72 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना २.२.रवि भूषण पाठक- औझका डायरी २.३.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र-संगम तीरे २.आशीष अनचिन्हार- प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल २.४.मैथिली लघुकथा १. पुरुषक नहि विश्वासे- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र २.प्रणव झा- अरजल जमीन ३. पद्य ३.१. अमरनाथ मिश्र- जुड़िशीतल-गीत ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.३.राजेश मोहन झा 'गुंजन'-ममताक अनुभूति-(जूड़शीतल पर विशेष) ३.४.रश्मि किरण झा- हाइकू ४.बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - ३ टा बाल कविता 5.VIDEHA FOR NON RESIDENTs- Dr. Shefalika Verma- Maithili Poem translated into English by Dr. Jaya Verma (Associate Prof. DU)- WHERE ARE WE? Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केलक अछि जकर संयोजक श्री दिनेश यादव जी रहता। अइ विशेषांकमे नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य केर मूल्यांकन रहत। अइ विशेषांक लेल सभ विधाक आलोचना-समीक्षा-समालोचना आदि प्रस्तावित अछि। समय-सीमा किछु नै जहिया पूरा आलेख आबि जेतै तहिये, मुदा प्रयास रहत जे एही साल मइ-जून धरि ई विशेषांक आबि जाए। उम्मेद अछि विदेहक ई प्रयास दूनू पायापर एकटा पूल जरूर बनाएत। विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा कएल जा रहल अछि। दोसर भागमे अइ बेर नीलमाधव चौधरी जीक रचना आमंत्रित कएल जा रहल अछि आ नीलमाधवजीक रचना ओ रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल कैलाश कुमार मिश्रजीकेँ आमंत्रित कएल जा रहल छनि। दूनू गोटाकेँ औपचारिक सूचना जल्दिये पठाओल जाएत। रचनाकारक रचना ओ आलोचकक आलोचना जखने आबि जाएत ओकर अगिला अंकमे ई प्रकाशित कएल जाएत। अइ शृंखलाक पहिल भाग कामिनीजीक रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही,जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर),जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना २.२.रवि भूषण पाठक- औझका डायरी २.३.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र-संगम तीरे २.आशीष अनचिन्हार- प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल २.४.मैथिली लघुकथा १. पुरुषक नहि विश्वासे- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र २.प्रणव झा- अरजल जमीन डॉ. कैलाश कुमार मिश्र मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना राम जगतपुज्य छथि। राम के हिन्दू सब आराध्यदेव बुझि पूजा करैत छथि। मिथिला में राम सर्वाधिक पूज्य छथि। पूज्य होबाक कारण रामक देवता भेनाई त अछिए ओ मिथिला केर दुलहा छथि ताहू लेल। कारण मिथिला में जमाय के विष्णुक अवतार मानल जैत अछि। सर्वश्रेस्ट पाहून जमाय होइत छथि। हुनकर मान-दान, आतिथ्य, भोजनक सचार, रंग-रंगक बिध-बेभार, गीत-नाद आ सब किछु अपूर्व। मुदा मिथिला के लोक के अदौं सं ई होइत रह्लनि अछि जे सीता संग रामक व्यवहार उचित नहि रह्लनि। आइयो मैथिलानी बात-बात में सीता के दुखक स्मरण करैत नोरायल आँखि सँ आ बझल कंठ सँ अनायास बाजि उठैत छथि: राम बियाहने कुन फल भेल। सीता जन्म अकारथ गेल। एकर अर्थ ई नहि जे राम मर्यादापुरुषोत्तम नहि रहला। एकर अर्थ इहो नहि जे मिथिलाक लोक अर्थात मैथिल विधर्मी भ गेलनि। ई त हिन्दू धर्म आ संस्कार के स्वभाव अछि जे जकरा लोक पसिन करैत अछि ओकर गलत निर्णय, अनुचित डेग, आदि पर ओकरा उपराग सेहो दैत अछि। यैह गुण सनातन धर्म के एखन धरि साश्वत रखने अछि। ताहि एहि लेख में जे भाव अछि ओकरा एक मैथिल, मैथिल सं अधिक मैथिलानी के अपन किशोरी केर दुलहा रामक प्रति विभिन्न ग्रन्थ आ लोककथा केर मादे कैल गेल स्नेहपूर्ण उपराग बुझल जा सकैत अछि। कुनो विद्वेष नहि, घृणा नहि, धर्मक प्रति असंवेदनशीलता नहि। रामायण के प्रारंभ एखन धरि प्राप्त जानकारी के आधार पर महाकवि वाल्मीकि सँ होईत अछि। तकर बाद अनेक स्थानीय विद्वान, सन्त, भक्त, कवि एकर कुनो प्रसंग, अथवा सम्पूर्ण कथा पर शास्त्रीय आ स्थानीय मान्यता के आधार पर काव्यमय रचना करैत रहलनि। रचनाशीलता आइयो चलि रहल अछि। खंड अथवा संदर्भ विशेष में अंतर कुनो बहुत पैघ बात नहि अछि। तुलसीदास त राम के अपन आराध्य देव मनैत राम के मर्यादापुरुषोत्तम बनबैत रामचरितमानस केर निर्माण करैत छथि। तुलसी के लेखनी अतेक प्रभावोत्पादक अछि जे समस्त उत्तर भारत, पूर्व भारत, उत्तर-पूर्व भारत, मध्य भारत धरि रामचरितमानस जन-जन के कण्ठहार बनि जाइत अछि। मिथिला में सेहो एखन धरि हमर ज्ञात जानकारी के हिसाबे 4 प्रकार केर रामायण मैथिली में लिखल जा चुकल अछि। मूल कथा के ध्यान में रखैत महाकाव्य रचनाकार किछु प्रसंग स्थानीय मान्यताक सँग जोड़ि दैत छथि। एकर अतिरिक्त लोककथा में, गीत में,लोक व्यवहार में सीता आ रामक भाँति-भाँति के चर्चा अबैत अछि। ई लेख रामायण के अतिरिक्त लोककथा, लोकमान्यता, गीत नाद आदि के आधार मानि लिखल गेल अछि। लोककथा सेहो साक्ष्य सँ कम नहि। आब चलु हमरा सङ्गे मिथिला आ रामकथा सँग रामक भाव के मैथिलानी आ सामान्य जनता के बीच मान्यता केर आधार पर, ग्रंथ आ लोककथा के आधार पर , गीत नाद पर शुद्ध मोन सँ सीताक प्रति रामक व्यवहार के समीक्षा करी। सिनेह राम सँ अछि त उपराग ककर? निश्चित रूप सँ रामक। मिथिलाक सब गाम, घर में सीता छथि आ घरे-घरे राम सेहो छथि। जेना राम संग विवाहक बादो सीता दाई के सुख नहि भेटलनि तहिना आइओ सुख कहाँ छनि? दहेज़क उत्पीडन, बेटा आ बेटी में अंतर, भ्रूणहत्या, शारीरक उत्पीडन, मानसिक दोहन इत्यादि अनंत समस्या स ग्रसित छथि घर-घर केर सीता। आ की नहि? कनि विचार करू ने? हेता राम प्रतापी राजा, महाबलशाली, समुद्र के सोखि लेबाक क्षमता बला, रावणक संहारक, आ की की! मुदा मिथिला में आबि ओ दुल्हा राम भ जाथि छैथ। मिथिला के लोक हुनकर पूजा नहि हुनका सँ नेह लगबैत अछि। निधोख डहकन गाबि हुनका कखनो छगरा गोत्रक कहैत छनि त कखनो शंका करैत छनि जे राजा दशरथ गोर, कौशल्या गोर फेर राम आ भरत कारी कोना? मैथिलानी राम के विवाह के बाद सासुर में रहबाक बेर-बेर निवेदन एहि लेल करैत छथिन जे सब भाई के आ विशेष रूप सँ राम आ भरत के रगड़ि-रगड़ि उबटन लगेती जाहि सँ हिनक श्यामवर्ण देह कनि सुन्नर लागै! भोजनक सिंगार, सचारक की कहब - अपूर्व । भाँति-भांति के सचार प्रेमक भाव सँ कतेक गुना बढ़ल। गान कला, नृत्यकला, वाद्यकला में माहिर मैथिलानी सब गाबि क, वाद्ययन्त्र के बजा, सिनेहक प्रदर्शन सँ,अपन कोइली सन अनमोल बोल सँ दूल्हा राम के स्वागत आ हुनकर मनोरंजन करैत छथि। से राम अगर सीता के लंका सँ अबैत देरी अग्नि परीक्षा, गर्भ क समय मे ककरो कहला सँ सीता के पुनः असगर निट्ठुर भेल जंगल भेजि दैत छथि त मैथिलानी हाक्रोश त करबे ने करती??? बल्कि कहि सकैत छी जे नारीक स्थिति एखनो सीते दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अछिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय में राम के अगुआ दैत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि: बंदौ राम लखन बैदेही जे तुलसी के परम सनेही तुलसीदास रामचरितमानस में 1443 बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ,दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र 147 पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि 325 – 147 बेर सीता, 69 बेर जानकी, 58 बेर बड़भागी आ 51 बेर बैदेही। अहू में एक राजनीति ऐछ। सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ। ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब सीताक दुःख देखू: लंका में राम रहला 111 दिन आ सीता रहली 435 दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन। डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वीक जीवन। देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप में आबथि: माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।। राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम में बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि। आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम। जखन समस्त मिथिला में अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ में एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहिये माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप में आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल? सबहक मोन में उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने! अगर राम नारायण के अवतार त सीता कुन कम? ओहो त श्री अथवा लक्ष्मी के अवतारे ने छथि? सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि में डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स? सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन। यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै”। राम चिंता में आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।” सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब।” राम बजलाह : "हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब।" फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि। विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली। रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली। मुदा सीता के शोषण वनवास के रस्ते शुरू भ गेलनि। मिथिला के लोक में विशेष रूप सँ मैथिलीलानी सबहक बीच एक दंतकथा व्याप्त छैक। ई दंतकथा पुरुख समाज द्वारा स्त्रीगण के कोना संस्थागत संरचना के आड़ि में शोषण कैल जाइत रहलैक अछि तकर बहुत सटीक व्यख्या करैत छैक। बात ई भेल रहैक जे जखन राम वनवास लेल सीता आ लक्ष्मण सङ्गे अयोध्या सँ विदा भ गेला त पुत्रशोक में महाराज दशरथ अधीर भ गेलनि। खेनाइ पिनाई सब त्यागि देलनि। लोक कतेक बुझेबाक प्रयत्न केलकनि मुदा हुनकर हृदय प्रतिपल क्षीण भेल गेलनि। दुःख बढ़ल गेलनि। अंततः राम-राम कहैत राजा दशरथ अपन प्राण त्यागि देलनि। राम के जखन ई जानकारी भेटलनि त ओ बड़ दुखी भेला। फेर सब गोटे बिचारलनि जे गया पहुच फल्गु नदी के कात में पितृ तर्पण करैत अपन पिता दशरथ सहित अन्य पित्र सबके पिण्डदान करता। कहल जाइत छैक जे ओहि समय मे पति सङ्ग पत्नी के सेहो ओतय जएबाक अनुमति रहैक। ताहिं राम आ लक्ष्मण सङ्ग सीता सेहो गया पहुँचली। स्नान ध्यान केलाक बाद राम किछु लेबाक हेतु बाहर गेलनि। सीता रामक बहिन सङ्ग असगरे रहि गेली। अहि बीच एकाएक राजा दशरथ केर आत्मा आबि गेलनि। आबि सीता के कहलथिन: "हम भूखल प्यासल छी। हमरा जल दीय, पिण्ड दीय।" सीता लजाईत बजली: "ई कोना उचित? राम आबि रहल छथि। अपने कनि इंतज़ार करु। ओ स्वयं अपना हाथे पिण्डदान करता। जल देता। आबिये रहल छथि।" मुदा दशरथ केर आत्मा रूकबा लेल तैय्यार नहि। झट दनि कहलथिन: "पुत्री सीता! अहाँ राम केर अर्द्धांगिनी छी। हमरा लेल जेहने राम तेहने अहाँ। हमर भूख आ प्यास प्रबल भेल जा रहल अछि। ताहिं अहाँ बिना कुनो बिलंब केने आ रामक पथ हेरने हमरा पिंडदान अर्पित करु। एकर शुभ फल राम आ अहाँ दुनू के सामान्य भाग में भेटत।" अहि तरहक निर्देश पाबि सीता हृदय सँ प्रफुल्लित होईत झट दनि विधिवत कर्मकाण्ड के तैयारी केलनि। पिण्ड बनेली। आ अपन ननदि, फल्गु धार आ कामधेनु गाय के साक्षी मानि अपन ससुर अर्थात महाराजा दशरथ के आत्मा के पिण्ड अर्पित केलनि। राजा दशरथ केर आत्मा सीताक पिण्ड सँ संतुष्ट आ तृप्त होइत पिण्ड स्वीकार केलनि आ किछु क्षण में ओतय सँ स्वर्गलोक लेल बिना राम आ लक्षमण के बाट तकने विदा भ गेला। किछु काल बाद राम वापस आबि गेला। पितर के दर्शन के अनेक प्रयत्न केलनि मुदा बेकार। दशरथ आकाश मार्ग सँ कहलथिन: "पुत्र हमरा अहाँक पत्नी पिण्डदान केली। आब अपनके कुनो प्रयोजन नहि।" एकर बाद राम चिंतित भ गेला। बहुत स्मरण केलनि मुदा दशरथ नहि एलथिन। सीता के पुछलथिन राम: "मैथिली! अहाँ पिण्डदान केलौं तकर की प्रमाण आ की साक्षी?" सीता उत्तर देलथिन: "हमर साक्षी अहाँक बहिन, कामधेनु गाय आ फल्गु नदी छथि।" आब राम फल्गु नदी, गाय आ सीता के ननदि सँ पुछलथिन। मुदा ओ तीनू साक्ष्य देमए में असमर्थता व्यक्त केल्थिन। विग्धल सीता श्राप दैत बजली: "है हमर ननदि, अहाँ हमरा झुट्ठी बना रहल छी। अहाँ छुछुनर बनब आ अहाँ हमेशा छुछुआति रहब। अहिना अहाँक प्राण जैत। है गाय! अहाँक पवित्रता त यथावत रहत मुदा अहाँ झूठ बजलों अछि तांहि अहाँक मुह अपवित्र रहत आ विष्ठा धरि अहि मुह सँ अहाँ ग्रहण करब। आ हे फल्गु नदी, अहुँ झूठ बजलों। जाउ, अहाँक धार में कखनो पानि बाहर रहबे नहि करत। ई हमर दग्धल मन के निश्छल श्राप अछि।" अहि सँ पता चलैत अछि जे सीता सँग अन्याय शुरू सँ भ चुकल छलनि। अनिष्ट हुनका अकारने भोग’ परतनि! जखन वैदेही के रावण छ्ल सँ हरण क ल जाइत अछि त जे राम समस्त चराचर के नियंता छथि, नियंत्रक छथि तथापि सीता के हरण के बाद जलचर,थलचर, कुंज लता, पक्षी सब किछु सँ बताह जकाँ सीताक वियोग सँ द्रवित पुछैत छथि: "अहाँ सब में कियोक हमर मृगनयनी सीता के देखलौं अछि: जलचर, थलचर मधुकर श्रेणी। तुम देखी सीता मृगनयनी?" आ स्थिति विचित्र आ विभत्स त तखन भ जाइत छैक जखन रावणक संहार केलाक बाद जखन राम सीता के लंका सँ मुक्त करैत छथि त राम के सीता जे चरित्र पर शंका होईत छनि। इहो भ सकैत अछि जे जनमानस में पत्नी के अपन पति के प्रति समर्पित भाव के उजागड़ अथवा स्थापित करबा लेल राम सीता दाई के अपन पवित्रता प्रमाणित करबा लेल कहैत छथि अन्यथा स्वीकार करबा सँ मना क दैत छथि। सीतो कुनो कम थोड़े ने छलि? साक्षात लक्ष्मी के अवतार। अपन पवित्र होमाक प्रमाण देबा हेतु सोझे अग्निकुण्ड में कूदि गेली। सीताक सतित्व देखि अग्निदेवता दंग रहि जाइत छथि। सीता के कुशक क्लेश तक नहि होइत छनि। बिना एकौ रत्ती जरल के निशानी के सीता अग्निकुण्ड सँ वापस आबि जाइत छथि। आर त आर स्वर्ग लोक सँ देवता लोकनि सेहो सीताक निश्छल, आ पवित्र होबक प्रमाण दैत छथि तखन जाक राम पुनः सीता के स्वीकार करैत छथि। किछु लोक अहि में ई तर्क (कुतर्क?) दैत कहैत छथि जे समाज मे उचित व्यवस्था आ आदर्श उत्पन्न करबा लेल राम एहेन कार्य केलनि। मुदा मैथिलानी के ई सोचब छनि जे राम सीता सङ्गे अन्याय केला आ समस्त स्त्री समाज पर बंधन थोपबाक एक अनर्गल परम्परा के प्रारंभ केलनि। की यैह छलनि रामक रघुकुल रीति? ओह!! कहब दुख ककरा सँ! अग्निपरीक्षा के संबंध में किछु लोक कहबा लेल एहनो बात कहैत छथि जे जाहि सीता के रावण हरण केलक से सीता त सही अर्थ में सीता छेबे कहाँ छलि। ओ त सीता के छाँह छलनि। असली सीता त अग्नि में समाहित भ गेल रहथि आ निश्चिन्त सँ अग्नि में चुपचाप बैसल। ताहिं छाँहक सीता के अग्निकुण्ड में जाइते देरी असली सीता अग्नि सँ बाहर निकलली जिनका राम सहज रूप सँ अर्धांगनी के रूप में स्वीकार करैत छथि। मुदा एक हाड़-मांस केर सामान्य मनुख होबाक नाते एकटा बात नहि पचा पबैत छी जे रामक ई दुरंगी चरित्र कोना देखी। जे राम ऋषि गौतम के पत्नी अहिल्या के उद्धार स्पर्श मात्र सँ करैत छथि वैह राम अपन पत्नी सीता लेल अतेक निरंकुश? जे राम बालि के एहि द्वारे बध करैत छथि जे ओ अपन छोट भाई सुग्रीव केर पत्नी के बलपूर्वक अपना लग रखने अछि। जखन बालि राम सँ पुछैत छनि: "में बैरी सुग्रीवहिं प्यारा। कारण कबन नाथ मोहि मारा।।" त राम उत्तर दैत कहैत छथिन: "अनुजवधु भगिनी सुतनारी। सुन सठ कन्या सम ए चारी।। इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधे कछु दोष न होई।।" बालि के मृत्यु के बाद राम अपन सखा सुग्रीव के फेर सँ अपन पत्नी के स्वीकार करबा लेल प्रेरित करैत छथि जकरा सुग्रीवक जेठ भाय बालि बहुत दिन धरि अपन कब्जा में रखने छ्ल। आ सैह राम सीताक मामला में एहेन कठोर, हृदयहीन कोना??? जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन। कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक? अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ में खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?” खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत, के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।” जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल। मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह। सीता रामे के वंशक सन्तति के जंगल मे बहुत नीक जकाँ सब शिक्षा संस्कार में पारंगत करा राम के औकात देखा देलनि। राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।” सीता: “से कोना?” राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।” सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?” राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी।” सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक ?” ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ि करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय! धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती में बिलुप्त भ गेलीह। धरती फटली आ धरतीपुत्री सीता धरती में समा गेलनि। ताहि जखन मैथिलानी सबके कोनो कष्ट होईत छनि त अपना के सीता बुझैत अनायास बाजि उठैत छथि: “फाटू हे धरती”। ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि। अपमानित होईत छथि। बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....” सनातन धर्म पूर्वजन्म के सिद्धान्त के मनैत अछि। मिथिला के लोक व्यवहार में धोबी के कहला सँ राम द्वारे सीता के पुनः वन भेजबाक एक लोककथा अछि जे कर्म के सिद्धान्त पर टिकल अछि। कनि देखी एकरा: बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी में भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से कम। झुला लागल प्रेमक डाली।i झुलथि सीता प्यारी ना।। सब सखी गबथि सिनेह देखाबथि। बिहुसथि जनकदुलारी ना।। सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर में गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान में मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ में प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली। सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल में आनि पिंजरा में राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत! राजमहल में अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी में सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ी मनुखक आवाज़ में मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी में स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"। सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी में स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा में बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा में देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली। ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरु हमर पत्नी के बदला में अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा में बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक। अपन पत्नी के प्रेम में मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल में आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन! बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट में हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!" कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना में मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल में कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी। आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था में घर स निकालि देता”। आब सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन। किछु लोक के मानब छनि जे रामक सीताक प्रति एहेन निष्ठुर व्यवहार सीता के व्यक्तित्व के सबल बनबैत छनि। मुदा ई केहेन व्यवहार। ककरो सबल बनेबाक हेतु, उदाहरण प्रस्तुत करबा हेतु अहाँ डेगे-डेगे प्रताड़ित करबैक? नहि-नहि, ई नहि उचित विचार। एक मैथिलानी हमरा कहली, "देखू, सीता एक प्रतापी राजा के बेटी आ दोसर प्रतापी राजा के पत्नी। हुनकर जखन ई हाल भेल त सामान्य महिला के की बात?" सीता मिथिला अपन नैहर आ पिता राजा जनक लग कियैक नहि एली? फेर स्मरण अबैत अछि : "बेटी सासुरे नीक की सर्गे नीक"। ताहिं सीता स्वर्गक रास्ता धेलनि। मोन में एक बात होईत अछि, उमरैत रहैत अछि - अगर राम मर्यादापुरुषोत्तम छथि त फेर ओहि मर्यादा के धोती के तार-तार कथी लेल करैत छथि? वैदेही के दुःख सँ द्रवित होइत मिथिला के अनेक पुरुख आइयो कनि उत्थर भ जाइत छथि, अधीर भ जाइत छथि, जेना विद्रोहक स्वर रामक प्रति प्रचण्ड भ जाइत होनि! धीरेन्द्र प्रेमर्षि त अतेक तामसे भेर भ जाइत छथि की हुनकर लेखनी बुझू जे क्षण मात्र लेल सब मर्यादा के अतिक्रमण करैत अपन भड़ास निकलैत बाजि उठैत अछि: "दण्ड-भेदे करू कि अपनाउ साम-दाम हमर सीते जँ बोन, अहाँ सुथनीक राम?" जो रे मर्यादा आ पुरुख द्वारा स्त्रीगन के अदृश्यबेड़ी संजकड़ल पैर! बेचारीमैथिलानी से कोना कहती? ई सब त सीता के द्वारा स्थापित मापदंड के एखनो ओही मर्यादा के सँग अक्षर-अक्षर अनुशरण करैत छथि, निर्वहन करैत छथि। पाहुन राम सँ उपराग त ठीक मुदा हुनका लेल अवाच्य कथा - हे भगवान! कथमपि नहि। ऊपर सँ "हम नहि जियब बिनु राम" गाबि-गाबि पाहुन के दिन-राति स्मरण करैत रहैत छथि। अतेक भेला बादो राम के मिथिला के लोक अपन सब सँ सुन्नर पाहुन मनैत छथि। राम के प्रति जेहिना भक्तिभाव तहिना प्रेमभाव। एक भाव जे मैथिलानी लोकगीतक मादे गबैत छथि से जरूर मोन के द्रवित क दैत अछि आ सब मैथिलानी में सीता आ सब मे सीताक व्यथा बुझना जाइत अछि: "हे भगवान! कुन कसूर विधना भेल बाम कहब दुख ककरा सँ?" ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक औझका डायरी
शुकुल जी जायसीक प्रशंसा करैत छथिन ।भाव ई छैक ‘मुसलमानो होइतो जायसी भारतीय कविता के एत्ते बूझैत छथिन ,मुसलमान होइतो जायसी हिंदू स्त्रीक जीवन ,प्रेम ,विरह कें एत्ते नीक जँका चिन्है छथिन ,मुसलमान होइतो जायसी अवधक लोकजीवन में प्रवेश क’ पाबैत छथिन ...... जेना मुसलमान केओ होय त’ ऊ कविता नइ लिखै ,लिखबो करै त’ केवल अल्लाह आ कुरान पर या केवल ईरान ,तुर्किस्तान पर । (दिनांक07 -04-17) मैथिली के एकटा आलोचक चाही ,आलोचक नइ नव्यालोचक ,नव्यालोचक नइ वज्रालोचक ।एहन आलोचक जे बज्जर सन सन बात कहै । काबिल सँ लिखबाबै , बेगारू सभ कें टरकाबै ।
एहन आलोचक जेकरा मे केवल बहुज्ञता नइ रसबोध सेहो होइ ,केवल रसबोधे नइ समै-सजगता सेहो । केवल फार्मे नइ कंटेंटक प्रति सेहो समझदारी होए ।
एहन आलोचक जेकरा मे समैक जिम्मेवारी उठाबैत साहित्य के आगू बरहेबाक ताकति होए । एहने सन जे मिथिला आ मैथिलीक परिवर्द्धित आ संवर्धित स्वरूपके बूझै आ ओकर रक्षा करै ।एहन आलोचक जेकरा मे मैथिलीक वर्तमान साहित्यक दिशा गमबाक हिम्मत होए आ ओकरा समकालीन भारतीय साहित्य के जनबाक जरूरति सेहो महसूस होए । (दिनांक 11 04 2017 )
ओकरा गाब’ दियौ ,गेबाक आनन्द लिय’ दियौ ,ओकरा पर अपन अपेक्षाक पहाड़ नइ लादियौ ,ओकरा पर उपराष्ट्रीयताक ठप्पा नइ लगाबियौ ,एहन अनेर नइ बाजियौ कि ऊ जीत जाए त’ मिथिला जीत गेलै आ ऊ हारि गेलै त’ मिथिला हारि गेलै । निश्चितरूपेण ओकरा मे आगू जेबाक हिम्मत आ ताकति छैक , मुदा ऐ चीजक लेल तैयार रहियौ कि ऊ जीत गेलै त’ ऊ राष्ट्रीय अपेक्षाक अनुसार अपना आप कें बदलि सकै ।ओकरा मत दियौ समर्थन दियौ आ ऐ चीजक आर्शीवाद कि ओ समग्र देशक लेल गाबि सकै ।जेना कुनो बोली राष्ट्रीय बनै छैक त’ ओ आनो बोलीक गुण आ सकारात्मक तत्व ग्रहण करैत छैक आ एक अर्थ मे ई ओइ बोलीक मृत्यु होइत छैक ,किएक त’ ओ पुरनका पंजर छोडि़ के नया रूप धारण करैत छैक ।तहिना ओ समुच्चा देसक लेल गाबै ,ई शुभकामना । बात एहने सन होए कि गायन कला जीतै नइ कि मिथिला ,पंजाब ,महाराष्ट्र या गुजरात ,ओना मॉडर्न बनियौटी एकरा संघर्ष आ क्षेत्रक संघर्ष वला रूप देबाक प्रयास करत ,मुदा हम सब संयमित रही ।आ एतबे धरि नइ मिथिला मे सब तरहक गायनक मुकम्मल परंपरा फेर सँ प्रारंभ होए ,ई नेशान केवल अमता ,बहेड़ी ,दरभंगा आ विद्यापति समारोहे तक सीमित नइ रहै ।ओहुना मैथिली मंच पर राम चतुर मल्लिक कें हूट केनिहार आ दुमका-झुमका कें बढ़ाबा देनिहारक कमी नइ ......
दिनांक 13-04-2017
ऊ हम्मर कुटुम छथिन ,दियाद छथिन आ दोस छथिन।ऊ चौबीसो घंटा हेलमेट पहिरै छथिन ,केओ कुटुम देखि ने लए ,ऊ कखनो काल एकटा अंग के बेकाम क’ दए छथिन ,कहबेन त’ सुनता नइ ,ईशारा देबै त’ रूकता नइ ,अनुमान यदि लगा लेता त’ ह्रदयहीन भेने कुशल ।ऐ रस्ता बाटे नइ ,ऐ चौक पर बाटे नइ ,दस बजे के बदला मे एगारह बजे चलता आ पांच बजे के बदला मे सात बजे लौटता ।धीरे-धीरे .....केओ देखि ने लए । हुनकर बदलबाक कुनो अंत नइ ,नाम ,गोत्र ,गाम ,शहर सब बदलि के अपन जेबी आ अपन स्टेटिक इनर्जी कें सेव करैत छथिन ।एहने केरेक्टर हमरे परिदृश्य मे नइ आहूं के वायुमंडल मे अछि ।ऊ आ हुनका सन कतेको कतेक अपन ओकादि बदलबाक प्रतीक्षा क’ रहल छैक । ओकादि बदलिते भाषा ,भंगिमा ,टोन ,बॉडी लैंग्वेज सब बदलि जाइत छैक ।कखनो-कखनो ओकादि आ भाषा साथ-साथ बदलैत छैक ,कखनो-कखनो ओकादि बदलबाक प्रत्याशा मे भाषा आ टोन समै सँ पहिले बदलि जाइत छैक आ ओकादि बाद मे बदलै छैक ।कखनो काल दुर्भाग्य सँ भाषा त’ बदलि जाइत छैक ,मुदा ओकादि बदलबाक प्रक्रिया मे ब्रेक लागि जाइत छैक (दिनांक 15-04-2017) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रबीन्द्र नारायण मिश्र-संगम तीरे २.आशीष अनचिन्हार- प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल १ रबीन्द्र नारायण मिश्र-संगम तीरे पत्नीक संग डेढ़ सालक बच्चा आ किछु मोटा-चोंटा सहित इलाहाबाद स्टेशनपर पहुँचलौं। हमर अनुज दड़िभंगासँ हमरा मदैत करए आएल रहैथ। दिल्लीसँ स्थानान्तरणक बाद नव निर्मित कार्यालय कर्मचारी चयन आयोगमे योगदान करबाक हेतु हम इलाहाबाद सपरिवार बिना कोनो डेरा तकने आएल रही। आब सोचैत छी तँ अपनो हँसी लगैत अछि, आश्चर्यो होइत जे केना नान्हिटा बच्चा ओ पत्नीकेँ इलाहाबाद टीशनपर छोड़ि अनुज-संगे डेरा ताकए विदा भेलौं..! पहिल बेर अही क्रममे डॉ. जयकान्त मिश्रजीसँ हुनकर आवास ‘तिरमुक्ति’ पर भेँट भेल। हुनकासँ भेँट भेलापर लागल जेना केतेको सालसँ परिचित होथि। सभ काज छोड़ि कऽ हमरासँ गप करैत रहला। परिवारक अन्य सदस्य सभ स्वागतमे लागल रहला। एक अपरिचित मैथिलक एतेक स्वागत करत? जयकान्त बाबूक मार्गदर्शनक अनुसार प्रयास कए हमरा लोकनिकेँ ओही दिन साँझ धरि डेरा भेटल। डेरा दड़ियागंजमे छल। ओइठामसँ टीशन आपस जा परिवारकेँ अन्य सदस्य, सामान सहित डेरामे प्रवेश केलौं। दिन भरिक संघर्षसँ हम सभ थाकि कऽ चूर भऽ गेल रही आ जेना-तेना भोजन कए शान्ति पूर्वक सूति रहलौं। प्रात:काल स्टेनली रोड स्थित कर्मचारी चयन आयोगक कार्यालय पहुँचलौं। ओ कार्यालय स्थापित भऽ रहल छल, अस्तु कार्यालय चलेबाक हेतु मूल वस्तु जेना कुर्सी, टेबुल तक नहि छल। एकटा अधिकारी छला जे ओइ कार्यालयक एक भागमे सपरिवार रहैत छला। क्रमश: किछु कर्मचारी सभ एला। टेबुल, कुर्सीक बेवस्था भेल। किछु स्थानीय नैर्मिातक कर्मचारी राखल गेल। आ कार्यालय चलि पड़ल। किछुए दिनमे नव भर्तीक विज्ञापनक आधापर आयोजित लिखित परीक्षाक हेतु आवेदन पत्रसभ आबए लागल। किछुए दिनमे एकटा कोठरी आवेदनक लिफाफासँ भरि गेल। किछु दिनक बाद कर्मचारी चयन आयोगक क्षेत्रीय निदेशक बनि कऽ श्री एल.के.जोश–आइ.ए.एस.–एला। कारी-कारी करगर मोछ, गोरनार भुट्ट आ बेसी काल गुमसुम रहएबला जोशीजीक एलाक बाद कार्यालयक प्रगति तेजीसँ होमए लागल। जोशीजीक पत्नी इलाहाबादेमे छेलखिन, तँए ओ ओहीठाम अपन पदस्थापना करौलैथ। कार्यालयमे कर्मचारी कम छल आ काज एकाएक बढ़ि गेल छल जइ कारणसँ लोक सभ तनावमे रहैत छल। चूकी परीक्षाक तिथि पहिने घोषित भऽ जाइत अछि, तँए सभ काज समयवद्ध ठंगसँ करबाक छल। तहिया कम्पूटरक आगमन नहि भेल छल। सभ काज हाथेसँ होइत रहइ। हालत ई छेलै जे जोशीजी स्वयं नित्य सैकड़ोक तादादमे प्रवेश पत्र लिखैत छला आ अनकर कथे कोन। परीक्षाक बेवस्था करब कोनो जबार भोज करबसँ बेसी कठिन काज छल। एतेक अस्त व्यस्तताक बाबजूद ओ कार्यालय आगू चलि पड़ल मुदा जोशीजी निरन्तर उदास रहैत छला। कारण परिवारिक छल। पत्नीक लगमे रही तँ ओ इलाहाबाद अएला आ थोड़ेक दिनक बाद ओ इलाहाबाद छोड़ि विदेश चलि गेलखिन। स्पष्टत: सभ किछु ठीक-ठाक नहि छल। बेकतीगत जीवनक ऐ अन्तर्द्धन्दसँ गुजरैत हुनकर मोन आसानीसँ पढ़ल जा सकैत छल। एकर दुष्प्रभव हुनकर कार्यालयक काजोपर पड़ैत छल। जोशीजीक प्रेम विवाह भेल छल। हुनकर पत्नी इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे इतिहास विषयक व्याख्याता छेलखिन। उम्रमे हुनकासँआठ साल पैघ। मुदा प्रेम तँ आन्हर होइत अछि। विवाह भऽ गेल। दूटा बच्चो भेल। मुदा खटपट सेहो शुरू भऽ गेल जे चलिते रहल आ अन्ततोगत्वा हुनका लोकनिक विवाह विच्छेद भऽ गेल। जोशीजी दिल्ली आपस चल गेला आ कार्मिक विभागक सचिव भेला। केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT)क उपाध्यक्ष भेला। आब ओ ऐ दुनियाँमे नइ छैथ। प्रेमक आवेशक अंजाम केतेको बेर बहुत कुटिल होइत अछि। उफानकमे रहएबला जोड़ी कएक बेर एक-दोसरक हत्या कऽ दैत अछि। नित्यप्रति एहेन घटना होइत रहैत अछि, तथापि लोक प्रेम करैत अछि। जँ प्रेम त्यागसँ अभिभूत नहि भेल, तँ ओ अस्किर हेबे करत। के हारत, के जीतत तेकर कोनो ठेकान नहि, मुदा सर्जनात्मकता तँ अन्त भाइए जाइत...। जोशीजीक प्रकरणकेँ स्मरणसँ दृदयमे कएक बेर अखनो कचोट भऽ जाइत अछि। दुनू गोटे अतिशिक्षित ओ संभ्रान्त परिवारक छला। स्वयं बहुत योग्य रहैथ मुदा जीवनक व्यतिक्रमकेँ नहि नहि सम्हारि सकल। भावी प्रवल। कार्यालयमे एकाएक तेतेक काज आबि गेल आ काज केनिहार लोक तेतेक कम छल जे बहुत अस्तव्यस्तता भऽ गेल। रबियो दिन छुट्टी नहि होइत छल। कखनो काल तँ दिल्ली घुरि जेबाक इच्छा होइत छल। दड़ियागंजसँ स्टेनली रोड स्थित कार्यालय आएब-जाएब कठिन काज छल। एक्कापर चढ़ि कऽ बेसी काल यात्रा होइत छल, तथापि समय तँ लगिते छल। तँए कार्यालयक आसपास डेरा ताकए लगलौं। आखिर किछु दिनमे १७,नयाममफोड़गंज हमर डेरा भेल। ममफोड़गंज इलाहाबादक संभ्रान्त आवासीय मोहल्लामे सँ मानल जाइत अछि। मकान मालकिन वृद्धा, स्वतंत्रता सैनानी छेली,जिनका सभ गुरुजी कहैन, कारण ओ शिक्षक छेली। सेवा निवृत भऽ गेल रहैथ। मासमे एक दिन पैंशन लेबए लेल जखन ओ जाथि तँ लगैक जे ओ दिव्य बेकती ठाढ़ अछि। आन दिन विक्षिप्त जकाँ एकटा कोठरीमे सिमटल। भूतलपर दोसर किरायादार छल। छतपर खाली जगहमे गोइठा भरल छल। कुलमिला कऽ ई आवास सुखद छल। आसपासमे नीक लोक सभ छल। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक भूतपूर्व कुलपति स्व. ए.वी. लाल, अर्थशास्त्र विभागक विभागाध्यक्ष डॉ. महेश प्रसाद, प्रसिद्ध महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. रमा मिश्र इत्यादि सभ आसे पासमे रहैत रहैथ। निगम चौराहा लगेमे छल। मिठाइ केर दोकान घरेलू समान इत्यादि सभ किछुक दोकान सेहो आसेपासमे। कार्यालयसँ ममफोड़गंज स्थित हमर डेरा पैदल ५-७ मिनटक रस्ता छल। अस्तु आवागमनक समय ओ खर्चा दुनू बाँचए लगल। क्रमश: आसपासक लोक सभसँ परिचय होमए लागल आ जीवन यात्रा अपेक्षाकृत सरलतासँ आगू बढ़ए लगल। छुट्टी दिनमे आसपास एमहर-ओमहर आएब-जाएब प्रारम्भ भेल। मोतीलाल नेहरू रिजनल इन्जीनियरिंग कौलेजमे हमर पितियौत भातिज पढ़ै छला। कहियो काल हुनकासँ भेँट-घाँट करए छात्रावास चलि जाइ। ओतए गेलापर अफशोस हुअ लागए जे नीक नम्बर रहितौं हम ऐ इन्जीनियरिंग कौलेजमे अपन नओं नहि लिखबा सकलौं। गामक एकटा फौजी कहियो काल अबैत रहै छला। सासुरक किछु सम्बन्धी सेहो भेट गेला। हमर स्कूलिया संगी इन्जीनियरिंग पास कऽ इलाहाबादेमे नौकरी पकैड़ लेने रहैथ। एवम् प्रकारेण पूर्व परिचित लोक सभसँ सम्पर्क भऽ गेलाक बाद कार्यालयसँ हटि कऽ समाज भऽ गेल जे क्रमश: बढ़िते गेल, तइसँ इलाहाबादमे रहब मनलग्गू भऽ गेल। कहि नहि हम दिल्ली छोड़ि इलाहाबाद किएक एलौं? प्राय: मोनमे रहए जे गाम लग रहत। खर्चा कम होएत वा इलाहाबाद धार्मिक स्थान अछि, तँए अध्यात्मिकताक विकासमे सहायक रहत। मुदा इलाहावाद आबि कऽ कोनो सुविधाजनक स्थिति नहि भेल। कार्यालयमे काज बहुत छल। रबियो दिन व्यस्तता रहैत छल, कारण अधिकांश परीक्षा रबिए दिन होइत छेलइ। अध्यात्मिक दृष्टिसँ किछु विशेषता तँ ऐ शहरकेँ अछिए। प्रतिवर्ष माघमे संगममे जबरदस्त मेला लगैत अछि। कहाँ-कहाँसँ सन्त-महात्मा, गृहस्थ सन्यासी लाखोक संख्यामे ओतए आबि कऽ मास करै छैथ। भजन-कीर्तन करै छैथ। गाम-घरक चिन्तासँ बेफिक्र लोक एकटा अद्भुत आनन्दक अनुभव करैत अछि। माघ मेलाक अवधिमे कहियो-कहियो विशेष स्नान होइत अछि। ओइ दिन तँ लगैत अछि जेना समुद्र संगम दिस अग्रसर भऽ रहल अछि। माघ मेलामे रंग-रंगक सन्त-महात्माक समागम होइत छल। ओइमे देवराहा बाबाक नाओंकेँ के नइ जनैत अछि। हुनकर उम्रक बारेमे कहल जाइत अछि जे ओ केतेक दिन जीला तेकर केकरो सही अनुमान नहि अछि। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद २-३ सालक रहैथ तँ हुनकर पिता बाबा लग लऽ गेल रहथिन आ बाबा हुनका देखते कहि उठला जे ई तँ राजा हएत। सन् १९५४ इस्वीमे भारतक राष्ट्रपति भेलाक बाद ओ बाबाक दर्शन केने रहैथ। ओही समयक समस्त प्रख्यात नेता सभ बाबाक दर्शन हेतु अबैत रहै छला। ओ घन्टो पानिमे डुबकी लगौने रहैत छला। हुनका योग सिद्ध रहैन आ सामने ठाढ़ बेकतीक मोनक बात बुझि जाइ छला। कहल जाइत अछि जे बाबा पानिपर चलि सकैत छला, योग क्रिया द्वारा एक स्थानसँ दोसर स्थान जा सकै छला। मंचपर बैस कऽ बाबा भक्त सभकेँ प्रसाद फेकैत रहै छला। केकरो-केकरो माथपर पैर रखि कऽ आशीर्वाद दैत छला। एहेन बेकती बहुत सौभाग्यशाली मानल जाइ छला। देवराहा बाबाक सम्बन्धमे हमर एकटा निदेशक महोदय सद्य: घटनाक वर्णन करैत कहला जे एकबेर हरिद्वारमे बाबा आएल रहैथ। ओ ओइठाम मेला अधिकारी छला। एकटा हाथी बताह भऽ गेल छल। लोक सभ कोनो तरहेँ ओइ हाथीकेँ नियंत्रित नहि कऽ पाबि रहल छला। बाबाक कान तक ई समाचार गेल। ओ हाथीक हेतु एकटा केरा देलखिन मुदा केकरो ओइ पागल हाथीक लग जेबाक साहस नहि होइ। बाबाक एकटा भक्त सिपाही ओ केरा लऽ हाथी दिस बढ़ल। हाथी ओकरा देखते हाथसँ बाबाक देल केरा लऽ कऽ खा लेलक आ एकदम शान्त भऽ गेल। एवम् प्रकारेण रंग-रंगक प्रसंग बाबाक बारेमे सुनबामे अबैत छल। जाबे इलाहाबादमे रही,ताबे प्रति बर्ख बाबाक दर्शन माघ मेलामे होइत रहल। ऐ लेल ममफोड़गंजसँ माघ मेला क्षेत्र कएक बेर पएरे जाइत रही, कएक बेर रस्तामे एक्का कए ली। एक बेर सोचैत रही जे जा तँ रहल छी, मुदा एतेक दूरसँ फेर पएरे केना आएब। ततबेमे देखै छी जे हमर परिचित एकटा बेकती हमरा दिस बढ़ि रहल छैथ आ आग्रह करए लगला जे आपस हुनके संगे साइकिलपर चलब। १९ जून सन् १९९० क योगिनी एकादशीक दिन बाबा ब्रम्ह्लीन भऽ गेला। एवम् प्रकारेण भारतक एक महान सन्तसँ प्रत्यक्ष दर्शन सम्भव नहि रहल, मुदा हुनकर स्मृति हमर इलाहाबाद प्रवाससँ सभ दिनक लेल जुड़ि गेला। बाबाकेँ खेचड़ी विद्या सिद्ध छल जइ कारण हुनका भूख ओ आयुपर नियंत्रण छेलैन। इलाहाबादमे रहैत प्रभुदत्त ब्रह्मचारीसँ भेँट-घाँटक सौभाग्य सेहो भेटल। ओ सन्त तँ छलाहे, धार्मिक, अध्यात्मिक विषयक सैकड़ो पुस्तकक लेखक सेहो छला। हुनकर लिखल भगवती कथाक दुनू खण्ड देवराहा बाबाक मंच लग प्रसाद स्वरुप लोक कीनैत छल। बाबा ओइमे हाथ लगा कऽ सम्बन्धित बेकतीकेँ दैत कहथिन- “जा कलियाण होइ। एकरा पढ़।” प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीक आश्रम झैसीमे छल। ओइ आश्रम द्वारा संस्कृत महाविद्यालय चलैत छल, जइठाम गरीब विद्यार्थी सभकेँ नि:शुल्क शिक्षा देल जाइत छल। एकबेर हम अपन अनुजक संगे ओतए गेल रही। प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजी हुनका बारेमे जिज्ञासा केलैन आ हुनका आग्रह केलखिन जे हुनकर संस्कृत महाविद्यालयसँ शास्त्रीक पढ़ाइ करैथ, मुदा ओ तइले तैयार नहि भेला। कृष्णाष्टमीक अवसरपर हम सभ सपरिवार प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीक आश्रम गेल रही। आश्रममे कृष्णाष्टमीक पर्व मनौल जा रहल छल। करीब ४ बजे ओ बाहर एला आ हमरा सभकेँ हुनकासँ भेँट भेल। ब्रह्मचारीजी आग्रह केलैन जे हम सभ कृष्णजन्म देखबाक लेल आश्रमेमे रूकि जाइ, मुदा किछु काल धरि ठहैर हम सभ आपस डेरा आबि गेलौं। एकर अलाबा यदा-कदा हम हुनकर आश्रमपर जाइत रहै छेलौं। ओइ आश्रमक अध्यात्मिक वातावरणक आनन्द लैत रहै छेलौं। संगममे स्नान, माघ मेलाक मास भरिक आयोजन, आ संत महात्माक दर्शन इलाहाबाद रहैत स्वत: उपलब्ध छल जेकर लाभ हमरा यथा-सम्भव होइत रहल। डॉ. जयकान्त मिश्रसँ भेँट इलाहाबाद अबिते भेल। ई भेँट-घाँट अनवरत बनल रहल। मैथिल मात्रसँ हुनकर सिनेहक ई प्रमाण छल। कएक बेर हुनका ओइठाम मैथिली भाषाक मूर्धन्य विद्वान लोकनिसँ भेँट-घाँट सेहो भऽ जाइत छल। क्रमश: हुनकर समस्त परिवारसँ तँ तेतेक सम्पर्क भऽ गेल जे लगैत छल जेना हुनकर कोनो निकट सम्बन्धी होइ, ई सभ विशेषता हुनकर छेलैन। ऐमे हमर योगदान की कहल जा सकैत अछि? मधुर वाणी, उदार हृदय ओ अपनत्वसँ सरावोर बेवहार केकरो आकर्षित कए सकैत छल। प्राय: सभ सप्ताह खास कऽ छुट्टी दिन हुनका ओइठाम जाइत रहै छेलौं। ओहो कएक बेर हमरा डेरापर सपरिवार अबैत रहै छला। हुनकर पिता म. म. डॉ. उमेश मिश्रजीक बरखीक भोजमे हम अबस्स आमंत्रित रहै छेलौं। भोजो अद्भुत होइत छल। बहुत नेम-टेमसँ हुनकर पत्नी भोजक आयोजन करै छेली। अस्तु, हमर इलाहाबादक स्मृतिक डॉ. मिश्रजी एकटा अमिट अंग भऽ गेला तँ कोनो आश्चर्य नहि। इलाहाबादक चर्च होइक आ डॉ. मिश्रजीक ज्येष्ठ पुत्र डॉ. रूद्रकान्त मिश्रजीक चर्च नहि करी तँ ई हुनका संगे बड़का अन्याय हएत। रूद्रकान्तजी सोभावसँ एकदम शान्त छला। संस्कारसँ तेजस्वी, कर्मठ, मेहनती आ भावुक व्यक्तित्व। पितासँ सपरिवार अलग रहै छला। पहिल पत्नीक असमयमे निधन भऽ गेल रहैन। ओइ पक्षमे एकटा कन्या रहइ। दोसर विवाहसँ सेहो सखापात रहैन। रसूलाबादमे गंगा स्नान करैत, गंगामे गायत्री जप करैत हुनका कएक दिन देखिऐन। संस्कृतक विद्वान छला। इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे संस्कृतक व्याख्याता छला। परिवारिक कारणसँ कर्जमे डुमल रहै छला। कहैथ जे हुनकर दरमाहाक अधिकांश भाग सूदे-तरे चल जाइत अछि। अतिरिक्त काज कऽ कऽ कमाइ करक हेतु निरनतर चेष्टाशील रहै छला। अपन कार्यालयमे परीक्षाक उत्तर पुस्तक जाँचमे कएक बेर हुनका बजबिऐन। अद्भुत परिश्रम आ एकाग्रतासँ ओ काज करै छला। हुनकर काजमे एकटा गलती नहि पाबि सकैत छी। हमरासँ बहुत पटै छेलैन आ कएटा नितान्त व्यक्तिगत गपसभ हमरासँ करैथ जे लिखब उचित नहि। एकबेर हम सपत्नी हुनकर डेरापर गेल रही। बहुत स्वागत भेल। हलुआ से स्वादिष्ट छल जे आइ धरि जीहमे पानि आबि जाइत अछि। बहुत रास सभ गप-सप्प भेल। बच्चा सभ संस्कारी। किछु दिनक बाद ओइ हलुआक प्रशंसा डॉ. जयकान्त मिश्रजी ओइठाम कएल। तुरन्त ओतहुँ हलुआ बनल। कहक माने जे ऐठामक हलुआ सेहो कम नहि...। मुदा हलुआ रूद्रकान्तजीक बेसी स्वादिष्ट छल। रूद्रकान्तजी दिल्ली आएल रहैथ। हुनकर पहिल पत्नीसँ कन्याक विवाहक आमंत्रण देबाक हेतु। हम ओइ कार्यक्रममे गेल रही। दिल्लियेमे विवाह-कार्यक्रम भेल रहइ। हुनकर समस्त परिवारसँ भेँट भेल। रूद्रकान्तजीसँ बहुत दिन बाद फोनपर गप भेल। डॉ. जयकान्त मिश्रजीकेँ साहित्य आकदमीसँ २००० इस्वीमे भाषा सम्मान भेटल रहैन। तइ क्रममे ओ सभ दिल्ली आएल रहैथ। हम भेँट करए गेलौं मुदा कनीक देरी भऽ गेल छल आ पता लागल जे किछुए काल पर्वू ओ सभ इलाहाबादक हेतु प्रस्थान कऽ चूकल छैथ। किछु दिनक बाद सुनैमे आएल जे रूद्रकान्तजी नहि रहला। ऑफिस तँ ऑफिस होइत अछि। चाहे ओ प्रयागमे होइक वा दिल्लीमे। इलाहाबाद अबैसँ पर्वू सोचने रही जे ओ धार्मिक स्थान अछि आ ओइठामक लोक सभ बहुत संस्कारी हेता। किछु एहेन लोक भेटबो कलाह। इलाहाबादक धार्मिक प्रसांगिकता अखनो अछिए। तँए किछु हदतक हमर ई सही छल। मुदा कार्यालयक अन्दर जे वातावरण छल, (आपसी सिरुफुरौआल कहि सकै छी) से तँ नर्के छल। एकटा निदेशक महोदय (जे आइ.एस. अधिकारी रहैथ) कहला जे कलक्टरक रूपमे काज करबामे हुनका ओतेक दिक्कत नहि भेल जेतेक १३ आदमीकँ सम्हारैमे ऐ कार्यालयमे भऽ रहल अछि। अधिकारी, कर्मचारी सभ युवक छला। केकरो बेसी अनुभव नहि रहइ। काज से बहुत रहइ। तनावक एकटा प्रमुख कारण सेहो छल। मुदा असल कारण छला एकटा स्टाफ जे दुनियाँ भरिक तिकरमवाज छला। जँ केकरो तंग करक हेतु २० किलोमीटर पएरो चलए पड़त तँ ओ तइले तैयारे रहै छला। एक राति करीब २ बजे हम भभा कऽ हँसि पड़लौं। श्रीमतीजीक नन टुटि गेलैन। निन्न टुटिते पुछली- “की भेलै, अहाँ एना किए हँसि रहल छी?” असलमे ओइ दिन कार्यालयमे मारि-पीट भऽ गेल रहइ, जेकर स्मरणसँ हँसी लागि गेल रहए। कार्यालयक दूटा स्टाफक बीच बाता-बाती होइत-होइत हाथापायी चलए लगल। हल्ला सुनि कार्यालयक सभसँ पैघ अधिकारी, निदेशक महोदय जे आइ.एस. छला, कोनो बहन्ने खसैक गेला। सभ गोटे मुहाँ-मुहीं देखैत रहल आ झंझैट हाथापायीमे बदैल गेल। एकटा सज्जनक हाथ टुटि गेल। ओ एफ.आई.आर. करबाक हेतु थाना विदा भेला। हुनकर अपेक्षा रहैन जे हम हुनका संगे थाना गबाहीमे चली, मुदा हमरा से पसिन नहि भेल आ ने हम ओइ झंझैटमे पड़ए चाही, अस्तु गाहे-बगाहे मौका ताकि कऽ हम घटना स्थलसँ खसैक डेरापर चल एलौं। ऐ बातसँ पीड़ित कर्मचारी बहुत नाराज भेला आ बहुत दिन धरि ऐ बातकेँ मोनमे गाड़ने रहला। नौकरीक शुरूआती दौड़मे दरमाहा कम छल। ओभर टाइम केलाक बाद किछु पैसा अतिरिक्त भेट जाइत छल। असलमे अधिकारीगण एकरा एकटा हथियारक रूपमे इस्तेमाल करैत छला। जे पसिन्नक लोक छल ओकरा असानीसँ ओभर टाइम भेट जाइ छल। हमरा सबहक एकटा संगी (जे दड़िभंगेक छला) चलाक-चुस्त रहबाक कारणेँ बिना अतिरिक्त काज केनौं ओभर टाइम प्राप्त कए लैत छला। कार्यालयोक समयमे ओ पढ़ैत रहै छला। प्रतियोगिता परीक्षा सबहक तैयारीमे लागल रहै छला आ अन्तत: आइ.ए.एस. परीक्षा पास कऽ ओ बहुत आगाँ बढ़ि गेला। किछु साल पूर्व आयकर आयुक्त रहैथ। ओभर-टाइम कार्यालयमे संवेदनशील मुद्दा छल। एकबेर समस्त कर्मचारीक अगुआ बनि हम कार्यालयमे हड़ताल करबा देलिऐ। परीक्षाक समय नजदीक रहइ। उम्मीदवार सबहक प्रवेश पत्र जारी हेबक छल मुदा कार्यलयमे काज ठप। मान-मनौअलक बाद हड़ताल समाप्त भेल। मुदा हड़तालमे सहयोगी हेबाक कारण बहुत दिन धरि तंग कएल गेल। एक दिन हम श्रीमतीजीकेँ डाक्टरसँ देखबए गल रही। कार्यालय आएबमे बिलम्ब भऽ गेल। जखन ओतए पहुँचलौं तँ देखलौं जे पूरा कार्यालयक कर्मचारी बाहर ठाढ़ अछि। निदेशक महोदय सेहो कुर्सी लगा कऽ बाहरेमे बैसल छला। मनमे उठल- माजरा की अछि? माथ ठनकल। तह-तहक बात सोचाए लगल। थोड़ेक आगाँ बढ़लौं तँ कियो कानमे फुसफुसा कऽ कहलैन- “ताला सभ कुंजीक अभावमे बन्दे रहि गेल अछि!” जल्दीसँ डेराआपस जा कऽ कुंजीक गुच्छा अनलौं। कोठरी सभ खोलल गेल। निदेशक माहेदय अपन कोठरीमे बैसला। तेकर बाद असगरमे बजा कऽ हमरा अपन नाराजगी व्यक्त केलैन। एहेन संतुलित आ संयत बेकती कम होइत अछि। लगभग तीन साल हुनका संगे काज करबाक अवसर भेल। प्राय: पहिलबेर हुना तमसाइत देखलिऐन जे वाजिवछल। असलमे कुंजीक झाबा बिना हमर जानकारीकेँ हमर बच्चाकेँ पकड़ा देने रहइ। हमरा ऐ बातक जानकारी नहि छल। मुदा गड़बड़ी तँ भाइए गेलइ। कार्यालयक रोकड़क हिसाव तथा पैसाक लेन-देन एकटा कर्मचारी छला जे जँ रातियोकेँ केतौ देखा जाइतैथ तँ भूतक प्रत्यक्ष दर्शनक आभास होइत। कारी,भुट्ट, बीड़ी पीबैत आ टंकक पर टिपिर-टिपिर करैत। अपन काजमे मेहनती आ माहिर रहबाक कारण अधिकारी सभ ओकरा मानैत। तेकर दुरुपयोग ओ लोककेँ तंग करबामे करैत छल। कोनो बिल दियौ, ओ ताकि कऽ लगती निकालि दैत, दाबापर कैंची चला दैत, ऐसँ टोकर परपीड़क सोभावकेँ आनन्द होइत रहइ। लोक सभ ओकरासँ तंग तँ रहए मुदा कएल किछु नहि। जखन प्रशासनक अधिकारी हम भेलौं तँ पहिने मौका भेटते ओकरापर आक्रमण कऽ देल। भेलै ई जे ओकर कोनो काजमे सुधारक परामर्श देलिऐक तँ ओकरा बड्ड खराप लगलै। चिकरए, भेकरए लागल जे ओकरा ऐ काजसँ हटा देल जाए, हम ने यएह देखलौं ने वएह, तुरन्त आदेश निकालि ओकरा जगह दोसर कर्मचारीकेँ खजॉंची बना देलिऐक। आक तँ ओ साँप जकाँ छटपटाए लगल, डिरियाइत घुमैत रहल। केतए-केतए-सँ सिफारिस लगेलक, मुदा हम अरि गेलिऐक। ओकरा हटए पड़लै आ कार्यालयक काज सेहो चलिते रहल। डॉ. जयकान्त मिश्रजी अंग्रेजीक प्राध्यापक छला। इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे विभागाध्यक्ष पदक हेतु हुनका मोकदमाबाजीक सामना करए पड़ल। हुनके विभागक कियो प्राध्यापक इलाहाबद विश्वविद्यालयमे मोकदमा कऽ विभागाध्यक्षक पदक हेतु हठ केने छल, मुदा ओ हारि गेल। अंग्रेजीक व्याख्यता रहितौं मैथिली आ मिथिलाक प्रति हुनकर अनुराग जगजाहिर अछि। हुनका ओइठामसँ मैथिलीमे ५-७ पृष्ठक एकटा पत्रिका निकलैत छल। हुनकर समस्त परिवार ओइ पत्रिकाक तैयारीमे लागल रहैत छल। ओकरा सैंकड़ो लोककेँ पठौल जाइत छल। एकाध बेर हमहूँ ओइ काजमे लागल रही। प्रतिवर्ष विद्यापति पर्व समारोह इलाहाबादमे मनौल जाइत छल। जइमे जयकान्त बाबू बढ़ि-चढ़ि कऽ भाग लैत छला। मुदा ओइमे गुटबन्दी भऽ जाइत छल। एकबेर तँ हालत तेतेक खराप भेल जे मारि-पीट तक भऽ गेल आ एक गोरेक कुर्ता सेहो फाटि गेलैन। कार्यालयक गुटबन्दी पराकाष्ठापर छल। छोटसन कार्यालयमे मानवीय सम्बन्ध एतेक जटिल छल जेकर वर्णन नहि। निदेशक सभ आइ.