43 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २२२ म अंक १५ मार्च २०१७ (वर्ष १० मास १११ अंक २२२) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ. वीणा कर्ण- मैथिलीक धरोहर 'सीता-शील' (खड्गबल्लभ दास ‘स्वजन’ जीक ‘सीता-शील’ मैथिली काव्यक साहित्यिक विवेचना) २.२.राजेश वर्मा "भवादित्य"- बीहनि लेख : वैशिष्ठय २.३.प्रणव झा- रक्षिता (लघु कथा) २.४.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- मैथिली जोग गीत मे प्रेम आ तंत्र केर प्रभाव ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार - ३ टा गजल ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- प्रेम चालीसा ३.३.१.राजीव रंजन झा- १. फगुआ (मुक्तक) २. गजल आ ३. जोगीरा ३.४.१.ओम प्रकाश- गजल २.सत्यनारायण झा- मोनक गीत Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केलक अछि जकर संयोजक श्री दिनेश यादव जी रहता। अइ विशेषांकमे नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य केर मूल्यांकन रहत। अइ विशेषांक लेल सभ विधाक आलोचना-समीक्षा-समालोचना आदि प्रस्तावित अछि। समय-सीमा किछु नै जहिया पूरा आलेख आबि जेतै तहिये, मुदा प्रयास रहत जे एही साल मइ-जून धरि ई विशेषांक आबि जाए। उम्मेद अछि विदेहक ई प्रयास दूनू पायापर एकटा पूल जरूर बनाएत। विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा कएल जा रहल अछि। दोसर भागमे अइ बेर नीलमाधव चौधरी जीक रचना आमंत्रित कएल जा रहल अछि आ नीलमाधवजीक रचना ओ रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल कैलाश कुमार मिश्रजीकेँ आमंत्रित कएल जा रहल छनि। दूनू गोटाकेँ औपचारिक सूचना जल्दिये पठाओल जाएत। रचनाकारक रचना ओ आलोचकक आलोचना जखने आबि जाएत ओकर अगिला अंकमे ई प्रकाशित कएल जाएत। अइ शृंखलाक पहिल भाग कामिनीजीक रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही,जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर),जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.डॉ. वीणा कर्ण- मैथिलीक धरोहर 'सीता-शील' (खड्गबल्लभ दास ‘स्वजन’ जीक ‘सीता-शील’ मैथिली काव्यक साहित्यिक विवेचना) २.२.राजेश वर्मा "भवादित्य"- बीहनि लेख : वैशिष्ठय २.३.प्रणव झा- रक्षिता (लघु कथा) २.४.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- मैथिली जोग गीत मे प्रेम आ तंत्र केर प्रभाव डॉ. वीणा कर्ण मैथिलीक धरोहर 'सीता-शील' (खड्गबल्लभ दास ‘स्वजन’ जीक ‘सीता-शील’ मैथिली काव्यक साहित्यिक विवेचना) मानवीय आदर्श ओ अध्यात्म चिन्तनक अभिव्यक्तिक लेल काव्य अमृत्वक काज करैत अछि। भक्तिक भावुकतासँ भरल मोनकें काव्य सृजक प्रेरणा स्रोत कहब अनुपयुक्त नहि होएत। एहि काव्यक शब्दार्थ होइत अछि कवि-कर्म जकर काव्य सम्पादनमे रचनाकारक काव्य रचनाक प्रवृत्ति ओ अभ्यास कार्यरत होइत अछि आ अहि व्युत्पत्ति ओ अभ्यासक बलपर ओ जे रचना पाठककें समर्पित करैत छथि से काव्य कहबैत अछि। वस्तुत: काव्यक रसानुभूतिसँ हमर हृतंत्रीमे जे तरंग उत्पन्न लेइत अछि ओकर लय ओ छन्दमे बान्हल रहब आवश्यक होइत अछि जे शैलीक आधारपर क्रमश: तीन कोटिमे बाँटल रहैछ, यथा- गद्य, पद्य ओ मिश्र। मिश्रकेँ चम्पू काव्य सेहो कहल जाइत अछि। छन्दरहित काव्य विधानकें जँ गद्य तँ छन्द्युक्त रचनाकेँ पद्य कहल जाइत अछि। पुन: गद्यमे अनेकानेक विधा अछि, जेना- कथा, उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्तांत , रिपोर्टाज, नाटक ,एकांकी आदि-आदि। ओहिना पद्यक सेहो दू भेद होइत अछि: प्रबंध ओ मुक्तक। प्रबन्ध काव्यक सेहो दू भेद होइत अछि – महाकाव्य ओ खण्डकाव्य। महाकाव्यमे जँ इतिहास प्रसिद्ध महापुरुष अथवा महीयशी नारीक सम्पूर्ण जीवनक गतिविधिक चारित्रिक लीला-गान रहैत अछि तँ खण्डकाव्यक विषयवस्तु होइत अछि एहने महापुरुष अथवा महीयशी नारीक जीवनकप्रसिद्ध खण्डविशेषक घटनाक्रमक चित्रांकन। प्रस्तुत कसौटीक आधारपर ‘सीता-शील’ केँ प्रबन्धकाव्यक कोटिमे राखल जा सकैत अछि सेहो महाकाव्यक कोटिमे। हँ, महाकाव्यक संज्ञासँ अभिहित करबाक क्रममे एहि रचनाक सन्दर्भमे किछु नियमकें शिथिल करए पड़त। एहि रचनाक महाकाव्यत्व सिद्ध करएमे मात्र दू टा तत्व,विविध छन्दक प्रयोग ओ सर्गवद्धताक अभावकें शिथिल करए पड़त। ‘सीता-शील’क रचनाकार स्वयं एकटा साहित्यिक विधाक कोनो कोटिमे नहि राखि पद्य-रचना कहैत छथि “सामान्य जन कें ओ सुग्रन्थक अर्थ समझ पड़नि जें स्पष्ट सुन्दर भाव समझै मे कठिनता होनि तें से जानि रचलहुँ मधुर भाषा मैथिली कें पद्यमे लागत पड़ै मे पढ़ि रहल छी जाहि तरहें गद्य मे” वस्तुत: रचना कोन कोटिक अछि से परिभाषित करब रचनाकारक नहि अपितु आलोचकक काज होइत छन्हि। ई हमर सभक दायित्व अछि जे एहन महानतम रचनाक प्रति संवेदनशील भए एकर उपयोगिताकें देखैत एकरा प्रति न्याय कए सकी। एकरा अहू लेल खण्डकाव्य नहि कहल जा सकैत अछि जे खण्डकाव्य तँ महाकाव्यक शैलीमे प्रधान पात्रक जीवनक कोनो एक खण्ड विशेष के लए कए लिखल जाइत अछि, किन्तु एहि रचनामे भगवती सीताक जन्मसँ लए कए जीवनक अन्तमे धरती प्रवेश धरिक घटना निबद्ध अछि। वास्तवमे देखबाक ई अछि जे प्रबन्धकाव्य लेल जे आवश्यक अर्हता होइत अछि तकर समाहार एहि महाकाव्य मे भेल अछि अथवा नहि। प्रबंन्ध-काव्यमे सर्वप्रथम कथानकक अनिवार्यता होइछ आ तकर प्रयोजन ओहि पात्र विशेषक क्रियाकलापक कथा होइत अछि जाहि कथासँ प्रभाव ग्रहण कए भावक अपन स्वच्छ चरित्रक निर्माणक दिशामे अग्रसर भए लोक-कल्याणक भावनाकें सबलता प्रदान करैत छथि। एहि महाकाव्यक कथानक सेहो एकटा महत् उद्देशयकें लए कए सृजित भेल अछि जाहिसँ समाज सुधारक मार्ग प्रशस्त भए सकए। भगवती जानकीक