VIDEHA — Issue 223 / अंक २२३

Publication: VIDEHA · Issue: 223
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64 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २२३ म अंक ०१ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२३) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथा २.२.राजदेव मण्‍डलक दूटा बीहैन कथा २.३. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- लोक वेद आ व्यवहारक पाबनि मधुश्रावण- मानवशास्त्रीय विवेचन २.४.ओम प्रकाश- विहनि कथा- विछोहक नोर ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार -  कविता/ रुबाइ ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.३.राजीव रंजन झा- ३टा गजल ३.४.गुफरान जीलानी- झमटबा गाछ Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केलक अछि जकर संयोजक श्री दिनेश यादव जी रहता। अइ विशेषांकमे नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य केर मूल्यांकन रहत। अइ विशेषांक लेल सभ विधाक आलोचना-समीक्षा-समालोचना आदि प्रस्तावित अछि। समय-सीमा किछु नै जहिया पूरा आलेख आबि जेतै तहिये, मुदा प्रयास रहत जे एही साल मइ-जून धरि ई विशेषांक आबि जाए। उम्मेद अछि विदेहक ई प्रयास दूनू पायापर एकटा पूल जरूर बनाएत। विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा कएल जा रहल अछि। दोसर भागमे अइ बेर नीलमाधव चौधरी जीक रचना आमंत्रित कएल जा रहल  अछि आ नीलमाधवजीक रचना ओ रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल कैलाश कुमार मिश्रजीकेँ आमंत्रित कएल जा रहल छनि। दूनू गोटाकेँ औपचारिक सूचना जल्दिये पठाओल जाएत। रचनाकारक रचना ओ आलोचकक आलोचना जखने आबि जाएत ओकर अगिला अंकमे ई प्रकाशित कएल जाएत। अइ शृंखलाक पहिल भाग कामिनीजीक रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. 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घड़ीसँ थाह लगिये गेल। नीन टुटिते अँगनोमे आ पछुआर दिस–रस्‍तापर सेहो लोकक गलगुल सुनि पड़ल। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल अनुमान लगबए लगलौं जे केतौ किछु भेल अछि। आरो कान पाथि सुनए लगलौं जे कनी नीक जकाँ बुझिऐ। मुदा से भेल नहि, दुखिया कक्काक नामटा नीक जकाँ बुझलौं, बाँकी बात बाँकीए रहि गेल। ओना पत्नियोँ ई सोचि नहि उठबैथ जे काल्‍हि भरि दिन मेहनतिया काजमे लगल रहला, तँए जँ कनी बेसी अराम भऽ जेतैन तँ देह बेसी फुहराम भऽ जेतैन जइसँ मनो फुहराम भाइए जेतैन। आइ कोनो तेहेन काजो अखन नहियेँ अछि जे कोनो नोकसान हेतैन। ओना पत्नी अपना विचारे बुझली मुदा से अछि नहि, जिनगीक तँ एक-एक क्षण एक-एक पल जीवन क्रियासँ जुड़ल अछि तँए नोकसान नहि हएत, एहनो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। समाचार बुझैक खियालसँ ओछाइन छोड़लौं। ओना आन दिनक ओछाइन छोड़ब माने ओछाइनपर सँ उठल आ ओझुकामे किछु अन्‍तर भाइए गेल छल। अन्‍तर ई जे आन दिन अपन दैनंदिनक काजकेँ नजैरमे रखि उठै छेलौं से आइ नइ भेल। अपन काज विचारक तर पड़ि गेल आ समाजक काज अगुआ गेल जइसँ अपन नित्‍य-क्रिया दिससँ मने बहैट गेल। ओछाइनपर सँ उठिते मनमे भेल जे धाँइ-दे केबाड़ खोलि केकरोसँ पुछैसँ बेसी नीक हएत जे ओरिया कऽ केबाड़क एकटा पट्टा घुसका पत्नीकेँ इशारासँ बजा हुनके पुछि लिऐन। मुदा से गरे कुगर छल। कुगर ई छल जे पत्नी विपरीत दिशामे घुमल छेली आ आन-आन लोक दोसर आँगनक स्‍त्रीगण, सोझमे पड़ै छेली। ओना अपनो पत्नी कखनोकाल बजैमे तिलकेँ ताड़ बनबै छैथ आ ताड़केँ तिल, मुदा भाँज बुझल अछि, तँए कोनो विचार वा बातकेँ नीक जकाँ बुझि जाइ छी। केबाड़ खोलि ओसारपर ठाढ़ भऽ हिया कऽ देखलौं तँ एक गोरे भौजी-तुल्‍य आ दू गोरे भावो-तुल्‍य छैथ, अखन गप-सप्‍पक क्रममे एकबट्ट छैथ तँए नजैर पड़िते ओहो सभ साकांच भऽ जेती। मुदा से भेल नहि। होइतो अहिना छै जे सम-तुल्‍य समयक बात-विचार वा लाज-विचार आ बेर-बिपैतिक समयक लाज-धाकमे कनी अन्‍तर आबिए जाइ छै। बिनु मुँह झँपने भावो गप बजैले–माने समाचार सुनबै-ले–उताहुल रहबे करैथ, मुदा एते होशियारी सभ करबे केलैन जे भौजी-तुल्‍य जे रहैथ हुनके समर्थनमे सभ मुँह उघारने ठाढ़ रहली। भौजी बजली- “बौआ, बड़ अनर्थ भेल!” ‘बड़ अनर्थ भेल’ से तँ भौजीक मुहेँ सुनलौं मुदा की अनर्थ भेल बुझबे ने केलौं। दोहरा कऽ आँखि उठा भौजीपर देलिऐन तँ बुझि पड़ल जे अस्‍सी मनक भार जेना हुनका मनपर पड़ल होइन। मनमे उठल जे नीक ई हएत जे किए ने अपने मात्र खोंरनी चलाबी आ भौजीए मुहेँ सभ बात सुनी। काटि-छाँटि अपन विचारकेँ रखैत बजलौं- “से की?” विह्वल होइत भौजी बजली- “दुखिया कक्काक परिवारमे बज्र खसि पड़लैन।” ओना तैयो भौजी सोझ-साझ नइ बजली, मुदा अपन मन मानि लेलक जे दुखिया कक्काक परिवारक किछु अंग-भंग जरूर भेलैन अछि। आगूक बात भौजीसँ नहि पुछि पत्नीकेँ इशारा दैत बजलौं- “कनी एमहर सुनू।” बजैत-बजैत मन जेना क्षीण हुअ लगल, देहमे कोनो लज्‍जतिये ने बुझि पड़ए। हुअए जे खसि पड़ब। मुदा कहुना कऽ हाथ-पएर बँचबैत ओछाइपर आबि चारूनाल चीत भऽ ओंघरा गेलौं। लगमे आबि पत्नी बजली- “बुधनी काकी मरि गेली।” पत्नियोँक बातपर जेते बिसवास हेबा चाही से नइ भेल, मुदा लगले मन गवाही दैत कहलक- घटना-घटनाक अपन-अपन मोल होइ छइ। एहेन घटनाक चर्च करैमे जेते इमनदारी लोकमे रहै छै तेते आन घटनामे थोड़े रहै छइ। इमनदारी रहबो केना करत। घटनो-घटनोमे अन्‍तर अछि किने कोनो इज्‍जत-आबरूसँ जुड़ल रहैए तँ कोनो शासन-सत्तासँ, तहिना कोनो धन-सम्‍पैतसँ तँ कोनो अपन चालिसँ सेहो जुड़ल रहैए। मुदा किछु हौउ, एते तँ इमानदारी लोकमे ऐछे जे केकरो घरमे आगि लगौ कि कियो गाछपर सँ खसि पड़ैए आकि केकरो साँपे-छुछुनैर काटि लइ छै, तँ एहेन बात बजैमे लोक इमानदार अछिए। पत्नीक बात सुनि भादवक ओइ अन्‍हार जकाँ मन अन्‍हरा गेल जइमे तरतर अन्‍हार करैत तरतर मेघ तरतराइत ठनको खसबैए आ तरतराइत बरखो होइए, मुदा उपाय? एकाएक मनमे नव उत्‍साह जगल। उत्‍साह जगिते शक्‍तिक संचार भेल। संचार होइते मनमे उठल- एहेन अन्‍याय दुखिये काकाकेँ भेलैन से तँ नइ अछि, एहेन-एहेन अन्‍याय बहुतोक संग भेल अछि आ आगूओ हएत...। मुँह-कानमे बिना पानि नेनहि दुखिया काका-ऐठाम विदा भेलौं। पहुँचते देखलौं जे कक्काक आँखिसँ नोर टघैर रहल छैन, मुदा तैयो मुइल पत्नीकेँ जरबैक ओरियानमे लागल छैथ। दुखिया कक्काक दशा देख अपनो मनक ओहने दशा भेल। दशा होइते दुनियाँ मनमे नाचल। यएह छी दुनियाँ जे जइ बुधनी काकीक संग दुखिया काका जिनगी-ले खेत-पथारक काज संगे करै छला, जारन-काठी गाछी-बिरछीसँ संगे अनै छला, से आब केकरा संगे करता? मुदा दुखिया कक्काक मनक विचार हमरा विचारसँ बिलकुल भिन्न छेलैन। हुनकर जे क्रिया-कलाप छेलैन तइसँ बुझि पड़ै छल जे होइ छैन केते जल्‍दी लहाश अँगनासँ निकैल आगिमे जरि जाइक। जेना सिनेह नामक कोनो विचार मनमे छैन्‍हे नहि। ओना, मृत्‍युक पछातियो सिनेह रहिते अछि, मुदा ओ कम-बेसी। किएक तँ जैठाम असगरूआ जिनगी अछि तैठाम मृत्‍युक पछातिक जे क्रिया-कर्म अछि ओ सिनेहकेँ धकेल अपना दिस खिंच लइए मुदा जैठाम भरल-पूरल परिवार अछि तैठाम तँ एहेन घटना भेलापर सिनेही पतिकेँ घरक केबाड़ बन्न कऽ रखले जाइए। ओना ओहूठाम दू रंगक हिसाब होइए। पहिल होइए जे जैठाम पति-पत्नीक बीच आत्‍मीय प्रेम रहल से आ दोसर भेल जैठाम जिनगीक विचारधारा एते दूरी बना दइए जे एक-दोसरकेँ देखैये ने चाहैए। दुखिया कक्काक काज देख मनमे उठल- जँ किछु मृत्‍युक विषयमे पुछबैन से समय तँ निकैल गेल अछि। माने ई जे मरैक कारण नीक रहल हौनु कि अधला, ई तँ मृत्‍युक पूर्वक क्रियाक विचारक समय छी। ऐठाम तँ बुधनी काकी मरि चुकल छैथ। अखन तँ मृत्‍युक पछातिक जे उपचार अछि सएह ने कएल जा सकैए। ओना,मृत्‍युक पछातिक सूत्र–माने कि सभ कएल जाइत अछि–देखलो पछाइत बिसैर गेल रही तँए पुछब तँ जरूरी अछिए। ओना सूत्रधार–लहास आँगनसँ निकैल असमसान तकक काज केनिहार–दुखिया काका पितियौत जेठ भाय रहैथ, मुदा मनमे उठल- काज तँ दुखिया कक्काक परिवारक छी, तँए पुछबो अनुचित नहियेँ हएत,तैसंग ईहो तँ भाइए सकैए जे अपन उपस्‍थितिक मोजर भऽ जाएत आ जँ कहीं दुखक धारमे दुखिया काका बहि गेला तँ मृत्‍युक कारणोक भॉंज लगि जाएत। यएह सोचि पुछैक विचार भेल। मुदा लगले आँखि माए लग–बुधनी काकी लग–बैसल पाँच बर्खक बेटी सबुरियापर पड़ल। दुनू आँखिसँ बेटीकेँ नोरक टघारो चलैत रहै आ चिचिया-चिचिया कनबो करै छल, मुदा तैयो माइक मुँह लग बैसल माछियो दहिना हाथसँ रोमैत रहै आ कियो जँ देखए चाहैथ तँ वस्‍त्रसँ झाँपल माइयक मुँह उघारि देखा कऽ पुन: झाँपि सेहो दइ छल। सबुरियाकेँ किछु कहैक साहस नहि भेल। साहस ऐ दुआरे नहि भेल जे जहिना दुखिया काका ऐगला ओरियानमे लगल छैथ तहिना सबुरिया सेहो लगले अछि तैठाम बीचमे अनेरे किछु बाजि बाधा उपस्‍थित करी से नीक नहि बुझि पड़ए तँए बजैक साहस नहि हुअए। ओना, समाजक बहुतो जिज्ञासु जिज्ञासा करए आएल छैथ, कियो बाँस काटए गेल छैथ, तँ कियो हाँइ-हाँइ जौड़ बाँटि रहला अछि। तैसंग किछु गोरे एहनो तँ छथिये जे बैस कऽ किछु स्‍मरण कऽ रहला अछि। हमहूँ ओही पाँतिमे बैस गेलौं। ओना, दुखिया कक्काक ऐगला-पैछला गप-सप्‍प चलि रहल छल, माने ई जे दुखिया कक्काक की परिवार छल आ आगू की हएत से दुनू गप-सप्‍प चलि रहल छल। बुधनी काकीक मृत्‍युक चारि दिनक पछाइत ऐगला क्रियाक जिज्ञासा करए दुखिया काका ऐठाम गेलौं। काल्‍हि छौरझँप्‍पी छल। बुधनी काकीक सारा बनि तुलसी गाछ रोपा गेल छेलैन। हमरा जाइसँ पहिने जीवन काका आ सिंहेश्‍वर भाय सेहो पहुँच चुकल छला। तीनू गोरे ऐगला क्रिया-कर्मक चर्च कऽ रहल छला। ओना, अपना मनमे एकटा विचार नाचि रहल छल, ओ विचार छल जे दुखिया काका अपने जे पत्नीकेँ आगि देलैन से ओते नीक नहि भेल जेते बेटी–सबुरिया–केँ देने होइत। ओना आन बात धियानमे नहि छल मुदा ई तँ रहबे करए जे असगरूआ दुखिया काका जे गरदैनमे उतरी लेलैन तइसँ ई तँ भेबे केलैन जे ऐगला काज करैसँ घेरा गेला। किएक तँ कर्ताकेँ–जे आगि देने रहल हुनका–अपन विहीतोक काज आ सोगो-पीड़ा रहिते अछि जइसँ ऐगला काज बाधित होइत अछि...। ..अपन मनमे कोनो जवाब उठबे ने करए जे मन असथिर होइत। बजा गेल- “जीवन काका, अपने तँ उमरदार भेने अनुभवी सेहो छीहे, दुखिया काकासँ नीक होएत जे सबुरिया आगि दइतैन।” ओना हम ऊपरे-ऊपर हल्‍के-फुलके ढंगसँ सराध-कर्मक काजकेँ नजैरमे रखि बाजल रही। परम्‍परा की अछि, बेवहार की अछि, से सभ मनमे नइ छल। मुदा जीवन काका गंभीरतासँ प्रश्‍नकेँ लैत किछु समय मने-मन तर्क-वितर्क करैत बजला- “नीक जरूर होएत, मुदा लोकोक विचार मानब तँ जरूरी भाइए जाइए।” जीवन कक्काक सह पेब आरो मनमे अपन विचारपर बिसवास जगल, जइसँ बुझैक जिज्ञासा सेहो बढ़ए लगल, बजलौं- “से की काका?” जीवन काका बजला- “पोथी-पतराक बात तँ नइ बुझल अछि मुदा समाजमे दुनू विचारधारा तँ बहिये रहल अछि। किछु गोरे एहनो छैथ जे पक्षमे छैथ आ किछु गोरे विपक्षमे सेहो छथिये। एक तँ ओहिना सराध-कर्म सीमित दिनक भीतरक काज छी, तैसंग समाजसँ जुड़ल सेहो अछिए। तैबीच जँ समाजमे विचारक विवाद उठत तँ काज ढंस होइक संभावना बनियेँ जाएत।” जीवन कक्काक विचार मनमे जँचल मुदा लगले दोसर प्रश्‍न उठि गेल। उठि ई गेल जे समाजे छी, सदिकाल एहेन-एहेन क्रिया अबिते रहत, तखन किए ने समाज एकरा एकठाम बैस विचार करैए? बजलौं- “काका, एहेन काजकेँ समाज पछुआ कऽ किए रखने अछि?” जेना जीवन काकाकेँ एहेन घटनासँ भेँट भऽ चुकल होनि तहिना मनमे खुशी एलैन। मुस्‍की दैत बजला- “जे नि:सन्‍तान छैथ हुनकर उपाय की अछि?” जहिना बाढ़ि एलापर माने पानिक धारमे खढ़ो-पात प्रवाहित होइए तहिना अपनो मनमे भेल। बजलौं- “काका, जिनका ने धिया-पुता छैन आ ने पति, तिनकर उपाय की हेतैन?” ओना जीवन काका ठमकला मुदा हमरा सन-सन लोक-ले हुनका लग घटना-घुटनी आकि खिस्‍सा-पिहानीक कमी थोड़े छैन जे जवाब नइ दइतैथ। मुदा बीचमे सँ दुखिया काका उठि कऽ ऑंगन कोनो काजे गेला। हम तीनियेँ गोरे दरबज्‍जाक बिछानपर बैसल रहि गेलौं। गर पेब सिंहेश्‍वर भाय बजला- “दुखिया काकाकेँ बड़ परेशानी हेतैन, अखन बेटी भानस-भात करै-जोकर नइ भेलैन अछि, अपने हर जोति दुपहरमे औता तखन भानस-भात करता!” हमरा गर भेटल, बजलौं- “तेतबे नहि ने, अपने समर्थ हड्डी छैन तँ कनी बरदासो कऽ लेता मुदा पाँच बर्खक सबुरिया भूखे छटपटाएत की नहि?” हमर बात जेना जीवन कक्काक मनमे गड़लैन तहिना मुँहक विसविसीसँ बुझि पड़ल। मुदा देखल-सुनल विचारक काज जेना मनमे नाचि उठलैन तहिना बजला- “ई स्‍थान अखन एहेन गप्‍पक नहि अछि, तँए अखन मुँह बन्ने राखह।” बजा गेल- “से किए काका?” जीवन काका- “तूँ जे बाजऽ चाहै छह से मृत्‍युक साल भरि बरजित[1] अछि तँए साल भरि मुँह बन्ने राखह।” सिंहेश्‍वर भाय बजला- “सालक सीमा किए अछि ओ तँ भरि जीवनोक भऽ सकैए?” साल भरिक सीमा सोझमे अबिते जीवन कक्काक मनमे साल भरिक क्रिया-कर्म उपैक गेलैन। बजला- “आइ चारिम दिन छी माने बुधनी काकीककेँ जरौला, नअ दिनमे सराध कर्म सम्‍पन्न हएत, तेकर पछाइत बारहो मास मासे-मासे छाया हएत जे साल लगलापर पूरत, तेकर पछाइत बरखी हएत, जे साले-साल होइत