ए.एस. अधिकारी होइत छला, मुदा मानवीय सम्बन्धक ओझरी सरकारी आदेशसँ नहि सोझरा सकैत छल। मोटा-मोटी दू भागमे कार्यालयक लोक सभ बँटि गेल रहैथ। कियो नव स्टाफ आबए तँ दुनू गुट ओकरा पटबैमे लागि जाइत। अहीक्रममे हमर कौलेजक सहपाठी स्मरण भऽ जाइत अछि। सी.एम. कौलेज दड़िभंगासँ ओहो पढ़ल छला। दड़िभंगामे घर रहैन। नौकरी भेलाक बाद कर्मचारी चयन आयोग इलाहाबादमे पदस्थापित भेला। मुदा मोटा-मोटी ओ दोसर गुटमे चलि गेला। बादमे ओ आइ.ए.एस परीक्षाक माध्यमसँ आयकर विभागमे पदनियुक्त भेला आ तेकर बाद कहियो भेँट नहि भेला। कार्यालयक एहेन उठा-पटकक बीच ९ वर्षक समय केना कटल से आश्चर्य...। इलाहाबाद स्थित कर्मचारी चयन आयोगक कार्यालयक मुखिया निदेशक आइ.ए.एस. अधिकारी होइत छला। १९८७ इस्वीमे हमरा चलि एलाक बाद ओइमे आन-आन सेवाक अधिकारी सभ सेहो नियुक्त भेला। ओइ पदपर वएह बेती अबैत छला जिनकर इलाहाबादमे घर वा परिवार रहए। हम ९ साल ओइ कार्यालयमे रहलौं जाइ अन्तरालमे चारिटा निदेशक संगे कार्य करबाक अवसर भेटल। ओइ चारूमे एकटा प्रोन्नत द्वारा आइ.ए.एस. बनल छला। ओइसँ पूर्व ओ प्रान्तीय सीनीक सेवा (पी.सी.एस.)मे रहैथ। हुनकर पिता उच्च न्यायालयक सेवा निवृत्त जज रहथिन। पिताक एक मात्र सन्तान छला। बहुत स्टाइलमे रहैथ। ओइ समयमे मूलत: फिएट वा एम्बेसडर कारक चलैन छलैक। हुनका लगमे फिएट कार छलैन, जइसँ ड्राइभर हुनका कार्यालय आनए आ लऽ जाए। दुपहरियाक भोजन सेहो घरे जा कऽ करैथ। कार्यालयमे जखन ओ पदस्थापित भेल रहैथ तँ कएक दिन धरि थूकदानीक लेल हंगामा भेल रहए। थुकदानी कोन नियमक अधीन कीनल जाए। हारि कऽ ओ अपन घरेसँ थुकदानी लऽ अनलाह। हुनका पान खेबाक आदैत रहैन, तँए पिकदानी राखब अनिवार्य छल। कार्यालयमे ओ कोनो रूचि नहि राखैथ। सभ अधीनस्थ अधिकारीपर छोड़ि देने रहैथ। एमहरसँ प्रस्ताव आएल तँ ओइपर दसखत आ ओमहरसँ आएल तँ ओइपर दसखत। कएक बेर तँ एहेन होइ जे एक्के विषयपर विपरीत आदेशपर ओ दसखत कऽ दैत छला। कहियो काल हुनकर घर जेबाक अवसर प्राप्त होइत छल। रसूलबाद स्थित गंगाक घाटसँ लगे काफी ऐल-फइल ओ सुन्दर हुनकर घर छल। बादमे पता लागल जे सेवा निवृत्तिक बाद ओ अपन घर बेचि लेला आ राजस्थानमे अपन पैतृक स्थानपर रहए लगला। कार्यालयमे हुनका निष्पृह रहबाक कारणे कार्यालयक महौल खरापे होइत गेल। मानवीय सम्बन्धमे कटुता बढ़ैत रहल आ किछु गोटे दिन-राति एक दोसरक टाँग खिचौवलमे लागल रहला। सन् १९८५ इस्वीमे कर्मचारी चयन आयोग, इलाहाबादक समक्ष प्रस्ताव छल जे बिहारमे दूटा नव परीक्षा केन्द्र स्थापित कएल जाए। ओहीमे एकटा केन्द्र दड़िभंगा वा मुजफ्फरपुरमे ओ दोसर दुमका वा भागलपुरमे। हमरासँ तत्कालिन निदेशक महोदय ऐ विषयपर परामर्श मंगलैन। हमर आग्रहक अनुसार दड़िभंगा आ दुमकामे परीक्षा केन्द्रक स्थापना भेल। दड़िभंगामे परीक्षा आयोजनक बेवस्था हेतु पर्यवेक्षकक रूपमे हम दड़िभंगा गेलो रही। दड़िभंगामे ५-६ टा परीक्षा केन्द्र छल जइमे हजारोसँ बेसी परीक्षार्थी भाग लेला। किछु केन्द्रपर परीक्षा बेवस्था स्तरीय नहि छल तथापि जेना-तेना काज ससरल। दड़िभंगामे परीक्षा केन्द्रक स्थापनासँ सैकड़ो स्थानीय विद्यार्थी सभकेँ कर्मचारी चयन आयोगक माध्यमसँ नौकरी भेटल, अन्यथा हुनका पहिने अही परीक्षा हेतु पटना जाए पड़ैत छल। दुमका केन्द्रमे अपेक्षाकृत कम उम्मीदवार रहैत छल, तँए बादमे ओ परीक्षा केन्द्र नहि रहल। दुमकाक जगह भागलपुरमे परीक्षा केन्द्र बनल जे सफल रहल। सन् १९८३क आसपास ओइ कार्यालयमे किछु नव लोक सबहक पदस्थापना भेल जइमे प्रमुख छला- श्री संजीव सिन्हा, एम.ए; एल.एल.बी.। ओ इलाहाबादक एकटा संयुक्त परिवारसँ अबैत छला। हुनक समस्त परिवार अति शिक्षित एवम् वरिष्ठ अधिकारी सभ छला। हुनकर एकटा बहिनोइ भारत सरकारमे सचिव पदसँ सेवा निवृत्त भेला। हुनकार बेवहार ओ विचारसँ ओइ कार्यालयक वातावरणमे तँ जे सुधार भेल से भेल, मुदा हमरा तँ जबरदस्त समर्थन भेटल। हुनकासँ मित्रता अखन धरि ओहिना चलि रहल अछि। बीचमे ओ दिल्ली स्थानान्तरित भऽ कऽ एला, फेर आपस इलाहाबाद गेला, हम दिल्ली चल एलौं, मुदा हमरा लोकनिक पारस्परिक सम्बन्ध ओहिना मधुर बनल अछि। हुनकर समस्त परिवारसँ हमरा क्रमश: सम्पर्क भऽ गेल जे अद्यावधि बनल अछि। कार्यालयक ओहन विकट वातावरणमे एहेन नीक लोक भेटला से ईश्वरक चमत्कारे कहक चाही। हमरा जीवनमे किछु गोटे एहेन भेटला जे बिना कोनो स्वार्थे निरन्तर मदैत करैत रहला। हमरा प्रति सद्भावना रहलैन आ संकटक समयमे सहोदर जकाँ ठाढ़ रहला। निश्चय कोनो जन्मक हमर पूण्यक ई फल रहल होएत। दड़िभंगामे नौकरी करैत काल पिण्डारूछक डॉ. विनय कुमार चौधरीजी ओ दिल्लीमे काज करैत काल हमरे नामधारी मिश्रजी (मूलत: दड़िभंगाक लगक रहनिहार) हमर जीवनमे प्रात:स्मरणीय छैथ। के कहैत अछि जे कार्यालयमे दोस्ती नहि होइ छइ? किंवा ओइठामक सम्बन्ध चलता होइत अछि। काजसँ काज मतलब राखए-बला परिवेशमे बेसी अपेक्षा सम्भवो नहि अछि आ ने राखक चाही। परन्तु उपरोक्त बेकती सभ विभिन्न समयमे कार्यालयमे हमरा भेटला आ जीवन भरिक हेतु घनिष्ट मित्र बनल रहला। इलाहाबाद कार्यालयक महौल खराप करैमे एक बेकतीक बहुत योगदान छल। आब ओ ऐ दुनियाँमे नहि छैथ मुदा जखन कखनो हुनकर चर्चा होइत अछि तँ ओ बात सभ मोन पड़िते अछि। गामक परिवेशसँ हम एकबेर दिल्ली तेकर बाद इलाहाबाद आबि गेल रही। नौकरी केना कएल जाइत अछि, तेकर बेवहारिक अनुभव नहि छल आ ने ओइ वातावरणमे कहियो रहलौं। दिन राति मेहनत करी, साए प्रतिशत इमानारीसँ काज करी, केकरो अहित नहि करी, तथापि अधिकारी लोकनि खूब प्रसन्न नहि रहैथ,कारण कोनो बात भेल आ आ ठाँइ-पठाँइ लड़ि जाइ, मुहेँपर सही बात बाजि दिऐ, कएक बेर सही विषयपर आक्रमणक सेहो भऽ जाइ, ऐ सभ कारणसँ अधिकारी लोकनिकेँ अहंपर चोट पड़ैत छेलैन आ सभ मौका पाबि कऽ तंग करैथ। कएक बेर बाजिव हक देबामे बाधा ठाढ़ कए दैथ आ किछु नहि तँ व्यंगे कऽ दैथ। कहलक माने जे काजसँ अधिकारीक अहंक रक्षा सरकारी कार्यालयमे अधिक महत्वपूर्ण होइत अछि, से बात जाबे बुझलिऐक, ताबे बहुत देरी भऽ गेल छल। कार्यालयक काज हेतु माटाडोर गाड़ी छल। ओकर ड्राइभर सज्जन बेकती छला। प्रशासनक काज हमरा जिम्मा छल, तँए गाड़ी ओ ड्राइभर हमर नियंत्रणमे रहैत छल। निदेशक महोदयक लेल अलगसँ गाड़ी नहि छल। आइ.ए.एस. अधिकारी होइतो ओ स्कूटरसँ कार्यालय अबैत छला। एकदिन एकाएक गाड़ी हुनकर घरपर पार्क भेल आ ओ गाड़ीक उपयोग अपना अधीन कऽ लेला। हमरा एकर जानकारी नहि छल भोरे किछु काजसँ केतौ जेबक हेतु गाड़ी तकलौं तँ पता लागल जे गाड़ी नहि अछि। हमरा बहुत तामस भेल। ड्राइभरकेँ डाँट-फटकार कऽ दिलिऐ। ओ नून-तेल लगा कऽ निदेशक महोदयकेँ चुगली कए देलक। सुनबामे आएल जे हुनका घर जा कऽ रंग-बिरंगक उपराग देलक। परिणाम भेल जे निदेशकजी बहुत क्रुद्ध भऽ गेला। ओहुना ओ हमरासँ अप्रसन्ने रहै छला। ऐ घटनाक बाद हमर हुनकर सम्बन्ध कहियो पटरीपर नहि आएल। आब सोचैत छी तँ हँसी लगैत अछि- अपनोपर, हुनकोपर। कार्यालयमे जे छल से छल, मुदा ओइसँ हटि कऽ हमर एकटा स्वस्थ, सुयोग्य लोकक समाज बनि गेल छल जइसँ तमाम कष्ट अभाव आ संघर्षक बीच हमरा मोन लगैत छल। डॉ. शुभद्र झाजी गाहे-बगाहे इलाहाबाद अपन माझिल पुत्र (भास्करजी)क ओइठाम अबैत रहै छला। हुनकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसरमे डेरा छल। एकबेर करीब ११ बजे दिनमे हम शुभद्र बाबूसँ भेँट करए भास्करजीक डेरापर गेलौं तँ डाक्टर साहैब कहला जे ओ लगातार ९ घटनासँ अध्ययन कए रहल छैथ। मैथिलीक शब्दकोषसँ सम्बन्धित किछु काजमे लागल छला। एकबेर शुभद्र बाबूकेँ हम नोत देने रहिऐन। डेरासँ ओ असगरे विदा भेला। भास्करजी पाछाँ विदा भेला आ हमर नायकटरा स्थित डेरापर पहिने पहुँच गेला। शुभद्र बाबूक कोनो पता नहि छल। भास्करजी परेशान रहैथ। हुनका ताकए हेतु एमहर, ओमहर वौआइत छला कि शुभद्रबाबूकेँ निच्चाँमे हमर नाम लऽ कऽ चिचियाइत सुनलौं। घर पहुँच कऽ कहए लगला जे गलतीसँ ओ बगलमे कनी हटि कऽ धोबी घाटपर चलि गेल छला। असलमे ओ मकान धोगीक छल, से गप हम हुनका कहने रहिऐन। कनी कालक बाद भाष्करजी सेहो आपस एला आ तखन भोज-भात भेल। हमर डेरा देख कऽ शुभद्र बाबू कहैथ जे केराक घौरमे जेना बातमे सँ पता निकलैत अछि, तहिना तोरा डेरामे कोठरीसँ कोठरी निकलैत अछि। गपक क्रममे कहलैथ जे सेवा निवृत्तक बाद रहक हेतु पाण्डिचेरीमे घर बनाबह। हुनका पाण्डिचेरी बहुत पसिन छेलैन। एवम् प्रकारेण जखन-कखनो आ इलाहाबाद अबैत छला तँ हमर-हुनकर भेँट-घाँट होइत रहैत छल, जे निश्चय आनन्ददायी छल। “Life is an endless struggle. Ef you stop struggling, You are tirished.” उपरोक्त कथन एकदम सत्य अछि। जीवन संघर्षक अन्तहीन यात्राक प्रत्येक डेग आगाँक यात्राक पथ प्रदर्शक बनि जाइत अछि। एहेन कमे लोक छैथ जे बनल-बनाएल सभ किछु प्राप्त कए लैत छैथ। मुदा हुनका ओ आनन्द कदापि नहि भऽ सकै छैन जे कठोर संघर्षक बाद प्राप्त छोटो-मोटो उपलब्धिसँ होइत अछि। इमानदारीसँ परिश्रमक कऽ जीवन-यापन करब तलवारक धारपर चलब थिक। लेकिन यदि आदमीमे साहस होइ, दृढ़ निश्चय होइ, ईश्वरमे आस्था होइ तँ संघर्ष रंग लबैत अछि। कहबी छै जे “Say not the struggle availith not.” नहि कहू जे संघर्ष रंग नहि अनैत अछि, अबस्स अनैत अछि, देर-सबेर भऽ सकैत अछि। ताइ लेल धैर्य चाही। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक प्रख्यात उपकुलपति स्व. ए.वी. लाल कहियो काल साक्षात्कार लेबए-ले कर्मचारी चयन आयोग अबैत छला। ओही क्रममे कएक बेर हम हुनका ओइठाम जाइत छेलौं। हुनकर घर गेलापर अद्भुत शानतिक आभास होइत छल। हुनका धिया-पुता नहि छेलैन। पत्नी आ ओ अपने अद्भुत शान्तिसँ रहैत छला। सोभावक सरलताक कोनो वर्णनन नहि। एकबेर भोपाल साक्षात्कारक क्रममे हम सभ संगे अतिथि गृहमे रहल रही। भोपाल संगे घूमल रही। दिल्ली एला पछाइत केतेको दिनक बाद पता लागल जे हुनकर पत्नीकेँ हुनके नौकर हत्या कऽ देलक। भेलै ई जे ओ अपने केतौ बाहर रहैथ।घरमे पत्नी असगरे रहथिन। आल्मीरासँ किछु पाइ निकालि कऽ नौकरकेँ तरकारी आनक हेतु देलखिन। ओइ आल्मीरामे रूपैआक गड्डी ओकरा देखा गेलइ। ओ लालचमे पड़ि कऽ कोनो भारी चीजसँ हुनकर माथपर चोट केलक जइसँ एकाएक हुनकर मृत्यु भऽ गेल। नौकरबा सभटा रूपैआ-पैसा लऽ कऽ फरार। ओइ नोकरक पिताकेँ आ ओकरो स्व. ए.बी.लालजी इलाहाबाद विश्वविद्यालमे नौकरी धरौने रहैथ। बहुत दिनसँ ओ सभ हिनका परिवारसँ जुड़ल छल। मुदा लोभमे आबि गेल। सभ बफादारी मिनटोमे बिला गेलइ। मुदा फबलै नहि। पकड़ा गेल। आजन्म काराबास भेलइ। मुदा एक निर्दोष आदमी मारल गेल। वृद्धावस्थामे ए.बी.लालजीकेँ घोर कष्ट लिखल रहैन। “ऐ भाई जरा देख के...। आदमी से जानबर ज्यादा वफादार है..।” जइ बेकतीक पूरा परिवारकेँ ओ संरक्षण देने छला,आजिविकाक प्रबन्ध केने छला आ संगे रखैत छला वएह विश्वासघात कऽ गेल। भावी प्रवल। ईजीवन बड़ विचित्र अछि। स्मृतिक आँगनमे जेतइ ठाढ़ होइ छी, धँसि जाइतअछि। रंग-बिरंगक घटनाक्रम सभ माथाकेँ गछारि लैत अछि। की लिखू, केतबा लिखू आकि चुप्पे रहि जाँउ। रंग-रंगक घटना क्रम सभ होइत रहल। नीको लोक सभ कालचक्रमे पिसाइत रहल। एकक टा मुर्ख, गमार, बैमान, उचक्काकेँ फलैत-फुलैत देखलिऐ। किछु नहि बुझाइ छै जे आखिर की-सँ-की भऽ जाइत अछि। निश्चय जीवन दू दूना चारि नहि अछि। भऽ सकैए कएक जनम्क हिसाब-किताब होइत होइक। सत्य की अछि, से तँ भगवाने जानैथ। ओइ समयमे इलाहाबादक चर्चित व्यक्तित्वमेसँ एकटा छला, राम सहाय,आइ.ए.एस.। ओ फौजी छला। फौजसँ सेवा निवृत्तिक पछाइत आइ.ए.एस.मे आएल रहैथ। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक उपकुलपति बनौल गेल रहैथ। आर केतेको महत्वपूर्ण पद सभपर ओ रहला मुदा हुनकामे अहं नामक चीज नहि छल। हुनकासँ गप-सप्प केलासँ अद्भुत उत्साह होइत छल। एकबेर कोनो काजे हुनका ओइठाम गेल रही। हुनकर पत्नी नौकर-चाकरक अछैत स्वयं चाह बनौलैथ, अपने हाथे चाह परसलैथ आ गप-सप्पक दौरान तेना कऽ मिलि गेली जे लगैत रहए केतेको बर्खक पुरान जान-पहचान अछि। निरन्तर प्रसन्न रहैत छला। कखनो तनाव नहि। हम ऐ प्रसन्नताक रहस्यक बारेमे पुछलिऐन तँ ओ कहलैन- “एकर दूटा कारण अछि- पहिल तँ हमर पत्नी छैथ जे निरन्तर हमरा संग दैत रहली आ दोसर हमर अहंकार रहित बेवहार। हम एकसँ एक पदपर रहलौं मुदा सामनेबला बेकतीसँ बिलकुल बराबरीक बेवहार कएल। पदाक अहंकार हमरापर कहियो हाबी नहि भेल। जखन जे समस्या आएल, ओकर तुरन्त ओ सरलताम समाधान करब हमर सोभाव अछि। ऐसँ हमर माथ निरन्तर चिन्तामुक्त रहैत अछि।” एक दिन हुनका पैंट-सर्ट पहिरने कटरा स्थित लक्ष्मी सीनेमा लग साइकिल चलबैत देखलिऐन। सीभील लाइन्ससँ कटरा साइकिलेसँ आबि गेल रहैथ। ई चुश्ती-फुर्तीओइ उमेरमे केतए भेटत? एहेन-एहेन लोक पृथ्वीपर ईश्वरक बरदान थिक। निश्चय किछु एहेन नीक लोक सभ छैथ जिनका भरोसे पृथ्वी माता सभ अन्याय सहि जाइ छैथ आ जीवन चक्र चलैत रहैत अछि। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक सहायक उपकुलपति टी.पतिजी गणितक विद्वान छला। सीधा, साधा पएरे चलैबला बेकती छला। कएक बेर साक्षात्कारक क्रममे ओ कर्मचारी चयन आयोग अबैत छला। साक्षात्कारक बाद पएरे आपस भऽ जाइत छला। लगेमे मिठाइक एकटा दोकान खुजल छल। पूरा आग्रह कऽ कऽ ओ मिठाइक दोकानपर लऽ जाइथ। हुनका लगमे एकटा सूची रहै छल जइमे इलाहाबादक कोन मिठाइक दोकानमे कोन मधुर बढ़ियाँ भेटैए तेकर जानकारी छल। दोकानपर ओइ सूचीकेँ देख ओ मिठाइक आदेश करैथ। बादमे ओ इलाहाबाद विश्वविद्यालयक उपकुलपति सेहो भेला। असलमे इलाहाबाद विद्या, कला, संस्कृति आ अध्यात्म हेतु युग-युगसँ ख्यात रहल अछि। निराला, महादेवी वर्मा, पंत इत्यादि एक-सँ-एक विद्वान ओइठाम भेला। एहेन ऐतिहासिक स्थापर रहि कऽ हमरा निश्चय बहुत आनन्द होइत छल। कार्यालयक उठा-पटकमे ओतहि छोड़ि ओइसँ हटि कऽ एकटा सुन्दर समाज हमरा उपलब्ध भऽ गेल छल। आपति काल परेखिय चारी, धरिज धर्म मित्र ओ नारी। तुलसी बाबाक उपरोक्त कचनी एकदाम सटीक अछि। धैर्य अछि, अनवरत संघर्ष करबाक चेष्टा अछि, तँ कोनो प्रश्न नहि अछि जे अहाँ गन्तव्य तक नहि पहुँचब। अबस्से पहुँचब। आ सत्य पुछी तँ सही रास्तापर चलबाक संकल्प अपने आपमे विजयक आभास कऽ दैत अछि आ तइले तँ भगवान दैते छथिन। एकबेर हमर ससुर इलाहाबद आएल रहैथ। हुनका संगे हुनकर अनुज रहथिन। हमर श्रीमतीजीकेँ आपसी यात्रामे नैहर जेबाक रहैन। टीशन जेबाक हेतु हम रिक्सा आनए गेलौं। कनिक्के दूर आगू गेल हएब कि कुकुर काटि लेलक। तथापि रिक्सा अनलौं आहुनका लोकनिकेँ विदा कऽ देलिऐन। हुनका सभकेँ पता नहि चललैन जे हमरा कुकुर काटि लेलक अछि, अन्यथा नहि जइतैथ। आब हम असगर भऽ गेल रही। ओइ समयमे कुकुर कटला बाद अंतरीमे १४टा नमका सूइ लगैत छेलइ। एकबेर पहिनौं सुपौलमे १९७५ ई.