VIDEHA — Issue 281 / अंक २८१

Publication: VIDEHA · Issue: 281
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २८१ म अंक ०१ सितम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४१ अंक २८१) 'विदेह' २८१ म अंक ०१ सितम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४१ अंक २८१) ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक ‘भकमोड़’मे परिवर्तनक स्वर ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- सुभिमानीजिनगी प्रदीप पुष्प गजल- १ हम लिखै छी लोक लए विद्वान लए नय हम गबै छी गाम लए जजमान लए नय पेटमे कूदत मूस तहन पागे करतय की हम खटै छी भूख लए सम्मान लए नय हम जनै छी देव हमर जेबीक लचार हम पुजै छी भक्ति लए वरदान लए नय छैक हमरो लोभ अपन बनि जाइ अहाँक हम तकै छी नेह लए पकवान लए नय भूमिका छै छोट मुदा नमहर सपना छै हम कनै छी टोल लए खनदान लए नय (21222112221122सभ पाँतिमे।तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अन्तिम ह्रस्वकेँ दीर्घ मानल गेल अछि) गजल- २ तपलौं जे रौद जेठक निखरि गेलौं हम एत्ते चललौं कि रस्ते बिसरि गेलौं हम मजरल हमहूँ रही फागुनक देहरिपर पी लेलौं कीटनाशी झखरि गेलौं हम बदलल छै लोक घऽर एत्तऽनइ छै हम्मर पाछू छै गाम आगू ससरि गेलौं हम छाती हमरो रहै निस्सने पाथर सन दोस्ती शीशाक केलौं भहरि गेलौं हम नै केओ मीत नै प्रेम छुच्छे टाका की भेटल आबि दिल्ली ठहरि गेलौं हम (222212212222सभ पाँतिमे) उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलजीक ‘भकमोड़’मे परिवर्तनक स्वर :: उमेश मण्डल भकमोड़ (2013) :2013 इस्वीक समय छल, जहिया औरहा (मधुबनी) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 79म कथा गोष्ठी आयोजित भेल रहय। तथा ओहीठाम 80म आयोजनक निर्णय निर्मली (सुपौल) लेल सर्वसम्मतिसँ भेल छल। तीन मासपर सगर रातिक एहि गोष्ठीक आयोजन होइत रहल अछि। ताहि बीचक समयमे मण्डलजी एहि पोथीकेँ लिखलन्हि। औरहा आ निर्मलीक बीचमे भुतहा चौक अछि जाहिठाम रस्ता भकमोड़ छैक, तहिक आधारपर कथाकार एहि पोथीक नामकरण कएलनि, जे प्रस्तुत पोथीक आमुखमे कथाकार लिखने छथि- “औरहा निर्मलीक बीच एकटा भुतहा चौक अछि। रस्ता भकमोड़ छै, तेँ संग्रहक नाओं ‘भकमोड़’ छी।” निर्मलीक प्रसिद्ध चित्रकार स्व. मिलन सदाय केर स्मृतिमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क 80म कथा गोष्ठीमे एहि पोथीक लोकार्पण कराओल गेल छल। संगहि उक्त गोष्ठीक निमिते कथाकार अपन एहि पोथीकेँ समरपित सेहो कयने छथि। द्रष्टव्य अछि हुनक लिखल पाँति- “ई संग्रह निर्मली गोष्ठी (कथा मिलन सदाय-सगर राति दीप जरय)केँ सेवामे समरपित...।” प्रस्तुत पोथीमे आठ गोट कथा संग्रहित अछि, यथा- 1. एक धाप जमीन- शब्द संख्या :2505 2. ओझरी- शब्द संख्या :1970 3. मुसहैन- शब्द संख्या :2742 4. केलवाड़ी- शब्द संख्या :2685 5. स्‍वरोजगार- शब्द संख्या :2388 6. घूर- शब्द संख्या :2812 7. कनियाँ-पुतरा- शब्द संख्या :2335 8. वारंट- शब्द संख्या :1638 9. गामक मुँह फेर देखब- शब्द संख्या :3073 एकधाप जमीन’,कथामे कथाकार मनुक्खक विचारक संग व्यवहार-परिवर्तन कोना होइत छैक तकर विस्तारित रूपक वर्णन कएलनि अछि। ज्ञान प्राप्त कएला पछाति मनुक्खक जीवनमे जहिना वैराग्य अबैत छैक तहिना नीच काजक अभ्याससँ नीचसँ नीचतम कार्य दिसि ओकर जीवन बढ़ैत चलि जाइत छैक। जकर उदाहरण कथाकार एहि कथामे प्रस्तुत कएलनि अछि। दू भाँइक भैयारीमे जाहिठाम प्रेमसँ प्रेमास्पदक रूप एबाक चाही छल ताहिठाम मात्र एकधाप जमीनक हेतु, जाहिमे केराक एकटा बीटमे एक घौड़ केरा छैक, ओहि लेल दुनू भाँइमे जानलेबा मारि-पीट भऽ जाइत अछि। दुनू भाँइ- दिनेश-महेशक परिचय कथाकारक शब्दमे, “महेश-दिनेशसहोदरभाए।