रहत, तैबीचमे मातृनवमी सेहो होइत चलैत रहत।” जीवन कक्काक बात सुनि सिंहेश्‍वर भाय टोकलकैन- “जखन साले-साल बरखी आ मातृनवमी चलिते रहत तखन बीचमे दुखिया काकाकेँ दोसर बिआह करैक समए कहियो भेटतैन?” तैबीच दुखिया काका आँगनसँ दरबज्‍जापर चलि एला। हुनका देखते तीनू गोरे अपन-अपन मुँह बन्न कऽ लेलौं। लगमे अबिते दुखिया काका बजला- “अपने लोकैन समाज भेलिऐ, केना गरदेनसँ उतरी हेट हएत से तँ अपने लोकैन ने विचार करबै।” दुखिया कक्काक बात सुनि जीवन काका बजला- “केकरा गरदेनमे उतरी लटकल रहल अछि जे अहाँक नहि उतरत। तखन तँ रंग-बिरंगक चलैन उतरी उतरैक ऐछे तइमे जे सकरता हएत तइ हिसाबसँ उतरी उतारि लेब।” अपना जनैत जीवन काका दुखिया काकाकेँ जवाब दऽ देलखिन, मुदा की कहलखिन से अपने बुझबे ने केलौं। बिनु बुझने किछु बाजबो नीक नहियेँ बुझि पड़ए। मुदा दुखिया काका जखन समाज बना समस्‍या रखलैन तखन चुप्‍पो रहब केहेन हएत? फेर हुअए जे कहि दिऐन जे बड़बढ़ियाँ विचार जीवन कक्काक छैन। मुदा लगले ईहो हुअए जे बड़बढ़ियाँ आकि बड़खराप से तँ बुझला पछाइत ने बुझब, बिनु बुझने नीक कि अधला केना बेराएब? अगदिगमे मन पड़ि गेल। कोनो गरे ने देखिऐ जे दुखिया काकाकेँ की जवाब दिऐन। फेर मनमे भेल जे जीवने काकासँ किए ने पुछिऐन। बजलौं- “की कहलिऐ काका जे रंग-बिरंगक चलैन अछि?” जीवन काका बजला- “अपना समाजमे रंग-रंगक चलैन अछि। पहिल भेल बिरखौ, दोसर भेल पंचदान आ तेसर भेल कुरसी।” जेना नव चीज सुनने होइ तहिना मनमे भेल, जइसँ आरो बुझैक जिज्ञासा जगल। बजलौं- “कनी तीनूकेँ फुटका कऽ कहियौ।” हमर बात सुनिते जीवन काका हमरा निहारए लगला। मनमे की भेलैन से तँ ओ जनता मुदा अपना बुझि पड़ल जे मने-मन विचारि रहला अछि जे केहेन ढहलेल जकाँ बाजल। ओना जीवन काका किछु अधला बात मुहसँ नहि निकालि असथिरसँ बजला- “बौआ, अखन तूँ बाल-बोध छह तँए समाजक तरी-घटी नइ बुझै छहक। हमरा तँ देखैत-देखैत केश-दाढ़ी पकि गेल।” किछु बुझब छल तँए ललचाइत मने कहलयैन- “काका, एकरा के काटत। खेलहा-पीलहा देह अछि तँए ने, नहि तँ मरि गेल रहितौं। अहीं कहू जे अहाँ उमेरक केते गोरे समाजमे छैथ।” हमर बात जेना जीवन कक्काक मनकेँ भरलकैन तहिना बुझि पड़ल। बजला- “बौआ, पहिल जे बिरखौ अछि ओइमे लोक हाथी-घोड़ा, गाए-बरद, गहना-जेबरक संग जर-जबारमे भोजो करैए आ सभ किछु दान सेहो करैए।” बिच्‍चेमे बजा गेल- “हाथीबला ने हाथी दान करता आ जिनका से नइ छैन ओ की करता?” हमर बात जेना जीवन काकाकेँ कठाइन लगलैन तहिना मुँहक रूपसँ बुझि पड़ल। बजला- “एते धड़फड़ेने समाजक पेनी पौबह। पहिल ने कहलियह आ दोसर रंगक अछि पंचदान, जइमे लोक कमसँ कम एगारह गोरेकेँ खाइयो-ले दइए आ जे विभव रहलै तइ हिसाबे दानो करैए।” जीवन कक्काक बात सुनि मन कनी थितगर भेल। तइ बिच्‍चेमे सिंहेश्‍वर भाय पुछलकैन- “कुरसी की भेल?” जीवन काका बजला- “जेना बिरखौ आ पंचदान नमगर-चौड़गर अछि तेना कुरसी नइ अछि। ‘कुरसी’मे जएह भेल सएह दानो केलौं आ खाइयो-ले देलिऐ।” दुखिया काका सेहो सभ बात सुनलैन मुदा बजला किछु ने। तैबीच एकभुक्‍तक समय सेहो लगिचा गेल छल। तँए आँगन दिस विदा होइत दुखिया काका बजला- “ओना, अखन सराध दिनगर अछि। जेना जे अपने लोकैन कहब, तेना से करैले हाजिर तँ छीहे।” सभ कियो उठि कऽ विदा भेलौं। साल भरिक पछाइत पहिल बरखी भऽ गेल। बरखी भेलाक तीन दिनक पछाइत दुखिया काका ऐठाम गेलौं। दुखिया कक्काक रंग-रूप बहुत बदलल बुझि पड़ल। जेना पत्नीक सभ सोग-पीड़ा बिसैर नव जिनगीक परिवार बना नेने होथि तहिना। सबुरिया सेहो छह बर्खक भऽ गेल। दुनू बाप-बेटी भानसक काजमे लगल रहैथ। डेढ़ियापर पहुँचते सोर पाड़ि बजलौं। अँगनेसँ दुखिया काका बजला- “अँगनेमे छी, अँगने आबह।” अँगनेमे पीढ़िया बैसैले देलैन आ दुखिया काका-अपने भुँइयेमे चुक्कीमाली बैसला। गामेपर सँ विचार केने गेल रही जे दुखिया काकाकेँ बड़ परेशानी पत्नीक अभावमे होइ छैन। से नइ तँ दोसर बिआह कऽ लैथ। मनमे अगुआएल विचार छल तँए बजैक उत्‍सुकता तँ छेलएहे। मुदा बिना कुशल-समाचार बुझने बजबो केना करितौं तँए कुशले-समाचारसँ गप शुरू करैत पुछलयैन- “काका, जिनगी अहाँकेँ बड़ परीछा लऽ रहल अछि।” हमर प्रश्‍नक उत्तर जेना दुखिया काकाकेँ ठोरेपर रहैन तहिना धाँइ-दे बजला- “जिनगीमे जे जेते परीछा देत, वएह ने ओते जिनगीकेँ चिन्‍हबो करत।” दुखिया कक्काक जवाबसँ बुझि पड़ल जे गप-सप्‍प करैत मूड बनल छैन। बजलौं- “काका, बिआह कऽ लिअ। सबुरियो चेष्‍टगर भेल, बिआह-दान हेतइ सासुर जाएत। अहाँ आरो परेशानीमे पड़ि जाएब। असगर रही कि दस गोरेक परिवारमे रही, जिनगी तँ जिनगी छी ओकर तँ सभ काज पुरबै पड़त।” बजला- “से तँ अछिए, मुदा समस्‍यो तँ अपने-अपनेटाक ने अछि।” बजलौं- “हँ, से तँ अछिए, मुदा परिवारिक जिनगीक अपन महत्‍ छइ किने।” हमर बात सुनिते दुखिया काकाकेँ पहिल पत्नी मन पड़लैन। केना हथियाक झॉंटमे प्रसव पीड़ा भेलैन आ लाख परियास केलो पछाइत बँचा नइ पौलिऐन। पछाइत दोसरो बिआह केलौं सेहो मरि गेली, साल भरि पहिने सराधसँ उरीन भेलौं। बर्ख दिन भऽ गेल। केना बर्ख दिन बीतल सेहो कहाँ बुझि पेलौं। अपन जिनगीमे जहिना रमैत एलौं तहिना रमैत आगूओक जिनगी काटि लेब। तइले एक नइ दू-दूटा सन्‍ताप भोगि रहल छी। सबुरिया भानसो-भात आ अँगनो-घरक काजमे सम्‍हारिये रहल अछि। बजला- “परिवार केतौ हेराएल अछि, दू बाप-बेटीक परिवार अखनो अछि। यएह ने हएत ते बिआहक पछाइत बेटी सासुर जाएत। जँ ओकर मन हेतइ तँ हमहूँ ओतै चलि जाएब नइ जँ बेटियेक मन हेतै तँ ओहो सभ एतै रहत।” ओना दुखिया कक्काक उत्तर मनोनुकूल नइ भेल, मुदा उत्तरकेँ काटबो तँ असान नहियेँ अछि। आँखिक सोझमे एहेन अनेको जिनगी अछिए। बजलौं- “काका, बेटाक वंश आ बेटीक वंशक अन्‍तर तँ भाइए जाइत अछि किने?” दुखिया काका बजला- “हँ, लोको तँ सएह बुझैए, मुदा मूल प्रश्‍न जिनगीकेँ चैनसँ जीब अछि। जखने दोसर बिआह करब तखने अपन पत्नी रहितो सबुरियाक तँ सतमाइये हेतै किने। जेकरा वंशक फूल बुझि सेवा करै छी ओकरा आगू एहेन बगुरक गाछ रोपि दिऐ, ई अपन मन नइ कहैए। किछु भेल तँ सतमाइये भेल। ओकरा कुभेला करबे करतै।” बजलौं- “की कुभेला?” काका बजला- “सभ रंगक कुभेला। ओ अपन बेटी सबुरियाकेँ बुझबे ने करत। मुदा हमर तँ बेटी छी, हम केना अपना सोझामे कुभेला होइत देखब। तइसँ नीक ने जे ओहन गाछे ने रोपब जेकर काँट बाल-बच्‍चाकेँ गड़त।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2764, तिथि : 31 मार्च 2017 ‘बेटीक पैरुख’ संग्रहसँ साभार....। कियो ने डेढ़ मासक शीतलहरी समैक रोहणियेँ उतारि देलक। पला-पला ओस पाला बनि दिन-राति बर्फवारी करैत जइसँ मनुखकेँ के कहए जे मालो-जाल आ गाछो-बिरीछ जिनगीसँ तंग-तंग भऽ काहि कटैसँ मरबे नीक बुझए लगल। काहि काटि कऽ मरबसँ नीक चटपट मरब होइते छइ। जहिना माल-जालक रूइयाँ भरि ‍दिन भुलकल ठाढ़ तहिना मनुखोक। मुदा माल-जाल जकाँ सौंसे देहक नहि। कारणो अछि जे मनुखकेँ रूइयाँ संग केशो होइ छै, माल-जालकेँ से नै होइ छइ। गाछ-बिरी‍छक पात अपन रंगेटा नै बदललक, पीअर भऽ भऽ सुखौ लागल आ तुबि-तुबि खसौ लागल अछि। आने-आन जकाँ पचासी बर्खक सुगियोकाकीक मनमे हुअ लगलैन जे आब छियासियम अगहन भरिसक नहियेँ देखब। जेहो जारैन-काठी आ अन-पानि घरमे छल सेहो सठि गेल, शीतलहरीक कोनो ठेकान नै अछि, जीब केना? सुगियाकाकीकेँ आगूक कोनो बाटे ने भेटैन। भेटबो केना करितैन, जँ माटिक रस्‍ता बाट होइ आ दिन-राति बर्खा होइत रहै, तखन पक्की सड़कक सुख कल्‍पने हएत किने? मुदा मरितो दम तक लोक जीबैक आशा थोड़े तोड़ैए जे सुगिया काकी तोड़ितैथ, कोनो कि हिनकर पचासी बर्खक पाकल फलक आँठी जकाँ देह सक्कत नै छैन। सकताएले आँठीमे ने अँकुरैक शक्‍ति सेहो अबै छइ। सुगिया काकीक नजैर गेलैन व्‍यास बाबापर। ओ जे कण्‍ठ फाड़ि-फाड़ि कहै छथि‍न जे ‘लूटि लाउ, कुटि खाउ, भि‍नसर भने फेर जाउ।’ से समैक ठेकान किए ने केलखिन जे जखन‍ घरसँ निकलैबला समए बनत तखने ने लोक घरसँ निकैल किछु करत आ जखन घरसँ निकलैबला समैये ने हेतै, तखन केना दोसर दिन किछु करए निकलत? मुदा पेट से थोड़े बुझत। देहक जे सुख छै से केना भेटतै? आकि व्‍यासबाबा एअर कंडीशन मकान आ भरल-पूरल अन-पानिक जिनगी बुझि बजै छथि‍न..? जेते सुगिया काकी मनकेँ मथैत तेते ओझराएले जाइत। जीबैक बाट कि भेटितैन जे आरो मन सोगाएले चलि गेलैन‍। असगर छोड़ि घरमे दोसराइतो तँ नहियेँ अछि जे दुनू गोरेक बुधियो आ हाथो-पएर लड़ा-चला कऽ देखितिऐ जे जीब सकै छी की नहि। एहने समैमे ने दोसराइतिक जरूरत‍ होइ छइ। आन समए हेबे किए करतै। असकरे लोक चाह पीब लइए, खेनाइ खा लइए, सुति-पड़ि रहैए। तखन दोसराइतक जरूरते की? दिन-रातिमे ऐसँ बेसी चाहबे की करी? चौबीसो घन्‍टा कटैक धार तँ बनले अछि किए ने कटत। मुदा से नहि, उमेरो तँ किछु छी? बुढ़ाड़ी मृत्‍युक कारण छी मुदा जुआनीकेँ केना से कहबै? होइ छै तेकरो हजारो कारण मुदा कारण कारण तँ नहि भऽ सकै छइ। अकारण कारण केना भऽ सकै छइ। हिया कऽ दुनियाँ दिस सुगिया काकी तकली तँ बुझि पड़लैन‍ बेसौंगरकेँ ठेंगो एकटा टाँगक काज करै छै तँए एकटा सहयोगीक जरूरत‍ तँ अछिए। मुदा सहयोगी हएत के? बेटी सासुरे बसैए, नैहरो हटले अछि, तखन? मुदा जरूरत तँ अछि औझुका। से तँ लगेक लोकसँ भऽ सकैए। मनमे प्रश्‍न अबिते उत्तर स्‍पष्‍ट भऽ गेलैन‍ जे रीतलालक ऐठाम जा अपन बात कहिऐ जे ओ की कहैए। ‘अनेरे बाबू जन लेबह हौ, तँ पनरह बापूत अपने छी।’तइसँ तँ काज नै चलत, काज तँ अछि अपन बनि अपना जकाँ जिनगीक पार लगबैक? मुदा तइसँ पहिने विचारि लेब नीक हएत जे जँ भार उठा लेलक तँ बड़ बेस आ जँ नै उठौत तखन‍? तखन‍ की‍, तखन‍ यएह ने जे रीतलाल सन-सन बाबन गाही गाममे पसरल अछि। सभ कि कोलिफटुए आकि रसफटुए भऽ जाएत। जेकरा हम अपन बना अपनेबै से किए ने अपनौत। जँ सेहो नहि अपनौत तँ पहिने बुझा कऽ कहबै पछाइत‍‍ बुझेबै...। उमेद-नाउमेदक बीच सुगिया काकी रीतलाल ऐठाम विदा भेली। ठंढसँ जहिना देह सिरसिराइत तहिना देहक फाटल-पुरान वस्‍त्र सिमसिमाएल रहैन। सुगिया काकीकेँ देख‍ते रीतलाल अचम्‍भि‍त भऽ गेल जे एहनो समैमे निकैल काकी दरबज्जापर एली! सुगिया काकीकेँ रीतलाल साक्षात् लक्ष्‍मी रूप बुझैत। गुणसँ भरल, जेहने कण्‍ठक स्‍वर, तेहने नजैरक गुण आ तेहने हाथक लूरिसँ भरल-पूरल सुगिया काकी। जाड़सँ सिरसिराइत देखते रीतलाल अपन देह परहक कम्‍मल सुगिया काकीकेँ ओढ़बैत अगियासी जोड़लक। अगियासीक दुनू कात दुनू गोरेकेँ बैसते गप-सप्‍प उखड़ैक मनसून बनए लगल। मुदा दुनू अपन-अपन मुँह दबने। मनमे अपन-अपन राग-दोख। रीतलालक मनमे होइत जे केना पुछबैन, काकी केमहर एलौं। दरबज्‍जापर एली तँ चाहक बेर चाह, जलखै बेर जलखै, कलौ बेर कल्‍लौ आ सुतै बरे ओछाइनिक ओरियान कऽ देबैन। तहिना सुगिया काकीक मनमे उठैत जे घरवारी पहिने किछु हँ-निहँस बाजत तखन ने उतारामे अपनो दुखनामा कहबै। गुमा-गुम्‍मी पसरल रहल। गुमा-गुमी देख किछुकालक भेला पछाइत‍‍ सुगिया काकी गुमगुमबैत गुमगुमा जकाँ बजली- “बौआ, एक तँ तूँ एक वंशक छह, दोसर अंश तोरामे अछि जे सुतलो-सूतल कानसँ सुनैत रहै छी, तँए...।” ‘तँए’ कहिते सुगिया काकीक बोल ब्‍लॉटिंग पेपरमे सोंखल रोसनाइ जकाँ बन्न भऽ गेलैन‍। मुदा किछु प्रश्‍न तँ उठिए गेल छल- ‘जे तूँ एकवंशक छह। तैसंग लूरि-बुधिक अंश सेहो अछिए।’ रीतलाल बाजल- “काकी, तेहेन दुरकाल भऽ गेल अछि जे चिड़ै-चुनमुनीक कोन बात जे नमहरको-नमहरकाक जान बँचब कठिन भऽ गेल अछि। चीन-पहचीन सेहो मेटाएल जा रहल छै, तखन तँ लोक ताबते धरि ने धीरज रखत जाबत धरि आँखि तकैए। ओना, तकितो आँखि देहक दुआरे अथबल भऽ जाइ छै मुदा तैयो तँ भूख लगने टंगटुटा चुट्टी जकाँ नेंगराइतो चलिते अछि। नेंगराइत-नेंगराइत जखन बेदम भऽ जाइए आ पेटक आगिमे जरए लगैए तखने ने अपनाकेँ हवन चढ़बैए। मनुख तँ सहजे मनुख छी।” रीतलालक बातकेँ सुगिया काकी किछु बेसीए बुझलैन‍। बेसी बुझैक कारण काकीक सोचक धार छिऐन। होइतो अहिना छै जे एक्के मुँहक बात कियो बेसी बुझैए तँ कियो कम। मुदा तैसंग तेसरो बुझनिहार तँ होइते अछि जे समगम बुझैए। समगम ई जे जेते प्रश्‍नकर्ताक बात रहल तेतबे सुननिहार बुझलक। सुगिया काकी तँ सहजे सुग्‍गाक बोल परखनिहारि छथिए। जहिना कोनो रंगक वस्‍त्रपर दोसर रंग चढ़बैक विधि अलग-अलग अछि, अलग-अलग ई जे कियो बेधड़क दोसर रंग घोड़ि वस्‍त्रकेँ डुमा देलक तँ कियो आस्‍ते-आस्‍ते रंग घोड़ि बेर-बेर डुमा-डुमा रंग चढ़बैए, तहिना काकी मने-मन सोचए लगली जे बेधड़क अपन विचार रखैसँ पहिने, आस्‍ते-आस्‍ते मनक उदगार व्‍यक्‍त करब बेसी नीक हएत। काकी विचारिते छेली कि रीतलालक पत्नी चाह नेने पहुँचली। काकीक हाथमे चाहक गिलास पकड़बैत कबुतरी कहलकैन- “काकी, तेहेन टिकजरौना समए भऽ गेल जे एक तँ दुनियाँ जाड़सँ जड़ा गेल अछि तैपर आगियो-छाइकेँ कि ओ तेजी छै जे बैशाख-जेठमे रहै छइ। ओइ समैमे जेते जारैनसँ रोटी-तरकारी बनैए तेतेसँ अखन खाली चाह बनैए।” कबुतरीक रस-रसाएल बोल सुनि कोइली-बोलीमे सुगिया काकी बाझक स्‍वरलहरी छिटकबैत बजली- “कनियाँ, एहने-एहने समैमे पुरुखक पुरुखपना परिवारमे देखल जाइ छइ। सभ किछु सुरीत रहने भारियो काज हल्‍लुके बुझि पड़ै छै, मुदा सभ किछु विपरीत रहने जे अपन-अपन परिवार, समाज आ मातृभूमिक सेवा करैए, वएह ने पुरुखपना भेल। बुढ़ भेलौं, कोनो कि भगवान छी जे जे कहब से भाइए जाएत। मुदा एते तँ कहबे करबह जे भगवान हमरे सनक नमहर जिनगी सभकेँ देथुन जे हँसैत-खेलैत दुनियाँ देखैत चलत।” एक संग अनेको बात काकी बाजि गेली। किछु बात कबुतरी बुझबो केलक आ किछु नहियोँ बुझलक। तहिना रीतलालो सोल्हन्नी बात तँ नहियेँ बुझलक मुदा पत्नीसँ बेसी तँ बुझबे केलक। दोसर बात रीतलालक मनकेँ ईहो ठेललक जे परिवारक भीतरक जे प्रश्‍न अछि ओइमे परिवारक सभकेँ विचार रखैक समान अधिकार छै मुदा समाजक बीच तँ एक-मतक जरूरत‍ होइ छइ। तइले परिपक विचारक जरूरत‍ होइते छइ...। कबुतरियोकेँ गड़ भेटल, मुँहमे ताला-लगा पति दिस आँखि उठौलक। पत्नीक नजैर पड़िते रीतलाल बाजल- “काकी, अखने देखियौ जे एक गिलास चाह पीलौं। यएह चाह गरम समैमे मन भरि दैत मुदा अदहोसँ कम शक्‍ति रहि गेल छै, तहिना तँ मनुखोक शक्‍तिकेँ होइ छइ?” रीतलालक प्रश्‍न सुगिया काकी ठाढ़ काने सुनललैन‍। प्रश्‍नक एकभग्‍गू उत्तर नइ दैत बजली- “रीतलाल, तोंही दुनू परानी अखन ऐठाम छह। परिवार तँ दुनू गोरेक छिअ। जे सन्‍तान छह ओहो सम्‍मि‍लिते छह, तँए परिवारमे ओहन विचारक धार बहबैक छह जे जिनगीक संग हँसैत-खेलैत-बोहैत‍ चलए। हँसी-खेल दुनियाँमे कहाँ छै, ओ छै अपन काजमे। अपन परिवार छी आकि परिवार अपन छी, एकरा नीक जकाँ बुझनहि लोक अपन परिचए बुझि पबैए।” काकीक विचार सुनि रीतलाल, पत्नीकेँ कहलक- “काकी कि केतौ पड़ाएल जाइ छैथ जे गपे सुनैमे रहि जाएब। जाउ, भानसक जोगार करू। खेला-पीला पछाइत‍‍ निचेनसँ गप-सप्‍प करब।” पतिक सह पाबि कबुतरी बाजल- “एहेन समैमे काकियो केतए जेती। हम सभ जुआन-जहान छी से तँ एक मोटा वस्‍त्र देहमे सटने छी, काकीक तँ सहजे सुखाएल हड्डी छैन‍, बेसीए जाड़ होइत हेतैन। पहिने चाइटा गोरहा आनि कऽ घूरमे दऽ दइ छिऐन जे लगले टनगर भऽ जेती। अच्‍छा ई कहथु जे कथी खाइक मन होइ छैन ‍?” आशा पाबि सुगिया काकी आश दैत आस मारली- “कनियाँ, भने दुनू बेकती छह, एक तँ भगवान बेसी अज-गज नै देलैन‍, तैयो अपन काजे ओहन रहल जे सभ दिन अजे-गजेमे बीतल। मुदा जे किछु अपन अछि सभ समेट लिअ। पाँच कट्ठा खेत बढ़ने अहूँक उपजा बढ़ि जाएत आ हमरो दिन घुसकैत कटि जाएत।” काकीक बात सुनि रीतलाल बाजल- “काकी, हमरासँ लगो अहाँकेँ बहुत अज-गज अछि पहिने ओ..?” झपैट‍ कऽ काकी बजली- “पहिने पाछू किछु नहि, चिड़ैकेँ जेतए घोघ भरै छै तेतए रहै छइ। जे कियो अपन छैथ ओ एहेन दुरकाल समए नै देख‍ रहल छैथ।” “देख‍ किए ने रहल छैथ मुदा सबहक तँ अपने जान भौर भऽ गेल छैन‍, तखन अनकापर नजैर केना जेतैन?” रीतलालक बात सुनि सुगिया काकीकेँ कटु लगलैन‍। कटु लगिते मन रबरबेलैन‍। रबरबाइते कबकबाइत बजली- “बौआ रीतलाल, कहलह तँ बड़-बढ़ियाँ मुदा मनुख तँ विवेकी होइ छै, ओकरा तँ विवेकसँ डेग उठबए पड़ै छइ। जँ से नइ उठौत तँ मनुखता केना औतै। खाली दूटा हाथे-पएर रहने तँ नइ हेतइ। दूटाकेँ के कहए जे चारियोटा पएर रहने पशु तँ पशुए भेल किने। जे हाथी पाँच गोरेकेँ पीठपर लादि चलैए। मुदा ओकरो तँ अपना रहैक ठौर-ठेकान आ खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि नहियेँ होइ छइ। ई दीगर बात जे बिनु दोसराइते बोन-झाड़मे रहि जीवन-जापन कऽ लइए मुदा पालतू तँ तखने कहबैए जखन मनुखक संग जीबैए।” सुगिया काकीक बात रीतलाल नीक जकाँ नै बुझि सकल। प्रश्‍न उनटबैत बाजल- “काकी, जखन‍ मनुख मनुख छी तखन‍ दोसराइतकेँ बाँहि पकैड़‍‍ उठाबए आकि दोसराक बाँहिक आशा अपने उठैमे करए…।” रीतलालक विचार सुनि सुगिया काकी मुस्‍कियाइत बजली- “बौआ, कालक्रमे मनुख धरतीपर आबि आगू मुहेँ चलैत अछि। तहीले परिवार-समाजक जरूरत होइ छइ। जखन‍ बच्‍चाक जन्‍म होइ छै तखन‍ जँ ओकरा दोसर रक्षा नै करतै तँ की ओ उठि ठाढ़ भऽ सकैए। नइ भऽ सकैए। तहिना बुढ़ाड़ीमे, जखन‍ शरीरक सभ अंग आस्‍ते-आस्‍ते काज करब छोड़ि दइ छै तखनो तँ दोसराइतक जरूरत होइते छइ। जँ एतबो बात लोक नै बुझत तँ की ओ मनुख कहबैक अधिकार रखैए?” सुगिया काकीक बात सुनि रीतलालक मनमे उठल- अनेरे काकी सन लोककेँ ओझरीमे ओझरबै छिऐन। अपनो नीक नहियेँ होइए। नीक तँ तखन‍ हएत जखन कामधेनु सन काकीसँ दूधक आशा राखब। तइले दुधारू भोजन आ रहैक ओरियान करए पड़त। मुदा जइ लीकपर गप-सप्‍प उतैर गेल अछि, तइसँ हटि दोसर लीकपर जाइमे बाधा तँ बीचमे अछिए...। अपनाकेँ ओझराएल देख रीतलाल बाजल- “काकी, अहाँ अपन जिनगी आ अपन विचारक मालिक अपने छी। जे मन हुअए से करब, अखन‍ एतबे जे जेते दिन अपन बुझि रहए चाहब, तइमे बाधा नै हएत। आगू अपन जानी।” रीतलालक विचार सुनि सुगिया काकीक मन मानि गेलैन‍ जे रहै-जोकर स्‍थानपर पहुँच गेलौं। सात भाए-बहिनक बीच सुगिया काकी अन्‍ति‍म तेसर बहिन। श्‍याम वर्ण, चाकर-चौरस देह, गोल मुँह, मझोल कदक सुगिया काकी। गाममे बेछप जनाना। ओना, समाजक जनानाक बीच एकरूपता बेसी मुदा तइसँ भि‍न्न रहने सुगिया काकी बेछप रहली। समाजक बहुलांश जनाना खेती-वाड़ीसँ जुड़ल तँए दिन-राति ओइ चक्कीकेँ चलबै पाछू बेहाल। बेहालो किए ने रहती? मनुख बनि जखन‍ ऐ धरतीपर खेल खेलैले एलौं, भि‍नसरमे घर-दुआर बना लेब, दुपहरमे बिलैम रौद-बसात जीड़ा लेब आ साँझमे सभकेँ उसारि अपने उसैर जाएब, यएह ने भेल जिनगी। से तँ सबहक सोझहेमे अछि। पतियानी लगौने बाबा अपन बेटाकेँ बाबा बना अपने उसैर-बिसैर जाइ छैथ। अहिना ने दोसर दिससँ पोता-बेटा बनैत, बाबाक कुट्टी लग पहुँच अपन समाधि लइए। मुदा ऐ बीच जे कुत्‍सि‍त बाधा बिचमाइन करैत रहल ओकरा तँ देखए पड़त किने? समाजमे सुगिया काकी ऐ दुआरे बेछप छेली जे जेहने हाथक लूरि बदलल छेलैन‍ तेहने छातीक धड़कनक संग कण्‍ठक स्‍वर रहलैन, जे मुँहक बोल होइत निकलैत रहलैन‍। गीत-संगीतक प्रेमी सुगिया काकी। भि‍त्ति‍-चित्र वृत्ति‍वाली सुगिया काकी। अदौरी, दनौरी, बिऔड़ी इत्‍यादिक संग आमक अँचार-मोरब्‍बासँ लऽ कऽ तिल-तिसी धरिक अँचार बनौनिहारि सुगिया काकी। तैसंग सतरंग सागक संग सतरंग तरकारी-भुजिया-तरूआ बनौनिहारि सुगिया काकी। साठि बर्ख पूर्व सुगिया काकी वसन्‍तपुर एली। जइ परिवारमे एली ओ परिवार बहुत जत्‍था-जमीनबला नहि। घराड़ीक संग पाँच कट्ठा चास। मुदा जेकरा संग बिआह भेलैन, ओ जेहने देखैमे भव्‍य तेहने कण्‍ठक सुरील। भजन-कीर्तन, नाच-गानसँ सोमनाथकेँ बच्‍चेसँ सिनेह छेलैन‍। जेना पाछूए-सँ नेने आएल होथि‍ तहिना। दसे-बारह बर्खसँ जे घर छोड़ि वौड़ाए लगल ओ रंगमंचक धीर कलाकार बनि वौड़ाइते रहला। पुश्‍तैनी–तीन पुश्‍त आगूसँ–सुगिया काकीक नैहरक परिवार गीत-संगीतसँ जुड़ल। सोमनाथो घुमैत-घामैत सालक तीन-तीन-चरि-चरि मास रहबो करैथ आ सीखबो करैथ। किसान परिवार रहितो सुगिया काकीक पिताक परिवार कृषि कार्यसँ अलग छेलैन‍। ओना परिवारमे बीस बीघा चास आ पाँच बीघा गाछी-कलमक संग नमगर-चौरगर बासो आ पोखैरो-इनार छेलैन्‍हे। कला-मर्मज्ञ विश्वनाथक परिवार, सोमनाथक बिआह अपन परिवारमे करा लेलैन‍। ने सोमनाथक घर-दुआर देखलैन‍ आ ने धन-सम्‍पैतक हिसाब-किताब पढ़लैन‍। वसन्‍तपुर अबिते सुगिया काकी परिवारक स्‍थि‍ति देख‍ मर्माहत भेली। मुदा उपाए की। अर्थ रूपमे पतिक कमाइ किछु ने, सालमे पाहुने-परक जकाँ पतिक आन-जान। पेटक आगि शान्‍त करै-खातिर सासु-ससुर दिन-राति एकबट्ट केने मुदा कटमटी तँ रहबे करैन। नव कनियाँ बनि सुगिया काकी घरमे एली, केना सासु-ससुर कहितैन जे कनियाँ बोइन-बुत्ता करए संगे चलू...। परिवारक प्रतिष्‍ठा तँ प्रतिष्‍ठा छिऐ, भलेँ जिनगी भरि नै निमहौ। एको दिन आकि एको क्षणक महत तँ जिनगीमे अछिए। अपन दिन-दुनियाँ देखैत सुगिया काकी अपना दिस तकलैन‍ तँ भरल-पूरल खजाना देखलैन‍। परती देख जहिना किसानीक जिज्ञासा जगैत, बजार देख बेपारक जिज्ञासा जगैत तहिना सुगिया काकीकेँ भेलैन‍। मुदा, सासु-ससुरक आगू मुँह केना उठौती, ई तँ प्रश्‍न रहबे करैन। जिनगी जीबैत-जीबैत मनुखो आ पशुओ-पक्षी अभ्‍यस्‍त भेने आनन्‍दि‍त जिनगीक सुख-भोग तँ करिते अछि। मुदा जँ बरिसल पानिकेँ खेतक आड़ि बान्‍हि-बान्‍हि नै राखब तँ खेतमे पानि केना अड़त? आ जाबे खेतमे पानि नै अड़त ताबे धान केना रोपब? जँ से नै रोपब तँ बोनिहारिन-बोनिहारक पुतोहुक कलंक केना धुआएत? आ जँ से नै धुआएत तँ जिनगीए केहेन भेल..? रंग-बिरंगक प्रश्‍न सुगिया काकीक मन बरसैत पानिक बुलबुला जकाँ इन्‍द्रधनुषी रंग नेने बनैत आ फुटैत...। मने-मन विचारली जे सभसँ पहिने अपन ढेकी-जत्ताक ओरियान करी। जखन‍ ढेकी-जत्ता भऽ जाएत तखन समाजक कुटौन-पिसौन कऽ अपन स्‍वतंत्र कारोबार अपना घर-आँगनमे करब। की‍ हमरा चूड़ा-चाउर कुटैक लूरि नइए। की हमरा मेदा-चिक्कस पीसैक लूरि नइए। तखन तँ भेल जे उक्‍खैर-समाठ, ढेकी-जात्ताक ओरियान करब। केना सासु-ससुरकेँ कहबैन जे अहाँ कर्जा लऽ कऽ हमरा कीनि दिअ। मुदा अपना माए-बापकेँ तँ कहि सकै छी। देह-हाथ मारि जे आँगनमे बैसल रहै छी तइसँ नीक जे अपन घर-आँगनमे किए ने अपन लूरिक किताब लिखब शुरू करी। आँगनक ओसारपर ओछाएल ओछाइनपर बैस सुगिया काकी अपन दिन-रातिक झख-झखैत मने-मन सुमारक करए लगली जे केना पौतीमे राखल खीड़ा-करैलाक बीआ समैपर माटिमे गाड़ल जाइ छै आ समए पाबि जखन‍ माटि पकैड़‍‍ हाल पबिते फुरफुरा कऽ अँकुरि माटिक ऊपर आबि अपनाकेँ गाछ कहए लगै छइ..! बौधिक रूपे अगुआएल सुगिया काकीक उत्‍साह जगलैन‍- किए ने फूल जकाँ गन्‍ध सिरैज हवाक संग वायुमण्‍डलमे पसरब। मुदा बीचमे बाधा तँ ऐछे, ओ अछि जइ परिवारमे एलौं ओ परिवार अपन छी कि नहि। कहैले तँ सभ कियो छैथ मुदा अपन विचारक केते महत अछि से तँ थाहला पछाइत‍‍ बुझब। मुदा थाहो लेब तँ कठिन अछिए। एकरूपा सासुकेँ तँ सम्‍हारि बाजि सम्‍हारि लेब मुदा ससुर तँ पुरुख छैथ। पुरुखक करेज बेसी स्‍वार्थी होइए, अपन विचारकेँ दाव-चाप बले राखए चाहैए...। सुगिया काकीक मन ठमकलैन‍। ठमैकते मनमे बिजलोका जकाँ छिटकलैन।‍ मन मानि गेलैन‍ जे सासुकेँ संगी बनौल जा सकैए। जखने सासु समटेती तखने ससुर उसरता, उसरैत-उसरैत अपने उसरागा बनि सोझ भऽ जेता। दोसर दिन, साँझू पहर सुगिया काकी चुल्हि‍क ओरियान करिते छेली कि तखन सासु-ससुर अनका खेतसँ खटि पहुँचलैन। पुतोहुकेँ काजमे लगल देख रधिया पतिकेँ कहलखिन- “बड़ काजुल कनियाँ घरमे पएर रखलैन‍ अछि।” पत्नीक बोलकेँ नकारब सोहनलाल उचित नै बुझलैन‍, बुझलैन‍ ई जे संगे-संग संगी बनि भरि दिन संगे काज केलौं तखन‍ जेहने विचार अपन अछि तेहने ने हुनको हेतैन, लोकक काजो तँ लोकक पहचान छी। तहूमे भरि दिनक थाकल-मारल अपनो घरमे जँ अराम नै करब से केहेन हएत...। अष्‍टयाम कीर्तनमे जहिना अगुआ-पछुआ एक्के धूनमे जयकार करैए तहिना सोहनलाल ताल मिलबैत बजला- “हम सभ तँ हिनके सबहक नौकरी करै छी। ओना उचितो अछि। तेहेन भगवान जनम देलैन‍ जे सोझहे हाथे-पैरटा देलैन‍। मुदा ओइमे बेइमानी नै केलैन‍, ओ चारू सुरेब अछि। जँ चारूमे सँ एकोटा अबाह रहैत तखन के केकरा पुछैत। अहीं हमरा पुछितौं कि हमहीं अहाँकेँ पुछितौं? भीख मांगब छोड़ि दोसर कोनो रस्‍ता जीबैक रहितए?” नमगर-चौड़गर पतिक बात सुनि रधिया भाव-विह्वल भऽ गेली। निशाँएल साहित्‍यकार जकाँ जे जहिना गुदरी-चेथरीक आगिसँ सोनाक लंका जरबै छैथ, तहिना सासुक बोल सुगिया काकीक कानमे पड़लैन‍। अनुकूल मनसून देख‍ सुगियाकाकी अपन दाउ सम्‍हारली, भरल बाल्‍टीन पानि आ लोटा नेने पुतोहु आगूमे पहुँच गेली। पुतोहुक आग्रह देखते जहिना बरफ-पानि हवा बनि अकासमे उड़ि जाइए तहिना रधिया उड़ैत बजली- “कनियाँक सभटा सीख-लीक खनदानीए छैन!” रधियाक संग सोहनलाल आरो उड़िया गेला। उड़ियाइत बजला- “जहिना दबो भोज्‍य-वस्‍तु चमकैत थारीमे परसलापर अनेरो खेबैयाक मन भरछए लगैत तहिना घरक चिष्‍टेचार ने घरकेँ घर बनबैए। ई घर कि कोनो हमरे छी कि आब हिनके सबहक भेलैन‍। जेना सम्‍हारैथ‍।” ससुरक बोल सुनि सुगिया काकीक मनमे कहलकैन- जेहने परिवारमे भगवान जन्‍म देलैन‍ भरिसक सासुरो तेहने भेला। मने-मन भगवानकेँ गोड़ लगिते जगलैन‍-ई दलिदता केते दिन छहटा हाथ पैरक आगू ठाढ़ रहत? मुदा सासु-ससुरकेँ जे जिनगी भरिक बात पेटमे छैन‍‍ से जाबे सुनि नै लेब ताबे बुढ़ी थोड़े कहती अपन चौथारीक गप-सप्‍प। तइ सुनैले तँ किछु पूजी[2] लगबै पड़त...। जहिना बड़का करखन्ना बैसबैले बड़का घर बनबए पड़ै छै तहिना नमहर गप-सप्‍प सुनैले बेसी धैर्यक जरूरत पड़िते अछि। जइ बनबैमे किछु बेसियो समए लागि सकैए किने। खेला-पीला पछाइत‍‍ सुगिया काकी मालीमे तेल नेने सासु-ससुर लग पहुँचली। भरि दिनक थाकल-ठेहियाएलक दबाइयो छी तेल। सोहनलाल रधियाकेँ कहलखिन- “काल्हि‍ धनरोपनी समापत भऽ जाएत। गाममे केते गिरहत तँ आठ दिन पहिनहि रोपनी उसारलैन‍। ई तँ गुण अछि जे अपना सभ केकरो बान्‍हल जन नै छी,नहि तँ अपनो सबहक काज आठ दिन पहिनहि समापत भऽ गेल रहितए।” आगूक बात सोहनलालक पेटेमे रहैन कि तैबीच पुतोहुक हाथमे माली देखलैन‍। माली देखते घरक मालीपर[3] नजैर गेलैन‍। अपने फुरने बाजए लगला- “भगवान तेहेन बेटा देलैन‍ जेकरा ने अपन खाइये-पीबैक ठेकान छै आ ने परिवारेक ठेकान। ओहन मनुख बुते घर चलत। अखन अपने दुनू बेकती थेहगर छी, कहुना कऽ घीच-तीड़ परिवारकेँ ससारने चलै छी।” बेटापर पिताक आछेप सुनिते रधियाक मनक महथीन बाजल- “बेटा धन छी, कोनो कि बेटी छी जे घर-अँगनाक