जीवन-चरितक प्रसंगमे रचनाकारक जे भावोक्ति छन्हि ताहीसँ एकर कथानकक चयनक औचित्य प्रतिपादित भए जाइत अछि। देखू जे महाकवि स्वयँ की कहैत छथि – “ओहिठाम प्रातिज्ञाबद्ध भ गेलहुँ जे रामायण मे वर्णित जगत जननी जानकीक आदर्श चरित्रक वर्णन अपन मातृभाषा मैथिली मे पद्य रचना कए पुस्तक प्रकाशित कराबी, तें – “आदर्श पुरुषक प्रेमिका कें चरित शुभ लीखैत छी उपदेश नारी लेल ‘सीता-शील’ मध्य पबैत छी अछि धारणा सीताक प्रति उर-मध्य श्रद्धा-भक्ति जे पद रचि प्रकट कs रहल छी अछि योग्यता आ शक्ति जे” एकरा संगहि एहि महाकाव्यक कथानकक चयनमे रचनाकार जे एहन सफलता प्राप्त कएलन्हि अछि से अहू कारणें जे ग्रामीण निष्कलुष वातावरणमे रहि कऽ महाकवि खड्गबल्लभ दास अपन एकान्त साधनासँ सुन्दर कथानकक चयन कएलन्हि अछि जाहिमे प्रेमक मधुर संगीत अछि तँ उद्दाम उत्साह सेहो। मानवताक व्याकुल आह्वाहन अछि तँ प्रकृतिक मधुर सौंदर्य अछि। सीताक वैभवक संग आदर्शक आकर्षण सेहो सशक्तता सँ चित्रित भेल अछि। कहल जा सकैत अछि जे एकर कथानक संयमित भावात्मकता ओ संयमित कलात्मकताक संग सामंजस्य सँ अत्यन्त प्रभावोत्पादक भए उठल अछि। वास्तवमे एहि महत् काव्यक कथानकक माध्यम सँ मानवीय मूल्यक अवमूल्यन कएनिहार लोककें मर्यादा रक्षाक पाठ पढ़एबाक आवशयकता बूझि एहन कथानक प्रस्तुत कएल गेल अछि जकर कथानक चयनक मादें पटना विश्वविद्यालयक अवकाशप्राप्त मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो। आनन्द मिश्र लिखैत छथि -“एहि पुस्तक द्वारा कवि साधारणों व्यक्ति कें ओहि उदात्त चरित्र सँ परिचय कराय नैतिकता एवं शालीनताक पाठ दए रहल छथि। लोकक चारित्रिक उत्थानहि सँ समाज एवं देशक उत्थान भए सकैछ। सम्प्रति लोक आधुनिक चाकचिक्यक जाल मे फँसल अपन संस्कृति एवं सभ्यता सँ हँटल जा रहल अछि। मानवीय मूल्यक अवमूल्यन भए गेल अछि। लोक अपन आदर्श चरित्र सँ अनभिज्ञ भए रहल अछि। बिना संस्कृतिक उत्थानहि आन प्रगति अकर्मिक भए जाएत।” वस्तुत: एहि कारणसँ एहन आदर्श कथानकक चयन कएल गेल अछि। महाकाव्यक दोसर तत्व होइत अछि नायक। जें कि पात्रक माध्यम सँ कविकें समाजकल्याणकारी महत् उद्देशयक प्रतिपादन करबए पड़ैत छैन्हि तें महाकाव्यक पात्रमे लोकनायकत्व क्षमता रहब अत्यन्त आवश्यक होइत अछि। संगहि कथानकक प्रतिपादनमे एहि लोकनायकक उद्देशयक पूर्तिक लेल अन्य सहयोगी पात्र सभक अनिवार्यता सेहो छैक। ‘सीता-शील’मे पात्रक सुन्दर प्रयोगसँ एकर सफलता सिद्ध भेल अछि। भगवत् भक्तिक प्रति अनुरक्तिसँ मनुष्यकें जाहि ब्रह्मानन्द सहोदरक प्राप्ति होइत अछि सएह जीवनक चरम उत्कर्ष बूझल जा सकैत अछि। परमात्माक असीम सत्त ओ हुनक लोककल्याणक भावनाक अजस्र धारमे सराबोर करबाक करुण चित्रण मैथिली सीताराम विषय महाकाव्यक विषय वस्तु बनल अछि। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ओ अयोनिजा भगवती सीताक चरित्रक स्मरण मात्रसँ एहि भावक बोध होइछ जे संसारमे जे किछु अछि से अही महत् चरित्र परमेश्वर ओ परमेश्वरीसँ ओत प्रोत अछि आ अही परमात्मा सीता-रामक लीला-गानकें प्रस्तुत रचनामे स्थान देल गेल अछि। भौतिकताक सीमासँ ऊपर उठि कए ‘सीता-शील’क रचनाकार ओहि परम सत्ताक संग अपन चेतनाकें एकाकार करैत अपन ‘स्व’ केर उत्सर्ग कए देने छथि। परमात्माक चारित्रिक उत्कर्षक प्रकाश एहि रचनामे सर्वत्र परिव्याप्त अछि जे ‘यावच्चंद्र दिवाकरौ’ हमरा सभक आचार विचारकें अनुशासित करैत रहत। मानवीय मूल्य संरक्षणक जेहन व्यवस्था, ओहि व्यवस्थाक प्रति व्यक्तिक उत्तरदायित्व निर्वहन जेहन दिशा-निर्देश जाहि रूपें एहि रचना सँ प्राप्त होइत अछि तकर समाजकल्याणक मार्ग प्रशस्त करएमे अत्यन्त पैघ भूमिका छैक तें एकर रचनाकार एहन पात्रक चयन कएलन्हि जिनक आदर्शक आलोकसँ समाजक मानसिकताकें प्रकाशित करबाक सद्प्रयासमे ओ कहैत छथि :- “आदर्श पूरुषक प्रेमिका कें चरित शुभ लीखैत छी उपदेश नारी लेल ‘सीता-शील’ मध्य पबैत छी” XXXXXXXXXX आ पुन: - “ई चरित पढ़ि आदर्श जीवन कें बनौती नारि जे बनतीह जग मे परम पूज्या पतिक परम पियारि से” महाकाव्यक लेल सर्गबद्धता अनिवायता कें स्वीकारल गेल अछि किन्तु एकर कथानककें विषयवस्तुक अनुरूप शीर्षक दए विषयकें विश्लेषित कएल गेल अछि। सर्गक अनिवार्यताक स्थानपर एहन प्रयोग महाकविक भावुक मानसिकताक परिचायक तँ अछिए संगहि एहि दिशा मे सक्रिय रचनाकारक लेल ई पोथी एकटा नव दृष्टिकोण सेहो प्रदान करैत अछि। महाकाव्यमे विविध छन्दक प्रयोग हएब सेहो आवश्यक अछि। अगिला विषयक विश्लेषण लेल पछिले सर्गक अन्तमे छन्द परिवर्तित कए देल जाइत अछि किन्तु एहि वृहत् रचनाक विषयवस्तुकें एकहि छ्न्दमे नियोजित कए कवि प्रवर चमत्कार उत्पन्न कए देने छथि। महाकाव्यमे अनेक छन्दक प्रयोगसँ ओकर अनेक तरहक रसास्वादनक स्थानपर एकहि छन्द मे एकर नियोजनसँ कोनो अन्तर नहि आएल अछि किएक तँ रसास्वादनक प्रवाहक गतिशीलता कखनहु अवरोध उत्पन्न नहि करैछ। एहन छन्द प्रयोगक मादें कवि स्वयं कहैत छथि :- “मात्रा अठाइस पाँति प्रति लघु-गुरु चरण कें अन्त मे सुन्दर श्रवण- सुखकर मधुर हरिगीतिका कें छन्द मे” आश्चर्यक बात तँ ई जे मात्र एकहि छन्दमे प्रयुक्त कथानक भेलोपर एहिमे कतहु रसहीनताक अवसर नहि भेटैछ। काव्यकलाक अन्तरंग ओ बहिरंग नवीनता, भावनाक माधुर्य ओ रसविदग्चताक कारण कविकें अपन अन्तस्थल सांस्कृतिक चेतनाकें सार्वजनिक करबाक सुअवसर प्रप्त भेल छन्हि। रसकें काव्यक आत्मा मानल गेल अछि। संस्कृतक प्राय: सभ विद्वान रसक महत्ताकें स्वीकार केने छथि। पंडित राज जगन्नाथ रसेकें काव्यक आत्मा स्वीकार करैत चाथि: -"रमणीयार्थ: प्रतिपादक: शबद: काव्यम" रसेमे ई शक्ति छैक जे काव्यक रसास्वादनक सत्य अर्थमे अवसर प्रदान करबैत अछि। सहृदयक ह्रदयमे आह्लाद एवं मनकें तन्मय बना देबाक रसक क्षमतासँ वाणी गद्गद ओ शरीर रोमांचित कए जायत अछि। साहित्यमे एकर सुन्दर प्रयोगसँ ब्रह्मानंदक सहोदरक रूपमे परमात्माक साक्षात्कार होएबाक अनुभूति होइत अछि। आध्यात्मिकताक भावभूमिपर रचल-बसल एकर विषयवस्तुक निर्वहनक लेल 'सीता-शील'मे शान्त रसक प्रयोग तँ भेले अछि, एहिमे शृंगार रसक एहन प्रभावशाली ओ उत्प्रेरक वर्णन भेल अछि जे काव्यमे साधारणीकरणक उपयोगिताकें सार्थक सिद्ध करैत अछि। महाकाव्यमे रसक उपस्थितिक केहन सशक्त प्रभाव पड़ैत अछि, पाठकक भावुकताकें उद्बुद्ध करएमे एकर की भूमिका छैक, एकर समालोचना एकरा कोन रूपें स्वीकार करैत छथि तकरा एहि महाकाव्यक प्रति कहल गेल बिहार विश्वविद्यालयक भूतपूर्व राजनीति विज्ञानक अधयक्ष प्रो.