाल शास्त्री, श्री राम विलास साहु, श्री बलराम साह, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री मिथिलेश मण्डल, श्री सुधीर कुमार ‘सुमन’ श्रीमती मुन्नी कामत, श्री ललन कुमार कामत, श्री फागु लाल साहु, श्री उपेन्द्र प्रसाद यादव।” किछु रचनाकारक नाओं ओ रचना निम्नवत् अछि जे हमरा विचारे दलित विमर्शक सूची प्रस्तुत केनिहार समीक्षकेँ नजैरपर जनु नहि पड़लैन अछि। हमरा बुझने ऐ कोटिमे घनेरो कवि-कथाकार छैथ, जइमे किछु निम्नवत् अछि- (1) सर्वश्री विभूति आनन्दक- ‘स्वाद’, ‘जानवर’, ‘काठ’ आ ‘खुल्ला’ कथा।[2] (2) अनमोल झाक- ‘चेतना’, कुमार मनोज काश्यपक- ‘जरल पेट’, ‘जीतक आगू’, डॉ. शम्भु कुमार सिंह रचित-‘जेठ’ आ ‘पूस’, ‘गरमी’ आदि।[3] (3) मनोज कुमार कर्ण ‘मुन्नाजी’क कथा- ‘रिलिफ’, ‘आरक्षित’, ‘काँट’ आदि।[4] ललितक ‘पृथ्वीपुत्र’, धूमकेतुक ‘मोड़पर’, रामानन्द रेणुक- ‘दूध-फूल’, धीरेश्वर धीरेन्द्रक- ‘कादो ओ कोयला’,‘ठुमकि बहू कमला’, मनिपद्मक उपन्यास- ‘राजा सलहेस’, ‘नैका बनिजारा’, कथा- ‘फूटपाथ’, लिलि रे रचित-‘पटाक्षेप’, विद्यानाथ झा विदितक- ‘विप्लवी बेसरा’, ‘कौसिलिया’, गजेन्द्र ठाकुरक- ‘सहस्त्र शीर्षा’ आदि-आदि। आइ सभसँ पैघ प्रश्न अछि, साहित्यकेँ फुटकबैबला राजा प्रधानमंत्री वा मुख्यमंत्री तथा हुनक मन्त्री मण्डलक सदस्य किनका मानल जाएत। हम जे कही ओ अहाँ मानि लेब? आकि अहाँ जे कहब ओ हम मानि लेब? नहि..! हमर मैथिली भाषा आ साहित्य अखनो अल्प विकसित अछि। साहित्यक विकास हेतु संसाधनक धोर संकट अछि। मुट्ठी भरि लोक अपन कैंचा-कौड़ी जोड़िया-जोड़िया किछु पोथीक प्रकाशन करबा रहल छैथ। प्रकाशक रूपैआ लऽ कऽ पोथी तँ प्रकाशित कऽ दइ छथिन मुदा पोथीक प्रचार-प्रसार आ बिक्री केन्द्र आदिक असुविधासँ अथवा अपन भाषाक पोथी खरीदबाक अरूचिक कारणे हमर मैथिली सर्वव्यापी नहि भऽ पाबि रहल अछि। संगे-संग ऐ आलेखक माध्यमसँ ईहो आग्रह करए चाहै छी जे जइ बेकती वा समूह द्वारा मैथिली साहित्यक सेवा आकि विकासक कार्य भऽ रहल हो हुनका सम्मान देल जाए, हुनका सहयोग कएल जाए। साहित्य सबहक सम्पैत छिऐ। साहित्यकेँ बेकती-विशेष, वर्ग विशेष आकि जाति विशेष वा समुदाय विशेषक बीच विभक्त नहि कएल जाए।◌ जय मिथिला- जय मैथिली। [1] मैथिलीक दलित साहित्यकार, आलेख- ‘सम्प्रति’ दलित साहित्यकारक सूची- डॉ. शिव कुमार यादव, सम्प्रति अध्यक्ष मैथिली विभाग, मारवाड़ी कौलेज, भागलपुर। यू.जी.सी. संपोषित संगोष्ठीमे पठित आलेखक संचयन- पृ. १६६-१७० [2] कथा संग्रह- काठ (विभूति आनन्द) [3] विदेह विहनि कथा संग्रह- श्रुति प्रकाशन दिल्लीसँ प्रकाशित। पृष्ठ- 82, 83, 105 [4] विहनि कथा संग्रह- ‘प्रतीक’ (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) पृष्ठ- 60, 45, 39 २ डॉ. कैलाश कुमार मिश्र तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति मिथिलाक संस्कृति केर दू अभिशाप अछि: तमाकूल आ भांग। पता नहि कोना ई दुनू इलम मैथिली संस्कृति