टाटक अढ़मे नुकाएल रहत। भगवान हमरो सबहक औरुदा ओकरे दउ जे आरो वोनाएल रहए।” ससुरक बात सुनि जहिना सुगियाक मन विसविसेलैन‍ तहिना सासुक बात सुनि मन तनतनेबो केलैन‍। मुदा सासु-ससुरक बीचक बातमे नव कनियाँकेँ पड़क चाही की नहि? सुगियाक मन तहीमे ओझरा गेलैन‍। मुदा नीककेँ ‘नीक’ आ ‘अधला’केँ अधला जँ नै कहल जाए तँ के पटकाएत तेकर कोनो ठीक छइ। हँसियो होइ छै आ हहासो होइ छइ। गंभीरो हँसब होइ छै आ फुलहो हँसब होइ छै, मुदा से बुझत के? हँसी तँ हँसीए छी। मुँह खोलि बत्तीसीकेँ जोरसँ छिड़िया देलिऐ, बड़का हँसब भेल..! तारतम करैत सुगिया सासुक विचारपर, सासु दिस घुमि, डि‍बियाक इजोतमे–मन्‍हुआएल चोकटल फूल जकाँ नहि, खिलैत कली जकाँ–आँखि-भौ-नाकक संग मुस्‍कियेली। पुतोहुक मधुर मुस्‍कान देख रधियाकेँ जहिना गोबरखत्तोक पानि धाराक संग पाबि गंगामे पहुँच गंगाजल बनि जाइए तहिना भेलैन‍। सौंझुका बेला-बेली जहिना अपन चौंसैठो कलासँ नाचए-गाबए लगैए तहिना रधिया पतिकेँ देखबैत बजली- “सोमनाथ अपन गुणक हिसाबसँ दुनियाँक गुणा-भाग जोड़ैए। जोड़ह, आरो जोड़ह। हम सभ माए-बाप भेलिऐ, तँए जीता-जिनगी ई नै कानमे आबए जे माए-बाप बेटा-पुतोहुकेँ बान्‍हि कऽ रखने छइ।” सासुक बात सुनि सुगियाकेँ जहिना अपन शक्‍ति मुँह जगौलकैन‍ तहिना रधियाकेँ सेहो दमपति-शक्‍ति जगलैन‍। मन्‍दिरक आगू दुनू हाथ जोड़ि भक्‍त जहिना अराधना करैत तहिना अखन धरि सुगियो हाथमे माली रखने आराधना करैत रहली। माली देख रधिया सुगिया काकीकेँ कहलखिन- “कनियाँ, अहाँ बैसू जे सेवा सासुरक छी ओ तँ सासुरेमे ने सीखब। हम अपने अहाँ ससुरकेँ देह-हाथ ससारि दइ छिऐन। ओना, ससुरोक सेवा पुतोहुक करतब छी मुदा स्‍थान-विशेषक अनुकूल। पिताक सेवा आ ससुरक सेवा एक रहितो दू प्रक्रि‍यासँ चलै छइ। तहिना जन्‍मदात्ती माए आ पोसनिहारि सासु-माइक सेवामे सेहो भेद होइ छइ। अहाँक ससुर सन भगवान केकरा ससुर देलखिन। भगवान एहने सभकेँ देथुन।” परिवारक बीच अपन प्रतिष्‍ठा पबैत सोहनलालक मन सोहनगर होइत-होइत सोन्‍हाएल दूधक डाबाक मक्‍खन सदृश सुगन्‍ध निकालैत बजला- “कनियाँ, ऐठाम तीनियेँ गोरे छी। अही तीनू गोरेक ने ई घर छी। ऐ घरक भार तँ तीनियेँ गोरेक ऊपर अछि किने। अहूँ खनदानी घरक बेटी छी। अहाँ दुनू गोरे[4] विचारि जे कहब से मानैत चलब। सएह ने..?” ससुरक विचार सुनि सुगिया शुभ प्रभातकेँ प्रणाम केलीह। दोसर दिन सबेरे सासु-ससुर बोइन‍ करए घरसँ निकललैथ आ एमहर भानस करैसँ पहिने चाह-ताह पीला पछाइत‍‍, सोलह बर्खक नव कनियाँ–सुगिया–घरक चौकैठ लग बैस अपन शक्‍तिकेँ खोजए लगली। मनमे उठलैन- हमरा सन परिवारमे जँ देह धूनि श्रम नै कएल जाएत तँ परिवारक नीवमे मजगूती नहि औत। ओना,शक्‍तिक क्षय ‘श्रम’ आ ‘भोग’ दुनूमे होइ छइ। यएह छी अकास-पतालक दूरी। खाएर जेतए जे हौउ मुदा आइसँ अपन दिनचर्या बना चलब। भोरहरबामे पाँचटा प्रभाती गाएब आ पहिल-दोसर साँझमे पाँचटा मंगल सेहो गाएब, अपना घरमे गाएब, अपन सासु-ससुरकेँ सुनाएब। सभ अपन घरऽ देवताकेँ पूजा करैए, हमहूँ करब। तइसँ पहिने अखने चिक्कनि माटि घोरि सभ घर-ओसारकेँ ढोरब शुरू कऽ ली। सुखैयोमे दू-तीन दिन लगबे करत। कहिया-ले आ केकरा-ले भि‍त्ती-चित्रक लूरि राखब। जिनगीक ठेकान नहि अछि। बिनु बँटने जे संगे जरि जाएत तँ अधरम हएत किने। से नहि तँ सभ घर-ओसारमे रंग-रंगक रूप-चित्र बना लेब। कोहवर, भानस, पढ़ैक, सुतैक रूप बना नै रखब तँ लूरियो-बुधि तँ हराइते छै, हराइते जाएत। मुदा ई सभ तँ भेल घर सजबैक। मूल तँ अछि पेट। जखन अपना खेत नै अछि तखन खेती केना करब? ओना, नैहरमे जँ खेत छेबे करैन तैयो तँ खेती अपने नहियेँ करै छैथ। ई तँ निसचित अछि जे जखने घर-ओसारमे चित्र बनबैक लूरि अछि तँ काजो-रोजगार अछिए। मुदा जैठाम छी तैठाम की‍ रेडि‍यो-अखबार छै जे लोक बुझत? लोक तँ बुझत देखिये-परेख कऽ, गाम-समाज बनत बजार। शुभ-अवसरक संग नव-नव घर बनत, नव-नव चित्रसँ घर सजौल जाएत। से नहि तँ सभसँ पहिने पेटक मुँह भरैक ओरियान कऽ ली, तखन बुझल जेतइ। ने दुनियाँ पड़ाएल जाइ छै आ ने अपने पड़ाएल जाइ छी। रहैयोक ऐछे आ रहब तँ संगो चलइ पड़त। परिवारमे सुगियाक सासुरक जिनगीक पहिल जीत यएह भेलैन‍ जे परिवारक सबहक विचारसँ घर चलत। सभ मिलि काजो-राज सिरजन करब आ सभ कियो मिलि-बाँटि करबो करब...। अपन तीनू श्रमकेँ एकठाम होइते शक्‍तिक रूप बनल। वएह शक्‍ति पूजी बनि ठाढ़ भेलैन‍। परिवारक दिन-दशा सुधरए लगलैन‍। जेना-जेना अर्थक स्‍तर सुधरैत गेल तेना-तेना श्रमक रूप बदलैत परिवार चलए लगल। कमो अपन पूजी–श्रम-अर्थ–जँ अपना मननुकूल उपयोग कएल जाएत तँ कर्कशतामे कमी अबैत। कर्कशता ओतए विकृत रूप पकड़ैत जेतए मनकेँ प्रतिकूल श्रम करए पड़ै छइ। समए बीतैत गेल। सासु-ससुर पुतोहुक सहयोगी बनि एकधारामे परिवारकेँ ठाढ़ केलैन‍। ओना दस बर्ख बीतैत-बीतैत सुगियाक नओं-जश चरिकोसीमे पसैर गेल छेलैन मुदा एते-सघन काजक समाजमे गाम छोड़ि अनतए जेबाक समैये ने भेटैन‍। एक बोनिहार परिवार समाजक ओइ मानचित्रपर पहुँच गेल जेकरा ‘सुतिहार परिवार’ कहल जाइए। बीस बर्ख पुरैत-पुरैत सुगिया काकीकेँ पाँचटा सन्‍तान भेलैन‍। तीनटा बेटी आ दू बेटा। सासु-ससुरकेँ रहने सुगिया काकीक काजमे ओते बाधा नै पड़लैन‍ जेते असगरूआ परिवारक चिलकौरकेँ पड़ै छइ। मनुख पैदा करब आ मनुख बना ठाढ़ करब, धिया-पुताक खेल नहि। ऐ बातपर सुगिया काकी सदिकाल धियान रखै छेली। मुदा धियान रखलो पछाइत‍‍ दुनू बेटा मरि गेलैन‍। मात्र तीनू बेटी बँचलैन‍। समाजक लोक सुगिया काकीकेँ जेहने गीत गौनिहारि, तेहने चित्रकार आ तेहने पाक पकौनिहारि एक स्‍वरसँ मानै छैन। समए बीतैत गेल। सुगिया काकीक पति–सोमनाथ–उड़ि कऽ बम्‍बइ चलि गेल। ओत्तै दोहरा कऽ बिआहो कऽ लेलक। साउसो-ससुर मरि गेलैन‍...। आइ तीनू बेटीक संग सुगिया काकी वसन्‍तपुरमे बँचि गेली। अपना जनैत सुगिया काकी तीनू बेटीक बिआह नीके घर जानि केलैन‍ मुदा समय केर विर्ड़ोमे उधिया तीनू जमाइयो आ बेटियो मद्रासे-कर्नाटकमे जा कऽ बसि गेलैन‍। अखन‍ धरि, पचासी बर्खसँ पहिने धरि–सुगिया काकी समाजक समुद्र रूपी पेटमे हराएल रहली, मुदा सालक शीतलहरी सुगिया काकीकेँ असहनीय बना देलकैन‍। ◌ शब्‍द संख्‍या : 3789 ‘उलबा चाउर’ लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍करणसँ साभार...। बालमण्‍डली दिनक बेर टगिते नवटोलीक पाँचो बच्‍चा, तीन लड़की आ दू लड़का, जे पाँच-सँ-सात बर्खक अछि, ओही मुइलहा बान्‍हपर आबि खेलैत अछि जे कहियो गामक शीर्ष छल। ओना, बेर टगब बारहो मासक अपन-अपन घड़ीक समयक हिसाबसँ अछि, मुदा बाल-बोध तँ वएह ने बुझत जे आब ऑंगनसँ निकलै-जोकर समै भऽ गेल, माने समैमे मीठपन आबि रहल अछि। पाँचो बच्‍चा, ओहिना आँगनसँ निकैल अपनामे गप-सप्‍प करैत खेलैले विदा होएत, माने टोलसँ हटि, खुलल आसमानक निच्‍चाँमे अपन खेलैक जगह बनौने अछि। जहिना पजेबा बनौनिहार पजेबा पाथि पसारि-पसारि सुखैले रखैत तहिना जिनगीक अपन अरमान पूरा करैक दुनियाँ ओहो बालमण्‍डल बुझैत। पाँचो बच्‍चाक मनक दल बालमण्‍डल भेल। ओना मण्‍डलियो मण्‍डले छी। भूमण्‍डलो छी प्रमण्‍डलो छी, अनुमण्‍डलो छी, वायुमण्‍डलो छी आ बालमण्‍डलो तँ छीहे। मुदा से नहि, भूमण्‍डलक सबा लग्‍गी नमतियो आ सबा लग्‍गी चौड़ाइयो पुरना सड़कक एक अंश भेल। ओना ऐठाम दुनू बात उठि सकैए जे जखन सबा लग्‍गी नमतियो आ सबा लग्‍गी चौड़ाइयो अछि तखन दुनू दुनू भेल आकि एकटा नमती भेल आ दोसर चौड़ी? मुदा ऐठाम से बात नइ अछि, पुरना सड़कक जे नमती आ चौड़ी अछि ओकरे नमती आ चौड़ीक मानि अछि। पौने दू धुरसँ कनी कम्‍मे जगह माने डेढ़ धुरसँ बेसी आ पौने दू धुरसँ तीन कनमा कम। जैपर कठही गाड़ी चलल सड़क जकाँ ठेहुन भरि गरदा-बौल नहि, मरने सड़क बनि गेल, तँए आवा-जाही कम भेने गरदो-बौल कम। ओना पहिने माने पूर्वमे ईहो सड़क सपना देखै छल जे देशेक सड़क हमहूँ छी, हमरो दिन कहियो-ने-कहियो फिरबे करत। जहिया दिन फिरत तहिया हमहूँ चमकबे करब। हमरो ऊपर एक दिन ईंटा चढ़त, हमहूँ खरंजासँ आभूषित हएब, सीमटी-बौल आ गिट्टी पेब पक्की सड़कक रूपमे सेवाक अवसर हमरो भेटत। भाय किछु छी तँ सड़क छी किने, सड़कक दूभियो एहेन अँखिगर-कन्‍हगर होइए जे अपना ऊपर चलैत बटोहीकेँ परखबो तँ करिते अछि जे कोन बटोही सासुर जा रहल अछि आ कोन बटोही परदेश जा रहल अछि। तहिना कोन बटोहिनी सासुरसँ नैहर हलसैत-फुलसैत जा रहली अछि आ कोन रूसि कऽ पड़ाएल जा रहली अछि। नवटोलीक ओ सड़क ओही दिनसँ मरनासन भेल जइ दिन गामक बीचो-बीच बड़का सड़क–एन.एच.–बनि गेल। ओना गाम-घरक बनाबटोमे अन्‍तर एबे कएल अछि। मोटा-मोटी यएह जे गामक ओभरवाइलिंग भऽ गेल। ऊँचगर-चौड़गर सड़क बनने पड़ोसियो अनगौंआँ भऽ गेल। अपन जगह पाँचो बच्‍चाकेँ ठेकनाएल रहबे करै, पाँचो अपन-अपन जगह पकैड़ अँगना-घर बनबए लगल। हाथेक बाढ़ैनसँ गरदा बहारि-बहारि अँगनाक सीमा बनौलक। पाँचो अपना काजमे एतेक व्‍यस्‍त भऽ गेल जे केकरो-सँ-केकरो गप-सप्‍प करैक पलखैत नहि। सभ मगन, सभ व्‍यस्‍त। जहिना मातृभूमि-प्रेमी मातृतुल्‍य बुझि मातृभूमिसँ प्रेम करैत तँ दोसर नारीक रूप देखैत, तहिना मने-मन ईहो पाँचो विचार करैत जे पाँचो घरवासी गामेक भेलौं तँए रहैक घर, भानस करैक घर, पढ़ै-लिखैक घर सभ किछु ने गामेमे बनबए पड़त। ई तँ नइ ने जे जेमहर पड़ोसियाक विद्यार्थी बैस कऽ पढ़ैए तेम्‍हरे अपना भानसक घरक खिड़की बना देबइ जे भरि दिन चुल्‍हिक धुआँसँ ओकर मन कड़ुआएल रहतै। ..तँए देख-सुनि कऽ ने सभटा करए पड़त। मुदा ई भेल नव गामक वासीक गप, ऐठाम तँ गृहवासू घरवासी छी। एक दिनक नहि,सभ दिनक अछि, पुश्‍त-दर-पुश्‍तक अछि। पाँचो बच्‍चा पहिने अपन-अपन सीमा पड़ोसियाक बीच बनौलक। ठेकनौले ऑंगन, ठेकनौले सीमा, तँए केकरो बीच आड़ि-मेड़क कहा-कही किए हएत। काजक देह चोरौल जे बेसी फोकटिया रहल ओ ने छड़ैप कऽ बेसी हँसोंथए चाहैए। मुदा ऐठाम तँ कम्‍मे रहने बेसी लाभक अछि। कनी घरे-दुआर ने छोट हएत, मुदा काजोक अराम तँ ओत्ते बेसी हेबे करत। ओना पाँचो बच्‍चाकेँ पँच-पँचे कनमाक आँगन भेल, मुदा सबहक एकरंग रहने किए कियो बुझत जे कम अछि। कम कि बेसी तँ ओइठाम देख पड़ैत जैठाम दू रंग रहैत, मुदा जैठाम एकरंग रहत तैठाम किए कियो अपनाकेँ बेसी बुझत आ कियो अपनाकेँ कम बुझत। धारमे हेलल सुगर जहिना कतबाहिसँ हिया बीचमे जाइते पाछू उनैट कऽ तकैए जे जे हिया चलल छेलौं, से ने तँ टेँढ़ भेल, तहिना पाँचो बच्‍चा सड़कपर बनौल अपन-अपन ऑंगनमे ठाढ़ भऽ हिया-हिया देखए लगल जे केतौ अँगनाक छहरदेवाली वा टाटे-फड़क ने तँ टेँढ़ भेल अछि। एक-आधठाम जे घरौदा[5] टेँढ़ो अछि, ओहूले दोसरक जरूरतो नहियेँ अछि। किएक तँ दुनियाँमे के एहेन अछि जे अपन अँगना टेँढ़ बनौत। जखने आँगन टेँढ़ हएत तखने सोझ चलनौं टेँढ़े हएत। तैसंग जखने आँगन टेँढ़ हेतै तखने अँगनाक घरो टेँढ़ हेतै आ जखने घर टेँढ़ हेतै तखने घरवासी सेहो टेँढ़ हेबे करत। जखने पड़ोसिया घरवासी टेँढ़ हएत तखने ओ बास झगड़ा-दनक अड्डा बनबे करत। मुदा से नहि, पाँचो बच्‍चाक मण्‍डलीक समझ अछि जे नवटोली कोनो आइयेक गाम नइ छी, अदौक गाम छी। सभ दिन जहिना, पीढ़ी-दर-पीढ़ी एकठाम बैस शान्‍तिसँ रहैत एला अछि तहिना ने बालो-मण्‍डली सभ दिनसँ अबैत रहल अछि। अँगनाक सीमानक कोणे-काणी सभ अपन-अपन देख घर बनबए लगल। सभकेँ निरमित काजक धड़फड़ी रहबे करइ, तँए जहिना झगड़ा-दनसँ परहेज रखने अछि जे ऐसँ जिनगीक काज बाधित होइए, तहिना फालतू गप-सप करैक समैकेँ सेहो बुझैत। बुझबो केना ने करैत, दिन उगले ने घर-अँगना बना ओइमे बास करैत हँसैत जिनगी सेहो बितबैक छइ। अखन तँ बाले-बोध अछि तँए किए बिआह-दुरागमन आकि नोकरी-चाकरीक बात सोचत। पाँचोकेँ अपन-अपन ऑंगन-घर, चुल्‍हि-चिनवार बना, खाइत-पीबैत, रामलला करैत जिनगी जीबैक छइ। चिक्कन गरदा-माटिक घर-ऑंगन, ऑंगुरेसँ लिखए लगल। जेकरा जहिना होइ से तहिना अपन-अपन आँगुर चलबए लगल। केकरो दिस कियो ने तकैत। तकबो किए करत, सभकेँ ने अपन-अपन परिवारक निमरजना करैक छइ। एक सूरे सभ अपन-अपन आँगुरसँ लिखबो करै आ हल्‍ला होइ दुआरे मने-मन काल्‍हुका सबकक ओरियान सेहो करए लगल। दिन अँचल। पाँचो एके-बेर एक दोसर दिस तकलक। अपन-अपन पाठ सभकेँ कण्‍ठस्‍थ तँए सबहक मनक रोहैन रोहनियाँ आम जकाँ सिनुराएल रहबे करइ। ओना पाँचोमे कनी थतमती सेहो आबि गेलइ। थतमती ई एलै जे पाँचोक बीच एक सबक रहने, सबहक मनेमे रहैए, मुदा सभ दिनक सबक बेरा-बेरी, सभ दिन सभसँ शुरू होइत। तँए कौल्‍हुका मिलानी करैत औझुका केकर पार हएत। मुदा तोहूमे बेसी देरी नहियेँ भेल, किएक तँ चक्कीक चालि सभकेँ बुझले रहै जे के केकरा पछाइत आ के केकरासँ पहिने होएत। अपना-अपना अँगनामे पाँचो ठाढ़ भऽ गेल। एक स्‍वरे पाँचो बाजल- “अपना अँगनामे की सभ देखै छीही?” प्रश्‍नक उत्तर दैत सभ बाजल- “सभ किछ देखै छी, किछ ने देखै छी।” ओना, पाँचोक बीच एकरूपताक बाढ़ि सेहो रहइ। एकरूपता-बाढ़ि ई जे कियो चारि सालमे स्‍कूलक मुँह देखलक आ कियो पाँच सालमे, मुदा अ, आ सीखलक संगे। तँए बाढ़िक हिसाबसँ एक दोसरक पुछबैयो भेल आ सुनबैयो, तसफीया तँ पाँचो मील कऽ करत। एक दोसरकेँ पुछलक- “अपना घरमे की सभ देखै छीही?” दोसर उत्तर देलक- “अन-पानि, धन-धानसँ भरल देखै छी।” खुदरा-खुदरी तँ निर्णय नइ करत। पुछै आ सुनैक अधिकार ने सभकेँ छै मुदा निर्णय तँ ओकाति देख कऽ करए पड़ै छइ। जे पूर्वजक सृजनमे सभ किछु धरोहर अछि, तइ सृजनकर्ताकेँ हवाइ जहाज आ एटम-बम बनबैक लूरि किए ने भेलैन..! देखा-देखी दुनियाँ चलैए, राड़ी-डबहाड़ी फूल तँ अकास मार्गसँ चलिते अछि भलेँ गुलाब अड़हुल धरतीए धेने किए ने रहि जाए...। फेर दोसर तेसरकेँ पुछलक- “अपन घरमे की-की देखै छेँ?” तेसर जवाब देलक- “सरस्‍वतीक फोटो भरल देखै छी मुदा लछमीक छुतियो ने..!” फेर तेसर-चारिमकेँ पुछलक- “तोँ की अपना घर देखै छेँ?” चारिम जवाब देलक- “लछमीक ढेरी देखै छी, सरस्‍वतीक छुतियो ने..!” फेर चारिम पाँचमकेँ पुछलक- “अपना घर की देखै छेँ?” पाँचम जवाब देलक- “मुहेँ-मुहेँ, काने-कान सुनै छी जे लक्ष्‍मी-सरस्‍वतीक बीच सदिकाल खट-पट होइए, तँए दुनूसँ हटले रही।” पाँचम पुछलक पहिलकेँ- “तूँ की देखलेँ?” “सभ फूसि!” दोसर मुरदा जकाँ खोंचारैत पुछलक- “से केना?” प्रश्‍न सुनि पहिल आगू-पाछू ताकए लगल जे बजैकाल तँ बजा गेल जे ‘सभ फूसि’, मुदा जेते सत अछि तइसँ की कम फूसि अछि? केते सत-फूसिक नाँगैर पकैड़ टहलब, तइसँ नीक ने जे खेले उसारि दिऐ। बाजल- “औझुका उसरपन आ कौल्‍हुका समर्पण ई जे अपना घर की खगता छौ?” पहिलक समर्पणक संग चारू बाजल- “अपना घर की खगता छौ?” पहिल बाजल- “घर-अँगना उसारै जाइ-जो।” हाँइ-हाँइ कऽ पाँचो अपन घर-अँगना ओहिना बना देलक जेना एलापर देखने छल। पाँचो टोल दिस विदा भेल। ओना छी पाँचो एके टोलक, मुदा पाँचोक घर फुट-फुट रहने आगू-पाछू भाइए गेल अछि। आँगनक मुँह लग ठाढ़ होइत पहिल बाजल- “खुरपी लेमे की बेँट, हमरा तोरा काल्‍हिये भेँट।” पहिलक जवाब ईहो चारू ओहिना देलक- “खुरपी लेमेँ की बेँट, हमरा तोरा काल्‍हिये भेँट।