देवनारायण मल्लिकक शब्द मे देखल जा सकैत अछि- "रचनाकारक प्रारम्भिक विनययुक्त पद्य पर दृष्टि परितहिं पढ़बाक उत्सुकता भेल। एके बैसक मे 'सीता-शील' कें आद्योपान्त पढ़ि गेलहुँ। एहि पाठ्यांतर मे कतेको बेर आँखि सँ नोर बहल अछि, कतेको बेर रोमांचित भए उठलहुँ अछि, कतेको बेर देवत्वक परिवेश मे आत्मा कें विचरण करैत पौलहुँ।" काव्यमे जँ रसास्वादन करएबाक क्षमता नहि हो तँ ओकरा काव्यक कोटि मे राखले नहि जा सकैत अछि। काव्य सृजनक आधार होइत अछि रस। प्रबन्ध काव्यमे एकटा प्रधान रस होइत अछि जकरा अंगी रस कहल जाइत अछि आ अन्य रस सभ ओहि अंगी रसक सफलतामे सहयोगीक काज करैत अछि। काव्यमे रसक अनिवार्यता प्राय: सभ विद्वान मानने छथि। हँ,ई बात फराक अछि जे केओ एकरे काव्यक आत्मा मानैत छथि तँ केओ अलंकार कें। केओ काव्यमे ध्वनिक समर्थक छथि तँ केओ छंदपर जोर दैत छथि किन्तु समग्र रूपसँ विद्वान सभक कथानक निचोड़ ई अछि जे रसोत्कर्षक सहायकक रूपमे अलंकार केँ राखल जा सकैत अछि किन्तु एकरा काव्यमे सार्वभौम सत्ताक कारण नहि कहल जा सकैत अछि। अलंकार काव्यक सौंदर्यवृद्धिमे सहायक तँ होइत अछि किन्तु एकरा काव्यक आत्मा मानब अनुपयुक्त होएत। वस्तुत: रसेकेँ काव्यक आत्मा मानब उचित अछि से रस 'सीता-शील'क प्राणवन्तताक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। जेँ कि प्रस्तुत महाकाव्य भगवती सीताक सुशीला स्वभावक दस्तावेज अछि, भारतीय संस्कृतिक प्रति कविक उच्चादर्शक निरूपण अछि आ पोथीक प्रारम्भसँ लए कए अन्त धरि सीताक प्रति करुणाक अजस्र धार बहएबाक अवसर प्रदान करैत अछि तेँ एकरा करुण रस प्रधान महाकाव्य कहि सकैत छी अर्थात् करुण रस एहि महाकाव्यमे अंगी रसक रूपमे उपस्थित अछि आ अंगक रूपमे अन्य रस सभ सहयोगीक काज करैत एकर रसास्वादनक क्षेत्र विस्तार करैत अछि जेना - सीतारामक अपरिमित प्रेम प्रसंगमे संयोग ओ वियोग श्रृंगार, सूर्पनखाक विरूपित रूपमे हास्य रस, जानकीक जन्मक क्रममे वात्सल्य, परशुराम-लक्षमण संवादमे रौद्र, राम-रावण युद्ध, बालि-वध, खरदूषण वध, मारीचवध आदिमे वीर रस, सीताक जनकपुरसँ विदाइ ओ वनगमनक काल सासु सभक उपदेश ओ सीतासँ विछोहमे करुण रस आदिक उपादेयताकेँ देखल जा सकैत अछि। काव्यमे अलंकारक उपस्थितिसँ एकर सौंदर्यवृद्धि ठीक ओहिना होइत अछि जेना कोनो नारीक सौन्दर्य अलंकारक प्रयोगेँ द्विगुणित भए जाइत अछि। अलंकारसँ काव्यमे जे प्रभावोत्पादकता उत्पन्न होइत अछि से ओकर इएह शक्तिमत्ता अछि जाहिसँ काव्य सुकोमल ओ मधुर रूप ग्रहण कए पाठककेँ भाव-विभोर करैत अछि। एकरामे हृदयग्रह्यता ओ सुषमासृष्टि करबाक क्षमतासँ एकर प्रभावान्वितिक प्रवाह तीव्रतर भए पबैत अछि। अलंकार प्रयोगक दृष्टिएँ 'सीता-शील' अद्भुत उदाहरण अछि। एहिमे उपमा, रूपक, अनुप्रास, अप्रस्तुत प्रशंसा आदिक आधिक्य रहितहुँ यमक उत्प्रेक्षा, वक्रोक्ति आदि अधिकाधिक अलंकारक प्रयोगेँ कविक कथ्यक मार्मिकता पाठककेँ साधारण स्तरसँ ऊपर उठाकए तन्मय कए दैत अछि। अपन सुकोमल भावनाक अभिव्यक्तिमे कवि प्रकृतिकेँ कखनहुँ बिसरल नहि छथि। काव्यमे प्रकृति चित्रणक कारण होइत अछि कविक सौन्दर्यबोध ओ प्रकृतिसँ हुनक साहचर्य से हिनक सौन्दरोपासनाक प्रति फलक साक्षी तँ प्रस्तुत रचना अछिए तखन ओहि सौन्दर्य के आत्मसात कएनिहार महाकविक वैभवपूर्ण सौंदर्यक वर्णन कोना ने करितथि। हिनक उच्चस्थ प्रकृति प्रेमकेँ पोथीमे अनेको ठाम देखल जा सकैत अछि जेना मिथिलाक शोभा वर्णनक क्रममे कवि प्रवर कहैत छथि - "हिमधवल पर्वत-पुञ्ज तल मे बसल मिथिला प्रान्त ई "सम्पूर्ण विश्वक देश एवं प्रान्त सँ शुभ शान्त ई" सीता हरणक पश्चात रामक विलापमे कविक प्रकृतिसँ साहचार्यक एहन अभिव्यक्ति भेल अछि से देखिते बनैत अछि। कखनो ओ अशोककेँ सम्बोधित करैत भगवती सीताक पता ज्ञात होएबाक जिज्ञासा करैत छथि तँ कखनो जामुनसँ पूछैत छथि। कखनहुँ शालसँ पूछैत छथि तँ कखनहुँ आम आ कटहरसँ। कखनो पीपरसँ पूछैत छथि तँ कखनो जूही, कनाओल, गेना, गुलाब, चम्पा, चन्दन, वर, कदम्ब, अनार, गूलरिसँ। कखनो कोमल हरिण, गजराज सिंह, बानर, भालू, सूर्या, वायु, चंद्र, धरती, वरुण, आकाश आदि जड़ हो अथवा चेतन, प्रकृतिक कण-कणसँ पूछैत छथि। कविकेँ प्रकृतिसँ आत्मीय सम्बन्ध छन्हि जे प्रकृतिक लेल रामक सम्बोधनमे देखल जा सकय अछि। प्रकृतिक मानवीकरणसँ कथ्यक विश्वसनीयता द्विगुणित भए जाइत अछि जकरा आलम्बनक रूपमे ग्रहण कए महाकवि 'स्वजन' जी एहि महाकवि 'स्वजन' जी एहि महाकाव्य केँ चिरनूतन सौन्दर्य प्रदान करलन्हि अछि। चित्ताकर्षक ओ प्रांजल भाषा मन-प्राणकेँ पुलकित कए दैत अछि से 'सीता-शील'क रचनाकार भाषाकेँ बोधगम्य, चित्रोपम एवं सस्वर बनएबाक भावुक प्रयास कएने छथि जाहि कारणें एकरा प्रति उद्दाम चित्ताकर्षण होइत अछि। कोनो साहित्यिक अपन रचनाकेँ चित्ताकर्षक बनएबाक लेल भाषा-प्रयोगक प्रति साकांक्ष रहैत छथि आ कथनकेँ भव्यतर बनएबाक लेल नै मात्र अपनहि मातृभाषाक प्रयोग करैत छथि अपितु तत्सम, तद्भव, देशज ओ विदेशज भाषाक चारू रूपक सानुपातिक प्रयोगसँ रचनाक उत्कृष्ट बनएबाक सत्प्रयास करैत छथि। महाकवि 'स्वजन' जीक एहि रचनामे तत्सम, तद्भए आ देशज शब्द तँ एकर आधार स्तम्भ अछिए विदेशज शब्दल प्रयोगइ सेहो रचनाकार अत्यन्त कुशल आ प्रबुद्ध छथि जाहि कारणें ठाम-ठाम ओकर सुन्दर प्रयोगसँ वाक्य संगठनमे कतहु मोनकेँ अकछा देबाक अवसर नहि देने छथि। जेना औषधिक स्थान पर दवा, उनटि देबाक स्थान पर उलटि देब, घुरबाक स्थान पर वापस, लोकक स्थान पर लोग, पिताक स्थान पर बाप, नमहरक स्थान पर लम्बा, कायरताक स्थान पर कायरपना आदि अनेको शब्दकेँ देखल जा सकैत अछि। वस्तुत: कवि 'स्वजन' जी जाहि कुशलतासँ एहि रचनामे सीता-शीलक महत्ताक निरूपणमे अपन संवेदना ओ विस्तारकेँ भाषाक कसौटीपर कसि कए भावनाकेँ अभिव्यक्ति देने छथि से निश्चित रूपेँ एहन महाकाव्यक लेल उपयुक्त, सुष्ठु भाषाक अनुरूप अछि जाहिसँ एहन भाषाक भावुकता महाकाव्यमे प्रयुक्त रस ओ अलंकार जकाँ धारदार, तीक्ष्ण ओ प्रभावोत्पादक भए सकल अछि। कवि अपन अतुल शब्द भण्डार सँ सुन्दर, सुकोमल ओ भावाभिव्यंजक शब्दक चयन कएने छथि जाहिमे अपन हृदयक रसरंग रंग टीपि देने छथि। कोनहु रचनाकारक ई दायित्व होइत छन्हि जे ओ अपन एहन रचनामे स्थानीय विशेषताकेँ स्थान अवश्य देथि से 'सीता-शील' मे मिथिलाक सौन्दर्य ओ संस्कृतिक वर्णनक क्रममे महाकवि अपन उदात्त पात्रक मुँहसँ की कहबैत छथि से देखू - "तिरहुतक तुलना मे कोनो नहि देश-प्रान्त पबैत छी मिथिला सदृश सौन्दर्य हम संसार मे न सुनैत छी" तहिना वनक मनोरमताकेँ सीता-रामक वनवासक क्रममे ओ रावणक ऐश्चर्यकेँ लंकाक वैभव सम्पन्न क्षेत्रमे देखल जा सकैत अछि। प्रबन्ध काव्यक लेल कथोपकथन सेहो अत्यन्त आवशयक तत्व अछि किएक तँ एकर एक पात्र दोसर पात्रसँ जाहि बातक अपेक्षा रखैत छथि से वार्तालापहिसँ सम्भव भए सकैत अछि। रचनाकार कथोपकथनक प्रयोगमे केहन निपुण छथि तकर संगठन 'सीता-शील'मे सर्वत्र देखएमे अबैत अछि खास कए परशुराम-लक्ष्मण संवाद, लंकामे रावण ओ सीताक मध्यक वार्तालाप, अनुसूया-सीताक मध्य वैचारिक आदान-प्रदान आदि प्रसंग मे देखल जा सकैत अछि। महाकाव्यक महत् उद्देश्य होइत अछि आ रचनाकार द्वारा ओकरा अपन रचनाक बिना आलम्बन बनौने कोनहु रचनाक सार्थकता सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि से अहू रचनाक पाछाँ महत् उद्देश्य छैक आ ओ छैक संसारसँ आसुरी शक्तिक नाश, मानवताक उच्चस्थ भावनाकेँ सम्मानित करब आ भगवती सीताक शील केँ समक्ष राखि नारीक विशुद्धाचरणक माध्यमसँ जन-कल्याणक भावनाकेँ पल्लवित करब। अपन एहि महत् कार्य-सम्पादनमे महाकवि अनेक ठाम सटीक सूक्ति वचनक प्रयोग कए समाजसुधारक कार्य सम्पादन करैत छथि जकरा देखबाक होयए तँ 'सीता-शील'क अनेक प्रसंग एकर गवाही देत। नारीक आदर्शकेँ जीवनक अक्षयनिधि मानि ओकरा सम्मानित करब एहि रचनाक मुख्य उद्देश्य अछि जकरा एकर चरित्र-प्रधान शीर्षकमे देखल जा सकैत अछि। कहाकवि 'स्वजन' जी स्वयं कहैत छथि - "सीखथु जगत मे नारिगण शिक्षा सियाक चरित्र सँ स्वामी प्रसन्नक लेल सब किछु करथि हृदय पवित्र सँ" आ पुन:- "ई चरित पढि आदर्श नीवन केँ बनौती नारि जे बनतीह जग मे परमपूज्या पतिक परम पियारि से" नारीक कर्त्तव्य ओ आदर्शक प्रति समाजकेँ साकांक्ष करबाक एहि उद्देश्य प्रतिपादनमे महाकवि ख्ड्गबल्लभ दास जी अत्यन्त संवेदनशील छथि। भगवती सीताक शिव संकल्पयुक्त कर्त्तव्यपरायणता ओ पातिव्रत्य हिनका अत्यधिक भावुक बनौने छन्हि फलत: कवि कहि उठैत छथि - "ई जौं पढ़थि सभ व्यक्ति 'सीता-शील' चित्त पवित्र सँ पढ़ि नारि-नर आचार सीखथि जानकीक चरित्र सँ" नारी चरित्रक सहिषणुता, सच्चरित्रता, लाग, क्षमाशीलता, ममता आदि गुण स्वस्थ समाज-निर्माणक दिशामे आवश्यक तत्व अछि जे लोककल्याणकारी विचारधाराकेँ सबल बनबैत अछि आ इएह अछि महाकवि खड्गबल्लभ दास 'स्वजन'क लोककल्याणकारी नारी जीवनक आदर्श आ ओहि आदर्शक अक्षरस: पालन करबाक पाठक सँ अपेक्षाक उद्देश्य प्रतिपादन। खड्गबल्लभ दास ‘स्वजन’ जीक ‘सीता-शील’ विदेहक पोथी डाउनलोडसँ सेहो डाउनलोड कऽ पढ़ल जा सकैए। विदेह पोथी डाउनलोड केर लिंक थिक--https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ (संपादक) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश वर्मा "भवादित्य" बीहनि लेख : वैशिष्ठय स्त्री आ पुरूष कहियो समान नहि भऽ सकैत अछि। जे बुद्धिजीवी लोकनि स्त्री- पुरूषक समानता लेल हो हल्ला मचबैत रहैत छथि, तिनकर बुद्धि पर हमरा तरस अबैत अछि। अहीसभ कहू जे मंज्जर सँ लदल आमक गाछ आ बबूरक गाछ मे कोन समानता? सृष्टिक सभ जीव एहि संसारमे अपन अपन विशिष्टता लऽ के आयल छैक। सभक अपन-अपन विशिष्ट पहिचान छै।एहि मे समानता आ असमानता कतय सँ आबि गेल। स्त्री तऽ विधाताक एहन अमूल्य वरदान थिक जिनकर बिना सृष्टिक कल्पनो नै भऽ सकैत अछि। सृष्टिक एकटा एहेन अमूल्य उपहार जिनकर बिना पृथ्वीलोक मनुष्य विहीन भऽ जायत। चूकि स्त्रीलोकनिक एकटा विशिष्ट व्यक्तित्व होइत छैक तेँ हुनकालोकनि के संसारक सभ क्षेत्रमे विशेष सुविधा भेटबाक चाही। ************************************ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा रक्षिता (लघु कथा ) आई रक्षिता भारतीय सेना के मेडिकल कोर्प में कमिशंड होबय जा छलिह । ऐ समारोह में हुनकर मां – पप्पा अर्थात रिद्धि आ रोहन सेहो आयल छलाह । रिद्धि के आई अपन बेटी के लेल किछु बेसिए दुलार आ फ़क्र बुझना जा रहल छल । समरोह में कुर्सी पर बैसल बैसल ओ पुरना खयाल में डूबि गेल छलिह । जखन पीजी - सुपर स्पेशलिटी के एंट्रेंस में रक्षिता नीक