139 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.राजदेव मण्डल- दूटा बीहैन कथा२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- २ टा निबन्ध आएकटा यात्रा वृत्तान्त २.२.नन्द विलास राय- दूटा लघु कथा २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- तीन गोट लघु कथा २.४.प्रणव झा- सदाचार क तावीज (मैथिलि लघु नाटिका) ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.राम विलास साहु- दू दर्जन कविता ३.३.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- गजल ३.४. राजीव रंजन झा-गजल ४.बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - ४ टा सचित्र बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केलक अछि जकर संयोजक श्री दिनेश यादव जी रहता। अइ विशेषांकमे नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य केर मूल्यांकन रहत। अइ विशेषांक लेल सभ विधाक आलोचना-समीक्षा-समालोचना आदि प्रस्तावित अछि। समय-सीमा किछु नै जहिया पूरा आलेख आबि जेतै तहिये, मुदा प्रयास रहत जे एही साल मइ-जून धरि ई विशेषांक आबि जाए। उम्मेद अछि विदेहक ई प्रयास दूनू पायापर एकटा पूल जरूर बनाएत। विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा कएल जा रहल अछि। दोसर भागमे अइ बेर नीलमाधव चौधरी जीक रचना आमंत्रित कएल जा रहल अछि आ नीलमाधवजीक रचना ओ रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल कैलाश कुमार मिश्रजीकेँ आमंत्रित कएल जा रहल छनि। दूनू गोटाकेँ औपचारिक सूचना जल्दिये पठाओल जाएत। रचनाकारक रचना ओ आलोचकक आलोचना जखने आबि जाएत ओकर अगिला अंकमे ई प्रकाशित कएल जाएत। अइ शृंखलाक पहिल भाग कामिनीजीक रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही,जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर),जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.१.राजदेव मण्डल- दूटा बीहैन कथा२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- २ टा निबन्ध आएकटा यात्रा वृत्तान्त २.२.नन्द विलास राय- दूटा लघु कथा २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- तीन गोट लघु कथा २.४.प्रणव झा- सदाचार क तावीज (मैथिलि लघु नाटिका) १.राजदेव मण्डल- दूटा बीहैन कथा२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- २ टा निबन्ध आएकटा यात्रा वृत्तान्त १ राजदेव मण्डल- दूटा बीहैन कथा भितरिया चोट चाहक दोकान लग किछु लोक ठाढ़ छल आ किछु बैसल छल। गप्पक छरक्का छुटि रहल छेलइ। विषय छेलै- आइ-काल्हिक लोक सभटा काज स्वार्थेक कारण करै छइ। मुदा हम ऐ बातपर अड़ल छेलौं जे किछु काज लोक ओहनो करैत अछि जइमे कोनो स्वार्थ नइ रहै छइ। जइ काजकेँ ‘उपकार’ कहल जाइ छइ। एम.एल.ए.क चुनाउ होइबला छेलइ। चुनाउक समैमे तँ पुलिसकेँ जेना पाँखि लगले रहै छइ। तखैने ओइठाम एकटा पुलिसिया गाड़ी रूकल। रूकल नहि बल्कि रोकए पड़लै। कारण छेलै, एकटा साइकिल सड़केपर ठाढ़ छेलै आ साइकिलबला केतौ चलि गेल छल। एकटा सिपाही गाड़ीसँ उतैरते बाजल- “केकर साइकिल छियौ रौ? साहैबक गाड़ी रूकल छइ। हटेबें जल्दी आकि देखबीही।” मुदा कियो साइकिल हटेबाक लेल नहि आएल। सिपाही पूरा तमसा गेल छल। ओकर रौद्र रूप देख हम जेना भीतरसँ डेरा गेल रहौं। हम तेजीसँ गेलौं आ साइकिलकेँ हटबए लगलौं। कमजोर रहने कनी अस्थिरसँ हटबै छेलौं। डरेबर बारम्बार हॉर्न बजा रहल छेलइ। सिपाही डण्टासँ हमरा पजरामे गोंजी मारैत बाजल- “तोहर खतियानी रोड छियौ। टेर मारैत केना चलैए! देखै नइ छै जे साहैबकेँ लेट होइ छइ!” हड़बड़ाइत आगू बढ़लौं कि रोडक कातमे साइकिल नेने खसि पड़लौं। चाहक दोकानपर लोक ठिठिया कऽ हँसि देलक। पुलिसिया गाड़ी हॉर्न दैत चलि गेल। एक गोरे टिटकारी मारैत बाजल- “की यौ उपकारीजी, की भेल?” डण्टासँ तँ कमे चोट लगल छल मुदा ‘की यौ उपकारीजी’ सुनिते भितरिया चोट जेना कुहरा देलक। लोक दिस तकलौं तँ लगल जेना नँगटे ठाढ़ छी। लाजे मुड़ी गोंतने विदा भऽ गेलौं। छोटकू दोस कृष्णाष्ठीक मेला लगल छल। दू-तीनटा संगीक संगे मेलाक गेट दिस ठाढ़ छेलौं। कृष्ण-सुदामाक मित्रतापर चरचा भऽ रहल छल। एकटा संगी बाजल- “देखियो जे कृष्ण आ सुदामाक दोस्ती। एगो राजा आ दोसर रंक। दुनूक दोस्ती एकटा ऐतिहासिक उदाहरण बनल अछि ऐ जुगमे एहेन दोस्ती संभव भऽ सकै छइ।” दोसर संगी बाजल- “नहि यौ, दोस्ती बरबैरमे होइ छै, तबे निमाहलो जाइ छै, नहि तँ ओ टुटि जाइए।” हमरा बाजए पड़ल- “केना नहि भऽ सकै छइ। हमर बाबूजी आ जगाधर बाबू दुनूमे केना दोस्ती छइ। जगाधर बाबूक परिवारमे तीन-तीनटा इन्जीनियर छैन आ हमर बाबू बिलकुल गरीब, तैयो हमरा बाबूसँ हुनक परेम देखियौ।” तखैने बगलमे एकटा कार रूकल। गजाधर बाबूक संगे एकटा ऑफिसर कारसँ उतरल। हम गजाधर बाबूकेँ देखते पएर छुबि प्रणाम केलिऐन। गजाधर बाबू बजला- “की रौ बाबू ठीक छौ ने?” कहलयैन- “जी ठीके छथिन।” गजाधर बाबू सँगे आगू बढ़ैत ऑफिसर पुछलकैन- “के छी ई बालक? संस्कारी बुझाइत अछि..!” मुँह घोंकचबैत गजाधर बाबू बजला- “धुर, छोड़ू ने। एकटा छोटकू दोसक बेटा छी।” गप करैत दुनू गोरे आगू बढ़ि गेला। गपकेँ झाँपैले हम किछु बाजए चाहलौं कि बिच्चेमे एकटा संगी चद-दे कहि देलक- “चुप रहू यौ छोटकू दोसक बेटा।” हमर बोलती बन्न भऽ गेल छल।◌ २ रबीन्द्र नारायण मिश्र- २ टा निबन्ध आएकटा यात्रा वृत्तान्त क्रोध मनुख भावुक प्राणी होइत अछि। दैहिक आवश्यकताक पूर्तिक संगहि संग ओकर मनोवैज्ञानिक आवश्यकताक पूर्ति सेहो आवश्यक अछि। जखन कियो केकरो दैहिक वा मानसिक कष्ट दैत अछि तँ ओकरा मोनमे क्रोधक प्रादुर्भाव होइत छइ। अतएव क्रोधक हेतु आवश्यक थिक जे कियो केकरो कष्ट पहुँचबैक संगहि ईहो आवश्यक जे कष्ट पहुँचेनिहारक पता होइक। अज्ञात बेकती द्वारा उत्पन्न कष्ट किंवा स्वयं अपनेसँ भेल कष्टपर क्रोध नहि होइत अछि। उदाहरण स्वरूप अगर दाढ़ी बनबए-काल गालक चमरी कटि जाए, खून बहि जाए वा हाथक लोढ़ा धोखासँ पैरपर खसि पड़ए आ पैरक आँगुर थकुचा जाए तँ क्रोध नहि होएत अपितु पश्चाताप होएत जे एना बेसम्हार दाढ़ी नहि काटक छल वा लोढ़ाकेँ सम्हारि कऽ रखबाक चाही छल। किंतु जँ कियो आन हमरा पाथरसँ मारए किंवा मारबाक उपक्रमो करए तँ तामस धड़ दय भय जाएत। क्रोधक भोजन थिक विवेक। विवेके रहलासँ मनुख जानवरसँ फराक अछि। मनुख सोचि सकैत अछि। नीक-बेजाए केर विचार कए सकैत अछि। किन्तु ई सभ काज विवेकसँ उत्पन्न होइत अछि। मुदा जाहि मनुखक विवेक नष्ट भऽ जाइत छै ओ बहुत रास अनुचित कथा बजैत अछि एवम् कर्म आ अकर्मक बीच भेदभाव बिसैर जाइत अछि। क्रोध अबिते नीक-सँ-नीक लोककक विवेक मरि जाइत छइ। आकृति बिगैड़ जाइ छै एवम् रक्तचाप बढ़ि जाइ छइ। क्रोधावेगमे मनुख गड़बड़ काज कऽ लैत अछि। अर्थ-अनर्थक भेद बिसैर जाइत अछि आ तँए सोभाविक रूपेँ विनास दिस अग्रसर भऽ जाइत अछि। क्रोधक प्रवल वेगमे मनुख ईहो नहि सोचि पबैत अछि जे ओकरा जे कष्ट पहुँचौलक तेकरा एहेन अभिप्राय रहइ वा नहि। ऐप्रकारक सभसँ नीक दृष्टान्त चाणक्यक ओइ आचरणमे भेटैत अछि जखन किओ कुश गड़ि जेबाक कारणेँ सभ कुशकेँ उखारि ओकरा जरिमे धोर देबए लगला। केतेक बेर एहेन होइत अछि पाथरसँ चोट लगलासँ लोक पाथरेपर चोट करए लगैत अछि। एहेन क्रोधकेँ जड़क्रोध कहल जाइ अछि। कारण क्रोधीकेँ एतबो अन्दाज नहि रहै छै जे ओगलत स्थानपर गलत रूपेँ क्रोध कऽ रहल अछि। क्रोधक जन्म कष्टसँ होइत अछि। सोभाविक अछि जे जेकरामे सहनशीलता जेतेक बेसी हेतै तेकरा क्रोध तेतेक कम हेतइ। वर्तमान समयमे बढ़ैत महत्वाकांक्षा एवम् वैज्ञानिक विकासक कारणेँ पारस्परिक टकरावक संभावना सेहो बढ़ि गेल अछि। जखन एक्के वस्तुक हेतु कएक गोटे प्रयत्नशील हेता तँ संघर्ष अनिवार्य भऽ जाइ छइ तथा असफल रहनिहार बेकतीकेँ क्रोध होएब सोभाविक। क्रोधमे लोकक आत्मसंयम समाप्त भऽ जाइ छइ। ऐ अवस्थामे लोक बहुत रास अन्ट-सन्टबाजि जाइत अछि। परिणामस्वरूप पुरान-सँ-पुरान सम्बन्ध ओ मित्रता नष्ट भऽ जाइ छइ। तँए उचित जे तामसमे गुम्म भऽ जाइ। जँ कियो तमसाएल अछि तँ ओ अन्ट-सन्ट बाजि सकैत अछि, जे सुनि हमहूँ उत्तेजित भऽ सकैत छी। परिणामत: मारि-पीट वा एहने कोनो अशुभ काज भऽ सकैत अछि। तँए उचित जे जेतए उत्तेजना होइक तैठामसँ ससैर जाइ जइसँ अनर्गल कथा ओ काज देख हमरो उत्तेजना नहि भऽ जाए। क्रोधक सीमित ओ संयत प्रयोग लाभकारी भऽ सकैत अछि। मानि लिअ जे कियो गोटे अहाँक टका रखने अछि आ लाख प्रयासक अछैतो ओ टका आपस नहि कए रहल अछि तखन क्रोधक प्रयोग केलासँ भऽ सकैत अछि ओ बेकती टका आपस कए दिए। परन्तु एहेन लाभकारी क्रोधकरबामे आत्मसंयमक प्रयोजन होइत अछि कारण क्रोध करैत-करैत जँ सीमाल्लंघन भऽ गेल, बहुत रास तामस भऽ गेल तँ परिणाम अनिष्टकारी भऽ सकैत अछि। टका तँ बुड़िये जाएत संगे ऊपरसँ मारियो लागि सकैत अछि। क्रोधक प्रयोग प्रतिकारक हेतु सेहो होइत अछि। जँ ट्रेनसँ यात्रा करैत कियो धक्का मारि दैत अछि किंवा ट्रेनसँ धकिया कए निच्चाँ खसा दैत अछि तँ ओकरापर कसि कऽ तामस भऽ जाइत अछि। परिणामस्वरूप हमहुँ ओकरा कोनो-ने-कोनो दण्ड देबए चाहैत छिऐ। यद्यपि ऐ बातक कोनो संभावना नहि रहैत छै जे ओइ आदमीसँ दुबारा कहियो भेँट होएत वा नहि। क्रोधक प्रयोगयदा-कदा आत्मस्वार्थ सेहो होइत अछि। कारण जँ कियो बेकती अहाँकेँ कोनो प्रकारक क्षति पहुँचा दैत अछि तँ अहाँक सोभाविक इच्छा रहैत अछि जे दुबारा फेर एहने क्षति नहि हो। तँए ओइ बेकतीपर क्रोधक प्रयोग कए घटनाक पुनरावृत्तिकेँ रोकबाक प्रयास कएल जाइत अछि। ऐ प्रकारसँ कएल गेल क्रोधमे आत्म रक्षाक भाव बेसी होइत अछि। क्रोधक शिकार नीक-सँ-नीक लोक भऽ जाइत अछि। कोनो आवश्यक नहि जे अहाँ कोनो गलती केनहि होइ आ तही कारणेँ अहाँकेँ कोपभाजन होमए पड़ल हो। असल बात तँ ई थिक जे क्रोधित मनुखक दृष्टिमे जँ अहाँ कोनो प्रकारसँ क्षति पहुँचेबाक चेष्टा कएल अछि तँ ओ क्रोधित भऽ जाएत। एहेन परिस्थितिमे क्रोधसँ बँचबाक एक मात्र साधन सहनशीलता थिक। क्रोध दुखक चेतन कारणक साक्षात्कार वा परिज्ञानमे होइत अछि। अतएव जेतए कार्य कारणक सम्बन्धमे त्रुटि होएतैक ओतए क्रोधमे धोखा भऽ सकैत अछि। दोसर बात जे क्रोध केनिहार लोक जेमहरसँ क्रोध अबै छै तेम्हरे देखैत अछि। अपना दिस नहि देखैत अछि। क्रोधक ई प्रवल इच्छा होइ छै जे जे बेकती ओकरा कष्ट देलक अछि ओकर नाश होइक मुदा ओ कखनो ई नहि सोचि सकैत अछि जे ओ जे कऽ रहल अछि से अनुचित छै, किंवा तेकर की परिणाम हेतइ। कखनो-कखनो लोक क्रोधमे अपने माथ पटकए लगैत अछि। तेकर कारण जे हुनकर ऐ काजसँ हुनक निकट सम्बन्धी, जिनकासँ ओ क्रुद्ध रहै छैथ, हुनका कष्ट होइ छैन। तँए हेतु क्रोधमे जँ कियो अपन माथ पटकए किंवा स्वयंकेँ कहुना कष्ट दिअए तँ बुझी जे ओ कोनो अपने बेकतीपर कुद्ध अछि। कोनो बातसँ खौंझाएब क्रोधक एकटा रूप छिऐ। एहेन बेकती मानसिक रूपसँ रोगग्रस्त होइ छैथ। ओ सामान्यत: छोट-मोट गड़बड़ी भेलासँ खौंझा जाइ छैथ। केतेको बुढ-बुढानुसकेँ अहाँ कोनो गप्प कहियौ, सुनिते देरी ओ ठेंगा लऽ कऽ दौग जाएत। ..क्रोधक ई रूप सामान्यत: वृद्ध वा रोगीमे देखना जाइत अछि। चाहे जे हो एतबा तँ निर्विवादे जे क्रोधक परिणाम बिरले नीक होइत अछि। सामान्यत: क्रोधमे समस्याक समाधान हेबाक बजाय नव-नव समस्याक प्रादुर्भाव भऽ जाइत अछि। क्रोधक आवेगमे कएल गेल गलती केतेको-बेर मरण-पर्यन्त पश्चातापक कारण भऽ जाइत अछि। अतएव क्रोध सबहक लेल घातक होइत अछि। ऐसँ अध्यात्मिक प्रगतिमे व्यवधान तँ होइते अछि संगे सांसारिक विकास सेहो अवरूद्ध भऽ जाइत अछि। अस्तु क्रोध अवश्य त्याज्य थिक। लेखक- रबीन्द्र नारायण मिश्र ७५८, सेक्टर ८ पुष्प विहार नई दिल्ली- ११०००१७ दिनांक- २४.०१.१९८८ २ यूरोप यात्रा भारत सरकारक प्रशिक्षण कार्यक्रमक अनुसार ३५ गोटेकेँ एक-संग युरोपक पाँच देश घुमबाक कार्यक्रम छल। सभ गोटे सरकारक प्रथम श्रेणीक अधिकारी छला। सभ नेतृत्व एकटा महिला अधिकारीक हाथमे छल। सभमे बेकतीमे विदेश देखबाक-घुमबाक आ रहबाक अवसरसँ मनमे अद्भुत प्रसन्नता छल। रहबो किए ने करत युरोपक देश छी किने। सभ कियो अपन-अपन कागज-पत्तर सरियाबैमे ललगौं। पासपोर्ट सरकारी बनल। वीजा कार्यालयक तरफसँ बनि गेल। टीकट सरकार देलक, तखन करके की रहइ। बस कपड़ा-लत्ता सरियाउ, किछु पाइ बेसी कऽ रखि सकी तँ राखि लिअ आ विदा होउ। ओना, किछु यूरोडालर सरकारक तरफसँ जेब खर्चक हेतु सेहो देल गेल। फ्रांसक राजधानी ‘पेरिस’ लौटबाकाल रस्तामे छल। सभकेँ इच्छा भेलै जे कनिको-मनिको ओकरो देख सकी तँ देख ली। से प्रयासक बाद सम्भव भेलइ। लौटैकालक कार्यक्रममे दिन भरि पेरिस भ्रमण शामिल कएल गेल। पैंतीस आदमीक हुजुम एक्केठामसँ विदेश विदा छल। एकर आनन्द सोचल जाए सकैत अछि। यूरोप भ्रमणक उपरोक्त कार्यक्रम असलमे प्रशिक्षणक अंग छल। अगस्त २००९ मे दू सप्ताहक हेतु केतेको दिनसँ तैयारी चलि रहल छल। विदेश यात्राक दौरान की करक नहि अछि, आ की करक अछि तेकर सविस्तार चर्चा भेल। कोनो एहेन काज नहि करबाक छेलै जइसँ देशक गरिमापर बट्टा लगइ। आठ बजैत-बजैत सभ कियो इन्दिरा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाइ अड्डापर पहुँच गेल रही। सबहक जेबीमे अपन-अपन टीकट, पासपोर्ट आदि जरूरी कागजात छल। रातिक २ बजे करीब हवाइ जहाजक उड़ान छल। किछु गोटेकेँ मुम्बइसँ आगूक जहाज लेबाक रहैन तँए ओ सभ अलग पहिनहि मुम्बइ चल गेल रहैथ। हम दिल्लीसँ सीधा फ्रैकफर्ट जाइबला हवाइ जहाजमे जाइबला समूहक संगे रही। दिल्ली हवाइ अड्डापर एक-एक-के सभ सहयात्री सभ जमा भऽ गेलौं। सुरक्षा जाँचक बाद हम सभ अन्दर इमीग्रेशन काउन्टरपर ठप्पा लगेलौं। सभकेँ संगमे कोनो प्रतिबन्धित सामान नहि लऽ जेबाक हिदायत पहिनहि दऽ देल गेल रहइ। तँए कोनो परेशानी नहि भेल। किछु कालमे बोर्डीग शुरू भऽ गेल आ हम सभ एक-एक-के बेरा-बेरी सभ कियो हवाइ जहाजमे बैस गेलौं। हमरा लोकनिक प्रशिक्षण स्लोवेनियाँ लुबियाना स्थित आइ.सी.पी.ई.(Interational centre for public Enterprises) छल। एकर स्थापना २४ अप्रैल १९७४ ई.मे तत्कालीन यूगोस्लावीया सरकार द्वारा भेल। भारत, नेपाल, श्रीलंका सहित पनरहटा आर देश सभ एकर सदस्य छैथ। ऐ संस्थाक विकास यात्रामे भारतक गम्भीर योगदान अछि। वर्तमानमे आइ.सी.पी.ई. दुनियाँ भरिक लोक हेतु विभिन्न प्रकारक विषय, खास कऽ आर्थिक विषयपर चर्चाक सघन माध्यम अछि। ऐ संस्थाक स्थापनामे संयुक्त राष्ट्र संघक नाओं (Non Aligned Movement) क बहुत योगदान अछि। भारतक श्री सी सुव्रमन्यम एवम् श्री जी पार्थ सारथी बहुत दिन धरि एकर नायक मार्ग दर्शक रहला। यूगोस्लावियाक विभाजनक बाद १९९२ ई.मे ऐ संस्थाक देख-रेख स्लोवेनियाँ सरकारक अधीन आबि गेल। ऐ संस्थाक प्रशासकीय प्रमुख डायरेक्टर जेनरल होइत छैथ जे संस्थाक एसेम्बलीक द्वारा चारि वर्षक हेतु चुनल जाइ छैथ। संम्प्रति डॉ. आनन्द एन अस्थाना ६ अप्रैल २०१५ सँ चारि सालक हेतु ऐ संस्थाक डायरेक्टर जेनरलक पदपर छैथ। दिल्लीसँ हवाइ जहाज खुजल तँ सोझे जर्मनीक फ्रैकफर्ट हवाइ अड्डापर उतरल। सूर्योदय भऽ गेल छल। मुम्बइसँ अबैबला हमर संगी सभ सेहो ओतहि आबि कऽ हमरा लोकनिक प्रतीक्षा करैत छला। ओइमे एक गोटेक सामानमे दारूक बोतल रहैन जे ओ मुम्बइ हवाइ अड्डापर कीनने रहैथ। फ्रैकफर्टमे ओ पकड़ल गेला आ हुनका बहुत परेशानी भेलैन। हुनका कहल गेल जे या तँ पीब लिअ, या केकरो दऽ दियौ चाहे फेक दियौ। संगे आगू नहि लऽ जा सकै छी। पता नहि, ओ तेकर की समाधान केलैन। फ्रैकफर्ट दुनियाँक पहिल हवाइ अड्डा थिक। १६ नवम्वर १९०९ ई.मे भेल। जर्मनीक ई वयस्तम हवाइ अड्डा अछि। सन् २००९ मे पाँच कड़ोर ९ लाख ३२ हजार ८४० यात्री ऐठामसँ गुजरल। फ्रैकफर्टक टर्मीनल १A पर हमरा लोकनि स्लोवेनियाँक (Lajubljana) हेतु छोट सन हवाइ जहाज पकड़लौं। घन्टा भरिमे ई यात्रा संपन्न भेल। रस्तामे सभ तरहक जलखै सेहो देल गेल। यात्रासँ पूर्व हमरा सबहक एकटा संगी मार्गदर्शन करैत निम्नलिखित पहलुपर धियान रखबाक परामर्श देलैन। (ओ केतेको बेर विदेश गेल रहैथ आ विदेशमे २ साल काजो केने रहैथ) १. हैण्ड वैगेजमे एक सेट कपड़ा राखी ताकि जँ चेकइन वैगेज देरीसँ पहुँचल तँ काज औत। २. चेकइन वैगपर अपन नाओं, गन्तव्य स्थानक पता सहित फोन नम्बर लिखल जाए। ओइ बैगमे अपन भिजिटिंग कार्ड राखल जाए। ३. पासपोर्ट, हवाइ जहाजक टिक, विदेशी मुद्रा अपना संगे सुरक्षित स्थानपर राखल जाए। ४. उपरोक्त जरूरी कागजातक तीन फोटो प्रति वैगमे अलग-अलग स्थानपर राखल जाए। ५. नित्यप्रति प्रयोगक जरूरी दबाइ अपना संगे राखू। ६. होटल आदिमे अपन सामानपर धियान राखू, ताकि ओ चोरि ने भऽ जाए। ७. विदेशमे हमेशा दू वा अधिकक समहूमे रहू ताकि जरूरी भेलापर मदैत भऽ सकए। ८. विदेशमे कीनल गेल सामानक रसीद संगे राखू, एमीग्रेसन काउन्टरपर तेकर काज पड़ि सकैत अछि। ९. अपना संगे छाता, हल्का ऊनी स्वेटर, आ कोट राखू। उपरोक्त प्रशिक्षण ९ अगस्तसँ २३ अगस्त २००९क दौरान सम्पन्न हेबाक रहइ। कार्यक्रम प्रारम्भसँ पूर्वहि हमरा लोकनिकेँ संस्थापनक डायरेक्टर जेनरलक तरफसँ इमेल भेटल जइमे संस्थानक बारेमे प्रारम्भिक जानकारीक अलाबा प्रशिक्षण कार्यक्रमक छल। दैनिक कार्यक्रम छल। तहिक अनुसार माने कार्यक्रम दौरान कोनो काजक हेतु श्री अश्विन श्रेष्ठ एवम् श्री उरोज जेबरसँ सम्पर्क करबाक छल। ९ अगस्त २००९ क लुवियाना हवाइ अड्डापर हमरा लोकनिक स्वागत हेतुश्री श्रेष्ठजी (जे नेपाली मूलक छला एवम् स्लोविनियाँमे बसि गेल रहैथ) आएल रहैथ। दूटा नमगर-नमगर बसमे चढ़ि हमरा लोकनि संस्थानक हेतु विदा भेलौं। आधा घन्टामे हम सभ संस्थान पहुँचलौं जेतए हमरा लोकनिक स्वागत डॉ. स्टेफन वोगडन सलेज, डायरेक्टर जेनरल केलाह। सभ गोटेकेँ होस्टल रूमक कुंजी देल गेल। प्रत्येक कोठरीमे दू गोटाक जगह छेलइ। मात्र एक्केटा रूप छेलै जइमे एसगरे हमर एकटा संगी रहला। कार्यक्रमक समन्वयक (महिला अधिकारी) केँ सेहो फराक कोठरी देल गेलैन। तेकर पछाइत हमरा लोकनिकेँ चाइनीज रेस्टोरेन्ट- सांग हाइ, लुवियानामे दिनक भोजन करौल गेल। छात्रावास साफ-सुथरा छल। कोठरी सभमे ए.सी. नहि रहै कारण ओइठाम ओतेक गर्मी नहि पड़ैत अछि। सभ जरूरी समान ओइ कोठरीमे सुरभ छल। संस्थानक भूतलपर रवीन्द्रनाथ टैगोर हॉलमे नित्य साढ़े सातसँ आठ बजेक बीचमे जलखै देल जाइत छल। जे तेतेक जूश पीबए चाहैथ से भेटैन। भारतीय शाकाहारी भोजन एकटा गुजराती ठेकेदार द्वारा देल जाइत छल। लगैत छल जेना अपने देशमे खा रहल छी। ओही हॉलमे रोजाना रात्रि भोजनक बेवस्था सेहो रहैत छल। एवम् दिनुका भोजना आन-आन ठाम। संस्थानक त्रुवार हॉलमे प्रशिक्षण भाषण होइत छल। समयसँ सभ प्रशिक्षणार्थी एवम् व्याख्याता लोकनि उपस्थित भऽ जाइत छला। चाह एवम् कौफीक हेतु दू बेर अवकाश होइत छल। चाह/कौफीक अलावा भरि पोख तरह-तरह केर बिस्कुटक बेवस्था सेहो छल। १० अगस्त २०१६क संस्थानक डी.जी. द्वारा स्वागत भाषणक बाद स्फोवेनियाँमे भारतीय राजदूत डॉ. भी.एस. शंषद्रि द्वारा भारत स्लोवेनियाँ सम्बन्धपर संक्षिप्त चर्चा कएल गेल। तद्दुपरान्त स्लोवेनियाँक विदेश मंत्रालयमे डी.जी. श्रीएन्ड्रेज वेन्डेज द्वारा स्लोवेनियाँ एवम् अर्थ संकट विषयपर भाषण भेल। भोजनोपरान्त प्रो. जोज ग्रिकर द्वारा Innova tive Cron Border i-Resion Development विषयपर भाषण भेल। रातिमे स्वागत एवम् रात्रि भोजनक कार्यक्रमक बाद सभ गोटे विश्राम केलौं। भोरे उठि हम सभ आसपासक जगहमे टहलए निकललौं। अकास स्वच्छ छल। वायुमण्डलमे केतौं प्रदूषण नहि। अकासक तारा सभ चकमक देखल जा सकैत छल। हवामे जे ताजगी छल ओकर अनुभव शब्दसँ नहि कएल जा सकैत अछि। मुदा ओत्तौ पार्कमे एकटा भिखमंगा सन बेकतीकेँ पुरान-धुरान ओढ़ना ओढ़ने सूतल देखलिऐ। कहबी छै जे गेलौं नेपाल, कपार गेल संगे..! स्लोवेनियाँ बहुत छोट सन देश अछि मुदा आर्थिक दृष्टिमे उन्नत देशमे अबैत अछि। ई देश यूरोपियन यूनियनक हिस्सा अछि एवम् ओइठामक मुद्रा यूरोडालर अछि। सभ किछुक अछैतो ओत्तौ अभागल लोक पार्कमे अनाथ जकाँ सूतल देखाएल, से देख आश्चर्यमे पड़ि गेलौं। ११ सँ सोलह अगस्त २०१६ ई.क बीच स्लोवेनियासँ बाहर वियाना, म्युनिस्क, मेनिस जेबाक कार्यक्रम छल। समस्त यात्रामे श्री अश्विन श्रेष्ठजी हमरा लोकनिक संगे रहैथ। हुनका संगे एकटा गाइड छल एवम् गाड़ीक ड्रइवर रहए जे अपना-आपमे मनोरंजक छल एवम् बहुत रास जानकारी दैत रहै छल। ९ अगस्तक सायंकाल हमरा लोकनि सीटी सेन्टर घुमैले गेलौं। सड़कपर काते-काते चलैमे अद्भुत आनन्द आबि रहल छल। सड़कक काते-काते साइकिल चलेबाक हेतु अलग पाँति छल। ट्रैफिक कन्ट्रोल सिस्टममे एहेन बेवस्था छल जे पदयात्री सड़क पार करबाक सूचना खीच दबा कऽ दए सकैत छल। अलग जाइबला लोक सभ हमरा लेाकनिक संग बहुत नीक बेवहार करै छला। ट्रैफिक कन्ट्रोलमे सेन्सर लागल छेलइ। जइ कार सभमे अनुमतिक चीप छल, तेकरा चेक प्वाइन्टपर अबिते रस्ता खुजि जाइत छल। शेष लोककेँ अपन कागजात देखबए पड़ैत छल। तेकर बादे अहाँक गाड़ी आगू बढ़ि सकैत अछि। जँ सड़कपर यातायात नियमक उल्लंघन करैत पकड़ल जाएब तँ तुरन्त सायरन बजि उठैत छल आ ओइसँ उवरक हेतु भारी जुर्माना ३० यूरोडालर अदा करए पड़ैत छल। सड़कक कातमे किंवा कोनो पार्कमे लघुशंका करब विल्कुल मना छल। एमहर-ओमहर जाइत काल परिचय पत्र लटकौने रहैत छेलौं जइसँ असानीसँ पहिचान भऽ सकए। स्लोवेनियाँक सरकारमे विषय वस्तुकेँ विशेषज्ञ सभकेँ मंत्री, सचिव बनौल जाइत अछि। सरकार बदललापर ओ सभ अपन पुरना काजपर आपस लौट जाइत छैथ। यूरोपियन पुनियनक संभावी सभ राष्ट्रमे एके बिन्दुपर टैक्स लेबाक परम्परा अछि। संसदक दू सदन अछि। राष्ट्रपति, मंत्रीक अलाबा नगरपालिका होइत अछि। ओइठाम राज्य नहि अछि। शहरमे पीबक पानिक आपूर्तिक उत्तम बेवस्था अछि। पद यात्रीक बहुत सम्मान कएल जाइत छल। यदि कारसँ चलैत बेकती कोनो पद यात्रीकेँ देखैथ तँ तुरन्त गाड़ी रोकि कऽ सड़क पार करबाक आग्रह करैथ। ११ अगस्त २००९ ई.