विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २७० म अंक १५ मार्च २०१९ (वर्ष १२ मास १३५ अंक २७०) 'विदेह' २७० म अंक १५ मार्च २०१९ (वर्ष १२ मास १३५ अंक २७०) ऐ अंकमे अछि:- २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- 'बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं' २.२.अरुण लाल-दू टा लघुकथा २.३.डॉ. बचेश्वर झा- मौलाइल गाछक फूल : जगदीश प्रसाद मण्डल २.४.आशीष अनचिन्हार-हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-७ ३. पद्य ३.१. संतोष कुमार राय 'बटोही' दू-टा कविता ३.२. अरुण लाल- 3 टा कविता ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु ३.४. नन्द विलासराय- हमर होली Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- 'बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं' २.२.अरुण लाल-दू टा लघुकथा २.३.डॉ. बचेश्वर झा- मौलाइल गाछक फूल : जगदीश प्रसाद मण्डल २.४.आशीष अनचिन्हार-हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-७ जगदीश प्रसाद मण्डल 'बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं' ( 'चितवनक शिकार' संग्रहसँ) ओछाइनपर सँ उठले रही कि जीबछ भाय दरबज्जाक आँगनमे खसास केलैन। ओना, खखाससँ नहि बुझि पेलौं जे जीबछ भाइक खखास छिऐन मुदा घ्वनिसँ बुझि पड़ल जे अकासक उड़ैत टिटहीक छी, तँए केतौ बिसाएत..! मुदा लगले ईहो भेल जे अकासक टिटहीक अबाज दोसर रंग होइ छै से तँ छी नहि। मने-मन गुनधुनाइतो रही आ डेगे-डेग ससैर कऽ बाहरो एलौं। जीबछ भायपर नजैर पड़िते बजलौं- “जीबछ भाय! भोरे-भोर अहाँ दर्शन भेल, औझुका दिन शुभ भेल।” जीबछ भाय अपनाकेँ शुभदाता बुझि विचारलैन आकि शुभ घटनाक आबाही बुझि से तँ जीबछ भाय जनता, मुदा एतबे बजला- “बौआ, कमरसाइरसँ घुमैतकाल राधेश्याम काका भेँट भेला। दरबज्जेपर बैसल रहैथ, देखते सोर पाड़लैन। असथिरसँ लगमे जा पएर छुबि गोड़ो लगलयैन आ मुहोँसँ बजलौं।” तइ समयमे राधेश्याम काकाकेँ ब्लड-पेसरक झोंक एलैन आकि ओहिना अपन मन धधकलैन से राधेश्यामे काका ने जनता। मुदा एतबे बजला- “बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं।” कहि चुप भऽ गेला। की जवाब दैतिऐन। जिनगी भरि पोथी-पुराणक बीच जिनगी गुजारलैन ओ आ कौल्हुका छौंड़ा भऽ कऽ की जवाब दैतिऐन। मुदा चुल्हिमे जहिना मिझाएल-पझाएल आगिकेँ खोंरनीसँ बाहर निकालि चुल्हिमे जारन देलासँ जहिना आगिक बढ़बारि होइए तहिना बजलौं- “काकाजी!” ‘काकाजी’ सुनि राधेश्याम कक्काक मन जेना ठमकलैन। मुदा व्यग्रताक उग्रता जे मनमे पजैर गेल छेलैन ओ ओहिना लहलहा रहल छेलैन। बजला- “बौआ, एकटा विचार पुछै छिअ।” राधेश्याम कक्काक विचार सुनि मनमे भेल जे हम कहियाक विचारी हिनकर रहलौं जे हमरासँ विचार पुछता? फेर मनमे भेल जे विचारक माने एतबे नइ ने होइए जे कोनो गम्भीरे विषयक विचार हुअए, ओ तँ साधारण नून-तेलक जे दाम बढ़ैए तेहनो होइए। विचार बुझैक मन बना राधेश्याम काका दिस नजैर उठेलौं। नजैर-मे-नजैर मिलिते राधेश्याम काका बजला- “हमर की गति हएत?” ‘हमर की गति हएत’ राधेश्याम काका सन लोकक मुहेँ सुनि मनमे पथराएल चोट जकाँ झाँइ-दे लगल। की रधेश्यामे काकाटा एहेन परिस्थितिमे फँसि गेल छैथ आकि समाजमे हिनका सन-सन आरो लोक छैथ? हमर की गति हएत, गतिक माने समयसँ लगौल जाइए जे दिशा भेल। मुदा दिशाक दशा की अछि सेहो तँ हेबे करत किने। ओना, ई बुझल अछिए जे राधेश्याम काका अढ़ाइ-तीन घन्टा पूजापर सेहो बैसनिहार छथिए। भलेँ पूजाक सामग्री जुटबैमे तबाही किए ने होइत होनु, ई दीगर भेल...। विचारकेँ सानि-बाटि बजलौं- “काका, अपना केने थोड़े किछु होइए, सभ ऊपरकाक हाथमे छैन। जाइ छी। हुनकर जेहेन मरजी रहतैन तेहने ने अरजियो लेता।” ओना, हम अपन