VIDEHA — Issue 287 / अंक २८७

Publication: VIDEHA · Issue: 287
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २८७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४४ अंक २८७) 'विदेह' २८७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४४ अंक २८७) ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहसा चौरी’ ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- भौक प्रदीप पुष्प गजल- १ अपनेसँ कान्ह पर अप्पन लहास लेने छी जिनगी ई भूत -बँगला हम बास लेने छी तूँ जाम दे जहर दे हमरा नै फिकर अछि हम आँखि मूनि हाथ फेर गिलास लेने छी वैह बीच सभामे बेईमान कहि देलक जकरा एकाबन दऽहम उनचास लेने छी बनि लंकेश कतेक अप्पन घेँट काटू हम भेल शिव छथि आन्हर ई विश्वास लेने छी गजल नोरक मोसि भरि कहैत रहब ‘पुष्प’हम अहाँ सुनबै जरूर हम ई आस लेने छी (222222222222सभ पाँतिमे।बहरे- मीर) गजल- २ हेतै जहिया इजोर हम मोन पड़बौ लगतौ तोरा बकोर हम मोन पड़बौ तोरा पाछू चलैत चुप्पेसँ केओ धरतौ जहने पछोड़ हम मोन पड़बौ फेरो केओ निहारि चन्दा जकाँ मुख हेतौ तोहर चकोर हम मोन पड़बौ जे तोरा देखि भोजमे खूब रस लऽकऽ बनतौ डलना चटोर हम मोन पड़बौ बेदीतर बैसि मंत्र पढ़ऽलेल बहिना पहिरेतौ जे पटोर हम मोन पड़बौ (222212122122 सभ पाँतिमे) उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहसा चौरी’ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहसा चौरी’ पद्य विधाक 9म पोथी छियनि। एहि पोथीक प्रकाशन 2019इस्वीमे भेल। रहसा चौरीक माध्यमसँ कवि मिथिलांचलक ओइ भूभागक चित्र प्रस्तुत कएलनि अछि जे भूभाग सालक छअसँ नअ-दस मास धरि पानिमे डुमल रहैए। जाहिमे उपज हएब असम्भव रहैए। एहन भूभाग गाम-गाममे अछि जे गामक कुल जमीनक तिहाइ-चौथाइ अछि। जाहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे मिथिलांचलक तिहाइ-चौथाइ भागक जमीन उपजाक दृष्टिसँ नगण्य अछि। जखन तिहाइ-चौथाइ भाग गामक वा मिथिलांचलक उपजबे ने करत तखन ओहिठामक किसानक आर्थिक स्थिति केहन हएत। अही स्थितिक जिक्र कवि जगदीश प्रसाद मण्डल अपन प्रस्तुत काव्य ‘रहसा चौरी’मे कएलनि अछि। ओना, पानिसँ डुमल धरती सेहो उत्पादित सम्पति भऽ सकैए मुदा तकर कोनहुँ समुचित व्यवस्था नहि रहने बेकार भेल पड़ल अछि। चौरीक दृश्य देखबैत कवि कहलनि अछि- “भीतरमिथिलाकओभूभाग चौड़गरएकटाचौरीछै। दूर-दूरधरिपसरल-पसरल बि‍सवासूखेतीकभूमिनइछै। नअमासपानिएगुड़गुड़ा हिआ-हारिकनबोकरैए। माटिओककर्मकफलतेहने अपनेबेथेचिचिआरहल-ए।” जखन धरतीक एहन रूप रहत तखन धरतीवानक अर्थात् किसानक केहन गति हएत? यथार्थवादी कवि अपन दृष्टि एहने भूमि दिस नजैर देलनि अछि। सर्वविदित अछि जे मिथिलांचल एक सघन अवादीबला क्षेत्र थिक। ओना, देशक अनेको शहर सेहो सघन आवादी अछि। ग्रामीण अवादीकेँ समेटने अछि।