विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३१२ म अंक १५ दिसम्बर २०२० (वर्ष १३ मास १५६ अंक ३१२) ऐ अंकमे अछि:- १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- ५म खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१२म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (५म खेप) २.४.नन्द विलास राय-बरबैरेपर छी २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-झूठक झालि २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-गणतंत्र २.७.आशीष अनचिन्हार-एकटा "मैथिली गजल" जे बदलि देलकै 'मैथिली गीत-संगीतक' इतिहास २.८.ज्ञानवर्द्धन कंठ- मोबाइलक रुटीन २.९.मुन्नाजी- लघुकथा- बीचला लोक २.१०.जवाहर लाल कश्यप- स्ट्रेश बस्टर ३. पद्य ३.१.नबोनारायण मिश्र- ई कीर्तिमान बनल ३.२.आनन्द कुमार झा- मात्सर्य ३.३. विजय इस्सर ’वत्स’- अपराधी छी हम ३.४.रमन कुमार झा-रूसा-फुली (भगवती वंदना) ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.ममता कर्ण- उपराग ४.२.कंचन कंठ- हमर नानीगाम ४.३.सविता 'सुमन'- स्त्री ४.४.सुचिता कुमारी- पोतीक बियाह ४.५.अनुपम रैना- यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज ४.६.अनुपम रैना- यात्रीक गद्य-साहित्यमे मिथिला समाज Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU इग्नू BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1 [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2 (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3 (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4 (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13 (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17 (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS ........................................................................................................................ OTHER OPTIONALS ........................................................................................................................ IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- ५म खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१२म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (५म खेप) २.४.नन्द विलास राय-बरबैरेपर छी २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-झूठक झालि २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-गणतंत्र २.७.आशीष अनचिन्हार-एकटा "मैथिली गजल" जे बदलि देलकै 'मैथिली गीत-संगीतक' इतिहास २.८.ज्ञानवर्द्धन कंठ- मोबाइलक रुटीन २.९.मुन्नाजी- लघुकथा- बीचला लोक २.१०.जवाहर लाल कश्यप- स्ट्रेश बस्टर योगेन्द्र पाठक वियोगी (सम्पर्क- 9831037532) नरक विजय (एहि नाटकक एक संस्करण हमर पोथी ‘त्रिनाटकम्’ मे छपि गेल अछि। ओहि मे दृश्यक संख्या बहुत बेसी रहला सँ किछु निर्देशक लोकनि एकर मंचन पर प्रश्न चिन्ह लगौलनि। ओहि आलोचना कें ध्यान मे रखैत एकरा परिवर्धित कएल गेल। एकर बंगला अनुवाद श्री नवीन चौधरी केलनि अछि।- नाटककार) पात्र परिचय मानव पात्र — रमेश, सुरेश, अनुपम अमित (वैज्ञानिक) पौराणिक पात्र — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, यमराज, चित्रगुप्त, दू यमदूत अंक 1 दृश्य 5 स्थान मर्त्यलोक मे बाहुबली रमेश आ सुरेशक मृत्युस्थल। मंच सज्जा ओहिना, कुर्सी टेबुल अछिए, डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड स्विच-ऑफ अछि। दूनू यमदूत कुर्सी पर बैसि टेबुल पर पएर पसारि मोबाइल मे कोनो सिनेमा देखबा मे तल्लीन छथि जे हुनका रमेश आ सुरेश देलकनि। दूनू बाहुबली मृतात्मा मंच सँ गाएब छथि। हड़बड़ाएल यमराजक प्रवेश। यमदूत लोकनि यमराज कें नहि देखैत छथि। यमराज (डँटबाक मुद्रा मे जोर सँ बजैत) की देखबा मे तल्लीन छी यौ दूत लोकनि ? (दूनू दूत चौंकि जाइत छथि, जल्दी जल्दी मोबाइल कें नुकेबाक चेष्टा करैत छथि मुदा यमराज मोबाइल छीन लैत छथिन आ स्वयं देखऽ लगैत छथि। कने हटि कए, स्वतः) अद्भुत वस्तु अछि ई। एतबेटा डिब्बा मे कोना एतेकटा मनुक्ख घुसिया गेल छैक आ बन्दे रहैत कोना नाचियो गाबि लैत छैक ? आश्चर्य। (लग आबि प्रकट) ई की देखि रहल छलहुँ अहाँ सब ? छिः छिः, कतऽ भेटल ई ? (दूनू यमदूत मूड़ी झुकेने चुपे ठाढ़ रहैत छथि) यमराज (आर जोर सँ बाजि खिसिआइत) चुप किएक छी ? बजै किएक नहि छी ? मर्त्यलोकक एहन अधलाह वस्तु अहाँ सब कें छुबाक साहस कोना भेल ? बूझल नहि छल जे एतए मृतात्मा कें छोड़ि आर कोनो वस्तु छूनाइ वर्जित छैक ? दूत एक (मूड़ी नीचा झुकौने, कान पकड़ैत) गलती भऽ गेल धर्मराज। दूत दू (कान पकड़ैत) पहिल बेर ई दूनू मृतात्मा कें लऽ जेबा मे देरी भेल आ एकरे दूनूक कारण ईहो गलती भेल सूर्यपुत्र। क्षमा कएल जाओ। दूत एक अपनेकें देरी भऽ रहल छल तऽ समय बितबैक लेल ई यंत्र ओ दूनू मृतात्मा हमरा दूनू कें देलनि। एहन गलती फेर कहियो नहि होएत से वचन दैत छी। अपने कें काज भऽ गेल ? यमराज काज भऽ गेल, मुदा अहाँ सब ओहि दूनू मृतात्मा कें कतऽ भगा देलियै ? दूत दू एतहि अछि ओ दूनू (मृतात्मा कें मंच पर चारू कात तकैत छथि, नहि देखि दूनू दूत चिन्तित होइत छथि, एक दोसराक मुह तकैत छथि) यमराज मुह की तकैत छी, भागि गेल ओ सब। भेल बखेरा, आब समूचा धरती पर ओकरा सब कें तकैत फिरू। (तखने ब्रीफकेस लेने रमेश आ सुरेशक प्रवेश) रमेश (ब्रीफकेस रखैत) एतहि छी धर्मराज। सुरेश (ब्रीफकेस रखैत) हम सब अपनेक संग यमलोक यात्राक लेल तैयार छी। यमराज (निःश्वास छोड़ैत, स्वतः) हऽ, पैघ झंझट सँ बचलहुँ। (प्रकट) आब विलम्ब की? चलैत चलू। रमेश बस, अन्तिम बेर कने आहे माहे सुना दी, यमलोक मे फेर अवसर नहिए भेटत। सुरेश अपने हमरा दूनू पर बहुत कृपा केलिऐ धर्मराज, स्वयं आबि गेलियै आ ब्रीफकेस संगें लऽ जेबाक अनुमति सेहो दऽ देलियै, एहि लेल हम सब कोटि जिनगी पर्यन्त अपनेक अनुगृहीत रहब। रमेश हमरा सबकें ई जानि बहुत दुख होइत अछि सूर्यपुत्र जे धरती पर कतहु कियो भक्तिभाव सँ अपनेक पूजा नहि करैत अछि। अपने सन धर्मात्माक पूजा हेबाके चाही। आन देवताक मन्दिर सब गामे गाम टोले टोल आ अपनेक मन्दिर तकबा लेल गूगल सर्च करए पड़ैत छैक। यमराज हमरा अपन काज सँ मतलब अछि, पूजा अर्चनाक चिन्ता हमरा नहि अछि। रमेश ई अपनेक महानता भेल धर्मराज मुदा सोचियौ ई भेदभाव किएक ? अपने यमलोकक एतेक पैघ साम्राज्यक देखभाल करैत छिऐक, अपनेक संग जे चित्रगुप्त रहैत छथि हुनको पूजा लेल वर्ष मे एक दिन निश्चित कएल छनि, तखन मात्र अपने किएक छूटल रहैत छी ? अपनेक पूजा तs सब देवताक संग हेबाक चाही सूर्यपुत्र। सुरेश जरूर एहि मे देवलोकक कोनो चक्रचालि छैक। हम तऽ कहब जे अपने देवता सब कें एक बेर हड़तालक नोटिस पठा दियनु जे यमलोकक सब काज अनिश्चित काल लेल बन्द भऽ जाएत। अपनहि सब लाइन पर आबि जेताह। यमराज यमलोकक काज बन्द कऽ देबैक ? ई की बाजि रहल छी अहाँ ? रमेश काज बन्द नहि करबैक, बन्द करबाक धमकीएटा देबाक अछि देव, हमरा विश्वास अछि जे हड़तालक नोटिस भेटला पर देवलोक मे हड़कम्प मचि जेतैक आ सब अपनेक बात मानबा लेल बाध्य भऽ जेताह। सुरेश हमरा सब कें जे कहबाक छल से कहि देलहुँ देव, यदि किछु अनुचित बजा गेल हो तऽ माफ कऽ देबैक। आब अपने रस्ता देखबियौ, हम सब यात्रा लेल तैयार छी। रमेश (दूनू यमदूत कें सम्बोधित करैत) ब्रीफकेस उठा ने लएह, तकैत की छह ? दर्शक दिस घूमि कए दूनू कोरस मे एकटा समदाओन गबैत छथि जाहि मे अपन कएल समस्त अपराधक लेल जनता सँ माफी मँगैत छथि। बर रे कुदिन मे जनम हम लेलियै, पढ़ि लीखि भेलियै जवान चाकरी के फेरा मे नेता के संग धेलियै, बनि गेलियै राकस हेवान माए बापक सपना समाजक मनोरथ, माटि मे देलियै मिलाए पापक जड़ि ओहि नेता सबकें मारि कए, लेलियै यम कें बजाए चलै छी हम यमदेश सब कें कना कए, कएल बहुत संहार एहन अधम हम माफी कोना मँगबै, करबै अहीं सब विचार, करबै …. (गबैत गबैत दूनू कानए लगैत छथि, पर्दा खसैत अछि, तखने नेपथ्य मे आगि लागि जेबाक हल्ला होइत अछि। लोक सबहक भाग-दौड़ आ अग्निशमन गाड़ीक हूटर के आवाज सुनाइ पड़ैत अछि। आगिक बारे मे दू व्यक्ति द्वारा घोषणा होइत अछि – एक बहुत दुखद खबरि अछि जे वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला आ राष्ट्रीय संग्रहालय मे आगि लागि गेल। ई आगि एहन समय मे लागल जखन वैज्ञानिक अनुपम अन्य ब्रह्माण्ड जेबाक तैयारी मे लागल छलाह। तीनटा वैज्ञानिकक प्रायः तीन मासक प्रयास सँ अन्य ब्रह्माण्ड जाए बला विशेष विमान तैयार कएल गेल छल। दू वैज्ञानिक अनुपम प्रेस वार्ता मे बतौलनि जे आगि सँ भेल क्षतिक आकलन करबा मे समय लागत। आगि कोनो शत्रु द्वारा लगाओल गेल छल। राडारक आँकड़ा कें नीक जकाँ छानबीन केला सँ शत्रुक पता लागि जेबाक सम्भावना अछि मुदा राष्ट्रीय सुरक्षा नीति कें देखैत शत्रुक परिचय गुप्ते राखल जाएत। प्रथम अंक समाप्त (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर लजकोटर (प्रवासीक जीवनपर आधारित) -12- लता पुछलक -"अखबारमे अहाँघरक आस-पासअगिलग्गीक समाचारछपल अछि ।तेँ चिंता भेल जे बात की छैक ?" "सही बात छैक । रातिभरि जागले छी ।सामनेमे एकटाघरमे गैसक सीलींडर फाटि गेलैक ।" "ओ! ई तँ बहुत गड़बड़ भेलैक।“ “अहाँ ठीक छी ने? " रातिभरिजगलेछी, तेँ कनी सुस्त छी ।" "हम तँअहाँक बाट तकैत रही,संगे सरोजिनीनगर बाजार जेबाक सोचैत रही ।" "कखन?" "हम तँ तैयेार छी ।" "कोनो बात नहि । हमसोझे ओतहि पहुँचि रहल छी ।"-से सुनि लता प्रशन्न भए गेलि । हम जलदीसँ तैयेार भेलहुँ आ सरोजिनीनगरक बसमे बैसि गेलहुँ ।कनीकालक बादहम सरोजिनीनगर बसस्टापपर उतरिते रही कि ओतहि लता भेटि गेलि। ओकरा देखितहि करेंट जकाँ लागल ।" सरोजिनीनगर बसस्टापपर लता अपन कारकेँ ठाढ़ कए हमर प्रतीक्षा कए रहल छलि । हमरा बससँ उतरैत देखितहि ओ हमरा कारमे बैसबाक हेतु इसारा केलथि ।हम ओकर कारमे बैसि गेलहुँ। लता अपने कार चला रहल छलि ।कार बजार दिस जेबाक बजाए नेहरूपार्क दिस बढ़िगेल । हमसभ नेहरुपार्क दिस बढ़ि रहल छलहुँ कि सामनेसँ विजयक जीप आएल । ओहिमे मालती बैसल छलीह । मालती हमरा देखलक कि नहि मुदा हम तँ ओकरा नीकसँदेखलिऐक आ चिन्हबो केलिऐक । विजय लताकेँ देखि कए परेसान जकाँ छल।हमहु ओकरे कातमे बैसल रही । हमरो ओ देखिनहि होएत । मुदा किओ किछु नहि बाजि सकल आ हमसभ आगू बढ़ि गेलहुँ। विजयक असलीरूप कमे लोक जनैतछल । कहि नहि मालती कोना ओकरा संगे फँसिगेलि मुदा आब तँ ओ पूर्णतः ओकर चांगुरमे छलि । उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू। हमरो ओकरा बारेमे बेसी नहि बूझल छल। मुदा ओकर असली खीस्सा तँ लता कहलक । नेहरूपार्कमे ओहिदिन हमसभ बैसल रही । तरह-तरहक गप्प-सप्प होइत छल। गामसँ दिल्ली आएल रही आ आब घुरि जेबाक सभटा रस्ता बंद भए गेल छल । आ एहिठाम तरह-तरहक लीलासभ भए रहल छल । से सभ हम देखि रहल छलहुँ । किछु इच्छासँ, किछु नियतिवश । लता माता-पिताक एसगरि संतान छलि । मैथिलीमे खुब नीक गप्प कए लैत छलि । ओकरासँ गप्प कए किओ नहि कहि सकैत छलि जे ओ बाइस सालसँ लगातार दिल्लिएमे रहि रहल अछि । ऐहीठाम जन्मल.बढ़ल,आ संपूर्ण शिक्षा प्राप्त केलक आ कइए रहल छलि । फिलहाल ओ एमएमे पढ़ि रहल छलि । कहि नहि ओकरा हमरामे की देखेलैक जे एतेक नीक लागि गेलिऐक ।नीक ओ हमरो लागि रहल अछि मुदा ताहिसँ की ? हमरा अपन औकात पता अछि,हम ई बात ओकरा कए बेर बुझेबाक प्रयासो करैत छी मुदा ओ जोरसँ हँसि कए टाड़ि दए दैत अछि । संभवतः ओकरा इसकूल-कालेजसँ बाहरक दुनियाँक जानकारी नहि भेलैक अछि। ओकर पिता दिल्लीसन महानगरमे प्रतिष्ठित अधिकारी छथि । घरोक सुखी,संपन्न अछि । तकरा आगू हमर की गणना अछि? हम इएस सभ सोचि-सोचि कै बेर परेसान भए जाइत छी । " अहाँ सदरिकाल की सोचैत रहैत छी?" हमरा जेना भक टुटि गेल। हम कहलिऐक- "किछु नहि?" " हमरा ठकबाक प्रयास कए रहल छी?" "सही बात कहिओ कए की होएत?" "मुदा गुमसुम रहलोसँ तँ किछु फएदा नहि छैक । अहाँ सदरिकाल परेसान रहैत छी । गप्प-सप्पमे मोन नहि लगैत अछि। एनामे तँ अहाँ दुखित पड़ि जाएब ।" " हम जँ दुखितो पड़िए जाएब तँ ककर की बिगड़तैक? माए छलि जे सोचि सकैत छलि सेहो गुजरि गेल। " "एना किओ बाजए ।समय सभदिन एकहि नहि रहैत छैक । अहाँमे बहुतरास गुण अछि। ई महानगर छैक । एतए किओ अपन प्रतिभाक अनुसार अपन स्थान बना सकैत अछि।" " सएह सोचि कए तँ एहिठाम अएलहुँ मुदा ढ़ाकक तीन पात । जएह काज शुरु करैत छी, ओहीमे अठबज्जर लागि जाइत अछि ।बिना काज-धंधाकेँ एहि महानगरमे किओ कतेकदिनटिकत?" " से बात सही छैक । हम अहाँक चिंताक समाधान कए देने छी ।" "की केने छी?" "काल्हिसँ अहाँ हमर कंपनीमे मैनेजरक काज करब।हमरेसभक घरक बामाकातमे जे खाली कोठरी अछि से अहाँक रहत । " "हमरा विश्वास नहि भए रहल अछि । कहीं अहाँक पिता ई सभ सुनि लेताह तँ पता नहि की सँ की होएत? " "हम सभटा गप्प हुनकासँ पहिनहि कए लेने छी । सएह कहए लेल हम आइ बजओने रही मुदा अहाँ झंझटमे रही तैँ हमही आबि गेलहुँ " "जौँ ई सही अछि तँ हम काल्हिसँ अवश्य काज करब ।" लताक मुँहे ई सभ सुनि विश्वासे नहि होइत छल । लगैत छल जेना दिनेमे सपना देखि रहल छी । रहि-रहि कए मोनमे चिंता होइत छल । मुदा ई संसारचमत्कारसँ भरल अछि । की पता हमर भाग्यमे किछु नीके हेबाक होइ । “अखनोअहाँके प्रशन्न नहि देखि रहल छी?"- लता बजलीह। "नहि, नहि से बात नहि छैक?" "तखन की बात छैक?" हम किछु नहि बाजि सकलहुँ । कहबे की करितिऐक? मोनमे किशुनक गप्पसभ घुमि रहल छल । झलफल भए रहल छल । "आब चलक चाही।-ओ बाजलि । हम दुनूगोटे उठि बैसलहुँ । पीठमे सौंसे घास-फूस लागि गेल छल। से सभझाड़ि कए बिदा भेलहुँ । लता हमरा घरधरि कारसँ छोड़एचाहैत रहथि मुदा हमही मना कए देलिऐक । जाइत-जाइत लता हमरा दिस तेना तकैत रहथि जे हम किछुकाल अस्थिपिंजर भए गेलहुँ । बहुत मोसकिलसँ आगा बढ़ि सकलहुँ । सामने बसस्टैंड छल । तुरंते बस आएल । कहुना कए धक्कमधुक्का करैत बसमे चढ़लहुँ । जाबे बस आगू नहि बढ़ि गेल, लता हमरा दिस तकैत रहलि। रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस : ६६ बर्ख, पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह, मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवा निवृत्त), शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक प्रकाशित कृति : मैथिलीमे:- १. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा), २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग), ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास)१२.