VIDEHA — Issue 280 / अंक २८०

Publication: VIDEHA · Issue: 280
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २८० म अंक १५ अगस्त २०१९ (वर्ष १२ मास १४० अंक २८०) 'विदेह' २८० म अंक १५ अगस्त २०१९ (वर्ष १२ मास १४० अंक २८०) ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- मैथिली साहित्य-रचनाक क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलक आगमन ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- पाइक इज्जत प्रदीप पुष्प गजल- 1 लगलेमे हीया हारि लेबै हम छातीमे मुक्का मारि लेबै हम हमरा नै मिललै चान गगनक तेँ करबै की डिबिये बारि लेबै हम खगता कनिको नै दऽर दियादक आब आँगनमे अमती गाड़ि लेबै हम कलपै बाजै बेटी तिलक कारण डिब्बा पेट्रोलक ढारि लेबै हम जेबीमे रखने छी प्रशासन हम क्यो एगो लेतै चारि लेबै हम (2222221222सभ पाँतिमे। तेसर शेरक अन्तिम लघु छूट तौर पर लेल गेल अछि) गजल- 2 फ्रेम टांगल छै चित्र उखाड़ि देलौं कानि भरि मोन तोरा बिसारि देलौं पएर ठमकल तोहर दलान लऽग जे छाती पाथर कऽडेग ससारि देलौं आस छल जिनगी रचबै गजल जेना बहर कठिन छै हम हिया हारि देलौं देखल नै गेल पराजय तोहर तेँ हम अपने अपनाकेँ बजारि देलौं तूँ पीठेमे चक्कू भोकबेँ कते तोरा लेल छाती उघारि देलौं चान धरि पहुँचब नै लिखल छल हमरा मोनकेँ हम सीढ़ीसँ उतारि देलौं (2222222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।) उमेश मण्डल मैथिली साहित्य-रचनाक क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलक आगमन :: श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक जन्म 5 जुलाई 1947इस्वीमेमधुबनी जिलाक बेरमा गाममे भेलन्हि। हिन्दी ओ राजनीति शास्त्र विषयसँ एम.ए. कए ई अपन जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यकेँ अपनौलन्हि। एहि प्रसंगमे मण्डलजी स्वयं ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासक ‘अप्पन बात’मे लिखने छथि- “जहियाएम.ए.कविद्यार्थीरहीतहिएनोकरीसँविरागभऽगेल।आठबीघाजमीनरहए।खेतीसँजीवन-यापनकरैकबिसवासभऽगेल।बिनुगार्जनक–पुरुषगार्जनक-परिवार 1960 ईस्‍वीमेभऽगेल।पितेक अमलदारीसँदूभाँइपिसियौतरहैछला।तत्कालगार्जनीहुनकेदुनूभाँइपर छेलैन।कोसीकउपद्रवसँभागलपीसाबेरमेमानेसासुरेमेरहिगेलरहैथ‍। ..पिताकमृत्युकसमयतीनबर्खकहमआछहबर्खकजेठभायछला।पिसियौतभाए 1960 ईस्‍वीमेअपनगाम‘हरिनाही’ चलिगेला।दुनूभाय, श्री कुलकुल मण्डल 1954 इस्वीमे आ हम 1957 इस्वीमे गामकस्कूलसँनिकैलअपरप्राइमरीस्कूलकछुबीमेनाओंलिखौनेरही। 1960 ईस्‍वीसँपरिवारकबोझपड़ल।पुरुषविहीनभेनौंमाएओहनपरिवारकछेली, जइपरिवारमेमामा 1942 ईस्‍वीमेअंग्रेजकगोलीखाचुकलछला।साहसीमाए।अपनगहना, जमीनबेचदेलबच्चाकेँपढ़बैखातिर। पैंतीससालधरिसमाजसेवाकेला पछाइत अपनहहरैतशरीरदेख‍किछुलिखै-पढ़ैकविचारजगल।” 2000 इस्वी धरि जगदीश प्रसाद मण्डलजी समाजसेवामे संलग्न रहलाह। रूढ़िएवम्सामन्तीव्यवहारकखिलाफलड़ाइ लड़ैत रहलाह, केस-मोकदमा, जहलयात्रादिमे हिनक लगभग चारि दसक समय बीतिलन्हि, पछाइतसाहित्यलेखनमे एलाह। पहिल रचना औपन्यासिक कृति ‘मौलाइलगाछकफूल’ थिकन्हि जे 2004 ईस्‍वीमेलिखलाह। 