VIDEHA — Issue 311 / अंक ३११

Publication: VIDEHA · Issue: 311
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३११ म अंक ०१ दिसम्बर २०२० (वर्ष १३ मास १५६ अंक ३११) ऐ अंकमे अछि:- १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- चारिम खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (११म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (चारिम खेप) २.४.नन्द विलास राय- अदरश विआह २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-हुसि गेलौं २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-टेट्टर २.७.आशीष अनचिन्हार-किछु बीहनि कथा २.८.प्रियंवदा तारा झा-मोनक गप्प २.९.ज्ञानवर्द्धन कंठ- कैमरामैन २.१०.आनन्द कुमार झा- एक बाल नाटक-बोलूक बेदना ३. पद्य ३.१.ज्ञानवर्द्धन कंठ-३ टा पद्य ३.२. विजय इस्सर "वत्स"-आजाद गजल ३.३.बाबा बैद्यनाथ-"कुण्डलिया छंद" ३.४.बिनय भूषण जीक दू टा कविता ३.५.बाबा बैद्यानाथ-गजल ३.६.डा जियाउर रहमान जाफरी-आजाद गजल ३.७.आनन्द कुमार झा-मुक्तिक तरास ३.८.विष्णुकान्त मिश्र-३ टा पद्य ३.९.प्रदीप पुष्प-२ टा गजल Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU  इग्नू       BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1    [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2    (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3    (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4                (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12               (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13               (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14                 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15                 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16                 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17                (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18                 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS ........................................................................................................................ OTHER OPTIONALS ........................................................................................................................ IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- चारिम खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (११म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (चारिम खेप) २.४.नन्द विलास राय- अदरश विआह २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-हुसि गेलौं २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-टेट्टर २.७.आशीष अनचिन्हार-किछु बीहनि कथा २.८.प्रियंवदा तारा झा-मोनक गप्प २.९.ज्ञानवर्द्धन कंठ- कैमरामैन २.१०.आनन्द कुमार झा- एक बाल नाटक-बोलूक बेदना योगेन्द्र पाठक वियोगी (सम्पर्क- 9831037532) नरक विजय (एहि नाटकक एक संस्करण हमर पोथी ‘त्रिनाटकम्’ मे छपि गेल अछि। ओहि मे दृश्यक संख्या बहुत बेसी रहला सँ किछु निर्देशक लोकनि एकर मंचन पर प्रश्न चिन्ह लगौलनि। ओहि आलोचना कें ध्यान मे रखैत एकरा परिवर्धित कएल गेल। एकर बंगला अनुवाद श्री नवीन चौधरी केलनि अछि।- नाटककार) पात्र परिचय मानव पात्र — रमेश, सुरेश, अनुपम अमित (वैज्ञानिक) पौराणिक पात्र — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, यमराज, चित्रगुप्त, दू यमदूत अंक 1 दृश्य 4 मंच सज्जा पहिने जकाँ। एकटा टेबुल आ छओटा कुर्सी टेबुलक तीन कात अर्धवृत्ताकार रूप मे सजाओल, आब डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर लीखल छैक ‘देवलोक’। विष्णु बीचक कुर्सी पर, ब्रह्मा हुनका बामा कात आ महेश दहिना कातक कुर्सी पर बैसल छथि। हिनका सबहिक मेकअप पौराणिक वर्णन हिसाबें कएल गेल अछि। महेश हाथ मे डमरू रखने छथि आ जटा सेहो बेस पैघ बनल छनि। प्रकाश शनैः शनैः तीनू पर पड़ैत अछि। तकर बाद प्रवेश पथ पर पड़ैत अछि जतए नारद बाबा अपन पौराणिक वेष मे वीणा लेने आबि रहल छथि। नारद जखन लग पहुँचैत छथि तखन पूरा मंच आलोकित होइत अछि। नारद        नारायण, नारायण ! त्रिमूर्ति कें साष्टांग दंडवत। विष्णु         स्वागत मुनिश्रेष्ठ। आसन ग्रहण कएल जाओ (एकटा कुर्सी दिस इशारा करैत) बहुत दिनक बाद दर्शन भेल। नारद        (ब्रह्माक बगल बला कुर्सी पर बैसैत) हॅं, कने चल गेल छलहुँ पृथ्वी भ्रमण हेतु। ओम्हरहु बहुत दिन सँ नहि गेल रही से सोचल जे देखि लियैक खुरापाती मानव जंतु की कऽ रहल अछि। ब्रह्मा         मानव कें खुरापाती किएक कहलियैक देवर्षि ? ओ तऽ हमर अप्रतिम सृजन थीक। नारद        अपनेक वचन सत्य चतुरानन, मुदा सोचियौ ओकर मस्तिष्क केहन तेज बना देलियैक। कहियो इहो सोचलियै जे एहन स्थिति आबि जेतैक जे ओ मानव देवलोक पर विजय अभियान लेल तैयार भऽ जाएत। राक्षस सँ अपने सब बहुत बेर युद्ध कएल, छल बल सँ जीतल मुदा मानव अहाँ सँ छलो बल मे बीसे रहत। ओकर कपटबुद्धिक आगू देवलोकक कोनो बुधियार नहि टिकता। महेश        (जटा पर हाथ फेड़ैत आ मुसकिआइत) नीके ने, एतए हम सब फोकट मे मजा लूटि रहल छी। ओ सब तऽ कहुना दिन राति खटि कए किछु उपार्जन करैत अछि, आविष्कार करैत अछि, आब जमाना आबि गेलैक अछि जे समस्त ब्रह्माण्ड मे ओकरे सबहक राज होइक। विष्णु         औघड़दानी कें तऽ एहिना चौल फुराइत रहैत छनि। महेश        चौल नहि, सत्य बात। मानव हमरा सब कें पूजा करैत, प्रशंसा करैत, टिटकारी दैत अकास ठेका देलक, अकर्मण्य बना देलक आ अपने कतेक आगू बढ़ि गेल। विष्णु         अच्छा, सुनियौ देवर्षि कें की कहबाक छनि। अपने मुनिश्रेष्ठ कने फरिछा कए कहियौ की की देखलियै, बुझलियै। नारद        देखलियै बहुत किछु, बुझलियै ओलक टोंटी। तैयो किछु बता दैत छी। पहिने हम रस्ता पेड़ा पर छद्म रूपें घुमैत रहलहुँ आ लोकक बीच वार्तालाप सुनैत रहलियै, धिया पूताक खेलेनाइ देखैत रहलियैक। अद्भुत नव नव वस्तुक आविष्कार भऽ गेलैक अछि। सबतरि सुनियै रोबोट सँ ई काज करा ले, रोबोट सँ ओ काज करा ले, एक ठाम देखलियै बच्चा सब फतिंगा जकाँ मसीन सब मे पचास साठि टा पजेबा बान्हि कए उड़ा रहल छल। पुछलियै ई की छिएक तऽ सब हँसऽ लागल। ब्रह्मा         फेर किछु बुझलियै की नहि ? नारद        हॅं, एकटा बच्चा कें दया एलै, कहलक “बाबा ई ड्रोन छिऐक, अहाँ कोन शहर मे रहैत छी ? आब ड्रोन तऽ सबतरि भेटैत छैक, दोकान सँ चीज वस्तु आब सबहक घरे घर एकरे द्वारा पठाओल जाइत छैक”। विष्णु         मुनिश्रेष्ठ, ठीक सँ सुनलियै की नहि ? ओ ड्रोन बाजल की द्रोण ? महेश        अहूँ की मजाक करैत छिऐक जनार्दन। द्वापर युगक गुरु द्रोण की आब कलियुग मे लोकक घरे घरे दोकान सँ सामान पहुँचबैत हेथिन ? नारद        हमरहु पहिने भेल जे बच्चा कें बजबा मे किछु गलती भेलैक, ड्रोन नहि द्रोण कहबाक छलैक। हम ओकरा फेर टोकलियै तऽ फेर सब बच्चा हँसए लागल, कहलक ई ड्रोन छिऐक, अंग्रेजी भाषाक शब्द छिऐक। हम तऽ गुम्मे रहि गेलहुँ। ब्रह्मा         (कने चिन्ता आ आश्चर्यक भाव लेने) बेस, आर की सब देखलियै, बुझलियै ? नारद        जखन एहि तरहें जिज्ञासा शान्त नहि भेल तऽ पता लगा कए एकटा वैज्ञानिकक कार्यालय मे घुसि गेलहुँ। विष्णु         वैज्ञानिक ? ई कोन जीव होइत छैक ? पंडित सब तऽ सुनने छलियै, ऋषि मुनि तपस्वी आदि सँ भेंट भेले अछि मुदा वैज्ञानिक शब्द तऽ पहिले पहिल सूनि रहल छी। महेश        (डमरू कें दू बेर बजबैत) तें ने हम कहलहुँ, हम सब घमण्ड मे चूर रहलहुँ, बुझैत रहलियै जे एहि ब्रह्मांड पर अनन्त काल तक हमर राज रहत, इनारक बेंग जकाँ देवलोकक चारि टा पहाड़, नदी, झील आ अप्सरा सबहक बीच दिन बितबैत रहलहुँ आ आन ठाम की की विकास भेलैक से बुझबाक कहियो चेष्टे नहि केलहुँ। ओ तऽ धन्य कही नारद मुनि कें जे किछु नव बातक जानकारी अनलनि। (एतए नारद पाकिट सँ लेजर टॉर्च निकालि ओकर प्रकाश चारू दिश फेकैत मंच पर नाचए लगैत छथि। लेजर प्रकाश तीनू देवताक आँखि मे सेहो पड़ैत छनि, हुनका सब कें चकचोन्ही लगैत छनि, सब आँखि मिलमिलबैत छथि आ आश्चर्यचकित भेल नारद दिस तकैत छथि) ब्रह्मा         ई कोन खेला देखा रहल छिऐक देवर्षि ? नारद        लेजर प्रकाशक नमूना चतुरानन। ई तऽ अति सूक्ष्म यंत्र अछि जे हम ओहि वैज्ञानिक सँ माँगि लेल। ओकर कहब छलैक जे बहुत शक्तिशाली लेजर सँ ओ सब कोनो ग्रह पर शत्रु कें नष्ट कऽ सकैत अछि। ओतए जे हम देखल से वर्णनातीत अछि। की कहू, एकेटा यंत्र सँ विभिन्न रंगक प्रकाश अनेक दिशा मे अनेक दूर तक जाइत जे देखल तऽ ठकमूड़ी लागि गेल। महेश        (दूबेर डमरू बजबैत) अति उत्तम आविष्कार। मानव जाति कें हार्दिक बधाइ। विष्णु         बधाइ बाद मे देबैक उमापति, एखन अपना पर आबऽ बला खतराक चिन्ता तऽ करू। अच्छा, आर की की देखलियैक-सुनलियैक देवर्षि ? नारद        ड्रोन, लेजरक अतिरिक्त रोबोट, साइबोर्ग, कृत्रिम सूर्य-चन्द्र, ग्रह-उपग्रह, कतेक कहू ? आब इन्द्रक पूजाक कोन काज ? मानव कृत्रिम रूपें सब किछु करबा लैत अछि। जखन चाही, जतए चाही, जतबे चाही, वर्षा भऽ गेल। शत्रु कें तंग करबा लेल बिहारियो उठा देत। ब्रह्मा         सब किछु हमरा सब लेल बहुत चिन्ताक विषय अछि। आर किछु कहू। नारद        ओहि वैज्ञानिक सँ बहुत रास जानकारी भेटल, मुदा जेना कहलहुँ ने, बात सब ठीक सँ बुझबा मे नहि आएल। हम ओहि वार्तालापक अंश कें जे किछु लीख सकलहुँ से देखा दैत छी। (विष्णुक हाथ मे एकटा कागत दैत छथिन, ओ स्वयं पढ़ि कए ब्रह्मा आ महेश कें बेराबेरी पढ़ऽ दैत छथिन, कियो ठीक सँ बात नहि बूझैत छथि, तीनू देव कें आश्चर्य सँ आँखि पसरले रहि जाइत छनि) विष्णु         बहुत बात तऽ हमहू नहि बुझलहुँ मुदा चिन्ताक बात एकेटा जे आब मानव दोसर ब्रह्माण्ड पर जेबाक तैयारी मे लागल अछि। अपना ब्रह्माण्डक विभिन्न भाग मे ग्रह नक्षत्र पर यान आ दूत पठा देलक अछि। ब्रह्मा         एहि अभियान कें रोकबा लेल किछु तऽ सोचहि पड़त। (एतबा मे हकासल पियासल अपसियाँत भेल यमराजक प्रवेश) यमराज       त्रिदेव कें हमर साष्टांग दंडवत स्वीकार हो। विष्णु         धर्मराजक स्वागत, मुदा एना अपसियाँत किएक भेल छी ? यमलोक मे सब कुशल तऽ अछि ने। यमराज       कुशल क्षेम बाद मे कहब, हम दौड़ल आएल छी एकटा अति आवश्यक मंत्रणा लेल। ब्रह्मा         मुदा चित्रगुप्त कें कतए छोड़ि देलिएनि ? हुनका बिना कोनो मंत्रणा कोना होएत ? यमराज       से ठीके, हड़बड़ी मे ध्याने नै रहल। एखनहि हम दूत पठा हुनका बजा लैत छी। (नेपथ्य दिस देखि) कने चित्रगुप्त कें जल्दी दरबार मे अबै लेल कहि देबनि। (प्रत्यक्ष भऽ कए) ताबत हमर समस्या तऽ सूनल जाओ। महेश        ठीक छैक, कहल जाओ धर्मराज। यमराज       किछु समय पूर्व मर्त्यलोक मे दू गोटेक टिकट कटि गेलनि। हमर दूत हुनका आनऽ गेल। ओ दूनू अपना कें बाहुबली कहैत छलखिन। दूत लोकनि जखन बहुत देरी भेलाक बादो मृतात्मा कें लेने नहि अएलाह तखन चित्रगुप्त महराज सँ मंत्रणा केलाक बाद हमरा स्वयं ओतए जाए पड़ल। (एही बीच मोट मोट खाता पजियौने अपन पारम्परिक वेश मे चित्रगुप्तक प्रवेश, हुनका सम्बोधित करैत) आउ, आउ, एकदम ठीक समय पर अपने पहुँचि गेलहुँ। हम जे मर्त्यलोक गेल छलहुँ तकरे खिस्सा कहि रहल छी। ब्रह्मा         ई तऽ बड़ विचित्र बात लगैत अछि जे यमदूत मृतात्मा नहि अनलक आ अहाँ अपनहि गेलहुँ। आबहु ओ सब आएल की नहि ? यमराज       नहि ने। सएह तऽ खिस्सा कहैत छी आ आवश्यक मंत्रणा करबाक अछि। ओहि दूनू बाहुबलीक अनुरोध छैक जे अपना संग किछु सामान यमलोक लऽ जेबाक अनुमति भेटए। हम स्वयं एकर निर्णय नहि लऽ सकलहुँ तें दौड़ल एलहुँ अपने सबहक दरबार मे। ओहि दूनू कें हम अपन दूतक पहरा मे मर्त्यलोके मे छोड़ि आएल छी। विष्णु         सामान आ मर्त्यलोक सँ यमलोक आनल जाएत ? ई तऽ सत्ते अभूतपूर्व घटना होएत। एकर दूरगामी प्रभावक अध्ययन केने बिना हम सब कोना निर्णय लेब जे अनुमति देल जाए की नहि। महेश        पहिने चित्रगुप्त महराज सँ सूनि लेल जाए हुनकर विचार। चित्रगुप्त      (बड़ी काल तक खाता कें उनटबैत पुनटबैत) हमरा खाता मे जतेक नियम कानून लिखल छैक से मात्र जीव लेल छैक। निर्जीव सामान लेल कोनो नियम कानून कहियो बनाओले नहि गेलैक। ब्रह्मा         हमरा त ऽ एहि मे बेस खतरा बुझा रहल अछि। जेना मुनि नारद सुनौलनि, यदि किछु एहन सामान आबि गेल तऽ फेर देवलोक कें सेहो डर छैक ने। यमराज       ओकरा दूनूक कहब छैक जे मर्त्यलोक सँ सामान पहिनहुँ यमलोक पठाओल गेलैक अछि। विभिन्न कुण्ड सब मे मानव मल मूत्र रक्त मज्जा आदि भरल गेलैक से तऽ ओतहि सँ आनल गेलैक। यमलोक आकि देवलोक मे मानव तऽ छलैक