'विदेह' ३३३ म अंक ०१ नवम्बर २०२१ (वर्ष १४ मास १६७ अंक ३३३) १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] राजनन्दन लाल दासः विशेषांक २.१.राजनन्दन लाल दासः परिचय २.२.प्रस्तुत विशेषांकक संरचनाक संदर्भमे २.३.मुकेश दत्त- एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व: राजनन्दन लाल दास २.४.दिलीप कुमार झा- मैथिली माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षा होइ सएह छलनि स्व. राजनन्दन लालदासक अंतिम इच्छा २.५.अजित झा- वन मैन आर्मी : श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास २.६.अशोक- सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ कर्णामृत २.७.जगदीश चन्द्र ठाकुर’ ’अनिल’- साहित्यकार-सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दास २.८.चन्दना दत्त- श्री राजनन्दन लाल दास : क्षीणकायामे असीम उर्जान्वित व्यक्तिव २.९.अमोद झा- क्रान्तिकारी चेतना जगबैत मैथिली नाटक ’संतो’ (लेखक स्व. राजनन्दन लाल दास जी) २.१०.अखिलेश झा- मैथिली साहित्यक एकांत साधक राजनंदन लाल दास २.११.चन्द्रेश- मैथिल शिरोमणि राजनन्दन लालदास २.१२.जितेन्द्र नाथ दत्त- संस्मरण- माछक रस २.१३.कंचन कण्ठ- आदरणीय श्री राजनंदन लाल दास २.१४.लक्ष्मण झा ’सागर’- राजनन्दन लालदास: एक उदारचेता सम्पादक २.१५.रमेश लाल दास- मामा श्री राजनन्दन लाल दास जी २.१६.शारदानन्द दास परिमल- मैथिली पत्रकारिता मे राजनन्दनक अवदान २.१७.नबोनारायण मिश्र: युग प्रवर्त्तक राज नन्दन लाल दास २.१८.सुरेन्द्र ठाकुर- मैथिली सेवी कलमक सिपाही: श्रीमान राजनन्दन लाल दास २.१९.सुधीर- श्रीयुत् राजनन्दन लाल दास जी ओ मैथिल २.२०.कामेश्वर झा ’कमल’- कर्णामृत पत्रिका आ सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास २.२१.प्रदीप बिहारी- संस्मरण : राजनन्दन लाल दास::अपने घरमे परगोत्री २.२२.अरविन्द ठाकुर- “चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म २.२३.विजय इस्सर"वत्स"- विभूति संग प्रतिभूति -स्व०राजनंन्दन लाल दास जी २.२४.शिव शंकर श्रीनिवास- राजनन्दन लालदासक नाटक २.२५.शैलेन्द्र मिश्र- राजनन्दन लाल दास : मिथिला-मैथिलीक एकटा निष्काम योगी आ योद्धा २.२६.आशीष नीरज- राजनंदन लाल दास २.२७.मुन्नाजी- साहित्यिक जातिवादी सीमा तोड़लनि राजनन्दन जी २.२८.आशीष अनचिन्हार- जातिवादी राजनंदन लाल दास बनाम दूधसँ धोल आन लोक Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU इग्नू BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1 [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2 (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3 (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4 (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13 (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17 (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS SANSAD TV OTHER OPTIONALS IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर राजनन्दन लाल दासः विशेषांक २.१.राजनन्दन लाल दासः परिचय २.२.प्रस्तुत विशेषांकक संरचनाक संदर्भमे २.३.मुकेश दत्त- एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व: राजनन्दन लाल दास २.४.दिलीप कुमार झा- मैथिली माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षा होइ सएह छलनि स्व. राजनन्दन लालदासक अंतिम इच्छा २.५.अजित झा- वन मैन आर्मी : श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास २.६.अशोक- सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ कर्णामृत २.७.जगदीश चन्द्र ठाकुर’ ’अनिल’- साहित्यकार-सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दास २.८.चन्दना दत्त- श्री राजनन्दन लाल दास : क्षीणकायामे असीम उर्जान्वित व्यक्तिव २.९.अमोद झा- क्रान्तिकारी चेतना जगबैत मैथिली नाटक ’संतो’ (लेखक स्व. राजनन्दन लाल दास जी) २.१०.अखिलेश झा- मैथिली साहित्यक एकांत साधक राजनंदन लाल दास २.११.चन्द्रेश- मैथिल शिरोमणि राजनन्दन लालदास २.१२.जितेन्द्र नाथ दत्त- संस्मरण- माछक रस २.१३.कंचन कण्ठ- आदरणीय श्री राजनंदन लाल दास २.१४.लक्ष्मण झा ’सागर’- राजनन्दन लालदास: एक उदारचेता सम्पादक २.१५.रमेश लाल दास- मामा श्री राजनन्दन लाल दास जी २.१६.शारदानन्द दास परिमल- मैथिली पत्रकारिता मे राजनन्दनक अवदान २.१७.नबोनारायण मिश्र: युग प्रवर्त्तक राज नन्दन लाल दास २.१८.सुरेन्द्र ठाकुर- मैथिली सेवी कलमक सिपाही: श्रीमान राजनन्दन लाल दास २.१९.सुधीर- श्रीयुत् राजनन्दन लाल दास जी ओ मैथिल २.२०.कामेश्वर झा ’कमल’- कर्णामृत पत्रिका आ सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास २.२१.प्रदीप बिहारी- संस्मरण : राजनन्दन लाल दास::अपने घरमे परगोत्री २.२२.अरविन्द ठाकुर- “चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म २.२३.विजय इस्सर"वत्स"- विभूति संग प्रतिभूति -स्व०राजनंन्दन लाल दास जी २.२४.शिव शंकर श्रीनिवास- राजनन्दन लालदासक नाटक २.२५.शैलेन्द्र मिश्र- राजनन्दन लाल दास : मिथिला-मैथिलीक एकटा निष्काम योगी आ योद्धा २.२६.आशीष नीरज- राजनंदन लाल दास २.२७.मुन्नाजी- साहित्यिक जातिवादी सीमा तोड़लनि राजनन्दन जी २.२८.आशीष अनचिन्हार- जातिवादी राजनंदन लाल दास बनाम दूधसँ धोल आन लोक राजनन्दन लाल दासः परिचय राजनन्दन लाल दास जन्म :5 जनवरी 1934 ई0 पिता स्व0 मनीलाल दास माता : स्व0 विद्या देवी जन्मस्थान : मातृक ग्राम : पटोरी, पंचगछिया, सहरसा पैतृक ग्राम : गोनौन, घनश्यामपुर, दरभंगा शिक्षा : एम0ए0 राजनीतिशास्त्र मे कलकत्ता विश्व विद्यालय सँ 1960 समाज, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास मे योगदान सचिव : अखिल भारतीय मिथिला संघ-1962 मैथिली संग्राम समिति-1967 मिथिला दर्शन प्रा0 लि0 कम्पनी सेक्रेटरी-1963 प्रकाशक : 'आखर' मैथिली मासिक-1967 प्रकाशित कृति : मौलिक: 1) सन्तो. मैथिलीक विभिन्न अधिकार हेतु क्रान्तिकारी नाटक-1970, 2) चित्रा-विचित्रा (आलेख संग्रह) – 2006, 3) प्रबोध नारायण सिंह (विनिबंध) साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित-2012, 4) मिथिला-मेथिलीक विकासमे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान (1974-2011), प्रकाशन वर्ष ज्ञात नै अछि। सम्पादन : 1) मिथिला दधीचि भोलालाल दास एवं राजेश्वर झा, व्यक्तित्व ओ कृतित्व-1978 2) मुन्शी रघुनन्दन दास व्यक्तित्व ओ कृतित्व-1983 3) कर्णामृत मैथिली त्रैमाशिक-1981 सँ अद्यावधि सम्मान : 1) मिथिला विभूति, विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-1999 2) कल्याण पथदायिनी खुटौना द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2003 3) कर्णगोष्ठी धनबाद द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2004 4) मिथिला सांस्कृतिक परिषद जमशेदपुर द्वारा सम्मान-2004 5) चित्र-गुप्त सभा पटना द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2004 6) विद्यापति स्मारक मंच कोलकाता द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2008 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। प्रस्तुत विशेषांकक संरचनाक संदर्भमे इच्छा छल जे राजनंदनजीपर नीक जकाँ विशेषांक निकाली मुदा से संभव नै भऽ सकल। आ एकर कारण मात्र हमहीं सभ छी। जहिया विशेषांक केर घोषणा केने रही तहिया राजनंदनजी जीवित छलाह मुदा प्रकाशित करबा समयमे आब ओ एहि दुनियाँमे नै छथि। जे किछु भऽ सकल से तर्पण रूपमे बूझल जाए। एहि विशेषांक केर रचना राजनंदनजीक कालमे सेहो आएल आ हुनक मृत्युक बाद सेहो आएल तँइ लेख केर भाषा अलग-अलग भेटत। ओना तँ विदेहमे टाइप कएल रचना प्रकाशित होइत छै मुदा संयोग एहन जे बहुत रचनाक हस्तलेखे टा पी.डी.एफ रूपमे देबए पड़ि रहल अछि। पाठक एहि लेल माफ करताह। किछु एहनो रचनाक टाइपिंग नै भऽ सकल जे कि बहुत पहिने हमरा लग आएल छल। मुदा एखन जे भऽ सकल ताहीसँ जँ हम सभ राजनंदनजीकेँ स्मरण कऽ सकी तँ नीक रहत। भविषयमे हम सभ एहि हस्तलेखकेँ टाइप रूप अवश्य देब। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुकेश दत्त एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व: राजनन्दन लाल दास दिलीप कुमार झा मैथिली माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षा होइ सएह छलनि स्व. राजनन्दन लालदासक अंतिम इच्छा राजनन्दन लालदास आइ हमरा सभक बीच नहि छथि। सबकें एक दिन एहि धराधामकें छोड़बाक छै। हुनका एतेक मातृभाषा सेवा क' क' एहि धराधामकें छोड़ब निश्चिते आजुक युगमे बहुत सुखद आश्चर्य अछि।अपन जीवनकें कृतार्थ करब थिक। मैथिलीमे समय -समयपर एहन -एहन मातृभाषा सेवी,मनीषी सब होइत रहलाह अछि ,हुनके सबहक सेवा आओर हठयोगक परिणामस्वरुप एतेक अन्हर- बिहारिक अछैतो मैथिली साहित्य फरि -फूला रहल अछि। जेना कि सर्वविदित अछि राजनन्दन लालदास कर्णगोष्ठीक कर्णामृत पत्रिकाक माध्यमसँ लगातार उनचालिस बर्षसँ मैथिली भाषा साहित्यक सेवा करैत रहलाह।रचनामे नब लोकक प्रवेशक आग्रही छलाह।समकालीन मैथिली साहित्यमे अनेको एहन रचनाकार छथि जिनक पहिल रचना कर्णामृतमे प्रकाशित भेल छनि। जहियासँ हम मैथिली जगतकें बुझ' लगलहुँ ,मैथिली माध्यमसँ शिक्षा हुए से जतय कतहुँ अवसर लागल उठबैत रहलहुँ अछि।एहि यात्रामे हमरा तीनटा एहन मनीषीसँ साक्षात्कार भेल जे ओ लोकनि कहलनि बिनु प्राथमिक पाठशालामे शामिल भेने मैथिलीकें भविष्यमे संरक्षित राखब संभव नहि अछि। ओहिमे हमरा सर्वप्रथम भेटलाह स्वनामधन्य डा.जयकान्त मिश्र जे स्वयं एहि अभियानक नेतृत्व करैत रहलाह आओर कतहुँ ने कतहुँ सम्प्रति जे आन्दोलन चलि रहल अछि तकर प्रेरणास्रोत छथि।दोसर,छथि राजनन्दन लालदास जे प्रेरित तँ करिते रहलाह।स्वयं अस्सी बर्षक अवस्थाक पार रहितो एहि मुद्दाकें सरकार समक्ष उठबैत रहलाह।पत्रिकामे एहि बिषयपर लगातार लिखैत रहलाह।तेसर छलाह पं.चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर'।जिनकासँ हम जहिया- जहिया भेट कयल ओहो इएह बात कहलनि जे आब मात्र एक उपाय अछि,प्राथमिक शिक्षाक माध्यम बनय मैथिली। राजनन्दन लालदास चौरासी बर्षक अवस्थामे १४फरवरी २०१७क' भारतक महामहीम राष्ट्पतिकें मैथिली माध्यमसँ शिक्षाक लेल पत्र लिखलनि।भारतक राष्ट्रपति बिहारक मुख्य सचिवकें एहि बिषयपर संज्ञान लेबाक आदेश देलनि मुदा बिहार सरकारक लेल धनसन।आदरणीय दासजी हमरा पत्रक प्रतिलिपि पठौलनि ।हम मैथिली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति,मधुबनीक माध्यमसँ यथासंभव प्रयास कयल।बिहारक मुख्यमंत्रीकें सेहो सेवायात्राक क्रममे मधुबनीमे एहि पत्रक प्रतिलिपि आओर ज्ञापन हाथोंहाथ देलियनि।माननीय मंत्री विनोदनारायण झा ,विधायक श्री रामदेव महतोक माध्यमसँ सेहो प्रयास कयल।चेतना समितिक मंचपर सेहो उठायल गेल।मुदा धनसन। मैथिली शिक्षाक माध्यम बनय।से विचार राजनन्दन लालदासक मोनमे कियै अबैत रहलनि? राजनन्दन लालदास मैथिलीक अनन्य उपासक छलाह.बंगालमे रहैत छलखह।ओतय बंगभाषीक मातृभाषा प्रेम देखि क' अभिभूत छलाह। बंगभाषी समुदाय अपना भाषाक विकासक प्रति सदति साकांक्ष रहलाह अछि।जे हमरा सबहक लेल प्रेरक अछि।अनेक बंगभाषी विद्वान मैथिली भाषा साहित्यक हित चिंतक रहलाह।मैथिली भाषा साहित्यक विकासमे सेहो सहयोग केलनि। देखि - देखि क' बहुतो मैथिल जे मातृभाषा प्रेमी रहथि ओहो सब अपना मातृभाषाक सम्मान लेल अनेक तरहक काज सब कयलनि।जाहिमे साहित्य लेखन ,नाटक मंचन,सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन, प्रकाशन, महाविद्यालय ओ विश्वविद्यालय सबमे मैथिलीक पढ़ाइ।ज्ञातव्य अछि जे सर्वप्रथम कोलकाता विश्वविद्यालयमे 1919ई. मे मैथिलीक पढ़ाइ आरंभ भेल।ओतय बाबू साहेब चौधरी,मिथिलेन्दुजी,प्रबोध नारायण सिंहक प्रभाव राजनन्दन लालदासपर पड़लनि ओ कर्णामृत पत्रिका प्रकाशन करय लगलाह संगहि प्राथमिक शिक्षामे मैथिली लागू होअए सेहो ध्यान देबय लगलाह।एहि सम्बन्धमे हमर विचार अछि मैथिल सब पछता रोटी खयने छथि।पहिने प्राथमिक पाठशालामे मैथिली लागू होअए से कोनो प्रयास नहि कयलनि।तें मैथिली विश्वविद्यालयमे तँ लागू भ' गेल मुदा प्राथमिक शिक्षामे आइ धरि उपेक्षिय अछि।एहि सम्बन्धमे बादेमे सही डा.जयकान्त मिश्र बहुत प्रयास कयलनि बादमे राजनन्दन लालदासक सेहो एहि अभियानमे योगदान छनि।हमसब जे 'मधुबनीसँ पाठशालामे मैथिली'अभियान आरंभ कयलहुँ तखनो ओ उत्साह बढ़बैत रहलाह।आइ डा.जयकान्त मिश्र ओ राजनन्दन लालादासक प्रेरणासँ हमसब एहि अभियानमे लागल छी एहि विश्वासक संग जे हमर पूर्बज सब भाषाक लेल जे त्याग तपस्या कयने छथि तकर प्रतिफल भटबे करत।जरुरति अछि सकल समाज एहिमे योगदान देथि।राजनन्दन लालदासक सपनाकें साकार करथि।वैश्वीकरण ओ बजारबादक एहि आन्हर दौरमे लोक भाषा ,लोक संस्कृति तेजीसँ विलोपित भ' रहल अछि।संसारक अनेक भाषा लुप्त भ' गेल।मैथिलियोपर गंभीर संकट उत्पन्न छैक।अनेक रंगक षडयंत्र मैथिली भाषाक संग भ' रहल छैक।हिन्दी भाषाक साम्राज्यवादी स्वरुप मैथिलीकें घोटि जयबापर विर्त अछि।जखन कि हिन्दी स्वयं अनेक लोकभाषाक मिश्रण अछि। लोकभाषाक तिरोहित भेनाय हिन्दियोक तिरोहित भेनाय छी।से एखन भाषाविद नहि बुझि रहल छथि।खैर जे से ।नीतिक कहब छैक जखन सबटा डुबैत हुए तँ जैह बचा लेब सै बहुत तें मातृभाषाक लेल जे गोटे जाहि मोर्चापर काज क' रहल छथि सब प्रणम्य छथि।हम आदरणीय दासजीक मातृभाषाक लेल कयल गेल काजक लेल श्रद्धा निवेदित करैत छियनि।हमरा लेल सब दिन प्रणम्य रहताह। दिलीप कुमार झा, आदर्शनगर,नवटोली रोड, मधुबनी मो.6207627509 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अजित झा वन मैन आर्मी : श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास मैथिली ई पत्रिका विदेह मे श्रद्धेय राम लोचन ठाकुर विशेषांकक उपरान्त किनका पर अगिला विशेषांक निकालल जाय से आशीष जी अपन फेसबुक वाल मे जिज्ञासा व्यक्त केने छलथि। एक्कहि क्षण मे हमरा मोन मे श्री राज नन्दन लाल दास जी केर नाम आयल आ हम आशीष जी केर पोस्ट मे हुनक नाम लिखि देल। ओहि केँ उपरान्त अनेको गोटे ओहि नाम केँ समर्थन कयलनि। हमर आनन्दक सीमा नहि रहल जखन आशीष जी अपन फेसबुक वाल पर घोषणा कयलनि जे विदेहक अगिला संस्करण राज नन्दन लाल दास जी केँ समर्पित रहतन। हम अहि पर अपन प्रसन्नता व्यक्त कैल आ प्रत्युत्तर मे आशीष जी लिखलनि जे अहि अंक हेतु हमरो योगदान अपेक्षित अछि। हमरा मे ओ सामर्थ्य कहाँ जे हम हुनकर साहित्य ओ कृतित्व पर किछु लिखि सकी तखन हम आशीष जी केर आग्रह नहि टारि सकैत छी आ श्रद्धेय दास जी सँ जुड़ल अपन किछु संस्मरण लिखबाक लोभ सेहो संवरण नहि क' पाबि रहल छी। कृतित्व नहि त' व्यक्तित्वे सही किछु चेष्टा क' रहल छी। हमर जन्म कलकत्ता मे भेल छल आ शिक्षा दीक्षा सेहो ओत्तहि सँ। मैथिलीक लगभग समस्त कार्यक्रम देखबाक लेल बाबूजी आ परिवारक अन्य सब सदस्य सबहक संग उपस्थित रहैत छलहुँ। ओहि समय त' गीत नाद छोड़ि अन्य कोनो चीज आकर्षित नहि करैत छल मुदा जखन होश भेल आ बात सब बूझय लगलियै तखन समझ मे आयल जे माँ मैथिली केर सेवा मे समर्पित ओ व्यक्तित्व सब जिनकर भाषण सँ दूर भागैत छलहुँ तिनकर सबहक कि मोल छन्हि? एहन किछु व्यक्तित्व जिनकर सम्पर्क मे बिताओल किछु क्षण हमरा लेल अमूल्य धरोहर अछि आ हमर जीवन केँ एकटा नब दिशा प्रदान कयलनि ताहि मे सँ एक छथि श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी। कोलकाताक दुर्गा पूजा प्रसिद्ध छैक आ ओत्तह रहय वाला सब अहि उत्सव केँ दौरान उत्साह सँ ओतप्रोत रहैत छथि। ओहने उत्सव केँ उमंग कोलकाता पुस्तक मेलाक सेहो रहैत छैक। साहित्यक प्रति बंगाली सबहक प्रेम आ समर्पण देखि मोन मे लालसा होइत अछि जे माँ भगवती मैथिल सब केँ सेहो आशीष देथुन जाहि सँ हमर सबहक सूतल चेतना पुनः जागृत भ' जाय। घटना सन् 1987 केँ अछि । हम अपन मित्र मंडलीक संग कलकत्ताक पुस्तक मेला मे स्टाॅले-स्टाॅले घूमि रहल छलहुँ कि अचानक मैथिली पुस्तकक स्टाॅल देखि मोन गदगद भ' उठल। कहबाक प्रयोजन नहि जे ओ स्टाॅल कर्णामृतक सौजन्य सँ छल। पहिल बेर श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी सँ गप्प करबाक अवसर भेटल। कोनो भाषाक लेल विपुल साहित्यक भंडार रहब कतेक जरुरी छैक से ओहि दिन हुनक सुनाओल कथा सँ बूझय मे आयल। अहिना साहित्य अकादमिक सूची मे मैथिली केँ स्थान नहि भेटल छलै। भारतवर्षक तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी मैथिली केँ साहित्य अकादमी मे स्थान देबय सँ पूर्व मैथिली पुस्तक सबहक एक प्रदर्शनी देखय चाहैत छलथि। डा० जयकांत बाबू कोना ओहि प्रदर्शनीक आयोजन लेल घरे घरे घूमि मैथिली पुस्तक सबहक ओरिआओन केने छलथि से खिस्सा कहलनि। पहिलबेर सहयोग राशि द' हम कर्णामृतक ग्राहक बनलहुँ। भारतीय वायु सेना मे सेवा समाप्तिक उपरान्त जखन मुजफ्फरपुर अयलहुँ आ पुनः भारतीय जीवन बीमा निगम केर समस्तीपुर शाखा मे पदस्थापित भेलहुँओ हमरा समस्तीपुर आ मुजफ्फरपुर मे सदस्य सबहक मध्य कर्णामृतक वितरण करबाक अवसर देलनि आ हम हुनक आज्ञा केँ शिरोधार्य कैल। एक दिनक घटना अछि हम ट्रेन मे छलहुँ आ हिनकर फोन आयल। हम ट्रेन मे छी जानि हुनका भेलन जे हम ड्यूटीक उपरान्त समस्तीपुर सँ मुजफ्फरपुर घुरि क' जा रहल छी तैँ ओ कहलनि जे घर पहुँचि क' फोन करु। हुनका सँ फूसि नहि बाजि सकैत छी तैँ हम कहलियन जे किछु व्यक्तिगत जरुरी काज सँ दू दिनक हेतु कोलकाता लेल ट्रेन पकड़ने छी। हमर बात सुनि कहलनि जे कोलकाता आबि रहल छी त' काल्हि डेरा पर आऊ। हुनक आग्रह केँ हम कोना टारि सकैत छलहुँ? सी आइ टी रोड वाला पुरना डेरा त' देखल छल मुदा नबका डेराक कोनो जानकारी नहि छल। ओ हमरा बागुईहाटी सँ सम्भवतः 45 नम्बर बस पकड़य लेल कहने छलथि। ठीक सँ मोन नहि अछि। हम हुनक बताओल बस स्टैंड पर उतरि जखन फोन केलियन तखन हमरा पाँच मिनट प्रतीक्षा करय लेल कहलनि। हमरा भेल जे किनको पठा रहल हेथिन मुदा हमर आश्चर्यक ठेकान नहि रहल जखन ओ स्वयं ओत्तह उपस्थित भेलाह। सच पुछू त' हम लजा गेल छलहुँ कारण किछु महीना पूर्वहि हुनका ब्रेन हैमरेज भेल छलनि। माँ भगवतीक कृपा सँ ओ अपन बीमारी केँ मात दय पुनः माँ मैथिलीक सेवा मे एकाग्र चित्त भ' लागि गेल छलाह। खैर घर पहुँचि हाथक इशारा सँ हमरा बैसय लेल कहलनि आ पाँच मिनट केर समय मङलाह कारण हुनकर दम फूलि रहल छलनि। पाँच मिनटक उपरान्त पुनः कथा वार्ताक दौड़ शुरु भेल। कर्णामृतक भविष्य केँ ल' क' चिन्तित छलथि। मैथिली केँ अष्टम सूची मे स्थान त' भेटलै मुदा एखनधरि प्रारम्भिक शिक्षाक पढ़ौनी मैथिली मे प्रारंभ नहि भ' सकल अछि ताहि लेल सेहो चिन्तित छलथि। अपन आगामी पुस्तक " मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्ण गोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान (1974-2011) " केर प्रकाशन पर विस्तृत चर्चा भेल। मुम्बई केर कर्ण गोष्ठी संस्था हिनका अपन कार्यक्रम मे सम्मानित करबा लेल उत्सुक छलथि मुदा कोनो सम्मान समारोह मे खर्च करय सँ नीँक ओहि राशि सँ कोनो पुस्तक केर प्रकाशन भ' जाइ से हिनका उपयुक्त बुझेलनि। अहि बात केँ जानि प्रसन्नता होयत जे मुम्बई केर कर्ण गोष्ठी संस्था हिनक बात सँ सहमत भ' गेलाह आ उपर्युक्त पुस्तक केर प्रकाशन ओहि संस्था द्वारा संभव भेल। मिथिला-मैथिली अभियानी द्वारा प्रस्तुत कयल ई एक अद्भुत उदाहरण अछि जाहि सँ प्रेरणा लेबाक प्रयोजन अछि। कोनो सम्मानित मंच पर पाग दोपटा पहिरि क' सम्मानित होबय सँ बेसी प्रिय हिनका लेल पुस्तकक प्रकाशन रहलनि अछि। बहुत रास गप्प भेल आ लगभग दू घंटाक उपरान्त हम ओत्तह सँ विदा होबय चाहैत छलहुँ मुदा हुनका द्वारा संग मे बैसि भोजन करबाक आग्रह नहि टारि सकलहुँ। हुनकर नतिनी हमरा सब केँ परोसि क' भोजन करौलनि। राति जखन हमरा सँ गप्प कय फोन रखने छलथि तखन हमरा विषय मे चर्चा केलखिन आ हुनक समस्या केँ समाधान हेतु ओ बचिया ओहि दिन कॉलेज नहि गेल छलीह। हमरा सन एक अति साधारण व्यक्ति लेल हुनकर मोनक उद्गार निश्चित रूप सँ हमरा लेल अविस्मरणीय क्षण अछि। ओनाहुतो पछिला तीस-पैँतीस बरख सँ ओ कतेको नवांकुर केँ प्रस्फुटित होयबाक अवसर प्रदान कयलनि अछि आ निरन्तर सबकेँ प्रोत्साहित करैत रहलनि अछि। के कतेक आगू बढ़लाह से आब हुनक प्रतिभा, लगन, मेहनत आ समर्पण पर निर्भर करैत अछि। सन् 1987 सँ हम कर्णामृतक पाठक छी। बीच मे कखनो काल क्रम भंग सेहो भेल मुदा से फौजी जीवन मे स्थानान्तरण केँ कारण मुदा मौका भेटिते पुनः सहयोग राशि पठा नियमित भ' जाइत छलहुँ । हिनकर क्रान्तिकारी नाटक "सन्तो" पढ़लहुँ। " चित्रा विचित्रा" पढ़बाक अवसर भेटल आ अन्त मे " मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्ण गोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान (1974-2011)" सेहो पढ़लहुँ। सब एक सँ बढ़ि एक आ अहि पर अनेको गोटे अपन दृष्टिकोण रखताह। हिनकर सम्पादकीय एवं मिथिलाक समसामयिक विषय पर आलेख मोन केँ छूबि लैत अछि। मिथिला एवं मैथिलीक सर्वांगीण विकास कोना होयत ताहि लेल निरन्तर अपन संपादकीय स्तम्भ केर माध्यम सँ निसभेर सूतल मैथिल केँ जागृत करबाक प्रयास करैत रहलनि। मात्र मैथिली लेखने टा नहि अपितु मिथिलाक्षर आ मिथिला चित्रकलाक प्रचार प्रसार मे लागल रहलनि। यात्री जी केर कहब छलनि जे आब नवतुरिए आगू आबौ आ हिनको प्रतीक्षा छन्हि जे कोनो नवतुरिया आगू बढ़ि हिनकर विरासत केँ सम्हारि लौ। आजीवन जाहि प्रतिबद्धता केर संग माँ मैथिली केर सेवा केलनि से निस्संदेह प्रशंसनीय अछि आ हमरा कहबा मे कनिको संकोच नहि भ' रहल अछि जे श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी " वन मैन आर्मी " छथि। हिनकर सम्पादकीय स्तम्भक एक शीर्षक हम एत्तह उद्धृत करय चाहब कारण लगभग 85 बरखक अवस्था मे हिनकर इच्छा छन्हि- " मैथिली केँ एकटा आर भगिरथ चाही।" अजित कुमार झा, यजुआर, मुजफ्फरपुर ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अशोक सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ कर्णामृत जगदीश चन्द्र ठाकुर’ ’अनिल’ साहित्यकार-सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दास भाषा साहित्यक विकासमे पत्रिका सबहक योगदान महत्वपूर्ण होइत अछि | पत्रिका आंदोलनक काज करैत अछि | नव लेखक-वर्ग तैयार करैत अछि | नव पाठक वर्ग तैयार करैत अछि | लेखक सबहक रचनाक माध्यमसं समाजक अतीतक मूल्यांकन करैत अछि, वर्तमानक समीक्षा करैत अछि, भविष्य लेल किछु लक्ष्य निर्धारित करैत अछि | ई सभ करबाक लेल एकटा कुशल नेतृत्वक आवश्यकता होइत अछि, जे सम्पादक होइत छथि | मैथिलीमे पत्रिका प्रकाशनक इतिहास सय बरखसं अधिकक अछि | दरभंगा, पटनाक अतिरिक्त मिथिलांचलसं बाहर जाहि-जाहि ठाम किछु रचनात्मक काज भेल ओहिमे कोलकाताक स्थान महत्वपूर्ण रहल अछि जत’सं मिथिला दर्शन आ ‘कर्णामृत’ पत्रिकाक प्रकाशन होइत रहल अछि | कर्णामृतक चारि दशकसं बेशीसं नियमित प्रकाशित होइत आबि रहल अछि | एहि पत्रिकाक नियमित प्रकाशनक श्रेय निश्चित रूपसं सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दासजीकें देब’ पड़त | पत्रिकाक नियमित प्रकाशनक लेल जतेक कौशलक आवश्यकता होइत अछि ताहिसं लगैत अछि जे एहि कार्यक लेल अनुभवी कुशल सम्पादकक निर्देशनमे काज करबाक आवश्यता होइत अछि | हमरा नहि बूझल अछि जे आदरणीय श्री राज नन्दन लाल दास जीकें कोना ई कौशल प्राप्त भेलनि | पत्रिकाक कोनो अंक उठाक’ देखू त हिनक कौशल दृष्टिगोचर होइत अछि | हमहूँ कर्णामृतक नियमित पाठक रहल छी | किछु अंकमे हमरहु किछु कविता प्रकाशित भेल अछि | हम एखनहु एहि पत्रिकाक प्रशंसक छी | पत्रिकाक किछु पुरानो अंक सभ सुरक्षित रखने छी | पत्रिकाक शारदीय विशेषांक आ अन्य विशेषांक सभ बेश लोकप्रिय आ संग्रहणीय होइत अछि | हमरा समक्ष शारदीय विशेषांक अक्टूबर-2010 अछि | मुखपृष्ठपर प्रकृतिक कलात्मक अभिव्यक्तिक रूपमे मनोहर दृश्यक छायांकन अछि | एकर भीतरक पृष्ठपर ‘कर्णगोष्ठी’ द्वारा प्रकाशित बीसटा महत्वपूर्ण पोथी सबहक मुखपृष्ठक छायांकन अछि | पहिल पृष्ठ एकटा विलक्षण सूक्तिक संग आरम्भ होइत अछि : समाज, साहित्य,संस्कृतिक पुनर्निर्माणक पत्रिका कर्णामृत मिलि जुलि रही खटी कमाइ, जे किछु लाबी बांटि चुटि खाइ | संघे शक्ति, शक्तिसं जीवन, एहिमे सबहक बुझी भलाइ || दोसर पृष्ठपर नारी अंकक प्रकाशनक योजनाक समाचार दैत साहित्यिक निबन्ध, ललित निबन्ध आ विविधक अन्तर्गत चौबीसटा महत्वपूर्ण बिन्दु सभ पर विद्वतापूर्ण आलेख एवं अन्य उपयोगी रचना सभ आमन्त्रित कयल गेल अछि | जाहि बिन्दु आ विषयपर रचना-आलेख आमन्त्रित कयल गेल अछि, से सम्पादक महोदयक सुरुचि, विद्वता आ विशिष्ट सम्पादकीय निष्ठाक द्योतक अछि | तेसर पृष्ठपर ‘अमृतवाणी’क अन्तर्गत एहि अंकमे कवि दामोदर लाल दास ‘विशारद’क आठ पाँतीक रचना अछि | एहि स्तम्भक अन्तर्गत सभ अंकमे कोनो-ने-कोनो महापुरुषक श्रेष्ठ वचन रहैत अछि | चारिम पृष्ठपर सम्पादकीय स्तम्भ ‘हमर कहब’ मे ‘बिहारक नवनिर्वाचित सरकार एवं मिथिला-मैथिली’ शीर्षक सं मातृभाषाक माध्यमसं नेना सभकें शिक्षाक अधिकारक क्रियान्वयनक लेल मैथिली क्षेत्रक विधायक लोकनिसं अनुरोध कयल गेल अछि जे एहि कार्य हेतु सरकारकें बाध्य करथि | पृष्ठ 5 सं 10 धरि ‘सामयिक’क अन्तर्गत ‘धरोहर’ मे कवि दामोदर लाल दास ‘विशारद’ जीक ‘शरद वर्णन’ अछि जे श्रीकृष्ण चरितामृतसं उद्धृत अछि, सतेन्द्र नारायण दासजीक दूटा गीत अछि, ‘विद्यापति उवाच’ शीर्षकसं विभिन्न पोथी सभसं विद्यापतिक सूक्ति संचयनक प्रस्तुति भेल अछि, ‘मिथिलाक शक्ति साधना’ शीर्षकसं पंडित शशिनाथ झाक निबन्ध प्रकाशित भेल अछि, ‘ईश्वर स्तुति’ शीर्षकसं डा. नित्यानंद लाल दासजीक दसटा दोहा प्रस्तुत भेल अछि | पृष्ठ 11 सं 19 धरि ‘कविता समग्र’क अन्तर्गत शारदानंद दास परिमल,आचार्य सोमदेव,रमाकांत राय ‘रमा’, डा. शेफालिका वर्मा,जीवकान्त,डा. जनक किशोर लाल दास, गजेन्द्र ठाकुर, योगानंद हीरा, कलानंद भट्ट, प्रताप परात्पर, कमल किशोर कर्ण और राजदेव मंडलजीक रचना प्रकाशित भेल अछि | कलानंद भट्ट जीक जे गजल प्रकाशित भेल अछि ओकर टंकण कविते जकाँ भेल अछि, गजल जकाँ नहि, से नीक नहि लगैत अछि | पृष्ठ 20 सं 39 धरि ‘कथा समवेत’क अन्तर्गत श्री चन्द्रेश, डा. उषा चौधरी, कुमार मनोज कश्यप,सुनीति, राधेश्याम झाक कथा, अनमोल झा, सत्येन्द्र कुमार झा और मिथिलेश कुमार झाक लघु कथा आ डा.