विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३०७ म अंक ०१ अक्टूबर २०२० (वर्ष १३ मास १५४ अंक ३०७) ऐ अंकमे अछि:- २. गद्य २.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (७ म खेप) २.२.प्रियंवदा तारा झा- दूटा बीहनि कथा २.३.आशीष अनचिन्हार- दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै २.४.तिरहुता लिपिक उद्भव आ विकास- गजेन्द्र ठाकुर- (भाग-१) २.५.डा. सुभाष चन्द्र झा- वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क साहित्य यात्रा २.६.मुन्ना जी- मोकाम दिस (मैथिली बीहनि कथा संग्रह) २.७.विष्णु कान्त मिश्र- चारि पत्र २.८.डॉ. चित्रलेखा- मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव २.९.डॉ. अर्पणा-पुष्कर काण्डक विशेषता २.१०.डॉ. अर्पणा- रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे ‘कौशल्या’ २.११. एडिटर्स चोइस सीरीज (बीछल गद्य-पद्य रचनाक संग्रह) ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' २ टा गजल ३.२.मुन्ना जी-कविता- पथराइत डीह ३.३.अमरेश कुमार लाभ-तीनटा कविता आ दू टा गजल ३.४.डॉ आभा झा-अपन घेर ३.५.इरा मल्लिक- हम स्त्री छी 3.6.GAJENDRA THAKUR- Language editing by Astha Thakur A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE-ERA BEFORE AND AFTER- LITERARY SCENCE IN MAITHILI AFTER THE ARRIVAL OF JAGDISH PRASAD MANDAL Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU इग्नू BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1 (Place of Maithili in Indo-European Language Family) TOPIC 2 (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3 (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतए समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होएत, लेखनीमे प्रवाह आएत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भए सकत।) TOPIC 4 (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 ........................................................................................................................ GS (Mains) ................................................................................................................................................ NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS ........................................................................................................................ OTHER OPTIONALS ........................................................................................................................ IGNOU eGYANKOSH ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २. गद्य २.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (७ म खेप) २.२.प्रियंवदा तारा झा- दूटा बीहनि कथा २.३.आशीष अनचिन्हार- दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै २.४.तिरहुता लिपिक उद्भव आ विकास- गजेन्द्र ठाकुर- (भाग-१) २.५.डा. सुभाष चन्द्र झा- वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क साहित्य यात्रा २.६.मुन्ना जी- मोकाम दिस (मैथिली बीहनि कथा संग्रह) २.७.विष्णु कान्त मिश्र- चारि पत्र २.८.डॉ. चित्रलेखा- मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव २.९.डॉ. अर्पणा-पुष्कर काण्डक विशेषता २.१०.डॉ. अर्पणा- रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे ‘कौशल्या’ २.११. एडिटर्स चोइस सीरीज (बीछल गद्य-पद्य रचनाक संग्रह) रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर लजकोटर (प्रवासीक जीवनपर आधारित) (७ म खेप) -7- पाँचो आदमी जकरा पुलिस पकड़ने छल से अपने ओहिठामक छल । भोरभेने जखन ई समाचार छपलआ ओहिमे ई बात प्रमुखतासँ आएल जे ई कोना भेलैकजे सभटा अपराधी ऐकहिठामक छथि तँ लोकसभक माथा ठनकलैक । लोकसभआपसमे चर्चा करए हेतु बैसार केलक । तरह-तरहक भाषणबाजी सेहो भेलैक ,काजक गप्प सेहो भेलैक । ई तय भेलैक जे चुप नहि बैसल जाएत । एहि मामलाकेँ उच्चस्तरधरि लए जाएल जाएत जाहिसँ सहीबात सभक सामने आबि सकए । मामला ततेक गनगनेलैकजे पुलिस अधिकारीसभकेँ जबाब दैत-दैत आफद भए गेलैक । उच्चस्तरीय जाँच-पड़ताल भेल आ ई बात सिद्ध भए गेल जे पाँचोआदमी बेफजुलमे फँसादेल गेल छल जाहिसँ असलीअपराधी बाँचि जाए । सरकार ओकरासभक खिलाफ केस आपस लेबाक आदेश देलक । ओ सभ हाजतिसँ छुटि-छुटि अपन-अपन घर आएल । सभक हालत खराप छल । पुलिसक मारिसँ गत्र-गत्र दुखा रहल छलैक । हालत ठीक नहि रहबाक कारण पाँचो आदमीकेँ पुलिसक हाजतिसँ सोझे अस्पताल लए गेल ।ओहिमेसँ एकटाअस्पताल जाइत-जाइत दम तोड़ि देलक । आओर दूटाक हालत बहुत खराप छलैक । दुनूकेँ आइसीयूमे भर्ती कराओल गेल । शेषदूटाकेँ जाहिमे किशुनो सेहो छल , आपत्तिकालीन विभागमे राखल गेल । आइसीयूमे भर्ती दुनूगोटे भोर होइत -होइत दम तोड़ि देलक । बाँचल दुनूगोटेके बचेबाक हेतु अस्पताल एड़ी-चोटीक पसीना बहा रहल छल मुदा ओहोसभ बेसुध छल । ई समाचार करेंट जकाँ सौंसे दिल्लीमे पसरि गेल । सरकारी अस्पतालक बाहर जबरदस्त सुरक्षा बंदोबस्त कएल गेल ।तथापि लोकक हुजुम रोकल नहि जा सकल । सभ उन्मत्त भेल अस्पतालमे घुसि गेल ।लाठिचार्ज भेलैक । कतेको लोक घायल भेल । मुदा हालत काबूमे नहि आबि रहल छलैक । तीनू बेकसूर लोकक लहासकेँ अपना कब्जामे कए हजारो लोकक हुजुम चलि रहल छल । तरह-तरहक नारा लगा रहल छल । ताबतेमे किओ खबरि देलक जे एकटा आओर आदमी नहि रहल । ओकर नाम-ठेकाना पुलिसकेँ पता नहि चलि रहल छलैक । हमरा ई समाचार सुनि ठकबिदोर लागि गेल । कहीं ओ किशुने ने होअए?मुदा ई खबरि सही नहि छल । पुलिस तुरंत एहि समाचारक खंडन केलक ,संगहि इहो कहलक जे अस्पतालमे भर्ती दुनू गोटेक हालतमे सुधार भेलनि अछि आ भए सकैत अछि जे साँझधरि हुनका सभकेँ छोड़ि देलि जानि । सरकारक तरफसँ मृत व्यक्तिक परिवारकेँ पाँच-पाँच लाख मुआबजाक एलान सेहो कएल गेल आ इहो आश्वासन देल गेल जे एहि घटनाक जाँच हेतु एकटा न्यायाधीशक अध्यक्षतामे आयोगक गठन कएल गेल अछि जे तीन मासमे अपन प्रतिवेदन देत आ दोषी व्यक्ति चाहे ओ जे हो,बखसल नहि जाएत । माइकपर वारंबार ई घोषणा होइत रहल। ओहि भीड़मेसँ दु-तीन गोटे सकरकारक समर्थनमे बजैत सभकेँ बुझबए लगलाह जे आब बेसी गरमेबाक गप्प नहि थिक कारण सरकार जे कए सकैत अछि से तँ भइए रहल अछि आ फेर जखन किछु गलती भेलैक अछि तँ ओकर निमेरा करएमे सेहो किछु समय तँ लगबे करतैक । किछु गोटे हुनकर सभक बातक समर्थन केलथि ।ऊपरसँ पुलिसप्रशासन लागले छल। कहुना कए मामिला थम्हल । तीनू मृत व्यक्तिक लहासकेँ पुलिसक संरक्षणमेयमुनाकातमे डाहि देल गेल । लोकसभ अपन-अपन घर आपस भए गेल । हमहुँ अपन डेरापर अएलहुँ । पता लागल जे पुलिस कए बेर हमरा तकैत ओतए आएल छल । से सुनि मोन अधीर भए गेल । ई कोन नव लफरा भेल? हम की केलिऐक जे पुलिस पछोड़ कए रहल अछि ? डेरा पहुँचले रही कि विजयक फोन आएल -" किशुनक हालत सुधरि रहल छैक । काल्हि दसबजे अहाँ थाना आबि जाएब। ओहिठामसँ संग अस्पताल चलब ।" "हम नहि आबि सकब कारण हमरा काजपर जेबाक अछि । फेर हम कहिआधरि एकरासभक चक्करमे पड़ल रहब। हमर हालत तँ अपने पातर चलि रहल अछि । कारखाना बंद होबएपर छैक ।कै गोटे काज छोड़ि गेल । हमरो कै बेर मालिक कहि चुकल अछि । अहीं कहू जे हम की करू?" "काल्हि कहुना कए आउ । फेर सभबातपरविचार करब।नहि होअएतँ छुट्टी लए लिअ। "ठीक छै । हम आएब ।"- से कहिते रहिऐक कि फोन कटि गेलैक। प्रात भेने हम थाना पहुँचलहुँ तँ विजय ओतहि छलाह ।विजय संग पुलिसक जीपसँ हम दुनूगोटे अस्पताल बिदा भेलहुँ ।रस्ते- रस्ते गप्पक क्रममे ओ कहए लगलाह- “देखू, अहाँ अपन लोक छी,तैँ कहि रहल छी । ई महानगर छैक,एहिठाम अपन काजसँ काज मतलब राखी। किओ ककरो नहि छैक । झूठ-फूसमे फँसा देत आ किओ काज नहि आओत । फेर एकरसभककोनो ठेकान नहि छैक । अहीसंगे रहत आ अहींक जड़िकाटएमे लागि जाएत ।जाति-पाँतिक एतहु चला-चलती छैक । जकरेसँ गप्प करए लागब ने सएह पहिने जाति अखिआसए लागत । एहन हालतमे अहाँ कथीलेल लफरासभमे पैर देने रहैत छी ।अपन काज करू,घर जाउ । हमरासँ जे मदति भए सकत से हम करबेकरब आ कइए रहल छीमुदा जखन तेहन कोनो मामिलामे फँसि जाएब तखन हमही की कए लेब? बात बुझलिऐक कि नहि?" "अहाँ अनुभवी लोक छी । सोचिए कए किछु कहैत होएब मुदा किशुन आ मालती आन नहि अछि । किशुन तँ हमर इसकूलक संगी अछि, मालती ओकर घरनी छैक ।एनामे हम केना हटि सकैत छी, ओहो जखन कि ओ सभ घोर संकटसँ गुजरि रहल अछि । समस्याक समाधान भए जाइक, तँ हम स्वयं एहि लफरासभसँ कात भए जाएब ।" " एहि समस्याक समाधान करब कुकुरक पोंछ सोझ करब थिक । किशुन तँ अहींक सिकाइत करैत रहए आ अहाँ चललहुँ अछि ओकरा शुभचिंतक बनए?" "किशुनक गप्प छोड़ू । मालतीक की दोख छैक?" "दोख छैक किएक नहि? एतेक सुन्दर होएबे सभसँ बड़का दोख छैक । सीता महरानीकेँ रावण किएक तंग केलकनि? रामक कोन दोख रहनि ? आ सीता महरानी तँ एकदम निर्दोष रहथि मुदा कतेक कष्ट काटलनि?कहबी छैक-विधि वाम के करनी कठिन जस सिअहि किन्हि बाबरो। बात बुझि रहल छिऐक कि नहि ?" विजय स्पष्ट कहलक जे मालतीक चिंता करबाक काज नहि अछि । ओ स्वयं मालतीक व्यवस्था कए रहल अछि । ओ इहो कहलक जे मालती आब ओकरे लग रहत । ओ फटकिएसँ एकटा घरदिस इसारा करैत कहलक जे मालती एतहि छथि । विजयक जीप ओहिघरक लगीचमे छल । हम देखलहुँ जे मालती घरक आगा रौदमे पटिआपर बच्चासंगे छथि । पता नहि ओ हमरा देखलक कि नहि मुदा हम तँ नीक जेना देखलिऐक आ बुझबो केलिऐक । हमर मोनकेँ विजय पढ़ि रहल छलाह । ओ हमरा छगुन्तामे देखि हँसए लगलाह । असलमे विजय असगरे छल ।ओकरा मालती नीक लागि गेल रहैक । बहुत दिनसँ ओ गुनधुनमे छल ।अवसर देखि ओ अपन काज कए गेल ।हम ओकरासंगे मुँहा ठुठ्ठी करब ठीक नहि बुझि चुप रहि गेलहुँ।किछु नहि बाजि सकलहुँ।विजय संगे हम अस्पताल पहुँचलहुँ । विजय फटकिए रहि गेल । किशुनकेँ संगे जे दोसर आदमी छल से कहि नहि कखन आ ककरा संगे अस्पतालसँ चलि गेल । किशुनकेँ जेबा जोगर हालत नहि रहैक । डाक्टरक हिसाबे किशुनकेँ अखन किछुदिन अस्पतालमे रहए पड़त ।हमरा देखितहि ओ भोकासी पाड़ि कए कानए लागल ।हम ओकरा तरह-तरहसँ बुझेलिऐक । ओ रहि -रहि कए मालतीक हाल पुछैत रहल । हम की कहितिऐक? झूठ बाजि नहि सकैत छलहुँ आ सच कहि नहि सकैत छलिऐक । कहुना कए ओकरा बुझासुझा कए हम अपन डेरा आपस आबि गेलहुँ । डेरामे पैर रखनहि छलहुँ कि गामसँ फोन आएल । " हम दिनेश बजैत छी।" " गोर लगैत छी काका? की समाचार ?" "समाचार ठीक नहि अछि ।" "की भेलैक?" "तोहर माए बहुत दुखित छथि । हालत ठीक नहि छनि।" "की भेलैक?" "जल्दिए आबह । अएलापरसभबात बुझेतह ।" से कहि ओ फोन राखि देलथि । हमर मोन एकदम परेसान भए गेल । एहिमास गाम टाको नहि पठओने रहिऐक । किसुन आ मालतीक लफड़ामे पड़ि कै दिन काजोपर नहि जा सकलहुँ । सभटा व्यवस्था गड़बड़ा गेल छल । ऊपरसँ ईनव संकट । तुरंत रेलक टिकटक ओरिआनमे लागि गेलहुँ । कहुनाक तत्कालमे टिकट भेटल। बारह बजे एकटा ट्रेन छलैक जाहिमे आरएसीमे टिकट भेल । जे भेल, जेबाक तँ छलहे, से बिदा भए गेलहुँ । एगारह बजे रातिमे एसगर टीसन दिस बिदा भेलहुँ । रस्ता भम्म पड़ि रहल छल । कतहु कोनो सबारी नहि छल । ताबे एकटा कार जाइत देखाएल। हाथ देलिऐक । ओ कार रोकि देलक। हमर हालत देखि ओ हमरा कारमे बैसा लेलथि। मोनमे डरो होअएजे पता नहि केहन आदमी अछि । मुदा ओ नीक लोक छल। हमरा सोझेटीसनपर उतारि देलक आ अपने आगा बढ़ि गेल । ऐ रचनापर पाठकक मंतव्य: 'लजकोटर' ------------------- श्री रबीन्द्र नारायग मिश्रजी द्वारा विरचित 'लजकोटर' उपन्यासक धारावाहिक पोस्ट पढबाक अवसर भेटल। प्रथमहि दू पाँती पढलाक बाद उक्त पोस्ट अपन साहित्यिक चुम्बकीय प्रवृतिक करणेँ तेना ने आकृष्ट कलक जे सम्पूर्ण पोस्ट एकहि निसांसमे पढि गेलहुँ। समाजक वर्तमान परिवेशक सापेक्ष चित्रणक संग उपन्यासकार उपन्यासक एहि अंशकेँ गढलनि अछि। चारि पात्रक चारित्रिक विश्लेषण, सम्वाद शैली, उत्कृष्ट कथा विन्यास, कौतुहलता, औत्सुक्यक प्रवृत्ति , गतिशीलता तथा परिस्थिति जन्य वातावरण निर्माण द्वारा सम्पूर्ण उपन्यासक उद्येश्यक आपूर्ति एहि छोटसन अंशमे समाहित अछि। चारि पात्रक छोट सन कथानक अपनामे पूर्णता प्रदान करैछ, जे एक दिस जँ समाजक विद्रुपता ,विभत्सताकेँ उद्- घाटित करैछ ,तँ दोसर दिस समाजक परोपकारी प्रवृत्ति तथा मानवीय संवेदनाकेँ सेहो प्रदर्शित करैत अछि। पात्रक रूपमे मालती, किसुन, विजय चायवला तथा लेखक स्वयं समाजक चारि विचारधाराकेँ प्रदशर्शित करैछ।एक दिस जँ साकारत्मक,भूमिकामे उपन्यासकार मालती आ स्वयंकेर चरित्रक चित्रांकन करैत छथि तँ दोसर दिस किसुन एवं विजयक चरित्रकेँ खलनायकक रूपमे देखाओलन्हि अछि। संम्पूर्ण कथानक मिथिलाक विभत्स रूप, गरीबी, बेरोजगारी, लाचारी श्रमशक्ति एवं प्रतिभा पलायनकेँ उद् घाटित करैछ। गाम छोड़ि किसुन गुजर करबाक लेल दिल्ली रोजगार हेतु जाइत छथि, मुदा ओत' गलत सतसंगमे आबि, कोना कुमार्ग पकड़ि अपना संग अपन परिवार, एतए धरि जे दू दिनक अपन एक मात्र नवजात शिशुकेँ सेहो संकटक महाजालमे ओझरा दैत छथि; जकरासँ मुक्त होएब असंभव भ'जाइत अछि। सम्पूर्ण कथानक घुमा-फिराकेँ मुख्यपात्र किसुनक इर्द-गीर्द घुमैत अछि ,मुदा संवादक्षीणता किसुने द्वारा देखाओल गेल अछि। ग्रामीण परिवेशक पात्र द्वारा कथाक वातावरण एकटा महानगरमे विकसित कएल गेल अछि, जे कतहु-कतहु कथानकमे काल्पनिकता गढि दैत अछि ,जे दिल्ली सन महानगरक हेतु आजुक समयमे लेखक लालटेनक उपयोग क' कथाकेँ पचास साल पाछू खीचिकेँ ल' जाइत अछि। पुनः मोवाइलक इजोत आधुनिक समयक भान करबैछ, जे कथानकेँ व्याघात उत्पन्न करैत अछि। मानवीय संवेदनाक संग जत' कथानककेँ आगू बढेबाक प्रयास भेल अछि ,ओतहि विजयसन स्वार्थी आ कुटिल पात्र द्वारा लेखक व्यंगक पुट सेहो उपस्थित करबामे सफल भेल छथि। कथ्यात्मक आ सम्वाद शैलीमे सम्पूर्ण कथानक सोझ डाँरिएँ आगू बढैछ ,जे एकटा प्रोढ लेखक वा कथाकारेसँँ संभव भ' सकैछ, मुदा कथानमे समस्या तँ उत्पन्न कएल गेल मुदा ओकर निदान करबामे लेखक सफल नहि भ'सकलाह। तेँ एकरा एकटा दुखान्त कथानके कहल जा सकैछ। उक्त कथांशमे समाजमे नैतिक मूल्यक ह्रास, मानवीय संवेदनहीनता, चारित्रिक दोषक संदेह तथा कुमार्ग पर अभिगमनक उद्'घाटन जँ किसुन विजय आ मोछ टेरैत पुलिससभक चरित्र द्वारा प्रदर्शित कएल गेल अछि, तँ चायवला आ लेखक स्वयं साकारात्मक चरितक भूमिकामे सहानुभूति ,परोपकार आ सहृदय चरित्रक प्रतीक छथि।मुदा मालतीक चरित्रक माध्यमे उपन्यासकार आजुक परिवेशमे जत' सभतरि नारी सशक्तिकरणक ढोल पीट जा रहल अछि, ओतहि एकटा लाचार, दीनहीन,बेसहारा, अशिक्षित, पराश्रित अबला मैथिलानीक भूमिकामे मालतीक चरित्रक चित्रांकन कएलन्हि अछि, जे बेबस आ लाचार अछि अपन एक दिन पूर्व जन्मल पिहुआक जीवन रक्षा करबामे। उक्त कथानकक माध्यमे लेखक नारी सम्मान, नारी रक्षा आ नारी सशक्तिकरणक ढोल पीटय बालाक मुँह पर एकटा निस्सन चोटक प्रहार करैत छथि ; मिथिलाक सुदूर गाम-घरक महिलाक दशा पर समाजकेँ सोचबाक हेतु बाध्य करैत छथि,जे एकटा परिपक्व आ स्थापित लेखकेसँ संभव भ'सकैछ। सम्पूर्ण अंश पढलाक संताँ जेना बुझाइछ जे उक्त घटना एकटा भोगल यथार्थ हो, जकरा उपन्यासकार कनेक रंग-टीप क' अपन काव्य प्रतिभाक माध्यमे एकटा उपन्यासक 'केनवाश'मे कसि रहल छथि। नीक कथानकक संग 'लजकोटर' अपन एक-एक डेग बढा रहल अछि। हमरा आशे नहि पूर्ण विश्वास अछि जे एक दिन ई उपन्यास पिंट मीडियासँ पुस्तकाकर रूपमे पाठकलोकनिकेँ सेहो उपलब्ध हेतनि आ मैथिली उपन्यास साहित्य मध्य 'लजकोटर' मीलक पाथर सिद्ध हएत। ढेर रास शुभकामनाक संग उपन्यासकारकेँ साधुवाद। विजयेन्द्र झा, मुजफ्फरपुर 22.09.2020 (विजयेन्द्रजी मुझफ्फरपुरक कालेजमे मैथिलीक ब्याख्याता छथि।) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रियंवदा तारा झा दूटा बीहनि कथा १ दूरक ढोल सोहाओन जहिया सऽ लाल काकी बड़का बेटा-पुतहु लग सऽ रहि कऽ आयल छथि , किछु बदलल जकां छथि। ओ पहिलुक्का रुआब जेना कत्तहु हेरा गेल होइन्ह। छोटकी पुतहु सुधाके छगुनता लागि गेलैन्ह, सासुके एतेक शान्त देखि कऽ। सुधा जाहि दिन सऽ सासुरमे पैर देलैन्ह , अपना लेल प्रशंसाके कोनो बोल नहिं पौलन्हि। कतबो प्रयास कयला उत्तर सासुके संतुष्ट नहिं कऽ सकलीह। लाल काकी हरदम बड़की पुतहुके गुणगानमे लागल रहैत छलीह। एहन दीब , एहन संस्कारी, साक्षात् अन्नपूर्णा छथि बड़की कनियां। हुनकर तऽ कोनो जोड़े नहिं। हमरा मुंह सऽ बजबा सऽ पहिने मोनक गप्प बूझि जाइत छथि। असकरे सबटा काज करैत सुधाके मोनमे अबैन्ह , सालमे दू-चारि दिन आबि कऽ एतेक मोनमे बसल छथिन्ह, आ जे चौबीसो घंटा लागल रहैत छैक , तकर खाली कुचेष्टा। अखन पिछले मास भैया एलखिन्ह तऽ लालकाकीके अपना संगे लऽ गेलखिन्ह। काकी गेली तऽ बड्ड हुलसि कऽ , मुदा पंद्रहे दिनमे छोटका बेटाके बजा कऽ संगे वापसो आबि गेलीह। आब बड़की कनियांके गुणगानो नहि। बुझाइत अछि लाल काकीके , 'दूरक ढोल सोहाओन ' के अर्थ बुझबामे आब भांगठ नहि रहलैन्ह। २ विकल्प भोरे सऽ गुनधुनमे लागल छथि मीता , निश्चय करैत छथि, फेर डेग पाछू भऽ जाइत छैन्ह। मोनके बुझबै छथि , हम कोनो अधलाह गप्प नहिं सोचि रहल छी , तखन एतेक द्वन्द्व कियैक ? अही साल मीता दिल्लीमे एकटा छोट-छीन घऽर कीनने छथि, तकर किस्त चुकबैत , बच्चा सबहक शिक्षा केर मोट खर्च आर्थिक तनावक कारण बनि गेल छैन्ह। दुन्नू गोटे जे कमाइत छथि, से जेना पहिले सप्ताहमे ओरा जाइत छैन्ह। एकटा सुगम उपाय बेर-बेर दिमागमे अबैन , कियैक ने नैहरमे खाली पड़ल कोनो जमीनके हटा कऽ कनी हल्लुक भऽ जाइ। हमहू तऽ ओही ठामक अंश छी , किछु तऽ हमरो अधिकार अछि ओतय। भाइजीके तऽ बाबू अपने मोने मदति केने रहथिन्ह। यैह विचारि भाइ सऽ गप्प करबा लेल विदा भेलीह , मुदा बकार नहिं फुटलैन्ह। समान अधिकारपर धाराप्रवाह भाषण देबऽ वाली चुपचाप अधिकारके सौहार्दपर वारि घुरि गेलीह। अधिकार वा स्नेह ई विकल्प अखनहुं समानताक सत्य छैक , नारी जातिक लेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै
आइसँ 5 बर्ख पहिने गंगेश गुंजन जी दुष्यंत कुमारक एकटा शेर दऽ कऽ कहने रहथिन जे मनोरथ अछि मैथिलीमे एहि 'मिजाज' ओ एहि वज्नक शेर हो। कहिया धरि एहन शेर एतै सेहो पुछने रहथिन। वज्न मने बहर भेल आ से मैथिली गजलमे पहिनेसँ अछि। रहलै दुष्यंत कुमारक शेर सनक मिजाज केर बात तँ हम तथ्यात्मक गिनती केलहुँ जे कहिया धरि एहन शेर लिखेतै मैथिलीमे। गिनती हम करब ताहिसँ पहिने दुष्यंतजीक ओ शेर हम प्रस्तुत करी जे गुंजनजी देने रहथि--
"उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये" निश्चित तौरपर नीक आ उत्तम शेर छै ताहिमे संदेह नै। तँइ गुंजनजी सेहो प्रस्तुत करबा लेल बाध्य भेलाह। तँ आब हम मूल बात दिस चली। हम अपन गिनती लेल दू टा मानक लेलहुँ अछि। पहिल दुष्यंतजीक गजल संग्रह प्रकाशन आ दोसर आधुनिक खड़ी बोली हिंदीमे लिखल शुरूआती गजल आ से हमरा भारतेंदु हरिश्चंद्रजी लगसँ भेटैए (जन्म- 9 सितंबर 1850- मृत्यु 6 जनवरी 1885)। भारतेन्दुजीक गजल सेहो छनि मुदा कोन बर्खमे प्रकाशित भेलनि से हमरा ज्ञात नै ताही लेल हम हुनकर मृत्यु वर्षकेँ अंतिम मानि आगू बढ़ि रहल छी। आब जानी दुष्यंत कुमारजीकेँ। दुष्यंतजीक जन्म- 01 सितम्बर 1933 आ मृत्यु- 30 दिसम्बर 1975 केँ भेलनि। एही बर्ख (1975) मे हिनक गजल संग्रह- 'साये में धूप' केर प्रकाशन भेलनि। एहि ठाम कने रुकि हम भारतेंदु आ हुनकर ठीक बादक किछु चूनल हिंदी गजलकारक किछु शेर देखी—
अजब जोबन है गुल पर आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी है शिताब आ साक़िया गुल-रू कि तेरी यादगारी है
एकर बहर अछि 1222-1222-1222-1222
आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया ऐ फ़लक क्या क्या हमारे दिल में अरमाँ रह गया एकर बहर अछि 2122-2122-2122-212
आब सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जीक शेर देखू-
भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है
एकर बहर अछि 2122-2122-2122-212
आब जयशंकर प्रसाद जीक ई शेर देखू--
सरासर भूल करते हैं उन्हें जो प्यार करते हैं बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं
एकर बहर अछि 1222-1222-1222-1222 आ ठीक एही बहरमे शमशेर बहादुर सिंहजीक ई शेर देखू--
जहाँ में अब तो जितने रोज अपना जीना होना है, तुम्हारी चोटें होनी हैं हमारा सीना होना है।
पं.कृष्णानंद चौबीजीक ई शेर देखू--
आपका मक़सद पुराना है मगर खंज़र नया मेरी मजबूरी है मैं लाऊँ कहाँ से सर नया
एकर बहर अछि 2122-2122-2122-212 आ ठीक एही सभहक बीचमे दुष्यंत कुमारजीक गजल छल। दुष्यंतजीक गजल संग्रहक हरेक गजल बहरमे अछि मुदा एकटा गजलक बहरपर बेर-बेर ओझराहटि हिंदी ओ मैथिलीक गजलकार दिससँ देखल जाइए आ ओहि गजलक मतला छै--
होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिए अही गजलक एकटा शेर गुंजनजी देने रहथिन जकरा हम उपरमे देने छी। जखन कोनो हिंदी-उर्दू गजल देवनागरीमे लिखाइ छनि तखन ओझराहटि आर बेसी बढ़ि जाइत छै। कमसँ कम हिंदीमे तँ बहुत घमर्थन छै जे हिंदी गजल लेल उर्दू शब्दक मूल ध्वनि लेल जाए कि हिंदी ध्वनि। हिंदीक बहुत गजलकार उर्दू ध्वनिक आग्रही छथि तँ बहुत हिंदीक ध्वनिक। दुष्यंतजी अपने सेहो एही ध्वनिक ओझरीमे छलाह तँइ बहुत बेर ओ अपन गजलमे शहर केर मूल ध्वनि शह्र=21 लेने छथि तँ हिंदी ध्वनि श-हर=12 सेहो। अही कारणसँ उर्दू गजलकार सभ दुष्यंत कुमार केर आलोचना केलकनि आ हिंदी बला सभ बुझलकै जे दुष्यंतजीकेँ नीचा देखाबए लेल उर्दू बला सभ एना कऽ रहल छै। एहि गजलक बहर बूझब हुनका लेल आसान हेतनि जे कि मुजाइफ बहर बुझि गेल छथि आ जे नै बुझने छथि से निच्चाक दूटा शेरक तक्ती देखथि-
होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए=2212-12-11-22-12-12 इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिए=2212-12-11-22-12-12
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें=2212-12-11-22-12-12 चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये=2212-12-11-22-12-12
अहाँ सभ चाही तँ पूरा गजल एहि बहरपर बैसा कऽ देखि सकैत छी। कुल मिला कऽ साबित भेल जे दुष्यंतजीक ईहो गजलमे बहर अछि। बिना बहरक गजल भइए ने सकैए। हमरा गुंजनजीक उद्येश्यपर संदेह नै मुदा हमर पापी मोन सोचलक जे कहीं गुंजनजी एहि शेरकेँ अही दुआरे तँ प्रस्तुत नै केलाह जे हुनको बुझाइत छलनि जे एहि गजलमे बहर नै भऽ सकैए। माफी चाहब ई हमर पापी मोनक संदेह छल वा अछि। आब एहि संदेह सभकेँ कात करैत मूल बातपर आबी। जेना कि देखलहुँ जे भारतेंदु आ हुनक बाद काँच-पाकल कथ्यक संग मुदा अनिवार्य रूपे बहरयुक्त हिंदी गजल दुष्यंत सन परिपक्व गजलकार धरि यात्रा केलक आ ताहिमे ओकरा लगभग 90 बर्ख समय लगलै (भारतेंदुजीक मृत्युसँ दुष्यंतजीक गजल संग्रहक प्रकाशन)। एहन नै छलै जे दुष्यंतजीसँ पहिने जे नाम देलहुँ से हिंदीमे अनाम छलाह ओ सभ स्थापित आ युगांतकारी साहित्यकार छलाह , गजलक सभ नियम पालन करैत छलाह, हिंदी गजलकार मानसिक रूपें सचेष्ट छलाह तकर बादो हिंदी गजलकेँ दुष्यंत सन मिजाज पेबामे 90 बर्ख लागि गेलै। एकर विपरीत मैथिलीक शुरूआती गजल बहरयुक्त रहल मुदा बादक अज्ञानी पीढ़ी प्रचारित केलक जे मैथिलीमे गजल भइए ने सकैए, गजलमे बहर होइते नै छै, बहुत बादक पीढ़ी सभ तँ ईहो कहए लागल जे दुष्यंत कुमार बहर तोड़ि देलाह, तँ अदम गोंडवी बहर फोड़ि देलाह आदि। आ एहि चक्करमे लगभग 1950क बाद मैथिलीमे बिना बहरक गजल चलल जे 2008 मे विजयनाथ झाजीक गीत-कविता-गजल संग्रह 'अहींक लेल' संग बंद भेल संगे-संग 2008हि मे गजल लेल समर्पित शोध पत्रिका 'अनचिन्हार आखर' केर स्थापना भेल। आ तकर बाद लगातार मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखा रहल अछि। एहिठाम ई कहब अनुचित नै जे पछिला पीढ़ीक बिना बहर बला सभ बहुत प्रयास केला जे युवा बहरयुक्त गजल नै लीखए आ ताहि लेल ओ पुरस्कार, लिस्टमे नाम देब, एक पन्नाक समीक्षा लीखि देब प्रलोभन देबाक सन काज सेहो केलाह आ किछु अंशमे सफल सेहो भेलाह मुदा जेना-जेना मैथिलीक युवा लग उर्दू-हिंदी गजलक तक्ती होइत गेलै तेना-तेना ओ सभ मानए लगलाह जे बिना बहरक गजल नै होइत छै आ ओ सभ अपन गजलमे बहर लेबाक लेल आवश्यक मेहनति करए लगलाह। चूँकि शुरूआती गजलक बाद लगभग 50 साल मैथिलीमे बिना बहर बला गजल रहलै तँइ हम 2008केँ मानक बर्ख मानि रहल छी आ एकरे आधार मानि रहल छी। आबि मानि लिअ मैथिलीक गजलकार हिंदिए गजलकार सन बहुपठित, नियमक पालन करए बला. प्रयोगी हेताह तइयो लगभग बर्ख 2090 सँ लऽ कऽ बर्ख 2100 धरिक बीचमे मैथिलीमे दुष्यंत कुमार सनक गजलकार हेबाक संभावना अछि वा कही जे ओहने मिजाजक गजल लिखल जेबाक संभावना अछि। एहिठाम गंगेशजी आपत्ति कऽ सकै छथि जे हम दुष्यंत नै दुष्यंतक गजलक मिजाज कहने छी। मुदा पहिने दुष्यंत तखन ने हुनकर मिजाज। बहुत गोटे प्रश्न उठा सकै छथि जे एतेक समय किए लगतै। मुदा हमरा जनैत ओ सभ कोनो विधाक विकाससँ अपरिचित छथि। विधाक विकास एक-दू सालक खेल नै छै। हम ईहो मानै छी जे वर्तमान समयक सभ मैथिली बहरयुक्त गजलकार प्रतिभाशाली छथि मुदा भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद, निराला आदिक दसो प्रतिशत नै छथि। जखन भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद, निराला सभकेँ रहैत 90 बर्ख लगलै तँ इम्हर बलाकेँ कतेक लगतै। बहुत संभव जे किछु लोक हमर आकलनकेँ गलत मानथि। हुनका बुझाइत हेतनि जे मैथिलीक गजलकार सभ बहुत प्रतिभाशाली छथि मुदा हमरा मोनमे एहन कोनो खुशफहमी नै अछि। ई 90-100 बर्खक गैप सदिखन रहत। मानू जे जँ एखनो जँ बहरयुक्त गजल बंद भऽ जाए आ फेर बीस बर्ख बाद फेरसँ बहरयुक्त गजल चालू हुअए तँ ओहि समयमे ई 90-100 बर्ख जोड़ल जेतै। तँ जेहन भाव हो काँच-पाकल से सभ बहरमे लीखी आ प्रतीक्षा करी निश्चित तौरपर मैथिलीमे सेहो दुष्यंतक गजलक मिजाज सन गजल लिखेतै। 2030 धरिक कोनो बहरयुक्त गजलकारमे दुष्यंतक मिजाज धारण करबाक क्षमता आएत से बहुत संभव। एखनुक कोनो-कोनो बहरयक्त गजलकार सेहो दुष्यंतक मिजाजमे आबि जाइत छथि मुदा ओ स्थायी नै भऽ पबै छै, भइयो नै सकैए कारण ओहि मिजाज लेल जे भूमि चाही से एखन दूर अछि। खुशीक बात अतबे जे बेसी दूर नै अछि। जँ ई मिजाज स्थायी भऽ जाए तँ बहुत संभव जे एखुनके कोनो बहरयुक्त गजलकार दुष्यंतक मिजाज गजलमे आनि लेताह। जँ हिंदी गजलमे दुष्यंतक गजलक मिजाज केर पृष्ठभूमि ताकल जाए तँ ओ निरालाक गजल हेतै। दुष्यंत कुमार शेर यथा-- सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
आ एहने सन बहुत रास शेर केर पृष्ठभूमि निरालाक ओ शेर अछि जे हम उपर देलहुँ। जँ मैथिलीमे देखल जाए तँ निरालाक समानांतर कविवर सीताराम झाजीक ई शेर अछि-- हम की मनाउ चैती सतुआनि जूड़शीतल भै गेल माघ मासहि धधकैत घूड़ तीतल मतलाक बहर अछि 2212+ 122+2212+ 122 मुदा अफसोच जे एहि पृष्ठभूमिक समुचित उपयोग मैथिलीक कथित गजलकार सभ नै कऽ सकलाह। भावक कोन कमी छै एहि शेरमे आ सेहो बहर सहित। जखन हिंदीक शीर्ष रचनाकार सभ बहरक पालन कऽ सकैत छलाह तखन ई मैथिली बला सभ कोन देवताक अवतार छलाह? आ तँइ सीतारामजीक भाव केर आधारपर मैथिलीमे एखन धरि दुष्यंतक गजलक मिजाज नै आबि सकल अछि आ ताहि लेल ओ कथित गजलकार सभ दोषी छथि जे कहलाह मैथिलीमे गजल भइए ने सकैए, गजलमे बहर होइते नै छै, दुष्यंत कुमार बहर तोड़ि देलाह, तँ अदम गोंडवी बहर फोड़ि देलाह आदि। एहन कहए बला सभ मैथिली गजलकेँ कतेक नोकसान केलाह से आकलन करब बहुत कठिन तँ नै मुदा दुखदायी छै। दुख होइत छै ई देखि जे एकटा नीक विधाकेँ मैथिलीमे कोना भुस्साथरि बैसाएल गेलै। गंगेशजी अपन पोस्टमे आशंका जतेने छथि जे दुष्यंतक गजलक मिजाजक शेर पढ़ि सकब आ कि............ हम जँ ॠषि रहितहुँ तँ हम अपन बाँचल उम्र हुनका नामे कऽ दितियिन ई दिन देखबाक लेल मुदा से संभव नै। हम बस शुभकामने टा दऽ सकैत छियनि जे ओ देखि कऽ जाथि। हलाँकि नव गजलकार सभ ई जरूर सोचथि जे जँ हमर पूर्वज लगातार बहरमे लिखने रहितथि तँ निश्चित तौरपर 90 केर दशकमे मैथिलीयोमे दुष्यंतक मिजाज सन गजल आबि गेल रहितै। भावक कमी मैथिलीमे कहियो नै रहलै आ ने भावकेँ पकड़बाक कलामे। मुदा दोष केकर................. हमरा लेल केकरो दोष निरूपति करबासँ बेसी आसान रहैए अपन हिस्साक काज कऽ लेब से एहू ठाम हम केलहुँ। आब पाठक आ सचेष्ट गजलकार जानथि। परिशिष्ट (एहिमे गुंजनजीक मूल पोस्ट दऽ रहल छी)— Gangesh Gunjan 8 July 2015 · " उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये" (दुष्यंत कुमार) हमर बड़ मनोरथ जे एहि मिज़ाज आ वज़नक शे'र अपन मैथिलीओ मे होइत ! कहि सकितय कोय । आस तँ नव तुरिये मे क' सकैत छी। देखी, से दिन पढ़ि क' जाइ छी कि ... ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर TOPIC:13 (संघ लोक सेवा आयोगक मैथिली ऐच्छिक- पत्र-१, भाग-१, ६अम क्रमक सिलेबसक लेल) टॉपिक एकसँ १२ लेल जाउ एहि लिंकपर: http://videha.co.in/aboutme.htm तिरहुता लिपिक उद्भव आ विकास- गजेन्द्र ठाकुर (भाग-१) लिपि? आ लिपि छी की? लिपिक उद्भव। एजिप्टक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपिक आविष्कार टोथ देवता केलनि, मेसोपोटामियाक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपि नीबो देलनि, ग्रीसक लोक ग्रीक लिपिक आविष्कारक हर्मीजकेँ मानै छथि आ भारतमे एकर श्रेय ब्रह्माकेँ जाइ छनि। पाषाणकालक लोक मारते रास चित्र लिखलनि आ ओहीसँ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटल। मुदा ई चित्र सभ चित्रलिपि नहि छल, कारण एकचित्रक सम्बन्ध दोसर सँ नहि छल आ सभटा चित्र फराक-फराक छल। मुदा ओहिसँ पाछाँ जा कऽ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटले होएत। पहिल-लिपि: चित्रलिपि एखन धरिक खोजबीनसँ पता चलैए जे चित्रलिपिक विकास भेल- टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील नदीक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे। उपरका खोह आ धारक कातक पाथरपर लिखल चित्र आ चित्रलिपिमे अन्तर बिकछेबाक खगता अछि। अहाँ हमरासँ प्रेम करै छी तँ हमर चित्र लिख देलहुँ, कोनो शिकार करै छी तँ से चित्र लिखलहुँ। से अहाँ भेलहुँ लिखिया। से भारतोमे बहुत ठाम छल, मुदा लिखिया लिपिकार चोट्टहि नहि बनि जाएत। लिपिकार जे चित्र बनेलक से कलकारी लेल नहि वरण् खगता लेल। से एतऽ सूर्य बनेबाक लेल वृत्त बना दियौ, पूरा चित्र बनेबाक खगता एतऽ नै अछि, फेर दूटा एहने चित्रक सम्बन्ध स्थापित करू, दूसँ तीन.. आ चित्र लिपि तैयार। से चित्रकार चित्र लिखलक, आ लिपिकार बनेलक। लिपिकारकेँ लिखिया नहि कहि सकैत छिऐ। आ से भेल टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कातक (असीरिया, बेबीलोन आ सुमेरमे), नील नदीक कातक (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे ईजियन आ मिनोअन सभयताक लोक। चित्रलिपि: चित्रात्मक चित्रलिपि आ विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि बाहरसँ दुनू चित्रलिपि अछि मुदा चित्रात्मक चित्रलिपि चित्रक मात्र बोध करबैत अछि जेना वृत्त सूर्यक बोध करेलक। मुदा जखन एकर प्रयोग गुमार लेल होमए लागल तँ ई भऽ गेल विचार आकि भावनाक प्रतीक आ ओहि लिपिक नाम भेल विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि। आब कलाकारीसँ बेशी खगता महत्त्वक भेल आ ताहि लेल चेन्हक आकार सेहो छोट भऽ गेल। आइयो चीन आ जापानमे विचार/ भावनात्मक चित्रलिपिक प्रयोग होइत अछि। मुदा पध-आधारित लिपि चीनमे खतम भऽ गेल, मुदा जापानमे ओ आइयो प्रयोगमे अछि। चित्र-ध्वनि लिपि भाषाक उद्भव आ विकास भेल। जेना ओतए ध्वनिसँ सम्बन्धित शब्द प्रवेश केलक तहिना लिपिमे सेहो भेल। आ चित्र-ध्वनि लिपिक विकास भेल। एहिमे विचार-भावनाक संग ध्वनिक प्रवेश सेहो भेल आ पाछाँ जा कऽ ओ ध्वन्यात्मक लिपि बनल। ध्वन्यात्मक लिपि ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि आ वस्तु-व्यक्तिक बीच सम्बन्ध स्थापित करैत चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि वा ध्वनि-समूह लेल चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे पोलीफोन (एक चिन्हक अनेकार्थ वा ध्वनि) आ होमोफोन (अनेक चिन्ह द्वारा एक ध्वनि वा अर्थ) मिला कऽ सेहो अर्थ/ ध्वनि-निर्णय नहि कऽ पबैत छल आ ताहि लेल तेसर ध्वनि-चिन्ह डिटरमिनेटिवक व्यवस्था भेल आ फेर अर्थ वा ध्वनि निर्णय सम्भव भेल। एहि लिपिसँ पद-आधारित आ व्यंजन-प्रधान लिपि बनल। स्थान-लाघव आ प्रयत्न लाघव एतए प्रयत्न-लाघवक चर्च करब आवश्यक अछि। प्रयत्न लाघव लेल कम प्रयाससँ अपेक्षित परिणामक प्राप्ति। माने भाषाक सम्बन्धमे कम शब्दमे सुस्पष्ट विचार व्यक्त करब, पैघ-ध्वनि लेल छोट सर्वमान्य ध्वनिक प्रयोग करब आ ओही हिसाबसँ लिपिक सन्दर्भमे पैघ चेन्ह लेल छोट चेन्हक प्रयोग करब। ओहिना स्थान-लाघव लिपिमे स्थान-कटौती लेल प्रयुक्त होइत अछि। टॊपिक १२ मे शब्द विचारमे लिपि-उच्चारण सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। से प्रयत्न लाघवसँ कखनो काल ध्वनि अनचिन्हार भऽ जाइत अछि, आ ओकर रूपान्तर लिपिमे प्रत्न-लाघव आ कखनो काल स्थान-लाघ्वक संग होइत अछि। पद-आधारित लिपि पद आधारित लिपिमे प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघव नहि रहैत अछि। एकरा एना बुझू जे तमिल लिपि अछि सिलेबल आधारित लिपि, रोमन लिपि अछि अल्फाबेट लिपि आ तिरहुता आ देवनागरी अछि अल्फा-सिलेबिक लिपि। माने जतऽ संयुक्ताक्षर नहि अछि से भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। माने अंग्रेजी, जे रोमन लिपिमे लिखल जाइत अछि, मे संयुक्ताक्षर नहि होइत अछि, मात्र २६ टा अल्फाबेट होइत अछि, से ओ भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। तमिलमे सिलेबल आधारित लिपि अछि। से ओ भेल सिलेबल आधारित लिपि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से ओ भेल अल्फा-सिलेबिक लिपि। एहि तीनूक तुलना मोटा-मोटी वार्णिक (अंग्रेजी), मात्रिक (तमिल) आ वार्णिक आ मात्रिक (तिरहुता आ देवनागरी) छन्दसँ कएल जा सकैत अछि। मुदा एतऽ एकटा पेंच अछि, अंग्रेजीमे वर्णक गणनासँ जे मीटर निर्माण करब तँ लय नहि बनत से ओतऽ सिलेबल आधारित गणना करए पड़ैत अछि, आ किएक तँ ध्वनिक सम्बन्ध मात्र सिलेबलसँ छै, शब्दकेँ सिलेबलमे तोड़ल जाइत अछि। जापानी लिपि पद-आधारित अछि से ओतऽ ई झमेल नहि अछि, आ ओतऽ ध्वनिक ईकाई लेल जे शब्द प्रयुक्त होइत अछि तकर अनुवाद मोटामोटी सिलेबलमे कएल जा सकैत अछि आ ओही आधारपर हाइकूमे १७ टा ध्वनि पुरेबा लेल गणना होइत अछि । तिरहुता, देवनागरी आ ब्राह्मीमे जे बाजल जाइए सएह लिखल जाइए, आ एतऽ पाणिनीपूर्व आ पणिनिक परम्परामे ध्वनि आधारित सन्धिक निअम बनल अछि। कर्मधारय समासक विग्रह पदात्मक होइत अछि, महादेव भेला महान् देव, आ जँ दूसँ बेशी पद अछि तँ से भेल बहुव्रीहि- जेना लम्बोदर (नमगर जिनकर उदर से, माने गणेश)। अंग्रेजी (रोमन लिपि) मे बजबा काल सन्धि होइत अछि मुदा लिखबा काल नहि, मुदा ओतहुओ दीर्घ लेल डबल ए, डबल बी आदि प्रयुक्त होइते अछि, पंकचुएशन सेहो ई काज करैत अछि, हँ ओतऽ ट्रिपल ए नहि होइत अछि, मुदा हमहूँ सभ तँ दीर्घक बाद प्लुतकेँ छोड़िये देने छी। आ तही कारणसँ मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखल जाइत अछि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से मात्रिक आ वार्णिक दुनू छन्द एहिमे गणना कएल जा सकैत अछि। टॊपिक १ मे पृष्ठ १८ सँ गणना (मात्रिक आ वार्णिक) सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। सिलेबल जेना शब्दसँ सम्बन्धित अछि पद तहिना समाससँ पहिलमे ध्वनि प्रमुख अछि आ दोसरमे पद (अर्थ)। से वएह पद आधारित लिपि ध्वन्यात्मक लिपिक विकास छल। जकर प्रमाण ऐतिहासिक रूपसँ उपलब्ध अछि, आ जतऽ सँ लिपिक असली विवेचन सम्भव अछि। आ चित्र-लिपिक रूपमे जाहि तीन गोट लिपिक चर्च भेल माने टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कात (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील धारक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे एहिमेसँ टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कातमे सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे जे सभ्यता सभ क्रमसँ आएल ओहिमे पहिने सुमेरमे क्यूनीफॊर्म लिपिक प्रारम्भ भेल ४००० शताब्दी बी.सी.