विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २८५ म अंक ०१ नवम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४३ अंक २८५) 'विदेह' २८५ म अंक ०१ नवम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४३ अंक २८५) ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गीतांजलि’ ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- समयसँपहिनेचेतकिसान प्रदीप पुष्प गजल- १ दोसरक गीत उगबै अछि चान मीता हमर गजलो गबै भूखक गान मीता आब रूदल बऽनब ने हम गऽछब कहियो जरल पेटसँ उठै ने सुर तान मीता भेल बटुआसँ तगमाकेँ नीक दोस्ती बिन टका छी सभा मध्ये आन मीता जैह देबै अहाँ हम रखबै हुलसिकेँ गाय बूढ़ो खपै विप्र- दान मीता पाँतमे हम अछोपक छी भोज खाइत ‘पुष्प’केँ नइ फिकर आ ने मान मीता (2122 1222 2122 सभ पाँतिमे) गजल- २ शब्द छौ भाव छौ अलंकार छौ तोर आँखि पिपनी तऽर साहित्य-संसार छौ तोर आँखि मन शान्तनु भेल ठमकै तोरे लग जा-जा कऽ की नव सुरसरिक अवतार छौ तोर आँखि जेना कोनो दरिद्रकेँ भेटल राज-पाट तहिना ऐ जीवनक आधार छौ तोर आँखि की कोना कथी कखन ककरा किए सन बहुत सद्य सजीव प्रश्नक बौछार छौ तोर आँखि छै विधाता हाथमे बाँचल बड्ड कौशल-कला ऐ शाश्वत तथ्यकेर प्रचार छौ तोर आँखि (222222222222- बहरे- मीर) उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गीतांजलि’ गीतांजलि (2013/2020): पद्य विधामे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक प्रस्तुत पोथी ‘गीतांजलि’, पाँचम कृति छियन्हि। मण्डलजीक काव्यधारा अपने-आपमे फराक स्थान निरूपित करैत अछि। जाहिठामक काव्यधारा मुख्य रूपसँ या तँ भक्तिपरक चिन्तनधारा वा शृंगारपरक चिन्तनधारासँ ग्रसित छल, ओना गौण रूपमे प्रकृतिपरककाव्यक संग मिथिलाक पावनि-तिहार, समाजक रीति-रिवाज धरिमे अपन विकासवादी गतिये चलि रहल छल, ताहिठाममानवीय मूल्यकेँ यथार्थपरक रूपमे नव दृष्टिकोण तथा नव-भाव-भूमिक संग मण्डलजी अपन जीवनक क्रियागत-अनुभवक आधारपर काव्यक सृजन कएलनि अछि। प्रस्तुत पद्य संग्रहमे कुल 37 गोट रचना संग्रहित अछि जाहिमेप्रथम पद्य- ‘हाल-बेहाल’ थिक। एहि रचनाक माध्यमसँ कवि कहैत छथि जे उसर भूमिमे सेहो जखन हाल डगडगाइत अछि तँ नव फूलक सिरजल भऽ जाइछ- “डगडगाएलहालपाबिउसरक फूलउस्सरसिरजैतरहैछै। घूरिताकिनैभरमएभौरा दिवारसराजकहबैतरहैछै। हाल-बेहालदेखिरंगराही कुशलफूल...।” कवि