नहि। विष्णु         बात तऽ ठीके कहैत अछि ओ सब। कने नारद मुनिक विचार सेहो सूनि लेल जाओ। नारद        हम जे किछु देखलियै तकरा आधार पर एतबे कहब जे ओकरा सबहक सामान हम सब चीन्हि नहि सकबैक। लाभदायक होएत की हानिकारक से बुझबाक कोनो उपाय देवलोक मे नहि छैक। बूझू अन्हार घर सापे साप। चित्रगुप्त      हमरा सब तऽ “एम्हर इनार आ ओम्हर खाधि”बला स्थिति मे आबि गेल छी। अनुमति नहि देला सँ ओ दूनू बाहुबली मर्त्यलोक सँ टसकत नहि आ अनुमति देला सँ संगें की आनत सेहो अज्ञात अछि। यमराज       किछु निर्णय शीघ्रे लेबऽ पड़त। महेश        हमरा विचारें अनुमति देबा मे कोनो हर्ज नहि। देवलोक नष्ट हेतैक तऽ नीके हेतैक, फेर सँ निर्माण करब। पुरान घर खसए, नव घर उठए (डमरू बजबऽ लगैत छथि) ब्रह्मा         संहारक रुद्र कें तऽ विनाशलीला देखबा मे मजा अबैत छनि। सब गोटे कने सीरियस होउ आ प्रस्ताव पर विचार करू। विष्णु         छोड़ू सब त्वञ्चाहंत आ बतकही। आनऽ दियौ जे आनत से। यदि कोनो विघ्न आओत तऽ अन्त मे भगवती तऽ छथिए सब दुष्टक संहार करबा लेल। चित्रगुप्त      नीक विचार। यदि सब गोटेक सहमति हो तऽ हम खाता मे लीख ली। आगू फेर एहन प्रस्ताव पर बहस करैक काज नहि रहत। ब्रह्मा         लीखू सर्वसम्मति सँ प्रस्ताव पास भेल। यमराज       बहुत नीक, आब हम चलैत छी (चित्रगुप्तक संग प्रस्थान) महेश        चलै चलू, बहुत समय बर्बाद भेल, कनियाँ सब बाट तकैत हेतीह (हुनका संग विष्णुक प्रस्थान, ब्रह्मा रुकि जाइत छथि।) ब्रह्मा         (नारद कें सम्बोधित करैत) मुनिश्रेष्ठ, कने एम्हर आउ। (नारद हुनका लग अबैत छथि, ब्रह्मा हुनका कान मे किछु कहैत छथिन) नारद        नारायण, नारायण ! देखियौ की कऽ सकैत छी। (दूनूक प्रस्थान, प्रकाश बन्द) (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर लजकोटर (प्रवासीक जीवनपर आधारित) (१०म खेप) -11- डेरा पहुँचतहि फेर माएक ध्यान आबए लागल । राति भरि टकटकी लागल रहैत छल । की कएल जाए? काज भेटि जाइत तँ डेरा बदलि लितहुँ। एहि डेरामे जाबे रहब अहिना होइत रहत । मोनमे से बात राति भरि घुमैत रहल । दू बजे रातिक बाद आँखि लागल तँ लागल जेना लता लगीचेमे कतहु अछि आ कतहुचलबाक हेतु कहि रहल अछि। हम ओकरासँ गप्प करए लगलहुँ। " अहाँ बड़का लोक छी । अहाँ संगे हमर दोस्ती कोना भए सकैत अछि? " "की बात करैत छी?हमरा अहाँ नीक लगलहुँ,एहिमे अहाँक कोन दोख । हमरा कोनो बातक परबाह नहि अछि । ने हमरा ककरो डर अछि ।हम जीब अहीँ लग,मरब अहीँ लग ।" " बाहरे अहाँ! जीवन कोनो तमासा नहि छैक जे जएह मोन हो सएह कए लिअ । डेग-डेगपर टाका चाही, रुतबा चाही । हमरा लगमे की अछि?" " हमरा ऊपर भरोसा करू । हम जे रस्ता तय केलहुँ अछि, निश्चय ओ कष्टकारी भए सकैत अछि, मुदा तकर माने की?" "अहाँ एतेक सुंदरिछी, पढ़ल-लिखल छी, नीक घरक छी, अहाँक पिता जेहन घर-बर चाहताह आनि लेताह । हम की छी? किछु नहि,मामूली आदमी जकरा ने घर अछि ने कोनो ठेकान अछि?" " प्रेम आन्हर होइत छैक । ई पुरान कहबी छैक । अहूँ सुनने हेबैक । हम आब पाछा नहि जा सकैत छी ।" अड़-बड़ सपना सीनेमाक रील जकाँ चलि रहल छल कि बाहर हल्ला भेलैक । सड़क ओहिपार ऊपरका कोठरीमे गैसक सिलंडर फाटि गेल रहैक । अफरा-तफरीक माहौल छल ।सभ जहाँ-तहाँ भागि रहल छल ।ओहि अफरा-तफरीक माहौलमे हमहु बाहर भगलहुँ । सड़कपर बहुत लोक जमा भए गेल छल । अग्निशमन यंत्रसँ पानिक बरखा कएल जा रहल छल । सभ एक-दोसरकेँ दिस देखि रहल छल। एही माहौलमे किशुन देखाएल ।हम जोरसँ आबाज देलिऐक-" किशुन! किशुन! मुदा ततेक हल्ला भए रहल छल जे ओ किछु सुनि नहि सकल । आखिर हमही जेना-तेना ओकरा लग पहुँचलहुँ । हमरा देखितहि किशुन चिचिआ उठल-" एतेक दिन कतए छलह?" "गाम चलि गेल रही । माए मरि गेल ।ओकर काज गामेमे करबाक विचार भेलैक ।से सभसँ निवृत भए आब दिल्लिएमे छी।" " ओ! हमरा तँ ई सभ बुझले नहि छल । " "एहिठाम कतए आएल छलह?"-हम पुछलिऐक। "हमर मामा एतए सपरिवार रहैत छथि ।संयोग छैक जे ओ सभ गाम गेल छथि । घरमे गैसक सिलिंडर राखल छलैक से एकाएक फाटि गेल । सभ समान जहाँ-तहाँ छिड़िआ गेल । चार फाटि कए उड़िआ गेल । गामसँ मामा फोन केलाह जे एना-एना बात । सएह सुनि कए भागल-भागल अएलहुँ अछि । " “एहि तरहेँ सड़कपर कतेक काल ठाढ़ रहबह ।हमर डेरा लगीचेमे अछि । ओतहि चलह।चैनसँ गप्पो करब आ चाहो पीब।" लाख प्रयासक बाबजूद घरक किछु समान नहि बचलैक।देखिते-देखिते सभकिछु स्वाहा भएगेलैक। आस-पासक कैटा कोठरीसभ सेहो क्षतिग्रस्त भए गेल छल ,मुदा ककरो जान नहि गेलैक,सएह बड़का बात । फरीछ भए गेल रहैक ।दूधबला दूध लए कए आबि गेल छल । अखबारबला अखबार फेकि गेल । बच्चासभ अपन-अपन इसकूल जा रहल छल । सड़कपर क्रमशः आवागमन सामान्य भए गेल छल तथापि किछु पुलिस अखनो ओतहि ठाढ़ डंटा घुमा रहल छल । दमकलसँ आगितँ मिझा देल गेलैक मुदा लोकक समान सभ यत्र-तत्र ओहिना छतराएल छलैक । किशुनक मामाक कोठरीक तँ किछु नहि बाँचलछलैक। तखन ओ ओहिठाम ठाढ़ रहिए कए की कए लैत? लोकसभ अपन -अपन कोठरीमे आपस चलि गेल छल । किशुन हमरासंगे हमर डेरापर  आबि गेल । हम अपन स्टोप पजारलहुँ ।  दू कप चाह बनओलहुँ । चाहक घोंट अंदर होइते जानमे-जान आएल । “आओरकोना की भए रहल छैक? -हम कहलिऐक । “हम अस्तालसँ घुरि अएलहुँ । टांग तखनो झखाइत छल। कतए जाउ? किछु फुराइएनहि रहल छल। हारिकए पुरनामंदिरे पर पहुँचलहुँ । मंदिरमे दोसर पुजारी काज कए रहल छल। हम ओकरा सभटा बात कहलिऐक ।ओकरा बहुत दुख भेलैक जे हम एहन हालमे पहुँचि गेल छी मुदा ई साहस नहि भेलैक जे अपना संगे हमरा राखि लिअए "- किशुन बाजल । "तखन?" "तखन की? ओहिठामसँ बिदा भए गेलहुँ ।झलफल भए रहल छल ।चौकपर चाहक दोकानबला भेटल ।ओकरा बहुत किछु बूझल रहैक । हमरा देखितहि किछु-किछु कहए लागल। कहलिऐकजेपहिने चाह पिआबह । फेर गप्प करैत छी। ओ धराक दए चाह बनओलक। चाह पिलहुँ । बिस्कुट खेलहुँ तँ जा कए जान मे जान आएल । ओकरेसँ एकटा दोसर मंदिरक पता लागल ।चोट्टे ओतए पहुँचलहुँ ।संयोग नीक छल । मंदिरेपर ओकर मालिकसभ भेटि गेलाह । ओहोसभ पुजारी ताकिए रहल छलाह । हमर ओहिठाम तत्काल सभटा ओरिआन भए गेल ।ओहिठाम रहबाक बढ़िआँ व्यवस्था छैक । कैटा कोठरी छैक । जतए रहू ।" "संगे के सभ रहैत छथि?" "किओ नहि । “ “मालतीक की समाचार छैक?" "की समाचार रहतैक? ओविजयसंगे रहैतछथि।“ “तूँ किछु केलहक नहि?" "की करितिऐक? किएक करितिऐक? जे हमर अछिए नहि तकर पाछा-पाछा कतेक दिन घुमैत रहितहुँ आ किएक ।" "आ वच्चा?" "छोड़ह ई गप्प-सप्प ।आब एहिमे की राखल छैक?" एहिसभसँ कष्टे भए जाइत अछि।" बुझाएलजेना ओकर मोन एकदम तीत भए गेलैक । कनी काल चुप रहि कए ओ बाजल-" जखन लोक बाघक मुँहमे हाथ देत तँ जे हेबाक से हेतैक । चारूकात समाजमे विकराल परिस्थिति पसरल अछि । कहएलेल ई महानगरी अछि मुदा सामर्थ्यवानेकचलैत अछि।सभठाम टाका चाही । कतए जाएब,ककरा कहबैक,के अहाँसंग ठाढ़ होएत? रक्षको यत्र भक्षकः बला गप्प भए गेल अछि । विजय मालतीकेँ तरह-तरहसँ पछोड़ करैत रहल । हम ई बात जाबे बुझलिऐक ताबे बहुत देरी भए गेल छल आ जँ पहिनहु बुझि जइतहुँ तँ की कए लितहुँ? पुलिस लग जइतहुँ,मुदा एहि मामलामे पुलिसेक लोक लागल छल। कोटमे केस करए हेतु टाका चाही,कतए सँ अबैत? फेर मालतीक नेत सेहो साफ नहि छल ।" आगा गप्प करैत ओ बाजल॒-"हम कै बेर विजयक जीप मंदिरमे लागल देखिऐक । सोची जे भगवानक दर्शन करए आएल होएत । हम तँ पूजा-पाठमे लागल रही आ ओ अपन काज सुतारए मे व्यस्तरहैत छल । आखिर मालती ओकरा संगे घंटो गप्प किएक करैत रहैत छल? बादमे जखन हमरा कनीमनी कान ठाढ़ भेल ताबे बहुत देरी भए गेल छल ।" एकदिन हम मालतीकेँ टोकबो केलिऐक । "की बात छैक जे ई विजय एतेक-एतेक काल धरि एहिठाम  मड़राइत रहैत अछि? "अहाँकेँ हमर ककरोसँ गप्पो करब नहि सोहाइत अछि ।एहन हालतमे हम कोना जीवि सकैत छी?हमहु मनुक्ख छी ।" " आ हम की जानबर छी?" " जे छी मुदा हम अहाँकेँ लेल जपाल छी तँ स्पष्ट किएक नहि बजैत छी?" एहिना उल्टा-पुल्टा ओ बाजए लागलि ।विजयकेँ मौका भेटि गेलैक । ओ अपनासंगे हमरा लेने गेल आ झूठमूठकेँ घरेलू हिंसा कानूनमे अंदर कए देलक ।" हम कै दिन बिना कोनो गलतीकेँ थानाक हाजतिमे बंद रहलहुँ ।ओमहर विजय मंदिरक बहाना बना कए मालती लग अबैत -जाइत रहल ।एहन लफड़ा कए बेर होइत रहल । हमरा होअए जे ई पुलिसक आदमी छैक,हमरा संगे बेजाए नहि करत । फेर छलहो अपनेठामक।" "ओएह तँ गड़बड़ भए गेल । किओ आन रहैत ने तँ एहन लीला नहि होइत । कहबी छैक जे डाइनो पाँचघर बारिकए चलैत अछि मुदा एहिठाम तँ अजगूते भए रहल अछि। परदेशमे लोक जाएत तँ ककरा लग?" "आखिर हमहु तंग भए गेलहुँ, तंगोसँ बेसी उदास भए गेलहुँ । हमरा आ मालतीमे मतभेद बढ़ितेगेल। ओ सदरिकाल अपने बात पर अड़ल रहैत छलि। अहीं कहू, एनामे कहीं गृहस्थी चललैक अछि? गाममे छलि तँ माए संगे उठापटक होइत रहल । गामसँ अबैतकाल की-की लफड़ा भेल से बूझले अछि । आ जखन संगे रहए लागलि तैओ शांत रहैत सेहोनहि । हम कइए की सकैत छलहुँ? कोनो राजा-महराजा तँ छी नहि? कमाएब नहि तँ खाएब की? ई से बात नहि बुझि दिन-राति दोसरे  फसादसभ करैत रहलिपरिणाम भेल जे मंदिरबला काज छुटि गेल , डेरा छुटि गेल  आआब तँ बात हदसँ ऊपर भए गेल ।" " की भेल, किएक भेल मुदाभेल बहुत दुखकर । अहाँक तँ घरे उजरि गेल ।"- हम कहलिऐक। “भावी प्रवल । कहबी छैक जे हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ ।" से कहि किशुनक आँखि नोरसँ भरि गेलैक । हम अपना भरि ओकरा बहुत बुझेबाक प्रयास केलिऐक । " जीवन कखनो ठाढ़ नहि भए जाइत छैक । जे गेल से गेल आगाक विचार करू । कोनो-ने-कोनो रस्ता निकलबे करतैक । भगवानक घरमे देर छैक अन्हेर नहि छैक ।" " से तँ बात सत्ते । मुदा गूंड़क मारि धोकरे जनैत छैक । हम नहि सोचि सकलहुँ जे अपने लोकसँ एहन धोखा होएत ।" किशुनकेँ परेसान देखि हमबात बदलैत कहलिऐक -" अहाँक मामा कहिआधरि अओताह ? " " ट्रेनमे बैसि गेल छथि । भए सकैत अछि जे साँझधरि आबि जाथि।" "आबथि तँ हमरो भेंट कराएब ।" "अवश्य ।"-से कहि किशुन उठि गेलाह । हम हुनका अरिआति कए अपन डेरामे आपस आएले छलहुँ की लताक फोन आबि गेल । रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस : ६६ बर्ख, पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह, मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवा निवृत्त), शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक प्रकाशित कृति : मैथिलीमे:- १. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा), २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग), ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास)१२.स्वप्नलोक(उपन्यास)१३.शंखनाद(उपन्यास)१४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) In English:- 1.The Lost House (Collection of short stories), 2.Life is an art हिन्दी में – १.न्याय की गुहार(उपन्यास) (उपरोक्त पोथीसभ pothi.com, amazon.com आओर www.flipkart.com पर सँ कीनल जा सकैत अछि) इमेल : mishrarn@gmail.com ब्लोग : mishrarn.blogspot.com  एमजोनक लेखक पृष्ठ : amazon.com/author/rnmishra ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल आमक गाछी (धारावाहिक उपन्यास- चारिम खेप) 4. कौलेज बन्न होइते धीरेन्द्र गाम जाइक तैयारी कऽ लेलक।आइ तीन-चारि दिन पहिनहिसँ तैयारीमे जुटल छल। मुदा जहिना अपनो मास दिनक छुट्टी बितबैले निचेनसँ जाएत तहिना परिवारक जे पटनाक काज छेलै सेहो सभ सम्हारने जाएत। पटनामे रहितो धीरेन्द्र अपनाकेँ प्रेमनगरिये बुझैए, पटनियॉं नहि। तेकर कारण अछि जे धीरेन्द्रस्पष्ट बुझैए- पटना पढ़ैले आएल छी,विद्यार्थी छी,नहि कि ऐठामक बासी छी। बासी छी प्रेमनगरक।अपन मातृभूमिक जे आकर्षण होइ छै ओइसँ धीरेन्द्र खाली आकर्षितेटा नहि अछिबल्किकर्मभूमिक संग धर्मभूमियोकेँ बुझियो रहल अछि आ नीकसँ निमाहियो रहल अछि। ओना,जहिना कर्मभूमियो आधर्मभूमियो दुनियोँछी तहिना तँ दुनियोँ दुनियॉं छीहे, सभठाम अपन-अपन सभ किछु छइ। जँ नीक जगह, नीक जगहक माने दुनू प्रकृति प्रदत्त जे नीक अछि सेहो आ कर्मसँ जे भूमि नीक बनौल गेल अछि सेहो, बुझि सभ एकेठाम बास करए चाहब तँ की अँटाबेस भऽ सकैए? जँ अँटाबेस भइयो सकैए तँ बॉंकी दुनियॉं तँ ओहिना परती-पराँत, पहाड़-नदी-नाला बनल रहत, आजुक जेहेन दुनियॉं अछिसे थोड़े बनि पौत। तइले तँ ओकरा कर्मभूमि बनबैक जरूरत अछिए। बच्चेसँ धीरेन्द्रकेँ परिवारक संग समाजो आ गामक माटियो-पानिसँ अपना जकाँ सिनेह रहल, तँए अपन गामक पानि, अपन गामक माटि आ अपन गामक लोकक बीच धीरेन्द्र अपनाकेँ सभ दिन देखैत आबि रहल छल जइसँ सभ कथूसँ अपनत्व तेना बनि गेलै जे अपनाकेँ ओकर अनुगृहीत बुझैत आबि रहल छल। अनुग्रहे ने ओ गुण छी जे कियो अपना कऽ तेना हथिया लइए जे हाथक काजक संग बुधियो-विचार अनुग्रहित होइत रसमय बना दैत अछि। ई गुण धीरेन्द्रकेँ अपन परिवारमे बच्चेसँ भेटैत रहल। शुरूक अवस्थामे माने बच्चामे जे धीरेन्द्रकेँ गामक स्कूलमे बुड़हागुरुजीसँपढ़ैयोक आ फुलवाड़ियो लगबैक शिक्षा भेटलैओधीरेन्द्रक बेवहार बनि गेल। पढ़ाइक संग-संग धीरेन्द्र दू कट्टा खेतमे फल-फलहरीक गाछ सेहो लगौलक आ दुआर-दरबज्जा, अँगना-घरक संग खुट्टा परहक गाइयक देख-भाल सेहो दायित्व बुझि करए लगल। आइसँ सात बर्ख पूर्व धीरेन्द्रपाँचटा आमक गाछ सेहो लगौलक आ लताम-नेबो-अररनेबा सेहो लगौलक।