2008 इस्वी धरिक अवधिमे पाँच गोट उपन्यास, एक नाटकतथा किछु कथादि लीखि चुकल छलाह। मुदा कोनहु पत्र-पत्रिकादिमे एकहु गोट रचना प्रकाशित नहि भेल रहनि। तथापि हिनक कलम, लिखबाक क्रम जारी रहलन्हि- प्रस्तुत अछि एहि प्रसंगमे हुनकहि लिखल बात- “मौलाइलगाछकफूल 2004 ईस्‍वीमेलिखलपहिल उपन्यासछी।अखनधरिपाँचटाउपन्यासआकिछुकथा, लघुकथा, नाटकसभअछि।छपबैकजेमजबूरीबहुतोरचनाकारकेँछैन‍सेहमरोरहल।मुदातइसँलिखैकक्रमनैटुटल।‘भैंटकलावा’ कथासेहोदू-हजारचारिकपहिलकथाछी।” 8 नवम्बर 2008 मे मिथिलाक प्रसिद्ध ‘सगर राति दीप जरय’क 64म कथा गोष्ठी डॉ. अशोक अविचलक संयोजकत्वमे हुनक गाम- रहुआ संग्राम (मधेपुर)मे आयोजित भेल छल जाहिमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी उपस्थित भऽ‘भैंटक लावा’ कथा केर पाठ कएलनि। एहि गोष्ठीमे भाग लेबाक आग्रह डॉ. तारानन्द ‘वियोगी’ कयने रहनि।सगर राति दीप जरयक गोष्ठीमे भाग लेबए लेल आयोजक/संयोजकक हकार अनिवार्य नहि होइछ। कोनहु माध्यमसँ पता चलल वएह थिक हकार। ‘वियोगीजी’सँ जगदीश प्रसाद मण्डलक पहिल भेँट 2008 इस्वीमे मधुबनीमे भेल छलन्हि। साहित्य क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पहिल मंच रहुआ संग्राम 64 सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीकेँ कहल जा सकैछ। जाहिठामसँ हुनक रचना सार्वजनिक हएब शुरू भेल। ओना, पहिनेबेरमा पंचायत आ रहुआ संग्राम, दुनू मधेपुर ब्लौकक अन्तर्गत पड़ैत छल। जे कि जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कर्म क्षेत्र रहल छन्हि। समर्पित समाजसेवीक क्रिया-कलाप रहल छन्हि। “8.11.2008 लक्ष्मीनाथगोसाँइकस्थानमेकार्यक्रमभेल छल। ओना, केतेकबेरराजनीतिकमंचपररहुआमेबाजिचुकलछेलौं, कर्मक्षेत्रछल तँएकथावचैमेसंकोचनइभेल।” 2008 इस्वीसँ पूर्व जगदीश प्रसाद मण्डलजीक एकहु गोट रचना सार्वजनिक नहि भेल छलन्हि। कोनहुँ पत्र-पत्रिकादिमे प्रकाशित नहि भेल छलन्हि। पहिल रचना ‘घर बाहर- पटना’सँ प्रकाशित भेलन्हि। जाहि कथाक पाठ रहुआ संग्राममे कयने छलाह, आ प्रशंसा भेल छलन्हि। द्रष्टव्य अछि के सभप्रशंसाकयने रहन्हि- “डॉ. रमानन्दझा‘रमण’जीओकथामांगिलेलैन।किछुएमासकउपरान्त‘घरबाहर’ पत्रिकामेप्रकाशितकेलैन।सिद्धपुरुषकस्थानमेप्रतिष्ठाभेटल।डायरी-कलमभेटल।गमछा-पागभेटल।लक्ष्मीनाथगोसाँइकमुर्तिसेहोभेटल।” घर-बाहरमे एक आर रचना (कथा) प्रकाशित भेलन्हि। पछाति ‘मिथिला दर्शन- कोलकाता’मे ‘चुनवाली’ नामक कथा प्रकाशित भेलनि। चुनवाली, भैंटक लावा आ बिसाँढ़, कथा प्रकाशित होइतहि ‘विदेह’क सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरजीसँ सम्पर्क भेलन्हि। तकर बाद मण्डलजीक रचना सभ पुस्तकाकार रूपमे प्रकाशित हुअ लगलन्हि। एहि सन्दर्भमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी ‘अप्पन बात’मे लिखलन्हि अछि- “घरबाहरमेभैंटकलावाआबिसाँढ़छपलआफेरमिथिलादर्शनमे‘चुनवाली’ कथापढ़ितेअनेकोबधाइफोनआएलजेना- पञ्जीकारविद्यानन्दझाजीक।एकटामहत्वपूर्णफोनश्रीगजेन्द्रठाकुरजीकरहल।हिनकरफोनसुनितेजिनगीकओहनचौबट्टीटपिगेलौंजेचौबीसघन्टाकखुशीमनमेआबिगेल।” 