कहैत छथि जे केहनो परिस्थितिमे शीलकेँ नहि छोड़बाक चाही मुदा वर्तमानमे शीलक स्थिति देखि हंस कानि कऽ कहि रहल अछि- “शीलाशीलदेखि-देखि हंसकानिकहैतएलैए। एकशीलश्रृंगचढ़ि-चढ़ि दोसरश्रृंगारबनैतएलैए। शीलाशीलदेखि-देखि हंसकानि...।” भावक अभाव भेलासँ कुभाव बनि जाइत अछि आ कुभाव बनि प्रेम गीत लिखाइत रहैत अछि- “भाव-अभाव कुभाव बनि-बनि गीत प्रेम लिखाइत रहै छै। रंग सियाही रोशनाइ बनि-बनि रेहे-रेह...।” दिन घटैत अछि राति चलि आबैत अछि। दिन-राति बदलैत मौसम बदैल जाइत अछि। चलैत ई क्रम वर्षमे बदैल जाइत अछि। प्रकृतिक लीला बदलैत रहैत अछि- “दिनघटतैकिरातियौभैया मौसममुस्कीदइछै सालेदिनकसमैयेकेते रंगलीलाकबदलैछै..।” ताल-ताल मिलि बेताल भऽ बाँहि आवाज भरि रहल अछि आ तन-मनसँ उठैत आगि छातीमे मुक्का मारि कहैत अछि- “उठितेआगितनैकमन मुक्काछातीमारिकहैछै ताल-तालमिलाबेताल संगबाँहिआवाजभरैछै। उठितेआगितनैकमन मुक्काछातीमारिकहैछै मुक्का...।” हे कौआ छप्परपर बैसल किए कुचड़ै छह। लग आबि नैहराक हाल-चाल, परिवार आ गाम-समाजक सोखर सुनावह- “छप्परकिएकुचड़ैछहहेकौआ छानिपरकिएबैसलछह। लग-आबिसमादसुनाबह नहिराकसोखैरगाबिसुनाबह भैया-भौजीकहाल-चालसंग गाम-समाजकहालसुनाबह। छानिकिएकुचड़ैछहहेकौआ छानिपर...।” ‘गामसँ किएडरै छी’ गीतक माध्यमसँ कवि प्रवासी लोककेँ सचेत कएलनि अछि। ओ कहैत छथि जे एक दिसि अपन बाप-पुरुखाक पुरुषार्थक गीत गाबै छी आ दोसर दिसि गामसँ डरे शहर दिसि भागि रहल छी- “बाप-पुरुखाकपुरुषार्थगाबि-गाबि छाती-तानिहामीभरैछी नानी-दादीकखिस्सा-पिहानी सुना-सुनामोहैतरहैछी तखनकिएगामबिसरैछी गामसँकिएडरैछी भाययौ...।” अन्हार आ इजोत जिनगीक दुनू पक्ष संगहि चलैत अछि। दुखक सागरक बिच्चेमे सुखक सागर सेहो रहैत अछि। एक्कहि मासमे अमावसिया आ पूर्णिमा रहैत अछि- “दोहरीपक्षजिनगीचलैछै अन्हार-इजोतकहबैछै। दुखसागरबीचसुखसागर अमवसियापूर्णिमाकहबैछै। एक्केमासकदुनूपक्षछी बुझैकफेरचलैतएलैए बेढ़बगीतगबैतएलैए बेढ़बगीत...।” जे व्यक्ति अपमान आ मान केर भेदकेँ बिसरि जाइत अछि ओ सुरधाम दिसि चलि जाइछ। एहि प्रसंग कवि ‘संग जिनगी’गीतक माध्यमसँ कहैत छथि- “मान-अपमानभेदभुलि संगमिलिसुरधामचलैछै। घाट-बाटअटैक-मटैक हारिजीतगुणगानकरैछै। हारिजीतगुणगानकरैछै। संगजिनगी...।” ‘सबहक जिनगी’ गीतक माध्यमसँ कहैत छथि जे सबहक जिनगी गीत गबैत छैक, ओ गीत नहिबल्कि सुख-दुख कहैत छैक- “सबहकजिनगीगीतगबैछै