मे हमरा कुकुर कटने छल। १४ टा सूइ ओइ बेर पड़ल छल। मुदा ओइ सूइक कोनो विकल्प नहि छल। कोताही केलापर रैबीज हेबाक डर छल। गाममे एक बेकतीकेँ रैबीजसँ मरैत देखने रही। से सोचि चिन्तामे पड़ि जाइ छेलौं। हमर डेरासँ १० किलोमीटर दूर नगरपालिका अस्पतालमे रैबीजक सूइ लगैत छल। एक दिनक बाद सूइ लगबक हेतु जाए पड़ैत छल। ओइमे कार्यालयक एकटा स्टाफ हमरा बहुत मदैत केला। ओ अपन साइकिलसँ हमरा लऽ जाथि, सूइ लगबा दैथ आ आपस डेरा तक पहुँचा दैथ। पेटमे सौंसे गुल्ठी भऽ गेल छल। मकान मालकिन बोतलमे पानि गरमा कऽ दैत छेली जइसँ पेटकेँ सेकल करी। क्रमश: उहो समय बीति गेल। पता नहि, कुकुरकेँ हमरासँ कोन जन्मक वैर छइ। तेसर बेर फेर दिल्लीमे आरकेपुरम डेराक लगमे कार्यालयसँ आपस अबैत काल नान्हिटा कुकुर अद्भुत तेजीसँ हमरा दिस आएल आ झपट्टा मारलक। कुकुर तेसर बेर काटि लेने छल। सभ काज छोड़ि कऽ चोट्टे सी.जी.एच.एस. जा कऽ सूइया लेलौं। ताबत सूइक आकार बदैल गेल छल। छोटा सूइ मात्र ६ टा लेबाक छल। लगेमे सी.जी.एच.एस. छल, तँए बहुत फेतरत नहि भेल। डाक्टरक कहब छेलै जे जेतेक बेर कुकुर। बानल काटत तेतेक बेर फेरसँ सूइ लेब अनिवार्य अछि। आब तँ कुकुरकेँ देखते साकंछ भऽ जाइ छी। जइसँ चारिम बेर सूइया नहि लेबए पड़ए। हम इलाहाबादमे ९ साल रहलौं। चारि साल गुरुजीक मकानमे किरायेदार छेलौं। १७ नयाममफोड़गंज, इलाहाबाद। तीन साल तँ निचैन भऽ कऽ रहलौं मुदा तेकर बाद तंग करए लागल जे मकान खाली करू। यद्यपि हम अपना भरि किराया समयपर देबक हेतु बहुत साकांक्ष रही। कोनो तरहेँ तंग नहि करिऐक मुदा ओकरा मोनमे मकानक चिन्ता होइत रहइ। डर होइ जे मकान चलि जाएत। केतबो बुझबिऐक मुदा ओकर मोन नहि बुझि पबइ। हमरा ओइ मकानमे बहुत नीक लगैत छल। मुदा नित्य प्रतिक झंझटसँ मोन तंग भऽ गेल आ कनी दूर हटि कऽ एकटा छोटसन मकान किरायापर लेलौं। ओकर किराया अपेक्षाकृत कम छल। कोठरीक आगाँ बड़ीटा छत छल जइमे कुर्सी धऽ कऽ बैसार होइत छल। मकान मालिकक सेवा निवृत्त पुरातत्व विभागक अधिकारी छला। बहुत सौम्य आ सहृदय बेकती। हमरा सबहक बहुत धियान राखैथ। ऐ डेरामे आबि कऽ बुत शान्ति भेल। किराया कम रहलासँ उसास सेहो भेल। लगभग २साल हम ओइ डेरामे रहलौं। हमर सबहक डेराक ठीक सामने ऊपरमे एकटा सज्जन सपरिवार रहैत छला। हुनकर छोटसन बच्चा स्कूलमे पढ़ैत छल। स्कूलक सवक पूरा करबाक क्रममे ओ अपन बच्चक जे दुर्गति करैत छला जे बिसरल नहि जा सकैए। प्रति दिन पढ़ाइक अन्त बच्चा मारि-पीटसँ होइ छल। पता नहि, ओइ बच्चाक की भविस भेल। अपन जीवनक महात्वाकांक्षा ओ भूतकालक असफलताक चोट निर्दोष बच्चापर बजारि कऽ अपने बच्चाक भविस नष्ट केनिहार ओ असगरे नहि छैथ। माता-पिताक ई बुझक चाही जे ऐ तरहक बेवहारसँ बच्चाक दिमाग कुंठित भऽ जाइत अछि, असफलताक भाव ओकरा घेरि लैत अछि आ एकटा व्यक्तित्व निर्माणसँ पहिनहि नष्ट भऽ जाइत अछि। एहने बच्चा सभ पैघ भऽ कुण्ठाग्रस्त भऽ आन-आनसँ बदला लैत रहैत अछि। एहने एकटा उदाहरण हमरा दिल्लीमे भेटल। हम गृहमंत्रालयमे अधिकारी छेलौं। हमर निदेशक महोदय प्रोन्नत आइ.ए.एस. अधिकारी छला। बेवहारमे बहुत कर्कस, बात-बातमे गारि देब हुनक सोभाव छल। बुझेबे ने करए जे ऐ बेकतीक संग केना समय कटत। क्रमश: हुनकर व्यक्तित्व बुझैमे आएल, आपसी सम्पर्क बढ़ल तँ एकदिन कहला जे हुनकर एहेन सदा बेवहार ओ अशुद्ध भाषाक हेतु हुनकर पिता जिमेदार छैथ। हुनकर पिता पाकिस्तानसँ भारत आएल रहथिन। हिन्दू कालैज दिल्लीसँ पढ़ल रहथिन आ मंत्रालयमे अधिकारी रहथिन। बचपनमे हुनका संगे बहुत सख्ती ओगारि-मारि करथिन जइ कारणेँ हुनकर सोभाव एहेन भऽ गेल जे सबहक हेतु कष्टकारी छल। धिया-पुताक संगे कएल गेल बेवहार ओकर व्यक्तित्वक अंग भऽ जाइत अछि। हमर ऐ डेराक सामने भूतलपर गैरेजमे एकटा चतुर्थ वर्गीय कर्मचारीक परिवार रहैत छल। नित्यप्रति साइकिलसँ ओ कार्यालय जाइत छल। कार्यालय जाइत काल पूरा परिवार ओकरा विदा करैत छल। परिवारमे बुढ़ माए, पत्नी आ कएटा बच्चा सभ छल। ओतेक छोट जगहमे सभ गोटे अद्भुत आनन्दसँ रहै छल। साँझमे कार्यालयसँ ओकर आपसीपर परिवारमे अद्भुत आनन्द पसैर जाइत छल। जोर-जोरसँ ठहाकासँ आस-पासक वातावरणमे आनन्द पसैर जाइत अछि। इलाहाबादक हमर दोसर डेरा अपेक्षाकृत छोट छल। एक्केटा कोठरी संगे स्नान, पैखाना गृह ओ कनीटा भनसा घर। मुदा आगूमे छत बड़ीटा छल। राति-बिराति छतपर जुड़ल पाइप लग लघी कए लैत छेलौं। एक राति अहिना करैत रही कि संयोगसँ निच्चाँक फ्लैट बालकनीमे सूतल एकटा बृद्धक मुँह खूजल रहैन आ हुनका नोनछराइन लगलैन। धड़फड़ा कऽ उठि गेला जे की भेल। भोर भेने ओइ बुढ़क जमाए (जे इन्जीनियर छला) तमसाएल एलाह। लाख बुझबिऐन जे मेघसँ पानिक बुन्नी खसि पड़ल हेतै, मुदा ओ मानैले तैयार नहि भेला। अन्तवोगत्वा हम अपन गलती मानि झगड़ा समाप्त कएल। कहि नहि सकै छी जे केतेक भारी संकटसँ जान बँचि गेल। थोरेक दिनक बाद हमरा सभकेँ कार्यालयसँ सटले नयाकटरा मोहल्लामे एकटा धोबीक मकान किरायापर भेल। ओइमे भनसा घर छोड़ि कऽ तीनटा कोठरी छल, छत छल आ किराया सेहो ठीके-ठाक छल। कर्यालयसँ पाँच मिनटमे घर आबि जाइ छेलौं। सटले वगलमे श्रीवास्तवजी रहै छला। ओ सभ अतिशय नीक लोक छला। कहियो काल टीवी देखबाक इच्छा भेलापर हम सभ ओइठाम चल जाइत रही। चित्रहार सप्ताहमे दू दिन होइत छल। टीभी देखू आ चाहो पीबू। पहिल बेर चन्द्रमापर गेल भारतीयसँ इन्दिरा गाँधीजीक वार्तालापक सद्य प्रसारण हम ओत्तै देखने रही। क्रमश: टीभीक चलन बड़ी तेजीसँ बढ़ि रहल छल। घरे-घरे टीभीक एन्टिना टँगाइत छल। सभ दोकानपर टीभी बिकाय लागल छल। हमर ज्येष्ठ पुत्र ‘भास्कर’छतपर लऽ जाथि आ सभ घरपर लागल एन्टिना देखबए लगैत। हमहूँ दोकान सभपर टीभीक मूल्यक सर्वे करैत रहलौं। कारी, उज्जर (स्वेत-श्याम) टीभीक जमाना छेलइ। ओकरा रंगीन टीभीमे परिवर्तित होमए-मे बहुत समय लागि गेल। नयाकटरा स्थित हमर डेराक मकान मालिक धोबी छला। बड़ीटा परिवारमे कियो पढ़ल-लिखल नहि छल। सबहक मुखिया बुढ़िया माए छेलइ। एकबेर हम किरायाक रसीदक मांग कएल, जइसँ इनकमटैक्समे छूट भेटैत। कनियेँ-कालमे जोरसँ हल्ला भेल! पुछलिऐन जे की भेलइ? भेल ई रहै जे किरायाक रसीदक मांगसँ ओ सभ भयभीत भऽ गेल जे मकान हाथसँ गेल आ ताहि चिन्तामे आपसमे लड़ए लागल। हम हुनका कहलिऐन जे कहियौ जे रसीद नहि चाही। से कहिते देरी तुरन्त एकदम शान्ति भऽ गेल। इलाहाबादक प्रसिद्ध गणितज्ञ स्व. गणेश प्रसादक ओ सभ धोबी छल आ वएह मकान बनबैमे मदैत केने रहथिन। क्रमश: ऊपरमे किछु आर कोठरी सभ बनौलक जइमे हम किरायेदार छेलौं। इलाहाबादक फगुआ बहुत आकर्षक होइत छल। पुरुकिया आ नाना प्रकारक पकवानक संग रंगमे सराबोर शहर मदमस्त ढंगमे फगुआ मनबैत छल। लाउडस्पीकरसँ पूरा मोहल्ला हल्ला होइत रहै छल आ झुंडक-झुंड लोक सभ रंग खेलाइत एक ठामसँ दोसर ठाम अबैत-जाइत रहैत छला। गाम-घरमे जहिना पहिने फगुआ मनौल जाइत छल, लगभग ओहिना इलाहाबादोमे धूम धर्ड़क्का होइत छल। मुदा आब तँ गामोमे फगुआ नि:शब्द भऽ गेल अछि। डालपर फागु सुनबामे नहि अबैत अछि। जोगीरा नहि गौल जाइत अछि। शराब बन्दीक बाद डगमग-डगमग चलैत लोक सभ देखबामे नहि अबैत अछि। फगुआ दिन गाम फोन कएल तँ पता लागल जे सभ किछु शान्त अछि। कोनो धू-धर्ड़क्का नहि। सभ अपन-अपन असोरापर बैसल पुरुकिया आ मालपूआक आनन्द लइ छैथ। इलाहाबाद प्रवासक महत्वपूर्ण घटनाक्रममे हमर कनिष्ठ पुत्रक जन्म छल। जन्मक समय नजदीक एलापर माए गामसँ एली। कमला नेहरू अस्पताल- इलाहाबादक प्रख्यात अस्पताल अछि। ओहीठाम हुनका भर्ती करौल गेल। माय संगे रहैथ। २-३ दिन रहलाक बाद डाक्टर सभ अस्पतालसँ ई कहि कऽ आपस कऽ देलक जे अखन समय लागत। मूल कारण अस्पतालक हड़ताल रहै, जइ कारणसँ मरीज सबहक देख-रेख कठिन भऽ गेल छल। घर पहुँचले रही कि तुरन्त अस्पताल जाए पड़ल। अस्पतालमे बहुत कम डाक्टर छला। हड़ताल चलिते रहइ। सी.जी.एच.एस.सँ हुनका हेतु दबाइक बोतल सभ अनने रही। ओइमे-सँ एकटा चढ़ैबते देरी स्वस्थ्य खराप होमए लागल। रच्छ भेल जे ऐ गड़बड़ीक तुरन्त पता लागि गेल आ डाक्टर सबहक तत्परतासँ हुनकर जान बँचि गेल। डाक्टर सभ विचार-विमर्श कऽ कऽ कहलक जे शल्य चिकित्सा द्वारा बच्चाक जन्म हएत। तइले प्रात:काल भोरेसँ अस्पतालमे तैनात रही। डाक्टरक परामर्शक अनुसार शल्य चिकित्साक सामग्री सभ कीनलौं। अस्पतालमे बेहोशी डाक्टरकेँ नहि रहबाक कारण ऑपरेशनमे देरी भऽ रहल छल। एलेनगंजमे डाक्टरक घरपर जा कऽ बहुत प्रयास केलौं, मुदा जखने हुनका आबक इच्छा भेलैन तखने एली। ऑपरेशन टीमक नेतृत्व डॉ. शशिवाला श्रीवास्तव करै छेली। ओ इलाहाबादक सफल तथा नामी डाक्टर छेली। हम हुनकर पिताक किरायेदार रहल रही। जान-पहचान देल। ऑपरेशनक समयमे हमर कार्यालयसँ कएक गोटे उपस्थित रहि भरपूर मदैत केलाह जइमे श्री संजीव सिन्हाजीक योगदान अविस्मरणीय अछि। किछु कालक बाद एकटा नर्स हँसैत बाहर निकलल आ पुत्र-जन्मक सूचना देलक। २० अप्रैल १९८५ क ११:३४ मिनटपर हमर छोट पुत्र क्षितिजक जन्म भेल। ऐसँ केतेक आनन्द भेल, तेकर वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। तुरन्त प्राइवेट वार्डमे कोठरीक बेवस्था कएल आ अर्द्ध-बेहोशीक हालतमे बच्चाक संग जच्चाकेँ ओतए आनल गेल। तेकर बाद तँ देखनिहरक ढवाहि लागि गेल। इलाहाबादक ई विशेषता थिक। लोकमे भावुक लगाव बेसी होइ छै, आ बेरपर आनो-आनो लोक ठाढ़ भऽ जाइत अछि। अगल-बगलमे रहैबला पड़ोसी, परिचित, कार्यालयक सहकर्मी, अधीनस्थ कर्मचारी सभ एकाध बेर अस्पताल अबस्स आएल। दिन भरि भूखल रही। संगम जा कऽ हनुमानजीक दर्शन केलाक बादे भोजन कएल। इलाहाबादमे आकाशवाणीमे कार्यरत कार्यक्रम अधिकारी डॉ. श्याम विद्यार्थीजी सँ आकाशवाणी युववाणी कार्यक्रमक रिकर्डिंगक दौरान भेल। सकारात्मक सोच ओ सरल सोभावक कारण हुनकासँ अनायासे मित्रता भऽ गेल। यदाकादा आकाशवाणीसँ हमर कार्यक्रम होइत रहै छल। स्थानीय अखबारमे सेहो कएकटा लेख कहियो काल छपैत छल। कार्यालयक बाद हमर ई सभ मनोरंजन छल। डॉ. श्याम विद्यार्थी राजस्थानक रहनिहार छला आ संघ लोक सेवा आयोगसँ आकाशवाणीक र्काक्रम विभागमे राजपत्रित पदपर नियुक्त भेल छला। ओइ समयमे डॉ. मधुकर गंगाधर आकाशवाणीक निदेशक छला। ओ पूर्णियाक छला आ किछु दिनक बाद स्थानान्तरित भऽ दिल्ली चल गेला। पटनासँ निकलैबला प्रसिद्ध मैथिली साप्ताहक मिथिला मिहिरमे हमर कएकटा कथा, लेख आ कविता सेहो छपल। बादमे मिथिला मिहिर बन्द भऽ गेल आ हम दिल्ली स्थानान्तरित भऽ गेलौं। तेकर बाद ऐ तरहक गतिविधि कम भऽ गेल। कार्यालयक वागवानीक देख-भालक हेतु एकरा नैनित्रिक कर्मचारी छल। ओ गाहे-बगाहे हमर बच्चा सबहक मनोरंजन सेहो करैत रहै छल। ओकर खूबी ई छल जे प्रत्येक बातमे ओ कहैत ‘यससर’ एक दिन ओकरा पुछलिऐ जे तूँ ई कला केतए सीखलह? कहलक जे पूर्वमे ओ एकटा बहुत पैघ अधिकारीक ओइठाम काज करै छल। वएह ओकरा ‘यससर’ कहबाक आदैत लगौलक। जँ ओकर खिलाफो कोनो बात होइत तँ ओकर उत्तर ओ ‘यससर’ मे दैत छल। असलमे ‘यससर’ सरकारी कार्यालयक रामवाण थिक। केहनो संकटसँ अहाँ ‘यससर’क सहयोगसँ उबैर सकै छी। सरकारी कार्यालयमे अधिकारी सभकेँ काजसँ बेसी हुनकर अहं तुष्टि जरूरी होइत अछि। अहाँ दिन राति काज करू आ अधिकारीसँ अहंक टकरावमे कसि गेलौं तँ सभ गुड़-गोबर भऽ जाएत। नीक बेवहार तँ उचित थिक, मुदा बात एतबेपर नहि धमि जाइत अछि। जी-हजुरीक बिना नीक कार्य मूल्यांकन नहि होइत अदि। एहेन कियो बिरले हेता जे काजक आधारपर श्रेष्ठता तँइ करैत हेता। जीवनमे सभ किछु गणितीय गणना जकाँ नहि चलैत अछि। सभ किछु सोचले नहि होइत अछि आ जे भऽ जाइत अछि से कए बेर अप्रत्याशित रहैत अछि। यत चिन्तितं तदिह दुरतरं प्रयाति यच्चेतसपिज कृतं तदिहाप्यपेति प्रातर्भवामि वसधाधिप चक्रंवर्ती सोहं व्रजामि विपिने जटिल तपस्वी। भगवान राम द्वारा कहल उपरोक्त वाक्य हमरा-अहाँपर ओहिना लागू होइत अछि। जे हेबाक छै से हेतइ। होनी कियो रोकि नहि सकैत अछि। तथापि जीवनमे हाथ-पर-हाथ धऽ बैसलो नहि जा सकैत अछि। जे भावी अछि से हेतइ। दड़िभंगासँ दिल्ली नौकरी करए गेल रही। ओइठामसँ थोड़बे दिनमे प्रयास कऽ कऽ इलाहाबाद आबि गेलौं आ ऐठाम ९ वर्ष रहलौं। आब अपनो आश्चर्य लगैत अछि जे केना ओइ वातावरणमे एतेक दिन रहि सकलौं। असलमे कार्यालय तँ जे छल से छल, मुदा बाहर एकटा नीक समाजिक परिवेश बनि गेल छल जइसँ बहुत भावनात्मक समर्थन भेट जाइत छल। आ कहबी छै जे अन्हेर गाइक राम रखबार। अन्तिम २ साल जे निदेशक छला, हुनकासँ हमरा एकदम नहि पटल। यद्यपि हम परिश्रम पूर्वक ओ पूर्नत: इमानदारीसँ काज करी तथापि ओ असंतुष्ट रहैथ आ तंग करैथ। हमर बदली हेतु दिल्ली मुख्यालय लीखि देलखिन। हम दिल्लीसँ डराइ जे केना गुजर हएत, तँए ओहनोमे इलाहाबादे रहए चाही मुदा से नहि भेल आ फरबरी १९८७ मे हमर स्थानान्तरण दिल्ली गृह मंत्रालय भऽ गेल। इलाहाबाद हमरा गाम-घर लगैत छल। बहुत नीक समाज भऽ गेल छल। कार्यालयमे कनी-मनी झंझट तँ सभठाम रहिते छै, ओकरा झेलिये रहल छेलौं। बच्चा छोट रहए। अर्थ-कष्ट तँ रहबे करए। तँए हम ओइठामसँ हटए नहि चाही, परन्तु निदेशक महोदय हाथ धो कऽ हमरा पाछू पड़ल रहै छला। कार्यालयमे दू गुट छल। स्पष्टत: ओ हमर घोर विरोधी गुटक संग भऽ गेल छला। वरिष्ठ अधिकारीक हेतु ई उचित नहि छल मुदा हुनका हमरा खिलाफ किछु भेटैन नहि तँए खिसियौल बिलाड़ि जकाँ...। विरोधी सभकेँ हमरा खिलाफ हावा दैथ। हमरासँ काज सभ हटा कऽ विरोधी खेमाकेँ दऽ दैथ। मुदा लोक हमरा संगे जे छल से छल। हुनका डरे हटल नहि, मुदा हुनका हाथमे प्रशासकीय चाबुक छल, जेकर गलत उपयोग ओहमरा परास्त करए लेल प्रयोग करैथ। बदलीक खिलाफ हम अध्यक्ष, कर्मचारी चयन आयोगकेँ आवेदन देल। हम ईहो लिखलिऐ जे जँ बदली होइक तँ हमर घोर विरोधीक सेहो होनि मुदा निदेशक ओकर पक्ष लऽ लइथ। असलमे निदेशकजीकेँ हमरासँ डर होइन। एकबेर ओ कहला जे हम घरेमे रही आ ओ हमरा पूरा दरमाहा दऽ देल करताह। मुदा हम कहलिऐन जे काज करब हमर अधिकार अछि। बिना काज केने हम वेतन किएक लेब? ऐ विषयपर अध्यक्ष, कर्मचारी चयन आयोगसँ दिल्लीमे हम भेँट केलौं। ओ भेँट करैकाल तुरन्त एकटा अधिकारीकेँ बजा लेला जे इलाहाबादमे पूर्वमे रहैथ आ निदेशकसँ परिचित छला। परिणाम भेल जे अध्यक्षजीसँ भेल हमर सभटा गप इलाहाबाद निदेशकजीक कानमे चल गेल। हम ओतेक खुलि कऽ हुनकासँ गपो नहि कए सकलौं। इलाहाबाद आपस एलौं तँ निदेशकजी तेतेक घबड़ाएल छला जे स्वयं हमर कक्षमे पहुँचला आ रंग-रंगक आश्वासन दिअ लगला। मुदा सचमे ओ डरा गेल रहैथ। डरेबाक हेतु ओ स्वयं जिम्मदार छला। हम तँ अपन आस्तित्वक हेतु संघर्षशील रही। अन्ततोगत्वा हमर बदली भऽ गेल। ओना, कनीकाल लेल सत्य हारैत बुझाबामे आएल मुदा...।