2009 सँ 2013 इस्वीक बीच जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल छन्हि। जाहिमे हिनका एक्कहु पाइ प्रकाशनक हेतु नहि देबए पड़लन्हि। ई चीज स्पष्ट होइछ दू ठामसँ, पहिल जे लेखक स्वयं अपन ‘तरेगन’ पोथीक मनमनियाँमे लिखने छथि- “समय-समयपरगजेन्द्रजी (श्रीगजेन्द्रठाकुर, मेंहथ)कआग्रहआसुझावआसंगहिश्रुतिप्रकाशनकश्रीनागेन्द्रकुमारझाआश्रीमतीनीतूकुमारीकभरपुरसहयोगभेटलासँलिखैकनवउत्साहोआआशोमनकेँसक्कतबनादेनेअछि।” आ दोसर ‘अंशु’ समालोचनाक पोथीमे श्री शिव कुमार टिल्लू लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लघुकथा‘बिसाँढ़’ आ‘भैंटकलावा’ घर-बाहरमेआ‘चुनवाली’ मिथिलादर्शनमेप्रकाशितहोइतेमैथिलीपत्रिकाकसंपादकमण्‍डलकसंग-संगप्रबुद्धपाठककमध्‍यहड़होरिमचिगेल।‘पहिनेआउआपहिनेपाउ’कआधारपरविदेहकसंपादकश्रीगजेन्‍द्रठाकुरहिनकरचनासभकेँअपनपत्रिकामेछपबएलेलहथियालेलनि।ऐ‍प्रकारकशब्‍दकप्रयोगकरबाकहमरतात्‍पर्यअछिजेजगदीशजीकोनोनवरचनाकारनैछथि, तिरसठिबर्खकमाँजलसाहित्यकारछथि, मुदाहिनकरचनाकप्रदर्शननैभेलछल।समग्ररचना-संसारहिनकपुत्रश्रीउमेशमण्‍डलजीककम्‍प्‍यूटरमेओझराएलछलकिएकतँछपबैलेकैंचाकेतएसँआएत?” एहि तरहेँ जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आगमन मैथिली साहित्यक दुनियाँमे होइत छन्हि। बिनु पाइक अर्थात् बिनु खर्चेक पोथी प्रकाशन मैथिली साहित्यमे नव उदाहरण छल। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी एकसंग श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेलन्हि। वर्तमानमे ओहि तरहेँ पोथीसभक प्रकाशन पल्लवी प्रकाशन,निर्मलीसँ भऽ रहलन्हि अछि। प्रस्तुत अछि मण्डलजीक आइ धरिक प्रकाशित पोथीक सूची, जाहिमे क्रमश: कथा, उपन्यास, कविता, गीत आ नाटक-एकांकी अछि- कथा- 1. गामकजिनगी (2009), 2. तरेगन (2010), 3. बजन्ता-बुझन्ता (2013), 4. शंभुदास (2013), 5. उलबाचाउर (2013), 6. अर्द्धांगिनी (2013), 7. सतभैंयापोखैर (2013), 8. गामकशकल-सूरत (2014), 9. अपनमनअपनधन (2015), 10. समरथाइकभूत (2014), 11. अप्‍पन-बीरान (2014), 12. बालगोपाल (2014), 13. भकमोड़ (2013), 14. रटनीखढ़ (2014), 15. पतझाड़ (2014), 16. लजबि‍जी (2014), 17. उकड़ूसमय (2015), 18. मधुमाछी (2015), 19. पसेनाकधरम (2015), 20. गुड़ा-खुद्दीकरोटी (2015), 21. फलहार (2015), 22. खसैतगाछ (2015), 23. एगच्छाआमकगाछ (2016), 24. शुभचिन्तक (2016), 25. गाछपरसँखसला (2016), 26. डभियाएलगाम (2016), 27. गुलेतीदास (2016), 28. मुड़ियाएलघर (2016), 29. बीरांगना (2017), 30. स्मृतिशेष (2017), 31. बेटीकपैरुख (2017), 32. क्रान्तियोग (2017), 33. त्रिकालदर्शी (2017), 34. पैंतीससालपछुआगेलौं (2017), 35. दोहरीहाक (2018), 36. सुभिमानीजिनगी (2018), 37. देखलदिन (2018), 38. गपकपियाहुललोक (2018), 39. दिवालीकदीप (2018), 40. अप्पनगाम (2018), 41. खिलतोड़भूमि (2019), 42. चितवनकशिकार (2019) उपन्यास- 1. मौलाइलगाछकफूल (2009), 2. उत्थान-पतन (2009), 3. जिनगीकजीत (2009), 4. जीवन-मरण (2010), 5. जीवनसंघर्ष (2010), 6. नैधाड़ैए (2013), 7. बड़कीबहिन (2013), 8. ठूठगाछ (2015), 9. इज्जतगमाइज्जतबँचेलौं (2017), 10. लहसन (2018), 11. पंगु (2018), 12.