VIDEHA — Issue 231 / अंक २३१

Publication: VIDEHA · Issue: 231
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65 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथा २.२.रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख २.३.प्रणव झा- "चक्रफाँस (मैथिली खिस्सा ) " २.४.मिथिलेश कुमार सिन्हा- "माया" (बीहनि कथा) ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार- -2 टा गजल ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- ४ टा गजल ३.३.प्रणव झा- जनप्रतिनिधि ३.४.राजेश मोहन झा 'गुंजन' - काटि गेल जुट्टी (हास्य रस) ३.५. पल्लवी मण्डल- बेटी Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय ई-पत्र प्रिय गजेंद्र जी, अहाँक पठाओल 'विदेह' पाक्षिक क 230 म अंक प्राप्त भेल | एहि सँ पूर्वक अंक सभ सेहो नियमित रूप सँ हमरा भेटैत रहल अछि ,आ सुविधानुसार हम ओकरा आदि सँ अंत धरि पढ़ितो रहल छी | कोनो एक व्यक्ति ,महत्वपूर्ण पद पर नोकरी करैत ,अपन मातृभाषा के समृद्ध करवाक लक्ष्य सँ एतेक  दूर धरि  निर्बाध चलि आओत,से कम सँ कम मैथिल समाज मे असंभव बात | ताहि लेल अहाँ क प्रयास स्तुत्य अछि |एहि ई-पत्रिका क सुदीर्घ जीवन मे कैकटा प्रतिभाशाली कवि -लेखक मैथिली कें भेटल अछि |  आशा करैत छी जे समाजक उदासीनता रहितो अहाँ एहि अभियान के बढ़बैत रहब |  'विदेह' अपन गति सँ नीक जकाँ चलि रहल अछि | एकर 250 म अंक किछु विशिष्ट हेवाक चाही | शुभाशीष | बुद्धिनाथ मिश्र देहरादून विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केलक अछि जकर संयोजक श्री दिनेश यादव जी रहता। अइ विशेषांकमे नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य केर मूल्यांकन रहत। अइ विशेषांक लेल सभ विधाक आलोचना-समीक्षा-समालोचना आदि प्रस्तावित अछि। समय-सीमा किछु नै जहिया पूरा आलेख आबि जेतै तहिये, मुदा प्रयास रहत जे एही साल मइ-जून धरि ई विशेषांक आबि जाए। उम्मेद अछि विदेहक ई प्रयास दूनू पायापर एकटा पूल जरूर बनाएत। विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा कएल जा रहल अछि। दोसर भागमे अइ बेर नीलमाधव चौधरी जीक रचना आमंत्रित कएल जा रहल  अछि आ नीलमाधवजीक रचना ओ रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल कैलाश कुमार मिश्रजीकेँ आमंत्रित कएल जा रहल छनि। दूनू गोटाकेँ औपचारिक सूचना जल्दिये पठाओल जाएत। रचनाकारक रचना ओ आलोचकक आलोचना जखने आबि जाएत ओकर अगिला अंकमे ई प्रकाशित कएल जाएत। अइ शृंखलाक पहिल भाग कामिनीजीक रचनापर छल आ टिप्पणीकर्ता मधुकांत झाजी छलाह। जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथा २.२.रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख २.३.प्रणव झा- "चक्रफाँस (मैथिली खिस्सा ) " २.४.मिथिलेश कुमार सिन्हा- "माया" (बीहनि कथा) श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथा- जेकर चुन तेकर पुन सेमी गौभरमेन्‍टक सहयोगसँ साहित्‍यिक कार्यक्रमक आयोजन भेल। सेमी गौभरमेन्‍टक माने भेल जे निसचित रकमक रूपमे सरकारी सहायता भेटल आ जन सहयोग सेहो भेल। ओना, जन सहयोगक जेतेक आशा कएल गेल छल तइ रूपे सहयोग नहि भेटल, माने ई जे परिवारक जनसंख्‍याक हिसावसँ सहयोगक आशा कएल गेल छल से नइ भेटल। ई कहब जे जनमे सहयोगक विचारक अभाव भऽ गेल अछि से बात नहि, अखनो लोकक विचारमे एहेन धारणा बनले अछि जे जाबे जनक सहयोग नहि हएत ताबे समाजिक काज नइ चलत। आ जँ समाजिक काजे नइ चलत तँ समाजक पहचान की बनत। आ जँ समाजक पहचाने नइ भेल तखन समाज केहेन अछि आ ओइ समाजक सामान्‍य जन केहेन अछि, से केना बुझब। सहयोगक धारणा रहितो सामान्‍य जनक सहयोग कम भेल। ओना एकरा असहयोगक दृष्‍टिसँ नहि देखल जा सकैए। असहयोग भेल, बुझि कऽ सहयोग नइ करब। मुदा से नहि, साहित्‍यिक कार्यक्रमक महतकेँ कम बुझनिहार रहने, आर्थिक सहयोग कम भेल तँए ई कहब जे कार्यक्रममे कमी भेल सेहो नहि, किएक तँ गाम-गाममे चरिपहिया वाहन, ठीकेदार आ रंग-रंगक एजेन्‍ट सबहक बहबारिसँ नीक सहयोग भेटल। सेमी कार्यक्रम रहने सरकारी बेवस्‍था एते छल जे गामक चौकीदारकेँ सुरक्षाक भार भेटल आ जनसेवकक माध्‍यमसँ सहयोग राशि भेटल। चौकीदार आ जनसेवक दुनू गामेक रहने कार्यक्रमक कमिटीक समक्ष अपन-अपन हाजरी पुरा छुट्टी लैत बाजल- “हमहूँ तँ गौंए छी, तँए जँ जरूरी हुअए तँ खोज कऽ लेब। किए ते सरकारमे ते हमहीं ने कैफियत देबइ। मुदा गौंआँ होइक नाते एते जरूर सभ नजैरमे राखब जे अनगौंआँ पीहकारी दऽ कऽ ने जाए। जखने पीहकारी पड़त तखने हम ओझरीमे पड़ि जाएब, तँए एते हमरो निवेदन अछि।” कार्यक्रमक प्रचार माध्‍यम नीक रहल। नीकक कारण भेल जे प्रचार तंत्रक सुविधा बढ़ने बेकतीगत रूपे सेहो सम्‍पर्क होइते अछि। गौंआँक एकेटा मंसा जे नीक कार्यक्रम हुअए। नीक कार्यक्रमक माने भेल नीक जुटानियोँ करब आ नीक मनोरंजनो करब। राघव दिल्‍लीसँ गाम आएल छल, कुमार बिसवासक मंच ओ देखने, तँए मनमे अपनो जिज्ञासा रहबे करइ जे ओहने कार्यक्रमक आयोजन हुअए। प्रचार करैक भार राघव उठा लेलक। मन टोबैक रस्‍ता बुझले छइ। जे जेहेन मनक लोक हुनका ओहने बात कहि-कहि हड़-टुट्टा, टंग-टुट्टासँ लऽ कऽ कनाह-बहीर धरिक जुटानी नीक करबे केलक। समय सुभ्‍यस्‍त भेने आयोजनमे कोनो बाधा उपस्‍थित नहियेँ भेल। खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ रहै-सहैक सेहो नीक बेवस्‍था भेल। कार्यक्रम शुरू होइसँ आधा घन्‍टा पहिनेसँ मंचपर साहित्‍यकार, पत्रकार, रेडियो स्‍टेशनक कलाकार आ गमैया गीतकार-संगीतकारक आगमन हुअ लगल। अधिकांश लोकक संग अपन-अपन दूटा-चारिटा मुँह लगुआ रहिते अछि। ग्रुप बना सभ बैसबो केला आ अपन-अपन मुँह-लगुआक संग फुसराहैट सेहो करैये लगला। असगरे राधेश्‍याम काका बीचमे बैसल चारू दिस तकैत रहैथ जे किनकोसँ हमहूँ गप करी। मुदा गपोक तँ कान्‍ही होइ छै, स्‍तर होइ छै से कान्‍ही मिलबे ने करैन। तहूमे मनमे ईहो रहबे करैन जे गंभीर साहित्‍यकार सबहक जुटानी छी तँए जँ मंचपर गंभीरता नइ बरतब सेहो केहेन हएत। ओना, चुपा-चुपी नइ छल मुदा गुप-चुपी नइ छल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। से तँ छेलैहे। रेडियो स्‍टेशनक बदलू भाय सेहो रहैथ। मुदा ओ अपन ड्यूटीमे रहैथ तँए राधेश्‍याम काकासँ कनी हटल रहैथ। दू गोरेमे ने कनी दुरसोसँ गप कएल जा सकैए मुदा जैठाम छत्ताक मधुमाछी जकाँ सौंसे मंचपर भन-भनी चलि रहल अछि, तैठाम कण्‍ठ फारि बाजलो तँ नहियेँ जा सकैए। ओना, बीचमे ईहो होइते अछि जे जेमहर आँखि-कान रहत ओमहुरका कनी फरिक्कोक बात सुनियोँ सकै छी आ देखियो सकै छी। मुदा लगले ईहो होनि जे गंभीरतोक तँ अपन-अपन विचार होइए। जखन साहित्‍यिक कार्यक्रममे आएल छी तखन तँ ओइ विचारक निमरजना करए ने पड़त। मुदा तैबीच एकटा प्रश्‍न तँ उठिये जाइन जे जखन कार्यक्रमक नियम पूर्वक घोषणा हएत तखन ने जे जेहेन छी से तेहेन गंभीरता प्रदर्शित करब। तइ बीच माने कार्यक्रम शुरू होइसँ पहिने, तँ सभ सामान्‍य जन छी माने मनुख होइक नाते मनुख छी, मनुखक बीच बैसले छी तखन जँ कुशलो-समाचार नइ हुअए सेहो केहेन हएत...। ओना, बीच-बीचमे राधेश्‍याम काका ईहो जरूर देखबे करैथ जे खुदरा-खुदरी नव आगन्‍तुक सभ जखन मंचपर अबै छैथ तँ आँखियेक इशारासँ प्रणाम-पाती, कुशल-छेम सभ काइये लइ छैन, संगे ईहो नजैरपर एबे करैन जे कियो-कियो अपन दुनू हाथ उठा इशारामे किछु कहिते छेलखिन। बदलूओ भाय अपन संगी-साथीक बीच गप-सप्‍प करिते छला, की गप करै छला से तँ ओ जानैथ, मुदा मुँहक रूखिसँ जरूर बुझि पड़ै छल जे खिचड़ी भोज जकाँ अपन खिचड़ी कार्यक्रमक योजना भरिसक बना रहला अछि तँए कखनो-कखनो जखन-जखन फोरनबला मिरचाइक झाँस लगै छेलैन तँ मुँह बिदैक जाइ छेलैन आ जखन-जखन घीक टॉंस लगै छेलैन तखन-तखन मुँह कलैश जाइ जाइन। राधेश्‍याम काकाकेँ नइ रहल गेलैन। आँखि उठा बदलू भायपर ई सोचि अँटकौलैन जे बदलू भाय चारू कोण झिझिरकोणा खेलाइबला शिकारी छथिये, जरूर नजैर उठा तकबे करता। जखन नजैर-मे-नजैर मिलत तखने नजरियेसँ कहबैन जे कनी अहूँ आगू घुसकु, अपन संगीकेँ छोड़ि ससरू आ कनी हमहूँ ससैर जाइ छी। जखन दुनू गोरे एक कान्‍हीक छी तखन जँ दूठाम रहब तँ दुनियाकेँ नीक जकाँ थोड़े देख पएब। आँखियेक इशारासँ राधेश्‍याम काका बजला- “झगड़ा ने दन, चुन तमाकुल किए बन्न।” खग जानए खगक बोल, बदलू भाय आँखियेक इशारासँ जवाब देलकैन- “फिफ्फी-फिफ्फी।” माने ई जे अहूँ कनी एक भाग भऽ जाउ आ हमहूँ भऽ जाइ छी। एकठाम होइते तमाकुलो खाएब आ मंचक–दुनियाँक–खेलो देखब। राधेश्‍याम काका सेहो बीचसँ घुसकैत-घुसकैत एक भाग भेला आ बदलू भाय सेहो बढ़ला। एकठाम होइते दुनू गोरे हाथ मिलबए लगला। हाथ मिलबैसँ पहिने बदलू भाय बजला- “चूने तमाकुलपर तँ ऐ दुनियाँक खेल चलैए, तखन जँ दुनू गोरे चुपे रहब से नीक भेल।” ओना बदलू भायकेँ राधेश्‍याम काका भीतरसँ जनिते छैथ जे बदलू भाय अलंकारिक लोक छैथ तँए झटहा फेकैक लूरि हमरासँ बेसी छैन्‍हे, मुदा किछु छैथ तँ छैथ,छिया तँ संगीए। जँ संगीक विचारे नइ बुझब तखन संगपना केतेकाल चलत। ओना, बदलू भायमे ईहो गुण छैन जे कोनो बात बजला पछाइत सुननिहारक मुँह बिदकैत देख बुझि जाइ छैथ जे भरिसक हमर विचारक रस नीक जकाँ नहि पीब सकला। मुदा केते पीलैन आकि नइ पीलैन, अइले तँ तीन लाखक जपानी थर्मामीटरक जरूरत अछि...। राधेश्‍याम कक्काक मुँह तेहने सन बिदकैत देख बदलू भाय बजला- “तमसँ तमाकुल भेल आ चनसँ चुन भेल।” बदलू भाइक मनक बात जेना राधेश्याम काका बुझि गेला तहिना बजला- “अहूँक बुझौवैल बुझनिहारेटा बुझि सकै छैथ। हमरा सन लोक-ले ते गीत आ छन्‍द फुटा कऽ कहब तखने बुझि सकै छी।” राधेश्‍याम कक्काक विचारकेँ, जहिना हर्ड़ी-मकरक मेलामे धिया-पुताक हाथसँ इनहोरमे सानल अरबा चाउरक रोटी आ अल्‍लू-कोबीक तरकारी लऽ कऽ कौआ उड़ि जाइए आ धिया-पुता अपन अहार छिनाइत बेवहारपर नजैर नहि दऽ खेलौना जकाँ चिल्‍होरिकेँ देखबो आ हँसबो करैत रहैए तहिना बदलू भाय राधेश्‍याम कक्काक मुँहक बोल लुझैत बजला- “गीत तँ संगीत छी जे लयक संग चलैए। लय असीमित अछि। मुदा छन्‍द मायाबद्ध होइए जे ध्‍वनि-अंकनकेँ पकैड़ अपन सिरजन करैए।” ओना बदलू भायकेँ जेना जीहेपर रहैन तहिना तरतरा कऽ तेना बजला जे राधेश्‍याम काका थकमकाए लगला...। थकमकाइक कारण भेलैन काका अपने छैथ तँ गद्यकार मुदा साहित्‍यिक कार्यक्रम दुआरे गोटि-पँगरा लयात्‍मक  कविता सेहो लिखि लइ छैथ मुदा ने छन्‍द रटने छैथ आ ने मात्राक ठेकान ठीकसँ बुझि पबै छथिन...। राधेश्‍याम काकाकेँ ठकुआइत मन देख बदलू भाय बुझि गेला जे जहिना सोझमतिया रस्‍ता चलनिहार राधेश्‍याम छैथ तहिना सोझमतिया सेहो छथिये। तँए गप-सप्‍पकेँ आगू नहि ठेल बदलू भाय पाशा पलैट बजला- “जखन एकठाम बैसल छी तखन पहिने तमाकुल खाउ। बुझिते तँ छी जे जे रामा-कठोला हएत से हेबे करत। तइले अपनाकेँ अनोन-विसनोन बनौने रहब सेहो नीक नहि।” ओना बजैक क्रममे बदलू भाय बाजि गेला मुदा लगले चारू भाग नजैर खिड़बए लगला जे तमाकुल खाएब किनको अधला तँ ने लगलैन। नजैर खिड़ैबते बुझि पड़लैन जे केते गोरेकेँ इच्‍छा भऽ रहल छैन। मुदा जखन अपन तमाकुलक डिब्‍बीपर नजैर गेलैन तखन मन पड़लैन जे तमाकुल तँ डिब्‍बीमे ऐछे नहि, अछि तँ मात्र चुनेटा! पाछू मनकेँ उनैटते भक खुजलैन जे जखन दुनू संगीक बीच ‘फिफ्फी-फिफ्फी’क सम्‍बन्‍ध अछि तखन परबाहे की। ओना राधेश्‍याम कक्काक मन बदलू भाइक जिनगीपर छछैल रहल छेलैन, तँए तमाकुलपर सँ नजैर हटि गेल छेलैन। तैबीच अपन हिस्‍सा बढ़बैत बदलू भाय बजला- “तमाकुल अहाँक भेल, चुन आ चुनौनाइ हमर भेल, हौउ आब देरी नइ करू।” बदलू भाइक मुहसँ तमाकुल निकैलते राधेश्‍याम काका जेबीसँ तमाकुलक डिब्‍बी निकालि बदलू भाय दिस बढ़बैत बजला- “निम्मन तमाकुल अछि। शुद्ध सरैसा, तँए नीक जकाँ चुन पिआएब।” राधेश्‍याम कक्काक मुहसँ तमाकुलक बड़ाइ सुनि बदलू भायकेँ जेना मनमे कचोट भेलैन। कचोट ई भेलैन जे भरि दिन तँ सकरी कट तमाकुल खाइबला छी। तखन...। मुदा विचारकेँ मोड़ैत बजला- “रस्‍तेमे तमाकुल सठि गेल, केतौ कीनैक गड़े ने लगल। आब सोचै छी जे जखन पान चलत तखन ओही डालीमे सँ एक पुड़िया तमाकुल लऽ लेब।” जेना-जेना बदलू भाय एक हाथक तरहत्‍थीपर दोसर हाथक औंठा रगड़ैत रहैथ तेना-तेना मनमे रंग-रंगक विचार सेहो उठए लगलैन। टीपगर तमाकुल रहने मुँहमे दइते दुनू गोरेक मनकेँ रसबए लगलैन। तही बीच पानिक संग चाहक कप मंचपर पहुँच गेल। चाहक कप देख बदलू भाय मने-मन अपन मेड़िया दिस बढ़ैक विचार केलैन। जे राधेश्‍याम काका बुझि गेला। बुझिते बजला- “अखन चाहे आएल अछि, पान पछुआएले अछि तखन एना कछ-मछ किए करै छी।” अपन आँट-पेट बुझैत बदलू भाय गुमे रहला। मुदा मनमे ई कछमछी रहबे करैन जे सीमालंघन भऽ जाएत। घोषित समैयक हिसावसँ पनरह मिनट बिलम भऽ रहल अछि, मुदा अखन तक ओतबे लोक पहुँचल छैथ जेते सुनौनिहार छथिन। माने कवि छैथ। सुननिहार गौंआँ-समाज अखन एके-दुइये आबिये रहला अछि। ओना मैकपर बेर-बेर घोषणा होइत छल जे आब कार्यक्रम शुरू भऽ रहल अछि, तँए समाजसँ आग्रह भऽ रहल अछि जे यथाशीघ्र सभा स्‍थलमे पहुँच अपन आसन ग्रहण कए ली। मुदा बहिरा करेतक बीख जकाँ मंत्रक कोनो सुनवाइ होइते ने छल। ओना किछु गौंआँक मनमे एहेन विचार रहबे करैन जे बाहरक विद्वतजन आएल छैथ तँए संग पूरब अनिवार्ये नहि उचितो छी। मुदा से कम लोक छला जिनकर एहेन विचार छेलैन। बेसी ओहन छैथ जिनकर सोचब छैन- जाकी रहे भावना जैसी, प्रभु मुरत देखी तिन तैसी..; ओहन लोक अपन-अपन जिनगीक लय अपना-अपना ढंगसँ पुरबैक पाछू बेहाल छैथ। जइसँ कवि आ कवितासँ मेले ने खाइ छेलैन। आधा घन्‍टा बिलम होइत-होइत छोट सभा-जोकर दर्शक-श्रोता पहुँच गेला। कार्यक्रम शुरू भेल। मंच सजए लगल। मानल-जानल साहित्‍यकार लोकनिक मंच सजए लगल। ओना बदलू भाय अपन निर्धारित स्‍थानपर पहुँच गेल छला मुदा राधेश्‍याम काका पछुआएल रहैथ। संजोग भेल राधेश्‍याम काका सेहो पहिलुका जगह बदैल मंचपर पहुँचला। ओना अपनो मन रहैन जे एहेन खिचड़ी मंचसँ अचारे-चटनी बनि अपन मर्यादा बना राखब नीक। सएह भेबो केलैन। पहिल खड़ीक अन्‍तिम छोरपर राधेश्‍याम काका बैसौल गेला। बसिते मनमे खुशी झलैक उठलैन जे भने नीक भेल। तमाकुलक थुको फेकैमे असान हएत आ बैसारक एकटा छोरपर बैसने आन साँप जकॉं तँ नहि मुदा गनगुआरिक दोसर मुँहथैर जकाँ तँ भेबे कएल। भाय, सभ अपन विचारक मालिक छी, एकठाम बैस विचार करू..! अपना जगहपर बैसल बदलू भाय राधेश्‍याम काकापर आँखि गड़ौने रहैथ। जखन अपना दिस तकैथ तँ बुझि पड़ैन जे समुचित जगहपर छी, मुदा राधेश्‍याम काका-ले अनुचित जरूर भेल छैन। हम तँ नोकरिया लोक छी, ड्यूटीमे छी, अपन गुण चाहे जे हुअए मुदा अखन तँ हमरा एकटा उत्तराधिकारीक रूप निमाहैक अछि...। चारू कोण घुमैबला बदलू भाइक नजैर, तँए समझौता करैत मानि गेलैन जे जखन खिचड़ीए कार्यक्रम छी तखन आड़ि-धूरक ठेकाने कोन..! जेना गामक पहिल साहित्‍यिक आयोजन भेल तेना जमल बढ़ियाँ। बढ़ियाँ जमैक आन कारण जे भेल हुअए मुदा एकटा प्रमुख कारण ईहो भेल जे काश्‍मीरसँ कन्‍याकुमारीक मेची धारक कातक नक्‍सलसँ लऽ कऽ अगरतल्‍ला धरिमे रहनिहार–माने ओइठाम नोकरी रूपमे काज केनिहारक–समाज गाम बनियेँ गेल अछि। सभकेँ किछु नवका विचार रखैक इच्‍छा होइते छै तँए एक कविक काव्‍यक पछाइत पचासो रंगक शायरी आ दोहा, पचासो भाषाक मंचपर श्रोता-वक्ता दिससँ झड़ए लगल। अढ़ाइ घन्‍टा केना गुजैर गेल से ने कवि-साहित्‍यकार बुझलैन आ ने श्रोता। अन्‍तिम पाठ दीनानाथ बाबाक भेलैन। थुल-थुल बुढ़ दीनानाथ बाबा, तँए चारि गोरे मिलि कऽ हुनका अराम कुर्सीपर बैसौलकैन। भोरुका नढ़िया जकाँ सबहक नीन टुटले छल, विचार ग्रहण करैले सभ एकाग्र छेलाहे, तँए सभा एकदम शान्‍त भेल। शान्‍त सभा देख दीनानाथ बाबा अपन पहिल आशीर्वचन जकाँ बजला- “ई कविता पचास बर्ख पूर्व रचने छेलौं।” ‘पचास बर्ख पूर्व’ सुनि सभामे गुदगुदी शुरू भेल। मंचपर बैसल दीनानाथ बाबा अकानए लगला जे केहेन प्रतिक्रिया भऽ रहल अछि। मुदा समाजोक तँ थाह नहियेँ अछि जे पचास बर्ख पूर्व सुनि कोन हँसी हँसि रहल अछि। पचास बर्ख पूर्वक समाजक ऐना आजुक समाजक लेल केते उपयुक्‍त अछि। गुदगुदीक संग भनभनी शुरू भेल- “पचास बर्खक बीच किछु रचबे ने केलैन जे हाल बदलैत समाजक हाल-चाल सुनैबतैथ!” “पचास बर्ख पूर्व कविता करै छला आ पछाइत छोड़ि देलैन..!” हर्ष-विस्‍मयसँ सभा भनभनाइते छल कि तही बीच मंच संचालक आदेश छोड़लैन- “आब अहाँ सब अपन-अपन भनभनी बन्न कऽ सुनै जाउ...।” फेर मंच संचालक महोदय आदेश प्रसारित केलैन- “वन्‍धुगण! एकाग्र भऽ बाबाक आशीर्वचन सुनू।” ओना, बाबाक कविता पाठक नाओं सुनि किछु गोरे साकांच जरूर भेला, मुदा किछु गोरेक बीच गुदगुदी चलिये रहल छल। गुदगुदीक कारण छल पचास बर्ख पूर्वक कविता। पचास बर्ख पूर्वक कविताक बीच पचास बर्खक समैयक अन्‍तराल भऽ गेल। दोसर ईहो जे जे बेकती एकबेर-दूबेर सुनने हेता हुनका की भेटतैन। ओना, कोनो कविताक रसास्‍वादन एको बेरे सुनने होइए आ दसो बेर सुनने नइ होइए। भाय, एकर कारण स्‍पष्‍ट अछि। स्‍पष्‍ट ई अछि जे कियो जँ रामायणकेँ अपन आचरणक अनुकूल बना पढ़ै छैथ तँ हुनका आगूक पाठक खगता होइ छैन, पैछला तँ जिनगीक पैछला पन्ना भेल जे इतिहास वा भूत भेल। जरूरत तँ वर्तमान आ भविसक अछि। मुदा जे सोझे–माने बिनु आचरण निरमौने–पाठ करै छैथ हुनका दस बेर कि जे दसो जुगो पाठ केने रस नइ भेटतैन। एक भागमे बैसल राधेश्‍याम काका आ दोसर भागमे बैसल बदलू भाय सभा दिस नजैर दौगा-दौगा देख-देख ऐ निर्णयपर आबि अँटैक जाथि जे जखन खिचड़ीए कार्यक्रम भेल तखन तँ सभ किछु ने खिचड़ीए हएत। खाएर.., खीर भलेँ नइ हुअए, किए तँ ओ एकचलिया माने एक गुण-सोभावक वस्‍तुक समावेशी छी, मुदा खिचड़ी तँ से छी नहि। ओ तँ नोनगरो होइए आ मीठगरो होइते अछि। भलेँ जाति-सोभाव भेने नोन अपन नाओं छिपा खिचड़ीए कहबए आ मीठ अपन नाओं खोलैत गुड़ खिचड़ी किए ने कहबए। ओना, घीक प्रवेश नोन खिचड़ीए-मे पचैए, गुड़ खिचड़ीमे नहि, मुदा ओहो अपन नाओं अरैज घी-खिचड़ी तँ कहबैए। आँखिकेँ डेढ़िया करैत बदलू भाय राधेश्‍याम काकाकेँ इशारामे पुछलकैन- “नीक लगैए की नहि?” जहिना आँखिक इशारामे बदलू भाय राधेश्‍याम काकाकेँ पुछलकैन तहिना राधेश्‍यामो काका इशारेमे जवाब देलखिन- “जेहने अहाँ तेहने ने हमहूँ।” ओना दुनू गोरे दीनानाथ बाबाक कविता सुनि मने-मन अपने-आपमे रमए लगला। ओना दुनूक रमैक अपन-अपन कारण छेलैन। रेडियो स्‍टेशनसँ प्रसारित कविता छेलैहे तँए बदलू भाय मने-मन खौंझाइत रहैथ जे भूतक संग हमहूँ भुतिआ रहल छी। मुदा राधेश्‍याम कक्काक रमकीक कारण रहैन जे जखन नव समाजमे प्रवेश पेलौं तखन ओइ समाजकेँ केना साहित्‍य समाजमे प्रवेश कराएब, तेहने ने कवितोक पाठ होइ। ठहक्काक बीच मंच विसर्जन भेल। मंच विसर्जन होइते राधेश्‍यामो काका सहैट कऽ बदलू भाय दिस बढ़ला आ बदलूओ भाय राधेश्‍याम काका दिस सहटैत आगू बढ़ला। आगू बढ़िते बदलू भाय बजला- “भाय साहैब, जीता जिनगी अहिना होइ छइ।” ओना, बदलू भाय राधेश्‍याम काकाकेँ अध्‍ययन करैत बाजल छला। अध्‍ययन ई जे शीर्ष पाठ जेहेन हेबा चाही से नइ भेल। मुदा एतेक खुशी तँ मनमे उठले छेलैन जे नव समाजक लेल नव कार्य भेल तँए नम्‍य भेबे कएल। राधेश्‍याम काका बजला- “जाए दियौ जेते जे भेल से भेल, तमाकुल खाउ आ अहूँ विदा होउ।” जेबीसँ तमाकुलक पुड़िया निकालि बदलू भाय बजला- “संचालन समिती धरि नीक बनल छल। लिअ, जीवनी खेनिहारक कीनल पुड़िया छी।” मुस्‍की दैत राधेश्‍याम काका बजला- “एक बेर अहाँक चुन छल आ हमर तमाकुल, मुदा ऐबेर हमर चुन रहत किए तँ अहाँक तमाकुल चोरुक्का छी।” बजन्‍ता लोक बदलू भाय, बजला- “जेते तमाकुलक पुड़िया छल तइ हिसावे खेनिहार कम छेला, तँए घरवारीक समान फेका जैतैन ने, तइसँ नीक ने जे ओकर उपयोग भऽ गेल।” चुनौटी निकालि बदलू भाइक हाथमे दैत राधेश्‍याम काका बजला- “नीक लागल किने?” ‘नीक लागब’ सुनिते बदलू भायकेँ जेना बिढ़नी काटि नेने होनि तहिना छटपटाइत बजला- “पहिलुक कविताक पाठ जे भेल तखने मन ओकिया गेल, से केतबो आसन मारी मुदा ओकियाएब कमे ने भेल। अन्‍त तक बनले रहल।” पहिल पाठ नवतुरिया कवि ताराकान्‍तक भेल छल। ताराकान्‍त बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनीमे जीवकोपार्जन करै छैथ। मुदा कविता गामक उजरल-उपटल जीवकोपार्जन केनिहारक जिनगीसँ सम्‍बन्‍धित छल। शब्‍द विन्‍यास नीक रहैन। राधेश्‍यामक काका ताराकान्‍तक जिनगीकेँ ओइ ढंगसँ नहि देखने, तँए भावक विचारमे भावावेश भऽ गेल छला। खास कऽ गामक उजरल-उपटल जिनगीक चर्च सुनि। ओना, ई बात जरूर राधेश्‍याम कक्काक मनमे ठहकै छेलैन जे अपरिचित कविक रचना जकाँ कविता अछि, मुदा नवतुरिया रचनाकार रहने मनमे आशा रहबे करैन जे आगू नीक कविता करता। बजला- “किए शुरूहेमे जी ओकिया गेल?” ‘किए’ सुनि बदलू भाय चारूकात नजैर खिड़ौलैन तँ बुझि पड़लैन जे अखन नीक जकाँ कार्यक्रम विर्सजन नइ भेल अछि, चारूकात सभ छिड़िआएले छैथ। बजला- “भाय साहैब, हम ते बन्‍हौटा जिनगीक जालमे पड़ल छी, तखन मुँह केना खुजल रहत! आइ एतबे रहए दियौ।” ठोरमे तमाकुल लैत राधेश्‍याम काका बजला- “भेँट-घॉंट होइत रहत।” बदलू भाय बजला- “मन रहितो मनमरु बनल छी। जँ जीबैत रहब ते भेँट हेबे करब।