विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २६९ म अंक ०१ मार्च २०१९ (वर्ष १२ मास १३५ अंक २६९) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.उमेश मण्डल-(मैथिली लेखकक रचना संसारसँ बीछल विचारक पाम्फलेटक पोथी) २.२.मोहनराज 'गगन'-बीहनि कथा २.३.वापसी-राजदेव मण्डल २.४.आशीष अनचिन्हार-हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-6 ३. पद्य ३.१. संतोष कुमार राय 'बटोही' दू-टा कविता ३.२. रामविलास साहु टनका ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु ३.४. नन्द विलासराय- दहेज Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups संपादकीय बीहनि कथाक नामपर घमर्थन- गजेन्द्र ठाकुर बीहनि कथा, लघु कथा आकि अति लघु (घुनसी) कथा, कोन नाम ऐ नव विधाक देल जाए? ऐ घमर्थनमे मैथिली बीहनि कथाक जे मूल प्रकृति फरिछा कऽ बहार भेल अछि, मैथिली आ मिथिलावासीक मधुर वाणीक कटाह-धराह मारिक (चेंगरा-पोठी चालि दे रोहुक सीर विषाय- चन्दा झा) अस्त्र, से दबा जकाँ गेल अछि। बीहनि कथा ने हास्य-कणिका अछि आ ने अति लघु कथा। जेना पैघगर कथा भेने लघु-कथा उपन्यास नै होइए, आ छोटगर भेने उपन्यास लघुकथा आकि अति-लघु कथा नै होइए, तहिना बीहनि कथा छोट लघुकथा केँ नै कहि सकै छी। जँ लेखक अति-लघुकथा केँ बीहनि कथा कहै छथि तँ ओ फरिछा कऽ बहार भेल बीहनि कथाक परिभाषासँ अपरिचित छथि। मुदा अति-लघुकथामे लघुकथाक तत्त्व अनबा लेल बड्ड मेहनति आ प्रतिभा लागत, तखनो ओकर आकार ओकरा अधखिच्चूए राखत। धराह लेखकक जे छोट सीझल कथा, सएह भेल बीहनि कथा, एतऽ सेहो बड्ड मेहनति आ प्रतिभा लागत मुदा तकरा बाद जे पाकबहराएत से अधखिच्चू नै रहत आ नहिये गिल्ल, सीझलो रहत आ फरहरो रहत। आ सएह भेल असली बीहनि कथा। विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.उमेश मण्डल-(मैथिली लेखकक रचना संसारसँ बीछल विचारक पाम्फलेटक पोथी) २.२.मोहनराज 'गगन'-बीहनि कथा २.३.वापसी-राजदेव मण्डल २.४.आशीष अनचिन्हार-हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-6 उमेश मण्डल (मैथिली लेखकक रचना संसारसँ बीछल विचारक पाम्फलेटक पोथी) जगदीश प्रसाद मण्डल राजदेव मण्डल डॊ. शिव कुमार प्रसाद रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारूदार’ राम विलास साहु नन्दविलास राय कपिलेश्वर राउत प्रीतम कुमार निषाद मोहनराज 'गगन' बीहनि कथा ---नव प्रयोगक विवाद व्यर्थ थिक, आऊ नव सदस्यक स्वागत अपनेक सभगोटे करी ---अहाँ बड़ बुझै छियै सभसँ पिछला पाँतिमे बैसल जोगिंदरा तामसे बाजल ---की कहबाक अर्थ अछि अपनेक खुलिकेँ बाजू, कथीक विरोध? ---किछु नए, मुदा एहि बगीचामे कोनो नवका गाछ आब नए लगब' देव, किछ भए जाय। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। वापसी राजदेव मण्डल पात्र परिचय- 1. पतिलाल- (दहेजक लोभी बेकती) 2. लुतीचन- (पतिलालक ग्रामीण) 3. कंतलाल- (पतिलालक बेटा) 4. चन्देसर- (पतिलालक समधी) 5. फूलोदाय- (कंतलालक पत्नी आ चन्देसरक बेटी) 6. सुखबा- (चन्देसरक बेटा) 7. घोंघाय- (चन्देसरक ग्रामीण) 8. चटपटिया- (चन्देसरक ग्रामीण) 8. अंकप्रारम्भ प्रथम दृश्य स्थान- पतिलालक दुआरि। समय- दिन। लुतीचनक प्रवेश लुतीचन- (जोरसँ आवाज दैत अछि।) काकाऽऽऽयौ काकाऽ ऽ। अँगनामे छिऐ यौ। एने आऊ कनी। (पतिलाल भीतरसँ निकलैत अछि।) पतिलाल- किए एते जोरसँ हल्ला करै छँह। बाज ने की बात छिऐ। लुतीचन- काल्हि सॉंझमे हाट गेल छेलौं। अहाँ समधीक भाय भेटल छल। समधी बेमार अछि। ओ कहलक भेँट करबाक लेल। पतिलाल- धुर, की भेँट करबै। बियाहमे जे दहेजक रूपैआ बॉंकी रहि गेलै से अखनी तक नहि देलक। दू गोरेक सोझामे गछौटी केने छल। लुतीचन- छोड़ि दहक आब ओइ गप्पकेँ। कहबियो छै- भेल बिआह आब करब की। पतिलाल- केना छोड़ि देबइ। ऐ कारणे तँ अँगनामे माए बेटा दुनू मिलि कऽ हमरासँ लड़ैत रहैए। लुतीचन- ओतए जेबहक तब ने कोनो बातो हेतह। पतिलाल- तहूँ चल ने लुतीचन। दुनू गोरे रहबै तँ गप्पो चलबैमे ठीक रहतै। लुतीचन- ठीके छै। हमहूँ जाएब। ओनएसँ बजारक काजो केने आएब। अहाँआऊ हम तैयार रहब। q (कहैत लुतीचन प्रस्थान करैत अछि।) सीन ड्राप। दोसर दृश्य- समय- दिन स्थान- (पतिलालक समधी–चन्देसरक घर। (पतिलाल आ लुतीचनक प्रवेश) लुतीचन- दुआरिपर तँ कोय नहि अछि। (अँगनासँ कनबाक स्वर आबि रहल अछि।) पतिलाल- (कान लगा कऽ सुनैत अछि) यौ समधीजी छी यौ। अँगनासँ निकलू ने। हम दुआरिपर ठाढ़ छी। (कनबाक स्वर मद्धिम भऽ जाइत अछि। चन्देसरक जेठ बेटा सुखबा ऑंखि पोछैत निकलैत अछि।) सुखबा- आऊ बाबू, अँगने आऊ। बाबूजी नहि रहला। चलि गेला स्वर्ग। आब हुनकासँ भेँट नहि होएत। पतिलाल- ओह! जुलुम भऽ गेलइ। की भेल छेलै? सुखबा- (कनैत स्वरमे) किछो नहि भेल रहै। दू-तीन दिनसँ बेाखार लगै छेलै। आइ एकाएक छातीमे दरद उठलै आ जाबे सचेत भऽ कऽ असपताल लऽ जैतौं ताबे पराने छुटि गेलइ। पतिलाल- अच्छा सबुर करह। कनलासँ किछ नहि हेतह। की करबहक, भगवानकेँ इएह मंजूर छेलइ। होनीकेँ कियो नहि रोकि सकैत अछि। धरतीपर एतबे दिनक दाना-पानी लिखल छेलैन। धीरज तँ बान्है पड़तह। सुखबा- हँ, से तँ ठीके। आब दोसर उपाये कोन छइ। मुदा पहिनेसँ एहेन बातक कनियोँ शंका नहि छेलइ। पतिलाल- हौ, एहेन मृत्यु तँ सभसँ नीक। किनको सेवो-टहलक अवसर नहि भेटलैन। सुखबा- ई तँ दोसर बात भेल बाबू। मुदा अचानक जे कोनो भरिगर भार कपारपर पड़ि जाइ छै तँ...। पतिलाल- शान्तिसँ काज करबहक तँ सब चीजक रास्ता लगि जेतइ। सुखबा- चलू बाबू। अहाँ सभ लहाश लग बैसब। ओइठाम कियो नइ छइ। दाह-संस्कारक लेल हमरा कतेक चीजक इन्तिजाम करए जाए पड़त। पतिलाल- चलह। (सुखबा आगू आ पाछूसँ पतिलाल आर लुतीचन विदा होइत अछि।) q सीन ड्रॉप। दृश्य- तीन समय- दिन। स्थान- चन्देसरक घरक एक भाग (चौकीपर चन्देसरक लहाश अछि। एकटा औरतिया ओइठाम बैसल अछि। सुखबा, पतिलाल आ लुतीचनक प्रवेश। (पतिलालकेँ देखते औरतिया नोर पोछैत विदा भऽ जाइत अछि।) सुखबा- अहाँ सभ अहीठाम बैसू आ हमरा लकड़ीक इन्तिजाम करैले जाए दिअ। (कहैत विदा भऽ जाइत अछि। पतिलाल माथपर हाथ दऽ एक कातमे बैस जाइत अछि।) लुतीचन- मन किएक दुखित करै छी। बुढ़ छेलैथ नीके भेलैन जे मरि गेला। पतिलाल- से तँ ठीके कहै छी। मुदा पत्नी आ बेटाकेँ की जवाब देबै? ओ तँ हमरे दिस हुड़कान मारै छइ। लुतीचन- की हुड़कान मारैए? पतिलाल- धुर तूँ की बुझबीही। गुड़क मारि तँ धोकड़े बुझै छइ। पत्नी कहैत रहैए जे लेाककेँ केते दहेज देलकै। मुदा अहाँकेँ ठकि लेल। गछलो टका नहि देलक। अहाँ बुड़बक छी। मुरुख छी। लुतीचन- अच्छा, सुनू एकटा बात कहै छी। पतिलाल- कह ने रौ। कोनो उपाय लगा ने। लुतीचन- समधीक कान दिस देखै छिऐ। (लहाश दिस इशारा करैत) दुनू कानमे सोनाक कनौसी अछि निकालि कऽ जेबीमे रखि लिअ। कियो ऐठाम नहि छै जे देखबो करत। पतिलाल- बात तँ तूँ ठीके कहै छँह मुदा बुझि जेतौ तब की हएत? लुतीचन- ऐठाम आइ केतेक लेाक एतै आ जेतइ। ओइमे की पता चलतै जे के लेलक। आ जँ बेसी डर बुझाइत अछि तँ अपना गामे दिस चलि देबइ। पतिलाल- ठीके कहै छँह। इएह अन्तिम उपाय अछि। (उठि कऽ समधीक लहाश लग जाइत अछि।) q सीन ड्रॉप। दृश्य- चारि समय- दिन। स्थान- चौबटिया। (पतिलाल आ लुतीचन लफड़ल चौबटिया लग पहुँच गेल अछि। पाछूसँ सुखबा अपना दूटा गौंऑं घोंघाय आ चटपटियाक संगे प्रवेश करैत अछि।) सुखबा- (हल्ला करैत) यौ बाबूऽऽऽ। कनी ठाढ़ रहू। (पतिलाल आ लुतीचन ठाढ़ होइत अछि) घोंघाय- (हकमैत) यौ किएक भागल जाइ छी? पतिलाल- भागल कहाँ जाइ छी। हम तँ गाम जाइ छेलौं। घोंघाय- गाम किएक जाइ छिऐ? पतिलाल- जाइ छी गामपर सँ बेटा-पुतौहकेँ भेज देबइ। ओ सभ एता तँ दाह-संस्कारमे भागो लेता। चटपटिया- अहाँक घरपर समाद भेज देने छी। ओ सभ अबिते हेता। अहाँ परेशान नहि होउ। पतिलाल- परेशान केना नहि हएब। दूटा माल-जाल अछि। घर-अँगनाकेँ सुनहट छोड़नाय नीक बात हेतइ। हम जाइ छी। चटपटिया- एकटा गप्प सुनि लिअ समधीजी तब जाएब। पतिलाल- जल्दी कहू। चटपटिया- केना कहब, कहितो अनोन सन लगैत अछि आ नहि कहब सेहो नहि बनतै। पतिलाल- सोझ मुहेँ कहू ने। जे कहैक अछि। चटपटिया- देखियौ, अहाँ ई नहि सोचबै जे कोनो आरोप लगबै छी। ओना, कर-कुटमैतीमे एहेन बात बाजब अनुचिते होइ छइ। मुदा जँ नहि बाजी तँ आरो अनुचित। सन्देह आ शंकाकेँ साफ कऽ ली, सएह उत्तम होइ छइ। घोंघाय- तूँ तँ तेतेक गप्पकेँ घुमा-फिरी करै छहक जे एहिसँ नीक हमरा बाजए दएह। पतिला- हँ-हँ, अहीं बाजू। घोंघाय- यौ समधीजी, लहाश लग अहीं बैसल छेलौं। तखनी ओइठाम कियो नहि छेलै। सोनाक कनौसी कानमे नहि छइ। अँगनाक स्त्रीगण सभ बजैए जे समधीक कानक कानौसी अहीं निकालि लेलिऐ। (पतिलाल चुप्पी साधने ठाढ़ अछि।) चटपटिया- चुप रहने काज नहि चलत समधीजी। सोनाक कनौसी छेलै तँए पुछै छी। अहाँकेँ एना नहि करबाक चाही। पतिलाल- ठीके कहै छी। हमरा एना नहि करबाक चाही। मुदा समधीजी जे हमरा संगे केलक से हुनका करबाक चाही? (पतिलालक बेटा कंतलाल आ पुतौह फूलोदाय प्रवेश करैत अछि।) चटपटिया- ओ तँ बेचारे स्वर्ग चलि गेला। ओ अहाँ संगे की केने छला? पतिलाल- अखनी तक दहेजक रूपैआ जे गछौटी केने छल से बॉंकीए अछि। ओना, अपने तँ दुनियेँसँ चलि गेला। मुदा ओ रूपैआ हमरा के देत? चटपटिया- ओ! तँए ओकरा बदलामे कानक कनौसी घींच लेलिऐ। पतिलाल- तँ की करितौं। पत्नी आ बेटा कहैत अछि जे अहाँ मुरुख छी। बिआहमे ठका गेलौं। अहाँ मनुख नहि छी। कंतलाल- बाबूजी, अहाँ एतेक नीचा गिर जाएब से पता नहि छल। फूलोदाय- (पति कंतलाल दिस तकैत) अहाँक बाबूजी पकिया आदमी अछि। जीयतक तँ बाते छोड़ू, मुइलोसँ सूइद समेत तसील लैत अछि। कंतलाल- हुनकर सेानाक कनौसी अपास कऽ दियौ। आब ऐ विषयमे हम कहियो नहि बजब। पतिलाल- ठीके छै, जखन तोरो वएह विचार छौ तँ वापस कऽ दइ छिऐ। (पतिलाल सोनाक कनौसी सुखबाक हाथमे दैत अछि।) घोंघाय- अच्छा, आब सब गप्प छोड़ू। चलै चलू, दाह संस्कारमे। पतिलाल- आब कोन मुहेँ ओइठाम जाएब। सोना तँ हम वापस कऽ देलौं। मुदा हमर प्रतिष्ठाक वापसी तँ नहि भऽ सकैत अछि। फूलोदाय- चिन्ता नहि करू बाबूजी। अहाँ चलू। हमर घर-पलिवार छिऐ। हम सब बात सम्हारि लेबइ। कंतलाल- बाबूजी, अहाँ तँ घिनेबे केलौं। सासुरमे हमरो घिना देलौं। पतिलाल- देखियौ, जेकरा लेल कानलौं, तेकरा ऑंखिमे नोरे नहि। आब ऐठाम हम ठाढ़ नहि रहि सकै छी। (तेजीसँ प्रस्थान) q सीन ड्रॉप। सम्बन्ध (एकांकी नाटक) पात्र- 1. लखपतिया : धनक लोभी बेकती 2. जगु बौकू : लखपतियाक भाए 3. दुखनी दाय : लखपतियाक माए 4. दुलारी (छिटकीवाली) : लखपतियाक पत्नी 5. लेटरू काका : लखपतियाक ग्रामीण 6. भुनेसर : लखपतियाक ग्रामीण 7. कमलेश : लखपतियाक ग्रामीण 8. फुलचन : लखपतियाक ग्रामीण (किछु ग्रामीण आर चाहबला दोकानदार) पहिल दृश्य- समय भिनसर (लखपतिया दरबज्जापर बैसल अछि। आगूसँ बाट धेने फुलचन जा रहल अछि।) लखपतिया- (कनी जोरसँ सोर पाड़ैत अछि) यौ फुलचन भायऽऽऽ। एने आउ।। एगो गप्प छइ। फुलचन- (घुमि कऽ लगमे अबैत अछि।) हँ, कहू की बात? लखपतिया- सुनै छी जे अहाँ अपना भाएकेँ हिस्सा नइ दऽ रहल छिऐ। सुनू- भाय-भैयारी महींसी सिंग, जखने जनमल तखने भिन्न। भाइक हिस्सा तँ दिअ पड़त। फुलचन- ओहिना होइ छै आधा हिस्सा यौ। कठ काटि कऽ सम्पैत बँचौने छिऐ। ओहिना बँचल छै, धन-सम्पैत। फोकटेमे आधा हिस्सा लेतै। काज करै बेरमे बबुआनी केने घुरै छेलइ। लखपतिया- भाइक हिस्सा मारि कऽ खेबै तँ सभ कुछ स्वाहा भऽ जाएत। फुलचन- देबै हिस्सा। कहियौ, पहिने महाजनक सभटा पुरना करजा आपस कऽ देतै तब आधा हिस्सा लेत। लखपतिया- ओ कहै छल जे अहाँ अपना सार आ पत्नीक बेमारीमे सभटा करजा उठौने छिऐ, तखन तँ ओइ करजाक भार अहाँक उठबए पड़त ने। फुलचन- हे बेसी लबर-लबर नहि करू। अहाँक ओकरासँ दोस्ती अछि तँए ओकरा दिससँ बजै छिऐ। खुलि कऽ खेलाउ ने। लखपतिया- ई मिलानबला गप्प नहि भेल। एनामे दुनू भॉंइमे लड़ाइ-झगड़ा भऽ जाएत। फुलचन- हमरासँ लड़ाइ करत। हमरा सोझामे एहेन गप्प बजत तँ सारकेँ खून कऽ देबइ। देखै छी- जे के आबै छै, ओकरा दिससँ। जे एतै तेकरो छोड़बै नहि। लखपतिया- ईमान-धरम सभ खतम कऽ देबइ? फुलचन- इह, हमरा ईमान-धरम सिखबै छैथ। अपना भाइकेँ दशा बिगाड़ि कऽ भगा देलखिन से मन नहि छैन। (फुलचन फानि कऽ विदा भऽ जाइत अछि।) q सीन ड्रॉप। दोसर दृश्य- स्थान : गामक चौबटियापर चाहक दोकान। (भुनेसर, कमलेश, फुलचन, आर किछु ग्रामीण सभ चाहकदोकानपर बैसल अछि।) (लेटरू काका संगे बौकू अबैत अछि।) लेटरू काका- (बौकूकेँ हाथसँ झोरा लैत) अपना गामपर आबि गेलौं। अहाँ पियासल छी, पहिने कलपर जा कऽ पानि पी लिअ, तब घर दिस जाएब। (बौकू पानि पिबैले जाइत अछि।) भुनसेर- लेटरू काका, ओ के छी यौ? लेटरू काका- नहि चिन्हलहक। लखपतियाक भाए बौकू छिऐ। (लखपतियाक नाम सुनिते फुलचन लगमे आबि ठाढ़ भऽ जाइत अछि।) भुनेसर- एकर तँ चेहरे दोसर रंग भऽ गेलइ। लेटरू काका- हँ, कहै छैलै जे दू बरिस पहिने बस एक्सीडेन्टमे घायल भऽ गेल छल। मुहेँमे बेसी चोट लगलै तँए एना भऽ गेलइ। भुनेसर- ई तँ आठ-दस बरिस पहिने निपत्ता भऽ गेल छेलए। फेर केना आबि गेल। कमलेश- अहाँकेँ केतए भेँट भऽ गेल? लेटरू काका- भोरमे दूध बेच कऽ आबै छेलौं। ई टीसन लग रस्ताकातमे ठाढ़ भऽ कऽ अपना गाम दिस ताकै छल। हमरा देखते पएर छानि कऽ कानए लगल। पहिने तँ हमहूँ अकबका गेलौं। मुदा पैछला सभ गप्प कहलक तब चिन्ह गेलिऐ। कमलेश- ई बौक तँ नहि अछि। फेर एकरा बौकू किए कहै छिऐ? लेटरू काका- नाम तँ एकर जगू छिऐ। मुदा ई बचपनेसँ कनी मतिछिन्नू जकॉं करै छेलै, जे काज करै से करिते रहि जाइ। नहि कोनो काज रहै तँ चुप्पी लाधि कऽ बैस जाए आ घन्टो बजबे ने करए, तँए बौकू नाम पड़ि गेलइ। अहाँ बाहरसँ आएल छी तँए नहि बुझल अछि। (हाथ-मुँह पोछैत बौकू आबैत अछि। बेरा-बेरी सभकेँ गोड़ लागि, कल जोड़ने ठाढ़ होइत अछि।) बौकू- यौ काका, यौ भैया, अहाँ सभक बड़ मन पड़ै छल। माइक मन पड़िते असगरमे खूब कानै छेलौं। नहि रहल गेल तँ अहाँ सभक दरशन करैले चलि एलौं। कमलेश- हौ एतेक दिनसँ केतए छेलहक? बौकू- भेट गेल छला एक सन्त भगवान। हुनके सेवा-टहलमे समए काटए लगलौं। फुलचन- आब ऐठाम रहबहक आकि फेर चलि जेबहक? बौकू- एलौं तँ भैयासँ भेँट करैले। ओ जँ राखि लेता तँ रहि जाएब। फुलचन- हँ कहै तँ छहक ठीके। ओ तँ बुझहक रावणे छिआ। समाजोमे सभसँ अलगे रहै छैथ। केकरो बात सुनत थोड़े। भुनेसर- ओइ बेर रूपैआ चोरौने रहै ओकरे सार आ मारि-पीट कऽ बौकाकेँ गामसँ भगा देलकै। लोक कहैत-कहैत थेथर भऽ गेल मुदा ओ केकरो बात नइ मानलक। (लखपतियाक पत्नी छिटकीवाली ओही बाटे जा रहल अछि। ओकरापर सबहक नजैर पड़ैत अछि।) फुलचन- हे यौ, छिटकीवाली घर दिस जा रहल छइ। कहि दियौ ने जे तोहर हेरेलहा दिअर आबि गेलौ। अँगना नेने जेतइ। भुनेसर- हँ यौ, ठीके कहै छिऐ। लखपतियाक पत्नी छिटकीवालीए छिऐ। (छिटकीवाली मुँह घुमा कऽ देखैत अछि आ तेजीसँ विदा भऽ जाइत अछि।) फुलचन- तखैनसँ कहै छेलौं तँ सुनबे ने केलिऐ। भुनेसर- आब लेटरू काकाकेँ नेने जाए पड़तै। लेटरू काका- ओ बाघ छिऐ जे हमरा खा लेतइ। चलू, बौकू, अहाँकेँ अँगना पहुँचा दइ छी। (लेटरू काकाकेँ संगे बौकू प्रस्थान करैत अछि। पाछूसँ सभ विदा भऽ जाइत अछि।) q सीन ड्रॉप। तेसर दृश्य- स्थान- लखपतियाक दरबज्जा। (लखपतिया दुआरिपर बैसल अछि।) छिटकीवाली- अहाँ दुआरिपर बैसल छिऐ आ ओनए अहाँपर काल बरिस रहल अछि। लखपतिया- की भेलै? केतए काल बरिस रहल छइ? छिटकीवाली- अहाँक हेरेलहा भाए भेट गेल। चाहक दोकानपर लेटरू काका आ फुलचन भैयाक संग फुसराहैट करैए। लखपतिया- अँए, ई केना भेलइ! छिटकीवाली- अहिना घरमे घेंसिया कऽ पड़ल रहू आ देखैत रहियौ। सभ सम्पैत बॉंटि कऽ बेच-बिकैन देत। लखपतिया- हम बुझै छिऐ। सभटा खेला फुलचनमाक लगौल छिऐ। अखैने तँ हमरासँ बकटेंटी केलक। ओनए खेला लगौने छल। छिटकीवाली- कहैत रहै छी तँ बाते ने बुझैत रहै छिऐ। सभ दुश्मनी कऽ रहल अछि, अहाँसँ। लखपतिया- अच्छा, अहाँ सिरिफ माएकेँ सम्हारने रहब। नहि होइए तँ ओकरा केतौ देासरठाम पठा दियौ। अहाँ अपना भाएकेँ कहियौ तैयार रहैले आ हमर लाठी नेने आउ। पहिने सोझा तँ आबए दियौ। (लेटरू काका संगे बौकूक प्रवेश।) लेटरू काका- यौ, अहाँक बौकू टीशनपर भेटल। बाटपर ठाढ़ भऽ कऽ अपने टोल दिस तकै छल। संगे नेने एलौं। (बौकू गोड़ लगबाक लेल लखपतिया दिस बढ़ैत अछि। बौकूकेँ लखपतिया ठेल दैत अछि।) लखपतिया- लगमे सँ हट। भाग ऐठामसँ। बौकू- भैयाऽऽ। हम