VIDEHA — Issue 315 / अंक ३१५

Publication: VIDEHA · Issue: 315
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३१५ म अंक ०१ फरबरी २०२१ (वर्ष १४ मास १५८ अंक ३१५) ऐ अंकमे अछि:- १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- ८ म खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१५ म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (८ म खेप) २.४.नन्द विलास राय-बुढ़क दुख २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-परिपक्व निरलज २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-पछतावा २.७.ज्ञानवर्द्धन कंठ-डॉलीक नामांकन २.८.लालदेव कामत- भूगोलमे मिथिलाराज कहियाधरि २.९.सुभाष कुमार कामत- २ टा बीहनि कथा २.१०.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर (आत्म-कथा) ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार-दू टा गजल ३.२.अमरेश कुमार लाभ- दुइ टा कविता आ एक टा गजल ३.३.बाबा बैद्यनाथ- गजल ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.अम्बिका मल्लिक-हंसी ४.२.तनुजा दत्ता- नारी क अंनत रूप ४.३.चंदना दत्त- फागु ४.४.शशि प्रभा-स्त्री ४.५.बबली मीरा- हम मिथिला के नारी छी Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU  इग्नू       BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1    [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2    (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3    (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4                (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12               (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13               (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14                 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15                 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16                 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17                (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18                 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS ........................................................................................................................ OTHER OPTIONALS ........................................................................................................................ IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.योगेन्द्र पाठक वियोगी- नरक विजय (धारावाहिक नाटक- ८ म खेप) २.२. रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर (१५ म खेप) २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- आमक गाछी- धारावाहिक उपन्यास (८ म खेप) २.४.नन्द विलास राय-बुढ़क दुख २.५.जगदीशप्रसाद मण्डल-परिपक्व निरलज २.६.मुन्नाजी-बीहनि कथा-पछतावा २.७.ज्ञानवर्द्धन कंठ-डॉलीक नामांकन २.८.लालदेव कामत- भूगोलमे मिथिलाराज कहियाधरि २.९.सुभाष कुमार कामत- २ टा बीहनि कथा २.१०.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर (आत्म-कथा) योगेन्द्र पाठक वियोगी (सम्पर्क- 9831037532) नरक विजय (एहि नाटकक एक संस्करण हमर पोथी ‘त्रिनाटकम्’ मे छपि गेल अछि। ओहि मे दृश्यक संख्या बहुत बेसी रहला सँ किछु निर्देशक लोकनि एकर मंचन पर प्रश्न चिन्ह लगौलनि। ओहि आलोचना कें ध्यान मे रखैत एकरा परिवर्धित कएल गेल। एकर बंगला अनुवाद श्री नवीन चौधरी केलनि अछि।- नाटककार) पात्र परिचय मानव पात्र — रमेश, सुरेश, अनुपम अमित (वैज्ञानिक) पौराणिक पात्र — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, यमराज, चित्रगुप्त, दू यमदूत अंक 2 दृश्य 3 मंच सज्जा ओहिना, टेबुलक पाछू छओटा कुर्सी अर्धवृत्ताकार रूप मे लागल। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर लिखल अछि ‘देवलोक’, तीनू देव बीच मे बैसल छथि। अत्यधिक चिन्तित मुद्रा मे नारदक प्रवेश। प्रकाश क्रम सँ चारू कें आलोकित करैत अछि। तखन धीरे धीरे पूरा मंच आलोकित होइत अछि। नारद        नारायण, नारायण, सब सत्यानास भेल जा रहल अछि। विष्णु         पहिने आसन ग्रहण कएल जाओ मुनिश्रेष्ठ। (नारद ब्रह्माक बगल मे कुर्सी पर बैसैत छथि) बहुत चिन्तित देखैत छी। किछु विशेष बात ? नारद        देव लोकनि, मोन हेबे करत किछु दिन पूर्व यमराज दूटा मृतात्माक सम्बन्ध मे एकटा विचित्र प्रस्ताव अनने छलाह। हम सब ओहि मृतात्मा कें मर्त्यलोक सँ किछु सामान अनबाक स्वीकृति दऽ देने छलियै। महेश        हँ, ओ प्रस्ताव तऽ सर्वसम्मति सँ पास भेल छलैक। नारद        ठीक, मुदा जेना हम कहने छलहुँ, ओहि सामान कें हम सब चीन्हि नहि सकबैक। ओहि मे की छलैक आ ओकर देवलोक पर की प्रभाव हेतैक से एखनहुँ हम नहि बुझैत छी मुदा किछु अप्रत्याशित घटना घटि रहल अछि जरूर। विष्णु         कने फरिछा कए कहू। नारद        ओहि मृतात्माक एलाक बाद ओकरा सब कें अग्निकुण्ड पठा देल गेलैक। मुदा ताहि सँ पहिने ओ सब बन्द घर मे स्नान केलक। ब्रह्मा         यमलोक मे आबि मृतात्मा बन्द घर मे स्नान केलक ! आश्चर्य घटना जे कहियो नहि भेल छल। नारद        ओतबे नहि, तकर बाद आबि कए यमराज आ चित्रगुप्त कें एकटा पैकेट उपहार देलकनि। ओ उपहार केहन छलैक से तऽ हुनके सब सँ सूनब। महेश        ओ दूनू गोटे उपहार राखि लेलनि ? कने बएन एम्हरो पठा दितथि तऽ हमहूँ सब स्वाद चिखितहुँ। नारद        कने दम धरू उमापति, ओ दूनू आबिए रहल छथि। ओतबे नहि, ओ सब अग्निकुण्ड मे जेबा काल सेहो किछु नाटक केलक। विष्णु         अच्छा ? नारद        एकरो विस्तृत वर्णन हुनके सब सँ सूनब। मुदा हम कालि यमलोक मे बड़ अजगुत देखल। महेश        खिस्सा बहुत रोचक बनि रहल अछि, कने फरिछा कए कहियौ देवर्षि। नारद        कालि ओहिना उत्सुकतावश यमलोक गेल छलहुँ जे यमराज सँ ओहि दूनू मृतात्माक हालचाल पूछी। ओतए जे देखल से अविश्वसनीय छल। ब्रह्मा         एहन की देखलियै मुनिश्रेष्ठ ? नारद        जखन हम प्रवेश कएल तऽ देखल जे यमराज सँ कोनो दूटा अदृश्य आत्मा गप कऽ रहल अछि। ओ सब प्रकट नहि होमए चाहैत छल। ओ हमरो चिन्हैत छल। विष्णु         अपने कें तीनू लोक मे के नहि चिन्हत देवर्षि ? नारद        से बात नहि चक्रपाणि, हम जखन मर्त्यलोक गेल रही तखन छद्मवेश मे। तकर बाद हाल मे एक बेर फेर गेल छलहुँ मुदा किछु विशेष कार्य सँ जाहि मे ककरो सँ भेंट करबाके नहि छल। महेश        चुपेचुपे एतेक मर्त्यलोक भ्रमण किएक देवर्षि ? नारद        ओ खिस्सा बाद मे कहब। एखन तऽ बूझि लेल जाओ जे ओ दूनू मृतात्मा मर्त्यलोक सँ लगातार सम्पर्क बनौने रहैत अछि। ब्रह्मा         यमलोक मे अग्निकुण्ड मे पड़ल आत्मा कोना मर्त्यलोक सँ सम्पर्क बना सकैत अछि ? ई तऽ अबूझ पहेली भेल मुनिश्रेष्ठ। नारद        वैज्ञानिक प्रगति जे हम देखल ताहि सँ ई सम्भव छैक चतुरानन। मुदा ओ बात एखन कात रहए दियौक। सूनू यमलोकक खिस्सा। महेश        सुनबा लेल व्यग्र भेल छी देवर्षि। नारद        ओ दूनू अदृश्य आत्मा हमरा दूनू कें बहुत डरा धमका देलक। यमलोकक वर्तमान स्थितिक ओ सब पूर्ण जानकारी रखने छल जेना पूरा इलाका मे ओ सब घुमैत रहल होअए। ब्रह्मा         कुण्ड मे पड़ल आत्मा कोना बाहर आबि गेल, कोना समूचा इलाका घूमि लेलक ? कुण्ड मे पहरा नहि छलैक ? नारद        से तऽ यमराज सँ पूछि लेब प्रजापति। एतेक जरूर जे ओ सब जाहि तर्कें बाजि रहल छल से सब ओहिना नकारल नहि जा सकैत छलैक। ओकरा तर्क मे औचित्य छलैक आ सब बात मर्त्यलोकक आधुनिक वैज्ञानिक विकासक अनुभव सँ प्रेरित छलैक। विष्णु         की मानव सत्ते देवलोकक विजय अभियानक तैयारी कऽ रहल अछि ? (महेश दू बेर डमरू बजा दैत छथि, जेना कोनो युद्धक बिगुल होए) नारद        तेहन सन तऽ नहि लगैत अछि। देवलोक ओकरा सब लेल कोनो चैलेंज नहि छैक। ओ सब तऽ ब्रह्माण्डक अन्यान्य ग्रह नक्षत्र पर पहुँचिए गेल अछि। आ अन्य ब्रह्माण्ड पर जेबाक तैयारी मे लागल अछि। (चित्रगुप्तक संग यमराजक प्रवेश) यमराज       त्रिमूर्ति कें हमर दंडवत प्रणाम स्वीकार हो। विष्णु         अबैत जाउ, आसन ग्रहण करैत जाउ (कुर्सी दिस इशारा करैत, यमराज, चित्रगुप्त दूनू कातक कुर्सी पर बैसैत छथि, चित्रगुप्त अपन खाताबही टेबुल पर रखैत छथि) कहल जाए धर्मराज, कोन विशेष प्रयोजन सँ एखन उपस्थित भेलहुँ ? यमराज       विशेष प्रयोजन भेल यमलोक मे घटैत किछु विचित्र घटना सँ देवलोकनि कें अवगत कराएब आ शिथिल होइत प्रशासन पर किछु चर्चा। महेश        आ मर्त्यलोकक उपहारक चर्चा नहि करबै ? यमराज       पहिने चित्रगुप्त महाराज सँ हुनकर अनुभव सूनि लेल जाओ देवलोकनि। विष्णु         सुनबा लेल तैयारे छी। चित्रगुप्त      खिस्सा ओहि दू विचित्र मृतात्मा सँ सम्बन्धित अछि। ओ दूनू अपना पेटी मे डायरी जकाँ एकटा यंत्र अनने छल जाहि मे अपन सब कुकृत्यक विस्तृत विवरण लिखने छल। आ से एहन नीक ढंग सँ जे ओकरा देखिते हमरा अपना लूरि पर लाज होमए लागल। ब्रह्मा         (आश्चर्य प्रकट करैत) से की ? अपने सन लेखाकार तीनू लोक मे नहि अछि तखन ओहि मर्त्यलोकक अदना जीव एतेक कोना सीखि लेलक ? चित्रगुप्त      हमरहु एकर उत्तर नहि भेटल अछि प्रजापति। एकेटा सम्भावना अछि — युग युग सँ हम सब शिथिलताक शिकार भेल छी। कहलनि ओहि दिन महादेव ठीके जे हम सब मानि बैसल छलियै सब लूरि मे सर्वोत्तम छी आ नव किछु कतहु भैए नहि सकैत छैक। ओही प्राचीन पद्धति कें कनहा पर टॅंगने हम सब एतए बैसि अपना अभिमान मे डूबल रहलहुँ आ धरती पर ई तेज बुद्धि बला मानव जाति की की ने विकसित कऽ लेलक। विष्णु         वैज्ञानिक आविष्कारक किछु झाँकी तऽ नारदमुनि देखि आएल छथि मुदा लेखाकृति मे सेहो एतेक प्रगति भऽ गेलैक ई नव सूचना भेल। एहि सँ अपने कें चिन्तित हेबाक कोन काज ? ओ हमरा सब कें चैलेंज तऽ नहिए करत। चित्रगुप्त      से बात नहि, मुदा विकसित सभ्यता सँ डर तऽ हेबाके चाही ने चक्रपाणि। नित्यप्रति ओहि मृतात्माद्वय लऽ कए कतेको अजगुत बात भऽ रहल अछि जे पहिने कहियो नहि देखने छलियैक। ब्रह्मा         से तऽ ठीके, किछु नारदमुनि एखनहि सुना देलनि। मुदा हम धर्मराज सँ पुछैत छिएनि जे कुण्ड मे पड़ल आत्मा बाहर कोना आबि गेल आ समूचा इलाका मे टहलि लेलक। ओतए पहरा देनिहार की करैत छल ? यमराज       कुण्ड मे दूनू मृतात्मा पड़ले अछि प्रजापति। हमरा सबहिक प्रशासन मे कतहु कोनो ढिलाइ नहि भेल अछि। हम सब किछुओ नहि बूझि रहल छी जे ओहि सँ अलग दूटा अदृश्य मृतात्मा कोना आबि गेल। विष्णु         किछु मथदुक्खी जरूरे अनलक अछि ई घटना सब। एकर जाँच पर विचार हेतैक। अपने किछु प्रशासनिक चर्चा करए चाहैत छलहुँ धर्मराज। यमराज       यमलोकक प्रशासन मे शिथिलता आबि रहल अछि देव। ब्रह्मा         धर्मराज सन न्यायप्रिय शासक आ चित्रगुप्त सन लेखाकारक अछैत ई शिथिलताक चर्चा किएक ? यमराज       प्रशासन मे शिथिलता आबि रहल अछि चतुरानन कारण युग परिवर्तनक संग हमरा लोकनिक न्याय व्यवस्था परिवर्तित नहि भेल। हम सब कलियुगक उत्तरार्द्ध मे आबि गेल छी आ व्यवस्था सतयुगे बला रखने छी। महेश        (डमरू बजबैत) एकदम ठीक, हम तऽ कहब जे व्यवस्था शीघ्र बदलब परम आवश्यक। यमराज       दूटा बात पर ध्यान देल जाओ प्रभो – एक तऽ भेल यमलोकक आकार। यमलोक कें जे जमीन आबंटन भेल से सतयुग मे। ओहि समय पातकीक संख्या न्यून छल। तें यमलोक कें कम हिस्सा भेटलैक। ब्रह्मा         ई तऽ ठीक मुदा आब एहि मे कोना संशोधन सम्भव छैक ? यमराज       आजुक तारीख मे यमलोक मे आबऽ बलाक संख्या हजारो गुणा बढ़ि गेल अछि, संगहिं पापक जे परिभाषा हम सब रखने छी ताहि अनुसार ओकरा सबकें यमलोक मे बहुत दिन तक रहए पड़ैत छैक। फल ई भेलैक जे यमलोक मे सब कुण्ड मे मृतात्मा सब ठूसल रहैत अछि। बहराइत अछि एकटा आ आबि जाइत अछि दशटा। चित्रगुप्त      धर्मराज ठीके कहैत छथि। हमरहु एहि स्थिति