'विदेह' ३३९ म अंक ०१ फरबरी २०२२ (वर्ष १५ मास १७० अंक ३३९) ऐ अंकमे अछि:- १. गजेन्द्र ठाकुर- संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] २. गद्य २.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्मकथा)- २४म खेप २.२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर- ३६म खेप २.३.डॉ. किशन कारीगर-बोंगपाद बौआक बखारी (हास्य कटाक्ष) २.४.मुन्नाजी- बीहनि कथा- बनबाक हर्ष! २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर (डायरी) 'लव यू टू' २.६.आशीष अनचिन्हार- अनुशासन + विद्रोह = परिवर्त्तन: अनुशासनहीनता +विद्रोह = अराजकता २.७.ज्ञानवर्द्धन कंठ- भाषाक झौहरि ३. पद्य ३.१.दिनकर कुमार- दस टा कविता ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर दू टा कविता ३.३.डाॅ किशन कारीगर- किछो ने करू (हास्य कविता) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह पेटार View Videha googlegroups (since July 2008) view Videha Facebook Official Group (since January 2008)- for announcements १. गजेन्द्र ठाकुर ........................................................................................................................ ........................................................................................................................ [संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो] [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] [FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI ALSO] यू. पी. एस. सी. (मेन्स) २०२० ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा २०२० सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, २०२० मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २ TEST SERIES-1 TEST SERIES-2 [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल/ FOR NTA-UGC-NET-MAITHILI] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01 NTA_UGC_NET_MAITHILI_02 NTA_UGC_NET_MAITHILI_03 (श्री शम्भु कुमार सिंह द्वारा संकलित) Videha e-Learning MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) UPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS BPSC MAITHILI OPTIONAL SYLLABUS मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक) मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य) मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक) मैथिलीक वर्तनी १ भाषापाक २ मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि| IGNOU इग्नू BMAF-001 ........................................................................................................................ MAITHILI (OPTIONAL) TOPIC 1 [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] TOPIC 2 (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) TOPIC 3 (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) TOPIC 4 (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) TOPIC 5 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) TOPIC 6 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) TOPIC 7 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) TOPIC 8 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) TOPIC 9 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) TOPIC 10 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) TOPIC 11 (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) TOPIC 12 (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) TOPIC 13 (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) TOPIC 14 (आधुनिक नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या- शम्भु कुमार सिंह)् TOPIC 15 (स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता- अरुण कुमार सिंह) TOPIC 16 (यू. पी.एस.सी. मैथिली प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण- शम्भु कुमार सिंह) TOPIC 17 (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-“ए”, क्रम-५]) TOPIC 18 [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] ........................................................................................................................ GENERAL STUDIES (PRELIMINARY & MAINS) GS (Pre) TOPIC 1 GS (Mains) NCERT-ENVIRONMENT CLASS XI-XII NCERT PDF I-XII TN BOARD PDF I-XII ALL INDIA RADIO ENGLISH NEWS ALL INDIA RADIO NEWS ARCHIVE ALL INDIA RADIO TALKS AND CURRENT AFFAIRS RAJYA SABHA TV NEWS DISCUSSIONS SANSAD TV OTHER OPTIONALS IGNOU eGYANKOSH (अनुवर्तते) -गजेन्द्र ठाकुर २. गद्य २.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्मकथा)- २४म खेप २.२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर- ३६म खेप २.३.डॉ. किशन कारीगर-बोंगपाद बौआक बखारी (हास्य कटाक्ष) २.४.मुन्नाजी- बीहनि कथा- बनबाक हर्ष! २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर (डायरी) 'लव यू टू' २.६.आशीष अनचिन्हार- अनुशासन + विद्रोह = परिवर्त्तन: अनुशासनहीनता +विद्रोह = अराजकता २.७.ज्ञानवर्द्धन कंठ- भाषाक झौहरि जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्मकथा)- २४.स्वर्गक दुख : दुखसँ मुक्ति 2001 मे 6 अगस्त क’ हम वृहत शाखा सदर बाजार,रायपुरमे वरिष्ठ प्रबंधकक पदपर कार्य भार ग्रहण केलहुँ | जबलपुरसँ जे साहू जी आएल छलाह, से आंचलिक कार्यालयमे वरिष्ठ प्रबंधकक पदपर कार्य भार ग्रहण केलनि | शाखाक वरिष्ठ प्रबंधक जी. एल.राठी साहेब 8 क’ भारमुक्त भेलाह | कर्मचारी-अधिकारी सभक संख्या 20 सँ बेशी छलै, एहिमे पाँचटा महिला छलीह | दूटा प्रबंधक छलाह | परिचालनमे एन. के.ब्राहा आ अग्रिममे आर. शंकर प्रबंधक छलाह |अग्रिममे दूटा और अधिकारी छलाह | शेष अधिकारी-कर्मचारी सभ परिचालन विभागमे छलाह | अधिकारी यूनियनक महासचिव एम.के.अग्रवाल साहेब सेहो ओही शाखामे छलाह | रायपुरमे हमर अभिभावक छलाह क्षेत्रीय कार्यालयमे क्षेत्रीय प्रबंधक आ आंचलिक कार्यालयमे दूटा मुख्य प्रबंधक आ आंचलिक प्रबंधक महोदय | जहिया शाखामे योगदान देने रही, ओही दिन औपचारिकताक निर्वाह करैत क्षेत्रीय प्रबंधक आ आंचलिक प्रबंधक महोदयसँ भेंट कर’ गेलहुँ | आंचलिक प्रबंधक महोदय पुछलनि, ‘एम.के.अग्रवालसँ अहाँकें कोन सम्बन्ध अछि ? हम कहलियनि, ओ हमरा यूनियनक महासचिव छथि | फेर पुछ्लनि, अग्रवाल जे कहता से अहाँ करब आकि जे बैंक कहत से करब | हम कहलियनि, हमरा त हुनको सहयोग लैत बैंकक काज करबाक अछि | बादमे पता चलल जे सदर बाजार, रायपुर शाखामे हमर पदस्थापनमे हमरा यूनियनक महासचिव अग्रवाल साहेबक जोर छलनि | हमरा मोनमे जिज्ञासा भेल छल जे जखन अग्रवाल सहेबक जोरपर ओ हमर पदस्थापन कोनो शाखामे क’ सकैत छथि तखन ई पुछबाक की अभिप्राय छलनि जे अग्रवाल साहेब जे कहता से अहाँ करब आकि जे बैंक कहत से करब | बहुत बादमे हमरा एकर समाधान भेटल | आवासक व्यवस्था : साहूजी जबलपुरसँ अबैत काल एकटा डेराक चाभी ल’क’ आएल छलाह | देवांगन जी जे जबलपुर क्षेत्रीय कार्यालयमे अधिकारी छलाह, हुनकर घर रायपुरमे समता कॉलोनीमे छलनि, ओही आवासक चाभी देवांगनजी हुनका द’ देने छलखिन | एक साँझ दुनू गोटे गेलहुँ देख’ | साहूजी के ई डेरा आंचलिक कार्यालयसँ दूर लगलनि, ओ आंचलिक कार्यालयसँ कम दूरीपर अपना लेल आवास तकलनि आ ई आवास देवांगनजीसँ बात क’ क’ हमरा दिया देलनि | एहि तरहें समता कॉलोनीमे आसानीसँ हमर आवासक व्यवस्था भ’ गेल | ओहि आवासमे हम दिसम्बर 2003 धरि रहलहुँ | देवांगन जीक स्थानान्तरण जबलपुरसँ रायपुर भेलनि त ओ हमरा सुचित केलनि, हुनका अपने अपन आवासमे रहबाक छलनि | दोसर आवास तकबामे ओ सहयोग केलनि आ ओही मोहल्लामे सेन्ट्रल बैंकक अवकाशप्राप्त अधिकारी सोनकर जीक नवनिर्मित मकानमे रायपुरमे शेष समय धरि रहबाक लेल आवासक व्यवस्था भ’ गेल | चाकरीक दुख-सुख : शाखाक दैनिक कार्यक निराकरण परिचालन आ अग्रिम विभागक प्रबंधक लोकनिक देख-रेखमे चलैत छल | अग्रवाल साहेब सेहो अपन काज नियमित रूपसँ करैत छलाह | ओ शाखामे सभसँ पहिने आबि जाइत छलाह | यूनियनक काज ओ डेरेपर करैत छलाह | हमर मुख्य काज छल क्षेत्रीय कार्यालय, आंचलिक कार्यालयक निदेशानुसार मीटिंग सभमे भाग लेब,क्षेत्रीय प्रबंधक,आंचलिक प्रबंधक महोदयसँ निरंतर सम्पर्क राखब,दुनू कार्यालयक कोनो पत्रक तुरन्त जबाब देब,ऑडिट रिपोर्टक अनुसार अनियमितताक निराकरण निर्धारित अवधिमे सुनिश्चित करब, कैश क्रेडिट खाता सबहक संचालनपर निगरानी राखब,कोनो अनियमितता देखलापर ओकर मालिक/पार्टनर/ निदेशक आदिसँ संपर्ककय खाताकें नियमित रखबाक लेल फोन-फान, दौड़-धूप करब,अपन निर्धारित सीमाक अंतर्गत कोनो प्रकारक ऋण स्वीकृत करबाक लेल जांच-पड़ताल आदि सुनिश्चित करब, शाखाक विरुद्ध कोनो शिकायतक शीघ्र निराकरण सुनिश्चित करब, पैघ-पैघ खाताधारक सभसँ सम्पर्क राखब आदि | एहि काज सभमे मदति करबाक लेल प्रबंधक आ सहायक प्रबंधक सभ छलाह | अंततः शाखाक कोनो त्रुटिक लेल जबाबदेही हमरेपर छल | एहि शाखामे बहुत एहेन काज छलै जे हमरा लेल नव छल, एहि लेल अतिरिक्त समय देब’ पड़ल | हम दोसरेक भरोसपर नहि रह’ चाहैत