पाँचो आमक गाछ धीरेन्द्र अपना बुधिये-विचारे लगौने छल। ओइमे पिता कोनो तरहक राय-विचार धीरेन्द्रकेँ ऐ दुआरे नहि देलखिन जे बुड़हागुरुजीक सिखौल बाड़ी-फुलवाड़ीक लूरि छी, अपन लूरि तँ वंशगत अछि, तँए जीबेन्द्र किछु ने कहने छेलखिन। अपन बाल-मनक सकाल सूर्यक किरण धीरेन्द्रकेँ छेलैहे, तँए मौसमक हिसाबसँ पॉंचो आमक गाछ धीरेन्द्र रोपने छल। माने ई जे किछु लोक ओहन छैथ जे आमक सुआद मानि एक्के रंगक आमो आकि कोनो आने फलक गाछ रोपि लइ छैथ, जे मौसमक चालि पकैड़ जहिना एक्केबेर संगे-संग फुलाइए, फड़ैए तहिना बड़बड़ा कऽ एक्केबेर पकबो करैए, जइसँ ओकर उपयोग करैक कम समय भेटैए। मुदा पॉंचटा पॉंच गुणकएक्के फलक गाछ रोपलासँ, जेकर अपन गुण आगू-पाछू होइ छै, ओ तँ एक्के फल पॉंच गुणा बेसी समैयक लेल भाइये जाइए। जइसँ पँचगुन्ना लाभकारियो होइते अछि। यएह सोचि धीरेन्द्र पॉंचो आमक गाछ लगौने छल। संजोग बनल, पाँचो आमक गाछ ऐबेर मनसम्फे फड़ल अछि। जे धीरेन्द्रकेँ पटनेमे पिता जानकारी पठा देने छेलखिन। अपन रोपल आमक गाछ फड़ल अछि तँए धीरेन्द्रक हीक-दम ओइपर छेलैहे, कौलेजकेँ बन्न होइते राता-राती धीरेन्द्र गाम विदा भेल। सवारीक एते तँ सुविधा भइये गेल अछि जे दिन-राति कखनो चलि-फिर सकै छी। ओना, आवागमनक सुविधा जरूर बढ़ल अछि मुदा से सड़केटा भेल अछि। तँए सड़कक सुविधा तँ कहल जा सकैए मुदा अवागमनक सुविधा केना कहल जाएत। आवागमनक सुविधा तँ भेल जे सड़कक संग सवारियोक सुविधा होइ। ओना, सड़कक देखा-देखीसँ सवारियो बढ़ल अछि मुदा से मनमाना अछि। जइसँ कोनो स्थानसँ कोनो स्थानक मासुल केते लागत से निर्धारित नइ अछि। तखन तँ जेहेन देश तेहेन भेष बना लोक पार-घाट लगैबते अछि। प्रेमनगर अबैमे कटपीस रस्ता रहने रेलक सुविधा ओते नीक नहि अछि जेतेक बसक सुविधा अछि। रातिमे खेला-पीला पछाइत पटनामे बसपर चढ़ू आ सुर्ज उगैत प्रेमनगर पहुँच जाउ। धीरेन्द्रकेँ बुझल रहबे करइ,सएह केलक। स्लीपर बसमे धीरेन्द्र अपन जगह पेब जा कऽ ओंघरा रहल। बस खुजिते,किछुकालक पछाइत बसक यात्री सभ निसबद भऽ सुति रहल जे नाकक वसातक हवासँ भासित हुअ लगल। यात्रीक रूपमे धीरेन्द्र असगरे जागल, बॉंकी ड्राइवर आ खलासीटा जागल छल। जहिना जेठ-अखाढ़सँ नदी-नाला फुलए लगैए तहिना ज्ञानभूमिक यात्री रहने धीरेन्द्रक मन सेहो फुलाए लगल। मनमे उठलै अपन जिनगी। ‘अपन जिनगी’ मनमे उठिते धीरेन्द्रकेँओ दिन मोन पड़लै जइ दिन पिताजी गामक स्कूलमे प्रवेश दियौने रहथिन। पोखैरक पहिल घाटक सीढ़ी जकाँ धीरेन्द्रक मन अपन जिनगीक पहिल घाटपर पहुँच गेल। अक्षर ज्ञानसँ लऽ कऽ अंक तकक ज्ञान ओतै भेल। जइसँ सौंसे जिनगीक तँ बोध नहिमुदावएह ‘अक्षर’ आ ‘अंक’ तँ अखनो बाट देखाइये रहल अछि।यएह ने भेल बोधक बीज रूप। गामक लोअर प्राइमरी स्कूलसँ आगू बढ़ि पड़ोसी गामक मिडिल स्कूलमे प्रवेश केलौं, पछाइत हाइ स्कूल होइत आगू बढ़ि अखन पटना कौलेजमे पढ़ै छी। साल भरिक पछाइत अहूसँ निकैल जिनगीक दोसर सीढ़ीपर जाएब। शुरूहेसँ, माने जहिया लोअरे प्राइमरी स्कूलमे पढ़ैत रही, किछु नव सिखैत रहलौं। जे किछु मनो अछि आ किछु बिसरियो गेलौं। ओना, आगू बढ़लापर किछु आरो नव ज्ञान-बातसँ भेँट होइते गेल जे बुझल बातक विस्तार रूप सेहो भेटबे कएल। तैसंग किछु बिसरलहो बात दोहरा कऽ मोन पड़ल आ किछु आरो बिसरबो करबे केलौं। खाएर जे मोन अछि आकि जे बिसरलौं, से बिसरलौं मुदा अखन जे मन से ने बुझब। जेना धारमे बलुआह माटिपर पएर रोपिते सर-सरा कऽ निच्चाँ मुहेँ धँसए लगैए आ धँसैत-धँसैत सक्कत माटि भेटिते असथिर भऽ जाइए तहिना धीरेन्द्रकेँ मनमे जिनगीक सक्कत माटि भेटल। असथिरसँ पएर रोपैत धीरेन्द्रक मन अपन जिनगीक विचार करए लगल। ओना, गहींर खाधिसँ पानि उपैछ ऊपर आनैमे बर्तनक काज पड़िते अछि, से जेहेन बरतन रहत तइ हिसाबे ने पानियोँ ऊपर औत। नइ तँ उपछा-उपछीमे रस्तेमे छिड़िया जाइए। दुनियॉं तँ दुनियॉं छी,जहिना रंगीन तहिना संगीन सेहो अछिए।कियो कबीर जकाँ धुनिया[i] बनि जिनगीक संग दुनियॉंकेँ धुनैए, तँ कियो धुनियॉंक धुनकीमे धुन-धुना धुनाइए। तही बीच निनाएल यात्री सबहक नाकसँ तेहेन अवाज निकलए लगल जे धीरेन्द्रककेँ अपनो शंका हुअ लगलै जे हमहूँ तँ ने आने-आन यात्री जकाँ सुतले छी। तहीकाल गाड़ी कसि कऽ हॉरन देलक। जेना अनभुआर रस्ता बुझि ड्राइवरक मनमे डरसँ शंका पइस गेल होइ। हॉरन सुनिते एकटा यात्रीकेँ नीन टुटलै, बाजल- “हौ खलासी!गाड़ी केतए पहुँचलह हेन।” खलासी जोरसँ बाजल- “तोरा जाइ-के केतए छह?” यात्रीक काँच नीन टुटल छल तँए मनमे कड़ूपन छेलैहे। खलासीपर कड़ुआइत बाजल- “एहेन तोहर बात किए होइ छह!” खलासी- “की बात होइए?” दुनू गोरेक कहाकहीसँ कएटाआनो-आन यात्रीक नीन टुटल। ओना, खलासी आ ड्राइवरकेँ बुझल जे अखन भियौन रस्तामे छी तँए बसमे जेतेक हल्ला-गुल्ला बढ़त तेतेक नीक। मुदा यात्रियो तँ पूरबा हवाक लहकीक नीनकेँ छोड़ए नहि चाहैत...। टुटल नीनकेँ जोड़ैले पहिलुक यात्री फेर बाजल- “खलासी, समय केते भेल हेन?” खलासी- “तीन बजे भोर भऽ गेल।” दोसर यात्री जे छल, जेकर नीन हल्ला सुनि टुटल छेलै ओ बाजल- “अँइ हौ खलासी!एहेन जे तूँ बुड़िवाण छह सेतोरा अखनो तक नइ बुझल छह जे तीन बजे राति कड़कड़ौआ नीनक छी?” खलासी बाजल- “हम ते कमे कहलियह, पोने तीनियेँ बजेसँ ‘भोर’ हुअ लगैए। तोहर विचार अढ़ाइ बजे रातियेपर अँटकल छह।” एकाएकी बसक सभ यात्रीक नीन टुटि गेल। ओना, कोनयात्री केकरा पक्षमे बाजत, ई समस्या सबहक मनमे उठिये गेल।तँए कियो केकरो पक्षमे ठाढ़ नहि भेल। सभ पंचे भऽ गेल आ एकसूरे बाजए लगल- “राति कि भोर भेल, केकरो कहने थोड़े होइए। ओ तँ भगवानक लीला छिऐन, जे जेहेन बुझत से तेहेन पौत। कियो राति सुति कऽ बितबैए आ कियो कनैत बितबैए।  तइले जे यात्रीक नीन भगन करै छहक, एहेन कि तोहीं दुनू गोरे छह!” तही बीच कनटेक्टरक नीन सेहो टुटल। नीन टुटिते कन्टेक्टरहाँइ-हाँइ कऽ पहिने अपन जेबी टोबलक। जेबी ठीके-ठाक बुझि पड़लै। ड्राइवरकेँ पुछलक- “जीवन, गाड़ीक रफ्तार ठीक छह किने?” ड्राइवर बाजल- “हँ।” ‘हँ’ सुनिकन्टेक्टर समय-स्थानक मिलान कऽ यात्री सभकेँ शान्त करैत बाजल- “अदहे रस्तामे गाडी अछि, तँए अखन सुतबेकरै जाउ।” भोर होइते गाड़ी प्रेमनगर-स्टेण्डपर रूकल। अकासमे चिड़ै सभ चहचहा रहल छल। अन्हाररातिमे डुमल गाम धीरे-धीरे सुर्जक संग उगि रहल छल। अपन बैग नेने धीरेन्द्र गाड़ीसँ उतैर सोझे अपना घर दिस विदा भेल। दसे मिनटमे धीरेन्द्र घरपर पहुँच गेल। पहुँचते माएपर नजैर पड़लै, पएर छुबि सुभावीकेँ गोड़ लगैत धीरेन्द्र बाजल- “बाबूकहाँ छैथ?” सुभावी बजली- “खेत-पथार दिस गेल छैथ।” धीरेन्द्र- “और सभ समाचार ठीक छैन किने?” सुभावी- “हँ। झोरा-झपटा राखह, रस्ताक झमारल छह, भूख लगि गेल हेतह। पहिने किछु खा लएह।” दरबज्जाक अपन कोठरीमे, अपन कोठरी भेल जइमे धीरेन्द्रक ओछाइनो-बिछाइन छै आ आनो-आन समान छै, बैग रखि, कपड़ा खोलि, लूँगी पहिर निकैल माएकेँ कहलक- “माए, बसमे तेते झमार पड़ल जे रौतुको खेलहा ने पचल अछि।तँए कनी घुमि-फिर लेब ते मन हल्लुक भऽ जाएत। पछाइत अपन नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ जलखै करब।” धीरेन्द्रक मनमे पटनेसँ अपन रोपल गाछक आम देखैक छल, मन छटपट करइ जे कखन अपना नजरिये देखी।अपन कएल कीर्तक फल देखैक इच्छा सभकेँ होइते छइ। जहिना कोनो विद्यार्थीकेँ अपन कठिन श्रमक रिजल्ट देखैक उत्सुकता रिजल्ट निकैलते कइएक गुणा बढ़ि जाइ छै तहिना धीरेन्द्रोकेँ अपन लगौल गाछक फड़ल आम देखैक उत्सुकता बढ़ले जा रहल छेलइ।दरबज्जापर सँ उतैर धीरेन्द्र बाजल- “माए,पहिनेकनी आम देखने अबै छी।” ‘आम’ सुनि सुभावीक मन खुशीसँ ओहिना दहला गेल जेना माता-पिताक कएल कीर्तकेँ बेटा-बेटी खुशीसँ आगू बढ़बैए।सुभावी बजली- “बौआ, आम ते लुधकी लागल फड़ल छह!” माइक बात सुनि धीरेन्द्रक मन आरो तरसए लगल जे कखन अपना नजरिये देखब। बाजल- “सभ गाछ फड़ल अछि कि अदहा-छिदहा?” सुभावी- “सभ गाछ फड़ल अछि। तूँ जे रोपने छह सेहो फड़ल अछि आ पहिलुका गाछ सभ सेहो खूब फड़ल अछि।” दरबज्जासँ पॉंच बीघा पूब,जैठाम धीरेन्द्र दू कट्ठा खेतमे अपना विचारे पॉंचटा आमोक गाछ आ आनो-आन फल सभ लगौने अछि। पॉंचो आमक गाछपर धीरेन्द्रक मन तेना अँटैक गेल जे आगूमे ठाढ़ आन-आन फलक गाछक फलपर नजैर पड़बे ने कएल। सिनुराएल गुलाबखास आ चिकिनाएल बम्बइ आम देख धीरेन्द्रक मन बिहुसए लगल। अपन रोपल पहिल बेरक फल छी। बाप-दादाकबनौल एहेन परम्पराअदौसँ आबिए रहल अछि जे पहिल फल साधु-सन्त-महात्माकेँ खुआ पछाइत अपने खाइ।अयाची मिश्र सेहो अपनश्रमक पहिल फल बिलहनहि छला। ओना, धीरेन्द्र अपन माएकेँ सेहो देखते आबि रहल छल जे चारपर कि ढाठपरफड़ल पहिल सजमैन पहिने ठकुरवारीमे दऽ अबैतरहथिन।तहिना केता बेर धीरेन्द्र अपनो भट्टाक पहिल फड़क भार बना कन्हापर उठा गामक बुढ़बा महादेव स्थानमे सेहो चढ़बैले गेल अछि...। भरि रातिक बसक यात्रा कएल धीरेन्द्रक मनसँ सभ थकान जेना मेटा गेल। मोन पड़ल जगमोहीक आमक हकार...। जगमोहीपर नजैर उठिते धीरेन्द्रक मनमे एकाएक घोदाबला सुतपुतिया झुंगनी जकाँ अनेको विचार उठि गेल। पहिल विचार उठल जे जँ जगमोही आबि गेल तँ जरूर ओकरा अपन लगौल फल-फलहरीक बागो-बगीचा देखा देबै आ पहिल सालक फड़ल आमो खुआ देबइ। जगमोहीपर सँ धीरेन्द्रक नजैर जगमोहीक रूप-गुणपर पहुँचल। की जगमोहीकेँ अखन ब्रह्मचारिणी नहि कहल जाएत? साल भरिक पछाइत ओ कौलेजसँ निकलत। बिआह-दान हेतै, परिवार बनौत, जीवन बिताएत। मुदा अखन धरिक जे जगमोहीक रूप-गुण-शील रहल ओ तँ यएह ने रहल जे विद्याध्ययन वृत्तिमेलागल अछि। माए-बापक देख-रेखमे परिवारोमे रहबो कएलआ जेतेक समय खाली भेटलै तेते परिवारक काज सेहो सम्हारैत रहल जइसँ जहिना ओकरा अपना नजैरमे माए-बाप-बहिन संग परिवार गड़ल छै तहिना ने माइयो-बाप आ बहिनोक नजैरमे जगमोही सेहो गड़ल अछि। यएह जिनगी ने परिवार बदलने–बिआहक पछाइत–नीकोमे जा सकैए आ अधलोमे जा सकैए। ऐमे जगमोहीक कोन कर्मक फल भेटत?धीरेन्द्रक मन थकथका गेल। मने-मन धीरेन्द्र विचारक दुनियाँमे विचड़ए लगल। विचड़ैत-विचड़ैत धीरेन्द्रक मनमे विचड़लै- एहनो तँ परिवेश बनियेँ गेल अछि जे माता-पिताक कएल सन्तानक सेवामे हेरा गेल अछि। दहेजक दानव ऐ रूपे समाजकेँ दबोचि नेने अछि जे एक कोखिक सन्तान भेलो पछाइत बेटी महत्-हीन भऽ गेल अछि, जइसँ भार स्वरूप परिवारमे बोझ बनि माए-बापक सिरचढ़ बनल अछि। तँए जरूरी अछि मनुखक रूपमे बेटा-बेटी दुनूकेँ एक-समान बना जीवन-यापन करैक। जे कोनो परिवार अछि, ओकर बनावट एहेन अछिए जइमे पुरुख-नारीक सामंजस्यसँ परिवार गतिक संग सृष्टिक सृजन होइते आबि रहल अछि। मुदा, तखन जँ एहेन दानवी समस्या आइ सिरचढ़ भेल तइमे केतौ-ने-केतौ समाजक दानवीय गुणक हाथ जरूर अछि। मुदा से के देखत? जीवमे श्रेष्ट जीव कहैबला मनुखकेँ जँ अपनोमे आ जैठाम बसैए तइ समाजोमे जँ एहेन ब्रह्मफॉंस लागल रहत तैठामक जिनगीक गतिशीलता केहेन रहत! जखन गतिये दिशाहीन भऽ जाएत तखन जिनगी केना जिनगी बनि आगू चलत..? विचारक दुनियॉंमे धीरेन्द्र जेतेक विचड़ैतरहए तेतेक मन थकथका-थकथका धक-धका रहलछेलइ। जइसँ ने आगू किछु देख रहल छल आ ने पाछू। दुनू दिस अन्हारे-अन्हार बुझि पड़इ। मुहसँ कोनो बकार नइ निकलै। निकलबो केना करितै, दोसर तँ कियो लगमे छेलैहो नहियेँ जेकरा पुछि धीरेन्द्र अपन रस्तो देखैत वा कहि-कहि अपन मनक बेथो मेटबैत। तहीकाल पिता- जीबेन्द्र हुहुआएल-फुहुआएल अपन पहिलुका वगीचा देख घुमल अबैत रहैथ कि थोड़ेक फरिक्केसँधीरेन्द्र प्राणाम करैत बाजल-“बाबू, ऐबेर तँ नवको आम...।” ओना, जीबेन्द्रक मनमे रहैन जे पहिने धीरेन्द्रक पटना प्रवासक समाचार बुझी, मुदा आगूमे जखन धीरेन्द्रक  विचार खसलैन तखन पहिने ओकर उत्तर देब जरूरी बुझि जीबेन्द्र बजला- “बौआ!आम तँ नवका नइ भेल।