'विदेह' २६८ म अंक १५ फरबरी २०१९ (वर्ष १२ मास १३४ अंक २६८) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- दू टा लघुकथा २.२.नन्द विलास राय-दूटा लघुकथा २.३.नारायण यादव-दू टा लघुकथा २.४.भारतीय मुसलमान आ भारतीयता- मूल हिन्दी लेख- गीतेश शर्मा, मैथिली अनुवाद- उमेश मण्डल ३. पद्य ३.१. संतोष कुमार राय 'बटोही' दू-टा कविता ३.२. रामविलास साहुक हाइकू/ शैनर्यू ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु ३.४. नन्द विलासराय- हमर चारूधाम ३.५.पल्लवी मण्डल- समाज Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups संपादकीय विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- दू टा लघुकथा २.२.नन्द विलास राय-दूटा लघुकथा २.३.नारायण यादव-दू टा लघुकथा २.४.भारतीय मुसलमान आ भारतीयता- मूल हिन्दी लेख- गीतेश शर्मा, मैथिली अनुवाद- उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डल- दू टा लघुकथा हारि केना मानब शारदीय नवरात्र चारि दिन पहिनहि समाप्त भऽ गेल, काल्हि पुर्णिमा छी। सुभ्यस्त समय रहने नवरात्र धूम-धामसँ सम्पन्न भेल। सूर्यास्त भऽ गेल, ब्रह्माजी गायित्री जप शुरू ऐ दुआरे नहि केने छला जे इन्द्रासनसँ कौल्हुका भारक आदेशपत्र नहि आएल छेलैन। सूर्यास्त होइते, होइते किए तहूसँ पहिनहि चान अकासमे बिनु रश्मियोक ओहिना उगल छलजहिना खखरियाएल धान बिनु चाउरक होइए। हँ, एते जरूर भेल जे सूर्यास्त होइते मनोक रंग आ रंगोक मनमे ब्रह्माजीकेँ लालिमा बढ़ए जरूर लागल छेलैन। तहूमे आइ चतुरदशीक चान छी। होइतो अहिना छै जे ‘उगै चान कि लपकी पूआ..!’ यएह चान ने भोरक सीमापर पहुँचते पूर्णिमा बनए लगत आ सॉंझ होइते पूर्णिमाक रंग-रूप पकैड़ उगि कऽ जगमगा जाएत, जे बारहो चानसँ–माने बारहो मासक चानसँ–अवल-धवल, शीतल, शीतचरक संग कोजगराक कौड़ी पाश[i]पर बैसल जुआरी सभकेँ सेहो केकरो हँसेबो करत तँ केकरो कनेबो करबे करत। खाएर जे करत, ओकर राति छिऐ, जे मन फुरतै, जेना मन फुरतै तेना अपन करत। नँगटे नाचह आकि नाँगट बनि नाचहसे ओ जानए। ब्रह्माजी ऐ दुआरे गायित्री-बन्धन नहि कए पबै छला जे अपन ब्रह्म-मुहुर्तक हिसाब नहि मिलि रहल छेलैन। ओ हिसाब छी, आजुक जिनगीक बिसरजन क्रियाकेँ काल्हुक क्रियामे जोड़ि एकसूत्रता बनाएब। तही बीच इन्द्रक सिपाही आबिब्रह्माजीक हाथमेएकटा चिट्ठी थम्हा, नमस्कार करैत विदा भऽ गेल। चिट्ठी उनटा जखन ब्रह्माजी देखलैन तँ पहिने हँसी लगलैन मुदा राज्यादेश[ii] मानि राजपत्रक फाइलमे रखलैन। फाइलकेँ पुन: उनटा चिट्ठी निकालि दोहरा कऽ पढ़लैन। लिखल अछि- ‘ओहन मनुखक निर्माण करैक अछिजे काल्हुक अनुकूल हुअए।’ ‘आइक दिन केहेन छल आ काल्हि दिन केहेन बनत’ ई विचार असगरमे करब ब्रह्माजी ठीक नहि बुझलैन। तेकर कारण ई नहि जे ब्रह्माजी विवेकवान् नहि छैथ, भरपूर छैथ। ठीक-ठीक[iii] कोनो विषयक मूल्यांकन करैक क्षमतामे कमी नहि छेलैन जइसँ निर्णय करैमे बाधा होइतैन।मुदा एते तँ मनमे शंका छेलैन्हे जे देवगण सभ एहेन जाबीर तँ छथिये जे धरती परहक मनुखकेँ निरमबैकाल मुँह देलिऐ खाइ-पीबैले, दॉंत देलिऐ काटैले, कण्ठ देलिऐ घोंटैलेआठोर देलिऐ ओकर टाट-फरक लेल तखन जे बलजोरी ओकरा सभसँ अक्षर निकालि बजेबो केलैन आ अपनो बजै-भुकैक मुँह बना देलैन तइमे हमर कोन दोख। तँए नीक हएत जे भने चतुरदशीक चान सेहो उगले अछि, इमानो-धरम आ बुधियो-विवेककेँ बजा विचारि लेब नीक हएत। बेकतीगत क्रिया जरूर छी मुदा ओहूमे तँ परिवार अछिए। पॉंच मिलि करी काज, हारने-जीतने कोनो ने लाज। हमरा मनुख निरमबैक मात्र भार भेटल अछि आकि ओइ मनुखकेँ बिआह केतएहएत आ बरिआती केते जेतै सेहो भार कि हमरे अछि। ओ विधाताक जिम्मा छैन। तँए ओ अपन पोथी-पतरा देखियो कऽ आ लिखियो कऽ करता। बारहो मासक चानसँबारहो मासक मौसमक रूप वर्णित होइते अछि। तँए चानोक चैतन्य रूप-रंगपर मनसूनक प्रभाव सेहो पड़िते अछि। तइमे सभसँ सुभ्यस्त मनसून आसिनक चानकेँ राति भरि भेटैए। चारू गोरेकेँ–माने इमनदारो भाय, धरमदेवो, बुधिनाथो आ विवेकोननकेँ–समाद ब्रह्माजी पठा देलैन। जाबे ओ चारू पहुँचला तइ बीचमे जे खाली समय मन पेलकैन तइमे उपैक गेलैन जे अनेरे विधाताक काजक भाँजमे पड़ि गेलौं! अपन काजक ने जवाबदेह अपने छी आकि दुनियाँक ठीकेदारी अछि। जखन हुनका (विधाताकेँ) छुट्टी भेटतैन तखन ओ बर-कनियाँ कपारमे लिखैत रहता। कियो अपने बुधि-विवेकसँ ने अपन काज करै छैथ। कियो काज केला पछाइत छुट्टी पबैए आ ओ (विधाता) छुट्टी भेलेपर काज करै छैथ। ओहन-ओहन देवगणक भार हमरा बुते उठत। गणो तँ गणे छी किने, खुशामद करि कऽ काजो करा लेता आ उनटा कऽ बजबो करता जे ई काज फल्लाँकेँ हमहीं सिखौने छिऐ किने। भाय! जब एते सिखबै-पढ़बैकक लूरि-बुधि अपने अछि तखन अपन-अपन जिनगीक काज अपने सम्हारैत चलू। जिनगी कोनो अफ्रीका बोनमे आकि कैलाशक पहाड़क झाड़मे नुकाएल अछि जे नइ देखब। देखते छी जे एक बीघा खेतबला दू बीघा बनबए चाहै छैथ, हाइ स्कूलक शिक्षक कौलेजक प्रोफेसर बनए चाहै छैथ। एकटा करखानाबला दोबर बनबए चाहै छैथइत्यादि-इत्यादि सभ चाहिते छैथ। एते तँ दुनियाँकेँ एक्के नजैरमे देख जाइ छी मुदा अपन जे आँखियो आ नजरियो भरिदिन संगेमे रहैए से देखबे ने करै छी! हँ, तखन ईहो बात अछिए जे ऑंखि ने केकरो अपना कपारमे सटल रहैए मुदा नजैर से थोड़े रहैए, ओ तँ नजैरवाने लक ने रहैए। ब्रह्माजीक समाद पबिते इमनदार भाय अपन सभ काज छोड़ि दौड़ले पहुँचला। ओना, इमनदार भाइक मनमे ब्रह्माजीक आदेश रहैन तँए मानै छला जे जे कहता से करब। मुदा ब्रह्माजी तँ परिवारक अंग बुझि सभकेँ विचार करैले बजौने छेलखिन तँए बाँकी तीनूक- धर्मदेव, बुधिनाथ आ विवेकाननक प्रतीक्षामे प्रतीक्षारत् छथिए, तँए किछु बाजि नै रहल छैथ। जइसँ किछु बजै नइ छला। संजोग बनल, तीनू गोरे–माने धर्मदेव, बुधिनाथ आ विवेकानन–संगे पहुँचला। चारू गोरेक बीचमेब्रह्माजी अपन राज्यादेशक राजपत्र रखि बजला- “एकरा पढ़ि कऽ सभ बुझियो लाए आ विचारो दाए जे ‘औझुका मनुखक निर्माण केहेन करब?” चिट्ठीकेँ बुधिनाथ पढ़लैन आ सभ कियो सुनला। ओना, सुनि-सुनि जहिना इमनदार भाय बिहुसै छला तेना ने विवेकानने बिहुसै छला आ ने बुधिनाथेकेँ ओहन बिहुसी एलैन। मुदा धर्मनाथक मन कोठीक गोरा तरमे राखल चुनक कोहीक मुँह जहिना चुन सन रहै छै तहिना होइत रहैन। बाजैथ किछु ने मुदा तरे-तर मन मसकैन जे घरसँ लऽ कऽ दुनियाँ धरिमे जँ केकरो गरदैनकट्टी भेल तँ हमर भेल हेन। चिड़ै जकाँ एकोटा पॉंखि देहमे सटल ई समय नहि रहए देलक। मुदा तँए कि हारि मानि लेब! जखन धरतीपर जनम लेलौं, धरतीसबहक माता छैथ तँ हमरो ने छथिए। माए-बच्चाक सिनेह तँ दुनू दिस ने हएत। चिट्ठी सुनि सभ कियो गुम्म भऽ विचार करए लगला जे समय-सापेक्ष मनुख बनै आकि मनुख-सापेक्ष समय बनै, आजुक मनुखक मुख्य रूप छी। ओना,ब्रह्माजी विचारकेँ विचारि मने-मन मनेमे रखि नेने छला। मुदा समैयक प्रभाव तँ देखिये रहल छला जे परिवारमे बेटा माए-बापकेँ कहैए जे तूँ हमर की केलह?जँ पुतोहु एहेन बजै तँ उचित छै, किएक तँ ओकर जन्मो आ सेवो ओकर माए-बाप केलकै-देलकै। सियान भेला पछाइत दोसर घर आएल। मुदा बेटा जँ एहेन बजैए ते जरूर कोनो बाल विद्यालयक पढ़ाइक ज्ञान छीहे। सतरह बापूतक सतरह रंगक कोचिंग अछिए, जइमे सतरह रंगक बुधि-विचारक मनुखो बनबे करत। ऑंखिक टुसकीसँ ब्रह्माजी इमनदार भायकेँ पुछलैन। जेनारस्तेसँ इमनदार भाय विचारैत आएल होथि तहिना धाँइ-दे उठि कऽ ठाढ़ भऽ बजला- “कान खोलि सभ सुनि लिअ, ब्रह्माजी जे एकरंग मनुख गढ़बो करता तैयो ओ बेदरंग हेबे करत जइसँ लड़ाइ-झगड़ा करबे करत। जइसँआइ धरिक इतिहासमे छोट-पैघ लगा कऽ चौदह हजार लड़ाइ भेल अछि, ओ भेल अछि कहियो देव-दानव कहि तँ कहियो रक्षा-राक्षस कहि। ई भेल अतीत, आगू अछि भविस आ बीचमे अछि वर्तमान।” इमनदार भाइक बात सुनि धर्मनाथक चुनियाएल मन कनी-कनी पुनियाए लगल। पुनियाइत धर्मनाथक मनक तामसमे पुनपन आबए लगलैन, बजला- “अतीत भेल बेतीत आ बेतीतसँ जे अपरतीत भेल से भेल प्रीतक पूर्व अवस्था- परपरतीत।” तही बीच नारदबाबा वीणा नेनेबिनु समादे पहुँच गेला।परिवारोमे अहिना होइए जे जँ कोनो विचार करए परिवारजन बैसब आ जँ कियो बाहरी लोक आबि गेला तँ पहिने हुनकर विचार सभ सुनिते छी। ब्रह्माजी नारदबाबाकेँ कहलैन- “भने अहॉं आबिये गेलौं। अहोभाग हमरा परिवारक। देश-दुनियाँक की हाल अछि?” नारदबाबा पहिने वीणाक तारक जड़िकेँ कनेठी दऽ कऽ ठीक केलैन। किएक तँ मनमे उठि गेल छेलैन, हाथमे जे वीणा अछिओछी कोन, मुहसँ फुकैबला सपहरिया सबहक आकि सरस्वती मैयाक हाथक? सारसत्त्वक मन रहितो असारसत्त्व केतए-सँ आबि जाइए..! नारदबाबा अपन विचार मंथन जे करए लगला तइसँ वीणोक हाथ रूकि गेलैन आ मुँहक वाणीकेँ सेहो धियानी धऽ लेलकैनजइसँ ब्रह्माजीक द्वारा पुछला पछातियो नारदबाबाक मुँह बन्ने रहलैन। नारदबाबाकेँ चुप देख बुधिनाथ टुसकी दैत बजला- “बाबा, अहाँ तीनू भुवनसँ टहैल-बुलि कऽ देख-सुनि एलौं हेनमुदातैयो किए मुँह..?” ओना, बुधिनाथक इशारा नारदबाबा बुझि गेला मुदा बुधियार लोक लेल ईहो तँ आफत अछिए जे नीको बात कि विचारकेँ सभठाम नइ बाजल जाइए...। अपन दिन-दुनियाँ देखैत नारदबाबा बजला- “बौआ, पेटमे विचारक लहैर उठल अछि जइसँ बजैले मन तनफनाइए जरूर, मुदा अपन हारल.., लोक, लोक लगमे बजबो केना करत!” ओना, ब्रह्माजी नारदबाबाक विचार सुनि मुस्की मारैत टुस्की दैत रहथिन मुदा विवेकाननक नजैर बुधिनाथपर टिकल छल आ धर्मदेवक नजैर इमनदार भायपर, जइसँ नारदबाबाक बात कियो ने सुनबे केलैन आ ने बुझबे केलैन। जहिना एकटा ऋृषि अपन इमानकेँ धरम बुझि सत्यक बाट धेने चलैत रहला। एकटा शिकारी एकटा गाएकेँ खेहारने आबि रहल छल। गाइयक दशा देख हुनका मनमे दयाक सागर उमैड़ गेलैन। जान बँचौने गाए पड़ाएल जाइ छल। रस्ताक ओझलसँ आकि बोन-झाड़क ओझलसँ गाए शिकारीक नजैरसँ हटि गेल। शिकारी ऋृषि लगमे आबि गाइयक जानकारीक बात पुछलकैन। स्पष्ट शब्दमे ओ ऋृषि जवाब देलखिन जे जे देखलक से बाजत नहि आ जे बाजत से देखलक नहि, तहिना भेल। चुपा-चुपी देख इमनदार भाय बजला- “से की बाबा?” अपन मजबूरीसँ बेवस भेल नारदबाबा बजला- “बौआ, बाल-बोधसँ कोनो विचार छिपाएब पाप छी। तँए तोरा सभसँ किछु ने छिपेबह।” नारदबाबाक उमड़ल मनक सागरकेँ विवेकोनन, बुधिनाथो, धर्मदेवो आ इमनदार भाय सेहो टकटकी लगा देखए लगला। नारदबाबाक मन आगू-पाछू हुअ लगलैन। आगू-पाछू होइक कारण भेलैन अपन तीनू भुवनक रूप-चित्र देखब। नारदजीक रूप-चित्र छैन, भक्तिक तीन पद्धतिमे–माने व्यास पद्धति, हनुमन पद्धति आ नारद पद्धति–एक पद्धतिक दाताक रूपमे नारदबाबा अपनो छैथ मुदा दोसर रूप जे देख रहल छला तइमे गाम-घरक पुरुख-पातरसँ लऽ कऽ मौगी-मेहैर धरिक बीचक छेलैन, जे नारदबाबा एक नम्बर झगड़लगौन छैथ। घरोबला आ घरोवालीकेँ सुख-चैनसँ रहऽ नहि दइ छैथ। एक गोरेकेँ कहै छथिन अहॉंक पति नोनियाह भऽ गेल छैथ आ दोसरकेँ कहै छथिन पत्नी अहॉंक देह चटै छैथ। से ओ चाहे मर्त्य-भुवनक हुअए आकि देव-भुवनक। ब्रह्माजी नारदबाबापर नजैर फेड़लैन। नजैर फेड़ाइते नारदबाबाक मन फुरफुरेलैन। बजला- “बौआ, नीक काज तँ नीक होइते अछिजे अधलो काज कखनो नीक भऽ जाइए। तहिना नीको काज केतौ अधलो भऽ जाइए! बुझिये ने पेब रहल छी जे नीक की आ अधला की भेल।” धर्मदेव बिच्चेमे टपकल- “जेना?” नारदबाबा बजला- “बुद्धदेव आ महावीर जैनक नाम सुनने हेबहक?” “हँ! इतिहासक किताबोमे पढ़ने छी।” “दुनूसन्त छला, जहिना भोजनमे सादगीतहिना वस्त्रमे सागदी आतहिना विचारक संग बेवहारोमे सादगी दुनूकेँ छेलैन। अपन विचारक विद्यालयमे अध्ययनसँ केकरो परहेज नहि करै छला। खुलल किताब जकाँ दुनूक विचारो आ बेवहारो छेलैन।” “हँ, से तँ छेलैन्हे।” “दुनू एक्के युगमे भेला, एक्केरंग दुनू युगद्रष्टा सेहो छला।” “हँ, से तँ छेलाहे।” “मुदा..?” “यएह जे एकगोरे ‘बहुजन हिताय’ आ दोसर गोरे ‘सबजन हिताय’ मानै छला।” ओना, ‘बहुजन हिताय’ आ ‘सभजन हिताय’क भाँजमे चारू