VIDEHA — Issue 321 / अंक ३२१

Publication: VIDEHA · Issue: 321
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विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३२१ म अंक ०१ मई २०२१ (वर्ष १४ मास १६१ अंक ३२१) १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर (आत्म-कथा)-आगाँ २.२.ज्ञानवर्द्धन कंठ- २ टा बीहनि कथा २.३.अरविन्द ठाकुर-पचपनियाँ बनाम बभनियाँ मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास) २.५.नन्द विलास राय- करौना २.६.मुन्नाजी- चुनरी (बीहनि कथा) ३. पद्य ३.१.बिनय भूषण-दू टा कविता- १.आइ पिरथी दिवस अछि २.आखिर एना कियैक लागि रहल अछि ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.रागिनी मनोरथ-शिक्षा ४.२.प्रीति प्रभा- मनोरथ ४.३.चंदना दत्त- मोह Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU  इग्नू       BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1    [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2    (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3    (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4                (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8                (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9                (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11               (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12               (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13               (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14                 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15                 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16                 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17                (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18                 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS OTHER OPTIONALS IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर (आत्म-कथा)-आगाँ २.२.ज्ञानवर्द्धन कंठ- २ टा बीहनि कथा २.३.अरविन्द ठाकुर-पचपनियाँ बनाम बभनियाँ मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास) २.५.नन्द विलास राय- करौना २.६.मुन्नाजी- चुनरी (बीहनि कथा) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ सम्पर्क -8789616115 आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ( आत्म-कथा ) 11. चरैवेति-चरैवेति-एक चारि बीघा वला परिवारक दुःख-सुखसं परिचित छलहुँ | विवाह भेलाक बाद पचास बीघावला परिवारक  दुःख-सुखसं परिचय होम’ लागल | मधुश्रावणीमे हम एक दिन लेल सासुर जा सकलहुँ | वापस ढोली गेलहुँ त किछुए दिनक बाद सूचना भेटल जे हमर जेठसारि कलकत्ताक एकटा अस्पतालमे अंतिम सांस लेलनि | तीनटा पुत्र बारह बरखसं उपरक छलखिन | एकटा पुत्री तीन सालक आ एकटा छओ मासक छलखिन | किछुए  मास पहिने गेल छलीह कलकत्ता | दांतक पीड़ा भेलनि | ऑपरेशनक बाद खाँसी भेलनि |ब्लीडिंग भेलनि | नहि बचि सकलीह | अपने गाममे सासुक सेवामे लागल रहलीह आ चारिटा दियर आ दूटा पुत्रक पढाई-लिखाई कलकत्तामे चलैत रहलनि तकर प्रबन्धमे हिनक प्रशंसनीय भूमिकाक चर्चा हुनकासं भेंटक उत्कंठा जगबैत छल, मुदा आब तकर कोनो संभावना नहि रहि गेल छल | आब यैह इच्छा रहि गेल जे साढ़ू कोना  प्रबन्ध क’ रहल छथि, से देखी  | हम सभ अंतिम वर्षमे गेलहुँ त आल इन्डिया टूर प्रोग्राम कॉलेज दिससं तैयार कएल गेलै | डेढ़ मासक प्रोग्राम छलै | एकटा बोगी सुरक्षित रह्तै, ट्रेन आ बसक माध्यमसं यात्रा पूर्ण हेबाक छलै | हम एहि यात्राकें नहि छोड़’ चाहैत छलहुँ | समस्या छलै जे छात्रकें अपना दिससं चारि सै टाका अग्रिम जमा कर’ पडैत छलै | हम एकटा अनुशासन अपनाले’ बनौने रही जे ससुरसं कोनो मांग नहि करबनि आ ने कोनो अपेक्षा करब | एकदिन ओ अपने कहलनि, ठाकुर हिनकाले’ एकटा साइकिल लेबाक अछि, तें  दरभंगा चलब | हम पुछलियनि कोन साइकिल लेबाक विचार छनि, त कहलनि सेन रेले |ओहि समयमे यैह सभसं नीक साइकिल होइत छलै | पुछलियनि कते दामक  छै, कहलनि चारि सै | हम चुप्प भ’ गेलहुँ, पुछलनि त कहलियनि जे साइकिलक बदला हमरा दोसर चीज बेशी उपयुक्त लगैए | कहलियनि जे आल इण्डिया टूर प्रोग्राम लेल एतबे राशि जमा करबाक छै | कहलनि हमरा कोनो आपत्ति नै अछि | हमर समस्याक निदान भ’ गेल | समस्तीपुर जंक्शनसं यात्रा आरम्भ भेल 12.04.1972  क’ बुध दिन  | हम साढ़ूकें पत्र द्वारा सुचित क’ देने छलियनि | सबेरे हावड़ा जंक्शन गाड़ी पहुँचलै | साढ़ू उपस्थित छलाह |पहिल भेंट छल तथापि  असौकर्य नहि भेल | दुनू गोटे जलखै केलहुं | संक्षिप्त गप-शप भेल | हम कहलियनि कोन नम्बरक  बस अथवा ट्रामसं पहुंचब, से  बता दिय’, हम साँझमे डेरापर आबि जाएब | पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार दिनभरि सबहक संग घुमैत रहलहुं | बोटैनिकल गार्डन, चिड़ियाखाना, अजाएब-घर,विक्टोरिया मेमोरियल, धर्मतल्ला होइत साँझमे साढ़ूक डेरा पहुंचि गेलहुँ | एकटा कोठलीमे साढ़ूक गृहस्थीक सभ सामान छलनि | यैह हिनक तपस्या-स्थल छलनि | एतहि रहि चारिटा अनुज आ बादमे तीनटा पुत्रक शिक्षाक संग अपन नोकरीक प्रबन्धन  करैत आबि रहल छलाह | भोजन अपने बनबैत छलाह | भोजन बनबैत काल बच्चाकें  पढाइमे मदति सेहो करैत छलाह | ओहि समयमे एकटा बालक संगे छलखिन | रूममे दूटा चौकी छलै | भोजनक बाद एकटा चौकीक उपर दोसर चौकी राखिक’ नीचांमे ओछाइन भेल | ओहिपर फ़ैलसं हम दुनू साढ़ू बड़ी राति धरि गप-शप करैत रहलहुं | साढ़ू अपन पारिवारिक जीवनक कथा कहैत-कहैत पत्नीक योगदानक चर्च करैत भावुक भ’ जाइत छलाह | ककरो संग अपन दुःख-सुख बँटलासं मोन किछु हल्लुक होइत छैक | हमरा बहुत किछु बूझल छल तथापि हुनका मूँहें सूनि नीक लागल | बडकी दाइक तपस्याक परिणाम कते दिन बाद आएत, से सोचैत रहलहुं | दोसर दिन साढ़ूक अनुज बिन्दु जीक संग किछु महत्वपूर्ण स्थान जेना कलकत्ता यूनिवर्सिटी इंडस्ट्रियल एंड टेक्नोलॉजिकल म्यूजियम, कालीघाट, प्लानाटोरियम आदि  देखि एलहुं | साँझमे साढ़ू हबर-हबर भोजन बनाक’ हमरा  भोजन करा देलनि | बिन्दुजी  हमरा हावड़ा जंक्शन पहुंचा देलनि | राति सबा आठ बजे पुरीक लेल प्रस्थान करै गेलहुँ | राति बर्थपर  पडल-पडल बड़ी काल धरि सोचैत रहलहुं साढ़ू, बडकी दाइ, दू टा अबोध पुत्री  आ तीन टा पुत्रक भविष्यक विषयमे | एक पीढ़ीक तपस्याक फल दोसर पीढ़ीकें प्राप्त होइत छैक | लगभग पचास साल भ’ गेलै | आइ बडकी दाइ आ साढ़ूक तपस्या आ आशीर्वादक प्रमाण बनल छथि सम्मानित सेवासं भारमुक्त भेल हुनक  दू टा पुत्र आ जर्मनी, अमेरिका, बंगलोर, जमशेदपुरमे हिनका सबहक  इंजीनियर, डॉक्टर पुत्र, पुत्री, पुत्रवधू आ जमाए  लोकनि | अपन पूर्वजक प्रति सम्मान व्यक्त करबाक संस्कृति अनमोल अछि | हम सभ आइ जाहि ठाम छी ओहिठाम पहुचबामे हमर पूर्वज लोकनिक की योगदान रहल छनि, से जानबाक चाही | सबेरे हम सभ पुरी पहुँचलहुँ | सभ गोटे बंगालक खाड़ीमे  ज्वार-भाटाक आनन्द लैत फेर चापा कलपर स्नान क’ क’ भगवान् जगन्नाथक दर्शन करबाक लेल मन्दिर जाइ गेलहुँ | ज्वार-भाटाक आनन्द लोककें पानिमे उतरबाक लेल आकर्षित करैत छैक | पानिक प्रवल प्रवाह कखनो  लोककें ऊपर ल’ जाक’छोडि अबैत अछि त कखनो नेने-नेने बीचमे पहुंचा दैत अछि जत’सं लोक घुरियो सकैए, नहियों घुरि सकैए | दू साल पहिने हमर परिचित  एकटा पति-पत्नी विवाहक बाद यात्रापर गेल छलाह | ज्वार-भाटा आकर्षित केलकनि | पानिमे उतरै गेलाह | थोड़े काल आनन्दमे रहलाह | किछुए कालमे आनन्द शोकमे परिवर्तित भ’ गेलनि  | दुनू गोटेकें पानिक प्रवल प्रवाह झिकने चल गेलनि मुदा वापस एके गोटेकें केलकनि | कनियाँ कनैत रहि गेलीह, पति वापस नै एलखिन | एहेन दुर्घटना कम होइछै, मुदा होइछै | तें हमरा दूरेसं ज्वार-भाटाक आनन्द लेब ठीक लगैए | बत्तीस बरखक बाद फेर पुरी जेबाक अवसर आएल त होटलमे स्नान क’क’ आरती देख’ मन्दिर गेलहुँ | बादमे दूरेसं ज्वार-भाटाक आनन्द लै गेलहुँ | शास्त्रमे द्रष्टा बनिक’ संसारक सौन्दर्य  देखबाक सन्देश अछि | मुदा, लोक डूबिक’ आनन्द लेबाक चक्करमे बहुत किछु गमा बैसैत अछि | भोजनक बाद गाड़ी वाल्टेर लेल प्रस्थान केलक | दोसर दिन भोरे वाल्टेर (आन्ध्र प्रदेश) पहुंचै गेलहुँ | स्नान-जलखैक बाद सिटी भ्रमण कय विशाखापत्तनमक बंदरगाह  देखि अबै गेलहुँ | एकटा मन्दिर सेहो देखि एलहुं | साढ़े चारि बजे साँझमे गाड़ी मद्रास लेल प्रस्थान केलक | सभ स्टेशनपर लोकक भीड़ अपन लोकप्रिय अभिनेत्री जय ललिताक स्वागत पुष्प-बृष्टिसं क’ रहल छल | सामान्य कद-काठीक अभिनेत्री हाथ जोडि अपन प्रशंसक सबहक अभिवादन स्वीकार क’ रहल छलीह | यैह लोकप्रिय अभिनेत्री बादमे तामिल  नाडूक लोकप्रिय मुख्य मन्त्री सेहो भेलीह | मद्रास सेंट्रल 2.30  बजे दूपहरमे पहुंचल रही | मूर मार्केट, पेरिस कार्नर, चाइना मार्केट आ जेमिनी स्टूडियो घूमि अबैत गेलहुँ | एक ठाम एकटा धूप चश्माक दाम पुछलियै, कहलक पचास रुपया | बढ़’ लगलौं त बिना नेने जाए नै देब’ चाहैत छल | कहलियै पाँच रुपया से ज्यादा नहीं देंगे | तुरत द’ देलक | तैयो भेल जे ठका गेलहुँ | एहने सन अनुभव बहुत गोटेकें भेलनि | फेर कतहु कोनो वस्तुक दाम नै पुछलियै | राति 8 बजे गाड़ी मद्रास सेंट्रलसं प्रस्थान करैत दोसर दिन सबेरे पाँच बजे इरोड जंक्शन पहुंचल | इरोडसं 6.30  बजे प्रस्थान क’ क’ साढ़े बारह बजे दूपहरमे तिरुचिरापल्ली पहुचै गेलहुँ | ओहि ठाम एकटा मन्दिर देख’ जाइ गेलहुँ | रातिमे साढ़े बारह बजे प्रस्थान क’ क’ दोसर दिन साढ़े बारह बजे दूपहरमे रामेश्वरम पहुँचै गेलहुँ | हिन्द महासागरमे स्नान कय  पाँच बजे बाइस टा कुण्डमे सेहो स्नान करै गेलहुँ | महासागर देखि मोन पडल कतेक कथा जे नान्हिटासं सुनैत आबि रहल छलहुँ |  दस हजार साल पहिने भेल सीता-हरणक कथा, हनुमानजी द्वारा समुद्र फानिक’ विभीषणक सहयोगसं सीता माताक  पता लगयबाक कथा, लंका दहनक कथा, बानर सेनाक सहयोगसं एहि महासागरपर बनल सेतुक कथा, ओइपार  कतेक दिन तक चलल युद्धक कथा, राम द्वारा रावणक संहारक कथा | आब विचार करैत छी त लगैत अछि जे रावण आइ कोरोनाक रूपमे आबि चुकल अछि जे सम्पूर्ण विश्वकें आतंकित केने अछि | ओहि समय दस टा  मुंह ल’क’ आएल छल, एखन  हजारो-लाखो  मुंह ल’क’ उपस्थित अछि | ओ रावण देखाइ दैत छल, तें ओकरा हनुमानजी आ अंगद सेहो लुलुआ लेलखिन, एखन त ओ देखाइए नै दैत अछि | एहेन स्थितिमे ओकर नाभि कत’ छै,से  के कहत ? ओइ बेर त बेर-बेर गरदनि काइटक’ भगवान अपने परेशान भ’ गेल छलाह | संयोग देखियौ ओम्हर अयोध्यामे रामक आगमनक हल्ला भेलै, एम्हर अदृश्य भेषमे रावण सौंसे दुनियामे त्राहि-त्राहि मचा देलक | युद्ध चलि रहल अछि | रामक सेनामे लाखो प्रतिभाशाली विशेषग्य- चिकित्सकक टीम दिन-राति पुल तैयार करबामे लागल अछि | किछु लोक रावणक ख़ुफ़ियाक रूपमे काज क’ रहल छथि | पुल बनबामे देरी करबा रहल छथि | कुर्सी पयबाक, कुर्सी बचयबाक अथवा कुर्सी हथियेबाक  प्रोजेक्टपर सेहो काज संगहि चलि रहल अछि | किछु गोटे रंग-विरंगक डहकन तैयार क’ रहल छथि | काज बहुत भेलैए | करोडो लोककें दुनू  खोराक टीका पड़लनि |  जान बचयबाक लेल सुझाव देल गेल छनि जे घरेमे रहू | एकटासं काज नै चालत, दू टा मास्क लगाक’ रहू | बेर-बेर हाथ धोइत रहू | दूनू डोज लेलाक बादो संक्रमण हो त चिन्ता नहि करब | डॉक्टरसं संपर्क क’ क’ सभटा दबाइ ल’ लिय’ आ जांच सेहो  करबा लेब | सभटा प्रोटोकाल सुनिश्चित राखब त मरब नै | शेष लोक सभ ले’ सेहो अभियान शुरू भ’ चुकल अछि | हमहूँ दुनू गोटे 12  अप्रैलक’ दोसर डोज लेलहुं | चारिम दिन माने 15 क’ हम भरि राति बोखारमे रहलहुं | बोखार 102 तक रहल | पानिक पट्टी मात्रसं ठीक भ’ गेल, मुदा फेर दस दिनक बाद बोखार आएल | डॉक्टरसं सम्पर्क केलहुँ | डॉक्टर साहेब सभटा दबाइ लीखि देलनि जे  अखबारमे प्रकाशित कएल गेल छलै | कोरोना वला तीनू नै भेटल | यैह दबाइ भेटल : 1.