जान छोड़बैत निकलए छेलौं मुदा राधेश्याम काका गम्भीर भऽ गेला। जीबछ भाइक विचारमे डुमए लगलौं। जेते डुमैत जाइ तेते जेना इजोत भेटल जाए..! बजलौं- “भाय! भिनसुरका समय छी, अखने सुति कऽ उठलौं हेन। अहाँ बहन्ने हमरो पत्नी बिस्कुटो खुऔती। चाह पीब लिअ।” ओना, जीबछ भाइक मनक तनतनीसँ बुझि पड़ि रहल छल जे बजैक इच्छा जोर मारि रहल छैन। चाहक नाओं सुनि जीबछ भाय बजला- “पहिने एक गिलास पानि पीआबह, पछाइत चाह पीब।” जहिना सबहक पत्नी पतिक गप-सप्पक कनसोह लइए आकि अतिथि-अभ्यागतक आगमन देख खिड़की लग ठाढ़ भऽ सुनैए तहिना पत्नी ‘एक गिलास पानि’ सुनि लगले नेने पहुँचली। हाथमे पानि देखते पत्नीकेँ कहलयैन- “एक लोटा हमरो दऽ जाएब। कुर्ड़ो कऽ लेब आ पीबियो लेब।” ओना, मने-मन पत्नी कुड़बुड़ेली मुदा मुँह खोलि बजली किछु ने। अपने तँ पत्नीक कुड़कुड़ाएब कनी-मनी बुझियो गेलौं मुदा जीबछ भाय बुझला कि नइ बुझला से तँ वएह जनैथ। अपनाकेँ निर्बल-निश्चल बनबैत जीबछ भाय बजला- “बौआ, अपन हारल आ बोहुक मारल बुड़िबकहा तँ बकि लइए मुदा काबिल लोक थोड़े मुँह खोलि बजता। ओ तँ कहबे करता किने जे सभ बात सभठाम नइ ने बाजल जाइए। आ जँ सएह भेल तँ बुड़िबक-काबिलमे अन्तरे की भेल।” जीबछ भाइक बात सुनि मनमे जेना उत्कंठ जगल तहिना भेल। बजलौं- “से की भाय साहैब?” संजोग बनल, पत्नी चाह नेने पहुँचली। जीबछ भाय आ अपनो पानि पीबिये नेने छेलौं। जीबछ भाइक मन जेना उड़-बिड़ाए रहल छेलैन तहिना बुझि पड़ल। मुदा तैबीच चाह हाथमे चलि आएल रहैन। एक घोँट चाह मुँहमे लइते बजला- “बौआ, राधेश्याम काका बड़-बड़ लीला राज मोरंगमे केने छैथ..!” एक दिस जीबछ भाइक चेहराक उदासी नजैरसँ देख पड़ैत रहए आ दोसर दिस मनचोभिया नाचक साजक संग अबाज दऽ रहला अछि! जरूर किछु रहस्यमय विचारमे छैन। मुदा से टोकचाल केने बुझबामे गड़बड़ा जाएत। किए तँ कोन विचार जीबछ भाइक मनमे रहस्यपूर्ण भरल छैन, से अपने केना बुझब। बकटेँट जकाँ किछु-सँ-किछु बाजि देब जेकरा जबबैमे जीबछ भाय लगि जेता, जइसँ अपन मनक बात मनेमे गराएल रहि जेतैन। पोचारा दैत बजलौं- “भाय साहैब। अहॉं सभतरहेँ श्रेष्ठ छी, अखने किए जिनगी भरि अहाँ सोझहामे हम बाले-बोध बनल रहब। अहाँ पढ़लो-लिखल बेसी छी, घुमबो-फीरबो बेसी करै छी आ करबो केनहि छी। तैसंग अपन एते नमहर कारोबार सम्हारिये रहल छी।” अपन इमनदार-जिनगीक बात सुनि आकि हमरा मुँहक सत् बात सुनि जहिना पहाड़क झरना झहरैत पानि धरतीमे उतैर धीरे-धीरे निर्बल-निश्चल हुअ लगैए तहिना जीबछ भाय निश्चल होइत बजला- “बौआ, राधेश्याम काकाकेँ हम तीन पुस्तसँ जनै छिऐन। साधारण किसान गौरी बाबा छला। माने राधेश्याम कक्काक पिता। जहिना सबहक मनमे अपन अपन-अपन अराधक प्रति आराधना होइए तहिना गौरी काका मनमे बेटाकेँ सज्ञान बनबैक आराधना अराधि बेटाकेँ एम.ए. पास करौलैन। कौलेजमे बेटाकेँ पढ़बैत-पढ़बैत बीघा भरि खेतो बिका गेल छेलैन। मनमे आशाक मोटरी बन्हले छेलैन जे बेटा पढ़ि-लिख लेत तँ अपन जिनगी अपना ढंगे जीबैक लूरि-बुधि भइये जेतइ। तइले अनकर आशा थोड़े रहतै। ओ तँ ओतबे काल अछि जेत्तेकाल नइ भेल अछि।” बजैत-बजैत जीबछ भाय चुप भऽ गेला। अपना बुझि पड़ल जे भरिसक जीबछ भाय किछु बात बिसैर रहला अछि, जनु तेकरे मन पाड़ैले बीचमे रूकला अछि। बजलौं- “भाय साहैब, एकबेर आरो चाह पीब?” चाहक नाओं सुनि जीबछ भाय बजला- “बौआ, चाहे ने चाह पैदा करैए ओत्ते चाह मनमे बैसले अछि जे कोन रूपे तोरा बुझा सकब, सहए ने मन थीर भऽ रहल अछि।” अपनो मन कनी-मनी अकछाए लगल। बजलौं- “भाय साहैब, शोर्ट-कटमे कहियौ।” जीबछ भाय बजला- “राधेश्याम काका प्रगतिशील विचारक लोक छैथ, अपना पाँचो बेटाकेँ अपना जकाँ संस्कृत विद्यालयसँ नहि जोड़ि अंग्रेजी विद्यालयसँ जोड़लैन। अपन उठाइन सेहो भेलैन। विद्यालयक