मुदा ग्रामीण क्षेत्रमे मिथिलांचल सेहो सघन अवादीबला जगह अछि। जाहिसँ बेरोजगारी परमान चढ़ल अछि। आ से आइये नहि, सभ दिनसँ रहल अछि। तँएमिथिलांचलवासीकेँ पलायन करब अनिवार्य भइये गेल अछि। जँ से नहि करता तँ जीवन-यापन करब कठिन छन्हिहेँ। अही विचारकेँ कवि रेखांकित करैत ‘बेरोजगारी’कवितामे प्रस्तुत कएलनि अछि- “बेरोजगारसँदेशभरलछै बौसबिनाकंगालबनलछै। तैबीचरोजगारेहेराएल तमसगीरतमाशादेख‍रहलछै।” लोक निराश भऽअपन भाग्यकेँ कोसैत हारल-थाकल भेल पड़ल अछि। पलायनवादी सोचक लोकजे लोक छथि, जनिक व्यवहार किछु आर उद्देश्य किछु आर तथा बजैत छथि किछु आर, ओहन व्यक्ति लेल कवि कहैत छथि- “गामकमाटिकजँदशाएहेन मिथिलाराजकेहेनहेतइ। बाहरे-बाहरकसुसकारीसँ गहुमनकबीखकेनाझड़तै। विचारइमानककेकराकहबै खोलिदेखूमातृकोष। अपने-आपप्रश्नपुछि विचारकरूसम्हारिहोश।” वैचारिक दौरमे सभ कियो तँ नीक्के चाहैत छी नीक्के बजैत छीमुदा दुनियॉंक बीच अपन स्थिति किए एहन अछि? एहन प्रश्नकेँ कवि एहि रूपेँ ठाढ़ करैत छथि- “सभछीशुभचिन्तकदेशेक सभविचारकसंगनेताकी। मुसहरबीचमूसहेराहेराएल धीया-पुताकाल्हि‍खेतैकी?” आगू कहैत छथि दिशाहीन रोजगार बनल छैक, रंग-बिरंगक दुनियॉं बनल छैक- “दिशाहीनरोजगारबनलछै रंग-बि‍रंगदुनियाँबनलछै। केतौपेन्‍शनधारीकरोजगार तँकेतौकरैबलापड़लछै।” अपनदुख-दरदभायजाधैरअपनेनइबुझब।ताधरिकेनापाबिसकैछीनीकभविष्यकनीकसोचब।निच्चाँ-ऊपरसभबजैए- “किसानेकदेशभारतछी कटि-मरिकिसानेसभ अँग्रेजोकेँभगौनेछी। जरि-उजैरकेतेगाम केतेलोकप्राणचढ़ौलक पैंसैठबर्खकआजादीकी पेटोकदुखमेटोलक। जहिनाआजादीसँपहिने चुसलकखूनराजा-रजवार। तहिनातँआइयोहोइए चुसैएदेशी-विदेशीकरखन्नादार।” टुटैतजिनगीकबेथाघुमिपाछूदेखएपड़त।सैयौनहि,हजारोबर्खनहि,जड़िएसँदेखएपड़त- “पाँचहजारबर्खकपुराण हँसि-हँसिबाजिरहलअछि। सुर-असुर, दानव-देवताक ऐतिहासिकगाथासुनारहलअछि। लगभगपौनेदूसाएबर्खपहिने अँग्रेजआबिआसनजमौलक।” जेकराभगितेऐठामकजन-गणआजादीकसाँसलेलक।मुदाएतबेनहि, कनेआगूचलू।हजारबर्षकीकहैए। चारूदिसभजारि-भजारि, तेकरापुछियौविवेकसँनिर्णयकीकरैए- “स्वर्णिमइतिहासकस्वर्णकाल ओझुकेभारतछलतहियो। निचोड़ि-निचोड़ि, तर्क-वितर्क निर्णयनिरमाबएपड़तआइयो। निर्णयनिरमाबए...।” बीतल बर्खक विदाइ दैत अन्तिम सत्कार सुनबैत कहैत छथि- “अन्‍ति‍मसत्कारसुनूशिकारी अन्‍ति‍मदिनकहैछी। अन्‍ति‍मबातसुना-सुना अन्‍ति‍मसत्कारकरैछी। हँसैतरहूसदैत‍अहाँ हमरोतँजीबएदिअ। सभकिछुतँलैएलेलौं एतबोतँबाजएदिअ।” प्रस्तुत पोथीमे कवि ‘बाढ़िक सनेस’ सँ लऽ ‘ऐ पढ़बसँ मुरखे रहितौं’ धरिक शीर्षक मध्य 40 गोट रचनाक समायोजन कयने छथि। क्रमश: सभ रचनाक शीर्षक निम्नांकित अछि- ‘बाढ़िक सनेस’,‘अगो-लोढ़ा’,‘हथियाक झटकी’, ‘रहसा चौरी’,‘बेरोजगारी’,‘लीढ़ी पोखैर’,‘बकरी भेराड़ी’,‘महगी’,‘जरनबिछनी’,‘नव-फल’,‘पू-भर’,‘चौरीक धनकटनी’,‘किसान’,‘टुटैत जिनगी’,‘कविता’,‘बुड़िबकी’,‘गाछी भुताह’,‘वोनक आगि’,‘बीतल बर्खक विदाइ’,‘संगी’,‘बेथा’,‘धब्‍बा’,‘पितृपक्षक भोज’,‘ठनका’,‘झपासा’,‘शिवचरन’,‘चौरचनक छाँछी’,‘भरदुतिया’,‘फुसि‍’,‘चिक्कैन माटि’,‘झारू-बाढ़ैन’,‘मेवाक फल’,‘चपरासी भाय’,‘नोत’,‘लटुआ’,‘एकैसम सदीक देश’,‘मधुमाछी’,‘जुआनी’,‘तरंग’,‘ऐ पढ़बसँ मुरखे रहितौं।’ ‘रहसा चौरी’ नामक एहि पोथीक आमुख डॉ. शिव कुमार प्रसाद, विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, एच.पी.एस. कॉलेज- निर्मली (सुपौल)लिखने छथि। ओहि आमुखमे रचनाकार- कविक सन्दर्भमे डॉ. प्रसाद कहैत छथि- “मैथिलीकसशक्तरचनाकारजगदीशप्रसादमण्डलजीमिथिलाकमाटि-पानिकरचनाकरछैथ।हिनकसभविधामेमिथिलाकमाटिपहिलपात्रकरूपमेअभरैतअछि।कथा,उपन्यास, नाटक, कविताआदिमेहिनकगाम, गामकमाटि, गामकलोक, बाड़ी-झाड़ी, खेत-खरिहॉंन, कलम-बँसबिट्टी, पाबैन-तिहार, माय, काकी, बाबी, बिधवा, सधवा, नचारइत्यादिकेँहमसहजेदेखसकैछी।हुनकहँसी-खुशी, वियोग-व्यथा, झगड़ा-झंझट, मुड़ण-उपनैन, बिआह-दुरागमन, मरण-हरणसभसमाजिक, पारिवारिक, आर्थिकतथामनोवैज्ञानिकभावकअभिव्यक्तिमण्डलजीकविविधविधामेविद्यमानछैन।आधुनिकजिनगीकछल-छद्मआ‘हमपीरमियॉंकभाव-बोधसँदूरकिसानीजिनगीजीबैतगतबीसबर्खमेसाएसँअधिकपोथीकप्रकाशनभऽचुकलछैन।” आशीष अनचिन्हार गजल बान्हल भाषा बान्हल बोल अइ नाटकमे अतबे रोल हुनका कहने दुनियाँ टेढ़ हुनके कहने दुनियाँ गोल खाली पेटक छै फरमान भरलाहाकेँ खोलै पोल चुप्पे आबै चुप्पे जाइ हिनकर आँगन हुनकर टोल किछु ने जानै अनचिन्हार के पहिरैए नवका खोल सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल भौक जेठमासकएगारहबजेदिनमे, सबेर-सकाल, खा-पीबगाछीकमचानपरसुतैकखियालसँपड़लेरहीकिदछिनवरियारस्तादिससँएकगोरेफाँढ़बन्हने, माथपरतौनीउड़ियाइतलफड़लअबैतरहैथ। बीचगाछीमेपूबे-पच्छिमेमचान-खोपड़ीदेनेछिऐ।अपनओछाइन-बिछाइनस्थाइयेरूपेभरिआम–जाबेतकआमकओगरबाहिचलैए–गाछीमेरखितेछी। पूबसिरहानेबामाकरेपड़बेकएलरहीकिहुनकाअबैतदेखनेरहिऐन।जहिनाअपन-अपनजीवनानुकूलअपन-अपनविचारोपलितेअछितहिनाअपनौंपालनहिछी। हुनकाअबैतजेदेखलयैनतँअपनेमनमेफुरिगेल- ‘एकटाओवेचारेछैथजेघरवालीककारणेरौदतपैछैथआअपनेछीजेपत्नीसबेर-सकालखुआ-पीआआरामकरएगाछीपठादइछैथ.! ईदीगरभेलजेरंग-रंगकआमखाइकलोभेओहमराओगरवाहबनाओगरवाहियेकरैलेकिएनेआमकगाछीअरियाइतकऽपठादैतहोइथ। गामकदच्छिनवरियाबाघमेजेतेऊँचरसजमीनअछि–मानेजेकराचौमासकहैछिऐ, चौमासभेलजेखेतचारूमौसममेफसलसँलहलहासकैए।भलेँओइचौमासचासकसदगैतअछिआकिदुरगैतईविचारणीयप्रश्नअछि।आमकगाछीलगलअछि।सालमेएकबेरआमफड़ैए, सेहोसभसालसोल्होअनाफरबेकरत, सेहोनहियेँकहलजासकैए।जँफड़बोकरैएतँमात्रएक-सँ-डेढ़मासलोकखाइए।भलेँअमृतेफलआमकिएनेहुअए, मुदाओनसीवकेतेकहोइए, मानेकेतेदिनतकखाइछी, ईहोविचारणीयअछिए।खाएरजेअछिजेतएअछिसेतेतएरहउ...। ओजखनदसलग्गाकबीचकरीबपहुँचलातखनचिन्हलयैनजेदीनबन्धुकाकाछैथ। दीनबन्धुकाकाकेँदेखतेअपनेउठिकऽबैसैतबजलौं- “काका, एनाहकासल-पियासलकेतए-सँअबैछी?” एकतँजेठुआरौदकदेहतबधलरहैनतैपरसँपत्नीकआदेशपूर्तिनहिभेलछेलैन, तइसँमनोतबधलरहबेकरैन।संजोगभेल, दीनबन्धुकाकामचानपरआबिबैसला। ओना, ताड़बलापंखाअपनोरखबेकरैछी, मुदाकनी-कनीजेपुरबाहवालहकीदैतरहैतइसँपंखाझेलबछोड़ि, ओइलहकीकआनन्दलइकविचारमनमेछेलए।मुदारौदाएलदीनबन्धुकक्काकहालतदेखहाँइ-हाँइपंखाकहवादिअलगलयैन। करीबदसमिनटकपछाइतदीनबन्धुकक्काकमनथीरभेलैन।मनथीरहोइतेबजला- “बड़काआफतमेपड़िगेलछी..!” ‘बड़काआफत’सुनिमनचौंकल।कीआफतभऽगेलछैन..! मुदाअपनोमनबजैसँरोकिरहलछल।किएतँकोनोआफतसुनबएकभेलआओइआफतकनिमरजनाकरबदोसरभेल।ऐठामतँअपनआमकगाछीकमचानपरबैसलछी, मुदातैयोजीजाँतिबजैकसाहसकेलौं।‘जीजाँति’कमानेभेलजेजेअपनशक्तिसँहएतओकरबआजेनहिहएतओकहिदेबैनजेहमराबुत्तेनहिहएत।पुछलयैन- “कीआफतमेपड़लछीकाका?” छगाएलमनदीनबन्धुकक्काकरहबेकरैन, तँएप्रश्नकउत्तरकीहेबाचाहीतैपरसँमनघुसकलरहबेकरैन।अनधुनबजला- “एतेकहरानसँरौदीभगतऐठामगेबोकेलौंआभेँटोनेभेल!” दीनबन्धुकक्काकबातककोनोभाँजेनेपेलौंजेकीबजला? भाँजपरचढ़बैतबजलौं- “कोनएहेनउताहुलभऽगेल?” मनकव्यग्रताबुझिआकिसमैयक, दीनबन्धुकक्काकमनजेनाव्यग्र-सँ-व्यग्रतमस्थितिमेपहुँचगेलैन।मुदाकेतबोव्यग्रकिएनेहोनि, जाबेसहिटविचार–समतलमनोवृत्ति–नहिबनतैनताबेकोनोविचारकेँसमुचितढंगसँबुझिकेनापएब? तहूमेगाछीकमचानपरछी, जैठामओछाइनकएलमचानआएकटासुराहीमेपानिआऊपरमेस्टीलियालोटामात्रअछि।आनकोनोवस्तुनेखाइ-पीबैबलाअछिआनेआनेकोनोजरूरतकपूर्तिलेलकिछुअछि।ऐठामकइयेकीसकैछी।तैयोबजलौं- “काका, पानिपीब? आनचीजतँअछिनहि, तमाकुलखाइछीचुनौटीसंगमेअछि।” हमरबातदीनबन्धुकाकासुनलैनआकिनइसुनलैनसेओजानैथ, मुदामनजेव्यग्ररहैनतइसँअपनाबुझिपड़लजेनीकजकाँहमराबातपरकनबाहिनइदेलैन।बजला- “अखननेतमाकुलखाइकमनहोइएआनेपानियेँपीबैक!” विचारकक्रममेअपनोविचारक्रमगतभऽगेलछल।बजलौं- “तखन?” ‘तखन’कमानेदीनबन्धुकाकाकेँजेलगलहोनिमुदाबजला- “देखहकजेभोरे–जलखैयेकेलापछाइत–रौदीभगतऐठामकाजेगेलछेलौंसेभेँटेनेभेल।” पुछलयैन- “किएनेभेँटभेलगाममेरौदीनहिअछिकी?” दीनबन्धुकाकाबजला- “हँ! गामेमेनइअछि।राम-रहीमबाबाकसंगबेसभकामाख्याजाइछलतेकरेसंगओहोधऽलेलक।” रंग-रंगकलोकधरतीपरजहिनाअछितहिनारंग-रंगकबुधियो-विवेक, चालियो-ढालिआकिरियो-करमतँअछिए।नेकेकरोगाम-घरकठौर-ठेकानअछिआनेजाति-सम्प्रदायिक।सभअपनेतालेबेतालअछिए।सबहकविचारयएहछैजेसभसँनीकहमहींछी।बाँकीजेतेअछिसेसभअधलेअछि।भलेँओअपनजिनगियोआअपनकिरियो-कलापबुझैतहुअएवानहि...। ओना, मनमेबहुतरासविचारजागलमुदाविचारकविचारकरबोकतँअपन-अपनजगहहोइतेछइ।ऐठामतँकोनोतेहेनजगहोनहियेँदेखरहलछीजेदोसरबातपुछितिऐन।बजलौं- “केहेनकाजरौदीभगतसँअछिकाका?” ‘केहेनकाज’सुनितेदीनबन्धुकक्काकविचारकरंगकसंगचेहरोकरंगएकाएकबदैलगेलैन।चेहरोआविचारोकरंगतँबदललैनमुदामात्रऊपरी! मानेजहिनाकोनोसुतलआदमीकसपनाअदहापरअबितेनीनटुटिगेनेअधडरेरेपरसपनाकरूपलटैकजाइएतहिनादीनबन्धुकक्काकसेहोछेलैन।बजला- “पत्नीकमोबाइलहेरागेलैनआकिचोरालेलकैनसेफरिछाकऽतँनैकहली, कहलीहेनएतबेजेमोबाइलकियोलऽलेलकअछि।तेकरेभाँजलगबएरौदीभगतलगगेलछेलौं।” पत्नीकमोबाइलकियोलऽलेलकैन, सेरौदीभगतकेनाबुझतजेकेलेलकैन? ओओइठामछलतँनहिजेदेखलकैन? जँदेखलकैनतँतहीसमयकिएनेकहबोकेलकैनआछीनकऽदइयोदेलकैन..? ओना, मनमेईहोउठिरहलछलजेएकतँपत्नीकपीड़ामेदीनबन्धुकाकाअपनेपाण्डुरोगीजकाँपीअरभेलजारहलछैथ, तैपरसँजँहमहूँपियरकारंगघोरिकपारपरउझैलदिऐनसेहोनीकनहियेँबुझिपड़ल।तँएएनाकऽबजलौं- “रौदीभगतभाँजलगादेत?” जेनाकेकरोउड़ैतआबिमच्छरआकिडाँसकाटिलइछैआओछिलमिलाउठैएतहिनाछिलमिलाइतदीनबन्धुकाकाबजला- “अपनाइलाकामेऐसँबेसीजगताजोरभगतदोसरथोड़ेअछि! रौदीओहनभगतअछिजेआँतमेजँकियोकोनोचोरेलहाचीजराखततेकराओऊपरे-ऊपरसँनिकालिदैत।” मनमानिगेलजेदीनबन्धुकाकाअखनएकभग्गूविचारकभऽगेलछैथतँएविचारकेँओत्तैरोकिबजलौं- “मोबाइलहेरेलैनकेतए?” असियाएलदीनबन्धुकाकाकेँहमरबातसुनितेआरोआसलगिगेलैन।बजला- “चारिमदिनपत्नीस्त्रीगणकसंगदेवरियागेलछेली।ओत्तैमोबाइलहरेलैन।” पुछलयैन- “देवरियाकिएगेलछेली?” हलसल-फुलसलमनेदीनबन्धुकाकाबजला- “हालेमे, दस-बारहदिनपहिने, एकटास्त्रीगणकेँसपनौतीभेलैन।” बिच्चेमेबजागेल- “कीसपनौतीभेलैन?” दीनबन्धुकाकाजोरदैतबजला- “एकरासोल्होअनासपनौतीएनहिबुझह।हजारकहजारजनि-जातियोआपुरुखकसंगधियो-पुताकसभरोग–मानेदैही-दैविकसभटादुख–मेटागेल, छुटिगेल।” ओना, अपनोकानेसैकड़ोमुँहकबातसुननहिछेलौंजेएकटास्त्रीगणअपनगहबरक, ओनागहबरपहिनेनहिछल, पीपरकगाछकनिच्चाँमेआठदिनपहिनेबनलछल, एकचुटकीमाटिजेकरादइएओकरादेहमेजेकोनोबर-बेमारीरहैछै, ओनिठाहीछुटिजाइछइ।मुदाअपनमनएहेन-एहेनअन्धबिसवासूहवा-बिहाड़िकेतेकोदेख-सुनिचुकलअछितँएबिसवासकिएकरब।कहियोमोहुकगाछमेसटलासँरोग-वियाधिभागल, तँकहियोएकचुटकीमाटिसँभगौलेगेलअछि।केतेरोग-वियाधिभागलआकेतेलोककेँभगौलकईतँसभजानियेँरहलछी...।तैयोदीनबन्धुकाकाओहनविचारकनहिछैथसेहोबातनहियेँअछि।पहिलुकाविचारक (अन्धविश्वासक) जेतेछैथओइमेसँकिछुधक्का-पंजालगनेसमहरबोकेलाअछिमुदासभसम्हैरियेगेलासेहोनहियेँकहलजासकैए।साँपजहिनासाले-सालसौनमासमेकेचुआछोड़िविषपरिमार्जनकरैएतहिनासमैयकसंगसमयकर्त्तानहिकरैएसेहोतँकरितेअछि।खाएरजेतएजेअछिमुदाऐठामतँदीनबन्धुकक्काकप्रतिष्ठापत्नीकदाउपरचढ़लछैन...।बजलौं- “जखनरौदीभगतनइभेटल, किएतँकामाख्येगेलअछितखनकोनोठेकानछैजेकहियाऔत।कहाँ-दनओम्हर–कामाख्यादिस–पुरुखकेँस्त्रीगणसभभेड़ा-भेड़ी, गदहा-गदहीबना-बनाबाधमेखुट्टा-खुट्टीमेठोकिभरिदिनचरबैएआसाँझूपहरमेघरपरआनिपुरुखबनबैए।” हमरबातसुनिदीनबन्धुकाकाकेँमनमेकीभेलैनसेतँओजानैथमुदाजहिनाकेकरोमिरचाइककड़ूपनसँसुरसुरीअबैछैतहिनासुसुआइतबजला- “बौआ, घरवालीकबातपरओतेधियाननहियोँदइतौं, मुदातोंहूतँदेखतेछहकजेगाम-समाजहौआकिआने-आनसमाज, केकरो-मे-केकरोमेदहानइअछि।तैसंगबेटो-पुतोहुककिरदानीदेखतेछहकजेमिथिलांचलकमहामंत्र–माता-पिताकसेवा–कलेलबिहारसरकारकेँकानूनबनबएपड़िरहलछइ।तखनतोहींकहहजेकीनीकहएत?” ‘कीनीकहएत’सुनिमनवौआएलगल, एकदिसजहिनानव-नवतकनीकएनेजिनगीसुलभभेलअछिजइसँपरिवारकचिनमारतकनवतकनीकपहुँचगेलअछितँतहिनादोसरदिसअन्धबिसवाससेहोसौनकसाँपजकाँकेचुआछोड़ि-छोड़िनव-नवरंगचढ़बैतविचारसँलऽकऽबेवहारधरिमेआबिघरो-आँगनापहुँचगेलअछि..! बजलौं- “काकाकीकरबै, दुनियेँजखनभौकमेपड़िभकुआगेलअछितखनतँअहीमेनेसभछी।” दीनबन्धुकाकाबजला- “कोनोउपाय?” बजलौं- “हँकाका, उपायकिएनेरहत! ओनानइभेटतमोबाइल, ओकरनम्बरलऽकऽआगूबढ़ू।भगता-भुगतीकविचारमनसँहटाउ।” “सएह!” दीनबन्धुकक्काकमुँहक‘सएह’सुनिहमरोमुहसँनिकलल- “हँतँसएहनेनीक।” शब्दसंख्या : 1403, तिथि : 14 जून 2019 Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

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