VIDEHA — Issue 300 / अंक ३००

Publication: VIDEHA · Issue: 300
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३०० म अंक १५ जून २०२० (वर्ष १३ मास १५० अंक ३००) ऐ अंकमे अछि:- २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता (आलोचना) २.२.१.जगदीश प्रसाद मण्डल२.प्रणव कुमार झा गिद्ध” (मैथिली लघुकथा) २.३.१.उमेश मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक व्‍यक्‍तित्‍व ओ कृतित्‍व एक अनुशीलन २.मुन्नाजी-बीहनि कथा-- मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष २.४.मुन्नाजी- किछु बीहनि कथा ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हारक गजल ३.२.संतोष राय ’बटोही’ क दूटा कविता ३.३.प्रदीप पुष्प- दूटा गजल ३.४. मुन्ना जी-गजल Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join Videha googlegroups २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता (आलोचना) २.२.१.जगदीश प्रसाद मण्डल२.प्रणव कुमार झा गिद्ध” (मैथिली लघुकथा) २.३.१.उमेश मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक व्‍यक्‍तित्‍व ओ कृतित्‍व एक अनुशीलन २.मुन्नाजी-बीहनि कथा-- मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष २.४.मुन्नाजी- किछु बीहनि कथ आशीष अनचिन्हार लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता (आलोचना) "सबद" मने शब्द। "मितारथ" मने मितार्थ। श्री कविराज विश्वनाथजी अपन पोथी "साहित्यदर्पण"मे तीन प्रकारक दूतक वर्णन केने छथि ताहिमेसँ "मितार्थ" दोसर प्रकारक दूत अछि आ एकर लक्षण ई जे कम बात कऽ जे ठीक काज कऽ लैत हो। मने कम बातमे बेसी काज। वेदमे एहन ॠचाकेँ धाय्या मानल गेल जे कि यज्ञ कालमे गाएल जाइत कोनो सूक्तमे अतिरिक्त रूपसँ जोड़ल गेल हो। धाय्या मने समिधा सेहो होइत छै "क्रोधाग्नौ निजतातनिग्रहकथाधाय्यासमुद्दीपिते"। समिधा मने fuel सेहो कि तँ सभ तरहँक। प्राचीन कालमे पत्नीक बहुत प्रकारक होइत छलै जाहिमे "महिषी"केँ सेहो धाय्या कहल जाइत छलै ( मूलतः भरण-पोषणक हिसाबें। हमर अनुमान अछि जे "धाय" शब्दक जन्म एही ठामक हएत। "सबद मितारथ धाय्या" अरविन्द ठाकुरजी द्वारा लिखल कविता संग्रह केर नाम अछि। 1 पहिल कविता "सुनू जयद्रथ" अछि। प्रतीक रूपमे जयद्रथक तते ने प्रयोग भेल छै अछि जे एकर उपयोग करए बलाकेँ बहुत सावधानी राखए पड़ैत छै से सावधानी एहि कवितामे नै राखल गेल अछि। एहि कविताक अंतिम किछु पाँति एना अछि-- "सुनू जयद्रथ एहि बेर कृष्णक मायाक मुँह नहि जोहल जाएत शुरू करब अहाँ जँ समर सूर्यास्त धरि प्रतीक्षा नहि करब हम" आन प्रसंग बादमे पहिने तँ हम इएह कहब जे जाहि तेवरक संग ई पाँति अछि ताहिमे हमरा हिसाबें "मुँह" शब्दक उच्चारण सही नै छै। एहि कविताक पाठमे "मूँह" स्वतः एतै। बहुत संभव जे लोक एकरा वर्तनी दोष मानथि मानथि मुदा हम एकरा मैथिली कवितामे लय कोना उपेक्षित होइत अछि तकर उदाहरण मानि रहल छी। आब एहि कविताक पहिल किछु पाँति देखी-- "एकरा काठी जुनि देखायब कि हमर कविताक अनगिनत पृष्ठ सभहक बीच अखनि सूतल पड़ल अछि बारुद" कविताक शुरूआतसँ पाठक बुझैत छथि जे ई कविक अपन मनोभाव छै मुदा अंतिम पाँतिसँ ई बुझाइत छै जे कविक भीतर बैसल अर्जुनक मनोभाव छै आ तँइ हमरा बुझने कविताक शुरुआत ओ अंतमे संबंध नै छै। ई पूरा कविता एही तरहँक अछि। एकटा सकांक्ष पाठक लेल ई कविता साधारण हएत तँ साधारण पाठक लेल जटिल। दोसर कविता "हम हत्या करय चाहै छी" केर सभसँ नीक बात जे ई कविता कोनो स्थूल नायक लेल नै लिखल गेल अछि। ई कविता विभिन्न प्रवृतिपर लिखल गेल छै। आब ई अलग बात जे विभिन्न प्रवृति एकै नायकमे हो वा कि अलग-अलग नायकमे। ई तरीका कोनो कथनकेँ कविता बना दै छै खास कऽ ओहन स्थितिमे जखन कि कविता गद्यात्मक हो। एहि कविताक नकारात्मक पक्ष ई जे कवि हत्या करबा लेल तते ने व्यग्र छथि ( भने ई व्यग्रता चरम दुखसँ हो) जे ओ विभिन्न प्रवृतिकेँ साँप बनि सेहो डँसबाक लेल तैयार छथि। बदला लेबाक कोनो तरीका जायज भऽ सकैए मुदा कविसँ हम कहबनि जे साँप बनबाक क्रममे जहर तँ हुनकोमे आबि जेतनि तँइ बदला लेबाक लेल साँप बनबाक तरीका हमरा उचित नै बुझाइए। तेसरसँ सातम कविता इनार सिरीज अछि। वस्तुतः कविता संग्रह हम एहीठामसँ शुरु मानैत छी। मितार्थ एहिठाम पहिल बेर आएल अछि। इनार-1 मे वैष्णव सन शांतिप्रिय विरल ओ बहुअर्थी अछि। इनार-2 मे इनारक लालाटपर जे लिखल छै से वस्तुतः इनारपर नै आजुक आर्थिक परिवेशमे कमजोर लोकक ललाटपर लिखल छै। इनार-3 मे "अनठीया बेंग", "रक्तहीन क्रांति" आ "ढोरिया साँप"क प्रयोग कविताकेँ अलग दिशामे लऽ जाइत अछि जाहि ठामसँ प्रवासक चिंता सामने अबैए। इनार-4 कविता एहि सिरीजक कमजोर कविता अछि कामी पुरुषक दोष इनारपर नै थोपल जेबाक चाही। इनार-5 अकादेमी राजनीतिकेँ देखार करैए मुदा एहि कविताकेँ आर धरगर बनाएल जा सकैए। "अलिखित कविता सभहँक पक्षमे" नामक कवितामे ओहन साहित्य सभकेँ अकानल गेल अछि जे कि मुद्रित नै भऽ सकल, अथवा पुरस्कृत नै भऽ सकल। ई नीक गप्प मुदा ईहो कविता अपन बात मुद्रित भैए कऽ कहि रहल अछि। बहुत संभव जे भविष्यमे पुरस्कृत सेहो भऽ जाए। किछु दिन पहिने रवीश कुमार नामक हिंदी टी.वी पत्रकार सेहो टी.वीक माध्यमे बजैत छलाह जे टी.वी नै देखल जेबा चाही। खएर माध्यम जे हो वंचितक पक्षमे बाजब बेसी जरूरी छै। "बुद्धिबोर्धलक्षणा" नामक कवितामे कवि टी.वी चैनल आ अपन पोतीक माध्यमे स्क्रीनक पाछूक अन्हार देखेबाक प्रयास केलाह अछि। एहि कविताक नीक पक्ष ई जे आन कवि जकाँ जबरदस्ती नै देखने छथि। कवि ई स्वीकार करै छथि जे आने जकाँ हमर पोती सेहो एहि अन्हारमे फँसल अछि मुदा कविकेँ उम्मेद छनि जे एक दिन हमर पोती एहि अन्हारकेँ जरूर जानत। जँ हम पोती बदला पाठक पढ़ी तँ ई कविता आन अर्थ दिस लऽ जेबामे सेहो सक्षम अछि। "हलफनामा" कविता मैथिलीक आधुनिक कविताक सर्वथा विपरीत अछि आ एकरा हम बहुत नीक मानै छी। एहि कविताक माध्यमसँ कवि मम्मट (प्राचीन आचार्य)केँ नकारै नै छथिन बल्कि मम्मटक विचारसँ आगू बढ़ए चाहै छथि। मैथिलीक कथित प्रगतिशील कवि अरविन्द ठाकुरकेँ पारंपरिक आ जड़ कहि सकै छथिन कारण ई कथित प्रगतिशील सभ बिना जड़िक नवीनता चाहै छथि। एहि कवितामे जे सत्तामे कील ठोकबाक बात कहल गेल छै ताहि लेल बहुत कथित प्रगतिशील कवि अरविन्दजीकेँ साधुवाद देताह मुदा हमर अनुभव ई अछि अधिकांश कविक लिखल क्रांति पोथिए धरि रहि जाइत छै मुदा आलोच्य कविक तेवर जे कवितासँ बाहर रहल अछि ताहिसँ उम्मेद जरूर जागल अछि जे ई कवि सत्ताक माथमे कील जरूर ठोकताह। "बुद्धिजीवी सन ओ-1" नामक कवितामे कवि कोनो सुनिश्चित आशंकासँ दहलल ओ सिहरल छथि मुदा एकटा पाठकक तौरपर हम ई कहब जे जँ कविक आशंका सच भेल तँ कविकर्म लेल सौभाग्यदायक रहत। मितार्थ फेर आएल अछि "बुद्धिजीवी सन ओ-2" नामक कवितामे। भारतीय समाजमे बहुधा देखल जाइए जे कुकुरक अवशेषपर मजार अथवा गहूँम आदि अँकुरा कऽ मंदिर-मजार बना देल जाइत छै। एहि कवितामे "लाल लंगौटी" अपन एही अर्थमे अछि। जेना किछु दबंग उपरोक्त विधिसँ मंदिर-मजार बना अपन आय निश्चित कऽ लैत अछि जेहिते किछु बुद्धिजीवी अपन पिता-संबंधी-गुरूक ओ नायाब लाल लंगौटी पहीरि बुद्धिजीवी बनि अपन नाम-इनाम निश्चित कऽ लैत अछि। जरूरी नै जे ई लाल लंगौटी मात्र बुद्धिजीवी पहिरै छथि सत्ता ओ बेपार दूनूमे इएह लंगौटी पहिरल जाइए। मैथिली कविताक इतिहासमे "लाल लंगौटी" प्रतीक विरल अछि। "हमर चेहरा पर हिंदुस्तान" नामक कवितासँ हम प्रभावित नै भऽ सकलहुँ आ ई हमर सीमा सेहो भऽ सकैए। जरूरी नै छै जे माथपर टोपी, गट्टामे ताग आ कन्हापर किछु रहत तखने अहाँ सर्वधर्म समावेशी कहाएब। महात्मा गाँधी बिना ई सभ केने सर्वधर्म समावेशी छलाह एवं आजुक नेता ई सभ कइयो कऽ कट्टर छथि। "मुंबइमे स्वतंत्रता दिवस-1 एवं 2" नामक दूटा कविता अछि जकरा जोड़ि कऽ एकै कविता बूझब जरूरी बुझाएल हमरा। एहि दू कवितामे कवि अपन आ रेलिंगपर चहचहाइत फुद्दी बीचक स्वतंत्रताक वर्णन केने छथि आ अपनासँ बेसी स्वतंत्र फुद्दीकेँ मानै छथि। आगू बढ़बासँ पहिने हम पाठककेँ हिंदीक उपन्यास "चित्रलेखा" केर ओ अंश पढ़ए कहब जे कि नायक बीजगुप्त आ सहनायिका यशोधराक बीच भेल छै। कविए जकाँ यशोधरा सेहो कहै छथिन जे चिड़िया सभ कतेक आनंदसँ रहैत अछि ताहिपर बीजगुप्त कहलखिन जे चिड़िया सभ सेहो इएह सोचैत हेतै जे देखियौ आदमी सभ कतेक सुख-सुविधासँ रहैत अछि। आ ई नमहर कथन छै से देब अहिठाम संभव नै। कविकेँ एहि दुनियाँमे कतेक स्वतंत्रता भेटल छनि सेहो आकलन करब जरूरी। "वाहक महान घटनाक" नामक कविता किनको चरित्रगत खसबाक प्रक्रियापर अछि आ से नीक अछि मुदा किछु पाँति बेसी बेर एलाक कारणसँ प्रभाव कम भेलैए-- "सोचय छी सोचैत रहै छी उठबाक हुअए कूबत त खसैक खतरा मोल लएमे कोनो बुराइ नहि" ई पाँति सभ कवितामे दू बेर प्रयोग भेल अछि जे कि प्रभाव कम करैत छै। समझ कवितामे आएल भाव जे "केकरो बुझाबक लेल कनियों ओकरा सन होमए पड़तै" ताहिसँ हम सहमत छी। "अन्यपुरुष" केर नामसँ 5टा कविता अछि। अन्यपुरुष-1 मे कांता, प्रभु, आ सुहृद ई तीनी शब्द एहि कविताक जान अछि जकर फैलाव निच्चासँ उपर धरि होइत अछि क्रमशः "सेक्ससँ सेंसेक्स" आ "शिलाजीत-मुसली" धरि पहुँचैत अछि। ओना हम कनी-मनी आयुर्वेद शास्त्रक जानकारी राखैत छी तँइ हम पाठककेँ कहबनि जे शिलाजीत-मुसली-अश्वगंधा मात्र यौन रोग लेल नै समान्य दुर्बलता हटेबाक लेल सेहो देल जाइत छै तँइ एहि सभहँक अर्थ मात्र यौने रोग धरि नै राखथि। अन्यपुरुष-2 ब्राह्मणवाद विरोधी कविता अछि आ एहन समयमे एहने कविता लिखल जेबाक चाही। जे लोक ब्राह्मण आ ब्राह्मणवादकेँ एकै बूझै छथि तिनका लेल ई कविता पढ़बा योग्य नै अछि। अन्यपुरुष-3 नामक कविता दरभंगाक भूतपूर्व मठाधीशक वर्तमान पुत्र सभ लेल लिखल गेल अछि कि 60 बर्खमे किछु नै भेलै से प्रलाप करए बला राजनीतिक दल लेल से कहब कठिन अछि मुदा मितार्थ एहिठाम चरमपर अछि आ तकर परिणित अन्यपुरुष-4मे भेटत। अन्यपुरुष-4 नामक कविताकेँ हम वास्तु ओ ज्योतिषक किछु समान्य शब्दक माधयमसँ देखाएब। वास्तुमे दिशा तँ ज्योतिषमे ग्रह केर प्रधानता छै। वस्तुक हिसाबें हरेक दिशा लेल देवता आ ग्रह निर्धारित छै जकर विवरण निच्चा अछि-- उत्तर दिशा-देवता कुबेर, ग्रह बुद्ध ईशान दिशा (उत्तर-पूर्व कोना) देवता शिव, ग्रह वृहस्पति पूर्व दिशा-देवता इंद्र, ग्रह-सूर्य आग्नेय दिशा (पूर्व-दक्षिण कोना) देवता अग्नि, ग्रह-शुक्र दक्षिण दिशा-देवता यम, ग्रह मंगल नैऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम कोना) देवता राक्षस, ग्रह राहु-केतु पश्चिम दिशा-देवता वरुण, ग्रह शनि वायव्य दिशा (उत्तर-पश्चिम)-देवता वायु, ग्रह चंद्र ऊर्ध्व -देवता ब्रह्मा, ग्रह उल्लेखित नै अधो-देवता शेषनाग, ग्रह उल्लेखित नै ई कविता ईशान दिशा (उत्तर-पूर्व कोना) कोनसँ शुरू होइत अछि। एहि कोनक देवता शिव छथि ग्रह गुरू जे ज्ञानक प्रतीक छथि। एकर बाद वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा अछि जकर देवता वायु छथि आ ग्रह चंद्र जे कि गुरूक पत्नी संग व्यभिचार केने छथिन। एकर बाद नैऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम कोना) अछि जकर देवता राक्षस ओ ग्रह राहु-केतु छथि। राहु-केतु चंद्रक दुश्मन। जँ राजनीतिकेँ मानी तँ दुश्मनक दुश्मन दोस्त होइत छै अर्थात बृहस्पति आ राहु-केतु दोस्त भऽ सकै छथि चंद्रक विरुद्ध। मुदा ई बृहस्पतिसँ शुरु कएल ई कविता आग्नेय कोन धरि नै पहुँचि सकल आ एकर कारण थिक जे आग्नेय कोनक ग्रह शुक्र छथि आ बृहस्पति ओ शुक्र दूनू दुश्मन दूनू दू ध्रुव। अकारण नहि जे कवि अपन कविताकेँ अध-सीझल कहै छथि। ई कविता विशुद्ध रूपसँ लोकक अपन मानसिक द्वंदक व्याख्यान कहैए। कविता अन्यपुरुष (5) मे सहज-सरल रहबाक कामना छै मुदा सहज-सरल रहब एते सरल कहाँ छै। "जँ अहाँ गुरू छी" ई कविता स्थूल भऽ गेल अछि। साफे-साफ पता चलि जाइत छै जे ई गुरूघंटाल सभपर लिखल गेल छै। एहि कविताक अंतिम पाँति अधिकांशतः फूसि थिक। असली चेला कहियो गुरू छोड़ि इजोत दिस नै जा सकै छथि। असली चेला रूकल रहै छै गुरुक वध कऽ गुरूआइक आसन लेल। लाल लंगोटी कविता मोन पाड़ू। "उन्टा साँस लैत लोक आ विद्यापति" एहि विषयपर बहुत विचार विभिन्न विधामे आएल अछि आ भरिसक तँइ प्रभावति नै कऽ सकल हमरा। पृष्ठ 49 सँ 61 धरि 11 टा कविता दरभंगाक विभिन्न भंगिमापर अछि मुदा काजक कविता मात्र पहिल कविता (दरभंगा राज आ ओकर विरासति) अछि। दरभंगापर दोहा सेहो अछि। किछु दोहामे मात्रा ओ यति-गति सही अछि मुदा किछुमे गड़बड़। "सहज सुमति माँगलनि विद्यापति" ईहो कविता सहज-सरल विषयपर अछि। हमरा विचारे ई कविता "अन्यपुरुष-5 सँ नीक अछि। आब फेर आएल अछि मितार्थ। दुर्योधनक कनियाँक नाम रहनि भानुमती आ भानुमती केर प्रयोग करैत 16 टा कविता अछि पृष्ठ 64 सँ 82 धरि। "तिरहुत आ भानुमती" नामक कवितामे मिथिलाक कथित महानता ओ मान्यतापर आक्षेप कएल गेल अछि। आ एकटा नमहर बहसक माँग करैत अछि। एहि कवितामे जँ "रिंग लीडर" शब्दक बदला "किंग मेकर" रहितै तँ बेसी नीक। "भानुमतीक लिंग" नामक कवितामे मितार्थ जुत्ता पालिशसँ चंडी पाठ धरि कऽ रहल अछि। कवि लेल भानुमतीक लिंग चाहे जे हो मुदा एकटा पाठकक तौरपर हमरा लेल भानुमतीक लिंग "गरीब आ प्राइभेट" नौकरिहारा अछि। पाठक समुदाय एहि कविताकेँ पढ़िए कऽ मजा लऽ सकै छथि। "भानुमती आ चुनाव" नकली वामपंथी सभपर अछि जे चुनाव वा आर कोनो तात्कालिक फायदा लेल अपन पुरुखाकेँ गरिआबैए। आ कविक मोताबिक भानुमती चुनाव लड़बा लेल एहन करैए। ओना बहुत बेर भूतकालक गलतीकेँ उजागर करबाक प्रक्रियाकेँ गरिआएब वा उकटब बूझि लेल जाइत छै। पाठक एहि कवितापर बिलमि एहि बिंदुपर सोचथि। "भानुमतीक पुश्तैनी क्रम" वस्तुतः एकट्ठे हमरे सभहँक क्रम अछि। ई कविता मितार्थक अद्भुत नमूना अछि। "भानुमतीक हँसब" एहि कवितापर जाएसँ पहिने हमरा एकटा लोककथा मोन पड़ल। एकटा गरीब बच्चा कोनो राजा लग सभ दिन जाइक आ राजा ओकरा लग सोना आ चानीक सिक्का राखि दै ओ बच्चा चानीक सिक्का उठा चलि दै। राजा ओ दरबारी से देखि हँसै जे देखियौ केहन निर्बुद्धि छै जे सोना रहितो चानी उठबै छै। एक दिन ओकर माए वा बाप पुछलकै जे सोना किए ने उठबै छीही तँ ओ बच्चा जबाब देलकै जे जहिया हम सोना उठा लेबै तहियेसँ ई खेल खत्म भऽ जेतै। तँइ हम मूर्ख बनि चानी उठा लैत छी। आब कवितापर आबी। कविताक अंतिम पाँति अछि "हँसी सन पवित्र वस्तुओ भानुमती सन चंगला लग आबि धंधा भऽ जाइत अछि। आ एहिठाम आबि पाठक बूझि सकै छथि जे कवि कोन खेलक रचना कविता माध्यमसँ केने छथि। एहि कवितामे भानुमती कियो भऽ सकैए लोकथाक बच्चा सेहो, गरीब सेहो आ चमचा सेहो। बेसी बुझबाक लेल पाठक कविता पठथि। "भानुमतीक उत्स" हम एहि कविताकेँ दू भागमे बाँटब। पहिल--- "गाछक जड़ि..........कंठस्थ कए उदरस्थ कएने अछि" आ दोसर- " जखनि कखनिओ उठैत अछि-----एकाकार भऽ जाइत अछि भानुमतीमे"। हमरा हिसाबें पहिले भाग कविता अछि। दोसर भाग एहि रचनाकेँ एकपक्षीय बना देलकै। जँ कवि एहि रचनाकेँ पहिले भागपर खत्म करतथि तँ ई दुनियाक हरेक भानुमतीक प्रतिनिधित्व करितै ओतबे शब्दमे मुदा एकर दोसर भाग आबि एहि रचनाकेँ एक भानुमतीपर केंद्रित कऽ कमजोर बना देलकै। "कवि भानुमती" नामक कविता जाहि विषयपर अछि ताहिपर बहुत रास व्यंग्य, चुटकुला आदि रचल जा चुकल अछि। आ प्रस्तुत कविताक शिल्पो तेहन नै जे आकृष्ट करए। "भानुमती आ काछु" नामक कविताक वएह दिक्कत जे ई दू भागमे अछि आ मात्र पहिले भाग कारगर अछि (काछु चारि इंचक-----कतेको साल तक)। जँ एहि कवितासँ दोसर भाग ( एहि धरतीपर---अपसियाँत भेल अछि भानुमती) हटा देल जाए तैयो एहि कविताक अभीष्ट पूरा भऽ रहल छै। "भानुमती आ घोंघा" नामक कवितामे भानुमतीकेँ घोंघा अपन लोक बुझाइत छै कारण घोंघेक दाँत सन भानुमतीक दाँत छै जाहिसँ ओ दुनियाँक हरेक वस्तुक भक्षण कऽ सकैए। "भानुमतीक चिन्ता" ईहो कविता दू भागमे अछि आ हमरा हिसाबें एकर पहले भाग (नवकी बहुरिया बिना गहना... नहि जीबि सकैत अछि किन्नहुँ) कारगर अछि आ एकर दोसर भाग (परम बूड़ि अछि ई प्रधानमंत्री...