VIDEHA — Issue 310 / अंक ३१०

Publication: VIDEHA · Issue: 310
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३१० म अंक १५ नवम्बर २०२० (वर्ष १३ मास १५५ अंक ३१०) ऐ अंकमे अछि:- १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- तेसर खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१०म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (तेसर खेप) २.४.नन्द विलास राय- बीहनि कथा- हमरे पार्टीक लोक २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल- सघन बन २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-असरा २.७.आनन्द कुमार झा-कने हंसि लिअ २.८.आनन्द कुमार झा-मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच २.९.नबोनारायण मिश्र-एकटा पाकल आम २.१०.आशीष अनचिन्हार-घर २.११.ज्ञानवर्द्धन कंठ-लघुकथा-पचहीबाली काकीक यात्रा-वृत्तांत २.१२.ज्ञानवर्द्धन कंठ-गहूमक रखबारी २.१३.डॉ. चित्रलेखा-मिथिलाक प्रसिद्ध लोक पर्वसामा-चकेबा ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा भक्ति गजल ३.२. विजय इस्सर "वत्स"-बचबिहऽ हो कक्का ३.३.विष्णुकान्त मिश्र-पथिक ३.४.प्रदीप पुष्प-दीयाबातीपर रुबाइ Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU  इग्नू       BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1    [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2    (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3    (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4                (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12               (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13               (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14                 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15                 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16                 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17                (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18                 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS ........................................................................................................................ OTHER OPTIONALS ........................................................................................................................ IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- तेसर खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१०म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (तेसर खेप) २.४.नन्द विलास राय- बीहनि कथा- हमरे पार्टीक लोक २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल- सघन बन २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-असरा २.७.आनन्द कुमार झा-कने हंसि लिअ २.८.आनन्द कुमार झा-मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच २.९.नबोनारायण मिश्र-एकटा पाकल आम २.१०.आशीष अनचिन्हार-घर २.११.ज्ञानवर्द्धन कंठ-लघुकथा-पचहीबाली काकीक यात्रा-वृत्तांत २.१२.ज्ञानवर्द्धन कंठ-गहूमक रखबारी २.१३.डॉ. चित्रलेखा-मिथिलाक प्रसिद्ध लोक पर्वसामा-चकेबा योगेन्द्र पाठक वियोगी नरक विजय (एहि नाटकक एक संस्करण हमर पोथी ‘त्रिनाटकम्’ मे छपि गेल अछि। ओहि मे दृश्यक संख्या बहुत बेसी रहला सँ किछु निर्देशक लोकनि एकर मंचन पर प्रश्न चिन्ह लगौलनि। ओहि आलोचना कें ध्यान मे रखैत एकरा परिवर्धित कएल गेल। एकर बंगला अनुवाद श्री नवीन चौधरी केलनि अछि।- नाटककार) पात्र परिचय मानव पात्र — रमेश, सुरेश, अनुपम अमित (वैज्ञानिक) पौराणिक पात्र — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, यमराज, चित्रगुप्त, दू यमदूत अंक 1 दृश्य 3 मंच सज्जा मे मामूली परिवर्तन, टेबुल सब हटा देल गेल अछि, मात्र किछु कुर्सी राखल। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड स्विच ऑफ छैक। ई स्थान बाहुबली रमेश आ बाहुबली सुरेशक मृत्युस्थल अछि। खाकी ड्रेस पहिरने दूनू नीचा मे सूतल पड़ल अछि, दूनूक हाथ लग पिस्तौल छैक। मंचक दूनू कात सँ दूटा यमदूतक प्रवेश। प्रकाश हुनका दूनूक मुह पर पड़ैत अछि। दूनू मरल लोक लग आबि कए ठाढ़ भऽ जाइत अछि। तखन प्रकाश यमदूतक मुह सँ नीचा दिस मृतक पर पड़ैत छैक। यमदूत ओकरा दूनू कें उठेबाक चेष्टा करैत अछि तखने ओ दूनू मृतक ठाढ़ भऽ जाइत अछि। रमेश        (हाथक इशारा सँ स्वागत भाव देखबैत) यमदूत लोकनिक मर्त्यलोक मे स्वागत अछि। दूत-एक      हमरा सब कें स्वागत कथी लेल करैत छी ? हमरा सबहक काज अछि मात्र अहाँ दूनू कें लऽ कए यमराजक दरबार मे हाजिर करब, फेर कोनो दोसर ड्यूटी मे लागि जाएब। सुरेश        अरे जेबे करब, कने सुस्ता लिअऽ, एक जूम तमाकुओ तऽ खा लिअऽ, भरि दिन यमलोक आ मर्त्यलोकक बीच दौड़ैत दौड़ैत थाकि जाइत होएब ने। दूत-दू        थाकि तऽ जाइते छी मुदा काजे ततेक ने भऽ गेल अछि जे की कहू ? साँसो लेबाक फुरसति कहाँ भेटैत छैक ? रमेश        तें ने कहैत छी, कने विलमि जाउ। (दूनू यमदूत एक दोसराक मुह ताकए लगैत छथि) दूत-एक      (दूत-दू सँ) की विचार छौ ? दूत-दू        ठीक छै, एक बेर कने नियम भंग कइए ली। सुरेश        बहुत नीक। (तमाकू चुना कए दैत) लिअऽ, खाउ। दूनू दूत            ई की छिऐ ? रमेश        आहि रे बा ? तमाकूओ नहि खेने छिऐक कहियो ? दूत-दू        ई सब यमलोक मे थोड़बे भेटै छै जे देखने रहबै ? सुरेश        अच्छा छोड़ू एकरा, आब ई कहू, हमरा सब कें यमलोक मे की की करऽ पड़तै ? दूत-एक      से कोना कहू ? यमराज जखन फैसला सुनेताह तखन ने बुझबै। रमेश        फैसला तऽ हमरा सब कें बुझले अछि, नरके मे जेबाक अछि। ताहि हिसाबें कहू ने की सब हेतैक। दूत-दू        सबटा तऽ हमरा सब कें नहि बूझल अछि, किछु देखने छिऐक से कहैत छी, जेना गरम तेलक कुण्ड मे फेकि देनाइ। सुरेश        अच्छा ! तेल कतेक गरम रहैत छैक ? माने ओकर तापमान कतेक रहैत छैक ? दूत-एक      ई की जानए गेलियै ? गरम तेल गरम तेल होइत छैक, बस एतबे। हम सब की ओहि मे पैसलियै जे बुझबै कतेक गरम छैक। रमेश        ऐं यौ एतबो नहि बुझैत छिऐ जे 50 डिग्री पर गरम कएल गेल तेल आ 200 डिग्री पर गरम कएल गेल तेल मे अन्तर होइत छैक ? अच्छा ई कहू जे तेल कोन वस्तुक रहैत छैक ? सरिसो, तीसी, नारिकेल, सोयाबीन आ कि कोनो फेंट फाँट बला ? (दूनू यमदूत एक दोसराक मुह तकैत छथि, किछु नहि बूझि रहल छथि जे की उत्तर देथि।) दूत-एक      देखू, ई हमरा सब कें नहि बूझल अछि आ ने एहि सँ कोनो सरोकारे अछि। अहाँ यमलोक पहुँचि कए यमराज सँ बूझि लेब। चलू देरी जुनि करू। सुरेश        कने सूनू तऽ। ओ तेल कोना गरम कएल जाइछै ? माने बिजलीक हीटर लागल छैक कि सौर ऊर्जा सँ आ कि जारनि सँ? दूत दू       हमरा सब कें किछु नहि बूझल अछि। चलू देरी भऽ रहल अछि। (दूनू दूत दूनू मृतक कें पकड़बाक चेष्टा करैत अछि, सुरेश, रमेश जोड़ सँ ओकर हाथ झटकि दैत छैक जाहि सँ ओ सब खसि पड़ैत अछि, फेर अपना कें सम्हारैत ठाढ़ होइत अछि) दूत एक      अहाँ सब यमलोक नहि जेबै ? सुरेश        जेबै तऽ जरूरे, मुदा बिना सब बात फरिछेने विदा नहि होएब। अहाँ सब जाउ आ यमराज कें एतहि बजौने अबियनु, ताबत हम सब एतहि रहब। (दूनू गोटे अपन कमीज कें समेटि बाँहि उघार करैत अछि आ फूलल मांशपेशी कें निहारैत अछि। दूनू यमदूत ओहि दूनूक शारीरिक सौष्टव कें देखैत कने भयभीत होइत छथि।) दूत-दू       अहाँ सब नहिए जेबैक ? रमेश        कहलहुँ ने, यमराज सँ सब बात फरिछा लेलाक बादे जेबैक। (दूनू मंचक पाछू भाग मे नीचा मे पड़ि रहैत अछि, खिसियाएल मुद्रा मे यमराजक प्रवेश, वेश भूषा पौराणिक वर्णनक हिसाबें। प्रकाश हुनका पर फोकस होइत अछि।) यमराज       (तामसक मुद्रा मे दूत कें सम्बोधित करैत) एतेक देरी किएक लागि गेल ? हम सब चिन्ता मे पड़ल छलहुँ। चित्रगुप्त महराजक कहला पर हमरा अपनहि आबए पड़ल। दूत एक      हमरा दूनू कें माफ कएल जाओ आ अपन समस्या कहबाक अनुमति देल जाओ धर्मराज। हम सब तऽ घुरि कए जाए बला छलहुँ अहाँ कें बजबै लेल। यमराज       (कने सामान्य होइत) बिना मृतात्मा कें लेने घुरि जइतहुँ ? से किएक ? दूत-दू        की कहू धर्मराज, एहन मृतात्मा सँ कहियो पाला नहि पड़ल छल जे प्रश्न पूछत। यमराज       (आश्चर्यचकित होइत) मृतात्मा प्रश्न पुछलक ? आश्चर्य, एना तऽ कहियो नहि भेल छलैक। दूत-एक      सएह ने कहैत छी। दूटा लोक अछि जे अपना कें बाहुबली कहैत अछि, नाम छैक सुरेश आ रमेश। ओ पूछऽ लागल नरक मे कोन तरहक यंत्रणा देल जाइत छैक। दूत-दू        हम सब गलती सँ कहि देलियै जे गरम तेलक कुण्ड मे फेकल जाइत छैक। बस, तकर बाद ओ सब प्रश्न पर प्रश्न करऽ लागल, तेल कतेक गर्म रहैत छैक, तेलक तापमान कतेक होइत छैक ? कोना कए गरम कएल जाइत छैक ? कोन पदार्थक तेल रहैत छैक – नारिकेल तेल कि सरिसो तेल कि फेंट फाँट बला। दूत-एक      हमरा सब कें एकर उत्तर बूझल नहि छल। ओ दूनू कहलक जे जाबत एहि प्रश्नक उत्तर नहि भेटि जाएत ताबत यमलोकक यात्रा नहि करब। जाउ यमराज कें अपनहि आबए कहियनु। यमराज       (खिसिआइत) मृतात्माक एतेक साहस कोना भेलैक जे अहाँ सब सँ प्रश्न पुछलक ? हमरा बजबैक आदेश देलक ? (तामसें जोर सँ बजैत) कतए अछि ओ दुष्टात्मा सब? देखाउ हमरा। एखनहि हम ओकरा सबहक नंगटपनी घोसारि दैत छिऐक। (एखन प्रकाश रमेश आ सुरेश पर फोकस होइत अछि) दूत दू       (हाथक इशारा सँ देखबैत) ओएह दूनू छी ओ बाहुबली मृतात्मा। (दूनू मृतात्मा हड़बड़ा कए उठि जाइत छथि आ एकहि संग धर्मराजक पैर पर खसैत छथि) रमेश, सुरेश   जय हो, जय हो, धर्मराजक जय हो। महाराज वैवस्वतक जय हो। मर्त्यलोक मे महाराज सूर्यपुत्रक स्वागत। यमराज       (तामस कें घोंटैत, कने हटि कए, स्वतः) आश्चर्यक बात, पहिल बेर एहि मर्त्यलोक मे कियो यमराजक जयजयकार करैत स्वागत कऽ रहल अछि, जरूर ई दूनू कोनो विशिष्ट व्यक्ति अछि। (लग आबि, प्रकट) अहाँ सब यमदूतक संग नहि जा कए बहुत पैघ नियम भंग केलियै, जे आइ तक नहि भेल छलैक। एहि अपराध लेल अहाँ सब कें सजाए बढ़ाओल जा सकैत अछि। रमेश        पहिने आसन ग्रहण कएल जाओ सूर्यपुत्र (हुनका हाथ पकड़ि कुर्सी पर बैसबैत छथि, अपने दूनू गोटे टेबुलक दूनू कात ठाढ़ होइत छथि, यमदूत लोकनि काते मे ठाढ़ रहैत छथि) यमलोक जेबा लेल तैयारे छी धर्मराज, आ जे कोनो सजाए भेटत ताहि लेल सेहो तैयार छी। सुरेश        मुर्दा पर जेहने दश मोनक बोझ तेहने पचास मोनक बोझ। जखन नरके मे बास करबाक अछि आ यातना सहबाके अछि तखन हजार बरखक बदला दू हजार बरख सएह ने। कोनो फर्क नहि पड़ैत छैक। यमराज       (आश्चर्यचकित होइत) अहाँ सब अपने मोने कोना बूझि गेलिऐ जे नरके मे बास करबाक अछि ? रमेश        धर्मराजक जय हो। बुझले अछि जे हम सब कोनो अबोध बच्चा नहि छलहुँ ने। ब्रह्महत्या, नारीहत्या, भ्रूणहत्या, गोहत्या आदि सँ लऽ कए छागरहत्या, शूकरहत्या, कुक्कुटहत्या, मत्स्यहत्या, छुटले की छल ? यमराज       (आश्चर्य प्रदर्शित करैत) अच्छा ! सुरेश        ओतबे नहि देव, डकैती तऽ साधारण बात भेल, अपहरण, व्यभिचार आ साइवर क्राइम मे सेहो हमरा दूनूक जोड़ नहिए रहल हेतैक। रमेश        बीस बरख तक एतेक जे पाप कएल तऽ ई सोचिए कए ने जे नरक मे दीर्घ प्रवास करब। सुरेश        नरक मे देल जाए बला यातना आदिक वृहत जानकारी सेहो लऽ लेने छी धर्मराज। सबटा शास्त्र पुराण आर अन्यान्य ग्रन्थ सब सेहो चाटि गेल छी। रमेश        जतेक प्रकारक अपराध हम सब कएल अछि ओहि सब लेल एतुका ग्रन्थ सब मे तऽ सजाएक प्रावधानो नहि छैक। लगैत अछि ग्रन्थकार कें ओहि अपराधक कल्पनो नहि छलनि। तकरा बारे मे अपने कोना निर्णय लेब से सोचि राखू धर्मराज। यमराज       ओ तऽ बादक बात भेल, एखन एहि मृत्युलोक मे रुकल किएक छी जखन कि अहाँ सबहक भोगक अवधि शेष भऽ गेल अछि ? अंट शंट प्रश्न पूछि कए यमदूत लोकनि कें रोकने रहलियैनि से किएक ? सुरेश        महाराज औदुम्बर, हमरा सब कें बूझल छल जे देरी भेला सँ अपने स्वयं मर्त्यलोक एबे करबैक। रमेश        हमरा सबहक प्रश्न ओ नहि अछि जे दूत लोकनि सँ पूछल। ओ तऽ बहन्ना छल। सुरेश        महाराज वैवस्वत, अपने कें कष्ट देल एतए बजाए से मात्र एकटा छोट अनुरोध करबाक हेतु। रमेश        हमर आग्रह जे दूनू यमदूत कात भऽ जाथि। (यमराज इशारा करैत छथिन, दूनू दूतक प्रस्थान) सुरेश        हमरा सबहक आग्रह एतबे जे अपना संग पाँच किलो ओजनक एकटा ब्रीफकेस लऽ जेबाक अनुमति भेटए। यमराज       (आश्चर्यचकित होइत) ई की बाजि रहल छी ? रमेश        महाराज औदुम्बरक जय हो। बुझले होएत जे आब फोकटियो हवाइ जहाज कम्पनी सब लोक कें सात किलो ओजन तक के ब्रीफकेस अथवा हैंडबैगक अतिरिक्त पन्द्रह किलो चेकइन लगेज लऽ जेबाक सुविधा दैत छैक। हम सब तऽ मात्र पाँच किलोक अनुमति माँगि रहल छी। सेहो ब्रीफकेस टा, कोनो चेकइन लगेजक झंझट नहि। यमराज       मुदा ई कोना सम्भव छैक ? आइ तक कहियो एना नहि भेलैक। सुरेश        अपने तऽ धर्मराज छी, हम सब मर्त्यलोकक अदना प्राणी अपने कें की बुझाएब ? तैयो