रमेशचन्द्र वर्माक एकांकी प्रकाशित भेल अछि | पृष्ठ 40 सं 46 धरि ‘धरोहर’ स्तम्भक अन्तर्गत दिनेश्वर लाल ‘आनन्द’क आलेख छन्हि : मैथिलीक अमर सपूत : अच्युतानंद दत्त आ श्री भोला लाल दास जीक आलेख-स्मृति छन्हि : पुलकित लाल दासजी ‘मधुर’ | पृष्ठ पृष्ठ 47 सं 49 धरि ‘स्वास्थ्य चर्चा’ स्तम्भक अन्तर्गत डा. काली प्रसाद कर्णक महत्वपूर्ण आलेख छन्हि : स्वास्थ्य आओर आहार | पृष्ठ 50 सं 65 धरि ‘आलेख एवं निबन्ध’ स्तम्भमे स्वयं सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास,शिव नारायण मल्लिक,लक्ष्मण झा ‘सागर’,सुरेन्द्र नाथ और जगदीश प्रसाद मंडलक महत्वपूर्ण आलेख-निबब्ध प्रकाशित भेल छन्हि | पृष्ठ 66 सं 69 धरि यात्रा-प्रसंग स्तम्भक अन्तर्गत ‘खेल, पर्यटन ओ पर्यावरण-हिमाचल यात्राक प्रसंग’ शीर्षकसं डा. विद्यानाथ झाक यात्रा वृतान्त छन्हि | पृष्ठ क्रमांक 70 सं 87 धरि आलोचना खण्डमे ‘मैथिली बाल काव्यधारा’,’हरिमोहन झाक रचनामे हास्य-व्यंग्यक महत्व’,’शिल्पक दृष्टिये प्रौढ़ भ’ गेल अछि मैथिली लघुकथा’,’गोविन्द दास –भजनावलीक काव्य वैशिष्टय’ आ ‘तखन आ अखन’ शीर्षकक अन्तर्गत प्रो. प्रेम शंकर सिंह,उपेन्द्र प्रसाद यादव, मुन्नाजी, डा. नारायण झा और सतेन्द्र नारायण दास द्वारा विलक्षण आलेख प्रस्तुत कयल गेल अछि | पृष्ठ 88 सं 94 धरि पोथी-समीक्षाक लेल अछि | एहि खण्डमे देवकांत झा,डा. नबोनाथ झा आ अमरनाथ झा द्वारा क्रमशः उपन्यास ‘भारती’, ‘इतिहास दर्पण और ‘मैथिली गीत गोविन्द’ पर सुन्दर समीक्षा प्रकाशित भेल अछि | पृष्ठ क्र.95 सं 99 धरि ‘स्मृति-शेष’ स्तम्भक अन्तर्गत डा. श्रीपति सिंह द्वारा बाबू उमापति सिंह पर ‘बाबू उमापति सिंह : व्यक्तित्व ओ कृतित्व’ शीर्षकसं संस्मरण प्रकाशित भेल अछि | पृष्ठ क्र.100 सं 104 धरि विभिन्न संस्था सभ द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम सबहक वर्णन अछि | पृष्ठ क्र. 105 सं 111 धरि ‘कर्ण गोष्ठी’क 33 आजीवन सदस्य, ‘कर्णामृत’ क 26 टा संरक्षक आ कर्णामृतक 408 टा आजीवन सहयोगी सबहक नाम आ संक्षिप्त पता अछि | पृष्ठ क्र.112 पर मिथिलाक्षर (तिरहुता) सीखू शीर्षक अन्तर्गत सभ अंक जकाँ मिथिलाक्षरसं परिचय कराओल गेल अछि | भीतरक अंतिम कवर पृष्ठपर कर्णामृतक विभिन्न विशेषांक सबहक कवर पृष्ठक छाया चित्र अछि | सम्पूर्ण पत्रिकामे सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दास जीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक दर्शन होइत अछि | ओ स्थापित रचनाकारकें सम्मान दैत छथि, नवोदित रचनाकारकें प्रोत्साहित करैत छथि | नव रचनाकार तैयार करैत छथि | पुरान पाठकक ध्यान रखैत छथि, नव पाठक वर्ग सेहो तैयार करैत छथि | स्वस्थ परम्पराक संबर्धनक बाट तकैत छथि | नवीन स्वस्थ परम्पराक समर्थन करैत छथि | अपन पाठक आ लेखकक स्वास्थ्यक चिन्ता करैत छथि | मातृभाषाक माध्यमसं बच्चा सबहक शिक्षाक प्रबन्धक चिन्ता करैत छथि | मिथिला, मैथिली आ देशक हितक कामना करैत छथि | अही सभ रचनात्मक गुणक कारणे श्री राज नन्दन लाल दासजी लाखो मैथिल आ साहित्य जीवी लोकक मध्य अपन एकटा विशिष्ट स्थान बना चुकल छथि | हम हिनक दीर्घ स्वस्थ जीवनक कामना करैत छी | ---------जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ सम्पर्क : 8789616115 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। चन्दना दत्त श्री राजनन्दन लाल दास : क्षीणकायामे असीम उर्जान्वित व्यक्तित्व अमोद झा क्रान्तिकारी चेतना जगबैत मैथिली नाटक ’संतो’ (लेखक स्व. राजनन्दन लाल दास जी) अखिलेश झा मैथिली साहित्यक एकांत साधक राजनंदन लाल दास मैथिली साहित्यक एकटा देदीप्यमान नक्षत्र छथि राजनंदन लाल दास। ई सदासँँ अपन योगदान मैथिली साहित्यक भंडारकेँ भरबा मे दैत रहला अछि। कतेको एहन महान विभूति लोकनि भेला जनिका हुनक योगदानक अनुरूप प्रसिद्धि आ प्रतिष्ठा आदि प्राप्त भेलनि, मुदा किछु एहनो भाषा साहित्यक सेवक भेला जे एकांत साधना करैत रहला आ निरंतर आ निःस्वार्थ माँ मैथिलीक सेवा करैत रहला। एतेक काज केलाक बादो इतिहासमे जेना कतहु कतिया देल गेला आ कालक्रममे विस्मृत क' देल गेला। एहने एकटा एकांत साधक छथि राजनंदन लाल दास। हिनक जन्म एकटा सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार मे भेलनि। हिनक जन्म सँ पूर्व परिवार आर्थिक रूपेँ टूटि गेल छल। खेत पथार गाछी विरछी विलटि गेल छलै। हिनक जन्म 5 जनवरी 1934 मे मातृक पटोरी पंचगछिया, सहरसामे भेलनि मुदा ओ अपन गाम दरभंगा जिलाक गोनौनेमे रहैत छला। हिनक पिता मनीलाल दास मधुबनी कोर्टमे कारप्रदाज छला। बादमे राज दरभंगाक पंडौल सर्कलमे लौ विभागमे नोकरी करय लगला। हिनक माता विद्या देवी कुशल गृहिणी आ धर्मनिष्ठ महिला छली। पित्ती बुच्चीलाल दास सकरीमे मुसलमान जमींदारक दीवान छलथिन। परिवारक भरण पोषण कोनहुना होइत छलनि। हुनक प्राथमिक शिक्षा अपना गामक स्कूल आ किछु दिन मधुबनीमे भेलनि। चारिमसँ सातम वर्ग धरि पंडौल मीडिल स्कूल आ आठमसँ एगारहम वर्ग धरि पंडौलक S.K.H.E स्कूलमे भेलनि। जखन ई आठम वर्गमे छला त' ऐच्छिक विषयक रूपमे मैथिली रखलनि। एही क्रममे कविवर सीताराम झाक पांति ' *पढि लिखि जे नै बजै छह निज मातृभाषा मैथिली*. ...' अत्यधिक प्रभावित केलकनि। एहि कविताक असरिसँ मातृभाषाक प्रति अनुराग बढि गेलनि। 1949 ई. मे दास जी मैट्रिक पास केलनि। घरक स्थिति देखैत पिता चाहै छलथिन जे ई नोकरी करथि मुदा अपन इच्छा आगू पढबाक छलनि। हिनक पित्ती आ जेठ भाई सेहो चाहै छलथिन जे ई आगू पढथि। एहि लेल हिनक जेठ भाई अपन सार(मोदनारायण दास)केँ चिट्ठी लिखलनि जे कलकत्तामे रहै छलथिन। मोदनारायण जी एकटा पैघ मारवाड़ीक धीयपूताकेँ पढबथिन। पत्रक उत्तर देलथिन जे कलकत्ता पठा दियौन। एत्तहि कौलेजमे पढता आ ट्यूशन करता। एहि पर हुनक जेठ भाई हिनका 115 टाका द' क' एकसरे विदा क' देलथिन। शिक्षा पूरा भेलाक बाद नौकरी करितो मिथिला संघक काजमे सहयोग दैत रहला आ संघक सचिव सेहो बनला। गाम एलापर अपन गाम, पाली आ रसियारी हाई स्कूल पर आ बादमे जीवकांत जीक सहयोगसँ खजौली हाईस्कूल पर सभा क' मैथिली भाषाक प्रचार लेल काज करैत रहला। हिनक व्यक्तित्व पर पंडित देवनारायण झाक बेसी प्रभाव पड़लनि, कारण जे ओ प्रत्येक रविकेँ दास जीक भेट करबाक लेल राजेंद्र छात्र निवासपर आबि जाथिन। पछाति दास जी मैथिली पोथी सभक प्रकाशन लेल सेहो अपन महत्वपूर्ण योगदान देबय लगलथिन। जखन कर्णगोष्ठी संस्था बनबाक सूरसार होमय लगलै त' ई ओकर विरोधी छला, कारण जे ई संस्था जातिक नामपर बनि रहल छलै आ एहिमे मूल आ पांजि केर आधारपर भेदभाव सेहो छलै। ई बात दास जीकेँ अनसोहाँत लगलनि। बादमे परिवर्तन भेलै आ कर्णामृत पत्रिका प्रकाशनक नेयार भेलै तखन ई संस्थासँ जुड़ला आ पत्रिकाक भाषा मैथिली रखबाक विचार देलनि। राजनंदन लाल दास 1967 मे 'आखर' पत्रिकाक प्रकाशन केलनि जे मात्र साल भरि चलि सकलै, किन्तु हुनक झुकाव मैथिली पत्रकारिता दिस बढि गेलनि। कर्णगोष्ठीक संस्थापक अर्जुन लाल कर्ण, कर्णामृत प्रकाशनमे नारायण प्रसाद कर्ण आ राजनंदन बाबू अपन बहुमूल्य योगदान देलनि। एक बेर दास जी पर आरोप लगलनि जे ई मात्र कर्ण कायस्थ लोकनिक रचना छपै छथि मुदा बादमे तथ्य देखला पर ई आरोप निराधार साबित भेल। ई बात 2016 केर अप्रैल वला कर्णामृत मे लक्ष्मण झा सागर केँ देल साक्षात्कारमे दास जी कहने छथि।(उपर्युक्त पत्रिकासँ सामग्री सहयोग साभार लेल गेल अछि) दास जी कर्णामृत मे स्थापित लेखकक रचनासँ स्तरीयता बनेबाक प्रयास त' करबे केलनि नवतूरकेँ अवसर द' चमकेबाक काज सेहो केलनि। एकर अतिरिक्त दासजी अखिल भारतीय मिथिला संघ, मैथिली संग्राम समिति, मिथिला दर्शन प्रा.लि. कम्पनी सँ जुड़ि क' मिथिला मैथिली लेल कार्यरत रहला। हिनक मौलिक प्रकाशित कृति छनि-: संतो(नाटक), चित्रा विचित्रा(आलेख संग्रह), प्रबोध नारायण सिंह (विनिबंध) आ मिथिला मैथिलीक विकासमे कर्णामृतक योगदान (शोधग्रंथ) हिनक सम्पादनमे प्रकाशित अछि-: मिथिला दधीचि भोलालाल दास एवं राजेश्वर झा, व्यक्तित्व आ कृतित्व।मुंशी रघुनंदन दास, व्यक्तित्व आ कृतित्व। कर्णामृत (त्रैमासिक) 1981 सँ एखन धरि। राजनंदन बाबू मैथिली मिथिलाक कतेको संस्था आ संगठन द्वारा सम्मानित आ पुरस्कृत भ' चुकल छथि मुदा सभ दिनसँ निस्पृह आ निःस्वार्थ भावसँ मातृभाषाक सेवामे समर्पित रहै छथि। _______________ लेखक-: अखिलेश कुमार झा, ग्राम-ननौर(मधुबनी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। चन्द्रेश मैथिल शिरोमणि राजनन्दन लालदास जितेन्द्र नाथ दत्त संस्मरण- माछक रस कंचन कण्ठ आदरणीय श्री राजनंदन लाल दास श्री राजनंदन दास सदैव आदरणीय व्यक्तित्व छथि। बहुत रास धन्यवाद दै छियनि *विदेह पत्रिका* केँ कि एहन उत्तम विचार ओ कार्य के संपन्न करयकेँ बीड़ा उठौलनि। ताहू सँ बेशी कि हमरा हुनका बारेमे किछु लिखबाक सुअवसर देलनि! हालाँकि हम अपनामे कोनो एहन गुण नहि बुझैत छी कि एहन विशाल व्यक्तित्व के बखान क सकी! आदरणीय श्री दासजीकेँ जतेक अनुभव छन्हि ओतेक त हमर उमरियो नहि अछि। तथापि एहिमे किछु त्रुटि; जे हेबे करतै, तकरा अपने सभ हमर अतिउत्साह एवं अनभिज्ञता बुझि क्षमा करब।हम बचपनसँ पापाक मुँहेँ सदिखन आदरणीय चाचाजी क चर्चा सुनैत रहलहुँ। ओ बराबरि बतबैत रहलाह कि श्री दास जी एकदम *श्री रविन्द्र नाथ* के *एकला चलो* के सिद्धांत पर छथि। *कर्णामृत* मे पुज्य पापा के आलेख सभ अबैत रहलन्हि।2012 ईमे मुंबई कर्णगोष्ठीक पैतालीसम वर्षगांठ पर सम्मान समारोह आयोजित भेल जाहिमे *श्री राजनंदन लाल दास*, *श्रीमती शेफालिका वर्मा* एवं हमर पिता *डा नित्यानन्द लाल दास* केँ सम्मानित कएल गेल! पु पापा हमरा ओहिठाम शेफालिका आंटीसँ भेँट करौलनि,मुदा चाचाजी अपन स्वस्थ्यसंबंधी परेशानीसँ नहि आबि सकलाह! हमर दुर्भाग्य कि हम हुनकर दर्शन-सान्निध्य नहि प्राप्त कए सकलहुँ। ओतहु हम आदरणीया शेफालिका आंटी ओ पापाक संग समारोहमे वक्ता सभकेँ आदरणीय चाचाजीक बारेमे उद्गार सुनि अभिभूत भऽ गेलहुँ। ओ लोककल्याणकारी कार्य लेल सदिखन प्रयत्नशील रहैत छथि; विशेषकर मिथिला-मैथिलीक लेल! हुनक कार्यक्षेत्र क बारेमे कहि त ओ *संतो* आ *चित्रा विचित्रा* आदि कयैक गोट पोथी लिखलनि अछि जाहि मे *संतो* के तऽ कतेको बेरि मंचन भ' चुकल अनेक ठाम! हुनक आलोचना तीक्ष्ण होइतहुँ कल्याणकारी होइत छन्हि।अपन संपादकीय द्वारा देश दुनियाके स्थिति परिस्थितिकेँ बारे में पैनी नजरि रखैत छथि। आ समय समय पर ओकरा अभिव्यक्ति प्रदान करैत छन्हि। मिथिला-मैथिलीक ओ समर्पित कार्यकर्ता रहलाह अछि! ताहि लेल ओ राजनीति, जातिपाँति सभसँ, कोनो गुटबंदीमें ओझरेने बिना अपन रस्ता चलल जा रहल छथि। मैथिलीक संरक्षण, संवर्द्धन ओ विकासक लेल ओ तन मन धन सँ एखनहुँ लागल छथि। एहिकेँ सभसँ बड़का प्रमाण अछि *कर्णामृत* त्रैमासिक पत्रिका, जकरा ओ समाजक न्यूनतम सहयोगक माध्यमे लगातार चालीस वर्षसँ निकालि रहलाह! सरकारी अथवा आन कोनो सहयोग त नगण्ये! जखन कि बड़का बड़का पब्लिकेशन हाउस सभ तरह - तरहक समस्याक कारणेँ या तऽ समझौता कऽ लेलक या समाप्त भऽ गेल! एहि पत्रिका में हुनकर संपादकीय,आ समय - समय पर भिन्न आलेख सभ हुनक तीक्ष्ण दृष्टिक परिचायक अछि। कर्णामृतक शारदीय अंक भव्य होइत अछि; जकर सुधि पाठक सभ व्यग्रतासँ प्रतीक्षा करैत छथि। एहि पत्रिकामें जतय वरिष्ठ साहित्यकार सभक आलेख भेटैत अछि; ओतहि नवतुरिया सभकेँ सेहो पर्याप्त स्थान भेटैत अछि। कतेक बेर हुनकर आलोचना कएल गेल की किछु हल्लुक रचना सभके सेहो स्थान भेट जाइछ। मुदा ताहि सँ विचलित भेने बिना ओ अपन दृष्टिकोण रखैत छथि, की लिखै-छपैसँ नवतुरिया सभ उत्साहित हेताह तखनहि ओ आगू सुधारक लेल अग्रसर हेताह! अन्यथा लिखबे छोड़ि देताह - ई हुनकर वात्सल्यसँ भरल प्रोत्साहन आ दूरदृष्टिए कहल जा सकैछ, मैथिली के प्रचार-प्रसार के लेल; जे आइक परिदृश्यमे अत्यंत समीचीन अछि। हमरा सन कतेक लेखक-लेखिका के ओ एहिना पीठ ठोकिकय बढ़ावा देलनि! हमर पहिल रचना दूगोट लघुकथा *लघुकथा विशेषांक*मे स्थान पओलक ! ताहि सँ आत्मविश्वास प्रबल भेल। *कर्णामृत* में समयानुसार सभ विषय के समेकित स्थान भेटल अछि। चाहे ओ स्त्री विमर्श हो वा कि दिवंगत साहित्यिक व्यक्तित्व सभसँ संबंधित विशेषांक! ओ अनेकानेक मैथिली संग संबद्ध आयोजन सभक अध्यक्षता क चुकलाह। मैथिली के दशा दिशा आ उत्थान-पतनक ओ एकटा सशक्त गवाह छथि। ओ बतबैत छथि कि मैथिली के संविधानमे स्थान दियाबय लेल आदरणीय मणिपद्म जी प्रथम प्रधानमंत्री श्री नेहरू के आगाँ निरंतर धाराप्रवाह मैथिलीक समृद्ध् अतीत, पौराणिकता, आजुक समयमे उपयोगिता,ओहि क्षेत्रमे सर्वाधिक बादल जायबला बोली अछि-- आदिक बारे में अपन बात अंग्रेजीमे रखलाह! जे सुनि प्रथम प्रधानमंत्री सन्न रहि गेलाह आ मैथिलीके संविधानमे स्थान भेटल। आगू श्री मणिपद्म जीक निश्छल व्यक्तित्वक बारेमे, हुनकर कला-कलाकारक,महिलाक प्रति दृष्टिकोणक चर्चा करैत ओ एक घटनाक उल्लेख करैत छथि: जखन #कर्णामृतक अंक ओ श्री मणिपद्म के देखौलनि तऽ ओ मुखपृष्ठ के मिथिला पेंटिंग सँ चकित रहि गेलाह! हुनका पता चललनि कि कलाकार राँटी गामक बेटी श्रीमती सुनंदा चौधरी, जिनक सासुर रामपट्टी छन्हि; ओ कलकत्तेमे रहैत छथि, तऽ ओ भेंट करबाक इच्छा व्यक्त केलनि। श्री दासजी श्री मणिपद्म के स्तरके धियानमे रखैत कहलखिन, "हम बजबा लै छियनि हुनका!" ताहि पर श्री मणिपद्म बजलाह,"ओ महिला भऽ कऽ आबि सकैत छथि आ हम की कलाकार सँ भेंट करय नहि जा सकैत छी! चलू ने हमहीं सभ भऽ आबि!" एकटा साक्षात्कारमे श्री दास जी सँ पुछल गेलनि; "अपनेक अंतिम इच्छा की अछि!" हुनकर जवाब छलनि,"हम मणिपद्म जी पर एकटा शताब्दी अंक निकालय चाहैत छी!" आ ओ अपन ई इच्छा सफलतापूर्वक 2018 ईमे पूर्ण केलनि। मिथिला-मैथिलीक लेल एहि समर्पण केँ हमर नमस्कार, प्रणाम! एहिना अनेकानेक साहित्यकार, मिथिला चित्रकलाकार सभकेँ संबंल दैत एलाह। पोथीके मुखपृष्ठ पर कतेको बेर मिथिलाक्षर के स्थान देलनि। आ मिथिला पेंटिंग तऽ रहिते छन्हि। पृष्ठ भाग पर तऽ मिथिलाक्षर वर्णमाला सदैव विद्यमान रहैछ। पोथी मे विभिन्न समसामयिक बिंदू सँ ल कऽ नवीन पुरान सामग्री, महामना सभक उपलब्धि,अवसान, विभिन्न तरहक लोकहितमे सहयोग करौनाय आदि एक एक आखर जेना हुनकर अपन व्यक्तित्वक साफ स्वच्छ दर्पण पाठककें समक्ष राखि दैत छैक! अपन कष्टक चिंता कएने बिना लोकहित केँ जीवनाधार बनेने चलल जा रहल छथि। हुनक मधुर स्वभाव, आवेश ओ आतिथ्यक ; हमर माँ श्रीमती मालती दास, जखन चर्च करैत छथि तऽ एकटा माधुर्य मुख पर आबि जाइत छन्हि ! चाचाजी अपनेक स्वस्थ रहि हमर सभक एहिना मार्गदर्शन करैत रहि आ हम सभ यथासाध्य एहि काज के आगू बढ़ाबी तकर ईश्वरसँ कामना! निवेदिका: कंचन कंठ, नाम: कंचन अरविन्द कंठ, पात्रता: स्नातक भाषा: हिंदी, मैथिली, अंग्रेजी लिपि: देवनागरी,मिथिलाक्षर,रोमन अभिरुचि: लेखन,सिलाई कढ़ाई,मिथिलाक्षर इन एम्ब्रायडरी,सामाजिक कार्यों में रुचि सम्मान व वर्ष: #हिंदी साहित्य लहर2019 #कृष्ण कलम मंच द्वारा वर्ष 2019ई में #कर्णप्रिय ललिता काव्य प्रतिभा सम्मान 2020 लेखन:लघुकथा एवं आलेख प्रकाशित: #समय संकेत#कर्णामृत#घरबाहर,#जखन-तखन, #कर्णप्रिय#समन्वय,# अरुणोदय,#सृजनोन्मुख# सदीनामा,*स्पर्श:चातुर्मासिक पत्रिका*#सांझा संग्रह: वो देखती राहें, #सांझा संग्रह: मिथिलाक संस्कृति #सांझा संग्रह: अ ब्लिसफुल सोल,#ग्राउंड रियलिटी ऑफ इंडिया,#समन्वय: #ब्लागर@bejodindia, #ब्लागर@mithilani.in #विदेह@videh.in Mo:-9175059970 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। लक्ष्मण झा ’सागर’ राजनन्दन लालदास: एक उदारचेता सम्पादक रमेश लाल दास मामा श्री राजनन्दन लाल दास जी आइ कोलकाता स श्री सुधीर भैयाक फोन आयल जे कोलकाताक मैथिल समाज “बिदेह” मैथिली पत्रिकाक आगामी अंक “श्री राजनन्दन विशेशांक” निकालय चाहैत छथि जाहि में परम पूज्य मामा श्री राजनन्दन लाल दास जी क “मैथिली आंदोलन आ साहित्यिक सम्वर्धन में योगदान” पर लेख आमंत्रित केलनि अछि I हमरो किछु साल कोलकता प्रवासक अवसर प्राप्त अछि. श्री नबो नारायण जी क आदेश अछि जे हमहू श्री राजनन्दन लाल दास जी क व्यक्तित्व आ कृतित्व पर किछु लिखी. कठिन कार्य अछि. हम कोनो लेखक, कवि, साहित्यकार नहि छी. पेशा स बैंकर छी. कोलकता छोड़ना 40 वर्ष भ गेल. कतेक घटना , संस्थाक नाम, पूज्य मैथिल प्रेमी लोकनिक नाम विस्मरण भ गेल अछि. तथापि किछु प्रयास क रहल छी. भगवती मैथिलीक अनेको सपूत मिथिला मैथिलीक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक आ साहित्यिक धरोहर आ परम्पराक संरक्षण, सम्बर्धन में अपन योगदान करैत आयल छथि I ओही कडी में वर्तमान में मिथिला मैथिलीक उन्नयन, साहित्यिक सम्वर्धन आ मैथिली भाषाक प्रति सामजिक दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तनक प्रयास मे परम पूज्य श्री राजनन्दन लाल दास जीक योगदान सहजहि सब के मोन में अभरैत छन्हि I सौभाग्य स हम हुनकर भागिन छियन्हि I किछु वर्ष कोलकता प्रवास में हुनकर निकटतम सनिध्य में मामा, अभिभावक, गुरु आ मित्र रूप् में रह्बाक सौभाग्य प्राप्त अछि I संगहि हमर किछु बर्षक कोलकता प्रवास में मामा संगे मैथिली संस्था सबहक गतिविधि,पुस्तकक प्रकाशन, वार्षिक सम्मेलन आ सर्वोपरि पूज्य मामा श्री राजनन्दन बाबूक बहुआयामी व्यक्तित्व के नजदीक स देखबाक, गुनबाक अवसर रहल I थोरेक प्रारम्भिक चर्चा जे करी त मामाक जन्म पटोरी (सहरसा) आ र्पैत्रिक गाव गोनौन, घनश्यामपुर के सभ्रांत संयुक्त परिवार में भेलन्हि I गोनौनक प्रसिद्ध दुर्गा स्थान मामाक पुरखा लोकनि द्वारा स्थापित अछि I आइ जखन संयुक्त परिवार लगभग एक परिकल्पना मात्र रहि गेल छैक, हमर मत्रिक परिवार एखनो संयुक्त परिवार छैक. परस्पर प्रेम आ पारिवारिक मर्यादा आइयो परम्परागत छैक जेकर पूर्न श्रेय मामा श्री राजनंदन बाबू के छन्हि. समग्र रुपेन परिवार के आपसी प्रेम आ सद्भावनाक संग हुनकर नेत्रित्व अनुकरनीय छन्हि. अगर समाज एहि गुणक अनुकरण करय त समाज में निश्चित पारिवारिक स्नेह, प्रेम आ सद्भाव प्रतिस्थापित भ जायत. पारिवारिक जिम्मेदारी किशोरेवस्था में आबि गेलन्हि. ओहि काल में कोलकता महानगर औद्योगिक दृष्ट स बर समृद्ध रहैक आ बिहारक लोक के जिविकाक साधन उप्लब्ध हेबाक अवसर भेटैत रहैक. पंडोल हाइ स्कूल स मैट्रिक पास केलाक बाद मामा श्री राजनंदन बाबू कोलकता आबि गेलाह आ राजेंद्र छात्राबास, कालेज स्ट्रीट में अन्य बिहारी छात्र सबहक संग रहय लगलाह. ट्यूशनक कमाइ स विद्यासागर कालेज में नाम लिखा शिक्षा आरम्भ केलन्हि. कह्बाक आवश्यक्ता नहि जे एहि में कोनो आर्थिक सह्जोग परिवारक नहि छलन्हि. दिन में ट्यूशन, संध्या में कालेज क्लास . अर्थोपार्जनक माध्यम मात्र ट्यूशन जाहि स अपन आ पारिवारिक दायित्वक दुनूक निर्बहन करैत छलाह. विद्यासागर कालेजक प्रिंसिपल अत्यंत सह्रिदय आ मेधावी छात्रक परम हितैषी आ सह्योगी छलाह. कोलकता विश्वविदयालय स राजनीति शास्त्र मे एम.ए. डिग्री प्राप्त केला उपरांत कोलकता विश्वविद्यालय के स्कूल ओफ बिजिनेस मैंनेजमैट स सेल्स मैनेजमैट एंड मार्केट रीसर्च में डिप्लोमा हासिल केलनि. तुरतहि एक प्रतिष्ठित निजी कंस्त्रक्सन इक़ुइप्मेंत कम्पनी में सेल्स आफिसरक नौकरी प्रारम्भ केलनि. राजेंद्र छात्राबास में अधिकांश मैथिल छात्र रहैत छलाह. शैक्छनिक परिचर्चाक अतिरिक्त मैथिली भाषाक उन्नयन आ सामाजिक चेतनाक विकास पर सेहो चर्चा होइते रहैत छल जे मामा श्री राजनंदन बाबू के मिथिलाक संस्कृति आ मैथिली भाषा के उन्नयन आ मिथिलाक सामाजिक चेतनाक विकास हेतु प्रेरित करैत छलन्हि. मिथिलांचल में मैथिली लोक भाषा त छल किंतु धारणा छलैक जे ई मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा थिक . मामा श्री राजनंदन बाबू मैथिली के जातिबादी भाषा स्वरूपक संकीर्ण्ता स उठा के समग्र मिथिलांचलक भाषा के रूप मे देशिल बयना के रूप में स्थापित करअ चाहैत छलाह. मैथिली भाषाक लीपि, व्याकरण, समृद्ध सहित्य आ मिथिलाक समृद्ध सांस्क्रितिक धरोहर के देखैत एकरा जातिबादी/ छेत्रबादी बंधन स मुक्त कय के आन भारतीय भाषा जोंका राष्ट्रव्यापी भाषाक रूप में प्रतिष्ठा, सम्विधान के अष्टम सूची में मान्यता दियबैक अकुलाहति ह्रिदय में हिलोर मारैत रहन्हि. समाज में समानता, भाषा आ संस्कृति पर सब वर्गक समान अधिकार हेतु सतत चिंतनशील रहैत छलाह. सहित्य समाज के प्रतिबिम्बित करैत छैक. एकरा मध्य में राखि प्रसिद्ध नातक “ संतो “ लिखलथि. एहि में केंद्र में मुख्य पात्र संतो महतो के राखल्खिन्ह जे जातिबादी संकीर्णता स पृथक छैक. मिथिलांचलक सहित्यिक जगत मे एकरा बहुत प्रतिष्ठा भेँटलहि आ एकर उदारबादी दृष्टिकोण समाज के एतेक प्रभावित केल्कैक जे सम्पूर्न मिथिलांचल में और बिभिन्न शहर में प्रवासी मैथिल संस्था सब एकर सफल मंचन क समाज में समानता आ समेकित आंदोलनक चेतना क संदेश देल्खिन्ह. सामाजिक चेतना जाग्रित करबा में संतो नातकक भूमिका सफल रह्लैक. सन्तोंक दोसर अंकक सप्तम द्रिश्य में आंदोलन जाति, सम्प्रदाय के परिधि के तोरि के जन साधारण के आंदोलन बनि गेलैक अछि. एअह त श्री राजनंदन बाबूक उद्देश्य आ अकुलाहति छन्हि. हमर व्यक्तिगत विचार अछि जे मिथिला मैथिली के प्रतिष्ठित करबा में प्रवासी मैथिल संस्था सभक भूमिका महत्वपूर्न छन्हि ताहू में कोलकताक संस्था आ प्रवासी सबहिक योगदान अग्रणी छन्हि. कतेक मनीषी पूज्य सर्व श्री बाबू साहेब चौधरी, पिताम्बर पाठक, सत्य नारायण लाल दास, उदित नारायन झा, महावीर झा, गणेश शंकर झा, मदन चौधरी, प्रबोध नारायण सिंह, नबो नारायण मिश्र , नरेश झा, दयानंद ठाकुर, ब्रहमानंद झा, राम कृष्णा ठाकुर , अर्जुन लाल कर्ण औरो कतेक समर्पित नाम अछि. संस्था में आल इंडिया मैथिल संघ, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, आदि संस्था सक्रिय छल. हावड़ा समस्तीपुर ट्रेनक नाम मिथिला एक्स्प्रेस रख्ननाइ, सम्विधानक अष्टम अनुसूचि में मैथिली के शमिल करेबाक जुलूस, मंत्री/ मंत्रालय संग पत्राचार, पोस्टर, बैनर आदि कतेक गतिविधि सब होइत रहैत छल. एहि सब में श्री राजनंदन बाबूक सक्रिय भूमिका रहैत छलन्हि. श्री राजनंदन बाबू आल इंडिया मैथिल संघक अध्यक्ष , सचिव आदि पद पर रहैत मैथिली आंदोलन के सफल नेतृत्व केलन्हि. एकर वार्षिक अधिवेसन में मुख्य अतिथि या मुख्य बक्ता के रूप में निश्चित रूपे ब्राह्मण कायस्थ स अलग जेना श्री बिलत पासवान बिहंगम, श्री फज़्लूर रह्मान हाशमी आदि के निमंत्रित करैत रह्थिन्ह. एक अभिजात्य बर्ग स पृथक बर्ग के मंच पर आमंत्रित आ सम्मानित केला स सामाजिक समानता सहजहि प्रभावित भ मुखर भ जाइक. समस्त मिथिलांचल के एक सूत्र मे समेकित क लई. मैथिली आ विद्यापति बिना बंगला सहित्य आ हिंदी सहित्य दूनू अपूर्न अछि. वार्षिक सम्मेलन में बंगाली विद्वान सब के सेहो अमंत्रित करैत रह्थिन्ह जाहि स बंगाली विद्वान सब में मैथिली क प्रति जिग्याशा, जागरूकता होइत छलन्हि. मैथिली सहित्यिक पत्रकारिता क्षेत्र में मिथिला मिहिरक योगदान अविस्मर्निय छैक. मिहिर के बंद भेलाक बाद कतेको पत्रिका मैथिलि में निकलल किंतु बहुत दिन तक नहि चलि सकल. श्री राजनंदन बाबूक हार्दिक बिचार छलन्हि जे मैथिली में एकटा एहन पत्रिका हेवाक चाही जे मिथिला मिहिर के कमी के भरि सकय. ओ सतत चिंतनशील रहैत छलाह. आन शहर जेंका कोल्कतो में कर्ण कायस्थक संस्था “कर्ण गोष्ठी कोलकता” अछि जेकर सदस्य लोकनि कर्णामृत पत्रिका हिंदी में निकालैत छलाह. संयोग स सम्पादक महोदय के कोलकता स बाहर जाइ परलन्हि आ कर्णामृतक सम्पादनक समस्या संगहि आगामी अंकक समस्या आबि गेलन्हि. कर्ण गोष्ठी कोलकताक सम्पादक श्री राजनंदन बाबू स सम्पर्क क कर्णामृतक सम्पादन हेतु निवेदन केल्खिन्ह. श्री राजनंदन बाबू निवेदन केल्खिन्ह जे हम सम्पादनक भार स्वीकार करैत छी. पत्रिकाक नाम कर्णामृत रहत किंतु भाषा मैथिली रहत. आइ लगभग 40 वर्ष स अधिक काल स कर्णामृत निर्बाध श्री राजनंदन बाबूक सम्पादन में निकलि रहल अछि. एहि प्रकारे कर्णामृत कायस्थ जाति विशेष आ हिन्दीक परिधि स बाहर आबि गेल आ समस्त मिथिलांचलक पत्रिका बनि गेल. समस्त मिथिलांचलक सुधी पाठकगण ग्राहक बनि आ बिद्वत लेखकगण अपन लेख स पत्रिका के अनुप्रानित करैत रहलाह आ कर्णामृत निर्बाध गतिये बैचारिक क्रांति आ आंदोलनक संबाहक बनि मिथिला मैथिलीक सेवा करैत रहल. कतेको बेर श्री राजनंदन बाबू के सफल सम्पादन आ पत्रकारिता हेतु बिभिन्न मैथिली संस्था सब पुरस्कृत क चुकल छन्हि. श्री राजनंदन बाबूक विद्वता, ओजस्वी लेख आ कर्मठता स प्रभावित भ साहित्य अकादमी किछु पुस्तकक अंग्रेजी स हिंदी मे अनुबाद्क दायित्व सेहो देल्कन्हि जेकरा सफलता पूर्वक निस्पादित केलन्हि. हिनकर साहित्यिक योगदान, प्रगतिशील चिंतन एवम अन्य भारतीय भाशाक प्रति समभाव दॄष्टिकोण स प्रभावित भय के साहित्य एकादमी साहित्यिक मीटिंग साहित्यिक परिचर्चा आदि में आमंत्रित करैत रहैत छलन्हि. प्रकाशनक क्षेत्र में सेहो श्री राजनंदन बाबूक योगदान अतुलनीय छन्हि. आल इंडिया मैथिल संघ आ कर्ण गोष्ठी क तत्वाब्धान में अनेक पुस्तकक प्रकशन श्री राजनंदन बाबूक निर्देशन में भेल अछि जहि में डा. ब्रज किशोर बर्मा मनिपद्मक अर्धनारीश्वर आ अन्य पुस्तक मुख्य अछि. पत्रिका आ साहित्यक मार्केटिंग आ विक्री महत्व्पूर्न होइत छैक. श्री राजनंदन बाबू कम्पनी कार्य स सम्पूर्न भारतक भ्रमण करैत छलाह. जाहि शहर में जाथि दिन में कम्पनीक प्रोडक्ट आ संध्या में कर्णामृत आ प्रकाशित पोथीक मार्केटिंग आ बिक्री करैत छलाह. कर्णामृत के ग्राहकक कमी कहियो नई भेलैक. मामा कोलकताक अनेक क्न्स्त्रक्सन इक़ुइप्मेंत कम्पनी मे सेल्स मैनेजर पद पर कार्यरत रहथिन्ह. मार्केटिंग अनुभव आ आत्म विस्वास एतेक जे दाबा स कहैत छल्थिन्ह ”कोलकता प्रोडक्ट कंस्त्रक्सन इक़ुइप्मेंत सम्पूर्न भारत में कम्पनी के ब्रांड से नही आर. एल.