ई आम तँ पहिनौंसँ आबि रहल अछि। मुदा नव जगहपर नव लोकक हाथक रोपल नव गाछ जरूर अछि।” पिताक उत्तर सुनि धीरेन्द्रक मनक कुहेस हटल। कुहेस हटिते विचार जगल जे, जे जे आमक गाछ रोपने छी ओ तँ कोनो दोसर गाछक कलम छीहे। हँ, तखन एकटा विशेष गुण जरूर अछि जे आमक मौसम जेतेक दिनक अछि तइमे एते चतुराइ जरूर अछिजे शुरू-सँ-अन्त धरिकमौसमक फल भऽ गेल। आमक पाँचो गाछ रोपैसँ पहिनहिधीरेन्द्रक मनमे उठि चुकल छल जे अपना ऐठाम ओहन गाछी-कलम अधिक अछि जइमे एक समैया आम बेसी अछि। जेकरा एक मौसमीकजरूर बना लगेलौं। यएह ने भेल समस्या समाधानक एक दिशारूप। माने जे कियो किसान जँ पाँच कट्ठा वा दस कट्ठा वा बीघा-दू बीघा गाछी-कलम लगौने छैथ तँ ओइमे ओ ओहने आम लगौने छैथ जे सुआदक हिसाबसँ जे पसिन भेलैन, मुदा ओ एक समैये ने भेल। मौसमकेँ तीन आकार अछि। पहिल अगता बीच बीचला आ पचतिया। प्रकृति प्रदत्त किस्म एक संग मोजरत, एक संग फड़त आ एक संग पकि कऽ झड़ि जाएत जइसँ फलक कम दिनक उपयोग भेल। ओना, विज्ञानक विकास भेने किछु दिन जोगा कऽ राखल जा सकैए, से तँ सभकेँ उपलब्ध नइ छइ। मुदा जँ आमक समैयक हिसाबसँ चयन कए रोपल जाए तँ जहिना जगरनाथपुरीमे बारहो-मास धान होइए, जइसँ तीन सौ पैंसैठो दिन नवका चूराक परसाद बनैए से तँ भइये सकैए। धीरेन्द्रकेँ मुँह बन्न देख जीबेन्द्र बजला- “बौआ, पटनामे नीके-ना रहै छेलह किने? अमैया छुट्टी तँ भऽ गेल हेतह?” धीरेन्द्र- “हँ, सबा मासक छुट्टी भेल अछि।” मुस्की दैत जीबेन्द्र बजला- “अपन रोपल गाछ छिअ, अपनो खैहिहह (खइहह) आ हितो-अपेछित, संगियो-साथीकेँ खुअबिहह।” ओना, संगी-साथीक नाओं सुनि धीरेन्द्रक मन मोहिया जगमोहीपर गेल मुदा बाजल किछु ने। दुनू बापूत संगे घर दिस बढ़ल। [i]जोलहा-धुनिया ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय अदरश विआह काल्हि मरर कक्काक पोतीक कथकिया आएल छेलखिन। कथकिया सबहक स्वागतमे हमरो रहबाक छल मुदा काल्हि हमरा मधुबनी कोर्टमे एकटा कुटुमक जमानतमे जाए पड़ल, तँए हम मरर काका ओइठाम नै जाए पेलौं। कथकियाकेँ लड़की पसिन भेलैन कि नै भेलैन आ जँ पसिन भेलैन तँ आगाँ की बात-विचार भेलै ऐ बातक भाँज अखन धरि नै लागल छल तँए मरर काका ओइठाम जेबाक लेल मन कछमछ करैत रहए। चारिये बजे भोरहरबामे नीन टुटि गेल मुदा ओछाइन छोड़लौं साढ़े चारि बजे। भैंसकेँ मालऽ घरसँ निकालि बाहरक नादिपर बान्हि खाइले दऽ पोखैर दिस विदा भऽ गेलौं।  दतमैन करैत गाममपर एलौं। कलपर कुर्रा-आचमन कऽ सोचलौं जे अखने मरर काका ओतए विदा भऽ जाइ। फेर सोचलौं पत्नीकेँ तँ जनतब दऽ दिऐ। जनतब की दिऐन हुनकासँ आदेश लऽ ली। छह मास पहिनुका गप मोन पड़ि गेल। निर्मलीमे विमला थियेटर आएल रहए। संगी-तुरियाक संगे हो-हामे बिना पत्नीकेँ कहने थियेटर देखऽ चलि गेलौं। दू बजे रातिमे थियेटर देखकऽ आपस गामपर एलौं। भूखो लगल रहए। आँगन गेलौं। पत्नीकेँ केतबो हाक देलिऐन आ केबाड़ो पीटलिऐ मुदा पत्नीक कुम्भकरणी नीन नै टुटलैन। आकि जाइने कऽ नै उठली ओ तँ पत्नीए जानती। हारि कऽ दलानक चौकीपर ओछाएल अखरे गोनैरपर सुतलौं। सुतब की कपार भरि राति तौनीसँ मच्छर हौंकैत परात केलौं। बिहान भने जखन मुँह-हाथ धोइ कऽ आँगन गेलौं तँ पत्नी वर्तन-बासन माजि कऽ आएल छेली। हम पत्नीक मूड ऑफ देख खुशामद करैत अपना बोलीमे पाँच किलो चीनी घोरैत कहलयैन- “की यै मेम साहब, चाहो-ताहोक जोगार अछि?रातिमे तँ भुखले रखलौं, अखनो कम-सँ-कम एक कप चाहो तँ पियाउ।” तैपर हमरा दिस देखैत पत्नी बजली- “आ छौरी सबहक जे नाच देखलिऐ तइसँ पेट नै भरल?” हम बजलौं- “नाचो देखलासँ कहीं भेट भरलै हेन।” पत्नी बजली- “नाचो की कोनो आजी-गुजी रहए, विमला थियेटरक छौरी सबहक नाच रहए। सुनै छिऐ जे थियेटरमे तँ छौड़ी सभ किदैन-किदैन देखबै छै जइसँ छौड़ा सबहक भूख-पियास सभ जेरा जाइ छै। आ अहाँ कहै छी हम भुखले रहलौं। की सभ देखौलक छौड़ी सभ। भरि मन भेल कि नहि। जँ भरि मन नै भेल हुअए तँ आइयो चलि जाएब।” यौ बाबू हम की बजितौं। चुप्पे रहैमे अपन भलाइ बुझि आँगनसँ निकैल गेलौं। तइ दिनसँ बिना पत्नीक आदेशे केतौ ने जाइ छी। आँगन गेलौं तँ पत्नीकेँ चुल्हा नीपैत देखलयैन। हमरा देखते बजली- “मर! मरर काका ओतए नै गेलिऐ। जा कऽ पता करियौ ग ने जे कथकियाकेँ लड़की पसिन भेलैन आकि नहि। जँ पसिन भेलै तँ आगाँ की बात-विचार भेलइ।” हम कहलयैन- “ओतइ विदा भेलौं हेन। सएह कहैले आएल छेलौं।” तैपर पत्नी पुछली- “चाह बना दिअ की?” हम मने-मन सोचलौं- की आइ दिनकर भगवान पच्छिममे तँ नै उगलखिन हेन। आगाँ सोचलौं जे पत्नी चाहो पियौती तँ पोडरक आकि नेबोबला पियौती मुदा मरर काका ओतए तँ भैंसिक दुधक गढ़गर चाह पीब...। कहलयैन- “छोड़ू चाह-ताह। कथीले फिरिशान हएब। हमरो मनमे छटपटी लगल अछि जे कखनी मरर काका ओतए पहुँची। जाए दिअ।” पत्नी बजली- “बड़बढ़ियाँ..!” हम मरर काका ओतए विदा भऽ गेलौं। हमर बाबूजी आ मरर काका लंगोटिया संगी। दुनूक घर दू टोलमे मुदा जवानीमे दुनू गोरे भरि-भरि दिन संगे महींस चरबै छला। पैछला साल फागुनमे हमर बाबूजी दिवंगत भऽ गेला आ मरर काका अखनो जीविते छैथ। मरर काका छोट खुट्टीक, कुहेलगर शरीर। उमेर लगधक 82-83 बर्ख छैन्हे। कहाबत अछि- लोहामे टाटा, जूतामे बाटा आ मनुखमे नाटा,बेसी दिन टिकैत अछि। मररो काका नाटा जवान तँए अखनो खूब थेहगर छैथ। जवानीमे पहलमानी करै छला। महींसिक थने-तरसँ तीन-चारि सेर दूध पीब जाइ छला। आठ-नअटा महींसो पोसै छला आ भरि-भरि दिन महींसे चरबैत रहै छला। अखनो खुट्टापर दूटा महींस रखने छैथ जइमे एकटा लगहैर छैन। ओना, मरर काका पढ़ल-लिखलक नाओंपर सोलह दूना आठ छैथ। बेटा-पोता नोकरी करै छैन। दूटा बेटा परिवार लऽ कऽ दिल्लीएमे रहै छैन। एकटा बेटा विमलजी संस्कृत विद्यालयमे शिक्षक आ दूटा पोता पंचायत शिक्षक छथिन। मरर काका दलानक चौकीपर बैस चाह पीबै छला। हम सड़केपरसँ कहलयैन- “काका, गोड़ लगै छी।” मरर काका बजला- “नीके रहह। के नन्दु?आबह-आबह। कहह कुटुम सबहक जमानत भऽ गेलैन किने?” हम कहलयैन- “हँ कका, अहाँ सबहक आर्शीवादसँ कहुना जमानत भऽ गेलैन कुटुम सबहक। ओना, मोकदमा बड़ उकड़ू छेलइ।” मरर काका बजला- “बैसह पहिने चाह पीबह। पछाइत गप-सप्प हेतइ।” कहैत मरर काका अपन पोतीकेँ हाक देलखिन- “विभा!विभा!! नन्दु काका-ले चाह नेने अबहुन।” तैबीच हम मरर काकासँ पुछलयैन- “काका, काल्हि जे कथकिया आएल रहैथ तिनका सभकेँ विभा पसिन भेलैन किने?” मरर काका बजला- “हँ हौ लड़की तँ पसिन भेलै मुदा..।” ताबेमे विभा एकटा ट्रेमे एक कप चाह, एकटा प्लेटमे चारिटा नमकीन विस्कुट आ एक गिलास ठंढाएल पानि नेने एली आ ट्रे चौकीपर रखि हमरा गोड़ लागि ठाढ़ भेली। हम आर्शीवाद दैत कहलिऐ- “नीक्के रहह। परीक्षाक डेट निकललऽ?” विभा बाजल- “हँ काका, पाँच जुलाईसँ परीक्षा छी।” मरर काका बजला- “हुअ, पहिने चाह पीबह। सराए जेतए।” बिस्कुट खा पानि पीब हम चाह पीबए लगलौं। तखने विभा पान नेने आएल। पान खा मरर काकासँ पुछलयैन- “हँ काका, जखन लड़की पसिन भऽ गेलै तखन आगाँ की बात-विचार भेल?” मरर काका हमरा पुछला- “बौआ, एकटा बात कहअ, अदरश विआह केकरा कहै छै?” अदरशविआह! हम किछ बुझबे ने केलौं। केतबो दिमागपर जोर दिऐ मुदा समझमे नै आबए। हमरा असमंजसमे देख विभा बजली- “काका, अदरश बिआह नइ बुझलिऐ। बाबा आदर्श बिआहकेँ अदरश विआह बजलखिन हेन।” हम मरर काकासँ कहलयैन- “काका जइ विआहमे दहेजक लेन-देन नै होइत अछि ओइ बिआहकेँ आदर्श बिआह कहल जाइत अछि।” मरर काका बजला- “कथकियामे जे लड़काक माम रहैथ ओ बजला- लड़की हमरा सभकेँ सोलहअनासँ बत्तीसअना पसिन अछि। लड़की सुन्नैर आ सुशील छैथ।” बिच्चेमे हमरा मुहसँ निकैल गेल- “से तँ विभा अछिए” मरर काका बजला- “आगाँ सुनहक ने।” कहलयैन- “कहियौ।” काका बजला- “हमर बेटा विमल पुछलकैन तखन आगाँ?” तैपर लड़काक बाप बजला- “बिआह अदरशे हएत मुदा हमरा जे लड़काकेँ इंजीनियर बनबए-मे 15 लाख टका खर्च भेल से आ कनियाँक जेबरमे एगारह भरि गोलड दऽ दियौ। लड़का अहाँक भेल। अतिरिक्त हमरा किछ नै चाही। हौ हमरा तँ विभा कहलक जे गोलड माने सोना होइ छै।” तैपर हम कहलयैन- “तखन ई कोन आदर्श बिआह भेल। बेटा जे पाइ कमेतैन से कि कोनो हमरा सभकेँ देता आकि बापेकेँ देथिन।” मरर काका बजला- “सएह तँ..! कहह ई कोन अदरश बिआह भेल।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल हुसि गेलौं हाटक काजे बिस्टौल विदा भऽ सड़कपर एलौं कि दुनू परानी जागेसर भाय टेम्पूपर पास करैत रहैथ। केतबो किछु भेल, लोक केतबो बदलल मुदा मिथिलाक माटि-पानि अखनो वएह अछि जे सभ दिनसँ अछि। बाहरसँ अबैत कियो परदेशी घर लग होइत पास करता, अपने सड़कपर रहब आ हुनका टोकबो ने करिऐन तखन गामक जँ कियो हेराएल-भुतियाएल आबैथ आ हुनका रहैक ठौर नहि भेटैन तखन गामक नाक-मुँह केहेन बनत। भाय! मिथिला छी, मिथिलाक अपन साजो-शृंगार अछि आ अपन मुहोँ-कान तँ अछिए। चारि लग्गा टेम्पू पाछुए छल कि जागेसर भायकेँ चिन्ह गेलिऐन। उमरदार छथिए। माने अपनासँ कहुना बीस बरख जेठ हेता, देखते कहलयैन- “भाय, दुनू परानीकेँ सम्मिलिते गोड़ लगै छी।” ताबे टेम्पू लग आबि रूकि गेल। जागेसर भाय बजला- “आब हमहूँ गामेमे रहब। पहिने अपन घर-घराड़ीक दर्शन कऽ लेब जरूरी अछि, पछाइत निचेनसँ दुनू भाँइ बतियाएब।” हाटपर विदाहे भेल रही, भीतरे-भीतर मनमे ईहो होइ छल जे घन्टा भरिक हाट अछि, जँ रस्तेमे समय बरदा जाएत तखन काजो हुसिये जाएत। मुदा संजोग नीक रहल जे जागेसर भायअपने समय लगबैले तैयार नहि होइत बजला- “अखन काजक बेर अछि, तोहूँ काज करए जा आ हमहूँ जाइ छी, निचेनमे साँझू पहर निचेनसँ गप करब।” जागेसर भाइक बात सुनि अपनो जान हल्लुक भेल, मुदा दुनू परानी जोगेसर भाइक चेहराक रूप किछु-किछु विकृत्ति जकाँ बुझि पड़ल, जइसँ मनमे खोंच-खरोंच जकाँ जरूर उठए लगल मुदा जागेसर भाय अपने साँझुका समय बना लेलैन। अखन जइ काजे निकलल छी तइसँ अलग जँ मनकेँ दोसर दिस बढ़ाएब तँ हाटक काजमे गड़बड़ी अबैक सम्भावना बनियेँ जाएत। जे काज केनिहार नहि अछि ओकरा लिये ने दिन-राति एक्केरंग होइए मुदा जे काज केनिहार अछि तेकरो लिये तँ होइते अछि जे करै छी कोनो काज आ मनमे नाचि रहल अछि कोनो दोसर काज। तँए, जखने आँखि काजपर गड़ए आ हाथ करए लगए तखने मनकेँ समेट ओइमे एकाग्र करी। जँ से करब तँ काज होइक संग बिसवासो बनिते अछि मुदा से नहि भेने दुइर हेबाक सम्भावना बनैए आ बिसवासक तँ कोनो बाते नहि। डेढ़े दू किलो मीटरक दूरीपर बिस्टौल गामक हाट अछि, तँए पएरे विदा भेल रही। थोड़बे आगू बढ़लौं कि जागेसर भाय पुन: मोन पड़ि गेला। मोन पड़िते विचार उठल जे जागेसर भाय घर-घराड़ी की देखता, ओ भरिसक बेचैक खियालसँ एला अछि। जेकरा जेतेक पाइ होइ छै ओकरा ओते पाइयक भूख बढ़िते अछि। तहूमे बैंकक सूदि जोड़निहारक हिसाब तँ आरो बदैलिये जाइत अछि। ऐठाम, माने गाममेजागेसर भाइकघरक तँ कोनो थाह-पता नहियेँ छैन,खाली घराड़ी बँचल छैन। ओना, बिनु घरे घराड़ियो केना भेल? हँ! एते जरूर भेल जे जोति-कोरि कऽ बाड़ियो-चौमास बनौल जा सकैए आ ऊँचगर रहने घरो बनौल जा सकैए। फेर अपने मनमे उठल जे जेतेक पाइबला लोक छैथ, हुनका ओतेक पाइयक भूख बढ़ै छैन, सेहो सोल्होअना केना मानल जाए? जखन संतोष-असंतोष दुनू जीवनक खास भावना छी तखन दुनूकेँ ने बराबरीक हिस्सा हेबा चाही। जेकर माने भेल,अदहालोक ओहन भेला जिनका पाइ रहितो पाइक भूख बढ़ै छैन आ अदहा लोक ओहन भेला जिनका पाइ भेने सवुर–संतोष–होइ छैन जइसँ पाइयक अभूख होइ छैन...। मनमे ईविचार चलिये रहल छल कि दोसर विचार अपने आबि धमकल। दोसर विचार ई आबि धमकल जे एहनो आदमी तँ होइते छैथ जिनका पाइ भेने सवुरो भइये जाइ छैन। माने जे जइ निमित्ते पाइक भूख जगल आ ओ निमित्त पूर्ति भऽ गेला पछाइत, माने खाहिंस पूर्ति भेनेभूखो मेटा जाइए। तैबीच मनमे तेसर विचार जगि गेल। जगि गेल ई जे कोनो निमित्त जीवनोपयोगियो होइए आ कोनो नहियोँ होइए, तखन? तैबीच हाटपर पहुँच गेलौं। गमैया हाट, खाइ-पीबैक वस्तु छोड़ि आन किछु रहिते ने अछि। चारिम दिन फेर लगबे करत। भेल तँ तीन दिन धरिक खाइ-पीबैक वस्तु कीनैक अछि, तँए बेसी झरो-झमेल नहियेँ अछि। हाटक काज लगले भऽ गेल। समैयेपर अपना ऐठाम पहुँच गेलौं। घरपर पहुँचते जागेसर भाय फेर मोन पड़ि गेला। साँझु पहर निचेनसँ गप-सप्प करैक बात कहने छला। अपन घर ऐठाम अछि आ हुनकर घराड़ी पाँच बीघा हटल छैन तखन गप-सप्प केतए हएत? ओना, जागेसर भायकेँ गाममे जेते लोक चिन्है छैन तइसँ बेसी अनचिन्ह छैन। चिन्ह-अनचिन्हक माने भेल जइ दिन जागेसर भाय गाम छोड़ि दिल्ली गेलातइसँ पहिलुका लोक आ जेकर जन्म जागेसर भाइक गेला पछाइत भेल वा बिसैर गेला से लोक। मुदा समाजमे (माने गामक समाजमे) एहनो तँ होइते अछि काजे एकठाम रहितो चिन्ह-अनचिन्ह सेहो बनल अछिए। जेकर अनेको कारणो अछि। बेवहारिक रूपमे झगड़ा-झंझट भेने वा कारोबारक सम्बन्ध नहि रहने चिन्ह-अनचिन्ह सेहो बनिते अछि। तैसंग जातीय वा साम्प्रदायिक विचार सेहो दूरी बनौनहि अछि। एक जाइतिक बीच केते एहेन बेवहार अछि जे दोसरमे नहि अछि। जइसँ ओ अनचिन्ह बनबे करैए। खाएर जे जइ गाममे अछि ओ ओइ गाममे रहह।ओओइ गौंआँक प्रश्न भेल तँए अपन-अपन बुझता। जहिना कोनो नमहर कारखानामे वा शहर-बजारमे वा गामे-घरमेहजारो-लाखो लोकक बीच जँ कोनो बेकती-विशेषसँ पूर्व परिचय रहल वा केतौ- जेना गाड़ीमे, कोनो दोकानपर वा कोनो ऑफिसमे किनकोसँ कनियोँ गप-सप्प भेल रहल वा बेवहारिक रूपमे कोनो काजे भेल रहल तँ हजारो-लाखोक बीच सहयोगीक परिचय भइये जाइए, तहिना जागेसर भायकेँ सेहो भेलैन। गाम अनचिन्हार बुझि पड़लैन आकि अपने अनचिन्हार बुझि पड़ला से ओ जानैथ, मुदा सूर्यास्त भेला पछाइत दुनू परानी पहुँच गेला। जागेसर भाय तँ सहजे गौंएँ छियाआ चिन्हो-पहचिन्ह अछिए। ओना, अनठियो-अनगौंआँकेँ तँ लोक अपना ऐठाम पाँच कौर भोजन आ पाँच बीत जगह सुतै-बैसैले दइते छैथ। तइले मनमे कोनो मलिनता राखब उचित नहि। दुनू परानी जागेसर भायकेँ देखते बजलौं- “आउ, आउ भाय!