उठाइन भेने, परिवारो आ बालो-बच्चाकेँ पढ़बै-लिखबैमे कहियो कोनो अभाव नइ भेलैन। पाँचो बेटामे एकटा डॉक्टर, दूटा इंजीनियर आ दूटा अफसर बनि जहाँ-तहाँ नोकरी करै छैन। पाँच बरख पहिने विद्यालयसँ रिटायर भेला। अपन कीनल जमीन, तइमे लगौल आमक गाछी, अपन खुनौल दस कट्ठाक पोखैर, तैसंग अपन बनौल दू-मंजिला घर वस्तु-जातसँ सजौनहि छैथ भलेँ समाजक बीच समाजिकता नहियेँ सजौलैन, से छोड़ि बेटाक संग रहैमे असोकर्ज छैन्हे। तँए टिटही जकाँ दुनू परानी रहै छैथ। शरीर घटने रंग-रंगक बिमारीक दाब जहिना पड़ि रहल छैन तहिना करताइतिक अभावे कष्ट सेहो भइये रहल छैन।” जीबछ भाय जेत्ते बजला तेते तँ अपने नइ बुझल छल मुदा किछु-किछु देखल-सुनल तँ अछिए। मन थकथका गेल जे की बाजूँ। जीबछ भाय दोहरबैत बजला- “राधेश्याम काका जे कहला ‘बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं’, से अपने ने जनबो करता जे भागबो करता। बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं आकि बुइड़ गेलौं। से तँ अपने मन ने कहैत हेतैन।” शब्द संख्या : 1086, तिथि : 04 मार्च 2019 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अरुण लाल
दू टा लघुकथा 1
कुंभ स्नान
.....परीछन छह ....। आबह आबह। हौ ! राम जी इच्छा स' कत' गेल छलह, मने गोटेक सप्ताह स' गायब छलह । कत' अलोपित्त भ' जाइत छह।किछु थाहे ने चलैए ।
.....कि कहियह ! तों जे नै रहैत छह ने , मोने ने लगैत अछि , एकदम खालीपन महसूस होमय लगैत अछि ।आर सब त' कुकुर बानर अछि ककरा स बतिआउ । सब स बेसी दिक्कत अखबारक होइए । तोरा इसकुल गेलाक बाद धरौरा बाली आनि लै छथि तोरा आंगन स'।
कहैत कहैत चौधरी जी महींस कें पुचकारय लगला।फेर कहय लगला ई जे महींस अछि ने से बड़ पौस मानैत अछि ,एकदम बकेन, बुझलह किने । राम जी इच्छा स' पक्का तीन सेर सबा तीन सेर दूध दैए , एकदम गढगर बुझलह किने ।
धरौरा चौक पर त' एकरे पांच सेर बना क बेच लेत ।हमरा त' तोरे सन सन चारि टा गाहक अछि ।राम जी इच्छा सँ एकहक सेर सबकें दैत छी आ किछु चाहो लै रहि जाइत यै । अच्छा छोड़ह इ सब बात ।बतौलह नै, कत्त' गेल छलह रामजी इच्छा स।
.....कि कहू बाबा ।हमरा इसकुल स' बस कें टिकट कटैत छै कुंभ स्नान के बुझलियै। हमरो टिकट कटा देलक जबरदस्ती । हमहूँ सोचलौं भइये आबी एक बेर । सब पाप कटा ली । मुलकी बाली त' जरि क' मरल छलै ने ।अहाँ कें त बुझलै अछि सबटा।
परेशानी त भेल जाइत काल । मुदा कि कहू बाबा, एक डूम देलाक बाद लागल जेना जिनगी सकारथ भ' गेल । सब पाप ओतहि बिला गेल ।देह एकदम हल्लुक,फूल जकाँ आ मन शान्त भ' गेल। बुझायल जेना हम किछु नै छी। एक टा कनौसियो बरोबरि नहि ।निमित्त मात्र छी ।हमर वजूदे कतेक ।संसार हुनके स चलैत अछि।लोक झुठे हाइ हाइ करैत अछि। सबहिं नचाबत राम गोसाईं ।
बहुत संतोष आ दृढ़ इच्छाशक्ति जागल अछि । जिनगीक अर्थ आब समझि मे आबय लागल ।भला होइन्ह जोगी जी कें ।अद्भुत संसार और संस्कृति रचलन्हि अछि कुंभ घाट पर ।
हमरा त' लगैए बाघ आ बकरी एकहि घाट पर निर्भिक भ' पाइन पीब रहल अछि ।अखंड शांति ।निर्मल कलकल बहैत गंगा, जमुना आ सरस्वतीक संगम मे डूम दैते अनन्त सुखक प्राप्ति होइछ ।पूछू नै फेर फेर जाइ के मन करैयै ।
ओह गदगद भ' गेल मन ।
...से बात ।ओह! तखन हमरो नेने जइतह ने अपने संगे रामजी ईच्छा स। बूढ सूढ आदमी हम सब कोना जा सकब ।
किए नै । कुंभ मे अइबेर बहुत नीक बेबस्था सरकार केने छै । आ जानै छिऐ बाबा अइ कुंभ मे जबाहर लाल सँ ल'क' जोगी , मोदी सब स्नान क' चुकलाह ।आ देखा देखी राहुल ,प्रियंका सेहो स्नान करती ।हिन्दुत्वक भावना हुनको सबकें किछु किछु जगलन्हि अछि ।भले देखाबटी ही सही ।