गोरे– इमनदार भाय, धर्मदेव, बुधिनाथ आ विवेकानन–ओझरा गेला। तँए मने-मन सभकियो विचारए लगला। जेकरा बुझि कऽ ब्रह्माजी मने-मन मुस्की मारि रहल छला। सभ अपने-अपने विचारमे तेना फँसि गेला जे वक्ता कियो रहबे ने केला। जइसँ चुपा-चुपी पसैर गेल। ब्रह्माजीक मनमे भेलैन जे एना जँ कोनो विचार करए बैसी आ कियो बजनिहारे ने रहता तखन विचार की हएत! नारदबाबाकेँ चरियबैत बजला- “नारदजी! इन्द्रासनसँ आदेशपत्र आएल अछि, आजुक मनुख निरमबैक, तइमे..?” नारदबाबाक मन दुनू दृष्टिसँ कड़ुआएल छेलैन्हे, पहिल- चलैत-चलैत तेतेक थाकि गेल छला जइसँ मन कड़ुआ गेल छेलैन आ दोसर- तीनू भुवनक चालि-चलैनिक बेवहार देख मन तेना अगिया गेल छेलैन जे विचार करिया गेल छेलैन। ओही कड़ुआएल-करियाएल मनक बीच ब्रह्माजीक प्रश्न छेलैन। नारदबाबा बजला- “आजुक जेहेन दुनियाँ अछि तइमे सभसँ उत्तम कोटिक निर्माण (मनुखक निर्माण) ओ हएत जे निर्माणाधीनकेँ (जेकर निर्माण करब) पूजी (पाइ) अनुकूल माने गरीबीमे नेपाली भतहा दारू अमीरीमे कनाडियन सरहा दारू पीआ मोटर साइकिलक सवारीपर चढ़ा, एक हाथमे मोबाइल आ दोसर हाथमे सिगरेट धराजइसँसवारीक हेण्डिलकेँ छोड़िअन्हा-गॉंहींस बाटपर चलैत रहत, सभसँ नीक निर्माण यएह हएत।” ब्रह्माजी बुझि गेला जे नारदजी खिशिया कऽ विचार देलैन। ओना, हुनको विचारकेँ सोल्होअना नहियोँ मानब नीक नहियेँ हएत। किएक तँ अपने ने बैसल-बैसल निरमबै छी, मुदा नारदजी तँ तीनू भुवनकेँ टहैल-बुलि देखै छैथ तँए देखलाहा बजला अछि...। अपन विचारकेँ बेवहारिक बना ब्रह्माजी बजला- “नारदजी, अहॉंक विचारसँ सहमत छी तँए समर्थन करै छी, मुदा एहेन मनुखसँ तँ जग-हँसार हएत! किछु छी ते जवाबदेहीमे छी किने।” ब्रह्माजीक विचार सुनि नारदजी अपन क्रोधकेँ मने-मन घोंटए लगला। मुदा जहिना डुमैबला वस्तु पानिमे जाइते डुमए लगैए आ बिनु डुमैबला अथाहो पानिमे अलगले रहैए, तहिना नारदबाबाक मनमे उठैत रहैन। अपन पल्ला झाड़ैत बजला- “लोको की लोक छी, जहिना बिनु सींग-सींग्हौटीक अछि तहिना बिनु नाँगैर-पुछड़ीक सेहो तँ अछिए, तेहने...।” ब्रह्माजी बजला- “बदनामी हएत..!” नारदजी बजला- “जे बदनाम करत ओ तँ अपने बदनाम अछि, तखन बदनामीक लाज केकरा हएत? हमरे कियो पद्धतिकर्ता कहैए आ कियो घर-जरौन कहैए, तेकरा हम की करबै।” ब्रह्माजीकेँ नारदजीक विचार जेना जँचलैन। जँचिते मनमे खुशी उपकलैन जइसँ मुँह मुस्कियाए लगलैन। मुस्की दैत नारदजी बजला- “तखन?” “तखन की!अहींकेँ लोक की बुझैए से बैसल-बैसल बुझबै, कियो बेइमान कहैए आ कियो नशाबाज..!” “से केना?” “जेकरा घरमे बेटीक बाढ़ि अबैए ओ बेइमान कहैए आ जेकर बुधि भँसिया जाइ छै ओ भँगपीबा कहैए।” “ऐमे हमर कोन दोख?” “से अपना मने बुझने हएत। बजबै जे भायहम तँ दुनियाँकेँ नजैरमे नर-नारीक सृजन करै छी, तहिना बुधि-विवेकक सेहो करै छी। मुदा तइसँ लोक मानत। ओ थोड़ै बुझत जे मकान बनौनिहार तँ पहुँच गेल, मुदा केतौ सीमेंट कम रहल आकि बालुए कम रहल, तइ दुआरे मकान बनौनिहार कामै हएत। ओ तँ कमो-बेसी करि कऽ मशाला तैयार कइये लेत।” ब्रह्माजी- “तखन?” नारदजी- “तखन यएह जे केतौ बदनामी हएत तँ कहबै जे भाँग कनी बेसी पीआ गेल छल। तँए, हारि थोड़े मानि लेब।” qशब्द संख्या : 2054, तिथि : 02नवम्बर2018 दिवालीक दीप कातिकक पनरह दिनक अन्हारक (सामुहिक, समूहक दिन) अमावस्या छी, आइये रातुक पहिल पहर आ दिनक पॉंचम पहरमे ‘लक्ष्मी पूजा’ आ दिनक छठम-सातम पहर आ रातुक दोसर-तेसर पहरमे ‘काली पूजा’ सेहो छी। कातिक मासक दुख-धन्धामे भरि दिन वौआएल रहलौं। साँझक आगमन होइते गोसाँइ स्थानसँ (गोसाँइ आगू) सँ लऽ कऽ अपन घर-ओसार, आँगन-दरबज्जासहित माल-जालक घर, थैर, जल-जलाशय आ धार-धारा होइत समुद्रक घाटपर सेहो दीप जरत। सूर्यास्त होइपर आबि गेल। ओना, श्रम करैक शक्ति सेहो शरीरमे शेष छल आ जिनगीक अग्रिम क्रिया सेहो शेष छलहे। क्रियाक सरदर नियम यहए ने अछि जे एक काजक पछाइत दोसर काज रोपी। तँए कटबी नियम नहि अछि सेहो बात तँ नहियेँ अछि। ओहो तँ अछिए जे काजक सघनताक बीचक जे जिनगी अछि, ओइमे समयानुकूल आ आवश्यकतानुकूल घटबी-बढ़बी करए पड़ैए। मुदा ऐठाम ने घटबीक प्रश्न अछि आ ने बढ़बीक, प्रश्न अछि जिनगीकेँ सुचारू ढंगसँ संचालित करैक, जइसँ समयपर दीपो जरा सकी आ पाबैन सेहो मना सकी। दरबज्जापर पएर दइते पत्नी बजली- “कृष्णदेवभैया लछमी पूजाक हकार दऽ गेला अछि।” बजलौं- “कहलयैन नइ जे अपने किम्हरोसँ अबिते हेतातैबीच चाहो पीब लेबआमुहाँ-मुहीं गप्पो भऽ जाएत।” “जहिना माछी-मच्छरक नंग-चंगसँ मन कछमछाए लगैए तहिना कृष्णदेव भैयाकेँ कछमछाएल देखलयैन।” : पत्नी बजली। मनमे भेल जे अनेरे जे झिंगाक झॉंगि मनमे बन्है छी से नीक नहि। सभ साल कृष्णदेव भाय कातिकक दिवाली दिन लक्ष्मीक पूजा करिते छैथ आ पान-मखान-मिठाइक हकार दइते छैथ, जेबो करिते छी। तहिना आइयो जाएब। पुछलयैन- “और किछु बजला?” पत्नी बजली- “रस्ते-रस्ती बजैत गेला जे एम्हरे होइत उदयलाल ऐठाम होइत घरपर जाएब।” मनमे भेल जे साँझुक पहिल पहरक पूजा ‘लक्ष्मी पूजा’ छी तखन अनेरे जे गप-सप्पमे समय गमा लेब तखन समयपर पहुँच केना पएब। मुँह बन्न करैत अपन साँझुक नियमित क्रियाकेँ अपनबैले मुड़िते रही कि रस्तापर अबैत उदयलालपर नजैर पड़ल। जखन कानमे आबि गेल जे कृष्णदेव भायलक्ष्मीपूजाक हकारक मादे ऐठामसँ उदयलाले ऐठाम विदा भेलातखन जँ हम कृष्णदेव भाइक साती हकारक जानकारी दऽ देबै तँ ओ दुनू सिरे ने नीक हएत। बजलौं- “उदयलाल, कृष्णदेव भाय ऐठाम आने साल जकाँ लछमीपूजा छिऐन, हकार छह। पहिल साँझक पूजा छी, तँए समयपर पहुँचैले अखन बेसी गप-सप्प नहि करह। तोंहू तैयार हुअ गआहमहूँ तैयार होइ छी। ओत्तै निचेनसँ गप-सप्प करब।” ओना, उदयलाल मजकिया लोक अछि, तँए ओकरो अपन भावनाक संग भावलोकक भवन छइहे। कठिन-सँ-कठिन आ गम्भीर-सँ-गम्भीर विचारकेँ मजाक-मजाकमे उड़ाइयो दइए आ पुराइयो तँ दइते अछि। उदयलाल अगुताएलेमे बाजल- “परसादमे पाने-मखानटा बँटता आकि नवको किछु बँटता?” उदयलालक बात सुनि नहलापर दहला फेकब वा बीबीक संग बादशाहक जोड़ा लगाएब नीक नहि बुझि चुपे रहलौं। हमर चुपी देख आकि अपन मनमे उदयलालकेँ कोनो उद्गार रहै से तँ वएह जानए, मुदा उदयलाल फेर बाजल- “भाय साहैब, पग-पग पोखैरकेँ जहिना कमला-कोसी खेलक आ पान-मखानकेँ परवासी भाय लोकैन खेलैन तहिना आब एकरा किताबे-कैसेटमे रहऽ दियौ।” ओना, मनमे भेल जे बाजी- ‘किताबो पढ़निहार कि आब अछि, आब तँ कैसेटसँ बेसी लोक पढ़ैए। जइसँ एते तँ लाभ भेबे कएल जे मिथिलाक शब्दमे अंग्रेजीक बाढ़ि एने शब्दकोश बढ़बे कएल अछि।’ मुदा फेर भेल जे जखने किछु बाजब कि उदयलाल फेर कोनो तेसर बात चालि देत। तँए, चुप्पे रहलौं। ओना, उदयलालकेँ समैयक पैबन्दी तँ नहि, मुदा काजक पैबन्दी रहने जिनगीक गाड़ीक गति असथिर छइहे।ओना, उदयलाल मजकियल चालि पकैड़ चलनिहार लोक जकाँ हँसी-चौल करिते अछि मुदा तेकरा ओ गपे-सप्प तक रखने अछि। गपोक कि कोनो आड़ि-धुर अछि लोकक मन जे फुरै छै से बजैए। मुदा जिनगीक खेल तँ किछु और छी, ओ तँ गति-विधिक क्रियासँ चलैए, जइसँ उदयलालक जेहने बुधि सकताएल छै तेहने काजो सकताएल चलिते छइ। तँए बिसवास पात्र अछिए। ओना, एहेन दोख उदयलालमे नहि अछि, जइसँ मन दुखी नइ होइए सेहो बात नहियेँ अछि। कोन क्रियाक लेल केते उच्चारण हएत से वेचारामे नइ छइ। एकर माने ओ स्कूल-कौलेज नइ देखलक सेहो बात नहियेँ अछि। हँ, एते जरूर छै जे व्याकरण नइ पढ़ने भाषा-बोधमे कनी कमी रहिये गेल छइ। ओना, पत्रिकामे पढ़ने छल जे अरस्तूए लगसँ भाषा आ समाजक विचार होइत आएलजे केहेन शिक्षाक खगता समाजकेँ अछि जइसँ ओकर जिनगी प्रगतिक पथपर गतिशील रहत। खाएर जे अछि तइसँ उदयलाले आकि अपने कोन मतलब अछि। मतलब अछि औझुका जे क्रिया अछि तइमे केना समयपर पहुँच पूजामे शमिल हएब। जँ उदयलालकेँ दरबज्जापर छोड़ि अपने चलि जाएब सेहो केहेन हएत। हँसी-खुशीसँ उदयलाल अपने ने आगू बढ़त। तइ बिच्चेमे उदयलालक प्रति दोसर विचार उचैड़ कऽ एकाएक मनमे चिड़ै जकाँ पॉंखि फड़कौनहि खसि पड़ल। अपना आगूमे खसल विचारकेँ देख मन तिलमिला गेल। तिलमिला ई गेल जे उदयलाल सन नवजुवक जे आजुक युवाशक्तिक अंश अछि ओ तँ भगवानेक अंश जकाँ ने युवोमे युवाशक्ति अछिए। उदयलाल समाजमे चाहे जे हुअए मुदा काजसँ बेसी काजक विचारकेँ बिकछबैमे समय लगैबते अछि तँए कालक दोखक दोखी तँ अछिए मुदा झड़-झड़ाहो लोक ओकरा नहियेँ कहल जा सकैए। झड़-झड़ाह ओ भेल जे समय अबैसँ पहिने धान जकाँ फुटि कऽ तैयारो भऽ जाइए आ पकैसँ पहिनहि पकि कऽ झड़िये जाइए। संजोग बनल उदयलाल बाजल- “पॉंच मिनटमे तोंहू तैयार भऽ जा आ हमहूँ तैयार भऽ जाएब। मुदा तैयार भेला पछाइत हम तोहर रस्ता नइ तकबह। सोझे कृष्णदेव भाय ऐठाम चलि जेबह।” ओना, उदयलालक समैयक बान्ह ओतेक सक्कत नइ बुझि पड़लमुदा संजोगो तँ सेजोग छी। जँ कियो ओकरा रस्तामे एतबो पुछनिहार भऽ जाइ जे ‘भाय!बड़ अगुताएल देखै छिअ’,तेकर जवाब ओ कखन तक देत तेकर ठीक नहि, तँए बान्ह हल्लुक बुझि पड़ल। मुदा जँ कियो नइ भेटतै तँ जहिना बाजल तहिना ओ आगू बढ़ि कृष्णदेव भाइक दरबज्जापर पहुँचते दरवारी जकाँ घरवारी बनि बोकियेबो नइ करत सेहो बात नहियेँ अछि। पत्नियो सभ बात सुनि मने-मन अपनो काजक आ हमरो काजक गोरा-गपसा बैसाइये नेने छेली। जँ किछु अवरोध मनमे होइतैन तँ बजबे करितैथ, मुदा से सभ किछु ने अखन धरि बजली। एकर स्पष्ट माने यएह ने भेल कृष्णदेव भाइक ऐठाम समयपर पहुँचबक आदेश दइये देलैन। जहिना पॉंच मिनटक समय उदयलाल देने छल तहिना तैयार भऽ घरसँ निकललौं। ओना, कहब जे उदयलालक घर कृष्णदेव भाइक घरसँ लग अछि तँए पहिने पहुँचत सेहो बात नहियेँ अछि। किए तँ जेते समय हमरा ऐठामसँ उदयलालकेँ जेबाकाल लागत तेतबे समय ने हमरो जाइमे लगत। मुदा समय तँ ओइसँ पहिने निर्धारित भऽ गेल, तँए मोटा-मोटी दुनू गोरेकेँ एक्के रंग समय भेटल। जहिना कृष्णदेव भाय ऐठाम हम पहुँचलौं तहिना उदयलाल सेहो पहुँचल। दरबज्जापर पहुँचैसँ पहिने दुनू गोरेक भेँटो भऽ गेल। संगे दुनू गोरे दरबज्जाक आगूमे प्रवेश केलौं। कृष्णदेव भायकेँ देखलयैन जे दुनू परानी हल-चल, हल-चल कऽ रहला अछि। हलचलीमे पड़ल दुनू परानीमे सँ किनको नजैर हमरा दुनू गोरेपर नहि पड़लैन। ओना, अपना बुझि पड़ल- भलेँ दुनू परानी कृष्णदेव भाइक नजैर हमरा सभपर नहि पड़ल हुअए मुदा सभकेँ अपन-अपन नजैरिक संग आँखियो तँ अछिए। जइसँ सोलहन्नी ईहो मानि लेब जे कृष्णदेव भाइक नजैर नहियेँ पड़ल हेतैन सेहो मानब ठीक नहि।