स्वप्नलोक(उपन्यास)१३.शंखनाद(उपन्यास)१४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) In English:- 1.The Lost House (Collection of short stories), 2.Life is an art हिन्दी में – १.न्याय की गुहार(उपन्यास) (उपरोक्त पोथीसभ pothi.com, amazon.com आओर www.flipkart.com पर सँ कीनल जा सकैत अछि) इमेल : mishrarn@gmail.com ब्लोग : mishrarn.blogspot.com एमजोनक लेखक पृष्ठ : amazon.com/author/rnmishra ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल आमक गाछी (धारावाहिक उपन्यास) 5. 19 जून,शनिदिन,छह बजे साँझमे रामलखन ऑफिससँ अबिते पत्नीकेँ कहलैन- “चारि बजे भोरुका बस पकैड़ काल्हि प्रेमनगर चलैक अछि, तँए सभ ओरियान आइये करि लअ।” ‘सभ ओरियान’सुनि सुवासिनीक मन विस्मित भऽ गेलैन। बारह बर्खक पछाइत नैहर जाएब, छुच्छे हाथे केना जाएब? चारि भाए-बहिनक बीच सुवासिनी एकमात्र माझिल बहिन। सुवासिनीसँ जेठ हरिनाथ, साझिल- दीनानाथ आ छोट- श्याम। हरिनाथ आ दीनानाथअपन-अपन पत्नी आ बाल-बच्चाक संग बंगलोरमे रहै छैथआ श्याम गाममे रहै छैथ। तीनू भॉंइ बी.ए. पास केने छैथ। पितेक अमलदारीमे हरिनाथो आ दीनानाथो नोकरी करए बंगलोर चलि गेला, जे पिताकेँ मुइला पछाइत दुनू भॉंइ अपन-अपन परिवारोकेँ[i]ओतइ लऽ गेला। बंगलोरेमे दुनू अपन-अपन मकान कीनि रहै छैथ। दस बीघा जमीनबला किसान परिवार राधारमणक छेलैन। गामक नीक ‘किसान परिवार’मे राधारमणक परिवारक गिनती छेलैन। जहिना अन्नक खेती करै छला,अन्न उपजबै छला तहिना गाछी-कलमक संग दस कट्ठा बँसवारियो छेलैन। तैसंग दूटा महींस सेहो पोसैत रहला। राधारमणजखन पचास बर्खक वयस पार कए रहल छला तही समयमेछोट बेटा सेहो बी.ए. पास कऽ नेने रहैन। ओना, श्याम बच्चेसँ घरक काजमे, खेती-गिरहस्तीमेपिताकेँ बॉंहि पुरए लागल छेलैन।जइसँ गिरहस्तीक सभ लूरि-बुधि श्यामकेँ भइये गेल छल। दुनू परानी राधारमण अपन सेवाक संग समाजक बीच परिवारक समाजिकताकेँ जीवित रखैक खियालसँ सेहो सोचि-विचारि श्यामकेँ कहलैन- “बौआ, जेठ दुनू भॉंइ तँ परदेशी भऽ गेलह। तोहू जँ नोकरी करए बाहर चलि जेबह तखन तँ परिवारक संग समाज धरिक सभ किछु बिलैट जेतह। ने अपन ठौर-ठेकान रहतह आ ने परिवारेक..!” पतिक विचारक सह पेब बुधनी सेहो अपन माइक ममत्त बुझबैत श्यामकेँ कहली- “बौआ, भगवान चारिटा सन्तान कोखिमे देलैन तँए ने, जँ एक्केटा देने रहितैथ वा चारिमे तीन मरिये गेल रहैत वा नोकरीए-चाकरी करए परदेश चलिगेल रहैत तखन परिवार..!” बी.ए. पास श्यामक मनमे माइयक विचार चोट केलक।परिवारक भविसक संग अपनो भविसपर नजैर पड़लै। एकाएक श्याम तिलमिलाएलगल। तिलमिलाइत श्यामक देह सिहरएलगलै। सिहैरते अनायास मुहसँ फुटलै- “माए..!” बेटाक मुहसँ ‘माए’ सुनि राधारमणक मनमे सेहो पितृ विचार जगलैन। पितृ विचार जगिते राधारमणक मन नाचि उठलैन। नाचि ई उठलैन जे घटना-दुर्घटना भेलापर कियो भगवानक नाम थोड़े लइए, लइ तँ अछि माइये-बापक नाम। माए गइ माए..,बाप रौ बाप..! वएह माए-बाप ने ओकरपारो-घाट लगबै छइ। भरिसक श्याम ओही सीमापर पहुँच गेल अछि। तँए जइ सीमापर अखन श्याम पहुँचल अछि ओही सीमाक इर्द-गीर्दक विचार ने ओकर कल्याणो करत। एहेन तँ नहि जे कियो हेराएल अछि कलकत्ताक चौरंगी चौकपर, जे आगू बाट हमर कोन छी।मुदा ओकरा से नहि देखा देखबए लगबै गाम-घरक बाट, तखन तँ भेल..! ओकरा तँ चौरंगीए चौकक रस्ता देखौलासँ ने काज चलत...। राधारमण श्यामकेँ प्रवोधैत बजला- “बौआ, जे बात माए कहलखुन ओ हुनकेटा विचार नहि, दुनियॉंक विचार छी। दुनियॉं जनैए जे बाल-बच्चाक जीवनदान जहिना माता-पिता करै छैथ तहिना ने वृद्ध माता-पिताक जीवनदान सन्तानोक कर्तव्य भेबे कएल।” पिताक भावनाकेँ अपन भावमे मिला भावावेश होइत श्याम बाजल- “एकरा के नकाइर सकैए।” श्यामक विचार सुनिते राधारमणक मनमे उठलैन- श्रवण कुमार जकाँ श्याम भार उठबैले कन्हा अरोपि देलक!एकाएक राधारमणक मन पसिज गेलैन। पसिजते मन कहलकैन- एकरो तँ अपन परिवारक संग समाजक बीच जीवन जीबाक छै तँएओहन जीवनधाराक खगता तँएकरो छइहे जइसँ हँसैत-खेलैत, हेलैत-डुमैत ईहो अपन जीवनक धार पार करए। मुदातइले तँ सुबुधिक संग सुकृत्तिक्रिया अपनबैक जरूरत छइ। माने, सुबुधिक संग सुकृत्तिकर्तव्य जँ अपनाएत तखने से सम्भव हेतइ। ओना, जीवनक लेल जे जे उपयोगी अछि ओइ सभ कथुक अपन महत् तँ होइते छै,मुदा जीवनानुकूल अपन कर्तव्य बनाएब तँ बेसी महत् रखैत अछि। जँ से नहि बनौल जाएत आ लकीरक फकीर बनि खाली चलैक परियास हएत तखन तँ केतौ-ने-केतौ समाजिक परिवेशक संग टकराउ हेबे करतै..!मने-मन सोचि-विचारि राधारमण सामंजस करैत श्यामकेँ कहलैन- “बौआ!दुनियॉंमे जहिना ने सभ कुछ नीके अछितहिना सभ किछु अधलो नहियेँ अछि। ओही नीक-अधलाक बीच असंख्य जीव-जन्तुक संग अरबो-अरब मनुखो अछिए। तँए, जीवन जीबैले जेहेन कर्तव्यक खगता अछि बस ओतबे अपनाकऽ चलैक अछि। अनेरे लोक अपन बुधिक पाछू तबाह भेल रहैए।” ओना, राधारमण झॉंपि-तोपि कऽ बजला मुदा नव चेतनसँ युक्त चेतल श्याम पिताक सभ बातकेँ मने-मन बुझि चुप रहल। पिताक विचारकेँ आदर्श आदेश मानि प्रतिउत्तर किछु ने दऽ बस एतबे बाजल- “अहाँ जे आदेश करब ओ शिरोधार्य अछि।” श्याम गामेमे रहब स्वीकार करैत नोकरी-चाकरीक भॉंजमे नइ पड़ल। ओना, कौलेजे जीवनमे श्याम अन्दाज कऽ नेने छल जे नोकरी-चाकरी स्वतंत्र जिनगी जीबैमे बाधा उपस्थित कइये सकैए। मुदा समाजक बहैत तुफानी धारमे दबि कऽ जे श्यामक विचार पातर-छीतर बेगवत स्थितिमे छल ओ पिताक आसिरवचन सुनि नव जागरणक रूपमे ठाढ़ होइक परियास करए लगल। चाह पीला पछाइत रामलखन पत्नीकेँ कहला- “प्रेमनगर अहाँक नैहर छी, ऐठाम जहिना अहाँकेँ माए-बाप, दिअर-ननैद, पित्ती-पितिआइन इत्यादि सभ बनल बनाएल बनौआ भेटल तहिना हमरो नेअपन सासुरमे भेटल छैथ।तँए,ओइठाम हमर कोनो जुति-बुधि नहि,सोल्होअना जुति-बुधि अहींक भेल।अहाँकेँ जे विचार हुअएसएह करब। अखने चलू बजारक काज समटैत बसक टिकट सेहो कटा लेब।” पतिक बात सुनि सुवासिनी मने-मन विचारए लगली,आइ जँ माता-पिता रहितैथ तँ लत्तो-कपड़ा आ खाइले तसमैये आकि हलुए बना कऽ नेने जइतौं, मुदा से तँ रहला नहि। भाए-भौजाइ तँ अखन अपने जुआन-जहान अछि, नैहरक सभ किछु दइये देने छिऐ। हँ! तीनटा जे बाल-बच्चा छै तेकरा सभ-ले लत्ता-कपड़ा आ थोड़ेक मिठाइयो जरूरकीन लेब...। मने-मन विचारैत सुवासिनीक मुहसँ किछु ने निकललैन। बिच्चेमे जगमोही बाजल- “बाबू, मामाक तीनू बच्चा स्कूल जाइए तँए तीनू ले कपड़ो-लत्ता आ महिना दिन जे रहब आ पढ़ेबै-लिखेबै तइले किताबो-कॉपी आ कलमो कीनि कऽ नेने जेबइ।” जगमोहीक विचारपर रामलखन सोल्होअना सहमत भऽ सभ कियो बजार दिस विदा भेला। बजारक काज सम्हारि, बसक टिकट कटबैत डेरासँ बस स्टेण्ड पहुँचबैले टेम्पू सेहो ठीक कऽ लेलैन। बजारसँ घुमतीकाल रस्तेमे सबहक विचार भेलैन जे चारि बजे भोरमे बस खुजत, तँए दू बजे रातिमे बिछान छोड़ि अपन तैयारीक पाछू सभ कियो लगि जाएब। तैयारो होइमे समय लगिते अछि। अपन नित्यकर्मक संग चीज-बौस सम्हारब इत्यादि बहुत रास काज अछि। तेतबे नहि, बिनु खेने-पीने डेरासँ केना निकलब। जखन अनके पएरे जाएब,माने बससँ, तखन ओकर कोन ठेकान अछि। जँ कोनो पॉंतरमे किछु भऽ गेलै तखन ओतए एक घोंट पानियोँ के देत? आठ घन्टाक बसक रस्ता अछि, तँए ओतेकालक अपन जीवन अपने हाथमे ने सम्हारि कऽ रखैक अछि। साढ़े तीन बजे टेम्पूबला आबि डेराक आगूमे हॉरन देलक। सभ कियो सभ किछु सम्हारि तैयारे छला। अनायास रामलखनक देहक पानिमे[ii] खूब तेजी आबि गेल छेलैन।आसे नव-विवाहित जमाए जकाँ नहि, एक जवाबदेह अभिभावक जकाँ। रामलखन अपन दायित्व जनै छला जे घरसँ बाहर जा रहल छी, बाट-घाटक जे स्थिति अछि तइमे सजगता जरूरी अछिए...।ओना, बसोक यात्रा बसेक यात्रा छी, कियो निचेनसँ टी.भी.क गीत-सीनेमा देखैत-सुनैत चलैए तँ कियो लोहा-लक्कड़सँ बनल गाड़ीक माध्यमसँ चलैत अपन सतर्कतापर नजैर राखि यात्रा करैए। मुदा जेते देखा-देखी दुनियॉं चलैएतेतेसीखा-सीखी थोड़े चलैए जे देखी-सीखी करैत लोक यात्रा करत। संजोग नीक बनल। जहिना कार्यक्रमक नक्शा रामलखन बनौने छला, तहिना साढ़े तीन बजे अन्हारमे डेरासँ निकैल प्रेमनगरक लेल सभ प्राणी विदा भेला। ओना, मोबाइलिक जुग भेने सुवासिनीक भाए- श्यामेक परिवारटा मे नहिबल्किश्यामक दियाद-बादआटोल-पड़ोसमे सेहो सुवासिनी सभ परिवारकेँ अबैक जानकारी भइये गेल छल। नव लोकक आगवानीक जानकारी भेने जहिना अँगना-घरक ओरियान घरवाली करै छैथतहिना दुआर-दरबज्जाक घरबला सेहो कइये लइ छैथ। बसक जानकारी सेहो प्रेमनगरबलाकेँ छैन्हे जे साढ़े एगारह बजेसँ पहिने बस नहियेँ औत, पछाइत जखन आबए। ओना, प्रेमनगरक अधिकांश लोक एगारहे बजेसँ अपन कान ठाढ़ कऽ नेने छल,किएक तँ सभ बसक हॉरन सभकेँ अकानल छइहे। अखन धरि सुवासिनीक नैहर आगमनक समाचार बेकता-बेकती, काने-कानदियादोवाद आ टोलो-पड़ोसमे छल। मुदा दस बजेमे जखन राधा दादी, सीता दीदी, शुभनी भौजी आ दुखनी काकी घास छिल कऽ पोखैर-महार परहकपीपरक गाछतर बैस सुवासिनीक आगमनक गप-सप्प करए लगली तखनसँ ओ समाजिक रूपमेबदलए लगल।जेठुआ रौदसँ रौदाएल चारू गोरे पीपरक गाछतर आबि सुसता रहल छेली। ओना, बाधेसँ चारू गोरे धरियाएलरहैथमुदा रौद आ उम्मससँ घामक पानि जे मुहमे पड़ैन से मन नून-छड़ा गेल रहैन तँए बाध भरिमेकियोकिछु ने बाजि अपन-अपन जी-जान बँचबैत पीपरक गाछ लग पहुँच माथपर सँ छिटा उतारि, दुभि बिछाएल बिछानपर पहिने चारू गोरे अरामसँ बैसली। पछाइत जेना-जेना सबहक मन ठंढाइत गेलैन तेना-तेना गहिंराइतो गेलैन। जहिना शुभनी भौजी आ दुखनी काकी एक-उमेरियाछैथतहिना राधा दादी आ सीता दादी सेहो एक-उमेरिये छैथ, संगे समाजिक वंशवृक्षक हिसाबेई दुनू ओइ दुनूसँ एक सीढ़ी ऊपर सेहो छैथ। तँएई दुनू गोरे सम्मानित बेकती भेबेकेली। शुभनी भौजी आ दुखनी काकीक बीच सुवासिनीक आगमनक समय लऽ कऽ शास्त्रार्थ बजैड़ गेल। शास्त्रार्थ कोनो आन बाते नहि, सुवासिनीक नैहर आगमनक मादेमात्र समैयक विवाद फँसलैन। दस बर्खक पछाइत सुवासिनीक आगमन भऽ रहल छैन...। शुभनी भौजी बजली- “सुवासिनी दाइ तँ सीते मैया जकाँ ने बोना गेली..!” शुभनी भौजीक पति-राम मनोहर, भारी खिस्सकर लोक। आध पहर राति धरि शुभनी भौजीकेँ शास्त्र-पुराणक नित्य नूतन खिस्सा सुनबैतरहै छथिन। तहिना दुखनी काकीक पति- सुखबा काका, सेहो नमहर खिस्सकर छथिए। शुभनीए भौजी जकाँ दुखनियोँ काकी शास्त्री बनियेँ गेल छैथ। खग जाने खगक बोल...। मुदाऐ सभसँ राधा दादी आ सीता दादीकेँ कोन मतलब छैन जे शुभनीए भौजीक आकि दुखनीए काकीक बात सुनती। ओ तँ पाथरक मूर्ति जकाँ पानिसँ नहेलो-धोलोपर ओहिनाक ओहिनाछथिए। बलुआहा माटिक मुरुत जकाँथोड़े छैथ जे एक्के लोटा पानिमे ढहि-ढनमना जेती। तँए, हुनका दुनू गोरेकेँ माने रधो दादी आ सीतो दादीकेँअपन-अपन स्पष्ट धारणा छैन जे दुनू गोरे अपनेमे फरिछाबह।अनेरे हम सभ ओइमे किए पड़ब। काल्हिसँ फेर सभकेँ एक्केठाम ने रहबो अछि आ संगे-संग करैत-धड़ैत चलबो अछि। औझुका प्राश्चित अपन आइये कटाबह।तैबीच दुखनी काकी शुभनी भौजीकेँ उत्तरोत्तर दैत बजली- “सीता मैया केतेक दिन तक बोनमे रहली से बुझल छह?” शुभनी भौजीक मन सेहो शास्त्रक धुनिमे चढ़ल रहबे करैन,बजली- “राम-लक्षमण आ सीताकेँ गामक सीमा टपैमे केतेक दिन लागल, पहिने से ने बाजब!” दुखनियोँ काकी तँखिस्सकरेक घरवाली,आगूक एक घाट आगू बढ़ि बजली- “गंगा पार करैमे तीनू गोरेकेँ केते दिन लागल रहैन से बुझल छह?” जवाबक केतौ पता नहि, मुदा प्रश्न-पर-प्रश्न चढ़ैत गेल। जेकरा देख रधो दादी आ सीतो दादीकेँनइ रहल गेलैन, दुनू गोरे संगे बजली- “गपे-सप्पमे जे खाएबो-पीब बिसैर जाइ जेबह, से की तोहीं दुनू एहेन गप्पकैर छह! महिना दिनक गप आइये फरिया लेबह। चलै चलह, नहाइयो बेर भऽ गेल।” ओना, चारू गोरे अपन आसनी-बासनी छोड़ि लगले उठि कऽ ठाढ़ भेली मुदा शुभनी भौजी आ दुखनी काकीक गप-सप्प चलिये रहल छेलैन। दुनू गोरेक कहा-कही सुनि राधा दादी फुटा कऽ बजली- “तोरा दुनूक गपैहिया बेमारी ताबे नइ हटतह जाबे बपैहियासँ भेँट नइ हेतह।” तुरैछ कऽ दुखनी काकी राधा दादीकेँ कहली- “ई सभ ने बुढ़ भेली, जे दिन छैथ से दिन छैथ मुदा हमरा दुनू गोरेकेँ तँ बहुत दिन तक ने ऐ पीपरक गाछतर बैस कऽ अपन जीवन-मरणक गप-सप्प करैक अछि।” घरक रस्ता फुटिते सभ छिड़िया गेली। बारह नइ बाजल छल, तइसँ किछु पहिनहि श्याम अपन बहिन-बहिनोइ आ भगिनी सबहक आगवानीक पूर्व तैयारी करि बसक हॉरनकेँ अखियासैत दरबज्जापर आबि कऽ बैसला। बसितेमोन पड़लैन सुवासिनी। बहिन मोन पड़िते श्यामक मन झमान हुअ लगलैन। केहेन करमघटू सुवासिनीक जिनगी भऽ गेल! भगवानोक नेत एकरंग नइ छैन। हमरा बाल-बच्चाक कम-बेसीसँ मतलब नहि, मनुख किछु छी तँ मनुख तँ छी किने।जे अपने-आपमे सम्पैतशाली भेबे कएल। मुदा भगवान केकरो बेटा दइ छथिन तँ घराड़ी दुआरे मारि फँसबै छथिन आ केकरो बेटी दइ छथिन तँ घराड़ियो बेचबबै छथिन, से केहेन निसाफ भेल! ई बात जरूर जे बेटा-बेटी समान अछि मुदा खाली कहने भरिसँ समान भऽ जाएत?माए-बापकेँ मुइला पछाइत बेटा तेरह दिनसँ तीन साल तकक अधिकारी अछि, बेटी किछु अछि तँ मात्र तीनियेँ दिनक।माने माटिक सारा बनि गेल, केशो कटबैक बेटीकेँ जरूरत नहियेँ,मात्र नह कटा पाक भऽ जाइए..! श्यामक गुनधुनी बढ़िते गेल-भगवान जे करै छैथ से नीके करै छैथ, समाज जँ नैहर-सासुरक बीच जे जलियाएल जाल बिछा मनुखकेँ शिकार बना शिकार करैएसे विचार केकर भेल?के करत? ई रोग एहेन अछि जे सभ परिवारमेअछिए, मुदा इलाज तेहेन अछि जइमे कियो मेटा जाइए आ कियो मोटा जाइए..! तैबीच बसक धमकसँ टोल-पड़ोसमे हरबिर्ड़ो जकाँउठि गेल। सबहक मुहसँ एक्के अवाज निकलए लगल-“बस आबि रहल अछि! अही बससँ सुवासिनी औत!!” टोल-पड़ोसक धिया-पुता बस स्टेण्ड दिस दौड़ल। धिया-पुताक पाछू-पाछू ट्रेनक गार्ड जकाँश्याम सेहो बस स्टेण्ड दिस बढ़ला। आठ घन्टाक बसक झमारसँ रामलखन सभ तूरक चेहरा मलिन भइये गेल छेलैन। सुवासिनीपर नजैर पड़िते श्यामकेँ टकटकी लगि गेलैन। मुदा तखने जगमोही पएर छुबि श्याम मामाकेँ प्रणाम केलकैन। असीरवाद दैत श्यामक नजैर रामलखनपर गेलैन। सार-बहनोइक बीच नमस्कार-पाती भेल। सभ कियो घर दिस विदा भेला। सभकेँ अपन-अपन नजैर तँए अपना-अपना नजरिये सभ प्रेमनगरक धरतीपर अपन-अपन पएर रोपि चलए लगला। जहिना सबहक अपन सोच, अपन विचारआ अपन जिनगी, तहिना सभकेँ अपन-अपन संगी सेहो भेटिये गेल। जगमोहीकेँ प्रेममोही भेटल। ओना, चेहरासँ जगमोहीकेँ प्रेममोही चिन्हैत नहि, मुदा सुवासिनीक पाँचो गोरेक परिवारमे जगमोहीक उमेरो आ कौलेजिया रूपो रहबे करइ, तँए प्रेममोही अन्दाजि नेने छल। ओना, प्रेममोही सेहो बी.