सं जुडि गेल? दुनू के सेवन मिथिला में नशा केर श्रेणी में नहि अबैत अछि। तमाकूल त बाप सं बेटा, चरबाह, हरबाह सं गिरहत तक मांगि खैत छथि। तमाकूल के नाम सुनिते मैथिली के एक चर्चित गीत जकरा आइयो बहुत सुवाद सँ सुनल जाइत अछि स्मरण आबि जाइत अछि: मामा यौ कनि खैनी दीय अपनों खाऊ कनि हमरो दीय जौं नहि देब त कहि देबनि हम मामी के तमाकूल के खैनी, सुरती, तम्बाकू आदि नाम सं जानल जैत अछि। ई अपन समग्र अवस्था मिथिला के संस्कृति में रचल बसल अछि। लोक त बारी-झारी में खेबा जोग तमाकूल उपजा लैत छथि। फेर ओकर कटनी, छटनी करैत छथि। शीत-रौद देखबैत छथि आ अंत में खर में राखि साल भरि लेल जमा करैत छथि। तमाकूल के ऐंठी आ जूम में सेहो कला देखि सकैत छी। कम्पनी सब के आबि गेलाक बाद सकरी कट आ आरो रंगक तमाकूल बाज़ार में उपलब्ध अछि। कनि तेज लगबा लेल कम्पनी सब ओहि में एसिड डालि दैत छैक। लोक कहता, “बड्ड चहट्गर अछि।” तमाकूल लोक सीधे चून लगा खाइत छथि, नोसि लेत छथि, बीड़ी में, सिगरेट में, चुरुट में, सिगार में, पाइप में, गुटखा, गुड़ाखू, गूल आ नहि जानि कथी-कथी में प्रयोग होइत अछि। आर त आर एकटा गूल केर कम्पनी "गुलाब गूल" नाम सँ अपन प्रोडक्ट बनबैत छ्ल। ओहि डिब्बा में एक चहटगर स्लोगन रहैक - "गूल हमारा आविष्कार है"। आब कहु, कुनो जोड़ अछि एकर महत्त्व के? मुदा जे सबसँ खतरनाक तरीका तमाकूल खेबाक अछि से अपन मिथिला आ आसपास केर क्षेत्र में देखल जाइत अछि - शुद्ध तमाकूल में चून मिला आ चुनेटि क ठोर में आँगुर सँ ठुसि लेनाइ। ई साक्षात् यम के नौत देबाक प्रथा अछि। ऊपर सँ ई लोक के असभ्य आ सुचिता के सिद्धान्त सँ दूर सेहो भगबैत अछि। लोक तमाकूल ठुसि यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकैत रहैत छथि। ई एहेन पपियाह लत अछि जे समाजवाद केर सिद्धांत पर अटकल अछि। समाजवाद, मार्क्सवाद,लेनिनवाद के जोड़ सँ पकड़ने अछि। की ब्राह्मण आ की हरिजन, की हिन्दू आ की मुस्लमान, ईसाई आ बहुत ठाम स्त्रीगण तक एकर स्वाद सँ झुमैत रहैत छथि। अतेक समाजवादी जे रिक्शा पर चढ़ल हाकिम रिक्शावाला सँ दांत निपोड़ैत बिना कुनो मान सम्मान के चिंता केने तमाकूल माँगि अपन ठोर में ठुसि लैत छथि। रिक्शावाला सेहो जे कनिकबेकाल पहिने लघुशंका केने छ्ल आ पानि के अभाव अथवा आर कुनो कारणे हाथ नहि धोने छ्ल अपन ओहि पवित्र हाथ सँ खूब मोन सँ तमाकूल के चून सँ रगरैत अछि आ हाकिम के दैत छनि। बाह! की दृश्य - जेहिना हाकिम तहिना रिक्शावला दुनू मस्त। तमाकूल के सेवन केनिहार रंग-रंग के बहाना बनबैत छथि। कियोक एकरा B B C अर्थात बुद्धिवर्धक चूर्ण त कियोक आरो किछु कहि संबोधित करैत छथि आ भांति - भांति के महिमा के बखान करैत छथि। हमर एक सम्बन्धी एक घंटा में 20 बेर तमाकूल ठोर तर दैत छथि। एयर फाॅर्स में काज करैत छला। हवाई जहाज केर इंजन केर अभियंता रहथि। हुनका बारे में एक बात प्रचलित छ्ल। जखन कखनो फाइटर हवाई जहाज केर इंजन में कुनो खरापी होइक