छलहुँ, तें लागि-भीड़िक’ सिखबामे आनन्द अबैत छल | एत’ कंप्यूटरक उपयोग करब सेहो सिखलहुँ | सभ शाखासँ सभ शुक्र दिनक’ शाखाक स्थितिक जानकारीसँ नियंत्रक कार्यालय सभकें अवगत करयबाक विधान छैक | शाखामे एकटा खाता एहेन छलै जाहिमे कोनो सप्ताहमे दस-बारह करोड़ तक पाइ जमा भ’ जाइ छलै त पूरा रायपुर क्षेत्र आ रायपुर अंचलक आँकड़ा बढि जाइ छलै आ कोनो सप्ताहमे दस-बारह करोड़ निकलि जाइ छलै त पूरा क्षेत्र आ अंचलक आँकड़ा कम भ’ जाइ छलै | बढि जाइ छलै त ठीक मुदा जखन घटि जाइ छलै त आंचलिक प्रबंधक आ क्षेत्रीय प्रबन्धकक फोन आब’ लगैत छल, स्पष्टीकरण माङल जाइ छल, कोनो तर्कसँ सहमत नै होइत छलाह, तामस अन्तरित होइत रहैत छल | |हुनको सभ लग एकर निदान नै छलनि | सम्बंधित खाताक संचालककें अनुरोध करैत छलियनि त कहैत छलाह, हमरा खातामे त अहिना लेन -देन चलत, अहाँ सभकें नै नीक लगैए त कहू हम सभ दोसर बैंक खाता ल’क’ चलि जाइत छी | एहि महत्वपूर्ण खाताकें दोसर बैंक जाए देब सेहो ठीक नै छलै | शाखामे एक-दूटा एहेन खाता छलै जाहिमे निर्धारित समयसँ किछु पहिने बहुत मात्रामे नकद राशि बड़का मोटामे आबि जाइत छलैक जमा करबाक लेल | बैंकक नियमक अनुसार ओकरा मना नहि कयल जा सकैत छलै | नोट गनबाक एकटा मशीन रहितो पूरा नकद गनबामे बहुत समय लागि जाइत छलै आ बैंक निर्धारित समयसँ दू-चारि घंटा बादो धरि खूजल रहैत छलै | प्रबंधक,परिचालन अपन टीम संगे लागल रहैत छलाह, हमरा कहैत छलाह अहाँ चलि जाउ | ई एकटा परम्परा जकाँ बनि गेल छलै | हमरा चिंता होइ छल जे एतेक काल धरि बैंक खुजल रहबाक कारण कहियो कोनो अप्रिय घटना ने घटि जाइ, से हेतै त हमहूँ जबाबदेहीसँ बचि नहि सकब | हम एकर निदान तकबाक प्रयास केलहुँ मुदा निदान नहि भेटल | शाखाक गेट भीतरसँ बन्द क’ क’ नोट गिनतीक काज करैत जाइत छलाह, तें सुरक्षाक दृष्टिसँ त खतरा नै छलै, मुदा एहिसँ किछु आन समस्या उत्पन्न होइत छलैक | एक त नोटक गिनती मशीनसँ होइत छल मुदा पैकेट बहुत रहबाक कारण किछु गोटे हाथसँ सेहो गिनती करैत छलाह जाहिमे त्रुटिक आशंका रहैत छलैक | दोसर समस्या ई छलै जे शाखामे धारित नगदी ( Cash in hand ) निर्धारित सीमासँ बहुत बेशी भ’ जाइत छलैक कारण बहुत देरी हेबाक कारण आ किछु आन कारणसँ अतिरिक्त राशि करेंसी चेस्टमे ओहि दिन जमा नहि भ’ पबैत छलै | निर्धारित राशिसँ बेशी नकद राशि शाखामे रहि जेबाक खबरि क्षेत्रीय प्रबंधक आ आंचलिक प्रबंधककें सेहो पहुँचि जाइत छलनि आ ओकर परिणाम हमरा धरि पहुचैत छल से अप्रिय रहैत छल | एक दिन एहि अनियमितताक एकटा परिणाम आएल | एक आदमी (ग्राहक) नोटक एकटा पैकेट नेने आएल जे हमरे शाखा द्वारा देल गेल छलै, ओहिपर हमरे शाखाक दू गोटेक हस्ताक्षर छलनि | ओहि सौ के पैकेटमे किछु पचास आ किछु दसक नोट छलैक जे गिनती करबा काल सम्बंधित अधिकारी –कर्मचारीक ध्यानमे नहि आएल छलनि | एना लगैत छलै जे ओ पैकेट कोनो दोसर बैंकसँ जारी भेल छलै आ हमरा शाखामे जमा भेल छलै | एत’ अपना शाखाक स्लिप लगाक’ हस्ताक्षर करबा काल चूक भेल छलै, फेर दोसर व्यक्तिकें देबा काल सेहो चूक भेलै आ ग्राहक सेहो ओहि दिन ई नहि बूझि सकलाह | हम तुरन्त सम्बंधित प्रबंधककें कहलियनि जे खजाना विभाग द्वारा ओहि ग्राहककें सही पैकेट दिया देथिन, ओ कहलनि जे प्रधान खजांची एकटा दोसर शाखामे गेल छथि, अबै छथि त हिनका दोसर सही पैकेट दिया दैत छियनि | हम ओहि ग्राहककें हुनकहि लग बैसाक’ निश्चिन्त भ’ क’अपना स्थानपर आबि दोसर काजमे लागि गेलहुँ | दोसर दिन स्थानीय दैनिक पत्रमे ई समाचार प्रकाशित भेलै तखन सम्बंधित प्रबंधकसँ हमरा पता चलल जे खजांचीकें दोसर शाखासँ एबामे देरी भेलनि, ओ ग्राहक कखन चल गेलाह से हुनको नहि पता चललनि | बात अखबारमे आबि गेलासँ भारी भ’ गेलै | क्षेत्रीय कार्यालय हस्तक्षेप केलक | जाँच भेलै | ग्राहककें तत्काल बजाक’ हुनका दोसर पैकेट दियाओल गेलनि | पैकेटपर हमरा शाखाक जाहि अधिकारी-कर्मचारीक हस्ताक्षर छलनि हुनका सभसँ स्पष्टीकरण लेल गेल | स्ट्रांग रूम बंद करबामे निर्धारित समय-सीमाक पालन सुनिश्चित करबाओल गेल | सम्बंधित खातेदार सभकें एहि निर्णयसँ अवगत कराओल गेलनि | हमर तनाव किछु कम भेल | एक दिन स्ट्रांग रूम बंद भेलाक किछु कालक बाद एकटा चपरासी आबि कहलक जे स्ट्रांग रूमक भीतरसँ किछु आवाज आबि रहल अछि | हमहूँ लग जाक’ यैह अनुभव केलहुँ | प्रबंधक,परिचालनकें पुछलियनि जे अन्तमे लाकरक परिचालन लेल के आएल छलाह, त रजिस्टरमे देखल गेल जे एकटा अपने बैंकक सेवानिवृत अधिकारी आएल छलाह, हुनकर जेबाकालक समयक विवरण सम्बंधित रजिस्टरमे अंकित नै छलै | तुरन्त स्ट्रांग रूम खोलल गेल त ओ सज्जन घामे-पसीने तर-बतर भेल निकललाह | हुनका अपना चैम्बरमे बड़ी काल बैसौलियनि, सामान्य भेलाह तखन पुछलियनि जे जखन बंद हुअ’ लगलै तखन ओ किए ने बजलखिन त कहलनि जे हमरा किछु ने बुझाएल कोना की भेलै | ओहि दिनक बाद दू दिन बैंक बंद रहबाक छलै | ओहि दिन यदि हुनका नहि निकालल गेल रहैत त की होइतै, से सोचि बड़ी काल धरि हम किछु-किछु सोचैत रहि गेलहुँ | प्रबंधक,परिचालन सतर्क भेलाह | एहेन घटना दोबारा कहियो नहि घटलै | हमरा ऋण स्वीकृत करबाक लेल कोनो दबाबक अनुभव नहि भेल, किन्तु जल्दी निर्णय लेबाक लेल अपनाकें आ अपना टीमके तैयार रखबाक आवश्यकता लगैत छल |अपन पवित्रताकें बचाक’ रखबाक आ यथासंभव शीघ्र निर्णय लेबाक क्षमतासँ अपनाकें तैयार रखबाक लेल सतर्क रहैत छलहुँ | एक बेर छप्पन लाखक एकटा प्रस्ताव क्षेत्रीय कार्यालयसँ हमरा शाखामे आएल | प्रबंधक, अग्रिम किछु दिनक अवकाशमे छलाह | हुनका एबा तक प्रतीक्षा करितहुँ त देरी भ’ जैतै | हम एकटा जीप भाड़ापर लेलहुँ | दिन भरि समय द’ क’ प्रस्तावित कार्यस्थलपर जाक’ आवश्यक जाँच-पड़ताल केलहुँ | ओ स्थान करीब चालीस किलोमीटरसँ बेसी दूर छलै, ओहि ठाम लगेमे भारतीय स्टेट बैंकक एकटा शाखा छलै, आवेदककें सम्बंधित काज करबाक लेल कोनो योग्यता अथवा अनुभव नै छलनि | हमरा लागल जे एते दूरसँ गतिविधिपर नियंत्रण राखब सेहो संभव नै छै | कोनो तरहें हमरा ई प्रस्ताव स्वीकृतियोग्य नहि लागल | हम अपन निरीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करैत ओहि प्रस्तावक अस्वीकृतिक सूचना क्षेत्रीय कार्यालयकें सात दिनक भीतरे पठा देलियनि | क्षेत्रीय प्रबंधक हमरा बजौलनि | हमरा लागल जे ओ हमर अस्वीकृतिसँ संतुष्ट नहि छथि | ओ टेबुलपर तबला बजबैत शोले फ़िल्मक एकटा डायलाग बजलाह : ‘ठाकुर .......... ‘ हम कहलियनि, हमरा जे ठीक लागल से हम रिपोर्ट केलहुँ, अहाँ चाही त हमरा अपन इच्छा अनुसार सलाह अथवा आदेश द’ सकैत छी, हम ओकर पालन करब | मुदा, फेर कहियो ओहिपर कोनो गप नै भेल | अग्रिम बढ़तै त शाखाक लाभ बढ़तै आ अग्रिमक लक्ष्य पूर्ण हेतै तें नियंत्रक कार्यालय सेहो अपना स्तरसँ नीक प्रस्ताव कोनो शाखाकें उपलब्ध करयबामे सहयोग करैत छल, मुदा शाखा द्वारा प्रस्तावक गुणवत्ता सुनिश्चित करब अनिवार्य रहैत छलैक | एक बेर हमर ओहि ठामक सभसँ पैघ अभिभावक कहलनि, हमर मकान मालिकक भागिनकें व्यवसायक लेल दस लाखक ऋणक आवश्यकता छनि, से जाथि त देखि लेबनि | ईहो कहलनि जे देखि-सूनिक’ निर्णय लेब, आँखि मूनिक’ ऋण स्वीकृत करबाक लेल हम नै कहैत छी | हम कहलियनि, ठीक छै सर, जल्दीए भ’ जेतै | हम अपन शाखाक अग्रिम विभागक प्रबंधककें कहलियनि ई बात | दू-तीन दिनक बाद ओ व्यक्ति अपन आवश्यक कागज़ सभ ल’ क’ एलाह | हुनकासँ आवश्यक पूछ-ताछ,जाँच-पड़ताल क’ क’ हुनक पछिला तीन सालक लाभ-हानि आ तुलन पत्रक अध्ययन क’ क’ हुनका ओकर प्रातहि दू लाखक स्वीकृति-पत्र उपलब्ध करबैत कहि देल गेलनि, यदि अहाँ स्वीकृत ऋणक उपभोग कर’ चाहैत छी त बैंकक दस्ताबेज सभपर हस्ताक्षर करू | ओ सज्जन चल गेलाह, फेर नै एलाह | किछु दिनक बाद हमरासँ ओहि विषयमे पूछल गेल त सभटा बात कहि देलियनि | कहलनि, हुनका दस लाखक आवश्यकता छलनि |कहलियनि, बैंकक नियमानुसार हुनका दू लाखसँ बेसीक स्वीकृति नै प्रदान कएल जा सकैत छलनि | ओ आगू नै किछु पुछलनि आ ओहि कारणसँ हमर कोनो अहित भेल हो से हमरा नै अनुभव भेल | एक दीयाबाती दिन साहेब फोन केलनि :’ हैप्पी दीपावली |’ हम फोनपर नमस्कार केलियनि | ओ नाराज भ’ गेलाह | कहलनि, तुम्हारे माँ-बाप ने यह संस्कार नहीं दिया कि अपने बड़े को ‘हैप्पी दीपावली’ बोलो ? हम ‘सॉरी सर !’ कहैत कहलियनि, सर हमें तो बुजुर्गों के चरण-स्पर्श करना, नमस्कार या प्रणाम कहना सिखाया गया है, फिर भी अगली बार से हम वही कहेंगे जो आप चाहते हैं | ओकर बाद ओ सामान्य स्थितिमे आबि गेलाह आ पारिवारिक हाल-समाचार पूछ’ लगलाह | ओकरा बाद नियत तिथिक’ सभसँ पहिल काज हुनका फोनपर ‘हैप्पी होली’ आ ‘हैप्पी दीपावली’ आदि कहब नै बिसरैत छलहुँ | मुदा ताहिसँ की ! नाराज हेबाक लेल दोसर कारण भेटि जाइत छलनि | उच्च अधिकारी लोकनिक डाँट-फटकार सुनबाक लेल बहुत तरहक स्थिति उत्पन्न होइत रहैत छलैक | एन.पी.ए.