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 1288, तिथि : 6 दिसम्‍बर 2016 ‘बीरांगना’ लघु कथा संग्रहसँ साभार... बेटीक लिलास बीस बर्ख नोकरी केला पछाइत चिन्‍तू मास्‍सैबकेँ अपन बाल-बच्‍चाक पढ़ाइ-लिखाइपर धियान एलैन। ओना, पॉंच सालसँ सन्‍तान नहि भेलैन अछि मुदा नइ होइक संभावना समाप्‍त भऽ गेलैन सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। सन्‍तान भाइयो सकै छैन मुदा तइ दिस मास्‍सैबक नजैर नहि एलैन। अखन जे दूटा बेटी आ दूटा बेटा छैन तेतबेमे विचार अँटैक गेलैन। हाइ स्‍कूलमे चिन्‍तू नोकरी करै छैथ, एम.ए. पास छैथ। बाल-बच्‍चाक पढ़ाइपर नजैर पडि़‍ते मन पाछू उनैट पितापर गेलैन। पितापर पहुँचते मन पड़लैन अपन पढ़ाइ। अपन पढ़ाइ मन पडि़ते मन अपन विचारोपर एलैन। जखन पढ़ैत रही तखन कहि‍यो मनमे नहि‍ भेल जे ‘इंजीनियर’ बनब कि ‘डाक्‍टर’ बनब। गामक स्‍कूलसँ पढ़ाइ शुरू केलौं आ दरभंगा कौलेजमे समाप्‍त केलौं। जहिना अपना मनमे इंजीनियर-डाक्‍टर नइ आएल छल तहिना पितोजीक मनमे नइ आएल छेलैन। सोझमतिया लोक पिताजीक सोझ विचार छेलैन जे पढ़ल-लिखल लोकक आचार-विचार, क्रिया-कलाप सुधैर कऽ अगुआइत चलत। यएह ने भेल विकासक प्रक्रि‍या। मुदा लगले चिन्‍तू मास्‍सैबक नजैर अपन बाल-बच्‍चापर पड़लैन। चारि भाए-बहिन अछि चारूकेँ शिक्षित बनाएब...। ओना, चारि सन्‍तानमे जेठ बेटी बीचमे माझिल-साझिल दू बेटा आ सभसँ छोट बेटी जे पाँच सालक छैन। जेठ बेटी पनरह सालक छैन जे मैट्रिकमे परीक्षा देत आ माझिल बेटा नौमामे आ साझिल पाँचमामे पढ़ै छैन। छोटकी बेटी सेहो स्‍कूल जाइते अछि। बाल-बच्‍चाक पढ़ाइ दिस नजैर पड़िते मास्‍सैबक मनमे विचार उठलैन जे जेकर काज छी–माने जे पढ़ैए–तेकरोसँ एक बेर पुछि लिऐ जे आगू की पढ़ए चाहैए। अखन तक चिन्‍तू मास्‍सैबक मन आन शिक्षकक देखा-देखीक धारामे बहि रहल छेलैन। तीस हजारक नोकरी, परिवारमे समटल काज तँए महिने-महिने किछु बँचिये जानि जे घटैन नहि। एक तँ छोट परिवार माने छह गोरेक आश्रम, दोसर किछु बपौतियो सम्‍पैत–खेत-पथार–छैन्‍हे। गामेसँ स्‍कूल अबै-जाइ छैथ। जहिना सभ माता-पिताक इच्‍छा अपन बाल-बच्‍चाक पढ़ाइ-लिखाइ दिस रहैए तहिना चिन्‍तू मास्‍सैबक सेहो छैन्‍हे। ओना, गामक बगलेक गाममे हाइयो स्‍कूल आ मिडिलो स्‍कूल रहने ओहन अभिभावक जकाँ खरचो नहियेँ छेलैन जिनका होस्‍टलक खर्च आ ट्यूशन फी, स्‍कूलक खर्चसँ वृहत्‍ जोड़ए पड़ै छैन। डेढ़े किलोमीटरपर स्‍कूल अछि तँए तीनू गोरे–माने बेटी आ जेठ बेटाक संग अपनो, संगे-संग स्‍कूल जाइतो छैथ आ अबितो छैथ। गामसँ गेने-एने होस्‍टलक खर्चो नइ होइ छैन आ साँझ-भोर अपने लग बैसा बेटा-बेटीकेँ पढ़ेबो करै छैथ जइसँ ट्यूशन-फी सेहो नहियेँ लगै छैन। धियो-पुतो चेष्‍टगर रहने आ अपनो दुनू परानी पैंतीस-चालीस बर्खक रहने बर-बेमारीसँ हटल छथिए। ओना, बर-बेमारीक कोनो ठेकान नहि अछि, तँए उम्रक बात नहियोँ अछि, मुदा ईहो तँ ऐछे जे जेते बर बेमारी बच्‍चा आ वृद्धकेँ होइए ओइ अनुपातमे बीचक उम्रबला–मोने चेष्‍टगर बच्‍चा भेला पछाइत आ वृद्धावस्‍थासँ पहिने–कम होइते अछि। तहूमे चिन्‍तूओ मास्‍सैबक आ परिवारोजनक जे दिनचर्या रहलैन ओ बेमारीक रोधक सेहो छैन्‍हे। तँए जँ कहियो कोनो मौसमी छोट-मोट बेमारी होइतो छैन तँ ओहुना माने बिनु इलाजोक वा अपन घरेलू इलाज–जेना सरदीमे तुलसी-पातक करहा–सँ वा छोट-मोट डाक्‍टरी इलाजसँ ठीक भऽ जाइ छैन, तँए बेमारीक ओइ रूप दिस नजरियो नहियेँ गेलैन जे भारी बेमारीक केहेन-केहेन भयंकर रूप होइए। जे रूप देख परिवारोजन आ समाजो भगवानसँ प्रार्थना करए लगै छैथ जे ‘हे भगवान! ऐ जिनगीसँ मरबे नीक, तँए धरतीसँ उठा लियौन..!’ जहिना बेमारीक चपेटमे चिन्‍तू मास्‍सैब अखन तकक जिनगीमे कहियो नइ पड़ल छला तहिना पढ़ाइयो-लिखाइमे नहियेँ पड़ल छला। तहूमे बीस बर्ख पूर्व अपने पढ़ने छला, जइसँ आजुक पढ़ाइ-लिखाइसँ सोल्‍हन्नी अनभुआर तँ नहि, मुदा अनभुआरो नइ छला सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। अनभुआरो-अनभुआरमे अन्‍तर अछिए। अन्‍तर ई जे दोसरकेँ देखलो पछाइत आ गप-सप्‍पक क्रममे बुझबो-सुझब, मुदा बेवहारिक रूपमे नइ केलहा अनभुआर आ दोसर ओ भेल जे ओहू दुनूसँ अनभुआर रहल। माने ई जे छोट-मोट वा सीमित जिनगी रहने ने दोसरकेँ देखबे करैत आ ने गप-सप्‍पसँ बुझबे करैत। चिन्‍तू मास्‍सैब ऐ दुनू कारणसँ अलग अनभुआर छैथ। अलग ई जे अपनो तँ एम.ए. तक पढ़नहि छैथ। मुदा तइमे भेलैन ई जे एक तँ नवकबरिये लोक छला, दोसर पिताक जुमौल खर्च रहैन, तँए खर्चपर धियाने ने गेलैन। मुदा पढ़ाइपर धियान रहने नीक जकाँ एम.ए. पास तँ कैये नेने छला। तीस हजारक नोकरियो भाइये गेलैन जे महिने-महिने बैंकसँ दरमहो भेटते छैन, तँए कहियो एहेन भेबे ने केलैन जे पाइ दुआरे काज मारल गेल होइन। तेतबे नहि, अपनोसँ प्‍लेन पेपर जकाँ मास्‍सैबक पत्नी–मनमोहनी–क जिनगी रहलैन। अपन खेतक परियाप्‍त उपजा, खाली कोठीसँ चाउर-दालि निकालि-निकालि मनमोहनी भानस करैत रहली आ बजारक चाह पत्ती-चिनीसँ चाह बनबैत रहली, तँए मनमोहनी किए कहियो ई बुझितैथ जे बिनु दूधोक चाह बनै छै आकि चिन्नीक बदला नूनोसँ लोक काज चलबैए वा बिनु चाह पीनहुँ जिनगी जीबैए। जहिना पढ़ाइ-लिखाइ आ बर-बेमारीक बेवहारिक पक्षक बोध दुनू परानी चिन्‍तू मास्‍सैबकेँ नहि छेलैन तहिना परिवारिक काजक सेहो नहियेँ छेलैन। पिताक अछैत माए मरलैन जइमे सभ क्रिया-कर्म पिते सम्‍हारने रहैन, अपने खाली माइक मुखाग्निक संग गरदेनमे उतरीटा नेने रहैथ, कहैले तँ एकभुक्त करैत रहैथ मुदा सबेरमे जलखैयो करिते छला आ चाहो पीबते छला। तहिना पितो बेरमे भेलैन, अपने मुखाग्नि दए उत्तरी लेलैन आ बाँकी क्रिया-कर्मक गारजनी मामा सम्‍हारि देने रहथिन। अपने तँ परिवारक ओहन भारी काज रहितो जे तेरहे दिनमे सम्‍हारए पड़ैए, जइमे काजक धुमसाही भाइए जाइए, तहूमे काजसँ अलग भऽ भरि दिन गरूड़-पुराण पढ़बो करैथ आ सुनबो करैथ, तहीमे समै कटि गेलैन। ओना, खर्च अपने भेल रहैन जे बैंकक हिसाबमे छेलैन तँए ठौर-ठेकान लगले बिसैर गेला। बिसरबो केना ने करितैथ। मासे-मासे तीस हजारक आमदनी रहबे करैन। दरबज्‍जापर बैसल चिन्‍तू मास्‍सैब हाक दैत मनमोहिनी आ बेटी कामिनीकेँ शोर पाड़लैन। सभ अँगनेमे रहैथ तँए लगले दुनू गोरे लग आबि गेलैन। अबिते पत्नीकेँ कहलखिन- “ऐबेर कामिनी मैट्रिक पास करबे करत। पढ़ैमे नीक अछिए। कोनो विषय एहेन छइहे नहि जइमे मिसियो भरि शंका फेल करैक छै, तँए आगूक पढ़ाइक विचार पुछब अछि।” बेटीकेँ आगूक पढ़ाइ सुनि मनमोहिनीक मनमे मोहैन चललैन। मोहैन चलिते मनमे रंग-रंगक विचार जहिना सभ माएकेँ जगैत तहिना मनमोहनीकेँ सेहो जगए लगलैन। जगिते बजली- “लड़का-लड़की मिला गाममे पनरह गोरे मैट्रिकमे अछि, तइमे अहीं कहू जे हमर बेटी केकरासँ कम चन्‍सगर अछि। जँ एहेन बेटीकेँ चान्‍स नहि भेटौ तँ केहेनकेँ भेटउ।” ओना चिन्‍तू मास्‍सैब पत्नीक आगूमे पुरुख पात्र छैथ, मुदा मनमोहनीक जे तर्क भेल ओ चिन्‍तू मास्‍सैबकेँ मोहि लेलकैन। मोहैक कारण भेलैन जे सचमुच स्‍कूलमे कामनी नीक विद्यार्थी अछिए। अहीमे सँ ने जे जेहेन अछि–माने पढ़ैयो-लिखैमे आ आर्थिक दृष्‍टिसँ सेहो–ओ ओहेन बनबे करत। ओना एम.ए. पास चिन्‍तू मास्‍सैब छैथ, मुदा जहियासँ कौलेज छोड़लैन तहियासँ ने एको पाइक किताब कीनि पढ़लैन आ ने समैयेक बचत होनि जे विचारवान लग बैस जिनगीक विचार करितैथ। कौलेजसँ टटका पढ़ि कऽ निकलले छला, हाइ स्‍कूलक किताब पान-सात साल पहिनहि पढ़ि चुकल छला, तँए ढलानपर जहिना निच्‍चाँ मुहेँ गाड़ी ढलकैए, जे बिना तेलो-मोबिलक अपना गतिसँ बेसी जोरसँ चलिते अछि, सएह बुझैमे चिन्‍तू मास्‍सैब हूसि गेला। हूसि ई गेला जे पैछला इतिहास तँ धियानमे रहलैन जे फल्‍लाँ साधारण परिवारसँ निकैल अपन उपार्जन करैत नीक डिग्री हाँसिल केलैन, मुदा भविस आ वर्तमानक परिस्‍थिति नहि आँकि सकला। ई नहि आँकि सकला जे प्रतिभा आइक प्रतियोगितामे पिछैड़ रहल अछि...। चिन्‍तू मास्‍सैब बजला- “अहाँक तँ दीब विचार अछि, जे अपनो मन कहैए।” माता-पिताक विचार सुनि कामिनीकेँ अपन प्रकाशित भविस सोझमे एलइ। अपन उज्‍वल भविस, चाहे ओ काल्‍पनिक हौउ आकि वास्‍तविक, मुदा केकरा अधला लगै छै जे कामिनीकेँ लगैत। मन कलैश गेलइ। कलैशते जेना कामिनीकेँ मनसँ मुस्‍कुराहटक अवाज फुटए लगलै मुदा मुहसँ निकललै नहि। ओना, बोलीक रूपमे मुहसँ नहि फुटलै मुदा चेहराक रंग-रूपमे जरूर फुटि गेलइ। लहलहाइत बेटीकक चेहरा देख मनमोहिनीक मन भँसिया गेलैन। ओना अपना नइ बुझि पड़लैन जे हम भँसिया रहल छी, बिहुसैत बजली- “अपना दुनू गोरे तँ माए-बाप भेलिऐ, बड़ करबै तँ पढ़ाइक खर्चक पुरती करबै मुदा पढ़ाइक पुरती तँ कामिनी अपने ने करत। तँए नीक हएत जे लगेमे कामिनी बैस सभ बात सुनबे केलक। अपन निर्णय अपने करह।” पत्नीक विचार चिन्‍तू मास्‍सैबकेँ मिसियो भरि अधला नइ लगलैन। पत्नीक विचारमे भँसियाइत बजला- “बेस तँ विचार अछि। बाजह कामिनी अपने मुहेँ जे माए-बापक विचार केतो अधला बुझि पड़ै छइ।” तीन मास पहिने कामिनी मात्रिकसँ नानीक सेवा कऽ आएल छल। माने ई जे नानीक टाँग टुटि गेल छेलैन। ओसारपर पीढ़ियामे तेना ठेँस लगि गेल छेलैन जइसँ खसि पड़ली। दहिना पैरक घुट्ठीक कील छिटैक गेल छेलैन, जइ दुआरे दरभंगा डाक्‍टर ऐठाम जाए पड़ल छेलैन। ओही इलाजक दौड़मे कामिनी सेहो दरभंगा गेल छल। दुनू परानी डाक्‍टर रहने दुनू रंगक रोगीक पहुँच डाक्‍टर ऐठाम रहबे करैन। नवतुरिया बच्‍चा कामिनी, दुनू परानी डाक्‍टर, कामिनीकेँ बच्‍चा बुझि लगेमे बैसा रोगियो देखैत आ इलाजो करिते रहैथ। जइसँ कामिनीकेँ कोनो काज उकड़ू नहियेँ बुझि पड़इ। तैसंग आमदनी सेहो देखने रहए। साओन मासक बरखा जकाँ पाइ झहरैत। हिया कऽ कामिनी डाक्‍टरकेँ देखलक तँ बुझि पड़लै जे हमहूँ पढ़ि कऽ डाक्‍टर बनि खुशहाली जिनगी जीब सकै छी। जे कामिनीक मनमे गड़ि गेल छल। ओना, जहिना पहाड़क जलधार हौउ आकि मेघक जलधार, ओ जखन निकलैए तखन थोड़े कोनो धारक नाओं आकि सरोवर-डबराक रहैए ओ तँ आगू बढ़ला पछाइत होइए तहिना कामिनीक चेतनशक्‍ति सेहो छेलैहे...। बाजल- “बाबू, माता-पिताक आसिरवचन बेटा-बेटीकेँ सहज स्‍वीकार कए लेबाक चाही। जँ अपने दुनू गोरेक एकमुहरी विचार अछि तँ तेही मुहेँ कहै छी। हम डाक्‍टरी पढ़ब।” एक तँ ओहुना लोकक एहेन धारणा बनियेँ गेल अछि जे डाक्‍टरी सभसँ नीक पढ़ब छी। ओना अनेको किस्‍मक डाक्‍टरी ज्ञान अछि, से अखन नहि। अखन मनुखक चिकित्‍सक रूपमे डाक्‍टर। कामिनीक मुहसँ विचार खसिते जहिना मनमोहिनी तहिना चिन्‍तू मास्‍सैब सेहो ऊपरे लोकि लेलैन। जइसँ जेते खुशी कामिनीक हृदयमे छल तइसँ केते गुणा बेसी दुनू परानी–माता-पिताक–मनकेँ मोहित कए लेलकैन। नोकरीक तीस हजार दरमाहा सोझेमे रहैन तँए पढ़ैक खर्चपर नजैर किए जइतैन। भस्‍मासूर जकाँ दुनू परानी आसिरवचन दइले मुँह खोलैसँ पहिने एक-दोसरक मुँह दिस तकलैन जे पहिने के बाजब। अही गुन-धुनमे दुनू परानी–चिन्‍तू मास्‍सैब–रहबे करैथ कि तैबीच विवेक बाबू पहुँचला। विवेक बाबू सेहो हाइये स्‍कूलमे चिन्‍तू मास्‍सैबक संग नोकरी करै छैथ। शिक्षक छैथ। ओना, विवेक बाबू चिन्‍तू मास्‍सैबसँ उमेरोमे जेठ आ दू साल पहिने एम.