विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ३२९ म अंक ०१ सितम्बर २०२१ (वर्ष १४ मास १६५ अंक ३२९) १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)- २७म खेप २.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्मकथा)- १७म खेप- नोकरीक साढ़े चारि साल- बैंकमे पहिल दिन २.३.ज्ञानवर्द्धन कंठ- औकवर्ड ट्रेडिशन २.४.अरविन्द ठाकुर- पचपनियां बनाम बभनियां मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU इग्नू BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1 [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2 (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3 (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4 (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13 (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17 (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS OTHER OPTIONALS IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)- २७म खेप २.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्मकथा)- १७म खेप- नोकरीक साढ़े चारि साल- बैंकमे पहिल दिन २.३.ज्ञानवर्द्धन कंठ- औकवर्ड ट्रेडिशन २.४.अरविन्द ठाकुर- पचपनियां बनाम बभनियां मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर रबीन्द्र नारायण मिश्र लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास) २७म खेप -२७- नीरजक घरक कोना-कोना मालती देखि आएल रहथि । कतए कोन वस्तु राखलअछि तकर सटीक सूचना ओ दामोदर आ किशुनकेँ देलथि । दामोदर मोंछपर ताव दैत बजलाह-" भागिन,आब हमरासभकेँ विलंब नहि करक चाही ।" "शुभस्य शिघ्रम्"-किशुन बजलाह ।फेर दुनू मामा-भागिन किछु-किछु कनफुसकी केलथि । ओही राति नीरजक घरमे डाका पड़ल।नीरजक हाथ तँ टुटले रहैक । हालेमे प्लास्टर खुजल छैक। हाथ नीकसँ सोझो नहि होइक । ओही हाथमे फेर चोट पड़लैक ।डकैतसभ सोझे ओकर सयनकक्षमे पैसल । ओकरा सुतलसँ उठओलक । नीरजऔंघाएल छलाह।उठबामे किछु विलंब भेलनि । डकैतबा तेहनकए हाथ मरोड़लक जे बाप! बाप! चिचिआ उठलाह । दोसर डकैत पेस्तौल तानि देलक । “हे भगवान!"- नीरजक मुँहसँ निकलि गेल । “खबरदार! जँकिछु बजबह तँ सोझे ऊपर जेबह । कुंजी निकालह"-दोसर डकैत बाजल । नीरज टेबुलक दराज दिस इसाराकेलथि ।एकटा डकैत कुंजीक झाबा निकाललक आ दोसर हुनका मुँहमे लत्ता ठुसि टेप साटि देलक । हाथ-पैर बान्हि कए ऊपरसँ सीरक राखि देलक। हल्ला-गुल्ला सुनि कए लताक निन्न टुटि गेलैक । ओबाहर आबए चाहली। डकैतसभ हुनको ओएह हाल केलक । केबारक कुंडी बाहरसँ बंद कए देलक । ओ छटपटा कए रहि गेलीह । गोट-गोटक समानसभ डकैतसभ ट्रकपर लादलक आ चंपत भए गेल । जाइत-जाइत नीरजकेँ नीकसँ पिटाइ कए देलक । भोरभेने काजबालीसभ घरक हालत देखि हल्ला केलक। बहुत रास लोक जमा भए गेल । ओहीमेसँ केओ पुलिसकेँ फोन कए देलक । लगीचेमे पुलिस चौकी छल । आश्चर्यक बात जे ओकरासभकेँ किछु पता नहि चललैक आ ट्रकपर लादि-लादि सभटा समान डकैत बिना कोनो रोकटोककेँ चल गेल। पुलिस घरमे पैसितहि गुम्म पड़ि गेल ।सौंसेघर तहस-नहस भेल छल। लताक कोठरीक कुंडि खोललक तँ देखैत अछि जे ओकर हाथ-पैर बान्हल अछि,मुँहपर टेप साटल अछि । पुलिस ओकर हाथ-पैर खोललक। मुँहपरसँ टेप हटेलक । गिलासमे पानि देलकैक । लता ततेक हतप्रभ छलि जेहुनका किछु बजले नहि होनि। पुलिस नीरज दिस बढ़ल । ओ बेसुध छलाह । मुँहपरसँ पट्टी खोललक । हाथ-पैर खोललक ।देह हिलओलक तँ सौंसे देह हीलि गेल । नीरजक सौंसेदेह अकड़िगेल छल । नीरजक प्राणान्त भए गेल छलनि।अपन पिताक हालत देखि लता भोखासी पाड़ि कए कानए लगलीह ।संयोग छल जे घरक सीसीटीभी काज कए रहल छल । पुलिस फूटेजक छानबीन केलक। डकैतसभ नकाब पहिरने छल तेँ चिन्हबामे दिक्कत भए रहल छलैक । मुदा एतबा पता लागि रहल छलैक जे ओ सभ तीनगोटे छल जाहिमे एकटा महिला सेहो छलि । सभसँ आश्चर्यक बात छल जे ओ सभलताकेँ किछु बिगाड़ नहि केलक । ओकरा सभकेँ नीरजसँ कोनोबातक कुन्नह छलैक सेहो बुझा रहल छल । मुदा ओ सभ छल के? कहबी छैक जे कतबो बुधिआरी करू ,किछु-ने-किछु गड़बड़ी भइए जाइत छैक । हरबरीमे एकटा डकैतक मोबाइलफोन ओतहि छुटि गेलैक। पुलिसकेँ ओहि मोबाइल आ सीसीटीभीसँ बहुत किछु जानकारी भेटलैक ।जाँच-पड़तालसँ पता लागि गेल जे ओ फोन दामोदरक छल आ ओ एखन ट्रेनमे चढ़बाक फिराक मे अछि ।पुलिस तुरंत ओकरा टीसनेपर घेरि लेलक । किशुन सेहो पकड़ल गेल । बहुतरास कीमती समानसभ सेहो ओकराससभसँ भेटल । एतेक जलदी बदमाससभ पकड़मे आबि जाएत से साइत पुलिसो नहि सोचने छल । असलमे विजय दामोदरक मदतिगार रहैत छलैक जाहिसँ ओकरा पुलिस किछु कए नहि पबैक। आब तँ ओहो नहि अछि । पापक घैल कखनो-ने-कखनो भरबाक छलैक से भरि गेलैक।दामोदरकअसली रूप प्रकट भए गेल । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ( आत्मकथा ) १७म खेप- नोकरीक साढ़े चारि साल - बैंकमे पहिल दिन मलमलियासं सिवान जाइबला सड़कक दहिना कातमे प्रथम तलपर पूब दिससं सेंट्रल बैंकक शाखा छलै जे छओ मास पहिने खूजल छलै, पच्छिम दिस भूमि विकास बैंकक कार्यालय छलै | सड़कक बामा कात प्रखंड-अंचल कार्यालय छलै | एहि ठामसं सिवान बत्तीस किलोमीटरपर छै | बैंकक हाल खूब नमहर छलै | स्वीपर छल महेन्दर बांसफोर | ओ सबेरे आबिक’ हमरा सभकें पानि आ चाह पियाक’, हमर सबहक ओछाइन स्टेशनरी रूममे राखि, बैंकक सफाइ क’ क’ चल गेल | हम सभ फ्रेश भ’ क’ नीचां चापा-कलपर स्नानकय तैयार भ’क’ बजारसं किछु जलखै क’ क’ एलहुं | वाटर बॉय छल राम नरेश, बाल्टीमे पीबैबला पानि भरिक’ रखलक | दफ्तरी छलाह राम अयोध्या पंडित, मशरक घर छलनि,सोम दिन गामसं अबैत छलाह, बैंकक हॉलमे दू टा टेबल जोडिक’ सुतैत छलाह, होटलमे खाइत छलाह, शनि दिन गाम चल जाइत छलाह | दस बजे बैंकमे आबि हम सभ बैसलहुँ | साढ़े दस बजे बैंकमे बहुत लोक आबि गेलाह | सिवानसं शाखा प्रबंधक एलाह, दास बाबू ( श्री निरंजन दास ) आ श्री गौरी शंकर सिंह, कृषि वित्त अधिकारी | दुनू गोटे सिवानसं सभ दिन बससं अबैत छलाह | शाखामे कृषि विभागक काज एखन धरि सिंहजी देखैत छलाह, सिवानसं अबैत छलाह आ साँझमे सिवान घूरि जाइत छलाह | एगारह बजैत-बजैत हालमे लोकक भीड़ लागि गेलै | हम त घबरा गेलहुँ | सिंहजी कहलनि, ई सभ गोटे गहूमक खेतीक लेल लोन लेबय आएल छथि, ब्लाक ऑफिस सं आवेदन फॉरवर्ड भ’ क’ आएल छै, अंचल अधिकारी द्वारा जमीनक प्रमाण पत्र देल गेल छै , प्रति एकड़ छः सौ रूपैयाक लोन स्वीकृत करबाक छै, दू सै बीयाक लेल आ चारि सै खादक लेल | स्वीकृतिक लेल हमसभ अनुशंसा क’ क’ शाखा प्रबंधक लग पठबैत छियनि, शाखा प्रबंधकक हस्ताक्षरक बाद हमसभ बैंकक दस्ताबेज सभपर आवेदक आ दूटा गारंटरक हस्ताक्षर ल’क’ बीज निगम कें बीजक लेल आ खाद डिपो कें खादक लेल डिलीवरी आर्डर देल जाइ छै | यैह भेल हमर प्रशिक्षण | दफ्तरी दस्ताबेजक सेट बनाक’ दै छलाह | सिंह साहेब एक-दूटा आवेदनक निष्पादनक प्रक्रिया देखा देलनि आ तकर बाद दस्ताबेज सभ पर आवेदक आ दू-दूटा जमानतदारक हस्ताक्षर लेब’ कहलनि | ठाकुर जी कैश विभागक काज देखि रहल छलाह | बीचमे ठाकुर जी संगे भोजन कर’ बजार गेलहुँ, सिंहजी एसगरे थोड़े काल काज करैत रहलाह | ठाकुरजी कहलनि, आज त लगैए रात भ’ जेतै, जत्ते लोक दू तीस तक बैंकमे आबि गेल छथि, हुनकर काज त हेबे करतै| हम घबरा गेलहुँ | लगातार एते काल बैसबाक अभ्यास नहि छल | साढ़े चारि बजे पेट्रोमक्स जड्बैत देखलिऐ तखन ठाकुरजी जे कहने छलाह तकर पुष्टि भ’ गेल | जाड़क मास छलै, बैंक बन्द होइत-होइत नौ बाजि गेलै | बड्ड थाकि गेल रही | होटलमे खेबाक लेल जे किछु भेटल, से ख़ाक’ जखन सूत’ गेलहुँ त मोनमे भेल जे नोकरी ठीक नै भेल, मुदा आब कोनो विकल्प शेष नहि रहि गेल अछि, से सोचि मोनकें स्थिर करबाक प्रयासमे लागि गेलहुँ | दू दिनक बाद सिंह साहेब सिवानसं एनाई बन्द क’ देलनि | हुनका जेना-जेना देखने छलियनि, तहिना आवेदन पत्र देखिक’ कते खेत हिस्सामे छै जाहिमे गहूमक खेती करबाक छै, से देखिक’ कते आ कोन-कोन खादक आवश्यकता छै,से गणना क’क’ ऋण स्वीकृतिक लेल अनुशंसा करैत अपन लघु हस्ताक्षर कय शाखा प्रबंधककें दै छलियनि | ओ हस्ताक्षर करैत छलाह | एकर बाद दस्ताबेज सभपर आबेदक आ जमानतदार सबहक हस्ताक्षर लैत छलहुँ | तकर बाद बीज निगमकें बीज लेल आ खाद डिपोकें खाद लेल डिलीवरी आर्डर भरिक’ ओइपर अपन लघु हस्ताक्षर कय शाखा प्रबंधकक हस्ताक्षर लैत आवेदककें द’ दैत छलियनि | आवेदक कृषक निगम आ डिपोसं बीज आ खाद ल’ क’ चलि जाइत छलाह, निगम अथवा डिपो किसानकें बीज अथवा खाद द’ क’ बैंक शाखामे बिल पठा दैत छलैक | बिलमे सूचना रहैत छलै जे बैंक शाखाक आदेशपर कोन कृषककें कतेक राशिकेर बीज अथवा खादक आपूर्ति कयल गेलैए | डिलीवरी चलानपर कृषकक हस्ताक्षर रहैत छलैक | बैंकक बही(लेजर)मे कृषकक खाता खोलल जाइ छलै, बिलक राशिसं सम्बन्धित कृषकक खाता नामे (डेबिट) होइ छलै | एतबे राशिक धनादेश (पे आर्डर ) अथवा ड्राफ्ट आपूर्तिकर्ताक नामे बनाक’ बिलक भुगतान क’ देल जाइत छलै | एकर विवरण जाहि छपल कागतपर लिखल जाइत छल तकरा डेबिट आ क्रेडिट भाउचर कहल जाइत छलै | भाउचरपर हमर लघु आ शाखा प्रबंधकक पूर्ण हस्ताक्षर होइत छलनि, भाउचर दिन भरिक अन्य भाउचरक संग अभिलेख(रिकॉर्ड) लेल सुरक्षित राखल जाइत छलैक | भाउचरपर विवरण कोना लिखी, से पछिला कोनो तिथिक सिंहजीक बनाओल भाउचर देखिक’ सिखैत छलहुँ – महाजनो येन गतः स पन्थाः | तकरा बाद : भीड़ क्रमशः कमैत गेल | रामेश्वर ठाकुर जीक ट्रान्सफर मुजफ्फरपुर भ’ गेलनि, हुनका स्थानपर मधुबनी शाखासं गणेश ठाकुरजी एलाह स्थायी हेड केशियर बनिक’ | गणेश ठाकुरजी डेरा ताकि लेलनि आ परिवार संगे रह’ लगलाह | हमरो लगेमे डेरा भेटि गेल | एसगर रह’ लगलहुँ | दफ्तरी राम अयोध्या पंडित ऑफिसमे रातिमे सुतैत छलाह, सबेरे आ साँझक’ हमरे संगे भोजन बनबैत छलाह आ करैत छलाह | शनि दिन ऑफिसक काजक बाद अपन गाम चलि जाइत छलाह आ सोम दिन अबैत छलाह | शाखा प्रबंधक दास बाबू ( श्री निरंजन दास ) सभ दिन सिवानसं बससं अबैत छलाह | डेरा भाड़ा प्रसंग हमरा आवासक किराया पचास रुपैया छल | सभ मास एक तारीकक’ पछिला मासक किराया मकान मालिककें खातामे जमाक’ दैत छलियनि | एक दिन मकान मालिकक भातिज एलाह आ कहलनि जे ऐ माससं किराया हमरा देब’ पड़त | हम कारण जान’ चाह्लहु त कहलनि, हमर पारिवारिक समस्या अछि, एकर किराया हमरा भेटक चाही, तें हमरा देब’ पड़त | हमर कोनो अनुरोध ओ सुनबा लेल तैयार नै भेलाह | हम सोचलहुँ जे हिनकासं झगड़ा करबासं नीक अछि दोसर डेरा ताकि लेब | हम कहलियनि, ठीक छै, जाउ ऐ महिनामे अहाँकें किराया भेटि जाएत | ओ कहलनि जे ओ आबथि त कह्बनि जे हुनका द’ देलियनि, अहाँ हुनकासं गप करू | हम कहलियनि, अहाँकें किराया भेटि जाएत, आब हमर चिन्ता अहाँ छोडि दिय’ | ओ प्रसन्न भ’ क’ चल गेलाह | ओही दिन साँझमे ओ एलाह जिनका पहिनेसं किराया दैत आबि रहल छलहुँ | ओहो अपन परिवारक समस्याक चर्च करैत कहलनि, अहाँ हमर पारिवारिक झगडामे नै पडू, अहाँ जहिना हमरा किराया दैत आएल छी, तहिना दैत रहू, ककरोसं डरबाक काज नै छै | ईहो अपने बातपर अड़ल रहलाह, हमर कोनो बात नै सून’ चाहैत छलाह | हम सोचलहुँ जे दोसर डेरा ताकि लेब ठीक रहत, ताबत ऐ मासक किराया हिनको द’ देबनि | कहलियनि. ठीक छै, अहाँकें जेना दैत छलहुँ से अवश्य भेटत | ओहो प्रसन्न भ’ क’ गेलाह | हमरा पंडित दफ्तरी कहलक, अहाँ ई ठीक नै केलहुं, दुनू गोटेकें किराया देबनि ? हम कहलियनि, एक मास द’ देबनि, दोसर मासमे हम ई डेरे छोडि देब | झगड़ा केलासं अपनो अशांत भ’ जाएब, ऐसं नीक पचास रुपैयाक नोकसान, बूझब जे पचास रुपैया जेबीसं कतहु खसि पडल | तीस तारीखक’ एक गोटे सबेरे आबिक’ किराया ल’ गेलाह | दोसर साँझमे एलाह | ओहो अपन किछु अनिवार्य आवश्यकताक चर्च करैत किराया ल’ गेलाह | हम दोसर डेराक खोज तेज क’ देलहुं | एक सप्ताहक बाद एकदिन मुखियाजीकें हिनका दुनू गोटेक संग अबैत देखलियनि त चिन्ता भेल | मुखियाजी कहलनि, हम अहांसं