आ हुनका भांगट बुझ में नहि आबनि त वरिष्ठ अधिकारी कहैंन, "भाई, हिनका चून तमाकूल दियौन, ई तुरत सब किछु ठीक क देताह।" फेर की लोक तुरंत तमाकूल तैयार करैत छल, हुनका दैत छलनि आ ओ बहुत गर्वित होइत तमाकूल के ठोर में ठुसैत अपन काज में मनोयोग सँ लागि जाइत छला। ई बात अलग अछि जे बाद में दम्माक गहन रोगी भ गेला। हालाँकि तमाकूल केर लत एखन धरि नहि गेलनि अछि। हुनकर पत्नी ओना त तमाकूल खेबा लेल हुनका सँ झगरैत रहैत छली मुदा जखन यैह बात एक दिन हुनकर छोट भाई बुझाब' लागलथिन त पत्नी के भेलनि , "तमाकूल के इलम कुनो बड्ड कलंकक बात थोड़े ने भेल? खाइत छथि त कोन कुकर्म?" झट दनि पतिक सुरक्षा कवच बनैत अपन देवर के ऊंच नीच कहनाय शुरू केलनि: "अहाँके अतबो संस्कार नहि बचल जे जेठ भाय सँ कोना बाजी? कोना हिम्मत भेल हिनका भाषण देबके? तमाकूल खाइत छथि कुनो कुकर्म नहि।" बेचारा छोट भाय, काटू त खून नहि! आ तमाकूल ठूसा श्रीमान अपन पत्नी सँ गदगद भेल। जखन दिल्ली यूनिवर्सिटी केर हॉस्टल में रहैत रही त अनेक बिहारी मित्र सब तमाकूल खैत छलाह आ एकरा बिहार आ मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर जकाँ मनैत अपन लत पर नितराइत छला। यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकबा के परंपरा के सेहो शाश्वत केने छला। एक मित्र त एहेन छला जे की कही। बहुत ज्ञानी, पढ़बा में विलक्षण, कुशाग्रबुद्धि मुदा तमाकूल खेबाक घनघोर समर्थक। वाक्यपटु सेहो छला। अपना सङ्गे अनेक बिहारी आ बहुत रास आनो ठाम के लोक के तमाकूल ठुसबक लत में निपुण केने छला - सिद्धस्त गुरु जकाँ। कहियों काल चिलम सेहो देख लैत छला। बाद में आई पी एस अधिकारी भेला। मित्रता एखनो अछि मुदा नाम देखार नहि करब। हमर त किछु नहि करता कनि देखार भ जेताह। भारत के अनेक तथाकथित शैक्षणिक कौशल में माहिर विश्वविद्यालय में त तमाकूल सङ्गे बीड़ी के प्रचलन भ गेल। लोक बीड़ी के धुआं में समाजवाद के संगीतक आनंद आ परमानन्द में भेर होमय लगला। अनेक महिला सब सेहो एकरा समाजवाद, वर्ग बिभेद हटेबाक, आ स्त्री-पुरुख के समानता के इंडिकेटर के रूप में देखैत छथि। सभा में, रैली में लोक बीड़ी पिबैत मस्त भेल मकुनी हाथी जकाँ चलैत रहैत छथि जेना बीड़ी केर हरेक कश सँ एक कुप्रथा के सर्वनाश क लेता, समाज सभ्य आ सम्यक भ जैत, माओ, नक्सल सब समस्या के चट सँ निदान। मुदा तमाकूल के आयुर्विज्ञान आ वैज्ञानिक शोध के तराजू पर जोखब त लागत जे ई दारु सँ अधिक हानिकारक अछि। कैंसर केर खतरा सब सँ अधिक तमाकूल सँ ओहू में ठोर में सीधे चुनेटल तमाकूल सँ अछि। विज्ञानक भाषा में कही त तमाकूल के गाछ निकोटियाना प्रजाति के अछि जकर जड़ि भारत में नहि अपितु दक्षिण अमेरिका में छैक। दक्षिण अमेरिका सँ ई पुर्तगाल आ पुर्तगाल सँ भारत 1600 ईस्वी में आनल गेल। आई विश्व के कुल उत्पाद के 7.8 प्रतिशत तमाकूल अपन देश भारत में होइत अछि। जे अनकर छ्ल, हानिकारक छल, व्याधि के घर छ्ल से अपन