◌ २ आशीष अनचिन्हार प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल प्रस्तुत अछि मैथिलीक व्यंग्य सम्राट प्रो. हरिमोहन झाजीक लिखल ई गजल जे कि हुनक रचनावली (कविता खंड)सँ पृष्ठ-87सँ साभार अछि। तकर बाद हम एकर तक्ती कऽ देखाएब जे ई वास्तवमे गजल थिक की नै थिक-- ने लड़लहुँ फौजदारी जौं त रुपया केर धाहे की खसौलक नोर नहि बापक त ओ कन्याक विवाहे की ने आधा ऐंठ फेकल गेल त फेर ओ भोज भाते की ने बहराएल एको बन्दूक त ओ थिक बराते की ने लगला जोंक बनि कय जे तेहन दुलहाक बापे की जौं लस्सा बनि कुटुम सटला त ओहिसँ बढ़ि पापे की पड़ल नहि खेत सुदभरना त ओ बापक सराधे की ने फनकल जौं देयादे सन त ओ गहुमन दराधे की 1972मे लिखल (प्रकाशित) आब एकर तक्ती देखू-- पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि--1222-1222 पहिल शेरक दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--1222-1222 दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर शेरक दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-11222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि- 1222-12221 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--12122-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि 1222-122221 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--122-1222 जँ कथित तौरपर "ए"केँ लघु मानी (जे कि गलत अछि) तखन एहि चारिम शेरक मात्राक्रम एना हएत-- पहिल पाँति -1222-12221 दोसर पाँति-122-1222 दूनू व्यवस्थाकमे मात्राक्रम मतलाक हिसाबें नै अछि। पाँचम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि- 2222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। छठम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। सातम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें अछि। आठम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि- 1222-2222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। उपरक विवेचनासँ स्पष्ट अछि जे ई गजल नै अछि। ओना हरिमोहन झाजी अपन आत्मकथा "जीवन यात्रा" मे लिखै छथि जे ओ पटना आबि मोशायरा सभमे सेहो भाग लेबए लगलाह। भऽ सकैए जे मात्र लौलवश ई कथित गजल हरिमोहनजी लिखने होथि। जे किछु हो मुदा ई गजल गजल इतिहासमे उल्लेख करबा योग्य नै अछि मुदा ओइ बाबजूद मात्र अइ कारणसँ हम विवरण देलहुँ जे काल्हि कियो उठि कऽ कहि सकै छथि जे हरिमोहन झा सन महान हास्य-व्यंग्यकार गजल लिखने छथि आ सही लिखने छथि। बस एही कारणसँ हम एतेक मेहनति केलहुँ अन्यथा एहि गजलमे कोनो एहन बात नै। हरिमोहन झाजी गजलक संबंधमे की सोचैत छलाह तकर बानगी "कहू की औ बाबू" नामक कविताक पहिले खंडमे देने छथि-- बसाते तेहन छै जे गोष्ठी मे कवियो गजल दादरा आ कव्वाली गबैये किछु दिन मे एहो देखब औ बाबू जे कविताक संग-संग तबला बजैए हरिमोहन झा रचनावली (कविता खंड) पृष्ठ-120 (11-11-1978 मे प्रकाशित)। भऽ सकैए जे हरिमोहनजीकेँ उर्दू शाइर सभहँक संग घनिष्ठता होइन मुदा ओ घनिष्ठता शाइरी ज्ञानमे नै बदलि सकल से उपरक हुनक विचारसँ परिलक्षित भऽ जाइए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मैथिली लघुकथा १. पुरुषक नहि विश्वासे- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र २.प्रणव झा- अरजल जमीन १ मैथिली लघुकथा पुरुषक नहि विश्वासे डॉ. कैलाश कुमार मिश्र आशुतोष गोड्डा सं छला आ सैनिक स्कूल तिलैया सं 12वीं पास केलाक बाद दिल्ली विश्विद्यालय में बी एस सी में नामांकन लेने छला। पढबा में तेज आ अपना विषय के प्रति साकांक्ष छला। भाषा में बहुत निक पकड़ छलनि जाहि कारने शिक्षक आ विद्यार्थी में बहुत चर्चित छला।शब्द केर प्रयोग, ओकर उचाचरण, लालित्य सब किछु में बेजोड़ छला आशुतोष।ई एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार सं छलाह। तीन भाई – एक पैघ एक छोट आ आशुतोष बीच में।आशुतोष केर जेठ भाय हिनका सं तीन वर्ष केर पैघ आ ओहो सैनिक स्कूल तिलैया केर छात्र।हिनक पिता छोट छीन सड़क इत्यादि के मरम्मत के ठीकेदारीकरैत छलथिन आ घर इत्यादि सम्हारक काज आशुतोष केर माय जे की चतुर गृहणी छलथिन करैत छलथिन। कहि नहि कथिलेल आशुतोष के सैनिक अधिकारी बनबाक भुत नेने सं सवार छलनि। हुनकर जीवन केर एक मात्र उद्देश्य सैनिक अधिकारी बनब छलनि। अपन कक्षा केर एक लड़की चंद्रकला सं नहु-नहु आशुतोष केर सामिप्य भ रहल छलनि। ओना प्रारम्भ में ई सामिप्य सहज आ पढबाक जिज्ञासा धरि सिमटल लेकिननित-नित आगा आ प्रगाढ़ होइत। आशुतोष जखन बी एस सी में पढ़ैत छला ताहि क्षण अपन क्लास केर सब छात्र संग फील्ड वर्क लेल एक आत्मीय प्रोफेसर के संगे गुजरात गेल छलनि। ओतय मनोयोग सं काज केलनि। करीब 25 दिन रहला। हुनका संगे चंद्रकला सेहो छलथिन। चंद्रकला सावरि, सुनदरि छलि। अति संस्कारवती। चंद्रकला केर पिता इनकम टैक्स केर कमिश्नर छलथिन। दू भाई के बीच असगर बहिन। चंद्रकला बीच में – एक भाय जेठ आ एक छोट। उपर सं जेठ भाय आई आ भाउज दुनू आई आर एस आ इनकम टैक्स विभाग में पदाधिकारी। मुदा अहि बातक लेशो मात्र घमण्ड नहि छलनि। चंद्रकला सामान्य वस्त्र पहिरैत छली। मेक उप सेहो नाम मात्र। अपन पैघ-पैघ आंखि में काजर जरुर लगबैत छली जे हुनका सौन्दर्य के कतेक गुणा बढ़ा दैत छल. चंद्रकला केर पहचान हुनकर सहजता, लज्जा भाव, आ पढ़ाई में समर्पण छलनि। आशुतोष संग काज करैत-करैत नहि कहि कोना चंद्रकला आशुतोष संग प्रेम करे लगलनि। आशुतोष के सेहो एहि बातक भान जल्दी भ गेलनि। बिना बिलम्ब केने आशुतोष सेहो अपन ठोर मुसकियबैत चंद्रकला के अपन प्रेमक स्वीकृति द देलथिन। चंद्रकला के एकाएक भेलनि जे समस्त संसार केर ख़ुशी जेना हुनका तुरत भेट गेलनि। मोन भेलनि जे मस्त भ सरिसो के खेत सं भरल खेत में नृत्य क सरिसबक पीयर फुल सं भरल खेत में घुसबो केली। दुनू हाथ आसमान दिस उठेली आ सिनेमा केर गीत “चलती फिरूं उड़ती चलूं आज गगन में” गेनाई शुरू केलनि। एकै आखर के बाद लज्जा आ हुनकर संस्कार जेना चंद्रकला के हाथ पकडि रोकि दनि? थमि गेली। भेलनि “ई की भेल?” यैह सब सोचैत-सोचैत नहु-नहु चलय लगलनि। करीब पांच डेग चलल हेती की कनि दूर सं आशुतोष केर हाकब सुनेलनि: “चंद्रकला, चंद्रकला?कत छी?” आब चंद्रकला आरो साकांक्ष होइत झट दनि सरिसबक खेत सं बाहर आबय लगली. लाज होम लगलनि, “कहीं आशुतोष हमरा हाथ ऊपर केने सरिसबक खेत में गबैत आ नचैत त नहि देख लेलनि? हे भगबान! अगर देख लेला त की सोचता?” अहि तरहक भाव मोन में बेर-बेर आबय लगलनि। डेग झटझारइत खेत सं बाहर आबय केर उपक्रम केली। अहि बीच आशुतोष आबि गेलाह अकचकाईत पुछलथिन: “की भेल चंद्रकला! अहाँ खेत में की क रहल छी? हम अहाँ के बगल बला गाम में किछु जानकारी लेबाक हेतु अपना संगे ल जाय चाहैत रही।" अकचकाइत अपन वस्त्र आ भाव-भंगिमा के ठीक करैत बाहर अबैत चंद्रकला बजली: “कुनो बात नहि। ओहिना सरिसब के फूल निक लागल त कनि भीतर खेत में घुसि गेलौं। देखू ने कतेक सोभनगर लगैत छैक? दिल्ली में की ई भेटत?” आशुतोष बिना किछु कहने अपन मुशकान सं हुनकर बात के हाँ कहलनि। आब चंद्रकला बजली: “चलू ने कुन गाम चलक अछि? हम तैयार छी. हमर रेकार्डर, पेन, नोटबुक सब किछु हमरा लगे अछि।” आशुतोष कनि रोमांटिक भ गेला। एहि क्षण चंद्रकला हुनका कनि अधिके सुन्नरि लगैत छलथिन। आगा बढैत चंद्रकला के हाथ अपन हाथ में लैत कहलथिन: “हाँ, सरिसब के फूल त एहि खेत में सत्ते बड्ड निक लगैत छैक। मोन त होइत अछि अहि खेत के बीच में हमहु घुसी?” चंद्रकला लजाईत बजली: “ठीके घूस चाहैत छी अहाँ?” आशुतोष: “अहाँ मोने की झुट्ठे? बहुत मोन क रहल अछि।" चंद्रकला: “ठीक छैक। तखन घुसु ने सरिसबक खेत में हमरा लग कैमरा अछि। हम फोटो खीचैत छी।" आशुतोष: “मुदा हमर एक शर्त अछि।" चंद्रकला: “की शर्त”? आशुतोष: “हमरा संगे अहुं चलू खेत में। आ दुनू गोटे एक संगे फुलक सौन्दर्य, प्रकृति केर सजल रूप आ खेतक हरियर-पीयर स्वरुप के देखी, निहारी आ ओकरा संगे तारतम्य स्थापित करी”। चंद्रकला लजा गेली। फुसिये के अभिनय करैत बजली: “नहि-नहि अहाँ जाऊ। हम की करब जाक?” चंद्रकला के लज्जा भाव में हाँ अथवा स्वीकारोक्ति केर अभिव्यक्ति स्पष्ट देखल जा सकैत छल। चंद्रकला के प्रेम में मग्न भेल आशुतोष जेना चंद्रकला केर अंतर्मन केर भाषा बुझि गेला। बिना समय बरबाद केने चंद्रकला के हाथ पकरि खेत के भीतर जाय लगला। उन्मादित मोन सं नहि-नहि कहैत चंद्रकला आशुतोष संगे खेत में बिदा भेली। आशुतोष केर पकड़ जोर भेल गेलनि। चंद्रकला आशुतोष केर हाथक दबाब सं आनंदित छली। तिल-तिल अनुराग बढ़ल जा रहल छलनि। आशुतोष सेहो गदगद छला। दुनू खेतक तह में घुसि गेलनि। आशुतोष एकाएक चंद्रकला के अपन बाहुपास में जकडि लेलनि। नहि-नहि कहैत चंद्रकला लाजवंती केर पात जकां समटल आशुतोष केर शरीरक अत्यधिक सामीप्य प्राप्त पाबि बैकुंठक सुख में विलीन होमय लगली। बिना कुनो प्रतिकार केने अपना आपके आशुतोष के उपर न्योछावर भ गेली। एकरा कहैत छैक नैशर्गिक प्यार आ प्यार में समर्पण। सघन खेत में फेर दुनू के बीच सब किछु भेल जे स्थापित आ कमिटेड प्रेमी-प्रेमिका में होइत छैक। हाँ, अपन मोन के सबल करबा लेल चंद्रकला आशुतोष के छाती सं सटैत,आशुतोष केर ह्रदय केर केश के जकरैत नहु-नहु कान में अतेक जरुर कहलथिन: “आशु, अहाँ हमरा कहियो छोड़ब त नहि?” प्रेम में – शरीर आ मोन दुनू – पागल आशुतोष झट दनि कनि ठसकल स्वर में बजला: “की कहैत छी चंद्रकला? हम आ अहाँ आब कहियो कुनो स्थिति में अलग नहि हैब। हाँ भ सकैत छी अगर अहाँ के हम पसीन नहि आबि आ कुनो अहाँ के पिता, भाई, आ परिवार के स्टेटस बला भेट जाय।" चंद्रकला आशुतोष के एहि बात सं तमसा गेली। कनि रुसैत उत्तर देलथिन: “की कहैत छी आशु? हमरा लेल अहाँ सबसँ उत्तम छी। अहाँ सफल रहि, असफल रही, हम अहाँ संगे आनंदित रहब। आई सं परिवार आ स्टेटस के बात नहि होबाक चाही।” अपन गलती के अनुभव करैत आशुतोष बिना किछु कहने अपन कान पकरैत चंद्रकला सं माफ़ी मांगि लेलनि। चंद्रकला सेहो फेर सं हुनक छाती सं सटि गेली। दू शरीर एक आत्मा बनि चुकल छल आ निश्छल प्रकृति केर कोरा में बिहंसि रहल छल। ने कुनो छल ने प्रपंच। ने शहर केर कोलाहल ने थोपल स्टेटस केर मर्यादा। निष्कपट, प्रांजल, शुद्ध, आ नैशर्गिक प्रेम। आधा घंटा कोना बीत गेलनि से पते नहि चललनि। एक त निरजन में खेत दोसर दुपहरिया के बेर। कियोक नहि एलेक। आधा घंटा के बाद आशुतोष चंद्रकला के माथ, आंखि, गाल, ठोर आ गरदनि में चुम्मा लैत गदगद भेला। चंद्रकला कुनो प्रतिकार नहि केलथिन। अंत में ओहो एक बेर आशुतोष के पकरि ठोर में चुमि लेलथिन। फेर दुनू गोटे चकवा चकवी जकां हाथ में हाथ देने खेत सं बाहर एलनि आ दोसर गाम दिस अपन फील्डवर्क लेल बिदा भेलनि। भरि रस्ता गप्प कम केला मुदा दुनू ख्वाब में रह्लनि। किछु दिनक बाद दुनू – आशुतोष आ चंद्रकला फील्ड-ट्रिप सं वापस दिल्ली विश्विद्यालय आबि गेलनि। आब प्रति दिन चंद्रकला आशुतोष लेल किछु-ने-किछु जरुर लबैत छली। क्लास समाप्त होइते एक ठाम बैसनाई, सिनेमा देखनाई,निरुला में किछु खेनाई, आर्ची गैलरी सं बिभिन्न तरहक कार्ड कीनब ओहि में अपन मोनक अभिव्यक्ति करैत एक दोसर के देब, लेब करैत समय भागल जा रहल छलनि। चंद्रकला केर शरीर के दोसरे रंगक चुहचुही आबि गेल रहनि। मस्त अलमस्त, मुदा संयत भाव सं सुन्दर स्वाभाव आ संस्कार सं। अनुकरणीय, निक प्रेमक परिभाषा या दृष्टान्त एकरे कहल जा सकैत छल। समय अपन प्रवाह सं चलैत अछि। एकर गति पर ककरो नियंत्रण नहि। चंद्रकला आ आशुतोष बी.एस. सी. पास केलाक बाद एम. एस. सी. में आबि गेलनि। आब चंद्रकला अपन अधिक सं अधिक क्षण आशुतोष संग बिताबय चाहैत चंद्रकला। अपन पिता आ यूनिवर्सिटी केर एक प्रोफेसर सं सिफारिस करा विमेंस हॉस्टल में आबि गेली। तर्क देलथिन जे रिसर्च लेल अपना आपके तैयार करती। पिता आ भाई कतेक बेर हिनका प्रशासनिक सेवा लेल प्रोत्साहित केलथिन मुदा चंद्रकला अपन धुन में मगन रहली जे शोध करती आ यूनिवर्सिटी में पढ़ेती। घरक लोक थाकि क छोडि देलथिन। आशुतोष कॉलेज के हॉस्टल सं यूनिवर्सिटी हॉस्टल में राघब लग आबि गेला। आब 8 बजे राति धरि आशुतोष आ चंद्रकला एक दोसरक सामिप्य में रहे लगलनि। प्रेम तिल-तिल बढ़ल गेलनि। विभाग केर सब छात्र आ बहुत शिक्षक सेहो बुझि गेल्थिन जे हिनक प्रेम सॉलिड रॉक छनि। एहि बीच आशुतोष केर ध्यान एकाएक भारतीय सेना के अधिकारी बला नोकरी दिस चलि गेलनि। अते चंद्रकला आ आशुतोष में अंतर छलनि। चंद्रकला केर इच्छा सामान्य जीवन जिबाक रहनि। ओ चाहैत छली जे आशुतोष सेहो हुनके जकां शोध करथि आ यूनिवर्सिटी अथवा कुनो कॉलेज में पढ़ाबथि। लेकिन आशुतोष अपन जिद पर डटल रहला। चंद्रकला आशुतोष केर भावना के सम्मान करैत चुप भ गेली। चंद्रकला कनि दब्बु प्रकृति के छली। कखनो काल आशुतोष हुनकर एहि स्वभाब के गलत फायदा उठबैत छलनि। आशुतोष केर किछु व्यवहार राघब के विचित्र लगैत छलनि। ओ हमेशा स्मार्ट बनि रहैत छला। ढंग सँ वस्र पहिरनाई,गर्दनि में स्कार्फ़ केर प्रयोग, मोछ के ऊपर ऐंठब, छाती तानि क रहब, गर्दनि ऊंच आ सोझ केने चलब, हमेशा गंभीर रहब, अंग्रेजी केर उच्चारण आ शब्दाबली पर अधिक ध्यान राखब किछु एहेन गुण सँ युक्त छला आशुतोष। पढ़बा में आशुतोष नीक छला। कुनो बातक वर्णन अथवा फील्ड वर्क केर रिपोर्ट साधल मानवशास्त्री जकाँ करथि। राघब के जूनियर रहितौं आशुतोष राघब केर भाषा एवं अन्य चीज़ सबके ठीक करैत छलथिन। आर त आर राघब केर एम फिल केर रिपोर्ट केर जखन अंतिम रूप बनि गेलनि त ओ आशुतोष के भाषा शुद्धिकरण एवं सिंगार लेल देलथिन। आशुतोष सेहो एहि काज के बहुत प्रोफेशनल ढंग सँ केलनि। 10 दिन में पूरा रिपोर्ट के सुन्दर, सोभनगर आ व्यवस्थित क देलथिन। फाइनट्यून भेलाक बाद राघब ओकरा बाइंडिंग लेल द देलथिन। आशुतोष सेहो राघब के बहुत सम्मान करैत छलथिन। आशुतोष प्रतिदिन वर्जिस करैत छला। अपन कक्ष में सद्दाम हुसैन केर फुल स्केल पोस्टर रखैत छला। पोस्टर के नीचा अपना हाथे लिखने रहथि - LET US IMBIBE HIM ई किछु एहेन बात रहैक राघब के कोनादन लगलनि। एक दिन राघब हुनका सँ जिज्ञासा केलथिन, "आशुतोष, ई सद्दाम केर पोस्टर आ ऊपर सँ अहाँक स्लोगन। एकर मतलब हमरा नहि लागल?" आशुतोष बिहँसैत बजला, "सर, सद्दाम केर दृढ़ इच्छाशक्ति, निर्णय आ हिम्मत हमरा प्रभावित करैत अछि। अमेरिका सनक देश के असगरे हिलेने अछि। सैनिक शाशक हो त सद्दाम सन। तांहि हम सद्दाम के पसिन करैत छी। देखू, हमेशा ई सैनिक केर वर्दी में रहैत अछि। सब सँ पहिने अपने निर्णय लैत अछि । युद्ध भूमि में सेहो आगा रहय बला नेता अछि एहि सँ एकर सेना में जोश भरल रहैत छैक।