बौकू छी। लखपतिया- फेर चुप, भाइक नाम नहिले। हम सभटा छल-प्रपंच बुझै छिऐ। दुश्मन सभ मिलि कऽ खेला लगौने अछि। हमर भाए तँ कहिया ने मरि गेल। बौकू- एहेन बात नहि बाजू यौ भैया। अहाँक बड़ यादि आबै छल। माइक मोन पड़िते कलेजामे सान्हि मारए लगै छल। तँए भेँट करैले आबि गेलौं। (एका-एकी फुलचन, कमलेश, भुनेसर आबि जाइत अछि।) लखपतिया- रे धोखेबाज, हम सभटा बुझै छियौ। हमरा सम्पैतकेँ बॉंटैले तोरा लाओल गेलौ। तूँ हमर भाए नहि बररूपिया छेँ। कहै छियौ, भागि जो हमरा सोझासँ। लेटरू काका- हे यौ लाखोजी, सुनू ई अहींक भाए छी। पैछला गप्प आ गामक बितलाहा घटना सभक बारेमे पुछि लियौ। अपने पता लागि जाएत। ई तँ एक्सीडेन्टक कारणे चेहरा कनी बदलल छइ। लखपतिया- हमरा सिखबै छी अहाँ। पैछला सभ बात बुझा-सुझा कऽ एकरा नाटक करबाक लेल अनने छिऐ। लेटरू काका- हमरापर झूठ-फूसक दोख नहि लगाउ। भाए छी अहाँक आ बात सुनब हम। लखपतिया- फेर, भाएबला बात बजिते छी। बौकू- यौ भैया, रूपैआ चोरौने रहै अहाँक सार आ दगनीसँ दागि कऽ भगा देलिऐ हमरा। सेहो दाग हमरा देहपर अखनी तक अछि। बिसबास नइ होइए तँ देख लियौ। (देह परहक दाग देखबैत अछि।) लखपतिया- देखबै की। हमर भाए मरि गेल। ओकर अन्तिम क्रिया-करम कऽ देलिऐ। (लखपतियाक माए दुखनी कानैत प्रवेश करैत अछि आ दौड़ कऽ बौकूसँ लिपैट जाइत अछि।) दुखनी- रौ बौआ, रौ बौआऽऽऽ। एते दिन केतए रही रौ बौआ। कोन-कोन देवता-पितरकेँ कौबला केलिऐ रौ बौआऽऽऽ। (बौकू आ दुखनी एक-दोसरसँ घेंट जोड़ि कऽ जार-बेजार कानि रहल अछि।) बौकू- माए गै माएऽऽऽ। तोहर सुरता कहियो ने बिसरलियौ गइ। रहि-रहि कलेजामे सान्हि मारै छेलौ। तोरासँ भेँट करैले आबए पड़लौ। तोरासँ मिल लेलियौ। आब मनक सन्ताप मेटा गेल। दुखनी- नहि रौ बौआ। आब तोरा केतौ नइ जाए देबौ रौ बौआ। (लखपतिया हाथमे लाठी लैत छिटकीवालीकेँ इशारा करैत अछि।) लखपतिया- छिटकीवाली, माएकेँ ऐठामसँ अँगना लऽ जाउ। ई बुढ़िया नाटक बेसी करैत अछि। घरमे बन्न कऽ कऽ एकरा मुँहकेँ थुड़ि दियौ। देखै छी की, एकरा घिसिया कऽ लऽ जाउ। आ लगाउ मुक्का-थप्पर। (छिटकीवाली आगू बढ़ि दुखनीकेँ हाथ पकैड़ घिसियाबैत अँगना लऽ जाइत अछि।) बौकू- (कानैत स्वरमे) हमरा कारणे माएकेँ नहि मारियौ। हम जा रहल छी। फेर कहियो घुमि कऽ एमहर नइ आएब। आइसँ हमर भैयारीक सम्बन्ध टुटि गेल। (विदा भऽ जाइत अछि, मुदा फुलचन रोकैत अछि।) फुलचन- तूँ धीरज राखह बौकू। एकरे मजाल छिऐ जे ई भाइक हिस्सा नइ देतै। पलिवारसँ भगा देतइ। आखिर समाज छै आकि नहि। अखैने हमरा उपदेश दऽ रहल छल आ अपना बेरमे बिसैर गेल। बौकू- नहि यौ, आब हम नहि रहब। हम समाजकेँ परनाम करै छी। जखैन हमरा भाए हेरा गेल तँ सम्पैत आ हिस्सा लऽ कऽ की करबै। हम तँ अपना सहोदराकेँ तकैले आएल छेलौं। हमरा लेल चिन्ता नहि करू। बड़का दरबार हमरा लेल खुगल छइ। अपना भऽ गेल सपना यौ पराया भऽ गेल अपना यौ। (तेजीसँ बौकूक प्रस्थान।) (दुखनी अँगनासँ चिचियाइत अछि। दुखनीक स्वरमे- बौआ रौऽऽऽ बौआऽऽऽ। q सीन ड्रॉप। समाप्त । ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-6 गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 "नगीना" फिल्म केर ई नज्म जे कि मोहम्मद अजीज जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि आनंद बख्शी। संगीतकार छथि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। ई फिल्म 1986 मे रिलीज भेलै। एहिमे ऋषि कपूर, श्रीदेवी, अमरीश पुरी, प्रेम चोपड़ा आदि कलाकार छलथि। आज कल याद कुछ और रहता नहीं एक बस आपकी याद आने के बाद याद आने से पहले चले आईये और फिर जाइये जान जाने के बाद अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये अपने दिल में मेरा घर बना दीजिये क्या करूँ दिल कहीं और लगता नहीं प्यार में आपसे दिल लगाने के बाद इश्क़ के मैंने कितने फ़साने सुने हुस्न के कितने किस्से पुराने सुने ऐसा लगता है फिर इस तरह टूट कर प्यार हमने किया एक ज़माने के बाद आपका नाम दिल से निकलता नहीं दिल्लगी में कोई ज़ोर चलता नहीं आपको भूल जाने की कोशिश भी की और तड़पा हूँ मैं भूल जाने के बाद पहिल आ तेसर पाँतिक मात्राक्रम अछि 212-212-212-212 तेनाहिते दोसर आ चारिम पाँतिक मात्राक्रम अछि 212-212-212-212+1 मूल मात्राक्रम अछि 212-212-212-212 मुदा उर्दूमे (मैथिलीयोमे) छूटक तौरपर अंतिम लघु मान्य छै। एकर बादक बंद सभमे पहिल तीन पाँतिक मात्राक्रम 212-212-212-212 आ चारिम पाँतिक मात्राक्रम अछि 212-212-212-212+1 एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। एहि नज्मकेँ शेरमे सेहो बदलि सकैत छी जेना निच्चा बदलल गेल छै-- आज कल याद कुछ और रहता नहीं एक बस आपकी याद आने के बाद याद आने से पहले चले आईये और फिर जाइये जान जाने के बाद अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये अपने दिल में मेरा घर बना दीजिये क्या करूँ दिल कहीं और लगता नहीं प्यार में आपसे दिल लगाने के बाद मतलाक दूनू पाँति मात्राक्रम छै 212-212-212-212 212-212-212-212+1 आ तकर बाद दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम छै 212-212-212-212 212-212-212-212 जे कि उर्दू सहित मैथिलियोमे छूटक तौरपर मान्य छै मने जँ एहि नज्मकेँ गजल कहल जाए ताहूमे कोनो दिक्कत नहि। 2 "अनारकली" फिल्म केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि राजेंद्र कृष्ण। संगीतकार छथि सी.रामचंद्र। ई फिल्म 1953 मे रिलीज भेलै। एहिमे प्रदीप कुमार, बीना राय आदि कलाकार छलथि। इस इंतेज़ार-ए-शौक को जनमों की प्यास है इक शमा जल रही है तो वो भी उदास है मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती ज़ुबां पर दिल की बेचैनी कभी लाई नहीं जाती चले आओ, चले आओ तक़ाज़ा है निगाहों का किसी की आरज़ू ऐसे तो ठुकराई नहीं जाती मेरे दिल ने बिछाए हैं सजदे आज राहों में जो हालत आशिक़ी की है वो बतलाई नहीं जाती एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222-1222-1222-1222 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। मुदा एहि पाँति "मेरे दिल ने बिछाए हैं सजदे आज राहों में" मे बहर टूटल छै आ शाइर एकर गजल कहियो नै रहल छथिन। बहुत काल शाइर गजल वा नज्मसँ पहिने माहौल बनेबाक लेल एकटा आन शेर दैत छै ओना ई अनिवार्य नै छै। एहि नज्मसँ पहिने एकटा शेर "इस इंतेज़ार-ए-शौक को जनमों की प्यास है" माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। 3 "प्यासा" फिल्म केर ई नज्म जे कि मोहम्मद रफी जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर लुधियानवी। संगीतकार छथि सचिन देव बर्मन। ई फिल्म 1957 मे रिलीज भेलै। एहिमे गुरू दत्त, वहीदा रहमान, माला सिन्हा आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 122-122-122-122 अछि। ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनियाँ, ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनियाँ, ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनियाँ, ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . हर इक जिस्म घायल, हर इक रूह प्यासी निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी ये दुनियाँ है या आलम-ए-बदहवासी ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . यहाँ इक खिलौना है इंसाँ की हस्ती ये बस्ती हैं मुर्दा परस्तों की बस्ती यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . जवानी भटकती हैं बदकार बन कर जवाँ जिस्म सजते है बाज़ार बन कर यहाँ प्यार होता है व्योपार बन कर ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . ये दुनियाँ जहाँ आदमी कुछ नहीं है वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है जहाँ प्यार की कद्र कुछ नहीं है ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . जला दो इसे फूक डालो ये दुनियाँ जला दो इसे फूक डालो ये दुनियाँ मेरे सामने से हटा लो ये दुनियाँ तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनियाँ ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। "हर इक" केर मात्राक्रम लेल अलिफ-वस्लक नियम देखल जाए मने एकर मात्राक्रम "हरिक" केर हिसाबसँ लेल जेतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. संतोष कुमार राय 'बटोही' दू-टा कविता ३.२. रामविलास साहु टनका ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु ३.४. नन्द विलासराय- दहेज संतोष कुमार राय दू टा कविता 1.गाल पर थप्पड़ अन्याय केँ खिलाफ बाजला पर गाल पर पड़ल थप्पड़ मारबाक धमकी भेटल इएह छियैय दुनिया । समाजक दुःख-दर्द केँ दूर करबा मे पाँछा रहनिहार मुँह पर पुरुख बनवाक लेल फिरिशान छथि नीक लोकनि केँ बदनाम करैत छथि । एकटा नव चुनौती अछि आब जीनगी लेल की करू- छुतहर घैल हम थोड़े छी ? हम दलित बनाउल गेल छी । 2. साहित्य मे भिनभिनौज चुप रहला सँ आओर गड़बड़ होएत अकादमी सँ लsकs गाम-घर तक इ हल्ला भs रहल छै पुरूस्कार मे घोटाला भेल छै। साहित्य मे गोंधियागिरी भ रहल छै जमीन-जायदाद जँका बाँट-बखरा गुहाँ-गिज्जर भs रहल छै भs रहल छै साहित्य मे भिनभिनौज । इ नीक नहि कहल जा सकैए 'बेटखौकी' झगड़ा-झंझट विद्यापति समारोह मे मूल्यहीन राजनीति केँ छकरबाजी साहित्यक धरोहर लेल सबको कुछ करबाक अछि। मीठगर गप हमरा फिरिशान केने अछि चमचागिरी सँ देश बिकायल आबो ज्ञान करबाक चाही फेर नहि तँ गुहाँ-गिज्जर लिखले अछि। संतोष कुमार राय 'बटोही' ग्राम- मंगरौना पोस्ट- गोनौली भाया-अंधराठाढ़ी अनुमंडल- झंझारपुर जिला-मधुबनी बिहार-847401 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रामविलास साहु टनका ज्ञानक खान समाजक दर्पण साहित्य अछि अमृतक खजाना पढ़ि बनू विद्वान श्रेष्ठ साहित्य सागरसँ गहींर गोंता लगाऊ जिनगी बदलत भेटत आत्म ज्ञान भाषा ज्ञानक जननी कर्मभूमि देशक मान जनगण कल्याण विकासक निर्माण मधुर भाषा सभक मन जीत उच्च आसन सम्मान दियाबैए दुखसँ बँचबैए मनक मैल विचार बदलैए समाज देश दुनूकेँ बिगाड़ैए मन रोग बढ़ा कऽ मनक मैल छबिकेँ बिगाड़ैए जनहित नै स्वार्थी बनबैए कुबाट चलबैए अमृत वाणी जनहित करैए नदीक पानि शीतल, नहि हानि पोखैर राखै मान जन्मदातासँ पालनकर्त्ता पैघ मारैबलासँ बँचबैबला श्रेष्ठ जन्मभूमिसँ के छी? माता कुमाता कहियो ने होइए पिता पुत्रक हत्यारा नै होइए कहै छैथ विद्वान कर्मयोगीकेँ भोगी निर्वल कहि जोंक बनि कऽ हकमारी करैए उन्टे नर्क भेजैए श्रमशीलकेँ लोक हीन बुझैए हिस्सा लूटि कऽ भोगी जोगी खाइए स्वार्थ सिद्ध करैए परिश्रमक मोल अनमोल छै नै बिकै तौल जे जानैए ई मोल से जन ज्ञानी होय दुख सहैले गरीब जनमैए सुख भोगैले भोगी ठग महंथ तियागी संत अछि असल सन्त जनहित करैए सुर, तुलसी कबीर, रैयदास चारू युगक दास सत्यक वाणि नै होइए उवाणि हेतै कुवाणि धर्मकेँ हेतै हानि बढ़ि जेतै अज्ञान बाट बटोही संग मिलि चलैए एक थकैए दोसर अछि थीर के होइए अधीर चोर कहियो इजोत नै सहैए भोगी कहियो दुख नहि सकैए के भोगत ई दुख? मनक शान्ति साहित्यसँ भेटैए राष्ट्र निर्माण समाज कल्याण-ले ज्ञानी बाँटैए ज्ञान असल प्रेम साहित्यसँ करियौ ज्ञान बढ़त समाज सुधरत सुख शान्ति भेटत बिनु बजने लोक बुझत केना जँ बाजै छी तँ होइए नकीहानि उन्टे जाइए जान बरसु मेघ एहि बाग-बोनमे पानिक त्रास बेसी बनि गेल-ए खेत सुखि जरैए रूसल मेघ मन नहि मानए मानत केना जखैन बरसत तखने ने बिश्वास मेध देख मन हरिया गेल जे गरजत से बरसत नहि केना बँचत प्राण जे गरजैए से नहि बरसैए चुप्पे रहने खेत बाग जरैए प्यासे लोक मरैए लोक कहैए इंसान पत्थरसँ कम नै अछि अखनो तँ विवेक बुझू मरले अछि कहै लेल तँ विवेक मरल-ए मुदा कठोर इंसान जगलासँ आतंक तँ बढ़ैए किए इंसान लूट हत्या करैए रावण कंस बनि खून पीबैए इमान की कहैए? एते निष्ठुर मनुख किए भेल दुश्मन बनि मनुखे मनुखक हत्यारा बनि गेल धरती डोलि कानि-कानि कहैए सभ डरल सामन्तक जड़िमे आतंक जनमल जवाब देतै सहए तँ दोषी छै चुप्पी सधने मुँह सीने रहै छै दीन दुख सहै छै जे जनमल एक दिन मरत किए होइए लोभी स्वीर्थेअधीर जगत अछि धीर सोच बदैल नेक इंसान बनु घिनौना काज छोड़ि कल्याण करू हेतै नव निर्माण सत्यक बाट चलए जँ इंसान आगू बढ़ैत आगि नहि पकत नहि पानि सड़त कर्मकेँ छोड़ि लोक धर्म खोजैए भवलोकमे भगवान खोजैए नर्क भोग भोगैए हारल दिल थाकल तन मन अकैर गेल जिनगी अगहए जगत छुटि गेल मनक मैल नै छुटल तीर्थसँ स्वर्ग खोजैमे मरणासन भेल कर्त्तव्यक खेलमे मोह बन्धन फँसि वौआए गेलौं बाट भुलि कऽ लक्ष्यहीन बनलौं आडम्बर देख कऽ ठगक मेला पाखण्डीक दोकान सज्जन जन पाप कीनै-बेचैए पुण्य-पापक खान अपन बात लोक दाबि रखैए अपन दुख अपनेसँ सिरैज ओझरा कऽ मरैए स्वर्ग कहि कऽ गामकेँ लजबैए नहि सुविधा सड़क बिजलीक खेती पछारू अछि गाम छोड़ि कऽ परदेशिया बनि खटैए लोक गाममे नै उद्योग पेटक समस्या-ए सभक पेट भरैबला मरैए भुखले पेट धिया-पुता बिलैट अनाथ बनल-ए कहै लेल तँ रीढ़ अछि किसान मुदा जीवन देखू बेवस्था खेल खेती चौपट्ट भेल उत्तम खेती कहैबला नै कियो साधनहीन खेतीक काज भारी माथ पीटै किसान मरि जीबि कऽ किसान खेती करै खा गेल रौदी धिया-पुता कनैए भुखै सॉंझ-विहान केना बँचत इज्जत आ आबरू नहि सुरक्षा दिन अपहरण राति हत्या होइए देश अजाद मुदा खेती उद्योग नै सुधरल नै भेटल सुविद्या की करत विधाता गामक गाम खाए सुते बलान बालुक ढेर उड़बै आसमान केना बँचत प्राण कोसी बलान कमलामे उफान एलै तूफान भँसिया गेल गाम मरल स्वाभिमान विकराल छै कोसीक बाढ़ि-पानि पेटे समेलै गाम-घर-दलान लाखक गेल जान कोसी त्रासदी विकराल निर्मम तांडव नृत्य महाकाल बनल धोइ पोछि खेलक लूटेरा सभ मिलि माल खेलक शोषण हत्या नारीजनकेँ भेल बच्चा दहए गेल धनक क्षति जनक मति गेल देखैबला नै डुमि मरल बच्चा गाम भेल निपत्ता प्रकृति कहि चेतबैए लोककेँ अचरज नै प्रदूषित धरती जहर उगलैए देख प्रकृति चेतावनी दइए धरती पानि हवा प्रदूषित भऽ संकट छै जीवक पावस रीतु अमाबस राति छी मेघ बरसै बाढ़िमे डुमैत छी के बँचेतै हमरा मेघ बरसै पुरबा झॉंट बहै गरैज कहै आइ नहि अखने जलमग्न करब झरझराति जे झरनाक पानि बहि कहैए हिम्मत नै हारू चलु लक्षक ओर ठरल पानि देहकेँ सिहराबै झील झरना सजि शोभा बढ़बै जगत सुख पाबै पानि बरैस मेघ करै कल्याण जीव रक्षा-ले झील झरना नदी भरि करै भण्डार बिनु श्रम नै जगतमे सजैए समाज देश खेतसँ खरिहॉंन सभकेँ राखै मान इज्जतदार ने इज्जत खोजैए बेइमान तँ बेच खाए गेल, जे हुनका की कहबै? अहिंसा छोड़ि लोक हिंसा करैए मानव गुण जनु अन्त होइए दानवे रूप मानु हिंसा छोड़ि अहिंसा अपनाऊ अमन चैन सुख शान्तिसँ जीबू हेतै सभकेँ कल्याण हिंसा छोड़ि कऽ अहिंसा पथ चलु हेतै कल्याण लोक सुखी हेतै तँ हेतै देश विकास तियागी बनि देशक सेवा करू सर्वहितसँ जनता खुश हेतै गर्वित हेतै देश बलिदानक देश अछि भारत माटि-पानि छै उपजाऊ अमृत कर्मवीरक स्थान अपन हित सुख सभ चाहैए अनका लेल काँट कीए रोपैए कर्म छोड़ि चलैए लोकक हित कल्याण जे करैए महामानव जग जानि मानैए देवतुल्य पूजैए प्रेमक बान्ह सभसँ मजगूत लाख जमाना नै मानैए तँए ने लोक हिंसा करैए स्वर्ग नरक यएह धरती छी सत्य पथकेँ पकैड़ स्वर्ग मिले कुपथसँ नरक के सुधारत एहि परम्पराकेँ नै जनमल तियागी ने इंसान सुतल भगवान चान सुरुज समरूप सभक बेवस्था किए दू रंग बनल-ए ऊँच-नीच देखैए मरुस्थलमे बरखा नै होइ छै दृष्टिहीन नै जग देख हँसै छै के अमृत लूटै छै शीशाक दिल एक्के धक्का जँ जुटै दुख सहैत गरीब कठोर भऽ पत्थर सन जे छै पियास बुझै पानिसँ, खूनसँ जे त्रास मिटबे की सत्य अहिंसासँ मिटत ई पियास? भ्रष्टाचारकेँ जे सौरि उखारत तेकरे नाम अमर हेतै देश पैर पूजतै लोक बढ़ चौंसठ एहेन घूसखोर भ्रष्टाचारकेँ जे पनाह दइ छै की देशद्रोही नै छै हाथो-हाथ जे काज करि लोककेँ हजार, लाख ऑफिसमे मांगै छै की भ्रष्टाचारी नै छै उचित लेल जे जान गमबै छै सर्वहितक कल्याण करैत छै असली मसीहा छै मान प्रतिष्ठा सँ बढ़ि संसारमे किछु नहि छै कर्म, धैर्य, संतोख जगत इजोत छै मन मन्दिर घर तीर्थ समान माए-बापक सेवासँ बढ़ि नै छै जगमे कोनो काज घूसखोरकेँ की कोनो नॉंगैर छै इमान बेच दुनियाँकेँ ठकै छै के नरक भोगै छै? भ्रमति मन प्यासल मृगसन सघन बोन