दास के नाम से बिकता है”. हम अति विश्वास आ दाबा स कहि सकैत छी जे कर्णामृत और मैथिली साहित्य श्री राजनंदन बाबू के सम्पर्क स बिकैत छल. सेल्स में नौकरी सम्पूर्न भारत के भ्रमण के सुयोग देल्कन्हि जे मैथिली आंदोलनक अलख जगाबय आ साहित्य और पत्रिकाक बिक्री में सब राज्य आ शहर में सहायक भेलन्हि. एक बेर में एक एक महीनाक दौरा रहैत छलन्हि. तूरक क्रम में कोनो राज्य,कोनो शहर में प्रवासी मैथिल स सम्पर्क करब, मैथिली सहित्य, पत्रिकाक प्रति रुचि आ प्रेम जाग्रत करब हिनकर अजेंदा में रहैत छलन्हि. कोलकता स बाहर अन्य शहर मे कर्णामृतक ग्राहक संख्या आ साहित्यक बिक्री हिनकर अथक परिश्रम के प्रमाणित करैत अछि. तूर पर जाइ काल हम हावड़ा तक जा बिदा करैत छलियन्हि आ वापस एला पर सम्पूर्न यात्रा ब्रितांत हमरा संग शेयर करैत रह्थिन्ह जे कोन शहर में किनका स भेंट भेल, के सब कर्णामृत के ग्राहक बनला और कतेक पोथी बीकल. अपन कतेक मार्केटिंग तक्निक आ अनुभव सेहो चर्चा करैत रहैत छ्लाह जे हमर सतत मार्ग दर्शन करैत रहल. उपर हम कहि आयल छी जे श्री राजनंदन बाबू हमर मामा, गार्जियन, मेन्टर आ मित्र छथि. एक ब्यक्ति स मामाक स्नेह, गार्जियनक सख्ती, मेन्टरक मार्ग दर्शन आ मित्रक अनौपचारिक खुलापन सब भेटल. हम अपना के धन्य मानैत छी जे हम बहु आयामी ब्यक्तित्व बाला मामाक भगिन छी आ किछु वर्ष मामाक निकट सानिध्य में रह्बाक अवसर भेटल. हमरा ग्रजुएशनक बाद अपना लग कोलकता बजा लेलन्हि आ हुनकर इक्शा हमरा चार्टर्ड अकॉण्टेट बनेबाक रहन्हि जे कतिपय कारण स नहि भ सकल किंतु ओ हमरा सतत प्रेरित करैत रहलाह आ प्राइवेट अथवा बैंक के नौकरी मे मार्गदर्शन करैत रहलाह. श्री राजनंदन बाबूक आडम्बरहीन निश्काम,निष्कलुष भावेन प्रेममय व्यवहार सबके आकर्षित करैत छलैक. ओ मैथिल, बंगाली, अफसर सब बर्ग में समान रूपेन स्वीकृत आ प्रतिष्ठित छलाह. श्री राजनंदन बाबूक मृदु भाशिता, कर्मठता कंस्ट्रक्शन एक्यूपमेंट उद्योगक विकास में हिनकर योगदान के कोलकताक उद्योगपति सब स्वीकार कय कोलकता बिल्डिंग एसोसिएशन क वाइस प्रेसिडेंटक पद पर सम्मानित केल्कन्हि. मामा सक्रिय सहभागिताक बादो सतत अपन प्रचार प्रसार आ आगू बढ़ि के कोनो काजक सफलताक श्रेय अपना नामे लेबाक पक्ष में नहि रहैत छथि. ओ एकटा निश्काम कर्मयोगी छथि. मामाक ब्यक्तित्वक बर्णन पूजनीया मामीक ब्यक्तित्वक चर्चा बिना अपूर्ण रहि जायत आ कचोटैत रहत. एक मात्र आयक श्रोत आ विशाल सन्युक्त पारिवारिक दयित्व . शिक्षा, विवाह, बीमारी, सर-कुतुम्ब आदिक अतिरिक्त कोलकता निवास पर अनगिनत अन्य सम्बंधी, मित्र लोकनि के कार्यवश आवागमन आ अस्थायी निवास. मामाक काकुरगाछीक निवास, अनेको के लोकल पता छल आ मामा लोकल गार्जियन छलाह से बिना पूजनीया मामी के सहयोगक सम्भव नहि छल. राम काल में जेना भगबती सीता अपन अद्म्य धैर्य,साहस आ संतान निर्माणक संकल्प स राम के मर्यादा पुरूषोत्तम बनाबय में सहायक रहथिन्ह, कृष्ण काल में जेना भगवती राधा सबके कृष्ण आ चराचर जगत के प्रेम में सराबोर केने रहथिन्ह. कृष्णा कालीन युद्ध, गीताक ग्यान में कतहु राधाक जिक्र या नाम नहि भेटत किंतु चराचर प्रेम में राधा बिना सब बेकार. अगर आध्यात्मिक दृष्टिकोने देखी त आनंदमय कोश स उपर राधा एक अह्लादिनि शक्ति रूपेण कृष्णा आ चराचर जगत के प्रेम में सराबोर करय बाली शक्ति छथि. तहिना पूजनीया मामी भगवती सीता जेका मामा के सब पारिवरिक दायित्व आ कर्तव्य के निर्बहन में धैर्य आ साहस स मामा के मर्यादाक रक्षा करैत रहल्थिन्ह आ भगवती राधा जेका सबके अपन प्रेम स सराबोर केने रखल्खिन्ह. ततेक प्रेममय रह्थिन्ह जे हमर माँ अपन छोट भाउज अर्थात मामी के प्रेमसागरि कहैत रह्थिन्ह. मामा अक्सर दौरा पर जाइते रहैत छल्थिन्ह. मामी धैर्य पूर्वक असग़र सब बच्चाक संग कोलकता में रहि शिक्षा , बिमारी अन्य पारिवारिक समस्या आदि समग्र ग्रिहस्ती के निर्बाह करैत मामा के उचित सह्योग दैत रहल्थिन्ह. संयोग स आइ हमर माँ आ मामी दूनू नहि छथि. हम दूनू के सादर नमन आ भावपूर्ण विनम्र श्रधांजली अर्पित करैत छियन्हि. मामाक व्यक्तित्व के मोन पारैत लिखैत हमरा ALEXANDER POPE क कविता “ODE ON SOLITUDE” मोन परैत अछि. ओ बस अपन पैतृक धन पर संतुस्त छथि. कोनो प्रचार प्रसारक कमाना रहित. अजस्र शांति सुखक अनुभव करैत छथि. जे लोक के मेडिटेशन स भेतैत छैक से हुनका सहजहि प्राप्त छन्हि . कविताक अंतिम दू स्तेंजा SOUND SLEEP BY NIGHT; STUDY AND EASE; TOGETHER MIXED; SWEET RECREATION; AND INNOCENCE; WHICH MOST DOES PLEASE WITH MEDITATION THUS LET ME Live UNSEEN UNKNOWN THUS UNLAMENTED LET ME DIE STEAL FROM THE WORLD AND NOT A STONE TELL WHERE I LIE तहिना मामा असगर परिवारक संचालन, समाज , क्षेत्र, भाषा सहित्यक विकास में सक्रिय सह्भागिता के बाबजूद कोनो नाम यशक कामना स उपर निश्काम, केकरो स अपेक्षा नहि, सबके प्रति निश्काम, निष्कलुष, निष्पक्ष प्रेम सद्भाव अपना में संतुष्ट, मस्त, प्रसन्न. व्यक्तित्व बला आधुनिक कर्मयोगी छथि. आइ पृथ्वी पर सांसारिक सम्बन्ध में मामा श्री राजनंदन बाबू हमर सब स अधिक पूज्य आ प्रिय छथि आ हम बुझैत छियैक जे हुनको अपन संतानक अतिरिक्त हम सब स प्रिय आ सिनेही छियन्हि. मोन करैत अछि जे एखनो किछुओ दिन मामाक सानिध्य में रहि हुनकर साहित्यिक सामाजिक चेतना के आत्म्सात क सकितहु से कतिपय पारिवारिक समस्याक कारणे सफल नहि भ रहाल अछि आ कचोटैत रहैत अछि. हम अपन परम पूज्य आ परम सिनेही मामा श्री राजनंदन बाबू के श्री चरण में शत् शत् प्रणाम अर्पित करैत छियन्हि आ परमात्मा स प्रार्थना करैत छियन्हि जे मामा स्वस्थ रहथि आ हमरा सब पर हुनकर आशीर्वाद निरंतर बनल रहय. एखनो मैथिली भाषा आ मिथिलांचल कतेक समस्या स ग्रसित अछि. जेना मध्य विद्यालय तक मातृभाषा में शिक्षा, मिथिलांचल राज्य आ कतेक स्थानीय समस्या. आवश्यकता अछि जे समस्त मैथिल संकीर्न्ताक परिधि स बाहर आबि सामेकित आंदोलन करी. पूज्य श्री राजनंदन बाबूक अस्वस्थता सं कर्णामृतक सम्पादन में बाधा उत्पन्न भ रहल अछि. हम विद्वान मैथिल समाज स निवेदन करैत छियन्हि जे कर्णामृतक निर्बाधता के बनौने रहथि. हम कृतज्ञ छी श्री नबो नारायण मिश्र जी के जे हमरा मोन राखने छथि आ आभारी छियन्हि जे पूज्य मामा श्री राजनंदन बाबू सन व्यक्तित्व के सार्बजनिक करबाक प्रयास केलथि आ हमरो किछु लिखबाक अवसर देलथि. कोलकता समाज स हमरा बहुत स्नेह आ सह्योग भेटल अछि. सबके हमर प्रणाम आ अनन्त मंगल कामना . II ओम् शम II II जय मिथिला II II जय मैथिली II II जय भारत II रमेश लाल दास, वाराणसी, मोबाईल 8840347525 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। शारदानन्द दास परिमल मैथिली पत्रकारिता मे राजनन्दनक अवदान मैथिली पत्रकारिताक इतिहास मे कर्णगोष्ठी-कर्णामृत,कलकत्ताक यात्रावधि एक एहन स्वर्णिम अध्याय अछि जकर चालिस वर्ष सँ अधिक,लगभग अर्द्ध शताब्दिक यात्रा अनवरत चलति रहबाक श्रेय श्री राजनन्दन लाल दास के नाम जाइत छन्हि ,जे मनसा -वाचा -कर्मणा सम्पूर्ण रूपे समर्पित भावें कर्णामृत कें विना कोनो सुदृढ़ आर्थिक पूँजी रहितो अपन अध्यवसायक बलें चलबैत रहला अछि।हिनक एहि संघर्षशील दीर्घ यात्रा पर ध्यान दै छी ,त सहसा महामना मदन मोहन मालवीय मोन पड़ि जाइत छथि। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय केर स्थापना क प्रसंग मे ओ लम्बा भ्रमण क क धन संग्रह कएने छलाह श्री राजनन्दनक क्रिया-कलाप कर्णामृतक माँदे लगभग तहिना रहल। इहो अपन जीवन-वृत्तिक सिलसिला मे नगर-नगर,डगर-डगर भ्रमण करैत कर्णामृतक झोरा लटकौने जनसम्पर्क करैत ग्राहक बनबैत मैथिली-मिथिलाक सम्बर्धन मे जुटल रहलाह अछि। सन् 1984ई०क आस-पास हमरा हिनका सम्पर्क तखन भेल जखन स्व० सुधाकान्त दास परिचय करौलनि आ कर्णामृतक ग्राहक बनबौलनि। तावत तक हम काव्य रचना दिश प्रवृत्त नहिं भेल छलहुँ;ओना छिट-फ़ुट शौक़िया तौर पर जखन-तखन किछु लिखि लैत रही। तत्पश्चात घनिष्ठता एना बढैत गेल जेना-जेना हमरा सँ कबिता -लेख मँगैत रहला आ हम यथा योग्य सामग्री पठबए लगलियनि। क्रम एहन सन बनि गेल जे साले-साल नव -वर्ष केर आगमन पर अभिनन्दन करैत तथा शारदीय अंक लेल सामग्री सेहो दैत रहलियनि। ओतबए नहिं कर्णामृतक आयु जेना बढैत गेल तेना ओकर दस वर्षक भेला पर,पुन: प्रौढि प्राप्त कएला पर तथा रजत जयन्तिक प्रसंगे कविता लिखैत गेलहुँ। एहि प्रसंग मे ई कहब अतिरंजन नहिं होयत जे मैथिली ल क हमरा न्यूनाधिक सक्रिय बनेबा मे राजनन्दन बाबूक बड़का योगदान छन्हिं।हिनक निष्ठा आ लग्नशीलता देखि क आनो तरहक संगठनात्मक क्रिया-कलाप मे संलग्न हेबाक प्रेरणा हमरा हिनके सँ भेंटैत रहल। जखन हम दिल्ली मे” मिथिलांगन “ नामक संस्था क स्थापन अओर संगठन मे लागल रही ,तखन यथायोग्य परामर्श -दिशा-निर्देश हिनका सँ भेंटैत रहल। ई यदा-कदा दिल्ली अबैत छलाह त हमर मिथिलांगनक बैसक मे सम्मिलित भए उचित परामर्श सँ हमर कार्यकर्ता लोकनि कें प्रोत्त्साहित कै उल्लसित करैत छलाह। ई त हिनक जन-सम्पर्क बढेबाक कला-कौशलक छवि थिक। कर्णामृत रूपी (सकुरीक एक्का)क लगाम पकड़ने ओकरा रथ जकाँ कोना हँकैत रहला तकर आनो कतेक पक्ष अछि। जेना कर्णामृतक शारदीय अंक साले-साल निकालब, पत्रिका प्रकाशनक संगे विभिन्न लेखकक पुस्तक प्रकाशन।एहि प्रकाशन मे लागत ख़र्च पाठक वर्ग सँ प्राप्त करब। संगहिं-संग लेखक कें प्रोत्साहित कए पुस्तक लिखबा क प्रकाशित करब।उदाहरण स्वरूप प्रसिद्ध लेखक मणिपद्मक लिखल पुस्तक सभ त अछिए।, “मैथिली दधीचि भोला लाल दास” ;रामानन्द रेणु रचित तथा आनो आर कतेक लेखकक रचना करणगोष्ठी द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तक अछि।
ई सभ कार्य हिनक कृतित्वक महार्घता त प्रमाणित करितहिं अछि संगहिं एकरा सम्पादित करबाक पाछाँ कतेक प्रकारक पारिवारिक एवम वैयक्तिक संघर्ष करेत रहए पडलनि से हिनक युद्धवीर प्राणवन्त हएबाक ठोस प्रमाण थिक । बीच-बिच मे अनेक एहन अवसर आएल जखन ई भीषण रूपें रोग-ग्रस्त होइत रहला आ दीर्घ कालीन चिकित्सा उपरान्त स्वस्थ भए मैथिलीक सेवा चालू रखलनि। कतेक बेर सामने उपस्थित मृत्यु पर्यन्त के टिटकारि क दूर भगौलनि अछि। मैथिली- पत्त्रकारिता के हिनक अवदान एना चिरस्मरणीय अछि जे हिनकर समानान्तर अथवा समकक्ष मैथिली साहित्यक प्रांगण मे दोसर केओ नहिं देखाइत अछि । हँ हिन्दीक पत्रकारिता मे महावीर प्रसाद द्विवेदी नजरि अबैत छथि। ई धारणा हिनक संघर्ष-साधना केर विविध पक्ष के ध्यान मे राखि क बनल अछि।हिनक साहसपूर्वक साधना मे सहधर्मिनी पत्नीक देहावसान भेलापर हमरा आशंका छल जे एहन वज्राघात सँ हिनक गतिशीलता कहीं अवरुद्ध ने भए जाय।मुदा हिनक संकल्प अप्रतिहत रहल। हमरा कतेको बेर कलकत्ता पहुँचि हिनक भेंट करबाक संयोग बनि-बनि क यात्रा टरि जाइत रहल आ आब त हम वृद्धावस्था जन्य असमर्थता सँ पीड़ित छी। स्वयम राजनन्दन बाबू बजबो-भुकबो सँ असमर्थ छथि। पहिने जेहो किछु वार्तालाप होइत रहइ छल आ भावनाक उष्मा सँ भरि जाइ छलहुँ,से संभव नहिं। तखन कर्णामृतक भविष्यक चिन्ता खेहारने रहैत अछि।आगू चित्रगुप्त भगवानक जे इच्छा। शारदानन्द दास परिमल, पता:-डी-००३अजमेरा ग्रीन एकर्स,कलेना, अग्रहारा बनरघट्टा रोड,बंगलुरु-560076 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नबोनारायण मिश्र युग प्रवर्त्तक राज नन्दन लाल दास सुरेन्द्र ठाकुर मैथिली सेवी कलमक सिपाही: श्रीमान राजनन्दन लाल दास मोसि सॅ भरल दवात आ लेखनी शिक्षित समाजक एकटा प्रधान अंग रहल छन्हि।जाहि सॅ ओ जन-जीवन सॅ संबंधित विभिन्न पक्षकें युगानुकुल लिपिवद्ध करैत आबि रहल छथि।ब्राम्हण वर्णक अतिरिक्त कायस्थ लोकनि सेहो उक्त उपकरण कें अपन- अपन जीविका अर्जन करबाक लेल प्रमुख आधार बनौलन्हि।आ,अतीतमे राजा-महाराजाक दरबार मे मुंशी-पटवारीक तत्कालिन प्रतिष्ठितपद पर आसीन होइत रहलाह।आधुनिक युग मे सेहो कायस्थ लोकनिसरकारी-असरकारी विभाग मे लेखा लिपिक,लेखापाल आ चार्टर्डएकाउण्टेंट आदि पद पर काज करैत आबि रहल छथि।एंकर अतिरिक्त ई लोकनि सामाजिक ,साहित्यिक,सांस्कृतिक राजनैतिक काज सॅ सेह़ो जुड़ित रहलाह ।एहि क्रममे श्रद्धेय श्री मान् राजनन्दन लाल दास जी से हो वंचित नहि रहलाह। श्रीमान राजनन्दन लाल दास शिक्षा अर्जन करबाक उदेश्येकोलकाता गेलाह।काल-क्रमेंण ओ कलकत्ता विश्व विद्यालय सॅराजनीति शाश्त्र मे स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण कयलन्हि,आ एकटाप्रतिष्ठित ईंजिनियरिंग कम्पनी मे'सेल्स प्रतिनिधि/अधिकारीक रुपमे काज करय लगलाह।अन्ततोगत्वा ओ सेवा निवृतो भेलाह। मुदा,श्रीमान् दास जी अपन जीवन कें मात्र चाकरी जीवन सॅसंबंधित नहि रखलाह।ओ राजनीति शाश्त्र मे मार्क्श-लेनिनक विचार- सिद्धान्त आ गतिविधिक संग रूसी क्रान्ति बा सर्वहाराकसमस्याग्रस्त जीवनक सेहो अध्ययन कयने छलाह।तकर प्रभावहुनक सामाजिक जीवन पर सेहो पड़लन्हि।आ,ओ सामाजिक-राजनैतिक आ आर्थिक सुधारक दृष्टिकोण ल'क' अपन अतिरिक्तसमय मे काज करय लगलाह।मुदा,ओ हमरा जनतबे ,कलकतास्थकोनो राजनैतिक दल विशेष क' कोनो साम्यवादी दल सॅ जुडितनहि रहलाह।मुदा,ओ सामाजिक स्तर पर ओ मिथिला-मैथिलीकसेवाक हेतु काज करय लगलाह। श्री मान् दास जी कोलकतास्थ अपन छात्रावस्था कालहिं मेमैथिली आंदोलनी(स्व०)पं० देवनारायण झा (दरभंगा) क सम्पर्कमे अयलाह।आ,अ०भा०मिथिला संघ(पूर्वक मैथिल संघ) मे प्रवेशक'अबाध गतिएं काज करय लगलाह।ओत्तहिं हिनका भेट भेलरहथिन्ह सर्व श्री पं०हरिश्चन्द्र मिश्र 'मिथिलेन्दु', उदित नारायण झा(बसौली) ,महावीर झा(शुभंकरपुर,दरभंगा), सहपाठी पीताम्वरपाठक(धकजरी,मधुवनी)देवकान्त ठाकुर(दुर्गापट्टी,मधुवनी) आ,बाद मे व्रम्ह नारायण झा(गाम-दुल्हा,मधुवनी)आ युगनारायण झा ( सरिसो,मधुवनी) आदि-२ सदस्य लोकनि। डा०(स्व०)लक्षमण झा क'आह्वान पर मिथिला राज्यक समर्थन मे मैथिल संघक दक्षिण कलकत्ताक शाखा अपन मूलसंगठन सॅ अलग भ'गेल आ,'मिथिला लोक संघ'क नाम सॅ काजकरय लागल।ओही मे प्रमुख रुपेंण छलाह:-सर्वश्री बाबू साहेबचौधरी,डा०प्रवोध नारायण सिंह,पं० देव नारायण झा,वैद्यनाथ झा(डुमरा,मधुवनी)आदि-२लोक।आ,मिथिला लोक संघ उत्तरोत्तरमिथिला राज्यक समर्थन मे बर्षों धरि गाजा-बाजाक संग कलकताक'राजपथ पर प्रदर्शन करैत रहल,काज सभ करैत रहल।मुदा,श्रीमान राज नन्दन लाल दास जी तात्कालिक भूलवश श्रद्धेय' श्रीमिथिलेन्दु जीक संग अपन मूल संगठन 'मैथिल संघ'मे रहि गेलाह। पूर्व मे मूल संगठन'मैथिल संघ' मिथिला राज्य निर्माणक प्रश्नपर एकमत नहि छल।मुदा, ई०सन्:-१९५८ क-२६ जनवरी क'दिन दुनू संगठन मिलि क' एकीकरण कयलक आ,नव नाम:-अखिल भारतीय मिथिला संघ क' नाम सं काज करय लागल।एकीकरणक श्रेय छलन्हि सर्वश्री :-डा० लक्षमण झा, डा०व्रज किशोरवर्मा 'मणिपद्म'आ डा०हरिमोहन झा क'।बाद मे संघ अपनमासिक पत्रिका'मिथिला दर्शन'क प्रकाशन डा०प्रवोध नारायणप्रयास सॅ शुरु कयलक।ओकरा लेल मिथिला दर्शन प्रा०लि०नामक कंपनीक स्थापना कयल गेल।जकर पहिल सचिव श्री मान्राज नन्दन लाल दास जी एं कें बनाओल गेल छल। ईम्हर नव गठित अ०भा०मिथिला संघ मे पुन: किछु मतान्तरक कारणें 'गुटबाजी'शुरु भ'गेल।दुनू ग्रूप परस्पर अपनाआप कें असली मिथिला संघ घोषित क'स्वतंत्र रुपेंण काज करयलागल। ओम्हर डा०प्रवोध नारायण सिंह ,श्री वैद्यनाथ झा क'सलाह पर उक्त संघ कें 'रजिष्ट्रेशन' चुपेचाप करबौलन्हि।तथापिदुनू ग्रूप काज करैत रहल।मुदा,बाद मे ई०सन् १९६५ मे महाजातिसदनक प्रेक्षागृह मे डा०प्रवोध नारायण सिंह 'संघ'क रजिष्ट्रेशनकसंबंध मे खुलाशा कयलन्हि।विरोधी ग्रूप पुन: सक्रिय भेल।मामिलाकलकत्ता हाई कोर्ट मे पहुॅचल।मुदा,डा०प्रवोध बाबू क'ग्रूप केंपूर्वहिं सॅ रजिष्ट्रेशन करयबाक कारणें 'डिग्री'भेटलन्हि।तदुपरान्तविरोधी ग्रूप पूर्वक आॅई० मैथिल संघ कें पुन:जीवित कयलन्हि।श्री मान् राज नन्दन लाल दास जी पुन:ओतहिं खूब जोर-सोर सॅकाज करय लगलाह।ओ उक्त संघ मे समय-समय पर मिथिला -मैथिली हेतु आन्दोलन,प्रदर्शन,मैथिली पुस्तकक प्रकाशन आदि-आदि काज सभ सदस्यक संग करय लगलाह।अपन संघी जीवनमे श्री मान् दास जी सचिव/अध्यक्ष पद कें सेहो बेश सुशोभित कयलन्हि।मिथिला-मैथिली क' लेल काज करब कें ओ आजीवन उदेश्यपूर्ण रुपेंण एकटा'मोटो' बना लेने छलाह। श्री मान् दास जी कलकत्तहिं सॅ प्रकाशित 'आखर'पत्रिका क'प्रकाशन सेहो शुरु कयने छलाह।प्रेरक आ सलाहकार छलथिन्हमैथिलीक सुपरिचित हस्ताक्षर (स्व०)राजकमल चौधरी।सहयोगीवृन्द मे छलथिन्ह सर्व श्री कीर्ति नारायण मिश्र,पीताम्वर पाठक,डा०वीरेन्द्र मल्लिक आदि-आदि। ई०सन्:-१९८३ अबैत-अबैत आॅई० मैथिल संघ क' गति अवरुद्ध भ' गेलैक।सर्वश्री मिथिलेन्दु जी, महावीर झा,उदितनारायण झा,पीताम्वर पाठक,युग नारायण झा,व्रम्ह नारायण झासहित श्रीमान् दास जी आदि सेहो तात्कालिक असक्रिय भ' गेलाह।व्रम्ह नारायण झा दक्षिण कलकत्ता मे 'मैथिल नव जागरण संघ' नामक एकटा अलग संस्था बनौलन्हि।पीताम्वर पाठक टेकनीकली आॅई० मैथिल संघ कें अखिल भारतीय मिथिला संघ मे श्री युग नारायण झा आदिक संग विलयन कयलन्हि। आ,श्री मान राज नन्दन लाल दास जी 'कर्ण गोष्ठी' नामक संस्था मे अपन सहयोग देबय लगलाह। श्री मान दास जी साहित्यिक कर्म सॅ सेहो जुड़लाह।ओ,नाटककारक रुप में 'सन्तो' नामक क्रान्तिकारीनाटक लेखन कयलन्हि।कलकत्ता में ओकर मंचन सेहो कयलन्हि।बहुत वर्षक बाद ओकर एकटा प्रति हमरो उपहार स्वरुप देने छथि।एकर अतिरिक्त ओ' चित्रा-विचित्रा नामक पोथी से हो सम्पादन कयने छथि।कथित पुस्तक 'कर्णामृत' पत्रिका में लिखल- छपल सम्पादकीय सभक संग्रह अछि।ओ तेसर पोथी लिखने छथि-'कर्णगोष्ठी आ कलकत्त्ता'।जाहि मे 'कर्णगोष्ठीक अतिरिक्त कलकत्ताक मैथिली गतिविधिक चर्च अछि। श्री मान् राज नन्दन लाल दास कें हम विशेष रुपेंणजनैत छियन्हि'कर्णामृत'क यशस्वी सम्पादक रुप में।ओलगभग ४० वर्ष धरि ओकर सफल सम्पादन करैत दोसर'कीर्तिमान'(रेकाॅर्ड)स्थापित कयलन्हि।एहि सॅ पूर्व 'मिथिला मिहिर' अपन कीर्तिमान स्थापित कयने अछि।ओना अधिकांश मैथिली पत्रिका सभ अल्पायुए रहल अछि।मुदा, श्री मान् दास जी जखन स्वयं शारिरिक आ मानसिक रुपेंण असक्रिय भ' गेलाह रखने 'कर्णामृत'कप्रकाशन बन्द भ'गेल।ओना ओ नहि चाहैत छलाह जे उक्त पत्रिका बन्द भ'जाइक।बीच-२ बीच में ओ श्री चन्द्रेश जी( दरभंगा) सन साहित्यकार कें 'अतिथि'सम्पादक सेवा सेहो लैत रहलाह।चन्द्रेश जी एक बेर 'कर्णामृत'क लेलनेपाली विशेषांक लेल सेहो अतिथि सम्पादक मनोनीत भेल छथि।श्री मान् दास जी अन्त-अन्त तक 'कर्णामृत' कलेल पूर्णकालिक सम्पादक खोज में लागल रहा।मुदा,ओअसफल रहलाह। 'कर्णामृत'पत्रिका में सर्वस्तरीय रचना सभ छपैत रहल।पहिले ओहि में 'मिथिला मिहिर' आ 'मिथिला मोद'जकाॅ हिन्दी रचना सभ से हो छपैत रहल।एक बेर हम श्री मान् दास जी केंअनुरोध कयने रहियन्हि जे अपने हिन्दीकरचना किएक छपैत छियैक? ओ तुरत्ते हमरा उत्तर देने रहि एखन'कर्णामृत' के जड़ि मजबूत करबाक अछि।शनै-शनै हिन्दीक रचना नहि छपतैक।आ,बाद में सैह भेलैक।'कर्णामृत'पूर्णकालीन मैथिली पत्रिका भ'गेल। ' कर्णामृत'पत्रिका मादे हमरा एकटा महत्वपूर्ण घटनामोन पड़ैत अछि।ओकर प्रकाशनक बादे कलकत्तामैथिली जगत में ई चर्चाक विषय बनि गेल जे उक्त पत्रिका 'कर्ण कायस्थ'सभक जातिक पत्रिका भ'गेल अछि। अ०भा०मिथिला संघ में एकर खूब प्रतिक्रिया भेलैक।मुदा,मैथिली सेनानी बाबू साहेब चौधरी एकरजोरदार समर्थन कयलथिन्ह।ओ 'कर्ण गोष्ठी' द्वारा आयोजित एकटा अनुष्ठान में अपन विचार व्यक्त कयलन्हि:-"हम जातिवादक समर्थक नहि छी।भारत वर्षसॅ जातिवाद शीघ्रे समाप्त नहि हैत।जाधरि ई रोग समाप्तनहि हैत,ताधरि यदि मिथिलाक सभ जाति जौं अपन मातृभाषा मैथिली में अपन-अपन पत्र-पत्रिका प्रकाशित करथि तॅ हर्जे की छैक?एहि सॅ मिथिला-मैथिलीक सर्वस्तरीय आन्दोलन सफल हैंत!!!बस्सकी छल,'संघ'में सेहो 'कर्णामृत'विरोधी स्वर समाप्त भ' गेल।आनो संस्था सभक स्वर बदलि गेलैक।आ,बहुतों सदस्य सभ'कर्णामृत'क ग्राहको बनि गेलाह। श्री मान् राज नन्दन जी मैथिलीक एकटा सफल सम्पादक रहलाह।ओ अपन पत्रिका में सतत् नव-नवरचनाकार कें प्रोत्साहित करैत रहलाह।एते तक की ओस्तरहीन किछु रचना के सेहो यदाकदा प्रकाशित करैत रहलाह।एक बेर हम हुनका सॅ अनुरोध करने रहियन्हि जेअपने एहि तरहक रचना सभ के कियेक प्रकाशित करैतछियैक? पत्रिकाक स्तर दिनानुदिन कमि जाएत।ओ चोट्टहि उत्तर देने रहथि:-"सुरेन्द्र जी ! नव रचनाकारकें प्रोत्साहन देनाई आवश्यक होइत छैक।बाद में एहनेरचनाकार सभ लिखैत-लिखैत चमकि जेताह।आ, हम तखन निरुत्तर भ'गेल रही। प्रसंगवश, हमरा एकटा आरो घटना मोन पड़ैत अछि। हम एक बेर बाबू साहेब चौधरी जी'क निधनक बहुत बादअपन एकटा रचना ल'क' श्रद्धेय दास जी लग गेल रही।प्रकाशित करबाक अनुरोध कयने रहियन्हि।ओ कहने रहि:-"सुरेन्द्र जी!आंहाॅ मात्र एकटा मैथिली कार्यकर्ता छी।हमरा ई नञि बुझल अछि जे आंहाॅ मैथिली में रचना करैत छी।'हम उत्तर देने रहियन्हि:-"दास जी ! अपने ठीके कहल अछि।हम अनियमित रुपेंण रचना सभ सेहो लिखैत छी।हमर निकटवर्ती किछुए लोक कें ई बात बुझल छन्हि।एकाध रचना हमर प्रकाशितो भेल अछि।खैर,जे किछु।स्व०बाबू साहेब चौधरी जी पर केन्द्रित हम अपन एकटा कविता' घूरि आउ-घूरि आउ'बन्द लिफाफ मे हुनका हस्तगत कराओल।ओ हमरा कहलन्हि:-ठीक छैकबाद में हम एकरा देखबैक।एखन कर्णामृत'क संभाव्य अंक प्रकाशित होअ-होअ पर छैक।एकोटा पन्ना बाॅचल नञि हेतैक। दोसर अंक मे हम पूर्ण प्रयास करब।" आ हम चाह पीलाक बाद हुनक निवास सॅ सहर्ष विदा भ'गेलहुॅ। अहि रे बा! ठीक दोसरे दिन श्रद्धेय श्रीमान् दास जीहमर कार्यालय मे फोन कयलन्हि:-सुरेन्द्र जी! आंहाॅक रचना प्रस्तुत अंक में छपि रहल अछि।(स्व०)चौधरी जी पर नीक कविता लिखल अछि।तैं हमहूॅ बाध्य भ'क' प्रेस बला के आग्रह केलियन्हि।ओ, एकटा पन्ना खाली हेबाकबात कहलन्हि।हम कहलियन्हि अबस्से छापि दियौक।तकर बाद हमर ओ बहुत प्रशंशा कयलन्हि।आ,निरन्तरलिखबाक आग्रह से हो कयलन्हि।हम हुनका धन्यवाद देने रहियन्हि।बाद में जखन 'कर्णामृत'हमरा हस्तगत भेल तॅ उक्त कविता कें प्रकाशित देखि हम बेश हर्षित भेल रही।आ,हम तुरन्ते श्री मान् दास जी कें पुन:अशेष धन्यवाद देल। श्री मान् दास जी समयानुसार 'कर्णामृत'क विशेषांक निकाल करथि।