किएक तँ आँखि रहितो कियो चश्मा लगा देखैए आ कियो बिनु चश्मेक ओकरासँ बेसी देखैए...। मन असमंजसमे पड़ि गेल। मुदा तइ बिच्चेमे उदयलाल बाजल- “गौरी भाय, भरिसक कृष्णदेव भाइक नजैर अपना सभपर नइ पड़लैन।” बजलौं- “केना बुझै छहक?” उदयलाल बाजल- “जहिना अपना सभ हकरिया भेलिऐ तहिना ने कृष्णदेवो भाय हकवाह भेला। जँ कनियोँ नजैर पड़ल रहितैन तँ ओ जरूर किछु-ने-किछु कहबे करितैथ।” उदयलालक विचार सुनि अपनो मन मानि गेल। फेर भेल जे कृष्णदेव भाय घरवारी छैथ, हुनकर नजैर नहि पड़लैन मुदा अपनो दुनू गोरे तँ समाजक संग हकरियो छीहे, तखन किए ने अपन हाजिरी हुनका लग दर्ज करा ली। बजलौं- “उदयलाल, अपना सभ आबि कऽ केतौ चुपेचाप बैस जाएब सेहो नीक नइ हएत, तँए अपन उपस्थिति दर्ज करा लएह।” उदयलालोक मनमे सएह विचार उठि रहल छेलइ। स्वीकारैत बाजल- “कृष्णदेव भाय लग चलि कऽ चेहरा देखा देला पछाइत केतौ बैस कऽ गप-सप्प करब।” आगू बढ़ि कृष्णदेव भाय लग दुनू गोरे पहुँचलौं। पहुँचते उदयलाल कृष्णदेव भायकेँ कहलकैन- “भाय साहैब, हाथी चढ़ि अहाँ गौर पुजने छी जे भौजी सन संगी हाथ लगल।” ओना, कृष्णदेव भाय पत्नी दिस ताकए लगला मुदा मुहसँ किछु बकार नहि फुटलैन। बजलौं- “भाय, केते काज पछुआएल अछि?” कृष्णदेव भाय बजला- “समयानुसार काज अपन रस्तेपर अछिमुदा सूर्यास्तो होइमे दू-चारि मिनट बाँकी अछिए।” उदयलाल बाजल- “भाय साहैब, ऐठाम हमरा सभकेँ रहने अहूँ दुनू परानीकेँ काजमे[iv] किछु-ने-किछु बिथुते हएत आ तैसंग हमहूँ दुनू गोरे शरमाएब जे जेठ भऽ कऽ कृष्णदेव भाय दुनू परानी खटि रहल छैथ आ हम सभ ठाढ़ भेल मुँह देखै छी।” कृष्णदेव भाय बजला- “तोहर की विचार?” उदयलाल बाजल- “अहाँ दुनू परानी अपन पूजाक तैयारी करू आ हम दुनू गोरे दरबज्जाक दुआरपर बैस हकरिया सबहक आगवानी करब।” कृष्णदेव भाय किछु ने बजला। बुझि गेलौं जे आदेश भेट गेल। दुनू गोरे दरबज्जाक ऑंगनमे कुरसीपर बैस गप-सप्प करैक विचार केलौं। ओना, गप-सप्पक क्रममे उदयलाल कखनोकाल झुझुआन जकाँ बुझि पड़ल। मुदा वास्तवमे ओ गहींरगरो आ गम्भीरगरो तँ अछिए। बजैक ढंग भलेँ ओ बदलने अछि,सदिकाल हँसि-हँसि बजबो करैए आ गम्भीर-सँ-गम्भीर विषयकेँ हँसीए-मे उड़ाइयो दइए आ पुराइयो तँ दइते अछि। सूर्यास्त भेल। बिजलीक इजोतसँ सौंसे जगमगाएल। कृष्णदेव भाय सेहो घर-ऑंगनमे बिजली लगौनहि छैथ। तहूमे आइ बेसी ओरियान सेहो केनहि छैथ। बजलौं- “उदय, बुधि बपजेठ होइए। भलेँ तूँ उमेरमे छोट छह मुदा तूँ बहुत होशियार छह। लोक लगमे हँसि-हँसि कऽ बाजि लइ छह, मुदा..?” ‘मुदा’सुनि उदयलाल जेना एकाएक गम्भीर हुअ लगल, एकाएक जेना गम्भीरता हृदयसँ ऊपर आबए लगलै, जहिना धरतीमे गम्भीरता एने ओकर सृजनशक्ति एते क्रियाशील भऽ जाइए जे ओइमे भाँगक बीआ छीटू आकि बथुआक, ओ बड़बड़ा कऽ जनैम जाइए तहिना उदयलालमे बुझि पड़ल। ओना, उदयलाल बाजि किछु ने रहल अछि मुदा जहिना करियाएल मेघ समुद्रमे लटैक अपन संगी-समुद्रसँ उठैत वादल-केँ पकैड़ संगे विदा होइए तहिना बुझि पड़ल। बजलौं- “उदय, बिजली बौलक इजोतकेँ दिवालीक दीप..?” जहिना समुद्रमे जुआर उठैए, धारमे बाढ़ि उठैए, पोखैर-इनारमे पानिक उछाल उठैए तहिना उदयलालक मनमे जग-जुआर उठल। उठिते बाजए लगल- “भैयारी, तखन ने भय-अरि (भय+आरि) होइए जखन सभ भाय एक-मुँह, एक-बोल बना एक-एक विचारो आ एक-एक काजो करैत आगू दिसक समय दिस बढ़ब। नइ तँ केतौ हृदयमे दीप जरत आ केतौ बिजलीक प्रकाशसँ प्रकाशित हएत। जइसँ जे दीपक ज्योति पर्व छी ओ तर पड़ि जाएत आ बिजलीक प्रकाशक पाबैन जगजिआर होइत रहत।” ओना, धरमागती बुझी तँ उदयलालक विचार सोलहन्नी नइ बुझलौं, मुदा ओकर वाणीक जे प्रवाह रहै ओकरा रोकि दिशा-हीनो करब नीक नहि बुझि बजलौं- “हँ, से..?” जेना हमर बातकेँ अधडरेड़ेपर उदयलाल लोकि लेलक।धीपल ताबा जहिना पानिक छिटका लोकि लइए तहिना लोकि लेलक। ओना, कहब जे पानियोँसँ पातर ओस होइए जेकरा दुभि अपन जीवनामृत बना माथपर ताधैर धेने रहैए जाधैर सुर्जक प्रकाश ओकरा अर्द्ध नहि कऽ लइए। मुदा से सभ बात नहि छल,अपना मनमे दिवालीक दीपक ज्योति पर्व बनल छल। उदयलाल बाजल- “आइ आधाकातिकक सीमापर छी। आगू सेहो आधा शेष अछि। कातिककेँ लोक तेरहम मास कहै छइ। किए? कोनो माससँ जँ मासक गिनती शुरू होइ तँ ओ मास तेरहम भइये जाइए।” मनमे जेना घोड़दौड़ शुरू भेल, तहिना हुअ लगल। हिसाब तँ ठीके उदयलाल कहैए मुदा बुझल तँ कातिकेटा अछि, जेकरा लोक तेरहम मास कहैए। आन-आन मासकेँ कहाँ कियो ‘तेरहम’मे गिनती करैए। तँए, अपन विचारकेँ नहियेँ बाजब नीक बुझलौं। किए ने उदयलाले अपन पनचैती अपने करैत चलत। मुदा उदयलालक बात हम नीक जकाँ सुनलौं आकि अनठाएल-मनठाएल जकाँ सुनलौं बुझलौं, सेहो तँ उदयलालकेँ इशारासँ बुझाएब जरूरी अछिए। तँए उदयलालेक स्वरमे अपनो स्वर मिलबैत बजलौं- “हँ, से तँ कहिते अछि।” उदयलाल बाजल- “कातिकमास तँकिसानी जिनगीक ओ मास छी, जे बरसातक विभिषिकासँ तुरत-तुरत उबड़ल रहैए। विभिषिकाक अनेको रूप अछि, केतौ धारक कटनिया, तँ केतौ अन्हर-तूफानक संग झटवाहिक जइसँ जान-मालक संग, चीज-वस्तुक क्षति होइए, तँकेतौ बाढ़ि बनि गामक-गामकेँ मेटा दइए, इत्यादि-इत्यादि। तँए, कातिककेँ दोबर भारी मास मानल गेल अछि। ओहुना फसलक उपजक हिसाबसँ सेहो चैतिक रब्बी-राइक पछाइत उपजक आठम मासक दूरीमे सेहो अछिए।” तैबीच कृष्णदेव भाय सेहो लगमे आबि बजला- “पूजाक समय भऽ गेल, तँए अहूँ सभ तैयार भऽ जाउ। जखने हम शंख फूकब कि अहाँ सभ देवस्थलपर पहुँच जाएब।” ओना, उदयलालोक मनमे रहबे करै जे कृष्णदेव भाइक ऐठामक पूजामे शामिल होइले एलौं हेन, हुनकर कृत्तिकल्प छिऐनतँए ओ अपना विहिते जे करता,हम सभ तहीमे ने पाछू-पाछू संग पुरबैन। बजैक क्रममे उदयलाल मस्तीसँ झूमि रहल छल, जहिना संगीतक अन्तिम मोड़पर एला पछाइत संगीतज्ञ झूमए लगैए तहिना। मुदा कृष्णदेव भाइक वाणीक अन्तिम लड़ीक कड़ीमे कड़ी जोड़ि उदयलाल बाजल- “औझुकेँ पनरहम दिन कातिकक पूरणिमा हएत, जइ दिन कातिक अपन अन्तिम सीमापर पहुँच भाए-बहिनक पाबैन–सामा-चकेबा–करैत अगहन दिस (धानक मास) अग्रसर हएत।” उदयलालक मुँहक मीठगर बोल सुनि-सुनि मनमे जेना मीठ-मीठ सुआद आबए लगल। ओना, मनमे ईहो होइत रहए जे कहीं बिच्चेमे ने कृष्णदेव भाय शंख फूकि दैथ जइसँ आगूक विचारक बाटे रूकि जाए! उदयलाल मने-मन ठिकिया लेलक जे जाबे कृष्णदेव भाय शंख फुकैक सुर-सार करता तइ बिच्चेमे अपन विचारकेँ सीमापर पहुँचा देब। मुदा तइ बिच्चे बजा गेल- “उदयलाल, आइ तँ अनहरिये पखक ने पाबैन छी?” जहिना प्रश्न उठेलौं तहिना उदयलाल जवाब दैत बाजल- “अनहरिया पखक सामूहिक रूपक अन्तिम दिनक पर्व छी। अन्हारमे सभ किछु हरेबे नइ करैए, भेटबो करैए। वएह भेटब छी ज्योति पुंज। जे पबैक पर्व छी दिवाली दिनक दीप पर्व।” ओना, उदयलालक विचार सुनि मनक कूह-काह छँटए लगल मुदा कूहो-काह की साधारण अछि, ओ तँ मैल वस्त्र जकाँ अछि, जेकरा जेते बेर साबुन लगा धौबै तेते ओकर मैल छँटैत जाएत आ चमक अबैत जाएत। मुदा तैसंग मनमे ईहो शंका तँ उठिये रहल छल जे तँए बुझै-सुझैक संग करैले समय चाही,जे अपना गतिये तेना पड़ाएल जाइए जे ओकरा पकैड़ चलब कठिन अछि। ओना, विचारो आ क्रियोक अपन गति अछिए मुदा से गति निर्भर करैए कर्तापर। जेहेन कर्ता भर्ता करैए तेहेन धर्ता धारण करिते अछि...। बजलौं- “उदय, अही प्रकाश पुंजकेँ..?” आगूक विचार पेटेमे छल कि तइ बिच्चेमे उदयलाल आगूक विचारकेँ लोकैत बाजए लगल- “भाय, पहिल साँझ लक्ष्मी पूजा छी, दिवा रातिमे काली पूजा सेहो हएतआ भोर होइते गोबरधन पूजाक आगमन सेहो भइये जाएत। माल-जालक घरो आ बाहरोमे दुभि-धानक संग फूलो-पातसँ भरल-पूरल बखारक पूजा सेहो छीहे।” बजलौं- “हँ, से तँ छीहे!” उदयलाल बाजल- “तँए कि पाबैन विसरजन भऽ जाएत। प्राते भने दोसर दिन भरदुतिया छी, जे भाए-बहिनक भरै-पुरैक पाबैन अछि। सभ बहिन नौतहारिनी भेली आ सभ भाए नौतपूरा भेला।” ओना, जइ सुढ़िये उदयलाल बजै छल तइ सुढ़िये अपने नइ बुझै छेलौं मुदा भकुआएल लोककेँ जेना-जेना भकुपन कमैत जाइ छै आ मन फरीच होइत जाइ छैतहिना हुअ लगल, जइसँ उदयलालक विचार सुनैमे नीक लगिये रहल छल। बजलौं- “हँ, से तँ छीहे!” उदयलालक विचारकेँ जहिना सह भेटल, तहिना सहटैत सहीटमे आबि बाजल- “भाय, परिवारक आँगनक बीच आँगनमे अरिपन साजि आसन ओछा दुनू हाथमे सिनूर-पीठार लगा पानक पात पसारि फूल-मखान आ अच्छतसँ दुनू भाए-बहिन अपन सम्बन्धकेँ पूजित करिते छैथ।” बजलौं- “ई तँ अदौसँ पूजित होइत आबि रहल अछि।” उदयलाल बाजल- “भाए-बहिनक पाबैनिक संग चित्रगुप्त पूजा सेहो छी।” बजलौं तँ किछु नहि, मुदा मुड़ी जरूर डोला देलिऐ। जेना उदयलालकेँ अपन विचारमे सहक संग समरथन सेहो भेटल होइ तहिना भेलइ। मुस्की दैत बाजल- “भरदुतियाक प्रातेसँ छठि पाबैनिक विधि शुरू हएत। माछ-मड़ुआ बाड़बसँ विधि करण शुरू होइत उगैत-डुमैत दुनू सुर्जक अर्घदान होइत, सामा-चकेबा सम्बन्धक सोहर-समदाउनक शुरूआतक संग अरिपनक बीच हर-कोदारि, खुरपी-हाँसूक संग खराम पूज्य होइत देहधारी देवक आगमन बीच देवोत्थान (देवउठान) सेहो होइते अछि। तेकर लगले पछाइत हनुमान जन्मोत्सवक लगले कोसी-कमलाक स्नानक संग सामा-चकेबाक कातिकक उसरन होइए।” तही बीच कृष्णदेव भाय महाभारतक कृष्ण जकाँ शंख फूकि देलखिन। दुनू भाँइ उठि कऽ विदा भेलौं। qशब्द संख्या : 2422, तिथि : 29 अक्टुबर 2018 [i]पचीसी [ii]शासनक आदेश [iii]सोलहअना [iv]पूजाक तैयारीमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय-दूटा लघुकथा सियानक मारि दही-चूरा हमरा गामसँ दू-अढ़ाइ किलोमीटर दूरीपर एकटा गाम अछि मझौरा। हमरा सबहक डीलरक घर मझौरा गाममे छैन। हँ, हँ वएह डीलर जेतए मोटिया तेल आ चाउर-गहुम भेटैत अछि। डीलरेक घरक बगलमे एकटा शिक्षक छथिन त्रिलोक वर्मा। भगवानक कृपासँ पत्नियो शिक्षिका छथिन। घरोक सुखी सम्पन्न लोक छैथ। त्रिलोकजी आ हम निर्मली कौलेजमे इन्टरमे संगे पढ़ैत रही। मुदा त्रिलोकजी सतर्की ई केलैथ जे इन्टरक पढ़ाइ बिच्चेमे छोड़ि रॉंची जा ओतएसँ टीचर्स ट्रेनिंग कऽ लेला। बादमे बी.ए. धरि सेहो पढ़ला। तँए ओ शिक्षक छैथ। हम ईनिंग नै केलौं तँए पढ़ि-लिखि कऽ बकरी चरबै छी। अखनो त्रिलोकजी जेतए-केतौ भेटै छैथ तँ कुशल-क्षेम हेबै करैए। मार्च मासक गप छी। हम आ हमर दियादीक एकटा भैयारी- मदनजी राशन आनए डीलर ओतए गेल रही। मदन भाइ सेहो शिक्षक छैथ आ जइ विद्यालयमे त्रिलोकजीक पत्नी शिक्षिका छथिन ओही विद्यालयमे मदनो भाय छैथ। हम आ मदन भाय डीलर ओइठाम ब्रेंचपर बैसल रही, डीलर रजिष्टरमे आ कार्डमे राशनक खानापूरी कऽ रहल छला। तखने त्रिलोकजीक बेटा मदन भायकेँ बजा कऽ लऽ गेलैन। हमरा नै बजेलैथ तँए हम डीलरे ओतए बैसल रहलौं। जखन राशन लेल भऽ गेल तँ त्रिलोकजी दरबज्जा दिस देखए गेलौं जे मदन भाय की करै छैथ। हम सड़केपर सँ कहलिऐ- “मदन भाय, गामपर नै जाएब?” मदन भाय कहलैथ- “आउ-आउ चलै छी।” त्रिलोकजी सेाहे दरबज्जेपर बैसल रहैथ। ओ कहला- “पॉंचे मिनट आओर रूकियौ मदनजी चाह पीने अबै छैथ।” तखने देखलिऐ जे त्रिलोक जीक बेटा दू कप चाह नेने आएल। एक कप चाह त्रिलोकजीक हाथमे देलकैन आ दोसर कप मदन भायकेँ। मुदा त्रिलोकजी हमरा चाह पीबैले आग्रह नै केलैन। हम चोट्टे डीलरक दरबज्जापर आबि ब्रेंचपर बैस गेलौं। हम सोचए लगलौं, मदन भाय शिक्षक छैथ तँए हुनका बजा कऽ त्रिलोकजी चाह पियौलकैन आ हम साधारण किसान छी तँए हमरा बैसबाको लेल आग्रह नै केलैन। जखन कि त्रिलोकजी हमर संगीए छैथ...! हमरा त्रिलोकजीक बेवहारक बड़ दुख भेल। हम सोचए लगलौं- एकर बदला त्रिलोकजीसँ केना लेल जाए। हम बहुत सोच-विचार केलौं। पनरहे दिनक बाद त्रिलोकजी मदन भायकेँ खोजए हुनका दरबजपर गेलाह मुदा मदन भाय दुनू परानी नेपाल गेल छला। त्रिलोकजी जखन आपस भेला तँ हमरा देखला तँ मोटर साइकिल रोकि कऽ मदन भाइक सम्बन्धमे पुछए लगला। हम सोचलौं आइ गर अछि, किए ने ओइ दिनक बदला सधा ली। हम बड़ आदरसँ त्रिलोकजीकेँ अपना दलानपर लऽ जा कऽ बैसौलयैन आ कहलयैन- “मास्टर साहैब, कनेक रूकू ऑंगनसँ भेल अबै छी।” ऑंगन जा पत्नीकेँ कहलयैन- “कनी दू कप नीक चाह बनाऊ। बुच्ची केतए अछि?” पत्नी इशारासँ पुबरिया घर देखा कहलैन बैस कऽ पढ़ैए। बेटी मैट्रिकक विद्यार्थी छी। ताबए ओ लगमे आबि कहलक- “की बाबूजी?” एकटा पचसटकही दैत एकटा बिकाजी भुजियाक पैकेट आ एकटा नमकीन बिस्कुटक डिब्बा आनए कहलिऐ। पुन: पत्नीकेँ कहलयैन- “जखन बुच्ची देाकानसँ भुजिया आ बिस्कुट आनि कऽ देत तँ दूटा प्लेटमे भुजिया आ बिस्कुट दऽ दरबज्जापर पठाएब।” हम दरबज्जापर चलि गेलौं। एतए त्रिलोकजीसँ दुनियादारीक गप-सप्प करए लगलौं। कनिक्केकालक बाद हमर बेटी दूटा प्लेटमे भुजिया आ नमकीन बिस्कुट दऽ गेल। हम अपना बेटीसँ कहलिऐ- “बुच्ची चाचाकेँ प्रणाम करहुन।” हमर बेटी त्रिलोकजीकेँ प्रणाम कऽ ऑंगन चल गेल। ऑंगनसँ एक जग पानि आ दूटा ग्लास आनि टेबुलपर रखि गेल। हम त्रिलोकजीकेँ एकटा प्लेट बढ़बैत कहलयैन- “लिअ मास्टर साहैब, कनेक पानि पीब लिअ। पछाइत चाह पीब।” तैपर त्रिलोकजी बजला- “चाह तँ गामेपर सँ पीब कऽ आएल रही।” हम कहलयैन- “चाहो कोनो पेटभरा चीज छी। जे एकबेर भरिपेट पी लोलौं तँ फेर ओ समयेपर पीअब।” त्रिलोकजी किछु लजाइत प्लेट हाथमे लेलैथ आ खाए लगला। जाबे हम दुनू गोरे भुजिया-बिस्कुट खा पानि पीलौं तैबीच बेटी एकटा ट्रेमे दू कप चाह दऽ गेल। हम ट्रेमे सँ एकटा कप चाह उठबैत त्रिलोकजी दिस बढ़बैत बजलौं- “लिअ मास्टर साहैब, चाह पीबू।” ओ फेर लजाइते चाह