विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३१४ म अंक १५ जनवरी २०२१ (वर्ष १४ मास १५७ अंक ३१४) ऐ अंकमे अछि:- १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- ७ म खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१४ म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (७ म खेप) २.४.नन्द विलास राय-प्रायश्चित २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-रहै जोकर परिवार २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा- करोट २.७.ज्ञानवर्द्धन कंठ- गदहाक इलाज २.८.मनोज झा मुक्ति- अस्तित्वक कटघेरामे मिथिला-मैथिलीक संघ संस्थासब २.९.सुभाष कुमार कामत- ३ टा बीहनि कथा ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.२.बिनय भूषण- कोरोना- अवकाश ३.३.आनन्द कुमार झा- प्रतिमुख ३.४. प्रदीप पुष्प- १ टा गजल आ २ टा रुबाइ ३.५. विष्णु कान्त मिश्र- चीरहरण ३.६.रमन कुमार झा- नेनपन ३.७. रमन कुमार झा- करम कुटय छी ढेंकी मे नऽ ३.८.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.अम्बिका मल्लिक- हम छी काली हम छी दुर्गा ४.२.विद्या रश्मि- गलतीक बोध ( संस्मरण) ४.३.निर्मला कर्ण- नारीक सम्मान ४.४. निर्मला कर्ण- ममताक सम्मान करु ४.५.प्रीति प्रभा- अप्पन मिथिलाधाम ४.६.आभा झा- पिघलैत हिमखण्ड Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU इग्नू BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1 [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2 (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3 (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4 (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13 (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17 (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS ........................................................................................................................ OTHER OPTIONALS ........................................................................................................................ IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- ७ म खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१४ म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (७ म खेप) २.४.नन्द विलास राय-प्रायश्चित २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-रहै जोकर परिवार २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा- करोट २.७.ज्ञानवर्द्धन कंठ- गदहाक इलाज २.८.मनोज झा मुक्ति- अस्तित्वक कटघेरामे मिथिला-मैथिलीक संघ संस्थासब २.९.सुभाष कुमार कामत- ३ टा बीहनि कथ योगेन्द्र पाठक वियोगी (सम्पर्क- 9831037532) नरक विजय (एहि नाटकक एक संस्करण हमर पोथी ‘त्रिनाटकम्’ मे छपि गेल अछि। ओहि मे दृश्यक संख्या बहुत बेसी रहला सँ किछु निर्देशक लोकनि एकर मंचन पर प्रश्न चिन्ह लगौलनि। ओहि आलोचना कें ध्यान मे रखैत एकरा परिवर्धित कएल गेल। एकर बंगला अनुवाद श्री नवीन चौधरी केलनि अछि।- नाटककार) पात्र परिचय मानव पात्र — रमेश, सुरेश, अनुपम अमित (वैज्ञानिक) पौराणिक पात्र — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, यमराज, चित्रगुप्त, दू यमदूत अंक 2 दृश्य 2 मंच सज्जा मे कोनो परिवर्तन नहि। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर ओहिना लीखल छैक ‘यमलोक’। यमराज मंच पर एम्हर ओम्हर टहलि रहल छथि। प्रकाश हुनका चेहरा कें आलोकित करैत अछि जाहि सँ हुनकर अति प्रसन्न मुद्रा देखाइत अछि। यमराज (स्वतः) अद्भुत अछि ई मानव जाति। की की आविष्कार केलक अछि आ केहन गुण बला सब जे देवलोकक सब देवी, देवता, अप्सरा, गन्धर्व ओकरा सबहक नोकर नोकरनीओ बनबा जोगर नहि छथिन। (किछु रुकि कए, एम्हर ओम्हर टहलैत आ देखैत, मूड़ी नीचा झुकौने, प्रकाश हुनका मात्र आलोकित करैत) एकटा छोट डिब्बा मे बन्द वस्तु, की नाम दियैक सेहो नहि बूझल अछि मुदा कतेक लुरिगर ! उर्वशी मेनका रम्भा तऽ कात जाथु, कामदेव प्रिया रतियो कें एतेक लूरि आ अनुभव हेतनि से कहब कठिन। स्वर कतेक मधुर ! अंग संचालन मे केहन चतुर ! लगैत अछि ऋषि वात्स्यायन सबटा ज्ञान एहि पुतरा मे भरि देलखिन। को विहातुं समर्थः ? ककरा ने हेतैक जे हरदम ओकरे सानिद्ध्य मे बैसल रही अथवा छाती सँ लगौने रहियै। (रमेश आ सुरेशक अदृश्य भेल प्रवेश। जेना पर्दाक पाछू सँ बजैत हो। दूनू कातक प्रवेश पथ पर अदृश्य भेल ठाढ़।) रमेश बुझाइत अछि धर्मराज मर्त्यलोकक उपहार अपने कें पसिन्न पड़ल। यमराज (चारू कात तकैत आ अकानैत) अहाँ के बजैत छी ? सुरेश उचित समय पर सबटा बूझि जेबैक धर्मराज, एखन एकरा रहस्ये रहए दियौक। (पारम्परिक वेश मे वीणाक संग नारदक प्रवेश, मंच पूरा आलोकित होइत अछि।) नारद नारायण, नारायण ! यमराज स्वागत देवर्षि। आउ, आसन ग्रहण कएल जाओ। (कुर्सी दिस इशारा करैत, दूनू गोटे बैसैत छथि) कोना एमहर आबि गेलियै ? नारद ओहिना यमलोकक हालचाल बुझबा लेल। ककरा सँ गप कऽ रहल छलहुँ धर्मराज ? यमराज कियो देखा नहि पड़ि रहल अछि मुनिश्रेष्ठ। हमहूँ नहि बूझि रहल छिऐक। एहन आवाज प्रथमे सुना रहल अछि। यमलोक मे ओहि दूटा विचित्र मृतात्माक एला सँ एहन आभास भऽ रहल अछि जे किछु उलटफेर होमए जा रहल अछि। रमेश (नारद कें सम्बोधित करैत) बाबा, फेर गेल छलियै मर्त्यलोक दिस? नारद अहाँ के बजैत छी ? प्रकट किऐक नहि होइत छी? सुरेश हम सब प्रकट भऽ जाएब तँ अहाँ कें दाँती लागि जाएत यौ बाबा। तें एखन एहिना रहए दियौ। उचित समय पर सब बात बूझि जेबै। एखन हमरा प्रश्नक उत्तर दियऽ। (नारद चुप्पे रहैत छथि) रमेश अहाँ की बुझलियै जे चुपचाप आकाश मार्ग सँ जा कए वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला मे आ राष्ट्रीय संग्रहालय मे आगि लगा देबै तऽ ओहि वैज्ञानिकक सबटा कएल धएल नष्ट भऽ जेतैक ? हाय रे बकलेल बाबा ! सुरेश एकटा बात ध्यान राखब बाबा। मानव सभ्यता बहुत विकसित भऽ गेलैक अछि, रामायण महाभारतक जमाना नहि रहलैक। पूरा ब्रह्माण्ड मे बीसो तह मे नुकाएल एकटा बगरो यदि पाँखि हिलेतै तकरो संकेत मर्त्यलोक मे राडार पर देखाइये जेतैक। रमेश अगिला बेर यदि फेर धरती पर पएर रखबै बाबा तऽ पाछू मे लोक लगा देत डाबा आ जहिना सामा चकेबाक चुगला कें लोक आगि लगबैत छैक तहिना दाढ़ी मे किरासन तेल चोपकारि कए आगि लगा समूचा घुमाओत। नारद (बहुत घबराएल, यमराज कें सम्बोधित करैत) वैवस्वत, किछु बूझिए नहि रहल छी जे मर्त्यलोकक घटनाक खबरि यमलोक मे कोना पहुँचि गेलै ? (हुनका कान मे किछु कहैत छथि) सुरेश बाबा, उत्तर धर्मराज कोना देताह, हमहीं सब देब। मोन पारियौ बाबा जखन वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला मे गेल छलियै तखन ओ की सब कहने छलाह आ की सब देखेने छलाह। रमेश बाबा, अनठबैत छिऐक तऽ हमहीं सब मोन पाड़ि दैत छी। ओ कहने रहथि जे एकटा स्मार्टफोन होइत छैक जाहि सँ ब्रह्माण्ड मे कतहु बातचीत कएल जा सकैत छैक, समाद आ फोटो आदि पठाओल जा सकैत छैक। सुरेश हमरा सब कें ओएह वैज्ञानिक खबरि पठौने छलाह बाबा। खैर, एहि बात कें एखन कात जाए दियौक। एखन हम सब जे कहैत छी से दूनू गोटे ध्यान सँ सुनैत जइयौ। रमेश हम सब समस्त नरक कुण्डक भ्रमण कएल अछि धर्मराज। जेना कि हमरा अन्दाज छल, सब कुण्ड पर लगाओल पहरेदार अपना मे मस्त कतहु चौपड़ि, कतहु लूडो, कतहु ताश आदि खेलाइत। ककरो ध्यान कुण्ड दिस नहि छलैक। लगैत छल जेना मर्त्यलोक मे अपना देशक अकर्मण्य पुलिस सब कें देखि रहल छी। सुरेश कुण्ड सबहक हालत की कहू ? लगैए युग युग सँ एकर निरीक्षण नहि भेलैक। सब अधिकारीगण अपना अपना मे मस्त, घमण्ड मे चूर। कहैए लेल ओ सब पापात्मा कें कुण्ड मे पीटैत रहैत छथिन। हम सब ककरो किछु करैत नहि देखलियै। खानापूरी करैक लेल दिन मे एक बेर आ राति मे एक बेर डंडा चला देलनि, कोनो अभागल कें चोट लगलैक, बाँकी सब बाँचि गेल। रमेश अग्निकुण्ड मे जारनि उसकैनिहार सेहो ओंघाइत छल, फल ई जे ओहि कुण्ड मे शुरू शुरू मे जे धधरा एक सौ हाथ उपर उठैत छलैक से एखन कहुना मात्र जड़ि रहल छैक। धधरा उपर किएक उठतैक ? सुरेश तहिना दोसरो कुण्ड सबके हाल बेहाल। मूत्र कुण्ड आधा सँ बेसी सुखाएल, बिटकुण्ड मे सबटा बिष्टा सुखा गेल, अश्रुकुण्ड, शुक्रकुण्ड, मज्जाकुण्ड सब तहिना मात्र नाम लेल अश्रु, वीर्य आ मज्जा सँ भरल। तैलकुण्ड मात्र सुसुम गरम। धर्मराज, अपने स्वयं सम्भवतः बहुत दिन सँ कुण्ड सबके निरीक्षण नहि केलियैक अछि। यंत्रणा योग्य पदार्थक आब मर्त्यलोक सँ आपूर्ति सेहो सम्भव नहिए बूझू। यमराज (अकचकाइत) से किएक ? रमेश आब पृथ्वी पर राजतन्त्र तऽ रहलैक नहि जे राजाक आज्ञा सँ सब काज हेतैक। ओतए आब जन प्रतिनिधि होइत छथि से अहाँक आज्ञा मानताह कि अपन वोटरक बात सुनथिन। वैज्ञानिक लोकनिक अनुसंधानक फलस्वरूप सब तरहक मल मूत्र, रक्त, मज्जा आदि सँ अति उपयोगी पदार्थ सब बनि रहल छैक। तें जनता ओकरा बाहर पठबए नहि देतैक। नारद बात तऽ ठीके कहैत छथि। रमेश आर सुनू। कुण्ड सब जहिया बनाओल गेल, कोनो तरहें बुद्धिक उपयोग नहि कएल गेल। सोचियौक जे अग्निकुण्ड मे अनेरे एक सौ हाथ ऊँच धधरा उठैत छैक तकर की प्रयोजन ? सुरेश कुण्ड मे जे मृतात्मा फेकल जाइत अछि से तऽ चल गेल नीचा। ओतए ओकरा जतेक धधरा आ ताप लगबाक छैक से तऽ लगबे करैत छैक ओहि सँ बेसी यंत्रणा तऽ हेतैक नहि। जे धधरा उपर उठैत छैक ओकर ताप अनेरे नष्ट होइत छैक। प्रदूषण बढ़ैत छैक। ओहि लेल जतेक जारनि खर्चा होइत छैक से निरर्थक। रमेश जारनि लेल अपने जंगल कटबैत छिऐक जाहि सँ पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत छैक। जारनि जड़ैत रहला सँ ब्रह्माण्ड मे ताप बढ़ैत रहतैक जाहि सँ यमलोको प्रभावित हेबे करत। यमराज एहि दृष्टिकोणे तऽ हम सब कहियो सोचबे नहि केलियैक। सुरेश सब कुण्डक दशा तहिना अछि। एकटा अछि कुम्भीपाक कुण्ड, तकरा एक लाख मर्द गहींर बना देने छिऐक, भस्मकुण्ड, दग्धकुण्ड डेढ़ हजार मर्द गहींर अछि, बूझू कथी लेल ? सस्ता पैसा आ बेगारक मजदूर छल, खुनबैत गेलियै, खुनबैत गेलियै, कहियो ई नहि सोचलियै जे एकर प्रयोजन की ? रमेश सब चीजक एकटा उचित आ विशिष्ट डिजाइन होइछै। ओहि अनुसारें बनेला सँ यातना सेहो अधिकतम होइतै आ खर्च सेहो कम। आ रखरखाबक खर्चा आर न्यून रहैत। की यौ नारद बाबा, चुप किएक छी, हम सब अनर्गल गप बजैत छी की ? नारद (बहुत मद्धिम स्वरें) बात तऽ ठीके कहैत छी अहाँ। सुरेश एकटा आर महत्वपूर्ण गप अछि काल सम्बन्धित। अपने सँ बेसी ई बात के बुझतैक धर्मराज जे यमलोकक नियम कानून सतयुग मे लिखल गेल छलैक जखन कियो कियो पातकी होइत छल। यमराज से तऽ ठीके। जखन विभिन्न लोकक निर्माण भेलैक तखने यमलोक आ देवलोक अस्तित्व मे एलैक। आ सब नियम कानूनो ओही समय लिखल गेल रहैक। रमेश हमरा सबहक विचारें आब कलियुग मे एहि नियम सब मे आमूलचूल परिवर्तनक आवश्यकता छैक। मर्त्यलोक मे समाज मे बहुत परिवर्तन आबि गेलैक अछि। जकरा सौ साल पहिने समाज गलत काज मानितैक तकरा आइ खुशी खुशी अंगीकार कऽ रहलैक अछि। सुरेश जखन समाज अपनहि नियम बदलि रहलैक अछि आ देशक संविधान सेहो निरन्तर संशोधित भऽ रहलैक अछि तखन हजारो साल पुरान नियम यमलोक मे किएक चलाओल जाए ? यमराज बात तऽ अहाँ तर्कसंगत कऽ रहल छी। हम सब जड़ताक शिकार भऽ गेलहुँ तें परिवर्तनक कोनो बात कहियो सोचबे नहि केलियैक। रमेश