भेल अछि? कहल ई जाइत छैक जे एक बेर पुर्तगाल स्थित फ़्रांसिसी राजदूत जॉन निकोट अपन देश के रानी लग तमाकूल के बिया भेजलनि आ अहि तरहेँ प्राचीन इतिहास में तमाकूल नामक ई गाछ प्रचलित भ गेल जे आई समस्त विश्व लेल पैघ समस्या बनल अछि। निकोट महोदय केर नाम सं एकरा निकोटिन कहल गेल। एमहर हमरा किछु बूढ़ आ जानकार सब सूचना देलनि अछि जे जखन बीड़ी के कंपनी सब बीड़ी बनेलक त लोक ओकरा पीबे नहि करैक । जों नहि व्यवहार करतै त व्यापार कोना हेतैक? एकरा ध्यान में रखैत कंपनी सब किछु कलाकार के एकत्रित केलक आ अनेक शहर, गाम, चौराहा पर लोक सबके लैला मजनू, सीरी फरहाद, सुल्ताना डाकू आदि नाटक केर आयोजन कर लागल। लोक सब के बजा मंगनी में नाटक देखबै आ बीच-बीच में बीड़ी लुटबै। लोक नहु-नहु बीड़ी पिनाई शुरू केलक। नशा केर प्रयोग बढ़े लागल। बीड़ी सँ वर्ग केर रचना भेल। ब्राह्मण शुरू में बीड़ी नहि पिलनि। सोइत ब्राह्मण - राम-राम कोना छोट लोकक चीज़ ग्रहण करितथि? लेकिन एकर स्वाद के चखबाक आकांक्षा सब के छलैक। फेर की समाधान? समाधान के रूप में पहिने सँ चुनेटल तमाकूल त छले बाद में सिगरेट आबि गेल। सिगरेट भेल त क्लास भ गेल। फेर की ब्राह्मण आ की जमींदार। बुझु जे सिगरेट त मॉडर्न आ पढ़ल लिखल ओहू में आधुनिक आ अंग्रेजी शिक्षा केर मापदंड भ गेल। जे मिथिला आई सं ४०-५० वर्ष पूर्व टमाटर के सार्वजानिक भोज में,आ आन व्यवहार में अनबाक अनुमति नहि देने छल। चूँकि ई बिलायत सं आयल रहैक ताहि एकर बिलौती कहैत छल। तीमन-तरकारी में टमाटर के बदला आमिल आ नेबो के प्रयोग करैत छल वैह समाज बिना कुनो मीन-मेख केने तमाकूल के कोना अपना लेलक? छैक ने गूढ़ बात! आर-त-आर, तमाकूल भ गेल शुद्ध, छुआछूत सं सेहो मुक्त। केह्नो उपास में आरो किछु खाऊ-कि-नहि खाऊ तमाकूल चूसि सकैत छी। कर्मकाण्डी के एकरा ग्रहण करबा में कुनो हर्ज नहि, शायद भगवान बैकुण्ठ सं अनुमति प्रदान केने छथिन। हमरा त लगैत अछि जे मिथिला आ मिथले कथिलेल समस्त बिहार में दारू संग तमाकूल आ भांग पर बंदी करक अत्यंत आवश्यकता अछि। नीतिश कुमार जी कनि इम्हरो ध्यान दियौक। अते त एखनो तमाकूल के प्रोडक्ट बनबे बला कम्पनी सब खुजल उक बनल अछि। कुनो प्रतिबन्ध नहि। पश्चिमी देश विशेष रूपेँ अमेरिका में तमाकूल इत्यादि के कारोबारीके अपन आमदनीक एक पुष्ट भाग 'कैंसर' आ दोसर असाध्य रोगक इलाजक हेतु लगब पड़ैत छनि किन्तु एहि तरहक नियम के बारे में भारत में सोचल तक नहि गेल अछि । ई अपना आप में घनघोर चिंताक विषय अछि। तथाकाथित सोशलाइट, विद्वान आ प्रगतिशील लोक सब चुप छथि। कतेक त स्वयं तमाकूल चुन आ तमाकूल सं निर्मित अन्य वस्तु के उपयोग में संलग्न छथि। जनसँख्या विष्फोट के कगार पर ठाढ़ भारत केर विद्वान लोकनि धर्म,मेजोरिटी, माइनॉरिटी, हरिजन, गिरिजन, आ व्यवस्था में निक अधलाह के मीन-मेख निकलबा में भेर छथि। जनसँख्या हुनका एसेट बुझना जैत छनि। कुनो अस्पताल के कैंसर, यक्ष्मा, आ ह्रदय विभाग