क प्रात: ६ बजे बससँ सभ गोटे आस्ट्रीयाक राजधानी वियानाक हेतु प्रस्थान केलौं। सभ गोटेक आपसी सहमतिसँ ओइ विदेश कार्यक्रमक हम मुनिटर रही। सभसँ पहिने तैयार भऽ आगू आबि कऽ आर लोक सभकेँ शीघ्र चलबाक हेतु प्रेरित करी। समयक प्रति निष्ठा ओइठाम बहुत आवश्यक छल, अन्यथा लोक हँसीक पात्र भऽ जाइत छल। वियाना आस्ट्रीयाक राजधानी थिक। एकर अवादी १.८ करोड़ अछि। वर्लिनक बाद विश्वमे सभसँ अधिक जर्मन भावी लोक ऐठाम रहै छैथ। आस्ट्रीयाक पूर्वी भागमे स्थित वियाना अनेको अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाक मुख्यालय अछि। २००१ ई.मे युनेस्को एकटा विश्व धरोहर घोषित केलक। वियानाकेँ संगीतक नगर सेहो कहल जाइत अछि। विश्व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक- फ्राइड ओहीठाम जन्मल छला। वियाना दुनियाँकमे उच्च जीवन स्तरक हेतु प्रसिद्ध अछि। २००५ ई.क एक अध्ययनक अनुसार दुनियाँक सर्वोत्कृष्ट रहै जोगर शहरमे एकर नाओं आएल छल। अमेरिकाक सैन फ्रैसिस्को एवम् कनाडाक वानकोमेर ऐ टक्करक आन शहर सभमे अछि। प्रति वर्ष ३.७ करोड़ पर्यटक ऐ शहरमे भ्रमण हेतु अबैत रहै छैथ। सायंकाल ५ बजे आस्ट्रीयामे भारतीय राजदूत श्री सौरभ कुमारसँ दूतावासमे हमरा लोकनिक भेँट भेल। सभ गोटेसँ परिचयक बाद जलखैक बेवस्था रहइ। वियानक बारेमे आवश्यक जानकारी सेहो हुनका माध्यमसँ भेलट। भारत एवम् आस्ट्रीयाक पारस्परिक सम्बन्धक चर्चा करैत ओ स्पष्ट केलैन जे २००० भारतीय ओइ देशमे रहि रहल छैथ। भारत भ्रमण हेतु वीजा देबामे कोनो देरी नहि होइत छल ओ अधिकांश लोककेँ ओही दिन वीजा भेट जाइत छल। राजदूत महोदय हमरा लोकनि द्वारा पूछल गेल केतेको जिज्ञासाक उत्तर दैत रहला। दूतावासक बाद हमरा लेाकनि नगर भ्रमण हेतु विदा भेलौं। ओइ क्रममे पुरना महल देखलौं जेतए-सँ ८०० साल तक ओइ देशक शासन भेल छल। प्रधानमंत्री आवास एवम् संसद भवनकेँ एकदम समीपसँ हम सभ देखलौं आ सुरक्षाकेँ जे ताम-झाम अपना देशमे अछि, से ओतए केतौ नहि बुझाएल। शहर एकदम स्वच्छ, मनोरम। लोकक अवादी बहुत कम। रस्तामे तँ मुश्किलसँ कियो देखाइत। खेत सभ हरिअर कंचन। बीच-बीचमे केतौ-केतौ गाम सभ, जेहो छोट-छोट मुदा पक्काक घर सभ दर्शनीय दृश्य उत्पन्न करैत छल। सभ घरपर सौर ऊर्जाक उत्पादनक बेवस्था छल। रस्ता भरि पवनचक्की द्वारा विद्युत ऊर्जा उत्पादनक बेवस्था देखाएल। यत्र-तत्र द्वितीय विश्व युद्धक स्मृति अवशेष भरल छल। सड़कपर ३५टा भारतीय हुजुम जखन चलैत छल तँ अभूतपूर्व दृश्य भऽ जाइत छल। देशक प्राय: सभ राज्यक लोक हमरा सबहक संगे छला। अहिना सड़कपर चलैतकाल वियानाक फूट-पाथपर एकटा पंजाबी दोकान केने छला। हमरा सभकेँ हिन्दीमे गप करैत सुनि बहुत प्रसन्न भेला। गप-सप्प्क क्रममे अपन परेशानी सभ व्यक्त करैत रहला। सम्पूर्ण यूरोप एक दोसरसँ जुड़ल अछि। सड़कक माध्यमसँ पूरा यूरोप घुमि सकैत छी। मल्टीपाल इन्ट्री वीजा भेटैत छइ। जहिना अपना देशमे एक राज्यसँ दोसर राज्य जाइ छी तहिना ओतए एक देशसँ दोसर देश घुमि सकै छी। दूरगामी बस सभक ड्राइवरकेँ दूटा यात्राक बीचमे आधा घन्टाक कानूनी विश्राम देल जाइत छइ। आसपासक घर सभमे फलक बगीचा छल। निच्चाँमे फल सभक पथार रहैत छल। सड़कक काते-काते हम सभ चली तँ लोक सभ आश्चर्यचकित भऽ देखैत रहै छल। कियो-कियो कहैत जे ओ इण्डियाकेँ जनैत अछि किंवा इण्डिया गेलो अछि। मुदा सबहक मुखमण्डलपर एकटा सत्कारक भाव भेटैत छल जेकरा बिसरब असम्भव...। १२ अगस्त २००९क हमरा लोकनिक पहिल पड़ाव छल- यूनीडो (United Nations in Destrial Developemant Organization) संयुक्त राष्ट्रसंघक अधीन यूनीडो अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर गरीबी निवारण हेतु औद्योगिकरणक विकास हेतु कार्यरत् अछि। जनवरी २०१७ तक भार सहित १६८ देश ऐ संस्थाक सदस्य छैथ। संस्थाक निदेशक द्वारा प्रस्तुतिकरणक क्रममे मूलत: निम्नलिखित विषय उभरल- १. वर्तमान परिवेशमे सरकार सबहक महत्व बढ़ल अछि कारण बाजार आधारित नीति स्वयंमे अपूर्ण अछि। २. यूनिडो सदस्य देश सभकेँ उत्साहित कए सकैत अछि मुदा असल काज तँ देश सभकेँ स्वयं करक हएत। ३. वायुमण्डल परिवर्तनक खेती-वाड़ीपर जबरदस्त प्रभाव अछि। ४. ऊर्जा उत्पादनक ताधैर महत्व नहि हएत जाधैर एकर सक्षम उपयोग नहि हएत। ५. भारतमे अफ्रिकोसँ कम प्रति बेकती उपलब्ध अछि। भारतक प्रगति हेतु ऊर्जा उत्पादन ओ उपलब्धिमे वृद्धि आवश्यक अछि। ६. गरीबी ओ ऊर्जामे अन्योन्याश्रय सम्बन्ध अछि। ७. प्रत्येक घरमे सौर ऊर्जा लगौल जाए। ८. कार्यालय एवम् दोकानक कार्यवधि घटा कऽ ऊर्जा व्ययकेँ सीमित कएल जाए। ९. भारतक किछु राज्य जेना महाराष्ट्र, जुजरात आन सात राज्यसँ बेहतर कऽ रहल अछि। ११ अगस्तक दिनुका भोजन एकटा भारतीय भोजनालयमे छल। ओकर संचालक एकटा भारतीय युवक छला जे ओइठाम होटल मैनेजमेन्ट करबाक हेतु गेल रहैथ आ पढ़ाइ पूरा कए भोजनालय चलबए लगला। ओ अपन प्रयासमे पूर्ण सफल छला। होटल खूब चलैत छल। उत्तम कोटिक भारतीय भोजनक बेवस्था छल। मुदा दोसर दिन एकटा चाइनीज भोजनालयमे खेनाइक बेवस्था छल। शाकाहारी लोकक संख्या आधा-आधी छल ओइमे ६-७ टा तँ कट्टर शाकाहारी छला। ..एकटा हाँड़ीमे भात राखल रहइ। वैरा कहलकै जे आधा दिस तँ अण्डा सहित भात अछि आ आधा बिना अण्डाबला। ई बात सुनि कऽ हम आ हमर एकटा दच्छिन भारतीय मित्र कड़ा विरोध कएल, आखिर ऐ बातक कोन गारंटी अछि जे एक्के हाँड़ीमे राखल दू तरहक भात उलैट नहि गेल हएत आ छूतिक तँ बाते छोड़ू। हम सभ ४-५ गोटे भोजनपर सँ उठि गेलौं। तैपर आयोजनक लोकनिक आग्रह भेल जे हम सभ कमसँ कम जूसे पीब ली। मुदा बादमे ओकर भूगतान लऽ कऽ बिबाद भऽ गेल जे मुश्किलसँ समटल। असलमे शाकाहारी लोकनिकेँ सभटा कष्ट बुझा सिवाय भारतीय होटल सभमे। दोसर ठाम तँ शाकारीक सही माने घास-फूस बुझल जाइक। जँ अहाँ छाँति सकब तँ अहाँ जानी। जय हो, शाकाहारी बाबा...। भोजनक मामलामे सभसँ नीक बेवस्था सलोविनयामे छल। ओइठाम भोरक जलखै एवम् रात्रिक भोजन गुजराती होटलसँ व्यवस्थित छल तँए अति रूचिकर छल। ओत्तौ दिनुका भोजनक हेतु चाइनीज भोजनालयक बेवस्था छल जेतए हमरा सन शाकाहारी प्राय: भूखले रहि जाइत छेलौं। ऐ आशामे जे रातिमे सभ सधा लेबइ। बाहर खाएब किंवा पानियोँ पीब बड़ महग रहइ। एकटा कौफीक हेतु तीन यूरोडालर यानी भारतक लगभग २७० रूपैआ होइत छल जे बड़ महग बुझाइत छल। जखन-कखनो कोनो बैसक वा सरकारी कार्यक्रम होइत छल तँ पानि, चाह, कौफी, बिस्कुटक बेवस्था तँ रहिते छल। नगर भ्रमणमे सेहो आयोजक द्वारा सीमित मात्रामे पानिक बन्द बोतल देल जाइक। ओइसँ बेसी पीब तँ कीनए पड़त। दाम-पुछू नहि। टके सेर भाजी, टके सेर खाजा। १२ अगस्त २००९क दुपहरियाक भोजनक बाद आइ.ए.ई.ए. (International Atomic Energy Agency) क निदेशक द्वारा भ्रमण छल। ओ भारतीय छला। ओइठाम नौकरीसँ पहिने भारतीय प्रशासकीय सेवाक अधिकारी रहैथ, आ तँए भारतीय परिस्थितिसँ पूर्ण अवगत रहैथ। ओ तरह-तरहसँ नाभिकीय ऊर्जाक रचनात्मक उपयोगक विषयपर अपन विचार रखैत ऐ बातपर जोड़ दैत रहैथ जे दुनियाँमे जइ प्रकारसँ ऊर्जाक प्रयोजन बढ़ि रहल अछि, तइमे नाभिकीय ऊर्जाक रचनात्मक प्रयोग अनिवार्य भऽ गेल अछि। तेतबे नहि, केतेको प्रकारक चिकित्सीय जाँच एवम् उपचारमे सेहो एकर उपयोगिता महत्वपूर्ण अछि। भाषणक बाद प्रश्न पुछबाक परिपाटी छल जइसँ बढ़ियाँ बात ई छल जे यू.एन.ओ.क संस्थामे रहितेा ओ भारतीय हितक प्रति बहुत संवेदनशील रहैथ। आइ.ए.ई.ए.क मूल उद्देश्य शान्ति हेतु आराविक शक्तिक प्रयोग थिक। एकर स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघक स्वायत्व संस्थाक रूपमे सन् १९५७ ई.मे भेल। वियानाक दर्शनीय स्थान सभमे महत्वपूर्ण अछि, हसवर्ग साम्राज्यक राज महल...। १२७९ ई.सँ लगातार कोनो-ने-कोनो राजाक शासन केन्द्र रहल ई महल संप्रति आस्ट्रीयाक राष्ट्रपतिक सरकारी आवास अछि। ऐ महलमे नाना प्रकारक म्यूजियम केर अलावा आवासीय अपार्टमेन्ट सभ अछि। राजमहलक अन्दर सार्वजनिक पूजाक स्थान अछि जैठाम आम जनता आबि जा सकैत अछि। रबि दिन-के ओइठाम संगीत कार्यक्रम सेहो आयोजित कएल जाइत अछि। राजमहलक अन्दर सीसी म्यूजियम अछि जे ९ बजेसँ सायं ५.३० बजे तक आम जनता हेतु खुलल रहैत अछि। सीसी म्यूजियमक अन्दर ऑडियो टूरसँ बहुत रास जानकारी भेटैत अछि। महलक अन्दर पुरना खजाना एवम् ओइमे राखल राजमुकुट ओ राजकीय वस्वा सभ दर्शनीय थिक। १३ अगस्त २००९ क आठ बजे हम सभ वियानासँ म्युनिख (जर्मनी) हेतु बस द्वारा प्रस्थान केलौं। लगभग पाँच म्युनिख स्थित भारतीय कांसुलेट जेनरलक कार्यालय पहुँचलौं। ओइपर फहराइ तिरंगा झण्डा फटकियेसँ देखा रहल छल। आपसी परिचयक बाद कांसुलेट जेनरल महोदय भारत-जर्मनीक आपसी सम्बन्ध एवम् वर्तमान आर्थिक परिवेशमे तेकर महत्व एवम् अनतर्राष्ट्रीय महत्वपर सारगर्भित भाषण देला। हुनकर कहब रहैन जे जर्मनी संगे भारतक पुरान सम्बन्ध रहल अछि। जर्मनीमे संस्कृत अध्ययन एवम् अनुसन्धानक अति प्राचीन इतिहास रहल अछि। दुनू देशकेँ जनतांत्रिक शासन पद्धतिक अलावा सांस्कृतिक एवम् नैतिक मूल्यमे अनुरुपता अछि। संगे ईहो कहल रहैन जे भारतीय द्वारा जर्मनीमे कएल गेल निवेशसँ तुलनात्मक दृष्टिये अधिकर तर जर्मनकेँ नौकरी भेटल अछि वनस्पति भारतमे जर्मन निवेश द्वारा कमतर भारतीयकेँ जीविका भेटल अछि। ओ अतिशय आग्रही एवं सरल सोभावक लोक छला। कार्यक्रमक बाद चाह-पान चलल आहमरा लोकनि होटलमे रात्रि विश्रामक हेतु चलि गेलौं। १३-१४ अगस्तक रात्रिमे हम सभ म्युनिखमे रहलौं। होटल आलोशान छल। लानगृहमे छोट-सँ-पैघ नापक तरह-तरहकेँ तोलिया राखल छल। कोठरीमे मिनीवार छल। पीबैबला घरेमे बैसल पीब सकैत छल, मुदा सबहक पाइ जायकाल चुकता करैक पड़ैत। भोरक जलखैक गुल्क नहि देबक रहइ। जलखैक जगह विशाल काय छल आ ओइमे जलखैक सामानक भरमार छल। जे खाउ, जेतेक खाउ। फल खाउ, फलक रस पीबू, अण्डा खाउ। ब्रेड सबहक तँ तेतेक किसिम रहै जेकर वर्णन कठिन अछि। म्युनिखक होटल सबहक साज-सज्जा वियानासँ बेहतर रहइ। चाहक विन्यास सभमे भारतीय दार्जलींगक चाहक पुड़िया सभ सेहो रहइ। लोक सभ सुन्दर नमगर ओ स्मार्ट छल। बड़का-बड़का मौल सभमे वस्तुक भरमार छल। जे चाही लिअ, मुदा दाम भारतसँ बेसिये रहइ। इलेक्ट्रॉनिक सामान सबहक भरमार रहइ, मुदा महग। तखन की लेल जाए? तरह-तरहक चॉकलेट सभ लेलक, सनेस हेतु। म्युनिखक वीयर हॉलमे हजारो आदमी एकठाम बैस कऽ दारू पीबैत अछि। हमर किछु सहयोगी सभ उत्सुकतावस ओकरा देखबाक हेतु रातिमे गेला मुदा लौटला पछाइत अफशोस करैत रहैथ जे बेकारे गेलौं। सम्पूर्ण वातारण दुर्गन्धसँ भरल छल। हम आ हमर रूमेट ओइ समयकेँ सुतमो उपयोग कऽ प्राय: बेहतर निर्णय लेने रही। म्युनिखमे सालमे एकबेर वार्षिक वीयर उत्सव अष्ट्रवरलस्ट होइत अछि। प्राय: सितम्बरक मध्यसँ शुरू भऽ अक्टुवरक प्रथम सप्ताह तक चलैत अछि। ऐमे दुनियाँ भरिसँ ६ करोड़सँ अधिक लोक भाग लइ छैथ। वावेरियन संस्कृतिक ई एकटा महत्वपूर्ण अंग अछि। ऐ उत्सवमे तरह-तरह केर खेल-धुप, नाना प्रकारक भोजनक अतिरिक्त मनोरंजनक अनेकानेक विकल्प सुलभ रहैत अछि। १४ अगस्त २००९ ई.क प्रात:काल ९.३० बजेसँ जर्मनीक चैम्बर ऑफ कामर्स एण्ड इन्डस्ट्री वयारियाक सभा गृहमे संस्थानक अध्यक्ष भाषण छल। उपरोक्त संस्थाकेँ जर्मनीक ३.३० कम्पनी सदस्य छल। पेरिसक सी.सी.आई.क आद ई अपना तरहक संस्थानमे दोसर स्थानपर छल। जर्मनीक एकीकरण एवं तेकर प्रभावक विषयमे ऐ बैसारमे विस्तारसँ चर्चा भेल। पच्छिमी जर्मनी अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध अछि। पू. जर्मनीक आर्थिक स्थिति तखनो खास्ता-हाल छल। तँए एकीकरणक बाद पच्छिमी जर्मनी दिसुका लोक सभ एकीकरणसँ अप्रसन्नता व्यक्त करैथ। जर्मनीकेँ म्युनिखमे घुमैत हमरा लोकनि ओलम्पिक खेलक स्थान देखलौं। म्युनिखक टेक्नीकल म्युजियम देखलौं। ओइमे विद्युत उत्पादनक व्यवहारिक वर्णन छल। अलग-अलग तलपर नाना प्रकारक वस्तु सभ प्रदर्शनीक हेतु राखल छल। वायुयान, रेल, जल-जहाज सहित अनेकानेक वस्तुक जर्मनीमे अविष्कार एवं प्रयोगक जानकारी लैत, देखैत चकविदरो लागि जाइत छल। निश्चय ओ सभ केतेको क्षेत्रमे हमरा सभसँ बहुत आगू छला। भऽ सकैए जे लोक यूरोपक प्रति अनेकानेक धारणासँ पूर्वाग्रहित हो, परन्तु हमरा केतौ रास्ता, होटल, चौबटियामे कोनो अभद्र नहि देखाएल। ओइ तुलनामे तँ दिल्ली किंवा आसपासक परिस्थिति अतिशय चिंताजनक अछि। ओइठामक लोक सभ कार्यक प्रति निष्ठावान एवं परिश्रमी छैथ। तेतबे नहि, व्यर्थक बिबादसँ सेहो कोनो मतलब नहि। ओतेक दिनमे मात्र एक दिन वियानामे पुलिसक जत्था देखबामे आएल जे कोनो प्रर्दशनकेँ नियंत्रित कए रहल छल। अपना सभ ओइठाम जकाँ यत्र-तत्र सर्वत्र पुलिसिया हुजुम किंवा सुरक्षाक तामझाम केतौ नहि देखबामे आएल। आस्ट्रीयाक प्रधानमंत्रीक घर तक अपरिचित लोक सभ बेरोक-टोकक चल जाइत छल। मंत्री सभ मेट्रोरेलसँ कार्यालय अबैत-जाइत छला। भोरे-भोर केतेको कार्यालयमे लोक भरल आ कार्यरत भऽ जाइत छला। साइकिल चला कऽ व्यायाम करब आम बात छल। साइकिलक हेतु सभठाम अलग रस्ता छल। सभसँ बेसी जे आकर्षक बात छल से ई जे लोक सभमे व्यर्थक अहंकार नहि छल। सरल एवं सहज रूपेँ लोक बेवहार करैत छल जेकर अनमान देखिए कऽ भऽ सकैत अछि। ओइ सभ शहरमे जनसंख्या कम अछि। तँए ओकरा व्यवस्थित करब किंवा ओकरा लेल बेवस्था करब अपेक्षाकृत असान अछि। मुख्य शहरकेँ जँ छोड़ि दी तँ बीचक रस्ता सभमे मुश्किलसँ लोक देखाइत। हँ! सप्ताहांतक दृष्टि अलग रहैत छल। शुकक रातिमे वास्तवमे माछी जकाँ लोक मन भनाइत रहै छल। शनिक भोरे लगैत जेना पूरा अवादी शहर छोड़ि कऽ केतौ भागि रहल अछि। कियो कारसँ,कियो मिनी बससँ, कियो कारमे ट्राली लटकौने लोकक हुजुम देखाइत छल। सप्ताहांत बिताएब हेतु कोनो झील, कोनो रमणीय स्थान वा कोनो दोसर शहर जा रहल छल। झीलक आसपास लोक पटोटैन देने रौद सोंखैत रहै छल। समुद्रमे अति तीव्र गतिसँ स्वचालित नाह सभसँ लोक सभ जल क्रीड़ा करैत देखाइत। ओकर वेग आ ओइमे सभ लोकक दुस्साहस प्रशंसनीय छल। गोराय लोक बड़ मोटाएल देखाइत छल, से देख दुख ओ आश्चर्य होइत छल, जे एतेक सम्पन्न परिवेश रहितो ई सभ शारीरिक रूपसँ अक्षम जकाँ रहबाक कारण केतेको सुखसँ वंचित हएत। यएह सभ देखैत-सुनैत हमरा सबहक समय निकैल जाइत छल। १५ अगस्तक स्वतंत्रता दिवस समारोहक अवसरपर हमरा लोकनि पुन: भारतीय कन्सुलेट जेनरलक ओइठाम पहुँचलौं, जैठाम झण्डोत्तोलन भेल आ भारतक राष्ट्रपति महोदयक संदेश पढ़ि कऽ सुनौल गेल। तद्दुपरान्त मिष्ठान भोजन भेल एवं आपसी गप सभ सेहो भेल। कार्यक्रमक समापनक बाद नगर भ्रमण करैत हम सभ सल्जवर्गक हेतु प्रस्थान केलौं। सल्जवर्ग आस्ट्रीयाक चारिम सभसँ पैघ शहर अछि। द्वितीय विश्वयुद्धक दौरान ७६०० घर घ्वस्त भऽ गेल ओ ५५० लोक मारल गेला। शहरक अधिकांश घर घ्वस्त भऽ गेल। द्वितीय विश्वयुद्धक बाद सल्जवर्ग सल्जवर्गराज्यक राजधानी बनल। विश्व प्रसिद्ध गायक मोजार्टक जन्म अही शहरमे भेल छल। २७ जनवरी २००६क मोजार्टक २५० मा जन्म समारोह धूम-धामसँ मनौल गेल छल। हम सभ मोजार्टक घर देखए गेलौं। ओइ घरकेँ अद्भुत रूपसँ सुरक्षित राखल गेल अछि। घरमे माजार्ट द्वारा प्रयुक्त किछु वाद्य यंत्र सभ लोकक दर्शनार्थ राखल अछि। मोजार्टक देहान्त मात्र ३५ वर्षक आयुमे भऽ गेल परन्तु एतबे कम समयमे ६०० सँ अधिक संगीतक रचना केला आ पाश्चात्य कलात्मक संगीतपर अमिट छाप छोड़ि गेला। १५ अगस्त २००९ क ८ बजे रातिमे थाकल, झमारल हमरा लोकनि लुवियाना आपस एलौं आ संस्थानक छात्रावासमे रात्रिक भोजन करि विश्राम केलौं। १६ अगस्त (२०१६)केँ भोरे सात बजे हम सभ बससँ बेनिस देखबाक हेतु विदा भेलौं। इटलीक पूर्वोत्तर भागमे ११७ छोट-छोट टापूसँ आच्छादित ‘बेनिस’शहर पूल द्वारा एक-दोसरसँ जोड़ल अछि। वेनिसक अवादी लगभग ५५ हजार छल। लुवियानासँ वेनिस जाइत काल १८ किलोमीटरक आवा-जाहीमे लगभग ३००० गुफा सभसँ जुजरए पड़ल। बीचमे बर्ड स्थान अछि जेतए द्वितीय विश्वयुद्धक दौरान ११५ सैनिककेँ गाड़ि देल गेल छल। असलमे द्वितीय विश्वयुद्ध ओइठामक लोकक मोनमे गड़ि गेल अछि। चाहे, अनचाहे लोक ओइ युद्धसँ जुड़ल घटनाक गप्प करए लगैत छल। दच्छिन दिस आल्प्स पहाड़ी क्षेत्र देखाइत छल। शहरमे प्रवेश हेतु बसकेँ ४०० यूरोडालर आ पार्किंग हेतु ४० यूरोडालर देबए पड़ल। रस्तामे मकई, जौ,अंगुरक जबरदस्त खेती देखलौं। जेतए तक दृष्टि जाइत, हरियर कंचन देखाइत। वेनिस शहर तँ जेना पानिमे डुबि रहल अछि। एक घरसँ दोसर घर जाइले पूलक सहारा लेमए पड़ैत। जेतए पूल नहि अछि ओतए नाहसँ लोक एकठामसँ दोसरठाम जाइत अछि। जेना अपना सबहक ओतए साइकिल रहैत अछि, तहिना ओइठाम लोक सभ नाह रखैत अछि। वेनिए-क कलात्मकता एवं शिल्पकारी अद्भुत अछि। आश्चर्य होइत अछि जे ई शहर पानिमे डुबि किएक ने जाइ छइ। मध्यकालीन समयमे वैनिस आर्थिक एवं सामुहिक प्रतिनिधिक केन्द्र छल। रेशम, मसाला एवं अनाजक प्रचुर मात्रामे व्यापार होइत छल। ९ वीं सँ १७वीं शताब्दी धरि वेनिस प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक केन्द्र छल जइ कारणसँ ई शहर सदिखन आर्थिक रूपसँ समृद्ध रहल। तेरहम शबदीमे ऐठाम ३७ हजार नाविक ३००० जहाजकेँ चलबैत छला। वेनिस अपन स्वतंत्र अवधिक दौरान गणराज्य बनल रहल। हलाँकि बेनिसक लोक आमतौरपर रूढिवादी रोमन कैथेलिक रहए मुदा धार्मिक कट्टरता एवं पाखण्डक होतए चलन नहि रहए। १३४८ ई.मे प्लेग फैल गेल जइसँ भयंकर मृत्यु भेल। १५७५ सँ १५८४ क बीच फेर ई विमारी फैलल जइमे पचास हजार आदमी मारल गेल। १६३० ई.मे फेर प्लेग पसरल जइमे बेनिसक एक लाख पचास हजार आदमी मारल गेल। नेपोलियन बोनापार्ट संगे युद्धक बाद वेनिसक स्थितिमे कएक बेर उठा-पटक होइत रहल। वेनिसकेँ महल सभक नीव लकड़ीक बनल अछि। ई लकड़ी सभ सैकड़ो वर्षसँ पानिमे डुमल रहलाक बादो खरापनहि भेल अछि। वेनिसमे दुपहरक भोजन एकटा भारतीय भोजनालयमे छल। ओहूठाम पहुँचक हेतु हमरा सभकेँ नाहक मदैत लेबए पड़ल रहए। भोजनक पछाइत हमरा लोकनि जहाजमे बैस कऽ मुरानो, वुरानो एवं टार्सोका द्वीप घुमैले निकैल गेलौं। मुरानोमे शीशा बनेबाक पुरान परम्परा अछि। वुरानोमे रंग-विरंगीघर एवं हथकरघाक सामानक प्रचूरता बुझाएल। टार्सोका द्वीपपर ऐतिहासिक एवं कलात्क हमत्वक केतेको उदाहरणक संग अत्याधुनिकताक प्रभाव देखबामे आएल। जहाजपर बैसल अनगिनित संख्यामे लोककेँ जल-क्रीड़ा करैत देख, ओइठामक लोक सभकेँ जीबाक अन्दाज अद्भुत छल। ऐ प्रकार घुमि-फिर हम सभ एक बेर फेर ९ बजे रातिमे कवियाना स्थित संस्थानक छात्रा-वासमे रात्रि विश्रामक हेतु पहुँचलौं। एवम् प्रकारेण वियाना, झुविख एवम् वेनिस सहित आसपासक प्रमुख स्थान देख-सुनि लेलाक बाद १७ अगस्तसँ २१ अगस्त २००९ तक संस्थानमे सार्वजनिक महत्वक अनेकानेक विषय सभपर भाषण भेल। जइमे सम्बन्धित विषयक शीर्षस्थ विद्वान सभ भाग लेला। संगहि लुवियानाक नगरपालिका, ब्लेड झील एवम् कुन्जक भ्रमण सेहो भेल। स्लोवेनियाँ स्थित विश्व वेपार केन्द्र सेहो देखबाक हेतु हमरा लोकनि गेलौं। २१ अगस्त २००९ क प्रशिक्षण कार्यक्रमक समाप्तिक संग सभ गोटेकेँ प्रमाण पत्र देल गेल। रातिमे संस्थानक डायरेक्टर जेनरल द्वारा विदाइ-भोज देल गेल। ओइमे संगीत (ऑकेस्ट्रा)क कार्यक्रम सेहो छल। किछु गोटे अपनो गीत गौलैन। अद्भुत महौल छल। केतेक हृदयसँ हमरा लोकनिक विदाइ भेल, तेकर वर्णन करब कठिन। २२ अगस्त २००९क शनि दिनक गप छी। संस्थानक क्रिया-कलाप संपन्न भऽ गेल छल। आपसी यात्रा २३ अगस्त २००९क छल। तँए ओइ दिनक उपयोग घुमबा किखामे भेल। हम सभ गोटे विश्व प्रसिद्ध पाल्टोजना गुफा घुमए गेलौं। जमीनक अन्दर बनल ई गुफाकेँ पैछला २०० सालक दौरान ३६ करोड़ लोक देख चूकल अछि। ऐ गुफाक यात्रामे डेढ़ घन्टा समय लगैत अछि। सुरंगमे बनल रस्ता, दीर्घा एवं हॉल सबहक श्रृखला देखैत बनैत छल। गुफाक अन्दर घुमबाक हेतु छोट सन रेलपर चढ़लौं जे छुक-छुक करैत हमरा सभकेँ गुफाक आरामसँ भ्रमण करा देलक। उपरोक्त भ्रमणक मार्गदर्शन विश्वक अनेकानेक भाषामे उपलब्ध छल। ओइ गुफाकेँ देखला, घुमलाक बाद जे मोनपर छाप पड़ल से अखनो अमिट अछि। कला एवम् पुरषार्थक अद्भुत संगम अछि ओ गुफा..! २२ अगस्त २००९क भोरे हम सभ कवियाना हवाइ अड्डापर रही। ओइठाम वायुयानमे संवार भऽ पेरिक हेतु विदा भेलौं। रस्तामे सभ यात्रीकेँ जलखै देल गेल। घन्टा भरिक ई लघु यात्रा देखैत-देखैतमे बीत गेल। फेर हम सभ पेरिस हवाइ अड्डापर उतरलौं। वार-वार हिदायत देल गेल जे अपन समानक सावधानीसँ रक्षा कएल जाए कारण ओइठाम उचक्का सभ तुरंत समान गाएब कऽ दैत अछि। हवाइ अड्डासँ बाहर निकैलते हमरा लोकनिक बस तैयार रहए। सभ अपन-अपन समान रखलक आ बस द्वारा नगर भ्रमणपर विदा भेल। संगमे एकटा मार्गदर्शक सेहो छल जे जगह-जगह अबैबला प्रमुख-प्रमुख वस्तु आ स्थान सबहक परिचय करबैत रहल। फ्रांसक राजधानी पेरिसक ‘इफेल टावर’ विश्व प्रसिद्ध अछि। हमरा लोकनि ओइ टावरपर चढ़लौं आ बेरा-बेरी पेरिस शहरक विभिन्न भागक फोटो टावरपर सँ खिचलौं। टावरक ऊपर तक चढ़बाक हेतु लिप्टक बेवस्था छै किंवा पएरो सिढ़ीक माध्यमसँ ओइपर चढ़ि सकै छी। इलेल टावरक नाओं ओकर निर्माता अभियंताक नाओंपर पड़ल अछि। ११८७-८९ ई.