मे वृद्धि, लाभ-जमा-अग्रिम आदि मदमे लक्ष्यक पूर्तिमे असफलता, कोनो विवरण प्रस्तुतिमे देरी, कोनो खातासँ बेशी मात्रामे निकासी, निर्धारित सीमासँ बेशी धारित नगदी (Cash in Hand ) आदि किछु एहेन विषय छलै जे ऊपरसँ वरिष्ठ प्रबंधक धरि क्रोधक प्रवाहकें बल प्रदान करैत रहैत छलै | एक दिन हमरासँ पूछल गेल जे हमरा शाखाक कोनो ग्राहक द्वारा हुनका विरुद्ध शिकायत किए कएल गेल छनि | हमरा एकर किछु अर्थ नै लागल | हमरा कहल गेल जे हमहीं ई शिकायत करबौने हेबनि | हम कहलियनि जे हमरा शाखाक कोनो ग्राहककें हमरासँ शिकायत भ’ सकैत छै, हुनकासँ किए हेतनि | ओ पुछ्लनि, तखन हुनका विरुद्ध शिकायत किए कएल गेल छनि | हम कहलियनि जे हमरा किछु नै बूझल अछि, हमरा कही त पता लगाक’ एकर सूचना दी | हुनकासँ शिकायतकर्ताक नाम पूछि हम तत्काल ओहि ग्राहकसँ संपर्क केलहुँ | हुनका पुछलियनि जे हमरा शाखासँ भेल कोनो त्रुटिक लेल हमरा विरुद्ध शिकायत क’ सकैत छी, हमरा उच्च अधिकारीक विरुद्ध शिकायत किए केलियनि | ओ कहलनि, बिना कारण हम त एकटा चुट्टी तककें दुख नै द’ सकैत छी, कोनो व्यक्तिकें दुख देबाक प्रश्ने नै उठैत छैक, हमरा अहाँक शाखासँ कोनो शिकायत नै अछि, त अहाँक विरुद्ध किए शिकायत करब, जिनकासँ दुख भेटल अछि, हुनका विरुद्ध कएल गेल छनि | ओ आगाँ कहलनि, हमर प्रतिनिधि हुनकासँ कय बेर भेंट करय गेलाह मुदा सभ बेर ओ मना क’ देलखिन,एहेन बात नै छै जे ओ ककरोसँ भेंट नै करैत छथि, यैह हमर शिकायत अछि | ओत’सँ अपना शाखामे आबि हम अपन उच्चाधिकारीकें फोनपर कहि देलियनि | ओ कहलनि, हमरा एते समय नै अछि जे हम सभसँ भेंट करैत रहू | हम कहलियनि, ओ हमरा शाखाक सम्मानित ग्राहक छथि, बहुत नीक लोक छथि,हुनका होइ छनि जे हमरे संग एना कएल जा रहल अछि तें दुखी छथि, हमरा लगैत अछि जे एक बेर किछु समय निकालिक’ हुनकासँ भेंट क’ लियनु त अहूँकें नीक लागत आ हुनकर सभ शिकायत खतम भ’ जेतनि | साहेब गेलाह | भेंट केलखिन | शिकायतकर्तासँ गप भेलनि | शिकायतकर्ताक दुख दूर भ’ गेलनि | साहेबकें सेहो नीक लगलनि | हमरा फोनपर सुचित केलनि आ कहलनि जे हुनकासँ भेंट क’ क’ शिकायत निवारणक एकटा पत्र लिखबाक’ हमरा फैक्स करबाउ | हम तुरन्त गेलहुँ | ग्राहकसँ भेंट केलहुँ | ओ प्रसन्न छलाह | हुनकासँ उपयुक्त पत्र लिखबाक’ साहेबकें फैक्स द्वारा उपलब्ध करबा देलियनि | हम लोक सभसँ, शाखाक अधिकारी-कर्मचारी सभसँ गप-सप आ व्यवहारमे शालीनता रखैत छलहुँ, ऋण स्वीकृत करबामे बेशी देरी नै करैत छलहुँ, जिनका बैंकक नियमानुसार ऋण स्वीकृत नै कएल जा सकैत छलनि, हुनका विनम्रतापूर्वक अपन असमर्थता कहि दैत छलियनि, तें लोकक अथवा कोनो स्टाफकें हमरासँ शिकायत नै रहै छलै किन्तु हमरा उच्च अधिकारीक विचारक दर्पणमे अपन छवि नीक नहि लगैत छल | मोबाइलक ज़माना आबि गेल छलै, किन्तु पैघे लोक सभ लग ओहि समय उपलब्ध छलै | मोबाइल साहेब सभकें दिव्य दृष्टि प्रदान करैत छलनि | साहेब कतहु रहैत छलाह त हुनका पता चलि जाइत छलनि जे कोन शाखामे की भ’ रहल छै | एक दिन एकटा खातासँ खातेदार अपन व्यवसाय हेतु पाँच करोड़ राशि अन्तरित करबौलनि | साहेबक मुँहसँ आगि निकल’ लगलनि | धधरा मोबाइलक माध्यमसँ हमरा कान धरि आएल | सभ दिन एहि आगिसँ अपना मोनकें बचयबाक प्रयास करय पड़ैत छल | ‘कुछ तो रहम करो यार, जरा ठीक-ठाक ब्रांच चलाओ, मैं समझता हूँ तुम शरीफ आदमी हो, मगर पिउनसे, क्लर्क से डरने की क्या जरूरत है,मैं हूँ न !’ ‘मुझे दुख होता है जब लोग कहने आते हैं कि तुम पिउन से भी डरते हो-ऐसे मैनेजरी से अच्छा है वी. आर. एस. ले लो | ज़माना बदल गया है, अब रिजल्ट अच्छा नहीं देनेवालों को बैंक लात मार कर बाहर कर देगा- मैं थोड़ा हार्स जरूर बोलता हूँ पर मैं जो कहता हूँ उसे अकेले में बैठकर सोचो |’ एकटा नीक बात ई छल जे सार्वजनिक रूपसँ कहियो कोनो अप्रिय बात नै बजैत छलाह, जे कहैत छलाह से फोनपर | तें ई लगैत छल जे सभ वरिष्ठ प्रबंधक सभकें हड़काक’ राखब अथवा जगाक’ राखब ओ अपन धर्म बुझैत छलाह, बैंकक हितमे बुझैत छलाह | हुनक धर्मक समय निश्चित नै रहैत छलनि | कहियो 10 बजे रातिमे, कहियो 8 बजे सबेरे अथवा दिनमे कखनो | हम अपना कें संयमित आ संतुलित रखबाक लेल किछु काल साहित्यक शरणमे जाइत छलहुँ | ओशोक कोनो पोथीक एक-दू पृष्ठ अथवा हरिमोहन बाबूक कोनो रचना पढ़ब अथवा कैसेटमे दादा पल्टू मुखर्जी द्वारा गाओल अपन किछु गीत सूनब हमरा लेल संजीवनीक काज करैत छल | हमर आत्मबल बढ़ि जाइत छल |एहि लेल हमरा कहियो शराबक शरणमे जाएब पसन्द नहि पड़ल | हम एसगरमे बैसिक’ सोचलहुँ, हमरा हुनक टिप्पणीक कोनो अर्थ नै लागल | हम निर्णय लेलहुँ जे साहेबसँ हुनका डेरा पर जाक’ कहियनि जे हमरा कोनो अर्थ नै लगैए, अहीं हमरा कनी बुझा दिय’ जे हमरासँ की गलती भ’ रहल अछि आ हमरा की करबाक चाही | हम एक दिन दू किलो सेव ल’क’ साहेबसँ भेंट कर’ विदा भेलहुँ | ओ जत’ रहैत छलाह ओहि मोहल्लामे एकटा परिचित अधिकारीक आवाससँ हम फोन क’क’ कहलियनि जे हम भेंट कर’ आबि रहल छी | साहेब कहलनि जे आइ किछु सम्बन्धी सभ आएल छथि तें आइ नै आउ | हम घुरि गेलहुँ | फेर कहियो डेरा पर भेंट करबाक नियारक सुयोग नै बनल | एक दिन हमरा ज्ञान भेल | हम सोचलहुँ, साहेब जे सोचैत छथि ताहीमे बैंकक हित हेतै | मुदा ओ की चाहैत छथि ? एक दिस कहैत छथि तुम आदमी अच्छे हो, दोसर दिस कहैत छथि रिजल्ट अच्छा नहीं देनेवालों को बैंक लात मारकर बाहर कर देगा | मतलब ओ हमरा नीक वरिष्ठ प्रबंधक नै मानैत छथि, मतलब हुनका नजरिमे अवश्य कोनो एहेन लोक छनि जे हुनका मनोनुकूल आ बैंकक हितक लेल उपयुक्त रहतनि | हम ईहो अनुभव केलहुँ जे जहिया हमरा अवकाशमे जेबाक होइए त ओ प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृति द’ दैत छथि, हम एहिमे हुनक उदारता अथवा कृपाक अनुभव करैत छलहुँ | कखनो-कखनो ईहो सोचैत छलहुँ जे हमर छुट्टीमे रहब बैंकक हितक कतेक अनुकूल होइत हेतैक | हम कल्पना केलहुँ जे यदि हम एहि शाखामे एहि पदपर नै रही त शाखाकें कतेक लाभ हेतैक | हमरा शाखाक कल्याणक सूत्र हाथ लागि गेल | 2001 मे 6 अगस्तक’ हम शाखामे आएल रही | 2002 मे 20 दिसम्बर क’ हम ऑफिसमे अग्रवाल साहेबकें कहलियनि जे हमरा मदति करथि आ जहिना जोर लगाक’ हमर पोस्टिंग एत’ करबौने छलाह तहिना एत’सँ स्थानान्तरण करयबामे हमर सहयोग करथि,हम आभारी रह्बनि | अग्रवाल साहेब हमरा बुझौलनि, एना किए परेशानीक अनुभव क’ रहल छी, हम छी एहि ठाम, कियो अहाँक किछु नै बिगाड़ि सकैए, अहाँ निश्चिन्त भ’ क’ रहू | हम जखन कहलियनि जे बैंकक हितमे आ अपनो हितमे ई हमरा आवश्यक लगैए, तखन अग्रवाल साहेब पुछ्लनि जे कत’ जाएब, राजनन्दगाँवमे वरिष्ठ प्रबन्धकक पद खाली छै,ओत’ जाएब ? हम कहलियनि जे रायपुरमे कोनो दोसर ब्रांच अथवा कोनो आन कार्यालयमे होइत त हमरा डेरा बदलबाक काज नै पड़ैत | अग्रवाल साहेब कहलनि जे तखन जोनल ऑफिसमे भ’ सकैए, मुदा ओत’ त फेर हुनकासँ भेंट हैत | हम कहलियनि जे हमरा हुनकासँ कोनो परेशानी नै अछि, ओहो हमरा नीक लोक त कहिते छथि, एहि शाखाक लेल नीक वरिष्ठ प्रबंधक नै मानैत छथि, हम अपने जखन एहि ठामसँ हट’ चाहैत छी त ओ जे चाहैत छथि से पूर भ’ जेतनि आ ई बैंकक हितमे हेतै, हमरा जतेक वेतन एत’ भेटैए से त भेटबे करत, एकटा मानसिक तनावसँ हम मुक्त भ’ जाएब-से हमरो लाभ हैत | 23 दिसम्बरक’ अग्रवाल साहेब सूचित केलनि जे हमर स्थानान्तरण आंचलिक कार्यालयमे करबापर सहमति भेटि गेल अछि | हम बहुत आनन्दित भेलहुँ | 26 दिसम्बर क’ हमरा स्थानान्तरण आदेश प्राप्त भ’ गेल | 2003 मे 2 जनबरी क’ आंचलिक कार्यालयसँ बनर्जी साहेब एलाह हमरा स्थानपर काज करबाक लेल | 4 जनबरी क’ हम सदर बाजार, रायपुर शाखासँ भारमुक्त भए 6 जनबरीक’ आंचलिक कार्यालय, रायपुरमे योगदान केलहुँ | पटना / 27.01.2022 (क्रमशः) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रबीन्द्र नारायण मिश्र लजकोटर -३६- हम एतेक दिनसँ मदनबाबूक संपर्कमे छी, हमरे गामक छथि से अखन धरि नहि बूझल छल। हुनकर अतीतक बारेमे बहुत कम बूझल अछि । कैक बेर मोनमे होअए जे पुछिअनि। ओहि दिन अपन समाज संस्थाक कार्यक्रमक बाद हमरा संगे अपना ओहि ठाम लेने गेलाह। हम सभ सोफापर बैसले रही कि एकटा बेस गरिमा युक्त महिला बहरेलीह। हुनका देखितहि मदन बाबू कहैत छथि - "हिनका चिन्हलिअनि? इएह छथि हमर श्रीमतीजी - मोहिनी । अपन सभक गामेक लगेमे इहपुर हिनकर गाम छनि। मुदा कहिओ गाममे रहलथि नहि। हिनकर पिता कलकत्तामे बहुत दिनसँ रहैत छलाह। ओतहि हुनकर नीक व्यापार छल। हमरा संगे बिआह भेलाक बाद थोड़बे दिन गाममे रहलीह। मुदा ओहि ठाम कोनो सुविधा नहि छलैक । हम हुनका संगे दिल्ली आबि गेलहुँ। चाह-पानक दोकान खोललहुँ, की-की नहि केलहुँ। तहिआसँ कहिओ घुमिकए नहि देखलहुँ। कोनो काज करबामे हमरा कहिओ संकोच नहि भेल मुदा गलत काज कहिओ नहि केलहुँ, ने गलत आदमीक संगे रहलहुँ। हमर सफलताक इएह मूल मंत्र बनि गेल, जे बहुत कारगर साबित भेल। आब अपनो आश्चर्य लगैत अछि जे हम कोना एतेक कए सकलहुँ। हमरो तरह-तरहक परेसानी भेल। बहुत गोटे मदतिओ केलक। मुदा हम अपन काजमे लागल रहलहुँ।” हम सभ गप्प कइए रहल छलहुँ कि मोहिनी स्वयं चाह लेने अएलीह। "चाह पीबू। ई तँ एहिना अहाँकेँ फदका सुनबैत रहि जेताह"- हुनकर श्रीमतीजी बजलीह। हमरा हुनकर बात सुनिकए हँसी लागि गेल। चाह-पान होइत रहलैक आ गप्पो बढ़ैत रहल। गप्पकेँ आगा बढ़बैत ओ कहैत छथि -"ओहि समय दिल्लीमे अपना ओहि ठामक लोककेँ हालत ठीक नहि रहैक। बेसी लोक छोट-मोट काज कए गुजर करए। किछु गोटे नीको-नीको पदपर रहथि मुदा ओहो सभ की करितथि? कतेककेँ पार लगबितथि। फेर अपना ओहि ठामक लोको सभ तँ तेहने फसादी। जाही थारीमे खाएब, ताहीमे भूर करब। एहन बहुत दृष्टान्त सभ होइत रहल। "धुर्र! जाए दिअ, बीतल बात सभकेँ बिसरु। एकरा गीरह बान्हि कए रखने जिनगी चलत?"