लऽ कए बेस चिन्ता रहैत अछि। विष्णु         अपनेक की सुझाव ? महेश        हमर तऽ विचार जे देव लोकनिक लेल एक एक बीघा जमीन राखि देवलोकक बाँकी सबटा जमीन यमलोक कें दऽ देल जाए। यमराज       भोलेनाथ तऽ सब दिन क्रान्तिकारी प्रस्ताव दैत रहलखिन। मुदा हमरा ओतेक नहि चाही। अपने सब कष्ट मे रहब से हमरा कोना नीक लागत ? हम कोना कैलास पर्वत आ क्षीर सागर पर कब्जा जमाउ ? तहिना सब देव अपन फैल आवास राखथु। सुविधानुसार जे बचए से यमलोकक नाम आबंटन कऽ दियौक। ब्रह्मा         मुदा एहि मे एकटा पैघ समस्या छैक – देवलोकक जमीन यमलोक कें दइयो देल जेतैक तऽ कोनो मृतात्मा ओहि भूभाग पर पैर कोना देत ? ई तऽ नियमक विरुद्ध हेतैक। महेश        तें ने हम कहैत छी पहिने नियम कें बदलू। विष्णु         ओहि भूखंड कें यमलोकक भाग घोषित कऽ देला पर मृतात्मा सब रहि सकताह मुदा कतेक जमीन चाही ? यमराज       जतेक बिन काजक जमीन हो यथा बंजर, बलुआह, चट्टान, चऽर चांचर, सघन जंगल आदि जकर देवलोक मे कोनो उपयोग नहि छैक। महेश        हमरा तऽ ई प्रस्ताव अति उत्तम लागल। जखन ओ सब अनुपयोगी जमीन लेबा लेल तैयार छथि तखन हर्जे की ? विष्णु         हमरा ई प्रस्ताव मंजूर अछि। ब्रह्मा         अनुपयोगी जमीन लेल हमरो स्वीकृतिए बूझल जाओ। यमराज       बहुत कृपा केलिऐ देव लोकनि। ई समस्या एतेक सुगमता सँ निपटि जाएत से हमरा अन्दाज नहि छल। आब हमर दोसर प्रस्ताव सुनू। विष्णु         कहियौ, हम सब तऽ बैसले छी ओही लेल। यमराज       जहिना जमीन आबंटन सतयुग मे भेला सन्ताँ कलियुग अबैत अबैत असंतुलन भऽ गेलैक तहिना पाप आ धर्मक परिभाषा सेहो प्राचीन भऽ गेलैक। पृथ्वी पर मानव समाज मे बहुत परिवर्तन एलैक। राजा, जकरा लोक इन्द्रक अवतार बुझैत छल, से सबतरि हटि गेलाह। लोक अपन शासन चलेबा लेल प्रतिनिधि सब चुनलक। ब्रह्मा         मुदा कर्म तऽ ओएह करैत रहल, हत्या, बलात्कार सब समय पाप रहबे करतैक। नारद       सतयुग आ कलियुगक युगधर्म अलग अलग छैक देवगण। यमराज       पुरान व्यवस्था मे यमलोक मे जे विभिन्न कुण्डक विधान छल ताहि हिसाबें नवका कुण्ड सब जे बनाओल जाएत ताहि लेल सामान सब कतए सँ आओत ? सूनल अछि जे मर्त्यलोक मे वैज्ञानिक लोकनि नव नव अनुसंधान द्वारा मल मूत्र आदि सँ बहुत उपयोगी पदार्थ बना रहलाह अछि तें यमलोक कें ओकर बिक्री आब नहि होएत। नारद        धर्मराज ठीके कहैत छथि। ओतबे नहि मनुष्य एहन आविष्कार केलक अछि जे अपन प्रतिरूप एतए पठा देत जकरा पर शीत, ताप, गंदगी आदिक कोनो असरे नहि हेतैक। महेश        देखू, हम पहिनहुँ कहने छलहुँ, आइयो कहैत छी जे देवलोक मे जड़ता आबि गेल छैक। परिवर्तन सृष्टिक नियम छिऐक। जहिना ठाढ़ जल शनैः शनैः दूषित भऽ जाइत छैक तहिना नियम कानून सेहो बेसी पुरान भेला पर बेकार भऽ जाइत छैक। नारद        मर्त्यलोक मे तऽ संविधान संशोधन चलिते रहैत छैक। विष्णु         बात बुझलहुँ, एहू दिशा मे कार्य हेबाक चाही। महेश        हम तऽ कहब जे वर्तमान विधान कें तत्काल प्रभाव सँ स्थगित कऽ देल जाओ, नव विधान बनेबा लेल गणेश अथवा कार्तिकक अध्यक्षता आ चित्रगुप्त महराजक सचिवत्व मे एकटा कमेटी बनए जे नव नियमक संग संविधान प्रस्तुत करथि। धर्मराज अपने विशेष सलाहकार रहता। ब्रह्मा         नव संविधान बनेबाक लेल समय सीमा निश्चित हेबाक चाही ने उमापति। महेश        देखियौ, एतेक युगक बाद पहिल बेर नव संविधान बनाओल जा रहल छैक। पृथ्वी पर जतेक वैज्ञानिक विकास भेलैकए ताहि हिसाबें अपराधो के नव नव रूप आएल हेतैक। संगहि ओहि मे ब्रह्माण्डक अन्य ग्रह आदि पर कएल गेल अपराध सेहो जोड़ए पड़तैक कारण मनुष्य आब सबतरि पहुँचि गेल अछि। एतेक पैघ काज लेल समय सीमा कोना निर्धारित करबै प्रजापति ? नारद        नव विधान लेल की स्वर्ग मे विराजमान पुरान विधि विशेषज्ञ सबहक सेवा नहि लेल जा सकैत अछि ? ब्रह्मा         जेना कि ? नारद        गाँधी, राजेन्द्र प्रसाद, अंबेदकर सन विधिवेत्ता सब जे छथि। महेश        जरूर जरूर, ओहने व्यक्ति सब सँ नव विधान वास्तव मे नव होएत। मात्र नव कलेवर नहि, नव आत्मा सेहो। हम तऽ कहब जे एकाध वैज्ञानिक कें सेहो राखि लेल जाए जे मर्त्यलोक मे भेल वैज्ञानिक विकास सँ परिचित होथि। विष्णु         ठीके कहलहुँ। वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु महोदय बैसले रहैत छथि। चित्रगुप्त      पुरना नियम स्थगित रहबाक अवधि मे यमलोकक प्रशासन कोना चलए ? महेश        हमरा विचारें धर्मराज कें विशेषाधिकार देल जाए, ओ स्वयं निर्णय लेथि जे कोन हिसाबें मृतात्मा सब कें रखताह आ कि छुट्टी दऽ देथिन। विष्णु         बेस, इहो प्रस्ताव पासे बूझल जाओ। दू तीन दिन मे सब सदस्य लोकनि सँ सहमति लऽ कए नव कमेटीक घोषणा कऽ देल जाएत। धर्मराज अपन विशेषाधिकार एखनहि सँ प्रयोग करथु। आर किछु ? यमराज       नहि देव, हमर सब समस्याक समाधान भऽ गेल। महेश        आहि रे बा ! उपहारक चर्चा तऽ करबे नहि केलियै कियो ? यमराज       ओ उपहार कोनो नैवेद्य मिष्टान्न नहि छल भोलेनाथ जे बएन पठबा दितहुँ। कालि ओकरा बारे मे नारदमुनि कें बताइये देने छलिएनि। हुनके सँ बूझि लेब। नारद        स्पष्टे कहियौ ने सूर्यपुत्र जे मर्त्यलोक सँ एकटा मसीनी पुतरा आएल अछि जे स्वर्गलोकक सब अप्सरा कें नोरी बना कए रखबाक गुण रखैत अछि। अपन एक मधुर सम्भाषण सँ कोनो तपस्वीक तपस्या भंग करबा मे समर्थ अछि। ठीक छैक ने चित्रगुप्त महाराज ? चित्रगुप्त            अपने बुझिए गेलियैक तऽ आब बेसी की कहल जाए ? महेश        बर बेस, सुख भोग करू दूनू गोटे। (दर्शक दीर्घाक अढ़ सँ रंगबिरंगी लेजर प्रकाश हॉल मे फेकल जाइत अछि, ओकर रूप सेहो क्षणे क्षणे बदलैत रहैत छैक, ई लेजर ओहने छैक जेहन नारद वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला मे देखने छलखिन। तखने ओहिना अढ़ सँ एकटा छोट ड्रोन उड़ाओल जाइत छैक जे किछु काल तक दर्शकक बीच उड़ैत रहै अछि। नेपथ्य मे विमान उड़बाक जोर सँ ध्वनि होइत छैक। महेश उठि कए डमरू बजबैत खुसी सँ नाचए लगैत छथि।) विष्णु         सुदूर मे ई कोन विचित्र प्रकाश देखल हम सब ? आ एतेक जोर आवाज बला चिड़ै सेहो पहिले बेर देखि रहल छी। नारद        इएह दूनू खेला हम ओहि वैज्ञानिक के प्रयोगशाला मे देखने रही। मुदा ई देवलोक मे कोना पहुँचि गेल से नहि बुझा रहल अछि। जरूर ओहि वैज्ञानिक के बदमासी छी हमरा सब कें बुझबै लेल जे ओ सब वास्तव मे ब्रह्माण्डक कोनो भाग मे जा सकैत अछि। महेश        (ठाढ़े ठाढ़) जिन्दाबाद, जिन्दाबाद, मर्त्यलोकक मानव आविष्कार जिन्दावाद। (बैसि जाइत छथि) ब्रह्मा         हँसी ठट्ठा नहि बुझियौ महेश्वर, कने सीरियस होउ। देवलोक पर बहुत पैघ खतरा आबि गेल अछि। हमर तऽ विचार होइत अछि जे भगवती दुर्गा कें आह्वान कएल जाए आ मानव जातिक नाश कएल जाए। ई विचार हम बहुत कष्टें देल अछि कारण बुझले अछि मानव हमर अप्रतिम सृजन अछि आ हमरा सबसँ बेसी प्रिय। महेश        चतुरानन, सत्ते अहाँ सठिया गेलहुँ अछि। मानव सँ अराड़ि लेब तऽ पूजा के करत? हम अहाँक पूजा करब आ अहाँ हमर तै सँ चुलहा कोना पजरत ? छप्पन प्रकारक भोगक आदति जे लागि गेल अछि से कतऽ सँ आओत ? देवलोकक छहरमहर दुइये दिन मे खतम भऽ जाएत आ तकर बाद ठनठनगोपाल। नारद        हमर कहब दोसर अछि। कोनो अभियान सँ पूर्व शत्रुक सबटा सैन्यशक्तिक पता लगा लेबाक चाही। विष्णु         से तऽ ठीके। दोसर बात जे देवी महिषमर्दिनी कतोक युग सँ युद्ध मे नहि गेलीह अछि। हुनको अस्त्र शस्त्र आब बिझा गेल हेतनि। महेश        मानव सँ युद्धक विचार त्यागिए देल जाए सएह होएत बुधियारी। आब कतेक दिन हम सब ओकरा ठकबै ? विष्णु         देखल जेतैक, एखन मीटिंग समाप्त भेल, सब गोटे अपन अपन घर चली। (सबहक प्रस्थान, प्रकाश बन्द) (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रबीन्द्र नारायण मिश्र- सम्पर्क -9968502767 धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर लजकोटर (प्रवासीक जीवनपर आधारित) 15- किशुन आ ओकर मामाक गेलाक बाद फोन देखलहुँ ।लताक पाँचटामिसकाल छल। कैटा एसएमएस आबि गेल छल। सभ किछुबिसरि हम पहिने ओकर फोन उठओलहुँ । घंटीबाजैत रहल मुदा ओ फोन नहि उठओलथि । आब की होएत? लताबिगड़ि गेल की ? तरह-तरहक अंदेशा मोन मे होबए लागल ।  जखन फोन नहि उठा रहल छलि तँ एकहिटा रस्ता छल जे अपने ओतए चलि जाइ , देरी तँ भइए गेल रहैक । असलमे किशुन आ ओकर मामाकसंगे बहुत समय निकलि गेल । करबो की करितहुँ? उपरसँ विजय से दुविधा कए देने रहए । हम फटाफट तैयारभेलहुँ । झोरा उठओलहुँ आ बिदा भेलहुँ । बसस्टापपर पहुँचले छलहुँ कि लताक फोन आएल । " हम अहाँक बाट तकैत-तकैत कारखानापर आबि गेल छी। अहाँ सोझेओतहि आबि जाउ।" "ठीक छैक ।"-हम किछु आओर कहए चाहलिऐक मुदा ताबे ओकर फोन कटि गेल । लता कारखानाक गेटेपर भेटि गेली । "एतेक देरी किएक भए गेल? हम तँ सोचैत रही जे अहाँ समानक संग अबैत होएब।" "भोरे- भोर किशुन अपन मामाक संगे आबिगेल । " "की भेलैक।" "अखबारमे पढ़नहि हेबैक ।किछुदिन पूर्व ओकर घरमे विस्फोट भए गेलैक ।सभटा समान जरि गेलैक। घरक चारो उड़ि गेलैक ।" " समाचार तँ पढ़ने रहिऐक ।" "ओ सभ बहुत परेसान अछि । विजय बजओने छैक । देखा चाही की होइत छैक?" "ओ सभ किछु नहि करतैक ।" "से तँ हमरो बुझाइत अछि । ई विजय नीक लोक नहि बुझाइत अछि ।" " अहाँक अनुमान सही अछि। हमरा तँ ओकरे पर सक होइत अछि ।" "से कोना?" " ओ तरह-तरहक धंधासभमे लागल रहैत अछि ।" " हमरा तँ ओएह अहूँ बारेमे किछु-किछु कहलक । सत बातकी छैक से नहि कहि मुदा हमरा दुविधामे दए देलक ।" "हम नहि बुझलिऐक । फरिछा कए कहू ।" "ओ कहलक जे अहाँसभ सँ बचिएक रही ।" सएह कहू ,केहन नेतघट्ट अछि । हमरे बाबू ओकरा काज धरओने रहथि आ हमरेसभकेँ जड़ि काटएपर लागल अछि ।" "की कहि सकैत छी?ककरा मोनमे की छैक से बुझब बहुत मोसकिल काज अछि । लोक अपन मोन तँ थाहिए नहि पबैत अछि,अनकर कोन कथा? हम एहि महानगरक प्रपंच नहि बुझैत छिऐक । हमसभ गामक सोझ लोक छी मुदा एहिठाम तँ डेग-डेगपर छल-प्रपंच भरल छैक । ककर बात मानू ,ककर नहि। हम तँ सोचने रही जे अपन काज करब आ चैन सँ जीब मुदा सएह नहि भए पबैत अछि । कोनो निजगुत काज नहि भेटैत अछि,जे भेटैत अछि ओहिमे किछु-ने-किछु हेराफेरी शुरु भए जाइत छैक।” गप्प-सप्पक क्रममे हम ओकरा साफे कहलिऐक जे अखन किछुदिन हम अपन पुरने डेरामे रहब । लता चुपरहिगेलीह। हम इहो कहलिऐक "-हम ई नहि बुझि पाबि रहल छी जे एतेकभारी राज-काज हम कोना चला सकब । हमरा कोनो तेहन शिक्षो नहि अछि ?" "कोनो बात नहि । नीकसँ बिचारि लिअ । जे ठीक बुझाए सएह करू । हमरासभकेँ कोन पूर्वाग्रह वा दुराग्रह नहि अछि । हमसभ तँ अहींक हित सोचैत रही । जे हेतैक, नीके हेतैक ।" "अहाँ तँ तमसा गेलहुँ ।" "नहि, नहि, तमसएबाक कोनो बाते नहि छैक।" लता अपन  कारमे बैसलि आ चलि गेलीह ।हमरा पुछबो नहि केलीह । हम पैरे-पैरे बससटैंड पहुँचलहुँ आ ओतएसँ बस पकड़ि अपन डेरा आपस चलि अएलहुँ । रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस : ६६ बर्ख, पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह, मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवा निवृत्त), शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक प्रकाशित कृति : मैथिलीमे:- १. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा), २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग), ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास)१२.स्वप्नलोक(उपन्यास)१३.शंखनाद(उपन्यास)१४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) In English:- 1.The Lost House (Collection of short stories), 2.Life is an art हिन्दी में – १.