क बीच निर्मित एक इलेल टावरक ऊँचाइ ३२४ मीटर अछि। ऐ टावरपर चढ़ि, घुमि हमरा लोकनिकेँ पेरिस शहरक विहंगम दृष्टि भेटल। अद्भुत शहर अछि, जइमे लगभग एक्के रंग ऊँचाइक महल सबहक भरमार अछि। इलेल टावरक निच्चाँमे कएटा भारतीय सभ छोट-मोट समान सभ बेचैत भेटला। परिसक सीन नदीपर ३७ टा पूल पेरिसमे अन्दर बनल अछि। ई नदी पेरिसक मुख्य वेपारीक जलमार्ग अछि। पेरिस शहरमे प्रयुक्त पानिक आधा भाग अही नदीसँ अबैत अछि। गर्मीक समयमे एतए यात्रीगण विश्राम कए अद्भुत आनन्दक अनुभव करै छैथ। हमर एकटा संगी साल भरि पेरिसमे रहल रहैथ, तैयो केतेको चीज नहि देख पाएल रहैथ। हम सभ तँ मुश्किलसँ बारह घन्टामे पेरिसकेँ देखए चलल रही। जाहिर छै, केतेक देख सकितौं। तथापि मोटा-मोटी प्रमुख स्थान सभ लग बस रोकैत छल आ हमरा लोकनिक गाइड यथा साध्य ओइ विषय वस्तुक इतिहास एवम् वर्तमानसँ परिचित करबैत छला। नेपोलियनक घर सेहो हम सभ देखलौं जे आइ-काल्हि स्मारक भऽ गेल अछि। दिनमे भोजनक हेतु एकटा पाकिस्तानी भोजनालयमे बेवस्था छल, मोन छह-पाँच करैत रहए जे खाइ आकि नहि खाइ, मुदा भूख बहुत लागि गेल छल। अस्तु भोजनमे शामिल भेलौं। पूर्णत: भारतीय शाकाहारी एवम् अति स्वादिष्ट भोजन कऽ मोनमे जे संतुष्टि भेल तेकर वर्णन नहि। भोजनोपरान्त हम सभ पुन: घुमए निकैल गेलौं। पेरिसक मेट्रो देखलौं। दुनियाँक सवोलम मेट्रोमे सँ एक पेरिस मेट्रो रेल मानल जाइत अछि। ३०० कि.मी. लम्बा ट्रैकपर करीब-करीब ३०० स्टेशनपर ई ठाढ़ होइत अछि। मेट्रोक अलावा बस, टैक्सी एवं नाह द्वारा शहरक यातायातक उत्तम प्रबन्ध होइत अछि। शहरमे किरायापर साइकिल देबाक सेहो बेवस्था अछि, जइले मामूली शुल्क लेल जाइत अछि। सायंकाल हमरा लोकनि आपस पेरिस हवाइ अड्डापर पहुँच गेल रही। ओइठाम सूर्यास्त आठ बजे तक नहि भेल रहए। तखने हम हवाइ जहाजपर अपन देशक हेतु उड़ि गेलौं। अकासमे लटकल सूर्य भगवानकेँ बड़ीकाल तक देखैत रहलौं...। ◌ ३ हिन्दू महिलाकेँ सम्पैतमे अधिकार भारतीय समाज मूलत: पुरुष प्रधान रहल अछि। हजारो-हजार बरखसँ पुरुषकेँ चल एवम् अचल सम्पैतपर वर्चस्व छल। समयक संगे ऐ स्थितिमे परिवर्तन भऽ रहल अछि, महिला सम्पन्न भऽ रहल छैथ। वैदिक समयमे पुरुष एवम् महिलाकेँ सम्पैतपर बराबर अधिकारक चर्च अछि। मुदा मनुस्मृतिमे कहल अछि जे पत्नी, चाकर ओ अवयस्क युवाकेँ सम्पैत नहि देबाक चाही। सम्पैतपर अधिकारक मामलामे पत्नी, बेटी वा विधवा कियो पूर्ण अधिकार सम्पन्न नहि छल। जँ स्त्रीगणकेँ सम्पैतपर अधिकार सीमित छल आ जेतए कनी-मनी छेलैहो, सेहो ओकर जीवन-यापन हेतु जीवनकाल तक रहैत छल, तेकर बाद ओ मूल श्रोतकेँ आपस भऽ जाइत छल। ऐ सबहक मूल उद्देश्य समाजमे स्त्रीगणपर स्वामित्व राखब छल। सम्पैतमे अधिकार भेलापर स्त्रीगणकेँ स्वतंत्र आस्तित्व बोध हएत जे तत्कालीन समाजकेँ स्वीकार नहि छल। हिन्दू संयुक्त परिवारमे एक पूर्वजसँ जन्मल लोक सभ होइत छैथ। ऐमे सबहक पत्नी, अविवाहित बेटी शामिल होइ छैथ। मुदा हिन्दू संदायदाता (Coparcenaty) ओइसँ बहुत सीमित होइत अछि। ओइमे बेटा, पौत्र, ओ प्रपौत्र शामिल होइत अछि। २००५ इस्वीक संशोधनक बाद बेटी सेहो ऐमे शामिल अछि। स्त्री, माय वा विधवा अखनो ऐमे शामिल नहि अछि। बेकती विशेषक हिस्सा कोनो सदस्यक मृत्युसँ बेसी किंवा नव सन्तानक जन्मसँ कम भऽ सकैत अछि। संयुक्त परिवारक सम्पैतक विभाजनक बादे कोनो हिस्सेदार अपन हिस्सक सम्पूर्ण मालिक होइत अछि। संयुक्त परिवारक सम्पैत हिन्दू कानूनक उपज थिक एवम् एकर अधिकारीकेँ संदायदाता कहल जाइत अछि। सम्पैतक उत्तराधिकार कानूनमे बारम्बार प्रयुक्त कानूनी शब्दक सही समझ भेलासँ ऐ कानूनकेँ बुझबामे सुविधा हएत। अस्तु संक्षेपमे किछु शब्दक व्याख्या कऽ रहल छी। १. उत्ताराधिकारी (Hier) निर्वसीयत सम्पैतमे हकदार पुरुष वा स्त्रीकेँ उत्तराधिकारी कहल जाइत अछि। २. निर्वसीयत (Intestafe) स्वअर्जित सम्पैत किंवा अन्य कोनो प्रकारसँ प्राप्त सम्पैत जैपर ओइ बेकतीक पूर्ण अधिकार हो, केँ ओइ बेकतीक मृत्युक बाद हस्तांतरणक दस्ताबेजी बेवस्था जेना दान (Gift), इच्छा पत्र (Will) नहि केने हो। ३. संदायदाता सम्पैत (Coparcenary Property) पूर्वजसँ प्राप्त पैतृक सम्पैत जैपर अविभाजित हिन्दू परिवारक संदायदाताक हिस्सा हो। ४. दस्ताबेजी हस्तांतरण (Testamentary Disposition) ऐमे हस्तांतरणकर्ताकेँ ओकर जीवन भरि सम्पैतपर अधिकार बनल रहैत अछि एवम् ओकर मृत्युक बाद ओइ दस्ताबेजी बेवस्थाक अनुसार सम्पैतक हस्तांतरण होइत अछि, जेना दानमे देल गेल सम्पैत। सन् १९३७ सँ पूर्व स्त्रीगणक सम्पैतमे अधिकारक सम्बन्धमे कोनो स्पष्ट बेवस्था नहि छल। ऐ तरहक विवाद भेलापर स्थानीय परम्पराक अनुसार मामला तँइ होइत छल। सन् १९३७ मे पहिल बेर हिन्दू महिलाक सम्पैतमे अधिकार कानूनन लागू भेल। ऐ कानून द्वारा विधवाकेँ ओकर पतिक सम्पैतमे सीमित अधिकार देल गेल। सन् १९३८ क संशोधन द्वारा ओइ सीमित अधिकारकेँ आओर क्षीण करैत कृषि भूमिसँ विधवाक अधिकार समाप्त कए देल गेल। ऐ कानूनक अनुसार विधवा संयुक्त परिवारक सम्पैतमे अपन पतिक हिस्साक मालिक तँ भऽ जाएत मुदा ओकर मृत्युक बाद ई सम्पैत ओकर उत्तराधिकारीकेँ नहि हेतैक, अपितु अन्तिम पुरुष मालिकवा स्त्रीधनक मामलामे अन्तिम महिला मालिकक उत्ताधिकारीकेँ हस्तान्तरित भऽ जाएत। सन् १९३७क कानून द्वारा सीमित अधिकारक धारणामे हिन्दू उत्तराधिकार कानून १९५६ द्वारा समाप्त कए देल गेल। सम्पैतमे हिन्दू महिलाक अधिकारक क्षेत्रमे ई एकटा प्रगति गामी प्रयास छल। ऐ कानूनकेँ लागू भेलापर हिन्दू महिलाकेँ ओकर सम्पैतमे पूर्ण स्वामित्व प्राप्त भेल। उपरोक्त कानूनकेँ धारा १४ द्वारा महिलाक सम्पैतमे पूर्ण अधिकारक अयोग्यता समाप्त कए देल गेल एवम् ओकर सीमित अधिकारकेँ पूर्णत: मालिकाना हकमे बदैल गेल गेल। कानूनमे उपरोक्त परिवर्तन भूतप्रभावी भेल। एवम् प्रकारेण हिन्दू महिलाक सम्पैतमे अधिकारसँ सम्बन्धित विद्यमान समस्त, नियम, कानून ओ परंपराकेँ समाप्त कए ई सुनिश्चित कएल गेल जे कोनो प्रकारक परंपरा, वा बेवहारिक अवधारणाक कारण सम्पैतमे हुनकर अधिकारपर ग्रहण नहि लगौल जा सकत। हिन्दू उत्तराधिकार कानून १५५६ मूलत: हिन्दूक निर्वसीयत सम्पैतमे उत्तराधिकार तय करबाक हेतु भारतीय संसद द्वारा पारित भेलाक बाद १७ जून १९५६ क राष्ट्रपतिक स्वीकृतिक बाद लागू भेल। निर्वसीयत सम्पैतक माने ओइ सम्पैतसँ अछि जेकर मालिक सम्पैतमे पूर्ण अधिकारक अछैत कोनो दस्ताबेजी हस्तान्तरण बिना केने स्वर्गवासी भऽ जाइत छैथ। एहेन सम्पैत उपरोक्त कानूनक सूचीमे वर्ग एफमे देल गेल उत्तराधिकारी (माने बेटा, बेटी, विधवा पत्नी, माय एवम् ऐ वर्गमे उल्लिखित अन्य बेकती) मे बरोबरि-बरोबरि कऽ बाँटल जाएत। वर्गक एकक उत्तराधिकारीक अभावमे वर्ग दू, तेकरो अभावमे क्रमश: मृतकक पुरुष रक्त सम्बन्धी अन्यथा महिला रक्त सम्बन्धी (Cognate) केँ ओ सम्पैतक अधिकार भऽ जाइत अछि। ऐ तरहेँ हिन्दू महिलाकेँ प्राप्त सम्पैतपर (उपरोक्त कानूनक धारा १४क अनुसार) पूर्ण अधिकार भऽ जाइत अछि। एवम् प्रकारेण प्राप्त सम्पैत महिला द्वारा निर्वसियत रहि गेलापर उपरोक्त कानूनक धारा १५ एवम् १६ द्वारा हस्तान्तरित होइत अछि। जइमे ओकर बेटा एवम् बेटी एवम् पतिकेँ बरोबरि-बरोबरि हक भेटैत अछि। उपरोक्त कानूनक धारा १४ हिन्दू महिलाक सम्पैतमे सीमित अधिकारकेँ पूर्ण अधिकारमे परिवर्तित करैत अछि। पतिसँ प्राप्त सम्पैतकेँ बेचि सकैत अछि आ क्रेताकेँ ओइ सम्पैतमे पूर्ण स्वामित्व प्राप्त भऽ जाइत अछि। पहिने ओ सम्पैतकेँ मात्र परिवारिक आवश्यकता एवम् पतिक धार्मिक अनुष्ठानक हेतु बेचि सकैत छल। धारा १४ मे सम्पैतक विस्तारसँ व्याख्या भेल अछि। ऐमे उत्तराधिकार, परिवारिक विभाजन उपहार किंवा कोनो प्रकारसँ प्राप्त चल एवम् अचल सम्पैत शामिल अछि। बिना वसीयतक मृत्यु भेलापर ऐ कानून द्वारा बेटाक माय, अतिरिक्त विधवा, बेटीकेँ संयुक्त परिवारक सम्पैतमे अधिकार प्राप्त भेल। यद्यपि १९५६क कानून द्वारा हिन्दू महिलाक सम्पैतक अधिकारमे निश्चित रूपसँ बढ़ोत्तरी भेल आ ऐ तरहेँ कहल जाए तँ ई एकटा क्रान्तिकारी प्रयास छल,मुदा बेटीक मामलामे ई कानून बहुत हितकारी नहि छल। किछु राज्य ऐ विषयमे अलग कानून बना कऽ बेटीक अधिकार देलक मुदा ई सर्वव्यापी तँ नहियेँ छल। हिन्दू उत्तराधिकार कानून १९५६क पत्रमे संशोधन कएल गेल। उपरोक्त संशोधन बिल संसदमे २० दिसम्बर २००४ क मानल गेल छल, तँए ऐ तिथिसँ पूर्व भेल बँटवारापर ऐ संशोधनक प्रभाव नहि पड़त। हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून २००५क अनुसार बेटीकेँ पिताक सम्पैतमे बेटा जकाँ बरोबरिक हिस्सा हएत, माइक सम्पैतमे सेहो हिस्सा हएत। उपरोक्त संशोधनसँ निम्नलिखित बेवस्था भेल- १. बेटा जकाँ बेटी संयुक्त परिवारक सम्पैतक हिस्सेदारी हएत। २. ओकर अधिकार ओहिना हएत जेना बेटा भेने रहैत। ३. बेटे जकाँ बेटियोकेँ ओइ सम्पैतसँ जुड़ल जिम्मेदारी हएत। ४. बेटोक बरोबरि बेटीक हिस्सा तय हएत। हिन्दू उत्तराधिकार कानूनमे २००५क संशोधनक बाद पैतृक। संयुक्त परिवारक सम्पैतक बँटवारा एवम् ओइमे बेटी सबहक हिस्सेदारी लऽ कऽ यत्र-तत्र जबरदस्त विवाद प्रारम्भ भेल। कारण कानूनसँ अधिकार भेटलाक बाबजूद एकर समाजिक स्वीकृतिमे प्रश्नचिन्ह लागल रहल। नैहरसँ सम्बन्ध खराप नहि हो, तँए केतेको बेटी अपन अधिकारक बलिदान कए देलैन, मुदा एहनो बहुत रास मामिला उठल, जे बेटी सभ अपन अधिकारक बहाली हेतु न्यायालयक शरणमे चलि गेली। न्यायालयमे मामिला जेबाक कएटा कारण छल। कियो कहलक जे सन २००५क कानूनी संशोधनक लाभ ९ सितम्बर २००५ क बाद जन्मल कन्याकेँ भेटतै। केकरो अनुसार ई कानून १९५६ सँ लागू हएत। आदि आदि। देशक विभिन्न उच्च न्यायालय उपरोक्त विवादस्पद विषय सभपर अलग-अलग फैसला देलक। अन्ततोगत्वा ई मामला भारतक उच्चतम न्यायालयमे पहुँच गेल। उच्चतम न्यायालयक न्यायमूर्ति ए.आर.दवे एवम् न्यायमूर्ति ए.के. गोयलक संयुक्त पीठ १६ अक्टूबर २०१५क अपन फैसलामे उत्तराधिकार कानून उपरोक्त विवादक पटाक्षेप करैत कर्णटक उच्च न्यायालयक फैसलाकेँ पलैट देलक। कर्णाटक उच्च न्यायालय फैसला देने छल जँ पिताक देहान्त ९ सितम्बर २००५ सँ पहिने भऽ गेल तखनो बेटीकेँ ओकर सम्पैतमे बेटाक बरोबरिक हिस्सा भेटत। मुदा उच्चतम न्यायालय एकरा पूर्णत: निरस्त कए देलक। प्रकाश एवम् अन्य बनाम फुलवती एवम् अन्यक मामलामे उच्चतम न्यायालय बेवस्था देलक जे उत्तराधिकार कानूनमे २००५क संशोधन भूतप्रभावी नहि अछि। ओ कानूनमे उपरोक्त संशोधन लागू हएत वशर्ते ओइ दिन पिता ओ पुत्री दुनू जीबैत रहल हो। १६ अक्टूबर २०१५ केँ उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रकाश एवम् अन्य बनाम फुलवती एवम् अन्यक मामलाकेँ मूल निर्णय बिन्दु छल जे २००५ क सम्पैतमे अधिकारक कानूनक संशोधन भूतप्रभावी अछि की नहि? वंशकेँ विभिन्न उच्च न्यायालय ऐ विषय परस्पर विरोधी एवम् भिन्न-भिन्न मत व्यक्त केने छल। ऐ मामलामे फुलवती उत्तराधिकारमे ओकर पिता द्वारा प्राप्त संम्पैतमे १/७ म हिस्साक मांग केने छल। १८ फरवरी १९८८क अन्दर पिताक देहान्त भऽ गेल। न्यायालयमे विचाराधीन मामलामे संशोधन करैत फुलवती संशोधित कानूनक अनुसार पिताक सम्पैतमे हिस्साक मांग केलक। कर्णाटक उच्च न्यायालय निर्णय देलक जे चुकी मामला न्यायालयमे विचाराधीन छल, अस्तु ऐ कानूनकेँ आगूसँ लागू हेबाक बाबजूद, एकर लाभ फूलवतीकेँ भेटत। उच्च न्यायालयक ऐ फैसलाक चुनौती उच्चम न्यायालयमे कएल गेल- १. ऐमे फुलवतीकेँ हिस्सा मात्र पिताक स्वअर्जित सम्पैतमे हएत। २. फुलवतीक पिताक देहान्त २००५ क संशोधित कानून लागू हेबासँ पूर्व १८ फरवरी १९८८ क भऽ गेल, तँए फुलवतीकेँ ऐ कानूनकेँ लागू हेबाक समय पैतृक सम्पैत वारिस नहि मानल जा सकैत अछि। ३. संशोधित कानून ऐ मामलामे लागू नहि हएत। संशोधित कानून लागू हेबासँ पूर्व हिन्दू उत्तराधिकार कानूनक धारा ६ केर मुताबिक बेटीकेँ एहेन संम्पैतमे अधिकार नहि हएत। उच्चतम् न्यायालय अपन फैसलामे स्पष्ट केलक जे कानूनकेँ प्रथम दृष्ट्या पढ़लासँ स्पष्ट होइत अछि जे ई संशोधन कानून लागू हेबाक तिथिसँ लागू हएत,कारण ऐमे केतौ एहेन संकेत नहि अछि जइसँ एकरा भूतप्रभावी कएल जाए। अतएव संदायदाता सम्पैतमे बेटीक हिस्सा तखने भेटत जखन कि कानून लागू हेबाक दिन यानी ९ सितम्बर २००५ क पिता ओ पुत्री दुनू जीवित हो। अन्य प्रमुख न्यायिक फैसलामे उच्चतम न्यायायल द्वारा सन् २०१२ मे तय गंदूरी कोटेश्वरम्मा वनाम च्रकी यनादिमे कहल गेल जे- नव धारा ६ संयुक्त परिवारक सम्पैतमे ९ सितम्बर २००५ वा ओकर बाद पुरुष वा महिलाक अधिकारमे समानता अनलक अछि। ऐ कानून द्वारा बेटीकेँ पक्षमे ठोस केलक एकर बाद बेटी स्वयंमे बेटा जकाँ पैतृक सम्पैतमे हिस्सेदार बनल। एवम् प्रकारेण ९ सितम्बर २००५ सँ बेटी पैतिक सम्पैतमे बेटा जकाँ उत्तराधिकारी भेल एवम् ओकरा बराबर हक सेहो बेटल। उपरोक्त मामला नीचला आदालतमे विचारनीय रहिते २००५क संशोधन भेल। नीचला अदालत संशोधित कानूनकेँ लागू करैत बेटीक बेटाक बरबैर हिस्सा तय केलक जेकरा उच्च न्यायालय पलैट देलक। अन्ततोगत्वा मामला उच्चतम न्यायालय पहुँचल, जेतए बेटीक जीत भेल एवं बेटीकेँ बेटाक बरोवरि हिस्सा भेटल। सन् २००५क हिन्दू उत्तराधिकार कानूनमे संशोधनक बाद परिवारक बेटीकेँ पैतृक सम्पैतमे हिस्सेदारी तँ भेट गेल मुदा ओइ संशोधनक आधारपर प्राप्त अधिकारकेँ केतेको प्रकारसँ पास कए पुत्र लोकनि द्वारा चुनौती देल गेल। एकटा एहने मामलामे सुजाता शर्मा वनाम मनु गुप्ता एवम् अन्य,मे दिल्ली उच्च न्यायालय दिल्ली द्वारा बेवस्था देल गेल जे संयुक्त परिवारमे जँ बेटी सभसँ पैघ जीवित हिस्सेदार अछि तँ ओ कर्ता भऽ सकैत अछि। माननीय न्यायालयक कहब जे उपरोक्त संशोधित कानून बेटीकेँ ओ सभ कानूनी हक दऽ दैत अछि जे बेटाकेँ पहिनेसँ प्राप्त अछि। मा. उच्च्तम न्यायालय त्रिभुवन दस हरि भाई तामबोली वनाम गुजरात राजस्व अधिकरण एवम् अन्यक मामलामे निर्णय दऽ चूकल अछि जे संयुक्त परिवारक वरिष्ठतम सदस्य कर्ता हएत। अस्तु बेटकेँ कर्ता हेबाक क्रममे कोनो भांगठ नहि अछि। २००५ इस्वीक उत्तराधिकार कानूनमे संशोधनक उपरान्त यद्यपि बेटीकेँ पैत्रिक सम्पैतमे कानूनी अधिकार प्राप्त भऽ गेल अछि, मुदा समाजिक स्तरपर ओकर पुरजोर विरोध देखबामे अबैत अछि। हालत ओहिना अछि जेना दहेज विरोधी कानूनक अछि। कानूनक अछैत दहेज कोनो-ने-कोनो रूपे समस्त भारतमे चलिये रहल अछि। कानून ईहो अछि जे व्यस्क युवक, युवती स्वेच्छासँ विवाह कऽ सकै छैथ, मुदा केतेको ठाम एकर विरोध ऐ हद तक होइत अछि जे युगल जोड़ीक हत्या तक भऽ जाइत अछि। कहबाक माने जे कानूनमे बदलाव संगे समाजिक सोचमे परिवर्तन जरूरी अछि। जन जागरण जरूरी ऐ मानेमे महिला तखने अधिकार सम्पन्न भऽ सकै छैथ। जमीनक किछु समाजमे खास कऽ दिल्लीक किंवा आन-आन पैघ शहरक आसपासक क्षेत्रमे बहुत प्रमुखता अछि। जमीन परिवारक प्रतिष्ठासँ जुड़ल अछि। जमीनपर पुरुषक वचस्व् कम होइ, भाग्यक संगे ओहिनो एकर हिस्सेदार हो, ई बात लेाककेँ पचि नइ रहल अछि। जहिना प्रेमी लोकनिक खिलाफ खास पंचायत काज करैत अछि वएह हाल पैतृक सम्पैतमे अपन हिस्साक मांग केलापर बेटी सबहक भऽ रहल अछि। हुनकर गप छोड़ू, माय, बाप सेहो ओकर संग नहि दइ छैथ। एहन केतेको दृष्टान्त आएल अछि जे जमीनमे अपन हिस्साक मांग करिते बेटीक गाममे प्रवेशो कठिन भऽ जाइत अछि, भाय सभ गप छोड़ि दइ छै आ माय-बापक मुँह लटैक जाइत अछि, जे ओकर बेटी जमीनमे अपन हक मागि कऽ ओकर सबहक नाक कटा रहल अछि। बेटी अपन हक नहि माँगि सकय तइले केतेको पिता अपन जीबैत अपन सम्पैत पोता किंवा पुत्रकेँ हस्तान्तरित कऽ दइ छैथ। तेतबे नहि, भाय सभ दवाब बना कऽ बेटीसँ बहिनसँ ओइ सम्पैतसँ अपन अधिकार छोड़बाक हेतु राजीनामा लिखा लइ छैथ। सारांश जे कानूनसँ प्राप्त अधिकारकेँ समान देबए-मे पुरजोर विरोध कऽ रहल अछि। हुनका लोकनिक धारणा अछि जे बेटीक देल गेल दहेज उत्तराधिकारमे प्राप्त होमए-बला सम्पैतक एवजमे पर्याप्त क्षतिपूर्ति अछि। एक सर्वेक अनुसार मात्र १३% बेटी अपन पैत्रिक सम्पैतमे अधिकार लऽ पबै छैथ। सम्पूर्ण देशमे लागू २००५ क कानूनसँ पूर्व पाँच राज्य (ऑंन्ध प्रदेश, कर्णाटक, महाराष्ट्र, तामिलनाडू आ केरल)मे बेटीकेँ पैत्रिक सम्पैतमे पहिनेसँ अधिकार प्राप्त अछि। परिणामत: बिहार एवम् मध्य प्रदेशक तुलनामे आन्ध्र प्रदेशमे चारिगुणा अधिक महिलाकेँ उत्तराधिकारमे जमीन सम्पैत प्राप्त भेल। आन-आन राज्य सबहक तँ ई हाल अछि जे ६९% महिलाकेँ एहेन कोनो महिलाक जानकारी नहि छै जे ऐ कानूनसँ लाभान्वित होइत पैतृक सम्पैतमे हकदार भेल हो। जेकरा केकरो ऐ कानूनक जानकारी छैहो, सेहो जमीन-जायदादमे अपन हक नहि मंगै छैथ। भारत वर्षमे दुर्गाकरूपमे स्त्री शक्तिकेँ सम्मानित कएल गेल अछि। जगत जननीक रूपमे हुनकर आराधना कएल जाइत अछि। सत्य ई अछि जे प्रायेक बेटी काल्हि जा कऽ माय बनैत अछि ओहि रूपमे ओ ओहि परिवारक सृजन करैत अछि, पालन करैत अछि, पल प्रतिपल रक्षा करैत अछि। हमर संस्कृति इतिहासक कोन कोनामे जा कऽ पुरुष वर्चस्वक प्रधानताक स्वीकार करैत स्त्रीणकेँ द्वेमदर्जा स्वीकार केलक, ई कएटा दुखद एवम् विचारणीय प्रसंग अछि। मुदा देरियेसँ सही, समाज जागि जाएत से उमेद अछि आ कानून द्वारा देल पैतृक सम्पैतमे उत्तराधिकारक सहर्ष पालन भऽ सकत। यत्र नारी पुज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता। उक्ति तखने सार्थक भऽ सकत। ६/४/२०१७ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नन्द विलास राय- दूटा लघु कथा हमर पत्नीक मनोरथ हम निर्मलीमे डाक्टर रमेश बाबूक क्लिनिकपर बैसल रही। डाक्टर साहैब कोठरीमे रोगी सभकेँ जाँच कऽ रहल छला। कोठरीक आगाँ राजदेव बाबू, रामविलास बाबू आ हम बैस कऽ मैथिली साहित्यपर चर्चाकऽ रहल छेलौं कि हमर मोबाइलक घन्टी बजल। जेबीसँ मोबाइल निकालि नम्बर देखलौं तँ मालूम भेल हमर पत्नीक फोन छी। हम मने-मन भनभनेलौं- “आबि गेल आफत...!” एक मन भेल जे फोन काटि दी, फेर मन भेल जे रिसिभे ने करी। मुदा डर ईहो रहए जे जँ फोन रिसिभ नै करब तँ गामपर पहुँचते देरी महाभारत शुरू भऽ जाएत आ रातिमे फेरो मच्छर सभकेँ हमर भरपूर खून पीबाक अवसर भेट जेतइ। यौ बाबू की करितौं हारि कऽ मोबाइलक हरियरका बटम टीपैत बजलौं- “हेलौ, की कहै छी?” ओम्हरसँ पत्नीक अवाज आएल- “फोन किए ने उठबैत रहिऐ। की करै छेलिऐ?” बजलौं- “फोन तँ उठेबे केलौं, हँ! पहिलुक घन्टीपर नहि उठा चारिम घन्टीपर उठेलौं। अच्छा कहू की हुकुम?” ओम्हरसँ पत्नी बजली- “दूटा ब्रेड पकौड़ा नेने आएब। आ हँ, पोलीथीनमे चटनी सेहो लऽ लेब।” कहलयैन- “ब्रेड पकौड़ा तँ गरमे खाइमे नीक लगै छै, ढंढामे तँ कोनो सुआदे ने बुझाएत।” ओ बजली- “अहाँ नेने आउ ने चूल्ही पजारि हम ताबापर सेक लेब।” ई कहि ओ फोन काटि देली। हमर मुँह लटैक गेल। किए तँ जेबीमे एकोटा छेदामो ने रहए। बीसटा टका जे रखने रही ओ साइकिलक ट्यूब पंचरमे खर्च भऽ गेल रहए। सोचमे पड़ि गेलौं। सोची केकरासँ मुँह छोड़ी। जं केकरोसँ मुँह छोड़ी आजँ पाइ नै देत तब तँ अपनेसनक मुँह हएत आ तनावसँ बढ़ि जाएत। फेर सोची जँ पत्नीक फरमाइस पूरा कऽ कऽ गामपर नै जाएब तँ रातिमे फेरो दलानेपर सूतए पड़त आ सूतब की कपार, भरि राति मच्दर हौंकैत परात करए पड़त। हमरा दस बर्खक पहिलुका घटना मोन पड़ि गेल। निर्मलीमे सर्कस आएल रहइ। गामक जनीजाति सभ सर्कस देखबाक प्रोग्राम बनौलैन। हुनका सबहकप्रोगाम सौंझुका 6 बजसे 9 बजेक शो देखबाक छेलैन। मुदा गामपर सँ विदा हेती दुइये बजे, किएक तँ पहिने जेती तखन बजारमेमे अल्ता, टिकुली, लिपिस्टिक स्नो-पोडर, पवन टोकी कानमेहक, नाकमेहक आ केशमेहक कीनती...। हमरो पत्नीकेँ मालूम भेलैन। ओ जलखैये करैकाल हमरा कहली- “यौ सुनै छिऐ?” हम कहलयैन- “कोनो कि कानमे ठेकी नेने छी जे नै सुनब। बाजू ने की कहै छी?” तैपर पत्नी बजली- “अँइ यौ, दारू पीब कऽ आएल छी की जे एना बजै छी?” हम कहलयैन- “से दिन कहिया हेतै जे पुतोहु कहत ..... । ऐठाम तँ चाह पीबैले पाइयेने अछि आ अहाँकेँ दारू सुझैत अछि! कहू ने की कहै छी।” पत्नी बजली- “गामक लोक सभ सर्कस देखैले जाइत अछि।” तैपर बजलौं- “ऐमे की लगै छइ। पच्चीस टका टिकटमे आ पच्चीस टकाक चाह-नाश्ता। पच्चीस टकाक व्योंत करि लिअ। नइ होइए तँ तीन किलो चीकने बान्हि लेब। ओकरा पल्लपर बेच लेब, पाइ भऽ जाएत।” ई बात सुनिते-देरी पत्नीक पारा चढ़ि गेलैन। ओ तामसे भेर भऽ गेली। बजली- “अँइ! हम चिकना लऽ कऽ सर्कस देखए जाएब! नै जाएब! हमर कपारे जरल अछि जे अहाँ संग बिआहभेल। ने कहियो सिनेमा आ ने कहियो सर्कस देखेलौं। ने स्नो, ने पाउडर, ने नाकमेहक, ने कानमेहक, ने काजर, ने ठोर रंगा, ने सेनुर आ ने टिकुली कहियो अहाँकेँ जुड़ल। अहीठाम मैलावाली छै, अेकर दुल्हा ओकरा रंग-रंगक साबुन, तेल आ सिंगारक चीज-वौस आनि-आनि दइ छइ। जखनी घर बलाकेँ जे कहलक तखनी घरबला हजूरमे रहै छइ। की हमरा कोनो मनोरथ नै छइ। अहाँबुते कहियो हमर कोनो मनोरथ पुरा भेल।” ई कहैत ओ कानए लगली। हम छगुन्तामे पड़ि गेलौं। हम कहलयैन- “मैलाववालीक घरबला मास्टरी करै छइ। तीस-पैंतीस हजार टका महिना कमाइ छै, आ अहाँक घरबला कएटा पाइ कमाइए। अच्छा हमहीं दोकानसँ चिकना बेच कऽ आनि दइ छी, अहाँ सर्कस देख आएब।” तैपर पत्नी बजली- “निर्मलीबजार जाएबतँ सर्कसेटा देखब आकि किछु सिंगारो-पेटारोक चीज कीनब। हमरा कमतीमे दू साए टका चाही।” हम कहलयैन- “अहीं कहू जे अखन हाथमे एकोटा टका नै अछि तखन दू साए टका केतएसँ देब। के देत दू साए टका। जहिया पाइक ओरियान हएत तहिया निर्मली जा कऽ सिंगारक समान लऽ आनब। आइ सर्कसटा देख आबू। हम दोकानसँ चिकना