ई. (बिफोर कॊमन एरा)मे। बेबीलोन लोकनि सुमेरसँ ई लिपि सिखलनि आ हुनकासँ असीरिया लोकनि। माटिक सानल आ लोथ बनाएल पट्टीपर सुखेलासँ पहिनहिये नोकबला स्टायलससँ, मोटा-मोटी ३५० टा अक्षरसँ, ई क्यूनीफॉर्म लिपि लिखल जाइ छल जखन आ फेर रौदमे सुखाएल वा चूल्हिमे पकाएल जाइत छल। आधुनिक कालमे एकरा पढ़बाकश्रेय एकटा अंग्रेज हेनरी रॊलिनसनकेँ जाइ छनि। तेसर चरणक बाद धरि ई पद-आधारित बनि गेल छल। एजिप्टमे हायरोग्लाइफिक (हायरोग्लिफिक, हायरेटिक आ डेमोटिक) लिपि क्यूनीफॉर्म लिपिक समकालीन छल। एहिमे २४ टा चिन्ह रहैक जाहिमे सभटा व्यंजन रहैक। स्वर रहबे नहि करैक, से बहुत रास झमेल आ अस्पष्टता आबि जाइ छलैक, से ओकर निवारणलेल ओ लोकनि आर विशेष चेन्ह आ चित्रक प्रयोग करैत छलाह। ओ सभ लाल मोशि-कलमसँ पेपीरस पातपर लिखैत छलाह, ओही पेपीरससँ पेपर बनल अछि। क्यूनीफॉर्म आ हाइरोग्लाइफिक ई दुनू लिपि दहिनसँ वाम दिश लिखल जाइत छल। एहि दुनू लिपिक समकालीन लिपि छल चीनक लिपि से ऊपरसँ नीचाँ लिखल जाइत छल। पहिने एकटा शब्द लेल एकटा चिन्ह छल, मुदा फेर एकटा विचार लेल एकटा शब्दक प्रयोग होमए लागल। चीनक लिपिमे कोनो अल्फाबेट नहि अछि, ४०,००० चिन्ह अछि। एकर अलाबे एलमाइट सभ पहिने देशज रेखात्मक आ चित्र-प्रचुर अक्षरक प्रयोग केलनि मुदा फेर ओ लोकनि सेहो क्यूनीफॉर्म लिपि पकड़ि लेलनि मुदा ओतऽ ११३ चेन्ह जाहिमे ८०सँ बेशी पद-आधारित चेन्ह छल, केर प्रयोग ओ केलनि। से एजिप्टक बदला लिपिक आविष्कारक मेसोपोटामिया (सुमेर, बेबीलोन आ असीरिया) क लोक रहथि, जे लिखबाक कलाक आविष्कर्ता छथि। जेना ऊपर चर्च भेल अछि, ओ लोकनि पहिने चित्र लिखलन्हि, आ किएक तँ चित्र बनेबामे बेसी समयक नोकशानी होइत छलन्हि से ओ लोकनि प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघवसँ चित्रकेँ चेन्ह बना देलन्हि, चेन्हमे समानता आ समरूपता आनि रेखात्मक पद्धतिक लिपि बनेलन्हि। फेर ई चेन्ह ध्वनिकेँ प्रदर्शित करए लागल, आ एहि तरहक मोटामोटी ३५० टा चेन्ह बनल। सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे जे खाँटी वर्ण आधारित लिपि बनल ताहूमे, फेर मिनोअन सभ्यतामे जे लिपि आविष्कृत भेल ओहिमे पद-आधारित लिपिक प्रभाव पड़ल। पद-आधारित लिपिक दूटा रूप चीनमे छल मुदा तकर प्रयोग चीनमे बन्द भऽ गेल मुदा जापानमे ई प्रयोगमे अछि जकर किछु चर्च ऊपर आएल अछि। व्यंजन प्रधान लिपि एकरा वर्णमाला वा वर्ण आधारित लिपि सेहो कहि सकैत छी। आन लिपि सभमे चेन्ह सभक संख्या ततबा बढ़ि गेल जे शिशु लेल ओकर सीखब असम्भव भऽ गेल। एहि लिपिक विकासक कारण छल प्रयत्न लाघव। एक्के लिपिमे अनेक भाषा लिखब सम्भव भऽ गेल। टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे)क क्यूनीफॉर्म लिपि वर्णमाला नहि बनि सकल। एहि लिपिक सम्बन्ध सेमेटिक भाषासँ हेबाक प्रमाण अछि। चित्रात्मक फेर विचारात्मक, फेर ध्वन्यात्मक लिपि ई बनि सकल। मुदा ध्वन्यात्मक लिपि सेहो संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आ क्रिया-विशेषणक आवश्यकताकेँ किछु सुधारक संग पूर्ण कऽ सकल। फेर ई पद-आधारित बनल आ एतहि एकर विकास खतम भऽ गेलैक। बादमे जा कऽ जुरुथ्रुष्टक अनुयायी लोकनि मेसोपोटामियामे अपन लिपिकेँ व्यंजन प्रधान बनेलन्हि जकरा अर्द्ध-वर्णमाला कहि सकैत छी। मुदा ओहिमे कृत्रिम हेबाक प्रवृत्ति बढ़ल, आ ई प्रवृत्ति ब्राह्मीमे सेहो भाषा-वैज्ञानिक लोकनिकेँ देखा पड़ैत छन्हि। क्रीटमे सेहो चित्र-प्रचुर रेखाकृतिसँ आगाँ बढ़ि १३५ चेन्हबला भावना-प्रधान आ ध्वनि-प्रधान लिपि बनेलन्हि। हिनकर लिखब वामसँ दहिन आ दहिनसँ वाम दुनू छल। उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे मूल वर्णमालाक आविष्कार दोसर शताब्दी बी.सी.ई. मे भेल जकर नाम उत्तरबरिया सेमेटिक वर्णमाला छल। आ तकर बाद आनो-आन मूल वर्णमाला आविष्कृत भेल जेना आरामाइक, फिनीशिअन, ग्रीक आ ब्राह्मी आ ई लिपि सभ अनचोक्के आविष्कृत नहि भेल होएत वरण ओतहु वएह प्रक्रिया भेल हएत जे मेसोपोटामियाक लिपि संग भेल छल। मुदा एक स्तरक बाद मेसोपोटामियाक क्यूनीफॉर्म लिपि पद-आधारित लिपि बनि अपन खिस्सा खतम केलक ई लिपि सभ पूर्ण वर्णमाला बनि गेल। भारतमे लिपि आ लेखनकला नागार्जुनकोण्डासँ प्राप्त दोसर शताब्दीक एकटा मूर्तिमे राजा शुद्धोधनक दरबारक दृश्य अंकित अछि जाहिमे तीनटा भविष्यवक्ता भगवान बुद्धक माता रानी मायाक स्वप्नक व्याख्या कऽ रहल छथि। हिनका सभक नीचाँ बैसल लिपिकार तकरा लिपिबद्ध कऽ रहल छथि। भारतमे लेखनकलाक ई आइ धरिक सभसँ पुरान चित्र आधारित प्रमाण अछि। एहिसँ अतिरिक्त पुरान प्रमाण हड़प्पा संस्कृति, अशोकक अभिलेख आदि तँ अछिये। अशोकक अभिलेख आ हड़प्पा संस्कृतिक बीचमे सेहो मारते रास अभिलेख भेटलाछि जेना सोहगौराक ताम-पत्र अभिलेख, पिपरहबाक बौद्ध-भीड़ अभिलेख, महास्थान आ बर्लीक पाथर अभिलेख, आ भट्टिप्रोलुक अभिलेख। भारतमे हड़प्पा सभ्यतामे पहिल बेर लिपिक प्रयोग भेल मुदा ओ एखन धरि पढ़ल नहि जा सकल अछि। एकर अभिलेख सभ छोट-छोट छैक सभसँ पैघ अभिलेखमे २६ टा चेन्ह छैक। धोलावीर (गुजरात) मे नग्रक द्वारपर एकटा साइनबोर्ड हेबाक प्रमाण अछि जाहिमे ९ टा चेन्ह छैक। ब्राह्मी आ खरोष्ठी ब्राह्मी वामसँ दहिन आ खरोष्ठी दहिनसँ वाम दिशामे लिखल जाइत अछि। मुदा दुनू भारतक वर्णमाला पद्धतिक आधारपर विकसित भेल अछि। अशोकक अभिलेख ब्राह्मी आ खरोष्ठी (मानसेहरा आ शाहबाजगढ़ी) दुनूमे भेटल अछि आ एकरा एकटा अंग्रेज जेम्स प्रिंसेप १८३७ सी.ई. मे ब्राह्मी पढ़बामे सक्षम भेलाह। खरोष्ठी पढ़बाक श्रेय सम्मिलित रूपसँ कर्नल मसोन आ जेम्स प्रिंसेप केँ देल जाइत अछि। एहि अभिलेख सभमे अशोकक नाम पियदस्सी लिखल छैक आ किछुमे असोक (अशोकक पालि-प्राकृत रूप) सेहो। अशोकक अभिलेखमे लिपिकरक चर्च अछि। ब्राह्मी लिपि बहुत दिन धरि विकसित आ परिष्कृत/ परिवर्द्धित होइत प्रयोगमे रहलाअ एहिसँ भारतक आन लिपि सभक उत्पत्ति भेल मुदा खरोष्ठी लिपि अपने संग खतम भऽ गेल। अशोकक अभिलेखक अतिरिक्त इण्डो-ग्रीक राजा सभ एकर प्रयोग अपन मुद्रापर केलन्हि जाहिमे तर आ ऊपरमे ग्रीक आ ्खरोष्ठी लिपिमे राजाक नाम लिखल रहैत छल। नारद-स्मृतिमे लिपिकेँ उत्तम आँखि कहल गेल अछि आ एकर सृजन ब्रह्मा केलनि तकर चर्च अछि। बृहस्पति स्मृतिमे चर्च अछि जे छह मासक बाद स्मृति धोखा देमऽ लगैत अछि से पातपर लिखल आखरक सृजन ब्रह्मा केलनि। चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनमे सेहो चर्च अछि जे वामसँ दहिन लिखल जाएबला लिपिक सृजनकर्त्ता ब्रह्मा छथि। एहि लिपिक नाम ब्रह्मी लिपि छल आ से पाणिनी पूर्व व्याकरणाचार्य द्वारा स्वीकृत छल, मुदा पाणिनी व्याकरणक अनुरूप ब्रह्मी अशुद्ध अछि। से एहि लिपिक नाम ब्राह्मी पड़ल। पाणिनी अष्टाध्या आ अमसिंह अमरकोषमे लिपि आ लिबिक चर्च करैत छथि। पाणिनी पूर्व आचार्य यास्क अपन निरुक्तमे बहुत रास पूर्व आ समकालीन व्याकरणाचार्यक नाम गणबैत छथि। वर्णक गणना आधारित छन्द आ व्याकरणाचर्य सभक उपस्थिति अपरोक्ष रूपसँ लेखनकलाक उपस्थितिक आभास करबैत अछि। तीन हजार वर्ष पूर्व झेलम आ चेनाबक बीच गांधार (अखन ओतऽ यूसुफजई पठान निवास करैत छथि) इलाकामे दक्षक संघराज्य छल, एहि इलाकामे काबुल धार पच्छिमसँ आबि कऽ सिन्धु धारमे संगम करैत अछि। ओहि संगमसँ चारि माइल उत्तर लहुर गाम, जे पाणिनीक नानी गाम छल, मे पाणिनीक जन्म भेल, ओइ गामक नाम ओइ कालमे शलातुर रहैक। चीनी यात्री ह्वेनसांग (युआन च्वांग), सातम शताब्दीमे. एहि गामक विद्वान ब्राहमण व्याकरणाचार्यक चर्च केने छथि। माने परम्परा आगाँ-पाछाँ काएम छल। जैनक भगवती सूत्र एहि ब्राह्मी लिपिकेँ नमस्कार करैत अछि। लिपिक आधार- अक्षर, वर्ण आ मात्रा आ तकर साक्ष्य ऋगवैदिक ऋचा वर्णवृत्तमे अछि, मात्रिक छन्दमे नहि। वार्णिक छन्दमे अक्षरक गणना होइत अछि। छान्दोग्य उपनिषदमे अक्षर शब्द उल्लेख अछि दीर्घ स्वरक सेहो। तैत्तरीय उपनिषदमे वर्ण आ मात्रा दुनूक चर्चा अछि। ऐतरेय आरण्यकमे स्वर आ व्यंजन दुनूक चर्चा अछि। पंचविंश ब्राह्मणमे सभसँ छोट दक्षिणा १२ कृष्णल आ सभसँ पैघ दक्षिणा ३,९३,०१६ कृष्णल सुवर्णक चर्चा अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र चूड़ाकर्म संस्कारक बाद लिपि आ अंकक प्रशिक्षणक निर्देश करैत अछि। राजाकेँ मन्त्रिपरिषदक संग पत्राचार आ गुप्तचरक कूटलिपिमे संदेश पठेबाक चर्च अछि। अर्थशास्त्र कहैत अछि जे लिपिकार तेजीसँ लिखबामे निपुण होथि, साफ-साफ लिखथि आ लेख पढ़बामे सेहो समर्थ होथि। बौद्ध ग्रन्थ सुत्तंतमे अक्खरिका क्रीड़ाक चर्च अछि, जाहिमे अकासी अक्षर बनेबाक स्पर्धा रहैत अछि। बौद्ध भिक्षु लेल एहि क्रीड़ाक निषेध अछि मुदा विनय-पिटक लेखल-कला सिखबाक अनुमति बौद्ध-भिक्षुकेँ दैत अछि। कटाहक जातकमे जाली पत्र देखाकेँ ठकबाक चर्च अछि तँ महासुतसोम जातकमे तक्षशिलाक अध्यापक अपन पुरान शिष्यकेँ पत्र लिखै छथि। कण्ह जातक अक्खर (अक्षरक पालि-प्राकृत रूप) क प्रयोग करैत अछि। महावग्गमे अंक-शब्दक प्रशिक्षण आ कटाहक जातकमे शीतलपाटीक चर्चा अछि जाहिपर लिखब सिखाओल जाइत छल। ललितविस्तर बुद्धक लिपिशाला, हुनकर शिक्षक विश्वामित्र, चाननक शीतलपाटी आ सोनाक लेखनीक चर्चा करैत अछि, एतऽ ६४ टा लिपिक वर्णन अछि जतऽ राजनैतिक सीमाक हिसाबसँ अंगक लिपि, मगधक लिपि वङक लिपिक चर्च अछि मुदा विदेहक लिपिक स्थानपर पूर्व विदेह लिपि लिखल अछि। एकर कारण अछि जे वज्जि विदेहपर अधिकार कऽ लेने छल आ वज्जि आ विदेहक लिपि संयुक्त रूपसँ विदेह लिपि छल। अजातशत्रु तेसर शताब्दीमे वज्जिकेँ जीति मगधमे राजनैतिक रूपसँ मिला लेलन्हि, मुदा सांस्कृतिक रूपसँ ओ अपन अस्तित्व बचेने रहल। ललित विस्तर तेसर शताब्दीक ग्रंथ थिक आ ताहि द्वारे ओ मगध लिपिक संग पूर्व विदेह लिपिक वर्णन करैत अछि। ई प्रवृत्ति बादमे गुप्तकालक तीरभुक्ति (तिरहुत) प्रान्तमे सुदृढ़ रूपसँ सोझाँ आएल आ पूर्वविदेह लिपिक नामकरण भेल तिरहुता। ललितविस्तरमे बाल अवस्थामे बुद्ध-सिद्धार्थक वर्णमाला प्रशिक्षणक चर्च अछि आ ओहिमे वार्णिक अक्षरक काँति आ अलंकरणक योजनाक चर्च अछि जे ब्राह्मी लिपिक अछि। उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला आ ब्राह्मीक बीचमे अलेफ् आ अ, बेथ् आ ब्, गिमेल् आ ग, दालेथ् आ द, हे आ ह, वाव् आ व, जाइन् आ ज, चेथ् आ घ, थेथ् आ थ, योध् आ य, काफ् आ क, लामेध् आ ल, मेम् आ म, नुन आ न, सामेख आ स, आइन् आ ए, फे आ प, साधे आ च, कॉफ् आ ख मे अद्भुत समानता अछि आ मानवक मस्तिष्क कोना दूर रहलोपर एक्के रङ अछि तकर द्योतक अछि। बूलरकेँ ब्रम भेलन्हि जे ब्राह्मी लिपि उतरबरिया सेमेटिक लिपिक अनुकरण केलक। ई ओ काल छल जखन हड़प्पा आ मोहनजोदाड़ोकेँ सेहो मेसोपोटामियाक आउटपोस्ट ताधरि मानल जाइत जाधरि भारतक आन भागमे उत्खनन नहि भऽ गेलै आ हड़प्पा संस्कृतिक देशज रूप प्रकट नहि भऽ गेलैक (हर्मन कुल्के आ दीतमार रोथरमण्ड, अ हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, २००४, पृ. १९, मुदा ओ पृ.५४ पर अखनो भ्रममे छथि जे खरोष्ठी अरामेइक लिपिक आधारपर बनल जे तखन फारसक आधिकारिक लिपि छल। अरामाइकमे मात्र २२ टा अक्षर छैक, स्वरक अपूर्णता अछि, ह्रस्व-दीर्घक भेद नहि अछि, स्वरक मात्राक सेहो अभाव अछि से ओ भारतीय भाषा लेल अयोग्य अछि, खरोष्ठीमे ई सभ गुण अछि, संगे दीर्घ-गुण-वृद्धि ध्वनि लेल भेदक चिन्ह सेहो अछि, प्राकृत अभिलेख लेल ई ब्राह्मी सन सक्षम छल, मात्र दहिन-वाम रहने ई विदेशी नहि भऽ जाएत। खरोष्ठी दहिनसँ वाम लिखल जाइत अछि मुदा एकर वर्णमाला भारतीय अछि, दहिनसँ वाम लिखल जएबाक कारण किछु विद्वान लोकनिकेँ एहिमे फारसक प्रभाव देखाइ पड़ैत छनि, मुदा सत्य तँ यएह अछि जे ब्राह्मी आ खरोष्ठी लिपिमे एक्के वर्णमालाक प्रयोग भेल अछि।)। जेना सङीतमे भारतक सारेगामा क सात टा सुर आ पश्चिमी ऑक्टेव (ओत्तहु साते टा छैक, ऑक्टेव माने आठम सँ पुनः पुनरावृत्तिक मात्र ई प्रतीक अछि) ई सिद्ध करैत अछि जे भाषा कोनो हुअए कान वएह छैक मनुक्खबला। ब्रेल आ इण्टरनेशनल फोनेटिक अल्फाबेट ध्वनिक संग मस्तिष्क (ब्रेल) क सेहो संप्रेषण मोटामोटी एक्के हेबाक प्रमाण दैत अछि (देखू अनुलग्नक) से पहिने तँ किछु विद्वान एकरा बैक्ट्रो-पालि आ आरियानो-पालि विदेशी लिपि बुझि कऽ कहलन्हि, कनिंघम एकरा गांधारी कहलन्हि, मुदा ललितविस्तर आ चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनक प्रमाण अकाट्य छल आ ओतऽ वर्णित एकर नाम खरोष्ठी सर्वमान्य भेल। चीनी साक्ष्य ब्राह्मीक उद्भव ब्रह्मा द्वारा आ खरोष्ठीक सर्जन ब्राह्मण आचार्य खरोष्ठ द्वारा भेल मानलक अछि। तेसर शताब्दीक बाद अभिलेख संस्कृतमे लिखल जाए लागल, प्राकृतक प्रयोग बन्द भऽ गेल। प्राकृत लेल ब्राह्मी आ खरोष्ठी दुनू सक्षम छल मुदा संस्कृतक सन्धियुक्त अलंकृत क्लिष्ट शब्द, पद आ समास लेल मात्र ब्राह्मी। से एक बेर जे एकर प्रयोग बन्द भेल तँ प्राकृतसँ निकलल भाषा सभ लेल सेहो ब्राह्मीसँ निकलल लिपिक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल। ब्राह्मीक एरागुडीक अशोकक अभिलेख २६ पाँतीमे अछि। वाम दहिन लेखनक पूर्ण रूपसँ पालन नहि भेल अछि, ओना बेशी पाँती वाम-दहिन अछि। किछु वाम-दहिन पाँतीमे किछु अक्षर वाम-दहिन तँ किछि दहिन वाममे अंकित अछि, किछि ऊपर नीचाँ सेहो अछि। ८ पाँती दहिन-वाम अछि। एक पाँतीमे मात्र एक अक्षर अछि। से दहिन वाम रहने विदेशी प्रभाव सिद्ध नहि होइत अछि। खरोष्ठी सन जापानी सेहो दहिन वाम लिखल जाइत अछि। ललितविस्तरक प्रसंग सेहो इशारा करैत अछि जे व्याकरणक विशेषताकेँ पूर्ण करब ब्राह्मीक उद्देश्य छल, मुदा ई आग्रह ऋगवेदसँ अर्थशास्त्र तक अछि, आ भारतीय परिप्रेक्ष्यमे ब्राह्मी आ ओहिसँ निकलल लिपि ओहि आग्रहकेँ पूर्ण करैत अछि, आ एकर परिष्कृत रूपकेँ कृत्रिम नहि वरण् स्वाभाविक मानल जेबाक चाही। से किछु विद्वान ब्राह्मीक व्याकरण सम्बन्धी आवश्यकताकेँ पूर्ण करए लेल भेल परिष्करणकेँ विदेशी अक्षरकेँ भारतीय प्रारूपमे आनब कहलन्हि अछि (बूलर, ऑन द ओरिजिन ऑफ द इण्डियन ब्राह्मी अल्फाबेट, १८९८), मुदा कनिंघम एकरा भरतीय चेन्ह सभसँ बहार भेल मानलन्हि अछि (कनिंघम, कोरपस इन्सक्रिप्शनम इण्डिकेरम, खण्ड-१)। ब्राह्मी लिपिक अतिरिक्त ६३ टा आर लिपिक चर्च ललित विस्तरमे अछि। सम्पूर्ण यूरोपमे ग्रीस आ रसियन कॉमनवेल्थ छोड़ि कऽ (एहि दुनू ठाम अलग-अलग लिपि छैक) सम्पूर्ण यूरोपमे रोमन लिपिक प्रयोग होइत अछि। से सम्पूर्ण यूरोपमे आइ मात्र तीनेटा लिपि छैक। जँ रूसकेँ यूरोपसँ हटा दी तँ ओ भारतक बराबरे अछि। भारतमे सभ प्रान्तमे मोटामोटी अलग-अलग लिपि अछि, मुदा तमिलक अतिरिक्त सभमे अल्फा-सिलेबिक (अक्षर आ संयुक्ताक्षरक) निर्वहण मोटामोटी एके रङ होइत अछि। एकर कारण छापाखानाक देरीसँ आगमन मात्र अछि। ब्राह्मीक मानक रूप आ ओकर क्षेत्रीय शैली ब्राह्मीक मानक रूप छल आ तकर प्रमाण अछि अशोकक अभिलेख। अशोक १४म प्रस्तर-अभिलेखमे कहै छथि जे अभिलेख-आलेखनक गुण-दोष लिपिकरक जिम्मा अछि, आ सएह कारण छल जे अशोकक अभिलेखमे अक्षर आ ओकर आकारमे समरूपता अछि आ ईहो प्रमाणित होइत अछि जे अशोकक काल धरि ब्राह्मीक मानक रूप आबि गेल छल। जे भेद अछि से क्षेत्र अनुसार, लिपिकरक लेखनक अनुसार आ लेखन उपकरणक विविधताक अनुसार अछि, आजुक हिसाबेँ जँ असमतल पाथर, खोह आदिपर लिपिकार द्वारा पुरातन उपकरणसँ जतेक असमरूपता आएल अछि से मानक ब्राह्मीक स्थिति आर सुदृढ़ करैत अछि। पंकचुएशन संस्कृतमे रहबे नहि करए से प्राकृतमे सएह परम्परा आगाँ बढ़ल। विराम चिन्हक व्याकरणगत आवश्यकता ब्राह्मीक लिपिकारकेँ ओही कारणसँ आवश्यक नहि लगलन्हि। कुटिल लिपि कुटिल लिपि ; उत्तर भारत ६अम शताब्दी सी.ई. ; पच्छिम (शारदा) ; पूब (किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरी। कुटिल लिपिक विशेषतासँ प्रेरित नामकरण- न्यूणकोण वर्णमाला (बूलर, इण्डियन पालियोग्राफी, प्.६८), नह शीर्ष वर्णमाला (टॊड, एनल्स ऒफ राजस्थान, पृ. ७००), भारयीय नाम सिद्ध मातृका,काश्मीर आ वाराणसीमे प्रचलित (अल-बेरुनी, भारत, पृ. १७३, सचाउ), देवल प्रशस्तिमे एकरा लेल कुटिलाक्षरणी प्रयुक्त भेल। आदित्यसेनक अफसड़ पाथर-अभिलेखमे एकर नाम विकटाक्षरणी अछि। विक्रमांकदेव चरितमे कुटिल लिपिमे सिद्धहस्त कायस्थ लोकनिक चर्च अछि। जेम्स प्रिंसेप, जे १८३७ ई. मे अशोकक अभिलेखकेँ पढ़ने छलाह, एकरा लेल कुटिल लिपिक नामकरणक अनुशंसा केलन्हि (जर्नल ऒफ एशियाटिक सोशाइटी ऒफ बेन्गाल, पार्ट-५ पृ. ७७८)। कुटिल लिपिक विकासक की कारण छल? पहिल तँ ई छल जे लिखबाक करची-कलम आ मोशिक प्रयोग संग नव उपकरण आ पुरान उपकरणक नव प्रयोगसँ अलंकरणयुक्त अभिलेख लेखनक इच्छा जागृत भेल, लटपटौआ लिखबाक आग्रह सेहो एहि लेल कारण बनल। एहिसँ उपरका भाग फन सन बनि गेल कारण मोशि ढबकि जाइ, पाछाँ नाङरि आ पद-चिन्ह सेहो सुस्पष्ट भेल। अलंकरणक प्रवृत्तिसँ वर्ण वृत्ताकार आ चिक्कन स्वरूप लेबऽ लागल। अलंकारक कारणसँ एकर नाम पड़ल सिद्धमातृका। कुटिल लिपिक अभिलेख भेटल अछि, कौशाम्बीक माटिक सदण्ड सप्तदीपक (ई मोन पाड़ैए मौर्य कालक बौद्ध सप्ताक्षरी (प्रसिद्ध मंत्र) कूटाक्षरक), मंदसौरक यशोधर्मनक अभिलेख, ईशानवर्माक हरहा पाथर-अभिलेख, सर्ववर्मनक असीरगढ़ मोहर-अभिलेख, अनन्तवर्मनक बराबर आ नागार्जुनी खोह अभिलेख, ईश्वर वर्मनक जौनपुर पाथर-अभिलेख, शाहपुरक प्रतिमापर अभिलेख , मन्दागिरि अभिलेख, जीवितगुप्त द्वितीयक देववार्णार्क स्तम्भ अभिलेख, हर्षवर्धनक मधुबन आ बाँसखेड़ा ताम्रपत्र-अभिलेख, हर्षवर्धनक सोनीपत मोहर-अभिलेख। तिरहुता तिरहुता लिपिक खोजमे आब भारतक पूब भागमे आउ। पूब भागक ब्राह्मीक बाद किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरीक प्रयोग भेटैए। किराँत लिपिमे लिम्बू भाषा आदि लिखल गेल। ई सभ लिपि वामसँ दहिन दिश लिखल जाइए मुदा रञ्जना लिपि कूटाक्षरमे ऊपरसँ दक्षिण लिखल जाइए। नागरीक रूप नन्दीनागरीक प्रयोग मुदा बेशी मध्य दक्कन आ दक्षिण भारतमे भेल आ माध्वाचार्यक द्वैत दर्शनक संस्कृतमे लिखल पाण्डुलिपि नन्दीनागरीमे अछि। विदेह, अंग, वज्जि आ नेपालक तराईमे संस्कृत आ मैथिली दुनू तिरहुतामे लिखल जाइ छल आ एहिमे सभ विषय, जेना साहित्य, गणित, धर्म, दर्शन लिखल जाइ छल आ पाता (सुख-दुख दुनुक) चलै छल आ चिट्ठी-पत्री अहीमे होइ छल। कैथीक प्रयोग हिसाब-किताब, खाता-खतियान लेल होइ छल आ मुख्य रूपसँ कायस्थ एकर प्रयोग करै छला। मुदा मिथिलाक कर्ण-कायस्थक पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल (मैथिल करण कायस्थक पाँजिक सर्वेक्षण- मेजर विनोद बिहारी वर्मा, १९७३)। एकर विपरीत मैथिल ब्राह्मणक पञ्जीक किछु फील्ड-वर्क आ पत्रचार कैथीमे भेल (अनुलग्नक) मुदा एतहु पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल। ई १४म शताब्दी सी. ई. (कॊमन एरा) सँ शुरू भऽ कऽ २०म शताब्दी सी.ई. धरि रहल जखन देवनागरीमे पञ्जी लिखब प्रारम्भ भऽ गेल। किछु नव आविष्कृत लिपि लिपिक अनुकरणसँ साइन (इशारा) भाषा वधिर लेल १८म शताब्दी सी.ई. (कॊमन एरा) मे वधिर स्कूलमे फ्रांसक चार्ल्स मिशेल देल एप्पे द्वारा आविष्कृत भेल। ई एहेन लिपि अछि जे कागतपर नहि वरण् वायु माने वातावरणमे बनाओल जाइत अछि। अन्ध-दिव्यांग लेल ब्रेल लिपि १९म शताब्दीमे फ्रांसक लुइ ब्रेल आविष्कृत केलनि। २०म शताब्दीमे रघुनाथ मुर्मू संथाली भाषा लेल ओल-चिकी लिपिक आविष्कृत केलनि। अनुलग्नक १: कैथी लिपिमे मैथिलीक किछु उदाहरण (साभार जीनोम मैपिंग आ जीनियोलोजिकल मैपिंग, मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध भाग-१ आ २ , श्रुति प्रकाशन, २००८, २००९) अनुलग्नक २: मिथिलाक कर्ण कायस्थक तिरहुता लिपिमे लिखल किछु पात (साभार मैथिल करण कायस्थक पाँजिक सर्वेक्षण- मेजर विनोद बिहारी वर्मा, १९७३) अनुलग्नक ३: लर्न मिथिलाक्षर- गजेन्द्र ठाकुर अनुलग्नक-१-२-३ लिंक (भाग-२ अगिला अंकमे) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डा. सुभाष चन्द्र झा ।।वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क साहित्य यात्रा।। बौक बधिर वाचाल मनुज गंभीर ज्ञान गुण स्नातक मूक पशु धरि भाव प्रेक्ष निश्नात होइछ सरीसृप जातक।। वैधनाथ मिश्र "यात्री "क जन्म ओहि काल खण्ड जून 1911ई.