ए. ऑनर्सक फाइनल इयरमे पढ़िते अछि, तँए कौलेजिया समाजक परिचयो छइहे। जगमोहीक हाथ-सँ-हाथ मिलबैत प्रेममोही पुछलक- “बहिन, केहेन नगर लगैए?” ओना, छोट बहिनक रूपमे अपन विचार प्रेममोही रखलक, मुदा जगमोही थकथका गेल। किएक तँ ओहो बुझि चुकल छल जे प्रेममोही सेहो बी.ए. फाइनलमे पढ़ैत अछि। जगमोही पटनिया भाषामे बाजल- “जेहने नगरक नाम छै तेहने लगैए।” शब्दो-शब्दक तँ खेल अछिए। कोनोबहु अर्थीए होइत अछि तँ कोनो बिनु सींग-नॉंगैरक, बिनुअर्थोक होइते अछि। गप-सप्पक क्रममे जगमोही आ प्रेममोहीक बीच, सम्बन्धक आकर्षणबढ़ए लगल जइसँ एक-दोसरक बीच विचार-विनिमयक दिशा-बाट सेहो खुजबे कएल। बिनु ठेकनाएल शब्दमे जगमोही बाजल- “ऐ गामक एक गोरे पटनामे पढ़ै छैथ, हुनकर घर किम्हर छैन?” प्रेममोहीकेँ गामक जानकारी छइहे जे गामक एक गोरे पटनामे पढ़ैए, तीन गोरे दरभंगामे आ सात गोरे झंझारपुरमे.., बाजल- “धीरेन्द्र हुनक नाओं छिऐन आ घर दोसर टोलमे छैन।” जगमोही- “परिवार केहेन छैन?” प्रेममोही- “गाममे सम्पन्न परिवार मानल जाइ छैन।” [i]पत्नी आ सन्तान [ii]फुर्तीमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय बरबैरेपर छी हम आ अनिल दुनू गोरे बनगामा हाइस्कूलसँ निर्मली कौलेजमे बी.ए. धरि संगे पढ़लौं। हमर घर भपटियाही सखुआ जखन कि अनिलक घर सखुआ महदेवा। जहिना हम बी.ए. पास केला पछाइत घोड़ा घास छीलै छी तेनाहिये अनिलो भैंसवार बनल अछि। एक दिन भूतहा हाटपर अनिल भेँट भेला तँ हम कहलयैन- “मीत गामेमे रहै छी मुदा कहियो भेँटो करए कहाँ अबै छी?” तैपर अनिल बजला- “आ अहाँ तँ हमरा ओइठाम सभ दिन जाइ छी किने।” हम सोचए लगलौं, अनिल ठीक्के कहलैथ। हमहूँ तँ गामेमे रहै छी मुदा हमहीं कहाँ कहियो अनिलसँ भेँट करए हुनका ओइठाम गेलौं..! सोचैत गुनधुनमे पड़ि गेलौं, बजैले जेना किछु रहिए ने गेल। मुदा ऐठाम चुपो रहबसँ सम्बन्ध प्रभाविते होइत। बजलौं- “चलू मीत बरबैरेपर छी।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल झूठक झालि अदहा चैत बीत गेलमुदा चैतक जेहेन उष्णता चाहीओअखन तक मौसममे नहि आएल अछि। जेना आन साल फगुआक पराते लोक अपन-अपन सिरको आ कम्बलोकेँ रौद लगा, समेट कऽ ऐगला जाड़-ले बान्हि कऽ रखि लइ छला, से ऐबेर नहि भेल। ओना, पहिनौं केतेकसाल एहेन होइते छल जइमे जाड़ किछु बिलंमसँ हटने सिरक-कम्बल किछु बिलम्ब धरि लोक ओढ़ै छला, मुदा से गोटे-गोटे साल एहेन होइत छल। ऐबेरक समय तइमे बीस पड़ल। तेकर कारण भेल जे एक तँ शीतलहरी फगुआ तक धेने रहल, दोसर शीतलहरी हटिते तेहेन जनमारा बरखा भेल जे जाड़केँ आरो आगू बढ़ा देलक। अनधुन पाथरो खसल आ पछिया हवा सेहो धुर-धार पकैड़ लेलक जइसँ जाड़क तेते बढ़ोत्तरी भऽ गेल जे अखनो घूर तापब आ सिरक-कम्बल ओढ़ब अनिवार्य बनले अछि। से खाली लोके आ माले-जालक संग भेल, सेहो बात नहियेँ अछि। मौसमक रूप बदलने आमो आ रब्बियो-राइक संग भेल। आन साल चैती दुर्गाक समय,जे अदहा चैतक पछाइत पड़इ छल, आमोक टुकला तेहेन भऽ जाइ छेलै जे लोक चटनियो आ कुच्चो-अँचार खाइ छल से ऐबेर आमक मोजरो अखन तक ओहिना अछि। मड़ुआ भरि-भरिक दाना बनल अछि। तहिना गहुमोक अछि। आन साल चैती दुर्गाक समय धुर-झाड़ गहुमक तैयारियो चलै छल आ खेतसँ कटियो गेल रहै छल। मुदाऐबेर से नहि,ऐबेर कोला-कोली गोटे-गोटे खेतक गहुम कटल अछि बाँकीमे ओहिना लगल अछि। लगल कि अछि जे तेहेन बर्खा-पानिक संग पाथर खसल जे खेतक-खेत गहुम चुरम-चुर भऽ गेल। मौसमक विकरालता रहने विवेक विहारी काकासँ चारि-पाँच माससँ भेँट नहि भेल, तँए मन उबिया रहल छल।मुदा मन उबियेनहि की, समयमे तेते ठण्ढ छेलै जे घरसँ निकलैक हिम्मते ने हुअए। ओना, पचहत्तैर बर्खक विवेक विहारी काका अखनो शरीरसँ एहेन फेहम छैथ जे नीक समय रहने सभ दिन एक बेर-दू बेर सौंसे गाम घुमैत छला मुदा सरदीसँ एलर्जी रहने आनो साल घुमैसँ परहेज करिते रहैथ। ऐबेर तँ सहजे तेतेक सरदी पड़ि रहल अछि जे दरबज्जा छोड़ि केतौ नहि जाइ छैथ। चैती दुर्गाक आइ तेसर पूजा छी माने चैत शुक्ल पक्षक तृतीया छी। ठण्ढ रहितो लोकमे, खास कऽ स्त्रीगण आ धिया-पुतामे पूजाक उत्साह जगिये गेल अछि। अपनो मनमे भेल जे एहने-एहने समयमे ने बुढ़ो-पुरान आ धियो-पुतो ठण्ढसँ मरिते अछि। तहूमे चैती जाड़ छी जे सोझे हाड़मे गड़ि शरीरकेँ थरथरबैए। मनमे भेल जे जँ कहीं विवेको विहारी काका जाड़सँ अक्रान्त भेला आ मरि गेला तखन तँ मन लगले रहि जाएत जे मरैसँ चारि-पाँच मास पहिनहिसँ काका भेँट नहि भेल छला। नीक समय रहने एकबेर-दूबेर सभ दिन एकठाम बैस गपो-सप्प करै छेलौं आ बहुत बात सिखतो छेलौं...। विवेक विहारी काकासँ भेँट करैले मन तेते उबिया गेल जे मने-मन विचारि लेलौं जे आइ किछु हएत मुदा काकासँ भेँट करबे करबैन। ओ ने बुढ़ छैथतँए घरसँ नइ निकलै छैथ, मुदा अपने तँ से नहि छी। चाह पीब विवेक विहारी काकासँ भेँट करए विदा भेलौं। घरसँ निकैलते मनमे उठल जे देखते काका कहबे करता जे हम ने बुढ़ भेलौं तँए घरसँ जाड़क दुआरे नइ निकलै छी मुदा तोंहू जबान रहितो सहए भेलह। फेर अपने मनमे बहन्नोसुझि गेल जे जँ से कहता तँ कहबैन जे काका समय खराब भेने काजक समय घटिये जाइए, मुदा परिवारक जे सबदिना काज अछि ओ तँ केला पछातिये ने परिवारक गाड़ी आगू मुहेँ ससरत। तइ संग ईहो मनमे भेल जे जखने तर्कपूर्ण बहन्ना करब तँ ओ बिसवास कइये लेता। मन हल्लुक भऽ गेल। विवेक विहारी काका-ऐठाम पहुँचते देखलौं जे काका सिरक ओढ़ि दरबज्जाक चौकीपर मुँह झाँपि बैसल किछु सोचि रहल छैथ। दरबज्जापर पहुँचते बजलौं- “काका, गोड़ लगै छी..!” अवाज सुनि मुँहपर सँ सिरक खसका काका बजला- “नीके रहह। बहुत दिनक पछाइत तोरासँ भेँट भेल।” बजलौं- “काका, समये तेहेन भऽ गेल अछि जे घरसँ निकलब कठिन भऽ गेल अछि, तँए नइ भेँट होइ छेलौं।” विवेक विहारी काकाकेँ जेना विचारक बाण सुतरलैन तहिना बजला- “एहने समयमे ने धियो-पुतो आ बुढ़ो-बुढ़ानुसक ताक-हेर जरूरी अछि, तैठाम जँ अनठा देबहक तखन तँ अनेरे ने ओ मरबे करत।” कक्काक बात सुनि अपने निरुत्तर भऽ गेलौं तँए विचारकेँ बदलैत बजलौं- “नीक समय रहह आकि अधला, कमसँ कम एते तँ भेबे कएल जे ओ कटि गेल।” मुड़ी डोला हमर बात तँ काका स्वीकारि लेलैन मुदा जेना मनमे कोनो बात–विचार–नाचि रहल छेलैन तहिना ओइ विचार दिस पुन: मन बढ़ए लगलैन। अपना बुझि पड़ल जे भरिसक काका कोनो विचारमे ओझराएल छैथ। अनायास विवेक विहारी कक्काक मुहसँ व्यंगपूर्ण मुस्कियो आ मुस्कीक संग अवाजो निकललैन- “झूठक झालि बजौनिहार चाटुकार सबहक चाटुकारिता कि कोनो आइयेक छी, सभ दिनसँ होइत आबि रहल अछि। अखनो अछि आ आगूओ होइत रहत।” अपना जनैत विवेक विहारी काका हमरा सुना कऽ बजला आकि अपन विचारक दौड़मे बजला से ओ जानैथ मुदा सुनलौं तँ हमहूँ। बजलौं- “से की काका?” विवेक विहारी काका बजला- “नारदक नाओं सुनने छहक?” बजलौं- “किए ने सुनने रहब। वएह नारद ने जे घरबलाकेँ कहलखिन- तोहर घरवाली तोहर देह चटै छह आ घरवालीकेँ कहलखिन जे तोहर पति नोना गेल छथुन तँए दुनू गोरेमे जे प्रेम हेबा चाही से नहि छह।” हमर बात सुनि कक्काक मनमे जेना भीतरसँ खुशीक गुदगुदी लगलैन तहिना हँसैत बजला- “तोरा हिसाबे नारद केहेन छला?” बजलौं- “काका, नारद नमरी झगड़लगौन छला। जखन दुनू परानी तककेँ नहि छोड़ै छेलातखन दू परिवार आ दू समाजकेँ छोड़ि सकै छला..!” अपना विचारे माने कानक सुनल विचारे हम बजै छेलौं आ चिन्तनक हिसाबे काका पुछि रहल छला तँए सबाल-जवाबमे केतौ मेल नहियेँ खाइ छल। ओना, काका दुनू बात–माने अपन कानक सुनल बात आ चिन्तनक बात–जानि रहल छैथ मुदा अपने तँ खाली सुनलेहे बात टा जनै छी, तँए अपन विचारकेँ दृढ़तासँ पकड़ने छेलौं। काका बजला- “नारद देवलोकोमे बास करै छला आ मर्त्तलोकमे सेहो घुमै छला।” बजलौं- “हँ, से तँ छेलाहे। देवलोक-सँ-मर्तलोक तक प्रतिदिन टहलै छला। मर्तलोकक संवाद देवलोकोमे पहुँचबै छला आ देवलोकक संवाद मर्तलोकोमे लोककेँ कहै छेलखिन।” हमर बात सुनि विवेक विहारी काका भभा कऽ हँसला।हँसी रोकि बजला- “बौआ श्याम, नारद पुराण पुरुष छैथ, माने पौराणिक पात्र। हुनक देल अमूल्य रत्न अछि। ओइ अमूल्य रत्नकेँ झाँपैक खियालसँ रंग-बिरंगक कथा गढ़ि झूठक झालि बजौनिहार चाटुकार सभ हुनका बदनाम करैत आबि रहल अछि।” कक्काक बात सुनि अपनो मन ठमकल। ठमकैक कारण भेल जे अपने की बुझै छी आ काका की कहि रहला हेन..! बजलौं- “से की काका?” विवेक विहारी काका बजला- “बौआ, नारद चौरासी टा विचार सूत्रक प्रतिपादन केलैन। जे चौरासियो सूत्र मनुखक जिनगीक चौरासी आसन छी, माने जीवन जीबाक चौरासी टा कला..!” अखन तक जे नारदक प्रति अपन धारणा मनमे बनल अछि, ठीक ओकर विपरीत विचार विवेक विहारी कक्काक सुनि बजलौं- “चौरासी आसन कीकहलियै काका?” विवेक विहारी काका बजला- “अखनो गाम-घरमे लोकक मुहेँ सुनै छह कि नहि जे चौरासी आसनसँ जीवन चलैए।” बजा गेल- “हँ, से तँ सुनै छी..!” विवेक विहारी काका बजला- “यएह चौरासी आसनक सृजन नारद केने छैथ। जेकरा घटिया कहक आकि झूठक झालि बजौनिहार चाटुकारक चाटुकारी कहक, ओही महत्वपूर्ण ज्ञानकेँ दबबाक षडयंत्र झूठ बजनिहार चाटुकारसभ सभ दिनसँ रचैत-करैत आबि रहल अछि आ अखनो रचै-बजैए।” बजलौं- “ऐ सँ झूठ बजनिहार चाटुकार सभकेँ की भेटै छै?” विवेक विहारी काका बजला- “अपन मरनमुख विचारकेँ जीवनमुख विचार बना समाजकेँ गुमराह करैत, माने धोखा दैत आबि रहल अछि। जइसँ समाज पथ-भ्रष्ट बनि जिनगीक स्वस्थ पथसँ विमुख भऽ दिशाहीन होइत आबि रहल अछि।” कक्काक विचार सुनि अपनो मनक मैल, माने अज्ञानता जेना कमए लगल तहिना भक् खुजि गेल। तैबीच विचारकेँ आगू बढ़बैत विवेक विहारी काका पुछि देलैन- “कालिदासक नाओं तँ सुननहि छह?” कहलयैन- “हँ। आइ कि बच्चेसँ सुनैत आबि रहल छी जे कालिदासएहेन छला जे जेही डारिपर चढ़ल छला तेही डारिकेँ जड़िसँ काटै छला।” हमर बात सुनि विवेक विहारी काका फेर भभा कऽ हँसला। हँसी रोकि बजला- “एकर माने यहए ने जे कालिदास सन मूर्ख ऐ धरती पर दोसर नहि भेल अछि?” ओना, कक्काक विचारक प्रवाहमे अपने नहि भँसलौं। माने ई नहि कहलयैन जे ‘हँ, हुनका सन मुर्ख दोसर नहि भेला’,किए तँ कालिदासक सम्बन्धमे ईहो बुझल अछि जे ओ महापण्डित छला। अनेको महान-महान कृति- मेघदूतम्, कुमारसम्भवम्, रघुवंशम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, अभिज्ञानशाकुनतलम् इत्यादि रचना सेहो केने छैथ आ राजा विक्रमादित्यक दरबारमे नवरत्नमे एक रत्न सेहो छला। बजलौं- “ओ महापण्डित छला तँए मूर्ख केना मानबैन?” विवेक विहारी काका बजला- “जे आदमी जइ डारिपर चढ़ल रहत ओइ डारिकेँ जँ जड़िसँ काटत, ओहन काटनिहारकेँ लोक की बुझत?” असमंजस में पड़ि गेलौं। किए तँ ईहो बात बुझले अछि जे जइ डारिपर छला ओकरो कटितो छला। तैसंग ईहो बुझले अछि जे ओ महापण्डित छला। बजलौं- “शुरूमे ओ मुरुखपन काज केने मुरुख छला, पछाइत सरस्वतीक असिरवादसँ विद्वान भेला। विद्वान भेला पछाइत अमूल्य कृति सबहक रचना केलैन।” कालिदासपर सँ धियान हटबैत विवेक विहारी काका बजला- “हमहीं महाविद्यालयक शिक्षण कार्य किए छोड़लौंसे बुझल छह?” बजलौं- “जखन बेटा कमाए लगला तखन अपने कमाएब छोड़ि देलौं। सएह ने?” मुस्कुराइत विवेक विहारी काका बजला- “नइ, ई बात नइ छी।” बजलौं- “तखन, की बात छी?” विवेक विहारी काका बजला- “जाधैर अपन विचार परिपक्व नहि भेल छल ताधैर नीक-बेजाए सभ बजै छेलौं, मुदा जखन विचार परिपक्व भेल तखन विचारमे दृढ़ता आनि निश्चय केलौं जे ने अधला (गलत) काज करब आ ने अधला विचार मुहसँ निकालि दोसरकेँ देब।” विवेक विहारी कक्काक विचार नीक जकाँ माने स्पष्ट रूपे नहि बुझि, बजलौं- “काका, कनी खरियारि कऽ कहियौ। नीक जकाँ नहि बुझि पेलौं।” हमर जिज्ञासा देख आकि की, विवेक विहारी काका हँसए लगला। ओना, हुनकर हँसी देख अपना मनमे कनी-मनी शंको हुअ लगल जे कहीं हमर विचारे ने ते उनटा-पुनटा भऽ गेल जइसँ काका हँसि रहलछैथ! मुदा से नहि, ओ विचारक गम्भीरताकेँ पकैड़ बजला- “श्याम!ओनाअपने जखन पढ़िते रही तहियेसँ झूठ बजैक परहेज करए लगलौं। मुदा की झूठ की सच से नहि बुझि पबैतरही, तँए बहुत झूठो बजाइ छल, मुदा जहियासँ झूठ-सच बुझैक ओकाइत भऽ गेल माने झूठ-सच बुझैक क्षमता भऽ गेल तहियासँ झूठ बजैक सोल्होअना परहेज कऽ लेलौं।” ओना, अपना जनैत काका समीचीन उत्तर देने छला, मुदा अपने नीक जकाँ बुझिये ने पेलौं। पुछलयैन- “काका, नीक जकाँ अपनेक विचार नहि बुझि पेलौं।” विवेक विहारी काका बजला- “श्याम, शुरूमे–माने नोकरीक शुरूमे–जखन बच्चा सभकेँ पढ़बै छेलौं तखन सिलेवसमे जे पोथी उपलब्ध छल ओही आधार पर पढ़बै छेलौं, मुदा जखन पोथीक नीक-अधलाक बोध भेल,तखन विचार अपने मनमे टकराए लगल। एक दिस जे सिलेवसमे अछि वएह पढ़बऽ पड़तआदोसर दिस अपन मन धिक्कारऽ लगल जे बच्चा सभकेँ सज्ञानक बदला अज्ञान बना रहल छी, जे अपना जनैत अनुचित भऽ रहल अछि। तँए नोकरी छोड़ि देलौं।” विवेक विहारी कक्काक विचार सुनि मन जेना शान्त भऽ गेल। बजलौं- “काका, अखन तक ई बात नहि बुझै छेलौंतँए गलत धारणा मनकेँ जमि कऽ पकड़ने छल।” अपन उपलब्धि आकि विचारक प्रभावसँ विवेक विहारी कक्काक मन जेना उत्फुलित भेलैन तहिना फूलक कली जकाँ मुँह मुस्किएलैन। बजला- “बौआ श्याम, मण्डन मिश्रकेँ जनै छुहुन?” बजलौं- “हँ।” काका बजला- “केना जनै छुहुन?” बजलौं- “वएह मण्डन मिश्र ने जिनकर सुग्गो संस्कृतेमे बजै छेलैन।” काका बजला- “हँ, आरो किछु?” बजलौं- “ओ अपन मैथिल अद्वैतवादी विद्वान छला। जे शंकराचार्यसँ शास्त्रार्थमे पराजित भेला।” ‘शंकराचार्यसँ शास्त्रार्थमे पराजित भेला’ सुनि कऽ आकि की, एकाएक विवेक विहारी कक्काक चेहराक रंग मलिन हुअ लगलैन। जेना नान्हिटा मेघक टुकड़ी, माने बादलक टुकड़ी सूर्यक प्रखर रौदकेँ किछु क्षणक लेल झाँपि दइए तहिना भेलैन। मुदा अपन आक्रोशकेँ ऐ दुआरे नहि व्यक्त केलैन जे ओ हमरा अबोध बच्चा बुझै छैथ। मनमे भेल हेतैन जे श्याम अपन अध्ययनक बले नहि, केकरो मुँहक सुनल बात बाजि रहल अछि...। बजला- “बौआ, भरिसक तूँ कोनो झूठ बजनिहार चाटुकारक मुँहक सुनल बात बुझै छह।” कक्काक बात सुनि मनमे भेल जे ठीके काका बुझि रहला अछि, किए तँ अपने मण्डन मिश्रक कोनो रचना तँ अखन तक पढ़नौं ने छी, मनन-चिन्तनक कोन बात..!