महाराज ओदुम्बर, यदि अपने यमलोकक साम्राज्य कें एखनहुँ प्रभावी आ प्रासंगिक बनौने राखए चाहैत छी तऽ ई गुह मूत गिजबाक व्यवसाय छोड़ू। धरती पर आब लोक कें एहि खिस्सा सब सँ भय नहि होइत छैक तें पापीक संख्या मे एतेक वृद्धि भऽ रहलैक अछि। सुरेश सबटा कुण्ड कें नष्ट कऽ कए एकदम अत्याधुनिक यातना शिविर सब बनाउ जाहि मे वायरलेस शॉक, लेजर ब्लाइन्डिंग, ग्रैविटी टॉर्चर, सोलर फ्राइ आदिक व्यवस्था रहतै। रमेश एहि काज कें मूर्त रूप देबा लेल अति महत्वपूर्ण अछि जे तत्काल प्रभाव सँ वर्तमान नियम स्थगित कऽ देल जाए। नव संविधान निर्माण लेल कमेटी बनाओल जाए। सुरेश दोसर जे कलियुगक उत्तरार्ध मे एखन पापीक संख्या मे गुणोत्तर वृद्धि हेतैक से यमलोकक विस्तार हेबाक चाही। यमलोकक विस्तार लेल देवलोक सँ अतिरिक्त जमीन आबंटन कराउ। नव निर्माण मे मर्त्यलोकक आर्किचेक्ट, इंजीनियर सब सँ मदति लेबाक व्यवस्था कराउ। बेस, आब हम सब चलै छी। (आवाज बन्द) नारद की सोचलियैक वैवस्वत ? हमरा तऽ लगैत अछि ई आवाज झूठ फूसिक धमकी छल। यमराज किछु फुराइये नहि रहल अछि। हम एकरा धमकी मानै लेल तैयार नहि छी, बात तऽ सटीक कहलक। हम सब विचित्र दशा मे आबि गेल छी देवर्षि। नारद से की ? यमराज पापक दंड लेल ओहि दूनू मृतात्मा कें पहिने अग्निकुण्ड पठेबाक विचार भेल। मुदा कुण्ड मे जेबा सँ पहिने ओ दूनू बन्द घर मे स्नान केलक। आ बाहर एलाक बाद हमरा आ चित्रगुप्त महाराज कें एक एक टा पैकेट उपहार देलक। नारद अजगुत बात जे मृतात्मा स्नान केलक, पैकेट उपहार देलक। की छलैक ओहि मे ? यमराज कोना कहू ? ओहि पैकेट मे मर्त्यलोकक नैवेद्य मिष्टान्न किछु नहि छलैक, छलैक एकटा पुतरा जे अपन रूप बदलि सकैत छल। ओ पुतरा अति मधुर नारी स्वर मे बजैत छल। आगू कहैत लाजो लगैत अछि। नारद से की ? यमराज संकेते सँ बूझि लेल जाओ मुनिश्रेष्ठ। नारद (स्मित हास्य दैत) उपभोग करू धर्मराज, आब चलैत छी। यमराज कालि दुपहरिया मे चित्रगुप्तक संग देवलोक आएब मंत्रणा करबा लेल। (दूनूक प्रस्थान, प्रकाश बन्द) (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रबीन्द्र नारायण मिश्र- सम्पर्क -9968502767 धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर लजकोटर (प्रवासीक जीवनपर आधारित) -14- लताक संगे भरिदिनरहलाक बाद डेरापर मोन कोना लागैत ।स्वभाविक छलैक जे दिनभरि घटित बातसभ मोनमे घुरिआइत ,से सएह होइत रहल । कतेक कालधरि एहिसभ बातपर सोचैत रहलहुँ कि विजयक फोन आएल । " केना छी ?" "ठीके छी, अपन हालचाल कहू ।" "ओहिदिन जीपसँ जाइत काल अहाँकेँ लतासंगे देखने रही ।” “हमरो अहाँ एकझक देखेलहुँ ।" “बँचिक रहब । ओकरसभक चांगुरमे नहि फँसब ।" "की बात?" " से कहिओ एमहर आएब तँ गप्प करब । फोनपर बेसी बाजब ठीक नहि मुदा अहाँ अपना -आपकेँ बँचा कए राखब । ई महानगर छैक?" " हमरा तँ किछु नहि बूझलअछि ।” “बुझेबो नहि करत । जाबे बुझबै ताबे आँखि बंद डिब्बा गाएब रहत ।” से कहि ओ फोन राखि देलक । हम माथ पकड़ि कए बैसि गेलहुँ। ओतँ जासूसी सीनेमा जकाँ रहस्यात्मक ढ़ंगसँ अपन बात कहि देलक मुदा हम तँ बहुत परेसान भए गेलहुँ । कहीं किछु बलंडर तँ नहि भए रहल अछि?"-मोने-मोन सोचाइत छल ।थाकल रहबे करी, ऊपरसँ विजयक फोनसँ ततेक तनाव बढ़ल जे सुता गेल। एकहि निन्ने परात भए गेल । सामनेक सड़कपर लोकक आबाजाहीशुरु भए गेल छल ।चौकपर चाहक दोकानपर लोकसभक गप्प-सप्प चलि रहल छल । हमहु उठि कए हाथ-पैर धो कए अखबार पढ़नाइ शुरु केने रही की किओ केबार ढ़कढ़केलक ।केबार खोलैत छी । किशुनकेँ एकटा अधबयसू लोकक संगे ठाढ़ देखैत छी। "आउ, आउ ।" ओ दुनूगोटे हमर खोठरीमे राखल खाटपर हमरे संगे बैसि गेलाह । " ई हमर मामा दामोदर छथि ।" हम हुनका गोर लगलहुँ । फेर पुछलिअनि- "कखन अएलहुँ?" "अजुके रातिमे अएलहुँ ।" "अहाँक तँ बहुत क्षति भए गेल । मुदा एना भेलैककिएक?"। "की कहू?हमरा तँ एहिमे कोनो षड़यंत्र बुझाइत अछि ।सिलींडरमे तँ कनीको गैस नहि रहैक तखन ओ फटितै कोना ? खामखा सिलींडर फटबाक खिस्सा गढ़ि कए असलीअपराधीकेँ बचाओल जा रहल अछि।" " ई तँ बड़ आश्चर्यक गप्प भेल ।" " हम तँ बर्बाद भए गेलहुँ । एतेक मोसकिलसँ घरक समानसभक जोगार भेल छल । देखिते-देखिते सभ स्वाहा भए गेल । “मुदा एहन काज केलक के आ किएक?” "इएह तँ नहि बुझा रहल अछि?" "पुलिसबलासभ की कहि रहल अछि?" "ऐखन तँ अएबे केलहुँ अछि । अबितेथाना गेल रही । मुदा ओ सभ हमरेसँ सौटा सबाल करए लागल ।" "विजय तँ अपने ओहिठामक अछि ।" "मुदा हमरा तँ ओएह गड़बड़ बुझा रहल अछि ।" " से कोना?" " की -की कहू?बात बहुत गंभीर बुझाइत छैक । " “से की?" ओ गुम पड़ि गेलाह । ताबे हमर चाह बनि गेल छल । दुनगोटेकेँ चाह देलिअनि । हमहु फेरसँ चाह लेलहुँ । किशुनक मामा दामोदर देखबामे भुट्ट मुदा कठमस्त छलाह ।करगर मोछ आकारी-कारी घनगर माथक केस । ओतेक भारी दुर्घटनाक बादो ओ शांतलगैत छलाह आ नीक-बेजाएक विचारकरैत छलाह । रेलवेमे चपरासीक काज करैत छलाह आ अंशकालिक किछु-किछु आओर धंधासभ करथि जाहिसँ दिल्लीसन महानगरमे नीकसँ गुजर भए जाइत छलनि ।हुनकर अंशकालिक काजक सही जानकारी ककरो नहि रहैक, ओकर घरोक लोककेँ नहि । घरमे ओ एतबे कहैक जे काजसँ बाहर जा रहल छी । कार्यालयमे कहिओ छुट्टी लैक,कहिओ अहिना जोगार कए लेथि।क्रमशः थोड़बे जमीन किनिकए ऊपर-नीचा घर बना लेने रहथि। किराया देबासँ बचत भए जाइत छलनि आ अपन घरमे रहबाक स्वादो भेटैत छलनि । मुदा ई दुर्घटनासँ बहुत क्षतिभए गेलनि । घरक चारे उड़ि गेलैक । घरक समानसभ जरिकए खाक भए गेल। बहुत रास कागज-पत्रसभ सेहो जरि गेलनि । किछु नगद टाका राखल रहनि ,सेहो निपत्ता छल । एहि तरहैँ ओ एकटा जबरदस्त संकटमे पड़ि गेल रहथि। सभसँ आश्चर्यक बात ई भेल जे एतेक भेलाक बाबजूद ओ पुलिस मे रपट नहि देलथि । किओ कहनि तँ कहथि – “एहिसभ सँ की होएत, जे जेबाक छल से गेल । पुलिस की करत? उल्टे किछु झिटबाक व्योंतमे पड़ि जाएत ।” मुदा पुलिसकेँ कान ठाढ़ भए गेलैक । जाँच-पड़ताल होबए लागल ।दिनमे कै बेर पुलिस अबैत-जाइत रहल । पुलिसकेँ ई पता लागि गेलैक जे ई कांड गैसक सिलिंडर फटलासँ नहि भेल। किछु आओर कारण की छल से पता नहि चलि रहल छल । ओहिदिन हमसभ चाह पीबैत रही कि दामोदरक मोबाइलपर पुलिसथानासँ फोन आएल-"अहाँकेँ विजय बजा रहल छथि ।" "ठीक छैक"-दामोदरबजलाह । फोन अबितेकिशुन अपन मामाक संगेहमरा ओहिठामसँ अपन डेरा हेतु बिदा भए गेलाह। स्नान- ध्यानक बाद दुनूगोटे थाना बिदा भेलाह । रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस : ६६ बर्ख, पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह, मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवा निवृत्त), शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक प्रकाशित कृति : मैथिलीमे:- १. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा), २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग), ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास)१२.स्वप्नलोक(उपन्यास)१३.शंखनाद(उपन्यास)१४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) In English:- 1.The Lost House (Collection of short stories), 2.Life is an art हिन्दी में – १.न्याय की गुहार(उपन्यास) (उपरोक्त पोथीसभ pothi.com, amazon.com आओर www.flipkart.com पर सँ कीनल जा सकैत अछि) इमेल : mishrarn@gmail.com ब्लोग : mishrarn.blogspot.com एमजोनक लेखक पृष्ठ : amazon.com/author/rnmishra ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल आमक गाछी (धारावाहिक उपन्यास) 7. दिन लहैस गेलजइसँ गरमीमे सेहो कमी आएल। छह बजे सॉंझक समय।सुवासिनी अपन छोट भाए श्यामकेँकहली- “बौआ, धीरेन्द्र जखन घर चढ़ि कहि गेल तखन विचार होइए जे...।” ओना, सुवासिनी अपन मनक बात (विचार)केँ दाबि लेलैन मुदा विचारक जे प्रवाहित प्रवाह छेलैन ओ तँ सुपुट[i] इशारा कइये रहल अछि। तहूमे श्यामक सोझक गप सेहो छीहे। अखन धरि प्रेमनगरमे ऐ टोल ओइ टोलक बीच–माने एक टोलसँ दोसर टोलक बीचकजे सम्बन्ध रहल ओ तेहेन सघन नहियेँ रहल अछि, तँए एक-दोसर परिवारक बीच आवाजाही नहियेँ जकॉं अछि, मुदा समाजो तँ समाज छी, ओ तँ कोनो मूर्त रूप नहियेँ छी! मुदा विचार रूप नहि छी सेहो केना नइ कहल जाएत। भलेँ ओकरा मनेक उपज किए ने कहल जाए। जेकर धार दुनू दिस छइहे। माने आगू बढ़ि जँ जोड़ैक अछि तँ पाछू हटि तोड़ैक सेहो छइहे...। बिना कोनो लागि-लपेटिक विचार केने श्याम सुवासिनीसँ कहला- “बहिन, ने गाम हमरेटा छी आ ने समाज, तखन तँ जे बीचमे अछिओ अपन नीक-बेजाए देखिये कऽ ने किछु करत। तँए जखन टहलैये-बुलैक बात अछि ते जाइमे कोनो हर्ज नहि।” ओना, जहिना सुवासिनीक मनक भीतर सम्बन्ध जगबैक विचार जगि चुकल छेलैन तहिना जगमोहीकेँ सेहो धीरेन्द्रकेँ लगसँ देखैक विचार छेलैहे। तँए देखै-सुनै-विचारैक छेलैन्हे। सुवासिनी बजली- “बौआ, खाली अपने चारू माय-धी जाएब आकि आरो केकरो संग कऽ लेब?” सुवासिनीक बात सुनि श्यामक मन ठमकलैन। ठमकलैन ई जे परिवारक इकाई ‘बेकती’ भेल आ बेकतीक सामूहिक रूप परिवारो भेल आ ओकरे वृहत् रूप समाज सेहो भेल। ऐठाम तँ बेकतीक सम्बन्धक प्रश्न अछि, तँए असगरे जाएब–अपने चारू माय-धी–से बेसी नीक हएत। श्याम बजला- “अनेरे अनका बरदबैक कोन जरूरी अछि। सभ कियो अपन-अपन परिवारक अंग छीहे तँए सभकेँ किछु-ने-किछु काज परिवारमे रहिते छइ। अहॉं सभ बहरवैया छी, टहैल-बुलि गामकेँ देखियौ।” पाँचे बजेसँ धीरेन्द्र सुवासिनीक प्रतिक्षा करैत रहइ। चारू माय-धी सुवासिनीकेँ देख धीरेन्द्र अपन माएकेँ कहलक- “हिनका सभकेँ चिन्है छुहुन?” सोझ मतिया विचारक लोक रहने सुभावी ठॉंहि-पठाँहि बजली- “नहि!” ओना, सुवासिनी सेहो आ तीनू बहिनो सुभावीकेँ गोड़ लगि चुकल छेलैन आ सुभावी सभकेँ असीरवादो दइये चुकल छेली जे नीके रहू, भगवान नीक करैथ...। मुदा धीरेन्द्रक पुछला पछाइत सुवासिनी किछु बजली नहि। सुभावीक बात सुनि जहिना धीरेन्द्र तहिना चारू माय-धी सुवासिनी चौंकली। चौंकली ई जे जा!