लेला। चाहक बाद हमर बेटी पान दऽ गेल। दुनू गोरे पान खेलौं। हम त्रिलोकजीसँ कहलयैन- “मास्टर साहैब हम तँ कहब जे जलखै खा कऽ जइतौं तँ नीक होइतए।” तैपर त्रिलोकजी बजला- “जलखै, चाह, पान सभ भऽ गेल आब कोन जलखै हएत।” ई कहैत ओ फटफटिया स्टार्ट कऽ चलि गेला। तीन दिनक बाद जखन मदन भाय त्रिलोकजीकेँ भेटलखिन तँ त्रिलोकजी मदन भायकेँ सभ बात बतौलखिन आ कहलखिन- “हम नन्दजी लग बड़ लज्जित छी। ओइ दिन अहॉंकेँ डीलर ओइठामसँ बजा कऽ चाह पियेलौं मुदा नन्दजीकेँ बैसबाको लेल आग्रह नै केलिऐन। तेकरे बदला नन्दजी हमरा जलखै आ चाह-पान करा कऽ लेलैन। एकरे कहै छै ‘सियानक मारि दही-चूरा।” q शब्द संख्या : 696 दहेज पाप छी भोरका उखराहा। समय नअ बजैत। लालबाबूक दलान बेस साफ-सुथड़ा भेल रहए। चौकीपर नवका जाजीम बिछौल रहए आ नबाक खोल लागल सिरमा सेहो लगौल रहए। दलानक निच्चॉंमे स्नानी चौकीपर एक बाल्टीन जल आ एकटा लोटा सेहो राखल रहइ। दलानक ओसारापर पॉंचटा कुर्सी सेहो राखल रहै आ दलानक रभीतरमे एकटा बड़ाक टेबुल आ टेबुलक दुनू भाग दू-दूटा कुर्सी लागल रहइ। लालबबूक नजैर बेर-बेर देबालमे टॉंगल घड़ीपर चलि जाइत रहैन। ओ सोचै छला- आठे बजेक नाओं चुनचुन बाबू कहने छला आ अखन नअ बजि रहल अछि। अखैन तक ओ सभ नै एला हेन, पता नहि की भऽ गेलइ। कियो दोसर लड़कीबला नै तँ उपरौंझ कऽ देलक...। लालबाबू ई सभ सोचिते छलाक कि एकटा अपाची मोटर साइकिल आबि दलानक आगॉंमे रूकल। ओइ मोटरसाइकिलसँ चुनचुन बाबू आ एक गोरे आरो उतरला। लालबाबू बजला- “आएल जाऊ, आएल जाऊ, हमरा तँ चिन्ता भऽ गेल रहए जे एतेक देरी किएक भऽ गेलैन।” तैपर चुनचुन बाबू हाथ जोड़ैत बजला- “नमस्कार..! लालबाबू, नमस्कारकजबाब दैत बजला- “नमस्कार!” चुनचुन बाबू अपन संगबे दिस इशारा करैत कहलखिन- “ई हमर मित्र छैथ, गोपी बाबू। उ. वि. बाबूबरहीसँ सेवा निवृत प्रधानाध्यापक, हिनको घर मौआहीए छैन।” लालबाबू गोपी बाबूकेँ हाथ जोड़ैत बजला- “अहो भाग्य!नमस्कर-नमस्कार..!” गोपी बाबू बजला- “नमस्कार।” लालबाबू बजला- “होउ, पएर-हाथ धोइ जाइ जाऊ।” दुनू गोरे हाथ-पएर धो कऽ कुर्सीपर बैसला। चुनचुन बाबू बजला- “किए देरी भऽ गेल से नै बुझलिऐ।” तैपर लालबाबू बजला- “कहब तखन ने बुझब। हमरा तँ होइत रहए जे गाड़ी नै तँ रस्तामे खराप भऽ गेलैन।” चुनचुन बाबू बजला- “की पुछै छी। तंग भऽ गेलौं हेन। एकटा ने एकटा बरतुहार दरबज्जापर अबिते रहै छैथ। आजुके गप लिअ, ठीक साढ़े सात बजे विदा होइले गाड़ी निकाललौं कि नेहराबला एकटा बुलेट मोटर साइकिलसँ आबि गेला। कुटमैती केनाइ तँ बादक बात भेल मुदा जे दरबज्जापर कियो जाति-कुटुम आबि जेता तँ हुनकर स्वागत-बात नै करबैन सेहो केहेन एहत। तहूमे अपना सभ मिथिलावासी छी। तँए देरी भऽ गेल।” ई गप-सप्प होइते रहए तखने लालबाबूक भातीज रोहित दूटा प्लेटमे भुजलाहा काजू, किसमिस, मनक्का आ नुनगर बिस्कुट अभ्यागतकेँ लऽ कऽ आएल। लालबाबू आग्रह केलखिन। तीनू गोरे दलानक भीतर जा कऽ बैसला। रोहित दुनू प्लेट लऽ पानि आनए अंगना चल गेल। लालबाबू टेबुलपर सँ प्लेट उठा लालबाबू आ गोपी बाबूक हाथमे दैत बजला- “लेल जाए, कनेक पानि पीब लेल जाए।” रोहित दूटा गिलास आ एक जग पानि टेबुलपर रखि गेल। जाबे दुनू गोरे यानि चुनचुन बाबू आ गोपी बाबू काजू-किसमिस खेलैथ ताबेमे रोहित तीन कप कॉफी लऽ कऽ आबि गेल। कॉफी पीलाक दसे-पनरह मिनटक पछाइत फलक प्लेट आएल जइमे सेब, समतोला, अनारक दना, अंगूर आ पँच-पँच छीमी मालभोग केरा रहए। फलहारक बाद मिठाइ आ नमकीनक प्लेट नेने रोहित पहुँचल। प्लेट देख चुनचुन बाबू बजला- “फलेसँ तँ पेट भरि गेल आब मिठाइ कोन पेटमे खाएब।” तैपर नूनू बाबू बजला- “अहूँ हद करै छी, फलोसँ केतौ पेट भरलै हेँ। लाबह हौ रोहित, मिठाइ आ नमकीनबला प्लेट दहुन सबहक हाथमे।” रोहित नूनूबाबू आ गोपी बाबूकेँ आगॉं मिठाइ आ नमकीनबला प्लेट रखि देलक। मिठाइमे अमूलक रसभरी, काजूक वर्फी, शुद्ध खोआक पेरा, नारियलक लड्डू आ नमकीनमे विकानेरी भुजिया छल। नाश्ताक बाद छाल्ही देल चाह तीनू गोरे पीलैन। चाह पीला पछाइत चुनचुन बाबू बजला- “आब कन्याकेँ बजौल जाए। किएक तँ हमरा लोकैनकेँ आपस गामो जेबाक अछि।” तैपर लालबाबू बजला- “किएक, ऐठाम घर नै छै कीजे एतेक औगुताइ छी।” चुनचुन बाबू बजला- “से तँ छैहे। जँ कुटमैती भऽ जाएत तँ केतेको दिन रहब।” लालबाबू बजला- “जँ कुटमैती करऽ चाहब तँ किएक ने हएत।” चुनचुन बाबू- “दस कोससँ जे एतेक हरान भऽ कऽ एलौं हेन से तँ कुटमैतीए करए लेल ने, आकि अहॉंक गाम देखए।” ई गप होइते रहए कि वीणा एकटा तश्तरीमे पान, सुपारी, इलायची, जर्दा आ तुलसी पत्ती लऽ एली। ओ तश्तरी टेबुलपर रखि सभकेँ पएर छुबि गोड़ लगली। गोड़ लगलाक बाद सबहक आगॉं पानक तश्तरी बढ़ौली। सभ गोरे पान-सुपारी इलायची खाइ गेला। वीणाकेँ एकटा कुर्सीपर बैसौल गेल। चुनचुन बाबू अपन मित्र गोपी बाबू दिस तकला। गोपी बाबू चुनचुन बाबूक इशारा समैझ गेला। गोपी बाबू वीणासँ पुछलखिन- “बुच्ची अहॉं की संज्ञा छी?” वीणा बजली- “वीणा।” गोपीबाबू- “बाबूजीक नाओं?” वीणा- “श्री लालबाबू राय।” गोपी बाबू- “कोन क्लासमे पढ़ै छी?” वीणा- “बी.ए. फज्ञइनलमे।” गोपी बाबू- “कोन विषयसँ आनर्स कऽ रहल छी?” वीणा- “गृह विज्ञान विषयसँ।” गोपी बाबू- चुनचुन बाबू दिस ताकए लगला। चुनचुन बाबू वीणासँ कहलखिन- “जाऊ बुच्ची। अहॉं ऑंगन जाऊ।” वीणा उठि कऽ ऑंगन चल गेली। तैबीच चुनचुन बाबू बजला- “लड़की हमरा पसन्द अछि। लड़की देखबा, सुनबामे सुन्नैर आ सुशील अछि।” तैपर गोपी बाबू बजला- “एकरा के काटत।” लालबाबू पुछलखिन- “तखन आगॉं?” गोपी बाबू बजला- “देखियौ मंगरौनीबला बीस लाख, एकटा बुलेट मोटर साइकिल आ पॉंच भरि सोन दइले तैरूार छला। मुदा लड़कीक ऑंखि कुइर छेलै तँए कुटमैती नै भेलइ।” चुनचुन बाबू बजला- “यो विवेककेँ इंजीनियर बनेबामे हमर बारह लाख टका खर्च भेल अछि। अखन ओ रेलबेमे इंजीनियर अछि आ आइ.एस.क तैयारी सेहो कऽ रहल अछि। पिलखबाड़बला पच्चीस लाख टाक नगद, एकटा अपाची गाड़ी आ सात भरि सोनाक अलाबे फ्रिज, कूलर, गोदरेज, वासिंग मशीन, टी.भी सभ दइ लेल तैयार छला मुदा लड़कीक कद छोट छेलइ। तँए हमरा लड़की पसिन नै भेल।” गोपी बाबू आ चुनचुन बाबूक बात सुनि लालबाबू सोचमे पड़ि गेला। ओ सोचए लगला जे ई सभ कहै छथिन तइ हिसाबे तँ कमतीमे तीस लाख टकासँ ऊपरे खर्च हएत, मुदा अपना तँ दसो लाखक सकरता नइ अछि। लालबाबूकेँ चुप देख गोपी बाबू बजला- “आब अहूँ तँ किछ बजियौ। एना चुप रहलासँ काज चलत?” तैपर लालबाबू बजला- “यौ मास्टर साहेब, चुनचुन बाबूकेँ बुझले छैन जे हम साधारण किसान छी। चटिया सभकेँ टीशन सेहो पढ़बैत छी। बेआ हमर एकटा छोट-क्षीण दवाइ देकान चलबैत अछि। हमरा तँ दसो लाखक सकरता नै अछि तँए चुप छी।” चुनचुन बाबू बजला- “तखन कुटमैती केना हएत। जँ इंजीनियर लड़कासँ बेटीक बिआह करबै तहूमे सरकारी जॉवबला, तँ तीस लाखसँ ऊपरे खर्च करए पड़त।” लालबाबू बजला- “यौ सरकार, हम दस लाखसँ बेसी खर्च करबामे अक्षम छी। अपने लोकैन जे हमरा दरबज्जापर एलौं तइले अपने लोकैनकेँ धैनवाद।” चुनचुन बाबू बजला- “हम तीन दिनक समय दइ छी, फोन नम्बर लऽ लिअ। अपन सभ परिवार विचारि लेब। जँ अपनो विचार भऽ जाएत तखन हमरा फोन कऽ देब। अहॉंक कन्या सुन्नैर आ सुशल अछि तँए तीन दिन समय दऽ रहल छी, नहि तँ हमरा बेटापर बरतुहारक लाइन लागल अछि।” फोन नम्बर लिखबए लगलखिन, लालबाबू अनमनस्क भावसँ फोन नम्बर लिखि लेला। वरतुहार सभ गेला। लालबाबू उदास भऽ गेला। ओ खेनाइयो ने खेलैन। ऐगला दिन भोरमे लालबाबूक बेटाक संगी विनय आएल। विनय निर्मली बजारमे मोबाइल रिपेयरिंगक दोकान खोलने अछि। लालबाबूक मुँहक उदासी देख विनय पुछलकैन- “काका, मोन बड़ खसल देखै छी। की बात छिऐ। काल्हि जे वीणा बहिनकेँ देखए बरतुहार सभ आएल छला से की भेल।” लालबाबू सभ बात जे पैछला दिन चुनचुन बाबूक संगे भेल रहैन, विनयकेँ कहलखिन। तैपर विनय बाजल- “अँइ यौ काका, ओइ बरतुहार सभकेँ ई नै बुझल छैन जे दहेज लेब-देब कानूनी अपराध छी। अखुनका जे नीतीशजीक सरकार अछि ओ तँ ऐ कानूनकेँ कड़ाइसँ पालन करबा रहल अछि। देखिलेऐ नहि जे बाल-विवाह आ दहेजप्रथाक उन्मूलन हेतु 21 जनवरीकेँ केहेन मानव श्रृंखला बनल छेलइ।” लालबाबू बजला- “हौ बाबू, ई सभ देखाबटी बात छी। एकटा बात कहह ई जे 31 जनवरीकेँ मानव श्रृंखला बनल तइसँ की दहेज लेनाइ-देनाइ रूकि गेल आकि रूकि जाएत। देखने छेलहक किने जे पैछला साल दारू बन्दीपर केहेन मानव श्रृंखला बनल रहइ, तँए की दारू बन्न भऽ गेल? सरकार दारू बेचनाइ आ पीनाइपर प्रतिबन्ध लगौलक मुदा बनबैबला बनैबते अछि, बेचैबला बेचते अछि आ पीबैबला पीबते अछि। हँ, आब ने खुल्लम-खुल्ला बिक्रीए होइए आ ने लोक खुल्लम-खुल्ला पीबे करैए। चोरा-नुका कऽ बिक्री होइए आ चोरा-नुका कऽ लोक पीबैए।” विनय बाजल- “पेपरमे नै देखै छिऐ केतेक पीनिहार आ बेचनिहार जेल जाइत अछि। तेनाहिये दहेजो लेनिहार आ देनिहार जेल जाएत।” लालबाबू बजला- “हौ कहॉं कोनो दहेज लेबए-बला जेल गेल हेन। टुनटुन बाबूक बेटाक बिआहमे एकटा स्कार्पिओ गाड़ी, दस लाख टका नगद, फ्रिज, गोदरेजक अलाबे कनियॉंक सभ जेबर लड़ियेबला देलकैन, कहॉं किछु भेलइ।” विनय बाजल- “यौ काका, जखन कियो प्रशासन ओतए शिकायत करत तखन ने कोनो कार्रवाई हएत, नहि तँ की हएत?” लालबाबू बजला- “प्रशासन ओतए जे लोक शिकायत करत तइले पुख्ता सबूतक जरूरत हेतै, तइमे शिकायत केनिहारकेँ बेसी फिरीशानी छइ। लाक बेटीक बिआह करत आकि केश-फौदारी लड़त। केहेन भ्रष्ट शासन बेवस्था अछि से नहि देखै छहक। एकटा गप आओर कहै छिअ। हमरा मामा गाममे एकटा पंचायत सेवक अपना बेटीक बिआह केने रहए, तेहेन भव्य पण्डाल लगौने रहए जे आन-आन गामक लोक पण्डाल देख आएल छेलइ। बी.डी.ओ, सी.ओ., एम.ओ., दरोगा आओर केतेक ने केतेक हाकिम सभ सेहो बिआहमे आएल रहैथ। खूब दारू आ मूर्गाक मासु चलल। सुनै छिऐ ओ ग्राम सेवक चारिटा पंचायतक पंचायती सचिवक प्रभारमे अछि।” विनय बाजल- “से तँ ठीके कहै छिऐ काका। मुदा बेटियोबलाकेँ तँ किछ फिरीशानी उठबए पड़तै तखने ने कोनो रसता निकलतै। अच्छा ई कहू, मौआहीसँ जे बरतुहार आएल छला, हुनका सभकेँ लड़की पसिन भऽ गेल छेलैन मुदा दहेजक चलते कुटमैती नै भऽ रहल अछि। सएह ने?” लालबाबू बजला- “हँ, सएह बात अछि।” विनय पुछलकैन- “अच्छा ई कहू जे अहॉं मौआही वीणा बहिनक बिआह करए चाहै छी?” लालबाबू बजला- “के एहेन अभागल हएत जे रेलबे नौकरी करए बला लड़ाकसँ बेटीक बिआह नै करत, तहूमे इंजीनियर लड़काक बाप डिग्री कौलेजक प्रोफेसर।” तैपर विनय बाजल- “काका अहॉं चिन्ता जुनि करू। वीणा बहिनक बिआह ओही लड़कासँ हेतइ। हम जेना कहै छी तेना करू।” ई कहि विनय लालबाबूकेँ किछ समझाबए लगलौन मुदा बड़ कम जोरसँ जइसँ तेसर कियो नै सुनए। लालबाबू मौआहीबला चुनचुन बाबूकेँ फोन पर कहलखिन- “काल्हि प्रात: आठ बजे हम आ एक गोरे आर बिआहक गप-सप्प करए मौआही आबि रहल छी।” चुनचुन बाबू बजला- “स्वागत अछि, आऊ। मुदा बेवस्था तीस लाखसँ ऊपरेक राखब।” लालबाबू बजला- “अच्छा-अच्छा ठीक छइ।” देसर दिन लालबाबू आ विनय मोटर साइकिलसँ ठीक सबा आठ बजे चुनचुन बाबूक दरबज्जापर पहुँच गेला। पहुँचते देरी चाह-नास्तासँ स्वागत भेलैन। गोपी बाबू सेहो रहैथ। लालबाबू विनयक परिचय करबैत कहलखिन- “ई हमरा बेटाक संगी छैथ। यएह कहला जे लड़का योग्य आ इंप्लायड छैथ, तँए किदु बेसियो खर्च करए पड़ए तैयो कुटमैती कऽ लिअ।” तैपर गोपीबाबू बजला- “ठीके ने कहलैन। यौ सरकारी जॉवबला लड़का भेटब बड़ मोश्किल छइ। तहूमे रेलबेमे इंजीनियर।” विनय चुनचुन बाबू आ गोपीबाबूकेँ हाथ जोड़ि कऽ प्रणाम केलकैन आ कहलकैन- “दहेजपर खुलेआम बात कहनाइ नीक नहि, कानून बड़ खराप छइ। तूंए दलानक भीतरमे चारिये गोरेमे गप हेबा चाही।” चुनचुन बाबू बजला- “ठीक छइ। चलू दलानक भीतरे। भीतरेमे चारिये गोरेमे गप करब।” विनय बाजल- “हम कनेक लघुशंका केने अबै छी ताबेत अपने सभ दलानक भीतर बैस कऽ गप-सप्प करू।” चुनचुनबाबू दलानक पाछॉं शौचालय देखबैत कहलखिन- “ओही लेटरीनमे चल जाउ।” विनय शौचालयमे जा मोबाइलमे टपरेकर्ड ऑन कऽ सर्टक उपरका जेबीमे रखि लेलक आ पेशाब कऽ दलानक भीतर आबि गेल। विनयकेँ अबिते लालबाबू बजला- “आबह, तोहरे दुआरे गप-सप्प बन्न छल।” विनय कुर्सीपर बैसैत चुनचुन बाबूकेँ पुछलकैन- “अपनेकेँ लड़की पसीन अछि किने?” तैपर चुनचुन बाबू बजला- “हमरा सोलहअनासँ बत्तीसअना लड़की पसिन अछि।” गोपीबाबू बजला- “एहेन सुन्नैर आ सुशील कन्या पसिन नै हेतैन तँ केहेन पसिन हेतैन।” विनय पुछलकैन- “जखन लड़की पसिन अछि तखन आगॉंक बेवस्था बात की हेतइ?” चुनचुन बाबू बजला- “हम तँ फोनपर परसूए लालबाबूकेँ कहि देने रहिऐन जे कमतीमे तीस लाखसँ ऊपरे खर्च हएत।” विनय पुछलकैन- “तीस लाखमे केना की, से कनी फरिछा लिअ।” चुनचुनबाबू- “देखू, हमर बेटा रेलबेमे इंजीनियर अछि। सरकार तरफसँ ओकरा चारि चक्का गाड़ी भेटल छइ। तँए बीस लाख टका नगद, कनियॉंक सभ जेबर, कमतीमे एगारह भरि सोन, एकटा अपाची मोटर साइकिल, फर्नीचर, सोफा, गोदरेजक आलमीरा, वासिंग मशीन, फ्रिज आ टी.भी. दियौ आ बरियाती जतबेक कहबै तेतबेक आएब।” लालबाबू बजला- “अपनेक सभ मांग हमरा मंजूर अछि, मुदा नगदीमे पॉंच लाख कम कऽ दियौ।” चुनचुन बाबू बजला- “पॉंच लाख कि पॉंच टका कम नै हएत। यौ ठाढ़ीबला पच्चीस लाख नगद आ एगारह भरि सोनाक अलाबे सभ समान दइक प्रस्ताव लऽ कऽ काल्हि आएल रहैथ, लड़कियो ए-वन छै, मुदा हम अपनेकेँ कहि देने रही तँए ठाढ़ीबलासँ गप्पो ने केलौं।” विनय कहलकैन- “ठीक छै, अपने लड़काकेँ बजा लियौन, औझका आठम् दिन हम सभ लड़काकेँ फलदान करब।” गोपीबाबू पुछलकैन- “आठम दिन कोन दिन पड़ै छइ।” चुनचुन बाबू बजला- “आठम दिन नअ तारीख आ सोम दिन पड़ै छइ। ठीक छै, हम रबिये दिन लड़काकेँ मंगा लेब। अहॉं सोमकेँ फलदान कऽ लेब। फलदानमे आएब केतेक गोरे?” तैपर लालबाबू बजला- “यौ कुटुम नारायण, हम चेल्हबासँ खैर लुटाएब नीक नै बुझै छी। तँए पॉंचे गोरे आएब। अहूँ बेसी लाम-काफमे नै जाएब। हम सभ सबेरे नअ बजे तक आएब आ पॉंच बजे बेरमे चल जाएब।” गोपीबाबू बजला- “एकदमउत्तम बात कहलिऐ।” तैपर लालबाबू बजला- “जखन सभ बात भइये गेल तखन हमरा सभकेँ विदा करू। बहुत इन्तजाम-बात करए पड़त।” गोपीबाबू कहलखिन- “से तँ ठीक्के। बेटीबलाकेँ बड़ इंतजाम करए पड़िते छइ। चलू कुटमैती नीक भेल। बेटी रानी बनि कऽ रहत।” चुनचुन बाबू बजला- “अच्छा खाना खा कऽ चारि बजे चल जाएब।” तैपर विनय कहलकैन- “नहि, हमरा सभकेँ किछ जलखै करा दिअ, हम सभ चलि जाएब।” सएह भेल। जलखै खा दुनू गोरे यानी विनय आ लालबाबू विदा भऽ गेला। आइ नअ मार्च छी। चुनचुन बाबूक दरबज्जापर डी.जे बाजा मधुर स्वरमे बजि रहल अछि। दरबज्जापर चुनचुन बाबू, गोपीबाबू आ चारि-पॉंच गोरे आर छथिन। कुटुम सभकेँ खाइ वास्ते दस किलो रहु माछक बेवस्थाक अलावे सुधा दुखक रसगुल्ललाक ओरियान सेहो कएल गेल अछि। ऑंगनमे गीतहारि सभ एकाएकी पहुँच रहली हेन। समय नअसँ साढ़े नअ बजल। घड़ी दिस ताकि चुनचुन बाबू बजला- “नअए बजेक समय लालबाबू देने रहैथ, साढ़े नअ बजि रहल अछि मुदा कोनो पता नहि छैन। अखन धरि तँ हुनका सभकेँ पहुँच जेबक चाहिऐन..!” तैपर गोपी बाबू बजला- “एक-आध घन्टाक कोनो बात नहि, सभ कियो अबिते हेता।” गप-सप्प चलिते छल कि बाबूबरही थानाक बोलेरो गाड़ी आबि कऽ चुनचुन बाबूक दरबज्जापर रूकल। गाड़ीसँ थाना प्रभारी आ पुलिस सभ उतरिते छला कि एकटा स्कार्पिओ गाड़ी आबि कऽ सेहो ठाढ़ भेल। ओइ गाड़ीमे लिखल रहए डी.एस.पी- मधुबनी। गाड़ीसँ डी.एस.पी. साहैब उतरा, हुनका पाछाँ चारि-पॉंचटा चितकबरा ड्रेस पहिरने शशस्त्र पुलिस सेहो उतरला। चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूकेँ किछु समझमे नहि एलैन। डी.एस.पी. साहैब दलानमे आबि कऽ पुछलखिन- “चुनचुनजीकौन है?” चुनचुन बाबू हाथ जोड़ैत बजला- “सर, हमहीं छी चुनचुन राय। की सेवा कएल जाए?” डी.एस.पी. साहैब कहलखिन- “आपको दहेज मांगने के अपराधमे गिरफ्तार किया जाता है।” आब तँ चुनचुन बाबूकेँ काटू तँ खून नहि। गोपी बाबू भागैले रस्ता खोजए लगला। डी.एस.पी. साहैब पुछलखिन- “गोपीजी कौन है?” गोपी बाबू हाथ जोड़ैत कहलखिन- “सर, हम छी गोपी।” डी.एस.पी. साहैब कहलखिन- “आपको भी गिरफ्तार किया जाता है।” डी.एस.पी. साहैब थाना प्रभारीकेँ कहलखिन- “बड़ाबाबू, इन दोनो आदमीकेँ गिरफ्तार कर गाड़ीमे बैठाइये।” थाना प्रभारी पुलिसकेँ आदेश देलखिन- “इन दोनो आदमी को हथकड़ी पहनाकर गाड़ीमे बैठाओ।” पुलिसक गाड़ी देख अँगनामे लाबा-फरही हुअ लगल। विवेको अँगनासँ निकैल दरबज्जापर पहुँच गेल छल। थाना प्रभारी बाबूबरहीक बात सुनि विवेक बजला- “सर, हमर नाओं विवेक छी। हम चुनचुन बाबूक बेटा छी। गोपी बाबू हमरा पिताजीक मित्र छथिन। सर, कोन अपराधमे हमरा पिताजी आ गोपीबाबूकेँ एरेस्ट केलिऐन हेन?” तैपर डी.एस.पी. साहैब बजला- “आपका पिताजी आपकी शदी के लिए लड़कीबलासँ बीस लाख रूपैआ नगद ओओर दस लाख का सोना तथा अन्य समान दहेजमे मांगे है। लड़कीबला मुख्यमंत्रीकेँ यहा आवेदन दिए हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय से एस.पी. मधुबनी को एफ.आइ.आर. दर्ज कर कठोरत्तम कार्रवाई करने के लिए वाइरलेस से आदेश दिया गया है।” तैपर चुनचुन बाबू बजला- “नै सर, हम दहेज नै मांगलयैन हेन। लड़कीबला झूठ-फूसक इलजाम हमरापर लगौलक हेन।” डी.एस.पी. साहैब बैगसँ एकटा टेपरेकर्ड निकालि चालू केलखिन। चुनुचन बाबू, गोपी बाबू, लालबाबू आ विनयक बीच जे गप-सप्प भेल रहए सभ सुनाए लगल। जखन सभ बात सुनाएल भऽ गेल तखन डी.एस.पी. साहैब बजला- “कहिये चुनचुनजी, अब क्या कहते हैं!झूठ क्यों बोल रहे थे?” चुनचुन बाबूक बोलती बन्न भऽ गेलैन, गोपीबाबूक चेहरा दिस देखैत चुनचुन बाबूक समुच्चा देह घामसँ नहा रहल छेलैन। गोपीबाबूक मनमे बेर-बेर उठैत रहैन- केकर खेती केकर गाए, कोन पापी रोमए जाए। नाहँकमे फँसि गेलौं। आब जेल गेने बिना कोनो उपाय नै अछि। विवेक सोचए जँ पिताजी जेल चलि जेता तँ सभ प्रतिष्ठा माटिमे मिलि जाएत। जखने लोक सभ बुझत कि कुटिचौल शुरू करत। रेलवेमे नौकरी करै छी। के कहलक नौकरियोपर ने पड़ि जाए। बिआहो करैमे दिक्कते हएत। अँगनामे विवेकक माए जखन बुझलैन तँ ओ कानए लगली। विवेककेँ किछु फुरेबे ने करइ। ऑंगनमे माइक कानब सुनलक तँ ऑंगन गेल। माएकेँ समझौलक। माएसँ कहलक तों जुनि कान। हम डी.एस.पी साहैबसँ निहोरा करए जाइ छिऐन। तूँ असथिरसँ बैस। विवेक दरबज्जापर आएल तँ देखलक चुनचुन बाबू आ गोपीबाबूकेँ गाड़ीमे बैसल छेला। डी.एस.पी. साहैब दरोगासँ कहैत रहथिन- “बड़ाबाबू, चलियेथानापर चलिए।” विवेक डी.एस.पी.क आगॉं हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेल आ बाजल- “सर, हमरा बाबूजी आ गोपीबाबूकेँ छोड़ि देल जाए। हम बिना दहेजकेँ बिआह करैले तैयार छी।” विवेकक विनम्रतापूर्वक निवेदन सुनि डी.एस.पी. साहैब बजला- “ठीक है। आप अपने पिताजीकेँ साथ गाड़ीमे बैठकर मधुबनी कोर्ट चलिये। मैं लड़कीबला को भी लड़की लेकर मधुबनी कोर्ट आने के लिए कहता हूँ। वहॉं आप की शादी कोर्ट में लालबाबू राय की बेटी से होगी। शादी के बाद इनलोगों के विषय में सोचा जाएगा।” एक घन्टाक बाद लालबाबू, लालबाबूक पत्नी, विनय आ लालबाबूक बेटी वीणा एकटा बोलेरो गाड़ीमे बैंस कऽ मधुबनी कोर्ट पहुँचला। कोर्टमे वीणा आ विवेकक बिआह भेल। बिआहक बाद वीणा डी.एस.पी. साहैबसँ कहलकैन- “सर, हिनका दुनू गोरेकेँ माफ कऽ दियौन।” लालबाबू सेहो कहलखिन- “हँसर, चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूकेँ माफ कऽ दियौन। हमरा हमरा बेटीक बिआह बिना दहेजक भऽ गेल।” तैपर डी.एस.पी. साहैब बजला- “ठीक है, पहले आप जो कानूनी कार्रवाइ करने का आवेदन दिये हैं उसके सम्बन्ध में एक आवेदन मामला आपस लेने काऽ दीजिये, फिर इन दोनों व्यक्तियों के विषय में सोचा जाएगा।” सएह भेल। माने लालबाबू मामला आपस लऽ लेला। डी.एस.पी. साहैब चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूसँ एकटा सपथ पत्र लेलखिन जइमे भविसमे फेर एहेन गलती नै करब तइ बातक जिक्र रहए। डी.एस.पी. साहैब चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूसँ कहलखिन- “आप लोग कान पकड़कर पॉंच बार बोलिये- दहेज पाप है।” चुनचुन बाबू आ गोपी बाबू दुनू गोरे कान अपन-अपन कान पकैड़ बाजए लगला- “दहेज पाप छी। दहेज पाप छी...।” q शब्द संख्या : 2922 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नारायण यादव-दू टा लघुकथा पंचैती रामपुरमे एकटा जमींदार छलाह। पैघ जमींदारी, नौकर-चाकर, खेती-पथारीक अम्बार लागल छल। हुनका तीन गोट बेटा छल। बहुत दिन धरि परिबारक भरण-पोषण करैत वृद्धावस्थाकेँ प्राप्त कयलन्हि। बुढ़ाड़ी अवस्थामे नाना प्रकारक बीमारी तंग करय लगैत अछि। जमींदार धातक बीमारीक इलाज करैत रहलाह। ओहि इलाजमे बहुतरास जमीन-जथा सेहो बिक गेलैन्ह। ठीक नहि भेलाह। स्वर्गवासी होइसँ पहिनहि गामक चारि-पॉंच प्रतिष्ठित व्यक्तिकेँ बजाय कहलनि- “हमरा सम्पति के दू भागमे बॉंटि देबैक।” श्राद्ध कर्म समाप्त भेल। गामक प्रतिष्ठित लोकनि सभ जमा भेलाह। बँटबारासँ पहिनहि। बुड़हाक कहल बात पर मंथन होमय लागल। बेटा छन्हि तीन आ बँटवारा होयत दू भागमे। सभ सोचय लगलाह। बुढ़ा मृत आत्माकेँ ठेंस नहि लागबाक चाही। बुढ़ाक बातक पालन होयबाक चाही। गणमान्य व्यक्तिक के किछु फुरा नहि रहल छलन्हि। सभ कियो एहि तारतम्यमे लागल रहलाह, जे एहि बातक निराकरण कोना होई। गणमान्यमे सँ एक व्यक्ति बजलाह- “नरारमे राम लषण बाबू बड़ पैघ पंचैतिया छथि। एहि वषय पर हुनकेँसँ राय विचार कय ली।” चारू-पांचू गणमान्य व्यक्ति राम लषण बाबूसँ राय विचारक लेल नरार पहुँचलाह। किनको हुनकर घर देखल नहि छल। राम लषण बाबूक घरक बगलमे एकटा इनार छल। ओहि इनार पर एकटा नव युवती पानि भरि रहल छलीह। युबतीक उम्र तकरीबन 17-18 वर्ष छलैक। गणमान्य व्यक्तिमेसँ एक व्यक्ति ओहि पानि भरैत नव युबतीसँ पुछलथिन्ह- “दाई, राम लषण बाबूक घर कोन छैक।” ओ युबती जवाब देलन्हि- “जिनकर अहॉं नाम लैत छी ओ तँ मरि गेलाह।” सभ कियो उदास भय गेलाह। ताबत् एकटा प्रौढ़ा इनारक नजदीक पहुँचलीह। ओ गणमान्य व्यक्ति सभकेँ देखि पुछलन्हि- “अहॉं सभ की खोजैत छी?” गणमान्य व्यक्तिमे सँ एक व्यक्ति कहलैन- “राम लषण बाबूक घर खोजैत छी।” प्रौढ़ा हाथसँ इशारा करैत घर देखबैत बजलीह- “ओ तँ आन्हर भय गेलाह।” गणमान्य व्यक्ति सभ ऑंगा बढ़लाह। कनेक दूर पर एकटा दरबाजा छल। ओतय राम लषण बाबू बैसल छलाह। गणमान्य व्यक्ति लोकनि राम लषण बाबूकेँ नमस्कार कय दरबाजापर राखल कुर्सी आ चौकी पर बैस रहलाह। हिनका लोकनिक मनमे नबयुवती आ प्रौढ़ाक जवाब पहेली बनल छल। होइत छलन्हि जे राम लषण बाबू जखन जीवित छथि तँ ओ नबयुवती कियैक बजलीह जे राम लषण बाबू एहि संसारमे नहि छैथ। प्रौढ़ा कियैक कहलीह जे राम लषण बाबू आन्हर छैथ। गणमान्य व्यक्ति लोकनिकेँ एहि प्रश्नक जवाब हेतु जिज्ञासा बढ़ि गेलैन्ह। कुशल-क्षेम परिचय-पात भेलाक बाद राम लषण बाबू हुनका लोकनिक स्वागत-सत्कारमे लागि गेलाह। नैना सभक सहयोगसँ पानि आ चाहक फरमाईश आंगनमे भेज देलन्हि। राम लषण बाबू बजलाह- “अहॉं लोकनि कोन प्रयोजनार्थ एतय अयलहुँ?” गणमान्य व्यक्तिमे सँ एकटा बजलाह- “सरकार हमरा लोकनिक समस्या बादमे कहब। ताहिसँ पहिनहि एकटा दोसर प्रश्न सामने आबि गेल। पहिने एकर समाधान करू।” राम लषण बाबू बजलाह- “बाजू कोन तरहक समस्या अछि?” गणमान्य व्यक्ति बजलाह- “एकटा बच्चिया इनार पर पानि भरैत छलीह। हुनकासँ अपनेक बारेमे पुछलयैन्ह। नबयुबती कहलैन- ओ तँ मरि गेलाह। एहि बातक कोनो अर्थ नहि लागल।” राम लषण बाबू बजलाह- “ओ बच्चिया तँ ठीके ने कहलक। ओहि बच्चियाक हम बाप छिऐक। ओ बियाहक योग्य भय चुकल छथि। हम ओकर बियाह नहि करा रहल छियैक तँ ओकरा लेल तँ हम मरियै ने गेलियै। ओ ठीके ने कहलक।” पुन: गणमान्य व्यक्ति बजलाह- “एकटा प्रौढ़ासँ पुछलयैन्ह तँ ओ बजलीह