बजलौं- “काका, एकटा पण्डीजी बाजल छेला, सएह सुनलो अछि आ मोनो अछि। सएह बजलौं।” तुरैछ कऽ विवेक विहारी काका बजला- “ओ मुफ्तक चूरा-दही खाइबला हेता,तँए एहेन बात बजला।” बजलौं- “तखन?” विवेक विहारी काका बजला- “ओना, कतेको विद्वतजन ऐ विचारकेँ झूठ साबित केने छैथ। मुदा अखन बहुत नहि, खाली दूटा विद्वानक विचार कहै छिअ। पहिल डॉक्टर वैद्यनाथ झाक, जे अम्बेदकर विश्वविद्यालयमे संस्कृतक विभागाध्यक्ष छला आ दोसर डॉक्टर तारानन्द ‘वियोगी’क विचार कहै छिअ।” ओना, दुनू गोरे–माने डॉक्टर वैद्यनाथो झा आ तारोनन्द ‘वियोगी’क नाओं सुनल अछि मुदा हुनकर लिखल विचार बुझल नहि अछि। बजलौं- “हँ, कहियौ।” विवेक विहारी काका बजला- “डॉक्टर वैद्यनाथ झा, जे राष्ट्रपति सम्मानसँ सम्मानित छैथ, ओ अपन पोथी ‘मण्डन मिश्र श्रद्धा-कुसुमाञ्जलि:’मे साबित केने छैथ जे मण्डन मिश्र आ शंकराचार्यक बीच कहियो शास्त्रार्थ भेबे ने कएल, तहिना डॉक्टर तारानन्द ‘वियोगी’ अपन पोथी ‘मण्डन मिश्र और उनका अद्वैत वेदान्त’ मे सेहो काफी चिन्तन-मनन केला पछाइत लिखने छैथ जे झूठ चाटुकार सबहक सभटा खेल छी।” पहिल-पहिल दिन दुनू पोथीक नाओं सुनलौं। अपन पढ़ल दुनूमे सँ कोनो नहि अछि मुदा विवेक विहारी काकापरएते बिसवास तँ जमले अछि जे जे आदमी झूठ बजैक विरोधमे अपन जीविका छोड़ि सकै छैथओ झूठ किए बजता, तँए मन मानि गेल जे काका जे कहि रहला हेनओ सोल्होअना सत् कहि रहला अछि। बजलौं- “ओऽऽऽ..! ई बात अछि..!” काका बजला- “एहेन झूठ बजनिहार कि कोनो आइये अछि, सभ दिनसँआबि रहल अछि। एकटा बात आरो कहि दइ छिअ। ओना, समयो बहुत बेसी भऽ गेल अछि विचारो बहुत भेल।” बजलौं- “काका, मन तँ होइए जे आरो सुनी मुदा नहाइ-खाइ-पीबैक समय भऽ गेल। खाएर जे भेल से भेलमुदा जे बजैक मन बनि गेल अछि ओ कहि दिअ।” विवेक विहारी काका बजला- “तुलसी दासक नाओं सुनने छह?” बजलौं- “हँ! तुलसी दास कि कोनो हेराएल साधक छैथ। हुनकर लिखल रामायण ‘रामचरित मानस’ रखनौं छी आ कहियो-कहियो पढ़बो करै छी।” विवेक विहारी काका बजला- “हुनका विषयमे की सभ बुझल छह?” कक्काक बात सुनि अकबका गेलौं। अकबकाइक कारण ई भेल जे तुलसीदासक रचना ‘रामचरित मानस’तेहेन रचना अछि जे दुनियाँक अधिकांश भाषामे ओकर अनुवाद सेहो भेल अछि आ एक-सँ-एक श्रेष्ठ विद्वान प्रशंसो केने छैथ, तइमे काका की पुछि रहल छैथ..! बजलौं- “काका, तुलसीदासक कि कोनो एक्केटा बात छैन। ओ तँ अथाह समुद्र जकाँ‘रामचरित मानस’क रचना केने छैथ।” विवेक विहारी काका बजला- “हुनकर जीवनी बुझल छह?” ओना, तुलसीदासक सम्बन्धमे किछु-किछु बात जरूर बुझल अछि, मुदा अपन तँ कोनो दृष्टिकोण अछि नहि, जइ अनुकूल हुनकर जीवनीकेँ परेखब। मुदा विवेक विहारी काकाकेँ तँ अपन दृष्टिकोण छैन, जइ अनुकूल ओ बुझै छैथ। बजलौं- “काका, ऊपरे-झापरे ने किछु-किछु बुझल अछि जे सहियो भऽ सकैए आ गलतियो भऽ सकैए, तँए अपनहि किछु कहियौ।” विवेक विहारी काका बजला- “बौआश्याम, जँ हुनकर जीवनीकेँ प्रतीक रूपमे बुझबह तखन तँ सही बुझेतह।मुदा जँ साधारण नजैरिये बुझबह तँ ओ सही नहि बुझेतह। अखन एतबे राखह। एतबे बुझह जे झूठक झालि बजौनिहार सभ दिनसँ आबि रहल अछि, अखनो अछि आ आगूओ ताधैर रहत, जाधैर लोकक अपन चिन्तन-मनन नहि बनत।” बजलौं- “सएह?” विवेक विहारी काका बजला- “हँ, अखन सएह।” अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी बीहनि कथा गणतंत्र -मालिक, गोर लगै छीयैन! -के ? -हम,हीरवा कनिञा।भरि जुआनी खटि , हिनका पुजिगर बनेलियैन आ आइ अन्चिन्हार ? -पछिला मास जे अहाँ गीदड़भभकी द' गेलहुँ- जे हमर एक-एक टा कैञ्चा (टाका) हिंसाब क' दौथ। अशोकबा कहैए-घर बैस के खो। तहिये सँ अहाँ हमरा आँखि सँ ओझल भेल बुझू। माञिन्जन ठेंगा उठा बाट ध' लेलनि....ठमकति!अच्छा दुरा पर एलौं त' खगतो कहिये दियय। अशोकबा बाप बेमार हय,दवाइ आ खेनाइ,दुनू घर में घटल है।किछो मदति क' दौथ, अशोकबा के 10 तारीख के अबैया हय,,सबटा पाइ सधा देबैन। हमरा ल'ग किछो नै हए,हम… अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार एकटा "मैथिली गजल" जे बदलि देलकै 'मैथिली गीत-संगीतक' इतिहास समाजमे हरेक एक केर प्रभाव दोसरपर पड़िते छै (नकलकेँ मुदा प्रभाव नै कहल जा सकैए)। से प्रभाव नीको भऽ सकैए आ खरापो। साहित्य सेहो समाजे केर चीज छै आ साहित्य केर विभिन्न विधा सेहो। साहित्य केर एक विधासँ प्रभावित भऽ दोसर विधाक नीक रचना होइत रहलैए। तेनाहिते एक विधाक कायान्तर कऽ दोसर विधामे रचल जाइ छै। आ ई प्रक्रिया नीक छै। मुदा धेआन देबाक बात ई सभ बात पाठक केर सामने रहैत छै। जेना मधुपजीक कविता 'घसल अट्ठन्नी' केर नाट्य रूप सेहो छै मुदा प्रचार-प्रसारमे पहिने कहि सूचित कएल जाइत छै जे ई मधुपजीक कविताक नाट्य रूप थिक। मुदा ई सौभाग्य मैथिली गजल लेल कहियो नै रहल। एकटा मैथिली गजल जे “बदलि देलकै मैथिली गीत-संगीतक इतिहास” मुदा साहित्यकार-संगीतकार एहि गजलक संग न्याय नै केलाह। गजल छै मुदा एकरा गीत कहि प्रचारित कएल जाइत छै। आब एकटा विधा लेल एहिसँ दुखद बात की हेतै? ई बात हम लोक लेल नै कहि रहल छी। ई हमरो बूझल अछि जे जखन कोनो महान रचना रचना लोकमे जाइ छै तखन ओकर शब्द उनट-पुनट होइते छै। ओकर विधापर धेआन नै देल जाइत छै। हमरा लोकसँ नै कथित विद्वान ओ अपनाकेँ महान गायक कहए बला सभसँ शिकाइत अछि जे ओ सभ एहि गजल संग न्याय नै केलथि। लगभग 90 बर्खसँ बेसी धरि पाठक-श्रोताकेँ भ्रमित कएल गेलै जखन कि ओहि रचनाक व्याकरण गजलक छै। रचनाकार ओकरा गजल कहि गेल छथि तकर बादो ई हाल। एहि गजलक प्रभाव ततेक जे जतबे गायक-गायिका एहि गजलकेँ गेलाह वा गेलीह से गलत कऽ वा एकर पैरोडीमे गीत बना गेलाह-गेलीह। अइ हाल लेल तीन टा कारण अछि पहिल जे आधुनिक मैथिलीक गीत विधा बहुत कमजोर अछि। आधुनिक कालमे एकरा अपन कोनो निश्चित आधार नै रहलै मैथिलीमे। आ ताहि लेल ओ गीतकार सभ जिम्मेदार रहलाह जे कोनो तुकांत पाँतिकेँ गीत मानि मंचपर पाग-माला लेल व्याकुल भेलाह। आइ धरि मैथिलीमे गीत विधाक कोनो अपन आलोचक नै भऽ सकलै आ ताहू लेल वएह कथित गीतकार सभ जिम्मेदार छथि। अपवादमे किछु नीक गीतक सृजन भेल मुदा ओ गीतकार सभ गीत विधाक आलोचनामे कहियो नै एलाह आ से चाहे रवीन्द्र नाथ ठाकुर होथि कि मैथिलीपुत्र प्रदीप होथि कि जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' वा चंद्रमणि झा। दोसर कारण जे मैथिलीमे कथित गजलकार सभ पतचटनाक भूमिकामे रहलाह सदिखन। जिम्हर देखला मंच तिम्हर केलाह लंच। आ ताहूपर गजलक व्याकरणक ज्ञान पूरा गोल। तखन कोना बूझितथिन जे ई रचना गजल छै। आ तेसर कारण एहि गजलक प्रभाव। विद्यापतिक गीतक प्रभावक बाद जँ कोनो आन रचनाक प्रभावक बात हएत तँ एहि गजलक नाम सभसँ उपर रहत। खएर हम एतए गीत विधाक चर्चा नै करए आएल छी। हम आएल छी ओहि भ्रमक निस्तार लेल जे कि 90 बर्खसँ 'कमजोर गीत विधा' केर 'कमजोर गीतकार' आ 'कमजोर गायक-गायिका' सभ द्वारा पसारल गेल छै। बहुत गायक कहि सकै छथि जे हम भासपर रचना केलहुँ। मुदा हम कहब जे कोन भासपर रचना केलहुँ? वएह भास ने जे गजलक छै। ओही गजलक किछु शब्दकेँ आगू-पाछू कऽ दऽ ओकरा गलत बना कऽ गाबै छी। कविवर सीताराम झा जी रचित सूक्तिसुधा (प्रथम बिंदु) केर पहिल प्रकाशन 1928 ई. मे भेल छल (संदर्भ- कविवर सीताराम झा-काव्यावली प्रथम भाग, संपादक- विश्वनाथ झा 'विषपायी', प्रकाशक-नमन निकुंज शिक्षा परिषद्, चौगमा, वर्ष-1998)। एहि सूक्तिसुधामे कविवर अपन एकटा रचनाकेँ गजल कहि प्रस्तुत केने छथि जकरा निच्चा दऽ रहल छी (फोटो परिशिष्टमे देखू)- जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी उपरक रचना गजल थिक आ सीतारामजीक अपन वर्तनीमे छनि। गायक सभ अही गजलकेँ गलत कऽ गाबै छथि। एहि गजलक व्याकरणकेँ हम अपन पोथी 'मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास' मे नीक जकाँ देखेने छी। तँइ एहिठाम नै दऽ रहल छी। जिज्ञासु पाठक ओहि पोथीकेँ पढ़ि जानि सकै छथि। बहुत लोक एकरा भगवती गीत कहै छथि जखन कि एकरा 'भगवती गजल' कहल जेबाक चाही। ई अनचिन्हार आखर टीमक सौभाग्य अछि जे ओ मैथिली गजलमे 'भक्ति गजल' सन शब्दक निर्माण केलक (7 अगस्त 2012 केँ अमित मिश्र द्वारा) आ एहि तरहें कविवर सीताराम झा मैथिलीक पहिल 'भक्ति गजल' कहनाहर-लिखनाहर छथि। कविवरजीक ई गजल वस्तुतः भक्ति गजल अछि। ईहो सौभाग्य अनचिन्हारे आखरकेँ छै जे ओ मैथिलीमे 'बाल गजल' सन शब्दक निर्माण केलक (24/3/2012 केँ एहि पाँतिक लेखक द्वारा) आ ईहो सौभाग्येक बात जे मैथिलीक पहिल 'बाल गजल' कहनाहर-लिखनाहर एक बेर फेर कविवर सीताराम झा सिद्ध होइत छथि (विशेष जानकारी हमर गजलक व्याकरण ओ इतिहास बला पोथीमे भेटत)। भासक चर्चा हम उपरे केलहुँ जतेक ई पुरान गजल अछि (8 बर्ख बाद ई गजल 100 बर्खक भऽ जाएत) ताहि हिसाबसँ एकर भास आब कल्ट बनि चुकल अछि। एकर भास आब कियो प्रयोग अपन पैरोडीमे नव रूपें बना सकै छथि आ बलजोरी कहि सकै छथि जे हम नकल नै केलहुँ। हमर अनुमान अछि जे ई गजल बहुतो लोकक नजरिसँ हटि गेल छल जकर पुष्टि रचना नामक पत्रिका केर जून 1984 अंकमे डा. रामदेव झा जीक लेखसँ सेहो होइत अछि जाहिमे ओ सीताराम झाजीक आन गजलक उदाहरण देने छथि मुदा एहि भक्ति गजलकेँ बिसरि गेल छथि। जाहि समयमे ई लेख लीखल गेल हेतै ताहू समयमे एहि गजलक प्रभाव रहल हेतै तँइ हमर अनुमान अछि जे ई गजल डा. रामदेव झाजीक नजरिसँ सेहो छुटल रहलनि। एहिठाम हम एहि गजलकेँ तोड़ि-मरोड़ि आ पैरोडी बनल एक-दू प्रस्तुतिक लिस्ट दऽ रहल छी जाहिसँ स्पष्ट हएत जे कोना एहि गजल संग मजाक भेल छै (एहि लिस्टमे शौकिया आ सिद्ध-प्रसिद्ध दूनूक नाम अछि)- 1) नीलकमल झा रचनाकारक नाम तँ गलत देनहे छथि अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि (ओना अधिकांश पाँति ई शुद्ध गेने छथि)- https://www.youtube.com/watch?v=SnRmai1qtj0 नीलकमल झा एहिमे गीतकार रूपमे -उपेन्द्र ठाकुर मोहनजीक नाम देने छथि से आपत्तिजनक तँ अछिए संगे-संग मैथिली गीत-संगीतक अवस्थाकेँ सेहो देखा रहल अछि। 2) संजय झा एकर भासपर गेलथि जकरा एहि लिंकपर देखि सकैत छी https://youtu.be/EYctiERxVwo 3) मैथिली ठाकुर अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=0wFT4nPm360 4) आदित्य नाथ पैरोडी बना गेलथि जकर लिंक अछि -https://www.youtube.com/watch?v=yHPSqoSBwN0 5) भाव्या रानी अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=5dbn5X6f5yQ 6) उमा झा अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=26vr-J3Wtvc 7) प्रेमसागर अपन गायनमे थर्ड क्लासक पैरोडी केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=JNAen4rZeMg हम पहिने कहने छी जे कविवरक गजलक भास आब कल्ट अछि। एहि भाससँ बहुत नव पैरोडी बनाएल जा सकैए। एकर अतिरिक्त आरो नाम अछि मुदा एहिठाम हम उदाहरण स्वरूप किछुए देलहुँ अछि। अपवादमे हम प्रदीप पुष्पजीक उल्लेख करब ओ गायक नै छथि मुदा फेसबुकपर अपन स्वरमे एहि गजलक शुद्ध पाठ केलथि जकर लिंक एही आलेखक अंतमे एकटा आन संदर्भमे भेटत। स्पष्ट अछि जे सीतारामजीक ई गजल गीत विधामे गहींर धरि गेल। आ एहि लेल बहुत तत्व जिम्मेदार छै पहिल तँ बहर (छंद) ओ काफिया, दोसर मिथिलाक शाक्त परंपरा, आ तेसर सरल शब्द। तीनू विशेषतासँ ई गजल अपन विधामे रहि कऽ गीत विधा धरि गेल इएह एकर सफलता छै। आब हमरा लोकनि लेल ई उचित जे लेखक केर सम्मान करैत, एकटा विधाक सम्मान करैत एहि रचनाक सही वाक्यक संग गायन हो, एहि रचनाक सही विधा देल जाए आ एहि रचनाक रचनाकारक नाम देल जाए। अन्यथा आब गजल विधा कमजोर नै अछि ओ अपन उचित स्थान लेब जनैत अछि। उपरक जे लिंक देखलहुँ तकर अतिरिक्त अन्नु कर्ण जीक गाएल ई भीडियो सेहो देखू- https://www.youtube.com/watch?v=T6XvSPbL9DY एहि लिंकक अलगसँ उल्लेख करबाक मतलब अतबे जे ई भीडियो जिनका द्वारा अपलोड भेल अछि से एहि गजलक संबंधमे बहुत कुतर्क केने रहथि प्रदीप पुष्प जीक वालपर जकरा अहूँ सभ एहि लिंकपर देखि सकैत छी https://www.facebook.com/pradeep.pushpa.7/posts/1414904502006571 हम उपरमे जतेक लिंक देलहुँ आ एकर अतिरिक्त आर जे लिंक हेतै ताहि ठाम जा-जा कऽ हमरा लोकनिकेँ एहि रचनाक सही विधा आ सही रचनाकारक नाम लेल कमेंट देबए पड़त आ ओकरा बदलबाबए पड़त ताहि लेल सभ गजल कार्यकर्तासँ आग्रह जे कविवरजी आ हुनक गजलकेँ उचित स्थान लेल जतेक संघर्षक जरूरति पड़तै से करथि। हम नीलकमल झाजीक लिंक उपर कमेंट दऽ एकर शुरूआत कऽ चुकल छी। परिशिष्ट- अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ मोबाइलक रुटीन विवेका बाबूकेँ बड्ड फिकिर लागल रहैत रहनि।घरनी काँटीबालीकेँ कहलथिन- "अइ, अपनेक बालकक चरजा हमरा एकोरत्ती सोहा नहि रहल अछि।जखन-तखन मोबाइल पर लागल रहैत छथि।राति दू बेरि निकास जाइत छी।दूनू बेरि हुनका जगले आ मोबाइल पर लगले देखैत छियनि।जीह लहरि जाइत अछि।कथी इदिर-बिदिर करैत रहैत छथि, नहि जानि!किदन-किदन बाजितो रहैत छथि कनटोपा लगेने।गोली मारो,पकड़ो,..... की-कहाँ अर्र-दर्र बजैत सुनलियनि अछि।कखनहुँ ठठाक' सनकाह जकाँ हँस' लगैत छथि।पता नहि,केहन संगी-संगत छनि! हम तँ हिनक जीवन-भविष्य ल' क' बड्ड चिंतित रहैत छी।सुनै छलियैक-नो नॉलेज,विदाउट कॉलेज।कॉलेज त' कहियो पढ़' जाइत नहि छथि।पता नहि,मोबाइल पर कोन यूनिवर्सिटी खुजल छैक!बुझाक' कहियौन जे अपन मोबाइलक एकटा रुटीन बनाबथु।हरदम मोबाइल जोतने रहैत छथि,से अकरहर क' रहल छथि।एनामे कोनो दिन हमहीं कतहु पड़ा जायब।से कहि दैत छी!" काँटीबाली कहलथिन- "अरे ओ गेम खेलैत रहैत छैक।ओही पर पढ़िया- लिखिया सेहो करैत रहैत छैक।अहाँ अनेरे एहि सभमे नहि पड़ू आ हमरा पेड़ू नहि! जाउ अपन ऑफिस।बेमतलब धिया-पूता पर खिसिएबाक जमाना नहि छैक।की-कहाँ क' लै छैक गे माय गे माय!देहो भुलकि गेल।जाउ, हमर माथ नहि खाउ!" साँझमे ऑफिस सँ आबि विवेका बाबू ओछान पर देह मोड़क लेल पड़ि रहलाह।ओतय सँ हॉलमे बैसल पुत्र पर नजरि गेलनि। ओतय आबि कुरसी पर बैसि गेलाह।कनी कालक बाद बजलाह- "बौआ,एकटा बात कही?खराप लागत त' नहि कहब!" बेटा कहलथिन- "कहू ने पापा! खराप किएक लागत?" प्रसन्न होइत बजलाह- "वाह, इ ने भेल हमर बेटाबला गप!देखू बेटा, हम अपना लेल नहि,अपितु अहींक लेल कहैत छी।एखन अहाँ जलखै क' रहल छी।एखनहुँ एक हाथ मोबाइले पर चलि रहल अछि।एक बेरिमे एक्केटा काज करू।भरि राति जागइ छी,आठ बजेक बादे सूतिक' उठैत छी।इ कोनो नीक बात थीक?गैसक समस्या भ' जायत।स्वास्थ्य गड़बड़ा जायत।तखन कोनो काज नीक सँ नहि क' सकब!मोबाइल सँ हमर कोनो शत्रुता नहि,मुदा अति सर्वत्र वर्जयेत्।तेँ एकटा रुटीन बना लिय'।एक नहि, दू, हे लिय' तीन घंटा मोबाइल चला लिय'।मुदा सदिखन ओही पाछाँ रहब,अहाँ सन बुधियार बेटा सँ हम इ अपेक्षा नहि करैत छी।की,अनुचित कहैत छी?" पुत्र कहलथिन- "पापा, अहाँक कहब सर्वथा उचित अछि।हम मोबाइलक रुटीन बनाक' अहाँकेँ देखबैत छी।" आधा घंटाक उपरांत ओ रुटीन बनाक' अयलाह।कहलथिन-"मात्र दू घंटा अपना लेल मोबाइल चलेबाक समय निर्धारित केलहुँ अछि।"