स्व०बाबू साहेब चौधरी परएकटा स्वतंत्र विशेषांक प्रकाशित कयलन्हि।स्व०सुरेन्द्रझा 'सुमन'जी आ स्व०पीताम्वर पाठक जी पर संयुक्तविशेषांक से हो प्रकाशित कयलन्हि।एहि तरहें आरो मैथिली मनिषी सभ पर ओ विशेषांक सभ प्रकाशित करैत रहलाह। प्रसंगवश हमरा आरो एकटा अविस्मर्णीय घटना मोनपड़ैत अछि।श्री मान राज नन्दन लाल दास जी'कर्ण गोष्ठी'क दिशि सॅ 'चित्रा-विचित्रा'नामक उत्कृष्ट पोथीकप्रकाशन कयलन्हि।ओ अपन निवास पर बजा क' हमराउक्त पोथीक एकटा प्रति हस्तगत करौलन्हि।पोथीक कभर पृष्ठ कें उनटि क'हम देखल।ओकर सामनेक दोसरपृष्ठ पर लिखा छल:-'रचनाकार सुरेन्द्र ठाकुर जी कें सादरभेंट।' ओह्! हम तखन बहुत भाव-विह्वलित भ'गेल रही।आ,हम हुनका पुन:अशेष धन्यवाद देने रहियन्हि। हमरा प्रति श्रद्धेय श्री मान् राज नन्दन लाल दास जी क' आदर-स्नेह आ प्रेम हमर मोन कें सतत् आनंदित करैत रहैत अछि।ईश्वर सॅ प्रार्थना जे ओ मिथिला-मैथिलीसेवार्थ सशरीर स्वस्थ्य रहथि आ दीर्घजीवी होथि!!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सुधीर श्रीयुत् राजनन्दन लाल दास जी ओ मैथिली कामेश्वर झा ’कमल’ कर्णामृत पत्रिका आ सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास प्रदीप बिहारी संस्मरण : राजनन्दन लाल दास::अपने घरमे परगोत्री भाइ राजनन्दन लाल नहि रहलाह। हुनक नहि रहब सम्पूर्ण मैथिली जगतकें दुखी क' गेल। आशीष अनचिन्हार जी हुनका श्रद्धांजलि दैत हुनका पर संभावित अंकक मादे लिखैत छथि जे हुनका जीबैत ओ अंक बहार नहि क' सकलाह। ठीके, समय पर रचना नहि द' सकबाक हुनक एकटा डिफॉल्टर हमहूं छी। भाइ राजनन्दन लाल दास जीसं हमर परिचय 1986 ई. मे भेल छल। ताहिसं पहिने नामटा सुनने रही। अपन उपन्यास विसूवियस लिखलाक बाद मास्सैब (जीवकान्त)क कथनानुसार कर्णगोष्ठी कलकत्ताकें पाण्डुलिपि पठा देने रहियनि। दू-तीन मासक बाद राजनन्दन लाल जीक पोस्टकार्ड भेटल। ओ लिखने रहथि जे संस्था पोथी छपबा लेल तैयार अछि, मुदा संस्थाकें थोड़ेक अर्थाभाव छैक। तें छपाइक खर्च वा कागतक मूल्य जं अहां जोगार क' दियैक, तं पोथी छपि जायत। हम एकरा एहि तरहें बुझलहुं पोथी प्रकाशनक पूरा खर्चकें दू भागमे बांटल गेल अछि । कागतक मूल्य आ तकर बाद छपाइ सम्बन्धित अन्य खर्च। पोथी प्रकाशन सम्बन्धी हमर पहिल अनुभव छल। हम तं बुझैत रही जे प्रकाशक स्वयं सभटा खर्च करैत छथि। करबाको चाही। तखन ने प्रकाशक। दोसर गप ई जे हमर नव-नव नोकरी छल। परिवारमे माय छलीह, पत्नी छलीह, जेठका बेटाक जन्म भ' चुकल छलै, हाइ स्कूल मे पढ़ैत छोट भाइ छल। हम एतेक दायित्व-निर्वहनक संग एहि स्थितिमे नहि रही जे पोथी छपयबामे अपन टाका खर्च क' सकी। हम हुनका पत्र लिखने रहियनि जे प्रकाशककें अपन खर्च क' पोथी छपयबाक चाही। जं संस्था एहि स्थिति मे नहि अछि तं कृपया पाण्डुलिपि घुरा दी, कारण हम पोथी प्रकाशनमे टाका लगयबाक स्थितिमे नहि छी। ओ उतारा देने रहथि जे अहांक मोनमे प्रकाशकक जे छवि अछि, मैथिलीमे तेहन प्रकाशक नहि छैक। मैथिलीमे संस्था सभ पोथीक प्रकाशन करैत आयल अछि आ बेसी संस्था चन्देसं चलैत अछि। किछु सामर्थ्यवान लेखक छथि, जे स्वयं प्रकाशक-वितरक छथि। ओ लिखने रहथि जे समितिक तीनटा सदस्य पाण्डुलिपि पढ़लनि अछि, कर्णामृत पत्रिकाक सहयोगी विद्वान ब्रह्मानन्द जी (ब्रह्मानन्द सिंह झा) सेहो पढ़लनि अछि। निर्णय छैक जे पाण्डुलिपि नहि घुराओल जाय। से पाण्डुलिपि हम सभ नहि घुमायब। तखन इहो निस्तुकी नहि कहब जे एहिबेर हमसभ छापि सकब कि नहि। 'कर्णामृत'क अंक पठौलहुं अछि। एकर सदस्य बनि जायब तं नियमित भेटैत रहत। हम सोचलहुं, भने संस्थे लग राखल रहय। हमहूं थोड़े छपा रहल छी। हम 'कर्णामृत' पत्रिकाक सदस्य बनि गेलहुं। मुदा, किछुए दिनक बाद पत्र आयल जे 'विसूवियस' छपि रहल अछि। हमर मोन मयूर नाचि उठल। पुस्तकाकार पहिल पोथी छल, तकर प्रसन्नता लिखल नहि, अनुभवेटा कयल जा सकैछ। विसूवियस छपल। कलकत्तामे लोकार्पण भेल। लोकार्पण करबा लेल संस्था द्वारा रमानन्द रेणु आमंत्रित छलाह। हम ताहि समय तइस बरखक रही। हावड़ा टीसन पर पहुंचलहुं तं संस्थाक किछु सदस्यक संग श्रद्धेय बाबू साहेब चौधरी आ किशोरी कान्त बाबू हमरा दुनू गोटक स्वागत लेल प्रस्तुत रहथि। हमर एहि तरहक पहिल अनुभव छल। हमरा आचार्य रमानाथ झाक वक्तव्यक ओ अंश मोन पड़ल जाहिमे ओ कहने छथि जे कलकत्ता मैथिलक तीर्थ अछि। हमरो लागल रहय जे तीर्थे कर' आयल छी। लोकार्पणक प्रसंग एतबे। अन्य विवरण सभ कहने विषयान्तर भ' जायत। आइ हमहूं अपन टाकासं पोथी छपबै छी, मैथिलीक बेसी लेखक छपबैत छथि। संस्था सभ पहिने सन उदार नहि अछि। पठनीयता एतेक घटि गेलैए जे पहिने गद्यक पोथी कम-सं-कम एगारह सय छपय, आब तीन सय छपैए। एहिमे किछु अपवाद भ' सकैत छथि।पहिने कवितोक पोथी तीन सय नहि छपय। एहन अवस्थामे राजनन्दन लाल दास मोन पड़ैत छथि। हुनका गेला बेसी समय नहि भेलनि अछि। मुदा ओ अपन जिविते कालमे प्रकाशन आ पठनीयताक ई स्थिति देखलनि। कर्णगोष्ठी, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित पत्रिकाक संपादक राजनन्दन बाबू छलाह । प्रधान संपादक अर्जुन बाबू (अर्जुन लाल करण) छलाह। मुदा, पत्रिकाक संपादन लेल संस्था हुनका स्वतंत्र कयने छलनि। पत्रिकाक प्रति हुनक अनुराग, समर्पण आ व्यवहारक कारणे कलकत्ताक रचनाकारलोकनि जेना, बाबू साहेब चौधरी, लूटन ठाकुर, ब्रह्मानन्द सिंह झा, श्रीकान्त मंडल, वीरेन्द्र मल्लिक, नवीन चौधरी, रामलोचन ठाकुर, लक्ष्मण झा 'सागर' प्रभृति लेखकलोकनिक सर्वविध सहयोग कर्णामृतकें भेटैत रहलैक। राजनन्दन बाबू मैथिलीक अलावे हिन्दी, बांग्ला आ अंग्रेजीक अधिकृत जनतब रखनिहार लोक छलाह। ओ मार्क्सवादी चिंतनक लोक छलाह। कलकत्ताक कतोक आन्दोलन मे ज्योति बसुक सहयोगीक रूपमे सक्रिय रहलाह, मुदा से रहि नहि सकलाह। एकर कारण ओ कहने रहथि जे परिवारक दायित्व छल, धियापुताक शिक्षा आ कैरियर छल, कोनो पैघ आ समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमिक लोक नहि रही, तें राजनीतिमे बेसी दूर धरि जयबाक बात नहि सोचलहुं। मुदा, हुनक चिन्तन, इमानदारी आ सहजतामे कोनो अंतर नहि भेलनि। सादा जीवन आ उच्च विचार बला लोक छलाह। राजनन्दन लाल मैथिलीक सुच्चा अनुरागी छलाह। हुनक लेखनी कर्णामृतक संपादकीयमे देखी तं कहियो नीक लागय आ कहियो बेजाय सेहो। जे संपादकीय नीक नहि लागय, माने संपादकीय सन नहि लागय तं हुनकासं पत्राचार होअय, कहियोकाल फोनो पर गप होअय, ताहिमे नीक नहि लगबाक गप कहियनि, कारण सेहो। अचरज जे हुनका प्रसन्नता होनि आ ओ अपन पक्ष इमानदारीपूर्वक राखथि। हुनक ई व्यवहार अनुकरणीय लागल हमरा। मैथिली आ मिथिला लेल जीबैत आ ओही लेल स्वयंकें होमक समिधा बनैत राजनन्दन लाल मैथिलीक प्राय: सभ संस्था आ मंच पर समादृत रहलाह। विसूवियसक लोकार्पणमे पहिल भेंटक बाद हमरा दुनू गोटेक 'भैयारी' भ' गेल। ओना हुनक ज्येष्ठ जमाय आ हमरा बयसमे बेसी तरपट नहि अछि। बयसें हम हुनक पुत्रवत होइतहुं, हुनक अनुज सन छलहुं। तें ओ 'भाइ' कहथि, हमहूं 'भाइ' कहियनि। कखनो क' 'बाउ' सेहो कहथि- बुझलहुं बाउ। ओना कोनो-कोनो पत्रमे 'प्रिय प्रदीप जी' सेहो लिखथि। अपन नोकरीक कारणें हुनका बरोबरि भ्रमण मे रह' पड़नि। बिहार आबथि, तं बेगूसराय अबस्से आबथि। कतोक बेर समस्तीपुर अयलाह, तं बेगूसराय सेहो अयलाह। हमहूं कलकत्ता जाइ तं हुनके घर पर रही। आग्रही आ अनुरागी एहन जे हुनका ओहिठाम जाइ तं प्रफुल्लित भ' जाथि। होनि कत' राखी आ कत' उसारी। आ से सभक लेल। स्थानीय साहित्यकार सभ हुनका ओहिठाम जाथि, तं हुनको लेल तहिना आह्लादित। हुनक एकटा नाटक छनि - सन्तो। ई आन्दोलनकारी नाटक थिक। एहिमे राजनन्दन लाल दास जीक वैचारिक प्रतिबद्धता देखल जा सकैछ। ई नाटक पढ़लाक बाद हमरा एकर नायक सन्तो आ सुक्खी (खजौली)क कम्युनिस्ट नेता सन्तु महतो मे साम्य भेटल। सन्तु महतो खजौली क्षेत्रक उदीयमान नेता छलाह। लोकप्रिय सेहो। हम पुछलियनि, "भाइ! अहांक नाटकक नायक हमरा गाम लग सुक्खीक सन्तु महतोक चरित्रसं बड़ मेल खाइए। की हुनके अहां एहि नाटकक नायक बनौलियनि अछि?" ओ मुस्किआइत बाजल रहथि, "जं हं कही, तं?" "तं की? कोनो हर्ज नहि।" एहि पर ओ बाजल रहथि जे ओ हमरा नीक आ प्रतिबद्ध लोक लगैत छथि। एहन लोकक बात समाज लग अयबाक चाही। हमरा सभकें अपन नायककें चिन्हक चाही। अपन लोककें पहिने अपने लोक नहि चिन्हतै, तं आन कोना चिन्हतै? ओ अपन कार्यालयी काजसं टूर पर रहैत छलाह, तखनो मैथिली आ कर्णामृत हुनका संगे रहैत छल। एकबेरक संदर्भ जे ओ कहलनि, से अछि - ओ विशाखापट्टनम (प्राय:) गेल रहथि। आफिसक काजक बाद घुरैत काल कोनो मोहल्लाक एकटा घरक गेट पर नेमप्लेट देखलनि। ओहि पर कोनो 'झा' लिखल छल। ओ सोचलनि, ई अबस्से मैथिली होयताह। बिनु परिचयक हुनका ओहिठाम पहुंचि गेलाह। एकटा कन्या बहरयलीह। हुनका मैथिलीमे गृहपतिक मादे पुछलनि, तं ओ एहि तरहें भीतर चलि गेलि जेना हिनक बात बुझनहि ने होथिन। राजनन्दन लाल जी चुपचाप ठाढ़ । तखने ओ कन्या मायक संग अयलीह, तं अपन परिचय देलनि। अपन नाम कहैत कहलनि जे कर्णामृत पत्रिकाक संपादक छी, मिथिलासं आयल छी, अहांक गेट पर नाममे 'झा' देखलहुं तं लागल जे अपन लोक छी, तें भेंट कर' आबि गेलहुं। दुनू माय- धी हतप्रभ। गृहपति घरमे नहि रहथि। महिलाक कथनानुसार रातुक आठ बजे फेर गेलाह। झा साहेबसं भेंट कयलनि। गपसप कयलनि आ हुनका पत्रिकाक ग्राहक बना देलनि। कर्णामृतक प्रचार-प्रसार आ संचालन लेल ओ एहन काज विभिन्न शहरमे करथि। पहिल बेर बेगूसराय अयलाह तं कहलनि जे चलू, रिफाइनरी टाउनशिपमे बहुत मैथिल छथि। अहांक परिचयक होयबे करताह, जं नहियो होयताह तं की हर्ज? भेंटघांट कयल जाय, परिचय कयल जाय। आ से जाथि, कर्णामृतक ग्राहक बना लैथि। हमहूं संग होइयनि। भाषा-सेवाक एहि विरल सेवकक प्रयास देखि हम नतमस्तक भ' जाइ। एखनो भ' जाइत छी। जेना हमरा बुझल अछि, ओ बिहारक कोनो शहरमे जाथि, तं मैथिलीए बाजथि। हुनका संग किछु ठाम हम गेल रही, कथा-वार्त्ताक संदर्भमे, तखन हम ई अनुभव कयने रही। आरोप-प्रत्यारोपक संस्कृतिसं कोनो साहित्य आ समाज नहि बांचल अछि, मैथिली साहित्य आ मैथिल समाज ताहिमे अपवाद नहि अछि। कर्णामृत पत्रिका पर आरोप लगलैक जे ई कर्ण कायस्थक पत्रिका अछि। ई आरोप एकबेर नहि, बेर-बेर लगलैक। एहि कारणें पत्रिकाकें किछु घाटा सेहो भेलैक। कर्णामृत आ राजनन्दन भाइक व्यवहार आ कार्यशिल्प हमरा तेहन कहियो ने लागल। तथापि हम पुछने रहियनि, तं अपन चिरपरिचित मुस्कीक संग कहने रहथि जे एहि भ्रमकें मणिपद्म तोड़ि देने छथिन- कर्णामृत माने कानकें जे अमृत समान ध्वन्यात्मक स्वाद दिअय। कहलनि जे एहि मादे ब्रह्मानन्द सिंह झाक लेख सेहो कर्णामृतक कोनो अंकमे छपल छनि। तखनो जिनका भ्रम हेतनि, से रहनि। हम ताहि पर नहि सोचै छी। कर्णामृतमे मैथिलीक प्राय: सभ रचनाकारलोकनिकें छापलनि। रचना मांगि-मांगि क' छापलनि, तगेदाक पोस्टकार्ड पठा-पठा क'। मैथिलीक दिवंगत रचनाकार सभ पर विशेषांक सेहो बहार कयलनि। ताहू सभमे हिनक संपादकीय दृष्टि मोहित करैत अछि। राजनन्दन भाइ कर्मठ लोक छलाह। ठाहिं-पठाहिं कह'बला सेहो। एक बेर हुनक कन्याक हेतु कथा-वार्तामे हम दुनू गोटें एकटा शिक्षकक ओहिठाम गेलहुं। शिक्षक महोदय परिचयक क्रममे जखन हिनक गामक नाम बुझलनि तं बजलाह जे अहांक गामक मधुसूदन बाबू हमरा बड़ मदति कयने छथि। जखन हमरा नोकरी भेल तं एहिठामक लोक हमरा ज्वाइने ने कर' दिअय। मधुसूदन बाबू हमर सभक अधिकारी छलाह। बड़ मदति कयलनि। हुनके प्रयासें हम एत' ज्वाइन क' सकलहुं। राजनन्दन भाइ कहलखिन जे ओ हमर पित्ती छलाह। अगले-बगल दुनू गोटेक आंगन अछि। जखन कथाक गप चललैक तं ओ शिक्षक कहलखिन- "यौ ! अहांक गाममे तं हमरा गामसं वियाह-दान होइते ने छै। मानि लिअ' जे हम पांजिक पात नहियो मानब, मुदा हमर जेठ बालक जे लहेरियासरायमे छथि, प्राय: तैयार नहि होयताह। गृहस्थक ओहिठाम कथा करबा लेल गाममे पहिल डेग प्राय: नहि उठौताह ओ। आ, आब हम भेलहुं बूढ़। वरक जेठ भाइ भेलाह ओ। आब हुनके सभक जूति चलतनि ने। तथापि अहां सन व्यक्तित्वक लेल हम अपना दिससं कहबनि। इहो कहबनि जे ओ मधुसूदन बाबू अहांक पित्ती होयताह।" बूढ़ा चुप भ' गेलाह। तामसे हमर देह तना रहल छल। हम किछु बजबालेल भेलहुं, से राजनन्दन भाइ बूझि गेलाह। ओ नहुएंसं हमर बांहि पर थपकी देलनि आ बजलाह, "मास्टर साहेब। अपनेक गप हम बुझलहुं। अपन जेठजनसं नहि पुछियनु। हमर पित्ती अपन सहृदयताक कारणें अहांक मदति कयने होयताह। स्वजातिक कारणें सेहो कयने होथि। एखनि हमर पित्ती रहितथि तं पछतावा होइतनि जे जातिकें चिन्ह'मे हुनका बुतें बड़का गलती भ' गेलनि।" हमरा दिस तकैत बजलाह, "चलू प्रदीप। उठू।" हम दुनू गोटें बिदा भेलहुं। हुनक डेराक क्षेत्रसं बहराइते भाइ अपन मुस्कीक संग बजलाह, "बुझलहुं प्रदीप! ई जाति...सभ फसादक जड़ि होइए..." हम देखलहुं जे ओ मुस्किया क' अपमान पीबि गेलाह आ मास्टर साहेबकें प्राय: माफ क' देलनि। मुदा, हमरा सन्तु महतोक संदर्भमे हुनक बात मोन पड़' लागल- "हमरा सभकें अपन नायककें चिन्हक चाही।" "मुदा कोना चिन्हत? आंखि होइ, तखन ने।" हम एहि आघातकें कतोक बरख धरि बिसरि नहि सकलहुं आ ओ एहन-एहन आघात सहैत रहलाह आ मुस्किया क' दर्द पीबैत रहलाह। ----------- --- बेगूसराय/15 अक्टूबर 2021/ विजयादशमी अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अरविन्द ठाकुर “चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म मैथिली साहित्यक विविध रचना आ ओकर रचनाकार कें प्रकाश मे आनबा मे कलकत्ता सं प्रकाशित ‘कर्णामृत’ पत्रिकाक अमुल्य योगदान रहल अछि। मैथिलीक प्रायः ई एकमात्र पत्रिका अछि जे अनवरत तीन दशक सं बेसी अवधि तक बहराइत रहल अछि आ एकर अहि निरन्तरताक एकमात्र श्रेय जं किनको छनि त से राजनन्दन लाल दास छथि।कर्णामृत आ कर्ण गोष्ठी तक पहुंचए सं पहिने राजनन्दन जी मिथिला दर्शन आ आखर सं सेहो जुड़ला।पत्रिका प्रकाशनक हुनक जिद एहन रहनि जे ओ शुरुआती विरोधक बावजूद जातीय संगठन सं जुड़बाक समझौता सेहो कएलनि।तीन दशक सं बेसी अवधि तक कर्णामृतक माध्यम सं मैथिली पत्रिका प्रकाशनक निरन्तरता कायम राखि राजनन्दन जी मैथिली मे एकटा इतिहास बनैनिहार अनन्य व्यक्तित्व छथि।अहि मामला मे हुनक कर्मठता, हुनक लगन,हुनक पुरुषार्थ पर कोनो संदेह नहि कएल जाए सकैत अछि,खास तौर पर ई देखैत जे ओ ने कोनो शुद्ध साहित्यकार रहथि आ ने कोनो मौलिक चिन्तक। पत्रिका प्रकाशनक अहि क्रम मे ओ सम्पादकीय आ अन्य टिप्पणीक माध्यम सं जे किछु कहलनि,से हुनक ‘चित्रा-विचित्रा’ नामक संग्रह मे संकलित भेल अछि आ तेकर संकलन आ संपादन करनिहार डा प्रेमशंकर सिंह तहि पर एकटा दीर्घ आलेख लिखने छथि।संग्रहक प्रकाशक कर्णगोष्ठी अछि,तें एकर प्रकाशकीय मे अर्जुनलाल करण सेहो अपन लघु टिप्पणी कएने छथि।मैथिलीक जे परम्परा रहल अछि,तेकर निर्वहन करैत लेखक आ ओकर लेखनक प्रशंसा करबाक काज अहि दुनू लेखक माध्यम सं भेल अछि। कोनोटा मैथिली पोथीक प्रकाशन सं अचल-अटल रहनिहार लीकजीवी बौद्धिकताक लेल एतेक सामग्री यथेष्ट अछि।किऐ त ओसभ पेटे सं पढिकए आएल छथि आ आब हुनका किछु पढबाक बेगरता बुझाइते नहि छनि।एकरहु नहि पढता। नारा,समारोह,हुड़दंग आ चंदा-चिट्ठारत आन्दोलनजीवी बौद्धिकताक लेल त ई संग्रह नित्य पारायण करबा योग्य मानल जाए सकैत अछि।किऐ त मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक माध्यम सं समय-समय पर झूठ-सांच,अर्द्धसत्य,छद्म,वायवीय कल्पना,मिथक आदि-इत्यादिक सहमेल सं यत्नपूर्वक गढल प्रचार साहित्य अहि संग्रह मे बहुलता सं उपस्थित अछि।ओलोकनि अपन काजक वस्तु एकेठाम पाबि सकए छथि,पढि सकए छथि आ विभिन्न मंडली आ मंच पर एकरा बेर-बेर दोहराए सकए छथि।यथार्थ,वस्तुसत्य आ सार्थकताक आग्रही विश्लेष्णात्मक बौद्धिकताक लेल सेहो अहि संग्रहक उपस्थिति सुविधाजनक छै।एकटा वर्ग-विशेष द्वारा भाषा कें अपन उपकरण बनाए ओकर माध्यम सं अपन उपनिवेश स्थापित करबाक ,अपन वर्चस्ववादी संस्कृति कें सर्वहाराक बहुमत पर लादबाक जे प्रयास दीर्घकाल सं चलैत आबि रहल छै,तेकर प्रायः समग्र दस्तावेज राजनन्दन लाल दास जीक अहि संग्रह मे उपस्थित छै।प्रगतिशील बौद्धिकता अपन अन्वेषण,अपन तार्किकताक छूरी-चक्कू सं एकर चीरफाड़ कए सकैत अछि। पश्चिमी महायुद्धक बाद ओतहुका बौद्धिक जगत मे एकटा वैचारिक हवा बहल रहए,जहि मे अहि बातक वकालत कएल जाइत रहए जे सभ्यता दिस अग्रसर हएबे गलत अछि,बेजाय अछि आ सभ्यताहीन आदिम मनुष्यलोकनि सं आवासित अंचल/क्षेत्र मे जाए नुकाएबहि त्राणक एकमात्र रस्ता अछि।पाछू दिस घुरि जएबा कें श्रेयस्कर माननिहार अहि पंथ/विचार कें प्रिमिटिविज्म (primitivism) कहल गेल रहए,जेकरा मैथिली मे आदिमवाद वा प्राचीनवाद कहि सकए छी।ई पंथ त पश्चिमी महायुद्धक बाद अस्तित्व मे आएल रहए,किन्तु मैथिलीक शाश्वत प्रति-क्रिया-पंथीलोकनि द्वारा अहि ‘प्रिमिटिविज्म’ कें सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ मंत्र मानि लेल गेल अछि। ‘चित्रा-विचित्रा’ अहि मैथिल प्रिमिटिविज्मक लिखित दस्तावेज अछि। एना नहि छै जे राजनन्दन लाल दास कें तीरभुक्तिक सामाजिक संरचना,ओकर जीवन-पद्धति,ओकर लोकाचार आ भाषा-संस्कृतिक यथार्थक भान नहि छनि। अहि संग्रहक अनेक आलेख मे हुनक ई समझ सोझां आबैत अछि आ फरिच्छ भए कए आबैत अछि।किन्तु हुनक अहि समझ पर आन्दोलनजीविताक भ्रमजाल तेना कए हावी भए जाइत अछि जे निष्कर्ष पर पहुंचए सं पहिनहि हुनक लेखन भुतलाए कए ओझराए जाइत अछि। अहि भ्रामकताक कारण कलकत्ताक प्रवासी मानसिकता मे खोजल जाए सकैत अछि।कलकत्ता गेल तिरहुत क्षेत्रक सर्वहारा कें अपन मेहनत-मजूरी पर भरोस रहए आ ओ अपन श्रमक बल पर अपन रोजी-रोटीक जोगार करए मे सक्षम रहल। निष्ठापूर्वक खटैत रहल आ तहि सं जे भेटल,तेकरा पेट मे राखि निश्चिन्तताक नींद सुतैत रहल। ई सुख किन्तु अभिजात्य प्रवासीलोकनि कें नसीब नहि भेलनि।ओसभ असुरक्षाक भाव सं ग्रसित त भेबे कएला,अपन श्रेष्टताक प्रदर्शन लेल सदैव व्याकुलता सं भरल रहला।एकरे परिणामस्वरूप ओतय मिथिलाक परिकल्पना वैचारिक अस्तित्व मे आएल।एकर माध्यम सं ओलोकनि संगठित त भेबे कएला, बंगालीसभक बीच हुनकरसभक पहचान सेहो बनलनि।एक बेर ई पहचान बनलाक बाद किछु खास वर्गक वर्चस्ववादी मानसिकता जोर मारए लागल आ अपन जन्मस्थानहि जकां कलकत्ताक समाज मे सेहो अपन जन्मना-कुलीनताक स्थापनाक स्वप्न देखए लगला। कलकत्ताक समय-समय पर बनैत-टुटैत संगठनसभ एकर प्रमाण अछि।कलकत्तो मे वएहसभ कठखेल चललए जे तिरहुत मे चलैत रहल रहए।गैरमैथिललोकनि पर अपन वर्चस्व स्थापित करबाक लेल जे प्रोपगंडाक सिलसिला चलल,तेकर प्रभाव मे लक्ष्य-जाति त अएबे केलए,एकर रचयितालोकनि सेहो एकर दुष्प्रभाव सं नहि बचि सकला।झूठ जखनि बेर-बेर अनवरत रूप सं दोहराएल जाइ छै त एकटा खास अवधिक बाद ओ सत्यक भ्रमाभास दिअए लागए छै आ एकर उत्पादक आ उपभोक्ता दुनू एकर शिकार बनैत अछि।ई कलकत्ता मे भेलए आ एकर प्रभाव ओतय रहनिहार आन रचनाकारलोकनिक संग-संग राजनन्दन जी पर स्वाभाविक रूप सं पड़लनि।‘चित्रा-विचित्रा’क आलेख-टिप्पणी आदि मे अहि कुप्रभावक प्रभाव देखल जाए सकैत अछि। एकर उदाहरणक क्रम अहि पोथीक प्रथमहि आलेख सं शुरू भए जाइत अछि। अहि आलेख मे ओ मैथिलीक भाषा-शैली पर गंभीरता सं चिन्तित देखाइ छथि आ अहि पर विचारणक क्रम मे विभिन्न बिन्दूसभ कें छुबए छथि। आलेख 1967क अछि,तें समय कें देखैत अहि मे नवता मानल जाए सकैत अछि,नहि त ईसभ बेर-बेर दोहराएल गेल गपसभ छै।ओ मानए छथि जे अहि भाषाक दू रूप अछि – एक संस्कृत निष्ठ परिमार्जित मैथिली जे बाबू-भैया बाजए छथि आ दोसर जन-बोनिहार लोकनिक खांटी मैथिली।ई बाबू-भैया लोकनि के छथि,से ओ स्पष्ट नहि कएने छथि।किन्तु अहि आलेख समेत सम्पूर्ण संकलन मे जहि तरहें अनगिनत बेर ‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग भेल अछि,तहि सं अनुमान लगाएल जाए सकैत अछि जे ‘बाबू-भैया’ सं हुनक अभिप्राय मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थहि सं छनि। आम सामाजिक स्थापना मे राजपूत,भुमिहार ब्राह्मण आ अम्बष्ट कायस्थ सेहो ‘बाबू-भैया’क श्रेणी मे आबए छथि। हुनकर सभक भाषा कोन रूपक अन्तर्गत आबैत अछि? बाबू भैया आ जन बोनिहार सं अलग एकटा वणिक-समाज सेहो छै,ओसभ की बाजए छथि?स्पष्ट छै जे अहि रूप-विभाजन मे राजनन्दन जी सं चूक भेल छनि आ ओ आन्दोलनजीवी मैथिल आंखि सं एतहुका सामाजिक संरचना कें देखलनि अछि।इएह दृष्टि-भ्रम छै जे संबंधित आलेख मे हुनका भाषाइ एकरूपताक सन्दर्भ मे कोनो स्पष्ट कार्यक्रम वा सुझाव देबए मे अक्षम कएलकनि अछि। आलेखक अंत मे ओ आरोप लगबए छथि जे ‘मैथिलीक विरुद्ध मे हिन्दीक अड़ख्स अंगिका आ बज्जिका कें गढि कए ठाढ कएल अछि’।एहन आरोप विकट अछि आ निस्संकोच हास्यास्पदताक श्रेणी मे राखि देल जेबाक जोगर अछि।कोय मुर्खहि अहि बात पर विश्वास कए सकैत अछि जे एहनो कोनो वीर-पुंगव जनम लेने छथि जे दू-दू टा भाषा गढिकए ठाढ करबाक उद्योग कए सकैत अछि। अहि आलेखक समापन ओ अहि आह्वान सं करए छथि जे ‘मैथिलीक विद्वानलोकनिक ई कर्तव्य थिकनि जे मैथिली भाषाक मौलिकताक रक्षा करैत एहन शैलीक प्रचार करथि जाहि सं मैथिली नेपाल सं संथालपरगना धरि आ चम्पारण सं पुरनिया धरि जनप्रिय साहित्यिक भाषा बनि सकै,संगहि आन समाजक लेल सरल तथा आकर्षक बनायब सेहो जरूरी’।ई अद्भुत आ भयंकर विरोधाभासी दिवास्वप्न अछि। अहि एकटा पंक्ति सं अनेकानेक प्रश्न उठि ठाढ होइत अछि। ‘मैथिलीक मौलिकता’ की छिअए? एहन विद्वानलोकनि कोन लोक सं अवतरित हेता? नेपाल सं संथालपरगना आ चम्पारण सं पुरनिया बला भौगोलिक क्षेत्र कोन ग्रह पर अवस्थित छै? ई ‘आन समाज’ कोन समाज छिअए? ‘सरल आ आकर्षक’क कोन परिभाषा छै? एहन-एहन अनेकानेक प्रश्नबला ई आह्वान शुद्ध किताबी छै।मैथिली भाषाक साहित्य अकादेमीय इतिहास अहि बातक साक्षी छै जे मैथिली सं प्राप्त सभटा आमदनी एक जाति-विशेषक झोड़ा मे जाइत रहल अछि। हिनकरसभक वश चलए त मैथिली कें अपन टोल तक सीमित कए लेता।एकर क्षेत्रफल बढाए कए दावेदारसभक संख्या किऐ बढएता? क्षेत्रफल बढाएब नाराबाजी थिक,प्रपंच थिक,धोखा थिक आ क्षेत्रफल घोंकचाएब वास्तविकता। नाराबाजिए करबाक अछि त एहन संकोच किऐ? एकरा कश्मीर सं कन्याकुमारी आ दिल्ली सं भाया काठमाण्डू होइत तिब्बत आ चीन तक लए जाऊ! ईसभ गप राजनन्दन जी कें नहि बुझल छनि,से बात नहि। अहि संग्रहक विभिन्न आलेख मे ई बात सभ दबलहि स्वर मे,किन्तु उपस्थित अछि।ई अलग बात जे हुनक मानस पर मिथिला-मैथिलक प्रोपगण्डा साहित्यक तेहन प्रभाव छनि जे ई सभ बात ओकर प्रभाव मे दबि कए मौन भए जाइत अछि। हुनकर लेखन आन्दोलनजीविता आ मैथिलवाद कें भने शक्ति दैत हुअए साहित्यक लेल नुकसानदेह भए जाइत अछि। ‘भारतीय जनतंत्र आ मैथिली’ शीर्षक आलेख मे ओ 1940क एकटा घटनाक चर्चा करए छथि। हुनका अनुसार बिहार सरकार द्वारा गठित प्राथमिक शिक्षा व्यवस्थाक पुनर्गठन लेल बनाएल गेल समितिक सदस्य अमरनाथ झा मैथिली कें मिथिलांचल मे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम बनैबाक मांग कएने छला जेकरा नकारि देल गेल। अहि पर राजनन्दन जीक शब्द छनि—‘एहि मांग पर समितिक अन्य वरिष्ठ सदस्य लोकनि कोनो ध्यान नहि दए आसानी सं टारि देलनि।कारण बूझल छलनि जे ॠषि मुनिक संतान मैथिल लोकनि अपन अधिकारक रक्षा करबा मे पूर्ण अक्षम छथि’। अहिना ‘बिसरल नहि जाइछ’ मे हुनक उद्गार छनि – ‘माछ देखि कए आ दही खाय कए यात्रा करब मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा थिक।मैथिल संस्कार।‘ स्पष्ट करबाक बेगरता नहि जे राजनन्दन जी मैथिल केकरा मानए छथि। अहि श्रेणी मे गैर ॠषि-मुनिक संतान (जेकरा ॠषि-मुनिक संतानलोकनि द्वारा चाण्डाल,शुद्र,सोल्हकन,राड़,नान्ह जाति आदि-आदि सम्बोधन सं विभुषित कएल जाइत रहल अछि) नहि छथि आ सएह यथार्थहु छै। अहि यथार्थक भान होइतहु,लिखित रूप मे स्वीकार करितहु राजनन्दन जी अपन आन-आन लेख मे एकटा मृत-राज्यक काल्पनिक क्षेत्र मे रहनिहार समग्र जन-समुदाय कें मैथिल कहि ओकरासभ कें भ्रमित करबाक अपराधक सहकर्मी होइ छथि त ई कोनो गुप्त एजेंडाक लेल जतेक उपयोगी हुअए, ‘सहितस्य भाव साहित्यम’ लेल बहुत दुखद आ अस्वीकार्य। अहि आरोप सं हुनकर बरी हएबाक एकहि टा उपाय बचैत अछि जे चित्रा-विचित्रा मे संकलित लेखन कें साहित्यक श्रेणी मे नहि राखि,प्रचार-साहित्यक (propaganda literature) श्रेणी मे राखि देल जाइ। कलकत्ताक मनोविज्ञान दिआ एकटा बात मशहूर छै जे एतहुका रहवासी अपन सभटा दुख,अपन समग्र समस्याक समाधान/निदान साम्यवाद मे देखैत रहल अछि। स्वाभाविक जे ओतय अपन नियोजनार्थ गेल लोकहु पर एकर प्रभाव पड़ल।मूल बंगाली कलकतिया लेल ई मनोविज्ञान स्वाभाविक रहए किन्तु प्रवासीसभक लेल ई शख वा मजबूरी जकां रहल,तें ई एकदम ओढल जकां—सुविधानुसार ओढी,असुविधा हुअए त उतारि दी। अहुना पुरोहिती संस्कारक लोक लेल वामपंथी हएब प्रायः असंभव जकां मानल जाइत अछि। राजनन्दन जीक जीवनी कहैत अछि जे ओ 1967 तक सीपीआईक कार्ड-होल्डर रहला।