में जाऊ, स्थितिक भान भ जैत। दम्मा के मरिज केर सर्वेक्षण करू यथार्थ बुझि जैब। कम सँ कम तमाकूल के उत्पाद के पूर्णतः प्रतिबंधित करबाक नियम लागू कैल जा सकैत छैक जाहि सँ एकर प्रचार-प्रसार कम स कम हो और अंततः ई समाप्ति केर डेग दिश अग्रसर हो। तमाकूल सँ घटे-घाटा। तमाकूल में मादकता अथवा उत्तेजना प्रदान कर’ वला मुख्य घटक निकोटीन (Nicotine) होइत छैक। यैह तत्व सबस अधिक मारुक सेहो होइत छैक। एकर अतिरिक्त तमाकूल में अनेक तरहक कैंसर उत्पन्न कर’ वला तत्व पायल जाइत छैक। तमाकूल के सेवन सँ मुँह, घेंट, श्वांसनली आ फेफड़ा केर कैंसर (Mouth, throat and lung cancer)होबाक सम्भावना रहैत छैक। बिमारिक अंत अतै नहि होइत छैक एते धरि ह्रदय के बीमारी (Heart Disease),धमनी काठिन्यता, उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), पेटक अल्सर (Stomach Ulcer), अम्लपित (Acidity), अनिद्रा (insomnia) आदि रोगक सम्भावना तमाकूल केर उत्पाद केर सेवन सँ बढ़ि जाइत छैक। आदिवासी समाज में सेहो बनिया सब स्त्री-पुरुख दुनू के तमाकूल आ एकरा सं निर्मित अनेक वस्तु के लति लगा देने छैक। तमाकूल केर सेवन एक पैघ समस्या अछि। मोन आ शरीर दुनू के सर्वनाश क रहल अछि। अहि पर सोचब जरुरी अछि। हम एहि कथ्य के माध्यम सं किनको ऊँच-नीच नहि कहि रहल छी। केवल यैह जे ई बहुत खराप इलम अछि, एकर त्याग करक चाही। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार - किछु जोगीरा आ ३ टा गजल ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.३.१.राजीव रंजन झा- २ टा गजल २.महेश डखरामी- महेश पद्यावली -अनुरोध ३.४.प्रदीप पुष्प- २ टा गजल ३.५. पल्लवी मण्डल-अपना ले अपनहि लड़ए पड़त आशीष अनचिन्हार किछु जोगीरा* आ ३ टा गजल जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा कहानी भेलै काँच कविता भेलै तीत पुरस्कार लेल जूरी लागै बापोसँ मीठ जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा पोथी लेने घूमैए बौआ कोने कोन जूरी केर दर्शन भेलै चानी ओ सोन जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा अड़हर दरहर सभ छै राड़ दरभंगा बलाकेँ बचलै ने चार जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा पटना बला सूतल छै लऽ कऽ नेपाली सहरसा बला बजाबैए खूब्बे ताली जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा कथा की कविता लीखू मगजक खेतमे पुरस्कार तँ जेतै दरभंगिये के पेटमे जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा दू दुन्नी चारि पढ़ि बनलै चारि सए बीस जूरी के दरबज्जापर चरबै महींस जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा गोष्ठीमे गुष्ठीपर होइ छै चर्चा तइ बाद भेटै छै चमचाकेँ खर्चा जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा बोतल कि सोंटल कि चिक्केन मटन जूरी लोभाबै देखा कऽ बदन जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा पुरना