बेचि पच्चीसटा टका आनि दइ छी।” तैपर पत्नी बजली- “हम जाएब तँ दू साए टका लऽ कऽ नहि तँ नै जाएब।” हम केतेको गोरेसँ दू साए टका मंगलौं मुदा कियो ने देलक। दोकानमे चिकना बेच पच्चास टका आनि पत्नीकेँ देलिऐन तँ ओ ढौआकेँ फेक देलक आ बाजल- “दू बजे लोक सभ सर्कस देखए विदा हएत। अहाँ जँ दू बजे तक दू साए टका आनि कऽ देब तब तँ बड्ड बढ़ियाँ नै तँ अहाँ जानी आ आ अहाँक काज जानए।” हम बड्ड परियास केलौं मुदा कियो मुँहपर माछी नै बैसए देलक। पत्नीक तुगलका फरमान हमरा बुत्ते पूरा कएल नै भेल। स्नान कऽ खेनाइ खा मैलामवाली लग गेलौं आ कहलयैन- “भौजी दू साए टकाक व्योँत कऽ दिअ। बड्ड जरूरी अछि।” तैपर मैलामवाली कहली- “हमरा लग पाँचे साए टका अछि आ निर्मली सर्कस देखए जाइ छी। बजारमे चूड़ी पहिरब आ किछु सिंगारक समान सेहो कीनब। हमरा तँ पाँच साए टकासँ पारो ने लागत तँ अहाँकेँ केना देब।” हम अपन सनक मुँह लऽ कऽ अँगना एलौं आ बोलीमे हजार मन मिश्री घोरैत पत्नीक हाथ अपना हाथमे लऽ कऽ कहलिऐ- “हे समूचा गाम घूमि एलौं मुदा कियो टका नै देलक। केकरा-केकरा लग ने मुँह छोड़लौं मुदा कियो मुँहपर माछी नइ बैसए देलक। से नै तँ अहाँ ई पच्चास टका लऽ कऽ सर्कस देख आउ, जखन पाइक व्योँत भऽ जाएत तँ दुनू गोरे फेर निर्मली चलब, सिनेमा देखब आ अहाँसिंगारोक समान कीनि लेब।” तैपर पत्नी हमर हाथ अपना हाथसँ झटकैत बजली- “ईह! बेदरा जकाँ हमर परताए एला हेन! जाउ राखु अपन पचसटकही। नै हम सर्कस देखै छी।” हम केतबो खुशामद केलिऐन मुदा ओ टस-सँ-मस नै भेली। आ ने सर्कसे देखए गेली। हमरो ब्लडपेसर बढ़ि गेल। मुदा दिमागकेँ स्थिर रखैत चौकपर चलि गेलौं। एक्केबेर आठ बजे रातिमे चौकपर सँ एलौं। अँगना गेलौं तँ चूल्हा-चौका सभ बन्न रहए आ पत्नी कोप भवनमे जा कऽ सूतल छेली। भीतरसँ बिलैया लगा नेने छली। हम केबाड़लग जा कऽ केतबो हाक देलिऐमुदा ने ओ केबाड़े खोलली आ ने किछु बजबे केलीह। सभसँ मोश्किल भेल जे रातिमे सूतब केतए। की करितौ हारि कऽ दलानपर जा अखड़े मोथीक पटियापर सूतलौं। सूतब की दैवक कपार भरि रातितौनीसँ मच्छर हौंकैत परात केलौं। मनमे पत्नीक प्रति पूरा रोष भऽ गेल रहए। सोचलौं ओ पत्नी की जे पतिक दुख नै बुझलक..! बिआहमे एकटा चरिआना भरि सोनाक औंठी देने रहए। वएह औंठी नरहिया बजारमे बन्हकी लगा दिल्ली विदा भऽ गेलौं। दिल्ली जा स्पोटमे पाँच हजार टका महिलापर काज पकड़लौं। आठ घन्टाक ड्यूटी रहए। चारि घन्टा ओभर टाइमो खटी। ख-पीब कऽ आ रूप भाउ़ा दऽ कऽ चारि हजार टका बँचैत रहए। छह मास धरि काज केला पछाइत लगधक पच्चीस हजार टका जमा भेल। एक दिन फोनसँ खबर भेल जे माए बीमार अछि। जँए छी तँए चलि जाउ। हम दिल्ली बजारमे पत्नी-ले ब्रेसिर, स्नो, पाउडर, लाहबला चूड़ी, रेाल्ड-गोल्ड नेकलस, कानक बाली, नाकमेहक नथिया, कानमेहक झुमका, गमकौआ साबून,ठोररंगा, पैररंगा आ लबन टोकी सभ सिंगारक चीज वौस कीनलौं। हँ, कपड़ा नै कीनने रही। किए तँ हमर कीनलाहाकपड़ा हमरा पत्नीकेँ पसिने नहि होइ छैन तँए सोचलौं दू हजार टका दऽ देबै अपन निर्मली जा शिव वस्त्रालयमे मनपसन्द कपड़ा कीनि लेती। एकटा अटैचीमे सभ समान राखि गाम विदा भेलौं। दरभंगावाली सुपर फास्ट ट्रेनमे बैसलौं। केतेको परियास केलाक बादो रिजर्वेशन नै भेल छल मुदा जेनरले बौगीमे खिड़की लग एकटा सीट भेट गेल रहए। अटैचीकेँ बर्थपर रखि चौकन्ना छेलौं जे कियो चोरा ने लिअए। भरि राति सुतबो ने केलौं। मुदा बनारस अबैत-अबैत आँखि लगि गेल। सपनामे देखलिऐ हमर पत्नी अपना आँगनमे सभ चीज-वौस रखि निहारि रहली अछि। ओ बड्ड खुश अछि। हमर हाथ अपना हाथमे रखैत बाजि रहल अछि- आइ हमर मनोरथ पूरा भऽ गेल। नीन टुटल तँ देखलिऐ एकटा बीस-बाइस बर्खक अति सुन्नैर लड़की हमरा कहि रहल छेली- कनेक हमरो बैसऽ दिअ प्लीज। हम पहिने अटैचीदिस देखलौं तँ ओ सुरक्षित बुझि पड़ल। तेकर बाद ओइ लड़की दिस धियानसँ देखलौं तँ ओ कोनो फिल्मी दुनियाँक हीरोइन जकाँ बुझि पड़ली। ताबेमे ओ लड़की फेर बाजल- “प्लीज कनेके खिसकु ने।” ओ गजब सुन्नैर छेली। अपना आपकेँ भाग्यशाली बुझैत हम खिसैक गेलौं। ओ लउ़की बैस गेली। भाग्यशाली ई बुझलौं जे एहेन दिव्य नवयौवना हमरा लगमे बैसली। हुनका शरीरसँ मधुर-मधुर सुगन्ध हमरा मदहोश करए लगल। ओ लउ़की पर्स खोललक आ एकटा पत्रिका निकालि पढ़ए लगल। हमर आँखि हुनकर सुन्दरता निहारएलगल। एकदम गोर वर्ण, भरल-पूरल देह। सेव जकाँगाल। हिरण जकाँ कजरारी आँखि। नागिनसन केश जे खुजले छल, कानमे तीन स्टेपबला झुमका,नाकमे हीरा जड़ल छक, समतोलाक फारा सन ठोर जैपर हल्का लाल रंगक लिपिस्टिक लागल। बिल्कुल पारदर्शी साड़ी आ ब्लौज पहिरने। साड़ीक भीतरसँ पेटीकोट आ ब्लौजक भीरसँ अधोवस्त्र पहिरने छेली से झलाक-झलाक देखाइत। पैरमे जे मेहदी(आरत)लगौने रहए ओ ओकरा पैरकसुन्दरतामेचारिचान लगबैत रहइ। ब्लौज तेतेककसल जे ओकर जवानीक छातीक एक चौथाइभागबाहरे। जेना देखनिहारकेँ जवानीक टेलर देखबैत...। हम ओइ लड़कीसँ पुछलिऐ- “ट्रेन केतए पहुँचल अछि?” ओ लड़की जवाब देलक- “मुजफ्फरपुरसँ आगाँ निकैल गेल अछि। केतए उतरब।” हमरा मुहसँ अनायास निकैल गेल- “दरभंगा।” तैपर ओ बजली- “हमहूँ दरभंगे उतरब। अहाँ दिल्लीसँ अबै छी की?” ओ फेर पुछलक। हमरा फेर बजा गेल- “हँ दिल्लीसँ अबै छी।” ई कहैत हम खिड़कीसँबाहर मकइकेँ फसल देखए लगलौं। ओ लड़की हमरा देहमे सटि गेली। हमरा जेना 440 वोल्ट बिजलीक झटा लगल, तहिना बुझना गेल। मुदा डरो हुअए तँए कनी अपनाकेँ सिकोररि लेलौं आ थोड़े ओइ लड़कीसँदेह अलग कऽ लेलौं। सोचलौं की जानि की भऽ जाए, किएक तँ कहल गेल छै-‘त्रियाचत्रिम् देवो ने जानए..।’ बजलौं- “मेडब कनेक हटिये कऽ बैसू।” ओ लड़की हमरा दिस तकैत बजली- “की यौ बिआह भेल अछि की नहि।” हम सोचलौं, लड़की ई गप किए पुछैए! कहलिऐ- “हँ बिआह तँ भऽ गेल अछि।” ओ फेर पुछलक- “बाल-बच्चा अछि की?” हमरा बजा गेल- “हँ एकटा बेटीअछि।” तैपर ओ पुछलक- “अपन छी की अनकर?” आब तँ बुझू जे हमरा रिश उठि गेल। मनमे बहुत बात आएल। मुदा डर हुअए जे किछु ऊँच-नीच गप बजा गेल आ जँ ई लड़की कोनो अबलट लगा दिए तखन तँ बड़का पहिपैटमे पड़ि जाएब आ सभ प्रतिष्ठा माटिमे चलि जाएत। मुदा तैयो हम पुछलिऐ- “मेडम एना किए बजै छिऐ।” तैपर ओ कहलक- “अहॉंकेँ देखै छी जे मौगीक महक लगैए। पत्नियोँ हेती तं हमरासँ सुन्नैर तँ नहियेँ हेती।” हम सकदम्म भऽ गेलौं। फेर वएह पुछलक- “आकि अहाँक बिआह हेमामालिनीक बहिनसँ भेल अछि?” हम बजलौं- “नइ जानि मेडम किएक अहाँ हमरा एहेन-एहेन बात कहै छी।” तैपर ओ लड़की बजली- “अच्छा छोड़ू ऐ बात सभकेँ आरामसँ चलू।” ई कहि ओ फेर हमरा देहसँ सटि गेल। डर तँ हेबे करए मुदा अपना-आपकेँ बड्ड सौभाग्यशाली सेहो बुझै रही जे एहेन दिव्य लड़कीक सानिध्य प्राप्त भऽ रहल अछि। थोड़ेकालक बाद ओ लड़की अपन हाथक पत्रिका हमरा दैत बजली- “लिअ पढू अहाँ बोर भऽ रहल छी।” हम पत्रिका पकड़ैत पुछलिऐ- “आ अहाँ?” जवाब देली- “हम गृहशोभा पढ़ै छी। हम पत्रिकाक पन्ना उलटाबए लगलौं। पत्रिकामे नीक-नीक लड़की सबहक अर्द्धनग्न फोटोसभ रहए। एकटा कथा रहै- लबली हेमा। कथा बड्ड रामोन्टिक रहए। हम ओइ कथामे हेरा गेलौं। ताबेमे ट्रेन समस्तीपुर टीशनपर पहुँच गेल छल। ट्रेन रूकल। एकटा चाहबला हमरा वौगीमे चए़ि अवाज देलक- “चाह गरम! गरम चाह..!” ओ लउ़की चाहबला दिस तकैत बजली- “ऐ चाहबला दो कप चाह देना।” हम मने-मन सोची जे दू कप चाह कीकरती। फेर मनमे भेल जे भऽ सकैए जे एक कप चाहसँ छाँक नै भरैत होइ। चाहबला दू कप चाह ओइ लड़कीकेँ पकड़ा देलकै। एकटा कम हमरा दिस बढ़बैत ओ लड़की बजली- “लिअ चाह पीबू। एतेक भीड़मे अहाँ अपना दिक्कत सहि हमरा जगह देलौं।” हम कहलिऐ- “धन्यवाद। अहाँ पीबू हम चाहबलासँ लऽ लइ छी।” तैपर ओ बजली- “यौ अहाँ हमर पाइक चाह नै पीयब तँ अहीं दियौ ढौआ, हमहीं अहाँ पाइक चाह पीब। अहाँ ने छुबा जाएब मुदा हम नै छुबाएब।” हम ओइ लड़कीक हाथसँ चाह पकड़ैत जेबीसँ दसटककी निकालि चाहबला दिस बढ़ा देलिऐ। ओ लड़की अपना पर्ससँ चारिटा मोट-मोट बिस्कुट निकालि दूटा बिस्कुट हमरा दिस बढ़बैत बाजल- “लिअ बिस्कुटक संग चाहक मजा लिअ।” हम कहलिऐ- “धन्यवाद। अहाँ खाउ।” तैपर ओ बाजल- “की होइए जे ई छौरी बिस्कुट खिया कऽ सभटा ढौआ-कौरी छीनि लेत। यौ हम एहेन नइ छी। हम मिथिला विश्वविद्यालयमे गृह विज्ञानक पी.जी फाइनलक छात्रा छी।” की करितौं। ओकरा हाथसँ बिस्कुट लऽ चाहमे डुबा-डुबा खाए लगलौं। बिस्कुट खेलाक किछे मिनटमे हमरा नीन आबए लगल। आँखि खुजल तँ लहेरियासराय अस्पतालमे बेडपर पड़ल रही। एकटा नर्स हमरा मुँहपर पानिक छीटा मारैत रहए। ने ट्रेन रहए आ ने ओ लड़की। हमरा चीज-वौससँ भरल अपन अटैची मोन पड़ल। हम बजलौं- “हमर अटैची?” तैपर ओ नर्स बजली- “आपको दरभंगा रेलबे स्टेशपर बेहोशी की हालत में उतारा गया है। पूरा बौगी खाली था। आप अपने सीटपर बिल्कुल बेहोश थे। चाह घन्टा उपचार के बाद आपको होश आया है।” हम अपन जीन्स पैन्टक जेबी टटौललौं तँ ढौआबला पर्स गायब रहए। हम बजलौं- “हाय रे हमर पत्नीक मनोरथ।” ई कहैत हम फेर बेहोश भऽ गेलौं। ◌ शब्द संख्या : 2077 25.03.2017 चरित्तर कक्काक ब्लडपेसर चरित्तर काकासँ भेँट करैले मन औनाइत रहए। हुनका भेँट भेना एक माससँ बेसीए भऽ गेल छल। किएक तँ हमहूँ धनकटनी आ गहुम बाउग करबामे व्यस्त छेलौं। गहुम बाउगसँ फुरसत भेटल तँ नारक टाल लगाएब, धान दौनी कराएब, एकटा ने एकटा काज लगले रहल। दौन-दौगोनी होइत-होइत गहुम पटबै-जोकर भऽ गेल। यौ बाबू किसानी जीवनमे बड्ड भीर। एकटा-ने-एकटा काज लगले रहत। आ जँ ओ काज समयपर नै करब तँ हानि छोड़ि लाभ नै हएत। मुदा मुदा नोकरी करैबलाकेँ से बात नहि। तइमे सरकारी नोकरी करनिहारक तँ बुझू पाँचो आँगुर घीयेमे। आगि लागौ चाहे पाथर खसौ समयपर दरमाहा भेटबे करतै आ ऊपरका आमदनी अलगसँ। ने हर-हर आ ने खट-खट। देखै नै छिऐ प्रो. वीरेन्द्र बाबूकेँ केहेन मोछमे घी लगबै छथिन। एगारह बजे दिनमे महाविद्यालय जाइ छथिन आ तीन बजे बेरमे आपस आबि जाइ छथिन आ दरमाहा केतेक भेटै छैन...। खाएर छोड़ू ऐ बातकेँ...। हम आ चरित्तर कक्काक बेटा विमल लंगोटिया संगी।पहलासँ बी.ए. धरि संगे पढ़लौं। ओ कलकत्तासँ बी.एड. कऽ लेलक तँए उच्च विद्यालयमे शिक्षकक पदपर नोकरी करै छैथ आ हम कोनो प्रशिक्षण नै प्राप्त केलौं तँए खेती-गिरहस्ती कऽ अपन जिनगीक गाड़ी खींच रहल छी। ओना, नोकरी-ले हमहूँ परियास कम नहि केलौं,मुदा ऐ युगमे भगवान भेटब असान अछि जखनकि नोकरी भेटब कठिन। 29 दिसम्बरकेँ जखन गहुम पटबैत रही, फोचाइ कहलक जे चरित्तर काका बेमार पड़ि गेला हेन। ब्लड पेसर बढ़ि गेल छैन। जखनेसँ कक्काक बेमारीक बात सुनलौं हुनकासँ भेँट करैले मन कछमछ करए लगल। कछमछाइत मनमे उठल- चरित्तर काका मेहनती किसान छैथ। कन्हपर कोदारि आ हाथमे खुरपी रहबे करै छैन। जीर-मरीच आ नोनक अलाबे खाइ-पीबैक कोनो वस्तु नै कीनए पड़ै छैन। कहियो ने सुनने रहिऐ जे चरित्तर काकाकेँ माथो दुखाएल हेतैन। फेर ब्लड पेसर किएक बढ़ि गेलैन? विहाने भेने सुति उठि कऽ चरित्तर काकासँ भेँट करए लेल विदा भेलौं। रस्तेमे नित्यक्रियासँ निवृत्त भेलौं। कक्काक घर हमरा घरसँ लगधक डेढ़ किलोमीटरपर। हमर घर गामक दछिनवरिया टोलमे सभसँ दच्छिन आ हुनकर घर उतरवरिया टोलमे सभसँ उत्तर छैन। चरित्तर काका दलापरचौकपर कम्मल ओढ़ि कऽ बैसल रहैथ। हम दलानक निच्चेसँकहलयैन- “काका गोड़ लगै छी।” काका बजला- “नीके रहह। आबह-आबह। केतए हेराएल छेलह हेन। एक-डेढ़ मासक वाद तोरासँ भेँट भेल हेन।” कहलयैन- “की कहब काका, एक्कोरत्ती फुरसत नइ भेटै छल। अहाँ तँ बुझिते छिऐ जे किसानक जिनगी केहेन होइ छइ। काल्हि गहुमक पहिल पटौनी समाप्त केलौं हेन। गहुमे पटबैतकाल फोचाइ कहलक जे काका बेमार भऽ गेला हेन। बुझू तखनेसँ अहाँक भेँट करैले मन कछमछ करै छइ। सुति उठि कऽ एमहरे विदा भऽ गेलौं।” काका बजला- “हँ, तेतेक ने टेंशन भऽ गेल अछि जे ब्लड पेसर बढ़ि गेल। आठम दिन डाक्टर रमेश जँचने रहए। कहलक जे नीचलका साए आ ऊपरका एकसाए साठि भऽ गेल अछि। दवाइ खाइ छी। काल्हि जँचबैलौं तँ कहलक आब ठीक अछि। तैयो परहेजसँ रहैले कहलक हेन। ठीक रहितो ऐ बेमरीमे दवाइ सभ दिन चलिते रहत सेहो कहलक। ठंढासँ बँचि कऽ रहैले कहलक हेन। भात आ नोन कम खाइले कहलक हेन।” हम सभ गप करिते रही ताबेमे चरित्तर कक्काक पोती दूटा प्लेटम चारि-चारिटा नमकीन बिस्कुट आ दूटा कपमे चाह दऽ गेल। काका पुछलैन- “पानियोँ पीबह?” कहलयैन- “हँ काका, पीब।” काका पोतीकेँ कहलखिन- “गइ रीना एकलोटा पानि आ एकटा गिलस नेने आ।” रीना एक लोटा जल आ एकटा गिलस राखि गेल। हम बिस्कुट खा जल पीब चाहक चुस्की लेबए लगलौं। चाहो पीबी आ कक्काकसँ गपो करी। हम पुछलयैन- “काका, ऐबेर गहुमक खेतीक केते केने छी?” तैपर काका जवाब देलैन- “एक्को धुर नहि।” कक्काक गप्पक हमरा कोनो अर्थे ने लगल। हम छगुन्तामे पड़ि गेलज्ञैं। सोचएलगलौं- काका जीवनी किसान छैथ। चारि-पाँच बिगहामे सभ साल गहुमक खेती करै छैथ। फेर एना किए बजला! पच्चीसे नवम्बरकेँ विमल चौकपर भेटल रहए तँ कहने छल जे आइए गहुमक बाउग समाप्त केलौं। तैपर हम पुछनौं रहिऐ जे केतेक खेतमे गहुम बाउग केलह अछि। तैपर विमल कहने रहए पँच बिगहामे। तैपर हम कहने रहिऐ-बड़ी अगता गहुम खेती मारि लेलह। तैपर विमल बाजल रहए- रौ मीत पाँचो बिगहा खेतमे क्रान्ति धान रोपने रही। नारेपर कटबा लेलौं। फारबला ट्रेक्टरसँ एक दिन पाँचो बबिगहा खेतकेँएक समार जोतबालेलौं आ पाँच दिन रौद लगला बाद छठम दिन खाद आ बीआ छीटबा कऽ रोटावेटरसँ एक चास करा देलौं। आब की कोनो हर-बरदसँ खेती होइए जे बेसी समय लगात। हम कहने रहिऐ- हँ से तँ ठीके कहै छीही। तोर खेतो सड़के कातमेछौ, तँए ट्रेक्टर जाइक सुविधा छौ आ छह-सात बिगहा खेतो एकेठाम छौ। विमल कहने रहए- हँ से तँ अछिए। एकेटा कमी अछि। बोरिंग नइ अछि। की करबै तीन-तीन ठाम लेअर जाँच करबौलिऐ मुदा 250-300 फीटसँ कमपर लेअरे ने भेटै छइ। हम कहने रहिऐ- तोहर खेत तँ बिहुलो धारसँ पटि जाइ छौ। बोरिंगक खगतो तँ नहियेँ छौ। विमल कहने रहए- हँ से तँ पटि जाइए। हमरा सोचमे डुमल देख चरित्तर काका टोकलैथ- “की सोचए लगलहक।” कहलयैन- “काका हमरा तँ अहाँ गपक कोनो अर्थे ने लागल। 25 नवम्बरकेँ विमल भाय कहने छला जे आइए पाँच बिगहा गहुम बाउग कऽ निचेन भेलौं हेन। ओ किए झूठ बाजल?” तैपर काका बजला- “ने विमले झूठ बाजल आ ने हमहीं गलत कहै छिअह।” कक्काक बात सुनि हम आरो ओझरीमे पड़ि गेलौं। गपक कोनेा भाँजे ने लागए। कहलयैन- “काका, अहाँ की कहै छिऐ से तँ हमरा भाँजे ने लगैए।” काका समझबैत बजला- “सुनह, गहुम ठीके पाँचबिगहामे बाउग केने छी। ओहो 25 नवम्बरकेँ। तोरा तँ बुझले छह जे गहुमक फसिलमे बाउग केलाक बीसम दिनसँ लऽ कऽ पच्चीसम दिन धरि पहिल पटौनी कऽ देबाक चाही।नै तँ गहुमक गाछमे वृद्धि नै होइ छइ।” मुड़ी डोलबैत कहलयैन- “हँ, से तँ ठीके। नहि तँ आखिरी पच्चीसम दिन धरि पहिल पानि देब अनिवार्य अछि।” काका बिच्चेमे बजला- “ठीके कहलक। आब तोंही कहह जे हमरा गहुम बाउग केला पैंतीस दिन भऽ गेल हेन आ अखन धरि पटवन नै भेल। भेल एक्को धुर गहुम बाउग केनाइ? बुझह जे हाथो तरक गेल आ लाटो तरक गेल।” हम मुड़ी डोलबैत बजलौं- “से तँ ठीके कहै छिऐ। जँ गहुमक फसिलमे पटवन नै केलिऐ तब तँ सभ खर्चा आ मेहनत पानिमे चलि गेल। मुदा एना भेल किए?” तैपरकाका बजला- “सभ साल बहुल नदीसँ गहुमक पटवन भऽ जाइ छल। एमकी अगते बहुल धार सुखि गेल।” हम पुछलयैन- “एना किए भेल? एतेक अगता धार किए सुखि गेल।” काका बजला- “सुनै छिऐ गोठ नरहिया लग एन.एच. 104मे पुल बनि रहल छै, तँए पुलक ठिकेदार धारकेँ नरहियासँ एक किलोमीटर उत्तर बान्हि देलक। तँए पानि एनाइ बन्न भऽ गेल आ धार सुखिगेल।” हमरा चरित्तर कक्काक ब्लड पेसरक कारणक भाँज लागि गेल। समयपर गहुम नै पटलासँ कक्काक ब्लड पेसर बढ़ि गेल रहैन। हम खड़ा होइत बजलौं- “काका,जाइ छी। बड्ड काज अछि।” ई कहैत हम विदा भऽ गेलौं। ◌ शब्द संख्या : 1061 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल- तीन गोट लघु कथा अपन रोपल गाछी भुताहि रामनवमी दिनक बेरुका उखड़ाहाक पाँच बजेक समए। अनेको लॉडस्पीकरसँ सूर भरल गीत-नाद गाममे अनघोल केने...। कोनोसँ अवाज निकलै- ‘रामराजमे सभ बरबैर..!’ तँ कोनोसँ निकलै- ‘दैहिक-दैविक भौतिक ताप रामराजमे नहि रहि पबैत..!’ तँ कोनोसँ अवाज निकलै- ‘रघु कुल रीत सभ दिनसँ आएल, प्राण जाएत तँ जाएत मुदा वचन नहि जाएत..!’ अनघोल वातावरण रहने रघुवीर कक्काक मन सेहो घोर-घोर होइत रहैन। अपन साठि बर्खक बीतल जिनगी दिस नजैर देलैन। पाछू घुमिते अपन बाल-बोधक जिनगीक मिलल रूप–विद्यार्थी जीवन–होइत अपन चालीस बर्खक समाज सेवाक बीच जखन एलैन तँ मन ओझराए लगलैन। अनेको प्रश्न मनमे उठए लगलैन जे जखन अपना जनैत केकरो ने अधला सोचलिऐ आ ने अखनो सोचै छी आ ने केकरो अधला केलिऐ आ ने अखनो करै छिऐ, तखन लोक किए अधला करैपर उताहुल भेल अछि? माने ई जे समाजेक लोक समाजोक लोककेँ आ तैसंग अपनो आ हमरो किए अधले नजरिये देखबो करैए आ करबो करैए..? रघुवीर कक्काक मनमे एकाएक ठनका जकाँ ठनक जगलैन। जगिते बकार फुटलैन- “अपन रोपल गाछी भुताहि! जइ समाज रूपी गाछीकेँ रोपि समाजरूपक माली बनि सेवा करैत अखन तक आबि रहल छी ओ एना भुताहि किए बनि रहल अछि..!” रघुवीर कक्काक ठनकल मन रहबे करैन, चोटे पाछू उनैट तकला तँ बुझि पड़लैन जे केतौ-ने-केतौ एहेन रोगक प्रकोप भीतरे-भीतर भेल अछि, जे चाहे बाँकी रूपमे हुअए आकि आने-आन कोनो रोगसँ गरसित भेल हुअए, मुदा भेल तँ जरूर अछि..! रघुवीर काका जेते विचारकेँ सोझराबए चाहैथ तेते ओझरी लगि-लगि जाइत रहैन। कोनो एहेन उत्तर मनमे जगबे ने करैत रहैन जे पेब मन हल्लुक होइतैन। गुम-सुम भेल रघुवीर काका अपन मनक घोड़ाकेँ चारूदिस दौड़ा-दौड़ा ताकए लगला मुदा आँखि देखबे ने करैन! भाय आँखि देखब ओते असान थोड़े अछि जे लगले देख जाएब..? तही बीच चाह नेने पत्नी पहुँच कहलकैन- “चाह पीब लिअ, पान खा लिअ आ रामनवमी दिन छीहे रामराज देखए चलू।” ओना तैबीच रघुवीर काका चारि-पाँच घोंट चाह पीब नेने छला तँए मनक ओझराएल विचार पतराए लगल छेलैन, ओना सोल्हन्नी नइ पतराएल रहैन तँए पत्नीक बात सुनि तामस तँ नइ उठलैन मुदा झड़क जरूर उठलैन। झड़कवाहि उठिते मन नचलैन। नचैत मनमे एलैन जे एक दिस पत्नी कहि रहली अछि- ‘रामनवमीक मेला छी, देखैले चलू।’ आ दोसर दिस अपन मन रूपी पति[1] लोकक लीला देख-देख घोर-घोर भेल अछि! तैठाम की मेला देखब आ कोन मेला देखब..? मुदा लगले होनि जे पति-पत्नीक बीच तँ एहेन पार्टनरशीप ऐछे जे अदहा-अदहा बँटवारा अछि। अपने किछु छी तैयो अदहे छी आ पत्नियेँ किछु छैथ तँ अदहाक मालिक छथिए...। रघुवीर काकाकेँ किछु फुरबे ने करैन जे की केने की हएत। थोड़ेकालक पछाइत, चाह जखन अदहापर एलैन–माने अदहा गिलास जखन पीब लेला–तखन एकटा जुकती मनमे औनाइत खसलैन। खसलैन ई जे केतबो अदहाक मालिक पत्नी किए ने होथि मुदा छैथ तँ पत्नियेँ। बहला-फुसला अधिक हिस्सा लाइए सकै छी। कक्काक मन कनी सुगबुगेलैन। सुगबुगाइते बजला- “जखन मेला देखए जाएब, तहूमे जुड़शीतलक धुर-खेल तँ छी नहि जे ‘जय-शिव, जय-शिव’ करैत मेला घुमि लेब। रामनवमी छी। रामक जनम दिनक उछाही जेकरा छै ओ तँ आइ की-की ने लूटाएत मुदा हमरा बुते तँ अहूँकेँ खुशी-खुशी मेला देखौल नइ हएत।” ओना, रघुवीर कक्काक बात सुनि काकीक मन मधुआ गेल छेलैन मुदा तैयो लाड़-झाड़ करैत बजली- “जइ दिनसँ बाप-माइक घर छोड़ि एहेन जरल घर एलौं जे कोनो मनोरथ पूर नइ भेल।” एक तँ पहिनहिसँ रघुवीर कक्काक मन भुतियाएल रहबे करैन, जेकरा समेट समाज-परिवारसँ हटि पत्नी लग पहुँचल छला, तैठाम तेहेन बज्जर सन कथा भेटलैन जे मन आरो चुरम-चुर भऽ गेलैन। चुरम-चुर होइत मनकेँ कहुना-कहुना बीछि-बीछि कऽ समटलैन। समैटते मन बिहुसलैन, बिहुसिते बकार फुटलैन- “हम तँ चाह अदहा पीब नेने छी अहाँ पीलौं?” पतिक बात सुनिते सितियोकाकी सभ लाड़-झाड़ समटैत बजली- “नइ कहाँ पीलौं हेन। हम कि कोनो औझुका लोक छी जे पतिकेँ बिना खुऔनहि-पीऔने अनजल कऽ लेब! अखुनका लोक ने टेस्ट करैत अपनो टेस्ट करैए जे नीक-बेजाए-क विचार पति करता कि पत्नी। हँ, जैठाम सूर्यक उदय अछि तैठाम पतिक की दशा छैन सेहो तँ सबहक सोझहे अछि।” सितिया काकीक सिताएल विचार सुनि रघुवीरो कक्काक मन सिता गेलैन। सिताइते बजला- “अदहे गिलास चाह पीलौं हेन अखन अदहा बाँकीए अछि तँए जँ आँगनमे कोशलौने होइ तँ जा कऽ पीब लिअ, नहि तँ अदहा रखने छी लीअ पीबू।” पतिक बात सुनि सितिया काकी लजा गेली। लजा ई गेली जे खाइ-पीबैक कारोबारी तँ अपने छी किने तैठाम जँ मौगियाही चालि पकैड़ जे परिवार रहत, माने परिवार रहत दस गोरेक आ सिदहा लगाएब सात गोरेक जे खाइत-पीबैत रस्तेमे सठि जाएत! ओइ परिवारमे विवाद हएत की नहि? हेबे करत, जखने खाइक भोजन रस्तामे सठत तखने ने किछु गोरे खा कऽ सुखे ढेकार करत आ किछु गोरेकेँ भुख ढकार करए पड़तैन। जखने दुनू ढकार हएत तखने दू रंग हवा चलबे करत, तैठाम के दोखी हएत? हँ! एहेन संभव अछि जे उपार्जनकर्ता भरपूर उपारजन, कोनो कारणे नइ कए पबैत होथि मुदा ई तँ हमरे ने बुझए पड़त। भरि थारी नहि, हिस्से भरि। हँ! एहनो संभव ऐछे जे दस गोरेक भोज्य-विन्यासमे, वस्तुक वाहुल्य देख, दस गोरेक जगह पनरह गोरेक बना रस्ता-पेरापर फेक गन्दा करबै सेहो केहेन हएत? मन कहलकैन- तखन? तखन तँ यएह ने हएत जे जहिना छबे-छबे खेत बढ़ैए, कौरे-कौरे पेट बढ़ैए तहिना रसे-रसे बुधियो-बेवहार ने सिखैत-सिखैत सीखि चलैए। सितिया काकी अपन लड़-झड़क चालि-प्रकृति पकैड़ बजली- “जहिना हमर अदहा गिलास तहिना ने अहूँक