आमकगाछी (2018) पद्य- 1. इन्द्रधनुषीअकास (2013), 2. राति-दिन (2013), 3. तीनजेठएगारहममाघ (2013), 4. सरिता (2013), 5. गीतांजलि (2013), 6. सुखाएलपोखरि‍कजाइठ (2013), 7. सतबेध (2018), 8. चुनौती (2019) नाटक/एकांकी- 1. मिथिलाकबेटी (2009), 2. कम्प्रोमाइज (2013), 3. झमेलियाबिआह (2013), 4. रत्नाकरडकैत (2013), 5. स्वयंवर (2013), 6. पंचवटी (2013), 7. कल्याणी (2015), 8. सतमाए (2015), 9. समझौता (2015), 10. तामकतमघैल (2015), 11. बीरांगना (2015) जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ एहि तरहक साहित्य सेवा लेल समय-समयपर सम्मान/पुरस्कार सेहो भेटैत रहलनि अछि। यथा-विदेहसम्पादक मण्डल द्वारा ‘गामक जिनगी’ लघु कथा संग्रह लेल‘विदेहसम्मान- 2011’, बालप्रेरकबीहैनकथासंग्रह ‘तरेगन’लेल ‘विदेह बालसाहित्यपुरस्कार-2012’, तथा ‘नैधारैए’उपन्यास लेल‘विदेहबालसाहित्यपुरस्कार- 2014-15’, ‘गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्यअकादेमी द्वारा-‘टैगोरलिटिरेचरएवार्ड- 2011’, मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- ‘वैदेहसम्‍मान- 2012’, मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- ‘वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’सम्मान- 2016’, रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- ‘कौमुदी सम्मान- 2017’, मैथिली साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा ‘कौशिकीसाहित्यसम्मान- 2015’, आमिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा ‘स्व. बाबूसाहेवचौधरीसम्मान- 2018’ इत्यादि। एहि तरहेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक अनवरत लेखन ने मात्र मैथिली साहित्य जगत बल्कि भारतीय भाषा साहित्यक बीच सेहो अपन स्थान निरूपित करैत अछि। उमेश मण्डल शोधार्थी, बी.आर.ए.बी.यू. मुजफ्फरपुर आशीष अनचिन्हार गजल गदहा सभ सरकार चलेतै लुच्चा सभ दरबार चलेतै जकरा लग ने पैसा कौड़ी से कोना संसार चलेतै जखने जागत सूतल जनता आर चलेतै पार चलेतै काँपै जकर मोन इजोतमे ओ मार कि सम्हार चलेतै बनतै गृहस्थ साधू बाबा साधू सभ परिवार चलेतै सभ पाँतिमे 222-222-22 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल पाइक इज्जत :: आइ सातम दिन सेहो प्रेमानन्द बाबाकेँ पाँच रूपैआ निकैल गेल छैन। ओना ओ पहिलुके दिन बुझि गेल छला जे पाँच रूपैआ निकलल अछि, मुदा बजला किछु ने। से ओही दिन नइ बजला से बात नहि, छअ दिन तक मुँह बन्न केने रहला। प्रतिदिन पँच-पँच रूपैआ निकललैन। मुँह बन्न रखैक कारण परिवारिक जिनगी छेलैन। झमटगर परिवार छैन, रंग-रंगक लोक रहने रंग-रंगक परिवारिक काज तँ सदिकाल परिवारमे होइते अछि। हेबो केना ने करत। जहिना कोनो झमटगर गाछमे दू-चारिटा पाते कि ठहुरिये सुखल रहैत तहिना ने परिवारो छी। तहूमे नमहर-झमटगर परिवार रहने तँ आरो सोभाविक अछिए। एक पुरखिया गाछमे ने एक-आधटा पात आकि एक-आधटा डारि सुखल रहत, जेकरा हटा देबै, गाछ निरोग भऽ जाएत। ओना, कम आँट-पेट रहने रोगो-वियाधि तँ कम