पुछैत छी जे जखन इन्द्र गौतम ऋषिक पत्नी अहिल्याक शीलभंग करबा लेल गेलखिन तऽ ओहि सँ पहिने ओहन घटना भेल छलैक की ? यमराज       अहाँ सब की कहऽ चाहैत छी ? रमेश        एतबे जे कोनो नव काज शुरू करबा लेल पहिने की भऽ गेल छैक तकरा देखब जरूरी नहि। एना जँ लोक करऽ लागए तऽ कहियो कोनो नव काज शुरुए नहि हेतैक। यमराज       मुदा यमलोक मे मृत्युलोकक चीज वस्तु कोना रहि सकैत छैक ? सुरेश        एखनहु तऽ रखने छिऐक धर्मराज। नरकक विभिन्न कुण्ड मे जे मानव मल, मूत्र, रक्त, मज्जा, वीर्य, अश्रु आदि भरल छैक से यमलोक मे तऽ नहिए भेटैत हेतैक। मानव तऽ मर्त्यलोकेटा मे छैक देव। ओ सामान सब तऽ एतहि सँ उठा कए लऽ गेलियैक। यमराज       सम्भवतः अहाँक बात ठीक अछि, मुदा ई काज बहुत दिन पहिने भेल छलैक जखन हमर पूर्वक पूर्वक पूर्वक यमराज यमलोकक काज देखैत छलखिन। रमेश        कहुना भेल होइक, भेलैक तऽ। बस, तखन हमरा सबहक निवेदन स्वीकार कऽ लेल जाओ सूर्यपुत्र। सुरेश        यदि अपनेक यान मे जगहक समस्या हो तऽ हम सब विशेष यानक व्यवस्था कऽ सकैत छी। ओ यान एतुका वैज्ञानिक लोकनि कठिन शोध सँ तैयार केलनि अछि जे ब्रह्मांड मे सबतरि जा सकैत छैक। यमराज       नहि नहि, तकर काज नहि पड़तैक मुदा हम अपने मोने ई अनुमति नहि दऽ सकैत छी। एहि लेल हमरा देवता सबहक संग विशेष मीटिंग करए पड़त। रमेश        कइये लेल जाओ धर्मराज, ताबत हमरा दूनू कें एतहि छोड़ि देल जाओ। ओतए चल गेलाक बाद घूरि कए तऽ आएल पार नहि लागत। यमराज       ठीक छैक, हम दूनू यमदूत कें अहाँ दूनूक पहरा मे लगा दैत छिएनि। (संकेत करैत छथि, दूनू यमदूतक प्रवेश), हम कने देवलोक मे एकटा इमर्जेन्सी मीटिंग करबा लेल जाइत छी, ताबत हिनका दूनू कें एतहि रखियनु। (यमराजक प्रस्थान) सुरेश        अपने सब आराम सँ भीतर मे बैसू ने। कतेक काल ठाढ़ रहब। भीतर मे अपनेक लेल सब इन्तजाम कएल अछि। (इशारा करैत छथि) दूत-एक      भगबै नहि ने यौ ? रमेश        भागि कए कतए जेबै ? मरल लोक समाजक बीच कोना जेतैक ? सब भूते बूझि लेत आ ढेपियौनाइ शुरू करत। अपने सब निश्चिन्त रहू। दूत-दू       बेस (दूनूक प्रस्थान) सुरेश        (दर्शक दिस मुह घुमा) देवलोक मे इमर्जेन्सी मीटिंग चलि रहल छैक, परमीसन तऽ भेटबे करतैक। किएक ने जल्दी जल्दी ब्रीफकेस तैयार कऽ ली। रमेश        आ विशेष यान कें सेहो तैयार करबा कए राखिए ली। किन साइत ? (दूनूक प्रस्थान, मंच अन्हार) (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर लजकोटर (प्रवासीक जीवनपर आधारित) (१०म खेप) -10- भोर होइते  चौकपर गरम-गरम सिंघारा जिलेबी खेलहुँ, चाह पिलहुँ आ लताक ओहिठाम बिदा भेलहुँ । बसस्टापपहुँचलेछलहुँकिबसआबिगेलमुदा ततेक भीड़ रहैक जे चढ़ि नहि सकलहुँ । दोसर बसक प्रतीक्षा करए लगलहुँ । बड़ीकाल धरि कोनो बस अएबे नहि केलैक ।लोकसभ बजैकजे भीआइपीक आवागमन छैक तेँ रस्ता बंद कए देल गेल अछि। हम बस स्टैंडपर ठाढ़े रही कि लताक फोन आबि गेल । " कतएछी?’’ "रस्ते मे छी । बसे नहि आबि रहल छैक ।बड़ीकालसँ बसस्टैंडपर ठाढ़ छी ।" "कोन बसस्टैन्ड छैक?" " जनकपुरी " ओ नीकसँ अपन घरक पता लिखा देलीह । हम पैरे-पैरे ओहिठाम बिदा भेलहुँ कि देखैत छी एकटा पुलिसक जीप हमरा पछोड़ कए रहल अछि । हम तँ घबड़ा गेलहुँ । ताबे ओ जीप रुकि गेल । ओहिमे विजय स्वयं छलाह । "की बात छैक? बहुत परेसान बुझा रहल छी?" "बसक प्रतीक्षामे छी ।" "केमहर जेबाक अछि?" "हम ओकरा पता कहलिऐक ।विजय हमर मुँह ताकए लगलाह ।फेर कहैत छथि- "अहूँ पहुँचल फकीर लगैत छी।" "की किछु गलती भए गेल की?" "ई पता अहाँकेँकोना भेटल?" "किएक?" " ई तँ हमर हाकिमक पता छनि ।" हम ओकरा बेसी बात कहब उचित नहि बुझलिऐक । चुप्पे रहि गेलहुँ । मुदा ओहो तँ पुलिसक आदमी छल। तरह-तरहसँ हमरा गोलिआबए लागल ।फेर कहलक-" हम अहाँकेँ ओहिठाम धरि छोड़ि देब । जीपपर आबि जाउ ।" हम ओकर बात मानि जीपपर बैसि गेलहुँ । कनीके कालमे हम ओतए पहुँचि गेलहुँ ।लता घरक गेटपर ठाढ़ि हमर प्रतीक्षा कए रहल छलीह । विजय जीप रोकि हमरा बाहरे उतारि देलथि।विजयक तँ चकरी गुम रहैक। जाइत-जाइत कहैत गेलाह– " घुरतीमे भेंट करैत जाएब । हम किछु जबाब नहि देलिऐक ।’’ हमरा देखितहि लता घरक गेटसँ बाहर आबि गेलीह । हुनकप्रशन्नता देखैत बनैत छल। ओ हमरा दिस कहि नहि कतेक काल धरि तकैत रहि गेलीह । हमरे लाज होबए लागल, जे कहीं किओ देखि ने लिअए। मुदा लताकेँ कनीको कोनो परबाह नहि बुझाएल। ओ जोरसँ चिचिआएलि॒-"आउ,आउ हम तँ बड़ीकालसँ अहाँक बाट ताकि रहल छी ।" हम संकोचपूर्वक आगू बढ़लहुँ । बाहरेसँ कोनो पैघ आदमीक घर लागि रहल छल । घरक चारूकात फूल-फलहरी लागल छल । हरिअर-हरिअर घाससँ सौंसे वातावारण मनमोहक लगैत छल । घरदिस आगा बढ़लहुँ ।ताबे नीरजसेहो बाहर आबि गेल छलाह । हुनका देखितहि लता बाजलि-" इएह छथि गोविंद,जिनका बारेमे काल्हि हम कहने रही ।" "ओ! बैसू "-नीरजबजलाह । हम हुनका प्रणाम केलिअनि आ अपन परिचय दैत कहलिअनि -" हम कै सालसँ दिल्लीमे किछु-किछु करैत रहलहुँ मुदा कोनो निजगुत काज नहि भेटल। किछुदिन पहिने हमर माएकेँ एतहि देहांत भए गेलनि । तेँ गाम जाए पड़ल । जेहो कनीमनी काज करैत रही सेछुटि गेल।" "कोनो बात नहि । अहाँ काल्हि हमरासँ आफिसमेभेंट करू"-एतेक कहि ओ ओहिठामसँ चलि गेलाह। हमहुँ आपस जेबाक हेतु उद्यत भेलहुँ कि लता रोकि लेलथि । कहए लगलीह॒-"चाह तँ पीवि लिअ" । ओ अंदर गेलीह । हम बैसले-बैसले सोचैत रही- " केहन-केहन चमत्कार होइत छैक, नहि तँ एतेक पैघलोकसँ हमरा कोना संपर्क होइत?" लता तुरंते चाह लेने आबि गेलीह । हमसभ चाह पिबैत किछु-किछु गप्प-सप्प करैत रहलहुँ । चाहो समाप्त भए गेलैक । मुदा लता ओतहि बैसलि रहि गेलि । बैसले नहि रहि गेलि,बहुतरास प्रश्नसभ पुछैत रहलि । हमरा किछु फुरेबे नहि करए। एहि तरहेँ बहुत समय निकलि गेल । अंतमे हमही उठि गेलहुँ । हमरा उठैत देखि कए लता सेहो उठलि आ जोरसँ हमरहाथ पकड़ि लेलथि । की कहू ,केहन अनुभूति भेल? हमरा जीवनमे एहि प्रकारक ई प्रथम अनुभव छल । बहुत संकोचपूर्वक हम ओतएसँ हटि आगा बढ़ि गेलहुँ । ओ हमरा दिस तकैत रहि गेलि आ हम आगा बढ़ैत रहि गेलहुँ। जाइत-जाइत कहए लागलि-" फेर आएब। कोनो बातक संकोच नहि करब। किछु  दिक्कत होअए तँ फोन कए देब ।" "ठीक छै ।"-से कहि हम बिदा भए गेलहुँ ।ओहिठामसँ बहराइत हमरागजब आनंदक अनुभूति भेल। ओ कहि नहि कखन एकटा लिफाफा हमरा जेबीमे राखि देलक । हमरा तँ ओहिपर ध्यानो नहि गेल । ओहिठामसँ निकलि बसमे चढ़बाक हेतु टाका निकालए लगलहुँ तँ ओ लिफाफा अभरल । ओकरा खोलैत छी । ओहिमे एकटा सुंदरसन मोबाइल फोन आ किछु टाका राखल छल ।संगहि एकटा छोटसन डायरी सेहो छल जाहि मे लताक घरक पता आ ओकर मोबाइल नंबर लिखल छल । हम ओकरासभकेँ सम्हारि कए रखलहुँ । बसक टिकट लेलहुँ आ सोझे अपन डेरा दिस बिदा भेलहुँ । पाठकीय: Dear Mishra jee, Excellent story in lucid and popular language comprehensive to common people. I could not understand if the story is fiction or true as there is a narrative of opening a hawking shop on not finding job at Delhi. The story is worth reading and it reveals the life of a migrant full of struggle.Hope future series will enlighten about other characters. Thanking for forwarding. -Kameshwar Choudhary रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस : ६६ बर्ख, पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह, मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवा निवृत्त), शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक प्रकाशित कृति : मैथिलीमे:- १. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा), २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग), ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास)१२.स्वप्नलोक(उपन्यास)१३.शंखनाद(उपन्यास)१४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) In English:- 1.The Lost House (Collection of short stories), 2.Life is an art हिन्दी में – १.न्याय की गुहार(उपन्यास) (उपरोक्त पोथीसभ pothi.com, amazon.com आओर www.flipkart.com पर सँ कीनल जा सकैत अछि) इमेल : mishrarn@gmail.com ब्लोग : mishrarn.blogspot.com  एमजोनक लेखक पृष्ठ : amazon.com/author/rnmishra ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल आमक गाछी (धारावाहिक उपन्यास- तेसर खेप) 3. चारिम दिन पढ़ा कऽ कौलेज बन्द हएत। मास दिन जहिना सभ साल कौलेज बन्न होइए तहिना अहूबेर हएत। अमैया छुट्टी आमक गाछीमे बीतत..!ई बात जहिना जगमोहीक मनमेतहिना धीरेन्द्रोक मनमे नचैत रहइ। अखनुक शिक्षण संस्थान सभ जकाँ पहिने नइ होइ छल। माने ई जे जहिना लोअर प्राइमरी हुअ कि मिडिल स्कूल, हाइ स्कूल हुअ आकि कौलेज, सभ संस्थानक अपन-अपन छुट्टीक निर्धारित समय छल। जहिना सभ कौलेजमे एक्के दिनसँ एकेरंग छुट्टी होइत छल तहिना हाइयो स्कूल, मिडिलोआलोअर प्राइमरियो स्कूलमे एक्के दिनसँ एक्केरंग छुट्टी होइत रहइ। ओना, सालक हिसाबसँ कौलेजमे बेसी छुट्टी होइ छेलै, तइसँ कम हाइ स्कूलमे आ तहूसँ कम मिडिलआ लोअर प्राइमरी स्कूलमे अवकाशक समय छल। मुदा किछु छल तैयो तँ अपना-अपनामे एकरूपता छेलैहे। अखुनका जकाँ तँ नहि, जे कोनो संस्थानमे छुट्टी बीत जाइए तखन कोनोमे शुरूए होइए। सभ स्कूलक अपन-अपन नियम छइ। ओना, नियम तँ कोनो संस्था अपन बनाइये सकैए आ बनैबतो अछिए, मुदा जे छुट्टी जइ निमित्ते होइए ओकरो तँ अपन महत् छइहे। जेना-गरमीए छुट्टी लिअ। एकरो अपन आधार अछि किने, जे जखन बहुत बेसी समय गर्म भऽ जाइए जइसँ पढ़ाइ-लिखाइक काजमे बाधा उपस्थित हुअ लगैएतखन छुट्टी होइए। ओना, कौलेजसँ लऽ कऽ नर्सरी स्कूल तकक छुट्टीमे एकरूपता नइ होइक कारणो अपन-अपन अछि। पहिने सार्वजनिक रूपमे, माने सरकारी स्तरपर स्कूल-कौलेज अधिक मात्रामे संचालित होइत रहैमुदा अखन सार्वजनिक संग-संग बेकतीगत, माने निजी स्तरपरबेसी संचालित भऽ रहल अछि। ओहूमे विचार-विचारक रूप सेहो अपन-अपन अछि। सार्वजनिक रूपमे जे शिक्षण संस्थान सभ चलि रहल अछि, ओ रंगगर मकानमे जरूर चलि रहल अछि मुदा पढ़ाइ-लिखाइक जगहबेसी खेनाइ-पीनाइ आ स्टायपेन मात्र रहि गेल अछि। तहिना निजी जेशिक्षण संस्था अछि ओ भिन्न-भिन्न सम्प्रदायसँ जुड़ल रहलाक कारणे अपन-अपन आचार-विचार आ बेवहारसँ प्रभावित भइये गेल अछि, जइसँ एक-दोसराक बीच दूरी सेहो बनियेँ रहल अछि। तैबीच आरक्षण सेहो अछिए। सार्वजनिक संस्थामे जे आरक्षण अछि ओ जाति-आधारित अछि, जइसँ किछु खास जातिक किछु खासपरिवारकेँ लाभ जरूर भऽ रहल अछि मुदा सामूहिक रूपक अभाव तँ अछिए। तहिना प्राइभेट संस्थामे पाइक (डोनेशन) आरक्षण भेने पाइबला आरक्षित भइये गेल अछि। तहू पाइबलामे एकरूपता नहियेँ अछि। मोटा-मोटी तीन श्रेणीक आरक्षण अछि। अधिक पाइबला, मध्यम पाइबला आ निम्न पाइबला लेल जहिना डोनेशन अछि तहिना संस्थाक बेवस्थो छइहे। जइ कौलेजमे धीरेन्द्रक चारिम बर्ख अछि तेहीकौलेजमे जगमोहीक सेहो चारिम बर्ख छी। दुनू संगे-संग पढ़ितो रहल आ पढ़ितोअछि, मुदा अपनामे गप-सप्प नइ भेने ने दुनूक बीच चीन-पहचीन भेल आ ने एक-दोसरकेँ कियो बुझिये-गमि सकल,तँएदुनूक बीचक सम्बन्धमे कोनो तरहक जागरण नहिआएल। जहिना धीरेन्द्रकेँ साइयो छात्रक बीच जगमोही मात्र एकसहपाठी बुझैत तहिना जगमोहियोकेँ धीरेन्द्र बुझैत। शिक्षण संस्थान तँ तीर्थे स्थान जकाँ अछिए, जेतेक दिनक कामनाक संग शिक्षार्थी एतए पहुँचैए ओते पुरला पछाइत अपन-अपन घर-परिवारक सुधि लइए। मुदा काल्हि जखनसँ जगमोही आ धीरेन्द्रक बीच गप-सप्प भेल,चीन-पहचीन भेल तखनसँ दुनूक जिनगीमे एक नव चेतनाकेँ जगने जीवन-जागरण सेहो हुअ लगल। तहूमे जखन धीरेन्द्र मास दिनक भार उठा जगमोहीकेँअपना गाम चलैले आमंत्रित केलक तखनसँ किछु आरो जवाबदेही बढ़िये रहल अछि। ओना, धीरेन्द्रक गाम जगमोहीक मातृकोछिऐहे, तँए दुनूक बीच प्रेमाकर्षण सेहो बढ़िये रहल अछि। जइसँ जहिना धीरेन्द्र तहिना जगमोही अपन-अपन मनसागरमे हिलोरोलइये रहल छल। अध्ययन कक्षसँ निकलला पछाइत कौलेजक अन्तिम गेटपर,जैठामसँ दुनू दू दिस हएततैठाम-पहुँच जगमोही बाजल,“काल्हि फेर भेँट हेबे करब..!” जगमोहीक आग्रह सुनि धीरेन्द्र आग्रहित होइत बाजल- “जँ कोनो बेवधान नइ उपस्थित हएत तँ जरूर अही समयमे अहीठाम भेँट हएब।” ओना, जगमोहीक मनमे ईहो उठैत रहै जे अखन डेरा पहुँचैमे अबेर नहियेँ भेल अछितँए धीरेन्द्रक डेरा तक जाइ, मुदा धीरेन्द्रक मनमे चारिम दिनक छुट्टी आ गाम जाइक तैयारी नाचि रहल छेलइ। मास दिन गाममे रहब, तैबीच कौलेजो बन्ने रहत तखन अनेरे पटना किए आएब। तँए ऐठामक सभ काज निपटा कऽ जाएब...। काजक बढ़बारिसँ धीरेन्द्रक मन दबाएल छल जइसँ जगमोहीकेँ डेरा चलैक आग्रह नहि कए सकल। कर्मे ने धर्मक सृजदाता छी,तँए जिनगीक लेल कर्मकेँ गसिया कऽ पकड़ला पछातिये ने किछु भेटैक सम्भावना बनैए। गप-सप्प केतौ पड़ाएल थोड़े जाइए, तहूमे भरि मास एकठाम हेबे करब...। जहिना काजक सुढ़ियाएल लोक बिना किछु बजने-भुकने अपन काजमे पील कऽ पड़िजाइ छैथ तहिना धीरेन्द्रोअन्तिम गेटपर गेला पछाइतोअपन डेगकेँ बिनु छोट केनहि डेरा दिस बढ़ि गेल। जगमोहीक मुहेँ जखनसँ सुवासिनी धीरेन्द्रक विषयमे सुनलैन तखनसँ मनमे आशाक