- मोहिनी बजलीह। "से अहाँ सही कहि रहल छी मुदा मोन तँ पड़िए जाइत छैक। "- मदन बाबू बजलाह। "आगा एहन प्रयास करू जाहिसँ फेर दोसर लोक सभकेँ एहन समय नहि देखए पड़ए।" "आब ओ हालत नहि छैक। मुदा अखनो आपसी सहयोगसँ रहबाक आवश्यकता तँ अछिए।" आइ पहिल बेर मदनबाबूक मुँहे ई गप्प-सप्प सुनि रहल छलहुँ। “हमरा सभकेँ एकहिटा संतान छथि-दीपा। ओ सभ दिन हमरा सभक संगे बाहरे रहलीह। विदेशी भाषा ओ संस्कृतिसँ प्रभावित हुनकर जिनगी सभ दिन फराके रहल। ओहिठाम एकटा अंग्रेज दोस्तक संग बिआह कए लेलीह आ आब ओही ठामक भए कए रहि गेलीह। हम सभ एतेक संपत्ति अरजलहुँ। मुदा तकर होएत की? सएह सोचैत -सोचैत परेसान भए गेलहुँ तँ अहाँकेँ एक दिन फोन कए अपन समाज-संस्थाक चर्चा केलहुँ। " “छोड़ु ई गप्प-सप्प। धीआ -पुत ासुखी रहए ताहिसँ बढ़ि कए की भए सकैत अछि? -मोहिनी बजलीह। हम हुनकर सभहक गप्प सुनि कए गुम्म रहि गेलहुँ। मदन बाबूक बातमे बहुत पीड़ा छलनि। मुदा मोहिनी शांत छलीह। बातकेँ घुमबैत कहलीह- " गाम जाइ छी की नहि?" "बहुत दिनसँ नहि जा सकलहुँ।" "हमरा तँ गामक रस्तो मोन नहि अछि।" सभ हँसए लगलाह। हम जएबाक हेतु आज्ञा लए बिदा भेलहुँ। “काल्हि साँझमे हमरा सभकेँ जेबाक अछि। "- मदन बाब ूबजलाह। “एतेक जलदी चलि जेबैक?" “जेबाक मोन नहि होइत अछि। गामघर तँ सदति काल मोन पड़िते रहैत अछि। मुदा कएल की जाए?ओहि ठामक कारबार के सम्हारत? "- मदन बाबू बजलाह। प्रात भेने हम हुनका सभक संगे हवाइ अड्डा धरि गेलहुँ। हम सभ हवाइ अड्डाक लगीचमे पहुँचि गेल रही कि मोहिनी बजै छथि-" जुलुम भए गेल।" "की भेल?"- मदन बाबू बजलाह। " छोटकी बक्सा घरेमे छुटि गेल।" "आब जाए दिऔ।जहाजक छुटबाक समय लगीच छैक।" "ओहि बिना हम किन्नहु नहि जा सकैत छी।" "ओहिमे की छै जे एना परेसान छी?" "हमर नैहरक माटि आ सिमरिआसँ आनल गंगाजल ओहीमे राखल अछि। कोनो उपायसँ ओकर ामंगाउ।" मदन बाबू हमरा दिस ताकए लगलाह। हम तुरंते दोसर गाड़ी कए मदनबाबूक घर पहुँचलहुँ तँ देखैत छी कुसुम बाहरे बक्सा लेने ठाढ़ि छथि। “हम तँ फोन लगबैत, लगबैत थाकि गेलहुँ। ककरो फोन नहि लागल। हारि कए तखनसँ एतहि बैसलि छी।"-कुसुम बजलीह। हुनकासँ बक्सा लए कए चोट्टे लौटि गेलहुँ। संयोग रहैक जे छुट्टीक दिन हेबाक कारण रस्तामे जाम नहि रहैक। मदनबाबू बाहरे भेटि गेलाह। बक्सा देखि कए मोहिनीकेँ जान-मे-जान अएलनि। हवाइ जहाज छुटबाक घोषणा भए रहल छल। ओ सभ झटकारि कए आगु बढ़ि गेलाह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डॉ. किशन कारीगर बोंगपाद बौआक बखारी (हास्य कटाक्ष) बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै जे बलू एहनो कहूँ बखारी भेलैए? आंई कहअ त नै राहैरै छै नै खेसारीए आ मटर केराउ त तकने नै भेटल कतौ आ एक्कर दाबी केहेन जे हमरा सन बखारी भइर गाम केकरो नै छैह? ई बोंगपाद बौआक बखारी मे धानक खखरी तक नै भेटल जे बसहो बरद के कुट्टी सानी लगा दैतियै? ई तरकेसरा एक नवंर बोंगपाद भऽ गेल की? एकरा बजबाक कोनो ठेकान नै रहि हेल. हरदम भाषण टा झारत जे हमरा बखारी मे कोन कमी है? हम ई कर देगा त ऊ कर दिया? गाम समाज के हम बिकास कैर देगा. हमरा एलेक्शन मे जीता दियअ त अई बेर केकरो कोनो कमी नै होने देगा? हम्मे बाबा स पूछली की होलै हौ बाबा? बलू केकरा बखारी पाछू परल छहो? किए बड़ बड़ का खिसियाअले छहू? अईं हौ बाबा भोरे भोरे की भागेसर पंडा संगे कुछो हो गेलौ? हमर गप सुनते बाबा बोललकै हौ कारीगर सबटा गप तोरो बुझले छह आ ताल मात्रा खेलाई छह? हम्मे बोललिई हमरा कहाँ कुछो बुझहल छहो हौ बाबा तोंही बोलहो ने जे बखारी मे की होलै? बाबा हां हां के हँसैत बोललकै हौ किशन तोरा मीडिया वला के त सबटा खबैर रहै छह कतह की भेलै? आ अखैन हमरे स सुनह चाहै छह की? अच्छा पहिने एक जुम तमाकुल खुआबह त सबटा गप कहै छियह? हम बाबा लै खैनी बनाबे लगली एक जुम बाबा के आ एक जुम कैमरा वला के खुआ देली. कैमरा चालू इंटरव्यू रिकार्डिंग हुए लागल. बाबा बोललकै हौ देखै नै छहक मिथिलाक लोक केहेन बोंगपाद होईए? रहतह दसो कट्ठा नै आ होहकारी पारतह जे बारहो बिगहा मालिक? कहतह हमरा दरबज्जा पर चौदह टा बखारी आ थारी मे दाइलो तरकारी नै देखबहक की? तहिना ई मिथिला के पेटपोसुआ नेता सब भाषण टा झारतह की मिथिला राज बनैत मातर मिथिला के सब दुख दूर. मगहिया शासन मिथिला मैथिलीक दुशमन अछि? झूठा नेता सब बुते चीनी मील चालू कराउल भेलै नै आ बोंगपादी टा जे मिथिला राज बनतै त ई क देबै ऊ क देगा? मिथिला स पलायन रोकले नै भेलै आ भाषणी बखारी तेहेन जे कि कहबहक? ई तरकेसरा महादेबहो पर चढ़ौलहा रूपैया ल परा जाईए आ भागेसर पंडा के कहलियै जे तोहर बेटा एना किए करैए? त ओ बाजल जे पार्टी फंडमे जमा करतै हाईकमान के आदेश छै बाबा. हमर ताररेसर जीतत त अहीं मंदिर के जीर्णोद्धार हेतै ने बाबा? हम मोने मन कहलियै जे आई तक पोखैर घाट बनेबै नै केलकै तै पर स मंदिर के जीर्णोद्धार क बखारी लगा देतै की? आई तक रूपैया आपस नै केलक तारकेसर? हम्मे बाबा से सवाल केली जे अकादमी पुरस्कारी वला बखारी पर तोंई की कहबहो? त बाबा बोललकै हौ कारीगर ई साहित्य अकादेमी मैथिली वला त आरो बोंगपादी करैए की? सर कुटमार के पुरूस्कार द देतह? अपना गिरोहक लोक के जूरी मेम्बर बना देतह आ पुरस्कारी दाबिए गौरबे चूर रहतह की? आ मैथिली वला सब के किताब लोक पढ़बे नै करै छै नै बिकाईते छै तइओ पुरूस्कारी बोंगपादी? मिथिला समाज साहित्य के बिरास एक्को रति नै आ सम्मान बंटतह एक ढाकी? भांटा मूरै जेंका हाटे बजारे चंदा वला समारोह मे किना बिका रहलै मिथिला सम्मान? हम्मे बाबा स फेर सवाल केली जे विद्यापति बखारी औरी मैथिली साहित्य महोत्सव , मैथिली गीत नाद पर कुछो बोल्हो ने? बाबा हां हां के बोललकै हौ ई विद्यापति समारोह आ मैथिली साहित्य महोत्सव वला सब त दोकनदारी पर उतारू अछि की? विद्यापति स्मृति पर्व नाम पर चंदाखोरी, पाग बांट, असर्द्ध गीत नाद आ भैर रता धमगिज्जर टा होई छै की? समाजक लोक के कहियो कोन उपकार होई छै? तहिना ई गिरोहवादी साहित्यक ठेकेदार सब मैथिली साहित्य महोत्सव के नाम पर अपना गिरोह के प्रमोट करै के फिराक मे रहतह की? हौ ज मिथिला समाज मैथिली साहित्यकार स जुड़ले नै छै त कथिक झूठे साहित्य महोत्सव? साहित्य के नाम पर ई सब अपन दोकानदारी मे लागल अछि की? तहिना ई मैथिली गायक गीतकार सब पैरोडी बना नेहाल करैए आ झूठौ दाबीए चूर जे भोजपुरी वला अशलील आ मैथिली वला सन चोरा नीक लोक कियो नै? बोंगपादी दाबीए चूर रहत सबटा? अंत मे बाबा स हम पुछली जे हौ बाबा मिथिला मैथिली पर तोंई की कहबहो तोहर कहनाम की हौ? बाबा बोललकै हौ कारीगर की हमरा मुँहे मिथिला मैथिली के ठकहरबा सबहक किरदानी देखार करेबह? लैह हईए सुनह. मैथिली वला सब डंका पीटतह जे अंगिक्का, बज्जिक्का, ठेठी, राड़ सबटा मैथिलीए छियै की? आ लिखबा बजबा काल पुरूस्कार बेर केन्द्रीय मैथिली सोतियामी टाोन के मोजर टा करतह की? आ बाद बांकी के राड़ सोलकन बोली कैह दुत्कारतह? यथार्थ कहक त उनटे हमरे तोरे मंचलोभी त कुंठीत कहि अपन ठकहरबा किरदानी झंपबाक चलकपनी मे रहतह? मिथिला मैथिली वला के हाल ओहने जेना बखारी मे राहैर नै छै आ नै खेसारी तइओ बड्ड भैरगर कहे बोंगपाद बौआक बखारी. आई जे मिथिला के नेता, साहित्यकार, मैथिली अकादमी, कलाकार, पत्रकार, समाजक लोक सब एकजुट भऽ समावेशी मैथिली लै काज करै जाई जैतै त मिथिला विकसित भेल रहितै. अई ठाम त सब अपना बखारी दाबिए चूर बोंगपादी टा मे लागल अछि त कहियौ मिथिलांचल के विकास हेतै किनौ. सब अपना बखारी अपन पेटपोसै के फिराक मे बेहाल यै तैं मिथिला अधमौगैते अवस्था मे रैह गेलै की? -डाॅ किशन कारीगर (मूल नाम- डाॅ कृष्ण कुमार राय) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। मुन्नाजी- बीहनि कथा बनबाक हर्ष! ढ़ोल, हरमुनिया आ हाथ माइक नेने साड़ी ,समीज बालीक हंजेड़ अनचोके बुचकुन कक्काक आंगन में ढ़ूकि गेल। कनिञां घोघ तनैत,बुच्ची सम्हारैत,नुकबैत कोठरी ध' लेलनि।काकी छाती पिटैत-रौ दैब रौ दैब पोता- पोता रटलौं त' एलीह भगवती। तै पर सं हिजड़ाक झुण्ड।। क्षणहि मे सगरो टोल दलमलित!स्त्री गणक हेंज अंगना सं दुरा धरि सोहरि गेल छल।फरमाइस क' के गीत सुनै गेल। नाच-गानक बीच कक्का काकी के एक हजार थम्हबैत लियय किछु कपड़ा लत्ता जोड़ि विदा करू। यै मां इ लौथ एक हजार आओर मिला द' देथुन। गै मए गै मए,जेना बेटा जनमल होइ! मां,बेटा- बेटी नै,मए हेबाक सुख हर्षित केलक! हिजड़बाक मुखिया आओर पांच सए लगा घुरबैतकहलक-"मइयां,हे इ आशीष। " बेटीये से ने बेटा,बेटी सम्हारू त' जग चलतै।" ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। संतोष कुमार राय 'बटोही' केर (डायरी) 'लव यू टू' 05.10.2011 मुसलमान बनि गेलहुँ अछि मुसलमान हेनै नीक गप्प छियैए या नहि से हमरा नहि बुझल अछि। परञ्च जहिया सँ जामिया मे दाखिला लेलहुँ तहिया सँ किछु लोकनि हमरा मुसलमान कहs लगलाथि। इ कोन मानसिकता छियैए ? हिन्दुस्तान मे अइ सोच केँ ढेर रास लोक छथि। किछु लोकनि हमर मजाक उड़ाबैत छथि - " देखियौ, संतोष मुसलमान भs गेलाह।" जामिया मे दाखिला लेलाक बाद किछु ओछी मानसिकताक लोकनि 'अस्सलाम वलैकुम' कहि कs हमरा फिरिशान करैत छथि। हम जामिया सँ हिंदी ऑनर्स , बी०एड० कs रहल छी। कोनहुँ धरम आओर विरादरी केँ लेल हमरा मोन मे खोंट कहियो नहि रहल। हमर बाबूजी केँ ढोलकिया मुसलमान छलथिन्ह। मंगरौना मे सब्जी वाली काकी मुसलमान छथिन्ह।मुहर्रम केँ समय हमर माए झरनी पर गावै वाला गीत गावैत छथिन्ह। दरिभंगा मे सी एम साइंस कॉलेज मे बड़ि रास सहपाठी मुसलमान छलथिन्ह। हमरा मोन मे किनको लेल कहियो पाप जनम नहि लेलक। जामिया सँ हम नीक संस्कार लेलहुँ अछि। अबै वाला समय डिसाइड करतै कि हम कोना मुसलमान बनि गेलहुँ अछि। 