विवेका बाबू प्रसन्न भ' बजलाह- "वाह, मोन खुश क' देलहुँ।" अगिला दिन फेर पुत्रकेँ मोबाइल पर लागल देखि कहलथिन- "बौआ! फेर मोबाइल?आ रुटीन?" पुत्र मुँह पर आँगुर राखि कहलथिन - "वाइवा चलि रहल छैक!" विवेका बाबू चुप लगा गेलाह।साँझमे पुत्रकेँ पुछलथिन- "यौ,अहाँ अपन रुटीन देखाउ त' बौआ!कनी हमहूँ त' देखी जे कोन रुटीन बनेलहुँ अछि!" पुत्र रुटीन आनि देखेलथिन- 'भोर 10बजे सँ साँझ 5 बजे धरि- ऑनलाइन क्लास। साँझ 5बजे सँ राति 10बजे धरि- क्लास-आधारित स्वाध्याय। राति 11 बजे सँ 1 बजे धरि -मात्र दू घंटा अपना लेल मोबाइल पर मनोरंजन/गेम/फेसबुक/व्हाट्सएप्प आदि।' विवेका बाबू कपार पीटि लेलनि।अपन ऑफिसक सहकर्मी लोकनि सँ पुछलथिन।सभक समान व्यथा।बड़ा बाबू कहलथिन - "देखू,तनावमे हमहूँ छलहुँ।अहीं जकाँ हमहूँ बड्ड उद्योग-उपाय केलहुँ।अंतमे केलहुँ की,त' हमहूँ एकटा एंड्रॉइड मोबाइल कीनि लेलहुँ।हम घर जाइते मोबाइल ल' क' बैसि जाइत छी।बस,आब संसारमे अट्ठाबजर ने खसि जाउ, हमरा लेल धनि सन!देखू, संसारक गतिक संग तालमेल मिला लिय'।कोनो तनाव नहि हैत।"विवेका बाबू तहिये अपना लेल एकटा एंड्रॉइड मोबाइल किनलाह।आब दूनू बापूत अपन-अपन संसारमे मगन छथि। काँटीबाली एकदिन कहलथिन- "एकटा एहने फोन हमरो किनबा दितहुँ!हथौड़ीबाली बड्ड चोट मारैत रहैत छथि।आइ मान चढ़ाक' की कहैत रहथि जे बुझलखिन हे बहिन!हमहूँ मोबाइल कीनि लेलियैन।आइकाल्हि ओहि लोककेँ कोनो लोक बुझै छैक लोक,जे एकटा मोबाइलो नहि राखत!की करत पाइ राखिक'? ल' जायत संगे उप्पर?आँय?" अपन मंतव्य editorial।staff।videha@gmail।com पर पठाउ। मुन्नाजी लघुकथा- बीचला लोक हमर साहित्यिक यात्रा कथा लेखन सं प्रारम्भ भेल छल. पहिल कथा-" मनियाडर" झंझारपुर कथा गोष्ठी (1993) मे पाठ पहिल प्रकाशनार्थ कथा " स्वीकार " कर्णामृत (1994) दोसर , प्रदीप बिहारीक संपादन मे सझिया संगोर " भरि राति भोर मे '(1997) तकर अतिरिक्त विदेह, मिथिलांगन....मे. ओइ बीच बीहनि कथा विधा फरिछाब' मे लागल आब ओ पाटि ध लेलक. पुन: कथा दिस....क्रमश: अपन तेरहम आ हिजड़ा जीवन पर लिखल टटका कथा प्रस्तुत ऐछ! सलाह, सुझाव सादर अपेक्षित!-मुन्नाजी वाह!आइ त' जतरा सुफांटि निकलल! तीन दिन सं बौआ-टौआ कें खाली हाथ घर घुरि जाइ! लगैए आइ परोपट्टाक मए सब चिलका जन्म देनाइ बन्न क' देलकैए! अपन अन्न पानि खा कते दिन निमहब? पहिने जाहि गली, मोहल्ला मे पएर दी घोघतनिया बाली सब सेहो कहि दिए-"फल्लां गाम बाली के बेटा भेलैए! "जाउ ने धनगर आ समंगर दुनू छै! खोंइछा, झोरा-झपटा सब भरि देत! धिया पुता सेहो पछोड़ लागि सुना दिए -" ओकरा घर मे बेटा एलैए, चलू ओकरे दुरा पर जमघट जमतै! "यै मइयां आब जनी जाति के चिलका नै होइ छै? धौर हेतै किए नै, ऐ तोर मे सबटा छौंड़ीए भफएल छलै! बेटा सुनिते,हिजड़बा-हिजड़नीक झुण्ड ढोल, हरमुनिया ल' ढ़ूकि जाइ ओही अंगना! रहै त' सबटा हिजड़नीये साया, साड़ी आ ब्लौज पहिरने! कियो कियो सलवार समीज मे आ ओढ़नी ओढ़ने! ओही मे सं कियो कियो जिन्स, टीशर्ट पहिरने, बाबरी छंटेने हिजड़बा भ' जए! आ बांकी सबटा जनी जातिक भेष मे छाती बढ़ेने ऐन मेन मौगीए बुझू! सांच मे त' इ सब ने स्त्री ने पुरूष, बीचला लोक, भगवानक डांग देल! मुदा समाज मे रहै बसै लए कपड़ा लत्ता आ बोल सं पानिगर! देहगर आ दुधगर सेहो! पएरक घुंघरू सं लोकक मोन हरिया दान, धान आ पाइ ल' घर घुरए ! मिथिला मे बेटाक जन्म पर लोकक मोन हर्षित केनाइ पमरियाक काज छल! इ इस्लाम धर्म माननिहार ' पमार' जातिक एकटा वर्ग पेशाक रूप मे अपना लेने छल! इ सब झुण्ड बना गामे गामे पता करैत रहैत छल -' कोन घर बेटा जन्म लेलक! "एकरो रेवाज मे आने पौराणिक रेवाज सन कान्या बारल रहै छलै! कोनो घर कान्या जन्मक खबरि पाबि ओ घर बागि चलए. जखन की एकर पुरूष झुण्ड मोन बहटारै लए किछु सदस्य कें घघरी पहिरा स्त्री वेश मे नचबैए माने राज नर्तकी सं लोक नर्तकी धरि, पेशा मे सेहो स्त्री के नचएब समाज कें बेसी पसिन्न.मिथिला मे लौण्डा नाचक प्रथा नै रहलैए.कबुला पाती मे छठिक घाट पर आंचर पर नटुआ नचएब होइ कि विवाह दान छकरबाजी नाच करतै पुरूष आ स्वांंग स्त्रीक.आ ताहि समाज मे बेटी जन्म पर ओकरा मनहुस बुझत.गर्भहि जांच लग सं ओकर प्रताड़ना सं समाज एकभगाह सन भेल जाइछ.एक दिस बेटी जन्म पर बान्ह आ दोसर दिस जीवनक संपूर्णता आ कि मोन बहटारबाक प्रमुख साधन बेटीये, स्त्री.यांत्रिक विकासें परम्पराक होइत पतन सं सामाजिक सरोकार सेहो भारल सन. आकि लोक विकासक गति नव नव रूचि मे परिवर्तित भ' रहल. हिजड़ा नाच सेहो तहि रूचिक संकेत थिक.आ आब हिजड़ा समाज सेहो तेजी सं विकसित भ' रहल. हय... हय तूं सब आङन मे कत' घूसल अबै छें? बाबा ,तमसाइ किए छी? की भेल अहां कें धीरज धरू ने.हम सब कोनो मुजरा बाली नै जे मोन आ देहक मनोरंजन क' ढ़ेका,जेबी ढ़ील क' घर घुरा देब. हय तों त' बताह जकां गप्प करै छें, हमरा की लालबत्ती बला बस्तीक गांहकि बुझै छें जे एना लोढ़िएने जाइ छें? नै यौ बाबा, हम सब अहांक सनक देखि कें चौल करै छलौं.हम सब कि कोनो कोठा बाली छी जे इमान, देह, धरम सब बेचि क' पेट भरब. हम सब अहीं सब सन माय बापक, इश्वरक डांग सं डेंगएल चिलका थिक. से इश्वरक गलती की हमर सबहक कर्तव्य दोष, नै जानि.एकहि कोखिक कियो सोझ कियो टेढ़ के त' परिवार, समाज राखिए लै छै. मुदा ओही कोखिक बीचला लोक माने नै बेटी ने बेटा के लोक मोन मारि बहटारि दैए.आ तहन हम सब मए बाप, सर समाजक निंहुछल एकटा नव समाजक अंग होइ छी.आ ओही तिरस्कृत समाजक हंसी ठठ्ठा मे समिलात भ' जीवन गुदस्त करैत रहै छी. छी त' हमहुँ सब मनुक्खे, सकलि सुरति , देह गात सं अहीं सन एकरंगाहे. मुदा प्रकृति प्रदत्त जे सृजनधर्मिता तकरा सं वंचित.समाजक लेल अशपृश्य त' नै मुदा कुड़कुट सन. सेहो अयोग्यता त' प्रकृतियेक देल. कोनो बलात् व्यवहृत वस्तु जात त' नै ने हम सब. तहन बाबा एना हिज्जो किए ? ऐ हिजड़ा जातिक एत' कोन खगता ?.हमरा घर त' पोती आयल, पोता नै ने! तहन कथीक हंसी खुशी. जो तों सब आन दुआरि,आन टोल, गाम. ताकुत कर गे नवजात बेटा आ घरन्दार घर. तों किन्नरवा सब हमरा बखसि दे,नेहोरा करै छीयौ. तों सब नाच गान कर तोहर सएह काज ने! जो धन संपति अरज पेट पोस! बाबा, हम सब किन्नर नै, हिजड़ा छी, हिजड़ा. मुदा किन्नर जातिक गुण सेहो अंगेजने छी, पेट पोस' लेल. किन्नर त' सृष्टिक आदिये काल सं छल, वनवासीक रूप मे. जाहि मे नर नारी दुनू फराक छल. जे स्वर्ग लोक मे नर्तक नर्तकी ( नचनिया) रूप मे उपस्थित रहै छल. रामायण- महाभारत सब काल मे नचनिया निमित्त रहल. मुदा हिजड़ा प्रकृतिए सतएल एहेन जीवात्मा ऐछ जे ने नर छल आ ने नारी.कालान्तर मे लेखक सब किन्नर आ हिजड़ा के ओहिना मिझ्झर क' देलक जेना सबटा वनस्पति घी भेल डालडा आ सबटा वाशिंग पाउडर सर्फ कहए लागल.पौराणिक ग्रन्थ ज्योतिष शास्त्र फरिछौने ऐछ जे "- कोनो स्त्री मे चन्द्रमा, मंगल आ सूर्यक लग्ने गर्भधारण होइछ.शारीरिक संबंध मे वीर्यक अधिकाधिक उपस्थिति सं बेटा, रक्तक अधिकाधिक सं बेटी आ दुनूक समान उपस्थिति सं नपुंसक वा हिजड़ा चिलका जन्म लैछ.ओना विज्ञान तकरा नै मानैए.विज्ञानक अनुसार गर्भधारणक विकासक क्रम अवरुद्ध भेला सं मिलावटी जननांग (intersex) के संभावना बनैछ.एकर कारण मे संबंधक अनियमितता, दवाइ सेवनक उनटा प्रभाव, क्रोमोजोम मे एक्स- वाइक जग्गह एकाकी उपस्थिति आदि होइछ. बाबा, एकटा बात गिरह बान्हि लियय जे जन्मक समय सब बच्चा हिजड़ा नै रहैछ.सिरखारी सं सब पुरूषे सन रहैछ, मुदा अविकसीत जननांग रहैछ, टेस्टोरेनक अभाव सं छाती त' विकसीत होइछ मुदा अविकसीत लिंग उपस्थित रहैछ. करीब अस्सी प्रतिशत एहेन चिलका सर्जरीक पछाति कोनो एक रुप पबैछ. किछु सफल ऑपरेशन सं पूर्णत: पुरूष वा पूर्णत; स्त्री काय मे सेहो नवजीवन पौलक. हय ,सुन ! हम कोनो स्कूलक कक्षा मे नै बैसल छी. तों तहन सं इतिहास, भूगोल, विज्ञान पढ़ेने जा रहलें. तोहर सबहक इश्वरक डांग सं समाजिक आ मानसिक स्थिति दारूण छौ से बुझै छी. मुदा आब की अंग्रेजी शासकक सत्ता थोड़े छै जे तोरा सबकें उभयलिंगी दर्जा आ अधिकार छीनि कें नक्सली की अपराधीक श्रेणी मे द' देने छलै. तोहर एतेक भाषण सं जिज्ञासा भेल जे तों नाच गान मे मगन रहै बाली इ विशिष्ट ज्ञानी कोना भेलें? बाबा! हम पूरे हाइ स्कूल पढ़ने छी, आ अपन हंजेड़क मेट छी.अपन आ समूह सदस्यक अधिकार आ ज्ञान प्राप्तिक वास्ते स्कूल, कॉलेज, कचहरी आ मंत्रालयक चक्कर कटैत रहै छी....! समाचार चैनलक पैनल सदस्य छी! बाबाक जिज्ञासा शान्ति पछाति ओकर खून मे नव उर्जा प्रवाहित भेलै,आंशिक चमक बढ़िया गेलै.हलसैत बाजि उठल-" हं बाबा हं, अहूं के जेना हमर सबहक जिनगीक दुख दर्दक खिस्सा बुझले ऐछ! आब कहू जे हम सब सबहक सुख- दुख मे सहयोगीये , मुदा शायद अंग्रेजबा सब रहै उनटा खोपड़ीक . जहन अवसान अबै छै तहन अहंकार बढ़ै छै आ बुद्धि घटै छै. तें ने 1871 मे इ सब एकभगाह कानून पास क' हमरा सब कें अपराधिक जनजाति " जरायम "के श्रेणी मे द' देने छल. बुझू ओ सब हमर सोन चिड़ै सन भारत के कामधेनु गए बुझि दुहि दुहि खए, से भेल मालिक.जहन की हम सब मांगि चांगि खाइ. फेरो हंसाब' खेलाब' जाइ से भेलौं ओकरा नजरि मे अपराधी. धनि कहू सुभाष, खुदीराम आ गांधी बाबा ....सब कें जे ओइ कलमुहां सब सं देश के आजादी दियौलनि.तहन 1951 मे अपन सरकार हमरा सब कें से हो ' जरायम ' सं आजाद करा समाज मे रहि नाच- गान क' पेट भरि जीवाक अवसर देलक. समाजक ओलवा दोलवा सं कहियो हम सब खिन्न नै होइ छी. जे समाज अपन संगतुरिया के नै बखसैए से हमर सबहक कोना हएत? हम सब त' प्रकृतिए बारल सन. बाबा एकटा बात ध्यान राखब, बरू हम सब बारले सही मुदा असमाजिक नै. देहक भूख बरू नै जगौ मुदा पेटक भूख त' लगबे करै छै. ताहि लए त' नाच गाने क' हम सब अहां सबहक नजरि मे रहै छी. अहींक समाज जकां हमरो समाज मे जहन संख्या वृद्धि होइत गेलै तहन कते लोक बधइये मांगितै? सुनने हेबै जे खगता आविष्कारक जननी होइछ.त' हमहूं सब गुरूक आदेशे बस, ट्रेन, रेडलाइट पर थपड़ी पारि अर्थक जुटान मे जुटि जाइ छी. आम समाज सं बरू बारले मुदा हमर कतिएल बेरएल लोकक सेहो एकटा संगठित समाज त' ऐछिए. समाज की? इएह ने जे एक फरीकक,एक जीव वर्गक सामुदायिक जिनगी जीवाक समूह.त' हमहूं सब की एकरवा थोड़े रहै छी. जेना अहांक समाज जाति, धर्म, वर्ग मे बांटल मुखिया, सरपंच, माञिन्जन शासन त'र निमहैए तहिना हमहूं सब अपन देवीक समूह मे बांट बखरा भ' सामूहिक जिनगी जीवै छी यै ने यौ.हमर समूह चारि वर्ग मे संगठित ऐछ! सब वर्गक अपन अपन देवी छथिन. पहिल बुचरा,ऐ वर्ग मे कने पिताह, पुरूषाह आ उग्र सदस्यक प्रवेश रहैछ.इ देवी सेहो काली माय जकां उग्र त' ओ ऐ समूहक शांति भंग नै होम' देथिन, इएह लोक मान्यता छैक. दोसर नीलिमा, इ संयमित, संतुलित जीवन जीयय वाली देवीक समूह ऐछ.!ऐ मे स्त्रैण सदस्य सबहक प्रवेश देल जाइछ. जे राब दुआब नै, अपना कें दाबि राख' वाली सदस्य होइथ.तेसर समूह जाहि देवीक होइछ ओ कहबैछ मनसा, जाहि मे एहेन सदस्य कें राखल जाइछ जे जीवन सं अगुताइथ नै, अपन जीवन मे किछु नव करबाक आतुर होइथ.आ चारिम समूह होइछ हंसा देवीक.ऐ मे हुनकर प्रवेश होइछ जे सदस्य उडांत होइथ. जिनकर पोन, मोन आ जीह एक ठाम टिक कें नै रहि पाबए.एक समूहक सदस्य कें दोसर समूहक सदस्य सं कोनो राग द्वेष नै रहैछ.मुदा जे जाहि समूह वर्गक सदस्य तकर नियमक बन्हन मे बान्धल सन बुझू.अहीं सबहक पंचायतक मुखिया जकां हमरो समूहक प्रमुख नायक कहबैछ.सब समूहक नायक मिलि जुलि एकटा गुरूक चयन करैछ.हमर समाजक कियो सदस्य प्रतिभाशाली, बलशाली, मेधावी कि उजड्ड हो, गुरूक अपमान नै करैछ.हम सब खोपड़ी खपा कि थोपड़ी बजा जे धन अर्जित करै छियै ने बाबा ओ सबटा गुरूक चरण मे अर्पित क' दै छियै. से करियौ किए ने, उएह हमर सबहक पालक आ उएह अभिभावक. ऐ फाल्गुन शुक्लपक्ष मे वार्षिकोत्सव ऐछ, ऐ अवसर पर सब समूहक सदस्य एक निर्धारित जगह पर उपस्थित होइछ.सब अपन लहंगा- चुनरी, जेवर सं सुसज्जित, सजि धजि , दुल्हिन बनि आयल ऐछ. गुरूक आदेशानुसार इ पर्व विवाह अनुष्ठानक पर्व थिक.ऐ दिन सबहक सामुहिक विवाहक स्वांग रचाओल जाइछ.सबहक एकहिटा वर होइत छथि ' अरवण'. गाम, शहर सं बहरी जग्गह, सुनसान सन, अरवण देवताक प्रतिमा लगाओल गेल ऐछ! शमियाना मे लाइट आ डी. जे सं चकमक आ गनगन करैत दृश्य! सब हिजड़ा गण पतियानी बना, धुप दीप जरा ' अरवण' देवताक अराधना मे बैसि गेल. नायक द्वारा पूजन, हवनक संग सबहक सिनूरदानक रेवाज पूर्ण भेल.आब सब नाच गान करैत हर्षोल्लास मे रमि गेल ऐछ! इ त्योहार सांझ सं भोर धरिक होइछ. भोरूकवा मे गुरूक आज्ञा होइते ' अरवण' देवताक मूर्ति तोड़ि फोड़ि नष्ट क' देल जाइछ. तहि संग सब वधुगण अपन अपन चुड़ी फोइर,सेनुर मेटा, मंगल सूत्र तोड़ि वैधव्य धारण क' लैछ.रंग विरंगा साड़ी, ब्लाउजक जग्गह उजरा साड़ीक परिधान मे आबि जाइछ. मुदा विलापक प्रथा नै छै. कींवदन्ति ऐछ जे- महाभारत काल मे हिजड़ा गण वनवासी छल. ओइ ठाम एकरा सब कें राक्षसक उत्पात भेलै.जकरा सं संघर्ष क' अर्जुन पुत्र ' अरवण' आजाद करौलनि. तें इ सब रक्षक बुझि अपन पति स्वीकार क' लेलक.मुदा अरवण,युद्धभूमि मे लड़ैत ओही दिन मृत्यु गति के प्राप्ति क' लेलनि.ओइ दिन सं इ, एकदिना पावनि मनेवाक रेवाज आइ धरि निरन्तरता बनौने ऐछ! आइ सबहक जुटान एकठाम भेल ऐछ, पूरा चुप्पी मुदा मोन अशान्त सन! शान्तिक मृत्यु सं सब मोने मोन खुश भेल ऐछ,जए दहि एकरा त' मोक्ष हेतै.गै बिन्दा,ओना थोड़े पैट हेतौ चप्पल, जुत्ता ला ने.आ सब मिलि लहाश कें चप्पल, जुत्ता सं पीटैत कहैए- जो... जो गै फेर एम्हर नै अबिहें, जनमिहें त' मनुक्ख भ' कें! गै किरणिया तों किए नोर बहबै छें,पोछ! नै त' इ फेरो एम्हरे घुरि औतौ.पुन: शान्ति पसरि गेल ऐछ!अधरतिये मे लहाश कें खेत मे आनल गेल. हिन्दु धर्म मानितो लहास जरएब असगुन बुझल जाइछ. कियो बहरी बला लोकक दर्शन सं एकरा मोक्ष नै भेटतै तें चुपचाप खाधि मे द' झांपि चल. मना जे अगिला जन्म मे मनुक्ख होउ, नर- नारी किछो मुदा बीचला लोक नै. आइ चारू भर खुशीक च'प उनार गप्प पसरल छै.सब हिजड़ाक करेजा सुप सन भेल बुझू.ओना निर्णय समाजक हो कि न्यायालयक सार्थके बुझू.इ निश्तुकि बुझू जे सब निर्णय सब पर लागू नै होइछ.आ कि एना कहू जे सब बात सं सब लाभान्वित नहि होइछ. मुदा तै सं कि आइ 15 अप्रैल 14 हमर सबहक जीवनक इतिहास स्वर्णक्षार सं लिखल सन! किए त' अझुके दिन सर्वोच्च न्यायालय हमरा सब कें पिछड़ी जातिक श्रेणीक बराबर आरक्षणक घोषणा कएलक! आब पढ़ल लिखल कें नोकरी मे जग्गह सुनिश्चित सन. ओना पहिनहियो सं हमर लोक सब शिक्षक, प्रोफेसर, पार्षद आदि त' भेले छै.मुदा आब अधिकार संग हेतै.