विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २७७ म अंक ०१ जुलाइ २०१९ (वर्ष १२ मास १३९ अंक २७७) ऐ अंकमे अछि:- २. गद्य २.१.अप्पन लोक- केशव भारद्वाज २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी २.३.डॉ. बचेश्वर झा-विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि २.४.दुर्गानन्द मण्डल- सोन्हगर ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हारक दूटा गजल ३.२.नन्द विलास राय- सरस्वती वन्दना ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.अप्पन लोक- केशव भारद्वाज २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी २.३.डॉ. बचेश्वर झा-विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि २.४.दुर्गानन्द मण्डल- सोन्हगर अप्पन लोक- केशव भारद्वाज भवेश के अनायास फेसबुक पर मैसेज एलईन। "आहां बंगाली टोला बला भवेश छी ने" भवेश सोच में पईर गेलाह कि ई के छथि। मैसेज पठबअ बाला के प्रोफाइल देखलखिन त ओ एकटा सुन्नईर ललना छलीह। उनकर संगी सबहक सुची में तकलाह- कियो इनकर जानअ बला नई। अतबा त निश्चित छल जे कियो मैथिलानी थिकीह। बंगाली टोला में त आई सं चालीस बरख पहिने रहल छलाह। ओतअ त कियो लड़की स उनका कोनो जान पहचान नई छलईन। मूदा रहल त छईते बंगाली टोला में। ईहो सत्ते थीक। तरह तरह के बिचार सब दिमाग में उमर घुमर करई छलईन। नई छोरले बनईन आ नई किछु कैले बनई। हरदम उयाह मैसेज माथा पर नचईत छलईन। जखने मौका लगईन ......ओई ललना के प्रोफाइल के उलटबईत पलटबईत ...... किछु निष्कर्ष नई निकलईन। मोन करईन जे ओ अई मैसेज के ज़बाब द क पुईछ ली। फेर बिबेक एना करअ स मना करईन। ई मोन आ बिबेकक बीच कशमकश कसिया क चईल रहल छलईन। अई में लटपटायल भवेश। जतेबे अई सं बहराय चाहई छलाह, ओतबे ओझरा जाई छलाह। ई त कांटक झाईर- झंखार भ गेल छल.....ओई में एक बेर फंसला के बाद जेतेक हाथ पैर मारब, ओतबे बेशी कांट में फंसब आ कांट गरबों करत। अखईन तक सुनई छलखिन जे फेसबुक में अहीना मैसेज अबई छई। संगी बनेबाक सेहो नोत अबई छई। संगी के नोत के गछिते आहांक सबटा समाद ओकरा लग चईल जाई छई। ओ तेहन ने एक टा अपन समांग के कम्प्युटर में बईसा दई छई........ समदिया जेकां ओ सबटा समाचार पठबईत रहई छई। अई ".बिन बजायल पाहुनक " डरक मारे भवेश आगु नई बईढ़ पाईब रहल छलाह। दोसर गप्प इहो रहईन जे ज्यों ई मैसेज पठबअ बाला पुरुख रहितईथ त ओ ज़बाब द क पुईछ लईतथिन। उम्रक ओही पड़ाव पर ठार छथि जे अगर इमहर ओमहर के कियो होई आ ई बात पसईर जाई त सेहो जुलूम। मैथिल समाज में बात चिथारअ सं बेशी दोसर कोनो काज में मोनो नई लगई छई। मुर्दा घर में त एके बेर लहाश के चीर-फाड़ कैल जाई छई .......... इनकर समाज में त जाबईत चिथड़ा चिथड़ा नई भ जाई छई, गप्पक पोस्टमार्टम चलिते रहई छई। फलां फसलाह। कोनो मउगी के चक्कर में पड़ल छलाह। पहिनेहो सं हेतईन। अई बेर भंडा फुटलईन। लोक के बुझनाई अतेक आसान नई। केकर भीतर कोन खिचड़ी पकई छई जे के कहत। ओ त अई बेर बात बढ़लई त लोक बुझलक....... ई सब तेला बेला स रेहल खेहल छलाह भवेश। नई साहस जुटा सकलाह-जबाब देबई लेल। किछु दिन बाद फेर मैसेज एलई -" बुईझ पड़ईया जे आहां नई चिह्न पेलऊं। हम धनहा गामक ललन बाबु के बेटी छी। आब उमेद अईछ.....चिन्ह गेल होयब। " मैसेज पढ़िते सब किछु सनसना के याद आईब गेलईन। पुरा देह झनझना गेलईन।अपना पर अफसोस होईन भवेश के जे कोना नई चिन्हलकिन। फोटो सं सेहो नई अंदाज लगलईन।ओ की बुझने हेतीह। चट सं अपन वाट्सएप नम्मर देलखिन.... ई लियह.....अई पर गप्प करु या अपन नम्मर बताऊ। चालीस बरख पहिलका सब घटना आंखिक सोझा आईब गेलईन। सनीमाक रील जकां सब नाचअ लगलईन। ओ चौदह - पन्द्रह बरख सं बेसी के नई छलाह। वार्षिक परीक्षा द देने छलाह। रिजल्ट नई आयल छलईन। उनकर सब संगी सब कतऊ कतऊ घुमअ गेल छल। ओ सब त की शहर में डेरा पर रहईत छल , तैं अपन गाम या कोनो दोसर शहर में संबंधी सब कतअ गेल छल। भबेश के गाम-शहर सब ईयाह छलईन। हुनकर कोनो संबंधी दोसर शहर में नई रहई छलखिन। बच्चे सं परीक्षा के बाद घरे में रहनाई भवेश के नीक नई लगईन। मूदा जेताह त कतअ जेताह। उनकर बाबुजी के अपन गाम सं विरक्ति छलईन। बदली बाला नौकरी सेहो नई छईन। मोन मसोईस क रही जाई छलाह भबेश। ई कोन नौकरी, जई में बदली नई। ओ त एहन नौकरी करताह, जईमें खुब घुमअ फिरअ के रहतई।सब साल जकां, परीक्षा क बाद क समय उनका पहाड़ जेकां लगईन......अहु बेर सैह छलईन। मूंह लटकाअ कअ घर में पड़ल छलाह। ओही समय हुनकर बाबुजी के संगी ललनजी बम्बई सं आयल छलाह। ओना ओ उम्र में भवेशक बाबुजी सं पैघ रहथिन, लेकिन दुनु में दोस्ती रहईन। दोस्तीक कारण छलईन जे दुनु गोटे पहिने अतई एक्के जगह नौकरी करई छलाह। ललनजी सीनियर छलखिन। बाद में ओ कोनो दोसर परीक्षा पास कं बम्बई चईल गेलाह। ओ जहिया कहियो गाम दिश अबई छथि त अई डेरा अयबे करताह। ओ सब बेर इनका सब के बम्बई अबई लेल कहई छथिन। बम्बई जाय के भवेशो के बड्ड मोन करईन लेकिन कियो जेब्बे नई करई। ललनजी कहबो केलखिन जे हम आब रिटायरो क जायब, आहां सब कहिया आयब। बड्ड नोन अतुका खेने छी, एक बेर हमरो कतअ आऊ। अई बेर ललनजी अप्पन छोटकी बेटी सीमा के बियाह करक लेल अपन गाम आयल छलाह। उनका तीन बेटी आ दु बेटा छलईन। सबहक बियाह दान भ गेल छलईन। ई अंतिम काज छलईन.......तैं अयबाक आग्रह बेशी छलईन। भवेशक मां बुझई छलखिन जे एतअ स तअ कियो जाय बला छई नई, आ भवेश के परीक्षाक बाद घुमबाक मोन क रहल छईन.....ओ कहलखिन- "ल जईयऊन भवेश के। आब त इयाह सब ने संबंध के आगु बढ़ौता। बाकी कियो त जाय बला अईछ नई। आहां स की छुपल अईछ। सब बुझिते छी।" फेर की छलई। भवेशक कपड़ा लत्ता सब एकटा झोड़ी में रखेलईन आ ओ ललनजी संग बिदा भेलाह। ई बिना मां बाबु जी के असगर जयबाक पहिले अवसर छलईन भवेश के। पुरा उत्साह में छलाह। पहिने ट्रेन, फेर टायरगाड़ी सं ओ धनहा गाम पहुंचलाह। ओ त टायरगाड़ी पर हाईर क सुतियो गेल छलाह। पहिले बेर एहन गाड़ी पर चढ़ल छलाह।काजक आंगन छल। सब लोक भवेश के देख कअ बड्ड खुश भेल। ललनजी के पुरा परिवार भवेश के हाथो हाथ रखलकईन। आखिर छलाह त बच्चे ने भवेश। थोड़बाक काल त दलान पर संचमंच भअ बैसल रहलाह। ललनजी सेहो कतऊ ऊईठ क गेलाह। उनकर घरक आर बच्चा सब भवेश के इशारा क क बजेलकईन....... ओ उईठ बिदा भेलाह.....फेर शुरू भेल- खेलक दौड़। चोरवा नुक्की, बुढ़िया कबड्डी, ताश, लुडो,लाली, पिट्टो आर कोन कोन खेल.... बीच में पकईर क लोक जलखई करेलकईन। अई बच्चा सब में ललनजी के बेटी सीमा सेहो छलीह। ओ अई सब सं अनजान जे दसे दिनक बाद उनकर विवाह छईन आ ओकर सातम दिन दुरागमन। भोरे सं खेल शुरू भ जाई आ राईत तक चलई। ईजोरिया के समय छलई तैं कोनो ईजोतो के बेशी काज नई। खेल में एक दिन त ओतुका बच्चा सब भवेश के बात माईन लेलकईन....... दोसर दिन सं लड़ाई होबअ लगलई। कयेक खेल में अतुका नियम अलग अलग छलई। कियो झुकई लेल तैयार नई। भवेशो के धमका देलकईन- "पाहुन बुझई छी अपना के त ओतअ दलान पर बैसु गअ, अतअ अतुक्के नियम चलतई। खेलअ के अई त हमरा सबहक नियम सं खेलू।" भवेश के समझौता के अलावा दोसर चाऱा नई छलईन। ओतुक्के नियम स खेलाय लगलाह। गामक बच्चा सब बईमानियो करई........ई भवेश के बर्दाश्त नई। झगड़ा भ जाई, फेर कनी काल में मेल। अई झगड़ा में सीमा हरदम उनके तरफ सं रहईन, बाकी सब अलग । सीमा बम्बई सं आयल छलीह। पांच भाई बहिन में सबसं छोट, ओई सं दुलारूओ बड्ड छलीह।दोसर उनके बियाह छलईन, तैं मोजर बेशी। एक दिन खेल में सबके अप्पन अप्पन शहरक नाम लेबाक रहई। भवेश बंगाली टोला बजलाह.....बसंत मुसरी घरारी बजलाह.....सीमा बंबई बजलीह आ आर बच्चा आन आन जगह। सीमा के "बंगाली टोला" सुनबा में नीक लगलईन। फेर की छलई ओ भवेश के" टोला" कहअ लगलखिन आ बसंत के "मुसरी"। ओ टोला आ मुसरी बाजस आ ठठा क हंईस दईथ।भवेशो सीमा के बंबई कहला पर कहलखिन जे ई त "सबुजा आम" के कहल जाई छई। ओ सब सीमा के सबुजा आ सीमा ईनका सब के टोला आ मुसरी कहथिन। अहिना हंसईथ खेलाईथ दिन बीत रहल छलई। बिना मां-बाप के भवेश आयल छलाह, तैं ललनजी आ घरक आन लोक, बेशी ध्यान दईन। सब बच्चा एक्के जगह सुतय,उठय, खाई पीयई छल। खाली नहाय में बच्चा आ बुच्ची अलग अलग जगह, समय एक्के छल। सीमा के लोक बिध बाध लेल बजा लई छलईन। उनकर मां कहथिन -खेलअ कुदअ दियऊ। फेर त अई घर गिरहस्थी के पचड़ा में फंसहे के छई। जेतबा बुझबा में अयलईन भवेश के, ओई अनुसार ललनजी के अही साल रिटायरमेंट छलईन। ओई स पहीने ओ सीमाक बिबाह क कअ जिम्मेदारी सं मुक्त होबाक चाहई छलाह। ओना सीमाक मां अई कथाक विरोध में छलखिन। तहिया स्त्रीगणक बाते कथा वार्ता में कतेक मानल जाई छलई। नई कियो कान बात उनकर बात के देलकईन। मोन माईर क अंत में लाईग गेलीह बिबाहक तैयारी में। लड़का एम टेक क कअ वैज्ञानिकक नौकरी क रहल छल। बड़क गुण देखी आ कनियाक रुप-ईयाह सीमाक मां सबके कहई छलखिन। ई सेहो उनका बुझल रहईन जे बरक बयस बेशी छई........ ललनजीक रिटायरमेंट वाला बात ल कअ ओ चुप्पी लगा लेने छलीह। सीमा के तं गाम अयलाह के बाद बिबाहक बात बतायल गेल छलईन- ई सब गप सीमा कहने छलखिन भवेश के, तैं फुईस होबाक कोनों मतलब नई। अहीना बिबाहक दिन आईब गेलई। सीमा आई नई खेलेली। ओ मऊगी सबहक भीड़ में घेरायल छलीह। सांझ में बर बरियाती आयल। भवेश अपन नबका कपड़ा जे मां देने छलखिन, से पहिरलाह। जे काज लोक अढ़ा दईन, से काज कईयों दई छलखिन। भवेश के सीमाक बर देखबा में नीक नई लगलईन। ओ बेशी बयसक छल। ककरो सं किछु बजितो नई छल। भवेश दोसर दिन कत्ती काल ओकरा लग ठाढ़ छलाह, टोकबो नई केलकईन। सीमा के आब बाहर निकलनाई एकदम्मे बन्न भ गेल छलईन। सारा दिन लोक सबहक एनाई गेनाई लगले रहई छलई। आब भवेश के खेलनाई सेहो बन्ने जकां छलईन। उनका मोन उचईट गेल छलईन। सीमा के आब भवेशक लेल समय नई छलईन। सीमा चुप्पी लगा लेने छलीह। हरदम जोर जोर से चिकरअ वाली, गुम्मी भ गेल छलीह। दुरागमन सं एक दिन पहिने " टोला" सोर क क भवेश के बजेलखिन-" हम काईल सासुर चईल जायब। आहांक बुझल अईछ"। - हं। हमरा बुझल अईछ। - हमरा नोर नई खसईया। की करु। - बीट्ठु जोर स काईट लियह। -नई नई। -दोसर उपाय बताऊ।सब कही रहल अईछ कि दुरगमनिया कनिया कनई छई। हम बड़ कोशिश केलऊं। नोर खसबे नई कैल। मुसरी कतअ छथि....... कही क हंस लगलीह। -हमर "बर" केहन लगलाह। -ठीक -ठीक की। एक नम्मर, दु नम्मर से कहु। - दु नम्मर। फेर कियो सीमा के बजा लेलकईन। भवेश सेहो परेशान छलाह जे दुरागमान काल में ज्यों सीमा नई कनतीह त लोक की कहतई। अगला प्राते सीमाक कननाई के आवाज सं भवेशक निन्न टुटलईन।उनका दहोबहो नोर खईस रहल छलईन। कखनो ओ अपन मां के गर लाईग क त कखनो बहिन के, त कखनो काकी के, त कखनो पीसी के,कखनो भऊजाई के, आरो लोक सब के, फेर ललनजी के। दुरगमनिया बरियाती सबहक आंईख सेहो नोरा गेल छलईन। कात में ठार भवेश सेहो काईन रहल छलाह।सीमा ततेक कनलीह ...... सब बजई जे अतेक त कियो नई कानल सासुर जाय काल। सबहक कोढ़ फाईट गेल छलई। भईर गऊंआ जमा छल ललनजी क दरबज्जा पर। नई कनई छल त ओ सीमाक बर छलाह। थोरबा काल बाद सीमा गाड़ी पर बैस गेल छलीह। लोटा में पाईन आईन क उनकर मां उनका दु घुंट पीयेलखिन। फेर गाड़ी के तीन बेर आगु पाछु केल गेल आ ओ गाड़ी में बईस कअ चईल गेलीह। भवेश सेहो एकटा दोसर पाहुन संग अपन घर घुईर गेलाह। किछु दिन घर पर मोन नई लगईन। सीमाक कनईत चेहरा उनका परेशान क रहल छलईन। धीरे धीरे अपन दुनिया में भवेश लऊट चुकल छलाह। कोनो हालचाल नई पता लगलईन। सब बिसईर गेलाह।आई चालीस बरखक बाद ई मैसेज उनका सब याद के तरोताजा क देलकईन। आब दुनु गोटे के वार्ताक क्रम शुरू भेल। सीमा के मां बाबु जी दुनु स्वर्गवासी भ गेल छलखिन। भाई- भाऊज आ बहिन- बहिनोई सब अपन दुनिया में व्यस्त छथि। सीमा लेल उनका सबके समय नई छईन। कहियो कोनो फोनो नई........आबअ जाय के त दुरक गप। सीमा एकतरफा शुरू में घरक लोक के फोन करई छलखिन........ बाद में फोन केनाई छोईर देलखिन। अहिना एकदिसाह संबंध कहियो चललई अईछ। लड़ाई नई छईन लेकिन अबरजात बंदे जेकां। सीमा के एकटा बेटा बेटी छईन। बेटी फैशन डिजाइनिंग क कअ विदेश में रही रहल छईन। जमाय ओ अपने चुनलक।सीमा दोबारा गलती नई करअ चाहई छलीह। अई बियाह ल कअ सीमाक बर प्रसन्न नई छथि। ओ अखईन तक अई संबंध के स्वीकार नई केलाह अईछ। ओकर डेरा पर बिदेश कहियो नई गेलाह। सीमा अपन साल दु साल पर विदेश बेटी कतअ जाईत अबईत रहईत छईथ। सीमाक घरबाला रिटायर क गेल छईथ। कंसल्टेंट क काज बंबई में शुरू कयलाह अईछ।बेटा बैंक में नौकरी क रहल छईन। ओकरा लेल लड़की ताईक रहल छईथ। अकरा बाद भवेशक बारी छलईन। बंगाली टोला बाला मकान बिका गेलईन। ओई पाई सं भवेशक दुनु भाई दोसर शहर में घर कीनलाह अईछ। भवेशक मां बाबूजी जे भईर जीवन कहियो गाम नई गेलाह, से बुढ़ारी में दुनु गोटे गाम में रही रहल छईथ। भवेश एक नौकरी सं दोसर नौकरी करईत, बिदेश में पड़ल छईथ। गाम के छोईर कतऊ घर दुआर नई बनौने छईथ। छोट छोट धीया पुता छईन, से सब अतई पढ़ई छईन। बदली बाला नौकरी क शौक रहईन, से आब जानक जपाल भ गेल छईन।पहिने शहरे शहर आब देशे देश छिछिया रहल छईथ। फेर मुसरी के हाल पुछलखिन सीमा। एक बेर त सकपका गेलाह भवेश। बड़का सांस छोड़ईत बजलाह- "नई कोनो संपर्क। ठीके हेताह"। सच्चाई त ई छलई जे सीमाक बियाहक तीन चाईर बरखक बाद बसंत के ह्रदय में कोनो बीमारी भ गेल छलईन। पटना सं डाक्टर वेल्लोर रेफर केने रहईन। घर में अर्थक अभाव कारणे गामे लगक बैद्यक इलाज शुरू कयल गेलईन। छ महीना बितईत बितईत बसंत इलाज क अभाव में अपन गामे में मईर गेल छलाह। सीमा गपशप क बाद बड्ड खुश छलीह। कहलखिन जे बुझाईत अईछ नैहर में छी जेना। भवेश कहलखिन-हं हं आहा़ं नैहरे सं गप्प के रहल छी। ललन ककाजी चईल गेलाह त ओई स की। हम आहांक भाई छी। नैहर आहां के सबदिना हमरा घर में बनल रहत। भवेशक स्नेह देख क सीमाक आंईख स नोर खंसअ लगलईन। कहलखिन- कोनो चीजक नई कमी अई आ नई चाही। बस ईयाह आबेशक लेल मोन घुरियाईत रहय आ आहां के तकईत रही। सीमा के अपन लोक आई भेट गेलखिन। आईयो दहोबहो नोर बहई छईन.........ई नोर खुशीक छईन-जे बड्ड दिन सं जमा छलईन। -केशव भारद्वाज, आइ-काल्हि युगाण्डामे। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आमक गाछी जगदीशप्रसाद मण्डल 1. बीस जून। माइक संग दुनू बहिन जगमोही प्रेमनगर पहुँचल। ओना, बीस जून गोटे साल शुरू जेठमे पड़ैए तँ गोटे साल उतार जेठमे, तैसंग कोनो-कोनो साल अखाढ़क शुरूमे सेहो पड़िते अछिमुदा से नहि, ऐ साल ‘बीस जून’ उतार जेठमे पड़ल। सप्ताहसँ बेसी बैरसाइतकेँ सेहो भइये गेल छल...। दस कट्ठाक जीबेन्द्रक गाछी-कलममे तीनटा आमक गाछ भरखैर पकैत, बॉंकी सात-गाछमे गोटि-पङ्गरा आ शेषमे कोनो-कोनोमे बोनाइत तँ कोनो-कोनोमे अखन खिच्चे सुआदक रंग पकड़ने। ओना, प्रेमनगरक किसान आन गामक किसानसँ कनी बुधिगरो आ श्रमगरो नइ छैथ सेहो केना नइ कहल जाए। प्रेमनगरक चारूकातक जे गाम सभ अछि, जेना- रामपुर, कृष्णपुर, महमदपुर आ रूद्रपुरइत्यादिगामक किसान सभ जे कलम-गाछी लगबै छैथ, तइमे कलमी आम हुअ कि सरही, जामुन हुअ कि बैर, बेल हुअ कि बरहर, शीशो हुअ कि गमहाइर, सभ कियो सहरगंजा रोपै छैथ, मुदा प्रेमनगरक किसान सभ जे गाछी-कलम लगौने छैथ आकि लगबै छैथ ओ एकदम कतारबन्दी रूपमे। कतारबन्दीकमाने ई जे कलमी आमक कलममे जहिना कलमी आम छोड़िदोसर ने कोनो आमे गाछ आ ने बेखे-बुनियादिक। बेख-बुनायादि भेल लकड़ी उपयोगी वृक्ष। ओना, कलमियो आम सइयो रंगक अपन गुण-धर्मबला अछिए, तँए एक गुणक मिलान आ एक धर्मक मिलान ओहूमे बेसी नीक होइत अछि। किएक तँ ओकर सभ किछु एक रूपे चलैए आ से नइ रहने जहिना बहुधर्मीकेँ एकठाम भेने होइए केतौ नहाइकाल झगड़ा तँ केतौ खाइकाल झगड़ा, केतौ चाहकझगड़ा तँ केतौ अनचाहक झगड़ा होइतो अछि आ अरबेधलो रहिते अछि। अरबेधब भेल- आगियो आ खढ़-पातसँ लऽ कऽ ठहुरी-चेरा धरिक सुखाएल जरनोकेँ एकठाम राखि देब, भलेँ किए ने कनी-कनी हटाइये कऽ रखलौं आ पूरबा-पछबा हवामे ऊड़ि-पुरि एकठाम भऽ सुनैग कऽ पजैर जाइते अछि। खाएर.., प्रेमनगरक किसान श्रेष्ठ किसान छथियो आ मानलो जाइते छैथ। इलाकामे जखन कखनो आमक गाछी-कलम वा बेख-बुनियादिक चर्च केतौहोइए तँ प्रेमनगरक चर्च जहिना होइए तहिना रामपुरोक चर्च होइतेअछि मुदा से प्रेमनगरक विपरीत दिशामे। विपरीत दिशा भेल-जहिना भगवान रामक नाम शुभ रहितो गन्दा-सँ-गन्दा वस्तु देख ‘राम-राम’ कहि गबाही रखि दइ छिऐन, जहिना मृत्युक बरियातीमे ‘राम-नाम सत् छी’ कहैत असमसानक पार लगबै छी तहिना ने जुआन-जहानक बरियातीमे रसगुल्ला खाइत-खाइत राम-धाम सेहो पार लगबैबते छी। खाएर जे छी से छी, सभ नीके छी आ सभ अधले छीमुदा सभ कियोतँ छीहे किने। पनरह जूनकेँ कौलेजमे गरमी छुट्टी भेल, ओना किछु गोरे एकरा ‘अमैया छुट्टी’ आ किछु गोरे ‘ग्रीष्मावकाश’ सेहो कहिते छैथ मुदा जाए दियौ ऐ बातकेँ, बात तँ बाते छी, अपना मनक मौजी बहुकेँ कहलौं भौजीआ लोको लग अपन निर्लजताक नाच नचैत रहलौं। भाय, पत्नी पत्नी छैथ किने, ओ तँ जहिना जीवन संगिनीभेली, अर्द्धांगिनी भेलीतहिनाप्रेमिका सेहो भेबे केली, मुदा तैठाम जँ कियो दिन-राति टी.भी.मे खेले वा सिनेमे देखती तँ देखौथ आ अपन कर्मक समय विधाताक हाथमे दऽ दौथ..! गरमी छुट्टी होइते धीरेन्द्र सोझे गाम आबि गेल। बीस जूनकेँ जगमोही सेहो आम खाइक बहन्ने अपन मातृक पहुँचल। धीरेन्द्र आ जगमोही पटनेमे रहि पटने कौलेजमे बी.ए. फाइनल इयरमे पढ़ितो अछि आ एक्के विषय दुनूक रहने संग-संग किलासोमे आ ट्यूटोरियलमे सेहो एक-दोसरकेँ देखतो अछिए। मुदा जहिना जेनरल क्लासमे तहिना ट्यूटोरियल क्लासमे सेहो दुनूक बैइसैक ब्रेंच अलग-अगल अछिए। जइसँ लगक गपो-सप्प कहियो किए हएत। ओना, अखन तक ने धीरेन्द्र अपन अंगीत जगमोहीकेँ बुझैत आ ने जगमोहीएधीरेन्द्रकेँ बुझैए। तेहेन जुग-जमाना आबि गेल अछि जे ने कियो नामक टाइटिलसँ केकरो परेख सकैए आ ने जाति-पाँजिसँ, केकरा एते छुट्टी छै जे अनेरेक रमझौआमे लागल रहत। नव पीढ़ीक लोक खेलाड़ी आ सिनेमा-कलाकार सबहक नामधुन करत आकि अपन बाप-पुरुखाक..! कोन मतलब ओकरा छै जे अपन बाप-पुरुखाक वंश आ जीवनकेँबिटिया अपन वंशक इतिहासक संग देश-दुनियाँक इतिहासकेँ बुझत। मुदा ईहो तँ बात सबहक सोझेमे अछि जे जे जेते जिनगीक रस पीबए चाहैए ओ ओते बेचैन सेहो भेले जाइए। ओना, समाजशास्त्र विषयक जेनरल क्लासमे पचाससँ ऊपर विद्यार्थी अछि, मुदा शनियेँ-शनि जे ट्यूटोरियल क्लास चलैए ओ उनटा पाठक, तँए ओ क्लास मात्र पान-सातटा विद्यार्थी करैए बॉंकी अधिकांश मैटिनी शो सिनेमा देखैए वा किछु गोरे घुमि-फिर शहरे-बजार देखैए। मैटिनी शो सिनेमा देखैक कारण टिकटक कन्शेसन सेहो अछिए। उनटा पाठ जे ट्यूटोरियल क्लासमे होइए ओ ई होइए जे आन दिन– माने सोमसँ शुक्र धरि शिक्षक जे पढ़बै छैथ ओकर उत्तर ओइ क्लासमे विद्यार्थीसँ लेल जाइए। आइक परिवेशमे–माने शिक्षण संस्थानक परिवेशमे,ट्यूटोरियल क्लासक नामो भरिसक छात्र सभ नइ बुझैत हएत–जखन कौलेजमे पढ़ाइये नहि भऽ रहल अछि तखन ओकर उत्तर की भेटत। ट्यूटोरियल क्लासक पान-सातटा विद्यार्थीमे जहिना धीरेन्द्रक तहिना जगमोहीक उपस्थिति अनिवार्य रूपसँ रहैए। बॉंकी पान-सातक बीच नव-पुरान होइत रहैए। सभ शिक्षकक अलग-अलग सप्ताहमे ट्यूटोरियल क्लास होइ छैन, तँए ऐ बातकेँ शिक्षक सभ नहि बुझिपबै छैथ। ओना, छात्रो सभमे किछु गोरेक सम्बन्ध शिक्षको सभ संग छैन्हे, तँए अपन-अपन ट्यूटोरियलमे अपन-अपन परिचित छात्र रहिते छैन जइसँ नव-पुरान हएब सोभाविके अछि। जहिना धीरेन्द्र अपनाकेँ ओते सक्कत बना क्लास पहुँचै छल जे जे किछु शिक्षक पुछतातइमे जे पढ़ौने छैथ ओकर अतिरिक्त अपनो विचार राखब, तहिना जगमोही सेहो अपन तैयारीक संग क्लास पहुँचै छल। ओना, ट्यूटोरियल क्लासमे कम विद्यार्थी रहने आगूक जे दुनू ब्रेंच बैसैक अछि, तहीपर दहिना भागक ब्रेंचपर धीरेन्द्र बैसैत आ बामा भागक ब्रेंचपर जगमोही। समैयक मिलानी दुनूकेँ रस्तोक मिलानी करबैत आ ट्यूटोरियल क्लासक सेहो। माने भेल एक गाड़ी पकड़ैले जहिना दूटा यात्री अपन निर्धारित समयपर घरसँविदाहोइ छैथ जइसँ रस्तामे गप-सप्प भलेँ नहियोँ होइत हौनु मुदा मुँह-मिलानी तँ होइते छैन। कहैकालमे भलेँ सभ कहि दइ छिऐ जे शरीरक पाँच इन्द्रीमे जहिना मुँह भेल, आँखि भेल तहिना कानो भेल। मुदा की तीनूक जीवन क्रिया एक्केरंग अछि? मुँहमे मुंगबाक सुआदसँ लऽ कऽ तेतैरक खट-मीठ आ नीमक तीतपन तकक रस भेटते अछि, जखन कि आँखि सोझे देखैबला भेल। नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधला देख-देख आँखि कखनो कानि-कानि नोरो चुबबैए तँ कखनो मिरचाइक कड़ुपनसँ पानियोँ तँ बहैबते अछि। मुदा कान तँ काने छी, खा-पीब कऽ रस चुसैक कोन बात जे आँखि जकाँ ने देखिये सकैए आ ने मुँह जकाँ सुआदे पाबि सकैए,लऽ दऽ कऽ हवामे उड़ल नीक-बेजाएकेँ खालीसुनिटा सकैए। जइसँ, जहिना बहिरा अपने ताले नचैए तहिना नाच करत। मुदा ऐ सभसँ कोन मतलब धीरेन्द्रेकेँ आकि जगमोहीए-केँ छइ। दुनू गोरे कौलेजमे पढ़ैए, कौलेजिया संगी कहियौ आकि क्लासक संगी, एक-दोसरक छी। अट्ठारह बर्खक उमेर सेहो दुनू टपिये गेल अछि, किए ने खुलि कऽ खेलाएत। मुदा से नहि, दुनू अपन-अपन सीमाक बीच अनुबन्ध अछि। ओना, दुनूक प्रश्नोत्तर दुनू तँ सुनिते अछि,तैसंग शिक्षक सेहो ट्यूटोरियल क्लासमे सुनै छथिन जइसँ एक-दोसरक अध्ययनक गहराइ सेहो एक-दोसर बुझिये रहल अछि। ओना, क्लासमे शिक्षक निर्धारित पाठ्यक्रममे जे पोथी निर्धारित अछि ओकरे आधार बना पढ़बै छैथ मुदा शिक्षको तँ शिक्षके ने भेला। कियो जेतबो सिलेबशमे अछि तेतबो ने पढ़बै छैथ आ कियो कियो एहनो तँ छथिए जे ओरिकासँ घी परसै छैथ। ‘ओरिकासँ घी परसब’क माने भेल सिलेबशसँ अतिरिक्तो पढ़ाएब, हुनका कोन मतलब छैन जे दालिक सुआद रहल कि मेटाएल। ओ तँ सिलेबशक कोन बात जे दुनियॉंक सिलेबश आगूमे रखिये दइ छैथ। शिक्षकेक अनुकरण ने शिक्षार्थी करत। ओहो ने वएह बुझत। भलेँ किए ने ओ शिक्षककपठनकेँ निर्णित करए जे जहिना शिक्षक जुग-स्रष्टा छैथ तहिना जुग-द्रष्टो तँ होइते छैथ। तँएशिक्षार्थियोकेँ तहिना ने जिनगीक बाट भेटत। ओना, शिक्षको अपन सिखपनसँ सीखिये नेने छैथ जे ट्यूटोरियल क्लासमे अनेरे जे माथक बोझ बढ़ाएब (माथक बोझ बढ़ाएब भेल- एक-एक छात्रसँ प्रश्न पुछब)तइसँ नीक जे पैंतालीस मिनटक घन्टीमे दस मिनट रीब-रीबेमे गेलबँचल पैंतीस मिनट, से नहि तँ एक-एक छात्र-छात्रासँ प्रश्न पुछि समय ससारि लेब। जे लाभ धीरेन्द्रोकेँ आ जगमोहीकेँ सेहो भेटिये जाए। जहिना कहल जाइए जे करत-करत अभ्याससँ जड़-मति सेहो सुजान भइये जाइए। मनुख तँ सहजे मनुख छी, अन्न-खाइबला आ पानि पीबैबला। घोड़ा घास खाइए तखन तँ एते हिहिआइए, मनुख तँ सहजे मनुख छी जेकर सभ जीव-जन्तुसँ अतिरिक्त गुण भेल हँसब। ट्यूटोरियल क्लासक शिक्षक भेला प्रश्नकर्त्ता, धीरेन्द्र आ जगमोही भेल उत्तर देनिहार। बाँकी सभ शिक्षकोक भाषण आ विद्यार्थियोक ‘उत्तर-भाषण’ सुननिहार भेल। तँए खुलल वा झाँपल भेल निर्णयकर्त्ता। किए अनेरे कोनो पक्षमे ठाढ़ हएत। किए ओ प्रश्नकर्त्ताक प्रश्न अङ्गेजत आ किए ओकर जवाबदेह बनत। सभ ने सुविधानुसार जीबए चाहैए। जखन अवसर भेटल तखन वएह सभ किए छोड़ि देत। अपन उत्तरमे जहिना शिक्षकक भाषण सिलेबशकेँ अतिक्रमण करै छेलैन तहिना धीरेन्द्रो आ जगमोहीओ उत्तर दइते छल। तेकरा शिक्षक लोकैन, ट्यूटोरियल क्लासक विषय कहि परीक्षामे लिखैसँ परहेज करैक सलाह दुनूकेँ दैत क्लास अन्त करै छला। दुनियाँमे प्रेमोक अपन रंग-रूप छइ। सात अरब लोकमे जगमोहीक जेहेन रूप धीरेन्द्र देख रहल छल ओहन रूप धीरेन्द्रक जगमोही नहि देख पेब रहल छल। दुनूक अपन-अपन नजरियो आ दृष्टिकोणो छेलैहे। मुदा ट्यूटोरियल क्लासक जे सिख (अध्ययन)छल ओ दुनूकेँ जरूर नव सिखपन (अध्ययनशीलता) दिस बढ़ौलक, जइसँ एक-दोसरक बीच, भिन्न दृष्टि रहितो आकर्षितकरबे करै छल। ओना, आकर्षणोक अपन गुण-धर्म अछि। कोनो आकर्षण ओहन होइए जइमे विकर्षणोसमान रूपमे संगे चलैए आ कोनो एहनो आकर्षण अछिए जइमे विकर्षणक मात्रा कम रहने हेराएल-हेराएल सन रहैए। जइसँ आकर्षणे-आकर्षण बुझि पड़ैए। तहिना विकर्षणोक तँ छइहे जे बेसी मात्रामे भेने आकर्षणकेँ दाबि दइए। जखन लोहा सन निर्जीव धातुक चुम्बकीय आकर्षण ओहन होइए जे अपना सन-सन भतलोहोकेँ अपना संगमेरंगि अपन गुण-धर्मसँ भरिये दइए। भलेँ ओ ओतबेकालक किए ने होउजेतेकाल चुमकलोहमे सटि अपनो चुम्बकत्वमे किए ने बदैल गेल हुअए। खाएर जेतए जे होइ से तेतए हुअए। अजगर सन साँपो जखन अपन नजैरककनखी आ मुँहक सूसकारीसँ आन साँपकेँ लगमे आनि भक्षे किए ने कऽ लैत हुअए मुदा तइसँ कोन मतलब धीरेन्द्रकेँ आकि जगमोहीएकेँ अछि। अखन तँ जिनगीक एको टपान दुनूमे सँ एको ने टपि सकल अछि, तखन जिनगीक टपानक बाते केना बुझत। जहिना धीरेन्द्रक मनमे जगमोहीक प्रति जिज्ञासा जागल तहिना जगमोहीकेँ सेहो धीरेन्द्रक प्रति जागल। एक रस्ताक राही–माने एक विषयक विद्यार्थी–भेने दुनूक मनमे एते तँ जिज्ञासा जगिये चुकल अछि जे जखन दुनू गोरे एक कौलेजक एक क्लासमे पढ़ै छी तखन बुधियो-ज्ञान ने एकरंग हुअए। एकर माने ईहो नहि जे आनसँ बेसी नइ हुअए,आ ने यएह माने हएत जे आनसँ कम्मो नइ हुअए। एक स्थानक यात्रीक बीच एहेन कोनो सीमा थोड़े अछि जे सभकेँ एक्केरंग चलए पड़त। कौलेजोमे तँ तहिना होइते छै जे कियो प्रथम श्रेणीमे उतीर्ण होइए, कियो दोसर श्रेणीमे आ कियो तेसर श्रेणीमे। मुदा जिनगीक अध्येता अपन जिनगीक अध्याय ओहीठामसँ शुरू करैक चेष्टा करै छैथ जैठाम मजगूत नीवक जरूरत अछि। औझुके नीवपर ने काल्हि ठाढ़ हएत। तँए, भविसवेत्ता भलेँ जे हुअए मुदा भविसक निर्माता नइ छी सेहो केना नइ कहल जाएत। औझुके रोपल गाछ ने काल्हि फल देत। धीरेन्द्रो आ जगमोहीयो एक-दोसरक जीवन परिचय गुप्त रूपसँभॉंज लगबए लगल। मुदा दुनूक प्रतिबन्धित बाट, प्रतिबन्धित ऐ मानेमे जे जानकारी पबैमे कहीं सीमोलंघन ने भऽ जाए,नइ तँ जगहँसी हएत। एक तँ पटनामे ने धीरेन्द्रकेँ बेसी चिन्ह-पहचीनक लोक आ ने जगमोहीएकेँ। ओना, कौलेजो आ हाइयो स्कूल, सइयो-हजारो अपरिचित चेहराक परिचित करबैक गर छीहे, मुदा परिचय-पात करैक जगह तँ छी नहि, छी तँ पढ़ै-लिखैक जगह। जेकर अपन निर्धारित सीमा-सरहद अछि।तँए, एक सिमानक बीच रहि कियो अपनाकेँ पार-घाट लगैबतो अछि आ लगबौ चाहैए। धीरेन्द्रकेँ पिता-पुत्रक बीच जे सीमा अछि तइमे जहिना पिता जीबेन्द्रछथिन तहिना पुत्र धीरेन्द्रो अछि। माने ई जे अनेको क्रिया-कलापक बीच पिता-पुत्रक जीवन अछिए। मुदा अखन से नहि। अखन एतबे जे जेतेक उचित खर्च विद्यार्थीक छल ओ धीरेन्द्र जहिना निमाहि रहल अछि तहिना जीबेन्द्रसेहो अपन पुत्रक हिसाबसँअपन माहवारी खर्चो आ स्वतंत्रतो देब निमाहि रहल छैथ। मुदा ऐ सीमाक बीच धीरेन्द्र अपन कोर्सक किताब सिलेबशक अनुसार पिताक पाइसँ कीनि नेने छल मुदा शिक्षकक मुहसँ अनेको अन्य किताबक नाओं सुनि मन तँ उछटबे कएल। जइसँ धीरेन्द्र प्रतिदिन एक घन्टा कौलेजक रीडिंग रूममे बैस नव-नव पोथी पढ़ैतरहल अछि। कौलेजक रीडिंग रूम, पुस्तकालय आ कार्यालय तीनू कोठरी एक्के मकानमे जुड़ल अछि। तीनूक बीचक देवालमे शीशा लागल अछि जइसँ एक दोसर कोठरीकेँ नीक जकाँ देखल जाइए। धीरेन्द्र रीडिंग रूममे कुर्सीपर बैस टेबुलपर तीन-चारिटा किताब रखि एकटाकेँ उनटा रहल छल, तहीकाल जगमोही पुस्तकालयक पैछलाकिताब जमा करैत ऐगला लइले आलमारी देखए लगल। ओना, पुस्तकालयक सभ पोथी रजिष्टरमे अंकितऐछे मुदा ओदोसर विद्यार्थी देख रहल छल। नमगर-चौड़गर रीडिंग रूमक कोठरी, दर्जनो आलमारी किताबसँ सजल अछिए। एकसँ दू आलमारी प्रति विषयक किताबसँ सजौल फुटा-फुटा लगौल अछि। बीचमे बइसैले कुरसीक संग टेबुल सेहो लगले अछि। जइसँ बिनु बँटवारा केनहुँ बैइसैक जगह बँटाइये गेल अछि। माने ई जे आलमारीक लगेमे कियो बैस कऽ पढ़बकेँ नीक बुझबे करैए। धीरेन्द्र अपन समयानुसार रीडिंग रूममे किताब सभ टेबुलपर रखि कलमसँ कॉपीमे लिख पुन: किताब उनटबैतरहए। पुस्तकालयक आलमारीमे जगमोही किताब खोजि रहल छल। पुस्तकालयो आ रीडिंगो रूमक आलमारी हाथ-हाथ भरिक दूरीमे सजल अछि। पुस्तकालयक दुनू आलमारी खोलि जगमोही किताब खोजि रहल छल आ दोसर दिस धीरेन्द्र दुनू आलमारी खोलि किताब निकालि टेबुल सजौने छल। दू आलमारीक बीचक जे जगह अछि ओइ बीच होइत जगमोही धीरेन्द्रकेँ देख रहल छल। तही बीच पुस्तकालयक किछु किताब गड़बड़ भऽ गेल रहै तेकर कहाकही ऑफिसमे उठल। मुदा किताब तँ किताब छी, आगियोमे जरैबला, पानियोमे गलैबला आ दिबारो-दिम्मककेँ खाइबला, तैठाम अनेरेक ने कहा-कही भेल। खाएर..,जेकरा माए-बाप जन्म दइए से तँ माए-बापकेँ बिसैर जाइए,ई तँकौलेजक पुस्तकालयक किताब छी,एकरके माए-बाप छै!अनेरे के एते आलमारीकेँ उधेसत। ओना, देवालक बीच शीशा लगल रहने जहिना जगमोही पुस्तकालयमे बन्न अछि तहिना रीडिंग रूपमे धीरेन्द्रोबन्ने अछि मुदा देख रहल छल दुनू एक-दोसरकेँ। ओना, अखन तकक तरपेसकी जानकारीमे जहिना जगमोही अपन मामा गामक धीरेन्द्रकेँ बुझैततहिना धीरेन्द्रो अपना गामक भगिनी जगमोहीकेँ बुझैत। मुदा अखन धरि एको दिन बात-चीत नहि भेल।..पुस्तकालयक कार्यालयमे कहा-कही भेने सबहक धियान ओइ दिस भेल आ जगमोहीक धियान धीरेन्द्र दिस भेल। शुरूमे जगमोही मोट-मोट किताब धीरेन्द्रक टेबुलपर राखल देख थोड़ेक सहमल जरूर मुदा एते तँ आत्म-शक्ति जगिये गेल छेलै जे धीरेन्द्र मामा गामक छी। चाहे तँ नाना दाखिलमे हुअए वा मामा दाखिलमे वा भाइक दाखिलमे, मुदा अंगीत तँ छीहे। जँ सेहो नइ छी तैयो एक कौलेजक एक क्लासक आ एक विषयक संगी तँ भेबे कएल। जखन एक्के विषयक संगी छी तखन जीवनक क्रियो-कलाप तँ एक्केरंग ने हएत। केना कोयलाखानक श्रमिक अपनाकेँ लेबर क्लास कहि एकठाम बैसार-उसार करैए। केना खेतक धान रोपनिहार धनरोपनिया कहबैए। कहाँ केतौ मर्द-औरतक भेद छइ। एक दिस मातृकक सम्बन्ध, दोसर दिस कौलेजक सम्बन्ध अछिए, तैसंग एक उमेरक सियान सेहो दुनू गोरेछीहे। तखन गप-सप्प करैमे बाधा की? चोरनुकबा प्रेममे कोनो दम होइए, ओ तँ चोर सबहक क्रियाभेल। प्रेम तँ सार्वभौंम अछि।विचारक प्रेम, बेवहारक प्रेम, जिनगी जीबैक प्रेमइत्यादि, जे लोकचोरा-नुका कऽ किए करत। दू आलमारीक बीचक रस्ता देने शीशाक देवाल पार करैत जगमोही धीरेन्द्रक अनुकरण करए लगल। धीरेन्द्र जहिना किताबमे आँखि गाड़ि, समुद्री हीरा जकाँ पाँति खोजि कॉपीमे नोट कए रहल छल, तेकर हू-ब-हू फोटोग्राफी जगमोही अपन बुधिक डायरीमे उतारए लगल। दस मिनटक फोटोग्राफीक रील जगमोही मनमे गढ़ि नेने छल। संजोग भेल, पॉंच बाजि गेल। आब सभ किछु बन्द हएत। जगमोहीकेँ दूटा किताब लेबाक छेलै जे इसू करा चुकल छल।धीरेन्द्र आलमारीमे किताब रखि कॉपी नेने बाहर निकलल। ओना, लोको पतराएले छलइ। मात्र दू गोरे कौलेजक स्टाफ आ चारि-पॉंचटा विद्यार्थी अछि। पुस्तकालयक सीढ़ीसँ निच्चाँ उतैरते जहिना धीरेन्द्रक नजैर खिर जगमोहीपर छिछलल तहिना जगमोहीक नजैर सेहो धीरेन्द्रपर छिछलए लगल। ओना, दुनूकेँ अपन-अपन नैतिक अनुशासनक विचार मनमे दौड़िये रहल छल। अही गुन-धुनमे दुनू बिना किछु बजने-भुकने कौलेजक अन्तिम गेट लग पहुँच गेल। चौबट्टी जगह, तँए के किमहर जाएत तेकर जानकारी दुनूकेँ अपन-अपन।ओना, एहेन कोनो प्रतिकूल मौसम नहियेँ अछि जे दुनूक बीच गप-सप्प नइ भऽ सकैए।मुदा ग्रामीण परिवेशक उपज दुनू, माने दुनूक जन्म गामदेहातमेभेनेदुनूक मनमे गामक गमैया सम्बन्ध सेहो बनियेँ गेल अछि।तँए दुनूक बीच किछु ओझरौठअछिए। जे ने जगमोही बुझि सकल अछि जे धीरेन्द्रक संग कोन तरहक सम्बन्ध मानि बाजल जाए, आ ने धीरेन्द्रे से बुझि रहल अछि।तैसंग दुनूक मनमे ईहो बेवधानछैहे जे अपनासँ उमेरमे जेठ मानल जाए वा छोट। तेकर कारण दुनूक अपन-अपन अछि। धीरेन्द्रक मनमे नचै छै- जखन दुनू गोरे कौलेजक एक क्लासमे पढ़ै छीतखन ई मानि लेब जे जगमोहीक उम्र हमरासँ कम हेतैई तँ बालबोधक विचार भेल!किएक तँ जेतेक समय हमरा ‘अ-आ’ सँ अबैमे अखन धरि लागल तेते तँ जगमोहीकेँ सेहो लगल हेबे करत, तखन छोट मानल जाए वा पैघ? आइ जँ कौलेजमे एको क्लास आगू-पाछू रहितौं तखन तँ एकटा देखौआ सीमा भेटैत, जहिना कोनो गामक जमीनक नापी लेल पैछला सर्वेक कोनो पहचान भेटला बाद अमीनकेँ कोनो खेतक आड़ि-मेड़ बनबैमे असान होइए तहिना। मुदा धीरेन्द्रक मनमे एकटा विचार उठल। उठल ई जे जइ गाममे बाढ़िक कारणे वा भुमकमक कारणे सिमानक पहचान मेटा गेल रहैए तँ ओइ सीमाकेँ पकड़ै तँदोसर गामकसिमानकसहारा लेले जाइए। जगहमोही जखन अपन पैछला इतिहास दिस नजैर खिरौलक तँसाफ-साफ देखए लगल जे जहिया पॉंच बर्खक रही तहिये बाबा लोअर प्राइमरी स्कूलमे नाओं लिखा देलैन, तहियासँ ने कहियो फेल केलौं आ ने कोनो क्लासे फानि कऽ टपलौं।मनमे उठलै- तहिना ने धीरेन्द्रोकेँ भेल हएत। बीचमेमातृकक सम्बन्ध सेहो अछि, जँ नानाक सम्बन्धमे हएत आ तखन जँ भैयारीक सम्बन्धे बाजबईहो तँ नीक नहियेँ हएत। आ तहूमे जँमाए बुझती तखन तँ ओहो गनजन करबे करती..! ओना, धीरेन्द्रोक मन सकताइये रहल छल जे अनजान-सुनजान महाकल्याण। गप-सप्पक पछाइत जखन सम्बन्धक असल परिचय हएत तखन अपन विचारकेँ सुधारि लेब। तहिना जगमोहीक मन सेहो रसे-रसे ओहन सीमापर पहुँच गेल।तँए दुनूकेँ मुँह खोलैक अनुकूल मौसम बनि गेल। एक तँ ओहुना जखन संगे-संग पढ़ै छी तखन बजा-भुकी करैमे कोन एहेन पहाड़े आकि समुद्रे बीचमे बाधक अछि। गेटपर पहुँच धीरेन्द्र जगमोही दिस तकलक। ओना, जगमोही सेहो धीरेन्द्रे दिस ताकि रहल छल।दुनूक आँखि मीलि गेल। आँखि मिलिते दुनूक मुँह टुस्कियाएल। जहिना पत्ता-कलश वा फूल-फलक टुसी चलिते अपन सुगन्ध निकालए लगैए तहिना दुनूक मनसँ निकलए लगल...। जगमोही बाजल- “डेरा केतए रखने छी?” जहिना जगमोही बाजल तहिना धीरेन्द्र उत्तर देलक- “ऐठामसँ साए मीटर हएत।” धीरेन्द्रक बात सुनि जगमोही घड़ी देखलक। पॉंच बाजि कऽ पॉंच मिनट भेल छेलइ। मने-मन अपन समैयक अँटकार लगौलक तँ बुझि पड़लै आधा घन्टा समय बीचमे खाली अछि। जगमोहीक ऐगला समैयकसीमा निर्धारित छेलै, किएक तँ सचिवालयमेजगमोहीक पिता-रामलखन कार्यरत छथिन जे नित्य छअ-पौने छअ बजे तक डेरा अबै छथिन। पिताजीकेँ अबैसँ पहिनहि जगमोही अपन कौलेजक काज निवटा डेरा पहुँच जाइए। तैबीच जगमोहीक माइयो बजारक काज कऽ आबि जाइ छथिन। जगमोही बाजल- “रस्ते-रस्ते चलि कऽ अपन डेरा देखा दिअ। दोसर दिन समय पेलापर आगूक किछु गप-सप्प करब।” सोल्होअना जगमोहीक बात नहि सुनि धीरेन्द्र बिच्चेमे बाजल- “चलू, संगे-संग चलबो करू आ अहाँ अपनो डेराक जानकारी दिअ।” साइए मीटरपर धीरेन्द्रक डेरा, गपे-सप्पमे दुनू गोरे पहुँच गेल। डेरा लग ठाढ़ होइत धीरेन्द्र असमंजसमे पड़ि गेल। असमंजस ई जे शहर-बजार छी। ऐठाम सभ तरहक प्रतियोगिता अछि! मुदा लगले मनमे उठि गेलै जे अखन विद्यार्थी जीवनमे छी, तँए अखन वर्त्तमानक विचार करब अछि नहि कि भविसक। धीरेन्द्र बाजल- “डेरामे चाह-ताह तँ नइ बनबै छी मुदा जलखैक ओरियान तँ रहिते अछि, चलू पहिने जलखै कऽ लेबतखन जाएब।” ओना, दुनूक मन गवाही दइतेरहै जे कौलेजसँ लऽ कऽ गाम धरिक सम्बन्ध अछिए, तखन खेबे-पीबेमे कोन हर्ज...। जगमोही बाजल- “डेरा तँ भीतर जा कऽ देख लेब मुदा जलखै नइ करब। बेसीसँ बेसी एक गिलास पानि पीब लेब।” दुनू गोरे कोठरीमे पहुँचल। कोठरीमे कुरसी नहि, छोट-क्षीणकोठरीमे धीरेन्द्रक पूर्ण जिनगी समटल अछि। एक्के चौकीपर बैस धीरेन्द्र बाजल- “गाममे ऐबेर आम खूब फड़ल अछि, अमैया छुट्टी हेबे करत...।” जगमोही बाजल- “अहाँक घर प्रेमनगर छी आ हमरो...।” ‘हमरो’ सँ आगाँ नहि बढ़ि जगमोही चुप भऽ गेल। अपन गामक नाओं सुनि धीरेन्द्र बाजल- “अहूँक मातृक तँ प्रेमनगरे ने छी?” जगमोही- “आइ एतबेपर रहए दियौ। पनरह जूनसँ अमैया छुट्टी भऽ रहल अछि, माइयो नैहर जेती, हुनके संग बीस जूनकेँ अहाँक गाम पहुँच जाएब।” मुस्की दैत धीरेन्द्र बाजल- “हमरा गाम पहुँचब आकि अपन मातृक?” जगमोही- “अहाँ जे बुझिऐ...।” शब्द संख्या : 3068, तिथि : 10 अगस्त 2018 2. धीरेन्द्रक डेरासँ निकैल जगमोही सड़कपर आबि बैट्री इंजनबला रिक्सा पकैड़अपन डेरा विदा भेल। ऐठामसँ दू किलोमीटरपर जगमोहीक डेरा छइ। जहिना मौसम उतरने धरतीमे पड़ल बीज एकाएक जीवन धारण करैले क्रियागत होइए तहिना ने मनुखोक जीवनमे अछि। विद्यार्थी जीवनक अन्तिम छोड़पर जहिना जगमोही पहुँच चुकल अछि तहिना ने धीरेन्द्रो पहुँचले अछि। साल भरिक पछाइत तँ दुनूकेँ नवजीवनमे प्रवेश करबेक छइ। ओना, धीरेन्द्र अपन लक्ष्य निर्धारित कऽ चुकल अछि जे बी.ए. केला पछाइत अपना ढंगसँ अपन जीवन निर्माण करब मुदा जगमोही अखन अनिसचितताक स्थितिमे अछि। ओना, उमेरक हिसाबसँ जगमोही बालिग भऽ चुकल अछि। नबालिगे धरि ने बाल-बच्चाक पूर्ण भार माता-पिताकेँ रहै छैन मुदा जखन बेटा-बेटी बालिग भऽ जाइए तखन तँ विचारणीय प्रश्न बीचमे आबिये जाइए। रिक्सापर चढ़ि जगमोही धीरेन्द्रकेँ कहलक- “फेर भेँट हेतइ।” भेँटक घॉंट करैत धीरेन्द्र बाजल- “जरूर, जरूर भेँट हेतइ।” ओना, इंजिनबला रिक्साक लेल दू किलोमीटरक दूरी बहुत नहियेँ भेल, तँए जगमोहीक मनमे कोनो ओहन प्रश्ने ने उठल जे भविसक विचार करैत, मुदा मनमे अपन विरहाइत भविस तँ नाचिये रहल छेलइ। डेराक आगूमे रिक्सा लगिते रिक्साबलाकेँ भाड़ा दैत जगमोही अपन डेराक कोठरीमे पहुँच,किताब रखि बेसुध भऽ ओछाइनपर ओंघरा गेल। जहिना समुद्रमे जुआरि उठैए तहिना जगमोहीक मन रूपी समुद्रमे जिनगीक जुआरि उठए लगल। एकसंग अनेको विचार जगमोहीक मनमे उठए लगल। बी.ए.क तेसर वर्षमे चारि मास बीत गेल, मात्र आठ मासमे कौलेजसँ निकैल जाएब। उन्नैस-बीस बर्खक उमेरो भइये गेल अछि, जइसँ जहिना माएकेँ बिआहक चिन्ता पकड़ने छैन तहिना पितोजी सेहो चिन्तिते रहै छैथ। दहेजक जे रूप समाजमे बनि गेल अछि तइसँ पितोजी आ माइयो अपन मनोनुकूल परिवारमे बिआह करा पौता कि नहि। एकटा ऑफिसक किरानीक ओकातिये केते भऽ सकैए। माल-जाल जकाँ खरीद-विकरीक बेवहार मनुक्खोक बनि गेल अछि..! कोनो एक विषयक एक पहलूपर जगमोहीक निर्णय भइये ने पबैत कि धॉंइ-दे दोसर उठि जाइत रहइ।अन्तमे, अपन विचारकेँ ठामेपर रोकि जगमोही ओछाइनसँ उठि, माए लग पहुँचल। सुवासिनियोँ बजारसँ सामान कीनि डेरा पहुँचले छेली कि बेटीपर नजैर पड़लैन। जहिना गुम्हराएल मेघ देख लोक मौसम बदलैक सम्भावना बुझए लगैए तहिना जगमोहीकेँ देख सुवासिनीकेँ भेलैन। मुदा केहनो रोग देहमे किए ने हुअए ओ तँ बजला पछातिये नीकसँ बुझल जाएत। ओना, किछु बाहरी रोग देखलोसँ बुझल जाइते अछि मुदा भीतरिया रोगकेँतँ बुझेला पछातिये कियो बुझिसकैए। अधखिलल फूल जकाँ जगमोही खिलखिलाइत माएकेँ कहलक- “माए, मामागामक एकगोरे संगे-संग पढ़ै छैथ।” नैहरक नाओं सुनिते सुवासिनीक मनमे जेना जलधर भऽ गेलैनतहिना बिहुसैत बजली- “कद-काठी केहेन अछि?” ‘कद-काठी’क पुछैकमाने सुवासिनीक मनमे छेलैन जे अखियाइस कऽ लड़काक परिचय बुझब। किएक तँ गामक जे नवतुरिया अछि ओ तँ सुवासिनीकेँ नैहर छोड़ला पछाइत जन्म लेलक मुदा चेहरो-मोहरोसँ तँ अनुमानित भॉंज परिवारक लगिते अछि। मुदा लगले सुवासिनीक विचार बदैल आगू बढ़ि गेलैन। आगू बढ़िते सुवासिनी बजली- “नामो-ठेकान पुछलहक?” अपनाकेँ संयमित करैत जगमोही बाजल- “रस्ते-रस्ते भेँट भेला, तखन केना नाम-ठेकान पुछितिऐन! मुदा एते तँ बुझले अछि जे धीरेन्द्र नाम छिऐन।” ‘धीरेन्द्र’ सुनि सुवासिनी अपन नैहरक दियाद-वाद दिस नजैर खिड़बए लगली, मुदा केतौ थाह-पता नहि लगलैन। बजली- “किछु गपो-सप्प भेलह?” जगमोही- “बहुत गप-सप्प तँ नहि भेल मुदा एते तँ ओहो मने-मन बुझबे केलैन जे हमरे गामक धीकधी छी।” धीरेन्द्रक गाम–प्रेमनगर–सँ कोस भरि हटल जगमोहीक गाम–रामपुर–अछि। ओना, एक राज्य आ एक जिलाक गाम रहितो गाम-गाममे अन्तर सेहो अछिए। अन्तरक केतेको कारण अछि। जहिना दू गामक भौगोलिक बनाबट दू रंग रहने आर्थिक स्थितिमे अन्तर होइए तहिना राजनीतिक दृष्टिसँ सेहो होइते अछि। राजनीतिकविचारधारा सेहो भौगोलिके बनाबट जकाँ अनेको रंगक अछिए जइसँ समाजिक रूप-रेखा सेहो अलग होइते अछि। डेरा अबिते रामलखन कपड़ा बदैल टंकीमे हाथ-पएर धोइ अपन बैसार रूममे पहुँचला। तैबीच जगमोही चाह बना नेने छल। ओना, ऑफिससँ एला पछाइत रामलखन अपन डेरामे तत्खनात् चाहेटा पीबै छैथ, किएक तँ ऑफिस छोड़ला पछाइत ऑफिसेक केन्टिनमे जलखै कऽ लइ छैथ। तेकर कारण अछि जे ऑफिसक स्टाफकेँ सुविधानुसार जलखै-खेनाइ भेट जाइ छैन। आने दिन जकाँ पॉंचो गोरे माने- रामलखन, सुवासिनी आ तीनू बहिन जगमोही, संगे-संग चाह पीबए लगल। ऑफिससँ डेरा रामलखन अपन संगी- कन्हैयाक संग सभ दिन पएरे एबो करै छैथ आ जेबो करिते छैथ जइसँ रस्तामे अपन-अपन गाम-घरक संग अपन-अपन परिवारक सुख-दुखक गप-सप्प सेहो करिते छैथ...। ऑफिससँ निकलला पछाइत कन्हैया अपन परिवारक बात उठबैत बजला- “रामलखन भाय, दरमाहाक पाइसँ परिवार चलाएब बोझ बनि रहल अछि। समयपर दरमाहा नइ भेटने सभ दिन संगी सबहक कर्जखौक बनले रहै छी।” कन्हैयाक बात सुनि रामलखनोक मन ठमकलैन मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे सोझ-साझ बजने वा कनने थोड़े समस्या मेटाएत। तँए, जीवन दिस इशारा करैत रामलखन बजला- “कन्हैया भाय, ईहो ने देखबै जे एक्के रेंकक कुरसीपर अहूँ छी आ रामानन्दो अछि,दुनू गोरेक दरमहोएक्के रंग अछि।मुदा रामानन्द केना एतेक हाइ स्तरक रहन-सहन बना नेने अछि!” रामलखनक प्रश्नपर जाबे कन्हैया विचार करितैथ ताबे डेरा पहुँच गेला। होइतो अहिना छै जे सभ-दिनासंगीक बीच किछु प्रश्न जँ पछुआइयो गेल तँ ई आशा बनले रहैए जे औझुका छुटलाहा गप काल्हि पूरा लेब। ओना, गप-सप्पक क्रममे रामलखन परिवारिक जिनगीक बात उठा चुकल छला मुदा जखन अपन डेरा एला आ चाह हाथमे लेलैन तखन कन्हैयाक विचार अनायास मनमे उठलैन। उठिते जखन अपन परिवारक समस्या आ समाधानपर नजैर गेलैन तखन बुकौर लागए लगलैन। परिवारमे तीन-तीनटा बेटी अछि, दोसर कोनो ने आमदनी अछि आ ने कोनो आशा..! बेटा अछि नहि। गाममे जे पैत्रिक सम्पैत अछि ओ दू भॉंइक भैयारीक अछि। तहूमे सरकारी नोकरी रहने समाजोक नजैरमे किछु-ने-किछुइज्जत बनियेँ गेल अछि। अखनो गाम-घरमे बेटा-बेटीक बीच पढ़ाइ-लिखाइक दूरी बनले अछि। तैठाम जखन जेठ बेटीकेँ बी.ए. तक पेढ़ेलौंतखन छोट दुनू बेटीक अधिकार सेहो बनियेँ जाइए। जँ से नहि करब तखन परिवारो आ समाजोमे दोखी बनबे करब आ जँ से करब तखन जहिना अखन मास पुरैत-पुरैत हाथ खाली भऽ जाइए, जइसँ किछु-ने-किछु पैंच-उधार भइये जाइए, तहिना ने आगूओ चलत। तहूँमे आब आधासँ बेसी समय नोकरीक समाप्ते भऽ गेल। अखन तक मात्र परिवार चलैत रहल अछि। अगुआएल काजमे मात्र जेठ बेटीकेँ कौलेजमे आ छोट दुनू बेटीकेँ हाइ-स्कूलमे पढ़बै छी। सालभरिक पछाइत जगमोही कौलेजसँ निकलत आ दुनू छोट बेटी एकाएकी कौलेज पहुँचत। तैसंग एका-एकी बिआहोक समस्या सिरचढ़ हेबे करत...। परिवारक विचार रामलखनक मनकेँ तेना बोझिल बना देलकैन जे आन दिनक अपेक्षा मुँहक चुहचुही मन्हुआ गेलैन।मुदा सुवासिनीक मन ठीक विपरीत छल, नैहरक बात सुनितेहिनकर सुतल स्मृति जागि मुँहक चुहचुहीकेँ बढ़ा देलकैन जइसँ अपन नैहरक गप-सप्प करए चाहै छेली। अपन जगैत जिज्ञासा आ पतिक मन्हुआएल मनकेँ देख सुवासिनी बजली- “मन किए खसल देखै छी?” ओना, सुवासिनीक विचार रामलखनकेँ अनसोंहाँत लगलैन मुदा पत्नीकेँ अशिक्षित मानि अनसोंहाँतकेँ मनमे दाबि लेला। अनसोंहाँत ई लगलैन जे अपने परिवारक समस्याक समाधानक बाट जोहि रहल छी, जइसँ परिवार उठि कऽ ठाढ़ो हएत आ आगूओ बढ़त,मुदा तेकर ठीक विपरीत पत्नी बाजि रहल छैथ जे मन बड़ खसल देखै छी..! परिवारक बीच रामलखन आगूक कोनो बात-विचार करबकेँ अखन नीक नहि बुझि रहल छला।नइ बुझैक कारण मन गवाही दऽ रहल छेलैन जे जहिना अपने पत्नीक संग परिवारकेँ उठि कऽ दौड़ैक विचार कहियो ने कऽ पबै छी तहिना ने आनो-आन अछि। रहबो केना ने करत, अखन जे परिवार सबहक धार बनि गेल अछि ओ यएह ने जे नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधला वृत्ति अपनाकऽ पुरुख कमा आनैथ आ महिला घरक भीतर खाइ-पीबैक ओरियान करती। जइसँ पुरुख जहिना परिवारक भीतरक जानकारीसँ अनाड़ी बनल रहै छैथ तहिना उपार्जनमे भागीदारी नइ भेने महिलो अनाड़ीएबनल रहै छैथ। प्रश्न अछि पुरुख-नारीक संयोग-सहयोगसँ परिवारकेँ आगूक दिशा दिस बढ़ाएब। खाएर...। परिवारक बीच माने पति-पत्नीक बीचक जिनगीमे रामलखन जेतेक डुमकी लगबै छला तेतेक नव-नव विचारो जगै छेलैन आ दुनू परानीक बीचक जिनगीमे ओझरी सेहो लगि रहल छेलैन। जइसँ चेहराक रूप-रंग आरो बेदरंग बनल जा रहल छेलैन। रंगो तँ रंग छी किने जे बेदरंगो होइए, सदरंगो होइए आ कुदरंगो होइते अछि। लगले रामलखनक मनमे उठलैन जे परिवारकेँ जानब आ जनैत रस्तासँ आगू बढ़ब बाल-बोधक खेल नहि छी, तँए नीक हएत जे अपने किए ने असगरे पहिने ढुड़िया पसाइरपरिवारकेँ नीक जकाँ ढुढ़ि ली।तइले यएह ने नीक हएत जे परिवारक सभ सदस्यकेँ अपना-अपना दिस माने अपन-अपन जीवनानुकूल दिस विचार घुमा दिऐन आ अपनो अपना दिस घुमि कऽ विचारी। तँए, नीक हएत जे पत्नीकेँ कहिऐन- ‘अखन मन भारी लगैए तँए कनीकाल आराम करए दिअ, तैबीच अहूँ सभ अपन-अपन काज देखू।’ ..विचारैक क्रममे तँ रामलखन विचारि लेला मुदा आगू किछु बजैसँ पहिने दोसर विचार मुँहकेँ रोकि दइ छेलैन। ‘बाजी की नइ बाजी, बाजी तँ की बाजी आकि नइ बाजी, अही बीच रामलखनक मनओझरा गेलैन। ओझरा ई गेलैन जे जँ बाजि दिऐ जे ‘मन भारी लगैए’आ जँ ओ सभ कोनो बिमारीक आगमन बुझि डॉक्टर-वैद करए लगत, तखन तँ अनेरे ने सभ अपना-अपनीकेँ तेतेक आहि-आलम करत जे जेहो कनी-मनी गुद्दी माथमे बँचल अछि सेहो नोचा जाएत। तइसँ नीक जे किए ने कनी झूठे बाजि ऑफिसेक काजक नाओं लगा बाजी जे तेहेन फाइल अछि जे की लिखब से फुरबे ने करैए..!रामलखनक मन मानि गेलैन जे एतेक झूठ बजलासँ बेड़ा पार भऽ सकैए। बजला- “तेहेन जुग-जमाना आबि गेल अछि जे ऑफिसक फाइल कि फाइल जकाँ रहल, ओ तँ फाइलोमे फाइल अछि। लगले अफसरक हुकुम अबैए जे पक्षमे लिखैक अछि आ प्राते भने आदेश बदैल विपक्षमे लिखैक भऽ जाइए। एके फाइलकेँ मास-मास दिन तक रगड़ैत रहै छी तैयो अधखिजुए रहैए..!” ऑफिसक नाओं सुनि जहिना सुवासिनी तहिना तीनू बेटी सेहो रामलखनकेँ आराम करैक मोहल्लत दऽ देलकैन। ओना, जहिना कोर्टमे कोनो जमानत हाकिम लगले दए दइ छैथ,आ कोनोकेँ मासक-मास रगड़ला पछाइत देबो करै छैथ आ नहियोँ दइ छैथ, तेना रामलखनकेँ नहि भेलैन। तेकर कारण रामलखनक अपन बिसवासू विचारसँ बेसी कारगर सुवासिनीक मनमे नैहरक जिज्ञासा आ जगमोहीक मनमे धीरेन्द्रक जिज्ञासा छल। खाएर जे छलसे छल मुदा रामलखनकेँ सोचै-विचारैले जमानत तँ भइये गेलैन। ओना, पितासँ नुका जगमोही माएसँबात करए चाहिते छल। तेकर कारण तेकठसँ बॉंचब रहइ। किएक तँ तेकठ विचार बेसी झंझटिया भेने काज नोकसान करबे करैए। गोटे-आधे काज सुधरैए नइ तँ बेसी दुरिये होइए। ऐठाम तेकठ भेल- पहिल सुवासिनीक नैहरक विचार, दोसर- जगमोहीक मातृकक विचार आ तेसर- रामलखनक सासुरक विचार।ओना, ऐठाम परिवारक विचार अछि मुदा से नहि, विचारोक रूपमे बेकतीगतो एहेन विचार होइते अछि जे रंग-बिरंगक विचार मनमे उठने,माने दोकठ, तेकठ, चौकठ भेने केतौ कियो निर्णये ने कए पबैए तँ केतौ गलतीए निर्णय कए लैत अछि। आ से एहेन कोनो अदने लोकटा-केँ होइए सेहो बात नहियेँ अछि। अदनाक कोन बात जे पदनोकेँ होइते अछि, जइसँ अधलासँ बेसी अधला होइक सम्भावना बनिते अछि। द्वापर युगमे जखन महाभारत शुरू होइक सम्भावना बनल, जइमे बड़का-बड़का योद्धा सभ दुनू दिस छला, एक पक्षमे कृष्णो छला। जइ पक्षमे कृष्ण छला तइमे तीनटा सेसर योद्धा रहैथ- अर्जुन, अभिमन्यु आ बर्बरी। गम्भीर रूपसँ जखन कृष्ण विचार केलैन तखन अर्जुन आ अभिमन्यु तँ एक पटरीपर बुझि पड़ैन मुदा बर्बरी कुछप बुझि पड़लैन जइसँ मनमे शंका उठलैन जे हो-न-हो एक दिस दुनू पक्षक बीच, माने कौरब आ पाण्डवक बीच युद्ध शुरू हुअए आ दोसर दिस अपने पक्षमे–माने पाण्डव पक्षमे–वैचारिक लड़ाइ उठि जाए,तखन हार छोड़ि जीतक आशा करबे मुरुखपना हएत किने। मुदा से बर्बरी मानबो करत तखन ने, आ जँ नइ मानए तखन? ओना, मानबो-मानबक परिवेश बनिते अछि जइ परिवेशक हवा किछु-ने-किछु सभकेँ प्रभावितो करिते अछि। खाएर.., अन्तमेरणकौशल कमिटीमे विचार कए बर्बरीकेँ लड़ाइसँ दूर रहैक विचार देल गेल। मुदा अपन जान अर्पित केनिहार बर्बरी छलाहे, ओहोएक शर्त्त लगा रणक्षेत्रसँ अलग रहैक विचार मानलकैन। ओ शर्त्त छल जे युद्धभूमिमे बर्बरी शामिल नइ हएत मुदा देखत अपना आँखिसँ..! तखन बर्बरीकेँ गरदैनसँ ऊपर काटि रणभूमिक बगलमे जे पहाड़ छल ओइपर रखि देल गेल। जइसँ गरदैन कटल बर्बरीक आँखि महाभारतक सभ किछु देखलक। धीरेन्द्रक चर्च सुनने सुवासिनीक मनमे नैहरक अपन बालपन मन पड़ए लगलैन,जइसँ जगमोहीए जकाँ रूप बनि गेलैन। जिनगीक रूपो तँ जिनगीमे मनोरंजन करिते अछि। केतौ जुआनीक बीच हारल जीतल जुआनीक मनोरंजन बनैए तँ केतौ अस्सी बर्खक वृद्ध आठ बर्खक बेदरा बनि माइक शासक बनि शासनो करिते अछि जे हमरा फल्लां बौस खाइले नइ देमे तँ हम घरसँ भागि देशक सिपाही बनि बन्दूक चलबैले सीमापर चलि जेबौ...। दस बर्खसँ सुवासिनी नैहर नइ गेल छेली तँए नैहरक जिज्ञासा बढ़ब सोभाविके छेलैन। धीरेन्द्रसँ आगूक गप-सप्प करैक भार जगमोहीकेँ सुमझबैत सुवासिनी बजली- “बुच्ची, बहुत दिन नैहर गेना भऽ गेल, माइयो-बाप नहियेँ रहला जे नैहर रहत, मुदा परिवारो आ गामोक समाज तँ नैहरेक भेला, तँए जाइक विचार मनमे होइए।” ओना, जहिना-जहिना समाजिक परिवेश बनैए आ बदलैएतहिना-तहिना ओ हवा सभकेँ लगबो करैए। आ से सिर्फ प्रभावितेबेकतीकेँ लगैए से बात नहि, सभकेँ लगैए। तँए, परिवारमे तीनू बेटीक पालन-पोषण, पढ़ाइ-लिखाइ आ बिआह-दान करैक समस्या जहिना रामलखनकेँ छैन तहिना सुवासिनियोँकेँ छैन्हे। ओना, आन स्त्रीगण जकाँ सुवासिनी नहियेँ छैथ जे दुरगमनियॉं कनियॉं बनि जखन नैहरसँ निकलए लगली आ स्त्रीगण सभ जे दुनू परानीकेँ राजा-रानी बना विदा केलकैन, से अखनो अपनाकेँ बुझिते छैथ। सुवासिनी समझदार औरत छैथ, बेटा नहि रहितो बेटी सभकेँ अपन जिनगी जीबै-जोकर चेतनशील बनबै पाछू सभ दिन प्रयत्नशील रहली। अपन परिवारिक आर्थिको स्थितिकेँ नीक जकाँ बुझिये रहल छैथ, मुदा जिनगीक आगूक बाटपर नमहर खाधि सेहो देखिये पड़ि रहल छैन। परिवेशक बहैत हवामे सुगन्धक संग दुर्गन्धो तँ अछिए। ओ अछि जे बेटीकेँ जेतेक पढ़ाएब तेतेक बेसी खर्च बिआहोमे हेबे करत। जे कोंढ़ बनि समाजक करेजकेँ खोखैर-खोखैर खाइते अछि। की एकरा झुठलौल जा सकैए जे जइ बेटीकेँ पढ़बैमे माए-बाप अपन जी-जान लगा, अपन जीवनकेँ पछुअबैत बेटीकेँ नीक-सँ-नीक शिक्षा दइ छैथ,मुदा ओकरे जखन बिआह करैले समाजमे डेग बढ़बै छैथ तखनपहाड़बनि दान-दहेज हुनकर रस्तारोकै छैन की नहि? की समाजक लोक ऐ बातकेँ नहि बुझि रहल छैथ जे पढ़ल-लिखल सक्षम मनुखक आगमन परिवारमे भऽ रहल अछि, ऐठाम दान-दहेज केतेक महत् रखैए।मुदा परिवेश एहेन दूषित बनल अछि की नहि? समाजक बीच बनल परिवेशकेँ समाजे बदैल सकैए, तँए ओहन समाज निरमा कऽ ओइ परिवेशकेँ रोकि कऽ सुधारए पड़त वा बदलए पड़त। ओहन समाज बनत केना? प्राय: सभ समाजक बीच एहेन एकोटा परिवार नहि अछि जे बेटा-बिआहे बेर राजा आ बेटी-बिआहे बेर अपनाकेँ भिखमंगा नहि कहै छैथ। ओना, बजैकाल बजबो करिते छैथ जे ‘दान-दहेज’ पाप छी। ऐ लेल जहिना माता-पिताकेँ संयुक्तमोर्चा–परिवारिक रूपमे–बनबैक खगता छैनतहिना फुटा-फुटा दुनूकेँ अलग-अलग मोर्चा–माने पुरुखक अलग आ महिलाक अलग–बना अपनाकेँ ठाढ़ करए पड़तैन। तहिना सभ जनबो करै छी आ बजितो छीहे जे युवाशक्ति देशक भाग्य निर्माता होइ छैथ। जे खुद एहेन परिवेशक शिकार बनि चुकल छैथ। बनियेँ नहि चुकल छैथ, अबैबला पीढ़ी सेहो बनबे करत। ओना, अविकसित समाज रहने पहिनहिसँ अनमेल बिआह–वैचारिक स्तरपर–होइत आबि रहल अछि, मुदा आब जखन समाज आगू बढ़ल,तखनो जँ वएह विचारधारा बहैत रहततखन समाज समस्या मुक्त केना हएत? एक-एक जन जखन समस्या मुक्त हेता तखने ने देशक गति तेज हएत आ स्वतंत्रताक वास्तविक रूप परगट हएत। धीरेन्द्रसँ गप-सप्प करैक अधिकार माइयक मुहसँ सुनिते रंग-रंगक रंगीन रोशनी जगमोहीक मनमे जागए लगल। ओना, सभ विचारकेँ मनेमे दाबि जगमोही दोसर दिनसँ कौलेजक रीडिंग रूममे एक घन्टा धीरेन्द्रक संग पढ़ैक विचार मनमे रोपि लेलक। जहिना मिथिलाक सभ गाम अछि तहिना प्रेमनगर सेहो अछिए। आने गाम जकाँ प्रेमनगरमे सेहो साइयो देवी-देवताक पूजो होइते आबि रहल अछि आ मनतो अछिए। तहिना दर्जनो रंगक जातियो आ जाइतिक बीच फूट-फूट देवी-देवता सेहो अछिए। जइसँ रंग-रंगक बेवहारो आ विधि-विधान सेहो अछिए। सभ किछु रहितो जहिना परिवार-परिवारक बीच अपन-अपन बेवहार रहने कोनो-कोनो परिवार नीको अछि आ नीकक माइनसेहो अछिए तहिना धीरेन्द्रक परिवारक अपन खास बेवहारो आ विचारो अछिए। धीरेन्द्रक पिता–जीबेन्द्र–क विचार अखनो छैन्हे जे एकटा बेटा अछि, जँ तेकरो बिआहमे दान-दहेज लऽ बेच लेब, तखन अन्तिम संस्कारमे मुखाग्नि केकरासँ दियाएब? तैसंग अनका जकाँजीबेन्द्र ईहो नहियेँ मानै छैथ जे बेटा निमित्ते बिआहमे जेतेक बेसी नगद-नारायण गनाएब तेतेक बेसी इज्जतदार बनब। ओना, समाजमे किछु लोकक बीच जहिना एक दिस दहेज नहि लेबकेँ प्रतिष्ठा बुझल जाइए तहिना जेतेक अधिक लेब तेतेक नमहर प्रतिष्ठित बनैक विचार सेहो अछिए। पिताक प्रभाव धीरेन्द्रपर सेहो भरपूर पड़ल अछिए। जइसँ बिआहमे दान-दहेजक विचारेधीरेन्द्रक मनसँ मेटा गेल अछि। जइ परिवारमे दान-दहेजक बेवहार अछि तइ परिवारक विचारो आ बेवहारोमे अन्तर ओइ परिवारसँ अछिए जइ परिवारमे दान-दहेजक चलैन नहिअछि। भलेँ एक-दोसरकेँ किए ने निच्चोँ देखबए आ नीच कहबो करए। पॉंच बजे तक कौलेजक रीडिंग रूम खुजल रहैए। अपन निर्धारित समय अनुकूल रहने धीरेन्द्र रीडिंग रूम पहुँच चुकल छल। किछुकालक पछाइत जगमोही सेहो पहुँचल। संजोग एहेन बनल जे रीडिंग रूममे दोसर कियो आन विद्यार्थी नहि छल। एक तँ सुनसान जगह, दोसर पहिल दिन जगमोहीक रहनेपूछ-आछ करैक सम्भावना सेहो बनियेँ गेल छेलइ। तहूमे टटके काल्हि भेँटो-घॉंट आ किछु गपो-सप्प भेले छेलै जइसँ विचारो तरगरे रहइ। धीरेन्द्र लग पहुँच जगमोही बाजल- “अहाँक चर्च माइयो लग केने छेलौं।” माइयक नाओं सुनिते धीरेन्द्र चौंकल। चौंकल ई जेजगमोहीसँ किछु गप-सप्प भेला पछाइत जे मनमे प्रेमासिक्त विचार अंकुरए लगल छल ओ मात्र संगी-साथीक बीचक नहि रहि परिवारिक रूपमे बदलैक बाट पकैड़ रहल अछि! ओना, बेकतीगत विचार आ परिवारिक विचारमे किछु-किछु अन्तर सेहो रहिते अछि। मुदा जहिना केतौ-केतौ अन्तर अछि तहिना ईहो तँ निर्विवाद सत्य अछिए जे नद-नालाक पानि मिलि जहिना नदीक रूप बनैए तहिना परिवारोजनक विचार एकत्रित भेला पछातिये ने परिवारक विचारधारा बनैए। ओना, परिवारक जे रूप-रेखा अखन समाजमे बनि गेल अछि ओ एहेन विचारसँ दूर भइये गेल अछि, तेकर कारण सदियोसँ अबैत गुलामीक जंजीर अछिए। गुलामीक जंजीर एहेन सूत्रवत् बनि गेल अछि जे परिवार हुअ आकि समाज,सभठामबेकतीगत विचार ऊपर उठि गेल अछि आ सामुहिक विचार दबि कऽ निच्चाँ उतैर गेल अछि। प्रश्न अछि जे ओ–नीच-ऊँच–केना एकरस भऽ एकरसतासँ चलत? परिवार हुअ कि समाज आकि समाजक बीच जे परिवार अछि सेजाधैरएकरस भऽ एकरसता नहि धड़तताधैर जिनगी बेठेकान चलबे करत, जइसँ जिनगीक सभ सीढ़ी बेठेकान भइये जाएत। जखन जिनगीक ठेकानेनहि रहत तखन मनुखक जिनगी केहेन हेबा चाही एकर कल्पनो तक असम्भवे रहत किने। जगमोहीक बात सुनि धीरेन्द्र बाजल- “ओना, अखन हम नीक जकाँ नहि बुझि रहल छी मुदा...।” ‘मुदा’क पछाइत धीरेन्द्रक मनमे उठल जे जँ अखन जगमोहीक माएकेँ बहिनमानि सम्बोधित करब तखन जगमोही स्वत: निच्चाँक खाड़ीमे उतैर जाएत। जखने निच्चाँक खाड़ीमे उतरत तखने दुनू गोरेक बीचक जे एकरूपताअछि ओ बाधित हेबे करत। ‘मुदा’क पछाइत धीरेन्द्रक चुप्पी देख जगमोही अपनविचारक खोंरना चलबैत बाजल- “मुदा की?” ओना, साएसँ ऊपरेकुरसी-टेबुल सजल अध्ययन कक्ष अछि,तँए नमगर-चौड़गर-पेटगर अछिए। जइसँ दू गोरेक बीचक बातक ध्वनि हेराएले रहत, तहूमे मात्र दुइए बेकती अछि। बॉंकी जे तीन आदमी–पुस्तकालयक कर्मचारी–छैथोओ सभऑफिसेक काजमे लागल छैथ। जगमोहीक प्रश्न सूचक बात सुनि धीरेन्द्र अपनाकेँ चौकन करैत अपनमनक विचारकेँ बदैल बाजल- “अहाँक डेट ऑफ वर्थ की अछि?” जगमोही बाजल- “एगारह फरवरीकेँ बीस बर्ख पुरि गेल आ अहाँक?” जगमोहीक प्रश्न सुनि धीरेन्द्र मुस्की दैत बाजल- “हम हारलौं, अहाँ जीतलौं!” धीरेन्द्रक मुहसँ ‘हारि-जीत’ सुनि जगमोही चौंकल। चौंकिते मनमे उठलै- अखन तँ परीक्षाक घड़ी पछुआएले अछि तैबीच कोन परीक्षा भऽ गेल जे दुनू गोरेक बीच हारि-जीतक निर्णय भऽ गेल! धीरेन्द्र मनमे मुस्की भरैत जे विचारक सरोवरमे जगमोही वौआएल अछि। ओना, एकरा वौआएब नहि कहल जा सकैए। वौआइत तँ लोक ओतए अछि जेतए नाम-ठेकान रहितो जगह हेराएल रहैए। मुदा ऐठाम से नहि अछि। धीरेन्द्र जँ अपन जन्म तिथि खोलि निर्णय सुनौनेरहैत आ जगमोही नहि बुझैत तखन ने जगमोहीक वौआएब होइत, से तँ छिपा कऽ धीरेन्द्र अखन मनेमे रखने अछि।..जगमोही बाजल- “आपमौजी जहिना दुनियोँ अछि तहिना दुनियॉंक लोको तँ अछिए, अपन-अपन विचारे सभ दुनियोँ देखैए आ अपने-अपने विचारे बजबो करैए, जइसँ केतौ बजड़बो करैए आ केतौ बजाड़ितो अछिए।” जहिना अनठेकानल वाण धीरेन्द्र चलौने छल तहिना जगमोही सेहो चला धीरेन्द्रक करेजकेँ बेध देलक। अपन वेधाइत विचारसँ प्रभावित होइत उनटा चालि–पाछू मुहेँक डेग–पकैड़ धीरेन्द्र बाजल- “ऐबेर प्रेमनगरमे खूब आम फड़ल अछि, चलू सभकियो संगे आम खाइले।” ‘प्रेमनगरक आम’ सुनिते जगमोहीकेँएकाएक बारह बर्ख पहिलुका खेलहा आम मन पड़लै,बाजल- “नानाक गाछीक ओहन सिनुरिया आम खेने छी जेकर खोंइछा पानोसँ पातर आ सुआद कपूरोसँ नीक रहइ।” धीरेन्द्रक आम जगमोहीक गुलाबखास भऽ गेल। धीरेन्द्र बाजल- “कहने जे छेलौं जे अहाँ जीत गेलौं आ हम हारि गेलौंसे बुझलिऐ?” जगमोही- “नइ!” धीरेन्द्र- “जहिना अहाँक जन्मतिथि एगारह फरबरी अछि तहिना हमर एगारह जनवरी अछि। अहाँसँ एक मास जेठ भेलौं ने?” बिच्चेमे जगमोही मुड़ी डोलबैत बाजल- “हँ से तँ भेबे केलौं।” जगमोहीक स्वीकृति सुनिते धीरेन्द्र धॉंइ-दे बाजल- “एक मास जेठ रहितो हमहूँ ओतइ ने छी जेतए अहाँ!” जगमोही- “की मतलब?” धीरेन्द्र- “मतलब यएह जे जेठ रहितो हमहूँ ओही क्लासमे पढ़ै छी किने। तँए कहलौं जे एकमास हमर हारल भेल अहाँक जीतल भेल।” जहिना ताशक गेम-गेम खेलमे नहलापर दहला आ बीबीपर बादशाह फेक मारल जाइए तहिना धीरेन्द्रपर अपन विचार फेकैत जगमोही बाजल- “एकर तँ दोसरो पक्ष अछिए किने। जहिना अहाँ अपनाकेँ हारल मानि रहल छी तहिना ने हमहूँ अहाँसँ एक मास हीनभेलौं आ अहाँहमरासँ श्रेष्ठ भेलौं।” जगमोहीक विचार सुनि धीरेन्द्र ठमकल। ठमकल ई जे जगमोहियोक कहब अनर्गल नहियेँ अछि। ताशोमे तँ अहिना होइते छै जे केतौ दहलाक नहला मारैए तँ केतौ बीबीक अभावमे बादशाह बेमौत मरैए। मुदा प्रश्न तँ बीचमे उठिये जाइए जे जँ दुनू पक्षक तर्क अकाट्य हुअए तखन निर्णयक रस्ता की हएत?अपन ओझराएल मनक विचारक बनमे धीरेन्द्रकेँ एकटा ओहन वृक्ष देखाए पड़लै जे नम्हरो आ पुरानो अछि। बाजल- “एकटा बात कहू ते जगमोही, अखन तकलोकक मनमे किए एहेन धारणा बनल अछि जे लड़का-लड़कीक वैवाहिक सम्बन्धमे लड़कीसँ बेसी उमेरगर लड़का हेबा चाही?देखै छी सालक-साल अधिक उमरदार लड़काक संग सम्बन्ध स्थापित होइत आबि रहल अछि। अहाँ एकरा की बुझै छी?” धीरेन्द्रक विचार जगमोही नीक जकाँ नहि बुझि पएल तँए प्रश्नकेँ सूत्रखोल करैत बाजल- “की मतलब?” अपन विचारकेँ स्पष्ट करैत धीरेन्द्र बाजल- “ओहुना गाम-समाजमे देखै छी जे कोनो परिवारमे पुरुख अधिक उमेर तक जीबै छैथ आ कोनो परिवारमे नारी अधिक उमेरगर भऽजीब रहल छैथ, तँए उमेरक हिसाबसँ दुनू एकरंगाहे भेल किने?” जगमोही- “हँ, से तँ भेबे कएल।” धीरेन्द्र- “तखन किए कम उमेरक लड़कीकेँ अधिक उमेरक लड़काक संग बिआह होइए?” धीरेन्द्रक विचारमे जगमोही हेरा लागल मुदा एक क्लासक संगी रहने मनमे थोड़ेक ग्लानि तँ जगबे केलै जे धीरेन्द्रक प्रश्नक उत्तर नइ दए पाबि रहल छी। मुदा लगले मन कलैश उठलै। कलैशते मनमे भेलै जे अखन दुइये गोरे ने छी, ओहुना दू गोरे जँ कोनो विचारक विनिमय इमानदारीसँ करए तँ निर्णयो इमनगर हेबे करत...। तैबीच धीरेन्द्रक मनमे सेहो उठलै जे अखन तक जहिना हम कोर्सक किताबमे अपन बुधिकेँ घेर रखने छी तहिना ने जगमोहीक सेहो घेराएले छइ। तैबीच एहेन चर्चे कोन अछि जेकरा जगमोहीक चूक मानल जाए? विचारक बीच सिमानपर अबिते धीरेन्द्रक मन बिहुसल,बिहुसिते धीरेन्द्रक मुँहपरमहसूस कएल मुस्कान छिटकए लगलै। धीरेन्द्रक मुस्की भरल मुस्कान देख जगमोही बाजल- “ऐबेर मातृकक आम खेबे करब।” धीरेन्द्र- “असगरे नहि, तीनू बहिनक संग मतो-पिताकेँ लऽ चलियौन।सभकियो संगे प्रेमनगरक आम खाइ, ई हमर विनम्रआग्रह।” शब्द संख्या : 3553, तिथि : 17 अगस्त 2018 3. चारिम दिन पढ़ा कऽ कौलेज बन्द हएत। मास दिन जहिना सभ साल कौलेज बन्न होइए तहिना अहूबेर हएत। अमैया छुट्टी आमक गाछीमे बीतत..!ई बात जहिना जगमोहीक मनमेतहिना धीरेन्द्रोक मनमे नचैत रहइ। अखनुक शिक्षण संस्थान सभ जकाँ पहिने नइ होइ छल। माने ई जे जहिना लोअर प्राइमरी हुअ कि मिडिल स्कूल, हाइ स्कूल हुअ आकि कौलेज, सभ संस्थानक अपन-अपन छुट्टीक निर्धारित समय छल। जहिना सभ कौलेजमे एक्के दिनसँ एकेरंग छुट्टी होइत छल तहिना हाइयो स्कूल, मिडिलोआलोअर प्राइमरियो स्कूलमे एक्के दिनसँ एक्केरंग छुट्टी होइत रहइ। ओना, सालक हिसाबसँ कौलेजमे बेसी छुट्टी होइ छेलै, तइसँ कम हाइ स्कूलमे आ तहूसँ कम मिडिलआ लोअर प्राइमरी स्कूलमे अवकाशक समय छल। मुदा किछु छल तैयो तँ अपना-अपनामे एकरूपता छेलैहे। अखुनका जकाँ तँ नहि, जे कोनो संस्थानमे छुट्टी बीत जाइए तखन कोनोमे शुरूए होइए। सभ स्कूलक अपन-अपन नियम छइ। ओना, नियम तँ कोनो संस्था अपन बनाइये सकैए आ बनैबतो अछिए, मुदा जे छुट्टी जइ निमित्ते होइए ओकरो तँ अपन महत् छइहे। जेना-गरमीए छुट्टी लिअ। एकरो अपन आधार अछि किने, जे जखन बहुत बेसी समय गर्म भऽ जाइए जइसँ पढ़ाइ-लिखाइक काजमे बाधा उपस्थित हुअ लगैएतखन छुट्टी होइए। ओना, कौलेजसँ लऽ कऽ नर्सरी स्कूल तकक छुट्टीमे एकरूपता नइ होइक कारणो अपन-अपन अछि। पहिने सार्वजनिक रूपमे, माने सरकारी स्तरपर स्कूल-कौलेज अधिक मात्रामे संचालित होइत रहैमुदा अखन सार्वजनिक संग-संग बेकतीगत, माने निजी स्तरपरबेसी संचालित भऽ रहल अछि। ओहूमे विचार-विचारक रूप सेहो अपन-अपन अछि। सार्वजनिक रूपमे जे शिक्षण संस्थान सभ चलि रहल अछि, ओ रंगगर मकानमे जरूर चलि रहल अछि मुदा पढ़ाइ-लिखाइक जगहबेसी खेनाइ-पीनाइ आ स्टायपेन मात्र रहि गेल अछि। तहिना निजी जेशिक्षण संस्था अछि ओ भिन्न-भिन्न सम्प्रदायसँ जुड़ल रहलाक कारणे अपन-अपन आचार-विचार आ बेवहारसँ प्रभावित भइये गेल अछि, जइसँ एक-दोसराक बीच दूरी सेहो बनियेँ रहल अछि। तैबीच आरक्षण सेहो अछिए। सार्वजनिक संस्थामे जे आरक्षण अछि ओ जाति-आधारित अछि, जइसँ किछु खास जातिक किछु खासपरिवारकेँ लाभ जरूर भऽ रहल अछि मुदा सामूहिक रूपक अभाव तँ अछिए। तहिना प्राइभेट संस्थामे पाइक (डोनेशन) आरक्षण भेने पाइबला आरक्षित भइये गेल अछि। तहू पाइबलामे एकरूपता नहियेँ अछि। मोटा-मोटी तीन श्रेणीक आरक्षण अछि। अधिक पाइबला, मध्यम पाइबला आ निम्न पाइबला लेल जहिना डोनेशन अछि तहिना संस्थाक बेवस्थो छइहे। जइ कौलेजमे धीरेन्द्रक चारिम बर्ख अछि तेहीकौलेजमे जगमोहीक सेहो चारिम बर्ख छी। दुनू संगे-संग पढ़ितो रहल आ पढ़ितोअछि, मुदा अपनामे गप-सप्प नइ भेने ने दुनूक बीच चीन-पहचीन भेल आ ने एक-दोसरकेँ कियो बुझिये-गमि सकल,तँएदुनूक बीचक सम्बन्धमे कोनो तरहक जागरण नहिआएल। जहिना धीरेन्द्रकेँ साइयो छात्रक बीच जगमोही मात्र एकसहपाठी बुझैत तहिना जगमोहियोकेँ धीरेन्द्र बुझैत। शिक्षण संस्थान तँ तीर्थे स्थान जकाँ अछिए, जेतेक दिनक कामनाक संग शिक्षार्थी एतए पहुँचैए ओते पुरला पछाइत अपन-अपन घर-परिवारक सुधि लइए। मुदा काल्हि जखनसँ जगमोही आ धीरेन्द्रक बीच गप-सप्प भेल,चीन-पहचीन भेल तखनसँ दुनूक जिनगीमे एक नव चेतनाकेँ जगने जीवन-जागरण सेहो हुअ लगल। तहूमे जखन धीरेन्द्र मास दिनक भार उठा जगमोहीकेँअपना गाम चलैले आमंत्रित केलक तखनसँ किछु आरो जवाबदेही बढ़िये रहल अछि। ओना, धीरेन्द्रक गाम जगमोहीक मातृकोछिऐहे, तँए दुनूक बीच प्रेमाकर्षण सेहो बढ़िये रहल अछि। जइसँ जहिना धीरेन्द्र तहिना जगमोही अपन-अपन मनसागरमे हिलोरोलइये रहल छल। अध्ययन कक्षसँ निकलला पछाइत कौलेजक अन्तिम गेटपर,जैठामसँ दुनू दू दिस हएततैठाम-पहुँच जगमोही बाजल,“काल्हि फेर भेँट हेबे करब..!” जगमोहीक आग्रह सुनि धीरेन्द्र आग्रहित होइत बाजल- “जँ कोनो बेवधान नइ उपस्थित हएत तँ जरूर अही समयमे अहीठाम भेँट हएब।” ओना, जगमोहीक मनमे ईहो उठैत रहै जे अखन डेरा पहुँचैमे अबेर नहियेँ भेल अछितँए धीरेन्द्रक डेरा तक जाइ, मुदा धीरेन्द्रक मनमे चारिम दिनक छुट्टी आ गाम जाइक तैयारी नाचि रहल छेलइ। मास दिन गाममे रहब, तैबीच कौलेजो बन्ने रहत तखन अनेरे पटना किए आएब। तँए ऐठामक सभ काज निपटा कऽ जाएब...। काजक बढ़बारिसँ धीरेन्द्रक मन दबाएल छल जइसँ जगमोहीकेँ डेरा चलैक आग्रह नहि कए सकल। कर्मे ने धर्मक सृजदाता छी,तँए जिनगीक लेल कर्मकेँ गसिया कऽ पकड़ला पछातिये ने किछु भेटैक सम्भावना बनैए। गप-सप्प केतौ पड़ाएल थोड़े जाइए, तहूमे भरि मास एकठाम हेबे करब...। जहिना काजक सुढ़ियाएल लोक बिना किछु बजने-भुकने अपन काजमे पील कऽ पड़िजाइ छैथ तहिना धीरेन्द्रोअन्तिम गेटपर गेला पछाइतोअपन डेगकेँ बिनु छोट केनहि डेरा दिस बढ़ि गेल। जगमोहीक मुहेँ जखनसँ सुवासिनी धीरेन्द्रक विषयमे सुनलैन तखनसँ मनमे आशाक पातर-छीतर ज्योति छिटकए लगल छेलैन। ज्योति ई छिटकए लगल छेलैन जे दुनियॉंमे अवलानारीक दुखहर्त्ता तँ पतिये वा भाइये ने होइ छैथ, से जखन भेट रहल अछि तखन अवसरकेँ छोड़ब नेनमति हएत। जगमोहीसँ पहिनहि सुवासिनी बजारक काज सम्हारि डेरा पहुँच, डेरोक जे काज छेलैन सेहो सभ अगुआ नेने छेली। जगमोहीकेँ डेरा पहुँचते सुवासिनी पुछलखिन- “बुच्ची, धीरेन्द्रसँ भेटोँ भेल छेलह?” ओना, जगमोहीक चिताकर्षण धीरेन्द्रक प्रति नव सिरासँ बढ़िये रहल छल, तैबीच मातृकक सम्बन्ध आ माइक जिज्ञासा आरो पॉंखि जोड़ि देलक। एक तँ ओहुना कौलेजक संगी सबहक सम्बन्ध गमैया वातावरणक अपेक्षा बहुत अगुआइये गेल अछि जइसँ, तैसंग शहरी वातावरणमे अनेरो बहुतो एहेन ग्रामीण शंका सभ अछि जे मेटाएल जा रहल अछि। अपनाकेँ समरस करैत समरसताक बाट पकैड़ जगमोही कहलकैन- “आने दिन जकाँ धीरेन्द्र आइयो क्लासो आएल छल आ रिडिंग रूपमे सेहो छल। जगमोहीक बात सुनि सुवासिनीक मन एकाएक अन्तर्धियान भऽ गेलैन। अन्तर्धियान होइते मनमे उपकलैन- जहिना दुनियॉंमे प्रत्येक पुरुखकेँ नारीक बीच सम्बन्ध बनौल जाइए तहिना प्रत्येक नारीकेँ सेहो पुरुखक बीच सम्बन्ध बनौले जाइएजइसँ सृष्टिक रचना होइए। ओना, मनुखक सघन वनमे जहिना असंख्य पुरुख अछि तहिना असंख्य नारियो अछिए मुदा केहेन नारीकेँ केहेन पुरुखक संग सम्बन्ध स्थापित करक चाहिये, ई विचार तँ प्रबुद्धजने ने करैत रहलाअछि, जे समाजमे समाजिक रेबाज बनि गतिशील सेहो होइत रहल अछि। मुदा भैयारीक सम्बन्ध तँ प्रकृति प्रदत्त अछि। एक माइक कोखिसँ निकलल सन्तानक बीच जहिना भाए-भाए वा भाए-बहिनक बीच भैयारीक सम्बन्ध उठि कऽ ठाढ़ होइए तहिना आनक संग भलेँ से नइ हुअ, मुदा बेवहारिक रूपमे अनेको दिशा-बाट तँ ओहन अछिए जइसँ भैयारीक सम्बन्ध स्थापित होइतआबि रहल अछि। ओना, सभ मनुखकेँ अपन-अपन सोभाव होइते छैन, जइसँ सम्बन्ध स्थापित होइमे अनेको रूप-रंग अछिए। मुदा से अखन नहि, अखन एतबे जे सुवासिनीक मनमे जे बेरपड़ल समस्या उठलैन से...। पतिक ओहन कमाइ नहि छैन जइसँ परिवेशक अनुसार परिवार चलबैत तीनू बेटीकेँ समुचित स्थानमे बिआह कऽ सकती।रामलखनकेँ सीमित दरमाहा छैनजइसँ परिवारक खेनाइ-पीनाइ, लत्ता-कपड़ा पुरबैत कोनो-धरानी बाल-बच्चाकेँ पढ़बै-लिखबै छैथ। शुरूमे मात्र जगमोहीक कौलेजक खर्च छेलैन, आब जखन जगमोही कौलेजक पढ़ाइ पूरा करत तखन दुनू छोट बेटी एकाएकी कौलेजमे प्रवेश करतैन। तैसंग जगमोहीक बिआह करब सेहो रामलखनक आगूमे छैन्हे। सुर्यास्त भेला पछाइत जहिना हलकाएल-फलकाएल अन्हार धीरे-धीरे करिखाएल-कजरियाएल राति भऽ जाइए, जइसँ हाथ-हाथ देखब कठिन भऽ जाइए तहिना सुवासिनीक आगूमे परिवारक समस्याधीरे-धीरेकजरियाएलराति जकाँसघन भऽ गेलैन। मुदा सुवासिनी अपनाकेँ संयमित करैत जगमोहीकेँकहलखिन- “बुच्ची,बाबू ड्यूटीसँ अबै छथुन।अपनेसँ कहियौन जे ऐबेर अमैया छुट्टीमे मातृक जाएब। जखने एकबेरगप उठत तखने रंग-रंगक अनेको गप उठबे करत, अन्तोअन्त किछु-ने-किछु निर्णयो भइये जाएत।” ओनातँनव परिवेशक उपजल जगमोहीअछिए,जे समाजिक परिवेश देखलो पछाइत अनभुआरे अछि, मुदा अनेको रंगक हवा-पानि लगितो रहल छै आ देखियो रहलेअछि। मुदा विचारधाराक अभावक चलैत ई नहि बुझि पेब रहल अछि जे अपन जिनगीक धार कोन दिशामे,कोन मुहेँ बहत। बुझब असानो नहियेँ अछि, किएक तँ जहिना रंग-रंगक रंगीनी दुनियाँ देख रहल अछितहिना रंग-बिरंगक विघटनोतँ देखिये रहल अछि। छअ बजैत-बजैत रामलखन डेरा पहुँचला। पत्नीक मन खनहन आ मुँहमे मुस्कान देख पड़लैन। कपड़ा खोलि टंकीपर जा कऽ मुँह-हाथ धोइते छला कि चाह नेने सुवासिनी पहुँच गेलैन। होइतो अहिना छै जे जखन विचारमे लग्नरूपता आबए लगै छै तखन काजमे सेहो क्रियमान आबिये जाइ छइ। ओना, मोटा-मोटी साल भरिसँ रामलखनक मनकेँ कन्यादान पकड़नहि छैन जइसँ सदिखन मन बिचैरते रहै छैन। ओना, रामलखन अपन मनकेँ मना लइ छैथ जे जेते तक सम्भव हएत तेतबे तकक ने काज करब। माने जेते ओकाइत रहत तेतबे खर्च करि ने बेटीक बिआह करब...।मुदा तैयो रामलखनक मन असथिर नहि भऽ पबै छैन,अनेको प्रश्न मनमे बिचैरते रहै छैन।अपन विचारानुसार अपन कन्याकेँ जँ उचित जगहपर ठौर दियौ चाहबतँ की अपनेटा विचारसँ से सम्भव अछि? जैठाम दू परिवार, दू माता-पिता, दू लड़का-लड़कीआदू समाजक बीचक प्रश्न अछितैठाम असगर लोक की कऽ सकैए..?अहीविचारक बीच रामलखनक मन तरेतर आक्रान्त रहै छैन। मुदा ने परिवारमे दोसर कियो उपारजन कर्त्ता छैन, जिनका संग रामलखन विचार-विनिमय कऽ सकता आ ने कियो संग पुरैबला संगी छैन। तँए रामलखन अपन मनकेँ समेटनेछला। आधा कप चाह पीला पछाइत रामलखनक मनमे जखने कनी तजपन एलैनकि नजैर उठि सुवासिनी दिस बढ़लैन। नैहरक विचार सुवासिनीक मनमे जगल रहबे करैन, बजली- “ऐबेर अमैया छुट्टी प्रेमेनगरमे बिताएब।” ओना, प्रेमनगर रामलखनक सासुर, सुवासिनीक नैहर आ जगमोहीक मातृकोछीहे मुदा से नहि,रामलखनअपन मनकेँ बहलबैत अमैया छुट्टीकमाने ‘सहरगंजा अवकाश’ आ प्रेमनगरक माने ‘बाल-बोधसँ प्रेम करब’ मानि बजला- “सभ चाहैए जे सहरगंजा अवकाश प्रेमेनगरमे बिताबी मुदा से पहिने प्रेमनगरकेँ जानि-पहचानि ओइ दिस बढ़त तखन ने बसैत-बसैत ओकर बशिन्दा बनत।” पतिक बात सुनि जहिना सुवासिनी अकचकाए लगलीतहिना जगमोही सेहो अकचकाएल। दुनूकेँ अकचकाइक अपन-अपन कारण, अपन-अपन विचारे उपकल। ओना, जहिना पोखैरमे मलाह पहिने छोटका जाल फेक माछक अनुमान लगबैए तहिना रामलखन सेहो विचारक जाल फेक बेटियो आ पत्नियोक वौद्धिक अनुमान लगबैक परियास केने छला,मुदा से ने जगमोही बुझलक आ ने सुवासिनीए बुझि सकली। बॉंकी दुनू छोट बेटीतँ सोल्होअना सुनैयेवाली छल, प्रश्नोत्तरीसँ मतलबे कोन छेलै जे हरखे आकि विसमाइये होइतै।जगमोहीक मनमे ई जरूर उठलै जे पिता जे किछु बजला ओ प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूपे जिनगीए लेल बजला। किएकतँ पिता ने हमरासँ चौल करता आ ने ओहन कोनो अनसोंहंतगर बाते बजता जइसँ परिवारकेँ कोनो तरहक अवघात हएत। तँएपिताक विचारकेँजगमोहीमने-मन घोंटैतआगूक बात सुनैले कान ठाढ़ केने छल। जखन सभ कियो एकठाम बैस परिवारेक गप-सप्प करै छी तखन पिताजी जे बजला आ नइ बुझि पेलौं तँ दोहरा कऽ पुछियो तँ सकै छिऐन।मुदा सुवासिनीक मनमे से नहि भेलैन। हिनका मनमे उठलैन जे पति-पत्नी मिलि परिवारक गाड़ीक खींच रहल छी, जँ गाड़ीक एकटा पहिया कमजोर रहत तँ रस्तामे केतौ टुटि सकैए वा लसकियो तँ सकिते अछि...। ओना, रामलखनक मुहसँ विचार खसने चुपा-चुपी पसरिये गेल छल, मुदा से सुवासिनीकेँ नीक नहि लगलैन। परिवारक सभ कियोसभ दिससँ भरि दिन भ्रमण केला पछाइत अखन एकठाम भेलौं हेन आ तैयो जँ सभ चुप्पे-चुप रहि जाएब तखन परिवारक भरि दिनक गति-विधिक जानकारी केना हएत? जिनगी तँ जिनगी छी, ई तँ नहि जे जहिना चिड़ै मारनिहार व्याधा जिनगी भरि चिड़ैक मारि-मारि चरौर केलक आ अपने जखन मृत्यु सजियापर पड़ल तखन मनमे एका-एकी जिनगी भरिक सभ चिड़ै आबि-आबि अपन हिसाब पुछए लगए! जिनगी तँ जिनगी छी,एकर तँदिन-दिनक हिसाब-बाड़ी फरिछबैत चली। ने बॉंचत बाइस आ ने खाएत कुत्ता। लूटि कऽ आनू कूटि खाउ,परात भने लूटै-कुटैले बुलन्दीसँ फेर जाउ..! चुपा-चुपी देख सुवासिनीकेँ नइ रहल गेलैन। पतिपरनजैर चढ़बैत बजली- “ई तेने बुझि पड़ैए जे ऑफिसमे सरकारक अंग बनि बजै छी!अखन परिवारमे छीतँए परिवार जकाँ परिवारसँ सम्बन्धित बात-विचार जखन बाजब तखने ने परिवारोसँ उत्तर पेबैक आशा करब।” सुवासिनीक मुँहक बात जगमोही सेहो एकस्वरे धियान लगा सुनि पिता दिस देखए लगल। पत्नीक संग जेठ बेटीक एकसंग चारि आँखि अपनापर पड़िते रामलखन सचेत होइत बजला- “सभ कियो परिवारमे छी, बुझिते छिऐ जे परिवारक गाड़ी अनवरत चलैबला छी,तँए ऐमे छुट्टी-छाट्टीक प्रश्ने ने अछि, अमैया छुट्टी हुअकिदुर्गापूजाक,मुदा ओ तँ स्कूल-कौलेजक छुट्टी भेल। हँ, सभ बहिनकेँ जरूर महिना दिनसँ ऊपरेक छुट्टी हएत, मुदा हमरा तँ एको दिनक छुट्टी नइ हएत। सी.एल. सेहो गनले दिनक भेटैए, तखन अमैया छुट्टी केना सभ मिलि प्रेमनगरमे बिताएब?” पतिक बात सुनि सुवासिनी, जवाबदेहक हैसियतसँ बजली- “बहुत दिन नैहर गेना भऽ गेल, नारीक नारीत्व तँ तखन ने उभरै छै जखन नैहर-सासुरक बास होइत रहल। जाबे तक बेटीक बिआह नइ भेल रहै छै ताबे तक नैहर आकि सासुरे थोड़े पनपैए। ओ तँ बिआहक पछाइत, दोसर समाजक बासीबनैक क्रमसँ शुरू होइए। फुलकुमारीकई बारहम बर्ख छी...।” नैहरक बातसँ अलग होइत फुलकुमारीक नाओं सुनिते रामलखन बिच्चेमे बजला- “जाबे धरि माता-पिता जीबै छलाताबैये धरि ने नैहर छल, भाए-भौजाइ अपन नैहर-सासुर देखत कि उजड़ल-उपटल बहिन-बहनोइकेँ देखत..!” ओना, पतिक बात सुनि सुवासिनी ठमकली। ठमैकते मनमे अनासुरती उठलैन जे एक हिसाबे तँ पति उचिते कहि रहला अछि,नैहराक परिवारो तँ एहने बनि गेल अछि। मुदा अपन माए-बापक बासभूमिकेँ सुबास नहि मानि कुबास मानि ली, सेहो केते धरि उचित हएत? सुवासिनीक मन भीतरे-भीतर–माने विचारक बीचो-बीच–फरफराए लगलैन। एक दिस मौजूदा परिवारकेँ तँ देखते छेली,दोसर दिस अपन बीतल जिनगीक परिवार सेहो आँखिक आगू आबि ठाढ़ भऽ गेलैन। सुवासिनी सकपकाए लगली। माइक सकपकाइत मनकेँ टोबि माता-पिताक बीच सामंजस करैत जगमोही बाजल- “बाबूजी, ओनाअखन हम मातृकक हिसाबसँ धीरेन्द्रकेँ नहि जानि रहल छिऐन, मुदा ओ कौलेजक क्लासक संगी छिया, संगे-संग कौलेजोक क्लास करै छी आ ट्यूटोरियल-क्लासमे सेहो संगे रहै छी, वएह कहलैन जे ऐबेरक छुट्टी प्रेमेनगरमे बिताउ।” जगमोहीक बात सुनि रामलखन सहमला। सहैमते विचारमे मधुरस जगलैन। मधुरस जगिते विचार मोड़ लेलकैन। मोड़ लइते मनमे अनेको प्रश्न उठलैन। जँ पत्नीकेँ नैहर नहि रहतैन तखन अपन सासुर आ बाल-बच्चाकमातृक केना होइत? माता-पिताकेँ मुइने भलेँ समधियौर तर पड़ि गेल, मुदा ऐगला पीढ़ी लेल नाना-नानी, मामा-मामी आ भाए-भौजाइक गाम तँ रहबे करत किने? रामलखनकेँ पाछू दिस विचड़ैत देख बिच्चेमे सुवासिनी चिल्होरि जकाँ झपटैत बजली- “नैहर आ सासुर बेक्त-विशेषक नइ होइए, ओ मतो-पिता आ साउसो-ससुरक समाज होइए।” ओना, जगमोही तीनू बहिनकेँ ‘नैहर-सासुर’ तँ सुनल-बुझल छेलैहे मुदा ‘माता-पिता आ सासु-ससुरक समाज’ ने सुनल छेलै आ ने बुझले रहइ, तँए तीनू बहिनकेँ बुझैक जिज्ञासा एकाएक जगलै। ओना, तीनू बहिनक जिज्ञासा अपना-अपना बुधिक हिसाबे तीन रंगकभऽ गेल। जगमोहीकरहै-जखन मते-पिता दुनू समाजक करता-धरता छैथ तखन दू बेवस्थाक बीचक समाजमे की अन्तर अछि? फुलकुमारीक मनमे उठल- एकटा भेल ‘बपहर’ आ दोसर भेल ‘ममहर’, तखन दुनू समाज दू केना भेल? मुदा बाल मन फुलकुमारीक, तँए एकरा मनमे उठल-जखन ननो-नानी मरि गेलाआददो-दादी मरिये गेला तखन नाना-नानी आ दादा-दादीक खिस्सा-पिहानी केना सुनब? अपनाकेँ समगम होइत रामलखन समरस भऽ समरसतासँ बजला- “एक परिवारमे सभ रहितो सभरंगक जिनगीमे आबद्ध छीतँए सबहक बीच एकरूपतो अछि आ बहुरूपतो अछि। अही एकरूपता आ बहुरूपताक बीच सामंजस करैत चलब नीक।” ओना, रामलखन बहुत आगू बढ़ि अपन विचार रखलैन। मुदा सुवासिनीक मनमे जे नैहर-सासुरक समाजक बीचक अन्तर आकि दूरी अछि, तहीमे घुरियाइत रहैन। होइ छेलैन जे कखन अपन नैहरकेँ सासुरक बरबैरसमाजमे स्थापित कऽली। खाएर जे किछु.., मुदा रामलखनक विचारकेँ जेतेक जगमोही कनखैरकऽ सुनि बुझलक ओतेक सुवासिनी नहि बुझि पेली। तेकर कारण ई भेल जेसुवासिनीकेँ अपन नैहर-सासुरक विचार तेना मनकेँ पकैड़ नेने छेलैन जे कनसोहे बन्न भऽ गेल रहैन। मुदा धड़फड़ाइत बिच्चेमे सुवासिनी बजली- “जहिना अपन माए-बापक समाज तहिना दोसरोक माए-बापक समाज समाजे भेल। अही बीच परिवारसँ उठि समाजिक सरोकार बान्हैत एक नहि अनेको अंगीतकेँ सिरजन कएले जाइत अछि।” ओना, जहिना जगमोही माइयक विचार सुनलक तहिना रामलखन सेहो सुनलैन मुदा विचारकेँ आगू नहि बढ़बैत, बजला- “एक तँ ओहुना, बिनु बजेनौंमातृक आ नैहर लोक जाइते अछि, मुदा नौतो-हकार आ आग्रह-जिज्ञासाक तँ अपन महत् होइत अछि किने।” रामलखनक ऐ विचारसँ सबहक बीचक गप-सप्पक वातावरणमे एकाएक जेना मधुमास आबि गेल।थोड़ेकाल धरि चुप रहि सुवासिनी बजली- “जगमोही,तोहर कौलेज कहियासँ बन्न हेतइ?” जगमोही बाजल- “चारिम दिनसँ।” बिच्चेमे रामलखन बजला- “केतेक दिन छुट्टी रहतह?” जगमोही- “एक मास सात दिन तक।” रामलखन- “सात दिनकेँ आगू-पाछू करैत काटि दहक, बॉंकी एक मास जे बँचलह तइमे मातृकसँ भऽ आबह।” सुवासिनी- “हम सभ माय-धी जाएब, मुदा आनै-पहुँचाबैक भार तँ अहाँ लेब किने?” रामलखन- “तीन दिनक पछाइत रबि पड़ैए, रबि दिन पहुँचा कऽ प्रात भने चलि आएब आ तीस दिन जहिया पूरत, जँ ओइ दिन रबि वा छुट्टी नहियोँ रहत तैयो सी.एलो लऽ कऽ पहुँच आनि लेब सएह ने?” मुड़ी डोलबैत सुवासिनी बजली- “हँ।” शब्द संख्या : 2484, तिथि : 22 अगस्त 2018 4. कौलेज बन्न होइते धीरेन्द्र गाम जाइक तैयारी कऽ लेलक।आइ तीन-चारि दिन पहिनहिसँ तैयारीमे जुटल छल। मुदा जहिना अपनो मास दिनक छुट्टी बितबैले निचेनसँ जाएत तहिना परिवारक जे पटनाक काज छेलै सेहो सभ सम्हारने जाएत। पटनामे रहितो धीरेन्द्र अपनाकेँ प्रेमनगरिये बुझैए, पटनियॉं नहि। तेकर कारण अछि जे धीरेन्द्रस्पष्ट बुझैए- पटना पढ़ैले आएल छी,विद्यार्थी छी,नहि कि ऐठामक बासी छी। बासी छी प्रेमनगरक।अपन मातृभूमिक जे आकर्षण होइ छै ओइसँ धीरेन्द्र खाली आकर्षितेटा नहि अछिबल्किकर्मभूमिक संग धर्मभूमियोकेँ बुझियो रहल अछि आ नीकसँ निमाहियो रहल अछि। ओना,जहिना कर्मभूमियो आधर्मभूमियो दुनियोँछी तहिना तँ दुनियोँ दुनियॉं छीहे, सभठाम अपन-अपन सभ किछु छइ। जँ नीक जगह, नीक जगहक माने दुनू प्रकृति प्रदत्त जे नीक अछि सेहो आ कर्मसँ जे भूमि नीक बनौल गेल अछि सेहो, बुझि सभ एकेठाम बास करए चाहब तँ की अँटाबेस भऽ सकैए? जँ अँटाबेस भइयो सकैए तँ बॉंकी दुनियॉं तँ ओहिना परती-पराँत, पहाड़-नदी-नाला बनल रहत, आजुक जेहेन दुनियॉं अछिसे थोड़े बनि पौत। तइले तँ ओकरा कर्मभूमि बनबैक जरूरत अछिए। बच्चेसँ धीरेन्द्रकेँ परिवारक संग समाजो आ गामक माटियो-पानिसँ अपना जकाँ सिनेह रहल, तँए अपन गामक पानि, अपन गामक माटि आ अपन गामक लोकक बीच धीरेन्द्र अपनाकेँ सभ दिन देखैत आबि रहल छल जइसँ सभ कथूसँ अपनत्व तेना बनि गेलै जे अपनाकेँ ओकर अनुगृहीत बुझैत आबि रहल छल। अनुग्रहे ने ओ गुण छी जे कियो अपना कऽ तेना हथिया लइए जे हाथक काजक संग बुधियो-विचार अनुग्रहित होइत रसमय बना दैत अछि। ई गुण धीरेन्द्रकेँ अपन परिवारमे बच्चेसँ भेटैत रहल। शुरूक अवस्थामे माने बच्चामे जे धीरेन्द्रकेँ गामक स्कूलमे बुड़हागुरुजीसँपढ़ैयोक आ फुलवाड़ियो लगबैक शिक्षा भेटलैओधीरेन्द्रक बेवहार बनि गेल। पढ़ाइक संग-संग धीरेन्द्र दू कट्टा खेतमे फल-फलहरीक गाछ सेहो लगौलक आ दुआर-दरबज्जा, अँगना-घरक संग खुट्टा परहक गाइयक देख-भाल सेहो दायित्व बुझि करए लगल। आइसँ सात बर्ख पूर्व धीरेन्द्रपाँचटा आमक गाछ सेहो लगौलक आ लताम-नेबो-अररनेबा सेहो लगौलक।पाँचो आमक गाछ धीरेन्द्र अपना बुधिये-विचारे लगौने छल। ओइमे पिता कोनो तरहक राय-विचार धीरेन्द्रकेँ ऐ दुआरे नहि देलखिन जे बुड़हागुरुजीक सिखौल बाड़ी-फुलवाड़ीक लूरि छी, अपन लूरि तँ वंशगत अछि, तँए जीबेन्द्र किछु ने कहने छेलखिन। अपन बाल-मनक सकाल सूर्यक किरण धीरेन्द्रकेँ छेलैहे, तँए मौसमक हिसाबसँ पॉंचो आमक गाछ धीरेन्द्र रोपने छल। माने ई जे किछु लोक ओहन छैथ जे आमक सुआद मानि एक्के रंगक आमो आकि कोनो आने फलक गाछ रोपि लइ छैथ, जे मौसमक चालि पकैड़ जहिना एक्केबेर संगे-संग फुलाइए, फड़ैए तहिना बड़बड़ा कऽ एक्केबेर पकबो करैए, जइसँ ओकर उपयोग करैक कम समय भेटैए। मुदा पॉंचटा पॉंच गुणकएक्के फलक गाछ रोपलासँ, जेकर अपन गुण आगू-पाछू होइ छै, ओ तँ एक्के फल पॉंच गुणा बेसी समैयक लेल भाइये जाइए। जइसँ पँचगुन्ना लाभकारियो होइते अछि। यएह सोचि धीरेन्द्र पॉंचो आमक गाछ लगौने छल। संजोग बनल, पाँचो आमक गाछ ऐबेर मनसम्फे फड़ल अछि। जे धीरेन्द्रकेँ पटनेमे पिता जानकारी पठा देने छेलखिन। अपन रोपल आमक गाछ फड़ल अछि तँए धीरेन्द्रक हीक-दम ओइपर छेलैहे, कौलेजकेँ बन्न होइते राता-राती धीरेन्द्र गाम विदा भेल। सवारीक एते तँ सुविधा भइये गेल अछि जे दिन-राति कखनो चलि-फिर सकै छी। ओना, आवागमनक सुविधा जरूर बढ़ल अछि मुदा से सड़केटा भेल अछि। तँए सड़कक सुविधा तँ कहल जा सकैए मुदा अवागमनक सुविधा केना कहल जाएत। आवागमनक सुविधा तँ भेल जे सड़कक संग सवारियोक सुविधा होइ। ओना, सड़कक देखा-देखीसँ सवारियो बढ़ल अछि मुदा से मनमाना अछि। जइसँ कोनो स्थानसँ कोनो स्थानक मासुल केते लागत से निर्धारित नइ अछि। तखन तँ जेहेन देश तेहेन भेष बना लोक पार-घाट लगैबते अछि। प्रेमनगर अबैमे कटपीस रस्ता रहने रेलक सुविधा ओते नीक नहि अछि जेतेक बसक सुविधा अछि। रातिमे खेला-पीला पछाइत पटनामे बसपर चढ़ू आ सुर्ज उगैत प्रेमनगर पहुँच जाउ। धीरेन्द्रकेँ बुझल रहबे करइ,सएह केलक। स्लीपर बसमे धीरेन्द्र अपन जगह पेब जा कऽ ओंघरा रहल। बस खुजिते,किछुकालक पछाइत बसक यात्री सभ निसबद भऽ सुति रहल जे नाकक वसातक हवासँ भासित हुअ लगल। यात्रीक रूपमे धीरेन्द्र असगरे जागल, बॉंकी ड्राइवर आ खलासीटा जागल छल। जहिना जेठ-अखाढ़सँ नदी-नाला फुलए लगैए तहिना ज्ञानभूमिक यात्री रहने धीरेन्द्रक मन सेहो फुलाए लगल। मनमे उठलै अपन जिनगी। ‘अपन जिनगी’ मनमे उठिते धीरेन्द्रकेँओ दिन मन पड़लै जइ दिन पिताजी गामक स्कूलमे प्रवेश दियौने रहथिन। पोखैरक पहिल घाटक सीढ़ी जकाँ धीरेन्द्रक मन अपन जिनगीक पहिल घाटपर पहुँच गेल। अक्षर ज्ञानसँ लऽ कऽ अंक तकक ज्ञान ओतै भेल। जइसँ सौंसे जिनगीक तँ बोध नहिमुदावएह ‘अक्षर’ आ ‘अंक’ तँ अखनो बाट देखाइये रहल अछि।यएह ने भेल बोधक बीज रूप। गामक लोअर प्राइमरी स्कूलसँ आगू बढ़ि पड़ोसी गामक मिडिल स्कूलमे प्रवेश केलौं, पछाइत हाइ स्कूल होइत आगू बढ़ि अखन पटना कौलेजमे पढ़ै छी। साल भरिक पछाइत अहूसँ निकैल जिनगीक दोसर सीढ़ीपर जाएब। शुरूहेसँ, माने जहिया लोअरे प्राइमरी स्कूलमे पढ़ैत रही, किछु नव सिखैत रहलौं। जे किछु मनो अछि आ किछु बिसरियो गेलौं। ओना, आगू बढ़लापर किछु आरो नव ज्ञान-बातसँ भेँट होइते गेल जे बुझल बातक विस्तार रूप सेहो भेटबे कएल। तैसंग किछु बिसरलहो बात दोहरा कऽ मन पड़ल आ किछु आरो बिसरबो करबे केलौं। खाएर जे मन अछि आकि जे बिसरलौं, से बिसरलौं मुदा अखन जे मन से ने बुझब। जेना धारमे बलुआह माटिपर पएर रोपिते सर-सरा कऽ निच्चाँ मुहेँ धँसए लगैए आ धँसैत-धँसैत सक्कत माटि भेटिते असथिर भऽ जाइए तहिना धीरेन्द्रकेँ मनमे जिनगीक सक्कत माटि भेटल। असथिरसँ पएर रोपैत धीरेन्द्रक मन अपन जिनगीक विचार करए लगल। ओना, गहींर खाधिसँ पानि उपैछ ऊपर आनैमे बर्तनक काज पड़िते अछि, से जेहेन बरतन रहत तइ हिसाबे ने पानियोँ ऊपर औत। नइ तँ उपछा-उपछीमे रस्तेमे छिड़िया जाइए। दुनियॉं तँ दुनियॉं छी,जहिना रंगीन तहिना संगीन सेहो अछिए।कियो कबीर जकाँ धुनिया बनि जिनगीक संग दुनियॉंकेँ धुनैए, तँ कियो धुनियॉंक धुनकीमे धुन-धुना धुनाइए। तही बीच निनाएल यात्री सबहक नाकसँ तेहेन अवाज निकलए लगल जे धीरेन्द्रककेँ अपनो शंका हुअ लगलै जे हमहूँ तँ ने आने-आन यात्री जकाँ सुतले छी। तहीकाल गाड़ी कसि कऽ हॉरन देलक। जेना अनभुआर रस्ता बुझि ड्राइवरक मनमे डरसँ शंका पइस गेल होइ। हॉरन सुनिते एकटा यात्रीकेँ नीन टुटलै, बाजल- “हौ खलासी!गाड़ी केतए पहुँचलह हेन।” खलासी जोरसँ बाजल- “तोरा जाइ-के केतए छह?” यात्रीक काँच नीन टुटल छल तँए मनमे कड़ूपन छेलैहे। खलासीपर कड़ुआइत बाजल- “एहेन तोहर बात किए होइ छह!” खलासी- “की बात होइए?” दुनू गोरेक कहाकहीसँ कएटाआनो-आन यात्रीक नीन टुटल। ओना, खलासी आ ड्राइवरकेँ बुझल जे अखन भियौन रस्तामे छी तँए बसमे जेतेक हल्ला-गुल्ला बढ़त तेतेक नीक। मुदा यात्रियो तँ पूरबा हवाक लहकीक नीनकेँ छोड़ए नहि चाहैत...। टुटल नीनकेँ जोड़ैले पहिलुक यात्री फेर बाजल- “खलासी, समय केते भेल हेन?” खलासी- “तीन बजे भोर भऽ गेल।” दोसर यात्री जे छल, जेकर नीन हल्ला सुनि टुटल छेलै ओ बाजल- “अँइ हौ खलासी!एहेन जे तूँ बुड़िवाण छह सेतोरा अखनो तक नइ बुझल छह जे तीन बजे राति कड़कड़ौआ नीनक छी?” खलासी बाजल- “हम ते कमे कहलियह, पोने तीनियेँ बजेसँ ‘भोर’ हुअ लगैए। तोहर विचार अढ़ाइ बजे रातियेपर अँटकल छह।” एकाएकी बसक सभ यात्रीक नीन टुटि गेल। ओना, कोनयात्री केकरा पक्षमे बाजत, ई समस्या सबहक मनमे उठिये गेल।तँए कियो केकरो पक्षमे ठाढ़ नहि भेल। सभ पंचे भऽ गेल आ एकसूरे बाजए लगल- “राति कि भोर भेल, केकरो कहने थोड़े होइए। ओ तँ भगवानक लीला छिऐन, जे जेहेन बुझत से तेहेन पौत। कियो राति सुति कऽ बितबैए आ कियो कनैत बितबैए। तइले जे यात्रीक नीन भगन करै छहक, एहेन कि तोहीं दुनू गोरे छह!” तही बीच कनटेक्टरक नीन सेहो टुटल। नीन टुटिते कन्टेक्टरहाँइ-हाँइ कऽ पहिने अपन जेबी टोबलक। जेबी ठीके-ठाक बुझि पड़लै। ड्राइवरकेँ पुछलक- “जीवन, गाड़ीक रफ्तार ठीक छह किने?” ड्राइवर बाजल- “हँ।” ‘हँ’ सुनिकन्टेक्टर समय-स्थानक मिलान कऽ यात्री सभकेँ शान्त करैत बाजल- “अदहे रस्तामे गाडी अछि, तँए अखन सुतबेकरै जाउ।” भोर होइते गाड़ी प्रेमनगर-स्टेण्डपर रूकल। अकासमे चिड़ै सभ चहचहा रहल छल। अन्हाररातिमे डुमल गाम धीरे-धीरे सुर्जक संग उगि रहल छल। अपन बैग नेने धीरेन्द्र गाड़ीसँ उतैर सोझे अपना घर दिस विदा भेल। दसे मिनटमे धीरेन्द्र घरपर पहुँच गेल। पहुँचते माएपर नजैर पड़लै, पएर छुबि सुभावीकेँ गोड़ लगैत धीरेन्द्र बाजल- “बाबूकहाँ छैथ?” सुभावी बजली- “खेत-पथार दिस गेल छैथ।” धीरेन्द्र- “और सभ समाचार ठीक छैन किने?” सुभावी- “हँ। झोरा-झपटा राखह, रस्ताक झमारल छह, भूख लगि गेल हेतह। पहिने किछु खा लएह।” दरबज्जाक अपन कोठरीमे, अपन कोठरी भेल जइमे धीरेन्द्रक ओछाइनो-बिछाइन छै आ आनो-आन समान छै, बैग रखि, कपड़ा खोलि, लूँगी पहिर निकैल माएकेँ कहलक- “माए, बसमे तेते झमार पड़ल जे रौतुको खेलहा ने पचल अछि।तँए कनी घुमि-फिर लेब ते मन हल्लुक भऽ जाएत। पछाइत अपन नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ जलखै करब।” धीरेन्द्रक मनमे पटनेसँ अपन रोपल गाछक आम देखैक छल, मन छटपट करइ जे कखन अपना नजरिये देखी।अपन कएल कीर्तक फल देखैक इच्छा सभकेँ होइते छइ। जहिना कोनो विद्यार्थीकेँ अपन कठिन श्रमक रिजल्ट देखैक उत्सुकता रिजल्ट निकैलते कइएक गुणा बढ़ि जाइ छै तहिना धीरेन्द्रोकेँ अपन लगौल गाछक फड़ल आम देखैक उत्सुकता बढ़ले जा रहल छेलइ।दरबज्जापर सँ उतैर धीरेन्द्र बाजल- “माए,पहिनेकनी आम देखने अबै छी।” ‘आम’ सुनि सुभावीक मन खुशीसँ ओहिना दहला गेल जेना माता-पिताक कएल कीर्तकेँ बेटा-बेटी खुशीसँ आगू बढ़बैए।सुभावी बजली- “बौआ, आम ते लुधकी लागल फड़ल छह!” माइक बात सुनि धीरेन्द्रक मन आरो तरसए लगल जे कखन अपना नजरिये देखब। बाजल- “सभ गाछ फड़ल अछि कि अदहा-छिदहा?” सुभावी- “सभ गाछ फड़ल अछि। तूँ जे रोपने छह सेहो फड़ल अछि आ पहिलुका गाछ सभ सेहो खूब फड़ल अछि।” दरबज्जासँ पॉंच बीघा पूब,जैठाम धीरेन्द्र दू कट्ठा खेतमे अपना विचारे पॉंचटा आमोक गाछ आ आनो-आन फल सभ लगौने अछि। पॉंचो आमक गाछपर धीरेन्द्रक मन तेना अँटैक गेल जे आगूमे ठाढ़ आन-आन फलक गाछक फलपर नजैर पड़बे ने कएल। सिनुराएल गुलाबखास आ चिकिनाएल बम्बइ आम देख धीरेन्द्रक मन बिहुसए लगल। अपन रोपल पहिल बेरक फल छी। बाप-दादाकबनौल एहेन परम्पराअदौसँ आबिए रहल अछि जे पहिल फल साधु-सन्त-महात्माकेँ खुआ पछाइत अपने खाइ।अयाची मिश्र सेहो अपनश्रमक पहिल फल बिलहनहि छला। ओना, धीरेन्द्र अपन माएकेँ सेहो देखते आबि रहल छल जे चारपर कि ढाठपरफड़ल पहिल सजमैन पहिने ठकुरवारीमे दऽ अबैतरहथिन।तहिना केता बेर धीरेन्द्र अपनो भट्टाक पहिल फड़क भार बना कन्हापर उठा गामक बुढ़बा महादेव स्थानमे सेहो चढ़बैले गेल अछि...। भरि रातिक बसक यात्रा कएल धीरेन्द्रक मनसँ सभ थकान जेना मेटा गेल। मन पड़ल जगमोहीक आमक हकार...। जगमोहीपर नजैर उठिते धीरेन्द्रक मनमे एकाएक घोदाबला सुतपुतिया झुंगनी जकाँ अनेको विचार उठि गेल। पहिल विचार उठल जे जँ जगमोही आबि गेल तँ जरूर ओकरा अपन लगौल फल-फलहरीक बागो-बगीचा देखा देबै आ पहिल सालक फड़ल आमो खुआ देबइ। जगमोहीपर सँ धीरेन्द्रक नजैर जगमोहीक रूप-गुणपर पहुँचल। की जगमोहीकेँ अखन ब्रह्मचारिणी नहि कहल जाएत? साल भरिक पछाइत ओ कौलेजसँ निकलत। बिआह-दान हेतै, परिवार बनौत, जीवन बिताएत। मुदा अखन धरिक जे जगमोहीक रूप-गुण-शील रहल ओ तँ यएह ने रहल जे विद्याध्ययन वृत्तिमेलागल अछि। माए-बापक देख-रेखमे परिवारोमे रहबो कएलआ जेतेक समय खाली भेटलै तेते परिवारक काज सेहो सम्हारैत रहल जइसँ जहिना ओकरा अपना नजैरमे माए-बाप-बहिन संग परिवार गड़ल छै तहिना ने माइयो-बाप आ बहिनोक नजैरमे जगमोही सेहो गड़ल अछि। यएह जिनगी ने परिवार बदलने–बिआहक पछाइत–नीकोमे जा सकैए आ अधलोमे जा सकैए। ऐमे जगमोहीक कोन कर्मक फल भेटत?धीरेन्द्रक मन थकथका गेल। मने-मन धीरेन्द्र विचारक दुनियाँमे विचड़ए लगल। विचड़ैत-विचड़ैत धीरेन्द्रक मनमे विचड़लै- एहनो तँ परिवेश बनियेँ गेल अछि जे माता-पिताक कएल सन्तानक सेवामे हेरा गेल अछि। दहेजक दानव ऐ रूपे समाजकेँ दबोचि नेने अछि जे एक कोखिक सन्तान भेलो पछाइत बेटी महत्-हीन भऽ गेल अछि, जइसँ भार स्वरूप परिवारमे बोझ बनि माए-बापक सिरचढ़ बनल अछि। तँए जरूरी अछि मनुखक रूपमे बेटा-बेटी दुनूकेँ एक-समान बना जीवन-यापन करैक। जे कोनो परिवार अछि, ओकर बनावट एहेन अछिए जइमे पुरुख-नारीक सामंजस्यसँ परिवार गतिक संग सृष्टिक सृजन होइते आबि रहल अछि। मुदा, तखन जँ एहेन दानवी समस्या आइ सिरचढ़ भेल तइमे केतौ-ने-केतौ समाजक दानवीय गुणक हाथ जरूर अछि। मुदा से के देखत? जीवमे श्रेष्ट जीव कहैबला मनुखकेँ जँ अपनोमे आ जैठाम बसैए तइ समाजोमे जँ एहेन ब्रह्मफॉंस लागल रहत तैठामक जिनगीक गतिशीलता केहेन रहत! जखन गतिये दिशाहीन भऽ जाएत तखन जिनगी केना जिनगी बनि आगू चलत..? विचारक दुनियॉंमे धीरेन्द्र जेतेक विचड़ैतरहए तेतेक मन थकथका-थकथका धक-धका रहलछेलइ। जइसँ ने आगू किछु देख रहल छल आ ने पाछू। दुनू दिस अन्हारे-अन्हार बुझि पड़इ। मुहसँ कोनो बकार नइ निकलै। निकलबो केना करितै, दोसर तँ कियो लगमे छेलैहो नहियेँ जेकरा पुछि धीरेन्द्र अपन रस्तो देखैत वा कहि-कहि अपन मनक बेथो मेटबैत। तहीकाल पिता- जीबेन्द्र हुहुआएल-फुहुआएल अपन पहिलुका वगीचा देख घुमल अबैत रहैथ कि थोड़ेक फरिक्केसँधीरेन्द्र प्राणाम करैत बाजल- “बाबू, ऐबेर तँ नवको आम...।” ओना, जीबेन्द्रक मनमे रहैन जे पहिने धीरेन्द्रक पटना प्रवासक समाचार बुझी, मुदा आगूमे जखन धीरेन्द्रक विचार खसलैन तखन पहिने ओकर उत्तर देब जरूरी बुझि जीबेन्द्र बजला- “बौआ!आम तँ नवका नइ भेल।ई आम तँ पहिनौंसँ आबि रहल अछि। मुदा नव जगहपर नव लोकक हाथक रोपल नव गाछ जरूर अछि।” पिताक उत्तर सुनि धीरेन्द्रक मनक कुहेस हटल। कुहेस हटिते विचार जगल जे, जे जे आमक गाछ रोपने छी ओ तँ कोनो दोसर गाछक कलम छीहे। हँ, तखन एकटा विशेष गुण जरूर अछि जे आमक मौसम जेतेक दिनक अछि तइमे एते चतुराइ जरूर अछिजे शुरू-सँ-अन्त धरिकमौसमक फल भऽ गेल। आमक पाँचो गाछ रोपैसँ पहिनहिधीरेन्द्रक मनमे उठि चुकल छल जे अपना ऐठाम ओहन गाछी-कलम अधिक अछि जइमे एक समैया आम बेसी अछि। जेकरा एक मौसमीकजरूर बना लगेलौं। यएह ने भेल समस्या समाधानक एक दिशारूप। माने जे कियो किसान जँ पाँच कट्ठा वा दस कट्ठा वा बीघा-दू बीघा गाछी-कलम लगौने छैथ तँ ओइमे ओ ओहने आम लगौने छैथ जे सुआदक हिसाबसँ जे पसिन भेलैन, मुदा ओ एक समैये ने भेल। मौसमकेँ तीन आकार अछि। पहिल अगता बीच बीचला आ पचतिया। प्रकृति प्रदत्त किस्म एक संग मोजरत, एक संग फड़त आ एक संग पकि कऽ झड़ि जाएत जइसँ फलक कम दिनक उपयोग भेल। ओना, विज्ञानक विकास भेने किछु दिन जोगा कऽ राखल जा सकैए, से तँ सभकेँ उपलब्ध नइ छइ। मुदा जँ आमक समैयक हिसाबसँ चयन कए रोपल जाए तँ जहिना जगरनाथपुरीमे बारहो-मास धान होइए, जइसँ तीन सौ पैंसैठो दिन नवका चूराक परसाद बनैए से तँ भइये सकैए। धीरेन्द्रकेँ मुँह बन्न देख जीबेन्द्र बजला- “बौआ, पटनामे नीके-ना रहै छेलह किने?अमैया छुट्टी तँ भऽ गेल हेतह?” धीरेन्द्र- “हँ, सबा मासक छुट्टी भेल अछि।” मुस्की दैत जीबेन्द्र बजला- “अपन रोपल गाछ छिअ, अपनो खैहिहह (खइहह) आ हितो-अपेछित, संगियो-साथीकेँ खुअबिहह।” ओना, संगी-साथीक नाओं सुनि धीरेन्द्रक मन मोहिया जगमोहीपर गेल मुदा बाजल किछु ने। दुनू बापूत संगे घर दिस बढ़ल। शब्द संख्या : 2291, तिथि : 28 अगस्त 2018 5. 19 जून,शनिदिन,छह बजे साँझमे रामलखन ऑफिससँ अबिते पत्नीकेँ कहलैन- “चारि बजे भोरुका बस पकैड़ काल्हि प्रेमनगर चलैक अछि, तँए सभ ओरियान आइये करि लअ।” ‘सभ ओरियान’सुनि सुवासिनीक मन विस्मित भऽ गेलैन। बारह बर्खक पछाइत नैहर जाएब, छुच्छे हाथे केना जाएब? चारि भाए-बहिनक बीच सुवासिनी एकमात्र माझिल बहिन। सुवासिनीसँ जेठ हरिनाथ, साझिल- दीनानाथ आ छोट- श्याम। हरिनाथ आ दीनानाथअपन-अपन पत्नी आ बाल-बच्चाक संग बंगलोरमे रहै छैथआ श्याम गाममे रहै छैथ। तीनू भॉंइ बी.ए. पास केने छैथ। पितेक अमलदारीमे हरिनाथो आ दीनानाथो नोकरी करए बंगलोर चलि गेला, जे पिताकेँ मुइला पछाइत दुनू भॉंइ अपन-अपन परिवारोकेँओतइ लऽ गेला। बंगलोरेमे दुनू अपन-अपन मकान कीनि रहै छैथ। दस बीघा जमीनबला किसान परिवार राधारमणक छेलैन। गामक नीक ‘किसान परिवार’मे राधारमणक परिवारक गिनती छेलैन। जहिना अन्नक खेती करै छला,अन्न उपजबै छला तहिना गाछी-कलमक संग दस कट्ठा बँसवारियो छेलैन। तैसंग दूटा महींस सेहो पोसैत रहला। राधारमणजखन पचास बर्खक वयस पार कए रहल छला तही समयमेछोट बेटा सेहो बी.ए. पास कऽ नेने रहैन। ओना, श्याम बच्चेसँ घरक काजमे, खेती-गिरहस्तीमेपिताकेँ बॉंहि पुरए लागल छेलैन।जइसँ गिरहस्तीक सभ लूरि-बुधि श्यामकेँ भइये गेल छल। दुनू परानी राधारमण अपन सेवाक संग समाजक बीच परिवारक समाजिकताकेँ जीवित रखैक खियालसँ सेहो सोचि-विचारि श्यामकेँ कहलैन- “बौआ, जेठ दुनू भॉंइ तँ परदेशी भऽ गेलह। तोहू जँ नोकरी करए बाहर चलि जेबह तखन तँ परिवारक संग समाज धरिक सभ किछु बिलैट जेतह। ने अपन ठौर-ठेकान रहतह आ ने परिवारेक..!” पतिक विचारक सह पेब बुधनी सेहो अपन माइक ममत्त बुझबैत श्यामकेँ कहली- “बौआ, भगवान चारिटा सन्तान कोखिमे देलैन तँए ने, जँ एक्केटा देने रहितैथ वा चारिमे तीन मरिये गेल रहैत वा नोकरीए-चाकरी करए परदेश चलिगेल रहैत तखन परिवार..!” बी.ए. पास श्यामक मनमे माइयक विचार चोट केलक।परिवारक भविसक संग अपनो भविसपर नजैर पड़लै। एकाएक श्याम तिलमिलाएलगल। तिलमिलाइत श्यामक देह सिहरएलगलै। सिहैरते अनायास मुहसँ फुटलै- “माए..!” बेटाक मुहसँ ‘माए’ सुनि राधारमणक मनमे सेहो पितृ विचार जगलैन। पितृ विचार जगिते राधारमणक मन नाचि उठलैन। नाचि ई उठलैन जे घटना-दुर्घटना भेलापर कियो भगवानक नाम थोड़े लइए, लइ तँ अछि माइये-बापक नाम। माए गइ माए..,बाप रौ बाप..! वएह माए-बाप ने ओकरपारो-घाट लगबै छइ। भरिसक श्याम ओही सीमापर पहुँच गेल अछि। तँए जइ सीमापर अखन श्याम पहुँचल अछि ओही सीमाक इर्द-गीर्दक विचार ने ओकर कल्याणो करत। एहेन तँ नहि जे कियो हेराएल अछि कलकत्ताक चौरंगी चौकपर, जे आगू बाट हमर कोन छी।मुदा ओकरा से नहि देखा देखबए लगबै गाम-घरक बाट, तखन तँ भेल..! ओकरा तँ चौरंगीए चौकक रस्ता देखौलासँ ने काज चलत...। राधारमण श्यामकेँ प्रवोधैत बजला- “बौआ, जे बात माए कहलखुन ओ हुनकेटा विचार नहि, दुनियॉंक विचार छी। दुनियॉं जनैए जे बाल-बच्चाक जीवनदान जहिना माता-पिता करै छैथ तहिना ने वृद्ध माता-पिताक जीवनदान सन्तानोक कर्तव्य भेबे कएल।” पिताक भावनाकेँ अपन भावमे मिला भावावेश होइत श्याम बाजल- “एकरा के नकाइर सकैए।” श्यामक विचार सुनिते राधारमणक मनमे उठलैन- श्रवण कुमार जकाँ श्याम भार उठबैले कन्हा अरोपि देलक!एकाएक राधारमणक मन पसिज गेलैन। पसिजते मन कहलकैन- एकरो तँ अपन परिवारक संग समाजक बीच जीवन जीबाक छै तँएओहन जीवनधाराक खगता तँएकरो छइहे जइसँ हँसैत-खेलैत, हेलैत-डुमैत ईहो अपन जीवनक धार पार करए। मुदातइले तँ सुबुधिक संग सुकृत्तिक्रिया अपनबैक जरूरत छइ। माने, सुबुधिक संग सुकृत्तिकर्तव्य जँ अपनाएत तखने से सम्भव हेतइ। ओना, जीवनक लेल जे जे उपयोगी अछि ओइ सभ कथुक अपन महत् तँ होइते छै,मुदा जीवनानुकूल अपन कर्तव्य बनाएब तँ बेसी महत् रखैत अछि। जँ से नहि बनौल जाएत आ लकीरक फकीर बनि खाली चलैक परियास हएत तखन तँ केतौ-ने-केतौ समाजिक परिवेशक संग टकराउ हेबे करतै..!मने-मन सोचि-विचारि राधारमण सामंजस करैत श्यामकेँ कहलैन- “बौआ!दुनियॉंमे जहिना ने सभ कुछ नीके अछितहिना सभ किछु अधलो नहियेँ अछि। ओही नीक-अधलाक बीच असंख्य जीव-जन्तुक संग अरबो-अरब मनुखो अछिए। तँए, जीवन जीबैले जेहेन कर्तव्यक खगता अछि बस ओतबे अपनाकऽ चलैक अछि। अनेरे लोक अपन बुधिक पाछू तबाह भेल रहैए।” ओना, राधारमण झॉंपि-तोपि कऽ बजला मुदा नव चेतनसँ युक्त चेतल श्याम पिताक सभ बातकेँ मने-मन बुझि चुप रहल। पिताक विचारकेँ आदर्श आदेश मानि प्रतिउत्तर किछु ने दऽ बस एतबे बाजल- “अहाँ जे आदेश करब ओ शिरोधार्य अछि।” श्याम गामेमे रहब स्वीकार करैत नोकरी-चाकरीक भॉंजमे नइ पड़ल। ओना, कौलेजे जीवनमे श्याम अन्दाज कऽ नेने छल जे नोकरी-चाकरी स्वतंत्र जिनगी जीबैमे बाधा उपस्थित कइये सकैए। मुदा समाजक बहैत तुफानी धारमे दबि कऽ जे श्यामक विचार पातर-छीतर बेगवत स्थितिमे छल ओ पिताक आसिरवचन सुनि नव जागरणक रूपमे ठाढ़ होइक परियास करए लगल। चाह पीला पछाइत रामलखन पत्नीकेँ कहला- “प्रेमनगर अहाँक नैहर छी, ऐठाम जहिना अहाँकेँ माए-बाप, दिअर-ननैद, पित्ती-पितिआइन इत्यादि सभ बनल बनाएल बनौआ भेटल तहिना हमरो नेअपन सासुरमे भेटल छैथ।तँए,ओइठाम हमर कोनो जुति-बुधि नहि,सोल्होअना जुति-बुधि अहींक भेल।अहाँकेँ जे विचार हुअएसएह करब। अखने चलू बजारक काज समटैत बसक टिकट सेहो कटा लेब।” पतिक बात सुनि सुवासिनी मने-मन विचारए लगली,आइ जँ माता-पिता रहितैथ तँ लत्तो-कपड़ा आ खाइले तसमैये आकि हलुए बना कऽ नेने जइतौं, मुदा से तँ रहला नहि। भाए-भौजाइ तँ अखन अपने जुआन-जहान अछि, नैहरक सभ किछु दइये देने छिऐ। हँ! तीनटा जे बाल-बच्चा छै तेकरा सभ-ले लत्ता-कपड़ा आ थोड़ेक मिठाइयो जरूर कीन लेब...। मने-मन विचारैत सुवासिनीक मुहसँ किछु ने निकललैन। बिच्चेमे जगमोही बाजल- “बाबू, मामाक तीनू बच्चा स्कूल जाइए तँए तीनू ले कपड़ो-लत्ता आ महिना दिन जे रहब आ पढ़ेबै-लिखेबै तइले किताबो-कॉपी आ कलमो कीनि कऽ नेने जेबइ।” जगमोहीक विचारपर रामलखन सोल्होअना सहमत भऽ सभ कियो बजार दिस विदा भेला। बजारक काज सम्हारि, बसक टिकट कटबैत डेरासँ बस स्टेण्ड पहुँचबैले टेम्पू सेहो ठीक कऽ लेलैन। बजारसँ घुमतीकाल रस्तेमे सबहक विचार भेलैन जे चारि बजे भोरमे बस खुजत, तँए दू बजे रातिमे बिछान छोड़ि अपन तैयारीक पाछू सभ कियो लगि जाएब। तैयारो होइमे समय लगिते अछि। अपन नित्यकर्मक संग चीज-बौस सम्हारब इत्यादि बहुत रास काज अछि। तेतबे नहि, बिनु खेने-पीने डेरासँ केना निकलब। जखन अनके पएरे जाएब,माने बससँ, तखन ओकर कोन ठेकान अछि। जँ कोनो पॉंतरमे किछु भऽ गेलै तखन ओतए एक घोंट पानियोँ के देत? आठ घन्टाक बसक रस्ता अछि, तँए ओतेकालक अपन जीवन अपने हाथमे ने सम्हारि कऽ रखैक अछि। साढ़े तीन बजे टेम्पूबला आबि डेराक आगूमे हॉरन देलक। सभ कियो सभ किछु सम्हारि तैयारे छला। अनायास रामलखनक देहक पानिमे खूब तेजी आबि गेल छेलैन।आसे नव-विवाहित जमाए जकाँ नहि, एक जवाबदेह अभिभावक जकाँ। रामलखन अपन दायित्व जनै छला जे घरसँ बाहर जा रहल छी, बाट-घाटक जे स्थिति अछि तइमे सजगता जरूरी अछिए...।ओना, बसोक यात्रा बसेक यात्रा छी, कियो निचेनसँ टी.भी.क गीत-सीनेमा देखैत-सुनैत चलैए तँ कियो लोहा-लक्कड़सँ बनल गाड़ीक माध्यमसँ चलैत अपन सतर्कतापर नजैर राखि यात्रा करैए। मुदा जेते देखा-देखी दुनियॉं चलैएतेतेसीखा-सीखी थोड़े चलैए जे देखी-सीखी करैत लोक यात्रा करत। संजोग नीक बनल। जहिना कार्यक्रमक नक्शा रामलखन बनौने छला, तहिना साढ़े तीन बजे अन्हारमे डेरासँ निकैल प्रेमनगरक लेल सभ प्राणी विदा भेला। ओना, मोबाइलिक जुग भेने सुवासिनीक भाए- श्यामेक परिवारटा मे नहिबल्किश्यामक दियाद-बादआटोल-पड़ोसमे सेहो सुवासिनी सभ परिवारकेँ अबैक जानकारी भइये गेल छल। नव लोकक आगवानीक जानकारी भेने जहिना अँगना-घरक ओरियान घरवाली करै छैथतहिना दुआर-दरबज्जाक घरबला सेहो कइये लइ छैथ। बसक जानकारी सेहो प्रेमनगरबलाकेँ छैन्हे जे साढ़े एगारह बजेसँ पहिने बस नहियेँ औत, पछाइत जखन आबए। ओना, प्रेमनगरक अधिकांश लोक एगारहे बजेसँ अपन कान ठाढ़ कऽ नेने छल,किएक तँ सभ बसक हॉरन सभकेँ अकानल छइहे। अखन धरि सुवासिनीक नैहर आगमनक समाचार बेकता-बेकती, काने-कानदियादोवाद आ टोलो-पड़ोसमे छल। मुदा दस बजेमे जखन राधा दादी, सीता दीदी, शुभनी भौजी आ दुखनी काकी घास छिल कऽ पोखैर-महार परहकपीपरक गाछतर बैस सुवासिनीक आगमनक गप-सप्प करए लगली तखनसँ ओ समाजिक रूपमेबदलए लगल।जेठुआ रौदसँ रौदाएल चारू गोरे पीपरक गाछतर आबि सुसता रहल छेली। ओना, बाधेसँ चारू गोरे धरियाएलरहैथमुदा रौद आ उम्मससँ घामक पानि जे मुहमे पड़ैन से मन नून-छड़ा गेल रहैन तँए बाध भरिमेकियोकिछु ने बाजि अपन-अपन जी-जान बँचबैत पीपरक गाछ लग पहुँच माथपर सँ छिटा उतारि, दुभि बिछाएल बिछानपर पहिने चारू गोरे अरामसँ बैसली। पछाइत जेना-जेना सबहक मन ठंढाइत गेलैन तेना-तेना गहिंराइतो गेलैन। जहिना शुभनी भौजी आ दुखनी काकी एक-उमेरिया छैथतहिना राधा दादी आ सीता दादी सेहो एक-उमेरिये छैथ, संगे समाजिक वंशवृक्षक हिसाबेई दुनू ओइ दुनूसँ एक सीढ़ी ऊपर सेहो छैथ। तँएई दुनू गोरे सम्मानित बेकती भेबेकेली। शुभनी भौजी आ दुखनी काकीक बीच सुवासिनीक आगमनक समय लऽ कऽ शास्त्रार्थ बजैड़ गेल। शास्त्रार्थ कोनो आन बाते नहि, सुवासिनीक नैहर आगमनक मादेमात्र समैयक विवाद फँसलैन। दस बर्खक पछाइत सुवासिनीक आगमन भऽ रहल छैन...। शुभनी भौजी बजली- “सुवासिनी दाइ तँ सीते मैया जकाँ ने बोना गेली..!” शुभनी भौजीक पति-राम मनोहर, भारी खिस्सकर लोक। आध पहर राति धरि शुभनी भौजीकेँ शास्त्र-पुराणक नित्य नूतन खिस्सा सुनबैतरहै छथिन। तहिना दुखनी काकीक पति- सुखबा काका, सेहो नमहर खिस्सकर छथिए। शुभनीए भौजी जकाँ दुखनियोँ काकी शास्त्री बनियेँ गेल छैथ। खग जाने खगक बोल...। मुदाऐ सभसँ राधा दादी आ सीता दादीकेँ कोन मतलब छैन जे शुभनीए भौजीक आकि दुखनीए काकीक बात सुनती। ओ तँ पाथरक मूर्ति जकाँ पानिसँ नहेलो-धोलोपर ओहिनाक ओहिनाछथिए। बलुआहा माटिक मुरुत जकाँथोड़े छैथ जे एक्के लोटा पानिमे ढहि-ढनमना जेती। तँए, हुनका दुनू गोरेकेँ माने रधो दादी आ सीतो दादीकेँअपन-अपन स्पष्ट धारणा छैन जे दुनू गोरे अपनेमे फरिछाबह।अनेरे हम सभ ओइमे किए पड़ब। काल्हिसँ फेर सभकेँ एक्केठाम ने रहबो अछि आ संगे-संग करैत-धड़ैत चलबो अछि। औझुका प्राश्चित अपन आइये कटाबह।तैबीच दुखनी काकी शुभनी भौजीकेँ उत्तरोत्तर दैत बजली- “सीता मैया केतेक दिन तक बोनमे रहली से बुझल छह?” शुभनी भौजीक मन सेहो शास्त्रक धुनिमे चढ़ल रहबे करैन,बजली- “राम-लक्षमण आ सीताकेँ गामक सीमा टपैमे केतेक दिन लागल, पहिने से ने बाजब!” दुखनियोँ काकी तँखिस्सकरेक घरवाली,आगूक एक घाट आगू बढ़ि बजली- “गंगा पार करैमे तीनू गोरेकेँ केते दिन लागल रहैन से बुझल छह?” जवाबक केतौ पता नहि, मुदा प्रश्न-पर-प्रश्न चढ़ैत गेल। जेकरा देख रधो दादी आ सीतो दादीकेँनइ रहल गेलैन, दुनू गोरे संगे बजली- “गपे-सप्पमे जे खाएबो-पीब बिसैर जाइ जेबह, से की तोहीं दुनू एहेन गप्पकैर छह! महिना दिनक गप आइये फरिया लेबह। चलै चलह, नहाइयो बेर भऽ गेल।” ओना, चारू गोरे अपन आसनी-बासनी छोड़ि लगले उठि कऽ ठाढ़ भेली मुदा शुभनी भौजी आ दुखनी काकीक गप-सप्प चलिये रहल छेलैन। दुनू गोरेक कहा-कही सुनि राधा दादी फुटा कऽ बजली- “तोरा दुनूक गपैहिया बेमारी ताबे नइ हटतह जाबे बपैहियासँ भेँट नइ हेतह।” तुरैछ कऽ दुखनी काकी राधा दादीकेँ कहली- “ई सभ ने बुढ़ भेली, जे दिन छैथ से दिन छैथ मुदा हमरा दुनू गोरेकेँ तँ बहुत दिन तक ने ऐ पीपरक गाछतर बैस कऽ अपन जीवन-मरणक गप-सप्प करैक अछि।” घरक रस्ता फुटिते सभ छिड़िया गेली। बारह नइ बाजल छल, तइसँ किछु पहिनहि श्याम अपन बहिन-बहिनोइ आ भगिनी सबहक आगवानीक पूर्व तैयारी करि बसक हॉरनकेँ अखियासैत दरबज्जापर आबि कऽ बैसला। बसितेमन पड़लैन सुवासिनी। बहिन मन पड़िते श्यामक मन झमान हुअ लगलैन। केहेन करमघटू सुवासिनीक जिनगी भऽ गेल! भगवानोक नेत एकरंग नइ छैन। हमरा बाल-बच्चाक कम-बेसीसँ मतलब नहि, मनुख किछु छी तँ मनुख तँ छी किने।जे अपने-आपमे सम्पैतशाली भेबे कएल। मुदा भगवान केकरो बेटा दइ छथिन तँ घराड़ी दुआरे मारि फँसबै छथिन आ केकरो बेटी दइ छथिन तँ घराड़ियो बेचबबै छथिन, से केहेन निसाफ भेल! ई बात जरूर जे बेटा-बेटी समान अछि मुदा खाली कहने भरिसँ समान भऽ जाएत?माए-बापकेँ मुइला पछाइत बेटा तेरह दिनसँ तीन साल तकक अधिकारी अछि, बेटी किछु अछि तँ मात्र तीनियेँ दिनक।माने माटिक सारा बनि गेल, केशो कटबैक बेटीकेँ जरूरत नहियेँ,मात्र नह कटा पाक भऽ जाइए..! श्यामक गुनधुनी बढ़िते गेल-भगवान जे करै छैथ से नीके करै छैथ, समाज जँ नैहर-सासुरक बीच जे जलियाएल जाल बिछा मनुखकेँ शिकार बना शिकार करैएसे विचार केकर भेल?के करत? ई रोग एहेन अछि जे सभ परिवारमेअछिए, मुदा इलाज तेहेन अछि जइमे कियो मेटा जाइए आ कियो मोटा जाइए..! तैबीच बसक धमकसँ टोल-पड़ोसमे हरबिर्ड़ो जकाँउठि गेल। सबहक मुहसँ एक्के अवाज निकलए लगल- “बस आबि रहल अछि! अही बससँ सुवासिनी औत!!” टोल-पड़ोसक धिया-पुता बस स्टेण्ड दिस दौड़ल। धिया-पुताक पाछू-पाछू ट्रेनक गार्ड जकाँश्याम सेहो बस स्टेण्ड दिस बढ़ला। आठ घन्टाक बसक झमारसँ रामलखन सभ तूरक चेहरा मलिन भइये गेल छेलैन। सुवासिनीपर नजैर पड़िते श्यामकेँ टकटकी लगि गेलैन। मुदा तखने जगमोही पएर छुबि श्याम मामाकेँ प्रणाम केलकैन। असीरवाद दैत श्यामक नजैर रामलखनपर गेलैन। सार-बहनोइक बीच नमस्कार-पाती भेल। सभ कियो घर दिस विदा भेला। सभकेँ अपन-अपन नजैर तँए अपना-अपना नजरिये सभ प्रेमनगरक धरतीपर अपन-अपन पएर रोपि चलए लगला। जहिना सबहक अपन सोच, अपन विचारआ अपन जिनगी, तहिना सभकेँ अपन-अपन संगी सेहो भेटिये गेल। जगमोहीकेँ प्रेममोही भेटल। ओना, चेहरासँ जगमोहीकेँ प्रेममोही चिन्हैत नहि, मुदा सुवासिनीक पाँचो गोरेक परिवारमे जगमोहीक उमेरो आ कौलेजिया रूपो रहबे करइ, तँए प्रेममोही अन्दाजि नेने छल। ओना, प्रेममोही सेहो बी.ए. ऑनर्सक फाइनल इयरमे पढ़िते अछि, तँए कौलेजिया समाजक परिचयो छइहे। जगमोहीक हाथ-सँ-हाथ मिलबैत प्रेममोही पुछलक- “बहिन, केहेन नगर लगैए?” ओना, छोट बहिनक रूपमे अपन विचार प्रेममोही रखलक, मुदा जगमोही थकथका गेल। किएक तँ ओहो बुझि चुकल छल जे प्रेममोही सेहो बी.ए. फाइनलमे पढ़ैत अछि। जगमोही पटनिया भाषामे बाजल- “जेहने नगरक नाम छै तेहने लगैए।” शब्दो-शब्दक तँ खेल अछिए। कोनोबहु अर्थीए होइत अछि तँ कोनो बिनु सींग-नॉंगैरक, बिनुअर्थोक होइते अछि। गप-सप्पकक्रममे जगमोही आ प्रेममोहीक बीच, सम्बन्धक आकर्षणबढ़ए लगल जइसँ एक-दोसरक बीच विचार-विनिमयक दिशा-बाट सेहो खुजबे कएल। बिनु ठेकनाएल शब्दमे जगमोही बाजल- “ऐ गामक एक गोरे पटनामे पढ़ै छैथ, हुनकर घर किम्हर छैन?” प्रेममोहीकेँ गामक जानकारी छइहे जे गामक एक गोरे पटनामे पढ़ैए, तीन गोरे दरभंगामे आ सात गोरे झंझारपुरमे.., बाजल- “धीरेन्द्र हुनक नाओं छिऐन आ घर दोसर टोलमे छैन।” जगमोही- “परिवार केहेन छैन?” प्रेममोही- “गाममे सम्पन्न परिवार मानल जाइ छैन।” शब्द संख्या : 2185, तिथि : 02सितम्बर2018 6. ओना, मोबाइलसँ धीरेन्द्रकेँजगमोहीकहि देने छेलैन जे बीस जूनकेँ प्रेमनगर जरूर पहुँचब। मुदा से प्रेमनगरक सीमामे प्रवेश केलापर जगमोही बिसैर गेल। बिसरबो केना ने करैत? भाय, किछु छी तँ प्रेमनगर ने छी, जैठाम घड़ी-पहरक कोन बात जे जिनगीक-जिनगी लोक बिसैर जाइए। मुदा से सभ जगमोहीकेँ नहि भेल, भेल एतबे जहिना दू समाजक लोकक बीचक सम्बन्ध दू जुगक सीमापर आबि होइतअछि।कोर्टमेजहिना बहस करैत काल वकीलकेँ होइ छैन जे अपन फाइलमे केसक दुनू पक्षकसभ रेकर्डो रहै छैन आ तैसंग न्यायालयकेँ सेहो बुझल रहिते छै जे फैसला दूमुहाँ अछिए तँए जेम्हर बेसी जोड़ देखब तेम्हरे कनी उनारि देब। जगमोहीक संग धीरेन्द्रोकस्थित सएह भऽ गेल अछि। एक दिस मिथिलाक गामक समाज, जैठाम नान्हि-नान्हिटा गप-सप्पमे रूआबक चलैत पैघ-पैघ घटना होइए।कुत्ता-बिलाइक झगड़ामे लोक मारियो-पीट करैए, खूनो-खच्चर होइए आ सालक-साल जहलो तँ कटिते अछि। तही बीच ने जगमोहियो आ धीरेन्द्रोक विचार फँसल अछि। ओना, शहरी-समाजक विचार मनमे नहि छैन सेहो बात नहियेँ अछि। संजोग बनल, मामाक घरपर एला पछाइत जगमोहीकेँ मन भेलै जे धीरेन्द्रकेँ अपन जानकारी दऽ दिऐ। बैसारसँ उठि, मुँह-कान धोइक बहन्ने चापाकल दिस ससैर जगमोही मोबाइलसँ धीरेन्द्रकेँ कहलक- “धीरेन्द्र बाबू, मात्रिक पहुँच गेलौं।” धीरेन्द्र- “गाड़ी-बसक यात्रा बढ़ियाँ रहल किने?” जगमोही- “यात्रा तँ बढ़ियेँ रहल मुदा...।” धीरेन्द्र- “मुदा की?” किछु बजैसँ पहिने जगमोही ठठा कए हँसए लगल। जगमोहीक हँसी सुनि धीरेन्द्र चौंकल। चौंकल ऐ दुआरे जे जाबे जगमोही किछु कमी नहि देखलक ताबे हँसल किए?दोहरा कऽ धीरेन्द्र पूरक प्रश्न पुछैत बाजल- “हँसलौं किए से कनी हमरो कहू। जँ सुधारैबला हएत तँ सुधारि लेब, नहि जँ छोड़ैबला हएत तँ छोड़िए देबआ जँ जोगबैबला हएत तँ जोड़ जोड़ि जोगा लेब।” तहीकाल जगमोहीक मोबाइलमे पटनासँ दोसर फोन आबए लगल जे जगमोहीक एक सहेलीक छल। धीरेन्द्रक गप-सप्पकेँ बिलमबैत जगमोही बाजल- “एकटा संगीक फोन पटनासँ आबि रहल अछि, तँए अखन एतबे जेबस स्टेण्डमे अहाँकेँ नइ देखलौं..!” मोबाइलिक लाइन तँ कटि गेल मुदा जगमोहीक विचारक चोट धीरेन्द्रकेँचोटा देलक। चोटाएल धीरेन्द्रक स्थित ओहिना हुअ लगल जहिनाअकासमे उड़ैत चिड़ैकेँ तीर लगलापरहोइत अछि।छटपटाइत धीरेन्द्रक मनमे विचार उठल- जगमोहीक जे प्रश्न अछि कीओ अनर्गल अछि? सचमुच जँ कनियोँ शुभ चिन्ह मनक कोनो कोणमे रहैत तँ एते तँ विचार करैत किने जे गाड़ी-सवारी सन अनबिसवासू यात्रा केनिहारि जगमोहीकेँ पुछि लैतिऐ जे यात्रा शुभ रहल किने। प्रेमनगरक केते गोरे जगमोहीकेँ चिन्हैए। गामक बुढ़-बुढ़ानुस बिसरिये गेलहेतैथआनवतुरकेँ बुझले नेहेतइ। भलेँकम्मे दिनक परिचय अपन किए नेअछिमुदा समाजक एक प्रवुद्ध विचारक बेकती ने अपनाकेँ बनबए चाहि रहल छी..! विचारमे विचड़ैत धीरेन्द्रकेँ जेना कोनो बोनमे पथार लागल पाकल आमक गाछक निच्चाँमे जगह भेटलै।ओना, ओहूमे खटगरो आ मीठगरोसुआदक आम होइते अछि मुदा से नहि, धीरेन्द्रकेँकरपूरिया सुआदबला आमक गाछ भेटलै। भेटलै ई जे जहिना अपने समाजशास्त्रक विद्यार्थी छी तहिना ने जगमोहियो अछि, तँए प्रायश्चितक रूपमेकिए ने दुनू गोरे मिलि-बॉंटि विचारि कऽ विचरण करैत रस्ता बना ली।हँ, होइले एते भइये सकैए जे अनुचित बुझि समाज अपन ढाठ लगा ढाठि दिअए, मुदा ओइ ढाठकेँ तोड़लो-सुधारलो तँ जाइए सकैए। परोपट्टामे प्रेमनगर सभसँ नमहर गाम। भौगोलिक दृष्टिसँ सम्पन्न गाम। जहिनाप्रेमनगर गामक नाम छी तहिना नामगुण गुणो-धरम अछिए। प्रेम तँ प्रेम छी,प्रेम कि कोनो आम-कटहरक गाछ जकाँएकपुरखियाह होइए, ओ तँ बॉंस-खरही जकाँ सघन होइत अछि। जहिना आमक प्रेमी लोक आमक गाछी लगबै छैथतहिना जामुनक प्रेमी लोक जामुनोक गाछी तँ लगैबते छैथ, माने जे जेकर प्रेमी से तेकरासँ आकर्षित होइते अछि। जखने कोनो वस्तु वा आने कोनो गुणसँ केकरो आकर्षण बढ़ै छै तखने ओइ दिस ओ आकर्षित भऽ अपना जिनगीमे ओकरा समाहित करैक परियास करए लगैए। चाहे ओ निरजीवसँ निरजीव आकि सजीवसँ सजीवे किए ने हुअए। पूर्वमे प्रेमनगर गामक पुबरिया भाग होइत एकटा धार बहैत रहइ, जेकर नाओं छल प्रेमाधार। पहाड़क झरनाकेँ क्षीण भेने प्रेमाधारक प्रवाह धीरे-धीरे क्षीण होइत-होइत रूकि गेल। प्रेमनगरसँ सटले दछिनवरिया गामक लोक सभओइ धारक मुँहकेँ बान्हि महार काटि-काटि भरि कऽ घर सभ बना लेलक। जनसंख्याक हिसाबे गामक रकबा कम रहने बास डीहक समस्यो रहबे करइ। धारक आगूक मुँह बन्हेने प्रेमाधारक रूप सरोवर कहियौ आकि झील आकि पोखैरसदृशबनि गेल। कहब जे पोखैरआझील, सरोवरमे अन्तर नइ होइ छै जे एक्के धार मुइने तीनू बनि गेल?ऐ सम्बन्धमे अखन बेसी नहिमात्र एतबे कहब जेधारक धार घेरेने मात्र प्रवाहेटाने रूकल,मुदा पहाड़सँ धरती धरि दोसरेदिशामे, पाछूए-सँमुदा जुड़लतँ अछिए किने। तँए, सरोवरो आ झीलोभेबे कएल।आ पोखैर होइक कारण भेल जे आगूक गाममे धारक मुँह बन्न भेने बीचमे महारनुमा भऽ गेल,जइमे पैछला गामबला सभपहटा-टौहकी लगा-लगा अपन धारक पानि घेर लेलक, जइसँ प्रेमाधार धीरे-धीरे ‘प्रेमा पोखैर’ बनि गेल। आब तँ ओकर नाम बदैल ‘परमा पोखैर’ भऽ गेल अछि। खाएर जे अछि मुदा एते तँ अछिए जे बिनु जाठियेक पोखैर किए ने हुअए मुदा जलक पवित्रतो आ गामक जलभण्डारो तँ छीहे। पनरह साए बीघाकप्रेमनगर ऊँचाइ-निचाइक हिसाबसँ तीन कोटिक गाम भऽ गेल अछि। माने ऊँचरस, मध्यम आ गहींर तीन श्रेणीक जमीनक बीच बसल गाम प्रेमनगर छी। गामक चारि साए बीघा जमीन ऊँचरस अछि, जइमे नौ साए परिवारो बसल अछि आ गाछी-बिरछी, बाड़ी-झाड़ी सभ सेहो ओहीमे अछि। ओना, आन-आन एहनो बहुत गाम ऐछे जइमे छिट-फुट ढंगसँ ऊँचरस-नीचरस जमीन छै, मुदा प्रेमनगरमे से नहि अछि। भाग लगा-लगा तीनू रंगक जमीन अछि। चारि साए बीघा जे ऊँचरस जमीन अछितइमे बाससँ लऽ कऽ बाड़ी-झाड़ीआगाछी-कलम धरि अछि,ओ देखैमेसोल्हन्नी गाम जकाँ लगैए आ दोसर-तेसर किस्मक जे जमीन अछि, जइमे अन्न-तीमनक उपजा-बाड़ी होइए, ओ बाध जकाँ लगैए। तँए, ओ भेल प्रेमनगरक बाध। मुदा जहिना शरीर आ शरीरी होइए, जेकरा कियो देखैए आ कियो नहियोँ देखैए तेना नहि अछि, गामक सभ बुझबो करैए आ मानबो करिते अछि जे प्रेमनगर सेहो दू भागमे विभाजित अछि। एक भाग भेल प्रेमनगर गाम दोसर भाग भेल प्रेमनगरक बाध। समटल गामक घराड़ी तँए समटल गाम। अनेको जातिक गाम प्रेमनगर छी, से खाली जातिक नामेटा सँ नहि छी, सभ जातिकेँ अपन-अपन देवियो-देवता छैन आ पाबैन-तिहारकसंगबीधो-बेवहार अलग-अलग छैन्हे। तैसंग अनेको रंगक जातिक समाज, अनेको रंगक धर्मस्थल आ अनेको रंगक बोली-चाली गाममे नहि अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए, सेहो अछिए। मुदा सभ कथूक बावजूदो गाममे कहियो कोनो विघटनकारी काज नहि भेल अछि। ओना, चुनावक समयमे गामक भोँट बँटाइते अछि मुदा से सभ नइ बुझैए। बुझबो किए करत, अपन-अपन जाति देख-देख सभ कियो जतिआरए भोँट बिल्हैए। ने राजनीतिक स्थायी पार्टी अछि आ ने कोनो विचारधाराजइसँ लोक प्रभावित होइत अपन-अपन मतदान करत। उम्मीदवारो सभ तेहने, जइ पार्टीमे टिकट भेटल तही पार्टीक भेलौं, तखन जीवनधाराक निर्माण केना हएत..? राजनीतिक विचारधारा जखन अछिए नहि, चुनावमे जीतैक मतलब मात्र एम.एल.ए; एम.पी. बनब अछि, तखन उम्मीदवार हुअ आकि भोँटर ओकरेकोन विचारधारासँ मतलब रहतै जेजीवनमे उतार-चढ़ाव हएत। किए लोक बुझत जे अपन चेतनशील विचार, चेतनशील जीवनकेँ समरपन करैक अछि किदान करैक अछि जइसँ अपनो जीवनदान भेटत...। बीस साल पूर्व प्रेमनगरबलाक सेहो अपन जीवन पद्धति छेलैनमुदा आब ओहूमे तोड़-जोड़ शुरू भइये गेल अछि।जइसँगामक रूप-रंग बदलल-बदलल सेहो बुझि पड़ैए। बीस बर्ख पूर्व तक जहिना रामपुर, कृष्णपुर आ महमदपुरमे पढ़ल-लिखल लोकक खगता कम छल तहिना प्रेमनगरमे सेहो छेलैहे। पढ़ल-लिखल लोकक ओतबे खगता छल जे रजिष्ट्री ऑफिसमेसनाक बनि दसखत करैक लूरि हुअए। राशनक दोकानपर निशानोसँ काज चलिते अछि। ओझा-वैद गामे-गाम घरे-घर अछिए। एकटा बिमारी हएत, सतरह गोरे सतरह रंगक दवाइयो-बुटीक जानकार आ ओझाइयो-भगताइक गुण रखनहि छैथ। तखन तँ शेष जिनगी वएह ने रहल जे रहैक घर, पहिरैक वस्त्र आ खाइक जोगार हुअए। सेहो तँ अछिए। सालमे तेतेक पाबैन-तिहारक उपास अछि जे सालक चारि माससँ बेसी बिनु खेनौं-पीनौं तँ धर्मदानक नामपर चलिते अछि। कहब से केना? सालमे सिर्फ बाबन-तीरपनटा रबि होइए। जे डेढ़ माससँ बेसीए भेल। तेकर अतिरिक्त जे अछि से सबहक सोझहेमे अछि। दोसर, खेतक उपजा ओहनो तँ अछिए जे पुरना लग्गी-डंटाक हिसाबे बीस मनक कट्ठा अल्हुओ-सुथनी उपैजते अछि। जँ चारियो कट्ठा खेती कऽ लेब तँ पार-घाट लगियेजाएत। भलेँ अल्हुए-सुथनी भोजन किए ने कहबए, मुदा भूखल तँ नइ ने कहौल जाएत। आजुक प्रेमनगर आब ओ नइ रहल जे बीस बर्ख पूर्व छल। आइ लोक गणीतीय पद्धतिसँ अपन जीवन पद्धति बना रहल अछि। पहिने सौंसे गाममे घास-फूसक घर छल, गरमी मासमे आगि-छाइक समस्या सर्वत्र छल मुदा पक्का घर बनने ओइमे कमी एबे कएल अछि, तँए विचारोमे बदलाव एबे करत। आन-आन गामक लोक कनैए जे ‘महिला शिक्षा’ पछुआ गेल अछि। मुदा प्रेमनगरक लोक कनैए जे ‘पुरुखेक शिक्षा’ पछुआ गेल अछि! सभ गामवासीक अपन-अपन सोचो-विचार छैन्हे। ओना, पूर्वक समाजमे सोच-विचारक जेतत्त्व छलतइमे भौगोलिक तत्त्वकस्थान महत्पूर्ण छल। मुदा आइ ओहूमे कमीआबि रहल अछि। सामाजिक सम्बन्धमे आन गामक विचारधारासँ भिन्न विचारधारा प्रेमनगरक अछि। आन गामक दोस्ती आ प्रेमनगरबलाक बीचक दोस्तीमे सेहो अन्तर अछिए। हिन्दूक बीच रूपैआक लेन-देनमे सूदखोरी अछि मुसलमानमे नहि अछि। जखन अपना-अपनामे भलेँ चलि सकए मुदा दुनूक (हिन्दू-मुसलमानक) बीच केना चलत? तहिना खेनाइयो-पीनाइमे अछिए। तैसंग आन गाममे ईहो अछि जे एक जातिक हाथक पानि दोसर जातिक लोक नइ पीबैए, छुअल अन्न नहि खाइए,मुदा प्रेमनगरमे से नहि अछि। बबाजीक झूण्ड जकाँ हरे-हरे करैत सभ एकठाम बैस खाइते छैथ। आन गाममे पहिने पोखैर-इनार रोकल जाइ छल मुदा आब चापाकल भेने बोरिंगक पानि रोकल जा रहल अछि। अदलैत-बदलैत ओहन-ओहन बेवहार अखनो आन-आन गाममे जीवित अछिए जे एक-दोसरक बीच दूरी बनबैए मुदा से प्रेमनगरमे ने पहिने भेल आ ने अखन अछि।हिन्दू-मुसलमानक बीच जे पाइ-कौड़ीक कारोबार अछि ओ एहेन अछि जइमे एकरूपता अछि। एकरूपता भेल एक बेवहारक प्रयोग करब। तहिना पनिचल्ला आ बिनु पनिचल्ला लोकक बीचक बेवहार सेहो अछिए। खाएर जे अछिसे अपन-अपन गामक अछि, तइसँ प्रेमनगरबलाकेँ कोन मतलब छइ। अपन गाम छै, अपन-अपन समाज छै, अपन-अपन विचार छै आअपन-अपन विचारधारा छै, जइमे सभ बहैत अछि। बिआह-दानक बेवहारमे प्रेमनगरबला ऐ बातकेँ नीक जकाँ बुझि रहल अछि, किए तँ ओ भुक्तभोगी अछिजे आइक परिवेशमे बेटा-बेटीक बिआहक रूप एहेन बनि गेल अछि जे बेटाक प्रति लेब अछि आ बेटीक प्रति देब अछि। मुदा एकरो नकारल नहियेँ जा सकैए जे पहिने बेटीक प्रति सेहो लेब छल आ बेटाक प्रति सेहो देब छल। यएह तँ दुनियॉंक खेल छी। एक भेल लेब, एक भेल देब आ एक भेल लेब-देब। जीबेन्द्रकेँ एकटा अछोप जातिक बेकती–मुसनसँ दोसतियारे भेलैन। दुनूक बैसार-उसार, गप-सप्पक सम्बन्ध बनलैन। खाएब-पीबसँ लऽ कऽ आर्थिकलेन-देन इत्यादि सभ तरहक सम्बन्ध बनलैन। एक दिन गप-सप्पक क्रममे मुसन जीबेन्द्रकेँ कहला- “दोस, जेहने कपार हमर अछि, तेहने भगवान अहूँक बना देलैन!” मुसनक इशारा समाजमे जे बेटाक प्रति दहेजक चलैन अछिओइ दिस रहइ। किएक तँ एक्केटा बेटा मुसनकेँ सेहो आ जीबेन्द्रकेँ सेहो छैन बॉंकी तीन-तीनटा बेटीए छैन। मुसनक इशारा जीबेन्द्र नहि बुझि पेलैन, मुदा समझदारी तँ एते शक्ति सृजित कइये देने छैन जे जखन दुनू गोरे एकठाम गप-सप्प करै छी तखन बात भागत केतए। कहुना-ने-कहुना मुसनक मुँहमे एबे करत, जइसँ बजबे करत। तैबीच किए ने मुसनकेँ दोसर दिस टहला दी। गप-सप्पक क्रम बदलने, सएह भेल। बजैत-बजैत मुसन बाजि गेल जे दोस जेकरा पाँचटा बेटा छै, तेकरा दहेजेसँ तेतेक आमदनी भऽ जाइए जे पाँच पुस्त बैसले खाएत। विचारक धारमे भँसैत मुसनकेँ हाथ पकैड़ जमीनपर ठाढ़ करैत जीबेन्द्र बजला- “दोस, तोरा ई नइ बुझल छह जे तोरा जातिक बिआहमे बेटेबलाकेँ रूपैआ गनि कऽ दिअ पड़ै छइ।” ओना, मुसनमे जिनगीक बहुत किछु समझदारी आबि गेल अछि, मुदा जिनगियो तँ महजाले जकाँ ने जलियाएल-सुतियाएल अछि, जइसँ सभ बात लोक अपनो ने बुझि पबैए। मुसनकेँ सेहो सएह भेल अछि। मुसन बाजल- “दोस अहाँक बात नइ बुझलौं?” जीबेन्द्र मने-मन विचारलैन जे मुसन दोस जखन अपनो बात अपने नहि बुझि रहल अछि तखन समाजमे केहेन जाल लगल अछिसे थोड़े बुझि पौत। मुदा जँ काजक विचारसँ पड़ा जाएब तखन दोसतिआरेक अर्थे की आ समाजे की। विचारकेँ गोल-मोल बना जीबेन्द्र बजला- “दोस, हमर-तोहर कपार गाममे सभसँ नीक अछि।” ‘नीक कपार’ सुनि उत्सुक होइत मुसन बजला- “दोस, से केना?” जीबेन्द्र बजला- “दोस, बेटा बिआहमे कि कोनो दहेज लेब अछि, अपना घर एकटा जुआन मनुख आनब तइसँ पैघ की दहेजे अछि।” मुसन जीबेन्द्रक रहस्यकेँ नहि बुझि विचारक प्रवाहमे बाजि देलक- “दोस, हमहूँ अपना बेटाक बिआहमे दहेज नइ लेब!” तहियासँ मुसनकेँ अपन परिवारमे तँ बदलाव एबे कएल जे टोलोक कार्य पद्धतिमे बदलाव आबए लगलै। बीचक समयमे लड़कीकेँ वस्त्राभूषण देब लड़का पक्षक बेवहार भेल आ लड़काकेँ वस्त्राभूषण देब लड़की पक्षक बेवहार भेल। खाइले डालपर चाउर आ दहीक पद्धति चलए लगल। मुदा आब तेसर मोड़पर समाज आबि गेल अछि। एक्कैस जून। भिनसुरका समय। धीरेन्द्र चाह पीब आगूक विचार करए लगल कि मनमे जगमोहीक माए- सुवासिनी एलइ। मने-मन विचारए लगल जे की करब नीक हएत। लोकक नजैर एहेन प्रदूषित भऽ गेल अछि जे अनेरो किछु-सँ-किछु बात उड़बैत रहैए..! समाजक बीच उड़ैत प्रदूषित विचारक बीच धीरेन्द्रक मनमे सुचित विचार जगल। सुचित विचार जगिते धीरेन्द्र उठि कऽ ठाढ़ भेल आ जगमोहीसँ भेँट करए ई सोचि विदा भेल जे जे कोनो प्रश्न सामनेमे औत ओकर सामना करैक अछि। ओना, सुवासिनी चारू माय-धी सेहो चाह-पीलाक पछाइत गाम घुमैक विचार कऽ नेने छेली। धीरेन्द्रक घरसँ श्यामक घर करीब दस मिनटक रस्ता। दू टोलमे दुनू गोरेक घर छैन। जाबे सुवासिनी घरसँ निकलैथ-निकलैथ कि तइ बिच्चेमे धीरेन्द्र पहुँच गेल। आइसँ बीस बर्ख पूर्व प्रेमनगरक लोकक बीचक सम्बन्ध ओहने छल जेहेन अखन आन-आन गामक अछि। माने ई जे गाम-समाजक लोक जातिक बीच विभाजित छैथ जइसँ एक-दोसर जातिक बीच किछु विधो-बेवहार आ जीवन शैलीमे सेहो अन्तर अछिए। ओ अन्तर एक-दोसर जातिक बीच खाधि बनि सोझ बाटकेँ किछु दूरी बनाइये देने अछि, जइसँ जाति-जातिक बीच दूरी बनि गेल अछि। उदाहरण रूपमे श्राद्ध-कर्मकेँ देखै छी। किछु जाति एहेन अछि जइमे मृत्युक पछाइत तेरह दिनक बीच सभ क्रिया सम्पन्न कएल जाइए, तँ किछु जाति एहेन अछि जेकर किरिया-कलाप पनरह दिनमे सम्पन्न होइए। तहिना किछु जाति एहेन अछि जेकर अट्ठारह दिनमे सम्पन्न होइए तँ किछु एहनो जाति तँ अछिए जेकर तीस दिनमे सम्पन्न होइए। तैसंग दोसरबाधा ईहो अछि जे जइ दिन तक नह-केशक किरिया सम्पन्न भेल रहतआ श्राद्ध-कर्म पछुआएल रहत तैबीच जँ अपने परिवार वा दियादवादक बीचक परिवारमे दोसर मृत्यु हएत तँ पैछला मृत्युक हिसाबसँ क्रिया-कर्म अगुआ जाएत जेते दिनमे क्रिया-कर्म सम्पन्न होइए। माने दोबरसँ लऽ कऽ पौन-दोबर धरि समय भेल। प्रश्न अछि जे जखन कोनो परिवारमे मृत्युक घटना होइए तखनेसँ तहिया धरि परिवारक जीवित काज बाधित होइते अछि। जखने जीवनक संग चलैबला काज बाधित भेल तखने ने जिनगीक गतियो बाधित भइये गेल। तहूमे समय-समैयक समस्या सेहो कम प्रभावितसँ अधिक प्रभावित करिते अछि। माने भेल जे सुभ्यस्त समयमे जे काज असानीसँ चलि जाइए वएह काज गरुगर समय भेने भारी भइये जाइए। तहूमे आइक समय आ पाछूक बीतल समैयक बीच जीवन क्रिया सेहो अविकसित रहने जटिल छेलैहे। आइ जे समस्या प्राय: समाप्त जकाँ भऽ गेल अछि, माने गाम-गामक महामारी-हैजा, प्लेग-कालाज्वर इत्यादि वएह रोग पहिने घरहंज कऽ दैत छल! मुदा से आइ समाप्ते जकाँ अछि। आजुक प्रेमनगरक लोकमे जहिना समयानुकूल विचार जगलैन तहिना अपन बेवहार सुधारैत आगू बढ़ि अगुआएल गाम-समाज कहियौ आकि विचारशील समाज कहियौ, से भइये गेल अछि। जहिना अखन आन-आन गामक लोक कतियाइत जाति-जातिक बीच सीमांकन केने छैथ तहिना जातिक बीच कूल-मूलक चलैत सेहो सीमांकन केनहि छैथ, जइसँ बेकती समाजक मुख्यधारा हेबा चाही, ओइसँ स्वयं कतिया गेल छैथ। ओना, गाम-समाजक बीच सभ दिनसँ जहिना ओहन रस्ता बनले आबि रहल अछि जे ने दोस्ती बनैमे देरी लगैए आ ने मेटाइमे देरी लगैए। एहने डेंगी नाहपर समाजक सवारी चलिये रहल अछि। तइमे प्रेमनगरबला सभअपनामे सुधार जरूर केलैन अछि। जेतए गजेरी-भँगेरी एकठाम बैस नॉंहकमे घन्टो-घन्टो समय दुइर करैत जे समाजक कोढ़ बनल छल से बदैल ओइ जगहपर पहुँच गेल जेतए आइक परिवेशपर विचार कएल जाइत अछि। आजुक जे परिवेश दुनियॉंक हवामे विर्ड़ो जकाँ उधिया-भँसिया रहल अछि ओकरा कोन ढंगे समाजक परिवेश बना असान ढंगक जीवन जीबैक क्रियाक बीच क्रियाशील बना समाजक दिशा-निर्देश स्थापित करी। धीरेन्द्रकेँ देखते जगमोही बिना मुँह खोलने मने-मन मुस्कियाएल मुदा सुवासिनी अपन मातृत्वक रक्षा करैत बजली- “बौआधीर, हम तँ गाम छोड़ि चलि गेलियह,आब ई गामतोरे सबहक भेलह। कहियो अबैले कहबह ते आएब नइ तँ मने-मन माता-पिताकेँ गोड़ लगैत नैहर मन पाड़ैत रहब। मन पाड़ैत रहब जे केना जन्मसँ लऽ कऽ बिआह-दुरागमन धरि गाममे रहलौं।” सुवासिनीक विचार सुनि, दृष्टिमान युवकमे जे गुण हेबा चाही ओ गुणसँ सम्पन्न धीरेन्द्र मुस्की दैत बाजल- “बहीन, हम समाजक ओहन भाए नइ छी जे बहिनकेँ कातिकक भरदुतियामे कहबैन जे बहिन, अगहनक दुतियाक चान जइ दिन उगतै तइ दिन आएब।” ओना, सुवासिनी पटनाक हवामे बहुत किछु बदैल गेल छेली मुदा प्रेमनगरक माटिपर कहियो नइ रहल छेली सेहो बात नहियेँ अछि। बिआहसँ पूर्व धरि रहल छेलीहे। धीरेन्द्रक विचार सुनि सुवासिनी अपन माथपर बल दैत प्रेमनगरमे अपन बितौल जिनगी मन पाड़ए लगली। केना फूल तोड़ि दसमीक दुर्गास्थानमे पहुँचबै छेलौं, केना आमक गाछीसँ टिकुला बीछि-बीछि आनि आमील बनबै छेलौं, केना शिवरातिक उपास,कृष्णाष्टमीक उपासक संग समाजमे जेतए-केतौ सत्-नारायण भगवानक पूजामेसेहो उपास करैत रही।तेतबे नहि, जँ बाढ़ि अबैतरहै तँ केना अँगनाकेँघेरैतरही,बाड़ी-झाड़ीक पानि उपछैतरही! इत्यादि-इत्यादिअनेको क्रिया-कलाप सुवासिनीक मनमे एकाएकी जागए लगलैन...। नैहरक विचार जेना-जेना सुवासिनीक मनमे जगैत गेलैन तेना-तेना सासुर बिसरैत गेली। सासु-ससुरकेँ बिसैर माता-पिता लग पहुँच गेली। माता-पिता लग पहुँचते सुवासिनीक मनमे जगलैन- कातिकक दुतियाक संग अगहनक दुतिया सेहो मन पड़लैन।भरदुतियाक संग धनकटनी समय मनमे अबिते एकाएक सुवासिनीक नजैर आजुक परिवारपर आबि अँटकलैन। अँटैकते दुनू आँखि नोराए लगलैन। नोराएल आँखिये सुवासिनी धीरेन्द्र दिस ताकए लगली...। धीरेन्द्रक मन निष्कपट रहने जिनगीक बीच मोड़पर ठाढ़ छल। सुवासिनी बजली- “बौआधीर, भगवान सभ बिपैत हमरे देलैन..!” विचारक दुनियॉंमे धीरेन्द्र तेना हेरा गेल जे हेराएल बटोही जकाँ मुँहक चुहचुही कमए लगलै। हेराइक कारण भेलै जे विपत्तियोकेँ कि सींग-नॉंगैर अछि जे लोक लगले बुझि जाएत जे ई घोड़ा छी कि हाथीआकि गाए छी कि महींस। बिपैत तँ बिपैत छी, जेकरा घरमे आगि लगै छै ओ बुझैए आ जेकरा घरमे नइ लगै छै ओ किए बुझत। तहिना जेकर घर बाढ़िमे भँसिया जाइए ओ भँसियाएब बुझैए आ जइ गाममे बाढ़िक पानि जाइते ने अछि ओकरा बुझैक कोन खगता छइ। मुदा से तँ बुझला पछाइत ने लोक बुझ़ैए, बिनु बुझलमे की बुझत। छोट भाइक रूपमे धीरेन्द्र बाजल- “से की बहिन?” धीरेन्द्रक बात सुनि सुवासिनीक मन जेना अछींजलसँ धुआ गेल होनि तहिना धुअल मने बजली- “बौआ, जहिना भैयारीक चलैत सासुर उपैट गेल, तहिना भगवान डॉंग मारलैन जे बेटा एकोटा ने देलैन आ तीन-तीनटा बेटीए देलैन। अखन अपनेनोकरी करै छैथ ते बड़बढ़ियॉं, मुदा जखन नोकरी छुटतैन, हाथक काज छिनेतैन तखन केतए रहब आ केना बेटी सबहक पार-घाट लगाएब!” ओना, सुवासिनी एकसूरे सभ बात बाजि गेली मुदा धीरेन्द्रक मन ओहिना थकथका गेल जहिना चारूकात पहाड़सँ घेरल ओ भूमिजे ओहन बनसँ आच्छादित हुअए जइमेमात्र मनुखभक्षी जानवरक बास होइ। मुदा रस्ता पहाड़ी होइ वा जंगली वा समुद्री, मनुख तँ दूटा हाथ-पैरबला जीव छीहेजेजहिना असथिरोसँ चलि सकैए, दौड़ियो सकैए तहिना जानवरकेँ मारियो सकैए आ प्रवोधियो तँ सकिते अछि। तैसंगपैघ-सँ-पैघ पहाड़ोपर चढ़ि-उतैर सकैए आ समुद्रोमे तँ हेलिये सकैए...। तखन तँ भेल जे दूहाथ-दू पैरसँएक्केबेर समुद्रोमे हेललआ जंगलो काटलतँ नइ हएत, मुदा बेरा-बेरी तँ भइये सकैए। तँए, एक-एक प्रश्नकेँ बिहिया-बिहिया, बटोरि-बटोरि जखने बाटपर आनि बटोही बनि हल करए लगब तखनने जिनगी भारसँ भारी रहतआ ने जीवन जीनसँ दूर रहत। तही बीच प्रेममोही अपनदोसर संगी- रूपमोहीक संग पहुँच गेल। परिवारसँ सम्बन्धित समस्या बाल-बोध लग राखबो उचित छी आ नहियोँ राखब तँ उचित छीहे। मुदा से अखन नहि, अखन एतबे जे भाए-बहिनक बीचक बात छी, तँए निच्चाँक खाढ़ीलग रखने दुनू तरहक प्रभाव–नीको प्रभाव आ अधलो प्रभाव–पड़ैक सम्भावना रहिते अछि। ओना, धीरेन्द्र प्रेममोहीकेँ जनैत जे गाममे एकटा प्रेममोही नामक लड़की अछि जे कौलेजमे पढ़ैए। मुदा सोझा-सोझी आइये भेल। धीरेन्द्र प्रेममोहीपर नजैर देलक मुदा प्रेममोहीक नजैर जगमोहीपर छेलै तँए सामने-सामनी नजरिक भेँट आइयो नहियेँ भेल। धीरेन्द्र जेना जगमोहीकेँ चिन्हैत तेना प्रेममोहीकेँ तँ नहि चिन्हैत मुदा सोल्होअना नहियेँ चिन्हैत सेहो बात नहि। धीरेन्द्रकेँ एते तँ बुझले छै किनेजे प्रेममोही हृदयनाथक बेटी छी, बी.ए.मे पढ़ैए। मुदा ऑनर्स रखने अछि से नहि जनैत रहए। जँ से जनैत रहितए तँ जहिना अपनाकेँ जगमोहीक समकक्ष बुझैएतहिना प्रेममोहीकेँ सेहो बुझितए...। सुवासिनीसँ गप-सप्प करैक विचारसँ धीरेन्द्रक मनमे उठल जे जगमोहियोकेँ आ प्रेममोहियोकेँ कहिऐ जे ‘अहाँ सभ दोसरठाम बैस गप-सप्प करू वा किम्हरो टहैल-बुलि जगमोहीकेँ देखाइये-सुना दियौ। मुदा जगमोही, प्रेममोही आ प्रेममोहीक संग आएल रूपमोहीक बीच धीरेन्द्र अपनाकेँ अनाड़ी बुझैत चुपे रहब नीक बुझिकिछु ने बाजल। एक तरहेँ भाए-बहिनक बीचक गप-सप्पमे सुवासिनी बोहिया-भँसिया लागल छेली तँए बीचमे दोसर गप-सप्पकेँ आबए देबनीक नहि बुझिजगमोहीकेँ कहलखिन- “बुच्ची, हम ऐ गाममे जन्मसँ लऽ कऽ सियान भेल छी, तँए बहुत देखने छी मुदा तोहर जन्म तँ भेलह अही गाममे मुदाजन्मक तीनियेँ मासक पछाइत सासुर चलि गेलौं। सासुर कि जाएब जे पटना गेलौं, तँए तोरा कम देखल-सुनल-बुझल छह, भने संगी-सहेली भेटिये गेलह, जाह गाम घुमि-फिर कऽ देख-सुनि आबह।” ओना, जगमोही माइक मुँहक बात सुनि चुकल छल तँए धीरेन्द्रक उत्तर सुनैक जिज्ञासा छेलैहे। मुदा तइ बिच्चेमे पटनाक परिचयकेँ नजर-अंदाज करैत धीरेन्द्र जगमोही दिस ताकि बाजल- “हँ, हँ! जखन जगमोही प्रेमनगर आएल अछि तखन आमेटा किए खाएत, गाम-घरक रूपो-रंग आ हवो-बसात किए ने देहमे लगा लेत।” जगमोही सेहो धीरेन्द्रक अपन रूप सौन्दर्यक संग परिवारिक जीवन-सौन्दर्य सेहो देखए चाहिते छल, जे धीरेन्द्रक अपेक्षा आन-आनसँ बेसी भेटैक सम्भावनाकेँ देखैत जगमोही उठि कऽ ठाढ़ होइत बाजल- “माए, हमर कोनो ठेकान नहि अछि जे कखन घुमि कऽ आएब। तँए, जँ तोरा केतौ घुमै-फिरैक विचार हौ तँतोहूँ टहैल अबिहेँ।” एकान्त शान्त वातावरण होइते धीरेन्द्र सुवासिनीकेँ कहलक- “बहिन, अखन हम ने समाजक कियो छी आ ने परिवारक, अखन हम मात्र विद्यार्थी छी, जेकरा गुरु-शिष्यक आश्रम सेहो कहल जाइतअछि। तँए जाबे छी ताबे तँ छीहे। ओना, अठारह बर्खसँ अपनाकेँ ऊपर सेहो उठा नेने छी आ स्नातक प्रतिष्ठाक छात्रो तँ छीहे, तँए..?” धीरेन्द्रक सुपुट वाणी सुनिते सुवासिनी ओहिना सुवासी भऽ गेली जेना मानसरोवरमे कमल होइए। ओ जहिना अपन बास स्थानपर अडिग भऽ सरोवरक पानिसँऊपर उठि अपन शुभ रूप देखबैए तहिना धीरेन्द्र सन भाएसुवासिनीकेँ देखा पड़लैन।खुशीसँ सुवासिनी बजली- “बौआ, तोहीं सभ ने बाप-दादाक डीह परहक भाए-वन्धु भेलह, अपन दुख-बेथाक कथा तोरा नइ कहबह तँ केकरा कहबै।” सुवासिनीक डगमगाइत जिनगीक डुमैत नाहकेँ अँकैत धीरेन्द्र जखन अपन आँक देखए लगल कि मनमे भकइजोत जकाँ भेलइ। भकइजोत ई भेलै जे अर्जुन सन योद्धापिता आकृष्ण सन माम जखन अभिमन्युकेँ मृत्युसँ बँचाइये नहि सकला तैठाम हम कोन खेतक मुरै छी। मुदा नहि!डगमगाइत बहिनक जिनगीक नाहकेँजेतए-तक पार लगबैक शक्ति अछि ओते तँ कइये सकै छी। तँए, पहिने सुवासिनीक विचारकेँ मानसपटलपर आनब जरूरी अछि। हरिमोहन बाबू जकाँ नहि, जे समाजक अधिकांश समस्याकेँ एकठाम आनि दोस-दुश्मन दुनूकेँ ठाढ़ कऽ देलैन..! धीरेन्द्र बाजल- “अहिना होइ छै बहिन,जखन बेथाएल मन रहने बजैक क्रममे किछु-ने-किछु झोंक उठिये जाइ छइ। तँए,एक-एकटा समस्याकेँ सामने रखैत विचार करू। छोट भाए होइक नाते जेतए-तक सम्भव हएतओतए-तकजरूर संग देब।” सुवासिनी बजली- “सासुरक बात छोड़ि दइ छिअह। भैयारीमे एहेन अन्याय ओहने गाम-सभमे रहह। मनुख छी जेतए रहैक नीक ठौर भेटत सएह ने हमर स्वर्गक बास भेल।” एकटा नमहर प्रश्नकेँ अपने हल होइत देख धीरेन्द्रक मनमे किछु चपचपी आएल। बाजल- “भैयारी समंगर छैथ किने?” सुवासिनी- “हँ।” धीरेन्द्र- “जाए दियौ, वंश बढ़ै तँ बक्खो हुअए...।” अपन रस्ता अपने देखैत सुवासिनी बजली- “सासु-ससुरक सम्पैतसँ तँ छातीमे मुक्का मारि संतोख केनहि छी।” जहिना खिस्साक कोनो एहेन भाग होइ छैजेकरारसिक खिस्सकर बेर-बेर दोहरा-तेहराकऽ कहैए तहिना सुवासिनी पुन: सासुरेक बात दोहरबैत बजली- “ओइ बइमनमा सभकेँ नीक नइ हेतइ। दियादी सम्पैतक बेइमानी नइ पचतै, पेटमे पनिदूदूर हेतै आ मनमे मनरोग।” मने-मन धीरेन्द्रकेँ हँसियो लगै आ आगू जखन बहिनक बेथापर नजैर जाइ तँ विचलितसेहोहुअ लगए।आगू कोन दिशामे बढ़ब नीक हएत से धीरेन्द्रक मनमे एबे ने करइ, तँए मुहसँ निकलबे ने करइ। मुदा सुवासिनीक मन सासुरक धन-सम्पैतक बीच औना रहल छेलैन। औनाइत सुवासिनीक मनमे अनायास विचारक झोंक उठलैन कि बजली- “जहिना हमरा अपन सम्पैतसँ भैयारी-दुसमन सभ अभोग केलक तहिना ओकरो सभकेँ अभोग हेतइ!” सुवासिनीक मनमे सासुरक धन-सम्पैतकेँ बेर-बेर धधरा जकॉं उठैत देख धीरेन्द्रकेँ विचार जगल जे सभसँ पहिने ऐ धधराकेँ शान्त करब जरूरी अछि। जाधैर विचारकेँ आगू नहि बढ़ाएब ताधैर अहिना सुवासिनीक मनमे सम्पैतिक आगि उठैत रहतैन आ ओइमे ओ झड़कैत रहती। धीरेन्द्र बाजल- “बहिन, आब समय बदैल गेल। पहिने जेना बेटा-बेटीक महत्-मे कमी-बेसी छल से आब नहि रहल। आब तँ जहिना बेटा तहिना बेटियो भऽ गेल अछि।” ओना, विचारकेँ दू ढंगसँ देखल जा सकैए, पहिल ऊपरे-ऊपरे माने सरसरी निगाहसँ आ दोसर गहराइसँ माने जिनगीक सच्चाइक आधारपर। धीरेन्द्रक बात सुनि सुवासिनी बजली- “हँ, से तँ अछिए बौआ! देखै छी जे लोकक बेटा सभ बुढ़ माए-बापकेँ छोड़ि गामक कोन बात जे देशो-कोस छोड़ि केतए-कहाँ चलि जाइए..!” सुवासिनीक विचार सुनि धीरेन्द्रकेँ भेल जे भरिसक बेचारी जिनगीक अगम धार देख महारेपर उग-डुम कऽ रहली अछि। धारमे पैस पार करैक हिम्मते नहि भऽ रहल छैन। जखन कि सभकेँ अपन-अपन जीवन अछि आ अपन-अपन जीवनधार छै, जइमे सभकेँ अपने पार करैक अछि। दोसर तँ बेसी-सँ-बेसी एतबे ने कऽ सकैए जे अपना ढंगे पार करैक रस्ता बाट-घाटमे किछु शारीरिको-आर्थिक सहयोग कऽ सकैए। ओना, कियो अपन जिनगीक बाट देखा जँ दोसरकेँ शारीरिके वा आर्थिके सहायता करबो करत तैयो ओतेक उपयोगी ओकरा लेल नहियेँ हेतै जेतेकसँओकर कल्याण हेतइ। तँए, पहिने अपने अपन जिनगीक बाट-घाटक बोध हएब जरूरी अछि, जे अपनो लोक खोजि सकैए आ दोसरोसँ प्राप्त भऽ सकैए। ओना, दोसरसँ प्राप्त दू तरहेँ होइए। पहिल- अनुभवसँ प्राप्त अनुभवीसँ आ दोसर- बिनु अनुभव प्राप्त केनिहार खोजी वा विचारवानसँ...। धीरेन्द्रक मनमे उठलै- अपनो तँ अखन सएह छी। अखन तकक जे अपन जिनगी रहल ओ तँ मात्र स्कूल-कौलेज धरिक रहल। मुदा परिवारिक आ समाजिक जिनगी तँ किछु आओर छी...। तैबीच श्यामक पत्नी- सुचिता चाह नेने पहुँचली। सुवासिनीक आगूमे चाह रखैत सुचिता बजली- “ई सभ तँ बजरूआ लोक भेली, क्षणे-क्षण चाह पीबैक आदैत हेतैन, पहिने चाह पीब लोथु तखन निचेनसँ गप-सप्प करैत रहिहैथ।” कहि सुचिता अपन काज दिस बढ़ि गेली। तस्तरीसँ चाहक कप उठा धीरेन्द्र दिस बढ़बए लगली मुदा तइ बिच्चेमे धीरेन्द्र तस्तरीमे राखल दोसर कप उठबैत बाजल- “बहिन, अखन हम ने अहॉंकेँ आग्रह करब। अपनो परिवारमे बेसी दिनपर जखन लोक अबैए तँ पहिने पाहुने स्वरूप ने रहैए। जे उचितो छी। किए तँ घर-परिवारक जे गतिशीलता अछि ओइसँ ओ अनभुआर रहिते छैथ। जेना-जेना गति-विधिक संग जुड़ैत जाइ छैथ तेना-तेना घरवारी बनैत जाइ छैथ।” धीरेन्द्रक बात सुनि सुवासिनीक मनमे उठलैन- ई घर तँ श्यामक छी, ऐठाम जेहने धीरेन्द्र तेहने ने अपनो भेलौं। बजली- “बौआ, ऐ घरक तँ जेहने हम भेलौं तेहने ने तोंहू भेलह।” समगम विचार देख धीरेन्द्र बाजल- “बहिन, अहाँ लिए तँ जेहने ई घर तेहने गामक आन-आन घर,तँए एक्केरंग भेल किने?” विचारक गहराइमे जाइते सुवासिनीक मनसँ अपन सासुरक बेवहार निकैल नैहराक विचार जागि चुकल छेलैन। बजली- “हँ, से तँ अछिए। मुदा सोझे मानब सेहो भेल आ जिनगीक संग मिलि चलब सेहो तँ अछिए।” स्वीकार करैत धीरेन्द्र बाजल- “हँ, से तँ अछिए। मुदा ओ तँ सम्बन्ध आगू बढ़ौने ने बनत। जँ सम्बन्धकेँ रोकि कऽ राखब तखन तँ अपनो बीरान भऽ जाइते छइ।” सुवासिनी- “हँ, से तँ होइते छै मुदा से होइ छै भरल-पुरलक संग। खगलकेँ ते..?” सुवासिनीक मुहसँ ‘खगल’ सुनि धीरेन्द्रकेँ झटहाक चोट जकाँ लागल। झटहाक चोट भेल इशारामे किछु कहब। मुड़ी डोलबैत धीरेन्द्र बाजब शुरूहे केलक कि बिच्चेमे श्याम पहुँच गेला। झटहाक चोट, इशाराक विचारकेँ अनुभव करैत धीरेन्द्र बाजल- “बहिन, खाली श्यामे भाइक परिवारटा केँ अपन नइ बुझियौ, गामक सभ परिवारकेँ अपन परिवार बुझियौ। अहाँ गामक धी छी, अहॉं लिए सभ बरबैर!किए तँ बेटी जाति समाजक होइए नहि कि परिवारक।” ओना, सुवासिनीक ऑंखिक आगू बेटीक भ्रुण हत्या नाचि रहल छेलैन। देख रहल छेली आजुक समाजिक परिवेश, जे बेटी जातिक जीवनकेँ समूल नष्ट करए चाहि रहल अछि।जेतए मनुक्खोक सीमापर पहुँचब बेटी-जाति लेल पहाड़ बनि गेल अछि, तैठाम आजुक मनुख बनब तँ आरो असंख्य पहाड़क बीच जीवन बनियेँ गेल अछि किने..! मुदा ईहो तँ सुवासिनी बुझिये रहल छेली जे आइ जइ तरहेँ समाजक बिखण्डन भऽ गेलआ तइसँ जे समाजक बीचक सरोकार-सम्बन्धक टुटान बढ़ि रहल अछि ओतँ धिया-पुताक खेल नहि जेकरा...। मुदा अपनाकेँ समगम बनबैत सुवासिनी बजली- “दुनियाँ केतबो इलैट-बिलैट जाए मुदा हम तँ अखनो अपन जन्मभूमि आ माए-बापक कर्मभूमि बुझिये रहल छी तखन तँ..?” सुवासिनीक बात सुनि श्यामक मनमे जहिना गँथाकऽ बेथेलैन तहिना धीरेन्द्रक मनमे सेहो गँथाएल। सुवासिनीक बात सुनि श्याम मने-मन विचारए लगला जे अपन सहोदर बहिनक आँखिसँ जे जमुनिया धार बहि रहल अछि, की झूठ एकरा कहल जाए?मुदा हम तँ अधिकारी जरूर छिऐ। जे भाए गामसँ बाहर चलि गेला हुनको बहिन छिऐन, तँए हुनको कहब जरूरी अछि, मुदा माए-बापक बासक मूल वासी तँ हमहीं भेलिऐ किने, तँए हम कि बहिनकेँ बोल-भरोस नहि देबैन। एतबे ने जे जे विभव अछि तइमे पाछू नइ घुसकब। ई तँ अपन भार भेल...। नव जुगक उठैत नवजुबक धीरेन्द्रकमनमे अनेको विचारक हिलकोर लगबे केलै जइसँमन विकृत हुअ लगलै। श्यामक मुँह दिस देख धीरेन्द्र सुवासिनीकेँ कहलक- “बहिन, अखन जाइ छी। बेरूपहर टहलै-बुलैले हमरो घर दिस आउ।” धीरेन्द्रक आग्रहसँ सुवासिनीक मनक मिठाँस जगलैन। जगबो केना ने करितैन, एक तँ जगमोहीक कौलेजक संगीछी धीरेन्द्र,तैपर जाबे पटनामे रहत ताबे परिवारक संगी आ तैसंग अपन जन्मभूमिक सेहो भेबे कएल। मुदा परिवारक एते रोच तँ सुवासिनी रखबे केली जे बिनु भाइयक विचारसँ किछु ने बाजब। तँए, चुपे रहली। तैबीच श्याम आश्वासन दैत धीरेन्द्रकेँ कहलैन- “हम कि सुवासिनी बहिनकेँ नैहरक बाट आकि जगमोहीक मातृकक बाट रोकब। हिनको जन्मस्थान छिऐन आ जगमोहियोक मातृक छिऐ।” गमगीन चेहरा धीरेन्द्रक बनि गेल। धीरेन्द्रकेँ कनी दूर हटला पछाइत श्याम सुवासिनीकेँ कहला- “बहिन, बेरूपहर चारू माय-धी धीरेन्द्रक ऐठामसँ टहैल-बुलि आउ। ओना, दुनू गोरेक आमक गाछी सेहो एक्केठाम अछि आ फड़लो बढ़ियाँ अछि। गाम छिऐ किने, पटना नइ ने छी जे सभ दिन जखन सेव-अंगूर खाइ छी तँ अनेरे किए आमसँ मुँह ऐंठाएब।” शब्द संख्या : 4701, चोरा चान12 सितम्बर 2018 7. दिन लहैस गेलजइसँ गरमीमे सेहो कमी आएल। छह बजे सॉंझक समय।सुवासिनी अपन छोट भाए श्यामकेँकहली- “बौआ, धीरेन्द्र जखन घर चढ़ि कहि गेल तखन विचार होइए जे...।” ओना, सुवासिनी अपन मनक बात (विचार)केँ दाबि लेलैन मुदा विचारक जे प्रवाहित प्रवाह छेलैन ओ तँ सुपुट इशारा कइये रहल अछि। तहूमे श्यामक सोझक गप सेहो छीहे। अखन धरि प्रेमनगरमे ऐ टोल ओइ टोलक बीच–माने एक टोलसँ दोसर टोलक बीचकजे सम्बन्ध रहल ओ तेहेन सघन नहियेँ रहल अछि, तँए एक-दोसर परिवारक बीच आवाजाही नहियेँ जकॉं अछि, मुदा समाजो तँ समाज छी, ओ तँ कोनो मूर्त रूप नहियेँ छी! मुदा विचार रूप नहि छी सेहो केना नइ कहल जाएत। भलेँ ओकरा मनेक उपज किए ने कहल जाए। जेकर धार दुनू दिस छइहे। माने आगू बढ़ि जँ जोड़ैक अछि तँ पाछू हटि तोड़ैक सेहो छइहे...। बिना कोनो लागि-लपेटिक विचार केने श्याम सुवासिनीसँ कहला- “बहिन, ने गाम हमरेटा छी आ ने समाज, तखन तँ जे बीचमे अछिओ अपन नीक-बेजाए देखिये कऽ ने किछु करत। तँए जखन टहलैये-बुलैक बात अछि ते जाइमे कोनो हर्ज नहि।” ओना, जहिना सुवासिनीक मनक भीतर सम्बन्ध जगबैक विचार जगि चुकल छेलैन तहिना जगमोहीकेँ सेहो धीरेन्द्रकेँ लगसँ देखैक विचार छेलैहे। तँए देखै-सुनै-विचारैक छेलैन्हे। सुवासिनी बजली- “बौआ, खाली अपने चारू माय-धी जाएब आकि आरो केकरो संग कऽ लेब?” सुवासिनीक बात सुनि श्यामक मन ठमकलैन। ठमकलैन ई जे परिवारक इकाई ‘बेकती’ भेल आ बेकतीक सामूहिक रूप परिवारो भेल आ ओकरे वृहत् रूप समाज सेहो भेल। ऐठाम तँ बेकतीक सम्बन्धक प्रश्न अछि, तँए असगरे जाएब–अपने चारू माय-धी–से बेसी नीक हएत। श्याम बजला- “अनेरे अनका बरदबैक कोन जरूरी अछि। सभ कियो अपन-अपन परिवारक अंग छीहे तँए सभकेँ किछु-ने-किछु काज परिवारमे रहिते छइ। अहॉं सभ बहरवैया छी, टहैल-बुलि गामकेँ देखियौ।” पाँचे बजेसँ धीरेन्द्र सुवासिनीक प्रतिक्षा करैत रहइ। चारू माय-धी सुवासिनीकेँ देख धीरेन्द्र अपन माएकेँ कहलक- “हिनका सभकेँ चिन्है छुहुन?” सोझ मतिया विचारक लोक रहने सुभावी ठॉंहि-पठाँहि बजली- “नहि!” ओना, सुवासिनी सेहो आ तीनू बहिनो सुभावीकेँ गोड़ लगि चुकल छेलैन आ सुभावी सभकेँ असीरवादो दइये चुकल छेली जे नीके रहू, भगवान नीक करैथ...। मुदा धीरेन्द्रक पुछला पछाइत सुवासिनी किछु बजली नहि। सुभावीक बात सुनि जहिना धीरेन्द्र तहिना चारू माय-धी सुवासिनी चौंकली। चौंकली ई जे जा!ई की भेल, चिन्हअ ने जानह मौसी-मौसी करह..! की बुझि धीरेन्द्रक माए असीरवाद देली..? ओना, धीरेन्द्र अपन माइयक ममत्वकेँ नस-नस जनैत, तँए धीरेन्द्र बेसी क्षुब्ध नहि भेल, मुदा सुवासिनी चारू माय-धी अखनो क्षुब्ध छथिए। तैबीच सुवासिनीक परिचय दैत धीरेन्द्र माएकेँ कहलक- “माए, पूवारि टोलक श्याम भाइक बहिन छथिन।” श्यामक बहिन सुनि सुभावीकेँ धक-दे सुवासिनीक बिआह मन पड़ि गेलैन। बजली- “तोरे सासुर ने रामपुर छिअ?” सासुरक नाओं सुनि सुवासिनीक ऑंखि नोरसँ भरि गेलैन। गाड़ा फटि गेलैन। फाटल गड़े बजली- “तेहेन गाम माए-बाप बिआह कऽ बोरि देलैन जे रने-बने वौआइ छी..!” सुवासिनीक बात सुनि अपन बचाव (समाजक बचाव) करैत सुभावी बजली- “आब ने माए छैथ आ ने बाबू छैथ जे सुनता। अपना जनैत तँ ओ सभ नीके गाम बिआह केलैन, आब जँ ओ अधला भऽ गेल तइमे हुनका सबहक कोन दोख।” तही बीच धीरेन्द्रक पिता- जीबेन्द्र पहुँचला। पत्नीक मुहसँ ‘गाम’ सुनि नेने छला मुदा बजला किछु ने। तैबीच सुभावियो आ सुवासिनीयो अपन नैहर-सासुरक बीचक मझधारमे झिलहोरि खेलिये रहल छेली। ओना, अपना ऐठामक बेवहार रहल अछि जे पुरुख जातिक लोक दरबज्जापर बैस गप-सप्प करै छैथ आ महिला जाति ऑंगनमे। मुदा से भेल नहि, दरबज्जेपर सुभावी माल-जालक थैर-गोबर करै छेली तहीकाल सुवासिनी चारू माय-धी पहुँचली। पत्नीक रमझौआ सुनि जीबेन्द्र दरबज्जापर सँ उठि सुभावीकेँ कहला- “रमझौए करब आकि चाहो-ताहो पीएबैन।” आन स्त्रीगण जकॉं सुभावी नहि छैथ जे पतिक बीच अपन हस्ती बढ़बै दुआरे झपैट कऽ बजितैथ। जीबेन्द्रक बात सुनिते जहिना कोनो गाड़ी ब्रेक लेलासँ रूकि जाइए तहिना सुभावी चोटे ऑंगन दिस बढ़ि गेली। सुवासिनी चारू माय-धी बेरा-बेरी जीबेन्द्रकेँ प्रणाम केली। तैबीच धीरेन्द्र सेहो गोलिया कऽ बैसैक ओरियान केलक। गोलिया कऽ बैसते, सुभावी चाह नेने पहुँच गेली। जीबेन्द्र बजला- “चाह बीचमे रखि दियौ आ अहूँ एत्तै बैसू।” ओना, पूर्ण रूपे दुनू परिवार माने सुवासिनीयोक आ धीरेन्द्रोक–नहियेँ भेल मुदा नहियोँ भेल से केना नइ नै कहल जाएत। खाली सुवासिनीक परिवारक रामलखन नहि छला मुदा धीरेन्द्रक तँ सभ छेलाहे। चाह पीलाक पछाइत जीबेन्द्र सुभावीकेँ पुछलैन- “हमरा अबैसँ पहिने गामक चर्च की करै छेलौं?” बेवहारिक जिनगी जीनिहार जीबेन्द्रक मनमे आबि चुकल छल जे समाजमे अखनो एहेन अछि आ पहिनौंसँ आबि रहल अछि जे समाजक बीच जँ कोनो समाजिक रूपक बैसार भेल–मानेसमाजक क्रिया-कलापक, तँ किछु परिवारक महत्-पूर्ण लोक पहुँचै छैथ, बाँकी परिवारक छॉंटी-छुँटी लोक माने कम महत्-क लोक पहुँचबोकरै छैथ वा केते परिवारक नहियोँ पहुँचै छैथ, जइसँ क्रिया-कलापक रूपमे किछु-ने-किछु कमी भइये जाइए। जखने समाजिक क्रियामे कमी औत तखने समाजक बीच समाजिकधार एकोशिया भइये जाएत। जइसँ धारक प्रवाह–समाजिक धारा–एकोशिया होइत बहैत-भँसैत सुखबे करत। जखने एका-एकी सुखब शुरू भेल तखने सुखाइत-सुखाइत अल्पांशसँ बहुलांश भइये जाएत। सुपुट शब्दमे सुभावी बजली- “श्यामक बहिन सुवासिनी चारू माय-धी छी। वेचारीकेँ सासुरमे बड़ दुख होइ छै, जइसँ अपन माए-बापकेँ..?” बजैत-बजैत सुभावी चुप भऽ गेली। गपक लाड़ैन चलबैत जीबेन्द्र बजला- “बीचमे किए मुँह बन्न केलौं। ऐठाम कियो आन अछि जे मुँह खोलैसँ सकुचाइ छी।” पतिक सह पेबिते सुभावीकेँ अपन विचारक वाण बजैक सह भेटलैन। मुख्य विचार दिस सहटैत बजली- “आब कहू जे एहेन होइ जे माता-पिता अपन बेटा-बेटीकेँ जिनगीक ठौर धड़ा देलैन सएह जँ गारि पढ़ैन से नीक भेल?” सुभावीक विचार सुनि सुवासिनी थकमका गेली मुदा जगमोही स्वीकारि बाजल- “नहि!” विचारकेँ सम्हारैत जीबेन्द्र बजला- “बीतल बातकेँ खण्डण-मण्डण हेबा चाही जे कि नीक भेल कि अधला भेल, ओकर जँ निराकरणक दृष्टिसँ किछु विचारब तँ ओ समय सापेक्ष थोड़े हएत जे ओकर प्रभाव घटनापर पड़तै।” पिताक बात सुनि जहिना धीरेन्द्र जगमोही दिस तकलक तहिना जगमोही धीरेन्द्र दिस ताकए लगल। मुदा बाजल दुनूमे सँ कियो ने। ओना, मनपंक्षी एक दोसरसँ लोल मिलानी करैत मने-मन स्वीकारि जरूर लेलक जे अनेरे गाड़ल मुरदाकेँ उखारि पोस्टमार्टम करब नीक नहि। अपना दुनू गोरे समाजशास्त्र पढ़ै छी तँ बड़बढ़िया मुदा इतिहास पढ़निहार की तखन डोका-कॉंकोर बीछत। ओ तँ वएह खोजत।चुपा-चुपी देख जीबेन्द्र बजला- “देखियौ, गामक अनाड़ियो-धुनाड़ीलोक जे समाज सूत्रकेँ नहि जनैएओहो बजिते अछि जे जाबे धरतीपर एकोटा धर्मात्मा नइ अछि ताबे ई धरती असथिर केना अछि। जखने धरतीपर सँ धर्मात्मा मेटा जाएत तखने ई धरतियो मेटा जाएत।” जेना सभसँ बेसी बुझैमे सुभावियेकेँ आएल होनि तहिना बिच्चेमे बाजि उठली- “हँ, से तँ हेबे करत।” पत्नीकेँ सम्हारैत जीबेन्द्र बजला- “एना धड़फड़ा कऽ बजने नइ ने हएत। जखन कोनो गाम आकि गामक समाजक विषयमे विचारै छी तखन नीक जकॉं समाजकेँ देखए पड़त। अखनो सभ गामक किछु परिवार एहेन अछिए जे बेटाक बिआहमे दहेज लेबकेँ पाप बुझै छैथ आ किछु गोरे नीको बुझिते छैथ। दोहरी रस्ता चलने समाजक बीच विघटन हएत। जइसँ अनमेल बिआहक चलैन बढ़त। अनमेलो भेने तँ परिवारक विघटन हेबे करत किने।” जीबेन्द्र जेना विचारक पाराग्राफ बदलए चाहलैन तहिना चुप भऽ गेला। जइसँ फेर चुपा-चुपी पसैर गेल। सबहक मन अही तारतम्यमे लगि गेलैन जे जाह ई की भेल जे फेर चुपा-चुपी पसैर गेल। दूटा स्त्रीगण तँ साँझ-सँ-भोर आ भोर-सँ-साँझ अपन बोलीसँ गामकेँ अलगेनहि रहैए आ ऐठाम तँ उम्रोक हिसाबसँ आ पढ़लो-लिखलक हिसाबसँ बैसले छी, तखन किए एना भेल अछि। ओना, दहेजक नाओं सुनि सुवासिनीक मन कुकुआ कऽ कड़ुआ लगल छेलैन्हे, मुदा समुदायमे बैसल देख अपनाकेँ संयमित केने छेली। थोड़ेकालक पछाइत जिज्ञासा करैत सुवासिनी बजली- “काकाजी, मास दिन-ले ऐठाम एलौं हेँ, भरि आम रहब।” जीबेन्द्र- “नीक विचार सोचि एलौं। नीक जकॉं तँ हम जानि नहि रहलौं हेन तँए पहिने अपन ठौर-ठेकानकहि दैतौं ते विचारक आदान-प्रदान करैमे नीक होएत।” ऑंखिक इशारा सुवासिनी जगमोहीकेँ देली। जगमोही आदर सूचक शब्दमे बाजल- “नानाजी, हमर नाम जगमोही छी। बी.ए. ऑनर्समे पढ़ै छी। समाजशास्त्र विषयमे ऑनर्स रखने छी।” जगमोहीक परिचय सुनि जीबेन्द्र बजला- “धीरेन्द्रो तँ पटनेमे पढ़ैए। दुनू गोरेमे परिचय-पात छह कि नहि?” जीबेन्द्रक बात (प्रश्न) सुनि जगमोही सकपकाएल, सकपकेबो उचिते अछि। उचित ई जे आजुक जे परिवेश बनि गेल अछि ओ सही दिशासँ हटि गलत दिशामे बढ़ल जा रहल अछि तँए अपनाकेँ संयमित राखबोक खगता तँ भइये गेल अछि। अपनाकेँ संयमित करैत जगमोही बाजल- “नीक जकॉं तँ धीरेन्द्रसँ परिचय नहि अछि मुदा चिन्हा-चीन्ही जरूर अछि।” जीबेन्द्र- “कए भाए-बहिन छह?” ‘भाए-बहिन’क नाओं सुनि जगमोहीक फेंच जेना खसि पड़ल। फेंच खसिते उदास मने बाजल- “तीन बहिनियेँटा छी।” एक तँ भाए नहि, दोसर तीन बहिन सुनि जीबेन्द्रक मन खन-खन-खिन-खिन होइतझहरए लगलैन। मुदा विचारक वाणक आगू शिवजीक धनुष रहितो समाजोक पहाड़ आ जिनगियोक पहाड़ तँ आगूमे अछिए। तँए धॉंइ-दे किछु विचार करब जल्दवाजी हेबे करत। जखने उचितसँ कम समयमे कोनो काजकेँ करैक जिज्ञासा जगत तखने जिज्ञासुकेँ जान-परान लगबए पड़तैन। जँ से नइ लगौता तखन बिसवासप्रद फल भेटैक सम्भावनामे असंदिग्धता रहबे करत किने। ओना, जीबेन्द्रक परिवारक गति-विधि सपाट छैन। ओना, सपाटोक विभिन्न रूप अछि। जेना समाजिक, आर्थिक, वैचारिक, बेवहारिक इत्यादि-इत्यादि मुदा से अखन नहि। अखन एतबे जे बेटा-बेटीक बिआह, सम्बन्ध आ बेवहार। तइ मानेमे जीबेन्द्रक परिवारक स्पष्ट इतिहास जीवित छैन जे बेटा-प्रति जे दहेजक रूपमे ‘हम एते लेबओते लेब’ से अखन धरिक परिवारिक इतिहास नहि रहल छेलैन। जे धारणा अखनो जीबेन्द्रक मनमे जीवित छैन्हे। ओना, प्रेमनगरमे खाली जीबेन्देटाक परिवारमे एहेन छैन से बात नहि, आनो-आनो जातिक समाजमे अछिए। जइसँ परिवारमे बेटा-बेटीकेँ जुआन माने वयस्क, होइते अधिकार भेट जाइए। जइसँ माता-पिताक विचारमे लोच अबैए। लोच आनबो तँ जरूरी अछिए। पिता-पुत्रक बीच आ परिवार परिवारजनक बीच केना सौहार्दता बनल रहत, ई तँ मनुख होइक नाते मनुक्खेकेँ सोचि-विचारि आगू डेग बढ़बए पड़त। दहेजेटा परिवारमे पीढ़ीक (वंशगत सम्बन्ध) बाधा नहि अछि। दहेजक अतिरिक्तो विघटनक अनेको दुआर खुजले अछि। अखन बेसी नहि सिर्फ एकेटा- वैचारिक। सभ मनुखमे चाहे ओ पुरुख हुअए आकि महिला, अपन-अपन गुण-धर्म तँ किछु-ने-किछु रहिते अछि। ओइ गुण-धर्मकेँ बेवहारिक जिनगीक संग केना सामंजस्य कएल जाएत, ई दायित्व तँ सबहक परिवारमे बनिते अछि। विचारक दुनियॉंमे उगैत-डुमैत जीबेन्द्र बजला- “केते दिन आरो पढ़बह?” जगमोही- “परिवारक स्थिति देखैत बी.ए. तकक विचार केने छी। जइमे आठ मास आरो बॉंकी अछि।” जीबेन्द्र- “आगूक लेल की सोचै छह?” आगूक बात सुनिते जहिना गरदैन कटल मनुखक धारा-प्रवाह मलिनता पसरए लगैत तहिना जगमोहीक विचारक मलिनता एकाएक मनकेँ छाड़ि देलक। कटैत रस्ताटुटैत जिनगीक बीच मझधारमे दहाइत-भँसियाइत जगमोही बाजल- “अखन किछु ने।” ओना, जीबेन्द्रक मनमे रहैन जे जगमोही अपन किछु-ने-किछु उदेस बना नेने हएत, मुदा अन्ना-गाहींस जिनगी देख जगमोही किछु ने विचार केने छल। जे उचितो तँ छेलैहे। ऐ राक्षसी समाजमे नारीक जिनगीक संग खेलवार भइये रहल अछि किने। जगमोही अपन विचारानुसार बाजल छल, मुदा तेमहर धियान जीबेन्द्रक नहि गेल छेलैन। ओ गेलैन जगमोहीक बजला पछाइत। बजला- “बाबू, की करै छथुन?” जगमोही- “पटनेमे नोकरी करै छैथ जइसँ परिवार चलैए।” ओना, जगमोहीक बात सुनि अनेको विचार जीबेन्द्रक मनमे जगलैन। मुदा सभ विचारकेँ तहियबैत धीरेन्द्रकेँ कहला- “बौआ, तोरो तँ अपन हाथक रोपल आम छहे। सभकेँ खुआबह।” गुलाव खास आ बम्बइकेँ धीरेन्द्र पटनासँ एला पराते घरमे पाल चढ़ा नेने छल जे दू दिनमे खाइ-जोकर भइये गेल छल। एक-एकटा आम सभकेँ हाथमे लेला पछाइत जीबेन्द्र बजला- “भरि आम तँ रहबे करबह?” जगमोही- “हँ।” जीबेन्द्र- “ऐ बेर अपना प्रेमनगरमे, खूब सहजोर आम फड़ल अछि।” मुस्की दैत जगमोही बाजल- “नानाजी, साले-साल आएब।” विचारक प्रवाहमे जीबेन्द्र भँसि गेला। अनायास मुहसँ खसि पड़लैन- “साले-साल किए, सालो-साल भरिले रहि जाह।” नहलापर दहला फेकैत जगमोही बाजल- “ऐ गामक लोक रहए देता तखन ने?” शब्द संख्या : 1805, तिथि : 15 सितम्बर 2018 8. जगमोहीकेँ मात्रिक आ सुवासिनीकेँ नैहर एला पनरह दिन पुरि गेल। मासक अधा भाग माने एक पख उतैर कऽ दोसर पख चढ़ि गेल। अखाढ़क पहिल झमझमौआ बरखा सेहो परसू रातिमेबरसल। धरतीमे आद्रा नक्षत्रक आद्रताक आगमन सेहो भइये गेल, जइसँ नव परिवेशक आगमन भेने जन-गण, जन-मनकसंग जन-धनमे सेहो प्रवेश कइये लेलक। प्रेमनगरक किसान जागल छैथ। गामक किसानक विचारक प्रतियोगितामे ओ किसान आगू मानल जाइ छैथ जे नून छोड़ि बाहरी कोनो वस्तुक उपयोग भोजनमे नइ करै छैथ। भाय, धोखा नइ हुअए। किसानक मुख्य सेवा भोजनक छी। ओना, करखन्नाक कच्चा वस्तुक सहयोग सेहो किसानीए-सँ होइत अछि। जेना कपड़ासेहो कृषि उत्पादित कच्चा वस्तुक छीहे। दुखद एतबे अछि जे पहिने गाम-गाममे कपड़ा बुनकर छल, खादी भण्डार ओकर अड्डा बनल छेलै जइ माध्यमसँ कारोबार छल, जे टुटि कऽ बजारू रूप पकड़लक। पटुआ सेहो अछि जेकर खेती पछुआ गेल, किएक तँ ओकर ऐगला अंग–माने कारखाना–बैसल नहि, जइसँ किसानक नगदी खेती छीना गेल। खाएर जे भेल से भेल, जानए जौ आ जानए जत्ता...। समय बदलने प्रेमनगरक किसान अपनाकेँ समयानुकूल मोड़ि लेलैन। बरखा भेने बाध-बोनमे खेतीक पी-पाह शुरू भेल। जेना धरती मैयाक आँगनमे शुभ सनेस आएल हुअए। पनरह दिन केना बीतल, से ने जगमोही बुझि सकल आ ने सुवासिनीए बुझि सकली। प्रेमनगरक हवा-पानि जेना दुनूक मनकेँ मोहि लेलकैन। ओना, पटनाक परिवारसँ सेहो सम्बन्धो आ सम्पर्को बनले रहैन जइसँ मनमे कोनो वैचारिक बेवधान किए पकैड़तैन। अपन-अपन विचारो आ विचारक नजरियो तँ सभकेँ अपन-अपन होइते अछि। जखन एक विचारक दू गोरे एक्को रस्ते चलै छैथ तहूमे दहिना-बामा दू दिशा होइते अछि। रस्ता चाहे जइ दिशामे जाए मुदा बाम-दहिनक भेद किछु-ने-किछु होइते अछि। रोहनिया, बम्बइ, गुलाबखास आम उतारक दिशामे उतैर रहल अछि जखन कि कृष्णभोग, मालदह, सबुजा, जरदालू इत्यादि चढ़ाइक दिशामे चढ़ि रहल अछि। ओना, किछु खटहो आ किछु सड़नमो आम एहेन अछिए जे सभ सेहो चढ़ाइक अवस्थामे सेहो अछि। मुदा ओकर मद्दी प्रेमनगरक लोक किए देत। जे धानकेँ धान बुझैए ओ धानक झड़केँ किए मानि देत। खाएर जे भेल ई तँ भेल प्रेमनगरक गिरहस्तक गिरहस्ती-जीवनक बात। मुदा एतबेटा दुनियॉं प्रेमनगरक लोककेँ नहि ने छैन। ऐसँ आगू गौऑं दुनियोँ देखै छैथ आ दुनियॉंकेँ सेहो देखबै छैथ। सुवासिनीकेँ जहिना अपन परिवारिक जिनगीमे भूचाल जकॉं उठल छेलैन तहिना धीरे-धीरे ऐ पनरहियामे घटि कऽ समतल भूमिपर पहुँच गेलैन। भाय!बड़ीटा दुनियॉं अछि किने, तँए अपन-अपन नजरिये ताकि-ताकि ने चलए पड़त...। सुवासिनियो तहिना अपन जगमोही-बेटीक बिआहक विचारक समतल भूमिपर पहुँच गेली। अखन धरि जे सुवासिनी मानै छेली जे बेटीकेँ जेते बेसी पढ़ाएब,जेतेक उच्च शिक्षाक डिग्री दियाएब ओतेक बेसी भारी बिआहक दहेजो होइए। नव परिवेशक प्रवेशसँसमाजक बीच लोकक विचारक नाप-जोख सेहो बदलल अछिए। खाएर जे अछि, जेतए अछि से तेतए रहौ, प्रेमनगरक लोक अपन विचारक ओइ सीमपर ठाढ़ छथिये जे जखन मनुख निरमबैक शक्ति अपनामे अछि–ओम् नर: नारायणम्–तखन दुनियॉं जेमहर भाँसए आकि भँसियाए ओ तँ ओइ भँसिएलहा सभकेँ ने बुझए पड़त। जिनगीक नव मोड़पर ठाढ़ जगमोही सेहो पनरह दिनमे संगी-बहिनपा सबहक बीच एना घुलि-मिलि रीतसँ रीतिया गेल जे बीतैत पनरह दिन आ अबैत पनरह दिनक बीचक भार एक्केरंग बुझि पड़ए लगलै। पनरह दिन जगमोहीकेँ अपन सखी-बहिनपाक बीच जे हँसैत-खेलैत चलल जइमे सृजन अछि, सृजनक साधन अछि आ तैसंग साधना सेहो अछिए। जइसँ सृजनक आनन्दो अछिए। माने नव-नव संगीक बीच विचारक आदान-प्रदान। जेना कोन स्कूलक की स्थिति अछि कोन कौलेजक की स्थिति अछि ओ गामो-देहात आ शहरो-बजारक बीचक तुलनात्मक गप-सप्प बुझबो केलक आ बुझेबो केलक। आइ सबेरे जीबेन्द्र धीरेन्द्रकेँ कहलैन- “बौआ, पनरह दिन बीत गेलहआबबाइसे दिनक छुट्टी ने बँचलह। ओना, अपन कलम-गाछीमे सभ आम अछिए मुदा अपन रोपल जे आम छह से तँ खा लेबह किने?” पिताक विचार सुनि धीरेन्द्र ठमैक गेल। मनमे उठलै- अपने जे पॉंचटा आमक गाछ रोपने छी ओ तँ पूर्ण मौसमक छी किने। पूर्ण मौसमक माने भेल आमक मौसमक आदिसँ अन्त धरिक। जे मास दिनसँ बेसी दिनक अछि। माने उतार जेठसँ लऽ कऽ चढ़न्त साओन धरिक। तही खियालसँ एकटा गुलाबखास, एकटा बम्बइ, एकटा सपेता, एकटा मोहनठाकुर आ एकटा राड़ि आमक गाछ रोपने अछि। धीरेन्द्रकेँ ठमकल देख जीबेन्द्र दोहरा कऽ बजला- “बौआ, तोहर मन मोहनठाकुर आ राड़िपर सेहो गेल हेतह, मुदा ओकर समय अखन नइ आएल अछि, ओ तोहर भविस छिअ। जहिया गाममे रहऽ लगबह ओ तहियाक भेलह। मुदा अखन जे सवा मासक छुट्टीमे आएल छह तइमे तीन रंगक आम पकड़ाइ छह, कम-सँ-कमओ तीनू तँ खा लेबह। भने अखन एकटा संगियो पटनाक छहे ओकरो खुआ दिहक।” एकटा जगैत भोरक सूर्यक शौर्य प्रकाशसँ दीपैत जकॉं नवयुवक धीरेन्द्र अपन जिनगीकेँ अपना हाथे स्थापित करैक विचार ओही दिन मनमे रोपि लेलक जइ दिन एक मौसमक एक रंगक फलक गाछ रोपलक। भायधीरेन्द्र तँ एक मौसम भरिक गर लगौलक मुदा जेकरा एको दिनक गर लगबैक लूरि-बुधि मनमे विचड़न करए लगत तँ ओकरो जिनगी रोपेबे करत। मनुख तँ मनुख छी, धरतीक सभसँ श्रेष्ठ ब्रह्मरचित रचना। गाछ-बिरीछ आकि जीवे-जन्तु थोड़े छी जे जैठाम अनुकूल मौसम रहत तैठाम तँ जीब सकै छी आ जैठाम नइ रहत तैठाम कालक गालमे चलि जाएब। मनुख दुनियॉंक कोनो कोणमे बसि वासी बनि अपन अनुकूल मौसम निरमा लइते अछि। चाहे ओ सहाराक मरूभूमि हुअए आकि साइवेरियाक वर्फीली भूमि...। ओना, संजोगो तँ संजोग छी। जीबेन्द्रकेँ सेहो अनुकूल संजोग भेटलैन। अनुकूल संजोग भेल जे सभ किछु शुभे-शुभ रहल आ प्रतिकूल संजोग भेल जइमे अनुकूल-प्रतिकूलक संग-संग सोलहन्नी प्रतिकूले रहल। मुदा से नहि, जीबेन्द्रक अनुकूल संजोगक पहिल कारण छेलैन जे धीरेन्द्रक अपन हाथक रोपल आमक फल छल। दोसर,जीबेन्द्रक मनमे ईहो छेलैन जे जँ कन्यादानकेँ ‘महादान’ कहल जाइए तँ अधिक-सँ-अधिक जेतेक सम्भव हएत ओतेक अधिक फलो प्राप्त करैक स्थान भेटत। तँए सुवासिनीकपीड़ासँ–बेटी बिआहक–पीड़ित भऽ जीबेन्द्र मने-मन बेपीड़ितसँ सुपीड़ित दिस बढ़ि रहल छला। जँ परिवारमे धीरेन्द्रक विचार भऽ जाएततँ धीरेन्द्रक माइयोमानियेँ जेती, किए तँ कियो पएर छुबि गोड़टा हुनकालागि लनु, महादेवक कोन बात जे हुनका संग पार्वतियो जँ पुरतैन तैयो ओते दान-बरदान नहियेँ पुरतैन, जेते ओ एक्के मुहेँ दऽ सकै छैथ। एहेन विचार पत्नीपर ऐ दुआरे जीबेन्द्रकेँ चलि गेल छेलैन जे सात दिन पूर्व, माने पैछले रबिकेँ, सुवासिनी चारू माइ-धी टहलैत-टलहैत जीबेन्द्रक ऐठाम आएल छेली। चारू गोरे बेरा-बेरी हिनका गोड़ लगलकैन। गोड़ लगिते हिनकर मन तेतेक उधिया गेलैन जे जहिना लोहियामे चढ़ल दूधक फेन उधियाइए तहिना उधियाए लगली। जगमोहीकेँ असीरवादो दऽ देलखिन जे मन माफित घर-बर हेतह! तैपर सँ सुवासिनी सेहो सह दैत बजली- “बुढ़-पुरानक विचार झूठ थोड़े हएत!” सुवासिनी-सभकेँ चलि गेला पछाइत सुभावी अपन असीरवादक शुभ- सम्वाद जीबेन्द्रक सिर थोपैत कहलकैन- “सुवासिनीक जेठकी बेटी जइ घर जाएतओइ घरमे साक्षात् लछमीक बास हएत!” पत्नीक चपचपी देख जीबेन्द्र बुझए चाहलैन जे धरतीक ऊपरका चपचपी छिऐन आकि नीचला। किए मनमे औतैन जे आजुक परिवेशमे गामक जिनगी आ बजारक जिनगीकबीच जे दूरी बनि रहल अछि तैबीच सामंजस्य करब बाल-बोधक खेल नइ ने अछि! मुदा मनुखो तँ मनुख छीहे जे केतो संघटनो कऽ सकैए आ केतौ विघटनो करिते अछि। तेसर ईहो संजोग जीबेन्द्रक मनमे रहबे करैन जेजँ धीरेन्द्र आम तोड़ैक भॉंजमे अपन कलम चलि जाएत तँ पत्नीकेँ पहिलुका आमक गाछी जाइले कहबैन। ओइठाम दसटा स्त्रीगण जमा हेबे करत, ओइठामसँ बहुत बात निकलबे करत। जखन धीरेन्द्रो आ धीरेन्द्रक माइयोक विचार देखब तखन अपनो विचार शामिल करैत किए ने परिवारकेँ एक सूतमे सुतिआइत रसे-रसे चलैत देखब। एहने परिवार ने सभ बनबए चाहैए। ओना, विघटनक अनुकूल परिवेश सेहो जबरदस बनल अछिए। सभ कियो देखते छी जे माता-पिता अपन दायित्व निमाहैत बेटाकेँ एकरंग शिक्षित बनबै छैथ मुदा वएह जखन जीवनमे उतरए चाहैए आ नोकरी करए विदा होइए तँ एक भाए कौलेजक शिक्षक होइए आ दोसर हाइ स्कूलक शिक्षक। दुनूक दरमाहाक दूरी भैयारीक परिवारमे विघटनक कारण बनिते अछि। तहिना जँ संजोगे दू भाए वा ओइसँ बेसी भैयारीक बीच बाल-बच्चाक दौड़मे एक भॉंइकेँ बेटाकसंख्या दोसर भॉंइक बेटीक संख्यासँ सेहो प्रभावित होइते अछि, जइसँ विघटनक मुँह सेहो खुजिते अछि। मुदा से अखन नहि। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र नागरिक होइक नाते जीबेन्द्रक मनमे ई दृढ़ता छैन्हे जे जहिना समाज तहिना देश हमरो छी, हमरो देशो सेवा आ समाजो सेवाक अधिकार अछिए। मुदा सेवा की? सेवा तीन रंगक होइए, एक सेवा ‘देब’ भेल, दोसर ‘देब-लेब’ भेल आ तेसर ‘लेब’ भेल। सबा अरब लोकक देश अपन छी, सबा अरब लोकक मनो आ विचारो अपन-अपन अछिए तँए एकटा मनक संकल्पित विचार ईहो अछि जे ‘देब’सँ कम ‘लेब’। जइले बेकतीगत जिनगी आ परिवारिक जिनगीमे अन्तर सेहो अछिए। बेकतीगत जिनगीक बाट समतल अछि मुदा परिवारक तँ से नहि अछि, परिवारमे तँ सम-विषम दुनू अछि। ऐ सम-विषमककारण अछि बेकतीक आ सामूहिक जीवन। चारि बजे बेरुका समय। धीरेन्द्र पितासँ पुछलैन- “बाबू, आमकगाछ तँ नमहर अछि, असगरे आम तोड़ि केना सकब?” बेटाक बात सुनि जीबेन्द्र बजला- “बौआ, काज करए तूँ जेबह, तँए तोरा बेवहारिक रूप पकड़ए पड़तह। बेसी-सँ-बेसी हम किछु कहि सकै छिअ, मुदा जरूरी नइ छै जे तोरो संग ओइठाम ओहने परिस्थिति रहतह।” धीरेन्द्र बाजल- “हाथसँ जे आम पकैड़ तोड़ल हएत ओ तँ असान अछि मुदा जे ऊपर अछि ओ तँ...।” मुस्की दैत जीबेन्द्र बजला- “हाथोसँ तोड़बमे भेद अछि। एक आदमी आमक जड़िसँ तोड़ैए आ दोसर डारिक कलशक मुँहपर सँ तोड़ैए। बाजह ते कोन नीक आ उचित भेल?” पिताक प्रश्न सुनि धीरेन्द्र ठमैक गेल। मने-मन विचार लगल जे भलेँकाज कम हुअए मुदा देख-बुझि परेख कऽ केलासँ नीक हेबे करत। भेल तँ आमक फलकेँ माटिक चोट नहि लगक चाही, एतबे ढंग ने पकड़ैक अछि। सुभावीकेँ अपन गाछी-कलम देखले छैन विदा भेली। मुदा अनकर गाछिये-गाछी सेहो जाइये पड़ै छैन। रस्ताकातक पहिल गाछी श्यामक छैन जइमे सुवासिनी गाछक आम सभकेँ निहारि-निहारि देख रहल छेली कि सुभावीपर नजैर पड़लैन। नजैर पड़िते बजली- “चाची, कनी छहरा लौथु। गाछी-कलम की केतौ भागल जाइ छैन।” ओना, सुभावीक मनमे सेहो रहैन जे सुवासिनीसँ किछु गप-सप्प करी। मुदा से अनका सीमामे, माने श्यामक गाछीक हातामे, अगुआ कऽ केना बजितैथ। सुवासिनीक बात सुनि सुभावी मचानपर बैसली। जगमोही अपना संगी-सहेलीक संग बगलक गाछमे छोट-छोट बच्चासँ नाटक करबै छेली। नाटकक विषय आजुक परिवेशमे नाटकक रूप छल। समाजक नाटकसँ भिन्न बेकतीक नाटक अछिए। सुभावीकेँ सुवासिनीक संग गप-सप्प करैत देख जगमोही सेहो नव उदित वाला सबहक संग पहुँचल। तैबीच सुभावी अपन परिवारक खेरहा पसाइर बजै छेली- “बौआकेँ बाप कहलकैन जे बाउ, अपन रोपल आमक गाछ छिअ, पनरह दिन गुलाबखास आ बम्बइ खेलह, आब अखाढ़ो आबि गेल आ तोहर छुटियो अदहा बीत गेलह, तँए सपेता-मालदह तोड़ि कऽ आइये पालपर दऽ दहक अपनो खइहह आ संगियो-साथीकेँ खुअबिहह।” तैबीच जगमोहीक संग-संग दर्जनो वाला सुभावीक पएर छुबि-छुबि गोड़ लगलकैन। असीरवाद बँटैमे सुभावी अकबका लगली। सामुहिके असीरवाद दैत बजली- “सभ कियो आम खाइले घरपर अबै जाएब।” दूधक फेन जकॉं उधियाएल सुभावीक हृदय रहबे करैनतँए गप-सप्पमे बेवधान किए होइतैन। प्रेममोही बाजल- “चाची, एकटा पुतोहु आनि देलौं हेन।” उधियाएल मन सुभावीकेँ रहबे करैन, सबहक बिच्चेमे बाजि गेली- “जखन तूँ आनि कऽ देलेँ ते हम कि ओकरा फेक देब!” गप-सप्प इशारेमे रहल। मुदा पनरह दिनक दौड़मे श्यामो आ जीबेन्द्रोक परिवारमे आपकता धीरे-धीरे बढ़िये रहल छल। होइतो अहिना छै जे एकठाम घर रहने वा एकठाम बैसार-उसार भेने प्रेम बढ़िते अछि। चाहे ओ परिवारिक लोक होथि वा आन, जाति होथि वा परजाति। तहिना अपन वा आनक बीच दूरी भेने सम्बन्धमे कमी सेहो अबिते अछि। ओना, आनो जीव-जन्तुमे एहेन देखले जाइए जे पानि-बिहाड़िक समय एकठाम गोलिया जाइए, मुदा तँए कि ओकरा समाजिक सरोकार आ जीवनक सरोकार थोड़े अछि। गप-सप्पक क्रममे लोक सभ जीवकेँ एक समान कहि दइए मुदा वैचारिक गुण जे मनुखमे अछि वा समाजिक सरोकारक गुण जे मनुखमे अछि ओ आन-आनमे थोड़े अछि। ओकर जीवन दू जगहपर केन्द्रित अछि, जँ मनुखक पोस मानि पशु अछि तँ ओकर जीबैक सभ बेवस्था मनुख करैए आ बदलामे ओकरा परिवारक अंग बना खाइले दूधो लइए आ आनो-आन सेवाक काजमे सेहो लगबैए। ओना, जे जीव-जन्तु तककेँ मनुख समान मानै छैथहुनकर विचार जीव आ जीवक जीवनसँ सम्बन्धित अछि। तँए कि ओकरा घर बना परिवारिक-समाजिक जीवन जीबैक लूरि-बुधि छै, से तँ नहियेँ छइ। तैसंग ईहो तँ अछिए जे जे कलासँ सम्पन्न मनुख छैथ ओ अपन कलासँ आनो-आन जीव-जन्तुकेँ ओहन बनाइये लइ छैथ जे मनुखे जकॉं किछु गुण ओकरामे आबिये जाइ छइ। केतौ-केतौ तँ (नीक कलाकारक सम्पर्कमे) ओकरामे, माने पशु-पक्षीमेएहनो गुणक समावेश भइये जाइए जइसँ मनुखोसँ अधिक गुणशील बनिते अछि। मुदा एकटा प्रश्न तँ ईहो अछिये जे जँ पशु-पक्षी जकॉं मनुखोकेँ सिखौल-पढ़ौल जाएत तखन ओ की भऽ सकैए? शब्द संख्या : 1917, तिथि : 25 सितम्बर 2018 9. कौलेजक छुट्टी काल्हि सम्पन्न भऽ जाएत। रौतुका गाड़ी पकैड़ सभ परिवार सुवासिनियो आ धीरेन्द्रो पटना जाएत। बेरुका समय, सुवासिनी चारू माइ-धी जीबेन्द्रक ऐठाम पहुँचली। तइसँ पहिनहिसँ श्याम पहुँच दरबज्जापर बैस जीबेन्द्रक संग गप-सप्प कऽ रहल छला। दरबज्जापर नहि रूकि सुवासिनी सभ कियो अँगने गेली। सुवासिनीकेँ देखते सुभावी ओसारपर ओछाइन ओछा सभकेँ बैइसैले कहलैन। जीबेन्द्र आ श्याम, आजुक परिवेशमे ‘कन्यादान’ परिवारक केहेन जटिल समस्या भऽ गेल अछि तही सम्बन्धमे गप-सप्प कऽ रहल छला। जीबेन्द्र श्यामकेँ कहलखिन- “बौआ श्याम, तोहर उमेर चालिसक नीचॉं छह मुदा हम तँ साठिसँ ऊपर टपि गेल छी। तँए, केना-केना बेटी बिआहक जटिलता आएल से तँ देखैत आबि रहल छी।” स्वीकार करैत श्याम बाजल- “दुनियॉंक जेते दुखो-सुख आ चढ़ो-उतरी अहॉं देखलिऐ तेते हम थोड़े देखलिये हेन। भलेँ आजुक नव परिवेशमे जे भिन्न-भिन्न सम्पद्रायक भिन्न-भिन्न विद्यालयमे भिन्न-भिन्न रूपक बेवहार पेब अलग बेवहार भऽ जाए मुदा मिथिलोक तँ अपन जीवनो आ दर्शनो रहबे कएल अछि। तैसंग जिनगी अँकैक कसौटी सेहो ऐठामक अप्पन रहले अछि।” ओना, श्यामक जे विचार छेलैन तेकरा आगू नहि बढ़ा जीबेन्द्र अपन विचारकेँऐ दुआरे मोड़ैत बजला जे सुवासिनी चारू माइ-धीकेँ ऑंगनमे प्रवेश करैत देख नेने छला। अँगनेक मुँह ने दरबज्जो छी। बजला- “जगमोहीक बिआहक गप-सप्प चलबै छह किने?” श्याम- “सुवासिनीक परिवारक विचार छैन जे बी.ए. केला पछाइत बिआहक गप-सप्प चलाएब।” जीबेन्द्र- “बढ़ियॉं विचार छह। आगू साल तक धीरेन्द्रोक बिआह कइये लेब।” ओना, जीबेन्द्र पत्नियो आ धीरेन्द्रोक सह पेब चुकल छला तँए अपनो सहैट कऽ आगू सपटिया सेहो गेले छला। ‘बढ़िया विचार’ जे जीबेन्द्रक मुहसँ निकललैन से तँ अपन मनोनूकल निकललैन मुदा श्यामकेँ थोड़ेक कठाइन लगल। किएक तँ आजुक समाजक परिवेश एहेन बनि रहल अछि जे आदिम जुगमे–जहिया मनुख शुरूक अवस्थामे छल–जहिना मनुखकेँ चिन्ह-पहचिन्ह नइ रहने जे जिनगीक गति छल ओहने गतिक परिवेश आइयो बनल जा रहल अछि। बाप-माए बेटाक सेवा लेल कोट-कचहरी जाए, एकरा की कहबै..? श्याम बाजल- “चाचाजी, जखन काल्हि सभ जेबे करत तँ संगे-संग सभ चलि जाएत।” जीबेन्द्र- “यएह सभ ने जिनगीक परीक्षाक घड़ी छी जे अपन परिवार आ दोसरक परिवारक बीच केहेन सम्बन्ध अछि।” ऑंगनमे ओसारपर बैसते सुवासिनी जगमोहीकेँ कहलखिन- “बुच्ची, चाचीकेँ चाह बनबैमे संग दहुन।” सुभावी किछु ने बजली। ओना, चाह बनबैक सभ सरंजाम घरसँ निकालि चुल्हि लग रखि चुकल छली। चाह बनल। जगमोहीक माझिल बहिन फुलकुमारी दू कप चाह नेने दरबज्जापर पहुँचल। ओना, फुलकुमारीकेँ देखते श्याम अपन नजैर निच्चॉं खसा लेलैन मुदा जीबेन्द्र नजैर उठा निहारए लगला। हाइ स्कूलक छात्रा फुलकुमारी। जगमोहीसँ चारि साल उमेरमे छोट। किशोरावस्थाक देहलीपर पहुँच चुकल अछि। फुलकुमारीकेँ देख मने-मन जीबेन्द्र हियासए लगल छला जे ऐ जुगमे ‘बेटीक बिआह’ तेहेन समस्या बनि गेल जे सुवासिनीकेँ एकलखाइत दस-पनरह बर्ख तक कठिन समस्यासँ जुझए पड़त। चाहक चुस्की लैत जीबेन्द्र बजला- “सुवासिनीक ईहो बेटी जगमोहिये जकॉं हड़गर-कटगर अछि।” जीबेन्द्रक बात सुनि श्याम बाजल- “तीनू बहिनक देह-दशा एकरंगाहे छइ।” जीबेन्द्र बजला- “जेकरा गरदैनमे ढोल पड़ै छै ओकरा तँ बजबइ पड़ै छइ। मुदा...।” जिज्ञासा करैत श्याम बाजल- “मुदा की?” चिन्तक जकॉं जीबेन्द्र बजला- “ओना, परिवारो आ समाजोमे एहेन विकरितता आबिये रहल अछि जे जहिना परिवारमे भैयारीक बीच तहिना समाजमे जाति-बेरादरसँ लऽ कऽ हित-अपेछितक बीच एहेन विचारक संग बेवहारो बनियेँ रहल अछि जे केकरो बेथा कथा कियो ने सुनए चाहैए आ ने ओइमे अपन कर्तव्यक भागीदारीए सम्मिलित करए चाहैए।” ओना, जीबेन्द्र अपना जनैत सोझराएले शब्दमे अपन विचार रखलैन मुदा श्यामकेँ नीक जकॉं बुझैमे नइ आएल। तँए बाजल- “से की?” परिवारसँ समाज धरिक रस्ताकेँ सोझरबैत जीबेन्द्र बजला- “यएह जे परिवारोमे देखै छी जे भैयारीक बीच बाल-बच्चाकेँ पढ़बै-लिखबैक हुअए आकि बिआह-दान ओ परिवारक दायित्वसँ उतैर बेकतीगत भऽ जाइए। तहिना समाजोमे अछि जे भोज-काजमे आनो-आन परिवारक सहयोग अपना जकॉं रहैए मुदा पढ़ाइ-लिखाइक सम्बन्ध पतराइते जा रहल अछि। आ बिआहो-दानमे सहयोग केतौ-केतौ पतराइत-पतराइत मेटाइयो गेल अछि।” अपना जनैत जीबेन्द्र सोझ-साझ रूपमे बजै छला मुदा श्यामकेँ बातक विचार ओझराएल-ओझराएल सन बुझि पड़ल। जिज्ञासा करैत श्याम बाजल- “चाचा, नीक जकॉं मनमे स्पष्ट नइ भेल।” श्यामकेँ दोहरा कऽ पुछलासँ जीबेन्द्रकेँ अनका जकॉं मनमे मिसियो भरि तामस नहि लहरलैन, अपन विचारकेँ सोझरबैत बजला- “परिवारक भैयारियोमे आ समाजक भिन्न-भिन्न जे रूप अछि तहूमे एहेन विचार पनैप रहल अछि जे सभ सभकेँ नीच-सँ-नीच नजैरसँ देखए चाहैए। जखन एहेन विचार मनमे घर बना लेत तखन समाजो आ परिवारोक बीचक एकरूपता सेहन्ता बनबे करत किने।” जीबेन्द्रक विचार श्यामकेँ सोहन्तगर बुझि पड़लै। बाजल- “से तँ सेहन्ता लगबे करत किने। मुदा उपाइयो तँ दोसर नहियेँ छइ।” श्यामक बातसँ श्यामक विचारक थाह जीबेन्द्र पाबि गेला। अथाहमे थाह लेब जमीनछुअब होइए। जाबे तक धरतीपर पएर नइ रोपल जाइए ताबे तक डुमै-भँसैक संकट रहिते अछि मुदा जखन धरती पएर छुबैए वा पएर धरती छुबैए तखन ठाढ़ होइक सम्भावना तँ बनिते अछि...। जीबेन्द्र बजला- “बाउ श्याम, दुनियॉंक तड़ियो-घटी आ तड़ियो-फड़ीकेँ दुनियाक सभकेँ चिन्हक चाही मुदा से नइ अछि।” जीबेन्द्रक विचार सुनि श्याम अकबका गेल। बाजल- “से की?” जीबेन्द्र- “परिवारोमे आ समाजोमे समस्याग्रस्त आदमीकेँ चिन्हित करैत ओकर दुख-दर्दकेँ बॉंटि-बॉंटि छोट करैत ओकरा निर्मूल बनाएब अछि। से नइ भऽ पाबि रहल अछि।” श्यामक मन जेना थकथका गेल। बाजल किछु नेमुदा चिन्तकक चिन्तन मनमे जरूर उठलै। बेथासँ बेथित नजैर जीबेन्द्रपर फेकलक। श्यामक कुम्हराएल चेहरा देख जीबेन्द्र बजला- “बौआ, मनुख बानरसँ ने भेल अछितँए अनुकरण करब एकरा संस्कारमे अछिए। अपना ऐठाम जे बेटीक बिआहमे दान-दहेजक एहेन विकराएल रूप बनि गेल अछि तेकर जड़ि केतए अछि से बुझै छहक?” मुड़ी डोलबैत श्याम कहलकैन- “नइ!” ‘नइ’ सुनिते जीबेन्द्र बजला- “रामायणिक अनुसार रामकेँ सेहो जनकपुरमे गाड़ीक-गाड़ी विदाइ देने रहैन। ई तँ भेल पुराणक बात, मुदा इतिहासक कड़ीमे देखबहक जे राजा-रजबार गामक-गाम अपना बेटीकेँ खोंइछ कहक आकि जमाएकेँ देब बुझहक, दइ छला। ओकरे देखा-देखी ओइसँ निच्चाँउतरल। जे उतरैत-उतरैत समाजक अन्तिक सीमा धरि मुँह बना लेलक अछि। ओइ राक्षसी वा दानवी मुँहमे समाजक एका-एकी सभ गिरैत जा रहल अछि जे आइ समाजक कोढ़ बनि कोढ़केँखोखैर-खोखैर लोहियामे दूधक जरल डारही जकॉंखा रहल अछि आ सभ कियो एक-दोसरक तमाशा देख रहल अछि।” आइ तीसम दिन पुरि जाएत परसूसँ पढ़ाइ शुरू भऽ जाएत। ओना, तीन-चारि दिनसँ धीरेन्द्र पटना जाइक तैयारीमे जुटि गेल छल, मुदा सुवासिनीक परिवार मात्र शेष दिन गनि रहल छल। भोरे-भोर, ओछाइनपर सँ उठैसँ पहिने आ नीन टुटला पछाइत धीरेन्द्र आजुक दिनक संग काल्हिकेँ जुटैत सीमापर ठाढ़ भऽ हर्षित मने अपन हिसाब जोड़ए लगल- आठ मासक पछाइत पटना छुटि जाएत। नोकरी करब नहि, तँए फेर गामे आएब। ओना, मात्र पटने छुटत तेतबे नइ अछि, पटनाक संग कौलेजक शिक्षा सेहो सम्पन्न हएत। कौलेजेटा किए, बाहरी शिक्षकक शिक्षा सेहो छुटत। अखन धरि जे सीखपन भेटल अछि वएह अपन मूल सम्पैत भेल, अही बले ने जिनगीक धारमे कुदि-हेलि चलैक अछि। जँ ज्ञानक बले चलब तँ हेलैत रहब, नहि तँडुमि मरब। भेल तँ आठ मास प्रवासी जीवन बिताएब अछि। फेर यएह रामा आ यएह कठोला रहबे करत। ओना, यएह आठ मासक भीतर विद्यार्थी जीवनक अन्तिम परीक्षा सेहो देब अछि...। जहिना प्रकृति समयानुसार अपन वसन्तसँ शिशिर धरिक गुण-गाण बारहो मास छत्तीसो दिन करैत चलैए तहिना धीरेन्द्रोअपन वसन्तसँ शिशिर धरि देख रहल छल। जीबेन्द्र सेहो बेटाकेँ शिक्षणभूमिमे पठबैक तैयारी कइये नेने छला। तँए मनमे कोनो तरहक क्लेश-बात शिशिर जकॉं नहियेँ छैन, मुदा वसन्तक बहार नहि नाचि रहल छैन, सेहो केना नइ कहल जाएत। बेटाक प्रति दायित्व, जे जिनगीक एक चौथाइक काज (कर्म) भेल माने करीब बीस बर्ख, तइमे ब्रह्म-चर्च जीवनक दायित्वनिमाहि सालोसँ कम आठ मासपर पहुँच गेल अछि, तँए तरे-तर विचारक निमहैत भारक खुशीसँ मन खुशियाएल छैन्हे। भोरे उठि टहलबोक खियालसँ आ ओगरवाहियोक खियालसँ जीबेन्द्र आमक गाछी गेला। रस्ता कातेमे, अपन आमक गाछीसँ पहिने सुवासिनीकेँ श्यामक गाछीमे उदास मन देख अपनो मन माने जीबेन्द्रक मन मन्हुआए लगलैन। मुदा लगले अपन विचारकेँ समेट सुवासिनीक जिनगी दिस नजैर टहलौलैन। बेचारीक उदास मन किए ने रहत?तेहेन जुग-जमाना भऽ गेल अछि जे अपन जिनगी भरिक कमाइसँ जैठाम बेटीक बिआह सम्हारब भारी भऽ गेल अछितैठाम तीन-तीनटा बेटीक भार सम्हारब खेल थोड़े छी, बेचारी चिन्तित किए ने हएत...। मुदा कनैत मुँहक रूप तखन बदलैए जखन हँसैत मुँहक विचारक रूप ओकरा भेटै छइ। जँ कनैतकेँ आरो बेसी कनैत मुँह भेटत तखन तँ ओ हिचैक-हिचैक आरो बेसी कनबे करत किने..! अपन रूप लावण्य स्थापित करैत जीबेन्द्र सुवासिनीकेँ देख बजला- “बुच्ची, आब केते कालक दाना-पानी प्रेमनगरक छह?” ओना, बजैक क्रममे सुवासिनीक मनमे उठि गेल छेलैन जे जेते आमपर हमर नाम लिखल अछि तेते सठला पछाइत ने जाएब, मुदा बजैसँ पहिने अपनाकेँ चेतैत बाजल- “अपन तँ नैहर छी, आइ जँ माए-बाप रहितैथ तँ दोसर जिनगीक गाम रहैत मुदा अखन भाए-भौजाइक बीचक ने अछि। मुदा तैयो गाम तँ गामे भेल। आइ छुट्टीक अन्तिम दिन छी, भरि दिन तँ रहबे करब। सौंझुका बससँ चलि जाएब।” जीबेन्द्र- “धीरेन्द्रोकेँ जाएब छइहे, नीक हेतह जे सभ संगे चलि जइहह। जहिना हँसी-खुशीसँ आम खाइले आएल छेलह तहिना हँसी-खुशीसँ जेबो करिहह। समय-साल नीक रहत ते ऐगलो साल अबिहह। अपन नैहर छिअ, तोरा कोनो केकरोसँ परमीशन लइक काज छह।” तैबीच जगमोही सेहो पहुँचल। जहिना कोनो यज्ञ-जपमे कर्म जखन अन्तिम छोर पकड़ैए तखन उदासीक आगमन होइते छै जे ‘उदासी’ कहियौ कि ‘समदाउन’ कहियौ तइसँ जे समापन करैकाल जेहेन प्रकृतक रूप सजै छै तेहने रूप जगमोहीक छल। भोरे ओछाइनपर सँ उठिते पहिल विचार मनमे यएह उठलै जे आइ चलि जाएब। मुदा जीबेन्द्रक विचारक अन्तिम बात सुनि नेने छल। मनमे उठलै- माइयक नैहर तँ हमरो ने मात्रिके भेल। ठीके ने बाजल छला जे तोरा परमीशनक खगता थोडे छह।मात्रिके ने मातृभूमीए जकॉं अछि। तैठामसँ जाइ-अबैक प्रश्न की भेल...। जीबेन्द्रकेँ पएर छुबि प्रणाम करैत जगमोही बाजल- “नाना, आइ चलि जाएब।” असीरवाद दैत जीबेन्द्र बजला- “मनसँ पढ़िहह। जखन धीरेन्द्रो संगे छह तखन दुनू गोरे मेल-मिलानसँ रहबो करिहह आ एक-दोसरकेँ मदतियो करिहह।” ऊपरक मने आकि भीतरक मने जगमोही सुनलक आकि की, से तँ ओ जानए मुदा रौदाएल-पियासलकेँ जहिना एक गिलास पानि पीने सात गिलास पानिक संतुष्टि होइ छै तहिना जगमोहीकेँ सेहो भेल। एकाएक मन कलैश गेलइ। जहिना कोनो गाछक मुड़ी कलैशते नव सिरासँ नव जिनगीक रूप-गुण पबैए तहिनाश्रेष्ठजनक असीरवादसँ नवजीवन पौनिहारकेँ सेहो जीवनधारक धारा प्रवाहित होइत भेटबे करैए। नव जिनगीक धारमे, माने पढ़ल-लिखलक बीच जगमोही उग-डुम करए लगल। ओना, समाजमे पसरल दहेजक प्रवाह सेहो देख-सुनि रहल छल मुदा विचारक दौड़मे अखन तक धियान नइ गेल छेलइ। कलशैत कलशमे जहिना फूलक कोढ़ी ऑंखि खोलैए तहिना जगमोहीक ऑंखि खुलए लगल। बाजल- “नाना!अहॉं सबहक जँ दया-दृष्टि रहल तँ एक-दोसराक मदैत प्रेमसँ करैत प्रेमसागरमे पहुँच स्वत: कल्याणक बाट पकैड़ लेब।” जगमोहीक विचार सुनि जीबेन्द्रक मन्हुआएल मन, सुवासिनीक विचार सुनि जे मन्हुआएल छेलैन ओ एकाएक कलैश कऽ फुलि-फलि कऽ मुँह बनि मोतीक धारमे स्वत: बाहर निकलए लगलैन। बजला- “हम तँ आब जिनगीक ओइ पारक घाट लग पहुँच गेल छी। आब तँ तोहीं सभ ने आइसँ काल्हि पहुँचैक बीचक ऐपारक घाट छह। जेना पार करए चाहबह ओ तँ तोरे सबहक ने हाथमे अछि।” जहिना एक दिस जीबेन्द्र जगमोहीक विचार सुनि ठमकला तहिना दोसर दिस जगमोही सेहो जीबेन्द्रक विचार सुनि ठमकल। आगू ने किछु जीबेन्द्र बजला आ जगमोही बाजल। तइ बीचमे सुवासिनी ठाढ़ एक दिस जगमोहीकेँ देखैत तँ दोसर दिस जीबेन्द्रकेँ। बीच सीमापर ठाढ़ सुवासिनी हर्ष-विसमयक बीचक भार तर अपनाकेँ दबल देख बकर-बकर दुनू दिस खाली ताकि रहल छेली। पटना पहुँचैत-पहुँचैत भोर भऽ गेल। गंगाक पुल पार होइते सभ सभपर नजैर दौड़ौलक। सबहक चेहराक रूप उतरल मुदा जहिना एक दिस रातिक यात्राक झमारसँ सबहक चेहराक रंग उखड़ल-उखड़ल बुझि पड़ैत तहिना दोसर दिस सबहक मनमे ईहो जगैत जे दुनियॉंक हेराएल लोक सेहो भेटला। समय बीतैत गेल। नव जिनगी जहिना नवयौवनसँ शुरू होइए तहिना नवयौवनक आभास सेहो सबहक मनमे भइये गेल छल, जइसँ नव भारक दाबसँसबहक मन दबाइये लगल। सभ अपन-अपन रूप-रंग सजबए लगल,सबहक मनमे उठए लगल- केहेन बेवहारमे अबैक अछि। आठ मास केना बीत गेल से ने धीरेन्द्रे बुझि सकल आ ने जगमोहीए। हेराएल-हेराएल लोक जहिना कर्ममे हेरा अपन सुधि-बुधि बिसैर काजक सुधि-बुधिमे रमि जाइए तहिना आठ मास रमता जोगीक झोरामे दुनूक समय चलि गेल। बीचमे परीक्षा भेल, रिजल्ट पछुआएल अछि। धीरेन्द्र गाम आबि गेल। जगमोही पटनेमे रहल। रिजल्टक बैसारीमे दुनूक मनमे यएह नचैत जे समाजशास्त्रक विद्यार्थी बनि विद्याध्ययन केलौं आ समाजेमे रहैक अछि तैठाम समाजिक जीवन केहेन बनाएब, यएह ने अपन दायित्व भेल। शब्द संख्या : 1914, तिथि : 30 सितम्बर 2018 डॉ. बचेश्वर झा विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि जाहि समयमे विद्यापतिक आर्विभाव मिथिलामे भेल छल ओ संक्रमणक काल छल। सामाजिक विश्रृंखलताक कारणेँ किछु लोक काज-धन्धा करबासँ मुँह मोड़ने छल। जे केओ काजुल, परिश्रमी छलो ओहो ननुचमे परि कर्त्तव्यहीन जीवन बितेनिहार भऽ गेल छल। मिथिलामे खेती आ पशुपालनक सिवाय दोसर जीविकाक साधनो तँ नहि छलैक। सीमित साधनो अछैत खेती करनाइ असौकर्ज बुझि दिनानुदिन आर्थिक दुर्वलताक शिकार होइत रहल। इएह कारण भेलै जे एतुका लोकक आर्थिक अवस्था लचड़ि गेलैक। एतबे नहि, किछु लोक कृषिक उपेक्षा कऽ भीख मांगब श्रेयस्कर बुझए लागल। एहन लोककेँ समाज घृणाक दृष्टिसँ देखैत छल। तेँ एहि प्रवृतिक लोकक ध्यान खेतीक ओर आकृष्ट करबाक निमित कहबी चरितार्थ भेल- “उत्तम खेती मध्यम वाण, निषिद्ध चाकरी भीख निदान।” तात्पर्य ई जे खेती करब सभसँ उत्तम मानल गेल। व्यवसाय करब मध्यम। नौकरी करब अधम मानल गेल। सभसँ अधलाह- भीख मांगब बुझल गेल। जहाँ तक नौकरीक गप्प छैक, आजुक समयमे नौकरियेकेँ प्राथमिकता भेटल छैक। ओ भलेँ सम्पन्न परिवारक किएक ने होथि, नौकरी हेतु अपस्यॉंत देखल जाइछ। एहनो समय छलैक जखन नौकरी कएनिहारकेँ समाजमे कुचर्चा होइत रहैक। एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे आत्म निर्भरताक शिक्षा देल जाइत छल। महा कवि विद्यापति अपन रचना ‘लिखनावली’ आ ‘वर्षकृत्य’मे मिथिलाक कृषिक बहुविधिवर्णा कहल अछि। संगहि कृषिकेँ उपेक्षाक दृष्टिसँ देखनिहारकेँ एहि ओर आकर्षित करबा लेल अपना रचनामे शिव आ गौरीक माध्यमसँ उपदेश देल अछि। विद्यापतिक मात्र उद्देश्य अकर्मण्यताक अन्मूलन करब छल। “बेरि-बेरि अरे शिव मो तोय बोलो, कृषि करिअ मनलाई, भिखि मांगिए पर गुण गौरव दूरिजाय, निर्धन जन बोलि सबे उपहासे, नहि आदर। अनुकम्पा। तोहें शिव पाओल आक-धतूर, हरि पाओल फूल चम्पा।।” भूमिक अधिकता आ जन संख्याक न्यूनताक कारण खेती अदलि-बदलि कऽ होइत छलैक। जाहि खेतमे एहि वर्ष धान गृहस्थ करैत छल, ओकरा परती छोड़ैत छल। ई करलासँ साल भरिमे खेतक ऊपज शक्ति बढ़ि जाइत छलैक। भूमि तीन श्रेणीक मानल गेल छल। विद्यापतिक समयमे पहिल श्रेणीमे गोचर, दोसर श्रेणीमे ऊपजाउ आ तेसर श्रेणीक वंजर। गोचर भूमिमे अनेक प्रकारक घास लगाओल जाइत छल जे पशुपालनक हेतु प्रमुख छल। ई गोचर भूमि साधारण गाममे एक सय दंड, पैघ गाममे दुई सय दंड एवम् नगरमे चारि सय दंड छोड़ल जाइत छल। वंजर भूमिकेँ तोड़ि कऽ खेतीक योग्य बनाओल जाइत छल। एहन भूमिकेँ विद्यापति खील भूमि कहलखिन्ह। एहन प्रकारक भूमिमे खेती कएनिहार भू-स्वामीकेँ सात वर्ष धरि ऊपजक आठम भाग दैत छल। तत्पश्चात् भू-स्वामीक अनुसार उपजक स्वामीत्वमे परिवर्त्तन भऽ जाइत छलैक। एखनहुँ परती जमीनमे खेती कएनिहारकेँ सुविधा देल जाइत छैक। एहि सुविधाक समय निर्धारित नहि छैक। जगह-जगहपर अन्तर देखल जाइत अछि। ओहि समयक समाज दू वर्गमे बँटल छल। एक वर्ग राजा महाराजाक सामन्तादिक छल। एहन वर्गक लोकक खेती-पथारी दूर-दूर धरि होइत छलनि। ओतए ओ लोकनिक खेती करबाक मिश्रित्त कर्मान्तिक अर्थात् कमतियाकेँ रखैत छलाह। एकर अतिरिक्त आरो अधिकारी वर्ग ओकर काजक निरीक्षण करबाक लेल राखल जाइत छल। समाजक दोसर वर्ग दलित वर्ग छल जे स्वयं अपन खेती करैत छल। एहन वर्गकेँ खेतीमे अपन पत्नीसँ सेहो सहयोग भेटैत छलनि। खास कऽपशुक हेतु सभ प्रकारक व्यवस्था स्त्रीगणे द्वारा होइत छल। महादेवकेँ मैथिल होएबाक प्रमाण कहक ईहो भऽ सकैछ। हुनक सासु मैना स्पष्ट रूपसँ कहैत छथिन्ह- “हमर धिया जखन सासुर जयतीह तखन ओ घास काटि लौती आ बसहा चरौती।” खेती-पाती हर एवम् कोदारिसँ ओहू समयमे कएल जाइत छल। हरक व्यवहार विद्यापति साहित्यक संगहि तत्कालीन साहित्यमे सेहो कतेको स्थलपर कएने छथि। विद्यापति अपन वर्ष कृत्यमे हरक मुहुर्त्तक उल्लेख कएने छथि। ओहि दिन बरदक सिंहमे मक्खन गूड़ आदि रगड़ल जाइत छल। प्राय: ओहि दिन धनी-मनी व्यक्ति हरक-फारक आगूमे सोना लगबैत छल। विद्यापति कहैत छथि सोन लगायब एक विधान छल। एक तरहक कहबी छैक वा लोक धारणा जे पंचमीक मुहुर्त्तमे हर जोतबा काल जौं बरद चित्कार करए वा मेमिया तँ चारि गुणा उपज होएबाक संकेत भेटैछ। ओहि दिन पाँच सिरोर जोतबाक विधान छलैक। विद्यापतिक लिखनावलीक एक पत्रमे हरक हेतु धुरन्धर बरदक चर्चा आयल अछि। खगौट भेलापर गृहस्थ एहन धुरन्धर बरदकेँ बन्हकी रखैत छल। एहिसँ ओहि समयक समाजक लचरल अवस्थाक परिचय भेटैत अछि। सम्पन्न गृहस्थ हरबाह खेत जोतबाक निमित रखैत छल। हरवाहीक अलाबा अन्यो काज हरबाहसँ करबैत छलाह। विद्यापतिक एक पद्यमे उल्लेख आएल अछि जे गौरी शिवसँ खेती करबाक लेल कहैत छथिन्ह, तखनुक ई पाँती अछि- “खटंग काटि हर हर जे बनाविअ, त्रीशूल तोड़ि करू फार। बसहा धुरन्धर हर लए जोतीय, खेत खोला पहाड़।” धनी-मनी व्यक्तिक ओहिठाम कमतियाक ऊपर महत्म होइत छल जकरा निरीक्षक समान पद होइत छलैक। कामत परक खेती-पथारीक सभ प्रकारक खबरि कमतियासँ लैत रहैत छल। कोन खेतमे कोन तरहक अन्न उपजाओल जाय संगहि खेत कोना जोतल जाय, कोन खेतमे आरि ऊँच्च कए बान्हल जाय संगहि कोन खेतमे कतेक लागत लगाओल जाय इत्यादि इत्यादि तकर जिज्ञासा महतम कमतियासँ करैत छल। विद्यापतिसँ पूर्व मैथिली डाक आ घाघ भेल छलाह जनिका मिथिलाक कृषि कार्यक उद्गेता कहल जाइछ। मै. डाककेँ प्रकृतिक गहन अध्यययन छलन्हि। एखनहुँ डाक वचनावलीक अनुसार मिथिलाक गृहस्थ कृषि कार्यक समीक्षा कऽ सचेत भऽ जाइत छथि। डाकक कहब छल- गृहस्थ छोट-क्षीण बरद नहियोँराखथि मात्र दुई गोट धुरन्धर बरद कीनि खेती करथि। अपन खेती भेलापर अनको खेतीक हेतु मंगनी देथि। हुनक शब्दमे- “नाटा बरद बेचि कए, दुई धुरन्धर कीन, अपन खेती करि कए आनकेँ मंगनी दीन।” एतबे नहि, ओ कहने छथि खेतक उपजा जोतपर निर्भर करैत अछि। थोड़ के जोतिए अधिक महिमविह अविए, ऊँच के बान्हिए आरि। जौं खेत तैयो नहि उपजए तँ डाक के परिह गारि। एहि लेल विद्यापतिकालीन महत्तम कमतियाकेँ सलाह दैत छलाह जे हरसँ तैयार कएला बाद खेतकेँ कोदारिसँ साधब उत्तम होइछ। मिथिलाक कृषिमे पर्याप्त वर्षाक अभाव प्राग ऐतिहासिक कालहिसँ रहल अछि। मानसून एतुका हेतु जुआवाजी कहल गेल अछि। किएक तँ अति वृष्टि अनावृष्टि आ दुर्भिक्षक शिकार एतुका गृहस्थ होइत रहलाह अछि। तेँ पटौनीक प्रभाव समय-समय पर होइत छलैक। विद्यापति साहित्यमे सेहो पटौनीक उल्लेख भेटैत अछि। पटेबाक एक यंत्र विशेषक चर्चा कएने छथि। यथा- रहट संस्कृत अरधदृ आ प्राकृतिक अरहट्ठ। एहि यंत्रसँ अहुखन इनारवा कूपसँ पानि बहार कएल जाइछ। एकर अतिरिक्त चर, चॉंचर, डबरा, खत्ता आ पोखरिसँ करीन द्वारा पटौनीक काज लेल जाइत छल। तत्कालीन राजा द्वारा बड़का-बड़का पोखरि खुनाओल गेल छल।। मिथिलामे एहन अनेको पोखरि विद्यमान अछि, जकर सकल आब बदलि गेल छैक। एहि तरहक पोखरि रजोखोरि कहबैत छल। किवदन्ति छल जे दैत्य द्वारा एहन विशाल पोखरि खुनल गेल छल। विद्यापति तँ मात्र नदीक उल्लेख कएने छथि- गौरी जखन शिवसँ खेती करबाक आग्रह कएलनि तँ शिव कहलथिन्ह- “सभ बात मानल मुदा पानिक अभाव भेलापर की होयत?तखन खेती तँ करब असौकर्ज होएत।” एहिपर गौरी उत्तर देलनि- “पाटय सुसरि धारा।” एहिसँ ज्ञात होइत अछि जे तत्तयुगीन मिथिलामे पटौनीक काज गंगानदीसँ कएल जाइत छल। ओहि समयक कृषकमे प्रगाढ़ प्रेम होइत छलनि। एक-दोसरक हित चिन्तनक संग अति आदरक भाव रखैत छलाह। खेतसँ उपज निर्विघ्न घर आबए तेँ बाधक हेतु रखवार राखल जाइत छल। अहुखन मिथिलाक गाममे रखवार रखबाक प्रथा अछि। रखवारकेँ विशेष अधिकार गृहस्थक द्वारा देल गेल छल। कहुखन ई रखवार खेतक पूर्ण उपजकेँ हथिया लैत छल जे विद्यापतिक पदसँ ज्ञात होइछ- “खेत कएल रखवारे, लूटल ठाकुर सेवा भोर।” यदा-कदा एहनो होइत छलैक जखन खेतीक समय बीति जाइत छल तखन वर्षा होइत छल। जेकर विद्यापतिक पदसँ पुष्टि होइछ- “समय गेले मेघे वरिसब, की दहु तेँ जलधार।” एहना स्थितिमे वर्षाक पानिकेँ रोकबाक हेतु खेतमे ऊँच्च आरि बान्हल जाइत छल ताकि खेतसँ पानि ससरि नहि जाय। विद्यापतिक पद्यसँ संकेत भेटैछ- “गेला नीड़निरोधक की फल।” पुन: विद्यापति अपन रचनामे प्रेम रूपी फूलक हेतु शीलक आरि बान्हि मर्यादाक रक्षा कएने छथि- “फूल एक फूलवारि लगाओल मुरारि, जतने पटओलन्हि सुवयन वारि। चौदिस वॉधलि सीलक आरि, जीव अवलम्वन करू अवधारि।” एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे लोक भूमिकेँ छोट-छोट टुकड़ीमे बाँटि खेती योग्य बनबैत छल। विद्यापतिक समयक कृषकक समस्त उपजाक अन्नक उल्लेख कतहु एकठाम नहि भेटैत अछि। तखन एतए मसूरी, राहड़ि, सरिसो, तिल जौ आदिक अवश्य उत्पादन होइत छलैक। जतेक प्रकारक अन्नक उल्लेख भेल अछि ओ सभ अन्न विभिन्न अवसरपर मिथिलामे विभिन्न देवी देवताक प्रसन्नताक हेतु दान कएल जाइत छल। एकर सांगोपांग वर्णन विद्यापतिक ‘वर्षकृत्य’मे भेटैत अछि। अनुकूल समयसँ यथेष्ट उपज होइत छलैक। गृहस्थी नीक हालतमे भेलासँ मिथिलाक लोक बाहर नहि जा कऽ घरहि रहैत छल। कहबी छलै- “कर खेती घरही भला।” इएह कारण छल जे एतुका जनमानस वाह्य परिवेशक अनुभवसँ वंचित रहल। विद्यापतिक पूर्व जहिना गृहस्थीसँ उदास लोक छल तहिना कविक रचनाक प्रभावसँ गृहस्थीक ओर झुकाव भेल छल। खेतीसँ उत्पन्न अन्नक उपयोग मोला व्यवस्था द्वारा चलैत छल। मोलाक अन्तर्गत क्रय-विक्रयक विधान छल। एकरो उल्लेख विद्यपतिक लिखनावलीमे आयल अछि। तौल-नापक व्यवस्थामे टंक और मानी पांथी चलैत छल। 4 मानी एक टंक होइत छलैक। ओहि समयक 1 मानी आजुक 16 सेरक बरा-बर होइत छलैक। खेतसँ पर्याप्त धानक प्राप्तिक प्रमाण छलैक जे पैघ गृहस्थ डेढ़िया वा सवाईपर कर्जा लगबैत छलाह। कर्जाक अदायगी अगहन मासमे नवका धान भेलापर होइत छलैक। विद्यापतिक लिखनावलीमे कृषि सम्बन्धी चर्चा विलक्षण ढंगसँ कएल गेल अछि। अस्तु...!q लेखन तिथि : 4 अगस्त 1993 एवम् आकाशवाणी दरभंगासँ प्रसारित : 7 अगस्त 1993 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। दुर्गानन्द मण्डल सोन्हगर आधुनिक कथाकारक उच्चतम् श्रेणीक कथाकार श्री नन्द विलास रायजीक सम्बन्धमे ‘विदेह’क सह सम्पादक लिखै छैथ जे ग्रामीण रचनाकार अपन पात्रक संगे-संग जीवन जीबै छैथ, संगे-संग संघर्ष करै छैथ, संघर्षक महत्वकेँबेवहारिक तौरपर बुझै छैथ और तँएओ ‘सम्बन्ध-बन्ध’क खियाल करै छैथ, सदैव सम्बन्ध बना कऽ रहए चाहै छैथ। ई मिथिलाक संस्कार छी। मिथिला अपन कोखिसँ सदैव एहेन विचारकेँ जन्मल अपन पूत मानैत रहल अछि। ऐठाम लोक सम्बन्धकेँ बहुत महत् दैत अछि। ‘अपनेटा नीक’केँ कहियो नीक नहि कहैक इतिहास रहल अछि मिथिलामे। हँ! ‘अपनो नीक’ एहेन धारणा तँ अछिए। अही धारणाक अनुशरणमे मिथिलाक प्रसिद्ध रचनाकार डॉ. शिव कुमार प्रसाद एक उदाहरणकसंगआइ मिथिलामे ठाढ़ छैथ। कहब जे एहेन पहिल अनुवादक शिवकुमारे बाबू भेला सेहो बात तँ नहि?ठीक! मुदा ई बुझि-सुझि कऽ कहबाक चाही जे मैथिली साहित्यक अनुवाद विधामे कएल अधिकतम काजक इतिहास की अछि। सभ जनै छैथ जे पारिश्रमिक एवम् पुरस्कारक लेल कएल गेल अनुदित पोथीमैथिली साहित्यमे बेसी अछि। प्राय: अनुवाद एसाइनमेन्ट लेल कएल गेलअछि। कहब जे शिवकुमारो बाबू भऽ सकैए ओही लेल लिखने नइ हेता तेकर कोन गारंटी? हँ, एकर दूटा गारंटी अछि। पहिल तँ ई जे नव मिडियाक सहारे बनल सम्बन्धक बीच मूल पोथीसँ अनुवाद करक लेल मैथिलीमे शिवकुमार बाबू स्वयं हृदयसँ तैयार भेला। आ ‘पिघलते हिमखंड’ केँ ‘पघलैत हिमखंड’क रूपमेसम्पूर्ण पोथीकेँ इच्छानुसार मनसँ अनुवाद केलैन अछि। आ दोसर गारंटी ई अछि जे डॉ. शिव कुमार प्रसाद सर्वहारा मंचपर बैसैबला गैर सर्वण रचनाकार सेहो छथिए।तहन हिनका सभपर, माने गैर योजनावद्ध ढंगसँ साहित्य अकादेमीकेँ संग देनिहार रचनाकारसभपर–भला ‘पुरस्कारक लोभ’ लिखब उचित नहि बुझै छी।डॉ. शिव कुमार प्रसाद‘सगर राति दीप जरय’सन मंच परहक वक्ता छैथ। जे मंच मिथिलिये नहि, समस्त भारतीय भाषा साहित्यमे असगरे अछि। ई बात हमरो बुझल अछि जे ऐ मंचक कल्पना पंजाबक एक मंचसँ कएल गेल अछि। मुदा हमर सबहक जे देह-हाथ अछि, खास कऽ नव मिडियाक बाद, ओइ रूपमे तँ आरो असगर पड़िए गेल अछि। मैथिली साहित्यगीत-कविता, काव्य आदिक लेल एकटा नव सुर्यक रचना ‘सोंहॉंत-अनसोंहाँत’रचनाकार डॉ. शिव कुमार प्रसाद आजुक समयमे आजुक पीढ़ीक लेल बड़ सोन्हगर लागल, आ पाठकोकेँ लगतैन। ई हमर आत्म विश्वास अछि। जइमे कविवर डॉ. प्रसाद अपन लेखनीसँ अनेकानेक, सभ तरहक रचना दऽ पाठक-प्रेमीक बीच अछप स्थान बनौलैन। ओना, वृततिये डॉ. प्रसार हिन्दी साहित्यक विद्वान छैथ आ हरि प्रसाद साह महाविद्यालय- निर्मलीमे हिन्दी विभागमे एसोसियेट प्रो. एवम् अध्यक्षपदपर सुशोभित। जइसँ आजुक पीढ़ीकेँ अपन ज्ञान दान दऽ समाज आ राष्ट्रक सेवा सेहो दऽ रहला हेन। सेवा मात्र नहि, अपितु अखन वर्तमान पीढ़ी जे शिक्षकक नामपर बौड़ा गेल अछि, जे जाएत केतए आ जेबाक केतए छै से ज्ञाने नहि, तैठाम डॉ. प्रसादजीक सारगर्भित ज्ञानसँ ओइ बोराएल पीढीकेँ एकटा उचित दिशा भेटतै। ओना, ई अलग बात जे एखुनका शिक्षा पद्यतिसँ डिग्री मात्रेटा भेटत, रोजगार सृजन आ ज्ञान नहि, तैठाम डॉ. शिवकुमार प्रसाद अपन ज्ञान दानसँ ऐ समाजक बीच ज्ञानोपदेश देबामे सफल बेकती छैथ। ई हमरा नीक नहाँति बुझल अछि। आ बुझलो केना नै रहत, हमहूँ तँ निर्मलीए माटिपर रहै छी। प्रस्तुत पोथीसँ पूर्व डॉ. शिवकुमार प्रसादक हिन्दी आ मैथिली- दुनू भाषामे अनेकानेक रचना सभ प्रकाशित भेल अछि। जे अपने सभ पढ़नहि हएब। एना ऐ दुआरे लिखलौं जे पढ़नहि हएब, जे नव मिडियाक समय अछि किने। आब ओ समय गेल जे अहॉंक रचना हम पढ़ब तइले पहिने मैथिलीक प्रिंट मिडियाक सम्पादकसँ फरिआउ। वर्तमान परिपेक्ष्यमे ‘सोंहाँत-अनसोंहाँत’अपनेक बहुत सोहनगर रचना अछि, ई रचना सभ पाठक-बन्धुकेँ सोन्हगरेटा लागत अनसोंहाँत नहि। किएक तँ अपने बहुत नीक जतनसँ ऐ काव्य संग्रहक रचना केलौं अछि। जइमे छोट-क्षीण मुदा अनुकरणीय आ कर्णप्रिय रचना सभ संग्रहीत केलौं। पोथीक आरम्भेमे रचनाकार मिथिला धाम लिख अपन गाम मोन पाड़लैन आ नेनपना सेहो। पढ़लाक बाद थोड़ेकाल धरिक लेल लागल जेना केतौ हेरा तँ ने गेलौं। जेतए लूखी, कचबचिया, मेना, पौरकी आदि रहै छल मुदा अखन दर्शनो नदारत, अखन सिर्फ पजेबा आ सिमेन्ट-बालुसँबनल बेश ऊँचकगर कोठा-सोफाटा देखाइत अछि। तहिना नवोदित रचनाकारक लेल डॉ. प्रसादक प्रोत्साहन जे किछु-ने-किछु लिखैत जाउ...। नीक लागल। जे ऐ तरहेँ जे छपैत-छपैत छैपिये जाएब। एक दिन लेखक बनियेँ जाएब। मंच आ इनामो भेटत...। एक दिस लेखक बनियेँ जेबै मंच आ इनामो भेटत..। तँए किछु-ने-किछु लिखैत जाऊ..। तहिना निर्मलीक निर्मलतामे शिर्षक कवितामे शिक्षाक ऐ महापंकमे गामक जिनगी लेटा रहल अछि कोचिंग, विद्यालय, कौलेजमे एक-एक जन लूटा रहल अछि शिक्षाक ऐहि महापंक...। वर्तमान शिक्षाक माध्यमसँ लूटाइत ग्रामवासी सबहक आर्थिक दुर्दशा देखेबामे कविवर सफल रहला अछि। अहिना ‘बौआक उबटन’सँ लऽ सॉंझ, ढोलकबोखार, छठि पाबैन लिख ठकुआ आ केरा सेहो मन पाड़लैन। रचनाकार दीप रचनाक मादे लिखै छैथ जे सगर राति हम दीप जरेलौं तैयो घर अन्हारे अछि। शिक्षा मेल विषयपर इजोत देलैन। तहिना ‘मन पछताय’, ‘झूठ-फूसमे बाझल छी’किएक से स्पष्ट केलैन अछि। देख एलौं हम पटना,ओझराहैट, ठनकल फेर ठनका, लिखलैन तँ सुमीता सन नारीक चित्रण करब सेहो नै बिसरलाह। रचनाकारक सरसता देखू जे फगुआआ फागुन लिखब सेहो नै बिसरला..! अपने तँ भाँग खा पटियापर ओंघराएल छैथ आ कनियॉं रंग खेलक लेल एलैन। ऐ प्रकारक सभ तरहक बीहैन काव्य रचना लऽ रचनाकार जाड़क कनकनीसँ लऽ जिनगीक झमेला, झूठ, भातक थारीसँ लऽ विद्याक अर्थीधरि लिख पाठक आ समाजकेँ उचित बाट देखौलैन। ऐ लेल रचनाकार श्री प्रसादजीकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद आ साधुवाद छैन। जे अपन रचनेक माध्यमसँ ओ आबए-बला पीढ़ीक लेल तमसोमा ज्योर्तिगमय साबित करैक परियास केलैन अछि। जे किनको अनसोंहाँत कहाँ सोन्हगरेटा लगलैत। बेस, अखन एतबे...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हारक दूटा गजल ३.२.नन्द विलास राय- सरस्वती वन्दना ३.३.रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- झारु आशीष अनचिन्हारक दूटा गजल 1 मोन मीलल बहुत बहुत नेह भेटल बहुत बहुत दूर गेलै जते जते नीक लागल बहुत बहुत साँच बजलहुँ कनी मनी संग छूटल बहुत बहुत बात करता जखन जखन खाद फेंटल बहुत बहुत साँझ खातिर कहीं कहीं भोर टूटल बहुत बहुत आइ हुनकर कथा व्यथा भाँज लागल बहुत बहुत आब भेलै महो महो रूप साजल बहुत बहुत गाछ देखै टुकुर टुकर काँच पाकल बहुत बहुत सभ पाँतिमे 2122 12 12 मात्राक्रम अछि। 2 बाहर जते फेम छै भीतर तते ब्लेम छै प्लेयर सहित फील्ड आ अम्पायरो सेम छै जैठाँ बहुत जौहरी तैठाँ कनी जेम छै अनकर हड़पि आनि लेब अतबे हुनक एम छै तोड़ब हृद्य मोनकेँ ई ओकरे गेम छै सभ पाँतिमे 2212-212 मात्राक्रम अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय सरस्वती वन्दना सरस्वती माता हे किएक ने दइ छी हमरोपर कनियोँ धियान एक नजैर हमरा दिस तकियौ करियौ हमर कल्याण सरस्वती मैया हे...। मृगतृष्णामे हम भटकै छी जेतए जे सुतैर गेल से झटकै छी तेना स्वार्थमे आन्हर बनल छी भ्रष्टाचारक दलदलमे फँसि कऽ अपनो कऽ बुझै छी आन। सरस्वती मैया हे..। हम मूरख, लोभी, अधर्मी चरित्रहीन, कपटी, कुकर्मी कनियोँ नहि अछि ज्ञान। सरस्वती मैया हे...। मानव बनि धरतीपर एलौं जे नै करैक छल सेहो सभ केलौं दानबबला कर्म करै छी भऽ गेलौं शैतान। सरस्वती मैया हे...। जे माए-बाप जनम हमर देलक पालि-पोसि कऽ पढ़ेलक-लिखेलक हुनका सभक सेवो ने केलौं केहन भेलौं हम बेइमान सरस्वती मैया हे...। महल-अटारी बहुत बनेलौं मानवता केर सेवा नै केलौं केलौं ने कहियो दान। सरस्वती मैया हे...। अधला काजक अधला फल होइ छै ई बात हम खूब बुझै छी बुझियो कऽ छी अनजान सरस्वती मैया हे...। हाथ जोड़ि विनती करै छी हे मैया अहाँ छी दयावान हमरा सद्-बुद्धि दिअ हे मैया आओर दिअ सद्गज्ञान मृगतृष्णासँ हम निकैल कऽ बनिऐ नेक इंसान सरस्वती मैया हे कनियोँ दियौ हमरोपर धियान। एक नजैर हमरा दिस तकियौ करियौ हमर कल्याण। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’ झारू- साधुवाद मिथिला केर धरती साधुवाद मैथिल जनता। साधुवाद हे ताज मिथिला केर साधुवाद सम्प्रभुता।। गीत- हमर वन्दना माँ मिथिलासँ विनय करू स्वीकार हे। बनि अनाड़ी जीबै छी जगमे जिनगी भेल बेकार हे।। राजाजनक छल अहीं गर्भ-के।-2 जन्म देलौं विद्यापति सर्व-के।-2 हमरा छुपेबै अहाँ कहिया तक हमरो करू उद्घार हे। बनि...। नहि जानि अहाँ केतेकेँ तारलौं-2 अपना धुलसँ बहुत उबारलौं-2 कनियोँ धुल हमरो छीटि दइतौं हमहूँ होइतौं साकार हे। बनि...। ज्ञान देलौं अहाँ सौंसे जगत-के।-2 करू दया कनी अहूँ भगत-पे।-2 पूजब हे तोरा कण-कण मैया दियौ मौका एकबार हे। बनि...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २७७ म अंक ०१ जुलाइ २०१९ (वर्ष १२ मास १३९ अंक २७७)