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2699, तिथि : 19 जुलाइ 2017 भूतलग्‍गू आकि भविसलग्‍गू जेठ मास। पाँच बजे बेरुका समय। मधुबनीसँ अबिते रही कि गामक कातेमे नेबुआवाली भौजी भेटली। बिस्‍टौल हाट जाइ छेली। सोम आ शुक्र दिनकेँ हाट लगैए। आइ शुक्र छी। भेटते बजली- “कनी साइकिल ठाढ़ करू।” ओना साइकिल नीक जकाँ ठाढ़ नइ केलौं मुदा जखने भौजी नजैरपर पड़ली तखनेसँ साइकिलक चालि थोड़ेक असथिर काइये देने छेलिऐ। बजलौं- “साइकिल ठाढ़ करैले किए कहलौं?” साइकिलेपर चढ़ल रहलौं मुदा एकटा पएर रोपि ठाढ़ भेलौं। ठाढ़ होइते भौजी बजली- “घरवालीकेँ भूत लगल अछि आ अपने साइकिलपर चढ़ि छिरहारा खेलाइ छी!” ओना, नेबुआवाली भैजीकेँ नइ बुझल छेलैन जे मधुबनीसँ अबै छी। किए तँ जहिना गाम-घरमे धोती-कुर्ता पहिरने आ कान्‍हपर तौनी रखै छी, तहिना झंझारपुरो-मधुबनी जाइ छी तँ रहैए, तँए भरिसक भौजी नहि बुझि पेली जे मधुबनीसँ अबै छी। ओना एक तँ साइकिलोक चालिसँ आ दोसर समैयोक हिसाबे देह-हाथ नइ घमाएल छल आकि चाइनपर सँ पसेनाक धार नइ बहै छल सेहो बात नहि, बहिते छल। मुदा तैपर भौजीक नजैर ऐ दुआरे नइ गेलैन जे रौदक चालिमे अपनो देह घमाएले छेलैन। भिनसुरका कोर्ट चलैए, चारि बजे भोरे उठि तैयार भऽ मधुबनी गेल छेलौं। आ कोर्ट उसरला पछाइत अढ़ाइ बजेमे ऐगला तारीख लैत मुंशीजी सँ गप-सप्‍प करैत तीन बाजि गेल छल। सबा तीन बजे मधुबनीसँ विदा भेल छेलौं। ओना, कोर्टक काज ढीले-ढाल चलैए तँए मनमे कोनो तरहक तेहेन बातो नहियेँ छल जे मन केम्‍हरो घुसकैत-फुसकैत। असथिर छेलौंहे। ओना मनो घुसकै-फुसकैक कारण होइए जे कोर्टेसँ केकरो धनो भेटै छै आ केकरो जीवनो जाइते छै, मुदा से नहि अपन पैंतीस साल पुरान अगिलग्‍गी (436) केस अछि। जइ समैमे केस भेल ओइ समए खेत-पथारक झंझट गाम-गाममे पसरल छल। ओना, खेत-पथारक झंझट अखनो नइ अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। अखनो अछिए, जँ से नहि अछि तँ जे छेहा गरीब अछि–माने जेकरा एको धुर अपना नामे जमीन नइ छै–ओकरा सरकारी घरो कहाँ छइ। आने गाम जकाँ हमरो गाममे बहरबैया जमीनदारक जमीनपर झंझट भेल। दखल-दिहानीक दौड़मे अगिलग्‍गी केस भेल। जमीनमे टाट-फरक ठाढ़ कए जमीनदारक लगुआ-भगुआक द्वारा आगि लगौल गेल छल, जइ लगबैमे हम-सभ फँसौल गेल छेलौं। तीस आदमीक ऊपर केस भेल छल। तइ बीच जमीनक सभ दशा सेहो भेल। मुदा केस कचहरीमे लटकले अछि। सालमे दू बेर तारीख लइ छी आ मधुबनी जाइ-अबै छी। ओना, मधुबनी गेलापर बहुत बात मन पड़ैए। मन पड़ैए टीशन कातक होटल, मन पड़ैए कोर्टसँ जहल आ जहलसँ कोर्ट अबै-जाइ काल गाड़ीमे सिपाहीक पहरा, मन पड़ैए जही कोर्टसँ जहल जाइ छेलौं तेही कोर्टसँ छुटि कऽ अबितो छेलौं...। ओना, जइ समए केस भेल छल तइ समैक स्‍थिति आ अखुनका स्‍थितिमे बहुत बदलाउ आबि गेल अछि। माने ई जे ओइ समैमे अगिलग्‍गी केसक बहुत महत छल। मास-मास, तीन-तीन मास केसक जमानत नइ होइ छल आ सेशन केसक रूपमे ओकर तहकीकात सेहो होइ छल मुदा आब से नहि रहल। ने अगिलग्‍गी केसे बेसी होइए आ ने ओइ रूपे ओकर तहकीकाते होइए। समए बदलने आब अपहरण आ राहजनीक घटना बढ़ि गेल अछि। आब एकर महत बढ़ि गेल अछि। पैंतीस सालक बीच केस सेहो मधुबनी-झंझारपुर तीन केलक। तीन बेर करैक कारण भेल जे झंझारपुरमे कोर्ट बढ़ने (सेशन कोर्ट) मधुबनी कोर्टसँ केस झंझारपुर आबि गेल। मुदा किछुए दिनक पछाइत पुन: केस मधुबनी चलि गेल। तेकर कारण भेल साल भरिसँ सेशन कोर्ट खाली रहल, जजक अनुपस्‍थिति रहल। ओना मधुबनियोँ कोर्टक हालत तेहने रहल। अधिकतर कोर्ट जजक अनुपस्‍थितिमे खालीए रहौ लगल आ अखनो अछिए। मुदा किछु अछि तैयो ने कोर्ट हरदा बाजल अछि आ ने अपने हरदा बजलौं अछि। नेबुआवाली भौजीक संग सम्‍बन्‍ध[1] बहुत पुरान नहियेँ अछि, हाले-सालक माने आठे-नअ बर्खक अछि। ओना सिंहेश्‍वर भाइक संग भैयारीक सम्‍बन्‍ध बच्‍चेसँ अछि,करीब पचास-पचपन बर्खसँ मुदा जहिया नेबुआवाली भौजी एली (दुरागमनक पछाइत) तहियासँ करीब बीस-पचीस बर्ख तक, दियर-भौजाइक जे सम्‍बन्‍ध अखन बनि गेल अछि, से नहियेँ छल। ओना टोका-टोकी कोनो काजे नइ होइत छल सेहो बात नहियेँ रहल अछि, मुदा ओ परिवारिक काजक अनुकूल रहल। असल दियर-भौजाइक बीच जे बेकता-बेकती सिनेह-सिक्‍त सम्‍बन्‍ध हेबा चाही ओ आठ-नअ बर्खसँ अछि। हुनको देहक समरथाइ निच्‍चाँ मुहेँ उतैर गेल छैन आ अपनो तँ सहजे उतरले अछि। ओना, आठे-नअ बर्खक सम्‍बन्‍धमे भौजियो हमरा चीन्‍हि नेने छैथ आ हमहूँ हुनका नीक जकॉं चीन्‍हि नेने छिऐन। मुदा ओ अपना जगहपर चिन्‍हारए अछि। बजै-भुकैमे अरबा चाउरक बसिया भात जकॉं नेबुआवाली भौजी कनी बेसी फरहर छथिए। तँए मनमे बेसी झॉंट-बिहाड़ि नहियेँ उठल। माने ई जे नेबुआवाली भौजी जे बजली‘घरवालीकेँ भूत लगल अछि आ अपने छिड़हारा खेलाइ छी।’ तँए मन बेसी आगू-पाछू नइ भेल मुदा कनी-मनी झॉंट तँ मनमे लगबे कएल। झॉंट ई लगल जे उपकैर कऽ एना किए नेबुआवाली भौजी बजली? जँ परिवारक बात छी तँ ई ने कहक चाही छेलैन जे केते कालसँ घरसँ बहराएल छी। अनेरे तँ सभ बात सोझहामे आबि जाइत। मुदा घरवालीकेँ भूत लगल अछि, एहेन बात किए बजली? खाएर..। मनकेँ थतमारि बात बदलैत पुछलयैन- “एते रौदमे केतए जाइ छी?” नेबुआवाली भौजी बजली- “कनी हाटपर जाइ छी। तेहेन ने रौदियाह समए भऽ गेल अछि जे तीमन-तरकारी दुआरे काल्‍हि रातिमे अँचारे संगे रोटी खेलौं।” ओना भौजीक बोल तेलमे डुमल तीन सलिया आमक अँचार जकॉं सोहनगर अखनो बुझि पड़ै छल, मुदा परिवारक बात सुनि मन कनी खसिये रहल छल। बजलौं- “की करबै, समैये जखन एहेन रौदियाह भऽ गेल तखन दोसर उपाइये की अछि।” कहि साइकिल आगू बढ़ेलौं। नेबुआवाली भौजी सेहो उत्तर मुहेँ हाट दिस बढ़ली। ओना, मनमे कनी-कनी बिनबिनी उठिये रहल छल, जे कनी खरियारि कऽ आरो आगू-पाछूक बात पुछि लितिऐन मुदा चीन्‍हल लोक नेबुआवाली छथिए जे तिलकेँ तार आ झूठकेँ सत्‍ बनबैमे हजार बेर किए ने बोलीक वाणी बदलैक जरूरत पड़ैन, ओ मुहे-मुहीं बदैल लइते छैथ, तँए मनमे जेहेन मर्मक स्‍थिति बनक चाही, से नहियेँ बनल। लग्‍गी भरि जखन आगू बढ़लौं तखन मनमे उपकल जे एकबेर पाछू उनैट भौजीकेँ आरो बात पुछिऐन, मुदा दोसर मन पहिल मनकेँ रोकलक। रोकलक ई जे जखन भरि दिनक बहराएल छी तइ बीचमे जँ कियो किछु तेहेन बात पत्नीकेँ कहि देने हेतैन आ ओ बजैत-बजैत बताहिक रूप बना नेने हेती, सएह रूप देख जँ नेबुआवाली भौजी बाजल हेती तखन किछु अंशमे सहियो तँ भेबे कएल। ओना विचारक दौड़मे से नहि भेल, किए तँ तत्त्वदर्शी चिन्‍तक क्षणेमे छतपर चढ़ि जाइ छैथ आ पलेमे पताल पहुँच जाइ छैथ...। मने-मन विचारितो रही आ साइकिलो चलिते रहल। चारि लग्‍गी आगू बढ़ैत-बढ़ैत मन पत्नीक नैहर दिस बढ़ि गेल। नैहर दिस बढ़िते मनमे भेल जे जँ पत्नी भूतलग्‍गू रहितैथ तँ नैहरेसँ लगैत आएल रहितैन। मुदा से कहाँ कहियो लगलैन? लगले भेल जे रौदमे चालीस किलो मीटर साइकिलसँ एलौं हेन, भरिसक तइसँ चेहराक रूप बदैल गेल अछि तँए चिक्कारीमे ने तँ नेबुआवाली भौजी बजली?ओना, चारू दिस नजैर खिड़ाबी जे कोनो दोसरो-तेसरो कारण तँ नइ ने अछि। मुदा से कोनो गरेपर ने चढ़ए। नैहरसँ पत्नीकेँ सासुर एला कहुना-कहुना तँ तीस-पैंतीस बर्ख भाइये गेल हेतैन, तैबीच जेते धिया-पुता हेबा चाही सेहो भाइये गेलैन। कहियो किछु ने देखलौं। तखन किए नेबुआवाली भौजी कहली..! मन उनटल। उनैटते उठल- समाजमे एहनो लोकक तँ कमी नहियेँ अछि जे चाहे पति-पत्नीक बीच हुअए आकि भाइ-भाइक बीच आकि दियादिनी-दियादिनीक बीच वा बाप-बेटाक बीच झूठ-फूस बात गढ़ि मतभेद नइ पैदा करैए। करिते अछि आ खूब करैए। समाजो तँ समाज छी किने, केकरो मुँह छै तँ नॉंगैर नहि, आ केकरो नॉंगैर छै तँ मुँह नहि, मुदा तैयो घरक धारण नइ केने अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। थोड़ेक आगू बढ़लौं कि धक-दे मनमे उठल। जेठ मास छी दशराहा परसुए भेल। भूत-प्रेतक बास गाछी-बिरछीमे होइ छइ। अखन तँ दू माससँ सभ गाछी-बिरछीमे आम-जामुनक ओगरवाह बैसले हएत, तखन तँ भूतो-प्रेत ने ओगरवाहक डरे पड़ा गेल हएत। ओना, जखन आम-जामुन गाछमे लटकल रहैए आ ओगरवाह बीच गाछीमे मचान बना जगलो रहैए आ सुतलो रहैए तखन कहाँ केकरो भूत लगै छइ? जखन आम-जामुन गाछी-बिरछीमे नइ रहल तखन पतखरड़नी सभकेँ कहियो काल बँसबिट्टीमे चुड़ीन-तुड़ीन लगितो अछि, मुदा सेहो मास तँ नहियेँ छी..! केतबो मनकेँ असथिर करी तैयो किछु-ने-किछु उपकिये जाए। अपना घरसँ कनी पाछूए रही कि मनमे फेर उठल- जँ कहीं नेबुआवाली भौजी झुठे कहने हेती, तखन?फेर लगले भेल जे भूतो तँ भूत छी, कोनो कि एक्के रंगक आकि एक्केटा अछि। रंग-बिरंगक अछि। मुदा कोन रंगक अछि ओ तँ देखला-बुझला पछातिये फरिछाएत, तइले अनेरे मनकेँ भरियौने छी। मन हल्‍लुक होइते लोकक मनकेँ मन देखए लगल। लोकक मनपर मन पड़िते मन थीर भेल। थीर होइते उठल- कहू! समए ओते आगू बढ़ि गेल जे लोक अँगनाक मड़बासँ ऊपर उठि हवाइये जहाजमे बिआहो करैए, भोजो-भात करैए, मुदा गाम-घरमे अखनो भूत-प्रेत लगिते छइ! एक्कैसमियो सदीमे जँ अहिना भूतमे लोक भुतियाइत रहत तखन ओझा-गुनी केतए-सँ औत। मन ठमैक गेल। ठमैकते मनमे उठल, परसू जेठक दशराहा छल। एक तँ तीन माससँ एको बून पानि नहि पड़ल, ओहिना वायुमण्डल गर्म अछि, तैपर रौदो तेहेन होइए जे माटिक रस तेना चुइस नेने अछि जे रसे-बेरस भऽ गेल छइ। दिनक दसे बजेसँ बाध-बोनमे लू चलए लगै छइ। भऽ सकैए जे कोनो काजे पत्नी बाध दिस गेल हेती आ लू-तू पकैड़ नेने होनि जइसँ मन गरमा गेल होनि आ बताहि जकाँ आकि भूतलग्‍गू जकाँ बोलीक बानि भऽ गेल होनि। किएक तँ मौसमक हिसाबसँ सभ किछु नहियोँ तैयो बहुत किछु तँ बदलियो जाइए। ओना, मौसमो-मौसमोक अपन-अपन चालि-प्रकृति छइ। बरसातक पछाइत जे स्‍वाती नक्षत्र अबैए आ ओकर जे बून छै ओ जँ केराक मुँहपर पड़त तँ कपूर बनत, सिप्‍पीक मुँहपर पड़त तँ मोती बनत आ साँपक मुँहपर पड़त तँ बीखे बनत किने। भलेँ एक्के नक्षत्र आ एक्के बर्खाक बून किए ने हौउ। तहिना ने जाड़क पछातिक मौसमक बून आकि गरमीक पछातिक मौसमक बूनमे सेहो अन्‍तर हेबे करत..? रंग-रंगक विचार मनमे उठिये रहल छल ता घर लग पहुँच गेलौं आ पत्नीकेँ दलानक आगूमे ठाढ़ देखलयैन। चुप-चाप ठाढ़ छेली तँए बोलक बाइनिक कोनो आभास नहियेँ भेल। ओना, अखन धरिक जिनगीमे दुनू परानीक बीचक जे सम्‍बन्‍ध रहल अछि ओइमे कहियो कोनो खटास नहियेँ आएल अछि जइसँ कोनो छोटो-क्षीण अबिसवास जगैत। ओना, वैचारिक रूपमे कहियो काल विचार-भेद जरूर होइए मुदा ओकर समाधान तँ परिवारक चलैत जिनगीक धारक क्रियाक रूपमे भाइये जाइए। हमरा देखते पत्नी बजली- “एते रौदमे किए चललौं। कनीकाल मधबनियेँमे बिलैम जाइतौं से नहि?” ओना मने नहि देहो-हाथ थकियाएले छल तँए जेहेन उत्तर पत्नीकेँ दिअक चाही से नइ दऽ पेलिऐन। मनमे छल जे कहिऐन- जँ लोक जाड़क डरे आकि रौदक डरे आकि झाँट-पानिक डरे घरसँ निकलबे छोड़ि दिअए तखन ओकर जिनगीक गाड़ी केना चलतै। ओना, ई दीगर अछि जे जखन समय असहज भऽ जाइए तखन ओकर अनुकूल लोक अपन जिनगीकेँ धड़ियबैत चलैए। मुदा से नहि, हारल सिपाही जकाँ अपनाकेँ समरपित करैत कहलयैन- “आब कि कोट-कचहरीमे एको क्षण रहैक मन होइए, तहूमे मधुबनीमे। जेतेकाल काज छल तेतेकाल काजमे हेराएल छेलौं। काज होइते पड़ेलौं।” ओना आन स्‍त्रीगण जकॉं पत्नी गपकेँ बेसी नहि नमरा बजली- “कनी काल छाहैरमे ठंढा लिअ, पछाइत किछु खाइयो-पीब लेब चाहे पहिने नहाइये लेब।” ओना मनमे नेबुआवाली भौजीक गप नचैत रहए। मुदा अगुआ कऽ बाजबो तँ नीक नहियेँ होइत। पत्नीक विचार हुनके मुहेँ किए ने सुनब जे आन स्‍त्रीगणक मुँहक बाते जँ दुनू परानीमे झगड़े भऽ जाए, सेहो केहेन हएत। तँए मनकेँ थतमारि कऽ राखबे नीक बुझलौं। ओना, मनमे ईहो हुअए जे नेबुआवाली भौजी जे भूत लागब कहने छली आ जँ लगल हेतैन तँ बोलिये वाणीसँ ने बुझि जाएब। कुरता-गंजी निकालि रौदमे दैत पत्नीकेँ कहलयैन- “कनी पंखा नेने आउ।” ऑंगनसँ पंखा आनि पत्नी ठाढ़े-ठाढ़ चलबए लगली। दसे हौंकैनमे मन शान्‍त भऽ गेल। मन शान्‍त होइते बजलौं- “नेहेनाइ तँ अछिए मुदा पहिने पानि पीब, चाह पीब आ पान खाएब तेकर पछाइत बुझल जेतइ।” ‘बड़बढ़ियाँ’ कहि पत्नी ऑंगन दिस बढ़ि गेली। ओना, नेबुआवाली भौजीक विचार मुहसँ निकलैले धानक गम्‍हरा जकॉं घोघमे तरतर करैत छल मुदा अपन थकानो आ चालिक गरमियोँसँ गप-सप्‍प करैक इच्‍छा मनमे नइ होइत रहए। ओना पत्नीक मुँहक चुहचुहीसँ बुझि पड़ै छल जे किछु बात पेटमे एहेन छैन जे बजैले लुस-फुसा रहली अछि मुदा हमरा रौदाएल बुझि ऐ दुआरे ओकरा पेटमे थतमारि कऽ रखने छैथ। भऽ सकैए मनमे ई होइत हेतैन जे रौदाएलमे कहने गरमाएलमे जँ कहीं बुझैयेमे तल-विचल भऽ जेतैन आकि अपन बजैयेमे भऽ जाएत तखन तँ ओकर अरथो अनर्थ हएत। जइसँ उत्तरो ओहने हएत। नीक उत्तर तँ तखन भेटैए जखन ओकर चारू कोण समगम रहल। किए तँ अही दुनियॉंमे ने रहैयोक अछि जइ दुनियॉंमे चारू कोणक लोक अछि। ओना बेसी उमेर भेला पछातियो पत्नीक देहक पानि अखनो ओहने जलजलौ छैन जेहेन एहेन उमेरक हेबा चाही। मोटा-मोटी यएह बुझू जे देहमे आसकैत ओते नइ छैन जेते आन बत-बनौन स्‍त्रीगणमे रहैए। चुल्‍हिपर चाहक केतली चढ़ा ऑंचकेँ नीक जकॉं लगा लोटामे पानि नेने पत्नी पहुँचली। ओना, अपन मन रहए जे ठेहुनसँ निच्‍चो आ भरि बाँहि पहिने धोइ ली जे थाकैन मारक होइए, मुदा मन असकता गेल। पत्नीक हाथसँ लोटा लऽ दू बेर कुर्रा केलौं आ भरि छॉंक पानि पीलौं। तैबीच पत्नियोँ चाह नेने पहुँचली। एक गिलास चाह पीब पत्नीकेँ चाबस्‍सी दैत बजलौं- “जेहने चाह पीबैक इच्‍छा छल तेहने बनेबो केलौं!” ओना, चाह आने दिन जकॉं छल मुदा देहक थकानक भूख बढ़ने वस्‍तुक (पीबैक) सुआद सेहो बढ़ाइये देने छल मुदा पत्नीकेँ बातक उन्‍टा अर्थ लागि गेलैन। उन्‍टा अर्थ ई जे हम तँ चाहक सुआद पेब बाजल रही मुदा पत्नीकेँ भेलैन जे व्‍यंग्‍य स्‍वरूप बजला। मुदा लगले ईहो होनि जे जखन सभ दिन अही चुल्‍हीपर अही हाथे चाह बनबैत आबि रहल छी तखन आन दिन की इच्‍छा नइ भरै छेलैन जे एना बजला? मुदा अपन जे विचार पतिकेँ कहैक रहैन ओइ आगू एकरा (माने चाहक गपकेँ) तुच्‍छ बुझलैन तँए मने-मन दबैत बजली- “हाथमे कि पाँचो ओंगरी एके-रंग अछि, तहिना ने पाँच दिनमे पॉंचो रंगक चाह तँ भाइये सकैए। अहाँकेँ केहेन चाह पीबैक मन अछि आ हमरा केहेन चाह बनबैक विचार अछि ओ गुम्‍मा-गुम्‍मीसँ थोड़े काज चलत। जँ सएह छल तँ कहि दइतौं जे कनी बेसी लीकरे आकि कोनो आने वस्‍तु बेसी करि कऽ आकि कम करि कऽ देबइ।” पत्नीक झपटसँ बुझि पड़ल जे जाबे अपनो ओहने नइ बनब ताबे ठीक-ठीक काज चलैबला नहि अछि। चाह पीब पान खा नेने छेलौं। बजलौं- “गामक हाल-चाल नीक अछि किने?” गामक हाल-चाल सुनि पत्नीक मनमे जेना दुपहरियाक बात नाचि उठलैन। बजली- “नाँहकमे सौंसे गामसँ झगड़ा भऽ गेल!” पत्नीक बात सुनि मनमे उठल जे कोनो समाजिक बात जरूर अछि। जँ से नहि रहैत तँ एक गोरेसँ ने झगड़ा होइतैन। सौंसे गामसँ किए भऽ गेलैन। मुदा प्रश्‍नक जड़िमे केतौ-ने-केतौ समाजक धारा जरूर छीपल अछि तँए समाजिक धारामे तँ नहि, मुदा मजकियल धारामे बजलौं- “सौंसे गामक लोकसँ झगड़ा केलौं आ झोंट ओहिना देखै छी, तखन झगड़े की भेल?” खिसिया कऽ पत्नी बजली- “से की?” सोझरबैत बजलौं- “जाबे स्‍त्रीगण झोंटा-झोंटौबैल नइ केलक ताबे ओकर झगड़ाक कोनो मानि नहि। ओ कोनो खेलक सर्ड़ी भेल।” पत्नीक रूप बदललैन। बजली- “भदुआरवाली कुम्‍हैन आएल छेली, परसू दशराहा रहै, लोक अपन-अपन घोड़ा चढ़ौलक। उधारे लोक एक-एकटा घोड़ा कुम्‍हैन ऐठामसँ लऽ अनलक।” बिच्‍चेमे बजा गेल- “मर्र, ई की भेल! एहेन तँ सभ साल होइते अछि।” सम्‍हारैत पत्नी बजली- “सभ दिनसँ घोड़ाक दाम तँइ छल, जइ हिसाबे आन साल दइ छेलखिन।” बजलौं- “ऐ बेर की भेल?” पत्नी बजली- “भदुआरवाली कुम्‍हैन अरि कऽ ठाढ़ भऽ गेली जे आब सभ किछु महग भऽ गेल, हमरो रंग-टीप करैमे खरच बढ़ि गेल अछि, तँए ओइ हिसाबे घोड़ाक दाम लेब।” पत्नीक बात सुनि मन हूमरल। मनकेँ हुमैरते विचार गुम्‍हरल। बजलौं- “ई तँ उचिते भेल।” ‘उचित’ सुनि पत्नी छड़ैप कऽ बजली- “हमहूँ तँ सएह कहलिऐ। मुदा एक दिस ठाढ़ीवाली, ननौरवाली आ तमोरियावाली भऽ गेली आ दोसर दिस नेबुआवाली आ धेपुरावाली भऽ गेली। दुनू दिससँ कौआ जकॉं लूझए लगली।” बजलौं- “पछाइत की भेल?” पत्नी बजली- “तामसमे कहा गेल जे तोरा सभकेँ भूत खिहारने छह, तँए भुतियाएल छह।” पत्नीक बात सुनि मनमे भेल जे भरिसक अहीक उपराग नेबुआवाली देने छेली। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2470, तिथि : 23 जून 2017 मर्माहत जोगारी भायकेँ गामक सभ जनै छैन जे ओ ओहन लोक छैथ जे अपन जिनगी चलबैक सभ जोगार अपने रखने छैथ। जहिना कुशल किसान अपना खुट्टापर बरद-महींसक संग खेतीक सभ समचा–माने हर-कोदारि, खुरपी-हँसुआसँ लऽ कऽ टेंगारी-कुरहैर होइत दमकल-बोरिंग तक–अपना हाथमे रखि नियमित जिनगी बना, नियमवद्ध चलै छैथ तहिना जोगारी भाय सेहो छथिए। जखन दुनियॉंक बीच मनुख बनि जीवन धारण केलौं तखन जँ अपन जिनगी समेट चलैक तँ दोसरोक सेवा नइ भेल तखन भक्‍ति की आ भजन की? आ जँ भक्‍ति-भजन करैत जिनगी नइ चलल तखन जिनगिये की। जिनगीक लेल जे आवश्‍यकता अछि, आवश्‍यकता अछि जिनगीक अनुकूल, माने ई जे केहेन जिनगी बना चलए चाहै छी। जेहेन जिनगी रहत ओइ अनुकूल ओकर आवश्‍यकता सेहो अछिए। चालीस बर्ख पूर्व जोगारी भाय तीन कट्ठा बँसवारि लगौलैन। पिताक देल जे बँसवारि छेलैन ओ ताम-कोर आ ताक-हेरक दुआरे उपैट जकॉं गेल छेलैन। जइसँ अपन आवश्‍यकता पूर्ति होइक संभावना नइ देखलैन। बाँसक खगतो तँ कम नहियेँ अछि। घर-घरहटसँ लऽ कऽ टाट-फरक, बाड़ी-झाड़ी-ले मचानक संग बरेब-बाड़ी-ले सेहो खगता होइते अछि। तहूमे हम सभ ओहन किसान परिवारमे जन्‍म नेने छी, जइ परिवारमे बॉंस उपजबैक साधन–माने जमीन–सेहो अछिए। बॉंस-गाछी गामक ओहन जमीनक पैदावार छी जे ऊँचरस हुअए। बाढ़ि-बर्खाक इलाका अपन छीहे जैठाम गामक आधासँ बेसी जमीन या तँ चौरी अछि वा ओहन नीचरस जमीन अछि, जइमे बॉंस गाछ नइ लागि सकैए। बॉंस ओहन खेतक पैदावार छी जे घराड़ीक सदृश हुअए। जइ गाममे घर बनबैले जमीन सभकेँ नइ छै तइ गाममे बॉंस-गाछ लगबैक जोगार केतए-सँ औत। जोगारी भायकेँ से नइ छैलैन। पुरना बँसवारि तीन-चारि साल रखि तैबीच ओइसँ काज चलौलैन, ओना सभ काज ओइ पुरना बँसवारिसँ नइ चलै छेलैन मुदा तैयो बिकरी-बट्टा नइ भेने अपन काज तँ चलिते छेलैन। ओना बँसवारि निच्‍चॉं मुहेँ हहैरिये रहल छल जइसँ आगू बाधा उपस्‍थित हेबे करतैन। यएह सोचि जोगारी भाय नवका बँसवारि लगबैक विचार केलैन। जुड़शीतल पाबैन, चैत-बैशाखक बीचक सिमान छीहे। जहिना चैतक गाछी आ माघक बाछी निरोग होइए तहिना बॉंसो अछिए। जेहेन बॉंस रोपल जाइए ओइमे नव बॉंसक कोंपर सेहो निकैलते अछि। रोपला पछाइत जँ नियमित ओकर पटौनी होइ तँ ओ अपन कोंपरकेँ जोगा नव बॉंसक रूपमे ठाढ़ करबे करैए। लोटा-बाल्‍टीसँ लोक गाछी-कलममे जलधार करिते छैथ मुदा तुलसी सन छोट गाछ-ले जँ एक कलश–माने एक डाबा–पानिक खगता प्रतिदिन होइ छै तैठाम नमहर गाछ-ले तँ ओइसँ बेसी खगता हेबे करत। ओना, तुलसीक छोट गाछ होइ छै, जइसँ ओकर मुसरो आ सिरो सभ धरतीक ऊपरके परतमे रहैए। जमीनक ऊपरका हाल[2] जे चाहे तँ निच्‍चॉं मुहेँ ससैर जाइए वा सुखिये जाइए जइसँ माटि बेरस भाइये जाइए। बेरस भेने सुखैक संभावना सेहो भाइये जाइ छइ। मुदा नमहर गाछक मुसरो आ सिरो तँ बेसी तर[3] तक जाइते अछि तँए ओइसँ बेसी (माने तुलसीसँ बेसी) जीबैक संभावना रहिते अछि तँए जँ एक लोटा पानि ओकरा[4] जड़िमे जुड़शीतल पाबैन दिन पड़ौ वा नहि पड़ौ, ओइसँ ओकर कोनो हर्ख-विस्‍मय नहियेँ होइ छै मुदा तैयौ किसान अपन पाबनिक विधान, नइ पान तँ पानक डन्‍टियोसँ पुरबैक विचारानुकूल एक लोटा जलधार करिते अछि। ओना आइ जुड़शीतल पाबैन छी, तँए किसान परिवारमे आरो बेसी काज अछिए। काजक हिसाबे औझुका दिन[5] छोट पड़ि जाइए। किए तँ भोरे सुति उठि गाछी-कलम, बाड़ी-झाड़ीकेँ जुड़बैत–माने जलधार करैत–माल-जालकेँ नहौनाइ-धोनाइसँ लऽ कऽ घरक केबाड़, बक्‍सा-बुक्‍सीकेँ धोनाइक संग-संग ऑंगन-घरक रस्‍ता-पेरा जुड़ौनाइक संग पोखरिक घाट आ इनारकेँ सेहो उराहब रहिते अछि। तैसंग चैतक रान्‍हल बैशाखमे खा कऽ पुरौनाइ सेहो अछिए। तेतबे किए, समाजक संग महादेव-पार्वतीक नाच, ‘जय शिव-जय शिव’ करैत सौंसे गाम घुमनाइ सेहो अछिए। एते तँ एक उखड़ाहाक–माने दुपहरसँ पहिनुक–भेल, दोसर उखड़ाहाक तँ पछुआएले अछि जेकरा सॉंझ धरि पुरबैक अछि। ई तँ भेल पहिल प्रकरण, दोसर प्रकरण तँ तेते नमहर अछि जे सॉंझ तक पुराएबो कठिन। ओ अछि किसानी जिनगीक उपद्रवी जानवरक शिकार सभकेँ गामक बोन-झाड़सँ रेबाड़ि-रेबाड़ि सीमा टपा-टपा भगाएब। तहूमे जँ सीमा टपबैकाल दोसर गामक शिकारीक संग भिड़ानी भऽ गेल तखन तँ आरो बेठेकान काज भऽ गेल। मुदा जे हुअए, जोगारी भाय मनमे ओही दिन रोपि लेलैन जे जहिया बॉंस रोपैक मुहूर्त बनत तहिया तीन कट्ठा बॉंस जरूर रोपब। ओना बॉंस रोपैक मुहूर्त जुड़ेशीतल पाबैन दिनटा नहि छी ओइसँ पहिने ओते दिन अछि जेते ओकर पछातिक अछि। दुनू कातक पलड़ामे दू परिस्‍थिति सेहो अछिए। एक दिस जँ पानिक (पटौनीक) खगता कम अछि तँ दोसर दिस पानिक खगता ओते बेसी अछि। यएह सोचि जोगारी भाय तँइ कऽ लेलैन जे जुड़शीतल पाबैन दिन किसानीक आन काज छोड़ि पाबैन मनबैत तीन कट्ठा बॉंस रोपब। बॉंस रोपब आकि बँसवारि लगाएब? मुदा अखन तँ ओ बॉंसे रोपब हएत, लगला पछाइत ने ओ बँसवारि हएत। जहिना कोनो वैचारिक संस्‍थाकेँ पहिने विचारमे आनल जाइए पछाइत नीब लेल जाइए। तहिना जोगारी भाय जिनगीक मूल खगताकेँ पहिने मनमे रोपि पूर्तिक विचार ठानि लेलैन। ओना, बीटमे[6] पुरान-सँ-पुरान पाकल-झुरुरक संग पकि-पकि सुखलो रहबे करैए मुदा वंश वृद्धिक लेल तँ ओहने ने रोपल जाएत जइमे कोंपरक ऑंखि होइ आ रोपला पछाइत ओ कोंपर दिअए। ओहन बॉंस तँ नहियेँ रोपल जाएत जेकर ऑंखिये भथा गेल होइ। पुरना बँसवारिसँ नवका–माने भौर परहक–बॉंस ठिकिया जोगारी भाय पहिनहि रखि नेने छला। चालीसटा बॉंस रोपब छैन, जेकरा बीटसँ उखाड़बोक छैन। नमगर-चौड़गर काज रहितो जोगारी भाइक मनसूबामे मिसियो भरि कमी नहियेँ छेलैन। एते बिसवास बनले छेलैन जे एकटा-एकटाकेँ उखाड़ि रोपलासँ बेसी समैक नोकसानी हएत तँए एक झोंकमे पहिने चालीसोटा उखाड़ि लेब आ दोसर झोंकमे रोपि, तेसर झोंकमे पटौनी करैत सबेर-सकाल घरपर आबि जाएब। सएह केलैन। आने खेती-बाड़ी जकॉं जोगारी भाइक बँसवारि सेहो नीक छैन्‍हें। पुरना बीटक बॉंस समाप्‍त होइत-होइत जोगारी भाइक नवका बीटक बॉंस शुरू भऽ गेलैन। किसानी जिनगीक तँ नगदी खेती बॉंस छीहे। तहूमे गाम-गाम बजार बनल अछिए। किछुए किसान उपजौनिहार छैथ मुदा खगता तँ सौंसे गाममे रहिते अछि। अखन तकक जिनगीमे जोगारी भायकेँ बॉंस सहयोगी पूजीक रूपमे संग दइते आबि रहल छेलैन। मुदा दिनो-दिन गमैया बजार टुटए लगल। किछु लोक ईंटाक घर बनौलैन तँए बॉंसक खगता कमल। मुदा तेतबे नहि ने भेल। बॉंसक दोसर जरूरत जे बरेब-बाड़ीमे होइ छल आ बरसाती तरकारीक मचानमे सेहो होइत छल। उहो कमि गेल। बॉंस लगौलाक पॉंचे बर्खक पछाइत जोगारी भायकेँ नीक बँसवारि बनि गेलैन। ओना बॉंसक बँसवारि हुअए आकि शीशोक शिशबोनी आकि आने गाछक गाछी लगबैक दिनमे लगौनिहारकेँ विशेष जिज्ञासा रहिते अछि मुदा किछुए लगौनिहार ओहन होइ छैथ जे धनबल बुझि ओकर धनि रखै छैथ, बल्‍कि अधिकतर ओहने लगौनिहार होइ छैथ जे एक-झोंकाह होइ छैथ। झोंकाहो कि कोनो एके रंगक अछि। सभ कथुमे, माने सभ काजमे सब रंगक झोंकाह होइते छैथ। जेना देखै छी जे किछु पढ़निहार अपनाकेँ पढ़ाइ दिस तेना झोंकि दइ छैथ जे या तँ दुनियॉंसँ हेरा जाइ छैथ वा दुनियेँ हेरा जाइ छैन। तहिना धन उपारजनमे सेहो किछु गोरे अपनाकेँ तेना झोंकि दइ छैथ जे या तँ भोगीए बनि जाइ छैथ जइसँ नीक-अधलाक विचारे मनसँ हेरा जाइ छैन वा जोगिये बनि जाइ छैथ जे जेतबे दिनमे खगता देखै छैथ ओतबे दिनमे उपारजनो करै छैथ। खाएर जेतए जे अछि मुदा जोगारी भायकेँ से नइ छेलैन। ओ बॉंसकेँ अपन उपयोगी वस्‍तु बुझैत किसानी जिनगीक नगदी पैदावार सेहो बुझै छैथ। बॉंस रोपलाक तीन सालक पछाइत, जहिना बाबाक अमलदारी अबैत-अबैत मृत्‍युक संभावना मनुखमे आबए लगैए तहिना बॉंसोक तँ अछिए। माने, पुरान बॉंसकेँ बीटसँ निकालब अनिवार्य भाइये जाइए, नहि तँ मनुखे जकॉं भऽ जाएत। माने ई जे जँ पैछलो पीढ़ी बाबा-परबाबा आ तोहूसँ ऊपरका बाबा सभ जँ परिवारमे जीविते रहता तँ ऐगला पीढ़ीक बाढ़िमे बाधा उपस्‍थित भाइये जाइए। तहिना बॉंसोक अछिए। तीन-चारि पीढ़ीक पछाइत जँ बीटसँ पैछला बॉंस निकालल नहि जाएत तँ ऐगला बॉंस प्रभावित होइते अछि। मुदा जोगारी भायकेँ अछैते आमदनी रहितो आमदनीमे खलल पसि गेलैन। खलल ई पैसलैन जे अपन परिवारमे जेते उपयोगक खगता छेलैन ओकर अतिरिक्‍त जे बिकरी-बट्टाक उत्‍पादित वस्‍तु छेलैन, ओइमे कमी एलैन। जइसँ अछैते धनबल रहितो जोगारी भाय धनहीन हुअ लगला। वस्‍तुक हिसाबसँ गाममे लेबाल कमए लगल। जइसँ समुचित लाभमे कमी एलैन। तेकर कारण जे किछु लोककेँ गामसँ बहरेनौं आ बरेब-बाड़ीक काज कमने बॉंसक खगता कमए लगल। दोसर दिस नव-नव योजनाक अन्‍तर्गत सेहो आ किछु लोक अपनो कमा-खटा कऽ पजेबाक घर बनबए लगला तइसँ घर-घरहटमे सेहो बॉंसक काज कमने बॉंसक बिकरीमे मन्‍दी एबे कएल जइसँ जोगारी भाय सेहो प्रभावित भेबे केलाह। चालीस बर्खक पछाइत जोगारी भाय दरबज्‍जापर बैस अपन किसानी जिनगीक समीक्षा कऽ रहला अछि। समीक्षा कए रहला अछि जे जिनगीक कोन लाभ बँचल अछि आ कोन हेरा गेल। तइमे सघन बँसवारिक की स्‍थिति अछि...। तही बीच पत्नी आबि बजली- “मन-तन गड़बड़ अछि जे मन्‍हुआएल देखै छी?” अपन बेथाकेँ छिपबैत जोगारी भाय बजला- “मन्‍हुआएल नइ छी भकुआएल छी। चाह पीलाक पछाइत मन फरहर भऽ जाएत।” पतिक चाहक बात सुनिते फुलकुमारी बजली- “चाहे बना कऽ तँ हम देखए आएल छेलौं जे दरबज्‍जापर छी की नहि।” ओना जोगारी भाइक मनमे पत्नीक बात सुनि कनी-मनी कुवाथ भेबे केलैन। कुवाथ ई भेलैन जे जखन हुनका मनमे शंका भेलैन जे दरबज्‍जापर छैथ की नहि, तखन ओ अनठेकानी चाहे किए बनौली! जँ हम दरबज्‍जापर नइ रहितौं तखन ओ चाह पानियेँ बनैत किने! मुदा लगले मनमे उठलैन, एक तँ हथियारक काटल घाव तैपर जँ नून छीटब तँ ओ बुड़िबकी छोड़ि आरो की हएत। एक तँ ओहिना घावक टीस अछि तैपर जँ नूनक मिस कऽ दिऐ तखन तँ ओ आरो टहकत किने। तइसँ नीक जे पोल्‍हाइए कऽ किए ने अपन मनक बेथा पत्नीकेँ सुना दिऐन। अर्द्धांगिनी छैथ जँ अदहो दरद हेरि लेलैन तँ अदहे ने बँचत, अदहा तँ कमबे करत...। यएह सोचि जोगारी भाय बजला- “शुभ काजमे जेते देरी करब ओते ओ अशुभ भेल, तँए पहिने चाह पिआउ।” हलशल-कलशल पतिक विचार सुनि फुलकुमारी मुस्‍की दैत चाह आनए ऑंगन गेली। दरबज्‍जापर सँ फुलकुमारीकेँ हटिते जोगारी भाइक मन फेर ओहिना बदरीहन हुअए लगलैन जेना सौन-भादोमे पुर्बाक लहकीपर मेघकेँ वादल पाबि होइए। मनमे पुन: उठि एलैन- अपन जिनगीक अमूल्‍य समए, श्रमशील समए ओहिना नष्‍ट भऽ जाएत..! अपन श्रमकेँ नष्‍ट होइते देखते जोगारी भाइक मनक विचार आगू बढ़लैन। आगू बढ़िते मनमे उठलैन- की बॉंसक एतबे उपयोग अछि जे अपन कठिन श्रम कएल पूजी नष्‍ट भऽ जाए? जोगारी भाइक मन ठमकलैन। ठमैकते मन आगू घुसकए लगलैन। जेते काज अखन तक बॉंसक हम सभ करैत एलौं अछि, ओ छेहा किसानी जिनगीक उपयोग केलौं अछि। मुदा जखन जिनगी आगू बढ़त तखन मशीनक जरूरत सेहो हेबे करत। दुनियॉंक दृश्‍य आइ ओहन भऽ गेल अछि जे जेकरा जेते अगुआएल मशीन छै ओ ओते शक्‍ति सम्‍पन्न देश बनल अछि। बॉंसेक तँ अनेको उपयोगी वस्‍तु–कागज, कपड़ा इत्‍यादि–बनिते अछि जेकर उपयोग आइये नहि, आगुओ होइते रहत। मुदा बॉंसक उत्‍पादन तँ मात्र ओत्तैटा नहि हएत जेतए अनुकूल वातावरण छइ। माने बॉंस उपजैक समुचित भूमि आ समुचित मौसम जेतए छइ, कम-सँ-कम कपड़ा आ कागजक खगता तँ सभ जगह छइहे...। तही बीच फुलकुमारी चाह नेने दरबज्‍जापर आबि गेलखिन। पत्नीक हाथमे चाहक गिलास देखते जोगारी भाइक मनमे विचारक चाह सेहो जगि चुकल छेलैन। ओना विचारक गंभीर वन–वनक सघन रूप–मे जोगारी भाइक मन तेना सघन हुअ लगल छेलैन जे पत्नीक हाथक चाहपर नजैर ओइ रूपे पड़बे ने केलैन जेहेन मन बनौने फुलकुमारी चाह नेने आएल छेली। मुदा तैयो पत्नीक हाथसँ चाह लैत जोगारी भाय ऑंखि-पर-ऑंखि जरूर फेड़लैन। ऑंखि-पर-ऑंखि पड़िते फुलकुमारी बजली- “बड़ीकालक बनौल चाह छी, देखियौ जे सुआदमे ने ते बाइसपन आएल अछि।” पत्नीक बात सुनि जोगारी भाइक मुहसँ बहरेलैन- “बाइसपन आबह कि तेइसपन, चाह तँ चाह छी।” ओना, जोगारी भाइक विचार फुलकुमारी नीक जकाँ नहि बुझली मुदा अपन हाथक बनौल चाहक प्रशंसा तँ सुनबे केलीह। प्रशंसा सुनि फुलकुमारी ऑंगन दिस मुड़ैत बजली- “ताबे अहॉं चाह पीबू, लगले हम आँगनसँ अबै छी।” तैबीच दू घोंट चाह जोगारी भाय पीब नेने छला, मनमे संतुष्‍टिक तुष्‍टि पनैप गेले छेलैन तँए मुस्‍कुराइत बजला- “ऑंगनसँ ओहिना किए आएब, चाह पीने आएब।” ओना पतिक विचारसँ फुलकुमारीकेँ मिसियो भरि कुवाथ नइ भेलैन, किएक तँ जे बात झॉंपन दऽ बाजल छेली ओ पति उघारि देलकैन, तेतबे ने। से तँ सभ जनिते अछि जे पति-पत्नीक बीच हुअए वा आन छोट-पैघक बीच, मुदा किछु विचार तँ ओहन होइते अछि जे लोक झॉंपन-तोपन दऽ कऽ बजैए। चाह पीब पान खाइते जोगारी भाइक मनमे धक्का जकॉं लगलैन। धक्का लगिते मन धड़कए लगलैन। धड़कए ई लगलैन जे आइये नहि, सभ दिन मिथिलांचलक अनमोल उपयोगी वस्‍तु बॉंस रहल, जे अनुकूल वातावरण पेब अदौसँ फुलाइत-फड़ैत रहल अछि। हजारो बीघाक कृषि पैदावार रहल अछि। जे ग्रामीण उपयोगिता कमिते बीटक बीट बॉंस सुखि-सुखि नष्‍ट भऽ रहल अछि। दुर्भाग्‍य तँ मिथिलांचलक रहबे कएल जे बुधिक शीर्षपर बसैबला मिथिलावासी अपनो नीक-बेजा बुझैले अखनो तैयार नहियेँ छैथ। आइ जँ गामक वस्‍तु सभ जे अनुपयोगी भेल जा रहल अछि, ओकर जँ समुचित उपयोग होइत तँ कि जएह मिथिला बुझै छी सहए रहैत..? एन.एच. सतावन बनल। जइसँ सभ गाम तँ नहि मुदा मिथिलांचलक बहुतो गामक सम्‍पर्क सूत्र देशक आन-आन भागसँ बनल। गाड़ी-सवारीक सुविधा बढ़ल। पैघ-पैघ वेपारीक नजैर बॉंसपर पड़ल। लोकोकेँ माने बॉंस उपजौनिहारोकेँ गाड़ाक घेघ बॉंस बनिये गेल अछि। पड़ाएल चोरक किदैन नफा, एहने मनोभाव लोककेँ उदय भेल। मजबूरीक भरपूर लाभ उद्योगपतिकेँ उठबैक अवसर भेटल। अपन जिनगीक संग जोगारी भाय समाजोक जिनगी देख रहला अछि। चालीस बर्ख पूर्वक रोपल सघन बँसवारि–माने नीक लाभक–देख जोगारी भाइक मन पाछू दिस भागि रहल छैन। साइयो बीघाक डुमैत समाजक सम्‍पैत देख जोगारी भाइक मनक विचार हहैर-हहैर अलिसाएल फूल जकॉं झड़ि-झड़ि खसि रहल छैन। मुदा उपाइये की?तही बीच लक्ष्‍मीनाथ एकटा वेपारीक संग पहुँचल। अनभुआर बेकतीकेँ देख जोगारी भाय लक्ष्‍मीनाथकेँ पुछलखिन- “हिनका नइ चिन्‍हलयैन?” ओना वेपारी चुपे रहला मुदा लक्ष्‍मीनाथ बाजल- “काका, ई बॉंसक वेपारी छैथ। गाममे जेते बॉंस अछि, सभटा कीन लेता।” ‘गामक जेते बॉंस अछि, सभटा कीन लेता।’ सुनि जोगारी भाइक मनमे खुशीक लहैर उठलैन। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे करोड़ोक सम्‍पैत बॉंस गाममे अछि,अखन तक जे बॉंसक विकरीक दर रहल अछि, ओइ दरे कीनता आकि..? मुदा अपन विचारकेँ मनेमे दाबि जोगारी भाय बजला- “ई तँ नीक बात भेल जे जे सम्‍पैत नष्‍ट भऽ रहल अछि ओकर उपयोग हएत।” अपन बात रखैत लक्ष्‍मीनाथ बजला- “काका, हिनकर कहब छैन जे सुखाएल आ खिच्‍चा बॉंस छोड़ि हरदर सभ एक रेटमे कीन लेब।” लक्ष्‍मीनाथक बात सुनि जोगारी भाइक मनमे उठलैन जे अनेको किस्‍मक बॉंस गाममे अछि, जे साइजो आ गुणेमे अनेक रंगक अछि, तखन एक दर केना हएत?विचारकेँ बहकबैत बजला- “टके सर भाजी, टके सेर खाजा।” मुस्‍कुराइत लक्ष्‍मीनाथ बाजल- “हँ, से सहए बुझू।” जोगारी भाय वेपारीकेँ पुछलखिन- “अहॉं केतए रहै छी?” जहिना मैथिलीमे जोगारी भाय पुछलखिन तहिना मैथिलियेमे वेपारी सेहो उत्तर देलकैन- “हमर घर सकरी अछि। असल वेपारी दिल्‍लीक छैथ।” जोगारी भाय- “अहॉंकेँ पार्टनरशिप अछि आकि..?” वेपारी बाजल- “नइ, पार्टनरशिप केना हएत। ओ–माने उद्योगपति–बहुत पैघ कारोबारी छैथ। हम एकटा अदना आदमी छी, तैबीच पार्टनरशिप केना हएत।” जोगारी भाय पुछलखिन- “तखन अहॉं?” वेपारी बाजल- “ट्रकक हिसाबसँ कमीशन भेटैए।” जोगारी भाय- “गामक सभ बॉंस कीन लेब?” वेपारी- “गामे किए, इलाकाक सभ कीना जाएत। हमरा सन-सन साइयो गोरे कमीशनपर काज कए रहला अछि।” जोगारी भाय- “की रेटमे बाँस कीनै छी?” वेपारी- “ओना, जे रोड साइड माने एन.एच.क बगलमे अछि ओकर दर अस्‍सी रूपैआ–एक बॉंसक–अछि। मुदा जे जेते हटि कऽ अछि, ओकर दर ओते कम होइत जाइए।” अपन गामक हिसाब अन्‍दाजि मने-मन जोगारी भाय जोड़लैन तँ बुझि पड़लैन जे जे बॉंस दू साए रूपैये बीकैए ओ सत्तैर-पचहत्तैर रूपैये भेल, अढ़ाइ-बड़ कम! मुदा दोसर उपाइयो तँ नहियेँ अछि। साले-साल सुखि-सुखि नष्‍ट होइत जाइए...। जोगारी भाय बजला- “मिथिलांचलक संस्‍कार रहल अछि जे जे दरबज्‍जापर आबि जाथि हुनकर मन दुखा कऽ विदा नइ करिऐन। तहूमे अहॉं ने पड़ोसी छी मुदा असल जे कारोबारी छैथ ओ तँ हजार कोस दूरक छथिये। केना कऽ मन दुखेबैन। जेते बॉंस अछि ओइमे एकटा बीटक अपना-ले रखि लेब, बाँकी सभ दऽ देब।” वेपारीक संग लक्ष्‍मीनाथ सेहो उठि कऽ विदा भेल। जहिना अभावीकेँ करजो रूपैआ हाथमे एने क्षणिक खुशी होइते छै तहिना जोगारी भायकेँ सेहो भेलैन। तही बीच फुलकुमारी दरबज्‍जापर पहुँचली। हड्डी चुसैत कुत्ता जहिना अपने मुँहक खूनक सुआदसँ मन तृप्‍ति करैत तिरपित होइए, तहिना जोगारी भायकेँ भेलैन। पत्नीकेँ कहलखिन- “गाड़ाक उतरी उतरल।