में भेल जखन देश परतंत्रताक पीड़ा सं आजिज मुक्त हेवाक लेल छटपटा रहल छल। अनाचार अत्याचार सं दग्ध जनमानस निर्णायक संघर्ष पर उतारू छल, अंग्रेजी सत्ता के उखाडवाक प्रण लय गाम गाम शहर शहर आंदोलन तीव्रता सं पसरि रहल छल, ओहि प्रभाव सं हिमालयक तराई में बसल भारतक गौरवशाली सभ्यताक प्रतीक रहल मिथिला सेहो अछूत नहिं रहल, बाढ़ि अकालक जांत में पिसाइत पिसाइत मिथिलाक गौरवशाली समृद्ध अतीत मैलछौन भ गेल छल। सामंतवादी परिपाटी गरीबक जीवन दोजख कय राखि देने छल। अन्न अन्न लै रकटल प्राण शरीर के जीर्णशिर्ण कमजोर अशक्त कय राखि देलक। अभावक कारणें अनेको कुप्रथा जन्म ल चुकल छल, बालविवाह बहुविवाह छुआछूत नारी उत्पीड़न आदि ओहि समयक सामाजिक विवशता सं अंकुरित भय समाजक लेल कोढ़ बनि समाज के निम्नतर स्तर पर आनि पटकि देलक। भेदभाव जातिवाद में मिथिला दिन पर दिन अपन सम्भ्रान्त अतीत सं विलग होइत गेल। जाहि मिथिला मध्य सम्पूर्ण भारतवर्षक चटिया लोकनि विद्याध्ययनक लेल सुदूर प्रांत सं चलि ज्ञानार्जन कय पुनः स्वपरान्त गमन करैत छलाह आ मिथिलाक विद्वान सं प्राप्त ज्ञान के प्रकाश सर्वत्र प्रकाशित करैत छलाह। ओ मिथिला अशिक्षा गरीबीक दलदल मे धंसल चल गेल। एहन विकट संक्रमण काल खण्ड में वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क जन्म प्रतिकूलताक अनुकुल स्वाभाविक प्राकृतिक घटना क्रम लगैछ, कारण जेहन कठिन सं कठिन आबोहवा हो प्रकृति ओहि वातावरण मे सार्थक पादप वा लताक लेल माकुल वातावरण तैयार क दैछ। शीत रौद छांह नमी शुष्क ठरल जबकल मृदा उर्वर सभ तरहक भूमि स्थल में जैव तत्व सक्रियता देखल जाइछ, गरीबी में जन्म लै, मैटुअर भय पिता सं उपेक्षित समाज सं उपेक्षित भय वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" जीवन यात्राक प्रारम्भ कठिन दौर सं शुरू भय गेल। ज्येष्ठ मासक पूर्णिमा मेघ मे बादलक प्रताड़ना सहि अपन सौम्य प्रकाश के धरती तक पहुँचा क रहैछ तहिना मातृक सतलखा में जन्म लै यात्री तरौनी मधुबनी आवि पिता गोकुल मिश्रक संरक्षण में कहुना पालल पोषल जाय लगलाह ।शिक्षा दीक्षाक संग संस्कृत पंडित पिताक अध्यवसाय पंडिताई में सेहो डैन पूरैत अग्रसर होइत रहलाह। येनकेन प्रकारेण यायावार यात्री शिक्षा यात्रा क्रम में कलकत्ता बनारस आदि शहर में अपन अध्ययन पुर्ण कयल। बहुभाषाविद् यात्री संस्कृत पाली बंगला हिंदी मैथिली आदि में अनेको रचना कयल। पत्रकारिता कय घुमक्कड़ी जीवन के अपना बौद्ध भिक्षु बनि श्रीलंका आदि देशक यात्रा कय सामाजिक मनोविज्ञान के अपन लेखनीक आधार बनाओल । कवि यात्री दवल कुचलल अस्पृश्यक आवाज बनि ललकार लगौलनि समतावादी विचार के जगौलनि, ऊंच नीचक भेद के मेटौलन्हि, समाज में पसरल कुरीति के ऐना देखा मानवीय संवेदना के जगौलन्हि, विधवा विलाप, कविक स्वप्न, मुखर आवाज़ बनल अवला लाचार ओ गरीबक लेल। प्रगतिवादी विचारधाराक पोषक अन्वेषक कुपोषण ओ भुख के अद्भुत रूपें चित्रित कयने छथि, यथा- मकड़ाक जाल सं बेधल ओय चुल्हाक मुँह, थारी गिलास सब बेच खा गेलय ऊंह।। कवि यात्री क रचना बहुआयामी समसामयिक परिस्थितिक दर्पण थीक। मैथिली में पत्रहीन नग्न गाछ मिथिलाक नग्न गरीबीक दस्तावेज थीक। और वर्तमान परिपेक्ष में ओहि सं सबक लेबाक नीक उपक्रम। साहित्य अकादमी सं पुरस्कृत उपरोक्त संग्रह समीचीन विवेचनात्मक तथ्य के सामने स्पष्ट करैछ। चित्रा सामाजिक परिस्थितिक भयावहता के सामने रखैछ। आरो अन्य रचना बलचनमा पारो सामाजिक विषमताक गवाही दै यात्रीक प्रगतिवादी सोच ओ अन्याय पूर्ण मानवीय दोष पर प्रहार करैत दृष्टिगोचर होइछ। ।।इति।। -डा. सुभाष चन्द्र झा, एम .ए. पी. एच. डी (मानविकी मैथिली) बी. आर. ए. बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्ना जी मोकाम दिस (मैथिली बीहनि कथा संग्रह) "बीहनि कथा " शब्द सृजनहार श्रीराज कें सादर समर्पित बीहनि कथा-- मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष """"""""""""""""""'""""""""""""""""""""""""""""""""""""""'''''""""""" मैथिली कथा साहित्य मूलत: संस्कृत भाषा साहित्य सं अनुदित भ'अपन पएर पसारने छल।एकर बीजारोपन चन्दा झा द्वारा विद्यापतिक 'पुरूष परीक्षा' सं भेल छल।कालान्तर मे मैथिली कथाकार बाङला कथा माध्यमे पाश्चात्य कथासाहित्य सं परिचित भेला।तत्पश्चात मैथिली कथा लेखनक कथ्य,शिल्प आ विषय परिमार्जित भ' मैथिली कथा साहित्य के नव दृष्टि देलक आ ओ संस्कृतक शब्द ,कथा/गल्प नामे लिखाइत रहल।पछाति प्रो. रमानाथ झा सदृश्य विद्वान/आलोचक ,अंग्रेजीक प्रभावे एकरा अंग्रेजी मे Short Story आ ओकर अनुवाद ' लघुकथा कहि संबोधित केलनि।तहिया सं इ कथा/ गल्प ,रचना त' ओही नामे होइत रहल मुदा विधागत ' लघुकथा ' (Short Story) विधाक अन्तर्गत मूल्यांकित होइत रहल।आ ताहि परिणामे मैथिलीक सब संग्रह पर अंग्रेजी मे Collection of Short Story अनिवार्य रूपें लिखल भेटत। तकर पछाति मैथिली साहित्यक इतिहासकार लोकनि सेहो कथा/गल्प नामक रचना कें लघुकथा विधाक श्रेणी मे राखि व्याख्या . करैत रहलाह।" संप्रति गल्प वा लघुकथा,उपन्यास सं अधिक लोकप्रिय भेल जा रहल ऐछ।तकर प्रबल कारण पाठक वर्ग मे क्रय शक्तिक क्षीणता वा पलखतिक अभाव, से नै जानि।" --डॉ. जयकान्त मिश्र-मैथिली साहित्यक इतिहास(प्रकाशक- साहित्य अकादमी)ऐ फरिछओठक पछाति अंग्रेजी साहित्यक विधाक पृष्ठभूमि मे ओहि विधा परिवारक अंग भ' स्थापित भेल। आगू ओकरा आओर फरिछबैत दुर्गानाथ झा श्रीश लिखै छथि--" आइ मैथिली साहित्यक एक मात्र उपलब्घि थिक लघुकथा(Short Story) पूर्वक कथाकार लोकनि गल्प आ उपन्यासक बीच शिल्पगत अन्तर नै बुझैत छलाह।मुदा आब इ स्पष्ट ऐछ।जाहि सं लघुकथा(कथा/गल्प नामे) विधागत स्वतंत्र परिचिति बना पओलक ऐछ।"--मैथिली साहित्यक इतिहास-दुर्गानाथ झा श्रीश।" हमरा मैथिली प्रतिष्ठा वर्गक छात्र रहने मैथिली साहित्यक इतिहासक अध्ययनक अनिवार्यता छल। एहि अध्ययनक क्रमे मैथिली कथा के विधागत ' लघुकथा( Short Story)बुझबाक अवगति भेल। हम आश्चर्य चकित रही अग्रज सबहक हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरणक रूपें अंधानुकरण पर, ई की ?पहिने सं जे विधा विद्यमान आ स्थापित ऐछ(कथा/गल्प नामे) ' लघुकथा(Short Story)।तहन ओइ विधाक दोहरीकरणक की खगता ?माने पिता आ पुत्रक एकहि नामे पुकार ! जहन की दुनूक चरित्र,प्रकृति आ क्रियाकलाप एक दोसराक विपरीत। फेर नकल वा मिझ्झरक अज्ञानता किएक ? ओही अज्ञानता वा अंधानुकरण सं पार पएबाक आ विधाक शुन्यता के भरवाक लेल अवतरित भेल बीहनि कथा विधा (1995)। सहयात्री मंच ,लोहना(मधुबनी)द्वारा भेल साहित्यिक बैसार मे सामूहिक रूपें सर्वसम्मति सं एहि विधाक अवतरण भेल छल। ऐ विधाक नाम की राखल जए ताहि पर बहसक पछाति श्री राज द्वारा ताकल नाम-" बीहनिकथा" पर सर्व सम्मति सं स्वीकृति द'आगू बढ़ाओल गेल।आ तहिया सं मैथिली कथा साहित्यक दू गोट विधा-पहिल,लघुकथा(Short Story)आ दोसर " बीहनि कथा(Seed Story)चलन सारि मे रहि गेल। 25 बरख सं कछुआ चालि सं चलैत बीहनि कथा विधा साहित्यिक छद्म खरहा सं टपि अपना के विजेता कहेबाक पात्रता आब हासिल क' लेने ऐछ।जन्मक पछाति ठेहुनिया मे कतेको के सैद्धांतिक पटकनिया दैत डेगा डेगी बढ़' लागल। तकर पछाति एकरा दबेवा/माटि मे गोड़बा लेल किछु तथाकथित/स्वघोषित विद्वान सक्रिय भ' गेला। फलत:एकर चालि बाधित होइत ठमकि सन गेल। सोझां मे ' एकला चलो रे' के उघैत करीब एक दशकक यात्रा एकरा हेरेबा लेल वेश रहल।2010 मे पुन: इ कान्ह उठेलक।आ ताहि मे पछिला सं जेरगर समूह नव आँखि-पाँखिक संग अंगेज पुन: सोझां आनि थिर केलनि।' विदेह , इ पाक्षिक' बनल राजपथ आ सारथी भेलाह संपादक-.गजेन्द्र ठाकुर आ सहायक संपादक-उमेश मण्डल। ऐ एक दशकक भीठ पड़ल साहित्यिक जमीन पर श्री राजक ' बीहनि कथाक साहित्यक बीराड़क बीहनि सं रोपनि भेल।तकरा हरियरी अनलनि गाम-घर, पत्रिकाक संपादक - शःरी रामभरोस कापड़ि भ्रमर।आ ऐ तरहें श्री राज भेलाह' वात्सल्य ' बीहनि कथा(2003)सं एकर पहिल प्रकाशनक स्वामी। बीहनि आ कथा शब्दक उत्पत्ति -------------------- -------------------- संस्कृतक ' ब्रीही ' शब्दक अर्थ होइछ बीज आ मैथिली मे बीहनि/बीहन/बीहैन सेहो ओही शब्दक मूलार्थ मे निहित।--प. भवनाथ झा कथा-संस्कृतक कथ् धातु सं बनल।जकर तात्पर्य होइछ- कहब वा वर्णन करब। बीहनि कथाक अर्थ आ परिभाषा ---------------------------------------- बीज/बीजम संस्कृत शब्द थिक।यथा-यज बीजै:सहस्त्राक्ष -महाभारत कथा सेहो संस्कृत शब्द थिक।यथा-कथासरित्सागर । कथाक मूलत: छ तत्त्व संग निर्मित होइछ। 01-कथावस्तु-कथाक संरचनात्मक रूप कथानक अथवा कथावस्तु कहाइछ।एकरा मे चारि प्रमुख स्थिति होइछ-आरम्भ, आरोह,चरम आओर अवरोह। 02-चरित्र चित्रण-उपपस्थित पात्रक गुण-दोषक वर्णन।रिजर्व चित्रण कहाइछ। 03-संवाद-पात्रक मनोदशाक वर्णन में प्रयुक्त शब्द। 04-देश काल-स्थितिक वास्तविक विवेचना लेल तैयार वातावरण। 05-उद्देश्य-कथा सृजन में उदघाटित मूल वा सार्थक पक्ष। 06-शैली-प्रस्तुतिकरणक कलात्मक विश्लेषण। अर्थात् बीहनि कथा पूर्णत: संस्कृत शब्दक उत्पत्ति थिक।जेना- लघुकथा मुदा साहित्यिक विधाक रूपें जाँची त' इ विधा मूलत:स्वतंत्र आ पूर्ण रूपे मैथिली साहित्य मात्रक विधा थिक।आयातित/ नकल नै। बीहनि माने बीज/बीया।जाहि मे विकास करबाक गुण निहित होइछ।मुदा ओ अविकसित रहैत ऐछ।समय अएला पर विकसित होइत ऐछ।ओकरा मे एक सं अनेक होएबाक गुण रहबाक चाही।बीहनि कथा-एहेन कथा,जे अनेक कथा(कथा/उपन्यास)के जन्म देबाक क्षमता राखए ओ बीहनि कथा भेल/हएत।अन्यथा नै। तें बीहनि कथा मे निष्कर्ष नै हेबाक चाही।---डॉ. भवनाथ झा बीहनि कथा विधाक नामकरण कर्ता श्री राजक मतानुसार-- बीहनि कथा,ओइ बीयाक समान ऐछ जकरा मे झमटगर/पूर्ण गाछक संभावना हो।मुदा ओ गाछ पीपर/पाकैड़ नै,पौध रूप मे हो।परञ्च बोनसाइ नै। पौध रूप सं तात्पर्य जे कथ्य/शिल्पें गसल मुदा शब्दक संख्ये सए सं डेढ़ सए धरि हुअए।मुदा बन्हन मे बान्हल नै। रचनान्त निकसगर(निस्तार देने)नै हुअए।निष्कर्ष पाठक पर। बीहनि कथाक चर्चित आ लोक प्रिय कथाकार, संपादक आदरणीय घनश्याम घनेरो ऐ विधा के परिभाषित करैत कहै छथि--- कोना बुझबै जे इ रचना बीहनि कथा भेलै:-- (क)शब्दक मानक औसत सव सौ हो (ख) विषय मारक ,आ सोचबा पर विवश करैत हो। (ग) कथ्य एहेन,जेना लगैत हो कथा/उपन्यास वा कोनो गद्यक सार हो। (घ) कथा मे निष्कर्ष नै हो। कथा साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर श्री राजकुमार मिश्र जीक विचारें--- (क) आकारगत छोट सं छोट हो (ख) कथ्ये फरिछएल आ गसल हो (ग) संपूर्ण गद्यक संभावना निहित हो (घ) ऐ सं इतर, अव्यवस्थित रचना फोंक हएत।ओ बीहनि कथा नै। बीहनि कथा विधाक मानकीकरणक आधारभूत इकाइ """""""""""""""""""'"'''''"'"'''''''''"''""'"""""""" गद्य साहित्य, मूलत: कथा विधाक मानकता तयकरणक आधार अंग्रेजी साहित्य ऐछ।अंग्रेजी साहित्यक अनुसार विश्व भरिक कथा ,अंग्रेजीक Flash fictionक अन्तर्गत निहित ऐछ।इ फ्लैश फिक्सन छ: खण्ड मे विभाजित ऐछ जकर तेसर खण्ड टेलब्रा(Tellbra )क अन्तर्गत मैथिलीक बीहनि कथा विधाक नियामकता सन्निहित ऐछ। फ्लैश फिक्सन(टेलब्रा)पर आधारित बीहनि कथा मापनक महत्वपूर्ण बिन्दू :- 01-कथ्य/शिल्पें पुष्ट जाहि कथाक न्यूनतम शब्द स. 20 आ अधिकतम 150 हो। 02-कथा साहित्यिक मानकताट परिपालक हो।यथा कोनो संस्मरण वा शब्द संग्रह मात्र बीहनि कथाक श्रेणी मे नै राखि सकैछ। 03-कथा,एकटा बीजक कथाक प्रतिदर्श हो।अर्थात एहेन कथा जाहि सं कथा/उपन्यास आदिक सर्जनाक संभावना प्रबल हो। 04कथा, निकस पर जा स्थिर नै हो। अन्त खूजल मुदा भावपूर्ण हो। 05-संपूर्ण कथा कोनो संदेशप्रद वा सकारात्म्क उद्देश्यक हो।शब्दक स्थूलकाय मात्र नै। उपरोक्त मानकता पर ठाढ़ रचना बीहनि कथा विधाक रचनाक रूपें अपन जग्गह पेबा मे सक्षम भ' पाओत।तकर पहिल मूल्यांकन लेखकक,पछाति संपादक ओ आलोचकक हाथ ऐछ। "कोनो नव सफलता हासिल करवा लेल पुरान मे पैस' पड़त।,खंघार'पड़त।तहन परिमार्जित फल सोझां आओत।जे भविष्यक नव बात गढ़ि मोकाम धरि ल' जएबा मे सक्षम बना पाओत।' एहि तरहें मैथिलीक लघुकथा विधा(कथा/गल्प)नामे लिखाइतक पछाइत बीहनि कथा विधा वैश्विक कथा मापदण्डें एकटा नव प्रतिमान गढ़ि,मैथिली साहित्य मे मैथिलीक अपन एक मात्र विधाक रूप मे स्थापित भेल।इ कोनो आन आयातित/नकल,विधाक विधान्तरण वा नामान्तरण नै।स्वयं मे मानक स्वतंत्र विधा हेबाक परिचिति कायम केलक। एहि प्रकारें मैथिली कथा साहित्यक दू टा स्वतंत्र विधा अपन अस्तित्व कायम क' रखने ऐछ।पहिल-लघुकथा (Short story)जे कथा/गल्प नामे लिखाइछ।ठीक ओहिना जेना कि अंग्रेजीक Poetry,मैथिली मे 'काव्य' नामक विधान्तर्गत-गीत,गजल,,कविता, हाइकु,क्षणिका आदि स्वतंत्र नामे/क्रियाकलापें/चारित्रिक गुणे अपन- अपन परिचिति बनौने ऐछ।मुदा विधागत सबटा काव्य परिवारक अंश वा अंग थिक। दोसर-बीहनि कथा(Seed Story) उपरोक्त दुनू विधा मध्यआओर कोनो वैध/अवैध विधाक लेल जग्गह वाँचल नै ऐछ। मुदा लघुकथा नामे बलधकेली मे हिन्दी लघुकथा विधाक नकल मैथिली अवतरण के घोसियेबाक असफल प्रयास ठाम ठीम क' मैथिली साहित्य के उकरू बनेबाक षडयंत्र जारी ऐछ।इ भ्रम वा द्वन्द ऐ द्वारे भेल जे किछु मैथिली रचनाकार लघु कथा माने आकारे छोट कथा बूझि नकल करैत रहलाह।ध्यातव्य महत्वपूर्ण बात जे लघुकथा एकटा शब्द मात्र नै,ओहि नामक एकटा स्वतंत्र विधा थिख।जे मैथिली मे अदौ काल सं कथा/गल्प नामे लीखाइत पहिने सं स्थापित ऐछ।आब तहन विचार करी मैथिली सं इतर हिन्दी भाषा साहित्यक अपन विधा " लघुकथा "क मैथिली अंधानुकरण पर। कोनो व्यक्ति,विषय,बौस्तक गुणक अनुसरण/अनुकरण बेजए नै।मुदा अंधानुकरण कतेक उचित ? मैथिली साहित्य मे विद्यमान " बीहनि कथा " विधा सं इतर सब विधा कोनो ने कोनो अन्य भाषाक विधा सं आयातित ऐछ।मुदा जत' सं आयातित भेल,ओइ मे आ मैथिली मे अपन मानकता वा प्रामाणिकता सिद्ध केने ऐछ। हिन्दीक लघुकथा विधा जे स्वयं मे आइयो मानक वा प्रामाणिक सिद्ध नै भ' पावि घड़ीक पेण्डूलम जकां डोलि रहल ऐछ।ओइ मे आइयो कते शब्दक वा कोन रचना ओइ विधाट रचना ऐछ की नै,तै पर मंथन चलिये रहल ऐछ।एते दशकक लेखनक पछातियो मूल्यांकन मे लघुकथाक जग्गह लघुकहानी सं जोइर व्याख्या होइछ।जतेक मुड़ी ततेक पीरी बला गप्प।एहेन अव्यवस्थित विषय/बौस्तक अंधानुकरण ,हास्यास्पद आ कि उठल्लूपन ? "अपने आँखिगर रहैत, अन्हरा के सहारे बाट ताकब कतेक उत्कीर्णा बला बात।" हिन्दी लघुकथा विधाक अंधानुकरणक प्रबल पक्ष रहल हएत,हमर सबहक सामान्य शिक्षाक हिन्दी माध्यम।हम सब एकेडमिक शिक्षा ग्रहण सामान्यतया हिन्दी भाषा माध्यमे केलहुँ।किताब,पत्र/पत्रिका क पाठनक भाषा हिन्दी रहलाक कारणे हिन्दी साहित्यक विषय-वस्तु पर निर्भर स्वाभाविक छल।तें हिन्दी साहित्यक संतान(विधा)कें पोसपूतक रूप मेअवैध रूपें अंगेज लेब अस्वाभाविक नै।ओही देखाँउसे वा नकल क'मैथिली मे लघुकथा संग्रह नामे 1972 मे आयल पहिल पोथी-" जे की ने से "--डॉ. हँसराजक।आ ,1975 मे तत्कालीन नवतुरिया कथाकार डॉ. अमरनाथक " क्षणिका "।दुनू पोथीक रचनाकार(आमुख मे)ऐ संग्रहक एको टा रचना ,कोनो पत्र/पत्रिका मे प्रकाशित नै हेबाट बात स्वीकारने छथि।ऐ सं इ स्प्ष्ट ऐछ जे मैथिली मे एकर कोनो अस्तित्व नै रहै।इ तहिया के घटना/बात छैक जहिया मैथिली सं इतर अन्य भाषा मे कथ्य/शिल्पें मजगूत मुदा आकारगत छोट रचनाक एकटा स्वतंत्र विधाकरूपें/नामे सृजन भ' रहल छलै।यथा-संस्कृत -लघ्वी,हिन्दी-लघुकथा,पंजाबी-मिन्नी कहाणी/कथावां,उर्दु-अफसांचे,ओड़िया-क्षुद्रकथा......आदि। मैथिली मे हिन्दी विधाक अंधानुकरण क शुभारंभ क' किछु मैथिली कथाकार स्वघोषित विद्वान हेबाक दंभ पोसलनि।तकर करीब पचीस बरख धरि अंधानुकरणित लेखन सेहो सुषुप्त वा शुन्य रहल।पुन: 1997 मे लघुकथा संग्रह नामे दू गोट पोथी,शिलालेख-तारानन्द वियोगी आ खण्ड-खण्ड जिनगी -प्रदीप बिहारीक आयल।से ताहि अवस्था मे जाहि सं दू वर्ष पहिने(1995 मे)मैथिलीक अपन एक मात्र विधा बीहनि कथा अवतरित भ' चूकल छल।ऐ विगत पचीस वर्षक नमहर अन्तराल मे अंधानुकरणित हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरण पर मैथिली मे कोनो मानकता तय नै भेल छल।(आइ एकैसम सदीक दोसर दशक धरि नै भेल)।जेना पहिने मिथिला मे सत्यनारायण भगवानक पूजन पर सुनता उपासक चलनि छल।तहिना मैथिली रचनाकार लघु कथा शब्द सुनि मात्र लघु कथा लिखबाक नकल करय लगलाह।जहन की हिन्दी मे लघु कथा शब्द मात्र नै,ओहि भाषाक एकटा स्वतंत्र विधा ऐछ।आ मैथिली मे कथा/गल्प नामे लिखाइत लघुकथा विधा पहिने सं विद्यमान छल।आब नकल क' लिखल जाइ बला रचना-जे बीस शब्द सं आठ सौ धरिक ऐछ।तखन प्रश्न उठैत जे कतेक लघु,ककरा सं लघु ?ऐ पर प्रकाशित कोनो तय मानकता नै छल(ऐछियो नै)जाहि सं इ सुनिश्चित कएल जए सकए जे कोन रचना लघुकथा विधान्तर्गत स्वीकार वा अस्वीकार कएल जा सकए।प्रसिद्ध कथाकार ओ इतिहासकार डॉ. मायानन्द मिश्र एकरा नकारैत लिखने छथि--" मैथिली मे लघुकथा नामे एक अन्य कथा लेखनक विकास भेल ऐछ जे समकालीन कथा/गल्प नै,अपितु चुटुक्काक निकट ऐछ।"--मैथिली कथाक विकास(संपादक- बासुकीनाथ झा)साहित्य अकादमी -2003 आधार हीन लेखने मठोमाठ हेबाक/कहेबाक परम्पराक निवहता मे किछु रचनाकार लीन रहलाह।जहन कि बेसुरा तान सं प्रसिद्धि पेनिहार गायक जकां बिना मानकताक लेखन मे लीन रहनिहार अपना के प्रयोगवादी आ प्रतिष्ठित बुझनिहारक रचना आ ओ तथाकथित विधा स्वय: खारिज ऐछ।ताहि लेल अदखोइ-वदखोइ आ माथा पच्चीक खगते कोन? हिन्दी विधाक मैथिली अवतरण लघुकथा नामक रचना आइ धरि बसात मे बौआइत ऐछ।जमीन पर अनबाक कहियो कोनो निश्तुकी प्रयास नै भेल।ओ तथाकथित विधा/रचना स्वत: खारिज होइत चेतना शुन्य भ' गेल।किएक त' जहन जमीन पर उतरबाक प्रयास केलक तहन आधारहीन हेबाक कारणे सूपक भाटा सन ओंघराइत रहल किएक त' स्थिरताक आधार पहिने सं नदारद!किछु स्वघोषित वा परपोषित विद्वान सब--" डाँरि पारि के ओकरा लक्ष्मण रेखा बुझ' लगलखिन,मुदा डाँरि सोझ भेल की वक्र तकरा सं दूर धरि सरोकार नै।"प्रसिद्ध रंगकर्मी श्री कुणाल ,कथा प्रसंग लिखल अपन आलेखक अन्तिम अनुच्छेद मे लिखै छथि--"आब मैथिली मे लघुकथा नामे किछु रचना सेहो देखाइछ,जे मैथिली साहित्य मे आधार हीन ऐछ।तें ओकर चर्च करब व्यर्थ सन।"--अंतिका-रजतजयन्ती अंक(2008)संपादक- अनलकान्त। लघुकथा नामित रचनाक भविष्य ? ''""""""""""""""""""""""''""""'''''''"''''''''"""""""'"'""' जेना अंग्रेज़ी मे पोएट्री,मैथिली मे " काव्य ' विधा ऐछ।आ ऐ काव्य विधान्तर्गत--गीत,कविता ,गजल,क्षणिका, हाइकु आदि स्वतंत्र नामे आ स्वतंत्र अस्तित्वे छैक।मुदा विधागत सब एकहि परिवार "काव्य "क अंग छै।तहिना अंग्रेजी क शॉर्ट स्टोरी विधा छै ,आ कथा/गल्प ओकर अंग। मैथिली मे लघुकथा सं इतर दोसर कथा विधा छै " बीहनि कथा "(Seed Story),हिन्दीक अंधानुकरणे लघुकथा नामे सृजित रचना बीहनि कथा विधान्तर्गत ग्राह्य ऐछ।परञ्च बीहनि कथाक तय मानकता पर ठाढ़ होइ बला रचना मात्र।से ओ लघु कथा नामे होइ वा बीहनि कथा नामे। बानगी स्वरूप देखल जए डॉ. सत्येन्द्र झा जीक लघुकथा नामे दू टा रचना- इसकूल-- ओहि गाम मे एकटा दोकान नै छलै।तीन किलोमीटर जाय पड़ै छलै छोटो छीन चीज किनबा लेल।जे कियो कहियो दोकान फोलबाक साहस केलक ओकरा दोकान मे दोसरे -तेसरे राति चोरि भ' जाय आ तकर बाद दोकान बन्न भ' जाय।चोरवा गामक नाम सं परोपट्टा मे जानल जाइत छल ओ गाम।मुदा नरेशक साहस कहू वा दु:साहस ओ बाहर सं आबि दोकान फोललक ओहि गाम मे।घर मे पिता आ पत्नी विरोध कयलनि मुदा ओ ककरो नै सुनलक।दोकानक स्टाफक रूप मे सभ सँ सेसर चोर के रखलक।ओ चोर सेहो निश्चिंत छल जे जखने बेशी समान जमा होयत कि चोराक सभ किछु ल' जायब।।