हं अधिकारक बात पर मोन पड़ैए वर्ष-94. जहिया हम सब टी.एन. शेषण कें नाचि गाबि मोन बहटारने रही.उएह त' पहिल बेर हमरा सब कें विधिवत मताधिकार प्रयोगक अधिकार दियौलनि.ओइ सं पहिने हमरा सब कें मतदानक ने कोनो अधिकार छल आ ने कोनो सरोकार.आब.. आब हमहूं सब सरकार भ' सकै छी आ हमरो सबहक सरकार बनि सकैए जेना एखनहु धरि अहां सबहक ऐछ! बाबा ओंघाइ छीयै की? ढ़ोल, हरमुनिया आ हाथ माइक नेने साड़ी ,समीज बालीक हंजेड़ अनचोके बुचकुन कक्काक आंगन में ढ़ूकि गेल। कनिञां घोघ तनैत,बुच्ची सम्हारैत,नुकबैत कोठरी ध' लेलनि।काकी छाती पिटैत-रौ दैब रौ दैब पोता- पोता रटलौं त' एलीह भगवती। तै पर सं हिजड़ाक झुण्ड।। क्षणहि मे सगरो टोल दलमलित!स्त्री गणक हेंज अंगना सं दुरा धरि सोहरि गेल छल।पमरियाक जग्ग्ह हिजड़ा देखि उत्सुकता दुन्ना।फरमाइस क' के गीत सुनै गेल। नाच-गानक बीच कक्का काकी के एक हजार थम्हबैत लियय किछु कपड़ा लत्ता जोड़ि विदा करू। यै मां इ लौथ एक हजार आओर मिला द' देथुन। गै मए गै मए,जेना बेटा जनमल होइ! मां,बेटा- बेटी नै,मए हेबाक सुख हर्षित केलक! हिजड़बाक मुखिया आओर पांच सए लगा घुरबैतकहलक-"मइयां,हे इ आशीष। " बेटीये से ने बेटा,बेटी सम्हारू त' जग चलतै।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जवाहर लाल कश्यप स्ट्रेश बस्टर "रागिनी जल्दी चलु 6.13 के ट्रेन भेट जायत तखन समय पर घर पहुँचब आ घरक काज जल्दी भ जायत" सुशीला ऑफिश स निकलैत रागिनी के हाथ ध क बजलीह / "नहि आई हम संगे नहि जायब /" "ओकर फोन आयल छल कि ?"w "हॉ ओकरे फोनेआयल छल कहलक जुहु मे भेट करु" रागिनी के मुँह पर लज्जा मिश्रित मुस्कान आबि गेल / ओकर बाद दुनु अलग अलग दिशा मे मुम्बई के भीड के हिस्सा भ गेलीह /मुम्बई के भीड, भागैत भीड, एक दोसर स आगा बढबा के होर लैत भीड, धकियाबैत मुकियाबैत भीड, पता नहि ई होर कहिया खतम होयत / ओहि भीड के अंग बनि सुशीला अन्धेरी स्टेशन पर आबि गेलीह / ट्रेन पहिले आबि गेल छल आ लगभग भरि गेल छल /ओ ओहि मे चढि गेलीह / बैसबाक नहि मुदा सोझ स ठाढ होबाक जगह भेट गेल छल / समय बीति रहल छल आओर् लोक ट्रेन मे चढल जा रहल छल / तिल रखबाक जगह नहि छल मुदा आदमी तैयो सन्हियायल जा रहल छल / मुम्बई के ट्रेन मे भारतक छवि देखल जा सकैत अछि / कोना नाना धर्म, नाना जाति , भिन्न-भिन्न प्रकार के वेश धेने सब एक संग समाहित भेल अछि आ अपस्यॉत भेल जिन्दगी जीबय लेल आ देश चलनिहार के गारि पढबाके लेल विवश भेल छथि / ट्रेन चालु भेल आ सब कियौ भगवानक जयकारा लगेलक / सुशीला रागिनी के लेल सोचय लगलीह हमरा त अप्पन काज स फुरसति नहि होईत अछि, आखिर कोना ओ सब काज करैत हेती /अप्पन आफिसक काज , घर मे दुनू बच्चा के काज , पति के काज तखन बॉयफ्रेंडक नखरा से अलग / पता नहि भारतक पतन आ पाश्चात्यक नकल कतय जा रुकत / * * * "आई पहिले आबि गेलहुँ" सुशीला घर मे घुसैत आँफिस स आयल अप्पन पति के देखि बजलीह / खुशी बड्ड भेलन्हि मुदा भरि दिनक झमारल मुँह पर ओ खुशी नहि आबि सकल आ मोनक ओहि खुशी के राहुल (पति) नहि देख सकलाह / राहुल व्यंग केलथि ,"चलु आई गलती भेल आब हम जल्दी नहि आयब /" "हाँ जल्दी आबि क हम्मर उपकार केलहुँ . . ." सुशीला खिसिया गेलीह "तखन स टी व्ही देख रहल छी / एक कप चाह नहि पिने होयब ? रवि (बेटा) के स्कुल स आनि लाबितहुँ, सेहो नहि केने छी…." राहुल बीच मे खिसिया क बजलाह "एक दिन हम सबेरे आबि जाउ तकर मतलब जे सब काज हमहीं करु /" "नहिं , आबि क टीव्ही देखैत रहु " सुशीला बैग राखैत, जबाब डेल्खिन्ह् / हन हन करैत , घरक दरबज्जा जोर स बन्द करैत, रवि के लावय लेल स्कूल विदा भ गेलीह /भरि रस्ता अप्पन क्रोध के शांत करबाक प्रयास करैत रहली मुदा क्रोध छल जे शांत हेबाक नाम नहि ल रहल छल / पता नहिं पुरुख जाति कहिया स्त्री के अपन सम्तुलय मानत / जतेक काज ऑफ़िश मे ओ करैत अछि ततेक त हमहुँ करैत छी, तखन कथीक घमंड / रवि के स्कूल मे छुट्टी होमय बला छल गार्जियनक लाईन लागल छलै, सुशीला मोने-मोन खिसियाईत पता नहिं ई लाईन स कहिया छुट्टी होयत जतय जाउ ओतय लाईन, बस मे लाईन, ट्रेनक टिकट मे लाईन, रोड पर गाडी के लाईन/तखने छुट्टी के घंटी बाजल / बच्चा सब अप्पन-अप्पन गार्जियन सब लग आबय लागल/ रवि के कुम्हलायल फुल सन सुखायल मुँह के देखिते सुशीलाक क्रोध ममत्व मे बदलि गेल / अप्पन जमाना याद आबय लागल / एकटा स्लेट ल क स्कूल गेनाई ,जतय पढाई कम,मौज-मस्ती ज्यादा /पढाबय के जगह पर कुर्सी पर बैस क सुतय बला मास्टर साहेब पासवान जी /खिस्सा सुना क पढाबय बला चन्द्रकांत बाबु /आब अपना स ज्यादा भाडी बैग /डिसिप्लिन के नाम पर बच्चा के टार्चर करैत सर / अहि चक्कर मे हरा गेल बचपना / सुशीला अहि बात के सोचैत अप्पन घर आबि गेल आ आबिते क्रोध अप्पन चरम पर पहुँच गेल / राहुल घर मे नहि छल, घर मे ताला लागल छलै आ घर के दोसर चाभी सुशील के बैग मे रहै / राहुल के मोबाईल स्विच आँफ छलै आब एकटा उपाय छल जे पडोसी के घर मे बैस इंतजार कैल जाय आ सुशीला वैह करय लगलीह /ज्यों-ज्यों समय बितैत छल हुनकर क्रोध चरम पर जा रहल छल / ओ आ रवि दोसर के घर मे बैसल परेसान भ गेल मुदा राहुल के कोनो पता नहिं / रातिके 9.35 मे राहुल घर आयल आ अप्पन गलती पर सफाई देनाई सुरु केलक, सुशीला ओकरा बिना सुनने अंदर आबि गेलीह / राहुल -" साँरी हमरा ई अंदाज न......... सुशीला- "चुप भ जाउ हमरा कोनो बात नहि सुनय के अछि /" सुशीला के क्रोध देखि रवि त सहमि गेल मुदा राहुल और खिसिया गेलाह / ओहि राति दुनु प्राणी मे खुब झगरा भेल / राहुल सुशीला पर पहिल दिन हाथ छोडि अप्पन पुरुषत्व सेहो प्रदर्शित केलाह /तीनु प्राणी भुखले सुतलाह / रातिक घटनाक प्रभाव भोर मे सेहो देखल गेल / राहुल बिना खाना खेने चलि गेलाह /सुशीला रवि के खाना खुआ स्कूल भेजि अपने बिना खेने चलि गेलीह / फ़ेर सुरु भेल ट्रेनक वैह भीड / अंधेरी मे ट्रेन स उतरि ऑफिस के लेल बिदा भेलीह तखने रागिनी के फोन आयल कहाँ छी हमहुँ अंधेरी आबि गेल छी / सुशीला ओकर इंतजार करय लगलीह /किछु देर मे खुशी मोन रागिनी आयल आ दुनु आँफिस के लेल बिदा भेल /सुशीला -" कि बात छै आई बहुत खुश छी /" "हम त अहिना खुश रहैत छी" रागिनी के जवाव छल "जिंदगी के एकटा मकसद अछि जे खुश ऱहु /" सुशीला -"एकटा बात पुछु खराप नहि ने मानब ?" पुछु.... "अहाँ जे दोसर लडका स भेंट करय जाईत छी से के अछि ?अहाँक बियाह भ गेल अछि, दू टा बच्चा अछि तखन ओकर की महत्व ? ओ अहाँक के अछि ?" रागिनी के मुँह पर मुस्कान आबि गेल -"ओ हम्मर कियौ नहि अछि आँफिस मे सर स परेशान आ घर मे पति के पुरुषत्व स / बस ओ स्ट्रेश बस्टर छै ,स्ट्रेश बस्टर ............. ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.नबोनारायण मिश्र- ई कीर्तिमान बनल ३.२.आनन्द कुमार झा- मात्सर्य ३.३. विजय इस्सर ’वत्स’- अपराधी छी हम ३.४.रमन कुमार झा-रूसा-फुली (भगवती वंदना) नबोनारायण मिश्र ई कीर्तिमान बनल
जे छल खास अपन आइ सैह अछि आन बनल। अभिशप्त जीनगी हमर, अवगुणक खान बनल।।
जकरे हित-साधन मे, रहलहुँ सभदिन लागल। तकरा नजरि मे आइ, हम छी अकान बनल।।
एहि आर्थिक-युग मे, टाका अछि सर्वोपरि। टाका बिनु जिनगी, जे ना सुन्न-मसान बनल ।।
फुसि-फटक बाजिकड, सभके ठकैत रहल। बिडम्बना एहन जे, आइ वैह अछि महान बनल।।
पुण्य भूमि मिथिलाक, कण-कण जुड़ा गेल। मैथिलीक संबर्द्धनार्थ, शंशोधित संविधान बनल ।।
श्रेयले बाक लुझि मे, हमहीटा पछु आयल । अपन पीठ ठोकि-ठोकि, सभ पहलमान बनल।।
जयकारक उद्घोष करैत, बेमत्त मैथिलीभाषी। अभिनन्दन समस्त मनीषी के जनिक प्रयासे ई कीर्तिमान बनल।।
(मूल पाठ कर्णामृत अक्टूबर-दिसम्बर २००७सँ साभार) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आनन्द कुमार झा मात्सर्य जहिया पहिल बेर ओ पकड़ने रहै हरक लागनि करै लागल रहै हरबाहि जोतए लागल रहै खेत नहि फाड़ल भेल रहै सोझ सरदर सिराउर दू दालि जॅका फोड़ि देने रहै बड़दक पीठ आबै काल लगा देने रहै बड़दकेॅ फाड़ बाबा देखिते छिनि उसाहि देने रहथिन पेना आ कहि देने रहथिन सीखगे कोनो आन इलिम नहि बनै जोग छेॅ हड़बाह कवि - आनन्द कुमार झा, मेंहथ, झंझारपुर - 847404 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विजय इस्सर "वत्स" अपराधी छी हम केकरा कहबै,के सुनतै किए मानत क्यो हमर बात सभक अपन अलगे ज्ञान बुद्धि आ संस्कार सभकेर भिन्नहि अछि चालि-चलन-व्यवहार कहाँ सुनलियै हमहूँ कहाँ बूझि सकलियै कहाँ मानल हमर मोन हमरा सँ एकहु बेर कतय गेल छलैक हमर ज्ञान बुद्धि आ विवेक जहन हमर आत्मा कहै छल हमरा सँ हमरे लेल,हमर बात डेगे डेग,बेरम बेर। केकरा पर उठायब आँगुर कोना कहब केकरो दोषी की गुणब अपराध आनक जखन हमहीं हतने छी हमर अपन आत्मा के मारने छी अपन मोन के कल्पेने छी अपन काया के केने छी कतेको अपराध अनुचित व्यवहार सँ केने छी बहुत खेलबार अपन संस्कृति-संस्कार सँ हमहीं सभसँ बेसी दोषी अपन आंतरिक अदालतक सभसँ पैघ अपराधी छी हम। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रमन कुमार झा रूसा-फुली (भगवती वंदना) मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। हम खसलउ बिचेऽ ठाम अहाँ करय छी आराम, जीवन रुकल बिचे ठाम बिगैर कऽ हम बैसल छी उजैर कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। केलियौ ऐहन कोन अपराध भटकय छीयउ बाधे बाध, छाहैर ताइक रहल छी सउसे छिछिया कऽ थाइक गेलउ डिरियाऽ कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। छोरले मेऽ गय हमर संग हम्मर मोन लगय छउ तंग, टुकटुक तकय छियौउ नामे सुमैर कऽ भेटय नय छेऽ जइन कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। धकधक करय छउ करेज साँस फुलय छउ बड्ड तेज, क्षण क्षण बितय छउ पहाड़ ई सोइच कऽ जीवन बितलौ नइच कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। घिरनी बनल छियउ माय आर कतेऽ नचेमेऽ दाय, घुरमा लइग रहल छउ गोल गोल घुइम कऽ माया मोह डुईब कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा -फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। सुजझय नय छउ कोनो बाट लगलउ दरशन केऽ उचाट, हमरा बिसैर गेलेऽ तू मामत अपन समेट कऽ संग सिनेहिया छोइर कऽ ना , मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ। हम नय रहबउ बेसी दिन हमरा नय छउ किछ पसीन, रहबउ तोरो संग हरदम मील कऽ संग सिनेहिया जोईड़ कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। अबही जल्दी हमरा लऽग रमन के नय आब ठग, नेना शोर पराय छउ सबहक आस छोइर कऽ देखही कने पलऽइट कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.ममता कर्ण- उपराग ४.२.कंचन कंठ- हमर नानीगाम ४.३.सविता 'सुमन'- स्त्री ४.४.सुचिता कुमारी- पोतीक बियाह ४.५.अनुपम रैना- यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज ४.६.अनुपम रैना- यात्रीक गद्य-साहित्यमे मिथिला समाज ममता कर्ण उपराग मरैई वाली चाची खुब झटकारने नमहर नमहर डेग बढ़ेने रस्ता मे दिखाई देलैथ । पुछलियन्हि लाल काकी कत जाई छी , फरियाक किछ नै बजलैथ लेकिन चेहरा पर खुशी साफ झलकैत रहैन्ह । (टोला मे सब हुनका लाल काकी कहैत छैन्ह ) दुआरे पर स हल्ला करैत बड़की दाई के अँगना पहुंच ल खिन्ह ,दाई ऐ बड़कि दाई कत छी बाहर निकलु । बड़कि दाई भानस घर में आँटा सनैथ रहथिन्ह लाल काकी के अवाज सुनि क अँटे हाथ सं बाहर एली लाल काकी आऊ बैसु कि बात छै । बैसब त हम बाद में पहिले हमर उपराग सुनि लिय ,सुनलौंह संतोष बौवा हवाई जहाज के पायलट बैन गेलैथह , मर मिठाई भोज भात त दुर अपना मुहँ स ई खबर भी नै सुनेलौंह । दोसर के मुहँ स सुनिक आबि रहलौंहँ । मालती पिसीया बड्ड शांत भाव स बजली हँ काकी बौवा फोन त केने छल पर सही बात त बौवा के एला के बादे बुझब । मालती पिसीया गामक बेटी छैथ ,घर के बड़ बेटी सब हुनका बड़कि दाई हहैत छैन्ह । संतोष जखन डेढ़ साल के रहथिन्ह तखन पापा कोनो हादसा मे खतम भ गेलखिन ,तहिया स मालती पिसीया नैहरे में रहिक बड़ दुख स अपन बेटा संतोष के पालन पोषण केने छैथ । दुख के झेलैत झेलैत सुख के अनुभुति जेना हुनका स कोषो दुर भ गेल छैन । ताहि स बेटा के नौकरी वला बात भी हुनका बिषेष प्रभावित नै क सकलैन ।पर लाल काकी के उपराग हुनका निक लग लैन । बजली काकी अखन चाय स मुहँ मिठा करु बाद मे सब हेतै । -ममता कर्ण, जमशेदपुर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। कंचन कंठ हमर नानीगाम हमर नानीगाम प्रसिद्ध अछि जतय छलाह महाकवि पंडित लाल दास जे छलथि हमर परनाना अद्भुत विद्वान् माँ सीताके दियौलनि मान सहस्र रावण के पराजयक वर्णन सुनि सुधीजन भय गेलाह मगन स्त्री धर्म शिक्षा पर पोथी लिखि जन जनमे भ' गेलाह अमर छलाह पंचभाषाऔ तंत्र क ज्ञाता ओ लिखल अठारह पोथी गाम खड़ौआ के स्कूल आ मंदिर ओ पोखरि झाँखरि सभसँ अमिट भेल नाम हुनकर । तनिकर बहुआसिन हम्मर नानी ओकर ममता कतेक बखानी हमर नानी छलीह बड्ड सोझ माथ पर धयने काजक बोझ मुदा तखनहुँ छुटय ने ईश भजन हाथ में काज मुँह में राम सबहक कयलीह सभटा निमेरा कखनहुँ नहि होइ मुँह मलिन गाबथि सिखबथि भजन सभ दिन कतेक सुआदु ओ तरकारी तीमन सोहारी बनाबथि ने परथन खसय सभ दिन हमर सभके हृदय बसय चलि भेलीह रामनवमी दिन राम जपथि रामहि मे लीन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सविता 'सुमन' स्त्री हम स्त्री छी हम जननी छी हम माँ छी हम बेटी छी हम पत्नी छी हम बहु छी कतेक हिस्सा में हम बंटल छी सब लेल जिए छी मुदा खुद के पहचान भूलि जाइत छी मिटा देइत छी अपन अरमान चुल्हा के आगि में भूला दैत छी अपन पहचान घरक काज में भोर सौं सांझ धरि चक्की जेना पिसाइत छी सभक चेहरा पढि सभक जरुरत पूरा करैत छी सभक ठोर पर मुस्कान आनैत छी मुदा अपन आंखिक नोर आंचर सौं छुपा कऽ पोछैत छी हम स्त्री छी कतबौ पढ़ल लिखल संस्कारी छी घरे में हराएल हम नारी छी आगु तऽ बढे दिअ हमरो कंधा सौं कांधा मिला के चलऽ तऽ दिअ हमरो कोमल हृदय हम स्नेह के अभिलाषी छी रचे छी श्रृष्टि मुदा प्रेमक प्यासी छी........ - सविता 'सुमन', सहरसा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सुचिता कुमारी पोतीक बियाह