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2523, तिथि : 29 जून 2017 गुणहीन जेठ मासक पूर्णिमा दिन। किछु दिन पहिने बैरसाइतिक आगूक दशराहा सेहो भऽ गेल। अपन-अपन मनकमना पूर होइ लेल डिहवारक स्‍थानमे रेमन्‍त सजल घोड़ा चढ़ा गामक लोक निश्‍चिन्‍त सेहो भाइये गेल छल। हथिया नक्षत्रक पछाइत एको बून बरखाक पानि तँ धरतीकेँ नसीब नहि भेल मुदा जाड़क शीतलहरी अपन रूपमे बेइमानी नइ केलक। तँए ध-ध धधकैत धरतीक छाती खेतक दरारि जकॉं फटि-फटि छहोँछीत भाइये गेल अछि। मौसमक रूखि देख जीवानन काका पाँच कट्ठामे सजमैनक खेती सरस्‍वती पूजासँ तीन दिन पहिने केलैन। ओना खेती करैक हिसाब जोते-कोर लगसँ शुरू भऽ जाइए मुदा मूलत: किसान खेतीक हिसाबसँ ऊपर उठा जोत-कोरक हिसाबमे रखने छैथ आ खेतमे बीज रोपनसँ खेतीक हिसाब शुरू करै छैथ। अही हिसाबे जीवानन काका सजमैनक बीआ पॉंच कट्ठा खेतमे रोपि लेलैन। गाछो नीक जनमलैन। बरखा नइ भेने शीतो-पल्‍लाक रूप बदैल गेल तँए ओते प्रभावित सजमैनक गाछ नहि भेल माने एकोटा गाछ कोंकरियाएल नहि, सोलहन्नी कलशल फुदकल गाछ भेल। अपन खेतीक पहिल सीढ़ीक काज देख जीवानन काका मने-मन हिसाब लगबैथ जे ढकिऔल खेत अछि,तैपर समुचित रसायनिक खाद सेहो देल अछि। तेतबे नहि, नीमक गाछक बीआक संग रसायनिक कीटनाशक दबाइ सेहो दइये देने छिऐ। तँए ने जड़िकेँ काटैक आ ने धड़-पातकेँ चाटैक संभावना अछि। जेना-जेना जाड़क दिन कमैत गेल तेना-तेना सजमैनक गाछमे उर्ज शक्‍ति अबैत गेल जइसँ समयानुसार लत्ती सुंघियाइत-मुड़ीयाइत आगू रमकल। महिना नइ बीतल मुदा फूलक कोढ़ीसँ लत्ती कोढ़िया जरूर गेल। सॉंझ-भोर देखैक संग जीवानन काका घन्‍टा-दू-घन्‍टा काजो खेतमे करिते छला। पचीसम दिन बीत गेल, खेतक संग लत्तियोकेँ पानिक तृष्‍णा जगिये रहल छल। तैबीच जीवानन कक्काक मनमे उठलैन- बच्‍चाकेँ जँ समुचित सुपोषित अहार नइ भेटत तँ ओ रोगाह-टटाह हेबे करत। अपन किसानी जिनगीक पूर्णता अपना जनैत जीवानन काका केनहि छैथ। अपन खेत, अपन पानिक साधनक संग श्रमक लेल अपन शरीरो छैन्‍हें, तँए जिनगी जीबैक बिसवास मनमे छैन्‍हें। श्रमे ओहन चीज छी जे लोककेँ तुष्‍टि प्रदान करैत अछि से जीवानन काकामे छैन्‍हें। छबीसम दिन अपन बोरिंगसँ जीवानन काका सजमैनक खेत पटौलैन। एक तँ मौसमक मासुमी दोसर नीराएल धरती, अपना-अपना ओकातिये लत्ती जोर केलक। तैपर नीरेलाक तेसर दिन बेरुपहरमे यूरिया खाद सेहो छीटि देलखिन। तीसम दिन फूलो आ फूलकोढ़ियो तरेगन जकॉं सौंसे खेत भुक-भुक करए लगल। कचे-बचे जहिना बतिया तहिना फूलो सौंसे खेत जगमगा गेल। आइ पैंतालीसम दिन छी, जीवानन काका खेतसँ एकटा सजमैन काटि घरपर लऽ कऽ एला। अबिते पत्नीकेँ दरबज्‍जेपर सँ सोर पाड़ि बजला- “कनी एमहर आउ।” ओना, पतिक सोरसँ सुदामा काकीक देहक कम्‍पन्नमे मिसियो भरि तेजी नइ एलैन। नइ अबैक कारण छल जे एहेन सोर पाड़ब की कोनो एकदिना छी, ई तँ सभदिना छिहे। माने भेल हम दरबज्‍जापर आबि गेलौं। पतिक असथिर डेगे सुदामा काकी दरबज्‍जापर एली तँ पतिक हाथमे पोछल-पाछल, पुष्‍ट सजमैन देख बजली- “अहॉं अमृतक स्रष्‍टा छी!” पत्नीक आस भरल बिसवासु बात सुनि जीवानन कक्काक मन दहैल गेलैन। बजला- “नीक चास अछि, एहेन फलसँ खेत भरल अछि!” पतिक मुँहक ‘नीक चास’ सुनि सुदामा काकीक मनमे बिसवासक बास भेलैन। बिसवासक बास होइते मन कलैश कऽ बिहसलैन। बिहैसते बजली- “लक्ष्‍मी दहिन छैथ..!” पत्नीक मुहसँ ‘लक्ष्‍मी दहिन छैथ’ सुनि जीवानन कक्काक मनमे अपन लक्ष्‍य-भेदल श्रम उठलैन। उठिते श्रमशील गुणक आभास भेलैन। आभास होइते मन कहलकैन जे एहेन गुण लोकमे एके दिने थोड़े अबैए। तहूमे हमरा सन इलाकामे। जइ इलाकामे महिने-दू-महिनामे मौसम करबट बदलैए। हँ, किछु हद तक ओहन इलाकाक लेल मानलो जा सकैए जइमे बारहो मास एकरंगाहे मौसम रहैए। मुदा अपना इलाकामे तँ ऑंखियो मुइन देखब तँ बुझि पड़त जे एकटा रौदियाह समए भेल, दोसर दहार आ तेसर भेल दुनूक आड़ि मध्‍यमास; जइमे ने रौदी आ ने दाही होइए। जखने तीन रंगक मौसमसँ किसानकेँ भेँट हेतैन तखने ने बुझए पड़तैन जे रौदिक ताक केहेन हएत आ दहारक ताक केहेन हएत। जैठाम तीन-गुणिया मौसम अछि तैठाम तीन-गुणियासँ नअ-गुणियोँ आ बरह-गुणियोँ भाइये सकैए, तँए एक-गुणिया बुधिसँ थोड़े काज चलत। तहूमे जँ मात्र बाते-विचारक रहैत तँ कनी काल मानलो जा सकैए। मुदा जैठाम विचारकेँ काजमे ढारैक प्रश्‍न अछि ओ तँ जटिल अछिए। जटिलताक कारण खाली मौसमेटा थोड़े अछि। श्रमक ढंग सेहो अछिए ने। कियो तेजीसँ कोदारि-खुरपी चलबै छैथ तँ कियो मन्‍द गतिये, तँ कियो मधमन्‍द गतिये सेहो चलैबते छैथ, तैठाम एक-हरफी बाजब केते धरि उचित हएत...। बजला- “हँ, संयोग नीक अछि।” बजैक क्रममे जीवानन काका बाजि तँ गेला मुदा लगले अपन मन अपना विचारकेँ घेरैत कहलकैन- “जे काज अछि (माने सजमैनक खेती) तेकर तँ मात्र एक प्रकरण रोपै दिनसँ फड़ै दिन तकक भेल। दोसर प्रकरण भेल फलकेँ सुन्‍दर बनाएब आ तेसर प्रकरण भेल ओकर बिकरी। दू प्रकरण–फल बनाएब आ बिकरी–तँ अखन आगूमे बॉंकीए अछि; तखन जँ ‘नीक संयोग’ मानब सेहो उचित नहियेँ भेल आ जँ ऐगला दुनू प्रकरणमे कुसंजोग भऽ जाए? तखन तँ संजोग-कुसंजोगक बीचक बीच ने मानल जाएत। जँ से नहि हएत तखन तँ एक-दिसिये ने भेल?” मुदा मन मानि गेलैन जे पति-पत्नीक बीचेक ने बात छी। आन परिवार आकि आन टोल आकि आन गामक बात थोड़े छी जे लोक दुसत। परिवारेक बात छी सदिकाल गप-सप्‍प होइते अछि। जाबे धरि संजोग नीक रहत ताबे तक बाजब जे संजोग नीक अछि आ जखनसँ कुसंजोगक आगमन हएत तखनसँ नीककेँ अधला दिस खसैक बात बाजब! तइ बिच्‍चेमे सुदामा काकी टोकि देलकैन- “भगवानक नीक नजैर पड़लैन।” पत्नीक बात सुनि जीवानन कक्काक सोझराइत मन फेर ओझरा गेलैन। ओझरेलैन ई जे सभ किछु तँ अपने लुरिये-बुधिये केलौं तखन पत्नी किए बेइमानीक बात बाजि रहली अछि। मुदा लगले मन मानि गेलैन जे सोल्‍होअना हमरेटा-ले बेइमानीक बात थोड़े बजली अछि, आधा तँ अपनो हिस्‍सा ने हेतैन, तँए पचास पाइ तकक बेइमानी सहाज कएल जा सकैए...। पुछलखिन- “भगवानक नीक नजैर पड़लैन आकि अपन नीक नजैर पड़ल?” तैबीच सुदामा काकीक मन सजमैनक पोछल-पाछल रूपमे वौआ गेल छेलैन। वौआ ई गेल छेलैन जे जखन लोक अपन कएल अमृत फल भोजन करत तखने ने ओ राजा भेल। तहूमे लक्ष्‍मी भण्‍डारक पहिल फल छी...। तँए जीवानन कक्काक बात सुदामा काकी नीक जकाँ नइ बुझली। बजली- “आइ पहिल फल छी तँए तड़ुओ-तरकारी बनाएब आ भुजुओ।” ‘तड़ुआ-भुजुआ’ सुनि जीवानन कक्काक मनक विचार सेहो निच्‍चॉं उतरलैन। उतैरते बजला- “कमा कऽ हाथमे देलौं, आब अहॉं मालिक छी जे जेना बनाबी, तइले अनेरे पहिले किए जी भरछबै छी।” ‘जी भरछब’ सुनि सुदामा काकी बुझि गेली जे नीक मनक इच्‍छा छैन। मुदा एहेन इच्‍छा पुरबैले तँ ओहने ने कलाकारियो चाही। मुदा लगले मन बदैल गेलैन। बदैल ई गेलैन जे सजमैन सन सुकुमार तरकारी दोसर कोन अछि जे कमसँ कम संगीक संग चलैए। मात्र नून आ मिरचाइक संग चलैबला छी, जे आन थोड़े अछि। आनो की एके रंगक अछि, रंग-रंगक अछि। किछु एहेन अछि जेकरा भरि देह मसाला चाही तँ किछु एहेन अछि जेकरा पेटे भरि मसल्‍ला चाही आ किछु एहनो तँ अछिए जे मसल्‍लेमे डुमल रहैए। आइ जेठक पूर्णिमा छी। बैशाख-जेठक धुमसाही लगन चलल अछि, जइमे धुमसाही भोजो-भात तँ हेबे करत। जखने धुमसाही भोज-भात हएत तखने ने तीमन-तरकारीक खगता सेहो बेसी हएत। जखने तीमन-तरकारीक बेसी खगता हएत तखने ने ओकर मांग सेहो बढ़त। जखने कोनो वस्‍तुक मांग बेसी हएत तखने ओइ वस्‍तुमे महगाइ सेहो औत। जखने महगाइ औत तखने ने पैदाइसकेँ लाभक पैदाइस भेल! आठ बजे भिनसरे जीवानन काका चाह पीब खेत गेला। खेतमे सजमैन देख समोह लगि गेलैन। समोह ई लगलैन जे एहेन अनुकूल समए रहितो उपज नष्‍ट भऽ रहल अछि! खेतक पचीसो प्रतिशत सजमैनक बिकरी नइ भेल! खेतमे पथार लागल सजमैन जुआ-जुआ बुड़हा जकॉं गेल छल। जइसँ लत्तीक बढ़बारि सेहो ठमैक गेल आ लत्तीमे फड़ रहने फड़ब सेहो कमि गेल...। आड़िपर बैस जीवानन काका विचारए लगला जे एना किए भेल। सजमैन सन सुपरिचित वस्‍तु, जेकरा दुनियॉं जनैए जे ओ सुपाचक संग सगुणकारी सेहो अछि। घर-घरमे उपयोग होइते अछि। तेकर एहेन दिन केना भेल जे सभटा खेतेमे पड़ल जुआ कऽ नष्‍ट भऽ गेल? जीवानन काकाकेँ अपन काजक प्रति मनमे शंका भेलैन। शंका दू रंगक भेलैन। पहिल फलक–माने सजमैनक–आ दोसर भेलैन लोकक मांगक प्रति। सजमैन खाइक वस्‍तु छी, घर-घरक लोक खाइते छैथ तँए मांगक जे बजार अछि ओ समटल नहि, पसरल अछि...। तँए मांगक प्रति विचार जीवानन कक्काक मनमे पछुआ गेलैन आ फलक विचार अगुआ गेलैन। फलक विचार अगुआइक कारण ईहो भेलैन जे वस्‍तु चाहे ऐ जुगक हुअ आकि ओइ जुगक मुदा प्रतियोगिता हएत वस्‍तुएक बीच ने। तँए मनमे प्रवल आशंका भेलैन जे वस्‍तुए ने तँ अधला भऽ गेल..! अधला वस्‍तुक विचार मनमे जगिते जीवानन काका आड़िपर सँ उठि खेतमे धँसला। खेतक पहिल गाछक लत्तीपर नजैर देलैन। पॉंचटा फल सिरगर बाँकी लत्तीक ऐगला फल टेंटी-टापर। पहिल गाछक फल देख जीवानन काका हिया कऽ खेत दिस तकला। पाँच कट्ठामे खेती अछि डेढ़ साए गाछ रोपने छी, एकटा गाछमे पाँचटा सिरगर फल भेल। डेढ़ साए गाछमे साढ़े सात साए भेल, जँ दसो रूपैये बिकाएत तँ पचहत्तैर साए ओहिना भेल। पाँच कट्ठामे पचहत्तैर साए कम नइ भेल। किएक तँ अपना ऐठामक जे जमीन रोगसँ रोगग्रस्‍त भऽ गेल अछि, तइ सिखालसँ। ओना, जँ ओही सजमैनक बीच जे बीआ अछि जँ ओकरा बीज रूपमे पैदा कएल जाएत तँ ओ लाखोक हएत। एक रूपैआसँ लऽ कऽ तीन रूपैआ तकक प्रति बीआक दाम बजारमे अछि। मुदा ऐठाम बीआ बनबैक बात नहि, तरकारीक बात अछि, सजमैनक उपजाक अछि। पचहत्तैर साए रूपैआक हिसाब जीवानन कक्काक मनमे अबिते दोसर विचार कुदि पड़लैन। कुदि ई पड़लैन जे जेकरा गरमा फसिल कहै छिऐ ई तँ मात्र ओ भेल, बाँकी बरसात आ जाड़ बँचले अछि। जखन एक मौसममे पनरह साए रूपैआ एक कट्ठाक उपज भेल तखन बीघाक भेल तीस हजार। तीन मौसमक माने भेल नब्‍बे हजार। नब्‍बे हजारक उपज जँ एक बीघाक हएत तखन ने खेतीक आगू बढ़बारि हएत। दस-बीस बीघा खेतबला सभ शहरक सड़कपर घुमि रहला अछि। ओना, अपन सजमैनक परिस्‍थिति आ गाम-समाजक बीचक जे हवा बनि गेल अछि ओइ हवामे जीवानन कक्काक मन छहराए लगलैन। छहराइत-छहराइत मन तेना थीर भऽ गेलैन जे कोनो बेचैनी मनमे रहबे ने केलैन। पाछू उनैट कऽ ताकिते जीवानन काकाकेँ मन पड़लैन अखन तक जलखैइयो ने केने छी। अनेरे कोन लाभ-हानिक झमेलमे मनकेँ वौऐने छी। मन समगम भेलैन। समगम भेल जीवानन काका घर दिस विदा भेला। ओना, मनमे रहि-रहि कऽ सजमैनक बेथाक टीस मारबे करैत रहैन मुदा जहिना बेथाक टीस तहिना पेटक टीस सेहो रहबे करैन। ओना विचारसँ जीवानन काका अपन मनकेँ बेर-बेर संतोख दैत रहथिन जे मनुख कर्मक भागी छी, जेना गीतो कहैए। अपन कर्ममे केतौ चूक कहाँ देखै छी, जँ कर्ममे चूक रहैत तँ एहेन उपज केना भेल? मुदा उपज भेलो पछाइत जँ समुचित लाभ नइ भेल तइमे केतए दोष अछि..? जखन बजार दिस तकैथ तँ अनुकूले-अनुकूल बुझि पड़ैन। माने ई जे तेहेन लगन-पाती भेल अछि जे मांगे-मांग होइत, से नहि भेल। तँए जीवानन कक्काक मनक सुरखीमे मलिनताक तमस आबिये जाइन। दरबज्‍जापर अबिते पत्नीपर नजैर पड़लैन। जलखैइक बेर उनहल देख सुदामा काकी बेर-बेर दरबज्‍जापर आबि-आबि देखैत रहथिन जे एला की नहि। जहिना जीवानन कक्काक नजैर सुदामा काकीपर पड़लैन तहिना सुदामा काकीक नजैर सेहो जीवानन काकापर पड़लैन। नजैर पड़िते सुदामा काकी चेहराक सुरखीसँ ऑंकि लेलैन जे मनमे कोनो-ने-कोनो कुवाथ जरूर छैन। मुदा किछु पुछैसँ पहिने नीक हएत जे जलखैक चर्चा करी। सुदामा काकी बजली- “कोन मुलुक चलि गेल छेलौं जे जलखैयो तियागि देलिऐ?” ओहन लोक जकाँ तँ जीवानन काका नहियेँ छैथ जे प्रश्‍न आगूमे किछु औत आ तमसेलहा मने वा वौएलहा मने जवाब किछु देब। आगूमे जलखैक प्रश्‍न छेलैन तँए मनक सभ ओझरीकेँ बैगमे रखैत बजला- “कोनो आन मुलुक थोड़े गेल छेलौं, छेलौं ते अपने मुलुकमे, मुदा...।” ‘मुदा’ कहि जीवानन काका तेना ठमैक गेला जेना दुखे बकार बन्न भऽ गेलैन। तेकर कारण छल जे मनमे उठि गेलैन- पत्नी तँ हमरे आश्रित छैथ, मुदा आशक तँ बाटे कटिया गेल तखन तोष-भरोसक बात की कहबैन? जीवानन कक्काक मनक मलिनता आरो बढ़ैत गेलैन जे सुदामा काकी बदलैत रूपकेँ सेहो आँकि रहल छेली। ओना, मने-मन ईहो उठि रहल छेलैन जे पीड़ितकेँ बेपीड़ित बात पुछबो ओतेकाल नीक नहि जेतेकाल पीड़ित अपन पीड़ाकेँ प्रसुति नइ करै छैथ। तँए अपन पत्नीत्‍वक विचार करैत सुदामा काकी बजली- “कहू! जलखैक बेर उनैह गेल, भूखे-पियासे मन सेहो बेपीड़ित भऽ विपरीत भऽ गेल हएत। पहिने अन-जल कऽ लिअ। पछाइत दुनियाँ-दारी दिस देखब।” पत्नीक विचार जीवानन काकाकेँ प्रभावित केलकैन। हाथ-पएर धोइले कल दिस बढ़ला। हाथ-पएर धोइ कऽ ऑंगन अबिते पत्नीक आकर्षक[7] आन दिनसँ किछु बेसी बुझि पड़ैलैन। मुदा जीवानन कक्काक अपन हेम-छेमक कटाएल रस्‍ता मनकेँ उठैये ने दैत रहैन। बेर-बेर मनमे उठि जाइत रहैन जे अपन हारल जिनगीक बात केना कहबैन? अपन टुटैत जिनगी देख अनेरे मन तीताइन भऽ जेतैन..! तँए अपन मनक बेथाकेँ जीवानन काका अपना मनेमे मुड़िया-मुड़िया मोड़ि-मोड़ि रखए चाहैथ। जहिना तबधल लोककेँ सरोवरमे पएर पड़िते जलन-तपनक बीच संघर्ष उठि जाइए, जड़ाएल लोककेँ आगि भेटिते तपन-जलन हुअ लगै छै तहिना आधासँ अधिक जीवानन काकाकेँ भोजन केला पछाइत सुदामा काकीकेँ हुअ लगलैन। मन मानए लगलैन जे आब जिनगीक लीलाकेँ आगू बढ़ौल जा सकैए। बजली- “सजमैनक खेतक की हाल अछि?” पत्नीक बात सुनि जीवानन काकाकेँ ओहिना मनमे भेलैन जहिना कोनो परदेशी अपन पत्नीक अनेको मनकामना लऽ परदेश जाइए आ कमेला पछाइत जखन गाम घुमैए आ रस्‍तेमे सभ कमेलहा या तँ कटि जाइ छै वा छीना जाइ छइ...। ओना, मनमे ईहो उठैत रहैन जे गीतामे कर्मक आगू फल अही दुआरे कृष्‍ण छिपा कऽ रखला जे कर्ता स्‍वयं अपन बूझत..! जीवानन काका बजला- “हाल की रहत, बेहाल अछि!” पतिक ‘बेहाल’ सुनिते सुदामा काकी चौंकली। चौंकली ई जे जँ पतिक हाल-बेहाल तँ पत्नीक हाल केना सुहाल बनि सकैए? मुदा की बेहाल, से तँ सुनला पछातिये ने बुझब। पुछलखिन- “की बेहाल अछि?” पत्नीक पुछबसँ जीवानन कक्काक मनक धुकधुकी तेज हुअ लगलैन। धुकधुकाइत मने बजला- “पहिने असथिर से जलखै करए दिअ, पछाइत दरबज्‍जापर बैस सभ किछु नीक जकाँ कहब।” ‘सभ किछु पछाइत’ सुनि सुदामा काकीक मनमे सेहो धुकधुकी उठि गेलैन। मनमे उठलैन- सभ किछुक माने एकेटा बात नहि, अनेको भेल! जखने अनेको विचार वा अनेको समस्‍यासँ लोक घेरा जाइए तखने ने ओ बेबस हुअ लगैए। जखने कियो बेबस भेल तखने ओकर स्‍वच्‍छन्‍दता मेटा लगै छै, जे मृत्‍युक कगार तक पहुँचबैए..! मुदा बजली किछु ने। मनमे बेर-बेर घुरिया लगलैन जे मनुष्‍य जँ चिड़ै जकाँ स्‍वच्‍छन्‍द भऽ अकासमे नइ उड़ि सकल तँ ओकर जिनगीए की आ जीवने की? मुदा चुप ऐ दुआरे भऽ जाथि जे जेते मने-मन खोद-वेद करैथ तेते ओझरियाइये जाइथ। एक तँ अपना मने बेथित छैथे आ तैपर हमहूँ ऊपरसँ लादि दिऐन, ई सेहो केहेन हएत? तँए सुदामा काकी सहमल रहली...। जलखै केला पछाइत जीवानन काका हाथ-मुँह धोइ, लोटा रखि दरबज्‍जाक चौकीपर बैस पत्नीकेँ सोर पाड़ैत बजला- “कनी एमहर आउ।” सुदामा काकी बुझि गेली जे पति-पत्नीक बीचक खेल यएह ने छी जे जखन पति पीड़ित रहैथ तखन हुनका उतपीड़ी-ले सुपीड़ी बनि नइ पूजब तखन पतिक पत्नीए की। तहिना पत्नीक बेपीड़ित अवस्‍था सेहो छी। मुदा बेपीड़ितक सेहो दू अवस्‍था अछि, नमहर-ले छोटक तियाग आ छोट-ले नमहरकेँ धकियाएब। मुदा ई विचारणीय विषय अछि जे पति-पत्नीक स्‍तरमे एकत्‍व भेला पछाइत होइ छइ। मुदा तइमे भारी खाधि अछिए, माने छीपा-पनार अछिए। अपन नव चेहराक छम-छमी बनबैत सुदामा काकी छमैक कऽ आगूमे ठाढ़ होइत बजली- “भगवान केकरो ऊपर दहिन छैथ तँ अपनो दुनू परानीपर छैथ।” पत्नीक बात जीवानन कक्काक कानमे पड़िते ठेकी जकाँ बैस अपन मनक बातकेँ ठेकिया देलकैन। ठेकियाइते बजला- “से की?” पतिक प्रश्‍न सुनि सुदामा काकीक मनमे भलैन जे आब छोर पकड़ा गेल! बजली- “ओछाइनपर भोरे यएह ठिकियबै छेलौं जे अपना सभसँ बेसी उमेरक लोक केते बँचल छैथ आ अपन संगी-साथी केते दुनियाँ छोड़ि देलैन।” सुदामा काकीक बात सुनि जीवानन काका आरो भँसियाए लगला। भँसियाइत बजला- “नाओं मन अछि?” सुदामा काकी बजली- “ए-गो-आध-गो रहैत तहन ने, से तँ दर्जन-सोड़ेमे अछि।” “दर्जन-सोड़ेक ठेकान अछि?” -जिज्ञासू चिड़ै जकाँ जीवानन काका बाजि कऽ मुँह खोलनहि रहला। मुस्‍की दैत सुदामा काकी बजली- “जहिना अज्ञानी औरत अपन श्रमसँ गाए पोसि दूध उपजबै छैथ आ पौए-पौए बेच घरक देवालपर डाँरि घीच-घीच अपन हिसाब जोड़ै छैथ तहिना मनक डायरीमे हमहूँ लिख कऽ रखने छी।” आरो जिज्ञासु भऽ जीवानन काका बजला- “मुँह जवानियेँ कनी सुना दिअ जे अपनो ठेकान करब।” सुदामा काकी बजली- “बेसी उमेरक तँ दर्जन-सोड़ेमे नइ छैथ, मुदा गाही-गण्‍डामे जरूर छैथ।” जीवानन काका आरो उताहुल होइत बजला- “संगी-साथी?” सुदामा काकी बजली- “संगी-साथीक तँ दुनियेँ छी मुदा ओ हिसाब दर्जन-सोड़ेमे नइ कएल जा सकै छै, मुदा ओकर अनुपातिक हिसाब तँ अछिए।” उत्तेजित होइत जीवानन काका बजला- “सएह सुनाउ?” अपन गुरुत्‍वक भार सम्‍हारैत सुदामा काकी बजली- “अनकर पाछू अनेरे केते वौआएब, अपन पछुआकेँ पछुआउ।” धारक धारामे भँसियाइत कतियाइत-कतियाइत जहिना कोनो चीज किनछैर लगैत तहिना जीवानन कक्काक भँसियाएल मन किनछैर लगलैन। बजला- “तीन मासक जिनगी हलेल गेल।” पतिक बात सुदामा काकी नीक जकाँ नहि बुझि पेली। तँए बुझैक रस्‍ता पकैड़ बजली- “से की?” पत्नीक ‘से की’ सुनि जीवानन कक्काक मनक झाँपल परदा हटलैन। हटिते पत्नी दिस नजैर उठौलैन। नजैर ठठिते मनमे बिसवास जगलैन जे अखन केहनो नीकसँ नीक आ अधलासँ अधला बात पचबै-जोकर मन खन्‍हाएल छैन। समगम होइत कहलखिन- “सजमैनक खेती डुमि गेल!” ‘सजमैनक खेती डुमि गेल’ सुनिते सुदामा काकीक बिसवासू मन एकाएक विस-विसाइन हुअ लगलैन। ओना, बहुत विस-विसाइन नइ भेल छेलैन मुदा जीवानन कक्काक आँकमे चलि एलैन। दोहरबैत बजला- “बहुत आशासँ खेती केने छेलौं, मुदा तैपर पानि पड़ि गेल!” पतिक बात सुनि सुदामा काकीक मन ऊपरसँ निच्‍चा उतरलैन। उतरैक कारण भेलैन जे कहाँ मन डुमि रहल छेलैन आ कहाँ लगले पानियेँटा फेड़ेलैन, जे बुझै छेलौं से बात नइ अछि। तइसँ कम अछि। मुदा केते कम अछि आ केते कम भेल से तँ बिना खोंचारे नइ बुझब...। खोंचार चलबैत बजली- “से की? कोनो ठेकनगर बात लगिते ने अछि।” पत्नीक विचार सुनि जीवानन कक्काक मन पोखैरक पानि जकाँ असथिर भेलैन। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे जिनगी तँ धारा छी, ई पोखैरक पानि जकाँ असथिर केना भऽ सकैए। जिनगी तँ गतिशील अछि। गतिये-गति चलैए। वएह गतिमे ने कुगतिक संभावना बढ़ि गेल अछि। मुदा ई बात पत्नी कोन रूपे बुझती..? अपन मजबूरी देखबैत जीवानन काका बजला- “यएह ने नीक जकाँ नहि बुझि पेब रहल छी जे गुणशील गुणहीन केना भऽ गेल।” ओना सुदामा काकीक वौद्धिक स्‍तरसँ जीवानन काका वाकिफ छैथ, मुदा भ्रम जालमे भ्रमित करैले अपन सीमापर सँ बाजि रहल छला। तैबीच सुदामा काकी बजली- “जखन अहीं नइ बुझि पेब रहलौं अछि, तखन हमरा केना पतियाएब?” पत्नीक बातसँ जीवानन कक्काक मनमे सवुर जगलैन। बजला- “आब तँ चाहो-पानमे कटौती करए पड़त!” एक तँ चाह-पान सन अदना वौस, तैपर सँ ओहूमे कटौती हएत तखन आरो जे नमहर-नमहर काज छैन से केना चलत? सुदामा काकीक आँखिमे चिन्‍तनक मजगूत रेख उतैर गेलैन। आँखि कड़ुआए लगलैन। बजली- “तखन?” ‘तखन’ सुनिते जीवानन काका बुझि गेला जे समाधानक बाट पत्नी जोहि रहली अछि, तँए निर्णय रूपमे नहि तात्त्‍विक विवेचन रूममे जेते नीक जकाँ बुझेबैन तेते नीक जकाँ बुझती आ जेते नीक जकाँ बुझती तेते परिवार आ परिवारजनकेँ आदर करती। किएक तँ एतेक सीमा दुनू गोरेक बीच बन्‍हले ने अछि जे पति हमहीं रहबैन आ पत्नी वएह रहती, तैबीच जँ कनी नोनगर आकि अनोन भऽ गेल तँ जिनगीक लेल ओ छोट-क्षीण बात भेल किने। अपन स्‍तरसँ (वैचारिक नहि भाषायी) उतैर जीवानन काका बजला- “अखैन तक हमहूँ आ भरिसक अहूँ यएह ने बुझै छिऐ जे सजमैन गुणकारी तरकारी छी, तँए अदौसँ खान-पानक चलैनमे अछि, मुदा भोज-काजमे सजमैनक मांग कम भऽ रहल अछि। माने भोज्‍य विन्‍याससँ कतिया रहल अछि जइसँ मांग कमि गेल अछि।” परती खेतमे ताम-कोरक पछाइत जहिना कोनो फसिल लहलहा उठैए तहिना सुदामा काकीकेँ सेहो भेलैन। अपन हाथ देखबैत बजली- “केते भोज-काजमे सजमैनक तरकारी ऐ हाथे बनौने छी तेकर ठेकान नहि। मुदा ऐ साल जे पाँच-सात गो भोज खेलौं, तइमे केतौ ने सजमैनक दर्शन भेल!” पत्नीक विचार सुनि जीवानन काका तोषपूर्ण शब्‍दमे बजला- “अखन जीवित छी तँए जीबे करब मुदा जिनगी भरि जेकरा (माने सजमैनकेँ) नीक बुझैत एलौं ओ एना अधला किए बनि गेल। की ओकर गुणशक्ति कमि गेल आकि खेबैयाक मनक चस्‍की बढ़ि गेल?” पतिक विचार सुनि सुदामा काकीक मन सहैट कऽ सहैम गेलैन। पत्नीक रूपमे अपनाकेँ देखैत बजली- “जखन संगे जीवन-मरण अछि तखन हवा-बिहाड़िक डर करब तँ जीब पएब।” मुस्‍की दैत जीवानन काका बजला- “सएह कहलौं...।