नरेश तीन सए टाका ओहि चोरकेँ दै छल।शहर सँ समान अनबाक हेतु नरेश ओही चोरबाकेँ पठबै छल। क्रमशः चोरवा कोन समान मे कते लाभ होइत छल सेहो धरि बुझय लागल। आइ ओहि दोकान मे समान भरल छल।आजुके राति चोरबा अपन संगी सभहक संग चोरिक योजना बनौलक।जखन दोकान बन्नक' नरेश चलि गेल तँ चोरबा अपन संगी सभहक संग दोकान मे घुसल।बोरा मे समान सब कसय लागल।एकटा संगी पुछलकै -" कते दामक समान हाथ लागल ?" दोसर चोर कहलकै-"पांच हजार सँ कम के नै हेतै।" "मुदा एहि पांच हजार मे तँ मालिक के पांच सयसँ बेशीक फयदा नै हेतै।साढ़े चारि हजार तँ मूलधन छै।"--चोरबा बाजल---फेर ओहिमे हमरो तीन सय के हिस्सा हेतै।" चोरबाक म़ोन तीत भ' गेलै।ओ अपन मित्र चोर सभके बुझबय लागल--चोरि त' तखने जायज होइछ जखन हमर हक छीनि क्यो अपन घर भरय,मुदा नरेश बाबू तँ ओतबे कमाइ छथि जतेक उचित अछि।ओ नाजायज लाभ कहाँ लै छथि ?" चोरबा चोरि करबाक विचार बदलि लेने छल।संगी सभ ओकर निर्णय पर सहमति व्यक्त कयलक।बोरा खोलि चोरबा सभ सामान केँ पहिने जकाँ सैंतय लागल।नरेश एकटा कोन मे ठाढ़ भ' ई सभ देखैत रहल।ओकरा बचझना गेलै जे ओ कोनो दोकान नहि,एकटा इसकूल खोलने हो। विश्लेषण--उपरोक्त रचना शब्द संख्ये नमहर ऐछ!माने टेलब्राक निर्धारित शब्द संख्या-150 सँ उपर। कथ्य-प्रेरक,पंचतंत्रक कथा समकक्ष।प्रारम्भिक लेखनक करीब बाझल। शैली- कथा बला,सेहो पूर्ण नै।छेंट सन। तें बीहनिकथाक परिधि सं बाहर ऐछ। दोसर बानगी ---------------- मौअति """""""""" ओ ईमानदार छल।तेँ लोकसभ ओकरा मारय छल।लोकसभ कहलकै- तोरा कुकुरक मौअति मारबौ।ओ चुप्प छल,मुदा प्रसन्न।कारण- ओ मनुक्खक मौअति नहि मरय चाहैत छल। विश्लेषण-इ रचना निर्धारित शब्द संख्या मे बान्हल ऐछ। मुदा कथ्य - भाषण वा आदेशक हिस्सा मात्र। शैलीगत-निष्कर्ष पर पहुँचा देल गेल छैक। तें इहो बीहनिकथाक हद मे नै रहि रहल। उपरोक्त दुनू रचना--सत्येन्द्र कुमार झाक लघुकथा संग्रह-अहींकेँ कहै छी(2007)।पृष्ठ- 30/31 सँ उद्धृत। आब अही लेखकक इ तेसर कथा क बानगी नीचाँ ऐछ जे हुनकर नवका संग्रह-"जँ अहाँ सुनितहुँ"(2020) सँ ऐछ । भेटब डूबब """"""""""""" " अहाँक जीवन मे सभ सँ नीक की लगैत अछि ?" "अहाँके भेटब...." "आ अहू सँ नीक.....?" " हमरा हेरा जएब...?" उपरोक्त रचना लिखल त' गेल ऐछ लघुकथा नामे मुदा बीहनिकथाक मानकताक करीब ऐछ। यथा-निर्धारित शब्द संख्या(अधिकतम-150)क भीतर कथ्य आ शिल्पें गसल। निस्तार विहीन। तें इ रचना पूर्णत: बीहनि कथा विधाक अंग मानल जा सकैए।शेष निंघेस सदृश्य।ठीक ओहिना जेना कोनो एक कक्षा मे पढ़ैत सब विद्यार्थी परीक्षा समय समान प्रश्न हल करैछ।परिणाम मे न्यूनतम अंक 30% प्राप्ति बला विद्यार्थी मात्र सफल आ शेष असफल घोषित होइत ऐछ। आब एहने बानगी बीहनि कथा नामे लिखल रचना सँ.... डागदर साहेब-- मिथिलेश सिन्हा ------------------ ------------- ------ बड्ड दिन सँ पत्नी कहैत छलीह जे,हमरा पर किछु धियाने नै दैत छी।खाली मोबाइल मे खुटूर-पुटूर करैत कविता-कहानी रचैत रहैत छी.....जखन बेमारी बढ़त,पलंग पकड़ि लेब...तखन सबटा कविगिरि घुसरि जएत। एहेन धमकी पर के नहि डरतै यौ?पत्नी केँ होमियोपैथिक दवाई पर पूर्ण विश्वास छैन्ह।पिछला मंगल दिन शहरक बड्ड पुरान एगो बंगाली डागडर ठाम हुनका ल' गेलहुँ। सांझुक बेर,लगभग आठ-नौ गोट रोगी बैसल छलाह।डागदर साहेब बयस सँ लगभग अस्सी-पचासीक हेताह।एकटा रोगी पर आधा घंटा पूछताछ करैत,अपन डींग डांग सँ रोगी आओर परिजनकेँ अपन बड़प्पनक खिस्सा कहैत समय आगाँ खींचि रहल छलाह।हमर नम्बर दोसरे छल,मुदा घंटा भरि डागदर साहेब लागल रहलाह। अगल-बगल मे बैसल आन रोगी अकछय लागल।आब हमर नम्बर आएल। " किनको देखाना हाय ?" " जी,हमर पत्नी केँ...।" " हूँ,इधर आइए" " हम हरि बाबूक बालक थिकहुँ.." "ओहो,तुम इंजीनियर का बेटा है । ओ हमसे ही अपना इलाज कराता था..कैसा है ओ..?"--आन रोगी दीसन तकैत बजलाह। " जी,ओ मरि गेलाह..." " ओ गॉड...,तोमहारा माई कैसा है?" "जी,ओहो मरि गेलीह...।" हमर जवाब सुनि क' बेंच पर बैसल आन मरीज,बहन्ना बना ससरय लागल....।---डागडर साहेब,आश्चर्यचकित भाव सँ खन हमरा,खन रोगी सबकेँ ससरैत देखय लगलाह। विश्लेषण:- उपरोक्त रचना बीहनि कथाक मानक शब्द स. सँ बाहर ऐछ। कथा मे उप कथाक समावेश। कथ्य-शिल्पें कथाक छेंट सन लघु कथा। ----मिथिलांगन,अंक-38-39 निर्वहन--कल्पना झा "''''''"""''''''''''"""'"'''"""""""""" --माय गे! दादी त' हाथे सँ लपे लप तिल-चाउर परसै छलीह,मुदा तों त' चम्मच सँ परसै छें ? --धुर्र ! ताहि सँ की हेतैक ? --नहि हेतैक की...?हमरो सबकेँ नीक रस्ता भेटल। --से की ? --"इएह जे ' निर्वहन 'मे सेहो 'चम्मच ' लगाओल जा सकैछ। मिथिलांगन---36-37 विश्लेषण:- इ रचना कथ्य-शिल्प आ शब्द स.मादे पूर्ण मुदा कथा सारक संग बन्न भेल।माने निकस पर कसैत।तें इहो कथा विधागत झूस ऐछ। बेटा निगम। --घनश्याम घनेरो लावारिस लहास पुछलकै : -- बेटा! नगर निगम? -- हम तोहर बेटा नहि, कर्मचारी छी। -- हमरा लेखा तोहीं बेटा। -- ठिक्के! लोक केँ लोक सँ मतलब नहि रहलै तँ... -- पहिने हमरा घिसिएबह आ की कुकूर केँ? -- तोरा। -- पहिने हमरे किए? -- एत्तेक मनुक्खता अखन छैक, तैं! -- मनुक्खक लहास केँ बादमे आ कुकूर पहिने कहिया सँ घिसिएल जेतै? -- ई काज हमर अगिला पीढ़ी करत। घिसिया क' ठेलापर चढ़बैत काल लहासक आँखि कुकूर दिस छलैक। इ रचना ऐ विधाक सब मानकता यथा- निर्धारित शब्दक भीतर।फरीछएल कथ्य आ गसल शिल्प मे निस्तार रहित पूर्ण ऐछ! अन्तत:मैथिली साहित्यक दू भाग भेल -लघुकथा (SHORT STORY)आ बीहनि कथा ,(SEED STORY )इ दुनू निर्धारित रूपें निरन्तरता बनौने रहत।शेष फोंक मात्र। --"पहिने बीहनि कथा,सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ैत रहल। आ आब................पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ैत रहत। # मुन्ना जी # 1 असरा बेरहट लए किछु देलकै ? हँ ,बान्हि देलियै . हम जाइ हियै....., नै सुनलकै की ? सुनि गेली ,मुदा हमर मोन करै है जे आइ नै जेतै से नै हेतै ? आइ मासक अन्तिम तारीख हइ, जएह एक दिनक खोराकी के पाइ त' बढ़ि जेतै. ओना मोन त' हमरो आगू - पाछू करैहए. ई कहतै बलू त' रहि जेबै! सब दिन त' एकरा थाका हारी रहिते हइ, आ घर अबै हइ त' बाले बच्चे सोहरल. हमरा लेल एकरा पलखति कहाँ रहै हइ. ईह.....! हम की भरि दिन खटै हियै अपने पेट खातिर! हे , पेट त' सबहक कोनहुना भरिए जाइ है. ई खाली, पेटे के सोचैत दिन, मास, बरख बितबैत रहओ. हम एकर पलखतिक असरे तकैत रहि जाइ हियै. आ एकरा लेल धानि सन! एह.....! हमहू त' कहिया स' उहे बाट तकैत रहियै. हे , एने आउ ने...... केवाड़क विलइया ठक सँ उठल ! 2 संगबे अगिनवाणक फोँका जकाँ बड़बड़ा उठल रहै नेहक लावा. कुलीन रहबाक कारणे नै कोइ बजै, आ नहिये कोइ रोकि पौलकै. दिन...… 3 टेट्टर. ----- -- ऐं ,कुकूर के एतेक सेवा ? -- लिस्बियन छै . -- सासु कोना छथि ? -- छोड़ू ! -- हुनकर चर्चो अनसोहाँत ! -- कुकुरो सँ बेकार बुझू ! -- जेटका बेटा कए सालक ऐछ ? -- बीस पुर भ' गेलै . -- जल्दीये स्थान भेटत. -- कोन ? -- साउसक 28-गणतंत्र ------ ,मालिक, गोर लगै छीयैन! के ? हम,हीरवा कनिञा।भरि जुआनी खटि ,हिनका पुजिगर बनेलियैन आ आइ अन्चिन्हार ? पछिला मास जे अहाँ गीदड़भभकी द' गेलहुँ--जे हमर एक-एक टा कैञ्चा (टाका) हिंसाब क' दौथ। अशोकबा कहैए-घर बैस के खो। तहिये सँ अहाँ हमरा आँखि सँ ओझल भेल बुझू। माञिन्जन ठेंगा उठा बाट ध' लेलनि....ठमकति!अच्छा दुरा पर एलौं त' खगतो कहिये दियय। अशोकबा बाप बेमार हय,दवाइ आ खेनाइ,दुनू घर में घटल है।किछो मदति क' दौथ, अशोकबा के 10 तारीख के अबैया हय,,सबटा पाइ सधा देबैन। हमरा ल'ग किछो नै हए,हम… 43-अदौ सँ... --हमरा बेर पर अहाँ सब कें अहिना लेसि दैए।इ बुझियौ ने जे इ एकटा पुरस्कार मात्र नै,हमर बौद्धिक संपति छी।खाली लिखि के नै , अर्जित संपूर्ण धनराशि छोड़ि क' महानता थोपेलौं ऐछ। -- बाउ, तोंही टा लिखै छह की ?तोरा सँ अजोध लेखक सब एत' काहि कटै छथि।की हुनकर रचना निश्शन सन नै? --जकरा देखू तकरा गलथोथरइ, सेहो खाली सिरखारी पोथी पर। पोथी पर चर्चा कहियो नै। --रौ, आबो मूँह चुपकर !हमरा नै बूझल ऐछ जे तोरा कोना भेटलौए पुरस्कार ! -- हें..हें..हें। कक्का " डगरिन सँ कतौ पेट नुकेलैए ?" अहींक डेलवाहि क' त' सिखलौं जोगाड़।जहिना अहाँ पौलहुँ तहिना हम । -- ओह! " जाहि घरक पानिए विषान्हि हो ताहि घर साकट ताक'चललौं।" करोट यै कनिञा,सुनि के दुख हएत,मुदा कहिए देब उचित बुझै छी। कहौथ ने मां,हिनकर सबहक बात के दुख किएक हएत। बौआ लाजे नै कहैए,हम सब निर्णय केलौं जे ओकर दोसर विवाह करा दियै। इस सब जे निर्णय करथिन से उचिते हेतै।मुदा तकर प्रयोजन की ? वंश पसार लए। बाबू जी," दवाई आ जांच सं निश्तुकी भेल जे दोष हुनके मे छनि।कहौथ जे कएटा बेटीक जीवन गार्त करथिन त' मोन भरतैन ? कनिञा,हमरा माफ करैत अपन कपारक दोष बुझि संतोष करौथ। नै बाबू जी,से कोना हेतै ? की करब अहां ? हम दोसर विवाह करब! के करत अहां सं विवाह ? कोनो निसंतान मर्द!आ कन्यादान हिनके पल्ला! पछतावा -- नै रौ बौआ,सगरो समय बिगड़ल छै,एखन गाम सं नै जए देबौ। -- आंइ यौ बाबू -पहिल बेर गाम सं जाइ सं पहिने त' माय के फिरिसान केने रहियै।पढ़ि- लिखि गाम पर बैसल हमर माथ खएत की माटि हबकत ?" --अहू बेर अहींक जिद्द गाम अनलक,नै त' ओतौ कोनो… बीहनिकथा """"""""""""" रक्षा : मुन्ना जी ----------- ------------- --एक टा पोसुआ कुकुर अपन मीत सँ-- रौ, घर मे किए घोसिएल छें, निकल.देखही अनेरूआ कुकुर अपन हेंज मे घोसिए चाहैए ! -- ऐं...! एना नै होम' देबै, चल- चल तूँ बढ...! -- आ तोँ ? -- हम चिलका नुकेने अबै छी, अपना सब त' लड़ि खपि लेब, मुदा ओकर की हेतै ? बीहनिकथा """"""""""""""" विचरण ! : मुन्ना जी --------- ----------- -- अहा....हा ! यै,समुद्रक किछेर मे बैसि केहेन आनन्दक अनुभव होइए ! समुद्र मे रहि रहि उठैत लहरि आ समुद्रक किछेर मे स्वतंत्र भ' लोकक विचरण ! -- यौ, जेबै नै.....चलू ने ! --अहाँ बढू ने हम पाछाँ सँ अबै छी. " लोक सब विदेश सँ आबि एत' मनोरंजन करैए, स्वीमिंग शुट मे स्वतंत्र विचरण ! अहा की आनन्दक क्षण छै. " --ओ.....त' अहाँ समुद्रक नै, ओइ स्वीमशुट बाली सब के निहारि निहारि आनन्द उठबै छी, नै ? -- नै, नै, मोन मे उठल लहरिक वर्णन करै छलहुँ. -- समुद्र मे जा देहक लहरि सेरा ने लियय, नैत' घुरमा उठत. -- ओहू मे त' लहरिये छै ! -- यौ, समुद्रक लहरि निश्छल छैक, मुदा अहाँक......कामुक. ! चुनरी 'मुन्नाजी' आशा दीदी बस स्टॉप पर ठाढ़ि छलीह । हुनका बगलमे ठाढ़ पुरुख उचकि - उचकि क' देखनि जेना - शंका भेलनि तँ टोकि देलखिन : - अहाँ प्रतीक्षारत नहि मुदा किनको तकै छियै - नै ? - नहि - नहि ! ओहिना । - तकर माने अहाँ हमरामे हेरायल छी - नै ? - से नहि । मुदा एकटा चुनरी जँ अहाँक देह पर होइताय ..... - जखन लोकक नजरिए मे खोंट रहतै तँ झलफांफी चुनरी कोन काजक ? पुरुख हाथक समतोला छिटकि क' रोड पर गुड़कि गेलै । ओ आगू बढलाह ता मे बस समतोला पर चढ़ि गेल रहैक । मुक्ति ------- -- हे भगवान, अहाँक घर देर ऐछ अन्हेर नै ! आइ बुझलौं। -- की यौ, केसक निबटारा भ' गेल की ? -- नै ! -- कनिञा नै देखाइ छथि ? -- आइ हम दु सँ तीन भ' गेलौं . --आठम आश्चर्य , झूट्ठा नहितन ! -- कीए ? -- विआहक तीने मास भेल, आ कहै छी तेसर....! -- सत्ते कहै छी. -- कतौ सेटिंग छलनि की ? -- हँ। -- तहन खुशी ? --आइ ओकरे संग दोसर विआह क' लेलनि ! श्री राज कें समर्पित :- दरेग. ------- -- लहालोट भेल चिलका के कोरा मे लैत दादी माँ - ऐँ यै कनिञा, केहेन निर्दयी छी ? -- माँ , फैरेक्स बनेने अबै छी! -- किए ,अपन छाती लगा लैतीयै से नै ? -- माँ , अपन दुध पीएला सँ फीगर खराब भ' जएत ! बजरूओ दुध पर त' पलाइए जेतै ने ! -- धुर ....छी ! " अहाँ सँ नीक त' ओ निमुधन गए , जे अपनो बच्चा पालैए आ अहाँ सनक मायक चिलका सेहो। बीहनिकथा (Seed Story) ----------------------------------- रिपोर्ताज ------------- आई बारहवीं वर्गक परीक्षा परिणाम बहरेलै .चारू भ'र गहमा गहमी बढ़ि गेल छल.जत' सँ जे जनतब दिए सभ ठाम टॉपर मे धीये/ सुआसिन. पत्रकारक एक टा दल , खुशी मनबैत धीया सबहक समूह मे जा प्रश्न केलनि --" सब ठाम सँ जनतब भेटैए जे ऐ बेरक टॉपर बेटीये सब ऐछ ! अहाँ सबहक की प्रतिक्रिया ? " -- यौ, पढनिहार बेटा पढि- लिखि जोकरक हेबे करतै .नै पढ़निहारो लग बड्ड विकल्प छै, कियो जूस बेचतै, कियो रिक्सा - ठेला चलेतै , तीमन - तरकारी बेचतै, नै त' जेबीये कटतै. आ ताहू सँ मोन नै भरतै त' हमर सबहक पछोड़ ध' फिरिशान हेतै. -- पूत धन के त' लपेट देलियै आ धीया सब ? -एक गोट पत्रकार टीपलक. -- " धीया सब आब टॉप क' टॉप पद पर जा अपन जूति चलेतै ." परस्पर. ------------ -- हे यै ,ओम्हर द' नै जाउ.बेर उनहि गेलैए. -- की करथिन, एखन त' साँझे छै राति नै ने भेलैए ? की करतै नेतबा सब खिधान्से ने ? -- नै यै, उछन्नर करत ! -- कक्का , ओहो सब महिला दिवस मनेबाक योजना बना रहल ऐछ ! -- धुर बताहि ! महिला कल्याण की सोचत ओ सब सुथनी ! अपन जुआनीक कल्याणक रिहर्सल करैए ! -- " अहा ! मुँह केहेन लगै छै , जेना चाने हो...." " रौ चुप्प तों सब ! बेचारी विधवा अपन हुब्बा सँ धीया - पुताक पेट त' भरै छै . " -- हा..हा..हा ! नेता जी , धीया- पुताक पेट त' पछातिक गप्प , पहिने अपन देह- पेटक जुगत धरा नेने हएत ! -- हिनका कहलियैन- बाट बदलि लौथ , नै मानलनि ने.देखलखिन जनि जाति देखि कोना चौल करैए जेना ई संबंधीये रहथिन ! -- कक्का , हमरा सँ ओकर सबहक भलहिं कोनो संबंध नै होइ मुदा ओकर चालि सँ जरूर संबंध छै. -- ऐँ.....केहेन ? --ओकर बौह , पंचायत समितिक काजे बी.डी.ओ ल'ग आ बेटी , कॉलेज जाइ छै तहन दोसरो पुरूषक जीह एहिना लपलपाइत हेतै , नै ? -- ओह !ई कहिया धरि चलैत रहतै एना से नै जानि ! -- " जा धरि एहेन पुरूष सबहक आँखिक पानि सुखएल रहतै . " टकटकी बेरा बेरी लोकक जमा भेल भीड़क सोझाँ ठोहि पाड़ि क' कान' लागल छल ओ छओँड़ी. कियो किछु पुछय त' उतारा नै द' सभहक मुँह तकैत रहल.... भीड़ बढ़ैत जा रहल छल....मुदा सब मुकदर्शक बनल. शान्त भीड़ मे सँ आब शब्द बहरेलै " गै, ई कह तोहर नाम ठेकान की छौ ?" --- यौ छोड़ू, की करब नाम ठेकान बुझि ?. --- तोरा तोहर घर धरि पहुँचा देबौ. --- यौ, हमर नै कोनो घर वाँचल आछ ने कोनो ठेकाना, हम त' दंगा पीड़ित शिविर मे सँ भागि एत' एलौं ऐछ. --- किए भगलीही , अपन जान बचेबा लेल ? --- नै यौ, अपन संपति बचेबा लेल. ! --- आँय ! तहन तो अपन गाम - घर जो ने अपन संपैतक रक्षा करिहें. ---- गाम मे किछु आब कहाँ वाँचल ऐछ.जे किछु संपति शेष ऐछ ओ त' हमरे लग ऐछ.आ तकरे बचेबा खातिर त' गाम सँ भगलौं. " कत्तौ कियो रक्षक नै देखएल. !" --- के पुरूष राखत तोरा ? जे राखत ओहो बदनाम भ' जएत. हा....हा.......हा, ठठा के हँसैत......यौ , जँ पुरूष सबके बदनामीक सत्ते डर होइतै त' गाम सँ परदेश धरि हमर संपैतक नोच- नोची नै ने करितए. ? भीड़ उछहि गेल....! सुतिहार -- तों त' बड्ड सुतिहार लगै छह हौ , थम्ह' तोरा एकर सबहक मेट (Team Leader )बना दै छीय' ! -- माथ पर बज्जर खसएब की ? हम अपने पुश्तैनी काज के सुखितगर बुझै छी...! -- गामो मे सुतिहारी देखबै छलियै अहाँ मुदा पेट भूखले रहि जए. -- तें त' शहर धेलौं ! -- आब सुखीतगर छी ने ? -- सुख मरि गेल बुझू ! -- ऐँ...? -- गाम मे तंगी एहेन जे शहर एबाक सोचबा पर मासूल जोड़ब पसेना छोड़ा देने छल . आब त' सब मास मे हवाई जहाज से जा आइब सकै छी. -- मास पुरिते गाम चल जा ठेही उतारै छ' की ? -- नै साहेब, कैञ्चा पुरि गेल त' पलखति.....उड़ि गेल ! बीहनि कथा वैधव्यता जानि नहि, पुजारीक मोनमे की छन्हि - बिधवा रमाक प्रतिए ! ओकर उमेरे कतेक हेतै - अंदाजन बीस-एकैस साल । प्रतिदिन ओ अबैत अछि आ अपन मनोकामनाक प्रश्न मंदिरमे छोड़ि दैत अछि । रमेश केँ सदैव एहि बातक कचोट रहैछ जे रमा असमय घटल घटनाक बिपत्ति उघि रहलि छलि । हँ ! एक बरख कहिया ने पूरि गेल छलै ओ विकट समय । आब रमा हँसि केँ बजबामे सक्षम भेलि ताहिमे रमेशक योगदान छैक । मधुश्रावणी दिन ! मंदिरमे महिलाक जुटान - गर्द्धमिसान ! रमा हाथमे पूजाक थारीमे फल - फूल आ माला देखि पुजारी आगू अबैत रमा सँ आग्रह कयलनि - हाँ - हाँ ? रमा ! आइ सोहागिन सभक पाबनि छैक । मंदिरक शोभा स्थिर आ स्थायी रहैक - सहयोग करू, सिरिफ आइ घुरि जाउ । रमेश ई सुनतहि थारीमे राखल गेना फूलक माला उठा रमाक घेंटमे खसा देलकै आ बाजल - आब तँ मंदिरक कोनो व्यवस्था भंग नहि हयत ने ? पुजारी आर आगू बढलाह - बाबू ! अहाँ नव विधानक संरक्षण कयल निधोख पूजा करू कोखिन ---------- " हम अपन पेट पैंच लगएब,देह नै ने।" सब स्त्री-पुरूष पेट भरवा आ देह झंपवा खातिर देश-परदेश जा की ने करैए।हम त' घरे में रहि कोखि पोसब आ सुखक सपना पूर करब। श्रॉक्सी आ रॉड्रिग्स दंपति द्वारा देल गेल विज्ञापन -"एकटा स्वस्थ कोखिन स्त्री चाही,हमर गर्भधारण आ निवारणक लेल !" इ देखिते स्मिता मुग्ध भ' गेल छलि। आ ओइ दंपतिक संपर्क में आबि सुखक सपना देखए लागलि। स्मिता अहां किए उठेलौं एहेन डेग,लोक की कहत हमरा ,अहांकें ? देखै छीयै यशोदा बेन कें।विदेशी सब जहन ओकर घर आबि घुरै छै तहन लोक ओकरा अभच्छक संज्ञा दै छै।आब अहीं कहू जे इएह सुनबा लेल हम गाम छोड़ि सुरत धेलहुं? नै विशाल,अहां निचैन रहू,हम चिकित्सकीय विधि सं गर्भ राखब,अवैध संबंधे नै।सफल होइते भेटत एक लाख डॉलर, हम सब भ' जएब मालोमाल। "हम कोखि बेचब,देह नै।" विधान """"""""" तों किए एना धौना खसेने छें गै,जो ने झंडा ल' के ,सब धीया-पुता खुशी मनबै छै। कथी के खुशी यौ ? अझुके दिन देशक अपन विधान बनल रहै। उंह!भइया लेल हमरा लेल थोड़े न । इह!छौड़ी मुंह केना तुरूच्छ जकां केने ऐछ । गै मम्मी तों त' नहिये बाज,भइया के बड़का झंडा आ हमरा छोटकी सन। माने दुनू भाय- बहीन लेल अलग- अलग विधान ने ? गै बुच्ची,की भेलौ तहन सं एना किए घाठि फेनने छें ? यौ पप्पा,सांझ खन मम्मी के कहलियै- डोलकी ला दुध नेने अबै छी। कहलक- बताहि भेलें हें।मुनहारि सांझ के जुआन बेटी जेतै दोसरा टोल,भइया के कही अनतौ दुध। तमसा जुनि।स्त्री कखनो पुरूषक चांगुर सं नोछड़ा जाइए। " त' झंडा फहरा एहने परतंत्रताक जश्न मनाबी मए बनबाक हर्ष! ---------------------- ढ़ोल, हरमुनिया आ हाथ माइक नेने साड़ी ,समीज बालीक हंजेड़ अनचोके बुचकुन कक्काक आंगन में ढ़ूकि गेल। कनिञां घोघ तनैत,बुच्ची सम्हारैत,नुकबैत कोठरी ध' लेलनि।काकी छाती पिटैत-रौ दैब रौ दैब पोता- पोता रटलौं त' एलीह भगवती। तै पर सं हिजड़ाक झुण्ड।। क्षणहि मे सगरो टोल दलमलित!स्त्री गणक हेंज अंगना सं दुरा धरि सोहरि गेल छल।फरमाइस क' के गीत सुनै गेल। नाच-गानक बीच कक्का काकी के एक हजार थम्हबैत लियय किछु कपड़ा लत्ता जोड़ि विदा करू। यै मां इ लौथ एक हजार आओर मिला द' देथुन। गै मए गै मए,जेना बेटा जनमल होइ! मां,बेटा- बेटी नै,मए हेबाक सुख हर्षित केलक! हिजड़बाक मुखिया आओर पांच सए लगा घुरबैतकहलक-"मइयां,हे इ आशीष। " बेटीये से ने बेटा,बेटी सम्हारू त' जग चलतै।" भार उघैत """"""""""""" ऐं गै मम्मी तों इ की करै छें ? की करै छी हम रौ ? सुनै छी जे आंटी के मूइला पछाति तों अंकल के संग धेने रहै छें। मार पपिआहा के केहेन बात बजै छें रौ ! होस्टल में रहि हमरा गाम घरक गप्प सं कोन सरोकार।