ए. सेहो केने रहैथ। विवेक बाबूकेँ एला पछाइतो मनमोहिनीक मनमे जेठ-छोटक विचार नइ जगलैन। विचार नइ जगैक कारण छेलैन जे ममियौत भाइक अनेमे विवेक बाबू लगै छेलखिन। बच्‍चेसँ मात्रिक एने-गेने मनमोहिनी निधोख छथिए। अबिते विवेक बाबू देखलैन जे परिवारमे खुशीक लहैर दौड़ रहल अछि, किछु बात जरूर अछि। मनमे खुशीक कारण बुझैक जिज्ञासा जगिते रहैन। मुदा मनेमे असथिर चित रहने उठलैन जे जहिना सोग-पीड़ा केकरो छिपौने नइ छिपैए तहिना ने खुशियो-खुशियाइए जाइए। ओना, जिनगी परखैक तीक्ष्‍ण नजैर विवेक बाबूक तँए जिनगियो तँ हँसी-ठठा नहियेँ छी जे एकबेर कहि देबै जे- जोगिरा सर्र-र्-र्...। आ जोरसँ हँसि देबै तइसँ जिनगी हँसै-जोकर भऽ जाएत, एहेन बुझब बचपना भेल। ओना विवेक बाबूक परिवार चिन्‍तूए मास्‍सैब जकाँ छैन। हुनको दू लड़की आ दू लड़का छैन। मुदा जहिना कियो ज्‍योतिषी अपन जीवन रेखा देख अपन भविस गुनि लइ छैथ तहिना विवेको बाबूक स्‍पष्‍ट सोच छेलैन। स्‍पष्‍ट सोच ई जे आइक परिवेशमे हमरा सन लोककेँ जिनगी बोझिल बनबैक बेवस्‍थामे पाछू धकेल रहल अछि। जेते बात (विषय) बुझैले पहिने महिना दिन किताब धाँगए पड़ैत तैठाम मशीनी युग भेने आइ घन्‍टा-सकेण्‍डक खेल बनि गेल अछि। तैठाम अपने ने विचारए पड़त जे अपन की ओकाइत अछि। हाइ स्‍कूलक शिक्षक छी, जँ बेटा-बेटी प्रोफेसर बनि जाए, वा कोनो बेवसायी बनि जाए आकि अपन जिगनी समयानुकूल चलबैक लूरि भऽ जाइ तँ वएह भेल जिनगी आ परिवारकेँ आगू बढ़ब। तैठाम जँ तहूसँ आगूक घाटसँ हेलए चाहै छी तँ एक नजैर विचार केला पछाइत हेलब। एक तँ भैयारीक अनेमे विवेक बाबू, दोसर चिन्‍तू मास्‍सैब सन पति जिनकर ‘गनल कुटिया नापल झोर’ सन जिनगी छैन जे भरि दिन विद्यालयक नोकरीक भाँजमे रहै  छैथ, तीस हजार पबै छैथ। ने कहियो नूनक दुख होइ छैन आ ने तेलक। तैठाम जेहने चिन्‍तू मास्‍सैब बुझैमे अगिया-बताल छैथ, तेहने पत्नियोँ छथिन। एक तँ भैयारीक सम्‍बन्‍ध विवेक बाबूक संग मनमोहनीक अछि तैपर बेटीमे डक्‍टरक रूप देखैत तँए बजैले मनमोहिनीक मन उबियाइते रहैन। बजली- “भैया, अहाँक भगिनी डाक्‍टर बनत, से असीरवाद दियौ।” बहिनक बात सुनि विवेक बाबूक विचारमे जोरक धक्का लगलैन। मन कहलकैन- मुहसँ असीरवाद देने जँ होइत तँ केकरा के असीरवाद नइ दइए, तखन होइ किए ने छइ? विवेक बाबू बजला तँ किछु नहि मुदा मुस्‍किया जरूर लगला। खुशीसँ मुस्‍कियेला कि हँसीसँ मुस्‍कियेला से तँ विवेक बाबू जनता कि चिन्‍तू मास्‍सैब आकि मनमोहिनी बहिन जनथिन, मुदा वातावरणमे थोड़ेक नरमी जरूर आएल। वातावरणमे नरमी अबिते चिन्तू मास्‍सैब पत्नीकेँ कहलखिन- “विवेक भाय अहींटाक भाए नहि छैथ, जे चाह नहियोँ पीएबैन तँ बहिन बुझि केतौ लोक लग नइ बजता।” खग जानए खगक भाषा, एक तँ मनमोहिनीक मन बेटीकेँ डाक्‍टरक रूपमे सीकपर टँगल रहबे करैन तैपर भाइक असीरवाद सेहो लेब छैन किने, तँए मनमे चाहक बदला कॉफी नहि उपकैन सेहो केहेन हएत। तैयो मनमोहनी चाहे बनबए विदा भेली। जहिना चिन्‍तू मास्‍सैब विवेक बाबूक विचार सुनैले कान पथलैन तहिना विवेक बाबू चिन्‍तू मास्‍सैबक मुहसँ कामिनीक विषयमे सुनए चाहै छला। किएक तँ अखन तक मौगी-मेहरिक बात मनमे नचै छेलैन। नचबो केना ने करितैन, एक तँ सहकर्मी चिन्‍तू मास्‍सैब छथिन, दोसर एम.ए. पास सेहो छथिए, तँए विवेक बाबूक अपन मन केना मानितैन जे हम जे बुझै छी से चिन्‍तू मास्‍सैब नइ बुझै छैथ। अही द्वन्‍द्वमे दुनू गोरे लटकल छला। मुदा दू गोरेक बीच जखन गुमा-गुमी पसैर जाइत अछि तँ वातावरणमे किछु मोड़ अबिते अछि। वातावरणमे मोड़ अबिते चिन्‍तू मास्‍सैब बजला- “भाय साहैब, ऐ साल पाँच हजारक बढ़ोत्तरी शिक्षकक जिनगीमे भारी उछाल आनत।” ओना, चिन्‍तू मास्‍सैब पाशा बदैल बाजल छला, मुदा विवेक बाबू पाशा पैसैकेँ रहलैन। तँए बहटारैत बजला- “सरकारक बात अखन अखबारेमे आएल अछि, सहर-जमीनपर अबैत-अबैत केते दिन लागत आकि नहियेँ औत, तेकर कोनो ठेकान अछि।” तही बीच मनमोहिनी चाह नेने पहुँचली। आगूक विचारकेँ जहिना चिन्‍तू मास्‍सैब रोकलैन तहिना विवेक बाबू सेहो रोकला। मुदा लगले विवेक बाबूक विचारमे मन धक्का मारलकैन। धक्का ई मारलकैन जे जहिना लगक लोक चिन्‍तू बाबू छैथ तहिना मनमोहिनी बहिन सेहो छी, आगू दिन जँ कोनो संकटमे फँसता तँ लगक लोक रहने पहिने हमरे ने कहता। तँए परिवारक जे दशा-दिशा अछि ओ अपने जे बुझै छी से जरूर कहबैन। भऽ सकैए जे हमर विचार प्रतिकूले भऽ जाइन। तइले तँ बड़ भारी जवाबदेहियो तँ नहियेँ रहत, कहबैन जे ओइ दिन जे बुझै छेलौं तइ अनुकूल बाजल छेलौं, आइ ओइसँ आगू बुझै छी...। विचार उठैत-उठैत विवेक बाबूक मन मानि गेलैन जे अपन विचार जरूर दुनू गोरेक बीच रखि दिऐन, भलेँ तीत लगैन आकि मीठ...। तैबीच तीन-चारि घोंट चाह पीब नेने छला। मनमोहिनी से कान ठाढ़ केने जे भैया थोड़े गड़बड़ असीरवाद कामिनीकेँ देथिन। शान्‍तचित्तसँ विवेक बाबू बजला- “बहिन, केकरा नइ मनमे रहै छै जे परिवार आगू नहि बढ़ए मुदा ओ रब्‍बड़क बैलून नइ ने छी जे हवा भरि अकासमे उड़ा देबइ। विवेकशील मनुखक डेग तँ अपन पाछूसँ अबैत जिनगीकेँ अँकैत ने आगू उठत।” ओना, विवेक बाबूक विचारकेँ मनमोहिनी नीक जकाँ नइ बुझली मुदा अधा-छिधा चिन्‍तू मास्‍सैब जरूर बुझलैन। ओना मनमोहिनीक मनमे उठए लगलैन जे ई केहेन हएत जे भैयाकेँ कहबैन अहाँक बात नइ बुझलौं! तँए मनमोहिनी चुपे रहब नीक बुझली। पत्नीकेँ चुप देख चिन्‍तू मास्‍सैब बजला- “भाय साहैब, तेहेन अलंकारमे अपने बजलिऐ जे बहिन बुझने हेती कि नहि। असल तँ हुनका ने बुझाएब अछि। बेटाक बात रहैत तँ कनी जोरो करितौं मुदा बेटीक बात छी किने। ओ तँ माइयेक ने...।” चिन्‍तू मास्‍सैब जइ हिसाबे बाजल होथि मुदा विवेक बाबू अपना हिसाबे बजला- “बहिन, बेटीक प्रश्‍न अछि, तँए आइक परिवेश की अछि से कहै छिअ। कामिनी डाक्‍टरी पढ़त नीक बात, नीक विद्यार्थी अछिए, मुदा आइक परिवेशमे बेटी पैघ समस्‍या बनि गेल अछि।” ‘पैघ समस्‍या’ सुनिते मनमोहिनी चौंकैत बजली- “से की?” बहिनक जिज्ञासा देख विवेक बाबूक मनमे चैनक हवा लगलैन। बजला- “बहिन, एक तँ अपना सन-सन परिवारमे डाक्‍टरी शिक्षा ओकाइत सँ बहार अछि। जइ हिसाबक खर्च अछि आ जे समाजिक रूप-रेखा बनि गेल अछि तइमे बेटीकेँ डाक्‍टर बनब आरो बोझिल...।” बिच्‍चेमे मनमोहिनी बजली- “से की?” बहिनक बढ़ैत जिज्ञासा देख विवेक बाबूक मनमे उठलैन जे नीक हएत, एक-एक प्रश्‍नपर दुनू परानीक विचार लइत चली...। बजला- “बहिन, जन्‍मसँ लऽ कऽ जाधैर बेटीक बिआह होइए ताधैरिक भारी बोझ माए-बापक कपारपर ऐछे किने?” मनमोहिनी- “से तँ अछि, मुदा बुझलौं नहि।” विवेक बाबू- “जेते खर्च आ मेहनत बेटीकेँ डाक्‍टर बनबैमे लगेबह, से समाज बुझतह? जेते पढ़ैमे खर्च हेतह तइसँ बेसी बिआहमे दहेज सेहो लगतह। अहू विचारपर ने नजैर राखए पड़तह।” मनमोहिनी ठमैक गेली, मुदा चिन्‍तू मास्‍सैबक मन अखनो पत्नीक विचारमे लटकले छेलैन। बजला- “कनी सोझरा कऽ बजियौ ने।” विवेक बाबू- “बेकती आ परिवार-ले मूल-भूत जे खगता अछि, ओइ सभपर नजैर रखक चाही। जँ से नहि रहत तँ कखनो ढनमना जाएत आ भाग्‍य-तकदीरकेँ कोसए लगबै। परिवारमे चारिटा बच्‍चा अछि, चारूक लेल अपन ओहन सोच बनाउ, जइसँ बेटा-बेटीक आगू भविसमे दोखी नइ बनी।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2621, तिथि : 11 मार्च 2017 ‘स्‍मृति शेष’ लघु कथा संग्रहसँ साभार...। [1] दोसर बिआह करब बरजित [2] समय [3] घरक मालिक- बेटापर [4] सासु-पुतोहु [5] चिक्कन कएल माटिक घेरा ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डलक दूटा बीहैन कथा भितरिया चोट चाहक दोकान लग किछु लोक ठाढ़ छल आ किछु बैसल छल। गप्‍पक छरक्का छुटि रहल छेलइ। विषय छेलै- आइ-काल्‍हिक लोक सभटा काज स्‍वार्थेक कारण करै छइ। मुदा हम ऐ बातपर अड़ल छेलौं जे किछु काज लोक ओहनो करैत अछि जइमे कोनो स्‍वार्थ नइ रहै छइ। जइ काजकेँ ‘उपकार’ कहल जाइ छइ। एम.एल.ए.क चुनाउ होइबला छेलइ। चुनाउक समैमे तँ पुलिसकेँ जेना पाँखि लगले रहै छइ। तखैने ओइठाम एकटा पुलिसिया गाड़ी रूकल। रूकल नहि बल्‍कि रोकए पड़लै। कारण छेलै, एकटा साइकिल सड़केपर ठाढ़ छेलै आ साइकिलबला केतौ चलि गेल छल। एकटा सिपाही गाड़ीसँ उतैरते बाजल- “केकर साइकिल छियौ रौ? साहैबक गाड़ी रूकल छइ। हटेबें जल्‍दी आकि देखबीही।” मुदा कियो साइकिल हटेबाक लेल नहि आएल। सिपाही पूरा तमसा गेल छल। ओकर रौद्र रूप देख हम जेना भीतरसँ डेरा गेल रहौं। हम तेजीसँ गेलौं आ साइकिलकेँ हटबए लगलौं। कमजोर रहने कनी अस्‍थिरसँ हटबै छेलौं। डरेबर बारम्‍बार हॉर्न बजा रहल छेलइ। सिपाही डण्‍टासँ हमरा पजरामे गोंजी मारैत बाजल- “तोहर खतियानी रोड छियौ। टेर मारैत केना चलैए! देखै नइ छै जे साहैबकेँ लेट होइ छइ!” हड़बड़ाइत आगू बढ़लौं कि रोडक कातमे साइकिल नेने खसि पड़लौं। चाहक दोकानपर लोक ठिठिया कऽ हँसि देलक। पुलिसिया गाड़ी हॉर्न दैत चलि गेल। एक गोरे टिटकारी मारैत बाजल- “की यौ उपकारीजी, की भेल?” डण्‍टासँ तँ कमे चोट लगल छल मुदा ‘की यौ उपकारीजी’ सुनिते भितरिया चोट जेना कुहरा देलक। लोक दिस तकलौं तँ लगल जेना नँगटे ठाढ़ छी। लाजे मुड़ी गोंतने विदा भऽ गेलौं।◌ छोटकू दोस कृष्‍णाष्‍ठीक मेला लगल छल। दू-तीनटा संगीक संगे मेलाक गेट दिस ठाढ़ छेलौं। कृष्‍ण-सुदामाक मित्रतापर चरचा भऽ रहल छल। एकटा संगी बाजल- “देखियो जे कृष्‍ण आ सुदामाक दोस्‍ती। एगो राजा आ दोसर रंक। दुनूक दोस्‍ती एकटा ऐतिहासिक उदाहरण बनल अछि ऐ जुगमे एहेन दोस्‍ती संभव भऽ सकै छइ।” दोसर संगी बाजल- “नहि यौ, दोस्‍ती बरबैरमे होइ छै, तबे निमाहलो जाइ छै, नहि तँ ओ टुटि जाइए।” हमरा बाजए पड़ल- “केना नहि भऽ सकै छइ। हमर बाबूजी आ जगाधर बाबू दुनूमे केना दोस्‍ती छइ। जगाधर बाबूक परिवारमे तीन-तीनटा इन्‍जीनियर छैन आ हमर बाबू बिलकुल गरीब, तैयो हमरा बाबूसँ हुनक परेम देखियौ।” तखैने बगलमे एकटा कार रूकल। गजाधर बाबूक संगे एकटा ऑफिसर कारसँ उतरल। हम गजाधर बाबूकेँ देखते पएर छुबि प्रणाम केलिऐन। गजाधर बाबू बजला- “की रौ बाबू ठीक छौ ने?” कहलयैन- “जी ठीके छथिन।” गजाधर बाबू सँगे आगू बढ़ैत ऑफिसर पुछलकैन- “के छी ई बालक? संस्‍कारी बुझाइत अछि..!” मुँह घोंकचबैत गजाधर बाबू बजला- “धुर, छोड़ू ने। एकटा छोटकू दोसक बेटा छी।” गप करैत दुनू गोरे आगू बढ़ि गेला। गपकेँ झाँपैले हम किछु बाजए चाहलौं कि बिच्‍चेमे एकटा संगी चद-दे कहि देलक- “चुप रहू यौ छोटकू दोसक बेटा।” हमर बोलती बन्न भऽ गेल छल।◌ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र लोक वेद आ व्यवहारक पाबनि मधुश्रावणी – मानवशास्त्रीय विवेचन एक बेर प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन एकाएक हमरा पुछलनि, "मिथिला में कुन चीज़ थिक जे लोक आ शास्त्र, सब कला के एक सङ्गे जोड़ने अछि?" हमरा भेल की उत्तर देल जाय? संयोग सँ किछुए दिन पहिने मधुश्रावनी कथा माँ सँ सुनि रेकॉर्ड केने रही आ बाद में ओकरा लिखने रही। भेल ई एक उत्तर भ सकैत छैक। हम झट दनि कहलियन्ह , "मधुश्रावणी पावनि”। हमर उत्तर सुनि प्रोफेसर जैन बहुत प्रसन्न भेला। कहलथि, "बिलकुल सत्य कहैत छी। यैह सही उत्तर अछि। अहाँक मिथिला में ई गजब के पावनि अछि जे अनेक तरहक ज्ञान, शिक्षा, कला, के सिखबाक प्लेटफार्म नव व्याहल लड़की लेल तैयार करैत अछि। ई एक एहेन पावनि अछि जे लोक आ शास्त्र के जोड़ैत अछि। अहाँक जवाब सँ हम संतुष्ट छी।" बात पर हम अतेक गौर नहि केलौं। कतेक दिन सँ मधुश्रावणी पर किछु लिखबाक इच्छा अछि मुदा आलस आ किछु आन कारणे नहि लिख पाबि रहल छी। सविता झा खान केर एक प्रश्न ओहो अति लघु प्रश्न अनेक दिशा के दरबज्जा खोलि देने अछि। जबाब एक ठाम सँ भेटब असंभव। खेपे खेपे अनेक ठाम सँ आनय पड़त। सैह क रहल छी। अहि बात पर सविता जी कहलनि, "आब थोड़ेक मधुश्रावणी पर लिखू"। हुनका नहि कहबाक हिम्मत नहि भेल। माँ के कहल मधुश्रावणी कथा के फेर पढनाई शुरू केलौं। ओहि में प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन केर जिज्ञासा (अथवा खोज) आ सविता झा खान के जिज्ञासा केर तत्त्व ताकय लगलौं। पहिल बेर में लागल किछु छैक जरूर। फेर भेल, "कतेक छैक?" कतेक छैक आ कत-कत छैक ताहि बातक रहस्य तकबा लेल ओहि कथा के अनेक बेर पढ़लौं। एक मैथिल समाजक सदस्य के नाते पढ़लौं। एक मानव विज्ञान केर छात्र के रूप में पढलौं। सब सँ पैघ बात ई जे एक जिज्ञासु के रूप में पढलौं। हमरा जे भेटल सँ हमरा जनैत अपूर्व बात छैक। अपन ज्ञान आ समझ के हिसाब सँ ओकर संक्षिप्त व्याख्या क' रहल छी। मधुश्रावणी अपन मिथिला में विवाहक पश्चात 13-15 दिन धरि के पाबनि छैक। जाहि में नाना तरहक फूल, पात, फड़ लोढ्नाई, पूजा केनाई, गीत गेनाई,विध बेबहार के संपादन, नियम निष्ठा के पालन, आ प्रति दिन कथा केर एक अथवा अनेक प्रसंग के समूह में बैस सुननाइ शामिल छैक। बरखा ऋतु में भेलाक कारने एकर नाम मधुश्रावणी बहुत सार्थक लगैत छैक। अगर विस्तृत फलक पर उदार भाव सं देखबैक त कहि सकैत छी जे मधुश्रावणी अपन मिथिला में मिथिला बला स्टाइल के हनीमून छैक। बरसातक मधुमास आ ताहि के मधुराति के जे आनंद मिथिला में छैक से कहाँ – प्रेमानन्द, परमानन्द! मधुश्रावणी वस्तुतः एक सम्पूर्ण पाबनि छैक जाहि में लोक आ शास्त्र, पुरुष आ प्रकृति, मनुख के प्रकृति केर अवयव जेना पानि, नदी, पोखरि, गाछ, झाड़-पात, लत्ती-फत्ती, फूल-फल; जीव-जंतु, सांप, कीड़ा; धरती-अकास, समतल आ पहाड़ आदि के बीच कोना साम्य बनबैत सबहक संगे कोना जीबी, कोना रही तकर शिक्षा, बल्कि व्यवहारिक शिक्षा देल जैत छैक। कोना स्थानीयता के सम्मान करैत समग्रता के भाव के स्वीकार करी, से शिक्षा देल जैत छैक। शिक्षा क्लास रूम सं अधिक ओपेन थिएटर जकां परिवेश में देल जैत छैक। जतय एक मांजल कथा वाचिका अपन कथा के ज्ञान सं आ अहु सं अधिक कथा कहबाक शैली सं नव व्यहिता के एक-एक कथा के खोइंछा छोड़ा-छोड़ा सुनबैत रहैत छथि। जखनओ कथा वाचिका कथा कहैत छथिन त ओ हरेक पात्र के अपना में समाहित क लैत छथिन। कथा केर पात्र जकां हंसनाइ, गेनाई, नहु-नहु बजनाई, जोर सं चिचियेनाइ, नाना तरहक जीव जंतु केर आवाज निकालनाइ, कहबाक शैली में उपर नीचा के भाव व्यक्त केनाई, सब किछु सर्वोत्तम। अभिनय केर पराकाष्ठा। ई एक एहेन स्टेज होइत छैक जाहि में स्त्री, पुरुख, देवता, दानव, जीव-जंतु, सबहक भूमिका मात्र एक कलाकार के करय पड़ैत छैक – वैह एक्टर, वैह डायरेक्टर। बीच में कुनो ब्रेक नहि। कतौं सं कुनो सहयोग नहि।  