VIDEHA — Issue 228 / अंक २२८

Publication: VIDEHA · Issue: 228
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104 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद? २.२.प्रणव झा -खिस्सा-सुखैत पोखैर प्यासल गाम २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- 6 गोट लघु कथा २.४.आशीष अनचिन्हार- तीन टा बिंदु ३. पद्य ३.१. 1.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- ४ टा गजल 2.आशीष अनचिन्हार-२ टा गजल ३.२.राम विलास साहु- 1 दर्जन कविता ३.३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - २ गोट कविता ३.४. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- गामक कचोट ४.बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - 2 टा  बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय ई-पत्र आदरणीय गजेंद्र जी विदेहक २२५ अंक में छपल रचना सभ निक लागल। विशेष रूप से डॉ शशिधर कुमार क बाल कविता गिरगिट, ठिकठीकिया, गोह आ सनगोह विशेष उत्तम लागल. ई  बाल  कविता सब बेस मनोरंजक आ बच्चा सभ लेल मैथिलि आ विज्ञान दोनों विषय में रुचिगर रूप सं ज्ञान बढ़ाबय वाला अछी. सभ रचनाकार आ सम्पादक मंडल के बधाइ - प्रणव झा विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केलक अछि जकर संयोजक श्री दिनेश यादव जी रहता। अइ विशेषांकमे नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य केर मूल्यांकन रहत। अइ विशेषांक लेल सभ विधाक आलोचना-समीक्षा-समालोचना आदि प्रस्तावित अछि। समय-सीमा किछु नै जहिया पूरा आलेख आबि जेतै तहिये, मुदा प्रयास रहत जे एही साल मइ-जून धरि ई विशेषांक आबि जाए। उम्मेद अछि विदेहक ई प्रयास दूनू पायापर एकटा पूल जरूर बनाएत। विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा कएल जा रहल अछि। दोसर भागमे अइ बेर नीलमाधव चौधरी जीक रचना आमंत्रित कएल जा रहल  अछि आ नीलमाधवजीक रचना ओ रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल कैलाश कुमार मिश्रजीकेँ आमंत्रित कएल जा रहल छनि। दूनू गोटाकेँ औपचारिक सूचना जल्दिये पठाओल जाएत। रचनाकारक रचना ओ आलोचकक आलोचना जखने आबि जाएत ओकर अगिला अंकमे ई प्रकाशित कएल जाएत। अइ शृंखलाक पहिल भाग कामिनीजीक रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद? २.२.प्रणव झा -खिस्सा-सुखैत पोखैर प्यासल गाम २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- 6 गोट लघु कथा २.४.आशीष अनचिन्हार- तीन टा बिंदु डॉ. कैलाश कुमार मिश्र गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद? मधुश्रावणी कथा आ पाबनि मनुक्ख आ प्रकृति, लोक आ शास्त्र, स्त्री आ पुरुख,बूढ आ नव, प्रेम आ केलि, पारिस्थितिकी संतुलन केर सहज रुपे मिथिलाक अद्भुत परंपरा अछि। एकर जतेक चर्च हो से कम। एहि पाबनि के, एकर सब कथा, उपकथा, प्रसंग, उप-प्रसंग के नीक सं बुझनाई, कथा के मिथिलाक बिभिन्न क्षेत्र में उपलब्ध अंतर के संकलन, ओकर घमर्थन, समाजशास्त्रीय-मानवशास्त्रीय-मनोवैज्ञानिक विश्लेष्ण जरुरी अछि। दुर्भाग्य सं इतिहासकार, समाजशास्त्री, मानवशास्त्री, मनोवैज्ञानिक आर-त-आर साहित्यकार लोकनि सेहो एकर बहुत विवेचना नहि क सकलनि अछि। ई चिंताक विषय अछि।मानवशास्त्र में एक शब्द होइत छैक “enculturation” जकर अर्थ भेल जे लोक कुनो चीज, लूरि, ज्ञान, भाव, परंपरा आदि स्कूल अथवा क्लासरूम अथवा कुनो विशेष शिक्षक या शिक्षिका सं नहि बल्कि लोक व्यवहार के देखैत, ओकर अनुशरण करैत बिना बुझने आ प्रयत्न केने सिखने जैत अछि। नहि सिखबला/बाली के आ ने सिखाबय बला/बाली के एकर विशिष्ट भान होइत छैक मुदा ई सामाजिक ज्ञान के एक पीढ़ी सं दोसर पीढ़ी में हस्तांतरित निर्विघ्न रूप सं होइत रहैत छैक – चरैवेति-चरैवेति। अपन अल्पज्ञान सं मुदा मैथिली संस्कृति के सिनेह के कारण मधुश्रावणी पर हम किछु काज क रहल छी। प्रतिदिन नव बात ज्ञात होइत अछि। विवेचन नव दिशा दिस संकेत करैत अछि। इम्हर अपन माय लग पुनः तीन दिन धरि अहि कथा के बुझबाक प्रयत्न कैल। लागल, ई कथा आ पाबनि त पुरुख केर पूजाक एकाधिकार के सोझे-सोझ चुनौती द रहल अछि। कथा सुननिहारि महिला, कथा कहनिहारि महिला, कथा केर सामग्री, विध, विधान, सब किछु बताबय बाली महिला, पुरुख में मात्र अन्तिम दिन वर आ ओहो महिला के इसारा पर चलयबला यंत्रवत प्राणी! बाकि सब चीज़ में पुरुख के एन्ट्री बन्द। किछु लोक एक प्रश्नउठोलनि। ई जिज्ञासा पहिने बड़ प्रभावित नहि केलक सोचलहुँ, कथि लेल घमर्थन करु? लेकिन एखन भेल जे थोड़ेक सोची जे आख़िर ऐना कियैक छैक - गौरी आ छिनारि? एकरा कोना कही? जौं शास्त्र धेने रहब त एकर उत्तर असंभव। धर्माधिकारी सब आक्रमण करता। लोक सँ करब त समाधान के समिप आबि सकैत छी। लोक आ शास्त्र में एक अंतर स्पष्ट छैक - शास्त्र फ्रेम में बज्र गांठ सनक बान्हल छैक। ओहि फ्रेम सँ बाहर एबाक कल्पनो असंभव। ठीक एकर विपरीत लोक फ्रेम में रहैत अछि लेकिन आवश्यकता भेला पर फ्रेम सं बाहर एबामे में कनिकबो संकोच नहि होइत छैक। लोक प्रेम में भक्त आ भगवान मित्र जकाँ, नौकर मालिक जकाँ, प्रेमी-प्रेमिका जकाँ व्यवहार करैत अछि आ ओहि व्यवहार में शास्त्रक गुण, शिक्षा, संस्कार सम्मिलित रहैत छैक। लोक भगवान के आन नहि अपन बुझैत अछि। अपन नहि अपन परिवारक मनुख बुझैत अछि। सब निराकार सब गुणे साकार भ जाइत छैक। भगवान लोक में मनुखे जकाँ व्यवहार करैत छथि। ई बात शास्त्र में संभव नहि। लोक महादेब के “उगना” बना दैत अछि। सबरी लोक अछि जे अपन निश्छल प्रेम मे राम के आठि वैर खुआबय में संकोच नहि करैत अछि। सधना जाट भगवान के पहिने भोजन करबैत अछि तखने अपने खाइत अछि। लिंगायत समाज के एक महिला हमरा कहलक: "देखू, महादेब के ने माय ने पिता; ने भाई ने बहिन! बेचारे बाल रूप में हमरा लग हमर गाय केर बछड़ा बनि हमर गौशाला में खुटेसल रहैत छथि। अगर सर्दी भ गेलनि, नाक सँ पानि बहै लगतनि त के पोछतनि? के तेलक मालिश करतनि? चलु छोड़ू सब के हे बाऊ महादेब। आई सँ हम अहाँके अपन बेटा बना लैत छी। हम तेल-कुर क देब, नाक पोछि देब, काढ़ा पिया देब”। सब सँ पैघ बात ई जे ई महिला निर्विकार भाव सँ बजैत छलि। जे बजैत छलि सैह करबाक इच्छा सेहो छलैक। ई भेल लोक अथवा फोक के शक्ति। एहेन बात अथवा व्यवहार शास्त्र के ज्ञाता अथवा विद्वान/विदुषि नहि सोचि सकैत छथि। आब बात करी मधुश्रावणी पावनि आ कथा में ओ प्रसंग जाहि में गौरी लेल छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल अछि। कथा के अनेक स्वरूप अछि। लेकिन सब स्वरूप में छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल छनि। मधुश्रावणी के प्रयोजन नव विवाहित लड़की के जीवन के सब किछु के व्यवहारिक ज्ञान देनाई अछि। व्यवहारिक ज्ञान में शास्त्रीय ज्ञान सम्मिलित छैक। अगर मधुश्रावणी के कथा के सब प्रसंग आ उपकथा के देखब आ गुनब त लागत जे किछु बाँचल नहि अछि। एक गृहणी के जतेक ज्ञान चाही सब किछु घोटि-घोटि एहि कथा के मादे सिखा देल जाइत छैक। गौरी देवी के भूमिका के छोड़ि एक आदर्श स्त्री के भूमिका में छथि जकरा सामान्य स्थिति में अनेक तरहक परिस्थिति के सामना कोना करक चाही तकर प्रैक्टिकल ज्ञान भेटैत छैक। अहि प्रसंग में गौरी के भूमिका एक एहेन शिक्षिका के रूप में छनि जे नारी मनक द्वंद के समाधान करैत छथि। महादेब के भूमिका एक एहेन पतिक रूप में छनि जे पत्नी के भ्रम के दूर करैत छथि, अपन पत्नी के सम्मान करैत छथि आ हुनक सम्मानक आ शब्दक रक्षा करैत छथि। संगहि महादेब गौरी के मर्यादा के भान सेहो करबै चाहैत छथि। एहि सम्पूर्ण उपकथा में स्त्री आ पुरुख एक दोसरक पूरक छैक। दुनू के एक दोसरक मर्यादा के चिंता छनि। गौरी तीन स्वरूप - डाईन, चोरनी आ छिनारि - में ई संवाद स्थापित करय चाहैत छथि जे शंका आ जिज्ञासा मनुखक प्राकृतिक गुण छैक। एकर प्रमाणिकता के परीक्षा करब अनिवार्य। दोसर दिस महादेब अपन कृत्य सँ ई प्रमाणित करय चाहैत छथि जे पति-पत्नीक संबंध विश्वास पर टिकल रहैत छैक। अहि विश्वास के सम्मान आ रक्षा करब दुनू के सामूहिक जिम्मेदारी होईत छैक। अविश्वास सँ संबंध टूटैत छैक। बात गौरी आ शिव के होईत छैक तांहि उपकथाक विषय वस्तु ओहने छैक। महादेब तंत्र के जनक छथि। तांहि बात डाईन के भ रहल छैक। गौरी डाईन बनय चाहैत छथि। महादेब ई कहैत छथिन जे ई कार्य सभक नहि छैक। गौरी के दक्षिण दिशा के गाम में जेबाक लेल मना करैत छथिन। गौरी कोना मानती? सिखनाई शुरू करैत छथि। बिना कहने महादेब साक्षी रहैत सब क्रिया के देखैत अपना कंट्रोल में लेने रहैत छथि। आ जखन गौरी चुपचाप डाईन केर सब मंत्र पढ़ि सिख जाइत छथि त गौरी अपन पुत्र गणेश आ कार्तिक के कोढ़ करेज देखै लगैत छथि। आब महादेब गौरी के पकड़ि लैत छथि आ कहैत छथिन: "हद भ गेल? हमरा मना केलाक बादो अहाँ गेलौं दक्षिण कोण में?”तामसे भेड़ महादेब कहैत छथिन जे पूरा तंत्र डाहि देथिन। तुरत गणेश एक-एक मंत्र लिखने जाइत छथि आ कार्तिक डाहने जाइत छथि। गौरी के होइत छनि जे तंत्र कम सँ कम मूल रूप में बचि जाइक। साबर मंत्र मात्र अढ़ाई आखर के होईत छैक जकरा कातिक सँ चुटकी में चोरा लैत छथि। चोरेबक उद्देश्य मंत्र अथवा परम्परा के रक्षण छैक आर किछु ने। हमरा एना बुझना जाइत अछि जे एहि प्रसंग के प्रासंगिकता एहि बात मे छैक जे एक सफल गृहणी के सब तरहे अपन घर आ गृहस्थी के रक्षा करक चाही। आब गौरी चोरनी छथि ताहि प्रकरण पर आबि। बहुत बेजोड़ प्रकरण अछि। आ एकर आधार सेहो गौरी तैय्यार करैत छथि। गौरी महादेब सँ आग्रह करैत छथि जे अगर कियोक चोरी करैत अछि, किम्बा छिनरपन करैत अछि त ओकरा शरीर मे किछु एहेन चिन्ह अंकित भ जैक जाहि सँ जन-सामान्य के ई सिख भेट जाइक जे एहेन काज नहि करी। महादेब ना-नुकूर करैत गौरी के निवेदन मानि लैत छथि। एक बेर पुनः गौरी मर्यादा के लाँघेत छथि आ महादेब के मना केलाक बाद एक गाम में भाटा चोरी करैत छथि। निशान के रुप मे जहिना-जहिना गौरी भाटा चोरबैत गेली तहिना-तहिना नागड़ि बढ़ैत गेलनि। जखन गौरी के भान होईत छनि त महादेब सँ निवेदन करैत पुनः ओकरा समाप्त करय कहैत छथि। फेर होईत छनि कनिक अवशेष चिन्हक रूप में रहक चाही। आ कहैत छथिन जे निशान मात्र ई जानवर में होबक चाही। सैह भेल। आब छिनारि बला प्रकरण में अबैत छी। एक बेर पुनः महादेब के मना केलाक बाद नहरि कात में गेलनि। महादेब माल्लाह बनला। नाव पर राश्ता कटैत काल माल्लाह गौरी के कखनो गाल छुबि लैन।कखनो चुट्टी काटि लैन। भाव उत्तेजक भेल गेलनि। जेना-जेना केलि भाव मे गौरी मगन भेली तहिना-तहिना हुनकर माथ पर सिंग बढ़ैत गेलनि। मल्लाह जाल खसेलक। गौरी माछ बिछलनि। एकर फायदा उठबैत मल्लाह गौरी सँग एमहर-ओमहर करैत केलि क्रिया के सेहो आनंद नहि-नहि करैत लैत रहल। केलि होइत गेलनि आ सिंघ बढ़ैत गेलनि। आब गौरी के होश एलनि : "हे भगवान! ई की भेल? आब की हैत?” यैह सोचैत गौरी अपन सिंघ के साड़ी सँ झपैत गेली। मुदा सिंघ बढ़िते गेलनि। अंततः महादेब सँ निवेदन केल्थिन: "गलती भ गेल हमरा सँ। ई मलहबा अपन सीमा नाघि गेल। छू-छाप हमर प्रतिशोध के बादो करिते रहल। एकरा केलि कहनाय उचित नहि। गलती सँ हम कहि देलौं जे चिन्ह द दियौक। एकर उपाय अहाँ बताऊ?" महादेब कहलथिन: "हे गौरा, हम त कहने रही अहाँके जे निशान के चक्कर मे नहि परु। मुदा अहीं जिद ठानि देलौं जे द दियौक। लेकिन अहाँ चिन्ता जूनि करु। ओ मलहबा कियोक आर नहि छल। हम रही। ताहिं अहाँ छिनारि नहि भेलौं”। महादेब बजिते रहलनि: "हमरा बुझा गेल जे अहाँ तथ्य के जानय चाहैत छी। हम सोचलहुँ, से त ठीक मुदा कहीं ऊंच-नीच भ गेल त की हैत? सैह सोचैत स्वयं मलहबा बनि अहाँ लग गेल रही। अहाँक चरित्र बाँचल अछि। अहाँ अनेरे चिंता जूनि करु”। गौरी के भेलनि जे ओ अनेरे महादेब पर शंका केलनि। कहलथिन गौरी: "हे महादेब! हमरा सँ गलती भेल। आब अहाँ एकर उपाय करु। सिंघ त कोनादन लागि रहल अछि”? गौरी दिस देखि हँसैत महादेब आब सिंघ के समाप्त करय लगला। गौरी कहलथिन :"एक काज करु, कनि नाममात्र सिंघ रहय दियौ जे मृतभुवन में जानवर के सिंगार बनत”। गौरी के बातक सम्मान करैत महादेब नाममात्र के सिंघ रहय देलथिन जे कथाक अनुसार आजुक जुग में जानवर सब में भेटैत अछि। लोक व्यवहार के अनुरूपे अगर कथा के विवेचना करब त लागत जे गौरी एक सामान्य हाड़-मासक महिला बनि शिक्षा दैत छथिन। गौरी कदाचित सब महिला के ई सिख दैत छथिन: "एखन धरि जे गलत-सलत केलौं से बिसरि जाउ। आब अपन दाम्पत्य जीवन मे संलग्न होउ। पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, विश्वास बनल रहक चाही। इतिहास के छोड़ि वर्तमान आ भविष्य के चिंता होबक चाही”। शास्त्र केर गौरी भले एहेन बात सोचि नहि सकैत छथि, लोकक गौरी अपने समाजक महिला बनि समाज के जन सामान्य महिला के मानशिक अवस्था के देखबैत चोरनी, डाईन आ छिनारि बनि एक नव सिखक परम्परा स्थापित करैत छथि। एकर नाम जे द दी – यथार्थवाद(realism), लोक परंपरा केर शक्ति, व्यवहारिकता, पुरुख-प्रकृति के समावेश अथवा आरो किछु। समग्र रुपे ई अद्भुत परंपरा अछि। हाँ, मिथिला में मधुश्रावणी पाबनि केएक बात कनि कचोट करैत अछि आ एकर सार्वभौमिकता पर भले खिड़की दोगे कथिलेल नहि मुदा चैलेंज करैत अछि: “ई कुन कारण सं मिथिला के सब जाति में समाविष्ट नहि भ सकल आ ब्राह्मण मात्र में नुकायल रहि गेल?” भले ई प्रश्न छोट लगैत हो लेकिन एकर उत्तर देनाई अतेक सहज नहि अछि। उत्तर तकला सं एकर एक नव आयाम ठाढ़ भ सकैत अछि? पूरा कथा सुनलाक आ बेर-बेर मनन आ विवेचन केलाक बाद अहि निष्कर्ष तक यात्रा कैल. पाठक के भावक प्रतीक्षा रहत। आभार: अपन माता श्रीमती शिवदुलारी देवी के कहल कथा के आधार पर एहि प्रसंग पर चर्चा कएलहुँ अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा खिस्सा-सुखैत पोखैर प्यासल गाम एहि बेर गाम में एकटा भातिजऽक उपनेन छल आ आफ़िस में सेहो ३-४ टा छुट्टी लगातार भेट रहल छल । बस फ़ेर की एकबैगे गाम जेबा क प्लान बनि गेल । प्लानो तेहन जे जूर-शीतल दिन सांझ तक गाम पहुंचितौं। मगध एक्स्प्रेस अपन आद्त अनुसार चारि घंटा बिलंब सं पटना पहुंचेलक । आब ओत से बरौनी के ट्रेन पकरबाक छल । गर्मी के दिन में सूर्यास्त किछ बिलंबे स होइ अछि, स्वाइत राजेन्द्र पूल पर जखन लगभग साढे छ: बजे पहुंचल छलहुं त सूर्यास्त क मनोरम दृश्य  दृष्टिगोचर भेल छल। ओई मनोरम छटा मे ३-४ टा छौंरा सब गंगा जी के बीच धार में चुभैक रह्ल छल। ई दृश्य देखय बला छल। मुदा इ कि! अचानक से ध्यान गेल जे गंगाजी त सूखि के आधा भ गेलिह आ पाईन क धार केवल पांजर धरि में बचल छल । आब ई स्थिति भयावह बुझना गेल। त एकर की मतलब जे सुखार अपनो गाम-घर दिस दस्तक द देने अछि ! जखन गाम पहुंचलौं त जूर-शीतलऽक कोनो नामो-निशान नै देखना गेल। यद्यपि गाम हम अन्हार भेला के बादे पहुंचल छलहुं । अगिला दिन भोरे भोर गाम दिस बिदा भेलहुं, बाट में भेंटनाहर लोक सब सं दुआ-सलामी लैत नदी कात पहुंचलहुं । मुदा देखै छी त ई की; नदी त अछिए नै! गामक बलान नदी सुखि क पीच रोड बनल अछि आ साइकिल, मोटरसाईकिल सभ ओई बाटे सरसरायल ऐ पार से ओइ पार भ रहल अछि। ध्यान गेल जे गामऽक मुखिया (जेकर जनेर-धैंचा के फ़सल नदी कात में लहलहायत छल) के अतिक्रमणक सीमा आउर अधिक बढि गेल अछि आ जत हरदम नदी के धार रहै छल तत्तौ मुखिया के फ़सल लागल छल। ओना फ़सलऽक हालत सेहो पिलपिल सन भेल छल । गाम सं नदी बिला जेनाइ मने कि जे मानु जेना कोनो सौभाग्यवती के सिहुंथ से सेनूर पोछि देनाई भेल! मानै छी जे हम बेसी दिन गाम नै रहलहुं अछि, मुदा जतबे दिन रहलहुं अछि, ई नदी से एकटा लगाव रहल अछि। बाल्यावस्था में नदी नहाय के अपन उत्साह होय छ्ल, मां के मनो केला पर कहां मानै छलियै। आ गर्मी महिना में त बुझू जे जखने मोन होय तखने चैल दिय नहाय लेल, कोनो अंगा-गंजी लेबा के काजे नै, बस ककरो सं गमछा मांगू आ कूदि जाउ। जा कनि काल नदि में चुभकि ततबे काल में नदि कात के भांईटऽक गाछ पर पसरल गंजी-जंघिया सभ सुखि जाय छल । हं ई बात के अफ़सोस रहत जे हम हेलनाई नै सीख पेलहुं। यद्यपि गामक भैयारी सब थोरे-बहुत सीखेने छल मुदा कालांतर में सेहो बिसरि गेलहुं। ओना गाम-घर में धिया-पुता के दुपहर काल में नदी कात जाय लेल मना करल जाय छल, जै के लेल भूत सं ल के पंडूब्बी तक के डर देखायल जाय छल। नदी किनार में ओना माछ आ डोका पकरय के सेहो अनुभव रहल अछि। ऐ मामला में मीता भाईजी बड्ड तेज छलाह। बुझु से बंसी आ बोर के असल खेलाडी वैह छलाह आ हम सभ त स्टेपनी टाइप में संग लागल रहै छलहुं । खैर छोडू, हमहुं कहां पहुंच गेलहुं। हलुमान चौक पर पहुंचलहु त देखै छी जे छौंरा सभ के चौकडी जमल अछि। मीता भायजी सेहो छलाह। हम कहलियैन जे यौ मीता भायजी इ त जुलुम भ गेल। ओ सशंकित होइत बजलाह – जे से की? की भ गेलय? हम प्रतिउत्तर में बजलहुं जे "महराज गामऽक नदी बिला गेल आ अहां पुछै छी जे की भेल!" मुदा हुनकर रिस्पांस बड्ड सर्द छल। ओ बजलाह जे ई सब भगवानऽक माया अछि। देश-दुनिया में पाप बढि रहल अछि, तेकर दुष्परिणाम त एहने ने हेतै हौ। हम बजलहुं जे भायजी, तैयो गमैया के त अपन कर्तव्य करबाक चाही ने नदी के बचाब के लेल। सालों-साल नदी के तह गाद से भरि क उपर भेल जाय अछि, तै पर से नदी तट पर मुखिया के अतिक्रमण बढल जाय अछि। आई नदी सुईख गेल, सोचु जे ऐ संगे कतेको जलिय जीव सभ के त समूले नष्ट भ गेल हैत। क्षेत्रऽक जमीन में पानिऽक लेवल भी नीच्चां खसि परल हैतैक…हं, से त सत्ते. पहिने पचासे फ़ीट पर कल गडा जाय छल मुदा आब सै फ़ीट से कम में कहां नीक पाईन अबै छै – बीच में बात कटैत कनकिरबा बाजल । हम बात के आगा बढबैत बजलहुं जे देखु ई नदी में लोक सब नहाइ जाय छल माल-जाल के नहब आ पाईन पियाब लेल नदी ल जाय छल, मौगमेहर सब कपडा-लत्ता सभ टा त नदिये मे करै जाय छल ने यौ। त जै नदी सं एतेक उपकार भेटै अछि ओकरा लेल किछ त चिंतित होयबाक चाहि ने। एना जे नदी के भूमि के अतिक्रमण होयत रहतै, त निश्चिते ने नदी बिला जायत। औ जी अहां शहर से आयल छि, ऐश-मौज में रहै छी तैं इ आदर्शवादी गप्प सब फ़ुरा रहल अछि। दिल्ली से ऐनिहार सब के एहिना गोल-गोल गप्प फ़ुराईत रहै छै। – ऐ बेर बीच में बात काटैत बंठाबबाजी बाजल । हम कनि व्यथित होयत कहलहुं जे हं शायद अहां ठीके कहै छि, हम पतित भेलहुं जे गामऽक चिन्ता केलहुं । ई गाम त जेना हमर अछिए नै। आ अहां कि जनै छि शहरऽक जिनगी के विषय में । पाईनऽक किल्लत आ ओकर मोल की होई अछि ई कोनो दिल्ली-बंबई बला से बढिया के बुझि सकै अछि! कालोनी सब में पाईन के लऽ कऽ झगडा-झंझट त डेली के खिस्सा रहै अछि, बात त मरै-मारय तक पहुंच जाय अछि। बडका कोठी आ फ़्लैट में रहऽ बला लोक सभ के सेहो सभ सुविधा त भेटै अछि मुदा पाईन हुनको नापि-जोखि क भेटै अछि आ ओकर बड्ड मोल चुकबय परै अछि। जे स्थिति अखन हम-गाम गमय दिस देख रहल छि, जौं लोक नै चेतल त भविष्य में एतुको स्थिति वैह  होबय वाला अछि। खैर किछ काल गप्प-सरक्का मारलाक बाद हम गाम पर पहुंचलहुं आ नहाय के लेल बौआजी ईनार दिस बिदा होबैये बला छलहुं कि मां टोकलक जे कले पर नहा ले, बौआजी ईनारऽक पाईन कदुआह भ गेल छै। ओह! एकटा आउर अफ़सोचऽक गप्प। जहिया से हमर नदी नहेनाय छुटल छल गाम में हम बौआजीए ईनार पर नहाइत एलहुं अछि। बड्ड पवित्र आ शीतल पाईन होय छल ओहि ईनार के। गर्मी के  दूबज्जी दुपहरियो में एकदम शीतल पाईन। हमरा याद अछि जे बचपन में देखै छलहुं जे जूरशीतल दिन गौआं लोक सभ एकट्ठा भ के एहि ईनारऽक सफ़ाई करै छल, ढेकुल कसाई छल, नब रस्सी बान्हल जाय छल। रामनन्दन पंडितजी यजमानी में भेंटल एकटा नबका डोल बान्है छलाह। माने बच्चो सभ के लेल ई उत्सव के माहौल होय छल । मुदा आब…..! गामऽक दोकान में आब कोल्ड-ड्रिंक संगे मिनरल वाटरऽक बोतल सेहो बिकाय लागल छल। किछु सम̨द्ध लोक के घर में २० लिटरा आरो-पाईनऽक बोतल सेहो किनाय लागल छल। भोज-भात में अक्सरहां कोनो छोट बच्चा जेकरा परसऽ के शौक होई अछि मुदा ओकरा लुरिगर नै बुझल जाय अछि के पाईन परसय लेल द देल जाय अछि। कुम्हरम के भोज काल में गुरकेलवा पाईन परसै छल। हम टोन दैत बजलहुं – कि रे गुरकेलवा! तों पाईने परसै छैं । ओ बाजल- ईह भायजी ! सबसं महरग चीज त हमही परसै छी। - से कोना रौ? हम पुछलियै ओ बाजल जे भाईजी, भोजन त कतौ भेट जायत मुदा ई गर्मी में सभसं सोंहतगर चीज त ठंढा पाईने लगै छै यौ। गामऽक आधा कल त सुखा गेल अछि आ ईनार-नदी सब के हाल त अहां देखनेहे हेबै। तखन अहिं कहु जे हम की गलत बजलहुं? एतनी गो गुरकेलवा एकटा गंभीर बात के बड्ड विनोदी भाव में बाजि गेल छल । पता लागल छल जे गामक चौधरी सरकार से सस्ता लोन ल के एकटा पोखैर खुनेला हन । हमरा प्रसन्नता भेल जे चलु नीके अछि जे एकटा पोखैर भेने किछ त राहत अछि आ ताजा माछ खाय लेल सेहो भेट जायत । मुदा मां से जखन चर्चा केलहुं त ओ बाजल जे एंह । ओ पोखैर में किछु अछियो! ओ त बहु पंचायत सदस्यऽक चुनाव जितलैन त जोगार से लोन पास करा लेलाह। बैंक के देखाब लेल खाईध खुना के मांईट सेहो बेच लेलाह आ लोनऽक पाई सूईद पर चढा क सूईद खा रहल छैथ। हम कहलहुं देखु त धंधा। सोझ रस्ता पर चलि क कियौ पाई कमाइये नै चाहै अछि, जै से लोक संगे समाजऽक सेहो भला होय। बहिन एत गेलहुं त ओतौ वैह हाल देखय लेल भेंटल। कहियो ओकर गाम एहि बात लेल नामी छल जे ओई गाम में बहत्तर टा पोखैर। आगा-पाछां, एम्हर-ओम्हर जेम्हरे मुडी घुमाउ तेम्हरे छोट-पैघ पोखैर-डाबर देखाय परै छल। मुदा देखलौ जे ऐ बेर ओइ में स कतेको पोखैर-डाबर भैस गेल छल । बचलाहो में से बहुते रास जीर्ण अवस्था में छल। भाईजी(बहिन के भैंसुर) के बुझल छल जे हम माछऽक प्रेमी आदमी छी। जै बेर बहिन ओत जाय छलहुं, ओ कोनो ने कोनो पोखैर से माछ ल आबै छलाह । बेरूपहर जखन  भाईजी सकरी जाय लेल विदा भेलाह  हम पुछलियै जे भाईजी कतऽ जा रहल छी। बजलाह जे अबै छी सकरी से माछ नेने। हम बजलहुं जे किए गाम में ऐ बेर उपलब्ध नै अछि की? ओ बजलाह जे ओह! गामऽक पोखैर सब सुखल जा रहल अछि। आई-काइल्ह कतौ मछहर कहां भ रहल अछि। तैं ऐ बेर अहां के सकरीए के माछ खोआबै छी। हमर एकटा मधुबनी के मित्र सं सूचना भेटल जे शहरऽक आस पास जे डाबर-पोखैर सभ छल जै में से कतेको में शहरऽक नाला सेहो बहै छल, ओकरा सभ के मुईन क ओय जगह पर मकान-दोकान सभ बनाओल जा रहल अछि। जै कारण भूजल स्तर में गिरावट के संगहि शहर में जलऽक निकासी के सेहो समस्या भ रहल अछि। वापस घुरै काल ट्रैन में जखन एकटा महिला के पंद्रह टाका एमआरपी बला पाईनऽक बोतल के बीस टाका में बेचै बला भेंडर से ऐ बात के लेल जिरह करैत देखलहुं त इ बात सब एक-एक कय के मोन परै लागल। हम सोचै लगलहुं जे अपन देश में जे हजारो-हजार के संख्या में पोखैर-डाबर-दिग्घी सब छल या अछि से अचानक से त नै प्रकट भ गेल हेतै। एकर पाछां निश्चिते जौं बनबाब बला के इकाई छल हैत त बनाब बला सभ के दहाई छल हैत। आ ई ईकाई-दहाई सभ मिल क सैंकडा-हजार बैन गेल हेतै। पिछला किछु दस-बीस साल में विकासऽक नया पाठ पैढ गेल समाज ऐ इकाई, दहाई, सैंकडा, हजार के सोझे शून्य में पहुंचाब के काज कय रहल अछि। ऐ विरासत के सम्हार के चिंता नै समाज के भ रहल अछि आ नै सरकार के । आ जौं कतौ भऽओ रहल अछि त सरकार आ समाज में सामन्जस्ये नै बैस रहल अछि। हम इहो सोचय लगलहुं जे  जौं जिनगी में भगवती अवसर आ सामर्थ्य देलखिन त गाम में पांच कट्ठा जमीन कीन क ओतय एकटा पोखैर खुनायब आ ओहि में माछ पोसब। आब ट्रेनक गति संगे हम  यैह सभ योजनाऽक खाका खीच रहल छी। बस एतबे छल ई खिस्सा । प्रणव झा राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक अदहा दर्जन लघुकथा- 1. जारैनक दुख मेटा गेल सरस्‍वती पूजाक परात–माने माघक तेसर सप्‍ताहक अन्‍तिम दिन–चिन्‍तामग्न भुल्‍ली काकी गुमसुम भेल घूर लग बैसल छेली। बगलमे बारह बर्खक बेटी–मरनी–सेहो बैसल छेलइ। मने-मन भुल्‍ली काकी विचारि रहल छेली जे आइ भरि–माने राति तक–तँ जारैन चलत मुदा काल्‍हिसँ की हएत! कोनो गरे ने देखा पड़ि रहल छेलैन जे केना जारैनक दुख मेटाएत। ओना मरनीक जन्‍म ओहन परिवारमे भेल छल जइ परिवारमे बिनु जोत-कोर कएल खेत जकाँ बाल-बच्‍चाक बुधि परती बनल रहिते अछि। रहबो केना ने करतै, एक दिस गाममे स्‍कूल नहि जे धिया-पुताक लाट पकैड़ बच्‍चा गामोक स्‍कूल धरिक शिक्षा प्राप्‍त करत, आ ने ओहन विस्‍तारित परिवार जइमे बहुआयामी कारोबार रहने बुधिक विस्‍तार होइए। तँए बाल-बच्‍चाक बुधि  सकुचा कऽ थकुचा जाइते अछि। आ ने ओहन परिवारक संग सम्‍बन्‍ध रहैए जइमे परिवारजन अपने जिनगीसँ समाजक जिनगी आ समाजक जिनगीमे अपन परिवारक जिनगी देखनिहारो आ बुझि कऽ बुझौनिहारो रहैए। ओना, आन दिन भुल्‍ली काकी दुनू माइ-धी जखन घूर लग बैसे छेली तखन अपन बीतल जिनगीक बेथा-कथाक संग भुल्‍ली काकी राजा-रानी, रजनी-सजनी,फुलकुमारी-फुलटुस्‍सीक संग फुलिया-फलियाक खिस्‍सा सेहो मरनीकेँ सुनैबते छेली। भुल्‍ली काकीकेँ गामोक लोक खिस्‍सकैर बुझिते छैन जइसँ केते गोरे ‘खिसनी काकी’ सेहो कहिते छैन। अचेत बालबोध तँ सहजे घूर पजैरते चारूकात बैस खिस्‍सो सुनैए आ आगियो तपिते अछि। यएह ने भेल जिनगी जे जाड़क दुख मेटबै-ले आ जड़ाएल हथियारक आक्रमणकेँ रोकैले घूरक आगिकेँ हथियार जकाँ उपयोग करैए। जखने दुखक आक्रमण कमैए तखने ने ओते देहमे सुखक आगमन होइते अछि। जखने देह सुखाएत–माने देहमे सुख हएत–तखने ने सुखक सुख बुझि पड़त। दुनियाँमे के एहेन अछि जे सुख नहि चाहैए। भलेँ केते भेटल वा नइ भेटल ई दीगर बात भेल, मुदा केकरो सुखक खगता नइ छै ई बासी-मुहेँ झूठ बाजब नीक थोड़े हएत। माइक खसल मन देख मरनी बाजल- “माए, मन किए एना खसल छौ?” बेटीक बात सुनि भुल्‍ली काकीक मनमे अपन जिनगी आ अपन परिवार नाचि उठलैन। ओना केते गोरेकेँ परिवारक संग समाजो कहियौ आकि परिवारसँ बेसी समाजेक कहियौ, मनमे नचै छैन मुदा से भुल्‍ली काकीकेँ नहि भेलैन। हेबो केना करितैन। ओ तँ समाजक बीच बसल रहितो परिवारेक चिन्‍ता–माने परिवारक भरण-पोषण–सँ आगू नहि बढ़ि सकल छेली, मुदा तँए कि भुल्‍ली काकी समाजक काजसँ सोल्‍होअना हटले रहली सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। समाजमे केतौ बिआहे-दान भेल आकि आने नमहर कोनो काज, तइमे नइ जा अपन भाँज पुरबै छेली सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। से तँ पुरैबते छेली। मुदा तेकरा लोक थोडे समाजक काज–माने समाज सेवा–बुझैए। ओ तँ तेहेन चलनसारि अछि जे काजक हकार पबिते लोक अपन भागीदारी उपस्‍थित करिते अछि। मरनीक बातसँ भुल्‍ली काकीक मनमे ईहो तँ एबे केलैन जे कमसँ कम एते तँ बेटीक जिज्ञासा जगबे कएल जे खसल मन देख बुझैक जिज्ञासा केलक। मुदा जे जिज्ञासा केलक ओ अखन–जाड़क मासमे–थोड़े एकरा बुते पुरौल हएत। तेहेन समए अछि जे जारैनक खर्च बेसी रहनौं माने भानससँ घूर तक, आमदक रस्‍ता बन्न अछि। ओना, सूर्यक रौदसँ काँचो लकड़ी वा गाछक पातो सुखि कऽ जारैन भऽ जाइए मुदा सूर्य तँ अपने तेना जाड़ो आ शीतलहरियोक ज्‍वरसँ आक्रान्‍त छैथ जे मुहोँ देखब कठिन अछि, तैठाम जारैनक सुख केना भेटत? भुल्‍ली काकीक मन जारैनसँ जरनबाह दिस बढ़लैन। जरनबाह दिस मन बढ़िते नजैर पतिपर पड़लैन। पतिपर परिते मन पड़लैन केना पतिक संग बेरू पहरमे सभ दिन जारैन आनए जाइ छेलौं। आगू-आगू कान्‍हपर लग्‍गी नेने ओ रहै छला आ पाछू-पाछू अपने जाइ छेलौं। अम्‍बोह गाछी-कलम गाममे अछिए, निच्‍चासँ जे लग्‍गीसँ पबै छला सेहो तोड़ै छला आ जे नइ पबै छला तेकरा गाछपर चढ़ि कऽ तोड़ै छला। जइसँ दुनू साँझक जारैनक ओरियान तँ भाइए जाइ छल जे किछु-ने-किछु उगैरियो जाइत रहए जेकरा जाड़-बरसात-ले ओरिया कऽ घरमे रखै छेलौं। चारि साल पूर्व झलिमा कक्काक मृत्‍यु गाछेपर सँ खसने भेल छेलैन। जामुनक गाछपर सँ जारैन तोड़ैकाल झलिमा काका खसि पड़ला। गाछक ऊपर चढ़ि कऽ जारैन तोड़ै छला, भारी लग्‍गी छेलैन्‍हे जे सम्‍हारमे नइ रहलैन, बेसम्‍हार होइत खसि पड़ला। भेल ई जे एकटा मोटगर जामुनक डारि सुखल छेलै, जइमे लग्‍गी लगा जे अपन सभ बल तोड़ैमे लगौलैन जइसँ बल ऊपर बढ़ने पएर ढील भऽ गेलैन! जारैन तँ टुटि गेल मुदा लकड़ियेक आसमे लगियो रहबे करै, जेकरा दुनू हाथसँ झलिमा काका पकड़ने रहैथ, ओही आसमे खसि पड़ला। लग्‍गियो हाथेमे रहैन डारिपर सँ डारिपर खसैत निच्‍चाँ खसला। ठनक जमीन रहबे करै चुरम-चुर भऽ गेला। घन्‍टा भरिक भीतरे प्राण छुटि गेलैन। जे भुल्‍ली काकी अपन आँखिक सोझमे देखने छेली। ओना आजुक परिवेशो नहियेँ छेलैन जे भुल्‍ली काकीक मनमे गैसक चुल्‍हि वा गैसकेँ जारैन बुझितैथ...। लगले भुल्‍ली काकीक मनमे बेटीक प्रश्‍नक जवाब फुरलैन। जवाब फुरैक कारण भेलैन जे जहिना घरमे बाइस-बेरहट नइ रहने भुखाएल बच्‍चाकेँ माए प्रवोधैत किछु आन वस्‍तु दैत वा मुहसँ कोनो-कोनो बात कहैत तहिना भुल्‍ली काकी बजली- “बुच्‍ची, आइये भरि जारैन चलत। काल्‍हिसँ कथी लऽ कऽ भानस करब आ कथी लऽ कऽ घूर करब। समए तेहेन अछि जे जान बँचब कठिन अछि।” ओना मरनी बाध-बोनसँ गोबरो बीछि-बीछि आनै छल, जइसँ गोइठा-चिपरी सेहो पाथि जारैनक ओरियान करै छल आ गाछियो-बिरछी आ बँसवारिसँ सुखल पात खर्ड़ैर अनिते छल। मुदा जारैन-ले तँ अखन मासे कुमास अछि। भरि दिन सौनक झिसी जकाँ शीतो आ गाछपर सँ टप-टप पानिक बून जकाँ ओसो खसिते अछि। अदहा अगहनसँ जे शीतलहर पनपल ओ रसे-रसे बढ़िते गेल। पूस चढ़ैत-चढ़ैत एहेन विकराल रूप बनि गेल जे लोकक दैनंदिनक काजेटा प्रभावित नइ भेल,जीबो दुभर हुअ लगलै। जइसँ बँचैक एकमात्र सहारा आगिये रहल। भरि-भरि दिन लोक आगि पजारि कहुना-कहुना दिवस गुदस करए लगला। जखने अगियासीक विरधी हएत तखने जारैनक खर्च बढ़बे करत। तहूमे बैसाख-जेठक अगियासी नहि जइमे समैयो संग दइए। एक तँ ओहुना जाड़क मासमे ठंढक प्रकोपसँ आगियोक शक्‍ति कमि जाइए, तैपर अधिक शक्‍तिक खगता भेने जारैनक अधिक खर्च होइते अछि। ओना भुल्‍ली काकी आने-सालक (पाछूक साल) अटकारि कऽ जारैनक ओरियान करि कऽ रखने छेली, मुदा खर्च बढ़ने ओ माघक तेसर सप्‍ताह बीतैत-बीतैत ओरा गेलैन। ओना अचेतन मन मरनीक रहने माइक प्रश्‍नक उत्तर लगले सूरे दैत बाजल- “जारैन की कोनो खाइक वौस छी जे काज नइ लागत–माने बोइन बुत्ता नइ हएत–तँ लोककेँ भुखसँ परान छुटि जेतइ। जारैन तँ बाधसँ बोन धरि भेटैए। दुनू माइ-धी आनि लेब।” ओना बेटीक बात सुनि भुल्‍ली काकीक मन जुड़ेबे केलैन। जुड़ाइक कारण भेलैन जे जखन केकरो बेटा-बेटी जिनगीक विकट घड़ी कटैले फाँड़ बान्‍हि तैयार हएत तँ जरूर ओ ओइ विकट घड़ीकेँ टपबे करत। मुदा लगले भुल्‍ली काकीक मनमे भेलैन जे एक तँ गाछ चढ़ै-जोकर नइ अछि, शीतसँ तेना भीज कऽ पीछड़ाह बनि गेल अछि जे ओइपर चढ़ि जरनवाहि करब दुसकर भऽ गेल अछि। तैपर ईहो तँ ऐछे जे गाछपर पुरुख-पात्र ने चढ़ि कऽ जरनवाहि करै छैथ, मरनी केना गाछपर चढ़ि जरनवाहि काए सकैए? ई तँ विचारक वेगमे भँसि, माइक बेथाकेँ कम करैक क्रममे बाजि गेल। हँ एते संभव अछि जे छोट लग्‍गीसँ छोट-छोट गाछक सुखल ठौहरी तोड़ि आनि सकैए। मुदा हमरेटा संगे शीतलहरीक प्रकोप अछि सेहो बात तँ नहियेँ अछि। सभकेँ छै, तँए छोट-छोट सुखल ठौहरी छोट-छोट गाछमे आब थोड़े हएत ओकरा तँ कहिया ने लोक तोड़ि कऽ जरा नेने हेतइ। गाछक सुखल ठौहरीपरसँ उतैर भुल्‍ली काकीक मन गाछक पातपर पड़लैन। पातपर पड़िते मन कलियाएल फूल जकाँ कलियेलैन। कलियेलैन ई जे गाछेक पातटा नहि, बँसवारिमे बाँसोक पात तँ धरतीपर खसिते अछि। एक बेर बहुत नहि, मुदा थोड़बो-थोड़ तँ हेबे करत जे अपनो दुनू माइ-धी आनि सकै छी। खुशीक दशांश खुशी भुल्‍ली काकीक मनमे उठलैन। बजली- “बेटी, जेहेन बेर-बिपैत पड़ैबला अछि ओकरा मेटेबहक केना?” बजैक क्रममे मरनी समस्‍याक–माने प्रश्‍नक–नाँगैर पकैड़ तँ बाजि गेल छल मुदा पड़ाइतकेँ ने नाँगैर पकैड़ पकड़ल जा सकैए, मुदा जे–माने पैछला दू मासक शीतलहरी–असथिर भेल अजेगर जकाँ थुसकुनियाँ मारि बैसल अछि ओकरा केना पकैड़ सकैए। माइक प्रश्‍न सुनि मरनी जारैनक मरम दिस जखन नजैर उठौलक तखन मर्माहत हुअ लगलै। मनमे रंग-रंगक प्रश्‍न उठए लगलै। बाध-बोधसँ चराटी गाए-महींक गोबर बीछि-बीछि अनै छेलौं, ओकर गोइठा-चिपरी पाथै छेलौं, से ने आब गाए-महींस चड़ैले–ठंढ दुआरे–जाइए आ ने अपने ओइ कनकनीमे टहैल-बुलि पाएब। तखन गोबर केतए-सँ आनब। जखन गोबरे ने रहत तखन गोइठा कथीक बनाएब...? फेर लगले मरनीक मन तरैप गेलइ। तरैपते उठलै जे रस्‍तो-पेरापर दू-चारि चोत गोबर भेटिये जाएत, जेकरा आनि कऽ पाथबो करब तँ ओ सुखाएत केना?काँच गोबरक जारैन केहेन हएत? गोबरोक जारैन बनबैक तँ मासो आ मौसमो होइ छइ किने। कम्‍मो-सम्‍म रौद भेने पातर गोइठा बनौलो जाइए आ सुखि-सुखि जरनो बनैए। मुदा सेहो नहियेँ अछि। जेना-जेना रौदक धाह बढ़ैत जाइए तेना-तेना ने गोबरो-गोइठाक आकारोमे बढ़ोत्तरी होइ छइ। जेठुआ रौद गोरहाक होइते अछि। जे रायफल जकाँ जाड़सँ रक्षा करिते अछि, सएह ने सठि गेल। मरनीक मन आगू बढ़ि गाछक सुखल ठौहरी आ निच्‍चाँमे खसल पातपर पड़लै। पातपर पड़िते मन औना गेलइ। औना ई गेलै जे अखन तँ गाछक पातो खसब बन्न अछि। ओकरो पतझाड़ होइक समए होइए। ओहो तँ बारहो मास एके रंग नहियेँ खसैए। तखन सुखल पात केतए-सँ खर्ड़ैर आनब? दुनू माए-बेटी–माने भुल्‍ली काकी आ मरनी–घूर लग बैसल आगूक जिनगीक संग जीबैक आशा ताकि रहल छेली। कोनो आशा नजैरक सोझ आबिये ने रहल छैलैन। जखने केकरो जिनगी जीबैक आशामे विकट संकट उपस्‍थित भऽ जाइए तखने ने ओइ संकटकेँ भगबैमे मनो आ मनक मथनो ढाही मारि-मारि चूरम-चूर होइए, से तँ दुनू माए-बेटीकेँ भाइये रहल छल, तही काल तेरह-चौदह बर्खक करनी सेहो पहुँचल। मरनी आ करनीक बीच सात-आठ बर्खसँ बहिना लगल छइ। जेहने मरनीक परिवार बोनिहारिनीक अछि तेहने करनीक परिवार सेहो अछि। ओना करनीक परिवार मरनीसँ नमहर अछि मुदा जीबैक–माने परिवार चलैक–आशा दुनूक एक्के रंग छइ। लगमे करनी अबिते घूर लग बैसैत बाजल- “बहिना, तोरा ऐठाम तँ अगियासियोक ओरियान छह, हमरा तँ दिनमे भानसो हएब कठिन अछि।” करनीक बात सुनि मरनीक मनमे एते तँ आशा भाइये गेल जे हमरा आइ भरिक–माने रौतुका भानस करै तकक–जारैन अछियो मुदा बहिनाकेँ तँ सेहो ने छइ। जखन ओकरा आइयो भरिक जारैन नइ छै, तखन ओ केना जारैनक दुख मेटाएत? तँए करनीक जुक्‍ति–माने जारैन ओरियान करैक विधि–केँ मरनी अखियाइस कऽ सुनए चाहि रहल छल। कोनो बेमारी साए गोरेकेँ आकि हजारे गोरेकेँ किए ने हौउ, मुदा जँ सभकेँ एकरंग बेमारी रहत तँ ओकर दबाइयो एक्के हएत किने। ओना, दुनू-गोरेक मनमे गंभीर समस्‍यो छल आ ओकर समाधानक गंभीर विचारो चलिये रहल छेलै, मुदा तेकरा मरनी पतझाँप दऽ बाजल- “बहिना, तोंहू भरि दिन झूठे-फूसेक परसादी बँटने फिरै छह?” मरनीक बात सुनि करनीक मनमे जोरक धक्का लागल। धक्का लगिते मनमे फुरलै जे दुनियाँक तँ यएह सभसँ पैघ बेमारी अछि जे कियो केकरो दुख-बेथा नइ पतियाइत अछि आ जँ पतियेबो करैए तँ ओकरा हँसी-चौलमे उड़ा दइए। कहू, जे जारैनक दुआरे एहेन समैमे भानस बन्न छै आ बहिना भऽ कऽ कहैए जे ‘भरि दिन झूठे-फूसेक परसादी बँटै छह।’ मुदा छी तँ बहिन किने, ईहो तँ भाइये सकैए जे हँसी-चौलमे दुखे बिसरा दियए। मनमे रहने ने दुख देहो आ मनोकेँ दुखबैए आ मन बहैल गेने तँ दुखो ने बहैल जाइ छइ। मनकेँ असथिर करैत करनी बाजल- “बहिना, तोरा सन पथराएल लोककेँ जाबे आँखिसँ नइ देखा देब, ताबे अहिना अनका दुखकेँ सुनि-सुनि हँसबो करबह आ चौलो करबह।” करनीक बात सुनि मरनी ठमकल। मुदा लगले जहिना जिनगी चीत-सँ-पट वा पट-सँ-चीत नइ होइए, रसे-रसे करोटिया होइत-होइत माने करोट बदलैत-बदलैत बदलैए तहिना मरनियोँक विचार केना लगले उनैट जाइत। ओना मने-मन मरनी अपन अबैबला दुखकेँ जरूर देख रहल छल मुदा गपो-सप्‍पक तँ अपन दुनियोँ अछि आ दुनियाँदारी सेहो अछिए...। दुनू बहिनाक बीच विचारक बेवधानकेँ–माने बीचक दूरीकेँ–सामंजस करैत भुल्‍ली काकी बजली- “बुच्‍ची, अखन अहाँ दुनू गोरे बच्‍चा छी, तँए जेते बुझला पछाइत–माने बुधि भेला पछाइत–जिनगीमे गति अबैए से अखन नइ आएल अछि। तँए नीक जकाँ जइ ढंगसँ बुझक चाही से नइ बुझि पेब रहल छी।” भुल्‍ली काकीक विचार सुनिते करनी जेना अपन विचार व्‍यक्‍त करैमे सह पौलक तहिना मुँहक रूखि बदललै। बदैलते मरनी दिस तकैत बाजल- “बहिना,तोरा तँ दू गोरेक परिवार छह तँए हल्‍लुक सवारी पेब घोड़ा जकाँ फौद खेलाइ छह मुदा हमरा तँ छह गोरेक परिवार अछि, कहुना-कहुना तोरासँ दोबर-तेबर जारैनक खर्च अछि!” करनीक बात सुनि भुल्ली काकी बजली- “करनी बुच्‍ची, एहेन समैमे जारैनक ओरियान केना करब?” भुल्‍ली काकीक बात सुनिते करनीकेँ अपन माइक सिखौल बात मन पड़लै। मन पड़िते बाजल- “काकी, अखन तँ ने गोइठा-चिपरीक ओरियान भऽ सकैए आ ने जारैन-काठीक, गाछ-बिरीछक पातो नहियेँ भऽ सकैए, तखन तँ एकटा उपाय ऐछे जे गाछ-बिरीछ ने शीत-पाला बीता कऽ पात छोड़ैए मुदा बाँस तँ ओसक आगमन होइते पात छोड़ए लगैए, तँए बँसबिट्टीक बिच्‍चोमे आ कातोमे पात झड़िते अछि, ओहीमे सँ खर्ड़ैर कऽ आनब।” करनीक विचार सुनि भुल्‍ली काकीक मन सहमलैन। सहैमते बजली- “बुच्‍ची, अपना सभ सन-सन लोक-ले राजा आ दैव दुनू बेपाट अछि, तखन तँ अपनो सभ मनुखे छी ई तँ बुझए पड़त किने।” भुल्ली काकीक बात सुनि करनी बाजल- “काकी, ‘राजा-दैव’ नइ बुझलिऐ?” करनीक प्रश्‍नसँ भुल्‍ली काकीक मनमे खुशी उपकलैन। खुशी उपैकते मुस्‍की दैत बजली- “बुच्‍ची जहिना राजा मदारी छी जे परजाकेँ बानर बुझि नचबैए तहिना दैव मदनारी भेल जे दैव सभकेँ डोर पकैड़ नचबैए।” भुल्‍ली काकीक बात जहिना करनी सुनलक तहिना मरनियोँ सुनलक मुदा बुझलक दुनूमे सँ कियो ने। तँए भुखल बच्‍चा जकाँ दुनू गोरे भुल्‍ली काकीक मुँह दिस बकर-बकर ताकए लगल। जे भुल्‍ली काकी सेहो बुझली। ओना भुल्‍ली काकीकेँ मनमे ई कुवाथ नहि भेलैन जे किए ने हमर बात दुनू बुझलक। मनमे ई भेलैन जे अखन तँ दुनू बच्‍चा अछि तँए दुनियाँदारीक बात नइ बुझैए। मुदा बुझै-जोकर तँ भाइए गेल अछि। आब कहिया बुझत। बारह-चौदहबर्खक दुनू ऐछे, किछु दिनमे बिआह-दान हेतइ, सासुर बसत, परिवारक भार पड़बे करतै। से नहि तँ दुनूकेँ दोसर ढंगसँ बुझौनाइ नीक हएत। दोसर ढंगसँ बुझबैत भुल्‍ली काकी बजली- “बुच्‍ची, जहिना देखै छहक किने जे एक दिस बरखाकेँ बहन्ना बना राजा गाछ-बिरीछ लगबै पाछू बेहाल अछि तँ दोसर दिस आन-आन देशसँ तेलो आ गैसो कीन-कीन, धुआँ-धुकुरक बहन्ना बना घरे-घर पसारि रहल अछि।” भुल्‍ली काकीक बात करनियोँ आ मरनियोँ बुझलक। बुझैक कारण भेलै जे आँखिक सोझमे गामेमे देख रहल अछि। ईहो देख रहल अछि जे भानस करैमे सुविधाजनक सेहो अछिए। मुदा लगले एकटा प्रश्‍न मनमे उठलै- तखन भुल्‍ली काकी किए ‘बहन्ना’ कहै छथिन..! करनी बाजल- “काकी, अहाँ एकरा बहन्ना किए कहै छिऐ?” करनीक जिज्ञासु प्रश्‍न सुनि भुल्‍ली काकी गंभीर भऽ गेली। गंभीर होइक कारण भेलैन जे जेहेन उपयोगी विचार अछि तेकरा जँ ऊपरे-झापरे किछु कहि बुझा देबै से नीक नहि। तँए प्रश्‍नक गंभीरताकेँ देख गंभीर होइत बजली- “एते जे गाममे गाछ-बिरीछ अछि, जे गामक सम्‍पैत छी, जँ एकर उपयोग नइ हएत तँ हएत की? देखते छहक जे लकड़ीक काज जे अछि ओ धीरे-धीरे लोहो आ प्‍लाष्‍टिको पकैड़ रहल अछि, तखन गामक-गाम जे लकड़ीक बोन अछि, ओ की हएत?” भुल्‍ली काकीक बात सुनि करनी मुड़ी डोलबैत बाजल- “हँ, से तँ भाइये रहल अछि।” विचारमे सहमति देख भुल्‍ली काकी बजली- “छोड़ह दुनियाँदारीक गप, अखन जइ दुखसँ दुखी छह तेकर निमरजना केना हएत, से गप करह।” भुल्‍ली काकीक बात सुनि करनीक मन एकाएक बैसए लगल। मनमे नाचए लगलै जे भानस बिनु जरने केना हएत? तोहूमे जैठाम छी तिनको नहियेँ छैन जे मुहोँ खोलब–माने मंगबो करबैन–तँ मुँह भरत? पाछू उनैट करनी तकलक तँ माइक बात मन पड़लै। मन पड़िते बाजल- “काकी, बँसबिट्टी सभमे तेते पातो आ सुखल कड़चियो सभ खसल अछि जे जँ ओकरा खर्ड़ैर आनब तँ जारैनक ओरियान भऽ जाएत।” करनीक बात भुल्‍ली काकीकेँ सोहंतगर लगलैन। बजली- “तखन ते जारैनक दुखे मेटा जाएत। समैयोमे देखै छी जे दिनो-दिन (कुहेस) कमले जा रहल अछि। सरस्‍वती पूजा भाइये गेल। वसंतक आगमन सेहो भाइए रहल अछि। गाछो-बिरीछ पतझाड़ लेबे करत।” हँसैत मरनी बाजल- “तखन तँ जारैनक दुखे मेटा जाएत किने?” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2465, तिथि : 17 अप्रैल 2017, ‘बेटीक पैरुख’ लघु कथा संग्रहक पहिल संस्‍कणसँ...। 2. बेटीक पैरुख पचहत्तैर बर्खक फुलकुमारीक देहक पानि अखनो ओहिना जलजलाउ छैन जेना ढेरबामे रहैन, माने ढेरबामे जे चढ़लैन ओ अखनो चढ़ले छैन। बैशाख मासक एगारह बजेमे मारन बाधसँ पुतोहुक संग घास नेने फुलकुमारी आँगन नहि जा सोझे मालक थैरक छाहैरमे आबि बैसली। छाहैरमे बैस अपन देहक थकानो हेट करए लगली आ गाइयो-बच्‍चाकेँ हिया-हिया देखए लगली। देखैत-देखैत जेना-जेना देहक थाकैन कमैत गेलैन तेना-तेना गाइक सिनेह मनमे उठैत गेलैन। उठैत सिनेहसँ सिनेहासिक्‍त होइत फुलकुमारी अपन दुनू हाथ जोड़ि आठ किलो दूधवाली गाएकेँ प्रणाम करैत पुतोहुकेँ कहलखिन- “छोटकी, एक लोटा पानि नेने आबह।” ‘छोटकी’ माने भेल ‘छोटकी पुतोहु’, नाओं छिऐन जलेसरी। नि:सन्‍तान एवं बैधव्‍य जीवन-यापन करैत जलेसरी करीब चालीस बर्खक अछि। दुइए सासु-पुतोहुक परिवार छैन। बच्‍चेसँ फुलकुमारी नैहरेमे रहल जइसँ सासुर बसैवाली औरतसँ बेसी बजैक संस्‍कार रहबे केलइ। ओना समाजमे बेटी-जातिक विचारकेँ कम आँकल जाइए जइसँ ओकर कटाहो बातकेँ तन्नुक बुझले जाइए। तन्नुक आँक रहने ने गड़ैक सम्‍भावना आ ने गड़ला पछाइत विसविसाइयेक। फुलकुमारीकेँ दू सन्‍तान भेलैन, दुनू बेटे। जेठ जीबछ आ छोट राधेश्‍याम। जीबछ नोकरी करए बम्‍बइ गेल। कपड़ाक एकटा कारखानामे नोकरी भेलै, तैबीच बिआहो भेलइ। बिआहक दू सालक पछाइत पत्नियोकेँ बम्‍बइये लऽ गेल। अखन जीबछकेँ चारिटा सन्‍तान–तीनटा बेटा आ एकटा बेटी–छइ। चारू हाइ स्‍कूल-सँ-कौलेज धरि पढ़ैए। बम्‍बइ गेला पछाइत जीबछ चारि-पाँच साल तक गामकेँ बिसरल नहि। मासे-मास रूपैयो पठबै आ साले-साल एबो करइ। जीबछेक लाटमे राधेश्‍यामो बम्‍बइ गेल। ओकरो ओही कारखानामे नोकरी भेलइ। ओना, राधेश्‍यामकेँ बम्‍बइक पानि नइ पचलै, रसे-रसे रोगाए लगल। छह मास बम्‍बइमे इलाजो करौलक मुदा रोग कमलै नहि जे बढ़िते गेलइ। ओना, सेवो जइ रूपे हेबा चाही से नै भेने निराश भऽ राधेश्‍याम गाम चलि आएल। जेहेन इलाजक आ पथ्‍य-पानिक जरूरत छेलै से गामोमे नइ भेने थोड़बे दिनक पछाइत रोधेश्‍याम मरि गेल। राधेश्‍यामकेँ तीन साल पहिने बिआह भेले छेलइ। सन्‍तान-शखा एकोटा ने भेलै, तइ बिच्‍चेमे ई दुनियाँ छुटि गेलै, छुटि कि गेलै जे छोड़ि कऽ जाए पड़लै। पतिकेँ मुइला पछाइत जलेसरी मनमे रोपि लेलक जे दोसर घर नइ जाएब। माने दोसर बिआह नइ करब। ओना समाजो तँ समाजे छी, जइमे सबहक अँटावेशो होइए आ सभ रंगक नियमो-बेवहार चलिते अछि। सभ नियम ई जे एहनो नियम ऐछे जे बिआहक पछाइत जँ पति मरि जाए तँ पत्नीकेँ दोसर बिआह वर्जित अछि। माने ई जे जीवन भरि विधवा बनि जीबह। ई भेल लड़की लेल नियम, मुदा ओहीठाम लड़का लेल एहेन नियम नहि अछि। ओ दोसर-तेसर कि जे दर्जनो बिआह कए सकैए। तहिना समाजमे किछु जाति एहेन अछि जइमे लड़का-लड़की–माने बिआहक पछाइत पति-पत्नी–मे कियो मरौ, माने ‘पत्नी’ मरौ आकि ‘पति’, दुनूकेँ दोसर-तेसर बिआह करैक अधिकार अछिए। तैसंग ईहो होइते अछि जे जइ जातिमे दुनूकेँ माने जहिना लड़काकेँ तहिना लड़कीकेँ  दोसर-तेसर बिआह करैक अधिकार रहितो जँ दोसर-तेसर नइ करए चाहैए तँ सेहो बड़बढ़ियाँ–माने नहियोँ कए सकैए। ओना चोरा-नुकी दुनूक संग चलिते अछि, माने जइ जातिमे लड़कीकेँ दोसर बिआह करैक अधिकार नइ छै, चोरा-छिपा कऽ ओहूमे कैये सकैए, मुदा से भेल समाजसँ छीप कऽ करब। हलाँकि समाजो तैपर सँ अपन नजैर छीपिये लइए आ छीपिते नहि अछि बल्‍कि छिपाएल धन जहिना लोक धीरे-धीरे बिसैर जाइए तहिना रसे-रसे बिसरियो जाइते अछि। मुदा तँए ई कहब जे नियम ढील भऽ बदैल गेल, सेहो नहियेँ भेल अछि। अखनो जीवित अछि आ कहिया तक जीवित रहत सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। घास झाड़ब छोड़ि छोटकी पहिने सासुक आदेश पूरबए विदा भेली। कलपर पहुँच हाथ-पएर धोइ कऽ पहिने अपने भरि छाँक पानि पीब लेली। पछाइत,बैशाख मासक गरमाएल लोटा जे आँगनमे बैसल-बैसल तबि गेल छल, तेकरा कलपर आनि चिक्कनि माटि नहि छौरसँ मजली। चिक्कनि माटिसँ नइ माजैक कारण भेलैन जे माटिक राखल ढेरी लग जलेसरी नइ गेली, कलक बगलमे राखल छौरक ढेरीपर नजैर पड़ि गेलैन, ओहीमे सँ एक मुट्ठी छौर लऽ लेली। छौर-पानिसँ भीतर-बाहर रगैड़ते लोटाकेँ ताउ शान्‍त होइत-होइत सभ तामस मिझा गेल। तामस मिझाइते धुआइओ गेल। धुएला पछाइत कण्‍ठ लगतक पानि भरि छोटकी सासुकेँ दइले बढ़ली, तैबीच शान्‍त भेल लोटा मने-मन छोटकीकेँ असिरवाद देलकैन जे ओ हमरा फुलकुमारी लग पहुँचबैत-पहुँचबैत कंचन बना देलक जइमे अमृत रूपी जल अछि। अमृतो तँ वएह ने छी जे जिनगी दइए। जखने मुहसँ प्रवेश करैत अमृत रूपी पानि नाभिकुण्‍ड लग पहुँचैए तखने ने शान्‍त-चित्तक किछु अवधि बढ़ि जाइ छै, जइसँ ऐगलो काजक मुहरी जागि-जागि जिनगीक संग चलैत रहैत अछि। सएह फुलकुमारियोक संग भेल। गाएपर नजैर अँटकौने फुलकुमारी मने-मन प्रणाम करैत बजली- “हे लछमी माता! अहीं एहेन दाता छी जे अपने बच्‍चा जकाँ हमरो दुनू सासु-पुतोहुक रछिया करै छी।” गाइक लक्ष्‍मी रूपकेँ देखते फुलकुमारी आराधना करए लगली, माने अपन कतर्व्‍य-कर्मकेँ अराधए लगली। तैबीच छोटकी पानि भरल लोटा नेने आबि लगमे ठाढ़ भऽ गेली। जेकरा फुलकुमारी नइ देख रहल छेली, किएक तँ आराधनामे नजैर तेना अँटैक गेल छेलैन जेना जीवन भेटला पछाइत एक संग मन-मस्‍तिष्‍क दुनू अँटैक जाइत अछि। फुलकुमारीक बन्न आँखि देख छोटकीकेँ बुझि पड़लैन सासु ओंघा रहली अछि, सिनेह भरल स्‍वरमे बजली- “माए, लगले आँखि लागि गेलैन?” होइतो अहिना छै जे किछु भेटला पछाइत खुशीसँ आनन्‍दक ओंघी सेहो अबिते छइ। निमग्न फुलकुमारी पुतोहुक बात सुनिते अकचका कऽ बजली- “नहि! ओंघाइ नइ छी कनियाँ, गाइक रूइयाँपर नजैर पड़ि गेल छेलए।” रूइयाँ देखब, माने दुधारू गाइक प्रमुख लक्षणकेँ देखब छी, ई बात छोटकीकेँ बुझले रहैन। बजली- “घासो झाड़ब पछुआएले अछि।” आशा भरल शब्‍दमे फुलकुमारी बजली- “ऐठाम लोटा रखि दहक आ घास झाड़ए चलि जा।” छोटकी सएह केलक। पानि पीला पछाइत फुलकुमारीक नजैर फेर गाइयेपर जा कऽ अँटैक गेलैन। अँटैकते मन विस्‍मित हुअ लगलैन। विस्‍मित ई जे जहिना अपन जिनगी अछि तहिना ने गाइयोक अछि। ओना, दुनूमे ई अन्‍तर ऐछे जे धनक भण्‍डार रहितो गाएकेँ अपन जिनगीक रक्षा करैक लूरि-बुधि नइ छै तँए, ने अपने रक्षा कऽ सकैए आ ने बच्‍चेक आ ने अपन दूधेक उपयोग अपनासँ कऽ सकैए। मुदा मनुख तँ से नहि छी। सभ किछु कऽ सकैए। तँए जँ दुनूक सम्‍बन्‍ध बनल रहत तँ एक-दोसरक आशापर असानीसँ जीवन-यापन कऽ सकै छी। गामक बेटी फुलकुमारी। दू कट्ठा घराड़ी पिताकेँ रहैन। पिता–सिंहेश्वर–किसानी जिनगीसँ जुड़ल छला। खेत-बोनिहारक रूपमे जे सोल्‍हे बर्खक अवस्‍थामे सिंहेश्वर जीवन धारण केलैन ओ ता-जिनगी धारण केनहि रहला। किसानी जिनगीक अधिकांश लूरि सिंहेश्वरकेँ रहबे करैन। हर जोतब, रोपैन करब आ कमठौन करबक संग घर बन्‍हैक सभ लूरिसँ सम्‍पन्न छला। सिंहेश्वरक पहिल पत्नी पहिल सन्‍ताने होनिहारिक समए मरि गेली, आ बच्‍चो माइये संग मरि गेल। परिवारमे दोसर-तेसर नइ रहने, असगरे सिंहेश्वर पेटक ओरियान करितैथ कि पत्नीक सेवा-टहल। अपना आँखिसँ सिंहेश्वर पत्नीयोँ आ बच्‍चोकेँ मरैत देखने छला, मुदा जिनगियो तँ जिनगी छी, सभकेँ जीबैक आशा रहिते अछि। ओना, समाजिक नियमो आ अपन टुटल मनोक चलैत सिंहेश्वर साल भरि तक उपारजनक संग अपने हाथे भानसो-भात करैत रहला। मुदा साल भरिक पछाइत समाजो दवाब दैत सिंहेश्वरकेँ कहलकैन- “दुनियाँमे अहींटा केँ एहेन गति नहि भेल, बहुतोकेँ भेलैन। तँए जखन मनुखक जिनगी भेटल तखन मनुख जकाँ ने परिवार बना परिवारिक जिनगी जीब।” समाजोक विचार आ अपनो जिनगीक खगता देख सिंहेश्वर दोसर बिआह केलैन। दू सालक पछाइत दोसर पत्नीसँ फुलकुमारीक जन्‍म भेल। तीन सालक जखन फुलकुमारी छल तखने मइटुग्‍गर भऽ गेल। माने सिंहेश्वरक दोसर पत्नी सेहो ऐ दुनियासँ चलि गेली। दोसर पत्नीकेँ मुइला पछाइत सिंहेश्वर तेसर बिआह नहि केलैन। केतबो समाजक लोक रंग-रंगक तर्क दऽ बुझबैत रहलैन मुदा किनको बात नहि सुनला। सिंहेश्वर दू-दूटा पत्नीक मृत्‍युक संग पहिल सन्‍तानक मृत्‍यु देख चुकल छला। दुनूक कष्ट-पीड़ा आँखिक सोझमे नचिते रहै छेलैन, तैसंग ईहो आशा मनमे जागिये गेल छेलैन जे जखन तीन बर्खक सन्‍तान ऐछे तखन वंशो तँ आगू बढ़बे करत। एकरे नीक जकाँ पोसब-पालब। पोसै-पालैमे चारि-पाँच बर्ख धरि किछु बेसी परेशानी हएत, सएह ने। हएत तँ हएत। जखन मनुख बनि धरतीपर जन्‍म लेलौं तखन जँ अपन भार अपने नइ उठा चलब, तँ जेकर आशा हम करब ओकरो तँ अपन जिनगी छै, अपन बाल-बच्‍चा छै, अपन परिवार छइ। सभ ने अपन-अपन परिवार चलबैमे लागल रहैए। आब तँ फुलकुमारी तीन बर्खक भेल, छहमसिया बच्‍चा जकाँ तँ नहि अछि जे भरि दिन देह धरा राखए पड़त आ माइक दूधो दिऐ पड़त। अन्नो-पानिपर फुलकुमारी जीविये सकैए। पाँच बर्ख टपला पछाइत फुलकुमारी आँगन-घरक किछु-किछु काज करए लगल। आठ बर्ख अबैत-अबैत भानसो-भात आ घरक आनो-आनो काज सम्‍हारए लगल। तैसंग सिंहेश्वर असगरूआ जिनगी जीबैक लूरिक अभ्‍यस्‍त सेहो होइत-होइत भाइये गेला। बाल-विवाहक चलैन समाजमे सभ दिनसँ आबि रहल अछि। ओना, बाल-विवाहक प्रश्‍नपर समाजमे सभ दिनसँ विभाजन रहल आ अखनो अछि। बालो-विवाहक अपन उत्तर अछिए। उत्तर ई जे बेटा-बेटीक बिआह-दान करब माता-पिताक धार्मिक काजसँ जोड़ल अछि। धार्मिक काज भेल ओहन काज जे जिनगीसँ जुड़ल अनिवार्य काजक श्रेणीमे अबैत अछि। अनिवार्य तँ ऐछे जे वंशकेँ आगू बढ़ैक सीढ़ी छी। मुदा ओहन काज रहितो जँ माता-पिता बेटा-बेटीकेँ बीस-पच्‍चीस बर्खक जुआन बनबए चाहता आ बिच्‍चेमे अपने चलि जेता तखन जिनगीक काजक पूर्ति केना हेतैन। जँ पूर्ति नहि हेतैन तखन अधरमी तँ भेबे केला किने। जखन अधरमीक विचार मन मानि लेतैन तखन तँ नर्कक भागी भऽ गेला किने। एक तँ ओहुना कियो नर्क नहि जाए चाहैए, मुदा जँ कियो धोखा-धोखीमे चलि जाएत से आ बुझलमे जाएत से, दुनू एक रंग थोड़े हएत। जानि कऽ नर्क जाएब बेसी कष्टकर होइ छइ। तँए केकरो अपन मन जानि कऽ एहेन विचार देत? नहि देत। ओना, समाजोक बन्‍धित चलैन आ आँखिक देखल अपन परिवारो तँ सिंहेश्वरकेँ छेलैन्‍हे, तँए सातमे बर्खमे बेटी–फुलकुमारी–क बिआह कऽ देलखिन । आइये नहि पहिनौं लोक परदेश खटिते छला। कलकत्ताक पटुआक कारखानामे लड़काक पिता नोकरी करै छला आ बाल-बच्‍चाक संग पत्नी गामेमे रहै छेलैन। तँए ओहन परिवारकेँ परदेशी परिवार नहियेँ कहल जा सकै छल, तँए भीतर-बाहरक विचार नइ रहने सिंहेश्वरक कुटुमैती माने बेटीक बिआह ओइ परिवारमे भेलैन। ओना समाजक किछु विचारवानक विचार स्‍पष्‍ट रहैन जे ग्रामीण परिवेश आ शहरी परिवेशमे जिनगीक सभ कथुमे अन्‍तर आबिये जाइ छै, जइसँ केतौ-ने-केतौ जिनगीमे बेवधान उपस्‍थित होइते छइ। ओना, आन कारण जे लड़काक पिताक रहल होनि मुदा मूल कारण छेलैन जे बारह घन्‍टा चटकलमे[1] काज केला पछाइत पान-सात गोरेक परिवार शहरमे चलब कठिन भऽ जाइन। मुदा गाम तँ गाम छी, गाममे लोक नोनियोँ साग खा साए-साए बर्खक जिनगी हँसैत-खेलैत काटिये लइए। मुदा जे हौउ, कलकतिया लोक तँ बरागत छेलाहे तँए आगू-पाछू किछु-ने-किछु जनिते छला। फगुआमे लड़काक पिता–मोतीलाल–गाम एला। सिंहेश्वरक पिसियौत बहिन ओही गाममे बसैत, तँए हुनके अगुआइमे बिआहक गप-सप्‍प शुरू भेल। ओना,बहिनकेँ घटक नहियेँ कहि सकै छिऐन आ ने बिआह-दानक दलाल। ओ तँ घटकैतीक रस्‍ताक राही भेली। तहूमे ओहन राही जे राहगीर बनबैमे सहयोगी होइथ। ओना, एहेन सूत्र सूत जकाँ गाम-गाममे पसरल ऐछे आ कथा-कुटुमैतीमे सक्रिय रूपमे चलितो अछिए। फुलकुमारीक बिआह नअ बर्खक विनाशक संग भऽ गेल। टुकधुम करैत विनाश गामक स्‍कूल धेने छल तँए नाम-गामसँ लऽ कऽ परगना तक बुझल रहइ। सिंहेश्वर अपन बेटीक बिआह ओहन लड़कासँ करैक विचार मनमे रखने छला जेकर चमड़ी काज करै-जोकर होइ। पाँच गोरेक संग सिंहेश्वर अपनो घर-वर देखए अन्‍तिम विचारक दिन मोतीलालक ऐठाम गेला। अखन तक पिसियौते बहिनक माध्‍यमसँ गप-सप्‍प होइत रहल छल। जइमे सहमतक झलकी तँ छेलैहे। एक तँ ओहुना गामक ओहन बच्‍चा जेकर परिवारिक आमदनी कम छै, ओकर जिनगियो तेहने–माने वगे-वाणि आ रहन-सहन–रहल अछि। तहूमे कलकतिया परिवार तँ भाइये गेल छल तँए मनसँ सिंहेश्वर मानि लेलैन। ओना, ई प्रश्‍न पहिने उठि गेल छल जे लड़काकेँ जँ अपन नाम-गाम लिखल हेतै तँ कुटुमैती कैये लेब। एक गोरे पितेक सोझमे लड़काकेँ नाओं-गाँओं लिखैले कहलैन, जे विनाशकेँ लिखल भऽ गेलैन। तैपर लड़काक पीठ ठोकैत हुनकर पिता ईहो आश्‍वासन दैत सभकेँ सुना देलखिन- “बिआहक पराते लड़काकेँ कलकत्ता लऽ जाएब। ओतै पढ़ेबो-लिखेबो करबै आ चटकलमे काजो सिखेबै।” विह्वल सिंहेश्वर आश्वासन दैत बजला- “बैशाखमे काज[2] सम्‍हारि लेब।” ओना मोतीलालक गीध-दृष्‍टि सिंहेश्वरक अढ़ाइ कट्ठा घराड़ी-बाड़ीपर अँटकल छेलैन, जेकरा ओ खुलि कऽ नहि बजै छला, तेकर कारणो छल जे चारि भाँइक भैयारीमे सतरह धूर घराड़ी अपना छेलैन जइसँ ऐगला पीढ़ीकेँ घराड़ियो बास हएब कठिन छेलैन्‍हें। ओ समैयो नहियेँ छेलैन जे कलकत्तामे बासक चर्च-बिचर्च मनमे उठितैन। तँए सोलहन्नी गामेक आशा मनमे रहैन। ओना कखनोकाल खास कऽ जाड़क मासमे जखन चटकलसँ भरि देह पटुआक रूसी लगले डेरा अबैथ आ नहाइक समए रहै छेलैन, तखन मने-मन तामसो उठबे करै छेलैन जे जइ गाममे बसैयो-जोकर–ओना बसबक विराट रूप अछि, मुदा अखन से नहि, अखन एतबे जे रहै-जोकर जमीन घरक लेल–जमीन नहि अछि तइ गाममे रहिये केना सकै छी। ओना, तामस उठला पछाइत मोतीलालक मनमे ईहो एबे करै छेलैन जे जे भोज नइ खाइ ओइमे पारा मरौ आ जइ गाममे बसैयो-जोकर खेत नहि तइ गाममे साँझ-भोर नढ़िया-कुकुर भुकौ...। मुदा बेवस मनक बेवसी विचार कैये की सकैए। ओना करैले दुनियाँ बड़ीटा अछि, मुदा केनिहारो बड़ीटा हुअए तखन ने, से तँ बुझले बात अछि जे जँ कमेने होइत तँ गरिबोहोकेँ होइत जे भरि दिन कोदारि तमैए...। बैशाख मास, फुलकुमारीक बिआह भेल। ओना गाम-घरमे–माने जैठाम फुइसिक घर अछि–बैशाखक लगन माने बैशाखमे बिआहक दिन खतरनाक अछिए। कखन हवा-बिहाड़ि उठि जाएत आ भानसेक आगिसँ घरो जरि जाएत तेकर कोनो ठेकान नहियेँ अछि। मुदा फुलकुमारीक बिआहमे से नहि भेल। तीन दिन पहिने तेहेन निराउ बरखा भऽ गेल जे फागुनोक लगनक दिनसँ बेसी सोहनगर बना देलक। एक तँ शहरी वातावरण दोसर पढ़ै-लिखैक सुविधा रहने मोतीलाल अपन बेटाकेँ मैट्रिक तक पढ़ा लेलैन। किछु-किछु अपन काजो, देखा-देखी सिखेबे केने छला तँए मनमे ईहो आशा रहबे करैन जे जखन चटकलक बिसवासू नोकर छीहे तखन धियो-पुताकेँ काज किए ने चटकलक मालिक देता। मुदा मनमे ईहो खरोंच उठबे करैन जे जखन अपने छेहा अनपढ़ छी तखन जँ लेबरक काज करै छी तँ बड़बढ़ियाँ, मुदा बेटा तँ पढ़ल-लिखल मैट्रिक पास अछि, ओकरा किए ने ऑफिसमे बाबूक काज हएत..? विचार तँ मोतीलालक अनुकूले रहैन मुदा ई बात मनमे उठबे ने करैन जे जहिना घोंदा-घोंदे लेबरकेँ धिया-पुता सुतपुतिया भँट्टा जकाँ फड़ैए, तहिना जँ करखनो फड़ै तखन ने अँटावेश हएत, जँ से नइ फड़त तँ अपन मनक सपना सुतली रातिक सपना जकाँ फूसि हएत की नहि। ओना, पेंशनक बेवस्‍था सेहो मोतीलालक मनकेँ भरने रहै छेलैन जे सेवा निवृत्तिक पछाइत जँ बेटा खाइयो-पीबैले नइ देत तैयो दुनू परानी ठाठसँ जिनगी काटि लेब। तहूमे साठि बर्खक पछाइत ने रिटायर हएब। मुदा ई बात मोतीलाल बुझबे ने करैथ जे सेवा-निवृत्तिक पछाइत अदहा जिनगी आरो जीब, मुदा तइले ओहन काजो करैत देहक रक्षा केने रहब तखन ने, से तँ पटुआक रूस्‍सी रसे-रसे फेफड़ेमे बसि रहल अछि, तखन केतेटा औरुदा लऽ लऽ नाचब, से बुझबे ने वेचारा केलैन। पचासे बर्खक अवस्‍थामे मोतीलाल मरि गेला, पेंशनसँ वंचित भाइये गेला। आजुक समए नहि छल जे अनुकंपासँ दोसरो समांगकेँ नोकरी भेट जइतैन। मुदा रच्‍छ रहलैन जे काजुल घरवाली रहैन जे अपन भार अपने उठौने छेली। ओना विनाश सेहो उट्ठा काज शुरू कऽ नेने छल, जइसँ पिताक मृत्‍युक पछाइतो कलकत्तेमे रहल। मोतीलालकेँ मुइलाक साल भरिक पछाइत विनाशक दुरागमन भेल। सासुरक परिवारिक स्‍थिति देख-बुझि विनाश अपने दिससँ दुरागमनक खर्च केलक। दुरागमनक पछाइत फुलकुमारी सासुर गेली, मुदा से वीध पुरबैले, मात्र सात दिन सासुरमे रहली। सात दिनक पछाइत फुलकुमारी अपन पैत्रिक गाम चल एली। विनाश सेहो कलकत्ता गेला। खाली विनाशक माए–माने फुलकुमारीक सासु–अपन गाम धेने रहली। सालमे एक मासक छुट्टीमे विनाश गाम अबै छला, जइमे दू-चारि दिन अपना गाममे रहै छला बाँकी समए सासुरेमे। कबैया-डोर रहने दू सालक पछाइत विनाश अपन गामक घराड़ी दियादक हाथे बेचि, माइयोकेँ सासुरे लऽ अनलैन। दूटा बेटा विनाश-फुलकुमारीकेँ भेलैन। दुनूकेँ गामेक स्‍कूलमे नाओं लिखा देलखिन। दू सालक पछाइत विनाशक माए सेहो मरि गेली, जे सुख-सराध सासुरेमे विनाश केलकैन। बाबन बर्खक अवस्‍थामे विनाशकेँ दमा रोग पकैड़ लेलकैन। एक तँ कलकत्ताक पानि जबदाह, दोसर दमा रोग, बेमारी बढ़िते गेलैन। अन्‍तो-अन्‍त चटकलक मालिक एक मासक दरमाहाक अतिरिक्‍त तीन हजार रूपैआ मिला अरतीस साए दऽ विनाशकेँ ताधरिक छुट्टी दऽ देलकैन जाधैर रोगमुक्‍त नहि भऽ जेता। विनाशक रोग जड़ियाइते गेल, जइसँ कलकत्ता छोड़ि गामे आबि इलाज-बात करए लगला आ आमदनी लेल एकटा लटखेनाक दोकान केलैन। मुदा से नइ चला सकला। नइ चलबैक कारण रहैन जे एक तँ शहरी वातावरणक अभ्‍यस्‍त, दोसर वेपार करैक लूरि नहि। ओना विनाश मैट्रिक पास रहबे करैथ, तँए मनमे भेलैन जे भलेँ कलकत्ता जकाँ कमाइ नइ हुअए मुदा ट्यूशन पढ़ा किछु कमा तँ लेबे करब। दोकानक संग-संग विनाश आठ-दसटा बच्‍चाकेँ ट्यूशन सेहो पढ़बए लगला। वएह आधार आमदनीक अपन रहलैन, जइमे बेमारीक दवाइयो आ पथो-पानि चलब कठिन भाइये गेल रहैन। मुदा फुलकुमारी तँ मेहनती रहबे करैथ। एकटा निम्‍मन गाए सेहो पोसने छेली आ दू कट्ठा घरसँ बँचल जे वाड़ी रहैन तइमे तीमन-तरकारीक खेती तेना भऽ कऽ कऽ लइ छेली जइसँ खेनाइ-पीनाइक संग किछु-ने-किछु आमदनियोँ भाइये जाइत रहैन, जइसँ गुजर-बसरमे बेसी दिक्कत नहियेँ होइन। गाममे रहलाक चारि सालक पछाइत विनाश मरि गेला। ओना फुलकुमारीकेँ सासुरक जे सुख होइ छै–माने परिवारसँ दियाद-वाद आ सर-समाजक–से नहियेँ भेटलैन। माने कहियो केकरो मुहेँ ‘भौजी’, ‘काकी’, ‘दादी’ नहि सुनि सकली। भौजी-काकी-दादी सासुर बसैवाली ने होइ छैथ, से तँ फुलकुमारी सासुरमे रहबे ने केलीह। ओना, परिवारसँ लऽ कऽ समाज धरिमे फुलकुमारी ‘बहिन’, ‘दीदी’ सभ दिन बनल रहबे केलीह। जहिना जीवन चिन्‍हनिहार जिनगीक श्रमकेँ चिन्‍ह अपनाकेँ श्रमशील जिनगीमे पएर रोपि ठाढ़ होइत चलब सिखैए आ चलैत-चलैत डेगा-डेगी दौड़ए लगैए तहिना फुलकुमारी अपन जीवन-श्रमकेँ चिन्‍ह तहियेसँ दौड़ए लगली जहिया पति मरि गेलैन, एकटा बेटा मरि गेलैन आ दोसर बेटा अपन परिवार बम्‍बइये लऽ कऽ चलि गेलैन। ओना, फुलकुमारीक परिवार अखनो ओहिना भरल-पूरल छैन जेना पैछला पीढ़ीमे छेलैन। माने जहिना विनाशो भैयारीमे असगरे छला आ फुलकुमारियो असगरे...। आइ भलेँ फुलकुमारी अपन विधवा पुतोहुक संग असगरे किएक ने जीवन-बसर कऽ रहली-हेँ मुदा बाप-पुरखाक घराड़ीपर तँ छैथे, तैसंग बम्‍बैयेमे किएन ने बसि गेलैन मुदा चारिगो पोता-पोतीक दादियो आ बेटा-पुतोहुक माइयो तँ वएह ने छैथ। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2735, तिथि : 26 मार्च 2017 ‘बेटीक पैरुख’ लघु कथा संग्रहक पहिल संस्‍कणसँ...। 3. जन्‍मतिथि तीस बर्ख नोकरी केला उत्तर रविकान्‍त आइ.जी. पदसँ सेवा निवृत्ति‍ भेला। जखन कि रविशंकर आइ.जी.सँ आगू बढ़ि डी.जी.पी.क पदभार सम्‍हारलैन‍। साल भरि ऐ पदपर रहता, ओते नोकरीक अवधि बँचल छैन। रविशंकरकेँ डी.जी.पी.क पदभार सम्‍हारला जखन तीन दिन भऽ गेल तखन रविकान्‍तकेँ मन पड़लैन‍ जे मीतकेँ बधाइ कहाँ देलिऐन। कारणो भेल जे पनरह दिन पहिनहिसँ जे कार्यभार दिअ लगलैन ओ नोकरीक अन्‍ति‍म दिन धरि नै फरिछौट भऽ सकलैन‍। समयक अभावमे रविकान्‍तकेँ मनमे एलैन जे मोबाइलेसँ बधाइ दऽ दिऐन। मुदा एक्के काजक तँ भिन्न-भिन्न जुइत होइए। जुइतिक अनुकूले ने काजो अनुकूल हए‍त, तँए मोबाइलसँ बधाइ देब उचित नै बुझि पड़लैन‍। ओना तत्काल जानकारीक रूपमे वधाइ दैत समए लेल जा सकै छल। मुदा से नै भेलैन‍। चाहक कप टेबुलपर रखि दहिना बाँहि उठबैत पत्नी‍केँ कहलखिन- “की ऐ बाँहिक शक्ति‍ क्षीण भऽ गेल जे काज नै कऽ सकैए। मुदा..!” रश्‍मि‍ अपना धुनिमे छेली। ओना एक्के टेबुलपर बैस चाहो पीबै छेली आ मेद-मेदीन जकाँ मुँहमिलानीमे गपो-सप्‍प करै छेली आ अपने धुनिमे मनो वौआइ छेलैन‍। एकठाम बैस‍‍ चाह पिबतो मन दुनूक दू-दिसिया छेलैन‍। रश्‍मि‍क मनमे रविशंकरक पत्नी ‘किरण’ नचैत रहैन। जिनगी भरि सखी-बहीनपा जकाँ रहलौं मुदा आइ ओ रानीसँ महरानी बनि गेली आ..? की हम ओइ बटोहिनी सदृश तँ ने भऽ गेलौं जेकरा सभ किछु छीनि घरसँ निकालि देल जाइ छइ? जहिना कोनो नीनभेर बच्‍चा माइक उठौलापर चहाइत उठैत बेसुधिमे बजैत तहिना पतिक प्रश्‍नक उत्तर रश्‍मि‍ देलखिन- “ऐ बाँहिक शक्‍ति ओतबेकाल रहै छै जेतेकाल शान चढ़ाएल हथियार ओकरा हाथमे रहै छइ। नहि तँ प्राणशक्‍ति निकलला उत्तर शरीर जहिना माटि बनि जाइ छै तहिना बनि कऽ रहि जाइए। हाथसँ हथियार हटिते जिनगी हहरए लगै छइ।” तैबीच चाहक कप उठा चुस्‍की लैत रविकान्‍त बजला- “बच्‍चेसँ दुनू गोरे संगे रहलौं। खेनाइ-पीनाइ, खेलनाइ-धुपनाइ, घुमनाइ-फीरनाइ सभ संगे रहल। कहाँ कहियो मनमे उठल जे दुनू मीतमे कोनो दूरी अछि। अपनाकेँ के कहए जे घरो-परिवार आ सरो-समाज कहाँ कहियो बुझलैन‍ दुनूमे कनियोँ अन्‍तर छै, मुदा आइ..?” “मुदा आइ की?” “यएह जे आइ बहुत दूरी बुझि पड़ि रहल अछि। बुझि पड़ैए जेना अकास-पतालक अन्‍तर भऽ गेल अछि। कोन मुँह लऽ कऽ आगू जाएब, से किछु फुरिये ने रहल अछि।” “तखन?” “सएह ने मन असथिर नै भऽ रहल अछि। जिनगी भरिक संगीकेँ ऐहेन शुभ अवसरपर केना नै बधाइ दिऐन। मुदा एते दिन बरबैरक विचार छल आब ओ थोड़े रहत। कहाँ ओ सिंह दुआरपर विराजमान होइबला आ कहाँ हम देशक अदना एकटा नागरिक। की अपनाकेँ ओइ कुरसीक बुझी जइसँ हेट भेलौं? सीकपर रखल वा तिजोरीमे रखल वस्‍तु ओतबेकाल ने जेतेकाल ओ ओतए रहैए। रविशंकर आइ ओतए छैथ जेतए हमरा सन-सन जिनगी जे अन्‍ति‍म छोड़पर पहुँचनिहार हुनकर हुकुमदारी करत। कोन नजैरिये ओ देखै छल आ आइ कोन नजैरिये देखता।” रविकान्‍तक अन्‍तर-मनकेँ रश्‍मि‍ आँकि रहल छेली। मुदा जेते आँकए चाहै छेली तइसँ बेसी घबाएल माछ जकाँ मनक सड़ैन बढ़ल जाइत रहैन। की आँखिक सोझक देखल झूठ भऽ जाएत? केना नै भऽ सकैए। दू गोरेक बीचक बात तँ ओतबेकाल धरि सत्‍य रहैए जेतेकाल धरि दुनू मानैए। काज थोड़े छी जे गरैज कऽ कहत जे तोरा पलटने हम थोड़े पलटबौ..! असथिर होइते रश्‍मि‍क मनमे विचार जगलैन‍। दुखक दबाइ नोर छी। पैघ-सँ-पैघ दुख लोक नोरक धारमे बहा वैतरणी पार करैए। बजली- “जहिना अहाँक मनमे उठि रहल अछि तहिना हमरो मनमे रंग-बिरंगक बात उठि रहल अछि। कहाँ रविशंकरक पत्नी किरण राजरानी आ कहाँ हम..? कहाँ राधाक संग कृष्‍ण आ कहाँ..! काल्हि‍ धरि दुनू गोरे एकठाम बैस‍ एक थारीमे खेबो करै छेलौं आ एक्के गिलासमे पानियोँ पीबै छेलौं मुदा आइ संभव अछि? आखिर किए?” हवाक तेज झोंकमे जहिना डारि-डारिक पात डोलि-डोलि एक-दोसरमे सटबो करैत आ हटबो करैत तहिना पत्नीक डोलैत विचार सुनि रविकान्‍तो डोलए लगला। एक तँ पहिनेसँ रविकान्‍तक मन डोलि रहल छेलैन‍ तैपर पत्नीक विचार आरो डोला देलकैन‍। अनभुआर जगह पहुँचलापर जहिना सभ हेरा जाइत तहिना रविकान्‍त हेरा गेला। औनाइत बजला- “कानसँ सुनितो आ आँखिसँ देखितो किछु बुझि नै पाबि रहल छी जे की नीक की अधला! की करी की नै करी से किछु ने फूरि रहल अछि। साठि बर्खक संगीकेँ एते दूर केना बुझब? मुदा लगो केना बुझब? साठि बर्खक पथिक-संगी जँ आब दू दिशामे चली तखन केते दूरी हएत, साठि बर्खक जिनगियो तँ छोट नै भेल।” बिच्‍चेमे रश्‍मि‍ टपैक पड़ली- “जिनगी तँ एक दिन, एक क्षण वा एक घटनामे बदैल‍ जाइए आ साठि-बर्ख की धो-धो चाटब!” “तखन?” “सएह नै बुझि रहल छी। एतेटा जिनगी एक संग बितेलौं मुदा आइ जइ जिनगीमे पहुँच‍‍ गेल छी तइ जिनगीक सम्‍बन्‍धमे किछु विचार कहियो नहि केलौं।” जहिना आन गामक चौबट्टी, तीनबट्टीपर पहुँचते भक्क लगि जाइत, जइसँ पूब-पच्‍छि‍मक दिशे बदैल‍ जाइत तहिना पत्नीक बात सुनि रविकान्‍तकेँ भेलैन। मुदा एहनो तँ होइते अछि जे ओहने चौबट्टी आकि तीनबट्टीपर भक्क खुजितो अछि। ओना रविकान्‍तक भक्क तेना भऽ कऽ तँ नहि खुजलैन‍ मुदा एक प्रश्‍न मनमे जरूर उठलैन‍-  बच्‍चासँ सियान भेलौं, सियानसँ चेतन भेलौं, चेतनसँ बुढ़ाड़ीक प्रमाणपत्र भेट‍ गेल। हरबाह थोड़े छी जे अधमरुओ अवस्‍थामे बुढ़ाड़ीक प्रमाण नइ भेटत। मुदा मन किए धकधका रहल अछि? जिनगीक चारिम अवस्‍था वानप्रस्‍थक होइ छै, संयासीक होइ छै जे दिन-राति दौगैत दुनियाँक हाल-चाल जानए चाहैए। से कहाँ मन मानि कऽ बुझि रहल अछि..? पतिकेँ गंभीर अवस्‍थामे देख रश्‍मि‍ बजली- “अहाँक मनमे जे नाचि रहल अछि वएह हमरो मनमे नाचि रहल अछि। मुदा ईहो बात तँ झूठ नहियेँ छी जे जिनगीक संग बाटो बनै छइ आ बाटे संग बटोहियो बाट बनबै छइ?” तैपर रविकान्‍त बजला- “की बाट?” पतिक प्रश्‍न सुनि रश्‍मि‍ विह्वल भऽ गेली। मनमे उठलैन- हेराइत संगीकेँ बाट देखाएब बहुत पैघ काज छी। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन‍ जे तखन अपने किए एते वौआइ छी? कम-सँ-कम चाह पीबैकाल बैसारियोमे ऐ बातक विचार करैत अबितौं तँ औझुका जकाँ नहि वौऐतौं, जहिना जोतल आ बिनु जोतल खेतमे चललासँ पहिने धड़ियाइ छै, धड़ियेला पछाइत‍‍‍ पतियाइ छै, पतिएला पछाइत‍‍‍ पेरियाइत पेरा बनै छै आ वएह एकपेरिया बहुपेरिया बनैत चलै छइ...। रश्‍मि‍ बजली- “अहाँ कौलेज छोड़ला उत्तर जिम्मा उठा सरकारी बाट पकैड़ साठि बर्ख पूरा लेलौं। ने कहियो जमीन दिस तकैक जरूरत‍ महसूस भेल आ ने तकलौं। मुदा आइ तँ ओतइ उतैर आबि गेल छी जेकर रस्‍ता अखन धरिक रस्‍तासँ भिन्न अछि।” पत्नी‍क विचार सुनि रविकान्‍त मुड़ी डोलबैत आँखि उठा कखनो पत्नीक आँखिपर रखैथ तँ कखनो धरती दिस ताकए लगैथ। आगिपर चढ़ल कोनो बरतनक पानि‍ जहिना निच्‍चाँसँ ताउ पाबि ऊपर उठि उधियाइक परियास करैत तहिना रविकान्‍तक वैचारिक मन उधियाइक परियास करए लगलैन। मुदा जहिना पिजराक बाघ पिजरेमे गुम्‍हैर कऽ रहि जाइत, तहिना आइ धरिक जे मन रूपी बाघ एहेन शरीर रूपी पिजरामे फँसि गेल छेलैन जे जेते आगू मुहेँ डेग उठबैक कोशिश करैथ ओते समुद्री वादल जकाँ आस्‍ते-आस्‍ते ढील होइत रहैन। आगूक झलफलाइत बाट देख रविकान्‍त बजला- “विचारणीय बात जरूर अछि, मुदा बिनु बुझल जिनगीक संग तँ अहुँक जिनगी चलल कहाँ केतौ बेवधान भेल। आइ जे कहलौं ओ तँ ओहू दिन कहि सकै छेलौं, जइ दिनसँ बहुत आगू धरि बढ़ि गेलौं। से तँ रोकि कऽ मोड़ि सकै छेलौं। मुदा आइ तँ जानल-बिनु जानल दुनू संगे वौआए चाहै छी!” पतिक बात सुनि रश्‍मि‍ मने-मन विचार करए लगली जे दुनियाँमे एहनो लोकक कमी नै अछि जेकरा जरूरत‍ भरि लूरि-बुधि नै छै, मुदा ईहो तँ झूठ नहि, जे जेकरा छेबो करै ओइमे बेसी ओहने अछि जे या तँ उनटा वाण चलबैए वा नहियेँ चलबैए। तखन सुनटा वाण केना आगू बढ़त आ जँ बढ़बे करत तँ केते आगू बढ़त जेकरा आगू दुश्मन जकाँ चौबगली उनटा वाण घेरने अछि? मुदा कोन उपाय अछि, जखन शुद्ध तेल-मोबिल देल मजगूत इंजनो चढ़ाइपर दम तोड़ए लगैए आ टुटलो चक्का रहैत बिनु तेलो-मोबिलक गाड़ी भट्ठा गरे दौड़ैत रहैए जइमे बिनु ब्रेकक गाड़ी जकाँ केतेकेँ जानो जाइए आ केतेकेँ मुहोँ-कान फुटै छइ? रश्‍मिक मन कहलकैन- डेग आगू उठाएब जरूर कठिन अछि। मुदा लगले मनमे फेर उठलैन‍- जइ बाटकेँ पकैड़ आइ धरि चललौं जँ ओइ बाटकेँ छोड़ि दोसर बाट पकैड़ नव बटोही जकाँ विदा होइ, ई तँ संभव अछि। जहिना चिन्‍हार जगहक चोर पड़ा दूर देश जा अपन क्रि‍या-कलाप बदैल‍‍ लइए आ नव-मनुखक जिनगी बना जीबए लगैए...। वाण लगल पंछी जकाँ पतिकेँ देख रश्‍मि अपन अनुभवकेँ सान्‍त्‍वना भरल शब्‍दमे बजली- “जहिना अहाँक जिनगी तहिना ने हमरो बनि गेल अछि। जएह बुढ़ापा अहाँक सएह ने हमरो अछि। मुदा एकठाम तँ दुनू गोरे एक छी। एक्के दबाइक जरूरत‍ दुनू गोरेकेँ अछि, तँए विचार दइ छी जे आब ने ओ रूतबा रहल आ ने ओकाइत, तखन जानि कऽ जहरो-माहूर खा लेब सेहो नीक नहि। मनकेँ थीर करू।” रश्‍मि‍केँ आगूक बात पेटेमे घुरियाइत रहैन तइ बिच्‍चेमे रविकान्‍त बजला- “बेसी दुख तँ नै बुझि पड़ैए मुदा साठि बर्खक प्रोढा अवस्‍था धरि हमरा सबहक नजैर नइ गेल! जखन कि सरकारक पैघ काजक जिम्मामे सभ दिन रहलौं। समयानुसार काज करितो अपन जिनगी तँ सुरक्षि‍त रखितौं। साठि बर्खक पछाइतो तँ चालीस बर्ख जीबैक छल। जखन कि ईहो तँ जनिते रही जे पछाइत दरमाहा टुटि जाएत आ जिनगीक आवश्‍यकता बढ़ैत जाएत।”‍ पतिक विचारकेँ गहराइत समुद्र दिस जाइत देख मुँहक दसो वाण साधि रश्‍मि‍ छोड़लैन‍- “अनेरे मनमे जुड़शीतलक पोखैरक पानि जकाँ घोर-मट्ठा करै छी। ओना, घोरे मट्ठा ने घीओ निकालैए आ अन्‍है सेहो निकालैए। संयासी सभ केना फटलाहा कम्‍मल सबहक मोटरी बान्‍हि कन्‍हामे लटका लइए आ सौंसे दुनियाँ घुमैए। अहाँकेँ तँ सहजे‍ चरि-चकिया गाड़ी चलबैक लूरियो अछि।” पत्नीक विचार सुनि रविकान्‍त ओझरा गेला जे एक दिस संयासीक बात बाजि कहि रहल छैथ जे जहिना कानूनी अधिकारसँ जीवन-रक्षा होइए तहिना ने संयास अवस्‍था–माने वानप्रस्‍थ अवस्‍था– पवित्र मनुखक नैतिक अधिकार सेहो छी। आ दोसर दिस चरिचकिया गाड़ीक चर्च सेहो करै छैथ जे भरिसक अपनो लगा कऽ कहै छैथ..! संगी देख रविकान्‍त दहलाए लगला। जहिना कोसी-कमलाक बाढ़िमे भँसैत घरपर बैस‍‍ घरवारी बंशियो खेलाइत आ कमला-कोसीक गीतो गबैत तहिना विह्वल भऽ रविकान्‍त बजला- “हँसी-चौल छोड़ू। आब कोनो बाल-बोध नै छी। आबो जँ समाजिक जीवन नै बनाएब तँ देखते छिऐ जे मनुख एकदिस चान छुबैए आ दोसर दिस सीकीक वाणक जगह बम-वारूद लऽ मनुखक बीच केहेन खेल दुनियाँमे खेला रहल अछि। खाएर, ओते सोचैक समए आब नइ रहल। जेकर तिल खेलिऐ ओकरा बहि देलिऐ। अपन चालीस बर्खक जिनगी अछि, ने हमर कियो मालिक आ ने हम केकरो मालिक छिऐ। भगवान रामकेँ जहिना अपन वानप्रस्‍थ जीवनमे अनेको ऋृषि‍-मुनि, योगी-संयासी सभसँ भेँट भेलैन‍ आ अपनो जा-जा भेँट केलखिन। तहिना ने अपनो दोसराक ऐठाम जाइ आ ओहो अपना ऐठाम आबए। मुदा विचारणीय प्रश्‍न ई अछि जे रामकेँ के सभ भेँट करए एलैन‍ आ किनका-किनका ओतए भेँट करए ओ स्‍वयं गेला। ई प्रश्‍न मनमे अबिते गाछसँ खसल पघिलल कटहर जकाँ रविकान्‍तक मन छँहोछित्त भऽ गेलैन‍। छँहोछित्त होइते जहिना खोंइचा-कमरी एक दिस होइत कोह उड़ि कऽ कौआ आगू पहुँच‍‍ जाइत, आँठी छड़ैप-छड़ैप बोन-झारमे बच्‍चा दइ दुआरे जान बँचबैत आ नेरहा उत्तर-दछिने सिरहाना दऽ पड़ल-पड़ल सोचए लगैत जे जेते पकबह तेते सक्कत हेबह तँए समए रहैत भक्ष बना लएह नहि तँ दुइर भऽ जेबह तहिना रविकान्‍त सोचैत-सौचैत जेना अलिसाए लगला तहिना हाफी-पर-हाफी हुअ लगलैन। पतिकेँ हाफी होइत देख रश्‍मि‍क मनमे उठलैन‍ जे हाफी तँ निनियाँ देवीक पहिल सिंह-दुआरिक घन्‍टी छी। भने नीक हेतैन जे सुति रहता, नहि तँ ऐ उमेरमे जँ नीन उड़लैन‍ तँ अनेरे सालो-महिनेमे बदैल‍‍ जेतैन। फटकैत रश्‍मि बजली- “जेते माथ धुनैक हुअए वा देह धुनैक हुअए अपन धुनू। हमर जे काज अछि तइमे हम बिथूत नै हुअ देब। हमरा लिये तँ अहीं ने सभ किछु छी।” तीन साए घरक बस्‍ती बसन्‍तपुर। छोट-नमहर चालीसटा किसान परिवार गाममे शेष सभ खेत-बोनिहारसँ लऽ कऽ आनो-आनो रोजगार कऽ जीवन-बसर करैबला। अनेको जाति गाममे, जइमे मझोलका किसान बेसी। ओकरो सबहक दशा-दिशा भिन्न-भिन्न। तेकर अनेको कारणमे दूटा प्रमुख। जइसँ विधि-बेवहारमे सेहो अन्‍तर। किछु जातिक लोक अपने हाथे हरो जोइत लैत आ खेतक काजो करैत, जइसँ आमदनीक बँचतो होइत आ किछु एहनो जे अपने हाथसँ काज-उदम नै करैत तँए बँचत कम। कम बँचत भेने परिवार दिनानुदिन सिकुड़ैत गेल। ओना गामक बुनाबट सेहो भिन्न अछि। एक तँ ओहुना दू गामक बुनाबट एक रंग नहि, तेकर अनेको कारणमे प्रमुख अछि, खेतक बुनाबट, जनसंख्‍या आ जाति इत्‍यादि। बसन्‍तपुर गामक बुनाबट आरो भिन्न। ऊँचगर जमीन बेसी आ निचरस कम जइसँ गाछी-बिरछी सेहो बेसी अछि आ घर-घराड़ी, रस्‍ता-पेरा सेहो ऐल-फइल अछि। बसन्‍तपुरमे दूटा नमहर किसान अछि। नमहर किसान परिवार रहने गामोक आ अगल-बगलक आनो गामक लोक जेठरैयती परिवारो बुझैत आ जेठरैयत कहबो करैए। राजक जमीन्‍दार तँ नहि, मुदा गमैया जमीन्‍दार सेहो किछु गोरे बुझैत। तेकर कारण जे दुनूक महाजनियोँ चलैत आ गामक झड़-झंझटक पनचैतियो करैत। कनी-मनी अनचितो काजकेँ गामक लोक अनठा दइत। तइमे राधाकान्‍त आ कुसुमलालक जमीनक बुनाबट सेहो भिन्न। चौबगली टोल सभ बसल अछि आ बीचक जे तीस-पैंतीस बीघाक प्‍लॉट छै ओ मध्‍यम गहींर अछि। जइसँ अधिक बर्खा भेने नाला होइत पानिक निकासी कऽ लैत आ कम भेने चौबगलीक ओहासीसँ रौदियाहो समैमे जमीन उपजिये जाइत। ओना दुनू गोरे बोरिंग सेहो गड़ौने छैथ तँए रौदियाहो समए भेने खेतक लाभ उठाइए लइ छैथ। पच्‍चीस-तीस बीघाक बीचक दुनू किसान छैथ। दुआरपर बखारियो आ पोखैरक महारपर दू-सलिया-तीन-सलिया नारोक टाल रहिते छैन। राघाकान्‍तो आ कुसुमलालोक परिवारक बीच तीन पुश्‍तसँ ऊपरेक दोस्‍ती रहल छैन। ओना दुनू दू जातिक छैथ, मुदा अपेक्षा-भाव एहेन छैन जे चालि-ढालिसँ अनठिया कियो नहि ई बुझि पबैत जे दुनू दू जातिक छैथ। किएक तँ कोनो काज-उदेममे एक-दोसराक बाले-बच्‍चे एक-दोसरठाम अबैत-जाइत रहल छैथ। तेतबे नहि, कुटुम-परिवार जकाँ दुनू परिवारक बीच कपड़ा-लत्ताक वर-विदाइक चलैन‍ सेहो अछि। मुदा तैयो सराध-बिआह आदि परिवारिक काजमे दुनूक दू जातिक परिचय भाइये जाइ छैन। नमहर भुमकम होइसँ पहिने जहिना नहियोँ होइबला बच्‍चा सबहक जन्‍म भऽ जाइ छै‍ जइसँ दोस्‍तियारेक संभावना अनेरो बढ़ि जाइ छै मुदा से नहि,राधाकान्‍त आ कुसुमलाल–दुनू गोरे–केँ एक्के दिन बेटा भेलैन‍। ओना कियो-केकरो ऐठाम जिगेसा करए नै गेला तेकर कारण भेल जे अपने-अपन घर ओझरा गेलैन‍। ओना, पमरिया-हिजरनी महिना दिन तक दुनू परिवारमे  दौग-बड़हा करैत रहल। रवि दिन जन्‍म भेने दाइयो-माइ छठिहारे दिन एकक नाओं ‘रविकान्‍त’ आ दोसराक नाओं ‘रविशंकर’ रखि देलखिन। अनेरे किए फूलक बोनमे आकि साँप-कीड़ाक बोनमे टहैलतैथ। बोन तँ बोने छी, दुनूक छी। तँए हरहर-खटखटसँ नीक दिनेकेँ पकैड़ लेलैन‍। ओना एकटा आरो केलैन‍ जे दुनूमे सँ कियो जातिक पदवी नै लगौलैन‍। सुभ्‍यस्‍त परिवार रहने तीन बर्खक पछाइते स्‍कूल जाइ-जोकर दुनू भऽ गेल मुदा चारिम बर्खमे दुनूक नाओं गामेक स्‍कूलमे लिखौल गेल। ओना जेहने सोझमतिया राधाकान्‍त तेहने कुसुमलालो, मुदा नाओं लिखबै दिन रविकान्‍तक पिता गेलखिन आ राधाकान्‍त अपने नै जा भायकेँ पठौलखिन। पित्ती एक बर्ख घटा कऽ रविशंकरक नाओं लिखा देलखिन। ओना राधाकान्‍तकेँ स्‍कूलपर जेबाक मनो नहियेँ रहैन। किएक तँ स्‍कूल सबहक जे किरदानी भऽ गेल ओ देखै-जोग नै अछि। शिक्षक सभ विद्यार्थीकेँ नहियेँ पढ़ैले प्रेरित करै छैथ आ नहियेँ पढ़ैक जिज्ञासा जगा पबै छथिन, छड़ी हाथे पढ़बए चाहै छथिन। एक तँ एकरंगाह परिवार तहूमे दोस्‍ती। दुनू गोरे तेहेन चन्‍सगर जे गामेक स्‍कूलसँ पटका-पटकी करैत निकलल। पटका-पटकी ई जे एक साल रविकान्‍त फस्‍ट करैत तँ दोसर साल रविशंकर, ओना हाइ स्‍कूलमे थोड़े गजपट भेलै, स्‍कूलक शिक्षक आँकि लेलैन‍ जे केतबो ऊपरा-ऊपरी छै तैयो सोचन-शक्‍तिमे दुनूक बीच अन्‍तर किछु जरूर छइ। कौलेज तँ बिना माए-बापक होइए, केकरा के देखत। मुदा ऑनर्सक संग दुनू गोरे प्रथम श्रेणीमे निकलल। आइ.पी.एस. कऽ दुनू गोरेक ट्रेनिंग आ ज्‍वानिंग सेहो भेल। दोस्‍तीमे बढ़ोतरी होइते गेल। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2378 ‘उलबा चाउर’ लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...। 4. पटियाबला जेठ मास, दिनक तीन बजैत। देखैमे रातिसँ बहुत नमहर दिन बनैत मुदा जहिना कायाक संग माया आ रौदक संग छाया चलिते रहैए तहिना नमहर दिनक संग धूपो एते बढ़ि-चढ़ि जाइत अछि जे श्रमशक्‍तिक दौड़मे मझोलको दिनसँ छोट बनि जाइए। सुरूजक शक्‍तिवाण एते उग्र रूप पकैड़ लैत अछि जे धरतियो ताबा जकाँ तबैध आगि उगलैपर उताहुल भऽ जाइए। धरती-अकासक बीच लुलुआएल लू एक-ताले बाधमे नाचए लगैए। जेना राम-रावणक बीच वा महाभारतक सतरहम दिन भेल तहिना आ तेहने तीरसँ बेधित सुलेमान बेहोश भेल ओइ चिड़ै जकाँ श्‍यामसुनरक दरबज्‍जापर आबि दाबामे साइकिल ओंगठा ओसारक भुइयेँपर चारूनाल चीत खसि पड़ल। खसिते आँखि मूना गेलइ। जहिना बन्न आखि साँस चलैत अधमरूक होइत तहिना सुलेमान बेहोश छल। श्‍यामसुनरकेँ बेरूका तीन बजेक चाह पीबैक अभ्‍यास छैन। बगलक घरक ओसारपर चाह बनबैत रहैथ‍ तँए साइकिलक खड़खड़ाएबसँ नै परेख सकला जे वाण लगल बाझ जकाँ कियो छैथ। साइकिलक बात समान्‍य तँए समुद्र उपछबसँ नीक जे जइ काजमे हाथ लागल अछि, ओकरा पूरा ली। सएह केलैन‍। चाह पीबैत श्‍यामसुनर दरबज्‍जापर अबिते देखलैन‍ जे ई अधमरू भेल के छिआ? मुँह निहारलैन‍ तँ चिन्‍हल चेहरा सुलेमानक! आँखि बन्न, कुहरैत मनबलाक तँ बोलियो अ-स्‍पष्‍टे जकाँ भऽ जाइ छै, तँए बाल-बोध वा पशु जकाँ दुख बुझब कठिन भऽ जाइत, तथापि छाती थीर करैत श्‍यामसुनर टोकलखिन- “सुलेमान भाय, सुलेमान भाय?” पानिक तहक अवाज जहिना ऊपर नइ अबैत, मुदा पानिक ऊपरक अवाज कम्‍पि‍त होइत, लहैरिक अनुकूल तेतए धरि जाइत जेतए ओ पूर्ण थिर नै भऽ जाइत। मुदा कोनो उत्तर अबैसँ पहिनहि श्‍यामसुनरकेँ मन पड़ि गेलैन‍ भिनसुरका अवाज- ‘पटिया लेब पटिया, पटिया लेब पटिया।’ लगले मनकेँ नअ घन्‍टा उचैट कहलकैन‍- ‘भरिसक रौदक चोट आ मेहनतक मारिसँ सुलेमान एते बेथा गेल अछि जे आँखि खोलैक साहस नहि भऽ रहल छइ! तैबीच चिन्‍हल दरबज्‍जा आ चिन्‍हार बोली अकाइन करोट फेरैत अधखिल्‍लू आँखि उठा सुलेमान बाजल- “श्‍याम भाय, केकर मुँह देख घरसँ निकललौं जे एको पाइक बोहैन नै भेल। उधार-पुधार ऐ उमेरमे खाएब नीक नै बुझै छी, कखन छी कखन नहि, केकरो खा कऽ मरब तँ कोसत। जलखै खा कऽ जे निकललौं, सएह छी। खाली पेटमे पानियोँ भोंकबे करै छै किने। पेटमे बगहा लगैए!” सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनरकेँ भेलैन‍ जे भरिसक एकरे बिलाइ कुदब कहै छइ। भुखाएल बिलाइ जहिना छटपटाइत अपनो बच्‍चाकेँ कण्‍ठ चभैले तैयार हुअ लगैत तहिना भरिसक होइत हेतइ! मुदा रोगो तँ असान नहि, एक संग केते तीर लागल छैन। कोनो घुट्ठीमे तँ कोनो बाँहिमे, कोनो छातीमे तँ कोनो माथमे। भूख-पियास, थकान इत्‍यादिसँ बेधल छैथ! तोसैत श्‍यामसुनर कहलखिन- “सुलेमान भाय, आँखि नीक नहाँति खोलू। एक्के कप चाह बनौने छेलौं जे आँइठ भऽ गेल अछि। बाजू पहिने चाह पीब आकि खेनाइ‍ खाएब?” पाश भरल बातमे आस लगबैत सुलेमान बाजल- “भाय, ऐ घरकेँ कहियो दोसराक बुझलौं जे कोनो बात बजैमे संकोच हएत। देहमे तेते दर्द भऽ रहल अछि‍ जे कनी पीठपर चढ़ि खुनि दिअ पहिने, तखन बुझल जेतइ।” साए घरक जुलाहा परिवार गोधनपुरमे। झंझारपुरसँ पूब सुखेत पंचायतक गाम गोधनपुर। जैठाम मरदे-मौगीए मिलि बिछानक कारोबार करैए। गाम-गामसँ मोथी कीनि, अपनेसँ सोनक डोरी बाँटि बिछान बीनि, उत्तरमे अंधरा ठाढ़ी, दछिन घनश्‍यामपुर, पूब घोघरडीहा आ पच्‍छिममे मेंहथ-कोठिया-रैमा धरिक बजार बना कारोबार करैए। ओना जुलाहा खाली गोधनपुरेटा मे नहि आनो-आनो गाममे अछि मुदा बिछानक कारोबार गोधनपुरेटा मे होइत। शहर-बाजरमे जहिना रंग-बिरंगक वस्‍तु-जात बिकाइत तहिना गामो-समाजक बजारमे चलैए। जइमे रंग-बिरंगक वस्‍तु-जातक बिकरी-बट्टा होइए। किछु वस्‍तुगत अछि आ किछु भावगत। साइयो परिवार अपन-अपन क्षेत्र बनौने अछि। सभ दिन सभकियो भिनसरे जेर बना-बना निकैल जाइए। ओना कहियोकाल सुलेमानो जेरेमे निकलैत रहए मुदा आइ असगरे निकलल छल। अपनामे सीमाक अतिक्रमण करबो करैत आ नहियोँ करैत। खुल्‍ला बजार तँ वएह ने टिकाउ होइत जे बिसवासू वस्‍तुक बिकरी करए। नइ तँ घटिया माल आ बेसी दाममे वस्‍तुक बिकरी हएत। मुदा गोधनपुरक पटियाबलामे से नहि, एकरंगाह वस्‍तु एकरंगाहे दाममे बेचैत। पीठसँ घुट्ठी धरि जखन श्‍यामसुनर दस बेर बुलला तखन सुलेमान पड़ले-पड़ल बाजल- “भाय, आब उतैर जाउ। एह, अरे बाप रे! ओइ जिनगीसँ घुरलौं। मन हल्‍लुक भेल।” कहि फुरफुरा कऽ उठि बैसैत बाजल- “भाय, अचेत जकाँ भऽ गेल छेलौं। आँखि चोन्‍हिया गेल छेलए। सौंसे अन्‍हारे बुझि पड़ए लगल छेलए। ई तँ रच्‍छ रहल जे दरबज्‍जाक पैछला देबालक ठेकान रहल, नहि तँ केतए वौआ कऽ मरितौं तेकर ठीक नहि।” श्‍यामसुनर सुलेमानक बातो सुनैत आ मने-मन विचारबो करैत जे हो-न-हो दरबज्‍जापर मरि जाइत तँ मुँहदुस्‍सी चिड़ै जकाँ लोक केना मुँह दुसैत तेकर कोनो ठीक नहि। जैठाम घरपर चिड़ै बैसने घरक सभ किछु चलि जाइत अछि तैठाम आइ हमरा संगे की होइत! मुदा जइ दुर्गतिक दुर्गपर सुलेमान पहुँच‍‍ गेल छल ओइठाम मनुखक मनुखपना केहेन होइ, ईहो तँ एक प्रश्‍न अछि। सत्तैर-पचहत्तैर बर्खक सुलेमान सभ दिन पचास किलो मीटर बिछानक बोझ लऽ कऽ टहैल बेचि जीविकोपार्जन करैत अछि, ओहनकेँ की कहल जाए। जे खून-पसीना एकबट्ट कऽ जीब रहल अछि ओकर अन्‍तिम बोलो कियो परिवारक सुनि पबितै..? श्‍यामसुनरक मन ठमैक गेलैन। ठमैकते बजला- “सुलेमान भाय, आब केहेन मन लगैए, किछु खाइ-पीबैक इच्‍छा होइए?” मुस्‍की दैत सुलेमान बाजल- “भाय, आब जीब गेलौं। आब खेबे करब किने। किछु दिन औरो दुनियाँक खेल-बेल देख लेब।” जहिना गुड़ घाक टनक जेते बहैसँ पहिने रहैत अछि आ मुँह बनि निकैलते किछु बेसिया जाइत मुदा खिल–मूल–निकलला पछाइत‍ जहिना सुआस पड़ए लगै छै, जइसँ रूप बदैल‍‍ जाइ छै, पाशा आस लगबए लगै छै, तहिना सुलेमान बाजल- “भाय, सरेलहा भात-रोटी खाइक मन नै होइए।” “तखन?” “टटका जँ गहुमक चारिटा रोटी भऽ जाइत तँ मन तिरपित भऽ जइत। ताबे नहा सेहो लेब।” सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनर बजला- “कल देखल अछि? बाल्‍टीन-लोटा आनि दइ छी, नीक नहाँति नहा लेब।” श्‍यामसुनरक बात सुनि हँसैत सुलेमान बाजल- “भाय, एना किए बजै छी। पचासो दिन पानि पीने हएब आ केतेको दिन नहेने हएब, तखन कल देखल नै रहत। लोटा-बाल्‍टीन कथीले आनब, आँगनमे काज हएत। हम सभ तरहक लूरि रखने छी ठाढ़े-ठाढ़ वा बैस‍‍ कऽ सेहो नहा लइ छी आ जँ सासुर-समधियौर गेलौं तँ लोटो-बाल्‍टीन लऽ कऽ नहा लेलौं। ओना, भाय की कहूँ लोको सभ अजीब-अजीब अछि। ने माल-जाल जकाँ नाँगैर छै‍ आ ने मनुखपना छइ। एक दिन अहिना रौदमे मन तबैध गेल रहए। एक गोरेक दरबज्‍जापर कल देखलिऐ, साइकिल अड़का नहाइले गेलौं। मन भेल पहिने चारि घोँट पानि पीब ली। तही बीच एकटा झोंटहा आबि झटहा फेकलक जे कल छुबा जाएत!” सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनरक मनमे वाल्‍मीकि आबि गेलैन। तमसा नदीक तटपर वाण लगल क्रोंच पक्षीपर नजैर गेलैन। मुदा अपनाकेँ सम्‍हारैत बजला- “अहूँ सुलेमान भाय कोन खिस्‍सा भुखाएलमे पसारै छी। झब-दे नहाउ, आँगनमे ताबे रोटी बनबबै छी।” सुलेमान कल दिस आ श्‍यामसुनर आँगन दिस बढ़ला। जहिना भोजनक पूर्व स्‍नानसँ खुशी होइत तहिना खुशी होइत सुलेमान कल दिस बढ़ला। मुदा श्‍यामसुनरक मनमे प्रश्‍न-पर-प्रश्‍न उठए लगलैन‍। पहिल प्रश्‍न उठलैन‍ जे मृत्‍यु-सज्‍जापर पड़ल यात्रीकेँ वा फाँसीपर चढ़ैत यात्रीकेँ पुछि भोजन देल जाइत अछि। अपना मुहेँ सुलेमान कहलक जे गहुमक रोटी खाएब। बिनु मेजनक गहुमक रोटी ओहने होइत जेहेन डम्‍हाएल मालदह आम। जँ सोझहे रोटी कहैत तँ मरूआ रोटीक मेजन अचार, पिआजु, नून-मिरचाय, तेल सेहो होइत, मुदा टटका गहुमक रोटी केहेन हएत? सभकेँ अपन-अपन प्रेमी होइ छइ। जँ से नइ होइ छै तँ जुड़शीतलमे अरबा चाउरक बसिया भात-ले पहिने लोक तरूआ-भुजुआ किए बना लइए? मुदा तँए कि मोटका चाउरक बसिया भातक प्रेमी नून-पिआजु-अँचार नै हेतइ। मुदा जेते जल्‍दि‍बाजीक जरूरत अछि–जल्‍दि‍वाजी ई जे भुखाएल पेट, स्‍नानक पछाइत‍‍‍ दोसर रूप पकड़ैत–तइमे रसदार तरकारी बनाएब संभव नहि, तँए दूटा घेरा पका चटनी आ रोटीसँ काज चलि सकैए। सएह केलैन‍। स्‍नान कएल नोतहारी जकाँ दरबज्‍जापर अबिते सुलेमानक भुखाएल मन प्रेमी भोजनक बाट ताकए लगल। आगूमे थारी देखते सुलेमानक मन सौनक सुहावन जकाँ हरैष‍ उठल। रोटीक पहिल टुक चटनीक संग मुँहमे अबिते दँतिया कऽ दाँत पकैड़ जीह रस चूसए लगल। रस पबिते बिहुसैत सुलेमान बाजल- “भाय, दुनियाँमे केतौ किछु ने छइ। छै सबटा अपना मनमे। जाबे आँखि तकै छी ताबे बड़ बढ़ियाँ, आँखि मुनिते दुनियाँ धिया-पुताक खेल जकाँ उसैर जाइ छइ। अपने मुइने सृष्‍टि‍क लोप भऽ जाइ छइ।” सुलेमानक गंभीर विचार सुनि श्‍यामसुनरक मनमे उठलैन‍ जे भोजैत जँ भोजहैरिक रसगर बात सुनै छै तँ ओ आरो बेसी आनन्‍दि‍त होइ छइ। मुदा अपन बात तँ बिनु प्रश्‍न पुछने नै हएत। द्वैतमे दुनियाँ हेराएल छइ। बाढ़ि आएल धार जकाँ केतए-सँ-केतए भँसिया जाएत तेकर ठेकान रहत...। श्‍यामसुनर बजला- “सुलेमान भाय, ऐ उमेरमे एते भारी काज किए करै छी?” श्‍यामसुनरक प्रश्‍न सुनि सुलेमान विह्वल भऽ गेल। जिनगीक हारल सिपाही जकाँ तरसैत बाजल- “भाय, जखन अहाँ घरक बात पुछिये देलौं तखन किए ने सभ बात कहिये दी।” सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनर बुझि गेला जे बरियातीक भोज हुअ चाहैत अछि, से नहि तँ चरिया दिऐन- “सुलेमान भाय, कहने छेलौं जे गरम-गरम रोटी खाएब सराएल नै खाएब आ अपने गपक पाछू सरबै छी?” श्‍यामसुनरक बात सुनि हाँइ-हाँइ दूटा रोटी आ अदहा चटनी खा एक घोंट पानि पीब सुलेमान बाजल- “भाय, माए-बापक बड़ दुलारू बेटा छेलिऐ। खाइ-पीबैक कोनो दुख-तकलीफ परिवारमे नै रहए। कपड़ाक कारोबार छल। चरखा चलबैसँ लऽ कऽ खादी भंडारसँ हाट धरिक कारोबार छल।” श्‍यामसुनरक मनमे उठलैन‍- मोबाइल, टी.बी, कम्‍प्‍यूटर, कपड़ा, जूतासँ घर भरल रहै छै मुदा सबुरक केतौ ठेकान नहि। भरि पेट अन्न नहि, फटलो वस्‍त्र नहि, मुदा छुच्‍छहो घरमे सबुर केना फड़ि जाइ छै! सुलेमानक परिवारिक जिनगीक ललिचगर गप सुनि श्‍यामसुनर जिज्ञासा केलैन‍- “ओ कारोबार किए छोड़ि देलिऐ। मेहनतो आ आमदोक खियालसँ तँ नीके छेलए?” अपन बामा हाथसँ चानि ठोकैत सुलेमान बाजल- “गाम-गामक बाबू-भैया सभ गरीबक कारखाना उजाड़ि देलक। खादी भंडारकेँ लूटि लेलक। छुच्‍छे हाथे की करितौं।” फेर जिज्ञासा करैत श्‍यामसुनर पुछलखिन- “कोन-कोन तरहक कपड़ा बनबै छेलिऐ?” सुलेमान- “पहिरन वस्‍त्रसँ लऽ कऽ ओढ़ैक सलगा धरि बनबै छेलिऐ।” डुमैत नाव देख जहिना नैया निराश भऽ जाइत जे जँ जिनगी बँचियो जाएत तँ जीब केना, तहिना सुलेमानक तरसैत मन काँपए लगल। बातकेँ समटैत श्‍यामसुनर बजला- “ई तँ धिया-पुताक खेल भेल, जाए दियौ।” श्‍यामसुनर सुलेमानकेँ तँ कहि देलखिन ‘जाए दियौ’ मुदा अपन मन ठमकलैन‍। काजक रूपमे समाज बँटल अछि। ओइ काजक लूरि तँ ओकरा-ले सुरक्षि‍त छइ। जँ कागजी ज्ञानक अभावो रहतै आ विकसित बेवहारिक ज्ञान देल जाइत तँ की घर-घर पाठशाला नै बनैत? जरूरत‍ छल समयानुकूल ओकरा बनबैक। से नै भेल। तेसर रोटी खाइत सुलेमान बाजल- “भेल तँ सएह, मुदा परिवार बिलैट गेल।” परिवारक बिलटब सुनि श्‍यामसुनर आगू बढ़ि पुछलखिन- “अपन परिवारक कारोबार मरि गेला पछाइत‍‍ की केलिऐ?” श्‍यामसुनरक प्रश्‍न सुनि उत्‍साहित होइत सुलेमान बाजल- “की केलिऐ! हमरो जुआनीक उठाइन रहए। मनमे अरोपि लेलौं जे दुनियाँमे केतौसँ कमा कऽ परिवार जीवित रखबे करब।” सुलेमानक संकल्‍पि‍त बात सुनि वाह-वाही दैत श्‍यामसुनर पुछलखिन- “दोसर कोन काज केलिऐ?” “गाम-गामक कपड़ा बुननिहार बम्‍बइ चलि गेलिऐ।” “बम्‍बइमे केतए?” “भिवंडी। भिवंडीमे लूम चलै छइ। ओइमे कपड़ा बुनाइ होइ छइ। गमैया लूरि तँ रहबे करए, लगले नोकरी भऽ गेल। ओना मजदूरी रेट कम रहइ मुदा काजक माप सेहो रहइ। जेते करब तेते हएत। जुआन-जहान रहबे करी दिनकेँ ने दिन आ ने रातिकेँ राति बुझिऐ। खूब कमेलौं।” श्‍यामसुनर- “तखन ओकरा किए छोड़ि देलिऐ?” श्‍यामसुनरक बात सुनि सुलेमानकेँ ओहिना भेलैन‍ जहिना चोटेपर दोहरा-तेहरा कऽ चोट लगलासँ होइत। कुम्‍हलाएल फूल जकाँ मुँह मलिन आ ठोरमे फुरफुरी आबए लगलैन नमहर साँस छोड़ैत बाजल- “भाय, चारि साल खूब कमेलौं, पाँचम साल बिहारी-मराठीक हल्‍ला उठल। हल्‍ले नै उठल केतेकेँ जानो गेल, केतेकेँ बहु-बेटी छिनाएल, केतेकेँ कमाइ लूटाएल। सभ किछु छोड़ि जान बँचा गाम आबि गेलौं।” तैपर श्‍यामसुनर फेर पुछलखिन- “गाममे आबि फेर की केलिऐ?” सुलेमान- “तेही दिनसँ पटियाक ई कारोबार शुरू केलौं। सभ परानी लागल रहै छी, घीचि-तीड़ि कऽ कहुना दिन बीतबै छी।” श्‍यामसुनर- “सुलेमान भाय, हम ई नै कहब जे अहाँ नै काज करू, मुदा काजक ओकाति तँ देखए पड़त किने। कहुना-कहुना तँ चालीस-पचास किलोमीटर साइकिल चलैबते हेबइ?” “हँ से ने किए चलबैत हएब। आब की ओ कोस रहल जे घन्‍टामे कोस चलैमे लगै छल।” मुड़ी डोलबैत श्‍यामसुनर बजला- “एक तँ ओहिना शरीर ढील भऽ रहल अछि तैपर साइकिल चलबै छी। तेतबे नहि, हो-न-हो केतौ रस्‍ता-पेरामे खसिये-तसिये पड़ब आ हाथ-पएर टुटि जाएत तँ के देखत?” एक तँ सुलेमानक जरल मन ठंढाएल तैपर सँ परिवार-ले हाथ-पएर टुटब सुनि बाजल- “भाय, केतबो अन्‍हारमे अनचिन्‍हार लोक ढेरिया किए ने गेल, मुदा हमहूँ तँ कोनो समाजक लोक छी तँए सभ समाज अपन-अपन धर्मक पालन करैए। तहूमे हम तँ चिन्‍हार छी, गोटे-गोटे अनठा कऽ आगू बढ़ि जाएत मुदा सभ तेहने तँ नहियेँ अछि। तहूमे जागल लोककेँ थोड़े विनाश होइ छइ।” सुलेमानक जागल बात सुनि श्‍यामसुनर ठमकला। मन कहलकैन- बात तँ बड़ सुन्‍दर अछि मुदा जागलक की अर्थ सुलेमान बुझैए, से बिनु जनने बात नै बुझि सकब। एक्के चीजक नाओं-शब्‍द ढेर अछि, नाओंक संग काज जुड़ल अछि। तैठाम बिनु पुछने काज नै चलत। पुछलखिन- “भाय, जागल केकरा कहै छिऐ?” जेना सुलेमानकेँ रटले रहै तहिना धाँइ-दे बाजल- “भाय, जखन आँखि मूनल देखै छिऐ तँ बुझि जाइ छिऐ जे सूतल अछि आ आँखि तकैत रहैए तँ बुझि जाइ छिऐ जे जागल अछि।” फेर ‘ताकब’ आ ‘मुनब’क ओझरी श्‍यामसुनरकेँ लगलैन‍। मुदा ओझरीमे नै पड़ि आगू बढ़ैत पुछलखिन- “केते गोरेक परिवार अछि?” सुलेमान कहलकैन- “अछि तँ बहुत मुदा चारू बेटीकेँ सासुर बसने अखन तीनियेँ गोरेक अछि।” श्‍यामसुनर पुछलखिन- “बेटासँ ने किए ई काज करबै छी, ओ तँ जुआन हएत?” बेटाक नाओं सुनि सुलेमान विह्वल भऽ गेल। जेना केतौ सुख-दुख दुनू बहिन गाड़ा-जोड़ी कऽ सामाक गीत गबैत होइ तहिना सुलेमान बाजल- “भाय, उमेरक ढलानेमे बेटा भेल। सभसँ छोट अछि। ओकरो दू अक्षर नै पढ़ा देबै, तँ लोक की कहत?” ‘लोक लाज’ सुनि श्‍यामसुनर हेरा गेला। एहनो जिनगीमे लोक-लाज जीवित अछि! बिहुसैत पुछलखिन- “मन लगा कऽ पढ़ैए किने?” केकरा मनक बात ऐ युगमे के कहत। सभ अपने बेथे बेथाएल अछि। सुलेमान बाजल- “भाय, से तँ ओकरे मन कहतै जे मन लगा कऽ पढ़ै छी आकि मन उड़ा कऽ पढ़ै छी।” “अहाँ की देखै छिऐ?” “हम तँ अपना धंधामे लगल रहै छी। तखन केना देखबै?” “संगी-साथी सभ कहैत हएत किने?” “हँ, से तँ कहैए जे जाइए पढ़ैले आ चलि जाइए सिनेमा देखए, मैच देखए।” “परीछामे पास करैए किने?” “हँ से तँ ढौऔ-कौड़ी लगने पास कइए जाइए।” “तब तँ आशा अछि?” “हँ, से तँ ओकरेपर टक लगौने छी। जँ कहीं नोकरी भेलै तँ दिने बदैल‍‍ जाएत।” बेटाक बात छोड़ि श्‍यामसुनर पत्नी-दे पुछलखिन- “घरवाली की सभ करै छैथ?” पत्नीक नाओं सुनि सुलेमान पसिज गेल। मनमे उठलै- आब कि पत्नी ओ पत्नी रहल। संगे-संग चलबैवाली, काँट-कुशक परवाह केने बिना कखनो गुरुक काज करैवाली, तँ कखनो संगीक, कखनो प्रेमीक! जिनगीक अन्‍ति‍म क्षण धरि रहैक प्रतिज्ञा..! बाजल- “भाय, कहुना कऽ बुढ़िया भानस भात कऽ लइए। बेचारी दम्मासँ पीड़ित अछि!” “इलाज किए ने करा दइ छिऐन?” “गरीब घरक लोकक इलाज की हेतइ। जेते पथ होइ छै तइसँ बेसी कुपथे भऽ जाइ छइ। तखन तँ चाहै छी जे बेचारी पहिने मरए।” ‘पहिने मरए’ सुनि श्‍यामसुनर पुछलखिन- “से किए?” “एतेटा जिनगीक सभ कमाइ लूटा जाएत, जखन हम मरि जेबै आ ओइ बेचारीक भीखक कलंक लागत।” सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनर गुम भऽ गेला। किछु फूरबे ने करैन। सुलेमानक चेहरा दिस तकैत रहला। जेना आश्‍चर्यमे श्‍यामसुनर पड़ि गेला तहिना। किछुकालक पछाइत‍‍ कहलखिन- “आइ रहि जाउ। काल्हि‍ एम्‍हरेसँ बेचैत-बिकनैत चलि जाएब।” तैपर हँसैत सुलेमान बाजल- “भाय, जेना आइ एको पाइ बोहैन नै भेल तेना नीके हएत। मुदा, बिमरयाह घरवालीकेँ एक नजैर नै देख‍ लेब से केहेन हएत।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2413 ‘उलबा चाउर’ लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...। 5. सनेस लक्ष्‍मण रेखाक बीच सीता नहाँति बैसल सनक काका प्रेम रस पीब प्रेमीक संग अधरुपिया चालि पकैड़‍ अधखिलू फूलक गमकमे गमियेला, गमियाइते सौंझुका सिंगहार जकाँ मुँहक मुस्‍की महमहेलैन‍- अजीब ईहो दुनियाँ अछि। ने सतीए अछि आ ने वेश्‍ये अछि। बनौनिहारकेँ धन्‍यवाद दी जे एक दिस विवेकक विन्‍यास बाँटि पाँतिए-पाँति, पाते-पात परैस देलैन‍ तँ दोसर दिस दिन-राति बना आगूमे ठाढ़ कऽ देलैन‍। धर्मक संग पाप, सुकर्मक संग कुकर्म, विद्वानक संग मुरुख आ पुरुखक संग मौगीक जोड़ा लगा-लगा पतियानी बीच पात्रेक पत्ते-पत्ते सेहो परैस देलैन‍..! जेते आगू दिस सनक काका देखै छला ओते छगुन्‍ता लगै छेलैन‍। एक दिस पानिक ठोप चन्‍द्रोदक कहबैत, तँ दोसर दिस असीम अथाह क्षीर सागर, मुदा चन्‍द्रोदको तँ केतौ दूधक तँ केतौ पानिक तँ केतौ दूधपनिया सेहो होइते अछि। कहू जे ई केहेन दुनियाँक खेल छी जे कियो असकरेमे सोल्‍होताल धऽ नचबो करैए, गेबो करैए, देखबो करैए आ कियो भीड़-भाड़ तकैत रहैए जे जेतेक देख‍निहार रहत तेते नीक नाच हएत। दुनियाँक चक्कर-भक्कर देख‍ सनक कक्काक मन तरे-तर उदास भेल जाइत रहैन। जहिना घुमती बरियाती रंग-रंगक बात करैत तहिना मनमे उठैत रहैन। अनेरे मनुख बनि जन्‍म लेलौं। मनुखपना जखन एबे ने कएल तखन मनुख किए भेलौं? मुदा ‘पना’ औत केना? बाँसक पना ओधि होइत अबै छै, केरा-मोथी-अड़िकोच इत्‍यादिमे सेहो ओहिना अबै छै, मुदा मनुखमे से कहाँ भेल? की बिनु ‘पने’क मनुख ठाढ़ हएत? ठाढ़ तँ हएत मुदा शुद्ध ठाढ़ हएत आकि अशुद्ध? जखन जानवरोमे फेंट-फाँट होइते छै, तखन अपन हिस्‍सा मनुखे किए छोड़ि देत..? थोड़ेकालक पछाइत सनक कक्काक मन कहलकैन- ओह! अनेरे दुनियाँक महजालमे फँसि मरैले छड़पटाइ छी। दुनियाँमे के एहेन अछि जे सुख-सागरमे बैस आनन्‍द नहि चाहैए, मुदा दुनियोँ तँ दुनियेँ छी जइमे रंग-बिरंगक सागरो सभ बसल अछि। क्षीर सागर, सुख सागर, लाल सागर, कारी सागर इत्‍यादि अनेक सागर...। सनक कक्काक मन ठमकलैन‍। ठमैकते मनमे उठलैन- जीबैतमे जेतए वौआइ मुदा समाधि तँ ठौरपर लेब। जँ से नहि तँ हिटलर जकाँ थूकक धारमे भँसियाइत रहब! उदास मन, बिरहाइत बगए सनक कक्काक रहैन। तखने भातीज पोलीथिनक झोरामे अदहा किलो अंगूर आ किलो भरि सेब आगूमे रखि देलकैन। झोरा आगूमे देखते ठहाका मारि सनक काका हँसला। कक्काक ठहाकाक चोट मनमोहनकेँ नइ लगलैन‍, जेना आमक गाछपर गोला फेकते कोनो आमकेँ खसने गोलवाहकेँ जेहेन खुशी होइत सएह खुशी मनमोहनकेँ भेल। मुदा निशान साधल आमक महत किछु आरो होइते अछि। मनमोहन बाजल- “काका, ई अहींक सनेस छी।” ‘सनेस’ सुनि सनक काका चौंकला जे सनेस कहि की कहैए! पुछलखिन- “केतक सनेस छी?” “कश्‍मीरी सेब छी आ पूनाक चमन अंगूर।” मनमोहनक बातसँ सनक कक्काक मन तरे-तर सनकए लगलैन। छौड़ा की बुझि मजाक करए आएल। जहिना बाप एकोटा कुकर्म नै छोड़लकै तही उतारक अपनो भेल जा रहल अछि आ सेब-अंगूर देखबए आएल अछि! मुदा तामसकेँ तरेमे दाबि काका बजला- “हौ मनमोहन, एक दिनक भोजे की आ एक दिनक राजे की। बच्‍चा सभकेँ दऽ दिहक। अपने अनरनेबा आ लताम दुइर होइए। जेते तोहर लेब तेते अपन दुइरे हएत। अच्‍छा, एकर भाउ की छइ?” लगले सुरे मनमोहन पुछि देलकैन- “एकर भाउ बुझैक कोन जरूरत‍‍ पड़ि गेल?” मने-मन सनक काका सोचलैन‍ जे छौड़ा नमहर छिनार-लूटार जकाँ बुझि पड़ैए। बजला- “बौआ, आब तँ सहजे‍ चल-चलौए छी मुदा अपनो देश-कोसक हाल बुझब कोनो अधला थोड़े हएत?” एक तँ सनक कक्काक बदनामी शुरूहेसँ रहलैन‍ जे घरोक लोक सनकाहे कहै छैन। केना नै कहतैन, सभ अपन-अपन परिवारक बाल-बच्‍चा-ले करैए आ सनक काका से बुझबे ने करै छैथ, माने अपन परिवार आ दोसर परिवारमे कोनो भेद नहि। जहिना अपन परिवार तहिना दोसराक। अखन धरि मनमोहन यएह बुझैत जे परिवारोसँ काका बाड़ले-बेरौल छैथ तँए सभ चीजक दुख-तकलीफ होइते हेतैन। मुदा गप-सप्‍पसँ मनमोहनक नजैर करुआए लगल। मनमोहनक रूखि देख सनक काका बुझैक कोशिश करए लगला, कारण की छइ। मुदा मनमे मिसियो भरि सन्‍देह अपनापर नै भेलैन‍। मन गवाही दैते रहलैन जे निनानबे प्रतिशत राक्षसक देश लंकामे विभीषण केना भक्‍ति‍-भजन करैत जिनगी गुदस करै छला। केहनो सघन बोन सुकाठ-कुकाठक किए ने हौउ मुदा आमक गाछ आम आ लतामक गाछ लताम फड़ब बिसैर जाएत? दोहरा कऽ मनमोहनकेँ पुछलखिन- “हौ बौआ, जहिना एक्के गोरे डाक्‍टरो आ इंजीनियरो नै भऽ सकैए किएक तँ दुनूक दिशा अलग-अलग छइ। मुदा सेबक जगह जँ अपनासँ नीक लताम आ अंगूरक जगह अनरनेबा नेने अबितह तँ फले नहि बीओ रोपि देतिऐ।” कक्काक प्रश्‍न सुनि मनमोहन उछलैत बाजल- “काका, दुनियाँ आब घर-आँगन बनल जा रहल अछि आ अहाँ अपन पुश्‍तैनी विचार रखनहि रहब।” मनमोहनक साँसक गरमीकेँ अंकैत सनक कक्काक सनकी तेज नै भेलैन‍। मिरमिराइत बजला- “बौआ, जँ दुनियाँ घर-आँगन बनि गेल तँ ओ नीक बात, मुदा ई तँ नीक नहि जे कियो नौड़ी-छौड़ी बना भाषा-साहित्‍य-संस्‍कृतिकेँ ओझरा मटिया मेट कऽ दिअए। से कनी बुझा दाए जे की भऽ रहल छइ?” गुम्‍हरैत मनमोहन कहलकैन- “काका, दुनियाँ आब नव पीढ़ीक अछि तँए केतबो दुसबै ओ चढ़बे करत।” मनमोहनक प्रश्‍नसँ सनक कक्काक सनकी पाछू मुहेँ ससरलैन‍। पछुआ पकैड़‍ बजला- “बौआ, जर्मनी-जापानी आ अंग्रेजी शब्‍द ऐ लेल चढ़-चढ़ौ भऽ गेल जे ओकर विकास अगुआ कऽ मशीनमे पहुँच‍‍ गेल आ मशीनक नाओं रखि-रखि अहाँक घर-अँगनामे छिड़िया देलक! आ अहाँ ऋृषि‍-मुनिक राज मिथिला कहि-कहि ओतए पहुँच‍‍ गेलौं जे ओ सभ (ऋृषि-मुनि) की कहलैन‍ तेकर डि‍क्‍शनरिये चोरा लेत। तखन अहाँ बुझबै जे केहेन नव युगक नव लोक बनि गेलौं?” सनक कक्काक बात सुनि मनमोहन ठमकल तँ मुदा पाछू हटैले तैयार नहि भेल। बाजल- “काका, बजारमे अखन एक-सँ-एक खाइयो-पीबैक समान आ फलो-फलहरी तेहेन आबि गेल अछि जे अपना ऐठामक फल-फलहरीकेँ के पुछत?” मनमोहनक प्रश्‍न सुनि सनक कक्काक सनकी आगू मुहेँ ससरलैन, बजला- “बौआ, कोनो देश-कोसक विकासमे ओइठामक माटि, ओइठामक पानि, हवा इत्‍यादि जेकरा पंचभूत कहै छहक, मुख्‍य तत्व भेल। अनुकूल गतिए सृष्‍टि‍ चलैए। अपना ऐठामक लताम आकि कोनो आने फल जे अछि ओकरा ऐठामक काल-क्रि‍याक गतिए जे जरूरी छल ओ प्रकृति पैदा केलक। अपना ऐठाम एकरे अभाव भेल जे पहाड़ी फलकेँ मैदानी क्षेत्रमे नीक मानल जाइए।” अपनाकेँ निरुत्तर होइत देख मनमोहन मैदानसँ हटैक विचार करए लगल। मुदा सेब-अंगुरक पोलिथीन बीचक सीमा बनल रहलै। रूमाल चोर जकाँ सीमा पहिने के टपत..! पाछू हटैत मनमोहन बाजल- “बड़ आशा लगा अनने छेलौं जे काकाकेँ नीक फल खुएबैन।” मनमोहनक बात सुनि सनक काका तारतममे पड़ि गेला जे अखन धरि जे हम बुझै छेलिऐ तइसँ भिन्न ने तँ मनमोहन अछि। आशाक दोहाइ लगा बजैए जे‘आशा लगा अनने छेलौं’ आशा तँ सभकेँ अपन-अपन होइ छइ। सबहक देहेटा अलग-अलग नहि, मनक उड़ान सेहो होइ छइ। पिजरामे बन्न सुग्‍गोकेँ पोसनिहार सिखबैए जे आत्‍मा राम पढ़़ू- ‘चित्रकूट के घाटपर भए सन्‍तन के भीड़। तुलसी दास चानन रगड़े, तिलक करे रघुवीर...।’ मुदा सेहो तँ नहि बुझि पड़ैए। तखन? ओ तँ पुछनहि पता चलत। पुछलखिन- “हौ बौआ, जहिना घरक लोक हमरा बताह कहैए तहिना ने ओकरो सभकेँ सनकपनीए फल खुएबै।” कहि मने-मन सनक काका सोचए लगला। भाँग पीब कियो बाजि चुकल छैथ आकि असथिर मने सोचि कहने छैथ जे ‘जेहेन खाइ अन्न तेहेन बने मन!’ मुदा अहू छौड़ाकेँ तँ छिछा-बीछा नीक नहियेँ छइ। भरि दिन देखै छिऐ जे ऐठामसँ ओइठाम, ओइठामसँ ऐठाम ढहनाइते रहैए। तैपर सँ दिन-दिन आगूए मुहेँ ससैर‍ रहल अछि, से केना? बहुरुपिया ने तँ छी? सलाइ रिंच जकाँ सभ नट पकड़ैबला..! तही बीच मनमोहन बाजल- “काका, अहाँ अपने हाथे बाँटि दियौ।” मनमोहनक बात सुनि सनक काका ठमैक गेला। जहिना कोनो टपारि कुदैले दू डेग पाछू हटि दौग कऽ टपल जाइत तहिना काका पाछूसँ आगू बढ़ि बजला- “हौ बौआ, बतरसिया हाथ भऽ गेल, ओहुना हरिदम थरथराइते रहैए, तैपर कोनो काज करैकाल तँ आरो बेसी थरथराए लगैए। अपन चीज जे थोड़-थाड़ छिड़ियाइयो गेल तँ नहि कोनो, मुदा तोहर जे एकोटा अंगुर खसि पड़त तँ तोरे मन की कहतह। यएह ने जे सनकाहक ठेकान कोन। तँए हमरा चलैत तोरा मनकेँ ठेँस लागह से नीक नहि बुझै छी।” कक्काक बात सुनि मनमोहन बाजल- “तँ की काका घुमा कऽ लऽ जाइ?” अनेरे ओझरीमे ओझराएल अपनाकेँ देख सनक काका, ठाँहि-पठाँहि बजला- “ई तोहर खुशी छिअ जे घुमा कऽ घरपर लऽ जा वा दोकानदारेकेँ घुमा दहक वा रस्‍ता-पेरामे कोनो धिए-पुतेकेँ दऽ दहक। हम किछु ने कहबह। एते दिनक पछाइत‍‍‍ दरबज्‍जापर एलह सएह खुशी अछि।” सनक कक्काक बात सुनि जहिना जाड़सँ कठुआ कियो देह-हाथ तानि अचेत भऽ जाइए तहिना मनमोहनकेँ हुअ लगल। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1285 ‘उलबा चाउर’ लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...। 6. बेटी हम अपराधी छी सही समैसँ साल भरि पहिनहि मनोहरकेँ सेवा मुक्‍ति‍क चिट्ठी ऑफि‍समे थम्‍हा देलकैन‍। थम्‍हबैक कारण रहैन काजक गजपटी। काजक गजपटीक कारण छेलैन मनक सन्‍ताप। ऑफि‍सक सभ मानि गेल जे मनोहरक मन चढ़ि गेलैन‍ तँए समुचित काज करइ जोग नै रहला। ऑफि‍सेक कुरसीपर मनोहर बैसल रहैथ‍‍ कि चपरासी आबि हाथमे चिट्ठी थम्‍हेलकैन। पहिने तँ नै बुझि सकला जे सेवामुक्‍त भऽ रहल छी मुदा पढ़ला पछाइत‍‍ केकरोसँ पुछौक जरूरत‍ नै रहलैन‍। पत्रमे कोनो लेन-देनक कारण नहि, बतहपनीक कारण स्‍पष्‍ट लिखल रहैन। पत्र पढ़िते जहिना बर्खा होइकाल अनासुरती मेघ ढनढ़नाए उठैए तहिना एकाएक मनोहरक मनमे उठलैन। जेकरो कहबै सेहो बताहे बुझि सुनबो ने करत! तखन, कहबे किए करबै? अनेरे मुहोँ दुरि करब..! मनोहरक मन जेना बेर-बेर चनकए लगलैन‍। टुकड़ी-टुकड़ी भेल मनमे उठलैन‍ जे सभटा कागत-पत्तरकेँ छीट-छाटि दिऐ, टेबुल-कुरसीकेँ उनटा-पुनटा दिऐ आ निकैल जाइ। मुदा मनोहरक मनक लगामकेँ बुधि पाछू खिंचलकैन‍। बदलैत सोच विचार केलकैन‍ जे एक तँ लिखतन बताह बनाइए देलक तैपर एहेन काज जँ करब तँ थियोरी प्रेक्‍टीकल भऽ जाएत, तखन बतहपनीक सजाक हकदार बनैमे केते देरी लगत? कुरसीसँ उठि मनोहर सोझहे घरमुहाँ भऽ गेला। डेराक सुधिए ने रहलैन‍ जे भड़ो-किराया फरिछा लितैथ। मनोहरक बेसुधि मनमे बेठेकान सोच लगले उठैन आ पानिक बुलबुला जकाँ फुटि जाइन। गामक सीमा परहक बड़क गाछ देख‍ते मनोहरक आँखिक सोझमे भकइजोत जकाँ भेलैन‍। भकइजोतेमे देखलैन‍ जे यएह अपन गाम छी। मनमे अप्‍पन अबिते पएर जवाब देलकैन- “आगू नै बढ़ब। गाममे मुँह देखबैबला नै छी।” मुदा तपाएल मुँह लगले पएरकेँ कहलकै- “ईह बुड़ि रे, मुँह देखबैबला नै छी! ई समाज मुँह देखबैबला नइए। हरिदम विवेक-विवेकक भाँग घोड़ि-घोड़ि इनारेक पानिकेँ निशॉंए देने अछि आ निरलज जकाँ बजैमे लाजे ने होइ छै, सुझबे ने करै छै जे जखन पाइक हाथे शिक्षा बिकाइए तखन ओ शिक्षा पाइबलाकेँ हएत आकि बिनु पाइबलाक! जइ समाजमे रोग-वियाधि पाइक हाथे छोड़ौल जाइ छै तइ समाजमे बिनु पाइबलाक गति-मति की हेतइ! रौद-बसात, जाड़, पानि-पाथरक रक्षा केना करत। अदौसँ अबैत नर-नारीक सम्‍बन्‍धक बीच जखन दान-दहेज एहेन बड़का मोनि घारक पेटमे फोड़ि देने अछि, जइमे केते हाथियो-घोड़ा फँसि जान गमा रहल अछि, तइ मोनिमे अदना-अदनीक अह्लादे केतै कएल जा सकैए। महींसक आगू वीणक कोन मोल छइ।” मने-मन मनोहर घर दिस बढ़ैक हूबा करैथ मुदा पएर उठैले तैयार नै होइन। जँ पएर थोड़े तैयारो होनि तँ आँखि साफे नहि। धरतीपर ओंघराएल मनोहरक सभ सुधि-बुधि हेरा कऽ छिड़िया गेलैन‍। मोबाइलक जुग रहने समाचार पसरैमे देरीए किए लगत। गाम-समाजक बच्‍चा-बच्‍चा बुझि गेल जे मनोहर बताह भऽ गेला, नोकरीसँ निकालि देलकैन‍। पेंशनो आने-आन लूटतैन। सुनयनाकेँ पहिने बिसवास नै भेलैन‍। आइ धरिक जे पति-प्रेम मनोहरसँ भेटल छेलैन‍ ओ अनकासँ बहुत बेसी छेलैन‍। मुदा जानकी बेटीक काँच बुधि मानि गेल रहै जे पिता पागल भऽ गेला, नोकरीसँ भगा देलकैन‍। गामेक लोकक जेरक संग दुनू माय-धी विदा भेली। लोकक बीच रंग-रंगक घौचाल चलैत रहइ। कोनो नीको मुदा बेसी अधले। घौचाल सुनि दुनू माय-धीक मन विचलित हुअ लगलैन‍। बेटीक मुँह सुनयना निहारए लगली आ माइक मुँह जानकी। पोखैरक घाटपर भुरही-माछ जहिना रंग-रंगक चाल चालि दैत तहिना दुनू माय-धीक कानमे रंग-रंगक चालिक बात पड़ए लगल...। कचकूह मन जानकीक तँए बेसी विचलिते होइत गेल। बताह भऽ बाबू छोड़ि पड़ाए जेता, समाज सहजे‍ हमरा सन-सनकेँ भगाइए रहल अछि। तखन माइक की गति हएत..! अधबटियाक पछाइत‍‍ सुनयनोक मन मानि गेलैन‍ जे पति पगला गेला। जानकीपर नजैर अँटका मने-मन सोचए लगली जे बाइस बर्खक कुमारि बेटीक मुँह सिंह दुआरिपर केना देखब? की दुनियेँ उजैर रहल छै आकि उजाड़ि चढ़ा देलक अछि? एको बीत धरती नै बँचल अछि जेतए नोरक धार सुखौल जाएत..! जहिना दंगलक खलीफा पटका चारू नाल चीत अखड़ाहापर खसैए तहिना मनोहर बड़का गाछक निच्चाँ जिनगीक अखड़ाहापर चारूनाल चीत भेल पड़ल मने-मन सोचैत रहैथ- अपन जिनगीक हारिक कारण अपने छी तँए पत्नियो आ बेटियो-ले अपराधी छी! मुदा फेर मन कहैन जे अपराध कथी केलौं जे अपराधी भेलौं? भवसागरमे डुमल मनोहरक शरीर चेतनशून्‍य छेलैन। तखने पत्नियोँ आ बेटियो लगमे पहुँच मुँह निहारए लगलैन‍। मँह देखते दुनूक मन कहलकैन‍- मुँहक रूखि कहाँ कहै छैन‍‍ जे कोनो रोग अछि। रणभूमिक हारिक रोग आ बिमारीक रोग तँ अपन बात अपने चिकैर-चिकैर कहै छै किने जे की छी...। बन्न मुँह देख‍ मनोहरक छातीपर दुनू गोरे अपन-अपन सती हाथ रखलैन‍। छातीक धुकधुकी समतूले बुझि पड़लैन‍। आखिर किछु छैथ तँ एकक पिता, दोसराक पति छैथ किने। मुदा दुनूकेँ अपन-अपन बिसवासमे शंका भेल। शंका होइते एक-दोसराक मुँह सुनयनो आ जानकियो देखए लगली। देखते आँखि-आँखिक बीच जेना पुल बनि गेल। सुनयनाकेँ सान्‍त्वना दैत जानकी कहलक- “माए, बाबूजीक हृदय तँ ओहिना पवित्र देखै छिऐन!” कदमक गाछक झूला जकाँ आस मारि सुनयना बजली- “बेटी, पुरुखक छातीपर बहुत भार होइ छइ। जेकरा माथपर जारैनक बोझ आकि अन-पानिक बोझ पड़बे ने कएल ओ ओइ बोझ उठबैबला छातीक धुकधुकी गनि केना सकैए। से नहि तँ छातीए डोला कऽ देखहुन जे मुहसँ केहेन बकार निकलै छैन।” माइक विचार सुनि जानकी आरो जाँच-पड़ताल करब नीक बुझलक। जहिना कलियाएल अड़हुल फुलाएल रहैए तहिना जानकीक मन पिताक छातीसँ ससैर‍ हाथ दिस बढ़लैन। केना नै बढ़ैत कहुना अछि तँ छातीक ऊपरेसँ ने लटकल अछि। जानकी बाजल- “माए, से नहि तँ छातीक धुकधुकीसँ अपनो मन धुकधुकाइते अछि। हाथक नारी पहिने देख‍ लहुन।” नारी तँ नारी छी, एक पुरखियाह। छाती जकाँ दुनू गोरे एक्केबेर थोड़े पकैड़ सकै छेली, नारीकेँ तँ बेरा-बेरी देखए पड़त, मुदा पहिने के देखत? दुनूक बीच ओझरी लगि गेलैन‍। एक पुरुख हजार रूप! की मनोहर जानकियो-ले वएह छैथ जे सुनयना-ले छथिन? मुदा की मनोहर सुनयनाक छिऐन आ जानकीक नहि?तखन? तैबीच जानकी सुनयनाकेँ कहलक- “माए, छातीक धुकधुकी तँ जोरसँ चलै छै तँए गनल भऽ जाइए मुदा हाथक नारी आइ धरि कहाँ गनलौं?” बेटीक बात सुनयनाकेँ सोहनगर लगलैन‍। ऐठाम कियो आन अछि, जे ऐछो ओ तमसगीरे अछि, उकटा-चाल करत। बामा हाथसँ तरहत्‍थी पकैड़ सुनयना अपन दहिना हाथ मनोहरक वाजूपर देलखिन। मनोहरक वाजूपर हाथ पड़िते सुनयनाक कानमे झड़झड़ाए लगलैन- “सुनयना! बहुत आशा जिनगीसँ केने छेलौं, मुदा टुटि कऽ सभटा छिड़िया गेल। समाजक डर हमरा नै होइए मुदा अहाँ पत्नी छी तँए कहै छी। बताह बना बतहपनीक फरमान हाथमे धरा देलक। कमेलहो खेलक आ ऐगलो कमाइ मारलक। जखने घरसँ निकलब धिया-पुता जानि-जानि देहपर कियो गोला फेकत, कियो काँट फेकत, कियो गोबर माटि फेकत! केकरा की कहबै, हमरा बातकेँ कियो कान धड़त? आइ दस बर्खसँ जानकीक बिआहक पाछू पड़ल छेलौं, मास दिन पूर्व जवाब भेटल जे वैवाहिक सम्‍बन्‍ध भंग भऽ गेल!” सुनयना अपन कानकेँ आरो ठाढ़ करैत पतिक वाजूमे सटौलैन। मनोहरक वाजूमे कान सटिते धड़धड़ाइत अवाज आबए लगल- “हम ओइ चुगलासँ पुछै छिऐ जे कोन बुधिए जमाए बनि एते सेवा करौलक! बाइस बर्खक बेटीक मुँह देखल जाएत। जखन‍ घरक भार उठबैमे अक्षम भऽ गेलौं तँ अनेरे जीविए कऽ की करब। मुदा परिवार? सेहो कहाँ रखि पौलौं! दस बर्खक अवस्‍थामे बेटी कन्‍यासँ कनियाँक रूप धारण करए लगैए तैठाम जानकीक बिआहक चर्च पत्नी दस बर्ख पूर्व बारह बर्खक अवस्‍थामे केलैन‍। अपनो ओइ पाछू पड़लौं। काजोक अगुताहत नहियेँ बुझि पड़ल किएक तँ समयानुसार परिवर्त्तन हेबेक चाही। बीस-बाइस बर्खक बच्‍चि‍या समाजक कुमारि बच्‍चि‍या छी तँए समाजमे केकरो चौह अलगबैक अधिकार नइ छै जे ओकरा अलग बुझए। जँ जमीनो बेचि जानकीक बिआह कऽ लइ छी तँ की समाज भार उठौत जे एहेन काज आगू नै हएत?” विस्‍मित भेल सुनयनाकेँ देख जानकी बाजल- “माए, कनी हमरो बाबूक नारी देखए दे।” बेटीक बोल सुनि सुग्‍गाक लोल सुनयना निहारए लगली। निहारिते मनमे उठलैन- यएह अवस्‍था छी जखन लोक सती बनैए, यएह अवस्‍था छी जखन लोक वेश्‍या बनैए आ यएह अवस्‍था छी जइमे लोक मातृ-पितृ भक्‍त बनि भगवत भजन करैए। मुदा जानकी..? पतिक हाथ सुनयना जानकीक हाथमे दैत कान ठाढ़ कऽ मुँह निच्‍चाँ गोड़ि लेली। पिताक नब्‍ज पकैड़ते जानकीक कानमे घनघनाइत अवाज आएल- “बेटी जानकी! हम अपराधी छी। हमरासँ अपराध भेल।” “नइ बाबूजी नहि! सौंसे दुनियाँ भलेँ कहए मुदा अपन जुआन नै निकैल सकैए। चौथारि सीमा धरि आबि अहाँ परिवारक सेवा करैत रहलिऐ। दुनियाँ बौक कहए कि बताह, कहह दियौ। मुदा अपन इमान कखनो धरमसँ विचलित नै हएत। हम मिथिवाला छी, हमरा वाजूमे शक्‍ति अछि। जहिना अपन कालखण्‍ड अपने इमानदारीसँ टपलौं तहिना ऐगला खण्‍ड हमरो छी। अपना दरबज्‍जापर बैस भगवत भजन करैत रहब, देहक चिन्‍ता नै करब। हमहूँ तँ सन्‍ताने छी किने। बेटा रहैत तँ बहिन बनि भार दैतिऐन। मुदा जखन भाए नै अछि तखन तँ हमहीं ने बेटा-बेटी भेलौं। ई प्रश्‍न हमरो भेल किने। बिआह हएत सासुर बसब, मुदा अहाँकेँ ऐ अवस्‍थामे छोड़ब केते उचित हएत। नीक-बेजाइक भार के उठौत। अपना जीबैत अपन माए-बापक एहेन गति भऽ जाए जे अनसोहाँतो-सँ-अनसोहाँत भऽ जाए, ई दोख केकरा सिर सवार हएत। मुदा समाजो तँ तेहेन अछि जे छातीक कोन बात कोढ़-करेज धरि खोखैर-खोखैर खाइते आएल आ खाइते रहत। हे शिव! एहेन धनुष उठबैक भार जँ अपने नै लेब तँ की ई समाज उठा सकैए? की मिथिलांगना अखनो धरि ई नै बुझि सकली जे माए-बाप जनमदाते टा नहि छैथ, जिनगीक हारि-जीतक सूत्रधार सेहो छैथ, जँ से नहि तँ सासु पुतोहुकेँ भिखमंगनी बेटी कहि किए मुड़ी गोंतबै छथिन। जरूरत अछि समयानुसार शक्‍ति उपका संचय करैक। जाबे तक से नहि हएत ताबे तक पुरुखक नजैर निच्‍चाँ केना कऽ पाबि सकै छी। देखए पड़त अपन भूत आ भविस। जाधैर अपन भूत-भविस देख‍ नै लेब, अपन-अपन बीर्तमानक लक्ष्‍मण रेखा खींच रक्षाक भार स्‍वयं नै उठा लेब ताधैर ऋृषि‍का, सती, साध्‍वी, पतिव्रता आदि-इत्‍यादिक शब्‍दक साकार जिनगी केना बनि सकत?” जहिना नट-नटीनक नाचमे दर्शक चारू दिस घेरि बैसैत आ बीचमे दुनू अपन जिनगीक राग अलापैत‍ रहैए तहिना समाजक लोकक बीच मनोहर, सुनयना आ जानकी अपन-अपन जिनगीक राग अलापि उठि कऽ घर दिस डेग बढ़ौलैन। मनोहरक दुनू हाथ पकड़ने आगू-आगू सुनयना-जानकी आ पाछू-पाछू धिया-पुतासँ चेतन धरिक डेग बढ़ए लगल। घरक मुड़ेरा देखते मनोहर दुनूक हाथ झमाड़ि कऽ छोड़ौलैन आ बजला- “बिसवासघात..! बिसवास घाती छी..! समाजमे जेहने मनुख रहत तेहने ने बनत। जे बिसवास देने छल सएह गर्त्तमे खसा पागल बना देलक! नहि सुनत दुनियाँ तँ नहि सुनह मुदा जाबे घटमे प्राण-घटवार रहत ताबे यात्रीकेँ कहबे करबै, कहिते रहबै।” सातम दसकमे मनोहर जिला-कार्यालयमे किरानीक नोकरी शुरू केने छला। समाजक पहिल विद्यार्थी मनोहर जे प्रथम श्रेणीसँ मैट्रि‍क पास केलैन‍। कौलेज लगमे नै रहने आगू पढ़ैक आशा तोड़ि जिनगीक मैदानमे उतरला। मुदा रिजल्‍टक कागत आँखिक सोझ अबिते मनमे उपैक गेलैन जे जहिना प्रथम श्रेणीक फल भेटल तेहने फलक गाछ रोपि ओकर सेवा टहल जिनगी भरि करैत अपनो आ समाजोकेँ नीक फल खुएबैन। एक तँ सरकारी कार्यालयमे काज नै जे पढ़ल-लिखल सबहक अँटाबेस होइत, दोसर स्‍कूलो-कौलेज कम रहने सभ पढ़ियो ने पबै छल। मुदा मनोहरक संग संयोग नीक बैसलै। जिलाक कृषि विभागमे किरानीक नोकरी भऽ गेलइ। जहिना दशमीमे दुर्गास्‍थानमे साँझ दिअ जाइसँ पहिने अपन-अपन घरक भगवती-आगू साँझ दइए तखन दसनामा देवालयमे जाइए तहिना मनोहर नोकरीपर जाइसँ पहिने माता-पिताक असीरवाद लऽ लेब जरूरी बुझलक। खुशी तीनू गोरेक मनमे रहैन, मुदा तीनूक तीन रंगक। किए ने तीन रंगक रहितैन। हजारो रंगक फूलमे हजारो रंगक सुगन्‍ध होइ छै आ सभकेँ अपन-अपन सुगन्‍ध सिरजन करैक जहिना हक छै तहिना पसारैयोक छइहे। दलानक ओसारपर बैस सत्‍यदेव कोदारिमे पच्‍चर लगबैत रहैथ‍। मनोहरकेँ खुआ आँगनमे माए असीरवाद देलक। आँगन-दलानक बीच मनोहरक मनमे उठल- ओह! माएकेँ तँ कहि देलिऐन जे नोकरीपर जाइ छी, असीरवादो देलैन‍ जे आब तोंही सभ ने ऐ घरक खुट्टा भेलह। हम सभ तँ पाकल आम भेलौं। मुदा से नहि,जहिना माइक एक रूप छैन‍‍, पिताक एक रूप छैन‍ तहिना एकटा संयुक्‍तो रूप तँ छैन्‍हे। तँए दुनू गोरेक ओइ रूपकेँ प्रणाम कऽ असीरवाद लेब मनोहरकेँ मनमे आएल। डेढ़िए-पर सँ बाजल- “माए, कनी एमहर आ।” शुभ काजमे विलमैक दोख अपनापर माए केना लेती, तँए अँइठे हाथे दरबज्‍जापर पहुँच मनोहरकेँ पुछलखिन- “की कहलह?” तैबीच पिताकेँ गोड़ लागि मनोहर बाजल- “बाबू, नोकरी करए जाइ छी।” ‘नोकरी’ कानमे पड़िते सत्‍यदेवक मन खुशिया उठलैन। मुदा सुगन्‍ध युक्‍त फुलबाड़ी आ बिनु सुगन्‍धक फुलबाड़ीक हवा जहिना दोरस रहैत तेना सत्‍यदेवकेँ नहि बुझि पड़लैन‍। असीरवाद दैत मनोहरकेँ कहलखिन‍- “बौआ, डि‍क्‍शनरी जकाँ जँ तीनियोँ-टा शब्‍दक कोष बना लेबह तँ मुइला पछाइतो बेर-बेर दर्शन होइते रहत, आ भरल-पूरल देख‍ आत्‍मा जुड़ाइते रहत।” सिनेह सिक्‍त पिताक शब्‍द सुनिते मनोहर सहमल, सहैमते सुहकारैत बाजल- “ओ तीन शब्‍द की छिऐ?” “बौआ, पहिल- झूठ नै बजिहह, दोसर- केकरोसँ एक्को पाइ कहियो डाँरिहक नहि आ तेसर- दरबज्‍जापर जे मनुख-शक्‍लक आबैथ, हुनका एक लोटा पानिक आग्रह जरूर करिहौनु।” पिताक मुँहक तीनू शब्‍दकेँ गुरु-पित वचन बुझि तत्काल मनोहर गीरह बान्‍हि रखि लेलक, रखबो जरूरी छेलइ। एगारह बजे ऑफि‍स पहुँचक छेलइ। मुदा पिताक वचनकेँ हास्‍य-कोषमे नहि हहासक डरसँ चाइलेंज-कोषमे लऽ अंगीकार केलक। दुरगमनियाँ कनियाँ जकाँ मनोहर अपन उपस्‍थिति कार्यालयमे दर्ज करा, सभकेँ प्रणाम-पाती करैत कोहवर जकाँ असकरे कुरसीपर बैस गेल। कोनो काज नहि देख‍ चुनौल तमाकुलक गीरह जकाँ गामक गीरह खोलए लगल तँ भक्क-दे पिताक असीरवाद मन पड़लै। होइतो अहिना छै जे जखन रॉकैट तैयार भऽ उड़ैक रूप जखन धारण करैए तखन धरती छोड़ैसँ पहिने जहिना उनटा जाँच-पड़ताल होइ छै तहिना मनोहरो अपन जिनगीकेँ उनटा जाँच करए लगल मुदा पैछला कोनो बात मन नै पड़लै, पहिने पिताक वएह तीनू शब्‍द मन पड़लै जे तीनू प्रश्‍न बनि जिनगीक आगूमे ठाढ़ रहइ। मनमे उठलै- जँ अपन प्रश्‍नक जवाब दइ-जोकर नै छी तँ कोनो लजेबाक बात नहि, जे अपन कमजोरी केना सुहकारी। जाबे तक कोनो खेतमे नव सिरासँ जोति नव बीज नै देल जाइ छै ताबे नव फलक आशा केना हएत? कुरसीपर बैसल मनोहरक मनमे पिताक असीरवादक तीनू शब्‍द तीन प्रश्‍नक गाछ रूपमे ठाढ़ भेल। कुशल माली जहिना सभ फूलक अपन-अपन पतियानी हियबैत तहिना मनोहरो अपन तीनू शब्‍दक पाँति हियाबए लगल। मुदा सतरंगा मकान बनौनिहार इंजीनियर जकाँ गुनियाँ-परकालसँ नइ गुनि, संकल्‍प बुझि विचारए लगल। ओना विचारक खण्‍डन-मण्‍डन जेते बेसी होइ छै ओकर बीज-स्‍वरूप दूधक मक्‍खन जकाँ ओते बेसी भेटबो करै छइ। मुदा मनोहरकेँ मनमे उठि गेलै- मात्र दू घन्‍टा ऑफि‍समे रहैक अछि। डेरो-डन्‍टा ठीक नहियेँ भेल अछि, तीन घन्‍टाक रस्‍ता काटि गामो जेनाइ अछि। तँए जेते खण्‍डन-मण्‍डन हेबा चाही तेते तँ नहि कऽ सकल, मुदा तात्वि‍क विचार जरूर केलक। ओना हनुमानजी जकाँ कखनो अकास मार्गपर नजैर पड़ै तँ विहाड़ि जकाँ भऽ जाइ, मुदा लगले महावीर जकाँ बदैल‍‍ लिअए। ‘झूठ नै बाजब।’ कोनो बड़का प्रश्‍न थोड़े भेल। नान्‍हिटा प्रश्‍न अछि। ने हमरा एक सेलक जीवाणुक इतिहास देखैक अछि आ ने सोनाक लंका। चौबीस घन्‍टाक दिन-रातिमे जे समयक संग अबैत जाएत आ विवेक कहैत जाएत तेतबे करबाक अछि...। मनोहरकेँ मनमे खुशी भेलइ। जहिना तीन प्रश्‍नक उत्तरमे एक प्रश्‍न हल भेने पास नम्‍बर चलि अबैत तहिना मनोहरक मनमे पासक आशा जगलै। आशा जगिते पास बदैल‍‍ पासापर दोसर आस मारलकै जे ‘दोसरकेँ नै डाँरब।’ मुदा ईहो बड़ भारी प्रश्‍न नै बुझि पड़लै, मन कहलकै- अपन खर्चमे कमी-बेसी भेनहि ने लोक करजदार होइए आकि कर्जदाता मुदा जँ सरपट चालि पकैड़ चलब तँ किए दुनूमे सँ कियो भेँट हएत। मुदा समाजक बीच परिवारकेँ रखैक जखन खगता मनमे एलै तँ सोल्हन्नी सरपट नै देख‍ मनोहरक मन अँटकल मुदा लगले घोड़ा जकाँ मन हिहिएलै- ‘खगताकेँ जेते तक पचा सकब ओते पचाएब, आ बढ़ता-ले समाज अछि।’ दू-तिहाइ अंकक आशा नहियोँ देख‍ मनोहरक मन मानि गेलै जे कोनो बेसी ओझरी नहियेँ अछि। मुदा तेसर प्रश्‍न- ‘दरबज्‍जापर एक लोटा पानि’ पर जखन नजैर पड़लै तँ मन ठमैक गेलइ। अपने घरसँ तीन घन्‍टाक रस्‍ता दूर रहब, दरबज्‍जापर बारह बजे दिन आकि बारह बजे राति जँ कियो आबि जाथि तखन अपना बुते की हएत? अखन माता-पिता जीबै छैथ तँ अपन दुआर-दरबज्‍जाक मुड़ेरा अकास ठेकेता मुदा परोछ भेला पछाइत‍ की करबै? जँ अखन नै विचारि बाट पकैड़ लेब तँ बेर-बिपैत पड़लापर तँ सहजे‍ लोकक बुधि हेरा जाइ छै, तखन केना विचारि पाएब..? वस्‍त्रक एक-एक सूत बिलगा-बिलगा जखन मनोहर देखए लगल तँ बुझि पड़लै जे प्रश्‍न भारी कहाँ अछि। पीसक हले-हल बनबैक जन्‍मभूमि मातृभूमि भेल आ सेवाभूमि कर्मभूमि भेल। मातृभूमि कर्मभूमि होइत चलए तेतबे विचारैक अछि। नोकरी भेलाक पनरह बर्खक पछाइत‍। मनोहरक माता-पिता मरि गेल छेलैन‍। अखन धरि मनोहर अठवारे गाम-अबै जाइ छल। गामक तसवीर तँ तेना भऽ नै सुधरल मुदा अपना घरसँ खा-पी कऽ बच्‍चा बी.ए. तक पढ़ि सकैए। घन्‍टा बीतैत-बीतैत डाक्‍टर ओइठाम पहुँच सकैए। तखन गाम छोड़ब-तोड़ब नीक नहि। जहिना माता-पिताक समए अबै जाइ छेलैं तहिना ऐगलो परिवार सेने रहब...। यएह सोचि मनोहर अपन परिवारकेँ गाममे रखलैन‍। जोड़ा बरदक जोतबला परिवार सत्‍यदेवक छेलैन‍। ओना, जोड़ा बरदक जोतक अर्थ विकृत भऽ गेल अछि। विकृत ई भऽ गेल अछि जे साए-साए बीघा जमीनबला खुट्टा उसरन कऽ लेलैन‍। तर्क देता ट्रेक्‍टर-थ्रेसरक मुदा अपने परदेशसँ अगहने-अगहन गाम पहुँचता! से नहि, सत्‍यदेव मेहनती गिरहस्‍त छला। गिरहस्‍तीक सभ रूप सजौने छला। कलमी-सरही आमक गाछी पाँच कट्ठा अखनो छैन्‍हे। दू कट्ठा बँसबाड़ि, एक कट्ठा करजान, पाँच कट्ठा घराड़ियो छैन्‍हे। तीमन-तरकारीसँ लऽ कऽ बाड़ी-झाड़ी सेहो छैन्‍हे। पानिक अपन बेवस्‍था केनहि छैथ। तेतबे नहि, जेहने सासुक चालि-चलैन‍ छेलै तेहने सुनयनोक भऽ गेलैन‍। गिरहस्‍तियोक काज सत्‍यदेवकेँ बँटाएले जकाँ रहैन। अढ़ाइ बीघा बाधक खेती अपन रहैन। तीमन-तरकारी, बाड़ी-झाड़ी आ फुलबाड़ी-फलबाड़ीक भार पत्नीपर रहैन। जे सुनयनाक हृदयक रूप बनि गेलैन‍। माने, सासु-ससुरकेँ परोछ भेने घरक सोल्हनी भार सुनयने उठा नेने छेली। सुनयनाक अभ्‍यन्‍तर कहैन जे ऐ घरक सोल्‍हन्नी कर्ता-धर्ता अपने छी। तेकरा जँ अपना जकाँ नै रखि बिनु आड़ि-मेड़क घर बना लेब तखन किए कहै छिऐ जे नारीक शोषण होइए। की एहेन नारी नै छैथ जे पुरुखसँ मालिश करबै छैथ? मुदा से नहि, ई भेल गप-सप्‍प...। जिला कार्यालयमे की खाली सरकारीए काम-काज होइए आकि जिला भरिक कथा-कुटुमैती, गाए-बरद आ महींसक खरीद-बिकरीक संग राजनीति,कूटनीति, छलनीति, दुर्नित इत्‍यादि सभ कथुक जिला छीहे। भलेँ कामकाजी लोक काजक औगताइमे तारिकोपर जेता मुदा पाछूसँ वारंट नेने औता। मुदा तेतबे तँ नइ अछि, कचहरी जाइ छी, भरि दिन केतए बैस समए गमाएब। तइसँ नीक किए ने पूर्बा हवाक गरपर बैस गाँजाक गन्‍ध पसाइर सभ गजेरीकेँ एकठाम समेटब नीक। एक चेहरा अनेक रूप दुनियाँक नव हाल भाइये गेल अछि। के अपराधी आ के अपराध रोकिनिहार? ई विचित्र स्‍थि‍ति अछिए। जँ दू-तीन-चारिक जोगकेँ खिचड़ी कहब तँ चाउर, दूध, चीनी आ मसालाक जोग खीर केना भऽ गेल? जँ से नहि, चाउर-दालि आ अल्‍लू-पानिक बीच चीन्नियोँ दऽ दिऐ तखन की हएत..? तँए सोझहे नून-चीनीक बात नइ अछि। सिंचाइ विभागक बड़ाबाबू छला जुगल किशोर। आब सेवा निवृत्ति‍ भऽ गेला अछि। इलाकाक एक्के जातिक नहि, अधिकांश जातिक पजियारीक पेशा सेहो अपनौने छला। कार्यालय सभमे अहिना होइ छै एक चिन्‍हारे भेने तीन दिनमे हजार चिन्‍हरबा भऽ जाइ छइ। सरकारीए काजक भाषामे जुगल किशोर निपुण नहि, घटकैतीक भाषाक सेहो पाकल पड़ोर छला। हुनके भाँजमे मनोहर पड़ि गेला। जखने जानकी एगारहम बर्ख टपि बारहममे पएर रखलक तखने सुनयना मनोहरकेँ जानकीक बिआहक भार सुमझा देलखिन। अखन धरि मनोहरकेँ कथा-कुटुमैतीक बोध नहि। भाँज लगलैन‍ जे जुगल-किशोरक हाथमे छपड़िया पैकार जकाँ साइयो जोड़ा बरद-गाए रहिते छैन। जिला कार्यालयमे मनोहरकेँ अपन पहचान छेलैन‍। जइसँ काजक बोझो कम रहै छेलैन‍। एक दिन चारि बजे छुट्टी होइते जुगल किशोरसँ भेँट करैत मनोहर अपन बात जानकी बिआहक रखलैन‍। जेना जुगल किशोरकेँ जीए-पर रखल रहैन तहिना मनोहरकेँ कहलखिन जे कृष्‍णकान्‍त बी.ए. पास कऽ नोकरी-ले वौआइए, मुदा लेन-देन दुआरे काज नै भऽ पबै छइ। से जँ अहाँ अपनेसँ जा कऽ कहिऐन तँ ओहिना–माने बिनु लेन-देनेक–काज भऽ जेतैन आ अहूँकेँ बिआहमे लेन-देनक भार नै पड़त। मनोहरक मन मानि गेलैन‍ जे एक परिवारकेँ ठाढ़ होइक प्रश्‍न छै से जँ कहलासँ भऽ जेतै तँ उचित-उपकार दुनू भेल। अपनो काज ससैर‍ जाएत। ओना, बीचमे एकटा बाधा ठाढ़ भेल, ओ ई जे पहिने नोकरी होइ आकि बिआह। घटकैती भाषमे जुगल किशोर कहलखिन- “मनोहर बाबू, अहूँ सभ दिन कागतेमे ओझराएल रहलौं, एतबो ने बुझै छिऐ जे जइ घर बेटी जाएत तेकरा घरो ने छइ। दू-चारि मास कमा कऽ घर बनौत तखन निचेनसँ बिआह हेतइ। अखन एगारहे-बारहे बर्खक बेटी अछि, आब कि कोनो ओ जुग-जमाना रहलै, आब तँ बीस-बाइसक चलैन‍ भऽ गेल अछि। नीको अछि।” सोझमतिया मनोहर जुगल किशोरपर सोल्हनी बिसवास कऽ लेलैन‍। समए बीतैत रहल, बीतैत रहल...। मनोहर निचेन रहैथ जे बीस-बाइस बर्खक बीचक काज टरि गेल। स्‍थायी रूपे जखन कृष्‍णकान्‍त बेवस्‍थि‍त भेल तखन जुगल किशोर अपन बेटीक बिआह कृष्‍णकान्‍तसँ पाँच लाख नगद गनि करा लेलैन‍। कृष्‍णकान्‍तो अपन पूर्व जन्‍मक कमाइ बुझलक। एक पट्टीमे नोकरी, दोसर पट्टीमे पाँच लाखक संग कनियाँ। के हमरा सन भागमन्‍त हएत। जानकी जखन बाइसम बर्खमे पहुँचल, तँ सुनयना अन्‍ति‍म वारनिंग मनोहरकेँ देलखिन। तखन मनोहरकेँ चाँकि जगलैन‍। धर्म-कर्म बुझि मनोहर जुगल किशोरक गाम पहुँचला। तीन साल पहिने जुगल किशोर सेवा-निवृत्त भेले रहैथ‍‍। दरबज्‍जापर बैसल जुगल किशोरक मन मनोहरकेँ किछु मोट बुझहेलैन‍। मुदा अपन काज तँ पहाड़ी इलाकामे लोक गदहो चढ़ि कऽ लइए। खाएर, हमहूँ कोनो कुटुमैती करए थोड़े एलौं जे मान-रोख रखब। काजे एलौं काज करब जाएब तैबीच समैये कखन बँचत जे पहुनाइ करब। बुढ़ियो बाघीन तँ फेर बाघीन छिऐ किने। मनोहरकेँ देखते जुगल किशोर चपाड़ा दैत अभिवादन केलकैन‍- “आउ-आउ मनोहरबाबू! आब तँ भेँटो दुरलव, केमहर-केमहर..?” मनोहर कहलकैन‍- “जानकी बाइस बर्खक भऽ गेल, सएह काजे आएल छी।” अखन धरि मनोहरकेँ नै बुझल जे कृष्‍ण कान्‍तक बिआह जुगल किशोरेक बेटीसँ भऽ गेलैन‍। मुदा ई दुनियाँक खेल छी जे दुनियाँमे रहितो लोक दुनियाँकेँ नै जानि पबैत अछि। जुगल किशोरक मनमे भेलैन‍ जे मास दिन पहिनहि काज भेल आ आइ ई ताना-मारए दरबज्‍जापर चलि एला! अपना सीमा कुकुरो बताह। जुगल किशोर सोझहे कहलखिन- “ऐठामसँ चलि जाउ, नै तँ पुलिसकेँ बजाएब!!” ओना जुगल किशोरक बात मनोहरकेँ तेते कठाइन नै लगलैन‍ जेते लागक चाही। किएक तँ अपन दरबज्‍जापर उचित-अभ्‍यागत-ले पुलिस आनी, सएह तँ मिथिलाक दरबज्‍जा छी। पुलिसक नाओं सुनि मनोहर भरमे-सरमे घरमुहाँ भेला। तही दिनसँ ऑफि‍सक काजमे मनोहरकेँ उन्‍टा-फेड़ हुअ लगलैन‍। जइसँ पागल घोषि‍त कऽ देल गेला। ◌ शब्‍द संख्‍या : 3359 ‘उलबा चाउर’ लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...। [1] पटुआ-कारखानामे [2] वैवाहिक कार्य ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हारक प्रस्तुत आलेख विदेहक 150म अंक, 15 मार्च 2014मे प्रकाशित भेल छल मुदा वर्तमानमे ई आलेख बेसी प्रासंगिक भऽ गेल अछि। तँइ विदेहक पाठक लेल ई आलेख एक बेर फेर देल जा रहल अछि (सं.)-- आशीष अनचिन्हार तीन टा बिंदु भाषा केर मनोविज्ञान भाग-1 जखन केओ कहै छै जे "मैथिली मधुर भाषा थिक" तखन हमरा ओहिसँ बेसी बड़का गारि किछु नै बुझाइत अछि। कोनो भाषा मधुर वा खटगर वा नुनगर की तेलगर होइते नै छै। आ जँ मधुर होइ छै तँ किएक? ऐ प्रश्नपर एबाक लेल बड़ साहस चाही। मध्यकालीन मिथिला सामंती छल। सामंत बैसल की चमचा सभ घेरि अपन समस्या सुनबए लागैत छलाह। आ जखन केकरो अहाँ अपन समस्या सुनेबै वा की केकरो चमचइ करबै तखन भाषा तँ मधुर राखहे पड़त। हमरा जनैत मैथिली अहीठाम मधुर भाषा थिक। कारण मैथिल चमचइ कर'मे बहादुर होइ छथि। मधुर बोल तँ राखहे पड़तन्हि। ठीक विपरीत मिथिलाक दलित ओ गैर-सवर्णक भाषामे चमचइ नै छै तँए ओहिमे टाँस बेसी बुझि पड़ै छै आ ब्राम्हण-कायस्थ सभ ओकरा रड़बोली कहै छथि।मुदा हमरा जनैत ई मात्र दृष्टिगत भेद अछि। जकरा अपन बाँहिपर विश्वास छै ओकर बोली ओ भाषामे टाँस रहबे करतै--जेना मिथिलाक दलित वर्गक मैथिली।आ जे चमचइमे लागल रहत तकर बोली ओ भाषामे मधुरता रहबे करतै--जेना मिथिलाक ब्राम्हण ओ कायस्थ वर्गक मैथिली। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-2 ई हम दू मिनट लेल मानि लै छी जे ब्राम्हण-कायस्थ महातेजस्वी होइ छथि तँ हुनके टा पुरस्कार भेटबाक चाही। मुदा की ब्राम्हण-कायस्थ दरभंगे-मधुबनी-सहरसामे छै वा मिथिला मने की दरभंगे-मधुबनी-सहरसा छै। ऐ समस्यापर जखन हम दृष्टिपात करै छी एना बुझाइए---- १) जेना-जेना दरभंगा-मधुबनी-सहरसाक क्षेत्र खत्म होइत जाइए तेना-तेना ब्राम्हण-कायस्थ ओ आन छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत जाइए (१००मे ९७टा केसमे)। चाहे ओ सीतामढ़ी हो की मुज्फफरपुर हो की पूर्णिया हो की भागलपुर हो की समस्तीपुर हो की बेगूसराय हो की चंपारणक किछु क्षेत्र (झारखंडक क्षेत्र बला लेल एहने बुझू, राजनैतिक बाध्यताकेँ देखैत नेपालीय मैथिलीक उल्लेख नै क' रहल छी)। २) जेना-जेना ब्राम्हण-कायस्थओ छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत गेलै ब्राम्हणवादी सभ ओकरा मैथिली मानबासँ अस्वीकार क' देलक। ऐ कट्टर ब्राम्हणवादी सभहँक नजरिमे ई छलै जे भाषाक भेदसँ ब्राम्हण वा छोट जातिमे भेद छै। आजुक समयमे अंगिका ओ बज्जिका भाषाक जन्म ब्राम्हणवादक एही प्रवृतिसँ भेल अछि। किछु दिन पहिने नरेन्द्र मोदी द्वारा मुज्फफरपुरमे भोजपुरीमे भाषण देब एही ब्राम्हणवादक विरोध अछि आ हम एकर स्वागत करै छी तथा ओहि दिनक बाट जोहि रहल छी जहिया ओ दरभंगा-मधुबनीमे भोजपुरी बजता। जँ ठोस विचारक रूपमे आबी तँ निश्चित रूपें कहि सकै छी जे मैथिलीकेँ तोड़बामे ई ब्राम्हणवादी सभ १०० प्रतिशत भूमिका निमाहला। जँ कदाचित् ई ब्राम्हणवादी सभ दरभंगा-मधुबनी-सहरसासँ हटि क' सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ पुरस्कार देने रहितथि तँ कमसँ कम मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहैत। ई अकारण नै अछि जे रामदेव झा, चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आदि एहन महान ब्राम्हणवादीक कारणे दरभंगा रेडियो स्टेशनसँ बज्जिकामे कार्यक्रम शुरू भेल। ३) आ जँ मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहितै तखन मिथिला राज्य लेल एतेक मेहनति नै कर' पड़ितै। कारण चंपारणसँ गोड्डा धरि सभ अपन भाषाकेँ मैथिली बुझितै। ऐ ठाम हम ई जोर द' क' कहब चाहब जे पुरान होथि की नव राज्य आंदोलनी सभ सेहो ब्राम्हणवादी छथि। अन्यथा ओ सभ सेहो रामदेव झा. चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आकी आन-आन मैथिली विघटनकारी सभहँक विरोध करतथि। आखिर की कारण छै जे धनाकर ठाकुर अपन मानचित्रमे चंपारण वा गोड्डाकेँ तँ लै छथि मुदा ओहि क्षेत्रक साहित्यकार लेल पुरस्कारक माँग नै करै छथि। ई प्रश्न मात्र धनाकरे ठाकुरसँ नै आन सभ राज्य आंदोलनीसँ अछि। ऐठाम ई बिसरि जाउ जे पुरस्कार कोनो छोट जातिकेँ देबाक छै। जँ ब्राम्हणे-कायस्थकेँ देबाक छल तखन फेर सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण, बेगूसराय आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ किएक नै ? तँ आब ई देखबाक अछि जे के-के मिथिला राज्य आंदोलनी ब्राम्हणवादी छथि आ के-के साँच मोनसँ मिथिला राज्यकेँ चाहै छथि। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-3 लोक जखने ब्राम्हणवादक नाम सुनै छथि हुनका बुझाइत छनि जे सभ ब्राम्हणकेँ कहल जाइत छै। मुदा हमरा लोकनि बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे ब्राम्हण आ ब्राम्हणवादक कोनो सम्बन्ध नै। कोनो चमार सेहो ब्राम्हणवादी भ' सकै छथि। ब्राम्हणवाद जाति विशेष नै भेल ई मात्र मानसिकता भेल जे कोनो जातिमे भ' सकैए। ब्राम्हणवादक प्रमुख तत्व वा लक्षण एना अछि--- १) केकरो आगू नै बढ़' देब------ एकटा छलाह स्व. रमानाथ मिश्र "मिहिर"। ई नीक हास्य-व्यंग केर कविता लीखै छलाह। मुदा ई मैथिली साहित्यमे आगू नै बढ़ि सकला। कारण? कारण हिनक दोख छलनि जे ई चंद्रनाथ मिश्र " अमर" जीक भातिज छलखिन्ह। दालि आ देयाद जते गलत तते नीक। साहित्यक स्तरसँ ल' क' पारिवारिक स्तरपर रमानाथ मिश्रजीकेँ पददलित होम' पड़लनि। ब्राम्हणवाद मात्र दलिते लेल नै छै। बहुत रास ब्राम्हण अपनो जाति केर लोककेँ आगू नै बढ़' दैत छै। २) मात्र अपने टाकेँ नीक बुझब--- जँ साहित्य अकादेमीक लिस्ट बला झा-झा सभ प्रतिभावान छथि तँ फेर मैथिली साहित्य विश्वक छोड़ू भारतीय साहित्य केर समकक्ष किएक नै अछि। आ जँ प्रतिभे छै तखन तँ श्री विलट पासवान "विहंगम" भारतीय राजनीतिसँ ल' क' मैथिली साहित्य धरि योगदान देने छथि। की विहंगम जी प्रतिभाहीन छथि। विहंगम जी सन-सन आर बहुत बेसी नाम अछि। ३) परिवारवाद---- रामदेव झा जखन रिटायर भेलाह तँ साहित्य अकादेमीमे ओ अपन ससुर चंद्रनाथ मिश्र अमरकेँ बैसा देलाह। तकर बाद अमर जी अपन समधि विद्यानाथ झा विदितकेँ बैसेलाह। आब विदितजीक निकट संबंधी (चेलाइन) छथि। कारण-- ब्राम्हणवादक एकमात्र कारण हीन भावना अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. 1.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- ४ टा गजल 2.आशीष अनचिन्हार-२ टा गजल ३.२.राम विलास साहु- 1 दर्जन कविता ३.३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - २ गोट कविता ३.४. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- गामक कचोट 1.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- ४ टा गजल 2.आशीष अनचिन्हार-२ टा गजल 1 जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' ३ टा गजल १ ककरासं  ई  कही  हम  कहबामे लाज होइए ल' क' बिसरि गेलाह ओ मङबामे लाज होइए ठुमरी  ई  सुनि-सुनिक'  परेशान  भेल छी हम भागब त ओ की कहता  भगबामे लाज  होइए नब्बे   बरखमे  एखनो   दनदना  रहल   छथि हुनका  समक्ष  कारसं  चलबामे  लाज  होइए फेस-बुक के ई जमाना  मोबाइलकेर  जमाना अपनहि सिखा-सिखाक' डंटबामे लाज होइए एहि ठाम मैथिली छथि ओहि ठाम मैथिली छथि हिन्दीमे   हम  ने  बाजब  बजबामे लाज होइए ( सरल वार्णिक बहर / वर्ण : 18 ) २ ककरोले'   मजबूरी   कविता हमराले'    कस्तूरी    कविता लागय  सौंसे  दुनिया  अपने गप्पक  बड़का  धूरी  कविता कवि  आ  पाठक  दूरे  रहला कम  नै  केलक  दूरी  कविता ककरो खातिर बनि-बनि आबय सींनुर  टिकुली  चूड़ी  कविता कहिया ककरो खातिर बनती तरकारी  आ  पूरी    कविता (  मात्रा-क्रम : 22222222    ) ३ गरमी  जाड़क खेल जिनगी दिन आ रातिक मेल जिनगी कखनो लागय फूल  गाछक कखनो लागय  रेल  जिनगी कखनो पाकल  आम जामुन कखनो काँचे   बेल  जिनगी कखनो लागय  माँछ  पानिक कखनो लागय  जेल  जिनगी मेला  सभदिन  पाप  पुण्यक संगम सन अछि  भेल  जिनगी बाजय    ताधरि  ढोल   डंफा जा  दीयामे      तेल    जिनगी ( मात्रा-क्रम : 2222-2122 ) ४ मौन रहत  ओ राम जपत ओ जैह     सिखेबै सैह  करत ओ तेज        चलेबै तेज   चलत  ओ जैह   करत  ओ सैह   कहत  ओ चोर  कहू  जुनि चोर   बनत ओ वाह   कहै  क्यो खूब   हंसत  ओ पाइ   बहुत   छै भोज  करत  ओ पाग  खसै   नै पैर  धरत   ओ आगि मुतै  छल आब मरत  ओ (मात्रा क्रम : 21-122) 2 आशीष अनचिन्हार २ टा गजल १ देह बसिया गेल छै मोन मसुआ गेल छै बाढ़ि रौदी सभ सही मेघ अगड़ा गेल छै फाइलो सभ कहि रहल काज अधिया गेल छै आइ फेरो हेतै किछु बात भजिया  गेल छै पानि चाहै ठोरकेँ धार डेरा गेल छै सभ पाँतिमे 2122 + 212 मात्राक्रम अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिक एकटा अंतिम दीर्घकेँ लघु नियम शैथिल्यक तहत मानल गेल अछि २ आइ फेर निंद नै अबैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर मोन नै लगैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर चोट लागि गेलै आइ फेर कियो मलहम देलक आइ फेर दर्द बड़ उठैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर देह छू कियो चलि गेल फेर कियो बैसल अछि आइ फेर सेज सभ बुझैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर नोर आबि गेलै आइ फेर कियो पोछत जल्दी आइ फेर आँखि ई बजैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर लोढ़ि लेत हमरा आइ फेर कियो छोड़त हमरा आइ फेर नेह किछु कहैए आइ फेर कियो जागल हेतै ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम विलास साहुक दर्जन भरि कविता- दिलक दरद मन पड़ल हे सखी पिया अधरतिया हे मनुआँ घबराएल हमर पिया खटैए परदेश हे...। क्षणकट छगाएल जिनगी योवन बनल पहाड़ हे आँखिक नीन हेराएल राति काटै छी मन महुड़ाएल हे...। बीसम बरस देह विषाएल मनमे लगल अछि वाण हे पिया परदेशिया सपनो ने देखै छी लगैए तनसँ छुटत प्राण हे...। जहिया एतै हमर पिया चरण पखारि नैन मिलबै हे पान-मखानसँ सुआगत करबै प्रेमक बतिया सुनेबै हे...। नयनक नोर केना सुखत मनक त्रास कहिया मेटत हे दिलक दरदकेँ के हरत की पिया बिनु तेजब प्राण हे...। ◌ उत्तम अन्न मरुआक मान अपरमपार रौदीक समय अमृत समान सभकेँ बचबैए परान कनियेँ पानि ऊँच खेत उपजै कम मेहनत उपजै कठमन बिपैत समयमे राखे मान देखैमे कारी बड़ गुणकारी खाइयोमे सुअदगर पियरगर सभ अन्नमे बेसी यार एकरे नोन, तेल, मिरचाइ, चटनी पियौज, कसौनी, अचारक संग खाइतो मजेदार अन्नक सुबेदार अन्नमे उत्तम सुरो ने खाए गरीबक मान मरुआ रखैए सागक संगे खाए शान बढ़बैए कफ-खाँसी जलोदर रक्‍तचाप मधुमेह रोगकेँ भगबैए पेटक रोगकेँ करैए कात जे मरुआकेँ दुखमे सुमिरन करैए तेकर बचबैए इज्‍जत प्राण मरुआकेँ नइए कोनो गुमान सभकेँ देखैए एक समान। ◌ बदलल नजैर सबहक नजैर अछि बदलल केकरा कहब के पतियाएत सगरो बैसल-ए बैमाने-शैतान जेतए जाइ छी तेतइ ठकाइ छी सगरे पसरल-ए ठकक ठीकेदार धरतीसँ असमान धरि बाट लगैए अन्‍हारे-अन्‍हार के पुछत केना जीबै छी सबहक सुखल-ए मुँह-गात खाइ खातिर पेट पीटैए जान बँचबैले भागल फिरैए घर छोड़ि परदेश खटैए समाज टुटि छिड़िया गेल-ए के सम्‍हारत एहेन समाजकेँ बदलल नजैरसँ करैए घात संकटमे अछि आजुक समाज बेवस्‍थाक छै दूटा आँखि एकटा अकास दोसर पताल बीचला केकरापर करत बिसवास बदलल नजैरसँ करैए विनाश। ◌ मिथिलाक अपमान युग-युगसँ प्रसिद्ध नाम अछि ऐ धरतीपर मिथिलाक नाम कोन बियाधि लगल जे ई भेल हाल स्‍वर्गसन धरती नरक बनल-ए के करत नव निर्माण, के देत प्राण भरल धरती मरल पड़ल अछि बिनु साधन लोक पड़ा रहल-ए जे मिथिलाकेँ होइए अपमान धर्म ग्रन्‍थ पुराणमे लिखए मोटगर अक्षरमे मिथिला महान सभ किछुसँ समपन्न रहितो आइ तेज रहल-ए प्राण मिथि वंशक राजा जनककेँ घर-घरमे जपैए अमर नाम जनक नन्‍दनी जानकी नारीमे प्रधान बड़ दुख सहि सीता जगमे सती महान्‍ मिथिलाक संस्‍कृतिकेँ विश्‍वमे मान केकर कसुरसँ आइ भेल बदनाम के करत बलिदान, जे हएत कल्‍यण की नव सृजनकर्ता रक्‍तहीन बनल-ए जे मिथिलाक अपमान सहि मरि रहल-ए उत्‍थानक बात तँ सभ करैए मुदा नइ भेल अखन धरि कल्‍याण बेर-बेर मिथिला सहि रहल-ए अपमान। ◌ जागु इंसान जागु-जागु इंसान सुतलसँ हएत हानि धरती धधैक रहल-ए बरैस रहल-ए अग्निवाण आबि गेल महगी शैतान नइ करत कियो कल्‍यण विधि विधाता दुनू बैमान जागु-जागु इंसान...। दूध बिनु बच्‍चा कनैए रोगी कानैए इलाजक खातिर नइए अखनो केकरो धियान इज्‍जत-आबरूक नै ठेकान भ्रष्‍ट तंत्र षडयंत्र रचैए लूट