चिन्ताक हमशकल भेल भानुमती) एहि कविताकेँ एकपक्षीय बना दैत छै। "भानुमती आ समाजिक न्याय" एहि कवितामे भानुमती ओहन लोकक अवतारमे अछि जे लोकतंत्रमे समतावादकेँ पचा ने सकल। कविताक अंत एहिसँ होइत अछि जे तमाकू खाएब राड़-रोहियाक अमल छै आ एहिसँ हम ई मानैत छी जे कवि 95 कथित ब्राह्मणकेँ राड़-रोहिया मानै छथि एहि अमलक कारणे। "कापरेटिभ भानुमती" नामक कवितामे भानुमती जोगाड़ीक रूपमे अछि। आब ई जोगाड़ी कोनो क्षेत्रमे पहुँचि सकैए। पाठक अपन क्षेत्रक हिसाबें एकर व्याख्या कऽ सकै छथि। "इतिहासवेत्ता भानुमती" ई कविता भानुमतीक ओहन रूपपर अछि जाहिमे ओ अतीतजीवी बुझाइत अछि। मुदा जेना-जेना कविता अंत दिस बढ़ैत अछि तेना-तेना बुझबामे आबि जाइत छै जे भानुमती अतीतक आवरण वर्तमानक अपन स्वार्थपूर्ति लेल केने अछि। एहि कवितामे मितार्थ चरमपर अछि। भानुमतीक ई रूप कोनो राजनीतिक दल सेहो लऽ सकैए। "भानुमती आ खबासी" ई कविता मठ ओ मठशिष्यपर अछि। कविताक अंत एना अछि "जखनि जखनि नेत्रपट खोलताह / श्री कृष्णरूपी मठाधीश/ तँ पहिने देखथिन ओकरे युधिष्ठिर रूप" मुदा ई तथ्य तँ दुर्योधन-अर्जुन ओ कृष्णक बीचक छनि एहिमे युधिष्ठिर कोना एलाह से शोधक बात। बहुत संभव जे भावनामे बहि गेल हेता कवि। वा ईहो भऽ सकैए जे आर आन कोनो मिथक हेतै जे कि हमरासँ छुटि गेल हो। पाठक एहि कविताक एहि मिथकपर धेआन राखथि। "भानुमती आ बतहबा" ई कविता भानुमतीक ओहन रूपपर अछि जे कि कोनो अवसरपर किछु पाँति मैथिली बाजए बलाकेँ देवता मानि लैत अछि। पाठक एकर विस्तार कोनो संस्थाक वार्षिक आयोजनसँ लऽ कऽ चुनावी सभा धरि कऽ सकै छथि। "अयनामे भानुमती" एहि कवितापर एबासँ पहिने विश्व साहित्यमे अंतरात्माक अवाज देखी तँ पता लागत जे जे मात्र किछुए नीक लोक अपन अंतरात्माक अवाज सुनि सकलथि आ बहुत खराप लोक अपन अंतरात्माक अवाजकेँ अनठा देलाह। एखनो वएह स्थिति छै आ बादोमे वएह रहतै। एहि कवितामे भानुमतीकेँ सेहो आयनामे आएल अपने रूप पसंद नै पड़लै। बात पुरान छै मुदा कहबाक शैली नव, इएह एहि कविताक विशेषता भेल। "सूर्यकेँ चिन्हह भानुमती" नामक कवितामे कवि भानुमतीक डर दूर कऽ रहल छथिन मुदा कोन डर से अज्ञात अछि। समान्यतः डर वा तँ शारिरिक कमोजरकेँ होइत छै वा नैतिक कमजोरकेँ। भानुमती कोन तरहक कमजोर अछि से पाठक अपना समयपर जानि सकताह। "जाउ महाप्रकाश" एवं "कुमार शैलेंद्र" संस्मरणपरक कविता अछि आ मैथिलीमे एहन कविताक आवश्यकता छै। "प्रतकेँ मुक्ति चाही" ईहो कविता कुमार शैलेंद्रजीपर केंद्रित अछि मुदा एहि कविताक किछु पाँति पूरा संसार लेल बनल अछि-- "आब किन्तु मरलाक बाद पछताइत छी / जीवैतमे कयल अपन ओहि करनीपर" "जीवित प्रेत सभहक बनायल छल-छद्मक चक्रवातमे नहि फँसू" "मानसिक खबासीक महापात्रीय मकड़जालसँ मुक्त होउ"................. आदि। "श्रीमान् कपरगर" नामक कविता ओहन चरित्रपर लिखल गेल अछि जनिक बाहरी आवरण चिक्कन-चुनमुन मुदा भीतरक आवरण छल-छद्मक छनि। जेना जीवन बिंदुसँ बिंदु धरिक यात्रा अछि तेनाहिते ई कविता कपरगरसँ कपरजरू धरिक यात्रा अछि। "शहादत" कविता बुझबाक लेल कुंडलिनी योग बुझए पड़त कारण एहिमे एहि योगसँ संबंधित शब्दावलीक प्रयोग भेल अछि। मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र। मूलाधार चक्र सभसँ नीचा होइत छै आ सहस्रार सभसँ उपर। ई चक्र सभ पीठक पाछू रीढ़क हड्डीमे होइत छै। एहि कवितामे कविक बिंदु विसर्ग (सहस्रार)पर एकटा मच्छर बैसि जाइन छनि आ कवि ओकरा आज्ञा चक्रक, विशुद्धि चक्रसँ खेहारैत मणिपुर चक्र लग ओहि मच्छरकेँ मारि दैत छथिन। कविकेँ आशंका छनि जे ई मच्छर हुनके स्वाधिष्ठान चक्रक कोनो कीड़ा छलनि। कुंडलिनी साधाना नीचासँ उपर होइत छै मने मूलाधार जागरण करैत साधक सहस्रार धरि पहुँचै छै। एकर मतलब ई जे जेना-जेना साधनाक ज्ञान उपर बढ़ैत छै तेना-तेना अज्ञानता नीचा घटैत छै। जँ एहि कवितामे मच्छरकेँ अज्ञानता-दुर्गुणक प्रतीक मानी तँ ई सूचित होइए जे ओ नीचाक दू चक्र धरि नहि पहुँचि सकल आ अप्रत्यक्ष रूपसँ ई देखबैए जे साधक केर साधना एखन दू चक्र धरि उपर नहि पहुँचल अछि मने साधक एखन विशुद्धि चक्रपर जा कऽ अटकल छथि हुनका एखन आज्ञा चक्र ओ सहस्रार चक्रक भेदन करए पड़तनि। योगी सभहँक मोताबिक विशुद्धि चक्र कंठक पाछू होइत छै। आ एकरा भेदन कऽ देलासँ अपार उर्जा भेटैत छै। साहित्य केर हिसाबसँ देखी तँ साहित्यमे बिना रीढ़ बला सभ साहित्यकार बेसी भेटताह तेहन स्थितिमे प्रस्तुत कवि ई साबित केलथिहए जे हम रीढ़क हड्डी मामिलामे पाँचम चेतना स्तरपर छी। योगक मोताबिक सांसारिक आदमी मूलाधार चक्रमे जीबि मरि जाइत छै तेनाहिते साहित्योमे साहित्यकार बिना रीढ़क हड्डीक मरि जाइत छै।"चेत सम्हार" कविता मैथिली भाषा मध्य विजातीय शब्दक घुसपैठकेँ रेखांकित करैए आ कवि ताहि लेल अपने घरक उदाहरण देलथि ई एकटा नीक पक्ष भेल। अपना ओहिठाम तँ सभ अपने घरकेँ बारि अनका घरक उदाहरणसँ शुरू करै छथि। "नागफनी पंडित" एहन कविता मैथिलीमे लगातार एबाक चाही। प्रायः जीवकांतजीक बाद कियो एहि तरहँक कविता नै लीखि पाबि रहल छथि। ई कविता कवि ओ प्रकृतिक बीच मौन संवाद अछि। "हम कए रहल छी गीर्वाण नृत्य" "हम कए रहल छी गीर्वाण नृत्य" एहि कवितामे प्रयुक्त शब्द गीर्वाण केर मतलब छै "देव-देवता" मने कवि देव नृत्य कऽ रहल छथि मुदा किए? प्रस्तुत कवितामे कवि सुगंध, स्पदन, तरलता आदि जमा कऽ रहल छथि, विश्वामित्रसँ नव-नव रचबाक प्रेरणा लऽ रहल छथि। अधम-निकृष्ट आदिकेँ बाहर फेकि रहल छथि आ कवि अपन आंतरिक आनंदमे मग्न छथि स्वाभावतः एहन परिस्थितिमे कवि देवे-नृत्य करताह मुदा की देवता नीके छलाह? जँ पौराणिक कथा सभ देखबै तँ देवि-देवताक छल-छद्म सभ सामने आबि जाएत तखन ई गीर्वाण नृत्य छल-छद्मसँ दूर कोना रहत। एकर विपरीत बहुतो एहन मानव भेटत जे छल-छद्मसँ दूर रहि नैतिकतामे देवतोसँ आगू गेलाह। कविसँ आग्रह जे धरतीपर सहज-सरल मानव नृत्यक आयोजन करथि ओ। "कविता लिखैत गेलहुँ" नामक कवितामे कवि अपन लिखबाक कारण दै छथि। ओना तँ सभ कवि कविता लिखबाक कारण मोनक शांति-आत्मसुख गनबै छथि। प्रस्तुत कविक मनोभाव एहने सन छनि जे हम हलाहल पिबैत गेलहुँ आ कविता लिखैत गेलहुँ। एकटा भिन्न कविताक रूपमे ई साधारण कविता अछि मुदा जखन अहाँ एही कविता संग्रहक दोसर कविता "हम हत्या करय चाहै छी"सँ जोड़ि कऽ देखबै तँ सुखद अनुभूति हएत। आखिर जे कवि शुरूमे हत्या करए धरि उताहुल छलाह से अंतमे आबि कहै छथि "पीबैत गेलहुँ सभटा हलाहल/ कविता लिखैत गलहुँ/ छोड़ैत गलेहुँ सभटा प्रमाण"। नकारात्मकसँ सकारात्मक दिस एबाक संकेत अछि। "दृष्टि"। राजस्थान उच्च न्यायालयक न्यायाधीश महेश चंद शर्मा द्वारा बयान देल गेल छल जे मजूरक नोर पीबि मोरनी गर्भवती होइत छै। पक्षी विशेषज्ञ सभ एकरा गलत कहलाह। बहुत संभव जे शर्माजी जनमानसमे पैसल भ्रमकेँ अपन बयान बना लेलाह। "दृष्टि" कवितामे कवि सेहो मोरनीक संबंधमे एकटा बात कहला जे ओ अपन पएरक कुरूपता देखि खूब कनैत छै। मिथिला क्षेत्रमे कियो पक्षी विशेषज्ञ हेताह तँ कहियो एहिपर अपन मंतव्य देता। ओना कोनो वस्तुक सुंदरता स्थिति आ ग्रहण करबाक क्षमतापर निर्भर छै आ ई बात सच छै से हमहूँ मानैत छी। "टिमटिम" ई कविता जतबे केकरो प्रयास, संघर्ष, जीजिविषा आदिकेँ देखार करैत अछि ओतबे सुविधा, षड्यंत्र, ईर्ष्या आदिकेँ सेहो। मुदा प्रश्न ई जे ई बात सभ जनितो दीप असावधान ओ आश्वस्त किए रहैए? "तीनहि टा कविता" कवि अपन पुत्रपर केंद्रित कऽ लिखने छथि। "धन्य कुशहा" ई कविता 18 अगस्त 2008मे आएल कोशी बाढ़िपर अछि। कोशी बाढ़िपर बहुत साहित्यकार द्वारा लीखल गेल अछि ताही सिरीजक एकरो बूझू। एहि कविताक मर्म वएह बूझि सकत जे कि बाढ़ि देखनो हो आ से प्रायः सभ मैथिल देखिते छथि। "बड़की माँक बक्सा" कविता संभवतः दाइ वा बड़की काकीपर रचित अछि। तेनाहिते "माँ देलनि ओलहन" माए केंद्रित कविता अछि। पहिल कवितामे कवि अपन बचपन लेल औनाइत छथि तँ दोसर कवितामे माए केर ओलहनसँ हुनक रचना संसारमे कोना वृद्धि भेल तकर वर्णन अछि। "टाइगर हिल पर सूर्योदय" ई कविता भ्रमण कविता अछि। मुदा अंत धरि अबैत कवि एहि कविताक माध्यमसँ अपन पिताक स्मरण कऽ लै छथि। "हमरा नहि छल बूझल" कविता मोह भंगक कविता अछि। से मोह भंग चाहे जीवनक हो, सुख-सुविधाक हो। एहि कविताक अंतमे कवि एक बेर फेर अपन बचपन लेल औनाइत देखल जाइत छथि। "आयु, अंक, अभिलाषा आ जीव" कविता आशा केर कविता अछि। कवि कोनो हालतिमे निष्क्रिय नै रहए चाहैत छथि। "अहाँ उठू, जागू" कविता कवियत्री प्रतिभा लेल अछि मुदा लागू हरेकपर होइत अछि। "विदा कालमे" ई कविता कवि अनाम मुदा चिन्हार लेल लिखने छथि। कवि ओहि अनामकेँ चीन्है छथिन ओकरा बारेमे किछु स्वीकार करए चाहै छथिन मुदा लीखि कऽ नै। ई कविता कविक क्षण-विशेषक कविता होइते सभहँक कविता अछि। सभहँक जीवनमे एहन समय आबै छै जखन ओ बहुत किछु कहए चाहै छै मुदा से कहि नै पाबैत छथि। एहन कविता मैथिलीमे बेसी लिखल जेबाक चाही। "स्मृति मित्र अछि" कवितामे कवि स्मृतिसँ मैत्री करबाक सलाह दै छथि। कहै छथि "समृतिमे हम सभ/ बीतल घड़ीकेँ फेरसँ जीबैत छी/ बेर-बेर जीबैत छी"। मुदा ई अनुभवसिद्ध गप्प अछि जे अवस्था भेलापर स्मृति बेसी जरूरी भऽ जाइत छै युवाक मोकाबिलामे। अतीतजीवी सेहो स्मृतिक मित्रे होइत छथि। "खांहिस" कवितासँ पहिने हमरा शिकायत छल जे एहि संग्रह किछु कविता दू भागमे बाँटि देल गेल अछि जाहिमे ओकर पहिले भाग कारगर अछि। मुदा ई कविता "खांहिस" एकै भागक छोट कविता अछि आ अपन अर्थ देबामे समर्थ अछि। ई कविता कविक नास्तिक स्वरक अछि मुदा कवि एहि शर्तपर आस्तिक बनि सकै छथि जे केकरो वैधानिक संग हुनका अगिला जन्ममे सेहो भेटनि। एहि कवितासँ ईहो पता चलैए जे कविक अभीष्ट कवि लेल बहुत महत्वपूर्ण छनि अन्यथा के अपन वैचारिकताकेँ छोड़त। एहि कविताक दोसर अर्थ ईहो भऽ सकैए जे जँ अभीष्ट पूरा हो तँ वैचारिकताकेँ छोड़ल जा सकैए मुदा एहि कवितामे आएल "वैधानिक" शब्द कविताकेँ नैतिक उर्जा दैत अछि। "दू मित्र" कवितामे एकटा मंच भोगी तँ दोसर एकांत सेवी छथि। मंचभोगीक मोकाबिलामे एकांत सेवीक क्रियाकलापसँ साबित होइए जे दोसर बेसी संवेदनशील छथि आ असल कविता लेल इएह संवेदनशीलता चाही। "बजारसँ घुरैत काल" जँ पाठक एहि कवितामे आएक शब्द बजारक बदला जीवन पढ़थि तँ अर्थविस्तार हएत। बजारक हवा जँ गूँह-मूत-घामसँ गन्हाइत अछि तँ जीवन विभिन्न कुकर्मसँ। एहि कविताक अंत ओतेक समाधनल नै अछि। "जँ अहाँ कवि छी" नामक कवितामे कविक मंतव्य छनि जे वृद्धावस्था अबिते शारिरिक तौरपर लोक कमजोर होइत अछि मुदा जँ कियो कवि छथि तँ ओ मानसिक तौरपर बलगर भऽ जाइ छथि। बहुत संभव जे एहन होइत हो मुदा मैथिली भाषामे कतेक ताहि प्रश्नपर मंथन करब उचित। ई कविता एहि संग्रह अंतिम कविता अछि। 2 मैथिली भाषाक परंपरानुसार विभक्ति सटबाक चाही, मैथिलीक सहोदरी भाषा (सहोदरी शब्द राजनैतिक बला नै)मे सेहो विभक्ति सटै छै,, एतए धरि जे गीता प्रेस, गोरखपुरसँ प्रकाशित सभ हिंदी किताबमे सेहो विभक्ति सटल रहै छै। प्रस्तुत संग्रहमे "पर" छोड़ि सभ विभक्ति मूल शब्दमे सटल अछि मुदा पता नै किए "पर"केँ छोड़ि देल गेलै। बहुत लोक मानै छथि (हमरा सहित) जे रचना सहज सरल भाषामे हेबाक चाही तँ बहुत लोक क्लिष्ट भाषाक प्रयोग सेहो करै छथि। ओना ई तँ निश्चिते कहल जा सकैए जे क्लिष्ट भाषाक एकटा फायदा ईहो जे ओकरा बुझबाक लेल मेहनति करए पड़ैत छै आ अंततः ई अध्य्यन पाठक-आलोचक सभ लेल नीक होइत छै। प्रस्तुत कविता संग्रहमे अधिकांशतः क्लिष्ट भाषाक प्रयोग भेल अछि। प्रायः एहन भाषा बला कविता संग्रह वा पद्य संग्रह बहुत कम प्रकाशित भेल अछि 1990 केर बाद (अपवादमे विजयनाथ झाजीक गजल संग्रह अछि जे कि 2008मे प्रकाशित भेल)। बहुत वर्तनी क्षेत्रीय उच्चारणक हिसाबसँ अछि आ कमसँ कम मैथिलीक हितमे अछि। बहुधा देखल जाइए जे कवि सभ अपन क्षेत्रीय उच्चारणकेँ बिसरि केंद्रिय उच्चारणपर बल देबए लागैत छथि (कारण जे हो) मुदा एहि संग्रहमे क्षेत्रीय उच्चारणकेँ राखल गेल अछि। हरेक लोकमे किछु ने किछु गुण-अवगुण रहिते छै, कवि सेहो लोके होइत अछि तँ कविक रचनामे सेहो गुण-अवगुण रहबे करतै। प्रस्तुत संग्रहमे सेहो नीक-साधारण कविता दूनू अछि। किछु कविताकेँ पुनर्लेखन कएल जेबाक चाही तँ किछु कविता मैथिलीक विरल कविता बनि कऽ आएल अछि। गुण-अवगुण समेत ई कविता संग्रह वर्तमानक नै भविष्यक अछि आ एकर अन्य पाठ निर्धारण बीस-पचीस बर्खक बाद संभव हेतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डल२.प्रणव कुमार झा गिद्ध” (मैथिली लघुकथा) १ जगदीश प्रसाद मण्डल दोहरी हाक महिना दिनसँ बुझि पड़ैए जे भरिसक आब चेतन भऽ गेलौं किएक तँ पहिलुका जकाँ भोरेसँ पत्नीक संग झगड़ा नइ लधाइए। पैछला मास तक एको दिन एहेन नइ होइ छल जे सुति कऽ उठैये बेरसँ झगड़ा नइ लधाइ छल। ओना झगड़बकेँ सेहो सोल्होअना अधले नहियेँ कहल जा सकैए मुदा झगड़बो तँ एके रंगक नइ होइए, तँए झगड़ब-झगड़बमे सेहो भेद होइते अछि जइसँ किछु नीको अछि आ किछु अधलो तँ अछिए। खाएर जेतए जे अछि मुदा अपना संग से बात नइ छल, अनुचित झगड़ा छल जइसँ मुक्ति भेटल, तँए मनमे खुशी अछि आ अपनाकेँ चेतन बुझए लगलौं। मुदा चेतन-अचेतनक बीच मन अखनो ई मानैले तैयार नइ अछि जे पहिने गलत छेलौं आ आब सही भऽ गेलौं। किएक तँ पहिने जे छेलौं सएह ने अखनो छी। दिन-दिनकेँ जोड़ब तँ कनी-कनी बेशियाइत जरूर गेलौं मुदा खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ देहो-हाथ ओहिना अछि जेहेन मास दिन पूर्व छल। खाएर जे छल कि अछि, सएह छल आ सएह अइछो। मुदा बीचमे एकटा जरूर भेल जे काजमे थोड़ेक संशोधन कऽ लेलौं। माने काजक प्रक्रियाकेँ थोड़ेक सुधारि लेलौं। बचपनक बचकानी विचार जँ पहिने नहि कहि देब तखन अहूँ केना बिसवास करब जे फल्लाँ ठीके आब चेतन आकि सियान भऽ गेला। जेना-जहिना कोनो काज करैमे नीकक सुधार भेने काज सुधरैत जाइए, जइसँ सुधरल काज बनैत जाइए, तहिना जिनगीक क्रिया सुधरने बालपन चेतनपन दिस बढ़ैत चेतन सियान बनैए। सएह भेल। लेधे-गोधे आठटा बेटा-बेटी अछि। नवम पत्नी आ दसम अपने छी, तँए दस गोरेक परिवार अछि। दस गोरेक परिवारमे अपन सिरक संग देहो-हाथ बेसी धुनाइते अछि मुदा एहेन खुशी तँ हुनकेटा ने हेतैन जे दस गोरेक परिवारमे बास करै छैथ। असगर-दुसगरकेँ आकि निवंशाकेँ ई खुशी थोड़े हेतैन, नहियेँ हेतैन। तँए हरदम मन दुखसँ दुखीए रहैए सेहो बात नहियेँ अछि। धान दौन करैबला खरिहाँनक मेह जकाँ ठाढ़ जरूर छी। असगर देहो रगड़ौने तँ काज गड़बड़ेबे करत जइसँ परिवारमे अनेको अनसून-मनसून आपैत-बिपैत नइ औत सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। जखन पैछला पीढ़ीक अन्त भेल–माने माइयो आ बाबूओ मरि गेला, बाबा-दादी तँ पहिनहि मरि चुकल छला, जइसँ परिवारक भारो पड़ल आ गारजनी सेहो अनायासे भेटल–तखन अपन गारजनीमे परिवारक देख-रेखपर नजैर रखइ पड़त किने। परिवारो तँ परिवार छी, एक दिस बाल-बोध सुर्ज सदृश उदय होइत रहैए तँ दोसर दिस सुरूजे जकाँ अस्त होइत अस्तांचलगामी नइ होइत रहैए सेहो नहियेँ कहल जाएत। मुदा जेतए जे हुअए अपन तँ पैछला पीढ़ीक अन्त भइये गेल। ओना, माइए-बाबूक अभिभावकत्वमे अपन बिआहो-दुरागमन भेल आ चारिटा धियो-पुता भेल, मुदा तहिया अपन महत परिवारमे ने कमाइबलामे छल आ ने विचारबला विचारकमे। बुझै छेलिऐ जे मनुख अपन परिवारक गाड़ीकेँ जोति अपने कन्हेठ चलबै छैथ, तँए मनुखकेँ अनेरे कोनो चिन्ता-फिकिर नइ करक चाही। बुझले बात आ देखले आँखि छल। ओना, बीच-बीचमे पत्नी जोर दैत एतेक जरूर कहैत रहली- “ई जे चारिटा धिया-पुता अछि से अनकर छिऐ, ओकरा जँ खुएबै-पीएबै नहि तखन ओ जीयत केना..?” ओना कहैत रहली नीक बात, से मने-मन अपनो बुझैत रहलौं। मुदा भगवानपर अटूट श्रद्धा आ बिसवास नइ रहए सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। श्रद्धाक संग बिसवासो रहबे करए। भाय! बिसवासेक गाछमे मेवा फड़ैए किने, अपनो तँ बिसवास ऐछे जे फड़बे करत...। तँए चिन्ता-फिकीर करैक खगते की। ओना गोटे-गोटे दिन पत्नी रबाड़ैत ईहो कहिते छेली- “घरमे कमाइ नइ होइए ते परदेश जाउ।” मुदा उपाइयो तँ दोसर नहियेँ छल, सिवा पत्नीक बातक सहाज करब छोड़ि कऽ, तँए सुनियोँ कऽ अनठबैत रहलौं। ओना, कहियो-कहियो मनमे उठै छल जे आब की कोनो माए-बाबू छैथ दोकानो-दौरीसँ उधार-पुधार नून-तेल आनि, कि अनकासँ पैंचो-पालट करि आकि कमाइये-खटा कऽ परिवारक खर्चा पुरौता। आब तँ अपने दुनू परानीपर परिवारक भार अछि, हमरे ने सभकेँ पुरबए पड़त। आब माए-बापक राज थोड़े रहल, आब तँ अप्पन भेल...। तैसंग लगले मनमे ईहो उठि जाए जे जे भगवान खाइक मुँह बनौलैन वएह ने खाइक ओरियानो करता। तइले अपन कोन काज। ..