न्याय की गुहार(उपन्यास) (उपरोक्त पोथीसभ pothi.com, amazon.com आओर www.flipkart.com पर सँ कीनल जा सकैत अछि) इमेल : mishrarn@gmail.com ब्लोग : mishrarn.blogspot.com  एमजोनक लेखक पृष्ठ : amazon.com/author/rnmishra ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल आमक गाछी (धारावाहिक उपन्यास) 8 जगमोहीकेँ मात्रिक आ सुवासिनीकेँ नैहर एला पनरह दिन पुरि गेल। मासक अधा भाग माने एक पख उतैर कऽ दोसर पख चढ़ि गेल। अखाढ़क पहिल झमझमौआ बरखा सेहो परसू रातिमेबरसल। धरतीमे आद्रा नक्षत्रक आद्रताक आगमन सेहो भइये गेल, जइसँ नव परिवेशक[i] आगमन भेने जन-गण, जन-मनकसंग जन-धनमे सेहो प्रवेश कइये लेलक। प्रेमनगरक किसान जागल छैथ। गामक किसानक विचारक प्रतियोगितामे ओ किसान आगू मानल जाइ छैथ जे नून छोड़ि बाहरी कोनो वस्तुक उपयोग भोजनमे नइ करै छैथ। भाय, धोखा नइ हुअए। किसानक मुख्य सेवा भोजनक छी। ओना, करखन्नाक कच्चा वस्तुक सहयोग सेहो किसानीए-सँ होइत अछि। जेना कपड़ासेहो कृषि उत्पादित कच्चा वस्तुक छीहे। दुखद एतबे अछि जे पहिने गाम-गाममे कपड़ा बुनकर[ii] छल, खादी भण्डार ओकर अड्डा बनल छेलै जइ माध्यमसँ कारोबार छल, जे टुटि कऽ बजारू रूप पकड़लक। पटुआ सेहो अछि जेकर खेती पछुआ गेल, किएक तँ ओकर ऐगला अंग–माने कारखाना–बैसल नहि, जइसँ किसानक नगदी खेती छीना गेल। खाएर जे भेल से भेल, जानए जौ आ जानए जत्ता...। समय बदलने प्रेमनगरक किसान अपनाकेँ समयानुकूल मोड़ि लेलैन। बरखा भेने बाध-बोनमे खेतीक पी-पाह शुरू भेल। जेना धरती मैयाक आँगनमे शुभ सनेस आएल हुअए। पनरह दिन केना बीतल, से ने जगमोही बुझि सकल आ ने सुवासिनीए बुझि सकली। प्रेमनगरक हवा-पानि जेना दुनूक मनकेँ मोहि लेलकैन। ओना, पटनाक परिवारसँ सेहो सम्बन्धो आ सम्पर्को बनले रहैन जइसँ मनमे कोनो वैचारिक बेवधान किए पकैड़तैन। अपन-अपन विचारो आ विचारक नजरियो तँ सभकेँ अपन-अपन होइते अछि। जखन एक विचारक दू गोरे एक्को रस्ते चलै छैथ तहूमे दहिना-बामा दू दिशा होइते अछि। रस्ता चाहे जइ दिशामे जाए मुदा बाम-दहिनक भेद किछु-ने-किछु होइते अछि। रोहनिया, बम्बइ, गुलाबखास आम उतारक दिशामे उतैर रहल अछि जखन कि कृष्णभोग, मालदह, सबुजा, जरदालू इत्यादि चढ़ाइक दिशामे चढ़ि रहल अछि। ओना, किछु खटहो आ किछु सड़नमो आम एहेन अछिए जे सभ सेहो चढ़ाइक अवस्थामे सेहो अछि। मुदा ओकर मद्दी प्रेमनगरक लोक किए देत। जे धानकेँ धान बुझैए ओ धानक झड़केँ किए मानि देत। खाएर जे भेल ई तँ भेल प्रेमनगरक गिरहस्तक गिरहस्ती-जीवनक बात। मुदा एतबेटा दुनियॉं प्रेमनगरक लोककेँ नहि ने छैन। ऐसँ आगू गौऑं दुनियोँ देखै छैथ आ दुनियॉंकेँ सेहो देखबै छैथ। सुवासिनीकेँ जहिना अपन परिवारिक जिनगीमे भूचाल जकॉं उठल छेलैन तहिना धीरे-धीरे ऐ पनरहियामे घटि कऽ समतल भूमिपर पहुँच गेलैन। भाय!बड़ीटा दुनियॉं अछि किने, तँए अपन-अपन नजरिये ताकि-ताकि ने चलए पड़त...। सुवासिनियो तहिना अपन जगमोही-बेटीक बिआहक विचारक समतल भूमिपर पहुँच गेली। अखन धरि जे सुवासिनी मानै छेली जे बेटीकेँ जेते बेसी पढ़ाएब, जेतेक उच्च शिक्षाक डिग्री दियाएब ओतेक बेसी भारी बिआहक दहेजो होइए। नव परिवेशक प्रवेशसँसमाजक बीच लोकक विचारक नाप-जोख सेहो बदलल अछिए। खाएर जे अछि, जेतए अछि से तेतए रहौ, प्रेमनगरक लोक अपन विचारक ओइ सीमपर ठाढ़ छथिये जे जखन मनुख निरमबैक शक्ति अपनामे अछि–ओम् नर: नारायणम्–तखन दुनियॉं जेमहर भाँसए आकि भँसियाए ओ तँ ओइ भँसिएलहा सभकेँ ने बुझए पड़त। जिनगीक नव मोड़पर ठाढ़ जगमोही सेहो पनरह दिनमे संगी-बहिनपा सबहक बीच एना घुलि-मिलि रीतसँ रीतिया गेल जे बीतैत पनरह दिन आ अबैत पनरह दिनक बीचक भार एक्केरंग बुझि पड़ए लगलै। पनरह दिन जगमोहीकेँ अपन सखी-बहिनपाक बीच जे हँसैत-खेलैत चलल जइमे सृजन अछि, सृजनक साधन अछि आ तैसंग साधना सेहो अछिए। जइसँ सृजनक आनन्दो अछिए। माने नव-नव संगीक बीच विचारक आदान-प्रदान। जेना कोन स्कूलक की स्थिति अछि कोन कौलेजक की स्थिति अछि ओ गामो-देहात आ शहरो-बजारक बीचक तुलनात्मक गप-सप्प बुझबो केलक आ बुझेबो केलक। आइ सबेरे जीबेन्द्र धीरेन्द्रकेँ कहलैन- “बौआ, पनरह दिन बीत गेलहआबबाइसे दिनक छुट्टी ने बँचलह। ओना, अपन कलम-गाछीमे सभ आम अछिए मुदा अपन रोपल जे आम छह से तँ खा लेबह किने?” पिताक विचार सुनि धीरेन्द्र ठमैक गेल। मनमे उठलै- अपने जे पॉंचटा आमक गाछ रोपने छी ओ तँ पूर्ण मौसमक छी किने। पूर्ण मौसमक माने भेल आमक मौसमक आदिसँ अन्त धरिक। जे मास दिनसँ बेसी दिनक अछि। माने उतार जेठसँ लऽ कऽ चढ़न्त साओन धरिक। तही खियालसँ एकटा गुलाबखास, एकटा बम्बइ, एकटा सपेता, एकटा मोहनठाकुर आ एकटा राड़ि आमक गाछ रोपने अछि। धीरेन्द्रकेँ ठमकल देख जीबेन्द्र दोहरा कऽ बजला- “बौआ, तोहर मन मोहनठाकुर आ राड़िपर सेहो गेल हेतह, मुदा ओकर समय अखन नइ आएल अछि, ओ तोहर भविस छिअ। जहिया गाममे रहऽ लगबह ओ तहियाक भेलह। मुदा अखन जे सवा मासकछुट्टीमे आएल छह तइमे तीन रंगक आम पकड़ाइ छह, कम-सँ-कमओ तीनू तँ खा लेबह। भने अखन एकटा संगियो पटनाक छहे ओकरो खुआ दिहक।” एकटा जगैत भोरक सूर्यक शौर्य प्रकाशसँ दीपैत जकॉं नवयुवक धीरेन्द्र अपन जिनगीकेँ अपना हाथे स्थापित करैक विचार ओही दिन मनमे रोपि लेलक जइ दिन एक मौसमक एक रंगक फलक गाछ रोपलक। भायधीरेन्द्र तँ एक मौसम भरिक गर लगौलक मुदा जेकरा एको दिनक गर लगबैक लूरि-बुधि मनमे विचड़न करए लगत तँ ओकरो जिनगी रोपेबे करत। मनुख तँ मनुख छी, धरतीक सभसँ श्रेष्ठ ब्रह्मरचित रचना। गाछ-बिरीछ आकि जीवे-जन्तु थोड़े छी जे जैठाम अनुकूल मौसम रहत तैठाम तँ जीब सकै छी आ जैठाम नइ रहत तैठाम कालक गालमे चलि जाएब। मनुख दुनियॉंक कोनो कोणमे बसि वासी बनि अपन अनुकूल मौसम निरमा लइते अछि। चाहे ओ सहाराक मरूभूमि हुअए आकि साइवेरियाक वर्फीली भूमि...। ओना, संजोगो तँ संजोग छी। जीबेन्द्रकेँ सेहो अनुकूल संजोग भेटलैन। अनुकूल संजोग भेल जे सभ किछु शुभे-शुभ रहल आ प्रतिकूल संजोग भेल जइमे अनुकूल-प्रतिकूलक संग-संग सोलहन्नी प्रतिकूले रहल। मुदा से नहि, जीबेन्द्रक अनुकूल संजोगक पहिल कारण छेलैन जे धीरेन्द्रक अपन हाथक रोपल आमक फल छल। दोसर,जीबेन्द्रक मनमे ईहो छेलैन जे जँ कन्यादानकेँ ‘महादान’ कहल जाइए तँ अधिक-सँ-अधिक जेतेक सम्भव हएत ओतेक अधिक फलो प्राप्त करैक स्थान भेटत। तँए सुवासिनीकपीड़ासँ–बेटी बिआहक–पीड़ित भऽ जीबेन्द्र मने-मन बेपीड़ितसँ सुपीड़ित दिस बढ़ि रहल छला। जँ परिवारमे धीरेन्द्रक विचार भऽ जाएततँ धीरेन्द्रक माइयोमानियेँ जेती, किए तँ कियो पएर छुबि गोड़टा हुनकालागि लनु, महादेवक कोन बात जे हुनका संग पार्वतियो जँ पुरतैन तैयो ओते दान-बरदान नहियेँ पुरतैन, जेते ओ एक्के मुहेँ दऽ सकै छैथ। एहेन विचार पत्नीपर ऐ दुआरे जीबेन्द्रकेँ चलि गेल छेलैन जे सात दिन पूर्व, माने पैछले रबिकेँ, सुवासिनी चारू माइ-धी टहलैत-टलहैत जीबेन्द्रक ऐठाम आएल छेली। चारू गोरे बेरा-बेरी हिनका गोड़ लगलकैन। गोड़ लगिते हिनकर मन तेतेक उधिया गेलैन जे जहिना लोहियामे चढ़ल दूधक फेन उधियाइए तहिना उधियाए लगली। जगमोहीकेँ असीरवादो दऽ देलखिन जे मन माफित घर-बर हेतह! तैपर सँ सुवासिनी सेहो सह दैत बजली- “बुढ़-पुरानक विचार झूठ थोड़े हएत!” सुवासिनी-सभकेँ चलि गेला पछाइत सुभावी अपन असीरवादक शुभ- सम्वाद जीबेन्द्रक सिर थोपैत कहलकैन- “सुवासिनीक जेठकी बेटी जइ घर जाएतओइ घरमे साक्षात् लछमीक बास हएत!” पत्नीक चपचपी देख जीबेन्द्र बुझए चाहलैन जे धरतीक ऊपरका चपचपी छिऐन आकि नीचला। किए मनमे औतैन जे आजुक परिवेशमे गामक जिनगी आ बजारक जिनगीकबीच जे दूरी बनि रहल अछि तैबीच सामंजस्य करब बाल-बोधक खेल नइ ने अछि! मुदा मनुखो तँ मनुख छीहे जे केतो संघटनो कऽ सकैए आ केतौ विघटनो करिते अछि। तेसर ईहो संजोग जीबेन्द्रक मनमे रहबे करैन जेजँ धीरेन्द्र आम तोड़ैक भॉंजमे अपन कलम चलि जाएत तँ पत्नीकेँ पहिलुका आमक गाछी जाइले कहबैन। ओइठाम दसटा स्त्रीगण जमा हेबे करत, ओइठामसँ बहुत बात निकलबे करत। जखन धीरेन्द्रो आ धीरेन्द्रक माइयोक विचार देखब तखन अपनो विचार शामिल करैत किए ने परिवारकेँ एक सूतमे सुतिआइत रसे-रसे चलैत देखब। एहने परिवार ने सभ बनबए चाहैए। ओना, विघटनक अनुकूल परिवेश सेहो जबरदस बनल अछिए। सभकियो देखते छी जे माता-पिता अपन दायित्व निमाहैत बेटाकेँ एकरंग शिक्षित बनबै छैथ मुदा वएह जखन जीवनमे उतरए चाहैए आ नोकरी करए विदा होइए तँ एक भाए कौलेजक शिक्षक होइए आ दोसर हाइ स्कूलक शिक्षक। दुनूक दरमाहाक दूरी भैयारीक परिवारमे विघटनक कारण बनिते अछि। तहिना जँ संजोगे दू भाए वा ओइसँ बेसी भैयारीक बीच बाल-बच्चाक दौड़मे एक भॉंइकेँ बेटाकसंख्या दोसर भॉंइक बेटीक संख्यासँ सेहो प्रभावित होइते अछि, जइसँ विघटनक मुँह सेहो खुजिते अछि। मुदा से अखन नहि। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र नागरिक होइक नाते जीबेन्द्रक मनमे ई दृढ़ता छैन्हे जे जहिना समाज तहिना देश हमरो छी, हमरो देशो सेवा आ समाजो सेवाक अधिकार अछिए। मुदा सेवा की? सेवा तीन रंगक होइए, एक सेवा ‘देब’ भेल, दोसर ‘देब-लेब’ भेल आ तेसर ‘लेब’ भेल। सबा अरब लोकक देश अपन छी, सबा अरब लोकक मनो आ विचारो अपन-अपन अछिए तँए एकटा मनक संकल्पित विचार ईहो अछि जे ‘देब’सँ कम ‘लेब’। जइले बेकतीगत जिनगी आ परिवारिक जिनगीमे अन्तर सेहो अछिए। बेकतीगत जिनगीक बाट समतल अछि मुदा परिवारक तँ से नहि अछि, परिवारमे तँ सम-विषम दुनू अछि। ऐ सम-विषमककारण अछि बेकतीक आ सामूहिक जीवन। चारि बजे बेरुका समय। धीरेन्द्र पितासँ पुछलैन- “बाबू, आमकगाछ तँ नमहर अछि, असगरे आम तोड़ि केना सकब?” बेटाक बात सुनि जीबेन्द्र बजला- “बौआ, काज करए तूँ जेबह, तँए तोरा बेवहारिक रूप पकड़ए पड़तह। बेसी-सँ-बेसी हम किछु कहि सकै छिअ, मुदा जरूरी नइ छै जे तोरो संग ओइठाम ओहने परिस्थिति रहतह।” धीरेन्द्र बाजल- “हाथसँ जे आम पकैड़ तोड़ल हएत ओ तँ असान अछि मुदा जे ऊपर अछि ओ तँ...।” मुस्की दैत जीबेन्द्र बजला- “हाथोसँ तोड़बमे भेद अछि। एक आदमी आमक जड़िसँ तोड़ैए आ दोसर डारिक कलशक मुँहपर सँ तोड़ैए। बाजह ते कोन नीक आ उचित भेल?” पिताक प्रश्न सुनि धीरेन्द्र ठमैक गेल। मने-मन विचार लगल जे भलेँकाज कम हुअए मुदा देख-बुझि परेख कऽ केलासँ नीक हेबे करत। भेल तँ आमक फलकेँ माटिक चोट नहि लगक चाही, एतबे ढंग ने पकड़ैक अछि। सुभावीकेँ अपन गाछी-कलम देखले छैन विदा भेली। मुदा अनकर गाछिये-गाछी सेहो जाइये पड़ै छैन। रस्ताकातक पहिल गाछी श्यामक छैन जइमे सुवासिनी गाछक आम सभकेँ निहारि-निहारि देख रहल छेली कि सुभावीपर नजैर पड़लैन। नजैर पड़िते बजली- “चाची, कनी छहरा लौथु। गाछी-कलम की केतौ भागल जाइ छैन।” ओना, सुभावीक मनमे सेहो रहैन जे सुवासिनीसँ किछु गप-सप्प करी। मुदा से अनका सीमामे, माने श्यामक गाछीक हातामे, अगुआ कऽ केना बजितैथ। सुवासिनीक बात सुनि सुभावी मचानपर बैसली। जगमोही अपना संगी-सहेलीक संग बगलक गाछमे छोट-छोट बच्चासँ नाटक करबै छेली। नाटकक विषय आजुक परिवेशमे नाटकक रूप छल। समाजक नाटकसँ भिन्न बेकतीक नाटक अछिए। सुभावीकेँ सुवासिनीक संग गप-सप्प करैत देख जगमोही सेहो नव उदित वाला सबहक संग पहुँचल। तैबीच सुभावी अपन परिवारक खेरहा पसाइर बजै छेली- “बौआकेँ बाप कहलकैन जे बाउ, अपन रोपल आमक गाछ छिअ, पनरह दिन गुलाबखास आ बम्बइ खेलह, आब अखाढ़ो आबि गेल आ तोहर छुटियो अदहा बीत गेलह, तँए सपेता-मालदह तोड़ि कऽ आइये पालपर दऽ दहक अपनो खइहह आ संगियो-साथीकेँ खुअबिहह।” तैबीच जगमोहीक संग-संग दर्जनो वाला सुभावीक पएर छुबि-छुबि गोड़ लगलकैन। असीरवाद बँटैमे सुभावी अकबका लगली। सामुहिके असीरवाद दैत बजली- “सभ कियो आम खाइले घरपर अबै जाएब।” दूधक फेन जकॉं उधियाएल सुभावीक हृदय रहबे करैनतँए गप-सप्पमे बेवधान किए होइतैन। प्रेममोही बाजल- “चाची, एकटा पुतोहु आनि देलौं हेन।” उधियाएल मन सुभावीकेँ रहबे करैन, सबहक बिच्चेमे बाजि गेली- “जखन तूँ आनि कऽ देलेँ ते हम कि ओकरा फेक देब!” गप-सप्प इशारेमे रहल। मुदा पनरह दिनक दौड़मे श्यामो आ जीबेन्द्रोक परिवारमे आपकता धीरे-धीरे बढ़िये रहल छल। होइतो अहिना छै जे एकठाम घर रहने वा एकठाम बैसार-उसार भेने प्रेम बढ़िते अछि। चाहे ओ परिवारिक लोक होथि वा आन, जाति होथि वा परजाति। तहिना अपन वा आनक बीच दूरी भेने सम्बन्धमे कमी सेहो अबिते अछि। ओना, आनो जीव-जन्तुमे एहेन देखले जाइए जे पानि-बिहाड़िक समय एकठाम गोलिया जाइए, मुदा तँए कि ओकरा समाजिक सरोकार आ जीवनक सरोकार थोड़े अछि। गप-सप्पक क्रममे लोक सभ जीवकेँ एक समान कहि दइए मुदा वैचारिक गुण जे मनुखमे अछि वा समाजिक सरोकारक गुण जे मनुखमे अछि ओ आन-आनमे थोड़े अछि। ओकर जीवन दू जगहपर केन्द्रित अछि, जँ मनुखक पोस मानि पशु अछि तँ ओकर जीबैक सभ बेवस्था मनुख करैए आ बदलामे ओकरा परिवारक अंग बना खाइले दूधो लइए आ आनो-आन सेवाक काजमे सेहो लगबैए। ओना, जे जीव-जन्तु तककेँ मनुख समान मानै छैथहुनकर विचार जीव आ जीवक जीवनसँ सम्बन्धित अछि। तँए कि ओकरा घर बना परिवारिक-समाजिक जीवन जीबैक लूरि-बुधि छै, से तँ नहियेँ छइ। तैसंग ईहो तँ अछिए जे जे कलासँ सम्पन्न मनुख छैथ ओ अपन कलासँ आनो-आन जीव-जन्तुकेँ ओहन बनाइये लइ छैथ जे मनुखे जकॉं किछु गुण ओकरामे आबिये जाइ छइ। केतौ-केतौ तँ (नीक कलाकारक सम्पर्कमे) ओकरामे, माने पशु-पक्षीमेएहनो गुणक समावेश भइये जाइए जइसँ मनुखोसँ अधिक गुणशील बनिते अछि। मुदा एकटा प्रश्न तँ ईहो अछिये जे जँ पशु-पक्षी जकॉं मनुखोकेँ सिखौल-पढ़ौल जाएत तखन ओ की भऽ सकैए? [i]मौसम [ii]बनबैबला ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय बुढ़क दुख दोसर साँझ, करीब सात बजैत। रघु काका मालऽ घरक मचानपर पड़ल छला। हुनकर मन खराप छेलैन। पेटमे मीठ-मीठ दरद करैत रहैन। तखने हुनकर बेटा जीवन आ पुतोहु बेलहीवाली भैंस दुअैले एली। जीवन भैंसक पर्ड़ूकेँ खोललक। पर्ड़ू भैंसक थन तर गेल मुदा भैंस पर्ड़ूकेँ पिअ नै देलकै। भैंस खटपटाए गेलइ। जीवन बाजल- “मर्र!