धरोराबाली हुलकी द' सब बात खिड़कीक दोग सँ अकानि रहल छलीह ।चौधरी जी संग धर्म युद्ध पर अड़ल छलीह जे किछु बीत जाय ओ कुंभ स्नान करबे करती ।हुनका मोन मे खुदबुद्दी लागल छलन्हि आ प्रायश्चित करय चाहैत छली आखिर दूध मे सबदिन एक लोटकी पाइन वएह त' मिलबैत छलीह ,राम जी इच्छा स ।
2.
ग्राहक .
आइ भोरे भोर चौधरी जी नहा सोना क' जल्दी जल्दी दोकानक शटर अपने स' कहुना क' उठा रहल छलाह कि रेंजर सैहेबक ड्राइवर तखने दोकान मे लिस्ट ल' क' पहुँचल ।
...यौ सोइंठ अछि , आ मरीच सेहो लेबै। कनी लाल मेरचाइ ,आ बाबा रामदेब बला हिंग अछि न ।
...आबय दही मनटुनमा के ।कने धुपबत्ती देखाबय दे । ...यौ बासमती चाउर केना दैत छिऐ।
...अबै छौ मनटुनमा बता देतौ।जय गणेश जय गणेश जय गणेश ..........
...यौ चिकेन मसाला अछि न ? ...आ सर्फ एक्सेल , डाबर हनी , बिसलरी बोतल ।
...चुप ने कनी मनटुनमा अबिते हेतै। कत' रहि जाइत छै, ईहो छौंड़ा ,राम जी इच्छा स ,से नहि जानि ।
...यौ जूता के फित्ता सेहो रखै छिऐ,आ फिनाइलक बोतल।
...हँ हँ सब छै।तों कनी दम धर । जय गणेश जय गणेश जय गणेश देबा।
...कखन आओत ओ। हमरा त देरी होइए । यौ किचेन किंग आ किचेन मसाला मे कोन बढियां होइत छै ।
...कत्ते बजै छैं , बाप रे बाप ।
...यौ कखन मनटुनमा आओत ।हमरा त सैहेब बाजय लगता । कहता कत' एतेक समय लागि गेलौ त की कहबै ।बताउ।
...ओम नमः शिवाय।कनी चुप रहय ने ।अगरबत्ती देखाब' दे न ।
यौ बासमती चाउर बढियां अछि कि कतरनी । कनी देखाउ न। कोन सस्ता छै आ बढियां , मेमसैहेब पोलाउ बनेथिन ।बहुते लोक सब आयल छै ।
...कहलियौ ने सब बात मनटुनमे के बुझल छै आ ओकरे रखलो छै ।
...यौ ओकरा कत्ते दरमाहा दैत छिऐ ।
...से कियै ।चौधरी जी कनी गरमाइत बजला। मोन आब खिसियानी बिल्ली सन भेल जा रहल छलन्हि।
...अहाँ के किछु बुझले ने अछि ।तखन ओकरे काउंटर पर बैसय दिऔ , पैसा अधिक भेटतै त अपने समय पर आओत आ अहाँ किछु दिन ओकर बला काज करु जाहि स' रखरखाव आ सब जिनिस के दाम सेहो पता रहत अहाँ कें ।
...ऐं ! कि कहलैं ।चौधरी जी लाचार भेल शून्य मे तकैत मनटुनमा कें अखनो एबाक इन्तजार बहुत बेसब्री स' क' रहल छलाह।
मने मन सोचय लगला सैह देखू कनियें ओहदा पाबि क' केना लोक इतराय लगैत छैक ।रेंजर के एक टा मामूली ड्राइवर कतेक पैघ बात कहि देलक । एबाक एबे करत मनटुनमा ,लेकिन बेइज्जत कराए देलक ।
ठीके लोक कहैत छै जे मौत आ ग्राहक कखनो आबि सकैए, राम जी इच्छा स ।
अरुण लाल 02.02.2019 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डॉ. बचेश्वर झा मौलाइल गाछक फूल : जगदीश प्रसाद मण्डल ‘मौलाइल गाछक फूल’क लेखक श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ हम साधुवाद दैत छियन्हि जे हिन्दी आ राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अर्हता प्राप्त होइतहुँ अपन मातृभाषाक प्रति अटुट सिनेह राखि मैथिलीमे लेखन करबाक भगिरथी प्रयास कएल अछि। ओना तँ मैथिलीमे अनेकानेक साहिन्यकार लोकनि चेष्टा कएल अछि। हुनका लोकनिक भाषामे फेंट-फाँट भेटल अछि, किन्तु मौलाइल गाछक फूलमे सुच्चा लोकभाषाक प्रयोग भेटैत अछि। प्रान्जल भाषा गमैया भाषाक आगाँ घुटना टेक दैत अछि, जन साधारण अल्पो शिक्षितकेँ गुद-गुदीक संग विषय अन्तस्थलीकेँ छुबि लैत अछि। वैचारिक दृढ़ता एवम् हार्दिक मृदुलताक अद्भुत समाहार जगदीशजीमे विरल अस्तित्वक परिचय दैछ। उपन्यासक प्रत्येक लेखपर माने उपकथापर दृष्टि दैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइछ जे एकर लेखक जेना प्रत्यक्षदर्शी भऽ विषयक निरूपण कएल अछि। ओना तँ शिक्षाक सीढ़ीकेँ पार कऽ लेखक कलाक बलवती इच्छा राखि मैथिलीक वाटिकाकेँ पल्लवित-पुष्पित करक भरपूर प्रयास कएलनि अछि। गाम ठामक बिलक्षण चित्रण हिनक लेखनीक विशेषता ऐ पोथीमे देखल जाइछ। हिनका भाषानुरागीक संग मातृभाषाक सिनेही