ओनाअर्थरोगसँपीड़ितपरिवार, तँएगामकस्कूलछोड़िबाहरकस्कूल-कौलेजकनियमितविद्यार्थीनैरहलामुदाएम.ए; पी.एच.डी.कसर्टिफिकेटनइछैनसेहोनहियेँकहलजासकैए।समयतेहेनभऽगेलअछिजेपाइकखेलकोनोस्कूलकेँचमकारहलअछि, तँकोनोकेँधमकारहलअछि।ओना, बम्‍बैयाकलाकारजकाँदुनूभाँइचौबीसोघन्‍टामेकअपेमेरहैछैथ।एकरंगाचेहरादि‍न-राति‍रहि‍तेछैन।वएहआलरंगकअंगा, खौंरकी, कट्ठाडेढ़ेकसिनूरकढिमकाआबिनुकमाइलदेलहाकेश-दाढ़ीतँबनौनहिछैथ।दुनूभाँइतारा-ऊपरीछैथ, रहबोकेनानेकरता, दुनियाँकीकनियेँ-टाअछिजेदसकट्ठाअहाँजोति‍एलेबतँदुनियेँजोताजेतइ।समाजकस्त्रीगणककौलेजकप्रोफेसरीनेमहेशकरैछैथ‍,मुदाअदहासँबेसीपुरुखककौलेजतँखालीएअछि।पारखीदि‍नेश, समाजेमेनोकरीताकिलेलैन‍।” समाजक दृष्टि, आलोचनाक संग सरोकार- “भरिदि‍नपोथी-पतराकन्‍हेमेलटकलरहैछैनआअपनोदि‍न-बेरागननइबुझैछैथ।एकसाएबेरदरबज्जापरजाएब, तखन‍धोपचटमेगोटेबेरभेटजेता, एहेनउड़नबाजदुनूभाँइछैथ, तखन‍कहूजेकेनाकेराघौरकपारफोड़ादेलकैन।मुदाजेहौउ, समाजोकतँदायि‍त्‍वअछि।तइसँएकबेरजाकऽहाल-चालपुछिलेबजरूरीएअछि।” कथामे प्रश्न- (1) “अहींकहूजेईउचि‍तभेलजेएकघौरकेरा-लेअपनोअस्‍पतालमेबरदाइआदोसो-महीमकेँबरदाबी।तहूमेकिकोनोहमरापहि‍नेकहि‍देनेछलाजेएकघौरकेरा-लेदुनूभाँइमाइरकरब।” कथामे प्रश्न- (2) “गाममेचोरअबैछेलैआकिआगिलगैछेलै, अवाजसुनितेओकराभगबै-मिझबैछेलौं।मुदाएहेननीकबेवहारमेआगिमिझौनिहारअगिलगौनआचोरभगौनिहारचोरिकरौनकसंगचोरबाकेनाबनल?” कथामे प्रश्न- (3) “कियोपतिचरित्रसँबिगड़लछैथआपत्नीचरित्रवानछैथ, तखनदुनूकबीचकसम्बन्धकेहेनहोइ? कियोपत्नीघूसखोरीकविरोधमेरहैथआपतिदिन-रातिघूसलथितैठामपत्नी-पतिकपाइकउपयोगनैकरती?” कथामे प्रश्न- (4) “तेहेनदुनूभाँइककिरिया-करमभऽगेलछैजेकहूदस-दसलाखकघरबनौनेअछि।तैपरदस-दसलाखबेटी-बिआहमेखर्चकरैछैथ! केतए-सँआनैछैथ? दुनूभाँइतेहेनबहुरूपियाबनिगेलछैथजेयएहसभसमाजमेभाए-भैयारीबनएदेथिन!” ‘ओझरी’,अपन देश 1947 इस्वीमे आजाद भेल आ देशक शासन प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे विकेन्द्रीकरणक माध्यमसँ चलैए। तँए, सभ स्तरपर अधिकारो आ कर्तव्योक विभाजन भेल अछि। मुदा जाहिठाम प्रजातांत्रिक व्यवस्थाक संग विकेन्द्रीकरणक विकास एकतंत्रीय रूपमे होइए ओहिठामक प्रजातांत्रिक सत्ताकेँ कोना गरदनि दाबल जाइत छैक, जाहिसँ सार्वजनिक संस्थासभक रूप विकृत भऽ जाइछ, तकर परिचय प्रस्तुत कथामे कथाकार नीक जकाँ करौलन्हि अछि। जे परिवर्तित स्वरूपकेँ देखार करैत अछि। ‘ओझरी’ कथासँ प्रस्तुत कथोपकथन- (1) “ओहुनादेख‍‍तेछहकजेदूटा-तीनटाचारिटानाओंलोकरखितेअछि, कियोअधकट्टीतँकियोगोलगोला, मुदाहमरासेनैभेल।गमैयानामकअधारपरभोँटरलिस्टबनल, भोँटरलिस्टकअधारपरपरिचयपत्रआराशनकार्डबनल।ओहीअधारपरबैंकमेखाताखुजल।मुदास्कूलकनाओंकागजे-कागजेवौआइतरहल।ओहीअधारपरचेकबनल।मैनेजरसाहैबसँपुछलयैन‍तँकहलैन‍जेएफिडेफी‍टलगाकऽनाओंचढ़िजाएत।संतोषभेल।चलिएलौं।दोसरदि‍नबैंकककाजछोड़िकऽकोर्टककाजदि‍सबढ़लौं।रबिरहनेएकदि‍नओहि‍नाचलिगेल। ..दोसरदि‍नएफीडेफि‍टबनेलौं।तेसरदि‍नबैंकपरगेलौंतँपतालागलजेमैनेजरसाहैबसस्‍पेंडभऽगेला।सातेदि‍ननोकरीशेषछेलैन‍तहीबीचसस्‍पेंडभऽगेला।आश्चर्यभेलजेसेवानिवृत्ति‍होइसँएकपनरहि‍याअपनेकागत-पत्तरसरियबैमेलगिजाइछइ।तखन‍घरमुहाँसँबहरमुहाँकेनाभऽगेला।कैसि‍यरसँपुछलापरपतालगलजेइन्दि‍राअवासककमीशनमेगोल-मालभेलतँएसस्‍पेंडभेला।ऐगलासप्‍ताहधरिदोसरआबिजेता।ओतँपुन: घुमिकऽनहियेँऔताकिएकतँकेतबोजल्दीफरिछाएततँनिच्चाँ-ऊपरकरैतसप्‍ताहबीति‍एजेतैन‍।सुनिचलिएलौं।” (2) “दोसरसप्‍ताहगेलौं, तानवकामैनेजरआबिगेलरहैथ‍‍।असगरेबैसलरहैथ‍,जाकऽसभबातकहि‍कागतदेलिऐन‍।कागतदेख‍‍रखिलेलैन‍।परिचए-पातकगप-सप्पउठल।नीकसंस्कारीपरिवारकछैथ।कहलैन‍,ईतँमैनेजरकअधिकारककाजछीजेउर्फकरिकऽनाओंचढ़ालैतैथ।अनेरेएतेकरैककोनकाजछेलइ! चेकदेख‍‍कहलैन‍जेएकरसमैयेसमाप्तभऽगेल। ..सुनिचोटेघुमिकऽआबिकागतकबीचरखिदेलिऐ।” ‘मुसहैन’,कथाक आरम्भ मुसहैनिक परिचयसँ भेल अछि। धान वा गहुम वा कोनहुँ फसिलकेँ काटि जे मूस अपना बिलमे जमा करैत अछि ओकरा मुसहैन कहल जाइछ। प्रस्तुत कथामे कथाकार मुसहैनिक परिचय करबैत एकटा अदना आदमी कोना अपनाकेँ स्वतंत्र बना स्वाधीन जीवन बीता सकैत अछि, यएह एहि कथाक परिवर्तित स्वरूप थिक जे बेलबाक माध्यमसँ कथाकार वैचारिक परिवर्तन आवश्यकता आ तकर क्रियागत महत्वकेँ ‘मुसहैन’मे समावेश कएलनि अछि। ‘मुसहैन’कथासँ प्रस्तुत कथोपकथन- (1) “सगुनकेँदोखीकहाँकहैछिऐ, जँगुणसगुनभऽजाएतखनतँजरुरनीकभेल, मुदाजँकोनोकाजेकेतौविदाहोइआमाछ-दहीसँसगुनबनाबीएकराहमनीकनैकहबै?” (2) “दुनियाँबड़ीटाछै, रंग-बिरंगकखेलचलैछैतँएअनकाछोड़ह, अपनेबातलएह।परसूजेछ-छपसेरीमुसहैनभेलहतेकराकीकहबहक?” (4) “तूँसभभलेँजेकहकमुदाहमरमननैमानैए।तीनसालकबाढ़िमेधानतँउपैजगेलमुदामुसहैनकिएनिपत्ताभऽगेल।जेचीजेनिपत्ताअछिओसगुनकेनाभऽपौत?” (5) “यएहनेकहलयहजेदुनियाँमेकेनाउनटा-पुनटाहोइछै, जेमहिलाशरीरसँपुरुखकअपेछानिरबलहोइएओकराकारखानाकइंजनआपुलिसकलाठीहाथमेथम्हादइछैआजेपुरुखसबलहोइएओकराहाथमेकागत-कलमथम्हादइछइ।एहनेरीतकेँनेवसन्‍तरीतकहैछइ!” (5) “अनेरेसमुद्रउपछैककोनचिड़ौड़ीमेलागलछह, ठनकाजेकरामाथपरखसैछैसेबुझैछैठनकाकगुण।चलह, अनेरेमनमेखुट-खुटीरखनेछह।कौल्हुकाकाजकाल्हिदेखलजेतइ।चेनसँखाएब, भगवानकनाओंलऽनिचेनसँसुतनाइछोड़िअनेरेकौल्हुकाचिन्तामेकिएमाथधूनब?” (6) “ठकुरवारीठाकुरसबहकछिऐआकिहमरछीजेओकरदेखौंसकरब।हमरतँयएहसंगतियासभनेछीजेकरासंगेजीबै-मरैछी।” ‘केलबाड़ी’,एहि कथाक माध्यमसँ केरा-खेतीक विषयक अपन अनुभवात्मक ज्ञानक साझा कथाकार कएलनि अछि। मिथिलांचलमे परम्परासँ जे केराक खेती होइत आबि रहल अछि, जे एहिठामक तीनू मौसम (जाड़, गरमी, बरसात)क अनुकूल रहल अछि।मुदा ओहि किस्मक जगह नव किस्मक केरा आएल, अर्थात् बौना किस्म, जकरा सिंगापुरी सेहो कहैत छिऐक, जाहिसँ मिथिलांचलमे जे पूर्वसँ अबैत केरा छल ओ उपैट गेल। मुदा ओ बौना किस्म, जे आन-आन देशक छल, अपन मिथिलांचलक माटि-पानिक अनुकूल नहि भेने विकास नहि कय सकल। जाहिसँ पुन: परम्परासँ अबैत जे अपन केरा छल, ओ अपन स्थान बना लेलक। उक्त विषयक विश्लेषणसँ प्रस्तुत कथामे अनुकूल परिवर्तन स्वर प्रस्फुटित भेल अछि। ‘केलबाड़ी कथासँ प्रस्तुत कथोपकथन- (1) “जहिनादेखबहकजेजामुनकमासमेलोकजामुनकबीआरोपैए, आमकमासमेआमरौपैए, अनारसकमासमेअनारसरौपैएतहि‍नाअपनाऐठामसरसठिकरौदीकपछाइत‍जेउथल-पुथलभेलताहिमेकेरोकखेतीआएल।बाहरीकिस्‍मककेरा, एक-मौसमी।जहपटारलोकअपनपुरनाकरजानसभउपटा-उपटालगालेलक।जेकेराअपनाऐठामबहुतपहिनेसँहोइतचलिआबिरहलछल, ओउपैटगेल।रोपाएलओजेसमायानुकूलनैछल, अपनोगेलआजेहोआएलसेहोगेल।जेकरफलभेल- मिथिलांचलककेदलीवनमहराइगाबएलगल!” (2) “बौआ, केचुआछोड़ैकलूरिजेकरारहैछैवएहऐधरतीकसुखबुझैए।अपनाऐठामकेराकखेतीअदौसँहोइतआबिरहलअछि।जेहनेगुणगरतेहनेपेटभर।मुदाऐठामतँपौष्टिकवस्तुकउत्‍पादनहोइवानैहोइ, मुदाजन-जनकेँपोष्टिकअहारभेट‍रहलछइ।जइसँस्‍वस्थशरीरकनिर्माणभऽरहलछइ।” ‘स्वरोजगार’,कथामे रविशंकर मुख्य पात्र अछि। रविशंकर स्नातक अन्तिम वर्षक विद्यार्थी अछि जे अपन परीक्षा छोड़ि घर चलि अबैत अछि। किए चलि अबैत अछि?यएह एहि कथाक विषय थिक। कथाकार काफी सचेत भऽ कऽ एहि कथाकेँ गढ़लनि अछि। रविशंकरक अलाबेएहि कथामे ‘भागेसर’, ‘राधा’ आ ‘चेतानन्द’ सेहो पात्रक रूपमे आएल छथि। प्रजातांत्रिक शासन पद्धतिक अनुकूल शासन व्यवस्था नहि भेने जे सार्वजनिक संस्थासभमे विकृतिपन आबि जाइएजाहिसँ ओकर कार्यप्रणाली प्रभावित हुअ लगैत छैक।भेल तहिना छल। रविशंकर जाहि युनिवर्सिटीमे पढ़ैत छल ओकरहु कार्यप्रणालीमे जे विकृतता आबि गेल, ओहि विकृतिसँ क्षुब्ध भऽ स्नातक अन्तिम वर्षक रहितो रविशंकर अपन परीक्षा छोड़ि दैत अछि आ घर एबाक हेतु चलि दैत अछि। मनमे अनेकहु प्रश्न उठि जाइत छैक। जाहिमे महत्वपूर्ण प्रश्न अछि भक्ति कालक विकास प्रक्रियासँ सम्बन्धित। अर्थात् भक्तिकालक (साहित्यक भक्तिकाल)क विकास प्रक्रियाक अनुसार रीतिकाल अर्थात् शृंगारकाल आरो नीक हेबाक चाही छल से नहि भऽ ठीक विपरीत दिशामे परिवर्तित भऽ गेल। प्रस्तुत अछि रविशंकरक मनोविश्लेषण, कथाकारक शब्दमे- “विश्वविद्यालय स्तरक कार्यक्रम भेल, बेकती-विशेषक नै छल, तखन‍ किए ने बुझलौं? ..ने प्रश्नक जड़ि भेटै आ ने विचार आगू बढ़इ। मुदा तैयो बाढ़िक पलाड़ी जकाँ बहबे करइ। मन बहकलै, इन्दि‍रा अवासक जेकरे पक्का घर रहै छै हथि‍याक झटकीमे खसल घरक अनुदानो तेकरे भेटै छइ। सएह ने तँ भेल। की अहि‍ना भोजे-भातक शिक्षण संस्थान बनल रहत? धू:! अनेरे मनकेँ बौअबै छी। ठीके लोक बताह कहैए! एहने-एहने बतहपनी सोचने ने लोक बताह होइए! अनेरे हमरे किए एते सोग अछि। ‘जानए जअ आ जानए जत्ता।’ लसि‍गर होइ आकि खढ़हर से ओ जानए। हमहीं की बजितौं जे अनेरे माथ धुनै छी। बड़ बजितौं तँ यएह ने बजितौं जे साहि‍त्य जगतमे मध्‍यकालीन युग स्‍वर्णिम रहल। भक्ति‍मय साहि‍त्यक सृजन एते कहि‍यो ने भेल, मुदा भक्ति‍ साहि‍त्यक पछाइत‍ वैराग्य अबैत आकि श्रृंगार? एबाक चाहै छल ‘वैराग्य’ से नइ आबि ‘श्रृंगार’ आबि गेल! समैयो मुगले शासनक छल। विश्वविद्यालय सर्वोच्च शिक्षण संस्थान छी। जे मिथि‍लांचल ऋृषि-मुनिक बास स्थल अदौसँ रहल आकि ओतबे गनल-गूथल छैथ‍ जेतेकेँ दोरिका छाप भेट गेलैन! विश्वविद्यालयक दायि‍त्‍व बनैत अछि जे जिनकर रचना दि‍वारमे सड़ि गेलैन‍, पानिक चुबाटमे गलि गेलैन‍ ओहनो-ओहनो रचनाकारक खोज हुअए।” प्रस्तुत संग्रहमे क्रमश: ‘घूर’, ‘कनियाँ-पुतरा’,‘वारंट’ आ‘गामक मुँह फेर देखब’ कथासभ सेहो अछि। आशीष अनचिन्हार गजल हुनकर बात पिपरक पात देशक अगुआ भेलै कात तप्पत नोर बसिया भात जिवनक नाम झंझावात अनचिन्हार केलक घात सभ पाँतिमे 2221 मात्राक्रम अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल सुभिमानीजिनगी भोरेसुति-उठिजीवनकाकादरबज्जासँगामदिसकरस्ताजेफुटलअछितैठामअपनडेढ़हत्थीठेंगासँडाँरिखिंचैतबुदबुदेला- “परिवारआकिसमाजएकदिसजुटिआगूमेकिएनेठाढ़हुअएमुदाएक्कोइंचपाछूअपनविचारसँनइघुसकब।” ओना, जहिनाआनदिनतीनबजेभोरेनीनतोड़िओछाइनेपरपड़ल-पड़लजीवनकाकाअपनबीतलदिनकहिसाबजोड़िअबैबलादिनकमुँह-मिलानीकरैतभरिदिनकहिसाबलगालइछलातहिनाआइयोकेलैन।मुदाआनदिनकहिसाबआऔझुकाहिसाबमेकिछुअन्तरआबिगेलछैन।मानेईजेआनदिनजीवनकाकाअपनभरिदिनकहिसाबपरिवारकलीलामेरखैछलामुदाआइसेनइकेलैन।परिवारकसंगसमाजोकचलैकरस्तापरठाढ़भऽअपनविचारकडाढ़िखिंचलैन।ओना, जीवनकक्काकअपनविचारईछैनजेजहिनासभदिननवसुर्जकउदयहोइएतहिनाअपनोजिनगीमेसभदिनहुअए।जखनेदूधनवनीतबनिघृतबनैकदिशामेऐआशाकसंगबढ़ैएजेअपनोजिनगीघीवाहबनतआजखनजिनगीघीवाहबनततखनेनेओकरसार्थकताहएत। अपनसंकल्पकविचारमनमेरोपिजीवनकाकाडेढ़ियापरडेढ़हत्थीठेंगासँडाँरिखींचिदरबज्जाकचौकीपरआबिबैसला।बैसतेव्रतीजकाँअपनव्रतमनमेरोपिदृढ़हुअलगलाजेदुनियाँकिएनेएकभागभऽजाएमुदापर्वतेश्वरजकाँएक्कोडेगपाछूनइघुसकब।पाछूनइघुसकैकदृढ़विचारमनमेरोपाइतेजीवनकक्काकनजैरअपनतेसरसन्तान- श्यामापरगेलैन।श्यामा..! श्यामामनमेअबितेविचड़लैन- ‘श्यामोतँहमरेसन्तानछी..!’ श्यामाकप्रतिविचारमनमेजगितेजीवनकक्काकदेहमेजेनाउमंगकफुनफुनीजगलैन।फुनफुनीजगितेदेहकँप-कँपाउठलैनजइसँएकदिसदुनियाँकभयआगूमेठाढ़भेलैनतँदोसरदिसअपनदृढ़संकल्पसेहोसमकक्षभऽजिनगीकसोझमेठाढ़भेलैन। जीवनकक्काकतेसरसन्तान‘श्यामा’कलिंगपरिचयअखनधरिस्पष्टनहिभेलछल।बालपनकजिनगीरहनेश्यामाकेँनेखाइ-पीबैमेकोनोतरहकअसोकर्जआनेमल-मूत्रतियागकरैमे।बच्चासबहकसंगखेलबोकरैएआपढ़ैलेस्कूलोजाइतेअछि।ओना, रंग-रंगकसमाचारअखबार-रेडियोमेअबितेरहैएजेअमुखडॉक्टरऐठामलड़का-लड़कीभऽगेलआलड़कीलड़का...। दसबर्खबीतलापछाइतआनेबाल-बच्चाजकाँश्यामाकशरीरमेसेहोकिशोरी-रूपझलकीदिअलगल।शरीरोफौदाएलगलैआमनकझुकावसेहोलड़कीसभदिसझुकएलगलै।ऐठामएकटाप्रश्नअछि, प्रश्नअछिजेबच्चाबाल-बुधिधरिलड़का-लड़कीसंग-संगसंगीजकाँखेलबो-धुपबोकरैएआखाइतो-पीबितोअछिए।ओकरासभमेलिंग-भेदककोनोआशंकामनमेरहितेनेछइ।तत्पश्चातलड़काकझुकावलड़कादिसआलड़कीकझुकावलड़कीदिसहुअलगैछइ।ईअवस्थालड़का-लड़कीकप्रेम-मिलनकअवस्थासँपूर्वकछी।ओना, श्यामाकशरीर-गठनमेनवपनआएलमुदाआनसँभिन्नरूपमे।अखनोईस्पष्टनहिभेलजेश्यामालड़काछीआकिलड़की।ओना, श्यामाकअपनउमेरकआकर्षणलड़कीदिसबढ़िरहलछलजइसँकेशबढ़ाएब, कनियाँ-पुतराकखेल-खेलाएबइत्यादि-इत्यादिश्यामाकमनकसंगबेवहारमेआबएलगलै।अखनधरिपरिवारोकनजैरमेश्यामाकअसलरूपआगामो-समाजकनजैरमेझँपाएलछल। आइआठदिनसँजीवनकाकाकेँहुनकपत्नियोँआदुनूबेटोमुँहफोरिकऽतँनहि, मुदाकात-करोटसँसुना-सुनाबाजएलगलैन- ‘श्यामाहमरापरिवारकनहि, हिजरापरिवारकभेल..!’ मंगलीकाकी–मानेश्यामाकमाए–जखनअसगरमेबैसविचारैछेलीतँदेखैछेलीजेजहिनाजेठदुनूसन्तानकेँपेटमेनअमाससेवलौंतहिनानेश्यामाकेँसेहोसेवनेछी।मुदा..!, ऐमेहमरकोनदोखअछि..? सभलीलातँभगवानकछिऐन..! मुदालगलेजखनबेटा-पुतोहुवासर-समाजश्यामाकप्रतिकहैनजेईअपनासबहकसन्ताननहि, तखनमंगलीकाकीसेहोओहीविचारमेभँसियासमाजदिसतकैतश्यामाकेँअपननहिबुझितियागकरैलेतैयारभऽजाइथ..! ‘माइकदिल’, ‘माइकदिल’तँदिन-रातिअनघोलहोइतेअछि, मुदाओकरबेवहारिकपक्षकीअछिसेकेदेखत..! श्यामाकप्रतिअखनधरिसमाजकअधिकांशलोककयएहधारणाबनलरहलछलजेश्यामालड़काछी।ओनादुनूपरानीजीवनकाकाकमनमेबच्चेसँशंकाउठलैनजइसँकेतेकोडॉक्टरआकेतेकोओझा-गुनीसँश्यामाकेँदेखा-सुनाचुकलछला।ओझा-गुनीतँघरकदेवताकदोखलगाअपन-अपनपल्लाझाड़लक।मुदाडॉक्टरीजाँच-परतालकरौलापछाइतअपनहारिकबुलकऽडॉक्टरसभजीवनकाकाकेँकहिदेलकैनजेहमरासाधसँबाहरअछिमुदाअहाँकतँसन्तानछी, अहाँकेँतेकेतौभगैकरस्तानहि...। डॉक्टरीविचारकपछाइतजीवनकाकालड़का-लड़कीकेँमनसँहटासन्तानकसीमापरठाढ़भऽगेला।मनमेकखनोकालकिन्नरपरिवारकरूप-रेखाअबैन।किन्नरपरिवारकरूप-रेखादेखमनकसंगदेहोकाँपिउठैनजेओपरिवारतँसमाजकहँसियापरअछि! अपनापरिवारमेबाप-पुरखाकदेलबीसबीघाजमीनअछि, किसानपरिवारछी, किसानीजीवनअछि।जेकरधर्मरहलैजेअपनपरिवारकभरण-पोषणककोनबातजेदरबज्जापरआएलआनो-आनखगलोकेँआबाटो-बटोहीकेँखाइ-पीबैकपरहेजनहिअछि।धार्मिकवृत्तिसमाजकपरिवारमेरहबेकएलअछिजेजिनकाजएहविभवछैनओओहीमेपरिवारकसभमीलि-बैसखाइ-पीबी।व्यासबाबाकसमाजतँआइअछिनहि, जेबुझत- लूटिलाउ, कुटिखाउ, प्रातभनेफेरजाउ...।’ अप्पनआइधरिकपरिवारकजिनगीकधाराकेँदेखजीवनकक्काकमनमेभोरेसँजहिनादृढ़ताउठलैनजेअपनआँखिकसोझमेअपनसन्तानकेँभिखमंगापरिवारमेकिन्नौंनइजाएदेब, चाहेऐखातिरजेहुअए।परिवारेआकिसमाजेकीकहत।कीसमाजईनइजनैएजेश्यामाहमरतेसरसन्तानछी..? दरबज्जाकओसारकचौकीपरजीवनकाकाकेँअकलवेरामेउमंगितबैसलदेखमंगलीकाकीकमनमेओहिनाहुमरलैनजहिनाजेठमासकरौदकजरलमेघमेहनहनाइततूफानीदौरमेकरियामेघऊपरचढ़एलगैएजइसँधरतियोपरहवा-बिहाड़ि, पानि-पाथरअबैकसम्भावनाबनिजाइए..! मुदालगलेमनथीरभऽगेलैन।तैबीचदरबज्जापरपहुँचमंगलीकाकीजीवनकाकाकेँपुछलकैन- “चाहेपीबआकिपानियोँपीब?” ओनाआजुकपरिवेशमेएहेनविचारमनुखाहबनिमरखाहबनिसकैए।किएकतँपानिनहि, पीबैकमानेकिछुखेलाकपछाइतपानिपीबसँअछि।मुदासेनहि, कृषकबीचअखनोएहेनचलैनअछिजेसभसँपहिनेमुँह-कानधोनौंवाबिनुधोनौंखालीपानिपीबाकचलैनअछि।बिनुमुँहधोनेमानेभेलबाइसेमुहेँबसियापानिपीब।तँएहुनकरखतियानएहेनबनिगेलछैनजेभोरमेसभसँपहिनेमनभरिपानिपीबी।पछाइतचाह-पानचलत।तैठामचाहकसंगपानिकचलैनकिएरहत? मुदासेनहि, मंगलीकाकीकमनजीवनकक्काकरूपदेखथरथरागेलरहैनतँएबाजलछेली। जीवनकाकामंगलीकाकीदिसटकटकदेखएलगलाजेयएहमाएअपनकोखिकसन्तानकेँभिखमंगाकसन्तानबनबएचाहिरहलीअछि।मुदामनकविचारकेँमनेमेअरोपिबजला- “चाहोपीबआकिछुगपो-सप्पकरब।तँएअपनोचाहएतैनेनेआउ।संगे-संगपीबोकरबआ...।” ओनासंगे-संगचाहपीबैकसाहसमंगलीकाकीकमनमेघटिरहलछेलैन।तँएबहन्नाबनबैतपहिनेहिनकेटा-लेगिलासमेचाहनेनेपहुँचली। पतिकहाथमेगिलासपकड़ामंगलीकाकीअपनेचोटेघुमिआँगनआबिगेली।आँगनआबिचाहतँपीबएलगलीमुदामनथरथराइतेरहैन।मनथरथराइककारणरहैनदुनूगोरेकबीचकनेपरिवारछी, तखनचाहमेकिए..? मंगलीकाकीघोंटे-घोंटेचाहोपीबैथआमनकेँघटे-घटसकतेबोकरैथ।चाहपीलापछाइतदरबज्जापरआबिजीवनकक्काकआगूमेठाढ़भेली।ओना, तैबीचकाकीकमनमेईहोजगिचुकलछेलैनजेजहिनापतिछैथतहिनानेबेटोअछि।जहिनापतिकेँखुशराखबअप्पनदायित्वछीतहिनानेबेटोकेँराखएपड़त।तँएनिर्भिकरूपमेमंगलीकाकीजीवनकक्काकआगूमेठाढ़भेली। पत्नीकेँआगूमेठाढ़देखजीवनकक्काकमनचकभौरलिअलगलैन।जहिनाधारकमोनिकचकभौरमेकियो-कियोडुमबोकरैए, तहिनाअकासमेगीधचकभौरलैतचारूदिशादेखबोकरैएआपाहिलगापहियेबोकरितेअछि।जीवनकक्काकमनमेपहिलदिशाकचकभौरमेजगलैनजेपति-पत्नीकबीचकनेपरिवारोछीआसन्तानोछी।मुदातँएसोभावमेअन्तरनहिअछिसेहोकेनामानलजाएत।पुरुखकसोभावहोइएजेजँअपनेवापरिवारकसन्तानेकआगूअबैतबाधामेसन्तानकेँसंरक्षणदैतअपनेआगूमेठाढ़भऽसामनाकरब, भलेँपरिणामजेहेनहोइ, मुदापत्नीककीईसोभावनइअछिजेआक्रमिकआगूमेठाढ़भऽसन्तानकेँदुनूहाथेदुनूहाथपकैड़मारिखुआदइए।ओना, ऐठामएहेनप्रश्नअछिएजेसंरक्षणकरूपकेहेनअछि? फेरदोसरचकभौरजीवनकक्काकमनमेउठलैन।उठलैनईजेश्यामाकजहिना‘पिता’भेलिऐतहिनानेपत्नियोँ‘माए’भेलखिन।तैठामअप्पनचाहकीअछिआपत्नीकचाहकीछैन? केकरोबातसुनलापछाइतओइपरनीकजकाँविचारबोतँजरूरीअछिए।विचारकपछाइतहँ-नइकनेनिर्णयकरब।आकिकियोबाजलजे‘कौआकाननेनेजाइए’आओकरासुनिअपनकानबिनुदेखनहिजँकौआकपाछू-पाछूदौगब, ईकेहेनहएत..? दूभौकटपैत-टपैतजीवनकक्काकमनकनीथमलैन।ओना, नेजीवनकाकाकिछुबजैछलाआनेमंगलीएकाकीकिछुबजैछेली।मुदाभीतरे-भीतरदुनूबेकतीकमनमेसमुद्रीतूफानचलियेरहलछेलैन।पत्नीकअलिसाएल-मलिसाएलचेहराकरंगदेखजीवनकक्काकमनसेहोपसीजरहलछेलैन।जेएकाएकमनबिहुसिउठलैन।जीवनकाकाबजला- “एकटापनचैतीअहाँसँकराएबअछि, घरकबातछीतँएपहिनेघरेकलोकनेओइपरविचारकरत।जँघरमेनइफरिछाएततखननेसमाजआकिसंसारदेखब।” पतिकविचारसुनिमंगलीकाकीकमनमेएकाएकचमकएलैन।चमकअबितेमनमेउठलैनजेपरिवारेकविषयमेनेपतियोविचारकरएकहिरहलछैथ।जखनेपरिवारमेपति-पत्नीमिलि, वैचारिकएकरूपताआनिपरिवारचलौततखनेनेओपरिवारअपनाबलेठाढ़हएत।जइसँजिनगीकधाराएकबट्टहोइतआगूबढ़ैतचलत।ओना, तैबीचपरिस्थितिवशतोड़-जोड़सेहोचलितेरहत।परिस्थितिकअर्थभेल- ‘परि+स्थिति’, तँए, जखनेपरकस्थितिआगूमेऔततखनेकनी-मनीडोल-पातहेबेकरत...। मंगलीकाकीबजली- “बाजू, कीकहैछी?” मंगलीकाकीकविचारसुनिजीवनकाकासमधानलप्रश्नरखैतबजला- “अपनादुनूगोरेकबीचकेतेसन्तानअछि?” मंगलीकाकीबजली- “तीन।” बजैकक्रममेतँमंगलीकाकीबाजिगेलीमुदालगलेमनबेटाकसंगसमाजदिसबढ़िगेनेतत-मतकरएलगली। पत्नीकततमतीदेखजीवनकाकाबुझिगेलाजेपछुआदाबिरहलछैन।ठिकियाकऽजीवनकाकादोसरप्रश्नरखला- “एतेटादुनियाँमेअहाँकेँसभसँलगकेअछि?” अतीतोमेजेअतीतअछि।जेकरजेहेनपरतीततेकरतेहनेनेअतीतो।किएकियोअपनछोड़िअनका-लेमरैएआकिएकियोअनकाछोड़िअपना-लेमरैए..? धरती-अकासकबीचकक्षितिजमेजहिनाकेहनो-केहनोउड़न-चिड़ैयाफँसिजाइएतहिनामंगलीकाकीकमनएकाएकफँसिगेलैन।दुनियाँमेसभसँलगके? अतीतमेवौआइतमंगलीकाकीकेँबिआहकअपनमरबामनपड़िगेलैन।मनपड़लैनजेओहीमरबापरनेमाए-बापकसंगसमाजोपतिकहाथपकड़ाकहलैनजेदुनियाँमेटिजाएमुदापतिकसंगनइछोड़ब...। मंगलीकाकीबजली- “बुझलोबातअनठाकिएबजैछी।हमराबकलेल-ढहलेलबुझैछी?” मंगलीकाकीकचपचपाएलबोलसुनिअपनचपचपीमिलबैतजीवनकाकाबजला- “अहाँकेनाबुझिगेलिऐजेहमअनठाकऽबजलौंहेन।जेकहैकअछिसेपहिनेचेतौनीदैतचेतादेब।” जीवनकक्काकवाणीमेजेहेनओजछेलैनतेहनेमनोओजस्वीछेलैन्हेजइसँमंगलीकाकीकमनमेभयसेहोजगलैन।भयकेँजगितेज्वर-बुखारनपैबलाथर्मामीटरकपाराजहिनागरमीपेबचढ़ैएआठण्ढीपेबउतैरतोअछितहिनामंगलीकाकीकेँभेलैन।बजली- “अहाँसँहमकोनोहटलछी।जेकहैछी, जेनाकहैछीतहिनानेसुनबोकरैछीआकरबोकरैछी।” पत्नीकविचारसुनिजीवनकक्काकमनमेउठलैनजेआइजेसमस्यापरिवारकसोझामेउपस्थितभऽगेलअछिओनान्हिटानहिअछि।पत्नीसँपरिवारहोइतसमाजधरिकबीचकसमस्याछी, तँएनान्हि-नान्हिटाविचारमेओझराएबउचितनहि...। जीवनकाकाबजला- “सुनबामेआएलअछिजेअहूँश्यामाकेँअपनसन्ताननहिबुझितियागकरैलेतैयारछी?” पतिकबातसुनिमंगलीकाकीसहैमगेली।करेजकसंगविचारोडोलायमानहुअलगलैन।कीबाजबआकीनइबाजबतैबीचमंगलीकाकीकविचारओझराएलगलैन।किछुबजैकसाहसेनेभऽरहलछेलैन। मंगलीकाकीकेँचुपीसाधलदेखजीवनकाकाबजला- “चुपरहनेकाजचलत! मुँहखोलिबाजूजेअहाँकीचाहैछी।कियोअपनेविचारकनेमालिकअछि।” थरथराइतमनेमंगलीकाकीबजली- “अपनबेटोआसमाजोकलोकश्यामाकेँअपननहिबुझिदोसराककहिरहलअछि! तैबीच..?” पत्नीकझूकैतविचारसुनिजीवनकाकादृढ़भऽबजला- “चाहेओबेटाहुअएवासमाज, कानखोलिकऽसभसुनिलिअजेश्यामाहमरसन्तानछी, सन्तानबनिरहत।ईहमहूँबुझैछिऐजेश्यामानि:सन्तानरहत, मुदातँएओमनुखनहिछीआमनुखकजिनगीनहिजीबसकैए, हमतेकरामानैलेतैयारनहिछी।” पतिकदृढ़विचारसुनिमंगलीकाकीकमनमेसेहोदृढ़ताआबएलगलैन, एकाएकअपनकोखिकसंतप्तश्यामापरमनएकाग्रहुअलगलैन।एकाग्रहोइतेमनमेउठलैन- श्यामेटाएहेनसन्तानथोड़ेछी, दुनियाँमेएहेनबहुतलोकअछिजेकराप्रकृत्तिप्रकोपसँसन्तानोत्पतिकशक्तिनइछइ।तँएओकरापरिवारवासमाजसँवहिष्कृतकरबकहाँधरिउचितहएत...। तैबीचजीवनकाकाबजला- “पहिनेअहाँईकहूजेअहाँकमनमेकीअछि।कीश्यामाकेँअपनसन्ताननइबुझिछोड़ैलेतैयारछी?” पतिकदृढ़विचारपेबबिनाकिछुआगू-पाछूतकनेमंगलीकाकीबजली- “श्यामाकीकोनोहमरेटासन्तानछीआअहाँकनहिछी।” ढलानपरसँटघरैतपानिकरोकाबकेँदेखजीवनानुभवीलोकजहिनाछील-छीलकऽचिक्कनबना-बनाएकबट्टकरैतछिड़ियाएलपानिकेँधरियाधाराकरूपमेआगूबढ़बैछैथतहिनाजीवनकाकामंगलीकाकीकछिड़ियाएलविचारकेँसमेटबजला- “पूबकसूर्जपच्छिमकिएनेउगइ, जमीनकपानिअकाससिरकिएनेचढ़इमुदाश्यामाकेँअपनसन्तानछोड़िनेअनकरबुझबआनेअनकाहाथजाएदेब।” विस्मितहोइतमंगलीकाकीबजली- “लोककीकहत..!” मंगलीकाकीकविचारसुनिजीवनकक्काकअन्तरात्माजेनाओहनबिजलोकाजकाँचमकलैनजेहेनमेठनकाखसैए।बजला- “लोककीकहत! लोकपहिनेअपनठेकानकरह।जेकराअपनठेकाननइसेअनकरठनकारोकिसकैएआकिअपनाकेँबँचासकैए।” पतिकविचारसुनिमंगलीकाकीसिरसिराएलगली।एकाएकदेहमेसिरसिराएलकँपनहुअलगलैन।कँप-कँपाइतपुछलखिन- “कीलोककठेकान?” पत्नीकजलियाएलविचारसुनिजीवनकक्काकमनमेकुवाथनहिभेलैन।तेकरकारणअछिजेजीवनकक्काकविचारकसागरमेलहैरजकाँउठिगेलछेलैन।लहराइतविचारमेआबिरहलछेलैनजेजँमनुखछोट-सँ-छोटआपैघ-सँ-पैघअपनजिनगीकरस्ताकबाधाकेँअपनाआँखियेठिकियामनसँहटबएचाहततँओजरूरहटाजिनगीकेँबाधामुक्तकऽसकैए।जखनेजिनगीबाधामुक्तभेलतखनेनेओजिनगीघोड़ाकचालिमेसरपटदौड़लगौत...। जीवनकाकाबजला- “जेसमस्याअपनापरिवारमेउपस्थितभऽगेलअछिओखालीअपनेपरिवार-टामेभेलआकिआइयेभेलअछिआपहिनेनइभेलहएतसेकेनाबुझैछिऐ? सभदिनहोइतआबिरहलअछिआआगूओहोइतरहत।महादेवकेँसेहोअर्द्धनारीश्वरकहलजाइछैन।जखनेअर्द्धनारीश्वरतखनेनेसन्तानविहीन! कार्तिकआगणेशतँतखनभेलैनजखनमहादेवआपार्वतीदुनूदूछला।मुदाजखनदुनूसटिएकभेलातखनकोनोसन्ताननइनेभेलैन।तँएकीहुनकादेववंशसँकियोहटादेलकैनआकिहटादेतैन?” ओना, मंगलीकाकीकेँमहादेव-पार्वतीकओकथा (मानेअर्द्धनारीश्वरबलाकथासुनलरहैनमुदाएनाभऽकऽनहि, ईनइबुझलरहैनजेअर्द्धनारीश्वरकी।तँए, धार-कातकपँकियाएलचपचपीमेजहिनाचँङ्गुराएलचिड़ौयोआपैरबलाजानवरकसंगलोकोचपिकऽगड़िजाइए, तहिनामंगलीकाकीसेहोचपिकऽगड़िमुँहपरहाथलैतबजली- “ऐँ.अ..अ..!” जीवनकाकाकेँजेनासहगरखेतकलभगरहालभेटलैनतहिनाबजला- “ऐँ-टेँनइकरू! वएहशिवजीमहादेवछैथजेदेखलखिनजेजेकृष्णजीमहिलासंगठनकनेताछैथओमहिलाछोड़िपुरुखकप्रवेशरोकनेछैथ, तखनओकीकेलैनसेबुझलअछि?” विचारकबोनमेहेराएल-भोथियाएलबेटोहीजकाँमंगलीकाकीबजली- “नइ! अहूँनेतँकहियोकहनेछेलौं।” जीवनकाकाबजला- “कोनोकिएकेटागपअछिजेओछुटिगेलतेबड़जुलुमभऽगेल।जखनेजागीतखनेपरात..!” उत्सुकाएलमंगलीकाकीबजली- “पहिनेशिवशंकरदानीककथाकहिदिअ।” पत्नीकचपचपीदेखचपचपाइतजीवनकाकाबजला- “शिवसँशिबानीबनिकृष्णजीकमहिलासंगठनमेशामिलभऽगेला..!” मंगलीकाकीकेँजेनाएकाएकभक्खुजलैनतहिनाबजली- “एहेनबातजेअहाँपेटमेरखनेछेलौंआकहियोएतबोसिनेहनइभेलजेहमरोकहितौं..!” पत्नीकझुझुआइतमनकेँजीवनकाकापकैड़बिच्चेमेबजला- “पेटमेकिएतबेअछि।अच्छाजखनअहाँपेटकबातलिअचाहैछीतेसुनू।ईतँशिवशंकरमहादेवकविषयमेकहलौं।आबसुनूमहाभारतकविषय।” ‘महाभारत’कनाओंमंगलीकाकीसुननेजरूरछैथआद्रौपदीकचिरहरणकसिनेमोदेखनेछैथ।तँए, महाभारतकनओंसुनिआरोजिज्ञासाबढ़िगेलैन।बजली- “सुनाइयेदिअ।जिनगीककोनोठेकानअछि, जँमनलगलेचलिजाएततखनतँअनेरेनेभूतबनिलपकबै।” मुस्कीदैतजीवनकाकाबजला- “जखनमहाभारतहोइतरहैने, तइमेएकटावीररहैशिखंडी, ओहोअपनेश्यामाजकाँछल।ओकीकेलकैसेबुझलअछि?” मुड़ीडोलबैतमंगलीकाकीबजली- “नइ..!” जीवनकाकाबजला- “कृपाचार्योकेँआकृतवर्मोकेँछेरा-छेराभरौलक!” मंगलीकाकीकमनमेजेनाआत्मबलफुलाएलगलैनतहिनाबिहुसैतबजली- “अरेवा..!” जीवनकाकामंगलीकाकीकमनमेपसिबजला- “ऐँ., एतबेमेहदिआइछी! भगवानरामजखनबोनजाएलगलातँअन्तिमविदाइअयोध्यावासीलैत-दैतपुरुख-नारीकहितँसभकेँविदाकऽदेलखिनआअपनेदच्छिनमुहेँकरस्ताधेलैन, आबीचमेकिछुगोरेओहिनाठाढ़ेरहिगेल, ओकीकेलकसेबुझलअछि?” मंगलीकाकीबजली- “नइ..!” जीवनकाकाबजला- “ओसभ–जेठाढ़छलसे–केसभछल? जेपुरुख-नारीकबीचकअछि।जेकराशखा-सन्ताननइहएत।जखनरामचन्द्रजी, लक्ष्मणआसीताकसंगघुमिकऽअयोध्याकआड़िपरपहुँचलातखनवएहसभदुनूभाँइकगट्टापकैड़कहलकैनजे‘अहाँहमराकिएनेविदाइदेलौं? जइआशामेअहींजकाँचौदहबर्खहमहूँसभटपलाखेलौं?” मंगलीकाकीकमनोआशरीरोजेनाशान्तभऽगेलैन।बजली- “जेअहाँकरबैसएहनेहमहूँकरब।” रणभूमिकसंगीपेबजीवनकाकाबजला- “श्यामाहमरसन्तानछी।अपनाजीबैतओकराभीखमाँगैतदेखब, कीओहनलाजकविचारलोकअपनेनइकरत।दुनियाँएकदिसभऽजाए, मुदा...।जाबेधरिश्यामापढ़एचाहत, समांगबुझिसहयोगदेबइ।जहियाओपढ़ाइछोड़ततहियाअपनाआँखिकसोझमेओकरामनोनुकूलजीबैकसाधनबनादेबइ।अपनापैरपरठाढ़कऽसमाजकओहनमनुखबनादेबैजेअपनश्रमसँअपनसुभिमानीजिनगीबनाजीबतआओकररक्षाकरैतरहत।” शब्दसंख्या : 2767, तिथि : 28 जनवरी 2018 Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

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