VIDEHA — Issue 282 / अंक २८२

Publication: VIDEHA · Issue: 282
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २८२ म अंक १५ सितम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४१ अंक २८२) 'विदेह' २८२ म अंक १५ सितम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४१ अंक २८२ ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- जगदीश प्रसाद मण्डलक औपन्यासिक कृति ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- बाबाकबाग-बगिया प्रदीप पुष्प गजल- १ टुकटुका रहल जिनगी सुगबुगा रहल जिनगी गीत फेर अचिआपर गुनगुना रहल जिनगी तेल बिनु डिबिया सन टिमटिमा रहल जिनगी नोरकेर बरखामे उजगुजा रहल जिनगी सून भेल आँगनमे लटपटा रहल जिनगी (212 12 22 सभ पाँतिमे) गजल- २ बीतलाहा बाटमे हेरा रहल छी ऐंठ छी हम चाह तेँ सेरा रहल छी पेरलक दैबा भऽतेना ने कसैया मेहमे बऽरदे जकाँ पेरा रहल छी देह भेलै आब अनमन टाँट सनठी आगि लागल ऊक सन फेरा रहल छी मीत मुसकी बीच कननी हैत अलगे नोर सुख दुखकेर हम बेरा रहल छी मन भेलै भोज करितौं गाम भरिक ‘पुष्प’गोलक बान्हमे घेरा रहल छी (2122 2122 2122 सभ पाँतिमे,मकताक पहिल पाँतिमे अन्तिम लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक औपन्यासिक कृति मैथिली साहित्यमे उपन्यास लेखनक आरम्भ होइत अछि 1914 इस्वीसँ। अनेकहु उपन्यासकार विद्वान लोकनि अपन-अपन औपन्यासिक कृतिसँ एहि विधाक सजबैत रहलाह। 1960 ईस्वीसँ पूर्व धरि मैथिलीमे निम्न-लिखित उपन्यासक सृजन भऽ चुकल छल- ‘निर्दयी सासु’ (1914), ‘शशिकला’ (1915), ‘पूर्ण विवाह’ (1926) ‘दुरागमन रहस्य’ (1946), ‘कलयुगी सन्यासी’ (1921),‘रामेश्‍वर’ (1915), ‘ सुमति’ (1918), ‘मनुष्‍यक मोल’ (1924) ‘चन्द्रग्रहन’ (1933),‘कन्यादान’ (1933), ‘चामुन्‍डा’ (1933), ‘मालती-माधव’ (1935) ‘सोन्‍दयोपासनक पुरस्कार’ (1938), ‘सुशीला’ (1943) ‘असहाया जाया’ (1945), ‘दुरागमन’ (1945), ‘जैबार’ (1946),‘पारो’ (1946),‘नवतुरिया’ (1956), ‘कुमार’ (1946), ‘भलमानुस’ (1947), ‘कला’ (1946), ‘विकास’ (1946), ‘चन्द्रकला’ (1950), ‘प्रतिमा’ (1950), ‘मधुश्रावनी’ (1956),‘वीरकन्या’ (1950), ‘विदागरी’ (1950), ‘अनलपथ’ (1954), ‘विद्यापति’ (1960), ‘कृष्णहत्या’ (1957), ‘रत्नहार’ (1957), ‘आन्‍दोलन’ (1958), ‘दुर्वाक्षत’ (1958), ‘आदिकथा’ (1958), ‘चानोदय’ (1959), ‘बिहाड़िपात-पाथर’ (1960) क्रमश: अनेकहु उपन्यासक सृजन अद्यतन भऽ रहल अछि आ आगूओ होइत रहत। कोनहु भाषा-साहित्यक सभसँ महान विधा उपन्यासकेँ मानल जाइछ। एहि विधाक श्रीवृद्धिमे मिथिलाक अनेकहु विद्वान उपन्यासकार लोकनि अपन-अपन अमूल्य योगदान दैत रहलाह अछि। जाहिसँ मैथिली साहित्यक उपन्यास-विधाक भण्डार दिनो-दिन विशाल होइत गेल अछि। एहि कड़ीमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो दू हजार इस्वीसँ रचना करय लगलाह। अन्यान्य विधाक संग उपन्यास विधामे सेहो हिनक योगदान महत्वपूर्ण अछि। अल्प समयावधिमे मण्डलजी दर्जन भरिसँ ऊपर उपन्यासक रचना कय सम्बन्धित विधाक श्रीवृद्धिमे योगदान कएलनि अछि। 1. मौलाइल गाछक फूल (2009), 2. उत्थान-पतन (2009), 3. जिनगीक जीत (2009), 4. जीवन-मरण (2010), 5. जीवन संघर्ष (2010), 6. नै धाड़ैए (2013), 7. बड़की बहिन (2013), 8. ठूठ गाछ (2015), 9. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं (2017), 10. लहसन (2018), 11. पंगु (2018), 12.आमक गाछी (2018), 13. भादवक आठ अन्हार- (अपूर्ण), 14. सधवा-विधवा- (अपूर्ण) क्रमश: सभ उपन्यासक पोथी परिचय द्रष्टव्य अछि- 1. मौलाइल गाछक फूल (2009):मण्डलजीक ई पहिल औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2004 इस्वीमे कयने छथि। लेखन कार्यक आरम्भक सन्दर्भमे उपन्यासकार अपन मंतव्य व्यक्त कयने छथि- “मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्‍वीमे लिखल पहिल उपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो रचनाकारकेँ छैन‍ से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटक लावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी।” प्रस्तुत उपन्यास, ‘मौलाइल गाछक फूल’क पहिल संस्करण 2009 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ भेल प्रकाशित अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। 03.04.2010क जनकपुर (नेपाल) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 69म कथा गोष्ठी आयोजित भेल छल। जाहिमे ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासक लोकार्पण डॉ. रामावतार यादव, प्रसिद्ध भाषाविद्, डॉ. रामानन्द झा ‘रमण’, डॉ. राजेन्द्र ‘विमल’, श्री राजाराम सिंह ‘राठौर’ तथा मंचस्थ अन्य विद्वान लोकनिक द्वारा भेल अछि। उपन्यासकारक समर्पण भाव विराट रूपमे अंकित भेल अछि। निम्नांकित हुनक समर्पण भावकेँ देखल जाए- “मिथिलाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलबाड़ी लगौनिहार तथा नव विहान अननिहारलेल...।” ई पोथी समर्पित अछि। एहि उपन्यासमे 13 गोट पड़ाव अछि। ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासमे उपन्यासकार समाजक विराट रूप प्रस्तुत कएलनि अछि। निम्नांकित 65 गोट पात्रक माध्यमसँ एहि उपन्यासकेँ मण्डलजी पूर्ण कएल- 1. बौएलाल, 2. रूपनी, 3. रधिया, 4. अनुप, 5. नथुआ, 6. मुसना, 7. रमाकान्त,8. शशि शेखर, 9. हीरानन्द, 10. अतिथि (मटकन) 11. सोनेलाल, 12. सोनेलालक बहिन, 13. सोनेलालक सारि, 14. फुद्दी, 15. सुगिया, 16. ड्राइवर, 17. झाड़ूबला, 18. डॉक्टर बनर्जी, 19. कम्पाउण्डर, 20. रमापति दास, 21. गंगा दास, 22. बुचाइ दास, 23. जुगेसर, 24. डॉक्टर महेन्द्र, 25. डॉक्टर रविन्द्र, 26. श्यामा, 27. डॉक्टर सुजाता, 28. डॉक्टर जमुना, 29. रमेश, 30. ब्रह्मचारीजी, 31. सुमित्रा, 32. रोगही, 33. कबुतरी, 34. बेंगबा, 35. राम प्रसाद, 36. टिकट मास्टर, 37. पैटमेन, 38. टमटमबला, 39. सुबुध, 40. सुकन, 41. मुनमा, 42. प्रधानाध्यापक, 43. विवेक बाबू, 44. राजिन्दर, 45. गुलबिया, 46. मंगल, 47. नवानीवाली, 48. किशोरी, 49. बुधनी, 50. सोमनी,51. बौका, 52. लखना, 53. बिलटा, 54. श्रीचन, 55. रूदल, 56. भज्जु, 57. झोली, 58. कुशेसरी, 59. मंगल, 60. एकटा ढेरबा बचिया, 61. ललबा, 62. सितिया, 63. जोखन, 64. भालेसर, 65. सोनमा। प्रस्तुत उपन्यासक परिचय दैत प्रसिद्ध साहित्यकारएवम् ‘विदेह’ ई पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर ‘प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना’ (भाग-२) मे लिखलन्हि अछि- “जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मौलाइल गाछक फूल’ गामक, गामसँ पड़ाइनक आ गलल व्यवस्थाक पुनर्जीवनक लेल समाधानक उपन्यास अछि।” प्रसिद्ध रचनाकार स्व. जीवकान्त एहि उपन्यासक भाषाक विषयमे प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना (विदेह-सदेह- 10)मे लिखलन्हि अछि- “पोथीक भाषा खाँटी लो‍कक भाषा थिक, कि‍ताबी भाषा नहि‍‍ थिक। सेहो एकटा विशि‍ष्‍ट आ महत्‍वपूर्ण बनबैत छैक। साहि‍त्यमे एहेन घर-आँगनक पात्र नहि आएल छल, से सभ प्रवेश कएलक अछि‍।” प्रसिद्ध समीक्षक/आलोचक डॉ. योगानन्द झा एहि उपन्यास तथा उपन्यासकारक सन्दर्भमे लिखलन्हि अछि- “श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासमे भाषाक कुशल ओ रचनात्मक प्रयोग भेल अछि जाहिसँ वर्णनमे सटीकता, सहजता, बिम्‍बधर्मिता, स्‍पष्टता ओ मनोवैज्ञानि‍क विश्‍लेषणक क्षमता प्रदर्शित होइत अछि। अपन गुणक कारणेँ मण्‍डलजीक कथा संसारमे विश्‍वसनीयता देखि पड़ैत अछि आ ओ अपन प्रौढ़ विचार ओ अनुभूतिकेँ पाठकीय मानसमे स्‍थानान्‍तरित करबामे सफल भेल छथि। अन्‍तत: महेन्‍द्रक उक्‍ति‍- ‘समाज रूपी गाछ मौला गेल अछि, ओहिमे तामि, कोड़ि, पटा नव जिनगी देबाक अछि जाहिसँ ओहिमे फूल लागत आ अनवरत फुलाइत रहत’मे उपन्‍यासक उद्धेश्‍य स्‍फुट भेल अछि। स्‍वभावत: मण्‍डलजी एहि कृतिक