लगबे करैए। मुदा झमटगर परिवार तँ झमटगर-ओझराएल गाछ जकाँ ने होइत अछि जइमे दू-चारिटा पातो आ दू-चारिटा ठहुरियो सदिकाल सुखले रहैए। तँए प्रेमानन्द बाबा मुँह बन्न केने रहला जे अँगने-घरक काजक बात छी, जखन परिवारमे बाबा-दाखिल छीहे तखन जँ परिवार ओइ बले नइ चलए, सेहो तँ नीक नहियेँ कहल जाएत। मुदा केतेक दिन बाबा बले फौदारी चलत। ओ तँ अपने-अपने सिरे ने चलत। तँए कि परिवार नहि चलि सकैए, सेहो बात तँ नहियेँ अछि। ओ तँ परिवारक विचारधारा छी। जइमे स्वच्छ धारा बनि सेहो प्रवाहित होइए आ दुबराएल, पतराएल, मराएल सेहो चलिते अछि। ओना, पाँच रूपैआक महत्ते की भेल? मुदा एक-एक पाइक महत अछि, पाँच तँ ‘पाँच रूपैआ’ भेल। खुदरा जिनगी प्रेमानन्द बाबाक तँए पँचहजारी-दसहजारी नोटक ओतेक महत हुनका-ले नै छैन जेतेक महत खुदरा पाइक छैन। होइते अहिना छै किने जे पाँच रूपैआक काजमे पँचटकही बेसी नीक। तैठाम जँ देबालकेँ दसहजारी देबइ, तँ ओ मने-मन गारि पढ़बे करत किने जे ‘नबाबी देखबए एला हेन!’ तइमे एकटा आरो अछि, रूपैआ तँ लेन-देनक बीचक वौस छी। काज तँ नहि। तैठाम जँ काजक समयकेँ रूपैये गनैमे नष्ट करब तँ अधला भेबे कएल किने। ओना, पँचहजारी-दसहजारी इज्जतखोर अछि सेहो बात नहि। जखन सोना-चानीक दोकानपर जाएब आ पँचटकही नोट देबै तँ ओहो तँ गारि सुनेबे करत किने जे ‘एला हेन हाथी किनैले आ संगमे छैन बकड़िया पाइ!’ खाएर जे अछि से अछि। अपन-अपन दुनियाँ आ अपन-अपन जग-जहान तँ सभकेँ अपन-अपन अछिए। एते तँ मनुख भेने अजादी भेटले अछि किने जे ‘कोइ काहू मगन, कोइ काहू मगन, जे जेहेन मगन से तेहेन पेबन!’ सूर्यास्तक समय। लक्षणसँ प्रेमानन्द बाबाकेँ बुझि पड़लैन जे परिवारमे एके बेकती एहेन अछि जे पाइ निकालैए...। मने-मन धपा कऽ ओकरा सोर पाड़लैन- “सुशील, कनी सुनिहह।” ओना, प्रेमानन्द बाबाक परिवारक सभ-कियो आज्ञाकारी छैन्हे। बाबाक लगमे आबि सुशील बाजल- “की कहलौं, बाबा?” प्रेमानन्द बाबाक सोझा अबैसँ पहिने सुशीलक जाँघ थरथराए लगल जे प्रेमानन्द बाबा आँकि नेने छला। मुदा मनमे पानिक बुलबुला जकाँ उठिये रहल छेलैन जे सुशील अखन हाइ स्कूलक बच्चा छी, परिवेश एहेन बनि गेल अछि जे हाइ-स्कूलक नबे-सँ-पनचानबे प्रतिशत बच्चा नशाक लतसँ प्रभावित भऽ रहल अछि, भलेँ ओ चौकलेटेक रूपमे किएक ने होइत होउ। लत तँ लत छी। एहेन परिस्थितिमे एकटा बाल मनकेँ दुतकारब वा चोरीक कलंक लगा चोर कहब, सेहो उचित नहि। किएक तँ जँ कियो तेसर सुनि लिअए आ भविसमे कहियो यएह बात ओकरा उनटा कऽ कहि दइ जे ‘तूँ चोर छँह’, तखन ओ धब्बा जकाँ ने बनि जाएत! जबकि अखन ओ उदीयमान सुर्ज सदृश अछि। जँ ओकरा गहन जकाँ गरैस लेल जाइ से केहेन हएत? ओ तँ सँपाएल गहुमनक वृत्ति हएत..! मुदा बिनु किछु कहने छोड़ियो देब तँ उचित नहियेँ हएत। मन खोलि कऽ प्रेमानन्द बाबा बजला- “बौआ, औझुका काज-ले पाँचटा रूपैआ रखने छेलौं, से नइ देखै छी..!” सुशील- “हम लेलौं।” साफ धारमे जहिना पाइनो साफ होइत सफा बनि बहैत चलैए तहिना पोताक गढ़पनकेँ गढ़ैत बाबा बजला- “बौआ, दुनियाँमे सभकथूक इज्जतो अछि आ बेइजती सेहो अछि। मानो अछि आ अपमानो अछि।” बाबाक बात सुनि सुशील कान ठाढ़ करैत