रैंक नेने छलिह तखन रोहन हुनका दिल्ली के एकटा जानल-मानल प्राईवेट मेडिकल इंस्टिच्युशन में प्रवेश लेब लेल कहने छलाह । ओ रक्षिता के बुझा रहल छलाह जे देखह बेटी ओ नामी कॉरपोरेट अस्पताल छै, नीक पाई भेटत, संगहि नाम आ शोहरत सेहो बढत त जिनगी ठाठ से कटत, तहि लेल कहै छि जे आर्मी अस्पताल में प्रवेश लेबय के जिद्द जुनि करू। ओतय अहां सं पहिनेहे बॉण्ड भरायल जायत आ पोस्ट डोक्टोरल (सुपर-स्पेशलटी) करय के बाद अहां के कैएक साल धरि सेना में जिवन घस पडत आ नै त लाखक लाख टका बॉन्ड भरू ! मुदा रक्षिता कहां मानय वला छलिह, छुटिते ओ बजलिह: अहुं ने पप्पा किछु बाजि दैत छी! हमरा जतेक नीक एक्स्पोजर आ लर्निंग के सुविधा आर्मी अस्पताल में भेंटत ओहन सुविधा अहांक ओ कॉरपोरेट अस्पताल में कतय सं भेटत! आ आर्मी अफ़सर के यूनिफ़ार्म देखने छी पप्पा कतेक चार्मिंग आ मस्त होई अछि ने, आ ओईपर सं आर्मी के रैंक पप्पा – सोचियौ जे डाक्टर के संगहि जौं हमरा कैप्टन , मेजर आ कर्नल रक्षिता रोहन के नाम सं पुकारल जायत त कत्तेक सोंहंतगर लगतै ने । आ अहां! ओना त टीवी डिबेट देख देख क हरदम सेना आ राष्ट्रवाद के जप करैत रहै छी आ आई जखन हम सेना के सेवा करय चाहै छी त अहां हमरा रोकि रहल छी! – इ सब गप्प ओ एक सुर में कहि गेल छलिह। एत्तेक सब सुनला के बाद कहां रोहन हुनका रोकि सकल छलाह । आ फ़ाईनली ओ आर्मी अस्पताल में डीएनबी-प्लास्टीक सर्जरी प्रोग्राम में प्रवेश ल लेने छलिह। जिद्दीयो त ओ बहुत बडका छलिह । पीजी एडमिशन के टाईम पर सेहो रिद्धि हुनका सं कहने छलिह जे अहां लडकी छी अहि लेल लडकी बला कोनो स्पेशल्टी ल लिय – ओब्स गायनी, रेडियोलोजी या एहने सन कोनो मेडिकल स्पेशिलिटी ल लिय; कत्तौ, कोनो अस्पताल में आराम सं काज भेंट जायत अ नै त अप्पन क्लिनिक सेहो खोलि सकै छी । फ़ेर विवाह दान भेला के बाद बर संगे एड्जस्ट्मेंट सेहो बनल रहत । "बर गेल अंगोर पर । हमरा त प्लास्टिक सर्जन बनै के अछि आ ओकरा लेल हमरा जनरल सर्जरी पढय के हेतै, त हम सर्जरी मे एडमिशन ल रहल छी बस । " – मां के बात के जवाब में ओ इ बात एक सुर में कहि गेल छलिह । रक्षिता बाल्यावस्थे सं होनहार बच्ची छलिह आ एकर श्रेय वास्तव में रोहन के जाइ अछि । नेनपने सं ओकरा पढबै के जिम्मेवारी रोहन अपने सम्हारने छलाह । १०-१२ घंटा के ड्यूटी के बाद जखन ओ हारल थाकल घर आबै छहाल तखनो ओ बड्ड लगन सं रक्षिता के बैसा क पढबै छलाह । हुनका पढबै खातिर समय निकालबा के चक्कर में कैएक बेर हुनका ऑफिस में अपन अधिकारी से सेहो उलझय पडय छल । एहन स्थिति में कै बेर रिद्धि कहने छलिह जे कत्तौ ट्यूशन लगा दियौ, आई-कैल्ह बिना ट्यूशन के कहीं बच्चा पढलकै अछि, मुदा रोहन हुनकर गप्प कहियो नै सुनलाह । इंटर में गेला पर इ सब दास सर के संपर्क में आयल छलाह, जे बड्ड योग्य शिक्षक छलाह, आ दास सर सेहो रक्षिता के पढबै में बहुत मेहनत केने छलाह, जेकर ई परिणाम छल जे रक्षिता एमबीबीएस के लेल सेलेक्ट भ गेल छलिह । जखन ओ दास सर सं गुरूदक्षिणा मांगय कहने छलिह त सर कहने छलाह जे "बेटी चिकित्सा मनुख क सेवा करय वला पेशा अछि, त जतेक भ सकै लोक सभ के सेवा करिह, यैह हमर दक्षिणा होयत । याद क पांइख लगा क रिद्धि अतित के गहराई में उतरय लागल छलिह । रोहन के संग हिनकर विवाह क कैएक वर्ष भ गेल छल मुदा हुनका कोनो संतान नै भेल छल । एक दिन अचानके स रोहन एकटा जन्मौटि नेना के कोरा मे नेने आयल छलाह आ ओकरा रिद्धि के कोरा मे राखि देने छलाह आ कहलाह जे "अपन बिटिया रानी"। "हाय राम! इ केकर बच्चा उठा के नेने एलहु अछि?" रिद्धि रोहन से पुछने छलिह । रोहन उत्तर दैत कहने छलाह जे "हम अनाथालय में एकटा बच्चा लेल आवेदन केने छलहु, आई ओतय स खबर आयल छल जे एकटा जन्मौटी बच्चा के केयौ राइख गेल अछि अनाथालय में यदि आहां देखय चाहै छि त …….।" बस हम ओतय पहुंच गेलहुं आ एत्तेक सुन्नैर नेना के देख क झट हं कहि देलहुं आ सभटा फ़ोर्मलिटि पुरा कय क एकरा अहां लग नेने एलहु अछि। "मुदा इ ककरो नाजाय बच्चा……" "हा..हा..हा… बच्चा कोनो नाजायज नै होई अछि, नाजायज त ओकरा समाज बनबै अछि" रिद्धि के बात काटैत रोहन बजने छलाह, आ जवाब बे रिद्धि बस एतबे बजने छलिह जे "अहां एकर रक्षक भेलहु आ इ हमर रक्षिता अछि।" अतितक गहराई में डूबल रिद्धि के कान में अचानक से रोहन के उ स्वर गूंजय लागल छल, आ हुनकर तन्द्रा तखन टूटल जब हुनका कान में रक्षिता के नाम गूंजल जे रक्षिता के कमिशनिंग आ बैज ओफ़ ओनर के लेल बजाबय लेल पुकारल गेल छल । रिद्धि के आंखि सं मोती जेका नोर टपकय लागल छल, कियेकि आई हुनकर बेटी एकटा आर्मी अफ़सर का एकटा कुशल प्लास्टिक सर्जन जे बनि गेल छलिह। -(प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र मैथिली जोग गीत मे प्रेम आ तंत्र केर प्रभाव डॉ. सविता झा खान हालहिं मे ओ एक जिज्ञासा केने छली: “मैथिल विश्व-दृष्टि मे इरोटिका वा कामुकता मुख्यधारा मे अछि की सबवर्ज़न (सबवरज़न माने स्थापित मुल्य, सत्ता आ शक्ति के खिलाफ) के रुप मे”। हमर जे अपन शोधक अनुभव अछि ताहि के आधार पर कहि सकैत छी जे अगर मुख्यधारा के अर्थ लोक अथवा जन समुदाय अछि त कामुकता मुख्यधारा के चीज़ थिक आ ई मिथिला मे भारतक बहुत आन ठामक परंपरा जकां अदौं सं विद्यमान रहल अछि, मान्य रहल अछि। खास क विवाह के समय आ ओकर बादक बिध व्यवहार मे गीत आ आन माध्यम सं कामुकता के प्रदर्शन होइत अछि तकर जतेक वर्णन करी से थोड़। शायद बिध बेभारक माध्यम सं बर आ कनिया के काम के प्रति परिपक्व आ एक दोसरक समीप लेबाक ई उत्तम प्रक्रिया छैक। उदाहरण के लेल लाबा छीट’ काल लाबा जे छैक ओकरा अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करब त कनिया अथवा बर के मन मे उठैत रंग-विरंगक प्रेम, अभिसार केर तरंग छैक। काम इच्छा के भावक प्रतीक छैक। ऊपर सं गीतक शब्द जाहि मे महिला सब बर आ कनिया के झिझक वर के माता आ कनिया के पिता; वरक दाई आ कनिया के पितामह, वरक मामी आ कनिया केर माम आदि सम्बन्ध केर संग जोडि ओकरा आरो रमनगर आ दुनू लेल इजी गोइनिंग अथवा सहज बना दैत छैक। एक उदाहरण देखू: बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक बाबी कनियाक बाबा संगे सुताउ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक माय कनियाक बाबू संगे सुताउ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक बहिनी कनियाक भैया संगे सुताउ दुनू घर गुजर चलाउ ........ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ ओना त ऊपर वर्णित गीत सहज लगैत छैक। मुदा अपन गायकी आ लोकक समर्पण, बिधक उद्देश्य आ लाबा छिडियाएब केर क्रिया आ लड़की सब द्वारे ओकरा लेल छीना-झपटी सब नव बर आ कनिया के अभिसार हेतु सहज क दैत छैक। धोखेनाई केर बात समाप्त भ जैत छैक। अहि पूरा गीत मे बरक दाई, माय, आ बहिन सब आ कनिया केर पितामह, पिता, आ भाई सब पात्र भ जैत छैक जकरा बीच परिहास केर सम्बन्ध उचित आ समाज सम्मत मानल जैत छैक। अहिना एक विध पटिया समेटब आ ओछाएब के होइत छैक। अहु बिध केर उद्देश्य बर आ कनिया के अभिसार आ रति-रभस लेल तैयार करब, सम्बन्ध के प्रगाढ आ सहज करब थिक। एक छोट सन गीत देखब त एकरो अर्थ बुझबा मे कोनो भांगट नहि हैत। गीत देखू: सब रंग पटिया समटू सोहबे दुलहा सं ओछबाउ हे पटिया ओछयबामे कसमस करता मारब चाट घुमाय हे टेढ़-तूढ जुनि पटिया ओछाएब रूसि रहती सुकुमारि हे हँसी-ख़ुशी पटिया ओछाएब हँसती सिया सुकुमारि हे .. कतेक आनंद, उल्लास, रंग आ वैविध्य सं भरल ई छोट सनक गीत छैक! नाम लेल पटिया छैक मुदा छैक बहुरंगी। सखी सब गीतक मादे कनिया के केलि-कीड़ा केर प्रैक्टिकल ज्ञान देमक यत्न क रहलि छथि। बर के कोना सोसिअलाइज करी से युक्ति बता रहलि छथिन। पटिया ओछायबक हेतु बर के कहथिन से बता रहल छथिन। अगर त्रुटि होइत छनि त प्रेमक चाट मरबा लेल उकसबैत छथिन। प्रेमक चाट दुनू मे साम्पिय स्थापित करबा मे सहायक हेतनि तखन ने बात आगा बढ़तनि? रुसब-बौंसब केर कला केर ज्ञान द रहल छथिन हँसब-बाजब के गुण बता रहल छथिन। सब सं पैघ बात ई जे कोनो बात छुपल नहि, चोरैल नहि। सब स्त्रिगन – दाई, माय, पितियाइन, भौजी, जेठ बहिन सबहक समक्ष आ सबहक अनुमति सं। एक बात इहो, सब सखी सब ओहि पर पिहकारी मारैत प्रहसन के आरो अनुरंजक बनबैत रहैत छथि। एकर स्पष्टीकरण निम्लिखित गीत मे अछि: सबरंग पटिया समटू हे सोहबे दुलहा देता ओछाय टेढ़-टूढ जों पटिया ओछाओता रुसि रहब सुकुमारि हे हे कसार मसरने पटिया ओछोता मारबनि चाट घुमाए हे हँसी-खुशी सं पटिया ओछोता तखन हंसथि सुकुमारि हे आब गीतक एक-एक शब्द के देखब त लागत जे समाज कतेक उदार भाव सं इरोटिका के स्वीकृति द रहल अछि। लेकिन एहि इरोटिका मे यौनाचार अथवा यौन विकृति के सम्बाद अथवा प्रतीक नहि छैक। मर्यादित इरोटिका जकरा लोकक भाषा मे हँसब-ठेठायेब सेहो कहि सकैत छी। एहेन इरोटिका जे श्रृंगार, शब्द व्यंजना, भाव, विध-बेभार, आ संस्कार सं सुसज्जित अछि। जकरा मर्यादित स्वरुप मे समाज मान्यता प्रदान करैत छैक। मिथिला मे विवाह के संग एक क्रिया जोगक होइत छैक। जोग के प्यूरिस्ट सब योग कहि सकैत छथि। दुनू के अर्थ एक भेल – जुड़ब अथवा जोड़ब। बर के कनिया सं आ कनिया परिबार के बरक परिवार सं। लेकिन मुख्य रूप सं बर-कनिया के जुडब – मानशिक, शारीरिक आ सामाजिक स्तर के संग-संग मनोवैज्ञानिक स्तर पर सेहो महत्त्व रखैत छैक। जोग मे बर आ कनिया के गीत सं, बिध-बेभार सं, आ तांत्रिक क्रिया सं सेहो जोड़क परंपरा रहल छैक। तांत्रिक क्रिया मे परिहास आ गीतक चासनी लागल रहैत छैक। नैना जोगिन के बिध मे मानल जैत छैक जे बंगाल, अथवा हिमालय अथवा कामख्या सं एक हाँकल योगिन अबैत छैक। गीत मे कखनो काल गीतगाइन सब अपना आप के तिरहुत के एक नंबर के फेरल जोगिन प्रमाणित करैत छथि। जोगक एक उद्देश्य बरक ध्यान अपन माय-बहिन सं अधिक कनिया दिस आकर्षित करब सेहो छैक। जोग मे गीत गेबाक शैली पूरा तंत्रमय भ जैत छैक। कखनो काल क धरती, अकास, समुद्र,पहार सब चीज़ के बान्हब आ अधिन करब के चर्च होइत छैक। जोग द्वारे असंभव काज के संभव करक बात होइएत छैक। निम्नलिखित जोग गीत के देखू: माइ हे सात बहिन हम जोगिन नैनहु थिकी जेठ बहिन माइ हे तिनकहूँ सं जोग सिखल तिन भुवन जोग हाँकल माइ हे समुद्रहु बान्ह बन्हाओल तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे तरहथ दही जनमयलहूँ तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे सुखाएल गाछ पन्हगेलहु तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे बांझिक कोखि पलटलहूँ तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे भनहि विद्यापति गाओल जोगिनिक अंत न पाओल .... एहि जोग गीत मे जोगिन अपन कला अथवा तंत्रक ज्ञानक महिमा मंडित क रहल छैक। एकरा जखन स्त्रीगन सब गबैत छथि त लागत जे अथर्ववेद वेद केर मन्त्र के कल्लोल भ रहल अछि। तंत्र सं केहनो असंभव काज भ सकैत अछि; धरती,अकास आ पाताल के हाँकल जा सकैत अछि, समुद्रके बान्हि सकैत छी, तरहत्थी मे दही जमा सकैत छी, सुखैल ठुठ गाछ मे प्राण आनि ओकरा हरियर कचोर क सकैत छी, केह्नो बाँझिन के कोखि मे संतान डालि सकैत छी। आ ई सब क सकैत छी ताहि त हमर सबहक नाम जोगिन अछि। विद्यापति कहैत छथि, “एहि जोगिन सब के अंत कियोक नहि पाबि सकैत अछि!” आई काल्हि लड़की सब रैंप पर उतरैत छथि, बिलाई के चालि चलैत छथि अर्थात कैट वाकिंगकरैत छथि। लटका मटका