पानि बिनु तड़ैप पटैक तेजै प्राण मृग तृष्णामे अज्ञानी वौआइए भवलोकमे घुमि तृष्णा बुझबे नर्क भोग भोगैए अपना लेल दिन राति खटैए सर्वहितक काज नहि करैए केना हेतै कल्याण इमान घटि लालच बढ़बैए इंसान नहि बेमान कहबैए मरि नर्क भोगैए मूर्खक वाणि अग्निवाण होइए ज्ञानीक वाणी अमृत समान-ए जगत कल्याणमे देव समान आदर मानदान सभ खोजैए बैस भोगी बनि कऽ जग केना चलत? जग अज्ञानी देख ज्ञानी कनैए ज्ञानक दीप कहिया जरत जे जग हेतै इजोत सोच बदैल समय-संग चलु हेतै उत्थान सभकेँ दियौ मौका हेतै जग कल्याण आइ तक जे पछुआएल अछि केना बढ़तै करियौ ने उपाय संग मिल चलैक साथ मिल जा समाज नै चलतै केना हेतइ समाजक विकास जा बेवस्था नै हेतै नियत जा नै सभक सुधरतै एक रंगक समाज केना हेतै जा दृष्टि दू रहतै काजक बेर पछुआएल रहै खाइ बेरमे कीए अगुआइ छै की नियत ठीक छै? सभक लेल कानून अधिकार एक रंगक सुविधा-ले बनल बेवहारमे दू छै मुँह देख कऽ मुंगबा परसै छै मुँहदुब्बरकेँ के जानि पुछै छइ होइ छै मानहानि जे केना बनतै समतल सपाट जाधैर नहि उभर-खाभरकेँ सहीट बनाएब के सुधारत दिशाहीन समाज सुधारक छै नेत्रहीन बनल विवेक छै मरल जे बनेलक समाज दिशाहीन माफी के देत बिनु मौत मरत पानि नै कियो देत सभक सुख छीन अपनेलक से भोगी बनि जगकेँ सतेलक से नरक भोगत जे छी दोखी से माफी मांगि लेत तँ क्षमा कऽ देतै आब क्षमादान नै मृत्युदण्डभेटतै दुखियाकेँ जे जानि सतबै छइ भगवानो नै क्षमा देत ओकरा दुख दबि मरै छै पक्षी जकाँ छै मनुखक जिनगी पेट भरैले परिवार छोड़ि कऽ उड़ल फिरैत छै पापी बनि कऽ जे जिनगी जीअल पापक भागी दोसर के बनत पाप ढोति मरत देश अजादी केकरा-ले भेटलै गरीबकेँ तँ भेटलै भूखमरी तियागक फलमे अजाद भेलै केकरा लेल देश बलिदानीकेँ की भेटलै सनेस गरीबी, घूसखोरी देश गरीब अमीर केतए-सँ धन लूटैले अकाससँ आबि कऽ सत्ता हथियौलक महगी मारि बेरोजगारी संगे भूखमरी आ हत्या, अपहरण उद्योगमे भेटल अनेकतामे एकता कहबी छै सभ-सभसँ मुदा किए छुबाए तन-मन दुनूसँ? देशक हाल बड़ गड़बर छै दलमलित छै गरीबक दिल महगीक मारिसँ पेट कहिया गरीबक भरतै की जरि जेतै ओकर अरमान के करतै कल्याण कहबी रटि सभ पढ़ि कहै छै सिद्धान्त सन मुदा काजरूपमे मोन पतियाबै छै बाहर साफ अन्दर घिनाएल बिश्वासघात कर्म, कुकर्म संगे नहाइ गंगाघाट फूल फड़क थाहे ने, रोपैइए ताड़क गाछ जे बढ़ि पीए ताड़ी तेकरे दिन भारी डाइन कहि महिला उत्पीड़न ओझा-गुणीक आरोप लगबैए वैज्ञानिक युगमे कोन कसूर महिला केने अछि जिनगी भरि शोषणक शिकार बनि सहि जीबैए प्रेमक अर्थ सभ नहि बुझैए उनटा अर्थ बुझि विष पीबैए जानि बुझि मरैए काँचक दिल टुटि केना जुड़तै प्रेमरससँ सोना सन जुड़तै नैन बीच बसतै फूल बनि कऽ गमगम करैत सभक नैन बसि दिल समेतै गीत प्रेमक गेतै आगि लगल जगत जरइ छै के मुझेतै ई सौनक धधकैत धधराकेँ यौ भाय? सावन मास बुलबुल चहकै मेघ बरसै पिया कहिया एतै नयन तरसैए धरतीक प्यास सावन नै बुझेतै मेघ बरैस की करतै जखन नयन बरसै छै सुखल खेत मेघ नै बरसल नै भेल कादो बितैए सौन भादो बेवस्था छै बेकाबू बरसातक दिन आएल मुदा झमकैआ तँ नै बरसल मेघ खेत केना रोपेतै सभक हित जे दिलसँ करतै अमृतफल जगतमे पाबतै स्वर्ग किए खोजतै पर सुख जे छिन कऽ अपनेतै नरक भोग भोगि जीते मरतै जग देख हँसतै पानिक स्नान तन शुद्ध करै छै मन शुद्ध नै सत्यकर्म ज्ञानसँ मन शुद्ध होइ छै तन शुद्ध तँ सभ करै छै मुदा मन नै कियो जे शुद्ध दुनू करै वएह महान छै मधुर भाषा कोइली बोल बोलै कौआक भाषा कोइली नहि सुनै कौआ मारि भगाबै निकटी तौल सोना रत्न बिकै छै नापि-तौल कऽ चीज-वौस बिकै छै बोली छै अनमोल सुखक खान धरती स्वर्ग सन प्रदूषित भऽ दुख सहि जीवकेँ कल्याण करैत छै भवलोकमे लोक स्वर्ग खोजै छै पृथ्वीसँ बढ़ि नै छै तीनू लोकमे साधनो छै उत्तम कर्मयोगीकेँ कर्ममे विश्वास छै भोगवादीकेँ रोगक चिन्ता होइ से तियागी कहै छै धनक शान हाथी घोड़ा दलान बागक शान मोर-मोरनी नाच तेकरो नाश तँ छै मधुर फल सभ खोजैत अछि रोपै ने गाछ बिनु पानि बुझेतै नै तन मनक प्यास भाग्य नै सुतै सुतै छै कर्महीन पौरुष जागि कर्मवीर बनै छै जगत पूजै छइ विष पीब कऽ पूरबामे सुतै छै विधाता केना ओकरा बँचेतै जे दुनियाँकेँ देखतै हिनभावसँ मनोबल घटै छै सम्पन्नतासँ शत्रु, रोग भागै छै दीन दुखे मरै छै बाढ़िक पानि धन-बल-यौवन स्थायी नहि छै सभ किछु छोड़ि कऽ विद्या संगे जाइ छै जीव जगत बिनु जल केना कऽ सजि जीयत नैए आन उपाय करू रक्षा जलकेँ सावन-भादो नदी उमरल छै बाढ़ि पानिक खतरा बढ़ल छै गाम-धर डुमल दीनक दुख देनिहार बहुते बँटनिहार नै भेल आइ धरि कियो नै छै इंसान प्राणक रक्षा केना करत लोक जान मालक नै छै कोनो सुरक्षा केना बँचतै प्राण बाढ़ि पानिक समस्या देशक छै केना निजात मिलतै गरीबकेँ डुमि मरै छै बाढ़ि गामक गाम दहि भँसिया गेल नेना भुटका बिलैट मरि गेल बाढ़िक तांडवमे बाढ़िक माया नै कोनो दया-मया धोइ पोछि कऽ सभ किछु खेलक निर्जन भेल गाम दुख सहि कऽ गरीब जीबैत छै नै कियो बाँटै दुखक पहाड़केँ गरीबे माथ पड़ै दीनक दुख के बाँटि कऽ हरतै सुख छोड़ि कऽ आनक बलाए केँ अपना माथ लेतै माटि उखाड़ि खेत जोते किसान चौकी मारि कऽ बीज बुनि सुतारि उपजे धनसारि खेती करैए किसान मजदूर माल मारैए बनियाँ आ बेपारी चिन्तामे छै दलाल सरकारक मौन चुप्पी देख कऽ सभ जनता बनल-ए लचार महगीक शिकार भूखल पेट धियापुता कानैए सॉंझ-विहान महगी मारि सहि सुते सॉंझे किसान नै रोजगार दुनू हाथ बेकाम आँखिक नोर बहैए धार सन केना बँचत प्राण रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ कहबी सन सभ करैए लूट केना भेटत सुख माल टलिया मालदार बनल देखकेँ लूटि दलाल बनल-ए भुखे मरैए दीन चोरक माल सरदारे बाँटैए चोरक माथ चढ़ि खेल देखैए फॉंसी चढ़ैए चोर सुख दुखक खेल खेलै खेलाड़ी पुण्य लूटाए शैतान अधिकारी माल खाए मदारी अपन दोष गुणे-गुण देखैए आनक दोष वियादोसँ विषाह चालैन दुसै सूप सभ खोजै छै सखुआ सागवान बेल बगूर कियो ने खोजै जानि गम्हारि बीचमानि सुखल डारि कियो ने पकड़ैए सभ खोजैए हरियरका डारि तइयो अछि हानि फलक चिन्ता करि सभ मरैए कर्मक चिन्ता कियो नहि करैए फलामृत नै होय बाट छोड़ि बटोही भटकैए आँखि रहितो आन्हर बनल-ए क्षणे प्राण गंबैए मोह ममता फँसि सभ मरैए तैयो तँ लोक भवलोक घुमैए नर्क भोग भोगैए समय छोड़ि जे काज करैत छै अपनाकेँ ओ चतुर समझैए ओझरीमे मरैए हवा पानिकेँ नै कोनो अछि डर बिहाड़ि बाढ़ि क्षणेमे बिगाड़ैए लइए जानि प्राण ठढ़िया साग ठाढ़ बाड़ी रहैए गेनहारी तँ चतुर गिरथानि पोरो धेने मचान अण्डीक खुट्टा बधण्डीक छै ठाठ सण्ठीक टाट मनेजरक खाट एके धक्का दू फॉंक परबुधिया बेटा जखने भेल सभ संकट तखने आबि गेल बुधियो हरा गेल परबुधिकेँ नै चलु आगू-पाछू मति-कुमति तखने बनि जाएत दुख घर आएत सप्पत दै छी राखू प्रेमक मान नै तँ दऽ देब अहॉंक विरोगमे हम अपन जान झीसी झीसिया फुहार पड़ै छइ फूही फूहिया थलकीचार बनि भादो कादो होइए समै मेघौन सावन कहबैए घनघनौआ बर्खा भादो होइए पानि बाढ़ि लाबैए कसूर केलौं खेतीहर बनलौं शोक भेटल गरीबीक संताप छाती पीटि मरै छी सुख-चौन जे हाथसँ छुटि गेल अपन काज बेरोजगार भेने होइ छी अपमान काज छुटने सोभिमान मरल केना कहब बेथा दुखक बात केना जीएब आब संकटमे छै किसानक जिनगी पुछनिहार नै बँचल छै कियो मुक्ति केना भेटतै सभ विपदा खेतीहर सहैए केना चलतै महगी मारि भारी धूरी टुटल गाड़ी मरितो क्षण चिड़ै उपकारी छी तइयो किए लोक शिकार करि संसार छोड़बै छी पानि बहतै पनिबटे ससैर नै हेतै हानि जँ बान्हबै बान्ह तँ पानि करतै हानि दीन दुखीकेँ उपकार करियौ हेतै कल्याण मिलतै जीवन काज हेतै महान् खुशबू दैत फूल हँसि कहैए हम छी प्रेमी प्रकृति जगतकेँ प्रेमी बनु हमर सूरत देख जगत लुभाइए सुगन्ध पाबि हमरा हत्या करि अत्याचार करैए सुन्दरता छी मात्र देखैक चीज छुबैक नै छी छुबै तँ प्रेमी नै छी दिलकेँ दुखबै छी अघोरकाल महा विकराल-ए बेटा-बापक दुश्मन बनल-ए देख जग कानैए पूर्वाग्रहसँ सभ ग्रसित अछि दुटत केना एहि बाटसँ मुक्ति जड़िमे अन्धभक्ति दूध फूल नै छुबाइ छै किनको जाति भेदसँ तनमन किएक पूर्वेसँ छुबाइए कसूरदार बहुत छै जगतमे इमानदार केकरा कहबै यौ के चढ़तै फॉंसी यौ आपसी भेद मतभेद बनि कऽ भेदिया वेद कुभेद पढ़ि-पढ़ि समाजकेँ तोड़ैए दिलक बात नै केकरो कहियो जानि करत तखने नकीहानि समैझ राखु मान कूदैक चिड़ै मधुर गीत गाबै पंख पसारि अकासमे उड़ै छै दुख-सुख सहै छै कोइली सुग्गा मोर पपीहा गाबै उपदेशक बगुला भगत छै मैना छै बजनियाँ आएल सौन उमैर गेल मेघ नाचे मयूर बेंग संगीत भरै कोइली गाबै गीत मेघ बरैस धरतीकेँ सींचै छै गरैज मेघ किसानकेँ जगाबै पानि संवारै चास खेतीक काज सभसँ उत्तम छै बिनु साधन बड़ दुखदायी छै नै केने, नै बनै छै पॉंच महल दस दरबाजा छै पॉंच मंत्री दू चोर, दू सिपाही काया बीच प्राण छै घुमि देखलौं अचरज दुलफी छोटका झाड़ फूल ऊपर पत्ता ज्वर करै निपत्ता। भूख जगबै पित्त नाश करै छै दुलफी पत्ता छेाट उज्जर फूल भेटै खेत उसर लत्ती लतैर बेधने रहै गाछ एक्को नै पत्ता अमरलत्ती कहि दुनियाँ पुकारै छै कठजीबी छै लत्ती-अमरलत्ती गुण भरल औषध कहबै छै परजीबी होइ छै चर्म रोगक असल दवाइ छै अमरलत्ती ज्योतिकेँ बढ़बै छै खून साफ करै छै यौवन पाबि जानि नै इतराउ चारि दिनक चाँदनी राति औत फेर अन्हार राति प्रेम ने छीपै दुनियाँ छीपबैसँ प्यास नै बुझै ओसकेँ चाटनेसँ दिलमे बसै प्रेम प्रेमक रस सभ रससँ मीठ के पीएत ई सभ डुमल अछि सोमरस पीबैमे मन कहैए अमृत पीब लेतौ आनब केना जे रस पीबि मीरा मोक्ष धाम पौलक रसक खान दुनियाँमे छिपल खोजैबलाकेँ सभ दिन कमी छै तेँ दुर्लभ कहै छै पर्यटककेँ अपार संभावना मिथिलामे छै स्थलक विकाससँ खुशहाली आनत मिथिला अछि पौराणिक स्थलक गाम, धामक तीर्थ स्थल अखनो कर्मभूमि सेहो छी कर्मभूमिसँ बढ़ि नै स्वर्ग भूमि हमरा चाही कर्मभूमि आ रणभूमि, नै चाही स्वर्गभूमि इतिहास छै मिथिलाक पुराण पवित्र धाम स्वर्गसन धरती देवो करैए मान जग जानैए मिथिला धरतीकेँ हवा पानि तँ अमृत सन अछि राखै जगमे मान अमृत पानि नदी झरना बहि मिथिला गाम सुखक खान अछि अन्न, फलक भूमि बाँटि देलक मिथिला समाजकेँ किछु सामन्ती अपन स्वार्थ लेल मुदा माफी के देतै समाज मिलि दहेज कैंसरकेँ मारि भगाउ मानवताकेँ राखू सभक हेतै हित दहेज छीऐ समाजक कलंक केना मिटत ई दानव-दहेज की नारी छी कलंक केना भागत दहेजक कुलीला लालची लोक करैए कठखेल जे मरैए महिला घृणित काज समाजमे होइए अपमानित नारी हत्या होइए केना चलत सृष्टि? छूआ-छूत छै समाजक समस्या केना मिटत संक्रमणक रोग की छीऐ मनरोग शुद्ध मने नै सड़ैन पकड़ने जड़ियाएल-ए दिल बेमान सेहो तेँ करैए अन्याय छूतहा रोग किछु लोककेँ धेने सभटा सुख हमरेटा भेटए बाँकी भॉंड़मे जाए असंतोष-ए मनुखमे घुसल कहिया हेतै ई रोगक निदान जे हेतै सर्वहित भेद रचि कऽ समाज बाँटि काटि अपना लेल बेसी सुख चाहैए दुख दर्द के लेतै? निमन फड़ लइले मारि करै सड़लहाकेँ के लेतै जानि मानि केकरो हेतै हानि माफ करियौ कहल सुनलकेँ सुखक खान बिनु कर्म नै भेटै कालक पहरा छै योद्धा मारैए तीरसँ, ज्ञानी मारै ज्ञान सम्मान मूर्ख मारै शूलसँ जे जाने से चतुर बिनु दागल केना पहचानत सभ छै ज्ञानी नै छै कोइ अज्ञानी तेँ छै ई किरदानी मूर्ख रहितो महामूर्खकेँ खोजे सभ भेटैए ज्ञानी, संत, विद्वान पढ़ै वेद पुराण सोचि करू जे सर्वहितक हेतै वदनाम छै त्यागी, संयासी सन्त जे छिपाएल नै छै किछु लोकक काज बदनाम छै जग जानै छै बौक आन्हर बनि मूर्ति जकाँ देखै छै संकीर्ण सोच शैतानक होइए कपटी दिल बेमानक होइए संतक दिल साफ पढ़ल ज्ञानी अनपढ़ अज्ञानी के छै अंजान जे ठकि कऽ खाइए से चतुर सियान ठककेँ ठकि खाइमे नैए हानि सभ चतुर अपनाकेँ बुझैए तइयो ठकाइए ठककेँ लोक ठकहरबा कहि दस लोकमे बदनाम करैए दागीकेँ की कहबै जे आइ धरि किछु नहि केलक करैबलाकेँ दुखे-दुख देलक माल चापि खेलक जोंक बनि जे जानि खून पीलक दुख देलक दीनकेँ सतेलक केना मुँह देखेतै कर जोड़ि कऽ विनती जे केलक तेकरे दुख दागी मिलि देलक के तियागी कहेतै? मरलहाकेँ मारि दागी बनल साधु बनि कऽ जगकेँ ठकलक इंसाफी के कहेतै? अन्याय भेल समाज टुटि गेल केना जुड़त बनत सर्वहित की हेतै अनरीत जे जेना भेल आबो तँ रहु मिलि सभक हित जन कल्याण हेतै नव समाज एतै पानि रंग जेना समाज हेतै भेदभव नै नव विचार संगे सभ गर्वसँ जीतै एक मनुख एके रंग लहू छै एक प्रकृति एके रंग सृष्टि छै भेद भाव कीए छै? अवगुणकेँ तियाग करू जानि जेना करैए हंस पानि तियाग ई छी ज्ञानीक वाणि रूप कुरूप सँ नै छै कोनो हानि गुण उत्तम सर्वहित समान से पाबै ऊँच स्थान बच्चा बेदरू भगवानक रूप प्रेम भूखल भेद भाव नै जाने सभक प्रेमी अछि घृणित काज अधर्मी ने करैए उत्तम काज दयावान करैए सर्वहितक दान आगि जराए जंगलकेँ बनबै छै, सुनसान चिंता पहुँचाबै-ए अर्थीपर श्मशान सॉंझक समे उदासी रहै मन देह गरम कठोर परिश्रम डुमल छेलौं गम प्रशंसनीय मैथिली रंगमंच दिशाहीन भऽ रणक्षेत्र छोड़ि कऽ उगडुम भऽ गेल यात्रा क्रममे हाट बजार देख मनमे भेल चुप्पे किछु कीनली देख महगी गुप्पे बेरोजगार महगी मारि खाए दुनू सॉंझक रोटीक जोगारमे बेमार पड़ि गेल पेटक प्रश्न जटिल बनल-ए मजदूरकेँ रोजगारक चिंता खोजे स्वरोजगार बोनिहारकेँ नै छै खेत पथार तेँ छै लचार पेट केना भरतै नहि छै रोजगार गरीबसँ छै सरकार बेमुख दुखे दुख छै गामक महाजन ऋृण खुआ मारै छै ऋृण खाए कऽ गरीब जनमै छै ऋृणे मरै छै धिया-पुताक लेल ऋृणे छोड़ि जाइ छै उधार पैंच गाम समाजमे छै शहरमे तँ नगदीए चलै छै तेँ गाम उत्तम छै सुखक खान गामक जिनगी छै शहरक तँ बनल छै विधान बाटे पर मरै छै अन्न पानि-ले गामक मजदूर नहि मरै छै स्वरोजगार लेल दिन-राति झखै छै रोजी-रोटीक समस्या बनल छै लचार बनि अपन लेहू बेचि धिया-पुता पालै छै अनकर जे हक मारि खेलक सुखक भोग दुनियाँ भोगलक से तँ नर्क भोगत। धरम छोड़ि अधर्म जे केलक सभकेँ ठकि दुनियाँ ठकलक मुँह केना देखौत भोगी रोगक इलाज नै होइ छै मन बुझैले उपचार करै छै मनरोग रहै छै रोगीक दुख दुखिया जनै छै जे रोग सहि जगमे जीबइ छै देख आन हँसै छै आम लताम मिथिलामे प्रधान अनार, जौम रक्त वर्द्धक अछि अनरनेबा प्राण मन रोगक इलाज केना हेतै अधक्की बनि सभकेँ लूटि-लूटि संतोषी कहबै छै सभ रोगसँ मनरोग भारी छै एकर नहि छै कोनो उपचार चिंताक छै शिकार अँवला नेबो अमृत समान छी नीम दबाइ आम अनरनेबा पेटक राखै मान पेटक रोग गुलैर भगबै छै ऑंव पित्तकेँ ठीकसँ पचबै छै शक्तिकेँ बढ़बै छै शोगसँ रोग शोगए रोगी बनि भोग उठल भाग्य हारि सुतल दुनियाँसँ रूसल फूल नै होय गुल्लैर मासे फड़ै पकि झड़ै छै दबाइ अमृत छै खाए पेट भरै छै जामुन छाल ओ पात, फड़, बीआ मधुमेहक अमृत दबाइ छी पौध गुणकारी छी धारक धारा पकैड़ ज्ञानीजन जग कल्याण नव युग निर्माण करैत जीबै छैथ ऊपरकासँ पैघ धन नै अछि प्रेमसँ बढ़ि कोनो सुख नै अछि सभकेँ जरूरी छै अनमोल छै मनुखक जिनगी जँ उपकारी बनि सेवा करए मीठ फल पाबत कारण की छी नारी हत्या होइए बदनामी तँ पुरुख सहैत-ए की यएह सत्य छी? अपन माए बहिन, पत्नी देवी अनकर छी कुलक्षणी, डाकनी नीति की कहैत छै प्रेमक बाट पकड़ैए विद्वान मधुर वाणि बोलि रस बँटैए जैसँ जग कल्याण फूल बनि कऽ गमकेँ चहुओर दिलक दर्द हरि मन जीतैए सर्वहित करैए जन कल्याण सेवा अछि महान उत्तम दान विद्यादान होइए श्रेष्ठ फल पबैए एक नारीकेँ दू नजैरसँ देखै की देखैबला दू रंगक होइए अन्ध बनि देखैए सभ नरकेँ नै छै सम विचार तँइ बहै छै जगमे खूनक धार बढ़ै छै अत्याचार गामक दशा जा नहि सुधरतै गरीब केना खुशहाल बनतै की देख सुधरतै? गरीबक छै समस्या पैघ भारी लचार बनि हाथ जोड़ि बैसल दुख सहि जीबै छै मजदूरकेँ जा रोजगार नहि मिलतै ता नै देश विकास हेतै संकट बढ़ि जेतै बाढ़ि पानिक संकटे टा नहि छै रौदी समस्या गंभीर बनल छै मुक्ति केना भेटतै? कृर्षि योजना बेकाम पड़ल छै गरीबी केना देशसँ दूर हेतै भूखे लोक मरतै पैघ समस्या देशक जनसंख्या रोजगारक समस्या छै गंभीर क्रान्तिक रूप लेतै सरकार छै बेवस्थामे हुसल जनता अछि संकटमे फँसल दुखकेँ के हरतै? सुधरलकेँ सभ बिगाड़ै छइ बिगड़लकेँ सुधारै नै छै कियो सभक सिर विषेतै कालाबजारी जाधैर नै रूकतै महगी बढ़ि अकास चढ़ि जेतै के रोकतै एकरा? देशक माल विदेशमे भेजैए महग माल बेपारी दाबि रखि