किन्तु ‘चित्रा-विचित्रा’क एकहु टा आलेख मे हुनक वामपंथी रूपक दरस नहि होइत अछि।एना बुझाइत अछि जे रोजगारजनित परिस्थिति आ मैथिलवादी तत्वक संगतिक प्रभाव मे हुनक शिक्षा आ वैचारिकता छाउर भए गेलनि। हुनक लेखन मे व्यक्त विचारसभ शुद्ध रूप सं परम्परावादी आ कर्मकांडीय स्थापनासभक पुष्टि मात्र करैत चलैत अछि। अमरकान्त झा होथि वा आन कोनो झा-वादक प्रवक्ता,तिनकरसभक स्थापना कें वामपंथक द्वन्द्ववाद पर परखबाक कोनोटा प्रयास हुनक लेखन मे नहि देखाइत अछि।मैथिली कें मैथिल आ मिथिलाक संग साटि कए जे मायावी प्रपंचजाल पसारल गेल अछि,तेकरा ओ शब्दसः स्वीकार कए लेने बुझाइ छथि।शंका करब,विश्लेषण करब आ तहि सं सत्य कें बाहर करब,तहि प्रगतिवादी,वैज्ञानिक बौद्धिक श्रमक बेगरता हुनका नहि बुझाएल छनि।एना बुझाइत अछि जे हुनका ई त बुझाइए गेल रहनि जे अतीतवाद आ प्रगतिवाद कें एकहि संग साधब हुनक बुत्ताक बात नहि छनि आ कोनो मृतयुगक कोनो कल्पना कें अजुका युग मे साकार करबाक स्वप्न देखब,तहि लेल हूलेलेले करबाक कर्मकांडीय खेलौर करब आधुनिकताक लेल हास्यास्पद अछि।ई बुझितहु ओ आधुनिक हेबाक सत्ती पुरातनपंथी हेबाक मार्ग चुनलनि जे कलकत्ताक अधिकांश प्रवासी द्वारा चुनल गेल छल आ जे कलकत्ताक तहि कालक मैथिलवाद कें आर्थिक सम्पन्नता सं दहोबोर सेहो करैत रहए।दुनियादार लोक सदैव बहुमतक संग रहबाक सुविधाजनक मार्ग चुनए छथि,राजनन्दन जी सेहो चुनलनि।सर्वहाराक संग देब,ओकरा संग समानताक व्यवहार करैत ओकरा अपन पथक सहयात्री बनाएब एकटा दीर्घ आ श्रमसाध्य प्रक्रिया छै,जे आश्रय आ सुविधाभोगी समुदाय कें कहियो पसिन्न नहि भेल अछि।तें राजनन्दन जी पहिने मैथिल महासभा आ अंततः कर्ण कायस्थक जातीय सभा दिस घुरि जएबाक सुगम आ सरल मार्ग चुनि लेलनि। अहि लेल हुनका दोषहु नहि देल जाए सकैत अछि।एहने वातावरण रहए,छै। इएह चहुदिस होइत रहए,भए रहल छै। अचरजक गप छै जे ‘परम्पराक सिक्कड़िमे कर्णकायस्थ’ सन विद्रोही तेवर आ प्रगतिशील चेतना सं आप्लावित लेख लिखनिहार राजनन्दन जीक समग्र लेखन एना अधोमुख किऐ भेल! अहि आलेख मे राजनन्दन जीक लेखनी सर्वाधिक उन्मुक्त,लक्ष्य-बिन्दू पर केन्द्रित आ निष्ठुर आलोचनाक संग प्रगट भेल अछि।एतय हुनका जाति-व्यवस्थाक कुचक्र,पुरोहितवाद सं भेल सामाजिक क्षति आदि खूब फरिच्छ भए कए देखाइ पड़लनि अछि। अहि आलेख मे ओ पुरोहितवाद आ पंजी-प्रबन्ध व्यवस्था कें नीक जकां बेनंगन करए छथि।रमानाथ झाक उक्ति ‘सभी वंशों में कलंक है,जो पांजि के रूप में व्यक्तियों के साथ लगे हैं। अतएव पंजी का गौरव करना अज्ञानता है’ कें उद्धृत करैत हुनक आलोचक अपन आक्रामक प्रखरताक संग प्रबल भेल अछि। ‘कर्णकायस्थ लोकनि संस्कृतक विद्वान होइत छलाह,मुदा पुरोहितवादक आगां हुनका लोकनि कें कोनो स्थान नहि भेटलनि।राजदरबारक राजपंडित तं ब्राह्मणे भए सकैत छलाह चाहे हुनका सं अधिक योग्य कोनो कर्णकायस्थ किएक ने होथि’, ‘पुरोहितवादक दोषपूर्ण प्रभाव सं एखनो कर्णकायस्थ लोकनि मुक्त नहि भेलाह अछि’, ‘श्राद्ध आदि मे दान दक्षिणाक परम्परा एक ढकोसला मात्र थिक।ई सब सं पैघ हथियार रहल अछि कर्णकायस्थक आर्थिक शोषणक’, ‘कर्णकायस्थ समाज ब्राह्मणे जकां पंजीप्रथाक ओझराहटि मे पड़ि गेल।पंजीप्रथाक द्वारा ब्राह्मण एवं कर्णकायस्थ मे जातिगत शुद्धता कें अक्षुण्ण रखबाक लेल एवं विदेशी प्रभाव सं बचेबाक असफल प्रयास कएल गेल।कारण हिन्दूक एहन कोनो जाति नहि,जाहि मे विदेशी मिश्रण समय-समय पर नहि भेल हो’ , ‘कर्णकायस्थ लोकनि श्रमक महत्व कें बुझथि,पुरोहितवादक कुचक्र सं अपना कें मुक्त करथि,जाहि सं व्यक्तिक आर्थिक विपन्नता उत्पन्न होइत छैक’ – ई सभ पंक्ति अही आलेखक अछि आ से कोनो उद्धरण नहि,राजनन्दन जीक अपन विचार छनि। अचरज होइत अछि जे आन्दोलनजीवी मैथिलवादक पक्ष मे जाइतहि राजनन्दन जीक जातीय वा व्यक्तिगत विश्लेषणात्मक बुद्धि,सत्यान्वेषण वृत्ति आ प्रगतिशीलता कतय अलोपित भए जाइ छनि,मिथिला-मैथिल दिस जाइतहि ओ पुरोहिती मायाजालक ओझरी मे किऐ ओझराए जाइ छथि।ई समझ सं बाहरक गप अछि जे जे व्यक्ति अपन जातिक लोक कें अतीत आ पुरोहितवाद सं मुक्त भए आधुनिक आ प्रगतिशील हेबाक आह्वान कए रहल अछि,वएह व्यक्ति अपन समग्र लेखन मे बेर-बेर आन लोक-समाज कें अतीतक कोनो मिथकीय खोह मे घुरि कए सन्हिआए जएबाक आ पुरोहिती प्रपंच मे फंसि जएबाक ललकारा केना दए सकैत अछि,अतीतजीविताक पैरोकारी केना कए सकैत अछि?भोलालाल दास पर लिखैत ‘पुरना संस्कार आ कुरीतिक भार सं समाजक जर्जर हएब आ कुहरबाक’ चर्चा करनिहार आन ठाम इएह संस्कार आ कुरीतिसभ कें भाषाक अढ मे आधुनिक युग,आधुनिक पीढी पर लाधबाक अनुशंसा केना कए सकैत अछि? ‘कर्णकायस्थ मे विवाहक समस्या’ मे ओ ‘इतिहास गवाही अछि जे मिथिला किऐक संपूर्ण भारतक कोनो जाति सुच्चा नहि अछि’, ’कायस्थ समाज मूलतः बुद्धिजीवी होइतहु आइ बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे सेहो मध्ययुगीन धारणा तथा कुसंस्कार सं मुक्त नहि भए रहल अछि’, ‘परम्परागत मध्ययुगीन धारणा तथा मध्यवित्त परिवारक कुसंस्कार सं ऊपर उठि कोनो तरहक प्रगतिशील डेग उठायब अथवा आदर्श स्थापित करबाक साहस कर्णकायस्थलोकनिक युवक-युवती मे नहि छनि’ सन-सन अतिक्रांतिकारी गप कहए छथि आ जातीय संरचनाक किछु विरोधाभाससभ कें चिन्हित सेहो करए छथि।किन्तु प्रो रामशरण शर्माक किछु उद्धरण दैत आ राजा हरिसिंह देवक चर्चा करैत अहि आलेखक मुख्य बिन्दू कर्णकायस्थलोकनिक वैवाहिक सुधार अछि।प्रायः दुनू उद्धरणक माध्यम सं कर्ण कायस्थ कें मैथिल ब्राह्मणक समकक्ष वा समान देखएबाक प्रयास भेल अछि। हरिसिंह देव पंजी प्रबन्ध मे मैथिल ब्राह्मणक संग कर्ण कायस्थ कें सम्मिलित कएलनि आ रामशरण शर्माक उद्धृत कथन कहैत अछि जे लोकनाथ नामक ब्राह्मण पिता-पक्ष सं करण लोकनिक पुर्वज रहथि।जातीय संरचनाक यथार्थ स्थितिक आभास हुनका छनि,जेकर प्रमाण हुनक अहि पंक्तिसभ मे देखल जाए सकैत अछि—‘चौदहम शताब्दी मे आबि राजा हरिसिंह देव मिथिला मे मैथिल ब्राह्मण तथा करणकायस्थ लोकनि कें आर्थिक हैसियतक आधार पर विभिन्न मूल मे विभाजित कए देलनि।ब्राह्मण लोकनि 180 मूल मे बांटल गेलाह जे परवर्ती काल मे लगभग एक हजार उपमूल अथवा उपजाति कें जन्म देलक।तहिना करण कायस्थ लोकनि मे सेहो अनेको मूल तथा उपमूलक जन्म भेल।एहि तरहें ब्राह्मण तथा कायस्थ लोकनि मूलक अतिरिक्त क्षेत्रीय आधार पर सेहो विभिन्न उपजाति तथा उपमूल मे बंटि गेलाह।एहि सं स्पष्ट अछि जे प्रत्येक जाति मे पैघ आ छोटक मान्यताक उत्पति मध्ययुगीन धारणा थिक तथा एकर आधार व्यक्तिक आचार-विचार,क्रिया,विद्वता,समाज सेवा आदि नहि बल्कि आर्थिक उप्लब्धि रहल अछि।जाहि मूलक लोक मध्ययुग मे पैघ मानल जाइत छलाह से आइयो पैघ मानल जाइत छथि चाहे ओ आइ कतबो दरिद्र किएक नहि होथि।व्यक्तिक निजी संस्कार,आचार-विचार,विद्वता आदिक कोनो महत्व नहि रहल।एहि तरहक विभाजन राजतंत्र तथा सामंतवाद कें जीवित राखबाक लेल उपयुक्त छल।‘ राजनन्दन जीक स्पष्ट मत छनि जे पंजी-प्रबंध जातीय श्रेष्टताक नहि आर्थिक श्रेष्टताक आधार पर बनल आ ई अहि मे सम्मिलित दुनू जाति कें जोड़बाक बदला विभाजित कएलक।एतय ई प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठैत अछि जे जखनि ओ अहि दू जातिक स्थितिक एहन सटीक आकलन कए पाबि रहल छथि त अहि दू जाति सं इतर समाजक आकलन मे किऐ चूकए छथि आ शेष-समाज कें सब धन बाइस पसेरी मानि ओकरा पुरोहिती पाखण्डक मायाजाल मे ओझराएल रहबाक लेल अपन लेखन मे मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक शंखनाद किऐ करए छथि? हुनक वैचारिकताक सीमा मैथिल महासभा धरि सीमित अछि अथवा अपन अस्तित्वक व्यक्तिगत पहचान बनएबा वा बनएने राखबा लेल कलकत्ताक प्रवासी-समाजक मानसिकताक संग समझौता कए ओकर सुर मे सुर मिलाए रहल छथि? आकि दुनू जातिक मूलतः एके हेबाक भावना हुनका अहि बात लेल प्रेरित करैत अछि जे नीक-बेजाय दुनू मे एक दोसराक पीठ पर रहब भैयारी-कर्तव्य अछि? क्वालालम्पुर,मलेशिया मे 10 अक्टूबर,1998 कें प्रथम विश्व दलित सम्मेलन कें सम्बोधित करैत कांशीराम कहने रहथि—‘हम जातिक विरुद्ध जातिक इस्तेमाल करए छी। आब जातिक तलवार एकतरफा नहि रहल।किछु हमरासभ कें काटैत अछि,त किछु ओमहरकासभ कें सेहो काटत।‘ कर्णकायस्थ सं सम्बन्धित राजनन्दन जीक लेखसभ कें पढलाक बाद नहि जानि किऐ हमरा ई टिप्पणी मन पड़ि गेल। ‘भारत मे क्षेत्रीय भाषाक भविष्य’ अविश्वसनीय आंकड़ासभ सं भरल अछि। ई लेख प्रकारान्तर सं इहो साबित करैत अछि जे कमजोर तर्क पर ठाढ व्यक्ति अपन दुर्बलता आ असफलताक लेल दोसर कें दोषी ठहराबैत अछि आ ओ दोसर जं अस्तित्व मे नहि हुअए तखनि कोनो काल्पनिक दुश्मन ठाढ करैत अछि। हुनक कहब छनि जे ‘मैथिलीभाषी सम्पूर्ण बिहार मे बहुसंख्यक छथि—50% सं अधिक’। कोनो महा-सनकल लोक वा कोनो महा-निरक्षर-भट्टाचार्यक गप छोड़ू,मिथिला-मैथिलक नाम पर दिन-राति हूले-लेले करैत कोनो महा-आन्दोलनीक गप छोड़ू,मैथिलीक बल पर अपन सौंसे खानदान कें धन आ पुरस्कार सं तिरपित करनिहारक गप छोड़ू, स्वयं राजनन्दन जी कें अहि बात पर विश्वास नहि रहल हेतनि आ लिखलाक बाद तहि क्षण-विशेष मे संभवतः ओहो अपन अहि मजाक पर खूब हंसल हेता जहि क्षण ओ मैथिलवादी प्रोपगंडाक दुष्प्रभाव सं मुक्त भए सामान्य भाव मे रहैत हेता।एकटा खूब प्रचलित कहबी छै जे झूठ तीन प्रकारक होइत अछि—झूठ,सफेद झूठ आ सांख्यिकी।मैथिलवादी आन्दोलनजीवी लोकनि अहि तीनू प्रकारक झूठक धुरझार प्रयोग कएने छथि आ खूब निधोख भए कए कएने छथि। हिनकरसभक सांख्यिकी परिस्थिति आ सुविधानुसार ऊपर-नीचां होइत रहैत अछि। समाज कें भ्रमित करबाक लेल आ सरकारक समक्ष अपन मांग आ दाबी राखबाक लेल ई लोकनि जहि संख्यां कें करोड़क करोड़ कहता,जहि पर जोर देबाक लेल ‘कोटि-कोटि’क हर्स्व कें दीर्घ लगाए ‘कोटी-कोटी’ मे परिणत कए देता,तहि संख्यां कें लाभ हंसोथैत बेर सैकड़ा वा दर्जन कए परिवार आ जाति तक सीमित कए देता। हो-हल्ला मचैबाक बेर,शक्ति-प्रदर्शन बेर सम्पूर्ण जन-समुदायक सहयोग चाही,लाभक बंटवारा बेर परिवार वा गोधिया-दायाद तक सीमित रहबाक चाही।व्याकरणाचार्य लोकनिक समाज अछि,हर्स्व कें दीर्घ आ दीर्घ कें हर्स्व करबाक लेल कोनो आन आश्रम त जेबाक नहि अछि। ‘मिथिला चित्रकलाक सर्वहाराक मसीहा कृष्णकुमार कश्यप’ लेखक शीर्षकहि दोषपूर्ण आ भ्रामक अछि,त ओकर अन्तर्वस्तुक तेहने हएब स्वाभाविक।जहि चित्रकलाक चर्चा राजनन्दन जी कए रहल छथि,से मधुबनी क्षेत्र-विशेषक कला अछि,मधुबनीक अस्मिता सं जुड़ल अछि आ मूलतः सर्वहारा वर्गक जनि-जातिक कला अछि। एकरा मिथिलाक कला कहब तहिना अछि जेना महमूद गजनवी सोमनाथ मन्दिरक निर्माता हएबाक दाबी ठोकए। आमदनीक नीक माध्यम भए गेलाक कारण आइ ई कला भने अनेक महानगर तक प्रसार पाबि लेलक अछि,सोल्हकनसभक घर-आंगन सं बहराए द्विजलोकनिक स्त्रीगण तक पहुंच गेल अछि,क्षेत्रीयताक सीमा तोड़ि आन-आन क्षेत्र तक खुदरिया रूप मे विस्तार पाबि लेलक अछि,किन्तु एकर मूल आ थोक उद्भव-स्थल मधुबनीए अछि आ सेहो मधुबनीक सर्वहारा समुदायक घर-आंगन। अहि कला कें ‘मधुबनी कला’ छोड़ि आन कोनो नाम देब प्रचण्ड थेथरपनीक अतिरिक्त आर किछु नहि। अहि आलेख मे राजनन्दन जी लिखए छथि—‘हम पुछलियनि,ई चित्रकला त मात्र मैथिल ब्राह्मण तथा कर्णकायस्थक परिवार सभ मे प्रचलित अछि जकरा महिला लोकनि अपन नानी,दादी,माय आदि सं सीखने छथि।तखन स्कूलक की प्रयोजन?’ राजनन्दन जीक ई प्रश्न हुनक अज्ञानता सं उपजल अछि कि ओ अहि विषय मे अल्पसूचित-भ्रमित छथि आकि जानि-बुझि कए एकर नव-नामकरणक स्वघोषित पुरोहित बनि रहल छथि,से निर्णय करब कठिन। आ जं राजनन्दन जीक प्रश्नक उत्तर मे अहि लेखक चरितनायक कश्यप जी एकरा ब्राह्मण,कायस्थक अतिरिक्त डोम,दुसाध,मुशहर आ मुसलमान आदिक कन्यालोकनिक माध्यम सं अहि कला कें सार्वजनिक आ सर्वसुलभ बनैबाक दाबी करए छथि त ई प्रपंच-पाखण्डक पारावार अछि।जहि लुरि कें कश्यप जी मां सरस्वतीक वरदान कहए छथि,से वस्तुतः मंथराक कूटबुद्धि बुझाइत अछि। ‘स्मृति किएक?’ मे राजनन्दन जी गछए छथि जे ‘मैथिली मिथिलाक लोक भाषा थिक,लोक चेतनाक संवाहक थिक’। किन्तु एकर बाद हुनक कहब छनि जे ‘एहि मे लोक जीवनक संघर्षक गाथा सभ समाहित अछि,मुदा मैथिली अपनहि संतान द्वारा अवहेलित अछि’।जं अहि अवहेलना सं संबंधित हुनक आरोप सर्वहारा वर्ग पर अछि त अहि आरोप सं सहमत हएबा मे कोनो अतस्तितह नहि हएबाक चाही।ई सत्य छै जे ई भाषा मूलतः गैर मैथिल लोकनिक थिक आ अहि मे लोकजीवनक संघर्ष गाथासभ ठीके समाहित छै,आ से लिखित रूप मे नहि,लोककंठ मे बसल छै।तेकरा लिखि कए दस्तावेजीकृत करबा मे निस्सन्देह ई लोक-समाज चूकल अछि।एतय सोचबाक गप ई छै जे लोकजीवनक संघर्ष गाथा कें लिखित रूप मे आनबाक लेल पढब-लिखब अनिवार्य छै आ जेकरा पर एकर जिम्मेदारी रहए तेकरा पढबा-लिखबा सं वर्जित करनिहारे आइ अहि भाषा पर अपन आधिपत्य जमएने छथि।किन्तु राजनन्दन जीक अपन सीमा छनि।ओ विश्लेषणक प्रक्रिया मे जाइ सं बचए छथि।ओ सरलीकरणक रस्ता चुनए छथि,कोनो बातक चर्चा कए देब,तहि पर चिन्ता व्यक्त कए देब हुनका यथेष्ट बुझाइ छनि। तें ओ चर्चा आ चिन्ता व्यक्त करबाक औपचारिकताक निर्वहन कए सीधे अभिजात्यक लिखल साहित्य दिस आबि जाइ छथि आ कहए छथि जे ‘मैथिलीक वर्त्तमान काव्य साहित्य,कथा साहित्य तथा नाटक भारतक कोनो समृद्ध भाषा साहित्यक समकक्ष ठाढ हैबाक सामर्थ्य रखैत अछि’। अपन अहि कथनक समर्थन मे ओ कोनो लेखक वा कोनो कृतिक उदाहरण देब आवश्यक नहि बुझए छथि। हुनका मात्र ई कहबाक छनि जे तें ओ कर्णामृतक माध्यम सं मैथिलीक साहित्यकार तथा मैथिली आन्दोलन सं जुड़ल सेनानी (?) लोकनिक स्मरण करए छथि।राजनन्दन जीक अपन एजेंडा छनि।तहि पर ओ चलथि तहि मे केकरो की एतराज भए सकैत अछि?किन्तु एकटा पाठकक मन मे ई सभ पढि जे अनगिनत प्रश्न उठैत अछि,तहि सं हुनकहु कोनो एतराज नहि हएबाक चाही।जं मैथिली लोक भाषा अछि त अहि मे संस्कृत परम्परा सं आविर्भूत भेल बाबू-भैयासभ अपन मनिजनी किऐ चलाए रहल छथि? अहि भाषा मे लोकजीवनक गाथासभ समाहित अछि त से लोक-कंठहि तक सीमित किऐ रहि गेल आ एकर लिखित साहित्य मे अभिजात्य गाथाक गान किऐ कएल जाए रहल अछि?मैथिली-मिथिलाक इतिहास लोक-जीवनक इतिहास नहि भए कए पुरोहित लोकनिक मरौसीक खतियान किऐ बनल अछि?मणिपद्म छोड़ि आन कोनो लेखक लोक-गाथाक संग्रहण-संकलन आ ओकर लिखित दस्तावेजीकरणक प्रयत्न किऐ नहि कएलनि?मैथिली लोक भाषाक मौलिक रूप मे एकटा श्रमजीवी स्त्री जकां निश्छल, निर्दोष आ पवित्र अछि।तेकरा मैथिलत्वक सोलह वा छप्पन शृंगार कए नगरवधु किऐ बनाए देल गेल?राजनन्दन जी द्वारा अहि भाषा कें लोक भाषा घोषित करैत क्रमानुसार जहि साहित्यकार लोकनि कें स्मरित कएल गेल अछि,तहि मे सं किनकरसभक एकरा लोक भाषाक रूप मे प्रतिष्ठित करबा मे,लोक गाथासभ कें प्रकाशित-सम्मानित करबा मे,भाषा कें लोक चेतनाक संवाहक बनाए कए राखबा मे कोन-कोन आ कतेक योगदान रहल अछि?वर्तनी सं लए कए एकर सभटा वाह्याभ्यन्तर स्वरूप,एकर इतिहास,एकर व्याकरण आ एकर अन्तर्वस्तु पर्यन्त कें एकटा विशिष्ट जातिगत अभिजात्यक जाल मे फांसि कए किऐ बान्हि देल गेल अछि आ अहि काज मे प्रायः सभ आन्दोलनजीवी लोकनि सहभागी किऐ भेल छथि? अद्भुत त इहो गप छै जे अपवादक रूप मे एकटा प्रबोध नारायण सिंह कें छोड़ि,कर्णामृत जतेक लोक कें स्मरण कएलक अछि,से सभ गोटे मैथिल महासभा द्वारा पंजीकृत जातिए सं आबए छथि।रहल मैथिली साहित्यक भारतक कोनो भाषा साहित्यक समकक्ष हएबाक गप,त ई नुकाएल गप नहि अछि जे ई भाषा आइ तक विद्यापति कें छोड़ि आन कोनो अखिल भारतीय व्यक्तित्व नहि दए सकल।साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत कृतिसभ कें जं अहि भाषाक प्रतिनिधि साहित्य मानि ली ( मानबाकहि चाही) त अहि मे सं अधिकांश लेखन आन भाषाक समक्ष ठाढ हएबाक सामर्थ्य नहि राखैत अछि। मणिपद्मक चर्चा करैत लिखल गेल अछि जे, ‘मणिपद्म जी अपन साहित्यिक प्रतिभा सं मिथिलाक प्राचीन गौरव कें जन जीवनक आशा-आकांक्षा कें अपन लेखनी द्वारा लोकतांत्रिक धरातल पर अनलनि। हुनक ई लोकतांत्रिक प्रवृति मिथिला मे भावात्मक एकता आ मैथिलत्व बोधक कुंजी सिद्ध भेल’। मणिपद्मक योगदान निस्सन्देह अनमोल अछि। ओ अहि क्षेत्र-विशेषक लोक-संस्कृति कें लिखित आ दस्तावेजीकृत करबा लेल जे श्रमसाध्य काज कएलनि अछि,तहि लेल ओ सदैव मन पाड़ल जेता। किन्तु राजनन्दन जीक उक्त वक्तव्य परस्पर विरोधाभासी आ वायवीय अछि।राजतंत्रीय गौरव आ लोकतांत्रिक धरातल दुनू दू चीज छिअए।तहिना लोकतांत्रिक प्रवृति आ मैथिलत्व बोध सेहो विपरीतार्थक छै।भावात्मक एकताक गप आ जातीय प्रतिद्वन्द्विता सेहो अलग-अलग गप। ई बात आब नुकाएल नहि रहल जे पौराणिक ‘मिथिला’ कें पुनर्जीवित करब मैथिल महासभाक अनेक रास गुप्त एजेण्डा मे सं एक अछि। अहि पौराणिक कथाक संग एकटा वृहत्तर समाजक धार्मिक भावना जुड़ल रहल अछि,जेकरा खूब नीक जकां भजएबाक काज भेल अछि।वस्तुतः जं कहियो एकर अस्तित्व रहबो करए त विदेह वंशक समाप्तिक बादहि एकर अस्तित्व समाप्त भए गेल।किन्तु एकटा सुनियोजित तरीका सं एकरा त्रेता,द्वापरक युगादि पर सं छड़पाबैत कलियुगक हरिसिंह देव आ घोर कलियुगक दरभंगा सामन्तक शासित क्षेत्र सं जोड़ि देल गेल अछि। पुरोहित समुदाय कें बुझल छनि जे भारतीय जनमानस धार्मिक मामला मे तर्क-वितर्क नहि करैत अछि आ अपन स्वाभावानुसार अहि अविश्वसनीय छड़पान पर सेहो शंका नहि करत। अहि अविश्वसनीय स्थापनाक चौतरफा लाभ पुरोहित लोकनि लेबाक जोगार कएलनि।पहिल ई जे हुनकासभक जातीय शुद्धता पर इतिहास जे शंका उठबैत अछि,से निर्मूल भए जाए आ ‘मिथिला’ शब्द सं ‘मैथिल’ शब्द जोड़ि अपन वंश कें पुराणकालीन समय सं सम्बद्ध कए लेल जाए। दोसर ई जे ठेठी वा पचपनियां वा तिरहुता नाम सं प्रचलित अहि क्षेत्र-विशेषक भाषा कें मैथिली नाम दए एकरा अपन नव यजमनिका वा खबोत्तर बनाएल जाए।तेसर ई जे अहि मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक माध्यम सं अहि क्षेत्र विशेष कें अपन सांस्कृतिक उपनिवेश बनाएल जाए।ई फेहरिस्त और नमहर अछि,किन्तु तेकरसभक चर्चा बाद मे कतहु।एतय एतबे जे हुनकासभक दुर्भाग्य सं देश आजाद भए गेल,राजशाही ढहि गेल आ चहुदिस लोकतंत्रक बयार पसरि गेल।युग-युग सं शिक्षा,समानता आ न्याय सं वंचित समुदाय शनैः-शनैः अपन अधिकार चेतना सं लैस हुअए लागल आ ओकरा मे प्रश्न उठएबाक साहस जागृत भेल। अहि जागरणक परिपेक्ष्य मे राजनन्दन जीक उपरोक्त वक्तव्य सेहो प्रश्नक घेरा मे अछि। मिथिला नामक कोनो वस्तु जं रहए त ओ राजतंत्र रहए।इतिहास गवाह अछि जे प्रायः शत-प्रतिशत राजतंत्री व्यवस्था शोषण पर आधारित रहए आ जं मात्र मिथिले नामक राजतंत्रक गप करी त ओहि मे कराल जनक सन-सन क्रूर आ पापी शासक सेहो भेल छथि। सीताक पिता आ रामक ससुर जनक सेहो अपन राजमहल आ शाही ठाठबाठ कोनो प्रेत-विद्या वा जादूगरीक प्रताप सं ठाढ नहि कएने हेता,प्रजाक शोषणक माध्यमहि सं कएने हेता,भनहि ओ अत्याचार प्रजालोकनिक बर्दाश्तक सीमाक भीतरे रहल हुअए।बर्दाश्तक भीतर हुअए वा बर्दाश्तक बाहर,कोनो प्रकारक शोषण गौरवक विषय नहि भए सकैत अछि।तखनि ओ कोन गौरव रहए जेकरा मणिपद्म लोकतांत्रिक धरातल पर आनलनि?किछु अपवाद छोड़ि मणिपद्मक प्रवृति लोकतांत्रिक रहनि,किन्तु ओ त भारतीय गणतंत्रक नागरिक रहथि;तखनि ओ भूतकालक यात्रा कए मिथिला मे भावात्मक एकता केना आनलनि? आ जं राजनन्दन जी वर्त्तमानक क्षेत्र विशेष कें मिथिला सम्बोधित कए रहल छथि त ई तथाकथित भावात्मक एकताक आन-आन ठामक दर्शनक गप छोड़ू,ई त मणिपद्मक पोथीसभक प्रकाशनहु मे नहि लखा दैत अछि। आन गैर-मैथिल जातिक गप सेहो छोड़ि दिअ,मैथिल ब्राह्मणक कोनो संगठन वा मंच अहि दिशा मे आगू नहि आएल आ ई काज अन्ततः कर्ण कायस्थ लोकनिक संगठन कर्णगोष्ठीए कें किऐ करए पड़ल?तहिना लोकतांत्रिक प्रवृति त मैथिलत्व-बोधक नम्बर एक दुश्मन अछि।मैथिलत्व बोध वस्तुतः फासीवादक पर्याय अछि। जेना अपन गरदनि मे उनटा स्वास्तिक लटकाए कए हिटलर अपन नस्लीय श्रेष्टताक घोषणा करैत आन नस्लक सफायाक मंशा साधने रहए,तहिना गरदनि मे ताग आ माथ पर पाग राखि ई मैथिलत्व कए रहल अछि। रत्ती-भरि अंतर ई जे दक्षिणाजीवी अहि समुदाय कें नरसंहार करबाक कुब्बत नहि छै आ तें एकर कार्य-पद्धति हिटलर सं कने अलग छै।मने नर-संहार नहि,सर्वहाराक संस्कार-संहार अछि। बाबूसाहेब चौधरी पर लिखल संस्मरण मे मैथिल संगठनसभक जातीय चरित्र प्रकट भेल अछि।किन्तु ई सायास नहि,राजनन्दन जीक व्यक्तिगत अनुभवक अभिव्यक्तिक क्रम मे अनायास भेल बुझाइत अछि। मिथिला संघक मंत्री पद पर अपन निर्वाचनक कथा कहैत ओ लिखए छथि जे, ‘ज्ञातव्य जे एहि सं पूर्व संघक मंत्री कोनो अब्राह्मण नहि भेल छलाह’। ई कथा बाबूसाहेब चौधरीक योगदानक चर्चाक क्रम मे आएल अछि,मिथिला-मैथिल संगठनसभक कारगुजारीक चर्चाक क्रम मे नहि।किन्तु एतबो लिखब कम नहि छै। अहि सभा-समिति-संगठनसभक इएह इतिहास रहल अछि।पांच-सात गो लगुआ-भिरुआ कें जुटाए कए संगठन बनाए लेब,ओहि मे ‘अखिल भारतीय’ शब्द जोड़ि देब आ ओहि मे कोनो गैरमैथिल कें ओहि मे पैसए नहि देब,पैसल त ओकरा पुनकए नहि देब,पैसाएब त ओकरा अपन भरिया वा पचिलगुआ बनाए कए राखब,इएह त होइत रहल अछि। अहि संग्रहक कोनो लेख मे राजनन्दन जी लिखने छथि जे दरभंगाक विद्यापति सेवा संस्थानक संस्थापक मणिपद्म रहथि। आइ अहि संस्थानक की स्थिति छै?एकोहं द्वितियो नास्ति! कहल जाइत अछि जे पटनाक चेतना समिति यात्री जीक परिकल्पना छल—भाषा आ साहित्यक उत्थान लेल।इहो समिति आइ शुद्ध रूप सं मैथिल लोकनिक जातीय संगठन मे तब्दील भए गेल अछि। को बड़ छोट कहऊ अपराधू! ‘विद्यापति स्मृतिपर्वक सूत्रपात’ मे राजनन्दन जी अहि स्मृतिपर्वक शुरुआतक श्रेय नरेन्द्रनाथ दास विद्यालंकार जी कें दए छथि। कतिपय ठाम एकर सूत्रधार कांचीनाथ झा किरण जी कें बताएल जाइत अछि।जे से! ई मैथिल महासभाक भैयारी विवाद भए सकैत अछि,ओएह लोकनि निबटाबथु। आम लोक कें ने एकरा सं कोनो मतलब छै आ ने अहि सं ओकरा कोनो फरक पड़ए छै। महत्वपूर्ण अछि अहि लेख मे व्यक्त राजनन्दन जीक चिन्ता, जे अहि पर्व कें मनैबाक तौर-तरीका सं संबंधित अछि आ सार्वजनिक चिन्ताक विषय अछि। हुनक चिन्ताक सारतत्व ई अछि जे अहि आयोजनसभ मे सभकिछु होइत अछि,बस जिनकर नाम पर होइत अछि,तिनकरे अवदानक कोनो चर्चा समक्ष नहि आबि पाबैत अछि। मैथिली सं जुड़ल के एहन व्यक्ति हएत जे हुनक अहि चिन्ता सं सहमत नहि हएत? किन्तु सोचबाक गप ई छै जे की ई आयोजन विद्यापति कें,हुनक अवदान कें स्मरण करबाक लेल होइ छै वा हुनका विपण्णणक वस्तुक रूप मे प्रस्तुत करबा लेल?एतय त ‘हाथीक दांत देखएबा लेल और,खएबा लेल और’ बला कहबी चरितार्थ भेल छै। नाम विद्यापतिक आ काम व्यक्तिगत विज्ञापन वा अर्थ-संग्रह।तखनि मुश्किल ई छै जे एहन चिन्ता व्यक्त करलाक बादो राजनन्दन जी अहि पैटर्न पर आनो आन कवि,साहित्यकार,गवेषक एवं आन्दोलनकर्ता लोकनिक स्मृतिपर्वक आयोजन करबाक सलाह सेहो दए छथि।विद्यापतिक मूल्य-निर्धारण बंगालक लोकसभ कए चुकल छथि,तें हुनका बेचए मे मैथिल लोकनि कें सुविधा छनि,ग्राहक भेटि जाइत छनि। आनहु कोनो मैथिल महामानव कें तहिना ग्राहक भेटि जएतनि,से के कहत! ‘मिथिलाक अतीत’ मे इतिहास सं सम्बन्धित हुनक चिन्ता अहि शब्द मे व्यक्त भेल अछि—‘सभ सं दुखक कथा जे अद्यावधि मिथिलाक प्रमाणिक ओ निष्पक्ष इतिहास मे अपन पितरक कृतित्वक सही मुल्यांकन उपस्थित नहि भए सकल अछि। अपन अतीतक प्रति एतेक उदासीन भाव अन्यत्र कतहु नहि भेटत’। अहि चिन्ताक क्रम मे ओ सम्पूर्ण भारत मे search for identity (आत्म-परिचिति)क दिशा मे लोकक जागरूकताक चर्चा सेहो करए छथि।ई गप जं गैरमैथिल समाजक लेल कहल गेल रहितए त अही सं शत-प्रतिशत सहमतिक गुंजाइश रहए। पुरोहिती वर्चस्वबला व्यवस्था मे आत्म-विस्मृतिक मारल सर्वहारा गैरमैथिल समुदाय शिक्षा आ शिक्षाजनित चेतनाक अभाव मे अपन इतिहास नहि लिखि सकबाक,अपन पितरलोकनिक पुरुषार्थ आ श्रमजीविताक दस्तावेजीकरण नहि कए सकबाक अपराधी अछि।ई अलग बात जे ओकरासभक अहि अपराधक जिम्मेदारी ओकरासभ कें शिक्षा सं वंचित राखनिहार ब्राह्मणे वर्ग पर अछि। किन्तु जेलोकनि राजनन्दन जीक लेखनक अन्तर्वस्तुक तह मे गेल छथि,तिनका बुझल छनि जे हुनक चिन्ता आ चिन्तनक दायरा मात्र मैथिललोकनि तक सीमित अछि। अहि क्षेत्र विशेषक इतिहास-लेखन दिआ ई नुकाएल गप नहि छै जे अहि क्षेत्रक एकक्षत्र क्षेत्राधिकार मैथिलहि लोकनि हथिअएने रहल छथि,अहि मे मात्र पितरहि लोकनिक गुणगान कएल गेल अछि आ ई गुणगान तहि सीमा तक गेल अछि जे बुद्धि-विवेक सं शुन्य पितरहुं कें पण्डित-महापण्डितक उपाधि सं विभुषित कए देल गेल अछि।इतिहास घटित होइत अछि,निर्देशित नहि।दुर्भाग्यवश मिथिला-मैथिलीक इतिहास-लेखनक नाम पर निर्देशन हाबी रहल अछि आ ई कपोल-कल्पना, मिथक,बनावटी तथ्य आ कालविरोधी कुतर्क आदिक क्षुद्र-समन्वयक फलस्वरूप शुद्ध रूप सं मैथिललोकनिक इतिहास भए गेल अछि।