पातर-छीतर ज्योति छिटकए लगल छेलैन। ज्योति ई छिटकए लगल छेलैन जे दुनियॉंमे अवलानारीक दुखहर्त्ता तँ पतिये वा भाइये ने होइ छैथ, से जखन भेट रहल अछि तखन अवसरकेँ छोड़ब नेनमति हएत। जगमोहीसँ पहिनहि सुवासिनी बजारक काज सम्हारि डेरा पहुँच, डेरोक जे काज छेलैन सेहो सभ अगुआ नेने छेली। जगमोहीकेँ डेरा पहुँचते सुवासिनी पुछलखिन- “बुच्ची, धीरेन्द्रसँ भेटोँ भेल छेलह?” ओना, जगमोहीक चिताकर्षण धीरेन्द्रक प्रति नव सिरासँ बढ़िये रहल छल, तैबीच मातृकक सम्बन्ध आ माइक जिज्ञासा आरो पॉंखि जोड़ि देलक। एक तँ ओहुना कौलेजक संगी सबहक सम्बन्ध गमैया वातावरणक अपेक्षा बहुत अगुआइये गेल अछि जइसँ, तैसंग शहरी वातावरणमे अनेरो बहुतो एहेन ग्रामीण शंका सभ अछि जे मेटाएल जा रहल अछि। अपनाकेँ समरस करैत समरसताक बाट पकैड़ जगमोही कहलकैन- “आने दिन जकाँ धीरेन्द्र आइयो क्लासो आएल छल आ रिडिंग रूपमे सेहो छल। जगमोहीक बात सुनि सुवासिनीक मन एकाएक अन्तर्धियान भऽ गेलैन। अन्तर्धियान होइते मनमे उपकलैन- जहिना दुनियॉंमे प्रत्येक पुरुखकेँ नारीक बीच सम्बन्ध बनौल जाइए तहिना प्रत्येक नारीकेँ सेहो पुरुखक बीच सम्बन्ध बनौले जाइएजइसँ सृष्टिक रचना होइए। ओना, मनुखक सघन वनमे जहिना असंख्य पुरुख अछि तहिना असंख्य नारियो अछिए मुदा केहेन नारीकेँ केहेन पुरुखक संग सम्बन्ध स्थापित करक चाहिये, ई विचार तँ प्रबुद्धजने ने करैत रहलाअछि, जे समाजमे समाजिक रेबाज बनि गतिशील सेहो होइत रहल अछि। मुदा भैयारीक सम्बन्ध तँ प्रकृति प्रदत्त अछि। एक माइक कोखिसँ निकलल सन्तानक बीच जहिना भाए-भाए वा भाए-बहिनक बीच भैयारीक सम्बन्ध उठि कऽ ठाढ़ होइए तहिना आनक संग भलेँ से नइ हुअ, मुदा बेवहारिक रूपमे अनेको दिशा-बाट तँ ओहन अछिए जइसँ भैयारीक सम्बन्ध स्थापित होइतआबि रहल अछि। ओना, सभ मनुखकेँ अपन-अपन सोभाव होइते छैन, जइसँ सम्बन्ध स्थापित होइमे अनेको रूप-रंग अछिए। मुदा से अखन नहि, अखन एतबे जे सुवासिनीक मनमे जे बेरपड़ल समस्या[i] उठलैन से...। पतिक ओहन कमाइ नहि छैन जइसँ परिवेशक अनुसार परिवार चलबैत तीनू बेटीकेँ समुचित स्थानमे बिआह कऽ सकती।रामलखनकेँ सीमित दरमाहा छैनजइसँ परिवारक खेनाइ-पीनाइ, लत्ता-कपड़ा पुरबैत कोनो-धरानी बाल-बच्चाकेँ पढ़बै-लिखबै छैथ। शुरूमे मात्र जगमोहीक कौलेजक खर्च छेलैन, आब जखन जगमोही कौलेजक पढ़ाइ पूरा करत तखन दुनू छोट बेटी एकाएकी कौलेजमे प्रवेश करतैन। तैसंग जगमोहीक बिआह करब सेहो रामलखनक आगूमे छैन्हे। सुर्यास्त भेला पछाइत जहिना हलकाएल-फलकाएल अन्हार धीरे-धीरे करिखाएल-कजरियाएल राति भऽ जाइए, जइसँ हाथ-हाथ देखब कठिन भऽ जाइए तहिना सुवासिनीक आगूमे परिवारक समस्याधीरे-धीरेकजरियाएलराति जकाँसघन भऽ गेलैन। मुदा सुवासिनी अपनाकेँ संयमित करैत जगमोहीकेँकहलखिन- “बुच्ची,बाबू ड्यूटीसँ अबै छथुन।अपनेसँ कहियौन जे ऐबेर अमैया छुट्टीमे मातृक जाएब। जखने एकबेरगप उठत तखने रंग-रंगक अनेको गप उठबे करत, अन्तोअन्त किछु-ने-किछु निर्णयो भइये जाएत।” ओनातँनव परिवेशक उपजल जगमोहीअछिए,जे समाजिक परिवेश देखलो पछाइत अनभुआरे अछि, मुदा अनेको रंगक हवा-पानि लगितो रहल छै आ देखियो रहलेअछि। मुदा विचारधाराक अभावक चलैत ई नहि बुझि पेब रहल अछि जे अपन जिनगीक धार कोन दिशामे,कोन मुहेँ बहत। बुझब असानो नहियेँ अछि, किएक तँ जहिना रंग-रंगक रंगीनी दुनियाँ देख रहल अछितहिना रंग-बिरंगक विघटनोतँ देखिये रहल अछि। छअ बजैत-बजैत रामलखन डेरा पहुँचला। पत्नीक मन खनहन आ मुँहमे मुस्कान देख पड़लैन। कपड़ा खोलि टंकीपर जा कऽ मुँह-हाथ धोइते छला कि चाह नेने सुवासिनी पहुँच गेलैन। होइतो अहिना छै जे जखन विचारमे लग्नरूपता आबए लगै छै तखन काजमे सेहो क्रियमान आबिये जाइ छइ। ओना, मोटा-मोटी साल भरिसँ रामलखनक मनकेँ कन्यादान पकड़नहि छैन जइसँ सदिखन मन बिचैरते रहै छैन। ओना, रामलखन अपन मनकेँ मना लइ छैथ जे जेते तक सम्भव हएत तेतबे तकक ने काज करब। माने जेते ओकाइत रहत तेतबे खर्च करि ने बेटीक बिआह करब...।मुदा तैयो रामलखनक मन असथिर नहि भऽ पबै छैन,अनेको प्रश्न मनमे बिचैरते रहै छैन।अपन विचारानुसार अपन कन्याकेँ जँ उचित जगहपर ठौर दियौ चाहबतँ की अपनेटा विचारसँ से सम्भव अछि? जैठाम दू परिवार, दू माता-पिता, दू लड़का-लड़कीआदू समाजक बीचक प्रश्न अछितैठाम असगर लोक की कऽ सकैए..?अहीविचारक बीच रामलखनक मन तरेतर आक्रान्त रहै छैन। मुदा ने परिवारमे दोसर कियो उपारजन कर्त्ता छैन, जिनका संग रामलखन विचार-विनिमय कऽ सकता आ ने कियो संग पुरैबला संगी छैन। तँए रामलखन अपन मनकेँ समेटनेछला। आधा कप चाह पीला पछाइत रामलखनक मनमे जखने कनी तजपन एलैनकि नजैर उठि सुवासिनी दिस बढ़लैन। नैहरक विचार सुवासिनीक मनमे जगल रहबे करैन, बजली- “ऐबेर अमैया छुट्टी प्रेमेनगरमे बिताएब।” ओना, प्रेमनगर रामलखनक सासुर, सुवासिनीक नैहर आ जगमोहीक मातृकोछीहे मुदा से नहि,रामलखनअपन मनकेँ बहलबैत अमैया छुट्टीकमाने ‘सहरगंजा अवकाश’ आ प्रेमनगरक माने ‘बाल-बोधसँ प्रेम करब’ मानि बजला- “सभ चाहैए जे सहरगंजा अवकाश प्रेमेनगरमे बिताबी मुदा से पहिने प्रेमनगरकेँ जानि-पहचानि ओइ दिस बढ़त तखन ने बसैत-बसैत ओकर बशिन्दा बनत।” पतिक बात सुनि जहिना सुवासिनी अकचकाए लगलीतहिना जगमोही सेहो अकचकाएल। दुनूकेँ अकचकाइक अपन-अपन कारण, अपन-अपन विचारे उपकल। ओना, जहिना पोखैरमे मलाह पहिने छोटका जाल फेक माछक अनुमान लगबैए तहिना रामलखन सेहो विचारक जाल फेक बेटियो आ पत्नियोक वौद्धिक अनुमान लगबैक परियास केने छला,मुदा से ने जगमोही बुझलक आ ने सुवासिनीए बुझि सकली। बॉंकी दुनू छोट बेटीतँ सोल्होअना सुनैयेवाली छल, प्रश्नोत्तरीसँ मतलबे कोन छेलै जे हरखे आकि विसमाइये होइतै।जगमोहीक मनमे ई जरूर उठलै जे पिता जे किछु बजला ओ प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूपे जिनगीए लेल बजला। किएकतँ पिता ने हमरासँ चौल करता आ ने ओहन कोनो अनसोंहंतगर बाते बजता जइसँ परिवारकेँ कोनो तरहक अवघात हएत। तँएपिताक विचारकेँजगमोहीमने-मन घोंटैतआगूक बात सुनैले कान ठाढ़ केने छल। जखन सभ कियो एकठाम बैस परिवारेक गप-सप्प करै छी तखन पिताजी जे बजला आ नइ बुझि पेलौं तँ दोहरा कऽ पुछियो तँ सकै छिऐन।मुदा सुवासिनीक मनमे से नहि भेलैन। हिनका मनमे उठलैन जे पति-पत्नी मिलि परिवारक गाड़ीक खींच रहल छी, जँ गाड़ीक एकटा पहिया कमजोर रहत तँ रस्तामे केतौ टुटि सकैए वा लसकियो तँ सकिते अछि...। ओना, रामलखनक मुहसँ विचार खसने चुपा-चुपी पसरिये गेल छल, मुदा से सुवासिनीकेँ नीक नहि लगलैन। परिवारक सभ कियोसभ दिससँ भरि दिन भ्रमण केला पछाइत अखन एकठाम भेलौं हेन आ तैयो जँ सभ चुप्पे-चुप रहि जाएब तखन परिवारक भरि दिनक गति-विधिक जानकारी केना हएत? जिनगी तँ जिनगी छी, ई तँ नहि जे जहिना चिड़ै मारनिहार व्याधा जिनगी भरि चिड़ैक मारि-मारि चरौर केलक आ अपने जखन मृत्यु सजियापर पड़ल तखन मनमे एका-एकी जिनगी भरिक सभ चिड़ै आबि-आबि अपन हिसाब पुछए लगए! जिनगी तँ जिनगी छी,एकर तँदिन-दिनक हिसाब-बाड़ी फरिछबैत चली। ने बॉंचत बाइस आ ने खाएत कुत्ता। लूटि कऽ आनू कूटि खाउ,परात भने लूटै-कुटैले बुलन्दीसँ फेर जाउ..! चुपा-चुपी देख सुवासिनीकेँ नइ रहल गेलैन। पतिपरनजैर चढ़बैत बजली- “ई तेने बुझि पड़ैए जे ऑफिसमे सरकारक अंग बनि बजै छी!अखन परिवारमे छीतँए परिवार जकाँ परिवारसँ सम्बन्धित बात-विचार जखन बाजब तखने ने परिवारोसँ उत्तर पेबैक आशा करब।” सुवासिनीक मुँहक बात जगमोही सेहो एकस्वरे धियान लगा सुनि पिता दिस देखए लगल। पत्नीक संग जेठ बेटीक एकसंग चारि आँखि अपनापर पड़िते रामलखन सचेत होइत बजला- “सभ कियो परिवारमे छी, बुझिते छिऐ जे परिवारक गाड़ी अनवरत चलैबला छी,तँए ऐमे छुट्टी-छाट्टीक प्रश्ने ने अछि, अमैया छुट्टी हुअकिदुर्गापूजाक,मुदा ओ तँ स्कूल-कौलेजक छुट्टी भेल। हँ, सभ बहिनकेँ जरूर महिना दिनसँ ऊपरेक छुट्टी हएत, मुदा हमरा तँ एको दिनक छुट्टी नइ हएत। सी.एल. सेहो गनले दिनक भेटैए, तखन अमैया छुट्टी केना सभ मिलि प्रेमनगरमे बिताएब?” पतिक बात सुनि सुवासिनी, जवाबदेहक हैसियतसँ बजली- “बहुत दिन नैहर गेना भऽ गेल, नारीक नारीत्व तँ तखन ने उभरै छै जखन नैहर-सासुरक बास होइत रहल। जाबे तक बेटीक बिआह नइ भेल रहै छै ताबे तक नैहर आकि सासुरे थोड़े पनपैए। ओ तँ बिआहक पछाइत, दोसर समाजक बासीबनैक क्रमसँ शुरू होइए। फुलकुमारीकई बारहम बर्ख छी...।” नैहरक बातसँ अलग होइत फुलकुमारीक नाओं सुनिते रामलखन बिच्चेमे बजला- “जाबे धरि माता-पिता जीबै छलाताबैये धरि ने नैहर छल, भाए-भौजाइ अपन नैहर-सासुर देखत कि उजड़ल-उपटल बहिन-बहनोइकेँ देखत..!” ओना, पतिक बात सुनि सुवासिनी ठमकली। ठमैकते मनमे अनासुरती उठलैन जे एक हिसाबे तँ पति उचिते कहि रहला अछि,नैहराक परिवारो तँ एहने बनि गेल अछि। मुदा अपन माए-बापक बासभूमिकेँ सुबास नहि मानि कुबास मानि ली, सेहो केते धरि उचित हएत? सुवासिनीक मन भीतरे-भीतर–माने विचारक बीचो-बीच–फरफराए लगलैन। एक दिस मौजूदा परिवारकेँ तँ देखते छेली,दोसर दिस अपन बीतल जिनगीक परिवार सेहो आँखिक आगू आबि ठाढ़ भऽ गेलैन। सुवासिनी सकपकाए लगली। माइक सकपकाइत मनकेँ टोबि माता-पिताक बीच सामंजस करैत जगमोही बाजल- “बाबूजी, ओनाअखन हम मातृकक हिसाबसँ धीरेन्द्रकेँ नहि जानि रहल छिऐन, मुदा ओ कौलेजक क्लासक संगी छिया, संगे-संग कौलेजोक क्लास करै छी आ ट्यूटोरियल-क्लासमे सेहो संगे रहै छी, वएह कहलैन जे ऐबेरक छुट्टी प्रेमेनगरमे बिताउ।” जगमोहीक बात सुनि रामलखन सहमला। सहैमते विचारमे मधुरस जगलैन। मधुरस जगिते विचार मोड़ लेलकैन। मोड़ लइते मनमे अनेको प्रश्न उठलैन। जँ पत्नीकेँ नैहर नहि रहतैन तखन अपन सासुर आ बाल-बच्चाकमातृक केना होइत? माता-पिताकेँ मुइने भलेँ समधियौर तर पड़ि गेल, मुदा ऐगला पीढ़ी लेल नाना-नानी, मामा-मामी आ भाए-भौजाइक गाम तँ रहबे करत किने? रामलखनकेँ पाछू दिस विचड़ैत देख बिच्चेमे सुवासिनी चिल्होरि जकाँ झपटैत बजली- “नैहर आ सासुर बेक्त-विशेषक नइ होइए, ओ मतो-पिता आ साउसो-ससुरक समाज होइए।” ओना, जगमोही तीनू बहिनकेँ ‘नैहर-सासुर’ तँ सुनल-बुझल छेलैहे मुदा ‘माता-पिता आ सासु-ससुरक समाज’ ने सुनल छेलै आ ने बुझले रहइ, तँए तीनू बहिनकेँ बुझैक जिज्ञासा एकाएक जगलै। ओना, तीनू बहिनक जिज्ञासा अपना-अपना बुधिक हिसाबे तीन रंगकभऽ गेल। जगमोहीकरहै-जखन मते-पिता दुनू समाजक करता-धरता छैथ तखन दू बेवस्थाक बीचक समाजमे की अन्तर अछि? फुलकुमारीक मनमे उठल- एकटा भेल ‘बपहर’ आ दोसर भेल ‘ममहर’, तखन दुनू समाज दू केना भेल? मुदा बाल मन फुलकुमारीक, तँए एकरा मनमे उठल-जखन ननो-नानी मरि गेलाआददो-दादी मरिये गेला तखन नाना-नानी आ दादा-दादीक खिस्सा-पिहानी केना सुनब? अपनाकेँ समगम होइत रामलखन समरस भऽ समरसतासँ बजला- “एक परिवारमे सभ रहितो सभरंगक जिनगीमे आबद्ध छीतँए सबहक बीच एकरूपतो अछि आ बहुरूपतो अछि। अही एकरूपता आ बहुरूपताक बीच सामंजस करैत चलब नीक।” ओना, रामलखन बहुत आगू बढ़ि अपन विचार रखलैन। मुदा सुवासिनीक मनमे जे नैहर-सासुरक समाजक बीचक अन्तर आकि दूरी अछि, तहीमे घुरियाइत रहैन। होइ छेलैन जे कखन अपन नैहरकेँ सासुरक बरबैरसमाजमे स्थापित कऽली। खाएर जे किछु.., मुदा रामलखनक विचारकेँ जेतेक जगमोही कनखैरकऽ सुनि बुझलक ओतेक सुवासिनी नहि बुझि पेली। तेकर कारण ई भेल जेसुवासिनीकेँ अपन नैहर-सासुरक विचार तेना मनकेँ पकैड़ नेने छेलैन जे कनसोहे बन्न भऽ गेल रहैन। मुदा धड़फड़ाइत बिच्चेमे सुवासिनी बजली- “जहिना अपन माए-बापक समाज तहिना दोसरोक माए-बापक समाज समाजे भेल। अही बीच परिवारसँ उठि समाजिक सरोकार बान्हैत एक नहि अनेको अंगीतकेँ सिरजन कएले जाइत अछि।” ओना, जहिना जगमोही माइयक विचार सुनलक तहिना रामलखन सेहो सुनलैन मुदा विचारकेँ आगू नहि बढ़बैत, बजला- “एक तँ ओहुना, बिनु बजेनौंमातृक आ नैहर लोक जाइते अछि, मुदा नौतो-हकार आ आग्रह-जिज्ञासाक तँ अपन महत् होइत अछि किने।” रामलखनक ऐ विचारसँ सबहक बीचक गप-सप्पक वातावरणमे एकाएक जेना मधुमास आबि गेल।थोड़ेकाल धरि चुप रहि सुवासिनी बजली- “जगमोही,तोहर कौलेज कहियासँ बन्न हेतइ?” जगमोही बाजल- “चारिम दिनसँ।” बिच्चेमे रामलखन बजला- “केतेक दिन छुट्टी रहतह?” जगमोही- “एक मास सात दिन तक।” रामलखन- “सात दिनकेँ आगू-पाछू करैत काटि दहक, बॉंकी एक मास जे बँचलह तइमे मातृकसँ भऽ आबह।” सुवासिनी- “हम सभ माय-धी जाएब, मुदा आनै-पहुँचाबैक भार तँ अहाँ लेब किने?” रामलखन- “तीन दिनक पछाइत रबि पड़ैए, रबि दिन पहुँचा कऽ प्रात भने चलि आएब आ तीस दिन जहिया पूरत, जँ ओइ दिन रबि वा छुट्टी नहियोँ रहत तैयो सी.एलो लऽ कऽ पहुँच आनि लेब सएह ने?” मुड़ी डोलबैत सुवासिनी बजली- “हँ।” [i]बेटीक बिआह ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय हमरे पार्टीक लोक एक दिन डॉ. दिलीप बाबूकेँ डेरापर बैसल रही।बालाकोट ऑपरेशनपर गप-सप्प करैत रही। तखने उदयजीक छोट भाए- विनीत जे एम.ए. पास छैथ एला। डॉ. दिपीप बाबू विनीतसँ पुछलकैन- “की विनीत केमहर-केमहर। कोनो खास बात छै की?” तैपर विनीत कहलकैन- “खासे बुझू। हमरा कनियाँकेँ खेनाइ नीक नै लगै छइ। खाइक क्षुधे ने जगै छइ।” तैपर डॉक्टर दिपीप बाबू एकटा कागजपर किछु दवाइ लिख देलखिन आ कागज विनीतकेँ दैत कहलखिन- “हम दवाइ लिख देलौं हेन। ई दवाइ सभ आनि कऽ दियौन। सभ ठीक भऽ जेतइ।” विनीत दवाइबला पुरजी लऽ चल गेला। हम डॉक्टर साहैबसँ पुछलयैन- “विनीत तँ मैथिलीसँ एम.