जनताकेँ लूटैए भ्रष्टाचारक जन्मदाता ऊँचका पालनकर्त्ता सेहो तँ जनता मुक्ति केना भेटतै वृक्षारोपन वन संरक्षणकेँ बढ़ाबा दियौ प्रदूषण घटत जीव जन्तु बँचत प्रदूषण छै जगतक समस्या केना घटतै जा मनुखक कर्म सद्कर्म नै हेतै मनुख द्वारा सृजल कुकर्म जा नै बदलतै ताधैर प्रदूषण विष बनि सतेतै प्रदूषणक कारण जनसंख्या जा नियंत्रण नहि हेतै ताधैर दुख सहे पड़तै प्रदूषणक निवारण नै हेतै ता जलवायु परिवर्त्तन हेतै कुप्रभाव बढ़तै धरती, वायु जल प्रदूषित छै वायुमण्डल विषक समान छै केना मुक्ति मिलतै? हल्लुक माटि बिलाइ खुनि कूदै मोछ टेर कऽ छालही घुमि खाए साधु सन्त कहए मूसक माटि पर मुसरी नाचै बिलाइ देख बिल घुसि दुबैक टाल ठोकि सुतए दलालक तँ घोड़ो बिकाइ छइ कुकुर कहीं आगि झड़कै छै कौआ सन्त होइ छै खेल खेलाड़ी नचनियाँ अनाड़ी घोड़ा सवारी नदीकातक बाड़ी नै अछि अख्तियारी बैसले लेाक अमृत खोजैए तँए जिनगी निर्धिन घिनाइए नर्के स्वर्ग बुझैए सम्प्रदायकेँ धर्म बुझि मनुख कर्म बदैल समाजकेँ तोड़ैए स्वार्थ सिद्ध करैए पाखण्डी रस्ता पकैड़ आडम्बरी भेदिया भेद विषवाण छोड़ैए क्षणे प्राण लइए देश, समाज सम्प्रदाय तोड़ैए जातिक भेद पाखण्डी बनबैए जानि हानि करैए खूनी हत्यारा लोक किए बनैए मानव प्रेम भूलि खून पीबैए धर्मी कहि जीबैए हल्लुक काज सभ खोजि करैए हलुआ खाए भैरवियो गाबैए जग देख हँसैए राजभाषाक दर्जा देबाक मांग मिथिलावासी अदौसँ करैत-ए सुनै नै सरकार अपन भाषा मैथिली जनभाषा अपन राज्य मिथिला छी महान अछि स्वर्ग समान मिथिलाक छी मैथिली जनभाषा राजभाषाक दर्जा कहिया हेतै पढ़तै धियापुता अनरनेबा उत्तम फड़ भारी भूख जगबै गैस, पित्त, कब्जकेँ समाप्त करै छइ बेरोजगारी दिन दिन बढ़त कम उद्योग काज करत यंत्र बनु स्वरोजगारी कुकर्मी भारी सुकर्मी हल्लुक-ए जानमालक खतरा बढ़ल-ए कानून की करैए चोरी उठल डकैती बढ़ल-ए अपहरण हत्याक उद्योग तँ विकसित भेल-ए जखने भेल कुपुत्र खंदानमे मान सम्मान पानिमे चलि गेल स्वर्ग नर्क भऽ गेल ओसक कण घासपर पड़ल मोती बनि कऽ धरती सजि गेल भोर आनन्द भेल अकास रंग सभ रंगसँ नीक मनक रंग सतरंग नहाए बाँकी निधि समाए ज्ञानक सुख अमृत सागर छी भौतिक सुख क्षणिक नाश्वर छी तैले कीए मरै छी खिलल फूल हँसि मालिकेँ कहै नै बनु स्वार्थी जग छै मतलबी के करत इंसाफ? मान सम्मान लेल सभ मरैए के अछि दोषी विचार के करत जे अछि खुद दोषी मजदूरक देह नै दुखाइ छै बैसलहाकेँ देह दुखि रोगी छै के करत दवाइ जे सभ दिन खेलकै चाटि चाटि मलाइयेटा सुखल केना खेतै कण्ठ फँसि मरतै माल मारि कऽ जे सभ खेलक-ए साधु बनि कऽ धोखा दैत रहल से तँ नर्क भोगत बैसले खेतै रोपतै बगूरो ने आम केना कऽ सभ दिन खाएत धेने रहत खाट सबलताकेँ पूजा सभ करै छै निर्वल जानि बकरी बलि चढ़ै देवीक भोग लगै शिकारी करै हरिणक शिकार शेर करै छै शिकारीक शिकार की ई छी अत्याचार डाकूसँ साधु भोगीसँ जोगी बनि बौआइत छै कर्म छोड़ि जगकेँ ठक बनि ठकै छै उसैर गेल मिथिलाक रिवाज डोली, कहार डम्फा, बौसली, नाच संगे रसनचौकी पतन भेल वियाहक चलैन विदा होइए मोटर साइकिल केना देखब डोली? बिनु लगने बियाहक चलैन राति बिआह भोरे तलाक होइ महफ्फा कीए औत? अपन चालि छोड़ि बन्दर नाचै वर-कनियाँ मीठक जड़ि खेतै बरियाती की हेतै? नीक होइत कनियाँ छोड़ि लोक दहेज संगे बियाह करैत तँ जनसंख्या कमतै पढ़ि लिखि कऽ लोक बनराएल पथ कुपथ पकैड़ चलै छइ श्रम चोरी करैए दीनक दुख पात-फूल सन छै अमीरक छै पहाड़ सन दुख कर्मे फल मिलै छै अमानवीय सोच नक्सलवाद खूनी हत्यारा आतंकवादी बनि शोक संताष दिए वंशवाद आ परिवारवादसँ समाजवाद खतरामे पड़ल लोकतंत्र मरल अपन दही सौजबी मीठ कहै अनकर तँ छै चुन्ने सन खट्टा अछियो घोरे मट्ठा उत्तम खेती नौकरी छी छोटहा स्वर्गक दुख गामक जिनगी छी प्रमाणो अछि पक्का जखने पुत्र परदेसिया भेल देव पित्तर सेहो उजैर गेल संस्कार हीन भेल हल्लुक माटि मुसरी खोदहै छै खेतक माटि जे खौदि उपजाबै वएह दुख पाबै टटका पानि भोरेमे करू स्नान दही चूराक चलपान हुए तँ शरीरक कल्याण सुडौल देह व्यायाम बनबै छै स्वस्थ दिमाग फूर्ति तनदुर्स्तीक संगे आयु बढ़ै छै निरोग तन मन अति प्रसन्न दिल दिमाग स्वस्थ सभ अंग काजमे लगै मन सभक लेल खेल-कूद जरूरी साधनहिन केना खेलत खेल बेवस्था छै फेल खेल-कूदमे छै बड़-बड़ भेद महग खेल अमीर सभ खेलै मंगनी खेलै दीन खेल खेलमे धिया-पुताक मेल भेद भाव नै कखनौं झगड़ा तँ लगले करै मेल कसरतसँ शरीर बलगर मन प्रसन्न खून संचार कमि राखैत-ए निरोग व्यायाम राखै शरीरकेँ निरोग बल बढ़ए भूख, रूचि जगबै फूर्ति राखै शरीर कब्बडी खेल गरीबक खेल छी नै कोनो खर्चा सभ मौसम खेलु अछि मनोरंजक केरा, लताम बारहो मास फड़ै गुण भरल गरीबक छी फल बड़ ललीचगर जातिक भेद अंधविश्वास अछि आडम्बरसँ समाज ओझराए दिशाहिन बनैए पूजा-पाठ आ हरि नामक जाप दिखाबा नहि तनमन अर्पण ईश्वारमे रमण आँखि बचाउ रौद, गर्दा धुआँसँ साफ राखि कऽ देखू दुनियाँदारी रत्न छी अनमोल दॉंतकेँ करू दतमैनसँ साफ नीम, साहुर बगूर छै उत्तम दॉंत राखै निरोग खैनी बीड़ीसँ करियो परहेज मुँह, दॉंतक नहि हएत रोग रहत मन प्रसन्न गाजर मुड़ै सागसँ करू मेल ज्योति बढ़त कब्ज दूर करत रोग नहि छूबत साफ सफाइ पर दियौ धियान मुक्ति मिलत रोगक जीवाणुसँ प्रदूषण घटत टमाटरमे गुण भरल अछि नित्य खाइसँ रूचिकेँ जगबैए रोगकेँ भगबैए सॉंझ विहान गामक दलानमे बैसार करू सभक बात सुनि करू हितक काज अखन नैए गामक दलानमे विचार लेल बुजुर्गक बेवस्था केना हेतै विकास माफ करबै कहल सुनलकेँ नैए वैरागी दुनियाँ छै तियागी के करत विश्वास? मोफत माल सभ कियो खोजैए परिश्रमसँ किए लोक डरैए जे भोगी बनल-ए भोगी कहैए जेगी छी हम सभ कर्मक चूक भेने पाप करै छी लोभ फँसि मरै छी वीर बिनु नै जगत चलै छइ कर्मक मान सदिखन मिलै छै कर्मसँ मिलै स्थान बानर चलि मदारी पकड़ै चिड़ैक चालि शिकारी पकड़ैए कर्म भटैक मरै सागो खाए कऽ बनी विद्वान तँ ऊँच आसन सदकर्म बितत जिनगी तँ आनन्द सत्य काज तँ नै अछि कोनो चिन्ता नहि बनाउ यात्रा पत्तरा देख अंजाम माफे-माफ नेक इंसान सदिखन पूजाए धरती मानै अपन पुत्र सन जगमे होय नाम जिनगी-शत्रु मोह, लोभ, क्रोध छी संगमे रहि जिनगी बिगाड़ैए क्रोध जीते जारैए मनक मोह मायामे फँसबैए श्रमदान तँ कर्मकेँ बढ़बैए विद्या बढ़बै यश ईमान धर्म इंसानक बाट छी उत्तम कर्म जिनगीक साधन सेवा कर्म श्रृंगार दूधमे पानि कहबैए तँ दूधे काजसँ जाति धोखा खाए बदली मुँह रंगि चलैए दुर्जन मरै कफनो नहि मिलै साधु, सजान दूध मेबा पबैए कौआ हंस नै होइ चोरक शत्रु महाचोर होइ छै सही इंसान सज्जनकेँ शत्रु नै पैघ शत्रु छी धन अहिंसा मार्ग विश्व पकैड़ चलै कल्याण हेतु पाछूसँ आगू बढ़ि शान्ति खोजि जीबैए गड़बड़ी छै देशक बेवस्थामे हिनभावसँ दोसरकेँ देखै छै असंतोषे जीबै छै ऊँच नीचक दूरी बढ़ि रहल जा धरि नहि समानता हएत नै हएत विकास अपन सुख बैसले खोजैए दोसरकेँ तँ खाधिमे गिरबैए उन्टे नोर बहबै सभ एके छी मनुखक बेवस्था किए ने एक केकरो छै घी, मेवा कियो मरै रोटी-ले कियो मरैए कोठा, नौलखा लेल कियो लूटैए सोना हीराक खान खोपरी केकरा-ले? तियागी नहि नाओं कमबै लेल करैए खेल स्वार्थ सिद्धि लेल तँ फल खोजेए मधुर कर्मक चूक रणसँ पराएल मृत्यु समान जिनगी अकारथ भेटै नै दूजा तन मान सम्मान सभक छै समान बेवस्था किए विषम बनि-बनि ऊँच नीच करैए केना कहब दुख सुखक बात देश चलैए उनटे बिनु बाट दागीकेँ अछि धाक सभ साधु तँ चोर केतए गेल चालि बदैल परमोशन भेल चोरसँ डाकू भेल खान पानमे संतुलित अहार नित्य व्ययाम भोरक स्नान सेहो रोगक निदान छी खेल कूद आ व्यायाम शरीरक रक्त संचार करैए संतुलित दूध अमृत पान फल मेवा तँ शक्तिवर्द्धक अछि साग पातसँ नेत्रक ज्योति बढ़ैए दूध पूर्ण अहार साग पतार शरीरक रक्षक ऑंखिक ज्योति ऑंतक बेमारीकेँ रखबारि करैए गरीबक छी अड़िकंचन साग उत्तम स्वाद खाइले ललचैए पैचियो लगबैए गेन्हारी साग बड़ गुण्कारी-ए उत्तम साग रोगी भोगी खाइए सभ दिन भेटैए पटुआ पोरो सागकेँ के पुछैए घौका साग तँ महग बिकाइए सभ मिलि खाइए सभ गुण छै बथुआ सागमे सेरसो साग श्रेष्ठ सुआदी बनि सभक दिल बसै करमी साग थाल पानि उपजै चौड़ चाँचर लतैड़ चतैड़ कऽ ओर अन्त नै लगै जाड़क मास सुआ मेथीक साग अल्लू चटनी नयका चाउरक भात-ले तरसै छी गर्मी समय सरहंची साग आ नोनियाँ संगे पुदीनाक चटनी हितकारी होइए अमरलत्ती नै पत्ता फूल फड़ पानक लत्ती पत्ता चतैर दुनू गुणकारी छै साँझ देखियौ दीयाबाती तेलकेँ तीनू मिलि कऽ जग इजोत करि जन कल्याण करै बिनु प्रेमक जग सुन्ना लगै छै तेल बिनु नै दियाबाती जरै छै प्रेमी देख तरसै दोस्तीमे कुश्ती दुश्मनसँ जँ मेल जे करै छइ जानि बुझि झमेल जिनगीमे नै चैन सभ खुश तँ जगत खुश अछि यएह तँ छी पैघ शुभकामना पूर्ण मनोकामना थालमे गैंची लत्ती अमरलत्ती बड़ चतुर नागफेनीक काँट कठजीव होइए बाड़ी झाड़ीमे सेवसन लताम अमृत फल गरीबो खाइए मंगनी फलदान ऑंखिक नोर बरखा बून जकाँ टपैक गिरै दिलमे टीस मारै के बाँटतई दुख? महगी मारि सभ सहि मरैए लूटेरा बनि अधिकारी बेपारी गरीबकेँ मारैए बेदागी पर दागी भाड़ी पड़ल देशक सत्ता गिद्ध कौआ हाथमे दीनहीन मरैए घी मे तरलु करैलाकेँ तइयो हएत तीते जड़ि खाऊ की छीप ईख लगत मीठे कुकुर कहीं आगि पकै छै, ठक कहीं उपास नंगटा नँगे नाचे के करत विचार अपन चालि छोड़ि कुकुर चालि किए चलै छी ऑंखिमे पट्टी बान्हि जग किए देखै छी जगक सुख कर्महीन लेल नै तियागी लेल सुख क्षीर सागर सत्य कर्म प्रधान बिनु श्रमक श्रम नहि होइए बिनु श्रम नै धरती उपजैए मोफतमे नै सोना असल सुख श्रमिककेँ मिलैए परिश्रमसँ जिनगी चलबैए दुखे सुख बुझैए नसीबमे नै दुनू सॉंझक अन्न कपड़ा नैए झॉंपितौं पूर्ण अंग सुतैले नहि घर बाट ससैर बटोही चलैए पानि ससैर नव गति पाबैए छी जिनगीक गति चान छिटैक पसारै इजोरिया प्रेम उमैर लुकछिप खेलैए बदरी संगे चान चानन वृक्ष कूहकै कोयलिया ओसक कण देख तृष्णा नै मिटै नेनसँ बहै नोर सभ नम्हर छोट कहै नै कोइ जे करै छोट अहित कम मुदा सभक हित होइ काज लेल नै नाओं लेल नम्हर जीबै मरैए पत्थर पट्ट पर नाओं खोदबै लेल सत्य छोड़ि कऽ इंसान नै चलैए देह छोड़ि नै लहू प्राण रहैए जेना नभमे सूर्ज बरखा बून सुखल धरतीकेँ नभसँ आबि बुझबैए पियास सजे लगैए खेत बाँस आ वंश समरूप होइए जीवितो संग मरितो संग रहि संगे संग जरैए वंशीक स्वर सभकेँ मन मोहै अमृत सुर रसपान कराबै संगीत सजि सुरताल बढ़ाबै रागतालसँ जगत सुख पाबै रोगीक रोग भागै राग भरि कऽ मल्हाड़ सुर गाबै ताल ठोकि कऽ बजबे ढोलकिया प्रेमी छै सुनबैया मृदंग बाजै धा धीप धा धीप धा तबला बाजै ती ती ना धी ना धी-ना गुमकै गुमगुमियाँ संगीत स्वर साजे हरमुनियाँ आठ स्वरसँ जगबैए दुनियाँ नाचैए नचनियाँ भोगी जोगीमे बहुत भेद होइए एक बिलासी दोसर कर्मवादी बिचला सुखदायी मरूआ रोटी नून तेल मिर्चाय नोनीक साग पियौज खटाइक संगे खाइए भोगी चाउर चूरा बासमती धानक बड़ सुन्नर जे ई उपजाबैए सेहे स्वाद पाबैए नाक बिनु नै शोभै छइ मुखड़ा दॉंत बिनु नै मुँह शोभैत अछि ऑंखि बिनु नै जग राति बिनु नै तरेगन शोभैए सुरुज बिनु दिन नै शोभै छइ पानि बिनु नै जीव पानि बिनु जे माछ तड़ैप मरै शोनीत बिनु जीव जन्तु मरैए दूध बिनु चिलका कर्महीनक काज उल्टे होइए सम्प्रादायकेँ धरम बुझै छइ दीप ज्योतिकेँ अंध घास खाए कऽ गाए दूध दइए उपकारक बाटपर बटोही अजीवन चलैए विकास देख मनुख मनुखसँ जरि मरैए सभहकहित नै स्वार्थ लेल जीबैए सॉंझ पहर फतिंगा उड़ै छइ दीप जरिते सभ उड़ि अबैए जरि-जरि मरैए नरक भोग भोगैत छै नरकी जोगीसँ भोगी सुख छीन भागै छै स्वर्ग जाइ खातिर हवा बहै छै पूरबा आ पछिया मेघ पहुँच पानि बरसाबै छै धरती उपजै छै प्रसिद्धी लेल सभ मरैत अछि इज्जत लेल कियो-कियो मरैए स्वार्थ लेल जीबैए राम नामक नदीमे कोइ कोइ नहाइ छइ अहित केकरो ने सभक हीत लेल सुख सीमाक अन्त होइ छै मुदा दुखक अन्त कहियो ने होइ छै दुखे सुख होइ छै बाह रे देह तोहर कोन कोन गति होइए मन घेरल अछि तन घिनाएल जेकर तन दोसरसँ छुबाइ से छुतहर किए ने कहाइए से घरहर केना? खाइ लेल नै जीबइ लेल खाउ अपन पेट कुकुरो पोषैए कर्महीन किए ने मनक शान्ति सभसँ उत्तम छै सुखक खान संतोखसँ भेटै छै धर्म हित लेल छै भाषाक रक्षा सभक कर्म धर्म बिनु भाषा नै कोनो काज होइ छै सभकेँ जरूरी छै छूआ छूतसँ भेद भव बढ़ै छै समाज टुटि कमजोर बनै छै हानि छोड़ि लाभ नै जातिवादसँ प्रेम घटैत अछि विकास कम विवाद बढ़ि गेल लाभ नै हानि भेल पानि पेट्रोल बँचाउ आगू लेल केना जीअब धनसँ बेसी मान जीब जन्तु लेल छै महुआ गाछ फुलाइते गमकै रस टपकै मधुमाछी लुबैध अमृत मधु दइ अनरनेबा जे सभ दिन खाए अमृत फल रोगक निवारण काया करै कंचन जारैन जरि उपकर करैए सभक लेल उपयोगी होइए भेद नहि बुझैए भेद कुभेद प्रकृति नै जानैए जीव जीवकेँ मतभेद करैए देख ज्ञानी हँसैए गरम रौद तपि घरा जरैए प्यास कहिया मेटत, से मरै छी नै घास उघारे छी मेघ देख कऽ किसान हुलसैए बरखा बून गिरि धरती जागि अंकूर लऽ बढ़ैए हर्षित मने किसान खेत जोतै बीआ उपारि धनरोपनी करि अन्नसँ कोठी भरै देशक मान किसान बढ़बैए सभक हित श्रमदान करि कऽ अन्नदान करैए अन्न बिनु नै जिनगी चलतै तँ खेती किए ने सभ मिलि करतै हेतै विकास काज जन काटैए झाड़ी वन पर्वत बनबे मार्ग सुगम लोकहित तइयो उपेक्षित गरीबजन महाजन दबंग केना जीअब समाज संगे संग देखैए दू नजैर अपन घर टुटलो मरैइया सुखक खान अनकर महल नै दिए कोनो काम बाबाक सुग्गा मीठ फल ने खाए लाल मिर्चाइ लेल रूसि रहए केना भक्ति हएत जे जनमैए एक दिन मरैए बाट भटैक रणक्षेत्र छोड़ैए केना जीतत जंग हित अहित सभसँ होइ छइ सभक हित साहित्यमे होइए से जगत जानैए जाल फँसि जेना माछ मरैए शब्दजालमे तहिना साहित्य मरि काल बनैए तनक संग करू मनकेँ साफ हित अहित देख कऽ चलु बाट नहि लागत दाग उथर धार रहि रहि उधिया गहींर धार चुप्पे चलैए चालि कहियो ने सुखाए हँसैत फूल देख भैंरा कहए नित्य रहब दुख सुखक संग मन करू प्रसन्न बात सुनि कऽ फूल भेल प्रसन्न झूला झुलब पवन संगे संग रहब उपवन रहब वन पीअब मकरन्द मधुर रस डुमल अंग अंग सुख दुखक संग स्वर्ग मिथिला तेहने माटि पानि गामो तेहने खेत खरिहॉंनमे भरल धान पान अनपढ़केँ दी अक्षरक बोध पोथी पढ़ि कऽ ज्ञानी बनि ज्ञानकेँ घर घर बाँटत श्रमिककेँ दी काज करैक ज्ञान भुखलकेँ दी दू रोटी भोर-सॉंझ बनु नेक इसान ऑंखि मिला कऽ सभ हाथ मिलबे दिल मिलबे ने कोइ, जँ मिलबे दिल, जग प्रेम बहै जाति धर्ममे छोट छिन झगड़ा अखन धरि लोक सम्प्रदायमे बँटल वौआइए जन कल्याण समाजक निर्माण शिक्षाक दान देशक उत्थानमे सभक जरूरी छै धन लगाबी समाज कल्याणमे हेतै विकास आगूओ हितकारक ज्ञानी करत काज दहेज रूपी दानव केना एलै जइ चक्कीमे सभ पिसा रहल सभ लूटा रहल सभ दयालु जग सुखी रहत केकरोसँ नै घृणा सभसँ प्रेम जगकेँ छै कल्याण रोगसँ देह चिंतासँ चतुराइ मनरोगसँ सभ किछु घटैए कहैए ज्ञानी कवि बच्चा बेदरू अनबुझ होइए काम, क्रोध नै निश्छल मन होइ सभ प्रेम करए रूप नै देखू बेवहार चरित्र नीकसँ देखू जँ चरित्रमे दाग तँ कलंकक बात ज्ञानी ज्ञानसँ योद्धा मारे तीरसँ मुर्ख मारे ठेंगाफोड़े कपार पाप पुण्य नै होइ जादू टोनामे दृष्टि दोष होइए मनक शंका भ्रमित लोक सभ नेत्रहीन सन-ए घृणा नै करू रोगीसँ, सेवा करू तन मनसँ प्राण बँचेतै धन ओ धन उत्तम छै मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा छै दूषित मन नर्कोसँ गन्दा होइ कर्मे स्वर्ग सन छै भूदानसँ नै जीवन दान मिले पैघ दान तँ अन्न रक्त नेत्र आ विद्यादान होइ छै भावे भजन अभावमे भोजन दुखमे हरि दर्शन होइत छै संतोखे सुख होइ अमृत वाणी सुखक खान अछि प्रेम अमर पैघ धन विद्या छी शेष नाश्वर अछि फूल बिनु नै फल बीज होइए बिनु कर्म नै सफलता मिलैए श्रेमे धन बढ़ए बरखा बून तृण-तृण जगबै धरती सजि अन्न फल उपजे जीव रक्षा करैए बेसी खुशी नै नीक होइत अछि बेसी धनसँ दुख दर्द बढ़ैए बेसी लोभ मरैए मध्यम मार्ग सभ मार्गसँ नीक दुख सुखक संगम चिंतनसँ सुख प्राप्त होइए भक्तिमे शक्ति जिनगीक गतिए कर्मे धर्म छी श्रमक प्रधानता सुख शान्ति दइए दुखक जड़ि लोभ मोह माया छी सुखक खान निर्मल मनमेए क्रोध मृत्यु आनैए खिलल फूल देख भ्रमरा नाचे प्रेमिका देख मोर मयुर नाचैए प्रेमीकेँ सताबैए मान सम्मान रोटी वस्त्र मकान सभकेँ चाही गरीब अमीरमे भेद भाव नै चाही