हमरो भाग्य जगल जे अहाँ सन गौंआँ दरबज्जापर एला।” ओना, जागेसर भाइक जेते मन उछटगर हेबा चाही से नहि रहैन। मुदा उपायो तँ दोसर नहियेँ छेलैन। मन उछटगर नइ रहैक कारण अपन दिल्लीक मकान सभ नजैरमे नाचि रहल छेलैन आकि की, से ओ जानैथ। जागेसर भाय बजला- “जाबे अपन ठौर-ठेकान रहैक नहि भऽ जाइए ताबे तोरे ऐठाम रहब।” हूँहकारी भरैत बजलौं- “ई तँ अपन घर बुझू भाय!जेते दिन रहैक मन हएत तेते दिन रहब।” तैबीच अपन पत्नियोँ आ मैझली बेटियो दरबज्जापर आबि गेल। बेटीकेँ कहलिऐ- “बुच्ची, चाचीकेँ अँगने लऽ जाहुन, आ रहैक गर लगा दहुन।” जागेसर भाइक पत्नी- सावित्रीकेँ संग नेने पत्नियोँ आ बेटियो आँगन गेल। आँगनसँ एकटा लोटामे पानि नेने दरबज्जापर अबैत बजलौं- “भाय, समान सभ भने चौकीपर रखि देलिऐ। होउ, पहिने पएर धोउ, पछाइत गप-सप्प होइत रहत।” आँगनमे पत्नी एते सतरकी करबे केली जे चाह बना दरबज्जापर नेने एली। पत्नीक हाथसँ चाहक दुनू कप पकड़ैत दहिना हाथक कप जागेसर भाय दिस बढ़बैत बजलौं- “भाय, पहिने चाह पीब लिअ, ताबे जलखैक ओरियान सेहो होइए। जलखै केला पछाइत फेर चाहो पीब, पानो खाएब आ निचेनसँ गपो-सप्प करब।” तैबीच सुनरलाल सेहो अनठियाकेँ भँजियबैत दरबज्जापर पहुँचल। सुनरलालक पैछला पीढ़ी, माने बाप-दादाकसम्बन्ध जागेसर भाइक परिवारक संग सात पुस्तसँ रहल छेलैन। जे जागेसर भायकेँ सेहो बुझल छैन आ सुनरलालकेँ सेहो बुझलेछैन। मुदा जागेसर भाइक अमलदारीमे सम्बन्ध, माने दुनू परिवारक बीचक सम्बन्धने टुटल छल आ ने नइ टुटल छल, तँए अधटुटू जकाँ बनियेँ गेल अछि। सम्बन्ध टुटबक माने बेवहारिक रूपमे सम्बन्ध बिच्छेद भेलआनइ टुटबक माने जे स्थान-विशेष बदलने सम्बन्धमे बाधा उपस्थित हएब। सुनरलालकेँ अबैसँ पहिने जागेसर भाय तँ चाह पीब शुरू कऽ नेने छला मुदा अपने ऐ ताकमे रही जे मुँहमे चाह गेला पछाइत जागेसर भाय किछु बजबो करै छैथ, माने चाहक नीक-बेजाएआकि चुप्पे रहै छैथ। तइ बीच सुनरलाल पहुँचल छल। सुनरलालकेँ देखते बजलौं- “एके कप चाह छह, अहीकेँ बाँटि दुनू भाँइ पीबह।” कहि चौकीपर चाह रखि अपने दोसर कप आनए आँगन गेलौं। सुनरलालक जहिना देहक पानि काज करैमे जलजलकरै छैतहिना मुँहक पानि बजै-भुकैमे सेहो छै। जइसँ बजैमे फरकोर अछिए। मुदा चाह बाँटि कऽ पीब, तइ सम्बन्धमे सुनरलाल किछु ने बाजल। भऽ सकैए जे जागेसर भायकेँ अनठिया माने गामसँ बाहर रहनिहार बुझि नइ बाजल आकि अपनत्वक विचारसँ नहि बाजल ओ तँ सुनरेलाल बुझैत हएत, मुदा बाजल किछु ने। एक घोंट चाह पीब सुनरलाल बाजल- “जागे भाय!पुस्तैनी सम्बन्ध रहितो, दुनू भाँइ दूठाम रहै छी तँए मुँह-मिलानी जकाँ नहियेँ अछि, मुदा जेना हमर पिताजी आ अहाँक पिताजीक बीच सम्बन्ध छल जे संगे-संग बेसी काल एकठाम रहै छला, तेना तँ हमरा अहाँक बीच नहियेँ अछि मुदा दुनू परिवारक बीच सम्बन्ध सात पुस्तक रहल अछि।” जागेसरो भायकेँ अपन परिवारक इतिहास बुझले-सुनले छैनतँए हूँहकारी भरैत बजला- “ओ दिन-दुनियाँ किछु और छल, आइक दुनियाँ किछु और भऽ गेल अछि, मुदा बीचमे विचारशील मनुख सेहो अछिए जे अपन वर्तमानकेँ नजैरमे रखि भविसक बाट पकैड़ सेहो चलबे करैए।” जागेसर भाइक विचारमे सुनरलालकेँ अपनत्वक भान भेल, जइसँ मनमे विचार जगलै जे किए ने जागेसर भायकेँ अपने ऐठाम चलैले कहिऐन। विचारैक क्रममे तँ सुनरलालकेँ मनमे विचार उठि गेल मुदा लगले अपने चिन्तनीय विचार रोकैत सुझौलकै जे समाजक (माने गाम-समाजक) ऐठाम जे पदारपन कऽ चुकल छैथ, तैठाम सँ दोसर ठाम जेबाक विचार देब अनुचित हएत, तँए मनक विचारकेँ मनेमे दबैत सुनरलाल बाजल- “भाय, अपने गामो आ अपने परिवारो-समाज छीहे,तँए अपनोमाने हमरो घर-दुआरक मुँह-कान चलि कऽ देख लेबइ।” सुनरलालक बात सुनि जागेसर भाइक मनमे जेना आरो बिसवास जगलैन तहिना मन हरिया गेलैन। हरियाइतमनेजागेसर भाय बजला- “सुनरलाल!यएह आशा देख ने गामो एलौं हेन आ रहैक विचार सेहो केनहि छी।” सुनरलाल बाजल- “की विचार करि कऽ आएल छी जे आब गामेमे रहब?” जागेसर भाय बजला- “हँ।” सुनरलाल बाजल- “गाममे नीक लागत?” जागेसर भाय बजला- “जखन गाममे रहैत रही, दिल्ली नहि गेल रहीतखन दिल्लियो ने तहिना छलमुदा रहैत-रहैत जखन अभ्यस्त भऽ गेलौं, तखन नीक लगए लगल किने।” ओना, जागेसर भाय आ सुनरलालक बीच जे गप-सप्प चलै छल, ओइसँ सम्बन्धमे गाढ़ता आबिये रहल छल मुदा बीचक जे जिनगी जागेसर भाइक रहलैन, से किछु बुझिये ने पेब रहल छेलौं। तँए ओइ दिस–माने बीचक बीतल जिनगी दिस–विचारकेँ मोड़ैत बजलौं- “सुनरलाल, जागे भाय जखन कहै छैथ जे आब गामेमे रहब, तखन गाम-घरक काजो आ बातो-विचार होइत रहत। तइ बीचक जे समय बीतल, पहिने से बुझब ने जरूरी अछि।” तेज-तैराक लोक सुनरलाल अछिए, हमर बात पकैड़ बाजल- “जागे भाय, केते दिनक पछाइत गाम एलौं हेन?” जागेसर भाय बजला- “तीस बर्खपर एलौं हेन।” सुनरलाल बाजल- “अपने, माने हम तँ मात्र पैंतीसे बर्खक छी, तँए पैछला किछुमोन नहि अछि। मुदा सुनल तँ बहुत बात अछिए। गामसँ जइ दिन निकललौं आ आइ पुन: गाम एलौं हेन, तइ बीचक जे समय बीतलओ जानकारी भेला पछातिये ने पुन: भूत-भविसक मुँहमिलानी हएत। माने पैछला जिनगीक जोड़क कड़ी ऐगला जिनगीक जोड़क कड़ीसँ जुटत।” सुनरलालक विचार सुनि जागेसर भायकेँ दोबर उत्साह जगलैन। दोबर उत्साहमे पहिल भेल-अपन तीस बरखबीतल दिल्लीक जीवनक परिचय आ दोसर ई जे जेते बेसी दू गोरेक बीच गप-सप्प होइए ओते सम्बन्धोमे प्रगाढ़ता अबिते अछि...। जागेसर भाय बजला- “सुनरलाल!तइ दिनमे, माने जखन दिल्ली गेलौंतखन अपनो उमेर बीसे-बाइस बर्खक छल। बाबा मरल रहैथ, हुनकर श्राद्ध-कर्म करैमे पिताजी कर्ज लेलैन। तीनिये सालमे कर्ज मोटा कऽ दोबर भऽ गेल। शुरूमे तँ देबाल–महाजन–पिताजीकेँ सोझे तगेदा करैन। माने सूदिक संग मूर रूपैआ दइले, मुदा पिताजीक हालत दिनानुदिन बद-सँ-बदतरे होइत गेलैनजइसँ रूपैआ नहि दऽ पाबि रहल छला...।” बजैत-बजैत  जागेसर भाय जेना किछु मोन पाड़ए लगला तहिना चुप भऽ मुँह बन्न कऽ लेलैन। ओना, अपना पहिलुका महाजनीक बहुत बात सुनलौं अछि आ बहुत देखलौं अछिए तँए मनमे कोनो तेहेन उथल-पुथल नहि भेल, मुदा सुनरलाल तँ नव कविरया लोकअछि,जेकरा ऊपरे-झापरे तँ महाजनीक किछु-किछु बात बुझल छैमुदा महाजनीक सूदि आ बैंकक सूदिमे की अन्तर अछि, से नीक जकाँ बुझले ने छै। बैंकोमे देखते छिऐ जे अहाँक पाइक सूदि केते भऽ जाइ छैआ बैंकक पाइक सूदि केते होइए, जखन कि दुनू पाइये छी। सुनरलाल बाजल- “भाय, चुप किए भेलौं?” जागेसर भाय बजला- “सुनरलाल, एहेन बर्बर घटना जिनगीमे पहिल बेर परिवारमे देखलौं। खेत-पथार सभ चलि गेल। मात्र घर रहने घराड़ीटा बँचल, बाँकी सभ चलि गेल। ओही सोगसँ माइयो आ पितोजी तेहेन सोगेला जे मरिये गेला।” एक पीढ़ीक जीवनान्त भेल, दोसर पीढ़ीमे जागेसर भाय छैथ। सुनरलाल बाजल- “भाय, तखन तँ अहाँ घोर संकटमे पड़ि गेल हएब..!” जागेसर भाइक भीतर मनक प्रश्न जेना सुनरलाल पुछने होनि तहिना जागेसर भायकेँ भेलैन। आँखि कड़ुआए लगलैन जइसँ दुनू आँखिमे नोर आबि गेलैन। बजला- “बौआ सुनर, जिनगीमेतेहेन अन्हार पसैर गेल जे मृत्यु छोड़ि दोसर बाट नहि सुझि रहल छल, तखन गामसँ भागि दिल्ली गेलौं।” जागेसर भाय आगाँ बजला- “दिल्लीक चर्च करैसँ पहिने एकटा बात आरो अछि, से पहिने सुनि लएह।” सुनरलाल बाजल- “हँ, पहिने सएह कहियौ।” जागेसर भाय बजला- “जहिना महाजनीक मारिसँ गामसँ भगलौंतहिना दिल्ली पहुँचते मनमे एकटा नव विचार जगि गेल।” बिच्चेमे सुनरलाल बाजल- “से की नव विचार जगल?” जागेसर भाय बजला- “से जगल जे जखन पाइमे (सम्पैतमे) एतेक शक्ति अछि तखन किए ने अपनो ओही उपार्जनमे जी-जानसँ लगि शक्तिशाली बनी।” विचारक क्रममे भँसियाइत सुनरलाल बाजल- “वाह..!” सुनरलालक ‘वाह’सुनि जागेसर भाइक मनमे भेलैन जे भरिसक हमर विचार सुनरोलालकेँ नीक लगलै, मुदा आगूक जे जीवन भेलसे जखन बुझैत तखन ने किछु निश्चयपर पहुँचैत। जागेसर भाय बजला- “पाइ बनबैक पाछू जहिना ने दिनकेँ दिन बुझलौं आ ने रातिकेँ राति, तहिना खटनियोकेँ ने भारी बुझलौं आ हल्लुक। पाइक पाछू जेना सोल्हन्नी मन लटैक गेल।” बिच्चेमे सुनरलाल बाजल- “वाह-वाह..!” सुनरलालक मुहसँ खसल ‘वाह-वाह’सुनि जागेसर भाय उत्साहित नहि भेला किए तँ अपन बीतल जिनगीमे तेहेन मोड़ आबि गेल छेलैन जे भीतरसँ मने टुटि गेल रहैन। विचारकेँ आगू बढ़बैत जागेसर भाय बजला- “बौआ सुनर, जइ समयमे गामसँ दिल्ली गेलौं, तइ समयमे बिआहो भऽ गेल छल आ एकटा सन्तान सेहो भऽ गेल छल। मासक पछाइत आठ मीटर लम्बा आ पाँच मीटर चौड़ा जमीनक एकटा टुकड़ा कीनलौं। डेढ़-दू साल बीतैत-बीतैत तीन कोठरीक अपन घर सेहो बना लेलौं। जइमे दूटा कोठरी अपन परिवार-ले रखलौंआएकटा भाड़ा लगा लेलौं।” सुनरलाल बाजल- “जखन रहैक ठौर अपन भऽ गेल तखन तँ भाड़ा-भुड़ीक पाइक बचत सेहो भइये गेल हएत।” जागेसर भाय बजला- “हँ, सेहो भेल आ एक कोठरीक भाड़ाक आमदनी सेहो आबए लगल। अखन कुल मिला कऽ तीन ठाम मकान अछि। चारिटा कोठरीक एकटा मकान अपने रखने छीआ दूठाम भाड़ा लगौने छी।” सुनरलाल बाजल- “सुनै छी दिल्लीमे मकानक भाड़ा आन शहरसँ बेसी अछि?” जागेसर भाय बजला- “हँ से तँ अछिए। ओना, दिल्लीसँ बेसी भाड़ा मुम्बईमे छइ।तँए ने पचास हजारसँ ऊपर भाड़ा महिनामे अबैए।” सुनरलाल बाजल- “जखन एते अज-गज अपन दिल्लीमे अछि तखन गाम किए आबि रहए चाहैछी?” सुनरलालक बात सुनि जागेसर भाइक बोलक अवाज फाटल बौसुरी जकाँ घड़घड़ाए लगलैन। अपन अतीत दिस नजैर दौड़बैत जागेसर भाय बजला- “सब पानिमे चलि गेल..!” ‘सब पानिमे चलि गेल’सुनि सुनरलाल बाजल- “से की भाय साहैब?” जागेसर भाइक मन जेना थरथराए लगलैन। थरथराइत मने बजला- “बौआसुनर, एकटा बेटीक पछाइत एकटा बेटा भेल, फेर एकटा बेटी भेल। माने तीनटा सन्तानक पछाइत पत्नीकेँ ऑपरेशन करा देलिऐन। जेठ बेटीक बिआह सेहो कऽ लेलौं। छोट दुनू बेटा-बेटीकेँ कौलेजमे नाओं लिखेलौं। कौलेजेक अवस्थामे, माने कौलेजमे पढ़ैऐक अवस्थामे छोटकी बेटी लव मैरेज कऽ लेलक आ बेटा गाड़ीक एक्सीडेन्टमे मरि गेल..!” सुनरलाल बाजल- “बाप रे!तखन तँ परिवारे नष्ट भऽ गेल..!!” सुनरलालक बात सुनि जागेसर भाइक दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलैन। आगू किछु बजैक साहसे ने होइन। नजैर उठा कखनो सुनरलालपर दैथ आ लगले फेर निच्चाँ कऽ लैथ...। दुनू गोरे माने जागेसरो भाय आ सुनरोलालकेँ थकथकाएल देख बजलौं- “कननौं तँ किछु नहियेँ हएत। जे चलि गेल ओ चलि गेल, मुदा अपने दुनू परानी तँ जीबै छी, तइले ते किछु...।” नोर पोछैत जागेसर भाय बजला- “बेटाक एक्सीडेन्टक पछाइत अपनोसँ बेसी पत्नीकेँ दुख भेलैन। मतिछिन्नू जकाँ करए लगली। एकटा मित्र कहलैन जे ‘हरिद्वार जाउ। ओइठाम गेला पछाइत सभ किछु ठीक भऽ जाएत।” बजा गेल- “हँ, ठीके कहलैन।” जागेसर भाय बजला- “दुनू परानी हरिद्वारो गेलौं।” बजलौं- “हरिद्वार गेला पछाति की भेल?” जागेसर भाय बजला- “मन्दिरक पुजेगरीकेँ सभ वृतान्त अपन कहलयैन। ओ विचार देलैन जे हरिवंश कथा सुनैक एक सप्ताहक अनुष्ठान करू, सभ ठीक भऽ जाएत।” सुनरलाल बाजल- “ठीके विचार देलैन।” जागेसर भाय बजला- “नियम-निष्ठासँ सेहो करेलौं, सुनलौं।” सुनरलाल बाजल- “सुनला पछाइत की बुझि पड़ल?” जागेसर भाय बजला- “परिवारक चिन्ता थोड़े जरूर कमलजइसँ विचारमे कनी उगरास भेल।” सुनरलाल बाजल- “की उगरास?” जागेसर भाय बजला- “दुनियाँमे हमहीं टा एहेन नइ छी, हमरा सन-सन हजारो-लाखो एहेन छैथ जे जीवनमे हुसबो केला आ हुसियो रहले छैथ। मुदा कोनो-ने-कोनो रूपे जीवन तँ बीतेबे केलैन आ बिताइयो रहले छैथ,सएह...।” अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी बीहनि कथा टेट्टर -- ऐं ,कुकूर के एतेक सेवा   ? -- लिस्बियन छै . -- सासु कोना छथि ? -- छोड़ू ! -- हुनकर चर्चो अनसोहाँत ! -- कुकुरो सँ बेकार बुझू ! -- जेटका बेटा कए सालक ऐछ ? -- बीस पुर भ' गेलै . -- जल्दीये स्थान भेटत. -- कोन ? -- साउसक अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार किछु बीहनि कथा 1 पत्नीभक्त भोज खएबाक लेल बैसल छलहुँ। पात पर भात, दालि आ दू प्रकारक तीमन आबि गेल छल। बारिक सभ मनोयोग सँ परसि रहल छलाह । एही क्रम मे एक गोट बारिक बजलाह-- " एखन धरि फेकू बाबू नहि पहुँचलाह आछि"। गप्प सुनतहि रमेश बाबू फरिझौलखिन्ह-- "औताह कोना पत्नी-भक्त छथि ने।