जे ओ आन्हर भय गेलाह तकर की रहस्य छैक?” राम लषण बाबू बजलाह- “ओ प्रौढ़ा हमर पत्नी थिकीह। ओ साज श्रृगांरसँ रत रहैत छथि आ ओकरा दिश ताकितो नहि छियैक, ओकर अभिलाषाक पूर्ति नहि होइत छैक। तेँ ओकरा लेल तँ हम आन्हरे ने छियैक। आब अहॉं सभक मूल समस्या की अछि से बाजू।” ताबत् ऑंगनसँ स्वागतक हेतु पानि आ चाह आबि गेल। सभ गणमान्य व्यक्ति पानि चाह पीब बजलाह। हमरा गॉंवमे कपिल बाबूकेँ तीन गोट बालक छन्हि। ओ जखन स्वर्गवासी होमय लगलाह तखन हमरा लोकनिकेँ बजा कहने छलाह जे हमरा सम्पति के दू भागमे बॉंटि देबैक। हमरा लोकनिकेँ कपिल बाबूक बातक अर्थ नहि लागल। बेटा तीन आ बँटबारा दू जगह। यैह समस्या लय हम सभ अपनेक शरणमे आयल छी। कोना दू भागमे बॉंटि, से बुझाऊ। राम लषण बाबू बजलाह- “एकर तँ सोझ हिसाव अछि। तीनू बेटामे सँ एकटा कपिल बाबूक बेटा नहि अछि। तेँ ओ कहि गेलाह जे हमर सम्पतिक बँटबारा दू भागमे करब। आब कोन बेटा कपिल बाबूक नहि छन्हि। ओकर पता लगेबाक उपाय बता दैत छी। एकटा कपिल बाबूक फोटो लय लेब आ ओहि फोटोकेँ एकटा कोनो घरमे कुर्सी या टेबुल पर राखि देबैक। तीनू भाईकेँ कोनो एकान्त जगहमे बैसा देबैक। बेरा बेरी कपिल बाबूक फोटो लग भेजब आ ओहि बेटाकेँ कहबैक जे एहि फोटोकेँ 10 जूता मारब ओकरा हिस्सा भेटत। जे बेटा बापक फोटोकेँ जूता नहि मारय ओकरा बुझब जे ओ कपिल बाबूक बेटा अछि। आ जे फोटो पर जूता मारत ओकरा बुझब जे ओ कपिल बाबूक बेटा नहि अछि। मुदा ई भेद दोसरकेँ नहि बुझय देब।” गणमान्य व्यक्ति सभ ओतयसँ घर अबै गेलाह। राम लषण बाबूक कथनानुसारक पिलबाबूक फोटो एकटा घरमे राखल गेल। सभसँ छोट बेटाकेँ गणमान्य पंच लोकनि घरक अन्दर प्रवेश करौलन्हि आ कहल गेल जे बापक फोटो पर जूतासँ मारब ओकरा हिस्सा भेटत। घरक अन्दर छोटका बेटा प्रवेश कयलन्हि। फोटोक बगलमे जूता राखल छल। छोट बेटा बापक फोटो पर फूल चढ़ौलक आ प्रणाम् कय किछु सोचय लगलाह। सोचैत बाजल जे बाप हमरा जन्म देलैन्ह, पालन, पोषण कयलन्हि। हुनका हम जूतासँ नहि मारब। एहेन पाप हम नहि कय सकैत छी, चाहे हिस्सा हुए वा नहि। बाहर जा नौकरी चाकरी कय जीवन बिता लेब। बाजैत घरसँ बाहर भय गेलाह। पंच लोकनि छोटका बेटाकेँ दोसर कोठरीमे लय गेलाह। आब मझिला बेटाक बारी एलैक। मझिला बेटा छोटका बेटा जकॉं कयलक ओहो अपन हिस्सा लेबसँ इन्कार कयलक। हिस्सा हुअ अथवा नहि मुदा बापकेँ जूता नहि मारब। पंच लोकनि मझिलो बेटाकेँ दोसर कोठरीमे लय गेलाह। आब जेठका बेटाक बारी एलैक। जेठका बेटाकेँ बुझौल गेल। जे बापक फोटोकेँ जूतासँ मारत ओकरे जमीन-जयदादमे हिस्सा भेटतैक। जेठ बेटा कोठरीमे प्रेवश कयलक। फोटोक वगलमे राखल जूता लय तावर-तोर बापक फोटो पर जूता बरसाबय लागल। आब पंचलोकनि एहि निष्कर्ष पर अयलाह जे जेठका बेटा कपिल देब बाबूक नहि अछि। पंच लोकनि कपिल देव बाबूक पत्नीसँ दरयाप्त केलन्हि। कपिल देव बाबूक पत्नीक कथन ई भेलैन्ह। हमर बियाह दोसर मर्दसँ भेल छल। पहिलुका घरबला स्वर्ग वास भय गेलाह। कपिल बाबू अबिबाहित छलाह। हमरे डेराक नजदीक हुनको डेरा छल। पतिक मुइलाक बाद कपिल बाबूसँ हेम-छेम बढ़ि गेल आ बादमे दुनू शादी कय ललहुँ। जेठका बालक पूर्वहि पक्षक अछि। ई बात हमही दुनू प्राणी जनैत छलहुँ दोसर कियो नहि। जेठको बेटाक जे बाप छल हुनको ओहि शहरमे ढेर रास सम्पति अछि। पंच लोकनि आश्वस्त भय कपिल बाबूक सम्पतिकेँ दू भागमे बॉंटि जवाबदेहीसँ मुक्त भय गेलाह। q स्वाद परिवर्तन अवकाश प्राप्त कर्मचारीक जे क्रिया कलाप होइत अछि। ताहुसँ हमहु वंचित नहि छी। परिवारो छोट-छीन अछि। पेंशनक पैसासँ कहुना दिन काटिये लैत छी। चारि गोट बालक अछि। पहिल- डॉक्टर, दोसर- इंजीनियर, तेसर- मास्टर आ चारिम- नेता। पहिल डॉक्टर जे बीमार अछि, दोसर इंजीनियर जे अछि। तेसर- मास्टर लाचार अछि। चारिम जे मैट्रीक फेल ओ देशक कर्णधार अछि। प्राय: सभ शहर बाजारक जिनगी जी रहल अछि। दुनू जीव ग्रामीण परिवेशमे रहि रहल छी। किछु खेती-पथारी सेहो अछि। आब तँ खेतो-पथार लोककेँ जानक जंजाल भय गेल अछि। कियो बटाई करक लेल तैयारो नहि होइत अछि। बहुत रास खेतमे पेड़-पौघा लगा देलियैक। बाल-बच्चा ग्रामीण परिवेशमे रहबाक लेल तैयारे नहि अछि। नीक-नीक आमक गाछ, लीचीक गाछ आ कटहरक गाछ रोपि देने छियैक। गाछ सभ पैघ भऽ गेल, आब फरनाई शुरू भेल अछि। गाम घरमे किसानक हालत बड़ खराब स्थिति रहल अछि। कोनो साल रौदी तँ कोनो साल दहारे भय जाइत अछि। धन रोपणीक लेल जन-मजदूर नहि भेटैत अछि। जँ भेटबो करैत छैक तँ उपजासँ बेसी मजदूरिये लय लैत अछि। वर्षा होबाक प्रतिशत बहुत कम भऽ गेल अछि। धानक उपज नहि भेल आ रबीक फसल गेहूँ, चना आ मसूरक उपज नीक भेल अछि। जे बेटा मास्टर अछि हुनक परिवार आ ओकर बाल-बच्चा गामेमे रहैत अछि। उपज नहि भेलाक कारण रोटी, सत्तू, दालि खाय पड़ैत अछि। चनाक उपज नीक भेलाक कारण, बेसी खाय पड़ैत अछि। सत्तू खाइत खाइत मन अकछा गेल अछि। सत्तू जखने ऑंगामे अबैत अछि तँ देखि मन कोना दन करय लगैत अछि। करब की कोनहुना खा लैत छी। कहावत छैक जे अपन हारल आ बहुक मारल कियो कत्तौ थोरे बाजैत अछि। बाल-बच्चा अपन-अपन कमाईमे सँ एक पाई नहि खर्च करत। घरक सभ खर्च नून, तेल, हरदी, मिरचाई आ सब्जीसँ लय पोता पोतीक पढ़ाईक खर्च हमरे वहन करय पड़ैत अछि। तँए पैसा नहिये के बराबर बचैत अछि। तैयो कभी कभार दू-चारि किलो चावल खरीद स्वाद परिवर्तन करा लैत छी। सत्तू देखि मन भिन्ना जाइत अछि। पत्नीसँ कहलियैन- “हम काल्हि पटना जायब। पटनाबला बौआ आ बौआसीन, पोता-पोतीक आ ओतयसँ रॉंची बेटी आ नातीनकेँ सेहो भेंट घॉंट कय लेब। मनमे तँ छल जे ओतय जायब तँ कमसँ कम सत्तूसँ पिंड छुटत आ स्वाद परिवर्तन सेहो भय जायत। इन्टर सीटी ट्रेनक टिकट कटेलौं। छ: बजे जयनगरसँ खुजि मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर,मुजफ्फरपुर, हॉंजीपुर, सोनपुर होइत डेढ़-दू बजे पटना पहुँचैत छैक। मनमे बड़ पैघ आशा नेने ट्रेनमे बैसलहुँ। गाड़ीमे भीड़ो भार कमे रहैत छैक। खिड़की लग जगह पकड़लहुँ। बाहरक दृष्यक आनन्द लैत आगा बढ़लहुँ। मनमे ई सोचैत छलहुँ जे पटना जायब तँ बेटा पुतोहु नाना प्रकारक फल, दूध, दही, बासमती चाबलक भात,अरहरिक दालि, आलू-परोरक तरकारी आ नाना प्रकारक तरूआ खूब खुऔत। पोता-पोतीक लेल मिठाई सेहो खरीद लेलौं। मनमे नाना प्रकारक ख्वाब देखैत पटना पहुँचलौं। मने मन सोचैत रही जे डेरा पर जायब तँ पहिने हाथ-पैर धोय चाह पीअब। किछु फल सेहो खायब। तकर बाद स्नान कय भात-दालि आ नाना प्रकारक स्वादिष्ट तरूआ, तिलौरी आ पापड़ खाइब। सत्तू खाइत खाइत मन अकछा गेल अछि तेँ स्वाद परिवर्तन भय जायत। स्टेशन पर उतरि टेम्पू पकड़लहुँ। टेम्पूसँ राजा बाजारक चौक पर उतलहुँ। डेराक नम्बर पता संगेमे छल। पुछैत-पुछैत डेराक नजदीक पहुँचलहुँ। 10-15 मिनट प्रतिक्षा कयलहुँ। तखन ऊपरसँ पुत्र-बधु देखलन्हि। तखन बेटा-पोता-पोती नीचा आबि झोरा हाथसँ लय सभ कियो पैर छू प्रणाम कयलक। सभक संगे ऊपर डेरा पर पहुँचलहुँ। पुत्र-वधु आबि पैर छू प्रणाम कयलन्हि। सौभाग्यवती भव: क आशीर्वाद दयलहुँ। तुरत एक गिलास पानि आयल। बाथ रूम जा हाथ-पैर धो पुन: कुर्सीपर आबि बैसलहुँ। फ्रीजसँ एक गिलास स्प्राइट टेबुल पर राखि देलक आ कहलक- “दादाजी, ठंढा पीब लिअ।” ग्लास उठा मुँहमे लगेलहुँ। कोनादन स्वाद लागल। बुझना गेल जे हमरा दारू कियैक पिबैक लेल देलक। आई धरि एहेन पेय पदार्थसँ दर्शन नहि भेल छल। पोता कुहय लागल- “दादाजी-दादाजी, ठंढा पीजिए। अच्छा है।” हम पोता आ पोतीकेँ स्प्राइट पीआ देलहुँ। गिलास खाली भय गेल। पुतोहु खाली गिलास लय खूब नीमन नहाति एक गिलास सत्तू आगूमे टेबुल पर राखि देलन्हि। सत्तू देखि मनमे भेल जे हम तँ ट्रेनसँ पटना अयलहुँ मुदा ई सत्ततु हमरासँ पहिनहि कोना एतय पहुँच गेल। बुझना गेल जे सत्तू हमरासँ पहिनहि शायद हवाई जहाजसँ एतय पहुँच गेल। किछु देरक बाद मनमे आश लगेने रही जे भोजनमे भात-दालि आ तरकारी भेटत तँ स्वाद परिवर्तन भय जाइत। आधा घंटाक बाद सत्तूसँ भरल लिट्टी, सेबईक खीर,आलू-गोभीक तीमन आगामे टेबुल पर आयल। ओना, भोजन बड़ प्रेमसँ बनल छल। मनहि मन सोचलहुँ जँ जायब नेपाल तँ कपार संगहि जायत। जाहि डरे भिन भेलहुँ सैह पड़ल बखरा। स्वाद परिवर्तनक लेल अयलहुँ पटना मुदा स्वाद परिवर्तन भाग्यमे लिखलो रहे तखन ने। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। भारतीय मुसलमान आ भारतीयता- मूल हिन्दी लेख- गीतेश शर्मा, मैथिली अनुवाद- उमेश मण्डल भारतीय मुसलमानक किछु एहेन खुबी रहल अछि जइ कारणेँ हुनका सभकेँ ‘मुसलमान नहि कहि ‘भारतीय मुसलमान’ कहब बेसी नीक होएत। दुनियॉंक कोनो देशक मुसलमान-समाजसँ हिनकर तुलना नहि कएल जा सकैत अछि। भारतक माटि-पानिमे रचल-बसल ऐ समाजक दैनंदिनक जीवन, आचार-बेवहारक इस्लामसँ दूरोक सम्बन्ध नहि, परन्तु दिक्कत तखन होइत अछिजखन इस्लामक केन्द्र सऊदी अरबकेँ ई लोकैन अपन सोचक केन्द्र मानि लइ छैथ आ ओतए-सँ आबि रहल हवाक सुगन्धकेँ महसूस करैक दाबी करै छैथ, जखन कि सच्चाइसँ एकर कोनो सरोकार नहि होइत। जेना किकहल गेल अछि, ई अपन रोजमर्राक जिनगी आ बेवहारमे इस्लामक ऐसी-तैसी करै छैथ, मुदा जँ कियो अन्तिम पोथी- ‘कुरान-ए-पाक’आ अन्तिम पैगम्बर ‘हजरत मुहम्मद’केँलऽ कऽ कियो सबाल उठबए तँ मरै-मारैले उताहुल भऽ जाइ छैथ। मजगर बात ई अछि जे ई सभ भारतमे जे करि लइ छैथ, यएह जँ सऊदी अरब मक्का-मदीनामे करैथ तँ या तँ हिनका सजा-ए-मौत मिलतैन वा बिना कोनो हीले-हवालेक हिनका ओतएसँ निकालि कऽ बाहर करि देल जेतैन। ई कहैमे कनिक्को परहेज नहिजे ऐ समाजक लोक निरपवाद रूपमे ओ सभ सभ काज करै छैथजेकर कुरान-ए-पाकमे सख्त मनाही(मुमानियत)कएल गेल अछि, संगे अल्लाह आ हजरत मुहम्मद सेहो जैपर सख्त पाबन्दी लगौने छला। ऐ मुद्दाकेँ आगू बढ़ेलासँ पहिने हम एकटा छोट-छीन उदाहरण देबए चाहब, हमर एक शुभेच्छु मित, जे जनै छैथ जे हम साए प्रतिशत नास्तिक छी, एक दिन साँझू पहर हमरासँ भिड़ गेला आ इस्लामकेँ लऽ कऽ बहस करए लगला। मौका पाबि हम लगे-हाथ कहलयैन- “अहॉंक मुहसँ इस्लामक बात शोभा नइ दैत अछि, किएक तँ नियमसँ अहॉं मुसलमान छीहे नहि!” हुनकर ऑंखि लाल भऽ गेलैन। ओ तमसाकऽ बजला- “ई कहबाक अहॉंक हिम्मत केना भेल?” हम कहलयैन- “दोस (मियां), हमरा बजैक मौका तँ दीअ आर ताबेतक अपन तामसपर कंट्रोल राखू।” हम सबालक ढेप बरिसबैत पुछलिऐ- “अहॉं शराब पीने छी?” निच्चॉं नजैर केने ओ धीरेसँ बाजल- “हँ।” हमर दोसर सबाल छल- “अहॉं पथिया लगबै छी। माने फुटपाथिया दोकान। भिनसर-सँ-साँझ धरि गहिंकीसँ मात्र झूठे नहि बजै छी, बल्कि सप्पत खा-खा कऽ झूठ बजै छी। मुदा जखन सौदा नइ पटैए तँ अधलाह जबानसँ ओकरा अधलाह गारि सेहो दइ छिऐ,की ई छी अहॉंक इस्लाम?” ऐठाम ई साफ करि दिअ चाहै छी जे ई बात हिंदुओ भाय लोकैनपर लागू होइते अछि। खास कऽ ओइ हिन्दूपर जे अपने-आपकेँ धर्मक ठीकेदार मानै छैथ। हम अपन मुस्लिम मितकेँ कहै छिऐन जे अहॉं अपना-आपकेँ भारतक माटिमे तइ तरहेँ रचा-बसा नेने छी जे ऍंड़ी-सँ टिकासन तक अहॉं सुच्चा भारतीय छी, मात्र देखाबाक लेल अहॉं इस्लामी मुखौटा लगबै छी, जइसँ हिंदु आ मुसलमानक बीच ऐ तरहेँ दूरीक जन्म होइए जइसँ रोटी-बेटीक रिश्ता-नाता तँ दूर जे एक थारीमे बैसकऽ खेना-पीनाइ तक असान नहि, जखन कि सच्चाइ ई अछि जे भारतक तहजीबक नीक-बेजाए कोनो एहेन पहलू नइ अछि जेकरा अहॉं अपनेने नहि होइ, बल्कि कतेको मामलामे तँ अहॉंकेँ महारत हॉंसिल अछि। आउ किछु बिन्दूपर खुलिकऽ चर्च करी। इस्लाममे जाति-पाति नहि अछि, परन्तु भारतीय मुसलमानमे तँ अछिआ सेअइछे नहि, बहुत बेसी तर तक अछि। आपसमे बेटीक बिआह नइ होइए। शेख सैयद, खान-पठान ऊँच जातिक, कुंजरा-जुलाहा-अंसारी नीच जातिक मानल जाइ छैथ। शादी-बिआहक रस्म-रेबाज मजहबी दूरीक बावजूद हिंदु आ मुसलमानमे ऐ तरहेँ मिलल-जुलल अछि जे ई कहब बहुत कठिन, जे ई रेबाज केकरासँ के लेलक। किएक तँ ‘वेद’ आ ‘कुरान-ए-पाक’मे ऐ रेबाजक