एकर माध्यम सं शेष-समाजक अनदेखी आ मानमर्दनक जे सुनियोजित लिखित षड्यंत्र भेल अछि,से एखनहु चुनौतीहीन अछि, अबाध रूप सं जारी अछि। हं,राजनन्दन जीक अहि वक्तव्य कें कर्ण कायस्थलोकनिक दिस सं छेहा मैथिल-ब्राह्मणीय पितर-पूजनक प्रति दबल स्वरबला प्रतिवाद अवश्य मानल जाए सकैत अछि। अहि प्रतिवादक दोसर रूप हुनक ‘मैथिली मे भ्रष्टाचार’ शीर्षक आलेख मे व्यक्त भेल अछि जेतय ओ महाकवि पंडित लाल दासक रमेश्वरचरित मिथिला रामायणक पुनर्मुद्रण मे डा रामदेव झा द्वारा पोथीक सभटा गूड़ गोबर करबा सं आक्रोषित भए ‘मैथिली मे इतिहास कें अशुद्ध करबाक प्रवृति’ आ ‘इतिहास कें मेटएबाक षड्यन्त्र’ आदिक उल्लेख करए छथि। मैथिलत्वक घटाटोपक बीच सं कर्णत्वक एतबो टा किरिण छटकैत अछि त एकरा भविष्य लेल शुभ लक्षण मानल जएबाक चाही। अहि प्रतिरोधी स्वरक सन्दर्भ मे स्वामी विवेकानन्दक चर्चा करैत चली जे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित एकटा अद्वितीय व्यक्तित्व रहथि जे सनातन धर्मक उदार पक्ष कें जगजियार कएलनि।ओ वैदिक सभ्यताक पैरोकार सेहो रहथि। अहि क्रम मे ओ भारतीय जाति-व्यवस्था सं बहुत ऊपरक व्यक्तित्व भए गेल रहथि। किन्तु अहि देश पर जातिक जे आत्मघाती प्रभाव छै,से हुनको नहि बकसलक। ब्राह्मण लोकनि द्वारा हुनका शुद्र घोषित करबाक गप जखनि हुनक संज्ञान मे अएलनि त हुनका सन वैश्विक व्यक्तित्व कें सेहो स्पष्टीकरण देबए पर मजबूर हुअए पड़ल छलनि।ओहि स्थितिक कल्पना मात्र सं मन उद्वेलनक पराकाष्ठा पर चलि जाइत अछि जे एकटा संन्यासी जे घर-परिवार सं विमुख भए विश्व-मानव बनि गेल छला,तिनका ब्राह्मणलोकनिक एकटा क्षुद्र टिप्पणीक कारण अपन वैश्विकता कें कात राखि जाति-व्यवस्थाक रौरव नरक मे घुरि अपन जन्मना जातिक उच्चताक गप कहए पड़लनि। हुनक कहब रहनि—“ओ लोकनि हमरा शुद्र कहए छथि आ ललकारि कए पुछए छथि जे शुद्र कें संन्यासी हएबाक की अधिकार अछि? हमर उत्तर अछि जे हमर उत्पत्ति ओहि पुरुष सं अछि,जिनकर चरण पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’ कहैत पुष्पांजलि समर्पित करैत अछि आ जिनकर वंशज अतिशुद्ध क्षत्रिय छथि ……”।रामदेव झाक करतूत पर राजनन्दन जी द्वारा कएल उपरोक्त टिप्पणीक माध्यम सं इतिहास स्वयं कें दोहरएलक अछि।एतय स्वामी विवेकानन्दक एकटा रोचक टिप्पणीक उल्लेख करबाक इच्छा कें नहि रोकि पाबि रहल छी जे ओ अपन एकटा शिष्यक ‘केकरो छुअल अन्न खएबाक’ जिज्ञासाक प्रत्युत्तर मे कएने रहथि। स्वामी जी अहि सन्दर्भ मे आन-आन बात कहबाक संग व्यंग्यात्मक आक्रोष मे ईहो कहने रहथि—‘कलकता मे जाति-विचार त और मजेदार अछि।देखल जाइत अछि जे अनेक ब्राह्मण आ कायस्थ होटलसभ मे भात खाए रहल छथि,किन्तु ओलोकनि होटल सं बाहर निकलि समाजक नेता बनि रहल छथि,वएह लोकनि दोसरसभक लेल जाति-विचार तथा अन्न-विचारक नियम बनबए छथि। हमर कहब अछि जे की समाज कें ओहि पाखंडीसभक बनाएल नियमक अनुसार चलबाक चाही?’ ‘मैथिली बनाम हिन्दी:बदलैत सन्दर्भ’ मे हिन्दीक प्रति हुनक व्यावहारिक आ पुर्वाग्रहमुक्त दृष्टिकोण समक्ष आएल अछि।एतय ओ किरण जीक ‘हिन्दी कुलच्छिनी कें झाड़ू मारि भगएबाक’ प्रतिक्रियावादिता सं दूर छथि। प्रायः एकर कारण ई जे ओ हिन्दीक शक्ति-सामर्थ्य कें बुझए छथि आ अहि भाषाक लाभक भुक्तभोगी रहल छथि।ओहुना कोनो भाषा कोनो भाषाक शत्रु नहि होइत अछि आ इहो बहुत साफ छै जे हिन्दीक विरोध मैथिली सं जुड़ल ओहने तत्व द्वारा भेल अछि जे हीनभावना सं ग्रसित छथि आ हिन्दी मे शुद्ध-शुद्ध दू पंक्ति नहि लिखि सकए छथि। हिन्दी-विरोधी स्वघोषित मैथिली-हितकारी लोकनिक समाजक बीच रहि एहन बौद्धिक साहसक प्रदर्शन लेल राजनन्दन जीक प्रशंसा हएबाक चाही। ‘मैथिलत्वक बोध’ आलेख महासभाइ मानसिकताक उपज अछि। ‘मैथिलत्वक बोध नहि भेने दृष्टिकोण व्यापक नहि भए सकैछ आ हमरालोकनि अपन विभूति,संत ओ मनीषी कें चिन्हि नहि सकैत छी’ सन टिप्पणी सं सहमत हएब कोनो गैरमैथिल लेल संभव नहि अछि।बल्कि अधिकांश प्रगतिशील मैथिलहुं अहि दृष्टि-संकोचक पक्षधर नहि भए सकता।ई मैथिलत्व बोधहि अछि जे मैथिली साहित्य कें नचारी-जगतक मध्ययुगीन भूलभुलैया मे भटकाए रहल अछि आ एकरा आधुनिकता-बोध सं कतिअएने रहल अछि। अहि तथ्य कें प्रमाणक बेगरता नहि छै जे जेलोकनि अहि मैथिलत्व-बोधक प्रतिगामी मार्ग छोड़लनि,वएह लोकनि आन भाषा-साहित्यक समकक्ष अपन रचना कें ठाढ कए सकला अछि। ‘मैथिलीक विरुद्ध कुचक्र’ अन्हार घर मे सांपे-सांप बला फकरा कें प्रमाणित करैत अछि।पहिनहि लिखि चुकल छी जे कट्टरता आत्मनिरीक्षणक पद्धति कें स्वीकार नहि करैत अछि आ अपन क्षुद्रता,अपन निर्बलताक लेल कोनो आन कें दोषी ठहराबैत अछि आ से दोषी प्रत्यक्ष नहि हुअए त काल्पनिक शत्रु कें ठाढ करैत अछि।एतहु दरभंगा आकाशवाणी द्वारा सीतामढी,समस्तीपुर तथा बेगुसराय कें मैथिली भाषी क्षेत्र सं अलग कए देबाक निर्णय पर रोदना ठानल गेल अछि आ तहि लेल मिथिला मैथिलीक विरुद्ध षड्यंत्रक इतिहासक बड़ पुरान हेबाक दोहाइ देल गेल अछि।प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शत्रुसभ कें दोषारोपी बनैबाक जे मैथिल परिपाटी रहल अछि,तेकर पालन सेहो कएल गेल अछि।एतय स्वाभाविक रूप सं ई प्रश्न उठैत अछि जे अपन पुरोहिती गुमान आ नव-नव यजमनिकाक खोज आ निर्माणक क्रम मे अहां मिथिला नामक मिथकीय भूखण्ड कें वर्त्तमान मे उपस्थित कए एकर अन्तर्गत भारत-भूमिक अनेकानेक क्षेत्रक संग नेपालक नमहर भूभाग कें सम्मिलित कए लेलिअए। ठीक छै! वर्त्तमान लोकतंत्रीय भारत मे स्वयं कें धर्म-संस्कृति-व्यवस्थाक स्वघोषित ठेकेदार मानि अहां कें राजतंत्रीय संस्कृतिक खेलौर करबाक अछि,त करू।किन्तु अजुका सजग-सचेत भेल समाज कें मध्ययुगीन मानसिकताबला मुर्ख मानि ओकरासभ सं अपन प्रपंच-कर्मक शब्दसः सम्पुष्टिक अपेक्षाक भ्रम किऐ अछि अहां कें? हिन्दीबला जखनि मैथिली कें हिन्दीक उपभाषा कहैत अछि,त अहांक मगज टीकासन धरि लैत अछि।किन्तु अंगिका,बज्जिका,मगही आदि कें मैथिलीक उपभाषा घोषित करैत काल अपन मैथिलत्वक अहं मे ई बिसरि जाइ छिअए जे अहांक अहि मारण-मंत्रोच्चार सं हुनकोसभक पित्त लहरि जाइत हेतनि। अहां अपन इतिहास कें षड्यंत्र-कुचक्र-प्रपंच-छल-छद्मक रोशनाइ सं लिखि स्वयं अपनहि लिखल सं भ्रमित होउ। ठीक छै! आन लोक जं ओकर वस्तुसत्य जानि ओहि कुचालि मे फंसए सं नठए छथि त हुनकासभ पर कुचक्रक दोष देब कतहु सं उचित नहि अछि।कोनो तर्कक आधारभूमि जं यथार्थ पर टिकल नहि हुअए त ओ कुतर्कक श्रेणीक वस्तु थिक।प्रत्येक इलाका सं दू-एक टा मैथिली लेखकक नाम गिनएने सं ने ओ क्षेत्र मैथिलीभाषी भए जाइ छै आ ने ओ मिथिलाक क्षेत्रांतर्गत आबि त्रेतायुग मे घुरिकए स्थापित भए जाइ छै।कलकत्ता त मैथिलीक लेल खूब गतिशील क्षेत्र रहल अछि,आधुनिक विकासक क्रम मे मारिते रास मैथिलीभाषी लोक देशक आनहु-आन विभिन्न क्षेत्रक रहवासी भए गेला अछि आ तें पटना,दिल्ली,मुम्बई,हैदराबाद आदि अनेक नगर-महानगर मे दू-एक टा मैथिलीक लेखक छथि।तेंकि ई सभटा इलाका मैथिलीभाषी आ मिथिला नामक मृत-प्रदेशक यमशासित क्षेत्रांतर्गत भए गेलए? लेखनक अहि अतिवाद सं बचबाक चाही। अहि सं लेखक विवादग्रस्त भए चर्चाक केन्द्र मे आबि सकैत अछि किन्तु ई अतिवाद भाषाक लेल बहुत घातक अछि। ‘बहुतो संघर्ष आ प्रयासक पश्चात बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा मे एक ऐच्छिक विषयक रूप मे मान्यता प्राप्त भेलैक।जकर प्रतिफल ई भेल जे शताधिक मैथिलीभाषी प्रत्याशी सरकारी नौकरी मे परीक्षा पास कए पदासीन भेलाह।एहि मे अधिकांशतः पछुआएले जाति तथा जन-बोनिहार वर्गक परिवार सं आयल शिक्षित युवक-युवती लाभान्वित होइत गेलीह।‘ 1998 ई मे लिखल ई टिप्पणी ‘केन्द्र सरकार ओ मैथिली’ शीर्षक लेख मे आएल अछि। अहि टिप्पणीक पक्ष मे कोनो आंकड़ा देबाक आवश्यकता नहि बुझल गेल अछि।एहन कोनो आंकड़ा अछिओ नहि।यथार्थ सेहो नहि।सत्य ई छै जे बिहार लोक सेवा आयोग मे मैथिलीक रहला सं मात्र मैथिल लोकनि लाभान्वित भेला अछि।पछुआएल जाति आ जन-बोनिहारक बेटा-बेटीक लाभान्वित हएबाक गप मात्र सरकार कें भ्रमित करबाक लेल कहल गेल अछि।मैथिलीए किऐ,आन-आन भाषा सेहो लोक सेवा आयोगक विषय बनए आ विभिन्न भाषाभाषी अहि सं लाभान्वित होथि,से के नहि चाहत।किन्तु तहि लेल अहि तरहक असत्य आ अपुष्ट सांख्यिकीक दुरुपयोग हुअए,से किनकहु स्वीकार नहि भए सकैत अछि। ‘संविधान मे मैथिलीक प्रवेश’ लेख मे राजनन्दन जी संविधानक आठम अनुसू्ची मे मैथिलीक अएबा सं अत्यधिक भावविभोर भेल छथि आ एकर आठ गो लाभ गिनबैत लाभ संख्यां-3 मे कहए छथि—‘मिथिलांचल आब अहिन्दीभाषी क्षेत्र मानल जाएत तथा एहि अंचलक लोक हिन्दी नहि,मैथिली भाषी मानल जयताह।‘ई रुमानी सोचक पराकाष्ठा छिअए। यथार्थविरहित यथार्थ एकरे कहल जाइ छै। एतबे नहि,लेखक अंत मे ओ दूटा निवेदन करए छथि,जहि मे निवेदन संख्या-1 अछि – ‘मैथिलीभाषी आबहु हीन भावना सं मुक्त होथि तथा अपना कें मैथिलीभाषी तथा मैथिल कहैबा मे गौरवक बोध करथि’।ई केहन निवेदन अछि जे हीन भावना सं मुक्त हएबाक गप करैत अछि आ हीनता दिस जएबाक आग्रह करैत अछि! मैथिलीभाषी कें मैथिलीभाषी कहैबा/कहबा मे की आपत्ति भए सकैत अछि?किन्तु युग-युग सं श्रम आ पौरुषक बल पर अपन जिनगीक गाथा गढनिहार लोकनि अपन मस्तक पर दक्षिणाजीविता आ पराश्रयताक समानार्थी बनल शब्द ‘मैथिल’ लिखाएब/लिखब कें स्वीकार किऐ करता? अपन भुजदण्डक सामर्थ्य पर आस्था राखनिहार श्रमजीवी पुरुष भूखल नहि रहि सकैत अछि आ जं दुर्भाग्यवश एहन कोनो स्थिति आबियो जाएत त ओ भूख सं मरि जाएत,याचना करब वा भीख मांगब कबूल नहि करत। राजनन्दन जीक मानस पर कलकत्ताक स्वार्थपोषित आन्दोलनी गतिविधि आ ओकर नाराबाजी सभक तेहन प्रभाव पड़ल छनि जे ओ समस्यासभ कें चिन्हितहु ओकर समाधान लेल गगनविहारिताक मार्ग पकड़ि लए छथि,एकदम रूमानी खयालक दुनियां मे चलि जाइ छथि।‘मिथिला-मैथिलीक विकासक प्रश्न’ लेख मे ‘मिथिला मूलतः कृषि प्रधान क्षेत्र रहल अछि।रौदी,दाही,बाढि आदिक प्रकोप सं त्रस्त। आमलोक सामंती व्यवस्था मे शोषणक शिकार रहबे कएल अछि। अन्न-वस्त्र विहीन,दारिद्र्य,अशिक्षा,रोगग्रस्त जीवन मे एकोपल सुख-चैन सं रहबाक स्थिति नहि भेलैक।भय सं त्रस्त,आंखिक नोर कहियो सुखैलैक नहि।…..आइयो स्थिति अनुकूल नहि अछि……ओहिना रौदी,दाही,बाढि,बिजलीक अभाव,बाट-घाटक अभाव,जीवाक हेतु शुद्ध विकार विहीन जलक अभाव,शिक्षाक हेतु विद्यालयक सुविधा, चिकित्साक हेतु डाक्टर,अस्पताल दवाई-विरोधक अभाव आदि,आदि।‘ सन जमीनी वास्तविकताक विवरण लिखनिहार राजनन्दन जी अहिसभक समाधान लेल ‘चेतना समिति,पटना’ सन संस्थाक सक्रियताक कामना करए छथि। ओ लिखय छथि—‘हमरा जनैत चेतना समिति,पटना सन एनजीओ (NGO) संस्था एहि दिशा मे जं क्रियाशील हो त काज किछु भए सकैत अछि’। चेतना समितिक अचेतना, सुप्त-चेतना दिआ किनका नहि बूझल छनि।भाषा-साहित्यक उन्नयन लेल बनल ई संस्था शुद्ध रूप सं जातीय संगठन आ जातिअहुक एकटा गुट-विशेषक रखनी जकां भेल अछि,जेकरा ने लोकतंत्री-पद्धति पर विश्वास छै आ ने गैर-मैथिलक चिन्ता।जे अपन ढेके सम्हारए मे अपस्यांत अछि,ओ आन लेल शमियाना आ दरी-जाजिम बिछाएत,ई अपेक्षा कोनो होशगर लोक केना करत? जाधरि हम राजनन्दन लाल दास जी कें मात्र ‘कर्णामृतक सम्पादक’ रूप मे देखैत रहलियनि,हमर मन मे हुनकर छवि एकटा कद्दावर साहित्य-सेवी,अल्पायु होइत मैथिली पत्रिकासभक बीच मे ‘कर्णामृत’ कें अपन श्रम आ समर्पणक बदौलत दीर्घजीवन देनिहार एकटा मिशनरी व्यक्तिक बनल रहल। हुनक सम्पादकीय आ अन्य लेखादिक संग्रह ‘चित्रा-विचित्रा’ कें समग्रता मे देखि/पढि हुनक ओ पूर्व छवि खण्डित होइत अछि।तीन मास पर हुनक सम्पादकीय पढबाक क्रम मे कथनसभक पुनरावृति, परम्परा-पोषणक भाव,पाखण्डसभक अंध-संपुष्टि आदिक आभास नहि होइत रहए,जे अहि संग्रहक समग्र अवलोकनक क्रम मे भेल अछि।सम्पूर्ण संग्रह मे मिथिला-मैथिल-मैथिलत्व आदि शब्दक ततेक बेर प्रयोग भेल अछि जे मन एकदम सं खिन्न आ उचाट जकां भए जाइत अछि। पौराणिक पात्र ‘मिथि’क मिथकीय कथा मन पड़ैत अछि,जाहि मे मृत निमिक देह कें ॠषिगण (जे ब्राह्मणे होइत छला) द्वारा मथल गेलाक उपरांत मिथिक प्राकट्य होइत अछि।कथाक अनुसार इएह ‘मिथि’क नाम पर ‘मिथिला’ संज्ञाक उद्भव भेल।ब्राह्मण द्वारा मथल अर्थात ब्राह्मण द्वारा जनित। अजुका युगक कोनो प्रचंड मुर्खहु कें बुझल छै जे कोनो मृत देह कें कतबो मथल जाइ,ओहि सं कोनो जीवित शरीर ठाढ नहि कएल जाए सकैत अछि,चाहे मथनिहार ब्राह्मण हुअए, शुद्र हुअए वा साक्षात अवतरित भेल कोनो विधाता।शाश्वत सत्य छै जे मृत व्यक्ति फेर सं नहि जीबैछ,बीतल राति फेर सं नहि आबैछ आ विगत उच्छ्वास फेर सं नहि घुरैछ। अहि स्थिति मे मनु महाराज द्वारा ‘विदेह’क जे अर्थ देल गेल अछि,से बेसी उपयुक्त आ समीचीन बुझाइत अछि।मनुस्मृतिक अनुसार ब्राह्मण पिता आ वैश्य स्त्री सं उत्पन्न संतान ‘विदेह’ अछि।एतय विदेह शब्दक व्याख्या करब वा ओकर उत्पत्तिक स्रोत खोजब उद्देश्य नहि अछि।एतय मात्र अहि सन्दर्भक चर्चा करब अछि जे पौराणिकताक प्रति अंधताक हद तक जाइत मैथिल-आग्रह हुनकासभ सं ओएहसभ करबा रहल अछि जे पुराणादि मे भेल अछि। ओसभ मानि लेने छथि जे बेर-बेर मथला सं, बेर-बेर गीजला सं मृत देह,मृत विचार,मृत राज्य आदि-इत्यादि कें पुनर्जीवित कएल जाए सकैत अछि। ई भने सायास नहि हुअए,संगतिक प्रभाव सं हुअए,राजनन्दन जीक मानस पर तेकर असर छनि।गोएबल्सक संगति मे रहनिहार हिटलर-दल सेहो एहने प्रभाव मे पड़ल रहए।परिणति की भेलए,से सभ कें बूझल छै। अहि संग्रहक पाठ-यात्रा करैत,एकर आलेखसभ पर नजरि खिरएलाक बाद निष्कर्षतः ई कहि सकए छी जे राजनन्दन जीक आलेख-संग्रह कें साहित्यिक कृति मानला सं अनेक रास विवाद भए सकैत अछि, अहि पर तथ्यमूलक टिप्पणी करबाक परिणामस्वरूप अप्रिय स्थिति बनि सकैत अछि,एकर लोकपक्षी समालोचना सं पुरोहित समुदायक आबालवृद्धलोकनि क्रुद्ध भए गारि-सराप पर उतरि सकए छथि। तें ‘चित्रा-विचित्रा’ कें आन्दोलनजीवी लोकनिक प्रचार-साहित्य/प्रोपगण्डा लिटरेचर मानि लेब सभ सं सुरक्षित विकल्प अछि। हं, ई कहबा/मानबा मे कोनो संकोच नहि जे मैथिलवादी-गिरोह द्वारा अपन एजेण्डाक क्रियान्वयन लेल समय-समय पर की-की अनर्गल प्रचारित कएल गेल आ तेकर प्रभाव मे आबि पढलो-लिखल समाज केना भ्रमित भेल,तेकर अधिकांश कें समग्रता मे जानबाक-बुझबाक लेल ‘चित्रा-विचित्रा’ बहुत उपयोगी संग्रह अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विजय इस्सर"वत्स" विभूति संग प्रतिभूति -स्व०राजनंन्दन लाल दास जी
चारि जुलाई (०४-०७-२०२१) कँ समस्त मैथिल समाज शोक संतप्त छल।लगै छलै जेना मैथिलीक कोनों अमुल्य धरोहरक लोप भ' गेल हो। देश-विदेशक प्रत्येक मिथिला-मैथिली सेवी क आँखि सँ अश्रुपात होइत छल।मुदा सभ कियो विवश आ किंकर्तव्यविमूढ़ छलाह ओहिना जेना कोनो परिवारक सभ सँ सुपात्र कमौआ पूतक परल लहास पर संपूर्ण परिवार विवश भेल हकानैत हो। मुदा विधिक विधान, मृत्यु निश्चित, से मृत्यु मिथिला विभूति राजनंदन लाल दासजी कें वरण क लेल।ओ सदेह हमरा सभक बीच नहि रहलाह मुदा हुनक यशोकृति , मैथिलीक प्रति हुनककर प्रेम आ प्रतिबद्धता, अंतिम स्वांस धरि सेवा भाव आ हुनक अपन समाज - मातृभाषा के प्रति निष्कपट सहज भाव मिथिला-मैथिली केनिहार लोकक लेल पाथेय बनल रहत ई हमर दृढ़ विश्वास।
बिना माउसक ठठरी सन सताशी (८७)सालक बूढ़ जर जर देह नेने दास जी अंतिम समय धरि अपन मातृभाषाक प्रेम मे एना मगन छलाह जेना कोनो शिषु अपन माएक कोर मे दुनियाक सब सँ पैग आनंदक अनुभूति करैत अछि।ओ जखन किनको सँ बात करैत छलाह त बस मैथिलीक मादे आ ने त हुनके संपादकीय मे ३९ साल सँ बहराइत प्रतिष्ठित मैथिली त्रैमासिक पत्रिका कर्णामृतक संबंध मे। हुनक सहज आ सरल व्यक्तित्व सँ समस्त मैथिल समाज प्रभावित होइत छलथि।दास जी के मिथिलाक दधिचि पुरुष कहब कोनों अतिशयोक्ति नहि।
दास जी'क आजीवन अवदान सर्वविदित अछि।ओ लेखा जोखा (Data)एतय हम नैं राखब मुदा एक बात विशेष प्रभावित करैछ जे राजनंदन लाल दास जी १९६० ईस्वी मे को०वि०विद्यालय सँ राजनीति शास्त्र मे एम० ए० केने छलाह तैयो हुनक जीवन मे राजनीतिक प्रपंच अदृश्य छल। जहन कि बेसी भाग सभा सोसायटी राजनीतिक कठपुतरी बनि नचैत अछि।ओ मिथिला मैथिलीक सेनानी नैँ एहि कालखंडक नायक छलाह।
हमरा मोन परैछ करीब दश-पंद्रह वरष पूर्व परमादरणीय स्व०दयानाथ झा (कक्का जी) हैदराबाद सँ आएल छलथि ऊत्तरपारा ,जतय ओ कैएक दशक सँ रहैत कलकत्ता के मैथिली के ऊर्जान्वित करैत छलाह।हुनक स्नेह हमरा ऊपर रहैत छल।एक दिन हमर कुटिया पर एलनि।भोजन भात भेलैक।समय छलै हमहूँ छुट्टी लेने छलहुं।ओ अपन इच्छा प्रकाश केलनि जे कने राजनंदन लाल दास जी सँ भेंट करबाक अछि तों जँ कने नेने चलितह।हम कहलियनि किएक नैं चलूं।हम दूनू गोटे दासजी के आवास पर गेल छलहुँ।खूब आनंदित छलाह मिलि क' एक दोसर सँ दुन्नु गोटें।हमहूँ मस्त छलहुँ ओहिना जेना डाढ़ि पर दू गुलाबक बीच में कोनो अकिंचन काँट मस्त रहैत छै स्थितिक लेल।ताधरि हमहुँ गीत नादक बहन्ने अपन परिचिति कलकतिया मैथिलीक बीच बना लेने छलहुँ।दास जी केँ हम पहिनहुँ बहुतो मंच के शोभित करैत देखने छलियनि।ओहो हमरा चिंहैत छलाह।कुशल क्षेम पहिनहुँ सँ होइत छल।मुदा बैस के बतियानक सुजोग कहियो नैं भेटल छल।ओहि दिन दास जी हमरो सँ बड रास बात सभ कहलनि सुनलनि।आइयो मोन अछि ओ कहने छलाह विद्यापति गीतक स्वरलिपि पर काज अरब अति आवश्यक।हुनके मुँहें सुनने छलहुँ महान संगीतज्ञ-गायक पं० विश्वनाथ मिश्रक व्यक्तित्व आ कृतित्वक बखान। बहुत रास इच्छा छलनि करबाक मैथिली साहित्य आ संगीतक काज। आब ओ कार्यकर्ता नहि रहलाह मुदा कार्यकर्ताक प्रेरणा श्रोत बनि जीवैत रहता सदैव।
हम नमन करैत छी ओहि पटोरी,पँचगछिया,सहरसाक(मातृक) माटि के जतय ओ जन्म लेलाह।हमर सादर नमन माता-स्व०विद्या देवी, पिता-स्व०मनीलाल दास,गोगौन, घनश्यामपुर दरभंगा (पैतृक गाम) के जिनका कूल मे आबि ओ धन्य केला।हम मनन करैत छी ०५-जनवरी १९३४(जन्मदिन) पावन दिन के जे मिथिला मे बेर बेर एहने दिन आबौ।हम प्रणाम करैत छी अखिल भारतीय मिथिला संघ, मिथिला संग्राम समिति आ मिथिला दर्शनक सचिव केँ।हमर प्रणाम संतो (क्रांतिकारी नाटक,), चित्रा-विचित्रा(निबंध संग्रह)आ डा०प्रबोध नारायण सिंह(विनिबंध)के यशस्वी लेखक केँ।हमर शत् शत् नमन आखर आ कर्णामृतक ओ अमर प्रकाशक-संपादक केँ।
स्व०राजनंदन लाल दास जी मिथिला मैथिलक विभूति संग प्रतिभूति छलाह,ओ मिथिला- मैथिलीक धरोहर-शाख-पत्र छलाह,ओ प्रतिबद्धताक प्रतिमूर्ति छलाह,ओ मैथिलीक सपूत आ संरक्षक छलाह।सादर नमनशत् शत् नमन अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। शिव शंकर श्रीनिवास राजनन्दन लालदासक नाटक शैलेन्द्र मिश्र राजनन्दन लाल दास : मिथिला-मैथिलीक एकटा निष्काम योगी आ योद्धा कोनो समाज कतेक जागृत अछि ओकर अनुमान ओइ समाज द्वारा अपन नायकक प्रति सम्मान आ उद्गारसँ पता लगायल जा सकैया । हमरा लेल चुनौतीक संग ई गौरवक बात अछि जे हम मैथिली साहित्य ,भाषा ओ संस्कृति के एहेन योद्धा के लेल आलेख लिख रहल छी जिनकर मूल्यांकन एखन धरि नै भेल अछि । हम बात कऽ रहल छी स्व. राजनंदन लाल दास जीक जिनका सन-सन महापुरुषक लेल विदेहक अइ अभियान के हम स्वागत करैत छी आ संग पुरि रहल छी । वस्तुतः ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै कियाक त हिनकर रचना सभ आ पोथी सभ सर्वसुलभ नै छै तथापि जएह किछु स्रोत हमरा भेट सकल तकर आधार पर हम एकटा प्रयास क रहल छी । हिनका सन मातृभाषा –प्रेमी शायद बहुत कम देखबा मे आबि रहल अछि आ सच कही तँ सम्पूर्ण मैथिल समाज में सर्वकालिक रूपसँ सेहो कम्मे भेटत । चालीस बर्ख धरि ‘कर्णामृत’ पत्रिकाक सम्पादन निश्चित रूपसँ दासजीक आत्मबल ओ दृढ़ विचारक हेबाक परिचायक अछि विशेषक मैथिली एहन भाषाक लेल जतय अधिकांश पत्रिका अल्पायु रहैत अछि आ किछु अंक निकलबाक बाद बंद भऽ जाइ छै । ‘कर्णामृत’ पत्रिका जाति विशेषक नाम पर रहितो ओ सभक लेल अछि, सम्पूर्ण मिथिलाक पत्रिका अछि । जाति –संप्रदाय से बढि के मैथिली साहित्य ,भाषा ओ सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार आ नब पौध के प्रेरणा –प्रोत्साहन, प्रशिक्षण आ एकटा दृष्टि देबय मे अपन सम्पूर्ण जीवन के माँ मैथिली के समर्पित कऽ देलथि । आरंभिक कालहिसँ राजनन्दन लाल दास एकटा एहन प्लेटफॉर्म तकैत रहथि जत’सँ मैथिली -मिथिला के लेल ओ वृहत्तर काज कऽ सकथि । हुनकहि शब्द मे –“हमरा एकटा मंचक प्रयोजन छल जतय हम निर्विघ्न बिना कोनो तिकड़मक काज कऽ सकी । सन 1973 ईस्वी में कर्णगोष्ठीक स्थापना भेल । मुदा संस्थाक कतिपय सदस्यक रूढ़िवादी विचार हमरा असह्य छल । तैं, हम ओहि संस्थासँ अलग रही । सन 1981 ईस्वी में कर्णगोष्ठीक एक बैसक में कर्णामृत नामक त्रैमासिक पत्रिकाक निर्णय भेलैक । एकर पंजीकृत संपादक ओ प्रकाशक भेलाह श्री अर्जुन लाल कर्ण, स्वामीत्व रहलैक कर्णगोष्ठीक । पत्रिकाक संपादनक भार हमरा कान्ह पर आबि गेल।" ई चालीस बर्ख धरि ‘कर्णामृत’क माध्यमे मातृभाषा संबंधी काज करैत रहलाह । एकर संपादकीय मे साहित्यिक चर्चा –परिचर्चासँ लऽ कऽ मैथिली भाषा आ पृथक मिथिला राज्यक निर्माण हेतु सभ बात भेट जायत । यदि मात्र हुनकर 41 वर्खक संपादकीय के पुस्तकाकार कयल जाय त विगत चारि दशकक मैथिली –मिथिला सं सम्बन्धित सब महत्वपूर्ण बातक लेखा –जोखा भेट जायत । आइ काल्हि एकटा बड़का भारी समस्या छै जे बहुतों लोक मैथिली साहित्य आ भाषा के लऽ कऽ हीन भावना सँ पीड़ित रहैत छथि हुनका मैथिलीक सामर्थ्यवान साहित्य आकि भाषा मानवा में कठिनाइ होइत छैन्ह । राजनन्दन लाल दासजीकेँ अपना भाषा आ साहित्य पर गर्व छलनि जकर ओ मुक्तभावसँ व्यक्त करैत रहलाह । हुनकहि शब्द में “ मैथिली अपनहि संतान द्वारा अबडेरल रहल अछि । आइ त’ स्थिति बेसी दुर्भाग्यपूर्ण अछि । तथाकथित शिक्षित समुदाय, ताहि में किछु अखरकटुए कियैक ने होथि, मैथिली बाजबा में हीनताक बोध करैत छथि । मैथिली पत्र-पत्रिका तथा पुस्तकक स्तरीयताक प्रति हीन भावना पोसने छथि आ से मात्र अज्ञानतावश । मैथिलीक वर्तमान काव्य साहित्य तथा नाटक भारतक कोनो समृद्ध भाषा-साहित्यक समकक्ष ठाढ़ हेबाक सामर्थ्य राखैत अछि । राजनैतिक समर्थन तथा सहयोगक अभाव रहितहुं, मैथिली साहित्यक विकास अवरुद्ध नहि भेल अछि।“ (संपादकीय, कर्णामृत जनवरी-मार्च 2003)। दासजी में सबसे जे नीक बात छलनि ओ कोनो बातक विश्लेषण योगदान आ गुणवत्ताक आधार पर करैत छलखिन्ह, अपन विचार गोल –मोल आ घुरियायाल नै राखि सोझ आ स्पष्ट रूपसँ रखैत रहलाह बिना कोनो परिणामक फिकीर केने कियाक त ओ चीप पॉपुलरिटी में विश्वास नै रखैत छलाह आ झूठक विरुद्ध अपन विचार खुलि के रखैत छलाह । हुनकर मत छलनि जे महापुरुष मैथिली मिथिलाक लेल जमीन पर ठोस काज केलथि हुनकर जयंती मनाओल जेबयाक चाही नहि की कोनो एहन प्रभावशाली व्यक्ति के जे खाली हाब-डीव करैत रहलाह । मैथिली भाषाक बिहार सरकार द्वारा लगातार उपेक्षा से ओ एकदम उद्वेलित रहैत छलथि आ कतेको अवसर पर बिहार सरकारक द्वेषपूर्ण व्यवहारक बारे मे अपन बिचार प्रस्तुत करैत रहलाह । कर्णामृतक अक्टूबर-दिसंबर 2017 के अपन संपादकीय में लिखने छथि –“मैथिली सेवी संस्था द्वारा अपन कार्यक्रममे मैथिलीक अस्मिताक रक्षा हेतु आक्रोशपूर्ण भाषण देल जाइत रहल अछि । बिहार सरकार मैथिलीकें संग सतौत व्यवहार करैत रहल अछि ।मैथिलीकें शिक्षाक माध्यम नै बनबैत अछि आ नै मैथिलीकें बिहारक दोसर राजभाषाक दर्जा दैत अछि । बरोबरि एहि लेल मांग राखल जाइत रहल अछि ।“ श्री अंजय चौधरी अपन पोस्ट में लिखने छैथ जे हुनका सम्बन्ध में समीचीन अछि –“भोला लाल दास, राजेश्वर झा ओ मुंशी रघुनन्दन दास तीनू महानक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक संपादक, प्रबोध बाबू पर विनिबंध लेखक, चारि दशक में अविस्मरणीय अवदान, कुशल प्रबंधक, विलक्षण प्रशासक ओ व्यवस्थित कर्मयोगी रहथि।“कर्णामृतक माध्यमसँ दास जी नवोदित प्रतिभा के प्रोत्साहित करैत रहलाह जाहिसँ ओ सभ आइ लिख रहल छथि , अइ बातसँ ई बात प्रमाणित भऽ जाइत अछि जे ओ मैथिली भाषा आ साहित्यक भविष्यक लेल सदति चिंतित रहैत छलाह । दासजी अइ बात के स्पष्ट रूपसँ बुझैत छलथि जे बिना बिहार सरकार द्वारा सरकारी मान्यता के आ शिक्षा में शामिल केने भाषाके विकास भेनाइ संभव नै छै । जनवरी –मार्च 2016 क अंक में हुनका द्वारा ई बात के उठायल गेल छल जे मैथिली के प्राथमिक कक्षासँ उच्च माध्यमिक धरि शिक्षाक माध्यम हएब अति आवश्यक अछि । आ से समाज मे ओहि वर्गक हेतु जे पछुआएल अछि जेना दलित, महादलित ताहूमे जे सभ ग्राम- घरमे बास करैत छथि । दोसर मैथिलीकें बिहारक द्वितीय राजभाषा घोषित करब । अंत में इएह कहि सकैत छी जे राजनन्दन लाल दासजी माँ मैथिली के एकटा सुयोग्य संतान छलथि जे व्यक्तिगत जीवन में विषमता रहितो मिथिला भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक सेवा अपन जीवनक अंतिम क्षण तक करैत रहलाह । हुनकर ई अतुलनीय अवदान अबै बला कतेको पीढ़ी के प्रेरणा दैत रहतै । हुनकर विचार,साहित्य आ काज के प्रचार-प्रसार केनाइ हुनका प्रति श्रद्धांजलि हेतै । हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे हम सभ हुनकर अप्रतिम योगदान के सदैव मोन राखब । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष नीरज राजनंदन लाल दास