कही तँ सर्वथा उपयुक्त होएत। ऐमे सामाजक ओइ वर्गक समीक्षा कएल अछि जकरापर आइधरि कियो सोचबो ने कएने छल। माजल ठेंठ गमैआ बोलीक मैथिलीमे समाहित कएने छथि। हमरा तँ लगैत अछि माए मैथिली लेखकक माथपर चढ़ि कऽ एहन चमत्कारी उपन्यास लिखक हेतु प्रेरित कएल अछि। फणिश्वर नाथ रेणु आ यात्रीजीक उपन्यासमे सामाजिक रहन-सहन वैचारिक भिन्नता अर्थाभावक कारणे स्वाभिमानक हनन जौं देखबामे अबैत अछि तँ सम्प्रति उपन्यासमे वर्णित घटना आ घटनासँ पात्रक प्रत्यक्ष दिग्दर्शन अति मार्मिक अन्तर मोनकेँ सोचवाक लेल उत्प्रेरित करैछ। मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे जन्म नेनिहार लेखक एतेक सुन्दर, सुवोध आ सुगम्य ढंगसँ विषएकेँ निरूपित कऽ पाठकक जिज्ञासाकेँ अन्त धरि बढ़बैत गेल छथि जे चिक्कन, चोटगर आ चयन लेल वाध्य करैत अछि। मैथिली साहित्याकाशक ई ज्योर्तिमान नक्षत्र सदृश उद्भूत भऽ मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृद्धता अनबामे योगदान कएल अछि। ओना तँ औपन्यासिक विचारानुसार ऐ उपन्यासमे त्रुटि अछि। एकरा उपन्यास कहल जाए वा सामजिक निबंध तइ परिप्रेक्ष्यमे विद्वान पाठके निर्णए कऽ सकैत छथि। मुदा हमरा तँ लेखकक ऐ उपन्यासमे कालानुसार घटना आ पात्रक चित्रणमे ताल-मेलक अभाव भेटैत अछि जेना- एक ओर अनुप वोनिहारक बेटा बौएलाल भूख-पियाससँ आकुल अछि इनारक पानि भरबामे डोरी डोलक प्रयोजन छैक तँ दोसर दिसि रमाकान्त आ हीरालालकेँ आधुनिक कालमे शराब चुस्कीक चर्चा होइत अछि तँए उपन्यासक विषए-वस्तु समए बद्ध नै रहलासँ औपन्यासिक दोष लक्षित होइत अछि। स्वीकार करए पड़ैत अछि जे हिनक ई उपन्यास विषय-वस्तुकेँ तइ रूपेँ समेटने अछि जेना सितुआमे समुद्र समाएल हो। लेखक जगदीश प्रसाद मण्डलजीक प्रयास आ आयास दुनू साराहनीय छन्हि। हम माँ मैथिलीसँ प्रार्थना करैत छी जे हिनकामे स्फूर्ना बनल रहनि जाहिसँ मैथिली साहित्यक सम्वर्द्धन होइत रहए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-7 गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 गोवर्धन राम त्रिपाठीजीक गुजराती उपन्यास "सरस्वतीचन्द्र"पर आधारित फिल्म "सरस्वतीचंद्र" केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर। संगीतकार छथि कल्याणजी-आनंद जी। ई फिल्म 1968 मे रिलीज भेलै। एहिमे नूतन, मनीष, विजय चौधरी आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 2122-122-122-12 अछि। एहि नज्मक पहिल दू पाँति "कहाँ चला ऐ मेरे जोगी, जीवन से तू भाग के...." माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। कहाँ चला ऐ मेरे जोगी, जीवन से तू भाग के किसी एक दिल के कारण, यूँ सारी दुनियाँ त्याग के छोड़ दे सारी दुनियाँ किसी के लिए ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं खुशबू आती रहे दूर ही से सही सामने हो चमन कोई कम तो नहीं चाँद मिलता नहीं सबको संसार में है दिया ही बहुत रौशनी के लिए कितनी हसरत से तकती हैं कलियाँ तुम्हें क्यूँ बहारों को फिर से बुलाते नहीं एक दुनियाँ उजड़ ही गयी है तो क्या दूसरा तुम जहाँ क्यूँ बसाते नहीं दिल न चाहे भी तो साथ संसार के चलना पड़ता है सबकी खुशी के लिए एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। 