विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २८८ म अंक १५ दिसम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४४ अंक २८८) 'विदेह' २८८ म अंक १५ दिसम्बर २०१९ (वर्ष १२ मास १४४ अंक २८८) ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गामक जिनगी’ ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- मनतरकपावर प्रदीप पुष्प गजल- १ राति सपना देखि गमेलौं तँकी भेटल नोर हमरा लेल खसेलौं तँकी भेटल फेर आपस हैब हमर नइ रहय सम्भव नैन बाटे बीच लगेलौं तँकी भेटल जाति सभ दिन माथ पर मारने पलथा टोलकेँ टोलेसँ सटेलौं तँकी भेटल छी अहाँ पपिआह तँकी ठोप आ चानन मास दिन गंगे जँ नहेलौं तँकी भेटल चित्र सभ ठाँ टांगल यात्रीक घर घरमे गीत बलचनमाक सुनेलौं तँकी भेटल प्राण काया केर बिना नइ रहय कखनो बिनु बहर गजले जँ कहेलौं तँकी भेटल (2122211221222सभ पाँतिमे) गजल- २ किछु रौदीमे किछु दाहीमे बाँकी जरतै अगराहीमे सत्तैर बरखक भेलै चिलका एतै कहिया फगुनाहीमे धी माइक अनुपम नाता ई दुन्नू डुबलै पुरनाहीमे जे जत्ते बड़का लीडर छै से तत्ते बेपरबाहीमे मुइने भेटत अनुदानो ता भुखले नारा बहबाहीमे उपरे उप्पर दौरा करिहेँ नइ जइहेँकोसी मरखाहीमे (22222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग-अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानल गेल अछि) उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गामक जिनगी’ ‘गामक जिनगी’ एक पोथीक नाओं थिक। एहि पोथीक लेखक छथिश्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी। मण्डलजीक ई पहिल कथा संग्रह छियनि। एहिमे 19 गोट कथा संग्रहित अछि। भैंटक लावा कथासँ एहि संग्रहक आरम्भ भेल अछि। एहि कथाकेँमण्डलजी 2004 इस्वीमे लिखलन्हि। पुस्तकाकार रूपमे पोथीक पहिल संस्करण, श्रुति प्रकाशन- नई दिल्लीसँ 2009 इस्वीमे प्रकाशित भेल छन्हि। प्रसिद्ध ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर आ डॉ. सुभाष चन्द्र यादवजी एहि पोथीक आमुखकार छथि। कथा एवं कथाकारक विषयमे लिखने छथि- “वर्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथासँ जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कथा भिन्न अछि। कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। मण्डलजीजीवनमे प्राप्य जिजीविषा, मानवीयता एवं आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनर्प्रष्ठित करबाक उद्देश्यसँ अनुप्राणित छथि।” लेखक मिथिलाक वृन्दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलबाड़ी लगौनिहार तथा नव विहान अननिहारलेल एहि पोथीकेँ समर्पित कयने छथि। ‘गामक जिनगी’ पोथीकलोकार्पण प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. योगानन्द झाक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’क70म कथा गोष्ठी, कबिलपुर, दरभंगामे, 12.06.2010क डॉ. श्रीमती कमला चौधरी, प्रसिद्ध लेखिका एवम् मैथिली विभागाध्यक्ष, बी.आर.ए.बी.