5 जनवरी 1934 के दिन छल, मातृक पटोरी में लेलैथ अवतार। दरभंगा के गोनौन पैतृक गाम भेल, राजनंदन बाबू करु नमन स्वीकार।।
एम.ए केलंहु अहां राजनीति शास्त्र मे मुदा रहल अपनेक लेखन सऽ सरोकार 1967 में " आखर " पत्रिका सऽ, शुरू केलंहु प्रकाशक के कार्यभार।।
1981 सऽ कर्णामृतक संपादन द्वारा, केलंहु मैथिली साहित्य के एकत्र। सहस्त्रों लेखक एवं कवि के प्रवर्तक, कर्णामृत भ गेल प्रसिद्ध सर्वत्र।।
अभामिस के सचिव रहलंहु अहां, अनेको संस्था देलक अहांके सम्मान। केकेएम के द्वारा "कर्ण श्री" भेटल, सम्पूर्ण मिथिला करैत अछि गुणगान।
मिथिला-मैथिली के अनन्य सेवक के, नमन करैत झुका रहल छी हम माथा। राजनंदन बाबू अहा़ं महापुरुष छी, सदा अमर रहत अहांके गाथा।।
चार्टर्ड एकाउंटेंट राष्ट्रीय महासचिव, कर्ण कायस्थ महासभा(के के एम) गाम: सरहद, मधुबनी वर्तमान शहर : दिल्ली मोबाइल: 9650333560 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी साहित्यिक जातिवादी सीमा तोड़लनि राजनन्दन जी आशीष अनचिन्हार जातिवादी राजनंदन लाल दास बनाम दूधसँ धोल आन लोक (एहि लेखमे राजनंदनजी आ कर्णामृतक अतिरिक्त आन संदर्भक प्रयोग मात्र उदाहरण लेल आ वर्तमान समयकेँ बेसी स्पष्ट करबाक लेल अछि। एकर अतिरिक्त एहि उदाहरण सभहक कोनो आन अर्थ नै) मैथिलीमे प्रगतिशील मूल्यबोध, मानवीय गुण आ वैचारिकतासँ भरल एकटा पत्रिका अछि "अंतिका" जकर संपादक छथि गौरीनाथ (मैथिलीमे गौरीनाथजीक पहिलुक नाम अनलकांत छलनि)। अंतिका केर पाठक सेहो एहि पत्रिकाक प्रगतिशीलताक वंदना करै छथि। मुदा जखन गौरसँ देखबै तँ अंतिकाक अधिकांश अंकमे "भाजपा सरकार" केर विज्ञापन देखाएत। एकर मतलब जे अंतिका चलेबाक लेल संपादककेँ भाजपा सरकारक मदति भेटैत रहलनि अछि (विज्ञापन रूपमे)। वएह भाजपा जकरापर धर्मक राजनीति करबाक आरोप छै, दंगा करबाक आरोप छै । जकर विधायक-लोकसभा सदस्य सभपर बलात्कारक आरोप छै आदि..आदि। तँ एहि ठाम ई प्रश्न उठैत अछि जे तखन अंतिका प्रगतिशील मूल्यबोध, मानवीय गुण आ वैचारिकतासँ भरल पत्रिका कोना भेल? एहि पत्रिकामे प्रकाशित होमए बला लेखक सभकेँ प्रगतिशील कोना मानल जाए? एहि पत्रिकासँ जुड़ल लेखक सभकेँ पारंपरिक, गतिहंता ओ जड़ किएक ने मानल जाए? आखिर एकै पत्रिका, एकै संपादक ओ एकै लेखक सभमे एहन द्वैध किएक छनि? कोनो पार्टीक समर्थक हएब खराब नै (चाहे ओ भाजपे किएक ने हो) मुदा ताहि लेल ढोंग, पाखंड एवं घोघ केर कोन जरूरति छै? विदेहक ई अंक राजनंदन लाल दासजीपर केंद्रित अछि आ हमहूँ राजनंदनेजीपर आलेख लिखबा लेल बैसल छी। आ तँइ पाठककेँ कठाइन लगतनि जे हम राजनंदनजीक बदला अंतिका केर किएक चर्चा कऽ रहल छी। तँ साहेब बात एहन छै जे कलकत्ता केर "कर्णगोष्ठी" नामक संस्था "कर्णामृत" पत्रिका शुरू केलक आ ओकर संपादनक बेसी भार राजनंदनजीकेँ हिस्सामे पड़लनि (शुरूआतमे कर्णामृतक संपादक अर्जुन लाल करण छलाह)। आ अही संग मैथिलीक प्रगतिशील सभ राजनंदनजीकेँ जातिवादी आ कर्णामृतकेँ जाति विशेषक पत्रिका घोषित कऽ देलकै। बादमे वएह प्रगतिशील लेखक सभ अंतिका एहन प्रगतिशील आ मानवीय गुण (भाजपे जकाँ) केर प्रतिनिधि बनि छपैत रहलाह। "कर्णगोष्ठी" निश्चित रूपसँ जाति केंद्रित संस्था छै मुदा "कर्णामृत" कोना जातिवाचक भेलै से एखन धरि हमरा बुझबामे नै आएल। आ जे समाज आइ कर्णामृतकेँ जातिपर आधारित कहि रहल छै काल्हि वएह समाज भारती-मंडन नामक पत्रिकाकेँ सेहो जाति वा व्यक्तिपरक पत्रिका कहि सकैए। मुदा नै, ई कथित प्रगतिशील सभ भाजपा समर्थित पत्रिका ओ आन पत्रिकाकेँ प्रगतिशील कहि देता आ कर्णामृतकेँ जातिवादी पत्रिका। आखिर से किएक? कर्णामृत पत्रिका ओ संपादक राजनंदन लाल दासकेँ जातिवादी रूपमे स्थापित करबामे कलकत्तेक किछु पाठक ओ लेखक केर हाथ लगैए। ओ लेखक जिनका राजनंदनजीसँ मोन नै मिललनि से यत्र-कुत्र राजनंदनजीकेँ जातिवादी स्थापित करबामे लागि गेलाह। कलकत्ताक किछु पाठक कथित प्रगतिशील पत्रिका ओ कथित प्रगतिशील लेखक सभहक प्रसंशामे फोनसँ लऽ कऽ सोशल मीडिया धरिमे आफन तोड़ै छथि मुदा राजनंदनजीक प्रसंगमे मौन रहै छथि। मंडन मिश्र आ हुनक संस्कृतक पोथी मिथिलाक भऽ गेल मुदा कथित प्रगतिशील सभ लेल श्रीधर दास आ हुनक रचना "सदुक्ति कर्णामृत" मिथिलाक नै बल्कि एकटा जातिक भऽ गेल। कर्णामृत नामक प्रश्नक उत्तर एही "सदुक्ति"मे भेटत। मैथिलीमे जँ कोनो लेखक कमजोर रचना करै छथि तँ ओकर बचावमे तर्क दै छथि जे "बड़दक दाम बड़दे कहतै" तखन फेर कर्णामृतक दाम बेरमे ओहि पत्रिकाकेँ किएक ने बाजल देल जाइत छै? ओहि कालमे तँ मात्र प्रकाशक ओ संपादक केर नाम देखि ओकरा जातिवादी घोषित कऽ देल गेलै। हम कथित प्रगतिशील लेखक सभकेँ चैलेंज दैत छियनि जे ओ कर्णामृतक हरेक अंक लेथि आ ओहिमे प्रकाशित लेखक केर जातिक विवरण देथि आ तकर बाद एहि पत्रिका-संपादकपर आरोप लगाबथि। आ जँ से नै कऽ सकथि तँ चुप रहथि कारण कोनो रूपमे कियो मैथिलीक काज कऽ रहल छै। राजनंदन लाल दास जातिवादी छलाह वा कि कथित छद्म प्रगतिशील सभ अपन झरकल मूँह झँपबाक चक्करमे हुनका जातिवादी बना देलक एहि प्रश्नक उत्तर भविषयमे जरूर ताकल जाएत। निच्चामे एकटा फोटो मात्र उदाहरण लेल देल गेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ........................................................................................................................ संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी माहुर करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका) डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/ (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta 97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 १६) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक VIDEHA 313 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १७) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-२ VIDEHA 317 १८) रामलोचन ठाकुर विशेषांक VIDEHA 319 १९) रामलोचन ठाकुर श्रद्धांजलि विशेषांक VIDEHA 320 २०) राजनन्दन लाल दास विशेषांक VIDEHA 333 लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 "पाठक हमर पोथी किए पढ़थि"- लेखक द्वारा अप्पन पोथी/ रचनाक समीक्षा सीरीज १. आशीष अनचिन्हार 'विदेह' क ३२७ म अंक ०१ अगस्त २०२१ एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। सूचना/ घोषणा १ "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। अपन अनुशंसा ३१ दिसम्बर २०२० धरि २०१९ पुरस्कारक लेल आ ३१ मार्च २०२१ धरि २०२०क पुरस्कारक लेल पठाबी। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २ “मिथिला मखान” फिल्म देखू मात्र १०१ टाकामे। Android App “BEJOD” download करू वा जाउ www.bejod.in पर, signup करू, एकटा ईमेल जायत, अपन ईमेल खोलू आ ओकरा क्लिक करू अहाँक अकाउंट एक्टीवेट भय जायत। आब मिथिला मखान रेण्ट पर लिअ, डेबिट कार्डसँ १०१ टाका अॉनलाइन पेमेंट करू आ फिल्म देखू। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२१. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2021 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३३३ म अंक ०१ नवम्बर २०२१ (वर्ष १४ मास १६७ अंक ३३३)
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(संस्मरण) माछक रस बहुत साल पूर्वक कहानी अछि | सन् 998 मे हम प्राइवेट नौकरी मे कार्यरत रही | ताहि समय मे हम अपन अनुज MT अरविन्द नारायण दत्त (सुमनजी) केँ अपनहिं पास स्टोरकीपर मे रखने Cll अचानक राजनन्दन बाबूक दिल्ली आगमन Aes | कार्यालय निरीक्षण मे किछु घोटाला महसूस भेलैन्ह TS हमरा कहलैन्ह जे परसू हमरा सुमनजी चाही, हम कर्यालयक सब भार सौंप वापस कलकत्ता चलि AAT | जेन-तेन प्रकारेण बहाना बना सुमनजी के अपना लग सँ हटा हुनका सौंप देलियैन्ह | सब व्यवस्था आ सब काम बूझा-सूझाकेँ WH बाबू रातुक भोजन हेतु हमरा घर एलाह। हमर सबसँ श्रेष्ठ बहिनोई छथि । हुनकर विवाहक बाद हमर जन्म अछि, ताहि आदरपूर्वक सत्कार F हुनका हम अपन किरायाक आवास पर अनलौंह | रातुक भोजनमे माछ-भात आ तरूआ-तीमनक आयोजन छल | भोरके गाड़ीसँ प्रस्थान HS जेताह ताहि लेल एक्कहि सांझक आतिथ्य स्वीकार केने TET! भा. “SATA मे हमर कनिष्ठ भ्राता बाजल, “पाहुन माछक रस Peas की?” मुसकाईत Hers, “पोखरिक माछ जल पीबि भिसिण्ड भड गेल छल ताहि AS HS ओकर रस पियब ।” राजनन्दन बाबू अपन पेशाक HOT कतेको भाषा बजबा मे माहिर छलाह, अखनो छथि | सुमनजी लज्जावश बाजल, “AS, झोड़ दैत छी ।” भभा HS हँसि उठलाह, कहलैन्ह, “Aa ओकरो ASH) पेरल जैत तखन रस निकलत ।” ई छल राजनन्दन बाबूक व्यंग्य । वर्तमान मे हमर परिवार वा आंगने नजि हमर टोलेक सबसँ जेठ was सेहो सशरीर छथि । अखन बेसी अस्वस्थ्य छथि, सुनबा मे दिक्कत HS | हम वास्तव मे हुनका संग कथा-कुटमैती मे काफी धूमलौंह, वर्तमान मे एहि मदे जे किछु सिखने छी से हुनकरे देन अछि । आब हमर बहिन AS नहि अछि मुदा हम राजनन्दन बाबूक बहुत आभारी fears । 980 मे हम पहिल बेर कलकत्ता गेल रही त५ हुनके आवास पर ee बड़ किछु सिखलौंह आ कलकत्ता भ्रमण कलौंह | जीतेन्द्र नारायण दत्त आजीवन सदस्य, मिथिलांगन, दिल्ली 3
“ate के कान '- डी OTE Be ही PAE ला SE + age == “CRW SS 2NsTy! Oss AE Death | ay बाते BAD AE ae ले डुनकर सह पति ay AER, ae से SAY SG कैल्लकनि। wa SMT ar cant Testers | stay आर STAY के' ghar wares WOR Gr aa ca Geary) a दो BY A or oa GA) भतार ap TGS ae A at मरे कानेंगर eee, ay oh जे Ty ey से el ऊे AU Da ayer aR AW ae ZISy, WAS Hs TR fe! ee oe A की BS \ Patron SS ASE सदा-स्दार्क ce E AV SNSY Ea SIUC coy Vay aha Sey ta cay ee पदक NE say a fasaty EN Bet at 9G \ AGEs ey A Away MS aay (> Sa fea sy ater URS za\ tae Baars केहन BIR car satay a Na Shae TRA Rox Sa BY Ba ae say + Wethes कोने गा के पीकर मा Sy Sawer नष्टि जे "कोने AVS “NAST ate NSS SEES Sone SURF RE Lay SaVear Sar sat जेनर spy के ee Mas) lea aa \ aA Aer Bar feat Ae FT| atic SNGY FET Zen ares aa \ Rat ry elar\ Son Sie TN AE Rat प्रति bia (ee SF a — SN est व्त्वित्ति a रलि। att SVS ना ने क्र जल्दी कु ETE मदन ay अल SAT STENT Tray Se SSN पत्रिका: 'लिव्मलब wy SNADS A She a Wat ee era. are) SIP SENT wah OY मी स्गीकार a sbey\ OVER ( Bane AS) WAST S VSM 'कुस्तव्ण शी STRAT AY She | डी खिला Sarg शा Be आए Shas करू SRS ae दस्त \ Rey ate ज्रेटन। | SAY AY ACs va Ie विजेषक ete Te Se हो- Waarg - STS RS कि ie ne © svt भरनिका शौद — 2) —
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मध्यप्रदेश लोक सेवा गारंटी कानून... | = . 46 ay, » ¢ { Ys , = £ ai Ry भरे पे ७ 4 > Ve Rs i “> Up, रे OL a, ( 4 : शिवराज सिंह चौहान as 5 tad ; कानूनी | | _ ह अब नया बिजली कनेक्शन Zs प्राप्त करना। जानें अपने हक़, Toners ~ fe aes = अभ-अधिकार पुस्तिका मिलना मांगें आ क़ छा रत € 30 दिन में कर नल का कनेक्शन मिलना। 30 दिन में बुजेन्द्र प्रताप fe नया:राशन AS बनना। क 60 दिन में ही की सुरक्षा पामाजिक सरक्षा पेंशन मिलना।
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सरकारी काम काजक हेतु अंग्रेजीक संगहि हिन्दीकेँ सेहो विकल्प मे मानि लेल गेल अछि जकरा देशक ऑफिसियल लैन्गुएज कहल जाइत अछि | राजभाषा कहल जाइत अछि | अतः सभ सरकारी संस्था एवं प्रतिष्ठान मे हिन्दी मे काम काजक सुविधा हेतु राजभाषा विभाग अछि आ अधिकारी राजभाषा देशक राज्य सरकार मे अंग्रेजीक संगहि ओहिठामक क्षेत्रीय भाषाक प्रयोग सरकारी कामकाज कोर्ट-कचहरी आदि मे माध्यम अछि | एतेक विशाल देश मे दुइये चारि राज्य मे मुख्यतः हिन्दीक व्यवहार होइत अछि | एहि स्थिति मे हिन्दी वा कोनो क्षेत्रीय भाषाकें समस्त देशक हेतु राष्ट्रभाषा मानि लेब अव्यवहारिक ect | किछु हिन्दीक कट्टर पक्षधरक कारणे देशमे भाषायी विवाद ठाढ़ AS गेल जकर उदाहरण तमिलनाडु अछि । तैं एहि दिशा मे उदारता चाही | राष्ट्रभाषा आ राजभाषा मे स्पष्ट अन्तरवेँ स्वीकार करब देशक अखण्डताक हेतु आवश्यके नहि बुद्धिमानी सेहो ec | कोनो भाषाक प्रति दुराग्रहक भाव श्रेयस्कर नहि थिक | आ प्रत्येक राज्य मे आन राज्यक आइ.ए.एस., आइ.पी.एस. ऑफिसर छथि | ओ सभ अपन मातृभाषाक अतिरिक्त अंग्रेजी, हिन्दी आ ओहि राज्यक स्थानीय भाषा AS अवश्यक जनैत छथि बल्कि ओतुका समाजक संस्कृति, आचार-विचार सँ सेहो परिचित As जाइत छथि | sited at ओहिठाम समाज मे घुलि-मिलि जाइत छथि । ओ सम्मान aS पावितहि छथि, लोक सेहो लाभान्वित होइत अछि। (कणम्त :- HeH-5; जुलाई-सितम्बर 2009) eo मातृभाषा मैथिलीक प्रति साहित्यकार एवं बुद्धिजीवीकँ हुनक दायित्व याद दियाबैत :— दुर्भाग्य जे हमर मैथिलीक साहित्यकार लोकनि मात्र कोनो पुरस्कार हेतु उपरौझ मे व्यस्त रहैत छथि। आइ आवश्यकता अछि जे मैथिलीक समस्त साहित्यकार, शिक्षक एवं अन्यान्य बुद्धिजीवी लोकनि बिहारक मुख्यमंत्रीक समक्ष धरना देथि एवं सरकार लग अपन मांग राखधि जे - (i) शिक्षाक माध्यम मैथिली (2) मैथिली मे पोथीक प्रकाशन (5) मैथिली शिक्षाक हेतु शिक्षकक नियुक्ति अविलम्ब करय। एहि सम्बन्ध मे हम मिथिला दर्शन (नवम्बर-दिसम्बर - 20])H अंक मे सम्पादक नचिकेता जीक नाम पं. गोविंद झाक पत्र दिश ध्यान आकृष्ट करय चाहबनि | की at एहि दिशामे आगू आबि नेतृत्व HS सकैत छथि? समस्त मैथिली भाषी हुनक ऋणी रहतनि | नचिकेता जी विश्व भारती, शान्ति निकेतन मे जाहि पदक सुशोभित HS रहल छथि ales हम गौरवान्वि छी । आइ एडहने प्रभावशाली बुद्धि 5
जीवीक आवश्यकता छैक मैथिली ah । (कणमित :- अंक-26; अप्रैल-जून 202) साहित्यकारक उद्देश्य मात्र महफिल सजायब वा मनोरंजक सामान जुटायब ae थिक, stat sia एतेक जुनि खसाउ। ओ दशभक्ति आ राजनीतिक अनुगामी नहि, बल्कि ओकरा आगू-आगू चलनिहार मशाल देखबैत सत्य थिक | मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार मणिपद्म जीक कथन छैन्ह- कलम तोड़ि कारतूस बना लें | (कणम्ित :- अंक-28; अक्टूबर-दिसम्बर 202) e मैथिलीक अस्मिताक रक्षार्थ ओ विकास हेतु आह्वान करैत लिखलैन्ह आब सबसँ अधिक जकर नितांत आवश्यकता अछि ओ थिक मैथिली मे एक दैनिक समाचार-पत्र। ओहिसँ मिथिलाक जनातक आशा-आकांक्षाक पूर्ति सम्भव YS सकत | मिथिलाक जनताक आवाज अधिकारी लोकनि धरि पहुँच सकत | विभिन्न आयोजन मे जबता खर्चा होइत अछि ast कम-सैँ-कम | पन्नाक aS एकटा दैनिक समाचार पत्र बाहर Ha जा सकैछ | सक्रिय कार्यकर्ता chsh चाही जे अर्थ सम्पन्न मैथिल लोकनिकेँ एहि दिशा मे प्रेरित करथि । (कणम्ित :- अंक-09; जनवरी-मार्च 2008) मणिपदूमजी एक बेर कहने छलाह, “जे समाज अपन मनीषीकें सप्राण राखत, ओकर With केओ अटका ae सकैछ ।” मात्र फोटो नहि मैथिली साहित्यमे हुनक अवदानक चर्चा सेहो रहबाक चाही | चेतना समिति मणिपदूम एवं महाकवि लालदासक जयंती मनाबैत अछि । ओहि दिन घर-बाहर पत्रिकाक मुखपृष्ठ पर हिनक फोटो एवं संक्षिप्त साहित्यिक परिचय देल जेबाक चाही । चेतना समिति पं. विनोदा ara झा जे एकबेर बिहारक मुख्यमंत्री भेल छलाह SAH जयंती सेहो मनाबैत अछि | मुदा, विनोदा नन्द झा नजि AS स्वतंत्रता संग्राम मे कोनो भाग लेने ware आ नजि मिथिला-मैथिलीक हेतु हुनक कोनो योगदान HS | डॉ. अमरनाथ झाक जयन्ती सेहो मनायल जाइत Bee । जे लोकनि मैथिलीकँ मिथिलामे शिक्षाक माध्यम बनबय चहैत छथि अथवा छलाह तिनका बुझल हेतैन्ह जे बिहार सरकार एहि लेल एकटा चारि सदस्यीय कमीटिक गठन केने छल जाहिमे एकटा सदस्य डॉ. अमरनाथ सेहो छलाह। Fal ओ अनुपस्थित AS मात्र एकटा विरोध पत्र eS अपन दायित्वक निर्वाह Hers | at ई US झा aeet मुक्त नहि aaa aS नजि मैथिलीक विकास St आ
नजि मिधथिलाक | अतएव हमारा लोकनिकेँ जे सही अर्थमे मैथिलीक हेतु अपन त्याग hers तिनका लोकनिक जयंती मनाएब उचित थिक | बाबू भोलालाल दास हिन्दीक लोक छलाह एवं दरभंगामे वकील छलाह। मुंशी रघुनन्दन दास हुनका ललकारा दैत कहि देलखिन्ह जे seth अपन बाड़ीक Gea तीत किएक लागैत अछि? भोला TWh एकर आइन लगलैन्ह AT सभटा छोड़ि मैथिलीक हेतु लागि गेलाह | WS HAT SAH वकालतो बन्द भर गेलैन्ह | (Huge :- अंक 48; अक्टूबर-दिसम्बर 907) ०». मातृभाषाक माध्यम मे नेनाक शिक्षा व्यवस्था पर :-- ज्ञातव्य जे पूर्व मे मैथिलीक नाम पर्यन्त हिन्दीक पक्षधर cata नहि सोहाइत Sa | कहला सँ मुँह बिचका aa wale | मैथिली मे सम्भाघषण करबा मे हीनताक बोध Het Gels | एखनहैँ किछु गोटे मात्र घर-बाहरेटा मे नहि अपन घर-परिवार मे धीया-पुताक संगे सेहो हिन्दी मे बाजबा मे गौरवक बोध करैत छथि | आवश्यकता अछि अपना समाज मे Set मैथिली विरोधी ass मुक्त हेबाक संगहि मिथिला मे मैथिलीक माध्यम St पढ़ौनी हेबाक । आइ मिधिलाक युवा पीढ़ी बिहार तथा केन्द्र सरकारक प्रशासन मे सम्मिलित AS रहल अछि | तखन शिक्षाक माध्यम हेबा मे कोनो तारतम्य रहत। आउ हमरा लोकनि अपना नेना-भुटकाकेँ साक्षर बनाबी, शिक्षित बनाबी | (Hurt :- BH-9; अक्टूबर-दिसम्बर 200) प्राथमिक शिक्षा मे मैथिलीक माध्यम बनेबाक दिशामे सरकार सब दिनसँ निष्क्रिय रहल अछि | जौँ इहो सरकार पूर्ववते निष्क्रिय रहय aS US” स्पष्ट हएत जे बिहार सरकार मैथिलीक विरोधी अछि | तखन aS अलग मिथिला राज्यक हेतु आन्दोलनक औचित्यकँ अस्वीकार नहि BUT जाय AHS | मैथिली भाषी क्षेत्रक विधायक लोकनिक ई कर्तव्य छनि जे एहि कार्यक हेतु सरकारकेँ वाध्य करथि । सम्प्रति पं. ताराकान्त झा (भाजपा) विधान परिषदक अध्यक्ष छथि, श्री विजयकुमार मिश्र (भाजपा) चेतना समितिक अध्यक्ष छथि, श्री नितीश मिश्र (जनतादल-यू) मंत्री छथि । मैथिली भाषी जनता हिनका सँ सार्थक प्रयासक आशा Het अछि | शिक्षाक माध्यम मैथिली भेने - () नेना सभ बिना रटने पढ़ि ज्ञान अर्जन HS सकत। (2) मैथिली पढ़बाक fest रूचि बढ़तैक | 7
(3) मैथिली भाषामे विभिन्न विषयक पोथी लिखल जायत। (4) स्कूल, कॉलेज तथा विश्वविद्यालय मे मैथिली पढ़निहार छात्र/छात्राक संख्या बढ़त । (5) मैथिली पढ़ौनिहार शिक्षक/शिक्षिकाक बहाली बढ़त आदि। (कणम्ित :- अंक-20; अक्टूबर-दिसम्बर 200) ०». मिथिला-मैथिलीक विकासक अओर भविष्यक प्रश्न पर :— मैथिल लोकनिक चरित्रक बारेमे डॉ. विद्यानाथ झा ‘fated’ अपन उपन्यास Taare’ मे स्पष्ट लिखैत छथि- जाति-धर्म, वर्ग, वर्ण, स्वार्थ, ईर्ष्या, देष आ संघर्षक लौहपटड़्िका सँ बनल पिजड़ामे आइ मिथिलाक भविष्य वांचयवला सुग्गा स्वयं बन्द अछि। ओ बाहर होबल लेल ओहि लौहक पत्ती पर अपन चांगुर सँ प्रहारो HS रहल अछि | चारि करोड़ अपन लोकक मुक्तिक आशामे अपलक निहारैत at सोचि रहल अछि जे कहिया = पिंजड़ा cea जे हम मिथिलाक कंठवाशिनी मैथिलीक भविष्य एक बेर पुनः सुनाबी | मुदा अखन AS ओहिठामक सभटा पढ़लो सुग्गा सभ बौके-बहिर बनल अछि तखन आओहि fish के alsa? विदित जीक मन्तव्य कतेक सही अछि से मैथिली संस्था सभक सोच a क्रिया सँ स्पष्ट HS जायत। मैथिलीक वरिष्ठ एवं पुरान (954) संस्था चेतना समितिक गठन देखि सकैत छी os धरि कोनो अब्राह्मण एहि संस्थाक अध्यक्ष नहि AS सकलाह। (कणम्त :- HeH-35; जुलाई-सितम्बर 204) प्रथम as aie कम-सँ-कम माध्यमिक कक्षा aft शिक्षाक माध्यम कराबथि | मातृभाषाक माध्यम सँ शिक्षाक आवश्यकता ओहि ath ठैक जे पछुआयल अछि | एहि वर्गमे दलित, महादलित एवं अन्यान्य अबैत BH | दोसर जे मैथिलीकँ बिहारक द्वितीय राजभाषाक दर्जा दियाबधि | Hea नहि पड़त जे मैथिलीएटा एकटा एहन भाषा अछि बिहारमे जकर अपन लिपि छैक तथा विकसित साहित्य ta | विश्वविद्यालय स्तर aft मैथिलीक पढ़ाइ तथा ओहि माध्यममे शोध Stet आयल अछि। तेसर जे मिथिलांचलमे एकटा अओर विश्वविद्यालय at आर.आइ.टी.क नितांत आवश्यकता ठैक | राजदरभंगाक राजनगर satel भव्य भवन ओहिना भकोभन्न पड़ल Bh एवं ओकर आस-पासक जगह | एकरा एकटा विश्वविद्यालयक हेतु उपयोग कैल जा सकैछ | संगहि आर.आइ.टी.क स्थापना छात्र-छात्रालोकनिक 8
हेतु आवास, पैघ नजि AS छोट-छीन अस्पताल आदि लेल उपयोग कैल जा AHS | मुदा ई काज GAH करत? एकरा हेतु स्थानीय विधायक अओर सांसद लोकनि & आगाँ बढ़बाक चाही | (कणम्ित :- sH-4; जनवरी-मार्च 2076) ued पूर्वक अंक सभक सम्पादकीय विमर्शमे दुइ गोट विषय पर लिखैत अयलहूँ अछि जे मैथिली कोना शिक्षाक माध्यम बनत आ मैथिली बिहारक दोसर राजभाषाक दर्जा पाओत। Hat आइ धरि Us दिशामे कोनो प्रयास नजि भेल | अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक मुजफ्फरपुर इकाई एहि लेल पटना उच्च न्यायालयकेँ एकटा आवेदन देने छल | न्यायालय बिहार सरकारसँ एकर स्पष्टीकरण चाहलक | मुदा, बिहारक राजनीतिमे गठजोड़क स्थितिक SRT एकर कोनो उत्तर कोर्टके नहि देल गेल । दुःखक बात जे एहि सम्बन्ध मे कोनो खोज-पुछारि आइ धरि Heit नहि केलैन्ह | नजि कोनो मैथिली संस्था आ afer मिथिलाक विधायक/सांसद | सभ कानमे तूर-तेल eS बैसल रहलाह | HHS एहि दिशामे दायित्व बोध नहि। ई हमर मात्र अरण्य रोदन AS रहि गेल । (कणम्ित :- अंक-44; अक्टूबर-दिसम्बर 206) ०». मैथिली पत्र-पत्रिका अनियमितता अओर युवावर्गक उदासीनता आ दायित्व पर :- fara युवावर्ग एहि दिश आकृष्ट होधि। तखनहि एकर उपयोगिता बूझल जायत। पत्रक शीर्षक देवनागरीक अतिरिक्त मिथिलाक्षर मे सेहो रहबाक चाही Wet पाठकवर्ग अपन प्राचीन लिपिसँ अवगत as हेबे करताह संगहि ओकर आवश्यकता केँ Fel बूझताह | मैथिलीक प्राचीन साहित्य मिथिलाक्षर मे उपलब्ध अछि | अपन लिपपिक जानकारी शोधकर्ता लोकनि हेतु उपयोगी होयत | art पत्र-पत्रिका से दैनिक होए वा साप्ताहिक, मासिक, aati वा त्रैमासिक नियमितता परम आवश्यक होइछ । संगहि सम्पादन, प्रकाशनक अतिरिक्त वितरणक व्यवस्था नजि Fart कोनो पत्रिका लोकप्रिय नहि ws सकैछ। तैं, वितरणक समुचित एवं ठोस व्यवस्था आवश्यक अछि। (कणम्ूत :- BH-; जुलाई-सितम्बर, 2008) मुदा आइ शहरक युवा मैथिल सभ अपन मातृभाषा सैँ कटि गेल छथि। मिथिला मे शिक्षाक माध्यम मैथिली नजि भेलाक Hey ओहिठामक युवा पीढ़ी सेहो मैथिलीसैं कटि गेल छथि | घर-बाहर, हाट-बाजार, स्कूल-कॉलेज मे TS सहजहिं 9
सभठाम हिन्दीयेक प्रयोग | मैथिलीक हेतु ई एकटा अशनि संकेत बुझना जाइछ | ait इएह स्थिति रहल aS ओ दिन दूर ae जखन मैथिली मात्र दादी-नानीक भाषा रहि शनैःशनैः विलीन AS जायत! Fat उक्त भयावह स्थिति सँ उबरबाक प्रयाग हेबाक चाही | APTA अथवा निष्क्रिय AS बैसल रहब कायरता थिक | बिना मैथिलीक मिथिला की? मिथिला as प्राचीन कालहिं सँ अछि | मैथिलीकँ बचायब सर्वोपरि दायित्व थिक | मिथिलाक विभिन्न राजनीतिक दल मे किछु-नजि-किछु as युवापीढ़ीक सक्रियता, सहभागिता अछिये Aerts बचायब सभहक दायित्व थिक | aT मैथिली कम-सँं-कम प्राथमिक शिक्षाक माध्यम बनि जाय WS बूझब जे एक धाप एहि दिशा मे बढ़लहूँ | (Huta :- अंक-8; अप्रैल-जून, 200) ०». मिथिलाक चित्रकलाक प्रचार-प्रसारक आवश्यकता पर :-- आब आवश्यकता अछि जे एहि Hear विवाह एवं आन शुभ अवसर एवं अनुष्ठान आदिक अवसर परक प्रयोगक सीमा सँ बाहर आनबाक | पारम्परिक विधि-व्यवहारक अवसर पर एकर प्रयोग सांस्कृतिक चेतनाक परिचय दैत अछि | मुदा आइ समाज एवं विश्व-मानव जहि समस्या GAs आक्रान्त अछि ओहि सबहि केँ चित्रक माध्यमे अभिव्यक्ति देब आवश्यक अछि जेना समाज मे व्याप्त दहेज प्रथा सन कोढ़, वधु-दाह, नारी शोषण, पर्यावरण एवं आतंकवाद विकलांगक जीवनक समस्या आदि कतिपय एहन समस्या अछि जाहि दिस जनसामान्यक ध्यान आकृष्ट करब आवश्यक अछि | ई काज कलाकार लोकनि HS सकैत छथि | SMT ई HM मॉडर्न आर्ट द्वारा दर्शाओल जाए रहल अछि जे प्रदर्शनी सभ मे देखल जाए सकैछ । मुदा मिथिला चित्रशैलीक माध्यमे वर्तमान समस्या AA उजागर करब आवश्यक APS | (कणम्ित :- BH-4; अप्रैल-जून 2009) ०». पुरुष अओर नारीक संबंध पर :-- मानव जीवन मे कांचन, कृषि आ कामिनी तीनूक अनिवार्यता अछि | एकरा faq जीवनक गाड़ी नहि चलि सकैत अछि । मुदा ईर्ष्या, लोभ, स्वार्थ सँ प्रेरित अतिशय sir परिवार, समाज एवं देशमे संघर्ष at अशान्तिकेँ जन्म ta अछि | रामायण आ महाभारत एकर ज्वलन्त SRT अछि। Hal ST समाज पुरुष प्रधान रहल अछि | नारी असूर्यमपश्या होइत छलीह | मानवीय अधिकार एवं शिक्षासँ वंचित मात्र पुरुषक भोग, विलासिकताक वस्तु आ प्रत्येक स्थितिमे पुरुषक सेविका | 0
विभिन्न परीक्षा मे मैथिली सेहो एकटा भाषा हेबे करत। तैं, आब मिधिलांचलक स्कूल, कॉलेज आ विश्वविद्यालय मे मैथिली पढ़निहार छात्र-छात्राक संख्या बढ़बाक चाही आ एहि सुयोग सँ लाभ उठेबाक चाही | (कणम्ूत :- अंक-96; अक्टूबर-दिसम्बर 2004) e साहित्य अकादमी मे मैथिलीक मान्यता लेल :-- डॉ. जयकान्त मिश्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय दिशि सै साहित्य अकादेमीक General Council क सदस्य मनोनीत AS Wels | ATT की छल | मातृभाषाक अन्यन्य सेवी एहि सुअवसरकेँ मैथिलीक हेतु उपयोग केलनि ओ पोथी What They say about Maithili ST A case for Maithili छपबाकड General Council मे deat देलैन्ह | Academy कलकत्ताक National Library 4 मैथिली पोथीक सूची मांगलकैक | मात्र साठि पोथीक सूची भेटलीन । एहि जानकारी F क्षुब्ध WS डॉ. मिश्र दिल्ली मे पुस्तक प्रदर्शनीक आयोजन केलनि | एकर अध्यक्षता केलनि संसदीय मंत्री बाबू सत्यनारायण सिंह तथा उद्घाटन प्रधानमंत्री पं. नेहरू | प्रधानमंत्री अपन मंतव्य मे लिखलनि I have seen a large collection of books and munuscripts in Maithili. It deserves encouragement for development. तकरा बादे साहित्य अकादेमी एकटा Expert Committee के गठन केलक AH TAT छलाह डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी, डॉ. सुकुमार सेन, पूना विश्वविद्यालयक डॉ. के. एम. अत्रे, डॉ. हजारी प्रसाद दिवेदी तथा डॉ. सुभद्र झा। संयोग एहेन जे डॉ. द्विवेदी कलकत्ता विश्वविद्यालय घनश्यामदास बिड़ला व्याख्यानमाला देबाक हेतु आयल ware | मिथिला संघक कार्यकर्त्ता लोकनि मे मदन चौधरी (आब स्व.), पीताम्बर पाठक (आब स्व.), सत्यनारायण लाल, ब्रह्मना. WAT झा तथा एहि पांतीक लेखक, डॉ. दिवेदी सँ भेट as मैथिलीक समर्थनक हेतु निवेदन केलथिन्ह | ओ स्पष्ट Heals, “मैं जानता हूँ, राजनीतिक कारण it से मैथिली को मान्यता नहीं मिलती है। मैं इतना कर सकता हूँ जो Expert Committee की बैठक में नहीं जाऊंगा ।” सैह भेलैक दूनू बंगाली विद्वान as मैथिलीक पक्ष मे छलाहे। आ सैह भेलैक । मैथिली साहित्य अकादेमी मे मान्यता पाबि गेल । डॉ. मिश्रक aaa ate बिसरल जाय सकैछ । ओ मैथिलीक आचार्य WHT शुक्ल छथि | (Hora :- अंक-0; अप्रैल-जून 2008) ०». USN अओर राजभाषाक Ja पर :--
प्रवेशांकहि मे रमानन्द रेणुक कथा *करमीक फूल कनैलक बीया' प्रकाशित भेलैन्ह | उक्त कथासँ SAH चेतना AT समाज मे पसरल शोषण, विशेष HS जन-बोनिहारक प्रति सामन्ती अत्याचार, प्रताड़न एवं ओहि वर्गक नारीक प्रति दुव्यव्यहार आदिक प्रति कथाकारक विद्रोही wae परिचय भेटल | यद्यपि एहि तरहक स्थितिक चित्रण कतिपय कथाकार, जे अपनाकेँ प्रगतिशील कहेबामे अघाइत AS छथि, हुनक कथामे भेटैल अछि | मुदा ओही सभ मे कथाकार मात्र स्थितिक चित्रण HS अपन दायित्व निर्वाह बुझैत आयल छथि | ओकर प्रतिकार वा विद्रोहक MSI पाठक पर छोड़ि देने छथि, मुदा AAS रेणु अपन उक्त कथामे मात्र नपुंसक सहानुभूति ae देखाय विद्रोहक स्वरूपकेँ स्पष्ट रेखांकित केने छथि | (कणम्ित :- अंक-25; जनवरी-मार्च 202) ०». मणिपद्म जीक जन्मशताब्दीक अवसर पर हुनका याद Het लिखैत छथि :-- मैथिलीक उज्ज्वल भविष्य आ अपन रचनाक उत्कृष्टता प्रति आस्थावान छलाह मणिपदूमजी । राजा सलहेसक प्रेसक कॉपी तैयार करैत काल हम पूछि देने छलियैन्ह, “मैथिलीमे एतेक fea रह छी आ केँ पढ़त?” ओ उत्तर देने छलाह - “हमरा विश्वास अछि जे हमरा मरणोपरान्त लोक हमरा aes अलमारी तोड़ि हमर पांडुलिपि AS जायत छापत Al Vet” SAH US SAA Goa छलैन्ह | मैथिलीक श्रीवृद्धि प्रति एहन समर्पित व्यक्तत्व दोसर देखबामे नहि आबैत अछि | आजीवन लिखेत रहलाह आ सेहो मैथिलियेमे | एकटा-दूटा नहि, एक सय छिहत्तरि a पोथीक पांडुलिपि, से विभिन्न विधा पर प्रकाशनक हेतु छोड़ि गेलाह | जे एकटा स्वतंत्र मणिपदूम प्रकाशनक स्थापना HS प्रकाशनक काज चलाओल जाए AS कतेक वर्ष लागि जाएत समस्त पोथीक प्रकाशनमे | (कणम्त :- अंक 57; जुलाई-सितम्बर 208) e मैथिलीकेँ संविधान मे मान्यता भेटला पर :-- aad महत्वपूर्ण काज अछि मिथिलांचल मे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मे मैथिलीकँ लागू करबाक | से नहि Hares मैथिली भाषा तथा साहित्यक विकास नहि AS Ghd | पत्रिका एखनहु कैकटा छपैत अछि | पोथी सेहो प्रकाशित होइत अछि, Fal पाठकक संख्या मे AAT जनक वृद्धि नहि AS रहल अछि | मैथिली जाधरि शिक्षाक माध्यम नहि होएत, पाठकक संस्था मे वृद्धि नजि AS सकत | आब बिहार सरकार तथा भारत सरकार द्वारा संचालित लोकसेवा आयोगक 3
हमरा मैथिली लिखबा लेल अओर मैथिली साहित्य दिश अभिप्रेरित करयवला दि जोड़ी मे पहिल छलाह समकालीन TSA अभय कुमार लाल दास (नवानी) SAT दोसर छथि श्री राजनन्दन लाल दास (गनौन, हमर पिसा) | पिसाक संपादन कला A सम्पादकीय हमरा सदिखन उत्साहित आ इच्छुक बनाबैत रहल | कणमितक प्रत्येक अंक मे हिनक “हमर Hee’ हमरा मैथिल साहित्यक संग-संग देश-दुनियाक वर्तमान आ इतिहास सँ अवगत करौलक | हिनक संपादनकला हमरा सदति अपना मे नवाचारक समावेश आ पूर्वक संकलन दिश अग्रसर केलक | एकटा पत्रिका वा पोधी मे पाठकरकँ कि-कि सब चाहि, एक पीढ़ी a दोसर पीढ़ीकँँ कोना जोड़क चाहि अओर कोना पाठक धरि अपन बातकेँ अभिप्रेषित करक चाहि एहि गुणक संतुलित आ सम्पादित व्यक्तित्व धनी छथि हमर पिसा- राजनन्दन लाल दास जी | एहि क्रम मे हम हिनक गजबक स्मरणशक्ति, frac, भाषा पर पकड़ (प्रायः अपन वार्तालाप मे ओ एक भाषा मे दोसर भाषाक शब्दक मिलावट नै ata छथि) आ सम्पादन कला सँ अभिसंचित कणमितक किछु अंकक उल्लेख करब आवश्यक बुझैत छी wes wong ule महान मैथिल साहित्यकारक ज्ञान Ata बुझि सकैथ। “हमर HEP द्वारा पाठक धरि अपन बातकेँ पहुँचैबाक कला He किछु बारिकी देखल जाऊ :-- ». यात्री जीकेँ याद करैत लिखेत छथि :-- मैथिली मात्र सम्मान देलकैन्ह Far रोटी नजि es sais! हिंदी रोटी देलकैन्ह आ सम्मान Set | हिन्दीक अपेक्षा मैथिली मे भने कम लिखने होथि मुदा मैथिलीकँ बिसरि नहि सकलाह। भारत सरकार द्वारा रूस पठाओल एक शिष्ट मंडल मे यात्री जी सेहो एकटा सदस्य ST छलाह | ताबत “पत्रहीन नग्न TB’ पर अकादमी पुरस्कार सँ सम्मानित AS चुकल छलाह | रूस मे परिचय पुछला पर स्पष्ट Heaters, “मैं हिंदी का नागार्जुन नहीं, मैथिली का यात्री बनकर आया हूँ, क्योंकि भारत सरकार नागार्जुन को नहीं जानती है ।” मातृभाषा मैथिलीक प्रति अगाध प्रेम तथा निष्ठा wees यात्री जीकें | हिन्दी मे लिखलाक Sry अनेको लोक हुनक आलोचना Het छलाह | मुदा ओ लोकनि ई faa जाइत छलाह जे जीवाक लेल AS रोटी चाहबे करी | (कणम्ूत :- अंक 75-76; जुलाई-दिसम्बर 999) ». रमानन्द रेणु se याद करैत :— TAS रेणु सँ हमर परिचय भाइ जीवकान्तक माध्यमे आ सेहो CATT पर, जखन रेणुजी निर्मलीमे सत्कार दूरभाष os पर कार्यरत छलाह भेल | *आखरक
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एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व : राजनन्दन लाल दास राजनन्दन बाबू मैथिली साहित्य जगत मे कोनो परिचयक मोहताज नजि छथि | हुनका बारे मे वा मैथिली साहित्य मे हुनक योगदानक बारे मे लिखबा वा HET योग्य नजि हम छी आ नजि हमरा मे ओतेक aH as | तथापि अपन अल्पज्ञान सँ हुनक मैथिली रचनाधर्मिता आ हुनक सम्पादकीय कार्य पर प्रकाश देबाक धृष्टता HS रहल छी | आशा अछि विद्वतजन हमर Acids क्षमा HS हुनक कार्य अओर मैथिली साहित्य मे हुनक योगदान पर प्रकाश दैत हमर एहि आलेखकेँ आत्मसात HATE | मातृभाषा मैथिलीक अभ्युत्थानार्थ अपन आत्माक असीम अनुराग S उत्प्रेरित; प्रखर मार्क्सवादी; छात्रावस्थाहि सँँ साहित्य AB स्वतंत्रता संग्रामक सजग प्रहरी; प्रसिद्ध स्तम्भकार, नाटककार; सामाजिक-सांस्कृतिक चेतनाक संवाहक; मैथिली भाषा अओर साहित्यक अस्मिता आ विकासक लेल कतेको आन्दोलन मे अहम भूमिका निभेनिहार; साहित्य-संस्कृतिक विकास ध्वजावाहक; 98] सँ अनवरत मैथिली त्रैमासिक पत्रिका कणम्ितक संपादन दायित्व निर्वाह करैत; मौलिक रचना - संतों (क्रान्तिकारी आंदोलनकारी नाटक, 970), चित्रा-विचित्रा (आलेख संग्रह, 2006), Water नारायण सिंह (विनिबांध, 20I2); संगहि सम्पादन कार्य मे मिथिला दधीचि भोलालाल दास एवं राजेश्वर झा व्यक्तित्व ओ कृतित्व (979), साहित्यकार मुंशी रघुनंदन दास - व्यक्तित्व ओ Hirst (985), मिथिला-मैथिलीक विकास मे वर्णगोष्ठी एवं कर्णात्मक को योगदान (974-20I) (20%) & मैथिली area समृद्ध करयवला मैथिलपुत्र गनौन (घनश्यामपुर) ग्रामवासी 05 जनवरी 934 Hh एहि धरा पर आयल श्रद्धेय राजनंदन लाल दास (पिता- स्व. मनीलाल दास AA माता- स्व. विद्या देवी) अपन जिनगीक 40 वर्ष एकटा प्राइवेट कंपनी मे मार्केटिंग संकायक प्रमुख SY अपन सेवा errs | US कार्यावधि मे ओ भारत आ Wh देशक कतेको बेर भ्रमण कैलेन्ह । 960 ई. मे कलकत्ता विश्वविद्यालय सँ राजनीतिशास्त्र सँ परास्नातक अओर हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली, बंग्ला सहित कतेको भाषाक विद्त्त आर. एल. दास नामे विख्यात राजनन्दन बाबू अपन सम्पादकीय लेख आ कला लेल मैथिली साहित्य मे अपन अलग पहचान बना चुकल ST | अपन जिनगीक 87 वसंत देखि चुकल दास बाबू मैथिल साहित्यकार लोकनिक मध्य अपन सम्पादकीय कला लेल aS हुनक पहिल पसंद रहलाह |
F atte Byam he #हीराजागर्पन सवाल oF ue शव्प्मकन | है लत oP ont ware) जोक cass fry Qayor-wa8) wher Ogi ony snd कीऊ -घतिक्विल कस We थे कलगक IST a ese ene ants विश जिला ae PF gs ar पर ates sy pres as Fore PT लयूलनमतिस्त करें जीन GA | ठोक 3 ene Mon) “ia At RAL ae कल्काजियें . « ( jee [aren eax Fey wr वे Yo “जज are? mene weet | a Rare a मत Meola कक काग $4 Nae EO मा एव लिये व 7S eet He Par जा Lane या 797 (ERD थे yo ie) 387, ony dle पल जुनल = lar ale tea] fae ere ge See pare oi wireat seer Bae ber ae कि ने Sapa lave) HS oN पद का नह रन fa arse WET AIT शाम कहे ae दर ते si Amp wa Gr a लाल An लाउगाय 7949/2) Oa] ag Se rege set नयदकाक गद्य TELAT, [952 Ayadie sia Pari He ठी करना Ap का TTT एड ऐे OST ऊलऊता रलगि a pape ore eS यब्नद् जा TE Hh eT यदि _ कर हि gam ore Seer 995 TEE | GT Geer FET or eae | err इसस “afte FET co mq <jo Fes a MH तैचक OT LYS TFET PIE] 7807 kcal < ded J ar cs FRET ONG TD GIF को FOG
प्राचीन काल मे sit कतिपय ऋषि-मुनिक पत्नी विदुषी भेलीह आ मिथिला कँ गौरवान्वित hes IS तकरा अपवादे कहबाक चाही | पुरुष द्वारा कलंकित, प्रताड़ित, अपमानित Ate जेना- अहिल्या, तारा, Hatt, मन्दोदरि अओर द्रौपदी केँ पंचकन्याक प्रातः स्मरणीयाक गरिमा दर पुरुष अपन HHA आ अपराधकेँ झाँपबाक TAT रचलैन्ह | (HoT :- अंक-29; अप्रैल-जून 20) ई सब AS मात्र हुनक सम्पादकीय कला “हमर कहब'क उदाहरण अछि। Ue ae केतेको विषय पर ओ अपन सम्पादकीय कलम चलौलैन्ह | हुनकर लेख, संस्मरण, साक्षात्कार आदिक वानगी देखैत बनैत अछि | अपन बात कहबाक बेबाकीनपन at निर्भिकता लेल ओ सदिखन जानल Tee | हिनक सम्पादकीय कौशलक ज्ञान एहिसँँ लगाओल जा सकैत अछि जे *कणम्त” सन् 954 F 977 A अओर पुनः 2000 सँ प्रतिवर्ष अक्टूबर-दिसम्बर अंक शारदीय विशेषांक रूपें प्रकाशित HS रहल अछि, जहिमे विभिन्न विद्या पर विद्वतजनक आलेखक समाविष्ट हिनक सम्पादकीय कलाकेँ सम्पुष्ट करैत अछि | विभिन्न साहित्यकारक स्मृति अंकक अलावे विभिन्न विशेषांक, नवांकुर स्तम्भ a अपन लेखनकलाक आरम्भ करयवला कतेको रचनाकार अपन लेखन सँँ मैथिली साहित्यकेँ श्रीवृद्धि केलैन्ह, ई दूरदर्शिता हिनक सम्पादनकलाक पहचान FATT | प्रत्येक अंक मे अमृतवाणीक समावेश, अगामी तीन मासक पावनि-तिहारक जानकारी, संगहिं पोथी भेटल, पत्रिका भेटल आदिक सूचना, पोथी प्रकाशनक सूचना, आवरण पर मिथिला चित्रकलाक प्रधानता हिनक सम्पादित पोथीक अभिन्न अंग बनल आ पाठकवूंदक स्नेह अओर जिज्ञासाक केन्द्र । विद्याव्यसनी दास जीकेँ कतेको मातृभाषानुरागी लोकनिक साहचर्य भेलैन्ह जे हिनका मातृभाषक विकासार्थ तन-मन-धनक तर्पण करा हिनक साहित्यिक गतिविधिकेँ सम्पुष्ट HS हिनका एकटा विशिष्ट साहित्यकार अओर सम्पादकक श्रेणी मे ठाढ़ HS tah | विलक्षण स्मरणशक्तिक मालिक दास बाबू अपन व्यांग्यत्मक हाजिर-जवाबी, असवरोपयुक्त, समयोपयुक्त, विषयानुकूल टिप्पणी लेल ACSA AMA जेताह | ओ मुख्यरूप सँ मैथिली भाषा-साहित्यकँ सजयबाक, सम्हारबाक आ ओकरा विकसित करबा पर जोड़ देलैन्ह | मैथिली आन्दोलनकेँ तीव्र बना एकटा संयुक्त मोर्चा गठित HS ओकर संयोजन Hers | जाहि क्रममे 967 मे मैथिली संग्राम समितिक गठन Has AA स्वयं मंत्री पदकक दाथित निर्वहण hers |
Bey R BTA phe A सुबा aera Bax pra He free शैन er [re Saray. tla ere THR etal bec Fe | व्यक्ति समा यदि TIT arr ET DY, ae BRET ER सम्पादक AAA Ede, ° aur ante साहिव्म AF, OfHATH pai ie ore FN yaart द्वारा HM} , C 9 Br Weare WIE करवाते AF -र्च्तिगात प् जीन के antler को Batt | HE eS rary AFR MIT HK Der FA Het FE | Bis (oie Bika a Speer ey भला af तरदे SIA = Sr ahr) पयिलीमे we /+०5्य दे Aare GIR FT aria tot FT wExaen Vt समय aft Ge KAT नो ने Brat WaT Fire Se afer Er | Tra Fewer, agar Be wee Der | PG चीफ सेव gira ar TMS | WCKA BTA Spann. AAMT Drie, सका सादिव्य AT कद GUT Pai oT BUT ela दि ES कम Atte 4° HST | पत्रिका न 4 IR TTS Ree ons wrx acta | TEE Ot KH केद कद He? डील ATARA AIA ATTA R प्रकाशित Bag जाय कला, 'पंत्रिकास कर्पाप्ठित ‘RH eet aay TER लिया, arm, Te zp wer ऊदि | VE PTR UB a aren दास | UAT MT Eley, =a HIG FHT कु रा VET RRR जे eer Lae Fe es Wat ST , wine Ta : ar Lat EAT | RAAT समका aio कर्पीएत s
tae ta <ae |oF ee Balls FE sat co सटीक j ot उौलाका | में SAB wart pear 3 ser) सॉपडुतका ऊन्दोसनक ATH nies आजीजी ऊपन अविक्रिशा देलस्विन्ड,- © vith abate सीन React ‘gira war oer ते aah cra poe Norse “oi ae, war JOIST SEE | aga es AT HOT Ree ue eater सिखर्लन्दि , साहित्य SITS HS HALE पर, जकर wee नच्विफ्रेग of कयपनि। डा: छाठिना WE “srg renter” ahr ae BTA SE RRM HAART, wel apt ser | vo offer लेता 4 SE RITAT TS भेंबिलीक wager se. wig Mary TEMS BT aie लोहा कु २ ang Td ale ys See) caer नणरिग Hace cad TT aratear, Helga), वेजुसयम SOME va eel ie वर fanz ut शाजनणर sae Fer ; gaa लिश्तनिदालप लत arate one , RUE EAT प्रा OK HATH GAMA व्यवस्था ox, F RE) BIT. HTS) SMTA ey | HIT Se ‘ x सुव्यव्पित 0 ang fr प्विकित्सा या परिपूर्ण | Rare ae | pe कालेजक स्थापना BETA a नेजुसशभ मे ढोग | पे oe mises aie ठन्च Prax Ge, SST © FoR ae reste a घ्ताहित्म रू जन ead ailer सजाल में
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क्रॉतिकारी चेतना जगबैत मैथिल्ली नाटक ‘Tay लेखक: स्व० राजनंन्दन लाल दास जी मैथिली नाटक'क अपन सर्वोतमुखी इतिहास tech अछि | प्रस्तुत नाटक संतो'क विबेचन मे ने aS हम पश्चात आचार्य भरत,भामह,दण्डी ओ रुद्रटक श्लोक आदि दय अपन Tear विदूवताक ठकोसला करब,आ ने मैथिलीक तथाकथित विद्वान seat कबिलौती जनायब, आ ने हम भाषा विज्ञानक बीहड़ि मे जाएब | हमरा सब्ख नहि जे हमरा अहॉँ विद्वान बुझी। हम एतय नाटकक सुदीर्घ इतिहासो के नहि लिखब जे प्राय: सबके बुझले हेतनि ! हम Hel सबके बेजाय एकटा सूचना दैत St जे कोलकाता मे मैथिली भाषा साहित्यक एकटा अनन्य सेवक जिनकर हालहि मे देहावसान भेलनि अछि, से छथि विद्वान राजनंन्दन लाल दास जी | जिनका मैथिली भाषा साहित्यक अभ्यर्थना मे आत्मीय तुष्टि भेटैत Gale | सामाजिक यथार्थ अंकित करबा मे हिनका आत्मीय सुख होइ़त छलनि, तकरे प्रतिफल मैथिलीक कर्णामृत सन पत्रिक Tikes वर्ष I अनवरत चलबैत रहलाह, जे एकटा इतिहास अछि | seat धरि मैथिली मे अनबरत कोनो पत्रिका एना Hs hs नहि प्रकाशित New| मिथिलाक आ मैथिली भाषाक अतीतक उत्कर्ष -आकर्षक चित्र प्रस्तुत करबा लय मैथिलीक वर्तमान अधोगति के केन्द्रित ms मैथिल्ली साहित्यमे सुधार आनबाक लक्ष्य सँँ प्रतिकात्मक शैली कें अपनाय. एकटा नाटक लिखलनि ' संतो | जे सामाजिक धरातल पर मैथिली ऑदोलनक गति विधि कें तेज आ गति देबाक aed क्रॉतिकारी उद्रतम् स्वरूपक संघर्ष कें अपन कथ्य बनौलनि अछि। नाट्यालोचनक दिशा मे पोथीसँँ आधुनिक नाटकक विकास के गति तथा एकटा ब्यापक आयाम भेटैत छैक | तात्यपर्य जे नवीन चेतना सँ भाषा साहित्यक प्रति आकर्षण प्रेम भावना एहि नाटकक प्रेरक प्रसंग छैक । प्रस्तुत नाटक “ संतोक ” Caer पाछू कोलकाता'क एकटा महत्त्वपूर्ण संस्था “अखिल भारतीय मिथिला संघक” प्लान छलैक मिथिला - मैथिल्लीक प्रति जनसाधारणक बीच चेतना- प्रसार आ दायित्व बोध करायब, जकर सर्वाधिक योगदान रहलैक अछि | aie भाव सँ मैथिललीक हित चिंतक परमादरणीय स्व० राजनंदन लाल दास जी मैथिली ऑदोलन के जाति धर्म संम्प्रदाय आ अभिजात्य संस्कारक परिधि के AR Hs मुक्त करेबाक धारणा सँ एकर रचना केने छलाह। हिनका सँ जखन -जखन गप्प होइत Gsa as aw भावना सँ अवगत est Beg जे मिथिलाक सभ जाति, धर्म, वर्णक ser मैथिली ' थिकैक, ताहि अनुप्रेरणा सँ रचलनि सन्तो नाटक, सन्तो नाम लगैत अछि ब्यंगात्मक बा कही जासूसी परंच नाटककार नायकक शॉतचित नाम शंतो दय भाषा क्रॉतिक ऑदोलन के प्रति जनसामान्यक आक्रोस के जगेबाक आत्म गौरव बुझेबाक प्रयास केलनि अछि। राजनंदन बाबू बुझैत छलाह जे ब्यक्ति ओ परिस्थितिक अवधारणा vig साहित्यिक विधाक मार्फेते बुझायब सुलभ बुझलनि।आ अपन मूल धारणा के तकरा जग जाहिर कयलनि अछि। तकर एकटा संवाद के अध्ययन ओ मनन संँ स्पष्ट THe जाइछ यथा: छात्र -४ (प्रश्न करैत), मास्टर सहाएब मातृक्षाषा HAT HoT BH ? शिक्षक: मातृभाषा नहीं समझते हो ? वह भाषा जो हमारी माँ बालती है तथा जिस भाषा मे हम अपनी माँ से बात करते हैं।
छात्र-५ : हमर मातृभाषा की थिक ? शिक्षक : हिन्दी छात्र-६ : हिन्दी ककरा Heat छैक शिक्षक : जो तुम पढ रहे हो , वही हिन्दी है | छात्र -१: मुदा मास्टर साहएब हमर माए एना कहाँ बजैत छैक, आ हमहू सब एना कहाँ बजैत छिऐक ? एहना प्रशनक उतर मे गोलमटोल बात पर छात्र के संतुष्टि ales होइत छैक परिणाम मास्टर साहेब प्रताडित HT मुह चुप कय दैत छथिन्ह | ताहि समय नायक संतोक प्रवेश sed छनि आ वर्तालाप संवाद मे शिक्षक अपन अज्ञानता मे सरकारी ब्यवस्थाकबहाना दय पार प्रयास के संतो परखि da छनि झगड़ा झंझट सँ नीक शॉति भाव संँ संतो महतो ओतय सँ निकलि जाइत छथि ,मुदा समस्याक विस -विसी हुनका लगले रहैत छनि ! शिक्षक'क ओ कथन “मैथिली मे user सँ नोकरी aie जायत, दोसर आब as हिन्दीएक चलती छैक ?” आदि-आदि धारणा सँ ब्यथित संतो अपन भाषा साहित्यिक ब्यथा कें एकटा दोसर रूप मे अनबाक लेल माहोल बनेबाक ध्यय सँ तैयारी करय लगैत अछि | एहि क्रम मे. संतो के संग भटैत छनि रेखाक जे कोलकाताक भाषा साहित्यक कॉति भूमिक ललना जे अंग्रेजी भाषाक छात्रा छथि, संतो के आश्चर्य ata ole अंगरेजी पढलि आ कोलतामे wa हिनका मैथिली सँ कोन लगाव | पश्चात विदुषी रेखाक अपन सभ्यता ओ संस्कृतिक संग मोह आ ममता नहि ea अर्थ भेल शिक्षा सँ Aged नहि छथि, संतोक संग ca मैथिलीक क्रॉतिक अगाह केलनि अछि संतो अपन मार्ग पर बढबाक भावना सँ विभिन्न संस्था संँ संपर्क ata छथि जाहि सँ उत्साहक बदला हतोत्साह बेसी होइत छथि | मुदा रेखा रोल हतोत्साह संतों के संघर्ष करबाक दिशा मे कोरामिनक कार्य ata छनि ।सतत् संघर्षशील संतो के नेता wate वचार सँ दुख होइत oft मुदा सर्वसम्मति सँ संघर्ष समिति acta अछि | आधुनिक मैथिली नाटकक पृष्टभूमि मे सामाजिक ब्यवस्था मे नवीन जीवन चेतना जीवन शैली दिशि अपना के जगेवाक लेल उत्कट भाव जगलैक, अभिशप्त आकॉक्षा के आचार्य नेमीचंद जैनक पॉती उद्धृत करब wigs नाटक “संतोक” प्रसंगे समीचीन सन लगैत अछि | एहि नाटक के पढला उत्तर एहेन सन प्रतीत होइत अछि जे आजुक आदमी के भीतर आ बाहर संघर्ष मे Set भावुकता wor सँ , वास्तविक संघर्ष आ संघर्षे जे ब्यक्ति के विचलित आ विक्षुब्द ata हो आ बाद मे ओ निष्क्रिय निरपेक्ष आ गतिहीन बना दैत छैक ।तकर प्रमाण नाटकक दोसर मे नेता १ आ २ के विचार बहुत कंजर वेटिव रहैत छनि जाहि SF ऑदोलन दुविधा मे पड़ैत अछि, Aer अंतत: ऑदोलन अपन मार्ग पर आगू बढैत अछि | प्रस्तुत नाटकक कथाबस्तु गतिमान जीवन संघर्षक कथा बस्तु थिकैक। नवजागरणक काल जे मैथिली मे साठिक दसकक मध्य आयल पश्चात देखल गेलैक जे नव - नव प्रयोग होमय लागल छल | अहीकालक रचना अछि राजनन्दन बाबूक * संतो” जकर पहिल खेपि 000 प्रति प्रकाशित भेल ten दिसंम्बर (968S0R | राजनंदन बाबू मिथिला संघक कर्मठ चिंतनशील कार्यकर्ता छलाह | हिनका मे सृजनात्मक गुण SAT छलनि vis नाटकक पहिल सफल मंचन i5fedax 968 A सायंकाल कोलकात्ता युनवर्सिटीक इन्सटीच्युट मंच पर Hol रहैक | ओना संघक अध्यक्ष मदन चौधरी बाबू लिखैत छथि “ प्रस्तुत नाटक मे नायक रचना-शिल्प एवं कलाक cite सँ किछु त्रुटि रहितो खूब सफल Hot रहैक | ओना मैथिली मे क्रॉतिकारी नाटक बेसी aie लिखल गेल अछि | स्वातंत्रयोक्त आदि-आदि समस्या के आधार बना पंडित गोविन्द बाबू, सुधॉसुशेखर बाबू,किरण जी ,गंगेश गुंजन ,सहित बहुत रास विद्वान सब लिखलनि मुदा दास जी जाहि प्रसंग a
कथा बस्तुक जिरह कयलनि अछि से एकटा साहित्यिक धारा A नवीन ओ साहसिक प्रवाहक जनक Gere | राजनंदन बाबू | रचना शिल्पक दिशा A एकटा एकटा नवीन प्रयोग कयलन्हि | आ आधुनिक Ae नाटकक पृष्ठिभूमिक अभीप्सित नाटकक कड़ी कही cs कोलकाताक जे मैथिली साहित्यक क्षेत्र मे अपन विशाल आयाम गढने अछि से अहिना नहि ! अपन जिजीविषा ar कुण्ठा के अपन क्षाव a नाट्य कृतिक कथ्य बना प्रस्तुत करब कोनो साधारण लोक सँँ संभव ae अपितु कोनो समर्पित मैथिली सैनानी राजनंदन बाबू सन विद्वत कर्मठ ओ भाषा साहित्यक गंभीर सँ संभव छलैक। ओना नाटक जे fers कमी छलैक ताहि पर मदन बाबू संघक अध्यक्ष कहि देने छथिन् तैं बेस fers लिखब उचित नहि , बल्की कमी Vast GR सब मे अछि जे हम जतहि Gag अपन भाषा साहित्यक विकासक क्षेत्र मे ओही ठाम छी जे हमर सबहिक दुखद पहलू अछि। ऑदोलन जिंदाबाद अछि Har हमसब देशी राजा Heer अपन GAT बना मात्र कबिलती जनाय अपन पीठ अपने ठोकि रहल छी। “मैथिली ऑदोलन जिंदाबाद” कहि अपन खाना पूर्ति क& ta ST | Us अभिनयक vise मंचनक क्रॉति पुरूष अभिनेता नाम देब आवश्यक बुझल जे आई सँ 53/54 वर्ष पूर्व Her छलैक :- पोथी :- सन्तो -लेखक ---- स्व० राजनन्दन लाल दास निर्देशक: = श्री कमल नारायण कर्ण पुरूष पात्र कला क्रॉतिकारीक नाम सन्तो ( क्रॉतिकारी शिक्षित युवक) Edo दयानाथ झा शिक्षक: श्री फेकू मिश्र सरकारी वकील श्री मदन चौधरी सफाई पक्षक वकील श्री महावीर झा पेशकार श्री ब्रम्ह नारायण झा अरदल्ली श्री त्रिभुवन झा संतरी श्री पंचानन मिश्र इंसपेक्टर श्री जगदीश कामत पुलिस श्री पंचानन झा aay गोट आ छात्र ६ TT स्त्री पात्र: रेखा (एकटा शिक्षित क्रॉतिकारी ललना ) सुश्री चंद्रकला किरण, TAT (छात्रा) कुमारी निलम चौधुरी ||
नननण इति 222 BI ot आलेख : आमोद कुमार झा गड़िया कोलकाता गाम: मोगलाहा,बाबुबरही मधुबनी He 943300497
कणम्ितक अद्यतन प्रकाशनक श्रेय दास Wh जाइत BS | एकर भाषा, व्याकरण प्रत्येक अंकक हेतु सामग्री संकलन, चयन, संशोधन, प्रूफ रीडिंग, पत्र व्यवहार, पत्रिकाक छपय सै वितरण धरिक आज ओ सहर्ष उल्लासक संग स्वंय सम्पन्न करैत ST | Ud अवस्था भेलोपरान्त sth ई उल्लास आइ धरि कम नहि भेल अछि | एकटा जीवट मैथिली भाषानुरागी, साहित्य चिन्तक जकर एकमात्र मूल उद्देश्य अछि जे ओ मनुष्य आ समाजकेँ रोग-शोक, अज्ञानता F बचा HS ओहिमे आत्मबलक संचार HS ओकरा मे साहित्यक अक्षय निधि ae सर्वांग रूपेण परिपूण Taare निर्माण करबा मे सहयेगी बनैथ | हम पहिनहिं कहि चुकल छी जे हुनक व्यक्तित्व, कृतित्व, सम्पादकित्व पर किछु कहब-लिखब हमरा एहन नवतुर लेल असंभव अछि, तैयो हम किछु लिखबाक प्रयास कएल जे सूरजकेँ दीप देखाबय जेना अछि | पुनः अपन अल्पज्ञता पर विद्व तजन सैँ क्षमा ARTA अपन लेखनीकँ विराम दैत छी । सादर मुकेश दत्त मिथिलांगन, दिल्ली (स्रोत :- Laity केर विभिन्न अंक 2. चित्रा-विचित्रा 3. मिधिला-मैथिलीक विकास मे कर्णगोष्ठी एवं HUA योगदान 4. पारिवारिक स्वजन) 2
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Taf = e ; ore डी स SNBZ शा ili sell i} थ Sik | aR a al 5 fF | — हा. farsa Ue got t सलाद, dad रेर्व्टिक निवयस ae FC हि. awe उादरणीय न्सीताराम gH कविताक Oe TSEPr ay | -निल मात, भाबा atin, fin प्र { ny id WT eee शुरकीसे तकर She लि ‘ aga जे द्वार = | हे दी ढमरा नें sat मैथिली 7 | : 6la ना Gtld blot हर MPL pet I Mar aid RENTS) सके
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