ए. केने छैथ। की करै छथिन अखन ओ?” तैपर डॉक्टर साहैबक पत्नी बजली- “की करता..! कनियाँक नुआँ-विस्तर खीचै छैथ।” तैपर हम कहलयैन- “तब तँ विनीत हमरे पार्टीक लोक भेला।” हमर बात सुनि डॉक्टर साहैब आ हुनकर पत्नी ठाहाका मारि हँसए लगला। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल सघन बन भोरमे अनचोके नीन टुटिते लाल भाइक मुहसँ अनायासे निकललैन- “बाप रे! जीब कठिन अछि..!” ओना, नीक जकाँ लाल भाइक भक् टुटल नइ रहैन, भकुआएलमे मुहसँ निकललैन। ओछाइनपर सँ उठि ठाढ़ भेल रहैथ। तइसँ किछुए पहिने पत्नी उठि घर बहारि रहल छेलखिन। पतिक बात सुनि सुचित्रा भौजी मने-मन विचारि लेली जे भरिसक सपनाएल मन छैन तँए मुहसँ एहेन बोल निकललैन। एहनो भऽ सकैए जे सपना देखते समय नीन टुटि गेल हेतैन, तहूसँ एना बजला अछि। ..मुँहक बातकेँ, सपनेक बात बुझि सुचित्रा भौजी झुठियाबए लगली। ओना, मनमे ईहो उठैत रहैन जे सुतैकाल, ओछाइनपर अबैसँ पहिने नीक जकाँ हाथ-पएर नइ धोने हेता तँए सपनेला अछि। फेर भेलैन जे जँ हाथ-पएर धोनौं होथि आ ओछाइनकेँ नीक जकाँ झाड़ि कऽ नहि ओछौने होइथ? मुदा अपने मन रोकैत कहलकैन जे ओछाइन तँ अपनेसँ झाड़ि कऽ ओछौने रही..! लगले फेर दोसर विचार जगलैन, एहनो तँ भइये सकैए जे पैशाव करि कऽ नहि सुतल होइथ। अनिसचित विचार सुचित्रा भौजीक मनमे उठने निसचित विचार जगबे ने केलैन। घर बाहरब छोड़ि सुचित्रा भौजी लाल भाइक चेहरापर नजैर देलैन। बसियाएल फूल जकाँ लाल भाइक चेहरा मौलाएल सन बुझि पड़लैन। पतिक चेहरा देख सुचित्रा भौजी किछु पुछैसँ पहिने परहेज करैत सोचली जे दिनक वा खाइ-पीबै राति तकक जँ बात रहैत तँ निर्भिक भऽ पुछलो जा सकइ छल मुदा लगले बिछानपर सँ निनाएल उठबे केला हेन। ई तँ ओहन अवस्था छी जखन कियो समाधि सम्पन्न करैत उठै छैथ। ई अवस्था दुनियाँ-दारीसँ हटल रहैक होइए, तइ बीच दुनियाँ-दारीक ओहन विषये किए सोझामे औत जे एना चौंक कऽ बजला..? ...किछु बजैसँ परहेज करैत सुचित्रा भौजी अपन मुँह बन्ने रखली। लाल भायकेँ ओछाइनपर सँ उठिते पत्नीपर, माने घर बहारैत सुचित्रापर नजैर पड़ि गेने चेत एते चेतनशील भइये गेल रहैन जइसँ मनमे उठैत अनेको दृश्यकेँ मनेमे दाबि अनमनस्क भेल विचारि लेलैन जे मनक देखल दृश्यकेँ मने-मन किए ने मँथली जे आखिर एहेन दृश्य मनमे आएल केना? देखल दृश्य जँ दोहरा कऽ अबैए तँ ओ उचित भेल मुदा बिनु देखल ओहन दृश्य जँ अबैए तँ ओहन दृश्यक रूप मनमे बनल केना? तँए अनमनस्क ठाढ़ भेल लाल भाय विचारए लगला। भोरक सपना। भोरक सपना तँ सत् होइते अछि, की दृश्य देखलौं? यएह ने देखलौं जे जीवन विचड़नक बीच सघन बन पहुँच गेलौं, जइमे सुन्दर-सुन्दर गाछो-बिरीछ, झड़नो-पहाड़ आ बाघ-सिंह आ भालु सन जानवरो अछि। तइ बीच जीब केना सकै छी? जी-बन माने जिनगी बना जीब कठिन अछिए। मुदा लगले मन ठोस गबाही दैत कहलकैन जे कठिन जरूर अछि मुदा असम्भव अछि, सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। जँ से रहैत तँ फेर जीवक जीवन अछि की नहि..! चौंकल मन लाल भाइक छेलैन्हे, अपन पूर्वज मोन पड़लैन। राजा हरिश्चन्द्र सपनेमे ने राज-पाट सभ बोहा लेलैन। मुदा ई विचारबे ने केलैन जे राज-पाट राजवासीक छिऐक आकि अपन खतियानी छी..! लगले लाल भाइक मन मोड़ लेलकैन। मोड़ ई लेलकैन जे भोरमे सपना देखलौं। मुदा भोरक सपना कहब केकरा? जँ समयपर सुतल रहितौ, जइसँ नीन पुरि गेल रहैत आ उठैसँ पहिनहि भोरमे जँ सपना देखने रहितौं तखन, एक बात होइत। मुदा भरि राति आन-आन काजमे बाँझल रही आ भोरमे पलखैत भेलापर अराम करए ओछाइनपर गेलौं कि नीनक संग सपनो चलि आएल, एहेन सपनाकेँ कोन सपना कहब? ई तँ भेल जे विद्यालयमे नाओं लिखौलौं आ स्नातकक सुख मनमे नाचए लगल वा आमक आँठी रोपलौं आ मने-मन आम-चूरा खाए लगलौं..! असल सपना तँ ओ ने हएत जे विद्यालयमे प्रवेश केलौं आ एक-एक अक्षरकेँ सीखि ओकरा जोड़-घटाउ, गुणा-भाग करैत स्नातकक श्रेणीमे पहुँच अपनाकेँ स्नातकक सुख देब। आकि तुलसीकृत रामायणिक एक पाँति- ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज्य कबहुँ नहि व्यापा...।’ रटि लोकक बीच प्रवचन केना दऽ सकै छी। आम-चूरा खाइसँ पहिने, चूरा केना बनैए आ आममे सुअदगर रस वा गुद्दा केना अबै छै; तेकरा जखन मनमे मथि लेब तखन ने मैथिली शब्द बुझबै। तैबीच बुलेट गोलीसँ टिटही मारू आ गुलेतीक गुल्लीसँ सिंहक शिकार खेलै जाउ...। तुलसी बाबा तमसा कऽ रामायणमे ई पाँति लीखि देलैन सेहो बात नहियेँ अछि। ओ देह आ आत्माक स्पष्ट व्याख्या करैत लिखला अछि। खाएर जे अछि ओ रामायणिक बात भेल। किए तँ तुलसी दास सेहो सगुन रूप रामेकेँ पूज्य मानि जीवन भरि पूजन करैत रहला आ कबीरो दास रामेकेँ पूज्य मानि जीवन भरि पूजन करैत रहला मुदा दुनूक राम एके छैथ वा गुण-शीलक हिसाबसँ दू छैथ ओ तँ वएह दुनू गोरे अपन पनचैतियो करता आ कातमे बैस आत्मारामो देखबे करता। तइसँ लाल भायकेँ कोन मतलब छैन। हुनकर मन तँ अपने भोरक चक्रमे भौराएल छैन। तइ बीच सुचित्रा पुन: लगमे आबि बजली- “घरेक बरेड़ी मने-मन गनैत रहब आकि भोर भेल दुनियोँ गनए जाएब..?” पत्नीक बात सुनि लाल भायकेँ तामस नहि उठलैन। नइ उठैक कारण भेलैन जे भौराएल शब्द पत्नीक मुहसँ सुनलैन। भौंरे ने दिनक अन्तिम पहरमे कमलक सिनेह पेब, अपने-आपकेँ समरपित करैत बिसरभोर होइत भोरक पहर कमलकेँ छोड़ि दुनियाँ देखए उड़ैए। ओना, लाल भाइक मन कमल आ भ्रमरक बीच जरूर गेलैन मुदा बेसी काल टिकलैन नहि। लगले अपन सपनाक दृश्य सोझहामे फेर आबि गेलैन। अपन मनक सपनाकेँ मनेमे दाबि विचारए लगला। जँ अपन मनक सपनाकेँ पत्नीक सोझमे खोलब आ ओ अँगने-अँगने टहैल-टहैल परसादी बाँटए लगती, माने आन-आनकेँ कहती, अनेरे होत्-सँ-होतान हएत। किए तँ कम आँट-पेटक लोकक कानमे, कोनो गम्भीर विचार वा पैघ विचार, गेने अनेरे कान कुकुअए लगैए आ जेहो विचार लोककेँ कहैबला नहि रहल सेहो विचार लोकक बीच बीआ-वाण (छिटा) भऽ जाइए। पत्नीपर सँ मन हटि लाल भायकेँ अपन सपनापर आबि गेलैन। अबिते मन कहलकैन जे अपने तँ सपनाक अस्सल विचार किछु बुझि नहि रहल छी, आ दोसरकेँ पुछि जँ बुझि नहि लेब तखन अनेरे मनमे बोझ बनल रहत जइसँ ने कोनो काज करैमे मन लागत आ ने असथिरे रहि पएत। जँ बलजोरी किछु करबो करब तँ नीको-अधला बनि सकिते अछि। सघन बोनकँ कातसँ देखते जहिना मन डरेबो करैए आ हेराइक सम्भावना सेहो रहैए तहिना लाल भाइक मनमे भऽ रहल छेलैन। ने किछु करैत बनि रहल छेलैन आ ने किछु नहि करैत बनि रहल छेलैन। गुन-धुनमे पड़ल मनमे उठलैन जे जाबे मनुख अपन गुन-धुनकेँ धुनकीमे धुनि रूइया जकाँ हल-हलका नइ लेत ताबत अकासमे उड़ि केना सकैए। तइले ते कोनो ज्ञानी, जानकारसँ पुछिये कऽ ने ओकर गुणनक्रिया कऽ सकै छी। सौनक मेघ जकाँ लाल भाइक मन उमैड़ कऽ घुमड़लैन। घुमैड़ते विचार उठलैन जे अपन परिवारे नहि, गामोक लोक गुरुकाकाकेँ सपनोक पारखी आ जीवनोक पारखी बुझै छैन तँए हुनकासँ पुछि लेब बेसी नीक हएत...। लाल भाइक मन मानि गेलैन जे गुरुकाकाकेँ अपन पेटोक सभ बात आ सपनोक सभ दृश्य सुनौलासँ किछु-ने-किछु रास्ता भेटबो करबे करत। जँ संतोषप्रद, सवुरगर विचार भेटत तँ ओइपर अमल करब आ जँ से नहि भेटत तँ या तँ आगू बढ़ि दोसरोकेँ पुछबैन वा ताधैर अमलमे नहि आनब जाधैर सपनाक फलाफलक आगमन नहि हएत। गुरु कक्काक असल नाम ज्ञानदेव छिऐन, जे लाल भाइक पितियौत बाबाक सम्बन्धमे लगै छैन। जहिना आनो-आन लोककेँ माता-पिता वा समाजक देल छठियारीक नाओं तर पड़ि जाइए आ कर्मगत वा बेवसायगत नामक सिरजन भऽ जाइए, तहिना ज्ञानदेव काकाकेँ सेहो भेलैन। ‘ज्ञानदेव’ नाम बुढ़े-पुरान टा जनै छैन, माने छठियारी रातिक देल नाम, बाँकी नवको पीढ़ी आ पुरानो पीढ़ीक ओहन लोक जिनका ज्ञानदेव कक्काक छठियारीक नाम नहि बुझल छैन, गुरुए-कक्काक रूपमे जनै छैन। ओना, तइमे एकटा विशेष बात ईहो भऽ गेल छैन जे अपन छोट भैयारियो आ जे बेटा-भातीजक अंगीतमे छैन सेहो आ जे तेसर पीढ़ीक नाति-पोताक अंगीतमे छैन सेहो, सभ गुरुए काका कहै छैन। लाल भाय गुरुकाका ऐठाम अपन सपनाक विचार करैक खियालसँ विदा भेला। पत्नीकेँ किछु ने ओइ विषयमे कहलैन। कहलैन खाली एतबे जे कनी गुरुकाका-ऐठाम एकटा काजे जाइ छी। ओना, सुचित्रा भौजी सेहो, जखनसँ लाल भाइ ओछाइनपर सँ उठला आ मनक संग चेहरो मौलाएल-मौलाएल सन बुझि पड़लैन तखनसँ मने-मन हिनके-दे सोचि रहल छेली, मुदा ‘हँ-हूँ’ किछु बाजि नइ रहल छेली। भिनसरक आठ बजे समय। फागुन मास, तँए समयमे मस्ती आबि गेल छल। गुरुकाका पार्वतीपुरक घटनापर विचार कऽ रहल छला। अजीव घटना पार्वतीपुर महंथानाक अछि..! कहियासँ महंथाना स्थापित भेल से तँ नहि बुझल अछि मुदा पाँच पुस्तसँ, लगभग डेढ़ साए बर्खसँ तँ जरूर बुझल अछि। अखन जे महंथानाक महंथ छैथ हुनकर नाओं शंकरदास छिऐन। हिनकासँ पूर्व शंकरदेव दास छला। शंकरदेव दाससँ पहिने महादेव दास छला। महादेव दाससँ पहिने देवदास छला आ देवदाससँ पहिने शंकरदास छला। अखन जिला-जवारमे सभसँ नमहर पार्वतीए-पुरक महंथाना अछि, जे देशक राजधानी जकाँ अछि। अखन तक पार्वतीपुर स्थानक चलैन रहल अछि जे महंथजी गाइयक दूधसँ दुनू साँझ नहाइ छैथ। घटना ई भेल जे परसू रातिमे महंथजीकेँ अपने चोरी भऽ गेलैन। ऐठाम अष्टघातुक मूर्तिक चोरी नहि, जीवित महंथजीक चोरी भऽ गेलैन। अजीव घटना तँए अछि। गुरु कक्काक मनमे सिनेमाक रील जकाँ पार्वतीपुरक महंथक घटना चलए लगलैन। ओना, आँखिक देखल घटना छेलैन नहि। किए तँ आँखिक देखल वा कानेक सुनल कोनो वस्तु वा घटना किए ने होउ मुदा देखला पछाइत वा सुनला पछाइत मन तँ मनन करिते अछि। तहिना गुरुकाका सेहो ओकर जोड़-घटाउ-गुणा-भाग कऽ रहल छला। घटना भेल केना? चारिम दिन करीब चालीस-पचासटा दाढ़ी-केश बढ़ौल बबाजीक रूपमे बैग-एटैची नेने अयोध्यासँ जनकपुरक तीर्थयात्री कहि पार्वतीपुर-स्थानपर पहुँचल। एक तँ अयोध्या वासी, एकर माने साकेत नहि बुझब, दोसर जनकपुरक तीर्थयात्री, तँए स्थानमे नीक जकाँ आगत-भागत सभकेँ भेलैन। ने खाइ-पीबैक कमी स्थानमे आ ने खुऔनिहार-पीयौनिहारक कमी। सभकेँ रहैक नीक बेवस्थो भेलैन। साँझक करीब आठ बजे साए-डेढ़ साए यात्री फेर पहुँचल। सबहक आगत-भागत नीक जकाँ भेलैन। निसभेर रातिमे घटना भेल। महंथजी ला-पता भऽ गेला। दिनमे, जे तीर्थयात्रीक समूह छल ओ स्थान पकैड़ लेलक आ जेते पहिलुका सभ छला सभकेँ साए-साए बेर कान पकैड़ उठा-बैसा पुन: स्थानमे रखि लेलकैन। गुरुकक्काक मुहसँ अनायासे फुटलैन- “हद भऽ गेल..!” ओना, गुरुकाका असगरे छला, दोसर कियो सुननिहार नहियेँ छल, मुदा तहीकाल लाल भाय जे पहुँचला से अझप्पे सुनलैन। गुरुकक्काक मुहसँ सुनल- ‘हद भऽ गेल!’ सुनि लाल भाइक मन अपनो दिस ठहकलैन जे अपनो तँ हद पार कइये नेने छी...। गुरु कक्काक लगमे लाल भाय पहुँचते बजला- “गोड़ लगै छी गुरुकाका..!” गुरुकक्काक मन पार्वतीपुरमे टहैल रहल छेलैन। तैबीच ‘गोड़ लगै छी’ सुनिते गुरुकाका चौंकैत बजला- “नीके रहह बौआ! तोरासँ भेँट करैक मन केता दिनसँ होइ छल, मुदा पलखतिक दुआरे जा नहि पबै छेलौं। भने तूँ आबिये गेलह। कहह, की हाल-चाल छह?” गुरुकक्काक विचार सुनि, ओना लाल भाइक मुहसँ निकैल गेल छेलैन- ‘बड़बढ़ियाँ’, मुदा अखन तक जे मनमे अपन सपना लटैक कऽ झुलिये रहल छेलैन, तइसँ भिन्न गुरुकक्काक मुहसँ ‘हद भऽ गेल’ सुनि दोसरो-तेसरो विचार मनकेँ झुलझुला देलकैन, मुदा बजला नहि। अपने मनक बातकेँ चालैत गुरुकाका बजला- “बौआ सहदेव, पार्वतीपुरक घटनो किछु बुझलह अछि?” ओना, अपन कानसँ एक गोटाक मुँहक बात सुनब एक बात भेल, आ वएह घटना वा कोनो विचार दू-चारि-पाँच-दस बेकतीक मुहसँ सुनब दोसर भेल। जे पहिलुकासँ पक्का भेबे कएल। मुदा ठीक एकर विपरीत, एक गोटाक मुहसँ कोनो अपना संग घटित भेल घटना वा अपना सोझमे घटित घटनाकेँ सुनब आ अपना संग बिनु घटल घटना वा बिनु देखल घटना वा घटित घटनाकारक मुहसँ नहि सुनि आनक मुहसँ सुनल सेहो होइते अछि। मुदा अपन मनक विचारमे नहि ओझरा लाल भाय बजला- “मौगी-मेहैरिक मुहसँ जरूर किछु-किछु सुनलौं मुदा ओइपर धियान नहि देलिऐ, तँए बुझू जे नहियेँ सुनलौं अछि।” शास्त्रीय विचारक लोक गुरुकाका छथिए, विचारकेँ छील-बना बजला- “तखन तोरे समाचार विचारपूर्ण हेतह। की सुनलह से बाजह।” गुरुकक्काक बात सुनि लाल भाय असमंजसमे पड़ि गेला। असमंजसमे ई पड़ला जे जेकरा हम मौगी-मेहैरिक बात बुझि मोजर नइ दइ छी, तेकरे गुरुकाका अस्सल विचार बुझै छैथ! ..लाल भाइक मनमे जेना उदवेग चढ़लैन तहिना बजला- “काका, अखन बेटा-भातीजक सम्बन्ध नहि बुझू। हम संवाद वाहक भेलौं आ अहाँ संवाद ग्राहक भेलौं। तँए कहैमे एको रत्ती धकचुक्की नइ अछि।” लाल भाइक बात सुनि गुरुकक्काक मन जेना चपचपा गेलैन तहिना चपचपीक संग मुहसँ निकललैन - “बौआ सहदेव! परिवार हुअ कि समाज, सत् बात बजैमे एको पाइ धकचुकाइ नहि।” गुरुकक्काक बात सुनि लाल भाइक मन फेर ओझरा गेलैन। ओझरा ई गेलैन जे एहनो तँ आँखिक सोझमे अछिए जे आँखि जेकरा देखलक चोरि करैत, न्यायालय ओकरा चोरि करैत नइ देखलक। तखन ओकरा की बुझब? मुदा लगले लाल भाइक मनक विचार आगू बढ़ि गेलैन। आगू बढ़िते मन सुझौलकैन जे केकरो मुँहक सुनले बात ने बाजब, तँए पहिने ओकरे नाओं किए ने अगुआ कऽ बाजी। ..