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 3134, तिथि : 6 जुलाइ 2017 [1] दियर-भौजाइक [2] नमी [3] गहराइ [4] नमहर गाछक जड़िमे [5] पाबनिक दिन [6] बॉंसक बीटमे [7] जलखैक हेम-छेम ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख नवका पोखैर “हर-हर महादेव। जानह हे महादेव! हमरा मोनमे किछु छ: पाँच नहि अछि। तूँहीं जानह हे महादेव..!” “अहाँकेँ जे बुझाए मुदा हम तँ अपना भरि सभकेँ सभ दिन केलिऐ...।” “आ हम केकरा नहि केलिऐ..?” पंचमुखी महादेवपर जल ढारैतकाल महिला सभ आपसमे अहिना चिरौरी करैत रहै छेली...। एक हाथ महादेवक निमोलपर आ दोसर हाथे जल ढारि रहल महिला सभ बीच-बीचमे मौका पबिते फदका पढ़ए लगैथ। जे कियो आएल, महादेवक ऊपरसँ जल ढारलक। जाड़ होइ आकि गरमी, सभ मौसम जलढरी अनवरत चलैत रहै छल। रच्‍छ छल जे दुपहरियामे ई भीड़ कम भऽ जाइत रहै जइसँ महादेव चैनक अनुभव करैत हेता। कम-सँ-कम घरेलू तथा परिवारिक झमेल सभ सुनबासँ तँ मुक्‍ति होइते रहैन। चारि बजे भोरेसँ नवका पोखैरपर स्‍नानार्थी सभ तपकए लगैत छल। ओइमे नियमित पाँच गोटे टोलसँ अबैत छला जइमे तीन गोट महिला छेली। टाइमक सोलहन्नी पाबन्‍द रहैन। भोरे-भोर ‘हर-हर महादेव!’ किछु वृद्ध नवका पोखरिक कोणपर बसल परिवारमे सँ सेहो भोरे स्‍नान करएबला लोक सभमे शामिल रहिते छला। स्‍नान, ध्‍यान एवम्‍ आराधनाक संग महादेवक अनवरत जलढरी चलैत रहै छल, आ तैसंग गपाष्‍टक जे आनन्‍द छल, तेकर वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। कहि नहि, महादेवकेँ ई सभ केतेक पसिन्न पड़ैत हेतैन! खाएर.., मुदा लोक सभ तँ तृप्‍त लगिते छला। सभ अपना-आपमे मगन, सभ अपने-आपमे आनन्‍दित। नवका पोखैर ओइ समयमे हमर गामक नाक छल। मूलत: हमर पित्ती–स्‍व. वंगट मिश्र–ओइ स्‍थानक दिन-राति देख-देख करैत छला। नवका पोखरिक दच्‍छिनबरिया महारपर भगवान शिवक पंचमुखी मूर्तिबला मन्‍दिर छल। नवका पोखैर तथा ओइठामक मन्‍दिरक निर्माण हमर सबहक समस्‍त दियाद सभ मिलि कऽ केने रहैथ। मन्‍दिरक प्राण-प्रतिष्‍ठा हमर पितामह–स्‍व. श्रीशरण मिश्र–द्वारा भेल रहए। पोखरिक जाइठ पड़ैकालक खिस्‍सा सभ हम सभ बच्‍चामे सुनिऐ। ओइ समयमे पोखैर-इनार खुनाएब बहुत मान-मर्जाक बात बुझल जाइत छेलइ। ओना, गाममे पहिनेसँ कएटा पोखैर रहै, जइमे तीनटा पोखैर तँ हमरा सबहक टोलेमे बुझू। तेकर अलाबा कुट्टी लगक पोखैर सेहो एकटा। तथापि आरो पोखैर सुनौल गेल, तेकर तात्‍पर्य बुझल जा सकैत अछि...। नवका पोखैर प्राय: सभसँ बादमे बनल छल तँए ओकरा ‘नवका पोखैर’ कहल जाइत अछि। पोखरिक दच्‍छिनबरिया भीरपर मन्‍दिरक संग रंग-रंगक फूल सभ लगौल गेल छल। जेना- चम्‍पा, मालश्री, कामिनी, करबीर, अड़हुल इत्‍यादि। चम्‍पा, करबीर आ अड़हुलक बड़का-बड़का गाछ छल। सम्‍पूर्ण परिसरक सफाइ स्‍व. वंगट काका करैत छला। वंगट काका असगरे जीवन पर्यन्‍त ओइ काजकेँ पूर्ण भक्‍ति-भावसँ करैत रहला। कहियो थाकैथ नहि। निस्‍वार्थ, स्‍वान्‍त: सुखाय ऐ काजकेँ करैत ओ तत्‍कालिने समाजक नहि अपितु अखनो समाजक बीच दृष्‍टान्‍त छैथ। मन्‍दिरक आगूमे धरमशाला छल। फूसक दरबज्‍जानुमा घर जे चारूकातसँ खुजल छल। कियो थाकल-ठेहियाएल पथिक ओतए रहि सकैत छला। ओ समस्‍त परिवारक आतिथि होइत छला। हुनकर सभटा बेवस्‍था होइत छल। हमरा मोन पड़ैत अछि जे एकबेर एकटा महात्‍मा आएल रहैथ। ओ बाजैथ नहि। सिलेटपर लिखि कऽ अपन इच्‍छा, अपन मन्‍तव्‍य प्रकट करैथ। हुनकासँ भेँट करक हेतु लोकक करमान लागल रहैत छल। सौंसे देह बभूति रमौने, जौरक डोराडोरि पहिरने, जटा जूट धारी भेष हुनक आकर्षणक केन्‍द्र रहैन। माथक भयानक ठंढ हो आकि जेठक तप्‍त रौद ओ देहपर एकटा गमछा मात्र रखैत छला। अपना समयक नामी पहलमान सेहो रहैथ। नवका पोखरिक उत्तरबरिया भीरपर अखाड़ा छल। ओइठाम युवक सभकेँ कुश्‍तीक प्रशिक्षण दैत छला, डंड बैसक करैत छला। किलोक किलो आखाड़ाक माटि देहमे औंसने घामसँ तर-बत्तर भऽ जाइत छला। तेकर बाद बड़का खर्ड़ासँ सम्‍पूर्ण परिसरकेँ अपने हाथे साफ करैत छला। प्रात: स्‍नान करैबला लोक सभकेँ तरह-तरह केर हिदायत दैत रहै छेलखिन। पोखरिक पानि स्‍चच्‍छ बनल रहए, तइले सतत सतर्क रहैत छला। पोखरिमे साबुनसँ कपड़ा खिचनाइ मना छल, ऐ लेल ऊपरमे बेवस्‍था छल। ओइ समयमे कियो-कियो पोखरिमे साबुनसँ कपड़ा खींच लेथि, मुदा जँ पकड़ल गेल तँ भगवाने मालिक। नवका पोखरिक दिन-प्रति-दिनक देख-रेखक सम्‍पूर्ण दायित्‍व ताजीवन वंगठ काका बिना कोनो स्‍वार्थक उठौने छला। घन्‍टो ओइ परिसरक विकासक हेतु काज करैत रहला। हुनका बाद ओइ स्‍थानक पूर्ति नहि भऽ सकल, भाइयो नहि सकैत छल। गाम-घरमे एहेन साफ-सुथरा रमणीक पार्कनुमा स्‍थान भेटब कठिन। ओना तँ खेत-पथार सभ हरियर कंचन रहिते अछि, थाल-कादोक अपन स्‍वाद सेहो छइहे, मुदा तहू माहौलमे जे अध्‍यात्‍मिक, सांस्‍कृतिक केन्‍द्रक रूपमे नवका पोखरिक बेवस्‍था जे छल आ बहुत दिन धरि जेना चलैत रहल ओ अद्भुत ओ बेमिसाल कहल जा सकैत अछि। नवका पोखरिक निर्माणमे हमरा लोकनिक परिवारक समस्‍त लोकक योगदान छल। सोदरपुरिये मानिक मूलक हमरा लोकनिक पर्वज छला जे सात पुस्‍त पूर्व वैवाहिक सम्‍बन्‍धोपरान्‍त गाममे बसल रहैथ। आइ गामक आधा जनसंख्‍यामे सभ सहभागी छैथ। वंगट काका मूलत: पहलमान रहैथ। गाम भरिमे धाक रहैन। कोनो पर-पंचैतीमे हुनका अबस्‍स बजौल जाइत रहैन। धिया-पुता कुश्‍ती लड़ए, खेती-बाड़ी करए, माल-जालक सेवा करए, महींस राखए जइसँ डोलक-डोल शुद्ध दुधक सद्य: लाभ होइक–तइ विचारक पोषक छला वंगट काका छला। कए दिन हुनका बाबूसँ माने हमरा पिताजीसँ विवाद भऽ जाइन। विवादक मुद्दा रहैत छल जे पढ़ाइ-लिखाइ करब सार्थक थिक आकि निरर्थक? आब कियो सुनत तँ हँसत। मुदा वंगट काका अपन विचार जोर-सोरसँ बजैथ- “पढ़ो पूत चण्‍डी, जार्स चले हण्‍डी।” कहक सरांश- खेती-बाड़ी करू, ऐमे सद्य: लाभ अछि। पढ़ाइ-लिखाइमे कहिया की हएत से के देखलक! गाममे कियो लुंगी पहीरिलक तँ ओ (वंगट काका) जोरदार विरोध करैथ। समय बीतलाक बाद आब कहल जा सकैत अछि जे पढ़ाइ-लिखाइक समर्थन करब सही छल, विरोध गलत। गाममे वा केतौ जे पढ़लक-लिखलक से आगू भऽ गेल। ओहू समयमे किछु गोटे कहैथ- “पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नबाब।” निसचित रूपसँ ओ सभ नश्‍चय अग्रसोची रहैथ। नवका पोखैर परिवारक गौरवसँ जुड़ल छल। केकरो कुटुम अबितैथ तँ नवका पोखैरपर हुनका अबस्‍स आनल जाइत। ओइठाम स्‍नान, ध्‍यान होइत, गप-सराका चलैत। धरमशालामे बैस कऽ आराम सेहो कएल जा सकैत छल। वंगट काका नित्‍य दुपहरियामे ओइठाम धर्मग्रन्‍थ पढ़ैथ। सायंकाल भगवान शिवक आरती-पूजाक संग नाचारी सेहो गाओल जाइत छल। ओइमे नियमित अनेको वृद्ध लोकनि भाग लैथ। नवके पोखरिक पच्‍छिम-दच्‍छिन भागमे सोदरपुरिये सरिसव मूलक किछु परिवार बसल छला। ओइ परिवारक बादशाह बाबा–स्‍व. ......– शिव मन्‍दिरक पूजाक बहुत दिन धरि बेवस्‍था देखैत रहला। सायंकालक नाचारीमे ओ तँ रहिते छला जे हुनका संगे ओही परिवारक कएटा आरो वृद्ध सभ सेहो नाचारी गायनमे भाग लऽ सुर-मे-सुर मिलबैत छला। हमर बाबा एवम्‍ वंगट काका तँ रहिते छला। ‘बाबा केतए सुतल छी औ बालक वनमे केतए-सँ अएला, कियो नहि हुनकर सथिया...।’ आदि नाचारीक स्‍वर अखनो हमर कानमे गुंजित होइत रहैत अछि। नवका पोखरिक मालश्री गाछक छाहैरमे हम केतेको दिन बैस कऽ प्रतियोगिता परीक्षा-सबहक तैयारी करैत रही। बीच-बीचमे पानि ओ अन्‍य आवश्‍यकताक पूर्ति ओइठाम रहनिहार नारायणजी करैथ। केतेको दिन हम अपन मित्र लाल बच्‍चा (स्‍व. प्रो. विष्‍णुकान्‍त मिश्र)क संग साँझक समयमे ओतए बैस गप-सप्‍प करी, भविसक योजना बनाबी। स्‍वच्‍छ, निर्मल वातावरणमे गाम-घरक झंझटिसँ दूर नवका पोखैरपर बैस कऽ एकटा स्‍वर्गीय आनन्‍द होइत छल। हम नियमित भोर-सॉंझ ओइठाम जाइत रही। प्राय:काल नित्‍यकर्म- स्‍नान, पूजा एवम्‍ व्‍यायाम आदि ओतइ होइत छल। नित्‍य सायंकाल गप-सप्‍प करबाक हेतु कएक गोटा भेट जाइथ। पूजा-पाठ तँ होइते छल। संग-संग एकटा स्‍वस्‍थ मनोरंजनक तथा अध्‍यात्‍मिकताक अनुभूति सेहो ओइठाम होइत छल। गाममे हमरा फरिखमे जँ केकरो देहान्‍त होइ तँ ओकर श्रद्धकर्म ओहीठाम होइत छल। हमर बाबा एवम्‍ बाबूक श्राद्ध-कर्म सेहो ओहीठाम भेल छेलैन। वैदिकी श्राद्ध-क्रर्ममे बछराकेँ दागल गेल। ओकर करूण क्रन्‍दन अखन तक हमरा रोमांचित करैत रहैत अछि। हमरा विचारासँ ई अमानवीय प्रयोग अछि, ऐसँ स्‍वर्गक सीढ़ी कियो केना चढ़त से हमर समझसँ बहार अछि। आर जे अछि से अछि, मुदा ई काज औअल दर्जाक क्रूड़ता अछि। एकटा जीवित प्राणीकेँ सरी धीपा कऽ दागि देब, केतौसँ मनुष्‍यत नहि थिक। नइ चाही एहेन स्‍वर्ग, जइ हेतु एकटा निरीह, निर्दोष जीवक संग क्रूड़ताक पराकाष्‍ठा कएल जाए। ओनाहू आब गाम-घरमे एकर विरोध भऽ रहल अछि, कारण साँढ़ द्वारा जजात चरि गेलासँ क्षतिक संग अन्‍यान्‍य कारण सभ सेहो अछि। नवका पोखरिक पच्‍छिम-दच्‍छिन कोणपर बसल किछु परिवार पहिने गामक बीचेमे छल। ओहो सभ भगिनमान छला। ओही परिवारक किछु गोटे गाममे शुरूए-मे बसि गेल छैथ। नवका पोखरिपर हुनका सभकेँ बच्‍चेसँ देखिऐन। सभ गोटे उद्यमी, संघर्षशील, परिश्रमी तथा संस्‍कारी छला। ओइठामक कएटा वृद्ध सबहक नाचारी महादेव मन्‍दिरपर सुनैत छेलौं। ओही परिवारमे उग्र संस्‍कार सम्‍पन्न, तेजस्‍वी स्‍व. रामनन्‍दन मिश्र भेला। उत्‍कृष्‍ट मेघा ओ उत्‍कट इच्‍छाक बाबजूद ओ बहुत आगू नहि पढ़ि सकला। खादी भण्‍डारमे नौकरी करैत निरन्‍तर गामसँ जुड़ल रहला। कोनो पाबनिमे ओ अबस्‍स गाममे उपस्‍थित रहैथ। हमरासँ हुनका अद्भुत सिनेह रहै छेलैन। कएक बेर नौकरीक दौरान जमशेदपुर एला। तेतबे नहि, कएक बेर दिल्‍लीमे आबि कऽ भेँट करैथ। अपन संघर्षककेँ सकारात्‍क रूखि दैत स्‍व. रामनन्‍दन मिश्र अपन परिवारक विकास यात्राकेँ एकटा निर्णयात्‍मक रूखि देबामे सफल रहला। परिणामत: आइ-काल्‍हि हुनकर परिवार गामे नहि, इलाकामे यशस्‍वी अछि, जानल जाइत अछि। आब ओइ स्‍थानमे कोठे-कोठा भऽ गेल अछि। ओही परिवारमे स्‍व. उमेश मिश्रक पुत्र श्री शशिवोध मिश्र अपन परिश्रम ओ संघर्षसँ ओइ समयमे बी.एस-सी. कऽ रहिका उच्‍च विद्यालयमे विज्ञान विषयक शिक्षक भेला। अपन पूरा परिवारक ओ कायाकल्‍प कऽ देलाह। जखन हुनका लग बैसी तँ ओ अपन जीवन-यात्राक एक-सँ-एक अनुभव सुनबैथ। पैछला चालिस बर्खमे नवका पोखरिक परिदृश्‍य एकदम बदैल गेल। ओतए बसल परिवारक अधिकांश लोक सकल विकास यात्राक उदाहरण छैथ। नवका पोखरिसँ हमर बाबाकेँ बहुत लगाव रहैन। जीवनक अन्‍तिम समय तक ओ नवका पोखैर टहलैले अबस्‍स जाइत छला। हाथमे छड़ी लेने रोडपर चलैत एक बेर हुनका एकटा साइकिलबला टक्कर मारि देने रहैन। ओहू अबस्‍थामे एक्के हाथे साइकिलकेँ घिसिएने-घिसिएने अपन दरबज्‍जापर लऽ आएल रहैथ। संभवत: १९६७-६८ इस्‍वीक गप थिक। हमरा लोकनि नवका पोखरिपर पुस्‍तकालय बनेबाक हेतु बैसार केलौं। गामक तमाम गणमान्‍य लोक सभ बैसारमे रहैथ। ओइसँ पूर्व गाममे एकटा पुस्‍तकालय बहुत पहिनेसँ छल, जे कोनो कारणसँ अव्‍यवस्‍थित भऽ गेल छल। एक समयमे ओ पुस्‍तकालय गामक प्रतिष्‍ठित संस्‍थान छल। १९६२क चीन-भारत युद्धक समाचार सुनबाक हेतु ओइठाम सौंसे गामक लोक जमा होइत छल। सटले खादी भण्‍डार छल ओ धिया-पुताक खेल-धूपक सामग्री सेहो छेल। मुदा की भेलै जे सभ गतिविधि कमश: ठप्‍प जकाँ भऽ गेल। नव पुस्‍तकालय बनेबाक बैसारमे किछु प्रवुद्ध लोकक विचार रहैन जे ओही पुस्‍तकालयकेँ जीर्णोद्धार कएल जाए। यद्यपि हम सभ ओइ प्रस्‍तावक समर्थन नहि केने रही, मुदा आब लगैत अछि जे ओ सही राय छल। नवका पोखरिक धरमशालामे पुस्‍तकालयक स्‍थापना हेतु प्रयासकेँ आगू बढ़बैत कएकटा बैसार आरो भेल। पुरान पुस्‍तक सभ घरे-घरसँ ताकि-हेरि कऽ आनल गेल। पुस्‍तक सभ रखबाक हेतु लकड़ीक रैक बनौल गेल। पुस्‍तकालयक उद्घाटन हेतु डा. शुभद्र झाजी केँ आमंत्रित कएल गेल। ओइ समयमे सेवा निवृत भऽ ओ गामेमे रहए लागल रहैथ। हाथमे बेंत लेने मिरनई पहीरिने ओ पुस्‍तकालयक उद्धघाटन कार्यक्रममे आएल रहैथ। हमरा लोकनि हुनकासँ किछु बजबाक आग्रह कएल। ओ कहला जे भाषण करब हुनका एकदम पसिन नहि अछि। तथापि ओ अपन बात कहैत पुस्‍तकालयक संचालनमे होमयबला बेवहारिक असुविधा सबहक वर्णन करैत अपन जीवनक अनेकानेक अनुभवक चर्चा सेहो केलैन। ओ पुस्‍तकालय अल्‍पजीवी भेल। संशाधनक अभावमे किछुए दिनक बाद सभ किछु ठप्‍प पड़ि गेल। नवका पोखैर अपना-आपमे एकटा संस्‍था छल। अध्‍यात्मिकताक संग ग्रामीण संस्‍कारकेँ सेहो प्रज्‍वलित केने रहैत छल। मुदा सभ खिस्‍साक केतौ-ने-केतौ आ कहुना-ने-कहुना अन्‍त होइते अछि। नवको पोखरिक संग सेहो सएह भेल। जहिना प्रत्‍येक मनुखक जीवनमे उत्‍थान-पतन होइत अछि तहिना ऐ संस्‍थाक संग सेहो भेल। जखन वंगट काका स्‍वर्गीय भऽ गेला तेकर पछाइत कियो एहेन बेकती नहि भेल जे नवका पोखरिक संग हुनका जकॉं एकात्‍म भऽ सकए। केकरो ओ रूचियो नहियेँ रहइ। जइ फुलबाड़ीमे एकटा पात नहि खसल भेटैत छल से क्रमश: कूड़ा, कर्कटसँ भरल रहए लागल। पोखरिक देख-रेख सेहो ढील भऽ गेल। जेतेक टा परिवार ऐ पोखैर एवम्‍ आसपासक परिसरक हिस्‍सेदार छैथ जे एकर एक स्‍वरमे रक्षा ओ विकास करबाक बजाय आपसेमे कचर-बचर होइत रहल। ढनमनाइत, ढनमनाइत मन्‍दिर खसि पड़ल। पोखैर सबहक व्‍यापारीकरण भऽ गेल। पोखरिक पानि नहाइ-जोकर नहि रहि गेल। कालान्‍तरमे किछु युवक लोकनिकेँ ऐपर धियान गेल। जइसँ मन्‍दिरक जीर्णोद्धारक प्रयास भऽ रहल अछि। आर-आर सकारात्‍मक प्रयास भऽ रहल अछि। मन्‍दिर भगवानक घर थिक, जेतए लोक अपन-अपन अहंकारक विसरजन कए ईवश्वरक शरणमे पहुँचैत अछि। अस्‍तु एकर पुनर्निर्माण ओ रखरखावमे जँ ऐ बातक धियान राखल गेल जे ओ परिवार विशेषक नहि अपितु समस्‍त आस्‍थावान लोकनिक वस्‍तु बनि सकए, तँ निश्चय ई कल्‍याणकारी हएत आ नवका पोखैर फेरसँ अपन गौरव प्राप्‍त कए सकत। ◌ तिथि : ३.७.२०१७ इच्‍छा पत्र मृत्‍यु अवश्‍यंभावी थिक। एक-ने-एक दिन सभ बेकती ऐ दुनियासँ सभ किछु छोड़ि कऽ चल जाइत अछि। जीवन भरिक स्‍वअर्जित एवम्‍ पैत्रिक सम्‍पैत अहीठाम रहि जाइत अछि। सवाल अछि जे ऐ तरहेँ छोड़ल गेल सम्‍पतिक की हएत? ओकर मलिकाना हक केकरा भेटत..? केतेक बेर ऐ प्रश्नक उत्तर तकबामे वर्षो लागि जाइत अछि। लोक आपसेमे लड़ि जाइत अछि। भाइ-भाइक दुश्मन भऽ जाइत अछि। आब तँ भाइक अलाबा बहिनो सभ ऐ युद्धमे कुदि जाइत अछि, खास कऽ तखन जखन सम्‍पतिक मूल्‍य ज्‍यादा हो, शहरी सम्‍पैत किंवा गामो-घरक सड़कक कातक सम्‍पैत सभ फसादक जड़ि भऽ रहल अछि। केतेको ठाम छोट-छोट विवाद लऽ कऽ अहंक टकराव भऽ जाइत अछि। कोनो पक्ष सुनैले तैयार नहि। तखन की हएत? जँ मृत्त बेकती इच्‍छा पत्र (Will) कऽ गेल छैथ तँ विवाद नहि हएत, नहि तँ सालक-साल मोकदमा चलत, जइसँ कोट-कचहरीक चक्कर लगबैत रहू एवम्‍ वकीलकेँ फीस थम्‍बैत रहियौ...। हमरा एकटा नामी वकील कहलैन जे एकटा छोट सन जमीन–जेकर मूल्‍य ७-८ लाख हेतइ–तैपर दू भैयारीमे विवाद छइ, अहंकारवश कियो हटए लेल तैयार नहि। जबकि एक भाँइ सात लाख टका फीसक रूपमे हमरा दऽ चूकल अछि। एतबे नहि, एक-आध लाख आरो भेटबे करत। ...कहक माने जे सम्‍पतिक जेतेक मूल्‍य होइत से वकील साहैब असूलि चूकल छैथ। तैयो लड़ाकू भैयारीमे सँ कियो पाछू हटैले तैयार नहि अछि..! ऐ तरहक लड़ाइमे कएक टा पुस्‍तैनी मकान खण्‍डहर भऽ जाइत अछि। अस्तु ई जरूरी ओ नितान्‍त आवश्‍यक अछि जे जिनका कोनो प्रकारक–माने चल वा अचल–सम्‍पैत अछि, से मृत्‍युक पूर्व इच्‍छा पत्र बना लेथि, कारण मृत्‍युक तारिखकेँ के जनैत अछि, कियो नहि। जँ कोनो बेकती मृत्‍युसँ पूर्व इच्‍छा पत्र (वसीयत) कऽ कऽ जाइ छैथ तँ हुनकर सम्‍पतिक हस्‍तान्‍तरण स्‍वत: ओइ बेकतीकेँ भऽ जाएत जेकरा सम्‍बन्‍धित इच्‍छा पत्रमे सम्‍पतिक अधिकारी बनौल गेल रहत। ओ बेकती माता, पिता, पुत्र, पुत्री, भाए, बहिन, भातिज, मित्र वा कियो अन्‍य भऽ सकैत छैथ। परन्‍तु जँ सम्‍पतिक मालिक बिना इच्‍छा पत्र बनौने मरि जाइ छैथ (Intestate) तखन ओइ सम्‍पतिक हस्‍तान्‍तरण आकि बँटबारा कानूनक अनुसार कोर्ट द्वारा होइत अछि। ऐ प्रक्रियामे सालो लागि सकैत अछि। खास कऽ जखन सम्‍बन्‍धित पक्ष परस्‍पतर विरोधी दाबा करैत हो। यदि सम्‍बन्‍धित पक्ष समझदार हुअए, आपसमे रजामन्‍दी होइक तखन ऐ तरह सम्‍पतिक निपटान असानीसँ भऽ जाएत। मुदा केतेको बेर सम्‍पतिकेँ मूल्‍यवान होइक कारणे बहिन वा बेटीक हक नहि देबाक कारण किंवा अहंक टकरावक कारण सम्‍पतिक बँटबारा/हस्‍तान्‍तरण परिवारिक कलह केर कारण भऽ जाइत अछि। अस्‍तु उचित ओ आवश्‍यक थिक जे जँ अहाँकेँ सम्‍पैत अछि तँ तेकर मृत्‍योपरान्‍त निस्‍तारण हेतु Will अबस्‍स करी। वसीयत कोनो बेकती द्वारा मृत्‍युक बाद ओकर स्‍वअर्जित सम्पतिक उत्तराधिकारीक बारेमे कानूनी घोषणा अछि जे ओइ बेकतीक जीवनकालमे बदलल वा रद्द भऽ सकैत अछि। मृत्‍युक बाद ओ लागू भऽ जाइत अछि। पैतृक सम्‍पतिक बारेमे वसीयत नहि कएल जा सकैत अछि। अस्‍तु वसीयत द्वारा स्‍वअर्जित सम्‍पतिक उत्तराधिकारी तय कएल जा सकैत अछि। भारतीय उत्तराधिकार कानून १९२५क धारा-२ (एच) मे वसीयतक कानूनी व्‍याख्‍या कएल गेल अछि। उपरोक्‍त कानूनक धारा ५क अनुसार वसीयत वा बिना वसीयतक स्‍वअर्जित सम्‍पित बेवस्‍था कएल गेल अछि। वसीयत केनिहारक उमर कम-सँ-कम २१ वर्ष हेबाक चाही। मानसिक रूपसँ स्‍वस्‍थ हेबाक चाही तथा बिना कोनो दबाबमे वसीयत करक चाही, ऐ सभ बातकेँ ओइमे उल्‍लेख करक चाही। इच्‍छा पत्र वसीयत केनिहारक जीवन कालमे कखनो ओकरा द्वारा बदलल जा सकैत अछि, संशोधित कएल जा सकैत अछि। मुदा वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बाद ओ तुरन्‍त लागू भऽ जाइत अछि। वसीयतक हेतु जरूरी अछि जे वसीयतकर्त्ता बिना कोनो दबाबसँ नहि, अपितु स्‍वेच्‍छासँ वसीयतमे अपन सम्‍पतिक वितरण करए। ओइ बेकतीकेँ मानसिक रूपसँ स्‍स्‍थ होएब जरूरी अछि जइसँ ओ निर्णय लेबक स्‍थितिमे हो। भारतमे इच्‍छा पत्र तैयार करबाक विधि बहुत असान अछि। सादा कागजपर बिना कोनो स्‍टाम्‍प पेपरक इच्‍छा पत्र टंकित कएल जा सकैत अछि। मुदा हस्‍तलिखित इच्‍छा पत्र केतेको कानूनी विवादमे लाभकारी भऽ सकैत अछि। वसीयतकर्त्ताकेँ इच्‍छा पत्रक प्रथम पैरामे स्‍पष्‍ट करक चाही जे ओ स्‍वेच्‍छासँ बिना कोनो दबाबक पूरा होशोहवासमे वसीयत कऽ रहल अछि। तेकर बाद समस्‍त सम्‍पतिक एक-एक कऽ फराक-फराक वर्णन हेबाक चाही। सम्‍पैत सबहक तत्‍कालीन मूल्‍य स्‍पष्‍टत: इच्‍छा पत्रमे लिखबाक चाही। तमाम बहुमूल्‍य कागजात रखबाक स्‍थान ओइमे स्‍पष्‍टतासँ लिखल जाए जइसँ समयपर ओ सभ ताकल जा सकए। वसीयतक भाषा सरल हेबाक चाही। वसीयतकर्त्ताक पूरा नाम लिखबाक चाही। वसीयतक सम्‍पतिक स्‍पष्‍ट विवरण हेबाक चाही। प्रस्‍तावित कानूनी उत्तराधिकारीक पूरा नाम हेबाक चाही। अन्‍तमे दूटा गवाहक नाम व पताक संग ओकर हस्‍ताक्षर हेबाक चाही। गवाह सामान्‍यत: ओहन बेकतीकेँ बनाबक चाही जे वसीयतकर्त्तासँ उम्रमे छोट होथि। यदि गवाहक मृत्‍यु पहिने भऽ जाइत अछि तँ फेरसँ वसीयत बना कऽ नव गवाहक हस्‍ताक्षर कराबक चाही। इच्‍छा पत्रमे हस्‍ताक्षरक संग तारिख अबस्‍स लिखबाक चाही। जँ एकसँ अधिक बेर इच्‍छा पत्र बनौल गेल तँ अन्‍तिम इच्‍छा पत्र लागू होइत अछि। बढ़िया हएत जे अन्‍तिम इच्‍छा पत्रमे पूर्व इच्‍छा पत्र सभकेँ निरस्‍त करबाक चर्च होइक। इच्‍छा पत्रकेँ जस-के-तस लागू करबाक हेतु बिसवासपात्र एवम्‍ जानकार बेकतीकेँ निष्‍पादक (Executor of will) बनाबक चाही जइसँ वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बाद वसीयतकेँ बिना लाइ-लपटक अमलीजामा देल जा सकए। वसीयतकर्त्ताकेँ चाही जे केकरो निष्‍पादक (Executor) नामित करैसँ पूर्व ओकर सहमति लऽ लेल जाए। वसीयतकर्त्ताकेँ दूटा गवाहक समक्ष हस्‍ताक्षर करक चाही। गवाहक पूरा नाम, पता सहित ओकर हस्‍ताक्षर जरूरी अछि। गवाह जँ चिकित्‍सक होइ तँ बढ़ियाँ जइसँ ओ स्‍पष्‍ट करत जे वसीयतकर्त्ता दिमागी रूपसँ स्‍वस्‍थ अछि। गवाह ओ निष्‍पादक अलग-अलग बेकती हेबाक चाही। वसीयतमे सम्‍पतिक हकदार गवाह नहि भऽ सकै छैथ। वसीयतक प्रत्‍येक पृष्‍ठपर संख्‍या लिखल जेबाक चाही एवम्‍ गवाह एवम् वसीयतकर्त्ताक स्‍पष्‍ट हस्‍ताक्षर हेबाक चाही। अन्‍तमे कुल पृष्‍ठ संख्‍या लिखल हेबाक चाही। ऐ प्रकारसँ तैयार वसीयतकेँ राखी केतए? कारण वसीयतक काज तँ ओइ बेकतीक मृत्‍युक बादे पड़ैत अछि आ तखन ओ ऐ विषयमे किछु कहक स्‍थितिमे नहि रहैत अछि। अस्‍तु वसीयतक दूटा मूल ओ हस्‍ताक्षरित प्रति बनाबी तँ बढ़ियाँ। एकटा प्रति बैंक लॉकरमे ओ दोसर प्रति निष्‍पादक वा तेहेन विश्वस्‍त बेकतीक संग रहक चाही। असलमे चाही तँ ई जे तमाम चीज, वस्‍तु, वसीयत, पासवर्ड आदिक जानकारी एकटा डायरीमे लिखि कऽ छोड़ि दी जइसँ मृत्‍युपरान्‍त अहाँक वारिसकेँ परेशानीसँ बँचौल जा सकए। एकबेर वसीयत केलाक बाद आवश्‍यकता भेलापर पूरक वसीयत द्वारा मूल वीयतमे संधोधन कएल जा सकैत अछि। मुदा बेर-बेर एहेन केलासँ वसीयतकेँ बदैल कऽ नव वसीयत कऽ लेब ज्‍यादा बढ़ियाँ होइत अछि। वसीयतकेँ निबन्‍धित कराबक आवश्‍यकता नहि अछि, मुदा जँ वसीयत द्वारा कोनो समाजसेवी संस्‍था (Chariable Organisation) केँ धन देबाक हो तखन वसीयतकेँ निबन्‍धित कराएब जरूरी अछि। जेना कि पहिने चर्च कऽ चूकल छी, वसीयत सम्‍बन्‍धित वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बादे लागू होइत अछि। जँ ओइमे स्‍पष्‍टता नहि रहत तँ मृत बेकती तेकर व्‍याख्‍या करक हेतु घुरि नहि औत। तँए वसीयतक भाषा सरल, स्‍पष्‍ट ओ बाध्‍यकारी हेबाक चाही। किन्‍तु-परन्‍तुसँ बँचबाक चाही। ओइ परिस्‍थितिक विचार हेबाक चाही जेकर घटित हेबाक संभावना जीवनमे बनल रहैत अछि। वसीयत केलाक बादो सम्‍पतिक मालिककेँ मृत्‍युसँ पूर्व ओकर निपटान करबाक अघिकार बनल रहैत अछि। कोनो बेकती जे कानूनी रूपसँ सम्‍पैत रखबाक अधिकारी अछि, वसीयतमे सम्‍पैत पाबक अधिकारी भऽ सकैत अछि। ओ नवालिग, भगवानक मूर्ति, कोनो तरहक कानूनी बेकती (Junstic person) भऽ सकैत छैथ। यदि कोनो नवालिगकेँ वसीयत द्वारा सम्‍पतिक उत्तराधिकारी धोषित कएल जाइत अछि तखन वसीयतकर्त्ता द्वारा अभिवावक नियुक्‍ति जरूरी अछि जे ऐ तरहेँ देल गेल सम्‍पतिक ओकरा वालिग हेबाकाल धरि बवस्‍था करताह। हिन्‍दू उत्तराधिकार कानून १९५६ क धारा ३०क अनुसार स्‍वअर्जित चल वा अचल सम्‍पतिक वसीयत द्वारा उत्तराधिकारी तय कएल जा सकैत अछि। वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बाद वसीयतमे उल्‍लिखित उत्तराधिकारी सम्‍बन्‍धित न्‍यायालय द्वारा प्रोवेटक हेतु प्रार्थना कएल जाएत। प्रोवेट न्‍यायालय द्वारा आम प्रमाणित वसीयत थिक। प्रोवेट कोनो वसीयतक कानूनी रूपसँ पक्का हेबाक निर्णायक प्रमाण थिक। यदि कोनो उत्तराधिकारी द्वारा वसीयतकेँ कानूनी चुनौती देल जाइत अछि तँ सम्‍बन्‍धित पक्षकेँ नोटिस जारी हएत, सभ अपन पक्षमे न्‍यायालयमे राखि सकैत अछि। आ सबहक बातक विचारक बादे न्‍यायालय प्रोवेट जारी करत। न्‍यायालय प्रोवेट जारी करबासँ पूर्व सुनिश्चित करैत अछि जे वसीयतपर दस्‍तखत वास्‍तवमे वसीयतकर्त्ताक अछि ओ गवाह सभ वसीयतक समय मौजूद छल। वसीयत द्वारा हस्‍तान्‍तरित सम्‍पतिक मालिखितपर प्रोवेट कोर्ट विचार नहि करैत अछि। ओ तँ मात्र एतबे तय कऽ दैत अछि जे वसीयत (इच्‍छा पत्र) सही अछि कि नहि। वसीयतमे प्राप्‍त सम्‍पतिक मालिकाना हकपर सिविल न्‍यायालयमे सम्‍पतिक सम्‍बन्‍धित पक्षकार द्वारा चुनौती देल जा सकैत अछि। कहक माने जे जँ वसीयतमे देल गेल सम्‍पैतपर वसीयतकर्त्ता पूर्ण अधिकार नहि अछि, ओ सम्‍पैत ओकर स्‍वअर्जित नहि अछि आ तखनो ओकरा वसीयत द्वारा दऽ देल गेल अछि तखन ओकरा सम्‍बन्‍धित पक्षकार द्वारा सिविल न्‍यायालयमे चुनौती देल जा सकैत अछि। सारांश जे इच्‍छा पत्र द्वारा सम्‍पतिक हस्‍तांतरण हेतु जरूरी अछि जे सम्‍बन्‍धित सम्‍पैत स्‍वअर्जित होइक। इच्‍छा पत्रक भाषामे कोनो ओझर नहि होइक तइ लेल बढ़ियाँ होएत जे इच्‍छा पत्र (वसीयत) कोनो योग्‍य अधिवक्‍ता द्वारा तैयार करौल जाए, जइसँ इच्‍छाकर्त्ताक मृत्‍युक बाद ओइ सम्‍पतिक हस्‍तांतरणमे कोनो विवाद नहि होइक। विवादसँ बँचैक लेल तँ इच्‍छा पत्र बनौले जाइत अछि। तँए ओकरा स्‍पष्‍ट ओ कानूनी रूपसँ पक्का हएब बहुत जरूरी अछि। समयक कोन ठेकान। भविसक झंझट तय कऽ जाउ। अपन अर्जित सम्‍पतिक वसीयत (इच्‍छा पत्र) बना कऽ राखि दियौ आ चैनक बंशी बजाउ। ◌ २३.०६.२०१७ तिरुअनन्‍तपुरम दिल्‍लीसँ ९ बजे रातिमे हम सभ वायुयानसँ त्रिवेन्‍द्रम हवाइ अड्डापर उतरलौं। ऐ यात्रामे लगभग तीन घन्‍टा समय लगल। बेस पैघ जहाज रहइ जइमे तीन साएसँ बेसी यात्री एकसंग सवार रहैथ। बीचमे कोचीमे सेहो जहाज उतरल छल। बहुत रास यात्री ओहूठाम उतरला, मुदा काफी मात्रामे सवारो भेला। जे थोड़बे कालक यात्राक पछाइत त्रिवेन्‍द्रम पहुँच गेला। त्रिवेद्रम हवाइ अड्डापर उतरैत जहाज समुद्रक ऊपर जे भ्रमण करैत रहल, ओ दृष्‍य बहुत विहंगम छल..! त्रिवेन्‍द्रम हवाइ अड्डापर उतरलापर देखलौं जे ओइ जहाजसँ कएटा वीआइपी सेहो उतरलैथ। हुनका लोकनिक स्‍वागतक नाराक बीच हम सभ अपन गन्‍तव्‍य स्‍थानपर अर्थात् केरल सरकारक अतिथि गृह विदा भऽ गेलौं। केरल भारतक एकटा प्रान्‍त अछि। एकर राजधानी तिरुवनन्‍तपुरम अर्थात् त्रिवेन्‍द्रम अछि। मलयालम एकर मुख्‍य भाषा थिक। हिन्‍दू, मुसलमानक अलाबा ईसाइ सेहो काफी मात्रामे एतए रहै छैथ। अपन सांस्‍कृतिक ओ भाषा वैशिष्‍ट्यक कारण दक्षिणक चारि राज्‍यमे एकर फराक पहिचान अछि। पौराणिक कथाक अनुसार परशुराम अपन फरसा समुद्रमे फेकि देला, जइसँ ओही अकारक भूमि समुद्रसँ बाहर निकैल गेल ओ केरलक प्रादुर्भाव भेल। कहल जाइत अछि जे ‘चेट स्‍थल: कीचड़ ओ अलम प्रदेश’ शब्‍दक योगसँ ‘चेरलम’ शब्‍द बनल जे बादमे ‘केरल’ बनि गेल। बहुत दिन तक ई भू-भाग चेरा राजाक अधीन छल, ओहू कारणसँ एकरा चेरलम आ बादमे केरलम नाम पड़ल। केरलक प्राकृतिक सौन्‍दर्य अद्भुत अछि। तँए एकरा ईश्वरक अपन घर सेहो कहल जाइत अछि। समशीतोष्‍ण मौसम प्रचूर वर्षा, प्राकृतिक सौन्‍दर्य, सघन वन, समुद्र घट ओ चालीससँ अधिक नदी, सभ मिलि एकरा सचमुच पृथ्‍वीपर स्‍वर्गक रूप देने अछि। केरल भारतक दक्षिणी छोरपर अरब सागर ओ पच्‍छिमी घाटीक ५००-२७०० मीटर ऊँचाइपर अवस्‍थित अछि। केरलकेँ तीन भागमे विभाजित कएल गेल अछि- तटीय निचला इलाका, उपजाउ मिडलैण्‍ड आ हाइलैण्‍ड्स। केरलक निचला भागमे अन्‍तहीन वैकवाटर ओ चौआलिसटा नदी अछि। मिडलैण्‍ड्स काजू,नारियल, अकीका अखरोट, केरा, चाउर, अदरक, कारी मिर्च, कुसिआरक संग-संग आर-आर बहुत रास वनस्‍पतिक हेतु प्रसिद्ध अछि। जंगली हाइलैण्‍ड्स चाय,कॉफी, रबर, मसाला सबहक बगान ओ वन्‍यजीव सबहक लेल प्रसिद्ध अछि। केरलक शान्‍त समुद्र तट, नाना प्रकारक वन्‍यजीव, आकर्षक वैकवाटर, एवम्‍ आनन्‍ददायक वैकवाटर सभ जगत प्रसिद्ध अछि। सड़क मार्गसँ यात्रा केलापर केरलक मनोरम प्राकृतिक छटाक बेहतर आनन्‍द लेल जा सकैत अछि। दक्षिनी केरल अलेप्‍पीक वैकवाटरसँ तमिलनाडूसँ सटल दक्षिनी सीमाक तटीय क्षेत्र शामिल अछि। केरलक राजधानी त्रिवेन्‍द्रम, कोवलम ओ वरकला समुद्रीय तट एवम्‍ प्रतिष्‍ठित वैकवाटर ऐ क्षेत्रमे पड़ैत अछि। १९८० ईस्‍वीसँ पूर्व केरलमे बहुत कम पर्यटक अबैत छल। ओकर बाद स्‍थानीय सरकार लोकक भागीदारीसँ जबरदस्‍त प्रचार-प्रसार केलक जइसँ पर्यटक लोकनिक आवागमन बढ़ल। बहुत रास पर्यटक स्‍थल सबहक बेवस्‍था छोट-मोट कारोबारी सबहक हाथमे देल गेल जेना कि केरलक प्रसिद्ध वैकवाटर सभमे ९० प्रतिशत भागीदारी छोट-मोट कोरोबारी सबहक अछि। पहाड़सँ लऽ कऽ समुद्र तट तक पर्यटकक आराम ओ सुविधाक निरन्‍तर चेष्टा कएल गेल। परिणामत: केरलमे पर्यटकक आकर्षण बढ़िते गेल। केरलक राजधानी त्रिवेन्‍द्रम हम कएक बेर गेल छी। त्रिवेन्‍द्रममे कम खर्चमे सुरूचि पूर्ण ओ स्‍वादिष्‍ट भोजन उपलब्‍ध अछि। राज्‍य पर्यटन निगमक अतिथि गृहमे भोजन, जलखै आ चाह-पानक सुविधा तँ अछिए, आस-पासक केतेको ठाम इडली, बारा,कॉफी ओ चाह उपलब्‍ध रहैत अछि। भाषाक समस्‍या ओतेक जटिल नहि जेतेक की तामिलनाडूमे। लोक हिन्‍दी बुझैत अछि। हमर रहबाक बेवस्‍था केरल सरकारक अतिथि गृहमे छल जेकर जेतेक प्रशंसा कएल जाए से कम होएत। सभ सुविधासँ परिपूर्ण अतिथि गृहक शुल्‍क सेहो कमे अछि। कएकटा पैघ राजनेता सभ ओइठाम अबैत-जाइत रहैत छैथ, तॅँए कएक बेर ओतए स्‍थल भेटब आसान नहि रहैत अछि। यात्राक क्रममे हम ओइ ठामक प्रसिद्ध पद्मनाम मन्‍दिर पहुँचलौं। पद्मनाम मन्‍दिर दुनियाँक केनो धर्मक कोनो मन्‍दिरसँ धनिक अछि। बेसुमार सोना, चानी,जवाहरात ओइठाम सैंकड़ो सालसँ राखल अछि। कहल जाइत अछि जे ओइ सम्‍पैतमे अधिकांश ओइठामक राजा सबहक योगदान छैन जे अपनाकेँ पद्मनाम भगवानक दास बुझैत छला। दोसर बात जे सुनबामे आएल ओ ई जे स्‍थानीय राजा आक्रमणमे लूट-पाटसँ बँचेबाक हेतु अपन समस्‍त मूल्‍यवान वस्‍तु मन्‍दिरक तहखानामे रखबा देलखिन। जे जेना भेल होइ मुदा ओइ मन्‍दिरमे अकूट सम्‍पैत भरल अछि, जे राखल-राखल व्‍यर्थ भेल अछि। लोककेँ तँ तखन बुझबामे एलै जखन उच्‍चतम न्‍यायालयक आदेशपर पाँचटा तहखाना खोलल गेल ओ ओइमे राखल गेल अमूल्‍य वस्‍तु सबहक गणना होमए लगल। जेतेक वस्‍तु हिसाव-किताव भेल तेकरे मूल्‍य लाखो कड़ोरमे भऽ जेबाक अनुमान अछि। छठम तहखाना धार्मिक किम्‍ववंतीक कारण नहि खोलल गेल। कहबी छै जे ओकरा जे खोलत से जीवित नहि रहत। आदि-आदि। हम जखन ओइ मन्‍दिरमे गेल रही तँ उपरोक्‍त समाचार सभ आबि गेल रहैक मुदा केतौ किछु बाहरसँ सुनबामे नहि आएल, आ नहियेँ किछु देखाएल। दद्मनाम मन्‍दिरमे पहुँचलाक बाद सभसँ पहिने सर्ट-पैन्‍ट निकालि कऽ धोती पहिरए पड़ल। धोती ओहीठाम मन्‍दिर प्रबन्‍धक द्वारा उपलब्‍ध करौल जाइत अछि। तेकर बाद पक्‍तिवद्ध भऽ दर्शन होइत अछि। चूँकि हमरा जोगार छल, अस्‍तु भीआइपी दर्शन करबाक मौका भेटल छल। सभसँ आगू एकदम गर्भ गृहमे जा कऽ पद्मनाम भगवानक दर्शनक सौभाग्‍य हमरा भेटल। संयोगसँ भारत सरकारक सेवा निवृत सचिव सेहो दर्शन करए गेल छेली। हम हुनका संगे काज केने रही। चूँकि ओ पाछाँ रहैथ, तँए हम हुनका नहि देख सकलयैन। ओहो केरल सरकारक अतिथि गृहमे ठहरल रहैथ। ओइठाम स्‍वागत कक्षमे हुनकासँ भेँट भेल। ओ कहली जे पद्मनाम मन्‍दिरमे हमरा देखने छेली। त्रिवेन्‍द्रम यात्राक सन्‍दर्भमे गप-सप्‍पक बाद हम सभ अपन-अपन कक्षमे चलि गेलौं। पद्मनाम मन्‍दिरमे विष्‍णु भगवान अनन्‍द सयनम मुद्रामे आदि शेष नागपर पड़ल छैथ। ओ ओइठामक राजवंशक कुल देवता मानल जाइत छैथ। ३ जनवरी १७५०क त्रावणकोरक महाराजा महाराज श्री अनीझुम थिरूनाल त्रावणकोर राज्‍यकेँ भगवान पद्मनाम स्‍वामीकेँ समर्पित कए स्‍वयंकेँ हुनकर दासक रूपमे घोषित कए देला। तेकर बादे ओ स्‍वयं ओ हुनकर उत्तराधिकारी श्री पद्मनाम दासक उपाधि ग्रहण कए लेलैथ। ऐ प्रकारेण त्रावणकोर सम्‍पूर्ण राज्‍य भगवान पद्मनाम स्‍वामीक समर्पित भऽ गेल। श्री पद्मनाम दासक उपाधि प्राप्‍त करक हेतु राजकुलक नवजात शिशुकेँ प्रथम जन्‍म दिवसपर श्री पद्मनाम मन्‍दिरक मोटक्कालमण्‍डपमपर राखि कऽ जलाभिषेक कएल जाइत अछि। तेकर बादे ओ श्री पद्मनाम दासक उपाधि रखबाक पात्र माल जाइ छैथ। त्रावणकोरक अन्‍तिम महाराजा मार्तण्‍डवर्गाक जन्‍म २२ मार्च १९२२ केँ भेलैन। हुनकर पिताक नाओं रवि वर्मा ओ माता संथु पारवथी वयी (कनिष्‍ठ महारानी) छेलैन। ९१ वर्षक उमेरमे १६ दिसम्‍बर २०१३ केँ हुनकर मृत्‍यु भऽ गेल। हुनकर मृत्युक बाद ओइ राजवंशक प्रतीकात्‍क उपस्‍थिति समाप्‍त भऽ गेल। सन्‍ १९७१क संविधान संशोधनक बाद राजा/महाराजा सबहक उपाधि समाप्‍त भऽ गेल। तँए त्रावणकोरक कानूनी शासक तँ केरल सरकार भऽ गेल आ महाराजाकेँ मन्‍दिरक देख-भालक कानूनी अधिकारपर प्रश्‍नचिन्‍ह लागि गेल। केरल उच्‍च न्‍यायालय ऐ विवादमे अही तरहक बेवस्‍था देलक। महाराजा मार्तण्‍ड वर्मा सन्‍ १९४७ मे स्‍वतंत्रताक समयमे त्रावणमोरक भारतमे विलयक अन्‍तिम गवाह छला। कहल जाइत अछि जे त्रावणमोरक राज परिवार ओकरा स्‍वतंत्र राष्‍ट्र रखबाक पूरजोर प्रयास केलक, जे अन्‍ततोगत्‍वा सफल नहि भेल आ त्रावणमोर भारतक हिस्‍सा बनि गेल। स्‍वतंत्राक बाद बदलल महौलमे राज परिवारक अनेको सदस्‍य राज्‍यसँ बाहर जाए सामान्‍य नागरिक जकाँ जीवन-यापन करए लगलाह। महाराजा मार्तण्‍ड वर्मा सेहो सपरिवार बंगलोर चलि गेला। सन् १९९१मे महाराजा चिथिर लरुनलक मृत्‍युक समय जनतामे जवरदस्‍त सहानुभूति देखल गेल। तेकर बादे मार्तण्‍ड वर्माकेँ लोक महाराजा कहए लागल। पद्मनाम मन्‍दिरक सामने बनल राज महलक चोटीपर घड़ी मेघान मणिक नामसँ जानल जाइत अछि। ई करीब साए साल पुरान अछि। ई प्राचीन समयक अभियांत्रिक चमतकारक नमूना अछि। घड़ीक आकर्षण ओइमे राक्षसक मुखैटाक संगे-संग दुनू कात विद्यमान बकरा अछि। जहाँ घन्‍टा पुरैत अछि, राक्षस अपन मुँह खोलैत अछि। आ दुनू बकरा ओकर गालपर चाटी मारैत अछि। जइसँ घण्‍टाक जोरदार स्‍वर निकलैत अछि आ राक्षस अपन मुँह बन्न कऽ लैत अछि। जेतेक बाजल रहैत अछि। तेतेक बेर ओ प्रतिक्रिया दोहराइत अछि। कहक माने जँ चारि बजतै तँ चारि चमेटा ओइमे राक्षसकेँ दुनू बकरा मारतै आ चारि बेर घण्‍टाक अबाज सुनैमे औत। अछि ने चमतकारी यन्‍त्र? मुदा आब ओ घड़ी केतेको सालसँ खराप पड़ल अछि। पद्मनाम स्‍वामी मन्‍दिरक सामने कुथीरमलिका पैलेश म्‍युजियम अछि। ऐ महलक निर्माता गावणकोरक महाराजा स्‍वाथी थीरुनल बलराम वर्मा छला। ओ महान कवि, समाज सुधारक, गायक एवम्‍ राजनेता छला। ऐ संग्रहालयमे नाना प्रकारक अमूल्‍य पेंटिंग सभ राखल अछि। ऐ संग्रहालयकेँ सोम दिन छोड़ि कऽ कोनो दिन प्रात: साढ़े आठ बजेसँ एक बजे आ तीन बजेसँ साढ़े पाँच बजेक बीचमे देखल जा सकैत अछि। प्रति वर्ष ४ सँ १३ जनवरीक बीचमे ओइठाम महाराजा स्‍वाथी थीरुलक स्‍मृतिमे संगीत उत्‍सव मनौल जाइत अछि। महलसँ मन्‍दिर जएबाक गुप्‍त मार्ग अछि जइ बोटे महाराजा नित्‍य पद्मनाम मन्‍दिरमे पूजा अर्चना करैत छलाह। अखनो भोरक एक घन्‍टा समय भगवानक पूजाक हेतु महाराजाक हेतु आरक्षित अछि। महाराजा पूजा कऽ लइ छैथ तखने आम जनताकेँ मन्‍दिरमे प्रवेशक अनुमति भेटैत अछि। राजमहलमे तरह-तरह केर वस्‍तु सभ (जे महाराजाकेँ भेँटमे देल जाइत छल) राखल अछि। महलक अधिकांश हिस्‍सा बन्‍द पड़ल अछि। कहल जाइत अछि जे ऐ महलक निर्माणक थोड़बे दिनक बाद महाराजाक मृत्‍यु भऽ गेल। तँए एकरा अशुभ बुझि महलकेँ छोड़ि राज परिवार आनठाम रहए लागल। सायं काल हमरा लोकनि त्रिवेन्‍द्रमक कोवलम समुद्र तटपर गेलौं। दूर-दूर तक देखाइत स्‍वच्‍छ जल, दीर्घ समुद्र तट ओ दूरगामी क्षितिजक अद्भुत दृश्‍य उत्पन्न करैत अछि। समुद्र तटपर प्रकाश स्‍तम्‍भ दूरेसँ देखल जा सकैत अछि। सूर्यास्‍तक छटा ओ अकासक मनमोहक रंग समुद्रतट प्रेमीकेँ सबहक आनन्‍दकेँ पराकाष्‍ठा (Climex) पर पहुँचा दैत अछि। केतेको बेकती समुद्रतट पर साइकिल चलेबाक आनन्‍द लैत देखबामे एला। प्रात भेने हमरा लोकनि वर्कला समुद्र तटपर गेलौं। ओइठामसँ अरब सागरक अद्भुत दृष्‍य देखलौं। ओही क्रममे त्रिवेद्रमक दछिनबरिया भागमे अवस्‍थित पूवार नामक गाम सेहो देखए गेलौं। ओइठाम वैकवाटर ओ टापूक संगम स्‍थल हेबाक कारण पर्यटककेँ अद्भुत आनन्‍दक अवसर प्रदान करैत अछि। त्रिवेन्‍द्रमसँ कन्‍याकुमारी रोडसँ जेबाक रस्‍तामे पद्मनाम पैलेश पर्शनीय थिक। ई वस्‍तुत: आजुक तामिलनाडूमे पड़ैत अछि, मुदा ऐ महलक बेवस्‍था एवम्‍ शासन केरल सरकारक अधीन अछि। पद्मनामपुरम पैलेश १६ मी शताब्‍दीक शानदार लकड़ीक महल थिक। १५५० सँ ई १७५० तक रहल त्रावणकोरक राजा लोकनिक ई महल छल। ई वस्‍तु कलाक केरलक स्‍वदेशी शैलीक उत्‍कृष्‍ट नमूना अछि। प्राचीन आंतरिक अंदरुनी रोझवेड नक्‍काशी ओ मुर्तिकला सजाबटसँ भरल अछि। महलमे १७म ओ १८म शदीक भित्ति चित्र शामिल अछि। महोगनीमे संगीत धनुष, रंगीन अभ्रकक संग खिड़की, चीनी नक्काशीक संग शाही कुर्सी, अद्भुत आकर्षण उत्‍पन्न करैत अछि। राजमाताक महलमे ९० अलग-अलग प्रकारक पुष्‍प डिजाइनक संग लकड़ी ओ सौगानक नक्काशीदार छत आकर्षणक केन्‍द्र अछि। पर्यटककेँ पद्मनाम पैलेश देख कऽ आनन्‍द तँ होइते छैन जे तत्‍कालिन राज घरानाक वैभवक पराकाष्‍ठाक सद्य: प्रमाण सेहो देखबामे अबैत अछि। महलक विभिन्न भागमे घुमैत-घुमैत हम सभ थाकि गेलौं। बाहर आबि कऽ थोड़ेकाल धरि छाहैरमे सुस्‍तेलौं आ तेकर पछाइत कन्‍याकुमारी दिस विदा भेलौं। ◌ १५ जुलाइ २०१७ कानूनी आतंकवाद (भारतीय दण्‍ड संहिता धारा- ४९८ ‘ए’, IPC 498 ‘A’) परंपरागत रूपसँ परिवारिक जीवनमे स्‍त्री अपन पति केर सहायकक रूपमे काज करैत छल। समस्‍या तखन बढ़ि गेल जखन पति-पत्नीक आपसी सम्‍बन्‍धक कटुता परिवारक चौकैठसँ आगू बढ़ल। सहैत-सहैत महिलाक जीवन व्‍यर्थ ओ दुष्‍कर हुअ लगल, आ ओइ परिस्‍थितिसँ मुक्‍तिक एकमात्र उपाय आत्‍म हत्‍या बुझि पड़ए लगलइ। केतेको महिला द्वारा ऐ तरहेँ आत्‍म हत्‍या केलाक बाद समाजक आत्‍मा आइपीसी- धारा- ४९८ ‘ए’ सन हिंसक कानूनक जन्‍म देलक। ऐ कानूनकेँ लागू भेलाक बाद गलत वा सही महिला द्वारा आरोपक एफआइआर थानामे दर्ज भेल। पछाइत पति एवम्‍ ओकर परिवार–अर्थात्‍ वयोवृद्ध माता,पिता एवम्‍ छोट-छोट बच्‍चा सभ सेहो–पुलिसक कृपापर निर्भर रहि ऐ हद तक भऽ जाइ छला जे जखन हुनका पुलिस चाहत तँ जेलमे बन्‍द कऽ दैत। सन्‍ १९८३ मे फौजदारी कानूनमे संशोधन कऽ भारतीय दण्‍ड संहिता (आई.पी.सी.)मे अनुच्‍छेद ४९८ ‘ए’ जोड़ल गेल जइमे मूलत: निम्नलिखित प्रावधान छल- १.      जखन कखनो पति वा ओकर सम्‍बन्‍धी महिलाक संग क्रुड़ता करत तँ अपराधीकेँ तीन साल तकक कैद हएत, संगे जुर्माना सेहो भऽ सकैत अछि। ऐ अनुच्‍छेद हेतु क्रुड़ताक अर्थ अछि- (क)    जानि कऽ कएल गेल एहेन बेवहार, जइसँ सम्‍बन्‍धित महिला आत्‍म हत्‍या करबाक स्‍थितिमे पहुँच जाए किंवा महिलाकेँ शारीरिक वा मानसिक स्‍वास्‍थ्‍यकेँ गंभीर क्षति पहुँचैक। (ख)   सम्‍बन्‍धित महिला वा ओकर निकट सम्‍बन्‍धितसँ सम्‍पैत वा कोनो मूल्‍यवान वस्‍तुक गैर कानूनी मांग करब आ एहेन मांग नहि पूरा भेलापर वा तइ हेतु प्रतारणा करब। भारतीय दण्‍ड संहिताक धारा ४९८ ‘ए’ संज्ञेय, गैर जमानती और गैर-संगठित अपराध थिक। अपराध संज्ञेय एवम्‍ असंज्ञेयमे विभाजित कएल गेल अछि। कानूनी तौरपर संज्ञेय अपराधक जॉंच करब एवम्‍ शिकायत दर्ज करब पुलिसक कर्तव्‍य थिक। ४९८ ‘ए’ एकटा संज्ञेय अपराध थिक। अपराध जमानती वा गैर जमानती भऽ सकैत अछि। ४९८ ‘ए’ गैर जमानी अछि। एकर माने भेल जे न्‍यायिक दण्‍डाधिकारी (मजिस्‍ट्रेट) केँ जमानत देबाक किंवा आरोपित बेकतीकेँ न्‍यायिक वा पुलिस हिरासतमे पठा देबाक अधिकार छइ। चूँकि ४९८ ‘ए’ गैर संगठित अपराधक श्रेणीमे अबैत अछि, अस्‍तु याचिकाकर्त्ता एकरा आपस नहि लऽ सकै छैथ। (मुदा जँ सम्‍बन्‍धित पक्ष मामलाकेँ आपसमे सोझराबैले न्‍यायालयसँ आवेदन करै छैथ, तखन न्‍यायालय मामलाकेँ आपस लेबाक अनुमति प्रदान कऽ सकैत अछि।) कानूनक उपरोक्त प्रावधानमे क्रुड़ताक प्रयोग निम्नलिखित प्ररिस्‍थितिमे कएल गेल अछि- १.      