“ राघब यद्यपि आशुतोष केर तर्क सँ बहुत प्रभावित त नहि भेला हुनकर जोश आ उमंग राघब के अवश्य प्रभावित केलकनि। एकदिन आशुतोष राघब के संबोधित करैत कहलथिन, "सर, हमरा जीवन मे मात्र एक नौकरी प्रभावित करैत अछि -सेनाक नौकरी। अगर रईसी आ गौरव के जीवन जीबाक हो त सेना में अधिकारी के नौकरी जॉइन करु।" आशुतोष केर आँखि सँ साफ बुझना जा रहल छलनि जे हुनकर जीवन केर उद्देश्य की छनि। राघब केर दोसर प्रश्न छ्लनि: "आखिर की बात एहेन छैक एहि में? अहाँ नीक विद्यार्थी छी, प्रशासनिक सेवा में जा सकैत छी, आई पी एस बनू, किछु क सकैत छी। पुलिस में सेहो कम सुविधा थोड़े ने छैक? अहाँ रिसर्च में नीक क सकैत छी। बहुत उत्तम स्तर केर शिक्षक भ सकैत छी?" आशुतोष बजलनि, “सर, हम अपने सँ सेना के ऑफिसर्स केर ठाठ देख चुकल छी। भले पाई कतौ भेटय लेकिन जे सुविधा, मस्ती, रोब आदि सेनाक ऑफिसर होबा में छैक से कतौ उपलब्ध नहि।“ आशुतोष के सैन्य अधिकारी बनबाक उच्च आकांक्षा देखि राघब अपना आप के मौन रखनाई उचैत बुझलनि। लेकिन मोने मोन थोड़ेक आशुतोष केर भविष्य के ल'क चिंतित जरूर भ गेला। एम एस सी प्रीवियस के नवम मास में एकाएक एक दिन आशुतोष चंद्रकला के कहलथिन , "देखू, हम परीक्षा नहि देब। आब हम राति दिन सैनिक अधिकारी बला एंट्रेंस कर तैयारी करब।" चंद्रकला : "ई बात त ठीक। मुदा परीक्षा देब में की हर्ज? कम सँ कम हॉस्टल में रहबाक अधिकार त रहत?" आशुतोष: "से त ठीक मुदा हम दू नाव में पैर नहि राखै चाहैत छी। सब समय आ ऊर्जा हम अपन प्रतिस्पर्धा बला परीक्षा में लगबे चाहैत छी।" चंद्रकला के बुझा गेलनि जे आशुतोष के बुझेनाई असंभव अछि। चुपे रहब में अपन आ आशुतोष दुनू के हित बुझना गेलनि। खैर, समय बितैत रहल आ आशुतोष अपन तैयारी में संलग्न रहला। अंग्रेजी आ जनरल नॉलेज कर चिंता हुनका नहि छलनि। हां कनि फिजिकल फिटनेस में डर रहनि। पहिल बेर में लिखित परीक्षा नहि पास क पेलनि। निराश भेला। दू-तीन धरि मौन भ गेला। ने बाजब ने भूकब। भोजनो नीक सँ नहि करथि। हाँ, दू-तीन बेर राघब लग आबि अवश्य बाजथि, "ई नहि पचा पाबि रहल छी सर जे लिखित परीक्षा में हमरा कथी लेल नहि भेल?" राघब सेहो दुखी छला। भरोश दैत कहलथिन, "कम ऑन आशुतोष! ई प्रतिस्पर्धा केर परीक्षा छ्ल कुनो यूनिवर्सिटी केर रूटीन परीक्षा नहि। रूटीन परीक्षा में जतेक विद्यार्थी नीक लिखतै, सब पास भ जेतैक। एकर विपरीत कम्पटीशन केर परीक्षा में निश्चित पद रहैत छैक आ अनन्त प्रवेशार्थी। तांहि बहुत गम्भीर छात्र सेहो छटा जाइत छथि। अहाँ मेधावी आ संस्कारी लोक छी। अपन कर्तव्य में लागल रही। सफलता एक ने एक दिन अवश्य भेटत।" राघब के बात सँ जेना आशुतोष के प्राण में प्राण एलनि। विस्वाश फेर जाग्रत भेलनि। कहलथिन, "ठीक कहैत छी सर। हमरा अनेरे भूतकाल केर असफलता पर पश्चाताप के छोड़ि फेर सँ पूर्ण मनोयोग सँ तैयारी करक चाही। आब हम सैह करब आ बाहरी दुनियां सँ थोड़ेक दूरी राखब।" एहि बीच चंद्रकलाकेर होस्टल में एक ऋचा नामक लड़की एली। ऋचा के चंद्रकला सङ्गे रूम शेयर करक छलनि। थोड़ेक दिन में दुनू में प्रगाढ़ मित्रता भ गेलनि। ऋचा के चंद्रकला अपन आ आशुतोष केर सब बात बता देलथिन। आशुतोष सँ भेट सेहो करा देलथिन। ऋचा गोरधप-धप, नमहर कद काठी, मुहँ में पानि, पैघ आँखि, आकर्षक शरीर,उंन्नत आ सुडौल कुच केर स्वामिनी छलि। जांघ तरासल, नितम्ब उठल आ गजगामिनी जकाँ चलैत छलि ऋचा। जेहने ऋचा देखबा में सुन्नरि तेहने बजबा में। ककरो पहिल बेर में अपन तनक सुंदरता सँ आ वचनक चातुर्य सँ अपन गुलाम बना लैत छली। मुदा आशुतोष के ऋचा अपन जेठ भाय बना लेलनि। इम्हर परीक्षा में नहि भाग लेबक करने आशुतोष के ऑफिशियली होस्टल खाली करय पड़लनि। यद्यपि राघब हुनका अपना रूम में रखने रहलनि। एक समस्या भोजन के छलनि। आशुतोष बाहर सँ भोजन करे लगला। आशुतोष के घरक स्थिति बहुत नीक नहि छलनि। पिता रइस आ एक नंबर कर देहचोर। किछु ठीकेदारी आ किछु खेतीबाड़ी सँ जीवनक गुज़ाडा चलैत छलनि। ऊपर सँ आशुतोष तीन भाई। पहिल भाई सेहो सैनिक स्कूल तिलैया सँ पढ़ल। बाद में आर्मी अफसर बनलथिन। मुदा थोड़ेक दिन में नौकरी छोड़ि लखनऊ आबि टेलीकॉम जगत में अपन व्यवसाय स्थापित केलनि। लखनऊ में अपना सँ पांच वर्ष पैघ अपने व्यवसाय के क्षेत्र केर दिक्षीत ब्राम्हण कन्या सँ प्रेम विवाह क लेलनि। माता पिता आ भाई सब सँ कुनो संबंध नहि छलनि। लेकिन आशुतोष केर माय बहुत गुणमति स्त्रीगण छलि। ओ विपरीत परिस्थिति में अपन दू छोट बालक के पढ़बैत छलि। आशुतोष एना स्थिति में निर्णय लेलनि जे आब ओ ट्यूशन पढा अपन खर्च चलेता। ऋचा छलि मध्यप्रदेश केर सिन्धी। दू बहिन आ एक भाय। ऋचा सबसँ पैघ, तकर बाद भाय जे इंजीनियरिंग केर द्वितीय वर्ष केर छात्र आ सबसँ छोट बहिन आ ओहो इंजीनियरिंग केर प्रथम वर्ष केर छात्रा। आशुतोष सँग सैनिक स्कूल केर समय केर हुनक मित्र विजय सेहो छलथिन जे एम एस सी करैत छला। चूंकि विजय केर अंक बहुत नीक नहि छलनि तांहि ओ बाहर में रहैत छला। ऋचा के भाई आ बहिन के सेहो होस्टल नहि भेटल छलनि। जखन हिनकर सभक संबंध प्रगाढ़ होमय लगलनि त सब मिलक मुखर्जी नगर में एक फ्लैट शेयर मोड में ल लेलनि। आशुतोष आब होस्टल छोड़ि देलनि। होस्टल में राघब आ चंद्रकला रहि गेलनि। चंद्रकला के पिता आब चंद्रकला सँ विचार करैत लड़का तकनाई शुरू करय चाहैत छला। मुदा चंद्रकला एकै बात कहै छलथिन, "बिना पी एच डी आ नौकरी केने ओ व्याह नहि करती।" हालांकि ई त चंद्रकला के बहाना छलनि। हुनकर मोन में रहनि जे एकबेर जखन आशुतोष आर्मी अफसर केर नौकरी में चयनित भ जेता त हिनका अपन पिता आ जेठ भाई सँ भेट करा सब राज बता देथिन। एमहर आशुतोष लिखित परीक्षा में दोसरो बेर असफल भ गेला। आब ओ बहुत तनाव में आबि गेला। छेपक में एहो बात बतेनाई जरूरी जे ऋचा मुक्त स्वभाब के।लड़की छलि। 11 विं क्लास सँ अनेक पुरुष मित्र सब सँग मानशिक आ दैहिक संबंध रखली। हुनका रति-रभस में, चुम्बन में आलिंगन में आ काम कीड़ा में बहुत आनंद अबैत छलनि। ओना त आशुतोष सँ भाई बहिन केर सम्बन्ध छलनि तथापि आशुतोष सँग सटिक रहब, हुनका भरि पांज क छेकब, हुनका सङ्गे आलिंगनबद्ध भय सुतब आदि सहज भाव सँ करैत छलि। आशुतोष सेहो अहि में आनंदित होइत छला। जखन आशुतोष के दोसर बेर सफलता नहि भेलनि तखन ओ एकदिन चंद्रकला के कहलथिन, "चंद्रकला, आब अहाँ अपन पिता के पसिन केर कुनो योग्य लड़का सङ्गे विवाह क लिय। हमर जीवन अंधकार भेल जा रहल अछि।" चंद्रकला के आँखि में नोर भरि गेलनि। बजली, "की कहैत छी आशुतोष? हम अहाँ सँ सिनेह केने छी। अहाँ जतय रहब हम ओतहि रहब आ खुश रहब। एहेन बात नहि बाजू अहाँ। अगर कही त आई हमर घर चलू। हम एखने अपन पिता आ भाई सँ अपन सबहक प्रेम आ विवाह के बात करैत छी। अगर कही त हम कोर्ट विवाह लेल सेहो तैयार छी।" आशुतोष कहलथिन : "हमर कहब अछि, अगर सफल नहि भेलौं त हमरा सङ्गे अहुँके जीवन बर्बाद भ जैत। अहाँक प्रति हमर प्यार ओतबे शाश्वत आ प्रांजल अछि जतेक अहाँक सिनेह हमरा प्रति।" ई कहैत आशुतोष चंद्रकला के अपन बाहुपाश में ल लेलथिन। प्रेमाधिक्य में चंद्रकला छोट नेना जकाँ कनैत रहलि। आब चंद्रकला पी एच डी करय लागली। बस्तर केर मुड़िया जनजाति केर जड़ी-बूटी केर ज्ञान, तंत्र-मंत्र आ चिकित्सा पद्धति पर हिनकर दिव्य काज चलि रहल छलनि। मुदा आशुतोष के प्रति प्यार एवं हुनक जीवन रूपी नैय्या के डगमग करैत चलब के कारणे चंद्रकला केर शोध कार्य जेना एक ठाम ठमकल पड़ल होनि! एहि बीच आशुतोष केर परिवार में एक आरो घटना घटित भ गेलनि। हुनकर जेठ भाय आ भउजी में तलाक केर स्थिति आबि गेलनि। बेचारी आशुतोष केर माय परेशान। करती त की करती? एकटा बेटा छलनि आशुतोष के जेठ भाय के। ओ बेचारा ककरा लग रहत? काज धाज से रुकल। जेठ बेटा घर मे बैसल। आशुतोष केर छोट भाय सेहो बी एस सी केलक बाद टेलीकम्यूनिकेशन केर क्षेत्र में नौकरी केनाई शुरू केने छलाह। प्रारंभिक संघर्ष केर बाद स्थिति नीक भ गेल छलनि। गाम पर माता पिता के सहयोग करब शुरू क देलथिन। हुनकर नाम छलनि प्रकाश। ओ बीच बीच मे आशुतोष लग अबैत रहैत छलाह। हुनका ऋतु अपना प्रेमजाल में फंसा लेली। पहिने हँसब, बाजब आ बाद में सब किछु शुरू भ गेलनि। बाद में ई जानकारी आशुतोष के सेहो चलि गेलनि। ऋतु आ प्रकाश घोषणा क देलथिन जे दुनू प्यार करैत छथि आ विवाह करती। विवाहक रोड़ा आशुतोष छलथि। मा कहलथिन, "जाबेत धरि आशुतोष सेटल नहि भ जेता आ विवाह नहि क लेता तावेत धरि प्रकाश केर विवाह कुनो हालत में संभव नहि छनि।" आब की हो? सब चुप। एहि बीच आर्मी ऑफिसर केर एंट्रेंस में आशुतोष असफल होइत रहला। अंत मे आयु सीमा सेहो खत्म भ गेलनि। पत्राचार केर माध्यम सँ प्रबंधन केर मास्टर डिग्री हासिल केलनि। आ अंततः एक सवयं सेवी संस्था में छोट छीन नौकरी पकड़ि लेलनि। हुनक प्रेम में मातलि दीपशिखा एखनो हुनका सँ विवाह करबा लेल तैयार। मुदा अपन हाव भाव सँ एवं अन्य श्रोत सँ आशुतोष चंद्रकला के ई सूचना द देलथिन जे हुनकर विवाह आब कुनो स्थिति में संभव नहि छनि। चंद्रकला आब की क सकैत छलि। चंद्रकला संगे हुनका सँ एक साल जूनियर लड़की सौम्या सेहो बस्तर केर मुड़िया जनजाति पर शोध करैत छलि। ओहो निखिल नामक एक क्लासमेट सङ्गे प्यार करैत छलि। प्यार की त लिव इन रिलेशनशिप में छलि। दुर्भाग्य सँ निखिल केर वकील पिता के ई संबंध नहि ठीक लगलनि। निखिल अलाइड सर्विस में आबि गेला। बाद में ई विवाह नहि भेलैक। हारि क सौम्या एक इंजीनियर सँग अरेंज्ड विवाह केली। ई अलग बात छैक की विवाह केर प्रथम दिन सँ हुनका अपन इंजीनियर पति सँ एडजस्ट होब में दिक्कत शुरू भ गेलनि। एक बेर एक मास लेल चंद्रकला आ सौम्या अपन शोध केर प्रयोजन सँ बस्तर गेल छलि। जखन बस्तर सँ एली त सौम्या सँ चंद्रकला के पिता कहलथिन जे एक इंजीनियर टाटा कंसल्टेंसी में काज करैत छैक। नीक परिवार छैक। लड़का के पिता आई आई टी दिल्ली में प्रोफेसर, जेठ भाई सेहो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में छैक। छोट भाय अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान सँ एम बी बी एस क रहल छैक। लड़का सहज छैक आ देखबा सुतबा में सुन्नर। अगर चंद्रकला के इच्छा होइक त एक बेर भेट क सकैत अछि। सौम्या चंद्रकला के ओहि लड़का के देख के हेतु उकसबय लागलि। चंद्रकला एक बेर फेरो आशुतोष लग गेली। आशुतोष अहि बेर साफ-साफ कहि देलथिन , "देखू, एहि स्थिति में आब हमर आ अहाँक विवाह संभव नहि अछि।" चंद्रकला के आँखि सँ धाराप्रवाह नोर खसैत रहलनि। थोड़ेक काल मे वापस होस्टल में आबि गेली। सब बात सौम्या के कहलथिन। सौम्या फेरो हुनका अपन दृष्टांत दैत एक बेर अपन पिता द्वारे चयनित लड़का सँ भेट करबा लेल मना लेलनि। दोसर दिन एक होटल में चंद्रकला अनन्त अग्रवाल सँ भेट केलनि। अनन्त हुनका ठीक लगलथिन। अनंतों के चंद्रकला बड्ड नीक लगलथिन। दुनू अपन-अपन अभिभावक के विवाह करक स्वीकृति द देलथिन। एहि स्वीकृति केर 15 दिनक भीतर आशुतोष केर विवाह गोड्डा कॉलेज केर हिंदी केर प्रोफेसर केर बेटी सँ भ गेलनि। एक मासक बाद ऋचाक विवाह आशुतोष केर छोट भाई प्रकाश सँग भ गेलनि। आब चंद्रकला के सब बात बुझ में आबि गेलनि। किछु त नहि बजली मुदा करेज भीतरे भीतर जेना दू फांक भ गेलनि। नहियो चाहैत ऋचा आ आशुतोष के श्राप दैत कहलथिन, "जाउ! हमर विश्वास, प्रेम आ समर्पण के अतेक खण्ड-खण्ड केलौं अछि अहाँ सब मिल क! कहियों नीक नहि हैत।" हां, ई श्राप ओ चुपचाप मुक्त अकास में ठाढ़ भेल देने छलि। ओ बजली आ सृष्टि केर नियंता सुनलक। नीक जकां सुनलक। विवाह के स्वीकृति दैत देरी पांच दिनक भीतर चंद्रकला के दिल्ली में एक यूनिवर्सिटी में लेक्चरर केर नौकरी लागि गेलनि। हुनकर मंगेतर जे पुणे में पोस्टेड छलथिन से एकाएक नोएडा में आबि गेलथिन। शायद भगबानो के लागल होनि जे एकरा सङ्गे बहुत अन्याय भेलैक आब न्याय होबक चाही! ऋचा केर भाई एक मलयाली लड़की सँ प्रेम विवाह क सऊदी अरब चलि गेला । छोट बहिन सेहो प्रेम विवाह एक महाराष्ट्रीयन इंजीनियर सँ केलनि। विवाह के दोसरे साल चंद्रकला के एक बेटी भेलनि आ ऋचा के बेटा। सौम्या के सेहो एक बेटा रहैक। तीन साल के बाद चंद्रकला के बेटा आ ऋचा के बेटी भेलैक। बेटी भेलाक एक वर्ष के बाद ऋचा आ प्रकाश में भयंकर लड़ाई शुरू भ गेलैक। स्थिति एहेन भ गेलैक जे दुनू आब संबंध ने विच्छेद क लेथि। मुदा प्रकाश केर मां आ ऋचा के सोचक कारणे फेरो दुनू में समझौता भ गेलैक। आशुतोष आब दिल्ली छोड़ि पटना चलि गेला। पटना में गुमनाम जिनगी जिबय लगलनि। दू बेटीक पिता। आमदनी सीमित। दुखक एकाकी जीवन। शायद एहि बातक अनुभव करैत जे सब किछु चंद्रकला सँग धोखा के कारण भेल अछि आ पता नहि भविष्य में की-की हैत? चंद्रकला राघब के भैया कहैत छलि। किछु दिन पहिने भेट भेलनि दुनू के एक सेमिनार में। एक कात में आनि राघब लग चंद्रकला बजली: "भैया, ऋचा आ आशुतोष केर व्यवहार हमरा तबाह केने छ्ल। हमर रोम-रोम सिहरि गेल छल। हम अन्हार में चलि गेल रही। तहिना ओहो सब खुश कहियों नहि रहत।" विजय गुरगांव में एक ऐड एजेंसी में काज करैत अछि। ओकर कनिया सेहो मैनेजमेंट कंसलटेंट छैक। विवाह के 20 वर्ष भ गेलैक मुदा संतान एखन धरि नहि भेलैक अछि। सौम्या केर पति ओकर जीवन नर्क क देने छलैक। अंत मे बहुत मुश्किल सँ तलाक भेटलैक। आब दोसर विवाह केलनि अछि आ अपन पति आ बेटा संगे जीवन जीब रहलि छथि। यूनेस्को में नौकरी सेहो लागि गेल छनि। चंद्रकला एक सफल पत्नी, पुतोहु, माँ, शिक्षिका केर भूमिका निभा रहलि छथि। जीवन मे आनंद आ परमानंद छनि। मुदा पुरुष जाति पर विश्वास नहि छनि। कोना रहतनि??? पुरुषक नहि विश्वासे। ---------- २ मैथिली लघुकथा प्रणव झा अरजल जमीन "की भेल यौ, कोनो निदान भेटल कि नै?" लालकाकी लालकक्का के दुआरि पर कपार धऽ कऽ बैसल देख के बजलिह। कहां कोनो बात बनल ओ त अडल अछि जे नै अहांक के त पाई देबैये पडत नै त ई जमीन हम आन ककरो हाथे बेच देब आ अहां के बेदखल होबय पडत। आ पंच सब कि बाजल? पंच सभ की बाजत, कहै ये जे अहां लग पाई देबाक कोनो सबूत नै अछि , नै अहां के नाम सं जमीन लिखायल गेल अछि त इ बात कोना मानल जाय जे अहां ई पांच कट्ठा जमीन कीनने छि! बेस त किछ बीच के रस्ता निकालल जा सकै अछि । आब देखियौ जे काइल्ह कि फ़ैसला होई अछि। बात इ छल जे करीब पच्चीस-तीस बरष पहिने लालकक्का अपन्न मेहनत आ श्रम के कमाई सं पांच कट्ठा घरारी के जमीन गामक जमीनदार ’सेठजी’ से कीनने छलाह । ओइ टाइम में जवान जुआन छलाह, कलकत्ता के एकटा मील में नौकरी करै छलाह, किछु पाई भेलैन त माय कहलखिन जे एकटा घरारी के जमीन कीन ले। बेस त किछु जमा कैल आ किछु ईपीएफ़ के पाई निकाईल के इ सेठजी से पांच कट्ठा घरारी के जमीन कीन नेने छलाह. मुदा भांगट एतबे रहि गेल छल जे ओ जमाना शुद्धा लोक सभ के जमाना छल, लिखा-परही, कागज-पत्तर गाम घर में कहां होई छल ओइ टाईम में ! बस मुंहक आश्वासन चलै छल । से लालकक्का के इ घरारी के दखल त भेंट गेल छल मुदा जमीन के रजिस्ट्री नै भेल। इ गप्प सब लालकाकी के बुझलो नै छल। के ओई जमाना में इ गप सब अपन नबकनियां के बतबै छल! बेस लालकक्का धीरे-धीरे ओय बंसबिट्टी के उपटेलाह, आ किछेक साल में एकटा छोट छिन पक्का के घर बना लेलाह. ओई टाईम में गाम में गोटैके घर पक्का के बनल छल, तखन लालकक्का के नाम सेहो बजै छल गाम में । बाद में जुआनी गेलैन आ काजो छुटलैन, आ ओ गाम धेलाह। गाम में कोनो बेसी खेत पथार त छलैन ने जे ओहि में लागल रहितैथ, तखन कोहुना समय कैटिये रहल छल ।