सुखक इच्छा सभ करैत अछि दुख इच्छा नहि करैए कोइ दुखेसँ सुख होइ रौद छाहैर दुनू संगे रहैए तहिना संगे दुख-सुख रहैए जेना तनमे प्राण पैसासँ वस्तु खरीदल जाइए नीन चैन नै प्रेमसँ शान्ति मिले जग सुन्दर होइ धन बलसँ घमण्ड बढ़ै छइ श्रृंगारसँ तँ सुन्दरता बढ़ैए कर्मसँ यश धर्म मृग तृष्णामे वन वन भटकै एलैए देखू पानि जानि कऽ तड़ैप प्राण दइ माछ पानिसँ नारी पति गहना शेर वनसँ बच्चा माए दूधसँ बैर नहि करैए पिता पुत्रसँ विद्वान किताबसँ लोभी धनसँ सत्यवादी सत्यसँ प्रेम करैत अछि धान पानकेँ बड़ मान होइए धान पेटक मान रखैत अछि मुँहक लाली पान मन हर्षित गाबे मधुर गीत भरल पेट चैनसँ खींचे नीन ने खुशी ने गम-ए चिड़ै ने खाए बेल नरियलकेँ ने खाए राही मुदा दुनू रहैए ऊपरसँ कठोर बीच कोमल ऊपरसँ कठोर दुनू दबाइ बेल नारियलकेँ पेटसँ बड़ मेल माघक बाछी चैत लगौल गाछी भादोक कादो चौरचनक दही बड़ नामी होइए लड्डू पान आ धूप दीप फलसँ देव पूजैए प्रेम भक्ति बिनु नै देव शक्ति मिलैए प्रेम मार्गसँ दोसर नै पैघ-ए प्रेम बिनु नै देवो खुश होइए प्रेम दिल जोड़ैए टुटल दिल जोड़ल ने जाइए प्रेमक बान्ह बान्हल जाइत-ए तोड़नौं ने टुटैए सौनक मास बिजुरी चमकैए मेघ बरसै धान रोपि गाबैए सोहर समदौन सावन मास गरजैत बरसै मन तरसै भिजै छै तन मन मन्द पवन बहै दूध आगिसँ पुष माघमे मेल गर्मीमे दही भोजन करै सही खट्टासँ दूर रही फागुन मास रंग अबीर खेलै फगुआ गाबै ढोल मजीरा झालि बजा खुशी मनाबै जरूरी अछि सौनक साग-पात भादोक दही आसिन कातिकक शीतसँ बँचि रही अमृत फल अँबला कहबैए आम फलमे मधुरस होइए फलराज शोभैए माटि पानिसँ अन्न उपजै छइ खाए जीबैए सभक छै कल्याण बिनु अन्न मरैए दुभिक घास बड़ गुणकारी-ए जीवन हित कल्याण करैत-ए धरती बँचबैए घासमे दुभि सभसँ उत्तम-ए अमृत पीब अमर कहबैए सगरो भेटैत-ए अमरलत्ती अमर होइत-ए अनके बले जीबैत मरैत-ए परजीबी होइए गुरूचलत्ती दबाइक गुरु छी लाभकारी आ रोगीक रोग हरि सबल बनबैए जादू मन्तर टोना-टापर तँ छी अन्ध विश्वास तांत्रिकक जंतर नहि छी छू मंतर ज्ञानीक ज्ञान हितकर होइए अभिमानीक ज्ञान कष्टदायक गुरु ज्ञान उत्तम गुरुक दान वरदान होइए अन्न दानसँ जिनगी बँचैत-ए जल तँ छी जीवन बड़ कठिन मनुख तन मिलै लोभ मोहमे फँसि घुमैत रहि आगिमे जरि मरै धर्मसँ पैघ श्रम, कर्म होइए अनुभवसँ अकुर काज होइ मुद्रासँ राजकाज कला नाटक पुरना संस्कृतिकेँ बँचा राखैए कलाकार कलासँ दिल खुश करैए गामक नाच मृत भेल जाइए वीर गाथाकेँ लोक बिसैर गेल खोजैबला नै कियो गाम घर तँ देशक प्राण अछि शुद्ध पवन हरियर खेतमे स्वर्ग सुख भेटैए फलमे पैघ कटहर होइए आन फलसँ मान कम होइए सब्जी, पका खाइए पूजा पाठसँ मन शान्त होइए मुदा कर्मसँ सफलता मिलैए सत्य कर्म धर्म-ए उथर नदी उधियाइत रहै गहींर नदी चुप्पे-गुप्पे रहैए ज्ञानी गहींर होइ मान सम्मान लेल सभ जीबैए अपमान नै सहैत अछि कोइ दुनू कर्मसँ होइ आम लताम केला, बेल, शरीफा सेव, पपीता तरबूज आ खीरा सभक हरै पीड़ा दूध, दही, घी मधु, मखान धान, पान, माछसँ बढ़े मान सम्मान मिथिला छी महान पानिक मान दुनियाँ करैत-ए बिनु पानि नै जिनगी चलैत-ए धराकेँ खींचैत-ए कारी कोइली प्रीतमकेँ बुलाबै अधरतियामे कूहू कूहू करि कऽ सभकेँ जगाबैए तोंता-मेनाक खिस्सा बड़ पुरान जे सुनैत-ए अचरजमे पड़ि सोचि शोग करैए राजाक दुख जनता बँटैत-ए प्रजाक दुख बाँटैत नहि कोइ दुख सहि मरैए गामक बेथा कथा नहि सुनल नहि देखल सहल नै जाइए कहै छी नै बाँटैए सभक सभ केकरो कोइ नहि सभ मिल कऽ कण-कण जोड़ि कऽ युग निर्माण होइ माए गाएकेँ सेवा सभ करियौ कर्म धर्मकेँ जोड़ि, मोह छोड़ियौ सदा सुखी रहियौ दुख सुखक संगम बीच रहि कल्याण लेल अपन श्रमदान अर्थदान करियौ चंचल चित मन धबड़ाएल स्वार्थी बनि माया बजार बीच सभ अछि घेरल केकरा लेल कानब जे हमर नोर पोछत निष्ठुर बनल-ए स्वार्थी बनि ठकैए मोह मायासँ दूर रहि कर्मकेँ करैत चलु कर्म धर्म बिनु नै मीठ फल मिलत परिश्रमसँ सभ डरैत अछि बिनु श्रम नै भूख मिटैत अछि नै हएत प्रगति भोरक तारा उगल भुरुकबा गमकै फूल भोर पहर घुमु रहत मन खुश माटिक घैला पानि निर्मल करै सोना नै शुद्ध संत उपकारी आ ज्ञानीक वाणि सुधा आगि नै बुझै हवासँ, बुझै दीप प्यास नै बुझै भरल सागरसँ कूप मिटबै प्यास मठ मस्जिद नै मिलै भगवान वन घुमने नै मिलै देव धर्म प्रभु बसैए मन रोगीक रोग दवाइसँ छुटैए मनरोग नै छोड़बैए दवा केना छुटत रोग नेत्रदानसँ पैघ दान नै अछि जीवन दान रक्तदान भूदान सँ कल्याण होइए सफलताक करू नीक तैयारी राति अपन जागि करू तैयारी प्रयास राखू जारी देश खातिर करब बलिदान रक्षा करब देशक छी कल्याण काज छी ई महान स्वर्गक सुख नहि चाही हमरा दुखमे मिलै हरिदर्शन सुख सुखक खान मेहनतसँ मिलै धन अपार आलस अछि दुखक पैघ बाट काज करू विचारि तीन बातसँ राखब परहेज मीठ बोलिया चटगर भोजन झूठसँ रहु कात कन्यादानसँ जगमे करू नाम काज महान समाजक कल्याण नारीक छै उत्थान पंच तत्वसँ बनल छै शरीर अनमोल छै ई जिनगीक गाड़ी अन्त किए होइ छै? धानक बिआ उखारि बोनिहार गीत गाबैत धान रोपैए खेत सबहक खातिर बच्चा कनैए स्कूल जाइ खातिर जरूरत छै काँपी,कलम, पोथी शिक्षाक छै जरूरी दूध पीब कऽ बच्चा पलैत बढ़ै भविस बनि उपकारी बनि कऽ देश रक्षा करैए माटिक मूर्ति हिलै उुलै नै बोलै किए मनुख पान, फूल, प्रसाद चढ़ा भक्त बनैए मानव तन लेल देवी देवता तप करैए दुर्लभ छै ई तन देवोकेँ नै भेटैए हाड़ माँससँ बनल ई शरीर नाश्वर अछि की भेटैए तनसँ मायामे फँसल-ए राजा सेवक जनता छी मालिक लोक उनटे बुझैए सेवककेँ राजा तँ मालिक छी गरीब लेल जेल जुर्माना अछि नेताक लेल कालाधन, खजाना जनता छै दिवाला सभ अपन नहि कियो पराया दुखक साथी निभबे जे दोस्ताना अनमोल खजाना मोती मालासँ शोभा बढ़ैत अछि कंठी मालासँ हरि भजन होइ कोन उपयोगी छी मजदुरक श्रमसँ बनै टुटै घर मकान मालिक छी महान श्रमिककेँ नै नाम चान सुरुज अकासमे चमकै अपने कर्मे लोक चमकैए जगमे नाम होइ आगि जरैत सभ देखैत अछि मन जरैत नहि देखैए कोइ किए अन्तर होइ पानिक बून मिलि नदी बनैए सींचे धरती प्यास बुझै सभकेँ दाम नै दइ कोइ मोट रोटीसँ पेट भरैत अछि नीक पोथीसँ ज्ञान बढ़ैत अछि दुनू राखैए मान जरैत दीप जगमग करैए मुदा अपने अन्हारेमे रहैए जग हित करैए देशक सेना सुरक्षामे मरैए देश गर्वित मुदा परिवार तँ शोकमे डुमल-ए चोरक माल सभ मिलि खाइए उनटे चोर फॉंसी पर चढ़ैए संगे कोइ नै जाइ नाचे बानर चौर खाए बबाजी बानर कहै माल अछि केकरो कमाल करै कोइ पढ़ल सुग्गा बोली छै अनमोल बन्द पिंजरा कैद रहि कहैए अजादी केना होइ गाछक फल सभ खाए जुराए गाछ नै खाए तैयो सभ फल धर्महीत करए धान पानसँ मिथिलामे सम्मान धोती-कुर्त्ता छी गौरव पहिचान स्वागतमे मखान पकै फसल कटनी दौनी होइ कुइट, पीस मधुर भोज बनि सभक पेट भरै बिनु खेने नै पेट भरैत अछि नहि देखने नयन जुड़ाइए नै ज्ञान मूर्खहोइ प्रेमक बाट पकैड़ सुख पाबै स्वर्गक सुख सफल जिनगीक उत्तम फल अछि हरिण देत सियारक गवाही दुनू भागि कऽ जंगल चलि गेल सजामे प्राण गेल सौनक साग भादवक दहीसँ बँचल रही आसीन कातिकक शीतसँ बँचि रही चंचल मन चित्त घबराइए जान जोखिम पैर लड़खराइ बाट नै देखाइए चोर-चोर छै मसियौत बनल अधिकारी छै पिसियौत बनल प्रजा साधु किए छै? आमक डारि झुलुआ झुलै छेलौं कोइली बोली सुनि गीत गबैत खुशीसँ हँसै छेलौं बाग-बगीचा लगबैत सींचैत आम, लताम खाइत जीबैत छेलौं चैनसँ सुतै छेलौं मोतीक माला फेरैए धनवाला हलुआ पुड़ी खाइए दिलवाला दूध बेचैए ग्वाला खीरा छी हीरा भोर पहर खाउ नोन लगाए सॉंझक पहर तँ खीरा पीड़ा दइए गंगाक पानि अमृत समान छी सागर मिलि नोनगर बनैए पीबिलो ने जाइए देश अजाद मुदा हम गुलाम भूखले पेट केना जश्न मनबै स्वतंत्रता दिवस मधु मिश्री घी तीनू तँ अमृत छी तीनू मिलि कऽ पैघ विष बनैए खाए लोक मरैए पुरान अन्न रागीक पथ्य अछि पुरान लोक समाज सुधारक सर्वहितकारी छी सभ महग किछो ने अछि सस्ता मुदा देशमे खून चून बेचैनी सभसँ सस्ता अछि खोजलोसँ नै भेटैए भगवान मन मन्दिर बसैए भगवान जे पूजे से महान आखि रहितो अन्हरा बनल अछि केना खोजतै ज्ञान दीप जरै छै सेहो आनहरे छै सत्य वचन पहाड़ सन भारी हिले ने डुले झूठ ऑंखिक धूल सत्य अग्निवाण छी सत्यक सोड़ि पताल पहुँचैए झूठक जड़ि रूइयाँ सन हल्लुक हवा उड़ा दइए पशु पक्षी छी मनुखक हितैषी नहि करियौ शिकार बलजोरी जीब छी हितकारी फूल गमकै नित्य बहै पवन चिड़ै चहकै ओशसँ भिजै तन सभकेँ भावै मन चना चनैक चैत मासमे पकै शानसँ खाइ धुधनी सतुआ दालि सुपाच्य होइ शीतल पानि बँचबै छइ प्राण गरम पानि लइए जानि प्राण नै बकसैए जान शीत चाटने नै मिटैए पियास हाथ चाटने नहि मिटैए भूख पानि मिटबे त्रास घर मन्दिर मनमे भगवान श्रद्धा शक्तिसँ ज्ञान इमान बढ़ै कर्म धर्म कल्याण सत्य बाजि नै सभ करैए काज हरिनाम नै जपैए इनसान जिनगी छै हराम झूठ बाजि कऽ ठगि खाइ बेमान इमान बेचि भगवानो बेचैए अमीर कहबैए कर्मक फल सभ भोगैत अछि अधर्म किए करैए सभ जानि छूटै नै छै प्राण नदी मौसम बदलैत रहै छै नै बदलै छै भाग्य सत्य मृत्यु नै बिगाड़ै छै कोइ बेटी धन छी अनमोल रतन सभक हित समाजक विकास देशक छै कल्याण विद्या धन तँ सर्वोत्तम धन छी बिनु विद्या तँ लोक पशुसन छी विद्या ज्ञानक खान धनमे विद्या स्थाइ उत्तम अछि नहि मांगैए राजा रंक फकीर नहि छिनैए चोर गाम स्वर्ग छी किए शहरमे नरक सन जिनगी बितबै छी आयुकेँ घटबै छी साए रोगक एक रोगी बनैए संयम किए नहि करैए लोक दवा खाए मरैए खान पानसँ करू रोग निदान दियौ धियान जड़ी-बुटी खाए कऽ रोगसँ पाऊ छुट्टी आत्मा शरीर दुनू दुख सहए आत्मा अमर शरीर नाश्वर छी एना किए होइए हाड़ मांससँ बनल ई शरीर मरणशील तँ किएक कुकर्म करैए लोक जानि ज्ञान बढ़बे धन मान सम्मान पाप घटबे इमान, धर्म, यश सत्य कर्म महान चंचल मन यौवन क्षणिक छी दुख सुखसँ जिनगी सजैत-ए विद्या धन स्थायी छी राम राज्यक सपना देखलैन महात्मा गांधी मुदा रावण राज कहिया खत्म भेल? मौत, ग्राहक इन्तजार नै करै वलवान नै मनुख होइत-ए काल वलवान छी मोह-मायामे सभ फँसल अछि मोक्ष मिलतै सदगुण कर्मसँ अधर्मी नर्क जेतै रोजगारसँ चलैत-ए जिनगी नहि होइ छै भूखमरी बैसारी सभकेँ छै जरूरी यौन शोषण दहेज उत्पीड़न भ्रूण हत्या छी कैंसर सन रोग बड़ पैघ चुनौती जग सुन्दर मनुख अज्ञानी-ए आन जीवसँ सीखब जरूरी-ए ज्ञानीक कहब-ए भेद कुभेद बीच मनुख रहि विष विषाह बनि कऽ सतबैए समाजकेँ तोड़ैए जीव जीबक सम्बन्ध अटुट-ए जीबे जीवक दुश्मन बनल-ए न्याय की कहैत-ए? आगू बढ़ब आनकेँ पछाड़ब पछुआएल सभकेँ छोड़ि आगू बढ़ब हिनता छी झूठ वचन सॉंच नहि होइए सभ छी झूठे जौं कहै एको सॉंच से दुनियाँमे होइ मनक मैल भावना बिगड़ैए दिशा बिगाड़ि जिनगीक चालिकेँ कुबाट पकड़ैए खरकट्टल जे रहए मनक मैलक धब्बा छुटल नै उपाय मन भेल कुपित हिन भावना चरित्र बिगाड़ैए जीव जीवमे भेद करि लड़बैए दुखे दुख सृजैए अद्भूत अछि जगतक जे लीला जीवे जीवकेँ संघारक बनल की उचित होइए? श्रम करैत जिनगी बितेलक साग पातकेँ खाए दुख सहल केना सुख पावत नीति कुनीति बीच बेवस्था अछि दू नजैरसँ दुनियाँकेँ देखैए दीन दुख सहैए तकदीरमे गरीबी लिखल-ए दुख काटैले जेना जनमल-ए ईश्वरो कुपित-ए केना भेटतै सुख, जेकर दुख जनमाऊ छै सुखक छाहैर तँ दूरेसँ भागल छै कोसी कमला बीच बलान बहै निर्मल गंगा स्वर्ग सन मिथिला पवित्र धाम कहै आम लताम अनरनेबाक छै उत्तम खान धान पान मखान मिथिलाक छी शान कुकुर कहीं आगि पकैए, ठक कहीं उपास कहैए धर्म दास संत पड़ै उपास ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’ झारू- मान नै केकर मन मानै छै केकर मन मानै अपमान।। अपनाबू सभ जीव जगतकेँ पूरत अहूँकेँ ई अरमान।। गीत- शिक्षाक बौछार लागल छै घर-घर पढ़ाइ-लिखाइ छै।-2 बड़ी सरम केर बात आबो लोकसँ लोक छुबाइ छै।।-2 केकर लहु केकरासँ कम छै सभ लहुमे एके दम छै।-2 श्रद्धा और सिनेहमे सबहक बड़बैर हक देखाइ छै।।-2 बड़ी...। जेकरा नै जीवनक आधार की बुझतै मानव अधिकार।-2 ऊँच नीचक हथियार उठा कऽ जगसँ लड़ै लड़ाइ छै।।-2 बड़ी...। मानवताक शासन मानू सभ मानवकेँ बड़बैर जानु।-2 जीबैक हक छै सभकेँ बड़बैर अन्धोकेँ ई देखाइ छै।-2 बड़ी...। q झारू- काल्हिकेँ के देखलकै बाबू काल्हिक करिश्मा बड़ा महान।। काल्हि हाथमे हेतै खप्पर आ की करब अहाँ कंचन दान।। गीत- आब की कड़ी हम सामने खड़ा सवाल छै।-2 जीनगी भेल दबाल छै ना।।-2 जँ फँसि जाइ छै ई मशला की करबै होइ नै फैसला।-2 ऐ सँ वंचित नै कियो राजा रंक कंगाल छै। जी...। भेटल समयसँ नै जवाब कल्लर बनि जाइ छै नबाब।-2 या खोजि गलत हल जीनगी करै हलाल छै। जी...। हल लालच केलक सवाल जिनगी फँसि गेल ओझड़ी जाल।-2 आब के छोड़तै केकरो कहाँ मजाल छै।-2 जी...। उत्तर समय चाहै छै कम जीयब या की घेरत जम रक्षा करू विधाता मौत जिनगी के सवाल छै। जी...। खोजै समय रहैत सच उत्तर बिरला छै जगमे ई पुत्तर। दुख से पाबै, जिनगी तेकर बबाल छै। जी...। q झारू- जागू बाबू देश बँचाबू लबका खुनक बोलीसँ।। जे मानवमे फुट कराबै तेकरा मारू गोलीसँ।। गीत- आधा रोटी खेबै यौ देशकेँ बँचेबै यौ।-2 ज्ञान-विज्ञानक डोर पकैड़ हम दुनियाँकेँ नचेबै यौ।-2 देशमे पसरल भ्रष्टाचारी गमन घोटाला अत्याचारी।-2 एकता के तलवार बना हम सबहक घेँट कटेबै यौ।-2 आधा...। सत् अहिंसा गाँधीसँ लेबै हिंसाकेँ नै बढ़ए देबै।-2 सुख शान्तिक महल बना हम दुनियाँकेँ बसेबै यौ।-2 आधा...। सेवाकेँ जन-जन बुनबै मानवताक मन्तर गुनबै।-2 जग अमन केर माला लऽ कऽ घर-घर धूम मचेबै यौ।-2 आधा...। q झारू- झारू बिनु नहि घरक शोभा झारू बिनु नहि होएत हवण।। हमरा बिनु नहि मन्दिर-मश्जिद आर ने देशक संसद भवन।। गीत- झारूसँ जुनि घृणा करू ई तँ अनुचित बात छी। -2 जइसँ मिलै छै जगमे शान्ति तेकर हम शुरूआत छी।। -2 जइ घर नहि छै हम्मर आदर तइ घर घुसतै दुक्खक बादर। -2 पएर पसारत रोग बेमारी ओघर भूतक जमात छी। -2 जइसँ मिलै...। की हमरा बिनु तनक शोभा फुटतै की मन ऐ बिनु आभा। - 2 के कहौत हमरा बिनु मानव केकर ई औकात छी। - 2 जइसँ मिलै...। के नहि लइ छइ हमर सेवा राजा रंक दानव आ देवा। -2 के गीन सकतै रूप-रंग हम्मर सोचैवाली बात छी। - 2 जइसँ मिलै...। q झारू- रहि नै गेल आजुक शिक्षामे ज्ञानकर्मक महान उदेस। भ्रष्टाचारसँ धनार्जण कऽ जड़ीया बँचि गेल बाँकी शेष।। गीत- शिक्षा भऽ नै जाउ बदनाम गै बेटी भार तोरापर छौ- 2 भैया बाबूक ठोरक लालीकेँ श्रृगार तोरापर छौ- 2 शिक्षासँ ले ज्ञान सुकर्मक राख परख मानवता धर्मक। 2 निष्ठा नीति इमानक मलार तोरापर छौ। 2 शिक्षा...। शील शुशिलता गढ़ा-ले गहना मानवता केर पहीरिले कंगना। -2 सिनेह प्यार सभ छोट पैघक बेवहार तोरापर छौ। -2 शिक्षा...। जगमे पसरल दहेज बेमारी वैद्य बनै केर कर तैयारी।-2 कुष्ट समाजिक दहेजक तलवार तोरापर छौ।– 2 शिक्षा...। q झारू- भूल करै जँ वनक पंछी पशु करै तँ औ छै बात। ऐसँ वंचित जीव जगत केर मात्र छोड़ि कऽ मानव जात।। गीत- दुइए फूलसँ घर सजाबू सुखी रहत संसार यौ।-2 करू नियोजित सभ कियो बाबू अपन-अपन परिवार यौ।-2 दू गोटे हम हमरा दूटा लक्ष्मी बेटी आ भोलबा बेटा।-2 नीकसँ मिलतै शिक्षा दिक्षा रोटी कपड़ा दुलार यौ।-2 करू नियोजित...। कान धरू विज्ञानक हल्ला भरल जोगार छै एकरा झोला।-2 नहि तँ होएत ककोड़बा वाणी खोधि कऽ खाएत कपार यौ।-2 करू नियोजित...। जनसंख्याँ केर बोझ भेल भारी नाकोदम केलक बेकारी।-2 आबो नै चेतब नर नारी फेल कऽ जाएत सरकार यौ।-2 करू नियोजित...। q झारू- सुति उठि लागू भोरे बाबू माए-बाबूकेँ गोड़ यौ। एकड़ा सन जगमे नै कियो सेवापर दियौ जोर यौ। गीत- माए गइ बोल तोहर छौ, बाइबिल वेद कुरान गइ। शान्तिकेँ बरदान गइ ना-2 तूँ तँ जगमे अनुपम, केकर उपमा देबै हम। सौंसे दुनियाँमे नै, कियो तोरा समान गइ। शान्ति...। आगू तूँ पाछू भगवान, जगमे तुहीं एक महान। तोरे नाओंसँ पुज्जित मन्दिरक भगवान गइ। शान्ति...। तूँ तँ ममता केर अकास। पहिल गुरु केर प्रकाश। तुहीं जगमे देखेलही, जीबै केर सामान गइ। शान्ति...। तूँ तँ अल्ला, ईषू, महेश, कार्तिक गणपति और गणेश। माए गइ चरण तोहर छौ, गंगामे स्नान गइ। शान्ति...। q झारू- गरीब भूखल कम रहै छै भूखल बेसी रहै धनवान। गरीब भूख बस सुखल रोटी अमीर भूखल हीराक खान। गीत- तूमलोग केना कऽ जीबतै ओतए आपलोग जतए बेमार छै। असंतोषमे माथ दुखाइ छै स्वार्थक चढ़ल बोखार छै। अहाँ बाबू बनू बरूआर हम छी सेवा-ले तैयार। मान-सम्मानमे सभकेँ बरोबैर जीबैक अधिकार छै। असंतोषमे......। आप उरू मोटर गाड़ी साइकिल हमरो रहए तैयारी। एक दोसरक घाट उतारनाइ दुनियाँक बेवहार छै। असंतोषमे......। अहाँ पाबू पुआ-खीर चुल्हा बुझै ने हमरो भीड़ इज्जतसँ दू वक्तक रोटी हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे......। अहाँ पहिरू सूट-सफारी फाटए हमरो ने पढ़िया साड़ी तन झाँपि कऽ हमहूँ जीबी हमरो तँ सरोकार छै। असंतोषमे......। अहाँ शोभा महल अटारी झोपड़ी हमरो रहै तैयारी। सीर छुपबैले छत होइ ऊपर हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे...। q झारू- की करी अपनेक सेवा घर खाली किछु छै नै धन। बैसू बिछा दी अहाँ नीचाँ श्रद्धा रंजीत अप्पन मन।। सुआगत गान- अर्पण करै छी चरण-कमलमे करू सुआगत स्वीकार यौ। हम अदना सन धुल घरा कऽ अहाँ छी देव अवतार यौ।