लाल भाय बजला- “काका, महिनाथपुरवाली भौजी ओही महंथानामे फूल तोड़ैक काज करै छैथ, वएह बाजल छेली जे महंथजी एकटा नअ-दस बर्खक चेलीक संग काशी घुमए गेला हेन। चोरी, माने महंथजीक चोरीक समाचार सोल्होअना अफवाह छी।” लाल भाइक बात सुनि गुरुकाका बजला- “तोरे सुनलाहा विचार सत् भऽ सकैए, सहदेव।” गुरुकक्काक मुहसँ ‘सत् विचार’ खसिते जेना लाल भाय चौंकैत चकोना होइत बजला- “काका, हमर नाम अगुआ कऽ नहि बाजब जे सहदेव बाजल छल। महिनाथपुरवाली भौजीक नाओं अगुआ कऽ बाजब।” गुरुकाका बजला- “कहलह ते बड़ सुन्नर विचार, मुदा हमर कान तँ तोरे मुँहक बात सुनलक। अच्छा छोड़ह ऐ सभ बातकेँ, ने तूँ किछु महंथानाक समाचार पसारह आ ने हम पसारब। अनेरे दू-तीन घन्टा समय पानिमे चलि गेल।” लाल भाय बजला- “काका, आइ भोरमे जखनसँ सपना देखलौं तखनसँ मन डेराएल-डेराएल सन भऽ गेल अछि।” लाल भाइक मुहसँ सुनल ‘डेराएल-डेराएल सन’ सुनि गुरुकाका लाल भायपर सँ नजैर निच्चाँ उतारि मने-मन विचारि बजला- “सपना तँ सपना छी, ओइसँ डेरेबाक की अछि। ओना, सपनोक दू रूप अछि। जहिना अनुकूल आसक्ति आ प्रतिकूल आसक्तिक बीच अछि। एकटा जहिना अकास चढ़ा दइए तहिना दोसर, पताल दिस सेहो धकेलिये दइए।” गुरुकक्काक विचार नीक जकाँ लाल भाय नहि बुझि सकला तँए मन अकबका गेलैन। मुदा लगले अपने मन सुझौलकैन जे जखन गुरुकाकासँ पुछैये-ले आएल छी, आ एक बेरमे नहि बुझि पबै छी, तँ किए ने दोहरा-तेहरा खरिआरि कऽ पुछि खरिआरि ली। ..लाल भाय बजला- “काका, एना झाँपन-तोपन दऽ कऽ बाजब तखन हम थोड़े बुझब। एक तँ अहाँ अपने ओहन लोक छी जे जेहेन लोक देखै छिऐ तेहेन वेष बना लइ छी। माने ई जे जिनकासँ गप करै छी हुनकर भाषो-शैली आ भावो-अभाव आ ओही भावो-अभावमे गप-सप्प करै छी। जे कोनो विषयकेँ जड़ियो-मूलकेँ खोजि निकालि दइए, आ कोनोकेँ झाँपि-तोपि मटिआइये दइते अछि।” लाल भाइक बात सुनि गुरुकाका बुझि गेला जे सहदेव अपन बात माने सपनाक बात, जड़ि-मूलसँ बुझए चाहि रहल अछि। प्रश्नकर्ताक प्रश्नक भावनाक जेहेन गहराइ वा जेहेन छीछलपन होइए ओइ अनुकूल ओकर उत्तर देबे ने ओकरा-ले समीचीन होइए। अपनकेँ एक स्तरपर, माने जीवनकेँ एक सीढ़ीपर ठाढ़ करैत गुरुकाका बजला- “बौआ, कनी जड़िसँ बुझा कऽ बाजह।” गुरुकक्काक जिज्ञासा देख लाल भाय बजला- “काका, निसभेर नीनमे रही। मनमे सपना जगि गेल। सपनाकेँ जगिते देखलौं जे ओइ सघन बन बीच पहुँच गेलौं अछि, जइ बनमे बाघ-सिंह-भालू इत्यादि खुनपीबा जानवर सभ भरल अछि। डर भेल जे आब जान नहि बाँचत। तही काल डरे नीन टुटि गेल।” लाल भाइक विचारमे किछु एहेन विचार गुरुकाकाकेँ भेटिये गेलैन जे विचारणीय अछि, मुदा विषयकेँ माने सपनाकेँ हलकबैत गुरुकाका बजला- “बौआ सहदेव, सपना सपना छी। सभ कि राजा हरिश्चन्द्रे छी जे सपनाक पाछू पड़ि असमसानक ओगरवाही करत।” लाल भाइक मनकेँ सपना चोटाइये देने छैन जइसँ छाती थरथराइये रहल छेलैन मुदा तैयो विचारमे दृढ़ता अनैत बजला- “काका, सपना जँ सपने होएत तखन लोककेँ लोक लग अनेरे बजैक कोन खगता छै। जहिना सपना देख सुति कऽ उठल तहिना बिनु देखल जकाँ अपन नित्यकर्ममे लगि जाएत, मुदा तैयो लोककेँ लोक किए कहै छै?” लाल भाइक विचारक भवलोककेँ देखैत गुरुकाका बजला- “बौआ, जखन सपनाक विचार करए चाहै छह तखन एक-एक शब्दक एक-एक अक्षरपर विचार करए पड़तह। ‘आगि लागल’ आ ‘अगिलगौन’, अक्षरक हिसाबसँ मोटा-मोटी एक्के अछि। मात्र एक अक्षर आ दू मात्रामे अन्तर अछि। तइमे अक्षरक रूप बदलने ‘न’ आ ‘ल’ सेहो बदैलते रहैए। आब तोहीं कहह जे दुनू- ‘आगि लागल’ आ ‘अगिलगौन’ एक्के भेल?” विचारक प्रवाहमे लाल भाय बजला- “से तँ नहि भेल।” गुरुकाका बजला- “बौआ, अपना सबहक बाप-दादाक अरजल यएह अमूल्य धन छिऐन।” गुरुकक्काक मुहसँ, ‘बाप-दादाक अरजल अमूल्य धन’ सुनि लाल भाय चौंकैत बजला- “की अमूल्य धन, काका?” लाल भाइक आँखि-मे-आँखि गाड़ि गुरुकाका बजला- “बौआ, दुनियोँमे आ अपनो ऐठाम विभिन्न सम्प्रदाय सभ अछि, जे अपना-अपना ढंगे दुनियाँक विचार केनौं अछि आ करितो अछि, तही विचारमे सपनो अछि।” जेना कोनो पोखैरमे एकटा कमल फूल देख लोक बजबे करै छैथ जे ‘फल्लाँ पोखैरमे कमल अछि’, तहिना सम्प्रदायक जे पोखैर अछि ओइमे कमल नइ अछि सेहो बात नहियेँ अछि। सेहो तँ अछिए। तहिना देवी भागवतमे साधना, उपनिषदमे ज्ञान, कुरानमे समाजिकता, बाइबिलमे सेहो समाजिकता वेदमे विद्वतापूर्ण तर्क, हिन्दू धर्ममे व्यक्तिगत साधना आ गीतामे ज्ञान-साधना आ कर्मक समन्वय सेहो अछिए। ओना, लाल भाइक मन वौआए गेलैन। वौआइक कारण भेलैन जे अपन पढ़ल एकोटा पोथी वा ग्रन्थ नहि छेलैन मुदा कानसँ तँ सुनितो आबिए रहल छैथ आ सुनबो करिते छैथ। बजला- “गुरुकाका, दुनियाँ-जहानकेँ छोड़ू, अपने जान-जहानकेँ देखब बेसी नीक हएत। तँए अपन जे सपना अछि, तेतबे विचार दिअ।” लाल भाइक बात सुनि गुरुकाका बिहुसैत बजला- “बौआ सहदेव, जखन तूँ अकछा रहल छह तखन मोटा-मोटी कहि दइ छिअ।” बिच्चेमे लाल भाय बजला- “मारू मुँह ऐ दुनियाँकेँ, अपने केना निश्चलपनगामी बनि जिनगीक गमन करब, तेतबे बुझा कऽ कहू।” गुरुकाका बजला- “बौआ! जहिना सघन बनमे बाघ-सिंह-भौल देखलह, तहिना सघन जीवनमे हजारो रंगक हाथो आ हाथक सफाइयो तँ अछिए।” गुरुकक्काक बात सुनि लाल भाय अकबका गेला मुदा अपनाकेँ संयमित करैत बजला- “आरो?” हँसैत गुरुकाका बजला- “आरो यहए जे तहिना सघन मेघ सेहो सघन बरसा दइते अछि।” अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी बीहनि कथा- असरा बेरहट लए किछु देलकै ? हँ ,बान्हि देलियै . हम जाइ हियै....., नै सुनलकै की ? सुनि गेली ,मुदा हमर मोन करै है जे आइ नै जेतै से नै हेतै ? आइ मासक अन्तिम तारीख हइ, जएह एक दिनक खोराकी के पाइ त' बढ़ि जेतै. ओना मोन त' हमरो आगू - पाछू करैहए. ई कहतै बलू त' रहि जेबै! सब दिन त' एकरा थाका हारी रहिते हइ, आ घर अबै हइ त' बाले बच्चे सोहरल. हमरा लेल एकरा पलखति कहाँ रहै हइ. ईह.....! हम की भरि दिन खटै हियै अपने पेट खातिर! हे , पेट त' सबहक कोनहुना भरिए जाइ है. ई खाली, पेटे के सोचैत दिन, मास, बरख बितबैत रहओ. हम एकर पलखतिक असरे तकैत रहि जाइ हियै. आ एकरा लेल धानि सन! एह.....! हमहू त' कहिया स' उहे बाट तकैत रहियै. हे , एने आउ ने...... केवाड़क विलइया ठक सँ उठल ! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आनन्द कुमार झा कने हंसि लिअ आइ काल्हि कोरोना कालमे डिजिटल बैसारक धर्रोहि लागल अछि । कवि गोष्ठी, कथा गोष्ठी, विचार गोष्ठी , नाना प्रकारक गोष्ठीक आयोजन नित फेसबुक पर अबैत रहैत अछि । जे होइत रहबाक औचित्यो छैक । जीवनकेॅ चलेमान बनोने रहबाक लेल एकर आवश्यकता छैक । मुदा जखन सभटा फेसबुके पर हेबाक छैक तॅ अहि परहक एक्सपर्ट्स लोकनिक मांग बढलैक अछि । तेॅ चलाचलती छन्हि । सभ आयोजक लोकनिकेॅ मन पसीनक विशेषज्ञ भेटब कठिन छन्हि । साहित्यिक जाहि विधा पर कार्यक्रम राखल गेल छैक तकरे विशेषज्ञ हेताह तकर आब आवश्यक नहि रहलैक । आब तॅ बस ओहि कार्यक्रम के सफल बनेबाक छैक इएह उद्देश्य छैक नहिकि ओहि विधा , ओहि विधाक लोक केॅ आगाॅ बढेबाक छनि । उद्देश्य मात्र एतबहि हुनका समीक्षक बना चर्चित बनेबाक अछि । तॅ बेगर्ते कि करताह । नहिसॅ तॅ बढिया । आब लिअ आजुक बैसाड़क विषय - वस्तु अछि - कथा नाटक कविता उपन्यासमे वर्तमान पीढीक योगदान । आब तॅ अतिथि लोकनि आयोजक लोकनिकेॅ आश्वस्ति दए देने छथिन्ह । हमरा लोकनि अहि सेमिनारकेॅ कोनो हालतमे सफल बनएब । आधा समय बितिगेल एखनधरि मूल मुद्दा पर बात नहि आबि सकल । आयोजक लोकनि विचलित । ओ संचालककेॅ कनफुसकी करए लगलाह । कतए भसा रहलियैक अछि विमर्शकेॅ । आब तॅ संचालक आगत अतिथि लोकनिकेॅ अपन बाट दिस आनैक प्रयास कएलनि । मुदा ओ असफल रहलाह । अन्ततोगत्वा संचालक जी स्वयं विमर्शक निष्कर्ष सुनबैत कहलखिन्ह - आजुक विमर्श रास्ता भटकि गेल अछि । कारण ई पहिल विमर्श कार्यक्रम छल । अहिमे ओ सभ बात कतहुॅ नहि अएल जाहिलए ई विमर्श बजाआओल गेल छल । तथापि ई विमर्श हमर संस्थाक लेल फायदेमंद रहल । से अहि दुआरे जे अतिथि लोकनि जे किछु बजलाह ताहि सभ पर अगिला विमर्शक कार्यक्रम कए सकब । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आनन्द कुमार झा मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच मैथिली नाटकक बासडीह थिक ग्रामीण रंगमंच । हमरा लोकनिक इतिहास कहैत अछि जे प्राचीन समयमे ज्ञान, यज्ञ , तप करैक भूमि रहल अछि मिथिला । एतए सम्पूर्ण भारतक लोक ज्ञान अर्जित करबाक लेल अबैत छल । से कहबाक तात्पर्य हमर ई थिक जे पूर्वमे अहिठाम एतेक नवीनता छल जे एतुका लोक विरक्त भए आन आकर्षण दिश कहिओ आकर्षित नहि होइत छल । तेॅ पलायन नहि होइत छल । मिथिलाक सभसॅ पैघ खूबी छलैक जे जीविकोपार्जनक विधि-विधान आधुनिक रहितहुॅ , तकरा उपरान्तो ग्राम्य जीवनक स्वरूप कहिओ नहि बदलल । तेॅ हमरा ई कहैत कनिको असोकर्ज नहि भए पाबि रहल अछि जे मैथिली रंगमंचक विशुद्धरुपे ओकर जड़ि ग्रामीण रंगमंच थिक । बुझि सकैत छी जे ग्रामीण रंगमंच कतेक सशक्त छल जे विद्यापति जखन मैथिलीमे गोरख विजय नाटक लिखैत छथि तॅ तकर मंचन एकटा सुदूर ग्राम भैरव स्थानमे (वर्त्तमानमे रैयाम पूर्वी पंचायत ) करैत छथि । जकर मुख्य अतिथि महराज शिव सिंह होइत छथि । आब आहाॅ ग्रामीण रंगमंचक उत्कर्षक अन्दाजा लगा सकैत छी । बादमे ग्रामीण रंगमंच पूर्णरूपेण स्वतंत्र सेहो भेल । स्वतंत्र हम अहि अर्थमे कहैत छी । वर्तमान समयमे जे शहरी रंगमंच अछि ओ पूर्वग्रस्त रहैत छथि जे फल्ले नाटककारकेॅ नाटक हमरा करबाक अछि । चाहे ओ नाटक नीक होएक की बेजय होएक । तहिमे नाटककार सेहो अपन साहित्यक अपघात करैत रंगमंच पर कोना हमर नाटक हएत ताहि लेल साहित्यिक चिन्तनसॅ बेसी ओ रंगमंचक चिन्तन करैत देखाइत रहैत छथि । जखनकि रंगमंचक चिन्तन केनिहार रंगकर्मीक समूह अछि । खैर , से कहै लगलहुॅ - ग्रामीण रंगमंच पर जे नाटकक पोथी चयन करैक प्रक्रिया अछि ओ पूर्ण रुपसॅ पारदर्शी पूर्वक होइत अछि । पहिने नाटक होएबाक सुरसार सुरुह होइत अछि । फेर दू - चारि - पाॅच गोटएकेॅ ई भार देल जाइत छन्हि जे नाटकक पोथी कीनि आनथि । ओ लोकनि बजार जाकेॅ किताबक दोकानसॅ तत्कालमे जतेक पढि सकलाह से पढि पोथी कीनि लैत छथि । ओना कतेको गोटए तॅ भिन्सरसॅ साॅझ कए दैत छथिन पोथी पढैत - पढैत । कतेक बेर तॅ किताब दुकानदारसॅ कहा - सुनी सेहो होमए लगैत अछि । एकटा पोथी बिकएबाक हेतु ओ भरि दिन बरदएल नहिने रहत । जे से पोथी साॅझखनधरि आबि गेलैक । बड़का दलान पर पहिनेसॅ रंगकर्मी लोकनिकेॅ जमघट लागल रहैत अछि पोथीक अएबाक प्रतिक्षामे । आब तॅ हम पहिने पढब तॅ हम पहिने पढब । किछुकाल छिनाछिनी होइत अछि । एहन उत्सुकता नहि देखल जएह । कतेक बेर तॅ अहि छिनाछिनीमे पोथी सेहो फाटिचिट जाइत अछि । आब तॅ राति एक बजौ कि दू , भोरो भए जाउ , जाधरि सम्पूर्ण नाटकक पाठ नहि भए जाइत ता धरि केॅ ससरत । ताधरि तॅ सभक आंगनसॅ कतेको समाद आबि गेलैक भोजन करबाक लेल । कएगोटेक आंगनमे तॅ झगड़ा - झंझट सुरुह भए जाइत छैक । कतेक गोटएकेॅ भोजन झाॅपल राखल रहैत छल । घरमे सभ ठीक नहि रहलैक तॅ उपासलो सुतैत देखलियैक अछि । आब नाटकक सलेक्शन भए गेल । रिहर्सल सुरुह भए गेल । नाटककारकेॅ कोनो सूचना नहि छन्हि । जॅ सम्पूर्ण समाजक अगुआ लोकनिकेॅ रिहर्सलसॅ नाटक मंचनक परिणाम नीक बुझाइत छन्हि तहन बिचार होइत अछि जे अहि लेखककेॅ बजाआओल जएह । नाटककार अबै छथि । गामक लोकक संग नाटक देखैत छथि । मंच हुनका यथाशक्ति सम्मान करैत छथि । आब आहाॅ कहू कतेक स्वतंत्र छल हमर ग्रामीण रंगमंच । कतौ भेदभाव नहि चयन प्रक्रियामे । कि वर्तमान समयमे आकि अवैबला समयमे ई पारदर्शिता सम्भव अछि ? नाटककारकेॅ धर्म छी ओ साहित्यिक दृष्टिकोणसॅ समाजक हितमे नाटक लिखबाक चाही । नहि कि रंगमंच पर कोना नीक हएत । रंगमंच पर कोना नीक हएतैक ताहि लेल हमर रंगकर्मी लोकनि सतत प्रयासरत रहैत छथि । आधुनिक रंगमंच पर कोनो चीज देखएब आब असम्भव नहि रहलैक । अपन मंतव्य editorial।staff।videha@gmail।com पर पठाउ। नबोनारायण मिश्र एकटा पाकल आम