अही असमनजसमे समय बीतैत गेल आ परिवार बढ़ैत-बढ़ैत दस गोरेक भऽ गेल। माने चारिटा धिया-पुता आरो भऽ गेल। अखन तक ओही बचकानी मतिक-गतिक रीति पकड़ने चलि आबि रहल छेलौं। मुदा तइमे एकटा मोड़ आएल। मोड़ ई आएल जे अभावक जिनगीकेँ जहिना रंग-रंगक भूत-प्रेतसँ लऽ कऽ राक्षस-दैत्य धरि दतिया कऽ धेने रहैए तहिना अपनो धेनहि छल। तँए दुनू परानीक बीच कहा-कही होइते छल। घरक बगलेमे मरनी दादीक घर छैन। अस्सी बर्खक मरनी दादी चारि बजे भोरे उठि आँगन-घर बहारि, दुआर-दरबज्जा बाहरैत मालक घरक थैर-गोबर करैत, पथियामे छाउरक संग करसी-मरसी उठा घरक बगलेक चौमासमे फेक, बाड़ी-झाड़ीसँ तीमन-साजन नेने आँगन अबैत-अबैत भिनसुरका पहरक बिसरजन करै छैथ। मुदा हमरा दुनू परानीमे सुति कऽ उठैये बेरमे जे झगड़ा लधाइए ओ भरि दिन लधले रहैए। भैंसा-भैंसीक कनारि जकाँ जहिना अपने पत्नीपर कनखरल रहै छी तहिना पत्नियोँ भरि दिन हमरापर कनखरले रहै छैथ, जइसँ बेर-बेर किछु-ने-किछु कहा-कही होइते रहैए। जुति-भाँति-ले होइए आकि की से बुझबे ने करै छेलौं। तेना भऽ कऽ अखनो नहियेँ बुझै छी। कियो अपना अँगनामे भरि दिन गीते गौत आकि झगड़े करत तइसँ अनका की। जखन अनकासँ अनका मतलबे नइ रहत तखन समाजे की? मुदा से बात मरनी दादीमे नहि छैन। दुनू परानीक बीचक झगड़ाकेँ केता दिन मान-मनोबैल करैत पहिनौं फरिछौने छैथ। मुदा फेर ओहिना-क-ओहिना रमा-खटोला शुरू भइये जाइए। ओइ दिन सेहो तहिना भेल जइ दिनक बात कहै छी। मरनीए दादी जकाँ अपनो ओहिना अखनो उठै छी आ सभकेँ–माने परिवारक आन-आन सभ सदस्यकेँ–सुतले छोड़ि अपने दिन-दिनक काजमे लगि जाइ छी। माने उठि कऽ माल-जालकेँ घरसँ निकालि खाइले दऽ दइ छिऐ, दुआर-दरबज्जाकेँ बहारि-सोहारि पर-पैखानासँ निवृत्ति होइत मुँह-हाथ धोला पछाइत एक तोरक काजकेँ जखन सम्हाइर लइ छी तखन टिफीन होइए, माने चाह-पानक बेर होइए। तखन परिवारक आन-आन सदस्यकेँ उठबए जाइ छी। आइयो तहिना उठबए गेलौं। चारि-पाँच हाक जेठका बेटाकेँ देलिऐ। जहिना गहुमन साँप हनहनाइत निकलैए तहिना भोरक हल्ला सुनि पत्नी घरसँ हनहनाइत निकलली, निकैलते हल्ला करए लगली। जहिना गाम-समाजमे कहियो घरमे आगि लगलापर तँ कहियो घरमे चोर पैसलापर रंग-रंगक हल्ला होइए तहिना ने घरो-परिवारमे होइते अछि। मुदा दुनू हल्लाक दू रूप अछि। आगिक हल्लामे लोक घैल-डोलमे पानि भरने दौड़ैए तँ चोरक हल्लामे लाठी-ठेंगा नेने दौड़ैए। तहिना परिवारोमे भेल। धिया-पुताक नाओं लऽ लऽ जगैले शोर पाड़लिऐ। किए ने शोर पाड़बै। परिवारक जवाबदेही जखन कन्हापर अछि तखन ओकरा सम्हारि लऽ चलबो तँ अपन दायित्व भेल किने। परिवारजनकेँ अपन दायित्वक संगे ने अधिकारो होइते अछि। मुदा जे अछि आ जेते अछि से तेते अछिए। बजैकालमे कौआसँ मेना तक कि नइ बजैए जे ‘भाय प्रकृत्तिसँ मिलि-जुलि कऽ चललापर जहिना भगवान जकाँ प्रकृत्ति मनुखक मददगार होइए, तहिना ओइसँ हटि कऽ चलब तँ ओ दानव-दैत्य जकाँ भक्षक सेहो भऽ जाइए। मुदा ईहो तँ झूठ नहियेँ अछि किने जे रातिकेँ ढलानपर ढलिते, अढ़ाइ बजे भोरे परबा-पौरकीक संग मुर्गा-मुर्गीक माध्यमसँ प्रकृत्ति जगैक आवाहन करैए। तखन जँ अपने आठ बजेमे ओछाइन छोड़ि दुनियाँ दिस ताकि अपनाकेँ जगबए लगब तखन कोन रूपक जगान हएत? नीक हएत कि अधला तहू दिस ने देखए पड़त? खाएर...। ओछाइनसँ उठि ललकैत पत्नी घरक चौकैठ टपि आगूमे आबि ठाढ़ होइत बजली- “अखन सुतै बेर छै, खुट्टा जकाँ बाप-माए जीबै छै, तैबीच जँ सुख-मौज अखन नइ करत तँ कहिया करत।” पत्नीक बात जेना-जेना कानमे पैसल जाए तेना-तेना मनमे लहैर उठल जाए। कोन हाथी चढ़ि गौड़ पुजने छी जे एहेन हथियाह मनुख जिनगीक संगी बनि संग पूरत। मुदा लगले मनक विचार तर-मुहेँ ससरल। ससरल ई जे जखन शरीरक भीतर सेहो प्रकृत्ति अनुकूल आ प्रतिकूल विचारक संग चलैत प्रकृतस्थ होइते अछि तखन अनेरे...। जहिना पुरुखक सोभाव तहिना ने नारियोक अछि। सभ ने अपन वचस्व चाहैए। तैठाम तँ पुरुख-नारी कहियौ आकि पति-पत्नी, अपन-अपन विचारानुकूल दुनूकेँ परिवारमे नव पीढ़ीक सृजन करब अछिए...। रंग-रंगक विचार मनमे बर्खाक बुन्नक बुलबुला जकाँ उठितो रहल आ फुटितो रहल आ गोटे-गोटे आगूओ पानिक धारक संग चलितो-बहितो रहबे कएल। समय आ स्थिति जेहेन छल, तइमे की नीक हएत आ की अधला हएत, ई विचार जँ परिवारक सिरजन नहि करैथ तँ बिनु सीरबला वा कम सीरबला वा जलियाएल सीरबला कोनो विचारमे की गति देत से तँ विचारणीय अछि किने, जे विचारए पड़त। पति-पत्नीक बीच जखन परिवारक कोनो काज सृजित हएत तखन जे सृजनकर्ता छैथ–माने माता-पिता–ओ सृजनक सीर तक नहि पहुँच अल्हुआ  वा पोरो सागक लत्ती जकाँ जँ ऊपरेसँ काटि रोपि कऽ नव सृजन चाहता तँ ओहो एक क्रिया भेल। मुदा किछु भेल, भेल तँ बिनु सीरेक। तैठाम दोसर-तेसर आकि चारिमजन जँ कम्मो सीरगर हुअए वा एकसिरे हुअए आकि सघने सीरबला होथि, होइ तँ अछिए। मुदा सघन सीरबला गाछकेँ जँ अल्हुआ वा पोरो जकाँ ऊपरसँ काटि कऽ रोपब, तँ ओ थोड़े सृजित भऽ सकैए। मनुखोक वंश-वृक्ष तँ तेहने अछि। तँए, पति-पत्नीक बीचक जे विचार अछि तइ अनुकूल बजलौं- “बाल-बोधकेँ ताधैर उठबैये पड़त जाधैर ओ ओछाइनसँ उठि ठाढ़ भऽ आगू बढ़ै दिस डेग नइ उठौत।” हमर विचारक वाण पत्नीकेँ जइ रूपे लगल होनि से ओ जानैथ, मुदा बिलसँ निकलल गहुमन साँप जकाँ आरो हनहन करैत बजली- “आध पहर रातिसँ जहिना अहाँ अपन जान गमबैत रहै छी तहिना दोसरोक जान लेबइ..!” पत्नीक बात सुनि मनमे उठल जे कहिऐन- “उठि कऽ चलैले जँ दिनक सुर्जक इजोते भरोसे रहब आ जँ कहीं दिनमे कुहेस लगि जाइ, तखन तँ अशे-अशीमे रातिये जकाँ दिनो सुतले-सुतल बहि जाएत। जाबे अचेतन चेतनक बाट पकैड़ सुरूजे जकाँ रातिक अन्तिम पहर–जे राति-दिनक संक्रमणकालक पहर छी–तइमे अपनो रातिक वृत्तिकेँ  दिनक वृत्तिक  बीच संक्रमण नइ करब तखन संक्रमित केना हएब? आ जँ संक्रमित नइ हएब तखन केहेन जिनगी पेब पएब?” तरेतर मन कड़ुआए लगल। कड़ुआइते उठल- कहू! जे जेकरा-ले चोरि करौं सएह कहए चोरा! एक दिस हम अपना संग पत्नियोँ आ परिवारक बालो-बच्चाकेँ धार सिरैज धाराक रूपमे धराधाम दिस बढ़ैक विचार कऽ रहलौं अछि, मुदा दोसर दिस परिवारक कियो सुतले अछि आ कियो झगैड़ते अछि तखन ओ प्रवाहित केना हएत..? कड़ुआएल आँखि ललिया गेल, पत्नीकेँ पुछलयैन- “दोसरक जान लिअ चाहै छिऐ आकि दिअ चाहै छिऐ?” हमर बात पत्नी की बुझली, केना बुझली कि सुनबे-बुझबे ने केली आकि सुनि कऽ मतसून जकाँ मठैर देली से तँ ओ जानैथ, मुदा मनक विचार फाड़ि बजली- “जहियासँ ऐ घरमे पएर देलौं तहियासँ एक्को दिन सुख नइ भेल..!” पत्नीक बात सुनि मन बेसम्हार हुअ लगल। ई तँ नमहर उपराग भेल! आइ जँ अपने सीमा तकक–अपन सीमाक माने भेल जहियासँ गारजनी भेल तेतबे तकक–उपराग रहैत तँ पति-पत्नीक बीचक बात बुझि छोड़लो जा सकै छल, मुदा जैठाम पैछला पीढ़ीक उपराग अछि तैठाम तँ पत्नीक मुँहमे लगाम लगौने बिना कियो चेतनशील केना भऽ सकैए। जिनगी जिनगी छी, ठट्ठा नहि। किछु सीखए पड़ै छै, किछु बिसरए पड़ै छै, किछु जोड़ए पड़ै छै आ छोड़ौ पड़िते छइ। आ जँ से नहि हएत तँ हीर-मति लाल-जवाहरक संग अमृतसँ भरल ई दुनियाँ खढ़-पातसँ तेना ढकि कऽ झँपा जाएत जे चीन-पहचीन सभटा लोप भऽ जाएत! जखन नीक-अधलाक विचारे लोप भऽ जाएत तखन जिनगीए की आ जीवने केहेन रहत? मन तेते गरमा गेल जे अपन विचार जोर-जोरसँ पत्नीपर लादए लगलौं। मुदा ओहो उतारामे की कहली, नइ कहली, से सुनि अखनो कान ओहिना बहीर अछि जेना सुनसान असमसान हुअए। मुदा चुपचाप सुनि कऽ बरदासो करब, केतौसँ उचित नहि बुझि पड़ल। बेतुकार मुहसँ निकलए लगल। जइसँ दुइये गोरेक बीचक बात अनघोल जकाँ भऽ गेल। तहीकाल मरनी दादी घर बहारि आँगन बहारै छेली आ सुनबो करै छेली। जखन अनसोहॉंत लगलैन तखन डेढ़ियापर बाढ़ैन रखि पहुँचली। अखन तक दादी दुनू गोरेक बाते अकानैत, बाजैत किछु नहि। मुदा विवादक जड़ि जखन नजैरमे नइ एलैन तखन अनधुन बजली- “की जोलहा-धुनियाँक घर जकाँ झूठ-फूसकेँ धुनकीमे धुनबो करै छह आ तानी-भरनी तानि अनेरे खटखुट करै छह।” ओना दादी हमरा दिस ताकि बजै छेली, तँए पत्नीकेँ अपन पछपात बुझि पड़लैन, जइसँ मुँह सुपुट लेलकैन। दू गोरेक बीच अपने फँसि गेलौं। एक दिस पत्नीक नजैर तेज होइत उठैत देखिऐन तँ दोसर दिस मरनी दादीक विचारकेँ आइ धरि कहियो सोझा-सोझी कटने नइ छी तँए किछु करैत किछु-ने बनैत रहए। मुदा रच्छ रहल जे आगू भऽ कऽ पत्नियेँ, दादी दिस नजैर उठा बजली- “दादी, भिनसरू पहरकेँ लोक राम-राम करैत नीन तोड़ैए आ ई सभकेँ तेना हकबाहि करै छैथ जे गाम-समाजक लोको सुनि की कहैत हेता!” ओना मरनी दादी पत्नियोकेँ आ अपनो ठेहुन लगसँ के कहए जे छाती धरि नीक जकाँ चिन्है छैथ। जे दुनू परानीक जिनगीमे की अन्तर अछि। ओना कोनो झगड़ाक पनचैती दू रूपक पंच दू रूपे करै छैथ। एक करै छैथ जे झगड़ाक गहींर पानिक पता नइ पौनिहार जकाँ आ दोसर करै छैथ झगड़ाक जड़िक पताल तक जानि कऽ। मरनी दादी दोसर श्रेणीक पंच छैथ। मुदा जेहेन ललका-ललकी दुनू परानीक बीच भेल छल सेहो तँ अपने काने सुनने छेली, केकरो कहलाहा नइ सुनने छेली, तँए घरमे लगल आगिकेँ पहिने जलक बूनसँ नहि घैल वा बाल्टीनक पानियेसँ ने तोपि कऽ शान्त कएल जा सकैए...। सामंजस करैत दादी बजली- “तोरा सबहक दुआरे होइए ऐ टोलकेँ के कहए जे गामेसँ पड़ा जाइ। ने रहब एहेन टोल आ ने सुनब एहेन लोकक बोल।” ओना अपना बुझबामे आबि गेल जे मरनी दादी एकभग्गू पनचैती कऽ रहली अछि, मुदा दुनू परानी जैठाम आमने-सामने दू पार्टी बनल छी, तैठाम जँ किछु बाजब तँ सोल्होअना दोखी हमहीं हएब किने। तँए मुँहकेँ बरैज लेलौं। मुदा दादीक बात सुनि पत्नीकेँ बुझि पड़लैन जे दादी हमरा विचार दिस भऽ गेली। माने हमर विचारकेँ मानि लेली। मुस्की दैत पत्नी बजली- “दादी, गाममे ई सभसँ सिरिस  छैथ, हिनकर बात जहिना ने कहियो कटलयैन हेन तहिना ने कहियो कटबैन।” ओना जहिना अपने बुझै छेलौं तहिना मरनी दादी सेहो पत्नीक घटी-कुघटी जनिते छैथ, मुदा ईहो तँ जनबे करै छैथ जे दुनू परानीक बीचक झगड़ा छी। ओना, जँ समतल जगहपर आनि कोनो घुरछीकेँ छोड़ौल जाए तँ ओ असानीसँ छुटि जाइए। मने-मन दादी ईहो देखबो आ सुनबो करैथ जे सभ दिन भोरे-भोर ओछाइन छोड़ि उठैले कहा-कही होइए। जखन चेतनो-सियान से नइ बुझत तखन की हएत..! हाथ पकैड़ आँगनसँ निकलैत मरनी दादी आँखिक इशारा देलैन। बुझि गेलौं जे किछु कहती, मुदा तइसँ पहिने पत्नीकेँ कहलखिन- “कनियाँ, घर-दुआर आकि बाल-बच्चा केकरो अनकर छिऐ, कि अपने छी। जाउ, अँगना-घरक काज सम्हारू।” हाथ पकड़ने मरनी दादी अपना अँगना आनि ओसारपर बैसा कहली- “बौआ, किछु भेलह ते पुरुख-पात्र भेलह किने। नारीमे नारीत्व आबि सकैए मुदा पुरख-ले ते दुनियाँ पसरल अछि। तहूमे अखन जुआन-जहान छह, अखन नमहर जिनगी जीबैक छह, तँए मिलि-जुलि कऽ रहह।” पत्नीक सोझमे मरनी दादीसँ जे विचार-विनिमय केलौं ओ एक रंगक अछि। माने जैठाम दू धारक मुँहक बीचक घाटक मिलानी होइए आ जखन पत्नी नइ रहै छैथ तखन एक घाटक मुँह जकाँ धारक गहींरपन दिस होइए। अखन दुइए गोरे छी, माने हमहीं छी आ मरनीए दादी छैथ। तँए मुर्दघटक अपन-अपन सीमा छै, जे मरनियोँ दादी बुझै छैथ आ अपनो बुझै छी। तैठाम जँ मरनी दादी दुनू परानीकेँ मिलि-जुलि रहैक बात कहलैन से केना सम्भव हएत। ओना दुनियाँमे किछु असम्भवो नहियेँ अछि, मुदा तैबीच अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति नइ अछि सेहो केना कहल जाएत। मुदा शंको तँ शंका छी, पत्नीक संग सामंजस करैत जिनगी चलि सकैए मुदा ओते बिसवासू नहियेँ हएत जेते हेबा चाही। मुहसँ खसि पड़ल- “दादी, जैठाम कर्मक जिनगी आ अकर्मक जिनगीक झगड़ा हएत तैठाम मिलान केना हएत जे मिलि-जुलि रहब?” ओना अपन मन गरमाएल जकाँ बाजल मुदा मरनी दादी-ले घैनसन। मुस्की दैत बजली- “बौआ, सब दिन कोरा-काँखमे लऽ खेलबैत एलियह से कि मनसँ हेरा गेल जे विचार बदैल जाएत। दुनू गोरेक बीच छेलौं तँए एहेन बात बाजब उचित छल।” ओना मरनी दादी खोलि कऽ नहि बाजल छेली, मुदा इशारामे ओ यएह बाजल छेली जे जहिना काजक जिनगी–माने कर्मशीलक जिनगीक अनुभवात्मक बोध–आ अकाजकक जिनगी, जे मात्र विचारक सीमाक भीतर रहैए, दुनूमे की दूरी छै तइ ठिकिया कऽ इशारा केने छेली। ओना, मरनी दादीक बात सुनि कनी-मनी मन नरमा जरूर गेल मुदा सोलहन्नी ठंढाएल नहि, तँए बजा गेल- “दादी, मुँह देख मुँगबा परसबकेँ अहाँ केना उचित कहै छिऐ?” जहिना अकासमे उड़ल बैलून, जे जेते नमहर रहल, धरतीपर उतरैकाल ओ ओते असानीसँ पकड़ाइए, तहिना मरनी दादी पकड़ैत बजली- “बौआ, चौमैतपर चारिटा मति एकठाम भऽ ओझराइए वा लड़ै-झगड़ैए, तैठाम केना कएल जाएत। कनी-कनीकेँ घटा-बढ़ा, घीच-तीर कऽ ने एकठाम साटल जाएत। एकर माने ई नहि ने भेल जे पाछूसँ अबैत मति चौमुहानीक पछाइत अपन रूपे बदैल लेत। ओकर तँ स्पष्ट दिशा छै जे पूबसँ आएल रस्ता जखन चौमैतमे मिलि चबुतरा निरमबैत आगू दिस बढ़ि जाइए। जे पूब-पच्छिम, उत्तर-दच्छिन सभ दिस बढ़ैए। तैठाम तँ कहले ने जाएत जे पच्छिम-मुहेँ जाएत किने ओ पुबरिया रस्ता भेल आ जे दच्छिन-मुहेँ जाएत ओ उत्तरबरिया भेल। जे दुनू दिससँ माने सभ दिससँ भेल।” ओना मरनी दादीक बात कनी-कनी बुझबो केलौं आ कनी-कनी नहियोँ बुझलौं। मुदा भिनसुरका समय गप-सप्पक तँ छी नहि। बजलौं- “दादी, अखन काज सभ अछि काजसँ जखन निचेन हएब तखन आगूक गप-सप्प करब।” मास दिनक बीच अपन विचारक संग काजमे संशोधन केलौं। जइसँ काजक रूप रूपायित भऽ बदैल गेल। भोरक झगड़ा मेटा गेल। काजक रूप ई बदलल जे जैठाम जेठका बेटाक नाओं लऽ लऽ शोर पाड़ै छेलिऐ जे अवाज सुनि सभ उठत। ओ छोड़ि देलौं। आठटा धिया-पुता रहने पत्नीकेँ सेहो टोकब छोड़ि देलिऐन। माने सुति कऽ उठैबेर, आठो धिया-पुताकेँ एक-एक बेर नाओं लऽ लऽ जोर-जोरसँ बजै छी, जइसँ आठ अवाजमे धिया-पुताक कोन गप जे बिनु टोकल पत्नियोँक नीन टुटि जाइ छैन। मुदा दोहरा-दोहरा बजितौं तखन ने ओहो सोन्हिमे सुइया तकितैथ, से तँ रहलैन नहि। तँए चुपे-चाप गबदी मारि ओछाइन छोड़ि उठि जाइ छैथ। शब्द संख्या : 2700, तिथि : 21 दिसम्बर 2017 - जगदीश प्रसाद मण्डल जन्म : 5 जुलाई 1947, बेरमा, जिला- मधुबनी (बिहार), शिक्षा : एम.ए. द्वय (हिन्दी, राजनीति शास्त्र), जीवि‍कोपार्जन : कृषि (मुख्यत: तरकारी खेती), रूचि : 2001 तक समाज सेवा (रूढ़ि एवम् सामन्ती व्यवहारक खिलाफ लड़ाइ, केस-मोकदमा, जहल यात्रा) पछाइत साहित्य लेखन। नाटक, एकांकी, गीत, काव्य, कथा, उपन्यासइत्यादि–साहित्यक मौलिक विधामे अनवरत लेखन।करीब 100 पोथीक लेखन/प्रकाशन। सम्मान/पुरस्कार : ‘विदेह सम्मान’, ‘विदेह भाषा सम्मान’, ‘टैगोर लिटिरेचर एवार्ड’, ‘वैदेह सम्‍मान’, ‘यात्री सम्मान’, ‘विदेह बाल साहित्य पुरस्कार’, ‘कौशिकी साहित्य सम्मान’ तथा स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मानोपाधिसँ सम्मानित/पुरस्कृत। २ प्रणव कुमार झा गिद्ध” (मैथिली लघुकथा) “बाबी गै, घर पर गिद्ध बैस गेने की होईत छैक?” रमण अपन बालमन में उठल प्रश्न बाबी से पुछैत बाजल छल. भोरहे से गाम में अनहोर उठल छल जे सीडी झा के घर पर गिद्ध बैस गेलै य।

"बाउ रे जै घर पर गिद्ध बैस जाइत छै ने तै घर में भूत-प्रेत के वास होमय लागैत छै. किएकि गिद्ध बड्ढ अधलाह जीव होइत छैक, मुइल जीव के नोचि के खाइत छैक”.   रमण कइएक बेर गिद्ध नामक ऐ विशालकाय पक्षी के घरक पछुआर में बड़का ताड़ गाछ पर बैसल देखने छल, आ गोटेक बेर बाबी संगे खेत दिस गेला पर देखने छल मुइल जानवर के मांस नोचैत.

ई घटना ओय समय के छल जखन रमण करीब छ: वर्षक बालक छलाह आ गाम में रहैत छलाह. समय बितला पर रमण अपन बाबी आ माय संगे बाबूजी लग रह गाजियाबाद चलि आयल छल. रमण के बाबूजी गाजियाबाद के एकटा फैक्ट्री में अकाउंटेंट के काज करैत छलखिन. रमण के नाम एकटा प्राइवेट इस्कूल में लिखा देल गेल छल. अब रमण 13  वर्ष के भ गेल छलाह. घर से इस्कूल करीब २ किलोमीटर छलै. रमण रोज सायकल से इस्कूल जाइत छलाह.      रास्ता में एकटा चौर पड़ै छलै जै में रमण देखैत छलाह जे लोक अपन मुइल पशु सबहक लहास फेंक के चलि जाय छल. रमण देखैत छल जे अक्सरहां एकटा १६-१७ वर्षक छौरा ओय लहास के चमड़ा छोड़ाबैत रहे छल आ ओय लहास के गिद्ध-कुकुर सब मिल के खाइय छल, बाद में ओ छौरा ओय में से बचल हड्डी सब के सोहो अपना झोरा में भरि लैत छल. ई देख के रमण के ओ छौरा के प्रति बड्ड घिन आबैत छलै, मुदा मोन में जिज्ञासा सेहो उठैत छलै जे "ओ एहन अधलाह काज किएक करैत अछि?" ओय हड्डी सब के ओ की करैत अछि? काकरो-काकरो से ओ सुनने छल जे किछ लोक हड्डी से कालाजादू करैत छैक? कतेको बेर रमण के भेलै जे ओकरा जा के पूछी जे "तों ई की करैत छहक आ ऐ काज से तोरा की भेटैत छह?" मुदा रमण के अपन आ ओकर वेश-भूषा के अंतर सदिखन ओकरा लग जा क ओकरा विषय में बात करै के साहस करै से रोकि दैत छल.