पेरासिटामोल 650 2.अज़िथ्रोमायसिन 500 3.विटामिन सी दू दिनक बाद आब बोखार नहि अछि | अज़िथ्रोमायसिन तीन दिन ल’ चुकल छी | पाँच दिनक सुझाव छल, तें दू दिन और लइए लेब, से सोचैत छी | हिनका पेरासिटामोलसं काज चलि गेलनि | परसू रातिमे नाक जाम भ’ गेल | राति भरि निन्न नहि भेल | चिन्ता  भेल, मुदा सरिसोक तेलक प्रयोगसं लाभ भेल | ऐसं नै होइत तखन फेर डॉक्टर- अस्पताल-सिलिंडर की-की कर’ पडैत आ की-की  होइत से के जानय ! एम्हर तरह-तरहक प्रयोग व्यक्तिगत स्तरपर सेहो लोक क’ रहल अछि | हमर मित्र सुधाकान्तजी सुचित केलनि अछि जे शहरक अस्पताल सभमे ओक्सिजनक कमी सूनि एक गोटे,  जिनकर ओक्सिजन स्तर कम भ’ रहल छलनि, गाम आबि गेलाह आ एकटा पीपड़क गाछक  जड़ि  लग साफ़ क’क’ ओतहि सात दिनसं  रहै  छथि आ एकदम स्वस्थ छथि | एमहर नारद जी द्वारा कतहु  ईहो प्रसारित कएल गेल अछि  जे जहिया आ जखने  ई रावण कोनो चुनावक रैलीमे चलि गेल अथवा गाम दिस गेल, ओही क्षण ई जरिक’ भस्म भ’ जाएत,कारण एहि बेर ब्रह्माजीसं वरदान मंगैत काल अही  दुनू ठाम अपन सुरक्षाक आश्वासन मांगब बिसरि गेल | तें देखै नै छिऐ जे गाममे मूडन, उपनयन, एकादशीक यग्य, विवाहक भोज-भात आदि अबाधित चलि रहल अछि आ पटना,दिल्ली, मुंबई और जहां-तहांसं आबि लोक एहिमे सम्मिलित भ’ क’ अपन योगदान दैत अयशसं बचि रहल छथि | शहरमे  प्रति दिन आत्मा सभ देह छोडैत जा रहल छथि | कुमार गगनकें नहि बचा सकलियनि | मनोज मनुज नहि बचि सकलाह | अदभुत लेखक नरेन्द्र कोहली नै रहलाह | अदभुत गीतकार-गजलकार कुँवर बेचैन चल गेलाह | कतेक घरक खाम्ह खसि पडल | कतेक घरक दीप मिझा गेल | लोक आतंकित अछि | किनकर कहिया आ कखन नंबर आबि जेतनि, से निश्चित नहि अछि | एखन क्यो खोंखी करैत अछि, त डेरा जाइ छी | क्यो छीकै छै, त डर भ’ जाइए | आपातकालमे लिखल गेल दुष्यंत कुमार जीक ई शेर मोन पड़ि रहल अछि : ‘सैर करने के लिए सड़कों पे निकल जाते थे अब तो आकाश से पथराव का डर होता है’ नीरज जी सेहो कहने छथि : ‘ मित्रो हर पल को जिओ अंतिम पल ही मान अंतिम पल है कौन-सा कौन सका है जान’ एकटा स्वामी जी कहैत छलाह, जतेक  पवित्र आत्मा सभ एखन  जा रहल छथि, से किछुए सालक  बाद वापस आबि जेताह आ हिनके सभसं हैत सतयुगक स्थापना | स्वामी जीक बातसं मरबाक डर कम भेल अछि | (क्रमशः) पटना /30.04.2021 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ २ टा बीहनि कथा १ भोल्टेज आइ हेड मास्सैब लग बिजली बाबू खेखनियाँ काटि रहल छथि-ओ मास्सैब ओ मास्सैब!हमरा बौआकेँ एगो साटीफीटी बना देल जाउ हाली सनी।हम त' बर्बाद हो गेली ओ मास्सैब! मास्सैब पुछलथिन- की भे गेल?काहे ला कछमछा रहल हती?की करम सर्टिफिकेट ले के?कहिया नाउँ लिखेले रही बौआके?कहिया पास केले रहय?कोन साल?कोन किलास? बिजली बाबू कहलथिन-से की जाने गेली ओ मास्सैब!हम कोनो पढ़ल-लिखल हती?पान-सात साल पहिले के रजिस्टरमे खोजू न! मास्सैब-की नाम हय बचबा के?कहिया के जनम हय?कुछ त' बोलू! बिजली बाबू- नाउँ त' हइ भोल्टेज!भिनुसरबामे भुइकम्प न भेल रहे,ओही रात ओकर जनम भेल रहे।हमनी सभ्भे दूरा पर रही।बिजली-लाइट एकदम्मे डीम रहे।पोल परके बौल टिमटिमा रहल रहे।तभिये जोर से भोल्टेज अलै आ मंगुराहाबाली आ के बोल गेलै-बिजली बौआके बेटा भेलै ह'!  रामानंदी बाबा हँसे लगलथिन।कहलथिन-बिजली के बेटा भेलै ह' आ अबते भोल्टेज आ गेलै।एकर नाउँ हम 'भोल्टेज' राख देलियै।कथी कहू मास्सैब?सगरे गाउँ ओकरा भोल्टेज-भोल्टेज लगलै कहे।उहे नाउँ इस्कूलोमे लिखा देलियै।तहिया परमेसर बाबू मास्सैब रहथिन।कहलथिन-नाउँ बदल दै हतियौ, मगर हमहीं न बदले देलियै।की जाने गेलियै जे ई भोल्टेजबा हमरे फ्यूज उड़ा देत?देखू न मास्सैब!बेल कराबे के हय।मधेपुरा-जेहलमे बन्न केले हय ओकरा। मास्सैब रजिस्टर उनटाब' लगलाह आ संगे-संग पूछ-ताछ सेहो कर' लगलाह- कोन अपराधमे जेहलमे बन्न क' देलै ह'? बिजली बाबू- अपराध कथी कहबइ ओ मास्सैब?इहाँ त' घर-घर ऊहे रोजगार हय।एक के दारू तीनमे बिलैक हो जाइ हय।उपरका परसेंट आ थाना-पुलिस काट-कूटके दोबरी नफा हो जाइ हइ।बूझ लू जे पूरा पेलवारे मूड़ी पर उठेले हय हमर भोल्टेज।ओकरे से रौनक पसरल हय हमनीके। मास्सैब रजिस्टर बंद क' गुम भ' गेलथिन। बिजली बाबू- कैला गुम्मी लाध लेली मास्सैब?अठारह से जादे उमेर हो गेलै ह' की?काम बनेबला न हइ कादो?अरे बाप!तब त' बेल न देतै ओकरा।की होतै हो भगमान?मास्सैब बाजि उठलाह-बिजली बाबू!अहाँ लेखा बिजली जाले समाजमे अइसन भोल्टेजसे रौशनी करैत रहत,ताले समाजके फ्यूज आ फेज उड़ते रहतै।हम सरकार रहती त' पहिले अइसन बिजलीएके तार काट देती। २ 'नीक' आ 'बड़ा नीक' एकटा रहय 'नीक' आ एकटा रहय 'बड़ा नीक'।'नीक' एक पन्ना पढ़य,त' 'बड़ा नीक' दू पन्ना।'नीक' दू करीन पानि पटाबय, तँ 'बड़ा नीक' चारि करीन।'नीक' सोझे कॉलेज पास केलक,त' 'बड़ा नीक' फर्स्ट डिवीजनसँ।पैघ भ' क' दूनू बनि गेल नेता। ठाढ़ होइ गेल चुनावमे। 'नीक' रहय 'ईर पार्टी'मे, त' 'बड़ा नीक' रहय 'बीर पार्टी'मे।'नीक' बाजल- हम नीक, त' 'बड़ा नीक' बाजल- हम बड़ा नीक।एक कहलक- एकमहला देबौ,त' दोसर गछलक- दुमहला देबौ।'नीक'केँ भोट एलै चौबन हजार,त' 'बड़ा नीक'केँ एलै पचपन हजार।मुदा 'ईर पार्टी' जीति गेल,'बीर पार्टी' हारि गेल।'नीक' बनि गेल मंत्री,त' 'बड़ा नीक' बनल ने मंत्री, ने संतरी।केओ कहलक 'नीक' नहि भेल,त' केओ कहलक- बड़ा नीक भेल।जनता जोहै अछि दुमहला।नहि बनलै एकमहला।'नीक' कहलकै- हरलाहाकेँ कोन लाज?'बड़ा नीक' कहलकैक- जितलाहाकेँ भेटलैक कि कोनो राज?सभ अपन-अपन करू ग' काज!खिस्सा खतम, पैसा हजम! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अरविन्द ठाकुर-संपर्क-9955155156 पचपनियाँ बनाम बभनियाँ मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर मैथिली साहित्यक संवादगत परिदृश्य प्राय: निद्रावस्थहि मे रहैत अछि। मौसमी घटना जकाँ किछु विद्यापति-समारोह,त्रैमासिक कथा गोष्ठी ‘सगर राति दीप जरए’ आ सहित्य आकादेमी द्वारा यदा-कदा आयोजित कवि-सम्मेलन/विचार-गोष्ठी सन किछु ढेला बीच-बीच मे एहि चहबच्चा मे ‘धप’ जकाँ गिरैत अछि,कादो-सनाएल पानि मे किछु क्षण लेल किछु लहरि उठैत अछि आ थोड़बे कालक बाद चहबच्चाक पानि मोफ़तिया यजमानी चुड़ा-दही भकोसि कए फोंफ काटैत थुलथुलहा पुरहित जकाँ स्थिर आ निद्रावश भए जाइत अछि।इहो मौसमी घटनासभ अपन सीमितता मे समेटल रहि जाइत अछि आ एकरसभक प्रकृति सेहो एकांगी अछि।एकर सहभागी लोकनि कविता,कथा वा आलेखक माध्यम सं अपन बात कहि अपन-अपन ठाम धए लए छथि,श्रोता वा अन्य सहभागी दिस सँ ताली-वाहवाहीक अतिरिक्त कोनो ठोस प्रतिदान नहि आबैत अछि,आन कोनो प्रतिदान अपेक्षितहु नहि रहैत अछि। नतीजा जे ई सभटा उपक्रम एकालाप,प्रलाप,विलाप तक सीमित रहि जाइत अछि,संलापक स्थिति नहि बनाए पाबैत अछि।वाद,प्रतिवाद आ संवादक अभाव मे मैथिलीक द्वन्द्ववाद पुनकिअहि नहि सकल अछि आ तें एकर अधिकांश स्वरुप एकरस आ बासी अछि। एमहर आबि पोथी प्रकाशनक गति त जोर पकड़लक अछि,किन्तु ओकर वितरण-व्यवस्था अखनिअहु व्यक्तिगत प्रयासहि तक सीमित अछि।पत्र-पत्रिकाक दलिदरा त जेना मैथिलीक भाग्य-रेखहि मे लिखल अछि।जे किछु बहराबितहु अछि,से कोनो ठोस वैचारिकता आ दृष्टिक अभाव मे बीधहि पुड़ैत रहैत अछि—कोनो योजना नहि,कोनो नवीन परिकल्पना नहि,कोनो दूरगामी सँकल्पना नहि—जे रचना भेटि गेल,छापि देलहु। परिणामस्वरुप मैथिली साहित्यक परिदृश्य संवादहीनताक नियति भोगबाक लेल अभिशप्त अपन स्थैर्यक ठाम पर कोनो पाथर जकाँ अचल पड़ल रहैत अछि आ अपन एहि दयनीय दशा पर कानिअहु नहि पाबैत अछि।ई संवादहीनता,ई विमर्षहीनता कोनो भाषा-साहित्य लेल बहुत खतरनाक आ मारूक होइत अछि।भाषा-साहित्यक जीवंतता, विकास आ आधुनिकीकरण लेल ई आवश्यक छै जे ओकर वैचारिकता,ओकर रचनात्मकता सतत प्रवहमान रहए। लेखन व्यक्तिगत कर्म होइतहु सामुहिकताक मुखापेक्षी अछि। तें लेखक कें बुझल रहबाक चाही जे ओकर चारुकातक लेखनक परिदृश्य की छै,के सभ लिखि रहल छथि,की लिखल जाए रहल छै,केना लिखल जाए रहल छै आ तहि मे ओकर अपन स्थिति आ स्थान की छै,ओकर अपन दिशा ठीक छै वा ओकरा मे कोनो परिवर्तन वांछित छै।लेखक जहि भाषा मे लिखि रहल छै,ओहि भाषा सँ सम्बन्धित आन्तरिक आ वाह्य गतिविधि की छै, तहि गतिविधि सँ भाषाक लाभ भए रहल छै वा हानि,तहु पर नजर राखब आ अद्यतन रहब सेहो लेखक लेल आवश्यक छै।लेखकक अपडेट रहब ओकर लेखन आ भाषा—दुनू कें परिमार्जित करए छै,आधुनिकता आ प्रगतिशीलता सँ लबरेज करए छै।किन्तु,जँ सुचना-संवाद सँ अपडेट रहल त से मैथिली की भेल! सूचना-संवादक अभाव मे मैथिलीक अधिकांश लेखन एकभगाह आ असंतुलित भेल अछि।भावयित्री आ कारयित्री दुनू क्षेत्र मे अराजकता व्याप्त अछि।इतिहास-लेखन आ वैचारिक क्षेत्र त झूठ,प्रपंच आ क्षुद्रताक जीवन्त दस्तावेजहि बनल छै।प्रतिरोधी आ यथार्थवादी लेखक-शक्तिक अभाव मे भाषा आ क्षेत्रक ‘सत्य’ ठोह पाड़िकए कानि रहल छै।कोय ओकर नोर पोछनिहार नहि।इतिहास-लेखनक कुरुक्षेत्र मे प्रतिद्वन्द्वीविहीन भेल धृतराष्ट्र अपन सार आ सखा-संतानक सँग उन्मत्त भेल अपन पैशाचिक-विजयक घोष कए देने छै।मनमानीक इ स्थिति छै जे एकटा सबाल्टर्न-शकुनी-इतिहासकार भुइयांगत यथार्थ कें आम आदमीक नजरि सँ देखबाक दाबी ठोकैत एकर पुनर्लेखनक गप करए छथि आ एहि क्रम मे हुनक सम्पूर्ण शक्ति अपन जातिक श्रेष्टताक वर्णन सँ होइत हुनक अपन व्यक्तिगत/पारिवारिक कुलीनताक स्थापना आ ओकर दस्तावेजीकरण मे खर्च भए जाइ छै।इतिहासक सामाजिकताक नाम पर एहन विकट निर्लज्जताक लिखित प्रदर्शन होइ छै आ एहि समाजविरोधी विध्वंसक लेखन पर कतहु सँ कोनो प्रतिरोधक स्वर नहि अभरए छै। प्रतिपक्षक अक्षमता आ एकरा प्रति रूचिहीनता कें दोष सेहो देल जाए सकए छै,किन्तु एकर एकटा प्रमुख कारक संवादहीनता सेहो छै,जे साहसिक आलोचना कें पुनकए नहि दए रहल छै। नतीजा छै जे निहित स्वार्थी तत्वसभ निधोख भए कए मैथिली साहित्य न्यायालय सँ एक्स-पार्टी डिक्री लेने चलि जाए रहल छै। शैलीक एकटा उक्ति छनि जे,”जेना एकटा निराश चोर चोरसभ कें पकड़निहार बनि जाइत अछि,तहिना निराश भए कए लेखक आलोचक बनि जाइत अछि”। शैलीक एहि उक्तिक अर्थ लोक अपन-अपन आग्रहक आधार पर निकालि सकए छथि।एहि ‘निराशा’क व्याख्या सेहो भिन्न-भिन्न प्रकार सँ कएल जाए सकए छै।कहल जाए सकए छै जे ई ‘निराशा’ लेखकक अपन लेखनक नि:शक्तता,अपंगता वा असफलताक परिणाम छिअए।किन्तु एकर एकटा दोसरहु पक्ष छै आ खासकए मैथिलीक प्रसंग मे ओ बेसी प्रासंगिक आ उपयुक्त बुझाइ छै।एतय जाति-बिरादरी, गोधिया-दियादवादक किल्लत सँ ग्रस्त कतेकहु सशक्त लेखक आ ओकर लेखन कें यत्नपूर्वक अनठिआएल गेल छै आ षड्यन्त्रपूर्वक ओकरा चिन्हार नहि हुअए देल गेल छै।तें ई ‘निराशा’ सशक्त,सार्थक आ प्रगतिशील लेखनक अछैतहु ‘पहचान’ आ ‘मोजर’ नहि भेटबाक परिणाम बेसी बुझाइ छै।गैर-मैथिल लेखकसभक सँग त ई अनदेखी परिपाटी जकाँ भेलहि छै,गुट-गिरोह सँ अलग रहनिहार मैथिलहु लेखक कें ई दण्ड भोगए पड़ल छनि।आवश्यकता एहि बातक रहए जे शैलीक एहि उक्ति कें चरितार्थ करैत एहि दुनू प्रकारक ‘निराशा’क परिणामस्वरूप ‘चोर पकड़निहार’ आलोचकसभक उत्पत्ति होइतए आ यथास्थिति कें खुल्ला चुनौती नहि त चुनौतीक आगमनक आशंकाजनित भय होइतए।अखनि तक एहन अपेक्षित स्थिति नहि आएल अछि।कामना करी जे ई उत्पत्ति जँ अखनि तक नहि भेलए त आगु हुअए,निकट भविष्यहि मे हुअए। फ़ारसीक एकटा कहावत छै—“अदावत के आंखि मे हुनर बहुत बड़का ऐब छै”। मैथिलिक पुरस्कार-सम्मान-लुटेरा समुदायक विभिन्न गुट-गिरोहक सँचालक आ ओकरा बलें वर्चस्वशाली बनल लोकक फोंक-भयभीत मानस कें हुनरमंद लोकक अस्तित्व खतरा जकाँ बुझाइत आएल छै आ ओ एहन तत्त्व सँ एन-केन-प्रकारेण छुट्टी छोड़ाए लिअए चाहए छै।एहि लेल ओसभ हुनर कें हतोत्साहित,भ्रमित करबाक लेल कोनहुटा छल-प्रपंच बांकी नहि छोड़य छथि। एहन सन संवादहीन,संवेदनहीन आ मौन-प्रपंचमय परिदृश्य मे सुभाष चन्द्र यादवक ‘गूलो’क प्रकाशन आ एहि मे प्रयुक्त भाषा कें ‘पचपनियाँ’ नामकरण करैत एहि पर आलेखक माध्यम सँ अपन पक्ष राखब एकटा एहन घटना छै,जेकर मैथिलि-थाना द्वारा सँज्ञान लेब,डायरी मे दर्ज करब,ओकर तहकीकात करब आ निष्कर्ष पर पहुंचब बहुत आवश्यक छै।एहि घटनापर सकारात्मक विमर्षक मार्ग प्रशस्त करब मैथिली भाषा आ एकर लेखन कें आत्मावलोकन,आत्मपरीक्षण आ आत्मशोधन/आत्मपरिष्करणक अवसर प्रदान करत।एहि अवसरक लाभ लेबाक चाही। सुभाष जीक आलेख एहि बात कें उजागर करए छै जे साहित्यक दुनियां मे सभकिछु पवित्र आ पूजनीय नहि छै,आनहि क्षेत्रसभ जकाँ एतहु अपवित्र,अशोभन आ निन्दनीय तत्त्वक उपस्थिति रहए छै।मैथिलीक परिपेक्ष्य मे त ई उपस्थिति प्राणघातक मात्रा मे,जानमारू बहुमत मे छै। सुभाष जीक आलेख विमर्ष कें जगैबाक लेल यथेष्ट खोराक दैत अछि,यद्यपि कि हुनकर कथनसभ मे बहुत रास झोलसभ सेहो अछि।जहि आलेखक माध्यम सँ ओ अनेक रास प्रश्न उठबए छथि,तहि आलेख पर सेहो अनेकानेक प्रश्न उठैत अछि।पहिल झोल त नामकरणहि मे अछि।ओ कहए छथि जे कोनो सोल्हकन सँ पुछला पर ओ अपन मातृभाषा ‘ठेठी’ बतबैत अछि आ शिक्षित सोल्हकन कहैत अछि जे,’मैथिली त बाभनक भाषा छिऐक’। सोल्हकन एकरा ‘ठेठी’ कहैत अछि।ठीक!शिक्षित सोल्हकन एकरा की कहैत अछि,से ओ नहि लिखलनि। हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि जे सोल्हकनहि नहि,पढल-लिखल सम्पूर्ण मैथिलेतर जातिक लोक एकरा सभदिन ‘तिरहुता’ कहैत आएल अछि,आइअहु कहैत अछि। हं,पुछला पर ई प्रतिक्रिया अवश्य भेटैत अछि जे मैथिल ब्राह्मणक आग्रही प्रभाव मे ‘तिरहुता’ कें ‘मैथिली’ सँज्ञा दए देल गेल अछि।ई प्रतिक्रिया एकदम वाजिब आ तार्किक छै आ एकर प्रमाण छै जे आइयो एकर लिपि कें ‘तिरहुता लिपि’ कहल जाइ छै—किछु एजेन्डाजीवी कें छोड़िकए।तखनि सुभाष चन्द्र यादव जी एकर नामकरण ‘पचपनियाँ’ कोन आधार पर कएलनि?हुनक आलेख मे एहि प्रश्नक उत्तर नहि अछि। ओ लिखए छथि जे सुपौल,सहरसा,मधेपुरा,अररिया तथा पुर्णियाक सवर्ण, पिछड़ा, दलित एवं सर्वहारा अर्थात सभ जाति आ वर्गक लोक एहि मैथिली(पचपनियाँ) मे बाजैत अछि।ई बाइ मे देल वक्तव्य जकाँ अछि – कोनो मौलवीक फ़तवा जकाँ।ध्यातव्य जे जेकरा सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली मे पचपनियाँ कहल जाइ छै,तहि मे सवर्ण आ दलित त नहिए टा आबैत अछि,यादव सेहो एहि गोल मे सम्मिलित नहि अछि। ‘सर्वहारा’ शब्द सेहो एहि सम्पूर्ण समुदाय कें नहि समेटैत अछि।एहि परिपेक्ष्य मे एकर नव-नामकरण ‘सबजनियां’ बेसी उपयुक्त होइतए।जँ क्षेत्रीयताक विभाजन कें आधार बनाबी,तखनिअहु एकर नामकरण ‘कौशिकी’ किंवा ‘कौशिकी मैथिली’ हएबाक चाही छल।ओना एहि नामकरणोत्सव मे ‘मैथिली’ सँज्ञाक प्रयोगहि किऐ हुअए? एतबे नहि,एहि नामकरणोत्सवक स्वघोषित पौरोहित्य ग्रहण करबाक धड़फड़ी मे सुभाष चन्द्र यादव जी एहि क्षेत्र-विशेष कें मिथिला कहि अनजानहि मे वएह एजेन्डा कें विस्तार दए दैत छथि,जेकरा लेल किछु मुर्दा-संस्कृतिक उघवाह अतीतजीवी लोकनि ढेका खोलिकए झालि बजा रहल छथि। डा मेघन प्रसादक सँग एकटा साहित्यिक कार्यक्रम मे कएल गेल अपमानजनक व्यवहार निकृष्टता आ अधमताक श्रेणी मे आबैत अछि आ एहन कुकृत्य करनिहार कें विद्वान की,मनुष्यहु नहि मानल जाए सकैत अछि। नीक आ प्रशंसनीय बात जे सुभाष जी एहि कुकाण्ड सँ विचलित भेला आ तत्क्षण ओकर प्रतिकार कएलनि।किन्तु सुभाष चन्द्र यादव कोनो छोटभैया-नेता किंवा सियासी-भोलंटियर नहि छथि।ओ लेखक छथि आ लेखक अपन प्रतिकार वाणी-मात्र सँ नहि,लेखनक माध्यम सँ करए,से अपेक्षित रहैत अछि।मेघन-काण्ड भेला कतेकहु वर्ष बीत गेल,एहि अवधि मे सुभाष जी बहुत किछु लिखलनि,किन्तु एहि घटना पर लिखल हुनकर कोनो सँस्मरण,कोनो रिपोर्ताज, कोनो निबन्ध व्यक्तिगत रूप सँ हमरा त देखल-पढल नहि भेल।ओ कहि सकए छथि जे सभटा पत्र-पत्रिका पर बाभनहिसभक आधिपत्य रहए,तें हुनकर एतद्सम्बन्धी रचना नहि छपल।प्रश्न तखनिअहु अपन ठाम पर छै जे की ओ एहि सोल्हकन-अपमान-काण्ड पर किछु लिखने रहथि,लिखलनि त कतय छपलनि,नहि छपलनि त के नहि छापलकनि आ कोय जँ नहि छापलकनि त ओ स्वयं एकरा प्रकाशित किऐ नहि कएलनि? सुभाष जीक मामला मे त आर्थिक सँकटहु कोनो बहाना नहि अछि।‘साफ दिखते भी नहीं,सामने आते भी नहीं’ सन गप!मेघन जी सँग भेल कुकृत्यक वाजिब आ असली प्रतिकार त इ रहए जे एहि घटना कें लिखिकए दस्तावेजी रूप देल जएतए आ एकर प्रस्तोता अपन कलम कें नोर आ लहू मे बोरि-बोरि लेखन-शक्तिक एहन सदुपयोग करितथि जे पढनिहार-सुननिहार एहि करतूत पर सिहरि उठितए,अपरिमित आक्रोष सँ भरि जएतए आ करतूतक दोषी कुकर्मीसभ पर असीम घृणा सँ थू-थू करितए।से नहि कए,बाभनहि राजकमल चौधरीक अभिनन्दन-लेखन करब हुनक प्राथमिकता मे किऐ अएलनि? देश मे लोकतंत्र छै,एकरा द्वारा प्रदत्त अधिकार छै,तें जवाबतलबी हएबाक चाही।किन्तु अधिकारक सँग कर्तव्य सेहो जुड़ल छै आ तें उत्तर मांगनिहार कें उत्तर देबाक उत्तरदायी सेहो हुअए पड़ए छै। लेखनक प्रारंभिक दौर मे कोनो लेखक अपन लेखन-भाषाक राजनीति वा आन गतिविधिसभ सँ अनभिज्ञ आ निर्लिप्त रहैत अछि। ओकर लेखकीय चेतना मूलत: अपन लेखन पर केन्द्रित रहैत अछि।तें अपन आरंभिक लेखन मे आनहि लेखकसभ जकाँ सुभाष जी जँ बभनियाँ मैथिलीक प्रयोग कएलनि आ साहित्यिक गोष्ठी,सेमिनार आदिक सँग-संग अपन दैनिक बैठकासभ मे बाभनहिक सँगति धएने रहला,त ई स्वाभाविक मानल जए सकैत अछि।किन्तु तिरहुता किंवा ठेठी (जेकरा ओ आग्रहपूर्वक पचपनियाँ कहए छथि) मे लिखबाक बेगरताक भान त हुनका मेघन प्रसादक सँग भेल बेहुदगीक बादहि भए जएबाक चाही छल।दुर्भाग्य जे तहिया हुनका ई इलहाम नहि भेलनि।तेकर बादहु हुनक लेखनक माध्यम बभनिअहि मैथिली रहल आ हद त ई जे पचपनियाँ मैथिलीक एजेण्डा उठाएब आ ओकर तरफ़दारी-पैरोकारी करबाक लेल सेहो ओ बभनिअहि मैथिली कें अपन माध्यम किंवा औजार बनएलनि।की हुनका सन अति-प्रबुद्ध लेखक कें ई सामान्य सन बात नहि बुझल भेलनि जे कोनो भाषिक-परम्परा (लेखन, शैली,वर्तनी) मात्र मुद्दा उठएला,तहि पर नाराबाजी वा हू-ले-ले  कएला वा कोनो अज्ञात अस्तित्व सँ ओकर मान्यता,स्वीकृति वा प्रमाणपत्रक याचना कएला सँ नहि,ओहि मे लेखनक निरन्तरता सँ बनैत अछि? एहि प्रसंग मे दू टा लेखक त विषयगत रोल माडलक रूप मे मैथिली मे अपन उपस्थिति दर्ज कएनहि छथि आ सुभाष जीक दृष्टि-परिधिअहु मे हएबहि करता।तारानन्द वियोगी अपन लेखन मे बहुत कुशलताक सँग अपन गाम-घर-परिवारक अनेक शब्द आ वाक्यांशक प्रयोग करए छथि आ बभनियाँ मैथिली कें एकटा अलग तरहक ग्राम्य-सौन्दर्य सँ सज्जित कएलनि अछि,त जगदीश मंडल अपन विशेष वर्तनी आ शैलीक माध्यम सँ विपुल लेखन कएलनि अछि आ एकटा बेछप उदाहरणक रूप मे स्वयं कें प्रस्तुत कएलनि अछि।जगदीश मंडल एतबहि पर नहि रुकला अछि।ओ अपन विशिष्ट शैलीक निर्माणक सँग-संग ओकर विकासक लेल एकटा वृहत बौद्धिक-समुदाय कें अपन सँग लए कए चलए छथि आ साहित्यिक-सहकारिताक अनुपम प्रयोग मे सफल भेल छथि। हिनकासभ सँ प्रेरणा लए मे सुभाष जी कें के रोकलकनि?दोसर बात ई जे कोय केकरो बात अहिना नहि मानि लए छै।तें प्रेरणा देबए सँ पहिने स्वयं मे प्रेरणाक स्रोत उत्पन्न करए पडए छै।प्रेरणाक सत्त्व ई छै जे एकर महत्व दए सँ बेसी ग्रहण करए मे छै। अहांक वैचारिक व्यक्तित्व प्रेरक अछि तखनहि कोय अहां सँ प्रेरणा ग्रहण करत।प्रेरणादायी व्यक्तित्व बनबाक लेल भीमराव अम्बेडकर महाड़ मे जल-सत्याग्रह चलैलनि, नासिक मे कालाराम मन्दिर मे दलित-प्रवेश लेल आन्दोलन कएलनि।भारतक सँविधानक निर्माणक सँग-संग दलित-अस्मिता आ आन-आन विषय पर प्रचूर लेखन कएलनि।ठीक छै जे सभक तुलना अम्बेडकर वा गांधी सँ सँ नहि कएल जएबाक चाही,किन्तु जे स्वयं के एहि परम्परा-पुरुषक रूप मे प्रस्तुत करए चाहए छथि,हुनका सँ त ई पुछलहि जाए सकैत अछि जे अहां लग अपन पूंजी की अछि?इतिहास कें बिसरब,त ऐतिहासिक भूल करब।जहि सर्वहाराक गप एहि प्रसंग मे आएल अछि,ओकर नायक के रहए,के छै? ओ केकरा सँ प्रेरणा ग्रहण करत?एक समय रहए जे कोय एहि समाज कें अपन नायक उधार देबाक लेल तैयार नहि रहए।किऐ? एकमात्र कारण ई जे ई सर्वहारा अपन नायक के चुनब,मानब छोड़ि अपन बुद्धि-विवेक कें  ओकरहि सभक चौखटि पर राखि आएल,जेकरा सँ ओकरा लड़बाक रहए।दुर्भाग्य रहलए जे ई वर्ग कहियो बुद्ध कें पकड़लक,कहियो कबीर,कहियो रैदास कें,कहियो ज्योतिबा फुले कें,त कहियो बिजली पासी,बिरसा मुण्डा,झलकारी बाई,सुहेलदेव कें आ अन्तत: फेर पुरोहिती-चौखटि पर घुरि आएल। कौशिकी-कक्षक भीम केवट आ लौरिक मनियार सोल्हकन-लोकसमाज स्मृति मे यथावत छथि,किन्तु सोल्हकन-अभिजात्य लेल त्याज्य किऐ छथि?प्रारम्भिक दिन जेहन हुअए,किन्तु सुभाष जी सबदिन एलिट बनल रहबाक लेल प्रयासरत रहलाह अछि।एहि क्रम में ओ पचपनियाँक पौध लगबए सँ पहिने जमीन तैयार करबाक अनिवार्यता कें बिसरि गेल बुझाइ छथि।से नहि त पहिने  उगरी महाराज,सोनाय महाराज,चिल्का महाराज,लाला महाराज,लालमैन महाराज,छेछना डोम,दीना भदरी,अमर बाबा आ सलहेस इत्यादि  हुनक लेखनक परिधि मे किऐ नहि अएला।ई सभ नायक आन-आन जातिक छथि,किन्तु यादवहु मे त लौरिकक अलाबे कारू खिरहरि,बीशू राउत,महिनाथ आदि लोकनायक भेला।जखनि अपन प्रतिरोधक अभिव्यक्ति लेल अहां जाति कें आधार बनबए छिअए त अपन जातीय आधार कें त पहिने सुदृढ करू। देश स्वतंत्र अछि,लोकतंत्र कें अंगीकृत कएने अछि आ देशक आधुनिक भूगोल प्रशासनिक दृष्टिकोण सँ राज्य, प्रमण्डल,जिला,अनुमण्डल,प्रखण्ड आदि  मे विभक्त अछि। एहन स्थिति मे आधुनिक व्यवस्था कें तिलांजलि दएत कोनो कपोल-कल्पित पुरातनकालक मिथकीय ‘मिथिला’ नामक यूटोपियाक कामना करैत ओकरा पुनर्स्थापित करबाक चौल करब अंगुरी पर गिनल जाएबला किछु अतीतजीविताक कारोबारीसभक काज अछि आ ई बात मैथिलेतर समुदाय त बुझितहि अछि,मैथिलक बुझनुक बहुमत सेहो एहि यथार्थ सँ अनभिज्ञ नहि अछि।एहन स्थिति मे ‘पचपनियाँ’क पैरोकारी करैत-करैत सुभाष चन्द्र यादव जी कें एहि यूटोपियाक गह्वर-पूजन मे भक्तिपूर्वक साष्टांग दण्डवत भए झालि बजाएब केना सोहएलनि?जखनि अनेक जिलाक गजेटियर लिखनिहार महान अण्वेषी इतिहासकार पी सी रायचौधुरी सहरसाक गजट लिखैत काल एहि क्षेत्र-विशेष कें कोनो मिथकीय-राजक हिस्सा मानए मे सशंकित भए गेला,एकरा सर्वकालीन स्वतंत्र क्षेत्र कहलनि,तखनि इतिहासक ककहरा सँ अनभिज्ञ कोनो व्यक्ति एहि तरहक भ्रम पसारए मे सहायक केना भए सकैत अछि? एतबहि नहि,ओ प्रकारान्तर सँ ईहो प्रस्ताव दएत बुझाइ छथि जे जँ हुनक ‘पचपनियाँ’क एजेण्डा स्वीकार कए लेल जाए त ओ एहि सँ जुड़ल राजनीतिक वा भाषाई आन्दोलनक सहभागी भए जएता।विचित्र द्वैध,अपच अतिरेक आ ब्लैकमेलिंग सँ भरल अछि ई गप,जाहि मे धमकीक अढ सँ परस्पर लाभ बांटि गठबन्धन करबाक प्रस्ताव अन्तर्निहित अछि। आ की ई सुभाष जीक कोनो पराजय-बोध-विशेष अछि जे अन्तत: मनुष्य कें याचनाक मुद्रा मे लए आबैत अछि?कनी काल लेल मानि लेल जाए जे दातालोकनि(?) दिस सँ हुनक पचपनियाँ कें सम्मान देब गछि लेल गेल,हुनका साहित्य अकादेमीक वांछित सम्मान सेहो दए देल गेलनि।आब ओ की करता? अपन घरक ताखा पर राखल मिथिला-राज उतारि सम्मानदाता-लोकनि कें हस्तगत कए देता? कतहु नुकाए कए राखल अलादीनक चिरागक जिन्न कें प्रकट कए अतीतक पुनर्स्थापनक एहि तमाशा कें महा-आन्दोलन मे तब्दील कए  घमासान मचाए देता? एहि काजक लेल अपन लेखकीय वा सामान्य जीवन मे कतेक लेखक वा समर्थक तैयार कएने छथि ओ? तिरहुता (जेकरा पचपनियाँ कहल गेल अछि) कें आदरविहीन (non-honorific) कहब सेहो अज्ञानतावश ओकर अनादर करब थिक। ठेठी आदरक अपन तरीका छै आ से तरीका देखबाक लेल कोनो अणुवीक्षण यंत्र (microscope)क बेगरता नहि छै।एकतुरिया वा छोट लेल जँ ‘तूं जेबही’ कहल जाइ छै,त जेठक लेल सम्मान देबाक स्थिति मे ‘तूं जेबहक’ कहल जाइ छै।एहन अनेक उदाहरण देल जाए सकैत अछि,जाहि पर सुभाष जीक ध्यान नहि गेल हुएनि,से सम्भव नहि ; अपन स्थापना कें सुदृढ करबाक लेल ओ एकरा जानि-बुझिकए अनठिअएने छथि,से बात अलग।अपन ‘गूलो’ मे ओ स्वयं ठेठीक आदरसूचक ठाठ पसारने छथि।‘घुरि कए आबै छियह’,’हौ!तू बड़ कंजूस छहक!’,’भैया,अपने टा खाइ छहक’,’बबा,कहिया कीन देबहक’,’पांच सौ लाइब कए देलियह।सबटा चाटि गेलहक आ पांच टका निकालै मे दांती लागै छह।‘ आदि सम्मानसूचक(honorific) नहि छिऐ,त की छिऐ?