गाम एलौं त' सुनलौं गौंवा,टोलबैया सं। धुर जो,तोहर प्रेम हमर अमृत ऐछ। सत्ते गै,तहन हमर बात मानमे ? हं रौ किए ने! तों दोसर बिआह क' ले। # मुन्ना जी # निमुधन नै छी । """"""""""""""""""" चट...चट....चटाक!निकल, दूर भ' जो दुरा पर सं।हम सैनिकक अंग छी,कोठा वाली नै। यै,हम किछु दिन सं नवीनक घर मे नित नव लोकक अबैया सं फिरिशान छी।नवीन विआहि क' सीमा पर चल गेल मुदा बहुरिया सीमा नंघैत सन..! चुप्प करू,जहिया सं नवीन गेलैए,कनिञा के चौकठि सं बहरी देखलियैए।अपन परार एतै त' बैला देतै की ? उंह,सब दिन नवका मनसा सबहक जात अवरजात सं सती लगैए ने। जं अहीं मुहपुरूष छी त' दंडित करू ने ओहि मनसा सबके जे जबरदस्ती घर घुइस ओकरा प्रताड़ित करै छै।आ असगर घर में ओ निमुधन भेल छै। कनिञा एकटा छओंड़ाक नरेठी धेने दुर्गा रूप में चौकठि नांघि गेलि- 'आइ कोनो बाप नै बचेतौ।तोहर मुक्ति हमरे हाथे।' बेर पर """"""""" अमरी कक्का मोइस लैत बमकि उठलाह-- पोती भेल से त' खुशीक बात मुदा जनमिते सोहर सुनि अनकट्ठल लागल। अहां सब पुरषाक सब परंपरा ध्वस्त क' मान मर्दन करता पर वीर्त छी । कक्काक पीठ पर चालू भर सं,कलकतिया,बम्बइया,पटनिया भातिज सब लुधकल-- कक्का,बेटा विवाह में धोती-कुर्ता त्यागि शेरवानी धारण आ घोड़चढ़ी में से हो बमकल रहियै।मोन ऐछ ने। जाह,तों सब तुर्क बना के छोड़बह।-कक्का सरदिएलाह। हौ,कनिञा सेहो आधुनिकता मे लपटएल छथि,हुनका पुछियौन इ करते सोहनगर ?ओ त' कहती डी. जे शुरु करू। नै पप्पा,जहन हिनका विजातीय कनिञा इ कहि स्वीकार जे बेटा सर्वोपरि । " त' बेटीये सं ने बेटा!बेटी जन्म पर सोहर किए नै ? उपरौंज ---------- रे रोहित ,तोहर एडमिशन भेलौ ? हं शशांक,भ' गेल,आ किताब से हो कीना गेल। कोन स्कूल में लिखेलौ नाम ?-शशांक पूछलक सर्वोदय बाल विद्यालय मे।-रोहित बाजल। ऐं, सरकारी स्कूल मे।गेलौ तोहर पढ़ाई।किताब देखा तं ? रौ रोहितवा,सभटा त' उएह किताब छौ,जे हमर ऐछ।माने NCERTक रौ शशांक,हमर भइया सब किछु बुझल- गमल मे नाम ओत' लिखेलखिन्ह।भइया आ दीदी सेहो अही स्कूल में पढ़ने छथिन। पढ़िए के की सब नेहाल सनाथ केलखुन सेहो कह ने ? भइया ,सरकारी बैंक में कैशियर छथिन आ दीदी बी. टेक करै छै। हमरा कहलनि-"मोन लगा के पढ़,तोरा हम सब अपना सं उपर ल' जेबौ।" # मुन्ना जी # विहान -------- भइया,मालिक कत' छथिन ? की बात,कह ने ? पप्पा बिमार छथिन,आइ काज पर नै औता।बंकियौता पाई भेट जैतै त इलाज मे काज अबितै। ऐं !बस एतबे।अइ लेल मालिक आ तोहर बाबू किए।जखन मोन होउ हमरा लग अबिहें ,हम खोंइछा भरि देबौ। मार मुंहझौंसा के बिन देह डोलेने पाइ ! डा.साहेब,रोगी हम नै बाबू छथिन।हमर मुंह नै निंघारू हुनका देखियौन। ओ'..एत' काज लए शिक्षा नै,देह आगू कर' पड़ै छै। शहर सं शिक्षा पाबि समाज परिवर्तनक मुहिम मे सुनीता परोपट्टाक जन प्रतिनिधि भ' चमकल।मुदा अर्थाभाव में बी.डि.ओ के धौंस देखेनिहारि आइ बाट बदलैत- बी. डी.ओ साहेब,बान्ह खन्हियबै बला प्रोजेक्ट हमरा द' दियय। हें ...हें...हें!बड़का प्रोजेक्ट बड़का पाइक एवज में भेटै छै! आ देहक एवज मे ? टाइम पास ! दायित्व ---------- हे,इ सब राखि लियय,हम जाइ छी।आम,लीची,खम्हरूआ,सातु सब बेरा लियर दु दिन सं बन्न छल,अरूआ जएत। जा , एखने एलियै कत' जेबै ? गाम,अपन वास पर आओर कत' ,ओकर बाद त' स्वर्गे आओर कत' ? से नै,एखने एलियै दु दिनक ट्रेनक झमारल।लगले फेर....! हौ,तोरा सबकें एबा मे असोकर्ज छल',तों त' पराधीन छह,हम त' खुल्ला।तों सब हजार- बारह सए कोस पर रह' की चान पर।हम अपन बलही बोझ उघवा मे एखनो सक्षम छी। ठीक छै,सब कुशल रह'! बाबू जी,एकर सबहक खगताक फिरिस्त नमरिते रहै छै।पूर होइ बला नै। तोहर बोझक रखबार हम ? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विष्णु कान्त मिश्र चारि पत्र कालचक्र (कथा संग्रहसॅ) पहिल पत्र --------- उजियारपुर, २१.८.१९६० मन मोहिनी, शरदक चानजकाॅ चमकैत रहू । आइ पन्द्रह दिनसॅ अहाॅक कुशल नहि बूझि पानिसॅ बाहर माछजकाॅ छटपटाए रहल छी। बी० एड०कोर्सक अध्ययनमे मोन नहि लागि रहल अछि। रहि_रहि क' ध्यान अहींक पूर्णिमाक चान सदृश मुॅहपर जा 'क ' अटकि जाइत अछि। अहाॅक डोकासनक आॅखि ,तीसीवला नाक,धनुष सदृशभौंह, डरकसके स्पर्श करैत भादवक मेघसन केशपाश ,मालपूआसदृश गाल,पीपरक पातके पतनुकान करयवला ओष्ठ हमरा मानसपटल पर तेना ने अपन साम्राज्य स्थापित क ' लैत अछि जे रात्रि क ' औंघियो हेराए जाइत अछि। हे प्रयाण प्रिये! मधुश्रावणीमे हम अहाॅक गाम आएल रही।अहाॅ एकटा पायलट फरमाइश करने रही।हम उजियारपुर पहुचितहि बाबू के पोस्टकार्ड लीखि ट्रेनिंग कालेजक फूसि बजट देखाय पायलकलेल रुपैया मॅगाय लेलहुॅ। कोजागरा क अब किछुए दिन बाॅकी रहि गेल छैक । दस दिन पूर्वहि हम क्लास छोड़ि अहाॅक खातिर गाम आबि जाएब । हे मृग नयनी! अहाॅक बाबू बढ़ कसाई छथि ।ओ हमरा अहाॅक बीच बदला छथि। दस तारीख क' हम गाम आएब ।हम बुझैत छी जे ओ हमरा बजयबाकलेल ककरो नहि पठौताह। एकटा युक्तिबुझाय दैत छी। अहाॅ अपन बहिनपा पानजोड़ीके सिखाय अपना मायक माध्यमसॅ बाबूपर दबाब बनाएब । जखनहि केओ हमरा बजयबाकलेल अओताह कि धुरिआएले पैर हम हुनकहिसंग पहुंचिए जाएब । हे प्राणाधार!अहाॅ त' बुझिते छी जेअहांक बाबू पुरान विचारक लोक छथि।कहां सिनेमा देखबाक प्रसंग अपना अन्तर्देशीयपत्रमे लिखने रही।हम ओकरा लेल तैयार छी ।हॅ, बाबूसॅ चोराय क' जाय पड़ता।जयबाक कार्यक्रम हम अहांके बुझाया दैत छी।भिनसरवे रात्रि दूनूगोटे उठि क 'विदा भ' जाएब।घंटे कोस चलब तैयो दूं घंटामे राजनगर पहुचि जाएब।साढ़े पांच बजे ट्रेनसं पौने छह बजे मधुबनी उतरि रिक्शासॅ जाय कपिलेश्वर महादेवा दर्शन करब। पुनः मधुबनी आबि टेबुल-कुर्सीवला होटलमेभोजन क ' मैटिनी शो सिनेमा देखि लेब।सबा छ:बजे ट्रेनसॅ।विदा भ ' साढ़े आठ-पोने नौ बजे धरि गामपर छवि आएब।बाबू ल'ग मायपेटक दर्दके डाक्टरसॅ देखयबाक बहाना बनाया लेथिन्ह। हे चन्द्र मुखी! हमर माय-बाबूजीमाघमे सोझे बरखे द्विरागमन करयबाक निर्णय ल' रहल छथि।अगहनमे हमरो परीक्षा सम्पन्न भ' जाएत।भगवती के किछु कबुला क' दिओन्ह जे कोनो हाई स्कूलमे झट द' हमरानोकरी भ' जाय ।फेरि दूनूगोटे बाहरे रहब।अहाॅक बाबू महींंस रखने छथि, मुदा ओ एहन ने कंजूस छथि जे एको चूरुक दूध अहाॅलेल नहि राखि सभटा बेचि लैत छथि ।अहाॅक सगर देहमे हड्डियेटा बाॅचल अछि । मायके कहबनि जे थैरिसॅजखनहि बाबू महींस दूहि क ' लाबथि त' ओ एक गिलास दूध अहाॅकलेल चोरा क' राखि लेतीह।एखन जॅ देह नहि फौदाएत त ' कहिया?हॅ, एकटा गप बिसरि गेल छलहु , नढ़िया टोलक खखरू बाबू वैद्य ल' ग पानजोरीके संग ल' छवि जाएब आ च्यवनप्राश कीनि आनब।पानजोड़ीसॅ कैंचा पैंच ल' लेब ।हम अबैत छी त ' सधाय देबनि ।एक गिलास दूधमे एक चम्मच च्यवनप्राश घोरि क ' प्रतिदिन पीबिलेल करब। रातिके बारह बाजि रहल छै।नींद त' हमरा नहिए हैत । एहि करोटसॅ ओहि करोट ओंघराइत रहब। तखन त ' --- ' एहि आशा अटक्यो रहत, अलि गुलाब के फ़ूल। अइहैंफेर बसन्त ऋतु, इन डारन ओ फूल ।। ।। इति ।। अहाॅक पिआसल अहींक भ्रमर --- देवनाथ दोसर पत्र ------------ हाई स्कूल, सहरसा 3/12/1970 प्रिये, शुभाशीर्वाद। हम एतय सकुशल छी। अहाँ क लिखल अंतर्देशीय पत्र एखनहि डाकपिउन हस्तगत करौलक अछि। पत्र पढ़ि सभ समाचार सॅ अवगत भेलहुँ। काशीनाथ के सर्दी भ' गेल छैक। ओकरा वैद्य जीसँ सितोपलादि चूर्णआनि देल करियौक। जड़कालाक समयछैक। अपनहु ठंडा सॅबचल रहब। दुन् माय-बेटा अठकपारिसॅ गायक दूध उठौना ल' पीब। हॅ, खाली पेटमे अधिक लाभ करत। कतेक दिन सँ सोचैत छी जे फेमिलीक संग रहब। प्राण अहुरिया काटि रहल अछि। मुदा अपने जाएब नेपाल, कपार संगहि जाएत । पछिला कर्जसभ कने झाड़ि लैत छी त' निश्चिन्त भ' सभ केओ एत्तहि सहरसेमे रहब। अहाॅजे घूटर कप्रसंग लिखलहुँ अछि जे ओ सपरिवार संगहि रहैत छथि से ओ त' मातवर घरक छथि। अनकर देखाउस करब त' छओ मास व्यथे मरब। गर्मीक छुट्टीमे हम गाँव आएब त' सभकें एतहि नेने आएव। काशीनाथ के सेहो एही ठाम स्कूलमे एडमिशन कराय देबैक- उसराहा परक तेफसिला दसकठवा खेत कहियो मरहन्ना नहि जाएवला, ताहिमे तीन मन धान बॉँटिके देलक अछि। खेतक आरिपर जखनहि जायवला केओ नहि छैक त' एहिना हेतैक। बटाइदार सभसँ नार-पोआर जमा करबा लेब आ ओकरे सभकें कहबैक जे बेचाय देत। खेतक मालगुजारीकलेल अहाँ लिखलहुँ जे कर्मचरी तंग क' रहल अछि से की करबैक। फरवरी धरिक मोहलति ल' लिअ । फरवरी कदरमाहा भेटितहि हम मनीआर्डर क' देब। एखन हमरा एक सय चालीस रुपैया दरमाहा अछि। अपना बुतात जोगर राखि हम चारि महि दिन एक सय दस मनीआर्डर क' देलहुँ अछि । जाड़ काला आबि गेल छैक। फलानेनवला . एकटा ओढ़नी अपना लेल आ बौआक लेल एकटा भरिबहुआँ स्वेटर-टोपी अवश्य कीनि लेब। अकलुआ माय मुँहक जोर छैक। ओ सदिखन झगड़ाक बीह तकिते रहैत छैक। ओ 'एकटा राहरि, सभसैँ बाहरि' छैक । एकरा सॅ मुॅह नहि लगाएब । हम एतय ट्यूशन सेहो पछिला दू मासससॅप्रारम्भ क' लेने छी। ई रुपैया हम अहाँके नहि पठाय अपनहि एतय जमा क' रहल छी जाहिसॅ झगड़ू बाबूक मोट कर्जसॅ उद्धार भ ' सकी । अहाॅके बुझले अछि जे दू बरख पहिने काशी नाथक निमोनिया बीमारी मे हुनकासॅ सत्तरि टाका दू पाइ सूदिपर लेने छलियनि ।सूदि-मूरि जोड़ि क' बहुत रास भ' गेलैक ।माय -बाबूक श्राद्धक कर्ज सभ सधि गेल अछि ।दुनू माय-बेटा अपना स्वास्थ्य पर ध्यान राखि ठंडासॅ बचि क' रहब ।कलम आब बन्द करैत छी ।पत्रक जवाब घुरती डाकसॅ अवश्य देब। अहींक , ---देवनाथ तेसर पत्र -------- हाई स्कूल,सहरसा ३/ १२/ १९९० प्रिय काशीनाथक माय, शुभाशीष। अहाॅक पत्र काल्हि जखन एकटा पानक दोकानपर ठाढ़ रही त' डाकपिउन हस्तगत करौलक । हम मोटा-मोटी कुशल छी ।पत्र पढ़िसभ समाचारसॅ अवगत भेलहु ।बेटा-पुतोहुक प्रसंगक सभ गप पढ़लहु ।की करबैक ?देह लगाए क' अंगेज' पड़ता।'अपन हारल आ बहुक मारल 'लोक बजितो नहि अछि ।बेंगाइक बेटा _पुतोहुक परतर जे अहाॅ तकैत छी से कोना होएत ।हम-अहाॅ ओहि जन्ममे दैवक घरमे आगि लगोने रहियैक ।सीता कुम्मरि एक पहर दिन उठलाक पश्चात सूति क' उठैत छथि। घर-आंगनक झाड़ू -बहारू , मनसा घर नीपब ,जारनि-काठी ओरिआएब,भानस-भात करब सभटा अहांके अपनहि करय पड़ैत अछि ।काशीयोनाथ बौकजकाॅ सभटा देखैत रहैत छथि ।की करबैक ?देह लगा क' मारू।बहिरा करैत बनि जाउ ।सगर पोखरिमे एकटा पोठी। हॅ, अहाँ लिखलहुँ जे काशी नाथ नी कुमरि के ल' जाय चाहैतछथि डेरा पर पटना। एहि लेल अहाँ कोना फसाद नहि करब। कनियाँके पटना सॅडेढ़ मास अएना भ' गेलनि। ओ मुर्गी जकाँ छटपटाइत होएतीह। जकरा जाहि बस्तुकएक बेरि चस्का लागि जाइत छैक, ओकरा छोड़ब पाथरपर दूध उगाएब जकाँ होइत छै। कतहु दुनू व्यक्तिबेकति रहथु, माँ भगवती सानन्दरखथुन। अहाँ कहते छी जे रात क' सपनो रूपेपएरो मे तेल नहि लगा देलनि। इहो नीके भेल। कमसँ कम एकर आदति त' नहि लागल। अहाँ कहैत छीजेसात दिनक छुट्टी ल' काशी नाथ गाम आयल छथि, मुदा खेत-पथार, कलम-गाछीदेखय नहि गएलाह। एतुका धन-सम्पतिसॅ हुनका कोनो मतलब नहि।की करबैक । हमरा-अहाँक परोक्ष भेला सन्ता एकर-सुख-दुःख ओ अपनहि बुझता । हम जनैत छी जे उदर विकार सँ अहाँ अस्वस्थ रहैत छी। लवण भास्कर चूर्ण आ त्रिफला चूर्णकसेवन नियमित रूप सॅ कएल करब । हम स हरसे ल' अनितहुँ, मुदा घरमे ताला बन्द क 'कोना आएब। चोरक हल्ला यदाकदाह होइत रहै छैक ।सुन्न घर-आंगन पाबिअन्न-पानि, सीता कुम्मरिक गहना-गुड़िया, पेटी-बाकस सभटा चोरबा सभ उठाके ल' जाएत। आब त' कोतवाल लोसभ रातिके पहरा देब छोड़ि देने छैक । रातिके जॅ कोनो जन-बोनिहारकें सुतबाको लेल कहबैक त' ' मारि करैत अछि ओकर दरमाहा । बौआ एतेक दिनसँ कमाइतो छथि, तथापि खगले रहैत छथि। जीवन भरि जे किछु कमाइ भेल ताहिसँ त' नाना प्रकारक भूरे सभकें मुनैतअएलहु।माय-बापक श्राद्ध ककर्ज, काशीनाथक मुंडन, उपनयन हुनक बी.ए. धरिक पढ़ाइक खर्च, पावनि-तिहार, दवाइ-वीरो आदिमे सभटा कमाइ चलि गेल। नोकरी कयलाकपश्चातो काशी नाथ कइएक बेरि हमरहिसँ टाका लेलनि अछि। हम-अहाँ एकटा ट्रान्जिस्टर किनबाक लेल सोचिते रहि गेल हुँ। नहि कीनि सकलहुँ। बौआ फूसि बाजि हमरासँ टाका मँगाय नोकरीक चारिए मासक पश्चात ट्रान्जिस्टर कीनि लेलनि। द्विरागमनक दुइएक मासक अभ्यन्तर कनियोके पटना ल' गेलाह। एहि बात सभहक चिन्ता नहि करब। चिन्ता चिता समान होइत छैक । स्वास्थ्य पर एहिसँ कुप्रभाव पड़त। दू वर्ष पश्चात हम रिटायर्ड भ' जाएब । अहाँके बुझले अछि जे हमरा सबके पेंशन नहि भेटैत छैक। अस्तु 'अनेर गायक राम रखवार' । पत्रक जवाब शीघ्र देव। क्रमश: काल्हि अहाॅक, -काशी नाथक बाबू चारिम पत्र ----------- मैनापट्टी, १७/४/२००१ चिरंजीवी काशी नाथ, शुभाशीर्वाद। एतय हमरा लोकनि नेपलिया रेल गाडी जकाॅ कुशल छी । डेढ़ माससॅ अहाँक समाचार नहि बूझि चिन्तित छी। पन्द्रह दिनसे अहाँक माय बीमार छयि ।ओ भनसा घर नी पीके निकलय लगलीह कि पएर पिछड़बाक कारणें चौकठि पर घड़ामसॅखसिपड़लीह। बेहोशी कारणे दाँती लागि गेलनि। लोक सभमुँह पर पानि छीटय लगलनि। केओ सरौता सॅदांत छोड़ाबय लगलनि त' गोटेक घंटाक प श्चातहोश मे अलीह। बादमे ढोढ़नबाबासँ दू सय रुपैया कर्ज ल' सरकारी अस्पताल ल' गेलियनि। डॉक्टर कहलक जे चोटक संग-संग ठेहुनक हड्डी टूटि गेल छनि। ढौआ-कौड़ीक अभाव में पुनः ढ़ोढ़न बाबाके सिमराहावाला पॅँचकठवा तेफसिला खेत भरना द 'चारि हजार टाका लेलहुँ। ठेहुन आ छाती दुनू ठाम बड़का पलस्तर क देने छनि। चौकीके थोड़ेक गोलमोल कटबाय आ ओकरा नीचाएकटा पैघ बर्तन राखिदेने छियैक।ओही मे सुतले-सुतले दीर्घशंका-लघुशंका करैतछथि। बाड़ीमे डबल खाधि कोड़ि देने छियैक। ओहीमे जाएके ओकरा खसायथोड़ेक माटिसँ झाँपि दैत छियैक। काँच-पाकल भोजन स्वयं बनाय लैत छी। हमरो स्वास्थ्य स्थिति नीक नहि अछि। डॉक्टर टी.बी. कायम कएलक अछि। अंग्रेजी दवाइ बड़ महग होएबाक कारणे वैद्य सँ दवाइ भ' रहल अति। भोजन मे दू पटल करय पड़ैत अछि। अहाँ क मायकलेल भात आ अपना लेल रोटी। अहाँ हमरा लोकनिक कोनो चिन्ता नहि करब। हमसभ काँच घैल छी। काँच घैलके मुंगरक आस। सीता कुम्मरि आ हरिनाथ के शुभ आशीर्वाद । शुभकांक्षी, देवनाथ पुनश्च : बंगट कोनो काजसँ पटना गेल छलाह। काल्हि हमरा हुन कासॅ मेंट भेल । ओ कहलनि जे अहाँ लोकनिक सभ परिस्थितिसँ हम अहाँक बालक के अवगत कराय देलियनि । अहाँ लोकनिक कुशलक्षेम कहलनि।अहाँ ताजमहल देखबाक लेल सपरिवार आठम दिन आगरा जाय रहल छी ई खबरि सुनि मन प्रसन्न भेल। हमरा लोकनिके त' आब 'औषधं जाह्नवी तोयं, वैद्यो नारायणः हरिः। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डॉ. चित्रलेखा मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव :: एहि ‘मिथिला’ नामकरणक पाछॉं सेहो एकटा इतिहास रहल अछि जकर आधार पूर्णरूपेँण धार्मिक यज्ञ- अनुष्ठानक अछि जे एहि प्रकारेँ अछि- “भारतमे ‘सूर्य’ नामक एकटा सूर्यवंशीय क्षत्रीय राजाक राज्य छल। ई वंश सम्पूर्ण आर्यावर्तमे विख्यात छल। एही वंशमे राम, कृष्ण आ बुद्ध सदृश्य महान लोकक जन्म भेल। सूर्यवंशीय ज्ञान पुरुष सूर्यक पुत्र ‘मनु’ भेलाह। ‘मनु’ महा मेधावी पुरुष छलाह। प्रत्येक मन्वन्तरमे अलग-अलग मनु भेल छथि। ओ ‘मनुस्मृति’ सन महान ग्रन्थक निर्माण कएलनि। ‘मनु’क पुत्र ‘इक्ष्वाकु’ अयोध्याक राजा भेलाह। ‘इक्ष्वाकु’क ज्येष्ठ पुत्र ‘विकुक्षि’ अपन पिताक उत्तराधिकारी भऽ कऽ अयोध्याक राजा भेलाह। ‘निमि’क वंशमे एक सएसँ अधिक व्यक्ति मिथिलाक राजा भेलाह आ हुनका लोकनिक उपाधि ‘जनक’ छल। ‘इक्ष्वाकु’क ज्येष्ठ पुत्र ‘विकुक्षि’ राजा छलाह आ छोट भाए ‘निमि’ अत्यन्त कुशाग्रबुद्धिक एवं दूरदर्शी पुरुष छलाह। ओ मने मन सोचलन्हि जे जीवन तँ क्षणभंगुर आ मृत्यु सनातन सत्य अछि, जे व्यक्ति राजा-रंक-फकीर एहि संसारमे आओत ओकर जाएब निश्चित छैक तथा ‘कीत्तिर्यस्य स: जीवति’क सिद्धान्तकेँ मनमे स्थिर कए दृढ़ संकल्प लेलन्हि जे हम एहन कीर्त्ति करब जाहिसँ हम सार्वभौम बनि जाएब। मनमे दृढ़ निश्चयक ओ अपन कुलगुरु ऋषि वशिष्ठसँ निवेदन कएलन्हि जे- ‘हमरा एहने यज्ञ करा दिअ जाहिसँ हमहूँ ‘ईश्वरक सदृश्य सर्वत्र विराजमान रही’। कुलगुरुक वशिष्ठ निमिसँ कहलन्हि जे- हम पूर्वहिमे देवराज इन्द्रकेँ यज्ञ कराएब स्वीकार कऽ लेने छी। इन्द्रक यज्ञ समाप्तिक उपरान्त हम अहॉंकेँ यज्ञ करा देब। एहिपर ‘निमि’ मौन धारण कऽ लेलन्हि। कुलगुरु वशिष्ठ ‘निमि’क मौन स्वीकृति लक्षणम्’ बुझि कऽ इन्द्रक यज्ञानुष्ठानक हेतु प्रस्थान कऽ देलन्हि। ‘निमि’ सोचलन्हि जे जीवन क्षणभंगुर आ मृत्यु तँ सनातन सत्य अछि, पता नहि कखन की भऽ जाए। ‘निमि’केँ यज्ञानुष्ठानक तीव्र लालसा हुनका व्याकुल कऽ देलकन्हि ओ ‘शुभस्थ शीघ्रम् ‘अर्थात् शुभकार्यमे विलम्ब नहि करबाक चाही कारण- “आदानस्य प्रदानस्य कर्त्तव्यस्य चकर्मण। क्षिणमक्रियमानस्य काल: पिबति तद् रसम्।।” एहि उत्कट इच्छाकेँ शीघ्र पूर्ण करबाक हेतु व्याकुल ‘निमि’अयोध्यासँ पूर्व दिशामे चलि पड़लाह आ चलैत-चलैत ओ मिथिला आबि गेलाह। मिथिलामे महर्षि गौतमक आश्रम छल। प्राचीन कालमे मिथिलाक भू-भागकेँ गौतमक ‘तवोबन’कहल जाइत छल। बादमे एकर ‘मिथिला’नामकरण एक अनुश्ठानक कारण पड़ल। ‘निमि’महर्षि गौतमक तप आओर तेजसँ अत्यधिक प्रभावित ओ आकर्षित भए गौतमक आश्रमपर यज्ञानुष्ठानक अपन लालसा प्रकट कऽ महर्षि गौतमसँ यज्ञ करा देबाक प्रार्थना कएलन्हि ताकि ओहि यज्ञक फलसँ ओ (निमि) सर्वत्र व्याप्त भऽ जाथि। महर्षि गौतम ‘निमि’क उत्कट इच्छाकेँ शान्त कए यज्ञ करा देबाक आश्वासन देलन्हि। महर्षि गौतम यज्ञार्थ- याज्ञवल्क्य, भृगु, वामदेव, उशित, कण्व, अगस्त्य्, भारद्वाज, वाल्मिकि आदि जितेन्द्रिय ऋषि लोकनिकेँ आहूत कऽ निश्चित समयपर यज्ञ प्रारम्भ कऽ देलन्हि। ‘वृहद विष्णु पुराण’क मिथिला महात्म्यमे एकर वर्णन उपलब्ध होइछ। एहि जितेन्द्रिय ऋषि लोकनिक द्वारा ‘निमि’क दीर्घकालीन यज्ञानुष्ठान संकल्पित भए ओहि यज्ञक श्री गणेश भऽ गेल। यज्ञक पूर्णाहुति होएबासँ पूर्वहि इन्द्रक यज्ञ समाप्त कऽ कऽ कुलगुरु जगद्रवंद्य ऋषि वशिष्ठ अयोध्या लौटलाह। ऋषि वशिष्ठकेँ जखन एहि बातक जानकारी भेलन्हि जे ‘निमि’ हुनक (कुलगुरुक) बिना प्रतीक्षा कएलनहि दोसर ऋषि लोकनिक सहयोगसँ यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ कऽ देलन्हि। एहि अवज्ञाक कारण ओ क्रोधित भऽ निमिक यज्ञस्थ्ज्ञलपर अएलाह तथा कुलगुरुपर विश्वास नहि करबाक हेतु ओ (कुलगुरु) ‘निमि’केँ दण्डस्वरूप विदेह भऽ जएबाक शाप दऽ देलन्हि। एमहर संकल्पित यज्ञ समाप्तो नहि भेल छल कि ‘निमि’ प्राणहीन भऽ गेलाह। आब उपर्युक्त सभ ऋषि लोकनिक हेतु एकटा विचित्र समस्या ठाढ़ भऽ गेल। किन्तु ‘अध्वर्यु’ (ऋत्विक) बनल ऋषि गौतम सभ ऋषि लोकनिसँ आग्रह कएलन्हि जे हम सभ अपन-अपन तपबलसँ एहि प्राणहीन ‘निमि’क शरीरक मंथन करी। मंत्रोच्चार एवं ऋषि तपबलक कारण मंथनसँ एक भव्य राजकुमार बालकक आविर्भाव भेल। मंथनसँ उत्पन्न होएबाक कारणें ओहि राजकुमारक नाम ‘मिथि’ पड़ल। तथा ऋषि लोकनि ओही ‘मिथि’सँ शेष यज्ञक कार्य पूर्ण कएलन्हि। मंथनसँ आविर्भूत ‘मिथि’क द्वारा बसाओल गेल नगर ‘मिथिला’ नामे प्रसिद्ध भेल। सम्पूर्ण संसारमे अनादिकालहिसँ मिथिले एकटा एहन पावन प्रदेश अछि, जाहिठामक सांस्कृतिक महत्ता एवं विद्वता अतुलनीय अछि। वेद-वेदान्त, पुराण, उपनिषद्, धर्मशास्त्र आ तंत्र-मंत्र विद्या एवं संसारक मानव चिन्तनक इतिहासमे ई अपन महत्वपूर्ण भूमिकाक लेल सुविख्यात अछि। मिथिलाक भूमि जनक, याज्ञवल्क्य, न्यायसूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक जनक कणाद, मीमांसाक प्रस्तोता जैमिनि तथा सांख्यदर्शनक संस्थापक कपिल आदिक जन्मभूमिसँ उर्वर रहल अछि। एतबे नहि छठम शताब्दी ओ तकर परवर्ती कालमे ई महान साहित्यिक एवं दार्शनिक क्रियाकलापक केन्द्र बनल रहल अछि। उद्योतकर मण्डन,वाचस्पति, उदयन, गंगेश, पक्षधर मिश्र प्रभृति विद्वान अपन प्रखर प्रतिभासँ मिथिलाकेँ विभिन्न युगमे परिभाषित कएलन्हि अछि जाहि कारणेँ ई भारतीय संस्कृतिक केन्द्र बनल रहल। मिथिलाक हेतु प्रयुक्त ‘विदेह’एवं ‘मिथिला’नामक उत्पत्तिकेँ विशुद्ध रूपेँ पौराणिक कहल जा सकैत अछि। राजा विदेध माधवक आगमनक पश्चाते एकर ‘मिथिला’नाम पड़ल। ई लोकनि सरस्वतीक तटपर निवास करैत छलाह। ‘शतपथ ब्राह्मण’क अनुसारेँ सदानीरा (गण्डकी) क तटपर आबि ई लोकनि अग्नि प्रज्वलित कए एहि भूमिक शोधन कएलन्हि। संगहि हिनका लोकनिक संग अनेक ब्राह्मण सभ आबि कऽ खेती-बारी प्रारम्भ कएलन्हि तथा यज्ञक माध्यमसँ अग्निकेँ संतृप्त कएल गेल। ओना तँ ई अन्वेषणक विषय थिक जे मिथिलाक उत्पत्ति कहिया भेल, मुदा प्राचीन ग्रन्थ सभक अध्ययन ओ अवलोकनोपरान्त एतबा तँ अवश्ये कहल जा सकैत अदि जे हिमालयक शृंखला एवं गंगाक बीचक स्थान (मध्य भू-भाग) मिथिलाक अन्तर्गत आबि जाइछ जे गंगा, ब्रह्मपुत्र आदि नदी-पहाड़क माटिकेँ आनि हिमालय आ गंगाक बीच जे एकटा समतल भू-भाग बनओलक सएह ‘मिथिला’थिक। पौराणिक वंशावलीक आधारपर कहल जा सकैत अछि जे ‘मनु’क पौत्र ‘निमि’एहि यज्ञ भूमिमे पदार्पण कएलन्हि आ मन्थनोपरान्त ‘मिथि’नामक कारणेँ ओ अपनहि नामपर ‘मिथिला’राज्यक स्थापना कएलन्हि। जखन नगरक निर्माण भेल तँ ओ ‘जनक’नामसँ प्रसिद्धि पओलन्हि। हिनक उत्पत्ति मन्थनक पश्चात् भेल छल तेँ हिनक नाम ‘मिथि’उपयुक्त मानल गेल। मिथिलाक उत्पत्तिक सम्बन्धमे पाणिनि कहने छथि- “मथ्यन्तेऽत्र रिपवो मिथिला नगरी :”अर्थात् जाहिठाम शत्रुक मर्दन कएल जाइछ से ‘मिथिला’थिक। ओना प्राचीन समयमे राजाक नामपर नगर बसएबाक परम्परा रहल अछि तेँ ई कहल जा सकैत अछि जे मिथिलाक सम्बन्ध राजा ‘मिथि’सँ अछि। भागवत् स्कन्ध अध्याय 133मे कहल गेल अछि- “जन्मना जनक सोऽभूद्र: वैदेहस्यतु विदेहज:। मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता।।” अर्थात् राजा ‘मिथि’क द्वारा जाहि नगरक निर्माण कराओल गेल सएह ‘मिथिला’नामसँ प्रसिद्ध भेल। मत्स्य पुराणक अनुसार ‘मिथिला’नामक एकटा तेजस्वी ऋषिक नामपर एहि नगरक ‘मिथिला’नाम पड़ल। डॉ. दिनेश कुमार झा अपन मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहासमे डॉ. मोती चन्द्रक कथनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि। हुनक कथन छन्हि जे- “जखन भारतमे एकटा मिश्रित संस्कृतिक विकास भऽ रहल छल तखने ‘तिरभुक्ति’ नाम लोक व्यवहारमे तिरोहित भऽ कऽ ‘तिरहुत (मिथिला) शब्दक निर्माण भेल।” एतबे नहि किछु भू-वैज्ञानिक लोकनिक ईहो मान्यता अछि जे तिरहुतक भू-भाग सभसँ पाछॉं आबि कऽ बनल अछि। कहल जाइछ जे एक लाख वर्ष पूर्व एहिठाम समुद्र छल जकर विस्तार हिमालय एवं विन्ध्यपर्वत मालाक मध्य अरबक खाड़ीसँ बंगालक खाड़ी धरि छल। हिमालयसँ नि:सृत नदी सभक संग प्रवाहित माटिक संचयसँ एहि मध्य भू-भाग तैयार भेल तेँ एतए पहाड़क कोनो नामो-निशान नहि अछि। एहिठाम नदी सभक अधिकता अछि आ एकरा तीरपर ‘मिथिला’ अवस्थित अछि तेँ एकर नाम ‘तिरभुक्ति’ वा ‘तिरहुत’ भऽ गेल। सम्पर्क- एसोसिएट प्रोफेसर मैथिली विभाग यू.भी.के. कॉलेज, कड़ामा- आलमनगर बी.एन.मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डॉ. अर्पणा पुष्कर काण्डक विशेषता कविवर लालदासक प्रशस्तिमे आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’कवि-नवतिकामे कहने छलाह- “रमा रहित रामक अयन नहि अशक्ति पुरुषत्व। लालदास रचि ‘रमेश्वरचरित’, बुझऔल तत्त्व।। ” आ दामोदर लाल ‘विशारद’लिखैत छथि- “लाल मधुप लखि लाल भव, किंशुक पर जनु मूल। वैदेही पद कमल मधु, सेव सकल सुख मूल।।”[1] रामायण रचनाक परम्परामे केओ एहन नहि होएत जे लालदासक नाम नहि जनैत हो वा रामायणक पद नहि सुनने हो। देवी कामाख्याक प्रेरणासँ महाशक्ति जाग्रत भूमिमे एकर लेखन ग्रन्थरत्नकेँ विशिष्ट अर्थवत्ता दैत अछि। फलत: रामेश्वर चरित मिथिला रामायणक रचनाक उद्देश्य अछि सीता-चरित्रक सर्वोत्तर्ष महालक्ष्मी, महासरस्वती आ महाकालीक समवेत रूपमे आदिशक्ति ध्वजोत्तोलन। महाकाली आ रणचण्डी दुर्गाक सीताक चरितक प्रतिष्ठापन ओज आ गर्वक प्रतीक नारी शक्तिक आह्वान। शक्ति-शक्तिमानक समरसेतुमे जीवनक चरितार्थ निहित अछि। बिनु शक्तिक योग ब्रह्मा, विष्णु महेश शव छथि, बुढ़ियाक फुसि थिकाह। एकर प्रतिपादन-सम्पादन रामायणक अन्तिम काण्ड पुष्पकरकाण्डसँ भए जाइत अछि। लालदासक सर्वश्रेष्ठ अवदान थिक जे नारीक अस्मिता-मनस्विता उद्वोधक अछि।[2] वीरांगनाक रूपमे सीताक अवतरण पुष्करकाण्डक भेँट थिक। सीताक चरित्रक सर्वातिशयता पुष्करकाण्डक अग्रणी भूमिका अछि। रामक रामत्व सीताक बिना शून्य अछि। सीता-परित्यागक मार्मिक अंशकेँ छोड़ब लालदासक बुद्धिमता थिक। रमेश्वर चरित मिथिला रामायण रामक लोक नायत्वमे सीताक असीम सामर्थ्य आकलित करैत अछि। वैष्वमतपर शाक्त मतक उत्कर्ष प्रदर्शित करैत अछि। एतय सभ किछु शक्तिक दृष्टिए देखल गेल अछि। सीता साक्षात योगमाया थिकीह जनिक भू-भागपर सृष्टिक जय ओ क्षय नचैत अछि।[3] मूल प्रकृति लक्ष्मी जनिक, सीता रूप प्रधान। तनिक नाम जपि पाबि नर, दुहु लोकक कल्याण।। पुष्करकाण्डमे देखाओल गेल अछि जे रामक पराक्रम ओ विजयक सभटा श्रेय सीताकेँ छलनि, राम तँ निमित्त मात्र छलाह। जहीिना महाभारतमे देखाओल गेल अछि जे अर्जुनक विजयक श्रेय कृष्णकेँ छलनि, कृष्ण विहीन होइते अर्जुनक सभटा शौर्य निष्प्रभ भए जाइत अछि। तहिना लालदास देखओलनि अछि जे सीताक सहाय्यसँ विहीन रहने सहस्त्रमुख रावणक सम्मुख प्रभावहीन भए गेल छलाह। हुनक समस्त सैन्य ओकर वयव्यस्त्रसँ उधिया गेल छल। मुदा सीताक हेतु ओकर बध करब कठिन नहि छल। पुष्करकाण्डक आरम्भमे रामक सिंहासनारोहणक पश्चात् एक दिन जखन ऋषि महर्षि लोकनि रामक अभिनन्दन करबाक क्रममे रामवण वधक प्रशंसा करैत छथि तँ सीताकेँ हँसी लागि जाइत छनि। ई देखि राम जखन जिज्ञासा करैत छथि तँ हुनका सीतासँ ज्ञात होइत छनि जे श्वेत द्वीपपर एखनहुँ सहस्त्रमुख रावण वर्त्तमान अछि। सीताक मुखसँ ई सन्दर्भ सुनि रामकेँ बड़ क्षोभ होइत छनि। तत्क्षण चारू भाई मिलि श्वेत द्वीप दिस प्रस्थान करैत छथि। मार्गमे वायुक तेहन प्रचण्ड प्रवाह बसि रहल छल जे ओकर झोंकमे चारू भाई उधियाइत-उधिआइत पुन: अवध फेका जाइत छथि। तदुपरान्त सीता हुनका लोकनिक संग पुष्पक विमानपर चढ़ि सैन्य सहित प्रस्थान करैत छथि। सीताक प्रभावसँ सभ केओ श्वेत द्वीप पहुँचैत छथि। युद्धमे राम सहित सभ सैन्य संज्ञाहीन भए जाइत छथि। वशिष्ठ मुनिक कहलाक पश्चात् सीताकेँ बड़ रोष होइत छनि तथा ओ अपन सामान्य स्वरूप त्यागि कालीक रूप धारण कए शत्रुक संहार करय लगैत छथि। थोड़बे कालमे सहस्त्रमुख रामवणकेँ वध कऽ दैत छथि मुदा हुनक उग्ररूप रामकथामे ‘सहस्त्र स्कन्ध रावणक वध-कथा उपलब्ध अछि। लालदास वैष्णव मतक प्रतिपादनक संगहि शाक्त सम्प्रदायक भावनाक अनुकूल वस्तु-विन्यास कयलनि अछि। भारतीय संस्कृतिक अनुरूप आदर्श पारिवारिक जीवन तथा भक्तिपक्षक अनुरूप आत्मनिवेदन ओ समर्पझा भावक रामयण वस्तु-विधान दृष्टिगोचर होइछ।■ सम्पर्क- बालूघाट, बॉंध रोड, मुजफ्फरपुर [1]आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ कविनवतिका, मैथिली मन्दिर, राजकुमारगंज, दरभंगा, 1984 [2]कर्णामृत (जुलाई-सितम्बर, स्मृति विशेषांक) 2000, कोलकाता [3]सम्पादक विजयनाथ ठाकुर ‘जयन्ती’, पृ.- 131, चेतना समिति, पटना, नवम्बर- 2004 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डॉ. अर्पणा रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे ‘कौशल्या’ कौशल्या एक आदर्श राजमहिषी तथा जननीक रूपमे चित्रित भेल छथि। कौशल्या हेतु राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नमे कोनोटा अन्तर नहि बुझल जाइछ। राम हुनके पुत्र थिक। ओ सौतिनि लोकनिकेँ छोट बहिनिक दृष्टियेँ देखैत छथि। हिनक सर्वप्रथम उल्लेख वाल्मीकि रामायणमे पुत्र-प्रेमक आकांक्षिणीक रूपमे भेटैत अछि। वाल्मीकिक परम्परामे रचित काव्य एवं नाटक सभमे कौशल्या सर्वत्र अग्र महिषीक रूपमे चित्रित छथि, मात्र आनन्द रामायणमे दशरथ एवं कौशल्याक विवाहक वर्णन विस्तारसँ भेल अछि। गुण भद्रकृत उत्तर-पुराणमे कौशल्याक मायक नाम सुवाला तथा पुष्पदत्त ‘पड़मचरित’ मे कौशल्याक दोसर नाम अपराजिता देल गेल अछि। राम कथामे अवतारक प्रभावक फलस्वरूप पुराणमे कश्यप आ अदितिकेँ दशरथ आ कौशल्याक रूपमे अवतारक वर्णन भेल अछि।[i] लालदास रामक वन गमनक समयमे कौशल्याक मातृ हृदयक सफल चित्रण कयलनि अछि- हम नहि विपिन जाय सतदेव। अहा अपयश जग मे बरुलेव।। नृपतिक हाथ देव वरु प्राण। त्यागव नहि अहँ सन सन्तान।। मुदा रामक वन गमनक उपरान्त भरतकेँ अयोध्या पहुँचलापर कौशल्याक मतृत्व ओ पत्नीत्वमे अत्यधिक संघर्षक स्थिति देखि पड़ैत अछि। रामक वन गमनक काल कौशल्याक मातृत्व उमड़ि पड़ैछ। कौशल्या मूर्छित खसलीह। शोकाकुल कानय लगलीह।। व्याकुल पीटथि हृदय कपार। कहथि कतय छथि प्राणाधार।। एक बेरि सुतमुख देथु देखाय। तखन प्राण तन रहिओ कि जाय।।[ii] राम वनसँ आपस नहि अयलाह से समाचार सुनि कौशल्या शोकाकुल भऽ उठैछ। कौशल्या सुनलनि परिणाम। फिरि नहि अयला वन सौं राम।। लगली पीटय हृदय कपार। हाय वत्स की कयल विचार। हमरा त्यागल ककर भरोस। मरब आइ करितहि आक्रोश।। हायबध दैलहु बड़ धन्ध। कयल देल हमर दुहू दृग अन्ध। अह बिनु हमर रहत नहि प्राण। लगयिछ ऑंगन भवन भयान।। स्त्रीधर्मक रक्षा करैत कौशल्या राजा दशरथसँ कहि उठैत छथि जे रामक वन गमनमे विधिक विधान अछि अपनेक कोन दोष नहि। कविक शब्दमे- अछि चिन्ता सौं चित्त अचयन। तैं कहलहु हम अनुचित वचन।। चलयित कहलनि राम बुझाय। किछु जनि कही पिता का माय।। हमर सिनेहो अनुचित बात। कहब तँ बड़ दु:ख पओता तात।। एहि प्रकारक कहि बारम्बार। वनगेला रघुनाथ उदार।। से सुत ममते गेलहुँ भुलाय। कहलहुँ पति रूषि वचन बजाय।। कयो नहि हमर सनि अछि अधलाहि। पतिकॉ कटु कहयित नहि आहि।। सुन प्रणेश अहूँक नहि दोष। कयल विधाता ई सभ रोष। एहि प्रकारेँ देखैत छी जे लालदास कौशल्याक पत्नीत्वक मर्यादाकेँ संरक्षित कयलनि अदि मुदा हुनक विविध उत्कट वचन नारीत्वक मर्यादायक अनुकूल बुझना जाइछ। राजा दशरथक मृत्युक पश्चात कौशल्याक कारूणिक दशा द्रवित भऽ उठैछ- ‘पति संग हमहु अनल समाय। रहब सुखी भल सुरपुर जाय।। सुनिसुनि कौशल्याक विलाप। सभजनकेँ बाढ़ल बड़ताप।। मनमे सभकेँ भेल सन्देह। हिना प्राण रहत नहि देह।। अर्ते कौशल्या कॉ दुखित ओहि देखल सकल समाज। अन्त:पुर लय जाय पुनि बोधल कति ऋषि राज।।[iii] नारी जीवनक पैघ उद्देश्य कुशलकरय वाली आ कुशल मानावय वाली जाधरि नारी सभक कुशल करब, कुशलक कामनाभावना नहि नहि राखत ताधरि ओ पूर्ण नहि कहा सकैत अछि। कौशल्या सातो गुण प्रधान नारी छलीह। मातृत्वक गम्भीरता, विश्वासक अडिगता, ममता तथा कुशल भावनापर कोना बाधा नहि आवय देलनि। जखन कैकई रामकेँ वन पठेवाक आदेश कौशल्या सुनलनि तँ मातृत्व आ कल्याणक भावनाक संघर्षमे हुनक अवस्थाक वर्णन गौस्वामीजी मात्र एक पांतिमे सुन्दर ढंगसँ कयलनि अछि- ‘सुनि प्रसंग रहि मूक जिमि वरनि नही जाई।’ कौशल्याक अवस्था गीताक साम्ययोगकेँ स्मरण करबैत अछि। कौशल्याक व्यापक रूपक दर्शनक प्रसंग मानसकार लिखैत छथि- “व्यापक ब्रह्मा निरंजन निर्गुन विगत विनोद। सो अज प्रेम भगति वस, कौशल्या को गोद।।”[iv] प्रभुक व्यापक रूपक दर्शन होइत अछि साधककेँ- “देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड। रोमरोम प्रतिलागे कोटि कोटि ब्रह्मांड।।”[v] एहि व्यापक रूपक दर्शन रामायणमे मात्र कौशल्याजीकेँ भेलनि। सम्पर्क- बालूघाट, बॉंध रोड, मुजफ्फरपुर [i]रामचरित मानस (अयोध्याकाण्ड) [ii]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (बालकाण्ड) [iii]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (सा.अ.) पृ.- 166 [iv]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (अयोध्याकाण्ड) [v]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (अरण्यकाण्ड) पृ.- 133 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७ (डाउनलोड लिंक) सम्पूर्ण पोथी विदेह आर्काइवमे पोथी डाउनलोड साइटमे फ्री डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह: मैथिली साहित्य आन्दोलन Videha: The Idea Factory VIDEHA ARCHIVE LINK:- http://videha.co.in/new_page_15.htm अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' २ टा गजल ३.२.मुन्ना जी-कविता- पथराइत डीह ३.३.अमरेश कुमार लाभ-तीनटा कविता आ दू टा गजल ३.४.डॉ आभा झा-अपन घेर ३.५.इरा मल्लिक- हम स्त्री छी 4.GAJENDRA THAKUR- Language editing by Astha Thakur A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE-ERA BEFORE AND AFTER- LITERARY SCENCE IN MAITHILI AFTER THE ARRIVAL OF JAGDISH PRASAD MANDAL जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' २ टा गजल (१)
धोती, जनउ, खराम बहुत अछि पुरस्कार बदलाम बहुत अछि
खुट्टापर त बरद एकहिटा जाबी और कराम बहुत अछि
रस्ता बदलि-बदलि क' देखल सभ रस्तापर जाम बहुत अछि
पूतना अछि बनल कोरोना भय चिन्ता सभ ठाम बहुत अछि
ईश्वर छथि संगहिमे सदिखन घुमबा खातिर धाम बहुत अछि
एखनो सोर करैए हमरा जामुन आम लताम बहुत अछि ( मात्रा क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दूटा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि । (२) अनके टेटर बैसल लोक गनैत रहल चालनि सभ दिन सूपक मू़ंह दुसैत रहल
आमक गाछीमे कोइली कुहुकैत रहल बगरा-बगरी आंगन आबि नचैत रहल
चारेपर कौआ सभ दिन कुचरैत रहल सूगा सदिखन सीताराम रटैत रहल
सीढी लोकक खातिर लोक बनैत रहल अहिना सभ दिन सभकें लोक ठकैत रहल
बांचल गाछक खातिर नेह-सिनेह कहां आमक खातिर बानर गाछ चढैत रहल
हल्ला भेलै लेकिन चोर धरैल कहां चौकीदारेकें सभ चोर कहैत रहल
कूकुर अहिना छाहो देखि भुकैत रहल हाथी अपने धुनिमे बाट चलैत रहल
सुरुज उगैत-डुबैत रहल सभ दिन अहिना कते अहिल्या रामक बाट तकैत रहल
(मात्रा क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दूटा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्ना जी-कविता- पथराइत डीह कविता.. पथराइत डीह .. रन्हबैया त' भेटि जाइछ पाइक बलें गाम गाम मे बाँटल पर्चा पर देने अपन फोन नम्बर सँ मोन पड़ैए भोज तिहार मे दसगर्दा तीमन डालना नै जानि कतेको बारी झारी सँ उपरा लेल जाइत छल कदीमा आ केरा आलूक संग मिज्झर करबा लेल खेबैया भ' गेल पहाड़ सन डालना बला भोज मे बीझो करिते जुमि जाइत छल सगरो टोलबैया आब हाक पर हाक नै सुनैए कियो कतेको बेर कनेक्ट होइत छी स्काइप आ मैसेन्जर पर वैश्वीकरण आ उदारीकरण सँ डालनाक जग्गह लेलक मिक्स भेज चिकन,मटन पुछि तय करै छथि नोतहारी खएबा लेल जएब की नै ! भोज भात मे आवश्यक साग भेटि जाइत छल बुढीमाइक डीह पर पछुआरक ओलती मे कोरल जाइत छल ओल आ खम्हाउर चटनी,तरुआक जग्गह लेलक पकौड़ा आब बुढीमाइ सब सेहो नन्हकिरबाक शरण मे छहरियेबाक ब्योंत तकैत गेलीह शहरिया डीहक हरियरी भेल गेल निपत्ता बाटक संग डीह सेहो पक्का भेल गेल वा रहि गेल परती पराँत कन्वेंट मे पढ़ि पढि सरवेन्ट हेबाक लिलसा मे धीया पुता, खएब त' दूर कहाँ सुनि पौलक गेन्हारी,ओल,खम्हाउर फलाहारक अल्हुआ,सुथनी नवतुरिया सब सुतितो उठितो तकैए- बर्गर,चाऊमिन आ फ्रेंचफ्राइ चारू पहर , एक फोन कॉल पर जुमि जाइए पिज्जा गामक थान तरहक अखाड़ा भ' गेल बज्जर जिम केर चलन रहरहाम भेने अखाड़ा सँ घुमि पीब' बला भैंसीक थ'न तरहक दूधक जग्गह लेलक गेटोरेड आ एन्डुरामास आबक मैञा,लोरी आ घुघुआ मेना कतिया लगा दै छथि पोगो आ डिस्कवरी किड्स चैनल माटि के त'र क' आँकड़ पाथर आ बालु सिमेन्टक अकारे डीह,बारी-झारी भेल जा रहल बज्जर बाबा,मइयाँक सेहो पथरएल गेलनि आँखि आ करेजा नन्हकिरबाक संग वैश्विक सुख सुविधा तकैत क' लैत छथि तुम्मा फेरी विद्युत शवदाह गृह सुनि जीविते भान होइ छनि देह मे पसाही लागल सन सेहन्ता जतबै छथि गमैये माटि पानिक नन्हकिरबा सेहो समयाभावक फेर मे परम्परा के उघवा सँ तकैए मुक्ति गामक बाट सँ घूरि मूनल अछिया सँ बीछल अस्थिक गंगा लाभकक करैए ब्योंत डीह रहि जाइए धराउख रेस्टुरेन्टक बुक कएल मेनू मे जतेक नोतहारी ततेक गाम गीनि ठाढे ठाढ पेट भरि पुरबै छथि भाँज नवका पीढीक धीया पुता बाबा सँ डैडीक व्यवहारक हस्तान्तरण के माटि छोडि निमाहि लेत यांत्रिक कम्पोजिशन आ डिस्काउन्ट ऑफर पर होम डिलेवरीक बलें गेन्हारी, कदीमा, केरा,ओल आ खम्हारुक खगता जएत विला तहन प्रकृतिक विऱूद्ध छोट छोट गमला मे भेटत गामो मे रंग विरंगा कैक्टस जे जीवन के भोगव त' दूर जे जीवन के छूबो सँ करत वंचित ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अमरेश कुमार लाभ तीनटा कविता आ दू टा गजल १ संतान ***** दाम्पत्य जीवन केँ मुस्कान होइछ संतान बियाहक बाद पहिल ख़ाब, पहिल अरमान होइछ संतान मायक कोख वा पिताक दोख के अड़चने जे रहि जाए छथि संतान सुख सँ वंचित नहि देखबन्हि हुनक मुँह पर मुस्कान किंचित संतान प्राप्ति लेल डाक्टर-बैद, कबुला-पाती तीरथ-धाम सब जुगत करए छथि आपन बूते पाबि संतान जुड़ाइ छन्हि छाती कोई कसर नहिछोडै जाए छथि पालै-पोसै मे संतानक जिनगी संवारै मे बिसरि जाए छथि आपन जिनगी नहिसूझै छन्हि किछु ता धरि जा धरि नहिस्थापित भ’ जाइछ संतान बढ़ियाँ सँ, खूब बढ़ियाँ सँ २ राग अलापने किछु नहि भेटत ************************* राग अलापने किछु नहि भेटत पाछाँ भागने किछु नहि भेटत जे मुठ्ठी ओ देखा रहल छथि ज्यों खूजत तँ किछु नहि भेटत l मिसरी सन मिठगर बाजै छथि जहर पसारै मे लागल छथि डाइगर बाँटि देने छथि सगरो रक्त-पिपासु बना रहल छथि l बड़ा चतुर छथि, मुठ्ठी बान्हने भ्रमित करथि, ज्यों बपौती राखने नहि सम्हरब तँ मुँह भरि खसब जहि दिस लेने जाए छथि हाँकने l ३ लागल छथि ********** गीता कुरान त’ नै पढ़िलथि धरम’क उद्धार मे लागल छथि जे गाम दिस तकितो नै छथि मिथिला के राज्य बनाबै छथि l ज्यों द्वार जाऊ त’ नै चिन्हता बड़का मानिजन कहलाबै छथि जे मर्म दीन केँ नै समझैथि गरीबी मेटबै मे लागाल छथि l जे लिख लोढ़ा लिख पाथर छथि शिक्षा केँ अलख जराबै छथि सब बड़का-बड़का अपराधी संसद केँ मान बढ़ाबै छथि l बड़का-बड़का डिगरी जिनका अफसर बड़का कहलाबै छथि मूरख चपाट नेता पाछाँ नेंगरी डोलबै मे लागल छथि l ४ गजल ******* केहन केहन जँ नहिटिकल की टिकब अहाँ कतबो चाहे नाक रगड़ि ली नहिजितब अहाँ मतदाता अछि कते अहाँ केर जाति के गनि गुथि केँ बड्ड ओतबे ने घिचब अहाँ अपराधी सब छँटल छँटल ठार भेल छथि हिनका सब सं अड़ारि मे की पड़ब अहाँ अरजल धन अछि कतेक आपन से थाहि ली डीहो डाबर बेचि टिकस कीनि सकब अहाँ जे छथि युवराज कुर्सी पर वैह बैसता झोरा ढोबति रहल सदा आ रहब अहाँ l ५ गजल ******* थामिलहुँ ज्यों हाथ तँ विसबास राखू एक दोसर लेल छी आभास राखू नहिरहै कोनो तरहक शक आ संदेह नहि पड़ए गाँठि भरिसक प्रयास राखू संग रहने टोनामेनी भइये जाइ छै नहिफनफनाउ आ नै खटास राखू खुलि के मोनक बात बतियाइ जाउ अनेरे नहिमोन मे किछु भरास राखू ओझराएल रहै छी काजे मे सदिखन खैर-खबर लेल तँ किछु अवकास राखू l - अमरेश कुमार लाभ, हरनीचक, अनीसाबाद, पटना –800002, Mob : 8873201735 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डॉ आभा झा अपन घेर जनता अछि बेहाल बाढ़ि मे, दंभ विकासक सभहक मुंह आइ बिमारी घर-घर पैसल किंतु चुनावक रचलहुं व्यूह। प्रकृतिक रोष सिमान -उपद्रव ,मृत्युक अछि पदचाप सगर एखनो नञि क्यो चेतल देखल, जतै जे भेटल,से हड़पल ।। सब तरहक व्यभिचार, कदाचारक अछि निष्ठुरता व्यापल प्रगतिक कथा हन्त! सपना, ओक्कर त' जड़िये कोकनल। एहनो विकट समय नेतागण आत्म प्रशंसा मे लागल किंतु जकर मत सं ताकतवर,सैह विवश निरूपाय बनल।। बुर्जुआ पक्षक प्रतिपक्षक खेलि रहल अछि निर्घृण खेल नञि ओक्कर प्रभुताक ह्रास हो, दुन्नू मे अछि अद्भुत मेल। चमकी मे शैशव मरैत छल,आइ वयस्को कालक ग्रास नञि ककरो क्यो देखबैया अछि,आइ प्रशासन केर नञि आश। दुर्बल आश्रयहीन श्रमिक संग शिक्षित सेहो राज्य तेजल यक्षप्रश्न वृत्तिक सुरसा सम अप्पन बड़का मुंह मुंह फोलल । अस्पताल जर्जर ,विद्या केर आलय अछि गुरुजन- विहीन किंतु न ककरो कोनो चिंता अपन घेर मे प्रभु बाझल। २२.