2 फिल्म "हमराज" केर ई नज्म जे कि महेन्द्र कपूर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर लुधियानवी। संगीतकार छथि रवि। ई फिल्म 1967 मे रिलीज भेलै। एहिमे सुनील दत्त, राज कुमार, मुमताज आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 212-212-212-212 अछि। तुम अगर साथ देने का वादा करो मैं यूँ ही मस्त नग़मे लुटाता रहूँ तुम मुझे देखकर मुस्कुराती रहो मैन तुम्हें देखकर गीत गाता रहूँ कितने जलवे फ़िज़ाओं में बिखरे मगर मैने अब तक किसीको पुकारा नहीं तुमको देखा तो नज़रें ये कहने लगीं हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो मैं हर एक शै से नज़रें चुराता रहूँ मैने ख़्वाबों में बरसों तराशा जिसे तुम वही संग-ए-मरमर की तस्वीर हो तुम न समझो तुम्हारा मुक़द्दर हूँ मैं मैं समझता हूं तुम मेरी तक़दीर हो तुम अगर मुझको अपना समझने लगो मैं बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ मैं अकेला बहुत देर चलता रहा अब सफ़र ज़िन्दगानी का कटता नहीं जब तलक कोई रंगीं सहारा ना हो वक़्त क़ाफ़िर जवानी का कटता नहीं तुम अगर हमक़दम बनके चलती रहो मैं ज़मीं पर सितारे बिछाता रहूँ एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। 3 फिल्म "बहारें फिर भी आएंगी" केर ई नज्म जे कि महेन्द्र कपूर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि कैफी आजमी। संगीतकार छथि ओ.पी.नैयर। ई फिल्म 1966 मे रिलीज भेलै। एहिमे धर्मेंद्र, तनुजा, माला सिन्हा आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222-1222-1222-1222 अछि। पूरा नज्म जीवन-दर्शन आ गेयतासँ भरल अछि मुदा हरेक पाँतिमे बहरक पूरा पालन भेल छै।ई नज्म ओहन-ओहन लोकक मूँहपर थापर अछि जे कहै छथि जे बहरक पालनसँ कथ्य आ गेयता घटि जाइ छै। बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं खाली बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी थकन कैसी घुटन कैसी चल अपनी धुन में दीवाने खिला ले फूल काँटों में सजा ले अपने वीराने हवाएं आग भड़काएं फ़िज़ाएं ज़हर बरसाएं बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी अँधेरे क्या उजाले क्या ना ये अपने ना वो अपने तेरे काम आएँगे प्यारे तेरे अरमां तेरे सपने ज़माना तुझसे हो बरहम ना आये राह पर मौसम बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। "चल अपनी" एकर तक्ती अलिफ-वस्ल केर नियमसँ छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. संतोष कुमार राय 'बटोही' दू-टा कविता ३.२. अरुण लाल- 3 टा कविता ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु ३.४. नन्द विलासराय- हमर होली संतोष कुमार राय दू टा कविता 1. गहमा- गहमी राफेलक फाइल चोरी भेला पर संसद सँ चाह दोकान धरि बवाल भेल छै रक्षा-मंत्रालयक दस्तावेज गुम हेनै मतलब सत्तासीन सरकार केँ नियति पर सुभान-अल्लाह । सत्ता लेल अतेक गहमा-गहमी चोर-चोर मसियौत भाई भs रहल छै इ राजा हरिश्चंद्रक मुलुक छियैय, परञ्च इतिहास-पुराण सभ चूल्ही में जरि रहल छै । अगिया बताल नेता सभ भेल छै लतम-जूतम केँ खेल भ रहल छै हिन्नू-हिन्नू,मियाँ-मियाँ केर हो-हल्ला मुलुक केँ श्मशान बनेवाक काज भs रहल छै । आउ मित, मातम मनाउ आब इ मुलुक मरि गेल अछि ठठरी बान्हु, मुख मे आगि लगाउ श्राद्ध करु, पिण्ड-दान देल जाउ ! 2. सुन्नर कनिया नहि आब ओ कहार रहलै नहि आब ओ डोलिया रहलै रसन-चौकी आओर घोड़ाक नाच आब नहि डफला-वंशी आओर नेंगड़ा नाच आब नहि । गाड़ी मे ठुसि-ठुसि कs बरियाती जाउ ठुसि-ठुसि केँ खाउ, रातिए मे फेर गाम पराउ मरजाद केँ आब उठान भेलै आब सभ किछु विधि पुरौवा भेलै । छुपि-छुपि केँ चोर-नुकबा देल जाउ गाय-महीस नहि,नहि साइकिल-रेडियो घड़ी केँ कुत्तो नहि पूछैत छै आब चारि चक्का सँ कम नहि चाही । हाट-बाजार गरमाएल छै जोड़-घटाव-गुणा भs रहल छै बाप केँ बोरा भरि कs रुपया चाही ओझा केँ हौ बाउ सुन्नर कनिया चाही । संतोष कुमार राय 'बटोही' ग्राम- मंगरौना पोस्ट- गोनौली भाया-अंधराठाढ़ी अनुमंडल- झंझारपुर जिला-मधुबनी बिहार-847401 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अरुण लाल 3 टा कविता 1 अहीं तं प्राण छी...