माध्‍यमे ग्राम ओ ग्रामेतर जीवनक संगहि व्‍यक्‍ति‍, परिवार, समाज ओ राष्‍ट्रक अभ्‍युन्‍नतिक हेतु एकर प्रत्‍येक इकाइकेँ त्‍याग ओ समर्पणक भावनासँ ओत प्रोत रहबाक आदर्श जीवन पद्धति अपनयबाक संदेश देलनि‍ अछि। हिनक ई संदेश ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्‍तु नि‍रामया:, सर्वे भद्राणि‍ पश्‍यन्‍तु मा कश्‍चि‍द् दु:खभाग भवेत्’क भावनाक पुन: उपस्‍थापन थिक।” एही कड़ीमे प्रसिद्ध समीक्षक श्री दुर्गानन्द मण्डल अपन ‘चक्षु’ पोथीमे उक्त उपन्यासक परिचय एहि तरहेँ प्रस्तुत कयने छथि- “मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यासमे सहजता, समरसता, यथार्थवाद, आदर्शवाद, धर्मभिरूता, एकल एवम् संयुक्‍त परिवारक रूप-रेखा खींच एकटा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण रूपमे उपन्‍यासकार हमरा लोकैनक मध्‍य उपस्थि‍त छैथ। हुनक ई विधासँ उपन्‍यास जगतमे एक्केठाम सभ तरहक सुख, आनंदक अनुभव होइत छैन। आजुक समाज जे सभ तरहेँ मौलाएल अछि। अपना उपन्‍यासक मादे उपन्‍यासकार मात्र एक आदमी रमाकान्‍तबाबूक हृदय परिवर्त्तन कऽ समाजमे एकटा नवका फूल खिलेबामे शत्-प्रतिशत सफल भेला अछि। रमाकान्‍त बाबू द्वारा अपन दू साए बीघा जमीन- सबहक माथपर एकहक बीघा खेत अर्थात् जेकरा सात गो बेटा ओकरा सात बीघा दऽ सभकेँ एकटा नव जिनगी प्रदान करैत छैथ। एक नव जिनगी जे पूर्णत: मौलाएल छल ओइमे फूल खिला दैत छैथ। हमरा आशा नै अपि‍तु विश्वास अछि जे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी सन उपन्‍यासकार होथि आ रमाकान्‍तबाबू सन नायक तँ अपन समाज रूपी मौलाएल गाछ, मौलाएल नै अपि‍तु फूलसँ लदि सकैत अछि।” 2. जिनगीक जीत (2009) : जिनगीक जीत उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक द्वितीय औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि कयने छथि। मुदा पुस्तकाकार रूपमे एकर पहिल संस्करण ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ 2009 इस्वीमे प्रकाशित भेल छन्हि। वर्तमानमे एहि पोथीक अग्रिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ सेहो प्रकाशित अछि। ‘जिनगीक जीत’ उपन्यासकपहिल संस्करण केर लोकार्पण कबिलपुर (दरभंगा)मे भेल अछि। डॉ. योगानन्द झाक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’क 70म कथा गोष्ठी 12.06.2010क आयोजित छल जाहिमे डॉ. मोहन मिश्रजी प्रस्तुत उपन्यास (जिनगीक जीत)क पहिल संस्करणक लोकार्पण कयने छथि। एहि उपन्यासक आमुखमे मैथिलीक सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. तारानन्द ‘वियोगी’ लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजीक साहित्यमे मिथिलाक ग्रामीण समाजक अद्भुत चित्र आएल अछि। मैथिलीमे एहि वस्तुक खगता सभ दिनसँ रहल अछि। हमरा लोकनि अक्सरहां चिन्तित होइत रहै छी जे गाम उजरि रहल अछि, गामक सम्बन्धमे जतबे जे किछु लेखन भऽ रहल अछि से निगेटिभ फोर्ससँ भरल अछि, अधिकाधिक हताश करऽ बला अछि। हमरा लगैत अछि जे जीवनमे देखबाक जे दृष्टिकोण जगदीशजीक छनि से आम मैथिली साहित्यकारक दृष्टिकोणसँ फराक छनि तेँ ओ एहन चित्र रचि पबैत छथि जे सामान्यसँ हटि कऽ अछि।” वरीय साहित्यकार श्री मन्त्रेश्वर झा लिखैत छथि- “जइ ‍ गाम घरक कथा सभ मण्डलजी उठाए ओकरा परि‍णति‍ तक पहुँचओने छथि‍ तइ गाम घरक एतेक सूक्ष्‍म आ वि‍स्‍तृत वि‍वरण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ऐसँ पूर्व कमे भेल अछि‍।” उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक सम्बन्धमे प्रसिद्ध साहित्यकार,‘विदेह’ ई पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरजीफ्लैपमे लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डल शिल्‍पी छैथ, कथ्यकेँ तेना समेट‍ लइ छैथ‍ जे पाठक विस्मि‍त रहि जाइत अछि। मुदा हिनका द्वारा कथ्यकेँ (कथा, उपन्‍यास, नाटक, प्रेरक-कथा सभमे) उद्देश्‍यपूर्ण बनेबाक आग्रह आ क्षमता हिनका मैथिली साहित्यमे ओइ स्थानपर स्थापित करैत अछि, जेतए-सँ मैथिली साहित्यक इतिहास ‘जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व’ आ ‘जगदीश प्रसाद मण्डलसँ’ ऐ दू खण्डमे पाठित होएत। समाजक सभ वर्ग हिनकर कथ्यमे भेटैत अछि आ से आलंकारिक रूपमे नै वरन अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर एबाक समान अछि। हिनकर कथ्यमे केतौ अभाव-भाषण नै भेटत, सभ वर्गक लोकक जीवन शैलीक प्रति जे आदर आ गौरव ओ अपन कथ्यमे रखै छैथ से अद्भुत।” एहि उपन्यासमे 15 गोट पड़ाव अछि। ‘जिनगीक जीत’ उपन्यासमे उपन्यासकार समाजक अन्तिम व्यक्ति अर्थात ओहन व्यक्ति जकरा देह छोड़ि किछु ने छैक, तकरा सभक माध्यमसँ अपन विराट भाव-भूमिकेँ प्रतिपादित कएलनि अछि। उपन्यासकार एहि उपन्यासकेँ लिखबामे निम्नांकित पात्र सभकेँ अनलन्हि अछि- “1. मखनी, 2. रूमा, 3. सुमित्रा, 4. बचेलाल, 5. पल्हैन‍, 6. अछेलाल, 7. जुगाय, 8. भुखनी, 9. दीनमा, 10. देवन, 11. भुटकुमरा, 12. राधाकान्त, 13. गुलेतिया, 14. रमुआ, 15. बुधनी, 16. नसीवलाल, 17. सजन, 18. जोगिन्दर, 19. फुसियाहा, 20. नवकी, 21. किसुनमा, 22. फुसियाहाकघरवाली, 25. जुगायक पत्नी, 26. . शिवकुमार, 27. रामनाथ, 27. दिनेशबाबू, 28. दोकानदार, 29. रमेसरा, 30. . देवीदत्त, 31. प्रधानाध्यापक, 32. धनिकलाल, 33. महंथजी, 34. पुजेगरी, 35. बबाजी, 36. बटोही, 37. शान्ति।” प्रो. वीणा ठाकुर, पूर्व विभागाध्यक्ष, मैथि‍ली वि‍भाग, ल.ना.मि.विश्ववि‍द्यालय- दरभंगा, ‘जि‍नगीक जीत उपन्यासक समीक्षा करैत लिखने छथि- “मिथिलाक लोक संस्‍कृति‍ संवाहक उपन्यास ‘जि‍नगीक जीत’मे उपन्यासकार जीवनक ओइ सत्यकेँ आत्मसात् करबाक प्रयास कयने छथि जइ‍मे जीवनक समस्‍त ‘सार’ नुकाएल अछि‍। उपन्यासक मध्‍यमे उपन्यासकार मनुष्‍य जीवनक समस्‍त राग-विराग, आशा-आकांक्षा, दीनता-हीनता, उत्‍कर्ष-अपकर्षक चि‍त्रि‍त करैत वस्‍तुत: जीवनक शाश्वत तथ्‍य- जीवाक इच्‍छाकेँ उजागर करवामे सफल भेल छथि। वस्‍तुत: ई उपन्यास भाषा अथवा वोलीमे जातीय स्‍मृति‍क आ साहि‍त्‍यि‍क रूप थिक जे हमर जातीय चेतना अथवा जातीय वोधकेँ सुरक्षि‍त राखने अछि‍। मिथिलाक सूच्‍चा चि‍त्र अंकि‍त करैत उपन्यासकार अपन जीवनानुभवसँ संचि‍त कएल ‘सार’ आओर ‘सत्य’केँ अभि‍व्‍यक्‍त कयने छथि। वस्‍तुत: ई उपन्यास मिथिलाक संस्‍कृति‍क प्रतीक थिक आओर एकर सार थिक शाश्वत। उपन्यास मध्‍य प्रकृति‍, परिवेश, आध्यात्म, समरसता आओर समन्‍वयक छवि आओर छटा सर्वत्र दृष्‍टि‍गोचर होइत अछि‍। वर्तमान साहित्यमे ई प्रवृति‍ प्रमुख अछि‍- एक समाजोन्‍मुख दोसर व्‍यक्‍ति‍ नि‍ष्ठा तथा आत्म केन्‍द्रीत। उपन्यासकारक प्रवृति‍ समाजोन्‍मुख अछि‍। सम्‍पूर्ण उपन्यास मध्‍य मिथिलाक गामक लोकक रहन-सहन, अचार-विचारक चि‍त्रण एतेक सजीव अछि‍ जे पाठककेँ ओइ‍ लोकमे लऽ जाइत अछि‍, जि‍नका गाम छुटि‍ गेल छन्‍हि‍। उपन्यास मध्‍य मिथिलाक समाजक चि‍त्र एतेक वास्‍तविक रूपमे चि‍त्रि‍त्र भेल अछि‍ जे मिथिलाक माटि-पानि‍क सुगन्‍धसँ पाठकक हृदए सहजहि आहलादित भऽ जाइत अछि‍।” 