केत्तौ कोनो जिकिर नहि। शेरवानी पहिरब, सेहरा लगाएब, चुहलबाजी करब, मेहदी-उबटन लगाएब, जुआ खेलब इत्यादि-इत्यादि सभ रेबाज अहीठामक छी, कोनो सऊदी-अरब, ईरान-इराकसँ थोड़े आएल अछि। नाच-गान, ऐक्टिंग करब, पेंटिंग करब, एतए तक कि शास्त्रीय संगीत आ भजन गायनमे मुसलमान अव्वल दर्जापर अछि। फिल्म हुअए कि नाटक आकि चित्रकला, एतए तक कि मूर्ति बनाएब ऐ सभ क्षेत्रमे मुस्लिम कलाकार आ कारीगर माहिर रहल अछि। जखन कि ऐ सबहक ‘कुरान-ए-पाक’मे सख्त मनाही कएल गेल अछि। अधिकतर मुस्लिम देशमे ऐ सभपर सख्त पाबंदी अछि। उदाहरणक तौरपर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां लिअ, की बिस्मिल्लाह खां सऊदी अरबमे शहनाइ बजा सकै छला? फ़िदा हुसैन अगर मक्का मदीनामे चित्रकारी करितैथ तँ हुनका ता-उम्र जेलमे बितबए पड़ितैन। मुदा ऐ कलाकार सभपर भारतकेँआत्म-सम्मानक भान भेलै आ हुनका सभकेँ पैघ-पैघ इनामसँ नवाज़ल गेलैन। भजन गायन? तौबा-तौबा। गबैबला मुसलमान, भजन लिखलैन मुसलमान, मौसीकार मुसलमान, पर्दापर गबैबला मुसलमान आ ऐ सभकेँ पेश करैबला प्रोड्यूसर सेहो मुसलमान। आइयो जखन ओइ भजनकेँ कियो सुनैए, तँ आस्तिक होथि वा नास्तिक भक्ति रसमे डुमि जाइए। केतेक नाओं गिनाबी कलाकार सबहक, समुच्चा पोथी लिखए पड़त। मुदा तैयो किछु कलाकारक नाओंकेँ जिक्र करब जरूरी अछि जेना- ‘गुलाम अली खां, अलाउद्दीन खां, उस्ताद अमीर खां, बेगम अख्तर, बिस्मिल्लाह खां, उस्ताद अल्ला रखा, आगा हश्र कश्मीरी, नौशाद, मुहम्मद रफ़ी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, सोहराब मोदी, दिलीप कुमार, सुरैया आदि। लेखन जगतमे ‘अमीर खुसरो’, पहिलहिन्दीमे लेखक छला, जिनकर लिखल गीत आइयो हिंदुक शादी-बिआहमे गाएल जाइत अछि। मलिक मुहम्मद जायसी नइ होइतैथ तँ कि रानी पद्मावती होइतैथ? रहीमक दोहा सभसँ के परिचित नइ छैथ? श्रीकृष्णपर रसखानक लिखल गीतक आइयो कियो बराबरी नहि। कबीर रहीम गोस्वामी तुलसीदासक समकालीन छला। तुलसीदास जखन रामचरित मानस लिख लेलैन तँ पोथीक पहिल प्रति कवि रहीमकेँ भेँट केलैन आ हुनक राय मंगलखिन। पोथी पढ़ि रहीम जे टिप्पणी केलैन, पाठककेँ जनतब हेतु ओकरा हम एतए छापि रहल छी- “रामचरित मानस बिमल सेतन जीवन प्राण हिंदुआन को वेद सम जमनहिं प्रकट कुरान।” (अब्दुर्र रहीम खानखाना) सैयद महफ़ूज़ हसन रिज़वी ‘पुण्डरीक’हमर करीबी मीत तँ नहि मुदा मीत छला। हमर हुनकासँ मित्रता ग़ज़लकार जितेन्द्र धीरक ओजहसँ भेल। नास्तिक होइतो रामचरित मानसपर हम अनेको प्रवचन सुनलौं। हमरा नजैरमे पुण्डरीक सभसँ अव्वल रहला। रामचरित मानसपर जखन ओ बजै छला तँ लोक सभ सम्मोहित भऽ कऽ हुनक व्याख्यान सुनैत छल। लगबे ने करै छल जे कोनो मुसलमान रामचरित मानसपर बाजि रहल छैथ। ओ निखालिस भारतीय मुसलमान छला आ भारत वर्षक तहज़ीबकेँ ओ आत्मसात कऽ नेने छला। ई बहुत कम लोक जनै छैथ जे उर्दूमे मोहब्बत आ मुल्क परस्तीकेँ लऽ कऽ बहुत बेसी गजल-शायरी लिखल गेल,आन-आन जबानक तुलनामे। मुस्लिम कारीगर अगर तीन मासक अवकाश लऽ लैथ तँ महल-झोंपड़ी, मन्दिर-मस्जिद बनब बन्द भऽ जाएत। जेवरात बनबैसँ लऽ कऽ हीरा तराशब, जड़ी-बुटीक कारीगरी, दर्जीगिरीक क्षेत्रमे सत्तर प्रतिशतसँ बेसी कारीगर भारतीय मुसलमान छैथ और हुनकर कारीगरीक बेपार करैबला हिंदू। मध्यपूर्वक देशमे लाखो मुसलमान कारीगर काज करैले जाइ छैथ आओर अपन कमाएल कमाइक निवेश भारतमे करै छैथ न कि यूरोप, अमेरिकाक बैंकमे। भारतीय मुसलमानक त्रासदी ई अछि जे ओ जनबे ने करै छैथ, भारतीय तहज़ीबमे सोल्होअना रंगल भारतीयताक स्वतंत्र देन रहल अछि। ओइ कौमक लोकक भारतीय तहज़ीबकेँ बेइन्तहा देन रहल अछि। जइ दिन ओ ऐ सच्चाइसँ बावस्ता भऽ जेता आ ऐपर फक्र करए लगता, हिन्दू मुसलमानक बीचक दूरी बहुत हद तक मेटा जाएत। कवि नज़रूल इस्लामकेँ लेल जाए, ओ अपन लेख आ कविताक माध्यमसँ ‘सनातन धर्म’ आओर ‘इस्लाम’पर हथौरीसँ चोट केलैन। ओ लिखलैन- दंगाक दौरान मन्दिर और मस्जिद तोड़ि देल जाइत अछि। मनुखक जान लऽ लेल जाइत अछि, ईश्वर आओर अल्लाह चुपचाप ई दृश्य देखैत रहि जाइ छैथ। मन्दिर-मस्जिद तँ फेर बनि जाएत, मुदा मनुखक जान आपस भऽ सकत? मुसलमनक सभसँ पैघ मसला ई अछि जे हुनकामे सही लीडरशिप नइ अछि। पढ़ल आ अनपढ़ल मौलवी-मुल्ला मजहबक नाओंपर हुनका भड़काबै आ भटकाबै छैन। हालक किछु वर्षमे ई देखल जा रहल अछि, हिंदू लीडारशिपक एक पैध तबका ऐ बदगुमानीक शिकार भऽ मुल्ला-मौलवीक रस्तापर चलि पड़ला अछि। दुनूक जुआन एक अछि, भड़काबै आओर भटकाबैक तरीका सेहो एक अछि, मुदा हुनकर बदकिस्मतीसँ हिंदूमे अखनो मुस्लिम कौम जकॉं कट्टरता नइ आएल अछि। ‘हिंदू धर्म’केँ लऽ कऽ बहुत हद तक खुलि कऽ चर्चाक गुंजाइश बँचल पड़ल अछि। मुस्लिम कौमक तँ ई हाल अछि जे कुरान शरीफ आओर हजरत मुहम्मदकेँ लऽ कऽ, अल्लाहकेँ लऽ कऽ नुक्ताचीनी तँ दूरक बात जे कोनो सबाल तक उठबैक इजाजत नइ अछि। मुसलमानक की प्राथमिकता तालीम, सेहत, गरीबी नहि बल्कि मस्जिद अछि। कुरान शरीफकेँ कंठस्थ करैबलाकेँ हाफ़िज मानल जाइए आओर इज्जतक नजैरसँ देखल जाइए। मात्र कंठस्त करि कऽ ‘कुरान-ए-पाक’केँ बिना समझने-बुझने..! छै ने कमाल..! मुसलमानक एक त्रासदी आओर अछि जे ओ जखन नमाज पढ़ै छैथ तँ मक्का-मदीना माने सऊदी अरब दिस मुँह घुमा कऽ, जखन कि सऊदी अरब कोनो कीमतपर हिनका अपनबै आ नागरिकता दइक लेल तैयार नहि। रहल अल्लाह केर प्रश्न, अगर ओ छैथ तँ सभ जगह छैथ। शहर कलकत्ताक एक इलाका खिदिरपुर आओर मटियाबुर्ज अछि, जेतए अस्सी प्रतिशत आबादी मुसलमानक अछि। ओतए लमसम साएसँ बेसी मस्जिद अछि, जइमे पनरहसँ बेसी मस्जिद पूर्णत: एयरकंडीशनसँ लैश अछि। करोड़ो रूपैआ लगा कऽ ओकर रौनकमे निखार आनल गेल मुदा समुच्चा इलाकामे एक्कोटा नीक स्कूल, एक्कोटा नीक कौलेज आकि नीक अस्पताल नहि अछि। मुसलमान सबहक पिछड़ापनक लेल केवल सरकारपर तोहमत लगाएल जाए आकि मुस्लिम कौमकेँ सेहो एकरा लेल जिम्मेदार ठहराएल जाए? भारतीय मुसलमान जखन अपन भारतीय सोचक जगह ‘मजहब परस्ती’केँ अन्हार-कूपमे रहब पसिन करता तँ अल्लाह सेहो हुनका ऐ सभ समस्यासँ छुटकारा नइ दिआ पौतैन। हिंदू समाजक ई खासियत अछि, विशेषता अछि जे केतेको सदिसँ एक-पर-एक केतेको समाज सुधार आन्दोलन भेल, एतए तक कि स्वामी दयानन्द सरस्वती मूर्तिपूजा (बुतपरस्ती) केँ ई कहि मुखालफ़त केलैन जे ई रेबाज वैदिक युगक पछातिक विकृति छी। ओ अपन पोथी- ‘सत्यार्थ प्रकाश’मे राम कृष्णकेँ एहेन ऐसी-क-तैसी केलैन अछि। राजा राममोहन राय, विद्यासागरआदि बाल-बिआहक विरोध आओर विधबा-बिआहक समर्थन केलैन। एतए तक कि सती-प्रथाक सेहो डटि कऽ विरोध केलैन। एकटा कानून ‘शारदा एक्ट’क तहत बाल-बिआहपर कानूनन रोक लगौल गेल। कट्टरपंथी सबहक विरोधक बादो ई कानून अमलमे लाओल गेल। ऐ मुहिमकेँ आगू बढ़ौलैन बामपंथी आ प्रगतिशील चिंतक-विचारक। मुसलमानक तुलमामे हिंदूमे जे बदलाव आएल, भलेँ सीमिते तौरपर, मुदा ओकर असर समाजपर पड़ल आ समाजकेँ ओइसँ नोकसान नहि भेल बल्कि लाभे भेल। मुदा विगत किछु बर्खसँ हिंदू कौमक चक्का उल्टा घूमि रहल अछि। रूढ़िवादी पुरातनपंथी तत्त्वक सोझहामे ई घुटना टेकने जा रहल अछि, जेकर सभसँ बेसी लाभ ओकरा भऽ रहल अछि, जे इस्लाम आ पश्चिमसँ आबि रहल खतराक नाओपर समुच्चा कौमकेँ अतीतोन्मुखी बनबैमे सफल भऽ रहल छैथ। मजगर बात तँ ई अछि जे हिंदुत्ववादी विचार पैघ-पैघसँ तायदादमे ओइ पख्श्चिममे जा कऽ बसि रहल छैथ, जिनका एतए राति-दिन कोसल जाइए। मुस्लिम कौमक नेता सभ जकॉं हिंदुत्ववादी नेता सेहो ‘हिंदू धर्म खतरामे’ अछि, ऐ नाओंपर समुच्चा कौमकेँ गुमराह कऽ रहल छैथ आओर बहुत हद तक हुनका कामयाबी सेहो भेटलैन अछि। लगैए, ईश्वर-अल्लाह एतेक कमजोर पड़ि गेल अछि कि हुनकर शख्सियतकेँ बँचबैक कोशिशमे दुनू कौमक लोक मिलिकऽ एक-दोसरक विरोधमे मोर्चा सम्हारि नेने छैथ। फलाफल ई भेल अछि जे दुनू कौमक लोक अपन बुनियादी हक- रोजी, रोटी, शिक्षा, चिकित्सा,गरीबीइत्यादिअनेको अमानवीय बेवहारककीमतपर मजहबी जुनून पैदा करि कऽ घृणाक आगि सुनगा रहल छैथ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. संतोष कुमार राय 'बटोही' दू-टा कविता ३.२. रामविलास साहुक हाइकू/ शैनर्यू ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु ३.४. नन्द विलासराय- हमर चारूधाम ३.५.पल्लवी मण्डल- समाज संतोष कुमार राय 'बटोही' दू-टा कविता 1. लोकतंत्रक प्रहरी कुरसी सँ चिपकल लोकनि भूलि गेलथिन्ह अपन इतिहास मुल्क इ सभक छियैए बपौती इ सभक छियैए । सभ किछु पर सभहक अधिकार छन्हि बेर-बेर ठगि रहल छथि सत्ता मिललाक बाद परञ्च आब हिटलरगिरि नहि चलतन्हि । जाति-धरम मे बाँटि कs लोक केँ संविधान सँ खेलवाड़ मंदिर-मस्जिद केर राजनीति नहि चलतन्हि तानाशाही । पढ़ल-लिखल भटैक रहल अछि नागरिक सेवा मे घुन लगलै जनताक टाका चोरी केनिहार शासन केँ सीना पर मूंग दररैत छथि । घुसखोर आफिसर फौदैत छथि लूटिस भs रहल छै सरकारी खजाना लोक सभ चिचियैत छथि जंतर-मंतर पर अखबार मे लिखल गेल छै ढेर रास । गरीबक कियो नहि होएत छै रोटी, कपड़ा,मकान,दवाई आओर शिक्षा सभ किछु बिकाउ छै टाका नहि अछि तँ मरि जाउ । सरकारी अस्पताल दम तोड़ि रहल छै मनरेगा मे आगि लगलै गामक मुखिया आओर वार्ड मेंबर सभ घुसखोर प्रधानमंत्री आवास योजना मे घुसखोरी । किसान,मजदूर तबाह भेल छथि अहाँ सत्ता मिलला पर मलफै उड़ाउ संवैधानिक संस्था केँ तोड़ू-फोड़ू पुलिस केँ बल पर खूब कुदू । इ लोकतंत्र छियैए से जुनि भूलियौ जनता मुल्कक प्रहरी होएत छै ओ जखन चोट करताह तँ निर्मूल भs जायब सावधान हे कुरसी बाबू ! 2.बहि रहल अछि फगुआक बयार कुहुकी-कुहुकी कs हिया मे दरद उठैए घर जाइत छी बाहर अबैत छी मोन परैत छथि स्वामी आजु थोड़ गे माइ कखन हेतै भोर । हमरा नहि टाका चाही हमरा नहि गहना चाही बिनु स्वामी डायन भेल चहुँ ओर आँखि सँ बहि रहल अछि दिन-राति नोर। अइ बेर के खेलताह हमरा संग होरी रंग-अबीर के लगौतिहिन हमरा किनका लेल बनौबै अइ बेर भांगक घोर गे माइ टुटि रहल अछि परेमक डोर । फूलेलै बाग-बगीचा हिलै छै आमक-जामुनक पत्ता पिया आबो पकड़ू परेमक एकटा छोर पुलिस अहाँ हमर हम अहाँक चोर । बहि रहल अछि फगुआक बयार गुदगुदि भेल सभतरि देह मे टुटि रहल अछि पोर-पोर हे कहिया धरि एबै यौ हमर चित-चोर । संतोष कुमार राय 'बटोही' ग्राम-मंगरौना पोस्ट-गोनौली प्रखंड-अंधराठाढ़ी अनुमंडल-झंझारपुर जिला-मधुबनी बिहार-847401 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रामविलास साहुक टनका हाइकू/शैर्न्यू अमृत वाणी छानि कऽ पीबू पानि नै कोनो हानि गरीबक छी मरूआ खान-पान बँचबे प्राण रोटी, कपड़ा मकान, शिक्षा, स्वास्थ सभकेँ चाही मनक प्यास बुझे ने मजबुरी आदत बुरी एक तँ चोरी दोसर सीना जोरी की छै जरूरी? ज्ञानक खान वेद पुराण अछि ज्ञानी महान कर्मे चलैए जिनगीक सवाड़ी नै तँ भिखाड़ी जीबाक इच्छा सभकेँ छै दीर्घायु कम छै आयु नाचे बानर माल खाए मदारी की छै लचारी? तुलसी एक साए गुण भरल पूज्य बनल ऑंवला फल अमृत फल अछि गुण भरल आमक फल अछि फलक राजा खाइतो माजा ज्ञान दानसँ पैघ नै कोनो दान कर्म महान धैलिक पानि ज्ञानी संतक वाणी नै कोनो हानि मेघ बरसै वादल गरजैत बेंग बजैत हवा बहैत दिन-राति चलैत जीवन दैत? रोगसँ रोगी तड़ैप मरैए तँ प्राण के देत राम नामकेँ बदनाम करैए सभ भजैए सॉंझ समय सुरुज डुमैत-ए दीप जरैए अन्नक संगे घुनो पिसाइत-ए तन संगे मन पुरान पोथी इतिहास, साहित्य बँचा कऽ राखू नशा करैए विनाशकारी काज लइए प्राण नशा सेवन शरीर आ आत्माकेँ हानि करैए रंग नै कच्चा ओहेन रंग रंगु जे होइ पक्का जन्म मरण निश्चित होइत-ए नाश्वार किए? देशक राजा प्रजा मिलि चुनैए मुदा, आन्हर दूतीया चान बढ़ैत ऊपर चढ़ै पूर्णसँ घटै मेघ बरसै धनरोपनी करै अन्न उपजै फसल पकै कटनी दौनी करै कोठी भरैए अन्नक दान सभकेँ बँचै प्राण करू कल्याण सभक मान रखै छइ किसान धानसँ मान धान मखान माछक खान पान पानसँ मान हवा दोमैत