एक दिन रमण जखन इस्कूल जाय छल त ओकरा घर से कनिकबे आगाँ एकटा मोदियाइन के घर छलै, जे ३-४ टा माल जाल पोसने छल. ओ देखलक जे ओत  किछु गोटे ओहि छौरा के घेरने छल आ अंधाधुंध लठियेने छलै. भीड़ से किछु सम्मिलित स्वर सुनबा में आबि रहल छल जे "मार सार के, ई गिद्ध थिकै, यैह बड्ड दिन से नजर लगउने छल फलां के माल पर जाहि कारणे ओ मरि गेल. बहुतो के माल जाल पर एकर गिद्ध बला नजैर रहैत छैक... आदि आदि।" मारि खाइत-खाइत छौरा अधमरू भ गेल छल। ओ त निक भेलै जे कियौ पुलिस के सूचित क देने रहै, तैं पुलिस आबि के भीड़ के तीतर-बितर केलकै आ ओहि छौरा के जान बचलै.

किछु दिन बाद एकदिन रमण घर पर कोनो बात से रूसल छल. छुट्टी के दिन छलैक ओ नेहेनहो सोनेने नै छल. एहिना गंजी पैजामा पहिरने घर से परा गेल छल. घुमैत-घामैत ओहि चौर दिस पहुँचल. देखलक त ओ छौरा फेर नजैर एलै. बस फेर की, रमण ओकरा लग पहुँचलै. ओकरा पुछलकै हौ! तो एहन अधलाह काज किएक करै छहक? लोक के माल-जाल के काला-जादू से मारि दैत छहक, आ ओकर खाल खिंचैत छहक! ओहि दिन एतेक मारि लागलह तैयो फेर यैह काज!

ओ कहलक मुइल माल-जाल के खाल-हड्डी निकालनाइ हमर खानदानी धंधा छियै. मुदा हमसब किनको माल-जाल के मारि दैत छियै आ की नजैर-गुजैर लगा दैत छियै ई सौ टका अनर्गल आरोप अछि हमरा सब पर. ऐ तरहे भीड़ अक्सरहा हमरा सब पर अत्याचार करैत अछि.

हमसब जे ई चमड़ा छोड़ा के ल जाइत छी, ताहि के सफैया क के आ फेर पोलिस आदि क चमका के रंग रंगक, जुत्ता, बेल्ट, बैग, पर्स आ कतेको आन आन श्रृंगारक आ उपयोगक वास्तुजात बनायल जाइत अछि, जे सभगोटे के भोग्य आ शुद्ध बुझना जाइत छैक. आ अहाँ की कहलियै हड्डी.....हा..हा..हा.., यौ जी हड्डी के हमसब कालाजादू के उपयोग नै करैत छियै. सभटा माल दिल्ली के शाहदरा-उस्मानपुर एरिया में भेज देल जाइत छैक. जत ओकर सफैया होइत छैक फेर फैक्ट्री में कटाई-घिसाई-पोलिस क के रंग रंग के सजावट के वास्तु जात, भगवान क मूर्ति, स्त्रीगण के श्रृंगार के लेल माला-झुमका आदि कतेको आकर्षक वस्तुजात एहि हड्डी सभ के बनायल जाइत छैक. बड़का मेला आ मार्केट सब में जे सस्ता सस्ता में मोती माला सब देखैत छियैक, से कोनो असली होइत छैक! सभटा एहि हड्डी सब के बनाओल जाइत छैक. से ई वस्तु जात कियौ हो, पंडित, मुल्ला, बनिया-रार, साहेब-गुलाम सब के सिनेह्गर लागैत छैक, आ हमरा सन के काज केनिहार सभके लेल अधलाह होइत छैक!  

जौं हमरा सन के काज केनिहार नै होइ, आ ई गिद्ध कुकुर नै होइ त अहाँक ई समाज मुइल जानवर के सड़ल लहास से पटल पड़ल रहत आ ओकरा कियौ उठेनाहर नै भेंटत. हम सब छी त अहाँ सब ऐ सड़ांध से छुटकारा पाबैत छी. मुदा तैयो अहाँ सब हमरा सब के गिद्ध कहि प्रताड़ित करबै, मौक़ा पाबिते लाठियेबै, मारबाई, आ इज्जत के त खैर छोड़िये दिय!

आब रमण सब किछु बुझि गेल छल, पारिस्थितिकि में गिद्ध के महत्वो, आ इहो बुझि गेल छल कि केना अहाँक पहिरन-ओरहन सेहो अहाँके कोनो लोक से संवाद करै में आ ओकरा विषय में वास्तविकता जानै में एकटा अवरोधक जेकाँ काज करै छैक. रमण के मोन पड़लैन जे कोना गांधीजी चम्पारण में किसानक दुखदर्द के देख अपन सूट-बूट त्यागि देने छलाह, तै के बाद हुनका देश के अंतिम आ सबसे कमजोर तबका सब के समस्या समझ में भांगट नै रहल छलैन्ह. ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.उमेश मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक व्‍यक्‍तित्‍व ओ कृतित्‍व एक अनुशीलन २. २मुन्नाजी-बीहनि कथा-- मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष ३. केशव भारद्वाज-कल्पवास (खिस्सा) १. उमेश मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलजीक व्‍यक्‍तित्‍व ओ कृतित्‍व एक अनुशीलन श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक जन्म 1947 इस्वीमे 5 जुलाईकेँ बेरमा गामक एकटा किसान परिवारमे भेलन्हि। ‘बेरमा’ मिथिलांचल अन्तर्गत मधुबनी जिलाक झंझारपुर अनुमण्डल स्थित लखनौर प्रखण्डक एक पंचायत अछि जे उत्तरी-पच्छिमी कोणक अन्तिममे पड़ैत अछि। तीन पीढ़ीसँ श्री मण्डलजीक परिवार एकपुरखियाह रहलन्हि। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी कहैत छथि- “दिनांक 5-7-1947 इस्वीमे जन्म भेल। भरल-पुरल परिवार। तीन पीढ़ीसँ एक‍पुरुखियाह परिवार चलि अबै छल। जहिना बाबा तहिना पिता छला। घर लग पोखैर-इनार रहने पानिक सुविधा रहल।”[1] श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जखन तीनियेँ वर्षक अवस्थामे रहथि तँ हुनक पिता कालकवलित भऽ गेलखिन। श्री मण्डलजी आगाँ कहैत छथि- “पिताक मृत्युक किछुओ नै यादि अछि, सिरिफ गाछीमे जरैत अछिया टा...। जखन तीन बर्खक रही। दू भाँइक भैयारीमे छह बर्खक भैया रहैथ। पिताजी करीब एक मास बीमार रहला। इलाजोक नीक बेवस्था नहि, ताबत दरभंगा अस्पताल नै बनल छेलइ। झाड़-फूकसँ लऽ कऽ जड़ी-बुटीक इलाज समाजमे चलै छल।” मण्डलजीक पितास्व. दल्लू मण्डल अगुआएल विचारक लोक रहथिन्ह। “एक तँ वंशगतो आधारपर आ दोसर जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पितोक ऊपर परिवारिक-समाजिक प्रभाव पड़ल छेलैन जइसँ किछु अगुआएल विचार रहैन।”[2] पाँच-छह वर्षक अवस्थामे जगदीश प्रसाद मण्डलजी लोअर प्राइमरी स्कूल (बेरमा) जाए लगलाह। 1956 इस्वीमे प्राइमरीसँ उत्तीर्ण भऽ 1957 इस्वीमे अपर प्राइमरी स्कूल (कछुबी) मे नाओं लिखेलन्हि। तकर पछाति  1960 इस्वीमे केजरीवाल (झंझारपुर) उच्च विद्यालयमे नाओं लिखौलन्हि। आवागमनक असुविधा रहने पएरे झंझारपुर जाइत-अबैत रहलाह। 1965 इस्वीमे हायर सेकेण्ड्रीसँ उत्तीर्ण भेलाक बाद बी.ए. पार्ट 1 मे हिन्दी ऑनर्ससँ उत्तीर्ण भेलाह। पछाति सी.एम. कॉलेज, दरभंगामे नामांकण करौलन्हि। हिन्दी ओ राजनीति शास्त्र विषयसँ एम.ए. कए मण्डलजी अपन जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यकेँ अपनौलन्हि। एहि प्रसंगमे मण्डलजी स्वयं अपन पहिल औपन्यासिक कृति- ‘मौलाइल गाछक फूल’मे ‘दू शब्द’मे लिखनहुँ छथि- “जहिया एम.ए.क विद्यार्थी रही तहिए नोकरीसँ विराग भऽ गेल। आठ बीघा जमीन रहए। खेतीसँ जीवन-यापन करैक बिसवास भऽ गेल।”[3] मण्डलजीकेँ खेती-किसानी कार्यसँ लगाव केर कारण की? एहि प्रश्नक उत्तरमे दू गोट महत्वपूर्ण बात सोझामे अछि। पहिल, आत्मनिर्भरताक संस्कार आ दोसर परिस्थितिवश। परिस्थिति ई जे जगदीश प्रसाद मण्डल जखन तीनियेँ वर्षक छलाह तँ हुनक पिता मरि गेलन्हि। ई बात लगभग 1950-51 इस्वीक थिक। मुदा ई गुण रहलन्हि जे पितेक अमलदारीसँ दू भाँइ पिसियौत रहैत छलखिन। (कोसीक उपद्रवसँ भागल पीसा बेरमे माने सासुरेमे रहि गेल रहथिन।) तत्काल गार्जनी हुनके दुनू भाँइपर छलन्हि। मुदा ओहो लोकनि अर्थात् दुनू “पिसियौत भाए 1960 ईस्‍वीमे अपन गाम ‘हरिनाही’ चलि गेला।”[4] मण्डलजीक परिवार बिनु पुरुष गार्जनक भऽ गेलन्हि। मण्डलजी कहैत छथि- “दुनू भाय, श्री कुलकुल मण्डल 1954 इस्वीमे आ हम 1957 इस्वीमे गामक स्कूलसँ निकैल अपर प्राइमरी स्कूल कछुबीमे नाओं लिखौने रही। 1960 ईस्‍वीसँ परिवारक बोझ पड़ल।”[5] स्पष्ट अछि जे तेरहे वर्षक अवस्थासँ मण्डलजीक लगाव पारिवारिक क्रिया-कलापसँ, खेती-बाड़ीसँ छन्हि। अर्थात् उपरोक्त प्रसंगक ईहो एक महत्वपूर्ण कारण थिक। ओना, जगदीश प्रसाद मण्डलक माए साहसी रहथि, शिक्षाक प्रेमी रहथि। ओहन परिवारक रहथि, जाहि “परिवारमे मामा 1942 ईस्‍वीमे अंग्रेजक गोली खा चुकल छला।”[6] “अपन गहना, जमीन बेच देल बच्चाकेँ पढ़बै खातिर।”[7]अत: जगदीश प्रसाद मण्डलजी एम.ए.क अहर्ता सेहो प्राप्त कएलनि। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी संवेदनशील व्यक्ति छथि। हिनकापर पिताजीक प्रभाव सेहो छन्हि। स्वतंत्रता संग्रामक समयमे सामाजिक-आर्थिक स्थितिसँ उपजल विडम्बनाक प्रति साकांक्ष आ मंथनक प्रवृतिक व्यक्ति छथि। 1947 इस्वीमे स्वतंत्र भेल भारत मुदा ई स्वतंत्रता आधा स्वतंत्रता अछि- ई विचार हिनका छात्र जीवनहिसँ उद्वेलित करैत रहलनि अछि। समाजक स्थितिपर हिनकर मन सदैव उद्वेलित होइत रहलन्हि। “सामन्ती सोच आ सामन्त मजगूत छल, जइसँ आम-अवामक बीच आक्रोश पनपए लगलै। राजा-रजबारे जकाँ शासन पद्धति चलए लगल।”[8] ..खेतमे काज करैबला बोनिहारोक स्थिति बद-सँ-बदत्तर छल। समस्यासँ ग्रसित राज्य सभ छलैहे तेँ भूदान आन्दोलन सेहो उधियाएल।”[9] समस्याक प्रति सजग व्यक्तित्व जगदीश प्रसाद मण्डलपर सामाजिक अवस्थाक प्रभाव पड़लन्हि आ 1967 इस्वीक चुनावी दौरमे जनवरी 1967मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक सदस्यता ग्रहण कएलनि। 1967 इस्वीमे कामरेड भोगेन्द्र झा संसद सदस्य भेला पछाति हुनकर पहिल आम सभा सकरीमे भेल छल जाहिमे पन्द्रह-बीस व्यक्तिक संग लाल झण्डा लऽ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो गेल छलाह। “अढ़ाइ-तीन घन्टाक पछाइत सभा विसर्जन भेल। सभामे भाग लेनिहार चारूकातक लोक चलि गेला। ..स्टेशनेपर भोगेन्द्रजीसँ पहिल भेँट भेलन्हि।”[10] ई क्रम मण्डलजीक कम्युनिस्ट पार्टीसँ लगावक पहिल स्तंभ अछि। मण्डलजी ओहिना कम्युनिस्ट दिसि अग्रसर नहि भेलाह। एकरा पाछू समाजक दीर्घ समस्या सभ छलन्हि जकर क्रमवार परिचय निम्न तरहेँ अछि। सृजनकर्त्ता संवेदनशील होइत छथि। ओ कतेको तरहेँ अनुभव करैत छथि- ‘पोथीसँ’, ‘प्रकृतिसँ’, ‘समाजसँ’ आ ‘समाज-देशसँ उठैत समस्यासँ’, सुरुजक सौन्दर्य आ तापक अनुभव सभ व्यक्ति करैत अछि। मण्डलजी समस्याकेँ नीक जकॉं अनुभव कएलनि आ ओहि समस्यासँ प्रेरित होइत रहलाह। यएह प्रेरणा हिनक धरोहर बनलनि। किसानक समस्या- बाढ़िक समस्यासँ किसान त्रस्त होइत छल। ऊचगर जमीनपर बसब आ खेती लेल जंगल-झाड़केँ साफ कय उपजाऊ जमीन बनाएब किसानक कार्य। बाढ़िसँ गामक गामकेँ घेरा जाएब आ फसलक बर्बादीसँ उपजल कष्टसँ परित्राणक आकांक्षा जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ जोर मारैत रहलन्हि। “मधुबनी जिलाक सीमा-कातमे हरिनाहियो आ हर्ड़ियो गाम बसल अछि। तइ बीचमे एकटा मरना धार अछि जे हरिनाहियो आ हर्ड़ीओ दुनू गामकेँ उपटौने छल।”[11] चुनावमे धान्धली- स्वतंत्रता प्राप्तिक पछाति सत्तापर कब्जा कय सुख-भोगक प्रवृत्तिक उदय भेल। ताहि लेल चुनावमे धान्धली पसरल- “चुनावमे जिला भरिक बूथपर खूब धाँधली भेल। ओना, जहिना खूब धाँधली भेल तहिना गामे-गाम मारियो-पीट खूब भेल आ केसो-मोकदमा खूब बढ़ल।”[12] ..पूर्व बिहार सरकारक छह गोट मंत्रीक विरुद्ध अय्यर साहेब रिपोर्ट देने छलाह। करोड़ोक लूट साबित भेल छल। द्रष्टव्य अछि हुनक शब्दमे- “बैद्यनाथ राम ‘अय्यर’, सुप्रीम कोर्टक जज छला। दक्षिणक छैथ। करीब पनचानबे-छियानबे बर्खक छैथ। जीविते छैथ। पूर्व बिहार सरकारक छहटा मंत्रीक विरूद्ध अपन जाँच रिपोर्ट दऽ देलखिन। करोड़ोक लूट साबित कऽ देने रहथिन।”[13] सामन्ती प्रथा टुटि रहल छल। देशमे लोक सभा आ विधान सभाक चुनाव लाठी हाथे शुरू भेल। जकरा जतेक हँसेड़ी ओकर जीत निश्चित होइत रहय। दलित आ कमजोर वर्गकेँ भोँट खसबैये ने देल जाइत छल। मालिकक हुकुम ईश्वरक हुकुम मानल जाइत छल। एतबहि नहि, गिनतीमे धान्धली होइत रहल- “बहुमत अल्पमतमे नामो बदैल देल जाइ छल।”[14] एहि प्रकारेँ देशमे राजनीतिक पराभव भेल। एहिमे स्वार्थ आ जाति भेद मुख्य आधार बनल। विशेष रूपसँ सामन्तवादी प्रथाक नव रूप सोझॉं आएल। जीव हत्या- पौराणिक परम्परा छल जे मनौतीमे जीवक बलि हुअए, कोनहु पुल, कोनहु मकान आ दुर्गापूजाक समयमे बलि देल जाइत छल आ कतौ-कतौ बलि देलो जा रहल अछि। तात्पर्य जे देवताकेँ प्रसन्न रखबाक लेल बलि प्रदानक चलन अछि। हिनकर अर्थात् जगदीश प्रसाद मण्डलक गाममे, बेरमामे दूर्गापूजाक आयोजन होइत छल। गाम दू भागमे बँटल। एक भाग सामन्ती व्यवस्थासँ अनुप्राणित छल। तकर विपरित गामक छोट लोक (दलित-पिछड़ा) आनठाम पूजाक विचार कएलनि। “दोसर प्रश्न उठल बलि प्रदानक। बेरमा गामक परोपट्टामे दुर्गापूजा दुनू ढंगक चलैत, वैष्णव दुर्गा सेहो- जेतए बलि प्रदान नै होइत। माने किछु ठाम बलि प्रदानो होइत आ किछु ठाम नहियोँ होइत। गप ओझरा गेल। एक मतक गाममे दुनू मत पनपल। जहिना बैसार एक मतसँ शुरू भेल तहिना दू मतमे विभाजित भऽ गेल। बलि प्रदानक पक्षसँ अधिक लोक विपक्षक भऽ गेल।”[15] ..घमर्थन होइत-होइत बलि प्रदान रूकल।”[16] एहि प्रकारेँ बलि प्रदानक विरोध समाजमे जीव-हत्यासँ उपजल कुरीति दिसि संकेत भेल। कर्मकाण्डक विरोध- समाजमे एखन धरि कर्मकाण्डक प्रथा प्रचलित अछि। एहिमे आर्यसमाजी, गायत्री परिवार, ओशो परिवारक सदस्य आ प्रगतिशील विचारधाराक लोक एखनहुँ एहि पद्धतिकेँ नहि मानि रहल अछि। पण्डीजीक सम्भाषण जे अहॉं जे देब हम मृतककेँ पहुँचा देब। ई मिथक रसे-रसे टुटि रहल अछि। बेरमामे कपिलेश्वर राउतक घरमे मृत्यु भेला पछाति पुरोहित आ कर्मकाण्डीसँ अनवन भेलनि, समाजक लोक अपने विधि-विधान सम्पन्न करौलन्हि, ताहिमे एकटा प्राणी श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो छलाह। “कियो बजै छल जे जखन मुरदा जरौला पछाइत पोखैरमे नहेलौं, आँगन आबि लोह-पाथर छुलौं, अपना ऐठाम आबि सोहराइ वा मिरचाइ खा नहा कऽ कपड़ा बदैल लेलौं तखन छुतका केतेटा अछि जे तैयो लगले रहि गेल?”[17] “बिना पनचैतीए पनचैती भऽ गेल जे केशमे किछु लागल रहै छै जिनकर मन मानए कटाउ, नइ मन मानए तँ नै कटाउ।”[18] गाम-घरमे भोजक औत्सुक्य बेसी रहै छैक, बिना पुरेाहित आ कर्मकाण्डी ब्राह्मणक मन्त्रोचारण कर्म समाप्त भेल मुदा भोजक प्रथापर सहमति बनल रहल। पुरोहितकेँ कर्ममे नहि अएलापर ‘रामअवतार राउतकेँ पुजबैक भार देल गेलैन आ बिदेसर ठाकुर सहयोगी बनि पुजा देथिन।’[19] खेतीसँ लगाव- 1960 इस्वीमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी खेती दिसि अग्रसर भेलाह। हिनकर अधिकतर कथा, उपन्यास, नाटक, एकांकीतथा पद्य-रचनामे सेहो प्रकृति प्रदत्त पानि, रौद, मेघ, बाढ़ि आ गाछ-बिरीक्षक वर्णन अछि। कुशल ज्ञानवेता सदृश समस्त प्राकृतिक उपादानक वर्णन ओकर लाभ-हानि सभ किछु हिनका रचनामे अछि। कोन मासमे कोन फसल हएत। जौं फसल बाढ़िमे भॉंसि गेल ताहि बीचमे कोन फड़ कोन जड़िमे भेटत, जकरा खाकऽ जीवन निर्वाह हएत, एकर पूर्ण ज्ञान मण्डलजीकेँ छन्हि। खेतीसँ जीवनमे कोना परिवर्तन होयत आ कोन फसिल नगदी हएत आ कोन पारम्परिक, तकर विशद् वर्णन हिनक रचना सभमे छन्हि। हिनकर ई ज्ञान अनुभवसँ उपजल अछि। हिनक सम्पर्क कामरेड भोगेन्द्र झासँ रहनि। हुनकर विविध देश-परदेशक ज्ञानसँ जगदीश प्रसाद मण्डलजी लाभान्वित भेलाह- “जगदीश प्रसाद मण्डल खेतीसँ थोड़-बहुत जुड़ि गेल रहैथ। मिरचाइ, भट्टा, कोबी, अल्लू इत्यादि खेती शुरू केलैन। धान, मरूआ, रब्‍बी-राइक खेती जने हाथे हुअ लगलैन।”[20] ..भोगेन्द्रजीक सम्पर्कमे एला पछाइत जगदीश प्रसाद मण्डलजीक खेतीक प्रति आरो जिज्ञासा तेज भेलैन। तेज ऐ दुआरे भेलैन जे जर्मनी, जापानक खेतीक बात ओ मनमे बैसा देलखिन। हिसाब जोड़ैथ तँ दस कट्ठा खेत एक परिवारक (पाँच गोरे) लेल बेसीए‍ बुझि पड़ैन।[21] एक तँ अपन हाथक पूजी खेत, दोसर जखन राजनीतिसँ जगदीश प्रसाद मण्डलजी जुड़ि गेलैथ तखन तँ काजो बढ़ि गेलैन। ..पूसा मेलासँ खेती-बाड़ीक किताब कीनि-कीनि आनए लगला। तैसंग किसानक जे कार्यक्रम होइ तइमे सेहो जाए-आबए लगला।”[22] विस्तृत अनुभवक उपयोग कय मण्डलजी खेती करय लगलाह। एखनहु हिनक बास आ परोपट्टाक जमीन लागल गाछ-बिरीछ आ अनेको रंगक फल, अनेको रंगक तरकारी, दरबज्जापर गाए-माल इत्यादि मण्डलजीक खेती-किसानीक प्रति लगाव केर उदाहरण अछि। जातिवादी प्रथा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी समरस समाजक समर्थक छथि। हिनक रचनामे जातिगत विद्वैष नहि देखल जा सकैछ। सभक प्रति नम्र आ आदरपूर्ण व्यवहार देखल जा सकैछ। तखन तँ पूर्वसँ जकड़ियाएल समाज अछि। एकाएक मलेरिया-रोग जकॉं दवाइसँ भगाओल नहि जा सकैछ। हिनक रचनामे जातिगत स्वार्थक आकलन अछि। एहि वर्णनसँ जगदीश प्रसाद मण्डलजी समाजकेँ सावधान करैत छथि। ओतहि टुटैत जाति-प्रथाक समर्थन सेहो करैत छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजी सभ विचार केलैन जे समाजक उत्‍थानमे जातिक कट्टरपन बाधा छी। ओना, जौं जातिक बीच कथा-कुटुमैती होइत अछि तँ ओ दू समाजक बीचक प्रश्न बनि जाइत अछि। मुदा समाजक बीच जातिक छूआ-छूत बहुत नमहर खाधि बनबैए...। तँए महिनामे एकबेर बैसार करब आ ओ करब टोले-टोल घुमि-घुमि, ई सबहक विचार भेलैन। बैसारमे कोनो बेसी जोगारक प्रश्न नहि, मुदा टोलबैयाक विचारसँ, जौं ओ सभ खाइ-पीबैक बेवस्था करैथ तँ सेहो बढ़ियाँ, सभ खाएब, ई सबहक विचार भेलैन।”[23] ई विचार समरसता आ जाति प्रथाकेँ तोड़बाक हेतु एकगोट सुलभ तरीका खोजलन्हि जे मण्डलजीक समरस विचारक द्योतक थिक। बटेदारी प्रथा- पुरातन कालसँ जमीन्दार गरीब लोककेँ जमीन बटाइपर दैत रहल अछि। जमीन्दारक ओहि जमीनपर खेती करत बटेदार। ऊपजामे बाटल जाएत। उपजा बॉंटक भिन्न-भिन्न प्रथा। जमीन्दारक शोषण कायम रहल। समाजमे ई भावना उठय लागल रहैक जे ‘कमाइबला खाएत’ मुदा जमीन्दारक शोषणसँ आहत बटाइदारमे रसे-रसे विद्रोहक भावना उठल, जकरा दबाबय लेल लठैत हँसेड़ीक प्रचलन चलल। ‘जकर लाठी तकर भैंस’, एहि तथ्यकेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी एहि रूपे वर्णन कयने छथि- “हल्ला सुनिते-देरी जे जेत्तै रहए से तत्तैसँ लाठी लऽ कऽ दौगल। टोल आ दोकानक बिच्चेमे मारि फँसि गेल। जबरदस मारि भेल। केते गोरेकेँ कान-कपार फुटल। केस-फौदारी आ जहलक भय समाप्त भऽ गेल छेलइ। एकतीस दिनक भीतर अट्ठाइसो मुदालहक जमानत भऽ गेलैन। जमानतक पछाइत जमीनक दखल-दिहानी शुरू भेल। गड़बड़ भऽ गेल रहै जे, जे असल बटेदार रहै ओ केस नै केलक आ जे बटेदार नै रहै ओ केस केलक।”