घरवालीक पएर जतैत हेताह"। सुधीर फेकू बाबूक समांग छलखिन्ह, तुरछि कए बजलाह--- पत्नी-भक्त भेनाइ खराप छैक की ? जबाब दैत रमेश कहलखिन्ह तखन बैसल छी किएक जाउ अहूँ। एहि बेर सुधीर गप्प के थोड़ेक मोड़ दैत बजलाह- " त की अहाँक सिद्धान्तक मोताबिक पुरुष पत्नी-भक्त नहि भए वेश्या-भक्त बनि जाए" 2 अंतर किछु बर्खक पछाति मैरिज सेरेमनीक शुभ अर्धनिशाभाग रातिमे बर अपन कनियाँसँ पुछलखिन्ह----- कहू तँ हमर सासुर आ अहाँक सासुरमे की अंतर भेटल ? कनियाँ औंघाएल मुदा चोटाएल स्वरे कहलखिन्ह------"इएह जे अहाँ अपन सासुरमे मालिक रहैत छी आ हम अपन सासुरमे बहिकिरनी" 3 लक्ष्मी परिछन-----------भगवती गीत---------हास-परिहासक गीत। बच्चा सभ अनेरो औना रहल छल। दरवज्जा पर धमगज्जर मचल। तुमुल हास-ध्वनि। नाना प्रकारक गप्प-सरक्का। बरक बाप कन्याक बापसँ कहलथिन्ह----" आह बूझि लिअ समधि जे हमरा घरमे लक्ष्मी देलहुँ अहाँ----। कन्याक बाप कहलखिन्ह " हँ से तँ ठीके" आ कहिते आँखि झुकि गेलन्हि आ मोने-मोन बजलथि--" एखन तँ लाखक-लाख टका संगमे अनलीहए ने लक्ष्मी तँ बुझेबे करतीह। जखन खत्म भए जाएत तखन इएह लक्ष्मी कुलच्छनी बनि जाएत।"------ 4 खाए बला पार्टी आइ साँझमे बड्ड दिनक पछाति भोजन बनेबाक अवसर भेटल। पिता श्री आ माँझिल भाएकेँ पुछलिअन्हि जे की खेबै ? अरे भाइ तों जे आगूमे देबही से खा लेबै। हम सभ तँ खाए बला पार्टी छी ... आ ओही रातिमे हम सपना देखलहुँ जे हमर पिता श्री आ माँझिल भाए नेता बनि क' मंचपर छथि आ राजनीतिक पार्टी बनेबाक घोषणा क' रहल छथि। 5 भविष्य वाह... ई बच्चे सभ तँ भविष्य होइत अछि। वाह....................... अच्छा ई कहू जे अहाँके ए.बी.सी अबैए..? हँ.... वाह उत्तम। अपन देशक चौहद्दी अबैए ? हँ...... वाह.. खूब नीक. बाबा-परबाबाके नाम मोन अछि ? हँ... वाह---वाह की संस्कार अछि। अच्छा ई कहू जे अहाँके कि नै अबैए ? जी हमरा बस लाज नै अबैए ---- 6 प्रतिभाशाली "प्रतिभाशाली लोक पोस नै मानै छै" ई बात बहुत बेरसँ एकटा बूढ़ साहित्यकार युवा साहित्यकारक पक्षमे बाजि रहल छलाह. ओ फेर तर्क देलाह जे सुच्चा रचनाकर्मी स्वतंत्र होइत छै ओकरा केकरो गुलामी नै करबाक चाही. सभामे सभ हुनकर तर्कसँ हारि गेल छल. बूढ़ साहित्यकार घर एला तँ किछु सुनसान लगलनि. बूढ़ीकेँ सोर पाड़लनि. बूढ़ीकेँ एबासँ पहिनेहे एकटा बेटा आबि कहलकनि "आब हम भिन्न होबए" चाहैत छी. बूढ़ साहित्यकार बिना किछु बजने अंगनासँ निकलि गेलथि. 7 सोति ओ- 'कहाँदुन सोतिक बियाह केस कटा कʼ होइत छै' हम- 'एकर मतलब जे हमहूँ सोतिए छी' ओ- 'से कोना' हम- 'हमरा केसे नै अछि, तँइ हम दुद्धा सोति भेलहुँ 8 मतलब ओ कहलथि "अभियान कहियो रूकए नै", लोक बुझलक "अभिनय कहियो रूकए नै 9 नर्क " हे रौ, खा ले पूरा। ऐंठ ने छोड़ " " ऊँ...ऊँह......नै आब नै खाएल हेतौ हमरासँ। पेट भरि गेलै " " हे देखही उपरसँ भगवान देखै छथन्हि जे लोक जतेक बेर ऐंठ फेकै छै तकरा नर्कमे जाए पड़ैत छै आ ओहिठाँ ओकरा ओतेक दिन भूखल रहए पड़ैत छै " " नै हमरा भूख नै छौ " आ माए ओही छीपीमे अपनो हिस्सा लए खाए लागैए। बच्चा जवान भेलै, हिस्सक वएह मुदा बहन्ना दोसर------ " छोड़ भगवान-तगवानकेँ। ओ कोनो देखै छै। सभ झुट्ठे छै " आ पिज्जा भरल पेटसँ आधे थारी खा उठि जाइत अछि। कालक्रमे जबान बूढ़ भेल। बेटा-पुतहु बाहरे। खाली अपने आ बुढ़िया घरपर। जहिया बुढ़िया बेमार पड़ै तहिया उपासे सन लागै। ओना कहिओ काल देआद सभ सेवा कए दए मुदा ओहो सभ तेरहे -बाइस। आ उपसे सन एकटा साँझमे बूढ़ाकेँ पड़ोसिया घरसँ सुनाइ पड़लन्हि--- " हे देखही उपरसँ भगवान देखै छथन्हि जे लोक जतेक बेर ऐंठ फेकै छै तकरा नर्कमे जाए पड़ैत छै आ ओहिठाँ ओकरा ओतेक दिन भूखल रहए पड़ैत छै " आ की ई सुनिते बुढ़बाक रोंआ ठाढ़ भए गेलै। मोन पड़ि गेलै ओकरा अपन माएक गप्प। ठीक इएह तँ कहै छलै। आ सिहरैत-सिहरैत बूढ़ा अपन वर्तमानमे आबि गेलाह आ हिसाब लगाबए लगलाह जे ओ कते दिन कतेक बेर ऐंठ छोड़ने छथि। (ई सभ बीहनि कथा विदेहक पुरान अंकमे प्रकाशित भेल अछि। अपवादमे दू टा कथा 'सोति' एवं 'मतलब' अछि। बीहनिकथाक नामपर हम एखन धरि जतेक लीखल अछि से अतबे। एहिठाम एक संगे दऽ रहल छी जाहिसँ पाठककेँ सुविधा होइन।- आशीष अनचिन्हार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रियंवदा तारा झा मोनक गप्प सूर्यदेव शनैःशनैः अस्ताचलगामी भऽ रहल छलाह। वातावरणमे कनी-कनी जाड़क उपस्थिति भऽ गेल छलैक। अरुणा सांझबातीक ओरियाओनमे लागल छलीह। हाथ काजमे व्यस्त छलैन्ह, मुदा मोन छलैन्ह ओझरायल सोचक व्यूहमे , सुगन्धाक सहज प्रश्न जेना स्थिर जलके हिलोड़ि देने होइ। सुगन्धा अरुणाके बड्ड प्रिय छथिन्ह।‌ हुनको प्राण छोटकी काकीमे बसै छैन्ह। स्कूल सऽ आबि जा सबटा गप्प काकीके सुना नै दै छथिन्ह ता चैन नै पड़ै छैन्ह सुगन्धाके। छोट -पैघ, आवश्यक-अनावश्यक सबटा गप्प मनोयोग सऽ सुनैत काकी हुनक फेवरिट छथिन्ह। आइ सुगन्धाके स्कूलमे काउन्सलिंग सेशन छलैन्ह, छात्र –छात्राक भावी जीवनक लक्ष्यक संबंधमे। ओही क्रममे चर्चा करैत अचोकेमे पूछि उठलखिन्ह सुगन्धा, "काकी अहांक की उद्देश्य छल पहिने आ अहांके हाॅबी? किछु क्षण तऽ किछु फुरैबे नहिं कयलैन्ह। ता भैया सुगन्धाके कोनो जरूरी काज लेल आवाज देलखिन्ह आ जेना अरुणाके भेटलैन्ह यक्ष प्रश्न सऽ उग्रास। स्वगते बजलीह, अप्पन मोनक गप्प तऽ हमहीं कहियो बुझबाक पलखति नहिं पयलहुं, अहांके हम की कहू बौआ? बच्चा रही तखनहुं जिद्द करब नहिं बुझलहुं। शिक्षा प्राप्त कयलहुं , मुदा संभावनाके आकाशके सब दिन अपनहिं मोने संसाधनक, परिवारक सुविधा –असुविधाक सिमानमे बंद राखलहुं। हम तऽ अपनहिं अप्पन मोनके नहिं बांचि पयलहुं , हम की कहू मोनक गप्प ? अपन मंतव्य editorial।staff।videha@gmail।com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ कैमरामैन सावित्री -बियाह मे बड़का बखेड़ा भ' गेल रहैक।पुबरिया असोरा पर बिछौना चद्दरि टाँगि गीतगाइन सभ गबैत-गबैत अप्स्याँत भेल रहथि।छौड़ी सभ ओहीठाम सँ हुलकी-बुलकी द' रहल रहैक।मुदा अँगना मे बेदी लग दुइए-चारि टा आइ-माइ सभ कनियाँ-बड़ लग बैसल रहथिन।बारह-बारह बरखक छौड़ी सभ कोना सोझा अबितैक?बड़क चारिटा हिरोलबा संगी जे बिच्चे ठाम कुरसी पर अकड़ि क' बैसल रहैक! कहू त' कोना देखतैक बियाह जवान -जुआन छौड़ी सभ ? ताहू मे एकटा झुल्फीबला कैमरामैन छैक।कहूँ केकरो फोटो झीक लेलकैक तब? लालकाका एहेन अकरहर देखथिन त' लगथिन ललक'? भने ओ भंडार घर दिस बाझल छथिन।सोनकाकी जोर सँ सुना क' कहलथिन- "हइ लोकनि, कहै जाहक ने फोटूबला बरियाती सभ केँ बाहर जेबाक लेल!बियाह भ' जेतैक त' फोटू-फाटू झिकैत रहत।केहन मौगी-मेहर सभक मुँह निंघारने जाइ छैक छौड़ा-मनसा बरियतिया सभ?गै पता करै जाइ जो त' के सभ छियैक इ सभ?एखने नाओं ल' क' गीते मे सातो पुरखा केँ उकटि- पुकटि क' हाथ मे द' दैत छियैक?गै पवितरी धमधुसरी! ओना उतान भ' क' नहि चल बेसी।कैमराबला केँ देखि क' छम-छम नहि कर!" छोटका भैया कहलथिन - "बड़क विचारे सँ ओ सभ आयल छैक।लड़िकी सभक फोटो नहि झिकतैक।गछलकैक अछि,तखन बैसाओल गेलैक अछि।अहाँ सभ हल्ला-गुल्ला नहि करियौक।" सोनकाकी बजलथिन- "धौर, आगि लागय मुँह मे जे फेर बाजी! हमरा कोन काज अछि?नंगटे नाच करै जाइ जाह।जीयब त' की-की ने देखब!हम जाइ छी।हमर हँकार पुरा गेल।" सोनकाकी ओतय सँ विदा भ' गेलथिन, मुदा कनियाँ माय आँचर जोड़ि ठाढ़ भ' गेलथिन,तँ चुपचाप सोनकाकी बैसि गेलथिन।पवित्री ससरि क' बहिन लग जाक' बैसि गेल।कैमराक फ्लैश चमकलैक।बच्चन लप्प द' कैमरामैनक कैमरा छीनि लेलकैक। भारी हंगामा भ' गेलैक।कनी टा बात भेलैक?समर्थ-सकरथ बेटीक फोटो बरियतिया झीक लेलकैक?आइ गामक नाक कटा देल जेतैक? किन्नहुँ नहि!लाककाकाक कान मे बात गेला सँ फोंसरी सँ भोकन्नर भ' गेलैक।बियाह तँ कोनो धरानिये भइये गेलैक,मुदा कोनो नतीजा बाकी नहि रहलैक।रूसा-फुल्ली।बात- बतकहन।आधा बरियात बिनु खयने पड़ा गेलैक।टीशन सँ घुरा-घुरा आनल गेलैक।दूनू दिसक कुटुंब सभ थोर-थाम लगेलनि।तखन जाकय कोनो प्रकारें पार-घाट लगलैक। सभसँ बेसी इज्जत खराप भेलैक ओहि कैमरामैनक।ओ बड़क संगी आ ममियौत दूनू रहैक।तेँ बड़ वरुण बाबू सेहो भीतर सँ दुखी रहथिन। आइ चालीस बरखक बाद आइ फेर एकटा बियाह रहैक।वरुण बाबू दोबरदिसिया रहथिन।बरियाती आ सरियाती दूनू।हुनके पैरवी सँ कथा फरियायल रहैक।।बेस धमगिज्जर बरियात रहैक।आजा-बाजा।मनसे-मौगीक गधकिच्चन डाँस।एगो स्त्री वरुण बाबूक पहुँचा पकड़ि जोर-जोर सँ झीकि डाँस करा रहल रहथिन अपना संगे।तावत वरुण बाबूक नजरि कन्याक बाप पर पड़लनि।ओ हुनका पकड़ि ओहि स्त्रीक सोझा आनि ठाढ़ क' देलथिन।कहलथिन-"यै पवित्री दाइ,बड़क माइ,हमर सारि! एकरा चिन्हलियैक?यैह छी अहाँक समधि!यैह छी वैह कैमरामैन जे हमर बियाह मे अहाँक फोटो झिकने रहय! मोन पड़ल?" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आनन्द कुमार झा एक बाल नाटक " बोलूक बेदना " पात्र - परिचय बोलू , प्राची , टुना लाल , बाबूजी , गहिकी ********************************* दृश्य - पहिल °°°°•••••°°° [ स्थान - पक्की सड़क । समय - दस बजे दिन । टुना लाल आ ओकर सॅघतिआ सभ बम्बा पर बैसि बनसी खेला रहल अछि । ओकर संगी लोकनि एकाएक बनसी समटि गामपर जाइ लगैत अछि । सभक हाधमे डाभी खढमे गाॅथल माॅछ अछि । ओ सभ आब चलि जा रहल अछि । जकरा उदास टुना लाल देखए लगैत अछि । ताबतमे स्कूल जाइत बच्चा सभक झुंड जाइत अछि । ओहि झुंडमे प्राची आ बोलू सेहो अछि । टुना लालकेॅ देखि बोलू रुकि जाइत अछि । बच्चा सभक झुंड आॅगा बढि जाइत अछि । ] बोलू : ( पीठ थपथपबैत ) टुना लाल! आइ तोरा एकहुॅ फड़ी माछ नहि भेलौ ? टुना लाल : नहि ! अजुका जतरा बड़ खराब । बोलू : कि हेतौ जॅ एक दिन माछ - भात नहिये खेमह तॅ ? टुना लाल : जो रे! हम तॅ कहियो नहि माछ खाइत छी । बोलू : अच्छा! तू दुध्दा वैष्णव छेॅ? माछ माछ - माउस नहि खाइत छेॅ? टुना लाल : नहि, कहियो नहि । बोलू : ओ तॅ बुझलियौ, माछ तोहर बाबू - मायकेॅ नीक लगैत हेतैन? टुना लाल : नहि! बाबूक तॅ हम मुहो नहि देखलहुॅ । मायक पेटेमे छलहुॅ तखनहि ओ मरि गेलाह । तेॅ हमर माय माछ - माउस नहि खाइत अछि । हमर माय जखन खेबे नहि करतैक तॅ हम किएक खएब? हमहू खएब छोड़ि देलियैक । बोलू : फेर माछ ककरा लेल मारैत छेॅ? टुना लाल : बेचैक लेल । बोलू : बेचैक लेल? टुना लाल : हॅ ! ओहि पाइसॅ चाउर - चिकस कीनिकेॅ लए जाइत छी । बोलू : माछ नहि भेलौ तॅ? टुना लाल : भानस बन्द । बोलू : आइ तॅ माछ नहि फसलौ? टुना लाल : से तॅ खाली हाथ गामपर नहिये जेबैक । मायकेॅ दुख हेतैक । बोलू : जलखै तॅ नहि कएकेॅ अएलाहेॅ? टुना लाल : सभटा एकहि बेर हएत, जखन गाम पर जएब । [ बोलू अपन बैगसॅ टिफिन बाक्स निकालि दैत अछि ।] बोलू : ई ले, तू खा लिहेॅ । टुना लाल : तू स्कूलमे की खेबही? बोलू : हमर चिंता नहि कर । [ पैनक बोतल निकालि दैत ] ई ले पैनक बोतल । भूलहुॅसॅ खत्ता महक पैन नहि पिबिहाॅ टाइफाइट भए जाइत अछि । आब हम चलैत छियौ । घुरती काल भेटिहाॅ । [ टुना लाल आश्चर्य करैत देखैत रहल । बोलू जाइत - जाइत पाॅछा घुमि - घुमि तकैत रहल । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] ---------------------------------- दृश्य - दोसर ••••°°°°°•••• [ स्थान - क्रमश: । समय - बेरुपहर । स्कूलमे छुट्टी भेल अछि । बच्चा सभ घर आपस भए रहल अछि । आकि एकटा गहिकी अएल ।] गहिकी : हेरौ छोड़ा, माछ बेचबीही रौ? टुना लाल : हॅ यौ मालिक! बेचहि लेल तॅ बैसल छी । गहिकी : कतेकमे देबही? टुना लाल : पूरे एक किलो छैक । पचास टाका लागत । गहिकी : सड़ल गन्हाएल माछक दाम पचास टाका । तोरा बेचैक मोन छौक कि नहि? टुना लाल : देखू बेसी हिजो हमरा नहि पसीन अछि । एक दाम चालिस टाका लागत । गहिकी : हेरौ छोड़ा, तोहर चालिस नहि चलतौक । पूरा - पूरी बीस देबौक । [ तखनहि प्राची आ बोलू स्कूलसॅ आबैत अछि । प्राचीक नजरि बम्बा पर राखल टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल पर परैत अछि । ओ आश्चर्य करैत उठबैत बोलूकेॅ इशारा - इशारामे प्रश्न करैत अछि । जकर उत्तर अलग हटि बोलू इशारेसॅ दैत अछि । प्राची उत्तरसॅ संतुष्ट होइत अछि । टुना लाल सेहो गहिकी परसॅ ध्यान हटा बोलू पर लगबैत अछि । ] गहिकी : कि रौ कोम्हर ध्यान अटकेने छेॅ? टुना लाल : एकबेर तॅ कहलहुॅ नहि हएत । गहिकी : तॅ कतेकमे हएत से तूही अन्तिम बेर बाज ! टुना लाल : नहि अहाॅक बीस आ नहि हमर चालिस एकदाम तीस टाका लाउ । बोलू : टुना लाल तू तॅ महामुर्ख छेॅ! माछ तॅ तीन सौ रुपैये किलो अछि । गहिकी : हॅ बौआ तोॅअपन बाट नापहनेॅ । दहीमे सही करैक लेल अएलह हेॅ । बोलू : हम किएक दहीमे सही करब । अहाॅ बच्चा जानि एकरा ठकि रहल छी । जाउ - जाउ ई माछ हम तीन सौ टाकामे कीनि लेलहुॅ । गहिकी : हेरौ नहि विचार भेलहुॅ? टुना लाल : सुनलियैक नहि हमर दोस तीन सौमे लए लेलकैक । [ गहिकी मुह - कान टेढ करैत चलि जाइत अछि । ] टुना लाल : दोस तू सत्ते लेबही माछ? प्राची : बोलू ई कोन तमाशा ठार कए रहला अछि? माछक दाम कतएसॅ देबही? टुना लाल : दीदी अहाॅ केहन बात करैत छी? हम अहाॅ सभसॅ पाइ लेब? बोलू : तहन तोरा घरक भानस? टुना लाल : की हेतै? बोलू : नहि, नहि । तू चल हमरा संगे हमरा गाम पर । हमर बाबूजी माछ कीनि लेथुन । प्राची : बहुत नीक आइडिया! चल ----! [ प्रची आ बोलू ओकरा संग लए जाइ लगैत अछि । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] □□□□□□□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - तेसर ♢♢♢♢♢♢ [ स्थान - पूर्ववत । पक्की सड़क । प्राची आ बोलू आपसमे बतिआएत स्कूल जा रहल अछि । ] प्राची : बोलू तू दू दिनसॅ स्कूलमे लन्च नहि करैत छेॅ जॅ पकड़ेमह तॅ घर पर सिकाइत जेतौक । बाबूजीकेॅ की जबाव देबहुन? बोलू : दीदी तू देखैत नहि छिही! टुना लाल भोरसॅ भुखल रहैत अछि । प्राची : टुना लाल तोहर केओ लगैत छौक? ओकरा तूॅ अपन हिस्साक टिफिन खुआ, अपने भुखल रहैत छेॅ? टुना लाल : ओहो तॅ अपनहि सभ जॅका बच्चा अछि । दीदी जॅ ओकर बाबू मरिये गेलैक तॅ ओ मछमाराक काज कएकेॅ गुजर करत से उचित भेल? प्राची : से तॅ अनुचित छी । एखन ओकर उमेर स्कूल जाइक अछि । खेलाइ - धुपाइक छैक । मुदा हम तू कए की सकैत छी? बोलू : ओकर स्कूल जाइक व्यवस्था । हम तू कए सकैत छी । प्राची : से कोना? बोलू : दुनूगोटए मिल एक स्वरमे बाबूजीकेॅ कहबनि । प्राची : बाबूजीकेॅ? बोलू : हॅ! प्राची : की कहबुहून? बोलू : हमरा दूनू गोटएकेॅ खर्च उठबैते छी । एकटा टुना लालक भार सेहो उठा लियौक । प्राची : तू की बाजि रहलाहेॅ? बोलू: मांग मजबूत अछि प्राची दीदी । प्राची : तोॅ तॅ जे पिटाई खेमह हमरो बात सुनेमह । बोलू : दीदी आब चाहे जे होएक, टुना लालकेॅअपना संगे स्कूल लए जाकेॅ रहब । प्राची : ओ तॅ तोहर स्क्रिप्ट तैयार बुलन्दी पर छौक? बोलू : किएक नहि दीदी । ई हमर बाल अधिकारक मुद्दा अछि । प्राची : हॅ, हॅ! हम तोहर संग छिऔक । ओकर, ओकरा स्कूल जाइक अधिकार भेटबाक चाही । [ बात करिते - करिते उएह बम्बा लग पहुचैत अछि जतए टुना लाल माछ मारैत रहैत अछि ।ओ देखितहि सहटिकेॅ लग अबैत अछि । बोलू ओकरा लन्च बाक्स आ पैनिक बोतल बैगसॅ निकालि थम्हाबैत अछि । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] □□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - चारिम ♢♢♢♢♢ [ स्थान - क्रमवत । टुना लाल बम्बा पर बैसि पाथल बनसी पर टकटकी लगौने अछि । उम्हरसॅ बोलूक बाबूजी अबैत छथि । ओ बम्बा पर टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल देखि आगिबबुल्ला भए जाइत छधि । ] बाबूजी : ई लन्च बाक्स ककर छी? [ टुना लाल लाजसॅ मुह नहि उठबैत अछि । ] मुहमे बकार नहि छौक? बोलूक हिस्साक अन्न गिरैत शर्म नहि अबैत छौक? टुना लाल : ओ तॅ हमरा जबरदस्ती दए जाइत अछि । बाबूजी : खबरदार जॅ झूठ बजमे तॅ! टुना लाल : मायक सप्पथ! हम झूठ नहि बजैत छी । बाबूजी : हम किछु नहि सुनै चाहैत छी । आजुक बाद तू हमर बोलूसॅ बात नहि कए सकैत छेॅ । टुना लाल : से तॅ नहि हएत! हमरा ओकरासॅ दोस्ती भए गेल अछि बाबूजी : कथीक दोस्ती? ओ स्कूल जाइत अछि तू बनसी खेलाइत छेॅ, गोली खेलाइतछेॅ, टाइल - गुल्ली खेलाइ छेॅ । टुना लाल : से तॅ हमर बाप मरि गेल तेॅ ----- बाबूजी : तॅ हम तोहर बपौती सम्पत्ति धारने छियौक? [ तखनहि गहिकीक आगमन होइत अछि ।] गहिकी : की रौ छोड़ा! आइयो हमरा माछ देमए की नहि? बाबूजी : अहाॅ लोकनि तॅ आर एकरा बत्तर बना देलियैक । माछ बजार - हाट जाकेॅ कीनब से नहि! अलोपितभए गेल अहि संसारमे ? एतेक छोट बच्चाक बनसी खेलाएब देखि नीक लगैत अछि? गहिकी : की कहू अहि छोड़ाक हाथमे जादू छैक । तड़ैला एकरती कनखी मारलक माछकेॅ उपर भेनाइ छैक । बाबूजी : तकर बदलामे देखैत छी, हमर अपघात कतेक कए रहल अछि? ई टिफिन बाक्स हमर बेटा बोलूक छी । परोठा, भुजिया आ फिल्टर कएल पैन ओकरा बदला ई भोग कए रहल अछि । टुना लाल : अहिमे हमर कोन कसूर । ओ हमरा बलजोड़ी दए दैत अछि । गहिकी : हे , इहो कोनो बेजय नहि कहैत अछि । अहूॅक बेटा कम नहि अछि । से दिन कीनल माछ पर डाक कए देलक । बाबूजी : अहाॅकेॅ तॅ खाली माछे सुझाइत अछि । हमर बेटा सप्ताह भरिसॅ स्कूलमे लन्च नहि करैत अछि । भुखले रहि जाइत अछि ।ओ तॅ आइ स्कूलसॅ फोन पर सिकाइत अएल अछि । गहिकी : मुह की तकैत छी । पकड़िकेॅ लए जाउ अहि छोड़ाकेॅ एकरा माय लग । एकर माय जखन एकरा कनगोजरिमे झापर लगौतैक तखन एकर बुध्दि ठीक हेतैक । बाबूजी : ठीके कहलहुॅ । आब सएह करै पड़त । आब कोनो दोसर उपए नहि बाॅचि गेल छैक । गहिकी : आइ माफ कए दिऔक ------- बाबूजी : अहाॅ कहैत छी तॅ आइ छोड़ि दैत छी । मुदा सुनिले बौआ अजुका बाद जॅ हमर बेटा दिस तकबो करमए तॅ बुझिराख । गहिकी : रौ छोड़ा माछ ताॅछ फसबो केलकौ अछि? बाबूजी: अहाॅकेॅ तॅ माछे - माउस सुझाइत अछि । एते कतहुॅ माछक सिनेह भेलैक अछि । चलू --- चलू ------ [ दुनू गोटए जए लगैत छथि । बाबूजी टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल लए लैत छथि । टुना लालकआॅखिमे नोर भरि जाइत छैक । मंच परदाकझाॅपनसॅ झपाइत अछि । ] □□□□□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - पाॅचम ♢♢♢♢♢ [ स्थान - यथाक्रम । समय - बेरुपहर । स्कूलमे छुट्टी भेल अछि । छात्र - छात्रा सभ गामपर दिसकेॅ जा रहल अछि । प्राची आ बोलू सेहो बढल आबि रहल अछि । आइ टुना लाल मुह लटकएने मन्हुआएल सन भेल बम्बा पर बैसल अछि ।] बोलू : ( टुना लालक समीप पहुॅचैत ) टुना लाल, तू एतेक उदास किएक छेॅ? प्राची : हॅ, आइ किछु बजितो नहि छेॅ । आखिर की भेलहुॅ अछि तोरा? बोलू : आइ तॅ बम्बा पर हमर टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल सेहो नहि देखाइ दैत अछि । टुना लाल : तोहर बाबूजी अएल छलखुन्ह । टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल उएह उठाकेॅ लए गेलखुन्ह । बोलू आ प्राची : बाबूजी? बोलू : जरुर कोनो बात हएत । प्राची : स्कूलसॅ सिकाइत गेल हेतनि । बोलू : अच्छा बता तॅ टुना लाल, बाबूजी की की कहलखुन्ह? टुना लाल : ओ साफ मना कए गेलाह अछि - तोरा लोकनिसॅ बात करैसॅ । बोलू : ओ तॅ आब बुझलहुॅ तोहर असल बात । तू हमर बाबूजीक आदेशक पालन करै खातिर मुह चुप कएने छेॅ । टुना लाल : ओ तॅ ठीके कहलखिन्ह । कतए तू सभ पढुआ बाबू । हम मछमारा । प्राची : टूना लाल तू हमर बाबूजीक बातक दुख नहि कर । बोलू : हॅ हुनका हम सभ सभटा बुझा देबनि । प्राची : हम सभ तोरा स्कूल दिसका रास्ता देखमए चाहैत छी । टुना लाल : नहि दीदी! ई कोना हएत? हम स्कूल जएब तॅ हमर घर कोना चलत? बोलू : एखन तोरा घर चलबैक बात सोचबाकेॅ नहि छौक । प्राची : से कोना हएत बोलू? स्कूल जएत तॅ बनसी नहि खेलएत, बनसी नहि खेलएत तॅ आमदनी रुकि जएत -------- टुना लाल : नहि, हम स्कूल नहि जएब । बोलू : देखही टुना लाल आइ हम दुनू भाई - बहिन प्रिन्सिपल सरसॅ भेॅट कएने छलहुॅ । ओ तोहर फीस माफ कए देथुन । ई बहुत बड़का बात भेल । प्राची : रहलौ तोहर घरक खर्चा से हम सभ अपन बाबूजीसॅ कहबनि । बोलू : केहन लगलहुॅ हमर सभक प्लान? टुना लाल : हमरा तॅ बड़ डर लगैत आछि । बोलू : स्कूल जाइक बाटमे डरैक कोनो बात नहि छैक । [ बातक बिचहिमे बाबूजी ओतए पहुॅचि जाइत छथि । ओ अबितहिॅ टुना लाल पर आॅखि लाल करैत देखलाह ।] बाबूजी: तू हमर बातकेॅ अभेलना कएलाॅह? बोलूकेॅ फेर रोकलाॅह बोलू : बाबूजी, ओकर कोनो दोख नहि अछि । बाबूजी : तोॅ चुप! प्राची : हॅ बाबूजी टुना लाल बेकसूर अछि । बाबूजी : लन्च बाक्स आ पैनिक बोतल टुना लाल तक कोना पहुॅचल? बोलू : बाबूजी टुना लाल कॅए - कॅए दिन उपासले रहैत अछि । हम तॅ गाम परसॅ खाइये कए स्कूल अबैत छी । प्राची : एकर माय सेहो कएक दिन सहि जाइत अछि । एकरा सभकेॅ केओ देखनाहार नहि छैक । बाबूजी : हम किछु नहि सुनै चाहैत छी । तू सभ पढाई लिखाई छोड़ि - छोड़िकेॅ समाज सुधारक बनै जाइ लगलाहेॅ ? प्राची : टुना लाल बड़ गरीब अछि । ई माछ नहि मारत तॅ दोसर आमदनी कोनो नहि अछि । बाबूजी : बस आब बहुत भेल । चल --- चलै चल एतएसॅ । बोलू : बाबूजी आइ हम सभ एतएसॅ तखनहि जएब जखन टुना लाल संग अहाॅ न्याय करब! बाबूजी : ओ तॅ आब जबर्दस्ती --- चल --- जल्दी चल ---- [ बाबूजी बोलूकेॅ बलजोड़ी घिचिकेॅ लए जाइत छथि । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] □□□□□□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - छठम् ♢♢♢♢♢♢ [ स्थान - पूर्ववते । टुना लाल आ बोलू बम्बा पर बैसल अछि । ओ दुनू गोटए अपनामे बात कए रहल अछि । ] टुना लाल : दोस! तू हमरा दुआरे एतेक कष्ट जुनि काट । चलि जो अपना अंगना । बोलू : नहि टुना लाल! जा धरि हमर बाबूजी हमर मांग पूरा नहि करताह , हम अपना आंगन नहि जएब । टुना लाल : अपना आंगन नहि जेमह तॅ हमरे आंगन चल । भुखल कतेक काल रहमए? बोलू : नहि! तोरो आंगन नहि जएब । टुना लाल - रातियोमे एतहि रहमए? बोलू : हमर बाबूजी हमरा बड़ मानैत छथि । ओ रातिकेॅ हमरा एतए नहि रहै देताह । [ तखनहि बाबूजी पहुॅचैत छथि ।] बाबूजी : बोलू तोॅ घरसॅ भागिकेॅ एलएहेॅ ? बोलू : हॅ, आब हम घर कहियो नहि जएब । बाबूजी : किएक? बोलू : बाबूजी अहाॅकेॅ खाली अपनहि बेटा - बेटीसॅ प्रेम अछि । आर ककरोसॅ नहि --------- बाबूजी : बोलू ----? बोलू : हॅ बाबूजी हॅ । टुना लाल टुगर अछि । अनाथ अछि । एकर बाबू मरि गेलै तॅ अहिमे एकर कोन कसूर छैक? बाबूजी : बोलू , अहिमे बाबूजीक कोन कसूर? बोलू : बाबूजी , जॅ हमरा सतहि मानैत छी तॅ हमरे जॅका टुनो लालकेॅ मानियौक । ओकरो हमरे संग - संग स्कूल पठबिऔक । ( कनैत ) बाबूजी आइ जॅ टुना लाल स्कूल नहि जएत तॅ हमहू स्कूल जएब बन्द कए देब । हमहू टुने लाल संग बम्बा पर बैसिकेॅ बनसी खलएब । तखन पतिआएब टुना लालक दुखकेॅ ------ [ बोलू रोदन पसारि दैत अछि ।आ कि प्राची धब दए पहुॅचैत अछि । ओकरा हाथमे स्कूल ड्रेस आ बैग रहैत अछि ।] प्राची : बोलू , अपन सभक बात बाबूजी मानि चुकल छथुन्ह । आब टुना लाल सेहो स्कूल जएत । बोलू : ( प्रसन्न होइत ) दीदी की कहलएह --- बाबूजी प्राची दीदी सत्ते कहलक नेॅ ? बाबूजी : प्राची ---, टुना लालक स्कूल ड्रेस आ स्कूल बैग दए दहीन । [ प्राची दैक लेल आॅगा बढैत अछि आकि बोलू धराक दए छिनि टुना लालकॅ पहिराबै लगैत अछि । ओकरा कन्हा पर बैग टाॅगैत अछि । बाबूजी बम्बा पर राखल बनसीक छीपकेॅ टुकड़ी - टुकड़ी तोड़ि जुमाकेॅ पैनमे बहुत दूर फेकि दैत छथिन्ह । सभगोटए सहटिकेॅ बाबूजीक समीप अबैत अछि । बाबूजीकेॅ सेहो एकटा नीक काज करबाक गुमान होइत छन्हि ।मंच पूर्ण कालिक परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] नाटककार - आनन्दकुमार झा, मेंहथ, झंझारपुर - 847404 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.ज्ञानवर्द्धन कंठ-३ टा पद्य ३.२. विजय इस्सर "वत्स"-आजाद गजल ३.३.बाबा बैद्यनाथ-"कुण्डलिया छंद" ३.४.बिनय भूषण जीक दू टा कविता ३.५.बाबा बैद्यानाथ-गजल ३.६.डा जियाउर रहमान जाफरी-आजाद गजल ३.७.आनन्द कुमार झा-मुक्तिक तरास ३.८.विष्णुकान्त मिश्र-३ टा पद्य ३.९.प्रदीप पुष्प-२ टा गजल ज्ञानवर्द्धन कंठ ३ टा पद्य १ मधुर-मधुर अहाँ बाजू यै मधुर-मधुर अहाँ बाजू यै! घुरि इम्हर कनी ताकू यै! बाजी अहाँ, से माखन-मिसरी ताकी अहाँ त' छिटुकय बिजुरी नैन मृगा-सन, बोल सुगा-सन जुनि मुसकी सँ मारू यै! गोर बरन मुख-चंदा शोभय श्याम केश-घन उपर डोलय रूपक बरखा रिमझिम-रिमझिम हमरो कनी नहाउ यै! धन्य विधाता गढ़ि-गढ़ि रचलक धन्य नयन दर्शन-सुख पओलक ही केर भीतर हूक उठैए एकरा कोना सम्हारू यै! मधुर-मधुर अहाँ बाजू यै! घुरि इम्हर कनी ताकू यै! २ के छथि? जनमैते उठि नाचथि, के छथि? रहि-रहि ताल लगाबथि, के छथि? बदलि-बदलि क' गाबथि, के छथि? अरे, पमरिया? नञ-नञ, कवि छथि! चिकरि-चिकरि क' बाजथि, के छथि? नव-नव ताल लगाबथि, के छथि? बेरि-बेरि गरियाबथि, के छथि? अरे, सनकहबा? पत्रकार छथि! डारिए-डारिए छड़पथि, के छथि? नव-नव नाच देखाबथि, के छथि? नोचथि,नोछरथि,भोम्हरथि, के छथि? अरे,बनरबा? नहि, नेता छथि! ३ नरक पीक' टुन्नी टुन्न भेला, खसला ओ गंदा नाला। किछु सुधि नहि रहलनि,पड़लनि जे दारु सँ बड़का पाला। फुटल माथसँ शोणित छर-छर, भीजल-तीतल झोंटा । मुँहसँ लसलस लेर चुअल छनि, बहल नाकसँ पोटा। लगमे बहुत बोकरने, लेभरल सगरो मारे गन्हकै छनि। आधा देह पड़ल नालामे, पिलुआ सह-सह सहकै छनि। भरल मुँह बैसल छनि माछी, पैरमे माखल गुँह। आबिक' केम्हरो सँ एक कुक्कुर लगलनि चाटय मुँह। जीबै लेल पिबै छथि वा ओ पीबै लेल जिबै छथि! इ जिनगी जँ छनि जिनगी तँ नरक कथीकेँ कहै छथि? ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विजय इस्सर "वत्स" आजाद गजल माँगि रहल छी सौंसे दुनिया, गामे टोल सुधारि दियौ ने बूझल जगमग करबै जग केंँ, डीही दीया बारि दियौ ने देशक-राज्यक बात बहुत छै, कत्ते कहबै कत्ते सुनबै अपनहि घर केँ स्वर्ग बनाके, भगवा झंडा गाड़ि दियौ ने भाषण काल फुराइ बहुत छै, कथनी करनी में बड अंतर मंचक नीचाँ आबि कने निज जीवन में उतारि दियौ ने हम्मर बाजब तिख्खे लागत,सत्यक धाह सहब की संभव अप्पन तामस शांत करब तेंँ, हमरे घर उजारि दियौ ने देश हमर छल मिथिला शोभित,राज्यक लेल किए बेलल्ला सुनगय दीयौ सभके हृद मे एक्कहि संग पजारि दियौ ने ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। बाबा बैद्यनाथ                     "कुण्डलिया छंद"                  