०९.२०२० ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। इरा मल्लिक हम स्त्री छी *********** हम!!!! जखन थाकि जाएत छी घर गृहस्थीक दैनिक जिम्मेवारी मे आ ओझराएल रहय छी ओकर जाल कराल सँओ छोट पैघ जिम्मेदारीक ओहह!!!! ई अनवरत यात्रा! एकर आवश्यकता पूरा करैत करैत पलखैत नहिं भेटैत अछि प्राण सांस उखैर जायत अछि थसथसा जायत अछि देह थकमका जायत अछि डेग सूर्य किरण उगै सँओ सूर्य अस्त तक के हमर अनवरत चलैत गृहस्थी क यात्रा कोना पूरा भsजायत अछि किछु नहि बुझना जायत अछि। एको घड़ी अपन सुधि लै के पलखैत नहिं भेटैत अछि। बसंत के खनक वसुन्धरा के श्रृंगार प्रकृतिक मनोरम दृश्य प्रचंड रौद तामसे घोर अकाश धरती मे फाटैत दरारि सूखल चास बास चैत बैसाखक कहर साओन के झूला बरखाक बून्न उमरैत नदी प्रवाह उमगैत देहक धाह। पूस माघक जाड़ थरथराइत गात होलीके रंग परिवार के संग सब मौसम जीबैत छी अपन काज राज के बीच सब संग जीब लैत छी सुख दुख के रंग अपन खुशहाल गृहस्थी मे बाँटि लैत छी ओहि ब्यस्त दिनचर्याक बीच सुख आ खुशी। हम गृहिणी के गार्हस्थ्य धर्म एक साधना अछि एक-एक दिन के तपस्या सँओ सजैत अछि! बसैत अछि ई खुशहाल गृहस्थी । ज़िन्दगी मे आओर कोनो कामना शेष नहिं बचैत अछि! हम स्त्री के दुनिया के इएह सत्य थिक । प्रेम सँओ परिपूर्ण हृदयक उद्गार ममता मानवता सदाशयता परोपकार श्रद्धा संस्कार आत्मगौरव अर्पण! समर्पण! पूजा! पवित्री! सब अहि मे समाहित रहैत छैक आ ओहि मे समाहित होयत अछि हमर गौरवमयी नारित्व! एक संपूर्ण सृष्टि के आधार!!!! रचनाकार:-इरा मल्लिक, रिलायंस ग्रीन्स टाउनशिप जामनगर गुजरात। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। GAJENDRA THAKUR- Language editing by Astha Thakur ERA BEFORE AND AFTER — LITERARY SCENCE IN MAITHILI AFTER THE ARRIVAL OF JAGDISH PRASAD MANDAL जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी GAJENDRA THAKUR ERA BEFORE AND AFTER — LITERARY SCENCE IN MAITHILI AFTER THE ARRIVAL OF JAGDISH PRASAD MANDAL Issue No. 88 (November – December 2019) of Muse India at http://museindia.com/Home/PastIssue displays Maithili literature in a very poor light. Moreover, it wrongly claims to be a representative review of the entirety of Maithili Literature. In actuality it was a representation of the so-called “dried main-drain” of Maithili Literature, in line with the Sahitya Akademi, Delhi. It is expected that Muse India will correct itself by announcing an issue exclusively devoted to the parallel tradition of Maithili literature. —Editor T.K. Oommen writes in the Linguistic Diversity Chapter of Sociology’, 1988, page 291, National Law School of India University/Bar Council of India Trust: "...the Maithili region is found to be economically and culturally dominated by Brahmins and if a separate Maithili State is formed they may easily get entrenched as the political elite also. This may not be to the liking and advantage of several other castes, the traditionally entrenched or currently ascendant castes. Therefore, in all possibility the latter groups may oppose the formation of a separate Maithili state although they also belong to the Maithili speech community. This type of opposition adversely affects the development of several languages." Jagdish Prasad Mandal Amartya Sen wrote about the famine of Bengal (1942-43), talking about how lacs and lacs of people died in that famine (15 lacs as per estimates of the Famine Enquiry Commission), but that this didn’t include his loved ones. Likewise in 1967 there happened a great famine in Mithila. When Indira Gandhi (then the Prime Minister of India) visited the area, she was shown how the people from the Mushhar community survived simply by eating bisarh (roots of lotus and other plants). But this tragedy was written about only in 2009 by Sh. Jagdish Prasad Mandal, over forty years after it happened. And the reasons for that delay are obvious. In Maithili literature there is a lopsided tendency which has made its journey slanted and ugly. The ones writing for mainstream Maithili literature have had no firsthand experience of tragedies of this magnitude, and so they could never write on such subjects. The coming of Jagdish Prasad Mandal on the literary scene simultaneously started a renaissance and a reformation movement in Maithili literature. It commenced a shiny new era. He gets credit for correcting the dark and ugly course the literary scene had taken. He gets credit for filling the gap and correcting the lopsided course of Maithili literature, which was hitherto moving on a one-way road. Jagdish Prasad Mandal is an artist. He has the ability to convey the facts in such an amazing way that the reader is left in a trance. He has the ability to present the facts in a directional and purposeful manner. Armed with this ability he has defined the literature of the Maithili language so greatly that we could bifurcate its history into two eras: the era before Jagdish Prasad Mandal, and the era which comes after. His facts are collated from every section of society. They’re not place in his prose as ornaments. Instead, they flow naturally. It’s as if a high tide has shaken the coastlines of the so-called main-drain of Maithili literature, which dies completely but then regains its shape during the monsoon. His words never present a lament. His writing never shirks from its responsibilities. No matter what hardships they face, the characters never lose hope or blame their lack of resources; they never grow dismal and resolutely keep marching on. He has respect for the lifestyles and contributions of every strata of society, and that is very exceptional. This becomes effective because there is absolutely no mismatch between his words and his deeds; and this is because of the greatness of his personal and social life. What he thinks, he does, and that he writes. It makes his literature become truthful. The ups and downs of the lyrical voice of the Maithili language attracted even the great Yehudi Menuhin who, in a BBC programme, said it was one of the sweetest languages. He talked of how his entire body swung hearing this language. Jagdish Prasad Mandal uses the ups and downs of this lyrical/rhythmic language to show the affinity of mutual dependence with its society and culture. This will bring revolution not only in literature but also in the economic arena. Survey of some books written by Shri Jagdish Prasad Mandal SHAMBHUDAS Jagdish Prasad Mandal injects into the minds of the readers the deity Barham Baba. He shows that both the devotees as well as Barham Baba himself are quite cheerful. He shows the convergence of “Shambhua” (disrespectful calling) into “Shambhu” (respectful calling). And then he sees Shambhudas changing to Darbaridas. The crumbling institutions of Mithila and Shambhudas, turned to rubble, seem to be proof that the arts practiced in Mithila have been destroyed. But the main characters of his other short stories, like Bhaitak Lava or Bisarh, refused to crumble. So then why has Shambhudas become Darbaridas? Is it just a simple loss of power? Or is it a change in Jagdish Prasad Mandal, the writer, himself? Has he become tired, is he being defeated? Looking closer we find that Shambhudas is not in any way inferior to the heroes and heroines of Bhaitak Lava or Bisarh. Then why is Shambhudas losing? Shouldn’t he be winning? Why does the writer push him to defeat? After all he is the writer, he’s actually God as far as the characters are concerned, why he is letting the circumstances be such that Shambhudas finds himself in a losing position? Jagdish Prasad Mandal’s characters are not artificial ones. And that is why they don’t always win on every economic front. In the economic front work is done through hands, through labour. But culture (including literature) is very delicate handiwork. The characters of this story get entrenched in this handiwork. When Jagdish Prasad Mandal’s other characters had to fight on the economic front, they fought like anything, and they triumphed. But to serve the area of Art, Shambhudas had to migrate (unlike the characters of Bisarh). So Shambhudas had to become a courtesan, a court-artist. Economically it was thankless work. But doing this was the only way of true survival in these changing times, for it represented the survival of Art! But here also, in what may still be seen as defeat (for economically, it was), Shambhudas unfurled a flag of revolt. He decided not to marry. He decided to let go of the possibility of a family life. Shambhudas became Darbaridas not for his economic survival. Indeed, he certainly isn’t a utilitarian, but he had to make the compromise for the sake of the survival of his Art. His decision not to marry was repentance for this compromise. The parallel tradition will topple if Art become “Darbaridas”. If Shambhudas loses it will be a loss for Mithila. It’s not just Jagdish Prasad Mandal who will lose, it is the entirety of Mithila which will lose in his defeat. Will Mithila heed this warning of Shambhudas? BAJANTA-BUJHANTA It is a collection of seed stories. The title seed-story Bajanta-Bujhanta (trans. talking-understanding) is a story of a parrot, who is Bajanta-Bujhanta. In this collection of seed stories, there is more symbolism like these than in the writer’s other stories. In Chaukidari we see a labourer working even in the eight month of her pregnancy, by tying a rope around her waist and stomach. The story Pator he dedicates to the famous seed-story activist Manoj Kumar Karn (alias Munnaji), and to him he assigns a piece of symbolism too. “Like a dark room which has serpents all around, like that are we too”. This moves the seed-story further forward. And Samdahi says — “Oh, you have become the listener of the very language of the crow.” TAREGAN This book lacks complex plotlines or complicated symbols for the simple reason that it was written to instill good values in children. But here, the whole story is a symbol. When Subhas Chandra Bose’s father tells him that to sleep on the ground is not enough, it leaves a remarkable imprint on his mind. What this man did later on for India is known to all. In Satya Vidya Bhardwaj says that “Knowledge is bigger than heaven.” This collection is not only of importance in children’s literature. It expands the horizons of seed stories too. GEETANJALI Chalu Uchitpur poem features a place called Uchitpur, where everyone has the exact same body language and the exact same clothing. In this land there is no difference between fire and water. The “new moonlike full moon” tells us many things about the deformed “bedhab roop”. Yaar Yau is a song of tragedy. It describes everything that has been washed away in a flood, including the washing away of the spirit and of the sense of existence. He dedicates the song to Sh. Rajnandan Lal Das’s ‘Yug-Yug’, where he has described how all door closes when one is entrapped in a spiderweb. This entire collection of song is dedicated to Professor Udaya Narayana Singh ‘Nachiketa’. All the songs in this collection are lyrical. RAIT-DIN Baba did not understand the mischief of the barren trees. He tilled and ploughed and planted the trees. But then those trees became the abode of dead souls. They did not touch the soil, reaching the sky by holding the top. Halluk Kaaj (trans. easy work) details the technicalities of labour-tools which make the work easy. It is an experience of satisfaction that the artists get after the completion of work. How a world full of empathy is created, it describes that too. Whether it’s in Patta Chhimee’s syrupy mental level or in “the huge-lad is condemned”, the writer brings new and distinct typical Maithili verse. It makes Rait-Din distinct. INDRADHANUSHI AAKASH We listen as someone sings Nachari (Maithili songs about Lord Shiva Songs) while fully swinging his voice and body. The spirituals and supernaturals have found their places. One is assembling (or creating) and the other is disassembling. The change is a mere game. The poet is very careful in his selection of words and subjects. Mystery, disappointment, answers, along with questions and hope, all keep coming and going. TEEN JETH EGARHAM MAAGH In Ghare-Ghare every household is lit up by a diya, but the whole village is in darkness. In Kaushal-Jakhain we are told why the land turned barren and how the dark village ended up in its sorry state. In Aas Prem Sang, hope returns to the village. SARITA Here, Jagdish Prasad Mandal’s verse keeps raising questions. It keeps on questioning. His poetry shows a painful awareness of facts and constantly brings up questions, even in its conclusion. If you compare his poetry with his prose, you will find much more pessimism in it, unlike his hope-filled prose. The short length of poems does not give him time to analyse the questions, to find the answers. So he keeps on raising questions and only questions, poking at the readers to look for the solutions themselves. This type of verse is an intriguing first for Maithili literature. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना RAMDEO JHA रामदेव झा- सव्यसाची (अभिनन्दन ग्रन्थ) RAMDEO JHA मैथिली लोकसाहित्य: स्वरूप ओ सौन्दर्य- डॊ. रामदेव झा RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा RAMDEO JHA उमापतिक "मैथिलेश"क अप्रमाणिकता- डॊ रामदेव झा RAMDEO JHA उमापति- डॊ रामदेव झा RAMDEO JHA मायानन्द मिश्र- डॊ रामदेव झा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा CHANDRANATH MISHRA AMAR चन्द्रनाथ मिश्र अमर- समीक्षा डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल CIIL SITE VIDYAPATI- BY RAMANATH JHA VIDYAPATI-BY RAMANATH JHA (SAHITYA AKADEMI SITE) सीताराम झा- लेखक भीमनाथ झा सीताराम झा- लेखक भीमनाथ झा (SAHITYA AKADEMI SITE) जगत्प्रकाशमल्ल- लेखक रामदेव झा जत्प्रकाशमल्ल- लेखक रामदेव झा (SAHITYA AKADEMI SITE) दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी सभकेँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी माहुर करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका) डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/ (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta 97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (c)२००४-२०२०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2020 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३०७ म अंक ०१ अक्टूबर २०२० (वर्ष १३ मास १५४ अंक ३०७)
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