3. उत्थान-पतन (2009) : प्रस्तुत उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक तेसर औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि भेल अछि। ‘उत्थान-पतन’क पहिल संस्करण 2009 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘उत्थान-पतन’ उपन्यासक पहिल संस्करणक लोकार्पण डॉ. वीणा ठाकुरजी ‘सगर राति दीप जरय’क 70म कथा गोष्ठी कबिलपुर (दरभंगा)मे कयने छथि। उक्त आयोजन 12.06.2010क डॉ. योगानन्द झाक संयोजकत्वमे आयोजित भेल छल। प्रस्तुत उपन्यास ‘उत्थान-पतन’मे 15 गोट पड़ाव अछि। उपन्यासकार निम्नलिखित पात्रसभक माध्यमसँ उक्त पोथीकेँ लिखलन्हि अछि- 1. गंगानन्द, 2. पार्वती, 3. रीता, 4. दुखन सिपाही, 5. बचना, 6. फुलिया, 7. बचनाक सरहोजि, 8. बिशेसर, 9. भोलिया, 10. रतना, 11. रविया, 12. गुमश्ता, 13. बराहिल, 14. अमृतलाल, 15. सावित्री, 16. दीनानाथ, 17. बौआजी, 18. रूपचन, 19. सुशील वैद, 20. गुलबा, 21. तेतरी, 22. लेलहा, 23. ढोरबा, 24. दादी, 25. भालेसर, 26. मालि, 27. ज्ञानचन, 28. सुधिया, 29. प्रकाशचन्द, 30. चुनचुन, 31. विहारी, 32. बुधना, 33. बिशेसरक बहनोइ, 34. देवसुनरी, 35. माधुरी, 36. श्यामानन्द, 37. यमुनानन्द, 38. पटवारी, 39. लीला, 40. रामधन, 41. यमुनानन्दक पत्नी, 42. बेंगबा, 43. कुरहरिया, 44. नवकी दादी, 45. माला, 46. सुनयना, 47. गुलाब, 48. चंचल, 49. रामदेव, 50. गंगानन्दक नातिन, 51. मुनीलाल, 52. रेखा, 53. रेखाक माए, 54. बचनू, 55. मिस्त्री, 56. रघुनाथ दास, 57. सुकल, 58. फुलचन दास, 59. दिनेश, 60. महेन्द्र, 61. सरिता, 62. डॉक्‍टर नीलमणि सेन, 63. प्रोफेसर जफर, 64. हसीना, 65. डॉक्‍टर मुकुल, 66. पण्‍डित शंकर, 67. कपिलदेव, 68. कपिलदेवक पत्नी, 69. सुकन, 70. गणेशी, 71. बंगट, 72. त्रिवेणी, 73. रिक्शाबला, 74. चपरासी, 75. किरानी, 76. रामकिसुन, 77. सोनेलाल, 78. मंगला, 79. रघुवीर बाबा, 80. विदेसर, 81. मनचल, 82. भोलानाथ, 83. खुशीलाल, 84. दोकानदार, 85. रेशमा एहि उपन्यासक सन्दर्भमेबहुविधाविद् रचनाकार श्री राजदेव मण्डलजी कहैत छथि, अर्थात प्रस्तुत पोथीक सन्दर्भमे लिखने छथि- “केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। ऐ दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा केलैन अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम छी। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भेसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि। समाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहै छैथ‍ जे टुटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जइसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतै आ गामक सम्पूर्ण विकास हेतइ। सबहक संगे समाजिक न्याय हेतइ। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जइसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। ऐ माध्यमसँ लेखक देखबए चाहै छैथ‍ जे अपनो गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करय तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नै जाए पड़तै आ पड़ाइन रुकि जेतइ। अखनो गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नै पहुँच सकल अछि। तइ कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध केने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजे ऐ उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। ऐ तरहेँ देखै छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित केने छैथ‍, संगे आदर्श रूप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि।” प्रस्तुत उपन्यास तथा उपन्यासकारक सम्बन्धमे प्रसिद्ध साहित्यकारएवम् ‘विदेह’ ई पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरफ्लैपमे लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलक कथ्यमे नोकरी आ पलायनक विरूद्ध पारम्‍परिक आजीविकाक गौरव महिमा मण्डि‍त भेटैत अछि। आ से प्रभावकारी होइत अछि हिनकर कथ्य आ कर्मक प्रति समान दृष्टि‍कोणक कारणसँ आ से अछि हिनकर बेकती‍गत आ समाजिक जीवनक श्रेष्ठताक कारणसँ। जे सोचै छी, जे करै छी; सएह लिखै छी तइ कारणसँ। यात्री आ धूमकेतु सन उपन्‍यासकार आ कुमार पवन आ धूमकेतु सन कथा-शिल्‍पीक अछैत मैथिली भाषा जनसामान्‍यसँ दूर रहल। मैथिली भाषाक आरोह-अवरोह मिथिलाक बाहरक लोककेँ सेहो आकर्षित करैत रहल आ ओइ भाषाक आरोह-अवरोहमे समाज-संस्कृति-भाषासँ देखौल जगदीशजीक सरोकारी साहित्य मिथिलाक समाजिक क्षेत्रटामे नै वरन आर्थिक क्षेत्रमे सेहो कान्ति‍ आनत।” 4. जीवन-मरण (2010) : प्रस्तुत पोथी जगदीश प्रसाद मण्डलजीक चारिम औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि भेल अछि। ‘जीवन-मरण’ उपन्यासक पहिल/द्वितीय संस्करण 2010 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। 02.10.2010क बेरमा (झंझारपुर) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 71म कथा गोष्ठीमे ‘जीवन-मरण’ उपन्यासक लोकार्पण कुमार रामेश्वर लाल दासतथा मंचस्थ अन्य विद्वान लोकनिक बीच भेल अछि। सम्पूर्ण ग्रामीणक आयोजकत्व तथा जगदीश प्रसाद मण्डलजीक संयोजकत्वमे, मध्य विद्यालय परिसर- बेरमा गाममे उक्त गोष्ठी भेल छल। कहल जाइछ, सगर राति दीप जरय’क 71म आयोजनसँकथागोष्ठीमे खास बदलाव आबए लगल। नव-नव कथाकार, नव-नव सयोजकक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’ गाम-गाममे, गौंआँ-समाजक साहित्य प्रेमीक सार्वजनिक स्थलपर आयोजित होएबाक दिशामे अग्रसर भेल। पल्लवी प्रकाशनसँ प्रकाशित 118 पृष्ठक ‘जीवन-मरण’ उपन्यासक संग उपन्यासकारक विषयमे प्रसिद्ध समालोचक श्री शिव कुमार झा ‘टिल्लू’जी ‘मैथिली उपन्‍यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण’ विषयक आलेखमे एहि रूपे जिक्र कएलनि अछि- “कहैले तँ सभ साहित्यकार अपनाकेँ साम्‍यवादी कहै छथि मुदा साम्‍यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथिलीक सर्वकालीन साहित्यमे ध्रुवताराक स्‍थान श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीकेँ भेटबाक चाही। हिनक सभ उपन्‍यास (मौलाइल गाछक फूल, जिनगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्‍थान-पतन, नै धाड़ैए, सदबा-विधवा, बड़की बहिन, भादवक आठ अन्‍हार।)मे दलितक चित्रण अनायास भेट‍ जाइत अछि। लिखबाक शैली ओ बिम्‍बक चयन तेतेक पारदर्शी जे सवर्ण-दलितक मध्‍य कोनो खाधि नै। सम्‍पूर्ण समाजमे सकारात्‍मक तारतम्‍य स्‍थापित करबाक जगदीश जीक स्‍वप्‍न मात्र उपन्‍यासमे नै रहत, ऐ‍‍सँ मिथिलाक समाजिक परिस्‍थि‍तिमे भविसमे सर्वे भवन्‍तु सुखिन:, सिद्धान्‍तक स्‍थापना अबस्‍स हएत। हिनक अविरल मर्मस्‍पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति ‘मौलाइल गाछक फूल’ मे दलित समाजक महादलित मुसहर जातिक रोगही, बेंगबा, कबुतरीक मनोदशा आ नित्यकर्मसँ समाजमे शांतिक ज्‍योति जगबैक कल्‍पना अनमोल अछि। दरिभंगाक प्‍लेटफार्मपर सँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मरीचिका एकठाँ भक्क दऽ उगि जाइत अछि। भजुआ, झोलिया आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जातिक छथि, जिनकर सहायता सम्यक् सोचबला ब्राह्मण रमाकान्‍तजी करै छथि। ऐ‍‍ कृतिक सभसँ अजगुत पात्र छथि रमाकान्‍तजी। हिनक छोट पुत्र कालक डांगसँ अधमरू, वनिता सुजाता जे धोबिन छथि, तिनकासँ बिआह कऽ लइ छथि। बिआहे टा नै, बिआहसँ शिक्षा ग्रहण करैले प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि, जइसँ ओ डॉ. सुजाता बनि गेली। गाममे रहनिहार आ अपन मातृभूमिक प्रति असीम श्रद्धा रखनिहार रमाकान्‍त जीकेँ अपन पुत्र महेन्‍द्रक ऐ‍‍ निर्णएसँ कोनो पीड़ा नै भेलनि। हिनक सम्‍पूर्ण परिवार ऐ‍‍ निर्णएकेँ सहृदए स्‍वीकार कऽ लेलकनि। ..जगदीश जीक दोसर उपन्‍यास ‘जीवन-मरण’मे हेलन-गुदरी डोम दम्‍पतिक चर्च कएल गेल अछि। जीबछ, छीतन, रंगलाल चमार जातिसँ सम्‍बन्‍ध रखै छथि। जिनगीक जीत उपन्‍यासमे पलहनिक नेपथ्‍यक पात्रता दर्शित अछि।” प्रस्तुत उपन्यास ‘जीवन-मरण’केँ उपन्यासकार निम्नलिखित पात्रसभक माध्यमसँ लिखलन्हि अछि- 1. शीला, 2. डॉक्टर देवनन्दन, 3. सुभद्रा, 4. दयानन्द, 5. स्टाफ-सँ छात्र धरिक झुण्ड, 6. डॉक्टर कृष्णकान्त, 7. ड्राइवर, 8. आशा, 9. रघुनन्दन, 10. करिया काका (बटु), 11. रधिया दादी, 12. श्रीकान्त, 13. किसुन लाल, 14. सोधन, 15. लेलहा, 16. लेलहाक घरवाली, 17. घुरना भैया, 18. सुखदेव, 19. सुन्दर काका, 20. छीतन भाय, 21. छीतनक घरवाली, 22. जीबछ, 23. रंगलाल, 24. फोंच भाय, 25. बचनू, 26. सोहन भाय, 27. मनोहर, 28. मनोहरक माए, 29. अढ़ुलिया, 30. अपराजित, 31. बतहू, 32. चंचल, 33. झोली, 34. लोहनावाली, 35. शीला, 36. पढ़ुआ, 37. हुलन, 38. गुदरी, 39. कुसुमलाल, 40. राजेसर, 41. शंकरदेव। 5. जीवन संघर्ष (2010) :‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यास जगदीश प्रसाद मण्डलजीक उपन्यास विधामे पाँचिम पोथी छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि मण्डलजी कयने छथि। लेखन कार्यक आरम्भक सन्दर्भमे उपन्यासकार अपन मंतव्य व्यक्त कयने छथि- “पैंतीस साल धरि समाज सेवा केला पछाइत अपन हहरैत शरीर देख‍ किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल। ...मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्‍वीमे लिखल पहिल उपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो रचनाकारकेँ छैन‍ से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटक लावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी।” ‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यासक पहिल/द्वितीय संस्करण 2010 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। 02.10.2010क बेरमा (झंझारपुर) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 71म कथा गोष्ठीमे ‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यासक लोकार्पण प्रसिद्ध रचनाकार उग्र नारायण मिश्र ‘कनक’, अशोक (कथाकार)तथा मंचस्थ अन्य विद्वान लोकनिक बीच भेल अछि। 145 पृष्ठक एहि उपन्यासक लिखयमे उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी निम्नांकित पात्र सभकेँ सोझॉं अनलन्हि अछि- 1. पवित्री, 2. कुसुमलाल, 3. कुसुमलालक बेटी, 4. मनधन बाबा, 5. जोगिन्दर, 6. प्रेमलाल, 7. अनुप, 8. रघुनाथ, 9. देवनाथ, 10. मंगल, 11. गणेशी, 12. झुनझुनावाली, 13. सोनमा, 14. ढोलबा, 15. तेतरी, 16. प्रोफेसर दयानन्द, 17. ललबा, 18. बरसपैतिया, 19. भगतजी, 20. डलिबाह, 21. मसोमात, 22. प्रोफेसर कमलनाथ, 23. दुखनी, 24. नवानीवाली, 25. श्यामा, 26. भुखना, 27. देवन, 28. सजना, 29. दुनियालाल, 30. मुनेसरी, 31. रूपलाल, 32. भुलिया, 33. नसीवलाल, 34. सुनरी, 35. राजेसर, 36. डॉक्टर, 37. डोमन, 38. फुलेसरी, 39. सुरतिया, 40. फुदना, 41. सितिया, 42. रघुनी, 43. दोकानदार, 44. भोला, 45. बलदेव, 46. ललित, 47. ललितक पत्नी, 48. सुरजी, 49. मकशूदन, 50. देवनाथक पत्नी, 51. जीबछ, 52. दुखा, 53. निरधन, 54. बौना, 55. नेंगरा, 56. बौकू, 57. बाबा एहि उपन्यास तथा उपन्यासकारक विषयमे प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. कैलाश कुमार मिश्र ‘विदेह-सदेह, 10’ मे लिखलन्हि अछि- “श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक उपन्‍यास ‘जीवन संघर्ष’ एक नीक रचना थिक। एहेन रचना अगर मैथिली साहित्यमे लगातार हो आ ऐ तरहक रचनाक प्रचार-प्रसार नीकसँ कुनो जाति-पाति, वर्ग, सम्‍प्रदाय, स्‍थानीयता आदिक दुर्भावनासँ दूर भऽ कएल जाए तँ मैथिली साहित्य महिमा-मण्‍डि‍त भऽ एक गौरवशाली परम्‍पराकेँ प्रारम्‍भ कऽ सकैत अछि। ...‘जीवन संघर्ष’ पोथीकेँ अद्योपान्‍त पढ़ि चूकल छी तँ अनेक तरहक विचार मोनमे हिलोड़ लऽ रहल अछि। होइत अछि अगर कुनो कुशाग्र-बुधि‍बला शोध-विद्यार्थी भेटत तँ ओकरा उत्‍साहित करबैक जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलक रचनाशैली, जीवन-क्रम आ व्‍यक्‍ति‍गत इतिहास तीनूकेँ समेटैत मैथिलांचलक समाजक सन्‍दर्भमे एक समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन करए। ...साहित्यकेँ समाजक दर्पण कहल जाइत अछि। दर्पण तखन जखन साहित्यकार पारखी होथि। समाजक संग चलथि। सामाजि‍क बेवस्‍थाकेँ समैक संग विवेचना करथि। साहित्य सृजनक धर्मकेँ बुझथि। मण्‍डलजी ऐ कार्यकेँ इमानदारीपूर्वक केलनि अछि। ऐ उपन्‍यासकेँ हिन्‍दी, अंग्रेजी इत्यादि भाषामे अनुवादित कए प्रचार-प्रसार होमाक चाही। ई रचना समाजक दर्पण अछि। एक निश्चल आ आशावान विचारधाराकेँ प्रतिपादित करैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्‍डल अपन कृतिमे Native intelligence केर अभूतपूर्व प्रमाण दैत छथि।” 6. नै धाड़ैए (2013) : उपन्यास बाल साहित्यपर केन्द्रीत ई मण्डलजीक पहिल औपन्यासिक कृति छियनि। ओना, ‘नै धाड़ैए’ 6म उपन्यास थिक, एहिसँ पूर्व पाँच गोट उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी लिखि चुकल छथि। बाल साहित्यपर केन्द्रीत एहि उपन्यासक लेखन 2010 इस्वीक पछाति कएलनि। एकर पहिल संस्करण 2013 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे चारिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘नै धाड़ैए’ उपन्यासक लोकार्पण श्री उमेश मण्डलक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क80म कथा गोष्ठीमे श्री गुरु दयाल भ्रमर, डॉ. अशोक ‘अविचल’, डॉ. रामाशीष सिंह तथा मचंस्थ अन्यान्य विद्वानक द्वारा उपन्यासकार करबौने छथि। उक्त आयोजन मानिक राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, निर्मली, (सुपौल),मे दिनांक 30.11.2013क आयोजित भेल छल। ओहि गोष्ठीमे प्रस्तुत पोथीक रचनाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक एकसंग 21 गोट पोथीक लोकार्पण भेल रहन्हि। ‘नै धाड़ैए’ उपन्यासकेँ कुल पाँच पड़ावमे लिखलन्हि अछि। जाहिमे निम्नांकित पात्रसभक माध्यम बनाओल गेल अछि- 1.राधामोहन, 2. नन्दलाल, 3. पण्‍डाजी, 4. बुधनी, 5. बड़बड़िया, 6. फैजली, 7. पी.एन. बाबू, 8. दीनानाथ बाबू, 9. सुरेखा, 10. सुरेन्द्र बाबू...। 7. बड़की बहिन (2013) : केन्द्रीत उपन्यास थिक। एहि उपन्यासमे पाँच गोट पड़ाव अछि। एहि पोथीक लेखन 2010 इस्वीक पछाति कएलनि। एकर पहिल संस्करण 2013 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे चारिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘नै धाड़ैए’ उपन्यासक लोकार्पण डॉ. अशोक ‘अविचल’क अध्यक्षता आ श्री उमेश मण्डलक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क80म कथा गोष्ठी, मानिक राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, निर्मली, (सुपौल),मे दिनांक 30.11.2013क भेल अछि। 8. ठूठ गाछ (2015) :‘ठूठ गाछ’ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 8म औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासकेँ 25 अक्टुबर 2015 सँ 16 दिसम्बर 2015 धरिक समयावधिमे लिखल गेल अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे एक रचनाकारक जीवनक बात कएल गेल अछि। वैचारिक आ क्रियागत जीवनमे गड़बड़ी भेलासँ प्रोफेसर रामकृष्ण बाबूक जीवन ठूठ गाछ सदृश भऽ गेलन्हि जाहिसँ हुनक मुँहक बोली बन्न भऽ गेलन्हि। ‘ठूठ गाछ’ उपन्यासक पहिल संस्करण 2015 इस्वीमे ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। तथा एहि पोथीक लोकार्पण ‘सगर राति दीप जरय’क 88म कथा गोष्ठी- डखराम (बेनीपुर)मे भेल अछि। उक्त गोष्ठी श्री अमरनाथ झाक आयोजकत्वमे तथा श्री कमलेश झाक संयोजकत्वमे दिनांक 30.01.2016क मध्य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर) भेल छल। प्रस्तुत उपन्यासक समर्पण भावकेँ उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी, एहि तरहेँ व्यक्त कयने छथि- “जिनगीक तँ दुइएटा ने धुरी अछि, सुख आ दुख। अही दुनू धुरीपर ने दुनियाँक बीच आनो-आनो चरसँ अचर धरि नचबो करैए, उड़बो करैए, महकबो करैए आ महकेबो करैए। जेना एक दिस- बेली, चमेली आ जूही अछि जे धरतीसँ सटल अपन पातक पवित्रता आ फूलक सादगीक संग अपन जिनगीक आदि-अन्त करैत अकासकेँ अपन महकसँ महकबैत जीवन-लीला समाप्त करैए तँ दोसर दिस- राड़ी, डबहारी आ पटेर अछि जे अपन फूलकेँ अकासमे पसारि एक दिशासँ दोसर दिशा उड़ि-उड़ि अपन रंग-रूप देखबैए, मुदा महक केहेन रखने अछि से बेली, चमेली आकि जूही पुछौ कि नै पुछौ मुदा देखनिहारक दायित्व तँ बनियेँ जाइए..!” 9. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं (2017) : उपन्यासकार एहि उपन्यासकेँ 14 सितम्बर 2017 सँ 19 अक्टुबर 2017 धरिक समयावधिमे कुल दस पड़ावमे रचलन्हि अछि। पल्लवी प्रकाशन प्रकाशित एहि उपन्यासक लोकार्पण ‘सगर राति दीप जरय’क मंचपर 16.12.2017क कराओल गेल अछि। उक्त आयोजन श्री राधाकान्त मण्डलजीक संयोजकत्वमे धबौली (लौकही, मधुबनी)मे आयोजित भेल छल। प्रस्तुत उपन्यास ‘इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं’मेक्रमश: सभ पड़ावक पात्रसभक विवरण निम्नांकित अछि- एक-1. खुशीलाल, 2. रघुवीर, 3. घसवाहिनी, 4. घसवाह दू-1. खुशीलाल, 2. सिंहेसर, 3. बचनू तीन-1. खुशीलाल, 2. सोमन, 3. रजनी, 4. राम सुनरि चारि-1. बचनू, 2. रमेश, 3. खुशीलाल, 4. राम सुनरि, 5. विलास, 6. रोहिणी, 7. भोगिया देवी पाँच-1. खुशीलाल, 2. बचनू, 3. खुशीलालक माए छअ-1. बचनू, 2. बचनूक पत्नी, 3. सुरेश, 4. जीतन, 5. सुगिया सात-1. जीतन, 2. बचनू, 3. सुरेश, 4. खुशीलाल, 5. बुधनी, 6. गीता, 7. सुभावी, 8. बड़ाबाबू आठ-1. बचनू, 2. बचनू भाइक पत्नी, 3. सुरेश, 4. खुशीलाल, 5. जीतन, नअ-1. जीतन काका, 2. बचनू, 3. सुगिया काकी, 4. महात्माजी, 5. खुशीलाल, 6. सुमित्रा, 7. बचनूक मामा, 8. सुशीला दस-1. भोगिया देवी, 2. विलास, 3. बचनू, 4. जीतन काका, 5. खुशीलाल, 6. सुशीला सभ उपन्यासक पात्रक नामकरण उपन्यासकार बड़ सोचि-समझि कऽ कयने छथि। नामक शब्दक अर्थ पात्रक चरित्रमे निरुपित कयने छथि। चरित्रक अनुसार अर्थात् नामक अनुसार चरित्र (पात्र) आ ताहि अनुकूल पात्रक क्रिया-कलाप जहिना जगदीश प्रसाद मण्डलक सभ रचनामे भेटैत अछि तहिना उपन्यासमे अछि। ई नहि जे नीक नाओं राखि लेलौं मुदा क्रिया-कलाप ओहि शब्दक गुणक उल्टा भऽ चलैए, शब्दक संग खेल करैत शब्द-साहित्यक प्रति मात्र खाना-पुरी करैए। 10. लहसन (2018) : प्रस्तुत उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक दसम औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 10 नवम्बर 2017 सँ 25 फरवरी 2018 धरिक समयावधिमे कएलनि। ‘लहसन’क पहिल संस्करण 2018 इस्वीमे ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार : 847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘सगर राति दीप जरय’क 97म गोष्ठीमे ‘लहसन’ उपन्यासक लोकार्पण भेल अछि। उक्त गोष्ठी, दिनांक 24.3.2018क प्रसिद्ध कथाकार श्री कपिलेश्वर राउतजीक संयोजकत्वमे बेरमा (झंझारपुर, मधुबनी)मे आयोजित भेल छल। प्रस्तुत उपन्यासक सन्दर्भमे प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रअपन ब्लॉग ‘भोरसँ साँझ धरि’मे लिखने छथि- “श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘लहसन’ उपन्यासकेँ पढ़लासँ पाठक थोड़बे कालमे समाजक निम्नतम पौदानपर ठाढ़ लोकक जिनगीक बारेमे बहुत किछु बुझि सकैत छथि। किछु एहन करबाक प्रेरणा प्राप्त कए सकैत छथि जाहिसँ मेवालाल सन-सन गरीब लोकसभकेँ गाम छोड़ि कलकत्ता सन महानगर पलायन नहि करय पड़नि। एहिसँ प्रेरणा लए समाजक समृद्ध लोकनि किछु करथि जाहिसँ गाम-घरसँ पलायन बन्द होअए आ गाम एकबेर फेर पल्लवित-पुष्पित भए जाए। ई उपन्यास हुनका लोकनिक हेतु एकटा मार्गदर्शकक काज कए सकैत अछि जे शहर गेलाक बाद आधुनिकताक प्रवाहमे अपनासन लोककेँ छोड़ि विशिष्ट बनबाक फिराकमे पैघ लोकसभसँ सटैत छथि आ ताहि क्रममे सभ किछु गमा लैत छथि। मिथिलाक अधिकांश लोक गुजर करबाक हेतु दिल्ली, पंजाब, कलकत्ता आ आन-आन शहरसभमे पसरि गेल छथि। कतेको गोटे तँ अरब चलि गेल छथि। किएक? तकर मूल कारण थिक अपना ओहिठाम रोजगारक अभाव।” एहि उपन्यासमे कुल नौ (9) गोट पड़ाव अछि। प्रत्येक पड़ावमे जाहि पात्रसभकेँ उपन्यासकार अनलन्हि, ओ क्रमश: निम्नलिखित अछि- एक- 1. मेवालाल, 2. सुभावी, 3. बुधिलाल, 4. मेवालालक पत्नी। दू- 1. मेवालाल, 2. सुभावी, 3. दोकानदार, 4. चाहबला, 5. मकैबला, 6. पानबला तीन- 1. मेवालाल, 2. रविनाथ चारि- 1. मेवालाल, 2. सुमनलाल, 3. नटुआ पाँच- 1. मेवालाल, 2. रविनाथ, 3. सुमनलाल, 4. दोकानदार, 5. भूषण, 6. बचनू, 7. बौन, 8. राघव, 9. मनोहर, 10. सुकदेव सात- 1. मेवालाल, 2. बौन, 3. बचनू, 4. दुखमोचन आठ- 1. मेवालाल, 2. मैनेजर नअ- 1. मेवालाल, 2. सुनीलपाल, 3. अंतिकापाल, 4. राधा, 5. वकील साहैब, 6. सुदामा 11. पंगु (2018) :‘पंगु’ उपन्यासक पहिल संस्करणक प्रकाशन वर्ष- 2018अछि। पल्लवी प्रकाशन : निर्मली (सुपौल)सँ एहि पोथीकेँ प्रकाशित कराओल गेल अछि तथा प्रसिद्ध कथाकार व समीक्षक डॉ. शिव कुमार प्रसादजीक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क 97म कथा गोष्ठी, सिमरा (झंझारपुर)मे ‘पंगु’क लोकार्पण कराओल गेल अछि।उक्त आयोजन दिनांक 16.6.2018क आयोजित भेल छल। ‘पंगु’ उपन्यासमे कुल 9 गोट पड़ाव अछि। एहि उपन्यासकेँ 11 मई 2018 सँ 6 जून 2018 धरिक अवधिमे मात्र 8 गोट पात्रक बीच उपन्यासकार रचना कएलनि अछि। क्रमश: सभ पात्रक नाओं द्रष्टव्य अछि- 1. गुलाबचन, 2. बराहिल, 3. बालचन, 4. सोराजीलाल, 5. सिंहेश्वर, 6. देवचरण, 7. हरिचरणतथा 8. सिंहेसरी। प्रस्तुत उपन्यासक आरम्भ सीतापुर गामसँ होइत अछि। उपन्यासकार सीतापुरक परिचय एहि तरहेँ देलन्हि अछि- “हजार बीघा जमीनक ऑंट-पेटबला गाम सीतापुरमे जहिना सभ रंगक भूमि अछि–ऊँचगर-सँ-निचगर धरि, तहिना ओइ भूमिक उपज सेहो सभ रंगक अछिए। ओना, सालो भरि बहैबला धार, जेकरा चलन्त धार कहै छिऐ ओ सीतापुरमे एकोटा नहि अछि। तँए कि सीतापुर धार रहित गाम अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। सीतापुरमे दूटा धार अछिए। जइमे उत्थर रहने एकटा धार मात्र बरसाते भरि बहैए, जेकरा चौमसिया धार गौंआसँ लऽ कऽ अनगौंऑं तक कहै छैथ। गौंआँ ऐ दुआरे कहै छथिन जे गाममे रहने अपना-अपना ऑंखिये देखबो करै छैथ आ ओइसँ जे हानि-लाभ अछि सेहो भोगिते आबि रहल छैथ। आ अनगौंआँ ऐ दुआरे कहै छथिन जे आनो-आनो गाम देने होइत ओ धार बनलो अछिए आ बहितो अछिए। मुदा दोसर जे धार अछि ओ बरहमसिया चलन्त धार तँ नहि छी, मुदा गहींरगर रहने अखाढ़-सँ-अगहन तक बहैत अछि। तँए ओकरा छह-मसुआ धार सभ कहै छैथ। जहिना खेत-पथार अखाढ़मे अन्नसँ आच्छादित होइए आ अगहनमे उसरन भऽ जाइए तहिना ओ धार पहाड़ी पानिसँ लऽ कऽ धरतीक पानिक बीच अपन धारा बना बहिते अछि। वर्फसँ बनल पानि जहिना पवित्र होइए, माने ओइमे सुन्नरताक चमक रहै छै, तेकर विपरीत बर्खाक पानिक बहाब होइए, जे मेघसँ बरिस पाथरक स्थानसँ लऽ कऽ माटिक स्थानकेँ धोइ-पखारि बहैए, जइसँ ओकर रंग मटमैल रहैत अछि। मटमैल एक रूप भेल आ गन्दगीसँ भरल गन्दपन दोसर रूप भेल। मटमैल रहनौं बिना गंदपन रहने गन्दा दोसर रूप भेल। खाएर जे भेल जेतए भेल से भेल तेतए भेल। मुदा सीतापुरक बीच जे धार अछि ओ माटि-पाथरक धोन पानिक अछि, तँए ओकरा गन्दा नहियेँ कहल जा सकैए। गेन्दा फूल जकाँ ओकरो ऑंखिमे चमक छइहे। जइमे बहाउ धारक अतिरिक्त अनेको रंगक जलस्रोत सेहो अछिए। मिथिलांचलक बीचक गाम ने सीतापुर छी तँए गामक अनेको विशेषता अखनो सीतापुरमे चलिए रहल अछि। गामो तँ गाम होइते अछि। मुदा ओहूमे ने नकोर, सकोर आ कुकोरक गुण सेहो होइए। ओना, तीनू गुणसँ सम्पन्न गाम सभ सेहो अछि आ फुट-फुट गुणबला गाम सेहो अछिए। तइमे आन-आनसँ भिन्न सीतापुर गाम अछि। जहिना हजार बीघा रकवा जमीन छै तहिना अठारह गण्डा पोखैर सेहो छै तहूमे जाइठबला। जहिना अठारह गण्डा जाठिबला पोखैर सीतापुरमे अछि, तहिना दूटा नमहर पनिझाउबला आ दर्जनो छोट-छोट पनिझाउबला पोखैर सेहो अछिए, मुदा ओ सभ जाइठ रहित अछि। ओना तहूमे दुनू नमहरका जे अछि ओकरा लोक दैंतक खुनल पोखैर कहैए आ बाँकी छोट-छोट जे रंग-रंगक अछि तेकरा सभकेँ चभच्चा, कोचाढ़िसँ लऽ कऽ डोह-डाबर कहैए। भाय! भूमि तँ भूमि छी किने, तहूमे सीतापुर गामक, जे कि मिथिलाक मध्य बसल गाम अछि। ऐठामक भूमिक तँ ई गुण ऐछे जे कुइयाँ-इनारक रूपमे जहिना पतालसँ पानि अनैए तहिना खेत-पथारसँ लऽ कऽ अकास धरिक पानिकेँ सेहो संचित करिते अछि। साए-साए बीघाक दूटा चौरी सेहो अछि। जइमे छह-सात मास तक पानिक जमाव रहैए। जइसँ अन्न, फूल, फल उपैजतो अछि आ ओकर रक्षा सेहो होइत अछि। अन्न-फूल आ फल तँ धरतीक ऊपर होइए। ओहन धरतीपर, जइमे पानि आबि किछु दिन पहुनाइ करैत या तँ अकासमे उड़ि कऽ चलि जाइए वा रसे-रसे पताल दिस सटैक कऽ चलि जाइए वा ऊपरसँ टघैर-टघैर ओही नीचला खेतमे- माने चौरीमे चलि जाइए। ओना, अकाससँ धरतीपर उतैर वएह पानि उड़ि-उड़ि अकासो दिस बढ़ैए आ पतालो दिस ससरैत समुद्रसँ सेहो गड़ाजोड़ी करिते अछि। खाएर जे अपना मन फुरै छै से अपन करैए, अनेरे सीतापुरबलाकेँ एतेक हिसाब लइक कोन काज अछि। हमरा सभकेँ ओतबे से ने मतलब अछि जे नीक-नीक माछ उपजए, नीक-नीक सौरखी, करहर आ बर्री उपजए, तैसंग गाए-महींसकेँ नहाइ-पीबैले आ खेत पटबैले पानि भेटए। बस भऽ गेल जरूरतक पुरती..! लोककेँ अनेरे कोन खगता छै जे धरतीए जकाँ पानियोँक ऊपरमे ओछाइन ओछा कऽ सुतबो करत आ बैस-बैस कऽ ताशो भाँजत। कोन खगता छै जे पचीसीक घर बना पचीसियो खेलत आकि कोजगरा-दिवालीक उत्सवे मनौत। तइले तँ धरती अछिए।” 12.आमक गाछी (2018) : एहि उपन्यासक लेखन 2018 इस्वीमे 10 अगस्त सँ 30 सितम्बर धरिक समयावधिमे कएल गेल अछि। उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी एहि उपन्यासक निर्माणमे 9 गोट पड़ाव बनौलन्हि अछि। प्रस्तुत पोथी 122 पृष्ठक अछि। एहि पोथीक पहिल संस्करण, पल्लवी प्रकाशन, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार : 847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘आमक गाछी’क लोकार्पण शातांक कथा गोष्ठीमे सामुहिक रूपमेभेल अछि। सगर राति दीप जरय’क 100म कथागोष्ठी 22 दिसम्बर 2018कउमेश मण्डलक द्वारा श्री नवरत्न जैन वेंगानी, श्री मनीष जालान आयोजकत्वमे निर्मली (सुपौल)मे भेल अछि। एहि उपन्यासमे 9 गोट पड़ाव अछि। शब्द संख्याक संग प्रत्येक पड़ाव केर विवरणनिम्नांकित अछि- 1. शब्द संख्या : 3068, तिथि : 10 अगस्त 2018 2. शब्द संख्या : 3553, तिथि : 17 अगस्त 2018 3. शब्द संख्या : 2484, तिथि : 22 अगस्त 2018 4. शब्द संख्या : 2291, तिथि : 28 अगस्त 2018 5. शब्द संख्या : 2185, तिथि : 02 सितम्बर 2018 6. शब्द संख्या : 4701, तिथि 12 सितम्बर 2018 7. शब्द संख्या : 1805, तिथि : 15 सितम्बर 2018 8. शब्द संख्या : 1917, तिथि : 25 सितम्बर 2018 9. शब्द संख्या : 1914, तिथि : 30 सितम्बर 2018 13. भादवक आठ अन्हार (अपूर्ण) : प्रस्तुत उपन्यासक लेखन कार्य एखन पूर्ण नहि भेल अछि, अपूर्ण अछि। तथापि ‘भादवक आठ अन्हार’मे एखन धरि जतबा पात्र सोझा आएल ओ निम्नांकित अछि- 1. सुरजा काका, 2. चुनमुनियाँ काकी : उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी,‘भादवक आठ अन्हार’ उपन्यासक आरम्भ एहि तरहेँ कयने छथि- “आने दिन जकाँ सुरजा काका जुन्ना आड़िपर राखि पाँज भरि जनेर कटने रहैथ आकि हल्ला जकाँ दूरक अवाज बुझि पड़लैन। जनेर काटब छोड़ि आड़िपर आबि ठाढ भऽ हियासए लगला। दूरक हल्ला दुरेमे, तँए कोनो तेहेन साफ नहि, घरघराएले बुझि पड़लैन। मन भेलैन जे कनी टहैल-बुलि हल्लाक भाँजो बुझि ली आ पानियोँ पीब लेब। पानि मनमे अबिते, मनेमे कटौझ उठलैन। एक मन कहैन- “पानि पीब” आ दोसर कहैन- “पानि नहि पीब।” दुनूक तर्को अपन-अपन आ चालियो अपन-अपन। एकक तर्क जे धरतीपर सभसँ शुद्ध पानि होइए। दोसराक तर्क जे पानि नहि, अन्न होइए। आनो-आनो गामक अन्नमे रोगक दोख नइ छै जे पानिमे छइ। एक्के गामक दोसर इनार वा कलक पानि पीने सरदी भऽ जाइ छइ। मुदा तैयो दुनू संगे शास्त्र-पुराणसँ लऽ कऽ चौक-चौराहा धरि तँ टहैलते अछि। देखनिहार तँ एक-दोसराक प्रेमी कहबे करत। ओना सुरजा काका जखन भोरुका उखड़ाहाक काज शुरू करै छैथ तइसँ पहिने अन्न-जल कइए कऽ शुरू करै छैथ। मनमे हल्लाक गुनधुनी लगले रहैन आकि एक गोटे मोटर साइकिलसँ सड़क धेने जाइतो आ बजितो जे कोसी बान्ह टुटि गेल। एक दिसनसँ गामक गाम डुमौने अबैए। बिना किछु दोहरौने सुरजा काका घासक आँटी बान्हि घर दिस बढ़ला। दस गोटेक परिवार सुरजा कक्काक। पाँच बीघा खेतक बीचक गिरहस्ती। ओना खेतक आँट-पेट छोट रहैन मुदा अपनाकेँ गिरहस्त मानैत। गिरहस्त तँ वएह ने जे अपन खेत-पथारसँ जीवन-यापनक लग घरि पहुँच सकए। पाँचे बीघाक रकबामे एकटा दस कट्ठाक पोखरियो छैन जोत जमीनमे एक बीघा घासोक खेती करै छैथ, जइसँ खुट्टापर गिरहस्ती जिनगीक एकटा उद्योग लगौने छैथ।” 14.सधवा-विधवा (अपूर्ण) उपरोक्त ‘भादवक आठ अन्हार’ सदृश अहू उपन्यासक लेखन कार्य एखन अपूर्ण अछि। एखन धरिक लेखनमे निम्नांकित पात्रसभक चर्च भऽ चुकल अछि- 1. सरोजनी मैयाँ, 2. रूक्मिणी, 3. हंशराज, 4. मदनेसर, 5. दमयन्‍तीक, 6.सुखदेव। प्रस्तुत उपन्यासक आरम्भ एहि तरहेँ कयने छथि- “सत्तैर वर्षीए सरोजनी मैयाँकेँ अखनो वएह सुधि-बुधि छैन जेना पहिने छेलैन। अखनो ओहने झोंकाह जकाँ जिनगीकेँ झोंकि चलै छैथ जेना जुआनीमे सभ चलैए। तहूमे मरणक ऐगला बेठेकान सीमा रहने ओ सीमाने हेराएल छैन। नर्क-निवारण चतुर्दशीक दिन। मरद तँ कमो-सम मुदा अधिकांश स्त्रीगण पाबैनक उपास केने। एक तँ किसान-बोनिहारक बैसारीयेक दिन दोसर दिनोक आँट-पेट छोट रहने उपासो असान। देखते-देखते दिन कटि जाइत अछि, तहूमे सूर्योदयसँ अस्ते भरिक ने उपास। किरिण डुमिते फलहार कऽ पाबैनक विसर्जन कए लेल जाइत अछि। बेर झूकिते सरोजनी-मैयाँ दिनक बाँकी काज दिस नजैर उठौलैन तँ भक-दे मन पड़लैन जे आन दिन समय पाबि खेनाइ खा विद्यालय देख अबै छेलौं मुदा बिसरैक कारण भरिसक उपासे तँ ने भेल। एक-सँ-साए धरिक गिनतीमे एकाएकी ऐगला संख्या अबैत जाइत अछि, भरिसक पैछला काज छुटने ऐगला ने तँ भोतिया गेल। मुदा छोड़लो तँ नहियेँ जा सकैए। तखन उपाय? हँ उपाय यएह जे, जे समय शेष बँचल अछि ओहीमे बीच बचा कऽ देख आएब नीक हएत।” श्री जगदीश प्रसाद मण्डल लेखन कार्यक प्रारम्भक संग अपना विषयमे मंतव्य व्यक्त कयने छथि- “जहिया एम.ए.क विद्यार्थी रही तहिए नोकरीसँ विराग भऽ गेल। आठ बीघा जमीन रहए। खेतीसँ जीवन-यापन करैक बिसवास भऽ गेल। बिनु गार्जनक–पुरुष गार्जनक–परिवार 1960 ईस्‍वीमे भऽ गेल। पितेक अमलदारीसँ दू भाँइ पिसियौत रहै छला। तत्काल गार्जनी हुनके दुनू भाँइपर छेलैन। कोसीक उपद्रवसँ भागल पीसा बेरमे माने सासुरेमे रहि गेल रहैथ‍। ..पिताक मृत्युक समय तीन बर्खक हम आ छह बर्खक जेठ भाय छला। पिसियौत भाए 1960 ईस्‍वीमे अपन गाम ‘हरिनाही’ चलि गेला। दुनू भाय, श्री कुलकुल मण्डल 1954 इस्वीमे आ हम 1957 इस्वीमे गामक स्कूलसँ निकैल अपर प्राइमरी स्कूल कछुबीमे नाओं लिखौने रही। 1960 ईस्‍वीसँ परिवारक बोझ पड़ल। पुरुष विहीन भेनौं माए ओहन परिवारक छेली, जइ परिवारमे मामा 1942 ईस्‍वीमे अंग्रेजक गोली खा चुकल छला। साहसी माए। अपन गहना, जमीन बेच देल बच्चाकेँ पढ़बै खातिर। पैंतीस साल धरि समाज सेवा केला पछाइत अपन हहरैत शरीर देख‍ किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल।” आशीष अनचिन्हार गजल कियो कारी बुझलक कियो उज्जर कहलक कियो शीशा बुझलक कियो पाथर कहलक जाइ अबै छी बिन रोक टोक ओइ ठाम कियो मालिक बुझलक कियो नौकर कहलक गलत काज भेलापर अंतर नै रहलै कियो साधू बुझलक कियो लोफर कहलक जीवन ईहो छै आ जीवन ओहो छै कियो अप्पन बुझलक कियो दोसर कहलक उपेक्षित रहब अनचिन्हारक कपारमे कियो चिंतक बुझलक कियो जोकर कहलक सभ पाँतिमे 222-222-222-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल बाबाकबाग-बगिया दसकट्ठाककलम-बागबाबाकआइसुखिरहलछैन, टुटि-टुटिझड़ि-झड़िखसिरहलछैन।बाबाकबाग-बगियाकओरूपनहिरहलजेकहियोछेलैन। गोबरधनदासकजन्मकतीनसालकपछाइतपिताकमृत्युभऽगेलछेलैन।बपटुग्गरगोबरधनदासअपनमाइकसंगदिनकाटएलगला।एगारहबर्खकजखनगोबरधनदासभेलातैबीचमाइयोकमृत्युभऽगेलैन।एगारहबर्खकगोबरधनदासकमनमेउठलैन- जेकरामाए-बाप, स्त्री-बच्चाछैसेनेपरिवारआपरिवारकमायामेओझराएलरहत, हमराकोनमायाअछिजेसमाजकवापरिवारककोनोबान्ह-छानलागत...। लगलेफेरगोबरधनदासकमनमेउठलैनजेअपनासनकिकोनोहमहींटाछीआकिआरोलोकअछि।जहिनादुनियाँमेसभअपनेसनअछितहिनानेहमहूँछी।नइरहबऐगाममे।जेकरालाब-लस्करछैतेकरानेमाया-मोहरहतै, हमराकिएरहत।एकटाटुटलघरअछि, सेहोघराड़ीअपननहियेँछी, जेकरछिऐओकखनोलऽलेत।जाबेदेनेअछिताबैयेतकनेअपनघरअछि, जहियाजमीनबलाकमनहेतैतहियालऽलेत। संजोगबनल, किछुएदिनकपछाइतकुम्भमेलाकसंगत्रिवेणीस्‍नानकसमयआएल।गोबरधनदासकमनमेउठलजेबाबाजीसभकेँगाड़ीमेटिकटनहियेँलगैछै, हमहूँकोनोबबाजीकजत्थाकलाटपकैड़लेब, बिनुटिकटेत्रिवेणीघाटपहुँचजाएब।गंगामेस्‍नानकरिमाता-पितासँलऽकऽपूर्वजधरिकस्मरणकरैतडूमलऽलेब।घुमतीकालफेरकोनोबबाजियेकलाटपकैड़लेब, मनहएततँबबाजीएबनिजाएबनइतँकेतौकोनोनोकरीएपकैड़लेब।जखनहाथ-पएरदुरुस्तअछितखनगुजरनइचलत! चलबेकरत।भेलतँछहसातबर्खकखेलअछि।जखनेजुआनहएबतखनेबिआह-दानकरैकछूटभेटियेजाएत।पछाइतबुझलजेतइ...। दुनूदिसकबाटगोबरधनदासकमनमेउठिगेलैन।मानेबबाजियोबनैकआपरिवारिकोबनैक।मुदाबबाजीकलाटपकड़ैलेतेबबाजीबनइपड़त।मानेकोनोसाम्प्रदायिकगुरुमंत्रकसंगकण्ठीलेलापछातियेनेबबाजीहएब।खाएर.., काजोतँकोनोतेहेनकठिनगरनहियेँअछि।हल्लुकेअछि।मुदाहल्लुकोकाजएतेधड़फड़ीमेहएतकेना? परसूएलोकगाड़ीपकड़त, आइबीतियेरहलअछि, अदहासँबेसीसमयबीतिचुकलअछि।अखनविचारियेरहलछी।भेलतँबीचमेमात्रकाल्हिभरिसमयअछि।तेहीमेबटखरचोकओरियानकरएपड़त।अनकाजकाँमाँगि-माँगिखाएबसेहोकेहेनहएत।अखनजनैमकऽठाढ़ेभेलौंअछि, अखनेजँआत्मामेआगिलगालेब–मानेमाँगि-माँगिखाएबशुरूकऽलेब, एकरालोकोनीकथोड़ेकहत।आजँमाँगि-माँगिखेनिहारनीकोकहततँअपनमनथोड़ेनीककहत।जेकरामाँगि-माँगिखाइकआदतछैआकिठकि-फुसियाकऽखाइकआदतछै, ओभलेँनीककहिसकैएमुदासेनीकथोड़ेभेल। एकसंगगोबरधनदासकमनमेतीनटाप्रश्नउठिगेलैन।पहिल- कुम्भमेलामेत्रिवेणी-स्‍नानकरब, दोसर- कण्ठीबान्हिबबाजीबनबआतेसर- रस्ताकखर्चकओरियान...। परसूभोरेलोकगाड़ीपकड़त।बीचमेएकदिनबँचैएजइमेतीनूकाजकेनासम्हरत? आजँनहिसम्हरततखनजाएबकेना? मुदाजेरामसेरामजाएबजरूर...। लगलेगोबरधनदासकमनमेउठलैनजेजखनजाइकविचारमनमेरोपागेलतखनजाएबजरूर।अखनेसँओइपाछूलगिजाइछी।होइतोअहिनाछैजेकोनोकाजकेँनिआरलापछाइतओइमेलगिगेलासँकाजकसिद्धिकसम्भावनाबनियेँजाइछइ।नइओइठामबनैछैजैठामकाजकनिआरखालीविचारेकनिआररहल, मानेनिआरमात्रगप-सप्पकक्रममेरहल। गोबरधनदासकमनकहलकैनजेकोनोकाजकक्रमिकसूत्रहोइए।जँओइसूत्रकेँपकैड़चललजाएतँकोनो-ने-कोनोसूत्रकश्रोतभेटियेजाएत।जखनेस्रोत्रभेटततखनेओइमेलगि-भीरपड़िजाएब।अखननेबुझिपड़ैएजेकाजजपालजकाँभारीअछि, मुदापुरबैकजोगारोकसमैयोतँअछिए।भेलतँजेकाजअनकाहाथमेरहलआकिअनकरहथौटीकाजजेअछिओनेअपनासाधसँबाहरअछि।मुदाजँअपनकाजकेँअपनहथौटीपहिराअपनाहाथेकरएलगबतखनेओअपनासाधमेआबिजाएत।जखनअपनाहाथमेअबैकसूत्रभेटजाएततखनेनेओसुढ़ियाजाएत।सेनहितँएक-एककाजकआबीचकएक-एकसमस्याकविचारकरबजरूरीअछि।अखननेतीनटाकाजअछितँभारीबुझिपड़ैए।मुदाजखनेतीनूकाजकेँतीनटुकड़ीबनाकरएलगबतखनेनेहल्लुकभऽजाएत। काजकेँहल्लुकहोइतदेखगोबरधनदासकमनहल्लुकभेलैन।हल्लुकहोइतेएक-एककाजआएक-एकटासमस्याकेँबिलगौलैन। पहिल- जखनबबाजीबनिघरसँनिकलैकअछितखनपहिनेबबाजीहएबजरूरीभेल।मुदाओहोतँअनकेहाथककाजभेल।पहिनेगुरुकेँटोहियाएबअछि।मुदागुरुकेँटोहियेलापछातियोओचेलाबनौताकिनहि, सेतँहुनकामनकनेभेल।अपनामनकतँएतबेनेभेलजेअपनेसँटोहियाहुनकाऐठामपहुँचब।एकतँगुरुतकैमेसमयलागततैपरओलगलेभेटताकिनहि।भेटलापछातियोचेलाबनौताकिनहि।तेतबेनहि, जँचेलाबनाएबगछियोलेताआऑफिसकहाकिमजकाँमासदिनकसमयदऽमासे-मासदौड़ाइयोसकैछैथ।तखनपरसुकागाड़ीकेनापकड़ब? आजँपरसूगाड़ीनइपकड़बतँकिहमरागरजेलगले-लगलेकुम्भ-स्‍नानहएत..? गोबरधनदासकमनआगू-पाछूहुअलगलैन।आगू-पाछूहोइककारणएकटाआरोभेल, ओईजेगोरबधनदासतँआइने‘गोबरधनदास’भेला, मुदाआइसँपहिने‘गोबरधना’छला।खेतकेँगोबरेलापछाइतओइमेअन्नवाकोनोआनेफसलजहिनाबेसीउपजैएतहिनागोबरधनासँबदलैतगोबरधनदासकमनमेकुम्भस्‍नानकविचारएलासँभेलैन।कुम्भेनेकलशसेहोछीजेकरापेबमनुखोकलशैए। एकाएकगोबरधनकमनमेउठलैन- किछुबीतजाएतमुदापरसुकागाड़ीजरूरपकैड़लेब।संकल्पेकसंगनेबिकल्पकरस्तालोकतकैए।जँसंकल्पेनहितखनविकल्पकजड़िकेतए..! सेविकल्पगोबरधनकेँभेटलैन।विकल्पईभेटलैनजेगुलावकेतबोनीकफूलकिएनेहुअएमुदाओकरधड़कभेखथोड़ेबनत।ओतँबनतकरबीर, तुलसी, बेली, जुही, कुशइत्यादियेसँ।आगू-पाछूकरैतगोबरधनकमनएकाएकबिहुसिउठलैन।बिहुसैककारणभेलैनजेजखनसंगेमेवैदतखनमरबबेकूफी।भेलतँबेलीफूलकएकटाडारिककण्ठीबनाओइमेप्रेमसँजनेउपहिरामालाबनालेब।जखनेजनेउकण्ठीपहिरततखनेमालाबनिजाएत।ओकरेपूजोकरबआजपबोकरब।जेहीहाथेकण्ठीबनाएबतेहीहाथेगरदैनमेधारणोकऽलेब।बसभऽगेलौंबबाजी।बबाजियोबनबकिबड़भारीअछि।रौदियाहसमयहोइतेसहरगंजालोककण्ठीपहिरलइयेआबरसातीउजैहियादेखतेओकरातोड़िमाछखाएलगैए।भेलतँएतबेनेसालमेकरएपड़तजेएकबेरपहिरबआएकबेरउतारिकऽकोठीककान्हपरराखब।जइदुनियाँमेएहेन-एहेनखेलअछितेहीदुनियाँमेनेअपनोछी।अपनेहाथेबबाजीहएब...। गोबरधनकमनमानिगेलैनआकण्ठीपहिर‘गोबरधनगोबरधनदास’बनिगेला। गोबरधनदासबनलापछाइतबटखरचापरनजैरउठौलैन।नजैरउठितेमनमेएलैनजेजखनगामेछोड़िजारहलछीतखनथारीए-लोटाकेकरा-लेरहएदेब।एकटाबेचकऽबेसाहि-बेसाहिखाएबआदोसरअपनाकाज-लेराखब। ‘एकटाबेचलेबदोसरअपना-लेराखब’एतएतककविचारसरपटदौड़मेगोबरधनदासकमनमेआबिगेलैनमुदाकोनराखबआकोनबेचब, मानेथारीराखबकिलोटातइमेओझरागेला।मनमेउठलैनजेजँलोटानइराखबतेपानिकथीमेपीब, आजँथारीबेचलेबतखनखाएबकथीमे? एकटाभेलपानिपीबैकवौस, दोसरभेलखेनाइखाइकवौस।खगतादुनूकअछिए।जँदुनूबेचलेब, तेतेकखगतोनहियेँअछिआदुनूराखिलेबतखनबेसाहबकथीसँ? संकल्पजेनागोबरधनदासकमनकेँहौंरदेलकैन।जहिनाछाँछमेमोहीसँमक्खनमथलजाइए, भलेँओअपननाओंछाँछेकिएनेरखिलिअए, तहिनासंकल्पगोबरधनदोसकमनकेँमथलकैन।मथितेसंकल्पकसंगविकल्पककारणजगलैनजेमात्रखाइयेबेरमेनेथारीकखगताहएत, ओतँकेरोपातसँकाजचलिसकैए, नइकेरापातभेटततँकुटो-कागजचलिसकैए।मुदालोटाकखाँहिसतँपानियोँपीबैकालहएत, परो-पैखानाजाइकालआनहेबोकालहएत।मानिलिअनहेबाकालजँथारीलऽकऽनहाएबतँनहियोँकोनोबातमुदापैखानाकरएजँथारीमेपानिलऽकऽजाएब, तेकराजेदेखतओकीकहत..? जँलोकनहियोँकिछुकहततँथारीभरिपानिलइयोकेनाजाएब? लैयोजाएबतँओसभटाहाथमेकेनाऔत..? विचारकमथानीगोबरधनदासकमनकेँमोहि-मोहिमनालेलकैनजेथारीभेलपसारी, जेकरविकल्पोढेरीअछिमुदालोटाबिनानइबनत।तहूमेजखनबबाजीबनिघरसँनिकलैयेचाहैछीतखनजँपानिपीबैलेएकटालोटोसंगमेनइराखबसेकेहेनहएत। लोटापरविचारअबितेगोबरधनदासकमनकसमस्यामेएकटासमस्याआरोउठिगेलैन।यात्राकलेललोटा, लोटकीनीकआकिकमण्डल? लोटातँगृहवासूकछी, मानेघर-परिवारमेरहैबला, हमतँघरोआपरिवारोछोड़ियात्रीबनिजारहलछी।यात्रीकजेतेकहल्लुकजिनगीरहतओतेनेओसुरक्षित।किएतँगाड़ी-सवारीमेजेरगरधिया-पुताबलाजेरहलओकरानेकोनोस्टेशनपरएकटाबच्चाहेराइएतेकोनोपरजोड़ालगाकऽ, आकेतौ-केतौधोखा-धोखीमेघरोवालीहेराजाइछैचाहेअपनेहेराजाइए।तहिनाबेसीमालो-असबावलऽकऽचलनिहारकेँनेहोइएजेकेतौकियोएटैचीचोरौलकतँकेतौबैग, केतौईछुटलतँकेतौओ।मुदाबबाजीबनिजखनघरछोड़बतखनओतबेसमाननेराखबनीकहएतजेतेकेँसम्हारिकऽलऽचलब।तँएलोटासँनीकलोटकीहएतआतहूसँनीककमण्डल।कमण्डलकेँमोटरीकडोरीसँतेनाबान्हिदेबैजेहेराएततँसभसंगेजाएतनइजँनइहेराएतआकिचौरौलजाएततखनसभसंगेनेरहत...। मुदालगलेगोबरधनदासकमनमेउठिगेलैनजेजँकिसानखेतीकरैयेकालईठेकाननइकऽसकलजेकीनीककखेतीकऽरहलछीआकीअधलाक।मुदाजखनओतैयारभऽखेबापरअबैएतखनजँकहबैजेईअशुद्धभेलआऐमेपौष्टिकतत्त्वछइहेनहि।तँएकरासोलहन्नीउचितकहबकेतेकनीक? तँएजइखेतिहरकेँजेहेनखेतमेउपजतओकरशुद्धभोजन, मानेमेहनतकभोजनवएहनेभेल।हमरोबाप-दादाकदेलकमण्डलनहिलोटाअछितँहमरा-लेयएहनेनीकभेल।तहूमेईकेहेनहएतजेअपनबेचलेबआअनकरकीनब। गोबरधनदासकेँकुम्भस्‍नान-लेघरसँनिकलैमेआबमात्रएकटासमस्यारहिगेलैन।ओछीकुम्भ-स्‍नान।मुदासेतँओतएपहुँचलापछातियेसम्भवअछि।मनमानिगेलैनजेपरसुकागाड़ीजरूरपकैड़लेब। चारिबजेभोरमेगाड़ीस्टेशनसँछुटत।‘चारिबजेभोर’मनमेअबितेगोबरधनदासकेँएकटाविचारजगलैनजेजाबेतककुम्भ-स्‍नानकरैकविचारमनमेनइउठलछल, तैबीचजेकेलौंआकिबजलौंसेकेलौं-बजलौंमुदाआबजखनअपनेआत्माकेँसाक्षीरखिअपनेहाथेकण्ठी-मालाबनाअपनगरदैनमेपहिरलेलौंतखनहृदयशुद्धभेबेकएल।तँएशुद्धहृदयजाबेखूबशुद्धनइबनतताबेशुद्ध-अशुद्धनीकजकाँकेनाबुझब।सेबिनुबुझनेशुद्ध-विचारआकिशुद्धबोलकेनाआबिसकैए? एकटाबातमाए-बहिनसँपुछैछिऐनजेजखननैहरछोड़िसासुरबासकलेलविदाभेलीतखनदादीनइकहनेरहैनजेबुच्चीमुँहकबोलकेँसमेटफुच्चीमेरखिहहआजेतबेखगताहुअतेतबेनिकालिहह।तहिनानेहाथोकलेलकहनेरहैन।मुदाअखनकीदेखैछी? खाएर.., गोबरधनदासकेँओइसभसँकोनमतलबछैन।मतलबछैनअपनासँ।तहूमेकुम्भस्‍नानकविचारमनमेप्रबलरूपसँजगियेचुकलछैनतँस्‍नानकपछाइतआरोबुझता। चारिबजेगाड़ीपकड़ैलेसाढ़ेतीनबजेघरसँनिकैलगोबरधनदासविदाभेला।तखनेगाड़ीपकड़ेतैन।ओना, एतेगुणतँगाड़ीमेऐछेजेसमयसँपहिनेनइअबैए, भलेँदेरीजेतेकहोउ।गोबरधनदासकअपनसमयबिसबासूबनलेरहैन, लगलेमनआगूबढ़लैन।आगूईबढ़लैनजेजखनवंशकर्तावाकुलकर्तापूर्वजजेछलाओसभतीनबजेसँपहिनहिउठिअपननित्यकर्मसँनिवृत्तभऽअपनजिनगीकपाछूलगिजाइछला।हमहूँजखनकुम्भस्‍नानकरस्तापकैड़लेलौंतखनआबहमरोनेहुनकेदेखौंसकरएपड़त। स्टेशनपरगाड़ीकेँअबितेगोबरधनदासगाड़ीमेकुम्भस्‍नानकरैबलाबबाजी-सभकेँटोहियाबएलगला।जेरगरयात्रीदेखकोठरीमेचढ़ला।यात्रीसबहकबीचगोबरधनदासतका-तकीकरएलगला।बजैथकिछुने।नइबजैककारणरहैनजेगाड़ीमेचढ़ैसँपहिनहिनेरस्ताकसम्बन्धमेआकिगाड़ीकसम्बन्धमेकिनकोसँपुछितैथ।मुदासेसभतँसमस्यारहलनहि।स्टेशनसँगाड़ीचलिदेलक।इलाहाबादहोइतेपारकरत, रस्तेमेउतैरत्रिवेणीघाटपरगोबरधनदासकेँपहुँचैकछैन। तक्का-तक्कीमेगोबरधनदाससिमरियापुलटपिगेला।मानेगंगाटपिगेला।गंगाटपितेमनमेउठलैनजेआबचुप्पा-चुप्पीसँकाजनइचलत।बगलमेजेबबाजीबैसलरहैनतिनकापुछलखिन- “महात्माजी! अपनेकिएघर-परिवारछोड़ितीर्थकरएजाइछी?” जीवनदासमहात्माउत्तरदेलकैन- “पत्नीमरिगेली।असगरेकमाकऽआनबआकिभानसकरिकऽखाएब।” उत्तरसुनिगोबरधनदासकमनमेउठलैन, हमहींनेनीकछीजेघरवाली-लेकनबोतँनहियेँकरब।बजला- “जखनमरबापरदुनूगोरेसप्पत-किरियाखेनेरहीजेकहियोसंगनइछोड़बसेकेनासंगछोड़िदेली?” सोझमतियाजीवनदासगोबरधनदासकप्रश्नपरधियाननइदैतबजला- “अहूँकुम्भेस्‍नानकरएजाइछी?” गोबरधनदास- “हँ।” ‘हँ’सुनिओमहात्माअपनमुड़ीडोलाचुपभऽगेला।बगलमेबैसलदोसरबबाजीकेँगोबरधनदासपुछलखिन- “गोसाँइसाहैब! अपनेकिएबबाजीभेलिऐ?” परिवारिकतामसनीकजकाँकर्मदासकेँअखनोतकनइमेटाएलछेलैन।बजला- “अपनाघराड़ीनइअछि, अनकेजमीनमेबाबूईकहिघरबान्हनेरहैथजेजाबेजीबताबेअहाँकचाकरीकरब, जहियामरिजाएबतहियाअपनघराड़ीलएलेब।” गोबरधनदासबजला- “पिताअपनेजिनगीभरिककहा-बद्धीकेनेछला, बाल-बच्चाकनहि?” कर्मदास- “सेजँकेनेरहितैथतँपैछलासालओमुइला।आहुनकामुइलाककिछुएदिनकपछाइतघराड़ीबलाघराड़ीछोड़ैकचेतौनीकिएदेलैन।” गोबरधनदास- “माएछैथकीनहि?” कर्मदास- “गुणभेलजेबाबूसँपहिनेमाइयेमरिगेलछेली।” गोबरधनदास- “कीगुणभेल?” कर्मदास- “भरिदिनबाबूकमाइछलाआहमघर-अँगनाककाजोकरैछेलौंआभानसोकरैछेलौं।जइसँभानसकरैकलूरिभऽगेल।गामेमेएकटाठकुरवाड़ीअछि, ओहीमेरहैछी।” गोबरधनदासगपो-सप्पकरैछलाआमने-मनविचारितोछलाजेजेदुखनामाहिनकासबहकछैनओतँअपननइअछि।स्वेच्छासँबबाजियोभेलौंआकुम्भोस्‍नानकरएजारहलछी। गाड़ीइलाहाबादपहुँचगेल।उत्तरभारतमेबबाजीसभ-लेगाड़ीफ्रीअछिए।दच्छिनभारतमेनेगाड़ीसँटी.टी. उतारिदइए।गाड़ीसँउतैरतेगोबरधनदासदेखलैनजेप्लेटफार्मसँत्रिवेणीघाटधरिबबाजीएसभसँभरलअछि।बबाजीककरमानदेखगोबरधनदासकमनमेउठलैन- जिनकागाम-घरआकिपरिवार-समाजसँमोहछैनओनेहेरेता-ढेरेता, आजेबबाजीबनिघरसँनिकललेछैथओकेनाहेरेता, केतएकरता।भनेअपनजानहल्लुकअछि। तीनदिनगोबरधनदासकेँकुम्भमेलामेकेनाबीतगेलैनसेनहिबुझिसकला।मुदाएतेअपननियमबनौनेरहलाजेअपनेजेबेसाहैलेपाइरखनेरहैथओहीसँबेसाहि-बेसाहिखेबोकरैथआदिन-रातिघुमबोकरैथ।ओना, भूखल-दुखल-लेकेतौअन्नतँकेतौवस्त्रकदानहोइतेछलमुदासेसभलइसँगोबरधनदासपरहेजरखनेरहला। आइचारिमदिनमेलाकउसरनभेल, सभयात्रीघरमुहाँविदाभेला।पैछलासभसंगीगोबरधनदासकहेरागेलैन।विदाहोइतेबगलमेजेबबाजीरहैनहुनकापुछलखिन- “गोसाँइसाहैब, अहाँमेरियामेछीकिअसगरे?” जिनगीदासबजला- “जखनदुनियाँमेअसगरेजन्मोनेनेछीआजीबैकभरोसोरखनेछीतखनअसगरकीआलसगरकी?” जिनगीदासकविचारमेगोबरधनदासकेँकीभेटलैनसेतँओजनतामुदाएतेतँबजबेकेला- “हमहूँअसगरेछी, अहींसंगहमहूँचलब।रहैकस्थानकेतएछी?” जिनगीदासकहलकैन- “काशी, कबीरआश्रम।” जिनगीदासकसंगगोबरधनदासकाशीआबिआश्रममेरहएलगला।आइपनरहमदिनछिऐन।पनरहेदिनकआश्रमकविचारोआक्रियो-कलापसँगोबरधनदासकमनएतेसबलभऽगेलैनजेपुन: अपनगामअबैकविचारमनमेजगिगेलैन। सोल्हमदिनमहंथजीकचरणछुबिअसीरवादलैतचरणकचरणामृतकेँजीवनामृतमानिगोबरधनदासअपनघरकबाटपकैड़विदाभेला।गामकसिमानपरअबितेमनततमतकरएलगलैन।एकमनजहिनामनाहीकेलकैनजेजइगामकेँछोड़िदेलौंतइगामपुन: घुमिकऽनहिजाएब..? तहिनादोसरमनकहलकैन- ‘तखनकरबकी?’ गामकबगलेकगामहरिपुरमेगोकुलदासकस्थानअछि।स्थानकिअछिजेअसगरेकपरिवारबनाओइठामगोकुलदासरहैछैथ।हेराएल-भोथियाएलबबाजियोआबाटो-बटोहीसभअबैत-जाइतरहैए।जखनजेरहलतखनतेकरेसबहकसहयोगसँदूटागाइयोकसेवाकरैछैथआमण्डूलदवाइककारोबारसेहोकरैछैथ।जखनजेरहलतेकरेसभकेँएकपरिवारजकाँमानि-मिलिझामकेँकुटि-कुटिमण्डूलबनबैछैथ।जइसँकेतेकोरोगकइलाजगोकुलदासकरैतरहलाअछि।तँएमहात्माकसंगवैदसेहौछैथ।कोसिकन्हासँलऽकऽसहरसा-पुर्णियाकसंगनेपालोककहालीसभअबैतरहैछैन।मणडूलकप्रसिद्धिसँस्थानमेनीकआमदनियोँहोइतरहलअछि। सुबहकसमयमेगोबरधनदासगोकुलदासऐठामपहुँचला।काशीस्थानकअनुभवगोबरधनदासकेँरहबेकरैन, अपननियमानुकूलअभिवादनकरैतबजला- “गुरु-गोसाँइ, अपनेकदरबारमेहमचौकीदारबनिरहब।” सभस्थानकअपन-अपननियमअछि, अपनानियमानुसारगोकुलदासपुछलकैन- “बेरागी! अखनअहाँकबालपनअछि।तँए, पुरनिकपातपरकपानिजहिनागोलीबनि-बनिगुड़कैतरहैएआजेतेकालपातपररहलतेतबेकालओअपनस्वच्छरूपरहिचमकैतरहैएमुदापातसँनिच्चाँहोइतेओकराधरतीसोंखिनिपत्ताकऽदइछै, तहिनाअखनअहाँकअवस्थाअछि।तँएअपननियमकेँजँअपनेरक्षाकरैकभारउठाबीतखनकिछुभऽसकैए।” गोकुलदासकविचारसुनि, नवकवरियागोबरधनदासटाँहि-देबजला- “स्थानकजेनियमहएततेकराहमसोल्होअनाअंगीकारकरब।” खिलैतगोबरधनदासकचेहरादेखफुलैतगोकुलदासबजला- “बाउ, दुनियाँमेबहुतलोकोछैथआबहुतरंगकव्रतोअछि! तँए...।” बिच्चेमेगोबरधनदासटोकदेलकैन- “कीव्रत?” गोकुलदासबजला- “कियोझूठनइबजैकव्रतलइछैथतँकियोझूठेकठीकेदारीकरैछैथ, कियोचोरिकेँअधलाबुझिपरहेजकरैकव्रतलइछैथआकियोचोरिकेँखनदानीपेशाबुझिपरम्पराकनिर्वाहसेहोकरैछैथ।” गोकुलदासकविचारसुनिगोबरधनदासकमनलाल-पीअरहुअलगलैन।जइसँचेहराकरंगकखनोफुलित, कखनोप्रफुलित, कखनोफलितआकखनोकलितहुअलगलैन।जेगोकुलदासबुझिगेला।तँएअपनविचारकेँरोकिचित्रकूटकघाटपकैड़लेलैन।जइघाटपरपहुँचलयात्रीकयात्राकेहेनहोएत, ईतँपहुँचलफकीरेनेबुझिपबता।मुदागोबरधनदासकबालपनसे-सभनहिबुझिबिहुसैतबाजल- “गोसाँइसाहैब! अपनेकजेआदेशहेतैसेशिरोधार्यजरूरकरैतरहब।” मुस्कीदैतगाकुलदासकहलकैन- “स्थानककोनोव्रतबान्हलनइअछि, जेहनेहमछीतेहनेबनिअहूँरहू।” समयबीतल, गोकुलदासगौलोकगेला।समयसेहोआगूबढ़िथोड़-थाड़लतैर-चतैरगेल।शुरूहेसँगोकुलदासकसंगगोबरधनदासगाँजाकसंगअफीमसेहोअपनजिनगीकक्रियामेजेाड़िनेनेछला।खान-पान, रहन-सहनसभकिछुगोकुलदासकअपनाऊपरगोबरधनदासउतारिनेनेछला। गोकुलदासकेँमुइलाबादमहंथाना-लेमानेमुख्यकर्ताबनैलेपुर्णिया-स्थानजकाँमारि-पीटसेहोनहियेँभेलैन।किएतँसबहकस्थानबुझिसभअपन-अपनदुख-भूखलऽकऽअबिते-जाइतरहैछैथ।स्थानकमुख्यकर्तागोबरधनदासभेला। स्थानकप्रमुखकर्ताबनलापछाइतगोबरधनदासगाइयोकसंख्याबढ़ालेलैनआवैदागिरीकक्षेत्रसेहोबढ़िगेलैन।जइसँस्थानकचला-चलतीआरोबढ़िगेल।आमदनीतेजीसँबढ़ल।रंग-रंगकभनडारा, रंग-रंगकलोकसबहकआबाजाहीसेहोबढ़ल।अफीमखेलापछाइतगोबरधनदासगाँजापीबैछलाआमनजखनफ्रेशहोइछेलैनतखनमुँह-मंगादानकरएलगैछला।जइसँपाइ-कौड़ीककोनोथिरी-थमननइरहलैनमुदाबाड़ी-फुलबाड़ीलगबैलेजेएकबीघाजमीनस्थानकआगूमेकीनलैनसेजरूरबँचलरहलैन। साठिबर्खकउम्रसँजखनगोबरधनदासऊपरटपलातखनएकटाविचारमनमेजगलैन।विचारजगैककारणभरिसकआगूकमृत्युपरनजैरपड़बछेलैन।किएतँगोकुलदाससेहोसत्तैर-बहत्तैरबर्खकअवस्थामेमरलरहथिन।गोबरधनदासकमनमेजगलैनजेजँदसोकट्ठाकबाग-बगियालगाऐगलापीढ़ी-लेनइदेनेजेबैतखनअपनकृत्तिपनेकीरहत।यएहसोचिदसकट्ठामेगोबरधनदासबाग-बगियालगौलैन। जहिनाऋृषि-मुनिजिनगीकेँदेखमननकरैतआबिरहलाअछि, तहिनागोबरधनदाससेहोकेलैन।पाँचकट्ठामेरंग-रंगकपैघगाछकफलबलावृक्षआपाँचकट्ठामेओहनफललगौलैनजेफलकसाइजमेतँएकरंगाहेछलमुदागाछ-बिरीछजकाँनहि, बल्किझाड़ीदारपौधसन।ओनाकिछुफलकगाछसालेभरिकपछाइतफलदिअलगलैन, मुदादसमबर्खपुरैत-पुरैतसभबोन-झारसँलऽकऽवृक्ष-बनधरिफड़एलगलैन।ओनाअन्तिमवृक्षकजेफलछल, ओजखनफुलेकअवस्थामेरहैतहीबीचगोबरधनदासकमृत्युभऽगेलैन। शब्दसंख्या : 3089, तिथि : 3 फरवरी 2018 Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

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