झारैत छथि। शरीर आ वस्त्र के कमोतेजक सौन्दर्य सं दर्शक के अपना दिस आकर्षित करैत छथि। करक चाही। एहि मे कोनो हर्ज नहि। ठीके त कहल जैत छैक, “सोच बदलबाक जरुरत छैक, वस्त्र नहि”। जोग गीत मे एहने भाव बल्कि अहू सं रमनगर, आ कामोत्तेजक भाव नव व्याहित कनिया द्वारा प्रदर्शित होइत छैक। स्त्रीगन सब गीत गबैत छथि कनिया कमर मटकबैत, नव वस्त्र सं झापल अपन देहक उभार के देखबैत, आभुषण सं पैर के छम-छम करैत, चूड़ी आ कंगना के खनखन करैत चलैत छथि आ पाहून के अपना दिस मोहित करैत रहैत छथि। पाहून के ध्यान कनिया छोडि ककरो लग नहि जाइन ताहि हेतु कनिया के माय पितियाइन तांत्रिक क्रिया क देने छथिन। पाहून के नोन पढि खुआ देल गेल छनि,हुनकर पाग के ताग निकालि ओकरा तांत्रिक क्रिया द्वारा खन्ती के तर मे गारि देल गेल छनि। आब ओ पूरा कनिया के अधिन छथि। कनि एक एहेन जोग गीत जे एहि तरहक बात कहैत अछि के देखैत छी: जोग जतिन हम जानल पहचानल गुनगर कैल जमाय अधिनक राखब रुनुकि-झुनुकि धिया चलतीह’ पहु देखताह’ पागक फेंच उघारि ह्रदय बीच राखल जखन धिया मोरी चलतीह’ पहु तकताह’ नागरि कैल जमाय अधिन क राखल हमर जोग नागर’ गुण आगर’ सात खण्ड नव दीप जोग अवतारल भनहि विद्यापति गाओल फल पाओल गुनगर कैल जमाय अधिन क राखब.... बाह रे प्रेम। तंत्र सँ बान्हल सिनेहक डोरी। गीत मे एक सँग कमनीयता, सौन्दर्य, दैहिक सौष्ठव, आ स्त्रीगनक अधिकार पुरुख पर देखार भ रहल अछि। धिया के चलब, धिया के देखब, पहु के ताकब, जोगिन के अधिकार सब एक संगे प्रबल बेग सँ प्रमाणित होइत। एक जोगक गीत मे त जोगिन ताल ठोकि कहैत छथि जे "आब अतेक क्रिया आ तंत्र सँ पहुँ के बाँधि देने छियैन्ह जे ओ कतहु जाथि, अंततः घुरि फिर क हमरे लग एता। जेता कत? माइ हे हमरहु जँ पहुँ तेजताह फल बुझताह माइ हे बान्हि देबनि बनिसार अधीन भय रहताह माइ हे चान सुरुज जकाँ उगताह उगि झपताह माइ हे नैन नैन जोड़ल सिनेह फलक नहि छोड़ताह माइ हे नाव डोरी जकाँ घुमताह घुमि अओताह माइ हे मकरी देबनि ऐंठि देहरि धेने रहताह माइ हे भनहि विद्यापति गाओल फल पाओल माइ हे गौरी के बढ़नु अहिबात सुन्दर बर पाओल।। कहक तात्पर्य भेल जे गीत जे गाबि रहलि छथि तिनका अपना तंत्र पर गुमान छनि। जेना सुरुज-चना आँखि मिचौनी करैत रहैत अछि; तहिना नायक आ नायिका के नैन सँ नैन मिल गेल छनि आ ओकरा तंत्रक मन्त्र सँ बान्हि देल गेल छैक। ककर मजाल जे ओहि डोरी के तोड़ि सकै? बर त कनिया सङ्गे नावक डोरी जकाँ जुड़ल छथि, कतहु जाथि अंततः वापस आबहे पड़तनि। आरो बहुत उपमा छैक जकरा बुझनाई कुनो मुश्किल नहि। अतेक तंत्र केर बात होइत अछि। किछु एहनो लोकक तंत्र पर काज होबाक चाही। बात बहुत किछु अछि। एखन एतबे।।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार - ३ टा गजल ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- प्रेम चालीसा ३.३.१.राजीव रंजन झा- १. फगुआ (मुक्तक) २. गजल आ ३. जोगीरा ३.४.१.ओम प्रकाश- गजल २.सत्यनारायण झा- मोनक गीत आशीष अनचिन्हार ३ टा गजल 1 कियो चूसि गेलै बहुत कियो हूसि गेलै बहुत कनी बातपर जानि कऽ कियो रूसि गेलै बहुत छलै मूँह बड़ सान के कियो दूसि गेलै बहुत रहै भूर कनियें मुदा कियो घूसि गेलै बहुत अहाँ सन कि हमरे सनक से महसूसि गेलै बहुत सभ पाँतिमे 122-122-12 मात्राक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु संस्कृतानुसार दीर्घ मानल गेल अछि अंतिम शेरक दोसर पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि 2 हरजाइ छलै ओ कस्साइ छलै ओ घाटा छथि अपने भरपाइ छलै ओ भोरक भूखल लग लटुआइ छलै ओ लक्ष्य जकर बहकल अगुताइ छलै ओ देखि कऽ अनचोक्के पछताइ छलै ओ अनचिन्हारेपर नितराइ छलै ओ सभ पाँतिमे 22-22-2 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि 3 हम्मर हक केर बात के करतै आ गुड लक केर बात के करतै भागल जे छीनि छानि मोनक नेह ओहन ठक केर बात के करतै चालू छै आन जान बहुते तँइ उपजल शक केर बात के करतै हीरा मोतीक भीड़मे ओकर नाकक छक केर बात के करतै जागल सूतल अहीं छियै सरकार टूटल भक केर बात के करतै सभ पाँतिमे 22-2212-1222 दोसर आ पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु नियम शैथिल्य बूझल जाए ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ प्रेम - चालीसा सभ क्यो दुनियामे अपन, कतहु कियो नहि आन इएह सोचि सदिखन करी, हम सबहक सम्मान | ई दुनिया भगवानक दुनिया सुरुज तरेगन चानक दुनिया न’व दृष्टि नव युगकेर दुनिया शांत सुखी सतयुगकेर दुनिया वन पर्वत खग सिन्धु सरोवर ई दुनिया सुन्दर-सुन्दर भिन्न मुदा सभ दृश्य मनोहर स’भ देश सुन्दर-सुन्दर पोखरि गाछी बाध रमनगर स’भ गाम सुन्दर-सुन्दर सुनू पराती. लगनी. सोहर सभ लोक सुन्दर-सुन्दर प्रेम क्षमा श्रद्धा आ आदर सभक सोच सुन्दर-सुन्दर कमल फूल सन निर्मल शीतल सभक बोल सुन्दर-सुन्दर जाति आतमा धर्म दिव्यता सभक दृष्टि सुन्दर-सुन्दर तन-मन-धन सभ सत्यक पथपर सभक सृष्टि सुन्दर-सुन्दर चलय अहर्निश शान्तिक पूजा सभक कृत्य सुन्दर-सुन्दर राग भैरवी ताल भैरवी सभक नृत्य सुन्दर-सुन्दर ह’म आतमा दिव्य आतमा ज्योति विन्दु चैतन्य आतमा ज्ञान प्रेम सुख शान्ति रूप हम पवित्रता आनंद शक्ति हम सहनशीलता अस्त्र हमर अछि देह हमर ई वस्त्र हमर अछि परम धाम केर बासी छी हम अजर अमर अविनाशी छी हम सभले’ शुभ भावना निरंतर हमर सोच सुन्दर-सुन्दर सदा सत्य सुन्दर कल्याणी हमर बोल सुन्दर-सुन्दर सबहक हितमे सदिखन तत्पर हम्मर तन सुन्दर-सुन्दर काम क्रोध मद लोभक बाहर हम्मर मन सुन्दर-सुन्दर सबहक छी हम,सभ छथि हम्मर हमर दृष्टि सुन्दर-सुन्दर हरियर नमहर और ललितगर हमर सृष्टि सुन्दर-सुन्दर धरती आ आकाश रमनगर