करतै जे नित साधना, आर कठिन अभ्यास। धन वैभव विद्या सहित, होयत सकल विकास।।

होयत सकल विकास, चतुर्दिक मान बढ़ायत। सदिखन लोकक झुंड, संगमे पुनि मड़रायत।।

कह "बाबा" कविराय, देखि दुष्टोसभ जरतै। तीव्र प्रखरता देखि, अहित ओकर नहि करतै।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। बिनय भूषण जीक दू टा कविता 1 ठौरक जोगारमे घरमूँहा मजूर ओकरा नीक जँका बूझल  अछि परदेसी होयबाक पीड़ा ओ जानैत अछि नीक जँका जरैत पेटक दर्द ओकरा  नीक जँका पता अछि जरैत पेट कोना कऽ लोककेँ ठेलिया दैत  अछि गामसँ दूर दूर - बहुत  दूर बहुत -  बहुत - बहुत  दूर करजा चुकेबाक  लेल वा परिवारक सौख पुरेबाक लेल ओ बहरा  जाइत अछि  दोसर  ठाम । अपन प्रियगर गामकेँ  छोड़ि ओहिना  नञि  पराइत अछि ओ परदेस परदेसमे ओ देखऽ  लगैत  अछि अपन  विकास परदेसमे  गुनऽ  लगैत  अछि  ओ अपन  खून  आ  पसेनाक  दाम परदेसमे  ओकर हृदयमे जन्मऽ  लगैत  अछि बड़का  लोक  बनबाक  स्वप्न ओ  सुतैत  अछि  फूटपाथपर ओ  काटैत  अछि  राति वायुबिहीन  बन्न  गोदाममे फैक्ट्रीक  फर्शपर सुतैत  अछि  गाढ़  निन्नमे निन्न  जरूरी  अछि  रोटिये  जँका अगिला  दिन  जतनसँ  खटबाक  लेल मालिककेँ  प्रसन्न  करबाक  लेल  । आइ  घरेमे  रहबाक भऽ  गेल  अछि  घोषणा ओकरा  रहबाक  लेल कहाँ  अछि  अपन  घर ओ  कतय  सुतत साँझकेँ  हाथक  आंगुरक  गफामे दिनुका  श्रमक  अरजल  टाकासँ अबैत  छलैक दुइ - चारि  क' र  नून - रोटी ओ  राति - दिन  देखैत  छल  सपना जे  ओकरो  थारीमे  अयतैक भात - दालि - तरकारी घी  लगाओल  रोटी  कि  पूड़ी - मिठाई ओ  अपन  कायामे शक्ति  जोगेबाक  लेल अगिला  दिन  काज  करबाक  लेल अपन  देह  आ  दिमागकेँ दुरुस्त  रखबाक  लेल ओ  पिबैत  छल  सतुआक  शर्बत  अमृत  जँका ओ  सपनाइत  छल  असंख्य  सपना भोटक  समय  ओकर  आँखिक  आगू सपनाक  हरियर  खेत ओ  अपन  माँ - पिताकेँ  लिखैत  छल  पत्र जे  देशमे  आबि  गेल  अछि  नीमन दिन  । ओ  फोनपर  कहैत  छल  अपन  पत्नीकेँ बदलि  रहल  अछि  देशक  दिन बदलि  जेतैक  ओकरो  दिन ओ  पठाओत  टाका  ढ़ेरीक  ढ़ेरी बड़के  लोक  जँका ओ  अपन  माँ - पिताकेँ पाँकेट - खर्चक  लेल  पठाओत  टाका  अलगसँ बाबूकेँ  खैनीक  लेल नञि  करऽ  पड़तैक  मुंहतक्की माँक  बीड़ीक  लेल  ओ  अलगसँ  पठाओत  टाका पत्नीक  लेल  ओ  जरूरे  कीनत  निकहा  सुंदर  साड़ी साड़ी - लाज  झँपबाक  लेल  साड़ी साड़ी  - अन्नमन्न  ओहने  साड़ी जेहन  पहिरैत  छैक  बड़की  गिरहतनी ओ  जरूरे  कीनत  अपन बेटा - बेटीक  लेल सुंदर - सुंदर  अंगा - पेंट आ  सलवार - सुट बड़के  लोकक  धिया - पुता  जँका ओकरो  बेटा - बेटी  लगतैक  सुंदर  अति सुंदर आब  ओकर  बेटा - बेटी नञि  पढ़तैक  खिचड़ी - स्कूलमे आब  ओकरो  बेटा - बेटी पढ़तैक  काँन्वेंटमे आब  ओकरो  बेटा - बेटीक  देह पर साजल  रहतैक  टायवला  ड्रेस ओकरो  बेटा - बेटीक पएरमे पहिड़ल रहतैक  चमचमाइत  जूत्ता - मौजा ओ  सपनाइत  छल  सपना सपना - समय बदलबाक  सपना सपना - दिन  घूरि  अयबाक  सपना सत्ते  आबि  रहल  अछि  नीमन  दिन  देशमे सत्ते  ओकरो  आबि  जयतैक  नीमन  दिन  । अचक्के  आइ ओकर  समस्त  सपनाक  अट्टालिका भऽ  रहल  अछि  शीशाक  महल  जँका चूर - चूर - चकनाचूर आइ  आबि  गेल  अछि  सरकारक  फरमान घरबन्दीक  भऽ  गेल  अछि  घोषणा मृत्यु- दूत  कोरोना  ओकर  कायाक  चारू  कात भिनभिनाइत  मँडरा  रहल  अछि  मधुमाछी  जँका काज - धाज  भऽ  गेल  अछि  थप्प ओकर  जेबीमे  नञि  अछि  एक्को  टाका फूटपाथपर  बरसैत  छैक  पुलिसक  डंटा फैक्टरी आ  गोदामक  गेटपर लागि  गेल  अछि  ताला ओ  कोनो  ठौरक  जोगारमे औनाइत  अछि  महानगरक  बाटपर महानगरक  बाटपर  पसरल  अछि पुलिसक  रौब  आ  तामस पुलिसक  बेंतसँ  लोहछि  जाइत  छैक  ओकर  काया नील - डाउन  आ  उठा - बैसक  के  अपमानजनक  दंड फाटऽ  लगैत  अछि  ओकर  छाती  । ठौरक  जोगारमे  ओ दाँत  निपोरि  निहोरा  करैत  अछि अपन मालिककेँ मालिक  कहैत  छथि  साफ - साफ आब  बन्न  भऽ  गेल  अछि  काज - धंधा तोहर  जरुरत  कहाँ  अछि  हमरा की  तोरा इ नञि बूझल  छौ घरबन्दीमे बन्न भऽ  जाइत  छैक  काज सम्पूर्ण  दुनियामे घूमि रहल छथि यमराज शायद  हवामे सेहो मिझरायल अछि कोरोना - दानव की तोरा नञि बूझल  छौ घरमे बन्न रहबाक  आबि  गेल अछि फरमान  । कोनो आश्वासनक  खोजमे ओ ताकैत रहैत अछि मालिकक मुंह मालिक भऽ जाइत अछि निश्तब्ध अपन  दिमागक  तार पर दैत अछि दबाव मालिक  ताकैत अछि गंहीर नजरिसँ ओकर  देहपर  लटकल मैल - कूटकूट  फाटल  अंगा दिस मालिकक  नाकसँ  टकराइत अछि ओकर  देहसँ  बहराइत  पसेनाक गंध मालिकक  आँखि टिकि  जाइत अछि ओकर  कारी - खूटखूट क्षीण - हीन काया पर मालिक  देखैत  अछि ओकर  ठोरक  भीतरक  निपोरल  दाँत ई  समस्त  दृश्य मालिकक हृदयमे भरि  दैत अछि  घृणाक  जहर ओ ताकैत रहैत अछि मालिकक मुंह मालिकक नजरि चलि जाइत अछि अचक्के मजुरक बिदकल  मुंह दिस आँखिसँ बहैत  नोरक धार  दिस किछु  नहि  बाजैत  अछि  मालिक घूमाऽ  लैत  अछि  अपन  नजरि लगाऽ  लैत  अछि  अपन  ग्रिलक  ताला  । मजूरक  आँखिक  आगू  देखाइत  अछि अन्हारे  -  अन्हार अन्हार - डेराओन  अन्हार अन्हार -  कोरोनाक  अन्हार अन्हार  - भूख - प्यासक  अन्हार अन्हार  - मृत्युक  अन्हार ओ  जानैत  अछि नीक  जँका अवश्यंभावी  अछि  ओकर  मृत्यु कोरोनासँ  मृत्यु - भूखसँ  मृत्यु मृत्युक  लेल  सहर्ष  तैयार  अछि  ओ ओकर  आँखिक  आगू  पसरि  जाइत  अछि घरबन्दीक  अदंकक  घनगर  कुहेस बाटपर  ठाढ़  पुलिसकेँ  देखिद पानि - पानि  भऽ  जाइत  अछि  ओकर  काया निराशाक  घोर  अन्हरियामे  औनाइत अपन  माटिपर  प्राण  त्याग  करबाक सेहन्तामे राजधानीक  राजपथकेँ  करैत  अछि  प्रणाम अपन  जनपदमे पहुँचि जयबाक अदम्य आकांक्षाक संग जनपथपर  बढ़ाऽ  दैत  अछि  अपन  डेग   । ओ  प्रसन्न  अछि  अपन  यात्रासँ ओकरा  लेल  इ  गृहयात्रा सामान्य  यात्रा नहि  छियैक ओकरा  लेल  इ  गृहयात्रा जीवनक महायात्रा  छियैक ओ प्रसन्न  अछि  एहि लेल  जे मृत्युसँ पूर्व  ओ  पहुँचि  जायत  अप्पन  गाम मृत्युसँ  पूर्व  अपन  आँखिसँ भरि  पोख  देखि लेत  अपन  माँ - पिताक  काया मृत्युसँ पूर्व ओ  पावि  लेत परिजन - पुरजनसँ स्नेह आ आशीर्वाद मृत्युसँ पूर्व  ओ अपन पत्नी - बेटा - बेटी आ भाइ - बहिनकेँ दऽ  सकत  बोल - भरोस अचक्के  ओकर  माथ घूमऽ  लगैत  अछि  घिरनी  जँका ओ  अपन तरबाकेँ  अजमाबैत  अछि जनपथ पर अपन  देहक  ताकतकेँ  तौलैत  अछि जनपथक  महायात्राक  लेल  । थाकि  गेल  अछि  ओकर  पएर दुखाए  रहल  अछि  ओकर  गत्रक  पोर - पोर प्रत्येक  पग - पगपर ओकर आँखिक  आगू देखाइत  अछि अन्हारे - अन्हार ओकर  मुंहमे आबैत  अछि हाफीक  हवा ओ  ढ़ेकरैत  अछि  सूखल  ढ़कार मुंहमे  आबैत  पितौंट  पानिकेँ चाटैत  अछि  ओकर  जीह अक्कत  तीत  स्वाद  पावि घोंकचि  जाइत  अछि ओकर चेहराक  झमान भेल चाम लड़खड़ाइत  अछि - लटपटाइत अछि नाकमे  रूमाल  बान्हने  घरमुंहा  सहयात्री सम्हारैत अछि - उठाबैत  अछि बढ़ौनय  जा  रहल  अछि अपन डेग कोरोनाक  अदंक  पैसल  रहैत  अछि हृदयमे ठौरक  लेल - घरबन्दी पालन  लेल अपने - आप बढ़ल जा रहल  अछि ओकर  डेग 2 महाप्रलयमे मृत्युसँ साक्षात्कार कोरोना महामारीक डेराओन तांडवक मध्य वैश्वीकरणक एक - एक परमाणु छिड़िया रहल अछि ग्लोबक कण - कणमे वसुधैव कुटुंबकम सन सुंदर आ शक्तिशाली मंत्रक महाशक्तिक भऽ रहल अछि क्षरण क्षण  - क्षण  । हमर आँखिक आगू सदिखन नाचैत रहैत अछि महाप्रलयक महातांडवक दृश्य प्रदीप्त तेजक संग दमकैत सुरूजक मध्य हमर आँखिक आगू सदिखन देखाइत रहैत अछि मृत्युक घोर अमावस्याक डेराओन चित्र  । अपन घरक सीमामे बान्हल हमर कल्पनाक श्वेत कपोतक कंठ गुँटरूं - गुंक मधुर स्वरक लेल कछमछाऽ रहल अछि कसायक परिकठ पर चमचमाइत धरगर छूरीसँ रेतल मुर्गीक कंठ जँका । हमर कल्पनाक श्वेत कपोतक स्वच्छंद उज्जर धपयधप पाँखि फरफराऽ रहल अछि मुर्गीक फरफराइत ललिछौह पाँखि जँका  । हमर कल्पनाक श्वेत कपोत अपन आँखिक दूनू कोरमे अपन पीड़ाक समस्त नोरकेँ रक्त बनौनय जिजीविषाक अस्तित्व रक्षाक लेल मृत्युक प्रतीक्षा करैत लड़ैत रहैत अछि कोरोनाक क्रुरतम प्रहारसँ । भोरे -  भोर नहि सुनाइत अछि कौआक काँव - काँवक सगुन  - स्वर नहिये सुनाइत अछि फुद्दी आ मैनाक कलरव आब कहाँ टकराइत अछि हमर कानसँ कोयलीक कूकक मधुर स्वर भोरे - भोर  । आब कहाँ भोरे - भोर पपीहाक पि - कहाँ पि - कहाँ आब कहाँ देखाइत अछि खिड़कीसँ कोनो बाबूक पोटरीमे चाउर - गहुम - चना कहाँ छिड़िआबैत  छथि कोनो बाबू दाना - ताना मैदानमे कहाँ आबैत अछि परवाक हेंज लुबलुब दाना लपकऽ लेल । उदास बैसल अछि परवा बहुमंजिला छत पर फुदकैत नञि अछि फुद्दी मैदानमे मैदानक कातमे अनमनायल बैसल अछि मैना निराश  बैसल अछि कौआ उदास गाछ पर नुकायल पपीहा आ कोयली डेरायल आँखियें देखि रहल अछि महामारीक महाप्रलयक दृश्य   । कुकुरक लेल कहाँ किओ आनि रहल छथि बासि सोहारी पावरोटी - बिस्कुट कठघरा लग कुकुर करैत अछि लोकक इन्तिज़ार डोलबैत अछि नांगरि मुदा निराश अनमनायल भूखल - सिहायल कुकुर लुद दऽ बैसि जाइत अछि बाटक कातमे । कचराक ढ़ेर पर कहाँ होइत अछि सुग्गर आ कुकुरक हुलदौर कहाँ देखाइत अछि सुग्गर शावक के मोहक रुप कहाँ कत्तौ कोनो कुतिया आकि मादा सुग्गरक थनमे लटकल देखाइत अछि सुग्गर - शावक आकि पिल्ला - पिल्ली  । गायक लेल कहाँ कोनो बाबू आनि रहल छथि रोटी - तरकारी कि पुड़ी - बुनिया माछक लेल पोखरिमे कहाँ केओ फेंकि रहल छथि चिक्कस - रोटी  - गुड़  । सुन्न भऽ गेल अछि वाट - चौवाट आ चौखरी कानि रहल अछि माछ - पानि - पोखरि - महार उदास ठाढ़ अछि गाछ समयक विकराल दृश्य देखि अदंकसँ सिहायल चिड़ै अपन खोंतामे बैसि तकैत अछि अकास दिस  । ग्लोबल दुनियाक भाड़ाक ग्लोबल निवासमे हमर आँखिक आगू देखाइत अछि ठाढ़ हमर मृत्यु - दूत हमर हृदयक खोंतामे बैसल कल्पनाक श्वेत - कपोत अचक्के देखऽ लगैत अछि नोरसँ डबडबायल हमर आँखि पीबऽ लगैत अछि कपोत हमर आँखिसँ बहैत समस्त नोर नागफेनीक काँट सन ठाढ़ हमर रोइयांकेँ सहलावऽ लगैत अछि अपन चांगुरसँ हमर फाटल करेजकेँ सीवऽ लगैत अछि अपन लोलसँ कल्पनाक श्वेत - कपोत हमर ठोरकेँ भींजा दैत अछि प्रसन्नताक मधु - अमृतसँ हमर गाल पर खिंचा जाइत अछि मुस्कानक गंहीर डिडीर । हमर नजरि चलि जाइत अछि पत्नी दिस हमर कानसँ टकराइत अछि पत्नीक मुंहसँ बहराइत ठहक्का बेटा - बेटीक संग प्रसन्न मुद्रामे बतिआइत हमर पत्नी संचार माध्यमक प्रशंसाक पुल बान्हैत अतीतक महामारीक चर्च करैत हमर बेटा - बेटी टी ० वी ० पर देखाइत कोरोना अपडेटसँ अवगत होइत हमर परिवार बच्चा आ बुढ़केँ सभसँ बेशी सावधान करैत टी० वी० चैनल  । अचक्के हमर आँखिक आगू नाचऽ लगैत अछि गाममे एसगर रहैत वृद्ध माँ - पिताक काया हम गाममे लगबऽ लगै छी फोन फोन अबैत अछि पहुँचक सीमासँ बाहर कछमछाबऽ लगैत अछि मोन मेटाऽ जाइत अछि हमर गाल पर खिंचायल मुस्कानक डिडीर  । आँखिक आगू नाचऽ लगैत अछि दरिभंगामे रहैत एसगर बहिन हरिद्वारमे रहैत एसगर नूनू दाइ समस्तीपुरमे बड़की नूनू कलकत्तेमे हमरासँ दूर रहैत हमर छोट भाय - भतीजा सिहरऽ लगैत अछि हमर देह  । हमर धिया - पुता आ पत्नी टी ० वी ० पर देखैत अछि कोरोना - अपडेट हमरा  मिसियो भरि नहि सोहाइत अछि कोरोना - अपडेट हम अपन मित्र आ परिजन - पुरजनसँ फोन पर गप करबाक करैत रहैत छी असफल प्रयास अचक्के हमर कानसँ टकराइत अछि समवेत स्वर समुचा दुनिया मुट्ठीमे  । हम डेरायल - सिहायल ताकऽ लगै छी अपन हृदयक खोंतामे नुकायल श्वेत कपोतकेँ निपत्ता भऽ गेल अछि श्वेत - कपोत अपन दरबज्जाक सीमाक भीतर कछमछाइत हमर मोन औनाबऽ लगैत अछि गाम जयबाक लेल  । माँ - पिताक खोज - खबरि लेबाक लेल भाइ - बहिनसँ भेंट करबाक लेल मित्र आ परिजन - पुरजनकेँ देखबाक लेल बैचैन होमऽ लगैत अछि मोन पुन: हमर आँखिक आगू देखाइत अछि ठाढ़ असंख्य मृत्यु - दूत निपत्ता अछि हमर हृदयक खोंतामे बैसल हमर कल्प - कपोत  । हमर आँखिक आगू देखाइत अछि वैश्वीकरणक क्षत - विक्षत काया ग्लोबक कण - कणमे छिड़िआयल कनैत वैश्वीकरणक परमाणु झनझनाबऽ लगैत अछि हमर मस्तिष्कक तार लोककेँ लोकसँ विच्छिन्न करैत कोरोनाक कहर हमर कानमे बेरि - बेरि गुंजैत रहैत अछि समुचा दुनिया मुट्ठीमे   । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। बाबा बैद्यानाथ गजल बहुत पैघ छथि ओ कखन बात होयत गरीबक  बुझू  नहि अबरजात होयत

कते लोक हेतनि मठाधीश बैसल जखन चाटुकारो गनब सात होयत

सरंजाम मस्तीक जोगार लागल हँसी आ ठहक्काक बरसात होयत

प्रयासो करब,नहि सफल भय सकब यौ समस्या सुनायब तँ अपघात   होयत

इलाकाक लोको कहै छनि विधाता मुदा राति दिन बस करामात  होयत 122-122-122-122 मात्राक्रम अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डा जियाउर रहमान जाफरी आजाद गजल

जीवन मे अछि प्यार    जरूरी  ई ते  अछि  हर बार      जरूरी 

घर हमर खतिहान   मे हुनकर अब  ते  अछि  दीवार  जरूरी 

मिथिला  के  ई   पहिचान अछि  हर गप्प  मे व्यवहार     जरूरी 

हर नारीक  रक्षा   के      खातिर  रावण   के  संहार          जरूरी 

सत्य के रक्षा   करवाक  खातिर  झूठक    छै      इंकार     जरूरी 

सत्ता भोगक    वस्तु  नहि   अछि  सब जन   के   उपकार      जरूरी 

हर पल  मे ई    बदलैत       दुनिया  भिनसरि   मे   अखबार      जरूरी 

जिनगी सहज  सरल नहि थिक ते  नहि  ऐसन   सरकार        जरूरी  ------------------------------------------

-हाई स्कूल माफ़ी +2, वाया -अस्थावां , जिला -नालंदा , 803107, बिहार , 9934847941, 6205254255 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आनन्द कुमार झा मुक्तिक तरास मुक्तिक तरास ओकरा बना रहलै अछि सक्कत देखाए रहलै अछि बाट करा रहलै अछि यात्रा ओकरा के रोकत ओकरा के टोकत ओकरा के बौसत आब ओ भए गेलै अछि सर्वतंत्र स्वतंत्र सब किछुक अधिकारणी किएक तॅ ओ नहि बनलि रहल कठपुतली आनहि सभ जॅका कठजीव ओ नहि करैत रहल असहाय होएक अलाप आकि बिलाप || - आनन्द कुमार झा, मेंहथ, झंझारपुर - 847404 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विष्णुकान्त मिश्र ३ टा पद्य १ बालबोध शिशुक नाल कटला सन्ता, माइक गर्भसॅ कोर अबै अछि। अनुश्रवण तखनहि माइक क', नित - नित आगाॅ भगैत रहै अछि।। वस्तु चिन्हाएब संकेतसॅ ल'क', बोली फोड़ब हुनकर काज। उमेरमे किछु आगाॅ बढ़ि, नकल करय ओ माइक बात।। बोली- आचरण जेहन हो सुनकर, ओकर पड़ै छै अमिट छाप। बाजि- बाजि क' जे सिखबै छथि, भ' जाइत अति मोहर छाप।। वातावरणमे जेहन रखै छथि ओकरा , तदनुकूले जड़ि बनै छै। बाल्यावस्था थिक नींव जिनगीक, आगाॅ बढ़ि तेहने गाछ अबै छै।। सुन्दर फूल,मीठफलक डारिसॅ, स्वयं अपन ओ ध्वज फहराबय। भनहि 'विसुन' कुम्भकारिन बनि ओ अपन कलाके जंग दरशाबय।। बालबोधक सरस्वती बनि, रहैत छथि सतत ओ ठाढ़ि। कुबुद्धि - सुबुद्धि दायिनी छथि ओ, ओहने ज्ञानक आबय बाढ़ि।। २ सामा - चकेबा नारी जातिक मुख्य पावनि अछि, माय -बहिनक प्रेमक गान। छठिक खरनासॅ प्रारम्भ होइत अछि, पूर्णिमा राति होइछ भसान।। बहिनलोकनि बड़ जतनसॅ बनबथि, माटिक सामा, चकेबा,चुगला।। माय -बहिन बीच फूट करबैमे , चालि चलय ओ सभटा दोगला।। बृन्दावन , लड़ुबेचनी, भरिआ , संगहि झाॅझी कुकुर बनाबथि । सभ राति क ' सखी-बहिनपासंग , मुदित मन भायक गीतों गाबथि ।। पूर्णिमा रात्रि सभ अॅगने-अॅगने, गोसाउनिलग भायसॅ सामा फोड़बाबथि। साॅची खूटपर नवका चूड़ा द ', गूड़क संग सिया जुड़ाबथि।। चॅगेरामे मूरुत सहित जरबैत दीप, भगवती ल 'गसॅ गीत गबैत। नहु -नहु डेग चलि क' आॅगनसॅ बाटपर सखीसॅ मिलन करैत।। जोतल खेत में जा' एक - दोसरासंग, सामा - चकेबाक आदान - प्रदानकरैछ। चुगिलाके डाहि -पजारि ठामहि, समदाओन गबैत आॅगन अबैछ।। कतयगेली ओ मिथिलानी सभ , एकरा बना देलनि इतिहास। सीता स्वर्गसॅ नोर खसाबथि, देखि एंकर एहन उपहास।। 'विष्णु' कर जोड़ि निवेदन करैछ, नीक परम्पराके नहि त्यागू। चिक्का -दरबड़क एहि दौड़ते, अहूॅएना निछोहे नहि भागू।। ३ अनुत्तरित प्रश्न मिथिलाक नारी कतहु रहथि, संस्कार अपन सर्वत्र चमकाबथि। आदि शक्ति वा प्रकृति कहीं , ब्रह्मक कल्पना छथि दरशाबथि ।। की अपन माटिक गौरवके , मिटि मिलाया मटिआए देती ? वा एकरा सीताक चानन बूझि , अपार अपन सटोने रहती ? पुरुषसॅ उच्च स्थान नारी के की हुनकासॅ नहि खानदान बनैछ ? मिथिला, मैथिल, मैथिलीक प्रति, की मनमे नहि श्रद्धा रहैछ ? की मैथिलीक कुहरवपर कान नहि , वा तूर - तेल ल ' बहिर बनती ? संतान में मिथिलाक संस्कार आनि वा पाश्चात्य संस्कारॅ धराके पटती ? हुनकहि हाथ मिथिलाक पाग छै, की ओकरा ओ खसय देती? वा फाॅड़ बान्हि रण चण्डी बनि, खसैत पागमाथपर रखती? ज्ञान - संस्कृतिक अमर कोश के, की पच्छिमक हिटलर लुटिते रहतै,? वा नारी समूह मिथिलाक दुर्गा बनि, समुद्र जाय हिटलर के भसेतै? करथि प्रश्न 'विसुन 'नारीसॅ, की मिथिलाक अधोगति होइते रहतै ? वा शपत लेब संस्कारक खातिर, जंतर छलै ओतहि जयतै ।। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रदीप पुष्प २ टा गजल १ नव सूर्य नव बिहान धरि चल मीत छौ दम त' आसमान धरि चल मीत पी नोर ई घटोसि ले तूँ दुःख हिम्मत बढ़ा निदान धरि चल मीत जिनगी बसै कतेक कष्टक बीच कसि डाँढ़ तूँ बलान धरि चल मीत जै ठाम भोज होइ टिकुलाकेर गाछीक तै मचान धरि चल मीत लिलसा जँ छौ विकास मिथिलाकेर पिछड़ल ख'गल दलान धरि चल मीत -©प्रदीप पुष्प (2212 1212 221 सब पांतिमे) २ स्वप्नक सिंदूरी आकाशमे हम छियौ कि नै कोनो बिसरल गीतक भासमे हम छियौ कि नै हम छी बरु बनिजारा डीह नै छै हमर मुदा तोहर अतमाके रनिबासमे हम छियौ कि नै जीवन कतबो रौदीमे बितै आ कि शीतमे ओ मुस्की सानल मधुमासमे हम छियौ कि नै छै सच नै छी तोहर आब हम वर्तमानमे बस ई कहि दे इतिहासमे हम छियौ कि नै बूझल अछि बिसरल छें नाम 'पुष्प'के मुदा तोहर असगरुआ अखियासमे हम छियौ कि नै -©प्रदीप पुष्प (22 222 221 22 12 12 सब पांतिमे) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार    अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल     CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी                         माहुर                          करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका)       डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/  (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta           97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७  (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]  तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]  तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। ३ विदेह अपन आगामी अंक (२०२१ क प्रारम्भमे) श्री रामलोचन ठाकुर पर विशेषांक निकालबाक नेयार केने अछि। हुनका सम्बन्धी रचना आमंत्रित अछि (संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा आदि) जे ३१ दिसम्बर २०२० धरि editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाओल जा सकैत अछि। विदेह पेटारक अन्तर्गत (पोथी डाउनलोड साइट) मे http://www.videha.co.in/new_page_15.htm  हुनकर मौलिक, अनूदित आ सम्पादित रचना फ्री पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2020 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३११ म अंक ०१ दिसम्बर २०२० (वर्ष १३ मास १५६ अंक ३११)

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