ई की भेल, चिन्हअ ने जानह मौसी-मौसी करह..! की बुझि धीरेन्द्रक माए असीरवाद देली..? ओना, धीरेन्द्र अपन माइयक ममत्वकेँ नस-नस जनैत, तँए धीरेन्द्र बेसी क्षुब्ध नहि भेल, मुदा सुवासिनी चारू माय-धी अखनो क्षुब्ध छथिए। तैबीच सुवासिनीक परिचय दैत धीरेन्द्र माएकेँ कहलक- “माए, पूवारि टोलक श्याम भाइक बहिन छथिन।” श्यामक बहिन सुनि सुभावीकेँ धक-दे सुवासिनीक बिआह मोन पड़ि गेलैन। बजली- “तोरे सासुर ने रामपुर छिअ?” सासुरक नाओं सुनि सुवासिनीक ऑंखि नोरसँ भरि गेलैन। गाड़ा फटि गेलैन। फाटल गड़े बजली- “तेहेन गाम माए-बाप बिआह कऽ बोरि देलैन जे रने-बने वौआइ छी..!” सुवासिनीक बात सुनि अपन बचाव (समाजक बचाव) करैत सुभावी बजली- “आब ने माए छैथ आ ने बाबू छैथ जे सुनता। अपना जनैत तँ ओ सभ नीके गाम बिआह केलैन, आब जँ ओ अधला भऽ गेल तइमे हुनका सबहक कोन दोख।” तही बीच धीरेन्द्रक पिता- जीबेन्द्र पहुँचला। पत्नीक मुहसँ ‘गाम’ सुनि नेने छला मुदा बजला किछु ने। तैबीच सुभावियो आ सुवासिनीयो अपन नैहर-सासुरक बीचक मझधारमे झिलहोरि खेलिये रहल छेली। ओना, अपना ऐठामक बेवहार रहल अछि जे पुरुख जातिक लोक दरबज्जापर बैस गप-सप्प करै छैथ आ महिला जाति ऑंगनमे। मुदा से भेल नहि, दरबज्जेपर सुभावी माल-जालक थैर-गोबर करै छेली तहीकाल सुवासिनी चारू माय-धी पहुँचली। पत्नीक रमझौआ सुनि जीबेन्द्र दरबज्जापर सँ उठि सुभावीकेँ कहला- “रमझौए करब आकि चाहो-ताहो पीएबैन।” आन स्त्रीगण जकॉं सुभावी नहि छैथ जे पतिक बीच अपन हस्ती बढ़बै दुआरे झपैट कऽ बजितैथ। जीबेन्द्रक बात सुनिते जहिना कोनो गाड़ी ब्रेक लेलासँ रूकि जाइए तहिना सुभावी चोटे ऑंगन दिस बढ़ि गेली। सुवासिनी चारू माय-धी बेरा-बेरी जीबेन्द्रकेँ प्रणाम केली। तैबीच धीरेन्द्र सेहो गोलिया कऽ बैसैक ओरियान केलक। गोलिया कऽ बैसते, सुभावी चाह नेने पहुँच गेली। जीबेन्द्र बजला- “चाह बीचमे रखि दियौ आ अहूँ एत्तै बैसू।” ओना, पूर्ण रूपे दुनू परिवार माने सुवासिनीयोक आ धीरेन्द्रोक–नहियेँ भेल मुदा नहियोँ भेल से केना नइ नै कहल जाएत। खाली सुवासिनीक परिवारक रामलखन नहि छला मुदा धीरेन्द्रक तँ सभ छेलाहे। चाह पीलाक पछाइत जीबेन्द्र सुभावीकेँ पुछलैन- “हमरा अबैसँ पहिने गामक चर्च की करै छेलौं?” बेवहारिक जिनगी जीनिहार जीबेन्द्रक मनमे आबि चुकल छल जे समाजमे अखनो एहेन अछि आ पहिनौंसँ आबि रहल अछि जे समाजक बीच जँ कोनो समाजिक रूपक बैसार भेल–मानेसमाजक क्रिया-कलापक, तँ किछु परिवारक महत्-पूर्ण लोक पहुँचै छैथ, बाँकी परिवारक छॉंटी-छुँटी लोक माने कम महत्-क लोक पहुँचबोकरै छैथ वा केते परिवारक नहियोँ पहुँचै छैथ, जइसँ क्रिया-कलापक रूपमे किछु-ने-किछु कमी भइये जाइए। जखने समाजिक क्रियामे कमी औत तखने समाजक बीच समाजिकधार एकोशिया भइये जाएत। जइसँ धारक प्रवाह–समाजिक धारा–एकोशिया होइत बहैत-भँसैत सुखबे करत। जखने एका-एकी सुखब शुरू भेल तखने सुखाइत-सुखाइत अल्पांशसँ बहुलांश भइये जाएत। सुपुट शब्दमे सुभावी बजली- “श्यामक बहिन सुवासिनी चारू माय-धी छी। वेचारीकेँ सासुरमे बड़ दुख होइ छै, जइसँ अपन माए-बापकेँ..?” बजैत-बजैत सुभावी चुप भऽ गेली। गपक लाड़ैन चलबैत जीबेन्द्र बजला- “बीचमे किए मुँह बन्न केलौं। ऐठाम कियो आन अछि जे मुँह खोलैसँ सकुचाइ छी।” पतिक सह पेबिते सुभावीकेँ अपन विचारक वाण बजैक सह भेटलैन। मुख्य विचार दिस सहटैत बजली- “आब कहू जे एहेन होइ जे माता-पिता अपन बेटा-बेटीकेँ जिनगीक ठौर धड़ा देलैन सएह जँ गारि पढ़ैन से नीक भेल?” सुभावीक विचार सुनि सुवासिनी थकमका गेली मुदा जगमोही स्वीकारि बाजल- “नहि!” विचारकेँ सम्हारैत जीबेन्द्र बजला- “बीतल बात[ii]केँ खण्डण-मण्डण हेबा चाही जे कि नीक भेल कि अधला भेल, ओकर जँ निराकरणक दृष्टिसँ किछु विचारब तँ ओ समय सापेक्ष थोड़े हएत जे ओकर प्रभाव घटनापर पड़तै।” पिताक बात सुनि जहिना धीरेन्द्र जगमोही दिस तकलक तहिना जगमोही धीरेन्द्र दिस ताकए लगल। मुदा बाजल दुनूमे सँ कियो ने। ओना, मनपंक्षी एक दोसरसँ लोल मिलानी करैत मने-मन स्वीकारि जरूर लेलक जे अनेरे गाड़ल मुरदाकेँ उखारि पोस्टमार्टम करब नीक नहि। अपना दुनू गोरे समाजशास्त्र पढ़ै छी तँ बड़बढ़िया मुदा इतिहास पढ़निहार की तखन डोका-कॉंकोर बीछत। ओ तँ वएह खोजत।चुपा-चुपी देख जीबेन्द्र बजला- “देखियौ, गामक अनाड़ियो-धुनाड़ीलोक जे समाज सूत्रकेँ नहि जनैएओहो बजिते अछि जे जाबे धरतीपर एकोटा धर्मात्मा नइ अछि ताबे ई धरती असथिर केना अछि। जखने धरतीपर सँ धर्मात्मा मेटा जाएत तखने ई धरतियो मेटा जाएत।” जेना सभसँ बेसी बुझैमे सुभावियेकेँ आएल होनि तहिना बिच्चेमे बाजि उठली- “हँ, से तँ हेबे करत।” पत्नीकेँ सम्हारैत जीबेन्द्र बजला- “एना धड़फड़ा कऽ बजने नइ ने हएत। जखन कोनो गाम आकि गामक समाजक विषयमे विचारै छी तखन नीक जकॉं समाजकेँ देखए पड़त। अखनो सभ गामक किछु परिवार एहेन अछिए जे बेटाक बिआहमे दहेज लेबकेँ पाप बुझै छैथ आ किछु गोरे नीको बुझिते छैथ। दोहरी रस्ता चलने समाजक बीच विघटन हएत। जइसँ अनमेल बिआहक चलैन बढ़त। अनमेलो भेने तँ परिवारक विघटन हेबे करत किने।” जीबेन्द्र जेना विचारक पाराग्राफ बदलए चाहलैन तहिना चुप भऽ गेला। जइसँ फेर चुपा-चुपी पसैर गेल। सबहक मन अही तारतम्यमे लगि गेलैन जे जाह ई की भेल जे फेर चुपा-चुपी पसैर गेल। दूटा स्त्रीगण तँ साँझ-सँ-भोर आ भोर-सँ-साँझ अपन बोलीसँ गामकेँ अलगेनहि रहैए आ ऐठाम तँ उम्रोक हिसाबसँ आ पढ़लो-लिखलक हिसाबसँ बैसले छी, तखन किए एना भेल अछि। ओना, दहेजक नाओं सुनि सुवासिनीक मन कुकुआ कऽ कड़ुआ लगल छेलैन्हे, मुदा समुदायमे बैसल देख अपनाकेँ संयमित केने छेली। थोड़ेकालक पछाइत जिज्ञासा करैत सुवासिनी बजली- “काकाजी, मास दिन-ले ऐठाम एलौं हेँ, भरि आम रहब।” जीबेन्द्र- “नीक विचार सोचि एलौं। नीक जकॉं तँ हम जानि नहि रहलौं हेन तँए पहिने अपन ठौर-ठेकान[iii]कहि दैतौं ते विचारक आदान-प्रदान करैमे नीक होएत।” ऑंखिक इशारा सुवासिनी जगमोहीकेँ देली। जगमोही आदर सूचक शब्दमे बाजल- “नानाजी, हमर नाम जगमोही छी। बी.ए. ऑनर्समे पढ़ै छी। समाजशास्त्र विषयमे ऑनर्स रखने छी।” जगमोहीक परिचय सुनि जीबेन्द्र बजला- “धीरेन्द्रो तँ पटनेमे पढ़ैए। दुनू गोरेमे परिचय-पात छह कि नहि?” जीबेन्द्रक बात (प्रश्न) सुनि जगमोही सकपकाएल, सकपकेबो उचिते अछि। उचित ई जे आजुक जे परिवेश बनि गेल अछि ओ सही दिशासँ हटि गलत दिशामे बढ़ल जा रहल अछि तँए अपनाकेँ संयमित राखबोक खगता तँ भइये गेल अछि। अपनाकेँ संयमित करैत जगमोही बाजल- “नीक जकॉं तँ धीरेन्द्रसँ परिचय नहि अछि मुदा चिन्हा-चीन्ही जरूर अछि।” जीबेन्द्र- “कए भाए-बहिन छह?” ‘भाए-बहिन’क नाओं सुनि जगमोहीक फेंच जेना खसि पड़ल। फेंच खसिते उदास मने बाजल- “तीन बहिनियेँटा छी।” एक तँ भाए नहि, दोसर तीन बहिन सुनि जीबेन्द्रक मन खन-खन-खिन-खिन होइतझहरए लगलैन। मुदा विचारक वाणक आगू शिवजीक धनुष रहितो समाजोक पहाड़ आ जिनगियोक पहाड़ तँ आगूमे अछिए। तँए धॉंइ-दे किछु विचार करब जल्दवाजी हेबे करत। जखने उचितसँ कम समयमे कोनो काजकेँ करैक जिज्ञासा जगत तखने जिज्ञासुकेँ जान-परान लगबए पड़तैन। जँ से नइ लगौता तखन बिसवासप्रद फल भेटैक सम्भावनामे असंदिग्धता रहबे करत किने। ओना, जीबेन्द्रक परिवारक गति-विधि सपाट[iv] छैन। ओना, सपाटोक विभिन्न रूप अछि। जेना समाजिक, आर्थिक, वैचारिक, बेवहारिक इत्यादि-इत्यादि मुदा से अखन नहि। अखन एतबे जे बेटा-बेटीक बिआह, सम्बन्ध आ बेवहार। तइ मानेमे जीबेन्द्रक परिवारक स्पष्ट इतिहास जीवित छैन जे बेटा-प्रति जे दहेजक रूपमे ‘हम एते लेबओते लेब’ से अखन धरिक परिवारिक इतिहास नहि रहल छेलैन। जे धारणा अखनो जीबेन्द्रक मनमे जीवित छैन्हे। ओना, प्रेमनगरमे खाली जीबेन्देटाक परिवारमे एहेन छैन से बात नहि, आनो-आनो जातिक समाजमे अछिए। जइसँ परिवारमे बेटा-बेटीकेँ जुआन माने वयस्क, होइते अधिकार भेट जाइए। जइसँ माता-पिताक विचारमे लोच अबैए। लोच आनबो तँ जरूरी अछिए। पिता-पुत्रक बीच आ परिवार परिवारजनक बीच केना सौहार्दता बनल रहत, ई तँ मनुख होइक नाते मनुक्खेकेँ सोचि-विचारि आगू डेग बढ़बए पड़त। दहेजेटा परिवारमे पीढ़ीक (वंशगत सम्बन्ध) बाधा नहि अछि। दहेजक अतिरिक्तो विघटनक अनेको दुआर खुजले अछि। अखन बेसी नहि सिर्फ एकेटा- वैचारिक। सभ मनुखमे चाहे ओ पुरुख हुअए आकि महिला, अपन-अपन गुण-धर्म तँ किछु-ने-किछु रहिते अछि। ओइ गुण-धर्मकेँ बेवहारिक जिनगीक संग केना सामंजस्य कएल जाएत, ई दायित्व तँ सबहक परिवारमे बनिते अछि। विचारक दुनियॉंमे उगैत-डुमैत जीबेन्द्र बजला- “केते दिन आरो पढ़बह?” जगमोही- “परिवारक स्थिति देखैत बी.ए. तकक विचार केने छी। जइमे आठ मास आरो बॉंकी अछि।” जीबेन्द्र- “आगूक लेल की सोचै छह?” आगूक बात सुनिते जहिना गरदैन कटल मनुखक धारा-प्रवाह मलिनता पसरए लगैत तहिना जगमोहीक विचारक मलिनता एकाएक मनकेँ छाड़ि देलक। कटैत रस्ताटुटैत जिनगीक बीच मझधारमे दहाइत-भँसियाइत जगमोही बाजल- “अखन किछु ने।” ओना, जीबेन्द्रक मनमे रहैन जे जगमोही अपन किछु-ने-किछु उदेस बना नेने हएत, मुदा अन्ना-गाहींस जिनगी देख जगमोही किछु ने विचार केने छल। जे उचितो तँ छेलैहे। ऐ राक्षसी समाजमे नारीक जिनगीक संग खेलवार भइये रहल अछि किने। जगमोही अपन विचारानुसार बाजल छल, मुदा तेमहर धियान जीबेन्द्रक नहि गेल छेलैन। ओ गेलैन जगमोहीक बजला पछाइत। बजला- “बाबू, की करै छथुन?” जगमोही- “पटनेमे नोकरी करै छैथ जइसँ परिवार चलैए।” ओना, जगमोहीक बात सुनि अनेको विचार जीबेन्द्रक मनमे जगलैन। मुदा सभ विचारकेँ तहियबैत धीरेन्द्रकेँ कहला- “बौआ, तोरो तँ अपन हाथक रोपल आम छहे। सभकेँ खुआबह।” गुलाव खास आ बम्बइकेँ धीरेन्द्र पटनासँ एला पराते घरमे पाल चढ़ा नेने छल जे दू दिनमे खाइ-जोकर भइये गेल छल। एक-एकटा आम सभकेँ हाथमे लेला पछाइत जीबेन्द्र बजला- “भरि आम तँ रहबे करबह?” जगमोही- “हँ।” जीबेन्द्र- “ऐ बेर अपना प्रेमनगरमे, खूब सहजोर आम फड़ल अछि।” मुस्की दैत जगमोही बाजल- “नानाजी, साले-साल आएब।” विचारक प्रवाहमे जीबेन्द्र भँसि गेला। अनायास मुहसँ खसि पड़लैन- “साले-साल किए, सालो-साल भरिले रहि जाह।” नहलापर दहला फेकैत जगमोही बाजल- “ऐ गामक लोक रहए देता तखन ने?” [i]स्पष्ट [ii]घटना [iii]परिचय [iv]समतल ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय प्रायश्चित बससँ दरभंगा जाइ छेलौं।हम नरहिया बजारमे बसपर चढ़ल छेलौं। बस फारबिसगंजसँ अबैत रहएतँए बसमे बेसी भीड़ छेलइ। फुलपरास तक ठाढ़े गेलौं। फुलपरासमे किदु पैसेन्जर सभ उतरला तँ हमरा एकटा सीट भेटल आ हम बैस गेलौं। बस खोपा चौकपर रूकल तँ एकटा लगधक उनहत्तैर-सत्तैर बर्खक महिला यात्री बसमे चढ़ली। हुनका संगमे एकटा दस-बारह बर्खक लड़की सेहो छेली। महिलाक कपड़ा-लत्तासँ बुझाएल जे ओ गरीब घरक छैथ। संगमे जे बुच्ची छेली ओहो साधारणे कपड़ा पहिरने छेली। महिला दुबर-पातर बड़ कमजोर छेली। पएरमे चप्पल नै रहैन। ओ महिला बस जगह खोजए लगली। मुदा बसमे केतौ एक्कोटा सीट खाली नै छेलइ। सत पुछू तँ ठाढ़ो होइमे महिलाकेँ दिक्कते छेलैन। ओ हमरा सीटक बगलमे आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेली। हुनक उमेर आ कमजोर शरीर देख हमरा दया आबि गेल। हम ठाढ़ भऽ गेलौं आ ओइ महिला आ हुनका संगमे जे बुच्ची छेली; बैसा देलिऐन। कनीकालमे बस कंडक्टर आएल आ ओइ बुढ़ीसँ पुछलक- “केतए जेमे बुढ़िया?” हमरा कंडक्टरक बोली बिसाइन जकाँ लागल, मुदा हम बजलौं किछु ने। बुढ़ी बजली- “झंझारपुर जाएब बाबू।” “ला भाड़ा ला।” –कंडक्टर बाजल। बुढ़ी एकटा बीस रूपैआबला नोट कंडक्टर दिस बढ़ौलक। कंडक्टर रूपैआ लैत बाजल- “दस टका और ला।” तैपर बुढ़ी बजली- “आब पाइ नै अछि बाबू।” कंडक्टर तमसाइत बाजल- “पाइ नै छौ तँ बसमे चढ़लीही किए। बस रूकतै तँ उतैर जइहेँ। ई ले अपन बीस रूपैआ।” तैपर हम कंडक्टरसँ कहलिऐ- “बुढ़ महिला छथिन। देह-दशा देखते छिऐ, गरीब बुझाइ छथिन। की हेतै दस टका नै देती तँ। कथी-ले दस टका खातिर उतारबै।” तैपर ओ कंडक्टर हमरा दिस तकैत बाजल- “की खराँतमे पैसेन्जरकेँ लऽ जाइऐ। अहाँक बड़ ममत लगैए तँ अहीं दऽ ने दियौ भाड़ा।” हम जेबीसँ एकटा पचसटकही नोट निकालि कंडक्टर दिस बढ़ा देलिऐ। ओ निच्चाँ-सँ-ऊपर हमरा दिस देखलक आ आगाँ बढ़ि गेल। हमरा पैछला एकटा घटना मोन पड़ि गेल। जखन हम बाइस-तैइस बर्खक रहीतही समैयक बात छी। हम पत्नीक संग राजविराजसँ अबैत रही। बस जखन बेलही स्टेण्डपर आबि कऽ रूकल तँ हम सभ नेपाली बससँ उतैर कऽ बोर्डर पार कऽ कुनौली बजार पहुँचलौं। कुनौली बजारक बस ठहरावपर निर्मलीक बस लगल रहए। अदहासँ बेसी सीट खालीए रहै, तँए हम दुनू पत्नी-पत्नी बीचला सीटपर एक्केठाम बैसलौं। बस खुजैमे एक घन्टा समय बाँकी रहइ। अदहा घन्टाक बाद विराटनगरसँ राजविराज जाइबला बस बोर्डरक ओइ पार बेलही (नेपाल) बस ठहरावपर आबि कऽ रूकल। ओइ बससँ तीस-पैंतीसटा पैसेन्जर उतैर कऽ बोर्डर पार कऽ कुनौली बस ठरावपर पहुँचल। ठहरावपर स्टैन्ड किरानीसँ टिकट लऽ-लऽ बसमे चढ़ए लगल। देखते-देखते पूरा बस पैसेन्जरसँ भरि गेल। बस खुजैसँ पाँच-सात मिनट पहिने एकटा महिला अपन मोटा-झोराक संग बसपर चए़ली। हुनकर उमेर लगधक चौंसैठ-पौंसैठ बर्ख रहल हेतैन। ओ साधारणे कपड़ा पहिरने छेली। ओ हमरा सीटक बगलमे आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेली आ बसमे जगह हियाबए लगली। मुदा बसमे आब एक्कोटा सीट खाली नै रहए। महिलो सीटपर महिले सीट बैसल छेली। केतौ जगह नै देख ओ हमरा दिस तकैत कहली- “बौआ कनेक हमरो बैसऽ दिअ।” ई कहि ओ हरा लग बैसऽ लगली। हम ओइ महिलाकेँ डपैट देलिऐ। महिला कातर भावसँ चारू दिस देखैत ठाढ़ भऽ गेली। हमरा बगलमे एकटा सज्जन बैसल रहैथ ओ ठाढ़ भऽ गेला आ ओइ महिलाकेँ बैसा देलखिन। जखन ओ महिला बैस गेली तखन हम हुनका चेहरा दिस तकलिऐ तँ हुनकर चेहरा हमरा जान-पहचानल लगल। हम अपना दिमागपर जोर देलिऐ तँ हमरा स्मरण भऽ गेल। ओ महिला नरहिया बजारक बैजनाथ भगतक माएछेली। हम आ बैजनाथ भगत संगे नरहिया हाइस्कूलमे अठमासँ मैट्रिक धरि पढ़लौं। बैजनाथक घर सड़कक कातेमे अछि तँए हुनका माएकेँ सेहो चिन्है छेलिऐ। पाँच-सात बर्ख बैजनाथक माएकेँ देखना भऽ गेल रहए तँए जल्दी नइ चिन्ह सकलौं। हमरा अफसोस भेल जे बैसऽ नै देलिऐ तँ नै देलिऐ मुदा डँटलिऐ किए। हम महिलासँ पुछलिऐ- “अहाँ घर नरहिया बजा भेल?” ओ महिला बजली- “हँ।” हम फेर पुछलिऐ- “अहाँ बैजनाथक माए छिऐ?” ओ महिला बजली- “हँ, बैजनाथ हमर जेठका बेटा छी। मुदा अहाँ बैजनाथकेँ केना चिन्है छिऐ?