हरियर काँच कली रूप रुचिर मोहिनी
हे सुंदर सुकुमारी ! अहाँक निश्छल हँसी
चिर परिचित मुद्रा मे मुस्की दय मुहथरि पर
एना किए ठाढ छी के छी अहाँ ! किए ने बजैत छी
डारि डारि पात पात पीत वस्त्र विभूषित
सिहराबय तन मन ठुमकय नाचय उमंग
कन्हैयाक बाँसुरीक मधुर सुमधुर तान छी
कि राधाक आँखि केर बिरह मिलन गान छी
जे छी अहाँ ! से भेद आब फोलि दिअह
कहीं अहाँ बसंतक सुकोमल तं ने प्राण छी
आउ आउ घर आउ कोनटा किए धयने छी
अहीं हमर प्रियतमा अहीं त प्राण छी .
2.
खेलब चैन सँ' होली
फेर सँ अहाँक देह बसंती बयार लागि गमकि उठल हैत सोन्हगर माटिक खुशबू जकाँ उड़ैत हैत आँचर हवा मे लहराइत हैत हारैत हारैत जीत जाइलए आकुल हैत
सब बात बुझै छी लागि गेल अछि अहाँक आँचर कें फगुनहटि टुह टुह लाल होइलए आतुर अछि
फुर्सति कहाँ अछि सीमा पर बहुत गोलीबारी पटकम पटका उठापटक छै जारी जवान सब टेसूक फूल जकाँ टेसुआएल लाल भेल अछि
एमकी होली फिच फिच छै पिचकारी मे रंगक बदला बारूदी धमक आओर गोली छै मार काट ,कटमारि मे होली गीत कहाँ मोन परैए डम्फाक थाप रडार सऽ बाहर मन सिनुरिया आम जाँकित रंगैए अहाँ बला होली कहाँ सजैए
एमरीदा सीमा कें साजब बारूदी गुलाल सऽ अपन लहू कें गर्म करब दुश्मन कें गाॅजब चुनि चुनि मारब गोली अगिला साल हम फेर खेलब चैन सँ होली
3.
गरम गरम गोनरि
गुड़कि गेलै गुड़का अनन्त काल लए गोनरि मे
मिसी मिसी दुनू अगिलका दांत बाहर केने कनी हँसैत कनी सकुचाइत हँसै केर अनवरत कोशिश करैत सरकि गेल नुआ कें माथ पर लैत उघार भेल देह कें फेर फेर झंपैत गुड़का केर गामबाली उनटाबैए पुनटाबैए मोने मोन बतियाबैए झाड़ि झाड़ि गोनरि कें उलटि पुलटि , सैंत सैंत सुखाबैए
बरख तेसरे जाड़ मे बहुत मेहनति स' केने छलै तैयार बहुत सोचि क' जे आब भागि जेतै ओकर दूनू प्राणीक जाड़ चाहे होइ माघक कनकनी या होइ पूसक ठाड़
एकमहले लागल छै भूख पिआस तिआगल छै जाड़क ठिठुरन मे ठिठुरले हाथे तीन दिन स गोनरि बनाबै छै सब काम बरदिएलै माल जाल खुट्टा पर सरदिएलै बतकही मे गामबाली रूसि क' भेलै उदास ओइ राति टुक टुक तकैत रहलै गुड़का गरम गरम निन्न लै काछर कटैत रहलै नै भेटलै ओकरा गामबालिक नरम नरम एहसास गुरैक गेलै गुड़का अनन्त काल लै गोनरि मे
एखिन्तो ओकर बनाओल गोनरि मे गमीॅ बाँचल छै ओकर गामबाली सुखा सुखा सैंतय छै डबडबायल आँखिये मोन के पतियबए छै ई गोनरि एखिनतो ओकरा ठिठुरैत जाड़ मे गरम गरम एहसास दियबै छै ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’ झारू- देख-देख दुनियाँ केरि रीति असगर दुख हम करब केतेक। शिक्षा तँ असमान छुबैत अछि पुरी पाताल धँसि गेल विवेक।। गीत- माए-बाप भऽ गेल नीम करैला कनियाँ तँ वर मीठ छइ।-2 देखू यौ बाबू आबि गेल आगू केहेन जमाना ढीठ छइ।-2 इलम छै नहि काम काजकेँ बुझै नहि किछु लोक लाजकेँ।-2 जौं बुढ़िया बेवहार बुझबै टुटै-ले ओकर पीठ छइ।-2 देखू यौ बाबू...। जबसँ गेलै दिल्ली दुल्हा फेर नहि फुकलक घुरि ओ चुल्हा।-2 बुढ़ियासँ सभ हटल करबै अपना धेने सीट छइ।