एहेन बेवहार जइसँ महिला आत्‍म हत्‍या हेतु प्रेरित हो। २.     एहेन बेवहार जइसँ महिलाक जीवन, शरीर वा स्‍वास्‍थ्‍यपर गंभीर समस्‍या उत्‍पन्न भऽ जाइक। ३.      महिला वा ओकर सम्‍बन्‍धीक सम्‍पैत लेबाक उद्देश्‍यसँ कएल गेल प्रतारणा। ४.     महिला वा ओकर सम्‍बन्‍धी द्वारा आर पैसा वा सम्पतिक हिस्‍साक मांग नहि मानबाक कारण प्रतारणा। यद्यपि ऐ कानूनकेँ लागू करबाक उद्देश्‍य विवाहित महिलाकेँ दहेज-लोभी पति एवम्‍ ओकर परिवार द्वारा प्रतारणासँ रक्षा करब छल, मुदा बेवहारमे एकर तेतेक दुरुपयोग भेल जे उच्‍चतम न्‍यायालय सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत सरकारक मामलामे आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ केँ कानूनी आतंकवादक रूपमे निन्‍दा केलक। उपरोक्त कानूनसँ पुलिस द्वारा लोकक लौकिक अधिकारक उल्‍लंघनक संभावना बढ़ल। ऐसँ निर्दोष लोक कानूनी धनचक्करक शिकार भेल एवम्‍ मजबूर भऽ कऽ वर्षो-वर्ष कोट-कचहरीक दरबज्‍जा खटखटबए लगल। तेतबे नहि, ऊपरसँ पुलिसक धनबल, राजनीतिक हस्‍तक्षेप, किंवा समाजमे प्रभवशाली वर्गक लिप्‍तता सेहो तइ रूपे काज करए लगल जे ओइ पति एवम्‍ ओइ परिवारक बुझू भगवाने मालिक..! केतेको मामलामे ऐ कानूनक दुरुपयोग विवाहित महिला द्वारा बर पक्षसँ अधिक-सँ-अधिक पैसा ओसलब, किंवा एहेन परिस्‍थिति निर्माण करब रहैत अछि जइसँ जान छोड़ेबाक लेल बर पक्षक लोक महिला पक्षक अनुचितो मांग मानैले बेवस भऽ जाइ छैथ। दहेज निषेध अधिनियम १९६१क धारा २ केर अनुसार दहेज लऽ कऽ माने बिआहसँ पूर्व, बिआहक समय वा बिआहक बाद कहियो देल गेल सम्‍पैत या मूल्‍यवान धरोहरसँ अछि- (१) जे बिआहक एक पक्ष द्वारा दोसरकेँ देल जाइत अछि। (२) माता-पिता वा कोनो आन बेकती द्वारा देल गेल। मुदा मुस्‍लिम विवाह कानूनक अधीन देल गेल मेहर वा (dower) ऐमे शामिल नहि अछि। विवाहक समय कोनो पक्ष द्वारा देल गेल नगदी, गहना, कपड़ा वा अन्‍य कोनो वस्‍तु दहेज नहि मानल वशर्ते ई वस्‍तु सभ विवाहक शर्तक अधिन नहि देल जाइत हो। ऐमे मूल्‍यवान धरोहरक अर्थ भारतीय दण्‍ड संहिता (आइपीसी)क धारा ३०क अनुकूल अछि। आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ मात्र पत्नी, पुतोहु वा ओकर सम्‍बन्‍धी द्वारा लागू कएल जा सकैत अछि। उच्‍चतम/उच्‍च न्‍यायालय बारम्‍बार ई स्‍वीकार केलक अछि जे कानूनक उपरोक्‍त धाराक अधीन ज्‍यादातर मामला झूठ रहैत अछि। अधिकांश मामलामे एकर दुरुपयोग वैवाहिक जीवनमे विवादक स्‍थितिमे पत्नी वा ओकर निकट सम्‍बन्‍धी द्वारा पति वा ओकर निकट सम्‍बन्‍धीकेँ ब्‍लैकमेल करबाक हेतु कएल जाइत अछि। एहेन परिस्‍थितिमे शिकायतकर्त्ता प्रचुर मात्रामे पैसाक उगाहीक प्रयास करै छैथ। एहेन अनगिनित उदाहरण सामने आएल अछि जइमे बिना जाँच-पड़ताल केने पुलिस बुजुर्ग माता-पिता, अविवाहित बहिन, गर्भवती भौजी एवम्‍ छोट-छोट बच्‍चाकेँ गिरफ्तार कऽ लेलक। ऐ तरहक मामलामे निर्दोष लोक मानसिक यातना एवम्‍ उत्‍पीड़नक शिकार भऽ जाइ छैथ। सामान्‍यत: एहेन मोकदमा ५-६ साल चलैत अछि आ मात्र २० प्रतिशत लोककेँ सजा होइत अछि। एहनो भेलै जे जेलसँ छुटि कऽ पति वा आरोपित माता-पिता आत्‍महत्‍या कऽ लेलक। चन्‍द्रभान बनाम राज्‍यक मामलामे दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय कहलक जे ऐमे कोनो संदेह नहि अछि जे अधिकांश एहेन शिकायत छोट-छोट बातपर आपसी अहं एवम्‍ टकरावक कारण तामसमे कएल जाइत अछि जेकर सभसँ गंभीर खामियाजा परिवारक छोट-छोट बच्‍चा सभ भोगैत अछि। अस्‍तु न्‍यायालय पुलिसकेँ निम्नलिखित आदेश देलक। (१)  एफआइआर रूटिनमे पंजीकृत नहि कएल जाए। (२)  पुलिसक प्रयास हेबाक चाही जे मामलाकेँ गंभीर जॉंच-पड़तालक बादे एफआइआर दर्ज करए। (३)  आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’/४०६ क अन्‍तर्गत कोनो मामला बिना डीसीपी (उपायुक्‍त पुलिस) एवम्‍ अतिरिक्‍त डीसीपीक आदेशक दर्ज नहि हएत। (४)  एफआइआर (पंजीकृत करबासँ पूर्व आपसी समझौताक हर संभव प्रयास कएल जाए आ जौं समझौताक कोनो आश नहि रहि जाइक तँ सभसँ पहिने स्‍त्रीधन आ दहेजक वस्‍तुकेँ सम्‍बन्‍धित महिलाकेँ आपस करौल जाए। (५)  मुख्‍य अभियुक्‍तक गिरफ्तारी एसीपी (सहायक आयुक्‍त) अथबा डीसीपी (उपायुक्‍त)क स्‍वीकृतिसँ मामलाकेँ पूरा जाँच-पड़तालक बादे कएल जाए। (६)  संपार्श्‍वक अभियुक्‍त (जेना सासु-ससुर)क मामलामे मिसिल (लाइल)मे डीसीपीक स्‍वीकृति जरूरी अछि। ऐ मामलामे न्‍यायालय ईहो आदेश देलक जे महिलाक उत्‍थान हेतु कार्यरत्‍ स्‍वयंसेवी संगठन एवम्‍ अन्‍य कानूनी संस्‍था सभ ऐ बातक पूरा प्रयास करए जे सम्‍बन्‍धित पक्ष सभकेँ आपसी सहमति बनि जाइक। मामलाकेँ न्‍यायालय पहुँचलाक बादो ऐ बातक लेल न्‍यायालय प्रयास करए। चाही तँ ई जे बिना बाहरी हस्‍तक्षेपक सम्‍बन्‍धित पक्ष मामलाकेँ आपसमे सोझरा लिअए। टी.आर. रमैयाक मामलामे मद्रास उच्‍च न्‍यायालसँ ऐ तरहक निर्देश दैत स्‍पष्‍ट केलक जे एहेन मामलामे पुलिसिया कार्रवाइ पयाप्‍त सावधानी एवम्‍ एहेन छान-बीनक बादे कएल जाएत। ललिता कुमारी बनाम राज्‍यक मामलामे उच्‍चतम न्‍यायालय ऐ बातपर विचार कए रहल अछि जे एहेन मामला उपस्‍थित भेलापर पुलिस द्वारा एफआइआर दर्ज करब अनिवार्य अछि किंवा तइसँ पहिने प्राथमिक पूछताछ जरूरी अछि। चूँकि ई मामला विचराधीन अछि अस्‍तु विभिन्‍न उच्‍च्‍ न्‍यायालय द्वारा देल गेल आदेश/निर्णयक सन्‍दर्भमे पुलिस कार्रवाइ करैत अछि। उच्‍चम न्‍यायालय द्वारा ऐ मामलाक निर्णयक बादे एहेन मामलामे एफआइआर करबाक दशा ओ दिसा अन्‍तिम रूखि लेत। ऐ कानूनसँ भयक वातावरण तँ बनल मुदा एकर दुरुपयोग ज्‍यादा होमए लागल। कनेको निर्दोष लोककेँ लोभ, किंवा प्रतिशोधक आवेशमे फँसा देल गेल। कएक बेर तँ पति एवम्‍ ओकर परिवारकेँ ऐ लेल फँसा देल गेल जे सम्‍बन्‍धित विवाहित महिला ओइ वैवाहिक जीवनसँ हटि कऽ प्रेमीक संग विवाह करए चाहैत छेली। केतेक बेर एहनो भेल जे पति-पत्नी बादमे मिलय चाहैत छल, अपन-अपन गलतीक अहसास करैत छल, मुदा ताधैर अपराधिक मोकदमाक जालवृत्तिमे फँसि चूकल छल, मुदा ओइसँ निकलत केना? कारण ई कानून Non Compoundable अछि माने शिकायतकर्त्ता स्‍वयं चाहियो कऽ एकरा आपस नहि लऽ सकैत अछि। ऐ सभ परिस्‍थितिमे मामला कतेको बेर उच्‍च न्‍यायालय एवम्‍ उच्‍चम न्‍यायालय पहुँचल जैठाम विचारणीय प्रश्‍न छल जे आखिर ऐ तरहक मामला चलबैत रहबाक की औचित्य अछि खास कऽ जखन कि पति-पत्नी आपसमे बातकेँ सलैट कऽ आपसी सहमति बना सुखी परिवारिक जीवन जीबए चाहैत होथि?आखिर एहेन मोकदमा जँ चलितो रहल तँ ऐमे सँ किछु निकलत नहि, कारण शिकायतकर्त्ता अपन बातसँ मुकैर जाएत। मामला कमजोर पड़ि जाएत, चाहे निरस्‍त निरस्‍त भऽ जाएत। मुदा एकर दोसरो पक्ष छल जे केतेको बेर समझौताक आडम्‍बर कऽ गरीब एवम्‍ कमजोर महिलाकेँ अपन शिकायत आपस लेबाक हेतु अनुचित दवाब बनौल जा सकैत अछि। मामला आपस लैतो पुनश्‍य यंत्रणाक नवीनीकरण भऽ सकैत अछि। ऐ सभ प्रश्‍नपर विभिन्न न्‍यायालयमे बारंबार विचार भेल। विवाह सम्‍बन्‍ध विच्‍छेदक प्रक्रियामे लम्‍बित मामलामे दुनू पक्षकेँ मौका पबैत आपसी सहमति बनबैक अवसर न्‍यायालय प्रदान करैत अछि। तहिना आइपीसी ४९८ ‘ए’सँ सम्‍बन्‍धित अपराधिक मामलामे यदि दुनू पक्ष आपसमे बातकेँ सोझराबए चाहैत अछि, सलैट लिअ चाहैत अछि तँ उच्‍च न्‍यायालय सीआरपीसीक धारा ४८२क अधीन अपन विशेषाधिकारक प्रयोग करैत मामलाकेँ रद्द कऽ देबाक आदेश दऽ सकैत अछि। उपरोक्‍त विषयसँ सम्‍बन्‍धित मामला उच्‍चतम न्‍यायालयक समक्ष जीतेन्‍द्र रघुवंशी एवम्‍ अन्‍य बनाम बबीता रघुवंशी एवम्‍ अन्‍य आएल। (जइमे पूर्वमे उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा बी.आर. जोशी बनाम हरियाणा सरकारक निर्णयकेँ बहाल राखल गेल।) जइमे कहल गेल छल जे सीआरपीसीक धार ४८२ क अधीन अधीन उच्‍च न्‍यायालय न्‍यायक हितमे अपराधिक प्रक्रिया वा एफआइआर रद्द कऽ सकैत अछि आ सीआरपीसीक धारा ३२० ऐमे बाधक नहि हएत। प्रीति गुप्‍ता बनाम झारखण्‍ड सरकारक मामलामे उच्‍चतम न्‍यायालय आइपीसी- धारा ४९८‘ए’ केर अधीन कएल गेल शिकायतक दुरुपयोग एवम्‍ बढ़ैत ममलाकेँ धियानमे रखैत केन्‍द्र सरकारकेँ उपरोक्‍त कानूनक समीक्षा करबाक हेतु कहलक। तदनुसार भारत सरकारक आग्रहपर विधि आयोग ऐ विषयमे गंभीरतासँ विचार करैत अपन २४३म प्रतिवेदनमे संस्‍तुति केलक जे ऐ अपराधकेँ न्‍यायालयक आज्ञासँ (Compoundable) बना देबाक चाही मुदा आयोग ऐ अपराधकेँ गैरजमानती बनौने राखए चाहलक ताकि समाजक दूरगामी कल्‍याणकेँ धियान रखैत ऐ कानूनक धार भोथ नहि होइक। ओयोगक कहब जे गिरफ्तारी सम्‍बन्‍धी लागू कानूनी निर्देश एवम्‍ मामलाक गहन छानबीन केलासँ एवम्‍ हिंसा सन गंभीर परिस्‍थितियेमे गिरफ्तारी केलासँ ऐ कानूनक दुरुपरोगसँ बँचल जा सकैत अछि। जुलाइ २०१४ मे न्‍यायमुर्ति सीके प्रसाद एवम्‍ पी.सी. घोषक उच्‍चतम न्‍यायालयक बैच द्वारा देल गेल निर्णयमे स्‍पष्‍ट कएल गेल जे धारा ४९८ ‘ए’ केर अधीन बिना मजिस्‍ट्रेटक आदेशक गिरफ्तारी नहि एहत। उच्‍चतम न्‍यायालयक कहब छल जे अधिकांश एहेन मामलामे महिला ऐ कानूनक दुरुपयोग करैत पति, सासु,ससुर आदिसँ बदला लइ छैथ। ऐ तरहक प्रकरणमे बहुत कम लोककेँ सजा धोषित हेबाक उद्धत करैत माननीय न्‍यायालय राज्‍य सरकार सभकेँ आदेश देलक जे पुलिस क्रीमिनल प्रोसीड्योर कोड (सीपीसी) क धारा ४१मे वर्णित मानकक अनुसरण करए एवम्‍ अपवादिक मामलामे अत्‍यावश्‍क भेने आरोपित बेकतीक गिरफ्तारी करए। सम्‍बन्‍धित मजिस्‍ट्रेट सीपीसीक धारा ४१ क अधीन पुलिस द्वारा प्रेषित प्रतिवेदनक विवेचना करैत बेकतीगत रूपसँ संतुष्‍ट भेलाक बाद एवम्‍ तेकर औचित्‍यक लिखित आधार बनबैत गिरफ्तारीक स्‍वीकृति प्रदान करए। उपरोक्‍त मामलामे फैसला दैत माननीय न्‍यायाधीशगण कहलैथ जे सन्‍ २०१२ मे दू लाख बेकती ऐ कानूनक अन्‍तर्गत गिरफ्तार भेला। जे सन्‍ २०११क संख्‍यासँ ९.४ प्रतिशत ज्‍यादा अछि। जइमे लगभग एक चौथाइ (४७९५१) महिला छेली। ऐसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि जे आरोपित पतिक माए, बहिनकेँ सेहो काफी तादादमे गिरफ्तार कऽ लेल गेल। उपरोक्‍त कानूनक तहत आरोप पत्रक दर ९३.७ प्रतिशत अछि जखन कि मात्र १५ प्रतिशत लोककेँ अन्‍तत: दण्‍डित कएल जा सकल। विभिन्न ट्रायल कोर्टमे ३७२७०६ मामला लम्‍बित अछि जइमे सँ लगभग ३१७००० मामलामे आरोपितकेँ छुटि जेबाक संभावना अछि। माननीय उच्‍चतम न्‍यायालयक कहब छल जे गिरफ्तारी बेकतीगत स्‍वतंत्रताक हनन तँ करिते अछि, संगे ई अपमान-जनक सेहो अछि। स्‍वतंत्रताक छह दशक बादो पुलिस अखन धरि उत्‍पीड़न, उत्‍पीड़नक साधनक रूपमे जानल जाइत अछि, जनताक मित्र तँ नहियेँ। अतएव उच्‍चतम न्‍यायालय गिरफ्तारीमे सावधानीसँ निर्णय लेबाक हेतु मजिस्‍ट्रेट लोकनिकेँ अगाह केलक। इन्‍दरराज मलिक एवम्‍ अन्‍य बनाम श्रीमती सुमिता मलिकमे दिल्ली उच्‍च न्‍यायालय बेवस्‍था केलक जे आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ दहेज निवारण कानूनक धारा ४ सँ एकदम अलग अछि, कारण दहेज कानूनमे मात्र दहेजक मांगसँ अपराध भऽ जाइत अछि। जखन कि आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ मे पति तथा पतिक परिवार द्वारा दहेजक मांग संगे-संग क्रुड़ताक बेवहार जरूरी अछि। आधुनिकीकरण, शिक्षा, वित्तीय सुरक्षा एवम्‍ बेकतीगत स्‍वतंत्रतामे वृद्धिक संग कट्टरपंथी महिला सभ आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’केँ एकटा हथियारक रूपमे दुरुपयोग कऽ रहल छैथ। कानून बनलाक केतेको सालक बादो ऐ कानूनक उचित समीक्षा नहि भेल जइ कारणसँ एकर दुरुपयोगक मामलामे लगातार वृद्धि भेल आ निर्दोष एवम्‍ व्‍यर्थमे फँसौल गेल पति तथा ओकर सम्‍बन्‍धी त्राहिमाम कए रहल छैथ। विभिन्न न्‍यायालय, गैर सरकारी संगठन सभ ऐ विषयपर लगातार मंतव्‍य दऽ रहल छैथ, कानूनमे संशोधनक हेतु सेहो चर्चा होइत रहैत अछि। मुदा ऐठाम ईहो महत्‍वपूर्ण अछि जे एक पक्षीय संशोधनसँ कानून बनाबक मूल उद्देश्‍ये ने नष्‍ट भऽ जाए। ऐमे कोनो दू मत नहि जे केतेको मामलामे विवाहित महिलाकेँ जीवन ओ सम्‍मानपर संकट ओकर सासुरमे उत्पन्न भऽ जाइत अछि  आ ओ मजबुड़ीमे सभ किछु सहैत अछि। सहैत-सहैत केतेको महिला तंग भऽ आत्‍म हत्‍या लेल सेहो विवश भऽ जाइ छैथ। अस्‍तु, ऐ कानूनक दुरुपयोगसँ उत्‍पन्न समस्‍याक समाधान हेतु बीचक रस्‍ता निकालबाक चाही जइसँ निर्दोष लोककेँ फँसौल नहि जाइक आ दोषीकेँ उचित दण्‍डो होइक आ समाजमे सम्‍मानक संग महिलो जीबैथ। अपन समाजमे कहबी छेलइ जे जेतए कनियॉंक डोली अबै ओतहिसँ अर्थी उठइ। मुदा आब युग बदैल गेल अछि। निष्‍ठाक समस्‍त जिम्‍मा मात्र महिलाक नहि भऽ सकैत अछि। लोक परिवर्तित परिस्‍थितिसँ जँ तालमेल नहि बैसोलक तँ जीवन भमरमे केतए जा कऽ थम्‍हत तेकर कोनो ठेकान नहि। शिक्षित बर-कनियॉं सभ रोजगार हेतु विश्व भरिमे पसैर गेल छैथ। गाम-घरक बात गामेमे सलटा लिअ से आब तथ्‍यपरक नहि रहि गेल। अपनो समाजमे विवाह विच्‍छेदक चलन बढ़ि गेल अछि। कानूनक रस्‍ता अख्‍तियार करैत केतेको परिवार नष्‍ट भऽ रहल अछि। प्रेम ओ सिनेहपर आधारित सम्‍बन्‍धकेँ कानूनक कुरहैरसँ चोट देल जाएत तँ परिणाम की हएत? परिवारिक मर्यादाक रक्षाक हेतु सन्‍तानक भविस बँचबैक लेल एवम्‍ जीवनमे सुख-शान्‍तिक स्‍थापना हेतु आवश्‍यक अछि जे हम सभ भारतीय संस्‍कारकेँ कटकटा कऽ पकैड़ ली आ पकड़नहि रही। त्‍येन त्‍येक्‍तेन भुंजीथा:। त्‍यागक गरिमा जखन जीवनमे लक्षित हएत, सभ अपने ठीक भऽ जाएत। ◌ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा "चक्रफाँस (मैथिली खिस्सा ) " दीपक बीसीए क के पूना के एकटा कंपनी में डाटा प्रोसेसर के पद पर काज करय छलाह । बीसीए कयलाक क बाद इ नौकडी় हुनका कोनो अनेरहे भेंट गेल होय एहन बात नै छल, मुदा हुनकर लगन, प्रतिभा आ भाग्य बले हुनका ई नौकडी় भेंट गेल छल अन्यथा हुनके कै टा संगी सभ एम्हरे-आम्हरे कय रहल छलाह। ओना जौं लंगोटिया दोस सब के बात करी त ओ सब हिनका स बढिये पोजिसन पर पहुंच गेल छलाह। रूपेश इलेक्ट्रोनिक इंजिनियरिंग क के इन्फ़ोसिस में छलाह त नंदन मैकेनिकल इंजिनियरिंग क के रिलायंस में । आषीश सेहो सरकारी बैंक में क्लर्क भ गेल छल । तखन इ छल जे दीपको ठीक-ठाक पोजिशन पकैड় नेने छलाह । एही बीच में देशऽक युवा वर्ग सब में राष्ट्र्भक्ति के नया हरबिर्रो उठि गेल छल। इलेक्ट्रोनिक मिडिया से ल के सोशल मिडिया तक में विविध प्रकार के उत्तेजक फ़ोटो, विडियो आ लिंक साझा करय जाय लागल छल । कालेजऽक कैंटीन से ल क आफ़िसऽक कैंटीन तक बस एतबे बहस। सेना की कय रहल अछि पाकिस्तान की कय रहल अछि, अमुक ग्रुप के छात्र सब देशद्रोही थिकाह, अमुक क्षेत्र के लोक सब देशद्रोहि थिकाह, बस यैह सभ चर्चा। दीपक सन भावुक लोक के कखनो काल ई अतिश्योक्ति देख मोन आरिज भऽ जाय छल त कखनो के ओ भावुक भऽ अपने आपे के कोसऽ लागै छहाल। इंटर पास करय के बाद दीपक एनडीए के परीक्षा में बैसल छलाह। पहिल प्रयास में त नै भेलैन ,मुदा दोसर प्रयास में ओ लिखित परीक्षा पास कऽ गेल छलाह। मुदा जखन एसएसबी के लेल भोपाल गेल छलाह त ओत घोर निराशा हाथ लगलैन। गा̐व आ दरिभंगा में पढल लड়का, नै अंग्रेजी बाजय में फ़र्राटेदार आ नै हिन्दी बाजय में ओ द̨ढता आ आत्मविश्वास! लिखित परीक्षा आ रिज्निंग राउंड तक त ठीके रहलैन मुदा जखन स्टोरी राईटिंग आ ग्रुप डिस्कसन राउंड आयल त हिनकर हाथ-पैर फ़ुलय लगलैन। अस्तु, ओ अगिला राउंड में नै पहुंच सकल छलाह। अहिना एक बेर बिहार मे प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षक के भर्ती निकलल । हिनको कै टा संगी आ गौंआ सब फ़ोर्म भरलक। ओ सब हिनको उकसैलक जे तोहुं भैर लैह हौ मीता, भ गेलह त बुजह जे आरामऽक नौकडी भ जेत अपन प्रदेश में । बाबू सेहो सैह राग अलापै छलखिन्ह। बाबू बाजल छलखिन्ह जे जतेक पाई ओत दै छौ लगभग ततेक पाई त एत्तौ भेटिए जेतौ। दीपक उत्तर में बजने छलाह जे बाबू से त ठीक अछि मुदा एत्त हमरा आगा तेजी स उन्नति भेटत ओतय से बात नै ने रहतै यौ। ऐ पर बाबू बजलाह जे देखह ओतय जत्तेक खर्च छ गाम-घर मे ओकर अपेक्षा खर्च कत्तेक कम हेत सेहो ने सोचह। तैं एकबेर ट्राई करऽ मे कोनो हर्ज नै। एहि प्रकारऽक  घमर्थन के बीच दीपक के मोन मे एकबैगे एकटा सोच जगलैन। ओ सोचय लगलाह जे जौं हमरा मास्टरी में भ जाय त हमरा लेल इ एकटा अवसर हेतै अपना गाम-घर दिस के बच्चा के पढाबय-लिखाबय के । यदि हम अपन प्राप्त ग्यान आ अनुभव के उपयोग क के मेहनत से किछु धिया-पुता के पढाबय के प्रयास करब त निश्चिते प्राथमिक-माध्यमिक स्तर पर किछु बच्चा में ओ ग्यान आ आत्मविश्वास भैर सकै छी जैसे ओ आगा दुनिया में स्पर्धा क सकै। फ़ेर बाबूओ ठीके कहै छथिन जे भ सकै अछि जे वापस गामऽक रस्ता धेने हमर करियर ओ मोकाम हासिल नै क सकै जे पूना में रहि क अगिला १०-१५ साल  में हम प्राप्त क सकै छि मुदा गाम-घर में ओइ अनुसार खर्चो कम हेतै आ अपन क्षेत्र में रहय के आनन्द सेहो त भेटतै । यैह सब सोचि क दीपक अप्लाई क देलाह। भगवती के इक्षा एहेन भेलैन जे दीपक ओई परीक्षा में सेलेक्ट भऽ गेलाह आ हुनका ट्रेनिंग के लेल सरकारी पत्र प्राप्त भेलैन । आब ऐ विषय पर लंगोटिया सब में ह्वाट्सएप ग्रुप में घमर्थन शुरू भेल । नंदन बजलाह जे बड्ड निक मिता जाउ जिब लिय अपन जिनगी….