राम दुलारी काकी के बड़की पोतीक विवाह ठीक भेलनि अछि। बड़का बेटाक फोन आएल रहैन जे छोटका संगे विवाह में आबि जाएब । काकी के दूटा बेटा रहैैन, बेटी नहि देने रहथिन भगवान तैं पोतीक विवाह देखबाक बड़ मोन रहैन हुनका। अपन बियौहती हार ओकरा देबाक वास्ते काकी रखने रहथिन। विवाहक खबरि सुनिते ओ जेबाक ओरिआओन में लागि गेली। काकीक बड़का बेटा कलकत्ता में बड़ पैघ वकील छलैन, मुदा छोटका के नहि कोनो नोकरी भेलै, आ ओ खेतीबारी सअ अपन परिवारक भरणपोषण करैत छल। बाबूक मरलाक बाद माएक देखभालक दायित्व सेहो एकरे छलैक। विवाह में जेबाक तैयारी पूरा भेलाक बाद काकी छोटका सअ पुछलथिन "कहिया जेबहक कलकत्ता? " "से कियैक" "पूजीया के बियाह छैक से बीसरि गेलहक? " "मुदा माए हम बियाह में त नहि जा सकब। " "से कियैक? " "अहा त बुझिते छी जे हमर आर्थिक हाल नीक नहि अछि, आ एहि बेर फसिल बढिया नहि भेल। आ फेर कलकत्ता जाए में त टाका लगतै से कहाँ सअ लाएब। भैया तअ सीधे एबाक लेल कहि देलाह, एको बेर पुछबो नहि केलाह जे टिकटक पाइ छह कि नहि? " "बेटीक बियाह में अपने कतेक खर्च होइत छैक त तोरा ओ पाइ लेल की पुछतह। " "हमरा छोरु मुदा अहां तअ माए छिऐन अहां के त आबि कए लअ जएता, आ नहि त कम स कम टिकटो कटा कअ पठबिताह। हमर हाल तअ बुझले छैन हुनका। " "छोड़ह ई सब गप्प, तु नहि जेबह तअ नहि जा मुदा हम त जाएब, हमरा लग किछु टाका अछि, जाहि से आबए-जाए के टिकट भ जाएत। " "मुदा अहां जाएब ककरा संगे। " "हम एसगरे चलि जाएब, तु गाड़ी पर बैसा दिहअ, आ बडका के फोन कअ दिहक, ओ हमरा कलकत्ता स्टेशन पर आबि क लअ जाएत। " "ठीक छै त अहां काल्हि गाड़ी पकड़ि लिय परसु बियाह छैक ,ओहि दिन भिनसरे पहुंच जाएब। आ फेर जहिया एबाक होएत हमरा फोन कअ देब हम दरभंगा स्टेशन पर स अहां के लअ आएब। " "ठीक छैक। "
एम्हर कलकत्ता में बियाह दिन सभ गोटे तैयारी में लागल छलाह। बरियातीक एबाक समय भअ गेल छलै। कन्याक पिता अपस्यात भेल काज में लागल छला कि तखने देखैत छैथ जे माए आगु में ठाढ छैथ। "माए अहां, एखन एलहुं, सबेरे किएक नहि एलहुं, आ एसगरे एलहुं, छोटका नहि आएल संगे ? " "छोटका नहि आबि सकल, हमरा गाड़ी में बैसा कअ ओ कहने छल जे तोरा फोन कअ देतह , आ तु स्टेशन आबि जैतह। गाड़ी त भिनसरे पहुँच गेल , कतेक काल तोहर बाट तकलहुं तु नहि एलह दुपहरिया भअ गेल तखन एकटा टैक्सी पकड़ि ओतअ स बिदा भेलहुं, कतेक बौआ क एखन घर पहुँचलहुं। "मुदा हमरा फोन नहि आएल, ऐ यैइ काल्हि छोटकाक फोन आएल छल? " "हं फोन त आएल रहै, मुदा अहां काज में व्यस्त छलहुं, तैं हम नहि कहलहुं। " पत्नीक उत्तर स वकील साहब खीसीया जाइ छैथ, "अहांक कारण माए के कतेक परेशानी भेलैन, आ अहां बादो में नहि कहलहुं जे छोटका फोन केनेे छल। " "जै दहक की भेलै बियाह स पहिने हम आबि त गेलहुं, आ कनिया पूजा कतअ अछि कने देखतियैक "। " ओ अपन रुम में तैयार भ रहल अछि। " "हम ओतहि जा कअ भेंट क अबै छी। " काकी जा कअ पोती के भरि पांज धअ लैत छथिन, आ गर में अपन बला हार पहिरा दैत छथिन, ताबेत पाछु-पाछु पुुतोहु सेहो आबि जाइ छैन। "मम्मी दादी के एतअ कियैक लअ एलियन, ओ हमर सभटा मेकअप खराब क देली, आ ई ओल्ड फैशन हार हमरा पहीरा देली अछि। " "कोनो बात नहि बेटा अहां अपन मेकअप ठीक कअ लिय,आ ई हार लाउ हम राखि लैत छी। आ माए ई चलते किछु जलपान क लेथ। " किछु काल बाद काकी जखन जलपान करैत जलील त हुनक कान में बेटाक स्वर सुनाई देलक, । "हे यै, सुनै छी,माए लेल कोनो घर में ओछैन कअ दियौ बड थाकि गेल हेती, किछु काल अराम क लेती। " "आब हुनका लेल बिछौना कोन घर में करियनि,सभ में त पहिने स गेस्ट सब भरल अछि, पहिने अहां कहलहुं जे माए नहि एती। आब ओ एलीह अछि त आब एखन कतअ व्यवस्था करियनि। " "ई अहां की कहैत छी, कतहुँ व्यवस्था कअ दियौन , माए थाकल छैथ। " ई सुनिते काकी ओतअ आबि जाइ छैथ। "की भेलह बौआ हमरा लेल किएक परेशान होइत छी, हम त बियाह देखबाक लेल एलहुं अछि, राति भरि बियाह देखब आ भोरे चलि जाएब गाम। हमरा लेल बिछौन नहि करु। " "से किएक भोरे चलि जाएब माए, आब एलहुं अछि त किछु दिन रहब ने। " "नहि बौआ हमरा एतअ मोन नहि लगैत अछि,हम त बियाहे देखबाक लेल आएल छलहुं। ओहि के बाद रहि क की करब एतअ। " "ठीक छैक जे अहांक इच्छा। " अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अनुपम रैना यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज साहित्यक रचनाक दू गोट विधा होइछ- गद्य ओ पद्य। गद्य विधाक अन्तर्गत कथा, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, स्मरण, व्यंग्य, आत्मकथा, पत्र लेखन, आदि अबैत अछि; ओतहि ‘पद्य’क अन्तर्गत कवि, गीत, गजल, मुक्तक, महाकाव्य, खण्डकाव्य आदि अबैत अछि। पद्यमे अलंकारक प्रयोग तुलनात्मक रूपेँ अत्यधिक होइत अछि। अलंकारकेँ पद्यक गहना कहल गेल अछि। पद्य विधाक रचनामे लयात्मकता होइत अछि। एहि प्रकारक रचना गेय होइछ। हमरालोकनि एकरा सुरमे गाबि सकैछ। पद्य रचनाक प्रारम्भ गद्यसँ पहिनहि भेल छल। महाभारतसँ लऽ ऋग्वेद काल धरिक पुरातन रचनासभ पद्य विधेमे अछि। यात्रीक मूल्यांकन कविक रूपमे :- कवि शब्दक अर्थ मात्र कविता लिखनिहार नहि थिक। प्राचीन भारत वा प्राचीन ग्रीक देशमे सभ दिन शब्दक प्रयोग द्रष्टा, क्रान्ति द्रष्टा, सर्वज्ञ, नियन्ताक अर्थमे होइत रहल। अंग्रेजीमे तकरे भावार्थ gifted, insight, seev, prophet आदि शब्देँ व्यक्त कएल गेल अछि। एही अर्थमे सोना कविकेँ आदिअहिसँ ओ जे कोनो भाव सभ व्यक्त कएलनि, जे किछु तथ्य विचारलनि तकरे, महत्व देल जाइत अछि। यात्रीजी की कएलनि, की लिखलनि, की कहलनि तकर महत्व एही दृष्टिसँ बुझबाक थिक। आइ हुनक मृत्युक बाद हमरा इएह खटकैत अछि जे हम सब ई नहि बुझि, हुनक महत्व मात्र हुनक कवित्वक चमत्कारकेँ दैत छिअनि। ओ कविता लिखनि, नीक कविता लिखलनि, नव ढंगक कविता लिखलनि से से सर्वथा सत्य थिक, मुदा ओतबे सत्य नहि थिक। ओ बरोबरि जाहि कवि कर्मकेँ धेने रहलाह, से हुनक नैसर्गिक ओ स्वाभाविक कलमक गति छलनि। विशिष्ट जे हुनकामे वस्तु छल, से ओतबे धरि नहि रहल। लोक कहैत छनि जे यात्रीजी बहुत संख्यामे कविता लिखलनि, ओ अपनहुँ बजलाह जे हम कतेक कएलहुँ, से लोक नहि जनैत अछि, हमर बहुत प्रकारक कविता भेल, हिन्दीमे भेल आ से मिथिलाक लोक नहि जनैत बुझैत अछि; हम बहुत प्रकारक विताकेँ नव आयाम देलियैक, से लोक नहि बुझैत अछि। हिन्दीमे कहल जाइत अछि जे ओ आञ्चलिकता, शब्दक ठेठपन, तद्भावना, व्यंगपूर्ण भावुकता आ प्रवल जीवन शक्तिक कविता लिखलनि, प्रगतिशील कविता लिखलनि, ओ नव छन्द, मुक्त वृत छन्द गढ़लनि, अतुकान्त कविता लिखलनि, गद्य लिखलनि।’ सभसँ बेसी कहल जाइत छनि जे जनताक पक्षधर ओ व्यंग, ओ बहुत संख्यामे आ बहुत दिन धरि दू हजार पाँती पचास वर्ष धरि- बरोबरि लिखैत रहलाह। आ इएह हुनक महानता छलनि। एहि प्रसंग बहुतो बात ठीक छैक आ बहुत बातक दृष्टिकोण हुनक कवि कर्मक सम्बन्धमे उनटा-पुनटा बूझल जाइत अछि। मोटा-मोटी हुनक सम्पूर्ण रचनामेसँ आजुक लोककेँ हुनक गद्य रचना विशिष्ट लगैत छनि। ई बात नहि जे हम हुनक गद्य शक्तिक महत्व कम दैत छिअनि, से भा्रमक होएत। प्रत्युत हम मानैत छी जे गद्यमे पाखण्डक ओ सामाजिक स्वार्थक महान चित्रण यात्रीजी कएलनि। एहिमे वर्ग संघर्षक विद्रोह एवं असन्तोष उजागर कएलनि अछि। ओ नव कविता आ मुक्तक छन्दक प्रचार-प्रसार सेहो कएलन्हि, मुदा हम ई नहि मानैत छी जे हुनक महत्व आञ्चलिकताक कारणेँ भेलनि। हिन्दीमे यात्रीजी अपन पेट पोसबाक लेल एवं विशाल क्षेत्रमे प्रसिद्धि पएबाक लेल जे प्रयास कएलनि, ताहि हेतु हुनक सभसँ विशेष महत्व देबय बला वस्तु छलनि। मुदा ओ तँ भीतरसँ- अन्तससँ मिथिलाक साहित्यकार छलाह, मिथिलाक माटि-पानि केर ओ मूलत: जीवन्त कवि छलाह, जकर सीमा महान छल, हिमालयक शिखर सन उच्च छल। ओ कोनो आञ्चलिक शक्ति नहि छलाह जे हिन्दीमे प्रकट भेलनि, किछु सन्हिआ गेलनि, किछु देखि पड़लनि। मैथिली साहित्यक एकटा विस्तार छल। मूलत: ओ हिन्दीक लेखक नहि छलाह। एहि विषयपर विचार करबाक हेतु एकटा बृहत् शोध-प्रबन्ध लिखबाक आवश्यकता अछि। हुनक मैथिली कविता कम रहनु, मुदा हिन्दी बला जकरा आञ्चलिकता कहैत छथि से बहुत बेसी, बहुत उत्तम, खाँटी मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक तात्विक छिटका सभ थिक। ओ सभ तँ मैथिलीमे लिखबाक वस्तु छलैक, मैथिलीएमे लिखल जइतैक, मुदा ताहि हेतु प्रचुर प्रकाशक नहि भेटलनि। ‘बाबा बटेसर नाथ’नामक जे ओ पोथी लिखलनि से विशुद्ध एहने कथा थिक। ओकर मर्म हिन्दीक पाठक नहि बूझि सकताह। ओकर गहींड़ सामाजिक अभिप्राय नहि पाबि सकताह, मुदा से यात्रीजी मैथिलीमे नहि लिखनि, तकर कारण छल मैथिलीक प्रकाशक नहि भेटब। मैथिलीमे लिखि ओतेक पैसा, मेहनति, विस्तृत क्षेत्रमे पाठक एवं यश भेटबाक आशा छलनि तेँ ओ पोथी मैथिलीमे नहि लिखल गेल। बलचनमा, दुखमोचन आदि एही प्रकारक आञ्चलिकताक द्योतक थिक। व्यंगपूर्ण सामाजिक चित्रण मिथिला मात्रक टिप्पणी नहि थिक, ओहिमे मिथिलासँ बाहरो अनुभव सभक प्रयोग भेल छैक। मुदा, कवित्व शक्ति जकरा कहैत छैक, जाहि कवित्व शक्तिक कारणेँ यात्रीक कविकर्मकेँ हमरालोकनि उत्युच्च कोटिक लेखन मानैत छिअनि, तकर बराबरी करय बला हिन्दीमे हुनक काव्य नहि भेटैत अछि। जेना- कल्पनाक पाँखिक उड़ान, द्वन्द्व, कृतिका नक्षत्रमे, हिमगिक उत्संगमे, ताड़क गाछ, भए गेल प्रात, ऋतु सन्धि आदि केर जोड़ी हुनक हिन्दी काव्यमे हम तककैत-तकैत हरान भए गेलहुँ, नहि भेटल। ‘आन्हर जिनगी’जाहि कविक शक्तिक परिचय दैत अछि से प्राय: विश्वक सभसँ श्रेष्ठ कवित्वमे कतहु भेटय तँ भेटय अन्यथा ओ बेजोड़ अछि। यात्रीजीक एकटा पैघ उपलब्धि ई छनि जे हुनका भाषामे ठेठ शब्दक प्रयोग होइत अछि आ हुनक भाषा एही कारणेँ क्रान्ति अनलक। ओ देहातीपनक गमैया टाँसमे ठेंठ बोलीक रचनामे माधुर्य उत्पन्न करैत छथि। एहि प्रकारेँ खाँटी शब्दक पाथर हिनक रचनामे अनायासे भेटि जाइत अछि। यात्रीजी एकटा विशेष शैलीमे लोक जीवनक ठाठ बुनि अपनत्व बोधक प्रगाढ़तामे जीवन यथार्थक खाला खिचलनि। श्री चन्देशक उक्ति छनि- ‘युग सत्रूक प्रमाणिक दस्तावेज’ यात्रीक प्रसंग।[i] उपर्युक्त चन्द्रेशक उक्तिमे हमरा अतिशयोक्ति देखि पड़ैत अछि। प्रत्युत हिन्दीक लेखनकेर बीचमे मैथिली शब्दावलीक प्रयोगकेँ हिन्दीक बोलीक रूपमे देखब छैक। हम मैथिलीक साधारण शब्दक साधारण प्रयोगकेँ गमैया आ ठेंठ अपमानजनक बुझैत छी। मैथिली शब्द मात्रकेँ गमैया प्रयोग कथमपि नहि मानल जा सकैछ। मैथिली शब्दक प्रयोग स्वस्थ आ शिष्ट मैथिली भाषाक शब्दावलीक प्रयोग थिक, जाहिमे सरल जीवन्त भाषा ओहिना रहैछ, जहिना मिथिलाक शिष्ट समाजमे मैथिली बाजल जाइत अछि। ओहिमे शब्द जे सरल अछि, ताहिमे कोनो गमैया प्रयोग नहि झलकैत अछि। ध्यान देबाक थिक जे ओहि शैलीमे संस्कृतिक प्रयोग सेहो पूर्ण साहित्यिक रूपमे यत्र-तत्र भरल अछि। जेना बंगला भाषाक कोनो साहित्यमे सरल बंगला सहित संस्कृतनिष्ठ शब्दावलीक प्रयोग करब स्वाभाविक होइत छैक। ओकरा गमैया ठेंठ कहब अपमानजनक थिक। ओ तँ शिष्ट भाषाक साहित्यिक रूप थिक। यात्रीजीक मैथिली काव्यमे जे प्रयोग सब अछि तकरा कोनो रूपेँ संस्कृतनिष्ठ शब्दावलीसँ ओत-प्रोत कएल छैक, तकरा देखलापर हुनक मैथिलीकेँ कोनो गमैया ठेंठ कहल जा सकैछ, से आश्चर्य लगैत अछि। एकर एकटा बानगीक रूपमे ‘परम सत्य’नामक कवितामे देखल जा सकैछ :- “हम, अहाँ ओ ई मने क्यो होथु- व्यक्ति मात्र थिकाह अगबे फूसि सत्य की तँ शून्य सत्य की तँ ब्रह्म सत्य की तँ घनानन्द, अखण्ड चित् कूटस्थ सैधव लवण सम नीरंध्र..।”[ii] की, एहि पाँती सभकेँ गमैया कहबैक? अगबे शब्द गमैया नहि थिक शुद्ध मैथिलीक शिष्ट भाषा थिक। आ ‘सौंधव लवण सम नीरंध्र मैथिलीक चमत्कृत संस्कृतनिष्ठ प्रयोग थिक। ई कोनो कृत्रिमताक भाषा नहि थिक। ई सहज शिष्ट मैथिलीक साहित्यक रूप थिक। जेना- “धनिकहा सबहक हाथमे छनहि राम-कृष्णक टीक जे बजइ अछि फूसितकरा डरेँ घर-घर कपइ छथि हलुमान, घूस रोटक पाबि दुष्टक पीठ ठोकथि काल भैरव सन विकट बलवान।”[iii] एहिठाम ध्यान देबा योग्य बात ई अछि जे हलुमान आ काल भैरव’क बिम्ब-गमैया ठेंठ आ संस्कृत पर आधारित छैक, से गमैया नहि थिक। ओ सभ मिल-जुलल मिझड़ाएल शुद्ध शिष्ट मैथिली भाषाक साहित्यिक रूप थिक। यात्रीजीक आओर कोनो कविता लेब; तँ ओहिमे सरल ओ सस्कृतनिष्ठ मिझड़ल भाषा भेटत, जहिना शिष्ट साहित्यिक भाषामे भेटत। ओकरा गमैया कहब धृष्टता होएत :- कुम्हीक लैत अओढ़, चारक पुरान खओढ़ कोड़ो धरैत खाम्ह, बरेड़ीक संग-संग छल जा रहल बहैत, अपसग अलझन दैत देखि भेलहुँ ढंग- क्षीर सागरमे सुतल भावनाकेँ करबाक लेल तंग।[iv] उपर्युक्त पद्यांशमे क्षीरसागर आ खाम्ह, कोड़ो, दुइ भाषा छैक? नहि। दुनू एके भाषा- शिष्ट, साहित्यक मैथिली भाषाक शब्दावली थिक। जाहिठाम जेहन कल्पना, जेहन साहित्यिक योजनामे जेहन भाषाक, जेहन शब्दावलीक माङ छैक, तेहन शब्दावली आनल गेल अछि। ई देहातीपनक बोलीमे रचना माधुर्य उत्पन्न करब थिक। ई शुद्ध मैथिली भाषा, मैथिली साहित्यक चमत्कार कवि कर्म थिक। ई सभ तँ सामान्य रूपेँ शीर्षस्थ कवि कर्मक गुण भेल। मुदा एतबे लए केँ हम यात्रीजीकेँ महाकविक रूपमे नहि देखैत छिअन्हि। ओ दूर द्रष्टा, युग स्रष्टा जे भेलाह से एहिसँ बेसी अपना देश अपन जन्मभूमि मिथिलाकेँ महान आधुनिक देश बनेबाक दृष्टि रखबाक कारणेँ भेलाह, जे आरम्भसँ हृदयमे आगि जकाँ पजरैत छल, मुदा पूर्ण रूप जीवनक अन्त अबैत-अबैत देखलनि। पहिल दृष्टिमे यात्रीजीकेँ सन 1931 ईसँ 1941 ई. धरि एतबे ध्यान गेलनि जे अपन प्राचीन इतिहास बहुत महान छल। मुदा ओहिमे बहुत रास सामाजिक ओ आर्थिक समस्या सभ आबि कऽ देशकेँ जटिल ओ दुर्भाग्यपूर्ण बना देने अछि, तकरा ओ बालविवाह ओ बृद्धविवाह केर कारूणिक एवं घिनाओन वैवाहिक दुखस्थाकेँ हटेबाक विकलता रूपमे देखलि। बूढ़ वर ओ बाल विधवाक विलाप नामक कवितामे लिखलनि- “बनौने जा रहल अछि नोरक धार ओहीमे लोक वेद भसिया बरू जाय अगराही लगौ बरू बज्र खसौ एहन जाति पर बरू धसना खसौ भूकम्प हौक बरू फटौक धरती मा मिथिले रहिये केँ की करती।”[v] एहिठाम ध्यान देबाक अछि जे मिथिलाकेँ बड़ उच्च स्वरमे ओ गौरव गाथा लय अपन काव्य दृष्टि आरम्भ कएने छलाह आर से गौरवमयी प्राचीन मिथिला केर गीत गाबि कऽ की हैत? जँ ई समस्या सभ नहि सुधरत। समस्याकेँ ओझराएबाक हेतु ओ नवतुरियाक आह्वान कएलनि। हुनक कहब छलनि- पछाति नवतुरिए आबओ आगाँ ई ओ पहिल दृष्टि थिकनि जाहिसँ ओ मिथिलाकेँ आगाँ बढ़ाबय चाहैत छलाह। यात्रीजी एतबेसँ सन्तुष्ट नहि होइत छथि। ओ ताकए लगलाह जे आर की करबाक छैक। कविक स्वप्न कामक कवितामे तकर आभास पूर्ण रूपसँ देखलनि- “अन्न नै छै, कैंचा नहि छै, कौड़ी ने छै गरीबक नेना कोना पढ़तैक रे? उठह कवि तोँ दहक ललकारा कने गिरि शिखर पर पथिक- दल चढ़तैक रे!”[vi] वास्तविकता की थिकइ से बुझितहक आँखि खोलि ओ चारू दिस तकलनि तँ मिथिलादेश हुनका देखि पड़लनि। बाढ़िक विकट समस्या, गरीबीक मारि, बेरोजगारीक झमारल देश आँखिक सामने नाचय लगलनि आ हुनका रहि नहि भेलनि। 1947 ई. अबैत-अबैत यात्रीजी बुझलनि जे मिथिलाक विकास तखने होएत, जखन समाजमे छोट-छोट, छोट-पैघ जे भिन्न-भिन्न अपनाकेँ बुझैत अछि- मिथिलावासी यावत् अपनाकेँ एकदेसी भए भेद-भावकेँ बिसरि, स्वयं जागि समस्या सभकेँ अपने नहि सोझराओत। ओ लिखैत छथि- “जय जय जय हे मिथिला भात जय लाख लाख मिथिलाक पुत्र अपनहि हाथेँ हम सोझराएब अपना देशक शासनक सूत्र।”[vii] तेसर दृष्टिकोण अबैत छनि मिथिलाक हेतु विद्यापति पर्व गाम-गाम मनयबाक-प्रचलित करबाक यात्रीजीक आह्वान आ चेतना समितिकेँ पटनामे स्थापित करब। ई कथा विशेष जोर दए कहबाक थिक ओ बुझबाक थिक। महाकवि विद्यापतिक नामेसँ जे मंच बनल से आइ एकर प्रतीक अछि जे मिथिला वासीक चेतना जगबाक इएह मंच, इएह संस्था मार्ग थिक, जाहिसँ नव मिथिलाक निर्माण भए सकत। कवि देखलनि आ हमरा सभकेँ मार्ग धरा देलनि। इएह विचारसँ घुमि-घमि ‘परम सत्य’नामक कवितामे कहैत रहलाह। ओ लिखलनि- धन्य हे श्रमशील मानव विश्वभरिमे व्याप्त तोहर जाति। अन्तिम सोपान अपन एकान्तमे लिखल पत्र सभ श्री जीवकान्तक नामे जे भारती-मंडन नामक पत्रमे छपओलन्हि तइमे ओ स्पष्ट ओ गूढ़ विचार रूपेँ ओ बाजि उठलाह- “संयुक्त मिथिला पीपुल्स पार्टी अथवा ताहिसँ पहिने रन्टेले कचुअल फोरम फार युनाइटेड मिथिला कोटिक कोनो ग्रुपकेँ अंकुर रूपेँ देखय लागल छी। समस्त पत्रावलीमे ओ सभटा विस्तारसँ देने छथि हुनक कवि दृष्टि विकसित भए गेलनि आर ओ की करय चाहैत छलाह। मिथिलाक निर्माण एत्ते एही मार्ग होएब सम्भव छैक। दु:ख एतबे जे एहि दृष्टिकेँ देखि-देखि ओ मात्र कविक स्पप्न बना सकलाह। मरबाक समय मात्र ओ एतबे बाजि सकलाह- हमरा लए चलह अपन गाम, सभसँ पहने मोन पड़इ अछि अपने भूमिक लोक। -अनुपम रैना, शोधार्थी, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर [i]यात्री- चेतना समिति पटना, 2000 ई, पृ.- 44 [ii]चित्रा- यात्री, (परम सत्य कविता) [iii]चित्रा- यात्रीजीसन्दर्भ- यात्री- यशोदानाथ झा पृ.- 44 [iv]चित्रा- यात्रीजी सन्दर्भ- यात्री- यशोदानाथ झा पृ.- 44 [v]चित्रा- परम सत्य कविता- वैद्यनाथ मिश्र यात्री [vi]चित्रा- बूढ़वर [vii]चित्रा- मॉं मिथिले कविता- यात्रीजी अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अनुपम रैना यात्रीक गद्य-साहित्यमे मिथिला समाज सामान्यत: मनुष्यक लिखबा-पढ़बाक अथबा बजबाक छन्दरहित साधारण व्यवहारक भाषा गद्य (Prose) कहबैत अछि एहिमे मात्र आंशिक सत्यता अछि, कारण एहिमे गद्यकारक रचनात्मक बोधक अवहेलना होइछ। साधारण व्यवहारक भाषा गद्य तखनहि भऽ सकैछ जखन ओ व्यवस्थित आ स्पष्ट रूपेँ व्यक्त कएल गेल हो। तेँ रचनात्मक प्रक्रियाकेँ ध्यानमे रखैत गद्यकेँ मनुष्यक साधारण किन्तु व्यवस्थित भाषा वा ओकर विशिष्ट अभिव्यक्ति कहब सएह उचित होयत। साहित्य रचनाक दू गोट विधा होइछ- ‘गद्य- ओ ‘पद्य’। गद्य विधाक अन्तर्गत कथा, उपन्यास, नाटक, अनुवाद, निबन्ध, संस्मरण, व्यंग, आत्मकथा, रिपोर्ताज, आलोचना पत्र-पत्रिका इत्यादि लिखल जाइत अछि। गद्यमे अलंकारक प्रयोग प्राय: नहिए होइत अछि मुदा पद्यमे एकर प्रयोग खूब होइत अछि। गद्य विधाक रचना सोझ-डारिएँ पढ़ल जाइत अछि, कारण एहिमे लयात्मकता नहि होइत अछि, जखन कि पद्य विधाक रचनामे लयात्मकता होइत अछि। यथार्थमे गद्यक सम्बन्ध हमरालोकनिक अभिव्यक्ति आ विचारसँ रहैत अछि जखन कि पद्यक सम्बन्ध मनोभावसँ रहैत अछि। दोसर शब्दमे पद्यक सम्बन्ध मनसँ होइछ आ गद्यक सम्बन्ध मस्तिष्कसँ। ई बात सत्य जे पद्य लेखन प्रारम्भ गद्यसँ पहिने भेल छल, जकर प्रमाण महाभारतसँ लऽ ऋग्वेदकालीन प्राचीन रचनासभकेँ देखलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ मुदा आधुनिक काल गद्यक स्वर्णयुग थिक कारण तुलनात्मक रूपेँ एहि कालखण्डमे गद्यक विकास बेसी भेल अछि। आधुनिक गद्यक प्रारम्भ :- मैथिली गद्यक प्रारम्भ कहिआ भेल से निश्चित रूपेँ नहि कहल जा सकैछ मुदा आरम्भमे एकर साहित्य मौखिके छल तथा एकर विकासो तहिना होइत रहल। चौदहम शताब्दीक प्रथम चरणमे ‘वर्णरत्नाकर’क रचना भेल छल। तेँ ई अनुमान लगाए असंगत नहि होयत जे ताबत काल धरि मैथिली गद्यमे साहित्याभिव्यक्तिक क्षमता आबि गेल रहए। मैथिली पद्य-साहित्ये जकाँ गद्य साहित्य सेहो सरस्वतीक अन्त: सलिला धारा जकाँ जनसमाजमे प्रवाहित भए रहल छल। वर्णरत्नाकरक पूर्वक गद्य साहित्यक स्वरूपक हमरालोकनि अनुमाने अथवा पीढ़ीगत हस्तान्तरणक आधारपर बुझि सकैछ। कारण ओ आलेखित आ मौखिक होइत छल। तात्कालीन समयक लोककथा जेहन प्रो. तंत्रनाथ झाक ‘जोगक संगी’ ओ ‘जिवितहिँ स्वर्ग’ अछि तथा विभिन्न प्रकारक लोक कथाकाव्य जाहिमे म.म. परमेश्वर झाक ‘सीभान्तिनी आख्यायिका’क अनुसार रूक्मिणी स्वयंवरसँ लऽ विरहा चाँचरि धरि अबैत अछि। एतबे नहि एहिमे सलहेस प्रभृति ‘लोकवीरगाथा’ सेहो अबैत अछि। लोककथा काव्यकेँ गद्य-साहित्यमे परिगणित करबाक कारण ई जे एहिमे पद्यक अतिरिक्त गद्यक प्रयोग होइत छल, मुदा ओ पढ़ल जाइत छल लयात्मक रीतिएँ, गीत जकाँ। एहि पढ़बाक रीतिकेँ म.म. परमेश्वर झा ‘गमैया भास’ कहने छथि। डॉ. ग्रियरसन अपन ‘मैथिली क्रिस्टोमैथी’ (1981) मे सलहेसकेँ संकलित कए प्रकाशित करबौने छथि। ओकर भाषा केहन छल से द्रष्टव्य अछि- “नान्हिटासँ पोसलहु, एतेक वस्तु आनि कै घरमे रखलहुँ, तैयो नहि स्वामी सलहेस ऐलाह। हुनका कारण फुलबारी रोपलि, रंग-रंगक फूल आनि जगाओलि। बेली फूल, चमेली ओ बुलकुंज, नेबार, तेखरिक फूल, फुलवारी लगाओल हुनि सलहेस... आदि।” उपर्युक्त पाँतीकेँ पढ़लासँ एतबा तँ स्पष्ट अछि जे ई नि: सन्देह ओहि समयक भाषा नहि थिक, मुदा ओहि समयमे भाषाक जेहन रूप रहल हो, गद्य धरि अवश्य लयात्मक प्रवाहमे गाओल जाइत छल आ ओ आइओ गाओल जाइत अछि। परन्तु वर्णरत्नाकरक पूर्वक गद्य लिखित रूपमे उपलब्ध नहि अछि। एकर कारण प्राय: छल पण्डितलोकनिक लोकभाषाक प्रति उपेक्षा भाव अथवा लिखबाक असौकर्य। इएह कारण अछि जे वर्णरत्नाकरक पूर्वकेँ के कहए, पश्चातहुक कोनो साहित्यक गद्य चन्दा झाक पूर्वक प्राप्त नहि होइत अछि। चन्दा झासँ छओ सए वर्ष पूर्व ‘वर्णरत्नाकर’क भाषाक गद्यमे रचना कए ज्योतिरीश्वर केहन साहसक परिचय देने होएताह, तकर आइ हमरालोकनि अनुमाने टा लगा सकैछ। विद्यापति सेहो लोकभाषामे पद्य रचना कए बड़ साहिसक परिचय देल एवं मैथिली लोकभाषाकेँ साहित्यिक गरिमा प्रदान कएल मुदा मैथिलीमे गद्यक रचना ओहो नहि कए सकलाह। विद्यापति गद्य लिखलनि तँ अवश्य मुदा अवहट्ठमे- ‘कीर्तिलता’ ओ ‘कीर्तिपताका’ तथा संस्कृतमे ‘पुरुषपरीक्षा’ प्रभृति ग्रन्थक माध्यमे एतेक दूर धरि जे लिखनावलीक रचना ओ संस्कृतमे कएल, जकर उद्देश्य छलैक पत्र प्रभृति लोकोपयोगी प्रणालीक व्यवस्था प्रस्तुत करब आओर जे आइ-काल्हि मिथिलाक धार्मिक सांस्कृतिक समारोहक अवसर आओर जे आइ-काल्हि मिथिलाक धार्मिक सांस्कृतिक समारोहक अवसरपर आमंत्रण प्रभृति लिखबामे आदर्श बनले अछि। एहिसँ पण्डित लोकनिक जाहिमे विद्यापति सेहो अन्तर्भुक्त कएल जा सकैत छथि, लोक भाषाक प्रति केहन प्रवृत्ति छल, तकर परिज्ञान होइत अछि। तथापि हुनक अवहट्ठु भाषामे मैथिली गद्यक विकासशील स्वरूपक परिचय भेटि जाइत अछि, यद्यपि ओहिमे संस्कृतनिष्ठता सएह अधिक अछि। आधुनिक कालमे मैथिली जकर अतीत आ मध्यकाल उज्जवल रहलैक अछि, अपन सवल-श्रेष्ठ आधुनिक साहित्यपर यक्तिञ्चतो गर्व करबाक स्थितिमे अछि। मिथिलाक नवजागरण “नवीन पश्चात्य शिक्षा-पद्धति ओ एहिसँ उद्भूत नाना प्रकारक आन्दोलन, मुद्रण-यंत्र तथा समुन्नत ब्रिटिश प्रशासन”क सत्परिणाम थिक। ओना एकटा बात एतए कहब आवश्यक जे जखन पटनामे हिन्दीसँ अभिभूत विश्वविद्यालय स्थापित भेल तँ मैथिली शिक्षा-संस्थानसँ हटाए देल गेल आओर “तिरहुत महाराज”क कचहरीसँ सेहो निष्कासित भए गेल, तथापि एकर साहित्यिक स्तर एवं परंपरामे महान् परिवर्तन आएल। एहि नवोन्मेषक एकदम प्रत्यक्ष ओ महत्वपूर्ण परिणाम गद्यक क्षेत्रमे परिलक्षित भेल अछि। प्राचीन आ मध्यकालीन गद्य नवीन युगक अपेक्षाक पूर्ति करबामे समर्थ नहि छल। पूर्वक गद्य अत्यधिक कवित्वमय आ अत्यधिक रीतिवादी छल; मध्यकालीन गद्यमे विभिन्न प्रयोजनक अनुरूप अपनाकेँ गढ़ि लेबाक खमता नहि छलैक। आधुनिक जीवनमे एहन गद्यक आवश्यकता छलैक जे दीर्घ काल धरि सुविधापूर्वक पढ़ल आ स्वादल जाए सकए, जे अखबार, पत्रिका, फिल्म, उपन्यास, विज्ञापन, कथा, आलोचना तथा एहिसभक संग शास्त्रीय निबन्ध एवं ग्रन्थक उपयुक्त माध्यम भए सकए। आधुनिक गद्यक आदिकालीन आ अन्तकालीन स्वरूपक बीच ततेक प्रखर अन्तर अछि जे आन्हरहुकेँ ओ देखि पड़तैक। एहि नवीन स्वरूपपर अएबासँ पूर्व मैथिली गद्यकेँ अपन अनेक सोपान पार करए पड़लैक अछि। एकर विकासमे जकर मत्वपूर्ण योगदान रहल अछि से थिक आधुनिक कालमे श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक उदय। हिनकहि प्रसादेँ मैथिली गद्य अपन नवीन स्वरूपक वरदान पाओलक अछि। मैथिली गद्यमे यात्रीक अवदान :- मैथिलीक कतोक शीर्षस्थ साहित्यकार लोकनि मातृभाषा ओ राष्ट्रभाषा दुनूमे उत्कृष्ट कोटिक रचना कएलनि। मातृभाषा आ राष्ट्रभाषामे अन्यतम सम्बन्ध छैक। अतएव साहित्यकार जे विवेकशील, सम्वेदनशील ओ व्यापक अन्तर्दृष्टिसँ सम्पन्न होइत छथि, हुनका लेल दुनूमे पार्थक्य भाव राखब असम्भव। मातृभाषा परिचितक माध्यम थिकै। मातृभाषा अपन देश-कोस, माटि-पानिक महत्वकेँ सार्वजनिक रूपसँ स्वीकृति मान्यता देबाक, आदर्श स्थापित करबाक माध्यम थिक। यात्रीजी एहि दृष्टिकोणसँ अन्यतम साहित्यकार छथि। ओ मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा दुनूमे समान रूपेँ रचना कएलनि तथा अपन रचनाक माध्यमसँ समाजकेँ नव दिशा-दशा, आयाम आ दृष्टि देलनि। इहो तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण ओ गूढ़ रूपसँ विचारणीय जे मातृभाषेक माध्यमसँ द्विभाषी साहित्यकार लोकनि शीर्षस्थ साहित्यिक पुरस्कार अर्थात् साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ पुरस्कृत भेलाह- ताहिमेसँ एक छथि ‘श्री वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’। मातृभाषाक ओ ‘यात्री’ छथि तँ राष्ट्रभाषाक- ‘नागार्जुन’। ‘यात्री’ सन साहित्यकार कोनो एक भाषा, देश-काल, माटि-पानि, व्यक्ति- वर्ग, समाज-लिंग, जातिक सीमामे बन्हाएल नहि रहैछ। ओ सार्वदेशिक, सार्वकालिक ओ सार्वभौमक होइछ। मानवीय धरातलपर उतरि जखन सम्वेदनाकेँ अनुभव कएल जाइछ एवं जन-जनमे तकरा देखल जाइछ, तखन सृजन होइत छैक, कालजयी- विश्व व्यापी रचनाक, जे युगधर्मसँ सम्पृक्त रहैछ। जन-जनकेँ अपनामे आत्मसात कएनिहार ‘यात्री’ आ जन-जनमे समाहित ‘यात्री’ वंचित, पीड़ित, शोषकक दु:ख दर्दक मूक वेदनाकेँ करूण किन्तु बुलन्द स्वर देलनि। स्वरमे अनुनय-याचना नहि, संघर्ष विद्रोह ओ ललकाराक तख्ती प्रदान कएलनि। भूतसँ स्वीकृति-अस्वीकृति, वर्त्तमानक समकालिकता एवं भविष्यक लेल स्वस्थ्य आस्थापूर्ण सूक्ष्म-तीक्ष्ण अन्तर्दृष्टिक दिग्दर्शन यात्रीक गद्य वा पद्यक अन्तर्गत होइत अछि। ‘यात्री’ मिथिलेक नहि वैश्विक छथि। एतएव हुनक गद्यमे प्राचीनताकेँ स्वीकार अथवा नकार भावसँ ग्रहण नहि कएल गेल अछि आ, ने तँ नवीनताकेँ सद्य: सकारि लेल गेल अछि। दुनूक ग्राह्य-अगाह्य पक्ष-तत्त्व सतत हुनक अन्तर्दृष्टिमे रहलनि अछि। यात्रीजीक मैथिली गद्य :- मैथिलीक गद्य विधापर जँ विचार करी तँ श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक रचना संसार अति विस्तृत अछि। अपन एहि गद्य रचनाक माध्यमे यात्रीजी मिथिलाक सुदूर गाम-घर, कोठा-अटारी, झुग्गी-झोपड़ी, नगर-नगर आदिक विस्तृत चित्रण प्रस्तुत कएलन्हि अछि। हिनक सभ रचनामे मिथिला समाजक माटिक सुगन्ध भेटत, मिथिलाक प्रतिभा प्रतिष्ठा भेटत, समाजक सोझ-टेंढ़, विद्रुप्ता भेटत जकरा साहित्यकार श्री वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ यथार्थताक संग प्रस्तुत करैत छथि। मैथिली गद्यक क्षेत्रमे यात्रीजीक निम्नलिखित कार्य अति प्रसंसनीय अछि यात्रीजी मैथिली साहित्यक प्रत्येक विधापर अपन हाथ चलौलन्हि आ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर थिक। हिनक दू गोट उपन्यास मैथिली भाषामे प्रकाशित अछि जे औपन्यासिक साहित्यक लेल एक विशिष्ट अवदान अछि- (1) पारो (1946) (2) नवतुरिया यात्रीजीक फुटकर गद्यक रूपमे जे प्रमुख साहित्यक हम अपन एहि शोध प्रबन्धमे चर्च करए चाहब ओहिमे निम्नलिखित कथाक नाम लेने बिना हिनक गद्यक प्रसंग चर्च अपूर्ण रहत। ओ थिक- (1) बउकन ठाकुर (2) बूढ़ बोको (3) गप्पक फोड़न (4) रूपान्तर (5) जरद्गव (6) चितकबरी इजोरिया यात्रीजीक तेसर विधा जे गद्यक रूपमे हमरालोकनिकेँ भेटैत अछि, ओ थिक हिनक संस्मरण, जाहिमे निम्नलिखित शीर्षकक संस्मरण कएने बिना यात्रीजीक गद्य-संसार अधूरा रहि जाएत। संस्मरण विधामे हिनक तीन गोट संस्मरणक विमर्श करब एतए उचित एवं आवश्यक अछि- (1) चारि अहोरात्रि एक दिन (2) पृथ्वी ते पात्रं (3) प्रवासक संस्मरण हिनक लेख व्याख्यान, रिपोर्ताज तथा स्फुट आदिक रूपमे जे प्रमुख गद्य यात्रीजीक अछि ओहिमे निम्नलिखित शीर्षकक उल्लेख करब अपेक्षित अछि- (क) मैथिल महासभा : मैथिलित्वक मानदंड (ख) रिक्तता ओ पूर्णता (ग) कविता युगक गीता (घ) प्रस्तुत प्रसंग (ङ) स्वगत- अनुचिन्तन (च) एकटा संदेश एकर अतिरिक्त स्तम्भ लेखन एवं पत्र सेहो यात्रीजीक छनि। ‘यत्र-तत्र-सर्वत्र’ नामसँ चारि गोट स्तम्भ, ‘यत्-किंचित’ शीर्षकसँ आठ गोट स्तम्भ तथा ‘ओ-ना-मा-सी-धङ’सँ दू गोट स्तम्भ छनि। -अनुपम रैना, शोधार्थी, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी माहुर करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका) डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/ (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta 97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। ३ विदेह अपन आगामी अंक (२०२१ क प्रारम्भमे) श्री रामलोचन ठाकुर पर विशेषांक निकालबाक नेयार केने अछि। हुनका सम्बन्धी रचना आमंत्रित अछि (संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा आदि) जे ३१ दिसम्बर २०२० धरि editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाओल जा सकैत अछि। विदेह पेटारक अन्तर्गत (पोथी डाउनलोड साइट) मे http://www.videha.co.in/new_page_15.htm हुनकर मौलिक, अनूदित आ सम्पादित रचना फ्री पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2020 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३१२ म अंक १५ दिसम्बर २०२० (वर्ष १३ मास १५६ अंक ३१२)
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