एकटा जानकारी प्राप्त कर’ आएल छी ठाकुरजी | हम कहलियनि, अवश्य, पूछल जाए | मुखिया जी पुछलनि, ई कहैत छथि जे ठाकुरजी हमरा किराया देलनि आ ई कहैत छथि जे किराया हमरा भेटल, ऐमे सही के अछि ? हम कहलियनि, मुखियाजी, दुनू गोटे सही छथि, गलत कियो नहि छथि | मुखिया जी आ ओहो दुनू गोटे हमरा दिस ताक’ लगलाह | मुखिया जी बजलाह, अजीब बात अछि , एक आदमी दुनू गोटेकें किराया देलाक बादो शांत छथि, कोनो शिकायत नै आ ई दुनू आदमी किराया लेलाक बादो अशांत अछि , लड़ाइ-झगड़ा करबा पर उतारू अछि ! मुखिया जी अपनापन जनबैत दुनू गोटेकें बुझौलखिन जे ई लाजक बात थिक | दुनू गोटे मुखियाजीक कहलापर पचास-पचास रुपैया हमरा वापस क’ देलनि | मुखिया जी हमरा कहलनि, अहाँ एखन राखू पाइ,दू-तीन दिनमे फैसला भ’ जेतै, तखन जकरा कहब तकरा द’ देबै | दुनू गोटेक गेलाक बाद मुखिया जी कहलनि तखन बुझलिऐ जे दुनू गोटे एके आँगनमे रहैत छथि, एक आदमी हमरासं किराया ल’क’ गेलाह आ अपना घरमे बजलाह, हुनकर पत्नी दोसरकें सुनाक’ कहलखिन जे लोककें बजलासं की हेतै, किरायादार हमरा मालिक बुझलक तखन ने किराया देलक | दोसर पक्षकें ई बुझेलनि जे ई हमरा खौंझबैए, किएक त हमरा त किराया आबि गेल अछि | प्रतिक्रियामे दोसर पक्ष सेहो किछु बजलीह, दुनू पक्षमे कहा-सुनी भ’ गेलनि, बात पुरुष सभमे सेहो भ’ गेलनि | झगडा ततेक बढ़ि गेलै, जे मुखियाजीकें हस्तक्षेप कर’ पड़लनि | हमरा दुख भेल जे हमर जे क्रिया भेल तकर परिणाम अशुभ भ’ गेलै, तें हमरा किछु दोसर तरहें समाधान ताकब उचित छल | तीन दिनक बाद मुखियाजी कहलनि, फैसला भ’ गेलै, अहाँ जिनका दैत छलियनि, हुनके देबनि, दोसर कियो आब कहियो किराया मांगय नै एताह | सैह भेलै | तकर बाद फेर कहियो डेरा ल’ क’ समस्या नहि भेल | लंबित आवेदन प्रसंग आपात काल चलिए रहल छलै | सभ ठाम शान्ति | सभ ठाम पोस्टर छलै, ‘अनुशासन ही देश को महान बनाता है |’ बैंकमे किसान सबहक ऋण आवेदन अबैत छलै प्रखण्ड कार्यालयसं अग्रसारित भ’क’ | आवेदन पत्र कोनो स्थितिमे पन्द्रह दिनसं अधिक अवधि लेल लंबित नहि रहबाक चाही, से स्पष्ट आदेश छलैक | आवेदन-पत्र सबहक निष्पादनक समीक्षा हेतु टास्क फ़ोर्सक साप्ताहिक मीटिंग होइत छलैक जिला स्थित कलेक्टरक सभा कक्षमे | मीटिंगमे प्रखण्ड विकास पदाधिकारी सभ रहैत छलाह आ बैंक दिससं जिला स्थित मुख्य शाखाक कृषि वित्त अधिकारी रहैत छलाह | बसंतपुरक प्रखण्ड विकास पदाधिकारी रिपोर्ट केलखिन जे सेंट्रल बैंक बसंतपुरमे बोरिंगक सत्तरिटा आवेदन तीन माससं लंबित अछि | कलेक्टर बहुत नाराज भेलाह आ गौरी शंकर सिंह, सिवान शाखाक कृषि वित्त अधिकारीकें कहलखिन जे ओहि ठाम जे स्टाफ काज करैत अछि, तकरा ससपेंड क’ क’ हमरा खबरि करू | दोसर दिन सिवानसं गौरी बाबू एलाह आ ई समाचार कहलनि | हमरा त ओत’ तीन मास भेलो नै छल, हमरासँ पहिने वैह सिवानसं आबिक’ एहि शाखाक काजक निष्पादन करैत छलाह | हम एहि बीचमे फसल-ऋणक आवेदनक निष्पादन करैत जा रहल छलहुँ | किछु सर्कुलर सभ जे आएल छलै, से पढने छलहुँ | हम ओहि सर्कुलरकें निकाललहुँ | गौरी बाबूकें बूझल छलनि | सर्कुलरक अनुसार जाहि किसानकें अपना पंप-सेट नै छै अथवा ओकरा आसानीसं उपलब्ध नै छै तकरा खाली बोरिंग लेल ऋण नै देबाक छै | विचार-विमर्श भेल | हमरा अगिला सप्ताहक टास्क फ़ोर्सक मीटिंगमे उपस्थित हेबाक लेल कहिक’ गौरी बाबू चल गेलाह | अगिला मीटिंगमे हमहूँ गेलहुँ | बसंतपुर प्रखण्डक चर्चा शुरू भेल त कलेक्टर साहेब पुछलखिन सेंट्रल बैंक बसंतपुरसं के एलाहे | हम ठाढ़ भेलहुँ | कलेक्टर पुछ्लनि लम्बित आवेदन पत्रक विषयमे | हम बैंकक ओहि सर्कुलरक चर्च करैत कहलियनि, अढ़ाइ मास पहिने आवेदन पत्र सभ प्रखण्ड कार्यालयकें वापस कएल जा चुकल छै | हम शाखा प्रबंधकक हस्ताक्षरसं गेल लगभग अढ़ाइ मास पहिलुक पत्रक प्रति देख’ देलियनि, गौरी बाबू सेहो एकर समर्थन केलखिन | कलेक्टर साहेब प्रखण्ड विकास पदाधिकारीपर बिगड़ि गेलखिन | कहलखिन, हमरा लगैत छल जे बैंक एहेन गलती नहि क’ सकैत अछि, मिस्टर पी वी पी, गलत सूचना ल’क’ नै आउ | अहाँक ठीक सामने अछि बैंक शाखा, अहाँ बैंकसं ताल-मेल किए नै रखैत छी ? आब बैंक स्टाफक संगे मीटिंगमे आउ | दोसर दिन पी वी पी हमरा शाखामे एलाह आ कहिया वापस भेलै आ के प्राप्त केने रहै, से जान’ चाह्लनि | दफ्तरी पिउन बुक देख’ देलकनि | प्राप्तकर्ताक हस्ताक्षर नहि चीन्हि सकलाह, पी वी पी गुम्म भ’ गेलाह, कहलखिन, आब यदि कोनो आवेदन वापस रही त कोनो आन अधिकारीकें देब | तकरा बाद फेर कहियो कोनो रिपोर्ट मे कोनो त्रुटि हेबाक अवसर नै एलै | पी वी पी कोनो मीटिंगमे जेबासं एक दिन पहिने बैंक शाखामे अपने आबिक’ अथवा कोनो अधिकारीकें पठाक’ बैंकक रिपोर्टसं अपना रिपोर्टक मिलान करा लैत छलाह आ जहिया टास्क फ़ोर्सक मीटिंग रहै छलै त हमरो संग क’ लैत छलाह | पिताक अस्वस्थता प्रसंग 190 रु. मूल वेतनपर हमर बहाली भेल छल, डी. ए. मिलाक’ 503 रु. होइ छलै | शुरूमे किछु मास धरि किछु ओवरटाइम सेहो भ’ जाइ छलै | एकर अतिरिक्त मीटिंगमे सिवान जाइ छलहुँ त ओकरा लेल डाईम अलाउंस सेहो एक दिनक बारह रु. भेटि जाइत छल | हम संतुष्ट छलहुँ | अपना लेल कम-सं-कम खर्च करैत पाइ गाम पठा दैत छलहुँ अथवा नेने जाइ छलहुँ | आमदनी भेल त खर्चक नव रस्ता सभ सेहो बन’ लागल | किछुए मासक बाद बाबूक स्वास्थ्य बहुत ख़राब भ’ भेलनि, जांचक बाद टी.बी. प्रगट भेलनि |बहुत खतरनाक बिमारी छलै ओहि समयक लेल | दबाइ, पथ्य आदिमे बहुत खर्चक आवश्यकता होइत छलैक | हमर प्राथमिकतामे सभसं ऊपर भ’ गेल बाबूजीक इलाज आ पथ्य | दरभंगामे नीक डॉक्टरसं इलाज चल’ लगलनि | लगातार छौ मास इलाज आ पथ्यपर बाबूक स्वास्थ्य सामान्य भेलनि | तकर बादो बहुत दिन धरि डॉक्टरक सलाहक अनुसार दिनचर्या चलैत रह्लनि | एक मास पुरलापर एक दिनक आकस्मिक अवकाश भेटैत छल | शनि दिन दू बजेक बाद विदा होइत छलहुँ, रातिमे गाम पहुँचैत छलहुँ, रवि दिन रहिक’ सोम दिन विदा भ’ जाइत छलहुँ | बादमे किछु मास लेल परिवार ल’क’ सेहो रहलहुं | किछु मास बाबूकें सेहो अपना संग रखलियनि | छोट भाए सभ गामक मिडिल आ हाइ स्कूलमे पढ़ै छलाह | घरमे आवश्यकतानुसार माएकें लोकसं कर्ज ल’ लेब’ पडैत छलैक, ओ ओकर सूदिक गणना करैत छलीह | बाबूक हाथक कर्ज सभकें बूझल रहैत छलै | हम दुनू तरहक कर्जसं धीरे-धीरे मुक्तिक प्रयास क’ रहल छलहुँ | बच्चीक गहना छोड़यबाक बात ध्यानसं हटि गेल | एक सालक बाद को –ऑपरेटिवसं लोन ल’क’ गहना छोड़यबाक बात सोचलहुँ त कहलक जे गला देल गेलै | हम तखन ओइ दिस सोचनाइए छोड़ि देलहुं | शाखामे नव-नव सदस्य सबहक आगमन शाखाक व्यवसायमे वृद्धि भेलैक त सदस्यक संख्यामे सेहो वृद्धि भेलै | कृषि वित्त अधिकारीक पदपर एलाह श्री शिव शंकर सिंह जी | सिंह जी सभसं लम्बा-तगड़ा छलाह, खांटी इमानदार आ स्पष्टवक्ता छलाह | परिवारक संग रहैत छलाह, पिता सेहो संग रहैत छलखिन | दफ्तरी राम अयोध्या पंडित लिपिक सह खजांची भ’ क’ गेलाह डुमरा ( सीतामढ़ी), हुनका स्थान पर मदन प्रसाद एलाह | किछु अंतरालक बाद एकटा और कृषि सहायक एलाह चितरंजन शर्मा जी | दिघवारासं श्रीवास्तवजी एलाह चीफ केशियर भ’ क’ | किछु मासक बाद शाखा प्रबंधक दास बाबूक स्थानान्तरण मुजफ्फरपुर भ’ गेलनि, हुनका स्थानपर चौबे जी एलाह आरासं | चौबेजी बहुत हंसमुख स्वभावक छलाह | लोक जे हुनका चैम्बरमे कोनो काजे जाइत छल, से प्रसन्न मुद्रामे निकलैत छल | सामान्यतया कृषि विभागसं सम्बन्धित आवेदन पत्र पर कृषि सहायक, कृषि वित्त अधिकारीक अनुशंसापर शाखा प्रबंधक स्वीकृतिपर हस्ताक्षर करैत छलाह | कोनो-कोनो आवेदन जे बैंकक सर्कुलरक अनुसार उपयुक्त नै रहै छलै, ओहिमे हमरा सबहक अनुशंसा नहियों रहलापर, यदि हुनका ठीक लगै छलनि, त स्वीकृत क’ दैत छलखिन | हमरा सभ जकाँ ओ नै डेराइत छलाह | कन्हैया लाल श्रीवास्तव लिपिक सह खजांचीक पद पर आ छपरासं बी.पी. शर्मा एलाह लेखापालक पदपर | शर्मा जी एसगरे रहैत छलाह | ओहो नियमक अनुसारे सभटा काज करैत छलाह, नियमसं कनियों विचलन पसन्द नै करैत छलाह | ओ कतेक सदस्यकें बैंक सेवामे भेल दुर्गति देखने छलाह अथवा सुनने छलाह, तकर चर्च समय-समयपर करैत छलाह आ सर्कुलरेक अनुसार सभ काज करबापर जोर दैत छलाह | ओ रस्तोपर चलैत काल यदि सड़कपर कोनो धिया-पूताकें देखि लैत छलाह त ओकर घरक अभिभावककें बजाक’ धिया-पूताकें सम्हारिक’ रखबाक उपदेश द’ दैत छलखिन | हम सभ एक बेर पुछलियनि जे अहाँकें कोन मतलब अछि आनक एते चिन्ता करबाक त कहलनि जे एक त सभ जिम्मेदार नागरिकक काज छै जे ककरोसं किछु चूक भ’ रहल छै, त ओकरा सतर्क क’ दियौ, दोसर जे कोनो दुर्घटना भ’ जाइ त पुलिस हमरो सभसं पुछ-ताछ क’ सकैए | एतेक सावधान रहैबला आ दोसरोकें सावधान करैबला शर्माजी ककरोसं अपन परिवारक विषयमे कखनो किछु नै कहैत छलखिन | एक दिन ऑफिसमे कोनो बात पर शर्माजी शाखा प्रबंधक महोदयकें कहलखिन जे कहियो अहाँ अपनो फसब आ हमरो सभकें फसाएब | जबाबमे शाखा प्रबंधक कहलखिन जे कपारमे लिखल हैत फसब त कियो बचा नै सकत आ लिखल हैत बचब त कियो किछु बिगाड़ि नै सकैए | शर्माजीकें ई बात नीक नै लगलनि, पान खाए बिदा भ’ गेलाह | हुनका ककरो बात पसन्द नै पड़ैत छलनि त पान खाए निकलि जाइत छलाह आ पाँच मिनटक बाद शांत भ’ क’ घुरैत छलाह | एक दिन एक गोटेक गपसं हुनका एतेक दुख भेलनि जे उठिक’ रोडपर एलाह, एकटा बस मुजफ्फरपुर जाइत रहै, ओहीमे चढ़ि गेलाह आ एक सप्ताहक बादे मुजफ्फरपुरसं घुरलाह | दुखक बात ई भेलै जे दस बरखक बादे शर्माजी शाखा प्रबंधक भेलाक किछुए दिनक बाद बैंक छोडि देलनि आ चौबेजी तीनटा शाखामे शाखा प्रबंधक रहलाक किछुए बरख बाद संसारे छोडि देलनि | शर्माजी किए बैंक छोडि देलनि, से पता नै चलि सकल | चौबेजी द’ पता चलल जे बिमारीक कारणे नै ठहरि सकलाह | डायबिटीज छलनि, मुदा अपेक्षित परहेज नहि करैत छलाह | बहुत पहिने एक दिन ऑफिसमे शर्माजी आ चौबेजीक मुंहसं जे निकलल रहनि से कोना एक-दोसरक लेल सत्य भ’ गेलै अथवा एक दोसरक लेल श्राप सिद्ध भेलनि,से चिन्तनमे आबि जाइत अछि | शर्माजीक कहब छलनि जे असावधान रहलासं अनिष्ट भ’ सकैत अछि, से चौबेजी लेल सत्य सिद्ध भेलनि | चौबेजीक कहब छलनि जे कतबो सावधान रहब, यदि भाग्यमे अनिष्ट लिखल अछि त कियो बचा नै सकैए—ई शर्माजीक लेल सत्य सिद्ध भेलनि | शर्माजी एतेक सावधान रहैत छलाह, कोनो अपराध नै केने छलाह तखनो स्वयं शाखा प्रबंधकक पद छोड़िक’ भागि पड़यलाह | चिन्तक लोकनि कहैत छथि – आवर वर्ड्स क्रिएट आवर वर्ल्ड, सोचिक’ कोनो बात बजबाक चाही, मुदा से कहाँ होइत छैक, पता नहि दिन भरिमे हम सभ अपन चिन्तन अथवा अपन शब्दसं किनका-किनका श्राप दैत रहैत छियनि अथवा किनकर-किनकर चिन्तन अथवा शब्द सभसं शापग्रस्त होइत रहैत छी | किछु मासक बाद अंचल निरीक्षकक पर पर एलाह रामजी लाल दास जी जे हमरे जिलाक छलाह | हुनकासं मैथिलीमे गप होइत छल,से हमरा लेल अतिरिक्त ख़ुशीक बात छल | दास जी हिन्दीमे लिखैत छलाह, त्रिकालदर्शी उपनामक संग कार्टून सेहो नीक बनबैत छलाह, एखनो फेस बुक पर हुनकर कार्टून अधिक काल देखैत रहैत छी | विज्ञानपर आधारित हुनक विलक्षण कथा संग्रह प्रकाशित भेल छनि, हमहूँ पढने छी | एकटा और पोथी प्रकाशित भेलनि अछि | दास जी छलाह त अंचल कार्यालयक स्टाफ मुदा बैंकक स्टाफ सभसं ततेक घुलल-मिलल छलाह जे बहुत गोटे हुनको बैंकेक स्टाफ बुझैत छलनि | हम सभ संगे साँझमे कहियो मलमलिया दिस त कहियो कन्हौली दिस पयरे घूमय जाइ छलहुँ | हम मिथिला मिहिर मंगबैत छलहुँ, मैथिली आ हिन्दीक किताब पढैत छलहुँ आ मैथिलीमे गीत लिखैत छलहुँ | हिन्दीमे काका हाथरसीक एकटा किताब पढ़लहुँ, हिन्दी मे सेहो किछु छोट-छोट कविता लिखय लागल छलहुँ | कन्हैया लाल श्रीवास्तव जी सेहो भोजपुरीमे गीत गबैत छलाह आ लिखबो करैत छलाह | हमरा संगे किछु मैथिली गीत सेहो गाबि लैत छलाह | मोटर साइकिल प्रसंग एक दिन आंचलिक प्रबंधक एलाह | कृषि विभागमे दू गोटे रही- हम कृषि सहायक आ सिंह जी, कृषि वित्त अधिकारी | हमरा सभकें पुछ्लनि जे हम सभ एखन धरि मोटर