अदहा भेल, तैठाम अपन-अपन दायित्व तँ निमाहए पड़त किने।” पत्नीक बात सुनिते रघुवीर काका बजला- “शुभ काजमे अपने ने देरी करै छी, दसटा हौर्नक अवाज जे कानक ठेकीकेँ केतबो ठेलत तइसँ की हेतइ। नीक जकाँ बनि-ठनि कऽ मेला देखए चलू, अहीं संगे हमहूँ जाएब।” ‘अहीं संगे हमहूँ जाएब’ सुनि माने पतिक बिसवासू विचार सुनि सितिया काकी विस्मित हुअ लगली। पत्नीकेँ विस्मित होइत देख रघुवीर काका बजला- “तेते ने लॉडस्पीकरक अवाज आबि रहल अछि जे अहाँकेँ सुनैमे रामनौमीए-टा अबैए मुदा चैती नवरात्राक[2] नौमी सेहो छी। तँए दुनूक बीच छी, कोन मेला देखए जाएब से पहिने विचारि लेब तखन ने घरसँ डेग उठाएब।” रघुवीर कक्काक बात सुनि सितिया काकी औनेली नहि, ऐ दुआरे नै औनेली जे भगवतीक आराधना–नवमीक मेला–आ रामनवमीक मेला–तहूमे केते सालक पछातिक राम जन्मोत्सव छी–दुनूमे अन्तर तँ अछिए। ओना, ओइ दिस सितिया काकीक नजैर नइ गेलैन। रस्तेमे अँटैक रामनवमीए दिस बढ़ि गेलैन। पतिक विचारकेँ सोल्होअना अनदेखी करी, सेहो केहेन हएत। सितिया काकीक मन उमुर-घुमुर करए लगलैन। कोनो रस्ते ने देखैथ जे आगू की केने दुनू बेकती मिलानसँ मेला देखए जइतैथ। मुदा लगले जुकती फुरलैन। जुकती ई जे रामनौमियो मेला छी आ नवरात्रियोक मेला छी, मुदा छी तँ दूनू मेले, तँए किए ने दुनू मीलि मेल-मिलान-मिलाप करैत मेला जाइ...। सितिया काकीक मन मानि गेलैन जे पतियेपर किए ने जहिना सीता रामकेँ माता-पिता बोन जाइले छोड़ि देलखिन तहिना हमहूँ आश्रित भऽ मेला देखए जाय। ओना, सितिया काकी धड़फड़मे अपने भरिक विचार कऽ लेली, जइसँ नजैरमे ई एबे ने केलैन जे नारियोक रूप अरूप अछि। केतौ नारी अपन इज्जत-आवरू-ले अपने बलिक बकरा बनि रक्तसँ धरती सींचै छैथ तँ केतौ दर्जन भरि बाल-बच्चावाली दूधमुहाँ बच्चाकेँ पतिक सिर मेढ़ि दोसर घरक बरक पूजा नइ करै छैथ सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। सितिया काकी नजैर उठा रघुवीर काकापर देलैन, मुदा बजैक जे विचार रहैन ओ मनेमे घोंटाइत रहलैन जे रघुवीर काका बुझि गेलखिन। मुस्कुराइत रघुवीर काका बजला- “जखन मेला जाइक विचार मनमे उठल, तखन नहियोँ जाएब मनकेँ मारब हएत किने। से नहि तँ झब-दे चाह पीब बनि-ठनि कऽ आँगनसँ तैयार भेल आउ।” पतिक बात सुनि सितिया काकी ठमकली। ने आँगन दिस डेग उठैन आ ने मेला जाइ दिस विचार उठैन। मेला तँ मेला छी दुनियाँक मेला। जे दुनियाँक कोण-कोणमे पसरल अछि। अयोध्या जे रामक जन्मभूमि छिऐन, ओइठामक सोहान आ जनकपुरक सोहान, जे सासुर छिऐन, दुनू एक्केरंग थोड़े हएत। तैसंग गाम-गाम आ परिवार-परिवारक आराध्य देव रहने गाम-परिवारक संग बेकतीगत सेहो पूज्य छथिए, तैठाम केते दूर तक देखल जाए ई तँ नजैर-नजैरिक खेल छी किने? ठमकल पत्नीक रूप देख रघुवीर कक्काक मनमे परिवारक ओइ अभिभावक (रक्षक) जकाँ विचार उठलैन जिनका लेल एक दिस घर-परिवारक गाड़ीकेँ आगू ससरब कठिन अछि आ दोसर दिस पाछूसँ कोनो सहारो नहियेँ अछि, माने हाथ सोल्हन्नी खाली...। तैठाम पत्नीक रूप बदैल सियाही सन सियाह बनियेँ रहल छेलैन, तँए विचारकेँ आगू ठेलैत रघुवीर काका बजला- “मेला देखए नइ जाएब तँ नहि जाउ, मुदा दुनू परानी एकठाम रहैत जे चुपा-चुपी केने छी से हमरा नीक नहि लगैए।” जहिना कोनो पशु आँखिक इशारा मात्र पेब फुरफुरा उठैए आ कोनो अँड़पेन देला पछाइतो नहि उठए चाहैए तेना सितिया काकीकेँ नहि भेलैन, ओ अपनो बले उठैत बजली- “मेला देखी वा नइ देखी, जहिना छी तहिना तैयार भऽ टहैल आबए चलू।” पत्नीक विचार सुनि रघुवीर कक्काक मनमे खुशी उपकलैन- जे पत्नियेँ ने लक्ष्मियो आ लक्ष्मीपात्रो छैथ जे अपन विभव देख अपन शक्ति अजमा घरसँ बाहर दुनियाँक मेला देखए चाहै छैथ। बजला- “बड़बढ़ियाँ कहलौं। मुदा गामो तँ गामे छी किने, कोनो कि शहर-बजार छी जे पतियानी लगा बनत। जेकरा जेतए अँटावेश होइ छै से तेतए बसि जाइए तँए शहर जकाँ एकपेरिया तँ नहि अछि, अछि तँ बहुपेरिया तखन कोन रस्ते जाएब शुरू करब, ई विचार तँ अखने ने कऽ लेब।” ओना सितिया काकीक नजैर (मन) अखन धरि आन-आनकेँ जे देखने छेली तेही हिसाबक छेलैन, तँए आगू दिस तकैक ने खगते पड़लैन आ ने तकबे केलीह। जखन खगते नहि तखन कियो ओरियाने कथीक करत। अनेरे दुनियाँक बोनमे जे असगरे वौआएत, से कथीले? मुदा रघुवीर कक्काक विचार ठनका जकाँ सितिया काकीक मनमे खसले छेलैन। तैपर तेहाला (तेसर) कियो अछियो तँ नहियेँ जे कनी-मनी टपो-टोइया आकि संगो-साथ दइत। असगरमे दुसगर होइते छइ। मुदा लगले मन कलशलैन। कलैशते चैती गाछक नवटुस्सा जकाँ मन काकीक टुसियेलैन, टुसियाइते बजली- “जखन दुनू परानी अदहा-अदहा घरसँ बाहर धरिक दुनियाँ बाँटि नेने छी तखन अपन विचारक[3] विचार[4] अपने ने पहिने ओइ मुहसँ देबै जइ मुहसँ विचार निकलल, पछाइत ने हमर पार औत?” सितिया काकीक ‘पत्नी रूप’केँ पति–रघुवीरकाका–देखलैन। देखते मन गवाही देलकैन जे अपन विचार पत्नी पूर केने बजली अछि, ओकरा पुराएब तँ अपने दायित्व छी किने। मुदा मुहसँ तँ वएह ने निकालब जे ओकर[5] मुँह केमहर छइ? जाबे मुँह नइ देखब ताबे मुँह मिलानी केना करब आकि मुँह मिलान हएत केना..? जहिना सम्पन्न फड़ल आमक गाछपर अनठेकानियोँ गोला फेकलासँ गोटे पाकल आम खसिये पड़ैए, मुदा की ओकरा ठेकानल कहब आकि ओ बेठेकानले भेल। मुदा बेठेकानलो तँ ठेकानल भाइये गेल जे तोड़ि के अनलक। ओना ठेकानल तँ ओ ने भेल जे ठेकना कऽ–माने लक्ष्य करि कऽ–गोला ओइ आमपर फेकलौं जइ आमपर मन गड़ल छल। गाछमे तँ सोहरी लागल आम ऐछे मुदा जेते अछि तेते खगतो नहियेँ ने अछि। आकि सभटा हमरे-ले अछि जे गोट-गोट कऽ तोड़ि लेब..! रघुवीर काका बजला- “जहिना देश सेवा, मानव सेवा देश भक्ति छी तहिना भक्तिक बीच अभक्ति आ सभक्ति केहेन अछि ओ बिना बुझने भक्तियो केना करब..?” ओना अपना जनैत रघुवीर काका सोझराएले बात बजला मुदा सितिया काकी नीक जकाँ नहि बुझि पेली। ने ई बुझि पेली जे पतिक विचारक आगू अपने अदहे छी। तँए पिपाशु पक्षी जकाँ सितिया काकी रघुवीर काका दिस मुँहक दोसर बोल सुनैले आँखि उठौली। मने-मन रघुवीर काका सितिया काकीक विचारकेँ तारि रहल छला। तारिते भारैत बजला- “जहिना दुनियाँक बोनमे सभ हेराएल अछि तहिना अपनो दुनू परानी तँ छीहे, तँए मेला देखैसँ पहिने मेलाक रस्ताक प्रण मनमे रोपए पड़त तखन ने मेलाक रस पीब, नहि तँ लोकेक भीड़ देखैत चलि आएब!” ओना अखन धरि सितिया काकी मेलाक वएह रूप बुझै छेली, मुदा पतिक अनमोल विचार सुनि थकमकेली। मन कहलकैन अपने की बुझि रहल छी आ पतिक मुहेँ की सुनि रहल छी..! ओना सितिया काकी जिद्दयाहि स्त्रीगणक श्रेणीमे अबिते छैथ मुदा ने जिद्द धरैक विचार सक्कत छैन आ ने जिद्द पकड़ैक मन मजगूत छैन। मुदा आइ तँ रामनवमीक मेलाक संग नवरात्राक नवमी मेला सेहो छी..! सितिया काकी बजली- “एना जे झाँपल-तोपल श्लोक बचै छी तइसँ नइ हएत, हमरा मुरकुट्टियेमे कहू जइसँ मन मानि जाए।” पत्नीक सिनेह भरल पिपाशु मनकेँ जँ रघुवीर काका नहि थतमारि सकैथ, ई केहेन होएत। तहूमे ओ पत्नी जे जहियासँ माता-पितासँ उत्सर्जित भऽ हाथ पकड़ने एलैन, ओ केना हाथ पकड़ने आगूओ चलतैन ई तँ विचारणीय प्रश्न रघुवीर कक्काक मनमे रहबे करैन...। जहिना कोनो विचार चितासन्न भेला पछातिये नव विचारक संग नव जीवन दइए तहिना काकाकेँ भेलैन। ओना जहिना सितिया काकी मने-मन विचारकेँ घोंटि रहल छेली तहिना मने-मन घोंटैत रघुवीरो काका अपन जिनगी पढ़ए लगला। चालीस बर्ख पूर्वसँ, जइ गाम-समाजमे साइयो रंगक छुआ-छूत पसरल अछि–माने जातियेटा मे नहि आनो-आनोमे–तँए ओइ समाजमे एकरूपता आनब तँ ओइ समाजक प्रमुख क्रिया भेबे कएल। जँ से नहि भेल तँ सदिकाल कखनो किछु-ले तँ कखनो किछु-ले हल्ला-फसाद, झगड़ा-झंझट होइते रहत आ समाजो टुटिते रहत। तँए जाबे कोनो बेवहारिक बन्धन–माने बेवहारिक चलैन–केँ एकसूत्रमे नहि आनि चलब ताबे समाजमे एकसूत्रताक जड़ि केना जड़ियाएत..? यएह सभ विचार मथन करैत रघुवीर काका समाजक बीच अपन विचार रखलैन जे जखन सभ मनुखे छी तखन सभ एकठाम बैस किए ने खाएब-पीब। अनेरे, छुत-अछुतक बीच बँटल छी..! रघुवीर कक्काक विचार संजीवनी जकाँ समाजकेँ जीवनदात्री बुझि पड़लैन, समाजक सभकेँ विचार नीक लगलैन। ओना रंग-रंगक अरचन बीचमे उठैक संभावना सेहो बुझिये पड़लैन, जइसँ विचारक संग बाटो टुटैक संभावना अछिए। मुदा गामक अधिकांश परिवारक एकमुँहरी विचार भऽ गेलैन। समाजो तँ समुद्रे जकाँ अछि। जहिना समुद्रमे हरण, मरण आ जरन सदिकाल चलिते रहैए तहिना समाजोमे तँ होइते अछि। सएह भेल। एक गोरेक वृद्ध बाबाक मृत्यु भेलैन। जहिना सभ एकठाम बैस खाइ-पीबैक विचार केने छला तहिना सभ लोरिक बरियात जकाँ जरबैयो-ले गेला। जइसँ सबहक भेँट सभकेँ असमसान घाटमे भेबे केलैन। असमसाने घाटपर ने असमानक मन्दिर सेहो अछि। जे कखनो बरफवारी करैए तँ कखनो जलवारी आ कखनो अगवारियो तँ करिते अछि...। ओना जइ रोगक निदानक बाट पकैड़ समाजक कर्णधार उठि कऽ ठाढ़ हुअ चाहै छला ओइ दिस ओइसँ पहिने–माने वृद्धक मृत्युक पूर्व–सेहो कनी-कनी डेग उठा नेने छला जइसँ समाजमे आड़िक माने बन्धनक टुट-फाट सेहो शुरू भऽ गेल छल। जइसँ जाति-जातिक बीच विचार संघर्षक संग बेवहारमे सेहो उतैर रहल छल। मुदा आगि लगलेपर ने कुकराहा सेहो उड़ैए जे दोस्त-दुश्मनक भेद खतम करैत केकरो घरमे लगि जाइए। सेहो भाइये रहल छल। जइसँ समाजक कोढ़-करेज खोखैर खाइबला बेवहार जरिये रहल छल। ओना समाजमे समाजिक बन्धन हौउ आकि देशमे देशक बन्धन, मुदा सभ–समाजिक संगठनो आ राजनीतिक दलो–मंचपर एकरा अधला कहिते छैथ, भलेँ परोछमे एकरे बले–माने छुआ-छुतेक बले–नचबो-गेबो किए ने करैत होथि। ओना जहिना समाजो तहिना राजनीतिक दल सेहो अछिए। जे कियो हाथीक नाँगैर पकैड़ हाथीक परिचय दइ छैथ तँ कियो हाथीक सूढ़ पकैड़ आ कियो हाथीक टाँग पकैड़, मुदा सभकेँ तँ देखैक अपन-अपन दाबी छैन्हे जे असल हाथीक परिचय हमरे अछि। भलेँ सभ अपन-अपन दाबी अपने-अपने घरमे किए ने रखैत होथि मुदा समस्यो तँ समस्या छी। जहिना समाजकेँ समाजक मंचपर आबि संकल्पक संग अंगीकार करैत बेवहारिक धरातलपर आबए पड़तैन तहिना राजनीतिक दलकेँ समाजिक मंचपर चढ़ि समाजकेँ राजनीतीकरण करैक संकल्पक संग जमीनी सच्चाइकेँ प्रतिपादित करए पड़तैन। जा से नइ हएत ता दिल्लीक लड्डु बनैत रहत, रामनवमीक संग नवरात्राक नवमीक मेला अबैत-जाइत रहत। रघुवीर कक्काक मनमे सेहो नव विचार जगलैन जइसँ मन मुस्कियेलैन। मुस्कियाइत मन रघुवीर कक्काक विचारकेँ टुस्कियौलकैन। टुस्कियाइते विचार चैती कलश जकाँ भकरार हुअ लगलैन। भकरार होइते मुहसँ निकललैन- “चलू जे राम से राम, रस्ते-रस्ते चलबो करब आ गपो-सप्प करब, भलेँ मेला देखी आकि नहि देखी।” रघुवीर कक्काक विचारकेँ केते दूर तक सितिया काकीक सिताएल मन बुझलकैन से तँ ओ अपने जानैथ आ जानैथ सुनयना दादी मुदा रघुवीर कक्काक मनमे बिसवास जगबे केलैन। विस्मित होइत सितिया काकीकेँ जहिना माइयक गोदमे बैसल बच्चा अपन जिनगीक सोग-पीड़ा बिसैर चैनक साँस लइत अरामसँ जीवन मुक्त भऽ सुतैए तहिना पतिक खलियाएल गोद देख मनमे जगलैन। जगिते मनमे उठलैन- चालीस बर्खसँ आइ माने पूबसँ पच्छिम, की देख रहल छी? की अपन रोपल गाछी भुताहि भऽ गेल..? ओना, टुटैत-बँटैत समाजकेँ देख जेते चिन्तित रघुवीर काकाकेँ हेबा चाहिऐन से नइ छैथ, मुदा चिन्ता नइ छैन सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। कम चिन्तित हेबाक कारण छैन जे जेतए-जेतए एहेन बान्हक बन्धन अछि तइ बन्धनकेँ या तँ तोड़ि लेलैन वा छोड़ि-छाड़ि देलखिन। जइसँ हिमालयक तराइक सघन बोनमे जहिना ने केतौ रस्ता रहै छै आ ने बिनु रस्तेक कोनो जगह खाली छै, गाछक बोन छै अपन-अपन अँगना-घर सभ बनौनहि अछि। सूर्यास्त होइते एक दिस घड़ी-घन्टक अवाज भेल तँ दोसर दिस आरती गायन। सितिया काकी बजली- “गपे-सप्पमे रहि गेलौं, चाहक बेर सेहो भेल। अहूँ तैयार हौउ आ हमहूँ चाह बनौने अबै छी।” पत्नीक पत्नीत्व देख रघुवीर कक्काक मनमे सामक समत्व विचार जगलैन मुदा बजला किछु ने..! ◌ शब्द संख्या : 2623, तिथि : 7 अप्रैल 2017 ‘बेटीक पैरुख’ लघु कथा संग्रहसँ...। सनेस लक्ष्मण रेखाक बीच सीता नहाँति बैसल सनक काका प्रेम रस पीब प्रेमीक संग अधरुपिया चालि पकैड़ अधखिलू फूलक गमकमे गमियेला, गमियाइते सौंझुका सिंगहार जकाँ मुँहक मुस्की महमहेलैन- अजीब ईहो दुनियाँ अछि। ने सतीए अछि आ ने वेश्ये अछि। बनौनिहारकेँ धन्यवाद दी जे एक दिस विवेकक विन्यास बाँटि पाँतिए-पाँति, पाते-पात परैस देलैन तँ दोसर दिस दिन-राति बना आगूमे ठाढ़ कऽ देलैन। धर्मक संग पाप, सुकर्मक संग कुकर्म, विद्वानक संग मुरुख आ पुरुखक संग मौगीक जोड़ा लगा-लगा पतियानी बीच पात्रेक पत्ते-पत्ते सेहो परैस देलैन..! जेते आगू दिस सनक काका देखै छला ओते छगुन्ता लगै छेलैन। एक दिस पानिक ठोप चन्द्रोदक कहबैत, तँ दोसर दिस असीम अथाह क्षीर सागर, मुदा चन्द्रोदको तँ केतौ दूधक तँ केतौ पानिक तँ केतौ दूधपनिया सेहो होइते अछि। कहू जे ई केहेन दुनियाँक खेल छी जे कियो असकरेमे सोल्हो ताल धऽ नचबो करैए, गेबो करैए आ देखबो करैए, आ कियो भीड़-भाड़ तकैत रहैए जे जेते देखनिहार रहत तेते नीक नाच हएत। दुनियाँक चक्कर-भक्कर देख सनक कक्काक मन तरे-तर उदास भेल जाइत रहैन। जहिना घुमती बरियाती रंग-रंगक बात करैत तहिना मनमे उठैत रहैन। अनेरे मनुख बनि जन्म लेलौं। मनुखपना जखन एबे ने कएल तखन मनुख किए भेलौं? मुदा ‘पना’ औत केना? बाँसक पना ओधि होइत अबै छै, केरा-मोथी-अड़िकोच इत्यादिमे सेहो ओहिना अबै छै, मुदा मनुखमे से कहाँ भेल? की बिनु ‘पने’क मनुख ठाढ़ हएत? ठाढ़ तँ हएत मुदा शुद्ध ठाढ़ हएत आकि अशुद्ध? जखन जानवरोमे फेंट-फाँट होइते छै, तखन अपन हिस्सा मनुखे किए छोड़ि देत..? थोड़ेकालक पछाइत सनक कक्काक मन कहलकैन- ओह! अनेरे दुनियाँक महजालमे फँसि मरैले छड़पटाइ छी। दुनियाँमे के एहेन अछि जे सुख-सागरमे बैस आनन्द नहि चाहैए, मुदा दुनियोँ तँ दुनियेँ छी जइमे रंग-बिरंगक सागरो सभ बसल अछि। क्षीर सागर, सुख सागर, लाल सागर, कारी सागर इत्यादि अनेक सागर...। सनक कक्काक मन ठमकलैन। ठमैकते मनमे उठलैन- जीबैतमे जेतए वौआइ मुदा समाधि तँ ठौरपर लेब। जँ से नहि तँ हिटलर जकाँ थूकक धारमे भँसियाइत रहब! उदास मन, बिरहाइत बगए सनक कक्काक रहैन। तखने भातीज पोलीथिनक झोरामे अदहा किलो अंगूर आ किलो भरि सेब आगूमे रखि देलकैन। झोरा आगूमे देखते ठहाका मारि सनक काका हँसला। कक्काक ठहाकाक चोट मनमोहनकेँ नइ लगलैन, जेना आमक गाछपर गोला फेकते कोनो आमकेँ खसने गोलवाहकेँ जेहेन खुशी होइत सएह खुशी मनमोहनकेँ भेल। मुदा निशान साधल आमक महत किछु आरो होइते अछि। मनमोहन बाजल- “काका, ई अहींक सनेस छी।” ‘सनेस’ सुनि सनक काका चौंकला जे सनेस कहि की कहैए! पुछलखिन- “केतक सनेस छी?” “कश्मीरी सेब छी आ पूनाक चमन अंगूर।” मनमोहनक बातसँ सनक कक्काक मन तरे-तर सनकए लगलैन। छौड़ा की बुझि मजाक करए आएल। जहिना बाप एकोटा कुकर्म नै छोड़लकै तही उतारक अपनो भेल जा रहल अछि आ सेब-अंगूर देखबए आएल अछि! मुदा तामसकेँ तरेमे दाबि काका बजला- “हौ मनमोहन, एक दिनक भोजे की आ एक दिनक राजे की। बच्चा सभकेँ दऽ दिहक। अपने अनरनेबा आ लताम दुइर होइए। जेते तोहर लेब तेते अपन दुइरे हएत। अच्छा, एकर भाउ की छइ?” लगले सुरे मनमोहन पुछि देलकैन- “एकर भाउ बुझैक कोन जरूरत पड़ि गेल?” मने-मन सनक काका सोचलैन जे छौड़ा नमहर छिनार-लूटार जकाँ बुझि पड़ैए। बजला- “बौआ, आब तँ सहजे चल-चलौए छी मुदा अपनो देश-कोसक हाल बुझब कोनो अधला थोड़े हएत?” एक तँ सनक कक्काक बदनामी शुरूहेसँ रहलैन जे घरोक लोक सनकाहे कहै छैन। केना नै कहतैन, सभ अपन-अपन परिवारक बाल-बच्चा-ले करैए आ सनक काका से बुझबे ने करै छैथ, माने अपन परिवार आ दोसर परिवारमे कोनो भेद नहि। जहिना अपन परिवार तहिना दोसराक। अखन धरि मनमोहन यएह बुझैत जे परिवारोसँ काका बाड़ले-बेरौल छैथ तँए सभ चीजक दुख-तकलीफ होइते हेतैन। मुदा गप-सप्पसँ मनमोहनक नजैर करुआए लगल। मनमोहनक रूखि देख सनक काका बुझैक कोशिश करए लगला, कारण की छइ। मुदा मनमे मिसियो भरि सन्देह अपनापर नै भेलैन। मन गवाही दैते रहलैन जे निनानबे प्रतिशत राक्षसक देश लंकामे विभीषण केना भक्ति-भजन करैत जिनगी गुदस करै छला। केहनो सघन बोन सुकाठ-कुकाठक किए ने हौउ मुदा आमक गाछ आम आ लतामक गाछ लताम फड़ब बिसैर जाएत? दोहरा कऽ मनमोहनकेँ पुछलखिन- “हौ बौआ, जहिना एक्के गोरे डाक्टरो आ इंजीनियरो नै भऽ सकैए किएक तँ दुनूक दिशा अलग-अलग छइ। मुदा सेबक जगह जँ अपनासँ नीक लताम आ अंगूरक जगह अनरनेबा नेने अबितह तँ फले नहि बीओ रोपि देतिऐ।” कक्काक प्रश्न सुनि मनमोहन उछलैत बाजल- “काका, दुनियाँ आब घर-आँगन बनल जा रहल अछि आ अहाँ अपन पुश्तैनी विचार रखनहि रहब।” मनमोहनक साँसक गरमीकेँ अंकैत सनक कक्काक सनकी तेज नै भेलैन। मिरमिराइत बजला- “बौआ, जँ दुनियाँ घर-आँगन बनि गेल तँ ओ नीक बात, मुदा ई तँ नीक नहि जे कियो नौड़ी-छौड़ी बना भाषा-साहित्य-संस्कृतिकेँ ओझरा मटिया मेट कऽ दिअए। से कनी बुझा दाए जे की भऽ रहल छइ?” गुम्हरैत मनमोहन कहलकैन- “काका, दुनियाँ आब नव पीढ़ीक अछि तँए केतबो दुसबै ओ चढ़बे करत।” मनमोहनक प्रश्नसँ सनक कक्काक सनकी पाछू मुहेँ ससरलैन। पछुआ पकैड़ बजला- “बौआ, जर्मनी-जापानी आ अंग्रेजी शब्द ऐ लेल चढ़-चढ़ौ भऽ गेल जे ओकर विकास अगुआ कऽ मशीनमे पहुँच गेल आ मशीनक नाओं रखि-रखि अहाँक घर-अँगनामे छिड़िया देलक! आ अहाँ ऋृषि-मुनिक राज मिथिला कहि-कहि ओतए पहुँच गेलौं जे ओ सभ (ऋृषि-मुनि) की कहलैन तेकर डिक्शनरिये चोरा लेत। तखन अहाँ बुझबै जे केहेन नव युगक नव लोक बनि गेलौं?” सनक कक्काक बात सुनि मनमोहन ठमकल तँ मुदा पाछू हटैले तैयार नहि भेल। बाजल- “काका, बजारमे अखन एक-सँ-एक खाइयो-पीबैक समान आ फलो-फलहरी तेहेन आबि गेल अछि जे अपना ऐठामक फल-फलहरीकेँ के पुछत?” मनमोहनक प्रश्न सुनि सनक कक्काक सनकी आगू मुहेँ ससरलैन, बजला- “बौआ, कोनो देश-कोसक विकासमे ओइठामक माटि, ओइठामक पानि, हवा इत्यादि जेकरा पंचभूत कहै छहक, मुख्य तत्व भेल। अनुकूल गतिए सृष्टि चलैए। अपना ऐठामक लताम आकि कोनो आने फल जे अछि ओकरा ऐठामक काल-क्रियाक गतिए जे जरूरी छल ओ प्रकृति पैदा केलक। अपना ऐठाम एकरे अभाव भेल जे पहाड़ी फलकेँ मैदानी क्षेत्रमे नीक मानल जाइए।” अपनाकेँ निरुत्तर होइत देख मनमोहन मैदानसँ हटैक विचार करए लगल। मुदा सेब-अंगुरक पोलिथीन बीचक सीमा बनल रहलै। रूमाल चोर जकाँ सीमा पहिने के टपत..! पाछू हटैत मनमोहन बाजल- “बड़ आशा लगा अनने छेलौं जे काकाकेँ नीक फल खुएबैन।” मनमोहनक बात सुनि सनक काका तारतममे पड़ि गेला जे अखन धरि जे हम बुझै छेलिऐ तइसँ भिन्न ने तँ मनमोहन अछि। आशाक दोहाइ लगा बजैए जे ‘आशा लगा अनने छेलौं’ आशा तँ सभकेँ अपन-अपन होइ छइ। सबहक देहेटा अलग-अलग नहि, मनक उड़ान सेहो होइ छइ। पिजरामे बन्न सुग्गोकेँ पोसनिहार सिखबैए जे आत्मा राम पढ़़ू- ‘चित्रकूट के घाटपर भए सन्तन के भीड़। तुलसी दास चानन रगड़े, तिलक करे रघुवीर...।’ मुदा सेहो तँ नहि बुझि पड़ैए। तखन? ओ तँ पुछनहि पता चलत। पुछलखिन- “हौ बौआ, जहिना घरक लोक हमरा बताह कहैए तहिना ने ओकरो सभकेँ सनकपनीए फल खुएबै।” कहि मने-मन सनक काका सोचए लगला। भाँग पीब कियो बाजि चुकल छैथ आकि असथिर मने सोचि कहने छैथ जे ‘जेहेन खाइ अन्न तेहेन बने मन!’ मुदा अहू छौड़ाकेँ तँ छिछा-बीछा नीक नहियेँ छइ। भरि दिन देखै छिऐ जे ऐठामसँ ओइठाम, ओइठामसँ ऐठाम ढहनाइते रहैए। तैपरसँ दिन-दिन आगूए मुहेँ ससैर रहल अछि, से केना? बहुरुपिया ने तँ छी? सलाइ रिंच जकाँ सभ नट पकड़ैबला..! तही बीच मनमोहन बाजल- “काका, अहाँ अपने हाथे बाँटि दियौ।” मनमोहनक बात सुनि सनक काका ठमैक गेला। जहिना कोनो टपारि कुदैले दू डेग पाछू हटि दौग कऽ टपल जाइत तहिना काका पाछूसँ आगू बढ़ि बजला- “हौ बौआ, बतरसिया हाथ भऽ गेल, ओहुना हरिदम थरथराइते रहैए, तैपर कोनो काज करैकाल तँ आरो बेसी थरथराए लगैए। अपन चीज जे थोड़-थाड़ छिड़ियाइयो गेल तँ नहि कोनो, मुदा तोहर जे एकोटा अंगुर खसि पड़त तँ तोरे मन की कहतह। यएह ने जे सनकाहक ठेकान कोन। तँए हमरा चलैत तोरा मनकेँ ठेँस लागह से नीक नहि बुझै छी।” कक्काक बात सुनि मनमोहन बाजल- “तँ की काका घुमा कऽ लऽ जाइ?” अनेरे ओझरीमे ओझराएल अपनाकेँ देख सनक काका, ठाँहि-पठाँहि बजला- “ई तोहर खुशी छिअ जे घुमा कऽ घरपर लऽ जा वा दोकानदारेकेँ घुमा दहक वा रस्ता-पेरामे कोनो धिए-पुतेकेँ दऽ दहक। हम किछु ने कहबह। एते दिनक पछाइत दरबज्जापर एलह सएह खुशी अछि।” सनक काकक बात सुनि जहिना जाड़सँ कठुआ कियो देह-हाथ तानि अचेत भऽ जाइए तहिना मनमोहनकेँ हुअ लगल। ◌ शब्द संख्या : 1285 ‘उलबा चाउर’ कथा संग्रहक तेसर संस्करणसँ जन्मतिथि तीस बर्ख नोकरी केला उत्तर रविकान्त आइ.जी. पदसँ सेवा निवृत्ति भेला। जखन कि रविशंकर आइ.जी.सँ आगू बढ़ि डी.जी.पी.क पदभार सम्हारलैन। साल भरि ऐ पदपर रहता, ओते नोकरीक अवधि बँचल छैन। रविशंकरकेँ डी.जी.पी.