गीतकसंगसुख-दुखकहैछै। केकरोसुखाएलसुख तँकेकरोदुखाएल-सुखाएलकहैछै।” कवि कहैत छथि जे सबहक जिनगीकेँ अपन-अपन तानी-भरनी होइछ जे समयक संग परीक्षा दैत चलैत रहैत अछि- “पकैड़तानसभकजिनगी घड़ीपरीक्षादैतचलैछै। तीत-मीठगढ़ि-गढ़ि, मढ़ि-मढ़ि दिन-रातिकहैतचलैछै..।” ‘पकैड़ पग’ गीतक माध्यमसँ कवि कहय चाहैत छथि जे प्रेमक पहुँची पकड़ि आगूक पथपर पग-पग चलैत चलू- “पकैड़पगपएरे-पएरे पग-पगपथपकड़ैतचलू। पकैड़प्रेमपहुँचीपकैड़ संगजिनगीकचलैतचलू। संगजिनगीकचलैतचलू। पकैड़पगपएरे-पएरेपकैड़...।” एहिठाम ककरो संच-मच कहाँ रहय दैत अछि। चिड़चिड़ी छीटि कऽ टिकमे ओझरी लगबैत रहैत अछि। रंग बदलि-बदलि एक-दोसरापर सियाही फेकैत रहैत अछि- “रंग-सियाहीबदैल-बदैल आँखिइजोतबदलैतरहैए। यारयौ, संच-मंचरहएकहाँदइए। भजारयौ...।” बाढ़िक प्रलयकारी वातावरणमे सेहो मण्डलजीक चिन्ता मानवीय सरोकारेक छन्हि। कहैत छथि- कानि-कलपि के ककरा कहत, सभ अपनहि दुखसँ दुखित अछि..! के सुनत केकर बात, अपनहि सभ वौड़ा गेल अछि..! उक्त भावकेँ निम्न पाँतिमे देखल जाए- “कानिकलैपकेकराकेकहतै अपनेबेथेसभबेथागेल। केसुनतकेकरनचारी अपनेमनेसभवौड़ागेल। अपनेमनेमेसभ...।” चीनीक चोर जिलेबी चीनीकेँ चोरबैत-चोरबैत चीनीक बोरमे डुमि कऽ मरि जाइत अछि- “रसरसियारसरचि-रचि रसे-रसरसिआइतरहैछी चीनी-बोरजिलेबीजहिना बिनुओर-छोरेडुमिमरैछी बिनुओर-छोरेडुमिमरैछी..।” मीत यौ, मात्र अहींटा केँ नहि कहैत छीगहवरक बीच गुहारि सेहो करैत छी- “मीतयौ, अहींकेँकहैछी गहबरबीचगुहारिकरैछी। दिशाचारूफेकिफूल शंखअकासफूकैतरहैछी देव-दानव-मानवकहि-कहि अकासशंखफूकैतरहैछी मीतयौ, गहबरबीचगुहारिकरैछी।” अजीव-अजीव खेल चलि रहल अछि, ई खेल नहि बल्कि खाली खाली मन भरल जा रहल अछि- “अजीब-अजीबखेलचलैछै खाली-खालीमनभरैछै। अजीब...।” हाल विकराल बनल अछि। मुँहगर-कन्हगर लोकक बीच केकरा के देखत-सुनत? तेँ हारल-मारल हेराएल चलि रहल छी- “हाल-गालविकरालबनलछै मुँहगर-कन्हगरबीचपड़लछै केकेकरादेखतै-सुनतै हारल-मारलहेराएलचलैछै।” जाहिठामक प्रजातांत्रिक सत्ता केन्द्रीकरण भऽ संचालित-प्रसारित होइत अछि ताहिठामक जनगणक स्वरकेँ कवि प्रस्तुत पद्यक माध्यमसँ कहैत छथि जे कखनहुँ दौड़ैत तँ कखनहुँ ठमकैत आशाक केर आश धयने घिसियाइत चलि रहल छी- “कखनोदौड़, कखनोठमैक आशा-आशघिसियाइतचलैए सतरंगगीतगबैतचलैए।” बाल आ जुआनी, चित्त आ चेतन सभटा हेरा गेल..! बाढ़िक विभिषिकासँ त्रस्त भऽ कवि लिखैत छथि- “बालदहाजुआनीजुड़ि-जुड़ि चित्तचेतनसेहोहरागेल मितयौ, बाढ़िमेसभकिछुदहागेल।” असली वानिकेँ अर्थात् असली चालिकेँ छोड़ि जे कुवानि धरत माने कुचालिकेँ पकड़ि कऽ चलत तँ ओ भ्रममे भरमैत रहत। ...