भाइमे एकसरे, परम दुलारू पाँच बर्षीय बालक ईश्वरजी अपन पिता द्वारा देल गेल मात्र एकटा पाकल आमपर प्रतिक्रियामे खिन्न होइत बाजि उठल-"पापा, एतेक रास आम किनलहँ अछि, एहिमे हमर हिस्सा एकहिटा भेल?" जँ सएह, तैयो शंकर भाइजी (खासे पितियौत) हमरा स बाछि कऽ एकहुटा वस्तु नहि खाइत छथि तँइ हेतु कमसँ कम एकहुटा आर आम हुनका लेल दिअ। एकसरे खेनाइ हमरा नीक नहि लगैए। पिताकें पुत्र द्वारा पूछल गेल एहन प्रश्नक आशा नहि छलन्हि । बारम्बार एकहि बातक आग्रहसँ तंग भऽ पिता पोलहबैत बाजि उठलाह - बेटा, जँ ओकरो सभक भार-चिन्ता हमहीं रखितहुँ तखन भिन्ने किएक होइतहँ? एही लेल ओकरा सभसँ भिन्न भेलहुँ जे अहाँकेँ सभ वस्तुक सुविधा ओकरासँ बेसी भेटय।। अहाँ बकलेल नेना जकाँ हठ पकरने छी। ओतेक जे हम ताकय लागब तखन आर दू किलो आम कीनय परत। पिताक उत्तर सुनि ईश्वरजी निरास होइत बाजि उठल- ठीक छैक, हम अहाँकेँ आब कहियो तंग नहि करब, हमर चिन्ता छोड़ि दिअ। हम दूनू भाइ एकहिटा आममे आधा-आधा बाँटि कऽ खा लेब। ताहिमे नहि ने अहाँ आ माय हमरा रोकब? (नबोनारायण मिश्रजीक ई रचना कर्णामृतक जुलाई-सितम्बर २००४ मे लघुकथा कहि प्रकाशित भेल छल) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार घर घर तीन प्रकारक होइत छैक। उच्च, मध्यम आ निम्न। एकर आरो भेद उपभेद भए सकैत छैक मुदा ताहिसँ हमरा कोनो बहस नहि। ओहिठाम हम जाहि घरक खेरहा कहब से भेल मध्यम। तँ आगा सुनू खेरहा मध्यम घरक। घरक मतलब मध्यम घर बुझल जाए। प्रत्येक घर ओ जीव होइत छैक जे मनमानी कए सकए। तुच्छ आर्दशक संग। तानाशाहीक बिना कोनो घर, घर नहि होइत छैक, चाहे ओ हमर घर हो वा कि अहाँक। सत्त इएह थिक। घर काठ अथवा ईंटासँ नहि, हुक्मसँ बनैत छैक। घर भूकंप अथवा तोड़लासँ नहि, हुक्म तोड़लापर टुटैत छैक। घर ओ नहि जाहिमे केओ फरमाइश कए सकल। घर ओ छैक जाहिमे हाथ उठा कए दए दिऔक। जकरा भागमे जे होएतैक से भेटतैक। घर अपना मोने किछु नहि होइत छैक। होइत छैक सभक मर्जीसँ मुदा ई घरे थिक जे अपन मर्जी के सभहक मर्जी बुझए लगैत अछि। ओकरा ईहो मोन नहि रहैत छैक जे हमर अस्तित्व कतएसँ अछि। ई घरे थिक जे जानि बुझि कए कोतबालक पदवी लैए प्रचुर योग्यता आ संभावनाक अछैतो प्रत्येक समय ओ कोतवालीक रुतबा देखबैत छैक अनेरो। ई घरे थिक जे कोतवाल बनि सूति रहैत अछि आ निन्नमे गबैत रहैए-'जगले रहिअह हो भाए। आ चोर चुप्पचाप माल निकालि लैत अछि ।घरकेँ दसटा आँखि होइत छैक दसटा दिशाक रूपें जे सदिखन लाल टरेस रहैत छैक। आ ई आँखि देखिते दोसरक आँखि झुकि जाइत छैक अनायास। घरक एकटा गरदनिमे एक लाख हाथीक आवाज रहैत छैक। कनिकतो खखसलापर लोकक पएर थकमका जाइत छैक। कान फाटि जाइत छैक। माथ दुखाए लगैत छैक अपने मने। लगही-नदी बंद भए जाइत छैक। प्रारंभिक वाक्य-: घर हिटलर अछि वा हिटलरे घर अछि एकर खोज करब आवश्यक। घर ओ जगह थिक जाहि ठामक घैलमे नोर भरल रहैत छैक आ चूल्हापर चढ़ाओल रहैत छैक हँसी। पिआस लगलापर लोक नोर पिबैत छैक आ भूख लगलापर हँसी चिबबैत छैक से अहाँ सभ बिनु लिखने बूझि गेल होएबैक। घरक लोक जखन लगही करैत होएतैक तखन नोर निकलेत होएतैक पोखरि दिस जाए कालमे हँसी। आ लोक जतए लगही करैत छैक ओहिठाम फुटि जाइत छैक मोनि। दिसा फिरलाहा जगहपर जनमि जाइत छैक गाछ। कथीक से सोचि लिअ। आ मोनि जतेक गहींर भेल चल जाइत छैक ओहि महक पानि ततबे सुखाएल जाइत छैक। गाछ जतेक नमहर होइत छैक, मनहूसी ओतबे नमहर भए जाइत छैक। गाछक डारि -पात नमरि जाइत छैक, सांसारिक समस्या जकाँ। हँ, एकटा गप्प आरो होइत छैक। पाहुन-परक अएलापर घैलक नोर नहि देल जाइत छैक। रान्हल हँसी जरूर भेटैत छैक। पाहुनक जखन लगही करैत छथि तखन मोनि नहि फुटैत छैक। हँ, दिसा फिरलापर गाछ जरूर जनमि जाइत छैक। आ सहयोग देबए लगैत छैक पहिनेसँ जनमल गाछकें। मोनि फुटैत अछि, गाछ जनमि जाइत अछि घरो-चलैत रहैए। भरत वाक्य - : नोर आ हँसीक माँझ घरक  स्थान छैक। घर ओ जगह थिक, जाहि ठामसँ दू टा बाट फुटैत छैक। एकटा आगू दने आ दोसर पाछू दने। बाम दहिनक प्रश्ने नहि। आगू महँक बाट पकड़ब तँ घंटा भरि लागत चौटिआपर पहुँचबामे। आ चौबटिओ तेहने। केन्द्र बिन्दुसँ चारि टा बाट निकलल आ फेर ओहि एक-एक बाटक शुरूआते में चौबटिआ फुटि गेल छैक आ क्रमश: प्रत्येक बाटमे एहनाहिते चौबटिआ फुटल छैक। आ अहाँ चौबटिआपर पहुँचि, थकमका जाएब। अथ-उथमे पड़ि जाएब। किछु नहि काज देत। कखनो सोचब जे ओहि बाटपर चलल जाए तँ कखने ओहिपर। घनचक्कर। किछु ने फुराएत। आ एहन समयमे बात अहाँ थाकि कए ओहि ठाम बैसि जाएब वा कोनो बाटपर चलि बिला जाएब वा पुनः घर घुरि जाए जहाजक चिड़ै जकाँ। आ जँ पाछूक बाट पकड़ब तँ पाँचो मिनटसँ बेसी नहि लागत चौबटिआपर पहुँचएमे। मुदा ओही चारि मिनटमे पाँच जुगक अनुभव भए जाएत। गोठुल्लासँ आगू बढ़ि पाएब जँ ओहि महँक निकलल बत्तीसँ आँखि माथ सही-सलामत बचि गेल तँ। आगू बढ़लापर दूगो घर बीचक एकटा गली भेटैत छैक। देहोसँ कम्म चौड़ा। कहिओ देबालमे लागि छिला जाएत। कहिओ किछु...। अगत्या पार कए जेबैक अहाँ कोनाहुतो ओहि गलीकेँ। आबि जएब चौबटिआपर। मुदा चौबटिआपर पाछूक बाटसँ पहुँचबाक पछातिओ अहाँक आगू में ओएह सनातन प्रश्न आबि ठाढ़ भए जाएत। कोन बाटपर बढ़ल जाए। निर्णय नहि कए सकब से हमरा बुझल अछि। आओर अंत में ओएह तीनटा उपाय-थाकि कए बैसि रहब वा अनचिन्हार बाटपर पएर बढ़ा देब वा घर घुरि आएब। ई घरे थिक जे दू-दूटा बाट राखिओ कए ककरो आँगा नहि बढ़ए दैत छैक। बृहस्पतिओ ग्रहसँ बेसी आकर्षण शक्ति छैक एकरामे। जतेक प्रबल शक्तिसँ अहाँ बाटपर बढ़बाक प्रयास करब एकर शक्ति ओतबे बढ़ल जाइत छैक। रामक समकालीन बालि जकाँ। आ अंतमे नुकाइए लेत ओ अपना पेटमे। घोर अन्हरियामे। पटकैत रहू माथ एहि देबालसँ ओहि देबालपर। टूटत नहि। फूटत नहि। निष्कर्ष वाक्य-: घर दू मूँहा अजगर थिक। घर ओएह थिक जे युग-युगसँ दुर्गा बनबाक देखैत देखैत मरि जाइत अछि। घर कहिओ ने बनि पबैत अछि दुर्गा। दुर्गाक दसटा हाथ आ एकटा मूँह देखि घर सोचैत रहि जाइत अछि जे दुर्गे जकाँ हमरो दसटा हाथसँ अबितै आ एकटा मूँहमे जाइत से कतेक नीक होइतैक। मुदा ई सपना देखिते-देखिते ओ भए जाइत छैक रावण। अबैत छैक दूटा हाथसँ मुदा जाइत छैक दस टा मूँहमे। कखनो कऽ घर ब्रम्हा आ रावणक रक्तसंबंधक प्रसंगमे सोचए लगैत अछि। सत्ते चतुर्मुखीक संतान दसमुखी केना ने हो। कहिओ-कहिओ घर सोचैत अछि जे दुर्गा नहि सही गणेश किएक नहि भए जाइत छी। पेट रहत मनुखक मूँह रहत जानवरक। जानवरक मूँहसँ दूभि-पात चिबाइए सकैत छी। सोहारी ओ भात तँ खएबामे कोनो दिक्कत नहि। मुदा घरक ईहो मनोकामना पूरा नहि भए पबैत छैक। आ रहि जाइत छैक ओ पहिनेहे जकाँ। कहिओ कए अधरतिआमे घर बिसुनाए लगैत अछि आ ओही कालमे ओकर बड़बड़ेनाइ चालू भए जाइत छैक। बड़बडेनाइमे ईहो मिलल रहैत छैक प्रार्थनाक रूपमे-हे भगवान वा तँ हमर मूँहे गाएब कए दिआ वा पेटे। ई दूनू बड़का गुंडा अछि। खास कए ई पेट। आ अंतमे ई प्रलाप सेहो बन्न भऽ जाइत छैक आँखिक संगे-संग। निष्पति वाक्य -: घर बड्ड किछु सोचैत छैक मुदा ओ पूरा नहि भए पबैत छैक। घरे एकटा एहन जीव होइत अछि जे अपना भीतर बाजल गेल हरेक शब्दकेँ रोकबाक लेल छोटोसँ छोट भुरकी बन्द कए दैत अछि। ई जनितो जे शब्दक दूत बसात होइत छैक। आ घरे तँ छैक जे दोसर ठामक गप्प सुनबाक लेल टाट की चारोकेँ हटा दैत छैक चाहे ओहिमे रहए बलापर पाथर खसौक वा पानि पड़ौक वा रौद लगौक। कोनो असरि नहि घरपर। आ एहन सामर्थ्य तँ घरे के हो जे घर में रहएबाला सभ पाथर, पानि रौदसँ भरि जाइत छैक मुदा ओ अपन काज कइएक निचैन होइए। छोट वाक्य -: घर मने ओ व्यापारी भेल जे कनेक लाभ लेल बड़का हानि के मोजर नहि दैछ आ बुझैछ जे हमरा पौ बारह अछि। कहिओ अहाँ सभ सोचलहुँ अछि जे आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे की अंतर होइत छैक। नहि ने। प्रयासो नहि कएने होएबैक। ओना दरबाजापरक घरकेँ घर कहले. नहि जाइत छैक। तइओ...। आङनक घर मने घरबैआ केबाड़ लगा लेताह तँ चारू दिससँ सुरक्षित। दरबज्जाक घरमे अहाँ सुरक्षित भइओ .सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। कतेको गोटाक घर आ दरबज्जामे मात्र एकटा टाटक अस्तित्व रहैत छैक। टाट हटा दिऔक कोन घर रहत कोन दरबज्जा से बुझि नहि पड़त। मुदा तैओ आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे अंतर होइत छैक। आङनक घरमे अहाँ ककरोपर खिसिआ कए हाथ छोड़ि देबैक मुदा दरबज्जाक घरमे चुप रहबाक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि। कारण जे होइक। आङनक घरमे केओ नोर बहा कए टाटकेँ अपन कथा कहि सकैत छथि। मुदा दरबज्जाक घरमे नोर की बेसी हँसिओ नहि सकैत छी। बेसी हँसब तँ लोक बताहे बूझत। आङनक घरक कोनो कोनमे एकटा कापी आ एकटा कलम रहैत छैक जाहिसँ लिखाइत छैक करेजक गप्प। दरबज्जाक घर महँक काँपीपर लिखाइत छैक नून-तरकारीक हिसाब। नमहर  वाक्य-: आङनक  घरमे सहजता होइत छैक। दरबज्जाक घरमे कृत्रिमता। घर मने एकटा ओहन मंच जाहिपर होइत रहैत छैक हर समय रंग-बिरंगी चौकी तोड़ नाच। एही चौकी-तोड़ नाचकेँ लोक गँड़िघुम्मा नाच कहैत जाइ छथि। आ नाचमे नटुआक जे घूमै घरक मूँह जरूर घूमि जाइत छैक। नाच खत्म भेलापर चौकी टूटल ककरो भेटतै की नहि भेटतै। मुदा टूटल मंच, टूटल घर जरूर भेटैत छैक। नाच शुरू होइत छैक चौकीतोड़क नामे मुदा अंतमे ओकर नाम रखबाक इच्छा भए जाइत छैक घरतोड़। मुदा ईहो एकरा अजगुते गप्प छैक जे एहि नाचक नाम हरेक बेर शुरू में चौकीतोड़ आ अंतमे घरतोड़ रहिते छैक। लोककेँ दूनू नाम पसिन्न छैक। एकैटा नामसँ गुजर नहि चलतै। आ ई घरे अछि जे एहि नाचमे ओ स्वयं भूमिका लैए आ दोसरो घरकेँ भूमिका दैए। आ सभ मीलि कए खेलैए चौकीतोड़ उर्फ घरतोड़ नाच। आप्त वाक्य - : घर एकटा मंच छैक जाहिपर नाच होइत छैक। सभ मीलि नाचैए आ खुश होइए। साँझ होइए, भोर होइए। इजोरिआ जाइए अन्हरिआ अबैए। देबाल ढहैए, चार टुटैए। नेओं पडैए, पीलर गड़ाइए। एस्वेस्टस किनाइए वा छत ठोकाए। सभ किछु होइए। एक घरसँ एकैस घर होइए। होइत जाइए। होइत जएबाक लेल बाध्य होइए। अन्तिम वाक्य - : घर ओ घर नहि अछि जे पहिने छल। घर ओ घर नहि रहत जे एखन अछि। (कथा विधाक ई हमर दोसर प्रकाशित लघुकथा अछि जे कि पटनासँ प्रकाशित घर-बाहर नामक पत्रिकामे अक्टूबर-दिसम्बर 2008 अंकमे प्रकाशित भेल छल। विदेहक पाठक एवं आन माध्यमक नव पाठक लेल हम एकरा एहिठाम दऽ रहल छी।- आशीष अनचिन्हार) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ लघुकथा पचहीबाली काकीक यात्रा-वृत्तांत उत्तिम काका बेसी दुखित भ' गेल रहथि।बेटा-पुतोहु इलाजक लेल ट्रेन सँ दिल्ली ल' गेलथिन।पचहीबाली काकी संगे रहबे करथिन।ओमहर सँ घुरती काल ट्रेनक टिकट नहि भेटि सकलैक।बेटा-पुतोहु केँ लंदन जेबाक रहनि।तेँ हिनका दुनू प्राणी केँ हवाइ जहाजक टिकट कटा एयरपोर्ट तक पहुँचाक' ओ लोकनि समुझा-बुझाक' चलि गेलथिन।सउँसे गाम इ समाचार पसरि गेलैक जे पचहीबाली काकी हवा-जहाज पर चढ़िक' दिल्ली सँ गाम अयलीह अछि।इ सुनि सउँसे गामक आइ-माइ सभ हुनका ओतय जुटय लगलीह।काकीक आँगन मे बड़का मेले लागि गेल। काकी सिरागू घर सँ भगवती केँ प्रणाम क' बहराइत छथि।आँगन मे लोकक जुटान देखि बजलीह - "काका केँ देखबाक लेल जुटै गेल छें गै? एहि लेल एतेक हसेरी बान्हि क' अबै गेलें हन?काका आब निकेँ छथुन! गै, अबै गेलेंहें त' ब्रह्मक घोड़ा जकाँ किएक ठाढ़ छें सभ गोटे?असोरा पर पटिया - शीतलपाटी सभ मोड़ल राखल छौक,से आँखि मे रतौन्ही भेल छौक?सूझै नहि छौक?एक रत्ती ल' क' ओछा लेबें त' रोइयाँ भगन भ' जाइ जेतौह?सभ दिन भसन्नरि के भसन्नरिए रहि जाइ जेबें?हमर बेटा बियाह केने रहय,तँ कतेक घोल- फचक्का केने रहय लोक सभ?आइ ओकरे सभक परसादे हवा-जहाज पर चढ़िक' हमहीं ने एलियैक? आकि आन?बाज!" सभ गोटे बैसि जाइ गेलथिन।तखन दुलारपुरबाली कहलथिन - "बहिन,भैया आब पूरा निकेँ छथिन ने?" काकी बजलीह - "गै, बूढ़ देह भेलनि।दबाइ पर छथिन।तखन तैयो आब ठीके छथिन।एकटा भेल जे बेमारीक बहन्ने हमरो तीर्थ-बर्थ भ' गेल।गे मैया, की कहियौक?ओमहरक मौगी सभ बड्ड रभसल! केकरो माथ पर नूआँ नहि।हमहूँ कहलहुँ जे गाम पर सौतिन सभ हमरे पुतोहु केँ देखि-देखि नाक-मुँह चमकाबै छल।छुछुनरी सभ एत्त' अबितय तखन ने चकबिदोर लगितैक?गै, की कहियौक?ओत्ते-ओत्ते टा घर नहि देखने रहियैक! एकटा होटल मे ल' गेल बौआ हमर।गे मैया सभ! तेहन छलछलौआ रहैक जे चली त' कतेक बेरि पिछड़िक' मुँहे भरे खस' लागी।गै, अपना सभक दिसन लोक चलै छैक आ सीढ़ी रुकल रहै छैक।ओमहर देखलियैक जे सीढ़िये चलै छैक आ लोक सभ ओहि पर सवारी क' क' जाइ अछि,ठाढ़े-ठाढ़े।उतरै काल जँ कनियाँ हमरा पकड़ि नहि लेथि तँ तलमलाक कान- कपार फुटले-घर छल। गे दाइ, की कहियौक?होटल मे खाइ लेल भरि थारी द' गेल।बारीक सभ टोपा लगेने लागय जेना कोनो महराज साहेबक नातिए सभ हुए।एकटा बाटी मे गरम पानि आ नेबो काटि क' देने गेल।हम त' गद्दीबला कुरसी पर पलथी मारने बैसल रही।पानि मे नेबो गाड़ि पहिने पी लेलहुँ।गे मैया, लोक सभ हमरे दिस ताकि क' हँसय लागल।कहलियैक जोर सँ-'की हँसता है?हमरा कोनो घेघ लटकल है?' बेटा-पुतोहु बुझाब' लागल,नहि तँ हम नानीक बियाह मोन पाड़ि देने रहितियनि। चल,हटा।हँ, इ भेल जे महरौली, झंडाबला आ कालका माइ मंदिल दर्शन करा देलक। अबिती काल त' अजगुते खेला भ' गेल।हवा-जहाज पकड़ाब' ल' जाइ गेल।सर-सामान  ल' लेलक।ओ एकटा घुमघुमौआ मशीन पर ध' देलकैक।ओ कत'- ने- कहाँ चलि गेलैक।बौआ कहलक जे पटना मे अपने द' देतौक।डिल्ली मे एकटा मजगूत सूप कीनि लेने रही।ओ हाथे मे रहय।ओ छीनि क' लागल मशीन सँ जाँच कर'।हम कहलियैक- 'अइ मे कथी ढूरता है?हुरिया?बड्ड सेहन्ता लगता है त' कोनो रोकता है।कीनि ने आनो आ दौ ने अपन बौह को।अनका समान पर कोन दाबी है केकरो?हल्ला केलहुँ त' आपस केलक। भीतर हवा-जहाज देखै छी त' बूझ ने जे बड़का बसे बूझ।ओहिना लोक सभ सीटे-सीट बैसल।एक गोटा केँ कहलियैक जे यौ हमरा कनी खिड़की लग बैस' दिय'।मोन घूम' लगैए,जी ओकाय लगैए।मुदा ओ मनसा कथी लेल मानत?काका बीच मे बैसि गेलथुन आ हम कात मे।कनी काल मे दू गो लटकी छौड़ी आबि मारितेक बात इशारा सँ कसरत क' क' बताब' लगलैक।हमरा किछु बुझेबे नहि केलक।कहलियैक -' हे गे छौड़ी, इमहर आ!की बजलें,से की हम बुझलियौक?ओ किदन-किदन कहि हमरा एगो फीता सँ सीट मे बान्हि देलक।कहलियैक जे एना मे लोक निकास-बात केना जाएगा?मुदा ओ हमरे सिखाब' लागल।एकरे कहै छैक- नतिनी सिखाबय बुढ़ नानी केँ!' गे मैया! खूब रेस क' क' एक्के बेरि अकास ठेका देलकैक जहाज।नीचाँबला घर सभ सलाइक डिब्बी जकाँ लागइ।मुदा हमरा ड'र नहि भेलहु।हँ, कान बहुत फरफराय लागल।एगो छौड़ी केँ हाक देलहुँ।कहलियैक जे कनी कम रेस मे जहाज हाँक' कहौ, कान बेसी फरफरा रहा है।तखन ओ दूनू कान मे तूर ठूसि देलक।पटना मे उतरै काल दूनू छौड़ी केँ एक-हकटा नमरी देलियैक जे किछु कीनि क' खा-पीबि लीहें।