भैंसकेँ की भऽ गेलै। खटपटाए किए गेल। भोरमे तँ केहेन बढ़ियाँ लागल रहए। भरिसक भरि पोख खेनाइ नइ भेलै तँए नहि तँ खटपटाए गेल।” तैपर पत्नी बेलहीवाली बजली- “सएह बात छिऐ। आन दिन बुढ़बा भोरो आ बेरूओ पहर डगर-बाटपर भैंस चरा आनै छेलइ। आइ बुढ़बा भरि दिन ओछाइने धेने छइ। किछ खेबो-पीबो नै केलक हेन। जलखै खाइले कहलिऐ तँ कहलक जे पेट फुलौने अछि, नइ खाएब।” जीवन बाजल- “खाइ-पीबैक कोनो ठेकाने ने रहै छैन तँ पेट फुलौतैन ने। रातिमे खीर-पुरी बेसी खा नेने हेथिन। चाह भोर-साँझ हेबाके चाही। जलखैमे रोटीक संग दूध सेहो चाहबे करी आ भैंस चरबै बेरमे मन खराप भऽ जाइ छैन।” बेटाक बात रघुकाका सुनलैथ। हुनका असीम कष्ट भेलैन मुदा बजला किछु ने। रघु कक्काक उमेर लगधक बहत्तैर-तिहत्तैर बर्ख छैन। गठिया-वातक शिकाइत रहै छैन। मुदा बेटा-पुतोहुक डरे भोर आ बेरूपहर डगर-बाटपर भैंस चरा अनै छैथ। रातिमे घड़ी पबैन छेलइ। पुतोहु- बेलहीवालीसँ रघु काका कहलखिन- “कनियाँ, हमरा-ले दूटा गहुमक सोहारिये बना दइतौं तँ नीक होइतए। पुरी खेलासँ गैस बनि जाएत। भऽ सकैए पेटो खराप भऽ जाए।” तैपर पुतोहु कहने छेलैन- “हम असगरे की-की करब। पाबैनक ओरियानमेखीर, पुरी, हलुआ बनाएब आकि हिनका-ले गहुमक सोहारी बनाएब..! यएह कहौथ हमरा एत्ते पलखैत भेटत? पाबैनक दिन छिऐ, दूटा पुरिये आ कनी खीरे खा लिहैथ।” रघु काका की करितैथ। पुतोहुक आग्रहपर दूटा दलिपुरी आ कनी खीर खा लेलैथ। कनेक हलुआ सेहो खा लेलखिन। अदहे रातिसँ रघु कक्कक पेटमे मीठ-मीठ दरद करए लगलैन। भोर हैत-हैत (हइत-हइत) मन बेकार भऽ गेलैन। पेटमे गैस भरि गेलैन। तँए भरि दिन किछु नहि खेलैथ। रघु काका सोचए लगला। केतेक फिरीशानीसँ जीवनकेँ बी.एस-सी. पास करेलौं। मालिक बाबाक हरवाही कऽ आ भैंसक दूध बेच-बेच ओकर पढ़ाइक खर्च जुमेलौं। जखन किसान सलाहकारक नौकरीक लेल पच्चास हजार टका मांगलक तँ दूटा जमक गाछ आ एकटा आमक गाछ बेच कऽ ढौआ देलिऐ। तखन जा कऽ ओकर बहाली किसान सलाहकारक पदपर भेलइ। सप्ताहमे दू नै तँ तीन दिन काजपर जाइए, नइ तँ भरि-भरि दिन चौकपर संगी-तुरयाक संग ताश खेलाइत रहैए। आइ नौकरी कऽ दूटा पाइ कमबैए तँ कहाँसँ बापकेँ बैसा कऽ खुअबिताए तँ उन्टे अन्ट-सन्ट बजैए। हमहीं की कोनो बैसले खाइ छिऐ। गठिया-वातक शिकाइत अछि। नेंगराए-नेगराए चलै छी तहू दशापर भैंस चरा कऽ आनि दइ छिऐ। आइ कनी मन खराप भऽ गेल आ भैंस चरबए नै गेलौं तँ बेटाक बात केहेन भेल। कहैत अछि ‘भोर-साँझ चाह पीबैत अछि..!’ कोनो कि हमरे लेल चाह बनैत अछि। अपना सभ लेल बनाबैत अछि तँ एक घोंट हमरो दऽ जाइत अछि। जलखैमे मन भेल तँ कहियो एक करौछ दूध दइए आ नहि मन भेलै तँ नहियेँ दइए। राति-के कहियो दूध देबे नइ करैए। विरधा पिलसिन जे उठा कऽ अनै छी तइमे सँ कहियो एक्को साए टका हमरा लग नहि रहए दइए। तमाकुल जे खाइ छी तहूपर आफत। लोक सभसँ मांगि कऽ खाइ छी। कएक गोरे तँ कहियो दइए जे ‘बुढ़बा विरधा पिलसिन जे भेटै छह तइमे सँ किए ने तमाकुल कीनै छहक।’ कोनो बेजाए तँ नहियेँ कहैए। रघु काकाकेँ नअ-दस बर्ख पहिलुका गप मोन पड़ि गेलैन। रघु काका गुड़की हाट बनगामा जाइत रहैथ1 नवटोली गामक पच्छिम सड़कक कातमे जुगुत मररकेँ बकरी चरबैत देखलखिन। जुगुत मररक घर नवटोलीए गाममे। हुनकासँ रघु काकाकेँ नीक चिन्ह-पहचीन। जवानीमे जुगुत मररक नीक चला-चलती रहैन। महींसक पैकारी करै छला। महींस कीनि-कीनि कहियो धरान तँ कहियो सुपौल लऽ जा कऽ बेचै छला। अपनो खुट्टापर एकटा लगहैर भैंस रहै छेलैन। आइ बकरी चरबै छैथ। जुगुत लालकेँ बकरी चलबैत देखिते रघु काकाकेँ छगुन्ता भेलैन। रघु काका जुगुत मररसँ पुछलखिन- “मर्र!मरर अपनेसँ बकरी चरबै छी। अहाँ तँ पहिने महींसक पैकारी करै छेलौं आ अपनो महींस पोसै छेलौं। आब बकरी चरबै छी। लोक की कहत?” तैपर जुगुत मरर बाजल छला- “हौ बौआ, बकरी जे नै चरा कऽ लऽ जेबैन तँ खेनाइयोपर आफत भऽ जाएत।” रघु काका पुछलखिन- “से किए कहै छिऐ मरर। भगवान अहाँकेँ कोन चीजक कमी देने छैथ।” जुगुत मरर बजला- “हौ बौआ, से तँ ठीके कहलह। कोनो चीजक कमी नै अछि। छोटका बेटा संजीत परिवार लऽ कऽ दिल्लीए मे रहैत अछि। सुनै छिऐ नीक घरो बनौने अछि। केतेको बेर हमरा अबैले कहैत अछि मुदा हमरा शहर-बजार पसिन नै अछि। तँए नै जाइ छी। जेठका बेटा रंगीत मासटर छी। तहूमे आजी-गुजी मास्टर नहि।” रघु काका बजला- “मरर, की कहलिऐ।आजी-गुजी मास्टर नहि’, हम बुझबे ने केलौं।” जुगुत मरर बजला- “हौ एकटा मासटर भेल शिक्षा मितर, दोसर भेल पंचायत शिक्षक आ तेसर भेल पूरा दरमाहाबला मासटर।हमर रंजीत पूरा दरमाहा बला माटर छी। किदैन तँ कहै छै पै-स्केलबला मासटर। सुनै छिऐ शिक्षा मितर आ पंचायत शिक्षकबला जे मासटर सभ अछि ओकरा सभकेँ दरमहो कम भेटै छै। आर एकटा बात सुनै छिऐ। ई जे शिक्षा मितर आ पंचायत शिक्षकबला मासटर सभ अछि ओकरा सभकेँ तँ दू कानसँ बीस कान धरि खाँतो ने अबै छइ।” रघु काका बजला- “छोड़ू ओइ मास्टर सभकेँ, अहाँ कहू जखन बेटा नीक दरमाहाबला मास्टर यऽ तखन ई बकरी किए चरबाबैए?” जुगुत मरर बजला- “हौ बौआ, ओइ मसटरबाकेँ कोन धरानी पढ़ेलौं से की कहबह। भैंसक पैकारी आ दूध बेच कऽ जे दूटा पाइ आमदनी हुअए से ओकरा पढ़ाइमे खर्च करी। कहुना कऽ सकण्ड डिवीजनसँ मैट्रिक पास केलक। निर्मली कौलेजमे नाओं लिखौलक। आइ.ए. सेहो पास केलक।” रघु काका बजला- “बड़ बढ़ियाँ, कहुना पाइक बेरबादी तँ नै केलक। पढ़ाइ कऽ खर्चा देलिऐ तँ आइ.ए. तँ पास कऽ गेल।” जुगुत मरर बजला- “हँ से तँ केलक। आगाँ सुनहक ने।” रघु काका बजला- “अच्छा, बजियौ।” जुगुत मरर बजला- “ओकर बिआहो कऽ देलिऐ। धनीकलालक बेटा मासटरी ट्रेनिंग बास्ते राँची जाइ छेलै। जखन रंजीतकेँ पता चललै तँ ओ हमरा कहलक, बाबू, धनीक लाल कक्काक बेटा अजीत मासटरी ट्रेनिंग करए राँची जा रहल अछि, हमहूँ जाएब। तैपर हम पुछिलऐ- केना की खरच-बरच हेतह।” रंजीत कहलक- “पच्चीस हजार टका डूनेशन आ तैपरसँ महिने-महिने दू हजार टका दू साल धरि।” हम सभटा खर्च जोड़लौं तँ लगधक एक लाख टका बुझाएल। टोटका बेटा अठमामे पढ़ैत रहए। रंजीतक कनियाँकेँ किछु जेबर रहए। हम रंजीतसँ कहलिऐ- कनियाँक जेबर बेच कऽ पच्चीस हजारक इंजाम कऽ लएह। मुदा कनियाँ अपन जेबर नै देलकै। एम्हर रंजीत जिद्द कऽ देलक। खेनाइ तियागि देलक। की करितौं हारि कऽ रंजीतक माइक छक आ हौंसुली बेच ओकरा देलिऐ तखन जा कऽ ओ राँची ट्रेनिंग कौलेजमे नाओं लिखौलक। दूध बेच आ भैंसक पैकारीक आमदसँ जखन ओकर खर्चा नै पुगल तँ दू कट्ठा जमीन बेच कऽ ढौआ देलिऐ। भैस सेहो बिका गेल। रंजीत कहने रहए- बाबूजी, पाइ कमाएबए लगब तँ जेहेन महिींस कहबै तेहेन कीन देब। मुदा आइ लगधक बीस बर्खसँ नौकरी करैए, कताक बेर कहलिऐ- हौ एकटा भैंस कीन दएह,दूध-दही खाइले जी ऐंठैत रहैए। मुदा तइ गपपर कहियो धियान नै देलक। अपने दुनू परानी आ धिया-पुता उठौना लऽ कऽ दूध खाइए मुदा हमरा एक कप चाहोपर आफत अछि।” ई कहैत जुगुत मररकेँ आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलैन। रघु काका सोचए लगला- सभ बुढ़क तँ यएह हाल छै..! हुनको आँखि डबडबाए गेलैन। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीशप्रसाद मण्डल परिपक्व निरलज सूर्यास्तक समयभऽ गेल रहैमुदा सूर्य डुमल नहि छल। अपनौं बाड़ीसँ काज कए नित्यकर्म दिस जेबाक विचार कइये रहल छेलौं कि मनसुख आएल आ बाजल- “रजनीकान्त भाय, बुधियार भाय जहलसँ एला अछिसेचलू कने जिज्ञासा कऽ लिऐन।” बुधियारक नाओं सुनिते देह जेना सिहैर उठल। सौंसे देहक रूइयाँ ठाढ़ भऽ गेल। ओना, अपनो बुझल छल जे परसू साँझमे बुधियार जहलसँ आएल, मुदा मनमे तेते घृणा ओकरा प्रति अछि जे मन भिन-भिना गेल। केकर जिज्ञासा करए जाएब। ओना, जिज्ञासा करब अधला विचार नहियेँ छी मुदा जिज्ञासोक तँ अपन महत छइहे। आइ जँ कियो जनसेवा वा अपने कोनो एहेन वृत्ति केला पछाइत जहल गेल रहैत जइसँ अपने वा जनमानसेक भलाइक विचार निहित रहैत तँ ओइ जिज्ञासाक अपन महत होइत, मुदा जे से नहि भऽ लुचपन्नीक कारणे जहलसँ आएल अछि, तेकर जँ जिज्ञासा करए जाएब तँ तेकर स्पष्ट माने होइए जे अपनो ओहने-ओहने लुचपन्नीक समर्थक छी। जे अपन विचारक ठीक विपरीत बात भेल। बजलौं- “मनसुख, तूँ जखन बुधियारक जिज्ञासा करए विदा भेल छह ते जाह, मुदा हम नइ जेबह।” मनसुख समाजक ओहन लोक, जेकरा अपन कोनो वैचारिक दिशा नहि। की नीक आ की अधला तेकर विचार करैक ने जरूरते छै आ ने से बुझबे करैए। समाजक देखा-देखीक अनुकूल अपनो चलैए आ ओही विचारानुसार हमरो आबि कहलक। अपन तँ विचारो अछि आ विचारक अनुकूल चलैक दिशा सेहो अछि, तँए ओहन-ओहन काजकेँ अधला बुझि परहेज केनहि छी। समाजमे बुधियारक परिवार सम्पन्न परिवार मानलो जाइए आ अछियो। सम्पन्न ऐ खियालसँ जे जेकरा पचास बीघासँ ऊपर अखनो जमीन छै। चारि भाँइक भैयारीमे भिनौज भेला पछातियो सोमनाथक अमलदारीमे, माने बुधियारक पिता सोमनाथकेँचारि साए बीघासँ ऊपर जमीन छेलैन। ओना, जमीन्दारी नहि छेलैन, जमीन्दारीक माने भेल रैयतसँ जमीनक मालगुजारी लेब। सोमनाथकेँ से नहि रहैन मुदा रूपैयोक आ धानो-चाउरक महाजनी तँ छेलैन्हे। अन्नक डेढ़िया चलै छेलैन। एक मनसँ डेढ़ मन सूदि-सवाइ चलै छेलैन। जइसँ केते लोकक जमीन कर्जा तरे सोमनाथकेँ भेल छेलैन। अपना मुइला पछाति सोमनाथक चारू बेटामे भिन-भिनौज भऽ गेल। ओना, किछु जमीन एक-दोसर भैयारीमे बेइमानियो भेलैन आ अपना भैयारीमे मुकदमावाजी सेहो भेलैन। जइसँ बहुत जमीन बिकबो केलैन। खाएर जे भेलैन मुदा पचास-पचास बीघा अखनो भैयारीक माथपर जमीन छैन्हे। बुधियार चालू-पुरजा लोक। सभ पार्टी माने राजनीतिक पार्टीसँ साँठ-गाँठ रखनहि अछि। जखन जेहेन हवा बहल तखन तइ पार्टीक संग भऽ गेलौं आ अपना उल्लू सीधा करैत रहलौं, यएह चरित्र बुधियारक रहल। महाजनी सोल्होअना, माने सूदि-सवाइसमाप्त भऽ गेलैन। सरकारी योजनानुसार, बैंक राष्ट्रीयकरण भेला पछाइत माने जखन इन्दिराजी प्रधानमंत्री छेली तखन जे बैंक सभ राष्ट्रीयकरण भेल, तेकर पछाइत आमजनकेँ सेहो बैंकक सुविधा प्राप्त भेल।ओना, शत-प्रतिशत लोककेँ सुविधा नहि भेटलैन। तेकर कारण बैंकक अपन आर्थिक स्थिति सेहो छेलै मुदा किछु लोककेँ सुविधा भेटबे केलैन। ओही सुविधानुसार बुधियार पाँच गोरेकेँ अगुआ माने पाँचटा साधारण किसानकेँ अगुआ बैंकसँ लोन दियौलैन। आपाँचो अनपढ़ लोक जइसँ अपने लिखै-पढ़ैक लूरि नहि छेलैन। अँगुठाक निशानेसँ काज करै छला। बैंकक मैनेजरसँ साँठ-गाँठ करैत पाँचो गोटेकेँ लोन मंजूरी करौलैन। मुदा लोन लोनीकेँ माने कर्ज नेनिहारकेँ प्राप्त नहि भेलैन। ओ रूपैआ बुधियार अपने उठा लेलैन। साल भरिक पछाइत जखन बैंकक कर्जक तगेदा पाँचोकेँ भेलैन, तखन चारि गोरेकेँजे मुँह दुब्बर छला, हुनका उनटा-सीधा बुझा बुधियार चुप केने रहला मुदा सिंहेश्वर चकित भेल। सिंहेश्वरक बहनोइ सेहो चालू-पुरजा लोक। हुनका जा कऽ सिंहेश्वर सभ बात कहलैन जे महींस पोसैक नामपर तीस हजार रूपैआ बैंकसँ लोनक लेल दरखास्त देलिऐ। केते दौड़-बरहा केला पछातियो लोन नहि भेटल। जे साल भरि पहिलुका बात छी। ऐ साल माने एक सालक बाद तीस हजार मूर आ ओकर सूद लगा पैंतीस हजार रूपैआ कर्जक तगेदाक नोटिश भेल अछि। सिंहेश्वरक बात सुनि रघुवीर पुछलखिन- “अपने बैंकसँ रूपैआ उठेने छेलौं आकि कियो दोसराइतिक हाथे कारोबार केने छेलौं?” तैपर सिंहेश्वर कहलखिन- “बुधियारक हथौटी कारोबार केने छेलौं। आइ-काल्हि, आइ-काल्हि करैत जखन तीन मास बीत गेल। ताबे खेतीक समय सेहो आबि गेलछल,हारि-थाकि कऽ छोड़ि देलिऐ।” सिंहेश्वरक बात सुनि रघुवीर बुझि गेला जे एहेन-एहेन विचौलिया सभ एहेन-धन्धा करिते अछि। रघुवीर सिंहेश्वरकेँ संग केने बैंकपर गेला। बैंकक मैनेजरकेँ नोटिश देखबैत कहलखिन जे सिंहेश्वर भैंसक लोन लेल दरखास्त जरूर केने छला मुदा अन्तो-अन्त हुनका लोन प्राप्त नहि भेलैन। बैंकक मैनेजर सभ कागजात मिलबैत कहलखिन- “हम किछु नहि कए सकै छी। तहूमे तीनिये मास एना भेल अछि, नीक जकाँ सभ किछु बुझलो ने अछि।” रघुवीर पुछलखिन- “तखन की उपाय हएत?” मैनेजर रस्ता बतबैत कहलखिन- “शिकायतिक एकटा दरखास्त बैंकोमे दऽ दियौ। जइसँ हम तत्काल तकेदा करब रोकि देब आ अहाँ आगू बढ़ि जिलाक जे बैंक अछि, जिनका अधीन ऐ सभ बैंकक कारोबार अछि, एकटा दरखास्त हुनका लग दियौ। जँ कोनो तेहेन जानकार लोक होथि तँ हुनका संग कऽ लेब।” बैंकक मैनेजरक विचारानुसार रघुवीर सएह करैत कहलखिन- “ठीक छै सर, हम अपने सक्षम छी, किनको जरूरत हमरा नहि अछि।” कहि रघुवीर घरपर आबि विचारलैन जे अनेरे तेसर-चारिमक भाँजमे की पड़ब। अगर बैंकक जिला ऑफिस जँ नहि किछु करत तँ सोझे न्यायालयमे केस करब। यएह विचारि रघुवीर जिलाक बैंक पहुँचला। बैंकक मैनेजर पंजाबी छला। रघुवीर अपन सभ बात सरदारजीकेँ कहलखिन।सरदारजी, तेसर दिनक समय बना ग्रामीण बैंकक शाखामे पहुँचला। रजिष्टर देख बुझि गेला जे बैंकक मैनेजर आ विचौलियाकसाँठ-गाँठसँ एहेन घटना भेल अछि। बैंकक मैनेजर तँ अपन कागजी मिलानी एहेन हिसाबसँ केने जे पकड़मे नहि आबि रहल छला मुदा बुधियार तँ पकड़मे आबि गेल। ओही कारबाइमे बुधियार जहल गेल छल। जइमे लोनक आधा माने पनरह हजार रूपैआ जमा करौलाक पछाइत न्यायालयसँ, दस दिन जहलमे रहला पछाइत जमानत भेल छल। हमर बात सुनि मनसुख बाजल- “भाय साहैब, अहाँ नहि जाएब तॅं नहि जाउ, मुदा समाजक हैसियतसँ हम जाइ छी।” बजलौं- “तोरा जेबासँ थोड़े मनाही करै छिअ।” अदहा घन्टाक पछाइत मनसुख पुन: आएल। अबिते बाजल- “रजनीकान्त भाय, पहुँचते बुधियार भाय अहींक चर्च उठौलैन।” बजलौं- “पहिने ई कहह जे बुधियारक मन केहेन बुझि पड़लह।” मनसुख बाजल- “मिसियो भरि मन मलिन नहि बुझि पड़ल।” बजलौं- “जखन ओइठाम, बुधियारक ऐठाम गेलह तखन आरो के सभ छला?” मनसुख बाजल- “आर कियो ने छला। जाइते बुधियारकेँ पुछलयैनजेकोन लफड़ामे पड़ि गेलौं। कहलैन- हौ, जिनगीमे अहिना होइ छै। जखन पुरुख बनि धरतीपर जनम नेने छी तखन केस-फौदारी आकि जहल-हिरासतक डर करब।जँ से करब तखन एको दिन जीब सकै छी।” मनसुख मुँहक बात सुनि मनमे उठल जे कहिऐ, ऐ धरतीपर निरलजोक की कमी अछि..! मुदा फेर अपने मन कहलक जे वेचारा मनसुख मुँह दुब्बर लोक अछि, एकरा कहिये कऽ की हएत। आइ जँ बुधियार सोझामे रहैत तँ किछु कहबो करितिऐ। बजलौं- “हमरा विषयमे बुधियार की सभ कहलखुन?” मनसुख बाजल- “ओ बजला जे गामक सभ जिज्ञासा करए आएल मुदा रजनीकान्त अखन तक नहि आएल अछि।” बुधियारक विचार सुनि मन तामसे शृंग चढ़ि गेल। एक दिस हुअए जे पहिने दसटा गारि दिऐ, दोसर दिस ईहो हुअए जे गारिये पढ़ब मुदा सुनत तँ नहि। तँए अनेरे गारिये पढ़ि कऽ की हएत। फेर मनमे भेल जे जखन बुधियार मनसुखक सोझामे हमर चर्च केलक से बड़बढ़ियाँ आ हम जँ मनसुखक सोझामे दसटा बात कहबै से बड़ अधला। मनमे अबिते पुन: क्रोधक दोसर तोर मनमे उठि गेल। जेना-जेना तामस उग्र होइत गेल तेना-तेना देहमे थरथरी सेहो तेज हुअ लगल। बजलौं- “मनसुख, बुधियार हमर के, तीन मे कि तेरह मे। धनीक बापक बेटा छी तँ रहह, तइसँ हमरा कोन मतलब अछि। आइ तक कहियो एक सेर कि एक टका मांगए गेलिऐ।” बिच्चेमे मनसुख बाजल- “भाय साहैब, एना जे उक्टा-पैंची करब तँ अनेरे झंझट हएत। जइ झंझटसँ लाभ किछु ने आ नोकसान ढेरी हएत।” मनसुखक बात सुनि मियाद आरो गरमा गेल। बजलौं- “झगड़ा-झंझटक डर करब तखन मुँह उठौल हएत। मुँह उठबैले सभ किछु करए पड़ै छै। तोरा बुझल हेतह कि नइ बुझल हेतह। भऽ सकैए जे सुननो हेबह तँ बिसैर गेल हेबह।” बिच्चेमे मनसुख बाजल- “कनी मन पाड़ि दिअ। जखने मन पाड़ि देब तखने मन पड़ि जाएत।” बजलौं- “पाँच साल पहिलुका घटना मन पाड़ह। सुनने रहक ने जे माइनर एरीगेशनमे नोकरीक बहाली ले दस-बाहर गोरेसँ बीस-बीस हजार रूपैआ बुधियार नेने रहइ।ने केकरो नोकरी भेलै आ ने केकरो रूपैये घुमबैले तैयार भेल।” मनसुख बाजल- “हँ, अदहा-छिदहा तँ मनो अछि मुदा अदहा-छिदहा बिसरियो गेलौं। ओही रूपैआ ले ने रूपलाल आ गौरीशंकर बुधियारकेँ चौराहापर पकैड़ कऽ कहने रहै जे जँ तोरा बुते नोकरी नइ दियौल भेलह तँ हमर रूपैआ सूदि लगा कऽ लाबह। नहि तँ एको डेग आगू ससरऽ नहि देबह।” बजलौं- “हँ!” मनसुख बाजल- “हँ!हँ!आब मन पड़ल। सौंसे गामक लोक जे बैस कऽ पनचैती केने रहैथ।” बजलौं- “हँ। देखने रहक ने जे गाममे कियो बुधियारक जमानतदार होइले तैयार नहि भेला। तेहने निरलज-पतीत बुधियरबा अछि। ई तँ रच्छ रहल जे दीनानाथ काका अपना सिर सभ दोख उठबैत जान बँचौलखिन। नहि तँ ओही दिन तेहेन मरम्मत दुनू गोरे कऽ दइतैन जे पुस्त-पुस्ताइन धरि बुधियारकेँनीक जकाँमोन रहितैन।” दुनू गोरेक माने हमरा आ मनसुखक बीच गप-सप्प होइते छल कि गिरिधारी लाल पहुँचल। गिरिधारीलालकेँ पहुँचते बजलौं- “की हाल-चाल गिरिधारी?” गिरिधारी लाल बाजल- “भायसाहैब, अहींसँ एकटा विचार पुछए एलौं हेन।” बजलौं- “केहेन विचार?” गिरिधारीलाल बाजल- “भाय साहैब, काल्हिसँ केते गोरे कहलैन हेन जे बुधियार जहलसँ एलाहेन तँए जिज्ञासा कऽ लहुन।” बजलौं- “ऐ मे हम कि विचार देबह। अपन जे मन हुअ से करह।” गिरिधारीलाल बाजल- “भाय साहैब, अपना सभ एक विचारक लोक छी, जखन कोनो विचार करैक होइए तखन अहींसँ ने पुछि लइ छी। जँ अपना मने करैक रहैत तँ केने रहितौं किने।” गिरिधारीलालक विचार सुनि मने-मन विचार केलौं जे पहिने गिरिधारीएलालक मनक विचार किए ने बुझि ली। बजलौं- “अपन की विचार होइ छह?” गिरिधारीलाल बाजल- “भाय साहैब, जँ अपना संग नीक बेवहार बुधियारक रहैत तँ कनी सोचबो-विचारबो करितौं मुदा मन अछि कि नहि जे स्कूल लगहक जे पँचकठबा खेत अछि, ओइ खेतक बेचनामा दाम-दीगर हमरासँ केने रहए। अदहा रूपैआ सेहो दऽ देलिऐ आ पछाइत डाकपर चढ़ा ओइ खेतकेँ दोबर दाममे जागेसरक हाथे बेच लेलक। अपने जे रूपैआ देने रहिऐ ओ छह मास तक घिसियौर कटा कऽदेलक।” ओना, ई बात अपनो बुझलो छल आ मनो छल, मुदा दुनूक बीच बीचक सम्बन्ध दुआरे बजलौं- “कनी-कनी मनो अछि मुदा नीक जकाँ मोन नहि पड़ि रहल अछि।” गिरिधारीलाल बाजल- “आठ-दस बरख तँ भइये गेल अछि, भरिसक तेँ बिसैर रहल छी।” बातकेँ आरो मटियबैत बजलौं- “हौगिरिधारीभाय, देखते छहक जे केते धनचक्करमे सदिकाल पड़ल रहै छी, तँए भरिसक मनसँ उतैर गेल।” गिरिधारीलाल बाजल- “भाय साहैब, बुधियारक बेटीक दुरागमन रहइ। हाथमे पाइ-कौड़ी नइ रहै जे काज सम्हारैत। हमरा कहलक जे गिरिधर भाय, स्कूल लगहक खेत बेचब। तोरा खेतक आड़ियेमे अछि, लऽ लएह। आठ हजार रूपैये कट्ठाक हिसाबसँ चालीस हजार दाम भेल।कहलिऐ जे काल्हिये रजिष्ट्री ऑफिस चलह, ओतइ सभ रूपैओ दऽ देबह आ तोहूँ रजिष्ट्री कऽ दिहह।” बजलौं- “आब कनी-कनी बात मन पड़ल जाइए।” गिरिधारीलाल बाजल- “तइ पर ओ कहलक जे पाँचमे दिन बेटीक दुरागमन छी। बुझिते छहक जे बेटीक दुरागमनमे केतेक जोगार करए पड़ै छै।तँए अखन रजिष्ट्री ऑफिस जेबाक पलखैत नहि अछि। तहूमे बीचक दू दिन ऑफिस बन्नो रहइ। अपनो मनमे भेल जे बेटी-जाति तँ समाजक होइए, तँए बीस हजार रूपैआ लगले दऽ देलिऐ। बेटीक दुरागमन भेला पछाइत जखन रजिष्ट्री करैले बुधियारकेँ कहलिऐ तखन तीन-तेरह देखबए लगल। जमीनकेँ डाकपर चढ़ा देलक। सहए छी ओ बुधियरबा।” बजलौं- “जमीनक की भेल?” गिरिधारीलाल बाजल- “की हएत। डाकक भीर नहि गेलौं। जमीनक डाकक माने जमीनेमात्रक डाक नइ ने होइए। समाजमे दुश्मनियो बढ़ै छै किने।” जेते बात गिरिधारीलाल बाजल ओ तँ अपनो बुझले रहए, मुदा सात-आठ बरख पहिलुका बात रहै तँए अनठा कऽ बाजल छेलौं। बजलौं- “खाएर, जे जहिया भेल से तहिया भेल। औझुका की विचार छह से बाजह?” जहिना बरखा भेलापर कोनो सुखल धारमे खेत-पथारक पानि एने धारा बनि बहए लगैए आ पाछूसँ पहाड़क पानिक संग गाम-घरक खेत-पथारक पानि मिलि पाछूसँ आबि धारक धाराकेँ प्रवल बना दइए जइसँ धारक पेट उफानपर उठि जाइए तहिना गिरिधारीलालक विचारमे उफान उठि गेल। बाजल- “भाय साहैब, अपना समाजमे यएह सभसँ पैघ कमजोरी अछि जे लगले लोक कोनो बातकेँ बिसैर जाइए। जइसँ समाजक गति-विधि कमजोर होइत-होइत एते कमजोर बनि गेल अछि जे अपन कोनो चीन्हि-पहचिन्ह रहिये नहि गेल छइ।” गिरिधारीलालक विचारमे सह दैत बजलौं- “तखन की करैक विचार छह?” गिरिधारीलाल बाजल- “अपन विचार अछि जे जिज्ञासा करए नहि जाएब।” अपन जान बँचबैत बजलौं- “जखन अपन विचार नइ जेबाक छह तखन नइ जाह। गाममे केकरो कोइ मालिक छी जे नइ जेबह ते कियो गामसँ उजारि देतह।” गिरिधारीलालकेँ जेना सह भेटलै तहिना बाजल- “भाय साहैब, जइ मनुखकेँ आइन नहि आ जइ बरदकेँ पाइन नहि ओहो कोनो मनुखे भेल आकि बरदे भेल।” गिरिधारीलालक विचार सुनि हँसी लगि गेल। मुदा हँसीकेँ दाबि बजलौं- “गिरिधारी भाय, अपना समाजक सभसँ पैघ दुर्बलता यएह छी जे जइ समाजक पेटमे एते प्रवल शक्ति अछि जइसँ किछु कए सकैए, ओ समाज ओहन मरल पड़ल अछि जे जेकरा कोनो गति गुद्दा नहि छइ।” ओना, गिरिधारीलालक मनमे बुधियारक प्रति आगि धधैक रहल छेलै, मुदा ऐठाम तँ ओ छल नहि जे ओइ आगिकेँ आरो धधकबैत। तैयो अपन मनक आक्रोशकेँ आक्रोशित करैत गिरिधारीलाल बाजल- “भाय साहैब, जँ समाजमे एकरूपता रहैत तँ ओहन-ओहन निरलज-पतीतकेँ बीच चौराहापर ठाढ़ कए समाज मुँहपर थुकैत। मुदा समाजो तँ तेहेन बनि गेल अछि जे के केकरा थुकत।” बजलौं- “गिरिधर भाय, देखते छहक जे समाजो बिनु डोराडोरिक मनुख जकाँ बनि गेल अछि। तखन तँ अपन इज्जत-आबरू बँचबैत मनुख बनि जीब ली यएह सभसँ पैघ उपलब्धि भेल।” हमर बात जेना गिरिधारीलालकेँ जँचल तहिना बाजल- “ठीके कहलौं,भाय सहाएब।” बजलौं- “आब की करबह?” गिरिधारी लाल बाजल- “कियो अपन जीवनक अपने मालिक छी।ओना, समाजमे रंग-बिरंगक दुष्ट सेहो अछि, मुदा ओइ दुष्टक बीच अपन विचार आ बेवहारकेँ जहाँ धरि सम्भव हुए तहाँ धरि रक्षा करैत जीवन जीब ली, यएह ने भेल मनुक्खक सभसँ पैघ मनुखपना।” बजलौं- “हँ, से तँ भेबे कएल।” गिरिधारीलाल बाजल- “ऐ भागक सुर्ज ओइ भाग किए ने उगै, मुदा अपन विचारकेँ कोनो हालतमे बदैल नहि सकै छी। नइ जाएब बुधियरबाक जिज्ञासा करए, जाइ छी अपन घर।” बजलौं- “जाह।” अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी बीहनि कथा पछतावा -- नै रौ बौआ,सगरो समय बिगड़ल छै,एखन गाम सं नै जए देबौ। -- आंइ यौ  बाबू -पहिल बेर गाम सं जाइ सं पहिने त' माय के फिरिसान केने रहियै।पढ़ि- लिखि गाम पर बैसल हमर माथ खएत की माटि हबकत ?" --अहू बेर अहींक जिद्द गाम अनलक,नै त' ओतौ कोनो… अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ डॉलीक नामांकन बियाहक चौदह बरीसक बाद जीबछकेँ बेटी भेलनि।घर आनंदसँ भरि गेलनि।नाम रखलनि- डॉली।बड़का भोज केलनि।डॉली बड़का खेलौने भ' गेलनि।सदिखन ओकरेमे ओझरायल रहैत छलाह।सुतलोमे ओकरे मुँह निहारैत रहथि।एक रत्ती कानि उठैन,त' चेहा उठथि।अपना गरमी  लागनि त' ओकरा पंखा हुँकय लागथि।डॉली बड्ड सहलोला।बड्ड ठोला।माय कहथिन- "रौ जीबछ! ओना बुच्चीक मुँह किएक निहारैत रहैत छही?मायो-बापक नजरि लागि जाइत छैक!" मुदा जीबछकेँ डॉली परसँ धेयान कखनो जेना हटबे नहि करनि! सुतली राति कोनो बच्चाक कानब सुनि जीबछ ओछान पर हथोड़िया मारि डॉलीक मुँह-कान छूबि आश्वस्त होथि जे ओ निकेँ अछि।बाजार जाथि त' एतबी ताकथि जे कोन चीज डॉलीक लेल लेब त' ठीक रहत।ऑफिसोमे स्टाफ सभक बीच हरदम चर्च करथि- 'हमर डॉली एना केलकैक, त' हमर डॉली ओना केलकैक!' एक दिन सहायजी हुनकर परोक्षमे कहलथिन- " जीबछ बाबूक प्राण डॉलीएमे बसै छनि।संतान की चीज थिकैक, ई संतान भेले पर बुझाइत छैक।नहि यौ?" महतोजी कहलथिन- "मुदा बुढ़ारीक संतान बड्ड पियरगर!आब जावत ओ पढ़ि-लिखि बियाह-जोग हेतनि, तावत जीबछ बाबू झुनकुट बूढ़ नहि भ' हेताह?एखने गाल झुर्रिया गेलनि अछि!" भवनाथजी बजलाह- "यौ, मनुक्खक हाथ किछु छैक?जे जनम दै छथिन, वैह पार-घाट लगबै छथिन।बुच्ची जुग-जुग जीबथु!" समयक पाँखि होइत छैक।चारि साल पूरि डॉलीक पाँचम चहरि गेलैक।जीबछ स्टाफ सभक बीच समस्या रखलनि- "यौ, अहाँ लोकनिकेँ किछु धेयान- बात अछि?हमर डॉलीक पाँचम शुरू भ' गेलैक अछि।ओना तँ हमर माय ओकरा बहुत-रास भजन, श्लोक आ गीत-नाद सिखा देने छनि आ हमहूँ कतेक चीज सभ पढ़ा देने छियैक, मुदा आब कोनो स्कूलमे ओकर नामांकन करा देनाइ आवश्यक बुझा रहल अछि।अहाँ लोकनिक की विचार?" एहि पर रंग-बिरंगक सुझाव आबय लगलनि।सहायजी कहलथिन- "यौ, एहि प्रश्न पर त' एक समय हमहूँ बड्ड असहाय भ' गेल रही।हमर बौअनकेँ सरकारीमे नाम लिखा देलियनि।तहिये सँ अंग्रेजी कमजोर भ' गेलनि।अपना देशमे लोक मातृभाषा-राष्ट्रभाषा अनघोल केने रहत, मुदा अंग्रेजी बिना उत्थान नहि।जँ बौअनकेँ 'इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स' नहि करेबितियनि,तँ आइ गाम पर बैसल झाम गुड़ैत रहितथि। हम तँ कहब जे 'जोसटेफ कॉन्वेंट'मे नाम लिखा दियौक बुच्चीकेँ!" महतोजी कहलथिन- "एह,नाम ऊँच आ कान बूच! हमरो भतीजा पढ़ैत रहय ओतय।एक बेरि दरमाहा नहि भेटल रहय।फीस दैमे विलम्ब भ' गेल।रौ बाप!ओकरा माथा पर हाथ रखबा रौदमे घंटा भरि ठाढ़ करा देलकैक।जखन हमर रौद्र रूप देखलक त' ओकर प्रिंसिपल लागल गोंगियाय।कहलियैक जे एखने थाना-पुलिस करबा देब पत्रकार बजबा क'।दू मासक फीस माफ केलक,तखन हम माफ केलियैक।की बाजत ओ सभ?कथी शिक्षा देत?" गुप्ताजी कहलथिन- "हम तँ कहब जे हमरे बच्चा सभक संग देहरादूनमे होस्टलमे रखबा दियौक आ निश्चिंत भ' जाउ।कोनो फीसो बहुत नहि छैक।तखन विचार क' लिय'।" पाठकजी कहलथिन- "यौ, सभसँ नीक त' हम कहब जे एतय टावर लग एकटा बड्ड नीक स्कूल खोललक अछि- मौर्या प्रिपरेटरी।दू प्राणी अछि।बच्चा सभक खूब ध्यान रखैत अछि।दुइए सालमे छब्बीस टा बच्चाकेँ रामकृष्णबलामे देवघर,पुरुलिया आ सैनिक स्कूल सभमे कंपीट करौलकैक अछि।ऊहो ठीक रहत।" प्रभावतीजी कहलथिन- "यौ, ओहू सभक बच्चा सभ एलेवेंथमे अबैत-अबैत कोटाक बाट ध' लैत छैक। तेँ शुरुहेसँ कोटेमे किएक नहि राखि देबैक?ओतय प्री-नर्चरसँ पढ़त त' 'नीट' वा 'जी'क टॉपर भ' क' बहरायत। ओत्तहि डेरा ल' क' घरनीक संगे राखि दियौक।घरक खान-पान रहतैक,देख-रेख रहतैक।अहूँ छुट्टी- छपाटीमे जाइत-अबैत रहब।एकटा बेटी अछि।नीकसँ व्यवस्था करू।" आदि-आदि। जीबछकेँ माथा काज नहि करनि।डॉलीकेँ अपनासँ दूर पठायब बर्दाश्त नहि रहनि।घरनी कहलथिन- "एतय नीक घरक बच्चा सभ 'जोसटेफ कॉन्वेंट'मे पढ़ैत छैक।अपनो बुच्ची ओहीमे पढ़तैक, चाहे जे हो।पता करू ग'!" जीबछ फॉर्म भरि अयलाह।इंटरव्यू दिन डॉलीकेँ ल' क' दूनू प्राणी स्कूल गेलाह।प्रिंसिपल कहलकथिन- " स्टूडेंट की मदर को होशियार रहना होता है।होम- वर्क करवाना होता है।इसलिये रूम नंबर थ्री के बगल में हॉल में सभी मदर को जाना है।'विंटर सीजन' पर एक पैसेज लिख कर टेबुल पर जमा करना है।एबुल मदर के चाइल्ड को एबुल मानकर एडमिशन ले लिया जाएगा।चलिए,दूसरे को बैठने दीजिये!" जीबछ बाबू सरकारीमे डॉलीक नामांकन करा एकटा ट्युशनियाँ मास्टर राखि दूनू माय-धीकेँ तैयारी करबा रहल छथिन।एहि बेरि नर्सरीमे त' प्राइवेटमे नामांकन नहि भेलनि,अगिला सत्रमे 'एल के जी'मे प्रयास करथिन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। लालदेव कामत भूगोलमे मिथिलाराज कहियाधरि जगत जननी जगदंबा जानकी महामाया थीकिह। जातेक रामायण संख्याँमे य रामायणक अवलोकन-मनन करैत धारावाहिक टी० वी० पर श्रीमान् रामानंद सागर जीक आयल। आ अहू कोरोना महामारीक लॉक डाउनमे रामायण सीरियल सर्व सुलभ भेल। ताहि लेल हुनकर धन्यवाद अवश्य करैत छी, परंच एकटा कचोट मनमे सदा सर्वदा रहैत अछि: जौ श्री सागर जी एतुका भाषाक (मैथिली) उपेक्षा नहिंकए तत्कालीन जनकपुर मिथिला क जनभाषाक कनेक चर्चा करितथि तँ मैथिली अनुरागीमे उत्साह बढ़ितैक। आओर हमसब जे जानकी नवमी मनाबैत छी, से आरो परिष्कार होइत। सामाजिक दूरीके नीमाहैत कतौह पैघ जमाबड़ा जुनिकरी, मात्रे नैतिक समर्थन करैत अपन पुरान मांग पर अड़ल रही " मिथिलाराज बनाके रहब " एहि संकल्पके फेरसँ दोहराबैत जनक सुता जानकी आ हुनक मातृभाषा मैथिली पर संक्षिप्त चर्चा करबा सँ अपनाके एहि अवसर पर रोकि नहिँ सकब। महर्षि महामुनि वेदव्यासक अध्यात्म रामायण जे ब्रह्मांड पुराणक उत्तर खंडक आख्यान अछि आ  संत बाल्मिकिक प्रतिष्ठा भारतवर्षमे आदि कविक रुपमे छैक जे संस्कृतमे रामायण लवकुश जन्मसँ पूर्वहि रचने रहथि। बहुतो इतिहासकार पौलथि जे सबहक रामायणमे रामेक गुणन बादन बेशी भेल छैक, जखनकि पंडित लाल दासक मैथिली रामायणमे सीताक गुणगान बेसी भेलैक। सीता बिनु रामक मर्यादा पुरुषोत्तम होयब कठिण रहैक। भगवतीरुपे जखन राक्षसके लतियबैत दण्डित करैत छथिन, ताहि प्रसंगके दोसर रचियता सब लालदाससँ फुट विचार केने छैक आ हुनका अपना छाती ( थन) सँ असुरक संहार करबाक कहने छथि: जे कियो पतिया नहिँ सकैत छैक। हमरौ ई तथ्य कनियों नहिँ अरघैत अछि। एहिठाम सीताक प्रति लेखकीय उदणडताक लगाम नहिँ लागने समीक्षक मंथन करथि। हमरा मैट्रिक मे लंका दहन आ आई0ए0 मे वर्षागीत पढ़बाक बाद डाँ0 बच्चेश्वर झाक रेडियो वार्ता सेहो महाकवि लालदास पर सुनवाक सौभाग्य भेटल रहय। हुनकर जन्मभूमि खड़ौआ गाम बहुतोबेर सन् 1980 सँ हालधरि जाकए ओतुका माँटिक चन्दन लगेबाक अवसर भेटल अछि। हुनकर किछु पांति एहि तरहेँ अछि- निज भाषा जननी निज देश! स्वर्गहु सँ जानथि जीवेश!! तेँ हम कथा कहब तेहिरीति! नहि विद्या कविता गुणगीति!! मिथिला भाषा मधु माधुर्य! शेष शारदा कह प्राचुर्र!! देश विदेश क कयल विचार! लक्ष्मी जतय लेल अवतार!! नाम जानकी पड़ल जनीकि! बजली मिथिला भाषा नीकि!! कोमल वाणी अमृत समान! तकर भाव रस क्यो-क्यो जान!! पुण्य देशमे भाषा नीकि! मिथिला सभक शिरोमणि थीकि!! ताहि भाषामे करब सुवन्ध! सीतारामक चरित प्रबंध!! मैथिलीमे राज आश्रित दू महाकविमे चंदा झाक मिथिला भाषा रामायण आ लाल दासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण  चर्चित भेल। लाल दास सबसँ बढ़िके सीता पर विस्तार देलनि एकटा पृथक पुष्कर काण्ड रचलनि, जकर पाँति देखू-: मिथिला देश परम अभिराम! सकल तीर्थमय धर्मक धाम!! आबथि ततय मुनीश अनेक! मिथिला वास करथि सुविवेक!! दुष्कर तप कर मुनि समुदाय! जनक सुश्रूषा करथि सदाय!! ऋषि आ घुमन्तु प्राचीन परम्पराक बाद मानव समाज मे जे मैथिली भाषा आ तकर पहिचान दियेबा लेल विश्व प्रसिद्ध हमरा सभक आदर्श सीता दाई लेल आधुनिक उदगार व्यक्त करयमे किछु प्रमुख तथ्य सोझासोझी अछि -: प्रो0 राम प्रमोद चौधरी अपन एकटा आलेख मे कहने छथि- जनक देश बाइस योजन धरि व्याप्त अछि। एतय हजारों गाम अछि। एहि देश मे नीच जातिमे उत्पन्न मनुष्यो प्रायः उदार होइत अछि। जनकरपुरक दक्षिणमे सात योजन दुर हटा कए डीजगल नामक महाग्राम  अछि जतय जनक महाराजाक राजप्रसाद अछि, ग्रामक सटले सरिता सभमे श्रेष्ठ यमुना अत्यंत वेग सँ बहैत अछि। डीजगलक दक्षिण भाग मे आध योजन दूरी पर गिरजा नामक ग्राम देशवासी सभ मे विख्यात अछि। एहिठाम  दुई नदीक मध्य मे एकटा प्राचीन मंदिर अछि। तत्पश्चात भैरव स्थान अछि जाहिठाम मुनिक... भैरव पूजन कए ओ सीतामण्डप गेलाह, जाहिठाम प्राचीनकालमे ग्रंथि बंधनक रुपे सीताक विवाह भेल छल। पांचम शताब्दीक वृहत पुराणक मिथिला महात्म्य खंड मे जे वर्णित छैक तकर अनुवाद कविवर चंदा झा ई पाँति सृजित केलाह- गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशी पूर्व कौशिकी धारा । पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा।। मैथिली साहित्य मे सिद्धहस्त हस्ताक्षर किछु कविक पाँति देखल जाए, 'वर्तमान मिथिला' कविता मे राजीव कुमार कण्ठ गाबै छथि - माँ मैथिली हटावल गेली, हम चुप रही बीपीएससी सौं धकियावल गेली, हम चुप रही हम मैथिल कियो नै! कास्यथ, ब्राह्मण,यादव बनल चुप्प रही जाति-पाति मे बटल समाज, तखन की हैत?... डाँ0 बुचरू पासवान 'श्री जानकी' कविता शुरू करैत गाबै छथि- मिथिला मे बहु ग्रह नाना   जानकी नवमीक बनल संगोर बहु संख्यकमे जनमनके जेना   पूजा अर्चना मे जन विभोर... सुभाष कुमार कामत केर पाँति मैथिल मंच सँ प्रकाशित - .... ठाकुरजी, चौधरीजी झाजी मिश्रजीक दलान सँ बहरा दियौक जाय दियौक यादवजी... पासवानजी भंडारीजी आ बारहौं वर्णक दलान पर मिथिला राज्यक नारा कें जाए दियौक घसछिलनी क छिट्टा मे  , हरबाहक लागैन पर...... तेरहम शताब्दी मे ज्योतिरीश्वर केर वर्णरत्नाकर मैथिली गद्य पोथी सँ ल के अद्यतन बहुतो रचनाकर् मैथिली साहित्यक कतेको विधामे अपन कलम चलेबामे समर्थ भेलाह/भेलीह। ताहि सद् प्रयास लेल मैथिली पाठक श्रोता अभिभूत रहैत आयल अछि। सन् 1971 मेँ जननायक कर्पूरी ठाकुर  सरकार बिहार विधान सभा सँ एक प्रस्ताव पारित कए भारत सरकार केँ पठौनै छलाह। मैथिली विरोध मे श्री धनिक लाल मंडल सन के नाम अबैत रहलैक । मधेपुरक पहिल विधायक स्व0 जानकी नंदन सिंह जी मिथिला राज्य लेल मांग केर बहस के आगू बढैनै रहथि।ओना 1918 सँ कोलकाता विश्वविद्यालयमे मैथिली विषयक एम0 ए0 धरि पढाई होइत रहल। 1939 सँ पटना विश्वविद्यालय मे क्रमशः इण्टर, स्नातक आ स्नातकोत्तर मेँ मैथिलीक पढौनी होइत रहल। मिथिलांचलक बहुतरास राजनेता मैथिलीक प्रति उदार छथि आ मातृभाषामे सदन मेँ शपथ लैत देखेलाह अछि। एखनो हक्कन कनैत मैथिलीक लेल नेतागण प्रयासरत रहौथु। मैथिली भाषा संविधानक अष्टम अनुसूची मे शामिल होअय, ताहि लेल एहि पाँतिक लेखक 1985 मे झंझारपुरक विद्वान सासंद डाँ0 जी एस राजहंस सँ पत्राचार करैत सरकार सँ सब एम0पी0 मिलकए भेंट करथि से आग्रह कैने रहैक। एहि दिशा मे संघर्षशील वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजूक’ भाषण एकबेर सरौती (घोघरडीहा) अन्तर स्नातक महाविद्यालयक स्थापना लेल प्रथम बैसक अधिवक्ता सूर्य नारायण कामत केर संग सुनने रही, ताहम अंडर मैट्रिक छात्र सरौती हाई स्कूल सँ रहल होयब। मिथिलाक गौरव गाथाक वर्णन बहुतो पोथीमे मुन्दर्ज छैक। एहि पोथीक नीक कागतक अभावे दीमक केँ शीघ्रे भेंट चढि जाईछ आ ग्रन्थालयमे धुरा गरदा तरमे सैंतायल रहल। किछु दुर्लभ पाण्डुलिपि प्रकाशन एखनो धरि नहिँ भेल छैक। मिथिला मे कोनो पोथीक ग्राहक सदा अभावै रहैत छैक,तैँ बेसी चलैन आब इलैक्ट्रानिक मीडिया आ ई-पत्रिका क भलैक अछि। एहिक लुत्फ नवपीढि उठवयमे लागले अछि। पोथीदिस तैयो उन्मुख समय पर हेबाक चाही। बिनु कोनो नारा आ बिना फ़ैशन केँ मैथिली आगू बैढ़ सकैत छलीह आ मिथिलांचल (भारत - नेपाल) सँ बाहर रहनिहार समस्त प्रवासी मिथिला लोक केँ सिनेमाक माध्यम मातृभाषा दिश आकर्षित करक उद्देश्य सँ मैथिलीक प्रचार-प्रसार चलचित्र माध्यमे हुअय, ताहिलेल धार्मिक बदला सामाजिक समस्या पर एकटा ममता गायब गीत फिल्म बनेबाक धुनकिमे लागल रहथि सर्व श्री केदार नाथ चौधरी (मधुबनी) आ हुनक परम मित्र आर्थिक मददगार स्व0 मदन मोहनदास,  उदय भानु सिंह जे राजनगर आ दरभंगा क विराट मठ मे रहल छलाह ओ तिरहुताक (मुजफ्फरपुरक) छलाह। आब तँ बहुत टेलीफिल्म आ सिनेमाक फिल्म चित्रालय सँ देखाईल गेल छैक। नव अभिनेता आ अभिनेत्री जिनक सद् प्रयास सँ मैथिली आरो आगू बढत से आशा जनमानस मेंँ बनल छैक। एहि लेल सरकारी  मदद चाहियेक।आ सुविधा बंचित समाजक नायिका गंभीरा देवीक' प्रोत्साहन भेटक चाही। देहाती कोशी क्षेत्रक एकटा गाम सँ मिथिलांचल कोशी विकास समिति हटनी आ एहिक 'कोशी संदेश ' त्रिमासिक मैथिली पत्रिकाक माध्यमे मैथिली लेल कतिपय काज भैलैक अछि। सर्वहारा मंचक रुपे सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी क माध्यमसँ नव लेखकीय समाज तैयार भ रहल छैक। सुच्चा मैथिलक कार्यक्रमक चर्चा चहुँओर पसरल हन। मिथिला मैथिली सँ जुड़ल लोग केँ एक साथ समेटैय म मैथिल मंच क योगदान प्रंशसनीय अछि। मातृभाषा मैथिली मेँ गीत संगीत  आ नाटक माध्यम आ मिथिलाक बिरुदावली बखानमे लागल महराय,गायकक दिश सँ मैथिली अगूएलिह अछि। मातृभाषा मे बच्चे सँ पढाई लिखाई केर व्यवस्था राज्य सरकार करय, तकर पाठ्य पुस्तक अकादमी तैयार करय, से काज आजुकौ तारीख म फछुआयल छैक। भुल्ली महिष वाला कथा आ मीरा कलम दिनेश सँ बाल वर्गक विद्यार्थीक मनोविज्ञानिक तरहेँ विकास होइत रहैक से ठमकल छैक तेँ आगू बढवामे पिछैड़ अधिगम स्तरधरि देरी सँ पहूँचैत छैक। जखन कि विदेशोक खानगी स्कूलों म नर्सरी सँ मातृभाषामे धियापुताक पढाई हुअय लागल अछि। मिथिलाक्षर केँ आजादी पूर्व दरभंगा महाराजाधिराज शासन कालेमे पाछु छोड़लक आ कैथी लिपिमे दस्तावेज लेखन कार्य अपन स्थान बनेलक से अद्यतन देवनागरीक ईजोत सँ नेपथ्य चलिगेल सन छैक। नैका पीढी अपन भाषा आ अक्षर पकड़ब केर बनसब्त इंगलिश दिश झूकल छैक। मधुबनी पेंटिंग केर पहिचान विश्व भरि मेँ छैक। एहि सभक संवर्घन होयब परमावश्यक छैक। मिथिला मैथिली लेल बाबा यात्री जी द्वारा स्थापित चेतना समिति पटना आओर छोट पैघ संस्था संगठन लक्षित लाभ लेल काज करैत रहलैक, करितौ अछि जाधरि पूर्ण सफल नहिँ होयत ताधरि ई बैनर "हमरा मिथिला राज्य चाही " जिंदाबाद रहत से विश्वास जमि गेल अछि। एहि छोट सन रिपोतार्य मेँ बहुत रास पैघ विद्वान क आ रचनात्मक कार्यकर्ता गणक चर्चा करब संभव नहिँ भ सकल जे अहर्निश माँ मैथिली जानकी नवमी आ मिथिला राज बनेबा ले अपन सर्वस्व निछावर केने होथि। हम एहि अवदान लेल हुनको सबहक प्रति आभार प्रकट करैत छी। प्रज्ञान रामायणक माध्यम सीताराम मिश्रक कहब- यदि राम छोड़ि दोसर पुरुष नै कएलौं चिंतन तखन सेँ पृथ्वी देवी हमरो दिअ शरण अपन सीता जीक श्रधान्वित एहि पाँति सँ समाप्त करब जे रामायणमे बहुत बेर पढ़ने होयव युग- युग जीवथु बसथु लखकोस हमर अभाग हुनक नहिँ दोष जानकी जीक महात्याग केँ शत् शत् नमन्। लालदेव कामत लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार नौआबाखर , घोघरडीहा 7631390761 अपन मंतव्य editorial।staff।videha@gmail।com पर पठाउ। सुभाष कुमार कामत 2 टा बीहनि कथा 1.भूख बीच राति मे मुन्नाक अपन माई सँ। माँ.. माँ.. उठ हमरा बिस्कुट दे। बिस्कुट दे आओर कानइ लगल। - बउआ रौ ! इतेक रातिक लोग बिस्कुट नै खाइयै छै। - नै हमरा चाही, हम खाएब आओर बोम फाड़ि काइनै लगल - राति मे खाए सँ पेट मे दर्द होएत छै। भोर मे खाएब ! अखन सुति रहूँ - माँ.. पेटक कोना पता की 'अखन दिन छै कि राति' 2. बुढवा पेंशन - हे रौ ! मुन्ना तोरा कहलियौ न लाल कऽ उधार नै दयि लऽ -  मालिक... - तखनौ नै 'तू हमर बात बूझै छी' - मालिक ओ तऽ सब दिन सँ अपने दुकान सँ बेसाहि गुजर बसर करै लैथि। ए लाकडाउन मे कतह जेताह ? - हे रौ ! से समय किछु आओर छल। अखन समय साल खराब छै , उपर सँ हुनकर अवस्था नै देखै छी - मालिक विपैत मे तऽ लोग ओनाहियो एक दोसर के मदद करैत छै। अहाँ कैंचाक चिंता जुनि करूँ , हुनका बुढवा पेंशन भेटते छै। -सुभाष कुमार कामत घोघरडीहा, मधुबनी 8271282752 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ( आत्म-कथा ) एकटा नाटकक अन्त : एक टा कथाक जन्म दिन भरि हम सभ क्लासक पाछाँ व्यस्त रहैत छलहुँ | साँझमे पाँच बजेसं सात बजे धरि समय रहैत छल घुमै लेल अथवा मनोरंजनक लेल | घुमैले’ हम सभ बान्ह पर जाइत छलहुँ | अधिक काल चारू गोटे संगे रहैत छलहुँ | गप कतहु सं शुरू होइ मुदा आबिक’ सभ दिन ओही ठाम पहुंचि जाइ छलै | एकटा झूठ सत्यक स्थान प्राप्त क’ नेने छल | मिश्र जी गीताक कोनो श्लोक द्वारा हमर स्थितिक विवेचन करैत छलाह आ समाधानक सूत्र कहैत छलाह | झाजी और ठाकुरजी सेहो अपन-अपन विचार दैत छलाह | सभ गोटे हमर तथाकथित समस्याकें सोझराबय चाहैत छलाह | निर्णय भेल जे पन्द्रह दिन बाद दू दिनक जे छुट्टी छै तकर उपयोग करैत हम शनि दिन क्लासक बाद बस पकडब | एहि सं पहिने हम एकटा चिट्ठी लीखि पठा दिऐ | मिश्र जी हमरा रजोगुण आ तमोगुणक त्यागक  लाभ बुझबैत रहलाह |एकटा चिट्ठी हमरासं लिखबाओल गेल | निर्धारित दिन, जेबाक लेल हमर यथोचित तैयारी  नहि देखि, हम नीक जकाँ जाइ तकर तत्काल  प्रबन्ध भेल | झाजी अपन बला आयरन कएल सुन्दर पैंट-शर्ट पहीरिक’ जाए लेल देलनि, जे हमरा फिट सेहो भ’ गेल | ठाकुर जी अपन बला  नबका बैग देलनि | एक बेर फेर हम अपन स्थिति स्पष्ट करबाक कोशिश केलहुँ, मुदा झूठ ततेक आकर्षक भ’ गेल छलैक जे सत्य प्रभावहीन भ’ गेल छल |  क्लासक बाद, भोजनक बाद  बस स्टैंड आबि हमरा दरभंगा बला बस पकड़ा देल गेल  | बसमे सीट भेटि गेल | बैगसं ‘मिथिला मिहिर’ निकाललहुँ | पढ़’ लगलहुँ | कोनो कथा पढ़ैत-पढैत एकाएक ध्यानमे आएल, हम जाहि स्थितिक अभिनयमे बाझल छी, ईहो त’ एकटा कथा भ’ सकैत छै | हम कल्पनामे डूबि गेलहुँ | एकटा नव विवाहित युवक- पत्नीक कोनो व्यवहारसं दुखी भेल अछि – कतेक नीक-अधलाह कल्पना करैत अछि –बहुत दिनसं एकटा चिट्ठीक बाट तकैत अछि –चिट्ठीक बिना डेग नहि उठब’ चाहैत अछि- परीक्षाक अंतिम दिन छै-कॉलेज सं घुरैत अछि –चाहैत अछि कोनो चिट्ठी आएल रहितै त’ आइ अवश्य विदा होइत सासुर....... | अपने संग संवाद चलि रहल छल | धुर, एहेन झूठ कतहु कथा भेलैए | त’ की कथा सत्य हेबाक चाही ? कथा कोनो अखबारक समाचार थोड़े होइछै ? त की सभटा जे कथा पढैत छी, झूठ छै ? से नहि त की ? कनी सत्य आ बेशी झूठ | मगर झूठ किए ? बिना झूठ के कथा नै भ’ सकै छै ? बिना झूठक कथा माने कोनो अखबारक समाचार | नै, अखबार ओ कहै छै जे भेलैए, जे हेबाक चाही से कथा कहतै | कथा लोकक सम्वेदनाकें जगबैत छै | अखबारमे एकटा तथ्य रहैत छै,कथा एकटा सत्य दिस लोकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि | कथासं एकटा सन्देश निकलैत छै, जकर उद्देश्य कल्याण होइ छै, सुख आ शान्ति होइ छै | कथ्य, तथ्य आ सत्य मे की अंतर ? की तीनू एके नै भ’ सकैत अछि ? किछु कथा सुखान्त होइत अछि, किएक त जीवनक लक्ष्य होइत अछि सुख-शान्ति, अन्त नीक त सभटा नीक | किछु कथाक अन्त दुखमे होइत अछि...एकटा प्रश्न छोडि जाइत अछि...एहि दुखसं उबरबाक प्रश्न | हमरा नीक लगैत अछि सुखान्त कथा | हमर कथा सेहो एहने हेबाक चाही | लिखलाक बाद मोन  हल्लुक लागय | हम अपन कथाक अन्त तकैत छी .....हम सिनेहसं किरण दिस तकैत छी.....तकिते रहैत छी .....बड़ी काल धरि....नीक लगैत अछि एना ताकब ....बहुत दिनक बाद | बस रुकल | हमर कल्पनाक उड़ान बन्द भेल | आबि गेल छलहुँ लहेरियासराय | लहेरियासराय सं दरभंगा, दरभंगासं सकरी –पंडौल होइत कैटोला चौक धरि पहुँचैत-पहुँचैत कथा मोनमे जन्म ल’ नेने छल आ कागत पर उतरबा लेल लालटेमक इजोत, कागत आ पेनक प्रतीक्षा करय लागल | सबेरे स्नान क’ क’ सायकिल लेलहुँ, विदा भेलहुँ भवानीपुर | संगे छलाह आशा भाइ आ भगवान बाबू | ईहो स्थान एकटा कथाक कारणें आकर्षित केने अछि | उगना नाटकमे एकर वर्णन अछि | महाकवि विद्यापति राजा शिव सिंह ओत’ जा रहल छलाह, संगमे छलनि खबास उगना | एतहि एलाक बाद बड्ड जोर पियास लगलनि | उगना कनिए कालमे जल आनिक’ देलकनि पीबाक लेल | पीलनि त गंगाजलक आभास भेलनि | पुछलखिन कत’  सं जल अनलें त जे जबाब भेटनि, ताहिसं संतुष्ट नहि होइत छलाह | लगमे कतहु जलाशय हेबाक सम्भावना नहि बुझाइत छलनि | कोनो अलौकिक शक्तिक आभास भेलनि | ध्यान केलनि त’ महादेव सोझां आबि गेलखिन | उगनामे महादेवक दर्शन भेलनि |पएर  पकड़ि लेलखिन | महादेव किछु पल लेल दर्शन दैत कहलखिन जे ई रहस्य जहिए ककरो लग प्रकट करब, हम अलोपित भ’ जाएब | कथा कहैत अछि जे महादेव विद्यापतिक गीतसं एतेक प्रभावित भेलाह जे हुनका संग रहबाक लेल धरतीपर एलाह आ हुनकर खबास बनिक’ बहुत दिन धरि रहलाह | काव्य-कर्मकें प्रतिष्ठा देब’ बला ई अदभुत कथा अछि | एहि कथाक कारण ई स्थान मिथिलाक प्रमुख धार्मिक स्थलक रूपमे लोकक आस्थाक केन्द्रमे रहल अछि | भव्य मन्दिर आ जलाशय लोककें आकृष्ट करैत अछि | शिव रात्रिमे एहि ठामक दृश्य मनोहर रहैत अछि, ओना रवि दिनक’ सेहो सालो  भरि दर्शक आ शिव-भक्त लोकनि अबैत रहैत छथि | हमहूँ सभ कतेक रविक’ एत’ आएल छलहुँ | ढोली जेबासं पहिने नियमित रूपसं रवि दिनक’ अबैत छलहुँ | पूजाक बाद मुरही-कचरी कीनि कतहु बैसिक’ गप-शप करैत खेबाक आ फेर साइकिलसं घर घुरैत आनन्दक अनुभव करैत छलहुँ | से बहुत दिनक बाद  आइयो भेल | आइयो विद्यापति आ उगनाक कथापर विचार करैत आनन्द अबैत अछि | पुराण सभमे भगवानक विभिन्न अवतारक कथाक वर्णन अछि | कहल गेल अछि जे धरतीपर जखन-जखन अन्याय-आतंक-अत्याचार बहुत बढ़ि जाइत अछि त धर्मक स्थापनाक लेल भगवान विभिन्न रूपमे प्रकट होइत छथि | कोनो महाकवि अपन विशिष्ट रचना द्वारा सामूहिक चेतनाक आविष्कार करैत छथि | यैह चेतना जन-मनमे नव संकल्प-शक्ति आ संस्कार भरैत अछि जे अपेक्षित सामाजिक, आर्थिक आ राजनीतिक आन्दोलनक सूत्रपात करैत अछि जे अन्याय-आतंक आ अत्याचारक अन्त करैत अछि | एहि चेतनाकें भगवानक रूपमे देखल  जा सकैत अछि | महाकवि विद्यापतिक समयमे समाजमे जे असमानता अथवा विद्रूपता छलै, तकरा मधुर गीतक माध्यमसं लोकक समक्ष आनि लोककें जागृत कएल गेल जे एकटा सांस्कृतिक आंदोलनक रूपमे देश-विदेश सभ ठाम प्रतिष्ठित भेल अछि | विद्यापति आ उगनाक कथाकें जखन एहि दृष्टिसं  देखैत छी त कथाकारक प्रति असीम श्रद्धा होइत अछि | ई शोधक विषय भ’ सकैत अछि जे टेलिफ़ोन-मोबाइलक आविष्कारमे ‘के पतिया लय जायत रे मोरा प्रियतम पास....’ अथवा एहने कोनो रचनाक की आ कतेक योगदान अछि, अनमेल विवाहकें रोकबामे ‘पिया मोर बालक......’ गीतक हस्तक्षेपक की प्रभाव पडल | साँझमे बैगसं कापी आ पेन निकालि लालटेम ल’ क’ बैसि गेलहुँ | सबेरमे मोन प्रसन्न लगैत छल | कागतपर कथाक जन्म भ’ चुकल छलै | आनंदक अनुभव करैत गामसँ प्रस्थान केलहुँ ढोलीक लेल | हमर मोन प्रसन्न छल, से देखि हमर शुभेच्छु संगी सभ सेहो प्रसन्न भेलाह | हमर कथा पढ़िक’ मिश्रजीकें नीक लगलनि आ आगू किछु पुछबाक आवश्यकता नहि रहि गेलनि | कह्लनि कथा आकाशवाणीकें पठा दियौ | तीनू गोटेक यैह  सुझाव छलनि | फेयर क’ क’ कथाकें आकाशवाणी,पटना कें मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ ले पठा देलहुँ  | एक मासक भीतरे आकाशवाणीसं सूचना भेटल जे कथा ‘भारती’मे प्रसारण हेतु स्वीकृत कएल गेल अछि, अतिरिक्त सूचना बादमे भेटत | नीक लागल | फेर किछु दिनक बाद प्रसारणक तिथि, समय आ पारिश्रमिक-राशिक सूचना भेटल | आनंदित भेलहुँ | संगी सबहक सुझाव जे हम अपनहि जा क’ कथाक पाठ करी, कल्पना ई जे कथाक नायिका सेहो सुनतीह त आनन्दित हेतीह | प्रसारणक समय  5.30  छलै | हम करीब 11  बजे आकाशवाणी पहुँचलहुँ |  गुंजनजीक आवाज त सुनने छलहुँ, भेंट आइ पहिल बेर भेल छल, से नीक लागल | अपन एबाक उद्देश्य कहलियनि |सम्पादित  कथा देख’ देलनि | देखलिऐ, किछु ठाम अंगरेजीक शब्द छलै, तकरा बदला मैथिली शब्द राखल गेल छलै, किछु और सुधार कयल गेल  छलै | हम आगाँ  ध्यानमे रखबाक संकल्प केलहुँ | कथा-पाठ  लेल 10 मिनट निर्धारित छलै | हमरा पढ़’ कहलनि | कहलनि, हडबडी करबाक काज नै छै, एक-आध मिनट बेशीयो  लागि जाइ त कोनो बात नै | कार्यक्रम साढ़े पाँच सं शुरू होइत छलै, हमरा पाँच बजे आबि जाय कहलनि | हम पाँच बजे गेलहुँ, त कथा प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’क हाथमे देखलियनि | प्रेमलता जी सेहो ‘भारती’ मे रहैत छलीह | गुंजन जी आ प्रेमलताजीक  स्वर सुनने रही,मुदा सोझां देखबाक-सुनबाक ई पहिल अवसर छल, से आनंदित भेलहुँ | कथा पर दुनू गोटेक  टिप्पणी नीक लागल | एकटा नव विवाहित नवयुवकक मनःस्थितिक चित्रण छलै कथामे | मिश्र जी कहैत छलाह जे ई जिनगी दू टा जिनगीक बीच ओहिना अछि जेना सिनेमाक बीचमे इन्टरवल होइ छै | हम कथाक नाम ‘इन्टरवल’ रखने रही, तकरा स्थान पर ‘धारक ओइ पार’ कयल गेल रहै, से हमरा कथाक अनुरूप ठीक लागल आ एहिसं शीर्षक चुनबाक लेल नव दृष्टि भेटल | नीक अनुभवक संग घुरल रही पटनासं | पटनासं घुरैत काल सोचैत रही जे कथामे की रहै -सन्देहक एकटा धार छलै, जकरा ओइ पार तथ्य छलै, से सुन्दर छलै, कल्याणकारी छलै | मुदा छलै त एकटा कल्पना आ कल्पना मात्र | हमर त विवाहो नै भेल अछि  | अपनहि मोन उतारा देलक, रोगीक दुःख दूर करबाक लेल कोनो जरुरी छै जे डॉक्टर कें बिमारीक अनुभव होइ ? त की जतेक कथा पढैत छी, से कल्पनाक कमाल मात्र थिक ? सीता आ रामक कथा – रामक चरण रजसं अहिल्याक उद्धारक कथा, आइ रामक राजतिलकक निर्णय आ काल्हि चौदह बरखक लेल वनबासक कथा, सीता-हरण आ रावणक मृत्युक पश्तात रामक  अयोध्या आगमन आ राज्याभिषेक –एहिमे कतेक सत्य आ कतेक कल्पनाक उड़ान से के कहि सकत | मुदा कथा विभिन्न परिस्थितिमे स्वस्थ जीवन जीवाक लेल मार्ग-दर्शनक रूपमे एकटा उपकरण बनिक सोझां अबैत अछि | हमरा ‘कन्यादान’क बुच्ची दाइक कथा मोन पडैत  अछि | बुच्ची दाइक वियाहक कथा –सी सी मिश्रक कथा – अनमेल विवाहक परिणाम –एकटा सामाजिक समस्या –समस्याक निदान देखबैत ‘द्विरागमन’ –की एना सम्भव छै.......मुदा, हम ई सभ किएक सोच’ लगलहुँ - हमरा जीवनमे बुच्ची दाइ नहि आबि सकैत छथि- हमरा सावधान रहबाक  अछि ...एकदम सावधान .... हमरा लगैत अछि जे जीवनक आनन्द लेल जीविकोपार्जनक व्यवस्था आ साहित्यसं प्रेम दूनू जरूरी अछि आ साहित्यसं प्रेमक लेल आवश्यक अछि जे पत्नी सेहो पढ़लि-लिखलि होथि .... आ से किएक ने भ’ सकैत अछि ...एकटा कल्पनामे विचरण करैत ढोली पहुँचलहुँ | होस्टल पहुंचि आनन्दित भेलहुँ | हमर प्रिय संगी सभ सुनने छलाह कार्यक्रम | सबहक कल्पना ई जे कनियाँ सेहो सुनने हेतीह त कते आनन्दित भेल  हेतीह | आब चर्चाक केन्द्र ई कथा बन’ लागल | हम कागज़ पर दू टा टुकड़ीमे लिखलहुँ  जे एहि नाटककें एतहि समाप्त कर’ चाहैत छी आ ठाकुरजी आ झाजीक कोठलीमे एक-एक टा टुकड़ी  नीचाँ द’ क’ रातिमे खसा देलहुँ | मिश्रजीकें मौखिक रूप सं कहि देलियनि, मुदा कियो मान’ लेल तैयार नहि भेलाह | हमरा कखनो क’ हुअ’ लागल की पता इहो सभ बुझियोक’ नहि बुझबाक नाटक क’ रहल छथि | तिला संक्रान्तिक बाद हमर पिता गामसं किछु सनेश नेने एलाह त कोनो तरहें मिश्रजी पूछि क’ सत्यकें स्वीकार करबाक स्थितिमे अबैत एक दिन कहलनि, हम सभ गोटे एहि सृष्टिमे कोनो-ने-कोनो भूमिकामे रहैत जीवन भरि अभिनय करैत रहैत छी, कखनो बालक-बालिकाक रूपमे, कखनो माता-पिताक रूपमे अथवा छात्र-गुरु,पोता-दादा, मित्र-शत्रु अथवा आन कोनो संबन्धमे, ई संसार एकटा रंगमंच अछि  आ हम सभ अभिनेता, अभिनेता मंचसं दूर भ’ जाइत अछि,मुदा अभिनयक स्मृति शेष रहि जाइत अछि ; अभिनेता बदलि जाइत अछि, रंगमंचपर अभिनय चलैत रहैत अछि.......... ( क्रमशः ) सम्पर्क -8789616115 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार-दू टा गजल ३.२.अमरेश कुमार लाभ- दुइ टा कविता आ एक टा गजल ३.३.बाबा बैद्यनाथ- गजल आशीष अनचिन्हार (सम्पर्क 8876162759) दू टा गजल 1 अपना सन नै लागल अनचिन्हार अनका लग ई बाजल अनचिन्हार रचनामे कनियों नै रहलै धाह सुविधा रसमे डूबल अनचिन्हार बहुते बाजल लेकिन काजक बेर नाँगरि सुटका भागल अनचिन्हार बदलत सभ कहियो बाजल ई बात अलमीरामे राखल अनचिन्हार पक्का हेतै ई चिन्हारक काज सोझा सोझी बाजल अनचिन्हार सभ पाँतिमे 222-222-222-1 मात्राक्रम अछि। 2 हुनका आगू कोनो मुद्दा नै बँचलै कुर्सी टेबुल चप्पल जुत्ता नै बँचलै जिनका आगू राखल छै खाली आँठी तिनका आगू रसगर गुद्दा नै बँचलै सभ भऽ गेलै अपना मोने साधू संत अइ संसारमे कियो लुच्चा नै बँचलै हेहर कहियौ थेत्थर कहियौ या किच्छो ई सच सभ दिन बँचलै सत्ता नै बँचलै भूखसँ जो़ड़ल समान एलै बजारमे महँगा नै बँचलै आ सस्ता नै बँचलै सभ पाँतिमे मात्राक्रम 222-222-222-22 अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अमरेश कुमार लाभ दुइ टा कविता आ एक टा गजल 1. सबकेबापु ************* दलित वंचित हरिजन सँ भरपूर प्यार छलैन्ह समरस समाज होमयजिनकर विचार छलैन्ह l ओहिनानैंकहलेल’थि ओ सबकेबापु सभके कल्याण होमय हुनका धियानछलैन्ह l जिनगीगुजारिदेलैन्हबनिकें फकीर सादा सरल जिनगीउच्चतम् विचार छलैन्ह l काज कोई नीच नैंसभकें महत्व जहिने संदेश देलैन्हओहिने व्यवहार छलैन्ह l दासताक बेड़ी में जकड़लछलैक देश तोड़ै में हुनक’रेप्रबलतम प्रहार छलैन्ह l ऋणी हुनक हम सभजाधरिईजिनगी मनुखरहितोंजिनकर देवतुल्य संस्कार छलैन्ह l 2. मिझलआगिकेँखोड़ने की ********************** मिझलआगिकेँखोड़ने की तितलसीरक ओढ़ने की प्रेम-दया केँ भाव ने जिनका हुनका केँ कर जोड़ने की अन्हराकेँआँखिखुजने की बहिरासोझा ढोल पिटने की अनठाकेँगबदीलधनेजे हुनका केँ झकझोरने की बीतल के यादि करने की खींझल के पाइर धरने की जीबैत में किछमोजरेनहि त गरल मुर्दा उखड़ने की भुक्खेपेटे सजने की अखरा बासनमजने की एक कनमासिदहानहि घ’र में चुल्हा फेन पजारने की लक्ष्यहीन के जिबने की नोरक घोंट के पिबने की अपने बल ज्यों नहि हासिल भेल बाप-पित्ती पर कुदने की 3.गजल ******* बडपिच्छड़छैपिछड़बनैंयौ ठामहिखसिकेँछितरबनैंयौ उतरा-चौरीबडहोइतअछि आनकसूनलपिनकबनैंयौ लागलछथिकिछउसगाबै में जारनिबनिकेँपजरबनैंयौ उघिलिअ’ जा धरिछीअहिठां गेला पर जेउगहबनैंयौ डगरा केँबैगन सन रहलौं लुढ़िकति-लुढ़िकतिससरबनैंयौ जहि घर सोहरसुनलौंकहियो समदाउनसुनिकेँसिहरबनैंयौ जे वाजिब अछिकहिदिअ’सोंझा पाछाँ जा केँउकटबनैंयौ -अमरेश कुमार लाभ, हरनीचक, अनीसाबाद, पटना – 800002 Mob : 8873201735 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। बाबा बैद्यनाथ गजल  आब नहि ई काज कर  किछु सुधरि जो लाज कर

 लूरि किछुओ सीख ले  नहि सदति अंदाज कर

 बाप के अरजल जमा  खूब खो आ राज कर

 भास सीखै  गीत के  सुर मिला ले साज कर

 नाम बढ़तौ देसमे  फेर तहिपर नाज कर

 सभ पाँतिमे 2122-212 मात्राक्रम अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.अम्बिका मल्लिक-हंसी ४.२.तनुजा दत्ता- नारी क अंनत रूप ४.३.चंदना दत्त- फागु ४.४.शशि प्रभा-स्त्री ४.५.बबली मीरा- हम मिथिला के नारी छी अम्बिका मल्लिक 1 *हंसी* समय हमर हंसी नै छिन सकैत अछि, हमर मुस्कान गुलाम नै भ सकैत अछि । समय ओकर राह बदैल‌ सकैत अछि, लेकिन ओकर मंजिल नै बदैल सकैत अछि। हमहीं त सब के हंसी सिखेलौं , स्वामी में, बृद्ध और बाल में । घर  के बगिया और गुलाब में, हमरे हंसी त बिराजमान अछि । अपन हंसी के हमहीं सृजन कर्ता छी, हमर हंसी में सम्पुर्ण कायनात अति । छिन नै सकैत अछि कोई हमर हंसी, कियाकी हंसी हमर पहचान अछि । रचनाकार:-अम्बिका मल्लिक, गीतांजलि कॉलोनी, मोबाइल टॉवर के नजदीक, बरहेत्ता रोड, लहेरियासराय,  दरभंगा पिन:-846001, फोन नं:-8178385814 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। तनुजा दत्ता नारी क अंनत रूप नारी अहाँ जीवनदात्री , वंश वृक्ष के रोपण छी ! सृष्टि के आधार अहाँ ,मातृ शक्ति के पोषण छी ! संयम,करुणा,दया भाव, वृहत गुण के खान छी ! कोमल हदय,सरल जीवन, ईहै अहाँ के शान छी ! विपदा होय समक्ष त बनलौं माँ दुर्गा अवतार! सहनशीलता,मान मर्यादा,शक्ति के भरमार ! बनि स्वरूप लक्ष्मी बाई करैत छी शत्रु  संहार ! त्याग भावना राखि, बनबय छी सुंदर घर संसार ! आँखि में दर्द क सागर, मुख पर रहल मुस्कान! दु:ख नुका लेलौं आँचर में,अहाँ के अछि  पहचान! प्रगति होयत समाज देश के,रहथि वृहत योगदान ! सभ क्षेत्र में भेट रहल, पुरूष संग नारी के सम्मान ! साहस अरु प्रेम के मूरत,केने छथि हर मुकाम हासिल ! माँ,बहन,बेटी नारी में हर रंग अछि शामिल ! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। चंदना दत्त फागु आय खेलब हम फागु सखी हे आय खेलब हम फागु. भरि मिथिलामे अनघौल मचल अछि रंग अबीर गुलाल घोरल अछि एकदिस खेलथि रामजी पहुनमा संग सखीके सिया लली छथि घोरल इनारमे भंग सखी हे आय खेलब हम फागु मातु सुनयना रानी पुआ पकाबथि जीमय छथि  राम चारु  भैया जुडा़ बथि मिथिलानि नयनमा उड़े चहुंओर केसरगुलाल सखी. हे आय खेलब हम फागु. गमगम गमके आमक मज्जरि महमह महके अड़हुल बेली चहुंदिस पसरल मादक सुरभि रमि गेला पहुनमा मिथिला क गली सखि हे आय खेलब हम फागु अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। शशि प्रभा स्त्री एक स्त्री जे नहिं सिर्फ स्त्री होयत अछि जेकरा में होयत अछि प्रकृति के सब गुण एक स्त्री, पहाड़ जेना अटल जेकर दृढ़निश्चय नहिं डगमगायत एक स्त्री, फूल जेना कोमल प्यार सं सम्हारू,नहिं तऽ मुरझायत एक स्त्री में, चिड़िया जेना हौसला तिनका तिनका जोड़ि नया घर बसायत एक स्त्री, नदी जेना चंचल समय के धार संग बहैत जायत एक स्त्री, गाछ जेना सृजनशील सृष्टि सृजित करैत जायत एक स्त्री, चान जेना शीतल चाँदनी राति जेना शीतलता बरसायत एक स्त्री जे नहिं सिर्फ स्त्री होयत अछि जे होयत अछि प्रकृति के हर गुण सं भरल जे होयत अछि प्रकृति के हर गुण सं भरल|||||||| अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। बबली मीरा हम मिथिला के नारी छी हम मिथिला के नारी छी रूकब नै झुकब नै चलिते रहब बढ़ीते रहब हम मिथिला के नारी छी... मां के प्राण छी बाबूजी के अभिमान छी भाई के भरदुतिया छी बहिन के संगी छी हम मिथिला के नारी छी... नारी छी,जननी छी पति के अध्दागिंनी छी बच्चा के अध्यापिका छी पुतोहू के धरोहर छी हम मिथिला के नारी छी... मिथिला के संस्कार छी तीज और त्योहार छी वटसावित्री और मधूश्रावणी छी गीत और नाद छी हम मिथिला के नारी छी... भनसा घर और कोबर घर छी चूल्हा और चिनवार छी कोठी और ढ़ेकी छी पुरहर और पातिल छी हम मिथिला के नारी छी... माछ और दही बला भोजन छी पान और मखान छी भाई के ओठगन छी हम मिथिला के नारी छी... कमला और बलान छी जीबछ धार छी गाम के पोखैर और गाछी छी किचर नैकमल छी हम मिथिला के नारी छी... जानकी और श्यामा छी उच्चैठ के भगवती छी डोकहर के गौड़ी छी दूर्गा और सरस्वती छी राधा और मीरा छी हम मिथिला के नारी छी... दुर्बल नै शक्ति छी सभ नारी के आवाज छी पुरे समूह के के नाज छी कविता में देखाई छी कहानी और गीत लिखय छी हं हम बबली मीरा छी हं हम बबली मीरा छी रचनाकार:- बबली मीरा जमशेदपुर (झाड़खण्ड), नैहर-हनुमान नगर सासुर-ईजोत अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार    अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल     CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी                         माहुर                          करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका)       डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/  (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta           97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 १६) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक VIDEHA 313 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७  (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]  तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]  तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। ३ विदेह अपन आगामी अंक (२०२१ क प्रारम्भमे) श्री रामलोचन ठाकुर पर विशेषांक निकालबाक नेयार केने अछि। हुनका सम्बन्धी रचना आमंत्रित अछि (संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा आदि) जे ३१ दिसम्बर २०२० धरि editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाओल जा सकैत अछि। विदेह पेटारक अन्तर्गत (पोथी डाउनलोड साइट) मे http://www.videha.co.in/new_page_15.htm  हुनकर मौलिक, अनूदित आ सम्पादित रचना फ्री पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२१. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2021 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३१५ म अंक ०१ फरबरी २०२१ (वर्ष १४ मास १५८ अंक ३१५)

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