[24] बटाइदारी कानूनक पछातियो समाजमे ई प्रथा रहल जे अवसानक करीब-करीब पहुँचि चुकल अछि। छूआछूत सेहो समाप्त भऽ चुकल अछि। सुलभ शौचालयमे सभ वर्णक लोक काज करैत अछि। स्वरूचि भोजनमे परसयबलाकेँ जाति नहि पुछल जा रहल अछि। भूदान आन्दोलन- विनोबा भावेक द्वारा चलाओल आन्दोलन सामन्तक कौर भऽ गेल रहय। जकरा पाइ-जमीन रहैक ओकरो भूदानक जमीन दिअ लगलय। घूसक कुप्रथा लागू भऽ गेल रहैक। जगदीश प्रसाद मण्डलजी एहि कुप्रथाकेँ अपना सोझमे देखने छथि। हिनकापर एकरहु प्रभाव पड़लन्हि- “भूदानी आन्दोलन अपन स्वरूप बिगाड़ि पाइक अड्डा बनि गेल, जइसँ मामला आरो ओझरा गेल। ओझरा ई गेल जे एक्के जमीनक पर्चा तीन-तीन गोरेकेँ भेटल। जइसँ जमीनबलाक झगड़ा जमीन लेनिहारोक बीच फँसि गेल।”[25] भ्रमण एक अनुभव- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक बेसी जिनगी गामे-घरमे बीतल छन्हि। एकर नीक लाभ ई भेलन्हि जे हिनक अनुभूति-अनुभवक संसार पैघ छन्हि। कोन पावनि कहिया हएत, कोन मासमे कोन फसल लगाओल जाएत, कोन गाछक की उपयोगिता छैक, कोन गाछक रोगक की उपाय होयतआदिक संग गाम-घरक दंगा-फसाद, जमीनक झंझटि-विवाद इत्यादि हिनक अनुभावात्मक संसार छन्हि, जकर क्षेत्रफल बहुत पैघ छन्हि। एकदिन मण्डलजीक मनमे एलन्हि जे कोन राज्य कतय अछि? एहि हेतु ओ एटलस बहार कय ताकय लगलाह। एहिसँ हिनका मनमे भ्रमणक इच्छा जगलन्हि आ बहरा गेलाह भ्रमणक हेतु। हैदरावाद, त्रिपुरा, अगरतला, असमआबंगालक भ्रमण कएलनि। भ्रमणेटा नहि कएलनि बल्कि ओतुक्का संस्कृति, भाषा, परिवेश, लोकरंग इत्यादिकेँ सेहो एक जिज्ञासु सृजनकर्त्ताक रूपमे दर्शन कएलनि। “असामसँ उत्तर-पूबसँ लऽ कऽ दच्छिन धरि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड राज्य अछि। ट्रेनक रस्ता थोड़ेक आगू धरि अछि। ऐठामक मुख्य सवारी बस-ट्रक छी। जंगल-पहाड़सँ भरल इलाका। हजारो किस्मक गाछ-बिरीछ। उपजाऊ जमीन कम। ओना, जैठाम रंग-रंगक गाछ-बिरीछ अछि तैठाम खाइबला फल सेहो हेबे करतै। ठढ़िया साग बाध-बोनक घास जकाँ उपजल।”[26] “कनियेँ आगू बढ़लापर रबड़क गाछ देखलैन। पतियानी लगा रोपल छल। गाछक आकारसँ बुझि पड़लैन जे पनरह-बीस बर्खक हएत। बहुत भारी नहि। छाती भरि ऊपरमे खोधल, जइमे सँ लस्सा (दूध) निकलैत।”[27] “जूटक एकटा कारखानाक संग लघु उद्योगक रूपमे बाँसक छत्ताक बेंट (डंटा), बाँसक बनल आरो-आरो वस्तु बनौल जाइत अछि।”[28] “पूर्वांचल (असाम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरूणाचल, नागालैंड आ सिक्कि‍म) मिला अपने-आपमे एक देश छी। जंगल, पहाड़, झील, नदी घाटीक समूह। भाषाक दृष्टिसँ सेहो बहुभाषी अछि। अपन-अपन क्षेत्रक भाषा सेहो छइ। मोटा-मोटी बंगला, अंगरेजी, हिन्दी, खासी, गारो, ककवार्क, मणिपुरी, मिजो, आओ, कोंयक, अंगामी, सेमा, लोथा, मोंपा, अका मिजू, शर्दुकमेन, निशि, अपतनी, हिलमिदि, तगिन, अदी, इदु, दिगारू, मिजिखम्री, सिंगफू, तंगला, नोक्टे, वांचू, लोपचा, भोटिया, नेपाली लिंबू इत्यादि।”[29] एहि प्रकारेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ आन-आन क्षेत्रक भौगोलिक, सामाजिक, आचार व्यवहार आ प्राकृतिक रूपकेँ दर्शन भेलन्हि। मण्डलजीकेँ अपन पैघ अनुभवसँ अप्रत्यक्ष रूपे कम्युनिष्टक आकर्षण बढ़ैत गेलन्हि। वस्तुत: क्रिया रूपमे जखन अएलाह तँ पार्टीक मिटिंग, कार्यक्रममे सम्मिलित होइत रहलाह। गाम-घरमे जमीनक विवादसँ लऽ कऽ आनो-आन कतेको तरहक सामाजिक मुद्दासँ सम्बन्धित केस-मोकदमा लड़लाह। कतेको बेर जहलक यात्रा करय पड़लन्हि। “1999 ई. अबैत-अबैत आशा-निराशाक बीच संक्रमणक स्थिति बनए लगलैन। 1998 ई.मे दफा 307क केसमे सजाए भऽ गेल रहैन। हाइ कोर्ट अपील होइमे 20-25 दिन लागि गेलैन। तइ समयमे रामपट्टी जेलमे रहैथ। मने-मन आश्चर्य होनि जे बिना किछु केनौं जहलमे छैथ। तहियो आ अखनो मन नै मानि रहल छेलैन‍ जे कोनो गलती हुनकासँ भेल हुअए। खाएर, अपील भेल, जमानत भेलैन।”[30] 2000 इस्वी धरि जगदीश प्रसाद मण्डलजी समाज सेवामे संलग्न रहलाह। रूढ़ि एवम् सामन्ती व्यवहारक खिलाफ लड़ाइ लड़ैत रहलाह, केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे हिनक लगभग चारि दसक समय बीति गेलन्हि, पछाति साहित्य लेखनमे एलाह। एहि प्रसंगमे मण्डलजी स्वयं अपन पहिल औपन्यासिक कृति- ‘मौलाइल गाछक फूल’क ‘दू शब्द’मे लिखनहुँ छथि- “पैंतीस साल धरि समाज सेवा केला पछाइत अपन हहरैत शरीर देख‍ किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल।”[31] श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पहिल रचना औपन्यासिक कृति ‘मौलाइल गाछक फूल’ थिकन्हि जे 2004 ईस्‍वीमे लिखलाह। 2008 इस्वी धरिक अवधिमे पाँच गोट उपन्यास, एक नाटक तथा किछु कथादि लिखि चुकल छलाह। मुदा कोनहु पत्र-पत्रिकादिमे एकहु गोट रचना प्रकाशित नहि भेल रहनि। तथापि हिनक कलम, लिखबाक क्रम जारी रहलन्हि- प्रस्तुत अछि एहि प्रसंगमे हुनकहि लिखल बात- “मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्‍वीमे लिखल पहिल उपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो रचनाकारकेँ छैन‍ से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटक लावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी।”[32] 8 नवम्बर 2008 मे मिथिलाक प्रसिद्ध ‘सगर राति दीप जरय’क 64म कथा गोष्ठी डॉ. अशोक अविचलक संयोजकत्वमे हुनक गाम- रहुआ संग्राम (मधेपुर)मे आयोजित भेल छल जाहिमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी उपस्थित भऽ ‘भैंटक लावा’ कथा केर पाठ कएलनि। एहि गोष्ठीमे भाग लेबाक आग्रह डॉ. तारानन्द ‘वियोगी’ कयने रहनि। ओना, सगर राति दीप जरयक गोष्ठीमे भाग लेबए लेल आयोजक/संयोजकक हकार अनिवार्य नहि होइछ। कोनहु माध्यमसँ पता चलल वएह थिक हकार। ‘वियोगीजी’सँ जगदीश प्रसाद मण्डलक पहिल भेँट 2008 इस्वीमे मधुबनीमे भेल छलन्हि। साहित्य क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पहिल मंच रहुआ संग्राम 64 सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीकेँ कहल जा सकैछ। जाहिठामसँ हुनक रचना सार्वजनिक हएब शुरू भेल। ओना, पहिने बेरमा पंचायत आ रहुआ संग्राम, दुनू मधेपुर ब्लौकक अन्तर्गत पड़ैत छल। जे कि जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कर्म क्षेत्र रहल छन्हि। समर्पित समाजसेवीक क्रिया-कलाप रहल छन्हि। 8.11.2008 लक्ष्मीनाथ गोसाँइक स्थानमे कार्यक्रम भेल छल। ओना, केतेक बेर राजनीतिक मंचपर रहुआमे बाजि चुकल छलाह, कर्म क्षेत्र छलन्हि तँए कथा वचैमे संकोच नइ भेलन्हि।[33] 2008 इस्वीसँ पूर्व जगदीश प्रसाद मण्डलजीक एकहु गोट रचना सार्वजनिक नहि भेल छलन्हि। कोनहुँ पत्र-पत्रिकादिमे प्रकाशित नहि भेल छलन्हि। पहिल रचना ‘घर बाहर- पटना’सँ प्रकाशित भेलन्हि। जाहि कथाक पाठ रहुआ संग्राममे कयने छलाह, आ प्रशंसा भेल छलन्हि। द्रष्टव्य अछि के सभ प्रशंसा कयने रहन्हि- “डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’जी ओ कथा मांगि लेलैन। किछुए मासक उपरान्त ‘घर बाहर’ पत्रिकामे प्रकाशित केलैन। सिद्ध पुरुषक स्थानमे प्रतिष्ठा भेटल। डायरी-कलम भेटल। गमछा-पाग भेटल। लक्ष्मीनाथ गोसाँइक मुर्ति सेहो भेटल।”[34] घर-बाहरमे एक आर रचना (कथा) प्रकाशित भेलन्हि। पछाति ‘मिथिला दर्शन- कोलकाता’मे ‘चुनवाली’ नामक कथा प्रकाशित भेलनि। चुनवाली, भैंटक लावा आ बिसाँढ़, कथा प्रकाशित होइतहि ‘विदेह’क सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरजीसँ सम्पर्क भेलन्हि। तकर बाद मण्डलजीक रचना सभ पुस्तकाकार रूपमे प्रकाशित हुअ लगलन्हि। एहि सन्दर्भमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी ‘अप्पन बात’मे लिखलन्हि अछि- “घर बाहरमे भैंटक लावा आ बिसाँढ़ छपल आ फेर मिथिला दर्शनमे ‘चुनवाली’ कथा पढ़िते अनेको बधाइ फोन आएल जेना- पञ्जीकार विद्यानन्द झाजीक। एकटा महत्वपूर्ण फोन श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक रहल। हिनकर फोन सुनिते जिनगीक ओहन चौबट्टी टपि गेलौं जे चौबीस घन्टाक खुशी मनमे आबि गेल।”[35] 2009 सँ 2013 इस्वीक बीच जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल छन्हि। जाहिमे हिनका एक्कहु पाइ प्रकाशनक हेतु नहि देबए पड़लन्हि। ई चीज स्पष्ट होइछ दू ठामसँ, पहिल जे लेखक स्वयं अपन ‘तरेगन’ पोथीक ‘मनमनियाँ’मे लिखने छथि- “समय-समयपर गजेन्द्रजी (श्री गजेन्द्र ठाकुर, मेंहथ)क आग्रह आ सुझाव आ संगहि श्रुति प्रकाशनक श्री नागेन्द्र कुमार झा आ श्रीमती नीतू कुमारीक भरपुर सहयोग भेटलासँ लिखैक नव उत्साहो आ आशो मनकेँ सक्कत बना देने अछि।”[36] आ दोसर-‘अंशु’ समालोचनाक पोथीमे श्री शिव कुमार टिल्लू लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लघुकथा ‘बिसाँढ़’ आ ‘भैंटक लावा’ घर-बाहरमे आ ‘चुनवाली’ मिथिला दर्शनमे प्रकाशित होइते मैथिली पत्रिकाक संपादक मण्‍डलक संग-संग प्रबुद्ध पाठकक मध्‍य हड़होरि मचि गेल। ‘पहिने आउ आ पहिने पाउ’क आधारपर विदेहक संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर हिनक रचना सभकेँ अपन पत्रिकामे छपबए लेल हथिया लेलनि। ऐ‍ प्रकारक शब्‍दक प्रयोग करबाक हमर तात्‍पर्य अछि जे जगदीशजी कोनो नव रचनाकार नै छथि, तिरसठि बर्खक माँजल साहित्यकार छथि, मुदा हिनक रचनाक प्रदर्शन नै भेल छल। समग्र रचना-संसार हिनक पुत्र श्री उमेश मण्‍डल जीक कम्‍प्‍यूटरमे ओझराएल छल किएक तँ छपबैले कैंचा केतएसँ आएत?”[37] एहि तरहेँ जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आगमन मैथिली साहित्यक दुनियाँमे होइत छन्हि। बिनु पाइक अर्थात् बिनु खर्चेक पोथी प्रकाशन मैथिली साहित्यमे नव उदाहरण छल। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी एकसंग श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेलन्हि। वर्तमानमे ओहि तरहेँ पोथीसभक प्रकाशन पल्लवी प्रकाशन, निर्मलीसँ भऽ रहलन्हि अछि। उपसंहार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन आस-पासमे होइत तमाम घटना, यथा-प्राकृतिक घटना, समय परिवर्तन, सामाजिक परिवर्तन, राजनैतिक परिवर्तन, लोक मानसक परिवर्तनकेँ साकांक्ष भऽ सर्वेक्षण करैत रहलाह, एकरहि परिणाम अछि जे हिनक रचनामे सभकिछुक दर्शन होइछ। कम्युनिस्ट पार्टीक उद्देश्य हिनका प्रभावित केलकन्हि। कम्युनिस्ट आन्दोलनक शीशा पानी, नूनथर, बराह क्षेत्रपर डैम आ कोशी नहरक निर्माण लेल सक्रिय भागीदारी देलन्हि। “पार्टी आन्दोलनक अन्तिम जेल यात्रा छेलइ। तेकर बाद जे जगदीश प्रसाद मण्डल गेबो केला तँ एक-दिना-दू-दिनामे। जे कएक बेर थानेसँ चलि आबैथ।..अपनो गाममे तेते मोकदमा भऽ गेल रहैन जे एक ने एकटा वारंट सभ दिन रहबे करैन।”[38] जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ नव काल्हि‍ देखैक इच्छा शुरूहेसँ रहलैन। से ओहिना नहि, कएला पछाति आरो मजगूत भेलन्हि। एहि प्रसंगमे श्री गजेन्द्र ठाकुर लिखित हिनक वायोग्राफीमे आएल अछि- “जेतए परिवारमे साधारण शिक्षाक आगमन भेल छेलैन। तैठाम मण्डलजी एम.ए. तक पढ़लैन। परिवारे नहि, गामेमे पहिल एम.ए. भेला। ओना, पैछला पीढ़ीमे संस्कृतक माध्यमसँ एक-पर-एक विद्वान बेरमामे भेला मुदा जेनरलमे जगदीश प्रसाद मण्डलेटा रहैथ। ..दोसर उदाहरण- बोरिंग-करौने खेतियोमे किछु नवता आबि गेल छेलै गाममे। दुनू रंगक खेती करै छला मण्डलजी। दुनू रंगकसँ मतलब- अन्नो आ नगदियोक। नगदी खेतीमे तरकारी आ फलक खेती सेहो करए लगला। ओना, जइ रूपे करए चाहै छला ओइ रूपे नै होइक कारण छल, किछु समैयोक अभाव आ किछु उपद्रवो। खेतीक एहेन उजाड़ि होइत रहैन जे जौं मारि-झगड़ा करए लगितैथ तँ दिनमे तीन बेर होइतैन। पैघ समस्याक आगू छोट गौण पड़ि जाइ छइ। मुदा मन तोड़ैक तँ अस्त्र भेबे कएल। उपद्रवो चाहे जेतए हउ मुदा मनकेँ प्रभावित तँ करिते अछि। तहूमे खेतीक उजाड़ि जइमे मेहनत आ पूजीक संग समैयक क्षति सेहो होइत।”[39] हजारो बर्खक गाछ किछु-ने-किछु अपनामे नवीनता अनिते रहैए। चाहे नव टुसा हउ आकि नव मुड़ी आकि नव पात आकि नव कलश। मण्डलजी पहिने विपुल अनुभव प्राप्त कएलाह पछाति लेखन दिसि अगसर भेलाह। प्रस्तुत अछि मण्डलजीक आइ धरिक प्रकाशित पोथीक सूची, जाहिमे क्रमश: कथा, उपन्यास, कविता, गीत आ नाटक-एकांकी अछि- कथा- 1. गामक जिनगी (2009), 2. तरेगन (2010), 3. बजन्ता-बुझन्ता (2013), 4. शंभुदास (2013), 5. उलबा चाउर (2013), 6. अर्द्धांगिनी (2013), 7. सतभैंया पोखैर (2013), 8. गामक शकल-सूरत (2014), 9. अपन मन अपन धन (2015), 10. समरथाइक भूत (2014), 11. अप्‍पन-बीरान (2014), 12. बाल गोपाल (2014), 13. भकमोड़ (2013), 14. रटनी खढ़ (2014), 15. पतझाड़ (2014), 16. लजबि‍जी (2014), 17. उकड़ू समय (2015), 18. मधुमाछी (2015), 19. पसेनाक धरम (2015), 20. गुड़ा-खुद्दीक रोटी (2015), 21. फलहार (2015), 22. खसैत गाछ (2015), 23. एगच्छा आमक गाछ (2016), 24. शुभचिन्तक (2016), 25. गाछपर सँ खसला (2016), 26. डभियाएल गाम (2016), 27. गुलेती दास (2016), 28. मुड़ियाएल घर (2016), 29. बीरांगना (2017), 30. स्मृति शेष (2017), 31. बेटीक पैरुख (2017), 32. क्रान्तियोग (2017), 33. त्रिकालदर्शी (2017), 34. पैंतीस साल पछुआ गेलौं (2017), 35. दोहरी हाक (2018), 36. सुभिमानी जिनगी (2018), 37. देखल दिन (2018), 38. गपक पियाहुल लोक (2018), 39. दिवालीक दीप (2018), 40. अप्पन गाम (2018), 41. खिलतोड़ भूमि (2019), 42. चितवनक शिकार (2019), 43. चौरस खेतक चौरस उपज (2019), 44. समयसँ पहिने चेत किसान (2019), 45. भौक (2019), 46. गामक आशा टुटि गेल (2019), 47. पसेनाक मोल (2019), 48. कृषियोग (2020), 49. हारल चेहरा जीतल रूप (2020),  50. रहै जोकर परिवार (2020), 51. गढ़ैनगर हाथ (अपूर्ण), 52. अपन काज अपने चिन्हू (अपूर्ण) उपन्यास- 1. मौलाइल गाछक फूल (2009), 2. उत्थान-पतन (2009), 3. जिनगीक जीत (2009), 4. जीवन-मरण (2010), 5. जीवन संघर्ष (2010), 6. नै धाड़ैए (2013), 7. बड़की बहिन (2013), 8. ठूठ गाछ (2015), 9. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं (2017), 10. लहसन (2018), 11. पंगु (2018), 12.आमक गाछी (2018), 13. सधवा-विधवा (अपूर्ण), 14. भादवक आठ अन्हार (अपूर्ण), 15. सुचिता (जारी... ) पद्य- 1. इन्द्रधनुषी अकास (2013), 2. राति-दिन (2013), 3. तीन जेठ एगारहम माघ (2013), 4. सरिता (2013), 5. गीतांजलि (2013), 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ (2013), 7. सतबेध (2018), 8. चुनौती (2019), 9. रहसा चौरी (2019), 10. कामधेनु (2020), 11. मन मथन (2020), 12. अकास गंगा (2020) नाटक/एकांकी- 1. मिथिलाक बेटी (2009), 2. कम्प्रोमाइज (2013), 3. झमेलिया बिआह (2013), 4. रत्नाकर डकैत (2013), 5. स्वयंवर (2013), 6. पंचवटी (2013), 7. कल्याणी (2015), 8. सतमाए (2015), 9. समझौता (2015), 10. तामक तमघैल (2015), 11. बीरांगना (2015) साहित्यक प्रति हिनक दृष्टिकोण जे छन्हिओ द्रष्टव्य अछि- “मैथिली साहित्य जगत समाजसँ एते दूर हटि गेल अछि जे जोड़ब असान नै अछि। ओना, ई सिरिफ मैथिलीए-मे नहि, आनो-आन साहित्यमे भरपूर अछिए। जेना- कबीर दासक चर्च मैथिली साहित्यमे कम अछि मुदा कबीर दासक जे जिनगीक (जीवन पद्धति) इतिहास प्रस्तुत कएल गेल अछि ओ विवेकपूर्ण जकाँ नै अछि। विवेकपूर्ण नै हेबाक कारणे कबीर दर्शन समाजसँ हटि गेल अछि। जेहो सभ दर्शनक प्रचार-प्रसार कऽ रहल छैथ। ओहो सभ या तँ अपनो गुमराहे छैथ, नहि तँ लाथी छैथ, जे गुमराह केने छैथ। तहिना तुलसी दास ‘गोस्‍वामी’ कहबै छैथ, मुदा केतेक गाए पोसने छला? जरूरत अछि युगानुसार साहित्यक निर्माण करब। तहिना जाधैर मैथिलियो साहित्य समाजक वस्तु (समाजक साहित्य) नै बनत ताधैर के केकरा की कहै छिऐ से भाँज थोड़े लगत। तँए शुभेक्षु साहित्यकारक दायित्व बनैए जे एक आँखि समाजपर रखि दोसर आँखि जखन कागत-कलमपर रखता तखन मैथिली साहित्‍ये नहि मिथिलाक कल्याण हएत। राज्यक अर्थ जौं राजधानीक एकटा कार्यालयसँ लइ छी तँए मिथिलाक समाज छुटि जाइए। मिथिलाक समाजिक पद्धति वैदिक पद्धतिसँ आगू बढ़त तखने सर्वांगी‍न विकास हएत।”