उक्त भावकेँ कवि एहि तरहेँ व्यक्त कएलनि अछि- “बानिछोड़िकुबानिपकैड़ चीज-बौसबनबैछी। भरैमभरमभरि-भरि भरमैतकिएरहैछी। निरमोहीबौआ...।” ‘अपना गतिये’शीर्षक पद्यक माध्यमसँ कवि कहैत छथि जे जिनगी तँ एकटा परीक्षा थिक, जकरा सभकियो अपना गतिये पग-पग परीक्षा दैत जिनगी चला रहल अछि- “अपनागतिएसबहकजिनगी पगपरीक्षादैतचलैछै। तीत-मीठसुआदसिरैज राति-दिनकहैतचलैछै। पग-पगपरीक्षादैतचलैछै।” जाहिठामक प्रीतक रीति कुरीत बनि गेल अछि, कुरीतकेँ सुरीति कोना बनाएबआ जाहिठाम घर-दुआरि थाल-खिचार बनल अछि ओहिठामक कल्पनाक कल्पवृक्ष कोना रोपब- “प्रीतिकरीतिकुरीतबनलछै रीति-सुरीतिकेनाबनापेबै। थाल-खिचारघर-द्वारबनि वृक्षकल्पकेनारोपिपेबै। हेबहिनाहेसंगी, हेप्रेमी सुरतकेनाबदलबै हेबहिना...।” सुखक जे धारा अतृप्त होइत अछि ओहि धारामे जिनगी भँसिया गेल अछि आ मन कलपैत-कलपैत कानि रहल अछि- “सुक्खकअतृप्तधारमे भँसियागेलैजीवन। भँसि-भँसिभँसियाभँसिया कानि-कलैपकहैएमन।” कवि ओहन व्यक्तिकेँ, जे ठकि-फुसिया पनिया कऽ अनका जिनगीक संग खेल खेलाइत अछि, नढ़ड़ा हेल हेलैत रहैत अछि। ओहन व्यक्तिकेँ सचेत करैत कहैत छथि- अहॉं अनका नहि, अपनहि जिनगीक संग खेलै छी- “नढ़ड़ाहेलहेलैछी, भाययौ नढ़ड़ाहेलहेलैछी। ठकि-ठकि, फुसिया-पनिया जिनगीसंगखेलैछी, भाययौ जिनगीसंगखेलैछी। नढ़ड़ाहेल...। जुगछलजमानाछल कलैपकूशनेलागैछेलै सोझ-साझफुलैक-फलैक चालिखिखिरधेनेछेलौं। चालिखिखिरधेनेछेलौं। नढ़ड़ाहेल...।” असमानताक भेद-भावकेँ देखि कवि क्षुब्ध भऽ गेल छथि तेँ कहैत छथि- चलू उचितपुर देश जाहिठाम सबहक सभ किछु समान होइक अर्थात् जतय समानताक भाव होइक- “चलूउचितपुरदेश यौ-भैयाचलूउचितपुरदेश। नैअछिभेदभावओतएकिछु नैअछिचोर-बैमान। नैअछिऊँच-नीचकिरदानी सबहकएक्केभेष। सबहकएक्केभेष। चलूउचितपुर...। सबहकचालि-ढालिएक्के अछिसबहकमान-समान मन-मनुखबनि-बनिसभ भरैएसूर-तान, यौभैया भरैएसूर-तान जेहेनदेसतेहेनभेष चलूउचितपुर...। आगि-पानिकभेदकोनोनै सबहकएक्केउदेस। पढ़ै-लिखैकएक्केरस्ताअछि सबहकएक्केसनेस। चलूउचितपुर...।” आशाकेँ जिनगी कहल जाइछ मुदा ओहि आशापर पानि फेरि गेल अछि। मुदा हारि कोना स्वीकार करब, तेँ आशाक डोर पकड़ि पाछू-पाछू घिसियाइत चलि रहल छी- “गामेमेहराएलछी रंग-बिरंगअन्न-पानि नीकसँछिड़ियाएलछी। नीकसँछिड़ियाएलछी। कानिकलैपकेतेकहब ..तैपरपानिफेराएलछै तैयोआशकडोरपकैड़ पाछू-पाछूघिसियाएलछी। कानिकलैपकेतेकहब” हँसैत, गबैत, नाचैत कहुना अहॉंक दुआरि पहुँचबे करब मुदा मकरजालक फाँस तँ रहबे करत- “हँसैत, गबैत, नचैत, भसैत पहुँचबतोरदुआरि मुदा, फाँसफँसिमकरजालमे मेटागेलसभचौपाड़ि हेमइये...।” जहिना वंशी पानिक मध्य घात लगौने रहैत अछि आ बोरक गन्धसँ शिकार फँसि जाइत अछि तहिना वर्तमान कालखण्डक स्थिति अछि, एहि प्रसंगमे कवि कहैत छथि- “तिनकमियाबंशीबनि-बनि पानिबीचघतियापड़लछै। गन्धबोरसुगन्धकहि-कहि मुँहमध्यअवघातबनलछै। घातलगौनेघातलगलछै।” जाहि व्यक्तिकेँ नमहर टाँग छैक आर्थात् जनिक आधार पैघ छैक वएह आड़ि-धूर (बाधाकेँ) टपि सकैत अछि- “देहमेनमहरटाँगजेकर आड़ि-धूरवएहकुदिटपैछै। टपिटपानहाथोकहैत राहीराहपकैड़चलैछै। देहमेनमहरटाँगजेकर आड़ि-धूर...।” निष्कर्षत: कहल जा सकैछ जे एखन धरिक काव्यधाराजे मध्ययुगीन काव्यधारासँ प्रभावित चिन्तनधारामे चलि रहल छल, ओहिसँ हटि श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्यधारामे विषयो-वस्तु आ यथार्थवादी दृष्टिकोणक झलक सेहो अछि। एहि पोथीमे कुल 37 गोट पद्य संग्रहित अछि, यथा- ‘हाल-बेहाल’,‘शीला शील’,‘रंग सियाही’,‘दिन घटतै’,‘उठिते आगि’,‘छप्पर किए’,‘गामसँ किए’,‘बेढब रूप’,‘संग जिनगी’,‘सबहक जिनगी’,‘सुन मैया गे’,‘पकैड़ तान’,‘भोरे’,‘कनी जगा देब’,‘पकैड़ पग’,‘संच-मंच रहए कहाँ दइए’,‘ओस बनि’,‘बाढ़िमे सभ’,‘हेराएल-ढेराएल’,‘मीत यौ अहींकेँ कहै छी’,‘अजीब-अजीब’,‘अपने ताले’,‘पग-पग’,‘मीत यौ’,‘निरमोही बौआ’,‘अपना गतिये’,‘भजार यौ’,‘हे बहिनी’,‘हे बहिना, हे दीदी’,‘सुक्खक अतृप्त’,‘नढ़ड़ा हेल हेलै छी’,‘अहीं कहू’,‘चलू उचितपुर देश’,‘कानि कलैप’,‘बुधिये बाट’,‘जुग-जुग’,‘घात लगौने’,‘देहमे नमहर।’ आशीष अनचिन्हार गजल भीजल कपड़ा गुदगर देह बिजली लागै सुंदर देह गौतम धेलथि इंद्रक भेष फेरो पाथर हुनकर देह हुनका ताकी कोने कोन हमरा लग छै जिनकर देह बज्जर सपना बज्जर आँखि बज्जर जीवन बज्जर देह सरकारक फाइल बहुते पैघ देखू घटलै किनकर देह सभ पाँतिमे 22 22 2221 मात्राक्रम अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल समयसँपहिनेचेतकिसान अखनतकदुनियाँकइतिहासमेआजुकसमयसभसँबेसीसम्पन्नभेबेकएलअछि। जहिनाआर्थिकक्षेत्रमेतहिनावौधिकक्षेत्रमेसेहोभेबेकएलअछि।तँएकहबजेसामरिकक्षेत्रमेनहिभेलअछिसेहोबातनहियेँअछि, सेहोभेबेकएलअछि।जेकरफलाफलदेखतेछीजेदेशक-देशमेटेबोकरैएआदेशक-देशसमृद्धिसँसमृद्धितमबनियोँरहलअछिए।तहीबीचमेनेबेरोजगारीसेहोएतेकबढ़ियेगेलअछिजेतेआइधरिकइतिहासमेकहियोनेभेलअछि।खाएरजेतएजेभेलअछिसेतेतएरहअ। ठनकाठनकैछैतेकियोअपनमाथपरहाथरखिसाहोर-साहोरकरैए।अहीसोचिबी.ए. केलापछाइतअपनोमनमेउठलजेकिछुकरकचाही।मुदारोजगारतँशहर-बजारपकैड़लेलकअछि, तइलेगामछोड़िजाइयेपड़त।जखनेअपनरोजगार-लेशहर-बजारजाएबतखनेपरिवारकसंगगामो-समाजकेँछोड़िजाइयेपड़त।जखनसभकिछुछोड़िगामसँचलिजाएबतखनजिनगीकमोलेकीरहल।जिनगीकमोलतँतखननेहोइएजखनअपनासंगपरिवारोआसमाजोकबीचकिछुकरैकअवसरभेटएआकिछुकरी।मुदासेबाहरगेनेभेटतनहि, तँएमनघुरियाइत-घुरियाइतमानिलेलकजेगामेमेकिछुरोजगारकउपायकरब। अखनधरिकजेपरिवारोआसमाजोकस्थितिरहलओमरनासन्नरहलजेकरफलाफलसभदेखतेछी।एहेनमरनासन्नस्थितिकपरिवारोआसमाजोकबीचकेनाजीवनमेजानऔत? प्रश्नजेसोझामेआबिठाढ़भेलओपर्वतनुमाविकरालअछिए।मुदाकेतबोविकरालकिएनेदेखपड़ए, मनुखोतँमनुखछी।ओकरोतँएतेबुझएअबितेछैजेदुनियाँकपर्वतढाहबसँनीकअपनजीवनपर्वतकेँढहनेसँलोककेँभेटतोअछिआभेटबोकरत...। मनघुमल, मानेगामदिसबढ़ल।गामदिसबढ़ितेमनसँमेटाएलगलजेकल-कारखानाआआनो-आनउद्योगसिमटाकऽखासजगहपरएकत्रितभऽगेलअछितँएओइठामकाजकबढ़ोत्तरीभेनेरोजगारकबढ़ोत्तरीअछि।गाममेसेनहिअछि।गाममेप्राचीनपद्धतिककिसानीजिनगीअखनोअछिए।ओना, एहेनरहैकएक्केटाकारणनहिअछि, अनेकोकारणअछि।खाएरजेअछि, कियोपहिनेअपना-लेसोचतआकिकरततखननेओकरदेखो-देखीआसिखो-सिखीसँसमाजिकताकजन्महएतजइसँसमाजमेगतिशीलताऔत। समयोमोड़परआबियेगेलअछितँएमोड़पकैड़मुड़ैकसम्भावनासेहोबनियेँगेलअछि।बैंकसभगामो-घरदिसबढ़बेकएलअछि, तँएकमबियाजपर–कमबियाजकमानेगाम-घरमेजेसूदि-सवाइकचलैनछलतइअनुपातमे–काजमेसहयोगकरैलेआर्थिकमदतदइलेतैयारभेलअछि। जाबेबैंकगाम-घरदिसनइछलताबेजेआर्थिकसमस्याछलओआबनइरहत। कोनोकाजशुरूकरैसँपहिनेएतेतँमनमेरोपिलिअपड़ैछैजेजइकाजदिसडेगउठाएब, ओकरजेलक्ष्यछैतइसीमापरपहुँचसकी।ईनहिजेबैंककसहयोगकेँभीखमंगाकभीखजकाँसोल्होअनासाफकऽदिऐ।ऐठामएकटाबातआरोअछि, आरोईअछिजेबैंकअपनविचारानुकूलसहायताकरैएआकिमददलेनिहारकविचारानुकूलमदैतकरैए? किएतँमदैतियो-मदैतिकअपन-अपनजगहअछि, कोनजगहपरकेहेनमदैतिकखगताहोइएआकेहेनमदैतभेटरहलअछि...।ईतँनहिनेजेकियोधारमेडुमैतहुअआओकरापुछिऐजे‘भाय, कीखाइकमदैतकरियह..?’ किसानपरिवारमेजन्मआपालन-पोसनभेनेकिसानीसंस्कृतियोआसंस्कारोरग-रगमेसमाएलअछिएतँएकिसानीवृत्तिसँजुड़लकारोबारदिसमनबढ़ल।जखनेआगूबढ़ैकविचारजगलतखनेसभकिछुअगुआकऽबुझौपड़तआकरौपड़बेकरत।मुदादुनियाँतँविश्वविद्यालयसेहोछीहे।केतौनव-नवकाजखोदि-खोदिनिकाललजाइएतँकेतौपहिलुकेकाजकेँनीकबनौलजाइएइत्यादि...। मनमेउठलजेपहिनेअपनकाजक (रोजगारक) बीआमनमेरोइपली, पछाइतविचारवानकाजकेनिहारसँपुछिलिऐन।पछाइतजँमनमेजँचततखनडेगउठाएब। परसूलालमोहनभायगामएला।बच्चेसँसहयोगकभावनाहुनकामेसेहोरहलैनआअपनोअपननापल-जोखलजिनगीजीवियेरहलछैथ।लालमोहनभायऐठामविदाभेलौं। लालमोहनभायबजन्तालोकछथिए।तीन-चारिगोरेकसंगबैसकिछुबाजियेरहलछलाकिइशारासँप्रणामकेलिऐन।ओना, असीरवादओहोदेलैनइशारेसँमुदाअपनबाजबरोकिबजला- “आगूमेबैसह।” बैसतेदोहरादेलैन- “किमहर-किमहरफिरंगी?” असगरेलालमोहनभायरहितैथतँनिधोखसँबजितौंमुदाचारिगोरेकबीचकबाततँओहननेहेबाचाहीजइसँचारूगोरेकेँलाभोहुअए।किएकियोहमरबातसुनताआकिहमहींकिएहुनकरसमयनष्टकरबैन।बजलौं- “भायसाहैब, केराखेतीकरैकविचारमनमेआबिरहलअछि।सएहकिछुबुझैकविचारसँएलौंहेन।” ‘केराखेती’सुनितेलालमोहनभायचौंकला।आश्चर्यसँनहिचौंकला, चाँकिसँचौंकला।चौंकितेबजला- “बहुतनीकविचारफिरंगीतोरामनमेएलहअछि।सोल्होअनाअपनविचारतोरादइछिअजेजखनमनमेएलहतखनशुभकाजमेबिलमकरबबुड़िपनाहएत।” लालमोहनभाइकविचारसुनिमनकविचारआरोमजगूतभेलमुदाईतँभेलकाजकरैले, मुदाकाजकप्रक्रियाकीहएतसेतँबुझबेनेकेलौं।जखनकिवएहबुझैकखियालसँआएलछी।बजलौं- “भाय, अहाँजेतेबुझैछी, जइअनुकूलविचारदेलौं, तेतेअपनेथोड़ेबुझैछीजेलगलेकाजमेहाथलगादेब।पहिनेनीकजकाँओकरजानकारीलऽलेब, तेकरपछातियेनेकाजमेहाथलगाएब।” हमरविचारलालमोहनभायकेँजँचलैन।जँचितेथोड़ेकठमकला।ठमकलदेखफेरबजलौं- “लालमोहनभाय! चुपरहनेनइहएत।कोनोकाजकरैसँपूर्व‘हँ-नइ’मेजवाबदेबएकबातभेल, मुदाओइमेगम्भीरतातखननेअबैएजखनओकरऐतिहासिकप्रक्रिया, मानेकाजकरैकऐतिहासिकतरीका, आतैसंगवर्त्तमान-भविसकप्रक्रियाकपथसेहोमनमेझलकएलगइ।” हमरबातसुनिलालमोहनभायगम्भीरहोइतमुस्कियेला।ओना, हुनकरमुस्कीमेकिरहस्यछेलैनसेतँनीकजकाँनइबुझिपेलौंमुदाअपनाबुझिपड़लजेमनखुशीछैनतँएमुस्कियाएलगलाअछि।तइबीचमेतीनू-चारूगोरेजेबैसलछलाओइमेसँएकगोरेबजला- “आबकसमयतँकेराकलेलअनुकूलभइयेगेलअछितँएभविसनीकछइहे।” गोल-मटोलविचारअपनाबुझिपड़ल।कोनोविचारकेँमनकतरजूपरपहिनेतौललेबनीकहोइए।तँएबजलौं- “कीनीकभविसकहलिऐ?” ओआदमीबजला- “केरानीकभोज्यपदार्थछी, ओनानीकोवस्तुसभ-लेनीकेनहियोँहोइए, केकरो-लेअधलोहेबेकरैए, मुदाजेसमयआबिगेलअछिवाआबिरहलअछि, तइमानेमेनीकअछिए।” ओआदमीअपनामनेकीबुझिबाजिरहलछलाआअपनेकीबुझएचाहैछेलौं, तइविचारककोनोजवाबनहिदेखबजलौं- “सेकेना?” ओबजला- “एकदिसलोककआर्थिकविकासभेनेभोजनमेसेहोउन्नैतभेलअछि।मानेजीबैलेअन-पानि, फल-फूल-पत्तालोकखाइते-पीबितेअछि, मुदाजीवनजीबैलेपौष्टिकभोजनकजरूरतअछिए, तहूखियालसँआतेतेनेदेवी-देवताकपूजा-पाठकसंगउपासकेनिहारिसँसहनिहारिधरिकफलहारकहियौकिअल्पाहार, तहूमेजरूरतबढ़ियेगेलअछि।” ओइआदमीकविचारसँकेराकबजारकपताकनी-मनीलगियेगेलमुदाअखनतँहमखेतीकरैयेकविचारलइलेनेआएलछी।सोचियेरहलछेलौंकितइबिच्चेमेदोसरआदमीओकराचोहटैतबाजल- “लालमोहनभायजेतेदेखलैनअछि, तेतेतूँथोड़ेदेखलहहेन।मनमेहमरो‘केराखेती’करैकविचारहोइए, तँएलालमोहनभायकेँबाजएदहुन।” ‘केराखेती’करैमेलालमोहनभायअसफलभइयेचुकलछैथ, तँएसफलकआशामनमेनइछेलैनसेहोबातनहियेँअछि।अहीसफल-असफलकबीचमनुखककिरदानीअछि।अहीकिरदानीपरलालमोहनभाइकमनअँटकलछेलैनतँएमने-मनसोचि-विचारिरहलछलाजेनवपीढ़ीकेँकेनाबुझौलजाए। ओना, अपनोमनरंग-रंगकविचारसुनिचौराएलेजाइछलमुदाईहोहोइछलजेभायपहिनेबेटाजनमापालन-पोषणकरबआकिमूड़नवाबिआहमेरण्डीनचबैकविचारकरब।अखनतँकेराकखेतीशुरूकेनाकरब, मूलप्रश्नईअछि। अपनअनुभवव्यक्तकरैतलालमोहनभायजिज्ञासाआओकरफलाफलएक्केसंगरखैतबजला- “फिरंगीबौआ, ओहीकेराखेतीकफलअपनेभोगिरहलछी, जेदसबर्खकमुम्बइमेनोकरीकेलापछाइतबैंकलोनसँछुटकाराभेटल।” खेतमेजहिनारंग-रंगकमानेकिस्म-किस्मक, बीजएकसंगबाउगभेनेरंग-रंगकगाछजनमनेअनाड़ीकेँचिन्हबकठिनभइयेजाइएजेकोनगाछकथीकछिऐ, तहिनामनमेभेल।बजलौं- “भायसहैब, नेजिनगीआइयेअन्तहोइएआनेअपनेअन्तहोइछीजेधड़फड़ीरहत।अखनजेखगताअछितेतबेकहू।” अपनहृदयखोलिलालमोहनभायबजला- “फिरंगी! ‘केराखेती’ओहनखेतमेहोइएजइमेपानिकजमावनइहोइ।अपनाओहनखेतनहिछलमुदामनमेखेतीकरैकजिज्ञासातँछेलए-हे।” “तखन?” “बैंककमैनेजरसँसभविचारकरैतयोजनाबनेलौं।दूबीघाखेतपाँचबर्खकलीजपरलेलौं।वोरिंगगड़ेलौं, दमकललेलौंआअपनजेतेकाजकसमयकेँछल, सभलगेलौं।मुदाअसफलभऽगेलौं..!” एकाएकहकासल-पियासलजिज्ञासाजगल।बजलौं- “सेकीभायसाहैब?” लालमोहनभायबजला- “बौनाकिस्मकजेकेराअछि, ओकराबिनाजँचने-परखनेखेतीकेलौं।जेजाड़कमासमेसभघौड़घोघेमेलटैकगेल।जइसँखेतीमरागेल।” शब्दसंख्या : 1326, तिथि : 25 मई 2019 Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA
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