मुदा बाह रे परंपरा मिथिला भूमि के आ बाह रे मैथिलानी! हरेक कथा वाचिका अपन दायित्व केर पालन बेजोड़ दंगे उत्कृष्ठता सं करैत छथि। अतेक प्रभावी ढंग सं जे, जे पूजैत छथि से त कथा सुनबाक हेतु बैसते छथि हुनका संगे आनो  स्त्रीगन सब सुनैत रहैत छथि।  जेहने कलाकार तेहने दर्शक – दुनू के बीच परफेक्ट हारमनी। आ कनिया के की कहब ओ चुपचाप एक गंभीर शिष्या जकां कथा वाचिका के हरेक शब्द के ज्ञानरूपी अमृत के एक एक बूंद मानि पिबैत रहैत छथि। एहि में भूमि-चित्रण अर्थात अरिपन केर ज्ञान भेनाई सेहो आवश्यक छैक। मधुश्रावणी केर अरिपन में वर्गाकार बॉर्डर के भीतर सुरुज, चान, कलश, पुरहर,पातिल, साठी (षष्टिका), मैना पात, नागक लटपटाएल जोड़ी, नवग्रह, नौमात्रिका आ कमल फुल के बिम्ब के रूप में गौरी, कुसुमावती, पिंगला, लीली आ चनाई आदिक समावेश बहुत व्यवस्थित ढंग सं कैल जैत छैक। एक गोट नव डाबा पर माटि आ गोबर सं पांच टा साँप बना साटि देल जैत छैक। पांचो सांपक थुथुन में दुभि खोईस देल जैत छैक। अरिपन काढब अथवा पारब में सब बिम्ब के स्थान, दिशा, कोण, स्वरुप आदिक ज्ञान आ शैली में निष्णात भेनाई अनिवार्य होइत छैक। चूँकि ई पाबनि अहिबात, वंश बृद्धि एवं वर आ कनिया के शुभ सँ जुड़ल छैक तांहि परफेक्शन में कनिकबो कोताही के गुंजाइश नहि रहैत छैक। पूजा में व्यवहरित सामग्री सं पता चलैत छैक जे बालिका के अहू बातक प्रशिक्षण देल जैत छनि जे ओ सब बस्तु के जानि लेथि। प्रतीकात्मक गौरी बनेबाक हेतु हरदि, कुसुमक फूल, सिंदुर, पान आ मेथी के पीसिक’ एक गोल आकृति केर प्रतिमा बना नव ढोरल सरबा में ठाढ़ क देल जैत छैक। एकरा अलावे मैना पात,नेवो, नीम, दूध, केरा पात, फूल, काजर, अरबा चाउर, चुडा, चुडलाई, चीनी, लाबा, आम, कटहर, केरा, अंकुरी, दही, सुपारी, बड़की-छोटकी इलायची, जाफ़र,लौंग, बड़का छोटका हडरी, बहेड़ा, नीमक पात, अमतौआ अनार, पखुआ, कुश, धामिक पात आदि के प्रयोग होइत छैक। अहि में अधिकांश बस्तु के एक नव वस्त्र में राखि एक पोटरी बना देल जैत छैक जकरा बिनी कहल जैत छैक। एहि बिनी के गौरी आ बिषहरि के स्वरुप मानि भोर साँझ पूजा अनिवार्य रहैत छैक। मधुश्रावणी पूजा आ कथा नागपंचमी दिन सं प्रारंभ भ जैत छैक। प्रतिदिन पूजा भेल आ स्त्रीगन सब पूजा सं पहिने आ पूजाक बाद गीत गेलथि। पूजा में संस्कृत आ मैथिली केर अद्भुत मिश्रण बला शब्द आ मन्त्र भेटैत छैक यद्यपि पण्डित जी के कुनो भूमिका एहि में नहि रहैत छनि। एक अनुभवी महिला अन्य महिला केर सहयोग सं एहि कार्य के संपादन में कनिया के निर्देशित करैत छथिन। सब चीज़ सटीक होइक तकर विशेष ध्यान रहैत छैक। गौरी पूजन केर एक मन्त्र देखू त संस्कृत आ लोक शब्दावली के सुखद जोग पर आनंदित हैब: “ऐ गौरी! महामाये, चानन डारि तोडैत एलहुं, सोहाग-भाग बटैत एलहुं, फूलक माला अहाँ लिअ, सोहाग-भाग हमरा दिअ, स्वामी-पुत्र सहित गौर्ये नमः।” फेर पूजा करक विधान आ ककर बाद ककर पूजा करी तकर विस्तृत व्याख्या आ रुपरेखा निर्धारित रहैत छैक। एहि क्रम में गौरी केर पूजा के बाद कलश केर पूजा, बिषहरि केर पूजा, तकर बाद लगातार वैरसिक, चनाइ नाग, कुसुमावती, पिंगला, लीली नाग, शतभगिनी सहित गुसाउनि नाग, साठि आदिक पूजा होइत छैक। पूजा केर समाप्ति पर अनेक विनती जकरा बीनी कहल जैत छैक केर गायन महिला सब उच्च स्वर में भक्तिभाव सं करैत छथि। पांच बीनी में अन्तिम बीनी ई प्रमाणित करबा लेल तर्कसंगत छैक जे कोना एहि पाबनि में सब वस्तु संगे सद्भाव आ संग रहबाक उक्ति व्याप्त छैक: दीप-दीप हरा जाथु घरा। मोती-मानिक भरथु घरा।। नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु। पांच बहिन बिषहरी बढ़थु।। बाल बसन्त भैया बढ़थु। डाढी-खोंढी मौसी बढ़थु।। आशावरी पीसी बढ़थु। बासुकी राजा नाग बढ़थु।। राही शब्द लए सुती। कांसा शब्द लए उठी।। होइत प्रात सोना कटोरा में दूध-भात खाई।। साँझ सुती प्रात उठी पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी।। ब्रह्माक देल कोदारि विष्णुक चांछ्ल बाट।। भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा। ताहि बाट आओताह ईश्वर महादेब।। पडल गरुड़ केर ढाठ। आसतिक- आसतिक, गरुड़-गरुड़ .. आब एहि गीत संग मिथिला चलू। मिथिला में बरसात के समय में खेत-पथार, पोखरि इनार, कलम-गाछी सब किछु पानि सं भरि जैत अछि सावन-भादब में। आब साँप आ नाना तरहक कीड़ा-मकोड़ा पानि के डर सं उचगर आ रुख स्थान दिस आबय लगैत अछि। मालक घर, मनुखक घर, चार, दरबज्जा आ कत-कत नहि आबि जैत अछि। अयबाक उद्देश्य कुनो ककरो छति पहुचेबक नहि अपितु पानि सं प्राण रक्षा आ भोजनक ब्योंत रहैत छैक। आ ठीक अही समय में मधुश्रावणी पाबनि पूजल जैत छैक। एकर उद्देश्य छैक जे हे नाग आ आन कीड़ा-मकोरा सब जेना मनुखक वंश वृद्धि होइत छैक तहिना तोरो सबहक होब। मनुख आ तों एक संग दोसर के रक्षा करैत एहि पृथ्वी पर निवास करैत रह। तोरा खेबाक लेल वस्तु आ पीबाक हेतु हम दूध अर्पित करैत छी। हमरा, हमर पति के आ सगा-सम्बन्धी के तों क्षति नहि पहुचाबह. हे नाग आ कीड़ा मकोरा के स्वामी शिव, हम अहांके पूजा अर्चना करैत छी। हे तंत्र केर जन्मदाता, हम अहांके निवेदन करैत छी, अहाँक यशगान करैत छी जे सब संगे हमरो सबहक रक्षा करू। हे नाग अहाँ रक्षा करू, हे गरुड अहुं रक्षा करू। अहि गीत के अगर ध्यान सं सुनब त लागत जे ई गीत कम आ तंत्रक मन्त्र अधिक अछि। एकरा गेबाक अंदाज, स्वर सब किछु अलग छैक। महादेब संगे ब्रह्मा, विष्णु केर सेहो गोहरायल जैत छनि एहि गीत में। गाय केर गोबर, दूध आदिक प्रयोग गाय केर उपयोगिता के देखबैत छैक ओतहि नाना तरहक वस्तु के प्रयोग सब में सामंजस्य। पाबनि त मूलतः ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ में होइत छैक मुदा एकर विधान आ सामग्री के जुटान में अनेक जाति के सहभागिता होइत छैक। उदहारण के रूप में सरबा, मङ्गल कलश कुम्हार सँ;डाला, बियनि, चंगेरा आदि डोम सँ; लहठी चूड़ी आ अन्य वस्तु लहेरनी सँ एवं अन्य सामग्री बज़ार सँ आनल जाइत छैक। ई सामंजस्य कथो में अनेक ठाम अनेक प्रसंग आ उप-प्रसंग में भेटैत छैक। कथा केर मूल नायक आ नायिका - बाला लखेंद्र आ बिहुला, बनिया अर्थात सौदागर समाज सँ छैक। तंत्र के ज्ञान, गूढ़ रहस्य जे बुझबैत छैक से धोबिन छैक, धामि केर चर्च सेहो होइत छैक जे छोट जाति केर छैक। कथा स्थानीयता के सीमा के सेहो तोरैत एकरा सार्वभौमिक बनबैत छैक। से कोना? ऐना जे चरित्र सब मिथिला सँ बाहर के सेहो छैक। कथा में अनेक देवता, देवी, गण के भूमिका छैक। सब एक व्यवस्थित आ समन्वय के विधान के निर्माण करैत छैक। आब पूजा के विधिवत समाप्ति के बाद कथा प्रारंभ होइत छैक। एक अनुभवी महिला जिनकर स्मरण शक्ति, उच्चारण आ कहबाक शैली के संगे गीत आ फकरा सुनेबा में महारत रहैत छनि से एहि कार्य के संपादन करैत छथि। कथा पांचो बहिनी बिषहरि सं शुरू होइत छैक। कोना एक बुढ़िया एक चिकनी पात में लहलहाइत पांच सापक पोआ के देखैत अछि। आ बूढी के गाम आबि ओकर वृतान्त कहब सं पूजाक पद्धति प्रारम्भ होइत छैक। फेर बिषहरी के जन्म होइत छनि। दोसर दिन केर कथा एक नव मोड़ लैत छैक कारण एहि में एकाएक मनसा के प्रवेश होइत छनि। मनसा के प्रवेश होइते मातर नाग आ तथाकथित पैघ देवता (ब्रम्हा, विष्णु एवं अन्य) के बीच आ दुनु के भक्त के बीच द्वन्द प्रारंभ होइत छैक। बिहुला आ चंदु सौदागर क्लासिक देवता के पूजक छथि जिनका मनसा जे मूल रूप सं नागक देवी छथि आ जिनका बारे में इहो कहल जैत छैक जे ओ शिबक मानस पुत्री छथि, केर संग द्वन्द। चंदु सौदागर मनसा के अस्तित्त्व के स्वीकार नहि कर चाहैत अछि फलस्वरूप मनसा अपन नाग-नागिन सं ओकर सब संतान के डंसि क ख़तम केने जा रहल छैक। ओकर अन्तिम बालक केर नाम बाला लखेन्द्र छैक जकरा बारे में ई छैक जे ओकर जाहि दिन विवाह हेतैक ओही दिन मनसा के साँप ओकरा डंसि लेतैक आ अहि तरहे चंदु सौदागर के वंश समाप्त। आब चंदु की करे ? धैर्य सं काज लैत अछि। चंदु के पता चलैत छैक जे बिहुला  नामक एक लड़की छैक जकरा अखण्ड सोहागबती रहबाक वरदान छैक। चंदु अपन पुत्र बाला लखेन्द्र केर विवाह बिहुला सं कर दैत छैक। दुनू लेल एक शीशा के घर बनैत छैक। मुदा साँस लेबाक हेतु एकै रत्ती भूर छोडि दैत छैक। ओहि भूर सं अपन नाग के भेजि मनसा बाला लखेन्द्र के डंसि लैत छैक। आब की हो? बिहुला कहैत छैक, “एक केरा के थामक नाव बना जरुरी के सामान राखि हमरा बैसा दिय। हम अपन पति के माथ अपन कोरा में ल नदी के प्रवाह संगे बहैत एकर कुनो समाधान करय चाहैत छी।” सैह व्यवस्था होइत छैक। बिहुला अपन पति के लाश लेने नदी में चलल जा रहलि अछि। लाश आब गलनाई शुरू भ गेलैक मुदा बिहुला के हिम्मत एखनो दृढ़ छैक। जैत-जैत एक ठाम देखैत छैक जे एक धोबिन नदिक कछेर में कपडा धो रहलि छैक। ओकर एक छोट बच्चा बेर-बेर ओकरा परेशान क रहल छैक। तंग आबि धोबिन अपन बच्चा के कंठ मचोडि दैत छैक। बच्चा मरि जैत छैक. आब धोबिन निश्चिन्त भ कपडा धोबैत अछि। बिहुला के बड़ आश्चर्य भेलैक! “कोना एक माय अपन संतान के छोट बात लेल जान मारि सकैत अछि?” बिहुला सोचैत छैक। बिहुला के होइत छैक जे जरुर अहि में कुनो रहस्य छैक। आब ओ अपन नाव के कात लगा दूर सं धोबिन के निरिक्षण करैत छैक। जखन कपड़ा धोआ जैत छैक त धोबिन नदी सं अँजुर में पानि ल मन्त्र पढ़ैत बच्चा पर फेकैत छैक. पानि परिते देरी बच्चा फुरफुरा क उठि जैत छैक। बिहुला बुझि जैत छैक जे ई धोबिन सामान्य महिला नहि अछि। ओकरा हांक लगबैत अपन व्यथा कहैत छैक। आब कहानी में अते सं तंत्रक पूर्ण यात्रा शुरू होइत छैक। धोबिन के कहला पर बाला लखेन्द्र के लाश के ओतय छोडि दुनू गोटे शिव लोक में जैत छैक। बीच में अनेक कथा आ कथा केर उपकथा अबैत छैक। बिषहरी के कथा आ हुनकर बारह नाम – जगत गौरी, मनसा, जरत्कारू, वैष्णवी,सिध्ह्योगिनी, नागेश्वरी, शैवी, जरत्कारू-प्रिया, नाग-भगिनी, आसतिक माता, बिषहरी एवं महाज्ञानयुक्ता। कथा खेपे-खेपे चलैत रहैत छैक – मंगला-गौरीक कथा, पृथ्वीक उत्पति केर कथा, समुद्र-मंथन केर कथा, सतीक कथा, पतिव्रताक कथा, महादेब केर परिवारक कथा, गंगाक कथा, गौरीक जनम, गौरीक तपस्या, गौरीक विवाह, मैनाक मोह भांग, कार्तिक आ गणेश केर जन्म, संध्या केर विवाह आ लीली केर जन्म,पतिव्रता सुकन्याक कथा, बाल बसन्त केर कथा, गोसाउनिक कथा, श्रीकर राजा केर कथा, आ अंत में गणेश भगबान द्वारा सोहाग माथब। अहि बीच बिहुला केर कथा चलैत रहैत छैक। कथा सब में तंत्र छैक, बुझौअल, छैक, गीत छैक, सब किछु छैक। कथा में हिन्दू धर्म के बहुत मूल तत्व के ज्ञान सेहो छैक। स्त्रीगन के व्यवहार, ओकरा समाज में रहबाक लूरि, पति, संतान, श्रेष्ठ, देवता, पितर, आदिक सम्मान आदिक ज्ञान भेटैत छैक। ऊँच-छोट के भेद के कोना पाटिक जीवन के चलेबाक चाही तकर प्रशिक्षण देल जैत छैक। सब प्रमुख धार्मिक चरित्र आ आदर्श महिला के सम्बन्ध में विवरण देल जैत छैक। अहि तरहे मधुश्रावणी केवल पाबनि नहि अपितु 13-15 दिनक कार्यशाला होइत छैक जाहि में एक लड़की के ससुर जयबा सं पूर्व आ गृहस्थी सम्हारबा सं पहिने एक प्रशिक्षित महिला बना देल जैत छैक। ओ बच्ची सं दुलहिन आ फेर दुलहिन सं गुनमति नारि अथवा सम्पूर्ण मैथिलानी बनि जैत अछि। मधुश्रावणी में नाग नागिन के मनुष्य स्वरुप में कल्पना कैल जैत छैक आ तदनुसार हुनका लेल वस्त्र, श्रृंगार, आभुषण सब किछु सं मोन में सुसज्जित के गीत गाबि स्मरण कैल जैत छैक। एक गीत देखू: पियरी अँचरी बिषहरी के नामी-नामी केस। घुमैत एली बिषहरी तिरहुत देस। तोहरो सिंगार बिषहरी लाबा आ दूध। हमरो सिंगार बिषहरी सिर के सिन्दूर। तोहरो सिंगार बिषहरी कोर भरि पूत। फल बीच गुअबा नवेद बीच पान। देवी बीच बिषहरी मैया दोसर नहि आन। मधुश्रावणी एक हिसाबे महिला के सत्ता के प्रतीक अछि. सब काज, विध, मन्त्र- पूजा महिला द्वारे प्रतिपादित होइत छैक। पुरुष केर कोनो भूमिका नहि। तंत्र के शक्ति एहेन जे छोट-पैघ सब एक ठाम आबि जैत अछि। सब तरहक देवता में आपसी सौहार्द्य के सूचक अछि मधुश्रावणी। अंत में सब ठाम होइत नदी केर कछेर