क पदभार सम्हारला जखन तीन दिन भऽ गेल तखन रविकान्तकेँ मन पड़लैन जे मीतकेँ बधाइ कहाँ देलिऐन। कारणो भेल जे पनरह दिन पहिनहिसँ जे कार्यभार दिअ लगलैन ओ नोकरीक अन्तिम दिन धरि नै फरिछौट भऽ सकलैन। समयक अभावमे रविकान्तकेँ मनमे एलैन जे मोबाइलेसँ बधाइ दऽ दिऐन। मुदा एक्के काजक तँ भिन्न-भिन्न जुइत होइए। जुइतिक अनुकूले ने काजो अनुकूल हएत, तँए मोबाइलसँ बधाइ देब उचित नै बुझि पड़लैन। ओना तत्काल जानकारीक रूपमे वधाइ दैत समए लेल जा सकै छल। मुदा से नै भेलैन। चाहक कप टेबुलपर रखि दहिना बाँहि उठबैत पत्नीकेँ कहलखिन- “की ऐ बाँहिक शक्ति क्षीण भऽ गेल जे काज नै कऽ सकैए। मुदा..!” रश्मि अपना धुनिमे छेली। ओना एक्के टेबुलपर बैस चाहो पीबै छेली आ मेद-मेदीन जकाँ मुँहमिलानीमे गपो-सप्प करै छेली आ अपने धुनिमे मनो वौआइ छेलैन। एकठाम बैस चाह पीबितो मन दुनूक दू-दिसिया छेलैन। रश्मिक मनमे रविशंकरक पत्नी ‘किरण’ नचैत रहैन। जिनगी भरि सखी-बहीनपा जकाँ रहलौं मुदा आइ ओ रानीसँ महरानी बनि गेली आ..? की हम ओइ बटोहिनी सदृश तँ ने भऽ गेलौं जेकरा सभ किछु छीनि घरसँ निकालि देल जाइ छइ? जहिना कोनो नीनभेर बच्चा माइक उठौलापर चहाइत उठैत बेसुधिमे बजैत तहिना पतिक प्रश्नक उत्तर रश्मि देलखिन- “ऐ बाँहिक शक्ति ओतबेकाल रहै छै जेतेकाल शान चढ़ाएल हथियार ओकरा हाथमे रहै छइ। नहि तँ प्राणशक्ति निकलला उत्तर शरीर जहिना माटि बनि जाइ छै तहिना बनि कऽ रहि जाइए। हाथसँ हथियार हटिते जिनगी हहरए लगै छइ।” तैबीच चाहक कप उठा चुस्की लैत रविकान्त बजला- “बच्चेसँ दुनू गोरे संगे रहलौं। खेनाइ-पीनाइ, खेलनाइ-धुपनाइ, घुमनाइ-फीरनाइ सभ संगे रहल। कहाँ कहियो मनमे उठल जे दुनू मीतमे कोनो दूरी अछि। अपनाकेँ के कहए जे घरो-परिवार आ सरो-समाज कहाँ कहियो बुझलैन दुनूमे कनियोँ अन्तर छै, मुदा आइ..?” “मुदा आइ की?” “यएह जे आइ बहुत दूरी बुझि पड़ि रहल अछि। बुझि पड़ैए जेना अकास-पतालक अन्तर भऽ गेल अछि। कोन मुँह लऽ कऽ आगू जाएब, से किछु फुरिये ने रहल अछि।” “तखन?” “सएह ने मन असथिर नै भऽ रहल अछि। जिनगी भरिक संगीकेँ ऐहेन शुभ अवसरपर केना नै बधाइ दिऐन। मुदा एते दिन बरबैरक विचार छल आब ओ थोड़े रहत। कहाँ ओ सिंह दुआरपर विराजमान होइबला आ कहाँ हम देशक अदना एकटा नागरिक। की अपनाकेँ ओइ कुरसीक बुझी जइसँ हेट भेलौं? सीकपर रखल वा तिजोरीमे रखल वस्तु ओतबेकाल ने जेतेकाल ओ ओतए रहैए। रविशंकर आइ ओतए छैथ जेतए हमरा सन-सन जिनगी जे अन्तिम छोड़पर पहुँचनिहार हुनकर हुकुमदारी करत। कोन नजैरिये ओ देखै छल आ आइ कोन नजैरिये देखता।” रविकान्तक अन्तर-मनकेँ रश्मि आँकि रहल छेली। मुदा जेते आँकए चाहै छेली तइसँ बेसी घबाएल माछ जकाँ मनक सड़ैन बढ़ल जाइत रहैन। की आँखिक सोझक देखल झूठ भऽ जाएत? केना नै भऽ सकैए। दू गोरेक बीचक बात तँ ओतबेकाल धरि सत्य रहैए जेतेकाल धरि दुनू मानैए। काज थोड़े छी जे गरैज कऽ कहत जे तोरा पलटने हम थोड़े पलटबौ..! असथिर होइते रश्मिक मनमे विचार जगलैन। दुखक दबाइ नोर छी। पैघ-सँ-पैघ दुख लोक नोरक धारमे बहा वैतरणी पार करैए। बजली- “जहिना अहाँक मनमे उठि रहल अछि तहिना हमरो मनमे रंग-बिरंगक बात उठि रहल अछि। कहाँ रविशंकरक पत्नी किरण राजरानी आ कहाँ हम..? कहाँ राधाक संग कृष्ण आ कहाँ..! काल्हि धरि दुनू गोरे एकठाम बैस एक थारीमे खेबो करै छेलौं आ एक्के गिलासमे पानियोँ पीबै छेलौं मुदा आइ संभव अछि? आखिर किए?” हवाक तेज झोंकमे जहिना डारि-डारिक पात डोलि-डोलि एक-दोसरमे सटबो करैत आ हटबो करैत तहिना पत्नीक डोलैत विचार सुनि रविकान्तो डोलए लगला। एक तँ पहिनेसँ रविकान्तक मन डोलि रहल छेलैन तैपर पत्नीक विचार आरो डोला देलकैन। अनभुआर जगह पहुँचलापर जहिना सभ हरा जाइत तहिना रविकान्त हेरा गेला। औनाइत बजला- “कानसँ सुनितो आ आँखिसँ देखितो किछु बुझि नै पाबि रहल छी जे की नीक की अधला! की करी की नै करी से किछु ने फूरि रहल अछि। साठि बर्खक संगीकेँ एते दूर केना बुझब? मुदा लगो केना बुझब? साठि बर्खक पथिक-संगी जँ आब दू दिशामे चली तखन केते दूरी हएत, साठि बर्खक जिनगियो तँ छोट नै भेल।” बिच्चेमे रश्मि टपैक पड़ली- “जिनगी तँ एक दिन, एक क्षण वा एक घटनामे बदैल जाइए आ साठि-बर्ख की धो-धो चाटब!” “तखन?” “सएह नै बुझि रहल छी। एतेटा जिनगी एक संग बितेलौं मुदा आइ जइ जिनगीमे पहुँच गेल छी तइ जिनगीक सम्बन्धमे किछु विचार कहियो नहि केलौं।” जहिना आन गामक चौबट्टी, तीनबट्टीपर पहुँचते भक्क लगि जाइत, जइसँ पूब-पच्छिमक दिशे बदैल जाइत तहिना पत्नीक बात सुनि रविकान्तकेँ भेलैन। मुदा एहनो तँ होइते अछि जे ओहने चौबट्टी आकि तीनबट्टीपर भक्क खुजितो अछि। ओना रविकान्तक भक्क तेना भऽ कऽ तँ नहि खुजलैन मुदा एक प्रश्न मनमे जरूर उठलैन- बच्चासँ सियान भेलौं, सियानसँ चेतन भेलौं, चेतनसँ बुढ़ाड़ीक प्रमाणपत्र भेट गेल। हरबाह थोड़े छी जे अधमरुओ अवस्थामे बुढ़ाड़ीक प्रमाण नइ भेटत। मुदा मन किए धकधका रहल अछि? जिनगीक चारिम अवस्था वानप्रस्थक होइ छै, संयासीक होइ छै जे दिन-राति दौगैत दुनियाँक हाल-चाल जानए चाहैए। से कहाँ मन मानि कऽ बुझि रहल अछि..? पतिकेँ गंभीर अवस्थामे देख रश्मि बजली- “अहाँक मनमे जे नाचि रहल अछि वएह हमरो मनमे नाचि रहल अछि। मुदा ईहो बात तँ झूठ नहियेँ छी जे जिनगीक संग बाटो बनै छइ आ बाटे संग बटोहियो बाट बनबै छइ?” तैपर रविकान्त बजला- “की बाट?” पतिक प्रश्न सुनि रश्मि विह्वल भऽ गेली। मनमे उठलैन- हेराइत संगीकेँ बाट देखाएब बहुत पैघ काज छी। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे तखन अपने किए एते वौआइ छी? कम-सँ-कम चाह पीबैकाल बैसारियोमे ऐ बातक विचार करैत अबितौं तँ औझुका जकाँ नहि वौऐतौं, जहिना जोतल आ बिनु जोतल खेतमे चललासँ पहिने धड़ियाइ छै, धड़ियेला पछाइत पतियाइ छै, पतिएला पछाइत पेरियाइत पेरा बनै छै आ वएह एकपेरिया बहुपेरिया बनैत चलै छइ...। रश्मि बजली- “अहाँ कौलेज छोड़ला उत्तर जिम्मा उठा सरकारी बाट पकैड़ साठि बर्ख पूरा लेलौं। ने कहियो जमीन दिस तकैक जरूरत महसूस भेल आ ने तकलौं। मुदा आइ तँ ओतइ उतैर आबि गेल छी जेकर रस्ता अखन धरिक रस्तासँ भिन्न अछि।” पत्नीक विचार सुनि रविकान्त मुड़ी डोलबैत आँखि उठा कखनो पत्नीक आँखिपर रखैथ तँ कखनो धरती दिस ताकए लगैथ। आगिपर चढ़ल कोनो बरतनक पानि जहिना निच्चाँसँ ताउ पाबि ऊपर उठि उधियाइक परियास करैत तहिना रविकान्तक वैचारिक मन उधियाइक परियास करए लगलैन। मुदा जहिना पिजराक बाघ पिजरेमे गुम्हैर कऽ रहि जाइत, तहिना आइ धरिक जे मन रूपी बाघ एहेन शरीर रूपी पिजरामे फँसि गेल छेलैन जे जेते आगू मुहेँ डेग उठबैक कोशिश करैथ ओते समुद्री वादल जकाँ आस्ते-आस्ते ढील होइत रहैन। आगूक झलफलाइत बाट देख रविकान्त बजला- “विचारणीय बात जरूर अछि, मुदा बिनु बुझल जिनगीक संग तँ अहुँक जिनगी चलल कहाँ केतौ बेवधान भेल। आइ जे कहलौं ओ तँ ओहू दिन कहि सकै छेलौं, जइ दिनसँ बहुत आगू धरि बढ़ि गेलौं। से तँ रोकि कऽ मोड़ि सकै छेलौं। मुदा आइ तँ जानल-बिनु जानल दुनू संगे वौआए चाहै छी!” पतिक बात सुनि रश्मि मने-मन विचार करए लगली जे दुनियाँमे एहनो लोकक कमी नै अछि जेकरा जरूरत भरि लूरि-बुधि नै छै, मुदा ईहो तँ झूठ नहि, जे जेकरा छेबो करै ओइमे बेसी ओहने अछि जे या तँ उनटा वाण चलबैए वा नहियेँ चलबैए। तखन सुनटा वाण केना आगू बढ़त आ जँ बढ़बे करत तँ केते आगू बढ़त जेकरा आगू दुश्मन जकाँ चौबगली उनटा वाण घेरने अछि? मुदा कोन उपाय अछि, जखन शुद्ध तेल-मोबिल देल मजगूत इंजनो चढ़ाइपर दम तोड़ए लगैए आ टुटलो चक्का रहैत बिनु तेलो-मोबिलक गाड़ी भट्ठा गरे दौड़ैत रहैए जइमे बिनु ब्रेकक गाड़ी जकाँ केतेकेँ जानो जाइए आ केतेकेँ मुहोँ-कान फुटै छइ? रश्मिक मन कहलकैन- डेग आगू उठाएब जरूर कठिन अछि। मुदा लगले मनमे फेर उठलैन- जइ बाटकेँ पकैड़ आइ धरि चललौं जँ ओइ बाटकेँ छोड़ि दोसर बाट पकैड़ नव बटोही जकाँ विदा होइ, ई तँ संभव अछि। जहिना चिन्हार जगहक चोर पड़ा दूर देश जा अपन क्रिया-कलाप बदैल लइए आ नव-मनुखक जिनगी बना जीबए लगैए...। वाण लगल पंछी जकाँ पतिकेँ देख रश्मि अपन अनुभवकेँ सान्त्वना भरल शब्दमे बजली- “जहिना अहाँक जिनगी तहिना ने हमरो बनि गेल अछि। जएह बुढ़ापा अहाँक सएह ने हमरो अछि। मुदा एकठाम तँ दुनू गोरे एक छी। एक्के दबाइक जरूरत दुनू गोरेकेँ अछि, तँए विचार दइ छी जे आब ने ओ रूतबा रहल आ ने ओकाइत, तखन जानि कऽ जहरो-माहूर खा लेब सेहो नीक नहि। मनकेँ थीर करू।” रश्मिकेँ आगूक बात पेटेमे घुरियाइत रहैन तइ बिच्चेमे रविकान्त बजला- “बेसी दुख तँ नै बुझि पड़ैए मुदा साठि बर्खक प्रोढा अवस्था धरि हमरा सबहक नजैर नइ गेल! जखन कि सरकारक पैघ काजक जिम्मामे सभ दिन रहलौं। समयानुसार काज करितो अपन जिनगी तँ सुरक्षित रखितौं। साठि बर्खक पछाइतो तँ चालीस बर्ख जीबैक छल। जखन कि ईहो तँ जनिते रही जे पछाइत दरमाहा टुटि जाएत आ जिनगीक आवश्यकता बढ़ैत जाएत।” पतिक विचारकेँ गहराइत समुद्र दिस जाइत देख मुँहक दसो वाण साधि रश्मि छोड़लैन- “अनेरे मनमे जुड़शीतलक पोखैरक पानि जकाँ घोर-मट्ठा करै छी। ओना, घोरे मट्ठा ने घीओ निकालैए आ अन्है सेहो निकालैए। संयासी सभ केना फटलाहा कम्मल सबहक मोटरी बान्हि कन्हामे लटका लइए आ सौंसे दुनियाँ घुमैए। अहाँकेँ तँ सहजे चरि-चकिया गाड़ी चलबैक लूरियो अछि।” पत्नीक विचार सुनि रविकान्त ओझरा गेला जे एक दिस संयासीक बात बाजि कहि रहल छैथ जे जहिना कानूनी अधिकारसँ जीवन-रक्षा होइए तहिना ने संयास अवस्था–माने वानप्रस्थ अवस्था– पवित्र मनुखक नैतिक अधिकार सेहो छी। आ दोसर दिस चरिचकिया गाड़ीक चर्च सेहो करै छैथ जे भरिसक अपनो लगा कऽ कहै छैथ..! संगी देख रविकान्त दहलाए लगला। जहिना कोसी-कमलाक बाढ़िमे भँसैत घरपर बैस घरवारी बंशियो खेलाइत आ कमला-कोसीक गीतो गबैत तहिना विह्वल भऽ रविकान्त बजला- “हँसी-चौल छोड़ू। आब कोनो बाल-बोध नै छी। आबो जँ समाजिक जीवन नै बनाएब तँ देखते छिऐ जे मनुख एकदिस चान छुबैए आ दोसर दिस सीकीक वाणक जगह बम-वारूद लऽ मनुखक बीच केहेन खेल दुनियाँमे खेला रहल अछि। खाएर, ओते सोचैक समए आब नइ रहल। जेकर तिल खेलिऐ ओकरा बहि देलिऐ। अपन चालीस बर्खक जिनगी अछि, ने हमर कियो मालिक आ ने हम केकरो मालिक छिऐ। भगवान रामकेँ जहिना अपन वानप्रस्थ जीवनमे अनेको ऋृषि-मुनि, योगी-संयासी सभसँ भेँट भेलैन आ अपनो जा-जा भेँट केलखिन। तहिना ने अपनो दोसराक ऐठाम जाइ आ ओहो अपना ऐठाम आबए। मुदा विचारणीय प्रश्न ई अछि जे रामकेँ के सभ भेँट करए एलैन आ किनका-किनका ओतए भेँट करए ओ स्वयं गेला। ई प्रश्न मनमे अबिते गाछसँ खसल पघिलल कटहर जकाँ रविकान्तक मन छँहोछित्त भऽ गेलैन। छँहोछित्त होइते जहिना खोंइचा-कमरी एक दिस होइत कोह उड़ि कऽ कौआ आगू पहुँच जाइत, आँठी छड़ैप-छड़ैप बोन-झारमे बच्चा दइ दुआरे जान बँचबैत आ नेरहा उत्तर-दछिने सिरहाना दऽ पड़ल-पड़ल सोचए लगैत जे जेते पकबह तेते सक्कत हेबह तँए समए रहैत भक्ष बना लएह नहि तँ दुइर भऽ जेबह तहिना रविकान्त सोचैत-सौचैत जेना अलिसाए लगला तहिना हाफी-पर-हाफी हुअ लगलैन। पतिकेँ हाफी होइत देख रश्मिक मनमे उठलैन जे हाफी तँ निनियाँ देवीक पहिल सिंह-दुआरिक घन्टी छी। भने नीक हेतैन जे सुति रहता, नहि तँ ऐ उमेरमे जँ नीन उड़लैन तँ अनेरे सालो-महिनेमे बदैल जेतैन। फटकैत रश्मि बजली- “जेते माथ धुनैक हुअए वा देह धुनैक हुअए अपन धुनू। हमर जे काज अछि तइमे हम बिथूत नै हुअ देब। हमरा लिये तँ अहीं ने सभ किछु छी।” तीन साए घरक बस्ती बसन्तपुर। छोट-नमहर चालीसटा किसान परिवार गाममे शेष सभ खेत-बोनिहारसँ लऽ कऽ आनो-आनो रोजगार कऽ जीवन-बसर करैबला। अनेको जाति गाममे, जइमे मझोलका किसान बेसी। ओकरो सबहक दशा-दिशा भिन्न-भिन्न। तेकर अनेको कारणमे दूटा प्रमुख। जइसँ विधि-बेवहारमे सेहो अन्तर। किछु जातिक लोक अपने हाथे हरो जोइत लैत आ खेतक काजो करैत, जइसँ आमदनीक बँचतो होइत आ किछु एहनो जे अपने हाथसँ काज-उदम नै करैत तँए बँचत कम। कम बँचत भेने परिवार दिनानुदिन सिकुड़ैत गेल। ओना गामक बुनाबट सेहो भिन्न अछि। एक तँ ओहुना दू गामक बुनाबट एक रंग नहि, तेकर अनेको कारणमे प्रमुख अछि, खेतक बुनाबट, जनसंख्या आ जाति इत्यादि। बसन्तपुर गामक बुनाबट आरो भिन्न। ऊँचगर जमीन बेसी आ निचरस कम जइसँ गाछी-बिरछी सेहो बेसी अछि आ घर-घराड़ी, रस्ता-पेरा सेहो ऐल-फइल अछि। बसन्तपुरमे दूटा नमहर किसान अछि। नमहर किसान परिवार रहने गामोक आ अगल-बगलक आनो गामक लोक जेठरैयती परिवारो बुझैत आ जेठरैयत कहबो करैए। राजक जमीन्दार तँ नहि, मुदा गमैया जमीन्दार सेहो किछु गोरे बुझैत। तेकर कारण जे दुनूक महाजनियोँ चलैत आ गामक झड़-झंझटक पनचैतियो करैत। कनी-मनी अनचितो काजकेँ गामक लोक अनठा दइत। तइमे राधाकान्त आ कुसुमलालक जमीनक बुनाबट सेहो भिन्न। चौबगली टोल सभ बसल अछि आ बीचक जे तीस-पैंतीस बीघाक प्लॉट छै ओ मध्यम गहींर अछि। जइसँ अधिक बर्खा भेने नाला होइत पानिक निकासी कऽ लैत आ कम भेने चौबगलीक ओहासीसँ रौदियाहो समैमे जमीन उपजिये जाइत। ओना दुनू गोरे बोरिंग सेहो गड़ौने छैथ तँए रौदियाहो समए भेने खेतक लाभ उठाइए लइ छैथ। पच्चीस-तीस बीघाक बीचक दुनू किसान छैथ। दुआरपर बखारियो आ पोखैरक महारपर दू-सलिया-तीन-सलिया नारोक टाल रहिते छैन। राघाकान्तो आ कुसुमलालोक परिवारक बीच तीन पुश्तसँ ऊपरेक दोस्ती रहल छैन। ओना दुनू दू जातिक छैथ, मुदा अपेक्षा-भाव एहेन छैन जे चालि-ढालिसँ अनठिया कियो नहि ई बुझि पबैत जे दुनू दू जातिक छैथ। किएक तँ कोनो काज-उदेममे एक-दोसराक बाले-बच्चे एक-दोसरठाम अबैत-जाइत रहल छैथ। तेतबे नहि, कुटुम-परिवार जकाँ दुनू परिवारक बीच कपड़ा-लत्ताक वर-विदाइक चलैन सेहो अछि। मुदा तैयो सराध-बिआह आदि परिवारिक काजमे दुनूक दू जातिक परिचय भाइये जाइ छैन। नमहर भुमकम होइसँ पहिने जहिना नहियोँ होइबला बच्चा सबहक जन्म भऽ जाइ छै जइसँ दोस्तियारेक संभावना अनेरो बढ़ि जाइ छै मुदा से नहि, राधाकान्त आ कुसुमलाल–दुनू गोरे–केँ एक्के दिन बेटा भेलैन। ओना कियो-केकरो ऐठाम जिगेसा करए नै गेला तेकर कारण भेल जे अपने-अपन घर ओझरा गेलैन। ओना, पमरिया-हिजरनी महिना दिन तक दुनू परिवारमे दौग-बड़हा करैत रहल। रवि दिन जन्म भेने दाइयो-माइ छठिहारे दिन एकक नाओं ‘रविकान्त’ आ दोसराक नाओं ‘रविशंकर’ रखि देलखिन। अनेरे किए फूलक बोनमे आकि साँप-कीड़ाक बोनमे टहैलतैथ। बोन तँ बोने छी, दुनूक छी। तँए हरहर-खटखटसँ नीक दिनेकेँ पकैड़ लेलैन। ओना एकटा आरो केलैन जे दुनूमे सँ कियो जातिक पदवी नै लगौलैन। सुभ्यस्त परिवार रहने तीन बर्खक पछाइतिये स्कूल जाइ-जोकर दुनू भऽ गेल मुदा चारिम बर्खमे दुनूक नाओं गामेक स्कूलमे लिखौल गेल। ओना जेहने सोझमतिया राधाकान्त तेहने कुसुमलालो, मुदा नाओं लिखबै दिन रविकान्तक पिता गेलखिन आ राधाकान्त अपने नै जा भायकेँ पठौलखिन। पित्ती एक बर्ख घटा कऽ रविशंकरक नाओं लिखा देलखिन। ओना राधाकान्तकेँ स्कूलपर जेबाक मनो नहियेँ रहैन। किएक तँ स्कूल सबहक जे किरदानी भऽ गेल ओ देखै-जोग नै अछि। शिक्षक सभ विद्यार्थीकेँ नहियेँ पढ़ैले प्रेरित करै छैथ आ नहियेँ पढ़ैक जिज्ञासा जगा पबै छथिन, छड़ी हाथे पढ़बए चाहै छथिन। एक तँ एकरंगाह परिवार तहूमे दोस्ती। दुनू गोरे तेहेन चन्सगर जे गामेक स्कूलसँ पटका-पटकी करैत निकलल। पटका-पटकी ई जे एक साल रविकान्त फस्ट करैत तँ दोसर साल रविशंकर, ओना हाइ स्कूलमे थोड़े गजपट भेलै, स्कूलक शिक्षक आँकि लेलैन जे केतबो ऊपरा-ऊपरी छै तैयो सोचन-शक्तिमे दुनूक बीच अन्तर किछु जरूर छइ। कौलेज तँ बिना माए-बापक होइए, केकरा के देखत। मुदा ऑनर्सक संग दुनू गोरे प्रथम श्रेणीमे निकलल। आइ.पी.एस. कऽ दुनू गोरेक ट्रेनिंग आ ज्वानिंग सेहो भेल। दोस्तीमे बढ़ोतरी होइते गेल। ◌ शब्द संख्या : 2378 ‘उलबा चाउर’ कथा संग्रहक तेसर संस्करणसँ... [1] विचार [2] भगवतीक आराधनाक नवमी [3] प्रश्नक [4] उत्तर [5] विचारक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा- सदाचार क तावीज (मैथिलि लघु नाटिका) (ई नाटिका हरिशंकर परसाई जी क एकटा निबंध सं प्रेरित अछि ) सदाचार क तावीज (मैथिलि लघु नाटिका) पात्र: १. राजा (भानु प्रताप सकरवार) २. सूचना एवं प्रसारण मंत्री (महिला) ३.वित्त मंत्री ४. गृह मंत्री 5. महामंत्री 6. विशेषज्ञ (खट्टर झा) 7. शिष्य विशेषज्ञ-१ 8. शिष्य विशेषज्ञ-२ 9. साधू १०. शिष्य साधू -१ ११. शिष्य साधू -२ 12. कर्मचारी दृश्य - १ पृष्ठभूमि : (निगम देश में हल्ला मचल छल जे भ्रष्टाचार अनहद रुपे पसरि गेल अछि | ) राजा दरबार में चिंता के माहौल अछि | राजा(भानु प्रताप सकरवार) मंत्रीगण सं : हे हमर मंत्री रत्न गण ! प्रजा बहुत हरबिर्रो मचा रहल अछि जे पूरा चौहद्दी में भ्रष्टाचार पसैर गेल अछि ! मुदा हम त आई धरि ई वस्तु के नै देखलहुँ अछि | यदि अहाँ सब के कतौ देखना में आयल होय त बतायल जाउ | सूचना प्रसारण मंत्री : महाराज ! भ्रष्टाचार जखन हुजूरे के नजैर में नै आयल, त हमारा लोकैन के कोना क देखयात ? राजा(गदगद भाव सं): ईह ! एहन कोनो बात नै अछि, सूचना मंत्रीजी ! कखनो काल जे हमारा नजैर में नै आबैत हेतै ओहो त अहाँ सभ के देखना में आबैत होयत की ने | जेना मानि लिय जे हमरा त खराप सपना कखनो नै देख में आबै अछि , मुदा अहाँ सब त खरापो सपना देखैत हेबै ! वित्त मंत्री : जी देखैत छी महाराज | मुदा ओ त स्वप्न के बात अछि की ने | राजा : से बुझलौं, तथापि अहाँ सब सगरो राज्य में खोज पर निकलु आ पता करू जे कतौ भ्रष्टाचार त नै अछि | जौं कतौ भेट जाय त हमरा देख लेल नमूना नेने आयब | हमहुँ त देखी की आखिर ई भ्रष्टाचार होइ केहन अछि ! गृह मंत्री (चाटुकार अंदाज में) : हुजूर ओ हमरा सभ के नै देखा सके अछि | सुनबा में आयल अछि जे ओ बड्ड महीन होइ अछि | हमरा सब के नजैर के त अहाँक विराटता देख के एतेक अभ्यास भ गेल अछि जे महीन वस्तु हमरा सब के देखाइते नै अछि | राजा (गंभीर होइत) : तखन फेर की करल जाय ? महामंत्री : महाराज ! अपनेक राज्य में एकटा जाति रहै अछि जिनका विशेषज्ञ कहल जाइ अछि | एहि जाति वर्ग के लग किछु एहन ऐनक होइ अछि जकरा अपन आइङ्ख पर लगा क ओ सब सूक्ष्म सं सूक्ष्म वस्तु के भी देख लैत अछि | अस्तु, सरकार सं ई निवेदन अछि जे ई विशेषज्ञ जातिए के कोनो लोक के हुजूर ई भ्रष्टाचार के खोजय के काज सौंपैथ | राजा (हुक्म देइत) : बेस त ठीक अछि | विशेषज्ञ जाति के एकटा समिति गठित करल जाय आ हुनका राज दरबार में उपस्थित होय के आज्ञा देल जाय | दृश्य - २ द्वारपाल : महाराज के जय होय ! महाराज ! विशेषज्ञ खट्टर झा अपन समिति सदस्य सहित महाराज के दर्शन के अभिलाषी छैथ | राजा (प्रशन्न होइत) : हुनका सभ के ससम्मान उपस्थित कैल जाय | (द्वारपाल चल जाइ अछि | खट्टर झा के चेला सहित प्रवेश ) खट्टर झा (चेला सहित) : प्रणाम महाराज ! राजा : प्रणाम महोदय ! महोदय, जनता हरबिर्रो मचेने अछि जे राज्य में चौतरफा भ्रष्टाचार पसरल अछि | अस्तु हम जानै चाहै छी जे ई भ्रष्टाचार केहन होइ अछि ? की अहाँ के कतौ भ्रष्टाचार भेंटल अछि? खट्टर झा : जी महाराज कतेको रास भेंटल अछि | राजा (हाथ बढबैत) : अच्छा ! त लाउ देखाबू त | देखी त केहन होइ अछि ई भ्रष्टाचार ? खट्टर झा : सरकार, ओ हाथ के पकड़ में आब वाला नै अछि | ओ स्थूल नै अछि परंच सूक्ष्म अछि, अगोचर अछि | मुदा ओ सर्वत्र अछि | ओकरा देखल नै जा सकै अछि, बस अनुभवे टा कैल जा सकै अछि | राजा (सोच में पड़ैत) : मुदा महोदय ! सूक्ष्म , अगोचर आ सर्वव्यापी भेनाइ त ईश्वरक गुण अछि ! त की भ्रष्टाचार ईश्वर अछि ? चेला १ : जी हं महाराज ! बेस कहलौँ आब भ्रष्टाचार बुझू त ईश्वरे भ गेल अछि | सूचना एवं प्रसारण मंत्री : मुदा ओ अछि कत ? आ ओकर अनुभव कोना क कैल जाय ? खट्टर झा (झौंक में) : ओ सर्वत्र अछि | एहि भवन में अछि | महाराज के सिंहासन में अछि .... राजा (सिंहासन सं उछलैत्त ): सिंहासन में अछि .....! चेला २ : जी हाँ महाराज, अहाँक सिंहासन में | पिछला महीना में एहि सिंहासन में रंग-रोगन करय के लेल जे बिल के भुगतान कैल गेल छल ओहि में सं आधा त अहाँक मंत्री सभ के ख़ास लोक सब खा गेल अछि | खट्टर झा (बीचमे चेला के बिगड़ैत) : दूर बूड़ी ! तोरा बीच में बजनाइ जरुरी छौह | (विशेषज्ञ के बात सुन के बाद राजा बड्ड चिंतित भ गेलाह आ संगहि मंत्री सब के कान सेहो ठाढ़ भ गेल ) राजा : ई त बड्ड पैघ चिंता के गप्प अछि ! खट्टर महोदय, हम ई भ्रष्टाचार के बिलकुल जैड़ सं मेटाब चाहै छी | की अहाँ सब एकरा मेटाब के कोनो उपाय बता सकै छी जे ई कोना क मेटायत ? खट्टर झा : जी हाँ महाराज | ऐ के लेल अपनेक एकटा योजना तैयार कर के होयत | भ्रष्टाचार मेटाब के लेल महाराज के व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर के पड़त | कोन कोन एहन कारण सब अछि जै खातिर मनुष्य भ्रष्टाचार में लिप्त रहै अछि ई सब विचार कर पड़त | राजा : बेस, त ठीक अछि | अहाँ अपन योजना आ विचार सब के एकटा रिपोर्ट बना क अगिला तीस दिन के भीतर प्रस्तुत करू | खट्टर झा : जे महाराज के आज्ञा | ((चेला सहित प्रस्थान करै छथि ) दृश्य - ३ (दरबार में दरबारी सब बैसल छैथ |) राजा: महामंत्री जी | की भेल, आई तीस दिन पुरल जा रहल अछि मुदा एखन धरि विशेषज्ञ खट्टर झा समिति अपन रिपोर्ट नै प्रस्तुत केलाह अछि ? (तखने खट्टर झा के चेला समेत प्रवेश) खट्टर झा : बंदा हाजिर अछि सरकार | ई लिय महाराज, ११०१ पृष्ठक ई रिपोर्ट | राजा (आश्चर्य सं चकित होइत) : एत्तेक मोट रिपोर्ट ! खट्टर झा : जी महाराज | हमर समिति दिन रात्रि मेहनत आ रिसर्च क क ई रिपोर्ट तैयार केलक अछि | महाराज, समिति भ्रष्टाचार के कारण, तरीका आ निवारण के व्रिस्तृत अध्ययन आ शोध क क ई रिपोर्ट तैयार केलक अछि | भ्रष्टाचार के बहुत रास दृश्य आ अगोचर कारण सभ अछि | राजा : जेना किछु दृष्टान्त दिय | खट्टर झा : जेना में की बेसिर पैरक विज्ञापन सब के बाढ़ि आबि गेल अछि जेकरा हम-अहाँ उपभोक्ता संस्कृति के नाम द देने छी मुदा एहि में भ्रष्टाचार के बीज सेहो छुपल अछि | राजा : उपभोक्ता संस्कृत्ति ! से कोना ? खट्टर : सरकार, उदहारण के लेल एकटा विज्ञापन लेल जाउ जाहि में देखबै अछि जे अमुक ब्राँडक कपड़ा पहिराला सं मुर्ख आ उदंड टाइप छौंड़ा के छोड़ी सब घेरने ठाढ़ अछि आ बगल में साधारण कपड़ा पहिरने एकटा सीधा-सदा युवक हीन भावना सं ग्रसित भ रहल अछि | कखनो विज्ञापन में ई नै देखना में आयल अछि जे फलाना ब्रांड के कपड़ा पहिरला सं बालक कतेक चरित्रवान बनि गेल अछि | आ की बुधन कक्षा में प्रथम आबै अछि कियेकी ओ फलाना ब्रांड के जूता पहिरै अछि | महाराज, एहि तरहक विज्ञापन सब साधारण परिवार के बच्चा सब में कुंठा उत्पन्न क रहल अछि आ ओकरा सभ के भ्रष्टाचार के तरफ आकर्षित कय रहल अछि | महाराज, एकटा सज्जन हमरा कहै छलैथ जे की हुनकर बालक गाड़ी के लेल जिद्द केने छैथ | मना केला पर की अपन ओकाइत नै अछि ओ उत्तर देलैथ जे भुटकुन के बाबू ओकरा कोना गाड़ी दिएलखिन | उत्तर में जखन सज्जन कहलखिन जे भुटकुन के बाप त घूसखोर अछि त बालक पलैट क जवाब देलखिन जे - अहाँक ईमानदारी के फायदे की जखन अहाँ बाइको नै दिया सकै छी ! आई-काल्हि के बालक-बालिका सब के ईमानदार बाप निकम्मा लाग लागल अछि हुजूर | राजा (गंभीर मुद्रा में) : हूँ | दोसर कारण | खट्टर झा : एकटा अन्य कारण शिक्षा के व्यवसायीकरण अछि महाराज | राजा : से कोना ? खट्टर : महाराज आई काल्हि इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट, लॉ आदि के पढ़ाई के लेल निजी क्षेत्र में जे संस्थान सब खुजि रहल अछि ओहि में स अधिकतर के एकमात्र ध्येय व्यावसायिक लाभ कमेनाइये रहि गेल अछि | एहि संस्थान सब में छात्र सभ सं पैघ रकम डोनेशन के नाम पर ल क प्रवेश देल जाइ अछि | आब घूस के बीया सं त बैमानी आ भ्रष्टाचारे के फसल ने तैयार हेतै यौ सरकार ! राजा : हुंह | बेस कहलौँ तथापि शिक्षा के विकास के लेल त निजी शिक्षा संस्थान आवश्यक सेहो अछि | खट्टर झा ; अरे सरकार, आशय एत शिक्षा के शुद्ध लाभक व्यवसाय बनाब से अछि | प्राथमिक सं ल क उच्च शिक्षा तक बच्चा सब के केवल लाभ कमब के ट्रेनिंग देल जा रहल अछि | शिक्षा में नैतिक सामाजिक आध्यात्मिक मूल्य के नितांत अभाव प्राथमिक स्तर सं देखना जाइ अछि आ उच्च शिक्षा में त ई विलुप्ते बुझू | राजा : हुंह | अन्य कारण ? खट्टर : एकटा अन्य पैघ कारण अछि भ्रष्टाचारी सभ के सामाजिक स्वीकार्यता आ प्रतिष्ठा सरकार | राजा (विष्मय से) : अर्थात ? खट्टर: हुजूर अपने जे राज्य के जनता के भलाई के लेल, ख़ास क क वंचित वर्ग के लेल जे मिड डे मिल, ए.