लेखक लेल अनेरे बबाल नवका हँसोथि गेल सभहँक माल जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा * स्थानक नाम साहित्यसँ संदर्भित अछि। ३ टा गजल 1 देशमे उत्फाल नवका दर्द पुरने हाल नवका धार जानै नेत सभहँक माछ पुरने जाल नवका किछु चुनौती फेर एलै लोक ठोकै ताल नवका छै जरूरे खाद फेंटल खेत पुरने टाल नवका दाग लगने इज्जते छै देह चाहै थाल नवका सभ पाँतिमे 2122+2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी) 2 बड़का बड़का धारे झा सौंसे छै बुधियारे झा मुरदा सन के दुनियाँ छै की करता हथियारे झा सूतल दुखिया मोन हमर जागल बस संसारे झा हमरा लग सुखले सुक्खल हुनका लग रसदारे झा अगुअति धेने एकै दू बड़ बैसल पछुआरे झा सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि 3 कनियें दूर नबाबक गाम बहुते दूर विकासक गाम बीचो बीच फसादी ठाढ़ चारू कात लहासक गाम किनको लेल हजारो लाख किनको लेल उधारक गाम बड़ खुश बाजि कऽ नव नौतार चुप्पे चूप पुरानक गाम अंतिम रूप दुखक एहन छै दाही माँगै सुखाड़क गाम सभ पाँतिमे 2221 + 12221 मात्राक्रम अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल (1) करुणा आदर प्रेम सिखबियौ ऐ बौरहबा मोनके बटुक कनेक काबूमे रखियौ ऐ बौरहबा मोनके देशक आजादीके खातिर फांसी चढला युबक कते भगत सिंहके कथा सुनबियौ ऐ बौरहबा मोनके जहां-तहांसं झोड़ि-झाड़िक’ झोरी अप्पन भरइत छी अयाचीक किछु पाठ पढ़बियौ ऐ बौरहबा मोनके अपने खातिर कते हरानीसँ बुनैत छी जाल अहाँ सत्य,शांतिकेर बाट धरबियौ ऐ बौरहबा मोनके नमन करू भारत माताकें, अपन संस्कृति,भाषाकें सोझ बाटपर नित्य चलबियौ ऐ बौरहबा मोनके ( वर्ण- 20) (2) पर-चिंतनसं मुक्त करैए राम-कथा जीवनमे सुख-शान्ति अनैए राम-कथा असली धन की थीक भरतजीसं सीखू मोनक सभटा ब्याधि हरैए राम-कथा सेवामे आनंद कते हनुमाने कहता प्रवल आत्म विश्वास भरैए राम-कथा रावणसं सीखू परिणाम अहंकारक राज स्वयंपर करू कहैए राम-कथा सहनशीलता, पौरुषके संगम देखू भवसागरले’ नाव बनैए राम-कथा (वर्ण-15) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजीव रंजन झा- २ टा गजल २.महेश डखरामी- महेश पद्यावली- अनुरोध १ राजीव रंजन झा २ टा गजल १ अहीं हृदय केँ भाबय छी कहू किएक नहि बाजय छी सगर राति कछमछ कछमछ अहीं याद मे जागय छी अहींक सपना मे डूबि के मधुर प्रेम रस पाबय छी अहीं लेल अछि मन-आसन किएक एतय नहि राजय छी कुसुम स्नेह अर्पित क सदिखन किएक नहि हिय सजाबय छी स्व -अधरक सिनुरिया आभा किएक नहि पुनि पसारय छी स्मित अधर सुधा रस अप्पन खनो नहि त छलकाबय छी चमकि रहल अछि देह गगन निज लटघन केँ छितराबय छी नहि एतेक आब जुलुम करु एतेक किएक कनाबय छी अहीं सँ हमर सब मनोरथ एतेक किएक सताबय छी हमर शपथ घूरि क' ताकू कहू पुनि अहाँ आबय छी सुनू राजिव शपथ मानू अहीं जितल हम हारय छी । मात्रा क्रम: 122 122 22 २ राजनीति सरहंडी भेल भोट भाट के मंडी भेल सगर देश के सिस्टम आइ खौलि रहल