VIDEHA — Issue 293 / अंक २९३

Publication: VIDEHA · Issue: 293
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' २९३ म अंक ०१ मार्च २०२० (वर्ष १३ मास १४७ अंक २९३) 'विदेह' २९३ म अंक ०१ मार्च २०२० (वर्ष १३ मास १४७ अंक २९३) ऐ अंकमे अछि:- १. प्रदीप पुष्पक दू टा गजल २. उमेश मण्डल-- जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘अकास गंगा’ ३. आशीष अनचिन्हारक एकटा गजल ४. जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा- कृषियोग प्रदीप पुष्प गजल- १ प्रेमक डोर की गजल नइ जगले भोर की गजल नइ टटका फूल सन नरम ई पातर ठोर की गजल नइ चानी सोन केर चमक सन देहक पोर की गजल नइ मातल पैघ पैघ नैनक कारी कोर की गजल नइ तोहर मीठ मीठ वचनक मिसरी बोर की गजल नइ तोरा लेल जे बहल ओ पुष्पक नोर की गजल नइ (2221 2122 सभ पाँतिमे) गजल- २ अपन किरदानी पैघ अनकर छोट लगैए बजलै केओ उचित कने बड़ चोट लगैए जानै के नै कर्म ककर छै श्वानक जगमे किदैन चाटि कऽबाजै जे अखरोट लगैए गन्ध अबै छै सत्ताक किए देहसँ धर्मक मंत्री जकाँ बाबाजीक लंगोट लगैए ककर चोरेलकै धन ककर जमीन छिनलकै छऽल जे दुब्बर लोक आइ बड़ मोट लगैए होइ पाठ नित धर्म- अधर्मक नीतिक तैयो देखि जगत व्यवहार हिय कचोट लगैए खन दहिना खन बामा होइत छथि नेताजी कुरता पजामा नव मन लोटपोट लगैए (222222222222सभ पाँतिमे।बहरे- मीर) उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘अकास गंगा’ अकास गंगा (2020): श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक पद्य रचनामे प्रस्तुत पोथी एकदम टटका कृति छियनि। एहि संग्रहमे कुल 39 गोट रचना संग्रहित अछि। ‘नजैर-नजैरमे तफरका भैया’ शीर्षक रचनासँ एहि पोथीक आरम्भ भेल अछि ‘सुफल काज’ नामक रचनाक संग अन्त। मण्डलजीक दृष्टिकोणक विषयमे एक-पर-एक विद्वतजन अपन-अपन विचार व्यक्त कएलनि अछि जे हिनक नव दृष्टिकोण मैथिली साहित्य लेल अनुपम अछि। प्रस्तुत संग्रहक किछु रचनाक संक्षिप्त परिचयात्मक वर्णन करबाक कोशिश कय रहलहुँ अछि। ‘नजैर-नजैरमेतफरकासभदिनहोइतएलैए।कहियोनावपरगाड़ीआकहियोनाव गाड़ीपरचढ़ैतएलैए।’ सामान्य जनकण्ठ प्रचलित एहि सत्यकेँ कवि परिवर्तन करैत प्रस्तुत काव्यक माध्यमसँ लोकक समक्ष उपस्थित कएलनि अछि- “नजैर-नजैरमेतफरकाभैया सभदिनहोइतएलैए। कहियोनावपरगाड़ी तँकहियोनावचढ़ैतएलैए। नजैर-नजैरमेतफरकाभैया सभदिनहोइतएलैए।” वएह गारि सुनि ककरो दुख होइ छैक आ वएह गारि सुनि ककरो तकलीफ, मुदा बुधियार लोक गारि आ कुगारिक बीच हँसैत चलैत रहैत छथि- “केकरोगारिसुगारिबनि-बनि केकरोगारिकुगारिबनैछइ। सुगारि-कुगारिबीचबुधियारि बीचो-बीचहँसैतचलैछइ। बीचो-बीचहँसैत...।” समाज द्वारा लोककेँ स्वतंत्रता भेटबाक चाही। मुदा एखन एहेन परिवर्तन भऽ गेल अछि जे समाज बान्ह-छेक कऽ रहल अछि। आ से परिवर्तन होइत एहेन स्थितिमे पहुँचि गेल अछि जे घरे-घर सभ कियो घोड़-छानमे बन्हा गेल अछि- “जेकराखुजलसमाजकहैछी बान्ह-छेकसँभरल-पड़लछइ। बान्हो-छेककिबान्ह-छेकजकाँ घरे-घरघोड़छानबनलछइ। घरे-घरघोड़छान...।” एहि पाँतिमे कविक परिवर्तनक स्वर देखल जा सकैछ। जे विद्वान-समाजक पूजा नहि करैत अछि हुनक कोनहुँ माइन नहि। समाजक हितमे जे कार्य करत ओकरहि समाज पूजा कऽ सकैत अछि। तहिना जे गाम उजड़ल अछि, ओहि गामक कोनहुँ महत्व नहि- “जइसमाजकगामउजड़ल ओइगामकमानियेँकी जेविद्वानसमाजनइपूजल ओइविद्वावनकमानियेँकी? ओइविद्वानकमानियेँकी? ओइपोखरिकमानियेँकी? ओइपोखरिक...।” ‘नवका बास’मे कवि कहैत छथि जे समाजक बीच समाज बसल अछि। मुदा ओकरा देखय लेल विचार आ व्यवहारक जरूरत अछि। जाधरि ओहन व्यवहार नहि करब ताधरि ओकर दर्शन सम्भव नहि, ठीक एकर विपरीत जखन ओहन विचार-व्यवहार कियो करैत अछि तँ सद्य: ओहि दृश्यक अवलोकन भऽ जाइत छैक- “समाजकबीचसमाजगाम-बास विचार-विचरणकरएलगैछइ। विचैड़-विचैड़, विचारि-विचारि कोने-कानीदेखएलगैछइ। जहिनाखेतककोन-कान तहिनासमाजोककोन-कानबनैछइ। कोने-कानी, कोन-कानताकि सम्पन्नबाससमाजबसैछइ। सम्पन्नबाससमाजबसैछइ। बिनुबसल-बसाएलधरतीपर नवघरबसिबासबनैछइ।” असंख्य व्यक्तिसँ लोकक सम्बन्ध रहैत अछि मुदा असली संगी वएह कहबैत अछि जे जिनगीमे संग पुरैत अछि- “जिनगीमेजेसंगपुरैए संगीवएहकहबैतचलैए। संगससैर, घुसैक-पुसैकसंग प्रेमीमित्रसंगीकहबैए। जिनगीमेजेसंगपुरैए संगीवएह...।” परिवर्तनक कारणे एखनुक स्थिति एहेन भऽ गेल अछि जे दूध-फूलक बीच कोनहुँ भेद नहि रहि गेल अछि। फलाफल छुतहरो घरहर बनि गेल अछि- “मिथिलामोहैनमथिमिथिला कहिछुतहरघरहरिया। दूध-फूलबीचभेदनेमानि छुतहरोबनतैघरहरिया।” निम्न पाँतिक माध्यमसँ आशुतोषकेँ उपराग देल गेल अछि जे सुख कहियो नहि भेटल, सभदिन दुखेक तरमे दबाएल रहलहुँ। मनुक्खक गति कहियो नहि भेटल- “सभदिनदुखकतरदबेलौं सुखकसुखकहियोनेपेलौं। चुहैटहृदयतोषपकैड़ मनुखकगतिकहियोनेपेलौं। हेआशुतोष...।” मनमे फूल फुलाइत रहैत अछि। जहिना वसन्त कालमे भोरहबेमे मेघक रंग ललौन बनल रहै छै तहिना मनक फूल फुलाइत रहैत अछि- “मनकफूलफुलाइतरहैछै मनमेफूलफुलाइतरहैछै भोरहरबेवसन्‍तजहिना मेघललौनबनैतचलैछै।” कवि कहैत छथि स्वार्थ आ अविश्वासक तेहन हवा बहि रहल अछि जे सच्चा इष्ट-मित्र बिड़ले भेटि सकैत अछि- “दुनियाँकभवभँवरमे मित्र-इष्टबिड़लेभेटैछै। इष्ट, शिष्ट, अशिष्टबनि-बिगैड़ मुकतिकतेहनेमार्गपबैछै। जेहनेशक्तिकरंग...।” लोकक जिनगी दू तलपर चलि रहल अछि, बाहर किछु आर आ भीतर किछु आर..। ऊपरसँ खेल खेलि रहल छी आ भीतरसँ बपहारि काटि रहल छी- “मन-मरदनकरैतरहैछी खेलखेलौनाखेलदेखैछी मने-मनबपहारिकटैछी। खेलखेलौनाखेलदेखैछी।” प्रेमी पियाक लेल ई उक्ति अछि- जे चीन्ह पहचीन्ह सभटा उड़िया गेल हवाक झोंकमे जिनगीक सभ चीज छिड़िया गेल...। आबो एकबेर नजरि उठा कऽ हमरा दिसि ताकू- “चीन्‍ह–पहचीन्‍हसबउड़ियागेल हवाझोंकपाबिसबछिड़ियागेल आबोकनीनजैरउठा, दिअहमरोजिया हेयौप्रेमीपिया...।” मनकेँ बिसरबाक क्षमता होइ छैक। हेबाक चाही। तेँ अपना प्रियजनकेँ लोक ओहिना बिसरि जाइत अछि जेना गाछक फूल डारिसँ खसलापर बिसरि जाइत अछि। तहिना हे बहिना हमर मन अहॉंकेँ बिसरि गेल- “बिसैरगेलमनतोरा हेबहिनाबिसैरगेलमनतोरा जहिनागाछकफूलझड़ैछै झरि-झरिखसलहतोरा हेबहिना, बिसैरगेलमनतोरा। हेबहिना...।” लोक दुखसँ भागि जाइत अछि, भूखसँ भागि जाइत अछि। मुदा भरल पेट तँ विचार करबाक चाही? आ से जखन भरलो पेट विचारकेँ ताखपर राखि देबैक तखन तँ..! आबो कनी विचार केर माध्यमसँ कवि यएह कहैत छथि। देखू निम्न पॉंतिकेँ- “आबोकनीविचारू भाययौ, आबोकनीविचारू। भुखेभगलौं, सभजनैए दुखेभगलौं, सभजनैए। भरलपेटविचारू आबोकनीविचारू भाययौ...।” वृद्धक प्रश्न अछि जे हम वृद्ध भेलहुँ, वृद्धसँ समृद्ध समाज बनैत अछि जकर कल्पना कएल गेल अछि, नीक समाजसँ अर्थात् समृद्ध समाजसँ- “वृद्ध-सँ-समृद्धकहबए समृद्धसमाजकल्पितछै साजसिंगारसोल्होकला रीतवसन्‍तसूरतानिकहैछै। बुझियोकहाँपेलिऐ। भाययौ, बुझियोकहाँपेलिऐ। वृद्धकेना...।” समय शान्त नहि अछि बल्कि समयमे भूचाल आबि गेल अछि, भूकम्प आबि गेल अछि आ ओहि भूकम्पक कम्पमे जिनगी बोहिया गेल अछि- “समयकेरभूचालिमे जिनगीबोहियागेल। जी-वनवनजीवनबीच बोहिआएलबाटबटियागेल।” भगवतीसँ लोक आशीर्वाद मांगैत अछि मुदा एहिठाम परिवर्तन ई भेल अछि जे भगवतीकेँ उपराग दैत कहैत अछि जे राति-दिन सुखल रोटी आ आलू केर सन्नाक रोग वियाधिकेँ हमरे दिस पठाबैत छी- “सुखलरोटीअल्‍लूसनिसानि दिन-रातिकिएखुएलौं बाँकीभगा-भगाकऽ रोग-वियाधिपठेलौं एनाकिए...।” कियो अनकहि बोझ उठबैत तबाह अछि तँ कियो अपने बोझ उठेबामे अपसियाँत अछि। ध्यान रखबाक अछि जे आनक बोझ उठबैत काल अपन बोझक जुन्ना ने ससरि जाए..! एहि भावकेँ कवि अपन ‘आनक बोझ’काव्यमे अनुभवात्मक शैलीमे एहि तरहेँ प्रस्तुत कएलनि अछि- “आनकबोझउठाबैखातिर अपनोबोझभड़ैकगेलइ। दबि-दबि, उनैर-उनैर जुन्नेबीचससैरगेलइ। मीतयौ, जुन्नेबीचससैरगेलइ।” आजादीक बाद तँ एकरा सुरक्षित रखबाक चाही आर आगू बढ़ेबाक चाही, उपाय खोजबाक चाही किन्तु एहिठाम आजादीक उमंग तेहन चढ़ल जे घाटे-बाटे वौआ रहल अछि, छिछिया रहल अछि- “आजादीकउमंगउमैक घाटे-बाटछिछियागेलौं। सत्त-समुद्रपहाड़बीच डेगे-डेगवौआगेलौं। भाययौ, डेगे-डेगबौआगेलौं। घाटे-बाट...।” जतय जिनगीक रस सुखा जाइत अछि ओतय वुधि सेहो बोझिल भऽ जाइत अछि। जिनगी तँ सरस हेबक चाही जाहिसँ सदिखन परिवर्तित होइत आगाँ बढ़ैत रहए- “रस-जिनगीकसोंखागेलै। जिनगीरससोंखागेलै। जिनगीएहरागेलै। भाययौ, बुधियेबोझियागेलै।” संसार सिर्फ आनन्द आ भोगक जगह नहि थिक बल्कि समर भूमि सेहो थिक। जँ से नहि तखन जिनगीमे जिनगानी कोना आओत आ जाहि जिनगीमे जिनगानी नहि ओहि जिनगीक कोन मोल? कवि अही भावकेँ निम्न पाँतिमे रखलन्हि अछि- “जिनगीबिनुजिनगानीवएह कोनसुरमुहेँगाबिपेबै। कोनसुरमुहेँगाबिपेबै। जाबौआ...। नइजापुरूखपनापुरुखमे नीनतोड़िबटबानिगेबै। बिनुभौकेभकुआइएरहि जीताजीजड़ाइतगेबै। जीताजीजड़ाइतगेबै। जाबौआ...। समरभूमिसंसारमे..।” जखन धारमे पानि रहैत अछि तँ ओ अपन अकार ग्रहण करैत अछि, मुदा एहिठाम परिवर्तन ई भेल अछि जे धार सुखि गेलाक बादहु अपन अकार-सकार धेने अछि- “सुखाएलधारसुखा-सुखा अकार-सकारधेनेरहैछै।” एहि पोथीमे मण्डलजी कुल 39 गोट पद्य रचनाक समायोजन कयने छथि। संग्रहित सभ रचनाक शीर्षक निम्नांकित अछि- ‘नजैर-नजैरमे तफरका भैया’,‘अपने मन ठकैए’,‘केकरो गारि सुगारि’,‘साँझ-भोर’,‘समाजक बान्ह छेक’,‘दियादी’,‘ओइ पोखरिक मानियेँ की?’,‘नवका बास’,‘जिनगीमे जे’,‘हे बहिना केनाकऽ जेबै ओइ घरिया’,‘हे आशुतोष’,‘मनक फूल’,‘फूल मनक’,‘बेकाल-काल’,‘जेहेन जेकर’,‘समय-साल’,‘संग मान-समान’,‘जेहने शक्ति‍क रंग रहै छै’,‘खेल खेलौना’,‘प्रेमी पिया’,‘बिसैर गेल’,‘आबो कनी विचारू’,‘सुआगत अपनेक’,‘वृद्ध केना’,‘समय केर’,‘भगवती गीत’,‘आनक बोझ’,‘अड़कन-मरकन’,‘हाल-बेहाल’,‘आजादीक उमंग’,‘बुधिये भोतिया गेल’,‘घर-घरा’,‘जा बौआ’,‘लत-लत लत्ती’,‘पीड़ित रीति’,‘अकार-सकार’,‘टेनशन बीच पड़ल छी’,‘आन्‍ही-अन्हर’,‘सुफल काज।’ आशीष अनचिन्हार गजल कियो पुछलक मोनक हाल कियो कहलक मोनक हाल खसल नोरक ठोपे गानि कियो बुझलक मोनक हाल कियो आनथि हीरा मोती कियो अनलक मोनक हाल कियो डाहैए संसार कियो डहलक मोनक हाल नुका पढ़तै अनचिन्हार कियो लिखलक मोनक हाल सभ पाँतिमे 122-22-221 मात्राक्रम अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबा छूट लेल गेल अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल कृषियोग आठबजेभिनसुरकासमय।कहबजेभिनसुरकाआठबजेकसमयसभदिनाएक्केरंगकहोइएसेनइहोइए।बैशाख-जेठकआठबजेभिनसुरकासमयजेहेनहोइएतेहेनपूस-माघकनहियेँहोइए।मुदासेसभअखननहि, अखनबसएतबेजेसामापाबैनकहियौआकिमासअसनान, चाहेहरिहरबाबाकपूजाकहियौआकिबराहबाबाकपूजा-मेला, ओइसभकेँभेनाआइछअदिनभऽगेलतँएअगहनकअन्हरियाकआइछठमदिनछी, मानेअठारहनवम्बर। एतेकहैकप्रयोजनकिछुखासनहियेँअछिमुदातारीखो-तिथितँअपनधरमबिगाड़ितेअछिबसतेतबए...। किसानछी, बाधदिसजाइतरहीकिटोलसँनिकैलतेरस्तेकातकआमकगाछकनिच्चाँमेयोगियोबाबाआसमदर्शियोबाबाकेँबैसलदेखलयैन।रस्तेधेनेआगूबढ़लजाइतरहीकियोगीबाबाठहाकामारिहँसला। एतेतँबुझलेअछिजेयोगीबाबाहमरासभकेँबाल-बोधबुझैछैथतँएजँकोनोगलतियोकरबतँबुझौता, चेतौतामुदाठहाकामारिहँसतातँनहि। ओना, हुनकादुनूगोरे–मानेयोगियोबाबाआसमदर्शियोबाबा–सँरस्ताकाटिअपनकाजकरस्तापकैड़आगूबढ़िगेलौं।गाछकछाहैरसँकनियेँआगूबढ़लौंकिमनमेउठलजेयोगीबाबाकहँसीकठहाकाजरूरकिछुशुभसन्देशकइशाराछी...। शुभसन्देशकइशारामनमेअबितेजहिनासभकेँनीकबातशुभसमाचारसुनैलेजिज्ञासाजगैएतहिनाअपनोभेल।घुरिकऽयोगीबाबालगपहुँचबजलौं- “बाबा, तेहेनरामधुनिमेमनफँसिगेलछलजेअहाँपरनजैरियेनेपड़लतँएआगूबढ़िगेलौं।पछाइतजखनधियानटुटलतखनअहाँपरनजैरपड़ल, तँएघुमिएलौं।” ओना, योगीबाबाअपनयोगक्रिया (जीवनयोग) सँहमरा-देबुझिगेलातेहेनउचक्काअछिजेएककिलोमीटरहटलेसँदेखनेनेहएतआकेहेनओरियाकऽबाजलअछि! मुदातइसँहमराकोनमतलब।जहिनावेदकेँकोनमतलबअहाँसँछै; ओतँअहाँकजिनगीकओहनरस्तापरठाढ़अछिजइसँअहाँकपूर्णस्वतंत्रजीवनभेटरहलअछिआकिनैभेटरहलअछि; तेकरलेखा-जोखाराखत।जखनस्वतंत्रजीवनकबाटभेटरहलअछितखनकिएनेपूर्णस्वतंत्रभऽजिनगीबिताएब, मुदातइलेअहाँकेँनेअपनवेदबुझएपड़त...।योगीबाबाबजला- “बौआ, गाम-घरककीहाल-चालअछि?” जहिनाकियोगामकचालिदेखबजैमेगामेकेँढठियादइएतहिनाहमहूँगामकेँढठियबैतबजलौं- “बाबा, अनकरहाल-चालकीकहब! अपनेऐगलोसालदेखबकिनइदेखबसेचिन्तामनमेबनलअछि।” जाधैरहमबजैतरहलौंताधैरयोगीबाबाअपनमुड़ीडोलबैतरहला, मुदाबजलाकिछुने। ओना, अप्पनमनलटकलछलओइहँसी–ठहाका–कफलसुनैलेमुदासेउनटेदिसयोगीबाबाभँसियारहलछला।अपनाकेँसंयमितकरैतबजलौं- “बाबा, अपनेटाठहाकामारिहँसबआकिअनकोहँसाएब?” ‘अप्पन’आ‘आन’सुनियोगीबाबाबजला- “हमकेकरोमनाहीकरैछिऐजेतूँनइहँसह।तखनतँहँसैलेमनचाही, सेतँओअपनेनेबनौत।” जहिनायोगीबाबाअप्पनपल्लाझाड़िकातभेलातहिनाहमहूँअपनपल्लाहुनकेऊपरमेदैतबजलौं- “बाबा, अहाँकेँसमाजेकबाबाटानइबुझैछी, गुरुओबुझैछी, तँएसदिखनमनमेरहबेकरैएजेगरुगरकेँसरुगरयोगीबाबाजरूरबनौता।” लेबलैया! बजैकक्रममेतँबाजिगेलौंमुदाअप्पनविचारमेकेतएघोंचभऽगेलसेबुझबेनेकेलौं।ओना, योगीबाबाबुझिगेलातँएठहाकामारितँनहिहँसलामुदामनजरूरमुस्कियेलैन। आब, ठहाकासुनिजेतेमननइघबड़ाएलछलतइसँबेसीयोगीबाबाकमुस्कीदेखघबड़ाएल।मनमेउठल- ठहाकाकेकरापरमारनेछलाकेकरापरनहि, तइसँअपनाकोनहानि-लाभअछिमुदामुस्कीतँसोल्होअनाहमरेपरमारलैनअछिजेअपनाऑंखिएसँदेखलौं..! मुदालगलेमनमेईहोभेलजेदोहराकऽजँफेरपुछिऐनआजँकहींपहिलुकेजकाँफेरकेतौघोंचभऽजाएततखनतँदोबरमुस्कीसँनेमुस्कीएता।मुदाबाबाकबातोतँताबेधरिनहियेँबुझबजाबेतकपेटसँनिकालिधरतीपरनैरखता।तखन? तखनतँयएहनेजेजहिनाभक्तसोल्होअनाभगवानसँअभक्तहोइतअपनाकेँसमर्पितकेनेरहैएतहिनाकरबबेसीनीकहएत।बजलौं- “बाबा, अहींजखनखेलखेलबैतखनहम–छौड़ा-माड़ैर–सभकीकरबै?” जेनालहकाबंशीकघावमाछकगलफड़मेलगैएवाजहिनावृन्दावनमेगोपीसभकेँकृष्णकबंशीकलगलैनतेनातँयोगीबाबाकेँनइलगलैनमुदाविचारमेकिछु-ने-किछुलावलगबेकेलैन।बजला- “अनुप! तोहरनामे‘अनुप’छहतँएतोरानइकहबहतँकेकराकहबै।” योगीबाबाकविचारसुनिमनथोड़ेकअपनोथीरहुअलगलआथोड़ेकअपनोशक्तिलगाथीरकेलौं।जँसेनइकरितौंतँयोगीबाबाकजोड़-घटावछिऐनकिने, निच्चाँमुहेँअधियाइतघटतआकिऊपरमुहेँबढ़ियाइतबढ़तसेसूत्रजँसुनबेनेकरबतखनतँदिनकानाचरातिमेलालटेनकइजोतेदेखब..! मुदाएतेकरच्छजरूररखलौंजेकिछुबजबेनेकेलौं।जँकिछुबजितौंतँतहीबातकनाँगैरपकैड़योगीबाबाधार-पोखैरमेहेलजइतैथ, मुदानइबजनेएतेतँभेबेकएलजेअपनाफुरनेअप्पनविचारकबातयोगीबाबाबजता।सएहभेल।योगीबाबाबजला- “अनुप, अखनतकतूँगुरुएनेबुझैछहक।” योगीबाबाकमुहसँसोझगरबातसुनि, जहिनापतराएलधारमेमोटाएलधारामिलतेमोटाएलगैए; तहिनायोगीबाबाकविचारसुनिअपनोमनमेभेल।बजलौं- “बाबा, ओहूमेकीकोनोरोख-वृखअछि।” हमर‘रोख-वृख’सुनियोगीबाबाकमुस्कीमेगम्भीरताआबएलगलैन।मने-मनबाबाकचिन्तचिन्तनधारलगपहुँचाविचारदेलकैनजेअनुपप्रशान्तमहासागरमेहेलै-जोकरअखननइभेलअछितँएकिएनेओहनबाटपकड़ादिऐजेजेहेनगतियेचलततेतेसमयमेपहुँचत...।योगीबाबाबजला- “बौआअनुप! गुरुतकतँबुझैछहकमुदासतगुरुनइबुझैछहक।” योगीबाबाकमुहसँखसल‘गुरु’आ‘सतगुरु’आइयेसुनलौं! मुदाअनेरेकिएबेसीलाड़-झाड़झाड़ितौं, सुपुटशब्दमेबजलौं- “नइ।” हम्मरबातजेनायोगीबाबाकमनकेँझमारिदेलकैनतहिनाविचलितहुअलगलैन।मनतेनाविचलितभऽगेलैनजेअपनेधिक्कारएलगलैन।धिक्कारएईलगलैनजेकेतेलोकसमाजमेएहेनअछिजेकर्म-ज्ञानकसंगवर्तमानमेभक्तबनिठाढ़अछि।दुनूकबीचमेजेकरजेदूरीबनलछैओतँअपनाआँखियेसभदेखैए।मुहसँबाजहवानैबाजह। ओना, अपनमनअखनतकयोगीबाबाकठहाकापरलटकलेछलमुदातैबीचदोसरे-तेसरेविचारसभउठिगेल।तहूमेजखनमुहसँखसिपड़लजेगुरुकऊपरसतगुरुनइबुझैछी, तखनउनैटकऽकेनापुछिऐनजेबाबा‘ठहाका’किएमारलिऐ? सभदेखतेछीजेपरिवारमेवृद्ध-वृद्धककीगतिछैन।जैठामसबहकआँखिकनोरपीड़ासँपीड़ितभऽभऽझहैररहलछैनतैठामयोगीबाबाकेनाठहाकामारिरहलाअछि..! मनमेओनाबेर-बेरविचारउमैकजाएमुदातेकरामनेमेजाँतिकऽरखनेरहलौं। योगीबाबाआसमदर्शीबाबा, दुनूएक-बतरियेछैथ, एक्केगामकएक्केटोलकसेहोछैथ, मुदाजेनायोगीबाबाकपरिवारजनठहाकामारिहँसैछैनतेनासमदर्शीबाबाकपरिवारमेनहिछैन।ओना, समदर्शीबाबाअपनेसभदर्शनोकविचारबुझैछैथआसभशास्त्रो-पुराणकसंगसमाजिकरीति-रेवाजसेहोबुझैछैथ।पढ़ल-लिखलसेहोछथिए, मुदानेअप्पनविचारकनेकोनोकोण-ठौरछैन, नेसमाजेकरीति-रेवाजकठेकान-ठौरआकोनोअप्पनजीवनकसंगपरिवार-समाजकरूपगढ़ैकदिशाछैन! जइसँसभकिछुबेठेकानबनलोछैनआबनितोछैन्हें।कहबजेतखनयोगीबाबाकेँगप-सप्पकमिलानसमदर्शीबाबाकसंगकेनारहैछैन? यएहनेसिद्धान्तआबेवहारअछि। जहिनाकियोश्रमिकउत्साहकसंगश्रमकरैतश्रमणबनिआगूबढ़ैएतहिनायोगीबाबाकमनतैयारभेलैन, बजला- “बौआअनुप, पचासबर्खककृषियज्ञमेहमरोयोगरहलअछि।” बजागेल- “एकराकेकाटत।” हमरबातसुनियोगीबाबाकमनमेबीसबर्खपूर्वकबातआगूमेआबिगेलैन।बजला- “बौआ, एकसालतेतेधानअपनो, अपनगामोआअपनाइलाकोमेभेलजेधनमण्डलभऽगेल।लेबालनइरहल।जेतबेमेजेकरबिकाएलसेतेतबेमेअपनधानबेचजानहल्लुककेलक।” बजागेल- “वाह..!” जहिनाखेतककोणलगहरवाहअप्पनहरमोड़िलइएतहिनायोगीबाबाकविचारहमर‘वाह’सुनिमोड़िलेलैन।मोड़ाइतेबजला- “बौआ, पचासबर्खकजिनगीमेकेतेकोरौदीदेखलौं।एक-सलियोरौदीदेखलौं, दू-सलियोदेखलौंआपन-सलियासेहोदेखलौं।देखबेटानइकेलौं, ओहनविपैत्तिकमुकाबलासेहोकेलौं।तइसँआरोजेभेलसेभेलमुदाऑंखितकैतजीबैततँअखनोदेखतेछहकिने।” बजलौं- “बाबा, सुनैछीजेबारहबर्खकरौदीमेजनकजीहरजोतलैनजइमेसीतोभेटलैनआखूबबरखोभेल..!” योगीबाबास्पष्टबजला- “तेहेनरौदीतँनइदेखलौंमुदागामकइनार-पोखैरसुखागेलसेतँदेखबेकेलौं, संगेओकरभोगसेहोभोगबेकेलौं।” अपनोविचारमेजेनाकोनोनवगछुलीकमुड़ीमेकनोजैड़छुटैछैतहिनाकनोजैड़छुटएलगल।बजलौं- “बाबा, ऐबेरकबाढ़िजकाँपहिनौंबाढ़िअबैछल?” रौदीकसंगबाढ़िकचर्चसुनितेयोगीबाबाकमनमेअनेकोगुणाआत्मवलकशक्तिजगलैन।मनकशक्तिजगितेयोगीबाबाबजला- “बौआअनुप, बाढ़िये-रौदीटाकिएकहैछह, केतेझॉंट-बिहाड़ि, पानि-पाथरकसंगछोट-पैघभुमकमकप्रकोपसेहोभोगनहिछी।मुदा..?” योगीबाबाकमुहसँखसल‘मुदा’सुनिअपनोमनमेभेलजेभरिसक‘मुदा’कहिबाबाविपैतसभकेँबिसरएचाहिरहलाअछि।पुछलयैन- “मुदाकीबाबा?” हमरपुछबसँयोगीबाबाकमनठंढाएलइनहोरपानिजकाँठंढाएलगलैन।बजला- “बौआ, आबऐसभघटनाकेँमनपाड़िअनेरेकिएमनकेँतड़पाएब।छोड़हऐसभकेँ।” स्पष्टभऽगेलजेअपनाजनैतयोगीबाबाअपनोभोगलजीवनकेँबिसरएचाहिरहलछैथ, मुदाअपनातँबुझलनहिछलतँएमनमेबेर-बेरजिज्ञासाजगियेरहलछलजेआरोकीसभभेल।पुछलयैन- “बाबा, बिनुबजनेजँछोड़िदेबतखनहमसभ–ऐगलापीढ़ी–केनाबुझब?” हमरबातसुनियोगीबाबाकमनठमकलैन।कने-कालमने-मनविचारकरैतबजला- “बौआ! जेजिनगीबीतगेलआजिनगीकसंगसुखो-दुखोआसमैयोबीतगेल, जेकराभूतोकहैछिऐआअतीतोकहैछिऐ।अतीतेपरठाढ़भेलवर्तमानोचलैए, मुदापुन: घुमिअतीतमेथोड़ेजाएत।यएहअतीतकअनुभव-ज्ञानगुरुरूपधारणकरैए।मुदासतगुरु..?” अदहाबातमाने‘गुरु’केँजानबतँबुझबेकेलौंजइसँमनमेकनीचैनआएलमुदा‘सतगुरु’बुझैकजिज्ञासामनमेतेतेजोरमारलकजेमुहसँअनेरेखसिपड़ल- “की‘मुदासतगुरु’कहलिऐबाबा?” हमरबातसुनियोगीबाबाकमनमेजेनाप्रसन्नताजगलैनतहिनाप्रसन्नहोइतप्रसन्नचित्तसँबजला- “बौआअनुप! वर्तमानकेँबुझब-जानबआबुझि-सुझिचलबे‘सतगुरु’भेला।” योगीबाबाकबातमनमेनीकजकॉंजगहोनेबनौनेछलकिसमदर्शीबाबाउठानहारैतयोगीबाबाकेँकहलैन- “भाय, ईसालनहिखेपब।” समदर्शीबाबाकबातसुनियोगीबाबाकमनमेअनेकोप्रश्नउठिकऽठाढ़भऽगेलैन।चारि-पॉंचबर्खउमेरोमेसमदर्शीछोटअछि, कोनोतेहेनबिमारियोदेहमेनइदेखैछिऐजेबिछानोधरत, तखनएहेनबातकिएबाजलजेऐसालनइखेपब..! योगीबाबाकठहाकाअपनोमनमेठहैर-ठहैरउठबेकरैछलमुदाजखनदूगोरेकबीचयोगीबाबाछैथतखनतँदुनूगोरेकबातनेबुझता।यएहसोचिअपनेचुपचापरही।तैबीचयोगीबाबाबजला- “किएनेईसालखेपबहसमदरसी?” जहिनायोगीबाबाचारिबीघाखेतबलाखेतिहरतहिनासमदर्शीबाबासेहोछैथ।ओना, बीचमेजेदुनूबेटीकबिआहकेलैनतइमेकट्ठापनरहेकरीबजमीनबिकाएलछेलैन, मुदाजिनगियोतँजिनगीछी, जहिनाखेत-बिकाइसँपहिलुकारहन-सहनआचालि-ढालिछेलैनतहिनाअखनोछेबेकरैन।समदर्शीबाबाबजला- “योगीभाय, अखनतकजेबनल-बनाएलजिनगीछलओएकाएकऐसालबाढ़िकचलैतटुटिगेल, ऐगलाकोनोआशानहिदेखरहलछी।” समदर्शीबाबाकसतहीविचारयोगीबाबाकेँसेहोअपनघटितजीवनसँअनुभवछेलैन्हेतँएनीकजकॉंमहसूसभेबेकेलैन।मुदाबाढ़िकपछातिकजीवनमेदुनूगोरेकबीचअकास-पतालकअन्तरजकॉंभऽगेलैन।योगीबाबाबजला- “समदरसी, बाढ़िकजेहेनघटनाऐबेरभेलतेहेनकीकहियोनइभेलछल।केतेकोबेरभेल, मुदामनुखतँसभकिछुअङ्गेजअपनवंश-धारकेँजीवितरखनहिअछिकिने, आकिनहि?” समदर्शीबाबाबजला- “हँ, सेरखनहिअछि।” योगीबाबाबजला- “जहिनातोहरकिगामेकआनलोककआकिइलाके-लोककतँएक्केगतिअछिकिने?” समदर्शीबाबाबजला- “हँ, सेतँअछिए।” धारकपानिजहिनासमुद्रमेमिलितेतुष्टिप्राप्तकरैएतहिनाअप्पनकिसानीजिनगीकधारमेबहैतयोगीबाबाबजला- “समदरसी, खेतमेलगौलजेकिछुस्थायीवाअस्थायीसम्पैत–गाछ-बिरीछ–छल, सभकिछुनष्टभऽगेल।मात्रखेतटाबँचलरहल।अखनजँहमलोककेँकहबेकरबैजेफल्लाँसालएहेनउपजाभेलवाआमेफड़लछल, तइसँअपनभुखाएलपेटकभूखमेटाएत?” समदर्शीबाबामुड़ीडोलबैतकहलखिन- “सेतँनहियेँमेटाएत।” योगीबाबाबजला- “सभआदमीकेँनेअपन-अपनहोशकरएपड़तैजेजीवनधारमेकेनाहेलब?” समदर्शीबाबाबजला- “हँसेतँहोशकरएपड़तै..!” योगीबाबाबजला- “भरिसकअहीबीचमेतूँबेहोशभऽगेलहतँएजिनगीखेपबभारबुझिपड़िरहलछह।मानैछीघटनाभेल, मुदाअप्पनटुटलजिनगीकजोड़ो-जाड़तँअपनेनेकरएपड़त।” मुड़ीडोलबैतसमदर्शीबाबाबजला- “हँसेकरएपड़त।” योगीबाबाअपनजीवनकयोगक्रियाकसंगफसलचक्रदेखबैतबजला- “आइअठारहनवम्बरछी, धानकउपजनइभेलमुदासमयपरगहुमकखेतीतँपकड़ियेलेलौं।गहुमकपछाइतखेरहीहएत, खेरहीकपछाइतआगूसालकधानहएत।” फसलचक्रकयोगनजैरपरपड़ितेसमदर्शीबाबाअवाक्भऽगेला। समदर्शीबाबाकेँअवाक्होइतेयोगीबाबाठहाकामारिहँसला। शब्दसंख्या : 2010, तिथि : 22 नवम्बर 2019 Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०२०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2020 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

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