लेबे नहि करय।कहलियैक जे असिरबादी छियौक, राखि ले।कतेक हुज्जति केलियैक,तखन ओ सभ गोर लाग' लागल।बड्ड असिरबाद देलियैक।सभ सँ अजब तमाशा तँ समान लै काल भेल।सभक समान बेरा-बेरी मशीन पर नाचैए आ लोक हथोड़िया मारि ल' रहल अछि।एहि मे तँ केकरो समान केओ उचंगि पड़ा जेतैक।हमरो धोखा भ' गेल।पुतोहु नवका बैग कीनि देने रहथि,ललका।ओ दोसर उठा लेलक।बस, हम गछारलहुँ ओक्कर गट्टा।कहलियैक-' पचहीबाली के बैग आप किए लेते हैं?अपन समान सँ माने- मतलब रखिये।ओ किन्नहुँ मानबे नहि करय।धरा-पकड़ी हुअ' लागल।तखने काका बाजि उठलखुन- 'अपन बैग हइये आब आयल अछि।'तखन ओकरा छोड़लहुँ।बेमतलब सरकार झगड़ करबै छैक। की कहियौक,कनियों चंसगर नहि रहितहुँ त' भारी बिपति मे पड़ि गेल रहितहुँ कैक बेरि।तों सभ एक बेरि हवा-जहाज पर चढ़िक' देखबही तखन ने बुझबही! गै जगदंबा,हइ कनी सभकेँ तेल-सिंदूर क' ने दहीक।" एकर उपरांत पचहीबाली काकी सभकेँ अपन मोटरी सँ निकालि परसादी- बद्धी सभ बाँट' लगलीह।बजलीह- "तों सभ जाइ जइहें त' भरोराबाली, हाबीबाली आ नरुआरबाली केँ सेहो पठा दीहें।सभ केओ हाल- चाल बूझ' आयल आ ओ तीनू बड़का महंथिन बनैए?कहि दिहैक,आबि क' परसादी ल' जाइ जायत,नहि त' सातो पुरखा केँ उकटि-पुकटि क' हाथ मे द' देबैक!" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ गहूमक रखबारी फूदे पुछलथिन -"यौ लूटे, तखनि सँ हाक द' रहल छी।अकानैत नहि छियैक?कनियों उनमुनेबो नहि केलहुँ!कोन अनमनामे लागल छलहुँ?एना अनमनायल किएक छी?मुँह किएक भकुआयल अछि?" लूटे कहलथिन- "की कहू भाय?इ गहूमक रखबारी लाहेब केलक। गहूम फटकायल असोरा पर धैल रहैक।काल्हि कनिकाल लेल झिसियाइ लगलैक।आध घंटाभरि फुँहिया गेलैक।केकरो धेयान नहि रहलैक।गहूम रहैक बोरामे। हमर नजरि गेल।हड़बड़ा गेलहुँ।फुरफुराक' उठलहुँ।तलमलाक' खसलहुँ।बासन सभ ढनमना गेलैक ।कछमछा गेलहुँ।तैयो ओरियाक' उठलहुँ।घिसियाक' बोरा भीतर ल' गेलहुँ।तैयो गहूम सिमसिमा गेलैक।की करितहुँ?मोन मारि ओछान पर ओंघरा गेलहुँ।भोरे तरफराक' उठलहुँ।देखलियैक,रौद मरियायल रहैक।अगुतायल रही, मुदा असोथकित भ' सुस्ताय लगलहुँ।फेर मोन भेल जे गहूम पसारि दैत छियैक।पक्के पर छिड़िया देलियैक।एम्हर गहूम पर कौआ सभ लुबुधायल रहैक।चुगै लेल लुसफुसायल रहैक।नंग-चंग क' देलक।बगिलमे सोंटा टेबियाक' धयने रही।जुमाक' चला देलियैक।ओम्हर सँ एकटा नेता लोक सभकेँ डोरिएने भोट माँग' आबि रहल रहैक।ओ सोंटा ओकरे कपार बजरि गेलैक।ओ डिरियाय लगलैक।चिचियाय लगलैक।हम सिटपिटा गेलहुँ।केबाड़ बन्नक' क' गबदी मारि पड़ि रहलहुँ।ओ सभ बड़ीकाल धरि केबाड़ पीटैत रहल।चिकरैत रहल।नेता कहलकैक -'छोड़ि दही, एखन भोटक टाइम छैक।' तखन सँ जीह हड़हड़ करैए।ताहिमे अहाँ खड़खड़ायल आबि गेलहुँ।ओ नेता बड्ड खबखबायल हेतैक,नहि यौ?कहूँ लोक जिता देलकैक, तखन यौ?बाप-रौ-बाप!" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डॉ. चित्रलेखा मिथिलाक प्रसिद्ध लोक पर्वसामा-चकेबा मिथिलाक स्त्रीसमाजक अनुपम आ आदर्शक एकटा अद्भुत आ अत्यन्त मनोरंजक पावनि थिक सामा-चकेबा। स्कन्दपुराणक निम्नलिखित श्लोकक आधार मैथिल ललना लोकनि आदिकालहिंसँ परम्परानुसार सामा-चकेबाक पावनि करैत आबि रहल छथि- “द्वारकायाञ्चकृष्णस्य पुत्री सामाऽतिसुन्दरी। साम्बस्य भगिनी ‘सामा’माता जाम्बवती शुभा।। इतिकृष्णेन संशप्ता सामाऽभूतक्षितिपक्षिणी। चक्रबाक इति ख्यात: प्रियया सहितो वने।।”[1] मिथिलाक स्त्रीसमाज ई पावनि अखण्ड भातृ सुख, सर्वभौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादिक अर्थात् सन्तानक कल्याणार्थक अतिरिक्त खास कऽ अपन पति आ भाइकेँ दीर्घायु, यशस्वी आ समृद्ध होएबाक कामनासँ करैत छथि। सम्पूर्ण मिथिलामे स्त्रीगण लोकनिक पावनिमे इएह एकटा एहन पावनि अछि जे लगातार पन्द्रह दिन तक चलैत अछि। ई पावनि प्रतिवर्ष कार्तिक मासक द्वितीया शुक्लसँ प्रारम्भ भए पूर्णिमा धरि चलैत अछि। प्राय: एकर कारण ई अछि जे शास्त्रानुसार कार्तिक मास सभ पापक नाश करएबला आ भगवान विष्णुक सभसँ प्रिय मास थिक। एहि पावनिमे मैथिलानी लोकनि खास कऽ अपन भाईक कल्याणार्थ चुगिलाक मुँह जरबैत छथि। शायंकाल गीत गाबि नवका धानक शीशसँ हिनक पूजा कएल जाइत अछि। भातृद्वितीया दिनसँ ई पूजा प्रारम्भ होइत अछि आ कार्तिक पूर्णिमा दिन नवका चूड़ा-दही, गुड़ भोग लगा कऽ परिचारिका एवं धियापूता सभमे प्रसाद बॉंटल जाइत अछि। वाटो बहिनोकेँ चौबटियापर अवस्थित कएल जाइत छन्हि। पन्द्रह दिन धरि मुन्हारि सॉंझ कऽ समा-चकेबाक डालाक अदला-बदली मैथिलीएमे मन्त्र पढ़ि-पढ़ि कएल जाइत अछि। डाला फेरलाक बाद कार्तिक पूर्णिमा दिन नानाप्रकारक पकमान बना कऽ बहीन, भाईकेँ भोजन करओलाक बाद भाईक द्वारा ठेहुन लगा कऽ मूर्ति सभ तोड़लाक बाद भाईक फाँड़ भरल जाइत अछि आ सामा-चकेबाकेँ अगिला वर्ष पुन: अएलाक नोत देलाक बाद विसर्जन कऽ देल जाइत अछि। ध्यातव्य जे ई पावनि अबितहिं मैथिल ललना लोकनिमे हर्षोल्लासक संग आनन्दक लहरि हिलकोर मारऽ लगैत छन्हि। कारण हुनका लोकनिकेँ अपन-अपन गीतक प्रदर्शन करबाक पूर्ण अवसर भेटि जाइत छन्हि। ई गीत गएबाक क्रम सायंकालसँ प्रारम्भ भए चारि-पाँच घन्टा तक चलैत रहैत अछि। मिथिलाक सामा-चकेबाक पूजा बड़ प्रख्यात अछि। ई पावनि मिथिलाक प्राय: प्रत्येक घरमे होइत अछि आ मात्र स्त्रीगणे लोकनि द्वारा ई सम्पादित कएल जाइत अछि। एकर मूल कारण अछि सामाक कथा, जे कथाक अवलोकनसँ स्वत: स्पष्ट भऽ जाएत। शोध-अन्वेषणसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर सामाक कथा तीन प्रकारक उपलब्ध होइत अछि- पहिल कथा :- सामा साम्बक बहिनि छलीह। ई अत्यन्त भव्य रूपलावण्यवतीक संग-संग बुधियारि (गुणवती) सेहो छलीह। ई अधिकांश समय मुनि लोकनिक आश्रम जाहि वनमे छलन्हि ततहि भ्रमणशील रहैत छलीह। वन-भ्रमण विचरणक आदति हिनका नैनेसँ छलन्हि। हिनका बलिप्रदान, होम, यज्ञ, वेद-पुराण पाठ आदि देखबा-सुनबामे खूब मोन लगैत छलन्हि। ओहिठामक होमाग्नि आ स्वच्छ शीतल हवा सेहो अत्यन्त स्वास्थ्यकर छल। श्यामा जखन नमहर भऽ गेलीह तखनहुँ ई ज्ञान यौवना बालकौतुहलवशात् नेने जकॉं पूर्ववते निश्छलतासँ विचरण करैत रहलीह। एहन अपूर्वसुन्दरि वालाकेँ देखि मुनि लोकनिकेँ पूर्ण आशंका ओ स्नदेह भेलन्हि जे कहीं मुनिकुमार लोकनिक चंचल मोन जे वायुवेगहुँसँ अत्यधिक तीव्र होएबाक कारणेँ डोलि ने जान्हि, तेँ सामाकेँ मना कएलन्हि जे ओ आश्रमणक निकट भोरे-भोर नहिं आबथि। किन्तु निश्छल पवित्र मोन वाली सामा बारम्बार मुनि लोकनिक द्वारा मना कएलहुँ पर ओ नहिं मानलन्हि। तखन क्रोधक आवेश मे आबि ओ मुनि लोकनि शाप दऽ देल जे ‘अहॉं पक्षी भऽ जाउ’। मुनि लोकनिक शापक कारणेँ सामा पक्षी बनि एमहर-ओमहर फुर-फुर करैत उड़ए पड़ए लगलीह। अशान्त मोनसँ मुनि आश्रमक निकट केवल चैं-चैं, टैं-टैं करैत ऐ डारिसँ ओइ डारि उड़थि फिरथि। कहाबत छैक जे ‘वृथा न होंहि देव ऋृषि वाणी’। कृष्णक पुत्र साम्बकेँ ऋृषि-शापक ई अशुभ समाचार भेटलन्हि। ओ दायार्द्रचित्त भए ठेहुनियॉं दए दस हजार वर्ष धरि विष्णुसहस्रनामक पाठादि तप कए भगवान विष्णुकेँ प्रसन्न कएलन्हि। तत्पश्चात् सामाक पक्षीत्व विमोचन भेलन्हि।[2] दोसर कथा :- एक समय कोनो सरोवरमे कृष्ण भगवान अपन आठो पटरानी सभक संग नग्न-नग्ना जल-क्रीड़ामे लीन छलाह। चारूकातसँ ओहार आ परदाक पूर्ण प्रबन्ध छल। साम्बकेँ कौतुहलवशात् परदाक इरोतमे भऽ जल-क्रीड़ा नुका कए देखबाक इच्छा भेलन्हि। ओ नुका कऽ परदामे छेद कए जल-क्रीड़ा देखए गेलाह। क्यो चुगिलाह जा कऽ भगवान कृष्णकेँ चुगली लाड़ि देलक। साम्ब अपन माए लोकनिकेँ वस्त्रहीना देखबाक महापाप कएलन्हि तेँ चुगिलाक चुगिलपनक कारणेँ क्रोधित भए कृष्ण हुनका शाप दऽ देलथिन्ह जे- ‘अहॉं कोढ़ि भऽ जाउ’। कृष्णक शापक बाद साम्ब तुरत्ते गलित कुष्टसँ अत्यन्त पीड़ित भऽ गेलाह। गलित कुष्ट रोगक कष्ट देखि सूर्य भगवानकेँ दया लागि गेलन्हि। साम्बकेँ स्वप्नमे ओ अपन 21 टा उग्र नाम कहलन्हि। जाम्बवतीक पुत्र साम्ब, ओही 21 नामक (साम्बपुराणान्तर्गत सूर्यस्तवराजक) पाठ करए लगलाह। पापक फल भोगलाक पश्चात् किछु दिनक बाद ओ रोगमुक्त भऽ गेलाह। हिनक पाठक अवधिमे हिनक बहिनि सामा अग्नि प्रज्वलित कए अपन भाइक जघन्य महापापक चुगली कएनिहार चुगिलाक नूआक मूर्ति बना कऽ जराएल करथि। तेँ मिथिलामे ई कहबी प्रचलित छैक जे- ‘चुगिला करए चुगली बिलाइ करए म्याउँ’। सामाक द्वारा अपन भाइक प्रति अगाध प्रेम ओ सहानुभूतियेक कारण कुलाङ्गना लोकनि सामाक पूजा-अर्चना करैत आबि रहल छथि।[3] तेसर प्रचलित कथा :- इएह कथा मिथिलामे प्राचीन कालहिंसँ परम्परासँ प्रचलित अछि आ एही कथाक अनुरूप ई ‘सामा-चकेबा’खेलाएल जाइत अछि। ई कथा एहि प्रकारेँ अछि :- एक समय ऋषि लोकनि सूत महाराजसँ कहलथिन्ह जे- हे सूत महाराज! हम सब अपनेक मुँह सँ अनेक इतिहास पुराणक कथाक श्रवण करैत आबि रहल छी। आई हमरा लोकनिक मोनमे सामाक सम्बन्धमे जिज्ञासा भेल अछि जे- एहि पृथ्वीपर सामाक पूजा किएक होइत छन्हि? ई सामा के थिकीह? ई किनकर पुत्री आ किनकर बहिन आ किनकर पत्नी छथि? पृथ्वीपर हिनकर पूजाक की विधान अछि? कृपया एहि वृतान्तकेँ सविस्तर सुनएबाक कृपा कएल जाए। ऋषिगणक आग्रहपर सूत महराज एहि ‘सामा-चकेबा’क कथा सविस्तार सुनएबासँ पूर्व कहलन्हि जे आइ जे हम सामाक कथा एखन विस्तार सँ सुनबाऽ जा रहल छी ताहि सम्बन्ध ई कहि दी जे एहि कथाक श्रवणसँ स्त्री सौभाग्वती होइत छथि आ सामाक पूजासँ स्त्रीगण कृतकृत्य भऽ जाइत छथि। हे मुनिश्रेष्ठ लोकनि! आब विस्तारसँ ई कथा सुनू- “सामा श्री कृष्णक पुत्री छलीह। हिनक भाइक नाम साम्ब आ माएक नाम जाम्बवती छलन्हि। सामा अपूर्व सुन्दरीक संग-संग उदारता आदि गुणसँ सम्पन्न छलीह। सामा अपन सखी लोकनिक द्वारा सदैव प्रशंसित रहलीह। ओ नित्य ऋषि-मुनिक आश्रम जाए खेलाइत छलीह। एही प्रकारेँ हिनकर समय व्यतीत होइत छल। सामाक विवाह चारूवक्य (चक्रबाक) नामक एकटा समृद्ध युवकसँ भेल छलन्हि। हुनका एकटा डिहुली नामक नोकरनी छलन्हि। एकदिन सामा मुनिक आश्रमसँ घुरल अबैत छलीह कि बाटहिमे ओ डिहुली नामक नोकरनी हिनका देखि लेलकन्हि आ कृष्णक लग जा कऽ सामापर मिथ्या मनगढ़ंत आरोप लगा कऽ चुगली कऽ देलकन्हि जे- ‘ई वृन्दावनमे टहलऽ जाइत छथि तेँ ऋषि सभक संग रमण करैत छथि।’ श्री कृष्ण सामाक चारित्रिक दोषारोपण सुनि अत्यन्त क्रोधित भए गेलाह आ ओही क्रोधमे सामाकेँ शाप दऽ देलन्हि जे- ‘हे समा! जखन एहन स्वर्गतुलय घर केँ छोड़ि अहॉं मुनिक निकट गेलहुँ, तँ जाउ! हम अहॉंकेँ शाप दैत छी जे पृथ्वीपर जा कऽ वृन्दावनक जंगलेमे चकबी पक्षी बनि निवास करू।’ श्री कृष्णक शापक कारण सामा चकबी पक्षी भऽ गेलीह। आ ओहो क्रोधमे आबि कऽ चुगिलपनक कारणेँ डिहुलीकेँ शाप दऽ देलन्हि जे जाहि मुँह सँ अहॉं हमरा पर मिथ्या मगनगढ़ंत आरोप लगौलहुँ ओ मुँह अहॉंकेँ आगिसँ झरकाओल जाएत।” शापित सामा चकबी पक्षी बनि वृन्दावनमे रहऽ लगलीह। ओमहर हिनक पति चारूवक्य (चक्रबाक) एहि शापक घटना सुनि अत्यन्त दु:खी भऽ गेलाह आ विरहमे तुरत देवाधिदेव महादेवक अराधनामे लीन भऽ गेलाह। एक दिन महादेव सामाक पति चारूवक्यक तपस्यासँ प्रसन्न भए कहलन्हि जे- ‘माँगू! अहॉं जे वरदान माँगब से हम देब।’ तखन सामाक पति महादेवसँ कहलथिन्ह जे- हे महादेव! हमर पत्नी सामा अपन पिता श्री कृष्णक शापसँ पक्षी बनि गेलीह। हम आब हुनका वियोगमे नहिं जीवि सकैत छी। तेँ हम जाहि कोनो प्रकारेँ हुनका संग रहि पति-पत्नीक सुख प्राप्त कऽ सकी से वरदान दिअ। तखन महादेव एवमस्तु कहि देलथिन्ह। महादेवक एहि वरदानक पश्चात् सामाक पति चारुवक्य (चक्रबाक) पत्नी सुख प्राप्त करबाक हेतु चकबा  पक्षी बनि गेलाह। तत्पश्चात् सामा आ चारुवक्य (चक्रबाक) दुनू गोटे (पति-पत्नी) पक्षी रूपमे वृन्दावनमे यत्र-तत्र-सर्वत्र संगे घुमि-फिरि दाम्पत्य जीवनबिताबए लगलाह। सामाक भाई साम्बकेँ जखन अपन बहिन-बहिनोइकेँ शापित भऽ पक्षी बनि जएबाक घटनाक जानकारी भेटलन्हि तखन ओ बहुत दु:खी भऽ गेलाह आ अपन बहिन-बहिनोइक उद्धारक हेतु तत्क्षण एकाग्रचित्त भऽ कऽ भगवान विष्णुक पूजा प्रारम्भ कऽ देलन्हि। विष्णु सहस्त्र नामक विष्णुक स्तुतिसँ शंख-चक्र-गदाधारी भगवान विष्णु साम्बक समक्ष प्रकट भेलाह आ साम्बसँ कहलन्हि जे- हे पुत्र! हम अहॉंक अराधनासँ अति प्रसनन छी। तेँ ‘अहॉं माँगू! जे वर माँगब से हम देब।’ साम्ब कहलन्हि जे- हे नारायण! यदि अहॉं हमर अराधनासँ प्रसन्न छी तँ हमर एकमात्र शापित बहिन-बहिनोईकेँ जे पक्षीक रूपमे आइ दर-दर जंगले-जंगल भटकि रहल छथि तनिका पुन: वास्तविक मनुष्य रूपमे सुखी दाम्पत्य जीवन व्यतीत करथि से वरदान दिअ। तखन भगवान विष्णु कहलन्हि जे- हे वत्स! अहॉंक बहिन-बहिनोइ जाहि तरहेँ शाप-मुक्त भऽ मनुष्य योनि प्राप्त करताह से उपाय हम कहैत छी। अहॉं ध्यानसँ सुनू- कार्तिक मास हमर सभसँ प्रिय मास अछि। ई मास सभ पाक नाश करऽबला होइछ। कार्तिक मासक शुक्ल पक्षक पंचमी तिथिमे घर-घरक स्त्री लोकनिक द्वारा नवीन वस्त्र पहिरि सामा, चुगिला, स्प्तर्षि आ वृन्दावन आ साम्ब आदिक मूर्ति बनाओल जाए। आ रंगल-ढेउरल ओहि सभ मूर्तिकेँ एकटा चँगेरामे राखि विधिवत् पूजा कएल जाए। रातिमे दीप जरा कऽ ओकरा घुमाओल जाए आ चारूकात सँ चुगिलाक मुँह झरकाओल जाए। एहिना करैत जखन पूर्णिमाक तिथि आबए तँ बहिनिक द्वारा विभिन्न पकमान बना कऽ भाइ केँ भोज कराओल जाए तत्पश्चात् भाईक द्वारा ठेहुनसँ ओहि मूर्ति सभकेँ फोड़लाक बाद, हुनका सभकेँ अगिला साल पुन: अएबाक नोत दऽ कऽ श्रद्धापूर्वक विसर्जन कऽ दिअए। एहि तरहेँ जखन ई पूजा कएल जाएत तखन अहॉंक बहिन-बहिनोइ स्वत/ मनुष्यक शरीर प्राप्त कऽ लेताह, आओर जे स्त्री सामाक पूजा करतीह ओ सौभाग्यवती होएतीह। ई बात कहि शंख-चक्र-गदाधारी भवान विष्णु अन्तर्धान भऽ गेलाह। साम्ब अपन राज्यमे सूचना प्रसारित करौलन्हि जे हमर सम्पूर्ण राज्यक स्त्री लोकनि उपरोक्त विधि-विधानसँ सामा-चकेबा बनाए चुगिलाकेँ जरौतीह आ जे एहि आदेशक पालन नहिं करतीह तनिका एहि राज्यसँ निष्कासित कऽ देल जाएत। साम्बक आदेशनुसार राज्यक महिला लेाकनि तदनुरूप कार्तिक शुक्ल पक्षक प्रथमे दिनसँ एहि कार्यमे लागि जाइत छलीह। साम्बक आज्ञानुसार गाम-गाममे स्त्री लोकनिक द्वारा उपरोक्त विधि-विधानसँ सामाक पूजा भेल आ ओहि पुण्यसँ सामा पुन: अपन मनुष्यक शरीर प्राप्त कएलन्हि। सामा पुन: अपन मूल रूप देखि विस्मित होइत अपन सखीसँ पुछलन्हि जे हमर ई रूप कोना भेल? आ ई काज के कएलक? से कहू। जे हमरा पक्षी रूपसँ मानव रूपमे परिवर्तित कएलन्हि हुनका हम जीवन दान देबन्हि। सखी उत्तर देलथिन्ह जे ई सभटा अहॉंक भाई साम्बक प्रयाससँ सम्भव भेल। सखीक ई बात सुनितहिं सामाक आँखिसँ अश्रधारा प्रवाहित भऽ गेलन्हि आ गद्-गद् वाणीसँ बजलीह जे- संसारमे सहोदर भाइक समान दोसर नहिं होइत अछि। धन्य थिक ओ स्त्री जकरा सहोदर भाई छैक। सामा अपन भाईक द्वारा एहि तरहक कार्य करबाक हेतु अनका अपन आन्तरिक हृदयसँ दीर्घायु होएबाक आशीर्वादक संगहि संसारक सभ बहिनकेँ हमरे सन भाई हो तकर कामना कएलन्हि। ओकर बाद सामा अपन भाईसँ भेँट कए पुन: अपन माए-बापसँ भेँट कएलन्हि। सूतजी कहलथिन्ह जे- हे ऋषिगण! जाहि दिन सामा अभिशापसँ मुक्त भेलीह ताही दिनसँ सामाक पूजा पृथ्वीपर होमए लागल। सामाक पूजा अखण्ड भ्रातृ सुख सर्वसौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादि प्रदान करऽवला कहल गेल अछि। जे नारी एहि व्रतकेँ प्रति वर्ष करैत छथि जे भ्रातृविहीना नहिं होइत छथि आ पुत्र-पौत्रादिसँ युक्त होइत छथि। सम्पूर्ण मिथिलामे भ्रातृद्वितीये दिनसँ सामा बनाएब प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। स्त्रीगण सभ ओहि दिन जाहि माटिसँ सामा बनौतीह तकरा स्पर्श अवश्य कऽ लैत छथि। तत्पश्चात् अधपहरा देखि कऽ छठिक खरना वा रपना दिन सामा बनबैत छथि। सभसँ पहिने सिरी सामा, दोसर दिन चकेबा, तखन एके पाँतीमे बैसल सातटा सतभैंयॉं चिड़ै, खररूचि भैया, बाटो बहिनो दू पक्षीक मुँह दू दिस भाग्य-चक्रसँ भाइ-बहिनक विमुख भेल भाइ-बहिन। नवका खढ़सँ बनल वृन्दावन, भम्हरा तथा सन (पटुआ) सँ मोंछबला अनाओल चुगिला आ चुगिलखोड़ चूड़कक प्रतीक अछि। सामा बनएबामे दिन-नक्षत्रादिक सेहो विचार कएल जाइछ। ई अधपहरा मे नहिं बनाओल जाइछ। सर्वप्रथम स्त्रीलोकनि सामा बनबैत छथि तत्पश्चात् क्रमसँ सामा-चकेबा, सतभइयॉं (सप्तर्षि), वृन्दावन आ साम्ब भैया, पक्षी आ ओकरा हेतु घर आओर चुगिला आदिक मूर्ति बनाओल जाइछ। चुगिला केँ जड़बाक काल स्त्रीगण बड़ गारि पढ़ैत छथिन्ह। एकर मुख्य कारण ई अछि जे सामाक चरित्रपर दोषारोपण लगबएवला चुगिले छल आ चुगिलेक चुगिलपनक कारणेँ सामा शापित भेल छलीह तेँ ओकरा गारि पढ़बाक परम्परा प्रारम्भ भेल। सम्पूर्ण मिथिलांचलक महिला वर्ग (की बूढ़, की बच्चा, की जवान) सभ मिलि कऽ समा-चकेबा खेलाइत छथि। सॉंझ होइते देरी धियापूतासँ लऽ कऽ बूढ़-पुरैनियॉं तक सभक मनमे एकटा नव उमंग, नव जोश हुंकार भरऽ लगैत अछि। कारण धियापूतासँ लऽ कऽ बूढ़ धरिक सभकेँ स्वतन्त्र रूपसँ अपन-अपन गीतक प्रदर्शन करबाक नीक अवसर भेटैत छन्हि। धिया-पूताकेँ बूढ़-पुरैनियॉं सभसँ गीत आ गीत गाबक कला सीखबाक सेहो नीक अवसर भेटैत छन्हि। अँगना-अँगनासँ स्त्रीगण सभ चँगेरामे सामा-चकेबा साजि कऽ धियापूताकेँ माथपर रखने गीत गबैत टोले-टोल एक ठाम जका भऽ कऽ टहाटही इजोरियामे नव-अनव धुनमे गीतक प्रतिस्पर्धा चारि-पाँच घन्टा धरि चलैत रहैत अछि आ नव-पुरान सभ गीतगाइन सभ गीत गाबि-गाबि प्रतिदिन थोड़ेक-थोड़ेक चुगिला के जरा कऽ डाला समेटि अपन-अपन घर चलि जाइत छथि। ई क्रम लगातार कार्तिक शुक्ल पक्षक प्रथम दिनसँ पन्द्रह दिन धरि चलैत अछि आ अन्तिम पन्द्रहम दिन अर्थात् पूर्णिमाक रातिमे आने दिन जकॉं सभसँ पहिने गोसाउनिक गीत गाबि समाकेँ नवका चूड़ा-दही, गुड़, मिष्टान आदिक भोजनोपरान्त सुपारी देल जाइत अछि। आँगनमे स्त्रीगण द्वारा सभ भाईक नामसँ ओकर कल्याणार्थ गीत गाओल जाइछ। तत्पश्चात् समा-चकेबा आ प्रज्वलित दीपसँ साजल चँगेरा माँथपर राखि स्त्रीगण सभ निम्नलिखित गीत गबैत आँगनसँ बहराइत छथि- “डाला लऽ बहार भेली, बहिनो से फल्लाँ बहिनो, फल्लाँ भैया लेल डाला छीनि, सुनू! राम सजनी। समुआ बैसल तोहेँ बाबा बड़ैता, तोर बेटा लेल डाला छीनि, सुनू! राम सजनी।। कथी केर डलबा गे बेटी! कथी बान्हल चारू खूट, कोनो रंग डाला लेलकौ छीनि, सुन! राम सजनी। सोने केर डलबा हौ बाबा, चम्पा, चमेली चारू खूट, लाले रंग डाला लेल छीनि, सुन! राम सजनी।। जौं तोरा आहे बहिनी हम डलबा दिया देबऽ हमरा के की देबऽ दान, सुनू! राम सजनी। चढ़बाक घोड़ा देब पढ़बाक पोथी देब, छोटकी ननदिया देब दान, सुनू! राम सजनी।।” उपर्युक्त गीत गबैत गामक सभ घरक महिला लोकनि जोतलाहा खेतमे क्रमश: जमा होमए लगैत छथि। ओतऽ सामा सब के पसारि देल जाइत अछि। तत्पश्चात् सीरी सामाकेँ हाथमे लऽ कऽ लगाएल पान, गोटा सुपारी आओर एक मुट्ठी अरबा चाउर महिला लोकनि अपना-अपना आँचरपर राखि सखी सभक संगे अदला-बदली करैत छथि। अदला-बदली करैत काल स्त्रीगण निम्नलिखित फकड़ा मन्त्र रूपमे पढ़ैत छथि- “जीब’ जीब’ हो की मोर पिया जीब’ की मोर भैया जीव’ जेहन धैबिया के पाट तेहन भैया के पीठ जेहन करड़िक थम्ह तेहन भैया के जॉंघ जेहन पोखरिक सेमार तेहन भैया के टीक।” एहि विधिक बाद भईक फाँड़ भरल जाइछ आ सामा फोड़बाक लेल देल जाइत अछि, जकरा ओ लोकनि अपन ठेहुनसँ फोड़ैत छथि। सामा फोड़लाक बाद भाई लोकनिकेँ नवका चूड़ा-दही-गुड़ खुआओल जाइत अछि। तत्पश्चात् सामाक खेल प्रारम्भ होइछ। तकरा बाद चुगिलाक मोँद-दाढ़ी जराओल जाइछ आ सभसँ अन्तमे वृन्दावन जराओल जाइछ। एहि सभ विधिक पश्चात् पुन: गीत गाओल जाइछ- “गाम के अधिकारी भैया हाथ दसं पोखरि। खुना दिअ’, चम्पा फूल लगा दिअ’हे। फलबा लोढ़ैते बहिनो आयल हे। घमि गेल सिर के सिन्दुर नयन भरू काजर हे। छत्ता लेने आबथि भैया से फल्लाँ भैया हे। बैसह बहिनो एहि छॉंह आसीष दहू हे। पानियो लेने दौड़ल आबथि अइहब भौजो हे। ननदो पीबि लिअ निरमल पानि से हमरो आसीष देहु हे। युगे-युगे जीबथु फल्लाँ भैया तोरो अहिबात बढ़ओ हे।” मिथिलाक स्त्रीगण सामा-चकेबाक गीत सभमे अपन-अपन भाइक नाम जोड़ि गीत गबैत छथि। मिथिलाक अनुपम आ आदर्शक एहि अद्भुत पावनि ‘सामा-चकेबा’सँ सम्बन्धित अनेकानेक गीत सभ अछि जे समयानुकूल सामाजिक परिवर्तनक कारणेँ धीरे-धीरे क्रमश: लुप्त भेल जा रहल अछि। हम ‘सामा-चकेबा’सँ सम्बन्धित किछु गीत सभक संकलन उद्धृत कऽ रहल छी जाहिसँ अध्येता आ शोधार्थी लोकनिकेँ सहयोगक संग-संग ई गीत सभ जीवन्त रहि जाए तँ खास कऽ हमरा काफी आत्मसंतुष्टि होएत। मिथिलामे परम्परासँ प्रचलित ‘सामा-चकेबा’क क्रमश: लुप्त होइत जा रहल किछु गीत सभ यत्र-तत्रसँ संग्रह कए प्रस्तुत कएल जा रहल अछि- गीत- 1 “साम चाको साम चाको अइह हे, अइह हे, जोतल खेतमे बइसिह हे, बइसिह हे- सब रंग पटिया ओछइह हे, ओछइह हे- ओहि पटिया पर कए कए जना, कए कए जना छोटे बड़े नबो जना, नबो जना। हमरा भैया के सोनाक छुरी, सोनाक छुरी।”[4] गीत- 2 “सामा खेल खेलू हे भौजो। चिर जीवन मोर भाए। चूड़क मुँह उक फेरब भौजो! चुगली करत न जाए। बापक शाप बशें वन ऐलौं चारु बदन पति पाए। पति सुत भाए जिअत सब भौजो! भैया होएत सहाए।।”[5] गीत-  3 “अयलइ काति मास हो भैया, सामा लेल अवतार। चिट्ठी ल’क’जैहें हजमा, नैहर हमरार। बाबा आगू बजिहें हजमा, गोचर हमार। भैया आगू बजिहें हजमा मिलन हमार। सेहो सुनि भेला भैया, घोड़ा पीठि असवार। सिन्दुर बेसाहताह भैया, बेतिया सन हे बजार। टिकुली बेसाहिह’भैया, पटना सन हे बजार। सामा बेसाहिह’भैया, मनसुर चक हे बजार। टिकुली झलकि गेल फल्लाँ बहिनि के कपार। सिन्दुर झलकि गेल भैया अइहब भौजी के कपार।”[6] सम्पर्क- एसोसिएट प्रोफेसर मैथिली विभाग यू.भी.के. कॉलेज, कड़ामा- आलमनगर बी.एन.मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा सन्दर्भ सूची- [1]मिथिला की सांस्कृतिक लोक चित्रकला- पं. लक्ष्मीनाथ झा [2]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र- पृ. 164 [3]मिथिलाक पावनि तिहार- बाबू गङ्गापति सिंह [4]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र [5]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र [6]मैथिली संस्कार गीत, उर्वशी प्रकाशन, पटना। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा भक्ति गजल ३.२. विजय इस्सर "वत्स"-बचबिहऽ हो कक्का ३.३.विष्णुकान्त मिश्र-पथिक ३.४.प्रदीप पुष्प-दीयाबातीपर रुबाइ आशीष अनचिन्हार २ टा भक्ति गजल १ नमो मेधा महामाया नमो देवी नमो भाषा नमो जटिला नमो ब्राह्मी

नमो सीता नमो राधा नमो धन्या नमो वसुधा नमो अनघा नमो लक्ष्मी

नमो दुर्गा नमो सत्या नमो आद्या नमो काली नमो चंडी महाकाली

नमो तारा नमो माँजरि नमो कुसुमा नमो लोना नमो लखिमा नमो थेरी

नमो गंडक महानंदा नमो गंगा नमो कमला नमो जीबछ नमो कोशी

सभ पाँतिमे 1222-1222-1222 केर मात्राक्रम अछि। परंपरासँ प्राप्त शब्दकेँ बहरमे सजा देल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। २

डोकहर वासिनी ग्रामिणी भगवती दुखहरी सुखकरी राज राजेश्वरी

मातृदेवी युगल उर्वरी कामिनी सुंदरी माधुरी काम कामेश्वरी

शालिनी मालिनी शेखरी रागिनी रुचिकरी शुचिकरी नाद नादेश्वरी

धर्मदा अर्थदा कामदा मोक्षदा जयकरी शुभकरी योग योगेश्वरी

कंकिनी काकिनी कोटरी साधिके शंकरी सहचरी सर्व सर्वेश्वरी

सभ पाँतिमे 212-212-212-212 मात्राक्रम अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विजय इस्सर "वत्स" बचबिहऽ हो कक्का हँसलक भभाकय, सभ मारलक ठहक्का भागलहुंँ चिकड़ि हम बचबिहऽ हो कक्का सुंदरि सभक बीच हम जाकय फसलहुंँ सीता स्वयंवर कें नारद जी बनलहुंँ अपन हाल देखि भेलहुँ हक्का बक्का भागलहुंँ चिकड़ि कय बचबिहऽ हो कक्का पता नैं जे हमरा मति मे कि आयल जेना कोनों मजनूं के आत्मा समायल थापर खा परेलहुंँ जेना चोर उचक्का भागलहुंँ चिकड़ि कय बचबिहऽ हो कक्का कियो नैं बुझै छै हमर दुर्दशा की जें हम छी कुमारे तें नें दशा ई भेलहुँ अधबयसू फिरी खाइत धक्का भागलहुंँ चिकड़ि कय बचबिहऽ हो कक्का ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विष्णुकान्त मिश्र पथिक ये बटोही चलैत रह पथपर , बिनु कोनो दूरी सोचने । एक मुट्ठी माटिक मोल नहि, भगैत नजरि मंजिल रखने।। आगमन -प्रस्थानसॅ अनजान छैं, साॅस जाधरि इस ताधरि। बाम -दहिन बिनु तकनहि, अन्तिम साॅसधरि इस मरि -मरि।। बाटमे हिम -आतप समशीतोष्ण भेटतहु, उच्च, मध्यम, दलित, भिखारि । सज्जन -दुर्जनक संपर्क होएतहु, करिहैं विज्ञ बनि तौल सम्हारि।। पग -पग पर पाथर आ फूल पुंज, संतुलित साॅससॅ सम्हरैत चल। शील संग सहयोग स्वभावमे, शान्ति, संतोष, नानक बल।। मंजिलधरि पहुचहिसॅ पूर्वहि, दिशाहीन भेलहु नहि भान होउ। भनहि 'विष्णु 'बन एहन बटोही, तोहर अनुकरणीय भ ' मान होउ ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रदीप पुष्प दीयाबातीपर रुबाइ आह होइ हियमे आनक करुण पुकार लेल जीवन बितै अहाँक सदति पर-उपकार लेल घर-आँगनक इजोत किछु कम्मो चलतै मुदा एकटा प्रदीप हो मनकेर अन्हार लेल अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार    अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल     CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी                         माहुर                          करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका)       डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/  (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta           97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७  (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]  तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]  तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। ३ विदेह अपन आगामी अंक (२०२१ क प्रारम्भमे) श्री रामलोचन ठाकुर पर विशेषांक निकालबाक नेयार केने अछि। हुनका सम्बन्धी रचना आमंत्रित अछि (संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा आदि) जे ३१ दिसम्बर २०२० धरि editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाओल जा सकैत अछि। विदेह पेटारक अन्तर्गत (पोथी डाउनलोड साइट) मे http://www.videha.co.in/new_page_15.htm  हुनकर मौलिक, अनूदित आ सम्पादित रचना फ्री पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2020 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३१० म अंक १५ नवम्बर २०२० (वर्ष १३ मास १५५ अंक ३१०)

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