बाजल- “से की, बाबा?” प्रेमानन्द बाबा बजला- “आम तँ नीक फल छी, दुनियाँ जनैए मुदा जँ कियो पीलुआहा आकि खटहा आमक गाछ रोपि बाग लगौत तँ ओ केहेन हएत?” बाबाक विचारकेँ सुनि सुशील मने-मन अँटकारए लगल जे बाबा कि कहलैन। आम तँ फल छी, तहूमे मीठ फल छी। जँ कम मीठका फल रहैत, जेना खीरा- तँ दोसर परिस्थिति बनैत से नहि, आमक गिनती उच्च कोटिक मीठ फलमे अछि। तैठाम मीठक बदला चुनेखट्टा आ अमृत सन भोज्य पदार्थमे उज्जर-उज्जर सोहरी लागल पील भेटए से, केहेन हएत..? सुशील बाजल- “ओ ते केहनो ने हएत।” सुशील जे बुझि बाजल हुअए, मुदा प्रेमानन्द बाबाकेँ बुझि पड़लैन जे कनियेँ चोटसँ तबला स्वर पकैड़ लेलक! खुशी होइत प्रेमानन्द बाबाक मनमे जे गामक लोक वा दोसर परिवारकेँ नहि बुझए देब, मुदा अपन जे परिवार अछि तैबीच सुशीलक आचरणसँ सभकेँ परिचय करा दिऐ जइसँ चारू दिससँ सबहक नजैर सुशीलपर पड़त। जखने चारि दिसक चारिटा आँखिक बीच सुशीलक आचरणपर पड़त तखने ओ सुधैर कऽ सोझ भऽ जाएत। मुदा लगले विचारकेँ मनक दोसर विचार रोकि कहलैन जे अखन तँ प्रश्न दुइये गोरेक बीच अछि, मुदा जखने दू-सँ-तीन वा चारिक बीच जाएत तखने चारि रंगक भाव-कुभावक उदय सेहो हएत। भलेँ ओ परिवारेक लोक किए ने हुअए। आ जखने चारि रंगक भाव-कुभाव एकठाम हएत, तखने बाबा-पोताक बीचक जे सम्बन्ध सूत्र अछि ओइमे किछु-ने-किछु अतिक्रमण हएत। जखन प्रश्ने नान्हिटा अछि, नान्हिटा ऐ दुआरे जे एक दिस प्रेमानन्द बाबा सन प्रेम पद पौनिहार तँ दोसर दिस हाइ स्कूलक बच्चा सुशीलकेँ कुशीलसँ विरक्त कऽ सुशील बनाएब अछि। दू गोरेक बीचक विचार छी। तहूमे सुशीलक बालपनक बालमन अछि। तँए ओकरा मनकेँ एतेक नइ झमारि दिअए जे अल्मुनियमक तार जकाँ रेगहा पड़ि जाइ जैठामसँ कखनो टुटि जाए..! प्रेमानन्द बाबा बजला- “केहनोक माने की भेल बौआ?” सुशील बाजल- “ने नीके आ ने अधले।” प्रेमानन्द बाबा बजला- “बाह! खूब कहलह!” जहिना झँपाएल सुर्ज रहने दिनक अन्हारमे कियो डिबिया बाड़ि घरमे कोनो काज करैत हुअए आ एकाएक जँ सुर्ज उगि फरिच कऽ दैत जइसँ डिबियाक ज्योति मलिन भऽ जाइत तहिना सुशीलकेँ भेल। सुशीलक विदीर्ण होइत मलिनाएल चेहरा देख प्रेमानन्द बाबा अपन शान्त चित्तकेँ प्रशान्त चित्तमे बदैल बजला- “बौआ, अखन तोरा दुनियाँमे आएले केते दिन भेलह। तँए अखन दुनियाँक तहियाएल तहकेँ नीक जकाँ नइ बुझि पेबहक। मुदा तैयो कहै छिअ।” बाबाक ‘कहै छिअ’ सुनि सुशील हरिणक बच्चा जकाँ आँखि-कान दुनू ठाढ़ करैत बाजल- “केना बुझबै?” सुशीलक प्रश्नमे बुझैक जिज्ञासा देख प्रेमानन्द बाबा बिहुसैत बजला- “बौआ, आमक गाछी तीन रंगक होइए, एकटा भेल मीठहा आमक गाछी, दोसर भेल पीलुआहा वा खटहा आमक गाछी आ तेसर भेल दुनूक बीचक मिलल-जुलल गाछी। जइमे खटहा-मीठहा दुनू रहैए।” प्रेमानन्द बाबाक विचार सुनिते सुशीलक मनक तृष्णामे जेना एकाएक तृप्ति जागए लगलै। जइसँ बुझैक जिज्ञासा आरो तेज हुअ लगलै। बाजल- “तखन तँ खटहा आम आकि पीलुआहा आमक गाछीक कोनो मोल नइ भेल?” प्रेमानन्द बाबा बजला- “बौआ, जइ दुआरे तोरा शोर पाड़ने छेलियह से कहब तर पड़ि गेल अछि, तँए पहिने ओ कहब जरूरी अछि, मुदा जखन बीचमे दोसर प्रश्न उठा देलह तँ पहिने वएह कहि दइ छिअ। जहिना मीठ आमक गुण पकलापर अबैए, तहिना खटहो आ पीलुओहोक गुण अन्तिमे अवस्थामे अबैए। तइसँ पहिने दुनूक एके रंग गाछो, पातो होइए आ पकैसँ पूर्व अवस्था तक दुनूक काजो आ गुणो एके रंग रहैए। तँए ओइसँ पहिने, माने पकैसँ पूर्व दुनूक काजो एके रंग होइए। माने ई जे जहिना लकड़ीक चीज-वौस, तहिना आमक चटनी-अँचार...। मुदा जे फलक फल छी तइमे अन्तर आबिये जाइए। अखन एकरा एतै छोड़ह। दोसर दिन नीक जकाँ सभ बात बुझा देबह।” ‘दोसर दिन सभ बात बुझा देबह’ सुनि सुशीलक जिज्ञासामे मिसियो भरि कमी नइ आएल। मन ओहिना उत्फुल रहल जहिना तत्काल बुझैले जागल। होइतो अहिना छै जे कोनो बात-विचार आकि कोनो वस्तुए-जात तत्काल भेटने आकि कनी ठहरियो कऽ भेटलासँ मनमे ओहन निराशा नइ अबै छै जे नहियेँ भेटत। भेटैक आशा बनले रहै छइ। सुशील बाजल- “बड़बढ़ियाँ।” सुशीलक मुहसँ ‘बड़बढ़ियाँ’ सुनि प्रेमानन्द बाबा बजला- “बौआ, जहिना आम आ आमक बागक इज्जत अछि तहिना दुनियाँमे सभ कथुक अछि।” ओना सुशील अखन तक इज्जतक सम्बन्ध सिर्फ मनुखेटा सँ बुझैत रहए मुदा ‘सभ कथु’ सुनि मनमे नव जिज्ञासाक संचार भेलइ। बाजल- “से की बाबा?” सुशीलक प्रश्न सुनि प्रेमानन्द बाबा मने-मन विचारलैन जे अखन सुशील बाल-बोध अछि तँए ओहन विचार राखब नीक नहि, जइसँ ओ अकबका जाए वा बुझबे ने करए। किएक तँ फलो-फलमे अन्तर अछिए। जहिना कुफल-कुफलमे आ कुफल-सुफलमे अन्तर अछि। दुनूकेँ जँ सींगसँ नाँगैर तक माने आदिसँ अन्त तक निहारब तँ ओहिना ‘सींग-नङरिया’ कहियौ आकि ‘नङरिया-सींग’ कहियो, भेटबे करत। जहिना नख-सिख वर्णन आ सिख-नख वर्णनमे नायिकाकेँ भेटैए। खाएर जे भेटैए, जेतए भेटैए आ जेकरा-ले भेटैए से जानए। ऐठाम तँ पोता-बाबाक बीचक बेवहारिक जिनगीक सम्बन्ध अछि। तँए जँ नीक जकाँ नइ बुझा देबै तखन बुझबैक मतलबे की रहल। तँए, ओतेक जरूर बुझा देबै जेतेसँ ओ अपने विचारि कऽ फल-कुफल बुझए लगत। जखन हंस सन पक्षी दूध-पानि बेरा सकैए, काग भुसुण्डी सन कौआ दुनियाँक सत्य-असत्य बुझि सकैए तखन तँ सुशील मनुखक बच्चा छी। एकरा बुझैमे देरीए केते लागत। तखन तँ यएह ने भेल जे खेत तँ अन्नेक छी मुदा अखन जोत-कोरक अभावमे परती बनल अछि। तँए कनी ओइ रूपे बुझबए पड़त। मुदा ईहो तँ सत्य ऐछे जे ने पचास बर्खक मनुखक बुधिक सक्कत परती जकाँ अखन सुशीलक बुधि अछि, आ ने पेटक बच्चा सदृश पानिमे पनियाएल खेत जकाँ अछि। ई दीगर भेल जे माटिक परतीक कोन बात जे पत्थरोसँ पथराएल पहाड़पर सेहो गाछ-बिरीछ उगिते अछि, भलेँ ओइपर केसर-किसमिसक उपज नइ होइत होइ। तहिना पानियोँमे रंग-रंगक उपजा सम्भव नइ अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। खाएर किछु अछि, मुदा सुशील तँ चौदह बर्खक बच्चा मनुखक छीहे। भगवान राम चौदहे बर्खक बीचमे पिताक मृत्युक संग अयोध्या छोड़ैसँ लऽ कऽ लंकाक रावणकेँ मारि लंकाकेँ जरबैत जरल लंकाक लंकापति विभीषणकेँ बना अपने अयोध्याक राजा बनला। सुशील तँ सहजे सुशील छी। धरतीपर एला पछातियो केतेको रोग शरीरमे घुसि कऽ पकड़ैए आ धरतीपर अबैसँ पहिने सेहो केतेकेँ पेटेमे पकड़ैए। मुदा ऐठाम तँ सुशील से नहि अछि। बाहरी परिवेशक हवामे रोगाएल अछि, जेकरा मौसमी रोग कहल जा सकैए। तँए ओहने प्रतिकार करब ने नीक हएत जइसँ सुशील पुन: ओ सुशील बनि जाए, जे गलत आचरणसँ पूर्व छल...। प्रेमानन्द बाबाक मन बिहुसि उठलैन। मुस्की भरैत सुशील दिस तकला। जहिना विद्यालयमे गुरु-शिष्यक बीचक तार एकसूत्रमे आबि जाइए तहिना प्रेमानन्द बाबाकेँ बुझि पड़लैन। ओना, जेहेन अपन मुस्कान भरल मनक मुँह रहैन तेहेन सुशीलक नहि छल, जेकरा ओ भाँपि लेलैन। सुशीलक जिज्ञासु चेहराक उदसपन सुरखीमे प्रेमानन्द बाबाकेँ अनुकूल आवरण बुझि पड़लैन। बजला- “बौआ सुशील! दुनियाँमे सभ किछुकेँ जेते इज्जतो अछि आ इज्जतक बाटो अछि तहिना तेते बेइज्जतीक सेहो अछिए, तँए एहेन जे जिनगीक धार अछि तेकरा बीचे-बीच चलब सीखह।” ओना हरियाएल चास जकाँ सुशीलक मन सेहो हरिया चुकल छल, मुदा हरियाएलो चासमे ओहन बीजकेँ औंकुरब कठिन ऐछे जे माटिक तहक बीच औंकुरैक शक्ति रखने अछि। हिया हारि सुशील बाजल- “बाबा, बाल पोथीक बोलमे कनी नीक जकाँ बुझा दिअ।” प्रेमानन्द बाबा बजला- “बौआ, अँगनामे दादी-मुहेँ सुनैत हेबह जे अपना पुतोहुकेँ कहैत रहै छथुन- जे ने तूँ जारन-काठीक इज्जत बुझै छह आ ने थारी-लोटाक, ने कपड़ा-लत्ताकेँ सेखीसँ रखि इज्जत दइ छहक आ ने घर-दुआरक सेखी रखने छह।” प्रेमानन्द बाबाक बात सुनि सुशील ठठा कऽ तँ नहि हँसल, मुदा मुँह खोलि भभा कऽ जरूर हँसल। हँसैत बाजल- “हँ, से तँ दादीक मुहेँ बरमहल सुनैत रहै छी।” प्रेमानन्द बाबा बजला- “ओकर सीमा-सरहद सेहो बुझि लएह आ सोचहक। जहिया तक पुतोहुकेँ माने तोरा माएकेँ, जारन-काठी जोगबैक आ थारी-लोटा रखैक समुचित बोध नहि हेतैन ताधैर ई बात सासु कहबे करतैन किने?” जहिना धाराक धार पेब पोखैरो-झाँखैरक आ खेतो-पथारक जमकल पानि गतिशील भऽ जाइए तहिना सुशीलोक मनक गति गतिशील भेल। बाजल- “हँ, से तँ उचिते किने।” सुशीलक प्रवाहित होइत विचारक धार देख प्रेमानन्द बाबा आँकि लेलैन जे आब सुशीलक मन फरीच भऽ गेल छै तँए जे पुछबै आकि कहबै ओ हरे-हरे-कऽ सभटा बुझि जाएत। प्रेमानन्द बाबा बजला- “टेबुलपर राखल पाइ तूँ लेलह?” बाबाक बात सुनि सुशील गुम भऽ गेल। होइतो अहिना छै जखन चोर-मोट एकठाम होइए। ओना सुशीलक मुहसँ किछु ने निकलल, मुदा मनमे विषाद जरूर जागि गेलै जइसँ मुँहक सुरखी बदैल गेल। सुशीलक मुँहक रूप देख प्रेमानन्द बाबा बजला- “गुम नइ हुअ। ईहो एकटा रोगाएल मनुखक लक्षण भेल। ओकरा मथि-मथि माथक मथानीसँ जरूर निकालि ली। जइसँ ओ रोग निरकटौवैल भऽ छुटि जाए।” सुशील बाजल- “हँ, छह-सात दिनसँ एक-एकटा पँचटकही लइत एलौं हेन।” सुशीलक बात सुनि प्रेमानन्द बाबा बजला- “जहिना दादीबला विचार सुनलह तहिना पाइयोक इज्जतो अछि बेइज्जती सेहो अछिए।” ओना बाबाक विचार सुशीलक हृदयकेँ बेधैत बैस रहल छल तँए कोनो तेहेन कम्पन्न बाबाकेँ नहि बुझि पड़लैन। बजला- “पाइक जे समुचित काज अछि, जँ ओइमे ओ लगौल जाएत तँ ओकर इज्जत भेल। आ जँ से नइ भेल तँ ओ दुइर होइत बेइज्जतीक कारण भेल। खाएर जे भेल से भेल, जखने जागी तखने परात।”  शब्द संख्या : 1999, तिथि : 05 जनवरी 2018 Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

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