साइकिल किए ने किनने छी, बिना मोटर साइकिलके फील्डमे कोना जाएब इंस्पेक्शन अथवा वसूली लेल | हम सभ कहलियनि जे चलब’ नै अबैए त कहलनि जे सीखि लिय’, बिना सिखने काज नै चलत | हम ईहो कहलियनि जे पन्द्रह प्रतिशत मार्जिन मनी जमा करब सेहो एकटा समस्या अछि | ओ तुरत लैटर पैडपर शाखा प्रबंधककें आदेश द’ देलखिन जे मोटर साइकिल के जतेक दाम छै, ततेक ऋण स्वीकृत क’ देल जाए, मार्जिन मनी नै जमा कराओल जाए | पुछ्लनि, और कोनो समस्या ? हम सभ आश्वस्त क’ देलियनि जे एक मासक भीतर मोटर साइकिल ल’ लेब | जाइत- जाइत आंचलिक प्रबंधक महोदय कहलनि, हम एक मासक बाद फेर आएब अहाँ सबहक मोटर साइकिल देखबाक लेल, से ध्यान राखब | हम सभ अपनामे विचार केलहुं जे आंचलिक प्रबंधक कें एते पलखति कत’ हेतनि जे एक मासक बाद फेर एहि शाखामे एताह | हम सभ निश्चिंत भ’ गेलहुँ | असलमे मोटर साइकिल चढ़बासं हम सभ डेराइत रही | सिंह जी हमरासं बेशी मोटर साइकिल चढ़बासं डेराइत छलाह, हुनकर देहो बेशी भारी छलनि,खसबाक डर बेशी होइ छलनि | हम सिखबाक लेल तैयार भेलहुँ, एक आदमी तैयार भेला अपन पुरान मोटर साइकिल देबाक लेल कहियो-कहियो थोड़े कालक’ सीख’क लेल | तीन-चारि दिनमे लागल जे हम आब चला लेब | एक दिन हुनकर मोटर साइकिलसं सात-आठ किलोमीटर दूर कोनो गाम गेलहुँ एसगरे | घुरती काल की भेलै से नै बुझलिऐ, गाड़ी रोक’ चहिऐ त रुकबे नै करै, ब्रेक फेल भ’ गेलै, हम नर्वस भ’ गेलहुँ, आब कोना-की करू | भेल जे आब कतहु ठोकर लागि जेतै, तखने एकटा विचार आएल आ झट द’ चाभी निकालि लेलिऐ, एकटा हाथ हैंडलसं हटलाक कारणे गाड़ी असंतुलित भेलै आ थोड़बे दूर पर रुकलै आ एक कात खसियो पड़लै | गति कम भ’क’ खसलै, तें बेशी चोट नै लागल | अपने उठिक’ गाड़ीकें गुड़कौने किछु दूर गेलहुँ त एकटा साइकिल मरम्मति बला दोकान भेटल ओकरा कहलियै त कहलक जे हम एते क’ दै छी जे धीरे-धीरे चलाक’ अहाँ बसंतपुर चल जाएब, ओत’ ठीक करा लेब | ओ मिस्त्री जहिना कहने रह्य तहिना धीरे-धीरे चलाक’ बसंतपुर सकुशल पहुंचि गेलहुँ | जिनकर गाड़ी छलनि हुनका कहलियनि त कहलनि जे आधा अहाँ सीखि गेलहुँ, एक दिन एक बेर और खसब तखन पूरा सीखि जाएब | हमरा एक सप्ताह तक गाड़ी चलयबाक हिम्मति नै भेल, मोने मोन सोचलहुँ जे पुरान गाड़ी पर आब नै चढब | खसबाक कल्पनासं डर भ’ जाइ छल | सिंहजी सेहो नै सीखि सकलाह | कखनो-कखनो ईहो बात ध्यानमे आबि जाइत छल जे आंचलिक प्रबंधक महोदय यदि आबिए जाथि त हम सभ की कह्बनि | एक दिन सिवानक राजकमल एजेंसीमे पता लगेलहुँ त कहलक जे एखन स्टॉकमे राजदूत मोटर साइकिल नै अछि, बस, हमरा सभकें एकटा बहाना भेटि गेल, आब यदि आंचलिक प्रबंधक महोदय आबियो जेताह त कहबनि जे हम सभ राजदूत मोटर साइकिल लेब’ चाहैत छी जे एखन स्टॉकमे नै छै | ठीके जहिना कहिक’ गेल रहथि, आंचलिक प्रबंधक महोदय मास दिनक बाद शाखामे आबि गेलाह आ हमरा सभकें देखिते पूछि बैसलाह, मोटर साइकिल ल’ लै गेलहुँ ने | जबाब हमरा सभ लग तैयार छल, कहलियनि जे राजदूत स्टॉक मे एखन नै छै | ओहि समयमे मोबाइल आ शाखामे फोनक सुविधा त रहबे नै करै जे ओकरा फोनसं पुछितथिन | कहलनि, हमरा संगे पटना चलू ओत’सं ल’ क’ चल आएब | हम सभ कहलियनि जे हम सभ आब गाड़ी लेलाक बादे चलेनाइ सीखब, तें पटनासं अनबाक विचार छोडि देल जाए, सिवानमे उपलब्ध भ’ जेतै त हम सभ ककरो मदति ल’क’ आनि लेब | साहेब कहलनि जे गाड़ी चलेनाइ सीखि लेब त फील्डमे जाएब त टी ए सेहो भेटत, तें आर्थिक दृष्टिसं सेहो अहाँ सबहक लेल मोटर साइकिल लाभदायक अछि आ एहिसं बैंककें सेहो काज बेशी हेतै | जेड.एम.साहेब सिवान पहुंचिक’ राजकमल एजेंसीमे पता लगबौलनि त कहलकनि जे एखन गाड़ी छै स्टॉकमे | ओकरा कहल गेलै जे दू टा राजदूत मोटर साइकिल बसंतपुर शाखाक दू टा फील्ड स्टाफ लेल राखि दियौ आ हमरा शाखाकें टेलीग्रामसं सुचित कएल गेल जे अहाँ सभ लेल गाड़ी राखल अछि, अविलम्ब आबिक’ ल’ जाउ | आब हमरा सभ लग कोनो बहाना नै रहि गेल छल | बैंकमे डॉक्यूमेंटेशन क’ क’ पूरा दामक राशिक ड्राफ्ट बनाक’ ल’ गेलहुँ आ तीन अप्रैल 1979 क’ हम दूनू गोटे सिवानक राजकमल एजेंसीसं राजदूत मोटर साइकिल कीनिक’ आबि गेलहुँ | दुनू गोटे एक-एक चालककें संग ल’क’ गेल छलहुँ जे हमरा सभकें सकुशल सिवानसं बसंतपुर पहुंचा देलनि | नवका गाड़ीपर एक-दू बेर कनी-मनी चोट लागल मुदा हम एक सप्ताहमे नीक जकाँ अपन काज जोगर गाड़ी चलेनाइ सीखि गेलहुँ | तकर बाद करीब तेरह साल बिहारमे रहलहुं, मोटर साइकिलसं कोनो दुर्घटनाक शिकार नहि भेलहुँ | धरना प्रसंग : आपात काल समाप्त भेलै,चुनाव भेलै, केन्द्र मे जनता पार्टीक सरकार आबि गेलै, सभ गाममे नव-नव नेता सभ भेलाह | सभ क्यो जनता सबहक बीच अपन नीक छबि बनयबा लेल परिश्रम करैत छलाह | ओ सभ बैंक शाखामे सेहो लोकक काजक पैरवीमे अबैत छलाह | बैंकक नियमानुसार शाखा आवेदन पत्र सबहक इमानदारीपूर्वक निष्पादन करैत छल, नेता लोकनिक बहुत आदर करबाक ध्यान नै रखैत छल | से बात नव नेता लोकनिकें पसन्द नै छलनि | बैंक द्वारा जे ऋण स्वीकृत कएल जा रहल छलैक, से मुख्यतः कृषि विभागसं सम्बन्धित रहै छलै | कृषि वित्त अधिकारी छलाह शिव शंकर सिंह जी जे पक्का ईमानदार आ स्पष्टवक्ता छलाह | स्थानीय नेता सभ हुनकासं जे अपेक्षा करैत छलाह से नै होइत छलनि | परिणाम ई भेलै जे सभ नेता मिलिक’ हुनका लक्ष्य क’क’ एकटा अभियान चलौलनि | शाखा प्रबंधककें लिखिक’ देलखिन जे आपके ए.एफ.ओ. के अमानवीय व्यवहार के कारण अमुक तिथि को बैंक शाखा के समक्ष धरना देंगे | पहिने त सभकें भेलै जे ओहिना धमकी द’ क’ डेरा रहल छथि, मुदा तारीख लग एलै त भेलै जे यदि सत्ये ई सभ एहेन किछु करथि त की करबाक चाही | ऐ तरहक परिस्थितिक अनुभव किनको नै छलनि | स्टाफ मीटिंगमे शाखा प्रबंधकक सुझाव भेलनि जे ओहि दिन सिंहजी ऑफिस नहि आबथि, कतहु फील्डमे कोनो काजसं निकलि जाथि, सिंह जीकें डेराक’ ऑफिस नै आएब पसन्द नै भेलनि | तखन हुनका ई सुझाव देल गेलनि जे ऑफिसमे रहथि, बाहर नै निकलथि | निर्णय भेलै जे शाखा प्रबंधक आ गणेश ठाकुर, प्रधान खजांची (जे हमरा सबहक यूनियनक सेक्रेटरी सेहो छलाह ) जाक’ गप करताह, शेष सभ गोटे बैंकक भीतरे रहताह | निर्धारित तिथिक’ करीब सै आदमीकें जुटाक’ धरना शुरू भ’ गेल, मुदा कोनो हल्ला नै रहै शुरूमे | 2.30 के बाद शाखा प्रबंधक आ गणेश ठाकुर गेलाह गप करै लेल | ओ सभ कहलकै जे सभ गोटेकें लोन देब’ पड़त | शाखा प्रबंधक से स्वीकार करबामे डेराइत छलाह | हम चाहैत रही जे आजुक भीड़ कहुना ख़तम भ’ जाइ,तें एकटा स्लिपपर लिखिक’ शाखा प्रबंधककें अनुरोध केलियनि जे एखन स्वीकार क’ लियौ, स्लिप वाटर बॉय द्वारा पठा देलियनि, शाखा प्रबंधक कहलखिन, ठीक छै, हमर स्टाफ अहाँ सबहक बात मानक हेतु तैयार छथि | तखन ओ सभ कह’ लगलै जे सात दिनक भीतर ऋण देब’ पड़त | हम फेर दोसर स्लिप पर लिखिक’ देलियनि जे कहि दियौ जे प्रखंड कार्यालयसं आवेदन पठा दिय’, हम सभ सात दिनमे स्वीकृत क’ देब | शाखा प्रबंधक गछि लेलखिन जे प्रखंड कार्यालयसं आवेदन पठा दियौ, सात दिनमे स्वीकृत भ’ जेतै | ओ सभ झगड़ा करबा लेल दोसर कोनो उपाए ताक’ लगलाह | एकटा नेता बजलाह जे अहाँक स्टाफ एत्ते उदार छथि त सामने आबिक’ किए ने बजैत छथि | सिंहजी एते काल तक चुप छलाह, मुदा ई बात सूनिक’ नै रहल गेलनि, हमरो सबहक कहने नै रुकलाह आ बैंक हॉलसं निकलि कहलखिन, अहाँ सबहक दुश्मन हमहीं छी ने, त हम सोझां मे छी हमरा मारि दिय’ | भीड़मे हिंसाक प्रवृति होइ छै | किछु लोक हो-हो करैत ऊपर सीढ़ीपर चढ़’ लगलै, मुदा तत्काल मकान मालिक आ हाइ स्कूलक एक शिक्षकक हस्तक्षेपसं ओ सभ उपर नै जा सकलाह आ कोनो अप्रिय घटना नै घटलै | मुदा जतेक भेलै, सेहो हमरा सभ गोटेक लेल बहुत अप्रिय आ अपमानजनक छल | तकरा बाद आगू की करी, से विचार करबाक लेल ओहि ठामक वरिष्ठ पदाधिकारी सी. ओ. साहेब ओत’ गेलहुँ | ओ कहलनि जे अहाँ सबहक लेल ई नव घटना अछि, हमरा सबहक विरुद्ध त जखन-तखन इनकिलाब-जिंदाबाद होइते रहैत अछि | ओ विचार देलनि जे अपन उच्च अधिकारीकें जानकारी द’ दियनु आ ओ जे कहथि,सैह करू | हम सभ गोटे एकटा जीपसं सिवान क्षेत्रीय कार्यालय गेलहुँ | क्षेत्रीय प्रबंधक कतहु गेल छलाह | हम सभ काल्हि एबाक अनुरोध करैत लिखित शिकायत जमा क’क’ बसंतपुर घुरि एलहुं | प्रात भेने क्षेत्रीय प्रबंधक पेंडसे साहेब एलाह | ओ सभटा घटनाक विवरण सूनि क’ कहलखिन जे यैह नेता सभ किछु दिनमे एम एल ए भ’ सकैत छथि, मन्त्री भ’ सकैत छथि, चीफ मिनिस्टर भ’ सकैत अछि, हिनका सभसं झगडा करब उचित नै अछि, बैंकक राष्ट्रीयकरण भेलै, आम आदमीक सुविधाक लेल बैंक छै, ओही बीचसं नेता सभ अबैत छथि, हुनका सभकें बैंक एबासं कोना मना करबनि, ओ सभ आबथि त प्रेमसं बैसाक’ चाह पियबियनु, आदर करियनु मुदा करू अपने मोनक माने बैंकक नियमानुसार | सी ओ साहेब सेहो एलाह | हमर क्षेत्रीय प्रबंधक हुनकोसं गप केलनि | फेर सी ओ साहेबक माध्यमसं एकटा मुखर नेताकें बजाओल गेलनि | नेताजी हमरा क्षेत्रीय प्रबंधककें कहलखिन जे बैंकक सभ सदस्य ईमानदार छथि, हमरा सबहक एकेटा शिकायत अछि जे अहाँक अधिकारीक व्यवहार पब्लिक आ नेता सभसं नीक नै होइ छनि | आर एम साहेब कहलखिन जे हमर स्टाफ यदि इमानदार अछि त इमानदार स्टाफ सभसं अहाँ सभ एहेन व्यवहार किए करै छी, यदि एहेन घटनाक पुनरावृति हैत त हम सभ एहि ठामसं बैंक शाखा हटा लेबाक लेल मजबूर भ’ जाएब, अहाँ सभकें कोनो शिकायत हो त सिवान आबिक’ हमरा कहू, मुदा हमरा स्टाफ सभसं नीक व्यवहार करू | पेंडसे साहेब गांधीवादी तरीकासं सभकें मेल करौलनि, सभकें एक दोसरसं हाथ मिलबौलनि, आपसमे एक-दोसरक बीच रसगुल्लाक आदान-प्रदान करबौलनि आ सभकें पीठ थपथपाक’ सीवान घुरि गेलाह | तकरा बाद फेर कहियो शाखामे अथवा शाखाक बाहर कोनो अप्रिय दृश्य नहि उपस्थित भेल | ई घटना हमरा जीवनमे कय बेर पथ प्रदर्शकक काज केलक | पिता बनलहुँ : बसंतपुरमे रही, ओही अवधिमे लगभग दू बरखक अन्तरालपर दूटा कन्याक जन्म भेलनि | पहिल बसंत ऋतुमे आएल छलीह, मधुबनी अस्पतालमे जन्म भेल छलनि, हिनकर नाम वसन्त कुमारी भेलनि, बादमे बदलिक’ वन्दना भ’ गेलनि | दोसरक जन्म दुर्गापूजाक मध्य अस्पताल पहुँचबासं पहिने भ’ गेलनि, हिनकर नाम मैथिली भेलनि आ मैथिलीए रहलनि | शशिकान्तजी-सुधाकान्तजीसं सम्पर्क : एक बेर गाम गेलहुँ त सकरीमे विद्यापति पर्वक कार्यक्रममे भाग लेबाक अवसर भेटल | कवि गोष्ठीमे हम अपन रचना पढलहुँ ‘ तीन कोटि मैथिल ताल ठोकिक’ कहैए / ई प्रवाह मैथिलीक कियो रोकि ने सकैए |’ हम जखन मंचसं नीचां एलहुं त शशिकान्तजी,सुधाकान्तजी हमरा लग एलाह आ अपन परिचय दैत हमरा ई गीत लीखिक’ देबाक अनुरोध केलनि | हमरा पहिने हिनका सबहक नाम सूनल छल, भेंट नहि भेल छल | दुनू भाइक स्वर बहुत मधुर छलनि आ दुनू गोटे मिलिक’ रवीन्द्र नाथ ठाकुरजीक गीत सभ गबैत छलाह | ओहू दिन कार्यक्रममे देखलियनि, बहुत आकर्षक प्रस्तुति भेल रहनि | हुनका सबहक अनुरोधपर हम ओ रचना लीखिक’ द’ देलियनि | ओ रचना पटना आ आनो ठाम ओ सभ प्रस्तुत केलनि आ श्रोता-आयोजकक नीक प्रतिक्रिया देखि हमरासं पत्र द्वारा सम्पर्क केलनि आ अनुरोध केलनि जे गाम आबी त हुनको सभकें सुचित क’ दियनि जाहिसं ओ सभ हमरासं और गीत सभ ल’ सकथि | तहिना भेलै आ पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार दुनू गोटे हमरा गामपर एलाह आ हमरा और गीत सभ लीखिक’ देबाक अनुरोध केलनि | हम फेर दूटा रचना देलियनि | ई क्रम कय मास धरि चलल | हिनके सबहक माध्यमसं हमर मैथिली-सेवा चलि रहल छल | हिनके सबहक स्वरमे हमर और कते गीत सभ लोकप्रिय भेल जेना : 1. ‘तोरा अंगनामे वसन्त नेने आएब सजना’ 2. ‘फगुआ आएल फगुआ गेल फगुआ चलिए गेल’ 3. ‘पटनाक मजा लीय’ दिल्लीक मजा लीय’ बेकार छी अहाँ त बम्बइक मजा लीय’ 4. ‘आएल केहेन समैया यौ बाबू यौ भैया दुनियाँसं उठि गेल धरम-करम बूझैए के धरतीक मरम मिथिला केर की बात पुछै छी सौंसे भारत भेल बदलाम, अरे राम-राम-राम |’ 5. ‘कक्का मारल गेला सौराठक मैदानमे पहिले कन्यादानमे ना |’ 6. ‘तिलक प्रथाकें बन्द करू’ 7. ‘आइ धरतियो लगैछ नव कनियाँ जेना’ 8. ‘आइ ने छोड़ब भौजी, लेपब गालमे लाल अबीर’ 9. ‘आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ह्रदयमे हो माटिक ममता, माएक सेवामे जीवन बितादी अछि बस यैह एकटा सिहन्ता |’ 10. ‘मोन होइए अहाँकें देखिते रही’ 11. ‘जुनि कान, जुनि कान,जुनि कान रे बौआ जुनि कान रे |’ 12 . ‘हम देशकेर सिपाही, हम एक बात जानी ऐ देशकेर पूत हम, थिक नाम हिन्दुस्तानी |’ 13. ‘आइ धरतियो लगैछ नव कनियाँ जकाँ’ 14. ‘छोटे-मोटे टूटल मड़ैयामे गौरी कोनाक’ रहती हे |’ शशिकान्तजी, सुधाकान्तजी देशमे जहाँ-जहाँ विद्यापति पर्व होइत छलै, ताहिमे अधिक ठाम बजाओल जाइत छलाह | गीत शुरू करबासं पूर्व ओ गीतकारक नाम लेब नहि बिसरैत छलाह | ई हुनक अपन विवेक-जन्य स्वभाव छलनि | हम अपने नहि जाइत छलहुँ,मुदा कोनो-ने-कोनो श्रोतसं ज्ञात होइत छल त नीक लगैत छल आ और लिखबाक लेल उत्साहित होइत छलहुँ | अखबार-पत्रिका सभमे सेहो विवरण पढ़ि आनन्दित होइत छलहुँ | हम मानैत छी जे हमरा गीत सभकें जे लोकप्रियता भेटै छलै, ताहिमे हिनका दुनू भाइक मधुर-मनोहर स्वरक योगदान बेशी छलनि | तोरा अङना मे हमर साहित्य साधनामे कन्हैया लाल श्रीवास्तव, बी पी शर्मा, रामजी लाल दास जीक सहयोग रहैत छलनि | जखन-तखन विचार-विमर्श होइ छलै आ गीतक पोथी छपयबाक विचार सेहो अबैत छल | श्रीवास्तवजी हमरा संगे कतेक बेर तोरा अंगनामे वसन्त नेने आएब सजना गेने छलाह आ गीत संग्रहक नाम ‘तोरा अंगनामे’ रखबाक विचार भेल छल | शर्माजी एक बेर भरिसक ट्रेनिंगमे पटना गेल छलाह | कतहु एकटा चित्र देखलनि जाहिमे एकटा स्त्री अपना आंगनमे अरिपन द’ क’ दीप सजा रहल अछि | शर्माजी हमरा गीतक पोथीक कवर पृष्ठक लेल ओ फोटो नेने एलाह आ हमरा देलनि | हम हुनक पसन्दकें स्वीकार क’ लेलहुं, मुदा पोथी छपयबाक निर्णय नहि भेल रहय | खैर, जहिया छपतैक, तहिया एकर उपयोग करबाक लेल राखि लेलहुं | हमर ढोलीक संगी अशोक कुमार ठाकुर जी एम. एस. सी. (ए जी ) केलाक बाद बिहार एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड केर ट्रेनिंग सेन्टर, पटनामे नोकरी करैत छलाह | पुनाइ चकमे आवास छलनि | हुनकासं पत्राचार होइ छल, कय बेर विचार होइ छल पटना जाएब त एक दिन रहब संगे | ओहो कहैत छलाह | एहि बेर विद्यापति पर्वमे पटना जाएब आ हुनकोसं भेंट करबाक विचार भेल | निर्धारित तिथिक’ पटना पहुँचलहुँ | ठाकुर जीक डेरापर ठहरलहुँ | हुनका संगे गेलहुँ विद्यापति पर्व देख’ | सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू भेलै | हम सभ पाछाँमे ठाढ़ भ’ क’ देखि-सूनि रहल छलहुँ | शशिकान्तजी, सुधाकान्तजी मंचपर एलाह त गीतकारक नाम लैत हमर तीन-चारिटा गीत प्रस्तुत केलनि | श्रोता-दर्शकक प्रतिक्रिया बहुत आनन्दित करैबला भेलनि | बादमे ध्यान गेल हमरा सबहक लगेमे हमर साढ़ूक अनुज चीनू बाबू ( कृष्ण चन्द्र झा, डुमरा,बेनीपट्टी, मधुबनी ) छलाह | ओ देखलनि त अपन मित्रकें कहलखिन जे शशिकान्त-सुधाकान्तजी एखन जाहि गीतकारक नाम नेने छलाह से अनिलजी यैह छथि | हमरो परिचय भेल | ई छलाह चतरा, बेनीपट्टी निवासी डा. हेम चन्द्र लाल कर्ण जे एम. बी. बी. एस. क’ क’ इंटर्नशिपमे छलाह, डॉक्टर्स हॉस्टलमे रहैत छलाह, हमर साढ़ूक अनुज हुनके अनुरोधपर हुनके डेरामे रहिक’ यू.पी.एस.सी./बी. पी. एस. सी.क तैयारी क’ रहल छलाह | ओ अपना डेरापर ल’ जेबाले’ बहुत अनुरोध कर’ लगलाह | हम अपन मित्र ठाकुर जीसं परिचय करबैत कहलियनि जे हम हिनका संगे आइ काल्हि छी, काल्हि साँझ धरि अहाँक डेरा आएब | दोसर दिन हुनका ओत’ पहुंचलहुँ त ओ जिद्द क’ देलनि जे आब अहाँ पटनासं अपन गीतक किताब बिना छ्पौने नहि जाएब | स्टेट बैंकक लोकल हेड ऑफिसमे डरहार(दरभंगा)क स्टाफ ऑफिसर छलाह बी.के.चौधरी, ओहो एलाह हुनका डेरापर | किछु मैथिल आ किछु अमैथिल डॉक्टर सभ सेहो एलाह | ओ सभ हमरासं किछु गीत सूनय चाहैत छलाह, सेहो भेलै | ओही हालमे एकटा सीट खाली छलै | डॉक्टर साहेब हमरा ओहि सीटपर स्थान दैत कहलनि जे अहाँ अपन पाण्डुलिपि तैयार क’ लिय’ | हम छुट्टी दुइए दिनक ल’क’ आएल रही, डॉक्टर साहेब कहलनि, हम मेडिकल सर्टिफिकेट द’ देब | हम पाइक व्यवस्था क’ क’ नै आएल रही, डॉक्टर साहेब कहलनि जे ओकर व्यवस्था भ’ जेतै, अहाँ दू-तीन दिनमे पांडुलिपि तैयार क’ क’ चलू मुसल्लहपुर, द’ देबै छप’ लेल | डॉक्टर साहेब नोकरीमे नै छलाह तें हुनकर आर्थिक सहयोग लेब हमरा उचित नै लगैत छल | पता चलल जे धनबादसं कोनो इंजिनियर आएल छलाह अपना पत्नीक इलाज करेबाक लेल, हुनका ई बहुत मदति केने छलखिन, हुनका पता चललनि जे ई पटनामे अपन क्लिनिक खोलबाक लेल स्टेट बैंकमे आवेदन देने छथि, जाहिमे मार्जिन मनी किछु जमा कर’ पडैत छैक, ओ ऐ ठाम त नै किछु बजलखिन, धनबाद जाक’ ओत’ सं तीन हजारके ड्राफ्ट पठा देलखिन, वैह पाइ हिनका पास छनि | लोनमे एखन समय लगतै, तें तत्काल एकर उपयोग क’ क’ बादमे पठा देबै, से भ’ सकैए | डॉक्टर साहेबक मैथिली प्रेम देखि आनन्दित भेलहुँ | हम 31 टा गीतक पांडुलिपि तैयार केलहुं | डॉक्टर साहेबक संग मुसल्लहपुर गेलहुँ, भवानी प्रकाशन | देवेन्द्र झा जीक प्रेस छलनि | पांडुलिपि देखिक’ एक हजार एक सय प्रतिक लेल लगभग तेरह सय खर्च आ लगभग दस दिनक समय कहलखिन | डॉक्टर साहेब आधा पाइ द’ देलखिन | हम मुख पृष्ठक लेल शर्माजीक पसन्द बला चित्र द’ देलियनि ब्लाक बनबयबा लेल | हम बसंतपुर शाखामे शर्माजीकें पत्र लिखलियनि जे हमरा आवश्यकतानुसार ड्राफ्ट पठा देथि, किताब छपि जेबाक संभावित तिथि सुचित क’ देलियनि | बटुक भाइसं भेंट क’ क’ भूमिका लिखबाक अनुरोध केलियनि | एक दिन तीनू गोटे हरिमोहन बाबू ओत’ गेलहुँ | हुनका अनुरोध केलियनि अपन आशीर्वचनक रूपमे किछु लिखिक’ देबाक हेतु | ओ एकटा गीत सुनब’ कहलनि | सुनौलियनि | ओ संकल्प-लोक लहेरियासरायक कार्यक्रममे गीत शशिकान्त-सुधाकान्तक मूहें सुनने छलाह से कहलनि | हुनकर आशीर्वचन ल’क’ विदा भेलहुँ त कहलनि जे मार्च धरि अखबारमे निकलतै पुस्तकालय सभ लेल पोथीक क्रयक सम्बन्धमे विज्ञापन त दूटा प्रति पठा देबै, अहाँक पोथी स्वीकृत भ’ जाएत तखन जतेक पोथी मांगत, से पठा देबै त पाइ त भेटबे करत, पोथी सभ सेहो सुठाममे चलि जाएत | डेरामे सभ साँझक’ उत्सव जकाँ वातावरण भ’ जाइत छलैक | डॉक्टर साहेब बहुत गोटेसं परिचय करौलनि | सभ ठाम किछु गीत-नाद होइत रहै छलै | मुरलीधर प्रेससं मिथिला मिहिर कार्यालय अबैत छलहुँ | आदरणीय भीमनाथ बाबू प्रूफ रीडिंग कय सुधार क’ क’ दैत छलाह, हम फेर मुरलीधर प्रेस, मुसल्लहपुर जाइत छलहुँ | एना क’ क’ पोथी छपल | बटुक भाइक लिखल भूमिका एलै | अंतिममे कवर पृष्ठपर हरिमोहन बाबूक लिखल आशीर्वचन छलनि | एहि बीच बहुत साहित्यकार लोकनिसं परिचय भेल | सभकें पोथीक प्रति भेंट केलियनि | समीक्षाक लेल दू-दू प्रति आकाशवाणी, मिथिला मिहिर, आर्यावर्त आ इंडियन नेशन कार्यालयमे सेहो प्रस्तुत केलहुं | एक दिन मैथिली अकादमी कार्यालय गेलहुँ | आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी ओहि समय अकादमीमे छलाह | ओ दिल्लीसं आएल ‘राधाकृष्ण प्रकाशन’क प्रतिनिधिसं परिचय करौलनि | हुनको दू प्रति देलियनि | बाद मे राधाकृष्ण प्रकाशन,दिल्लीसं पच्चीसटा पोथीक मांगपत्र आएल, पठा देलियै, समयपर ओकर भुगतान सेहो प्राप्त भ’ गेल | जहिना आदरणीय हरिमोहन बाबू कहने रहथि, अखबारमे विज्ञापन एलै, दू टा प्रति पठा देलियै | राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी संस्थान ( कलकत्ता ) सिन्हा लाइब्रेरी,पटनाक माध्यमसं 340 पोथीक मांग केलक आ शीघ्रहि ओकर भुगतान सेहो क’ देलक | किछु पोथी शशिकान्तजी-सुधाकान्तजीक माध्यमसं सेहो बिका गेल | एहि प्रकारें पोथीक लागत मूल्य लगभग प्राप्त भ’ गेल | बादमे एहि पोथीक दोसर संस्करण उर्वशी प्रकाशन, पटनासं प्रकाशित भेल, गोपीकान्त बाबू हमरा पच्चीसटा प्रति उपलब्ध करा देलनि | ज्ञात भेल जे भवानी प्रकाशन,पटना द्वारा गीतक फुलवाड़ी प्रकाशित भेल जाहिमे हमरा सहित छओटा गीतकारक रचना सभ छलनि | ओकर एकोटा प्रति नै प्राप्त भेल, देवेन्द्र बाबू कहलनि जे एकोटा नहि बांचल अछि, ओकर बदला ओ एकटा दोसर पोथी द’ देलनि | कतहु देखबो ने केलिऐ | बहुत दिनक बाद एक गोटे सुचित केलनि जे काठमांडूमे गीतक फुलवारीमे अहाँक गीत पढ़लौं | संतोष केलहुं | एहि गीत संग्रह “तोरा अङना मे’ केर किछु गीत सभक ऑडियो कैसेट आएल | कोनो कैसेटमे भाइ चन्द्रमणि जीक बहुत सुन्दर स्वरमे आ एकदम शुद्ध-शुद्ध सुनने रही ‘कक्का मारल गेला सौराठक मैदानमे, पाहिले कन्यादानमे |’ आब अलोपित भ’ गेल अछि | ‘आइ ने छोडब भौजी,लेपब गालमे लाल अबीर’ टी-सीरीजक कोनो कैसेटमे छल, ओहो नै देखि रहल छी | महादेव ठाकुरक कैसेटबला गीत सभ सेहो अदृश्य अछि | एखन जतेक गीत सभ यू-ट्यूब पर अछि ओहि सभमे अधिकमे किछु-ने-किछु अनियमितता अछि | अनियमितता अछि कतहु-कतहु उच्चारणमे, कतहु-कतहु शब्दक हेर-फेरमे, अपूर्ण गायनमे, पोस्टरपर गीतकारक नाम त किछुए ठाम देखबामे अबैत अछि | पदोन्नति : 10 दिसम्बर 1975 क’ हम बैंकमे योगदान केने रही | 1980 मे पदोन्नतिक लेल लिखित परीक्षामे सफल भेलाक बाद मौखिक परीक्षा द’ क’ एलाक बाद क्षेत्रीय प्रबंधक महोदय शाखामे एलाह त पुछ्लनि जे कत’ पोस्टिंग चाहैत छी त हम जयनगर शाखाक नाम कहलियनि, मधुबनीमे ए. एफ. ओ. छलाहे, जयनगरमे नै छलाह तें पता लगाक’ कहने रहियनि, मुदा जखन पदस्थापनक पत्र आएल त ओहिमे हमरा सिवान शाखामे योगदान करबाक आदेश छल | निदेशानुसार 18 अगस्त 1980 क’ सिवान शाखामे कृषि वित्त अधिकारीक रूपमे कार्य भार ग्रहण केलहुं | (क्रमशः ) पटना / ३१.०८.२०२१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ औकवर्ड ट्रेडिशन लिजा आ ग्रेसी दूनू बहिन मातृक पहुँचैत अछि।माय कानय लगैत छथिन।संगे-संग मामी सभ सेहो। ममियौत भायक नवकी कनियाँ मरौत काढ़ने घरसँ बहराइत छथिन।दूनू बहिन एयर बैग असोरापर राखि तमाशा देख' लगैत अछि।नवकी भौजी मलसीसँ तेल निकालि एकरा सभक मायक एकटा घुट्ठीमे लगा नहुँ-नहुँ ससार' लगैत छथिन।माय कहैत छथिन-"आब छोड़ि दिय' कनियाँ, भ' गेलैक।" ई कहि ओ अपन दोसर पैर हुनकर आगाँ बढ़ा दैत छथिन।तावत दोसर आँगनसँ आइ-माइ सभ सेहो प्रत्यागत भ' जाइत छथिन।कनियाँ सभक पैर ओंगार' लगैत छथिन।एकटा बूढ़ी कनियाँक घोघ उठा कहैत छथिन-"यै! ई सभ जे कहथुन,कनियाँ त' बड्ड सुन्नरि छथिन,मुदा मोहन सन नाक नहि छनि।रंगो मद्ध छनि कनी।" दोसर टिपलथिन-" बहिने जकाँ नकार- सिकार छैक यै कनियाँक।एकर बहिन हमरे बहिनौतसँ ने बियाहल छैक! ओकरो काट एहने छैक।"एहने सन रूप-लक्षण- विश्लेषणक क्रममे कनियाँ बेरा-बेरी बुलनिहारि सोआसिन सभकेँ तेल-कूर आ सिंदूर लगा आ सभक चरण माथ लगा अपन कोठली दिस अबैत छथिन।दूनू बहिन भौजी लग आबि घोघ हटा दैत छनि।लिजा कहैत छैक -"भौजी!अहूँ बड्ड बैकवर्ड छी।एहन-एहन औकवर्ड ट्रेडिशन फॉलो करैत छी,से बड्ड टीजिंग नहि लगैए?" ग्रेसी कहलकनि - "वर्ल्ड कत'सँ कत' चलि गेलैक, गर्ल सभ आब अप-टु-डेट आ एडुकेटेड भेल आ अहाँ बुढ़िया सभक लेग पॉलिस करैमे लागल छी?धुर जाउ!पढ़ल-लीखल नहि छियैक कनियो?" तावत कनियाँ एकटा प्लेटमे मेवा-मधुर आ दूटा रुमाल राखि दुनूक आगाँ राखि बजलीह -"लिय, ई सभ अपना सभक ट्रेडिशन छैक।" लिजा पुछलकनि - "हमर भैया लेक्चरर छथि आ अहाँ कोना एहन गमार भ' गेलियैक भौजी?कतेक तक पढ़ल छियैक?" भौजी धीरेसँ बजलीह - "एखन त' पढ़िते छियैक।'एम डी'मे नामे लिखेलैक अछि।एखन त' तीन साल लगतैक।" ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेहक ३२१म अंक जे कि १ मइ २०२१केँ प्रकाशित भेल छल ताहिमे अरविन्द ठाकुरजीक पचपनियाँ मैथिलीपर आलेख छल। ई आलेख एक बेर फेर देल जा रहल अछि कारण वर्तमानमे एहि विषयपर वर्तमानमे जहाँ जे काज भऽ रहल अछि से सभ अरविन्दजीक पक्षसँ अपन तर्ककेँ मजगूत बना सकताह। - संपादक अरविन्द ठाकुर पचपनियां बनाम बभनियां मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर मैथिली साहित्यक संवादगत परिदृश्य प्राय: निद्रावस्थहि मे रहैत अछि।मौसमी घटना जकां किछु विद्यापति-समारोह,त्रैमासिक कथा गोष्ठी ‘सगर राति दीप जरए’ आ सहित्य आकादेमी द्वारा यदा-कदा आयोजित कवि-सम्मेलन/विचार-गोष्ठी सन किछु ढेला बीच-बीच मे एहि चहबच्चा मे ‘धप’ जकां गिरैत अछि,कादो-सनाएल पानि मे किछु क्षण लेल किछु लहरि उठैत अछि आ थोड़बे कालक बाद चहबच्चाक पानि मोफ़तिया यजमानी चुड़ा-दही भकोसि कए फोंफ काटैत थुलथुलहा पुरहित जकां स्थिर आ निद्रावशं भए जाइत अछि।इहो मौसमी घटनासभ अपन सीमितता मे समेटल रहि जाइत अछि आ एकरसभक प्रकृति सेहो एकांगी अछि।एकर सहभागी लोकनि कविता,कथा वा आलेखक माध्यम सं अपन बात कहि अपन-अपन ठाम धए लए छथि,श्रोता वा अन्य सहभागी दिस सं ताली-वाहवाहीक अतिरिक्त कोनो ठोस प्रतिदान नहि आबैत अछि,आन कोनो प्रतिदान अपेक्षितहु नहि रहैत अछि। नतीजा जे ई सभटा उपक्रम एकालाप,प्रलाप,विलाप तक सीमित रहि जाइत अछि,संलापक स्थिति नहि बनाए पाबैत अछि।वाद,प्रतिवाद आ संवादक अभाव मे मैथिलीक द्वन्द्ववाद पुनकिअहि नहि सकल अछि आ तें एकर अधिकांश स्वरुप एकरस आ बासी अछि। एमहर आबि पोथी प्रकाशनक गति त जोर पकड़लक अछि,किन्तु ओकर वितरण-व्यवस्था अखनिअहु व्यक्तिगत प्रयासहि तक सीमित अछि।पत्र-पत्रिकाक दलिदरा त जेना मैथिलीक भाग्य-रेखहि मे लिखल अछि।जे किछु बहराबितहु अछि,से कोनो ठोस वैचारिकता आ दृष्टिक अभाव मे बीधहि पुड़ैत रहैत अछि—कोनो योजना नहि,कोनो नवीन परिकल्पना नहि,कोनो दूरगामी संकल्पना नहि—जे रचना भेटि गेल,छापि देलहु। परिणामस्वरुप मैथिली साहित्यक परिदृश्य संवादहीनताक नियति भोगबाक लेल अभिशप्त अपन स्थैर्यक ठाम पर कोनो पाथर जकां अचल पड़ल रहैत अछि आ अपन एहि दयनीय दशा पर कानिअहु नहि पाबैत अछि।ई संवादहीनता,ई विमर्षहीनता कोनो भाषा-साहित्य लेल बहुत खतरनाक आ मारूक होइत अछि।भाषा-साहित्यक जीवंतता, विकास आ आधुनिकीकरण लेल ई आवश्यक छै जे ओकर वैचारिकता,ओकर रचनात्मकता सतत प्रवहमान रहए। लेखन व्यक्तिगत कर्म होइतहु सामुहिकताक मुखापेक्षी अछि। तें लेखक कें बुझल रहबाक चाही जे ओकर चारुकातक लेखनक परिदृश्य की छै,के सभ लिखि रहल छथि,की लिखल जाए रहल छै,केना लिखल जाए रहल छै आ तहि मे ओकर अपन स्थिति आ स्थान की छै,ओकर अपन दिशा ठीक छै वा ओकरा मे कोनो परिवर्तन वांछित छै।लेखक जहि भाषा मे लिखि रहल छै,ओहि भाषा सं सम्बन्धित आन्तरिक आ वाह्य गतिविधि की छै, तहि गतिविधि सं भाषाक लाभ भए रहल छै वा हानि,तहु पर नजर राखब आ अद्यतन रहब सेहो लेखक लेल आवश्यक छै।लेखकक अपडेट रहब ओकर लेखन आ भाषा—दुनू कें परिमार्जित करए छै,आधुनिकता आ प्रगतिशीलता सं लबरेज करए छै।किन्तु,जं सुचना-संवाद सं अपडेट रहल त से मैथिली की भेल! सूचना-संवादक अभाव मे मैथिलीक अधिकांश लेखन एकभगाह आ असंतुलित भेल अछि।भावयित्री आ कारयित्री दुनू क्षेत्र मे अराजकता व्याप्त अछि।इतिहास-लेखन आ वैचारिक क्षेत्र त झूठ,प्रपंच आ क्षुद्रताक जीवन्त दस्तावेजहि बनल छै।प्रतिरोधी आ यथार्थवादी लेखक-शक्तिक अभाव मे भाषा आ क्षेत्रक ‘सत्य’ ठोह पाड़िकए कानि रहल छै।कोय ओकर नोर पोछनिहार नहि।इतिहास-लेखनक कुरुक्षेत्र मे प्रतिद्वन्द्वीविहीन भेल धृतराष्ट्र अपन सार आ सखा-संतानक संग उन्मत्त भेल अपन पैशाचिक-विजयक घोष कए देने छै।मनमानीक इ स्थिति छै जे एकटा सबाल्टर्न-शकुनी-इतिहासकार भुइयांगत यथार्थ कें आम आदमीक नजरि सं देखबाक दाबी ठोकैत एकर पुनर्लेखनक गप करए छथि आ एहि क्रम मे हुनक सम्पूर्ण शक्ति अपन जातिक श्रेष्टताक वर्णन सं होइत हुनक अपन व्यक्तिगत/पारिवारिक कुलीनताक स्थापना आ ओकर दस्तावेजीकरण मे खर्च भए जाइ छै।इतिहासक सामाजिकताक नाम पर एहन विकट निर्लज्जताक लिखित प्रदर्शन होइ छै आ एहि समाजविरोधी विध्वंसक लेखन पर कतहु सं कोनो प्रतिरोधक स्वर नहि अभरए छै। प्रतिपक्षक अक्षमता आ एकरा प्रति रूचिहीनता कें दोष सेहो देल जाए सकए छै,किन्तु एकर एकटा प्रमुख कारक संवादहीनता सेहो छै,जे साहसिक आलोचना कें पुनकए नहि दए रहल छै। नतीजा छै जे निहित स्वार्थी तत्वसभ निधोख भए कए मैथिली साहित्य न्यायालय सं एक्स-पार्टी डिक्री लेने चलि जाए रहल छै। शैलीक एकटा उक्ति छनि जे,”जेना एकटा निराश चोर चोरसभ कें पकड़निहार बनि जाइत अछि,तहिना निराश भए कए लेखक आलोचक बनि जाइत अछि”। शैलीक एहि उक्तिक अर्थ लोक अपन-अपन आग्रहक आधार पर निकालि सकए छथि।एहि ‘निराशा’क व्याख्या सेहो भिन्न-भिन्न प्रकार सं कएल जाए सकए छै।कहल जाए सकए छै जे ई ‘निराशा’ लेखकक अपन लेखनक नि:शक्तता,अपंगता वा असफलताक परिणाम छिअए।किन्तु एकर एकटा दोसरहु पक्ष छै आ खासकए मैथिलीक प्रसंग मे ओ बेसी प्रासंगिक आ उपयुक्त बुझाइ छै।एतय जाति-बिरादरी, गोधिया-दियादवादक किल्लत सं ग्रस्त कतेकहु सशक्त लेखक आ ओकर लेखन कें यत्नपूर्वक अनठिआएल गेल छै आ षड्यन्त्रपूर्वक ओकरा चिन्हार नहि हुअए देल गेल छै।तें ई ‘निराशा’ सशक्त,सार्थक आ प्रगतिशील लेखनक अछैतहु ‘पहचान’ आ ‘मोजर’ नहि भेटबाक परिणाम बेसी बुझाइ छै।गैर-मैथिल लेखकसभक संग त ई अनदेखी परिपाटी जकां भेलहि छै,गुट-गिरोह सं अलग रहनिहार मैथिलहु लेखक कें ई दण्ड भोगए पड़ल छनि।आवश्यकता एहि बातक रहए जे शैलीक एहि उक्ति कें चरितार्थ करैत एहि दुनू प्रकारक ‘निराशा’क परिणामस्वरूप ‘चोर पकड़निहार’ आलोचकसभक उत्पत्ति होइतए आ यथास्थिति कें खुल्ला चुनौती नहि त चुनौतीक आगमनक आशंकाजनित भय होइतए।अखनि तक एहन अपेक्षित स्थिति नहि आएल अछि।कामना करी जे ई उत्पत्ति जं अखनि तक नहि भेलए त आगु हुअए,निकट भविष्यहि मे हुअए। फ़ारसीक एकटा कहावत छै—“अदावत के आंखि मे हुनर बहुत बड़का ऐब छै”। मैथिलिक पुरस्कार-सम्मान-लुटेरा समुदायक विभिन्न गुट-गिरोहक संचालक आ ओकरा बलें वर्चस्वशाली बनल लोकक फोंक-भयभीत मानस कें हुनरमंद लोकक अस्तित्व खतरा जकां बुझाइत आएल छै आ ओ एहन तत्त्व सं एन-केन-प्रकारेण छुट्टी छोड़ाए लिअए चाहए छै।एहि लेल ओसभ हुनर कें हतोत्साहित,भ्रमित करबाक लेल कोनहुटा छल-प्रपंच बांकी नहि छोड़य छथि। एहन सन संवादहीन,संवेदनहीन आ मौन-प्रपंचमय परिदृश्य मे सुभाष चन्द्र यादवक ‘गूलो’क प्रकाशन आ एहि मे प्रयुक्त भाषा कें ‘पचपनियां’ नामकरण करैत एहि पर आलेखक माध्यम सं अपन पक्ष राखब एकटा एहन घटना छै,जेकर मैथिलि-थाना द्वारा संज्ञान लेब,डायरी मे दर्ज करब,ओकर तहकीकात करब आ निष्कर्ष पर पहुंचब बहुत आवश्यक छै।एहि घटनापर सकारात्मक विमर्षक मार्ग प्रशस्त करब मैथिली भाषा आ एकर लेखन कें आत्मावलोकन,आत्मपरीक्षण आ आत्मशोधन/आत्मपरिष्करणक अवसर प्रदान करत।एहि अवसरक लाभ लेबाक चाही। सुभाष जीक आलेख एहि बात कें उजागर करए छै जे साहित्यक दुनियां मे सभकिछु पवित्र आ पूजनीय नहि छै,आनहि क्षेत्रसभ जकां एतहु अपवित्र,अशोभन आ निन्दनीय तत्त्वक उपस्थिति रहए छै।मैथिलीक परिपेक्ष्य मे त ई उपस्थिति प्राणघातक मात्रा मे,जानमारू बहुमत मे छै। सुभाष जीक आलेख विमर्ष कें जगैबाक लेल यथेष्ट खोराक दैत अछि,यद्यपि कि हुनकर कथनसभ मे बहुत रास झोलसभ सेहो अछि।जहि आलेखक माध्यम सं ओ अनेक रास प्रश्न उठबए छथि,तहि आलेख पर सेहो अनेकानेक प्रश्न उठैत अछि।पहिल झोल त नामकरणहि मे अछि।ओ कहए छथि जे कोनो सोल्हकन सं पुछला पर ओ अपन मातृभाषा ‘ठेठी’ बतबैत अछि आ शिक्षित सोल्हकन कहैत अछि जे,’मैथिली त बाभनक भाषा छिऐक’। सोल्हकन एकरा ‘ठेठी’ कहैत अछि।ठीक!शिक्षित सोल्हकन एकरा की कहैत अछि,से ओ नहि लिखलनि। हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि जे सोल्हकनहि नहि,पढल-लिखल सम्पूर्ण मैथिलेतर जातिक लोक एकरा सभदिन ‘तिरहुता’ कहैत आएल अछि,आइअहु कहैत अछि। हं,पुछला पर ई प्रतिक्रिया अवश्य भेटैत अछि जे मैथिल ब्राह्मणक आग्रही प्रभाव मे ‘तिरहुता’ कें ‘मैथिली’ संज्ञा दए देल गेल अछि।ई प्रतिक्रिया एकदम वाजिब आ तार्किक छै आ एकर प्रमाण छै जे आइयो एकर लिपि कें ‘तिरहुता लिपि’ कहल जाइ छै—किछु एजेन्डाजीवी कें छोड़िकए।तखनि सुभाष चन्द्र यादव जी एकर नामकरण ‘पचपनियां’ कोन आधार पर कएलनि?हुनक आलेख मे एहि प्रश्नक उत्तर नहि अछि। ओ लिखए छथि जे सुपौल,सहरसा,मधेपुरा,अररिया तथा पुर्णियाक सवर्ण, पिछड़ा, दलित एवं सर्वहारा अर्थात सभ जाति आ वर्गक लोक एहि मैथिली(पचपनियां) मे बाजैत अछि।ई बाइ मे देल वक्तव्य जकां अछि – कोनो मौलवीक फ़तवा जकां।ध्यातव्य जे जेकरा सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली मे पचपनियां कहल जाइ छै,तहि मे सवर्ण आ दलित त नहिए टा आबैत अछि,यादव सेहो एहि गोल मे सम्मिलित नहि अछि। ‘सर्वहारा’ शब्द सेहो एहि सम्पूर्ण समुदाय कें नहि समेटैत अछि।एहि परिपेक्ष्य मे एकर नव-नामकरण ‘सबजनियां’ बेसी उपयुक्त होइतए।जं क्षेत्रीयताक विभाजन कें आधार बनाबी,तखनिअहु एकर नामकरण ‘कौशिकी’ किंवा ‘कौशिकी मैथिली’ हएबाक चाही छल।ओना एहि नामकरणोत्सव मे ‘मैथिली’ संज्ञाक प्रयोगहि किऐ हुअए? एतबे नहि,एहि नामकरणोत्सवक स्वघोषित पौरोहित्य ग्रहण करबाक धड़फड़ी मे सुभाष चन्द्र यादव जी एहि क्षेत्र-विशेष कें मिथिला कहि अनजानहि मे वएह एजेन्डा कें विस्तार दए दैत छथि,जेकरा लेल किछु मुर्दा-संस्कृतिक उघवाह अतीतजीवी लोकनि ढेका खोलिकए झालि बजा रहल छथि। डा मेघन प्रसादक संग एकटा साहित्यिक कार्यक्रम मे कएल गेल अपमानजनक व्यवहार निकृष्टता आ अधमताक श्रेणी मे आबैत अछि आ एहन कुकृत्य करनिहार कें विद्वान की,मनुष्यहु नहि मानल जाए सकैत अछि। नीक आ प्रशंसनीय बात जे सुभाष जी एहि कुकाण्ड सं विचलित भेला आ तत्क्षण ओकर प्रतिकार कएलनि।किन्तु सुभाष चन्द्र यादव कोनो छोटभैया-नेता किंवा सियासी-भोलंटियर नहि छथि।ओ लेखक छथि आ लेखक अपन प्रतिकार वाणी-मात्र सं नहि,लेखनक माध्यम सं करए,से अपेक्षित रहैत अछि।मेघन-काण्ड भेला कतेकहु वर्ष बीत गेल,एहि अवधि मे सुभाष जी बहुत किछु लिखलनि,किन्तु एहि घटना पर लिखल हुनकर कोनो संस्मरण,कोनो रिपोर्ताज, कोनो निबन्ध व्यक्तिगत रूप सं हमरा त देखल-पढल नहि भेल।ओ कहि सकए छथि जे सभटा पत्र-पत्रिका पर बाभनहिसभक आधिपत्य रहए,तें हुनकर एतद्सम्बन्धी रचना नहि छपल।प्रश्न तखनिअहु अपन ठाम पर छै जे की ओ एहि सोल्हकन-अपमान-काण्ड पर किछु लिखने रहथि,लिखलनि त कतय छपलनि,नहि छपलनि त के नहि छापलकनि आ कोय जं नहि छापलकनि त ओ स्वयं एकरा प्रकाशित किऐ नहि कएलनि? सुभाष जीक मामला मे त आर्थिक संकटहु कोनो बहाना नहि अछि।‘साफ दिखते भी नहीं,सामने आते भी नहीं’ सन गप!मेघन जी संग भेल कुकृत्यक वाजिब आ असली प्रतिकार त इ रहए जे एहि घटना कें लिखिकए दस्तावेजी रूप देल जएतए आ एकर प्रस्तोता अपन कलम कें नोर आ लहू मे बोरि-बोरि लेखन-शक्तिक एहन सदुपयोग करितथि जे पढनिहार-सुननिहार एहि करतूत पर सिहरि उठितए,अपरिमित आक्रोष सं भरि जएतए आ करतूतक दोषी कुकर्मीसभ पर असीम घृणा सं थू-थू करितए।से नहि कए,बाभनहि राजकमल चौधरीक अभिनन्दन-लेखन करब हुनक प्राथमिकता मे किऐ अएलनि? देश मे लोकतंत्र छै,एकरा द्वारा प्रदत्त अधिकार छै,तें जवाबतलबी हएबाक चाही।किन्तु अधिकारक संग कर्तव्य सेहो जुड़ल छै आ तें उत्तर मांगनिहार कें उत्तर देबाक उत्तरदायी सेहो हुअए पड़ए छै। लेखनक प्रारंभिक दौर मे कोनो लेखक अपन लेखन-भाषाक राजनीति वा आन गतिविधिसभ सं अनभिज्ञ आ निर्लिप्त रहैत अछि। ओकर लेखकीय चेतना मूलत: अपन लेखन पर केन्द्रित रहैत अछि।तें अपन आरंभिक लेखन मे आनहि लेखकसभ जकां सुभाष जी जं बभनियां मैथिलीक प्रयोग कएलनि आ साहित्यिक गोष्ठी,सेमिनार आदिक संग-संग अपन दैनिक बैठकासभ मे बाभनहिक संगति धएने रहला,त ई स्वाभाविक मानल जए सकैत अछि।किन्तु तिरहुता किंवा ठेठी (जेकरा ओ आग्रहपूर्वक पचपनियां कहए छथि) मे लिखबाक बेगरताक भान त हुनका मेघन प्रसादक संग भेल बेहुदगीक बादहि भए जएबाक चाही छल।दुर्भाग्य जे तहिया हुनका ई इलहाम नहि भेलनि।तेकर बादहु हुनक लेखनक माध्यम बभनिअहि मैथिली रहल आ हद त ई जे पचपनियां मैथिलीक एजेण्डा उठाएब आ ओकर तरफ़दारी-पैरोकारी करबाक लेल सेहो ओ बभनिअहि मैथिली कें अपन माध्यम किंवा औजार बनएलनि।की हुनका सन अति-प्रबुद्ध लेखक कें ई सामान्य सन बात नहि बुझल भेलनि जे कोनो भाषिक-परम्परा (लेखन, शैली,वर्तनी) मात्र मुद्दा उठएला,तहि पर नाराबाजी वा हू-ले-ले कएला वा कोनो अज्ञात अस्तित्व सं ओकर मान्यता,स्वीकृति वा प्रमाणपत्रक याचना कएला सं नहि,ओहि मे लेखनक निरन्तरता सं बनैत अछि? एहि प्रसंग मे दू टा लेखक त विषयगत रोल माडलक रूप मे मैथिली मे अपन उपस्थिति दर्ज कएनहि छथि आ सुभाष जीक दृष्टि-परिधिअहु मे हएबहि करता।तारानन्द वियोगी अपन लेखन मे बहुत कुशलताक संग अपन गाम-घर-परिवारक अनेक शब्द आ वाक्यांशक प्रयोग करए छथि आ बभनियां मैथिली कें एकटा अलग तरहक ग्राम्य-सौन्दर्य सं सज्जित कएलनि अछि,त जगदीश मंडल अपन विशेष वर्तनी आ शैलीक माध्यम सं विपुल लेखन कएलनि अछि आ एकटा बेछप उदाहरणक रूप मे स्वयं कें प्रस्तुत कएलनि अछि।जगदीश मंडल एतबहि पर नहि रुकला अछि।ओ अपन विशिष्ट शैलीक निर्माणक संग-संग ओकर विकासक लेल एकटा वृहत बौद्धिक-समुदाय कें अपन संग लए कए चलए छथि आ साहित्यिक-सहकारिताक अनुपम प्रयोग मे सफल भेल छथि। हिनकासभ सं प्रेरणा लए मे सुभाष जी कें के रोकलकनि?दोसर बात ई जे कोय केकरो बात अहिना नहि मानि लए छै।तें प्रेरणा देबए सं पहिने स्वयं मे प्रेरणाक स्रोत उत्पन्न करए पडए छै।प्रेरणाक सत्त्व ई छै जे एकर महत्व दए सं बेसी ग्रहण करए मे छै। अहांक वैचारिक व्यक्तित्व प्रेरक अछि तखनहि कोय अहां सं प्रेरणा ग्रहण करत।प्रेरणादायी व्यक्तित्व बनबाक लेल भीमराव अम्बेडकर महाड़ मे जल-सत्याग्रह चलैलनि, नासिक मे कालाराम मन्दिर मे दलित-प्रवेश लेल आन्दोलन कएलनि।भारतक संविधानक निर्माणक संग-संग दलित-अस्मिता आ आन-आन विषय पर प्रचूर लेखन कएलनि।ठीक छै जे सभक तुलना अम्बेडकर वा गांधी सं सं नहि कएल जएबाक चाही,किन्तु जे स्वयं के एहि परम्परा-पुरुषक रूप मे प्रस्तुत करए चाहए छथि,हुनका सं त ई पुछलहि जाए सकैत अछि जे अहां लग अपन पूंजी की अछि?इतिहास कें बिसरब,त ऐतिहासिक भूल करब।जहि सर्वहाराक गप एहि प्रसंग मे आएल अछि,ओकर नायक के रहए,के छै? ओ केकरा सं प्रेरणा ग्रहण करत?एक समय रहए जे कोय एहि समाज कें अपन नायक उधार देबाक लेल तैयार नहि रहए।किऐ? एकमात्र कारण ई जे ई सर्वहारा अपन नायक के चुनब,मानब छोड़ि अपन बुद्धि-विवेक कें ओकरहि सभक चौखटि पर राखि आएल,जेकरा सं ओकरा लड़बाक रहए।दुर्भाग्य रहलए जे ई वर्ग कहियो बुद्ध कें पकड़लक,कहियो कबीर,कहियो रैदास कें,कहियो ज्योतिबा फुले कें,त कहियो बिजली पासी,बिरसा मुण्डा,झलकारी बाई,सुहेलदेव कें आ अन्तत: फेर पुरोहिती-चौखटि पर घुरि आएल। कौशिकी-कक्षक भीम केवट आ लौरिक मनियार सोल्हकन-लोकसमाज स्मृति मे यथावत छथि,किन्तु सोल्हकन-अभिजात्य लेल त्याज्य किऐ छथि?प्रारम्भिक दिन जेहन हुअए,किन्तु सुभाष जी सबदिन एलिट बनल रहबाक लेल प्रयासरत रहलाह अछि।एहि क्रम में ओ पचपनियांक पौध लगबए सं पहिने जमीन तैयार करबाक अनिवार्यता कें बिसरि गेल बुझाइ छथि।से नहि त पहिने उगरी महाराज,सोनाय महाराज,चिल्का महाराज,लाला महाराज,लालमैन महाराज,छेछना डोम,दीना भदरी,अमर बाबा आ सलहेस इत्यादि हुनक लेखनक परिधि मे किऐ नहि अएला।ई सभ नायक आन-आन जातिक छथि,किन्तु यादवहु मे त लौरिकक अलाबे कारू खिरहरि,बीशू राउत,महिनाथ आदि लोकनायक भेला।जखनि अपन प्रतिरोधक अभिव्यक्ति लेल अहां जाति कें आधार बनबए छिअए त अपन जातीय आधार कें त पहिने सुदृढ करू। देश स्वतंत्र अछि,लोकतंत्र कें अंगीकृत कएने अछि आ देशक आधुनिक भूगोल प्रशासनिक दृष्टिकोण सं राज्य, प्रमण्डल,जिला,अनुमण्डल,प्रखण्ड आदि मे विभक्त अछि। एहन स्थिति मे आधुनिक व्यवस्था कें तिलांजलि दएत कोनो कपोल-कल्पित पुरातनकालक मिथकीय ‘मिथिला’ नामक यूटोपियाक कामना करैत ओकरा पुनर्स्थापित करबाक चौल करब अंगुरी पर गिनल जाएबला किछु अतीतजीविताक कारोबारीसभक काज अछि आ ई बात मैथिलेतर समुदाय त बुझितहि अछि,मैथिलक बुझनुक बहुमत सेहो एहि यथार्थ सं अनभिज्ञ नहि अछि।एहन स्थिति मे ‘पचपनियां’क पैरोकारी करैत-करैत सुभाष चन्द्र यादव जी कें एहि यूटोपियाक गह्वर-पूजन मे भक्तिपूर्वक साष्टांग दण्डवत भए झालि बजाएब केना सोहएलनि?जखनि अनेक जिलाक गजेटियर लिखनिहार महान अण्वेषी इतिहासकार पी सी रायचौधुरी सहरसाक गजट लिखैत काल एहि क्षेत्र-विशेष कें कोनो मिथकीय-राजक हिस्सा मानए मे सशंकित भए गेला,एकरा सर्वकालीन स्वतंत्र क्षेत्र कहलनि,तखनि इतिहासक ककहरा सं अनभिज्ञ कोनो व्यक्ति एहि तरहक भ्रम पसारए मे सहायक केना भए सकैत अछि? एतबहि नहि,ओ प्रकारान्तर सं ईहो प्रस्ताव दएत बुझाइ छथि जे जं हुनक ‘पचपनियां’क एजेण्डा स्वीकार कए लेल जाए त ओ एहि सं जुड़ल राजनीतिक वा भाषाई आन्दोलनक सहभागी भए जएता।विचित्र द्वैध,अपच अतिरेक आ ब्लैकमेलिंग सं भरल अछि ई गप,जाहि मे धमकीक अढ सं परस्पर लाभ बांटि गठबन्धन करबाक प्रस्ताव अन्तर्निहित अछि। आ की ई सुभाष जीक कोनो पराजय-बोध-विशेष अछि जे अन्तत: मनुष्य कें याचनाक मुद्रा मे लए आबैत अछि?कनी काल लेल मानि लेल जाए जे दातालोकनि(?) दिस सं हुनक पचपनियां कें सम्मान देब गछि लेल गेल,हुनका साहित्य अकादेमीक वांछित सम्मान सेहो दए देल गेलनि।आब ओ की करता? अपन घरक ताखा पर राखल मिथिला-राज उतारि सम्मानदाता-लोकनि कें हस्तगत कए देता? कतहु नुकाए कए राखल अलादीनक चिरागक जिन्न कें प्रकट कए अतीतक पुनर्स्थापनक एहि तमाशा कें महा-आन्दोलन मे तब्दील कए घमासान मचाए देता? एहि काजक लेल अपन लेखकीय वा सामान्य जीवन मे कतेक लेखक वा समर्थक तैयार कएने छथि ओ? तिरहुता (जेकरा पचपनियां कहल गेल अछि) कें आदरविहीन (non-honorific) कहब सेहो अज्ञानतावश ओकर अनादर करब थिक। ठेठी आदरक अपन तरीका छै आ से तरीका देखबाक लेल कोनो अणुवीक्षण यंत्र (microscope)क बेगरता नहि छै।एकतुरिया वा छोट लेल जं ‘तूं जेबही’ कहल जाइ छै,त जेठक लेल सम्मान देबाक स्थिति मे ‘तूं जेबहक’ कहल जाइ छै।एहन अनेक उदाहरण देल जाए सकैत अछि,जाहि पर सुभाष जीक ध्यान नहि गेल हुएनि,से सम्भव नहि ; अपन स्थापना कें सुदृढ करबाक लेल ओ एकरा जानि-बुझिकए अनठिअएने छथि,से बात अलग।अपन ‘गूलो’ मे ओ स्वयं ठेठीक आदरसूचक ठाठ पसारने छथि।‘घुरि कए आबै छियह’,’हौ!तू बड़ कंजूस छहक!’,’भैया,अपने टा खाइ छहक’,’बबा,कहिया कीन देबहक’,’पांच सौ लाइब कए देलियह।सबटा चाटि गेलहक आ पांच टका निकालै मे दांती लागै छह।‘ आदि सम्मानसूचक(honorific) नहि छिऐ,त की छिऐ?ई बात सही छै जे एहि सर्वहारा तिरहुता मे विकारीक उच्चारणबला कोनो शब्दक स्थान नहि छै आ तें ‘भ गेलै’,‘क देलकै’ आदिक स्थान एतय नहि छै ; किन्तु एकरा ‘भाए गेलै’, ‘काए देलकै’ लिखब त जानि-बुझिकए एकरा विकृत करबाक कुचेष्टा छिऐ। अजीब बात जे अपन आलेख मे सुभाष जी गर्वपूर्वक एहि प्रयोगक चर्चा करए छथि,जखनि कि ‘गूलो’ मे कएकठाम ‘कए-भए-लए’क प्रयोग करए छथि।ई त ‘गतानुगतिकता’क विरोधक नाम पर ‘नव-गतानुगतिकता’क प्रतिपादन करबाक,नींव राखबाक उपक्रम बुझाइत अछि।उपरोक्तक जे उच्चारण कौशिकी जनपद मे होइ छै,तहि अनुरूप ओकरा ‘भए गेलै’, ‘कए देलकै’ लिखब बेसी उपयुक्त छै।ई अलग बात जे ‘गूलो’ मे इएह टा प्रयोग नहि छै।‘गूलो’क प्रयोगसभ मिनजुमला खाता छिऐ,जहि मे भाषा,बचल-खुचल विभिन्न प्रकारक तर-तरकारी सं बनल ‘डलना’(mixed vegetable) भए गेल छै।एहि मे ‘काए’ के संग-संग ‘कए’ के प्रयोग सेहो भेल छै आ ठाम-ठाम भेल छै।जं ‘काए’ आ ‘भाए’ लिखल गेलए तखनि ‘लए’ किऐ?एकरहु ‘लाए’ हएबाक चाही छलए।लेखक एहन अनेक दोष टंकक वा प्रकाशकक माथ पर थोपि सकए छथि,किन्तु पाठक कें कोनो आन ठाम देल स्पष्टीकरण पढबाक फुरसत कहां छै।प्रयोग हएबाक चाही,एकर स्वागत! प्राय: प्रत्येक लेखक प्रयोग करैत अछि।किन्तु प्रयोग करैत ई सजगता त हएबाकहि चाही जे प्रयोग युक्तिसंगत हुअए, पाठकक मगज मे आसानी सं घुसि जाइ,अराजकता नहि पसारए। ‘गूलोक पुनर्पाठ कयला पर केदार कानन कें कोनो असुविधा नहि भेलनि’ सन-सन तर्क बेतुक छै।केदार कानन एहि पोथीक प्रकाशक छथि आ एकर भुमिका सेहो वएह लिखलनि अछि।स्वाभाविक आ अपेक्षित छै जे ओ एकरा बेर-बेर पढथि।किन्तु पुनर्पाठक ई अपेक्षा सामान्य पाठकहु सं किऐ राखल जाए? ईहो आवश्यक नहि जे सभक बौद्धिक-स्तर केदार काननहि जकां उच्चस्तरीय हुअए। अनुभव कहैत अछि जे मैथिली “खिधांसीक ओस्ताद” लोकनिक खान अछि। डेग-डेग पर भेटता।केकरो खिधांस करए लागता त एहि पुण्य-प्रयास मे आकाश-पाताल एक कए देता।खिधांसक वेध-लक्ष्य जं कोनो विचार वा स्थापना छै त ओकरा अपन उद्गम-माताक कोखि मे घुरि जएबाक लेल बाध्य कए देता आ जं लक्ष्य(Target) पर कोनो व्यक्ति छै त ओकरा रौरव नर्क गेनहि कल्याण।किन्तु खिधांसीक एहि ओस्तादलोकनि कें हुनकर अपनहि कहल बात कें लिखिकए व्यक्त करबाक आग्रह करिअनु त अहांक आग्रह अनन्त-अनन्त जन्म तक अपन पालनक प्रतीक्षा करैत रहि जाएत। कोनो व्यक्ति ताल ठोकिकए जे बात मौखिक तौर पर कहि रहल छै,तेकरा लिखित रूप मे व्यक्त करए मे ओकरा की दिक्कत? दिक्कत छै। दिक्कतहि टा नहि छै,खतरा सेहो छै।मौखिक अभिव्यक्ति मे अपनहि कहल बात सं नठि जएबाक सुविधा छै।एहि सुविधाक लाभ लैत मूंहक अतिसार सं ग्रसित मानुस बेर-बेर बोकरि सकैत अछि आ अपन वमन संग अनर्गल प्रलापक मल-मुत्र विसर्जन कए सकैत अछि।लिखिकए अपन बात कहए मे मारिते रास खतरा छै।पहिल खतरा छै—मारि खएबाक।ई खिधांसीक ओस्ताद लोकनि प्रकटत: ‘बुधिक बखारी’ भनहि होथु,हुनका अपनहु बुझल छनि जे ओ वस्तुत: ‘फोंकहा संठी’ सं बेसीक औकात नहि राखए छथि।ई सभ ओस्तादलोकनि पछुआरक वाणी-वीर छथि।सम्मुख होइतहि चरण गहि ‘नाथ-प्रभु-बापा’ कहि लम्बवत भए जेता,उठिकए देह झाड़ि लेता आ पछुआर जाइतहि फेर वएह गारि-कीर्तन।जे से!कोनो कथन एक बेर लिखित भेलाक बाद दस्तावेज भए जाइ छै,प्रकाश मे आबितहि अपरिवर्तनीय भए जाइ छै। लिखनिहार लेल अपन बात सं नठबाक,पलटबाक कोनो गुंजाइश नहि रहि जाइ छै।जं एहि मे कोनो आरोप छै त ओकरा प्रमाणित करबाक जिम्मेदारी आरोपकर्त्ता लेखक पर स्वत: चलि आबए छै। तथ्यहीन बात लिखला पर ओ सार्वजनिक निन्दा आ हास्यक पात्र बनि जाइ छै।ओकर समकालीन ओकर वयस,वरिष्टताक लिहाज कए भनहि दम साधि लिअए,चुप रहि जाइ,किन्तु अगिला पीढी ओकरा पर कोनो मुरब्बत नहि करत,ओकरा छील देत।कखनियो काल एहनहु होइ छै जे शब्दक मधुमय आवरण मे गरल परसबाक ओस्तादी कएल जाइ छै।किन्तु एहि सं खतरा टरैत नहि छै,कनी विलम्बित भनहि भए जाओ। अपन बात कहबाक लेल लेखकक एक-एक शब्द-चयन,वाक्य-विन्यास आदि लेखकक मूल मंशा,ओकर वैचारिक-मानसिक स्थिति कें प्रकट कएअहि दए छै।बुझनुक पाठक लग अभिधा-व्यंजना-लक्षणा वा व्याज-स्तुति-वक्रोक्ति आदिक मायाजाल कोनो काजक नहि रहि जाइ छै। अपन शिल्प-शैली वा कलात्मकताक बल पर अहां अपन लेखन कें केतबहु आवरण दिअओ,ओकर वस्तुगत अर्थ-यथार्थ सुधि-पाठक तक पहुंच जाइत अछि। अहां द्वारा प्रयुक्त एकटा शब्द,एकटा वाक्य,एकटा अनुच्छेद अहांक लेखकीय टा नहि, अहांक व्यक्तिगत व्यक्तित्वक वास्तविकता कें नीक जकां प्रकट कए दएत अछि।जं रामलोचन ठाकुर अपन पोथी ‘बेताल कथा” हरिमोहन झा कें समर्पित करैत आनहि परम्परावादी पण्डा-पुरहित साहित्यकार जकां हुनका ‘हास्य सम्राट’ कहए छथि त एहि एक शब्द मात्र सं हुनकर मार्क्सवादी चोला आ व्यंग्य-हास्यक भेद सम्बन्धी हुनकर साहित्यिक समझ दुनू धराशायी भए जाइत अछि।जखनि महापण्डित गोविन्द झा लिखए छथि जे, ‘अधिकतर ग्राहक भेला समृद्ध वृद्ध भूमिहार ब्राह्मण,एकर प्रेरक भेलनि अपन जाति मे कन्याक कमी आ दोसर मैथिल ब्राह्मण वर्ग मे समएबाक कामना’,त भूमिहार ब्राह्मणक प्रति हुनकर घृणा,एहि जातिक विराट पुरुषार्थ कें लघुकाय करबाक हुनक क्षुद्र-प्रयास आ मैथिल ब्राह्मण(हुनक अपन जाति) द्वारा बेटी बेचबाक अधम आ घृणित कर्मक बादहु ओकर श्रेष्टता(?) कें अवांछित सुरक्षावरण देबाक प्रपंच नुकाइत नहि अछि,जगजियार भएअहि जाइत अछि।जं डा वीरेन्द्र मल्लिक अपन कविता ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’ मे कविता कें मारिजुआना आ किदन-कहांदन घोषित करए छथि त ई बात नुकाइत नहि अछि जे ओ अपन काव्य-रचना सं पूर्व कथीक सेवन करए छथि।जं अग्निपुष्प अपन टिप्पणी मे जीवकांत कें एलेन गिन्सवर्गक परम्पराक कवि घोषित करए छथि त हुनक अध्ययन-मननक अल्पता स्पष्टतया देखार होइत अछि।एहन अनेक उदाहरण मैथिली मे अछि,किन्तु तेकर विस्तारण आन कोनो ठाम लेल छोड़ल जाए।एतय आशय एतबे जे अभिव्यक्तिक लेखन-प्रणाली दुधारी तलवार छै,जाहि पर चलब सभाक बुत्ताक बात नहि छै। आन-आन भारतीय भाषाक साहित्य मे जे स्वतंत्रता,प्राय: किछुअहु कहि देबाक जे छूट आइ उप्लब्ध अछि, ओ सभ टा वर्त्तमान लेखकलोकनिक अपन अरजल नहि छनि।ई हुनकर पुरखासभ छला जे सभ अपन समय मे एकरा लेल कठिन संघर्ष कएने रहथि।मैथिली साहित्य मे दुर्भाग्यवश एहन संघर्षशील पुरखासभ वा त छथिअहि नहि, वा नगण्य छथि।मैथिलीक लगभग शत-प्रतिशत पुरखा लेखकसभ आजादी सं पूर्व राजा,राजभवन, सामन्त, जमीन्दार आ आजादीक बाद सत्तासीन शक्तिशाली वर्गक आ सम्पूर्ण काल मे धार्मिक-प्रतिष्ठानसभक लेल स्तवन लिखबाक काज मे बाझल रहला आ एहि मे विद्यापति सन नमहर नाम सेहो सम्मिलित अछि।एकरहि परिणाम अछि जे मैथिली साहित्य सं आक्रोश आ प्रतिरोध अलोपित अछि आ हमरासभ कें आत्मालोचनक परम्परा आ ओकर उप्लब्धिसभ सं पूर्णतया वंचित रहि जाए पड़ल अछि आ वर्त्तमान वा दू-एक पीढी पूर्वक किछु गिनल-गुथल प्रगतिशील लेखकलोकनि कें प्राय: शून्य सं अपन शुरुआत करए पड़लनि अछि। आधुनिकता आ ओकर संघर्ष त वस्तुत: आब विचारणक केन्द्र मे आबि रहल अछि आ सेहो अधिकांशत: मैथिल ब्राह्मणेतर लेखकलोकनिक मारफत। ई स्थिति जातिक नाम पर स्थापित लेखकीय-प्रतिबद्धताहीन समुदाय कें भयभीत आ असहज कए रहल अछि। हुनकासभ कें बुझल छनि जे नबका पीढी कें देबाक लेल हुनकासभ लग ने अपन व्यक्तिगत पूंजी छनि,ने पुरखासभक देल कोनो समृद्ध क्रान्तिकारी विरासत आ जे किछु बटुआ-झोड़ा मे छनि,जं तेकर नीक सं जांच-पड़ताल भेलए त ओहिसभक फोंक आ जीर्ण-शीर्ण अस्तित्व देखार भए जेतए,बेनंगन भए जेतए।तें कोनो नबका विचार आबितहि ओकरा पर अभद्र आक्रमणक कुत्सित प्रयास शुरू भए जाइत अछि।ई काज अखनि लेखनक माध्यम सं कम,मौखिक रूप मे बेसी आ सोशल साइट्सक अभद्र टिप्पणीसभक माध्यम सं बेसी भए रहल अछि।प्रसंगवश एकटा कहावत मन पड़ैत अछि—‘प्रेमी लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ चुम्मा-चाटी करए लागए छै आ वक्ता लग जखनि शब्द सठए छै त ओ खोंखी करए लागए छै’। वर्त्तमान स्थिति कें देखैत एहि कहावत मे एकटा टुकड़ी और जोड़ल जाए सकए छै—‘मैथिल लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ गारि पढए लागए छै’।कहावत मजाकिया छै,किन्तु चेतबए छै।मैथिलीक राड़ी-बेटखौकी बहुत चिन्ताजनक छै। केकरो दोष बताएब ओकर खिधांस करब नहि होइ छै।ई लक्ष्य-तत्वक परिमार्जनक लेल एकटा शुभेच्छा सेहो होइ छै।एकर संज्ञान लेब त अहां अपन परिमार्जनक दिशा मे बढब,नहि लेब त बूड़ू,लोकक की जाइ छै! ‘निन्दक नीयरे राखिए आंगन कुटी छबाय’ तें कहल गेल रहए। आब ई अहांक इच्छा जे अपन कुतर्कक परम्परा मे नव कुतर्क गढि ली जे ई बात मैथिली मे नहि कहल गेल छै,तें एकरा नहि मानब। एहिसभ परिपेक्ष्य मे जं सुभाष चन्द्र यादव लिखित रूप मे कोनो विषय (एहन,जहिपर विवाद हएब सुनिश्चित-सन छै) पर अपन मन्तव्य प्रकट कएलनि अछि त हुनक लेखकीय साहसक (मैथिलीक परिपेक्ष्य मे दुस्साहस) प्रशंसा कएल जएबाक चाही। अनेक रास झोल,अन्तर्विरोध आ लचर प्रस्तुतिकरण (जहिपर पुर्व मे चर्चा कएल गेल अछि) आदिक उपस्थितिक बादहु सुभाष जीक आलेख मे जे बिन्दुसभ उठाएल गेल छै,तेकर अनदेखी करब कठिन त छैहे,एकरा अनठिआएब सेहो मैथिलीक हित मे नहि छै। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयक वार्षिक वाद-विवाद सभा मे पूर्व केन्द्रीय मंत्री आ सुप्रसिद्ध लेखक शशि थरूरक महत्त्वपूर्ण भाषण आ पुर्वोत्तर मैथिल पत्रिका मे सुभाष चन्द्र यादवक पचपनियां मैथिली पर केन्द्रित आलेख संयोगवश एकहि समयावधि मे आएल आ दुनूक विषयगत केन्द्रीय तत्त्व ‘उपनिवेशवाद’ सं जुड़ल अछि। शशि थरूर आक्सफोर्ड मे अपन बात कहैत बेर ई नीक जकां जानैत रहथि जे ब्रिटेन भारत आ भारतीय जन-समुदाय संग कएल अपन अपराधक मुआवजा भारत कें कहियो आ किन्नहु नहि देत।किन्तु ई जानितहु ओ एहि बात कें रेखांकित कएलनि जे ब्रिटेन द्वारा गलतीक माफीअहि कें यथेष्ट मानल जाएत।शशि थरूरक कहब रहनि जे, ‘जं दू सौ बरस तक भारत पर निर्दयता सं राज करबाक एवज मे ब्रिटेन प्रतिवर्षक लेल मात्र एकहु टका देत त हमसभ सन्तुष्ट हएब’।सुभाष चन्द्र यादवक आलेख मे शशि थरूर बला स्पष्टता आ आक्रामकता नहि छनि,किन्तु ओ प्रकारान्तर सं अनगिनत वर्षक पुरोहिती वर्चस्वक अधीन भेल शोषणक लेल माफी आ प्रतीकात्मक (Token) क्षतिपुर्तिअहिक गप कहि रहल छथि।तेवर जे हुअए,सुभाष चन्द्र यादवक आभार मानल जएबाक चाही जे ओ एहि आलेखक बहन्ने पुरोहिती उपनिवेशक तटस्थ हिसाब-किताब तैयार करबाक लेल मैथिली-समाज कें उद्वेलित कएलनि अछि,भाषा सहित्य पर पड़ल एकर दुष्प्रभावक निष्पक्ष आकलन हेतु खोराक देलनि अछि,एकटा परिणामदायी बहसक परम्परा शुरु करबाक डगर देखएलनि अछि,विषमता सं पीड़ित वर्त्तमानक वास्तविकता आ प्रायोजित बौद्धिक प्रपंचक अभियानक क्षुद्रता कें उघार कएलनि अछि।ई आलेख एक दिस मैथिलीक औपनिवेशिक सत्ता कें देल गेल चुनौती अछि त दोसर दिस सर्वहाराक हेराएल अस्मिता कें खोजबाक,खोजिकए पुनर्स्थापित-पुनर्प्रतिष्ठित करबाक प्रयास सेहो अछि। एकर स्वागत लेल अभिजात्यक साहित्यिक-दुर्गक द्वारपट खोलल जएबाक चाही। समय निरन्तर करवट फेरैत रहए छै आ एकर प्रत्येक करवटक संग जीवन-जगतक कण-कण मे कोनो ने कोनो परिवर्तन होइ छै।एहि परिवर्तन कें रोकब कोनो ताकतक वश मे नहि छै।विवेकवान व्यक्ति वा समाज एहि परिवर्तनक हुलसि कए स्वागत करए छै आ एकर एकटा हिस्सा बनि गतिशीलताक प्रवाहक सहयोगी होइ छै।जे एहि परिवर्तनक अवश्यम्भाविता सं आंखि मुनने रहए छै,अपन पुर्वाग्रही मन कें अतीतक भूलभुलैया मे अटकएने वर्त्तमान सं स्वयं कें काटने रहए छै,ओ व्यक्ति वा समाज वा त ठस भेल मृत वा अप्रासंगिक भए जाइ छै वा परिवर्तनक अंधड़ ओकरा उड़िआकए अजायबघरक वस्तु बनाए दए छै।ई परिवर्तन जीवनक प्रत्येक क्षेत्र मे अपन प्रभाव छोड़ए छै आ तें साहित्य सेहो एकर प्रभाव सं मुक्त नहि रहए छै। नव-स्वतंत्र अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनि कें लागलनि जे हजारक हजार वर्ष सं हुनकसभक अस्मिता शासन-सत्ताक दुष्चक्रीय आवरण मे विलुप्त-सन भए गेल अछि आ ओकर पुनर्स्थापन हएबाक चाही।एकरा लेल एकटा विराट समूह आन्दोलित भए उठल।प्रत्येक आन्दोलन जकां एकरहु अपना लेल एकटा विशिष्ट संज्ञाक बेगरता बुझएलए। नव-अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनिक ई विराट समूह अपन अस्मिताक आक्रोश-भरल खोज कें गर्वपूर्वक ‘श्यामत्व’ (मूल शब्द—नेग्रिट्यूड/Negritude) नाम देने छला। अपनहु देश मे दलित साहित्य अपन भिन्न पहचान बनएलक, जेकर अधिकांश श्रेय महाराष्ट्र कें जाइ छै।मराठी मे एहन साहित्यक विपुल आ प्रभावी भण्डार छै।जं तिरहुत मे एहन साहित्यिक उभार कें स्वतंत्र व्यक्तित्व देबए लेल एकरा ‘सोल्हकनत्व’ कहि एकटा बहुजन समाज अपन अस्मिता,अपन भाषीय-संस्कृतिक आक्रोश-भरल खोज करैत अछि,ओकरा सर्वस्वीकृति दिएबाक संघर्ष करैत अछि आ एकर अनेक उपकरण मे सं एक ‘पचपनियां मैथिली’क पैरोकारी मे आवाज उठाबैत अछि त प्रगतिशील शक्तिसभ सं ई सहज अपेक्षा होइत अछि जे ओ आगू बढि एकरा अपन अंकवार मे भरथि, एकर स्वागत-अभिनन्दन मे तोरण-द्वारहि टा नहि बनाबथि, हुलसिकए एहि प्रवृति कें सशक्त करबाक आयोजन मे सम्मिलित सेहो होथि।मैथिलीअहिक नहि,तिरहुत क्षेत्रीय समाजहु लेल ओ गर्वक स्थिति हेतए,जखनि ब्राह्मणत्वक तुलना मे सोल्हकनत्व कें हेय नहि मानल जएतए,बल्कि ओकरा श्रेष्टत्व प्राप्ति हेतए।ई स्थिति अपन आगमन लेल अभिजात्यक ‘कृपणता’क नहि,उदारताक मुखापेक्षी अछि। प्रगतिकामी चेतना आ उदार सावधानीक संग विचार कएला पर ई बुझाएत जे नानाप्रकारक एतिहासिक परम्परासभक आन्तरिक मार्गक अनवरत यात्राक चलते भिन्न-भिन्न जनसमूहक लेल भिन्न-भिन्न प्रकारक भाषाक आवश्यकता होइ छै आ एहि आवश्यकताक आन्तरिक प्रस्फुटन सं भिन्न-भिन्न भाषा-उपभाषाक प्रकटीकरण होइ छै।ई बात सत्य छै जे एहि क्षेत्र-विशेषक बोली(जेकरा परम्परा सं तिरहुता वा ठेठी आ सुभाषीय आग्रह सं पचपनियां कहल गेल छै) कें भाषाक स्वरूप दए मे मैथिल ब्राह्मणलोकनिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहल अछि। भनहि एहि सभक पाछू बबुआनी करबाक लिलसा हुअए,यजमानीक नव-क्षेत्रनिर्माणक परिकल्पना हुअए वा अपन जातीय संस्कृतिक उपनिवेश बनएबाक योजना हुअए,किन्तु ई मैथिल ब्राह्मणलोकनिअहि छथि जे नेपालक जनकपुर,विराटनगर,राजबिराज सं लए कए बिहारक विभिन्न शहर-नगर-गाम आ झाड़खण्डक रांची,जमशेदपुर सं लए कए बंगालक कोलकाता कि तेलांगनाक हैदराबाद तक खुब ताम-झाम सं मैथिली सं जुड़ल आयोजनसभ करए छथि।मैथिलीक विभिन्न अल्पायु-दीर्घायु पत्रिकासभ हुनकहिलोकनिक प्रयास सं बहराएल अछि।मैथिली पोथीक प्रकाशनक जे काज भए रहल अछि,ताहि काजक सभटा अगुआ/प्रकाशक मैथिल ब्राह्मणहि छथि।आइयो एहि भाषा मे लिखनिहारलोकनि मे एहि जातिक लोकक बहुमत छै।स्वाभाविक छै जे एहि भाषा पर हुनकर सभक लेखनक शैलीक वर्चस्व छै आ तेकर प्रभाव आनहु जातिक लेखकलोकनिक लेखन पर पड़ल छै। हं,तखनि एकर माने ई नहि जे ओसभ स्वयं कें एहि भाषाक निर्माता आ भाग्य-विधाता मानि एकरा अपन उपनिवेश किंवा खबोतर बनाए लेथि।बहुमतक अपन अलग महत्व छै,किन्तु ई ध्यान राखब आवश्यक जे ‘लोकलाज’ आ ‘नैतिकता’ सेहो कोनो चीज होइ छै आ एकर अपेक्षा सभसं बेसी साहित्यकारहि सं होइ छै। एहि ऐतिहासिक तथ्य कें सेहो नहि नकारल जाए सकए छै जे क्षेत्र-विशेष (तिरहुत कहू,कौशिकी कक्ष कहू वा मिथिला नामक मिथकीय खबोतर मे हड़पि लिअ) आ भाषा-विशेष (तिरहुता कहू,ठेठी कहू वा मैथिली नाम सं जातीय खतियान मे दाखिल कए लिअ) दुनूक दृष्टिकोण सं मूल डीही त सर्वहारा समुदायहि अछि। अभिजन समाज वा अग्रजन्मालोकनिक पाही हएबाक तथ्य अपन ठाम पर अचल अछि,भनहि महापण्डित गोविन्द झा सन-सन ‘काव्य-नाटकाख्यानकाख्यायिका-लेख्य-व्याख्यानादि-क्रिया-सर्वविद्या-निपुणै:’ व्यक्तित्व कागज पर डीही-पाहीक भ्रमोत्पादक-मिथ्या-लेखनातिसार करैत रहथि।जखनि हमसभ ई सुनि उत्तेजित भए हाकरोस करए लागए छी जे फल्लां व्यक्ति आन-आन भाषा-बोली कें सुनब किंवा बोलब पसन्द करैत अछि वा हमरासभ सं अलग वर्तनीक प्रयोग करैत अछि,त वस्तुत: हमरासभक रोष ओहि भाषा,ओहि बोली वा ओहि वर्तनीक उपर नहि,ओकर बजनिहार, ओकर सुननिहार,ओकर प्रयोगकर्ताक प्रति होइत अछि।ई बात प्रमाणित करैत अछि जे हम ओहि व्यक्ति सं प्रेम नहि करए छी।जं हमरासभक मन मे प्रेम उपस्थित रहितए त हमसभ ओकर वा ओकरसभक रूचि आ संस्कारादि कें बुझबाक प्रयत्न सेहो करितहुं।ई जे चिढ हमरासभक मन मे प्रकट होइत अछि,से स्वयं कें विशिष्ट मानबाक,श्रेष्ट मानबाक क्षुद्रभाव सं उपजैत अछि आ हमरासभक ‘प्रेम-दारिद्र्य’क सूचक अछि।एहि प्रेम-दारिद्र्य कें तजने बिना ने हमरासभक अपन कल्याण अछि,ने अगिलाक आ ने भाषा आ लोक-समाजक। हमरासभक पाण्डित्य-बोध कें ईहो बोध रहबाक चाही जे ई भाषाक भदेसपन छै जे ‘रेणु’ कें ‘रेणु’ आ ‘काशीनाथ सिंह’ कें ‘काशीनाथ सिंह’ बनबैत अछि।भाषाक अभिजात्य कें पवित्र मूर्ति जकां पूजनीय-वंदनीय मानबाक मानसिकता सं बाहर आबिअहि कए ‘मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी कसम’ आ ‘काशी का अस्सी’ सन कालजयी रचनाक जन्म भए सकैत अछि। बभनियां मैथिली सं पिण्ड छोड़ाइअहि कए ‘गूलो’ सन अभिनव कृति रचल जाए सकैत अछि। एतय एक बेर और ‘शैली’ कें उपस्थित करी। हुनकर कथन मे प्रयुक्त ‘निराशा’क किछु पक्ष पर पुर्व मे चर्चा भेल अछि।एहि ‘निराशा’ सं जे ‘आलोचना’ उत्पन्न होइत अछि,से केहेन हएबाक चाही?एहि पर विचारण सं पहिने कन्नड़ दलित साहित्यकार डा मोगल्ली गणेशक दलित लेखन पर कएल किछु रोषपूर्ण टिप्पणी पर दृष्टिपात करैत चली।ओ कहए छथि जे, ‘दलित लेखक सौन्दर्य-पक्षक उपेक्षा करैत आइ तक जे लिखैत रहला अछि,ओ एकटा लमगर शिकायती-पत्र बनि गेल अछि’ आ ‘अनेक दलित लेखकलोकनि अपन समुदायक अनुभवसभक पुंजी सं अपन कैरियर चमकएलनि अछि’।ई टिप्पणी खासतौर सं आलोचना पर नहि,सम्पूर्ण दलित-लेखन लेल कहल गेल अछि।किन्तु एहि टिप्पणी मे जे ‘लमगर शिकायती-पत्र’ आ ‘कैरियर चमकाएब’ अछि,से ध्यातव्य अछि। रचनात्मक लेखन हुअए किंवा आलोचनात्मक,ओहि मे उपरोक्त दुनू चीज कथमपि स्वीकार नहि भए सकैत अछि।सदति मन राखए पड़त जे कलपला सं,याचना सं,समझौतावादी नजरिया सं कृष्ण-सन पक्षधर होइतहु धर्म पर स्थिर पाण्डवलोकनि कें किछु नहि भेटलनि।कहियो बुद्ध कहने रहथि जे संसार मे दुखक मात्रा बहुत अछि आ एहि सं मुक्तिक लेल ओ करुणा आ अहिंसा सन मानवीय गुणक पैरवी कएने रहथि,जे कालान्तर मे असफल सिद्ध भए गेल।बुद्धक अहिंसक अनुयायी लोकनि कें लुटेरासभ सं आत्मरक्षार्थ जूडो-कैराटे सन रणकौशल विकसित करए पड़लनि।ई बात सही छै जे युद्ध कोनो विकल्प नहि होइ छै,किन्तु ईहो बात सही छै जे जखनि कोनो विकल्प नहि होइ छै,तखनिअहि युद्ध होइ छै।मैथिलीक साहित्यिक सत्ताखोर,मखमलिया बुद्धिजीवी,अचूक अवसरपरस्त आ यथार्थ-विरहित यथार्थ-स्रष्टालोकनि एहन विकल्पहीनताक स्थिति नहि आबए देथि आ एहि स्थिति कें स्वीकार करथि जे भाषा कें अपन खबोत्तर वा उपनिवेश बनाए कए राखबाक उपक्रम ओहिना धराशायी भए जाएत,जेना पुरोहिती उपनिवेश भेलए,जेना ब्रिटिश उपनिवेश भेलए,जेना राजा-महराजा लोकनिक प्रासाद-दुर्ग आदि भेलए। व्यक्तिगत,परिवारगत लाभ आ अय्यासीक लेल एकटा विशाल समुदाय कें अपन शत्रु बनाएब पहिनुकहु युग मे उचित नहि रहए,अजुकहु युग मे बुधियारीक गप नहि छै।पुरुख बली नहि होत है,समय होत बलबान;भिल्लन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान।समय आबि गेल छै जे प्रत्येक पक्ष ई स्वीकार करए जे हमसब वैदिक सिन्धु-सरस्वती संस्कृति आ सनातन धर्मक मार्ग सं आएल छी। ने कोय जन्म सं शुद्र छै,ने कोय जन्म सं ब्राह्मण। ई सभ कर्मणा दायित्व छै ,जे दूषित भए जन्म-आधारित भए गेल छै।अनेकानेक शताब्दी पूर्व जे जातिगत विभेदीकरण भेल रहए,ओकर आधार समाज मे श्रमक समुचित आ यथोचित विभाजन करब रहए,ने कि उत्कृष्टता वा निकृष्टता,श्रेष्टता वा अधमताक निर्धारण करब।एकरा आधार बनाए कोनो वस्तु पर कोय अपन एकाधिकार घोषित कए दिअए,ई अजगुत गप एकदम सं अवांछित आ अस्वीकार्य छै। दोसर दिस, “पाग-दोपटावला मैथिली चल जायत,लेकिन गोलगलावला मैथिली जीबैत रहत” सन-सन हवाबाजी, ज्योतिषाचार्यी भविष्यवाणी,नाराबाजी आ खामखयाली सं सेहो काज चलएबला नहि छै।पाग-दोपटाबला कें ई बुझि लिअए पड़तनि जे मुर्दा-संस्कृतिक गौरव-गानक पाछु खबोत्तर-रक्षा आ जीवित-संस्कृतिक उपेक्षाक उपक्रम आब लोक खूब नीक जकां बुझि रहल अछि,तें एहिपर पूर्णविराम लागब जरुरी।गोलगलाबला कें सेहो ई बुझि लिअए पड़तनि जे जीवित-संस्कृति कें मुर्दा-संस्कृति पर श्रेष्टता/वरिष्टता दिअएबाक लेल सामाजिक क्षेत्र जकां सामाजिक-न्याय मात्रक भरोसहि यथेष्ट नहि अछि आ एहि सं प्रदत्त आरक्षण सं साहित्य-संस्कृतिक क्षेत्र मे काज चलएबला नहि अछि।एहि क्षेत्र-विशेष मे मात्र नाराबाजी नहि,फांकीबाजी नहि,ठोस काज चाही। ठोस काज माने लेखन। आ से मात्र रचनात्मक साहित्यहि टा मे नहि,इतिहास आ आलोचनाक क्षेत्रमे सेहो प्रचूर यथार्थवादी लेखनक मांग करैत अछि। अकबर इलाहाबादीक ‘मेरा ईमान क्या पूछती हो मुन्नी,शिया के साथ शिया,सुन्नी के साथ सुन्नी’ शेरबला दुपनियां-मानसिकता सं पचपनियाबला एकजनियां एजेण्डाक फेकौअल खेलल जाए सकए छै,किन्तु एहि सं ने निष्कलुष सत्यक संधान कएल जाए सकए छै,ने निर्णायक शक्तिक संचय। पक्षपात नहि करू,किन्तु अपन पक्ष त चुनैए पड़त,राखैए पड़त,स्थापित करैए पड़त।महान अफ्रीकी लेखक चेनुआ अचेबेक कहब कें सदति मंत्र जकां कण्ठस्थ राखए पड़त आ ओकरा क्रियान्वित करबा लेल प्रयत्नशील रहए पड़त—“जा तक हिरणसभ अपन इतिहास स्वयं नहि लिखत,ता तक हिरणसभक इतिहास मे शिकारीसभक शौर्य-गाथा गाबल जाइत रहत”। मैथिली मे एहि सं आगूअहुक काजसभ छै। हिरण कें अपन इतिहास लिखबाक संग-संग ओकर पाठकक निर्माण सेहो करबाक अछि। करू।मैथिलीक खबोत्तर-पीठक कबन्ध-अस्तित्वक रहितहु कोनो प्रतिभाक लेल निराश हएबाक आवश्यकता नहि छै।संघर्ष आ ओकर निरन्तरता अवश्य चाही।कोनहु युग मे कोनो सत्ता-प्रतिष्ठान,कोनो मठ-सम्प्रदाय कोनो प्रतिभाक डगर नहि छेक सकल छै।मैथिलीअहु मे एहन मैथिलेतर लेखक,जिनका मे प्रतिभा छनि,लिखबाक जिद छनि,ध्येय मे निरन्तरता छनि,से अपन परिचिति बनएलनि अछि आ अपन लेखकीय प्रतिभाक धमक कें स्वीकृत करबएलनि अछि।ई परिचिति,ई स्वीकृति कोनो सम्मान,कोनो पुरस्कारक, कोनो प्रमाणपत्रक सोंगरक बेगरता नहि बुझैत अछि।ई स्वीकृति-परिचिति ईच्छा सं हुअए वा अनिच्छा सं, घोषित रूप मे हुअए वा मनहि-मन,से महत्त्व नहि राखैत अछि।ओना,जं लिखब-रचब अहांक धर्म अछि त कोनो स्वीकृति, कोनो परिचिति,कोनो सम्मान-पुरस्कारक अपेक्षहि किऐ?अपन रचनाक मुल्यांकन भविष्य आ भावी पीढी पर छोड़ू।जं अहां कें बुझाइ ए जे एहि भाषा-साहित्य कें जन्मना वेद-व्यास-समुदाय कब्जएने अछि त अहां कें तुलसीदास बनए सं के रोकलक?जं व्यवस्था पर वशिष्ठक आधिपत्य छै आ से अहां कें स्वीकार नहि अछि त विश्वामित्र बनए सं अहां कें के रोकलक?जं गुरू द्रोणाचार्य पक्षपाती बनि अर्जुन कें प्राथमिकता/वरीयता दएत अहांक तिरस्कार कए रहल छथि त अहां कें एकलव्य बनए सं के रोकैत अछि?अहूं धनुर्धर बनू आ जं गुरू अहां कें एकर अधिकारी नहि मानए छथि त हुनका अपन अऊंठा दए सं नठबहि टा नहि करू,हुनकरहि अऊंठा छोपि लिअ।जं अहांक प्रतिभा कोनो मठाधीश-प्रदत्त प्रमाणपत्र वा पुरस्कारादिक असीम लिलसा सं सुखिकए टटाए नहि रहल अछि,जं अहांक अतमा पुरहितक पंजी-प्रबन्धक सुरक्षा-कवच मे घुसिअएबाक लेल कलपि नहि रहल अछि,जं अहांक बौद्धिकता खबासी-कर्मक लेल उताहुल-व्याकुल नहि अछि आ जं अहांक मेरुदण्ड सोझ रहबाक सत्ती करची वा सांप जकां लहरदार हएबाक विषानि प्रवृति दिस लहरिया नहि मारि रहल अछि त फजुलक अरण्य-रोदनक की अर्थ? ई त जेकरहि सं घीन अछि,तेकरहि देह मे देह रगड़ि ओकर दुर्गंध सं जनम सोगारथ करबाक कृत्य भेल। ई तहिना हास्यास्पद अछि,जेना कार्ल मार्क्स कोनो धीरूभाई अम्बानी सं अपन विचारक पुष्टिक कामना करथि,जेना हिरण कोनो शिकारी सं अपन अमरताक वरदान चाहए,जेना विश्वामित्र कोनो वशिष्ठ सं ‘ब्रह्मर्षि’ पदक याचना करथि,जेना कोनो भिखारी भिखारिअहि सं भीखक अपेक्षा करए। जं एना छै त अहां सम्मानक नहि,दया आ दुत्कारक पात्र छी। जं विचार मे वैज्ञानिकता आ मानस मे पौरुष अछि, अपन लेखनक सार्थकता पर आस्था अछि त आत्मदया, आत्मग्लानि, आत्मरतिक आत्महन्ता मानसिकताक बेढ सं बाहर आऊ। बनबाक अछि त अपन श्रम,अपन पौरुष,अपन शक्ति पर विश्वास राखनिहार स्पार्टाकस बनू। सम्मान-पुरस्कार आदिक वांछना कोनो पाप,कोनो अपराध नहि छै। यशेषणा साहित्यकारक लेल स्वाभाविक छै। किन्तु एकरा लेल याचनाक हद तक जाएब,सम्भव छै जे अहां कें लहलहाइत लत्ती बनाए दिअए,किन्तु अहां फलदार-छायादार-छतनार वृक्ष नहि भए पाएब। हारल मन सं भीख मांगल जाइ छै,जे देनिहारक इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर छै। प्रश्न अछि जे अहां कें भीख चाही वा अपन अधिकार— चुनब अहींक हाथ मे अछि। हारि मानि चुकल व्यक्ति जीवनक कुरुक्षेत्रक एहन योद्धा(?) होइत अछि जे रणक्षेत्र मे उतरए सं पहिनहि अपन अस्त्र-शस्त्रादि बाहरहि छोड़ि दएत अछि। प्रश्न अछि जे अहां लग कोनो अस्त्र-शस्त्र अछिअहु की? जं अहां सही माने मे साहित्यक हस्तिनापुर पर कौरव-दलक बलात आधिपत्य सं आहत छी,आक्रोषित छी आ ईमानदारी सं एकर प्रतिरोध करए चाहए छी,त एहि लेल एकाध बेर गारि देबाक बीध पुरि भागिकए कोनटा धए लेब कायरी-विकल्प अछि,कोय कए सकैत अछि,करैत रहैत अछि। जं अहां मे आत्मसम्मान आ ओकर रक्षाक प्रति सजगता अछि,जं अहां मे वीरता,पुरुषार्थ आ संघर्षक संकल्प अछि त अहां कें अन्यायक विरुद्ध लामबन्द हुअएअहि पड़त,अपन प्रतिरोध कें योजनाबद्ध प्रक्रियाक अन्तर्गत आनएअहि पड़त।कहबी छै जे असगर वृहस्पतिअहु झूठ। तें पहिने पांच टा पाण्डव कें एकत्रित करबाक लेल प्रेरक त बनू। कथा-कविताक पुष्पास्त्रक अपन महत्त्व छै,ओकरहु उपयोग हुअए।किन्तु निर्णायक युद्धक लेल इतिहास,आलोचना आ वैचारिक लेखनक रुद्रास्त्र सं सुसज्जित भेने बिना विजयक गप त बाद,बराबरी (Draw)बला स्थितिअहुक कल्पना नहि कएल जाए सकैत अछि। ओशो (आचार्य रजनीश) अपन ‘साहस सं खुलैत अछि ईश्वरक मार्ग’ शीर्षक लेख/प्रवचन मे कहए छथि – ‘सत्यक बहुत रास लोक कें खोज छनि।परमात्माक बहुत चर्चा छै।किन्तु ई सभ साहस सं कमजोर लोक कए रहल छथि। ओ,जे संग छोड़बाक लेल राजी नहि छथि आ जे दीया बुतैबाक लेल राजी नहि छथि। अन्हार मे जे असगर चलबाक साहस करैत अछि बिना प्रकाशक,ओकरहि भीतर साहसक प्रकाश जन्म लेब शुरू भए जाइत अछि। आ,जे अबलम्ब खोजैत अछि,ओ निरन्तर अबल होइत चलि जाइत अछि। हम जखनि कमजोर किंवा शक्तिहीन कहि रहल छी,त एतय तात्पर्य एहन लोकसभ सं अछि,जे एकटा अबलम्ब पएबाक खोज मे छथि।भगवान कें अहां सहारा/अबलम्ब नहि बुझिअनु।जे लोकनि भगवान कें अबलम्ब बुझैत हएता,से सभ भ्रम मे छथि। हुनका भगवानक अबलम्ब नहि उप्लब्ध भए सकतनि। साहस सं रिक्त एहन लोकक लेल एहि जगत मे किछुअहु उप्लब्ध नहि होइ छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल आशीष अनचिन्हार २ टा गजल १ एक आँगन बहुते विचार सात चुल्हा सत्तर भतार माथ हुनकर हुनके लिलार हाथ हुनकर हुनके कटार देशमे छै अतबे फसाद मूँह हुनकर अनकर सचार मोनमे छै अतबे सवाल कोन कोना जेतै लचार नग्र नग्रक बाते कमाल गाम गामक दुक्खे अपार सभ पाँतिमे 2122-22-121 मात्राक्रम अछि। २ सभटा सुविधा सरकारी राम हरे खाली हुनके सरदारी राम हरे जीवन भेलै अखबारी राम हरे रिपोर्टिंग रहलै जारी राम हरे अपनेमे मारा मारी राम हरे उजड़ल पूरा फुलवारी राम हरे अपने थारी घिउढ़ारी राम हरे खाली अपने परचारी राम हरे बच्चा भेलै संस्कारी राम हरे माए रहलै बेचारी राम हरे सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। राम हरे पदक प्रयोग भजन सभसँ लेल गेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी माहुर करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका) डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/ (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta 97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 १६) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक VIDEHA 313 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १७) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-२ VIDEHA 317 १८) रामलोचन ठाकुर विशेषांक VIDEHA 319 १९) रामलोचन ठाकुर श्रद्धांजलि विशेषांक VIDEHA 320 लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 "पाठक हमर पोथी किए पढ़थि"- लेखक द्वारा अप्पन पोथी/ रचनाक समीक्षा सीरीज १. आशीष अनचिन्हार 'विदेह' क ३२७ म अंक ०१ अगस्त २०२१ एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। ३ विदेह अपन आगामी अंक (२०२१ क प्रारम्भमे) श्री रामलोचन ठाकुर पर विशेषांक निकालबाक नेयार केने अछि। हुनका सम्बन्धी रचना आमंत्रित अछि (संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा आदि) जे ३१ दिसम्बर २०२० धरि editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाओल जा सकैत अछि। विदेह पेटारक अन्तर्गत (पोथी डाउनलोड साइट) मे http://www.videha.co.in/new_page_15.htm हुनकर मौलिक, अनूदित आ सम्पादित रचना फ्री पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२१. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2021 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३२९ म अंक ०१ सितम्बर २०२१ (वर्ष १४ मास १६५ अंक ३२९)
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