एन.एम, आशा, आंगनवाड़ी, मनरेगा आदि सामाजिक आ आर्थिक भलाई के योजना सब शुरू केलौ अछि, एहि सब में कार्यरत भ्रष्ट कर्मी सब जे अछि से सब एहि योजना के राशि सं बड़का कोठा, गाडी आ सम्पइत ठाढ़ क लेलक अछि ओहि सम्पइत के वजह सं हिनकर सब के समाज में इज्जत आ प्रतिष्ठा बैढ़ जाइ अछि | ईमानदारी से पढ़ाबय बला मास्टर सब के कोनो पूछ नै अछि मुदा जे मास्टर इस्कूलक मुंह देखने बिना दरमाहा हठबाई अछि आ पंचायत-प्रखंड में जा क नेतागिरी आ वन टू का फॉर करै छथि हुनकर बड्ड नाम भ रहल अछि | एतबे नै सरकार कतेको कुप्रथा सब सेहो एहने लोक सब के कारण प्रतिष्ठा के विषय बनि गेल अछि | जे जतेक बेसी तिलक-दहेज़ देइत-लैत अछि समाज में ओकर ओत्तेक बेसी मान-प्रतिष्ठा होइ अछि | स्वाइत लोक सब विवाह-दान, दहेज़-लेन-देन आदि के लेल भ्रष्ट तरीका सं बेसी सं बेसी धन कमब में प्रवित्त भेल अछि | ई सब सुनैत सुनैत राजा साहब के माथ दुखाय लगलन (ओ माथ पर हाथ धरैत बीच में बात काटैत बजलाह : ठीक अछि महोदय अहाँ अपन रिपोर्ट देने जाउ । मंत्री मंडल एकर अध्ययन क उचित कार्यवाही करता । (खट्टर झा रिपोर्ट सौंप क ओतय सं विदा होयत छैथ ) दृश्य ४ राजा (चिंतित मुद्रा में ) सूचना एवं प्रसारण मंत्री : चिंता के कारण अहाँक स्वास्थ्य दिनोदिन खराब भेल जा रहल अछि महाराज | ओ विशेषज्ञ सरबा सब अहाँके अनेरे झंझट में फंसा देलक | राजा : हाँ, आइकाल्हि हमरा राति-राति धैर चिंता के मारल निन्न नै आबै अछि | की करी ना करी किछु फुरा नै रहल अछि | वित्त मंत्री : मार बाढ़ैन ध क | एहन रिपोर्ट के त आइग लगा देब के चाही जेकरा चलते महाराज के नींद में खलल पड़ै | राजा : लेकिन करी की ? अहों सब त रिपोर्ट के अध्ययन केलहुँ अछि | अहाँ सब के की राय-विचार अछि ? की ऐ रिपोर्ट के अमल में लाब के चाहि ? गृह मंत्री : ई योजना की अछि एकटा मुसीबत अछि सरकार | एकरा जों लागू करै के चेष्टा करी त सबटा व्यवस्थे में उलट फेर भ जायत | अपने सब के किछु एहन कर के आवश्यकता अछि जाहि सं व्यवस्था में बिना किछु उलट फेर केनेहे भ्रष्टाचार समाप्त भ जाय | राजा : हमहुँ त इहे चाहै छी | मुदा से संभव कोना के होय ! हमर परबाबा के त जादूओ टोना आबै छलैन मुदा हमरा त ओहो नै आबै अछि | (तखने महामंत्री के एकटा साधू समेत प्रवेश ) महामंत्री (हर्षित मुद्रा में) : महाराज अहाँ चिंता जुनि करू | अहाँक समस्या के समाधान हम ल क एलहुँ अछि | राजा : से की यौ ? जल्दी बाजू | हमारा सब्र नै अछि एही मामिला में | महामंत्री : सरकार हम अपना संगे ई महान साधक के जोहने एलहुँ अछि जे कइएक वर्ष धरि खोज आ तपस्या के पश्चात सदाचारक तावीज बनौलैथ अछि जे मन्त्र सं सिद्ध कैल गेल अछि आ जेकरा बांधला सं मनुष्य स्वत: सदाचारी भ जाइ अछि | (साधू अपन झोरा सं तावीज निकालि क राजा के दैत अछि | ) राजा: हे महात्माजी एहि तावीज के विषय में हमरा विस्तार से बुझाउ | साधू (दार्शनिक अंदाज में ) : हे राजा, भ्रष्टाचार आ सदाचार मनुष्य के आत्मा में वास करै अछि ; विधाता मनुष्य गढ़ई काल में आत्मा में एकटा यंत्र फिट क दैत छैथ जाहि में सं ईमान अथवा बैमानी के स्वर निकलै अछि , जेकरा आत्मा के पुकार कहल जाइ अछि | त प्रश्न ई उठै अछि जे जिनका आत्मा सं बैमानी के स्वर उठै अछि ओकरा दबा क ईमान के स्वर कोना निकालल जाय ? एहि विषय पर कइएक वर्ष धरि शोध आ तपस्या के पश्चात हम ई तावीज बनेबा में सफल भेलौ महाराज | जै मनुष्य के बाँहि पर ई बान्हल रहत ओ सदाचारी बैन जायत | राजा : मुदा एकर की गारंटी ? साधू: महाराज ई तावीज टेस्टेड अछि | हम एकर प्रयोग बिलाड़ियो पर क क देखने छी | ई तावीज बन्हला सं बिलाड़ियो रोटी नै चोरबई अछि | येह ई तावीज के खासियत अछि महाराज | (दरबारी सब उठी उठी क तावीजक तजबीज कर लागै छैथ ) राजा (प्रसन्न मुद्रा में हाथ जोड़ैत ) : हम अपनेक बड्ड आभारी छी महात्मन | अपने हमरा घोर संकट सं उबारलहुँ अछि | हम सर्वव्यापी भ्रष्टाचार सं बड्ड परेशान छलहुँ आ एकरा रोक में असमर्थ भेल छलहुँ| मुदा हमरा एकटा नै अपितु करोड़ो तावीज चाहि | हम राज्य के तरफ सं तावीजक कारखाना खुलबा दैत छी आ अहाँ के ओकर सी.ई.ओ बना दैत छी | की औ मंत्रीगण ई प्रस्ताव पारित होय की ने ? वित्त मंत्री : मुदा एकर की आवश्यकता सरकार ! राज्य एतेक झमेला में किये परौ ! किएक नै एकरा लेल टेंडर निकालल जाय आ चुनिंदा एजेंसी सब के एकर ठेका द देल जाय | आ साधू महाराज सं ई फार्मूला के पेटेंट अधिकार राज्य के तरफ स अधिगृहीत क के ओहि कंपनी सब के द देल जाय | एहि सं अतिशीघ्र तावीज उत्पादन के कार्य संभव भ जायत आ राजदरबार एहि झंझट से सेहो उबरल रहत | राजा: ठीक अछि | साधू महाराज के उचित सत्कार कय के विदाय कैल जाय | आ हिनकर बौद्धिक सम्पदा ई तावीज फार्मूला के जनहित में राज्य के तरफ सं अधिगृहीत कैल जाय | आ यथाशीघ्र टेंडर के कार्य पूरा क के तावीज के उत्पादन शुरू कैल जाय | (अगिला दिनक अखबार के खबर - "सदाचार क तावीज के खोज | जल्दीये तावीज बनाब के फैक्ट्री खुजत आ जनता के तावीज मुफ्त उपलब्ध करैल जायत तथा नागरीय सुविधा लेब लेल तावीज पहिरनाई अनिवार्य कैल जायत ") (पटाक्षेप ) दृश्य - ५ राजा अपना आप सं : - सदाचार के तावीज त बनि गेल | आब एकदिन भेष बदैल क देखबाक चाहि जे ई ठीक ढंग सं काज करै अछि की नै | (फेर राजा भेष बदैल क एकटा कार्यालय पहुँचैत अछि ) ओतय एकटा कर्मचारी सं राजा : नमस्कार बड़ा बाबू | कर्मचारी : नमस्कार | कहु की सेवा कैल जाय | राजा : हुजूर हमर एकटा टेंडर पास होबय के अछि अहाँ एत सं | कर्मचारी : ठीक छै, टेंडर अखन प्रक्रिया में अछि | अगिला हफ्ता परिणाम आबि जायत | जे सबसँ योग्य उम्मीदवार हेथिन हुनका नाम सं टेंडर खुजत | राजा (5०० के नोट दैत ) : हे ई लिय हुजूर बच्चा सब के लेल मिठाई खातिर राखि लिय | नाचीज के बनवारी लाल कहल जाइ अछि बस एतेक ख्याल राखब | कर्मचारी ( डाँटे के मुद्रा में ) : बेशर्म ! लाज नै होय छह घुस दैत | भागै छह एतय सं की बजाबी पुलिस के | (राजा लंक ल क पराई छैथ | ) (किछु दिन बाद एक दिन फेर राजा ओहि कर्मचारी लग जाय अछि ) राजा (फेर से ५०० के नोट पकराबैत ) : हुजूर ई बाल-बच्चा के मिठाई खातिर राइख़ लिय | बस हमर टेंडर के ध्यान राखब | (एहि बेर कर्मचारी नोट राइख ले अछि ) राजा (क्रोधित होइत ) : हम अहाँक राजा छी | अहाँ घूस लैत रांगल हाथ पकड़ल गेलहुँ अछि | अहाँ घूस कोना क लेलहुँ ? की अहाँ सदाचारक तावीज नै बंधने छी ? कर्मचारी (डरे कँपैत स्वर में ) बांधने छी महाराज | ई देख लिय (देखबै अछि ) | (राजा आश्चर्य सं तावीज में कान लगबै अछि ) तावीज सं आवाज आबै अछि : "आई त ३० तारीख छै आई त ल ले नै त फेर आई कनियाँ आ बाल-बच्चा सब अपन अपन मांग ल क बेज्जत आ गंजन करतौ | ई सुनैत राता के तावीज के उत्पादन में गड़बड़ी के भान भ जाइ अछि आ ओ अपन माँथ पीट ले अछि | (पटाक्षेप ) प्रणव झा राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.राम विलास साहु- दू दर्जन कविता ३.३.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- गजल ३.४. राजीव रंजन झा-गजल आशीष अनचिन्हार २ टा गजल 1 जै ठाँ निबाह नै हेतै तै ठाँ उछाह नै हेतै रहतै समुद्र नुनगर आ पोखरि अथाह नै हेतै केना कहू जे किछु रहने दुनियाँ बताह नै हेतै किछु झूठ लेल मरलो सन सच तोतराह नै हेतै सभ साधनाक एकै फल जीवन कँचाह नै हेतै सभ पाँतिमे 2212+1222 मात्राक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ नियम शैथिल्यक कारण लघु मानल गेल अछि 2 छौ तोहर केहन करतूत सखी देखि जो कनी हमर सबूत सखी छै काँचे जौबन काँचे जीबन नेहो हुनकर काँचे सूत सखी बहुते झुकला टुटलापर लागल दुनियाँमे किछु नै निजगूत सखी हुनकर घिरना सहि बुझलहुँ जे हम्मर नेह कते मजबूत सखी नहिए रहलै विश्वासो लायक अनचिन्हरबा छै अवधूत सखी सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम विलास साहु- दू दर्जन कविता अनमोल जिनगी तूँ अमरुख अज्ञानी अभिमानी किए घुमै छँह डेगे-डेग ठक बैसल छौ गली-गलीमे लेतौ प्राण क्षणेमे अमती खेत बड़ी कठिनसँ मिलल छौ जिनगी धने देने छौ बनैले दानी सेवा खातिर जग मिलल छौ किए बैसल छँए बनि नदानी ज्ञान-विज्ञानकेँ अलख जगबैले कुकर्म छोड़ि सद्कर्म करैले जग बनतै अद्भुत कल्याणी सहए कहै छैथ पण्डितज्ञानी रे मुरख तूँ धीरज धरिहेँ कर्म पथ सत्यकेँ पकड़िहेँ तीनूलेाकमे नाम करिहेँ कर्मक फल उत्तम मिलतौ नाओं अमर अमृतरस पीब यमराजो तोरासँ दूरे रहतो स्वर्गक बाट खुजले भेटतौ हरि नाम हरि कथा अनन्ता जे जपत से अमरत्व पाबत अममोल जिनगी किए ठकाएत जीवन-मरणसं मुक्ति पाएत। ◌ मिथिलाक गुमान कोसी कमलाक रेठान तैपर बनल बलानक दलान बालुक बुर्जा बनल गाए महींसक बथान दूध-दहीक पेमौज होइए छाल्ही घीकेँ कियो ने पुछैए डारहीकेँ कुकुरो ने खाइए अल्हुआ होइए प्रात जलपान तिलकोरक पातक तरुआ प्रधान मरूआ रखने गरीबक मान मकइ गहुमक अछि छिगरीतान खा सुतैए ऊँचगर मचान गामे-गाम चाहक दोकान निठुर दूधमे चाह बनैए फिका पड़ैए मेबा मिष्ठान माछ-मखान महग भेल-ए मधु भेल-ए अमृत समान अपन खेती छोड़ि किसान परा रहल-ए जान-बेजान बेवस्था अछि अखनो बेइमान रावण कंसक राज चलैए केना भेटत ऐसँ त्राण ई छी मिथिलाक गुमान। ◌ हम किछ नै कहै छी हम किछ नै कहै छी तैयो कीए हमरे पुछै छी की कहब कहैत जलाइ छी सभ जनै छी सभ देखै छी बजैले कोइ ने चाहै छी नेता अभिनेतासँ सभ तवाह छी बेटाक नजैरबाप अपराधी छी नेता अभिनेता यार बनल-ए चोर सिपाहीपर भारी पड़ल-ए देशक खजाना अधिकारी लूटैए साधनक अभावमे खेत पड़ल-ए बेरोजगारीसँ लोक भूखे मरैए जन्मेसँ देशमे गरीबी भेटल-ए पुरुखा लगसँ शौगात मिलल-ए असन्तोषक बोखारमे सभ वौआइए दिन-राति सुनि अचरज लगैए की कहब ई दुखक बात जहरक घोँट पीब मरै छी हम किद नै कहै छी...। ◌ हमर टोल हमर टोल सभ दिन करैत रहल किलोल कोइ ने सुनलक आइ धरि हाकीम-हुकुम नै देखक दिन दुखियाकेँ ईश्वार सेहो बेमुखे रहल के करत हमर सहयोग बाढ़ि पानिसँ घेराएल लगैए नै बँचत हमर टोल छाती पीट-पीट बहबैए आँखिक नोर भँसिया गेल माल-जाल किदु नै बँचल अन्न-पानि धिया पुत्ताक के कहैए बुढ़बो बुढ़िया उगडुम करैए नवतुरियासँ जवनका धरि हिम्मत जुटा कऽ माल-जालकेँ बँचबैमे भीरल-ए पुरबा-पछिया झाँटि-बिहाड़ि हमरे टोलकेँ सतबैए जेना सभ दुख सहैले हमर टोल अगुआएल-ए नै कोनो रक्षा, अनुदान तखन केना हएत हमर ओलक उत्थान सभ मिलि संकल्प लेलौं अपन जन श्रमदानसँ टोलक करब ऊंच नाम सा मिलि दुखकेँ भगाएब टोलकेँ समृद्ध बनाएब अपन काजसँ आत्मनिर्भर हएब। ◌ खेतीक काज फाड़ पीट खेत जोति बैसाखक रौदमे हाड़ सुखाए जेठ मास मरूआ रोपि करैए कमठौन अखारमे धानक बीहैन पाड़ि सौन-भादो करैए कादो बिीहैन उपाड़ि रोपैए धान आसीन मास धानक कमौनी कातितमे करैए खेतक रखबारि अगहन-पुसमेकटनी-दौनी उपजल अन्न तैयार करैए साल भरिक उपजाकेँ भरैए कोठी-बखारी अपनो खाइए आनोकेँ खीबैए दाही-रौदी-ले बँचा राखैए समय पाबि अन्नदान कऽ खुशीमनसँ भण्ज्ञार करैए अपन परिश्रमपर भरोष रखि नै केकरोसँ आश करैए चास-बासपर करैए राज खेतीसँ सबहक पेट भरैए सभ दिन तियाग श्रम करैए देशक बढ़बैए मान-सम्मान सोचि चलु हे देशक इंसान खेतीक काज छी सभसँ महान किसान छी देशक असल सन्तान। ◌ मोह-माया सगरो माह-माया पसरल-ए मायाक बजार सजल-ए ठगिनियाँ माया-जाल पसाइर सभकेँ बान्हि-फँसा रहल-ए ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। सभ सज्जनदुर्जन नहि कोइ साधु सन्त महंथ कहबैए सज्जन साधु सन्त महंथ माया फँसि घुरिया रहल-ए ठो-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। लोभी सभ निरलोभी नै कोइ इमान बेचि इंसान कहबैए कुकर्मकेँ धरम-करम बुझि मोह-मायामे सभ घेराएल-ए ठामिे-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। ई जगत केना कऽ चलतै के नेकी इंसान कहेतै केना सभकेँ भेटतै त्राण माया देख कवि नोर बहबैए ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। ◌ सतघटिया बाट सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलै छी सात समुद्र जकाँ किए उनैट उधियाइ रहै छी जिनगीक असल बाट छोड़ि किए सतरंगी बनि जीबै छी सात घाट सात बाट पकैउ़ किए चलै छी। जिनगी केना सजि चलत से नै बान्हि चलै छी पानि वाणि छानि कऽ जिनगी किए ने जीबै छी झूठ-फुसक खेल खेला हानि नकिहानि करै छी सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलै छी। सुलभकेँ दुरलभ बुझि-बुझि उनटे नजैर सदिखन रखै छी पथ्य, कुपथ्य खा-खा कऽ नव-नव रोग सृजैत रहै छी सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलै छी। एक बाट एक उदेस पकैड़ चलैत जीबैत रहब मातृभूमिकेँ कर्मभूमि बुझि कर्मक पथपर चलैत बढ़ब सही ज्ञानक ज्योति जरा जगतकेँ जगमग करैत रहब सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलैत रहब। ◌ मिथिला महान पावन धाम मिथिला महान पावन धाम हमर छी असल पहिचान धान, पान, मखानक खान पान बढ़बैए सबहक सम्मान फूल-फड़केँ के पुछैए माछक होइए नीत खान पान पोखैर, खन्ता डेग-डेगपर नदी बहैए गामे गाम जगतमे होइए अमर गुनगान मिथिला महान पावन धाम। स्वर्गसँ सुन्दर जगतक मनोरम माटि-पानि हवा अमृत सन बाग-बगीचा फलवाड़ीमे फूल-फड़ लुभधल रहैए बाड़ी-झाड़ी फड़ल भरल-ए सभसँ गुणगर फड़ लताम चिड़ै-चुनमुन चहैक-चहैक कोइली बजैए मधुरतान जगतमे अछि बड़ नाम मिथिला महान पावन धाम। जड़ी-बुटीसँ भरल ई धरती औषधीक खान अदौसँ अछि घरे-घर पैघ-पैघ वैद्य बना रहल-ए उत्त दवाइ ऋृषि मुनीकेँ पहिलपपसीन रहल मिथिलाक पावन भूमि जैठाम मनुज अछि देव समान अपन ज्ञान बाँटि बाँटि जगतकेँ करैए कल्याण मिथिला महान पावन धाम। सरस्वती, लक्ष्मी, अन्नपूर्णा देवी सबरी सीता भारती सन नारी घर-घर, गामे-गाम बसैए ज्ञानी सन्त विद्वान भरल-ए दुनियाँकेँ दइए ज्ञज्ञन-विज्ञान जेतए जनता करैए श्रमदान घर-दलानमे भरल-ए धान अतिथिक सेवा देव समान जगतमेअछि अमर नाम मिथिला महान पावन धाम। ◌ चरण पूजव चरण पूजव हे जननी जन्मभूमि सुति-उठि चढ़ाएब चरणमे फूल जनम-करम तँ अहीं देलौं पालि-पोसि सपुत बनेलौं अहाँक सेवा बढ़ अनमोल केना साधाएब हम अहाँक कर्जा मनक भूल नै करैए कबुल ज्ञान विज्ञान दइ छी अद्भुत साए जनम सेवा करब हम नै करब जिनगीमे कहियो भूल चरण पूजव हे जननी जन्मभूमि सुति उठि चढ़ाएब चरणमे फूल। जननी जन्मभूमि हमर छी दाता दोसर नै अछि कोनो विधाता अहाँ छोड़1ि हम केकरा पूजब सभसँ पैघ माता अन्नदाता अहाँक ऋृण केना चुकाएब हम कोनो कसैर रहत हे माता साए बेर हम सिर झुकाएब अपन वलिदान दऽ ऋृण चुकाएब सभ कसूर माफ करब हे माता हम छी अहाँक नदान सन्तान चरण पूजव हे जननी जन्मभूमि सुति उठि चढ़ाएब चरणमे फूल। ◌ भजन हरि दर्शन बिनु अँखिया तरसैए मोर जन्मेसँ सागरमे सीप पियासल बहबैए नोर स्वातीक बून लेल विभोर हरि दर्शन बिनु अँखिया...। हम छी पियासल पंक्षी चकोर चित चंचल मन अविचल स्वातीक बून लेल छी बेकल हरि दर्शन लेल रस्ता तकै छी बनि चकोर हरि दर्शन बिनु अँखिया तरसैए मोर...। ◌ धधकैत धरती धधैक-धधैक धरती दिन-राति धधकैत जरि-जरि सुरुज आगिक ज्वाला बनि धरतीकेँ जरबैत भीषण गर्मी बढ़ैत धरतीसँ अम्बर धरि धधराक धाह लगाए के बुझाएत धधराकेँ पािन सुखि पतालमे डरे नुकाएल रहए अपन दुखकेँ मनुख अपने सृजन करैए गाछ वृक्ष काटि-काटि जंगलकेँ उजारैए धरतीक स्वरूप बिगरल जन-जीवन बिगैर वृष्टि अनावृष्टि भेल रौदी-दाही बाढ़ि बढ़ैए मनुखक समस्या बढ़ल बढ़ैत सभ बुरिया रहल धधकैत धरतीमे जीव जरि मरि रहल-ए। ◌ अग्निपथ केनए जाएब, केनए छिपाएब केकरा-ले कानब के हमर नोर पोछत जेनइ जाइ छी तेनइ डेग-डेगपर रावण कंस देखाइए सुगम राह कोनो ने सभ राह काँटसँ भरल-ए अग्निपथपर चलैत चलैत मंजिल अतिदूर लगैए हारि थाकि जौं उठै छी कुकुर बहुत भुकैए मनमे होइए डुमि मरी कोसी-कमला सुखाएल-ए गंगासन पवित्र नी खन्ता डबरामे नुकाएल-ए भागैत पहुँचलौं धाम सभ धाम दानवसँ भरल मिथिला धामक धरती भेद-कुभेदसँ घेरल मानपर दानव भारी ऐ दानवसँ मुक्ति लेल जाधैर जिनगी अछि हारि केना मानब जीबैले किछु करए पड़त अग्निपथपर चलए पड़त। ◌ किसान जिनका सभ कहै छी अन्नदाता भाग्य विधाता मतदाता वएह छी देशक असल बेटा हुनके अछि टुटल घर तनपर नै लत्ता कपड़ा दुखमे फँसल हरिनाम जपैए जिनकर करैए सभ गुणगान हुनके समस्या अछि महान् जिनगी सुखल लड़की सन संघर्ष करैत जाइए श्मशान तैयो सहैए दोसरत तान आइ धरि ने कियो सुधि लेलक आ ने दुखमे नोर पोछलक मुदा ओ करैए सबहक कल्याण अपना भूखल सबहक पेट भरैए सभ दिन करैत रहल उपकार हुनके दुख अछि पहाड़ जेहेन दुर्दशा बनल छै जीवन हारि एक दिन अन्न नै उपजेतै तखन सभ लोक भूखले मरतै ताधैर नै किसानक दिशा दशा सुधरतै। ◌ दिन भेल बाम खेतमे फटल दराइर आड़िपर बैसल सोगाएल किसान छाती पीट बपहारि कटैए केना कटत सालक दिन राति की खा जीयब हौ भगवान खेत की जरल, जरल तकदरीर सभटा हमर अरमान जरल धियापता भऽ जाएत बीरान पेट पीट-पीट देत जान टुटल धर टटल दलान केना निमहत मेहमान खुट्टापर गाए महींस हुकरैए केना बँचाएब ओकर प्राण अखड़ा रोटी नून देख चिलकौर कनैए साँझ बिहान माथपर टीटही टहकैए बगल बैसल कुकुर कनैए बिलाइ छालही ओलि खाइए सरकार उड़बैए रॉकेट यान गरीबक जिनगी बनल गुलाम किसान दइए खेतमे जान सरकारक कोन ठेकान कुर्सीकेँ बुझैए भगवान केना बँचत किसानक प्राण दिन भेल बाम...। ◌ नशा जे नशा करत ओकर जिनगी नकर बनत ओ दिन दुरदिन नहि जखन बाटीमे भीख मांगए पड़त देख जगत हँसत अपन पराया सभ छुटत जिनगी दुखमे डुमल रहत जे नशा करत। गाँजा पीब कऽ उड़ाएत भँग खा भकुआएल रहत दारू पीब कऽ दुरि भेल बीड़ी पीते बुड़ियाएल घर उजरल परिवार बिगड़ल सभ सम्पैत बिलैट गेल तखनो कोनो कुकर्म नै बँचल बाटीमे भीख मांगए पड़त जे नशा करत। ◌ भगवतीक गीत कोन फूल लोढ़ब हे मैया कोन फूल चढ़ाएब हे कोन फूलक माला बनाएब हमरा नै अछि ज्ञज्ञन हे जगत जननी छी हे मैया सबहक करै छी पतिवाल हे कोन कसुरक चुक हमर छी गे हमरा दइ छी सजा हे बेली चमेलीक गजरा बनेलौं चम्पा फूल पैर पूजन हे गेना फूलक आसन बनेलौं अरहुल फूलक माला हे पान, फूल, फल, मधुर, मेबा सभ दिन चढ़ाएब प्रसाद हे छागर-पाठी बलि नै देब हम अहिंसाकेँ होइ छै अत्याचार हे अंजान अवोधकेँ माफ करबै हम छी अहींक सन्तान हे सभ जीब पर दश करियौ हेतै जगतक कल्याण हे कवि करैत अछि विनती हे मैया सभकेँ दियौ सभ ज्ञान हे जगमग हेतै अन्ध जगतक दियो एहेन वरदान हे...। ◌ केहेन मिथिला हमर मिथिला हम छी मैथिल किए बदैल गेल काया स्वरूप के अछि एकर जिम्मेदार की नै रहल असल रखबार दोषी बेवस्था बढ़ल समस्या कंकीर्ण सोचसँ बँटल समाज तखैन मँगै छी मिथिला राज्य की मिथिला मिथ्या छल जे असल मांग करै छी हमर मिथिला केतए हरा गेल जे खोजैमे आन्हर बनल छी के दोषी छैथ के जिम्मेदार जे केलैन भेद कुभेद जोगी कहि योगी बनि गेल कर्म भूलि पाखण्डी भेल अवसर देख रंगवादी भेल जाति पाँतिक राजनीतिक खेलमे मिथिलामैथिली बदैल गेल जे मिथिला अदौसँ स्वर्ग छल तेकर किएक ई हाल भेल जाति परजातिक बात करै छी सभकेँ बुझै छी अखनो अछोप तैयो ने अछि मनमे सन्तोख गरीब कमा केतौ गुजर करत तइले लोक किए प्राण गमाएत उठत एक दिन साए-साए सबाल केकर मिथिला केहेन स्वरूप किनका मिलत ऐसँ सुख भूखले पेट जे करतै काज से किए माँगत मिथिला राज नै छैथ जनक नै छैथ सीता के भोगतै ई मिथिला राज। ◌ दीन हीन दीन-हीन जखने भेलौं सभ दुख सम्हिर पड़ल आपैत-बिपैतमे फँसि सभ नेकरम करैत एलौं आब की करब नै फुराइए तखने केलौं हरिक पुकार हरिक महिमा अपरमपार देलैन साहस भेल एहसास कहलैथ कर्मपर करू बिसवास कर्म-धर्मसँ बढ़ि किछु नइए तेकरे दइ छी हमहूँ साथ दुखक दरिया पार लगा सुख सागरमे दइ छी पहुँचा दुख-सुखक बीच जीब जीबैए से रहस्य किया ने जानैए ऋृषि-मुनी, देवी-देवता सबहक विधाता हरि अनन्ता हरि हरण दुख हरता दीन-हीन दुख सहितो स्वर्ग जगतमे सुख पबैए दुख देखि जे अधिर होइए से नर सुख कहियो ने पबैए कर्म प्रधान बिश्वक मांग जे अपनाबए वएह महान्। ◌ हम गरीब हम गरीब केतेक करीब सबहक काज करैत जीबै छी बहुतो काज नहि छी बाज फुरसत पाबि अपन बीरान सबहक पुरबै छी काज लेल रोब देखा नजैर बदैल काज करबैए प्रेम-भाव नहि अपमान भरल बेवहार करैए तैयो दुखे-भुखे जरैत5मरैत करैत रहलौं सभ दिन काज बोल भरोसक नै भेटल शौगात बुढ़ाड़ी देह जखन भेलौं बेकाम नै कियो पुछैए नाम ठेकान आब की करब घरेमे मरब जपैत हरि नाम राम-राम। ◌ किरानीक किरदानी देखलौं किरानीक किरदानी मरदे नहि मौगियाहे बुझि पड़ल जएह कहता वएह नै करता तीन पेखन रोज घुमौता तखन कहता परसू आएब जँ परसू जाएब तँ ओ नै रहता बेसी घुमेता फिरिसान करता तखन कहता खर्चा करए पड़तह हम कहलौं काज तँ नइए भीरगर सुनिते कुकुर जकाँ भूमि भगौता डरि हारि जँ पराए लगलौं तखन बनर भूलकियो देता साहस करि कऽ हम डटले रहलौं जखन निर्भिक हमरा देखलैन इशारा दऽ लग बजौलैन कानमे कनफुसकी दैत बजला- मोटगर रकम खर्च करए पड़तह जँ नै करब खर्चा-बर्चा तँ ऑफिस अबैत जाइत पएर टुटि जेतह हारि थाकि हमहूँ बजलौं- मोटगर तँ नहि दऽ सकब हम मुदा पातरेसँ चलाउ काज निर्जज बनि बढ़ौलक हाथ तखने मनमे भेल आश काज भऽ जाएत हाथो-हाथ। ◌ फूलक लचारी मालि पटबैए कियारी फुलवाड़ी हँसि फूल कहैए- भेद कुभेद नै हमरा मनमे सबहक छी प्रेमी रंग रूप स्वरूप भिन्न रहितो मिलि रहै छी कियारी नइए रंगभेद, वर्भेद केकरोसँ नै छुबाइ छी एक बेवहार अपन सुवास सभ मिलि बँटैत रहै छी राजाहुअए आकि रंग सबहक छी हम पुजारी नहि कलेश आ ने उपराग सबहक दिलमे करै छी बास प्रकृतिकेँ सुन्दर बनबै छी वातावरणकेँ करै छी साफ धरती, पवन, गगनकेँ गमकाबै छी चारूकात मुदा, मनुख नै करैए हमरा बीच इंसाफ जाति भेद, वर्ण भेद रंगभेद बाँटि करैए बिसवासघात सृंगार बुझि सजा दइए बेचैए हमरा हाट बजार की कसुर अछि हमर जे करै छी एहेन अत्याचार दया रखि करू विचार अहाँक बीच हम झूकि करै छी विनती, छी लचार के करत हमर इंसाफ? ◌ लोकतंत्रक खून निर्वल जनता, दागी पहलवान जनता लचार, वदनाक सरकार जंगल राज,अन्धा कानून बिनु घूस नै काज चलैए न्याय बिकाइए पसेरी भाव इंसानक इमानकेँ के पुछैए तरजू तौल बेचैए बेमान भ्रष्ट तंत्र बीकि गेल जनता लफड़ामे पड़ि गेल लोकतंत्रक खून होइए हंस सुग्गा भूखे मरैए गिद्ध, कौआ चिल्होरिया मासु नोचि खा रहल-ए शेर, बाघ खा मोटा गेल नढ़िया खिखिर मंत्री बनल कुकुर बिलाइ रखबारि करैए हत्या अपहरणक उद्योग बढ़ल जनताक खूनसँ देश चलैए जिनगी नकर कंगाल बनल-ए हिंसक हिंसाक बीच निर्दोषक फाँसी पड़ि रहल-ए राम राज्यक सपना सपने रहि गेल बुद्ध गाँधीजीक बाट बिसैर गेल। ◌ सपना सपना कुसपना देख-देख भ्रममे भरैम भरमैत रहल अमर अमृत छोड़ि-छोड़ि विष विषहा लूटैत रहल भेद-कुभेद वाण-उवाणि देख हंस कौआ लड़ैत रहल देश समाज दहि भँसियाइए बिनु पतवार चलैत रहल मनुख कुमनुखक बीचमे अन्हारा डीठरा देख रहल-ए जनताक सुख ऊपरके लूटि-लूटि धरती अम्बर बीच उड़ैत रहल देश माल खजाना खाली कालाधनमे बदैल गेल महगी मारि जनता सहि पातर बनि पतराइत रहल नेता अफसर मोट-मोट बनि भरिगर भारसँ भरिया गेल भारी भारसँ देा दबि कऽ चिन्तामे शेागा गेल भेद-कुभेदक बीच भेदिया लहू पीब जीबैत रहल राग, ताल, सुर अलाप अलगे नाच नरखेल करैत रहल देशक इज्जित लूटि-लूटि बीच बजारमे बेचैत रहल सुतल छेलौं नीरन भेर की देख सपना नीन टुटल। ◌ बटिया खेती बड़ी जतनसँ बटिया खेतीकेलौं रौदी आबि विषाएल खेतमे फटल दाराइर फसल जरि उसैर गेल गिरत गिरहकट्टा दू-चारि कथा बेथा सुनबे साँझ विहान अपजश माथ चढ़ल ऊपरसँ भूखमरी बढ़ल मेहनत लागत दुरि गेल मँह सुखल पेट धँसल परिवारक चिन्तामे फँसल की खाएब केना जीयब भूखे मरत धियापुता जँ कमाइ-ले जाएब दिल्ली, पंजाब, कलकत्ता धियापुता बिलैट जाएत के बनत भाग्य विधाता हारि थाकि ठीकौती खेत लेलौं दस कट्ठा खेत जोति कुइयॉं खुनि तरकारीक खेतीकेलौं रंग-बिरंगक बीया रोपि दिन-राति मेहनत करैत रहलौं खोपड़ी बान्हि केलौं रखवारि मनसम्फे तरकारी उपजल हाट-बजार बेच भेलौं नेहाल खा-पीब ठीकौती दऽ नफा भेल हजारक हजार पाँच कट्ठा खेत कीनि जोड़ा भरि हर-बरद संगे बटिया छोड़ि अपन खेती केलौं चास-बासपर करै छी राज ने केकरोसँ अछि आश बटियो खेती जँ करत रही पपदेशक काजसँ घरे नीक। ◌ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' गजल नै अछि भुस्सा नार हमरा आ रे बरदा मार हमरा तकरे पाछां जैब हमहूं जे देलक कुसियार हमरा जकरा सबदिन गोर लागी से बूझय बुधियार हमरा कखनो सबकिछु ठीक लागय आ कखनो बेकार हमरा नारक तोशक आगि घूरक मोने अछि ओ जाड हमरा अनकर साडी फ्लैट गाडी केने अछि बीमार हमरा जक्कर खेबै गैब तकरे एत्ते अछि अधिकार हमरा जेहन खेबै गैब तेहन कहने अछि संसार हमरा जाधरि खेबै गैब ताधरि सब केलक लाचार हमरा भरि दुनियामे चोर डाकू कहइत अछि अखवार हमरा समले' सुख आ शांति ताकी सय कोटिक अछि भार हमरा ( मात्रा क्रम : 2222-2122 ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजीव रंजन झा गजल आँगुर त'र मे विश्व सगर छै अपनहि लागय लोक दीगर छै यारी फूसि फटक अछि सभटा पूरल भरल पड़ल असगर छै भावक भाव नैं रहल कनिञो मुइल मिझायल नयन नगर छै आँगुर पर निबाहि रहल मुदा हृदयक ई नहि सरल डगर छै शत शत मीत देश परदेशक अपनहि बीच जेना झगड़ छै बैसल ठाम आहार भेटय लेने काढि फेन अजगर छै जरि रहल अछि जड़ि गाछ केर लागय डारि सभ मोटगर छै ************************* राजीव रंजन झा भीठ भगवानपुर, मधेपुर, मधुबनी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - ४ गोट सचित्र बाल कविता गिरगिट (बाल कविता) गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें । गिरगिट केहेन ?? सोचए बच्चा मनें - मनें ।।*१ वन-उपवन बाड़ी-झाड़ी, सभ ठाँ भेटैत अछि । ठण्ढीक भोरमे बैसल, ओ रौदा सेकैत अछि । घऽरमे भेटैछ, भेटैछ संगहि रणे - बने ।*२ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। पहिने रंग रहए जे चामक, चट दऽ बदलल । या रंगक विन्यास सकल, आमूलहि बदलल । देखि अचंभित, चकित आँखि छै कने-कने ! *३ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। गोहि आओर सनगोहि, भाए छी गिरगिट केर । मुदा पैघ ने, ओतेक काय छी गिरगिट केर । जीह निकालि कऽ, पकड़ए कीड़ा क्षणें - क्षणें ।*४ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “गिरगिट” शब्दक अर्थ मैथिलीमे बहुत व्यापक अछि जे अपना आपमे सामान्य गिरगिट, ठिकठिकिआ / घरैया गिरगिट, गोहि, सनगोहि, डाइनोसॉर आदि सभकेँ समाहित करैत अछि । मैथिलीक गिरगिटक तुलना अंग्रेजीक LIZARD शब्दसँ कए सकैत छी जाहिमे COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON आदि सभ आबैत अछि । गिरगिट शब्दसँ अमेरिकी महाद्वीपक IGUANA नामक सरिसृपक केर सेहो बोध कहल जा सकैत अछि, हलाँकि ओ सामान्य गिरगिटसँ ओ बहुतहु बातमे भिन्न अछि । परिवेश वा इच्छानुसार चामक रंग बदलबाक गुण कमोबेश हर गिरगिटमे होइत अछि मुदा चमेलिओनाइडी /केमेलिओनाइडी कुल (Family - Chamaeleonidae; Eng. - Chameleons) केर गिरगिट सभमे ई गुण बहुत अधिक विकसित भेल अछि । चुँकि, मैथिलीमे ठिकठिकिआ, गोहि, सनगोहि आदि शब्द पुर्णतः परिभाषित अछि तेँ एकरा सभकेँ छोड़ि शेष सम्बन्धित प्राणीक लेल हम एहि ठाम “गिरगिट” शब्दक प्रयोग कएल अछि । *२ - सरिसृप वर्गक प्राणि होएबाक कारणेँ गिरगिट सेहो शीतरक्तीय प्राणी अछि आ तेँ ठण्ढीक समएमे भोरुका पहर रौद सेकैत आरामसँ देखल जा सकैत अछि । *३ - गिरगिट रंग बदलबामे माहिर होइत अछि । ओ अपन चामक रंग ओ रंगक विन्यास अपना आस - पासक परिवेशक अनुसार क्षण भरिमे बदलि लैत अछि । ओना तँऽ बहुत रास समुद्री जीवमे ई गुण पाओल जाइत अछि, मुदा धरती पर आ ओहो मनुक्खक आवास क्षेत्र केर आस - पास गिरगिटहि एहिमे सभसँ कुशल होइत अछि । जीव विज्ञानमे एहि तरहक घटनाकेँ छलावरण या छद्मावरण (CAMOUFLAGE) कहल जाइत अछि । ई छद्मावरण दू तरहेँ गिरगिटकेँ सुरक्षा प्रदान करेत हछि - पहिल तँऽ वातावरणक रंगमे स्वयंकेँ दुश्मनक नजरिसँ नुकाए लैत अछि आ दोसर आक्रामक रंग परिवर्तन कए प्रतिद्वन्दीकेँ डेराए दैत अछि । *४ - गिरगिटक जीह बेङ्ग जेकाँ होइत अछि आ मूँहसँ बाहर शिकार पर दागल जाइत अछि । जीह केर अगिला भाग शिकारकेँ अपन लसलस लेरमे सटाए मुँहक भीतर नेने जाइत अछि । क्र॰ सं॰ जीवक मैथिली नाम अंग्रेजी नाम विशिष्ट गुण १ गिरगिट LIZARDS (Including CHAMELEONS & IGUANAS & OTHERS) · रंग बदलबामे कुशल · बहुतहु गिरगिटक जीहक संरचना ओ कार्य-शैली बेङ्ग जेकाँ होइछ २ ठिकठिकिआ (ठिकठिकिया) /घरैया गिरगिट COMMON HOUSE GECKOES / HOUSE LIZARDS · रंग बदलबामे बेसी कुशल नञि · खतरा पड़ला पर नाङ्गरिक पछिला भागक त्याग करैछ ३ गोहि MONITOR LIZARDS / VARANUSES (Including KOMODO DRAGONS) · साँप जेकाँ द्विभाजित जीह · गिरगिटसँ पैघ आकार · रंग बदलबाक गुण नञि ४ सनगोहि GOLDEN / YELLOW MONITOR LIZARD · गोहि केर एक प्रकार · चामक रंग किछु पीताभ सनि होइछ आ अपना दिशि पाओल जाइछ ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया (बाल कविता) गिरगिट छी, पर नञि छी गिरगिट, या छी घरैया गिरगिट । “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।।*१ घरक भीत - देबाल आदि पर सदिखन भेटत । कोनहु इजोतक, लऽग - पासमे, अनुखन देखब । कीड़ी - फतिङ्गी लगीच इजोतक, खाए ठिकठिकिआ गिरगिट । “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। बदलए चामक रंग, सहज गुण - से एकरामे । मुदा कने कमतर, बड़का गिरगिट तुलनामे ।*२ बहुत प्रकारक विश्वमे होइए, ई ठिकठिकिआ गिरगिट । “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। खतरा बुझने, पछिला नाङरि, चट दए छोड़ैछ । छटपटाइत ओ नाङ्गरि, दुश्मनसबकेँ धोखबैछ । प्राण बचाए भागैछ बेचारा, नाङ्गरिकट्टा गिरगिट ।*३ “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। रातिचर ई गिरगिट, तेँ रातिमे, बेसी अभरैछ । वा दिनहु, अन्हार दोग दिशि, भागैत देखबैक । ठिक-ठिक-ठिक केर ध्वनिक कारणेँ, छै ठिकठिकिआ गिरगिट ।*४ “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - सामान्य मैथिलीमे एकरा सेहो गिरगिट कहि देल जाइत अछि, किछु हद धरि से ठीकहु अछि, मुदा गलत सेहो । गिरगिटसँ अवश्यहि किछु विशिष्ट अन्तर अछि आ तेँ गिरगिटसँ पार्थक्य देखएबाक लेल एकरा “घरैया गिरगिट” (HOUSE LIZARD) कहल जाइत अछि । गाम घऽरमे एकरा ठिकठिकिआ या ठिकठिकिया(COMMON HOUSE GECKO) सेहो कहल जाइत अछि । *२ - एकर चामक रंग माटि या गोबरसँ नीपल भीतक देबालक रंगमे छपएबला होइत अछि । एकरहुमे रंग बदलबाक क्षमता रहैत अछि, मुदा गिरगिट (CHAMELEON) केर तुलनामे एहि तरहक समायोजनक क्षमता बहुत कम होइत अछि । *३ - गिरगिट (CHAMELEON) अपना सुरक्षाक लेल चामक रंग बदलि छलावरण या छद्मावरण (CAMOUFLAGE) केर सहारा लैत अछि । जखनि किठिकठिकिआ (HOUSE LIZARD / COMMON HOUSE GECKO) आवश्यकता पड़ला पर अपन नाङ्गरिक पछिला हिस्साकेँ अपन शरीरसँ अलग कऽ दैत अछि । धऽरसँ अलग भेल नाङ्गरि कने काल धरि छटपटाइत रहैत अछि जाहिसँ ठिकठिकिआक दुश्मन शिकारी जीव ओहिमे ओझराए जाइत अछि आ ठिकठिकिआ अपन जान बचाए भागि जाइत अछि । बादमे किछु दिन वा महीनामे ओ कटलाहा नाङ्गरि पुनः बढ़ि पहिने जेकाँ भऽ जाइत अछि । *४ - ई रातिचर प्राणी अछि आ दिनमे अन्हार जगह पर कोण-दोगमे नुकाएल रहैत अछि । तेँ अंग्रेजीमे एकरा “मून लिजार्ड / लिजर्ड” (MOON LIZARD) सेहो कहल जाइत अछि । ई एक प्रकारक ध्वनि निकालैत अछि जे सुनबामे मैथिलीक “ठिक-ठिक-ठिक” ध्वनि सन लगैत अछि । तेँ मैथिलीमे एकर नाम ठिकठिकिआ (या ठिकठिकिया) पड़ल होयत । मिथिला सहित पुबारी ओ उतरबारी भारतक आन बहुत रास क्षेत्र सभक जन सामान्यमे ई धारणा अछि कि कोनहु बातकेँ बजबा काल जँ ठिकठिकिआ “ठिक-ठिक-ठिक” ध्वनि बहार करैत अछि तँ ओ बात या तँऽ सत्य अछि या भविष्यमे सत्य होयत । ओना एहि धारणाक कोनहु वैज्ञानिक आधार नञि अछि, एहि ठाम बस प्रसंगवश उल्लेख कएल गेल अछि । अंग्रेज आ यूरोपीय लोक सभ ठिकठिकिआक ध्वनिकेँ “Gecko,Gecko,Gecko” सन बुझैत छथि आ तेँ एकर नाम GECKO / GEKKO राखि देल । - गोहि (बाल कविता) संस्कृतक जे “गोधिका”, ताहिसँ निकसलि “गोधि”। ताहि गोधि केर रूप छी, मिथिलाभाषाक “गोहि” ।। पैघ-पैघ गिरगिटक नाँओ, सामुहिक रूपसँ गोहि । संसारक हर-एक भागमे, भाँति-भाँति केर गोहि ।।*१ थलचर जीव ई गोहि छी, प्रायः बिलमे रहैछ । बाढ़ि आ बरखा कालमे, बेसी ओ अभरैछ ।।*२ किछु एहनहु छी गोहि जे, पानिक कात रहैछ । गोंता मारि शिकार करैछ, पानिमे खूब हेलैछ ।।*३ बाध - बोन केर बीचसँ, सड़क - बाट जे जाइछ । तकरा पार करैत ओ, बहुधा देखल जाइछ ।। गोहिमे किछु विषहीन छी, आ किछु छी विषयुक्त । तेँ जनमानस धारणा, गोहि लेल भययुक्त ।।*४ इण्डोनेसियाक गोहि एक, नाम “कॉमोडो ड्रेगन” । गोहिमे सभसँ छी विशाल, “दैत्य गोहि” ओ ड्रेगन ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आइ - काल्हि ओना तँऽ मैथिलीमे “गोहि” आ “सनगोहि” पर्यायवाची शब्द जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । किछु लोकक निजी धारणा इहो छन्हि जे सनगोहि गोहिसँ बेसी विषाह होइत अछि …….. आदि, आदि । मुदा वास्तवमे “गोहि” एकटा व्यापक शब्द अछि आ बहुतहु पैघ-पैघ गिरगिटसभक (जे सामान्य गिरगिट सभसँ बेस पैघ होइत अछि) लेल सामुहिक रूपसँ मैथिलीमे प्रयुक्त होइत अछि । गोहिकेँ अंग्रेजीमे मॉनीटर लिजार्ड्स या वैरानस (MONITOR LIZARDS / VARANUSES) कहल जाइत अछि । *२ - विश्वक बेसीतर गोहि थलचर (TERRESTRIAL) होइत अछि, आ जमीन पर बिल (बियरि) बनाए अथवा प्राकृतिक रूपसँ बनल बिलमे अथवा आन प्राणीसभ द्वारा बनाओल आ छोड़ल बिलमे रहैत अछि । *३ - किछु गोहि वृक्षाश्रयी (ARBOREAL) ओ आन किछु उभयचरी (AMPHIBIOUS) अर्थात् थल ओ जल दूनूमे विचरण करएबला होइत अछि । उभयचरीगोहि सेहो जमीनहि पर बिल बनाए रहैत अछि, मुदा पानिमे हेलि शिकार करबामे माहिर होइत अछि । *४ - विश्वक बेसीतर गोहि विषहीन होइत अछि, मुदा किछु प्रजाति विषयुक्त । मुदा मिथिला सहित पूरा भारतक जनमानसमे ई धारणा प्रबल अछि जे गोहि अतिशय विषयुक्त ओ बयानक प्राणी अछि । जकर कारणमेसँ किछु निम्न प्रकारेँ भऽ सकैत अछि - · गोहि केर हवामे लपलपाइत द्विभाजित जीह, साँप सदृश भयोत्पादक लगैछ · गोहि केर आकार गिरगिटसँ बहुत पैघ होयब · गोहि ओ साँपक अवास क्षेत्रमे समानता होयब · विषहीन ओ विषयुक्त गोहि केर पहिचान जन सामान्यक बीच नयि होयब · सम्भवतः ऐतिहासिक समएमे विषयुक्त गोहिक संख्या आजुक समएसँ बहुत बेसी होयब, आदि । किछु लोकक कहब अछि जे गोहि जँ मनुक्ख वा सूतल नेनाकेँ फूकि दैत अछि तँऽ ओहि मनुक्ख वा नेनाक शरीर फुलि जाइत अछि जाहिसँ बादमे ओकर मृत्यु भए जाइछ वा जँ जिउतहु अछि तँऽ कोनहु काजक नञि रहि जाइछ । मुदा, यथार्थमे से नञि (अपवाद - दैत्य गोहि, मुदा भारतमे ओ ने तँऽ कहियो छल आ ने आइ अछि) होइत अछि । *५ - इण्डोनेसिया नामक देशक एक गोट निर्जन द्वीप पर “कॉमोडो ड्रेगन” (COMODO DRAGON) नामक विशालकाय ओ महाविषयुक्त गोहि पाओल जाइत अछि जकरा मैथिलीमे “दैत्य गोहि” कहि सकैत छी । ई दुनिञाक सभसँ पैघ गोहि अछि मुदा ओहि तथाकथित द्वीपक अतिरिक्त दुनिञामे आन कतहु नञि पाओल जाइत अछि । सनगोहि (बाल कविता) बहुविध पैघ - पैघ गिरगिटसभ, कहल जाइछ मिथिलामे गोहि । ताहि गोहिमे किछु पीयर सनि, सएह कहाबैत अछि सनगोहि ।।*१ थलचर जीव छी गोहि समूहक, पानिमे नञि ओ हेलि पाबैतछि । बाढ़ि आ बरखाक पानि बियरिमे, तेँ मनुक्ख दिशि ओ भागैतछि ।।*२ गोहि साँप दूनू सरिसृप अछि, जीह कटल अछि तेँ आगाँसँ । सएह देखि कए लोक डेराइछ, मारि दैछ बरछी - भालासँ ।।*३ कटल जीह केर कारण कए ठाँ, “सनगोहि साँप” एकर छी नाम । एखनहु खूब भेटैतछि जाहि ठाँ, बाध - बोन केर संग छी गाम ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आइ - काल्हि ओना तँऽ मैथिलीमे “गोहि” आ “सनगोहि” पर्यायवाची शब्द जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । किछु लोकक निजी धारणा इहो छन्हि जे सनगोहि गोहिसँ बेसी विषाह होइत अछि …….. आदि, आदि । मुदा वास्तवमे “गोहि” एकटा व्यापक शब्द अछि आ बहुतहु पैघ-पैघ गिरगिटसभक (जे सामान्य गिरगिट सभसँ बेस पैघ होइत अछि) लेल सामुहिक रूपसँ मैथिलीमे प्रयुक्त होइत अछि । गोहिकेँ अंग्रेजीमे मॉनीटर लिजार्ड्स या वैरानस (MONITOR LIZARDS / VARANUSES) कहल जाइत अछि । एहि मे सँ एकटा विशेष प्रकारक गोहि जकर चामक रंग किछु पीयर सनि वा सोनाक रंग सनि होइत अछि, से सनगोहि कहबैत अछि । सनगोहिकेँ अंग्रेजीमे यॅलो या गोल्डेन मॉनीटर लिजार्ड (YELLOW / GOLDEN MONITOR LIZARD) कहल जाइत अछि । एकर जैव वैज्ञानिक नाँओ वैरानस फ्लॅवेस्सेन्स (Varanus flavescens) अछि । *२ - ई थलचर प्राणी अछि आ प्रायः नम (आर्द्र) ओ छाहरियुक्त जमीन पर बियरि (बिल) बनाए रहैत अछि । बाढ़िक समय बियरिमे पानि भरि जएबाक कारणेँ प्रायः मनुक्कक आवास-क्षेत्र दिशि बौआइत भेटैत अछि । *३ - सनगोहि साँप जेकाँ विषयुक्त नञि होइत अछि मुदा साँपहि जेकाँ ओकरहु जीह आगाँसँ कटि दू भागमे बँटल रहैत अछि । तेँ लोक विशेष डेराइत अछि आ बहुधा भाला, बर्छीसँ मारि दैत अछि । *४ - द्विभाजित जीहक (Bifid tongue) कारण सनगोहिकेँ मिथिलाक किछु भागमे “सनगोहि साँप” सेहो कहल जाइत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ता लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। ५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा “’विदेह’- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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रद्द पर | uals ws खाइत ठिकठिकिआ वा ठिकठिकिया
साभार सौजन्य - pixabay.com (free download) एक 5 प पे Pa oor... डिक हि be Shae Bs कर Se [3 Be . 4 ieee oe x = 4 Pas 3 न = Pisabay.com (free download) मैथिली - गिरगिट हिन्दी - गिरंगिट संस्कृत - कृकलास, कृकवाकु, शरण्ड, प्रतियूर्य, प्रतिसूर्यशयान, गलगति (2) अंग्रेजी - LIZARD (Including COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON, IGUANA & OTHERS) जैववैज्ञा० नाम - SAURIA SUPERGROUP of SUBORDER LACERTILIA (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नांओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नंओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
ie fii मी ~~ मैथिली - ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया / den गिरगिट अंग्रेजी - HOUSE LIZARD / GEKKO जैंववैज्ञा८ नाम - Hemidactylus spp. Gekko spp. (चित्रमे Gekko gecko) (कुल 5 वंशक लगभग 950 जातिक सदस्यसभ) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
-~ 3 7 as & eo”, : A 6S 3 Rec ee a agdg गिरगिटक (खास DS CHAMELEON समूहक गिरगिटक) sie सरिसूप वर्गक आन सदस्यक (यथा - ita, गोहि आदि) जीह जेकॉ द्धिभाजित (BIFID) abr होइत अछि | sites सभक जीहक संरचना उभयचर वर्गक (AMPHIBIANS) बेड्ग आदिक सदश होइत अछि। 'एकर जीह शिकार पकड़बाक प्रमुस्व अंगक रूपमे रुपान्तरित रहैत अछि।
a 7 . कु es bain कर दी > Y A ete” pa. / मैथिली - गोहि या गोहि Bia (उच्चारण - गोहि ar aise) अंग्रेजी - MONITOR LIZARDS / VARANUSES जैववैज्ञा०८ नाम - Varanus spp. (नोट - संस्कृत माषामें आयल हरेक नॉजों या पर्यायी at स्वतः AP ar पर्यायी at ts जाइत अखि- तत्सम स्खमे)
“ge ee ae a Wise pe Te ‘ bia | ope ej y J : Lo pixabay.com eee” "कॉमोडो Serer" - विश्वक सभर्से Ga आ विषयुक्त गोहि, Fel मात्र इल्डोनेसियाक एकटा द्वीप पर पाओल जाइत अछि | दैत्य गोहि = COMODO DRAGON = Varanus komodoensis
ee wi © साभार सौजन्य - pixdbay- snr ही ie aes oa जीव विज्ञानमे गोहि ओ सौँप go सरिसूप वर्ग (Class - Reptilia) केर प्राणी अछि आओर Gorey जीढ आरगोर्सें द्िभाजित (Bifid) Sel अछि | तेँ मिथिलामे ASA ora "गोहि" a5 "गोहि सॉप" कहल GSA अछि | (चित्रमें - Sea SHS वा कॉमोडो ड्रेगन) |
एखन फोटो उपलब्ध नजि अछि। मैथिली - सनगोहि / सनगोहि Ata (उच्चा५ - सनगोहि / सनगोइह) हिन्दी - पीला oie संस्कृत - स्वर्णगोधिका अंग्रेजी - YELLOW / GOLDEN MONITOR LIZARD जैववैज्ञा० नाम - Varanus flavescens (Hardwick & Gray, 827) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः ARH भाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम रूपमे)