एक हंडी भेल लोकतंत्र के सेवक आइ पतित पैघ पाखंडी भेल जाति पाति मे बाँटनिहार मातृभूमि के दण्डी भेल शासन मद मे नेता चूर संतरी धरि घमंडी भेल मालिक जनतंत्रक जे बनल वैह नम्हर कुकंडी भेल लूट पाट तांडव अछि मचल ‘रेप' पीड़िता चंडी भेल अन्न अन्न केँ कोटि मरैछ राजिव शिक्षित शिखंडी भेल । ( मात्रा क्रम: 2121 222 21 ) - उच्च वर्गीय सहायक भारतीय जीवन बीमा निगम समस्तीपुर, बिहार २ महेश डखरामी महेश पद्यावली -अनुरोध- ☆ मैथिल मध्य नहि सहजहि एका धरहि मान सिर तजहि विवेका ☆ बिखह विषाद विशद बखाना मनहि मनन सुसचिव सुजाना ☆ मैथिल प्रवासी संगम एकठामा सियहि सुभाष जोगाबहि रामा ☆ कारन कबन सब बैसि विचारी विगत त्रूटि अब लेंहु सम्हारी ☆ सीता संतति जानि सब हृदय सिनेह सुजान कहेउ महेश हित मैथिली तेजहु सब अभिमान ☆ भिन्न पुष्प अरु गुण प्रतिकूला माला मध्य मति मंगल मूला ☆ अन्तर प्रीति मन सनेहु अनुरागे तबहि प्रेम सबहि हिय जागे ☆ मातु एक अरु संतति अनेका सबहि सहोदर सिंचित एका ☆ धरहुं धीर शत कोटि निहारी चिंतन मनन अब तुम्हरी बारी ☆ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रदीप पुष्प २ टा गजल १ अचके ल' जाय दूर ई जिनगी केहेन छै निठूर ई जिनगी तकिते रहत अहाँक नैना आ सपना क' देत चूर ई जिनगी केओ अपन जँ संग छोड़ै छै जानक लगै जबूर ई जिनगी ककरा कहब कठोर कत्ते ई छै लैत सूद मूड़ ई जिनगी सबकेँ तहस नहस करै पलमे सबहक बनल हजूर ई जिनगी - प्रदीप पुष्प (२२१२ १२१२ २२ सब पाँतिमे| २ हेतौ जहिया इजोर हम मोन पड़बौ लगतौ ठीके बकोर हम मोन पड़बौ तोरा पाछू चलैत चुप्पेसँ केओ धरतौ जहने पछोड़ हम मोन पड़बौ फेरो केओ निहारि चंदा जकाँ मुख लगतौ तोहर चकोर हम मोन पड़बौ जे तोरा देखि भोजमे खूब रस ल'क' बनतौ डलना चटोर हम मोन पड़बौ बेदीतर बैसि मंत्र पढ' लेल बहिना पहिरेतौ जे पटोर हम मोन पड़बौ -प्रदीप पुष्प (222212122122 सब पाँतिमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पल्लवी मण्डल, गाम बेरमा, जिला मधुबनी अपना ले अपनहि लड़ए पड़त अपना ले अपनहि लड़ए पड़त बजैत रहता लोक मुदा अपन जे काज अछि तेकरा तँ अपनहि करए पड़त आगाँ बढ़बाक अछि अहाँकेँ अपने बितल बातकेँ बिसरए पड़त समय स्वयं पुछैए अहाँकेँ जवाब तँ ओकरा देबए पड़त.! कहिया धरि बुझैत रहब अपनाकेँ बेचारी तालीम अहाँक की, ई तँ बुझए पड़त केतबो करए कियो कात अहाँकेँ स्वतंत्र अहाँकेँ हुअ पड़त नव राह, नव डेगक संग अपना ले अपनहि लड़ए पड़त! अपना ले अपनेहि करए पड़त!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ता लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। ५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा “’विदेह’- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २२१ म अंक ०१ मार्च २०१७ (वर्ष १० मास १११ अंक २२१)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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