इजोरिया जरैत प्रेमी तरसै दुखित मन अन्हरिया छै राति दिल धड़कै माया नगरी पहुना हेराएल केना खोजब? फलमे केरा सभक राखे मान सस्ता समान नारियलक फल बड़ कठोर बीचमे जल हाटक चौर बाटक पानिसँ, नै कटत दिन ऑंखिक नोर आ ओश चटनेसँ नै मिटै प्यास दिलक बात कहै भौंरा फूलसँ प्रेम अमर चिड़ै चहकै एकताक पाठ छै उत्तम गुण संकल्प नेने चींटी चढ़ै उतरै लक्षक ओर नेता, नायक झूठे करै वणिज मूर्ख बनबै बालुक भित शीतसँ पटौनी नै होइत अछि जीवन मृत्यु निश्चित होइत छै तै अमर के बाट चलैत मुरि-मुरि देखैत संगी नै कोइ लाठी ठेंगैत ठोकरसँ बँचैत आगू बढ़ैत ऑंखि नै सुझै बिनु सहयोगीकेँ बाट चलैत प्रेमक भूख भोजनसँ नै मिटै आत्मा भटकै जीवन नैया मजधार फँसल धर्म खेबैया गाए-माइक सेवासँ मिलैए उत्तम मेवा सुखक खान कर्म अछि प्रधान सभक मान ज्ञानसँ करू जगतक कल्याण भेटत मान ज्ञानक खान गीता, वेद, पुराण पढ़ु मनसँ आम लताम सभक राखै मान गुणक खान खान पानमे दूध, दही, फलसँ शान बढ़ैए माए-बापकेँ भोरे करू दर्शन हरि दर्शन गीत संगीत मन हर्षित करै दुख हरए नदी कातक चास-बासकेँ नहि कोनो आश कागजपर लिखलाहा नाम तँ अमर नहि वन पर्वत नै मिलै भगवान मनमे राम बुढ़ पुरान अनुभवी होइए करू सम्मान मिथिलामे छै पाबैन तिहारक बेसी चलैन लेखक, कवि दुनियाँकेँ बनबे जनकेँ ज्ञानी रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ जरूरी अछि दिवाली संगे अबैत अछि जाड़ होलीमे जाए कर्मक मान दुनियाँमे होइ छै कुकर्मक नै गाछक फल खाए जुराए गाछ नै खाए जीबाक इच्छा सभकेँ छै दीर्घायु कर्ममे पाछू हिंसा नै करू अहिंसासँ कल्याण कर्म महान मान सम्मान सबहक करियौ सभ सीखतै वृक्षा रोपन सर्व हितक काज जीव जन्तु ले नेत्र दानसँ नै कोनो पैघ काज जग देखैले अंग दानसँ दोसरकेँ कल्याण उत्तम काज रक्त दानसँ दोसरकेँ बँचैए जिनगी प्राण ज्ञानी, सज्जन समाजक अमृत बढ़बे ज्ञान मीठ वचन अकुर काज करे नै कोनो हानि दोस्त करैए दुखमे हितकाज नै बदनाम लालची मित्र कुकुर समान-ए हानि करैए तन बदैल रूप देखबैत-ए आत्मा एक-ए समाजमे नै बुजुर्गक मान छै करू सम्मान नीमक गाछ रोगक किटाणुकेँ मारि भगाबे माटिक मूर्ति फूल फल ने खाए बलि पड़ैए अनरनेबा पित्त वायु नाशक पैघ पाचक ऑंखि रहितो जे आन्हर होइए तँ की कहबै? खजूरक छै राजस्थानमे मान शक्तिवर्द्धक अछि ताड़ गाछसँ ताड़ी चुबबैत छै नशा खातिर पानसँ राखे मेहमानक मान मिथिला जन फूलक सेज नीन चैन नै होइ मरणासन कुकर्म अछि नरकक समान छे बदनाम श्रमदानक छै दुनियाँमे मान होइ कल्याण फूलक शोभा गंध उड़ै अकास स्वर्गक वास श्रमिक बले देश भेल महान मुदा गरीब खेत उपजै छै अन्न, फल, साग सभक लेल झूठ वचन बोलि जँ हित हुए नै कोनो हानि फलक राजा आम जे खाइए से पहलवान बासि भोजन नै खाउ जानि प्राणि हएत हानि पानि दूध छै दुनू अमृत सन बँचाबे प्राण खीरा छी हीरा भोर खाउ नोनसँ नहि तँ पीड़ा राति जगैए दिन सुतै नित्य केतए बास देश कंगाल दलाल केने अछि माल हरैप घासमे दुभि धनमे गाए अछि कल्याणकारी माघक जाड़ दीनकेँ सतबैए हिलबे हाड़ जाड़क रौद सभकेँ मन भाबे जाड़ भगाबे मालिक चोर मुंशी कोतबाल-ए संत भण्डारी भोज भारी दालि अछि खेसारी खाए भैयारी अन्हरा राजा बहिरा अछि मंत्री बौक छै प्रजा रोगीकेँ भावे से वैद्य फरमाबै जान गमबै घड़ी चलै छै दिन-राति समान लोक कीए ने? दुखसँ भारी मनरोग होइ छै लाइलाज छै ज्ञानक सुख असल सुख अछि धन सुखसँ कर्मक फल सभ भोगैत अछि कर्मवीर के? धन खर्चासँ कर्मक खर्चा नीक जेना बरखा फुटल भाग्य कर्मसँ बनैत-ए जँ धर्मी होइ खेलसँ बढ़ै धिया-पूतामे मेल नै कोनो भेद भजन करै साधु, संत, पुजारी खाए महंथ फल खाइक सभकेँ इच्छा अछि रोपे ने गाछ अन्हरा नाचे बहिरा सुनि हँसे डीठरा सुते सोना चानीसँ अमीर मालोमाल देश कंगाल भोजनमे छै साग पातक मान केकरा लेल? गाइक दूध दही, घी, गोंत अछि दबाइ सन नीमक छाल पत्ता, फड़ दबाइ राखे निरोग लाजक खान लजैनी छै महान अनेको काज विद्वानक छै मिथिलामे खान तेँ जगमे नाम मिथिला नाम बड़ पैघ पुरान छी कर्म स्थल विवेकी ज्ञानी बुधिसँ करै काज अनका लेल जल सभक जिनगी बँचबैए भूमि सींच कऽ बहु विवाह गरमेल जोड़ी तँ अभिशाप छी यौन शिकार देहक बेपार तँ देशक मुद्दा स्त्री उत्पीड़न समाजक शोषण अपराध छी संघर्षशील गतिशील होइए जिगनी लेल सुविद्या अछि गुणवत्ता घटल महग भेल स्तनपानसँ बच्चा निरोग छै कोनो नै हानि युगक जुआ कवि लेखक खींचे मरितोदम खेतीक काज दुनियाँक राखैए सभक लाज पानि छुबाइ दूध नै छुबाइए कारण की छी? अन्न जलसँ पोसाइत-ए काया लोभसँ माया कुकर्माहाकेँ नरको जाइत नै लाज होइ छै अनुभवसँ मिलैए रोजी रोटी पोथीसँ ज्ञान सभ चाहैए अनकर हरैप धनिक बनी इनसाफ नै मिलैए अदालतमे न्याय बिकै छै खुदा जनैए इनसाफक बात इनसान नै राति खाइ छै दिन लेल झखै छै नेक मरै छै मौसम जकाँ बदैल खेलु खेल शरीर लेल रोगी रोगसँ पीड़ीत रहैत छै भोगीकेँ दूना भाग्य नै बाँटै नहि चोराबै कोइ जाने ने कोइ? भाग्यक खेल चमतकारी होइ जाने विधाता हिन भावना विकासक बाधा छी कुकर्म सन जलक मान सभसँ छै महान बँचाबे प्राण खेल-खेलमे सभसँ राखू मेल नै कोनो झेल शैतान करे जानि कऽ परेशान मारए जान माइक गोद धरतीक बिछौना नै छै तुलना दीप जरिते फतींगा जरि मरे कोन गलती? विद्या धन तँ खर्चासँ बढ़ैत-ए संगे कल्याण खान-पानमे सचेत रहु जानि नै हुए हानि पैघ चुनौती दऽ रहल कुरीति तोड़ैत नीति सतीत्व लेल सीता देली परीक्षा बिनु धोखेसँ जीव जन्तुक जिनगी गतिशील मरणशील खेल कूद छै बच्चा लेल जरूरी विकास लेल काम अराम भोजन दुनू सॉंझ नैए समान सुख दुख छै सभकेँ जनमेसँ मरने मिटै सियार भालू पैघ होइए चालु नै ए कमाउ कलम लिखे तकदीरक खेल खुदा हुक्मसँ सेवा संस्थान करैए काज कल्याण लेल फॉंसीक फंदा गर्दनिमे पड़िते देख मरैए बाहर मान घरमे बदनाम करैए हानि हितक काज अपन हुए हानि बढ़बे मान प्रेमक मार्ग स्वर्ग समान अछि शान्तिक मार्ग जेहने खाए अन्न तेहने होइ छै तन मन पोथी पुराण पढ़े ज्ञानी महान ज्ञानक खान ज्ञानीक मान महाज्ञानी करैए राजा शलाम सौनक राति बिजुरी चमकैत मेघ बरसै भादोमे कादो धान रोपे किसान बाढ़िसँ हानि आसिन मास हथिया झॉंट बहै घर खसबै कातिक मास किसान देखे चास मन उल्लास धानक खेत लहलहाति देख सजै खम्हार धान पकए कटनी दौनी करि कोठी भरए अगहनमे चोरो साधु बनि कऽ अन्न समटे पुसक मास दिन राति पड़ैए ओस कुहेस माघक राति कनकनी जाड़सँ हिलैए हाड़ फागुन मास वसंत करै राज गमकै बाग चैत मासमे चना गहुम पकै गाछ कलशै बैशाख मास धरती जरैत-ए तबा समान जेठक मास धरतीकेँ बुझबै मेघ पियास अषाढ़ मास धानक बीआ गिरा खेत गजारे सौनक बून मोती बनि गिरैए धरा सजैए सोना बिकैए तौल-तौल महग माटि अमुल्य इमान घटि बेमान तँ बनैए पेट खातिर आम लताम दीनक राखे मान बढ़बे शान धान मखान मिथिलाक छी शान पानसँ मान गुलाब फूल कॉंटक संग रहि मन लुभाबे दुख सुखक बीच गुलाब रहि सुगंध बाँटे मैथिली बोली मधुर जनभाषा सभक आश आगि पानिकेँ जरबैए, पानि तँ बुझबे आगि कुकुर कहीं आगि पकैए ठग कही उपास एक मार्ग-ए सुमार्ग मनुखक सत्य अहिंसा सुखक फल हित सेवा कल्याण मिलत त्राण कोइली कूक सुनि मन हुलसै नैन बरसै धनी बनब सभक इच्छा अछि दीन किए ने? जेल जुर्माना सुधारे ने जमाना नहि इंसान हाथ आएल शिकार छुटि गेल छगुन्ता भेल नहि भेटल माए-बापक प्रेम छी भाग्यहीन संघर्षशील कर्मशील जिनगी श्रेष्ठ होइए फटीचरक पहिचान बेढंगा बुझू लफंगा अश्रु पीब कऽ जेना शोकाकुल छी मरले बुझू समस्या भारी बेमारी फौजदारी छी कष्टकारी अनरनेबा फल गुणकारी औषध भारी पेटक दुख हरै अनरनेबा खाइमे मेबा अनरनेबा उपजै बाड़ी झाड़ी हरे बेमारी अनरनेबा पेट भरूआ फल छी हितकारी सुखले सौन कारी मेघ रूसल कृर्षि मरल सुखल खेत देख किसान काने भूखे पियासे दरारि देख माथा ठोके किसान तेजए प्राण अन्न अम्बार जे खेत उपजाबे सुख नै पाबे भूखले पेट मजदुर मरैए देखैबला के? मन मोहिया मोह मायामे फँसि लोभी मरैए मांगत भीख केना जीअत दीन की उचित छै? शोक संताप गरीबकेँ भेटल वरदानमे गरीबसँ तँ भगवान बेमुख सुखसँ दूर केना जीबत गरीबक संतान नै छी इंसान नै छै खिलौना खाइले नै छै खाना पृथ्वी बिछौना दुख भोगैले गरीब जनमल विषके पीतै? सभ इंसान हैवान बनल-ए सुधारत के? मोह-मायामे फँसि लोक मरैए बँचाएत के? लोभ-मोह तँ मनुखक दुश्मन तियागत के? क्रोध आगिसँ ज्वलनशील अछि बँचि कऽ रहू दुख भरल लोकक जिनगीए खोजैए सुख सुख दुखक जिनगी मधुर छै मध्यम मार्ग जे दुख सहि जीबैए शुद्ध सोना सन होइए जे नै सहैए भूख ओ की बुझत आनक दुख खुआ खाए कऽ जे चैनसँ सुतैए दुख के लेत फुटहा खाए दुख काटि जे जीलै केकरा लेल सभक हिस्सा मारि जे खेलक दोषी के हेतै? कहै लेल तँ सभ संतोषी अछि अधक्की के छी? रोग निदान संयमसँ होइए भोगी सृजैए पोड़ो, बथुआ गरीबक साग छी सेहत लेल पोष्टिक साग पोड़ो, बथुआ खाए गिरहतुआ साग पतार देहक रक्षा करि रूचि बढ़ाबे सागक गुण सभ नहि बुझैए सस्ता भेटैए सुखक बाट भोगी पकड़ैए तँ दुख के लेत? कर्महीन नै पुरुषार्थ होइए नर्क भोगैए विपत्ति सहि इमान बँचबैए स्वर्ग पाबैए बिगड़लकेँ साहित्य सुधारै छै ढोंगी छोड़ि कऽ अपन हित दोसरकेँ अहित स्वार्थी करैए प्रेम मार्गसँ देश समाज सजि आगू बढ़ैए प्रेमक बाट पकैड़ जे चलैए सुख पाबैए ई जिनगी नै नहि जीबै मरै छी अधमरू छी सत्य बात आ अमृतवाणि बाजु नै हेतै हानि जीवन मृत्यु सभक सत्य अछि माया घेरैए दुख सुखकेँ समरूप भोगैत जीबैत चलु मनक शुद्धि साहित्य करैत-ए सुख दइए ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’ झारू- जीयो और जीने दो मन्तर जँ जपतै ई जग संसार।। जग अमनकेँ जड़ि जुएतै हरिएतै मानव अधिकार।। गीत- जीयो और जीने दो मन्तर राखू हरदम याद यौ।-2 किए केकरोसँ झगड़ा हेतै हेतै किए विवाद यौ।-2 किए...। आसमान छी सबहक पिता भू मण्डल छी सबहक माता।-2 तँए भैयारी सभ जग वासी मनमे करू सुआद यौ।-2 किए...। बढ़बू जन-जनमे सभ प्रीत हेतै मानवता केर जीत।-2 एक बनि जीबै सभ जग वासी घर-घर दियौ समाद यौ।-2 किए...। दियौ जग अमनपर जोर चलू विश्व शान्ति केर ओर।-2 केकरो नै कियो करै गुलामी सभ जीबतै अजाद यौ। किए...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलासराय- हमर चारूधाम एक दिन एला हमर दोस जेकर नाओं छिऐन हरेराम हम आदरसँ बैसौलिऐन नेबोबला चाह पियौलयैन स्पेशल पत्ती आ जर्दाक संग खियौलयैन पान। हमर दोस बजला चलू मीत एमकी काँवर लऽ कऽ बाबाधाम बाबाधाम गेलासँ नहि हएत किछो हानि यौ भोलाबाबा छैथ बड़का औधरदानी सभ मनोकामना पूर करता हमरा बातक करू बिसवास जे-जे मंगबै सभ देता पूरा करता सब आश। हम बिच्चेमे बजलौं यौ दोस हमर माए छथिन साक्षात पार्वती आओर बाबू छैथ शंकर भगवान हुनका सभक सेवाकेँ धर्म बुझै छी कथी-ले जाएब हम बाबाधाम। सुति उठि सभ दिन करै छिऐन माए-बाबूकेँ प्रणाम ऐ काजसँ पैघ नहि बुझै छी हम गंगा स्नान जाबे धरि माए-बाबू जीबै छैथ नै जाएब तीर्थ स्थान माए-बाबू जेतए बसै छैथ वएह छी हमर चारूधाम। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पल्लवी मण्डल, गाम-बेरमा, जिला- मधुबनी समाज सभक लेल सभ तरहक नियम बनबैत अछि समाज ई जेम्हरे धर तेम्हरे भर खसबैत अछि! बेटीकेँ आज्ञाकारी संगे संस्कारी बनबै छै आ बेटाकेँ शिक्षित ऑफ़िसर बना अप्पन काज ससारै छै जरूरत भेला पर एक-दोसरक संगो पुड़िते छै ओतइ किछु नव काजमे असगरो छोड़ै छै समाजक सांचामे सब तरहेँ लोक बनए की राम एहि ऐ समाजें तँ रावणो अहिँ समाजसँ निकलय! ओना... समाजक सांच सभक लेल समान नै होएत नै तँ झूठ भगवान आ सच बदनाम होएत समाजक बीच अप्पन रास्ता बनाएब कठिन छै मुदा ओकर बनाइल रास्ता पर चलब आसान मुदा जखन बहैत अछि पानि बिनु बनाइल रास्तासँ तखन सहजहि हुअ लगै छै नव धाराक संग धारक निर्माण! ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २६८ म अंक १५ फरबरी २०१९ (वर्ष १२ मास १३४ अंक २६८)