अहाँक घर कोन गाम भेल?” हम कहलयैन- “हमर घर भपटियाही अछि। हम बा बैजनाथ संगे-संग पढ़ने छी।” बगलमे बैसल एकटा बुर्जुग बजला- “चिन्है छेलिऐन तखनो बैसए नै देलिऐन।” हम सोल्हन्नी चुप रहि गेलौं। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल रहै जोकर परिवार बैशाख मास। भोरे-भोर रघुनी भाय पहुँचला। अपनो सुति कऽउठले रही। रघुनी भायकेँ देखते बजलौं- “भाय साहैब, भोरे-भोर किमहर सवारी निकलल अछि?” रघुनी भाय बजला- “राधेश्याम, तोरेसँ भेँट करए एलौं हेन..!” काल्हि साँझोमे रघुनी भाय भेटल छला, मुदा किछु कहलैन नहितँए मनमे तारतम्य हुअ लगल जे जँ कोनो तेहेन काज रहितैन तँ साँझेमे कहने रहितैथ मुदा साँझमे किछु कहलैन नहि आ रातिमे कोन एहेन बात भऽ गेलैन जे भोरे-भोर आबि गेला हेन! बजलौं- “किए?” रघुनी भाय बजला- “राधेश्याम, अदहा जिनगी बीत गेल मुदा अखन तक कोलकाता नहि देखलौं हेन। रातिमे एकाएक मनमे उठल जे देखते-देखते लोकक जिनगी बीत जाइए मुदा दुनियोकेँ देख नहि पबैए।” रघुनी भाइक विचार सुनि मनमे भेल जे रघुनी भाय ठीके कहै छथि। अपनो उमेर दिस तकलौं तँ बुझि पड़ल जे खाली रघुनीए भाइक अदहा उमेर नहि बितलैन, अपनो तँ बीतिये गेल अछि। अपनो ने कहियो कोलकाता गेलौं हेन। ऐठाम एकटा प्रश्न अछिएजे ‘अदहा उमेर’ केकरा कहबै? जन्मक ठेकान तँ अछिजे फल्लॉंक जन्म फल्लॉं दिन भेल मुदा मृत्युक तँ ठेकान नहियेँ अछि जे के कहिया मरत तखन अदहा उमेर केकरा कहबै? कियो बीसे बर्खमे मरि जाइए, कियो पचास बर्खमे मरैए तँ कियो एहनो तँ अछिए जे साए बरखबीतला पछाइत मरैए। गामेमे देखै छी जे घुरन बाबा एक साए पाँच बर्खमे मुइला, मनोहर बाबा एक साए एक्कैस बर्खमे मुइला। तैबीच अदहा उमेर माने अदहा जिनगी केकरा कहब! ओना, अपना ऐठाम साए बर्खकेँ पूर्ण जिनगी मानल गेल अछि मुदा मरै-जीबैक कोनो बिसवासू आधार नहियेँ अछि। रघुनी भाय साल भरिक जेठ छथि।जइसँ अपन जिनगीक अनुमान केने छेलौं। अपने ने कहियो स्कूल देखलौं जे उमेरक प्रमाणित सर्टिफिकेट रहत आ ने जन्मक कोनो टिप्पैण अछि जइसँ उमेरक ठेकान पबितौं, मुदा रघुनी भायकेँ से नहि छैन, कौलेज तक पढ़ने छैथ, जइसँ प्रमाणित सर्टिफिकेटो छैन्हे। जहिना अपन बिसवास सभसँ बेसी रघुनी भायपर अछि तहिना रघुनी भायकेँ सेहो हमरापर छैन। रघुनी भाइक मुँहक बात जे ‘दुनियाकेँ नहि देख पबैए’अपन मनकेँ हिलौलक। हिलौलक ई जे अखन तक दुनियाँकेँ ओतबे टा बुझै छी जेते दूर घुमल-फिरल छी। ओना, लोकक मुहेँ ‘कोलकाता’ सुनिते आबि रहल छी मुदा कोलकाता छी की, से ने कहियो मनमे विचारे उठल आ ने बुझैक जिज्ञासे भेल। बजलौं- “बढ़ियाँ विचार अछि। देखते-देखते लोकक जिनगी बीत जाइए, ने किछु कऽ पबैए आ ने देख पबैए। ” ओना, अपन की विचार अछि से स्पष्ट नहियेँ भेल मुदा रघुनी भाइक मनमे जेनाबिसवास जगलैन। बजला- “राधेश्याम, तोरासँ भेँट अही दुआरे करए एलौं जे दूरक सफर अछि। असगर-दुसगर जाएब नीक नहि,तँए तोरो कहए एलियह जे तोहूँ चलह।” अपने तँ किछु बुझल-गमल अछि नहि जे केते खर्च हएत आ केते समय लागत। तँए बजलौं- “भाय साहैब, संग पुरैमे कोनो हर्ज नहि, मुदा खर्च-बर्च केना कि पड़त आ समय केते लगत?” रघुनी भाय सभ बात पुहुपलालसँ भँजिया नेने छला तँए बुझल छेलैन। रघुनी भाय बजला- “कोनो कि हाथी-घोड़ा कीनब जे बहुत खर्च हएत। भेल तँ गाड़ी-सवारीक भाड़ा-भुड़ी आ खाएब-पीबमे जे पड़त, तेतबे ने खर्च हएत।” अपना जनैत छाँह-छुँहमे रघुनी भाय बाजि चुकल छला मुदा अपने अन्दाज नहि कए पेलौं जे भाड़ा-भुड़ीमे केते खर्च हएत आ खाइ-पीबैमे केते खर्च हएत। बजलौं- “भाय, अहूँ कोलकाता नहि गेल छी, तँए ठीक-ठीक नहि बुझल हएत। तहूमे खाली कोलकाता गेनाइये टा रहैत तखन दोसर बात होइत मुदा जखन देखै-सुनैले जाइ छी तखन केते समय लगत आ केते खर्च हएत आ जइ स्थानपर जाएब, तइठामक किछु सनेस नहि आनब, सेहो केहेन हएत। तँए एकटा अनुमान कऽ लेब किने।” स्वीकार करैत रघुनी भाय बजला- “राधेश्याम, कोलकाता खाली महानगरे टा नहि ने छी जे बजारे टा अछि। बजारक अतिरिक्तो, जे कोलकातासँ बाहर अछि, दर्शनीय जगह सभ अछि, ओहो ने देखने आएब।” हूँहकारी भरैत बजलौं- “ठीके किने। गामेक नहि, परोपट्टेक केतेकोलोक कोलकातामे नोकरियो करै छैथ आ अपन परिवारो रखने छैथ, मुदा अपना सभ तँ से नहि छी, देखै-सुनैले जाएब आ देख-सुनि कऽ घुमि आएब। तँए, ओत्ते ओरियान केनहि ने जाएब जे केतौ कोनो बाधा उपस्थित नहि हुअए।” मने-मन विचारि रघुनी भाय बजला- “राधे श्याम, जँ ठीक-ठीक बुझल रहैत तँ ठीक-ठीक कहि दैतियह मुदा से नहि अछि। मानि लएह जे एक मास समय लागत आ एक हजार रूपैआ खर्च हएत।” बैशाख-जेठक समयछीखेती-पथारी अखन कोनो अछिए नहि तँए समैयक तँ कोनो बाते नहि। तैबीच परसू बारह साएमे खस्सी बेचने छेलौं, से रूपैआ हाथमे छेलए-हे। कहलयैन- “ठीक अछि भाय, जखन विदा होइ, हमहूँ तैयार छी।” तैबीच पत्नी चाह बना दरबज्जापर आबि गेली। पत्नीक हाथसँ चाहक दुनू कप लैत एक हाथक रघुनी भाय दिस बढ़ैलौं आ एक हाथक अपने रखलौं। ओना,पत्नी सुनि नेने छेली- ‘जखन विदा हएब, हमहूँ तैयार छी’ तँए ऐगला बात सुनैले छोट डेगेआँगन घुमली। मुदा तैबीच ने अपने किछु बजलौं आ ने रघुनीए भाय किछु बजला। ओना, अपन मन मानि गेल जे पत्नी ऐगला गप सुनै दुआरे डेग छोट कए आँगन दिस बढ़ि रहली अछि, तँए अपने पाशा बदलैत बजलौं- “भाय साहैब, चाह नीक बनल किने?” कर्ताक मन तँ कर्मपर रहिते अछि तहूमे चर्च कऽ देने छेलौं। रघुनी भाय पाशाकेँ आरो छिड़ियबैत बजला- “धु: चाहोकेँ लोक सुआदि-सुआदि पीबैए। आब तँ चाह पानिये जकाँ लोक केता बेर दिनमे पीबैए तेकर कोनो ठेकान छै।” पत्नी ताबे अढ़ भऽ गेली, माने अँगना पहुँच गेली। बजलौं- “रघुनी भाय, खेबो-पीबोक ओरियान करब?” रघुनी भाय बजला- “हम सभ बात पुहुपलालसँ बुझि नेने छी। खाइ-पीबैक किछु ने ओरियान करैक अछि, खाली अपन जे देहक कपड़ा पहिरैबला अछि बस तेतबे। कोलकाता जाएब किने, जैठाम अपना देशक कोन बात जे अपन मधुबनी-झंझारपुरमे जे खाइ-पीबैक समानकदाम अछि तेकर अदहा दाममे ओतए भेटैए। तँए जैठाम एतेक सस्ता अछि तैठाम अनेरे गामसँ किए किछु नेने जाएब।” बजलौं- “तखन तँ एक गोरेक खर्चमे, माने जेते खर्च मधुबनी-झंझारपुरमे एक बेकतीकेँ खाइ-पीबैमे होइए, तेतेमे दुनू गोरेकेँ कोलकातामे भऽ जाएत।” रघुनी भाय बजला- “तेहने सन बुझह।” बजलौं- “बड़बढ़ियाँ। घरसँ कहिया निकलब?” रघुनी भाय बजला- “परिवार छी किने, किछु-ने-किछु सदिकाल होइते रहैए। तँए, जखन नियारि लेलौं तखन बेसी समय लगबैक थोड़े अछि। काल्हि भोरे विदा भऽ जाएब।” बजलौं- “आइ भरि दिन समय अछि। कपड़ो-लत्ता खींच लेब आ काजो सभकेँ गर-गुर लगा लेब।” दोसर दिन भोरे दुनू गोरे गाड़ी पकड़ए विदा भेलौं। ओना, अपना स्टेशनसँ डायरेक्ट गाड़ी कोलकाताक नहियेँ अछि मुदा दरभंगासँ अछिए। दरभंगा-हाबड़ाक जे गाड़ी अछिओ दरभंगेसँ खुजैए, भीड़ो-भड़क्का बेसी नहियेँ छल तहूमे रिजर्व टिकट बनौने छेलौं। ओना, भीड़-भड़क्का गाड़ीमे बेसी नहि छल मुदा जगहक हिसाबे यात्री तँ छेलैहे। दुनू गोरेक जगह एक्केठाम भेल। बगलमे आन-आन यात्री सभ छला। संजोग एहेन भेल जे दूटा बंगाली यात्री सेहो बगलमे बैसला। गाड़ी जखन दरभंगासँ खुजल तँ ओ दुनू बंगाली यात्रीहिन्दीमे गप-सप्प शुरू केलैन। बुझि पड़ल जे दुनू बेपारी छैथ। अपन-अपन वेपारक सम्बन्धमे गप-सप्प करए लगला। ओना, दुनू अपरिचित, एक-दोसरकेँ नहि चिन्हैत, मुदा किछु समैयक पछाइत दुनू हिन्दी छोड़ि बंगलामे गप-सप्प करए लगला। जाबे तक हिन्दीमे गप-सप्प करैतरहला ताबे तक तँ किछु बुझितो छेलौं मुदा जखन बंगलामे गप-सप्प करए लगला तखनसँ किछु ने बुझि पेलौं। बंगलामे गप-सप्प सुनि रघुनी भायकेँ कान लग फुसफुसा कऽ कहलयैन- “भाय, ई दुनू डिब्बामे मारि फँसौत। देखै छिऐ केहेन बढ़ियाँ हिन्दीमे सभ्य जकाँ आप-आपक प्रयोग करै छल आ आब ‘तुमि-तुमि’- तुम-ताम केनाइ शुरू केलक!” अपना जनैत हम ऐ दुआरे बजलौं जे अपना ऐठाम देखै छी जे पहिने लोक मैथिलीमे गप-सप्प शुरू करैए आ रक्का-टोकी करैत हिन्दीमे पहुँच झगड़ा-झंझट, मारि-पीट करए लगैए। मनमे सहए भेल। तँए रघुनी भायकेँ कहने छेलिऐन। रघुनी भाय बंगला भाषा आ बंगालीक सम्बन्धकेँ बुझै छैथ, बजला- “राधे श्याम, यएह बंगाली भाषाक शक्ति आ बंगभूमिक खास गुण छी जे जखने एक-दोसरकेँ बंगवासी बुझि जाइ छैथ तखने आन भाषाकेँ छोड़ि अपन मातृभाषामे बाजए लगै छैथ। जइसँ अपनामे अपनत्व बढ़ए लगै छैन।” रघुनी भाइक विचार उन्टा बुझि पड़ल। उनटा ई जे अपना ऐठाम जे बच्चो आ कि सियाने मैथिलीसँ अलग हटि हिन्दी वा अंग्रेजीमे बजै छथि तँ हुनका लोक बेसी बुद्धिमान बुझै छैन, आ बंगालीमे तेकर उन्टा अछि। तँए कनी छगुन्ता जरूर लगल। बजलौं- “से की भाय?” विचारकेँ सोझरबैत रघुनी भाय बजला- “राधे श्याम, बंगला भाषा आ बंगला साहित्य जे एते सशक्त अछि एकर यएह कारण अछि जे बंगालकलोक अपन मातृभूमि-मातृभाषाकेँ हृदयसँ बेसी आदर करै छैथ। जे अपना ऐठाम नहि अछि। बजैक क्रममे अपना ऐठामक लोक जेतेक बढ़ा-चढ़ा कऽ बाजि लैथ मुदा बेवहारमे ठीक एकर विपरीत अछि।” रघुनी भाइक विचारकेँ गहराइसँ तँ नहि बुझि पेलौं मुदा एतेक तँ बिसवास रघुनी भायपर बनले अछि जे ओ ठक-फुसियाह नहि छैथ, तँए झूठ-फूस नहियेँ कहता। तही बीच गाड़ी समस्तीपुर पहुँच गेल। मकैक ओरहा बेचनिहार बोगीमे पहुँचल। पाँच रूपैये बाइल बेचै छल। ओहो दुनू माने दुनू बंगाली यात्री सेहो दूटा बाइल लेलैन आ रघुनी भाय सेहो दूटा बाइल लेलैथ। अखन तक ने रघुनीए भाय हुनका सभसँ माने बंगाली भाय सभसँ किछु पुछने छेलखिन आ ने वएह सभ रघुनी भायकेँ किछु पुछलकैन। मुदा समस्तीपुरक मकै-ओरहा दुनू गोरेकेँ लग अनलकैन। एक गोरे माने एकटा बंगाली यात्री रघुनी भाय दिस घुमि बजला- “अच्छा है!” ओना, रघुनी भाय बुझि गेल छला जे दुनू बंगाली छैथआ अपनो बंगाले जा रहल छी तँए किछु जानकारी करब आवश्यक अछिए।