ई बात सही छै जे एहि सर्वहारा तिरहुता मे विकारीक उच्चारणबला कोनो शब्दक स्थान नहि छै आ तें ‘भ गेलै’,‘क देलकै’ आदिक स्थान एतय नहि छै ; किन्तु एकरा ‘भाए गेलै’, ‘काए देलकै’ लिखब त जानि-बुझिकए एकरा विकृत करबाक कुचेष्टा छिऐ। अजीब बात जे अपन आलेख मे सुभाष जी गर्वपूर्वक एहि प्रयोगक चर्चा करए छथि,जखनि कि ‘गूलो’ मे कएकठाम ‘कए-भए-लए’क प्रयोग करए छथि।ई त ‘गतानुगतिकता’क विरोधक नाम पर ‘नव-गतानुगतिकता’क प्रतिपादन करबाक,नींव राखबाक उपक्रम बुझाइत अछि।उपरोक्तक  जे उच्चारण कौशिकी जनपद मे होइ छै,तहि अनुरूप ओकरा ‘भए गेलै’, ‘कए देलकै’ लिखब बेसी उपयुक्त छै।ई अलग बात जे ‘गूलो’ मे इएह टा प्रयोग नहि छै।‘गूलो’क प्रयोगसभ मिनजुमला खाता छिऐ,जहि मे भाषा,बचल-खुचल विभिन्न प्रकारक तर-तरकारी सँ बनल ‘डलना’(mixed vegetable) भए गेल छै।एहि मे ‘काए’ के सँग-संग ‘कए’ के प्रयोग सेहो भेल छै आ ठाम-ठाम भेल छै।जँ ‘काए’ आ ‘भाए’ लिखल गेलए तखनि ‘लए’ किऐ?एकरहु ‘लाए’ हएबाक चाही छलए।लेखक एहन अनेक दोष टंकक वा प्रकाशकक माथ पर थोपि सकए छथि,किन्तु पाठक कें कोनो आन ठाम देल स्पष्टीकरण पढबाक फुरसत कहां छै।प्रयोग हएबाक चाही,एकर स्वागत! प्राय: प्रत्येक लेखक प्रयोग करैत अछि।किन्तु प्रयोग करैत ई सजगता त हएबाकहि चाही जे प्रयोग युक्तिसंगत हुअए, पाठकक मगज मे आसानी सँ घुसि जाइ,अराजकता नहि पसारए। ‘गूलोक पुनर्पाठ कयला पर केदार कानन कें कोनो असुविधा नहि भेलनि’ सन-सन तर्क बेतुक छै।केदार कानन एहि पोथीक प्रकाशक छथि आ एकर भुमिका सेहो वएह लिखलनि अछि।स्वाभाविक आ अपेक्षित छै जे ओ एकरा बेर-बेर पढथि।किन्तु पुनर्पाठक ई अपेक्षा सामान्य पाठकहु सँ किऐ राखल जाए? ईहो आवश्यक नहि जे सभक बौद्धिक-स्तर केदार काननहि जकाँ उच्चस्तरीय हुअए। अनुभव कहैत अछि जे मैथिली “खिधांसीक ओस्ताद” लोकनिक खान अछि। डेग-डेग पर भेटता।केकरो खिधांस करए लागता त एहि पुण्य-प्रयास मे आकाश-पाताल एक कए देता।खिधांसक वेध-लक्ष्य जँ कोनो विचार वा स्थापना छै त ओकरा अपन उद्गम-माताक कोखि मे घुरि जएबाक लेल बाध्य कए देता आ जँ लक्ष्य(Target) पर कोनो व्यक्ति छै त ओकरा रौरव नर्क गेनहि कल्याण।किन्तु खिधांसीक एहि ओस्तादलोकनि कें हुनकर अपनहि कहल बात कें लिखिकए व्यक्त करबाक आग्रह करिअनु त अहांक आग्रह अनन्त-अनन्त जन्म तक अपन पालनक प्रतीक्षा करैत रहि जाएत।  कोनो व्यक्ति ताल ठोकिकए जे बात मौखिक तौर पर कहि रहल छै,तेकरा लिखित रूप मे व्यक्त करए मे ओकरा की दिक्कत? दिक्कत छै। दिक्कतहि टा नहि छै,खतरा सेहो छै।मौखिक अभिव्यक्ति मे अपनहि कहल बात सँ नठि जएबाक सुविधा छै।एहि सुविधाक लाभ लैत मूंहक अतिसार सँ ग्रसित मानुस बेर-बेर बोकरि सकैत अछि आ अपन वमन सँग अनर्गल प्रलापक मल-मुत्र विसर्जन कए सकैत अछि।लिखिकए अपन बात कहए मे मारिते रास खतरा छै।पहिल खतरा छै—मारि खएबाक।ई खिधांसीक ओस्ताद लोकनि प्रकटत: ‘बुधिक बखारी’ भनहि होथु,हुनका अपनहु बुझल छनि जे ओ वस्तुत: ‘फोंकहा सँठी’ सँ बेसीक औकात नहि राखए छथि।ई  सभ ओस्तादलोकनि पछुआरक वाणी-वीर छथि।सम्मुख होइतहि चरण गहि ‘नाथ-प्रभु-बापा’ कहि लम्बवत भए जेता,उठिकए देह झाड़ि लेता आ पछुआर जाइतहि फेर वएह गारि-कीर्तन।जे से!कोनो कथन एक बेर लिखित भेलाक बाद दस्तावेज भए जाइ छै,प्रकाश मे आबितहि अपरिवर्तनीय भए जाइ छै। लिखनिहार लेल अपन बात सँ नठबाक,पलटबाक कोनो गुंजाइश नहि रहि जाइ छै।जँ एहि मे कोनो आरोप छै त ओकरा प्रमाणित करबाक जिम्मेदारी आरोपकर्त्ता लेखक पर स्वत: चलि आबए छै। तथ्यहीन बात लिखला पर ओ सार्वजनिक निन्दा आ हास्यक पात्र बनि जाइ छै।ओकर समकालीन ओकर वयस,वरिष्टताक लिहाज कए भनहि दम साधि लिअए,चुप रहि जाइ,किन्तु अगिला पीढी ओकरा पर कोनो मुरब्बत नहि करत,ओकरा छील देत।कखनियो काल एहनहु होइ छै जे शब्दक मधुमय आवरण मे गरल परसबाक ओस्तादी कएल जाइ छै।किन्तु एहि सँ खतरा टरैत नहि छै,कनी विलम्बित भनहि भए जाओ। अपन बात कहबाक लेल लेखकक एक-एक शब्द-चयन,वाक्य-विन्यास आदि लेखकक मूल मंशा,ओकर वैचारिक-मानसिक स्थिति कें प्रकट कएअहि दए छै।बुझनुक पाठक लग अभिधा-व्यंजना-लक्षणा वा व्याज-स्तुति-वक्रोक्ति आदिक मायाजाल कोनो काजक नहि रहि जाइ छै। अपन शिल्प-शैली वा कलात्मकताक बल पर अहां अपन लेखन कें केतबहु आवरण दिअओ,ओकर वस्तुगत अर्थ-यथार्थ सुधि-पाठक तक पहुंच जाइत अछि। अहां द्वारा प्रयुक्त एकटा शब्द,एकटा वाक्य,एकटा अनुच्छेद अहांक लेखकीय टा नहि, अहांक व्यक्तिगत व्यक्तित्वक वास्तविकता कें नीक जकाँ प्रकट कए दएत अछि।जँ रामलोचन ठाकुर अपन पोथी ‘बेताल कथा” हरिमोहन झा कें समर्पित करैत आनहि परम्परावादी पण्डा-पुरहित साहित्यकार जकाँ हुनका ‘हास्य सम्राट’ कहए छथि त एहि एक शब्द मात्र सँ हुनकर मार्क्सवादी चोला आ व्यंग्य-हास्यक भेद सम्बन्धी हुनकर साहित्यिक समझ दुनू धराशायी भए जाइत अछि।जखनि महापण्डित गोविन्द झा लिखए छथि जे, ‘अधिकतर ग्राहक भेला समृद्ध वृद्ध भूमिहार ब्राह्मण,एकर प्रेरक भेलनि अपन जाति मे कन्याक कमी आ दोसर मैथिल ब्राह्मण वर्ग मे  समएबाक कामना’,त भूमिहार ब्राह्मणक प्रति हुनकर घृणा,एहि जातिक विराट पुरुषार्थ कें लघुकाय करबाक हुनक क्षुद्र-प्रयास आ मैथिल ब्राह्मण(हुनक अपन जाति) द्वारा बेटी बेचबाक अधम आ घृणित कर्मक बादहु ओकर श्रेष्टता(?) कें अवांछित सुरक्षावरण देबाक प्रपंच नुकाइत नहि अछि,जगजियार भएअहि जाइत अछि।जँ डा वीरेन्द्र मल्लिक अपन कविता ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’ मे कविता कें मारिजुआना आ किदन-कहांदन घोषित करए छथि त ई बात नुकाइत नहि अछि जे ओ अपन काव्य-रचना सँ पूर्व कथीक सेवन करए छथि।जँ अग्निपुष्प अपन टिप्पणी मे जीवकांत कें एलेन गिन्सवर्गक परम्पराक कवि घोषित करए छथि त हुनक अध्ययन-मननक अल्पता स्पष्टतया देखार होइत अछि।एहन अनेक उदाहरण मैथिली मे अछि,किन्तु तेकर विस्तारण आन कोनो ठाम लेल छोड़ल जाए।एतय आशय एतबे जे अभिव्यक्तिक लेखन-प्रणाली दुधारी तलवार छै,जाहि पर चलब सभाक बुत्ताक बात नहि छै। आन-आन भारतीय भाषाक साहित्य मे जे स्वतंत्रता,प्राय: किछुअहु कहि देबाक जे छूट आइ उपल्बध अछि, ओ सभ टा वर्त्तमान लेखकलोकनिक अपन अरजल नहि छनि।ई हुनकर पुरखासभ छला जे सभ अपन समय मे एकरा लेल कठिन सँघर्ष कएने रहथि।मैथिली साहित्य मे दुर्भाग्यवश एहन सँघर्षशील पुरखासभ वा त छथिअहि नहि, वा नगण्य छथि।मैथिलीक लगभग शत-प्रतिशत पुरखा लेखकसभ आजादी सँ पूर्व राजा,राजभवन, सामन्त, जमीन्दार आ आजादीक बाद सत्तासीन शक्तिशाली वर्गक आ सम्पूर्ण काल मे धार्मिक-प्रतिष्ठानसभक लेल स्तवन लिखबाक काज मे बाझल रहला आ एहि मे विद्यापति सन नमहर नाम सेहो सम्मिलित अछि।एकरहि परिणाम अछि जे मैथिली साहित्य सँ आक्रोश आ प्रतिरोध अलोपित अछि आ हमरासभ कें आत्मालोचनक परम्परा आ ओकर उप्लब्धिसभ सँ पूर्णतया वंचित रहि जाए पड़ल अछि आ वर्त्तमान वा दू-एक पीढी पूर्वक किछु गिनल-गुथल प्रगतिशील लेखकलोकनि कें प्राय: शून्य सँ अपन शुरुआत करए पड़लनि अछि। आधुनिकता आ ओकर सँघर्ष त वस्तुत: आब विचारणक केन्द्र मे आबि रहल अछि आ सेहो अधिकांशत: मैथिल ब्राह्मणेतर लेखकलोकनिक मारफत। ई स्थिति जातिक नाम पर स्थापित लेखकीय-प्रतिबद्धताहीन समुदाय कें भयभीत आ असहज कए रहल अछि। हुनकासभ कें बुझल छनि जे नबका पीढी कें देबाक लेल हुनकासभ लग ने अपन व्यक्तिगत पूंजी छनि,ने पुरखासभक देल कोनो समृद्ध क्रान्तिकारी विरासत आ जे किछु बटुआ-झोड़ा मे छनि,जँ तेकर नीक सँ जांच-पड़ताल भेलए त ओहिसभक फोंक  आ जीर्ण-शीर्ण अस्तित्व देखार भए जेतए,बेनंगन भए जेतए।तें कोनो नबका विचार आबितहि ओकरा पर अभद्र आक्रमणक कुत्सित प्रयास शुरू भए जाइत अछि।ई काज अखनि लेखनक माध्यम सँ कम,मौखिक रूप मे बेसी आ सोशल साइट्सक अभद्र टिप्पणीसभक माध्यम सँ बेसी भए रहल अछि।प्रसंगवश एकटा कहावत मन पड़ैत अछि—‘प्रेमी लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ चुम्मा-चाटी करए लागए छै  आ वक्ता लग जखनि शब्द सठए छै त ओ खोंखी करए लागए छै’। वर्त्तमान स्थिति कें देखैत एहि कहावत मे एकटा टुकड़ी और जोड़ल जाए सकए छै—‘मैथिल लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ गारि पढए लागए छै’।कहावत मजाकिया छै,किन्तु चेतबए छै।मैथिलीक राड़ी-बेटखौकी बहुत चिन्ताजनक छै। केकरो दोष बताएब ओकर खिधांस करब नहि होइ छै।ई लक्ष्य-तत्वक परिमार्जनक लेल एकटा शुभेच्छा सेहो होइ छै।एकर सँज्ञान लेब त अहां अपन परिमार्जनक दिशा मे बढब,नहि लेब त बूड़ू,लोकक की जाइ छै! ‘निन्दक नीयरे राखिए आंगन कुटी छबाय’ तें कहल गेल रहए। आब ई अहांक इच्छा जे अपन कुतर्कक परम्परा मे नव कुतर्क गढि ली जे ई बात मैथिली मे नहि कहल गेल छै,तें एकरा नहि मानब। एहिसभ परिपेक्ष्य मे जँ सुभाष चन्द्र यादव लिखित रूप मे कोनो विषय (एहन,जहिपर विवाद हएब सुनिश्चित-सन छै) पर अपन मन्तव्य प्रकट कएलनि अछि त हुनक लेखकीय साहसक (मैथिलीक परिपेक्ष्य मे दुस्साहस) प्रशंसा कएल जएबाक चाही। अनेक रास झोल,अन्तर्विरोध आ लचर प्रस्तुतिकरण (जहिपर पुर्व मे चर्चा कएल गेल अछि) आदिक उपस्थितिक बादहु सुभाष जीक आलेख मे जे बिन्दुसभ उठाएल गेल छै,तेकर अनदेखी करब कठिन त छैहे,एकरा अनठिआएब सेहो मैथिलीक हित मे नहि छै। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयक वार्षिक वाद-विवाद सभा मे पूर्व केन्द्रीय मंत्री आ सुप्रसिद्ध लेखक शशि थरूरक महत्त्वपूर्ण भाषण आ पुर्वोत्तर मैथिल पत्रिका मे सुभाष चन्द्र यादवक पचपनियाँ मैथिली पर केन्द्रित आलेख सँयोगवश एकहि समयावधि मे आएल आ दुनूक विषयगत केन्द्रीय तत्त्व ‘उपनिवेशवाद’ सँ जुड़ल अछि। शशि थरूर आक्सफोर्ड मे अपन बात कहैत बेर ई नीक जकाँ जानैत रहथि जे ब्रिटेन भारत आ भारतीय जन-समुदाय सँग कएल अपन अपराधक मुआवजा  भारत कें कहियो आ किन्नहु नहि देत।किन्तु ई जानितहु ओ एहि बात कें रेखांकित कएलनि जे ब्रिटेन द्वारा गलतीक माफीअहि कें यथेष्ट मानल जाएत।शशि थरूरक कहब रहनि जे, ‘जँ दू सौ बरस तक भारत पर निर्दयता सँ राज करबाक एवज मे  ब्रिटेन प्रतिवर्षक लेल मात्र एकहु टका देत त हमसभ सन्तुष्ट हएब’।सुभाष चन्द्र यादवक आलेख मे शशि थरूर बला स्पष्टता आ आक्रामकता नहि छनि,किन्तु ओ प्रकारान्तर सँ अनगिनत वर्षक पुरोहिती वर्चस्वक अधीन भेल शोषणक लेल माफी आ प्रतीकात्मक (Token) क्षतिपुर्तिअहिक गप कहि रहल छथि।तेवर जे हुअए,सुभाष चन्द्र यादवक आभार मानल जएबाक चाही जे ओ एहि आलेखक बहन्ने पुरोहिती उपनिवेशक तटस्थ हिसाब-किताब तैयार करबाक लेल मैथिली-समाज कें उद्वेलित कएलनि अछि,भाषा सहित्य पर पड़ल एकर दुष्प्रभावक निष्पक्ष आकलन हेतु खोराक देलनि अछि,एकटा परिणामदायी बहसक परम्परा शुरु करबाक डगर देखएलनि अछि,विषमता सँ पीड़ित वर्त्तमानक वास्तविकता आ प्रायोजित बौद्धिक प्रपंचक अभियानक क्षुद्रता कें उघार कएलनि अछि।ई आलेख एक दिस मैथिलीक औपनिवेशिक सत्ता कें देल गेल चुनौती अछि त दोसर दिस सर्वहाराक हेराएल अस्मिता कें खोजबाक,खोजिकए पुनर्स्थापित-पुनर्प्रतिष्ठित करबाक प्रयास सेहो अछि। एकर स्वागत लेल अभिजात्यक साहित्यिक-दुर्गक द्वारपट खोलल जएबाक चाही। समय निरन्तर करवट फेरैत रहए छै आ एकर प्रत्येक करवटक सँग जीवन-जगतक कण-कण मे कोनो ने कोनो परिवर्तन होइ छै।एहि परिवर्तन कें रोकब कोनो ताकतक वश मे नहि छै।विवेकवान व्यक्ति वा समाज एहि परिवर्तनक हुलसि कए स्वागत करए छै आ एकर एकटा हिस्सा बनि गतिशीलताक प्रवाहक सहयोगी होइ छै।जे एहि परिवर्तनक अवश्यम्भाविता सँ आंखि मुनने रहए छै,अपन पुर्वाग्रही मन कें अतीतक भूलभुलैया मे अटकएने वर्त्तमान सँ स्वयं कें काटने रहए छै,ओ व्यक्ति वा समाज वा त ठस भेल मृत वा अप्रासंगिक भए जाइ छै वा परिवर्तनक अंधड़ ओकरा उड़िआकए अजायबघरक वस्तु बनाए दए छै।ई परिवर्तन जीवनक प्रत्येक क्षेत्र मे अपन प्रभाव छोड़ए छै आ तें साहित्य सेहो एकर प्रभाव सँ मुक्त नहि रहए छै। नव-स्वतंत्र अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनि कें लागलनि जे हजारक हजार वर्ष सँ हुनकसभक अस्मिता शासन-सत्ताक दुष्चक्रीय आवरण मे विलुप्त-सन भए गेल अछि आ ओकर पुनर्स्थापन हएबाक चाही।एकरा लेल एकटा विराट समूह आन्दोलित भए उठल।