[40] जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ समय-समयपर सम्मान/पुरस्कार सेहो भेटैत रहलनि अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा ‘गामक जिनगी’ लघु कथा संग्रह लेल ‘विदेह सम्मान- 2011’, बाल प्रेरक बीहैन कथा संग्रह ‘तरेगन’ लेल ‘विदेह बाल साहित्य पुरस्कार-2012’, तथा ‘नै धारैए’उपन्यास लेल ‘विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014-15’, ‘गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- ‘टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011’, मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- ‘वैदेह सम्‍मान- 2012’, मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- ‘वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ सम्मान- 2016’, रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- ‘कौमुदी सम्मान- 2017’, मैथिली साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा ‘कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015’, आ मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा ‘स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018’ इत्यादि। एहि तरहेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक अनवरत लेखन ने मात्र मैथिली साहित्य जगत बल्कि भारतीय भाषा साहित्यक बीच सेहो अपन स्थान निरूपित करैत अछि। [1]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 07 [2]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 07 [3]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09 [4]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09 [5]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09 [6]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09 [7]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09 [8]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 18 [9]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 21 [10]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 42 [11]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 37 [12]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 40 [13]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 40 [14]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 88 [15]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 26 [16]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 27 [17]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 67 [18]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 67 [19]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 69 [20]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 60 [21]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 61 [22]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 62 [23]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 63 [24]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 80 [25]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 82 [26]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 99 [27]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 98 [28]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 101 [29]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 103 [30]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 123 [31]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09 [32]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 09 [33]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 10 [34]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 10 [35]मौलाइल गाछक फूल, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 10 [36]तरेगन, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 06 [37]अंशु, शिव कुमार झा ‘टिल्लू’, पृष्ठ संख्या- 53 [38]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 112 [39]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 124-125 [40]जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा वायोग्राफी, गजेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ संख्या- 127 २ मुन्नाजी बीहनि कथा-- मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष """"""""""""""""""'""""""""""""""""""""""""""""""""""""""'''''""""""" मैथिली कथा साहित्य मूलत: संस्कृत भाषा साहित्य सं अनुदित भ'अपन पएर पसारने छल।एकर बीजारोपन चन्दा झा द्वारा विद्यापतिक 'पुरूष परीक्षा' सं भेल छल।कालान्तर मे मैथिली कथाकार बाङला कथा माध्यमे पाश्चात्य कथासाहित्य सं परिचित भेला।तत्पश्चात मैथिली कथा लेखनक कथ्य,शिल्प आ विषय परिमार्जित भ' मैथिली कथा साहित्य के नव दृष्टि देलक आ ओ संस्कृतक शब्द ,कथा/गल्प नामे लिखाइत रहल।पछाति प्रो. रमानाथ झा सदृश्य विद्वान/आलोचक ,अंग्रेजीक प्रभावे एकरा अंग्रेजी मे Short Story आ ओकर अनुवाद ' लघुकथा कहि संबोधित केलनि।तहिया सं इ कथा/ गल्प ,रचना त' ओही नामे होइत रहल मुदा विधागत ' लघुकथा ' (Short Story) विधाक अन्तर्गत मूल्यांकित होइत रहल।आ ताहि परिणामे मैथिलीक सब संग्रह पर अंग्रेजी मे Collection of Short Story अनिवार्य रूपें लिखल भेटत। तकर पछाति मैथिली साहित्यक इतिहासकार लोकनि सेहो कथा/गल्प नामक रचना कें लघुकथा विधाक श्रेणी मे राखि व्याख्या . करैत रहलाह।" संप्रति गल्प वा लघुकथा,उपन्यास सं अधिक लोकप्रिय भेल जा रहल ऐछ।तकर प्रबल कारण पाठक वर्ग मे क्रय शक्तिक क्षीणता वा पलखतिक अभाव, से नै जानि।" --डॉ. जयकान्त मिश्र-मैथिली साहित्यक इतिहास(प्रकाशक- साहित्य अकादमी)ऐ फरिछओठक पछाति अंग्रेजी साहित्यक विधाक पृष्ठभूमि मे ओहि विधा परिवारक अंग भ'  स्थापित भेल। आगू ओकरा आओर फरिछबैत दुर्गानाथ झा श्रीश लिखै छथि--" आइ मैथिली साहित्यक एक मात्र उपलब्घि थिक लघुकथा(Short Story) पूर्वक कथाकार लोकनि गल्प आ उपन्यासक बीच शिल्पगत अन्तर नै बुझैत छलाह।मुदा आब इ स्पष्ट ऐछ।जाहि सं लघुकथा(कथा/गल्प नामे) विधागत स्वतंत्र परिचिति बना पओलक ऐछ।"--मैथिली साहित्यक इतिहास-दुर्गानाथ झा श्रीश।" हमरा मैथिली प्रतिष्ठा वर्गक छात्र रहने मैथिली साहित्यक इतिहासक अध्ययनक अनिवार्यता छल। एहि अध्ययनक क्रमे मैथिली कथा के विधागत ' लघुकथा( Short Story)बुझबाक अवगति भेल। हम आश्चर्य चकित रही अग्रज सबहक हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरणक रूपें अंधानुकरण पर, ई की ?पहिने सं जे विधा विद्यमान आ स्थापित ऐछ(कथा/गल्प नामे) ' लघुकथा(Short Story)।तहन ओइ विधाक दोहरीकरणक की खगता ?माने पिता आ पुत्रक एकहि नामे पुकार ! जहन की दुनूक चरित्र,प्रकृति आ क्रियाकलाप एक दोसराक विपरीत। फेर नकल वा मिझ्झरक अज्ञानता किएक ? ओही अज्ञानता वा अंधानुकरण सं पार पएबाक आ विधाक शुन्यता के भरवाक लेल अवतरित भेल बीहनि कथा विधा (1995)। सहयात्री मंच ,लोहना(मधुबनी)द्वारा भेल साहित्यिक बैसार मे सामूहिक रूपें सर्वसम्मति सं एहि विधाक अवतरण भेल छल। ऐ विधाक नाम की राखल जए ताहि पर बहसक पछाति श्री राज द्वारा ताकल नाम-" बीहनिकथा" पर  सर्व सम्मति सं स्वीकृति द'आगू बढ़ाओल गेल।आ तहिया सं मैथिली कथा साहित्यक दू गोट विधा-पहिल,लघुकथा(Short Story)आ दोसर " बीहनि कथा(Seed Story)चलन सारि मे रहि गेल। 25 बरख सं कछुआ चालि सं चलैत बीहनि कथा विधा साहित्यिक छद्म  खरहा सं टपि अपना के विजेता कहेबाक पात्रता आब हासिल क' लेने ऐछ।जन्मक पछाति ठेहुनिया मे कतेको के सैद्धांतिक पटकनिया दैत डेगा डेगी बढ़' लागल। तकर पछाति एकरा दबेवा/माटि मे गोड़बा लेल किछु तथाकथित/स्वघोषित विद्वान सक्रिय भ' गेला। फलत:एकर चालि बाधित होइत ठमकि सन गेल। सोझां मे ' एकला चलो रे'  के उघैत करीब एक दशकक यात्रा एकरा हेरेबा लेल वेश रहल।2010 मे पुन: इ कान्ह उठेलक।आ ताहि मे पछिला सं जेरगर समूह नव आँखि-पाँखिक संग अंगेज पुन: सोझां आनि थिर केलनि।' विदेह , इ पाक्षिक' बनल राजपथ आ सारथी  भेलाह संपादक-.गजेन्द्र ठाकुर आ सहायक संपादक-उमेश मण्डल। ऐ एक दशकक भीठ पड़ल साहित्यिक जमीन पर श्री राजक ' बीहनि कथाक साहित्यक बीराड़क बीहनि सं रोपनि भेल।तकरा हरियरी अनलनि गाम-घर, पत्रिकाक संपादक - शःरी रामभरोस कापड़ि भ्रमर।आ ऐ तरहें श्री राज भेलाह' वात्सल्य ' बीहनि कथा(2003)सं एकर पहिल प्रकाशनक स्वामी। बीहनि शब्दक उत्पत्ति -------------------- ------ संस्कृतक ' ब्रीही ' शब्दक अर्थ होइछ बीज आ मैथिली मे बीहनि/बीहन/बीहैन सेहो ओही शब्दक मूलार्थ मे निहित।--प. भवनाथ झा बीहनि कथाक अर्थ आ परिभाषा ---------------------------------------- बीज/बीजम संस्कृत शब्द थिक।यथा-यज बीजै:सहस्त्राक्ष -महाभारत कथा सेहो संस्कृत शब्द थिक।यथा-कथासरित्सागर । अर्थात् बीहनि कथा पूर्णत: संस्कृत शब्दक  उत्पत्ति थिक।जेना- लघुकथा मुदा साहित्यिक विधाक रूपें जाँची त' इ विधा मूलत:स्वतंत्र आ पूर्ण रूपे मैथिली साहित्य मात्रक विधा थिक।आयातित/ नकल नै। बीहनि माने बीज/बीया।जाहि मे विकास करबाक गुण निहित होइछ।मुदा ओ अविकसित रहैत ऐछ।समय अएला पर विकसित होइत ऐछ।ओकरा मे एक सं अनेक होएबाक गुण रहबाक चाही।बीहनि कथा-एहेन कथा,जे अनेक कथा(कथा/उपन्यास)के जन्म देबाक क्षमता राखए ओ बीहनि कथा भेल/हएत।अन्यथा नै। तें बीहनि कथा मे निष्कर्ष नै हेबाक चाही।---डॉ. भवनाथ झा बीहनि कथा विधाक नामकरण कर्ता श्री राजक मतानुसार-- बीहनि कथा,ओइ बीयाक समान ऐछ जकरा मे झमटगर/पूर्ण गाछक संभावना हो।मुदा ओ गाछ पीपर/पाकैड़ नै,पौध रूप मे हो।परञ्च बोनसाइ नै। पौध रूप सं तात्पर्य जे कथ्य/शिल्पें गसल मुदा शब्दक संख्ये सए सं डेढ़ सए धरि हुअए।मुदा बन्हन मे बान्हल नै। रचनान्त निकसगर(निस्तार देने)नै हुअए।निष्कर्ष पाठक पर। बीहनि कथाक चर्चित आ लोक प्रिय कथाकार, संपादक आदरणीय घनश्याम घनेरो ऐ विधा के परिभाषित करैत कहै छथि--- कोना बुझबै जे इ रचना बीहनि कथा भेलै:-- (क)शब्दक मानक औसत सव सौ हो (ख) विषय मारक ,आ सोचबा पर विवश करैत हो। (ग) कथ्य एहेन,जेना लगैत हो कथा/उपन्यास वा कोनो गद्यक सार हो। (घ) कथा मे निष्कर्ष नै हो। कथा साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर श्री राजकुमार मिश्र जीक विचारें--- (क) आकारगत छोट सं छोट हो (ख) कथ्ये फरिछएल आ गसल हो (ग) संपूर्ण गद्यक संभावना निहित हो (घ) ऐ सं इतर, अव्यवस्थित रचना फोंक हएत।ओ बीहनि कथा नै। बीहनि कथा विधाक मानकीकरणक आधारभूत इकाइ """""""""""""""""""'"'''''"'"'''''''''"''""'"""""""" गद्य साहित्य, मूलत: कथा विधाक मानकता तयकरणक आधार अंग्रेजी साहित्य ऐछ।अंग्रेजी साहित्यक अनुसार विश्व भरिक कथा ,अंग्रेजीक Flash fictionक अन्तर्गत निहित ऐछ।इ फ्लैश फिक्सन छ: खण्ड मे विभाजित ऐछ जकर तेसर खण्ड टेलब्रा(Tellbra )क अन्तर्गत मैथिलीक बीहनि कथा विधाक नियामकता सन्निहित ऐछ। फ्लैश फिक्सन(टेलब्रा)पर आधारित बीहनि कथा मापनक महत्वपूर्ण बिन्दू :- 01-कथ्य/शिल्पें पुष्ट जाहि कथाक न्यूनतम शब्द स. 20 आ अधिकतम 150 हो। 02-कथा साहित्यिक मानकताट परिपालक  हो।यथा कोनो संस्मरण वा शब्द संग्रह मात्र बीहनि कथाक श्रेणी मे नै राखि सकैछ। 03-कथा,एकटा बीजक कथाक प्रतिदर्श हो।अर्थात एहेन कथा जाहि सं कथा/उपन्यास आदिक सर्जनाक संभावना प्रबल हो। 04कथा, निकस पर जा स्थिर नै हो। अन्त खूजल मुदा भावपूर्ण हो। 05-संपूर्ण कथा कोनो संदेशप्रद वा सकारात्म्क उद्देश्यक हो।शब्दक स्थूलकाय मात्र नै। उपरोक्त मानकता पर ठाढ़ रचना बीहनि कथा विधाक रचनाक रूपें अपन जग्गह पेबा मे सक्षम भ' पाओत।तकर पहिल मूल्यांकन लेखकक,पछाति संपादक ओ आलोचकक हाथ ऐछ। "कोनो नव सफलता हासिल करवा लेल पुरान मे पैस' पड़त।,खंघार'पड़त।तहन परिमार्जित फल सोझां आओत।जे भविष्यक नव बात गढ़ि मोकाम धरि ल' जएबा मे सक्षम बना पाओत।' एहि तरहें मैथिलीक लघुकथा विधा(कथा/गल्प)नामे लिखाइतक पछाइत बीहनि कथा विधा वैश्विक कथा मापदण्डें एकटा नव प्रतिमान गढ़ि,मैथिली साहित्य मे मैथिलीक अपन एक मात्र विधाक रूप मे स्थापित भेल।इ कोनो आन आयातित/नकल,विधाक विधान्तरण वा नामान्तरण नै।स्वयं मे मानक स्वतंत्र विधा हेबाक परिचिति कायम केलक। एहि प्रकारें मैथिली कथा साहित्यक दू टा स्वतंत्र विधा अपन अस्तित्व कायम क' रखने ऐछ।पहिल-लघुकथा (Short story)जे कथा/गल्प नामे लिखाइछ।ठीक ओहिना जेना कि अंग्रेजीक Poetry,मैथिली मे 'काव्य' नामक विधान्तर्गत-गीत,गजल,,कविता, हाइकु,क्षणिका आदि स्वतंत्र नामे/क्रियाकलापें/चारित्रिक गुणे अपन- अपन परिचिति बनौने ऐछ।मुदा विधागत सबटा काव्य परिवारक अंश वा अंग थिक। दोसर-बीहनि कथा(Seed Story) उपरोक्त दुनू विधा मध्यआओर कोनो वैध/अवैध विधाक लेल जग्गह वाँचल नै ऐछ। मुदा लघुकथा नामे बलधकेली मे हिन्दी लघुकथा विधाक नकल मैथिली अवतरण के घोसियेबाक असफल प्रयास ठाम ठीम क' मैथिली साहित्य के उकरू बनेबाक षडयंत्र जारी ऐछ।इ भ्रम वा द्वन्द ऐ द्वारे भेल जे किछु मैथिली रचनाकार लघु कथा माने आकारे छोट कथा बूझि नकल करैत रहलाह।ध्यातव्य महत्वपूर्ण बात जे लघुकथा एकटा शब्द मात्र नै,ओहि नामक एकटा स्वतंत्र विधा थिख।जे मैथिली मे अदौ काल सं कथा/गल्प नामे लीखाइत पहिने सं स्थापित ऐछ।आब तहन विचार करी मैथिली सं इतर हिन्दी भाषा साहित्यक अपन विधा " लघुकथा "क मैथिली अंधानुकरण पर। कोनो व्यक्ति,विषय,बौस्तक गुणक अनुसरण/अनुकरण बेजए नै।मुदा अंधानुकरण कतेक उचित ? मैथिली साहित्य मे विद्यमान " बीहनि कथा " विधा सं इतर सब विधा कोनो ने कोनो अन्य भाषाक विधा सं आयातित ऐछ।मुदा जत' सं आयातित भेल,ओइ मे आ मैथिली मे अपन मानकता वा प्रामाणिकता सिद्ध केने ऐछ। हिन्दीक लघुकथा विधा जे स्वयं मे आइयो मानक वा प्रामाणिक सिद्ध नै भ' पावि घड़ीक पेण्डूलम जकां डोलि रहल ऐछ।ओइ मे आइयो कते शब्दक वा कोन रचना ओइ विधाट रचना ऐछ की नै,तै पर मंथन चलिये रहल ऐछ।एते दशकक लेखनक पछातियो मूल्यांकन मे लघुकथाक जग्गह लघुकहानी सं जोइर व्याख्या होइछ।जतेक मुड़ी ततेक पीरी बला गप्प।एहेन अव्यवस्थित विषय/बौस्तक अंधानुकरण ,हास्यास्पद आ कि उठल्लूपन ? "अपने आँखिगर रहैत, अन्हरा के सहारे बाट ताकब कतेक उत्कीर्णा बला बात।" हिन्दी लघुकथा विधाक अंधानुकरणक प्रबल पक्ष रहल हएत,हमर सबहक सामान्य शिक्षाक हिन्दी माध्यम।हम सब एकेडमिक शिक्षा ग्रहण सामान्यतया हिन्दी भाषा माध्यमे केलहुँ।किताब,पत्र/पत्रिका क पाठनक भाषा हिन्दी रहलाक कारणे हिन्दी साहित्यक विषय-वस्तु पर निर्भर स्वाभाविक छल।तें हिन्दी साहित्यक संतान(विधा)कें पोसपूतक रूप मेअवैध रूपें अंगेज लेब अस्वाभाविक नै।ओही देखाँउसे वा नकल क'मैथिली मे लघुकथा संग्रह नामे 1972  मे आयल पहिल पोथी-" जे की ने से "--डॉ. हँसराजक।आ ,1975 मे तत्कालीन नवतुरिया कथाकार डॉ. अमरनाथक " क्षणिका "।दुनू पोथीक रचनाकार(आमुख मे)ऐ संग्रहक एको टा रचना ,कोनो पत्र/पत्रिका मे प्रकाशित नै हेबाट बात स्वीकारने छथि।ऐ सं इ स्प्ष्ट ऐछ जे मैथिली मे एकर कोनो अस्तित्व नै रहै।इ तहिया के घटना/बात छैक जहिया मैथिली सं इतर अन्य भाषा मे कथ्य/शिल्पें मजगूत मुदा आकारगत छोट रचनाक एकटा स्वतंत्र विधाकरूपें/नामे सृजन भ' रहल छलै।यथा-संस्कृत -लघ्वी,हिन्दी-लघुकथा,पंजाबी-मिन्नी कहाणी/कथावां,उर्दु-अफसांचे,ओड़िया-क्षुद्रकथा......आदि। मैथिली मे हिन्दी विधाक अंधानुकरण क शुभारंभ क' किछु मैथिली कथाकार स्वघोषित विद्वान हेबाक दंभ पोसलनि।तकर करीब पचीस बरख धरि अंधानुकरणित लेखन सेहो सुषुप्त वा शुन्य रहल।पुन: 1997 मे लघुकथा संग्रह नामे दू गोट पोथी,शिलालेख-तारानन्द वियोगी आ खण्ड-खण्ड जिनगी -प्रदीप बिहारीक आयल।से ताहि अवस्था मे जाहि सं दू वर्ष पहिने(1995 मे)मैथिलीक अपन एक मात्र विधा बीहनि कथा अवतरित भ' चूकल छल।ऐ विगत पचीस वर्षक नमहर अन्तराल मे अंधानुकरणित हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरण पर मैथिली मे कोनो मानकता तय नै भेल छल।(आइ एकैसम सदीक दोसर दशक धरि नै भेल)।जेना पहिने मिथिला मे सत्यनारायण भगवानक पूजन पर सुनता उपासक चलनि छल।तहिना मैथिली रचनाकार लघु कथा शब्द सुनि मात्र लघु कथा लिखबाक नकल करय लगलाह।जहन की हिन्दी मे लघु कथा शब्द मात्र नै,ओहि भाषाक एकटा स्वतंत्र विधा ऐछ।आ मैथिली मे कथा/गल्प नामे लिखाइत लघुकथा विधा पहिने सं विद्यमान छल।आब नकल क' लिखल जाइ बला रचना-जे बीस शब्द सं आठ सौ धरिक ऐछ।तखन प्रश्न उठैत जे कतेक लघु,ककरा सं लघु ?ऐ पर प्रकाशित कोनो तय मानकता नै छल(ऐछियो नै)जाहि सं इ सुनिश्चित कएल जए सकए जे कोन रचना लघुकथा विधान्तर्गत स्वीकार वा अस्वीकार कएल जा सकए।प्रसिद्ध कथाकार ओ इतिहासकार डॉ. मायानन्द मिश्र एकरा नकारैत लिखने छथि--" मैथिली मे लघुकथा नामे एक अन्य कथा लेखनक विकास भेल ऐछ जे समकालीन कथा/गल्प नै,अपितु चुटुक्काक निकट ऐछ।"--मैथिली कथाक विकास(संपादक- बासुकीनाथ झा)साहित्य अकादमी -2003 आधार हीन लेखने मठोमाठ हेबाक/कहेबाक परम्पराक निवहता मे किछु रचनाकार लीन रहलाह।जहन कि बेसुरा तान सं प्रसिद्धि पेनिहार गायक जकां बिना मानकताक लेखन मे लीन रहनिहार अपना के प्रयोगवादी आ प्रतिष्ठित बुझनिहारक रचना आ ओ तथाकथित विधा स्वय: खारिज ऐछ।ताहि लेल अदखोइ-वदखोइ आ माथा पच्चीक खगते कोन? हिन्दी विधाक मैथिली अवतरण लघुकथा नामक रचना आइ धरि बसात मे बौआइत ऐछ।जमीन पर अनबाक कहियो कोनो निश्तुकी प्रयास नै भेल।ओ तथाकथित विधा/रचना स्वत: खारिज होइत चेतना शुन्य भ' गेल।किएक त' जहन जमीन पर उतरबाक प्रयास केलक तहन आधारहीन हेबाक कारणे सूपक भाटा सन ओंघराइत रहल किएक त' स्थिरताक आधार पहिने सं नदारद!किछु स्वघोषित वा परपोषित विद्वान सब--" डाँरि पारि के ओकरा लक्ष्मण रेखा बुझ' लगलखिन,मुदा डाँरि सोझ भेल की वक्र तकरा सं दूर धरि सरोकार नै।"प्रसिद्ध रंगकर्मी श्री कुणाल ,कथा प्रसंग लिखल अपन आलेखक अन्तिम अनुच्छेद मे लिखै छथि--"आब मैथिली मे लघुकथा नामे किछु रचना सेहो देखाइछ,जे मैथिली साहित्य मे आधार हीन ऐछ।तें ओकर चर्च करब व्यर्थ सन।"--अंतिका-रजतजयन्ती अंक(2008)संपादक- अनलकान्त। लघुकथा नामित रचनाक भविष्य ? ''""""""""""""""""""""""''""""'''''''"''''''''"""""""'"'""' जेना अंग्रेज़ी मे पोएट्री,मैथिली मे " काव्य ' विधा ऐछ।आ ऐ काव्य विधान्तर्गत--गीत,कविता ,गजल,क्षणिका, हाइकु आदि स्वतंत्र नामे आ स्वतंत्र अस्तित्वे छैक।मुदा विधागत सब एकहि परिवार "काव्य "क अंग छै।तहिना अंग्रेजी क शॉर्ट स्टोरी विधा छै ,आ कथा/गल्प ओकर अंग। मैथिली मे लघुकथा सं इतर दोसर कथा विधा छै " बीहनि कथा "(Seed Story),हिन्दीक अंधानुकरणे लघुकथा नामे सृजित रचना बीहनि कथा विधान्तर्गत ग्राह्य ऐछ।परञ्च बीहनि कथाक तय मानकता पर ठाढ़ होइ बला रचना मात्र।से ओ लघु कथा नामे होइ वा बीहनि कथा नामे। बानगी स्वरूप देखल जए डॉ. सत्येन्द्र झा जीक लघुकथा नामे दू टा रचना- इसकूल-- ओहि गाम मे एकटा दोकान नै छलै।तीन किलोमीटर जाय पड़ै छलै छोटो छीन चीज किनबा लेल।जे कियो कहियो  दोकान फोलबाक साहस केलक ओकरा दोकान मे दोसरे -तेसरे राति चोरि भ' जाय आ तकर बाद दोकान बन्न भ' जाय।चोरवा गामक नाम सं परोपट्टा मे जानल जाइत छल ओ गाम।मुदा नरेशक साहस कहू वा दु:साहस ओ बाहर सं आबि दोकान फोललक ओहि गाम मे।घर मे पिता आ पत्नी विरोध कयलनि मुदा ओ ककरो नै सुनलक।दोकानक स्टाफक रूप मे सभ सँ सेसर चोर के रखलक।ओ चोर सेहो निश्चिंत छल जे जखने बेशी समान जमा होयत कि चोराक सभ किछु ल' जायब।।नरेश तीन सए टाका ओहि चोरकेँ दै छल।शहर सँ समान अनबाक हेतु नरेश ओही चोरबाकेँ पठबै छल। क्रमशः चोरवा कोन समान मे कते लाभ होइत छल सेहो धरि बुझय लागल। आइ ओहि दोकान मे समान भरल छल।आजुके राति चोरबा अपन संगी सभहक संग चोरिक योजना बनौलक।जखन दोकान बन्नक' नरेश चलि गेल तँ चोरबा अपन संगी सभहक संग दोकान मे घुसल।बोरा मे समान सब कसय लागल।एकटा संगी पुछलकै -" कते दामक समान हाथ लागल ?" दोसर चोर कहलकै-"पांच हजार सँ कम के नै हेतै।" "मुदा एहि पांच हजार मे तँ मालिक के पांच सयसँ बेशीक फयदा नै हेतै।साढ़े चारि हजार तँ मूलधन छै।"--चोरबा बाजल---फेर ओहिमे हमरो तीन सय के हिस्सा हेतै।" चोरबाक म़ोन तीत भ' गेलै।ओ अपन मित्र चोर सभके बुझबय लागल--चोरि त' तखने जायज होइछ जखन हमर हक छीनि क्यो अपन घर भरय,मुदा नरेश बाबू तँ ओतबे कमाइ छथि जतेक उचित अछि।ओ नाजायज लाभ कहाँ लै छथि ?" चोरबा चोरि करबाक विचार बदलि लेने छल।संगी सभ ओकर निर्णय पर सहमति व्यक्त कयलक।बोरा खोलि चोरबा सभ सामान केँ पहिने जकाँ सैंतय लागल।नरेश एकटा कोन मे ठाढ़ भ' ई सभ देखैत रहल।ओकरा बचझना गेलै जे ओ कोनो दोकान नहि,एकटा इसकूल खोलने हो। विश्लेषण--उपरोक्त रचना शब्द संख्ये नमहर ऐछ!माने टेलब्राक निर्धारित शब्द संख्या-150 सँ उपर। कथ्य-प्रेरक,पंचतंत्रक कथा समकक्ष।प्रारम्भिक लेखनक करीब बाझल। शैली- कथा बला,सेहो पूर्ण नै।छेंट सन। तें बीहनिकथाक परिधि सं बाहर ऐछ। दोसर बानगी ---------------- मौअति """""""""" ओ ईमानदार छल।तेँ लोकसभ ओकरा मारय छल।लोकसभ कहलकै- तोरा कुकुरक मौअति मारबौ।ओ चुप्प छल,मुदा प्रसन्न।कारण- ओ मनुक्खक मौअति नहि मरय चाहैत छल। विश्लेषण-इ रचना निर्धारित शब्द संख्या मे बान्हल  ऐछ। मुदा कथ्य - भाषण वा आदेशक हिस्सा मात्र। शैलीगत-निष्कर्ष पर पहुँचा देल गेल छैक। तें इहो बीहनिकथाक हद मे नै रहि रहल। उपरोक्त दुनू रचना--सत्येन्द्र कुमार झाक लघुकथा संग्रह-अहींकेँ कहै छी(2007)।पृष्ठ- 30/31 सँ उद्धृत। आब अही लेखकक इ तेसर कथा क बानगी नीचाँ ऐछ जे हुनकर नवका संग्रह-"जँ अहाँ सुनितहुँ"(2020) सँ ऐछ । भेटब डूबब """"""""""""" " अहाँक जीवन मे सभ सँ नीक की लगैत अछि ?" "अहाँके भेटब...." "आ अहू सँ नीक.....?" " हमरा हेरा जएब...?" उपरोक्त रचना लिखल त' गेल ऐछ लघुकथा नामे मुदा बीहनिकथाक मानकताक करीब ऐछ। यथा-निर्धारित शब्द संख्या(अधिकतम-150)क भीतर कथ्य आ शिल्पें गसल। निस्तार विहीन। तें इ रचना पूर्णत: बीहनि कथा विधाक अंग मानल जा सकैए।शेष निंघेस सदृश्य।ठीक ओहिना जेना कोनो एक कक्षा मे पढ़ैत सब विद्यार्थी परीक्षा समय समान प्रश्न हल करैछ।परिणाम मे न्यूनतम अंक 30% प्राप्ति बला विद्यार्थी मात्र सफल आ शेष असफल घोषित होइत ऐछ। आब एहने बानगी बीहनि कथा नामे लिखल रचना सँ.... डागदर साहेब-- मिथिलेश सिन्हा ------------------   ------------- ------ बड्ड दिन सँ पत्नी कहैत छलीह जे,हमरा पर किछु धियाने नै दैत छी।खाली मोबाइल मे खुटूर-पुटूर करैत कविता-कहानी रचैत रहैत छी.....जखन बेमारी बढ़त,पलंग पकड़ि लेब...तखन सबटा कविगिरि घुसरि जएत। एहेन धमकी पर के नहि डरतै यौ?पत्नी केँ होमियोपैथिक दवाई पर पूर्ण विश्वास छैन्ह।पिछला मंगल दिन शहरक बड्ड पुरान एगो बंगाली डागडर ठाम हुनका ल' गेलहुँ। सांझुक बेर,लगभग आठ-नौ गोट रोगी बैसल छलाह।डागदर साहेब बयस सँ लगभग अस्सी-पचासीक हेताह।एकटा रोगी पर आधा घंटा पूछताछ करैत,अपन डींग डांग सँ रोगी आओर परिजनकेँ अपन बड़प्पनक खिस्सा कहैत समय आगाँ खींचि रहल छलाह।हमर नम्बर दोसरे छल,मुदा घंटा भरि डागदर साहेब लागल रहलाह। अगल-बगल मे बैसल आन रोगी अकछय लागल।आब हमर नम्बर आएल। " किनको देखाना हाय ?" " जी,हमर पत्नी केँ...।" " हूँ,इधर आइए" " हम हरि बाबूक बालक थिकहुँ.." "ओहो,तुम इंजीनियर का बेटा है । ओ हमसे ही अपना इलाज कराता था..कैसा है ओ..?"--आन रोगी दीसन तकैत बजलाह। " जी,ओ मरि गेलाह..." " ओ गॉड...,तोमहारा माई कैसा है?" "जी,ओहो मरि गेलीह...।" हमर जवाब सुनि क' बेंच पर बैसल आन मरीज,बहन्ना बना ससरय लागल....।---डागडर साहेब,आश्चर्यचकित भाव सँ खन हमरा,खन रोगी सबकेँ ससरैत देखय लगलाह। विश्लेषण:- उपरोक्त रचना बीहनि कथाक मानक शब्द स. सँ बाहर ऐछ। कथा मे उप कथाक समावेश। कथ्य-शिल्पें कथाक छेंट सन लघु कथा। ----मिथिलांगन,अंक-38-39 निर्वहन--कल्पना झा "''''''"""''''''''''"""'"'''"""""""""" --माय गे! दादी त' हाथे सँ लपे लप तिल-चाउर परसै छलीह,मुदा तों त' चम्मच सँ परसै छें ? --धुर्र ! ताहि सँ की हेतैक ? --नहि हेतैक की...?हमरो सबकेँ नीक रस्ता भेटल। --से की ? --"इएह जे ' निर्वहन 'मे सेहो 'चम्मच ' लगाओल जा सकैछ। मिथिलांगन---36-37 विश्लेषण:- इ रचना कथ्य-शिल्प आ शब्द स.मादे पूर्ण मुदा कथा सारक संग बन्न भेल।माने निकस पर कसैत।तें इहो कथा विधागत झूस ऐछ। बेटा निगम।                  --घनश्याम घनेरो लावारिस लहास पुछलकै : -- बेटा! नगर निगम? -- हम तोहर बेटा नहि, कर्मचारी छी। -- हमरा लेखा तोहीं बेटा। -- ठिक्के! लोक केँ लोक सँ मतलब नहि रहलै तँ... -- पहिने हमरा घिसिएबह आ की कुकूर केँ? -- तोरा। -- पहिने हमरे किए? -- एत्तेक मनुक्खता अखन छैक, तैं! --  मनुक्खक लहास केँ बादमे आ कुकूर पहिने कहिया सँ घिसिएल जेतै? -- ई काज हमर अगिला पीढ़ी करत। घिसिया क' ठेलापर चढ़बैत काल लहासक आँखि कुकूर दिस छलैक। इ रचना ऐ विधाक सब मानकता यथा- निर्धारित शब्दक भीतर।फरीछएल कथ्य आ गसल शिल्प मे निस्तार रहित पूर्ण ऐछ! अन्तत:मैथिली साहित्यक दू भाग भेल -लघुकथा (SHORT STORY)आ बीहनि कथा ,(SEED STORY )इ दुनू निर्धारित रूपें निरन्तरता बनौने रहत।शेष फोंक मात्र। --"पहिने बीहनि कथा,सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ैत रहल। आ आब................पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ैत रहत। # मुन्ना जी # ३ केशव भारद्वाज कल्पवास (खिस्सा) दहन बाबु के आंगन सं बड्ड ईच्छा रहईन - " एक बेर कल्पवास करितऊं "। उनकर नैहरे- सासुर सब मास दिनक लेल कल्पवास केने छलईन।ओई कल्पवासक समय भोगल जिनगी, संत महात्मा के बोल- वचन, लोकक भीड़, सात्विक जीवन, साधु संतक बड़का बड़का टेंट, कुंभ में लोकक रेला, ओ मोरक पंख, लोहाक हांसु, लोक के हरेनाई आ हरेला पर तकनाई, सरकारक बेबसथा, हड्डी गलबअ बाला जार, भीजल जारईन, ईंटाक चुल्हा,  सांझक बजार, तरकारी बाली सबहक मोल मोलई , ओ मोटरा- मोटरी, ओ ठगहा स्वामी, ओ वस्तुजातक चोरी, अहीना कतेक रास खिस्सा पिहानी ओ सुनने छईथ। सासुर के लोक गेल होईथ वा नैहर के, खिस्सा एकरंगाहे। कल्पवास उनका अपना दिश सम्मोहित करई छलईन। ओ एक दु बेर पहिनेहो मोने मोन जाय के तैयारी केनहो छलीह लेकिन ऐन मौका पर कोई न कोई विघ्न बाधा सामने ठार भअ गेलईन। नई जा सकलीह, मोन मसोईस कअ रही गेलीह। अपने के मनेलीह- ओना अखईन तेहन बुढ़ थोरबे भेल छईथ, कल्पवास कोन भागल जाई छई। आब सब जिम्मेदारी सं मुक्त भेली अईछ। ओना त भईर जीवन किछु ने किछु लगले रहई छई।दुनु बेटी अपन सासुर बसई छईन। बेटा के नीक नौकरी छईन। दु बरखक पोतो छईन। दिल्ली में बेटा-पुतोहु रहई छईन।नाईत, नतनी आ पोता भेलाक बाद उनका लागअ लगलईन जे आब बुढ़ भअ रहल छईथ। ओना देह- दशा सं नीक छईथ। कियो नई कहतईन जे घरबाला नौकरी सं रिटायर कअ गेल छथीन। ओना ई दहन बाबु के उपराग में कहितो छथिन- आहां रिटायर भेल छी, हम नई। से मोन राखु। कहलो गेल छई जे पोता भेलाक बाद स्वर्गक रस्ता सीधा खुईज जाई छई। ईयाह स्वर्ग सुनला पर तअ कल्पवासक धुन सवार भेल छईन।अई बेर सोईच लेने छलीह जे किछु भअ जाय माघ में प्रयागराज जेबे करतीह।एक दु टा धरम करम बाली बुढ़ी सब के दोसराईत लेल पुछबो केलखिन, लेकिन ओ सब नई तैयार भेलखिन।अंत में हाईर कअ दहन बाबु के कहलखिन- " आहां हमरा कल्पवास में जा कअ छोईर देब आ फेर एक महीना बाद लअ आनब"। से कियैक? हम कै गोटे के कहलियनि, कियो संग दई लेल नई तैयार भेल। अरे हम छी ने। हम संग देब! सकारात्मक ज़बाब भेटला पर दहन बाबु के कनिया कनी आर जोशेली। बजलीह- से तअ हमरा बुझल अईछ जे आहां संग हमर देबे करब।ओही सं त कहलऊं। मूदा हम छोईर कअ नई आयब? कियैक? डर होईया। आहां कोनो बहुरूपिया साधु के नई पिछोड़ धअ लेबई। आब कतअ जायब। ओतअ हम धरम करअ जाई छी। एहनो नई छी जे कियो बहला फुसला लेत हमरा। बात बात में दहन बाबु अपनो कल्पवास जयबाक ईच्छा जतेलखिन।  आब की छलई। उनकर कनिया तअ खुशी सं झुमअ लगलीह। सब बेटा बेटी के अपन जाय के बारे में बतेलखिन। सब बयस भेला पर बदलईत अईछ।दहन बाबु घरो में कहियो पुजा पाठ नई केलाह, ओ मास दिनक लेल कल्पवास करअ जा रहल छथि। सब के अचरज लगलई। अगिले दिन इलाहाबाद बाला ट्रेन में रिजर्वेशन के  टिकट अबिती- जयती के करा लेलाह। समान सबहक लिस्ट बनअ लागल। जे बुढ़ी सब पहिने कल्पवास केने छथि, उनका सब सं ब्रीफिंग पर ब्रीफिंग दहन बाबु के कनिया लअ रहल छलीह।जाय सं एक हफ्ता पहिनेहे सब जरूरत के समान कीना गेल छलईन। इलाहाबाद  में एकटा सीधा संबंधी तअ नई, लेकिन जोड़ुआ तअ अबस्से कहबईन, ऊनकर पता आ फोन नम्बर सब लअ लेने छलाह। उनका सं एकदिन फोन पर गप्प सेहो भअ गेल छलईन। हुनका अपन आबअ के प्रोग्राम बता देने छलखिन। कोना की स्टेशन सं गंगा कात जेबाक छई, कतेक की भाड़ा लगतई, कोना आ कत्ते पाई में टेंट भेंटतई, सब बुईझ- सुईझ लेने छलाह। दहन बाबु के कनिया के होईन की आब तअ ओ सोझे स्वर्गे जेतीह। ओकरे लेल रस्ता सब बईन रहल छई। जाय सं एकदिन पहिने सब धीया- पुता के " आल द बेस्ट आ हैप्पी जर्नी" बाला फोन सेहो एलईन। आई ओ नानी-दादी बाला खाड़ी में अपना के असली में बुईझ रहल छलीह। जखईन घर सं बिदा भेलीह तअ भईर दियाद बिदा करअ आयल छलईन।बुझा रहल छलईन जे कोनो जंग में जा रहल छईथ। लोक सब कुंभ आ कल्पवासक सुनल सुनायल गप कहईन आ डरबईतो रहईन। दहन बाबु के कनिया पर अकर एक नबको असर नई छलईन। उनका दहन बाबु के अफसर बाला रौब पर भरोसा छलईन। जे काज ओ हाथ में लई छलाह, सफलता भेंटते छलईन। चाहे बच्चा सबहक एडमिशन होई, ट्रेन में जतरा होई, बेटी सबहक कथा वार्ता होई, सब जगह ई गोटी लाल क कअ घुरल छलाह। रेलवे टीशन पर छोड़अ लेल एकटा भातिज आ उनकर कनिया मोटर सं आयल छलखिन।एसी बोगी में रिजर्वेशन छलईन। बेशी भीड़भाड़ नई छलई। अपन आराम सं दुनु बेकती रिजर्व सीट पर बईस गेलाह। जखईन अगिला दिन भोरे इलाहाबाद पहुंचलाह त देखईत छईथ जे एक गोटे उनका सब के लेबई लेल स्टेशन पर ठार छथि। ई ऊयाह व्यक्ति छलाह जिनकर पिता सं दहन बाबु के गप भेल रहईन।ओतअ सं ओ सब सीधा संगम गेलाह, जतअ कल्पवासक लेल टेंट सब लागल छलई। पहिनेहे सं इनका सबहक लेल एकटा टेंट ठेकनायल रहईन।ओ व्यक्ति फाइनल अई सं नई केने छलाह, ईनका सब के केहन नीक लगतईन? बढ़िया जगह पर ओ टेंट लागल छलई। सब जगह ओतअ सं लगे छलई।थोड़ेक काल में ईनका सब के व्यवस्थित केलाह के बाद ओ व्यक्ति चईल गेलाह। उनकर अनुसार कल्पवासी के किछु काज आईब कअ ओ अपन खाता में धर्म के डेबिट कअ रहल छलाह। कतऊ भी स्थानीय अपन लोक रहलाह पर सब किछु आसान भअ जाई छई। अखईन‌ प्रत्यक्ष में ई सब देखलाह।थोड़ेक काल में चुल्हा जड़ा कअ चाह बनबई गेलाह आ पीयई गेलाह। भानस भअ गेल, तअ बुझु सब भअ गेल। बदली बला सरकारी नौकरी में उनका सब के अकर अनुभव छलईन। सब सं पहिने, घर में घुसिते देरी ओ भंसे घर में जाई छलीह आ जै चुल्हा रहई, ओकरा पजाईर कअ चाह बनबईत छलीह। अतऊ ओहिना भेलई। अगिला दिन स़ं अपन अई बालु परहक दुनिया शुरू भअ गेल छलईन। गंगाजी में प्रातः स्नान सं दिनचर्या शुरू होईन। दिनभर पुजा पाठ, भजन, खेनाई बनेनाई, आ गप्प सरक्का में बीतई। अद्भुते अनुभव रहलईन। केना भोर सं सांझ भअ जाई, कनियो नई बुझाई। कोनो तरहक विकार मोन में नई अबई। सुआईत ने लोक मास करअ अतअ अबई छई। दिन हो या राईत, चारु कात इजोते -इजोत, अलगे दुनिया छलई। कोनो ओहन सुविधा नई रहनेहो, खुब नींद होई आ भुख सेहो लगई। गंगा माई के कृपा ठीके अपरम्पार छईन, ओहिने उनकर महिमा। सुर्यास्त सं पहिनेहे अतअ लोक रतुका भोजन कअ लई छल। ओकर बाद साधु संतक प्रवचन सब सुनईत छल। कतऊ कतऊ भंडारा सेहो लागल छलई। ईनका सब के पूर्वक संस्कार के कारण लंगर में के खेनाई खाईत ठीक नई बुझेलईन। ओना खाय बला प्रसादे कहई छल। ओ सब अपने बनबईत आ खाई छलाह। पांचे सात दिनक बाद त कैक परिचित लोक भेटा गेलखीन। आब त सब कियो एकदोसरक टेंट में जाय आबअ लागल छलाह। ई कल्पबासीक नब दुनिया बईन गेल छलई। कियो साते दिन लेल आयल छल त कियो दु हफ्ता लेल, कियो किनको पहुंचाबई लेल त कियो कुशल क्षेम लेबअ लेल। सब अपन दुनिया में रमल छल। दहन बाबु के कनिया के तअ कयेक टा मैथलानी चिन्हार परिचयबाली सब भेटा गेल छलखिन। पईंच उधारी सेहो गाम जेकां मऊगी महाल में शुरू भअ गेल छल‌‌‌। दहन बाबु चुपचाप सब देखईत रहई छलाह। उनका होईन जे अतऊ ऊनकर कनिया के सब ठईग रहल छईन।ऊमहर कनिया ऊनकर कल्पवास में दान-पुण्य करबाक चाही, सैह सोईच कअ देब लेब करई छलीह। सांझ में एकटा संत के प्रवचन में ओ सब जाईत। ओ कहई- ई संसार मिथ्या थीक। बेटा-बेटी,अपन आन सब भ्रम छई। जे सच छई। ओ आत्मा छई। ईयाह अचर, अजर, अमर छई। कहियो ओ संत प्रवचन में कहई छई- ई सब माया छई। आहां संग ई लोक तकने तक सटल अईछ, जाबईत ओकर स्वार्थ आहां सं जुड़ल छई। जहिये मतलब खत्म,ओ घुरियो नई ताकत।संग के रहत? ओ रहत अपन सद्कर्म। अही सद्कर्म के रस्ता पर कोना चलब? ओईलेल अपन सर्वस्व समर्पण के भाव जगाऊ भगवानक प्रति। अहिना ओ संत तरह तरह के खिस्सा पिहानी सब कहई। ओकरा अनुसारे "अप्पन " किछु नई छई। जखन अई देहे के भरोस नई त आर दोसर कथी के,? ओ संतक बाणी में तअ मिठास घोरल छलई लेकिन ओकर शब्द दहन बाबु के कनिया के लोहछा दई छलईन।बाकी सब पर ओतेक रंज नई होईन, जखईन ओ बेटा-बेटी पर कहई, त ओ इनका कनिको नई गिराईन। एकदिन ओ प्रवचन में कहई छल- " मनुक्ख अपन स्वार्थ लेल ई माय- बाप आ संतानक जाल बनबईत अईछ। जाल के फेर पोखईर में फेंकईत अईछ.......... जाबईत धईर ओकरा माछ फंसईत रहईत छई............जाल नीक बुझाई छई। जखने जाल में माछ नई फंसलई, ओ जाल के ऊल्टबअ- पल्टबअ लगईत अईछ। ओकरा होई छई जे जाल में कोनो दोख छई, ताहि लेल माछ नई फंसल। दोसर  - तेसर जाल बदलईत रहईत अईछ।ओ पोखईर में नई तकईत अईछ जे ओई में माछ छई वा नई। माछ नई जाल में फंसलाक कारण पोखईर में माछक नई भेनाई सेहो भअ सकईत छई। ओहिना ई संसार छई। जाल भेल स्वार्थ। जाबईत माछ जाल रूपी स्वार्थ में भेंटईत रहई छई.........ताबईत सब नीके छई। जखने नई भेटलई, ओ बदईल लईत अईछ।अतअ पोखईर अईछ आहांक सद्कर्म। ऊयाह आहांक काज पुरा करबईत अईछ। दोसर कियो किछ नई करईत अईछ।आहां ई झुठहा के मोह-माया सं निकलु। अई लोक के ज्यों नई सम्हाईर सकलऊं, त ओई लोक के सम्हारू। आहां जरूरतमंद के दियऊ, नई की अपन कहल सखा- संतान के। आहा़ं अखनो देख सकई छी। मूदा आहांके आंईख पर संतानमोहक पर्दा लागल अईछ.........ओ नई किछु देखअ देत। अहिना ओई महात्मा के प्रवचन सुईन कअ दहन बाबु के कनिया के मोन कनी काल लेल हिल-डुल जाई छलईन।फेर मोन में अबईन, भअ सकईत होई अई सधुबा संगे बीतल होई, तैं अपन राग अलापईत रहईत अईछ। दहन बाबु त प्रवचनक समय टेंट में आराम कअ कअ बीतबई छलाह। ओ नई अई पचरा में फंसई छलाह। समय कतऊ रूकलईया। कल्पवासक मास बीत गेलईन। आबअ काल में बैग में भंसाक समान भरल आ आब सनेश सं भरल। मोरक पंख, लोहाक वस्तुजात,कयेक जगहक निर्माल, प्रसाद, गंगाजल सं भरल बैग लअ कअ टीशन आयल छथि, ट्रेन पकड़ई लेल। तखईन पता चललईन जे ऊनकर ट्रेन तअ कुंभ लअ कअ कैंसिल भअ गेल छईन। आर जे कीछु चिन्हल जानल लोक सब छलखिन, ओ सब दिल्ली जा रहल छलाह। उनकर सबहक ट्रेन में रिजर्वेशन छलईन। ओ सब आग्रह सेहो केलखिन। दहन बाबु सोचलाह जे दिल्ली में उनको बेटा छथिने। अखईन अतई चईल जाई छी.......संगत अईछ। मास दिन नीक सं बीतल........ जतरो नीक रहत।ई जे सनेश सब छई, अखने दअ देबईन। ओ मंदिरक निर्माल माथ पर सब के टटका टटकी लाईग जेतईन।टिकट लेलाह आ दिल्ली ऊनकर सबहक संग आईब गेलाह। आब दहन बाबु के कनिया दिल्ली टीशन पर सं बेटा के फोन केलखिन जे हम सब टीशन पर आयल छी।आईब कअ लअ जाऊ। बेटा तामसे घोर भअ कअ फोने पर ज़बाब देलखिन- हम सब दक्षिण भारत आई जा रहल छी। आहां सब के पहिने बतबअ के छलाय।एना कतऊ हुलेले होई छई। हमर सबहक ई टूर छह महीना पहिने बनल छल। आहांके गामक टिकट छल त ईमहर किया एलऊं। जे बुझाईत अईछ करु।हम अपन यात्रा नई कैंसिल कअ सकईत छी।फोन पर पाछु सं पुतोहु के बरबराईत अस्पष्ट बात सेहो सुना रहल छलई। दहन बाबु के कनिया के चेहराक भाव देख कअ पता लाईग चुकल छलई जे की ज़बाब भेटल छईन। पटना के दोसर ट्रेन लागल छलई। दहन बाबु ओकर टीटी लग गेलाह। अपन परिचय दईत दु चाईर टा रेलवे अधिकारी सबहक बारे में कहलकिन। ओ टीटी, पटनाक टिकट दुनु गोटे के बना देलकईन आ  अपनबाला सीट एसी बोगी में दअ देलकईन। दहन बाबु के कनिया कहलखिन- हमरा आहां पर भरोसा छल जे आहां रस्ता निकालबे करब। हम आहांके नेने छोड़ब।अतऊ गोटी लाल करबे केलऊं। आब दहन बाबु के कनिया के ओई साधु के प्रवचनक सब शब्द मोन पईर रहल छईन। सब स्वार्थक संग छई- संतान सेहो।कियो ककरो संग तखने तक छई, जाबईत स्वार्थ पूर्ति भअ रहल छई। निश्वार्थ ऊयाह परम ब्रह्म अईछ।ओकरा पर यश अपयश, नीक बेजाय, उचित अनुचित , लाभ हान सब छोईर दियऊ आ जतअ जेना जहीया तक राखय.....खुशी खुशी रहु।जीवन रेतक टीला अईछ, अई पर नई कोनो घमंड आ नई राखु कोनो भ्रम। कल्पवास इनका सब के जीवनक पाठ पढ़ा देने छलईन। आब मोह माया सं अपना के परे बुझईत गाम घुईर रहल छलाह। कहिया तक ई कल्पवासक प्रभाव रहतईन, से नई जाईन। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी किछु बीहनि कथा १ टेट्टर -----                     ------------- -- ऐं ,कुकूर के एतेक सेवा   ? -- लिस्बियन छै . -- सासु कोना छथि ? -- छोड़ू ! -- हुनकर चर्चो अनसोहाँत ! -- कुकुरो सँ बेकार बुझू ! -- जेटका बेटा कए सालक ऐछ ? -- बीस पुर भ' गेलै . -- जल्दीये स्थान भेटत. -- कोन ? -- साउसक २ गणतंत्र ------ ,मालिक, गोर लगै छीयैन! के ? हम,हीरवा कनिञा।भरि जुआनी खटि ,हिनका पुजिगर बनेलियैन आ आइ अन्चिन्हार ? पछिला मास जे अहाँ गीदड़भभकी द' गेलहुँ--जे हमर एक-एक टा कैञ्चा (टाका) हिंसाब क' दौथ। अशोकबा कहैए-घर बैस के खो। तहिये सँ अहाँ हमरा आँखि सँ ओझल भेल बुझू। माञिन्जन ठेंगा उठा बाट ध' लेलनि....ठमकति!अच्छा दुरा पर एलौं त' खगतो कहिये दियय। अशोकबा बाप बेमार हय,दवाइ आ खेनाइ,दुनू घर में घटल है।किछो मदति क' दौथ, अशोकबा के 10 तारीख के अबैया हय,,सबटा पाइ सधा देबैन। हमरा ल'ग किछो नै हए,हम की दू अल्हुआ ? हँ...हँ.अल्हुए द' देथून ने, सबहक खेनाइ चलतै।हमहू आरी त' उएह खा के पलएल हीयै। इह....एके टा अल्हुआ ककरा,ककरा बाँटब हम ? देखू त' सपरतीब बुढ़बा के, गारि दै छथिन की ? आओर हमरा ल'ग की ऐछ विलहै लए। -- थम्हौत,अखैनते बतबै छियैन हिनका। -- की क' लेब अहाँ ? --- अशोकबा फोन पर कहने रहै से बलू आब मालिक धकियबौ त' कहि दीहै जे सरकार एस एस टी कोट(एस. सी /एस. टी एक्ट)धराउख लए बनेलकै की ३ दायित्व. ----------- -एक टा पोसुआ कुकुर अपन मीत सँ-- रौ, घर मे किए घोसिएल छें, निकल.देखही अनेरूआ कुकुर अपन हेंज मे घोसिए चाहैए ! -- ऐं...! एना नै होम' देबै, चल- चल तूँ बढ...! -- आ तोँ   ? -- हम चिलका नुकेने अबै छी, अपना सब त' लड़ि खपि लेब मुदा ओकर की हेतै। ४ चाँ'छ ! ---------- वीणा भौजी , जहन सजि धजि बहराइत छथि त' सगरो मोहल्ला दलमलित भ' उठैए. ओ बड्ड सुन्नरि नै, मुदा आधुनिकताक सब सुत्र अंगेजने बुझू. देखनिहार पुऱूष ,मौगी जीह आ दाँत दबेनहि रहि जाइए.किएक त' भौजी बड्ड कहबैका. -- लिस्बियन कुकुर के कार मे ल' विदा होइत भौजी बजलीह- " माँ,हम कुकुर के डॉक्टर सँ देखेने अबै छी.ई घरे मे रहिहथि.ककरो डोरबेल बजेला पर केवाड़ नै खोलिहथि.हम गोटे घंटा मे घूरिआयब." -- यै कनिञा, हमरा रातिये सँ तीन डिग्री बोखार ऐछ,कोनो दवाई दीतौं ! -- ठीक छै, हम अबिते ओकरो निदान क' देबैन. बुढि.माय के दुरखा सँ कोठरी मे अबिते पानि भरल थरमस देखेलनि. थरमस ल' झट्टे बहरेली जे ओह ! कनिञा त' पियासले रहि जेती.दुरखा सँ बहराइत धरि कार नजरि सँ ओझल भ' गेल. " मुस्कियाइत सासू माँ थरमसक कनकनएल पानि माथ पर ढारि लेलनि । ५ लौल -- अरौ बाप रौ बाप! छोड़ि दियय,नै मारू यौ बाबू। --ऐं ! की भ' गेल अहाँ के ?छौरा के किए छरपिटा देलियै ? --यै देखियौ अशोकवा बेटा के,बोर्ड मे फस्ट केलक आ इ फेल।हमर सबहक देखाउंसे ओहो बेटा के हाइस्कूल मे नाम लिखेलक नै त' घास छिलैबतै। --बाबू,ओकर बाबू सबटा होम वर्क अपने बैसा के करबै छलै।  हम किछो पुछीअहाँ के त' धानि सन। --" चुप! ओकरा फस्ट केने की हेतै,मोजर तकैत रहए !" ६ बीहरौन ------- --- ओह!ऐ नंगों-चंगों मे हम नै बेसम्हार होइ छी की? जेहने अपने तेहने बेटा ।जेना घरनी के यंत्र बुझैत हो आ अपना के रिमोट। --- एह, जूता मँगलियैन तै लए घाटि फेनै छथि, छोड़ू...। ---हँ यौ,झाड़ू-पोछा,चूल्हि-चौका,बरतन-वासन,कपड़ा-लत्ता ,खएन-पियन सब मे ओझरएल स्त्री,सेहो बौक,बहीर सन।गप्प छाँटए पुरूष। --- हें..हें..हें!स्त्रीक मूँह बन्न,दुनियाक आठम आश्चर्य नै हेतै ? आ पुरूष सदिखन देह ल' ठाढ़ रहै छै,ओकर कोनो मोल नै? --- यौ,स्त्री के प्रेमक खगता नै,जे ओ घर-बाहर दोहरी मारि मारल जाइछ । --- हा..हा..हा!यै,अहाँ कहू ने त' छोइर दियै ऑफिस गेनाइ आइ ! --- एह! कहलकै जे,बुध्दू सेहो अपना के बुधियार बूझैए। " हे यौ,देह सँ वासना तृप्त होइ छै, प्रेम नै।" ७ ---------- संकेत ---- --हा..हा...हा नेनमति ! ---आलिंगन मे नेनमति ? ---नै यै,बाँहि पसारबाक जग्गह,अहाँक आँखि आ मुट्ठी बन्न ।नेनपने ने? --- यौ,प्रेम मे जँ मुट्ठी बान्हल हुअए ,त' प्रेम ससरि जाइ छै। --- आ खूजल हुअए तहन ? --- तहन त' बुझू दूर धरि विचरण करै छै। --- आ ज' मुट्ठी तानल हुअए त' ? --- त' बुझियौ जे,वासनाक सुनगल आगि धधरा भ' जाइए। --- तहन ? --- बाट फरीछ होइत.... ८ लुतुक ------- आउ साहेब!आइ बड्ड स्मार्ट चीज भेटत।मुदा पाइ बेशी करगर ।--कोठा बाली मालकिन भाव खेलक। बजाउ.........! -- इ हमरा संग क' दीयय,हम मोन माफिक पाइ देब। ---कोठा बाली ,कोठी मे नै भएत साहेब !एतै भोगि लियय। --माइ जी, हम संग जा सकै छी,दस सं दूहेबा सं नीक एक सं दस बेर.....! ---" हम जा धरि नै आबी,अहाँ देहरि नै नांघब।आइ हाजिरी मात्र लगा चलि अबै छी। ---आंइ,अहाँ......कोठा पर ? ---"अहाँक हाजिरी चेक क' ,कोठीये पर भेटब। ९ तरघूसकी ------------ खूब गर्दमिशान .....! सुन्न मशान.......! किछु पछिलगुआ चुट्टी, उधवा उठेलक।बाजल-ओकरा समाज सं कतिया देब। धर्रोहि....मीठक आश मे......! कसगर जुटान भेल।मुदा सब बाट ताकए अगुएत के......? नव आँखि बला कान्ह उठेलक--एना नै चलतै, ओकर जुति नै चल' देबै।पाँखि फरफरेलक,उड़ि आकाशी भेल। हा ! चीड़ैक मूँहे घोंटि लेल गेल।। शान्ति.....! १० चाँ'छ ! ---------- वीणा भौजी , जहन सजि धजि बहराइत छथि त' सगरो मोहल्ला दलमलित भ' उठैए. ओ बड्ड सुन्नरि नै, मुदा आधुनिकताक सब सुत्र अंगेजने बुझू. देखनिहार पुऱूष ,मौगी जीह आ दाँत दबेनहि रहि जाइए.किएक त' भौजी बड्ड कहबैका. -- लिस्बियन कुकुर के कार मे ल' विदा होइत भौजी बजलीह- " माँ,हम कुकुर के डॉक्टर सँ देखेने अबै छी.ई घरे मे रहिहथि.ककरो डोरबेल बजेला पर केवाड़ नै खोलिहथि.हम गोटे घंटा मे घूरिआयब." -- यै कनिञा, हमरा रातिये सँ तीन डिग्री बोखार ऐछ,कोनो दवाई दीतौं ! -- ठीक छै, हम अबिते ओकरो निदान क' देबैन. बुढि.माय के दुरखा सँ कोठरी मे अबिते पानि भरल थरमस देखेलनि. थरमस ल' झट्टे बहरेली जे ओह ! कनिञा त' पियासले रहि जेती.दुरखा सँ बहराइत धरि कार नजरि सँ ओझल भ' गेल. " मुस्कियाइत सासू माँ थरमसक कनकनएल पानि माथ पर ढारि लेलनि !" ११ पुश्तैनी ---------- -- नै यौ गिरहत , हम सब छोइर देलियै ई का़ज सब ! -- रौ, गामक मुखिया छथिन, हिनकर बात त' राख तों सब . -- कथी के, हमर टोलवैया सब के कोनो  दरमाहा की पेंशन भेटै छै , पुश्तैनी काज करवा लेल. -- रौ , पसारी त' तोंही सब ने ! -- खाली मरल माल फेकै लए , नै ? दाइ- नौरीक खगते उठि गेल, सोइरी बुझू अस्पताले आब,रसनचौकीक जग्गह बजैए बैण्ड . तहन पसारी ? -- ई त कह, माल - जाल मरतै त'  ककरा कहबै ? -- म'र तोरी के, कहियौ ने नगरपालिका/ नगर निगमक साहेब सब के! " सरकार ! स्वछता अभियान मे हमर अहाँक बड्ड पाइ बहबैए ! " १२ जुआनी ----------- -- हे मीत ! आब सीक- पटै उघव अहाँक वशक नै रहल, वएस दिस त' देखियौ. -- यौ मीत! केलहा देह आ खेलहा पेट कतौ ढ़ठिएल रहि पौलैए ? -- यौ नुनू, ज'न- बोनिहार भेटै नै छै.अहूँ काज भंगठाब' एलौं हें . --यै भौजी, मीत हमरा सँ जेठगरे ने. कहू त' ५५ गिर गेल आब. कोनो जुआनी धएल छै ? -- नुनू बाबू , हुब्बा देखियौ १३ अर्थ. ------- -- आइ साँझ, सड़कक लाल बत्ती पर छोट-छोट दु गोट बुच्ची तिरंगा झंडा हाथ मे ल' बेचबाक चेष्टा करैत--- कोन झंडा चाही सर!  छोटका, मझिलका , बड़का , कपड़ा बला , प्लास्टिक बला....? -- ऐं गै बुच्ची ,ई झंडा की हेतै ? -- अहाँ के नै पता, काल्हि सब एकरा ल' के अजादीक जसन मनेतै. -- आजादी की होइ छै ,गै ? -- नै पता ! -- तहन झंडा किए बेचै छें ? -- मम्मी कहलक- " जते बेशी झंडा बेचमए तते पेट भरतौ !" १४ खरजितिया ------+------- -- जो रे कोढिया, मरियो नै जा होइ छै .लोकक नोकसान क' हमरा दुखी करैत रहैए । एकर हरहठपनी कते दिन उघी हे भगवान ! -- गै , तोहर गारियो हम अपन आशीष बुझै छी । -- बाप रे बाप, दैवा हो दैवा के केलक हमर बाबू के अधमौगति ? " हे जिमुतवाहन दू दिन सँ अन्न/ पानि त्यागि खरजितिया केने छी अही हरहठबा लए ।आब एकर जिनगी अहींक हाथ " -- गै , काल्हि त' कहलें कतौ जा मरि जो आ आई जिमुतवाहन के गोहारि....! -- रौ बाबू, संतान के कहूँ मए- बाप अधलाह कहलकैए ! -- त' काल्हि ककरा शरापने रही  ? -- " तोहर कुचालि  के ! १५ निवहता -- धौर, तहन सँ एकरा सबहक खुशामद क' अपस्याँत छी, कोइ टेरबे नै करैए। -- कथी मे अपस्याँत छी यै ? -- तील बहमे ? के रीत निमाहै लए। -- झुट्ठे अपस्याँत छी, आब की पहिलका जकाँ पुत सब बैसल रहै छै घर मे मए बापक निवहता लए। -- से त' छै, मोन त' पतिया लेब। -- जे धीया - पुता, तील - चाउर खाय मे घैहर कटबैए  ओकरा सँ तील बहबाक  मनोरथ रखै छी ? --" हमरा नै खुएब तील- चाउर ?" -- हमर निवहता लए त' हमर मए- बाप ,  तिलाञ्जलि द' जनम भरिक गेंठजड़बा क' देलनि। १६ एहि माटिक रंग - -- अन्टी बधाइ हुअए ! पोती भेल ए।मिठाइ मँगाउ ने। __अस्पताल क सिस्टर आबि विभाक साउस के जनतब देलक। --यै, जे भेलै से नीके कहू।पहिलोठ चिलका छै।मुदा बुच्ची छ:मस्सू छै, बचतै की नै, से ड'र होइए ! -- नै यै अन्टी,बुच्ची हृष्ट-पुष्ट आ समय पूर क' नवम मास मे जन्म लेलक ऐछ। -- यै, कहू त' भला छ:मस्सू नै त' सतमस्सू हेतै? बौआक विआहक साते मास त' भेलै ए। -- से बात भाभीये जी कहती।.....चलू ने वार्ड में भेंट क' लियौन। " भाभी जी, विआहक सात मास आ चिलका नौ मस्सू ?" कने कहियौन अन्टी के बुझा के। -- हें...हें..हें।यै मम्मी, इहो त' स्त्रीये ने , हिनका नै बूझल छन्हि जे स्त्री सदति पुरूषक नीच्चे दबल रहै छै।कखनो नजरिक त'र त' कखनो देहक त'र । -- ऐं...! माने कतेक पुरूषक किरदानी छी इ चिलका ? -- धौर ! इहो कोना चौल करै छथिन।   हम दुनू गोटे एके ऑफिसक नोकरीहारा ।  हिनको बेटा त' पुरूषे ने । १७ जब्बरि तगमा लेबाक लेल मंच सँ बेरा बेरी विजेताक नाम पुकारि सम्मानित कएल जा रहल छल. आब पुकारल गेल - मिकी चौधरी,पिताश्री अरूण चौधरी मंच पर आबथि ! -- आदरणीय आयोजक मण्डल सँ हमर नेहोरा जे हमरा संग जन्म द' पऱा गेल अऱूण चौधरीक नाम नै, जन्म द' पोसनिहारि अनीता चौधरीक नाम जोड़ि जानल/ पुकारल जए ! -- हे गैैैे बुच्ची, परोपट्टा मे तोहर नाम भ' गेलौ.आ तों एना बजै छें, लोक की कहतौ ,चु- यौ बाबा ! अहाँ जाहि पड़एल संतान लेल काहि कटै छी,हमहू त' ओकरहि संतान ने ? अहाँ निश्तुकि क' लियय ई पोती अहाँ के सोझे मोक्ष धाम पठा देत। --बेटीक पैऱूख चलतै ? -- सुनू,हम्मर आ हम्मर मएक नाओं त' चलबे करतै जे हमहू जहिया बेटीक मए हेबै,पैऱूख बेटीये के सक्कत करबै ओकर बापक संग आ कि बापक बिना  ! १८ हिक - -- नै मारू-पिटू कियो,हाथ जोड़ै छी,आब नै आयब एम्हर।--हाक्रोश करैत पिन्टुआ -- गै मए गै, बचा दही,छोड़ा दही,पड़ा जेतै। -- गै किरणियां,तोरा सनक हिया के टुकड़ी के जे कोन्टा -फड़का हुलुक- बुलुक ,आ बाट-घाट रोका-टोकी केलकौ से बाप-भए कोना बर्दाश्त करतौ,चुप्प! जो अपने कोठरीमे। -- गै मए,जेना हम तोहर हिया के टुकड़ी तहिना ओहो हमर हिया में सन्हिएल बुझ। --चुप्प अलगी,त'तों एना उथर-पाथर तें होइछें जे ओकरा पर तोहर हिक गड़ि गेल छौ। - गै मए , हिक गड़ल टा नै,लुतुक लागि गेल सन बुझ।ओकरा बिनु रहब मोश्किल । -- कते दिनक असरा ? -- "माथा नुआं भ' जेतै तहन थोड़े उंच- नीच " ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. आशीष अनचिन्हारक गजल ३.२.संतोष राय ’बटोही’ क दूटा कविता ३.३.प्रदीप पुष्प- दूटा गजल ३.४. मुन्ना जी-गजल आशीष अनचिन्हारक गजल घूसक संगे गबन करू टिक्का चानन हवन करू पीठक पाछू गारि बात आगू अबिते नमन करू हुनकर आँखि कोना उठल जेन्ना तेन्ना दमन करू किछु नै बँचतै दुनियाँमे रमन चमन के जतन करू छोट छोट या नमहर हो जिम्मेदारी वहन करू सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। संतोष राय ’बटोही’ क दूटा कविता 1.कमला-बलानक मारल मुसहरी लग टुटि गेल छै छहर कमाल-बलानक पानि अगिया बताल भेल छै किछु टा नहि बचलै मुसहरी में हो..हो पानि एलै हो भरि राति जागल छलहुँ आइ बैठौनी लग टुटि जैतै तs की कैरतियै इ पैघ प्रश्न छियैए । छोट-छोट नेनाक ठोर देख कs नोर बहि गेल से कहनै बेमानी छियैए नरूआर आओर रखवारी गामक स्थिति देखि कs करेज फाटि जाएत भूख सँ बिलबिलायत नेना आओर वृद्ध महिस,बकरी आओर गाएक जोर-जोर सँ कानब सचहों भगवान मरि गेल छथि। भ्रष्ट ठीकेदार आओर मंत्री मिल कs छहर रिपेयर केँ नाम पर खूब लूटलथि इ मौगा केँ देश छियैए जत सभ बनिया फौदैत छथि गरीब-गुरबा मरि रहल अछि जनता केँँ टैक्स पर जनप्रतिनिधि रंगरेली मनाबैत अछि सुशासन कुमार बौरा गेल छथि । बनौल आओर जोड़ल घर आँखिक सामने पानि मे बहलाक बाद अपन करेजा केँँ टुकड़ा  बाढ़ि मे भसिएला पर दोख ककरा दियैए ? नसीब केँ ? लोकतंत्र केँ प्रहरी केँ ? सत्तासीन सरकार केँ ? भ्रष्ट-तंत्र केँ ? 2.  रौदी आओर दहार इंद्र भगवान सुति गेल छथिन्ह धानक बिया अखन धरि बाग नहि भेलै खेतिहर हताश-निराश छथि माटि मे बेबाय फाटि गेल छै अइ बेर की हेतै ? रौदी ! पोखरि सभ सुखि गेलै चापाकल केँ पानि सुखि गेलै भूमि तैप रहल छै आगि जकाँ कुक्कुर कानि रहल अछि साँझ-बिहनसर अन्न लेल तड़ैप रहल छै मूस बिलाय कs रहल अछि म्याऊँ । पाँच दिन बरखा भेला पर छोट-छोट बिया सभ डुबि गेल कहुना कs रोपल धान डुबि गेल इ बाढ़ि मिथिलाक नसीब लिखैत छै हमर-अहाँक दरद केँ बाँटत ? भसिया गेलै नसीब खेतिहर केँ । लिस्ट बनि रहल छै गामे-गामे दहार केँ नेता सभहक बिजनेस बढ़ि गेलैए एन एच 57 पर बाढ़िक बाद नसीब लिखल जा रहल छै मुसहरी टोलक लोकनि केँ सरकार आओर ओकर तंत्र हरिश्चंद बनि गेल छथि। संतोष कुमार राय 'बटोही ' रिसर्च स्कोलर (ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा), ग्राम-मंगरौना, पोस्ट- गोनौली, थाना-अंधराठाढ़ी अनुमंडल-झंझारपुर, जिला-मधुबनी ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रदीप पुष्प दूटा गजल १ के की कहलक की कहू के की ठकलक की कहू हमरो उजरे रंग छऽल के की दगलक की कहू भेलै साधू आब सभ के की चिखलक की कहू माया बड़का पैघ ई के की रचलक की कहू अखनो नै छी पास हम के की जँचलक की कहूq (2222212सभ  पाँतिमे) २     गप्प उठतै तँपहुँचबे करतै मेघ लगतै तँबरसबे करतै ओकरा रोकि सकत नै केओ गीत रचतै तँपरसबे करतै पाप आ पुण्य कथी नइ बूझै भूख लगतै तँभटकबे करतै छै अभिव्यक्तिक हक सभकेँतेँ दम्म फुलतै तँखखसबे करतै छै उमेरक गलती चालिक नइ डाँड़ हिलतै तँलचकबे करतैq (2122 112222 सभ  पाँतिमे) - मूल नाओं- प्रदीप कुमार, जन्म- 23 फरवरी 1982 पिता- श्री हरेराम मण्डल, माता- श्रीमती लक्ष्मी देवी, निवास- ग्राम+पोस्ट : ननौर, वाया- रुद्रपुर, जिला- मधुबनी, पिन- 847411, शैक्षणिक/प्रशैक्षणिक योग्यता- एम.ए (हिन्दी) संगीत प्रभाकर, प्राथमिक शिक्षामे डिप्लोमा, वृति- मध्य विद्यालय, विक्रमपट्टी, खानपुर (समस्तीपुर)मे प्रखण्ड शिक्षक।प्रकाशित पोथी- मोनक देहरि पर (पहिल पोथी, गजल संग्रह- 2020)..बहुतो पत्र-पत्रिकामे रचना प्रकाशित। अलबम, कैसेट आ मैथिली फ़िल्ममे गीत लेखन। ग्रामीण रँगमचपर अभिनयमे सक्रिय भूमिका। गीत-गायनमे अभिरुचि। नुक्कड़ नाटकमे राष्ट्रीयस्तरपर बिहार टीमक प्रतिनिधित्व। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्ना जी                          गजल                          अजीबो गरीबी कहानी   क' गेलै बच्चा जे छलै तें नदानी क' गेलै पहिने पता केलकै बाट ओतै छलै बिसरल जे जबानी क' गेलै पछाड़ैत कोना रहितै नढ़िया चढ़ि माथ देहो कटानी क' गेलै कहिया धरि रैहतै आस मे ओ रहि शेख काजो पठानी क' गेलै मंदिरोक शानो  छलै जे तहिया ध्वजा के बचेबा अजानी क' गेलै पहिने छलै जे कतिया क' ठाढ़ो भगेबाक काजो मशानी क' गेलै बहर- ए- मुतकारिब.   मात्रा  क्रम-१२२ १२२ १२२ १२२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १४) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of original work.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०२०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2020 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ३०० म अंक १५ जून २०२० (वर्ष १३ मास १५० अंक ३००)

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