सभक भाग्य सुन्दर-सुन्दर हम आनंदित सृजनक पथपर हमर भाग्य सुन्दर-सुन्दर हमर पिता पति वन्धु सखा ओ परम पिता परमातमा ओ ज्योति विन्दु करुणासागर ओ सकल कला सभ गुण आगर ओ सदिखन हमरा संग रहै छथि सत्य प्रेम आनंद भरै छथि हम हुनके सभ काज करै छी अपना मनपर राज करै छी सभले’ देखी सुन्दर सपना हम सभकें स्वीकार करै छी हम पूजै छी ध्यानक प्रतिमा ज्ञान और विज्ञानक प्रतिमा अपन शक्तिसं परिचय भेल विषय-वासना आ भय गेल दुखकेर सागर फानि गेलौं हम सभ संभव अछि जानि गेलौं हम शांतिक सीता ताकि एलौं हम घ’र घूरिक’ आबि गेलौं हम लोभक लंका जरा-तराक’ मन रावणकें डरा-हराक’ पहुंचि गेलौं सुखधाम अपन हम स्वयं पवनसुत, राम अपन हम हम भगवानक शक्ति पबै छी दुनियामे सुख-शान्ति बँटै छी हुनके आशीर्वाद बँटै छी आनंदक परसाद बँटै छी न’व दृष्टि नव सृष्टिक जय हो सुख-समृद्धि केर वृष्टिक जय हो अंध स्वार्थसं मुक्तिक जय हो संस्कृति केर भक्तिक जय हो पवित्रता केर जय हो जय हो मानवता केर जय हो जय हो | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजीव रंजन झा- १. फगुआ (मुक्तक) २. गजल आ ३. जोगीरा १.फगुआ (मुक्तक) > > फगुआ केर एहि पावन अवसर > आबू भाल गुलाल मली > > आबू प्रेमक एहि अवसर पर > रंग एक दोसरक गाल मली > > आबू सभ केओ मिलिजुलि केँ > बढा ली निज हिय केर धड़कन > > आबू सभ केओ सजा ली अप्पन > सात रंग सँ उर उपवन > > आबू एहि बासंती क्षण मे > बढा ली किछु मन केर सिहरन > > आबू गरा मिली सभ मिलिजुलि > बिसरि द्वेष जौँ राखल मन > > बरसय खुशी अपार अहाँ पर > फूलय नित्तहि हर्ष सुमन > > सातो रंगक सपना अहाँ केर > हुअ' सजीव प्रतिपल प्रतिक्षण
> २. गजल
> ककरो होअ सरकार यौ > हमरा कोन दरकार यौ > > भोटक भीख देल जकरा > भेलय वैह चिन्हार यौ > > करतै किएक चिंता हमर > एकरो इएह बेपार यौ > > ठकलक बेर बेर हमरा > धूनै छी हम कपार यौ > > कैंचा जैह खरचत तकर > करबै भाइ जयकार यौ > > सभटा गढल एक साँच मे > सभटा एक्कहि भजार यौ > > लुटतै फेर वैह करोड़, तेँ > झीटय छी हम हजार यौ > > ककरो भोट देब करतै > नेता भ्रष्ट आचार यौ > > ककरो पर भरोसा करब > भेलै आइ बेकार यौ > > सबहक पार पायब अहाँ > नेताजीक नहि पार यौ > > गिरगिट सन बदलताह ई > झुट्ठा केर सरदार यौ > > बाबू कहथि एक बेर ओ > करियौ फेर सतकार यौ > > पाँचो बरख दर्शन कहाँ > देतय फेर ई यार यौ > > फेरो इएह करबे करत > एहने भाइ आचार यौ > > हमहूँ आइए ठनलहुँ अछि > टनबै सत्तरि हजार यौ > > चीन्हू अप्पन प्रतिनिधि के > घेरू बीच बाजार यौ > > अप्पन यैह अधिकार छै > बैसू आब तैयार यौ > > चोरिक माल जौं दैछ ओ > करु नहि आब विचार यौ > > ओकर बात सुनियौ कनी > करियौ जैह नेयार यौ > > देखू छोट जेकर उदर > मतक दियौक आधार यौ > > राजिव अपन संधानि लिय > जनतंत्रक हथियार यौ > > ३.जोगीरा > > फेंकू भैय्याक हाथ टूटि गेल > सभा लुटायल खाट > दर-दर ठोकर खाइत अछि पप्पू > कुर्त्तो गेलय फाट... > > जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा.. > > मुलायम कठोर भेल > चलल चाइल शिवपाल > बापहि केर बाप निकलल > नेताजीक लाल > > जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा > > फेंकू भैया घर-घर बाँटय > पन्दरह- पन्दरह लाख > साह बताबय जुमला ओकरा > तइयो नहि टूटल साख। > > जोगीरा सारारारा....जोगीरा सारारारा > > अखिलेश भैया सभा बजाबथि > भाषण करन्हि लुगाइ > बूढवा बच्चा सबहक डिम्पल > भ' गेलीह भौजाइ > > जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा... > > मालामाल फेंकू भैया > बाँकी सभ कंगाल > दीदी, बुआ, पप्पू कानय > खाँसथि खुजलीवाल > > जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा -राजीव रंजन झा ( जन्म तिथि: 12/01/1980)रर ग्राम+पो: भीठ भगवानपुर भाया: मधेपुर जिला : मधुबनी (बिहार) सम्प्रति: उच्च वर्गीय सहायक, भारतीय जीवन बीमा निगम, समस्तीपुर शाखा, समस्तीपुर, बिहार ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ओम प्रकाश- गजल २.सत्यनारायण झा- मोनक गीत १ ओम प्रकाश गजल गमक' लागलै बसंती हवा चहक' लागलै बसंती हवा करेजाक टीस बढ़बै हमर चमक' लागलै बसंती हवा चलल झूमि मस्त हाथी जकाँ बहक' लागलै बसंती हवा अगिनबाण मारलक बीच हिय दहक' लागलै बसंती हवा चिड़ै गीत गाब' लागल मधुर ठहक' लागलै बसंती हवा मात्राक्रम (1-2-2, 1-2) दू बेर प्रत्येक पाँतिमे। २ सत्यनारायण झा मोनक गीत तखनहि ओकर याद अबैत अछि । मोनक तृष्णा शान्त होयत अछि लोक वेद सभ नीन्द लैत अछि पछबा पुरबा वायु चलैत अछि हृदयक अन्दर स्नेह जगैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि जखन ओकर नोर देखाइत अछि आगु पाछू किछु ने सोहाइत अछि आँखिक भीतर समा जाइत अछि मरल मोन फेर जागि पड़ैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि ओकर काया हमर हीया, दुनू मिलि कए एक बनैत अछि आध पहर रातिए मे निस दिन मानस पटल हमर खुलैत अछि भए विह्वल हीय नाचि उठैत अछि अपन तन मन लुप्त रहैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि स्वप्न लोक विचरैत विचरैत, मोहन मुरली बाजि उठैत अछि तन कए सुधि रहय ने केखनो मोनक गीत गबाय लगैत अछि सुधा पीबि मोन झुमि उठैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ता लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। ५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा “’विदेह’- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २२२ म अंक १५ मार्च २०१७ (वर्ष १० मास १११ अंक २२२)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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