प्रत्येक आन्दोलन जकाँ एकरहु अपना लेल एकटा विशिष्ट सँज्ञाक बेगरता बुझएलए। नव-अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनिक ई विराट समूह अपन अस्मिताक आक्रोश-भरल खोज कें गर्वपूर्वक ‘श्यामत्व’ (मूल शब्द—नेग्रिट्यूड/Negritude) नाम देने छला। अपनहु देश मे दलित साहित्य अपन भिन्न पहचान बनएलक, जेकर अधिकांश श्रेय महाराष्ट्र कें जाइ छै।मराठी मे एहन साहित्यक विपुल आ प्रभावी भण्डार छै।जँ तिरहुत मे एहन साहित्यिक उभार कें स्वतंत्र व्यक्तित्व देबए लेल एकरा ‘सोल्हकनत्व’ कहि एकटा बहुजन समाज अपन अस्मिता,अपन भाषीय-संस्कृतिक आक्रोश-भरल खोज करैत अछि,ओकरा सर्वस्वीकृति दिएबाक सँघर्ष करैत अछि आ एकर अनेक उपकरण मे सँ एक ‘पचपनियाँ मैथिली’क पैरोकारी मे आवाज उठाबैत अछि त प्रगतिशील शक्तिसभ सँ ई सहज अपेक्षा होइत अछि जे ओ आगू बढि एकरा अपन अंकवार मे भरथि, एकर स्वागत-अभिनन्दन मे तोरण-द्वारहि टा नहि बनाबथि, हुलसिकए एहि प्रवृति कें सशक्त करबाक आयोजन मे सम्मिलित सेहो होथि।मैथिलीअहिक नहि,तिरहुत क्षेत्रीय समाजहु लेल ओ गर्वक स्थिति हेतए,जखनि ब्राह्मणत्वक तुलना मे सोल्हकनत्व कें हेय नहि मानल जएतए,बल्कि ओकरा श्रेष्टत्व प्राप्ति हेतए।ई स्थिति अपन आगमन लेल अभिजात्यक ‘कृपणता’क नहि,उदारताक मुखापेक्षी अछि। प्रगतिकामी चेतना आ उदार सावधानीक सँग विचार कएला पर ई बुझाएत जे नानाप्रकारक एतिहासिक परम्परासभक आन्तरिक मार्गक अनवरत यात्राक चलते भिन्न-भिन्न जनसमूहक लेल भिन्न-भिन्न प्रकारक भाषाक आवश्यकता होइ छै आ एहि आवश्यकताक आन्तरिक प्रस्फुटन सँ भिन्न-भिन्न भाषा-उपभाषाक प्रकटीकरण होइ छै।ई बात सत्य छै जे एहि क्षेत्र-विशेषक बोली(जेकरा परम्परा सँ तिरहुता वा ठेठी आ सुभाषीय आग्रह सँ पचपनियाँ कहल गेल छै) कें भाषाक स्वरूप दए मे मैथिल ब्राह्मणलोकनिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहल अछि। भनहि एहि सभक पाछू बबुआनी करबाक लिलसा हुअए,यजमानीक नव-क्षेत्रनिर्माणक परिकल्पना हुअए वा अपन जातीय सँस्कृतिक उपनिवेश बनएबाक योजना हुअए,किन्तु ई मैथिल ब्राह्मणलोकनिअहि छथि जे नेपालक जनकपुर,विराटनगर,राजबिराज सँ लए कए बिहारक विभिन्न शहर-नगर-गाम आ झाड़खण्डक रांची,जमशेदपुर सँ लए कए बंगालक कोलकाता कि तेलांगनाक हैदराबाद तक खुब ताम-झाम सँ मैथिली सँ जुड़ल आयोजनसभ करए छथि।मैथिलीक विभिन्न अल्पायु-दीर्घायु पत्रिकासभ हुनकहिलोकनिक प्रयास सँ बहराएल अछि।मैथिली पोथीक प्रकाशनक जे काज भए रहल अछि,ताहि काजक सभटा अगुआ/प्रकाशक  मैथिल ब्राह्मणहि छथि।आइयो एहि भाषा मे लिखनिहारलोकनि मे एहि जातिक लोकक बहुमत छै।स्वाभाविक छै जे  एहि भाषा पर हुनकर सभक लेखनक शैलीक वर्चस्व छै आ तेकर प्रभाव आनहु जातिक लेखकलोकनिक लेखन पर पड़ल छै। हं,तखनि एकर माने ई नहि जे ओसभ स्वयं कें एहि भाषाक निर्माता आ भाग्य-विधाता मानि एकरा अपन उपनिवेश किंवा खबोतर बनाए लेथि।बहुमतक अपन अलग महत्व छै,किन्तु ई ध्यान राखब आवश्यक जे ‘लोकलाज’ आ ‘नैतिकता’ सेहो कोनो चीज होइ छै आ एकर अपेक्षा सभसं बेसी साहित्यकारहि सँ होइ छै। एहि ऐतिहासिक तथ्य कें सेहो नहि नकारल जाए सकए छै जे क्षेत्र-विशेष (तिरहुत कहू,कौशिकी कक्ष कहू वा मिथिला नामक मिथकीय खबोतर मे हड़पि लिअ) आ भाषा-विशेष (तिरहुता कहू,ठेठी कहू वा मैथिली नाम सँ जातीय खतियान मे दाखिल कए लिअ) दुनूक दृष्टिकोण सँ मूल डीही त सर्वहारा समुदायहि अछि। अभिजन समाज वा अग्रजन्मालोकनिक पाही हएबाक तथ्य अपन ठाम पर अचल अछि,भनहि महापण्डित गोविन्द झा सन-सन ‘काव्य-नाटकाख्यानकाख्यायिका-लेख्य-व्याख्यानादि-क्रिया-सर्वविद्या-निपुणै:’ व्यक्तित्व कागज पर डीही-पाहीक भ्रमोत्पादक-मिथ्या-लेखनातिसार करैत रहथि।जखनि हमसभ ई सुनि उत्तेजित भए हाकरोस करए लागए छी जे फल्लां व्यक्ति आन-आन भाषा-बोली कें सुनब किंवा बोलब पसन्द करैत अछि वा हमरासभ सँ अलग वर्तनीक प्रयोग करैत अछि,त वस्तुत: हमरासभक रोष ओहि भाषा,ओहि बोली वा ओहि वर्तनीक उपर नहि,ओकर बजनिहार, ओकर सुननिहार,ओकर प्रयोगकर्ताक प्रति होइत अछि।ई बात प्रमाणित करैत अछि जे हम ओहि व्यक्ति सँ प्रेम नहि करए छी।जँ हमरासभक मन मे प्रेम उपस्थित रहितए त हमसभ ओकर वा ओकरसभक रूचि आ सँस्कारादि कें बुझबाक प्रयत्न सेहो करितहुं।ई जे चिढ हमरासभक मन मे प्रकट होइत अछि,से स्वयं कें विशिष्ट मानबाक,श्रेष्ट मानबाक क्षुद्रभाव सँ उपजैत अछि आ हमरासभक ‘प्रेम-दारिद्र्य’क सूचक अछि।एहि प्रेम-दारिद्र्य कें तजने बिना ने हमरासभक अपन कल्याण अछि,ने अगिलाक आ ने भाषा आ लोक-समाजक। हमरासभक पाण्डित्य-बोध कें ईहो बोध रहबाक चाही जे ई भाषाक भदेसपन छै जे ‘रेणु’ कें ‘रेणु’ आ ‘काशीनाथ सिंह’ कें ‘काशीनाथ सिंह’ बनबैत अछि।भाषाक अभिजात्य कें पवित्र मूर्ति जकाँ पूजनीय-वंदनीय मानबाक मानसिकता सँ बाहर आबिअहि कए ‘मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी कसम’ आ ‘काशी का अस्सी’ सन कालजयी रचनाक जन्म भए सकैत अछि। बभनियाँ मैथिली सँ पिण्ड छोड़ाइअहि कए ‘गूलो’ सन अभिनव कृति  रचल जाए सकैत अछि। एतय एक बेर और ‘शैली’ कें उपस्थित करी। हुनकर कथन मे प्रयुक्त ‘निराशा’क किछु पक्ष पर पुर्व मे चर्चा भेल अछि।एहि ‘निराशा’ सँ जे ‘आलोचना’ उत्पन्न होइत अछि,से केहेन हएबाक चाही?एहि पर विचारण सँ पहिने कन्नड़ दलित साहित्यकार डा मोगल्ली गणेशक दलित लेखन पर कएल किछु रोषपूर्ण टिप्पणी पर दृष्टिपात करैत चली।ओ कहए छथि जे, ‘दलित लेखक सौन्दर्य-पक्षक उपेक्षा करैत आइ तक जे लिखैत रहला अछि,ओ एकटा लमगर शिकायती-पत्र बनि गेल अछि’ आ ‘अनेक दलित लेखकलोकनि अपन समुदायक अनुभवसभक पुंजी सँ अपन कैरियर चमकएलनि अछि’।ई टिप्पणी खासतौर सँ आलोचना पर नहि,सम्पूर्ण दलित-लेखन लेल कहल गेल अछि।किन्तु एहि टिप्पणी मे जे ‘लमगर शिकायती-पत्र’ आ ‘कैरियर चमकाएब’ अछि,से ध्यातव्य अछि। रचनात्मक लेखन हुअए किंवा आलोचनात्मक,ओहि मे उपरोक्त दुनू चीज कथमपि स्वीकार नहि भए सकैत अछि।सदति मन राखए पड़त जे कलपला सँ,याचना सँ,समझौतावादी नजरिया सँ कृष्ण-सन पक्षधर होइतहु धर्म पर स्थिर पाण्डवलोकनि कें किछु नहि भेटलनि।कहियो बुद्ध कहने रहथि जे सँसार मे दुखक मात्रा बहुत अछि आ एहि सँ मुक्तिक लेल ओ करुणा आ अहिंसा सन मानवीय गुणक पैरवी कएने रहथि,जे कालान्तर मे असफल सिद्ध भए गेल।बुद्धक अहिंसक अनुयायी लोकनि कें लुटेरासभ सँ आत्मरक्षार्थ जूडो-कैराटे सन रणकौशल विकसित करए पड़लनि।ई बात सही छै जे युद्ध कोनो विकल्प नहि होइ छै,किन्तु ईहो बात सही छै जे जखनि कोनो विकल्प नहि होइ छै,तखनिअहि युद्ध होइ छै।मैथिलीक साहित्यिक सत्ताखोर,मखमलिया बुद्धिजीवी,अचूक अवसरपरस्त आ यथार्थ-विरहित यथार्थ-स्रष्टालोकनि एहन विकल्पहीनताक स्थिति नहि आबए देथि आ एहि स्थिति कें स्वीकार करथि जे भाषा कें अपन खबोत्तर वा उपनिवेश बनाए कए राखबाक उपक्रम ओहिना धराशायी भए जाएत,जेना पुरोहिती उपनिवेश भेलए,जेना ब्रिटिश उपनिवेश भेलए,जेना राजा-महराजा लोकनिक प्रासाद-दुर्ग आदि भेलए। व्यक्तिगत,परिवारगत लाभ आ अय्यासीक लेल एकटा विशाल समुदाय कें अपन शत्रु बनाएब पहिनुकहु युग मे उचित नहि रहए,अजुकहु युग मे बुधियारीक गप नहि छै।पुरुख बली नहि होत है,समय होत बलबान;भिल्लन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान।समय आबि गेल छै जे प्रत्येक पक्ष ई स्वीकार करए जे हमसब वैदिक सिन्धु-सरस्वती सँस्कृति आ सनातन धर्मक मार्ग सँ आएल छी। ने कोय जन्म सँ शुद्र छै,ने कोय जन्म सँ ब्राह्मण। ई सभ कर्मणा दायित्व छै ,जे दूषित भए जन्म-आधारित भए गेल छै।अनेकानेक शताब्दी पूर्व जे जातिगत विभेदीकरण भेल रहए,ओकर आधार समाज मे श्रमक समुचित आ यथोचित विभाजन करब रहए,ने कि उत्कृष्टता वा निकृष्टता,श्रेष्टता वा अधमताक निर्धारण करब।एकरा आधार बनाए कोनो वस्तु पर कोय अपन एकाधिकार घोषित कए दिअए,ई अजगुत गप एकदम सँ अवांछित आ अस्वीकार्य छै। दोसर दिस, “पाग-दोपटावला मैथिली चल जायत,लेकिन गोलगलावला मैथिली जीबैत रहत” सन-सन हवाबाजी, ज्योतिषाचार्यी भविष्यवाणी,नाराबाजी आ खामखयाली सँ सेहो काज चलएबला नहि छै।पाग-दोपटाबला कें ई बुझि लिअए पड़तनि जे मुर्दा-संस्कृतिक गौरव-गानक पाछु खबोत्तर-रक्षा आ जीवित-संस्कृतिक उपेक्षाक उपक्रम आब लोक खूब नीक जकाँ बुझि रहल अछि,तें एहिपर पूर्णविराम लागब जरुरी।गोलगलाबला कें सेहो ई बुझि लिअए पड़तनि जे जीवित-संस्कृति कें मुर्दा-संस्कृति पर श्रेष्टता/वरिष्टता दिअएबाक लेल सामाजिक क्षेत्र जकाँ सामाजिक-न्याय मात्रक भरोसहि यथेष्ट नहि अछि आ एहि सँ प्रदत्त आरक्षण सँ साहित्य-संस्कृतिक क्षेत्र मे काज चलएबला नहि अछि।एहि क्षेत्र-विशेष मे मात्र नाराबाजी नहि,फांकीबाजी नहि,ठोस काज चाही। ठोस काज माने लेखन। आ से मात्र रचनात्मक साहित्यहि टा मे नहि,इतिहास आ आलोचनाक क्षेत्रमे सेहो प्रचूर यथार्थवादी लेखनक मांग करैत अछि। अकबर इलाहाबादीक ‘मेरा ईमान क्या पूछती हो मुन्नी,शिया के साथ शिया,सुन्नी के साथ सुन्नी’ शेरबला दुपनियां-मानसिकता सँ पचपनियाबला एकजनियां एजेण्डाक फेकौअल खेलल जाए सकए छै,किन्तु एहि सँ ने निष्कलुष सत्यक सँधान कएल जाए सकए छै,ने निर्णायक शक्तिक सँचय। पक्षपात नहि करू,किन्तु अपन पक्ष त चुनैए पड़त,राखैए पड़त,स्थापित करैए पड़त।महान अफ्रीकी लेखक चेनुआ अचेबेक कहब कें सदति मंत्र जकाँ कण्ठस्थ राखए पड़त आ ओकरा क्रियान्वित करबा लेल प्रयत्नशील रहए पड़त—“जा तक हिरणसभ अपन इतिहास स्वयं नहि लिखत,ता तक हिरणसभक इतिहास मे शिकारीसभक शौर्य-गाथा गाबल जाइत रहत”। मैथिली मे एहि सँ आगूअहुक काजसभ छै। हिरण कें अपन इतिहास लिखबाक सँग-संग ओकर पाठकक निर्माण सेहो करबाक अछि। करू।मैथिलीक खबोत्तर-पीठक कबन्ध-अस्तित्वक रहितहु कोनो प्रतिभाक लेल निराश हएबाक आवश्यकता नहि छै।संघर्ष आ ओकर निरन्तरता अवश्य चाही।कोनहु युग मे कोनो सत्ता-प्रतिष्ठान,कोनो मठ-सम्प्रदाय कोनो प्रतिभाक डगर नहि छेक सकल छै।मैथिलीअहु मे एहन मैथिलेतर लेखक,जिनका मे प्रतिभा छनि,लिखबाक जिद छनि,ध्येय मे निरन्तरता छनि,से अपन परिचिति बनएलनि अछि आ अपन लेखकीय प्रतिभाक धमक कें स्वीकृत करबएलनि अछि।ई परिचिति,ई स्वीकृति कोनो सम्मान,कोनो पुरस्कारक, कोनो प्रमाणपत्रक सोंगरक बेगरता नहि बुझैत अछि।ई स्वीकृति-परिचिति ईच्छा सँ हुअए वा अनिच्छा सँ, घोषित रूप मे हुअए वा मनहि-मन,से महत्त्व नहि राखैत अछि।ओना,जँ लिखब-रचब अहांक धर्म अछि त कोनो स्वीकृति, कोनो परिचिति,कोनो सम्मान-पुरस्कारक अपेक्षहि किऐ?अपन रचनाक मुल्यांकन भविष्य आ भावी पीढी पर छोड़ू।जँ अहां कें बुझाइ ए जे एहि भाषा-साहित्य कें जन्मना वेद-व्यास-समुदाय कब्जएने अछि त अहां कें तुलसीदास बनए सँ के रोकलक?जँ व्यवस्था पर वशिष्ठक आधिपत्य छै आ से अहां कें स्वीकार नहि अछि त विश्वामित्र बनए सँ अहां कें के रोकलक?जँ गुरू द्रोणाचार्य पक्षपाती बनि अर्जुन कें प्राथमिकता/वरीयता दएत अहांक तिरस्कार कए रहल छथि त अहां कें एकलव्य बनए सँ के रोकैत अछि?अहूं धनुर्धर बनू आ जँ गुरू अहां कें एकर अधिकारी नहि मानए छथि त हुनका अपन अऊंठा दए सँ नठबहि टा नहि करू,हुनकरहि अऊंठा छोपि लिअ।जँ अहांक प्रतिभा कोनो मठाधीश-प्रदत्त प्रमाणपत्र वा पुरस्कारादिक असीम लिलसा सँ सुखिकए टटाए नहि रहल अछि,जँ अहांक अतमा पुरहितक पंजी-प्रबन्धक सुरक्षा-कवच मे घुसिअएबाक लेल कलपि नहि रहल अछि,जँ अहांक बौद्धिकता खबासी-कर्मक लेल उताहुल-व्याकुल नहि अछि आ जँ अहांक मेरुदण्ड सोझ रहबाक सत्ती करची वा सांप जकाँ लहरदार हएबाक विषानि प्रवृति दिस लहरिया नहि मारि रहल अछि त फजुलक अरण्य-रोदनक की अर्थ? ई त जेकरहि सँ घीन अछि,तेकरहि देह मे देह रगड़ि ओकर दुर्गंध सँ जनम सोगारथ करबाक कृत्य भेल। ई तहिना हास्यास्पद अछि,जेना कार्ल मार्क्स कोनो धीरूभाई अम्बानी सँ अपन विचारक पुष्टिक कामना करथि,जेना हिरण कोनो शिकारी सँ अपन अमरताक वरदान चाहए,जेना विश्वामित्र कोनो वशिष्ठ सँ ‘ब्रह्मर्षि’ पदक याचना करथि,जेना कोनो भिखारी भिखारिअहि सँ भीखक अपेक्षा करए। जँ एना छै त अहां सम्मानक नहि,दया आ दुत्कारक पात्र छी। जँ विचार मे वैज्ञानिकता आ मानस मे पौरुष अछि, अपन लेखनक सार्थकता पर आस्था अछि त आत्मदया, आत्मग्लानि, आत्मरतिक आत्महन्ता मानसिकताक बेढ सँ बाहर आऊ। बनबाक अछि त अपन श्रम,अपन पौरुष,अपन शक्ति पर विश्वास राखनिहार स्पार्टाकस बनू। सम्मान-पुरस्कार आदिक वांछना कोनो पाप,कोनो अपराध नहि छै। यशेषणा साहित्यकारक लेल स्वाभाविक छै। किन्तु एकरा लेल याचनाक हद तक जाएब,सम्भव छै जे अहां कें लहलहाइत लत्ती बनाए दिअए,किन्तु अहां फलदार-छायादार-छतनार वृक्ष नहि भए पाएब। हारल मन सँ भीख मांगल जाइ छै,जे देनिहारक इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर छै। प्रश्न अछि जे अहां कें भीख चाही वा अपन अधिकार— चुनब अहींक हाथ मे अछि। हारि मानि चुकल व्यक्ति जीवनक कुरुक्षेत्रक एहन योद्धा(?) होइत अछि जे रणक्षेत्र मे उतरए सँ पहिनहि अपन अस्त्र-शस्त्रादि बाहरहि छोड़ि दएत अछि। प्रश्न अछि जे अहां लग कोनो अस्त्र-शस्त्र अछिअहु की? जँ अहां सही माने मे साहित्यक  हस्तिनापुर पर कौरव-दलक बलात आधिपत्य सँ आहत छी,आक्रोषित छी आ ईमानदारी सँ एकर प्रतिरोध करए चाहए छी,त एहि लेल एकाध बेर गारि देबाक बीध पुरि भागिकए कोनटा धए लेब कायरी-विकल्प अछि,कोय कए सकैत अछि,करैत रहैत अछि। जँ अहां मे आत्मसम्मान आ ओकर रक्षाक प्रति सजगता अछि,जँ अहां मे वीरता,पुरुषार्थ आ सँघर्षक सँकल्प अछि त अहां कें अन्यायक विरुद्ध लामबन्द हुअएअहि पड़त,अपन प्रतिरोध कें योजनाबद्ध प्रक्रियाक अन्तर्गत आनएअहि पड़त।कहबी छै जे असगर वृहस्पतिअहु झूठ। तें पहिने पांच टा पाण्डव कें एकत्रित करबाक लेल प्रेरक त बनू। कथा-कविताक पुष्पास्त्रक अपन महत्त्व छै,ओकरहु उपयोग हुअए।किन्तु निर्णायक युद्धक लेल इतिहास,आलोचना आ वैचारिक लेखनक रुद्रास्त्र सँ सुसज्जित भेने बिना विजयक गप त बाद,बराबरी (Draw)बला स्थितिअहुक कल्पना नहि कएल जाए सकैत अछि। ओशो (आचार्य रजनीश) अपन ‘साहस सँ खुलैत अछि ईश्वरक मार्ग’ शीर्षक लेख/प्रवचन मे कहए छथि – ‘सत्यक बहुत रास लोक कें खोज छनि।परमात्माक बहुत चर्चा छै।किन्तु ई सभ साहस सँ कमजोर लोक कए रहल छथि। ओ,जे सँग छोड़बाक लेल राजी नहि छथि आ जे दीया बुतैबाक लेल राजी नहि छथि। अन्हार मे जे असगर चलबाक साहस करैत अछि बिना प्रकाशक,ओकरहि भीतर  साहसक प्रकाश जन्म लेब शुरू भए जाइत अछि। आ,जे अबलम्ब खोजैत अछि,ओ निरन्तर अबल होइत चलि जाइत अछि। हम जखनि कमजोर किंवा शक्तिहीन कहि रहल छी,त एतय तात्पर्य एहन लोकसभ सँ अछि,जे एकटा अबलम्ब पएबाक खोज मे छथि।भगवान कें अहां सहारा/अबलम्ब नहि बुझिअनु।जे लोकनि भगवान कें अबलम्ब बुझैत हएता,से सभ भ्रम मे छथि। हुनका भगवानक अबलम्ब नहि उपल्बध भए सकतनि। साहस सँ रिक्त एहन लोकक लेल एहि जगत मे किछुअहु उपल्बध नहि होइ छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रबीन्द्र नारायण मिश्र लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास) १९म खेप

एहि तरहेँ हमर काज चलए लागल । हमरा आटो,कार ठीक करबाक कोनो लूरि नहि छल । तेँ शुरुमे हल्लुके काज सभ करी । बहादुर आ बटुक अपन-अपन काजमे माहिरछल । बहादुर टेम्पु आ बटुक कार मरम्मतिक काज करैत छल । हम छोट-मोट काज जेना पेंचर साटब,चक्कामे हवा भरब करए लगलहुँ । संगहि नव-नव काज सभ सिखबाक प्रयास करए लगलहुँ । बटुककेँ बेसी ज्ञान रहैक मुदा ओकरा समये नहि रहैक । भोर सँ साँझ धरि भूत जकाँ खटैत रहैत छल । बहादुर ओतेक लुरिगर नहि छल । ओकरा लग काजो कम रहैत छलैक । खाली समयमे ओ यथासाध्य हमरा अपन काजसभ सिखबैत रहैत छल । कखनो काल बटुको किछु-किछु मदति कए दैत छल । हमहु दिन-राति एक केने रही । जतेक संभव रहैक,काज करी । एहिबातसँ मालिक बहुत खुश रहथि । एकदिन असगरमे बजाकए कहैत छथि - " हमरा लगैत अछि अहाँ सभकेँ पछाड़ि देबैक।" " से की?" "अहाँक हाथ बहुत माजल अछि ।" मालिक द्वारा एहि तरहेँ उत्साहित केलासँ हम आओर जोर-सोरसँ काज करए लगलहुँ । मास दिनक भीतरे हमर जनसँ मिस्त्रीक काज करए लगलहुँ आ दरमाहा ,सुनबै तँ गुम्म पड़ि जाएब । पहिलुका महिनामे चारि हजार दरमाहा भेटल छल । एकहि मासक बाद जखन लिफाफा खोललहुँ तँ ओहिमे सँ निकलैत अछि कतेक? अनुमान करू? चलू हमही कहि दैत छी-"सोझे बीस हजार" । नोट गनैत-गनैत पसीना आबि रहल छल । लिफाफा देबए काल मदन बाबू बजाकए कानमे कहने रहथि-" ककरो कहबै नहि । अहाँक दरमाहा अहींकेँ बूझल हेबाक चाही।" "ठीक छैक । हम खुशीसँ मदनबाबूकेँ गोर लगलहुँ आ डेरा बिदा भए गेलहुँ ।संयोगसँ ओहिदिन हम असगरे रही । बटुक आ बहादुर दारू कीनबाक हेतु पहिने निकलि गेल रहए । सभ सँ पहिने हम पुरना मकान मालिकक ओहिठाम गेलहुँ । ओतए कुसुम गेटेपर ठाढ़ि भेटि गेलीह । हुनकर बाँकी किराया चुकता करबाक हेतु लिफाफा हाथमे देलिअनि । " ई की अछि?" "अहाँक बकिऔता किराया ।" "हद भए गेल । एकर अखन कोन ताहिरी छैक?बादमे देखल जेतैक । अहाँ पहिने अपन व्यवस्थातँ ठीक कए लिअ ।" कतबो कहलिऐक ओ लिफाफा नहि लेलथि । हमरा घिचने अपन कोठरीमे लेने गेलीह। देखिते-देखिते ओ हमरा भरि पाँज गछारि लेलथि। डरसँ हमर छाती धर-धर कए रहल छल। होअए कहीं डाक्टर ने आबि जाथि । अनेरेकेँ हंगामा भए जाएत ।हमर चिंताकेँ पढ़ैत ओ कहलीह –“ओ बाहर गेल छथि । काल्हि साँझधरि वापस अएताह ।” कुसुम कोनो हालतमे हमरा जाए नहि देथि आ हम कोनो हालतमे ओतए रहए नहि चाही। "जौँ डाक्टर आबि गेलाह तखन की होएत? "-एही चिंतामे हमर ओ समय कटि रहल छल ।ओमहर बटुक आओर बहादुर भरिपेट दारू पीबि डेरामे हंगामा केने छल । बहादुरक घरबाली तँ अभ्यस्त छलैक मुदा बटुकक घरनी केँ ई एकदम बरदास्त नहि रहैक । ओ हमरा फोन करैत छथि – " कतए रहि गेलिऐक? ई सभ तँ हंगामा कए देने अछि ? जलदी आउ ।" फोनक स्पीकर आन रहैक । कुसुम पुछैत छथि-"की भेलैक?" हमर नवका पड़ोसीसभ पिविकए हंगामा केने छैक ।" "तखन तँ अहाँ नहिए जाउ।" हमरा हँसी लागि गेल । कुसुमक बिआहक कैक साल भए गेल रहैक मुदा धीआ-पूता नहि रहैक । डाक्टरकेँ पीबासँ फुर्सतिए नहि रहैक जे घर दिस सोचैत । मुदा सक्की छलैक एक नंबरक । केओ जँ कुसुमसँ गप्प करैत देखाजइतैक तँ आफत कए दैत छल । तकरबाद दुनूगोटेमे झंझट शुरु होइत । कुसुमकेँ कैकबेर दूपहर रातिमे बफारितोरैत सुनिऐक । पीबि कए कैकबेर ओ हाथो उठा दैत छलैक ।मुदा असलीबात की रहैकसे के आकिएक पुछितैक ? कहाँदनिडाक्टरेमे गड़बड़ीछलैक । कैकबेर जाँच-पड़ताल भेलैक । मुदा ढ़ाकक तीन पात । आइ जखन कुसुम हमरा साफे कहि देलथि तँ हमरा नहि रहल गेल । "तँ एकरा छोड़ि किएक नहि दैत छी?" "एतेक आसान छैक । एखन अहाँकेँ बहुत किछु बुझबाक अछि । ई महानगर छैक ।" "लएह इहोसएह कहि रहल छथि ।आब तँ मोन होबए लागल जे एहि महानगरी नामक बिमारीकेँ ठीके कए दी । मुदा कथी-कथी आ ककर-ककरा ठीक करैत फिरब। ओहिठामसँ निकलैत -निकलैत बहुत राति भए गेल । सड़कपर कुकुरसभ भुकि रहल छल । कतहु केओ नहि देखा रहल छल । आब तँ बड़ी चिंतामे पड़ि गेलहुँ । ताबते एकटा एकदम खाली बस आएल । हाथ देखेलिऐक तँ ठाढ़ कए देलकैक । बसमे चढ़िकए जान-मे-जान आएल । बस संचालक पीने बुत छल । कहिऐ आम बुझैक इमली। आब की होएत? जेबीमे टाका रहए । डर होबए लागल जे कहीं किछु भए ने जाए । मोने-मोन हनुमान चलीसा पढ़ए लगलहुँ। संयोग नीक रहल जे अपन बस स्टाप आबि गेल । बससँ उतरि कए लागल जेना फेरसँ जीबि गेलहुँ । डेरा पहुँचलहुँ तँ देखैत छी जे ओकर बाहरी गेट बाहरेसँ बंद अछि । आब तँ बेस मोसकिलमे पड़लहुँ । एतेक रातिमे कतए जैतहुँ । कतहु केओ नहि देखाइत छल । ओकरासभकेँ बूझल रहैक जे हम बाहर गेल छी तथापि ताला बंद कए ई सभ कतए चल गेल? ताबते मे चौकीदार सीटी मारैत आएल । " बटुकआ बहादुर केँ देखलहक अछि की?" "ओ सभ तँ कनिके काल पहिने अस्पताल गेलाह अछि।" "ककरा की भेलैक?" "बहादुर आ बटुकमे कोनो बात लए कए झंझट भए गेलैक । बहादुरक घरबाली थोर-थाम्ह लगबए गेलैक कि ओकर पैर पिछड़ि गेलैक । ओकरा पाछु बहादुर सेहो खसल। दुनूगोटेक टांगटुटि गेलैक अछि । बटुक ओकरासभकेँ लए कए अस्पताल गेल अछि ।" "बटुकक घरबाली सेहो गेलैक अछि कि घरे मे छैक?" "से नहि कहि सकैत छी । मुदा ताला तँ बाहरसँ बंद अछि।" कहुना कए चौकीदारकेँ मनेलहुँ आ ओकरे संगे साइकलसँ अस्पताल पहुँचलहुँ । ओहि समय रातुक एक बाजि रहल छल । अस्पतालक गेटेपर बटुक भेटल । ओकर मुँहसँ दुर्गंध आबि रहल छल । बात लटपटाइत छल । कहि नहि एहन हालत मे एहिठाम धरि कोन आबि सकल? हमरा देखिते कहए लागल-"हमर किछु दोख नहि । बहादुरेसभटा गड़बड़ केलक अछि। हमरा ओकरा आगुमे ठाढ़ होएब मोसकिल लागि रहल छल । कहुना कए आगु बढ़लहुँमुदा ओ पछोड़ धेने रहल । ताबे पुलिस आबि गेल छल । डाक्टरसभ मामला पुलिसमे रेपोर्ट कए देने रहैक ।पुलिस ओकरा पकड़ि लेलक आ थाना लेने चलि गेल ।अस्पतालमे बहादुर आ ओकर घरबाली भर्ती छल मुदा ओकरसभक हालतक सही जानकारी नहि भेटि रहल छल ।अस्पतालक स्वागत कक्षमे गेलापर पता लागल जे एकटा नेपाली महिलाक किछुए कालपूर्व मृत्यु भए गेलैक अछि। ओकर घरबलाक नाम बहादुर छैक आ ओकरो हालत बहुत खराप छैक । हमरा तँ जेना लकबा मारि देलक । मोने-मोन सोचलहुँ जे हमर भागे खराप अछि । जतहि जाइत छी ओतहि किछु-ने-किछु उकबा उठि जाइत अछि । ओतेक रातिमे जेबे कतए करितहुँ। फेर जखन अस्पताल आएल रही तँ बिना भेंटकेने वापस चलि जाइ सेहो उचित नहि बुझाएल,ओहो जखन कि ओकरासंगे केओनहि रहैक। आपत्तिकालीन वार्डमे आगा बढ़लहुँ तँदेखैत छी जे बहादुरकेँ आक्सीजन लागल अछि । डाक्टरसँ हालचाल पुछलिऐक तँ कहलक-"अजुका राति जँ खेपि गेलाह तँ बुझु बचि गेलाह। अखन किछु नहि कहल जा सकैत अछि ।" रातिभरि जगले रहि गेलहुँ । बहादुरक हालत बेहतर रहैक। मुदा ओकरा अखन अस्पतालमे किछु दिन आओर रहए पड़ि सकैत अछि । डाक्टरसभक अनुसार ओकरजांघक हड्डी टुटि गेल अछि ।तकर शल्य चिकित्सा करबाक हेतैक । ओकरा ठीक होबएमे मासोदिन लागि सकैत अछि । आब समस्या छलजे ओकर घरनीक लहास के लए जाएत ? ओकर अंतिम संस्कार केना होएत ? अखनधरि बहादुरकेँ ई बात नहि बताओल गेल रहैक । जखन ओकरासे पता लगतैक तँ ओकर की हाल रहत? ई सभ बहुत रास समस्या छल। बटुकआबहादुरमेजबरदस्ततालमेलछलैक, घरोमे आबाहरो।तइओएनाकिएकभेलैक? असलमे ओकर सभक कोठरी नामेक लेल फराकछल।ओहिठामआठ-दसटा कोठरी सभ एक-दोसरसँ सटल छल । सभमे तरह-तरहक किराएदारसँ भरल छल । एकहिटा लैट्रीन,एकहिटा स्नानगृह । कोनो निजताक गुंजाइस नहि छलैक । पेट भरबाक जोगारमे अस्तव्यस्तलोकसभ आओर किछु देखबाक-सुनबाक स्थितिमे नहि छल ।असलमे बटुककेँ नजरि बहादुरक घरबाली पर रहैत छलैक जाहि कारणसँ ओ बहुत बातसभपर कान पथने रहैत छल । बहादुर ई बात बुझैक । बटुक सेहो पाछा नहि छल । बहादुरक घरबालीसँ ओकरा बेस जमैत छलैक । मुदा ओहिदिन पीबिकए ओकर मोनक कुंठा जाग्रत भए गेल रहैक । हम अस्पतालक हातामे इएहसभ सोचैत घुमैतरही कि विजय देखेलेथि। ओ एही मामलाक तहकीकात करएआएल रहथि । "की औ! एतेक रातिमे एतए कोना छी? सभ किछु ठीक अछि ने ?" "ठीक की रहत?" "की भेल?" ओकरा कहनाइ शुरुए केने रही कि बहादुरक नाम अबिते ओएह बात लोकि लेलथि। "अहाँ एहि चक्करमे कोना पड़ि गेलहुँ ।" "हमर पड़ोसीसभ छथि। आइ-काल्हि हम ओतहि रहैत छी ।" "चुपचाप खसकिजाउ, नहि तँ थाना-पुलिस करैत-करैत एँड़ी खिआजाएत । ई महानगर छैक । एहिठाम अपन काजसँ मतलब राखू ।" फेर ओएह बात । महानगरी छैक तकर माने की? की एतए मनुक्ख नहि ,दानव रहैत अछि? ई एहिठामक समाज एतेक विचारहीन होइत अछि जे खसलव्यक्तिकेँ मरैत छोड़ि आगा बढ़ि जाइछ।" "एहिना कबाइत पढ़ैत रहि जाएब । अहाँनहि सुधरब ।जानी अहाँ आअहाँक काज। हम तँ कहबे ने करब । अहाँक भाग्य तँ नहि बदलि देब ।"- विजय बाजल । " हमरा किझु नहि बुझा रहल अछि ।" "जखन अपन माथा नहि काज करए तँ कम सँ कम दोसरोक सुनल करी ।" " की करू से अहीं कहू । " विजय इसारा केलक जे हम ओकर जीपक पछिलका सीटपर बैसि जाइ । हम सएह करैत छी । विजय रस्ते-रस्ते कहैत गेल-" मुफ्तमे हत्याक केसमे फँसा देल जाएब । जिनगी भरि काहि कटैत रहि जाएब । अपन लोक छी तैँ कहि रहल छी,नहि तँ हमरा की ? आगा अहाँक मर्जी ।" कनी कालमे जीप विजयक आङनमे ठाढ़ छल । जीप देखितहि किशुन आ मालती संगे विजयक घरसँ बाहर भेल । ओकरासभकेँ संगे देखि हम छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ । विजय ई बात तारि गेल । " किशुन आ हमर सासुर एकहि गाममे अछि।ताहि हिसाबे ओहमर साढ़ूए छथि।" "सएह कहू ,ई बात हमरा पहिने किएक नहि कहलहुँ?" “बुझिए कए की करितहुँ?ई महानगर छैक । एहिठाम बहुत किछु सोचि कए चलए पड़ैत छैक ।अहाँकेँ हमर बात कठाइन लगैत होएत मुदा समय अएलापर अपने सभबात बुझा जाएत । कतेक मोसकिलसँ सीआइडीक खातासँ अहाँक नाम हटओने रही । आब फेर जौँ फसलहुँ तँके बचाओत?"- विजयबाजल । महानगर नहि भए गेल ,एकटा तमासा भए गेल । जकरे देखु सएहपाकल पड़ोर बनल घुमि रहल अछि।विजयक बात सुनि हम तुरंते झोड़ा उठा बिदा भए गेलहुँ । विजय, मालती आओर किशुनक बीचमे बेस तालमेल बुझाएल।कहि नहि से कोना भेलैक? टाकामे बहुत ताकति होइत अछि।संभवतः एहि सभक रहस्य ओएह छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नन्द विलास राय करौना रामू कक्काकजमाए विनीतजी दिल्लीक एकटा प्राइवेट कम्पनीमे नौकरी करै छथिन। नीक पाइयक आमदनी छैन। विनीतजी तेज-तर्रार लोक। पाँच-सात बर्खसँ दिल्लीमे रहै छैथ। दू बर्ख पहिने रामू कक्काक बेटी रीतासँ बिआह भेलैन। बिआहक बाद छह मास धरि रीता सासु-ससुरक संग सासुरेमे रहली मुदा छह मासक बाद जखन विनीतजीक नौकरीमे तरक्की भेलैन तँ दरमाहा सेहो बढ़लैन। कम्पनी तरफसँ क्वाटर सेहो भेटलैन तँ ओ अपन पत्नी रीताकेँ दिल्ली लऽ गेला। भगवानक कृपासँ रीताक पएर भारी भेलइ। पहिल बच्चा तँए सावधानी बरतब जरूरी, तँए जखने रीताक पएर भारी भेलै विनीत जी महिला डॉक्टरसँ रीतकोँ देखा सलाह लेलैथ। महिला डॉक्टर मासे-मासे रीताकेँ सम्पर्क करए लेल कहलखिन। जखन पाँचम मास चढ़लै तँ रामू काका आ सीतीया काकी सेहो बेटी-जमाए ओतए दिल्ली गेलैथ। रामू काका आ सीतीया काकीकेँ लऽ कऽ एकेटा सन्तान आ ओ रीता। तँए जखने बेटीक पएर भारी हएब सीतीया काकी सुनली तखनेसँ बेटी ओतए दिल्ली जेबा लेल आफन तोड़ए लगली। मुदा जेती केना, माने दुआरिपर एकटा बाछी छैन, तेकरा छोड़ि कऽ केना जेती?पाँच दिन पहिने ओ बाछीकेँ एक गोरेकेँ पोसिंया दऽ देली आ छठम दिन रामू काका सीतीया काकी दिल्लीक लेल बस पकैड़ लेली। दिल्ली पहुँचलापर बेटी रीता आ जमाए विनीतजी बड़ खुश भेला। रामू कक्काक विचार रहैन जे बेटीक हाल-चाल बुझि एक सप्ताहक भीतर गाम वापस भऽ जाएब। मुदा से भेलैन नहि। एक्के ठीन जमाए कहलकैन- “अखन जाएब केना नीक?भगवानक कृपासँ हमरा कोनो चिजीक अभाव नै अछि डेरो फइल-ऐल अछिए। सुतै-बैसैमे कोनो दिक्कत नहियेँ अछि। क्वाटरमे तीनटा बेड रूम, एकटा किचेन, एकटा ड्रांइगरूप आ लेटरीन-बाथरूम सभरूममेएटाएच अछिए।” माने जाबे धरि रीताकेँ सुहिरदे पूर्वक बच्चा नै जनैम जाइ छै ताबे धरि दुनू गोरे यानी रामू काका आ सीतीया काकीकेँ दिल्लीएमे रहए पड़तैन।की करितैथरामू काका आ सीतीया काकी बेटी-जमाइक बात मानए पड़लैन। गामोपर कोनो काज नहियेँ छेलैन। खेतीयो-पथारी नहियेँ जकाँ छैन। बालो-बच्चाक नाओंपर एक्केटा सन्तान रीतेटा। रामू काका कहलखिन- “पाहुन, हम सभ अहाँक बात मानि एतए रहब मुदा हमरा डेरामे बैसल नीक नहि लागत तँए कोनो छोट-छीन नौकरी लगा दिअ।” जमाए बाबू कहलकैन- “ठीक छै, जँ अपनेक सएह मन अछि तँ तेकरो जोगार भऽ जेतै, ओना हम कहब जे अपने डेरेपर रहू। कवि छीहे, डेरेपर बैस कऽ कविताक रचना करैत रहू। दिल्लीयोमे कवि गोष्ठी होइत रहै छै ओइमे भाग लिअ।” तैप्र रामू काका कहलखिन- “डेरामे बैसल-बैसल मन उबिया जाइत अछि। तँए कोनो नोकरी करब तँ मनो लगल रहत आ दूटा पाइ सेहो हएत।” विनीतजी एकटा कम्पनीमे रामू काकाकेँ दरवानक काज धरा देलकैन। सीतीया काकी बेटीक भानस-भात आ कपड़ा-लत्ता धोइमे मदैत करए लगलखिन। जखन रीताक पएर भारी भेना सात मास भऽ गेलै तखन करोना बेमारीक कारण पूरा देशमे लॉक-डॉन लागू भेल। सभ कल-कारखाना, दोकान-दौरी, कारवार सभ बन्न भऽ गेल। खाली दवाइ देाकान, फल, किराना आ सब्जीक देाकान सभ खुजैत रहए। तहूमे दबाइ दोकानक अलावे किरानी, फल आ सब्जीक दोकान समयसँ खुलए आ समयसँ बन्न भऽ जाए। रामू कक्काक नौकरी सेहो छुटि गेलैन किए तँ कम्पनीए बन्न भऽ गेलइ। विनीतजी मासे-मास रीताकेँ महिला डॉक्टरसँ देखबिते छला। दिल्लीमे करोना वायरसक प्रकोप बेसी बढ़ि गेल। डॉक्टरो सभ करोना,ख वायरससँ संक्रमित होमए लगला। केतेक डॉक्टर तँ अपन प्राइवेट क्लिनिक बन्न कऽ देलैन। हँ, करोना वायरसक संक्रमण बढ़लासँ खानगी नरसिंग होमक मालिक चानी काटैए। पाँच लाखसँ लऽ कऽ दस लाख टका लऽ कऽ करोना वायरससँ संक्रमित बेकतीकेँ इलाज करैए। बुझू जे करोना वायरसक नाओंपर लूटम-लूट होइए। रीताक नवम् मास चलि रहल छेलइ। विनीतजी रीताकेँ लऽ कऽ डॉक्टर (जइ डॉक्टरसँ देखबैत छला) ओतए पहुँचला। संगमे रामू काका आ सीतीया काकी सेहो छेली। डॉक्टर कहलकैन- “रीताकेँ करोनाक जाँच करबए पड़त।” विनीतजी पुछलखिन- “जाँच केतए हएत?” तैपर डॉक्टर प्राइवेट जाँचघरक पता आ स्लिप देलखिन। विनीतजी रीताकेँ लऽ कऽ डॉक्टर साहैबक बतौल जाँचघर गेला। ओतए रीताक कण्ठ लगसँ पाइपसँ सेम्पल लेल गेल। जाँच घरक डॉटर विनीतजीकेँ फोन नम्बर सेहो लेलखिन। विनीतजी पुछलखिन जाँच रिपोर्ट कखन भेटत। तैप्र जाँच घरक डॉक्टर कहलकैन- “रिपोर्ट तैयार भऽ जाएत तँ फोनसँ अहाँकेँ खबैर कऽ देब।” विनीतजी सेम्पल दऽ सभतूर डेरा आबि गेला। डेरामे मोबाइल चार्जमे लगा कऽ बजार दिस गेला।रामू काका एकटा कविता लिख रहल छला तखने विनीतजीक मोबाइलमे घन्टी बजल। रामू काका चार्जमे सँ मोबाइल निकालि कऽ हरियरका बटन टिपैत बजला- “हेलो, के बजै छिऐ?” ओम्हरसँ अवाज आएल- “हम खन्ना जाँच घर का डॉक्टर बोल रहे हैं। आपकी पत्नी का जाँच रिपोर्ट पोजेटीव आया है।” तैपर रामू काका कहलखिन- “रीताहमारी बेटी है।” तैपर मोबाइलमे सँ अवाज आएल- “देखिए, आपकी बेटी को अविलम्ब मलहोत्रा नरसिंह होममे भर्ती करना पड़ेगा। लगभग पाँच लाख रूपये का प्रबन्ध कीजिए। देखिये आपकी बेटी को बच्चा होनेवाला है। मामला सीरियस है। जल्दी कीजिये। अगर और बेहतर इलाज चाहते हैं तो सात-आठ लाख रूपैआ का बेवस्था कीजिये, दिल्ली का ए-वन नरसिंग होममे भर्ती करबा देंगे। गारंटी के साथ इलाज होगा।” रामू काका कहलखिन- “अच्छा गारजियन आते हैं तो कहते हैं।” रामू कक्काक आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलैन। कनेक कालक बाद सीतीया काकी चाह नेने रामू काका लग एली तँ पतिकेँ कनैत देख पुछलखिन- “मर्र!ई की भऽ गेल।कनइ किए छिऐ?” मुदा रामू काका किछु ने बजला। ओ सोचए लगला जे जखन रीताक माएकेँ कहबैन तँ ओ आर दुखी हेती आ जोर-जोरसँ कानए लगती। रीताकेँ मालूम हएत तँ ऊहो दुखी हेती। तँए रामू काका सीतीया काकीकेँ किछु ने बतौलखिन। तखने विनीतजी बजारसँ सब्जी आ किरानी समान लऽ कऽ डेरा पहुँचला। ससुरकेँ आँखिमे नोर देख पुछलखिन- “की बात छिऐबाबूजी, अपनेक आँखिमे नोर देखै छी..!” रामू काका विनीतजी केँ मोबाइलपर भेल सभ बात बता देलकैन। विनीतजी सोचए लगला रीतामे तँ करोना बेमारीक कोनो लक्षण नै छल। फेर रिपोर्ट पॉजिटीव केना आएल? विनीतजी सोचमे पड़ि गेला। तखने मोबाइलक घन्टी बाजल। विनीतजी फोन रिसिव करैत बजला- “आप रीता का पति बोल रहे हैं?” विनीतजी कहलखिन- “हँ, हम रीता का हसबेन्ड बोल रहे हैं। आप..?” बिच्चेमे अबाज आएल- “हम खन्ना जाँच घरसँ बोल रहे हैं। आपकी पत्नी का रिपोर्ट पॉजेटीव है। कम-सँ-कम पाँच लाख का प्रबन्ध कीजिए। मलहोत्रा नरसिंग होममे भर्ती करा देते हैं। अगर उससे भी बेहतर इलाज चाहते हैं तो सात-आठ लाख का बेवस्था कीजिए। समझे, देखिये मामला सीरियस है जल्दी कीजिये।” विनीतजी कहलखिन- “ठीक है। हम रिपोर्ट लेने आ रहे हैं वहीं बात होगी।” ई कहि विनीतजी फोन काटि देलखिन। विनीतजी अपने दिल्लीक फेरल लेाक। एम.ए. पास केला बाद दिल्लीए आबि गेल छला। किछु दिन सरकारी नौकरीक लेल प्रयास केलैथ मुदा सरकारी नौकरी नइ भेटलैन तँ प्राइवेट कम्पनीमे काज करए लगला। प्राइवेट नरसिंग होम सभमे केना मुल्लाकेँ फँसौल जाइ छै आ नीक इलाजक नाओंपर केना लूटल जाइ छै, सभ बात विनीतजीकेँ बुझल। तँए ओ जाँच रिपोर्ट पॉजिटीव सुनला पछाइतो घबड़ेला नहि। टेम्पू केलैथ आ रिपोर्ट आनए विदा भऽ गेला। रामू काका कहलखिन- “हमहूँ संग चलै छी।” तैपर विनीतजी कहलखिन- “नइ, अपने नइ जाउ। हम रिपोर्ट नेने अबै छी। ताबे अपने सभ तैयार रहब आ रीताकेँ सेहो तैयार राखब। हम ओम्हरेसँ गाड़ी नेने आएब। रीताकेँ जय प्रकाश नारायण अस्पतालमे भर्ती कराएब।” ई कहैत विनीतजीचलि गेला। खन्ना जाँच घरक डॉक्टर विनीतजीकेँ बड़ उन्टा-सीधा समझौलकैन। डॉक्टर कहलकैन- “देखिये आपकी पत्नी को दस-पनरह दिन के भीतर बच्चा होनेवाला है। इसलिऐ किसी अच्छा नरसिंग होममे भर्ती कराना जरूरी है ताकि करोना का अच्छा इलाज हो सके। अभी मलहोत्रा नरसिंग होम में अच्छा इलाज हो रहा है। बेवथा भी ठीक है। पाँच लाख रूपये लगेंगे।” तैपर विनीतजी कहलखिन- “मैं साधाराण आदमी हूँ। मेरी हैसियत किसी प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने का नहीं है। मैं किसी सरकारी अस्पताल में इलाज कराऊँगा।” डॉक्टर कहलकैन- “आप कम से कम कितना खर्च कर सकते हैं। मैं कुछ छूट भी करबा दूँगा।” विनीतजी कहलखिन- “मेरे लिए अभी करौना वायरस के चलते लॉक-डॉनमे परिवार चलाना भी मुश्किल है। लाइये रिपोर्ट दे दीजिए।” डॉक्टर रिपोर्ट दैत कहलकैन- “मेरा काम अपको अच्छा रास्ता दिखलाना था। आगे आप जाने और आपका काम।” तैपर विनीतजी कहलकैन- “सलाह के लिए धन्यवाद।” रिपोर्ट लऽ विनीतजी विदा भऽ गेला। डॉक्टर विनीतजीकेँ जाइत देखैत रहि गेला। ओ सोचए लगला, मुल्ला फँसा नहीं। विनीतजी एकटा बोलेरो गाड़ीबलाकेँ फोन कऽ बजौलैथ आ डेरापर एला। डेरापर सभ गोरे तैयार रहबे करैथ। गाछ़ीमे रीताकेँ बैसा रामू काका अ सीतीय काकीक संगे विनीतजी जय प्रकाश नारायण अस्पताल पहुँचला। ओतए रीताकेँ भर्ती कऽ देलखिन। अस्पतालक डॉक्टर विनीतजीकेँ कहलकैन- “करोना से घवड़ाने की आवश्यकता नहीं है। वैसे आपकी पत्नी को दस-पन्द्रह दिनों के भीतर डिलेभरी होनेबला है। खून चढ़ाना पड़ेगा।” विनीतजी डॉक्टरकेँ कहलकैन- “सर मेरा खून ले लीजिये। मेरे खून का ग्रूप और मेरी पत्नी का खून का ग्रूप सेम है।” तैपर डॉक्टर कहलकैन- “आप तो अपने दुबले-पतले है। आपके शरीर से खून नहीं निकाला जा सकता है।” रामू काका कहलखिन- “सर हमर खून लऽ लिअ।रीताक हम पिता छिऐ।” डॉक्टर शायद मैथिले छला। ओ बजला- “नहि, अपनेक उमेर बेसी भऽ गेल अछि। तँए अपनेक खून काज नइ करत। कोनो जवान बेकतीक खून चाही। दू तीन दिनक भीतर खूनक प्रबन्ध करू।” रीताकेँ भर्ती कऽ सभ गोरे डेरा आबि गेला। विनीतजी अपना मित्र-मण्डली आ सगा-सम्बन्धी जे दिल्लीमे छला सभकेँ खून देबा लेल आग्रह केलखिन, मुदा कियो तैयार नइ भेलैन। विपीतजी खूनक लेल चिन्तित भऽ गेला। ओ रामू काकाकेँ कहलखिन- “बाबूजी खूनक बेवस्था तँ भइये ने रहल अछि। केना हएत। अपनेकेँ कियो चिन्ह-पहचीनक लोक दिल्लीमे छैथ तँ प्रयास करियौ।” तैपर रामू काका कहलखिन- “अछि तँ केतेको सर-कुटुम, मुदा रक्तदान करता कि नहिसे नइ जानि।” विनीतजी कहलखिन- “प्रयास कएल जाउ ने।” रामू काका अपन सर-कुटुम, गौंआँ-घरूआ आ अड़ोसी-पड़ोसीकेँ फोनोसँ आ भेँटो करि कऽ कहलखिन। मुदा कियो तैयार भेलैन। दिल्लीमे एकटा संगठन अछि, नाओं छिऐ- सुच्चा मैथिल। मुख्य रूपसँ ओ संगठभ्न मैथिली भाषाक साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी लोकनिक संगठन छी। रामू काकाकेँ कवि सम्मेलनमे ओइ संगठनक अध्यक्ष अस सचिवसँ परिचय भेलैन। रामू कक्काक कविता सुनि संगठनक अध्यक्ष, सचिव प्रभावित भेल छला। रामूओ काकाकेँ ओइ सुच्चा मैथिल संगठनक सदस्य बनौल गेलैन। बरबरि संगठनक अध्यक्ष, सचिवसँ रामू काकाकेँ सम्पर्क मोबाइल द्वारा होइ छेलैन। रीताकेँ अस्पतालमे भर्ती केलाक पाँचम दिनक गप छिऐ। रामू काका आ विनीतजी रीताक लेल खूनक बेवस्थापर गप करै छला कि रामू कक्काक मोबाइलक घन्टी बाजल। रामू काका मोबाइलक रिसिभ करैत बजला- “हेल्लो, हम रामू बजै छी।” ओम्हरसँ अवाज आएल- “हम सुच्चा मैथिली संगठनक अध्यक्ष बजै छी। की हाल-चाल अछि कविजी?” तैपर रामू काका बजला- “प्रणामअध्यक्षजी, हमर हाल-चाल ठीक नइ अछि। बेटीकेँ बच्चा होमए बला अछि। खूनक बेगरता अछि। अखैन धरि खूनक बेवस्था नइ भऽ सकल अछि।” अध्यक्षजी बजला- “केतेक खून चाही। जेतेक खूनक बेगरता हएत भऽ जेतै, अहाँ चिन्ता जुनि करू। रातिमे दस बजे हमरा फोन करब।” दस बजे रातिमे रामू काका अध्यक्षजीकेँ फोन केलकैन। अध्यक्षजी कहलकैन- “काल्हि ती गोरे अहाँक डेरापर जएत। अहाँ तीनू गोरेकेँ अस्पताल लऽ जाएब आ जेतेक खूनक बेगरता हएत ओ सभ देता।” सएह भेल। जेतेक खूनक अवश्यकता छल ओतेक खून एके गोरे दऽ देलकैन। रीताकेँ खून चढ़ौल गेल। दसम दिन रीता एकटा लड़ाक जन्म देलक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी चुनरी (बीहनि कथा) आशा दीदी बस स्टॉप पर ठाढ़ि छलीह ।  हुनका बगलमे ठाढ़ पुरुख उचकि - उचकि क' देखनि जेना - शंका भेलनि तँ टोकि देलखिन : -  अहाँ  प्रतीक्षारत नहि मुदा किनको तकै छियै - नै ? -  नहि - नहि ! ओहिना । -  तकर माने अहाँ हमरामे हेरायल छी - नै ? -  से नहि । मुदा एकटा चुनरी जँ अहाँक देह पर होइताय ..... -  जखन लोकक नजरिए मे खोंट रहतै तँ  झलफांफी चुनरी कोन काजक ? पुरुख हाथक समतोला छिटकि क' रोड पर गुड़कि गेलै । ओ आगू बढलाह ता मे बस समतोला पर चढ़ि गेल रहैक । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.बिनय भूषण-दू टा कविता- १.आइ पिरथी दिवस अछि २.आखिर एना कियैक लागि रहल अछि बिनय भूषण-संपर्क-7003286056 दू टा कविता- 1.आइ पिरथी दिवस अछि 2.आखिर एना कियैक लागि रहल अछि 1 आइ पिरथी दिवस अछि ग्लोबक कोन - कोनमे भऽ रहल अछि माय धरती के जयजयकार पिरथीक संरक्षणक लेल ठाम - ठाम भऽ रहल अछि जुटान गणपति सभ मना रहल छथि पिरथी - दिवस के उत्सव समस्त लक्ष्मीपतिक भीजल ठोरसँ निकसि रहल अछि ओजपूर्ण वक्तव्य धरतीकेँ हरियर कचोर बनेबाक लेल पिछला वर्ख जकाँ पुनः दोहराओल जाइत अछि संकल्प गणपति सभ पिरथीकेँ बचेबाक लेल सिरजैत अछि असंख्य विधान धरतीक मुस्कानकेँ अक्षुण्ण रखबाक लेल जंगलकेँ बचा कऽ रखबाक लेल जाइत अछि सपथ सदानीरा नदी जे मिझबैत अछि पिरथीक पियास तकर अस्तित्वक  संरक्षणक लेल बनाओल जाइत अछि कानून आब एहि ब्रह्मांडक कोनो देश नहि करत एक्कोटा परमाणु - परीक्षण टी० वी० पर मचैत छैक अनघोल पीचरोड पर आब कम भऽ जेतैक धूइयां वला गाड़ी आब चिमनीसँ बहरेतैक प्रदूषणकारी धूइयां बहुत कम आब किसानीक लेल बचाओल जयतैक धरती गाय - भैंस आ बरदक पालनकेँ कयल जयतैक उत्साहित रासायनिक खादसँ बाँझ होइत धरतीकेँ बचेबाक लेल गोबरक खादसँ बढ़ाओल जेतैक धरतीक ताकति लागि रहल छैक जेना पिरथीक समस्त समस्याक आइये भऽ जेतैक समाधान । मुदा किछुए दिनक पश्चात समस्त गणपति आ लक्ष्मीपति अर्थयुद्धक दौड़मे एक दोसराकेँ पछाड़बाक लेल लगब' लगबैत अछि सरपट दौड़ न'केँ निन्यानवे करबाक नव - नव तकनीकक होम' लगैत अछि आविष्कार स्वयंकेँ सर्वश्रेष्ठ साबित करबाक लेल कर' लगैत अछि प्रकृतिक दोहन काटल जाइत अछि हरियर - हरियर गाछ अन्धाधुन्ध लगाओल जाइत अछि फैक्ट्री देश आ देशक बीच अपन प्रभुत्वकेँ बढ़ेबाक लेल होम' लगैत अछि हथियारबन्दीक होड़ असंख्य गाड़ी दौड़' लगैत अछि वाट पर गरम होब' लगैत अछि हवा पटपटाब' लगैत अछि पिरथीक काया औनाब' लगैत अछि पिरथीक सन्तान पिरथीक आँखिसँ बह' लगैत अछि कोशी कमला बलान हवामे गुंज' लगैत अछि पिरथीक क्रन्दनक कारुणिक स्वर । अपन सन्तानक समस्त दुखकेँ दूर करबाक लेल रोगाह काया रहितो पिरथी सिरज' चाहैत अछि जीवन उच्च तापक्रमक बोखारसँ पीड़ित रहितो अपन घबाह वक्ष पर पिरथी रोपि लैत अछि असंख्य गाछ लुटब' लगैत अछि असंख्य स्वादिष्ट फल विपरीत परिस्थिति रहितो अपन काया पर पिरथी सिरजैत अछि हरियरी गम्हरैत धानक शीशमे भरैत अछि जीवन रस पिरथी गहुँमक सोनुहला शीशमे पिरथी भरैत अछि जीवनक सुगंध चाहैत अछि पिरथी जे ओ मुक्त हस्तसँ परसय सुख - समृद्धिक समस्त सनेस दूर करय जीवक समस्त क्लेश पिरथीक वक्ष पर जे मनुक्ख लगौनय जा रहल अछि पजेबा, बालु आ सीमेंटक जंगल ओहि जंगलमे संताप आ खतराक अदंककेँ अपन हियामे जोगने कछमछाइत जीबि रहल अछि लोक पिरथीक आँखिसँ बह' लगैत अछि ममताक नोर पता नहि कियैक आइ जखन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मना रहल अछि पिरथीक पावनि हमर कानसँ टकरा' रहल अछि पिरथीक कर्णभेदी झौहरि । 2 आखिर एना कियैक लागि रहल अछि एखन पूव क्षितिजसँ हुलकि रहल छथि बालारुण सूर्य निशाक घोर तिमिरकेँ ललकारि रहल छथि बाल - दिवाकर फूला गेल अछि राजीव पंकजक मुस्किआइत पाँखिक प्रतिबिंबसँ आह्लादित भऽ गेल अछि सरोवरक निर्मल तल पोखरिक महार पर ठाढ़ पाकरिक गाछ पर चुनमुना' रहल अछि चिड़ैं हरियर - हरियर दूभि पर चमकि रहल अछि मोती हम घरसँ बहरयबाक क' रहल छी प्रयास आँखिक आगू देखाइत अछि अन्हार हम जंगलासँ हुलकि - हुलकि जोह' लगैत छी कोनो इजोतक अाश चारूकात देखाइत अछि अन्हार अन्हार अन्हारे - अन्हार हमर हृदयमे पैसल अदंकक नागफेनी क' दैत अछि लोहुलोहान हमर आत्माकेँ हम डेराइत - डेराइत घरसँ बहरेबाक लेल संगोर' लगै छी धैर्य आ साहसक अमृत सुरूज तँ प्रारंभहिसँ अपन ज्योति आ धाहसँ अपन अजस्र ऊर्जाक स्रोतसँ करैत रहल अछि सदिखन आवेशित हमर आत्माकेँ हमर जिजीविषाकेँ सदिखन करैत रहल अछि उद्वेलित सुरूज सुरूजे तँ परसैत रहल हमरा लेल समस्त जीव - जगत लेल जीवन अमृत पता नहि कियैक आइ हमर आँखिक आगू देखा' रहल अछि भय आ अदंकक हवा हमर जीवन - संघर्ष आ साहस हमर अक्खड़पन आ अपराजित होयबाक अटल संकल्प तिलमिला' रहल अछि आइ  । जीवन जीवाक लेल जरूरी अछि रोटी रोटीक लेल जरूरी अछि श्रम श्रम करबाक लेल जरूरी अछि शक्ति शक्तिक लेल जरूरी अछि रोटी रोटीक लेल जरूरी अछि अन्न अन्नक लेल जरूरी अछि श्रम श्रमक लेल जरूरी अछि ताकति आ आरोग्य आरोग्यक लेल जरूरी अछि स्वच्छ हवा स्वच्छ पानि आ स्वच्छ माटि हमर कानसँ टकराइत अछि बेरि - बेरि जे हवामे मिझरा' गेल अछि कोरोनाक जहर सुनैत छियैक जे इ कोरोना ल' लैत अछि मनुक्खक प्राण हम अपना अापकेँ अपन घरमे बन्न करबाक लैत छी निर्णय सोच' लगै छी जे किछु दिन धरि भूखल रहबाक करी अभ्यास सुरूज जे हमरा जीयत रखबाक लेल एहि पिरथी पर अस्तित्वक संरक्षण लेल जरैत छथि स्वयं अजस्र धाहमे अपन धाहसँ सिरजैत अछि जीवन एहि पिरथी पर दैत रहल छथि साहसक सनेश एहि पिरथीक समस्त जीवकेँ पता नहि कियैक आइ भोरे भोर ओ कहि रहल छथि हमरा घरेमे रहू ,जुनि बहराउ कोनो आन ठाम । पेटमे धधकैत भूखक आगिकेँ मिझेबाक लेल आवश्यक अछि रोटीक जोगार हमर घरक पछुआरमे एकटा मैदानमे फुदकैत किछु खजन चिड़ैया हमर झुर्रियायल चेहरा देखि हमरा पर ठठा'केँ हँसल छलीह चरी करैत - करैत मुँह दुसने छलीह हमरा हमरा विस्मय भेल छल ओहि खजन चिड़ैयाँ पर हम तँ एकरासँ करैत छी आत्मिक प्रेम कतेको बेरि जखन ओ लुब - लुब करैत हमर छरियायल दानाकेँ खाइत होइत छलीह अत्यंत प्रसन्न ओकर आँखिमे चमकैत छलैक कृतज्ञताक इजोत शायद ओ हमर अकर्मण्यता आ विवशताक उड़ा' रहल छलीह मजाक हमर अन्तरमे जन्मैत विस्मयक औंकुरी सुखा' जाइत अछि अनायास हम सोच' लगै छी अपन नियति नाप' लगै छी जीवन आ मृत्युक बीचक दूरी देख' लगै छी मनुक्खताइ आ सामाजिकताक बदलल परिदृश्य आँखिक आगु अत्यंत निर्मम मुद्रामे ठाढ़ देखाइत अछि यमराज डोल' लगैत अछि हमर आत्मविश्वासक कैलाश हमर मोन कहियो नञि सोचनय छल जे हमर आँखिक आगू ठाढ़ होयताह यमराज आइ अनायास सोचि रहल अछि मोन जे हम आबि गेल छी मृत्युक लगीच मृत्यु - भूखसँ मृत्यु मृत्यु - कोरोनासँ मृत्यु । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.स्त्री कोना (सम्पादक- इरा मल्लिक) ४.१.रागिनी मनोरथ-शिक्षा ४.२.प्रीति प्रभा- मनोरथ ४.३.चंदना दत्त- मोह रागिनी मनोरथ शिक्षा भोर भेल सूरज घर आयल खोलू मनऽक किवाड़ चलू आखर-आखर जिनगी पढ़ी कऽ जीवनके उद्धार करू। कटनी, कुटनी सब भऽ जायत घर अंँगना सभ रचि-बसि जायत हल शिक्षाके मन जौं चलतै दिव्य कमल मनमे खिल जायत। देर भेल किछ मन नै मारू अखनेसँ शुरुआत करू आखर-आखर जिनगी पढ़ी कऽ जीवनके उद्धार करू। ज्ञानक कुंजी जे मन धारे जीवन भव हर्षित तरि जाए बिन शिक्षा पशुगत जीवन अछि गहन तिमिर भटकैत बुरि जाए। शिक्षाके जगमग दुनियाके आऊ सब सत्कार करू आखर-आखर जीनगी पढ़ी कऽ जीवनके उद्धार करू। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रीति प्रभा मनोरथ एक मनोरथ पूर्ण करू हे दाता रहे सकल जग स्वस्थ विधाता मात भवानी अहिं पर आसरा सबके करै छी नित सुमिरन अहीं के  अंबे बाल -गात सब बिखरल- पसरल कतःविलोकित चहक विभोर प्रातः वंदन करी हम जगदंबे अहिं छी सबहक पालनहार मानव तअ अछि कठपुतरी करियौ माफ नादानी-कुविचार। अप्पन ह्यास के रचयिता हमसब भौतिक सुख में उजाड़ल बाग महल सुख के चाहत बनल अछि कतःदेखब आब विपिन देवदार उचित ज्ञानपूँज दियौ हे अंबे घर -घर गुँजत शहनाई,आँगन घुटरून बाल गोपाल एक मनोरथ पूर्ण करू हे दाता रहे खुशहाल जगत के प्राणी गुँजै भँवरा झूमे जन जन हरित रहै पादप परिवार। -प्रीति प्रभा, जमशेदपुर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। चंदना दत्त मोह “आइयो नहिं आयल दुनू भाय, कि विचार केलक नहिं जानि.” सोचैत पवित्री देवी जांतमे अरवा चाउर पीसय लगलीह. आंय यै काकी अहां अपने दुखित छी, आ इ कि करय बैसलौंह यै? बुझि पड़यै प्राण त्याग य लेल तैयार छी|  रहिका वाली जे आय तीस वर्खसं काज धेने छन्हि से लौहछैत बाजि उठल, ओ रातिखन ज्वरसं तपैत काकीकें कहुना एकटा सोहारी संगे गोटी खुआ कय गेल छल , से भोरखन हुनका जांत पीसैत देखि छगुनता संगे तामस लहलहा गेलय ओकर. “नहि हमरा कि हैत गय रहिकावाली, तों जे रातिखन जांतिपीचि क गोटी खुआ देलैं से मोन हल्लुक लगैत छल दुनू भायक अबैया छैक ने तें कनि पीसय लगलहुं चिक्कस, बड्ड नीक लगय छैक दुनूकें , शहरमे कतय खाइत हैत कनि अललू कुम्हरौरीके तीम्मन क दिहय आ आमकके चटनी.” ठीके कहय छै, मायक जी गायसन आ पुतक कसायसन, जहियासं नौकरी आ बियाहदान भेलनि दुनू भायके खाली धानपान आ आमे लेबय आबय छथिन्ह अखन ऐहन दुखित छथिन्ह ई पढुआ कका दसदिनसं फोन पर फोन करय छथिन्ह से अखनधरि पलखति नहि भेलनि अछि. गय कि करबहि परान छुटि जायत त पुरखाक देहरि नहिने छुटत, ल जायत त महिना दु महिना लेल बांटि लेत तहिसं त नीके ने. कहैत आंखिक नोर आंचरक कोरसं पोछय लगलीह पवित्री देवी. -चंदना दत्त, रान्टी, मधुबनी अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार    अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल     CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी                         माहुर                          करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका)       डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/  (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta           97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 १६) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक VIDEHA 313 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १७) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-२ VIDEHA 317 १८) रामलोचन ठाकुर विशेषांक VIDEHA 319 १९) रामलोचन ठाकुर श्रद्धांजलि विशेषांक VIDEHA 320 १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७  (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन  नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]  तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]  तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। ३ विदेह अपन आगामी अंक (२०२१ क प्रारम्भमे) श्री रामलोचन ठाकुर पर विशेषांक निकालबाक नेयार केने अछि। हुनका सम्बन्धी रचना आमंत्रित अछि (संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा आदि) जे ३१ दिसम्बर २०२० धरि editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाओल जा सकैत अछि। विदेह पेटारक अन्तर्गत (पोथी डाउनलोड साइट) मे http://www.videha.co.in/new_page_15.htm  हुनकर मौलिक, अनूदित आ सम्पादित रचना फ्री पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२१. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2021 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३२१ म अंक ०१ मई २०२१ (वर्ष १४ मास १६१ अंक ३२१)

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