यू. मुजफ्फरपुर द्वारा भेल अछि। वर्तमानमे पल्लवी प्रकाशन- निर्मली (सुपौल),सँ एहि पोथीक अग्रिम संस्करण सेहो उपलब्ध अछि। मैथिली साहित्यक एकल पुरस्कार- ‘टैगोर साहित्य पुरस्कार’ एवम् पहिल ‘विदेह साहित्य सम्मान’सँ एही पोथीपर श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ सम्मानित कएल गेल छन्हि। गामक जिनगी’ पोथीक अन्तिम पृष्ठपर ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षित ई-पत्रिकाक सम्पदकश्री गजेन्द्र ठाकुरजी लिखलन्हि अछि- “१९४२-४३क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे ऐ अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइला (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओइमे नै भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाएल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा ऐपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ ऐ विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, तइ कारणसँ अमर्त्य सेन जकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओइ महाविभीषिकासँ ओत्ते प्रभावित नै भेल हेता। आ एतऽ जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लैए।” ‘गामक जिनगी’ कथा संग्रहक सम्बन्धमे प्रसिद्ध साहित्यकार श्री मन्त्रेश्वर झा लिखने छथि- “गामकजिनगीकसभकथाग्राम्यजीवनकेँकिछुअनछुअलप्रसंगकेँमार्मिकचित्रणकरैतअछि।” प्रस्तुत पोथीमे 19 गोट कथाकेँ कथाकार समायोजित कयने छथि। शब्द संख्या सहित सभ कथा-लेखनक विवरण क्रमानुसार निम्नांकित अछि- 1. भैंटक लावा- शब्द संख्या :3100 2. बिसाँढ़- शब्द संख्या :2516 3. पीरारक फड़- शब्द संख्या :2064 4. अनेरुआ बेटा- शब्द संख्या :3369 5. दूटा पाइ- शब्द संख्या :3294 6. बोनिहारिन मरनी- शब्द संख्या :3412 7. हारि-जीत- शब्द संख्या :2373 8. ठेलाबला- शब्द संख्या :2572 9. जीविका- शब्द संख्या :3655 10. रिक्साबला- शब्द संख्या :3963 11. चुनवाली- शब्द संख्या :2452 12. डीहक बटबारा- शब्द संख्या :4789 13. भैयारी- शब्द संख्या :4026 14. बहिन- शब्द संख्या :2688 15. घरदेखिया- शब्द संख्या :4021 16. पछताबा- शब्द संख्या :2663 17. डाक्टर हेमन्त- शब्द संख्या :4407 18. बाबी- शब्द संख्या :2167 19. कामिनी- शब्द संख्या :2289 ‘भैंटक लावा’, कथाकेँ 3100 शब्दमे कथाकार लिखने छथि। कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल मिथिलाक गाममे रहैत छथि। मिथिलाक बहुसंख्य लोकक जीवन कृषि कार्यपर निर्भर अछि। मण्डलजी सेहो किसान छथि, हिनकहु जीविकोपार्जन कृषि छियन्हि। अत: ई अपन पहिल कथा लिखलनि ‘भैंटक लावा’, जाहिमे मिथिलाक किसान-मजूदरक सभसँ पैघ समस्याकेँ चिह्नित कएल गेल अछि। सभकियो जनैत छी जे सभदिनसँ मिथिलांचल बाढ़ि-रौदीक चपेटमे पड़ैत रहल अछि। एहिठाम जहिना रंग-रंगक बाढ़िक रूप अछि, माने बाढ़िक एकरूपता नहि अछि तहिना रंग-रंगक रौदी सेहो अछि। अर्थात् जहिना बाढ़ि नम्हरो होइए आ छोटो होइए तहिना रौदीक सेहो अछि। रामायणिक हिसाबसँ रौदी बारह वर्ष धरिक भेल अछि। किएक तँ बारह वर्षक रौदीक पछाति राजा जनकजी हर जोतने छलाह जाहिमे सीताक जन्म भेल छलन्हि। मिथिलांचलमे अनेको तरहक पहाड़ी नदी सभ बहि रहल अछि। संख्याक हिसाबे करीब दू दर्जन धार (नदी) अछि जे मिथिलाक भूभागमे उत्तरसँ प्रवेश करैत दच्छिन मुहेँ बहि रहल अछि। जाहिमे किछु