केर धोबिन संगे बिहुला वापस अबैत अछि. बाला लखेन्द्र के लाश में प्राण आबि जैत छनि। ओ आरो सुन्दर आ सोहनगर भ जैत छथि। चंदु सौदागर के सब बेटा आ सम्पति फेरो आबि जैत छैक। ओकर सब बेटा सेहो जिबित भ जैत छैक। चंदु आब आन देवता संगे अपन पुतहु के कहला पर बिषहरी आ मनसा के पूजा अर्चना शुरू क दैत अछि। सब किछु शुभ होमय लगैत छैक। एहि पाबनि आ कथा के जे ध्यान सँ सुनल जाय आ एकरा गुनल जाय त पता चलैत छैक जे शास्त्र पर लोक जेना कतौ-कतौ भारी पड़ैत हो! अंततः, चंदू सौदागर के भले अपन पुतहु आ बेटा के कारणे, मनसा देवी आ विषहरी के प्रभुत्व मानबाक हेतु बाध्य होमय पड़ैत छैक। एहि कथा में एक बात स्पष्ट ई होइत छैक जे अगर बहुत बात शास्त्र मर्यादा के नाम पर बहुत बात अथवा क्रिया अथवा दृष्टान्त देबा लेल मना क दैत छैक मगर लोक ओही बात लेल ओकर व्यवहारिक पक्ष के देखैत उदार भ जाइत छैक। उदाहरण के रूप में लोके में ई हिम्मत भ सकैत छैक जे गौरी के छिनारि कहैंन; महा मर्यादित महादेव के मैथुन आ काम कर क्रिया में लिप्त देखा देनि। यद्यपि उद्देश्य शिक्षा ग्रहण करक होइत छैक। एकर एक अर्थ एहो भ सकैत अछि जे नव व्याहता के ई बता दी जे काम अथवा यौन क्रिया शाश्वत प्रक्रिया छैक। एकरा मनुष्य आ जिव जंतु के बाते छोड़ि दी देवता, देवी सब स्वीकार करैत छथि सृष्टि के चलेबाक हेतु अहि में संलग्न रहैत छथि। ई कदाचित सफल गृहस्थ जीवन जीबाक मूल मंत्र छैक। मधुश्रावणी पाबनि केर लिंक सूत्र छैक मनसा आ विषहरी केर आराधना। मनसा अर्थात नागक देवी। मनसा आर्थत ओहेन देवी जिनका शक्ति त छनि मुदा हुनकर सत्ता मानबाक लेल मुख्यधारा के देवी देवता केर भक्त सब सहज भाव सँ तैयार नहि अछि। मनसा एक एहेन देवी छथि जे अपन छोट स्वरुप अर्थात स्थानीय स्वरुप के विस्तार अखिल भारतीय स्वरुप में करय चाहैत छथि। मनसा के इच्छा छनि जे हुनका सब वर्ग, जाति आ समाज के लोक पूजा करय, हिनकर गुणगान करय। मुदा ई काज ओतेक सहज नहि अछि। छोट जाति के लोक हिनकर सत्ता के स्वीकारि लेलक। स्त्रीगण सेहो ओही दिस बिदा भेली मुदा पुरुख कोना मानत? ई कनि पैघ प्रश्न अछि। मनसा हिमालय सँ चलैत छथि आ नेपाल, तराई बला मिथिला, भारत बला मिथिला, असम, बांग्लादेश, बंगाल, ओड़िसा, होइत फेरो मध्य आ उत्तर हिमालय धरि व्याप्त रहैत छथि - उत्तराखंड, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश धरि। मनसा संगे बिहुला केर कथा नेपाल, मिथिला, बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा धरि मूल कथा सँग डारि-झारि में कनि-मनि फेर बदल सँग चलैत रहैत अछि। उत्तराखंड आ हिमाचल में मनसा केर अनेक कथा प्रचलित अछि। साँप के प्रभाव आ भय के स्वीकार करैत लोक वर्ग, समुदाय, लिंग आ जातिक सीमा सँ उपर उठैत मनसा देवी के समक्ष नतमस्तक होइत छथि। यैह प्रभाव मिथिला में  सर्वहारा वर्ग में आ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ केर स्त्रीगण में भेटैत अछि। मुदा हमरा अगर हम समाजशास्त्रीय ढंग सं मधुश्रावणी केर विवेचन करैत छी त ऐना लगैत अछि जे पितृसत्तात्मक समाज किछु अनरगल प्रभाव एहि में बिध आ पूजा के नाम पर घुसा देने छैक जाहि सं मानशिक स्तर पर महिला सब ओहि परम्परा के नाम पर अपना के स्वयम शोषित आ प्रतारित करैत रहैत छथि। अनेक ठाम सती केर महत्त्व के गुणगान कथा सब में अनेक बेर अबैत छैक। धर्म, पूजा-पाठ, गिरहस्ती, प्रेम-अनुराग, तंत्र-मन्त्र, पितृ, देवता, प्रकृति, प्रकृति केर अवयव – फुल, पात, साँप, चिरै, धर्म ग्रन्थ केर सार; निक आ अधलाह में अंतर करब, पुन्य आ पापक बीच अंतर आ निक मार्ग केर चुनाव, मानवधर्म केर पालन,स्त्री धर्म केर निर्वहन, आर ने जानि की की मुदा एहि पाबनि केर अन्तिम दिन जे कनिया के ठेहुन टेमी सं दगबक प्रथा अछि से बड़ अमानवीय। बल्कि ई कहि सकैत छी जे सती प्रथा के बांचल हिस्सा जकां अछि। सब महिला, माय, पितियाईन, दाई, सखी-बहिनपा एहि बात सं दुखी रहैत छथि जे कोना एहि जरैत टेमी के सेहो एक बेर नहि तीन-तीन बेर धाह केर घाव के वर्दाश्त करती! परन्तु परंपरा लाचार केने छनि। की क सकैत छथि? अगर निक सं फोका हेतनि त अचिर सोहागबती हेती। पति के सब किछु निक हेतनि। ताहि ओकर पालन हेबे करत। आब एकहि उपाय रहि जैत छनि जे सुरुज भगवान सं निवेदन कैल जाय जे ओ अपन रौशनी में श्निग्धता आनथि, अग्नि कोमल भ जाथि, पानक पात ओना त शीतल होइत अछि मुदा ओ आरो शीतल भ जाय जाहि सं दागै काल बेटी शीतल के कम वेदना होनि,पाहून मधुर हाथ सं आंखि झापथि, गंगाजल आ आन जल खूब ठंढक प्रदान करय, टेमी के धाह मधुर-मधुर जरै, चानन केर लेप आरो शुशितल भ जै जाहि सं परम्परा के निर्वहन करैत कनिया के ठेहुन दागल जा सकै: शीतल बहथु समीर दहो दिश शीतल लथु उसासे। शीतल भानु लहुक लहु उगथु शीतल भरल अकासे। शीतल सजनी गीत पुनि शीतल शीतल बिध बेबहारे। शीतल मधुश्रावणी बिधि हो शीतल बसन सिंगारे। शीतल घृत शीतल वेरु बाती शीतल कामिनी अंगे। शीतल अगर सुशीतल चानन शीतल आबथु माँगे। शीतल कर लय नयन झँपाबह शीतल देलहुँ पाने। शीतल हो अहिबात कुमर सँग शीतल जल असनाने ।। गीत, बिध-बबहार सब किछु शीतल होबक चाही। वर अपन कोमल हाथ सँ आँखि झापथि, घी, बातिक सङ्गे टेमिक अग्निक सेहो शीतल भ जाय, पवन शीतल मंद भ बहै, वस्त्र आ सिंगारक सामग्री सेहो शीतल होइक जाहि सँ बेचारी नायिका अहि प्रथा के पालन करैत अपन ठेहुना के दगबा सकैथ। एक गीत में त कनिया केर माय आ आन महिला सङ्गे हुनकर कुमर अर्थात वर सेहो अपन हाथ सँ ओना त नायिका के आँखि झाँपने रहैत छथि मुदा वेदना देखि द्रवित भ जाइत छथि। ह्रदय केर वेदना दुनू आँखि सँ नोर भ झहरै लगैत छनि: आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख कियै पड़ल उदासे। अम्बा मुख हेरय किये कामिनी पल पल लैह उसासे। कुमर नयनसँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते। बड़ अजगुत मधुश्रावणी विधि परम कठिन इहो रीते। मधुश्रावणी केर विध-बेभहार त सब के विध्वंसक आ स्त्रीगन के शारीरिक आ मानशिक शोषण केर एकटा वीभत्स परंपरा बुझना जा रहल छनि। धिया के दर्द हेतनि से बेचैनी सेहो छनि। बिधक पहिने आ विधक बादक दर्द हेतनि से जानि बहुत चिंतित रहैत छथि। मुदा विध के त्याग भला कोना सकैत छथि? एहि में धिया के कल्याण छनि – अचिर सौहाग्यवती होबाक कल्याण, पुत्रवती होबाक कल्याण। अतेक सुन्नर पाबनि में मात्र ई बिध कनि अन्कच्छ्ल लगैत अछि। एकरा समाप्त क देबाक चाही। समय बदलि रहल छैक। आबलड़की सब सेहो प्रतिकार करक अवस्था में छथि। बाल विवाह मिथिला में समाप्तप्राय अछि।ठेहुन दगबा के प्रतीक में केवल टेमी धाह उपर सं देखा विध पूरा कैल जा सकैत अछि। अतेक निक पाबनि के मात्र ई छोट सन बिध जाहि में धिया के सब उमंग आतंक में बदलि जैत अछि, हमरा कोनादन लगैत अछि। अहि टेमी बला पर स्त्रीगन, पुरुष, संस्कृत के विद्वान मिल शीघ्र निर्णय लय एकरा समाप्त करथि अथवा प्रतीक मात्र राखथि। ओना कियोक भावुक कहि सकैत अछि, मुदा हमरा ऐना बुझना जैत अछि जेना बिना कुनो कसूर के सीता के अग्नि परीक्षा लेल जैत अछि। सीता के माँ, पितियाइन, जेठ बहिन, भौज सब मौन भेल तरपैत सीता के देखैत छथि! बड्ड भेल, एहि पर सोच आवश्यक। निक आ अधलाह त सब परंपरा में रहैत छैक।जे हो मधुश्रावणी एक बहुत उत्तम पाबनि अछि। एकर निर्वहन होबाक चाही। ई अतेक पैघ विषय थिक जकरा पर पूरा पोथी लिख सब बात पर गंभीरता सं विचार राखल जा सकैत अछि। मुदा सब बात अगर एत लिखब त फेर पढ़नाइ दुर्लभ। ताहि अतय विराम दैत छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश विहनि कथा विछोहक नोर पछिला साल कोचिंग करै लेल बेटीक नाम कोटामे लिखौने छलौं। जखन ओकरा कोटामे छोड़ि क' आबैत रही तखन ओ बड्ड उदास छल। ओकरा बुझेलियै जे हम नियमित रूप सँ आबि भेंट करैत रहबै। मुदा नौकरीक झमेलामे फुरसति नै भेंटल आ हम कहियो नै जा सकलौं। साल पूरा भेला पर ओ डेढ़ मासक छुट्टी पर गाम आएल छल। ऐ बेर ओकरा कोटा छोड़ै लेल फेर हमहीं गेलियै। ओकरा छोड़लाक उपरान्त जखन वापसीक ट्रेन पकड़बा लेल हम टीसन आबैत रही तखन ओ कातर दृष्टिसँ हमरा दिस ताकि रहल छल एकदम चुपचाप। हमहुँ ओकरासँ नजरि चोरेने औटोमे बैसि गेलौं। ओ हमरा गोर लागलक आ बेछोह कानय लागल। हमर आँखिमे सेहो जेना मेघ उमड़ि गेल मुदा ओइ मेघकेँ रोकैत ओकरा बूझबय लागलौं। रामायणक चौपाई मोन पड़ि गेल:- लोचन जल रहे लोचन कोना जैसे रहे कृपण घर सोना। खैर टीसन आबि ट्रेनमे बैसि गेलौं। जखने ट्रेन टीसनसँ घुसकल तखने ओकर कातर नजरि मोन पड़ि गेल आ लागल जे करेज फाटि जायत। नोरक मेघ ऐ बेर नै मानलक। हम सहयात्री सबसँ नजरि चोरबैत ट्रेनक बाथरूममे ढुकि गेलौं । बाथरूमक भीतर हमर मेघ बान्ह तोड़ि देलक आ हम पुक्की पारि क' कानय लागलौं। विछोहक नोर आवाजक संग पूर्ण गतिसँ बहय लागल मुदा हमर क्रन्दन ट्रेनक धड़धड़ीक आवाजमे विलीन भ' गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार -  कविता/ रुबाइ ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.३.राजीव रंजन झा- ३टा गजल ३.४.गुफरान जीलानी- झमटबा गाछ आशीष अनचिन्हार कविता फेर "चुप ठोरक अवाज बहुत दूर धरि जाइ छै" "सिक्कामे अवाज होइ छै नोट चुप्पे रहै छै" एही विश्वासक संग ओ चुप रहला बहुत दिन आ अंतिम समयमे जखन किछु बजबाक जरूरति बुझेलनि तखन कमजोर अंग संग नै देलकनि रुबाइ अपन पीठ अपने ठोकि लेलियै हम अपन गेंद अपने लोकि लेलियै हम आनक गला घोंटलासँ की फायदा  अपन कंठ अपने मोकि लेलियै हम ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २ टा गजल 1 सभकें कमल सामान बूझू संगमे छथि भगवान बूझू बेटा पुतहु पौत्र और पौत्री सभकें गगनक चान बूझू मोनक शान्ति अमोल होइए एकरहि सोनक खान बूझू छला जे पर्वत खाधि बनला समय कते बलवान बूझू बाढ़ि और भूकम्पक तांडव छटपट कोटि परान बूझू अनिल त्याग विनु जिनगी की विनु धानक खरिहान बूझू (वर्ण- 11) 2 देखबामे नीक लागल सुनबामे नीक लागल शब्दक इनार पोखरि  खुनबामे नीक लागल आयल पहाड जत्ते  सभ तूर सन बुझायल मनसं धुनैत रहलौं   धुनबामे नीक लागल अहां आंखिसं जे कहलौं से बात हम बुझलियै सभ ठाम फूल गाछक चुनबामे नीक लागल केलौं कतेक मेहनति भरलौं दुखक  खजाना अपनाले' जाल अपने  बुनबामे नीक लागल कहियो बबूर वनसं भयभीत हम  ने  भेलौं बीहरि कतेक सांपक  मुनबामे नीक लागल वर्ण-18 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजीव रंजन झा ३ टा गजल १. जे काजक अछि सुनै छी ततबे जे भाबय हिय गुनै छी ततबे केओ कहय किछु, मानी कोना जतबे रूई धुनै छी ततबे सपना देखब नहि अनुचित मुदा जतबे बीया बुनै छी ततबे आँखि रहैत अछि हरदम फूजल जतबे काजक मुनै छी ततबे मजगूती नीबक अछि जरूरी जतबे चाही खुनै छी ततबे २. मुट्ठी भरि नेहाल छै बाँकी सभ बेहाल छै ककरो रोटी नोन नै केओ मालामाल छै साधि रहल निज साध्य किछु निज ताले बेताल  छै बेचि रहल निज माय केँ घूमय एहन दलाल छै बेईमानक राज ई मुहसच सभ मोहाल  छै गड़य गड़ल अछि माटि मे इचना पोठी जाल छै छै जतबे धुड़फंद जे ततबे गोटी लाल छै राजीव पतित नीच जे वैह बजाबय गाल छै ३. ककरो होअ सरकार यौ हमरा कोन दरकार यौ भोटक भीख देल जकरा भेलय वैह चिन्हार  यौ करतै किएक चिंता हमर एकरो इएह बेपार यौ ठकलक बेर बेर हमरा धूनै छी हम कपार यौ कैंचा जैह खरचत तकर करबै भाइ जयकार यौ सभटा गढल एक साँच मे सभटा एक्कहि भजार यौ लुटतै फेर वैह करोड़,  तेँ झीटय छी हम हजार यौ ककरो भोट देब करतै नेता भ्रष्ट आचार यौ ककरो पर भरोसा करब भेलै आइ बेकार यौ सबहक पार पायब अहाँ  नेताजीक नहि पार यौ गिरगिट सन बदलताह ई झुट्ठा केर सरदार यौ बाबू कहथि एक बेर ओ करियौ फेर सतकार यौ पाँचो बरख दर्शन कहाँ देतय फेर ई यार यौ फेरो इएह करबे करत एहने भाइ आचार यौ हमहूँ आइए ठनलहुँ अछि टनबै सत्तरि हजार यौ चीन्हू अप्पन प्रतिनिधि के घेरू बीच बाजार यौ अप्पन यैह अधिकार छै बैसू आब तैयार यौ चोरिक माल जौं दैछ ओ करु नहि आब विचार यौ ओकर बात सुनियौ कनी करियौ जैह  नेयार यौ देखू छोट जेकर उदर मतक दियौक आधार यौ राजिव अपन संधानि लिय जनतंत्रक  हथियाबिहार - राजीव रंजन झा            उच्च वर्गीय सहायक            भारतीय जीवन बीमा निगम            समस्तीपुर, बिहार ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गुफरान जीलानी झमटबा गाछि अपन गामक झमटबा गाछि सुखि रहल अछि

खादि दियौ पानि दियौ     आ अगोरबाहि करु भोरि म' दुपहरि म' साझि म' अनहरिया म' उजरिया म' अनहर म'     आ बरखा म'

तहन फेरि  सँ अपन गामक झमटबा गाछि हरियर भ' जाएत। -MANUU , दरभंगा ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ता लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। ५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा “’विदेह’- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २२३ म अंक ०१ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२३)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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