-2 देखू यौ बाबू...। लक्सक खुशबू तन गमकै छै साड़ी सीतारा सोन चमकै छइ।-2 फाटल-पुराणमे बुढ़िया जीबै कनियाँ झाड़ै जीट छइ।-2 देखू यौ बाबू...। हरदम ककही हाथ रहै छै माथसँ आँवला तेल बहै छइ।-2 अलता-टिकुली-रीबन चोटी ठोरक लिपीस्टिक हीट छइ।-2 देखू यौ बाबू...। q झारू- बेवहारे पहिचान कराबै बेकती और इंसान केर।-2 कियो देखाबै रूप दानवी केकरो गुण भगवान केर।-2 प्राती- उठू जागू बेटोही भिनुसर भेल छुपि गेल निशाँ आब जागू ने। बहि रहल पवन अमृत धारा निज तनमे एकरा लगाबू ने।। आलस बिसतर खटिया छोड़ू नित्त क्रियामे तनकेँ जोड़ू।-2 दिशा दतमैनक राखू याद स्नान करू तेल मलला बाद।-2 मलि तन पोछू निज गमछासँ कपड़ा कालादेशक पाबू ने।-2 उठू जागू...। मन्ने-मन्न हरिक धियान धरू माए-बाबूकेँ प्रणाम करू।-2 आशिष लिअ सत्त सेवा केर बोलीमे बाँटू मेबा केर।-2 निजसँ जानू पर पीड़ाकेँ दुखियाकेँ गला लगाबू ने।-2 उठू जागू...। q झारू- साधुवाद हे देशक धरती साधुवाद हे सभ जनता। साधुवाद हे ताज देशक साधुवाद हे सम्प्रभुता।। गीत- हमरा देशक धरती महान छै गइ बहिना। तँए सोनासँ भरल भण्डार छै की ओहिना।। केतौ लोहा केतौ ताम्बा भरल छइ।-2 केतौ चानी केतौ हीरा गड़ल छइ।-2 केतौ कोयलाक भण्डार छै गइ बहिना तँए सोनासँ भरल भण्डार छै की ओहिना।-2 जेतए छै किमती आनि जानसँ। झूकै नहि ई बस टुटै शानसँ।-2 राष्ट्र हित लऽ सेफ छै प्राण गइ बहिना तँए सोनासँ भरल भण्डार छै की ओहिना। सेवा केर जेतए परम्परा छइ। सभ मानव लेने हाथ खड़ा छइ।-2 घर आएल मेहमान लगै भगवान गइ बहिना। तँए सोनासँभरल भण्डार छै की ओहिना।-2 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलासराय- हमर होली फगुआक उमंग सभपर चढ़ल रंग कियो पीबै दारू कियो पीबै भंग मुनसाकेँ की कही मौगी सभकेँ रंग खेलाइत देख हम रहि गेलौं दंग। चारूकात मचल छल हूरदंग कियो पीटैत डम्फा कियो पीटैत मृदंग सभ अपनेमे मतंग लोक सभकेँ होली खेलाइत देख हमरो मनमे उठल तरंग मनमे आएल हमहूँ खेलितौं होली अपन संगी सबहक संग मुदा आब केतए पाबी सभ संगी गाम छोड़ि शहर जा लगेने अछि अपन-अपन डाली छी बुड़बक तँए गाममे रहि ताकए चाहै छी होली आ दिवाली अपन बचपनक यारी...। केना खेलब होली किनका लगाएब रंग कियो कहि ने दिअए एना किए भऽ गेल छी उदंड रंगक खातिर भऽ नै जाए केकरोसँ जंग। मनमे आएल होली खेलब अपन पत्नियेँक संग ओकरे रंगब अंग-अंग। यएह सोचैत हम अँगना गेलौं पत्नीकेँ लगमे बजेलौं ओ बजली- की यौ अहॉंक रंग लगैए आइ बड़ बेढ़ग दारू पीलौं हेन आकि पीलौं अछि भंग? कहलयैन- आइ होली खेलब अहींक संग अहींकेँ लगाएब रंग। पत्नी बजली- टोला-पड़ोसाक छौंड़ासभ हमरा कऽ देने छल अपचंग आब अहॉं हमरा जुनि करू तंग। हमर राखले रहि गेल लाल-हरियर सभटा रंग। फेर मनमे आएल किएक ने बाबाकेँ पैरमे अबीर लगा हुनकासँ आशीष पाबी। हम दलानपर गेलौं बाबाकेँ पैरमे अबीर लगेलौं हुनक दुनू पैर छुबि अपन दुनू हाथसँ केलौं प्रणाम ओ बजला- जीबह नीके रहअ रोशन करह अपन मातृभूमिक नाम। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA