विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २७९ म अंक ०१ अगस्त २०१९ (वर्ष १२ मास १४० अंक २७९) ऐ अंकमे अछि:- १.मुन्नाजीक किछु बीहनि कथा २.आशीष अनचिन्हारक गजल ३.नागेश कुमार प्रेषित आशुतोष- श्रीरामचरितमानस १ मुन्नाजीक किछु बीहनि कथा 1 असरा बेरहट लए किछु देलकै ? हँ ,बान्हि देलियै . हम जाइ हियै....., नै सुनलकै की ? सुनि गेली ,मुदा हमर मोन करै है जे आइ नै जेतै से नै हेतै ? आइ मासक अन्तिम तारीख हइ, जएह एक दिनक खोराकी के पाइ त' बढ़ि जेतै. ओना मोन त' हमरो आगू - पाछू करैहए. ई कहतै बलू त' रहि जेबै! सब दिन त' एकरा थाका हारी रहिते हइ, आ घर अबै हइ त' बाले बच्चे सोहरल. हमरा लेल एकरा पलखति कहाँ रहै हइ. ईह.....! हम की भरि दिन खटै हियै अपने पेट खातिर! हे , पेट त' सबहक कोनहुना भरिए जाइ है. ई खाली, पेटे के सोचैत दिन, मास, बरख बितबैत रहओ. हम एकर पलखतिक असरे तकैत रहि जाइ हियै. आ एकरा लेल धानि सन! एह.....! हमहू त' कहिया स' उहे बाट तकैत रहियै. हे , एने आउ ने...... केवाड़क विलइया ठक सँ उठल ! 2 संगबे अगिनवाणक फोँका जकाँ बड़बड़ा उठल रहै नेहक लावा. कुलीन रहबाक कारणे नै कोइ बजै, आ नहिये कोइ रोकि पौलकै. दिन...... दुपहरिया सौंसे गाम सोरहा भ' गेलै.....! सुरूजक ताप सन उठल ज्वारि चान उगवा धरि चाने सन सेरा गेल रहै. मुदा ता धरि छओंड़ाक शोणितक टघार....मुँह मलिन क' देने रहै.छओंड़ी अपन ओढ़नी सँ ओकर फुटल कपार के झँपने....! गामक चारू भ'र सँ सगरोक लोक जुमि गेल रहै. सब कियो बिन माँगल सलाह देब' लगलै-....! दुन्नू के गोली मारि दे....! नै, छओंड़ी के भगा के छओंड़ा अनलकौ, एकरे गाछ मे टांगि दे, गरदनि मे गमछा लगा के. पंचायतक बैठार भेलै ,फरमान सुनएल गेल.... " छओंड़ा के काटि के गाड़ि दे !" छओंड़ी विहुँसैत पुछलक - 'आ छओंड़ी के ?' माय - बाप केधमका के सुनझा दही. नै, किन्नहुँ नै. छओंड़ी तमकि उठल- " जेबै त' दुन्नू, जीबै त' दुन्नू ." 3 छुच्छ दुलार समस्त युवा युवती सँ अपील-" जाति- पाति, रंग- भेद, धर्म - कर्म सँ उपर उठि देशक सर्वांगिन विकासक लेल सोचै जाउ." की यौ......, आइ त' बुझाइ छल जे कोनो बड़का पाटीक बड़का नेता भ' गेलौं अहाँ . यै , हम समाजक सब रूढ़िक रीढ़ के तोड़ि नव समाज बनेबाक संकल्पित छी. आ ताहि मे अहाँ सनक उच्चकोटिक विचारवान महिला चाही, संग पुरवा लेल. सेआइये मात्र नै, जन्म जन्मांतर धरि. 'खाउ सप्पत....अहाँ संग देव, जीवन संगिनी बनि. ' ' हे भाषण छोरू, पुइछ आउ अपन पुरखा के, हमर जातिक लोक अहाँक जाति मे मिझ्झर हएत. ? ' वाह! ओइ छओंड़ाक नमहर- नमहर लच्छेदार शब्द आ वाक्य माइक आ मंचे पर तक रहि गेलै. केना नयना मे घुइस हृदय मे उतरै लए उताहुल छल! हमर जाति सुनि ओकर आँखिक पानि उतरि गेलै. 'नीक भेल जे हमर हीयाक हीत हिया मे बाँचल रहि गेल, अप्पन लोक लए.' " नै त' प्रेमक फाँस मे फँसा हमरो घीना छोड़ैत आ अपन बाप पुरखा के सेहो " 4 दिहलगड़ि टेंगरा, पोठी, ईचना लै जाऊ...! कोना दै छीही गै ? लू ने मालिक , जे टका दै के मोन होत से द' देबै.साँझ झलफलाइ है.फेनो घरो घुरै के है. एँ गै, तों जे दिन राति खटै छें से तोहर मरद'बा की करै छौ, कहाँ छौ ओ ? ओ घरे मे रहै है मालिक. किए गै ओ मरद छौ की तों ? मालिक ओकरा घुमै फिरै मे असोकर्ज होइ है, तें भानस भात आ बाल बच्चा उएह देखै है " मुनहारि साँझ हो गेलै हम कखनी से एकर असरा मे ओसारा पर बैसल हीयै.ई मौगी भ' दुरे दुरे जा खटै है आ हम, बाल बच्चा आ भनसाघर मे लागल रहि जाइ हियै की विधनाक लिखल है से नै जानि" ई हदियाइ किए है, मनसा आ मौगी असगर मे त' अधुरे रहै है पूर त' तहन होइ है जहन दुनू एक भ' काज पुरवै है. हम करियौ की ई करौ, बात त' बरोबरिये ने बुझौ. "आ हे , दुनू गोटे बलू सब खन घर मे रहौ की नै रहौ,एक दोसरा के हिया मे त: बसले रहै है न'. ! 5 उफाँटि ओह...! केहेन निर्मम हत्या भेलै ओकर. के केने हेतै एहेन काज ? छओंड़ी जतबे सुन्नर ततबे सुशील सेहो छलै.तहन ककरो सँ दुश्मनीयो त' नै हेतै! यै, सुन्नर आ सुशीलक संग भरल पुरल जुआन सेहो छलै. हँ से त' छलैहे. त' ककरो सँ ....रंगरभस के फेर मे भेल हेतै ! यै जहन सभ चीज सँ भरल पुरल छलैहे तहन ककरो हिया मे त' बैसिये गेल हेतै ने. नै यौ,एकक हिया मे पैसल रहितै तहन ने अ'ढ़घात सँ दोसरो जँ नजरि गड़ेने होइ ? सब टा दोष छओंड़े के किएक ? जँ छओंड़ीयो सिनेह के पीयो फेको वासन जकाँ बुझैत होइ ! पकड़ा गेलै......पुलिस पकैड़ लेलकै. ककरा यौ ? हत्यारा के! के छै ? ओकरे प्रेमी ! 6 जुड़बन्हन गेंठजोड़बा क' दियौ ....! देखब यै कनिया , एम्हर ओम्हर नै भागथि. ककरा भगै के गप्प करै छी यै, कनिया के की वर के ? मनगर त' दुनू ने. मुदा मौगी त' जाँतल मोने रहि जाइए पर मनसा....हुलकाह बुझू. किए यै, मौगी के मोन कोनो मनसा पर नै जाइ छै की, सत्ते कहू त ' ? यौ, ज' से नै होइतै त' मनसा मौगीक प्रयोजने कोन ? मनसा मनसाक संग आ मौगी मौगीक संग रहि लैतै. तहन अहीं कहू बन्हन सँ की हएत ? हँ यौ इहो बात त' सत्ते ! " नुआ , धोतीक बन्हन सँ मोन नै बन्हाइए. मोनक बन्हन लए हिया सँ हियाक मिलान चाही " 7 निंघेस
गै दइया गै दइया, कहू त' एकर सपरतिब. ई रहत केठरीक भीतर विलइया ठोकि के , आ हम रहू टुग्गर- टापर जकाँ ढेंगराइत. मनसा त' पहिने हमर , तहन ने ओकर. पहिने प्रेमालाप! तहन देहक भूख.....निवारण.कहियो ऐ सब मे असोकर्ज नै हुअ' पबै ताहि लेल दिन राति अपना के समर्पित क' रखने रही यौ, अहाँक प्रेम फाँस मे फँसि दुनू गोटेक जुड़बंधन भेल छल. .आ हम तकर निवहता आइ धरि करैत रहलौं. मुदा अहाँ....अहाँ त' स्वर्गक सुख देखा नरक मे धकेल देलहुँ. "गै, ओ हमरासँ प्रेम केलकै आ हमहु ओकरा सँ......!" तखने दुनू एक भेलियै.आ तों त' आब देह सँ पुरान भ' गेलेँ. गै दइया गै दइया, हम पुरान भ' गेलियै आ एकर देह त' नवे धएल छै. हँ गै. त' ई कहौ जे आइ दोसराक प्रेम मे अपन अछिंजल सँ ओकरा सिक्त क' रखतै.आ काल्हि फेर तेसर.फेर....कतेक दिन धरि अपन अछिंजल सँ नवकी - नवकी छओँड़ी के घोंकि- घोंकि के छोड़ैत रहतै. ' जाधरि देह मे हुव्वा रहत!' आ ओउ निँघुछल.मौगी सबहक की हेतै ? ओहो सब हमरे जकाँ नवका प्रेम जाल बुनतै.....! बाढ़ैन नै मारतै ओहोन सिनेही के.....? " बाढ़ैन मारौ की खापड़ि, डेग त' चुकि गेलै." 8 बखरा मुन्ना जी उँह........! की भेल. ? अहाँक दाढ़ी गड़ैए . हा....हा....हा !नीक चौल केलौं. पहिने त' बिन काटलो दाढ़ी नै गड़ल कहियो. आ आब.....! आब बौआ भेलै ने . " त' की, बौआ भेने हमर गाल मे काट उगि गेल की ." से नै यौ......! आ की हमरा लेल अहाँक हृदय मे पाथर समा गेल ? नै यौ, सिनेह त' आब बौओ के चाहियै ने . हँ, समय अलग - अलग हेतै . नै , हमरा अहाँक बीचक सिनेह मे सँ आब ओकरो बखरा लगतै. " हे देखियौ, अहाँक किरदानी पर ओहो मुस्कियाइए ." 9 अन्हरिया मे
हम ओकर दुनू पाँजर मे गुदगुदी लगाबी आ ओ खिलखिला उठए.....! बड़ मजगर लागए ओ क्षण, ओकरा लेल धानि सन. फुलवारीक बीच दुनू गोटे एके पाथर पर बैसी, सोझाँ सोझे नजरि मिलौने. दुनूक गप्पक पहाड़ नै ढ़हि पावए कखनो, कतौ , कहियो. मुदा ओकर ठोरक विहुँसव, आ हमर ओकर नयनक किरणक मिझ्झर हएब, नै जानि कत' हेरा दै छल दुनू के.सोच जतेक दुर धरि जए, सिनेहक ओतेक लगीचक एहसास होइत रहै छल. ई क्रम जारी रहल......! फेर आजुक गप्पक क्रम मे पुछि बैसल.....एँ यौ, हमरा सेझाँ पबिते अहाँ एना बेसुधि किए भ' जाइत छी ? अहाँक नयनक किरिण हमरा अहाँक हिरदय मे समेबाक लेल उताहुल क' दैए! अच्छा छोड़ू , कहू जे हम अपन विआह मे बजएब त' एबै ने ? " यै, आब ई त' पक्का ऐछ जे जहन दुनू गोटे एक मड़बा पर बैसब, तखने विआहल जएब." नै यौ, हमर अहाँक प्रेम लचार भ' गेल हमर मए बापक हमरा प्रति प्रेमक आगाँ.....! हमर विआह दोसरा सँ हएब निश्चित भेल ऐछ. सिनुर दानक बेर बिजली गुल भ' गेल. अन्हारे अन्हार.......की भेलै.....ठीक करू जनरेटर....! " ईजोत भेल.....वर सिनुरक तामा हाथ मे लेने ठाढ. कनिया......फरार ! 10 सेल्फी
यौ, अपन मोनक एक टा बात कह' चाहै छी , कहू ? कहू ने एत' कियो दोसर त' छै नै. हमर मोन कहैए- जेनाहमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेल ऐछ. यै हमहू फरिछाइए दी, सत्ते अहाँ हमरा हृदय मे समा गेलौं ऐछ मुदा हम अहाँ सँ प्रेम नै करै छी. बुध्दु कहीं के ! प्रेम कएल नै जाइ छै, ओ त' अपने भ' जाइ छै. यै ,जे अपने भ' जाइ छै से अनेरूआ कहाइ छै. ओकर कोनो ठौर- ठेकाना नै होइ छै. तहन दुनू गोटे एहिना रह' दियौ. " एक दोसरा क् करेज मे समएल ." 11 खोंइछक धान
गै विमला, ओम्हर के पतियानी मे हाँसू किए लगेलें. एम्हरे आ ने हमर वाम - दहिन. एके संग दुनू गोरा कटनी करब, काजो उसरत आ तोहर मुँह निहारव सेहो संगे चलत. उँह....! एत' एलैए बोइन कर' की परेम कर' ? गै, जाबे आओर बोनिहार सब एतै ता धरि ई छओंड़ा- छओंड़ी पेटक संग- संग करेजक आगि सेहो सेरा लेतै. हरज कोन ! "ई कह जे तोरा मोन मे ओ नै होइ छौ जे हमरा होइत हएत ? यौ, छओंड़ा जते उधवा उठवैए तै सँ की कम आगि छओंड़ी के लेसै छै. मुदा हम सब निमुधन ! जबले मुँह रही त' परिवार आ समाज दुनूक प्रतिष्ठा रखनिहार बुझू. हे यौ, ओ सब अवै बला है.हम अपन आँटी ल' के जाइ छी. गै, तों ज' चलि जेम' त' हमरो बोझ कहाँ पुरत. आँटिये भरि रहि जएत. हे ले........! राजू हाँय -हाँय धान मीर के ओकरा खोंइछ मे द' देलक. विमला- ऐँ ई की करै छी, हमर विआह त' भेवे नै कएल.तहन खोंइछ ? " गै , ई खोंइछक धान नै , प्रेम दै छियौ धराउख रखिहें." आ ज' हम दोसरा के भ' जेबै ? तें ने धराउख.....! " आ जे से हेतै त' हम अहिना रहि जेबै तोहर खोँइछक याद मे ! 12 दासीन
नहुएँ, नहुएँ पछिया सिहक' लागल रहै. मोन त' चान सन शीतल मुदा हृदय मे सिनेह लहक' लगलै. यै, अहाँ ठोर पर लिपिस्टिक किए लगा लै छी ? "ठोर मे नवका रंग देवा लेल ." मुदा अहाँक ठोरक वास्तविक रंग कहाँ धोखरल ऐछ एखन धरि.अहाँक ठोरक मुस्की त' कतेको ठोर त'र क' दैए. यौ वास्तविक ठोर त' एके टाक मुस्की मे मिझ्झर होइ छै. मुदा रांगल ठोर नै जानि कतेको हृदय पर पाथर जकाँ बजरैए. आ हमर हृदय त' ओहिना रहि जाइए मोम जकाँ नहुएँ नहुएँ पसिझैत अहाँक सिनेहक दासिन बनि. " दोसरा सँ की स'ख मनोरथ." 13 प्रतिक
गै , तोहर घर त' बालू के छौ, अपने भहरि के खसि पड़तौ! चुप्प, तोरो घर त' संठी के छौ, एके बिहाड़ि मे उधिया जेतौ! रंजन, बाध मे महीस आ नमिता बकरी ल' चरब' जाइ छल.कतेको चरवाहा चरवहिनीक संग इहो दुनू गोटे घोलका -माली खेलाइत रहै छल. सामा -चकेवा आ कनिया - पुतरा खेलाइत कतेको बरख धरि दुनू एक दोसराक संग झगड़ा झाँटी केलक आ फेर सहटल रहल. वयसक चढानक संग आव मिलनक चढान सेहो उपर जए लगलै.पहिने त' सबहक सोझाँ मिलान होइआ आव चोरा नुका के. " रौ रंजन आब. तोँ ककरा सँ चोरा नुकी मिलबेँ रौ !" किए गै, तोरे सँ .....! हमर त' काल्हि विआह भ' जएत. हम सासुर चलि जेबौ. आ तोँ.....? रंजन अवाक.....! की भेलौ रौ ? ' ऐँ गै, हमर सबहक मोनक महल ठीके के भहरि गेल! एतेक दिनक याद क्षणे मे विला जएत गै ?' नै रौ, चल ऐ च'र मे एक टा गाछ रोपि दै छियै.जहिया धरि लोक रहतै तहिया धरि हमर तोहर सिनेह जियैत रहतौ. ' कथी के गाछ रोपमे ? पीपर के, सब के छहरियेतै सब मोन पाड़ैत रहतौ. नै रौ चल आमक गाछ रोपि दै छियै किए गै , आमेक गाछ . किएक? रौ, जहिया फड़तै तहिया हमर तोहर रसिकताक प्रतीक दोसरो के हिया रसौतै " 14 सिनेहक धार
ऐं गै छओंड़ी, तोरा सब दिन नवका - नवका छओंड़ा संग देखै छियौ....? आंटी ओ सब हमर ब्वायफ्रेण्ड छै ! त' तोहर कोनो संगबहिना नै छौ, सब टा संग भइये छौ की ? अहाँ एना शक्क किए करै छी आंटी ! चुप्प गै लुच्ची ! " सिनेह ककरो सँ लागए त' धराउख बुझी.ई नै जे जकरे सँ नैन मिल जए, मोन बाँटि लियय. यै आंटी ,अहाँ सब बला जमाना धएल नै रहलै आब.सुनै छी जे पहिलुका लोक सबहक ( कनियो - वरक)चोरा क' मिलान होइ छलै.संतान ......दर्जन भरि ! लबरी कहीं के.....! गै, हम सब दर्जन भरि जनमाइयो के शरीर मे हुव्वा रखै छलौं.आ सब टा चिलकाक निमेरा सेहो अपने सँ करै छलौं. मुदा आवक छओंड़ा -छओंड़ीक जुआनीयो नितुआन ! शक्तिवर्द्धक दवाई, जीम आ योगा पर टिक के जीवैए. धीया - पुता भेल त' वेशी सँ वेशी दू टा ओहो पलाइए दोसरे भरोसे. यै आंटी ,लोक जनम लेलक ऐछ कमाऊ , खाऊ मौज उड़ा ऊ फेर चलि जाउ ! ' तें रंग रभस त' जरूरी छै' त' एकर मतलब भेल जे क्षणे- क्षणे किरायाक घर जकाँ घरवला सेहो बदलैत रहू.एहेन कोन प्रेम जे कतौ ककरो पर जा टिक नै पावए. यैआंटी, .....जकरा सँ मोन मिलए उएह मीत बुझू. ई काज त' उएह क' सकैए जे सिनेही ऐछ ! " तेँ मोन राखू, दुखक नोर सुखि जए त' सुख' दियौ, हृदय सँ सिनेह नै सुखल ताकए कहियो" ' 15 ऐब की बेरिया
रौ सौरभ, तोरा बड़िखन सँ देखै हियौ एने- ओने मुड़ियारी देने फिरै ही रे. किछो हेरा गेल हौ की ? दोग दोसाइने वोन झाँखुड़ मे तकने फीरै ही रे....! सौरभ अवाक्......! फेर - हँ रौ, ताकै हियै से देखाइ कहाँ कतौ हइ. की हेरा गेल हौ, कह ने त' हमहू ताकिदै हियौ. रौ सुरजा ,तोरा नै भेटतौ. तूँ हियाँ से जो. ऐँ , एहेन कोन चीज हेरएल है रौ, जे तोरा भेटतौ हमरा नै.सेहो भेटेतौ तखनी जहन हम हियाँ नै रहबै. सेआब जे होइ हमहू तोरा संग ताकिये के रहबै.दुनू गोटे मिलि तकमे त' जल्दी भेटेतौ रौ. हौअए रौ....जकरे नाम गुलाब छड़ी सएह चलि आबए. निक्की सौरभ दिस बढ़ले रहए ....सौरभ सेहो सहटल निक्की दिस दुनूक नजरि मिललै की निक्की के सोझाँ मे परि गेलै सुरजा.निक्की दुनू के मुँह लुलूअबैत पड़एल उनटे पएरे.कोनटा फड़की, दोग दोसाइने लंक ल' पड़ाइत........! सौरभ ओकरा पछुएने.....अपस्याँत! " रूक....रूक गै,आइ नहिये छोड़बौ जाबे तोरा पटा नै देबौ.तोहर ठोरक मुस्की मे अपन ठोरक मुस्की मिझ्झर क' " 16 परदा पर
हम सबहक सोझाँ सप्पत खा कहै छी.पृथ्वी अकाशक बीच अगिनक सोझाँ. आई सँ अहाँ हम्मर आ हम अहाँक भेलौं अहा.,प्रिये....! जेहने रसिकगर गप्प तेहने बनल सेट. जेना स्वर्गक आनन्द करवैए. से त' सत्ते. हमहू नै जानि कोना अहाँक करेज मे सटि सब किछु बिसैर गेलौं.ई संकोचे हेरा गेल जे हम अहाँ मंच पर छी.घर मे नै.हम अहाँ एक टा कलाकार मात्र छी सच्चौ के पति-पत्नी नै. यौ से त' ठीके. ठीके नै यै ! माने, मंचक प्रदर्शन करैत- करैत मोन नुकएल की खुजल सत्तौ के प्रदर्शन ताकय लागल ऐछ. मुदा से त' मोने भरि रहि सकैए.कल्पना करैत रहू यथार्थक खोज मे विलमल रहू. त' की हमर अहाँक प्रेम प्रदर्शन कहियो बन्न घर मे आकार नै लेत ? किन्नौ नै. "प्रेम आ कला कहियो बन्हन मे नै बन्हाइछ.लोक के देखाउ, मुदा मोन नै भरमाउ." 17 पसार....!
इह .....! चोर नहितन. कखनो एम्हर कखनो ओम्हर, हुलूक बुलूक़ करैत रहै छथि.उचक्का नहितन. की बरबराइ छी यै ? किछु नै, अहाँक उचकपनी के फरियबै छलहुँ.आब ई सब बहुत भेल छोड़ि दियय हुलूक बुलूक. जँ सत्ते सिनेही छी त' आइ एकर स्थायी निदान भ' जए. स्थायी निदान ? से कोना विआहि क'. तखन जतेक सिनेह हृदय मे उसारि राखल ऐछ, सबटा खुल्लम खुल्ला उझिल सकैछी. यै विआहो क' के लोकक प्रेमालाप लए बन्ने घर चाही. तहन विआहे किए ? प्रेमक वंशमनि पसार लए......! 18 आशीर्वाद -------------- कला आ प्रेम कहियो कखनो कोनो सीमा मे नै बन्हएल .दुनू असीम ऐछ.तहन प्रेम पर पहरा किएक ? खास क' ओहोन प्रेम जे वएसक परिपक्वताक संग सीढी चढए आ बढए.. नै किन्नौ नै, ई सर्वथा असंभव ऐछ. प्रेमक धार मे तुँ वहि गेलेँ.मुदा हम भसिए नै देबौ. ई कह जे तोरा सब सुविधा द' पढ़बा लेल छोड़लियौ की प्रेमक धार वहेवा लेल! डैडी, प्रेमक लेल कोनो सरंजामक बेगरता नै हृदयक उदारता चाही.जाहि सँ विआहक बन्हन मे बन्हा एक दोसराक नीजता के उघि सकी. अहाँ दुनू माय बेटी बताह भ' गेलौं की ? ओ जे कहत सएह हेतै.मानलौ जेओ छओंड़ा सेहो अपने जातिक छै.पढ़ल गुनल इंजिनियर छै.मुदा एकर जन्मदाता की आश्रयदाता त' हमही छी.हम जे चाहब से हेतै ! ऐं...., निम्मी भागि गेल ! अहाँ मए भ' के की करै छलौं? हम त' अहूँ के बुझौलौं आ बेटियो के.मुदा की करू मौगी त' शुरूहे सँ वेवश ऐछ पुरूखक सोझाँ. हँ, आ बेटी वेवश छल प्रेमक आगाँ ! तहन पढल आ मुर्ख मे की अन्तर . प्रेमक बेर त' दुनू बरोबरि ! ओकरा कहि देबै जे घूरि के ऐ घर मे पएर नै दिए.आशीर्वाद त' दुरक गप्प जे ओकरा लेल ई दुआरि सदा के लेल बन्न भ' गेल. "डैडी,अहाँ हमरा लेल नव दुआरि त' ओही दिन खोलि देलौं जहिया हमरा इंजिनियरी करेलौं.उएह आशीर्वाद हमर निवहताक सारथी सेहो हएत ." 19 आँचर....! ---------------- मए बापक इच्छाक विरूद्ध प्रेम मे बताह भ' घर सँ भागल बेटीक लेल - " बेटी, तों हमर धाख नै मानलेँ.मए सँ त' सीखतेँ जे ओआइयो हमर निर्णयक विरूद्ध डेग नै उठबै छथि." तों भगलें त' सदाक लेल ऐ घरक दरवज्जा बन्न बुझ, अपना लेल.बना ले नव दुनिया बसा ले नव परिवार.बिसरि जो जन्मदाता आ आश्रयदाता के. नै , हम अहाँक भोगक वौस्त नै छलहुँ, अर्द्धांगिनी छी.आ अपन पेट मे पालल धिया लेल- " बेटी तों गलत डेग त' निश्चिते उठेलेँ मुदा प्रसन्न रह जकरा जिनगीक संगी बनेले तकरा संग.मुदा कहियो जँ सब देहरि बन्न बुझाउ तइयो एक टा दुरखा अवश्य खुजल भेटतौ- मएक आँचर ." 20 उठल्लू
देखू त' केहेन उजड़ी उपटी सन भ' गेल ऐछ! प्रेम विआह सँ भेल छुट्टा छुट्टी ओकरा मौगति धरि पहुँचा देलक ऐछ. कहू त' की उमेर छै ओकर.ह मरा आगाँ त' जनमल ऐछ.देखिते देखिते जुआन भेल, प्रेम भेलै , विआह भेलै. आ, फेर छुट्टम छुट्टा! हे, देह आ मोन दुनू सँ टुटि गेल ऐछ.ओकरा परिवार समाज द्वारा सम्हारवाक प्रयास कएल जए तोड़वाक नै.आखिर नेनमति सँ जे केलक तकर सजए जिनगी भरिक लेल हम सब त' नै दियै. बड्ड खटरास करै छी अहूँ.एहेन जे कुल शील बुझिते त' अनेरूआ लोकक प्रेम जाल मे फँसिबे नै करितए.तहिया मए बाप , गौंआ समाज ज' बुझबै त' सब बुझाय ओकर दुश्मन ! त' भोग' बुझतै कोना ? हे यौ अनिल जी,हम अहाँक हृदय सँ आभारी छी.जे अहाँ टुटल समय मे जिनगी के जीवाक आ कि भोगवाक सामर्थ्य देलौं.अहाँक प्रेम हमरा आइ धरि जियौने रहल.ज' एहिना हमरा आगुओ जियाव' चाहै छी त' अंगिया क' नव जिनगी दियय.धर्म रक्षक आ जीवन रक्षक दुनू मे नाम हएत अहाँक. हे , हम परिवार आ बाल बच्चे भरल पुरल छी.तोरा जकाँ उठल्लू नै छी हम. " ध्यान रखिहें ,सेवा आ प्रेम बँटै छी हम, सोहाग नै." 21 बाट- घाट
अहा ! केहेन मनोरम दृश्य. प्रकृतिक कोरा मे हम सब, कृत्रिम कोरा मे दुनू गोटे.कहू केहेन आनन्दक क्षण ! हँ यौ, पहाड़, जंगल ताहु मे दुइ टा जुआन छओंड़ा छओंड़ीक जोड़ी.अहाँक मोन जेना उच्छश्रृंखल हेबाक प्रयास क' रहल ऐछ ! आओर अहाँक यै ? स्थिर चित, शान्त मोन प्रेरणाक मध्य टिकल. हँ यै, जिनगीक किछु क्षण ऐ तरहें बितैत....लगैए जेना जिनगीक मठोमाठ सन. हे यौ, मुदा छओंड़ी, जँ एहेन जिनगी मे देखार भ' जए त' बुझू जेना- मसोमात सन ! तहन आब अहीं कहू आगूक की विचार ? हे यौ , हमर विचार मानव ? किएक ने .कहि के त' सुनाउ. आब दुनू गोटे अपन जिनगीक यथार्थ तकबा लेल विलगि जाउ एक दोसरा सँ. आँय यै, त' अहाँ एहिना अधखर जिनगी जियव ? नै यौ, जहिया जकर गात लगबै तहिया ने.ता धरि त' सब टा अपने छी संपुर्ण.आ ओही संपुर्णताक खातिर त' अहूँ सहटलौं! त' हम ई मानि ली जे ओ सहटब क्षणिक छल. किएक ने. " अपन बाट अपने बना, मोकाम ताकू !" 22 द्वन्द -------- हे , फोन क' वेशी तंग केलौं त' आवि के गरदनि मोइक देव, बुझलियै.घरवाली छी, घरे भरिक सोचू....! हम कत' जाइ छी, की करै छी ओइ मे टांग अड़वै के कोशिश नै करू. फोन राखू. यौ सुनीत हमआब जाइ छी , बड्ड बेर भेल. एन केना जए देब. त' की करव आओर ? गप्प सरक्का ! डेढ़ बरख सँ सएह करैत एलौं.मुदा आइ पता चलल जे अहाँ सिनेही नै निर्मोही छी. से की ? एक त' अहाँ विअाहल छी , परिवारिक लोक.जे हमरा सँ नुकौलौं.दोसर जे मौगीक उपभोग मात्रक वौस्त बुझि पहिने रंग रभस फेर गरदनि मोकवाक लेल तैयार..! आ आव हमरा संग....! हे रुकू.... रुकू ने,नै रूकब त' गोली मारि देब. यै, ओइ दिन त' भागि गेलौं. तकर पछाति फोन बन्द....! की भ' गेल अहाँ के ? "हे , सुनू राति मम्मी- डैडीक चिन्हल जानल लड़िका सँ हमर विआह भ' गेल.अखन हम सब हनीमून पर निकलल छी.अखनुक पछाति फेर हमरा फोन नै करी अहाँ , से मोन राखब. " विआह अहाँक,पसिन्न मम्मी- डैडीक !" हँ यौ, कुल- परिवार त' चिन्हल जानल छै. " बाट-घाटक सिनेही त' अनेरूआ होइ छै, अनेरूआक धरम- करम के कोनो किच्छो ठौर ठेकान नै ! " 23 देह, मोन आ प्रेम सबीना आ मोहसिनक जोड़ी सौंसे जोलह टोलीमे प्रसिद्ध छल। किएक तँ मोहसिन सभ साँझ पोलिथिन पीबि कए आबए आ सबिनाकेँ खूब मारै गरियाबै। मुदा सबिना चुपचाप पाथर बनि जाए। लोककेँ आशचर्य लागै। जखन की ओकर टोलक आर मर्द-जनानी मीलि हपनामे खूब उठा-पटक, भागादौड़ी करए, हरबिर्रो मचि जाए टोल भरिमे। कहियो काल सबिना सेहो मोहसिनसँ मुँह लगा लिए आ मोहसिन भरि इच्छा कूटि दै ओकरा। बाजा-भुक्की बन्न भए जाइ दूनूमे। तखन सबिनाक बाप अबै। सबिनाक बाप बड़का मौलबी छल। सबिनाकेँ सिखाबए पढ़ाबए जे अपन अल्ला मियाँ नराज भए जाइ छथिन्ह जँ केओ मौगी अपन पतिपर हाथ छोड़ैए तँ। अब्बाक कहल बात सुनि अपन नोरकेँ नूआक खूँटमे सुखा लिए। सम्मान करए अल्ला आ कुरानकेँ। मोहसिनकेँ मुइना आइ तेसर दिन भए गेल रहै। ओ सभ दिन भोर-साँझ ओकर कब्र लग जा भेसै छल। कब्रक उपर बेना डोलबैत छल। देखहो बला लोककेँ आशचर्य लगै।एकरासँ बेसी प्रेम तँ कोनो मौगी अपन पतिकेँ नै केने हेतै। मुदा..........मुदा सत्य छल जे ओकरा मोहसिनसँ प्रेम नै रहै। ओकरा मगजमे खाली कुरान शरीफक ओ बात घुसल रहै जाहिमे कहल गेल रहै जे" साँच मुसलमान वएह अछि जे कुरानक तहरीरकेँ मानैए" आ सबिना कहियो सुनने रहए जे " जाबत धरि पतिक साराक माटि नै सुखाइत छै तावत दोसर बिआह वा परपुरुख संपर्क कुरानक नजरिये अवैध मानल जाइत अछि" आ....आब आस्ते, आस्ते मोहसिनक कब्र केर गिल्ल सारा सुखा सक्कत भेल जा रहल छलै। 24 परमेश्वर करमान लागल लोकक बीच पंचैती शुरू भेल। पहिल पुरुष पंच----- अइ छौंड़ा-छौंड़ीकेँ तँ भकसी झोंका कए मारि दिअ। छोड़ू नै। इ प्रेमक नामपर सगरो समाजकेँ कलंकित केलक अछि। दोसर पुरुष पंच----- नै एकरा ऐ पड़ौआ छौंड़ासँ मुक्ति दिआ बिआहि दिऔ कोनो लुल्ह,नाङर,घेघाह वा कनाहसँ अपन कुकर्मक सजाए एतै भोगि लेत इ। मौगी पंच----ऐ उढ़री-ढ़ररीसँ कोन गामक लोक बिआह करत? एकरा तँ तरहड़ा खूनि गाड़ि दिऔ। एहि घोंघाउजक बीच छौंडीक कुहरल आवाज आएल----- हम अहाँ सभहँक पएर पकड़ै छी। हम उढ़री नै छी। हम एकरासँ प्रेम करै छी। हमरा जे चाही से सजाए दिअ। मुदा हमरा सभकेँ जिनगी दिअ। आ चोट्टे मुखिया जी छौड़ी माएकेँ बजा कहलखिन्ह------ लिअ एकरा झोंट पकड़ि लए जाउ आ बान्हि राखू। तखने सभ पंच समवेत स्वरे बाजल---- मुखिया जी अपने तँ परमेश्वर छिऐ तखन फेर एकर सजाए-----बास एतबे। मुखिया जी बजलाह--- नेतृत्वक काज छै जे जँ कतौ पसाही लागल देखए तँ ओहिमे पानि ढ़ारि दै नै की घी। 25 जिया जरए सगर राति अहा.....मूहँ तँ लगै जेना चाने हो आ आँखि तँ बुझू जे मृगनयनी सन। कने मूड़ी तँ उठाउ। एक बेर नजरि मिला कए तँ देखिऔ। आँ...... एहन झटका तँ बिजुरियोसँ नै लागल छल। कोनो बात नै बिआहक पछाति पहिल राति एहने संवेदनशील होइत छै। हे यै....की भेल। एना आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार किएक ? हमरासँ कोनो गलती भेल की। नै गलती तँ हमरासँ भेल जे अपन गलतीक सजा अहाँकेँ दए देलहुँ। केहन गलती आ केहन सजाए ? किशोरी होइतहिं हम यौवनक मधुमासमे डुब्बी लगेबाक सोचि उतरए लगलहुँ। अमीरीमे पोसाइत, जुआनीकेँ पबिते मोन बान्ह-सिकड़ीकेँ तोड़ि बहार हेबाक लेल औनाए लागल छल। हम कइए की सकैत छलहुँ। किशोर वयमे भटकबाक एकमात्र कारण छल- ई भरल-पुरल देह जे जौबनकेँ चरम पर जा टिकल छल। जकरा अमीरी आ जुआनीकेँ बीचसँ निकलल संक्रमण घेर लेलक। बिआहो तँ अहाँ संग वएह सभ करेलक जे हमर बाँचल संपतिक पहिल उपभोग केने छल। हमर माए-बाप अपन बेटे जकाँ बुझि सभ सुख-सुविधासँ पूर्णछुट्टा छोडि देलनि। कारण जे माए-बापक एक मात्र संतान रही हम। यै, हम बड्ड उम्मेदसँ आजुक रातिक प्रतीक्षा करैत रही। हमरा सोंझा उपस्थित कएल गेल बहुत रास कथा स्थगित भए गेल छल। कारण छल हमर सोच-- जे हम शहरुआ छोंड़ीक लिव-इन-रिलेशनशिपकेँ फैसन वालीकेँ अपनासँ दूर राखए चाहैत छी। यौ, हमर बिआह भए गेल। हमर कुमारिक पद छुटि गेल। मुदा हम अहाँक जिनगी खराप नै करए चाहैत छी। हमर मौगी जाति असवी होइत अछि। मुदा किछु वर्ख पहिने लागल एड्सक बेमारी हमर जिनगीक सीमा देखा देलक अछि। सत्ये बेमारीक कोनो विश्वास नै, मुदा अहाँ एकटा रोगी मात्र नै अहाँ तँ चरित्रहीनसँ बेसी किछु नै देखाइ छी हमरा। जँ एतेक निष्ठावान छी जे अपन रोग हमरामे नै देखए चाहैत छी तँ अपन मूँह पर पोतल करिखासँ हमर मोन जिनगी स्याह किएक केलहुँ ? यौ, ऐ समाजक परंपरा निमाहैत लोक-लाज आ अपन रक्षार्थ पुरुषक गात लागब आवश्यक बुझलहुँ। बस। बाहर रौदक धाह देखाएल। मुदा मोनमे अन्हारे-अन्हार पसरि गेल छल। उजासक बाट सेहो अन्हराएल। 26 साढ़े एकैसम सदी हेलो..... हाय। की हाल छै ? फाइन। ई कोनो एबाक समय छै। डेढ़ घंटा लेटसँ । खिसिया किए गेलहुँ। रस्तामे सौरभ भेटि गेल। सटि गेल हमरासँ । कहू हब भागि जैतहुँ । केहन एक्सपिरिएन्स गेन करैत ओ। मुदा अहूँ तँ समय पर नहिए आएल हएब। हँ रियाकेँ गोल्डेन पार्कमे तते ने मोन लगै छै जे घेंटा-जोड़ी कए लेने छल। छोड़िते नै छल। जखन रियासँ एते घेंटा-जोड़ी अछि तखन हमर कोन काज ? अहाँसँ नीक सौरभे जे हमर बाट जोहैए। ओ नामरद अछि की जे अहीं टाक बाट जोहैए। हम जाइ छी। कत' सौरभ लग। कथी लेल। इन्ज्याय करबा लेल।३ हेलो जुगनू कत' छी। बुढ़बा गाइड लग। की करै छी। हर्षक संग छलौहें की। आब फ्री छी। आबि जाउ हमरा लग। कतए छी अहाँ ? डीयर पार्कमे। आबै छी। तँ करू प्रतीक्षा जुगनू केर हम चलै छी। खिसिआइ छि किए। आब की केकरो पर आश्रित छै। एक जँ केलक मना तँ दोसर तैयार छै। आब बिआह तँ केकरोसँ कतौ क' लैए। मुदा भोगैए केओ, कतौ केकरो दोसराकेँ। पहिने प्रथा चल घर बदलबाकेँ मुदा आब तँ घरवला बदलबाक परंपरा छै। विदेह अंक-७८मे प्रकाशित 27 भूख सतबरतीक मोहर अपना उपर लगेबाक लेल नै जानि कतेको सासु आ माएकेँ आरोपित केलक। एतेक धरि जे कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक। ओकरा पर शंका तँ भरि गौंआ करै मुदा ओहि मौगीक छुटल मूँहक सोंझा सभ अपन-अपन मूँह बन्द राखए। असलमे ओकर घरबला सेनाक नौकरीमे छल। छुट्टीक कमी। ताहि पर ओ मौगी गजबकेँ सुन्दर रहै। तँए ओ गामे नै अनगौंआक नजरिमे आबि गेल रहै। एक दिन गाम भरिक मौगी सभ ओकरा बैसार क' क' कूब ज्ञान देलक। ओ मौगी खूब आक्रोशित स्वरें बाजल---ऐ गामक कोन घरक बेटी-पुतोहु हाट-बजार आ मेला ज क' नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ कहियो अपन घरसँ बहरा क' दूरो पर नै जाइ छी। आब केओ पाहुन-परक एतै तँ हम ओकरा कोना क' भगा देबै। यै कनियाँ, नै बरदास भेल तँए मूहँ खोलै छी। पाहुन-परककेँ नै भगा देबै मुदा ओकरा संग करै बला रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकै छी ने। देखिऔ सभहँक बेटी-पुतोहु अपन सासु-माए केर संग जा कतौ घुमैए आ फेर चलि अबैए। केकरो किछु भेलैए आइ धरि। अहाँ तँ घरेमे रहि पेट क' लेलहुँ अछि। घरबला जे अगिला मासमे आएत तकरे लेल ई रखने छिऐ ई अनजनुआ चिलका। बुझा ने देथुन्ह ईएह सभ। हम तँ फोन पर फोन कए हारि गेलहुँ। नौकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जबानी की धराउ राखल छैओ तँ आबि घुरि जेतै फेर दिया-बातीमे एबाक बचन द' क'। ऐ बीचमे हमरा जखन मोन हएत संग रहबाक तकर कोन बाट हेतै। अहिना कुहरि क' मरबै की आ कि एकरा शांतिक लेल दोसर बाट तकबै हम। भूख लगला पर भोजन चाही खाली बचन नै। आ सभा खत्म भ' गेल छल। २ आशीष अनचिन्हारक गजल अइ संसारकेँ अनकासँ मतलब आ हमरा छलै अपनासँ मतलब पूल बनाउ नदी महानदीपर कातक धारकेँ लचकासँ मतलब भेटै आशीर्वाद या कि सराप छै भगताकेँ देवतासँ मतलब भूआ पसरल जमीनपर तैयो सिंगरहारकेँ खसबासँ मतलब जकरा लग कियो नै अनचिन्हार अनचिन्हारकेँ तकरासँ मतलब सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।सुझाव सादर आमंत्रित अछि। ३ नागेश कुमार प्रेषित आशुतोष- श्रीरामचरितमानस श्रीहरिरू श्रीरामचरितमानसक विषय क्रम मंगलाचरण। गुरु दृ वन्दना। ब्राम्हण दृ संत दृ वन्दना । खल दृ वन्दना । संत दृ असंत दृ वंदना । रामरूपसँ जीमात्रक वन्दना । तुलसीदासजीक दीनता आओर रामभक्तमयि कविताक महिमा । कवि दृ वन्दना । वाल्मीकिए वेदए ब्रम्हाए देवताए शिवए पार्वती आदिक वन्दना । श्रीसीताराम दृ धाम दृ परिकर दृ वन्दना । श्रीनाम दृ वन्दना आओर नाम महिमा । श्रीरामगुण आओर श्रीरामचरितक महिमा । मानसनिर्माणक तिथि । मानसक रुप आओर माहात्म्य । याज्ञवल्क्य दृ भरद्वाज दृ संवाद आ प्रयाग दृ माहात्म्य । सतीक भ्रमए श्रीरामजीक ऐश्वर्य आओर सतीक खेद । शिवजीद्वारा सतीक त्यागए शिवजीक समाधि । सतीक दक्ष दृ यज्ञमे जायब । पतिकेँ अपमानसँ दुरूखी भय सतीक योगाग्निसँ दहनए दक्ष दृ यज्ञ दृ विध्वंस । पार्वतीक जन्म आओर तपस्याए श्रीरामजीक शिवजीसँ विवाहकेँ लेल अनुरोध । सप्तर्षिलोकनिक परीक्षामे पार्वतीजीक महत्व । कामदेवक देवकार्यमे जायब आओर भस्म होयब । रतिकेँ वरदान । देवतालोकनिक शिवजीसँ बिवाहक लेल प्रार्थना करबए सप्तर्षिलोकनिक पार्वती लग जायबए शिवजीक विचित्र बराति आओर विवाहक तैयारी । शिवजीक विवीह ष शिव दृ पार्वती दृ संवादए अवतारकेँ हेतु । नारदक अभिमान आओर मायाक प्रभाव । विश्वमोहिनि स्वयंवरए शिवगणसभकेँ आ भगवानकेँ शाप आओर नारदक मोह दृ भंग । मनु दृ शतरुपा दृ तप एवं वरदान । प्रतापभानुक कथा । रावणादिक जन्मए तपस्या आओर हुनक ऐश्वर्य आ अत्यातार । पृथ्वी आओर देवतादिक करुण पुकार । भगवानक वरदान । राजा दशरथक पुत्रेष्टि यज्ञण् रानीसभकेँ गर्भवती होयब । श्रीभगवानक प्राकट्य आओर बाललीलाक आनन्द । विशवामित्रक राजा दशरथसँ राम दृ लक्ष्मणकेँ माँगब । विशवामित्र दृ यज्ञक रक्षा । अहलेया उद्धार । श्रीराम दृ लक्ष्मणसहित विशवामित्रक जनकपुरमे प्रवेश । श्रीराम दृ लक्ष्मणकेँ देखिकय जनकजीक प्रेम दृ मुग्धता । श्रीराम दृ लक्ष्मणक जनकपुर दृ निरीक्षण । पुष्पवाटिका दृ निरीक्षणए सीताजीक प्रथम दर्शनए श्रीसीतारामजीक परस्पर दर्शनए । श्रीसीताजीक पार्वती पूजन एवं वरदानप्राप्ति आ राम . लक्ष्मण संवाद । श्रीराम दृ लक्ष्मणसहित विश्वामित्रक यज्ञशालामे प्रवेश । श्रीसीताजीक यज्ञशालामे प्रवेश । बन्दीजनसभद्वारा जनकप्रतिज्ञाक घोषणा । राजासभसँ धनुष नहि उठब ए जनकक निराशाजनक वाणी । श्रीलक्ष्मणजीक क्रोध । धनुषभंग । जयमाल पहिरायब । श्रीराम दृ लक्ष्मण आओर परशुराम दृ संवाद । दसरथजी लग जनकजीक दूत भेजबए अयोध्यासँ बरातिक प्रस्थान । बरातिक जनकपुरमे आगमन आओर स्वागतादि । श्रीसीता . राम . विवाह । बरातिक अयोध्या लौटब आओर अयोध्यामे अनन्द । श्रीरामचरित सुनब दृ गायबक महिमा । अयोध्याकाण्ड मंगलाचरण । रामराज्याभिषेकक तैयारिए देवतालोकनिक व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसँ हुनक प्रार्थना । सरस्वतीक मन्थराक बुद्धि फेरब । कैकैयीक कोपभवनमे जायब । दशरथ दृ कैकेयी दृ संवाद आओर दशरथ दृ शोकए सुमन्त्रक महलमे जायब आओर ओतयसँ लौटकय श्रीरामजीकेँ महलमे भेजब । श्रीराम दृ कैकेयी दृ संवाद । श्रीराम दृ दशरथ दृ संवादए अवधवासिलोकनिक विषादए कैकेयीकेँ समझायब । श्रीराम दृ कौसल्या दृ संवाद । श्रीसीता दृ राम संवाद । श्रीराम दृ कौसल्या दृ सीता संवाद । श्रीराम दृ लक्ष्मण दृ संवाद । श्रीलक्ष्मण दृ सुमित्रा दृ संवाद । श्रीरामजीए लक्ष्मणजीए सीताजीक महाराज दशरथ लग विदा माँगय जायबए दशरथजीक सीताजीकेँ समझायब । श्रीराम दृ सीता दृ लक्ष्मणक वनगमन आओर नगर दृ निवासिलोकनिकेँ सूतल छोडिकय आगू बढब । श्रीरामक श्रृंगवेरपुर पहुँचबए निषाद द्वारा सेवा । लक्ष्मण दृ निषाद दृ संवादए श्रीराम दृ सीतासँ सुमन्त्रक संवादए सुमन्त्रक लौटब । केवटक प्रेम आओऱ गंगा पार जायब । प्रयाग पहुँचबए श्रीराम दृ भरद्वाज दृ संवादए यमुनातीरनिवसिलोकनिक प्रेम । तापस दृ प्रकरण । यमुनाकेँ प्रणामए वनवासिलोकनिक प्रेम । श्रीराम दृ वाल्मीकि दृ संवाद । चित्रकूटमे निवासए कोल दृ भीलसभक द्वारा सेवा । सुमन्त्रक अयोध्याकेँ लौटब आओर सर्वत्र शोक देखब । दशरथ दृ सुमनत्र दृ संवादए दशरथ मरण । मुनि वसिष्ठक भरतजीकेँ बजाबय लेल दूत भेजब । श्रीभरत दृ शत्रुध्नक आगमन आओऱ शोक । भरत दृ कौसल्या दृ संवाद आओर दशरथजीक अन्त्येष्टि क्रिया । वसिष्ठ दृ भरत दृ संवादए श्रीरामजीकेँ लयबाक लेल चित्रकूट जयबाक तैयारि । अयोध्यावासिसभसहित श्रीभरत दृ शत्रुध्न आदिक वनगमन । निषादक शंका आओऱ सावधानि । भरत दृ निषाद दृ मिलन आओर संवाद एवं भरतजीक आ नगरनिवासिसभक प्रेम । भरतजीक प्रयाग जायब आओर भरत दृ भरद्वाज दृ संवाद । भरद्वाजद्वारा भरतक सत्कार । इन्द्र दृ बृहस्पति दृ संवाद । भरतजी चित्रकूटकेँ मार्गमे । श्रीसीताजीक स्वप्नए श्रीरामजीकेँ कोल दृ किरातसभकेँद्वारा भरतजीक आगमनक सूचनाए रामजीक शोकए लक्ष्मणजीक क्रोध । श्रीरामजीक लक्ष्मणजीकेँ समझायब एवं भरतजीक महिमा कहब । भरतजीक मन्दाकिनी दृ स्नानए चित्रकूटमे पहुँचबए भरतादि सभलोकनिक परस्पर मिलापए पिताक शोक आओऱ श्राद्ध । वनवालसलोकनिद्वारा भरतजीक मण्डलीक सत्कारए कैकेयीक पश्चाताप । श्रीवसीष्ठजीक भाषण ण् श्रीराम दृ भरतादिक संवाद । जनकजीक पहुँचबए कोल दृ किरातादिक भेंटए सभलोकनिक परस्पर मिलाप । कौसल्या दृ सुनयना दृ संवादए श्रीसीतजीक शील । जनक दृ सुनयना संवादए भरतजीक महिमा । जनक दृ वसिष्ठादि दृ संवादए इन्द्रक चिन्ताए सरस्वतीक इन्द्रकेँ समझायब । श्रीराम दृ भरत दृ संवाद । भरतजीक तीर्थ दृ जल दृ ल्थापन आ चित्रकूटभ्रमण । श्रीराम दृ भरत दृ संवादए पादुका दृ प्रदानए भरतजीक विदाई । भरतजीक अयोध्या लौटबए भरतजीद्वारा पादुकाक स्थापनए नन्दिग्राममे निवास आओर श्रीभरतजीक चरित्र दृ श्रवणक महिमा । अरण्यकाण्ड मंगलाचरण । जयंतक कुटिलता आओर फलप्राप्ति । अत्रि.मिलन एवं स्तुति । श्रीसीता.अनसूया.मिलन आओर श्रीसीताजीकेँ अनसूयाजीक पातिव्रतधर्म कहब । श्रीरामजीक आगू प्रस्थानए विराध.वध आओर शरभङ्.प्रसंग । राक्षस.वधक प्रतिज्ञा करब । सुतीक्ष्णजीक प्रेमए अगस्त्य.मिलनए अगस्त्य.संवादए रामक दण्डक.वन.प्रवेश आओर जटायु मिलन । पञ्चवटी.निवास आओर श्रीराम.लक्ष्मण.संवाद । शूर्पणखाक कथाए शूर्पणखाक खर.दूषण लग जायब आओऱ खा.दूषणादिक वध । शूर्पणखाक रावणकेँ निकट जायबए श्रीसीताजीक अग्नि प्रवेश आओर माया सीता । मारीचप्रसंग आओर स्वर्ण.मृगरूपमे मारीचक मारल जायब । श्रीसीताहरण आओर श्रीसीता.विलाप । जटायु.रावण.युद्ध । श्रीरामजीक विलापए जटायुक प्रसंग । कबन्ध.उद्धार । शबरीपर कृपाए नवधा भक्ति.उपदेश आओर पम्पासर दिसि प्रस्थान । नारद.राम.संवाद । संतलोकनिक लक्षण आओर सत्संग.भजनक लेल प्रेरणा । किष्किन्धाकाण्ड यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक प्रभुताकेँ सभ अहिना ;अकथनीयद्ध बूझैत छथि तथापि बिनु कहल कियो नहि रहल । एहिमे वेद एहन कारण बतयने अछि कि भजनक प्रभाव बहुत तरहेँ कहल गेल अछि । ;अर्थात भगवानक महिमाक पूर्ण वर्णन तँ कियो कय नहि सकत य परन्तु जकरासँ जतबा भय सकय ततबा भगवानक गुणगान करबाक चाही । किएकतँ भगवानक यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक प्रभुताकेँ सभ अहिना ;अकथनीयद्ध बूझैत छथि तथापि बिनु कहल कियो नहि रहल । एहिमे वेद एहन कारण बतयने अछि कि भजनक प्रभाव बहुत तरहेँ कहल गेल अछि । ;अर्थात भगवानक महिमाक पूर्ण वर्णन तँ कियो कय नहि सकत परन्तु जकरासँ जतबा भय सकय ततबा भगवानक गुणगान करबाक चाही । किएकतँ भगवानक गुणगानरूपि भजनक प्रभाव अजीब अछि ओकर नाना प्रकारसँ शास्त्रसभमे वर्णन अछि । कनेको भगवानक भजन मनुष्यकेँ सहजेँ भवसागरसँ तारि दैत अछिद्ध ।।1।। बालकाण्ड अक्षरक , अर्थसमूहक, रसक, छन्दक आओर मंगलकेॅ करनिहार सरस्वतीजी आओर गणेशजीकेॅ हम वन्दना करैत छी ।। 1 ।। ं श्रद्वा आओर विश्वासक स्वरुप श्रीपार्वतीजी आओर श्री शंकरजीक हम वंदना करैत छी, जनिक बिनु सिद्व जन अपन अंतःकरणमे स्थित ईश्वरकेॅ नहि देखि सकैछ ।। 2 ।। ज्ञानमय, नित्य, शंकररूप गुरुक हम वंदना करैत छी, जनिक आश्रित भेलेसॅ टेढ चान ;सेहोद्ध सर्वत्र वन्दित होईछ ।। 3 ।। श्रीसीतारामजीक गुणसमूहरूपि पवित्र वन मे विहार करयवाला , विशुद्व विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर श्रीवाल्मीकिजी आओर कपीश्वर श्रीहनुमानजीक हम वन्दना करैत छी।। 4 ।। उद्भव , स्थित ;पालनद्ध आओर संहार करयवाली , क्लेशकेॅ हरयवाली आ संपूर्ण कल्याणकेॅ करयवाली श्रीरामचन्द्रजीक प्रियतमा श्रीसीताजीकेॅ हम नमन करैत छी ।। 5 ।। जनिक मायाक वशीभूत सम्पूर्ण विश्व , व्रम्हादि देवता आओर असुर छथि , जनिक सत्तासॅ रस्सीमे सर्पक भ्रमक भाॅति ई सकल दृश्य - जगत् सते् बुझना जाईत अछि आओर जिनक केवल चरणे भवसागरसॅ तरक इच्छावालाक लेल एकमात्र नौका अछि, ताहि समस्त कारणसॅ पर ; सभ कारणक कारण आओर सभसॅ श्रेष्ठ द्ध राम कहावयवाला भगवान हरिक हम वन्दना करैत छी ।। 6 ।। अनेक पुराण, वेद आओर ; तन्त्रद्ध शस्त्रसॅ सम्मत जे रामायणमे वर्णित अछि आओर किछु अन्यत्रोसॅ उपलव्ध कथाकेॅ तुलसीदास अपन अन्तःकरणक सुखकलेल अत्यंत मनोहर भाषा रचनामे विस्त्रृत करैत अछि ।। 7 ।। जिनक स्मरण करयसॅ सभ कार्य सिद्व होईत अछि जे सभक स्वाामी आओर सुन्नर हाथीक मुखबाला छथि , वएह बुद्विक राशि आओर शुभ गुणसभक धाम ;श्रीगणेशजीद्ध हमरा पर क्रिपा करथि जनिक क्रिपासॅ बौका बड नीक बाजयवाला भय जाईत अछि आओर नांगर - लुल्ह दुर्गम पहाडपर चढि जाईत अछि , ओ कलयुगक सबटा पापसमूहकेॅ जरा देवयवाला दयालु ;भगवान द्ध हमरापर द्रवित होईथ दया करथि ।। 2 ।। ्र जे नील कमलक भॅाति श्यामवर्ण छथि, पूर्ण फुलायल लाल कमलक भाॅति जिनक नेत्र छन्हि आओर जे सदा क्षीरसागरमे शयन करैत छथि से भगवान ; नारायणद्ध हमरा हृदयमे निवास करैथ ।। 3 ।। जिनक कुंदक पुष्प आओर चानक समान ;गौरद्ध देह अछि , जे पार्वतीजीक प्रियतम आओर दयाक धाम छथि , आओर जिनक दीनसभपर स्नेह अछि , ओ कामदेवकेॅ मर्दन करयवाला ; शंकरजी द्ध हमरापर कृपा करथि ।। 4 ।। हम ओहि गुरू महाराजकेॅ चरणकमलक वन्दना करैत छी, जे कृपाकेॅ समुद्र आओर नररूपमे श्रीहरिये छथि आओर जनिक वचन महामोहरूपि घन अन्हारकेॅ नाश करबाक लेल सूर्य - किरणसभक समूह अछि ।। 5 ।। हम गुरूमहाराजकेॅ चरणकमलक रजक वन्दना करैत छी, जे सुरुचि ।सुन्नर स्वाद।, सुगंध तथा अनुरागरूपि रससॅ पूर्ण अछि ; ओ अमर मूलक द्धसंजीवनी जडी । सुन्नर चूर्ण अछि, जे सम्पूर्ण भवरोगक परिवारकेॅ नाश करयवाला अछि ।। 1 ।। ओ सुकृति ; पुण्यवान ्र पुरूष द्ध रूपि शिवजीक देहपर सुशोभित निर्मल विभूति अछि आओर सुन्नर कल्याण आओर आनंदक जननी अछि , भक्तकेॅ मनरूपि सुन्नर दर्पणक मैलकेॅ फराक करनिहार आओर तिलक करयसॅ गुणसभक समूहकेॅ वशमे करनिहार अछि ।। 2 ।। श्रीगुरूमहाराजक चरण - नखक ज्योति मणिसभक प्रकाशक ;इजोतकद्ध समान अछि, जकर स्मरण करितहि हृदयमे दिव्य दृष्टि उत्पन्न भय जाइत अछि ओ इजोत अज्ञानरूपि अन्हारकेॅ नाश करयवाला अछि ; ओ जकर हृदयमे आबि जाईत अछि, तकरे बड भाग्य अछि ।। 3 ।। ओहिकेॅ हृदयमे अबिते हृदयक निर्मल नेत्र खूलि जाईत अछि आओर संसाररूपि रात्रिकेॅ दोष - दुःख मेटाय जाईत अछि आ श्रीरामचरित्ररूपि मणि आओर माणिक्य, गुप्त आओर प्रकट जतय जे जाहि खानमे अछि, सबटा देखाय लागैत अछि - ।। 4 ।। जेना सिद्व जनकेॅ नेत्रसभमे लगाकय साधक, सिद्व आओर सुजान पर्वतसभ, वनसभ आओर प्रिथ्वीकेॅ तौरमे कौतुकेसॅ बहुत - रासि खानसभ देखैत छथि ।। 1 ।। श्रीगुरूमहाराजक चरणक रज कोमल आओर सुन्नर नयनाम्रित-अंजन अछि, जे नेत्रक दोषसभकेॅ नाश करयवाला अछि । ताहि अंजनसॅ विवेकरूपि नेत्रसभकेॅ निर्मल कय हम संसाररूपि बन्धनसॅ छोडावयवाला श्रीरामचरित्रक वर्णन करैत छी ।। 1 ।। सर्वप्रथम प्रिथ्वीक देवता ब्राम्हण लोकनिक चरणक वन्दना करैत छी, जे अज्ञानसॅ उत्पन्न सबटा संदेहक हरनिहार छथि । तखन सभ गुणक खान संत - समाजकेॅ प्रेमसहित सुन्नर वाणीसॅ प्रणाम करैत छी ।। 2 ।। संतसभक चरित्र कपासक चरित्रक ;जीवनकद्ध भाॅति शुभ अछि, जकर फल नीरस,विशद आओर गुणमय होइत अछि । ;कपासक द्ध डोडी नीरस होइत अछि, संत - चरित्रमे सेहो विषयासक्ति नहि अछि, ताहिसॅ ओ सेहो नीरस अछि; कपास उज्वल होइत अछि, संतक हृदय सेहो अज्ञान आओर पापरूपि अन्हारसॅ रहित होइत अछि, एहि लेल ओ विशद अछि, आओर कपासमे गुण ;तनुद्ध होइत अछि, एहि तरहेॅ संतक चरित्र सेहो सदगुणसभक भण्डार होइत अछि, एहि लेल ओ गुणमय अछि । जेनाॅ कपासक धागा सूईक काएल छेदमे अपन तन दय झाॅपि दैत अछि, अथवा कपास जेनाॅ तूनय गेलासॅ, काटय गेलासॅ आओर बूनय गेलासॅ कष्टो सहिकय वस्त्रक रूपमे परिणत भय दोसराकेॅ गोपनीय स्थानसभकेॅ झाॅपति अछि तहिना। संत स्वयं दुःख सहिकय दोसरकेॅ छेदसभ ; दोषसभद्ध केॅ झाॅपति अछि, जाहि कारणे ओ जगत ्रमे वन्दनीय यश प्राप्त कयने अछि ।। 3 ।। संतसभक समाज आनन्द आओर कल्याणमय अछि, जे जगतमे चलैत - फिरैत तीर्थराज ;प्रयागद्ध अछि ं जतय ;ओहि संतसमाजसभक प्रयागराजमे द्ध रामभक्तिरूपि गंगाजीक धारा अछि आओर व्रम्हविचारक प्रचार सरस्वतीजी छथि ।। 4 ।। विधि आओर निष्ेाध ; ई क रु आओर ई नहि क रु द्ध रुपि कर्मसभक कथा कलयुगक पापसभक हरन्हिहार सूर्यतनया यमुनाजी छथि आओर भगवान विष्णु आओर शंकरजीक कथासभ त्रिवेनीरूपसॅ सुशोभित अछि जे सुनितहि सभ आनंद आओर कल्यााणसभक देनन्हिहार छथि ।। 5 ।। ।ताहि संतसमाजरूपि प्रयागमे। अपन धर्ममे जे अटल विश्वास अछि से अक्षयवट अछि, आओर शुभकर्मे ओहि तीर्थराजक समाज ।परिवार। अछि ओ ।संतसमाजरूपि प्रयागराज। सभ देश सभमे सभ समय सभकेॅ सहजहिमे प्राप्त भय सकैत अछि आओर आदरपूर्वक सेवन कयलासॅ क्लेशसभकेॅ नष्ट करयवाला अछि ।। 6 ।। ओ तीर्थराज अलोकिक आओर अकथनीय अछि, आ शीघ्र फल देवयवाला अछि; ओकर प्रभाव प्रत्यक्ष अछि ।। 7 ।। जे मनुष्य एहि संत - समाजरूपि तीरथराजक प्रभाव प्रसन्न मनसॅ सुनैत आओर बुझैत छथि आओर फेर अत्यंत प्रेमपुर्वक एहिमे डुब्बी लगावैत छथि , ओ एहि देहकेॅ रहितहि धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष - चारूटा फल पाबि जाइत छथि ।। 2 ।। एहि तीरथराजमे स्नानक फल तत्कंल एना प्रतीत होइत अछि कि कौआसभ कोईली बनि जाइत अछि आओर बगुलासभ हंस । ई सुनिकय कियो आश्चर्य नहि करय , किएक तॅ सत्संगक महिमा नुकायल नहि अछि ।। 1 ।। वाल्मीकिजी, नारदजी आओर अगस्त्यजी अपन - अपन मुखसॅ अपन होनि ;जीवनक वृत्तान्तद्ध कहने छथि । जलमे रहन्हिहार, थलपर चलन्हिहार आओर अकाशमे विचरयवाला नाना प्रकारक जड - चेतन जतेक जीव एहि जगतमे छथि ।। 2 ।। ताहिमेसॅ जे जाहि समय जतय कतहु जाहि कोनो जतनसॅ बुद्वि, कीर्ति,सद्गति, विभूति ;ऐश्वर्यद्ध आओर भलाई पओने छथि , से सभ सत्संगेक प्रभाव बुझबाक चाही। वेदसभमे आओर लोकमे एहि प्राप्तिक दोसर कोनो उपाय नहि अछि ।। 3 ।। सत्संगक बिनु विवेक नहि होइछ आओर श्रीरामजीक कृपाक बिनु ओ सत्संग सुलभ नहि । सत्संगति आनंद आओर कल्याणक जैड अछि। सत्संगक सिद्विये ;प्राप्तियेद्ध फल अछि आओर सभ साधन त‘ फूल अछि ।। 4 ।। दुष्टो सतसंगति पाविकय सुधरि जाइत अछि , जेनाॅ पारसक स्पर्शसॅ लोहा सोहाय जाइत अछि ।सुन्नर सोना बनि जाइत अछि . किन्तु दैवयोगसॅ यदि कहियो सज्जन कुसंगतमे पडि जाइत छथि, त’ ओ ओतहुं साॅपक मणिकेॅ समान अपन गुणेक अनुसरण करैत छथि ।अर्थात जाहि तरहेॅ साॅपक संसर्ग पाबियोकय मणि ओहिक विषकेॅ ग्रहण नहि करैछ आ अपन सहज गुण प्रकाशकेॅ नहि छोडैत अछि, तहिना साधु पुरूख दुष्टोक संगमे रहियोकय दसेसरकेॅ प्रकाशे दैत छथि, दुष्टसभक प्रभव हिनकापर नहि पडैछ। ।। 5 ।। ब्रम्हा, विष्णु, शिव,कवि आओर पण्डित सभक वाणी सेहो संत महिमाक वर्णन करबामे सकुचाय छथि ; ओ हमरासॅ कोना नहि कहल जायत अछि, जेनाॅ साग - तरकारी बेचयवाला बुतय मणिक गुणसमूह नहि कहल जा सकैछ ।। 6 ।। हम संतसभकेॅ प्रणाम करैत छी, जनिक चित्तमे समता छन्हि, जनिक ने कियो मित्र अछि आओर ने शत्रु! जेनाॅ आंजुरमे राखलगेल सुन्नर फूल ;जाहि हाथसॅ फूल टूटल आओर जाहि हाथमे राखल गेल ताहि। दुनू हाथकेॅ समानरूपेॅ सुगंधित करैछ द्ध ताहि प्रकारेॅ संत शत्रु आओर मित्र दुनुक समानरूपेॅ कल्याण करैत छथि। ।। 3 ।क। ।। संत सरल हृदय आओर जगत्क हितकारि होइत छथि , हुनक एहन स्वभाव आओर स्नेहकेॅ जानिकय हम विनय करैत छी, हमर एहि बाल - विनयकेॅ सुनिकय कृपा करि श्रीरामजीक चरणमे हमरा प्रीति दियह ।। 3 । ख । ।। आब हम साॅच भावसॅ दुष्टसभकेॅ प्रणाम करैत छी, जे बिनु प्रयोजनेॅ, अपन हित करयबालाक हेतु सेहो प्रतिकूल आचरण करैत छथि । दोसरक हितक हानिय जिनक दृष्टिमे लाभ अछि, जकरा दोसरकेॅ उजडयमे हर्ष आओर बसयमे विषाद होइत अछि ।। 1 ।। जे हरि आओर हरक यशरूपि र्र्पूिणमाक चानक हेतु राहुक समान ;अर्थात जतय कतहु भगवान् विष्णु वा शंकरकेॅ यशक वर्णन होइत अछि, ताहिमे ओ बाधा दइत अछिद्ध आओर दोसर सभक निंदा करबामे सहस्रबाहुक समान वीर छथि ; े दोसरसभक दोषसभकेॅ हजार आॅखिसॅ देखैत छथि आओर दोसरसभक हितरूपि घीकेॅ हेतु जनिक मन माछीक समान अछि द्धअर्थात जाहि प्रकारेॅ माछी घीमे खसिकय ओहिकेॅ खराब कय दइत अछि आओर स्वयं सेहो मरि जाइत अछि, तहिना दुष्ट गण दोसरकेॅ बनल - बनायल कार्यकेॅ अपन हानि कइयोकय बिगारि दइत छथि ।।2 ।। जे तेज ;दोसरसभकेॅ जरावयवाला ताप द्ध मे अग्नि आओर क्रोधमे यमराजकेॅ समान छथि, पाप आओर अवगुणरूपि धनमे कुबूरक समान धनिक छथि, जिनक उदय सभक हितक नाश करबाक हेतु केतुकेॅ ;पुच्छल ताराकेॅ द्ध समान अछि, आओर जिनक कुम्भकर्णक भाॅति सुतले रहबाटामे भलाई अछि ।।3।। जेनाॅ हिम कृषिकेॅ उपटकय अपने सेहो गैल जाइत अछि, तहिना आं दोसरक कार्य बिगाडबाक हेतु अपन शरीरधरि छोडि दइत छथि । हम दुष्टसभकेॅ ;हजार मुखवाला द्ध शेषजीक भाॅति बूझि प्रणम करैत छी, जे परक दोषकेॅ हजार मुखसॅ सहर्ष वर्णन करैत छथि ।।4।। पुनः हुनका राजा पृथुक ; जे भगवानक यश सुनबाक हेतु दस हजार माॅगने छलाह द्ध भाॅति जानिकय प्रणाम करैत छी जे दस हजार कान दोसर सभक पाप सभकेॅ सुनैत छथि फेर इन्द्रक समान मानिकय हुनक विनय करैत छी, जिनका सुरा ;मदिराद्ध नीक आओर हितकर बुझना जाइत छन्हि ।इन्द्रकेॅ लेल सेहो सुरा नीक अथर््ाात देवताक सेना हितकर छन्हि। जिनका कठोर वचन सदिखन पिअरगर लागैत छन्हि आओर हजारो आॅखिसॅ दोसरसभकेॅ दोषसभ देखैत छथि ।।6।। दुष्टसभक ई रीत अछि कि ओ उदासीन, शत्रु अथवा मित्र ककरो हित सुनिकय जरैत छथि । ई बुझिकय दुनू हाथ जोडिकय ई जन प्रेमपूर्वक हुनकासॅ विनय करैत अछि ।। 4 ।। हम अपन दिसिसॅ निहोरा कयलहुॅ, मुदा ओ अपन दिसिसॅ कहियो नहि चुकताह । कौआसभकेॅ कतबो प्रेमसॅ पोषू; तथपि ओ की कहियो माउसक त्यागी भय सकैछ ? ।। 1 ।। आब हम संत आओर असंत दुनुक चरणक वन्दना करैत छी; दुनूटा दुःख देवयवाला छथि, मुदा उभयक बीचमे किछु अन्तर कहल गेल अछि । आं अन्तर ई अछि जे एक ;संतद्ध त’ बिछुडैत काल प्राण हैर लइत छथि आओर दोसर ;असंतद्ध मिलैत छथि तखन दारूण दुःख दइत छथि । ;अर्थात संतक बिछोह मरनक समान दुःखदायि होइत अछि आओर असंतक मिलान द्ध ।। 2 ।। दुनू ;संत आओर असंतद्ध जगमे संगहि जनमैत छथि; मुदा ;एकंे संग जनम लेनहारद्ध कमल आओर जोंकक भाॅति हुनक गुण पृथक - पृथक होइत छन्हि । ।कमल दर्शन आओर स्पर्शसॅ सुख दइत अछि, मुदा जोंक देहक स्पर्श पवितें सोणित चूसय लागैत अछि। । साधु अमृतक भॅाति ।मृत्यु रूपि संसारसॅ उबारयवाला। आओर असाधु मदिराक भाॅति ।मोह, प्रमाद आओर जडत उत्पन्न करयवाला। अछि, ;शास्त्रसभमे समुद्रेमन्थनसॅ अमृत आओर मदिरा दुनूक उत्पत्ति बतायल गेल अछिद्ध ।। 3 ।। भॅल आओर बेजाय अपन - अपन करनीक अनुसार सुन्नर यश आओर अपयशकक सम्पत्ति पाबैत छथि । अमृत, चान, गंगाजी आओर साधु आ विष, अग्नि, कलियुगकें पापसभक नदी अर्थात कर्मनाशा आओर हिंसा करनिहार व्याध, हिनक गुण - अवगुण सभ कियो जानैत छथि; मुदा जकरा जे भावैत अछि तकरा सैह नीक लागैत अछि ।। 4 - 5 ।। भॅल भलाइये ग्रहन करैत अछि आओर ओछ ओछतेंकेॅ ग्रहण करैत अछि । अमृतक सराहना अमर करबामे होइत अछि आओर विषक मारयमे ।।5।। दुष्टसभकेॅ पापसभ आओर अवगुणसभक आओर साधुक गुणसभक कथा - दुनूटा अपार आओर अथह समुद्र अछि। एहिसॅ किछु गुण आओर दोषक वर्णन कायल गेल अछि, किएकतॅ बिनु चिन्हल हुनक ग्रहण वा त्याग नहि भय सकैछ ।।1।। नीक, बेजाय सभटा बिधिक बनायल अछि, परंच गुण आओर दांषसभकेॅ बिचारिकय वेद, इतिहास आओर पुराण कहैत छथि कि ब्रम्हाक ई सृष्टि गुण - अवगुणसॅ सानल अछि ।।2।। दुःख - सुख, पाप - पुण्य, दिन - राति, साधु - कुसाधु, सुजाति - अजाति, दानव - देवता, उॅच - नीच, अमृत - विष, सुजीवन ;सुन्नर जीवनद्ध -मृत्यु सम्पत्ति - दरिद्रता, रंक - राजा, काशी - मगध, गंगा - कर्मनाशा, मारवाड - मालवा, ब्राम्हण - कसाई, स्वर्ग - नरक, अनुराग - वैराग्य ।ई सभटा पदार्थ ब्रम्हाक सृष्टिमे छथि। वेद - शास्त्र सभ हिनक गुण - दोष सभक विभाजन कयने अछि ।।3-5 ।। करतार एहि जड - चेतन विश्वकेॅ गुण - दोषमय रचने छथि ; मुदा संतरूपि हंस दोषरूपि पानिकेॅ छोडिकय गुणरूपि दूधेटा ग्रहण करैत छथि ।।6।। बिधाता जहन एहि प्रकारक विवेक दइत छथि , तहन दोषसभकेॅ छोडिकय मन गुणसभमे अनुरक्त होइत अछि । काल - स्वभाव आओर कर्मक प्रबलतासॅ भॅल मनुष्य ।साधु। सेहो मायाक बश भय कहियो - काल भलाईसॅ चूकि जाइत छथि ।।1 ।। भगवानक भक्त जेनाॅ ओहि चूकिकेॅ सुधरि लइत छथि आओर दुःख दोषसभकेॅ मेटकय निर्मल यश दइत छथि, तहिना दुष्ट सेहो कहियो - काल उत्तम संग पाबि भलाई करैत छथि; मुदा हुनक कहियो भंग नहि होबयवाला स्वभाव नहि मेटाइछ ।।2।। जे ।भेखधारी। ठग अछि, तकरो ;साधु जेकाॅद्ध भेष बनायल देखिकय भेषक प्रतापसॅ जगत पूजैत अछि; मुदा एक - ने - एक दिन ओ चैड आबिये जाइत अछि, अन्तधरि ओकर कपट नहि निमहैछ, जेनाॅ कालनेमि, रावण आओर राहुक हाल भेल ।।3।। अधलाहो भेष बना लेबयसॅ सेहो साधुक सम्माने होइत अछि, जेनाॅ जगतमे जाम्बवान आओर हनुमानजीक भेल । अधलाह संगतिसॅ हानि आओर नीक संगतिसॅ लाभ होइत अछि, ई बात लोक आओर वेदमे अछि, आओर सभ कियो एहिकेॅ जानति छथि ।।4।। बसातक सगसॅ धूल अकाशपर चढि जाइत अछि आओर ओ नीच ।नीचमे बहयवाला। पानिक संगसॅ थालमे मिलि जाइत अछि । साधुक घरक तोता - मैना राम - राम सुमिरैति अछि आओर असाधुक घरक तोता - मैना गनि - गनिकय गारि दइत अछि ।।5।। कुसंगक कारणे धुआॅ कारिख कहाइछ, वएह धुआॅ ।सुसंगसॅ। सुन्नर स्याही बनिकय पुराण लिखबाक काममे आबैत अछि आओर वएह धुआॅ जल, अग्नि, वायु आओर पवनक संगसॅ मेघ बनि जीवनदाता बनि जाइत अछि ।।6।। ग्रह, औषध, जल,वायु आओर वस्त्र - ई सॅभ सेहो कुसंग आअेार सुसंग पाबिकय संसारमे अधलाह वा नीक पदार्थ भय जाइत अछि । चतुर आओर विचारशीले पुरुष एहि बातकेॅ जानि पाबैत छथि ।। 7।ख। ।। माहक दुनू पखमे इजोत अन्हार समाने रहैत अछि, मुदा विधाता एहिक नाममे भेद कयने छथि ;एकटाक नाम शुक्ल आओर दोसरक नाम कृष्ण रखलन्हिद्ध । एकटाकेॅ चानकेॅ बढावयवाला आओर दोसरकेॅ ओहिकेॅ घटावयवाला बूझिकय जगत एकटाकेॅ सुयश आओर दोसरकेॅ अपयश दय देलक ।। 7 ।ख। ।। जगतमे जतेक जड आाओर चेतन जीव छथि, सभकेॅ राममय बूझिकय हम हुनक सभकेॅ चरणकमलक सदिखन दुनू हाथ जोडिकय वन्दना करैत छी ।।7।ग। ।। देवता, दैत, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर आओर निशाचर सभकेॅ हम प्रणाम करैत छी । आब सभ हमरा पर कृपा करथु ।।7।घ। ।। चैरासी लाख योनिसभमे चारि प्रकारक ; स्वेदज, अण्डज, , जरायुद्ध जीव जल, पृथ्वी आओर अकाशमे रहैत छथि, ताहि सभसॅ भरल गेल एहि समस्त जगतकेॅ श्रीसीताराममय जानिकय हम दुनू हाथ जोडिकय प्रणाम करैत छी ।। 1 ।। हमरा अपन दास बूझिकय कृपाक खान अपने सभ गोटे मिलिकय छल छोडिकय कृपा करू । हमरा अपन बुद्वि - बलक भरोस नहि अछि, तेॅ हम सभसॅ विनती करैत छी ।। 2 । हम श्रीरघुनाथजीक गुणक वर्णन करय चाहैत छीए मुदा हमर बुद्धि ओछ अछि आओर श्रीरामजीक चरित्र अथाह छन्हि । तेँ हेतु हमरा उपायक एकहुटा अंग अर्थात किछुओ ;लेशमात्रद्ध उपाय नहि सुझाईछ । हमर मन आओर बुद्धि कंगाल अछिए मुदा मनोरथ राजा अछि ।।3।। हमर बुद्धि तँ अत्यंत नीच अछि आओर रुचि बड ऊँच अछि । रुचि तँ अम्रित पीबाक अछिए मुदा जगत् मे जुरईया छॉछो नहिं । सज्जन हमर ढिठईकें क्षमा करथु आओर हमर बालवचनकें मन लगाकय ;प्रेमपूर्वकद्ध सुनथु ।।4।। जेना बालक जहन तोतराति बात बाजैत अछि तँ ओकर माता दृ पिता ओहिकें प्रसन्न मनसँ सुनैत छथि । मुदा क्रूरए कुटिल आओर कुबिचारि लोक जे दोसरसभकेँ दोषेसभकेँ भूषणरुपसँ धारण कयने रहैत छथि ;अर्थात जिनका दोसरक दोषे नीक लागैत छन्हिद्धए हँसताह ।।5।। सरस हो अथवा फीकए अपन कविता ककरा नहि नीक लागैछ घ् मुदा जे दोसरक रचनाकेँ सुनिकय हर्षित होईत छथिए एहन उत्तम पुरुष जगतमे बेसी नहि छथि ।। 6 ।। हे भाई ! जगतमे पोखरि आओर नदिक समान मनुष्ये बेसी छथिए जे जल पाबिकय अपने बाढिसँ बढैत छथि ;अर्थात अपने उन्नतिसँ प्रसन्न होईत छथिद्ध । समुद्र जेकाँ तँ बिरले कियो सज्जन होईत छथि जे चानकेँ पूर्ण देखिकय ;दोसरक उन्नति देखिकयद्ध उमडि पडैत छथि ।।7।। हमर भाग्य ओछ अछि आओर इच्चा बड पैघ अछि ए मुदा हमरा एकटा विश्वास अछि कि एहिकेँ सुनिकय सज्जनसभ सुख पौताह आओर दुष्ट उपहास करताह ।।8।। मुदा दुष्टसभकेँ हँसलासँ हमरा हिते होयत । मधुर कंठबाली कोइलीकेँ कौआ तँ कठोरे कहैत रहैत अछि । जेनाँ बौकला हंसकेँ आओर बेंग पपीहकेँ हँसैत अछिए तहिना मलिन मनवाला दुष्ट निर्मल वाणीकेँ हँसैत अछि ।।1।। जे नहि तँ कविताक रसिक छथि आओर ने जिनका श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे प्रेम छन्हिए हुनक हेतु सेहो ई कविता सुखद हास्यरसक काम देत । प्रथम तँ ई भाषाक रचना अछि ए दोसर हमर बुद्धि भोरि अछि य एहिसँ ई हँसहो योग्य अछि ए हँसयमे कोनो दोष नहि ।।2।। जिनका नहि तँ प्रभुक चरणमे प्रेम अछि आओर ने नीक बुझे छन्हिए हुनका ई कथा सुनयमे फीके लगतन्हि । जिनक श्रीहरि ;भगवान विष्णुद्ध आओर श्रीहरकेँ ;भगवान शिवद्ध चरणमे प्रीति अछि आओर बुद्धि कुतर्क करयवाला नहि अछि ;जे श्रीहरि दृ हरमे भदक अथवा ऊँच.नीचक कल्पना नहि करैछद्धए हुनका श्रीरघुनाथजीक ई कथा मिठ लगतन्हि ।।3।। सज्जनगण एहि कथाकेँ अपन जीमे श्रीरामजीक भक्तिसँ भूषित जानिकय सुन्नर वाणीसँ सराहना करैत सुनताह । हम नहि तँ कवि छीए ने वाक्येरचनामे कुशल छीए हम तँ सभ कला आओर सभ विद्यासभसँ हीन छी ।।4।। नाना प्रकारक आखरए अर्थ आओर अलंकारए अनेक प्रकारक छन्द रचनाए भाव आओर रससभक अपार भेद आओर कविताक भाँति.भाँतिक गुण.दोष होइत अछि ।।5।। एहि मे काव्य सम्बन्धी एकहुटा बातक ज्ञान हमरा नहि अछिए ई हम कोर कागजपर लिखिकय ;शपथपूर्वकद्ध सत्य.सत्य कहैत छी ।।6।। हमर रचना सभटा गुणसँ हीन अछिए एहिमे बस जगत्प्रसिद्ध एकटा गुण अछि । तकरा बिचारिकय नीक बुद्धिक पुरुषए जिनक निर्मल ज्ञान अछिए एहिकेँ सुनताह ।। 9।। एहिमे श्रीरघुनाथजीक उदार नाम अछिए जे अत्यंत पवित्र अछिए वेद.पुराणसभक सार अछिए जकरा पार्वतीजीसहित भगवान् शिवजी सदिखन जपल करैत छथि ।।1।। जे नीक कवि द्वारा रचल गेल बड नीक कविता अछि ए सेहो रामनाम बिनु शोभा नहि पाबैछ । जेनाँ चान जेकाँ सुन्नर मुखबाली सुन्नर स्त्री सभ प्रकारसँ सुसज्जित भेलोसँ वस्त्र बिनु शोभा नहि दैछ।।2।। एहिक विपरीतए कुकविक रचल गेल सभ गुणसँ हीन कविता सेहोए रामक नाम एवं यशसँ अंकित जानिकयए बुद्धिमान् गण आदरपूर्वक कहैत आओर सुनैत छथिए किएक तँ संत मधुवनक भाँति गुणे ग्रहण करन्हिहार होइत छथि ।।3।। यद्यपि हमर एहि रचनामे कविताक एकोटा रस नहि अछिए तथपि एहिमे श्रीरामजीक प्रताप प्रकट अछि । हमरा मनमे इएह एकटा भरोस अछि । भल संगसँ भलाए के नहि वडप्पन पौलक घ् ।। 4।। धूआँ सेहो अगरकेँ संगसँ सुगंधितभय अपन स्वाभाविक कडुवापन छोडि दैत अछि । हमर कविता अवश्य भद्दा अछिए परन्तु एहिमे जगतक कल्याण करन्हिहार रामकथारूपि उत्तम वस्तुक वर्णन कायल गेल अछि । ;ताहिसँ ई सेहो नीके बुझल जायतद्ध ।।5।। तुलसीदासजी कहैत छथि जे श्रीरघुनाथजीक कथा कल्याण करन्हिहार आओर कलयुगक पापसभक हरन्हिहार अछि । हमर एहि क्रूर कवितारूपि नदीक चालि पवित्र जलवाली नदीक ;गंगाजीद्ध चालिक जेकाँ टेढ अछि । प्रभु श्रीरघुनाथजीकेँ सुन्नर यशकेँ संग सँ ई कविता सुन्नर आ सज्जनसभक मनकेँ भावयवाला भय जायत । श्मशानक अपवित्र राखो श्रीमहदेवक अंगक संगसँ सोहनगर लागैत अछि आओर स्मरण करिते पवित्र करन्हिहार होइत अछि । श्रीरामजीक यशकसंगसँ हमर कविता सभकेँ अत्यंत प्रिय लागत जेनाँ मलय पर्वतक संगसँ काष्ठमात्र ;चानन बनिकयद्ध वन्दनीय भय जाइत अछिए फेर की कियो काठक ;तुच्छताद्ध विचार करैत अछि घ् ।।10;कद्ध।। श्यामा गौ कारी भेलोसँ ओकर दूध उज्वल आओर बड गुणकारि होइत अछि । इएह बूझि सभ लोक ओहिकेँ पीबैत छथि । एहि प्रकारेँ गँवारु भाषामे भेलोसँ श्रीसीता . रामजीक यशकेँ बुझिकय लोक बड प्रेमसँ गावैत आओर सुनैत छथि ।।10;खद्ध।। मणिए माणिक आओर मोतीक जेहन सुन्नर छवि अछि ए ओ साँपए पर्वत आओर हाथीक मस्तकपर ओहन शोभा नहि पावैछ । राजाक मुकुट आओर नवयुवती स्त्रीक शरीरकेँ पौलेसँ ई सभ बेशी शोभा पाबैत अछि।।1।। एहि तरहेँए बुझनिक लोकनि कहैत छथि कि सुकविक कविता सहो उत्पन्न कतहु होइत अछि आओर शोभा कतहु पावैत अछि ; अर्थात कविक वाणीसँ उत्पन्न भेल कविता ओतय शोभा पाबैछ अछि जतय ओकर विचारए प्रचार व ओहिमे कथित आदर्शक ग्रहण आओर अनुसरन होइत अछिद्ध । कविक अनुसरण करिते ओकर भक्तिक कारणे सरस्वतीजी ब्रम्हलोककय दौगल आबैत छथि ।।2।।सरस्वतीजीक दौगल आयलक ओ थकान रामचरितरूपि सरोवरमे हुनका नहबयने बिनु दोसर करोडोटा उपायसभसँ नहि जाइछ । कवि आओर पंडित अपन हृदयमे एहन बिचारिकय कलियुगक पापसभकेँ हरन्हिहार श्रीहरिक यशेक गाण करैत छथि ।।3।। संसारि मनुष्यसभक गुणगान कयलासँ सरस्वतीजी माथ धुनिकय पछताय लागैत छथि ;कि हम किएक एकरा बजयलासँ एलहुँद्ध। बुद्धिमान लोकनि हृदयकेँ समुद्रए बुद्धिकेँ सीप आओर सरस्वतीजीकेँ स्वाति नक्षत्र जेकाँ कहैत छथि ।।4।। एहिमे जौं श्रेष्ठ विचाररूपि जल बरसैत अछि तँ मुक्तामणिकेँ समान श्रेष्ठ कविता होइत अछि।।5।। ताहि कवितारूपि मुक्तामणिसभकेँ युक्तिसँ बेधिकय फेर रामचरित्ररूपि सुन्नर तागमे पिरोकय सज्जनजनि अपन निर्मल हृदयमे धारण करैत छथिए जाहिसँ अत्यंत अनुरागरूपि शोभा होइत अछि ;ओ आत्यंतिक प्रेमकेँ प्राप्त होइत अछिद्ध ।।11।। जे कराल कलयुगमे जनमल छथिए जनिक करनि कौआक समान अछि आओर भेष हंस जेकाँ अछिए जे वेदमार्ग छोडिकय कुमार्गपर चलैत छथिए जे कपटक मूर्ति आ कलियुगकेँ पापसभक भाँड छथि ।।1।। जे श्रीरामजीक भक्त कहबाकय लोकसभकेँ ठकैत छथिए जे धन ;लोभद्धए क्रोध आओर कामक गुलम छथिए आओर जे धींगाधीं करन्हिहार ए धर्मध्वजी ;धर्मक फुशि ध्वजा फहरावयवाला दृ दम्भीद्ध कपटक धन्धासभक बोझ उघन्हिहार छथिए संसारक एहन लोकसभमे सभसँ पहिल हमर गनती अछि ।।2।। जौं हम अपन सभ अवगुनसभकेँ कहय लागू तँ कथा बड बढि जायत आओर हम पार नहि पायब । ताहिसँ हम बड अवगुणसभक वर्णन कयलहुँ अछि। बुझनिक जन कम्मेमे बूझि लेब ।।3।। हमर विविध प्रकारक विनतीकेँ बुझिकयए कियो एहि कथाकेँ सुनिकय दोष नहि देत । एतबहुपर जे शंका करताहए ओ तँ हमरोसँ बेसी मूर्ख आओर बुद्धिक कंगाल छथि ।।4।। हम नहि तँ कवि थिकहुँए ने ने चतुर कहाबैत छी य अपन बुद्धिक अनुरूपेँ श्रीरामजीक गुण गावैत छी । कतय तँ श्रीरघुनाथजीक अपार चरित्रए कतय संसारमे आसक्त हमर बुद्धि ।।5।। जाहि बसातसँ सुमेरु दृ जेकाँ पहाड डि जाइत अछिए कहू तँ ओकर आगूमे रुई कोन गनतीमे अछि । श्रीरामजीक असीम प्रभुता बूझिकय कथा रचयमे हमर मन बड हिचकैत अछि . ।।6।। सरस्वतीजीए शेषजीए शिवजीए ब्रम्हाजीए शास्त्रए वेद आओर पुरान ई सभ ृ नेति . नेति ृ कहिकय ;पार नहि पाबिकय एहन नहिए एहन नहि कहैतद्ध सदा जनिक गुणगान करैत रहैत छथि ।।12।। यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक प्रभुताकेँ सभ अहिना ;अकथनीयद्ध बूझैत छथि तथापि बिनु कहल कियो नहि रहल । एहिमे वेद एहन कारण बतयने अछि कि भजनक प्रभाव बहुत तरहेँ कहल गेल अछि । ;अर्थात भगवानक महिमाक पूर्ण वर्णन तँ कियो कय नहि सकत य परन्तु जकरासँ जतबा भय सकय ततबा भगवानक गुणगान करबाक चाही । किएकतँ भगवानक गुणगानरूपि भजनक प्रभाव अजीब अछिए ओकर नाना प्रकारसँ शास्त्रसभमे वर्णन अछि । कनेको भगवानक भजन मनुष्यकेँ सहजेँ भवसागरसँ तारि दैत अछिद्ध ।।1।। जे परमेश्वर एक छथिए जनिक कोनो इच्छा नहि अछिए जनिक कोनो रुप आओर नाम नहि अछिए जे अजन्मल ए सच्चिदानन्द आओर परमधाम छथि आओर जे सभमे व्यापक एवं विशवरुप छथिए सैह भगवान दिव्य शरीर धारण कय नाना प्रकारक लीला कयलाह ।।2।। ओ लीला केवल भक्त सभक हितेक वास्ते अछि य किएकतँ भगवान परम कृपालु छथि आओर शरणागतक बड प्रेमी छथि । जनिक भक्तसभपर बड ममता आओर कृपा छन्हिए जे एक बेर जकरापर कृपा कय देलन्हिए ओकरा फेर कहियो क्रोध नहि कयलाह ।।3।। ओ प्रभु श्रीरघुनाथजी गेल वस्तुकेँ फेर प्राप्त कराबयवालाए गरीबनवाज ;दीनबन्धुद्धए सरलस्वभावए सर्वशक्तिमानए आओर सभक स्वामी छथि । इएह बूझिकय बुझनिक लोकनि ओ श्रीहरिक यश वर्णन कय अपन वाणीकेँ पवित्र आओर उत्तम फल ;मोक्ष आओर दुर्लभ भगवत्प्रेमद्ध देवयवाला बनाबैत छथि ।।4।। ताहि बलसँ ;महिमाक यथीर्थ वर्णन नहिए परन्तु महान् फल देवयवाला भजन बूझिकय भगवतेकृपाक बलपरद्ध हम श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे माथ नवाकय श्रीरघुनाथजीक गुणसभक कथा कहब । ताहि विचारसँ ;वाल्मीकए व्यास आदिद्ध मुनिसभ पहिने हरिक कीर्ति गएने छथिए भाई ! ताहि मार्गपर चलब हमरालेल सुगम होयत ।।5।। जे अत्यंत पैघ नदी सभ अछि ए जौं राजा ओहिपर पुल बान्हि दैत छथि तँ अत्यंत छोट चुट्टियो ओहिपर चढिकय बिनु परिश्रमे पार चल जाइत अछि ; ताहि प्रकारेँ मुनिसभक वर्णनक सहारासँ हम सेहो श्रीरामचरित्रक वर्णन सहजहिं कय सकब द्ध ।।13।। एहि प्रकार मनकेँ बल देखाकय हम श्रीरघुनाथजीक सोहनगर कथाक रचना करब । व्यास आदि जे अनेको श्रेष्ठ कवि भय गेल छथिए जे बड आदरसँ श्राहरिक सुयश वर्णन कयने छथि ।।1।। हम ओहि सभ ;श्रेष्ठ कविसभद्ध केँ चरणकमलमे प्रणाम करैत छीए ओ हमर सबटा मनोरथसभकेँ पूर करथि । कलियुगक सेहो ओहि कविसभकेँ हम प्रणाम करैत छी ए जे सभ श्रीरघुनाथजीक गुणसमूहक वर्णन कयने छथि ।।2।। जे बड सियान प्राकृत कवि छथिए जेसभ भाषामे हरिचरित्रसभक वर्णन कयने छथिए जे एहन कवि पहिने भय चुकल छथिए जे एखन वर्तमान छथि आओर जे आगू होयताहए तिनका हम सबटा कपट तेजिकय प्रणाम करैत छी ।।3।। अपने सभ प्रसन्न भय ई वरद्न दियॅ कि साधु दृ समाजमे हमर कविताक सम्मान होवय य किएकतँ बुझनिक जन जाहि कविताक आदर नहि करैत छथिए मूर्खे कवि ओकरा रचबाक व्यर्थ परिश्रम करैत छथि ।।4।। कीर्तिए कविता आओर सम्पत्ति वएह उत्तम अछि जे गंगाजीक भाँति सबहक हित करन्हिहारहोवय । श्रीरामचन्द्रजीक कीर्ति तँ बड नीक ;सभक अनन्त कल्याणे करन्हिहारद्ध अछिए परंच हमर कविता कुरूप अछि । ई असमंजस अछि ; अर्थात् एहि दुनुक मेल नहि मिलैछद्धए एहिक हमरा अंदेस अछि ।।5।। परंच हे कविगण ! अपनेक कृपासँ ई बात सेहो हमरा लेल सुगम भय सकैत अछि । रेशमक सिअन टाटोपर सोहनगर लागैत अछि ।।6।। चतुर पुरुष ओही कविताक आदर करैत छथिए जे सरल होवय आओर जाहिमे निर्मल चरित्रक वर्णन होवय एवम जकरा सुनिकय शत्रुओ स्वाभाविक वैरकेँ बिसारि बखान करय लागय ।।14।। एहन कविता बिनु निर्मल बुद्धिक होईछ नहि आओर हमर बुद्दिक बल बड कम अछि । तेँ बेर दृ बेर निहोरा करैत छी कि हे कविगण ! अपने कृपा करीए जाहिसँ हम हरियशक वर्णन कय सकी ।।14 ;खद्ध।। कवि आओर पण्डितगण ! अपने जे रामचरित्ररूपि मानसरोवरक सुन्नर हंस छीए हमर बालविनय सूनिकय आओर सुन्नर रूचि देखिकय हमरापर कृपा करी ।।14;गद्ध।। हम ओहि वाल्मीकि मुनिकेँ चरनकमलक वन्दना करैत छीए जे रामायणक रचना कयने छथिए जे खर ;राक्षसद्ध सहित भेलोसँ खर ;कठोरद्ध सँ विपरीत बड कोमल आओर सुन्नर छथि आ जे दूषण ;राक्षसद्ध सहित भेलोसँ दूषण अर्थात दोषसँ रहित छथि ।।14;घद्ध।। हम चारू वेदक वन्दना करैत छीए जे संसारसमुद्रकेँ पार होयबाक वास्ते जहाजक समान छथि आ जिनका श्रीरघुनाथजीक निर्मल यश वर्णन करैत सपनोमे खेद ;थकानद्ध नहि होईछ ।।14;डण्द्ध।। हम ब्रम्हाजीक चरण.रजक वन्दना करैत छीए जे भवसागर बनयने छथिए जतयसँ एक दिशि मनुष्यरूपि विष आओर मदिरा उत्पन्न भेल ।।14;चद्ध।। देवताए ब्राम्हणए पण्डितए ग्रह.एहि सभकेँ चरणक वन्दना कय हाथ जोडिकय कहैत छी जे अपने प्रसन्न भय हमर सबटा सुन्नर मनोरथसभकेँ पूर करी ।।14;छद्ध।। पुनरू हम सरस्वतीजी आओर देवनदी गंगाजीक वन्दना करैत छी । दुनूक पवित्र आओर मनोहर चरित्र छन्हि । एकटा ;गंगाजीद्ध स्नान कयला आओर जल पीवयसँ पापसभकेँ हरैत छथि आओर दोसर ;सरस्वतीजीद्ध गुण आओर यश कहला व सुनलासँ अज्ञानक नास कय दैत छथि ।।1।। श्रीमहेश आओर पार्वतीकेँ हम प्रणाम करैत छीए जे हमर गुरु आओर माता.पिता छथिए जे दीनबन्धु आओर नित्य दान करन्हिहार छथिए जे सीतापति श्रीरामचन्द्रजीक सेवकए स्वामि आओर सखा छथि आ हमरा तुलसीदासक सभ तरहेँ कपटरहित ;सत्द्ध हित करन्हिहार छथि ।।2।। जे शिव.पार्वती कलियुगकेँ देखिकयए जगतक हितक लेलए साबर मन्त्रसमूहक रचना कयलन्हिए जाहि मन्त्रक आखर बेमेल अछिए जाहिक नहि कोनो ठीक अर्थ होईत अछि आओर नहि तँ जपे होईत अछिए तथापि श्रीशिवजीक प्रतापसँ जनिक प्रभाव प्रत्यक्ष अछि ।।3।। ओ उमापति शिवजी हमरापर प्रसन्न भय ;श्रीरामजीकद्ध एहि कथाकेँ आनन्द आओर मंगलक मूल ;उत्पन्न करन्हिहारद्ध बनयताह । एहि प्रकारेँ पार्वतीजी आओर शिवजी दुनूक स्मरण कय आओर हुनक प्रसाद पाविकय हम चावभरल चित्तसँ श्रीरामचरित्रक वर्णन करैत छी ।।4।। हमर कविता श्रीशिवजीक कृपासँ एना भाओतए जेना तरेगन समेत चानक संग भावैत अछि । जे एहि कथाकेँ प्रेमसहित आ सचेत भय समझि दृ बूझिकय कहताह.सुनताहए ओ कलियुगक पापसभसँ रहित आओर सुन्नर कल्याणक भागी भय श्रीरामचन्द्रजीक चरणक प्रेमी बनि जयताह ।।5.6।। जौं हमरापर श्रीशिवजी आओर पार्वतीजीक सपनोमे साँच प्रसन्नता हौइन्हि ए तँ हम एहि भाषाए कविताक जे प्रभाव कहलहुँ से सभ साँच हो ।।15।। हम अतिपवित्र श्रीअयोध्यापुरी आओर कलियुगक पापसभक नाश करन्हिहार श्रीसरयू नदीक वन्दना करैत छी । फेर अवधपुरीक ओहि नर.नारिकेँ प्रणाम करैत छी जिनकापर प्रभु श्रीरामजीक थोड ममता नहि छन्हि ;अर्थात बहुत अछिद्ध।।1।। ओ ;अपन पुरीमे रहयवालाद्ध सीताजीक निन्दा करयवाला ;धोबीद्ध आओर ओकर समर्थक पुर.नर.नारिसभद्ध केँ पापसमूहक नाश कय ओकरा शोकरहित बनाकय अपन लोक ;धामद्ध मे बसा देलन्हि । हम कोसल्यारूपि पूर्व दिशाक वन्दना करैत छीए जनिक कीर्ति समस्त संसारमे पसरि रहल अछि । जतय ;कौसल्यारूपि पूर्व दिशाद्ध सँ विश्वकेँ सुख देन्हिहार आओर दुष्टरूपि कमलक लेल पालक समान श्रीरामचन्द्रजीरूपि सुन्नर चान प्रकट भेलाह । सभ रानीसहित राजा दसरथजीकेँ पण्य आओर सुन्नर कल्याणक मूर्ति मानिकय हम मनए वचन आओर कर्मसँ प्रणाम करैत छी । अपन पुत्रक सेवक जानिकय ओ हमरापर कृपा करथिए जिनका रचिकय ब्रम्हाजी सेहो बडाई पौलाह आ जे श्रीरामजीक माता आओर पिता होयबाक चलते महिमाक सीमा छथि ।।3।। हम अवधक राजा श्रीदसरथजीक वन्दना करैत छीए जिनक श्रीरामजीक चरणमे सत्य प्रेम छलए ज दीनदयाल प्रभुकेँ बिछुडतहि अपन प्रिय देहकेँ मामूली तृण जेकाँ त्यागि देलाह ।।16।। हम सपरिवार राजा जनकजीकेँ प्रणाम करैत छीए जिनक श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे गूढ प्रेम छलन्हिए जाहिकेँ ओ योग आओर भोगमे नुका रखने छलाहए मुदा श्रीरामचन्द्रजीकेँ देखैतेँ ओ प्रकट भय गेल ।।1।। ;भाईसभमेद्ध सभसँ पहिने हम श्रीभरतजीक चरणमे प्रणाम करैत छीए जिनक नियम आओर व्रत वर्णन नहि कयल जा सकैछ आ जिनक मन श्रीरामजीक चरणकमलमे मधुप जेकाँ लोभायल अछि ए कहियो हुनक संग नहि छोरैछ ।।2।। हम श्री लक्षमणजीक चरणकमलकेँ प्रणाम करैत छीए जे शीतलए नीक आओर भक्तसभकेँ सुख देवयवाला अछि । श्रीरघुनाथजीक कीर्तिरूपि विमल पताकामे जिनक ;लक्षमणजीकद्ध यश ;पताकाकेँ ऊँच कय फहरावयवाला द्ध दंड जेकाँ भेल ।।3।। जे हजार मूडीवाला आओर जगतक कारण ;हजार मूडीपर जगतकेँ धारणकय राखयवाला द्ध शेषजी छथिए जे पृथ्वीक भय भगावयलेल अवतार लेलाहए ओ गुनाकर कृपासिन्धु सुमित्रानन्दन श्री लक्षमणजी हमरापर सदिखन प्रसन्न रहथि ।।4।। हम श्रीशत्रुघ्नजीक चरणकमलकेँ प्रणाम करैत छीए जे बड वीरए सुशील आओर श्रीभरतजीक अनुगामी छथि । हम महावीर श्रीहनुमानजीक विनती करैत छीए जिनक यशक श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ;अपन श्रीमुखसँ द्ध वर्णन कयने छथि ।।5।। हम पवनकुमार श्रीहनुमानजीकेँ प्रणाम करैत छीए जे दुष्टरूपि वनकेँ भस्म करय लेल अग्निरूप छथिए जे ज्ञानक घनमूर्ति छथि आओर जनिक हृदयरूपि भवनमे धनुष.बाण धारणकय श्रीरामजी निवास करैत छथि ।।17।। कपिपति सुग्रीवजीए रीछसभक राजा जाम्बवानजी ए राक्षससभक राजा विभीषणजी आओर अंगदजी आदि जतबा बानरसभक समाज अछिए सभक सुन्नर चरणक हम वन्दना करैत छीए जे लोकनि अधमो ;पशु आओर राक्षस आदिद्ध शरीरमे श्रीरामचन्द्रजीकेँ प्राप्त कय लेलाह ।।1।। पशुए पक्षीए देवताएमनुष्यए असुरसमेत जतेक श्रीरामजीक चरणक उपासक छथि ए हम ताहि सभ लोकनिकेँ चरणकमलकेँ वन्दना करैत छी ए जे श्रीरामजीक निष्काम सेवक छथि ।।2।। शुकदेवजी ए सनकादिए नारदमुनि आदि जतबा भक्त आओर परम ज्ञानी श्रेष्ठ मुनि छथि ए हम धरतीपर माथ टेकिकय ताहि सभ लोकनिकेँ प्रणाम करैत छी य हे मुनीश्वर लोकनि ! अपने सभ हमरा अपन दास बूझिकय कृपा कयल जाय ।।3।। राजा जनकक बेटीए जगतक माता अओर करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीकेँ प्रियतमा श्रीजानकीजीक दुनू चरणकमलकेँ हम मानैत छीए जनिक कृपासँ निर्मल बुद्धि पावी ।।4।। फेर हम मनए वचन आओर कर्मसँ कमलनयनए धनुष.बाणधारीए भक्तसभक विपत्तिक भंजन करय आओर ओ लोकनिकेँ सुख देवयवाला भगवान् श्रीरघुनाथजीक सर्वसमर्थ चरणकमलक वन्दना करैत छी ।।5।। जे वाणी आओर ओकर अर्थ आ जल आओर जलक लहरक भाँति कहयमे पृथक.पृथक अछिए परंच वास्तवमे अभिन्न ;एकद्ध अछिए ओहि श्रीसीतारामजीक चरणक हम वन्दना करैत छीए जिनका दीन दृ दुखी बड रास प्रिय छन्हि ।।18।। हम श्रीरघुनाथजीक नाम ष्राम ष् केँ वन्दना करैत छी ए जे कृशानु ;अग्निद्ध ए भ्नु ;सूर्यद्ध आओर हिमकर ;चानद्ध केँ हेतु अर्थात श् र श् आ श् आओर श् म श् रूपसँ बीज अछि । ओ श्रामश् नाम ब्रम्हाए विष्णु आओर शिवरूप अछि । ओ वेदसभक प्राण अछि य निर्गुणए उपमारहित आओर गुणसभक भण्डार अछि ।।1।। जे महामन्त्र अछिए जकरा महेश्वर श्रीशिवजी जपैत छथि आओर हुनक द्वारा जकर उपदेश काशीमे मुक्तिक कारण अछिए आ जकर महिमाकेँ गणेशजी बूझैत छथिए जे एहि श्रामश् नामक प्रभावेसँ सभँ प्रथम पूल जाइत छथि ।।2।। आदिकवि श्रीवाल्मीकिजी रामनामक प्रतापकेँ जानैत छथि ए जे उलटा नाम ;श्मरा श् श्मराश्द्ध जपिकय पवित्र भय गेलाह । श्रीशिवजीक एहि वचनकेँ सुनिकय कि एक राम.नाम सहस्त्र नामक समान अछि ए पार्वतीजी सदिखन अपन पति ;श्रीशिवजीद्ध केँ संग रामनामक जप करैत रहैत छथि ।।3।। नामक प्रति पार्वतीजीकेँ हृदयक एहन प्रीति देखिकय श्रीशिवजी हर्षित भय गेलाह आओर ओ स्त्रीसभकेँ भूषणरूप ;पतिव्रतासभमे शिरोमणिद्ध पार्वतीजीकेँ अपन भूषण बना लेलाह ;अर्थात हुनका अपन अंगमे धारणकय अर्द्धांगिनि बना लेलाहद्ध । नामक प्रभावकेँ श्रीशिवजी नीक जेकाँ जानैत छथिए जाहि ;प्रभावद्ध केँ कारण कालकूट माहुर हुनका अमृतक फल देलक ।।4।। श्रीरघुनाथजीक भक्ति वर्षा . ऋतु अछि ए तुलसीदासजी कहैत छथि जे उत्तम सेवकगण धान छथि आओर श्रामश् नामक दूटा सुन्नर आखर साओन . भादवक महिना अछि ।।19।। दुनू आखर मधुर आओर मनोहर अछिए जे वर्णमालारूपि शरीरक नेत्र अछिए भक्तसभक जीवन अछि आ स्मरण करयमे सभक लेल सुलभ आओर सुख देवयवाला अछिए आओर जे एहि लोकमे लाभ आओर परलोकमे निर्वाह करात छथि ;अर्थात् भगवान् क दिव्य धाममे दिव्य देहसँ सदिखन भगवत्सेवामे नियुक्त राखैत छथिद्ध।।1।। ई कहयए सुनय आओर स्मरण करबामे बड नीक ;नीक आओर मधुरद्ध अछि य तुलसीदासकेँ तँ श्रीराम.लक्षमण जेकाँ प्रिय छन्हि । हिनक ;श्रश् आओर श्मश् केँद्ध पृथक.पृथक वर्णन करयमे प्रीति बिलगावैत अछि ;अर्थात बीजमन्त्रक दृष्टिसँ एहिक उच्चारणए अर्थ आओर फलमे भेद बूझि पडैत अछिद्ध परंच छथि ई जीव आओर ब्रम्हकेँ समान स्वभावेसँ संग रहयवाला ;सदा एकरूप आओर एकरसद्ध ।।2।। ई दुनू आखर नर.नारायणकेँ सुन्नर भाई छथिए ई जगतक पालन आओर विशेषरूपसँ भक्तसभक रक्षा करन्हिहार छथि । ई भक्तरूपिणी सुन्नर स्त्रीक कानक सुन्नर गहना ;करणफूलद्ध अछि आओर गतक तक लेल निर्मल चान आओर सूर्य छथि ।।3।। ई नीक गति ;मोक्षद्ध रूपि अमृतक स्वाद आओर तृप्तिक समान छथिए कच्छप आओर शेषजीक समान पृथ्वीकेँ धारण करन्हिहार छथिए भक्तसभक मनरूपि सुन्नर कमलमे विहार करयवाला भ्रम्रक समान छथि आओर जीहरूपि यशोदाजीकेँ लेल श्रीकृष्ण आओर बलरामजीकेँ समान ;आनन्द देवयवालाद्ध छथि ।।4।। तुलसीदासजी कहैत छथि. श्रीरघुनाथजीकेँ नामकेँ दुनू आखर बड शोभा दैत छथिए जाहिमेसँ एक ;रकारद्ध छत्ररूप ;रेफ .द्ध सँ आओर दोसर ;मकारद्ध मुकुटमणि ;अनुस्वार .द्ध रूपसँ सभ आखरसभकेँ उपर छथि ।।20।। बुझनामे नाम आओर नामी दुनू एक जेकाँ छथिए मुदा दुनूमे परस्पर स्वामी आओर सेवक जेकाँ प्रीति अछिए ;अर्थात् नाम आओर नामीमे पूर्ण एकता भेलोपर जेना स्वामीक पाछू सेवक चलैत अछि ताहि प्रकारेँ नामकेँ पाछू नामी चलैत छथि । प्रभु श्रीरामजी अपन राम नामेटाक अनुगमन करैत छथिए नाम लैइतहि ओ आबि जाइत छथिद्ध । नाम आओर रूप दुनू ईश्वरक उपाधि छथिए ;भगवानकेँ नाम आओर रूपद्ध दुनू अनिर्वचनीय छथिए अनादि छथि आओर सुन्नर ;शुद्ध भक्तियुक्तद्ध बुद्धियेसँ हिनक ख् दिव्य अविनाशि, स्वरूप बुझना जाइत अछि ।।1।। एहि ;नाम आओर रूपद्ध मे कोन पैघ अछिए कोन छोट अछिए ई कहब तँ अपराध होयत । हिनक गुणसभक तारतम्य ;कम.बेशद्ध सुनिकय साधु जन स्वयं बूझि लेताह । रूप नामक अधीन देखल जाइत अछिए नामक बिनु रूपक ज्ञान नहि भय सकैछ ।।2।। कोनो विशेषरूप बिनु ओकर नाम जानल तलहथीपर राखलो चिन्हल नहि जा सकैछ आओर रूपकेँ बिनु देखलो नामक स्मरण कयल जा तँ विशेष प्रेमक संग ओ रूप हृदयमे आबि जाइत अछि ।।3।। नाम आओर रूपक गतिक खिस्सा ;विशेषताक कथाद्ध अकथनीय अछि । ओ बुझलामे सुखदायक अछिए मुदा ओकर वर्णन नहि कयल जा सकैछ । निर्गुण आओर सगुनकेँ मध्यमे नाम सुन्नर साक्षी अछि आओर दुनूक यथार्थ ज्ञान करोन्हहार चतुर दुभाखिया अछि ।।4।। तुलसीदासजी कहैत छथिए जौं तू भीतर आओर बाहर दुनू कात इजोत चाहैत छह तँ मुखरूपि द्वारक जीहरूपि दुहारिपर रामनामरूपि मणि.दियौरीकेँ राखह । ब्रम्हाकेँ बनायलगेल एहि प्रपञ्च ;दृश्य जगत्द्ध सँ बिरक्त भेल वैराग्यवान मुक्तयोगी पुरुष एहि नामकेँ जीहसँ जपैत ;तत्वज्ञानरूपि दिनमेद्धजागैत छथि आओर नाम आ रूपसँ रहित अनुपमए अनिवर्चनीयए अनामय ब्रम्हसुखक अनुभव करैत छथि ।।1।। ओ परमात्माक गूढ रहस्यकेँ ;यथार्थ महिमाकद्ध बूझय चाहैत छथिए सैह नामकेँ जीहसँ जपिकय ओहिकेँ जानि लैइत छथि ख्लौकिक सिद्धिसभकेँ चाहनाहर अर्थार्थी, साधक लौ लगाकय नामक जाप करैत छथि आओर अणिमादि ;आठूद्धसिद्धिसभकेँ पाबिकय सिद्ध भय जाइत छथि ।।2।। ख्संकटसँ अकुलायल, आर्त भक्त नाम जाप करैत छथि तँ हुनक बड भारी अधलाह.अधलाह संकट मेट जाइत छन्हि आओर ओ सुखी भय जाइत छथि । जगतमे चारि प्रकारक ;1. अर्थार्थी . धनादिक चाहसँ भजन्हिहारए 2. आर्त . संकटक निवृत्तिक हेतु भजन्हिहार ए 3. जिज्ञासु: भगवानकेँ जनबाक इच्छासँ भजन्हिहारए 4. ज्ञानी . भगवानकेँ तत्वसँ जानिकय स्वभाविकेँ प्रेमसँ भजन्हिहारद्ध रामभक्त छथि आओर चारूटा पुण्यात्माए पापरहित आओर उदार छथि ।।3।। चारूटा चतुर भक्तसभकेँ नामेटाक आधार छन्हि । एहिमे ज्ञानी भक्त प्रभुकेँ विशेषरूपसँ प्रिय छन्हि । एनातँ चारू युगमे आ चारू वेदमे नामक प्रभाव अछिए परंतु कलयुगमे विशेषरूपसँ अछि । एहिमेतँ ;नामकेँ छोडिद्ध दोसर कोनो उपाये नहि अछि ।।4।। जे सभ प्रकारक ;भोग आओर मोक्षकेँ सेहोद्ध कामनासभसँ रहित आओर श्रीरामभक्तिक रसमे लीन छथि ए ओ सेहो नामक सुन्नर प्रेमरूपि अमृतक सरोवरमे अपन मनकेँ मीन बनौने धयने छथि ;अर्थात ओ नामरूपि सुधाक निरंतर आस्वादन करैत रहैत छथिए क्षणोभरि लेल ओहिसँ फटकि होवय नहि चाहैछद्ध ।।22।। निर्गुण आओर सगुण . ब्रम्हकेँ दूटा स्वरूप छन्हि । ई दुनूटा अकथनीयए अथाहए अनादि आओर अनुपम छथि । हमर सम्मतिसँ नाम एहि दुनूसँ पैघ अछिए जे पन बलसँ दुनूकेँ अपन वशमे कयने अछि ।।1।। सज्जनगण एहि बातकेँ हमर दासक ढिठई वा केवल काव्योक्ति नहि बूझैथ । हम अपन मनक विश्वासए प्रेम आओर रूचिक बात कहैत छी । ख्निर्गुण आओर सगुण, दुनू प्रकारक ब्रम्हक ज्ञान अग्निक समान अछि जे काठक भित्तर अछि ए परंतु देखाइछ नहिय आओर सगुण ओहि प्रकट अग्निक समान अछि जे प्रत्यक्ष देखाइत अछि । ख्तत्वतरू दुनू एके अछि य केवल प्रकट . अप्रकटकेँ भेदसँ भिन्न बुझना जाइत अछि । तहिना निर्गुण आओर सगुण तत्वतरू एके अछि । एतेक भेलोसँ, दुनूटा बुझबामे बड कठिन अछिए परंतु नामसँ दुनू सुगम भय जाइत अछि । एहिलेल हम नामकेँ ;निर्गुणद्ध ब्रम्हसँ आओर ख्सगुण, रामसँ पैघ कहने छीए ब्रम्ह व्यापक अछिए एक अछिए अविनाशि अछि य सत्ता चैतन्य आओर आनन्दक घनराशि अछि ।।2.3।। एहन विकाररहित प्रभुक हृदयमे रहितो जगतक सभटा जीव दीन आओर दुखी अछि । नाँओक निरूपन कय ;नाँओक यथार्थ स्वरूपए महिमा ए रहस्य आओर प्रभावकेँ जानिकयद्ध नाँओक जतन कयलासँ ;श्रद्धापूर्वक नामजापरूपि साधन कयलासँद्ध वएह ब्रम्ह एना प्रकट भय जाइत अछि जेना रत्नकेँ जानिगेलासँ ओकर मूल्य ।।4।। एहितरहेँ निर्गुणसँ नाँओक प्रभाव अत्यंत पैघ अछि । आब अपन विचारक अनुसारे कहैत छी कि नाम ख्सगुण, रामसँ सेहो पैघ अछि ।।23।। श्रीरामचन्द्रजी भक्तसभक हितक वास्ते मनुष्य शरीर धारण कय स्वयं कष्ट सहिकय साधुसभकेँ सुखी कयलाह य परंतु भक्तगण प्रेमक संग नाँओक जाप करैत सहजहिमे आनन्द आओर कल्याणक घर भय जाइत छथि ।।1।। श्रीरामचन्द्रजी एकटा तपस्वीयेटाक स्त्री ;अहल्याद्धकेँ तारलन्हिए परन्तु नाम तँ करोडोटा दुष्टक बिगडल बुद्धिकेँ सुधारि देलक । श्रीरामजी ऋषि विश्वामित्रक हितक वास्तेँ एकटा सुकेतु यक्षक कन्या ताडकाक सेना आओर पुत्र ;सुबाहुद्ध सहित समाप्ति कयलन्हिय परन्तु नाम अपन भक्तसभक दोषए दुरूख आओर दुराशासभक एना नाश कय दइत अछि जेना सूर्य रात्रिक । श्रीरामजी तँ स्वयं शिवजीक धनुषकेँ तोडलन्हि परन्तु नाँओक प्रतापेटा संसारक सभटा भयसभक नाश करयवाला अछि ।।2.3।। प्ररयवाला अछि ।।2.3।। प्रभु श्रीरामजीक ख्भयानक, दण्डक वनकेँ सोहनगर बनौलन्हिए परन्तु नाम तँ असंख्य मनुष्यसभक मनकेँ पवित्र कय देलक । श्रीरघुनाथजी राक्षससभक समूहकेँ मारलन्हि ए परन्तु नाम तँ कलियुगक समस्त पापसभक जडि उखाडयवाला अछि ।।4।। श्रीरघुनाथजी तँ शबरीए जटायु आदि उत्तमे सेवकसभकेँ मुक्ति देलन्हि य परन्तु नाम तँ अनगनत दुष्टसभक उद्धार कयलक । नाँओक गुणसभक कथा वेदसभमे प्रसिद्ध अछि ।।24।। श्रीरामजी सुग्रीव आओर विभीषण दुईएटाकेँ अपन शरणमे रखलन्हिए ई सभकियो जानैत छथिय परंतु नाम तँ अनेको गरीबसभपर कृपा कयने अछि । नाँओक ई सुन्नर विरद लोक वेदमे विशेषरूपसँ प्रकाशित अछि ।।1।। श्रीरामजी तँ भालु आओर बानरक सेना बटोरलन्हि आओर समुद्रपर पूल बान्हयलेल कनेक परिश्रम नहि कयलन्हि य परंतु नाम लैतहि संसार.समुद्र सूखि जाइत अछि । मनमे विचार करू ख्कि जे दुनूमे कोन पैघ अछि, ।।2।। श्रीरामचन्द्रजी कुटुम्बसमेत रावणकेँ युद्धमे मारलन्हि ए तखन सीतासमेत अपन नगर ;अयोध्याद्ध मे प्रवेश कयलन्हि । राम राजा भेलाह ए अवध हुनक राजधानी भेल ए देवता आओर मुनि सुन्नर वाणीसँ जिनक गुण गावैत छथि । परंतु सेवक ;भक्तद्ध प्रेमपूर्वक नामकेँ स्मरणमात्रसँ बिनु परिश्रम मोहक प्रबल सेनाकेँ जीतिकय प्रेममे मग्न भेल अपने सुखमे विचरैत छथिए नाँओक प्रसादसँ हुनका सपनहुमे कोनो चिंता नहि सताबैछ ।।2.4।। एहि तरहेँ नाम ख्निर्गुण, ब्रम्ह आओर ख्सगुण, राम दुनूसँ पैघ अछि । ई बरदान देबयवालाकेँ सेहो बर देबयवाला अछि । श्रीशिवजी तँ अपन हृदयमे ई जानियेकय सै करोड रामचरित्रमेसँ एहि श्राम श् नामकेँ ख्साररूपसँ चूनिकय, ग्रहण कयने छथि ।।25।। मासापारायणए पहिल विश्राम नमेटाक प्रसादसँ शिवजी अविनाशि छथि आओर अमंगल वेषवाला भेलोसँ सेहो मंगलक राशि छथि । शुकदेवजी आओर सनकादि सिद्धए मुनिए योगीगण नामेटाक प्रसादसँ ब्रम्हानन्दकेँ भोगैत छथि ।।1।। नारदजी नामक प्रतापकेँ जानिगेल छथि । हरि समस्त संसारकेँ प्रिय छथिए ख्हरिकेँ हर प्रिय छन्हि, आओर आहाँ ;श्रीनारदजीद्ध हरि आओर हर दुनूगोटेकेँ प्रिय छी । नामकेँ जपलासँ प्रभु कृपा कयलन्हि ए जाहिसँ प्रहलाद भक्तशिरोमणि भय गेलाह ।।2।। ध्रुवजी ग्लानिसँ ;विमाताक वचनसँ दुखी भय सकामभवसँद्ध हरिनामकेँ जपलन्हि आओर ओकर प्रतापसँ अचल अनुपम स्थान ;ध्रुवलोकद्ध प्राप्त कयलन्हि । हनुमानजी पवित्र नाँओक स्मरण कय श्रीरामजीकेँ अपन वशमे कय रखने छथि ।।3।। नीच अजामिलए गज आओर गणिका ;वेश्याद्ध सेहो श्रीहरिक नाँओक प्रभावसँ मुक्त भय गेल । हम नामक बडाई कतय धरि कहूए राम सेहो नामक गुणसभकेँ नहि गाबि सकैत छथि ।।4।। कलियुगमे रामक नाम कल्पतरु ;मनचाहल पदार्थ देवयवालाद्ध आओर कल्याणक निवास ;मुक्तिक घरद्ध अछिए जकर स्मरण कयलासँ भाँग.जेकाँ ;निकृष्टद्ध तुलसीदास तुलसीक समाने ;पवित्रद्ध भय गेलाह ।।26।। ख्केवल कलियुगेटाक बात नहि अछिए, चारू युगमेए तीनू कालमे आओर तीनू लोकमे नामकेँ जपिकय जीव शोकरहित भेल छथि । वेदए पुराण आओर संतसभक मन ईयैह अछि कि समस्त पुण्यसभक फल श्रीरामजीमे ख्अथवा रामनाममे, प्रेम भेनाई अछि ।।1।। पहिने ;सत्यद्ध यूगमे ध्यानसँए दोसर ;त्रेताद्ध युगमे यज्ञसँ आओर द्वापरमे पूजलसँ भगवान प्रसन्न होईत छथिय मुदा कलियुग केवल पापक जडि आओर मलिन अछिए एहिमे मनुष्यसभक मन पापरूपि समुद्रमे माछ बनल गेल अछि ;अर्थात पापसँ कहियो फऱाक होबहेँ नहि चाहैछ य एहिसँ ध्यानए यज्ञ आओर पूजन नहि बनि सकैछद्ध ।।2।। एहन कराल ;कलियुगकेँद्ध कालमे तँ नामे कल्पवृक्ष अछिए जे स्मरण करितहि संसारक सभटा जंजालसभक नाश कय देवयवाला अछिए परलोक परम हिताषि आओर एहि लोकक माता.पिता अछि ;अर्थात परलोकमे भगवानक परमधाम दैत अछि आओर एहि लोकमे माता.पिताक जेकाँ सभ तरहेँ पालन आओर रक्षण करैत अछिद्ध ।।3।। कलियुगमे ने कर्म अछिए ने भक्ति अछि आओर ने ज्ञाने अछि य रामनामे एकटा आधार अछि । कपटक खान कलियुगरूपि कालनेमिकेँ ;मारबाकद्ध लेल रामनामे बुद्धिमान आओर समर्थ श्रीहनुमानजी छथि ।।4।। रामनाम श्रीनृसिंह भगवान छथिए कलियुग हिरण्यकशिपु अछि आओर जाप करयवाला लोक प्रहलादकेँ जेकाँ अछि य ई रामनाम देवतासभक शत्रु ;कलियुगरूपि दैत्यद्ध केँ मारिकय जाप करन्हिहारक रक्षा करत ।।27।। नीक भाव ;प्रेमद्ध सँए अधलाह भाव ;वैरद्ध सँए करोधसँ वा आलस्यसँ कोनो तरहेँ नाम जपलासँ दसू दिशामे कल्याण होईत अछि । ओहि ;परम कल्याणकारिद्धरामनामक स्मरण कय क आओर श्रीरघुनाथजीकेँ माथ झुकाय कय हम रामजीक गुणसभक वर्णन करैत छी ।।1।। ओ ;श्रीरामजीद्धहमर ख्बिगडल, सभ तरहेँ सुधारि लेताहय जनिक कृपा कृपा कयलासँ नहि अघाईछ । राम.सँ उत्तम स्वामि आओर हमराजेकाँ अधलाह सेवक ! ततबोपर ओ दयानिधि अपन दिसि देखिकय हमरा पोसने छथि ।।2।। लोक आओर वेदमे सेहो नीक स्वामीक ईएह रीति परसिद्ध अछि जे ओ विनय सुनितहि प्रेमकेँ चीन्हि लैत छथि । धनिक दृ गरीब ए गँवार दृ नागर ए पण्डित दृ मुरूखए बदनाम दृ यशस्वी ।।3।। सुकवि दृ कुकविए सभ नर दृ नारि अपन दृ अपन बुद्धिक अनुसारेँ राजाक सराहना करैत छथि । आओर साधुए बुद्धिमानए सुशीलए ईश्वरक अंशसँ उत्पन्न कृपालु राजा . ।।4।। सभक सूनिकय आओर हुनक वाणी ए भक्तिए विनय आओर चालिकेँ चीन्हिकय सुन्नर ;मिठद्ध वाणीसँ सभक यथायोग्य सम्मान करैत छथि । ई स्वभावतँ संसारि राजासभक अछिए कोसलनाथ श्रारामचन्द्रजी तँ चतुरशिरोमणि छथि ।।5।। श्रीरामजी तँ विशुद्ध प्रेमेँटासँ रीझैत छथिए मुदा जगत् मे हमरासँ बढिकय मुरूख आ मलिनबुद्धि आओर के होयत घ् ।।6।। तथापि कृपालु श्रीरामचन्द्रजी हम दुष्ट सेवकक प्रीति आओर रूचिकेँ अवश्य रखताहए जे पाथरकेँ जहाज आओऱ बानर दृ भालुसभकेँ बुद्धिमान मंत्री बना लेलाह ।।28 ;कद्ध।। सभकियो हमरा श्रीरामजीक सेवक कहैत छथि आओर हम सेहो ;बिनु लाज . संकोचकेँद्ध कहाबैत छी ;कहनहारक विरोध नहि करैछद्धय कृपालु श्रीरामजी एहि निंदाकेँ सहैत छथ जे श्रीसीतानाथजी दृ जेहन स्वामिक तुलसीदास जेकाँ सेवक अछि ।।28 ;खद्ध।। ई हमर बड पैघ ढिठई आ दोख अछिए हमर पापकेँ सुनिकय नरको नाक सिकोडि लेने अछि ;अरथात नरकोमे हमरा लेल ठौर नहि अछिद्ध । ई बूझिकय हमरा अपनहि कल्पित डरसँ ड र भय रहल अछिए मुदा भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तँ सपनोमे एहिपर ;हमर एहि ढिठई आओर दोषपरद्ध ध्यान नहि देलाह ।।1।। वरं हमर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी तँ एहि बातकेँ सुनिकए देखिकय आओर अपन सुचित्तरूपि चक्षुसँ निरीक्षण कय हमर भक्ति आओर बुद्धिक ;उनटेद्ध सराहलन्हि । किएक तँ कहबामे चाहे बिगडि जाय ;अर्थात हम चाहे स्वयंकेँ भगवानक सेवक कहैत दृ कहावैत रहूद्धए मुदा हृदयमे नीकपन होयबाक चाही । ;हृदयमे तँ अपनाकेँ हुनक सेवक बनय जोग नहि मानिकय पाप आ दीने मानैत छीए ई नीकपन अछि ।द्ध श्रीरामचन्द्रजी सेहो दासकेँ हृदयक ख् नीक, स्थिति जानिकय रीझ जाइत छथि ।।2।। प्रभुकेँ चित्तमे अपन भक्तसभक कयलगेल भूल दृ चूक याद नहि रहैछ ;ओ ओहिकेँ बिसरि जाइत छथिद्ध आओर हुनक हृदय ;केँ अच्छाई . नीकीद्ध केँ सै.सै बेरि याद करैत रहैत छथि । जाहि पापक कारणेँ ओ बालिकेँ व्याध जेकाँ मारने छलाहए तेहने कुचालि फेर सुग्रीव चलल ।।3।। वएह करनी विभीषणक छलए मुदा श्रीरामचन्द्रजी सपनहुमे ओकर विचार नहि कयलाह । उनटहि भरतजीसँ भेटकाल श्रीरघुनाथजी हुनक सम्मान कयलन्हि आओर राजसभामे सेहो हुनक गुणक बखान कयलन्हि ।।4।। प्रभु ;श्रीरामचन्द्रजीद्ध तँ वृक्षक निच्चाँ आओर बानर डाल्हिपर ;अर्थात कतय मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी आओर कतय गाछक डाल्हिसभपर कूदयवाला बानर ।द्ध मुदा एहन बानरसभकेँ सेहो ओ अपने जेकाँ बना लेलन्हि । तुलसीदासजी कहैत छथि जे श्रीरामचन्द्रजी दृ जैकाँ शीलनिधान स्वामि कतहुटा नहि अछि ।।29 ;कद्ध।। हे श्रीरामजी ! अपनेक अच्छाईसँ सभक नीक अछि ;अर्थात अपनेक कल्याणमय स्वभाव सभक कल्याण करयवाला अछिद्ध । जौं ई बात साँच अछि तँ तुलसीदासक सेहो कल्याणे होयत ।।29 ;खद्ध।। एहि तरहेँ अपन गुण दोषसभकेँ कहिकय आओर सभकेँ फेर माथ नवाय हम श्रीरघुनाथजीक निर्मल यश वर्णन करैत छी जाहिकेँ सुनलासँ कलियुगक पाप नष्ट भय जाईत अछि ।।29 ;गद्ध।। मुनि याज्ञवलक्यजी जे सोहनगर कथा मुनिश्रेष्ठ भारद्वाजजीकेँ सुनयने छलाहए सएह संवादकेँ हम बखानिकय कहबए सभ सज्जन सुखक अनुभव करैत ओहिकेँ सुनू ।।1।। शिवजी पहिने एहि सोहनगर चरित्रकेँ रचलाह ए फेर कृपा कय पार्वतीजीकेँ सुनयलाह । वएह चरित्र शिवजी काकभुशुण्डिजीकेँ रामभक्त आओर अधिकारि चीन्हिकय देलाह ।।2।। ओहि काकभुशुण्डिजीसँ फेर याज्ञवाल्क्यजी पौलाह आओर ओ फेर ओहिकेँ भारद्वाजजीकेँ गाविकय सुनयलाह । ओ दुनू वक्ता आओर श्रोता ;याज्ञवलक्य आओर भरद्वाजद्ध समान शीलवाला आओर समदर्शी छथि आओर श्राहरिक लीलाकेँ जानैत छथि ।।3।। ओ अपन ज्ञानसँ तीनू कालक बातकेँ तरहत्थीपर रखने धात्रीक जेकाँ ;प्रत्यक्षद्ध जानैत छथि । आओर सेहो जे सुजान ;भगवान् क लीलासभक रहस्य जानयवालाद्ध हरिभक्त छथिए ओ एहि चरित्रकेँ नाना प्रकारसँ कहैत ए सुनैत आओर समझैत छथि ।।4।। फेर वएह कथा हम वाराह दृ क्षेत्रमे अपन गुरुजीसँ सुनलहुँय मुदा ताहिकाल हम बालपनक कारणेँ बड बेसमझ छलहुँ ताहिसँ ओहिकेँ ओहिप्रकारेँ ;नीक जेकाँद्ध बुझलहुँ नहिं ।।30 ;कद्ध।। श्रीरामजीक गूढ कथाकेँ ;कहयवालाद्ध आओर श्रोता ;सुनयवालाद्ध दुनूटा श्रानक खजाना ;पूर ज्ञानीद्ध होईत छथि । हम कलियुगक पापसभसँ ग्रसल महामूढ जड जीव भला ओहिकेँ कोना बूझि सकितहुँ ।।30 ;खद्ध।। तथापियो गुरुजी जखन बेरि.बेरि कथा कहलन्हिए तखन बुद्धिक अनुसारेँ किछु बुझना गेल । वएह आब हमरासँ भाषामे रचल जायतए जाहिसँ मरा मनकेँ सन्तोष हो ।।1।। जेनाँ किछु हमरामे बुद्धि आओर विवेकक बल अछिए हम हृदयमे हर प्रेरणासँ ताहिक अनुसारेँ कहब । हम अपन संदेहए अज्ञान आओर भ्रमकेँ हरयवाला कथा रचैत छीए जे संसाररूपि नदीकेँ पार करबाकलेल नाव अछि ।।2।। रामकथा पण्डितसभकेँ विश्राम देवयए सभ मनुष्यसभकेँ प्रसन्न करय आओर कलियुगक पापसभक नाश करन्हिहार अछि । रामकथा कलियुरूपि साँपक लेल मयूरनी अछि आओर विवेकरूपि अग्निकेँ प्रकट करबााकलेल अरणि ;मन्थन करबाक लकडीद्ध अछिए ;अर्थात एहि कथासँ ज्ञानक प्राप्ति होईत अछिद्ध ।।3।। रामकथा कलियुमे सभ मनोरथकेँ पूर्ण करन्हिहार कामधेनु गौ अछि आओर सज्जनवृंदक लेल सुन्नर संज्जीवनि जडी अछि । पृथ्वीपर इएह अमृतक नदी अछिए जन्म . मरणरूपि भयकेँ नाश करन्हिहार आओर भ्रमरूपि बेंगसभकेँ खयबाक लेल सर्पिणि अछि ।।4।। ई रामकथा असुरसभकेँ सेनाक जेकाँ नरकसभकेँ नाश करन्हिहार आओर साधुरूप देवतासभकेँ कुलक हित करन्हिहार पार्वती ;दुर्गाद्ध अछि । ई संत.समाजरूपि क्षीरसमुद्रक लेल लक्ष्मीजीक समान अछि आओर सम्पूर्ण विश्वक भार उठाबयमे अचल पृथ्वीक समान अछि ।।5।। यमदूतसभक मुँहपर करिखा लगेबा लेल ई जगतमे यमुनाजीक समान अछि आओर जीवसभकेँ मुक्ति देबाकलेल बुझू काशिए अछि । ई श्रीरामजीकेँ पवित्र तुलसी जेकाँ प्रिय अछि आओर तुलसीदासक लेल हुलसी ;तुलसीदासजीक मायद्ध जेकाँ हृदयसँ हित करन्हिहार अछि ।।6।। ई रामकथा शिवजीकेँ नर्मदाजीक समान प्रिय अछिए ई सभ सिद्धिसभक आ सुख . सम्पत्तिक राशि अछि । सद्गुणरूपि देवतासभकेँ उत्पन्न आओर पोषबाकलेल माता अदितिक समान अछि । श्रीरघुनाथजीक भक्ति आओर प्रेमक परम सीमा जेकाँ अछि ।।7। तुलसीसजी हैत छथि जे रामकथा मन्दाकिनि नदी अछिए सुन्नर ;निर्मलद्ध चित्त चित्रकूट अछिए आओर सुन्नर स्नेहेँ वन अछिए जाहिमे श्रसीतारामजी विहार करैत छथि ।।31।। श्रीरामचन्द्रजीक चरित्र सुन्नर चिनतामणि अछि आओर संतसभक सुबुद्धिरूपि स्त्रीक सुन्नर श्रृंगार अछि । श्रीरामचन्द्रजीकेँ गुणसमूह जगत् क कल्याण करन्हिहार आओर मुक्तिए धनए धर्म आओर परमधामकेँ देवयवाला अछि ।।1।। ज्ञानए वैराग्य आओर योगकलेल सदगुरु आओर संसाररूपि भयंकर रोगक नाश करबालेल देवतासभक बैद ;अश्विनीकुमारद्ध जेकाँ अछि । ई श्रीरामचन्द्रजीकेँ प्रेमकेँ उत्पन्न करबालेल माता . पिता छथि आओर सम्पूर्ण व्रतए धर्म आओर नियमसभक बीज छथि ।।2।। पाप संताप आ शोकक नाश करयवाला आओर एहि लोक आओर परलोककेँ प्रिय पालन करन्हिहार छथि । विचार ;ज्ञानद्ध रूपि राजाकेँ शुरवीर मन्त्री आओर लोभरूपि आपार समुद्रकेँ सोखबाकलेल अगस्त्य मुनि छथि ।।3।। भक्तगणक मनरूपि वनमे बसयवाला कामए क्रोध आओर कलियुगकेँ पापरूपि हाथीसभकेँ मारबाक लेल सिंहक बच्चा अछि । शिवजीक पूज्य आओर प्रियतम अतिथि छथि आओर दरिद्रतारपि दावानलकेँ बुतयबाक लेल कामना पूर्ण करन्हिहार मेघ छथि ।।4।। विषयरूपि साँपक विष उतारबालेल मंत्र आओर महामणि अछि । ई ललाटपर लिखलगेल कठिनतासँ मेटायवाला अधलाह लेखसभकेँ ;मंग प्रारब्धद्ध मेट देवयवाला अछि । अज्ञानरूपि अन्हारकेँ हरण करबाकलेल सूर्यकिरिणक जेकाँ आओर सेरूपि धानकेँ करबालेल मेघकेँ समान अछि ।।5।। मनोवाञ्छित वस्तु देवयमे श्रेष्ठ कल्पवृक्ष समान अछि आओर सेवा करबामे हरि दृ हरकेँ जेकाँ सुलभ आओर सुख देवयवाला अछि । सुकविरूपि शरद् ऋतुक मनरूपि आकाशकेँ सुशोभित करबालेल तरेगणक समाने आओर श्रीरामजीक भक्तसभक तँ जीवनधने अछि ।।6।। सम्पूर्ण सुकृतक फल महान भोगक समाने अछि । सेवकसभक मनरूपि मानसरोवरकेँ लेल हंस जेकाँ आओर पवित्र करबामे गंगाजीक तरंगमालाक समाने अछि ।।7।। श्रीरामजीक गुणसभक समूह कुमार्गए कुचालि आओर कलियुगक कपटए दम्भ आओर पाखण्डकेँ जरयबाक लेल ओहने अछि जेनाँ ईंधनक लेल प्रचंड अग्नि ।।32;कद्ध।। रामचरित्र पूर्णिमाक चानक किरिणक जेकाँ सभकेँ सुख देवयवाला अछिए मुदा सज्जनरूपि कुमुदिनि आओर चकोरक चित्तक लेल तँ विशेष हितकर आओर महान लाभदायक अछि ।।32;खद्ध।। जाहि तरहेँ श्रीपार्वतीजी श्रीशिवजीसँ प्रश्न कयलन्हि आओर जाहि तरहेँ श्रीशिवजी विस्तारसँ ओकर उत्तर कहलन्हिए ओ सभ कारणेँ हम विचित्र कथाक रचना कय गाबिकय कहब ।।1।। जे ई कथा पहिने नहि सुनने होइथए ओ एहिकेँ सुनिकय आश्चर्य नहि करौथ । जे ज्ञानी एहि विचित्र कथाकेँ सुनने छथिए ओ ई जानिकय आश्यर्य नहि करैथ कि संसारमे रामकथाक कोनो सीमा नहि अछि ;रामकथा अनन्त अछिद्ध । हुनक मनमे एहन विश्वास रहैत अछि। नाना प्रकारसँ श्रीरामचन्द्रजीक अवतार भेल अछि आओर सै करोड आ अपार रामायण अछि ।।2.3।। कल्पभेदक अनुसारेँ श्रीहरिक सुन्नर चरित्रकेँ मुनिश्वरगण अनेको प्रकारसँ गयलन्हि अछि । हृदयमे एहन विचारिकय संदेह जुनि करू आओर आदरसंग प्रेमसँ एहि कथाकेँ सुनू ।।4।। श्रीरमचन्द्रजी अनन्त छथिए हुनक गुण सेहो अनन्त छन्हि आओऱ हुनक कथाक विस्तार सेहो असीम अछि । तेँ जिनक विचार निर्मल छन्हिए ओ एहि कथाकेँ सुनिकय आश्चर्य नहि मानताह ।।3।। एहि प्रकारेँ सभ संदेहसभकेँ फटकिकय आओर श्रीगुरूजीक चरणकमलक रजकेँ माथपर धारणकय हम फेर हाथ जोडिकय सभक विनती करैत छीए जाहिसँ कथाक रचनामे कोनो दोष स्पर्श नहि करय ।।1।। आब हम आदरपूर्वक श्रीशिवजीकेँ माथ नवाकय श्रीरामचन्द्रजीकेँ गुणसभक निर्मल कथा कहैत छी । श्रीहरिक चरणपर माथ राखिकय संवत 1631 मे एहि कथाकेँ आरम्भ करैत छी ।।2।। चैत मासक नौमी तिथि मंगल दिनकय श्रीअयोध्याजीमे ई चरित्र प्रकाशित भेल । जाहि दिन श्रीरामजीक जन्म होईत अछिए वेद कहैत छथि जे ओहि दिन सभटा तीर्थ ओतय ;श्रीअयोध्याजीमेद्ध चल आबैत अछि ।।3।। असुरए नागए पक्षीए मनुष्यए मुनि आओर देवता सभ अयोध्याजीमे आबिकय श्रीरघुनाथजीक सेवा करैत छथि । बुझनिकगण जन्मक महोत्सव मनावैत छथि आओर श्रीरामचन्द्रजीक सुन्नर कीर्तिक गान करैत छथि ।।4।। सज्जन सभक बहुत दृ रास समूह ओहि दिन श्रीसरयूजीक पवित्र जलमे स्नान करैत छथि आओर हृदयमे सुन्नर श्यामशरीर श्रीरघुनाथजीक ध्यान कय हुनक नाँओक जाप करैत छथि ।।34।। वेद दृ पुराण कहैत छथि कि श्रीसरयुजीक दर्शनए स्पर्शए स्नान आओर जलपान पापसभकेँ हरैत अछि । ई नदी बड पवित्र अछिए एकर महिमा अनन्त अछिए जाहिकेँ विमल बुद्धि सरस्वतीजी सेहो नहि कहि सकैछ ।।1।। ई शोभयमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजीक परम धाम केँ देन्हिहार अछिए सभ लोकसभमे प्रसिद्ध आओर अत्यंत पवित्र अछि । जगत् मे ;अण्डजए स्वेदजए उद्भिज आओर जरायुजद्ध चारिटा खानि ;प्रकारद्ध केँ अनन्त जीव छथि ए एहिमेसँ जे कियो अयोध्याजीमे शरीर छोरैत छथि ओ फेर संसारमे नहि आबैछ ;जन्म.मृत्युकेँ चक्रसँ छूटिकय भगवानकेँ परमधाममे निवास करैत छथिद्ध ।।2।। एहि अयोध्यापुरीकेँ सभ प्रकारसँ मनोहरए सभटा सिद्धिसभकेँ देन्हिहार आओर कल्याणक खान बूझिकय हम एहि निर्मल कथाक आरम्भ कयलहुँए जाहिकेँ सुनलासँ कामए मदए आओर दम्भ नष्ट भय जाईत अछि ।।3।। एहि नाम रामचरितमानस अछिए जाहिकेँ कानसँ सुनलासँ शान्ति मिलैत अछि । मनरूपि हाथी विषयरूपि दावानलमे जरि रहल अछिए ओ जौं एहि रामचरितमानसरूपि सरोवरमे आबि जाय तँ सुखि भय जाय़ ।।4।। ई रामचरितमानस मुनिसभकेँ प्रिय अछि ए एहि सोहनगर आओर पवित्र मानसकेँ शिवजी रचलन्हि । ई तीनू प्रकारक दोषए दुरूख आओर दरिद्रताकेँ आ कलियुगक कुचालिसभक आओर सभटा पापसभक नाश करन्हिहार अछि ।।5।। श्रीमहादेवजी एहिकेँ रचिकय अपन मनमे रखने छलाह आओर सुअवसर पाविकय पार्वतीजीकेँ कहलन्हि । ताहिसँ शिवजी एहिकेँ अपन हृदयमे देखिकय आओर प्रसन्न भय एहिक सुन्नर ष्रामचरितमानसष् नांव रखलाह ।।6।। हम सएह सुख देनहार सोहनगर रामकथाकेँ कहैत छीए हे सज्जनवृंद ! आदरपूर्वक मन लगाकय ई सुनू ।।7।। ई रामचरितमानस जेनाँ अछिए जाहि तरहेँ बनल अछि आओर जाहि हेतुसँ जगतमे एकर प्रचार भेलए आब वएह सभ कथा हम श्रीउमा.महेश्वरक स्मरण कय कहैत छी ।।35।। श्रीशिवजीक कृपासँ ओकर हृदयमे सुन्नर बुद्धिक विकास भेलए जाहिसँ ई तुलसीदास श्रीरामचरितमानसकेँ कवि भेल । अपन बुद्धिक अनुसारेँ तँ ओ एहिकेँ मनोहरे बनावैत अछि । मुदा तखनो हे सज्जनवृंद ! सुन्नर चित्तसँ सुनिकय एहिकेँ अपने सुधारि लेब ।।1।। सगुण लीलाक जे विस्तारसँ वर्णन करैत छथिए वएह राम.सुयशरूपि जलक निर्मलता अछिए जे मलक नाश करैत अछिय आओर जाहि प्रेमभक्तिक वर्णन नहि कयल जा सकैछए वएह जलक मधुरता आओर सुन्नर शीतलता अछि ।।3।। ओ ;राम.सुयशरूपिद्ध जल सत्कर्मरूपि धानक लेल हितकर अछि आओर श्रीरामजीक भक्तसभक तँ जिवने अछि । ओ पवित्र जल बुद्धिरूपि पृथ्वीपर खसल आओर समटाकय सोहनगर कानरूपि मार्गसँ चलल आओर मानस ;हृदयद्ध रूपि श्रेष्ठ स्थानमे भरिकय ओतहि स्थिर भय गेल । वएह पुरनाकय सुन्नरए रुचिगरए शीतल आओर सुख देनहार भय गेल ।।4.5।। एहि कथामे बुद्धिसँ विचारिकय जे चारिटा अत्यंत सुन्नर आओर उत्तम संवाद ;भुशुण्डि.गरुडए शिव.पार्वतिए याज्ञवलक्य.भरद्वाज आओर तुलसीदास आओर संतद्ध रचल अछिय वएह एहि पवित्र आओर सुन्नर सरोवरकेँ चारिटा मनोहर घाट अछि ।।36।। सातटा काण्डे एहि मानस.सरोवरक सुन्नर सातटा सिढी अछिए जिनकी ज्ञानरूपि आँखिसँ देखितहि मन प्रसन्न भय जाइत अछिए श्रीरघुनाथजीक निर्गुण ;प्राकृतिक गुणसभसँ अतीतद्ध आओर निर्बाध ;एकरसद्ध महिमाक जे वर्णन कयल जायतए वएह एहि सुन्नर जलक अथाह गहराई अछि ।।1।। श्रीरामचन्द्रजी आओर श्रीसीताजीक यश अमृतकसमाने जल अछि । एहिमे जे उपमासभ देल गेल अछि वएह तरंगसभक मनोहर विलास अछि । सुन्नर चौपाईयेसभ एहिमे घनगर पसरल पुरइन ;कमलिनीद्ध अछि आओर कविताक युक्तिसभ सुन्नर मणि ;मोतीद्ध उत्पन्न करन्हिहार सोहनगर सीपसभ अछि ।।2।। जे सुन्नर छन्दए सोरठा आओर दोहासभ अछिए वएह एहिमे बहुरंगा कमलसभक समूह सुशोभित अछि । अनुपम अर्थए ऊँच भाव आओर सुन्नर भाषे पराग ;पुष्परजद्धए मकरन्द ;पुष्परसद्ध आओर सुगंध अछि ।।3।। सत्कर्मसभ ;पुण्यसभद्ध केँ पुंज भौंरासभक सुन्नर पाँति अछिए ज्ञान बिराग आओर विचार हंस अछि । कविताक ध्वनि वक्रोक्तिए गुण आओर जाईते अनेको प्रकारक माँछ अछि ।।4।। अर्थए धर्मए कामए मोक्ष. ई चारूए ज्ञान.विज्ञानक विचारिकय कहनिए काव्यकेँ नौटा रसए जापए तपए योग आओर वैराग्यक प्रसंग. ई सभ एहि सरोवरकेँ सुन्नर जलचर जीव छथि ।।5।। सुकृति ;पुण्यात्माद्ध गणलोकनिकेंए साधुलोकनिकेँ आओर श्रीरामनामेक गुणसभक गाने विचित्र जलपक्षिसभक समान अछि । संतसभक सभे एहि सरोवरकेँ चारु दिशक अमराई ;आमकगाछीद्ध छथि आओर श्रदधा वसंत ऋतुकेँ समान कहल गेल अछि ।।6।। नाना प्रकारसँ भक्तिक निरुपण आओर क्षमाए दयाए आ दम ;इन्द्रियनिग्रहद्ध लतासभक मण्डप अछि । मनक निग्रहए यम ;अहिंसाए सत्यए अस्तेयए ब्रम्हचर्य आओर अपरिग्रहद्धए नियम ;शौचए संतोषए तपए स्वाध्याय आओर ईश्वरप्रणिधानद्ध टा हिनक फूल छन्हि आओर श्रीहरिकेँ चरणमे प्रेमे एहि ज्ञानरूपि फलक रस अछि । ई वेदसभक कहब थीक ।।7।। एहि ;रामचरितमानसद्ध मे आओरो जे अनेको प्रसंगसभक कथा सभ अछि ए वएह एहिमे सूगाए कोईली आदि रंग.बिरंगक पक्षी अछि ।।8।। कथामे जे रोमाञ्च होईत अछिए वएह वाटिकाए बाग आओर वन छथि य आओर जे सुख होईत अछिए वएह सुन्नर पक्षीसभक विहार अछि । निर्मल मने माली अछि जे प्रेमरूपि जलसँ सुन्नर आँखि द्वारा हुनका पटावैत ;सींचैतद्ध अछि ।।37।। जे कियो एहि चरित्रकेँ सरियाकय गाबैत छथिए वेह एहि पोखरिक रखवार छथि आओर जे स्त्री.पुरुष सदा आदरपूर्वक एहिकेँ सुनैत छथि ए वएह एहि सुन्नर मानसकेँ अधिकारि उत्तम देवता छथि ।।1।। जे अति दुष्ट आओर विषयी अछि ओ भाग्यहीन बौकला आ कौव्वा अछिए जे एहि सरोवरक समीप नहि जाईछ । किएकतँ एतय ;एहि मानस.सरोवरमेद्ध डोकाए बेंग आ सेवार जेकाँ विषय.रसक नाना तरहक कथा नहि अछि ।।2।। तेँ बेचारा कौआ आओर बौकलारूपि विषयी लोक एतय आबयसँ हृदयमे हारि मानि जाईत अछि । किएकतँ एहि सरोवरधरि आबयमे बड कठिनाइ अछि । श्रीरामजीक कृपाक बिनु एतय नहि आयल जा सकैछ ।।3।। घोर कुसंगेटा भयानक अधलाह बाट अछि य तहि कुसंगिसभक वचने बाघए सिंह आओर साँप अछि । घरक काम.काज आ गृहस्तिक भाँति.भाँतिक जंजाले अत्यंत दुर्गम पैघ.पैघ पहाड अछि ।।4।। मोहए मद आओर माने बड रास बीहड वन अछि आओर नाना प्रकारक कुतर्के भयानक नदीसभ अछि ।।5।। जिनका संगमे श्रद्धारूपि बटखर्चा नहि छन्हि आओर संतसभक संग नहि छन्हि आओर जिनका श्रीरघुनाथजी प्रिय नहि छन्हिए हुनकालेल ई मानस अत्यन्ते अगम अछि । ;अर्थात श्रद्धाए सत्संग आओर भगवत्प्रेमक बिनु कियो एहिकेँ नहि पावि सकैछद्ध ।।38।। जौं कोनो मनुष्य कष्ट उठाकय ओतय धरि पहूँचो जाय तँ ओतय जाइतहि ओकरा नींद्रारूपि जूडि आबि जाइत छैक । हृदयमे मूर्खतारूपि बड कडगर जाड लागय लागैत छैकए जाहिसँ ओतय जाइयोकय ओ अभागा स्नान नहि कय पावैत अछि ।।1।। ओकरा बूतेँ ओहि सरोवरमे स्नान आओर ओकर जलपान तँ कयल नहि जाइछए ओ अभिमानसहित फिरि आबैत अछि । तखन जे कियो ओकरासँ ख्ओतयकेँ हाल, पूछय आबैत अछिए तँ ओ ख्अपन अभागक बात नहि कहि, सरोवरक कुचेष्टा कय ओकरा समझाबैत अछि ।।2।। ई सभटा विध्न ओकरा नहि व्यापैछ ;बाधा नहि दैछद्ध जकरा श्रीरामचन्द्रजी सुन्नर कृपाक दृष्टिसँ देखैत छथि । वएह आदरपूर्वक एहि सरोवरमे स्नान करैत अछि आओर महान् भयानक त्रितापसँ ;आध्यात्मिकए आधिदैविकए आधिभौतिक तापसँद्ध नहि जरैछ ।।3।। जिनक मनमे श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे सुन्नर प्रेम अछिए ओ एहि सरोवरकेँ कहियो नहि छोरैछ । हे भाई ! जे कियो एहि सरोवरमे स्नान करय चाही से मन लगाकय सत्संग करौथ ।।4।। एहन मानस सरोवरकेँ हृदयक आँखिसँ देखिकय आओर ओहिमे डुब्बी मारिकय कविक बुद्धि निर्मल भय गेलए हृदयमे आनंद आओर उत्साह भरि गेल आओर प्रेम आ आनंदक प्रवाह उमडि आयल ।।5।। ताहिसँ ओ सुन्नर कवितारूपि नदी बहि गेलए जाहिमे श्रीरामजीक निर्मल यशरूपि जल भरल अछि । एहि ;कवितारूपिणी नदीद्धक नाम सरयू अछिए जे सम्पूर्ण सुन्नर मंगलसभक जडि अछि । लोकमत आओर वेदमत एहिक दूटा सुन्नर किनार अछि ।।6।। ई सुन्नर मानस.सरोवरक कन्या सरयू नदी बड पवित्र अछि आओर कलियुगक ख्छोट.पैघ, पापरूपि तिनका आओर वृक्षसभकेँ जडिसँ उखारिकय फेकन्हिहार अछि ।।7।। तीनू प्रकारक श्रोतासभक समाजे एहि नदीक दुनू किनारपर बसल पुरए गाँव आओर नगर छथि य आओर संतसभक सभाएटा सभटा सुन्नर मंगलसभक जडि अनुपम अयोध्याजी छथि ।।39।। सुन्नर कीर्तिरूपि सोहनगर सरयूजी रामभक्तिरूपि गंगाजीमे जा मिलिलन्हि । अनुज लक्ष्मणसहित श्रीरामजीक युद्धक पवित्र यशरूपि सोहनगर महानद सोन ओहिमे आबि मिलल ।।1।। सेवा करबामे आशुतोष Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली 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Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २७९ म अंक ०१ अगस्त २०१९ (वर्ष १२ मास १४० अंक २७९)