हत्‍या रेप अपहरणक उद्योग बढ़ल-ए धरती-असमान जागु-जागु इंसान...। ठकक कोनो कमी नै अछि ठकि रहल-ए छाती तानि धर्मक नामपर लूट होइए मानव बनैए दानव समान जाति-पातिमे टुटल इंसान शिष्‍टाचारसँ भ्रष्‍टाचार बेसी जेना मरि गेल जगसँ इमान जागु-जागु इंसान...। ◌ जीवन पथ चल रे बटोही चलैत चल जीवन पथपर बढ़ैत चल पाछू नहि आगू चलैत चल राह कठीन राही निर्भिक बनि अपन पथपर डेगैत चल जिनगीक नाह डगमग चलैए सही दिसा खेबैत पार चल चल रे बटोही चलैत चल जीवन पथपर बढ़ैत चल…। जग सुन्‍दर जीवन दुर्लभ प्रकृति जीवक जीवन दाता अपने करनी भेल वेतरणी मनुखे बनल-ए मनुखक दुखदाता लोभ, मोह, मद असन्‍तोषमे फँसि बाट कुबाट पकैड़ चलैए नरकक द्वार खोलि रहल-ए स्‍वर्गक बाट कर्मयोगी चलैए चल रे बटोही चलैत चल जीवन पथपर बढ़ैत चल...। ◌ चंचल मन चंचल मन चलैत चल दुनियाँकेँ परखैत चल सभकेँ सम नजैरसँ देख समतल करैत बढ़ैत चल। भेद-भावक विचारि छोड़ि अभावमे भाव भरैत चल धीर वीर बनि चलैत चल ज्ञानक प्रकाश पसारैत चल। पलखैत कम पहचान बेसी सबहक उपकार करैत चल दुख-सुख सहैत जगक संग संजीविनी बुटी बाँटैत चल। सम धारा बनि बहैत चल राग-विराग खटराग छोड़ि प्रेमक बाट पकैड़ बढ़ैत चल कर्मक पूजा करैत चल। मनक गति सभसँ बेसी सदिखन पकैड़ काबू कर मायासँ हटि कर्मसँ सटि दुख-सुख संगे सम्‍हैर चल चंचल मन चलैत चल दुनियाँकेँ परखैत चल। ◌ माघक जाड़ माघक जाड़ हाड़ छुबैए थर-थर कँपैए करेज ठिठुरल हाथ-पएर बेकाम लगैए शरद भऽ गेल सौंसे देह जेना छुटि जाएत तनसँ प्राण कोसी-कमलाक बीच चास-बास झलफाँफी बनल टटघर ओश –कुहेससँ डुमल धरती सौन मेघौन सन पड़ैए फुहार पुरबा-पछियाक सम्राज्‍य बिनु साधन हम छी नचार खाइले फुटहो ने अछि सुतैले अछि कनियेँ नार-पुआर सुरुजक दर्शन सेहो ने होइए दिन-राति लगैए एक्के समान भसठिया लकड़ी ठेंगक संगे बनगोइठाक घूर जरा कऽ कहुना बँचबै छी प्राण मुदा नै मानत ई माघक जाड़ हाड़पर पीटत लोहाक फाड़ गरीबकेँ नइए कोनो उपाय बुढ़ लोक जान मालकेँ सताए खा लेत सुखा अचार-बना तखने करत जान उबरास माघक जाड़ माघक जाड़। ◌ हकार जड़ि गेल बीआ मरि गेल खेत सुखल धरती पड़ती पड़ल-ए खरिहाँन बनल-ए श्‍मशान माथ ठोकि कनैए किसान हड्डी-पसलीमे नइए जान भुखल नेना तेजैए प्राण रक्षक भक्षक बनि बैसल-ए नइ छै अखनो केकरो धियान केना जीब हौ भगवान काज बिनु हाथ भेल बेकाम दिन भेल बाम छुटत प्राण पड़ल अकाल गरीब भेल कंगाल सुखि गेल देह जेना नर कंकाल कालक पहड़ा नचैए जोगनी शोणित पीब रहल-ए सियार माथपर टीटही चिल्‍होरिया उड़ैए गीद्ध-कौआ मीलि मांस नोचैए सुखल हड्डी कुकुर चिबबैए नइए केकरो गरीबसँ सरोकार विधि विधाता बनल लचार भुखल निर्बल दऽ रहल-ए हकार मचि रहल-ए चहुदिस हहाकार एके सिरहौने सभ हएब पार हकार, हकार, हकार...। ◌ कोसीक इतिहास अगम कोसी केर कोश भरिक पेट अथाह पानि भरल भित्तामे दराइर फटल कटिनियासँ धसना गिरल सबहक होश उड़ल बहि गेल गामक-गाम उजरल खेत-पथार खरिहाँन उपजा-बारीक थाह नहि सगरो पसरल बालुक ढेर चर-चाँचर टपरामे पटेर, झौआ, कासक बोन उपैट गेल गाम-समाज जे बँचल गेल कोसी पेट तैयो नहि भेल सन्‍तोख अछैते औरुदे लेलक जान बँचल बेघर बेठेकान कखनो जाएत सबहक प्राण नइए तेकर कोनो ठेकान केना भेटत ऐसँ त्राण बेवस्‍था अछि अखनो बेइमान दू भागमे बँटल समाज कोसीकेँ नइए कोनो लाज विकास नहि होइए ह्रास केना बनत नव इतिहास कोसीक इतिहास, कोसीक इतिहास। ◌ मुक्‍ति हथिया नक्षत्रक झाँट सुतल छी टुटल खाट मठौत उजरल लटकल सोकबा ठोपे-ठोप चुबैत पानि...। रहि-रहि भिजैए देह सिहैर उठलौं अकचकाति सगरो अन्‍हरिया राति सुझए ने कोनो बाट...। केहेन भेल दिन बाम झख मारै छी निष्‍काम पेटमे अन्नो ने अछि दू दिनसँ उपास पड़ल-ए..। भीखो जे देने रहए कुकुर खा गेल बाट कठजीव बनि जे जीबै छी मरै नइ छी ई खाटपर...। दिनक दोख जे चुकल छी जीबै छी ने मरै छी अधमरू पड़ल छी खाट केतेक सहब केतेक कहब दुखक बात...। हे ईश्वर फाटह धरती दऽ दाए तीन हाथ परती केतेक कठ काटि मरब दऽ दाए ऐ तनसँ छुट्टी...। मृत्‍यु भूवनमे तन तरपैए करब भक्‍ति दिय शक्‍ति करम-धरम देख-परेख कऽ जनम-मरणसँ कऽ दाए मुक्‍ति...। ◌ ऋृतुराज वसन्‍त आएल ऋृतुराज वसन्‍त सजि गेल चहुओर धरती पुष्‍पकक पराग छिटैक गेल मदमातल पवन झिलहैर खेले मधुआएल महुआ महमह करैए आमक मंज्जरसँ अमटोकी वौड़ाएल भन-भन करैए सगरो मधुमाछी कोइली कुहकैए मिश्री समान फूलक रस पराग पीब कऽ भ्रमरा गबैए वसन्‍तक गान तीसी, सेरसो, मटरक फूलसँ खेत सजल-ए दुल्‍हिन समान हँसि चान नजैर लगबैए छबि छटा धरतीकेँ देख अचरजमे पड़ि गेल ऋृतुराज पछिया पवन मस्‍ती मारैए धूल उड़ि चढ़ि गेल आसमान फॉगुक रंगमे तनमन रंगाएल बुढ़बा, नवतुरिया फगुआ गबैए रंग-अबीरमे सभ नहाएल सभ साल अबैए नव उमंग लऽ कऽ हरियर-पीअर मनोरथ पूर्ण आएल ऋृतुराज वसन्‍त। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - २ गोट कविता बरियातीक समए - ‍१ बौआ ! सम्हरि कऽ चलिहें बाट कातमे, बरियातीक समए छै । ई की कहलियै ? बरियातिसँ, हमरा की मतलब छै ।। बड़ बेमत्त छै चलबैत ओ सभ, पी-पा कऽ बुझू मातल । की कहैत छी ? अपना राज्यसँ, दारू अन्तऽ भागल ।। पिउने हो वा नञि पिउने मुदा, रहइछ सभ बेमत्त । बरियाती नञि, सेना युद्धक, तहिना सभ उन्मत्त ।। जएबाक छै बरियाती - सुनितहि, ऊठैछ मोन उजहिया । बरियाती हुहुकारा दैछ, ड्राइवर केर मोन उछहिया ।। तहिना साटा पर साटा, दिन - राति उघैतछि गाड़ी । जागरणक जे निशाँ लगैतछि, फीका दारु-ताड़ी ।। अपने तँऽ मरबे करैत अछि, बरियातीक अपग्रह । पएरे छी वा संग दुचकिया, सभहक लेल अवग्रह ।। बरियातीक समए - २ आजुक मिथिलाक बरियाति, आहा ! बड़ दीव ! धूरा उड़बैत, यातायातक सभ नियम तोड़ैत, रोड पर सनसनाइत, युद्धक घुड़सवारक काफिला सनि, दूचकिया चारिचकियाक पाँति ।। पाँति नञि, अनियन्त्रित बेसम्हार काफिला । केकर मजाल छी जे, सड़क पर साइड रहितहुँ आगाँ बढ़ि जाए । केकर मजाल छी जे, क्रॉसिंगक लेल पास मांगए । बरियाती थोड़बहि ने छी, राष्ट्रपतिक काफिला छी, आगाँ-पाछाँ आ साइड खाली करब, अहाँक जिम्मेवारी छी ।। साइड नञि अछि तँऽ, कूदि जाउ, सड़क कातक धारमे, सड़क कातक बाधमे, वा नञि तँऽ, मरि जाउ पिचा कऽ, बरियातीक काफिला नञि रूकत, ओकर रफ्तार नञि थम्हत, राजशाही ठाठ छी , ओकर बापक बाट छी ।। प्रस्थान बरियातीक कहाँ छी ? प्रयाण युद्धक छी ! के कहैछ बरियाति ओकरा, सेना छी ओ कीर्तिसिंह केर, अथवा राजा शिवसिंह केर, कीर्त्तिलता लिखबा लेल बेहाल ! कीर्त्तिपताका फहरएबा लेल बेहाल !! संकेत - बरियाति (उच्चारण - बरियाइत) बरियाती (उच्चारण - बरियाती) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र गामक कचोट बूढ़ी आ बूढ़क भुरुकबा पराती मस्ती करैत पोखरि आ नहरि में हेलब फुलबारी में कनैल, अड़हुल, चम्पा, फूल लोढ़ब  हाथ सँ माटिक महादेब- हज़ार, लखराम बनाएब  मंदिर, तुलसी चौरा, भगवती घर के निपब आ पूजाक ठाम शालीग्रामक पूजा, भगबतीक पातरि, भगवानक भोग कबड्डी, झिटकी, नुका-चौड़ी, झिझिया खेलायेब अन्हरिया राति में पानिक झट्टक के सङ्गे आम बिछब आम ख़ेसारी साग, अडरनेवा के झखहा कंसार वाली सँ भुजबैत चाउर, गहूम, चुरा, बदाम मड़ुआ के रोटी में पोठी मछरिया बकेन महिसक दूध-दही, छाली नब बियायल महिसक खिड़सा उदासी, सोहर, समदाउन, जोग, खेलोना लोकगीत   चैताबर, बसन्त, तिरहुत, बारहमासा, छौमासा सजनी गीत महेशबानी, नचारी, ब्राह्मण, भगबती, विष्णुक भजन हरियर कचोर पोखरिक पानि निर्मल जल इनारक जे करैत छल पियास केर शांत लह-लह करैत बहैत नदिक अछिन्जल जल कादो में भीजल आ कदियाल गृहस्थक देह आ वस्त्र मारकीन के नुआ में प्रकृति सुन्नरि बनल गामक युवती लताम, केरा, कटहर, बरहर, आता, सरिफा, टाभ नेबो मह-मह गमकैत रंग-विरंगक फल झींगा, इचना, बुआरी, रहु, गैंचा, कबइ, पोठी, मारा सिंघी, मांगुर, दरही, छही माछ डोका आ कांकोड के तीमन बाड़ीक पटुआ, झाड़िक तिलकोरा आ कन्ना पातक तरुआ ज़मीरी नेबो देल ओलक सन्ना घुरक पाकल सोन्हगर आलू आ अल्हुआ तरल कदिमाक फूल आ खमहारु माय-पितियैन केर बिना लोभक अशीर्वादक सँग नीक बोल आ ने जानि की की सब समाप्त भ गेल??? शहर में आबि भ गेल मनुख घड़िक सुई पर नचनिया नीक वस्त्र, घर, गाड़ी, A. C. सब सुविधा में रहैत अछि  मुदा जीवन मे एना लगैत छैक जेना नाना तरहक मिष्ठान्न परसल हो लेकिन मधुमेह सँ ग्रसित रोगी हो मनुख ? जे सब वस्तुक उपलब्धता के बादो ओकर उपयोग सँ बंचित हो!!! ओह गाम! अप्पन गाम! मिथिलाक गाम!!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - २ गोट सचित्र बाल कविता १. कड़रिक सितुआ या कड़रिक शितुआ या जोंकती (बाल कविता) कड़रिक  ऊपर   सितुआ  चोख ।*‍१ कड़रिक थम्ह पर  सितुआ चोख ।*‍२ कड़रि - कदलि - केरा  भेल अर्थ, केरा पर किए  सितुआ  चोख ?? *‍३ केराक  फऽड़  ने,  केराक  थम्ह, आशय  छी − केरा  केर  गाछ ।*‍२ ताहि  केरा  केर  गाछक  ऊपर, खुरचनि चलबय केर की काज ?? *‍३ खुरचनि - सितुआ  धार - नदीसँ, केरा   गाछ   कोना   पहुँचल ? नञि पहुँचल तँऽ कोना कड़रि पर, दाँत ओकर  भऽ गेल धारगर ?? *‍४ खुरचनि - सितुआ आन जीव आ कड़रिक  सितुआ  आन  थिकै ।*‍५ दुहु  जीवमे   छी  बड़  अन्तर, की जँ  एक्कहि  नाम  भेलै ?? कड़रिक सितुआकेँ  रओ  बौआ, खुरचनि - ढाकन नञि होइ छै ।*‍६ छाहरियुक्त  माटि  जे  भीजल, ताहि ठाँ  कड़रिक सितुआ छै ।। भाँति-भाँति छै  कड़रिक सितुआ, एक्कर छै  साम्राज्य बड़ी - टा । सभहक  देह  बहुत छै  कोमल, रौद - नूनसँ   भागय  उनटा ।। प्रायः  देह  एकर  छै   नमगर, मूड़ी  पर  छै   दू  संस्पर्शक । कतोक  जीव केर  छै आहार ई, मुदा मनुक्ख एकर ने भक्षक ।।*‍७ छाहरिमे   जे   गाछ   उगैतछि, तकर   देहमे   पानि    बहुत । ओकरहि खा कऽ अछि  जिबैत ई, करैछ  तकर  तेँ  हानि  बहुत ।।*‍८ एहने  गाछ  छी  केरा  केर  आ लत्ती - फत्ती    सजमनि   केर । स्वयं  जीव  कोमल  छी  तइयो, भक्षक  कोमल  तरुगण   केर ।।*‍९ तेँ     कहबीमे    केरा - कदुआ, अबल - दुबल   पर्याय   बनल ।*‍९ मुदा छगुन्ता, कड़रि आ खुरचनि, कोना   एक   पर्याय   बनल !!*‍१० जोंक  जेकाँ  नमरैत  चलैत  अछि, मुदा ने जन्तुक  खून चुसैत अछि । चलबामे   सादृश्य  छै  किछु  तेँ, “जोंकती” सेहो लोक कहैत अछि ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मैथिलीक एकटा पुरान कहबी । कड़रि = कदलि = केरा । *‍२ - उपरोक्त कहबीक समानार्थी अपरूप । “कड़रिक थम्ह” संकेत करैछ जे एहि कहबीमे “कड़रि” माने केराक फऽर नञि अपितु केराक गाछ अभिप्रेत अछि । *‍३ - जँ एहि कहबीक “शितुआ”केँ खुरचनि मानैत छी तँऽ प्रश्न ई उठैत अछि जे कड़रिक थम्ह पर खुरचनि चलएबाक की प्रयोजन ? *‍४ *‍५ - जँ जिबैत खुरचनि (अर्थात खुरचनि सितुआ) केर बात करी तँऽ ओ नदी वा धारक पेनीमे रहैत अछि । आ केरबन्नी वा केराबाड़ी धरि पहुँचबाक कोनहु सम्भावना नञि । आ जँ बाढिक पानिक संग ताहि ठाम पहुँचिअहु गेल तँऽ केरा गाछकेँ नोकशान नञि पहुँचाए सकैछ । तेँ “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ”निश्चितहि दू अलग-अलग तरहक प्राणी वा प्राणी समूह थिक । *‍६ - “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ” दूनू मोलस्का सुदायक (Phylum - Mollusca / Molluska) प्राणी छी मुदा दूनूमे बहुत अन्तर अछि । “खुरचनि सितुआ” (FRESHWATER BIVALVE MOLLUSCS) पानिमे रहएबला जीव अछि, पानिअहिसँ भोजन तथा ऑक्सीजन प्राप्त करैछ आ बाहरसँ दूटा ढाकन सदृश कठोर अवयवसँ बनल सम्पुटसँ आवृत्त रहैछ । मुदा, “कड़रिक सितुआ” (GASTROPOD / UNIVALVE PULMONATE MOLLUSCS) जमीन पर रहएबला जीव अछि तथा ओ ऑक्सीजनकेँ सीधे वायुमण्डलसँ अपन श्वसन छिद्र वा न्यूमोस्टोम (PNEUMOSTOME) नामक अंग द्वारा ग्रहण करैछ । “कड़रिक सितुआ” जमीन पर छाहरियुक्त ओ नम स्थान पर रहैत अछि तथा ताहि ठामक वनस्पतिसभकेँ हराशंखहि जेकाँ बड़ क्षति करैछ । कड़रिक सितुआकेँ ऊपरसँ देखला पर ओकर शरीर पर प्रायः कोनहु कवच (SHELL / EXOSKELETON) नञि रहैत अछि मुदा उपरुका चामक नीचाँमे एकटा छोट-क्षिण अन्तः कवच(VESTIGIAL INTERNAL SHELL / EXOSKELETON) रहैत अछि जे कि ओकर शरीरकेँ पुर्ण रूपेँ नञि झाँपि सकैत अछि । *‍७ - “कड़रिक सितुआ”क भक्षण प्रायः मनुक्ख नञि करैत अछि, जखनि कि मिथिलाक जनजातीय समूहक लोक सभ “खुरचनि सितुआ”क भक्षण डोका आ घोंघरी आदि सदृश करैत अछि । *‍८ - छाहरिबला स्थान पर उगल कोमल गाछ-पात, लत्ती-फत्ती आदि केर भक्षण कए कड़रिक सितुआ अपन पेट भरैत अछि । *‍९ - छहरिबला स्थान पर उगल कोमल गाछ-पात, लत्ती-फत्ती आदिकेँ दुर्बल वा कमजोर मानल जाइत अछि कारण जे ओहि तरहक गाछ बिरिछमे पानिक मात्रा बहुत बेसी रहैत अछि आ मजगूत काठ नञि रहैत अछि । तेँ मिथिलामे एकटा कहबी आओरहु अछि - “अबल दुबल पर सितुआ चोख” । *‍१० - एहि प्रकारेँ निम्न चारू कहबी समानार्थी अछि - ·        कड़रिक ऊपर सितुआ चोख ·        कड़रिक थम्ह / गाछ पर सितुआ चोख ·        अबल दुबल पर सितुआ चोख ·        कदुआ ऊपर सितुआ चोख मुदा आश्चर्यक बात जे मिथिलाक जन-सामान्य ओ विद्वत-लेखक वर्गमे सेहो दूनू सितुआकेँ खुरचनि बूझल जाइत अछि जखनि कि लोक साहित्यक सूक्ष्म अवलोकनसँ स्पष्ट संकेत भेटैछ जे दुहु दू प्रकारक जीव थिक । २. खुरचनि सितुआ या खुरचनि शितुआ (बाल कविता) कड़रिक  सितुआ  बुझू ने  हमरा, हम   छी   खुरचनि - सितुआ ।*‍१ हम  ने  केरा - सजमनि  नाशक, निर्धन     केर     पेटभरुआ ।।*‍२ सीप  सनक  हमरहु  दू - ढाकन, “खुरचनि”    तकरहि     नाम । हम  छी  कोमल  जीव, हमर छी कवचक   “खुरचनि”     नाम ।।*‍३ पोखरि - धार - नदी - डबरा  केर, पेनीमे   अछि   बास    हमर । हम नञि  धरती पर  फिरैत  छी, पानिमे  चलइछ   साँस  हमर ।।*‍४ मनुख जे निर्धन, नहि उपाए किछु, तकर   प्राण-रक्षक   हम   छी । आहूत बनि  स्वयं,  पेट भरी हम, नञि   जजाति-भक्षक  हम छी ।।*‍२ खतड़ा  देखितहिं  अपन  कवचमे, नुका  रहैत  छी   हम   बैसल । जिबितहि  हमरा  उसीनि दैत छी, तइयो  हमरा   नञि  चिन्हल ।। कोना कहैत छी  कड़रिक सितुआ, अबल - दुबल पर सितुआ चोख ? हम तँऽ छी  निर्बल  केर  रक्षक, तकरा  पेटक   आगिक  तोष ।।*‍५ आन  ठाम   दुनिञाभरि   सौंसे, हमर   बहुत   व्यञ्जन  अछि । अपन देश,  ने जानि किए,  पर हमर  बहुत   गञ्जन   अछि ।। हमर खोल  खुरचनि केर  जगमे, बहुतहि      छी      उपयोग । “बटन” बनैत छल  एहिसँ पहिने, बहुविध      आन     प्रयोग ।। दूध  आ  घी  केर  डाढ़ी  पहिने, खुरचनिसँ    खोखरैत    छलहुँ । रगड़ि - भूर  कऽ   बीच  भागमे, काँच   आम   सोहैत   छलहुँ ।। चित्रकार    खुरचनिमे    पहिने, रंगक      करथि     मिलान । पएर - मँजना  केर  रूपमे  सेहो, हम्मर   छल    बड़    माँग ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ” दूनू मोलस्का सुदायक (Phylum - Mollusca / Molluska) प्राणी छी मुदा दूनूमे बहुत अन्तर अछि । *‍२ - “खुरचनि सितुआ”  लत्ती, साग आ छाहरियुक्त जमीन पर उपजएबला आन कोनहु तरहक /कोमलन गाछ-बिरिछकेँ कोनहु ञि पहुँचेबैत अछि । *‍३ - मोलस्का समुदाय (PHYLUM - MOLLUSCA) केर एहेन समस्त प्राणी (चाहे समुद्रमे रहए किंवा नदी-धार आदिमे) जे दू गोट ढाकन सदृश ठोसगर संरचनाक सम्पुटमे बन्न रहैत अछि मैथिलीमे “सीप” (BIVALVES / BIVALVE MOLLUSCS / BIVALVE MOLLUSKS) कहबैत अछि । सीपक दूनू ढाकन वा पट एक कातसँ एकटा स्नायु (LIGAMENT) द्वारा परस्पर जुड़ल रहैत अछि जे कब्जा (HINGE) जेकाँ काज करैछ । एहि कब्जाक कारणेँ सीपक दूनू ढाकन एक दिशिसँ परस्पर जुड़ल रहैत अछि आ दोसर दिशिसँ जीवक इच्छानुसार फुजि सकैत अछि । एहि प्रकारेँ खुरचनि सितुआ (UNIOES) सेहो व्यापक रूपेँ एकटा सीपहि अछि जकर दूनू ढाकनकेँ मैथिलीमे “खुरचनि” नाँओसँ जानल जाइत अछि । *‍४ - “खुरचनि सितुआ”  नदी, धार, पोखरि आदिक पेनीमे माटि वा बालुमे आधा धँसल रहैत अछि । एकर शरीरमे दूटा नली सदृश संरचना रहैत अछि जे कवचसँ (ढाकनसँ) बाहर अलग-अलग छेदक रूपमे फुजैत अछि । एक छेदसँ पानि अन्दर जाइत अछि आ दोसरसँ बाहर आबैत अछि । पानिमे उपस्थित भोज्य पदार्थ आ ऑक्सीजनकेँ ई जीव अवशोषित कऽ लैत अछि आ उच्छिष्ट व उत्सर्जी पदार्थकेँ पानिक संग पुनः आपिस जलाशयमे त्यागि दैछ । पानिसँ निकाललाक बाद किछु दिन धरि ई सुषुप्तावस्थामे निष्क्रिय वा निस्चेष्ट रहैत अछि मुदा बेसी दिन धरि नञि जीबि सकैत अछि । *‍५ - कड़रिक सितुआक रूपमे खुरचनि सितुआकेँ उपस्थित करब एकटा बहुत पैघ साहित्यिक चूकि छी । खुरचनि सितुआ कोनहु प्रकारक मनुष्योपयोगी गाछ - बिरिछकेँ नोकशान नञि पहुँचबैत अछि । उनटहि, मिथिलामे सामाजिक-आर्थिक रूपसँ कमजोर वर्गक आहार बनि ओकर क्षुधाकेँ शान्त करैछ । *‍६ - विश्वक विभिन्न भागमे भिन्न-भिन्न समुदायक लोकसब द्वारा खुरचनि सितुआ आहारक रूपमे लेल जाइत अछि । खुरचनिसँ पहिने शर्ट आदि केर बटन बनैत छल । गाम घरमे लोकसब दूधक डाढ़ी खखोरबाक लेल, काँच आम आ खीरा आदि सोहबाक लेल, पएर मँजबाक लेल प्रयुक्त होइत छल । पहिने चित्रकार लोकनि विभिन्न रंगकेँ फेँटबाक लेल वा मिलान करबाक लेल खुरचनिक प्रयोग करैत छलाह । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ता लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। ५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा “’विदेह’- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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0 a ar _— onal hi “Videha’ र के. ननिवत न जि ioe eee 2 atc ६: + seed सर न — ie 4] : ae pegs # कि कर tate न दे, कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जॉोंकती

‘Se. Gare > की 2 स्थान - दुलारपुर (रुचौल - दुलास्पुर), दरिशनंगा स्थान -सजे rotary, दरिननंगा मैथिली - कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती हिन्दी - वनस्पति को नष्ट करनेवाला एक प्रकार का घोंघा * संस्कृत © अंग्रेजी - SLUG / LAND SLUG / GARDEN SLUG जैववैज्ञा८ नाम - Limax 5] ., Ambigolimax spp., Tandonia spp. ete PP. Ig PP. PP: [a polyphylactic group of apparently shell-less terrestrial Gastropod molluscs] ake संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी न स्वतः मैथिली आषामे पर्यायी नॉँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) * Rog बिहारी पत्रकार लोकलि द्वारा Roda wow aa प्रयुक्त "सितुआ" शब्द वास्तव मैथिलीक शब्द थिक

हे # Z c ogi के : Q 4 G Re ope Fz, कक 5 4 by. मैथिली - खुस्चनि (उच्चारण - Wado) सितुआ / Wafer शितुआ अंग्रेजी - UNIO (A type of FRESHWATER BIVALVE MOLLUSC) जैंववैज्ञा८ नाम - Unio spp. हनोट - See भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉो स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉजो Sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

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_ जलाशयक पेनीक माटिमे आधा गड़ल "Water खितुआ" (खुर्चनिक मुँह आंशिक रूपयेँ फुजल अछि)

द् हि कु दा we गण fo 4 pete gitar Kumar "Videha” © डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” © UT. AP ¥ a स्थान - ast pre पे Spat एक प्रकारक कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती (पृष्ठ भाग / DORSAL ASPECT)

a 5 mI Si a? ¢ ee थे ’ oe Be ae 4 % 4 एक प्रकारक कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती (उदर भाग/ VENTRAL ASPECT)