-2 दर्शन देलौं हमरा हुजुर नाचि उठल मन मजूर।-2 मनसा पुरलैन हमर विधाता सुनलैन हमर पुकार यौ।-2 हम अदना...। अहाँ चरणकेँ धुऐत धुल मनमे समा रहल नै फूल।-2 पावन भेल हमर घर-अँगना हम भेलौं साकार यौ।-2 हम अदना...। घर हमरा नै पकवान सुखल रोटी छै नीदान।-2 पाबि बिसारब देव अतिथि हम छी गरीब अपार यौ।-2 हम अदना...। q झारू- सफल करब जँ जिनगी बाबू कसि पकड़ू ई दू आधार। पहिला जानू सादा जिनगी दोसर जानू उच्चविचार।। गीत- चालि चली सादा निमहे बाप-दादा-2 कहि गेला बुढ़ पुरनियॉं अहीमे छै फायदा-2 देखती नै खाउ पीबू देखती नै पीनहुँ-2 रहू औकात धरि अपनाकेँ चिन्हुँ-2 जिनगी आनन्द हाएत हम करै छी वादा।-2 चालि चली...। दोसरकेँ नीक देख किन्नौं नै जरू-2 अपनो आनन्द रहू दोसरो-ले मरू-2 ज्ञानी पुरुषक यएह छी कायदा।-2 चालि चली...। फाटलकेँ लाज कोन मैले लजाबु।-2 झूठक वेपार छोड़ि सच गाल बजाबू।-2 बात करू कम-सम काम करू ज्यादा-2 चालि चली...। परक उपकार करू, करू नहि निन्दा।-2 जीवितेमे मरू नहि मरि कऽ रहू जिन्दा।-2 जिनगी शीतल करू किनू नहि रौदा।-2 चालि चली...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलासराय- दहेज दहेज पाप छी दहेज अभिशाप छी दहेज छी बड़ पैघ कलंक सभ मिलि करू ऐ समस्याकेँ अन्त। दहेज समाजक लेल भऽ गेल अछि कोंढ़ दहेज अछि एड्सोसँ पैघ रोग दहेजसँ बढ़ि कऽ नै अछि कोनो रोग जे भोगने अछि एकर भोग ओकरा अखनो तक अछि तेकर सोग। दहेजक कारण बेटी मरैए दहेजक कारण बेटी जरैए फँसरी लगाकऽ जान गमबैए धार-पोखैरमे सेहो डुबैए दहेजेक कारण कन्या-भ्रूण हत्या होइए आउ, सभ मिलिकऽ ऐ समस्यापर विचारू दहेजकेँ अपना समाजसँ खिंधारू जे कियो दहेजक मांग करए ओकरा खर्ड़ा-बाढ़ैन आ झारूसँ मारि भगाउ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २६९ म अंक ०१ मार्च २०१९ (वर्ष १२ मास १३५ अंक २६९)
जैठाम न्यायालयक न्याय अबिसवासू AS जाए, aaa cd लड़ाइ-झंझेटक GUS रूप ने पकड़त जे खाइ-पीबैले शहर-बंजारक कचहरी tes feat आ रगड़ा-रगड़ी समाजमे करी । Oa Ag करब I समुद्रक अमृत थोड़े भेटत। तइले समुद्र Aa पड़त | 307 दफाक मुकदमा निचला area fed दिनक पछाइत सी.जी.एम. कोर्टमे चलि गेल । जहिना लोक रोगाएल अछि तहिना परिवार रोगाएल छै, परिवारे किए समाजे रोगा गेल अछि | जखने गाछक जड़िमे गराड़ धरत तखने नसे-नसे डारियो aus रोगेबे करत किने । कोटो- कचहरी age किए stra ted | नस-नसमे रोग घुसले अछि, ass जिनगियो बेठेकान ys गेल Os | जैठाम न्यायालयक न्याय अबिसवासू Us जाए, तखन a लड़ाइ-झंझटक तैँ वएह रूप ने पकड़त जे खाइ-पीबैले शहर-बजारक कचहरी ves feat आ रगड़ा-रगड़ी समाजमे att जैं से नइ करब तैं समुद्रक अमृत थोड़े Yea | तड़ले समुद्र मथै पड़त। aus सभ AA जाइत-जाइत साठि-सत्तैर बर्ख Us जाएत। जिनगीए केतेटा अछि, तखन a Aa लड़ाइ- झगड़ा, एक आइटम काज | बाइस बर्खक पछाइत HSS केसक फैसला भेल | रोगाएल जेहेन फैसला हेबा चाही सएह भेल | Ae सजा भेल | BA जेल गेल | द CRA Collected Thoughts of Sh Jagdish Prasad Mandal : An anthology of pamphlets from lus literary corpora. 4 सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited and Collected by Umesh Mandal
& | जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 नह नह OP, ‘ गाम : बेरमा (मधुबनी) il जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) रूचि : 200 इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि \ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन अपन पढ़ैक धार d नीक रहल, एहेन नीक रहल जें कोशी-कमला Sel अपन पेटकें के HEU जे आनो आनक चास-बास धरिया गेल छल जे लिखैक बाट छोड़ि मंचपर बजैक बाट पकड़ा देलक | लिखबो-ले ata चाही बजबो-ले वौस चाही। सुवोधनीक मन धारक मोनिक पानि जकाँ नचलैन, नचिते मनमे उठलैन, गाँधीजीक शहादत दिवसपर देल गेल भाषण । गाँधीजी एशिया महादेशक भारत, आ अफ्रिका महादेशक बीच गुलामीक विरोधमे महाभारतक कृष्ण जकाँ शंख फुकलैन। की ओ As St छला जे गुलामीक केहेन- केहेन जाल अछि। गाँधीजीक ओही विचारकें get ure अपन समय चलि गेल। एशिया महादेशक सउदी अरब, यमन, ओमान, भूटान लाओस जहिना, तहिना अफ्रिकाक माली, वरकिना, नाइजर, टागो, सेनेगल मनकें घेरि मुड़ीकें गोंति गोंतिया कहा-बधी करा नेने छेलैन जे गाँधीजीक शहादत दिवसपर पोथीक रूपमे लोकार्पण करन, कहाँ भेल! किए ने भेल? 'सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collected by Umesh Mandal
on | जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 ) गाम : बेरमा (मधुबनी) a जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) न । रूचि : 200l sett तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | ; y नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन वेद fd वेद छी, अक्षर ब्रह्म | मुदा वेदोमें भेद तँ अछिए | जैं से नै अछि, d Ud रंगक वेद आ Ud वेदवेत्ता केना भेला कि Ba? भेदो उचिते ने, जेहेन देश तेहेन AGT जेहेन उपारजन तेहेन भोजन, मुदा उपारजनो तैं प्रकृते अनुकूल, dT जेहेन भोजन तेहेन जिनगी... | Fel जख़न देश-देशक माटि-पानि, उपजा-वाड़ी रंग-बिरंगक अछि तखन तैँ जिनगियो ने सभ रंगक हएत चाहे लाल हुअए कि कारी! आ जखन जिनगी सभ रंगक हएत तैँ जीबैक विधो- बेवहार ने सभ रंगक हएत। जख़न बीध-बेवहार फर-फराक हएत तखन तैँ वेदोमे भेद हेबे करत किने... | पड़ले-पड़ल सुकल भाइक मन घोर-मट्ठा भ5 गेलैन। मनमे उठलैन जे जे बात बुझए चाहै छी से तर पड़ि गेल आ आने-आने ऊपर US गेल! aaa? तखन तैँ यएह ने नीक हएत जे जड़ चीजक खेती ara ash as चीजकें छोड़ि बाँकी- sit चाहे उपयोगीए वस्तु किए ने हुअए- सभटा घासे भेल किने । बिना ओकरा हटौने जजात अपन अनुकूल AS ने हएत। ओ a तखने अनुकूल US THU जखन दोसर ओकर माटिक शक्ति As लड़... | ¥ 'सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collected by Umesh Mandal
oO जगदीश प्रसाद मण्डल : I 947 न Ws FH, गाम : बेरमा (मधुबनी) 4 जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) रूचि : 200 इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि \ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन ओना, तीन मासक दौड़मे, जाबे धरि दर्जन भरि सी.आर.पी.क ड्यूटी रहल, AAI बहुत लाभ Act | वारन्टीक पकड़-धकड़ तेते as भेल, Hal समाजक दर्जनों उचक्का HPS गेल । जहिना जालमे घोंघा-सितुआ ओंघराइत HA जाइए तहिना Aer | AAS अन्दाजमे आएल जे जाबे गामक उचक्का AS सोझ हएत, ताबे समाज केना सोझ STR पकड़त | Fal सोचब, करब आ हएबक बीच ct किछु-ने-किछु दूरी बीचमे अछिए | अही बीचक isd भेल ई जे रंग-रंगक घटना फँसल । से दुनू eas फँंसल | के केकर शासन करत | लड़की संग घटना फोर्सो एकटा परिवारक संग केलक | तहिना गौओंक बीच भेल। तीन मास बीतैत-बीतैत शासन बदैल गेल । बहरबैया मालिकक सात Hel घराड़ी खेत | एक Me खेत खरीदैक गप केलैन | बेना- बट्टा AS गेल | दू फरीकक हिस्साक जमीन | दुनू फरीक बिकरीक गप cig Hs नेने Del | रजिष्टीक डेट बनल एक फरीक रजिष्टी ऑफिस पहुँचबे ने केला | ) Collected T houghts of Sh Jagdish Prasad Mandal A nanthology of pamp hlets‘from has literary compora सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and- Collected by Umésh Mandal
on | जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 TP नह शा ‘ गाम : बेरमा (मधुबनी) $ कै जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) p= रूचि : 200i इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | ; y नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि \ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन जहिया स्कूलमे पिताजी नाओं लिखौलैन तहिया जे गुरुजी उमेरक BAe करैत पितेक सोझहामे कहलैन- Sea अपन मन तेहेन अपन धन ।' मने-मन भेल- डायरीसैं ठेकान नै पेब सके छी। एक F ओहुना sit अधखरूआ होइए, दोसर अपने लिखनाइए छोड़ि देलौं | तखन? हैं! दोसर SH आरो YS सकैए sit अछि छठिहारीक दूध | मुदा ओहो तैँ डुमले पोखैरक पानि भेल! छह दिनक बच्चाकें की ठेकान ted जे छठिक दूध केहेन Sle छै, Act Gon दिन किए ने ओही दूधपर oe भेल Teer FST | ओहो बेठेकाने अछि | TEA? हैं, तखन तेसरो अछि- पेटक मल आ जन्मक मल । मुदा ओ तैँ प्राण छुटैबेर अपन परिचए दइए... ओह! sige भाँज नै लगत, ओ a भविसक भेल । तखन? तखन तैँ यएह ने हएत जे जहियासँँ अप्पन ठेकान अछि ae ठेकना ली । मुदा ओहो तैँ बेठेकाने अछि | सभ दिन नवके-नवके He aed गेल, Far एते TVS जे जहिया स्कूलमे पिताजी नाओं लिखौलैन तहिया जे गुरुजी उमेरक उमेद ata पितेक सोझहामे कहलैन- “Ges अपन मन तेहेन अपन धन |” y 'सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collected by एम Mandal
& जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 नह नह VP, भ गाम : बेरमा (मधुबनी) | जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) रूचि : 200l इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि \ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन नीके भेल जे डायरी लिखब छुटि गेल | आब लोककें ओते पलखैत कै, TEA SRC आब उपयोगिते की रहल? नोकरीक वेतन आकि fea भत्ताक खर्च लिखियो सके छी, म॒दा उलफी आमदनियाँ आ काजो लिखब नीक थोड़े हएत | जखन लिखबे ने नीक हएत तखन केते नीक हएत? मुदा लगले सुकल भाइक मन घुरि गेलैन । घुरि ई गेलैन- भाइ! सबहक ई दुनियाँ छी, सबहक दिन राति छी, तैसंग कि लोको-वेद as छी। मुदा ओ तैँ तखने ने हएत जख़न लोक-वेदकें खोद-बेद करैत Wa! ओना, खोदो-बेद असान थोड़े अछि | खोदो जहिना versa समुद्र aft अछि तहिना ने वेदो अछि । पहाड़क पाथर खुनी आकि meta माटि खुनी, घी जकाँ पीघलैत पाथर welt आकि Bed झरना-बहैत धार खुनी, चाहे sss बनल समतल भूमि-गंगा-ब्रह्मपुत्रक मैदान-खुनी आकि ay धारक संगोरल गंगासागरक घाट खुनी, बंगालक खाड़ी खुनी आकि प्रशान्त महासमुद्र खुनी | केते खुनब..! केते खोदब..! G सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collacted by Umesh Mandal
& | जगदीश WATS मण्डल : 947 TP हू OV, ) गाम : बेरमा (मधुबनी ) दि ह जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) pee रूचि : 200 set तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | भ 4 नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि ९ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन दिन भरि तैं दर्जन भरि सिपाहीक आगू हजारो सिपाही मर्द-औरत किलोमीटर हटि गामेक गाछीमे बिसवासक संग राति fade छल | समाजमे संक्रमणक स्थिति पनपए लगल | गामक गाड़ीक चक्का केमहर He SPA चलत? जेहेन चलौनिहार रहत तेम्हरे Ye A Beta | राघोपुर गामक एक दिनक एकटा केसक मुकदमाकें के कहए जे सत-सत, अठ-अठटा केस हुअ लगल | भरि दिन थाना राघोपुरक लोकरसँँ झँपाएल रहैत, गामोमे तहिना दू-चारि-पाँच ठाम पटका-पटकी, थापर-मुक्का आ लाठी-फराठी चलिये जाए | बेवस्थाक AVS धुरी छी | जे बेवस्था चैंसाइत-चैंसाइत एते चैंसा गेल अछि जे डेग भरि आगू We ससरब कठिन Us गेल छै, तेनामे बदलाव छोड़ि char रस्ते की छड़। एक दर्जन सी.आर.पी.क चौबीस घन्टाक ड्यूटी प्रशासनिक अफसरक संग गाममे ys गेल | मुकदमाक ant दू-दिसिया us गेल que बीचमे एहेन स्थिति बनौल गेल जे एक दिस जैं मच्छरों ने मरैत तेकरो बदला मर्डर केस Flea, a दोसर दिस Saas Hunt Hea tea a sitet लाठीए बना देल जाइ छल, स्थिति भयंकर sas लगल | विस्फोटक बन$ लगल | न्यायालयक प्रति सुबल सबहक बिसवास बढ़ल | थानाक वहिष्कार ऐ शर्तपर केलक जे आगूक कारवाईमे थनोक स्टाफकेँ लपटौल जाए | जे बेवहारिक रूपमे ds भेल | Sat संगीक संग सुबल मनमे ठानि लेलक जे गाम AS छोड़ब, TA छोड़ब पाछू हटब भेल, SAS हटब | YY ator, पल्लवी प्रकाशन, amare Reiter Collected by Umesh Mandal अ-
“ ) जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 [> 3 गाम : बेरमा (मधुबनी) f जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) रूचि : 200। इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि ९ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन Ae कोनो जब्त वस्तुकें SSH महीनोक चक्कर लगबए पड़े BE | एक तैँ पुलिस प्रशासन अपने लोभे परमोशन-ले लोभाएल जे जाधैर जी- जान लगा काज AS करब AK खरकाह केना SAT | जखने खरकाह FAT तखने ने अवसर हाथ लगत | न्यायालयमे मुकदमा पहुँचते पुलिसक सिरचढ़ भेल। साते दिनक भीतर मारनिहार कोर्टमे हाजिर भेल। ऐ feared जे औवेल मुदालह छी जिला न्यायालयसँ जमानत हेबे करतै, पछाइत बाँकी मुदालहक ओही आधारपर जमानत AS जाएत। Fal पुलिसक कारवाइ एते तेज भेल जे सातमे दिन मुदालहक घरमे जब्ती-कुर्को भ गेल । सुबलक घरक केबाड़-चौकी आदि जे जब्त भेलैन से तैँ भेबे कएल जे खेतीक दमकल, जे सिंचाइक साधन छी, ओहो जब्त भेल | जे | सालक पछाइत आपस At! | साल लगैक कारण भेल जे मुकदमाक सघनता | एक-ने-एक AGS बारहो मासक रहबे करै, जे से थानाक Ta सुबलक FA रहल | ¥ सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collected by Umesh Mandal
जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 = ; Soa | गाम 5 बेरमा (मधुबनी . = | जीविंकोपार्जनं : कृषि(तरकारी eth) ae j Shr 200rsethan ast सेवा; पछइत साहित्य eT | के Meh, UAH, Me, काव्य, कथा, उपन्यास: इत्यादि \ साहित्यकं मौलिंक-विधोमें:अनवरंत लेखंनें | करीब 00 'पोथीक लेखन/प्रकाशन एक दिस कोनो काजक मूर्तिरूप अछि दोसर दिस ख़ढ़-माटिर्सँ गढ़ल... तैठाम देखनिहारोक c fers दायित्व बनिते अछि..! — SF Collected T houghts of Sh. Jagdish Prasad Mandal’ An anthology of pampiletsfrom hus literary corpora U ee उस्टनय re कि ee ee iN Tsay, पल्लवी Wh शन, ACAT/ Tet a a nee thenalie te hand Coll: cted by Umesh M (a@ndal —
जय मिथिला जय मैथिली अपन पितापर सँ नजैर हटि सुबो धनीक राष्ट्र-पिता महात्मा गाँधीपर गेलैन | जहिना सिनेमाक Ser रील नचैत तहिना गाँधी बाबा सुवोधनीक मनमे नचला । गाँधी बाबा अपन लीलसा पूरा HS लेलैन | हुनक लिलसा रहैन जे शहीद Sls, जे भेलैन । मुदा हुनके मंचपर अपन कएल संकल्प देशक सटले सीमानक कातक देश भूटान अछि, जैठाम रेलगाड़ी नसीव as भेल | छियालीस हजार छह साए वर्ग किलोमीटरमे पसरल देशक पनरह-सोलह लाख देशवासी क भाग्य निर्माण, तहिना सउदी अरब जे भूटान जकाँ सटल नहि Hal महादेशक दूरियो नहि, सउदी अरब, यमन, ओमान लाओसटा नहि अफ्रिकाक माली जे बारह लाख चालीस हजार एक साए बियालीस वर्ग- किलोमीटरमे पसरल देशक अठहत्तैर लाख लोकक जिनगी, जड़मे steers बेसी जमीन मरूभूमिये अछि, अदहामे सहेल सवाना घास उपजैए, तहिना बरकिना जे दू लाख चौहत्तैर हजार एक साए बाइस वर्ग किलोमीटर जमीनमे पसरल सरसैठ-अरसैठ लाख लोक ओहने ठाम ने अछि जैठाम एक दिस सहारा मरूभूमिसैं गुजरैत सर्द हवा जीवन-मरणकेँ सदिकाल झुलबैत रहैए | Har तैयो गिनीक मानसूनी हवा Seat ¢ aed Gel तहिना नाइजर, टोगो इत्यादि-इत्यादिक अछिए । “इत्यादि- इत्यादि' सुवोधनीक मनमे उठिते wea तखने arg दरबज्जापर सँ आँगन आबि आदेश दैत कहलखिन- “कनियाँ, बुड़हाकेँ अबै बेर Us गेलैन, aa पहिनेसँ अपन ओरियान-बात ws लिअ।” Gaara सुतरलैन | सुतरलैन ई जे अखन a अँगने नहि दरबज्जोक मालिक साउसे छैथ, बजली- “अखनो बुड़हे सोहाइ छैन मुदा चारि बर्खक पोती as सोहाइ छैन ।” पछड़ैत कामिनी कनी ores घुसकैत बजली- “बुड़हा कि कम सियाखी Sa अपनों गुप-चुप खेनहि- पीनहि हेता आ पोतियोकेँ खियौनहि हेता की ।” एक संग दुनू- सासु-पुतोहु-क आँखि, कान, विचार आ मुँह सम बनैत ठहाका मारि आत्मसात करए लगल | ् सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited and Collected by Umesh Mandal
o | जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 नह हू VY, ) गाम : बेरमा (मधुबनी) बे. ० जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) a. j रूचि : 200l इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन जहिना दूंध-पिण्ड होइए तहिना पानि-पिण्डसँ AS HS भकक््खो, बगिया ak होइते अछि... | ..बगियों की वगिया छी, रंग-रंगक बगिया अछि, जेते लोक aa बगिया ने अछि । feat बगूरक गाछ रोपि बगुरवगिया बनबैए तँँ feat फूलक गाछ रोपि फूलवगिया लगबैए तैं feat फलवगिया लगबैए। मुदा au कि ईहो सोझ-साझ अछि । जैं तीनियेँटा wa माने बगूर, फूल, फल- तैयो नीक tea सेहो ने अछि, घोदा-घोदे तीनू अछि । जहिना बगूरमे काँट तहिना aga मोटगर काँट बेलमे आ टाभ नेबोमे अछि | फूल-पात जहिना बगूरमे तहिना पातो आ Heit सैनीमे अछि, wel बगूरक crea आकि टुस्सा He जे तोरासँ नीक छी, Wal काँट तँ नमहर US! aed नीक ने सैनी, जेकर wie we छड़। तहिना ने फूलोक अछि जे एकटा धरतीपर फुलाइए तँँ दोसर अकासोमे फुलाइते अछि आ तहिना ने फलोक अछि जे एकटा खेने पेट भरैए Ft दोसर पेनौं तँ मन खुशियाइते अछि...! yY 'सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collected by Umesh Mandal
पछुआएल Ga, ओना, समैयक fears ओहो नहियेँ पछुआएल छला, धोती-कुर्ता पहीरि नेने Sa, Ver st जूता खाली ऊपर-निच्चाँ ओढ़ब-पहीरब पछु आएल Se | ज्योतिक ज्योतिमे अपन ज्योति मिलैबते सुवोधनीक मन बिहुसल, बिहुसिते बकार फुटल- | “विचार हेरा गेल आकि हारि गेल' Vora आबि सुवोधनीक बकार बन्न भड गेलैन | फुला गेलैन | विचार हेरा गेल, कि हारि गेल, हरण भड गेल आकि दहन Ys वौआ गेल...! सुवोधनी अकवका tet) तैबीच देवचन दरबज्जेपर सै face जकाँ टाँहि देलखिन- 4 सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited and Collected by Umesh Mandal
oO | जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 TP नह हा ‘ गाम : बेरमा (मधुबनी) $ . जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) p= रूचि : 200i इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | ; y नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि \ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन जहिना दिन-राति लोक अष्टयाम-नवाहमे मंत्र जप ot करैत अछि, मुदा भीतरक रस-रहस्यसैँ हटल रहैत अछि, तहिना अपनो हटल Tech | बच्चा रही मन खाली रहए असधिरसैँ मनमे पइस गेल । मन Sat भरलो ने रहए जे उमटाम Fea! खाली रहए घोरि-घोरि पीबए लगलौं | अखनो मोन अछि | मुदा मोनेटा अछि! मोनेटा किए ने रहत? जहिना दिन-राति लोक अष्टयाम-नवाहमे मंत्र जप at करैत अछि, मुदा भीतरक रस-रहस्यसँँ Ft हटल ted अछि, तहिना अपनो eet रहलौं | एकर माने ई aS ने भेल जे सटल नै रहलौं | हैं! Aaa सटल रहलौं HHS हटल रहलौं, Aaa ने Ae? आ तेतबे किए भेल, जनकपुरक जनक बाबाक संकल्पित धनुष उठबैक कुबत नै भेल, ATS ने । अयोध्यास सजल आएल बरियाती जनकपुरमे नै हेराएल से कि नै बुझल अछि | बुझले अछि | au कि दौजी बरियाती tea सेहो ने | मुड़हन रहैथ, जे जनकपुर आबि ने धोखा खेलैन? जैं as Ga रहितैथ a डोमक घरकें किए जनकक सीता बिआहक बरियातीक बास- स्थल बुझितैथ? ओ की कोनो अयोध्यासँ As Hs आएल es आकि जनकपुरेक सज-सजिया, हेल- मेल आ विधि-बेवहार देख बुझलैन | St बुझल रहितैन Gi... | y 'सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collected by Umesh Mandal
जय मिथिला जय मैथिली भरिसक हुनका मनमे ई तैँ ने भेलैन जे बेटा HAS TS. HS पिण्डदान तकक हकदार अछि, गारि पढ़ियो Hs आंकि सुनियाँ HS, बेटा सबदिना भेल, जबकि बेटी जनगीक एक कालखण्डक | माने बिआहर्सँ पूर्व धरिक मात्र! AEA समाजो एहेन बहुरंगी अछि जे कोनो विचारकें बुझैए ने चाहैत | कन्याँगत अपना कन्याँकें जेते बेसी पढ़ा-लिखा नीक मनुख बना दुनियाँक रंगमंचपर अबै जोकर बना संगबे देथिन तैं संगबैयेक कोनो sar नहि! एक a अपन जिनगीकें काटि-छाँटि नीक अध्ययनक बेवस्था बेटीकें करब पछाइत Sas संगी तकैले जाएब तैं जेते सेवा बेटीक केने छिऐ सभ पानिमे जा कहत जे बाबू अहाँक ई Sha AS जे हमरा पढ़ेलौं, cha ई जे समाज बेटी-जातिकें विद्यासँ वंचित tha अपन बुधि-विवेक जगै ने देलकै | जैं जाग५ देल जाइतै FT रूपक संगी गुणों होइतै, Fal से कहाँ अछि | केतौ रंग-बेदरंग करैत FT केतौ अर्थ वेदरंग करैत समाजेकें बहुरंगी बेदरंग बना देने अछि । St कन्याँकें ars निकालि पढ़5 देबैन ct पर्दाक पाठ पढ़ा अनुचित कहल STS के, a केतौ संवेदनशीलाकें कठोरशीलामे जोति जिनगीक भार HSI लटका देल जाइ Es | हमर संवेदनशीलताकेँ पिता जानि ws जब्बह केलैन आकि कोनो वाध्यता छेलैन | बीचमे बाजब सुवोधनीकें उचितो a नहियँ कहल जा सकै os! अभिभावक feo dea t srs बेसी अनुभवी a, मुदा au कि ओहो जानि ws गरदैनमे छुरी चलौने हेता? केना कहबैन, जनमदाता HA | Wel हमर संवेदनकें ओ तखन आँखिक सोझक ताखपर रखि विचार केलैन जखन लेन-देनमे प्रोफेसर पति सुवोधनीक संगी aft ois तँँ की ast समाजोक बीच लोक-लाज तैँ बैचल ted | प्रोफेसर माए-बापक बेटी, प्रोफेसर पतिक संग रहत a कि अपना जिनगी सहश सुवोधनीकें नहि भेटतै, जरूर भेटतै... | Gy सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited and Collected by Umesh Mandal
o | जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 नह नह VP, ‘ गाम : बेरमा (मधुबनी) a ५ जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) रूचि : 200 sett तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | Fs नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि \ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन परिवारक गारजनी साठि बर्खक देवचन अपने दुनू परानी हाथमे रखने SY मुदा अपना सन पत्नी AS छैन | दुनूक दू गंति-मति तथापि पति-पत्नीक बीच जिनगी। पत्नी- कामिनी- परेखी du arent परिवारकेँ अँकैत। अपन दुनू परानीक काज कामिनीक मनकें खुशी रखनहिं छैन | किए ने रहतैन, गाममे EET गोरे प्रोफेसर बनला, तड़मे एकटा FT अपने बेटा छैथ। बेटा- रूपचन- Ta हटि पनरह किलो मीटरपर कौलेजक प्रोफेसर छथिन | मोटर साइकिलसैं अबै-जाइ HT | ओना, दुनू गौंआँ ओही कौलेजमे काज करै a मुदा दुनू दू टोलोक on दू जातियोक । ae परिवारिक जिनगीमे अन्तर सेहों छैन। दुनूक पत्नियाँ बी.ए. पास मुदा सुवोधनी wea घुरियाएल Ba, जखन कि सरोजनी are स्कूलक शिक्षिका Ser | नोकरीक ore Sel दू कारण, सरोजनीक परिवार Pras उठैत av नोकरीकें जीविकोपार्जनक साधन afer ata, मुदा सुवोधनीक सम्पन्न परिवार, aw महिलाक बीच नोकरी- arent Preps ase देख निषिध बुझल जाइत अछि | एक ct ओहुना नोकरी-चाकरी हेय Sie | एक तैं अपन सम्पन्न परिवार. कामिनीक तैपर बेटोकेँ नीक कमाइयो आ प्रतिष्ठो a sei ओना, ज्योतिकें विद्यालयंमे प्रवेश जहिना सुवोधनीक मनमें नचैत तहिना कामिनियाँक मनमे, मुदा दुनूक दू-दिशाह नाच छेलैन | कामिनीक मनमे नचैत जे अपना बेटी नइ रहने परिवारमे विद्याक प्रवेश तैँ पुतोहुए-जनीसैं भेल, मुदा अप्पन परिवारक चमकी ज्योतिमे चमकैत देखबे केलैन | अपने कामिनीकेँ एको अक्षरक बोध नहिं। पोतीक संग पतिकें विद्यालय गेने दरबंज्जा खाली भड़ये गेलैन, जे कामिनीकें पसितन्न नहि तैए आँगन छोड़ि दरबंज्जे पकैड़ लेलैन। असगरे सुवो धनी आँगनक पुबरिया घरक ओसारक चौकीपर देवाल लगल ओंगठल, मने-मन अपन माता-पितापर नजैर देलैन | की जानि माता-पिता पढ़ौलैन, आ की पाबि ect छी...! y 'सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited-and Collected by Umesh Mandal
जय मिथिला जय मैथिली "नीन टुटैपर अछि आकि अखन रहैबला काँच अछि?” सभ बुझिते छी जे जखन एक्के अबाजे नीन Seu TE ओ टुटैये-टुटैपर भेल आ जखन दू-चारि हाके वा हकवाहिसैँ नीन ee, ait भेल काँचोमे खिंचा काँच | Heel ते ईहो कहल जाइए जे केकरो नीन ale as छै आ HHA पातर | ओना, बुढ़-बुढ़ानुसक कहब ईहो Ga जे जगलो रही आ of कियो बाहरसँ नाम US HS सोर पाड़ए तैँ एक्के AA उतारा नइ दिऐ। ओ भूतो-प्रेत रहैए आ मलो-मलेछ रहिते अछि | ओना, सियनगर चोरो As WU सेहो बात नहियेँ अछि | गुँहचोरा fare ने पछुआरमे सीन काटि घर पैसि घरक समान चोरा लइए मुदा सियनगर चोर a से AS करत। Bld यएह ने करत जे एक दिस पूजी विहीन लोक जे मिथिला सन धरतियो an माटियो-पानिकें-जे दुनियाँमे awe नीक अछि-छोड़ैले तैयार अही दुआरे अछि जे पूजी as अछि जे गुजर चलत आ दोसर दिस जे fee जीवनक मुख्य अंग अछि ओकरा कपैट-छपैट असली-नकली ae aft एजेन्टक भाँजमे पड़ि अपन पाइक संग अपन जिनगी सम्हारैक ae छोड़ि, सभ fee ओकरे सभकें au जेकर ओ नोकरी करैए | एहने-एहने जाल-फाँस लगौनिहारे ने सियनगर चोर Ae | y
(y जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 कह नह. है कर ) गाम : बेरमा (मधुबनी ) रूचि : 200i Seat तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | j नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि \ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन Usa Set काबिले किए st जे बुढ़िया-फुसि केसमे फँसल छी?' Wal से बात नहि अछि अपनों इच्छा अछिए जे जेते जल्दी सम्भव हुअए dd जल्दी HIS फारकती ली मुदा से कोर्टो बुझए तखन ने । age बुढ़िया-फुसि केस जे तीस साल पुरान अछि। बुढ़िया-फुसि केस ऐ दुआरे कहलौं जे एकटा जमीनक-माने तीन gl जमीन अछि GSA घर-दुआरसँँ बाड़ी-झाड़ी aft अछि- रगड़ाक-झगड़ा अछि | दखल-दिहानीक बात अछि । दुनू पक्ष गामसँ बहरा बंगलोरमे नोकरियो HAT आ ओत्तै घर-दुआर Get बना लेलक | जहिया गाममे छल तहिया विवाद भेल, मुदा आब ad दुनू अपने छोड़ि बंगलोर चलि गेल आ dal कहैए हमरा दखलमे अछि sts बाड़ी-झाड़ीमे फुलबारियो लगौने St at तीमनो-तरकारी उपजबै SH | से दुनू HET |
कि जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 नह नह VY, ) गाम : बेरमा (मधुबनी) कि. | जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) bake रूचि : 200i इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि ९ साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन जे मनुख केलक-धेलक किछु ने आ खाइत-पीबैत, सुतैत-पड़ेत जिनगी बीता लेलक aug जिनगी ने रीब-रीबाएले रहि गेल | जिनगी तैँ ओ ने भेल जे अपन भरण-पोषण करैत किछु आगू धरि डेग soda चलए | ओना डेगो-डेगोक अपन-अपन गुण अछि | जेना एक भेल आगू दिस उचित डेग बढ़ाएब आ दोसर भेल पाछू ससरब | मुदा बीचमे तेसरो Gf Us जे ने आगू दिस बढ़ल आ ने re दिस ससरल बीचमे ठमकल चलैत Teer | ओना, आगू दिस डेग बढ़ाएब आकि ore दिस ससरबक कारण अपन-अपन सेहो अछि, एके कारण दुनूक नहि अछि i आगू दिस ace जहिना दुनू कारण अछि तहिना we दिस ससरबक सेहो दूटा कारण Ff अछिए। माने ई जे जहिना आगू दिस उचित डेग बढ़बैक एक कारण भेल जे ओहन डेग SA अपना संग परिवारो-समाजक मंगल कामना निहित अछि आ दोसर अछि- Ged केकरो मंगल कामना नहि As अमंगले भेल | तहिना पाछू दिस ससरबक Sel दू कारण अछिए | पहिल भेल बिना fers केने-धेने ठाढ़ ot an समए Fa ws आगू दिस बढ़ि गेल आ अपने पछुआएल मुँह तकैत रहलौं | तहिना दोसर कारण ईहो तैँ US जे समैक संग चलैमे पानि-पाथर आ बिहाड़िक एतेक चोट ved जे लाखो चेष्टा केला पछाइतो जिनगीक St पाछूए मुहँ घुसैक गेल | माने ई जे जड़ साधनक संग डेग आगू बढ़ाएब ओ साधने छीना गेल आ समैक थपेर ओकरा थोपरा ws निच्चाँ उतारि देलक... | Collected Thoughts of Sh Jagdish Prasad Mandal: An anthology of pamphlets from his literary corpora ty सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited and Collected by Umesh Mandal
“कृष्णदेव भाय ऐठाम आने साल जकाँ लछमीपूजा छिऐन, हकार छह | पहिल साँझक पूजा छी, तँए समयपर पहुँचैले अखन Sat गप-सप्प नहि करह | Tig तैयार हुअ ग आ SAEs तैयार होइ छी । ओत्तै निचेनसैँ गप-सप्प करब ।” ओना, उदयलाल मजकिया लोक अछि, aU ओकरो अपन भावनाक संग भावलोकक भवन Ose | कठिन-सैँ-कठिन आ गम्भीर-सँं-गम्भीर विचारकेँ मजाक-मजाकमे उड़ाइयो दइए आ पुराइयो तैँ asc अछि | उदयलाल अगुताएलेमे बाजल- “परसादमे पाने-मखानटा बैटता आकि नवको किछु बैटता?” उदयलालक बात सुनि नहलापर दहला फेकब वा बीबीक संग बादशाहक जोड़ा लगाएब ate afe बुझि चुपे रहलौं | हमर चुपी देख आकि अपन मनमे उदयलालकें कोनो SAR रहै से तैं AUS जानए, मुदा उदयलाल फेर बाजल- “भाय ed, पग-पग पोखैरकेँ जहिना कमला-कोसी खेलक आ पान-मखानकें परवासी भाय लोकैन खेलैन ASAT आब एकरा किताबे-कैसेटमे ves दियौ ।” AAA भेल जे बाजी- “किताबों पढ़निहार कि आब अछि, आब तैं कैसेट्स बेसी लोक पढ़ैए | SSS एते of लाभ भेबे कएल जे मिथिलाक शब्दमे अंग्रेजीक बाढ़ि एने शब्दकोश बढ़बे कएल अछि ।' सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली Edited and Collected by Umesh Mandal
जगदीश प्रसाद मण्डल : 947 ५ .. जीविकोपार्जन : कृषि (तरकारी खेती) — रूचि : 200i इस्वी तक समाज सेवा, पछाइत साहित्य लेखन | थ नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन | करीब 00 पोथीक लेखन/प्रकाशन साँझक आगमन होइते गोसाँइ VIA (MAIS आगू) A AS Hs अपन घर-ओसार, ऑआँगन-द्रबज्जा सहित माल-जालक घर, थैर, जल-जलाशय आ धार-धारा होइत समुद्रक घाटपर सेहो दीप जरत | सूर्यास्त होइपर आबि गेल । ओना, श्रम करैक शक्ति सेहो शरीरमे शेष छल आ जिनगीक अग्रिम क्रिया सेहो शेष wad | क्रियाक सरदर नियम यहए ने अछि जे एक काजक पछाइत दोसर काज रोपी। du कटबी नियम ate अछि सेहो बात a afer अछि sitet ad अछिए जे काजक सघनताक बीचक जे जिनगी अछि, ओइमे समयानुकूल आ आवश्यकतानुकूल घटबी-बढ़बी करए पड़ैए । मुदा ऐठाम ने घटबीक प्रश्न अछि आ ने बढ़बीक, प्रश्न अछि जिनगीकें सुचारू aa संचालित करैक, Tes समयपर दीपो जरा सकी आ पाबैन सेहो मना सकी । q
् राजदेव मण्डल गाम : मुसहरनियाँ (मधुबनी ) साहित्यकार (मैथिली एवम् हिन्दी साहित्य) करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन हम छी ऐ अंचलक किसान देशक बढ़ेबाक अछि मान-सम्मान बचेबाक अछि सबहक प्राण wae दिएबाक अछि त्राण हम करब संघर्ष नै छी बेजान ee गाएब कृषि गान | ‘TIT (काव्य संग्रह- 203)
Ns | राजदेव मण्डल i गाम : मुसहरनियाँ (मधुबनी ) साहित्यकार (मैथिली एवम् हिन्दी साहित्य), करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन हम नुकाएल छी ओहीठाम जेतए सभ किछुक AR रहल दाम नोंचि नेने अछि ओ सभ हमरा देहक मासु-हाड़ अंग-अंग छोड़ा HS HS देने अछि तार-तार नेने हाथमे हाड़ हैँसैत अछि बेसम्हार हम देखै सभ किच्छो कानै छी जार-जार | ATI (काव्य संग्रह- 2073) रु सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल)
८ | राजदेव मण्डल NO गाम : मुसहरनियाँ (मधुबनी ) साहित्यकार (मैथिली एवम् हिन्दी साहित्य), करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन लेने छी हाथमे मनक तरूआरि तरासि-तरासि अंगसँ देबै उतारि पोर-पोरसँ तोड़ि tect छी Fach AAV मोड़ि रहल छी | “बसुन्धरा” (काव्य संग्रह- 203)
» = राजदेव मण्डल Ny. गाम : मुसहरनियाँ (मधुबनी ) भर साहित्यकार (मैथिली एवम् हिन्दी साहित्य), करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन परबाक छै भागे जरल एहेन अतिथि St पहुँचल दुआरि पोसा परबाकें feat आइ मारि एहेन लोक कहिया आएत से नै जानि फेर हेतै परबा बात लिअ मानि। पानिमे SAT HS जखैन लेलक जान परबाकें भेल मनुखक पहचान | TTIW (काव्य संग्रह- 2073)