वरसाती धार अछि बॉंकी अधिकतर धार बारहो मास बहैबला अछि। अर्थात् जहिना बाढ़ि मिथिलांचलक किसानकेँ तोड़ैत रहल अछि तहिना रौदी सेहो किसानक जिनगीकेँ तबाह करैत रहल अछि। जाहिसँ एहिठामक किसानक उन्नैतिक दिशा अवरूद्ध भेल पड़ल अछि। मुदा किछु-किछु ओहन लोक एखनहुँ छथिए जे लाख समस्याक बावजूदो अपन किसानी संस्कृतिकेँ पकड़ि चलि रहला अछि। प्रस्तुत कथा- ‘भैंटक लावा’क लेखन कथाकार 1987 इस्वीक बाढ़िक रूप-रंगकेँ अपना आँखिसँ देखि कऽ कयने छथि। तँए, बाढ़िक एतेक सजीव चित्रण कथाकार कयने छथि। ओ कहैत छथि- “पैछला बाढ़ि मोन पड़िते देह भुटैक जाइए। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइए। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नाचए लगैए। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बाढ़ियो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुढ़िया। बुढ़िया रूप बना नृत्य करैत। केकरा कहूँ बड़की धार आ केकरा कहूँ छोटकी, सभ अपन-अपन चीन-पहचीन मेटा समुद्र जकाँ बनि गेल। जेमहर देखू तेमहर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दच्छिन-मुहेँ दौगल जाइत। केतेक गाम-घर पजेबाक नइ रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखैर, बोरिंग, चापाकल पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल। एहेन भयंकर दृश्य देख लोककेँ डरे छने-छन पियास लगलोपर पीबैक पानि नइ भेटैत। जीवन-मरण आगूमे ठाढ़ भऽ झिक्कम-झिक्का करैत। घर खसल, घरक कोठी खसल, कोठीक अन्न भँसल। जेहने दुरगैत घरक तेहने गाइयो-महींस, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक।” प्रस्तुत कथा मुसना आ जीबछीक माध्यमसँ गढ़ल गेल अछि। मुसना आ जीबछी ओहन परिवारक अछि जकरा सम्पतिक नामपर किछु ने छैक। मात्र अपन हूनरअर्थात्लूरि आ श्रम करैक शक्तिटा छैक। जाहिक बले मुसना आ जीबछी जीवन-यापन करैए। दुर्कालकचलते गामक कतेको लोक आन-आनठाम जा कऽ जीवन-यापनक जोगार करैए मुदा मुसना दुनू परानी गामहिमे रहि अपन भोजनक जोगार ताकि लइए। ई कथाकारक खास विशेषता छन्हि। जे हिनकर पात्र कोनहुँ स्थितिमे भटकैत नहि अछि। एहि प्रसंगमे प्रसिद्ध आलोचक डॉ योगानन्द झा लिखने छथि- ‘मिथिलामे उपलब्ध प्राकृतिक उपादानक उपयोगितापर विमर्श प्रस्तुत करैत अछि। बाढ़ि आ सुखारसँ पीड़ित मिथिलाक जनसमुदाय अपन जीवन रक्षाक हेतु कोन तरहेँ भैँट, बिसाँढ़, पीरार आदिकेँ अपन मेहनतिक बलेँ खाद्य पदार्थक रूपमे ग्रहन करैत रहल अछि तथा एहिठामक प्राकृतिक संसाधनक उपयोग द्वारा कोना मिथिलाक भूखमरी ओ बेरोजगारीकेँ दूर कएल जा सकैछ, एकर आर्थिक विकास कएल जा सकैछ तकर चित्र एहि तीनू कथामे भेटैत अछि। श्रमपर विश्वास, इमानदार प्रयास, कर्मण्यता ओ चातुर्यक संबलसँ विपन्नतापर विजयक ई गाथा सभ मिथिलाक लोकजीवनमे व्याप्त उत्साह ओ संघर्षक मर्मस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करैत अछि। कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी प्रस्तुत कथामे समाजक अन्तिम व्यक्तिकेँ अगुआ माने ओहन पात्रकेँ आगाँ आनि निराशाक जीवनसँ निकालि आशावान बना जीवनक चर्च कयने छथि, जकरा अपना किछु ने छैक। 2. ‘बिसाँढ़’कथा गामक जिनगी संग्रहक दोसर कथा थिक। एहि कथाकेँ 2516 शब्दमे लिखल गेल अछि।एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार रौदीक विषद चर्च कयने छथि। जहिना रंग-रंगक बाढ़ि होइएमाने छोटो, मध्यमो आ नम्हरो होइए तहिना रौदी सेहो रंग-रंगक होइए। एहनो रौदी होइए जे एक मौसममे माने वरसातक मौसममे मौनसूनी वर्षा नहि भेने सालक बारहो मासकेँ प्रभावित करैए तँ एहनो रौदी होइते अछि जे दू-साल-तीन-साल धरिकेँ प्रभावित करैबला होइए। जहिना बंगालक 1942 इस्वीक रौदी छल तहिना बिहारमे 1966-67 इस्वीक रौदी सेहो भेल। जाहिसँ मिथिलांचलक किसाने टा प्रभावित नहि भेलाह, किसानक संग बोनिहारो आ मालो-जाल, गाछो-बिरीछ आ चिड़ैयो-चुनमुनी प्रभावित भेबे कएल। बहुतो किस्मक चिड़ै-चुनमुनीक उपटान भऽ गेल। तहिना गाम-गामक मालो-जाल आ गाछो-बिरीछ सुखि गेल जाहिसँ इलाकाक (मिथिलांचलक) चेहरा कुरुप भऽ गेल। प्रस्तुत कथामे कथाकार डोमन आ सुगियाक चर्च कयने छथि।एहि दुनू व्यक्तिक माध्यमसँ रौदीक विषद चर्च करैत कथाकार निराशासँ भरल जिनगीकेँ आशावान बनौलन्हि अछि। कथाकार एक दिसि रौदी-सुखारसँ त्रस्त भऽ गामक लोक ढाका, दिनाजपुरओ मोरंग आदि स्थानपर जा अपन जीविकोपार्जनक तालाश करैबला लोकक चर्चा कएलन्हि अछि तँ दोसर दिसि डोमन ओ सुगियाकेँ गामहिमे रहबाक आ सुगियाक मनक विश्वासक चर्च सेहो कएलन्हि अछि- “जे भगवान जन्म देलैन आ मुँह चीरने छैथ, अहारो तँ वहए ने देता।” तथा ओ रास्ता तखन साफ भऽ जाइत अछि जखन डोमनकेँ मोन पड़ैत छन्हि जे जहिना माटिक तरमे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ रहै छैक तहिना पुरैनक जड़िमे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैत अछि। अनासुरती मुहसँ निकललै- “बाप रे! बाबन बीघाक पोखैरमे तँ केते-ने-केते बिसाँढ़ हेतइ। ओकरे खुनैमे माछो भेटत।” एक पंथ दू काज। मनमे खुशी अबिते डोमन हाक पाड़ि अपन पत्नीकेँ कहलन्हि- “भगवान बड़ीटा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीव-जन्तुकेँ जन्म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।” श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक एहि ‘बिसाँढ़’ कथाकेँ लेखन-बिम्बपर ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षित ई-पत्रिकाक सम्पदाक, गजेन्द्र ठाकुरजीअपन ‘प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना’ (भाग-२) मे लिखलन्हि अछि- “१९४२-४३क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे ऐ अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइला (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओइमे नै भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाएल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा ऐपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ ऐ विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, तइ कारणसँ अमर्त्य सेन जकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओइ महाविभीषिकासँ ओत्ते प्रभावित नै भेल हेता। आ एतऽ जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लैए।” एहि कथाक प्रसंगमे समीक्षक शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ अपन पोथी- ‘अंशु’ नामक प्रबन्ध-निबन्धमे लिखने छथि- “बिसाँढ़ कथाक इतिश्री सुखारक मध्य एहेन फलक शोधक रूपमे कएल गेल जकरा विषयमे बहुत कम लोक सोचने हेताह।” बिसाँढ़ पुरनि (कमलफूल) गाछक जड़िक सीरमे फड़ैए। जकरा लोक खाइए। ओही बिसाँढ़केँ खा डोमन आ सुगिया रौदीसँ अपन त्राण पबैए। 3. ‘पीरारक फड़’, ई कथा ‘गामक जिनगी’क तेसर कथा थिक। एहि कथाकेँ लगभग 2064 शब्दमे कथाकार गढ़लन्हि अछि। अहू कथामे ओहन लोकक जिनगीकेँ कथाकार सोझमे अनलन्हि अछि जकरा देहक अलावा किछु ने छैक। पिचकुन आ धनिया दुनू परानी पीरारक फड़ आ अनेरूआ माछसँ अपन आर्थिक तंगीकेँ दूर करैत अछि आ जीवनमे सभ किछु जोड़बाक प्रयास सेहो करैत अछि। कथाकेँ पढ़लापर बुझना जाइत अछि जे वास्तवमे प्रकृति अनेको चीज ओहन मनुक्ख लेल उपलब्ध कराओने अछि जकरासँ पाबि मनुक्ख जीवन जीवि सकैए। मुदा मनुक्ख स्वयं ओहन-ओहन चीजसँ बिमुख अछि। एकटा पीरारक गाछक प्रति कथाकारक जे नजरि छन्हि आ ओकर जे वास्तविक रूप अपना एहिठाम छैक तकरा देखल जाए- “एतेक नमहर जिनगीमे ने कियो जड़िकेँ तामि-कोरि पानि देलक आ ने ठारिकेँ छकैड़-छुकैड़ गाछकेँ सुन्दर बनौलक। सोल्होअना देखभाल भगवानेक ऊपर। तँए पाँचो गाछ स्वाभिमानसँ भरल जे केकरो एहसान रूपी कर्ज जिनगीमे नै लेलौं। हरिदम पाँचो हँसैत-इठलाइत मन्द हवामे झूमैत...। पहिने पाँचो गाछक फूल फुला फड़ बनि झड़ि जाइत, पछाइत फड़ पूर्ण जिनगीक सुख भोगि अन्तिम अवस्थामे आबि पवन रूपी नौतहारीकेँ पठा चिड़ै-चुनमुनीकेँ बजा-बजा अपन शरीर दान करैत, यएह पाँचो गाछक जिनगी भरिक धरम रहल। ...ओइ गाछसँ हटिए कऽ लोक अपन खेतक जोत-कोर आदि करैत जे ओइ गाछपर सुगबा साँप रहैए। सुगबा साँप लोककेँ देखैमे अबिते ने छै किएक तँ ओ हरिअर-लत्ती जकाँ होइए। जेकरा कटलासँ स्वर्ग-नरकक द्वार अनेरे खुजि जाइ छइ। बीचमे केतौ कोनो रूकाबट नै होइए।” सम्पूर्ण कथाकेँ पढ़लापर स्वत: भान होइत अछि जे जौं मनुक्ख लगनसँ कार्य करय तँ सभ किछु सम्भव छैक। एहि कथाक पात्रसभ अछि- धनियाँ, पिचकुन, मुनेसरीआ सोमनी दादी। 4. ‘अनेरुआ बेटा’, 3369 शब्दक कथा अछि। गरीब गृहस्त परिवारक कथा थिक। लगभग पचास वर्षक सन्तानहीन गंगाराम एहि कथाक पात्र अछि। गंगाराम हाटसँ अबैकाल जखन एकटा जनमौटी अनेरूआ बच्चाकेँ सड़कक कातमे फेकल देखि कोरामे लऽ कऽ घर अबैत अछि आ घरवालीकेँ कहैत छैक- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि।” तँ अनायास दुनू परानीक बीच प्रसन्नताक माहौल बनि जाइत अछि। क्रमश: ओइ बच्चाकेँ अपन बेटा जकाँ पोसए-पालए लागल। ओहि बच्चाक नाओं ‘मंगल’ राखल जाइत अछि। आर्थिक विपन्नताक कारणे मंगल चाहक दोकान खोलि लैत अछि। दोकानदारीक संग मंगल अपन पढ़ाइ सेहो करैत अछि। अपन जीवनक अन्तिम समयमे गंगाराम अक्षरस: मंगलकेँ ओकर जन्मक सभ बात सुना देने रहैक। मंगल किताबक संग-संग समाजक बेबहारक अध्ययन सेहो करय लागल। पछाति मंगल एकटा उपन्यास लिखैत अछि, जकर शीर्षक अछि ‘मरल गाम’, जाहि सम्बन्धमे एक गोट पत्रकार मंगलक बात सुनैत छथि आ ओकरा छापि दैत छथिन। मंगल द्वारा लिखित ‘मरल गाम’क विषयमे सुनि सुनयना नामक एकटा पढ़ल-लिखल नायिका मंगल लग अबैत छथि आ मंगलक प्रतिभासँ प्रभावित भऽ अपन वकील पितासँ दलील दऽ मंगलसँ विवाह करय लेल पिताक सोझमे प्रस्ताव रखैत छथि। एहि कथामे कुल सात गोट पात्र अछि-1. गंगाराम, 2. भुलिया, 3. कबुतरी, 4. मंगल, 5. सम्पादक, 6. सुनयना, 7. ओकील साहैब। आशीष अनचिन्हार गजल ठोरक गिलास ठोरक शराब के राखत किछु ठोपक हिसाब अनधन लछमी हुनका हिस्सा हमरा हिस्सा गालक गुलाब उनटाबैए ओ चुप्पे चुप देहक पन्ना मोनक किताब सुंदर शब्द भेलै बेकार ओ अपने छथिन अपन जबाब अनचिन्हारक इयाद अबिते पूरा दुनियाँ लागै खराब सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल मनतरकपावर सभदिनजहिनाअपननिर्धारितसमयपरचाह-पानखेला-पीलापछाइतकाजकरएजाइछीतहिनाआइयोसबेरेसातबजेकोदारि-खुरपीनेनेखेतदिसविदाभेलौं। दरबज्जापरसँनिकैलतेमनमेमौसमकबदलैतमिजाजदेखरंग-रंगकविचारोआनवढंगसँकरैयोकउमकीउठिरहलछल।जेसोभाविकोअछिए।सोभाविकएनाअछिजेजँअहाँआमकसंगसेवरोपैछीतँआमरोपैकसंगउपजबैकढंगसेहोसीखएपड़त, तहिनासेवकवास्तेसेहोसेवकढंगसीखैयेपड़त...। मौसमकबदलैतमिजाजदेखअपनोमिजाजकेँबदलबजरूरीअछिए।दसलग्गाआरोआगूबढ़लौंकिआगूए-सँ–मानेदच्छिनसँ–लुटनभायअबैतरहैथआअपनेउत्तरसँदच्छिन-मुहेँजाइतरही।उत्तरे-दच्छिनेरस्ताअछि। लगअबितेलुटनभायपरसोल्होअनानजैरपड़ल।लुटनभाइकमुँहधुआँ-धुआँभेलरहैन।मुदाजखनसभदिनसँलुटनभाइकसंगहेमो-छेमआबजो-भुकीचलिआबिरहलअछितखनजँनइटोकितिऐनसेहोकेहेनहोएत! बजलौं- “लुटनभाय! भोरे-भोरकिमहर-किमहर?” ओना, लुटनभायकेँमनधुआँइककारणदोसरदिसकछेलैनतँएकिएओहमराजवाबदेबछोड़ितैथ।बजला- “कीकहबह, औझुकायात्राभोरे-भोरबिगैड़गेल!” लुटनभायएकबतरियेछैथमुदाहुनकरबेसीप्रतिष्ठागाममेरहनेहमहूँभाइयेकहैछिऐनआओहमराहराशंखेकहैछैथ। हराशंखकेँसमुद्रीशंखनहिबुझबओहमरनाओंछी।नामोओहनछीजेमाता-पिताकदेलअछि।आनो-आनसभहराशंखेकहैछैथ, किएनेकहता? जखनहमरनामेछी...। ओना, लुटनभायपूर्णमनतरियाछैथ, मुदासाँपकतँविशेषज्ञेछैथ।पूर्णमनतरियाकमानेभेल, साँपसँलऽकऽछुछुनैर, मूसबीच्छइत्यादिकीड़ी-फतिंगीककाटलवाचाटलकबीखमनतरसँउतारिदइछथिन।आमदनियोँनीकछैनआसमाजमेमान-प्रतिष्ठासेहोएतेकछैनजेबुढ़-बुढ़ानुससँलऽकऽअपनासँउमेरगरधरिकियो‘लुटनबौआ’, कियो‘लुटनबच्चा’कहैछैनआअपनासँछोट‘लुटनभैया’, ‘लुटनकाका’, ‘लुटनबाबा’सेहोकहितेछैन।तेतबेनहि, सोझमेपड़नेप्रणामो-पातीसभकरितेछैन।ईतँभेललुटनभाइकबातमुदाअपनातेहेननइअछि, तँएओबेसीप्रतिष्ठितछैथअपनेकमछी।कमकीछीजेनहियेँछी।ओना, तइलेमनकमियादिमेमिसियोभरिबेथ-बेथानहियेँअछि।अपनमिजाजअछि, अपनामिजाजेबुझैछीजेजेतेबेसीलोककप्रणाम-पातीहएततेतेबेसीअपनसमैयोगमाएत, जेतेअपनकाजकसमयगमाएततेतेक्षतियोअपनेहएत।अनेरेप्रणामे-पातीमेअधिकसमयचलिजाएत।तइसँनीकनेहएतजेओइसमयकेँसार्वजनिकबनाबहुजनहिताइमेलगादिऐ। लुटनभायबजलाजेभोरे-भोरजतराबिगैड़गेल।भोरोतँसबहकअपन-अपनअछि।जहिनामनुखकभोरभेल‘बालपन’, तहिनानेविचारकभोरभेल‘बालबोध’, करखानामेरातुकड्यूटीकेनिहारकएकपालीबलाकसाँझपड़ल, तँदोसरपालीमेकाजकेनिहारकभोरेनेभेल? मनओझराएलगलमुदातेकरासोझराजिज्ञासाकरैतबजलौं- “सेकीभायसाहैब?” ‘भायसाहैब’सुनिआकिमनकउत्सुकताबुझिलुटनभायकनीथकथकेला।मुदाचटसारपरहकलोकलुटनभायछथिए।तहूमेचटाइपरबैसचटियाअपनभविस-लेजैठामझखैएसेचटसारनहि, चाटीसँसाँपकबीखउतारनिहारकजेचटसारहोइतओइचटसारपरहकमनतरियाआकानमेडाकैनदइबलालोकछैथलुटनभाय। ओना, जखननिचेनमे–मानेजखनकोनोकाज-उदमनहिरहलतखन–दुनूगोरेएकठामहोइछीतँकहबोकरैछिऐनजे‘लुटनभाय, अहाँनवजुगकरहितोपुरानजुगकविचारसँचलिरहलछी, जेसमयानुकूलनइअछि, तँएएक-ने-एकदिनसमुद्रकफेनजकाँबुझियौआकिदूधकफेनजकाँअनेरेछनाकऽफेकाजाएब।’मुदालुटनभायहमराविचारपरकिएकानदेता।आमदनियोँछैनआनीकमानो-प्रतिष्ठाछैन्हे। भोरकसमयछेलैहेरातुकसुतलमनोउठियेचुकलछलमानेविचारोजगियेचुकलछल।मनएकाएककहलकजेएनाजेरामायणिकएकपाँतिपढ़िसम्पूर्णरामायणिकरामकथासुनादइछिऐतइसँकाजनहिचलत।विचारकेँजाधैरबेवहारिकरूपमेजाँचल-परिखलनहिजाइएताधैरओकाँच-कुच, सड़ल-गललसभनीकेरहैएमुदाजखनबेवहारककसौटीपरकसिओकराजाँचलजाइएतखनओपरेखमेअबैए।जखनओपरेखमेअबैएतखनपरखनिहारबुझैछैथजेईप्राण-पखेरुअछिआकिजीवनकजान-पखेरु..! मुदाऐलेलविचारकप्रगाढ़ताकजरूरतअछिए।ओना, तइमेअपनोअधकचड़ेछी, किएतँकेतौअधलाकेँअधलाबुझिबाजियोदइछी, मुदाकेतौ-केतौएहेननइहोइएजेअधलोकेँनीकनहिकहाजाइएसेहोकहाइयोजाइएआकराइयोजाइतेअछि। अधरतियेमेएकगोरेकेँसाँपकाटिलेलकैन।हुनकरसमांगदौड़लआबिलुटनभायकेँकहलकैन।जहिनामरीजवामरीजा, मानेरोगी, कहालीकेँदेखडॉक्टरअपनलक्ष्मीकआवाहनबुझैछैथतहिनालुटनभायसेहोबुझितेछैथ।दिनकपहिलकाजबुझूआकिचारिबजेभोरकपहिलकाजबुझिलुटनभायविदाभेला।ओना, विदाहोइसँपहिनेलुटनभायठोरपटपटा-पटपटाअपनदेहबन्हैबलामंत्रपढ़िदेहबान्हिलेलैनतखनविदाभेला। ओना, जिनकासाँपकटनेरहैनतिनकाऐठामलुटनभायपहुँचतेलटुआएलसँपकटिया-रोगीककानमेजोरसँडाकैनदेलखिनकिओहीकालओकरप्राणछुटिगेलइ...। अखनतकलुटनोभायहजारोठामबाजिचुकलछलाजेकेहनोजुआएल-सँ-जुआएलमानेविषधर-सँ-विषधरसाँपकिएनेकटनेरहौ, मुदाजँओइठामपएरदऽदेबतँकालकेँकेकहएजेमहाकालोजँआएलरहततँओकराबिनाभगनेकोनोउपायनहिछइ...। सुरसाजकाँअपनरूपलुटनभायबनौनहिछैथ।ओना, साँपकटलाहामरैनहिअछिसेहोबातनहियेँअछि।विषजखनसौंसेशरीरमेनिजाजाइछैतखनरक्तकसंचालनबन्नभेनेमरितेअछि।मुदातेकरालुटनभायविधिकविधानबनाटारिकऽअपनजानबँचालइछैथ...। बड़ीकालकबादलुटनभायमुँहखोलिबजला- “हराशंख, मनकबातकेकराकहब।तूँतँलंगोटियासंगीछिअतँएकहैमेकोनोसंकोचनहि।” लुटनभाइकमुँहकबात‘लंगोटियासंगी’सुनिमनतड़कल।तड़कलईजेलंगोटियोसंगीतँएक्केरंगकनहिहोइए।ओहोतँअनेकोरंगकअछि।एकभेलजेछोट-छोटबबाजीसभजकाँधरियाकहियौआकिलंगोटा-कोंपीनपहीरिएकठामरहिखेलेबो-धुपेबोकरैएआखेबो-पीबोकरैए।मुदाहमरासंगलुटनभाइकएहेनसम्बन्धतँनहियेँअछि।तखनतँभेलजेकोनोकाजकरैलेअखड़ाहाबनाओइपरकच्छी, जंघियावालंगोटाबान्हिउतरलौं, सेहोतँनहियेँअछि! तखनकेनाहमहुनकरलंगोटियासंगीभेलिऐन? खाएरजेबजलासेअपनामुहेँबजला, अपनेबेसी-सँ-बेसीएतबेनेकऽसकैछी, जेहुनकरमुँहकबातअपनामुहेँनहिबाजब।बजलौं- “लुटनभाय, मनकबातमेजेमैलबुझिपड़ैएओकराजेतेजल्दीहुअएनिकालिकऽदोसरककानतकपहुँचाअपनसफाइकऽली।” हमराविचारसँजेनालुटनभायकेँसहभेटलैनतहिनाबजला- “हराशंख! तोहींकहऽजेहमकेकरोप्राणविधातासँछीनकऽआनिदऽसकैछिऐ? भाय! विषैलासाँपकटलकै, मरल! तइमेहमरकोनदोख?” नटखलीफाजकाँलुटनभायपेतरातँखूबभरिरहलछलामुदाजड़िदिसबढ़ियेनेरहलछला।बिटियबैतबजलौं- “लुटनभाय, अहाँसमाजमेकहियाअनर्गलआकिअनुचितकाजकेलौंजेमुँहचुरुहएब।” जेनाहमरेहाथमेसौंसेगामकलोकोआलोककविचारोहुअएतहिनालुटनभायबुझलैन।बजला- “कहऽजेईउचितभेलजेउमकलालसभसमांगकोनोदशाबाँकीनइरखलक!” लुटनभाइकविचारभाँजपरफेरनहिचढ़ल।कोनोदशाककीमाने? वैचारिककहाकहीआकिकोनोवस्तुजात-लेगारि-गरौवैलिकसंग-संगमारियो-पीट? अदहेजीबेबजलौं- “सेकीभायसाहैब?” सत्सँभेँटभेलापछाइतमानेसत्यकेँसत्बुझलापछाइतबुझनिहारजहिनाअपनोबुझएलगैएजेकीगलतीभेल, तहिनालुटनभायकेँसेहोभेलैन।ओना, अखनतकलुटनभायऊपरे-घारेछलाजेसभसाँपकबीखएक्केरंगहोइए, जेमनतरसँउतैरजाइए।ईनहिबुझैछलाजेहजारोकिस्मकसाँपमेकिछुएहेनसाँपअछिजेकराबीख्होइतेनेछैमानेओमात्रसाँपकआकारमेअछिआबेंगसभबिछ-बिछखाइए, तँएकिओहनसाँपनहिअछिजेकरबीखहेटकरबअखनोधरिमेडिकलोसाइंसकपहुँचसँबाहरअछि। एक-दूसँसाएधरिजहिनाअंककगिनतीअछि, जइमेमहतककमी-बेसीहोइतेअछितहिनासाँपोकबीखकतँअछिएजेकोनोमेबीखकमात्राअछियेनहि, कोनोमेथोड़-थाड़अछितँकोनोमेथोड़-बहुत।तहिनाकोनोमेबहुतअछितँकोनोमेबहुत-बहुत।खाएरजेअछिओसपहरियासबहकलेलअछितइसँहमराकोनमतलब..! जखनकोनोअपराधीकेँन्यायालयअपराधानुकूलसजादइए, तखनओअपराधीस्वयंबुझएलगैएजेहमरकेहेनअपराधछल, तहिनालुटनभायसेहोअपनजिनगीकअराधलवृत्तिकपरिणाम, गारि-फज्झैतसुनलापछाइतनीकजकाँबुझएलगलछैथ।मुदातैयोगैंचीमाछजकाँगैंचियाइतबजला- “हराशंख, तोहींकहऽजेबारहबजेरातिमेजखनसभआरामसँसुतलरहैएतखनोजँकेकरोसाँपकाटैएतँदौड़लआबिकहैएजेकाकाआकिबाबाआकिभइये, ‘हमरासमांगकेँसाँपकाटिलेलक, सेकनीचलूनइतँओमरिजाएत।’तैठामजँओकरजानबँचबएजाइछीसेअधलाभेल?” ओना, लुटनभाइकविचारदमगरजरूरबुझिपड़लमुदाएहेन-एहेनचलैनिकचलैनकेनाभेल, तइदिसजखननजैरउठबैछीतँबुझिपड़ैएजेपूर्वकलोकजहिनाजीवनसँपछुआएलछलातहिनाजीवनकबेवहारसँसेहोछेलाहे, तँएएहेन-एहेनबेवहारसोभाविकअछिए। बजलौं- “लुटनभाय, दुनियाँकलोकबहुतआगूबढ़िगेलअछि।अपनेछातीपरहाथरखिबाजूजेअहाँकमनतरसँबीखउतरैततँकियो-कियोमरिकिएजाइए?” हमरबातसुनिलुटनभायसहमला, मुदाजिनगीकखेलतँबहुतआगूधरिबढ़िचुकलछेलैन, जइसँअपनजीवनकसंगजीवन-जापनकआमदनी, मानेआर्थिक, प्रतिष्ठाकसंगसमाजिकप्रतिष्ठाजेअखनधरिबनिचुकलछेलैन, तैसंगअपनमान-सम्मानसभकिछुअपनाआँखिकसोझमेभँसियाइतदेखरहलछैथ।जइसँकण्ठकस्वरमेफटलबसुलीजकाँअवाजमेघड़घड़ीआबिगेलछेलैन।ओहीघड़घड़ाएलस्वरमेलुटनभायबजला- “आबकीउपायअछि?” लुटनभाइकनि:वलस्वरसुनिमनपसीजगेल।बजलौं- “लुटनभाय! खालीअहींटानहि, दुनियाँकभौकमेसभपड़िगेलअछि।जइसँसभअपनेबेथेकुहैर-कानिरहलछैथ।” अपनासंगआनो-आनकेँदेखलुटनभाइकमनकहोशजेनाएलैनतहिनाबजला- “सेकेनाहराशंख?” बजलौं- “लुटनभाय, ओहनोजुग-जमानाछेलैहेजइमेअहाँसन-सनवृत्तिकारकेँमानो-प्रतिष्ठाछलआसमाजिकप्रतिष्ठितजीवनोछेलैन।मुदाआजुकपरिवेशमेजखनबिसवासूइलाज (चिकित्सा) भऽरहलअछि, तखनकानपकैड़सप्पतखालिअजेआबएहेनवृत्तिकभीरनइजाएब।” पचासबर्खकजिनगीकमौजलुटनभायअहीसमाजमेभोगिचुकलछैथ, तँएपैछलाभरछलजीहकेँदागबओत्तेअसानोतँनहियेँअछि...। लुटनभायबजला- “लोकसभजेदरबज्जापरआबिहल्लाकरतजेकनीचलिकऽदेखियौतखनकीकरब?” कहलयैन- “जेकियोकहऽआबैथहुनकाकहबैन, ‘हमरमनतरकपावरबोल्टकनटेजकाँढीलभऽगेल।” शब्दसंख्या : 1598, तिथि : 17 जून 2019 Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०१९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2019 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA
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