ओ तँ विचारेक आदान-प्रदानसँ बेसी नीक हएत। रघुनियो भाय अपन भाषाक महतकेँ बढ़बैत बजला- “मिथिलाक मुख्य सनेस छी। ऐ इलाकामे, माने समस्तीपुर इलाकामे मकैक अनेको ढंगक भोज्य विन्यास बनैए। जइमे ओरहो एक विन्यास छी।” ओना, मैथिली भाषाकेँ ओ दुनू बंगाली नीक जकाँजानि जाइ छला मुदा बजैमे कनी बंगलाक गन्ध आबिये जाइ छेलैन। ओहो दुनू अधखिज्जू मैथिलीमे गप-सप्प रघुनी भाइक संग करए लगला।एक बेकतीमैथिली भाषा-साहित्य आ मिथिलाक्षर लिपिक जानकार सेहो छला। ओ बंगला लिपि आ मिथिलाक्षर लिपिक सम्बन्धमे सेहो बजला। किछु आगू बढ़ला पछाइत माने जखन गाड़ी सिमरिया पुल टपि गेल तखन रघुनी भाय रवीन्द्रनाथ टैगोरक साहित्य आ संगीतकचर्च उठौलैन। रवीन्द्र साहित्यक चर्च उठिते ओ बंगाली बजला- “जहिना हिन्दी साहित्यजगतमे तुलसीक रामायण आ तुलसीदासकेँ महानसँ महानतम स्थापर रामचन्द्र शुक्ल पहुँचेलैन तहिना कबीरदासक जनभाषा आ जनविचारकेँ रवीन्द्रनाथ पहुँचेलैन।” अपने तँ साहित्य आ साहित्यकारक विषयमे किछु बुझल नहि अछि तँए चुप्पे रहलौं। मुदा रघुनी भाय साहित्यक नीक जानकार छैथ तँए दुनू गोरेक बीच गप-सप्प हुअ लगलैन। किछुकालक पछाइत रघुनी भाय बजला- “हमहूँ दुनू गोरे बंगाले जा रहल छी। ओना, जीवनमे पहिल बेर जा रहल छी, तँए नीक जकाँ बुझल-गमल नहियेँ अछि। अपने कने बंगालक विषयमे किछु जानकारी दऽ दिअ जे घुमै-फिरैमे सुविधा हएत।” ओ बजला- “बंगालक चौराई तँ कम्मे अछि मुदा नमती बहुत बेसी अछि। दच्छिनमे बंगालक खाड़ीसँ लऽ कऽ उत्तरमे हिमालय तक अछि। जइसँ अनेको धारो-धुर आ जलवायु सेहो अछिए।” रघुनी भाय बजला- “नोकरी-चाकरी करैक खियालसँ तँ बंगाल नहियेँ जा रहल छी, देखै-सुनैक खियालसँ जा रहल छी। ओना, रवीन्द्रबाबू आ शान्तिनिकेतनक सम्बन्धमे किछु-किछु किताबी जानकारी जरूर अछि मुदा कहियो गेल नहि छी।” शान्तिनिकेतनक नाओं सुनिते ओ, बंगाली भाय जेना फुटि पड़ला। धुरझार शान्तिनिकेतनक प्रशंसा करैत बाजए लगला। जइसँ रघुनी भाइक मनमे सेहो शान्तिनिकेतनक प्रति आकर्षण बढ़ए लगलैन। रघुनी भाय बजला- “शान्तिनिकेतन जाएब केना?” ओ बजला- “ई गाड़ी माने जइमे चढ़ल छी, हाबड़ा पहुँचा देत। बंगालक दूटा जक्शन एहेन अछि, हाबड़ा आ सियालदह, जैठामसँ बंगालक सभ जगहक लोकल गाड़ी भेटैए। हाबड़ासँ अनेको गाड़ी शान्तिनिकेतनक अछि।” रघुनी भाय बजला- “हाबड़ा शान्तिनिकेतनक बीच केतौ दोसर गाड़ी नइ ने बदलए पड़ै छै?” ओ बजला- “बीचमे केतौ ने गाड़ी बदलए पड़त। चारि-पाँच घन्टाक रस्ता अछि। सोझहे हाबड़ासँ शान्तिनिकेतन पहुँच जाएब।” बारह बजे रातिमे हाबड़ा स्टेशन पहुँचलौं। ओना, लोकक आवाजाही तेतेक जे राति बुझिये ने पेब रहलछेलौं मुदा घड़ीमे बारह बाजि रहल छल। स्टेशनेक प्लेटफार्मपर दुनू गोरे जाजीम बिछा सुति रहलौं। चारि बजे भोरे उठि अपन नित्य-कर्मसँ निवृति होइत चाह पीलौं। छह बाजि गेल। गाड़ीक टिकट लेलौं। साढ़े छह बजेमे शान्तिनिकेतनक गाड़ी खुजत। गाड़ीमे बैसलौं। गाड़ीमे बैसते रघुनी भाय शान्तिनिकेतनक विषयमे जानकारी दिअ लगला। ओना, आनो-आन बहुत यात्री शान्तिनिकेतन जाइछला जइमे किछु देखनिहारो छला आ किछुकेँ अपन घरो छेलैन आ किछु कारोबारियो छला। साढ़े बारह बजे गाड़ी शान्तिनिकेतन पहुँचल। दुनू गोरे प्लेटफार्मेपर नहेलौं, नहेला पछाइत रोडेपर माने फुटपाथेक दोकानमे जा कऽ खेलौं। सचमुच बुझि पड़ल जे बंगालक होटल अपना ऐठामक होटलसँ सस्ता अछि। छबे रूपैआमे दुनू गोरे भरि पेट खेलौं। ओना, खेनाइ-खेला पछाइत अपन मन असविस करए लगल मुदा रघुनी भाय कहला जे जखन देखै-सुनैले आएल छी, तखन जँ अरामेक पाछू समय लगाएब से नीक नहि। एक गोरेकेँ रघुनी भाय पुछि शान्तिनिकेतनक जानकारी लेलैन। दुनू गोरे विदा भेलौं। रवीन्द्रबाबूक बनौल शान्तिनिकेतन आ रेलबे स्टेशनक बीच आदिवासी सबहक घर। ओना, देखैमे ओ सभ कारी छल मुदा जेहने सोझ-सपटविचारसँ तेहने बेवहारसँ सेहो छल। दुनू गोरे शान्तिनिकेतनक विश्वभारती महाविद्यालयकेँ फरिक्केसँ देखलौं तँ बुझि पड़ल जे सचमुच हम सभ शान्तिवनक शान्तनिकेतनमे पहुँच गेल छी। आगू बढ़लौं तँ एकटा चिन्हार चेहरा आगूमे देख पड़ला। हम तँ हुनकापर धियान नहि देलिऐन मुदा रघुनी भाय टकटकी लगा हुनका देखए लगलखिन। ओहोरघुनी भायकेँ निग्हारि बजला- “अहाँ सभ मैथिल छी?” मैथिली भाषा तीनू गोरेक बीच सम्बन्ध बढ़ौलक। रघुनी भाय कहलकैन-“हँ.!” ‘हँ’ सुनिते जेना हुनका बिसवास बढ़ि गेलैन, बजला- “अहाँकेँ कने-मने चिन्है छी..!” रघुनी भाय बजला- “अहूँकेँ कने-मने चीन्हि रहल छी मुदा नीक जकाँ मन नहि पड़ि रहल रहलौं हेन।” ओ बेकतीबजला- “पहिने चाहक दोकानपर चलू, चाहो पीब आ परिचय-पात सेहो करब।” सएह भेल। तीनू गोरे चाहक दोकानमे गेलौं। चाहक कप हाथमे लइते ओ बजला- “अहाँक घर चैनपुर छी?” रघुनी भाय बजला- “हँ।” ‘हँ’ सुनिते मुस्कियाइतओ बजला- “हमर नाओं शान्तिनाथ छी। हमरो घर चैनपुरे छी। आइसँ तीस बरख पूर्व हम परिवारक झड़-झमेलसँ आजीज भऽ गामसँ पड़ा गेलौं। अपन बपौतीक सभ सम्पैत हुनके सभकेँमाने भाइये सभकेँ छोड़ि देलिऐन। आ ऐठाम आबि विश्वभारतीक कार्यालयमे नोकरी शुरू केलौं। ओना, सोझे ऐठाम नहि पहुँच गेलौं। एकटा बंगाली शिक्षकक संग कलकत्तासँ एलौं। नमहर इतिहास अछि। ओ अखन नहि कहब।” चाह पीलाक पछाइत शान्तिनाथ अपन कार्यालय पहुँचला। हमहूँ दुनू गोरे संगे रहिऐन। कार्यालयमे बड़ाबाबूसँ कहि हमरा दुनू गोरेकेँ घुमबए-फिरबए लगला। नमगर-चौड़गर विश्वभारतीक आँट-पेट, तँए घुमैत-फिरैतसाँझकसात बाजि गेल। पछाइत संगे शान्तिनाथ अपन डेरापर अनलैन। चारिटा बाल-बच्चाक संग दुनू परानी शान्तिनाथ रहै छैथ। अपन गाम-समाजकेँ लंका–रावणक लंका–सदृश मानि शान्तिनाथ बजला- “बौआ रघुनी, रावणक-लंकोसँ बदत्तर अपन समाज अछि। केकरो कियो शान्तिसँ जीबए नहि दिअ चाहैए। जहियासँ ऐठाम एलौं तहियासँ बिलकुल शान्तिसँ जी रहल छी।” रघुनी भाय बजला- “अपनो गाम तँ मिथिलेक गाम छी ने।” शान्तिनाथ बजला- “हँ, सेमानै छी!मुदा जे बेवहार पक्ष अपना गामक अछि,ओ तँ..?” विचारकेँ आगू नहि बढ़बैत रघुनी भाय बजला- “हमहूँ दुनू भैयारी देखै-सुनैक खियालसँ आएल छी।” शान्तिनाथ बजला- “शान्तिनिकेतन तँ देखिये लेलिऐ, काल्हि सुन्दरवन सेहो देखा देब।” अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी बीहनि कथा करोट यै कनिञा,सुनि के दुख हएत,मुदा कहिए देब उचित बुझै छी। कहौथ ने मां,हिनकर सबहक बात के दुख किएक हएत। बौआ लाजे नै कहैए,हम सब निर्णय केलौं जे ओकर दोसर विवाह करा दियै। इस सब जे निर्णय करथिन से उचिते हेतै।मुदा तकर प्रयोजन की ? वंश पसार लए। बाबू जी," दवाई आ जांच सं निश्तुकी भेल जे दोष हुनके मे छनि।कहौथ जे कएटा बेटीक जीवन गार्त करथिन त' मोन भरतैन ? कनिञा, हमरा माफ करैत अपन कपारक दोष बुझि संतोष करौथ। नै बाबू जी,से कोना हेतै ? की करब अहां ? हम दोसर विवाह करब! के करत अहां सं विवाह ? कोनो निसंतान मर्द!आ कन्यादान हिनके पल्ला! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ गदहाक इलाज ओहिदिन मास्सेब भूटनबाबूक ओतय गेल रही।अँगनेमे पटिया पर उघारे देहे पड़ल छलाह।दूटा चटिया सौंसे देह मलहम लगा रहल छलनि।ओ दरदसँ कुहरि रहल छलाह।कहलियनि-"मास्सेब प्रणाम! की भेल?किएक कुहरि रहल छी?" कुहरि-कुहरि बजलाह- "हौ,सौंसे देह सबसबाइ छल जे ओहि गदहासँ उपचार कराब' गेलहुँ।लगैए,ओकरो कोनो रोगीसँ भेँट नहि भेल रहैक।पहिने-पहिन हमरे पाबि ओ गदहा अपन गदहा जनम लागल छोड़ाब'!देह दुखाइत रहबे करय।पुछलक।कहलियैक जे केहन गदहा छी जे हमरेसँ पुछैत छी जे की होइए?अहाँ पढ़ि-लिखिक' गदहा बनलहुँ अछि,त' अहीं ने कहब जे हमर रोग की थिक?एखनो गदहपचीसी लगले अछि?कहिया सम्मत हैब?अरौ तोरिक-तोरी!तीन गोटेसँ मिलिक' लागल ततार'!पहिने हम बुझलियैक कि जे नीचाँ खसाक' किछु जाँच कर' चाहैत अछि।जखन मुकियाब' लागल तँ शुरूमे स्वास पड़ल।नीको लागल।तकर बाद तीनू गोटे देह पर चढ़ि लागल खून'।मुदा कनिक्के कालमे लागल जे ई रोगक नहि, हमरे इलाज करैए।ओ गदहा हमरा सात गदहाक मारि मारलक।अरौ बाप!छगबा-पिटबा क' देलक।बपलहरि छोड़ा देलक।बोखार झाड़ि देलक।ओ हो हो,इस्स!" कहलियनि-"मास्सेब, अहाँ जेना अपन चटिया सभकेँ बाते-बाते गदहा कहि दैत छियैक,तेना ककरो कहि देबैक,तँ ओ खराप मानबे करत।चिकित्सकक एकटा सम्मानित पेशा होइत छनि।हुनका हुनकर स्टाफ सभक समक्ष गदहा कहनाइ पैघ अशिष्टता भेल।तकर दुष्परिणामसँ अहाँकेँ जे कष्ट भेल देखि रहल छी,से बड्ड कष्ट भ' रहल अछि।" कहलाह- "हौ,गामक लेखे ओझा बताह आ ओझा लेखे गाम बताह!की करू?कपारक दोख!हौ अथाह!पढ़ाइ-लिखाइसँ लोक भागैत अछि,तेँ ने ज्ञानो पड़ायल जा रहल छैक?हौ, हम कोन अनुचित कहलियैक?हौ, 'गद' माने होइत छैक 'रोग' आ 'हा' भेलैक 'हरण केनिहार'।की बुझलह? एतदर्थ 'गदहा'क तात्पर्य भेलैक 'रोगक हरण केनिहार' अर्थात 'चिकित्सक'।तँ केओ पढ़त नहि, शब्दकोश राखत नहि आ सभटा गदहपनी उतारत भूटने मास्सेब पर?कहह?इस्स!" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मनोज झा मुक्ति सम्पर्क -काठमाण्डू 9851124834 अस्तित्वक कटघेरामे मिथिला-मैथिलीक संघ संस्थासब
संसारक समृद्ध संस्कृति, मिठ्ठ भाषा आ दुराग्रही संस्कारसँ भरल मिथिला धिरेधिरे अपन सबचीज गुमवैत जाऽरहल अछि । सऽभ तरहें मिथिलाक पहिचान संकटमे पडैत जाऽरहल बातके स्वीकार करवामे किनको आपत्ति नई होएवाक चाही । आखिर, ई अवस्था कोना अएलै ? एकर दोषी के ? के एकर खोज करत ?
विद्वानक बात करव त एकसँ एक विद्वताक व्यक्ति सर्टिफिकेट सहित सहजे उपलब्ध भऽजएता । अभियानक बात करबै त उत्कृष्ट अभियान संचालन कएने प्रमाण सहित प्रस्तुत होवऽबलाके कमी नै भेटत । मिथिला आ मैथिली प्रति अपन जीवन समर्पण कऽदेने कहनिहार व्यक्ति आ संस्थाक गन्ती सेहो संख्यामे कम नई । मुदा, ई सब बात पेपर–पत्रिका, सभा–सेमिनार, गोष्ठी या मंचपरक गप्प अछि । ई आ एहन बात कहऽ÷सुनऽमे जेतवे बड सुहनगर लगैत छैक, निर्वाह करऽमे ओतवे कठीन छै । किया त कहऽ÷सुनऽमे पाई आ परिश्रम नई लगैछै । ‘मंगनीके पाई त नौ मन तौलाई’ से सबठामकलेल बनल कहावत होइतो अपनासबहक माटिपानिकलेल एकदम सटीक बैसैत अछि ।
मिथिला÷मैथिलीकलेल मात्र नेपाल÷भारतमे बहुतो रास संघ÷संस्था खुजल । बहुत, किछु दिन अस्तित्वमे रहल आ शिथिल होइत बिलागेल । किछु समय–समयपर खुजैत अछि, पुनः बन्द भऽजाइत अछि । आ किछु नामेमात्रलेल बोर्ड टांगिकऽ बैसल अछि । विगतमे मैथिली÷मिथिलाकलेल जमिनीरुपमे काज कएने संस्थासब एखन नाफा–घाटाके दोकानमे परिणत भऽ साइन बोर्ड झमकौने अछि । कहियो अभियान मुख्य उद्देश्य रहल संस्था अपनाके पूर्ण व्यावसायीक बनालेने कहैत अछि आ केहनो काजमे जीविकोपार्जनक प्रश्नके ठाढ कऽदैत अछि ।
मैथिली÷मिथिलाकलेल काज कएनिहार व्यक्ति या संस्थाके जहन पुरस्कार या सम्मानक बात होइत छैक तहन मैथिली÷मिथिलाक नाम भँजौनिहार व्यक्ति आ संस्थासब बुलबुलाकऽ निकलव कोनो नव बात नहि ।
हमर शिर्षक अछि जे मिथिला÷मैथिलीसँ जुडल संघसँस्था सबहक अस्तित्व संकटमे अछि । ओना अस्तित्व बिहीन लोकसब रहल संस्थाक अस्तित्व कोना लहलहाओत ? कहवाक तात्पर्य ई जे नैतिक धरातलके बिसरिगेल लोक जहने कोनो संस्थामे रहत त धिरेधिरे अपन चरित्रके प्रभाव ओहि संस्थापर छोडवे करत ।
मिथिला÷मैथिलीक संरक्षण आ संवद्र्धनलेल कोनो काज नईं होइत अछि या संस्थासब नई करैत अछि सेहो बात नई छै । मुदा, प्रश्न छै जे जाहि तरहक काज मिथिला÷मैथिलीक अस्तित्व निखरारऽलेल÷जोगावऽलेल होएवाक चाही से कि भऽरहल छैक ? जाहि स्तरके काजक आवश्यकता मिथिला÷मैथिलीक छै, से कि कएलजारहल छै ? या जे काज कोनो व्यक्ति अथवा संस्था जे कऽरहल अछि, ताहिसँ मिथिला÷मैथिलीके अभिष्ट पुरा भऽरहलैय ?
हमरा जनतवे मिथिला÷मैथिलीकेलेल बहुत रास व्यक्ति आ संस्था काज कऽरहल देखवैत अछि । अन्तरर्राष्ट्रि«य मैथिली सम्मेलन, मैथिली लिटरेचर फेस्टिभल, मैथिली साहित्य सम्मेलन, कवि गोष्ठी, कथा गोष्ठी, विचार गोष्ठी, सम्मान कार्यक्रम, पुरस्कार वितरण समारोह, फग्ुआ फुर्रर् दंग, महामूर्ख सम्मेलन, विद्यापति स्मृति कार्यक्रम, चनमा,सांगितिक कार्यक्रम, नाटक महोत्सव लगायतक बहुत सभा÷सेमिनार महोत्सवक आयोजना प्रायः कतौ ने कतौ होइते रहैत अछि । लोक सहभागियो होइत छथि, खर्चो जुटवैत छथि, खर्चो करैत छथि । मुदा की मिथिला÷मैथिलीके ओहिसँ उपलब्धी छै त ? जँ छै त, केहन ?
जहने काज होइत छै या कएल जाइत छै त किछु ने किछु उपलब्धि भेनाई स्वाभाविक छै, होएवो करैत छै । मुदा, जाहिरुपसँ मिथिला÷मैथिलीक अस्तित्वपर चौतर्फी प्रहार कएल जाऽरहल छै, मान मर्दन कएल जाऽरहल छै, ओतऽ जाहिरुपक काज होएवाक चाही से कि भऽरहल छै त ?
चाहे मिथिला राज्य नामाकरणक प्रश्न होई या मिथिला क्षेत्रमे मातृभाषामे पढाइयक । सरकारी कार्यालयसबमे मातृभाषाक प्रयोग बढावऽके अभियान होई या मिथिला क्षेत्रमे साइनवोर्ड, पर्चा÷पम्पलेट, वालपेन्टिगं अपन भाषामे लिखएवाक अभियान, कतेक संस्था जमिनीस्तरपर एहि काजमे अपन उर्जा लगौने अछि ? विगतमे कएलगेल काजके कतेकदिनधरि गन्ती कराविकऽ दोकानक बिक्री होइत रहत या बेचैत रहब ?
भाषा कोनो जातिक नईं होइत छै, भूगोलक होइतछै से साश्वत सत्यके जनितो मिथिलाक क्षेत्रमे भाषागत जे वितण्डा मचाओल जाऽरहल छैक, ताहिपर मात्र सभा÷सेमिनारमे विचार विमर्श कहियाधरि सिमीत रहतै ? मिथिला क्षेत्रक लोककेँ जाहिं तरहें झूठफूस बाजिकऽ मैथिलीक विरोधी मानसिकता तैयार कएल जाऽरहल छै, तकरा के फरिछेतै ?
जँ कोनो राजनीतिक दल या कोनो नेताके भरोसे बैसल रहब त सबहक अस्तित्व बँचत कि डूबत से प्रायःलोक बुझिरहल छियै । विवेकहीन विभिन्न पार्टीक कार्यकर्ता आ नेताक कारणे सेहो मिथिला÷मैथिलीकेँ अस्तित्वपर प्रहार कएल जाऽरहल छै से सबके नीकजकाँ बुझल अछि । भोंटक लोभे आ दोपटा ओढवाकलेल कोनो नेता या मन्त्री केहनो एवम् ककरो मंचपर जाऽकऽ आयोजक अनुसारके भाषण करऽमे कनिक्को नईं हिंचकिचाएल करैछ अछि । नेता अपना माइयक बोलीके कखनो कोनो भाषा त कखनो कोनो भाषा कहऽमे कनिक्को विचारधरि नई करैत अछि ।
एहन अवस्थामे मिथिला÷मैथिलीकलेल लागल प्रत्येक व्यक्ति आ संघ÷संस्थापर ऐतिहासिकरुपसँ कलंकक टीका थारी सजल दरबज्जापर प्रतिक्षा कऽरहल अछि । जौं सबकियो अपन–अपन काजके जमिनी स्तरपर नई करव, मिथिला क्षेत्रक लोकके मानसिकतामे विष रखनिहारकेँ नंगा करैत, फरिछिएवाक काज अविलम्ब शुरु नई भेल त सबहक अस्तित्व घोर संकटमे लगभग लगभग पडैत जाऽरहल अई ।
अपनाके मिथिला÷मैथिलीक सेवक कहनिहार, मिथिला÷मैथिलीक अभियानी कहनिहार, मिथिला÷मैथिलीक नामपर पेट पालनिहार व्यक्ति आ संघसंस्थासबके अविलम्ब एकटा रणणीति बनाविकऽ मिथिलाक गामगाम आ टोलटोलमे पैसऽके शुरु कऽदेवऽपरत ।
नेपाल आ भारत संविधानमे मातृभाषामे पठन–पाठन कराओल जएवाक बात रहितो बहुत कम व्यक्ति आ संस्था एहिदिस प्रयास कएलक । किछु व्यक्ति या संस्थाक प्रयाससँ मैथिली विद्यालयधरि पहुँचल त, मुदा सहयोगक आभावमे थकमका रहल अछि । जँ सहयोगी हाथ, संघसंस्थासबके आवाज बुलन्द नई कएलगेल त पाठशालाधरि पहुँचल मैथिली दम तोडिदेत । एहिलेल व्यक्तिगतरुपसँ या संस्थागतरुपसँ मिथिला÷मैथिलीकलेल कएल जाऽरहल खर्चमेसँ मैथिलीक पठनपाठनके सहयोग कऽ जोगौनाई सन ठोस काजक संस्कार कहियासँ शुरु होएतै ?
सरकार जनगणनाक तैयारीमे अछि, पाईकेलेल अपना मायके बेचिलेने मैथिलीएक किछु बेटा गामगाममे नौटंकी करऽमे लागल अछि । ककरो राजनीतिक अभिष्ट पुरा करवामे अपन भाषाके दोसर ठामक भाषा, जातिक भाषा कहिकऽ विभिन्न गतिविधि कऽरहल अछि । गामगाममे अभियानी या संघसंस्थाके जाऽकऽ अपन अस्तित्व रक्षा सन महत्वपूर्ण काज शुरु करवामे शारिरीक, नैतिक आर्थिक सहयोगक वातावरण निर्माणकलेल गोष्ठी कहिया होएतै ?
एकटा बात निश्चित अई जे मिथिला÷मैथिलीक बात कएनिहार, काज कएनिहार, दोकान खोलनिहार, भँजौनिहार सबहकलेल खतराक घण्टी बाजिगेल अछि । एहन समयमे मिथिला÷मैथिलीकलेल खुजल संघसंस्थाक अस्तित्व कटघेरामे अछि । जँ अस्तित्व जोगएवाक अछि, नैतिकता बँचल अछि त संघसंस्थासब एहि दिस ठोसगर सोंच बनाविकऽ आगा बढऽमे विलम्ब नई करी । ओना त किछु विलम्ब भइएगेल अछि, आब जँ आओर विलम्ब भेल त सबहक अस्तित्व मात्र संकटमे नई अछि, सबहक नामके इतिहास कलंकीत करवाक प्रतीक्षामे सेहो अछि । जानकी समय अछैते सबमे चेतना देथुन्ह । अपन मंतव्य editorial।staff।videha@gmail।com पर पठाउ। सुभाष कुमार कामत ३ टा बीहनि कथा 1. मैथिली गाम सँ मुन्ना बीए मे नामांकन कराबै लेल दरभंगा आयल। शहर कें नामी गामी कालेज मे नामांकनक लेल , भोर सँ लाइन म भूखे प्यासे ठार छल। जखन नामांकन काॅउण्टर पर पहुँचल तऽ क्लर्क 'साईठ टाका फाजिल' मांगलक। - सर हमरा लऽ फाजिल पैसा नहि य। - नै देबह ! जे बाद म आबियह - सर ! जौं आय हमर एडमिशन नै हेइत तऽ 'गाम जाएत - जाएत राति भ जाएत' । कालि फेरो आबि परत ? - जे बाद म आबियह , 'औरों लोग लाईन म ठार छै' मुन्ना उदास भऽ प्रिंसिपल आफिस आयल - नमस्ते सर ! - नमस्ते - सर ! हम एडमिशनक लेल भोरे सँ लाईन म ठार भेल छी। गाम सँ पढि ख़ातिर , पाँच रुपये सैकड़ा सूद पर कर्जा लऽ केँ आएल छी। एडमिशन काॅउण्टर पर - सर 'एक्सट्रा पैसा मांगै रहल छैथि'। - 'मुझे मैथिली समझ मे नहीं आती'। हिंदी या अंग्रेज़ी में बोलो। - सर ! मैथिली अष्टम अनुसूची मे शामिल अछि आओर ई मिथिलाक राजधानी थिक । "मिथिला मे चाकरी करब त' मैथिली सिखि लियय"। 2. औंठा आधार कार्ड बनबै लेल लोग लाईन मे ठार छल। मुन्ना कका हाथसँ फार्म लैत आधार कार्ड औपरेटर कहल - पहिने अपन दूनू औंठा लागाऊँ आओर फेर अपन दूनू हाथक सबटा अँगूरी मुन्ना कका बाजिल - 'हम पाँचमा पास छी हस्ताक्षर करब , औंठा नै लगेब" 3. मुनाफ़ा एबरि पिछला साल सँ बेसी ठंड अछि। मुन्ना डिल्ली सँ अपन घरवाली लेल दू हाजारमे एकटा सुटर किन गाम पठालौंक । किछु दिनक बाद गाम सँ घरवाली कऽ फोन आएल। - हे यौं ! कहलौं अहाँ जे सुटर पठौने छलिह। से सभक 'बड्ड सुन्नर, बड्ड नीक' लागल। कतैक मे किनै छलिए। - छौड़ू न दाम, आहाँ पहिरू न - नै नै ! कहूं न दाम - पंद्रह सौ मऽ - मधुबनी वाली काकी गुड्डू बउआ के मम्मीक बड्ड पसन्न, हुनका "साढ़े सोलह सह म दऽ दयि छी" । 'चारि - पाँचटा' आओर पठा देब। -सुभाष कुमार कामत, साकेत, नयी दिल्ली, 8271282752 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- २ टा गजल ३.२.बिनय भूषण- कोरोना- अवकाश ३.३.आनन्द कुमार झा- प्रतिमुख ३.४. प्रदीप पुष्प- १ टा गजल आ २ टा रुबाइ ३.५. विष्णु कान्त मिश्र- चीरहरण ३.६.रमन कुमार झा- नेनपन ३.७. रमन कुमार झा- करम कुटय छी ढेंकी मे नऽ ३.८.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २ टा गजल 1. अही गाँमे हमरो रहबाक अछि और हमरा नै किछु कहबाक अछि अपन मूर्खतापर हंसबाक अछि दुनियाक दुरगतिपर कनबाक अछि किछु लोक दिनकें राति कहैत छथि बस एहेन लोकसं बचबाक अछि किछु लोक नाथथि कुडहरिसं महींस देखी, मुदा किछु नै बजबाक अछि किछु लोक ठोकथि अपने अपन पीठ कान आँखि मूनि सभ सुनबाक अछि करैब अपन आँखिक ऑपरेशन टेटर दोसरक नहि गनबाक अछि किछु जन बाटेपर रोपथि बबूर अही बाटपर हमरो चलबाक अछि सभ क्यो कहैए अहाँ नै बुझै छियै माटिक मुरुत जकाँ बनबाक अछि ढोलक आ झालि जकाँ बाजब हम अहिना अपन दिन आब गनबाक अछि घरेमे छथि सभ देव आ देवी शरण आब त हुनके गह्बाक अछि सभ क्यो करैत अछि सबहक खिधांस सभ जनैए एकदिन मरबाक अछि किछु लोक मरियोक’ नहि मरैत छथि हमरो किछु तेहने करबाक अछि मास्क बिनु लगौने छोडू नै घर कोरोनासं सभकें लड़बाक अछि (मात्रा-क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दूटा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | 2. ई दुनिया थिक भोजक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का रसगुल्ला आ भांगक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का खाजा मुंगबा और जिलेबी सत्य थीक ऐ जीवनमे बांकी सभटा झूठक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का योग करी सकरौडीसं आ ध्यान खीर-मलपूआ केर तड़ुआ आ तिलकोरक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का परमानन्दक अनुभव होइछ चूड़ा-दही-चिन्नीमे अदभुत आम-अँचारक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का प्रेम प्रवल सजमनि-कोबीसं कुम्हरौडी-खटमिट्ठीसं गजब ओल आ सागक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का जे अछि स्वर्गहुमे दुरलभ से सभ सहज अछि मिथिलामे माँछ-मखानक पानक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का सालो भरि मौसम अछि भोजक ब्याह श्राद्ध आ बरखीमे मूडन आ उपनयनक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का भोजेसं कंगाल भेल छथि मिसर चौधरी ठाकुर झा उजड़ल अछि जयबारक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का धन्य हमर सीता जे रामक आदर छन्हि संसारमे अदभुत शील-स्वभावक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का (मात्रा-क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दू टा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | सम्पर्क -8789616115 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। बिनय भूषण कोरोना-अवकाश
ई एक्कैस दिनक घरबन्दी ओकरा लेल घरबन्दी नञि छियैक ई एक्कैस दिनक घरबन्दी ओकरा लेल अवकाश छियैक, अवकाश जखन ओ सुनैत अछि जे एक्कैस दिन अपने घरमे रहबाक आबि गेल अछि आदेश जखन ओ सुनैत अछि जे एक्कैस दिनक लेल ओकर मालिक दऽ देतैक ओकरा छुट्टी जखन ओ सुनैत अछि जे एक्कैस दिनक लेल ओकरा करबाक अछि आराम तखन ओकर हृदयक आकाशमे उमरि अबैत अछि प्रसन्नताक बादरि ओकर मोनक जमीनपर सोहनगर पाँखि पसारि नाचय लगैत अछि मनमोहक मयूर ।
ओकर काया सदिखन लगौने रहैत छल अवकाशक आस ओकरा कहाँ कहियो भेटैत छलैक छुट्टी ओ कहाँ कहियो सुति पबैत छल भरि निन्न ओ तँ ओंघाइते उठैत छल भोरमे ओंघाइते चलि जाइत छल काजपर ओंघाइते करैत छल काज काजमे भऽ जाइत छल मग्न लगैत छलैक जेना दस - दस हाथीक बल छलैक ओकरा बिसरि जाइत छल भूख - पियास ।
बड्ड जतनसँ ओ लाल टुह-टुह भारी आ गरम लौहक सिल्ली ओकर देह नहायल रहैत छलैक घामक टघारसँ ओकर नाकसँ टकराइत रहैत छलैक सदिखन लोहाइन गंध एहि गंध मध्य ओ लैत छल गँहीर साँस हफसि जाइत छल ओ इएह हफसी आ साँस ओकरा लेल छलैक अनुलोम - विलोम इएह हफसी आ साँस ओकरा लेल छलैक ऊर्जाक अजस्र - स्रोत साँझकेँ मालिक दैत छलैक किछु कैंचा इएह कैंचा ओकरा लेल छलैक अकुत धन - सम्पत्ति साँझकेँ एहि कैंचाकेँ बदलि लै छल रोटीमे मिझाए लैत छल पेटक आगि थकानक नशामे मदमस्त सुति रहैत छल निसभेर ।
आइ भोरे - भोर जागि गेल अछि अपन बिछाओनपर ओकर आँखिक आगू देखाए रहल छैक प्रसन्नताक महासमुद्र ओ सोचैत अछि आइये साँझ ट्रेन पकड़ि चलि जायत गाम ओ सोचैत अछि एतेक नमहर छुट्टी ओकरा कहाँ भेटैत छलैक कहियो ओकर हृदयमे घुमरय लगैत छैक सोनहौला सपनाक बादरि ।
ओ सोचय लगैत अछि एहि छुट्टीमे बहुत बेशी दिन ओ रहत अपन पत्नी आ बाल - बच्चाक संग ओ सोचय लगैत अछि एहि छुट्टीमे अपन माँ - पिताक करत सेवा - सुश्रुसा खूब फैलसँ ओ सोचय लगैत अछि घरक बनल अमृत सन भोजनसँ तृप्त होयत हमर मोन अपन बाड़ीक रामतोरइ आ झिंगुली ओ सोचय लगैत अछि तुलसीचौड़ाक बगलमे रोपल मिरचाइक गाछसँ तोड़ि आनत हरियर कुच - कुच मिरचाइ ओ सोचय लगैत अछि टाटपर लतरल खीड़ाक लत्तीसँ खयबाक लेल तोड़ि आनत खिज्जा खीड़ा ओ सोचय लगैत अछि काटि आनत हँसुआसँ चार पर लतरल लत्ती मे लागल कदीमा आ सजमनि ओ सोचय लगैत अछि ओहि ठाम रहतैक घरे के चाउर , घरे के दालि कतेक मजा लगतैक गाममे ।
एहि घरबन्दीकेँ ओ बूझैत छैक अवकाश अवकाश - गाम जयबाक अवकाश अवकाश - अपन माटिक दर्शनक अवकाश अवकाश - भगवानसँ भेंट करबाक अवकाश हँ ! हँ ! भगवानक दर्शनक अवकाश सत्ते ओकर माँ - पिता ओकरा लेल भगवान छियैक - भगवान अवकाश - प्रेमक इजहार करबाक अवकाश अवकाश - पत्नीक मूँह देखबाक अवकाश अवकाश - अपन बाल - बच्चाक गाल चुमबाक अवकाश अवकाश - गाममे शान्तिसँ रहबाक अवकाश अवकाश - मित्रगणक बीच गप लड़ेबाक अवकाश चौक - चौवटियापर सुख - दुख बतियेबाक अवकाश अवकाश - अपन गाछीमे बैसि आम ओगरबाक अवकाश अवकाश - मशीनी जीवनसँ मुक्तिक अवकाश अवकाश - प्रेम आ आपकताकेँ महसूस करबाक अवकाश अवकाश - प्रकृतिक साक्षात्कारक अवकाश अवकाश - बाल - बच्चाकेँ वात्सल्यक दर्शन करेबाक अवकाश अवकाश - बूढ़ - बुजुर्गसँ स्नेह पयबाक अवकाश ओ अत्यंत उत्साहित भए गाममे अवकाश बितेबाक बनबए लगैत अछि योजना ।
ओ सोचए लगैत अछि एहि अवकाशमे ओकर कोदारि चीरतैक पिरथीक वक्ष अपन पिरथीक माटिसँ बहराइत जीवन- गंधसँ ओकर मोनमे होयतैक आह्लादक संचार माय धरतीक आशीर्वचनसँ अलोपित भए जेतैक ओकर आत्माक पियास ओ निहारत अपन खेतकेँ अन्नमन्न ओहिना जेना कोनो मंदिर व मंदिर - परिसरकेँ निहारैत अछि तीर्थयात्री ।
खेतमे ओलरल खेसारी आ मौसरीक लत्ती देखि ओकर आँखिमे आबि जेतैक हरियरी ओकर आँखिक आगू चमकैत रहतैक सोनाक छड़ीक चमकैत पीयर रंग ओकर शीर्षपर नन्हकी सोनक झूनझूना सन झूलैत चमकैत गँहुमक शीश ओ निहारत मोनभरि मक्कैक गाछ तरुआरि सन पातकेँ देखैत ओकर देहमे हजार - हजार हाथीक ताकत ओकर पाँजरमे खोंसल हरियर बालि एहि बालिक भीतर नुकायल जीवन - रस बालिक शीर्षपर हिलैत उज्जर आ बादामी रंगक मोछु मोछुसँ बहराइत जीवन - गंध ।
ओ सोचए लगैत अछि भोरे - भोर जायत अपन गाछी गाछीमे गमकैत रहतैक मज्जरक सुगंध महुआक गाछसँ तुवैत रहतैक गमगमौवा उज्जर फूल ओकर कानसँ टकरेतैक कोयलीक कूक सत्ते ओ प्रसन्न अछि अवकाशक संवादसँ अवकाश - एक्कैस दिनक अवकाश मोटरी - चोटरी बान्हि ओ करए लगैत अछि साँझक इन्तिज़ार असंख्य सपनाक पोटरीकेँ अपन हृदयमे नुकौने टीसन दिस बढ़ाए लैत अछि अपन डेग । ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आनन्द कुमार झा प्रतिमुख अहाॅकेॅ हम नहि नीक लगैत हएब तेॅ हमर गीत नहि नीक लगैत हएत तेॅ हमर कविता नहि नीक लगैत हएत तेॅ हमर कथा सेहो नहि नीक लागल हएत तेॅ हमर नाटक सेहो नहि नीक लागल रहएह तेॅ हमर चिन्तन कहिओ नहि सोहाएल आहाकेॅ नहि नीक लागल ताहिसॅ कि हम लिखिते चलि जएब आहाॅ बाॅचल रहब जखन हम नहि रहब प्रतिमुख भेल ठार हमही नीक लागब हमरे नीक लागत कएल सभटा काज किएक तॅ हम लिखैत छी अपन समाजक लेल अपन देशक लेल अपन विश्वक लेल अपना लेल किछु नहि अपना लेल कहिओ नहि कवि - आनन्द कुमार झा मेंहथ, झंझारपुर मधुबनी - 847404 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रदीप पुष्प १ टा गजल आ २ टा रुबाइ १ गजल उघरल खाट छी उसरल हाट छी क्यो ने जाय छै बिसरल बाट छी खुट्टा ठाढ छै भसकल टाट छी भुखले भोजमे अंतिम लाट छी सगरो मैल हम पोखरि घाट छी - प्रदीप पुष्प (२२२१२ सब पाँतिमे।) २ २ टा रुबाइ १ ई पेंच आ प्रपंच-व्यापारसँ कोन मतलब हमरा नै स्नेह,नै दुलार, उपहारसँ कोन मतलब हमरा जै ठाम आइयो ख'गल लोक कनैत हो सिदहा ले तै देशमे फिजूल जयबारसँ कोन मतलब हमरा -प्रदीप पुष्प (2212 1212 2112 12222) २ तिला-संक्रांतिक शुभकामना सहित..... "जा बोली छै, तोरा माँ कहबे करबौ हम, तोरा ले' सदिखन नेन्ना रहबे करबौ हम, बरु छी परदेशे, मारल हम सत्ते पेटक, तैयो तिल- चाउर तोहर बहबे करबौ हम," अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विष्णु कान्त मिश्र चीर हरण -------- कहयवला समय नहि रहलै, माइक खोंछि आब नहिभरलै। बाॅचल आब की रहल अछि, कूपहिमे भाॅग नीक घोरल अछि। जड़िएहिमे जहर देर जाइतछै, गाछक चीरहरण भेल जाइत छै। गननाएब हमरासॅ पार नहि लागत, बहिरा करैत कखनहु नहि जागत। भाषा,शिक्षा, धर्मक चीरहरण, दक्षिण-वामपंथी छथि पीर हरण। चरक निकलुआ उपर बैसल अछि, जन मानस चुपचाप सैंथल अछि। उपर-नीचा एजेन्ट रखने अछि, युवा-वुद्धिजीवीके नीक पेकने अछि। संस्कार,संस्कृति,प्रेमादिक चीरहरण, परिवार, गाम,नगरादिक चीरहरण। विआहक नीति के तोड़ि-ताड़ि, जाति-संप्रदायकेफोड़ि-फाड़ि। सभहक ठीक एक दोसराॅ ओझराबय, हत्यारा सभ एहिना राज चलाबय। जिनगीक कोन क्षेत्र अछि बाॅचल, जे अछूत हो नहि हो आंचल। भनहि'विष्णु' सत्यानाशमे नहि भांगठ, युवा वर्ग बचाबथु होएबासॅ नांगट। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रमन कुमार झा नेनपन ममता केऽ आंचर हमर बिछौना ओरहय छी मेऽ तोहर सिनेह, हमरा नेऽ चाही मेऽ तोसक तकिया लेरहेबउ मइटे में देह, कतबो तमसेबही मइया सुइन-सुइन कऽ अगरेबउ माय, जाइन-बुइझ ओंघरेबउ मइया कोरा कांख लही लगाय, इमहर उमहर भगबउ मईया तोरा देख परेबउ माय, कोने-कोन नुकेबउ मइया रहि-रहि हुलकी मारबउ माय, झात-झात खेलेबउ मइया किलकारी मारबउ माय, खिखिया कऽ हँसबउ मइया पेंर हाथ पटकबउ माय, थाल खिच लेरहेबउ मइया सगरो देह लेबउ भिजाय, छपछप-छपछप करबउ मइया आँचर में जेबउ लेपटाय, ठेहुनिया हम देबउ मइया घुसकुनिया कटबउ माय, छोइर जऽ तू गेलेऽ मेऽ गय, जोड़-जोड़ डिरियेबउ माय, आंगुर पकैड़ कऽ चलबउ मैय्या दियमाने फटबउ माय, रुइक-रुइक डेग उठेबउ माइया खसबौ परबौ गुरकबउ माय, दु डेग चललियौ नय कि असगर छोइड़ गेलेऽ पराय, भवसागर मे छोइड़ कऽ हमरा माया मोह देलेऽ ओझराय, उलझन सब सुलझबिहेऽ मईया आसरित हम छियउ माय, असमंजस में आईब कऽ मईया रमन केऽ राह दिहेऽ दिखाय , अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रमन कुमार झा करम कुटय छी ढेंकी मे नऽ नेना कोनाऽ रहैयेऽ माय अपने अईब कऽ देखियौ आय, कतउ निक नेऽ लागेऽ अहाँ विन अय नगरी में , करम कुटय छी ढेंकी में नऽ।। ठारहे पएर चलाबी माय बाट गेलउ हराय , अहुँ बिसैर बैसल छी जीवन केऽ अय करकी मे, करम कुटय छी ढेंकी में नऽ। खाली पएर उठाबी माय एक डेग चललो ने जाय, एकई ठाम कुदय छी सब दिन अय भुरकी में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। भेटेंऽ किछ नय हमरा माय खाईध देलियई और धसाय, मईट उखरल जाईये चारू कात ठेकरी में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। संग्गी साथी सब उसकाय अप्पन हाथ बचाबे दाय, बेगतरे हाथ चलाबेऽ डईर डईर कऽ उख्खैर में, करम कुटय छी ढेंकी में नऽ। ढक-ढक करय छी हम माय अही करियौ कोनोऽ उपाय, कत्ता दिन कुदेबय कनियेऽ टा केऽ जिगगी मे, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ।। करमेऽ खुब कुटऽलियई माय सब दिन मुसरा के पिजाय, तईयो पेएर कऽ रखलउ उत्थर भेल उख्खैर में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। जंघहा उखरल जाईये माय हम्मर जांघो कनकनाय, कतेक करम कुटेमें किस्मत केऽ अय खेती में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। रमन कोनाऽ रहैयेऽ माय अपने अईब कऽ देखियौ आय, कतउ निक नेऽ लागेऽ अहाँ विन अय नगरी में , करम कुटय छी ढेंकी में नऽ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार (सम्पर्क 8876162759) २ टा गजल 1
रूसल रहलै खाली पेट नहिये भेलै राजी पेट
भरले पेटक पूछम पूछ नै नै करतै हाँ जी पेट
कत्ते करतै पूजा पाठ साधुक सेहो पापी पेट
पूरा जीवन दुन्नू साँझ खाली रहलै खाली पेट
कखनो अफरल कखनो धोधि लुच्चा छै सरकारी पेट
सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। ई बहरे विदेह अछि।
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इम्हर एने तगमा भेटत उम्हर गेने घटना भेटत
मूड़ी झुकने बाबू सभहँक दिल्ली भेटत पटना भेटत
कत्ते देखब हुनकर भीतर जे सभ भेटत ठकना भेटत
पाखंडी सभहँक चाँगुरमे राधा भेटत सलमा भेटत
अनचिन्हारक संगे रहने इच्छा भेटत सपना भेटत
सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.अम्बिका मल्लिक- हम छी काली हम छी दुर्गा ४.२.विद्या रश्मि- गलतीक बोध ( संस्मरण) ४.३.निर्मला कर्ण- नारीक सम्मान ४.४. निर्मला कर्ण- ममताक सम्मान करु ४.५.प्रीति प्रभा- अप्पन मिथिलाधाम ४.६.आभा झा- पिघलैत हिमखण्ड अम्बिका मल्लिक हम छी काली हम छी दुर्गा ******************** मां!!!! अहि धरा पर सुत ,सुता सब अहिं के संतान अछि फेर किया मां लाल आंहां के क्यो - क्यो एहन चांडाल अछि चीत्कार करैत रही जखन हम बधिर किया संसार छल आब जखन निष्प्राण भऽ गेलौं तखन किया ई शोर अछि नारी के अस्तीत्व के लेल लंका दहन और महाभारत भेल आई किया कानून हमर मुक बधिर और नि:सहाय अछि नै बनब हम बेटा सन मां हमर अलग पहचान अछि हम छी काली हम छी दुर्गा हमही अपन रक्षपाल बनब बेटी बचाऊ बेटी पढ़ाऊ सञ पहिले नारा एक और बनाऊ जखन बेटी मजबूत और सशक्त बनत तखन फलत बेटी बचाऊ और बेटी पढ़ाऊ रचनाकार:-अम्बिका मल्लिक, गीतांजलि कॉलोनी, मोबाइल टॉवर के नजदीक, बरहेत्ता रोड, लहेरियासराय, दरभंगा पिन:-846001, फोन नं:-8178385814 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विद्या रश्मि गलतीक बोध ( संस्मरण) ********************** बात ओहि समय के छियै जखैन हम आठवां में छलौ आ गरमी छुट्टी में हास्टल स गाम आयल रहौ।सांझ क खेला क आयले रही कि ब्राह्मण टोला स दामोदर कका ऐलखिन आ लालपीसी के कहलखिन जे लालबहिन आई राइत में आयब हमरा अंगना आई हमर बड़की बेटी लालदाई के बियाह छियै राइत में।लालदाई हमरे उमर के रहै आ छोट में जखैन गाम में पढ़ै छलौ त एके क्लास में रहौ। लालपीसी आश्चर्य स पुछलकै जे अखन दूपहरिये में त लालदाई के आम क गाछी में देखने रहियै आ अहुं के त खेत दिस जाईत देखने रहौं त कत चारि घंटा में वर भेट गेल? कहलखिन जे नै राजे कथा लगेने रहियै लड़का बर सम्पन्न छलै घर दुआर सेहो नीक छलै लेकिन बर के माय बहुत पाई मंगै छैलै तै छोड़िए देने छलियै ई कथा लेकिन ओहि लड़का के आई राति में हमर छोटका भाय रामबाबू पकैड़ के आनतै आ चोरौका बियाह हेतै । लालपीसी आश्चर्य भ कहलकै अखने किया करै छियै बियाह अखैन त अठमें में अछि आ चोरौका बियाह किया करै छियै। दामोदर कका ज़बाब देलखिन जे चोरौका बियाह नै करबै त पाई कत स गिनेबै दहेज के आ अखैन नीक लड़का फंसेने छै रमबबूआ ई कहि हरबरैलै चलि गेलखिन ओत स।हम आश्चर्य स लालपीसी के पुछलियै जे चोरौका बियाह की होई छै त लालपीसी दुखी भ कहलकै जे राति में चलिहें बियाह देखै लै त देखिहै।बांकि के चारि घंटा तक हमरा लै बहुत मुश्किल भ गेल बितेनाई कियकि लालदाई संगी जकां छलै हमर आ एक्का अगले तरह के बियाह। लेकिन जखैन राति में मां आ लालपीसी संगे दामोदर कका के अंगना गेलौ बियाह देखै लै त ओत के दृश्य देख क अचंभित रैह गेलौ। बियाह बला के वर जबरदस्ती एते शराब पिया देने रहथिन ई सब जे उ नीचा भूईंया में उंघरायल आ धोती खाली डांर में लपटायल रहैन्ह और नशा के हालत में भरि अंगना के लोक के गारि पढ़ै छलैथ।आ लालदाइ बियौहतलि सारि पहिरने कोबर घर के कोना में डरे डबडबायल आंखि ठार।आ भरि अंगना के लोक जल्दी जल्दी बियाह के ओरियान करै में लागल रहै किया कि अगर बर के होश आइब जैतै त भाइग जेतै।हम ओते पैघ त रहौं नै लेकिन तैयो बहुत डर भ गेल पता नै ई केहन बियाह होई छै।हम लालपीसी के अक्कछ कर लगलीयै जे अंगना चल हमरा नै नीक लागैया तखन कनीये काल बाद हम सब अंगना चलि एलौं।भरि रात्रि ठीक स नींद नहि भेल जहां आंखि लागय कि सपना में बियाह बला अंगना के दृश्य देखाय लागै आ हड़बड़ा कर उठि जाई छलौ।भोरे कमनिहरि कहलक जे राति में जे बियाह भेलै ओहि में त बाद में वर के कनि होश एलै त भाग लगलै तखैन सब डरा धमका क कहुना बियाह करेलकै।भोर में दामोदर कका ऐलखिन तो बड खुश भ क कहै छथिन जे लालबहीन लालदाई के बियाह सम्पन्न भ गेल।आब हमर आधा मन हल्का भ गेल तीन चारि बरख के बाद अपन छोटकी बेटी फूलदाई के सेहो अहिना क क लेबै बियाह।हमरा बहुत आश्चर्य लागल जे हिनका अपने बेटी के ओ तकलीफ भरल चेहरा पर नजैरि नै गेलैन जे ई अखनो एते खुश छथिन। लेकिन बाद में कका बुझलखिन जे हुनका स केहन बड़का गलती भ गेलैन जेकरा सुधारनाई बहुत मुश्किल छै।जखैन चतुर्थी तक तो कहुंना पकरि धकरि के रहलैन बर लेकिन ओकर पराते चुपे चापे भागि गेलैन्ह आधा रात्रि में। बर अपन गाम स कतौ और जा के नुका गेलैन। आ लालदाई त गुम्मी लाईद लेलकै। नै किछ बाजै ने भूकै कतौ चुपचाप बैसल रहय। पढ़ाई सेहो छोड़िए देलकै। एकदम मुरझा गेलै।आब त दामोदर कका के बेटी के हालत देखल नै जानि।कतेको बेर बर के माय स भेंट करथिन्ह जे कहुना बर के खबर पता चलनि लेकिन किच्छ नै पता चलैनि। बहुतों बेर भेंट केला पर बर के माय हुनकर हैसियत से बहुत बेसी दहेज ल क ई बियाह के मानलखिन आ अपन बेटा के सासुर जाय देलखिन्ह आ फेर दुरागमन भेलै। ई सब खबरि जखैन गाम अबियै छुट्टी में त लोक सब दैत रहै छलै। पांच छःसाल बीत गेलै अहि बात के । फेर एक बेर गाम गेल छलौ छुट्टीये में त एक दिन भोरे दामोदर कका हरबरायले एलैथ आ लालपीसी के कहलखिन जे उतरबायर गाम जाई छी फूलदाई के कथा ठीक करै लै।हम त आश्चर्य स तकलियैन कका दिश किया की आब हमहु पैग भ गेल रहौ आ लालदाई के चोरौका बियाह के मतलब बुद्धि गेल रहौं। लेकिन ओहि दिन कका के चेहरा में तकलीफ देखाई दैत छलैन कह लगला नै बुच्ची ऐ बेर फेर स उ गलती नै करबै ए बेर देख सुनि क करबै। ई लड़का बला कहलकै या जे सोनदाई के पढ़ देतै आगू। गरीब परिवार छै लेकिन की करियै तिलक नै द सकै छियै किया की लालदाई के सासु के पाई दै लै सबटा बेच देलियै आ बिना टाका के संभव नै छै सर्वगुणसंपन्न लड़का आ ई लड़का बला बिना तिलके(टाका) के बियाह करै लेल तैयार छै। कका त चलि गेलैथ लेकिन हम बहुत किछ सोचै पर मजबूर भ गेलौ। जेना दामोदर कका बड़की बेटी के धनवान आ सम्पन्न लेकिन लालची, संवेदनहीन लोक के घर में बियाह क क खुश छैथ वा छोटकी बेटी के गरीब आ बुझनुक लोक बला घर में बियाह क क। कि सबटा गलती दामोदर कका के छैन्ह या ई गलती करै पर मजबूर कर बला त बेटा के बाप के , जे ई नै बुझै छै जे आदमी बेचै के वस्तु नै होई छै? दामोदर कका सन लोक त मानि गेलैथ अपन गलती आ सुधारै के कोशिश केलखिन,लेकिन पाई लै बला बेटा के बाप अपन गलती कहिया मानता नहि जानि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। निर्मला कर्ण नारीक सम्मान ----------------------- पापी संसार ई सदिखन सँ, नारी के छथि अपमान केने | सब छलने छथि हुनका हरदम , आ हुनके छथि बदनाम केने | मानव-दानव के बात छोड़ू, देवो तs छथि यैह काज केने | छलना नारी के संग केलनि , आ रक्षा सृष्टि के नाम देलनि | नारी नहीं केलनि भूल मगर , सब हक दोषी ओ भs गेली | पाप केलनि कोई आन मगर , नारी पापिन बुझना गेली | वृंदा के पातिव्रत्य जखनि, स्वर्गक गर्वत्व हरण केलनि | पतिव्रत्य हरण के हेतु तखन, वृन्दा संग गुरुतर छल भेलनि | क्षण भर के लेल हरि के मन में , नहिं वृंदा लेल सन्ताप कोनो | अपने भक्तक संग छलना में , हरि के बुझना नहिं पाप कोनो | वृंदा के संग छल कs क, हुनकर पति के संहार केलनि | जलंधर के रण में वध करवा , मानवता के उपकार केलनि | प्रभु के वरदान पाबि वृंदा , प्रातः स्मरणीया देवि भेली | प्रभु के पटरानी होईतो धरि, वृन्दा जग में पथभ्रष्टा नाम पेली | रणनीति बनाक छल केलनि , तखनो प्रभु के किछु दोष नहिं | पावन, सती,अबला वृन्दा के , ई जग कहलक निर्दोष नहिं | हे अखिल विश्व के रचयिता , स्वीकार करू करबद्ध नमन | विनती सुनियौ हे जगतपिता , हमर सम्मान राखु हे कमलनयन | हम सब नारी छी सृष्टि कर्ता , निर्देश अहाँ सs पाबि प्रभु | ई गुरुतर हम भार लेलहुँ, आदेश अहिं के मानि प्रभु | बस एक प्रार्थना अछि प्रभुवर , निर्दोषे दण्ड ने पाबी हम | अनकर पापकर्म कलुषित , के बोझ ने आब उठाबी हम | हे जगत नियंता सुनु विनय , जग में वितरित करु दिव्यज्ञान | अहिं सन जग में न्याय होए , धरती के नर होय नारायण | अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। निर्मला कर्ण ममताक सम्मान करु --------------------------------- माय के वन्दन के करथि, माय के अभिनन्दन के करथि | सब स्वार्थ में छथि भेल दृष्टिहीन, माय के अवलंबन के बनथि | माय के रुधिर सँ सिञ्चित भेलथि, आ रूप मनोहर पाबि लेलथि | मातृ-स्नेह सँ सज्जित भs क, प्रज्ञा जखनि निखारि लेलथि | पाबि जगत सँ सम्मान तखनि, बिसरा गेल मायक अँचरा छनि | लक्ष्य अपन पौलथि जखने, आब कोनो जोकरक नहि ममता छनि | भूलल बिसरल स्मृति में माय, एक कोन में आब परल रहली | अपने सन्तानक सम्मुख माय, हिरणी सँ भीत बनल रहली | माय के सुधि लेमय वाला, नहि आई छथि कोनो सपूत | मायक दुःख करता की, देख पराई छथि ओ कपूत | मायक स्नेह बिसारि अहाँ, पायब अपन पहचान कहाँ | किछु श्रेष्ठ जगत के दs पाबी, आब ततेक रहब ऊर्जावान कहाँ | जड़-मूल नष्ट तs कय लेलहुँ, शाख कहाँ रहि पाओत आब | सब पात तना फल सूखि जायत, झरि माटि में मिलि जायत आब | आबहु चेतू आबहु सम्हरु, ममता के नहि अपमान करु | माय छथि गँगा जमुना ओ सरस्वती, एहि सलिल-सँगम में स्नान करु | ममता छूटत तs जग रुसत, ओ स्नेह कहाँ फेर पायब मनु | ईश्वर छथि मायक ममता में, से कहियो धरि बिसरायब जनु | माता आओर धरती माता, दूनू छथि जग के जीवन-दायिनि | हिनकर रक्षा में तत्पर रहि कs, रोकब अपना सबहक जीवन-हानि | अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रीति प्रभा अप्पन मिथिलाधाम पवित्र पावन अछि हम्मर धाम जे नही देखलहूं देख लिय चलू मिथिलाधाम। शगुण के सब किछ ओतय भेटत।लाल पाग संग माछ, पान आ सौम्य मखान अई स घिरल अछि अप्पन धाम जे नहि देखलहूं देख लिय चलूं मिथिलाधाम। माँ वैदेही के परल चरण अतए श्रीराम नरेश भेलैथ कुटुम्ब एतय मीठगर वाणी सअ भेटत सम्मान खोईछा भरी पाबि लिय मान सम्मान। उगना महादेवक साक्षात दर्शन लिय अंगना दलान पर उदित भास्कर के संग लिय चाहक मजा चाँनी सन माछ के दर्शन महान जे नही देखलहूं देख लिय चलू मिथिलाधाम। मधुबनीक पेंटिग के मास्कक भेल गुणगान आब नई कोई दिक्कत राह भ गेल आसान उड़ी उड़ी पहुँचु हम्मर धाम प्रीति के कलम स देख लिय चलू मिथिलाधाम। -प्रीति प्रभा, जमशेदपूर। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आभा झा पिघलैत हिमखण्ड हिमानी दुरागमन भ' क' अयलीह शिशिरक संग। स्वाभाविक छलै जे गीतनाद होइतै,अरिछन- परिछन होइतै, मुदा से सभ कत'?दुआरि पर ठाढ़ छलै सात बरखक बेटा आ खबासिनी!उत्सुक दू जोड़ी आंखि दिस देखबा सॅं बचैत हिमानी शिशिरक पाछू शयनकक्ष धरि एलीह। शिशिरक किछु कहबा सॅं पहिनहिं बजलीह- "हम बहुत थाकल छी,सूतब।जयबा काल केबाड़ ओठगंबैत जायब।" "किछु खा लितहुॅं।खेनाइ बनौने होयत सुशीला!भिनसरे बिदा भेलहुॅं,बाटो मे किछु नञि खेलहुॅं अहाॅं!" "नञि,भूख नञि अछि।" हिमानीक सपाट स्वरक आगाॅं किछु कहबाक साहस नञि भेलनि शिशिर केॅं। चुपचाप बहरेलाह,बेटा केॅं दुलार- मलार केलखिन्ह,ओकर उत्सुक प्रश्न सभहक उत्तर दैत रहलखिन्ह आ भोजन कय बेटे संग सूति रहलाह! एम्हर हिमानी-पाथर जकाॅं छत दिस तकैत अपन जीवनक एहि नाटकीय मोड़ पर क्षुब्ध छलीह! नञि चाहितो पाॅंच बर्ख पूर्वक ओ दिन मोन पड़ि गेलनि जाहि मे सजलि- धजलि कतेक उमंगक संग विनोदक प्रतीक्षा क' रहल छलीह! मुदा विनोद-ओ त' कोनो न कोनो बहन्ने हिमानी सॅं दूर रहथि!पूछथि ककरा हिमानी?न समवयस ननदि,न दियादिनी!बूढ़ सासु सॅं की पूछथि,कोना पूछथि? एवंक्रमेण दू मास बीतल,जाहि मे आफिसियल टूर पर दू बेर भ' अयलाह विनोद!आब धीरज टुटि गेलनि हिमानीक,एक दिन ठाढ़ भ' गेलीह सोझां,जखन विनोद आफिस स' आबि चाह- जलखै क' फेर खेलबा लेल बहार भ' रहल छलाह ,ओ स्पष्टत: कारण पुछलखिन। पहिने बहाना,फेर धमकी,मुदा अंततः जे सत्य बहरायल ओ बहुत भयाओन छल! हिमानी आ विनोदक चिकरा- चिकरी सुनि सासुओ सभ गप बुझि गेलखिन आ पश्चात्तापक संग अपन अनभिज्ञता बुझबैत,नैहर पठा देलखिन। साल भरि विवाह- विच्छेदक प्रक्रिया चलल।किछु कादो हिनका पर, किछु विनोद पर पड़ल, मुदा ई मुक्त भेलीह।तकर बाद कोनो तरहें अपना केॅं सम्हारि पढ़ाई पूरा केलनि आ एकटा प्राइवेट स्कूल मे नोकरी कर' लगलीह।जीवन किछु किछु सामान्य होमय लागल छलनि, तखने बड़की काकीक भतीजाक प्रस्ताव पर हिनकर जीवन मे भूकंप आबि गेलनि।हिनक सभ प्रतिरोध मायक नोरक बहाव मे बहि गेल आ ई यन्त्रवत् सभटा सम्पादित करैत,सुखल आंखिए आबि गेलीह समस्तीपुर सॅं पुणे। मुदा उल्लसित मोने नञि,एकटा मातृहीन बच्चाक माय बनि। अगिला दिन सॅं फेर मशीनी जिंदगी शुरू भेल।शिशिर अपनहिं सॅं प्रभात केॅं तैयार क' स्कूल पठौलनि,अपनहुॅं जलखै क' आफिस बहरेलाह। हिमानी कनेक फ्री भ' सुशीलाक सहायता सॅं घरक काजदान बुझलनि आ हफ्ता भरि मे घरक व्यवस्था संभारि लेलनि।मुदा मोन!ओ त' शुष्क पाषाण बनल छल! धीरे- धीरे प्रभातक सभ दायित्व हिमानी संभारि लेलनि, ओहो धीरे-धीरे दोस्ती कर' लागल किन्तु अन्तरंगता कत'? हिमानी केॅं किछु अनुभवे कहाॅं होइन? ओ त' ड्यूटी क' रहल छलीह! शिशिर सभ टा देखैत छलाह, किन्तु ओ मौका देब' चाहै छलखिन! जीवन जॅं खायब, पीयब,सुतब,उठब,काज करब, नोकरी बजायब होइ छै त' नीक जकाॅं चलि रहल छलनि दूनूक! एकदिन प्रभात सीढ़ी पर सॅं खसि अचेत भ' गेल आ हिमानीक हाथ पैर सुन्न भ' गेलनि।कत' ल' जेथिन,हुनका त' किछु बुझले नञि छलनि पुणे के बारे मे।कहुना खबासिनीक सहायता सॅं लगीचक अस्पताल मे ल' गेलखिन। सीटी स्कैन आदि मे जखन किछु विशेष चोट नञि बुझेलै,त' कने होश मे अयलीह आ सुशीला केॅं कहलखिन सर केॅं खबरि देबा लेल। जखने प्रभात आंखि फोललक,तखने ओकरा मुंह सॅं मम्मी बहरेलै आ हिमानी ओकरा कसि क' छाती सॅं लगा कान' लगलीह।हुनक आंखि सॅं बहैत अजस्र अश्रुधार जेना युगयुगक संचित पीड़ा बहा रहल हो।ओम्हर खबासिनीक फोन सुनि हड़बड़ायल एलाह शिशिर माय बेटाक ई अन्तरंग मिलन देखि थकमकायल रहि गेलाह,हुनका बुझा गेलनि हिमखण्ड पिघलि रहल छैक….. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी माहुर करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका) डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/ (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta 97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 १६) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक VIDEHA 313 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। ३ विदेह अपन आगामी अंक (२०२१ क प्रारम्भमे) श्री रामलोचन ठाकुर पर विशेषांक निकालबाक नेयार केने अछि। हुनका सम्बन्धी रचना आमंत्रित अछि (संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा आदि) जे ३१ दिसम्बर २०२० धरि editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाओल जा सकैत अछि। विदेह पेटारक अन्तर्गत (पोथी डाउनलोड साइट) मे http://www.videha.co.in/new_page_15.htm हुनकर मौलिक, अनूदित आ सम्पादित रचना फ्री पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२१. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2021 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३१४ म अंक १५ जनवरी २०२१ (वर्ष १४ मास १५७ अंक ३१४)
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