‘ = राजदेव मण्डल Ny. गाम : मुसहरनियाँ (मधुबनी ) 4 साहित्यकार (मैथिली एवम् हिन्दी साहित्य), करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन हरक नाशपर सबहक आश चहुदिस छिटकल हरिअर प्रकाश उस्सर धरतीपर अहाँ लिखे छी नव-नव इतिहास अहीं HS सकै छी Baa जय हे किसान, जय हे किसान । TTI (काव्य संग्रह- 2073)
डॉ. शिवकुमार प्रसाद एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष- हिन्दी विभाग, हरि प्रसाद are महाविद्यालय- निर्मली, (भू.ना. मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा- बिहार) अहाँक समान Sel St बुद्धिगर Sol As गेल Ara | एहि दुनियाँमे अहाँ सन के अछि दूधो भड गेल BIS । । शिक्षक भेल हाथक झुनझुना बजा बजा सभ WAT | बाजत काल्हि ANH झुनझुना आँखि ने किनको खुलए | । जाहि देश और जाहि प्रांतमे शिक्षक हएत wafer | शिक्षा केर श्मशान बनत ओ जनम5त मात्र भनसिया । । सोंहाॉँत-अनसोंहाँत' (Ta संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 20I8
८... डॉ. शिवकुमार प्रसाद न = 7 एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष- हिन्दी विभाग, हरि प्रसाद ae महाविद्यालय- | ata \ निर्मली, (भू.ना. मण्डल विश्वविद्यालय, | मधेपुरा- बिहार) | अपन अदौरी wad नीमन START बडड़ी फिक्का अपन सड़ल दही अछि मिठगर दोसराक टटका TET | नीति अनीतक चालि-चलैनसं बुझि रहल संसार झारखंड बनलासँ की अदिवासी भेल नेहाल | सोंहाँत-अनसोंहाँत' (Tel संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 20i8
Oe — डॉ. Ragan प्रसाद -_ — 7 एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष- हिन्दी wil ........... विभाग, हरि ware are महाविद्यालय- निर्मली, (भू.ना. मण्डल विश्वविद्यालय, । मधेपुरा- बिहार) । अपना मने खूब नचै छथि अनको नीक लगैछैन की ई सोचबाक पलखैत किनका छनि अपनहि जान गमौता S| बुड़बक बेटा रुपैये काबिल ई कहबी कोनो झुठे ठै कबिलाहा जब दंड fra ofa बुड़िबकहाकें कहबै की | सोंहाँत-अनसोंहाँत' (Te संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 20i8
छत... डॉ. शिवकुमार प्रसाद = j एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष- हिन्दी विभाग, हरि प्रसाद ae महाविद्यालय- | aw निर्मली, (भू.ना. मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा- बिहार) | जुग पुरुष बाते नहि करमे होइत OS | गाए AAS बला AH किसुनमे नहि ws जाएत छैक ताहि लेल गोबरधन सेहो उठब5 पड़ैत Oe | सोंहाँत-अनसोंहाँत' (Te संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 20i8
aa ef ..... डॉ. शिवकुमार प्रसाद की = एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष- हिन्दी विभाग, हरि प्रसाद ae महाविद्यालय- कं निर्मली, (भू.ना. मण्डल विश्वविद्यालय, y मधेपुरा- बिहार) | निर्मलीक निर्मलतामे मनक मलाल AH मेटा रहल अछि शिक्षाक ऐ महापंकमे गामक जिनगी लेटा रहल अछि | सोंहाँत-अनसोंहाँत' (Te संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 208
8 | kK" iy रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार' | गाम : रसुआर (सुपौल), अनवरत साहित्य लेखन, bi करीब आधा दर्जन पोथीक प्रकाशन जीयो और जीने दो मन्तर जैं जपतै ई जग संसार । । जग अमनकें जड़ि जुएतै हरिएतै मानव अधिकार | । जीयो और जीने दो मन्तर WE हरदम याद At ।-2 किए hans झगड़ा हेतै हेतै किए विवाद यौ ।-2 किए... | आसमान छी सबहक पिता भू मण्डल छी सबहक माता ।-2 au भैयारी सभ जग वासी मनमे करू सुआद यौ ।-2 किए... | शगीतांजलि sire’ (गीत/झारू संग्रह- 208) Ye सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल)
रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार' Ha गाम : रसुआर (सुपौल), अनवरत साहित्य लेखन, &... brs करीब आधा दर्जन पोथीक प्रकाशन मान नै केकर मन मानै छै केकर मन मानै अपमान | | अपनाबू सभ जीव जगतकें पूरत अहूँकें ई अरमान । । जेकरा नै जीवनक आधार की बुझतै मानव अधिकार ।-2 ऊँच नीचक हथियार उठा Hs TS लड़ै लड़ाइ छै । ।-2 बड़ी... | मानवताक शासन मानू सभ मानवकें बड़बैर जानु ।-2 जीबैक हक कै सभकें बड़बैर अन्धोकें ई देखाइ छै ।-2 ast... | शगीतांजलि sre’ (गीत/झारू संग्रह- 208) & सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल)
8 | 3 | रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार' गाम : WSR (सुपौल), अनवरत साहित्य लेखन, Kk” करीब आधा दर्जन पोथीक प्रकाशन जागू बाबू देश बैचाबू लबका खुनक AAS । । जे मानवमे फुट कराबै तेकरा ATS MeHg । । ah जन-जन Fat मानवताक मन्तर TAS ।-2 जग अमन केर माला AS HS घर-घर TA मचेबै At ।-2 शगीतांजलि sire’ (गीत/झारू संग्रह- 208) & सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल)
9 / Kk” : ae | रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार' an गाम : रसुआर (सुपौल), अनवरत साहित्य लेखन, Bs करीब आधा दर्जन पोथीक प्रकाशन झारू बिनु नहि घरक शोभा झारू बिनु नहि होएत हवण | । हमरा बिनु नहि मन्दिर-मश्जिद आर ने देशक संसद भवन | | red जुनि घृणा करू ई तँ अनुचित बात छी -2 wed मिलै छै जगमे शान्ति THT हम शुरूआत SH | | -2 जड़ घर नहि S SAR आदर तड़ घर घुसतै CRAP STA | -2 पएर पसारत रोग बेमारी ओघर भूतक TATA ST | -2 wea मिलै... | राजा TH दानव आ देवा | -2 के गीन सकतै रूप-रंग हम्मर सोचैवाली बात छी । - 2 wea मिलै... | थ्ीतांजलि sre’ (गीत्/झारू संग्रह- 208)
डे राम विलास arg 5 गाम : लक्षिमनियाँ (मधुबनी ) ae अनवरत साहित्य लेखन Ca . करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन “अहाँक मनोभाव देख हमरा लगैए जे मनमे जातिवादक qa अखनो aft ऐछे au भूखलो St FT नै खाएब । जैं से नै रहैत तैं जाति-पातिसँ ऊपर उठि गाम-समाजक ay ath ata as खिऐबतौं ने, सभ आनन्दित होइतए | सबहक प्रेम आ जश सेहो भेटितए। सभ TWA आ भावक भूखल होइए नै कि भातक भूखल | जखन अपने लोककें नीच Get छिऐ aa ने लोको अहाँकें नीच बुझलक ।अपने कहने जैं लोक मड़र होइतए GT सभ मड़रे ने कहाइबतै। जीविका लेल ने लोक अलग-अलग काज करैए। मुदासभ तैँ मनुखे जाति ने छी । से जैं आबो नै aera GT साड़ामे जाइबेर बुझि की करबै | एतेक तँँ खियाल wea Usa जहिना सभ जाति मिलि समाजमे सबहक काजमे मदैत करैए तहिना जैं सभ जाति मिलि खानो-पीन, मेलो-बेवहार करब तखन ने समाजमे आपसी प्रेम-भाव बढ़त | अही अभावक कारणे ने ans धरि समाज पछुआएले अछि ।” “अंकुर (कथा संग्रह- 206)
g राम विलास arg कि कं करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन “गाछपर बिसवास अछि जे ओ अपन गुण-धरमकें सोलहन्नी नै बदलैए मुदा मनुखकेँ बदलैमे t कोनो समैए ने लगे BE | महेशकें He छी I कहैए छुट्टीए ने मिलैए | ete तेहेन अँठिलाहि अछि जे ठोर-पर- SR बैसबे ने करै Gs | जैं कहियो छुट्टी हेबो Hr छै aq नैहरेमे बितबैए। हमरा के देखैए। हम जेहेन केलौं से भोगि रहल छी, एहेन कष्ट a भगवान सात-घर दुश्मनोकें नै देथुन |” ‘sig? (कथा संग्रह- 20I6)
राम विलास arg गाम : लक्षिमनियाँ (मधुबनी ) अनवरत साहित्य लेखन करीब दर्जन af पोथीक लेखन/प्रकाशन पैघ विद्वान समीक्षक सभक Feu जबाव के देतैन? VA जबाव देनिहार sit सरकारी नौकरी करैबला Ted at चक्रव्यूहमे फँसा खा जेता। जौं कहीं प्राइवेटमे नौकरी करैत हएत ad कान पकैड़ हटबा देता । जौं कहीं अखवार, पत्रिका वा फेश- बुकपर fers टिप्पनी करत d धमकीपर धमकी पड़ए लगत | AU बाजबसँ चुप्पे भला बुझे छला | “अंकुर (कथा संग्रह- 206)
g राम विलास arg गाम : लक्षिमिनियाँ (मधुबनी ) अनवरत साहित्य लेखन करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन “अहाँ GU तँ असलमे अबसरवादी सामन्तवादी कमतिया ot सालमे तीन-चारि मास पानिक afta भेने दर्शन es ol, मुदा हम ad बारहो मास सबहक सामने अपन समाजमे रहै छी | लोकक कल्याण करै छी । से केना Gel सुनियँ लिअ- जखन रौदी भेने लोक जट-जटीन बरखा खातिर खेलैए TAA उक्खैरमे ES हमरा समाठसँ कुटैए आ हम बेदमोमे बाजि-बाजि मेघकें asta छी आ बरखा Gls OS | लोकक कल्याण Sls छड़ | हम केना ने लोकक हित-कल्याण aa तियाग आ बलिदान at छी? Sa कियो हमरा सन तियागी, तैँ हुनका सामने आनू, हुनके महंथी सभ मिलि as देबैन ।” ‘HHT (कथा संग्रह- 20I6)
g राम विलास arg गाम : लक्षििनियाँ (मधुबनी ) अनवरत साहित्य लेखन करीब दर्जन भरि पोथीक प्रकाशन जखन बुझै fou जे डोम समाजक aa Ua te लोक छै, बिना डोमक आगिसँ लोककें मरलोमे मुक्ति as Ae छै, तखन डोमकें एते निच्चाँ किए get छिऐ...। जखन कि जीबैतमे ay Sas छुबाइ छी, आ मुइलापर पैघ बुझै Ot... | डोमो तँ अही समाजक लोक St, Far गामसँ हटि mS वेचारा सभ TAA बसैए। सभ fal ओकरा अछोप बुझि आइ aft लग बैस खेनाइ तैँ टूर जे बातो ने करैए । एक लग्गा फटिकेसैं पुछ-पाछ करैए... | ऐबेरमे कोन असोकर्ज हुअ लगैए... | “अंकुर (कथा संग्रह- 206)
Ae विलास राय ma : भपटियाही (मधुबनी ), अनवरत साहित्य लेखन, विभिन्न विधामे करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन गर्मी हुअए चाहे भीषण जाड़ जाड़सैँ दलकैत अछि देहक हार मुदा जूनून नहि छैन कनीक्को कम जीब कि मरब तेकर नहि गम मातृभूमिक tates लेल केने छैथ अपन प्राण अर्पण हुनका सभक लेल ASAT’ अछि पोथी समरपन |
ara विलास राय dy गाम : भपटियाही (मधुबनी ), अनवरत साहित्य लेखन, विभिन्न विधामे करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन गाँधीजीक विचारधारा देह tS छैन हुनकर अपनौने छैथ मुदा दिलक छथिन साफ छैथ पूरा सदाचारी केतबो पैघ कियो बुद्धक दर्शन अपराध करए हुनकर wi छैथ mS os छथिन माफ छैथ पैघ परोपकारी आनक धनकें समझे SI रामायण आओर गीताक बिल्कुल ओ हराम OF हुनका पूरा ज्ञान हमरा गाममे a au छैथ ओ निष्ठावान एकटा धनवान । हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान |
are विलास राय ि ma : भपटियाही (मधुबनी), अनवरत साहित्य लेखन, विभिन्न विधामे करीब दर्जन भरि पोथीक लेखन/प्रकाशन सभ महानगरमे होनि अपन निजि मकान पेट्रोल पम्प, बंगला गाड़ी आलीशान रिश्तेदारकें भेटै पद आओर सम्मान यएह सभ तैँ हुनकर छैन अरमान अपन नेता छैथ केतेक महान । “हमर चरूधाम' (पद्य संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 2078, विमर्श सादर सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) आमंत्रित : pallavi.publication.nirmali@gmail.com
“हमर चरूधाम' (पद्य संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 208, विमर्श सादर सौजन्य, Tech प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) आमंत्रित : pallavi.publication.nirmali@gmail.com
Y SR चरूधाम' (पद्य संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 208, विमर्श सादर सौजन्य, Tech प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) आमंत्रित : pallavi.publication.nirmali@gmail.com
ay Ee. लखनौर, जिला- मधुबनी । (बिहार) पिन : कि = साहित्य लेखन : 2009 इस्वीरैं | Y \ 2 मौलिक विधामे करीब आधा दर्जन पोथी केर लेखन/प्रकाशन “aig यौ बाबा, तहिन d बाइढ़ोमे अहिना होइत हेतइ़?” बाबा बजला- “हैं, प्रकृतिमे पाँचटा जे तत्व अछि GAT अकास, सूर्य, हवा, जल आ धरती एही पाँचो aca बनल ई शरीर अछि आ अही पाँचोक नजैर सभ मनुखपर बराबर अछि । यएह ने देवता भेल, जेकरामे कोनो भेद-भाव AS SS | अकासमे जेकरा जेतेक उड़बाक Ss lS सकैए | सुरुअक नजैर सभपर बराबर पड़ेत अछि | मौसमक farses अपन गुण-अवगुण छड़ | बैशाख-जेठमे गर्मी जन-मारुख होइए आ वएह गर्मीक जाड़मे संजीवनी बुटीक काज करैत अछि | तहिना जलोकें छै, सबहक लेल बराबर बरसैत अछि | Fal वएह जल कहियो प्रलयकारी बाढ़ि सेहो आनि ea अछि a कहियो पियासक ca तरसबैत Gel अछि | तहिना हवोकें छै, सबहक लेल बराबर | कहियो मारुख a कहियो शीतलता सेहो दैत अछि | तहिनाने धरतियोक अछि । धरतीकें घरती माता कहि क$ लेक पुकारैत अछि, जहिना are अपन घिया- पुताकें केतबो कष्ट सहि Hs पालन-पोषन करैत अछि तहिना ने धरती सेहो करैत अछि ।”
Ye सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, बेरमा/निर्मली | साभार : “पुनर्नवा' (कथा संग्रह) प्रकाशन वर्ष : 2077, © श्री कपिलेश्वर राउत
‘2 Sp कपिलेश्वर राउत : 952 लखनौर, जिला- मधुबनी | (बिहार) पिन : 84740 ' 200 इस्वी तक समाज सेवा | . साहित्य लेखन : 2009 इस्वीसैं | मौलिक विधामे करीब आधा दर्जन पोथी केर लेखन/प्रकाशन “बाबू आब चाहक दोकान छोड़ि दियौ। हम ay Als आब कमाए-खटाए लगलौं | आब अहाँक उमेरो पचपन-साठि भेल। ay दिन कि काम-धन्धा करिते रहब |” “बौआ कहलह तैँ बड़ नीक बात, मुदा चाहे दोकानक बदौलत तूँ सभ ATS बनलह आ आइ शहर जा रूपैआ-पैसा देखे छहक। हम Ft कौहुना अपन रोजगारमे लागल रहै छी। देहकें धुनि गुजर-बसर करै छी। कमाएल-खटाएल देह अछि, जेतेक Mh चलाएब-फिराएब तेतेक ने देहक खून चालू रहत आ अपनो दुरुस्त WT तूँ सभ SF हमरा काहिल बनबैक बात He छह | Tat ak tea अछि aad af हम कमेबे-खटेबे करबह। रफिक मियाँकेँ नहि देखलहक, पाँचटा बेटा कै, पाँचो कमासुत, FART VA काम-धन्धा छोड़ा देलक | काज छुटिते वेचरा लोथ us Hs AR गेल । नोकरियोबला केँ तहिना होइ छड़। जहाँ ने कि are रिटायरमेन्ट भेटल कि Fant अपनाकेँ कोनो जोकरक नहि gets लागल | जिबाक बीस ae ct जीबत पाँच बर्ख। मने झूस YS जाइ Bs I”
१ हे प्रीतम कुमार “निषाद' गाम : मुरहदी (मधुबनी), अनवरत साहित्य लेखन, करीब दर्जनसैं बेसी पोथीक प्रकाशन अहोश्री युगपति बुझनुक प्रियजन आगत श्री युग देखैत HE सार्थक ज्ञान-विज्ञान सहारे नाश बुद्धिकें फेकैत रहू शुभचिन्तक होऊ नव पीढ़ी केँ पथ निर्देशक बनि बढ़ियौ लोक समाजक श्रम-विधान संग प्रीतम उपदेशक गढ़ियौ जगत लोक मंगल पथ जोहए Waal सांझ-विहान A, सगरो श्रद्धा... । 0 ।। crag मिथिला लोक waite’ (पद्य संग्रह- 20i8) सौजन्य, Teast प्रकाशन, निर्मली (सुपौल)
Ed प्रीतम कुमार “निषाद” गाम : मुरहदी (मधुबनी), अनवरत साहित्य लेखन, करीब core बेसी पोथीक प्रकाशन बाट औ घाट केओ बिगाड़ैत रहल ज्ञानी बाउर जकाँ बमकी दैत कहल किछुयो सूझए कहाँ आब देखब कथी अगवे दुर्दिन हँसए सुन्न कोठा महल भाव-भाषाक अकबक्की कोनटा TTA देखि कलजुग कहए काल पुरखा छलाह गाम केर भलमानुष जकाँ ओ छलाह काल पुरखा छलाह, WA पुरखा छलाह । । 4 । । aa मिथिला लोक प्रगीत' (पद्य संग्रह- 20i8)
iH प्रीतम कुमार ‘rare’ गाम : मुरहदी (मधुबनी), अनवरत साहित्य लेखन, करीब दर्जन बेसी पोथीक प्रकाशन छल-प्रपंचक राजनीति... फूइस, पेंच, गलबैहिया घेने गाम-घरमे रीत-कुरीति ज्ञानक मन्दिर इसकुल जर्जर दसगरजा घर सभटा गड़बर जत्तय aren डिठरा बमकै चतुर चलाको चुगला चमकै दाँव-पेँच दोगलई & दलाली औनी पथारी सभ Es रहल अछि तैं नें हम विकासक प्रयास &S रहल ST मुदा सर्वग्रास AS tect अछि ई विसंगति & मानए के? ई विसगतिकेँ जानए के? की555 एहने हम विकास KS रहल छी? जे सर्वग्रास औ Se Us रहल अछि? crag मिथिला लोक प्रगीत' (पद्य संग्रह- 20i8)
H प्रीतम Han ‘rare’ गाम : मुरहदी (मधुबनी), अनवरत साहित्य लेखन, करीब asd बेसी पोथीक प्रकाशन अछि जन प्रतिनिधि मौका परस्त | भारत मिधिला अछि अस्त-व्यस्त । । सत्ता सेवक खुशहाल मस्त | कोन भष्ट पतिक अछि ate हस्त । । आहत अगस्त आहत अगस्त... LOT fers संविधान सुख अछि निरस्त मर्यादित अछि-फिरका परस्त किए, आतंकी दिन-दिन प्रशस्त राष्ट्रीयताकेँ देवए शिकस्त... ।। 0 ।। आशाक तिरंगा कोटि हस्त झण्डोत्तोलन भए रहल GET और, सर्व धर्म समभाव पस्त हाय, राष्ट्र पर्व केर उदय-अस्त आहत अगस्त आहत अगस्त... LOU! crag मिथिला लोक atte’ (पद्य संग्रह- 20i8)
q 8 प्रीतम कमार “निषाद' गाम : मुरहदी (मधुबनी), अनवरत साहित्य लेखन, करीब asta बेसी पोथीक प्रकाशन ज्ञान धरम de जोड़ि Hs HAT बकुआएल भगवान at... सगरो श्रद्धा भक्ति HAT मठ-मस्जिद संस्थान यौ... ज्ञानी-पण्डित मुल्ला-साधु बना रहल शैतान a... सगरो श्रद्धा... 00 crag मिथिला लोक प्रगीत” (पद्य संग्रह- 20i8) & सौजन्य, पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल)