विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २९१ म अंक ०१ फरबरी २०२० (वर्ष १३ मास १४६ अंक २९१) 'विदेह' २९१ म अंक ०१ फरबरी २०२० (वर्ष १३ मास १४६ अंक २९१) ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- जगदीश प्रसाद मण्डलक दर्जन भरि कथाक सामान्य परिचय ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- पसेनाकमोल प्रदीप पुष्प गजल- १ लोक मरैत रहतै तंत्र चलैत रहतै तोप हँसैत रहतै पेन कनैत रहतै भात सधैत रहतै बात बढ़ैत रहतै पेट घटैत रहतै धोधि बढ़ैत रहतै बान्ह बनैत रहतै बाढ़ि अबैत रहतै भूत गबैत रहतै धैम नचैत रहतै (2112122सभ पाँतिमे) गजल- २ स्नेहक सम्मान माए छै दैबक वरदान माए छै छै डूबल जोतमे दुनियॉं सय सय दिनमान माए छै कोनो पूजा कथी लेल पहिलुक भगवान माए छै जे हेरत बाट जगले ओ सबहक अनुमान माए छै जितिया छठि दशहरा संगे माहे रमजान माए छै जे हम्मर पेट भरलक ओ भूखल खरिहान माए छै (22221222सभ पाँतिमे।तेसर शेरक अन्तिम लघु दीर्घ मानल अछि) उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक दर्जन भरि कथाक सामान्य परिचय श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी प्रस्तुत विधामे बहुत रचना कयने छथि। हिनक कथा लेखनक संसार बेस व्यापक छन्हि। एहिठाम हम दर्जन भरि कथाकेँ अध्यायन कय ओकर सामान्य परिचय, सामान्य अर्थ प्रस्तुत कय रहलहुँ अछि- 1. ‘डीहक बटबारा’,श्रीकान्तआ मुकुन्द दुनू व्यक्ति एकहि परिवारक छथि। पितियौत भैयारी। दुनू व्यक्ति पढ़ि-लिखि कऽ इंजीनियर बनि गामसँ बाहर रहैत छलाह। गाम प्राय: छुटिये गेल छलन्हि। आबजखन अवकाश प्राप्त कएलनि आजीवनक बीचरंग-रंगक समस्या सभ आबए लगलन्हि, अर्थात् शहरी जीवनक मध्य समस्या आदिसँ भेँट हुअ लगलन्हि कि दुनू व्यक्तिकेँ गामक जिनगी आकर्षित केलकन्हि। गाम आबि पहिल कार्य घर बनाएबकेँ आरम्भ करैत छथि जाहिमे अपन-अपन सुविधायुक्त बुद्धिक नीक-जकाँ जहिना इस्तेमाल सभ दिन करैत रहथि तहिना करय लगलाह। पाँच कट्ठाक घराड़ी छन्हि जे बटबारा नहि भेल छल। वएह बटबाराक क्रममे गामक अमीन आ छह-पाँच करएबला लोकक संग फराक-फराक ढंगसँ दुनू इंजीनियर साहैब चाहैत छथि जे हमरा तीन कट्ठा हुअए तँ हमरा तीन कट्ठा हुअए। एही तरहेँ कथा आगू बढ़ैत अछि। गामहुँमे अनेको तरहक लोक छथिए। किछु लोक हिनका सबहक किरदानीसँ छुब्ध भऽ, किछु करय ताहिसँ हमरा कोन मतलबक विचारसँ खाली पश्चाताप कएलक आ किछु लोक ओहनो तँ अछिए किने जे ठककेँ ठकब अपराध नहि मानैए। माने, ओहन लोक अपन-अपन हाथ सुतारए लगल। आ जतयसँ अपराध बोध हुअ लगलैक कि गुरुकाका लग जा कऽ राय-विचार करैत अछि। गुरुकाका- “देखहक, गामक पढ़ल-लिखल वा बिनु पढ़ल-लिखल लोक, पेट भरै दुआरे नोकरी करैले बाहर जाइ छैथ, नीक बात। मुदा गामकेँ सोलहन्नी नै छोड़ि दैथ। अखन देखै छी जे अमेरिका, इंग्लैडसँ लोक तीन दिनमे गाम आबि सकै छैथ। तँए सालमे कम-सँ-कम एक्को बेर, नहि तँ हुनको गाम छिऐन, केतेको बेर आबि सकै छैथ। जइसँ गामक लोक आ खेत-पथारक संग सम्बन्ध बनल रहतैन। मुदा से नै कऽ गामकेँ सोलहन्नी छोड़ि, अनतहि घर बना रहए लगै छैथ, ओ गामक दुर्भाग्य छी। जेकर फल होइए गामक ज्ञान निर्यात भऽ जाइए। जइसँ सुतल गाम सुतले रहि जाइए। संगे गामक बेवहार, कला-संस्कृति सभ टुटि जाइए। रिटायर केला पछाइत वा जिनगीक अन्तिम अवस्थामे, जँ कियो गाम आबि रहए चाहता तँ हुनका गाम केहेन लगतैन। डेग-डेगपर टक्कर आ बात-बातमे विवाद हेबे करतैन। ..दोसर बात सुनह, अपना गाममे वैदिकजी भेल छैथ। जिनके पोता शुभकान्त छिऐन। वेदक प्रकाण्ड विद्वान वैदिकजी। नाओं तँ छेलैन गंगाधर मुदा वैदिकजी नाओंसँ विख्यात भेला। अपनो राज्यमे आ आनो-आनो राज्यमे जहन पण्डितक बीच शास्त्रार्थ होइ तँ हुनकर जवाब देनिहार कियो ने ठहरैत। अनेको तगमा आ प्रशस्ति पत्र भेटलैन। अखनो परोपट्टाक लोक हुनके नाओंपर अपना गामक नाओं ‘वैदिकजीक गाम’ बुझैए। हुनके चलौल अपना गामक पानि छी। पहिने पानिक छुआ-छूत अपनो गाममे छल, मुदा ओ सभकेँ बैसार करा कऽ बुझा देलखिन जे दुनियाँमे जेते मनुख अछि, सभ मनुख छी, तँए मनुख-मनुखक बीच छुआ-छूत नै हेबा चाही। थोपड़ी बजा सभ हुनकर विचारक समर्थन कऽ देलक। ओइ दिनसँ पानिक छुआ-छूत गामसँ मेटा गेल। तहिना दोसर भेल जोगिनदर, भिखारी दासक पक्का चेला। अजीब कला हुनकोमे छेलैन। जहिना नचैमे अगिया-बेताल, तहिना गीत गबैमे। जे पार्ट लऽ कऽ स्टेजपर अबैत, धऽ कऽ झहरा दइत। एहेन बिपटा अखन धरि कोनो नाचमे नइ देखलिऐ। ओकरे परसादे गाममे भिखारी दासक नाच केतेको बेर भेल। जहन भिखारी दासक पार्टी छपरासँ पूब-मुहेँ असाम, बंगाल, नेपाल विदा होइ तँ अपने गाममे रूकइ। खाली खेनाइ आ इजोतक खर्च गौंआँक होइ। तहिना जब तीन-चारि मासमे घुमै तँ फेर अँटकै। तहिना भेल महावीर। वेचारा बड़ गरीब छल। नोकरी करैले कलकत्ता गेल। मुदा नोकरी नै कऽ रिक्सा चलबए लगल। अजीब संस्कार ओकरोमे छेलइ। रिक्शो चलबै आ गीतो-कविता बनबै। पहिने तँ लिखल-पढ़ल नै होइ, मुदा अ-आसँ सीखब शुरू केलक। किछुए दिनक पछाइत लिखबो आ पढ़बो सीखि लेलक। रिक्सापर जहन चलै तँ अपन बनौल गीत गाबए। एक दिन एकटा साहित्य प्रेमी रिक्सापर चढ़ल रहैथ आ महावीर रिक्शो चलबै आ गीतो गबइ। उतरै काल कवि पुछि देलखिन। सभ बात महावीर कहलकैन। ओ एकटा कवि गोष्ठीमे आमंत्रित कऽ देलखिन। ओइ गोष्ठीमे पहुँच महावीर तीनटा कविता आ दूटा गीत गौलक। तइ दिनसँ ओ कवि गोष्ठीमे आमंत्रित हुअ लगल। बंगाल सरकार दस हजारक पुरस्कार आ प्रशस्तिपत्रसँ सम्मानित केलकैन। तहिना भेल कारी खलीफा। जेकरा इलाकाक लोक खलीफा मानैत। बड़का-बड़का दंगलमे पहुँच ओ आन-आन जिलाक केतेको खलीफाकेँ पटकलक। ओकरा चलैत गाममे कियो केकरो बहु-बेटीकेँ खराब नजैरसँ नै देखैत। एक बेर एकटा घटना जमीनदारक सिपाहीक संग घटलै। एक साए लाठी सिपाहीकेँ समाजक बीचमे मारलकै। तही दिन जमीनदार दू बीघा खेत ओहिना दऽ देलकै। एहेन-एहेन पण्डित, कलाकारक बनौल गाम छी, तेकरा हम सभ अपना जीबैत केना दुइर कऽ देबइ। आइ जँ गाम दुइर हएत तँ ऐगला पीढ़ी केकरा गारि पढ़तै। तँए जँ दुनू गोरे मनुख बनि गाममे रहए चाहता तँ बड़बढ़ियाँ, नहि तँ गाममे रहने कियो समाज तँ नहि बनि जाइत।” अमानत भेल। कोनो बेसी झमेल रहबे नहि करैक। पाँच कट्ठाकेँ दू भाग करब। बँटवारा कय रामचन्द्र अमीन बजलाह- “जिनका संदेह हुअए ओ चाहे कड़ीसँ वा फीतासँ वा लग्गीसँ आकि डेगसँ भजारि लिअ।” 4789 शब्दक एहि कथामे आठ गोट पात्रआएल अछि, यथा- 1. श्रीकान्त, 2. मुकुन्द, 3. बुचाइ, 4. रामचन्द्र, 5. खुशीलाल, 6. किसुनदेव, 7. सरूप, 8. गुरु काका। डॉ योगानन्द झा प्रस्तुत कथाक सन्दर्भमे लिखने छथि- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक ‘डीहक बॅटबारा’, कथामेभ्रष्टाचार पूर्वक धन अर्जन कएनिहार समाजक अधोगतिक चित्रांकन करैछ।” 2. ‘भैयारी’, कथामे कथाकार ओहन लोकक चर्च कयने छथि जे परिवारक महत्वकेँ तँ नहियेँ बुझि पौलक जे गामो आ समाजहुसँ दूर भऽ मात्र धन अर्जनकेँ जिनगी बुझि ओहि पाछू लागि जाइत छथि। प्रस्तुत कथाक पात्र कुसुमलाल सेहो यएह कएलक। बी.ए. पास कए मधुबनी कोर्टमे किरानीक नोकरी शुरू कएलक। कोर्टक बड़ाबाबूक बेटीसँ विवाह भेलैक। मधुबनीए मे डेरा लऽ दुनू व्यक्ति रहए लागल। किछु दिनक पछाति नीक कमाइ हुअ लगलैक। धीरे-धीरे शहरी वसातमे कुसुमलाल उधियाए लागल। शराब पीबैक लत सेहो पकड़ि लेलकैक। विचार कएलक जे गाममे जे अपन सम्पतिक हिस्सा अछि ओ बेचि मधुबनीए आनि ली। सएह कएलक। किछु दिनक पछाति कुसुमलाल बीमार पड़ि जाइत अछि। तखन परिवार आ समाजक महत्वकेँ बुझैत अछि मुदा ताबत बहुत समय ससरि गेल रहैक। मनुक्खक जिनगीए कतेकटा होइए। एहि कथाक प्रसंगमे कैलाश कुमार मिश्र लिखने छथि ओ निम्नांकित अछि- “भैयारी कथा शहरी जीवनक चकाचौंधसँ लोककेँ सावधान करैत अछि। जे ऐ बातकेँ नहि बुझैत छथि आ अपन परम्परा आ संस्कारकेँ नै ध्यान मे राखि गामक जमीन जत्था बेचि, गामक जड़ि के समाप्त कए जे शहरमे बैस जाइत अछि तकर परिणाम नीक नै होइत अछि।” एहि कथाकेँ बुनबामे कथाकारकेँ चारि हजार छब्बीस गोट शब्द तथा पाँच गोट पात्र, यथा- 1. दीनानाथ, 2. रामखेलौन, 3. सुमित्रा, 4. कुसुमलाल, 5.ऑफिसक एकटा स्टाफ, केर संचयन करय पड़लन्हि। 3. ‘बहिन’,कथाकेँ ‘राधेश्याम’,‘रागिणी’,‘मामा’,‘सुनीता’,‘रीता’,‘डॉक्टर सुधीर’,‘उमाकान्त’, डॉक्टर सुनिता’,‘शबाना’,‘रेहना’ तथा सरोजनी नामक पात्रक माध्यमसँ कथाकार बेस मनोयोगसँ 2688 शब्दमे लिखने छथि। एहि कथाक सन्दर्भमे डॉ. योगानन्द झा समीक्षामे कहने छथि- “बहीन, कथामे सरोजनी नामक वृद्धाक कथा अछि जनिक मृत्युक अवसरपर बजाओलो उत्तर हुनक पुत्री रीता हुनक अन्तिम दर्शनक हेतु नहि अबैत छथि आ व्यस्त होएबाक लाथ लगा दैत छथि जखन कि परजातिक मुसलमानि बहिना शबाना हुनका देखबाक हेतु अबैत छथिन। राधेश्यामक एहि चिन्तनमे सम्बन्ध-बन्धक वास्तविकताकेँ उद्घाटित करैत कहल गेल अछि- ‘दुनियाँमे बहिनक कमी नै अछि। लोक अनेरे अप्पन आ बीरान बुझैए। ई सभ मनक खेल छिऐ। हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैमे जे संग रहए, वएह अप्पन।” माता-पिताक प्रति धियापुताक कुभेलाक संगहि एहि कथामे मानवतावादक प्रतिपादन मण्डलजीक लक्ष्य बुझना जाइत अछि। उच्च शिक्षा प्राप्त वर्गमे सम्प्रति विदेश गमनक लिलसा प्रबल देखल जाइत अछि। एहि प्रवृत्तिक कारणे ओ लोकनि स्वदेश सेवासँ तँ वंचित रहिये जाइत अछि, अपनो जीवनक परिवेश संकुचित बना लैत छथि।” क्रमश: डॉ कैलाश कुमार मिश्र- “बहीन कथाक माध्यमसँ मण्डलजी कहए चाहैत छथि जे केबल माइयक कोरासँ जन्म लेने बहिन या भाए नै भऽ सकैत अछि। एक दिसि जतऽ अपन बेटी अपना कार्यमे अतेक लीन अछि जे मरनासन्न माएकेँ देखबाले समए नै निकालि पाबि रहल अछि ओतहि दोसरठाम माइयक एक मुसलमान सखी हल्ला-फंसाद रहितहुँ रातिमे चोरा कऽ बहिनाकेँ देखए अबैत अछि। ई कथा हिन्दु-मुसलमानक संग आपसी प्रेमक गंगा-जमुनी प्रवाह कहल जा सकैत अछि। मैथिलीमे ऐ तरहक कथाक रचना हेवाक चाही।” 4. ‘घरदेखिया’,कथा चारि हजार एक्कैस (4021) शब्दक ऑंट-पेटबला कथा थिक, जकरा कथाकार ओहन पात्रक माध्यमसँ लिखलन्हि अछि जकरा कियो ने छैक। लुखिया, जे एक मसोमात छथि। एहि कथामे ‘लुखिया’क अलाबे ‘नागेसर’,‘भुरकुरिया’,‘पीहुआ, पुहुपलाल’,‘डोमन’ आ ‘बुचन’ नामक पात्र आएल अछि। कथाक सन्दर्भमे डॉ. योगानन्द झा लिखलन्हि अछि- “दहेजक सामाजिक समस्याक उन्मूलनक दृष्टिएँ ‘घरदेखिया’ कथा अत्यन्त हृदयस्पर्शी अछि। मिथिलाक उच्चवर्गीय समाजमे धनलोलुपताक कारणे उत्पन्न एहि समस्याक कुफल नारी प्रताड़नाक अतिरेकक रूपमे अत्यन्त गर्हित स्थिति प्राप्त कयने अछि जकर कारणे कन्याक विवाह एकटा पैघ समस्या बनल रहल अछि आ एकर कोनो ठोस समाधान अद्यावधि समक्ष नहि आबि सकल अछि। मण्डलजी एहि समस्याक समाधान लोकजीवनक वैचारिक परिवर्त्तनकेँ मानैत छथि आ सर्वहारा वर्गक अतिशय दीन पात्र लुखियासँ कहबैत छथि- “नै। हम ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।” लुखियाक एही वाक्यमे दहेज समस्याक प्रति समाधानक दिशा-बोध होइत अछि।” 5. ‘पछताबा’, कथा भारतीय आजादीक लड़ाइमे योगदान देबयबला, गोली खेलहा परिवारक व्यक्ति शिवनाथक थिक। ओ समय छल। आब शिवनाथक पुत्र- ‘रघुनाथ’ पढ़ि-लिखि कऽ इंजीनियर बनि अमेरिका चलि जाइत अछि। सासुर पक्षसँ एहि तरहक निर्णय लेल प्रोत्साहन भेटैत छैक। बेटाकेँ अपन देश छोड़ि आन देश जएबाक निर्णयसँ शिवनाथकेँ दुख होइत छन्हि। पुछैत छथिन- “किए?तोरा-जोकर काज अपना ऐठाम नइ छइ?” मुदा रघुनाथ किछु ने बाजल आ ने अपना निर्णयमे संशोधन कएलक। उच्च शिक्षा प्राप्त रघुनाथक निर्णयकेँ पिता शिवनाथ स्वीकार करैत चुप रहि गेलाह। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र एहि कथाक समीक्षा करैत कहलन्हि अछि- “पछताबा एक एहेन कथा थीक जकरा माध्यमसँ ई कहक प्रयास कएल गेल अछि जे आधुनिक आ तकनीकि शिक्षा प्राप्त कए लोक बाहर भागि जाइत अछि। बाहर जाए जीवन मशीन भऽ जाइत छैक। रघुनाथ किछु एहने कार्य केलन्हि। चलि गेलाह अमेरिका। मुदा अन्तमे अपन गलतीक अनुभव भेलन्हि आ अपने-आपकेँ बोनिहार-मजदुरसँ निषिह मानए लेल तैय्यार भेलाह- “हमरासँ सइयो गुना ओ नीक छथि जे अपना माथापर घैल उठा मातृभूमिक फुलवाड़ीक फूलक गाछ सींचि रहल अछि। अपन माए-बाप समाजक संग जिनगी बिता रहल छथि। आइ जे दुनियाँक रूप-रेखा बनि गेल अछि ओ किछु गनल-गूथल लोकक बनि गेल अछि। जिनगीक अन्तिम पड़ावमे पहुँचि आइ बुझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्हैक बुद्धि भेल आ ने गाम समाजकेँ।” एहि कथाकेँ 2663 शब्दमे लिखल गेल अछि। जाहिमे कथाकार मात्र तीन गोट पात्रकेँ माध्यम बनौलन्हि, यथा- 1. रघुनाथ, 2. शिवनाथ, 3. रुक्मिणी। 6. ‘डॉक्टर हेमन्त’, एहि कथामे बाढ़िक चपेटमे जनमानसक राँइ-बाँइ होइत परिवार, जिनगी आ जिनगीक संघर्षक परिचय कराओल गेल अछि। संगहि समयपर ओहन लोककेँ मात्र एकटा चिकित्साक सुविधा उपलब्ध कराओने केहन खुशी होइत छैक तकर प्रमाण उपलब्ध करबैत कथाकार गाम-समाजक योगदानकेँ सेहो देखबैत छथि। व्यवहारिक रूपकेँ प्रस्तुत करैत देखा देलन्हि अछि जे एक्कोरती सहयोग भेटने कोना ओहनो परिस्थितिमे, बाढ़िमे अपन बिलटल परिवारकेँ बिसरि लोक समाजक सेवामे लोक तन-मनसँ लागि जाइत अछि। सुलोचनाक परिवार बाढ़िमे दहा गेल, तथापि सुलोचना डॉक्टर साहैबक संग आपदागस्त रोगीक सेवामे लागि जाइत अछि। संगहि एकटा डॉक्टरकेँ अपन कार्यक प्रति वास्तविक रूखिक वर्णन सेहो करैत अछि जाहिमे हुनक असुविधाकेँ सेहो सोझा आनल गेल अछि। कथाकेँ समीक्षा करैत डॉ. कैलाश कुमार मिश्र, प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना (विदेह-सदेह- 10)मे लिखने छथि- “डॉ. हेमन्त प्रतिनिधित्व करैत छथि ओइ तमाम डाक्टर समुदायकेँ जे अपन विधाकेँ मर्यादा बिसरि शहरी जीवन जीबैत अछि, पैसा कमाइत अछि, गाम-घर किंवा दुर्गम स्थानमे जेनाइ, जहल जेनाइ किंवा कालापानीक सजा बुझैत अछि। जखन डॉ. हेमन्त कोसिकन्हामे बसल बाढ़िसँ प्रभावित गाम जाइत छथि तँ एक बारह वर्षक किशोरी सुलोचनाक व्यवहार आ गामक लोकक सिनेह पाबि ओ कृत-कृत भऽ जाइत छथि। अभावक सिनेह कतेक रमनगर आ सुअदगर भऽ सकैत अछि। सुलोचनाक मुँहसँ गाम आ शहरी जीवनक तुलना मिरचाइ आ चीनीक कीड़ासँ कए लेखक कहानीमे नव बिम्वक रचना करैमे सफल होइत छथि। कथामे सुलोचना डॉ. हेमन्तकेँ कहैत छन्हि- “हम तँ बच्चा छी डॉक्टर सहाएब तेँ बहुत नै बुझै छी। मुदा तइयो एकटा बात कहै छी। जहिना चीनी मीठ होइत अछि आ मिरचाइ कड़ू। दुनूमे कीड़ा फड़ै छै आ ओइमे जीवन-यापन करैत अछि। मुदा चीनीक कीड़ीकेँ जँ मिरचाइमे दऽ देल जाइए तँ एको क्षण नै जीबित रहल। उचितो भेलै। मुदा की मिरचाइक कीड़ाकेँ चीनीमे देलाक बाद जीबित रहत? एकदम नहि रहत। तहिना गाम आ बाजारक जिनगी होइत।” कथाकार एहि ‘डॉक्टर हेमन्त’ कथाकेँ कुल छह गोट पात्र, यथा- 1. डॉक्टर हेमन्त, 2. कम्पाउण्डर, 3. रिक्साबला, 4. नैया, 5. सुलोचना, 6 जीयालाल केर माध्यमसँ लिखलन्हि अछि। जाहिमे 4407 शब्दक संचयनक खगता पड़लन्हि। 7. ‘बाबी’, एहि कथा केर पाठसँ स्पष्ट होइछ जे कथाकार हिन्दू-मुस्लिम सरोकारकेँ छठि पावनिक ऐतिहासिक आधारकेँ उजागर करैत एकटा ठोस प्रमाण उपस्थित कएलनि अछि। एहि कथाक समीक्षामे डॉ. कैलाश मिश्रजी लिखलन्हि अछि- “बाबी कथाक माध्यमसँ लेखक एक एहेन सामाजिक महिलासँ परिचए करबैत छथि जे ओना तँ अपन नाओं लिखऽ नै जनैत छथि परन्तु व्यवहार आ बुद्धिसँ समस्त गाममे पूज्या थीकी। गामक लोक कुनो कार्य हुनका पुछने बिना नै करैत अछि। बाबी सबहक लेल छथि आ सभ बाबी लेल तत्पर। कथाक प्रारम्भमे एकटा उपमा खाँटी देसी आ औरिजनल लगैत अछि। कातिक मासक वर्णन करैत बाबी कहैत छथि जे ई एहेन मास थिक जैमे लुंगिया मिरचाइक घौंदा जकाँ पावनिक घौंदा अछि। एहेन उपमा हमरा अन्यत्र नै भेटल अछि। अही कथामे “पथियामे दूटा नारियल, पान छीमी केरा, दूटा टाभ नेबो, दूटा दारीम, दूटा ओल, दूटा अड़ुआ, दूटा टौकुना, दूटा सजमनि, एक मुट्ठी गाछ लागल हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक माए आंगन पहुँचि बाबीक आगूमे रखि बाजलि- बाबी अपनो डालीले आ हिनको-ले नेने एलिएनि हेँ।” ई कथा हिन्दु-मुसलमानक बीच प्रेम आ सांस्कृतिक एकताक कड़ी थीक। अपन बेटा रहमत जे कि बच्चामे बीमार भऽ गेलैक आ बाबी ओकरो लेल छठि मइयासँ कबुला कऽ देलथिन्ह, तँए ओकर माए बाबीक माध्यमसँ पाँच वर्ष धरि निष्ठाक संग छठि मनबैत अछि। ओहिना उपास, सभ चीजक पालन, छठिक प्रति आस्था। बाबी जखन खरनाक खीरक प्रसाद रहमतक माएकेँ दैत छथिन्ह तँ ओ खुशीसँ नाचि उठैत अछि। छठि मइयाकेँ गोर लगैत छन्हि आ बेटाकेँ निरोग जिनगी जीबैक आशा सेहो लगा लैत अछि।” कथाकेँ 2167 शब्दमे ‘बाबी, ‘सिरखरियावाली’, ‘रहमतक माए’ आ सोनरेवाली नामक पात्रक बीच कथाकार लिखलन्हि अछि। 8. ‘कामिनी’,कथामे कथाकार ओहन चित्र प्रस्तुत केलाह अछि जाहिमे लालबाबू सन लोकक किरदानी स्पष्ट भेल अछि। लालबाबू एहि कथाक एक पात्रक नाओं अछि जे नारीकेँ नारी नहि बुझि माने मनुक्ख नहि बुझि मनोरंजनक साधन बुझैत छथि। आ भैयाकाका सन लोक ओहन मनुक्खकेँ चिह्नित नहि कए पबैत छथि जाहिसँ भयानक परिणामक कामिनीकेँ भोगय पड़ैत छन्हि। भैयाकाकाकेँ अपन बेटी- कामिनी केर विवाह पाँच लाख रूपैआ खर्च कएलाक उपरान्तो बुझि पड़ैत छन्हि जे हम अपन बेटी-संग कंजुसाइ कएलौं हेँ। भैयाकाका अपना मुहेँ स्वीकार करैत छथि- “हमरा दस बीघा खेत अछि। तेकर बादो केते रंगक सम्पैत अछि। गाछ-बाँस, घर-दुआर, माल-जाल इत्यादि। मुदा ऐ सभकेँ छोड़ि दइ छी। खाली खेतेक हिसाब करै छी। अपना गाममे दस हजार रूपैए कट्ठासँ लऽ कऽ साठि हजार रूपैए कट्ठाक जमीन अछि। ओना, सहरगंजा जोड़बै तँ पैंतीस हजार रूपैए कट्ठा भेल। मुदा हम्मर एक्कोटा खेत ओहेन नै अछि जेकर दाम चालीस हजार रूपैए कट्ठासँ कम अछि। बेसियोक अछि। मुदा चालिसे हजारक हिसाबसँ जोड़ै छी तँ आठ लाख रूपैए बीघा भेल। दस बीघाक दाम अस्सी लाख भेल। तीन भाए-बहिन अछि। हमरा लिए तँ जेहने बेटा तेहने बेटी।” एहि कथामे पात्र सभ आएल अछि- ‘भैया काका’, ‘कथाकार’,‘कथाकार केर माय’,‘लालबाबू’, ‘मृगनयनी’, ‘मुरही बेचयवाली एक वृद्ध महिला’ तथादुखपुर गामक अनेको घसवाहिनी। 9. ‘ओ दिन’, एहि कथामे गामक झगड़ा, झंझट मारि-पीट आ केश-फौदारीक चर्चा भेल अछि। फगुआक दिन सुवल, किरण, अरूण, तरूण, वरूणआ करूण एकठाम बैस विचारैत अछि जे आशा नहि छल जे समाजक मरण भऽ जाएत। तरूण बजैत अछि- “भाय सहाएब, अनेरे तरङे छी, आब कि ओ दिन रहल जे मरद-औरत, धिया-पुता सभ मिलि गेबो करत, खेबो करत आ रंगो-अबीर खेलत।” गाममे केश-मोकदमाक चलते विषाक्त वातावरण बनि गेल अछि, ताहिमे आपसी प्रेम, भायचारा इत्यादि समाप्त भऽ गेल रहैत अछि। 10. ‘उरीन’,ई बुधना काकाक बेथा-कथाक कथा थिक। जकरा कथाकार फराक अन्दाजमे लिखलन्हि अछि। कथा अमैया भारसँ शुरू होइत अछि। जहिना लोक माए-बापक क्रिया-कर्म कएला पछाति ऋणसँ उरीन होइत अछि तेनाहिते बेटा-बेटीक विवाह कएलापर सन्तानक ऋणसँ सेहो उरीन होइत अछि। बुधना काकाक तेसर बेटीक विवाह छल। बुधना काकाकेँ दूटा पुत्र छन्हि, दुनू गामसँ बाहर रहि नौकरी करैत छन्हि। दुनू पुत्र अपन-अपन पत्नीकेँ सेहो अपना लगहिमे रखने छथि। तेसर बेटीक विवाहमे बुधना काकाकेँ दुनू पुत्रमे सँ क्यो ने गाम आएल आ ने आर्थिक सहयोग केलकन्हि। बुधना काका गाइक खटालक नाओंपर बैंकसँ तीन लाख टाका कर्ज उठा कए बेटीक विवाह कएलनि। 11. ‘देखौंस’, कथामे किसानी कर्मक उत्तराधिकारपर रघुवीर बाबा आ गौरीनाथक बीच गप्प भेल अछि। रघुवीर बाबा आब 80 वर्षसँ बेसी उम्रक भेलापर अपन जीवनक अन्तिम समयक कल्पना करैत छथि। एहेन गौरीनाथसँ अपन अन्तिम समयमे देखभालक कामना राखैए। मुदा गौरीनाथ रघुवीरबाबाकेँ अपन गुरु जकाँ मानैत अछि। ओ सामाजिक जीवनमे स्वीकार करैए जे जेँ हम बाबाक देखौंस केलौं तेँ हमरा खेती करबाक लूरि भेल। 12. ‘हेराएल जिनगी’, कथामे ओहन लोकक गप्प आएल अछि जे नियमित रूपे अपन कार्यकेँ सम्पादन करैत अपन जिनगीसँ बहुत उम्मीद तँ रखैत छथि, मुदा तेहन भऽ नहि पबैत छन्हि। हीरानन सुभ्यस्त किसानक पढ़ुआ बेटा छथि। हीरानन बी.एस-सी. धरि पढ़ि पबैत छथि मुदा कोनहुँ नोकरी नहि भऽ पबैत छन्हि। देखिते-देखिते हुनक बेटा-बेटी सेहो बालिग भऽ जाइत छन्हि। अपन पैतृक, साढ़े तीन बीघा जमीनक बदौलति हीरानन अपन बेटीक कन्यादान करब आ बेटाकेँ एम.बी.ए. कराएब असम्भव लगैत छन्हि। हीराननकेँ अपन जिनगी हेराएल सन लगैत छन्हि। आशीष अनचिन्हार गजल केहन छै ई लोकक आँखि फूलक मूँह काँटक आँखि सभहँक भूख एकै रंग ताकै खाद खेतक आँखि कोनो बिंदुपर मीलल छै शहरक आँखि गामक आँखि सुरजक बात कहिए देत भोरक देह साँझक आँखि अनचिन्हार एबे करतै रहलै जागि बाटक आँखि सभ पाँतिमे 2221-2221 मात्राक्रम अछि। मतलाक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि, तेसर आ पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल पसेनाकमोल कातिकमास।गोबरधनपूजा-दिनकअढ़ाइबजेकउम्मसआटहटहौआकतिकारौद।ओना, अपनेनिकललरहीहुरियाहाकटोहमे, हुरियाहाभेलसुग्गरकेँगोला-लाठीभरिगाए-महींसिकसिंगसँरगड़ाएब।कनीफरिक्केसँएकटाघासवालीकेँदच्छिन-सँ-उत्तरमुहेँघासकबोझमाथपरनेनेचलिअबैतदेखलिऐ।एकतँकनीफरिक्कोरहीआदोसरबोझकलटकलघाससभसँमुँह-कानझँपाएलरहनेचीन्हिनहिपेलौं।तैबीचमनमेउठिगेलगामकपाँचबर्खपूर्वहोइबलाहुरियाहा।भाय! मिथिलांचलछी, रंग-रंगकपावनिकसंगहुरियाहासेहोहोइतेअछि।मुदाआनगामजकाँमनुखकहुरियाहानहि, गाए-महींसिकसंगसुगरकहुरियाहाहमरागाममेहोइए। पाँचबर्खपूर्वधरि, केतेपूर्वसँतेकरतँठेकाननहियेँअछिमुदाअन्तिमछोरतँमनअछिए।जहियानीलकण्ठकाकामुइलाहतहियासँगामकहुरियाहाबन्नभऽगेल। नीलकण्ठकाकामोनपड़ितेजेनाअपनोमनकराग-विरागमेटागेल।जखनेमनकराग-विरागकमलआकिबजागेल- “अहिनाउदय-प्रलयसभदिनसँहोइतोआबिरहलअछिआआगूओहोइतरहत।” तैबीचअल्लापुरवालीभौजीघासकबोझरखिडेढ़ियापरठाढ़भेली।अपनोलगमेपहुँचतेअल्लापुरवालीभौजीकदेहकपसेनाआपसेनाकमोलआगूमेनाचिउठल।ओना, मुँहकरूखिसँबुझिपड़लजेअल्लोपुरवालीभौजीकिछुबाजएचाहिरहलीअछि।मुदाबाजैथकिछुने। मनमेभेलजेदेहकथकानमनोमेथकानअनैए, आकिअगुआकऽकिछुनहिबाजएचाहैछेलीसेभौजीएजानैथ, मुदाहुनकरमुँहकरूखिएहेनजरूरबनिगेलैनजइसँस्पष्टभऽगेलजेकिछुगप-सप्पकरएचाहिरहलीअछि।बजलौं- “भगवानघरवालीदेलखिनतँसिंहेसरभायकेँ! एकटाहमछीजेसभसँअभागलमनुखकपारमेसाटिदेलैन।” अपनप्रशंसा, तहूमेमुँहपर, सुनैमेजहिनासभकेँनीकलगैछैतहिनाअल्लापुरवालीभौजीकेँलगलैन।मुदाअप्पनखुशीकेँमनमेदाबिबजली- “अहाँ-घरवालीकेँकीचोराछुबिदेनेछैन?” अल्लापुरवालीभौजीकबातसुनिमनमेभेलजेएतेकदूरसँ–मानेडेढ़किलोमीटरसँ–घासकएहेनभारीबोझमाथपरउठाकऽअनलापछातियो, तहूमेएहेनटहटहौआरौदमेभौजीमिसियोभरिभारीपनकथकाननहिबुझिरहलीअछि।यएहछीमेहनतकेँअङ्गेजब..! जखनलोकमेहनतकेँ, अभ्याससँअङ्गेजलइएतखनअपनजीवनकभारस्वत: फुलकुमारिजकाँउठाचलैए।ओना, एहेनपरिस्थितिइलाका-इलाकाआगाम-गामकजाति-विशेषपरिवारसभमेअलग-अलगरीतुएअछिए, मुदाकिछुएहनोतँअछिजेसामुहिकरूपमेअछि...।बजलौं- “चोराकीछुबनेरहतभौजी, हमराघरवालीकनैहरेभोथियागेलछैन।” ओना, हमरबातअल्लापुरवालीभौजीनीकजकाँनहिबुझिपेली।नीकजकाँतखनबुझितैथजखनअपनइलाकाआआनइलाकाकसमाजिकजीवनकक्रिया-कलापकबोधरहितैन, सेतँछेलैननहि।रहबोकेनाकरितैन, एकतँकिताबीज्ञान–मानेजेकरापढ़ब-लिखबबुझैछी–नहिछेलैन, दोसरभौगौलिकबनाबटकचलैतइलाका-इलाकाकबनाबटसेहोविचित्रअछिएआतेसरजेहेनपरिवारकअल्लापुरवालीभौजीछैथओआर्थिकोआसमाजिकोस्तरपरपछुआएलअछिए...।अल्लापुरवालीभौजीबजली- “गामोकोनोभोथियाहहोइछै! अहाँअपनेभोथियागेलहएब!!” गरभेटल।गरभेटैककारणभेलजेभौजीहमरसासुरकइलाकाकेँनहिजनैछेली।बजलौं- “भौजी, सिंहेसरभाइकघरवालीअहाँअल्लापुरपरगनाकछी, तँएकेहेनचाकर-चौरसहाड़-काठअहाँकअछि, हमरतँबुझलेअछिजेबछोरपरगनाकछी, सभदिनबछौड़ियेरहतकिने।” गपकक्रमकभाँजनहिबुझनेअल्लापुरवालीभौजीअकबकागेली, मुदाजखनगप-सप्पकपाशापरदूगोरेबैसलरहबतखनगोटीभलेँउफाँटिकिएनेचलएमुदापाशापरकियोलगलेहारिमानएथोड़ेचाहैए।जखनकियोनेचाहैएतखनअल्लेपुरवालीभौजीकिएहारिमानती।अपनविचारकेँऊपरचढ़बैतअल्लापुरवालीभौजीबजली- “कोनकुत्ताघिसियेनेछेलौंजेहमरेजकाँएहेनटहटहौआरौदमेवौआइछी?” ओना, भौजीअपनेविचारेहारिरहलछेलीकिएकतँजहिनाअपनेभरिडाँरकघासकबोझमाथपरदलिहाराचौरसँअननेछेली, मानेकठिनपरिश्रमकेनेछेली, तेकरजोड़ालगाहमरोकहलैन, मुदाअपनोतँकिछुइमानअछि।बजलौं- “भौजी, जेकुकुरघिसियाएबअहाँकहलौंसेकुकुरतँनइघिसिएलौंहेन, मुदामनकअपनकुत्ताजरूरघिसियारहलछी।” हमरबातसुनिभौजीपछड़लीजरूरमुदापाछूनइहटिबजली- “एहेनकुत्ताकीअहींपोसनिहारछी?” भौजीकबातसुनिमनमेनेमिसियोभरिजलनभेलआनेमिसियोभरिआनियेँ-अवगराइनलागल, मुदाएकटासिनेहमनमेजरूरभैवगेल।बजलौं- “भौजी, अहूँकिकोनोनव-नौतारिछीजेलगलेबिसैरजाएब, आइहुरियाहापाबैनछी।पाँचबरखपूर्वधरिअपनोगाममेहोइछल।अढ़ाइ-तीनबजेसँशुरूभऽजाइछेलै, आजखनसुग्गरमरिजाइछेलैतेकराबादधिया-पुतासभकुश्तीलड़ैछल।” विचारकेँसूहकारिअल्लापुरवालीभौजीबजली- “बौआ, कहबियोछैजे‘जेपुतहरवाहिगेलदेव-पितरसभसँगेल’, हमतँसएहभेलौं।गाममेनीलकण्ठकाकाछलाजेसाले-सालगामकअगुआ-बहानबनिहुरियाहापाबैनकरैछला।” ओना, अल्लापुरवालीभौजीकविचारमेजेनारंग-रंगकअनेकोविचारगॉंथलछेलैनतहिनाबुझिपड़ल, मुदादुइयेगोरेकबीचगप-सप्पकक्रमरहनेफाँकजगहोतँअछिए।बजलौं- “भौजी, नीकभेलजेनीककण्ठकाकामरिगेला।भनेहुरियोहोचलिगेलआजितियादिनकओटगनपाबैनो, ओटगनपाबैन-दिनलोकभोरमेचूरा-दहीखाइछलआभरिकातिकढों-ढोंकरैतरहैछल।आसीनमासकदहीकेहेनहोइएसेभादवेसँचेतौलअछि- ‘भादवकदहीसँहटलेरही..!” ओना, नीलकण्ठकक्काकमृत्युसुनिअल्लापुरवालीभौजीमने-मनचुचकारीदिअलगलीजेअनर्थभेल।मुदाअपनोगरभेटल।गरभेटतेसुसकारीदैतबजलौं- “भौजी, अनेरेलोकबपहारिकटैएजेमौगीमेमजगूतीआबए, मानेनारी-सशक्तीकरण.., ऐठामकनारी-जीवनबिसैरलोकबजैए।” हमरबातसुनिअल्लापुरवालीभौजीअकबकाएलगलीमुदामनकइमानजगिचुकलछेलैन, बजली- “नइबुझलौंबौआ?” अपनादिसबढ़ैतअल्लापुरवालीभौजीकसिनेहसँसिनेहिलहोइतससिनेहबजलौं- “भौजी, अहींछातीपरहाथरखिबाजूजेहमराघरवालीसनचमचिकनी-ललमुँहीजँअहाँरहितौंतँएहेनगाममेबासहोइत?” अपनजीवनअल्लापुरवालीभौजीकमनमेजेनानाचिउठलैनतहिनाअप्पनतीनमासकबीतलदुरकालकेँस्मरणकरैतबजली- “बौआ, गाममेतेसभदेखतेछिऐजेभैयाकेहेनछैथ।भरिदिनगपे-सप्पआताशेकपाछूलगलरहैछैथ।विधातेकेँकीदोखदेबैन।रंग-रंगककलमरखनेरहैछैथविधाता, जखैनजेहेनमनरहलैनतखैनतेहेनकलमसँलिखदइछैथ।” भौजीकबातसुनिहँसीलगिगेल।हँसीलगैककारणभेलजेदुनियॉंकआदि-अन्ततँसभजनैएजेजेजन्मलेलकओमरबेकरत।मुदाबीचकजिनगीमेकेतएभोथियाजाइएसेबुझबेनेकरैए।एहनेबुधिआरिबुझनिहारिअल्लापुरवालीभौजीसेहोछथिए।ओना, अल्लापुरवालीभौजीसासुरअबिते, बिनासासु-ससुरककहने, गाइयकथैर-गोबरसँलऽकऽखुआएब-पियाएबमाल-जालकशुरूकऽनेनेरहैथ, जइसँसाउसो-ससुरअपनपरिवारकप्रमुखकाज–मानेपशुपालनकसभकाज–सँनिसचिन्तजकाँमने-मनभइयेगेलैथ।बजलौं- “भौजी, अहाँजनितेछीजेनेखुट्टारखनेछीआनेतइमेबन्हैलेमाल-जालपोसनेछी।लऽदऽकऽएकगाहीमनुखेटाहमराघरमेअछि।तइमेऐबेरकबीतलतीनमासजेरहलअछिआअखनोअछिओनाकोदमकेनहिअछि, तैठामबलिहारीअहाँकेँअछिजेएहनोसमयमेदूटागाएसम्हारिदसकिलोदूधकआमदनीपरिवारमेकेनेछी।” जहिनाकोनोबीतलघटनावाचलैतजिनगीकक्रियाकबीचकबिचड़ैतविचारमनकेँउत्फुलितकरैएतहिनाअल्लापुरवालीभौजीकेँभेलैन, बजली- “बौआ, केलहेदेहअछितँएएहेनसमयमेअपनाकेँसम्हारिरखलौं, नइतँबिलैटजइतौं।” अल्लापुरवालीभौजीकविचारकप्रवाहमेअपनकोनोपरवाहनहिरहल।खापड़िमेदेलमकइजकाँअनेरेमुँहफुटिगेल- “भौजी, ऐतीनमासकबैसारीमेमानेबाढ़िएलहासमयमे, गामकयएहदेखैछीजेजँबोड़ो-कट्ठाकहिसाबसँधानभेलरहैततँआइगामधनमण्डलभेलरहैतमुदासेभऽगेलपौकेटकटलाहापरदेशियाजकाँ, जेकराकानबछोड़िमुँहमेकोनोबोलनहिरहैत।गाममेजेतबोमाल-जाल, गाए-महींसछलओहोरंग-बिरंगककारणे–रंग-बिरंगककारणभेल, खुएनाइ-पीएनाइसँलऽकऽबरसातीखढ़करोगकसंग-संगरखैकघर-दुआरधरि–सभटाउपैटगेल।धन्यवादअहाँकेँदी, जेअखनोअपनमुँहकलालीओहनेरखनेछीजेहेननीकसमयमेरहैछल।” हमरबातसुनिअल्लापुरवालीभौजीकविचार-धारमेजेनामोइनफुटिगेलैनतहिनाबजली- “बौआ, मनुखबनिजखनधरतीपरजनमनेनेछीतखनजँअपनोजीबैकउपायसोचिनहिचलबतँजीबकेतेदिनसकैछी।” भौजीकविचारसुनिमनजेनापसीजगेल।जँएहेनविचार-शक्तिनारीकिपुरुखोमेजगिजाएतँओजरूरअपनोआअपनासंगआनो-आनकेँमनुखकशकलमेमानवबासस्थापितकऽलेत।मुदा...।अपनजिनगीकबेवहारिकप्रवाहकेँनुकावैचारिकधारमेभँसियाइतबजलौं- “भौजी, लोककिकोनोझुठेबजैएजेबुधिबपजेठहोइछइ।तहूमेजँओबेवहारिकभऽजाएतँघीबोसँचिक्कनहोइतेअछि।” ‘घीबोसँचिक्कन’आकि‘बुधिबपजेठ’सुनिअल्लापुरवालीभौजीकमनजेनाप्रेमास्पदकअवस्थामेपहुँचगेलैनतहिनाभव-विह्वलहोइतबजली- “बौआ, भगवानओहनेमाए-बापकपरिवारमेजन्मदेलैन, जिनकादुनियॉंकसम्पैतमेकिछुओनेहिस्साछैन, छैनसिरिफअपनदेहभरिकसम्पैतटा, तैठामजँदेहधुनिनहिचलबतखनपारलागल।एकतँओहुनादेखैछीमनुखकओहनचालिअछिजेअनेरोलोककचीजोचोरबैएआदुब्बर-दानरदेखबलजोरियोछिनैए, तैठामजँअपनोभरिनहिकरबतखनकएदिनचलब..!” अल्लापुरवालीभौजीकविचारसुनिअवाक्भऽगेलौं।स्त्रीगणरहैतअल्लापुरवालीभौजीककाजोआविचारोदेख-सुनिअपनेमनअपनाकेँधिक्कारएलगल।मुदाएकतँभौजीकआगूमेछी, दोसरझड़लेझाँखुरकिएनेहोइमुदाछीतँपुरुखेकिने।लगलेहारियोमानिलेबउचितथोड़ेहएत।तहूमेगोबरधनपावनिकदिनछी..! बजलौं- “भौजी, औझुकाजेपाबैनअछिओमाल-जालक, असलमेओअहींकछी।भोरेउठिकऽगाइयकथैरमेअन्नसँलऽकऽकरमीकफूलतककबरवारीअहाँबनौनहिहएब।” ‘औझुकापावनिकनाओंसुनितेभौजीजेनाभरिगामकसुड्डाहभेलमालकथैड़सभपरनजैरदौड़बैतबजली- “जखनतीनबजेरातिमेढोलकअवाजभेलआकिउठिकऽहाँइ-हाँइपहिनेपोखैरजाकरमी-लत्तीअनलौं।लगलेथैर-गौबरकरैतखरैड़-बरैड़कऽसौंसेचिक्कन-चुनमुनकरैतनिपलौं।पछाइतहाथ-पएरधोइगोधनपूजाशुरूकेलौं।” अनेरेमुहसँखसिपड़ल- “वाह..!” हमरमुहसँखसल‘वाह’सुनिअल्लापुरवालीभौजीजेनाअपनजिनगीमेभँसियाइतबजली- “दिनउगितेजँदलिहाराचौरनइजाएबतँकाजपारलगत।भोरेअँगनाककाजसम्हारिकिछुमुँहमेलऽलइछीआघोड़ाजकाँदौड़लजाइछी।जानउपैछघासकटैछी, तखनतँअबैत-अबैतबेरखसिपड़ैएआजखनकनियोँकाजमेढीली-सील्लीहएततखनतँभरिदिनमेपारोनेलागत।” दलिहाराचौरअढ़ाइ-तीनसाएबीघाकअछि, जइमेकिछुहिस्सामेपानिसुखनेउपजोहोइएआकिछुहिस्सा, लगभगसाठि-सत्तैरबीघाकरकबाओहनअछिजइमेबारहोमासपानिरहनेअनेरुआघाससभसेहोअछि, ओहीदलिहाराचौरसँअल्लापुरवालीभौजीतेसरादिनपरघासआनिदुनूगाइकसेवाकरैछैथ।तीनमाससँबाढ़िमेडुमलगामरहनेघासकखेतियोनहियेँभऽसकल, संगहिखेत-पथारकआड़ि-धुरमेजेघासहोइए, सेहोनेभेल। अल्लापुरवालीभौजीकनहाइकसमयदेखअपनेमनकहलकजेबेवकूफजकाँअप्पनसमयनष्टकरितेछीजेएकैसमीसदीमेगाए-सुगरकलड़ाइदेखैछीआकर्मकारिणीअल्लापुरवालीभौजीकसमयसेहोदुइरकरैछिऐन।उठिकऽविदाभेलौंकिदच्छिनदिससँरामेसरकेँअबैतदेखलिऐ। रामेसरगामकमध्यमवर्गीयपरिवारमेसचेष्टकिसानीजिनगीधारणकेनेअछि।एगारहटागाएपोसिपरिवारमेकृषिउत्पादितकारोबारपसारनेअछि।बीसबीघाजमीनबलाकिसान- रामेसरसमुचितढंगसँघासकखेतीकरैतदसबर्खसँदूधककारोबारकरैतआबिरहलछलजेऐसालबाढ़िकचलैतसभटानष्टभऽगेलइ...।मनमेरामेसरकप्रतिदयाजगलेछल, मुदाहमकइयेकीसकैछिऐ, एतबेनेजेबोल-भरोसदेबइ।लगअबितेरामेसरककननमुँहदेखअपनोछातीफाटिगेल।बजलौं- “रामेसर, किम्हर-किम्हर?” रामेसरबाजल- “केतएजाएब।वौआइछी।” शब्दसंख्या : १७४८, तिथि : ०६नवम्बर२०१९ Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०२०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2020 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA
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