ओना लालकक्का के इ व्यक्तिगत विचार छल जे लोक के जीवन में तीन टा कर्म पूरा करबा के रहै अछि – घर बनेनाई, बेटी बियाह आ बेटा के अपन पैर पर ठारह रहै योग बनेनाई । से लाल कक्का इ तीनो काज सं निश्चिंत भ गेल छलाह आ कखनो गाम में त कखनो बेटा लग में जीवन बिताबय लगलाह। मुदा किछु दिन पहिने एकटा एहन बम फ़ूटल जै कारणे लालकक्का के अपन अरजल घरारी हाथ सं निकलैत बुझना गेलैन । जेना होमय लगलैन जे जीवन में किछु नै केलहुं। बात इ भेल छल जे अचानके से गाम में बात ई उठल जे हिनकर घरारी के जमीन त हिनका नाम पर अछिए नै। सेठजी के मुईला उपरांत इ जमीन हुनकर बडका बेटा के नाम पर चढा देल गेल छल आ आई सेठजी के मुईला के कतेक बरष उपरांत जमीनदारजी के इ जमीन ककरो आन के बेचय के बात कय रहल छलाह। लालकक्का के जखन ई खबर दलालबौआ द्वारा लगलैन ओ जमीनदारजी लग जाय कहलखिन जे औ जमीनदारजी! ई कि अन्याय करै छि। इ घरारी हम अहांक बाबूजी से किनने छलहुं चारि हजार कट्ठा के भाव से बीस हजार रूपया में से अहुं के बुझल अछि, अहां के सामने पैसा गिन के देने छलहुं। कतेको बरष से एहि घरारी पर घर बना के वास कय रहल छि, से ओय समय में त लीखा परही भेल नै छल, आब अहां करै चाहै छि त इ जमीन हमरा नामे लिखियौ। इ बात पर जमीनदारजी भौं चढा के बजलाह जे देखू अहां दूइए कट्टा के पाई देने रही आ बांकि के तीन कट्टा में एहिना बास क रहल छी, से जौं यदि अहां सभटा जमीन लिखबऽ चाहै छि त लाख रूपए कट्ठा के दर से तीन लाख टाका लागत आ नै जौं अहां लग पांच कट्ठा जमीन कीनय के कोनो सबूत अछि त से बताबु। एतेक घुडकी लालकक्का सन शुद्धा लोक के विचलित करय लेल बहुत छल । तथापि ओ हिम्मत कऽ के बजलाह जे यौ श्रीमान एना कोना अहां बाजि रहल छि अहांके सामनेहे हम अहां बाबू से ई जमीन कीनने छलहुं आ कतेको बरष सं एतय रहै छि, आई सं पहिने त अहां किछु नै बजलहुं । बीच में दलालबौआ बजलाह जे कक्का अहां लग लेन-देन के कोनो सबूत कोनो कागज ऐछ कि? यदि नै अछि त फ़ेर त पंचैति करा क जे निर्णय होय अछि से स्वीकार करय परत अन्यथा अहां के ओइ जमीन से बेदखल होबय परत । काल्हि भेने पंचैति बैसल – पंचैति कि बुझु, दलालबौआ, जमीदारबाबू, आ दू-चारि टा लगुआ-भगुआ । पंचैति में जमीनदारबाबू तीन लाख टका के मांग रखलैथ, लालकक्का सेहो अपन पक्ष रखलैथ। अंतत: ई निर्णय भेल जे लाल कक्का या त दू कट्ठा जमीन जै पर घर बनल अछि से सोझा जमीनदारबाबू से लिखा लियैथ आ नै जौं पांचो कट्ठा के घरारी चाहिएन त डेढ लाख टाका (जमीनदारबाबू द्वारा प्रस्तावित मूल्य के आधा) जमीनदारबाबू के देबय परतैन । लालकक्का कहियो सपनो में नै सोचने छलाह जे हुनका संगे एहनो कपट भ सकै अछि । मुदा आब कोनो चारा नै रहि गेल छल । बेटा के जौं इ बात कहलखिन त ओकर रिस्पोंस ठंढा छल. पहिने त अफ़सोच केलक जे बाबूजी अहां आई धरि ई बात नै मां लग बजने छलहु नै हमरा सभ लग। फ़ेर कहलक जे दूइए कट्ठा लिखा ने लिय, घरारी ल के की करब, हमरो सभ के कियौ गाम में नै रह दै चाहै अछि आ साल में किछुए दिन लेल त गाम जाय छी। मुदा लालकक्का के लेल ओ जमीन कोनो धिया-पुता से कम छल कि! अपन पसीना के कमाय से अरजल घरारी। ओ निर्णय केलाह जे डेढ लाख टाका दऽ के पांचो कट्ठा लिखबा लेब। लिखबाय सेहो पचास हजार टाका लगिए जाएत। माने जे आब सवाल छल दू लाख टाका के जोगार के । किछु पाई एम्हर-आम्हर से कर्ज लेलैथ । बांकि के लेल बेटा के कहलखिन त ओ कहलक ठीक छै अहां ओकर अकाउंट नं० भेजु हम दस दिन मे कतौ से जोगार क के ट्रांसफ़र क दैत छि। लाल कक्का जखन जमीनदारबाबू लग अकाउंट नं० मांगय गेलाह त एकटा नबे ताल शुरू भ गेल । जमीनदारबाबू कहलाह जे पाई त अहांके सभटा नकदे देबय परत से अहां अपना अकाउंट पर मंगबा लिय आ हमरा बैंक से निकालि क दऽ देब। लाल कक्का सभटा गप्प बेटा के कहलखिन। बेटा कहलक जे नै ई ठीक नै अछि, ओ कैश में पाई ल के ब्लैकमनी बनबै चाहै अछि से अहां मना क दियौ। आ ओनाहुं जौं आइ अहां से पाई ल लेत आ पहिनेहे जेना मुकैर जायत तखन की करबै? से अहां साफ़ कहि दियौ जे जौं पाई बैंक के मार्फ़त लेताह त ठीक नै त हम नकद नै देब। लालकक्का के इ बुरहरी में एहन उपद्रव भेल छल दिमाग अहिना सनकल छल तै पर से अपन अरजल जमीन हाथ से निकलि जाय के डर। तहि लेल शायद हुनका बेटा के इ आदर्शवादी बात निक नै लागल छल। उल्टा-सीधा सोचय लगलाह । भेलैन जे छौंडा कहिं टारि त नै रहल अछि। फ़ेर ध्यान पडलैन अपन एफ़डी दऽ। करीब डेढ लाख हेतै। बड्ड जतन सं जमा क के रखने छलाह। कोनो मनोरथ लेल। पता नै शायद पोता के उपनयन लेल की अपने श्राद्ध लेल हुनकर मोने जनैत हेतैन कि लालेलाकी के। एकाएक निर्णय केलैथ आ लालकाकी के कहलखिन जे एकटा काज करू – पेटी से हमर एफ़डी के कागज सभ निकालू त । लालकाकी उद्देश्य बुझैत कहलखिन जे धैर्य धरू ने, कंटीर कहलक अछि ने जे जमीनदारबाबू के अकाउंट नं० पठा देब लेल ओ पाई भेज देत, से कहै त ओ सहिए अछि कि ने – ईमानदारी के पैसा कमसेकम ईमानदारी से जमीनदरबा के भेटै ने, एकबार फ़ेर जाउ ओकरा से मांगियौ अकाउंट नं०, जौं पाई के ओकरा बेगरता छै त देबे करत ने। हं! हम भरोसा कऽ के पछताय छी आ आब बेटा ईमानदारी देखा रहल अछि। यै, आब सज्जन आ ईमानदार लोक के जुग रहलै अछि! देखलियै नै कोना जमीन लेल दरिभंगा में एकटा के आगि लगा के मारि देलकै। ई लोभी आ बैमान दुनिया के कोनो ठेकान नै। तैं निकालू झट द कागज सब, आईए बैंक भ आबि। आब एतेक सुनला के बाद लाल काकी की जवाब दऽ सकै छलिह । हुनका लग एतेक गहनो त नै छ्ल जे आवेश दैत कहितथि जे "त बेस इ गहने बेच दिय"। बस चुपचाप पेटी खोलि क कागज निकालै लगलिह। प्रणव कुमार राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली http://pranawjha.blogspot.in ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. अमरनाथ मिश्र- जुड़िशीतल-गीत ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.३.राजेश मोहन झा 'गुंजन'-ममताक अनुभूति-(जूड़शीतल पर विशेष) ३.४.रश्मि किरण झा- हाइकू अमरनाथ मिश्र जुड़िशीतल-गीत ************* जुड़िशीतलमे सभकेँ जुड़ा दियौन यौ-२ जुड़िशीतलमे सभकेँ।। साल नव मैथिलीक शुभागमन भेलै, नव-नव अन्न-पानि आँगन-दलान भेलै, शीतल सतुआक सतुआनि करा दियौ यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। टटका आ बसियाकेँ अजगुत विधान एलै, फेँटि-फेँटि घाइठक बड़-बड़ी खोंटैल गेलै, आमक टिकुलासँ चटनी बनबा दियौन यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। पौखरि-इनार गाम-घरक सफाई भेलै, तुरिया-भजारमे थाल-कादो लेपाइ भेलै, प्रेम चासैत, समारैत, गजारि दियौ यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। बाँसक दुइ खुट्टा पर बल्ली लटका दियौ, तुलसी - चौड़ामे पानि सल्ला बना दियौ, देव-पितर केर प्यासकेँ मिंझा दियौन यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ जुड़ा दियौन यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। ******************** जुड़िशीतलक अनंत शुभकामनाक संग अमरनाथ मिश्र' भटसिमरि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २ टा गजल 1 घूमि एलौं हम जहाँ-तहाँ ऐ दुनियामे कियो ने भेटल अहाँ जकाँ ऐ दुनियामे सूर्यक चारू कात घुमथि धरती मैया छनि जननीकें चैन कहाँ ऐ दुनियामे पाप थीक अनकामे ताकब दोखहिटा सबसं बड़का धर्म क्षमा ऐ दुनियामे जतेक सिकन्दर एला खाली हाथ गेला अंतमे टूटै सभक निशा ऐ दुनियामे ओ सम्पति जे मुइलो पर जायत संगे जतेक मोन हो करू जमा ऐ दुनियामे चलू-चलू ऐ दुनियासं हंसिते-हंसिते जुनि ककरोसं करू घृणा ऐ दुनियामे (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण -15) गजल 2 काहि कटै छी तोरे ले' गीत गबै छी तोरे ले' माटि हवा आ जल बनलौं आगि बनै छी तोरे ले' चानक चोरी केलौं हम भोर अनै छी तोरे ले' रौद बहुत छै दुनियामे छाँह तकै छी तोरे ले' बात हमर ई बूझत के हम कुहरै छी तोरे ले' (मात्रा-क्रम : 21122- 222) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश मोहन झा 'गुंजन' ममताक अनुभूति (जूड़शीतल पर विशेष) ***************** हृदय हकारल स्नेह नीर सँ माथ जुड़ाओल जूड़शीतल मे, ममता केर छल ओ अनुभूति नीन मे आओल जूड़शीतल मे, चिर ज्योति विलीन भेली जे आजु स्वप्न मे आबि गेली जे माँ मिथिलाक धरि क' रूप आबि उठाओल जूड़शीतल मे, सगर दाह आ थाह कतहु नहि दामिनी कखनो डरा रहल छै शीतल आँचरक द' क' छाँह पुनि सुताओल जूड़शीतल मे, कतेक दिन बीति छवि भेल विस्मृत पैरक ध्वनि टा मोन पड़ैए रातुक अंत पहर ओ ध्वनि सुनि कान जुड़ाओल जूड़शीतल मे॥ ********* :---- जूड़शीतल आ मैथिली नववर्षक शुभकामना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रश्मि किरण झा- हाइकू 1)जाड माघ के दलपिट्ठी बगिया रान्हे कनिया
2)बुड पुरान हड्डी पांजर काँपे माघ डेरावे
3)पैन न छूबौ ओसरे बैसल रे माघ जाय दे
4)गतिया तौर खिस्सा कहबो तोरा नुनु ऐते आ
5) बितलै माघ गधा जन्म छुडैबो गंगा नहैबो ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - ३ टा बाल कविता (१) आइ आबए बला रिजल्ट छै (बाल कविता) आइ आबए बला रिजल्ट छै । आइ दिन बड़ी डिफिकल्ट छै । की करियै - किछु फुरा रहल ने, आइ ने कोनो विकल्प छै ।। जएह लिखलियै, खूब लिखलियै । सभ पन्नाकेँ भरि - भरि देलियै । तइयो आइ बड़ डऽर लगैए, छपने केहेन रिजल्ट छै !! कोनो चीजमे मोन ने लागए । कछमछ मोन उताहुल भागए । इण्टरनेट अछि देखा रहल बस, “आबए बला रिजल्ट छै” ।। कहुखन मोनेँ टॉप करै छी । कहुखन सभसँ फ्लॉप करै छी । आइ तराजू केर पलड़ा सनि, डगमग दृढ़ संकल्प छै ।। (२) छोट माँछ, पैघ माँछ (बाल कविता) छोट माँछ, पैघ माँछ, ताहूसँ पैघ माँछ, कक्कर आहार के ? – बुझिते छी भाइ यौ । दुनिञाक इएह नियम, सदिखनसँ आबैए, बेसी हम की कहू - बुझिते छी भाइ यौ ।। जिनगी संघर्ष छिऐ, सएह आदर्श छी, विश्वक विचित्र संकल्पना छी भाइ यौ । हर कण निर्जीव जे, वा हो सजीव जे, करइछ संघर्ष नित, अस्तित्वक, भाइ यौ ।। मानी ने मानी अहँ, संघर्षे सत्य छी, शान्तिक विचार बस सपना छी भाइ यौ । जतबा प्रकृतिकेँ, हमसब जनैत छी, अस्तित्वक इएह संकल्पना छी भाइ यौ ।। जल थल बसात नभ, अस्तित्व लेल निज, करइछ प्रयत्न नित, बुझले छी भाइ यौ । अपना अस्तित्वकेँ जञो नञि बचाए सकी, सहअस्तित्व तखन सपना छी भाइ यौ ।। (३) पटना पुस्तक मेला (बाल कविता) आइ गेल छलहुँ पुस्तक मेला, पटनाक गान्धी मैदानमे ।*१ नञि विशेष किछु छल तइयो, नव पोथीक अनुसन्धानमे ।। याद आबैछ एखनहु ओहिना, पटनाक पहिल पुस्तक मेला । पोथी सभहक अम्बार बेस, आ लोक सभक रेला - ठेला ।। मीर, रादुगा, प्रगति प्रकाशन, सोवियतक पुस्तक आगार ।*२ ऑक्सफोर्ड, प्रैण्टिस आ कैम्ब्रिज, एन॰बी॰टी॰, सी॰एस॰आइ॰आर॰ ।।*३ हरेक विषय पर छल पुस्तक, भाषा, इतिहास, भूगोल रहए । अभियंत्रन, वाणिज्य, चिकित्सा, ज्योतिष, धर्म, खगोल रहए ।। बहुबिध देसी आओर बिदेसी, पुस्तक केर स्टॉल रहए । मैथिलीक सेहो एक - दू टा, नीक छोट स्टॉल रहए ।। सोचल आगाँ धीरे - धीरे, मैथिलीक स्टॉल बढ़त । ई तँऽ पहिलुक बेर थिकै, आगाँ बढ़िञा माहौल रहत ।। एहनहु बरख रहल जहिया, छल नामहि केर पुस्तक मेला । पाटलीपुत्र मैदान फिरल, भेल दूसल्ला पुस्तक मेला ।। कतोक प्रकाशन बन्न भेल, अन्तर्जालक ई युग आएल । थिक उदासीन सरकार सेहो, राज्यक भाषा सभ बौआएल ।। युवा ई मेला - चौबीस बरखक, वृद्ध सनक लागैत अछि । पुस्तक मेलाक शिशु अवस्था, याद बहुत आबैत अछि ।। *१ - पटना पुस्तक मेला २०१७ *२ - रादुगा पब्लिशर्स मॉस्को, मीर पब्लिशर्स मॉस्को आ प्रगति प्रकाशन मॉस्को - ताहि समए मे भारत मे उपलब्ध सोवियत पोथीक प्रकाशक सभ । *३ - किछु अमेरिकी’ ब्रिटिश आ भारतीय विज्ञान विषयक पोथीक प्रकाशक सब । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। VIDEHA NON RESIDENT MAITHILS Dr. Shefalika Verma- Maithili Poem translated into English by Dr. Jaya Verma (Associate Prof. DU ) WHERE ARE WE? What poem should I recite? How can fill greenness in my withered mind. Worried mind asking one question My inner-soul anxious to know you. You celebrate Vidyapati Parva You rejoice at Rajkamal, Lal Das, Chanda Jha Anniversaries You ignite lamp of your soul during Women Liberation Movement Student leaders aping tone and pitch of mass leaders All harping My Great Mithila. But where are we going? Going which direction? Janki burning in dowry fire and pyre Sons being sold in luxury and splendour Our soul dying Our son becoming animal like, satisfying carnal desires Nothing exists here, only double-standard power is left Women the epitome of knowledge and wisdom But what is the meaning of being educated here? As the daughter of your parents You descend as tear drops Now as mother you sell your son dear As mother-in-law you burn your daughter-in-law as drenched wood You forget that once you were also a daughter The head which never bowed, you as a daughter Forcing to bow Listen, the life which you thought to be meaningless Educating daughters and throwing them in the fire Now throwing money as donation in the flood of election No No Do not sell your son Save sons from being sold You are the birth-giver and creator of daughter and son If Mithila’s honour and Maithili not saved Do we exist? Where Are We? DR. Shefalika verma A, 103, SIGNATURE VIEW APARTMENTS DDA HIG FLATS DR. MUKHARJI NAGAR , DELHI 110009 विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ता लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। ५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा “’विदेह’- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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