क लिय मजा । ऐ पर रूपेश बाजल छल जे एहेन कोन बडका नौकडी় लागल छैन, से हमरा लेखे त ऐ मे ज्वाईन केने कैरियर ग्रोथ पर ब्रेक लागि जेतैन । दीपक संग दैत बजलाह जे हमरो येह चिन्ता अछि। उत्तर में नंदन फ़ेर बजलाह जे "यौ भाई ई कियेक नै बुझै छि जे कतबो अछि त अछि त ई सरकारिए नौकडी की ने । ऐ मे सेलरी से बेसी उपरी कमाई देखल जाई अछि। आब देखियौ ने आशीष भाई के छैन त क्लर्के के नौकडी় ने यौ मुदा हुनका हमरा- अहां से बेसी तिलक भेटलैन अछि से किछु देखिए के भेटलैन अछि कि ने! औ दीपक मीता अहौक जैम क तिलक भेंटत, ज्वाई करू मास्टरी ।" "हमरा तिलक-दहेज के कोनो लोभ नै अछि मुदा आशीष एहन कोन कमाई करै छथि बैंक में !" – दीपक बजलाह। ऐ पर आशीष दार्शनिक के मुद्रा मे बजलाह जे बैंक लोक सभ के बकरी कीनय से ल के बकरी फ़ार्म खोलय तक के आ इंजिनियरिंग में नां लिखबय से ल के इंजिनियरिंग कालेज खोलय तक के लेल लोन दैत अछि। आ ऐ सभ प्रकारऽक लोन में बैंक अधिकारी-कर्मचारी सभ के ’कट’ फ़िक्स रहै अछि। अहिना अहौं के टिप दऽ दैत छी जे स्कूल में मिड डे मीळ से ल के भवन के रख-रखाव आ साईकिल वितरण से ल के स्कोलर्शिप वितरण तक में ’कट’ के जोगार रहै अछि आ बेसी हाथ-पर मारी त वोटर कार्ड से ल के राशन कार्ड आ स्वच्छ भारत से ल के इंदिरा आवास तक में ’कट’ भेटय के गुंजाइस रहै अछि। आ मास्टरी संग त अहां साईड बिजनेसो क सकै छी। एलआईसी एजेंट बनि जाउ, या लोन एजेंट या कोनो आन धंधा क लिय। बीच-बीच में स्कूल जाय हाजरी बना लिय आ हावा-पाईन लय आबु। इ सब सुनि क दीपक व्यथित भाव स बजलाह जे हम ऐ प्रोफ़ेशन में इ सब गोरख-धंधा करय लेल नै जाय चाहै छी । हमर उद्देश्य अछि अपन क्षेत्र क बच्चा सब के नीक शिक्षा भेटै तय में हमर योगदान हो। तैं हम बस अपन आर्थिक भविष्य आ करियर ग्रोथ ल क आशंकित छी। "तखन अहां बूडि छी" एहि बेर नंदन टोकलक । यौ भाय लोक एकटा काज छोडि় क दोसर धरै अछि अपन प्रगति के लेल दू टा पाई बेसी कामाबी ताहि लेल आ कि अनेरहे ……… बीच में बात कटैत दीपक द्रिढता से बजलाह जे नंदन भाय, अहां जे व्हट्सएप से लय के फ़ेसबुक तक पर भरि दिन राष्ट्रभक्ति के राग अलापैत रहै छी से खाली अनका ज्ञान ठेलय लेल आ कि किछु अपनो अमल में लाबय लेल आ कि बस अपन कुंठा मिटब के लेल! नंदन के समर्थन करैत रूपेश बजलाह जे दीपक भाय अहां अनेरे भावुक भ रहल छी। वास्तव में ई देशभक्ति, राष्ट्रवाद, ईमानदारी आदि शब्द नेता सभ के गरियाब लेल, कि समर्थन लेल आ कि अपन कुंठा मेटाब लेल, हवाबाजी लेल, दोसरा के परतार लेल प्रयुक्त होई अछि, मुदा वास्तविकता के धरातल पर अहां कोना क के अर्थ (धन) कमाबी यैह सबसं पैघ सोच होय अछि। अहांके समाज में इज्जत ऐ ल के नै भेंटत जे अहां कतेक शुद्ध आ समाजवादी आचरण रखै छी बल्कि ऐ से भेंटत जे अहां धन संचय करय में कतेक काबिल छी (चाहे ओकरा लेल जे तरीका अपनाबी)। आ देखु अहौं जे दुविधा में छी ओकर कारण करियर ग्रोथे त अछि । ऐ घमर्थन के बीच दीपक के मोन के दुविधा मेटा गेल छल ओ उत्तर दैत बजलाह "भ सकै अछि जे लोक हमरा बताहे क के बुझि लैथ मुदा आब हम इ नौकडी় ज्वाईन करब आ ओहि उद्देश्य लेल करब जे हमर मोन में अछि। रहल बात अर्थोपार्जन के त किछु आर तरीका सेहो अपनायब जेना विद्यालय के बाद के समय में ट्युशन, छोट-मोट सोफ़्टवेयर/वेबसाईट/प्रोजेक्ट/डाटा-एन्ट्री वर्क आदि के कार्य करय के प्रयत्न सेहो रहत। जौं भगवति कऽ आशिर्वाद बनल रहलै त जिनगी ठीके-ठाक कटि जेतै ।" दीपक के पोस्टिंग अपने जिला के एकटा आन प्रखंड के एकटा माध्यमिक विद्यालय में भ गेल छल ।  दीपक ओतबे उत्साह आ आशा के संग विद्यालय ज्वाईन केलाह जतेक उत्साह आ आशा सं कोनो सासु अपन नबकी कनिया के दुरागमन काल में परिछण करै छथि। मुदा किछुए दिन में दीपक के विद्यालय में पसरल अव्यवस्था के भान भ गेल। विद्यालय में अनुपस्थिति के मामिला में मास्टर आ विद्यार्थी में जेना कोनो अघोषित शर्त लागल होय! माने पचास प्रतिशत सं बेसी नै मास्टर के उपस्थिति रहै आ नै विद्यार्थी के । विद्यालय भवन के हाल सेहो तेहने सन भेल छल जेना कोनो स्त्री के, जिनकर वर बहुत दिन से बाहर कमाय लेल गेल होइथ आ सासुर में केयौ मानऽ बला नै होइन । शौचालय के नाम पर २ टा शौचालय टूटल-फ़ाटल गन्हाइत जैमे नाक नै देल जा सकै अछि आ दू टा मास्टर सब लेल कनि ठीक-ठाक अवस्था में जै में ताला मारल रहै छल । कियेकि आधा मास्टर सदिखन अनुपस्थिते रहै छलाह तैं किछु क्लास या त खालिए रहै छल अथवा दू टा तीन टा क्लास के एक्के संगे बैसा देल जाय छल । ई अव्यवस्था देख दीपक के मोन खिसिया गेलैन। ओ एकरा विषय में बिईओ साहेब के विस्तार पूर्वक लिखलाह आ हुनका से ऐ विषय में उचित कार्यवाही कर के निवेदन केलथिन्ह। किछु दिन बाद बिईओ साहब एलाह आ विद्यालय के निरिक्षण केलखिन। पूरा काल हेडमास्टर, किरानी आ लगुआ-भगुआ मास्टर सब हुनका घेरने रहलैन आ विद्यालय के अव्यवस्था के झांप के पूर्ण प्रयास केलाह । आब दीपक उम्मीद करै छलाह जे प्रखंड से किछु कार्यवाही हैतैक। मुदा एहन त किछु नै भेल परंच एक दिन मुखिया आ सरपंच पहुंचलाह स्कूल पर। पंहुचैत देरी दीपक के पुछारि भेलैन। दीपक आबि क हुनका सब के प्रणाम-पाती केलखिन्ह। मुदा प्रणाम के उत्तर देने बिना हुनका पर प्रश्न दागल गेल जे यौ दीपक बाबू! अहां एतय नौकडी় करय लेल एलहु अछि कि राजनीति करै लेल? जं राजनीति करै के अछि त खुलि क बाजू आ नै त एम्हर-आम्हर के बात सब नै कैल करू । चुपचाप विद्यालय में आउ, समय बिताबु आ आराम से दरमाहा लेल करू बस। "आ जौं दरमाहा कम बुझना जाय त टोली बना के सरकार के आगा धरना-प्रदर्शन करू" किरानी बाबू बीच में बात लोकैत व्यंगात्मक लहजा में बजलाह । दीपक उत्तर में कुछु नहीं बजलाह। हुनकर मोन बड्ड कुंठित आ व्यथित भ गेल छल । दीपक के मलिन मु̐ह देख के एक दिन मंडल सर पुछलखिन जे हौ दीपक, एना कियेक मोन मलिन केने छहक? सिनेहऽक छा̐ह भेटने दीपक के मोन द्रवित भ गेल। ओ बजलाह जे सर, हम अपन करियर आ महानगरऽक जीनगी छोडि় क इ नौकडी় पकड়ने छलहु̐ ई सोचि क जे अप्पन गाम-घर के धिया पुता सब के निक शिक्षा देबय में अपन योगदान करब। मुदा एत ओकरा लेल जे माहौल भेंट के चाहि से त अछिए नै, उल्टे धमकी भेटै अछि। ऐ पर मंडल सर बजलाह "हौ कि करबह, इ समाजे एहने अछि। ई हेडमास्टर, किरानी, मुखिया, चपरासी, इ सभ एहि समाज के छैथ कि ने हो, कोनो लंदन से त आयल नै छैथ! तोरा कि लगै छ: जे इ जतेक गोरख-धंधा होय अछि से कि मुखिया-सरपंच के बुझल नै रहै छै। हौ, ऐ सब में ओकर सब के हिस्सा राखल रहै छै।" मुदा सर ऐ विद्यालय में बच्चा त ग्रामीणे के ने पढै अछि, तखन लोक सब एहन चोर मुखिया-सरपंच के कियेक चुनै छथि! "हौ ई एकटा जटिल सिस्टम चक्र अछि जै में सबहक भागिदारी के तीली देखबह।" मंडल सर प्रतिउत्तर में बजलाह। "देख, ऐ विद्यालय में समाज के किछु एहनो सक्षम वर्ग के बुतरू सब के नामांकन भेल अछि जिनकर बुतरू सब वास्तव में कोनो पब्लिक स्कूल में पढि रहल अछि। मुदा सरकारी योजना के लाभ लेब हेतु ओ सब नामांकन एतहु करौने छथि। विद्यालय प्रशासन से हुनका ई लाभ भेटै छैन जे बिना विद्यालय एनहि हुनकर सब के हाजरी बनि जाय अछि आ सरकारी योजना सब के लाभ भेट जाय अछि। ताहि एवज में ओ सभ एहन चोर मुखिया-सरपंच के चुनै छथि। " "मुदा एना करै के बजाय यदि ओ सक्षम लोक सब एत्तहि निक पढाई के लेल जे दवाब बनेथिन त कदाचित एत्तहु निक पढाई भेंट सकै छैन जै से ओ सभ पब्लिक स्कूल के महरग फ़ीस के चक्कर से सेहो बा̐चि सकै छैथ!" दीपक बजलाह। मंडल सर एकटा गहिर सा̐स छोडैत बजलाह "ह̐। मुदा ऐ मे हुनका सब के एकटा भांगट ई बुझना जाय छैन जे फ़ंडऽक कमी स̐ सरकारी विद्यालय में ओ इंफ़्रास्ट्रक्चर आ सुविधा नै अछि जेकर दरकार अछि आ दोसर जे कदाचित इ मनोविचारधारा सेहो काज करै अछि जे तखन त हुनकर बच्चा संगे आनो (आर्थिक अक्षम) लोक सब के बच्चा सब सेहो आगु बढि जायत जे कदाचित इ वर्ग के पसंद नै छैन ।" मुदा एहनो लोक सब के त समाज में कमी नै जिनका सब के सरकारी विद्यालय में निक शिक्षा भेंटय से लाभ होउ। से सब किये नै एहन मुखिया-सरपंच सब के विरोध करै छैथ? – दीपक पुछलाह। "नाना प्रकार के दबाव, जागरूकता के कमी, रोटी-पानि में ओझरायल रहै के कारणे आ भ्रामक प्रचारतंत्र एकर कारण अछि" – मंडल सर बजलाह । ऐ प्रकारे किछुए मास में दीपक के ओय कुचक्रव्युह के जानकारी भ गेलैन जै में शिक्षा व्यवस्था(सिस्टम) ओझरायल छल । मुदा ऐ चक्रव्युह के तोडी कोना से कोनो मार्ग नै भेंटय छल।  कोनो आर सक्षम लोक के सहायता के उम्मिदो लगेता त मार्ग रोकय लेल कैएक टा जयद्रथ ठाढ भेल छल। छुट्टी में जखन ओ गाम गेलाह त अपन मोनऽक व्यथा बाबा के सुनेलखिन्ह। बाबा कहलखिन्ह जे बौआ जखन उखैर मे मु̐ह दैये देलह त मु̐सर स̐ किये घबराय छह। तों त बस अपन कर्तव्य करह, बा̐कि विधाता पर छोडि় दहक। मोन लगाक धिया-पुता के पढाबह लिखाबह। एहन त नै अछि जे तों किछु अजगुत देख रहल छह। हमरा पीढि स̐ ल के तोरा पीढि तक लोक सीमिते साधन में ने पढलक अछि हौ। दीपक के बाबा के बात ज̐चि गेल । बस फ़ेर की ओ एम्हर-आम्हर के कुव्यवस्था के देखनाय छोडि क बच्चा सब के पढबै पर ध्यान देबय लगलाह। एक्स्ट्रा क्लास सेहो लेबय लगलाह। जल्दिए ओ छात्र सब आ किछु गार्जियन के बीच लोकप्रिय भ गेलाह। एम्हर ओ १५ अगस्त के अवसर पर छात्र सब के बीच छोट-मोट प्रतियोगिता के आयोजन के योजना बना रहल छलाह आ ओम्हर करमनेढ स्टाफ़ सब में खुसुर-फ़ुसुर चालु भ गेल छल। फ़ेर एकदिन दीपक जखन अपन योजना ल के हेडमास्टर लग पहु̐चलाह त हेडमास्टर बात कटैत बजलिह जे पहिने  इ कहु जे कि अहां विद्यालय के बाद ट्यूशन करै छी? जी ह̐।-दीपक उत्तर में बजलाह। त की अहांक नियमावली नै बुझल अछि?-हेडमास्ट्र बजलिह। जी बुझल अछि मुदा हम ई विद्यालय समय के बाद करै छी आ ऐ से विद्यालय में हमर शिक्षण पर कोनो प्रभाव नै पडै় अछि, विद्यालय में सबस̐ बेसी क्लास हम लै छी ई विद्यालय के बच्चा-बचा जनै अछि। आ आन आन शिक्षक सभ त नै जानि कतेक तरहक व्यवसाय करै छैथ आ ओहो विद्यालय के समय में, आधा टाईम गैबे रहै छैथ। - दीपक आवेश में एक्कै सुर में बाजि गेलैथ। "अहा̐ बेसी काबिल बनै छि की? लोक की करै अछि से देखनाहर अहां के? अप्पन काज करू, हमरा की करय के चाही से जुनि बताउ। बेसी उड়ब त लिखित में ग्यापन पकडा় देल जायत अहां के ।" – हेडमास्टर साहिबा झिड়की दैत बजलिह। दीपक उखरल मोन सं ओतय से घुरलाह।  हुनका हेडमास्टरो के गोरखधंधा बुझल छल। ओकर वर ठेकेदार अछि, आ विद्यालय के अधिकांश कार्य/आपूर्ति के ठेका ओकरे भेंटै अछि। मुखिया-नेता सब से सेहो संबंध। आ जे लोक समाजऽक लेल किछु काज करय चाहै अछि तेकरा ज्ञान देबय चललिह अछि! अगिला दिन किरानी हिनका हाथ में एकटा आर्डर थम्हा देलैन जेकर अनुसार हिनका प्रखंड के कोनो योजना के कार्यान्वयन के लेल सर्वेक्षण के कार्य में लगा देल गेल छल। मतलब जे हिनका विद्यालय में छात्र के पढाबै के कार्य से हटाब के नया षडयंत्र रचि देल गेल छल। दीपक हाथ में आर्डर नेने ई नव-संघर्ष के विषय में सोचय लगलाह। आब त इ समये बता सकै अछि जे दीपक व्यवस्था(सिस्टम) के ऐ चक्रफ़ा̐स स̐ बचि क निकैल पाबै छैथ की नै? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मिथिलेश कुमार सिन्हा "माया" (बीहनि कथा) "हेह, सुनै छियै ?" "----" "सुनू नै !" "की कहै छी ?" "चाय नहि भेंटतै की ?" "थम्हू अखन कनियां के इस्कुल जाय मे बिलंब भ' रहल छैन्ह. हुनकर नाश्ता बना रहल छी. कनेक कृष्णा कें  सम्हारियौ नै, कनियां के तंग कैने छै !" किचन सं ठेंसगर जबाब भेंटलैन्हि. "पप्पू केम्हर छै जे कृष्णा  के हम  सम्हारु ?" ओ बजलाह. "ओ मोटर साईकिल साफ क' रहल छै, कनियां के इस्कुल पहुंचैते ने...!" "बेस, कत' गेलौं यौ कृष्णा बाबूsss...? चलू पोखरि मे माछ देखाबै छी !" चाह'क मोह त्याग उठि कृष्णा केर लगलाह पोल्हाव' ! कनियां,पप्पू संग इस्कुल लेल विदा भ' गेलीह. "हे आबो त' चाय पीया दिय !" "थम्हू अखन, पप्पू लेल नाश्ता बनौबाक अहि, ओकरो ने आफिस जैबाक बेर भ' गेलैए ?" हुनक पत्नी बजलीह. पप्पूओ विदा भ' गेलै अप्पन आफिस ! चाय'क आस मे ओ बेकल छलाह,"आबो चाय भेंटतै की ?" "हां, छानि रहल छी, लाबि रहल छी." पत्नी'क मधूर आवाज भेंटलैन्ह. "लिअ" "एसगरे खाली हमहीं ?" "ई चाह'क बेर छै ?" "लाबू एकटा कप, एकरे मे बांटि लैत छी. कनी हमरो लग बैसू नै ! खाली काम, काम....." "देखहीं, एहि उमैर मे...." बजैत-बजैत झेंपि गेलिह. "आहि कहू त'.... हमर अहां जीवन संगनी छीयै, हमरो दीस कखनो धियान दियौ !" ओ कनेक रोमांटिक भ' गेलाह आ हुनक हाथ अपन हाथ मे लैत बजलाह,"हमर त' एकदोसरे मे नै संसार एहि, एक्को बिनु हम अधूरे छी, बांकि सभ माया थीक.... सत्य छै त' हमर एकदोसर केर प्रति समर्पण.... प्रेम....!"  "की भ' गेलै यै ई बूढ़वा के ?" पत्नी हंसैत बजलीह," देखियौ त' एहि उमैर मे बहैक गेलखिन यै !" "नहि पप्प मांं, हम बहैक नहि रहलहुं यै. हम एकदोसर सं जखने विमुख भ' जायब तखने बेटा-पूतोहु सभ'क नजरि मे टूअर भ' जाएब, केओ नै भैल्यू देत.... ने बेटा, ने बेटी ,ने पूतोहु, ने आन केओ !" "की पगला जकां बात क' रहल छी , की भ' गेलैए ?" "हमर एकदोसर केर प्रति आकर्षण कतओ हेरा गेलैए, अहां पर सं हमर अधिकार छीना गेलैए.... एकटा चाह'क लेल मजूरी कर' परैए.... की कहु पप्प् मां.....  ककरा कहू, हमर ने मां छथिन नै बाबू, अंही सं ने कहबै, हमर सुनवो वास्ते किछु टेम निकलू पप्पू मां...." कहैत-कहैत ओ फफैक-फफैक कान' लागलाह.  पत्नी अवाक, कृष्णा अवाक.....!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हार- -2 टा गजल ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- ४ टा गजल ३.३.प्रणव झा- जनप्रतिनिधि ३.४.राजेश मोहन झा 'गुंजन' - काटि गेल जुट्टी (हास्य रस) ३.५. पल्लवी मण्डल- बेटी आशीष अनचिन्हार 2 टा गजल 1 छै सभ कियो असगर अपने अपन सहचर ई आगि ओ आगि दुन्नू रहल मजगर बुझबै अहाँ सभ किछु एतै जखन अवसर जीवन मने बिजनस रिस्को रहत कसगर संवेदना टूटल खूनो रहै पनिगर सभ पाँतिमे 2212-22 मात्राक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिक लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। 2 छन भरि के पहिचान छै जीवन भरि अनुमान छै सोना चानी बैंकमे आँचरमे दुभि धान छै पुरहित आ जजमान संग अपने ओ भगवान छै चुप्पे रहलहुँ देखितो केहन ई अभिमान छै स्वामी अनचिन्हार जी हमरे सन बइमान छै सभ पाँतिमे 222+2212 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि मकतामे हमरा जनैत दोष छै। पहिल पाँतिमे "जी" आदर सूचक छै तँ दोसर पाँतिमे "छै" बराबरी सूचक। आग्रह जे उपाय बताएल जाए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ४ टा गजल (1) सभ घर सभ आंगनमे देखल चोरा-नुक्की पसरल जन-जीवनमे देखल चोरा-नुक्की कखनो नाचय कखनो कानय सभ दुनियामे सभतरि तन-मन-धनमे देखल चोरा-नुक्की परवत-सन भारी आ हल्लुक तूरे-सन सभ सभदिन सभ दरपनमे देखल चोरा-नुक्की जहिना आबय तहिना जाइछ सरदी-गरमी पल-पल परिवरतनमे देखल चोरा-नुक्की जे  हेतै  से नीके  हेतै  कहइछ  गीता अन्तक अभिनन्दनमे देखल चोरा-नुक्की (मात्रा-क्रम :222222-222222 ) (2) भात दालि तरकारी ला मंगनी पैंच उधारी ला सभ चाही एखने चाही बेचिक’ घ’र घरारी ला उपनयनक  अर्थ  की गहना आ धोती साडी ला परम्परामे पिसा गेलौं चल कोनो बुधियारी ला ईहो दुःख, थिक पाहुन झटद’ पान सुपारी ला बियाहसं विधिए भारी बदलबाक  तैयारी ला राम-राज हो दुनियामे हुनके-सन भैयारी ला ( सरल वार्णिक बहर, वर्ण-9 ) (3) ऐ ठामक लोक बदलाम किए छै सभ रस्तापर एत्ते  जाम किए छै ने खा सकैत छी ने पीबि सकैत छी एहनो वस्तुक  एते  दाम किए छै जकरा नै सोहाइ छै भाएक ख़ुशी ओकरा  ठोरपर  श्रीराम  किए छै नै एलै  झोडी  टांगैले’ उपनैनमे एहेन निसोख चारू माम किए छै ए सी कारमे बैसल कियो सोचैए ओकरा लेल विधाता बाम किए छै (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण-13) (4) कखनो सागर कखनो निरझर कखनो फूल समान गजल कखनो लागय धधरा धह-धह कखनो तीर कमान गजल कखनो खुरपी कुडहरि खंती ऊखड़ि और समाठ जकां कखनो बाड़ी कखनो गाछी कखनो भेल मचान गजल कखनो आंगनमे अरिपन सन कखनो नार-पुआर जकां कखनो चालनि कखनो बाढ़नि कखनो पान मखान गजल कखनो गामक चौबटिया लग मंदिर और इनार जकां आ कखनो सीमापर लडइत देशक वीर जवान गजल कखनो मौनी आ पौतीमे सांठल जीर-मरीच जकां कखनो कोसीमे हलचल आ छटपट कोटि परान गजल ककरो खातिर मुरही-कचरी जामुन आम लताम ‘अनिल’ हमरा खातिर दीयाबाती अथवा देव-उठान गजल ( मात्रा-क्रम : 2222-2222-2221-12112) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा जनप्रतिनिधि कहबै छि हम जनप्रतिनिधि मुदा भेंटब नै हम कोनो विधि मचल रहौ जनता में हाहाकार रहै छि तैयो हम निर्विकार किये सोची कोना जीबैत निर्धन निमग्न छि बढाब में हम अप्पन धन नै मतलब कतय भेल अन्याय बस अप्पन पैर में नै फाटै बेमाय सगर गाँव रहौ अन्हरिया में बनल रहि हम बस ‘पावर हाउस’ छात्र सब भने होएत रहै फेल किएक लेबै हम ककरो टेर? ठप्प रहै रेल क यातायात कहुत ई भेल कोन बड़का बात! लड़ै छि बड़का जुबानी जंग बजबै छि ट्वीटर पर झाइल मृदंग भेटै अछि जौं किछु आलोचक लोक झट द करै छि हुनका ब्लॉक आयल कत्तेक सुन्नर बरसात कवि लिखू अहूँ किछु रसगर बात शहर तब्दील भेल नाला में व्यस्त छि हम घोटाला में शिक्षा-स्वास्थ्य बनि गेल अछि व्यापार युवा भ रहल अछि बेरोजगार मुदा हम मगन ई आशा में विधाता करताह बेड़ा पार शुरू करब सभटा अप्पन खेल जखन आयत वोट लेबा के बेर नै छोड़ने छि कोनो विकल्प चुनत सब हमरे बेरम बेर।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश मोहन झा 'गुंजन' काटि गेल जुट्टी (हास्य रस) साँप जेना जुट्टी कें काटि गेल चुड़ैल, की कहू हे दैया। गरदनि सँ डाँड़ धरि सदिखन लहराय छल सतरंगी आँचर पर आबि क' फहराय छल काटलक निरासिन बनेलक चनैल, की कहू हे दैया। देखथि 'ओ' कहथि ई साओन केर घन हे केशक सिनेह मे डूबि उमड़ल मोर मन हे काटि मधुलत्ती लगा गेल करैल, की कहू हे दैया। परवतिया पूछलक माँ जुट्टी की भेलौ गे माँझ राति पहर केओ काटि ल' गेलौ गे सुन्नर सुराही भेल कनफुट्टा घैल, की कहू हे दैया। सघन घन केश काटि हिप्पी बना देलक पूनम के इजोरिया तरेगन देखा देलक माथ छल मधुवन लगाओल कनैल, की कहू हे दैया। साँप जेना जुट्टी कें काटि गेल चुड़ैल, की कहू हे दैया। ******* (ध्यान देल जाऊ:-एहि रचनाक उद्देश्य मनोरंजन मात्र। अंधविश्वास सँ कोनो संबंध नहि। ई चर्चित जुट्टीकांडक एकटा कारण सौतिया डाह भ' सकै छै। राजेश मोहन झा 'गुंजन'॥) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पल्लवी मण्डल, गाम बेरमा, जिला मधुबनी बेटी नै अहाँ ओकरा पढ़लौं नै किछु बतेलौं जखन ओकर मन भेल किछु बुझबाक ओकरा "लड़की" कहि कऽ घर बैठेलों! दहेज़मे गिन देलिऐ लाखों रूपैआ गलती खाली दहेज़ ले बलाकेँ बतोलिऐ प्रश्रय देलिए अहूँ ओतबे किछु कम आ किछु बेसी मुदा अहूँ केलिऐ दहेज़केँ अहाँ जमा कऽ लेलिऐ लाखो रूपैआ पढ़ाब काल ओकरा अपनाकेँ ना समर्थ बतौलिऐ... ऐ समाजक गप्पक चिन्ता अहाँ लेत-लेत अपन अपन बेटीक अधिकारक गप्प नै सुनि पेलिऐ! पढ़ब अखुनका अपराध ब्यूरोक परिणाम तँ मनमे कचोट हएत हर घन्टा मरैत अछि अहीं सभक बीस टा बेटी कियो दहेजक उलहना तँ कियो मुर्खक तानासँ आबो बुझियो ओकरा आबो बुझियौ ओकरा!!!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-17. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-17 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ता लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। ५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा “’विदेह’- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह www.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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