27.12.2011 अपवित्र आख्यान बाया राजघाट लल्ली आइ राजघाट पर आयल छलीह। हिनका नॉर्थ कैम्पस, डीयू बस स्टैण्ड सँ रिसीव केलियैन्ह। बस सँ उतैर कs ओ हमरा दिस अइलीह। हम दोसर बस एला पर ओही बस मे चढ़ि गेलहुँ अछि। ओहो ओई बस मे चैढ़ गेलीह। राजघाट बस स्टैण्ड पर हम दुनु गोटे उतैर गेलहुँ। राजघाट बड़ि नीक सँ सजौल गेल छै। गांधीजी केँ समाधि पर 'हे राम' लिखल छै। नाथुराम गोडसे जखन गांधी जी केँ गोली मारलखिहीन , तँ हुनका मुख सँ निकलल अंतिम वाक्यांश छलैह ' हे राम'। इ गांधीवाद केँ मूलमंत्र 'रामराज्य' केँ परिकल्पना थिकैक। लल्ली एकटा नीक जगह देखि कs बैस गेलीह। अपन बैग मे सँ 'कुछ मीठा हो जाय' के मूड मे 'मदर डेयरी' केँ चौकलेट निकैल कs हमरा दिस बढौलाथि - 'लीजिए'। इ प्रेमिका केँ तरफ सँ प्रेमी केँ मुँह मिठाई करेवाक रिवाज़ छल। हम गदगद मोन सँ हुनकर गिफ्ट केँ स्वीकार केलियैन्ह। ओ कनखी आँखि सँ हमरा देखलीह। अपन बड़ि रास खिस्सा हमरा सुनौलीह। किछु परेमक छल , किछु परिवारक आओर किछु समाजक आओर देशक। 02.01.2012 आँखिक नोर आइ हम मसुएल छी। मोन होएत अछि फोंफकारि मारि कs कानी । ओ राजघाट पर आयल त छलीह, परञ्च हमरा करेजा मे सूईआ भोंकि कs चलि गेलीह अछि। हम खानपुर केँ अइ मरल बिल्डिंग मे पड़ल टेंसन मे छी। जिनगी बड़ि परीक्षा लैत छै। एकटा तँ गरीबी सँ मारल छी, दोसर प्रेमिका केँ कछुआ स्वाभाव सँ फिरिशान छी हम। लल्ली केहने प्रेमिका छलीह !! तीन-चारि महीना कोनो अता-पता नहि। नहि फोन-फान, नहि लेटर ! प्रेमी के धीरज केँ परीक्षा छल ई वा प्रेमी केँ कुहरा-कुहरा केँ मारबाक उपाय। मारबाक मीठगर हथियार ! हम अबोध बालक जँका 'वेट एंड वाच' केँ मुद्रा मे बिछान पर ओंघरयाह मारि रहल छी। ओनs लल्ली दूध-भात खैत छथि। ई छियैए ' लैला-मंजनू' के धोबिया घाट । प्रेमी कपड़ा जँका धोएत अछि प्रेमिका जूनक रौद मे प्रेमक अँचार केँ सूखाबैत अछि। आब धीरज टुटि गेल हमर। हमर करेज जलि रहल अछि। माथा फाटि रहल अछि हमर । लागि रहल अछि आब हम नहि छी। तीन दिन सँ देह तापि रहल अछि। जामिया केँ क्लास मिस भs रहल अछि। हे देव ! ई की भs रहल अछि। आँखि डबडबा गेल अछि। नोर बहि रहल अछि। आँखिक नोर मोती जँका ढरैक रहल अछि। 15.01.2012 बेदरदी बालम आइ दिव्या केँ रोहिणी अम्बेडकर हॉस्पीटल मे जनम भेलैन्ह। ई ब्लॉक के दोसर फ्लोर पर हम रूम मे लेटल छी । सोचि रहल छी - अइ जिनगी केर की हेतै ? कोनहुँ रस्ता नहि सुझा रहल अछि आब। एम ए मे दाखिला लs लेलहुँ अछि हम। लल्ली हंसराज मे पढ़ैत छथि। दिव्या केँ आइ छठियार छियैन्ह। आइ ई ब्लॉक केँ अइ बिल्डिंग मे लघु पार्टी भs रहल छै। लल्ली सेहो आयल छथि। हमरा सँ करीब पाँच महीना सँ हुनका गप्प नहि होएत छन्हि। ओ पार्टी सँ चलि गेलीह । हम छत पर बिछान केने छी। लेटल छी। चिंता मे छी कि हमरा परेम करकs चाही वा नहि। ई संशय बनि गेल अछि। परेम मे संशय पैघ दरार कहल जा सकैए। हमरा ब्रह्म फाँस लागल अछि। ओनs लल्ली केँ किछु तकर फर्क नहि पड़ैत छन्हि। बड़ि भs गेलै इम्तिहान परेमक । हे देव ! आब कतेक सतेबहक अइ गरीब के ? हम शक्तिविहीन भs चुकल छी। ' प्यार क्या तो डरना क्या' इ सिर्फ मुहावरा छियैए आओर किछु नहि। बालम केँ विरह मे हम पगलैल छी। नागमती हम भेल छी। जायसी तँ हम छी नहि जे बारहमासा लिखs कs नागमती के विरह केँ संग अपन विरह केँ अमर बना ली। हे देव ! बेदरदी हमर बालम । कोन गली नुकायब हम ? कोन जादू- टोना करब हम ? कोना रहब आब हम ? के डायन हमर बालम केँ हमरा सँ दूर केलक ? दरद...महादरद !! ( 'लव यू टू' डायरी केर बाकी अंश अगिला खेप मे ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार अनुशासन+विद्रोह=परिवर्त्तन: अनुशासनहीनता+विद्रोह=अराजकता अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः । सं देवत्रा बभूवथुः (ॠगवेदक ई मंत्र अछि जाहिमे अग्नि ओ सोमदेवक निमंत्रण देल गेल छनि आ कहल गेल छनि जे अहाँ दूनू ऐश्वर्यसँ भरल छी, अहाँ दूनू देवत्वसँ युक्त छी। अहाँ दूनू गोटे संयुक्त रूपे एहिठाम आमंत्रित छी। अहाँ दूनू गोटे हमर स्तुति स्वीकार करी। अही मंत्रक अनुकरण करैत हम कहि सकैत छी जे हमर हरेक आलोचना लेल लेखक ओ पाठक दूनू सादर आमंत्रित छथि। दूनूक यथायोग्य सत्कार कऽ हम अपनाकेँ भाग्यवान बूझब)। मैथिली साहित्यमे एकटा परंपरा छै जे कोनो गलतीकेँ वेद वाक्य मानि लगभग पूरा लोक ओही गलतीकेँ पकड़ि जीवन भरि चलताह आ मैथिली साहित्यकेँ गलत परंपराक इनारमे खसबैत रहताह। खास कऽ मैथिली गजलक संदर्भमे तँ ई बात आरो देखल जाइए। अही क्रममे हम अरविन्द ठाकुरजीक पोथी "मीन तुलसीपात पर" केर चर्च करब। एहि पोथीमे गजलक व्याकरण आदिक बारेमे एहन प्रश्न सभ उठाएल गेल छै जकर कोनो विशेष माने नै लागै छै। गजलक व्याकरण नहि हो ताहि लेल एहनो बात कहल गेल छै जकर गजल विधासँ कोनो लेना-देना नै छै। आब अरविन्दजीक एहि पोथीक भूमिकाकेँ किछु युवा सत्य मानि लेने छथि। एकर माने ई भेल जे अरविन्द ठाकुर गलत करताह तँ ईहो सभ ओकरा मानि लेताह। युवा केर की अर्थ छै, गलतकेँ हटा सहीकेँ प्रचलन करब वा कि मंच-पुरस्कार लेल गलतकेँ मानि लेब। गलतकेँ मानि चलए बला युवा भइए ने सकैए। अरविन्द ठाकुर अपन पोथीक भूमिकामे की लिखलाह, जे लिखलाह से सही अछि कि गलत, आ ओहि सही-गलत केर आधार की छै से ताकब हमर एहि आलेखक मूल काज अछि। आब एतेक लिखलाक बाद बुझिए गेल हेबै जे "मीन तुलसीपात पर" सेहो एहन पोथी अछि जकर रचनामे बहरक पालन नै भेल अछि आ काफियाक सेहो बहुत दोष अछि। गजल लेल बहर आ काफिया अनिवार्य तत्व छै। जँ बहर-काफिया हेतै तखने ओ गजल बनतै आ तकर बादे ओ गजल नीक छै कि खराप ताहिपर बहस हेतै। एहि पोथीमे रचनाक अतिरिक्त 37 पन्नाक भूमिका लिखने छथि अरविन्द ठाकुरजी जकर शीर्षक अछि "संहिताक उपनिवेश नहि अछि साहित्य" आ एहि भूमिकाक शुरूआते कठोपनिषद् केर वचन "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"सँ भेल अछि। मुदा अर्धाली रूपमे। एहन-एहन अर्धाली अरविन्दजी आरो प्रयोग केने छथि अपन भूमिकामे। आगू बढ़बासँ पहिने "संहिता" केर अर्थ जानी संहिता केर सरल अर्थ छै संकलन आ रूढ़ अर्थ छै नियमक संकलन। एकर मतलब भेल जे अरविन्द ठाकुरजी साहित्यकेँ नियमक वा नियम-संकलनक उपनिवेश नै मानबाक आग्रह केने छथि। मुदा जँ साहित्य केर अर्थमे देखबै तँ अरविन्द जीक आग्रह साफे विरोधाभासी अछि। कारण हरेक साहित्य अपना आपमे नियमक संकलन होइत छै। अरविन्दजीक एहि पोथीक बहुत रचना नियम अछि आ तँइ ईहो पोथी संहिता बनि गेल अछि। आब साहित्य केर रचना सत्ता लेल छै, कि जनता लेल छै कि लेखके लेल छै से बात अलग भेल। जेना संहिता संकलन समाजकेँ नैतिकता हिसाबें नियंत्रण करै छै तेनाहिते जे साहित्य जनता लेल छै ओ साहित्य सेहो सत्तापर नैतिकता हिसाबें नियंत्रण करबाक प्रयास करै छै। जे साहित्य सत्ता लेल छै ओ साहित्य जनतापर नियंत्रण करबाक प्रयास करै छै। अपनापर नियंत्रण करबाक लेल बहुत कम साहित्य लिखल गेल अछि। अरविन्दजीक रचना पढ़ि अनुमान लगाएल जा सकैए जे ओ केकरापर नियंत्रण करबाक लेल संहिता रूप लेने अछि। हमर मूल कथन जे साहित्य अंतिम रूपमे संहिते होइत छै। एकरा अहाँ पानि-बर्फ वा मेघ-पानि बला उदाहरणसँ नीक जकाँ बूझि सकैत छी। तँइ हम कहलहुँ जे अरविन्दजीक भूमिकाक शीर्षक विरोधाभासी अछि। अपना समाजक विद्वानक बीच अर्धाली बहुत चलै छै। अर्धाली मतलब कोनो प्रसंगक आधा उल्लेख करब। ई समय बचेबाक लेल होइत छै मुदा ई अर्धाली मात्र शिक्षित ताहूमे सर्वज्ञाता लेल होइत छै। जनता लेल अर्धालीक प्रयोग तँ सर्वथा अनिष्टकारक होइत छै। चतुर लोक मात्र अर्धाली प्रयोग कऽ अपन अभीष्ट सिद्ध कऽ लै छथि। एहने एकटा चतुर लोक छलाह युधिष्ठिर जे कि युद्धमे "अश्वत्थामा हतो..." एहि अर्धालीक प्रयोग कऽ अपन स्वार्थ सिद्ध कऽ लेलाह। महाभारत केर प्रसंग छै ई जे गुरू द्रोण जखन अपन कौशलसँ दुर्योधनकेँ जिता रहल छलाह तखन हुनका विचलित करबाक लेल हुनकर बेटा अश्वत्थामाक नामपर एक वाक्य रचल गेल "अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो" माने अश्वत्थामा मारल गेल आदमी वा हाथी। मुदा घोषणा कालमे एकर अर्धाली "अश्वत्थामा हतो" साफ-साफ बाजल गेल आ दोसर भाग "नरो वा कुंजरो"केँ शंख ध्वनिसँ दाबि देल गेल। एकर असरि ई भेलै जे द्रोण ई बुझलाह जे हमर बेटा अश्वत्थामा मारल गेल आ ओ शोकमे आबि युद्ध छोड़ि देलाह। परिणाम पांडव युद्ध जीति लेलाह। हम ई बिल्कुल नै कहै छी जे अरविन्द जी युधिष्ठिर जकाँ चतुर छथि वा कि ओहो कोनो युद्धपर निकलल छथि। हमर कहब अतबे जे जखन कोनो प्रसंगक उलेल्ख करी तँ पूरा करी। जाहि श्लोक सभहक अर्धालीक ओ प्रयोग केने छथि से श्लोक सभ छंदमे बान्हल मात्र किछुए शब्दक श्लोक छै जेना "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥"। देखियौ बेसी लंबा-चौड़ा तँ छै नै तखन ओकरा पूरा देबामे कोन दिक्कत? एकटा आर प्रसिद्ध अर्धाली देखबै छी- "अहो रूपं अहो ध्वनि:" एकर मतलब ई छै जे अहा की रूप छै, कि ध्वनि छै। माने प्रसंशा भेलै। जनता एकरा अपन प्रेमिका लेल सेहो प्रयोग कऽ सकैए। मुदा एहि अर्धालीक पूरा रूप एना छै " ऊष्ट्राणां विवाहेषु, गीतं गायन्ति गर्दभा: | परस्परं प्रशंसन्ति, अहो रूपं अहो ध्वनि:" आब एकर पूरा माने भेलै "ऊँटक बियाहमे गदहा गीत गेलकै आ दूनू एक दोसरक प्रसंशा केलकै। गदहा ऊँटकेँ कहलकै जे अहाँ की रूप अछि अहाँक आ तकरक जबाबमे ऊँट कहलकै जे अहाँ की ध्वनि अछि अहाँक। तँ बुझि गेल हेबै जे साधरण जनता लेल अर्धाली कतेक भयंकर परिणाम दै छै। हमरा लग अर्धालीपर बहुत रास प्रसंग अछि मुदा उदाहरण लेल मात्र दू टा देलहुँ। अरविन्दजी कहि सकै छथि जे जनता सर्वज्ञाता होइत छै। अरविन्दजी संहितासँ साहित्यकेँ अलग करै छथि मुदा ओ अपन भूमिकामे जतेक अर्धाली देने छथि से छंदक संहितासँ संचालित छै। हुनकर पहिले अर्धाली बला श्लोक देखी- "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥" हम जतेक जनैत छी एहि पूरा श्लोकमे कुल 48 टा अक्षर छै आ ई जगती छंद भेलै (जँ हम गलत होइ तँ ओकरा सुधारबाक लेल आलोचना सादर आमंत्रित अछि)। जगती छंदमे हरेक पादमे अलग-अलग अक्षर संयोजन हिसाबें अलग-अलग नाम पड़ैत छै आ इएह बात आनो छंद जे गायत्री, अनुष्टुप, त्रिष्टुप आदिपर लागू होइत छै। मने अरविन्दोजीकेँ अपन बात कहबाक लेल संहिते केर जरूरति पड़लनि। ई अरविन्दजीक दोसर विरोधाभास छनि। एहि भूमिकामे जे आन श्लोकक उदाहरण अछि सेहो सभ पूरा छंदमे छै। एकर माने ईहो भेल जे तात्कालिक कारण जे हो मुदा अरविन्दजीकेँ ई बात पता छनि जे बिना संहिताकेँ अपन बात नै कहल जा सकैए। "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥" एहि श्लोकक सरल अर्थ छै जे "उठू, जागू आ वरिष्ठक संगमे आबि ज्ञान लिअ मुदा ई काज तलवारक धारपर चलि कऽ पार करब समान अछि से बात कवि (ॠषि) कहै छथि। एहि श्लोकक पहिल भाग महत्वपूर्ण अछि मुदा तकर कारण दोसर भाग छै। दोसर भागमे ई कहल गेल छै जे ई काज तलवारक धारकपर चलबाक समान छै? कोन काज तँ पहिल भागमे छै वरिष्ठक संग आ उठब-जागब। आब एहि ठाम ईहो प्रश्न छै जे कोन वरिष्ठ? जे उम्रमे नमहर होथि वा ज्ञानमे, जे एक ज्ञान नमहर होथि कि दोसर ज्ञानमे?। लोक अपन वरिष्ठे तकबामे समय गमा देताह तखन उठताह वा जगताह कोना। तँइ एहि काजकेँ तलवारक धारपर चलब मानल गेल छै। असल काज छै वरिष्ठे ताकब मुदा कोन वरिष्ठ? सही दिस लऽ कऽ जाए बला कि गलत दिस लऽ जकऽ जाए बला?। जे सही वरिष्ठ ताकि लै छथि से उठि जाइ छथि, जागि जाइ छथि आगू बढ़ि जाइ छथि। जाहि भूमिपर ई संहिता रचल गेल ताही भूमिपर दत्तात्रेय सेहो भेल छथि जिनका अपन वरिष्ठ एहनो चीजमे भेटि गेल रहनि जकरा समाज कोनो जोगरक नै मानै छथि। दत्तात्रेय अपन 24 टा गुरू रखने रहथि तकर सूची देखू- 1) पृथ्वी, 2) जल, 3) वायु, 4) अग्नि, 5) आकाश, 6) सूर्य, 7) चन्द्रमा, 8) समुद्र, 9) अजगर, 10) कपोत, 12) फतिंगा, 12) माछ, 13) हिरन, 14) हाथी, 15) मधुमाछी, 16) मधु निकालए बला, 17) कुरर पक्षी, 18) कुमारि कन्या, 19) नाग, 20) बालक, 21) पिंगला वैश्या, 22) तीर बनए बला, 23) मकड़ी, 24) भृंगी कीट। एहि सूचीमे कोन वरिष्ठ आ केहन वरिष्ठ सभ छथि से ताकि लिअ। पद-पोस्ट, धन-छलसँ पोषित मैथिली साहित्यकार सभ एहि सूचीमे देल वरिष्ठ सभकेँ अपना लेल वरिष्ठ मानताह से संदेह अछि। आब एहि भूमिका केर आन प्रसंगपर आबी। आन प्रसंग सभकेँ हम प्वाइंट बना कऽ दऽ रहल छी। पहिने अरविन्दजीक कथन रहतनि आ तकर निच्चा हमर समर्थन वा विरोध रहत। अरविन्दजी अपन भूमिकामे जे बात उठेने छथि तकर उत्तर हम बहुत पहिने अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे विस्तारसँ देने छी। एहिठाम हम प्रसंगानुकूल संक्षिप्त रूपे दऽ रहल छी। एकटा बातक उल्लेख करब जरूरी बुझाइए जे अरविन्दजी हिंदीक किछु आलोचना पढ़ि ओतहिसँ प्रश्न उठेने छथि। जँ अहाँ सभ देवेन्द्र आर्यजी द्वारा लिखल हुनक आलोचना "हिन्दी ग़ज़ल आलोचना की दिक्कतें" पढ़बै तँ बुझि जेबै जे अरविन्दजी कोन प्रश्न किम्हरसँ लेने छथि (देवेन्द्र जीक ई आलेख पहल पत्रिका, बर्ख 2015 मे प्रकाशित भेल रहै)। अइ संदर्भमे हमर कहब ई अछि जे हिंदी भाषामे गजल संगे जे किछु दिक्कत छै ताहिसँ मैथिलीकेँ कोन मतलब छै। मैथिली गजलक अपन समस्या छै आ तकरा नीक करब मैथिलिएसँ सभंव छै। उदाहरण लेल हिंदीमे बलाघात नै छै, मैथिलीमे छै तँ स्वाभाविक रूपे मैथिलीमे काफिया आ हिंदीमे काफियाक प्रकृति अलग हेतै आ ओहने नियमसँ संचालित हेतै। ई बात सभ हमरा एहिठाम अइ कारणसँ लिखए पड़ल जे बहुत रास मैथिल हिंदी बला गजलक व्याकरण पढ़ि बहस करै छथि जे मैथिलीमे एना किएक नै? तँ आब अरविन्दजीक भूमिकाक अंश आ तकर हमरा द्वारा कएल समर्थन वा कि विरोध देखू--- 1) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहि क्रममे अनेक रास बनल-बनाओल ढाँचा-संरचना हिलैत अछि- किछु हिलिकए टेढ़ भए जाइत अछि, किछु भरभराए कए टूटि जाइत अछि। एहि विस्फोट, एहि विघटनसभक परिणाम होइ छै जे हिंसा-प्रतिहिंसा, पुणर्निर्माण, पुनर्वास, उत्तराधिकार आ ध्वस्त ढाँचासभक प्रेत-छाया ओहि काल-विशेषक अलंकार शास्त्रक (Rhetoric) प्रमुख हिस्सा भए जाइ छै। साहित्य केना एहि सभ सन्दर्भसँ अनछुअल रहि सकै छै, रहिए नहि सकै छै.." हमर कथन- हँ, साहित्य सेहो परिवर्तनसँ कात नै रहि सकैए मुदा अतबो आ एहनो परिवर्तन नै होइ छै जे साफे-साफ निशान मिटा जाइ। असलमे अरविन्दजी परिवर्तनकेँ विनाश मानि लेने छथि जखन कि परिवर्तन मात्र स्वरूपकेँ सुंदर वा कि सरल बनेबाक बात करै छै। जाहिमे स्वरूप बदलियो सकैए आ नहियो बदलि सकैए। मुदा जँ स्वरूप बदलतै तँ नाम सेहो बदलि जाइत छै । उदाहरण लेल एना बूझू जे वैदिक साहित्य सरल वार्णिक छंदमे अछि मने एहन छंद जे अक्षरक संख्यासँ संचालित होइत अछि। अनुष्टुप छंदमे 32 अक्षर होइत छै। बादमे अनुष्टुप केर किछु स्थानपर लघु-गुरू केर स्थान नियत भेलै मुदा अक्षर बत्तीसे रहलै तँइ ओकर नाम अनुष्टुपे रहलै। बादमे एही छंदमे परिवर्तन भेलै आ अक्षरक संगे पूरा मात्राक्रम सेहो नियत कऽ देल गेलै जकरा वार्णिक छंद कहल गेलै आ अक्षर संचालित छंदक प्रयोग कम होइत गेलै। बादमे वार्णिक छंदक प्रचलन सेहो कम भेलै आ तकरा बदला मात्रिक छंदक प्रयोग होबए लगलै। एहि उदाहरणसँ स्पष्ट होइए जे छंदक स्वरूप बदलिते ओकर नाम बदलैत गेलै मुदा छंदक महत्व रहबे केलै। गजलोमे इएह छै। जे बहर अरबी भाषामे प्रचलित भेलै से फारसीमे नै आ जे फारसीमे प्रचलित भेलै से उर्दूमे नै। इएह बात मैथिली गजल लेल सेहो छै। 1222-1222-1222... बहर उर्दूमे अतिप्रचलित छै मुदा संभव जे ई मैथिली भाषाक अनुकूल नै हो आ तकरा बदला 121-1221-1221 वा 1212-1221-1212 वा कि एहने सन आन बहर आबि जाए। तँ ई भेलै परिवर्तन। एहन नै हेतै जे परिवर्तनक नामपर साफे-साफ छंद वा बहरकेँ हटा देल जेतै। 2) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "इतिहासपर दृष्टिपात करी, त स्पष्ट देखाइत अछि जे प्रत्येक काल-विशेषक मनुष्य ओहि काल-विशेषमे अपन कार्य-कुशलता, क्षमता आ परिणामदायी चेतनाक रेखांकन लेल नव औजार, नव उपकरणक आविष्कार कएलक अछि आ अनुपयोगी वा पिछड़ल औजारसभक त्याग कएलक अछि.." हमर कथन- अरविन्दजीक पहिले कथनक छायामात्र अछि ई बात। तँइ पहिले कथन बला हमर उत्तर अहूपर लागू हएत। 3) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "भगवतीचरण वर्मा कहै छथि– नव कवितामे लय आ छन्दके निरर्थक बुझल गेल अछि। किएक त लय आ छन्दक मान्यता प्राचीन छै आ जे किछु प्राचीन छै, ओ सड़ल-गलल छै, ओकरा नष्ट हेबाकहि चाही.." हमर कथन- नव कवितामे जे भऽ रहल छै ताहिसँ उपन्यास वा आलोचना विधाक शिल्पपर कतेक प्रभाव पड़लै से किएक ने कहि रहल छथि अरविन्दजी। जहिया ई बात कहि देता तहिया हमहूँ नव कविताक शिल्पसँ गजलक शिल्पक संबंध कहि देब। रेल गाड़ीक ढाँचा परिवर्तनसँ हवाइ जहाजक ढाँचापर की प्रभाव पड़तै से जनबाक लेल हमहूँ अधीर छी। 4) अरविन्दजी फेर अर्धाली लीखै छथि जे- "गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति...." हमर कथन- मैथिलीमे अवधी, ब्रजभाषा आदिक प्रभावें रस, रीति आ अलंकार आदिपर बहुत चर्चा भेलै मुदा ऐ सभहँक कारणें वाक्य असंतुलित होइत गेलै मने वाक्य केर स्वाभाविकता मरैत गेलै। मुदा अरबी-फारसी-उर्दूमे लोक जेहन अपन घरमे बाजैए ओकर शाइर ठीक ओहने वाक्यसँ शाइरी रचैत अछि तँए शेर-ओ-शाइरी सभहँक जीहपर चढ़ि जाइए मुदा मैथिलीक निज काव्य विधा जीहसँ खसि पड़ैत अछि मने लोक जल्दिए बिसरि जाइत छै। संस्कृतक एकटा प्रसिद्ध वाक्य थिक “गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति” । लोक एकर मतलब निकालै छथि जे कवि लेल गद्य लिखब आवश्यक कारण पद्यमे छंदक हिसाबसँ तोड़-ममोड़ तँ भऽ सकैए मुदा गद्यमे नै। मुदा ई सटीक नै। हमरा हिसाबें एकर गलत अर्थ लगाओल गेल छै। एकर अर्थ एना हेबाक चाही “पद्यमे जे कवि जतेक बेसी स्वाभिक रूपसँ गद्यक प्रयोग कऽ सकता सएह हुनक पद्य लेल निकष हेतनि” । हमरा बूझल अछि ई काज बहुत कठिनाह छै तँए एकरा मानए लेल कवि तैयार नै हेता। गद्यकार तँ अपनाकेँ एही बलें महान मानै छथि तँइ ओ तँ मानबे नै करता। 5) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहि देशमे विद्रोहक पहिल बीया गौतम बुद्ध खसएलनि। ओ बीया अंकुरित चाहे जहिया भेल हुअए, पल्लवित आ पुष्पित ओ तखनि भेल, जखनि सिद्ध-सन्तसभक समय आएल। विद्रोही तेवरहिक संग सिद्धलोकनिक प्राकृतमे लिखल साहित्य आधुनिकताक वाहक बनल आ एतहिसँ परम्परासभकें चुनौती भेटए लागल.." हमर कथन- हँ, परंपरा सभकेँ चुनौती भेटलै। मुदा धेआनसँ सोचियौ गौतम किएक सफल भेलाह विद्रोहमे। एकर मूल कारण छै जे गौतम सनातन धर्मक विशेषता ओ कमजोरी दूनूसँ परिचित भेलाह। ओइ विशेषताकेँ लऽ आ कमजोरीकेँ हटा अनुशासन संगे गौतम अपन नव पंथ चलेलाह जे कि लोकप्रिय भेल। सोचियौ जँ गौतम सनातन धर्मक विशेषता ओ कमजोरीसँ परिचित नै रहतथि तखन की होइतै? जँ ओ अपन नव विचार लेल अनुशासित नै रहितथि तखन कि ओ परिवर्तनक सफल नेतृत्व कऽ सकतथि? परिवर्तन वएह कऽ सकैए जे कि मूल नियमकेँ नीक जकाँ पालन केने होथि, ओकर ज्ञाता होथि मने अनुशासित होथि। एहन भैए ने सकैए जे नियमसँ अनजान लोक ओहि नियममे परिवर्तनक सफल संचालन केने होथि। गौतम बुद्ध बकायदा संघ केर संचालन लेल बहुत रास नियम बनेने रहथि। तखन तँ अरविन्दजीक हिसाबे गौतम बुद्ध सेहो संहिताक उपनिवेश बना देबाक लेल खराप भऽ गेलाह। बौद्ध धर्म अबिते साहित्य केर कथ्यमे परिवर्तन एलै। धेआनसँ पढ़ू कथ्यमे परिवर्तन भेलै। कर्मकांडक विरोध भेलै मुदा छंदेमे। छंदोमे परिवर्तन भेलै मुदा वार्णिक छंदक बदला मात्रिक छंद प्रचलित भेलै। मोन राखू संहिता ओहिना रहलै बस संहितामे नव-नव आकार-प्रकारक नियम सभ जुड़ि गेलै। दोहा-चौपाइ अही कालक देन छै। दोहे-चौपाइमे आन-आन पाँति जोड़ि घत्ता, कड़वक आदि छंद बनलै। आगू बढ़बासँ पहिने सरहपादजीक एकटा दोहा आ एकटा चौपाइ देखू (ई दोहा-चौपाइ हम हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावलीसँ लेने छी)- जीवन्तह जो नउ जरइ, सो अजरामर होइ। गुरु उवएसे विमल मइ, सो पर धरणा कोई ॥ एहि दोहामे देखू ठीक 13-11 केर नियमक पालन छै। आब चौपाइ देखू- पंडिअ सबल सत्य बक्खाणइ। देहहि बुद्ध बसन्त ण जाणइ॥ गमणागमण न तेन विखण्डिअ। तो वि णिलज्ज भणहि हउ पण्डिअ॥ एहि चौपाइ केर चारू पादमे 16-16 मात्रा छै। अरविन्दजी कोन आधारपर बौद्ध धर्मक परिवर्तनकेँ छंदसँ जोड़ि देलखनि से हमरा पता नै। एहि ठाम दुइएटा उदाहरण देलहुँ अछि। पाठक आरो ताकि सकै छथि। बौद्ध धर्ममे अधिकांशतः कर्मकांडक मारल ओ अशिक्षित जन एलाह आ तकर बादो ओ अपन साहित्यमे छंदकेँ नै छोड़लाह। हुनकर आलोचना शक्ति गलत कर्मकांड लेल प्रयोग भेल छंद लेल नै। वस्तुतः छंदे हुनका सभहक साहित्यमे अतेक शक्ति देलक जे हुनकर बात सुगमतासँ जनता लग पहुँचए लागल। आब एखन जे शिक्षित जन छथि से छंद किए छोड़ए चाहै छथि से नै पता। छोड़बाक छनि तँ छोड़ि सकै छथि मुदा पाठक-जनतामे भ्रम पसारब कतेक उचित? छांदिक विधाक नामपर अछंद परसब कतेक उचित। ई सभ अपन रचनाक लेल दोसर नाम किएक नै ताकै छथि। व्यक्तिगत तौरपर हमरा बिना छंद बला रचनासँ दिक्कत नै अछि मुदा अछांदिक रचनाकार सभहक ई दायित्व छनि जे ओ कोनो विधाक नामपर अराजकता नै पसारथि। जँ कियो गजलमे बहरक-काफियाक पालन नै चाहै छथि तँ ओहि रचनाकेँ गजल नै कहथि। गजल जखने कहता तखने गजलक विधान ताकल जेतनि, ओहि आधारपर हुनकर कमजोरी उजागर कएल जेतनि। हमरा पूरा विश्वास अछि जे बौद्ध गण सभ अशिक्षित रहितो संस्कृतक छंद वा गजलक लेखन केने रहितथि तँ जरूरे ओकरो नियम पालन केने रहितथि। कारण ओ सभ अनुशासित छलाह, नियमक महत्वसँ परिचित छलाह तकर उदाहरण उपरमे हम देने छी। 6) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एकटा छोट-सन उदाहरण मुस्लिम स्त्रीक बुर्काक ली त एकर पारम्परिक रंग कारी होइत रहए। कालान्तरमे एकरा कलात्मक कढ़ाइसँ फैशनेबुल बनाएल गेलए आ आब ई उज्जर, कत्थी, भुइला आदि अनेक रंगमे उपलब्ध आ चलनमे छै। नहि आयल जे मुस्लिम सन कट्टर समुदाय पारम्परिकता आ आचार-संहिताक आधारपर एकरा बुर्का मानए सँ इनकार कएने हुअए.." हमर कथन- एक बेर फेर अरविन्दजी परिवर्तनकेँ निशान मिटा देब बूझि लेने छथि। ओ बुर्कामे कढ़ाइ केर उदाहरण दऽ रहल छथि मुदा हम पुछबनि जे कढ़ाइ देलाक बाद बुर्का बुर्के रहलै वा कि बुर्काक बदला साड़ी भऽ गेलै। बुर्का रहबे केलै। तेनाहिते छंद रहबे करतै, बहर रहबे करतै। फेर कहब नियममे परिवर्तन नियमकेँ मानिए कऽ संभव छै। हम बहरे विदेह (22-22-22-22-1) मे गजल कहै छी। अरविन्दजीकेँ दिक्कत हेतनि तँ एहिमे परिवर्तन कऽ बहरे कोसी बन लेताह। ओहिमे दिक्कते की छै। दू टा उदाहरण दऽ रहल छी आ दूनूक पात्र जीबिते छथि। भारतीय शास्त्रीय संगीतमे विश्वमोहन भट्ट प्रख्यात नाम छथि। पं रविशंकरसँ सितार सिखने छथि बादमे भट्टजी सितार आ गिटार दूनूक संयोगसँ अलग वाद्य यंत्र बनेलाह जकर नाम भेलै "मोहनवीणा"। एहने एकटा कलाकार छथि निलाद्रि कुमार। ईहो सितारक महान वादक छथि। बादमे सितारक तारमे किछु परिवर्तन कऽ अलग बनेलाह जकर नाम भेलै "जितार"। एहि उदाहरण सभसँ दू टा बात स्पष्ट अछि जे पहिल जे कोनो मूल चीजमे परिवर्तन करबा लेल ओहि मूल चीजक बारेमे पूरा जानब आवश्यक अछि। दोसर परिवर्तन भेलाक बाद नव चीजक नया नाम होइत छै। अरविन्दजी जँ बहरमे परिवर्तन चाहै छथि तँ हुनका पहिने बहरक पालन करए पड़तनि। अइ बिनु परिवर्तन सफल नै हेतनि। जँ बहरक पालन नै चाहै छथि तँ ओकरो स्वागत मुदा तखन अपन विधा लेल नव नाम ताकथु। अन्यथा गजल लेल जे अनिवार्य तत्व सभ छै से हुनकर रचनामे ताकल जेबे करत आ नै भेटलापर खारिज हेबे करत। आ इएह बात ओहन सभपर लागू होइए जे कि अपन कमजोरी नुकेबाक लेल किछुओ लीखि ओकरा गजल कहि देबाक अभियान चला लेने छथि। 7) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "उल्लेख करैत चली जे हमरा सभक प्राचीनतम काव्य वेदसभमे सुरक्षित अछि, फेर रामायण आ महाभारतमे। एहिना 'नाट्यशास्त्र हि काव्य शास्त्रक प्राचीनतम ग्रंथ अछि जकर समय ईसा पूर्व छठम् शतीसँ लए कए ईसाक दोसर शती तक मानल गेल अछि आ भरत मुनि काव्य-शास्त्रक आदि चिंतक। एहि प्राचीनतम काव्य आ प्राचीनतम काव्य शास्त्रक बीच अनेक शतीक अन्तर अछि। भरत मुनिसँ लए कए पंडितराज जगन्नाथ तक लगभग डेढ़ हजार वर्ष तक पसरल संस्कृत काव्यशास्त्रक परम्परामे अनेक काव्य सिद्धान्तक प्रतिपादन आ खण्डन-मण्डन होइत रहल अछि.." हमर कथन- डेढ़ हजार वर्ष हो कि डेढ़ लाख वर्ष मुदा जे भेल से संहितेक भीतर भेल। नियमक भीतर भेल, छंदक भीतर भेल। हँ एतेक तँ हम जरूर मानब जे गायत्री कि अनुष्टुप छंदमे व्यक्त भेल कर्मकांडक खंडन दोहा-चौपाइ वा कि आन कोनो छंदमे भेल। मुदा जे भेल से छंदेसँ भेल। 8) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "ई अलग बात जे अरबीमे गजल नहि भेटैत अछि.." हमर कथन- ई बात ओहिना भेल जेना कियो कहथि जे भारतमे बौद्ध धर्म जन्मल मुदा बौद्धसँ संबंधित चीज भारतमे नै लिखाएल। अरबीमे गजलक परंपराक एक झलक अरविन्दजी एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि https://www.dawn.com/ 9) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "प्रत्येक युग लीक छोड़िकए चलनिहार सिंह आ सपूतके जन्म देलक अछि त लीक छोड़ि चलनिहार शाइरके सेहो.." हमर कथन- ई बात सही छै जे हरेक कालखंडमे लीक छोड़ि चएल बला सभ हरेक क्षेत्रमे भेलाह अछि। मुदा लीक छोड़ि चलब की छै? की बिनु पएरकेँ लीक छोड़ि चलल जा सकैए? हमरा जनैत अरविन्देजी नै हरेक मैथिल बिनु पएरकेँ चलब लीक छोड़ि चलब मानि लेने छथि। चलब क्रियामे पएर महत्वपूर्ण छै से चाहे पुरने लीकपर हो कि नव लीकपर। एकटा फेर उदाहरण दै छी जकर पात्र एखनो जीबैत छथि। होली उल्लासक पाबनि छै आ तकर गीतमे उल्लासे भाव रहैत छै। होली गीतक प्रमुख पात्र क्रमशः कृष्ण, राम, शिव ओ अन्य छथि। ताहूमे शिव पात्र बला गीत दू खंडमे छै पहिल तँ जेना राम वा कृष्णक छनि। आ दोसर श्मसान बला। आन गीत सभ तँ समाजमे प्रचलित छै मुदा श्मसान बला होली गीत समाजमे प्रचलित एखनो बेसी नै छै। भारतीय शास्त्रीय संगीतमे छन्नू लाल मिश्र नामक गायक छथि जे कि शिवक श्मसान बला होली गीत समाजमे प्रचलित केलाह। गीतक बोल छै "खेले मसाने मे होली दिगंबर.."। एहन नै छै जे ई होली गीतक छन्नु लाल जी देलाह। ई गीत तँ बहुत पहिनेसँ छै मुदा एहि गीतक संग जे धारणा छै से छन्नु लालजी तोड़लाह। मुदा एहि धारणाकेँ तोड़बाक लेल छन्नुजी होली गीतकेँ सोहर, कि चौमासा कि कजरी रागमे नै गेलखिन। होलीक जे राग छै ताही रागमे ओ गेलखिन। लीक तोड़ब इएह भेलै। जँ छन्नू लालजी होलीकेँ सोहर रागमे गेने रहितथि तँ भारतक संगीत समाज हुनका माथसँ पटकि देने रहितनि। साहित्यकार लीक तोड़थि मुदा अपन पएर काटि कऽ नै से जानब आवश्यक। एहिठाम हम अपन नोट- लगाएब जे मैथिली साहित्ये नै, गीत-संगीत, परंपरा, बिजनेस आदि कोनो काजमे आगू नै छथि तकर एक मात्र कारण इएह अछि जे ओ सभ अपन पएर काटबकेँ लीक तोड़ब बुझि लेने छथि। 10) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "1700 ई. अर्थात् आइसँ तीन शताब्दी पहिने वली दक्खिनी (दकनी), जिनका ‘पैगम्बर-ए-सुखन' अर्थात् शाइरीक पैगम्बर कहल गेल छै, शब्दके अपन तरीकासँ लिखबाक छूट लेलनि। ओ 'तुमको' के 'तुमन', 'हमको' के 'हमन', 'से' के '', 'से', 'सेती' आ 'को' के 'कूँ' लिखलनि। ई ‘हमन'बला प्रयोग कबीर लग सेहो भेटै छै- हमन है इश्क मस्ताना.." हमर कथन- भाषायी छूट तँ मैथिलीमे बहुत बेसी छै। केयो बदला कियो, कएल, कयल,कैल.... जतेक छूट लेताह अरविन्दजी से लेथि। एहिमे कोन मनाही छै। मूल बात ई छै जे जेहन शब्द हेतै तकर मात्रा ओनाहिते गनेतै। हमन=12, हमारा=122, हम=2 तेनाहिते केयो=22, कियो=12, एम्हर-22, कएल=121, कयल=12,कैल=21 कतेक रूपक प्रयोग करताह अरविन्दजी। दोसर बात छूटो ओकरे भेटै छै जे अनुशासित होइत छै। अरविन्द जी कबीरक पाँति देलाह अछि "हमन है इश्क मस्ताना.."। ई वस्तुतः गजल छै आ से पूरा बहरमे छै। दू टा शेर दऽ रहल छी- हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दरबदर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या? ई गजल बहर—ए—हजज जाहिमे 1222-1222-1222-1222 केर मात्राक्रम अछि तकर पूरा पालन भेल अछि। उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे छूटो हुनको भेटि सकैए जे अनुशासित छथि। कबीर अनुशासित छलाह तँइ हुनकर भाषायी प्रयोग स्वीकारल गेलनि। मैथिलीमे बहुते भाषायी छूट छै तँइ छंद-बहरक पालन बहुत आसान छै। अरविन्दजी जानथि कि नै जानथि मुदा पाठक एक बात अवश्य जानि लेथि जे प्राचीन क्रांतिकारी कवि जेना पादगण, रैदास, कबीर ओ अन्य सभ छंदक पालन केने छथि। ओ सभ विद्रोह केने छथि, परिवर्तन केने छथि मुदा समाजमे भ्रम पसारि कऽ नै। आ एहि आलेखमे हम उदाहरण स्वरूप हुनकर लिखल सभ सेहो देने छी। 11) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "कोनो गजलक मतलाक शेरक दुनू मिसरामे समान रदीफक प्रयोगक आग्रह रहल अछि। किन्तु उर्दूएक अनेक शाइर एकरा अनेक ठाम अनठिअएने छथि। आ तेकर उदाहरण गालिबसँ लए कए अली सरदार जाफरी आदि तक देखल जाए सकैत अछि। आ ई रदीफ की छै? गालिबक संग्रह (प्रस्तुति : राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली)मे गजलसँ पहिने शीर्षक रूपमे ओकर रदीफ एना लिखल गेल छै– रदीफ अलिफ (अ), रदीफ ते (त), रदीफ जीम (ज), रदीफ दाल (द), रदीफ रे (र), रदीफ सीन (स), रदीफ काफ (क), रदीफ मीम (म), रदीफ नून (न), रदीफ गाफ (ग), रदीफ वाओ (व, ओ), रदीफ ये (ए, इ, ई) आदि। एहन स्थितिमे उर्दूसँ दीगर भाषाबला लोक की करत.." हमर कथन- अरविन्दजी पता नै कोन पोथी पढ़ि एहि बातकेँ गजलसँ जोड़ि देलखिन। हम जतेक जनैत छी ताहि अनुसारे ई गजलक नियम छैहे नै। अरविन्दजी जतेक बात लिखने छथि ताहिसँ बुझाइए जे ओ दीवानक परिभाषा नै बुझि सकल छथि। दीवान कोनो शाइरक एहन गजल संग्रहकेँ कहल जाइत छै जाहिमे गजलक प्रस्तुति ओकर रदीफक अंतिम वर्णानुसार हो। आब उर्दूमे वर्ण कोना होइत छै से बूझल हेतनि अरविन्दजीकेँ से उम्मेद अछि हमरा। मने दीवान गजलक प्रस्तुतिकरण शब्दकोशक नियमसँ चलैत छै। मज्मूआ एहन संग्रहकेँ कहल जाइत छै जाहिमे वर्णानुसार प्रस्तुति नै होइत छै। कोनो शाइर केर रचनाक समग्र प्रस्तुतिकेँ कुल्लियात कहल जाइत छै। आब पोथीमे रचनाक प्रस्तुतिकरणकेँ गजलक बहरसँ कोन आ कतेक संबंध छै से हमरा नै पता। 12) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहिना एकटा आग्रह छै तकाबल- रदीफैन। एकर अनुसार मतलाक बाद बला शेरक पहिल मिसरामे रदीफ नहि अएबाक चाही। रदीफ लमगर है त ओकर अन्तिमहु शब्द नहि अएबाक चाही। किए? उस्ताद एकर उत्तरमे कहताह जे फारसी अरुजक इएह परम्परा छै। चूल्हिमे जाओ परम्परा! अँ कथ्यक सौन्दर्यक लेल दुनू मिसरामे रदीफक अन्तिम शब्द आबि गेलए, रदीफ आबि गेलए त कोन अन्हेर भए गेले.." हमर कथन- हरेक काव्यशास्त्रमे एहन बहुत रास दोषक विवरण होइत छै जकरा हटेलासँ काव्य उत्तम होइत छै। भारतीय काव्य परंपरामे सेहो बहुत रास काव्य दोष छै जेना- शब्द दोष, च्युत संस्कृति दोष, अश्लीलत्व दोष, क्लिष्टत्व दोष आदि सभ छै। एहि दोष सभहक अतबे मतलब भेलै जे काव्यमे जँ ई दोष नै रहितै तँ ई उत्तम काव्य होइतै। जँ कोनो काव्यमे अनिवार्य नियम यथा छंदक आदिक पालन तँ भेल छै मुदा आन कोनो दोष छै तैयो दोषक संग ओ काव्य तँ छैहे कारण ओकर अनिवार्य नियम यथा छंदक आदिक पालन तँ भेले छै। तेनाहिते शाइरीक परंपरामे सेहो बहुत रास ऐब (दोष) केर उल्लेख छै जाहिमे एकटा ऐब छै- तकाबल-ए-रदीफैन। एहि दोषक ई परिभाषा भेलै- जँ मतलाक बाद कोनो आन शेरक पहिल पाँतिक अंतमे बिना काफियाक रदीफ देल जाए तँ ओ दोष भेलै। ठीके ई दोष भेलै। मुदा एकर अपवादो सभ छै मुदा अपवाद नियम नै होइत छै। अपवादकेँ अपवादे मानब उचित। अरविन्दजी अपवादकेँ नियम मानि लेने छथि से हमरा बुझाइए। फेर मोन राखू- काव्य दोषक मतलब छै जे काव्यमे अनिवार्य नियमक पालन भेलाक बादक दोष। एहि दोष लेल अनिवार्य नियमकेँ बेकार मानब कतेक उचित से पाठक वर्ग जानथि। 13) अरविन्दजी लीखै छथि जे- 'कोई हो मौसम थम नहीं सकता रक्से-जुनूँ दीवानो का जंजीरों की झनकारों में शोरे-बहाराँ बाकी है।' अली सरदार जाफरीक एहि गजलक उपरोक्त मतलाक शेरमे दुनू मिसराक अन्तमे रदीफक अनिवार्यता नहि मानल गेल छै..’ हमर कथन-अरविन्दजी अली सरदार जाफरीजीक जाहि पाँतिक उल्लेख केने छथि से जाफरीजीक पोथी "मेरा सफर"सँ लेल गेल अछि जे कि भारतीय ज्ञानपीठसँ प्रकाशित भेल अछि। ई पोथी जाफरीजीक नज्म सभहक संग्रह अछि। ओना नज्मक पोथीमे सेहो गजलक संकलन भऽ सकैए वा कि गजलक संग्रहमे नज्म सेहो भऽ सकैए। कोनो गजलमे मतला नै छै (बहुत एहन उदाहरण भेटत) जकर एकमात्र कारण छै जे बहुत बेर एहन होइ छै जे शेर सभ लिखाएल मुदा ओकर मतले सटीक नै आबै छै तखन या तँ रचनाकार अपने ओकरा संकलन कऽ दै छै वा कि ओकर संपादक ऐतिहासिकताक दृष्टिकोणसँ दै छै। लगभग 100 बर्ख पहिले धरि गजल आ नज्मक शिलपमे ओतबे अंतर रहै जतेक अंतर तसलाक भात एवं प्रेसर कुकर (आब राइस कुजिन सेहो) केर भातमे छै। एकटा नज्मक उदाहरण दै छी जे कि छै तँ नज्म मुदा अरविन्दजी ओकरा गजल मानि लेताह। ई नज्म मजाज केर छनि- शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ अरविन्दजी एकरा गजल मानि लेताह कारण एहिमे काफिया-रदीफक पालन भेल छै। तँ की ई गजल भऽ जेतै? मैथिलीक लेखक सभकेँ शाइरी परंपराक अध्य्यन करबाक चाही। शाइरी माने मात्र गजले टा नै होइ छै। हमरा लगैए जे अरविन्दजी गजल आ नज्मकेँ एकै बूझि लेने छथि। 14) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "गजलक अन्तिम शेर, जेकरा मकता कहल जाइ छै, ताहि शेरमे गजलकार अपन नाम, उपनाम अथवा तखाल्लुस आनै छै। अँ एकर प्रयोग नहि हुअए किंवा मकताक शेरमे प्रयोग नहि कए मतलाक शेरमे वा बीच बला कोनो शेरमे प्रयोग कएल जाइ त एहिसँ गजलकें कोन क्षति होइ छै, जैं फॉर्मेटक बदला कथ्यके महत्व दी त एहिसँ कोनोटा क्षति नहि, रत्तीअहु भरि नहि.." हमर कथन- लगैए अरविन्दजी गजलक प्रकृतिसँ ओतेक परिचय प्राप्त नै कऽ सकल छथि। गजलक हरेक शेर स्वतंत्र रूपमे होइत छै तँइ दोसर शेरकेँ तेसर स्थानपर दऽ दियौ वा कि चारिम कि पाँचम स्थानपर ओहिसँ किछु नै बिगड़तै। हँ, मतलाकेँ अपन पहिले स्थानपर हेबाक चाही अनिवार्य रूपसँ। शेरमे शाइर अपन नाम-उपनामक प्रयोग नहिए करता तँ गजलकेँ की बिगड़ै छै? आब ओनाहुतो नाम उपनामक प्रयोग नै के बराबर छै। जँ शाइर चाहथि तँ अपन नाम-उपनाम बला शेर गजलमे कत्तौ राखि सकै छथि मुदा तकरा "मकता" नहि कहि सकै छथि। नाम-उपनामसँ सजल शेर मकता तखने कहा सकैए जखन कि ओ सभसँ अंतमे आबै। एकटा प्रश्न अरविन्दजी जखन शेरक स्थान लऽ कऽ कोनो दिक्कत नै छै तखन आन स्थानपर नाम बला शेरकेँ मकता कहबाक जिद किए धेने छथि। 15) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "छन्दक उपयोग गेयता लेल, गेयताक उपयोग लोकप्रियता लेल होइ छै आ लोकप्रियताक लालच शाइरके वायवीय संसारमे लए जाइत छै, यथार्थसँ दूर करै छै.." हमर कथन- अरविन्दजीकेँ छन्दक प्रकृति नै बूझल छनि। छंद गेयता लेल नै होइत छै। असंख्य एहन रचना छै जे कि बिना छंदक छै आ ओकर गायन लोकप्रिय छै। ई अलग बात जे छंद बला रचनाकेँ सेहो गाएल जाइत रहलैए मुदा ई अपराध तँ नै छै। छंद एकटा बाटक नाम छै। जँ अहाँकेँ ओहि बाटपर नै चलबाक अछि तँ ई अहाँक मर्जी मुदा छंदक बाटसँ जे लक्ष्य भेटै छै सएह लक्ष्य ओहि बाटकेँ छोड़ि अहाँ क्लेम करबै से मान्य नहि हएत। बिना दोहाक नियम पालन केने अहाँ कोनो दू पाँतिकेँ दोहा कहि देबै से कियो नै मानत। बिना बहरक रचनाकेँ गजल कहि देबै कियो नै मानत। जँ छंदक बाट नै चाही तँ अहाँ अपन रचनाकेँ अलग नाम दियौ। इएह उचित तरीका छै। 16) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "साहित्यकारसँ अपेक्षित अछि जे ओ लोकक रुचि बदलए आ वएह बात कहए जे सत्य छै, भनहि अप्रिय हुअए आ लोककें तत्काल नीक नहिअहु लागए.." हमर कथन- लोकक रुचि बदलबाक काज छंदक नै, रचनाक कथ्यक नै बल्कि लेखक केर आचरणपर निर्भर करै छै। जाहि लेखक केर आचरण नीक रहतै ओहि लेखक केर बिना छंदो बला रचना लोकक रुचि बदलि देतै। जाहि लेखक केर आचरण भ्रष्ट छै से कतबो छंद राखत ओ रुचि नै बदलि सकैए। प्रधानमंत्री आवास योजनामे घूस खाए बला लेखक कि अपन कनियाँ छोड़ि आन ठाम मूँह मारए बला लेखक सभहक नकली गर्जन चमचा सभ सूनै छै समाज नै। अरविन्दजीक लेखन-आचरण एकसमान छनि। जँ ओ बिना भ्रम पसारने अछंदोमे लिखता प्रभावी हेतै मुदा शर्त अतबे जे भ्रम केर संग छोड़ए पड़तनि। समाजमे बिना भ्रम पसारने अपन बात राखब बेसी काज करतै। 17) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "अली सरदार जाफरी सन जिदिआह शाइर सेहो भेला जे अवाजक जोर-आजमाईशक बीच बिनु ऊँचगर आवाज आ बिनु आलाप लेने अपन रचना-पाठकें लोकप्रिय बनाए लेलनि, आ रचना केहन त आजाद आ रदीफ-काफिया रहित। सरदार जाफरी दिआ सिद्धिकुर्रहमान लिखै छथि- ...आजाद आ रदीफ-काफिया रहित नज्मकें जै स्वीकार कए लेल गेल.." हमर कथन- उपरमे हम संकेत देने छलहुँ जे अरविन्दजी गजल आ नज्मकेँ एकै बूझि लेने छथि। से एहि ठाम स्पष्ट भऽ गेल। एक बेर फेर हम कहब जे नज्मक शिल्पकेँ गजलक शिल्पसँ कोन लेना-देना छै। दूनू अलग-अलग विधा छै। हम तँ अतबे कहि सकै छी जे शाइरीमे मात्र गजले नै बहुत रास विधा छै। परिचय प्राप्त करबाक भार अरविन्दजीक उपर छनि। 18) अरविन्दजी लीखै छथि जे-"वाचिक परम्पराहिक परिणाम रहए जे कविता ‘सुनाएल' जाइत रहए, गजल 'कहल' जाइत रहए। स्वाभाविक रहय जे एहि 'सुनाबए' आ 'कहए' के प्रक्रियामे गेयता एकटा प्रमुख कारक भए गेलए.." हमर कथन- हम अरविन्दजीकेँ मोन पाड़ए चाहबनि जे वाचिक परंपरामे कविते आ गजल नै कथो कहल आ सुनाएल जाइत छलै। आ कथे किए वाचिक (मूल परंपरा) रूपे साहित्य केर सभ विधा कहले आ सुनाएल जाइत छलै। मुदा ताहिमे गेयता रहितो छलै आ नहियो रहैत छलै। लिखित परंपरा बहुत बादमे बहुत कम मात्रामे भेलै। बादमे जा कऽ पूरा-पूरी लिखित परंपरा एलै जे कि एखन धरि छै। मुदा ताहूमे आब परिवर्तन भऽ रहल छै। ई सभ तँ छल अरविन्दजीक भूमिकाक संदर्भमे हमर कथन। एहि भूमिकामे बहुत रास बात एहनो अछि जकरा गजल विधासँ नजदीकी संबंध नै छै। हम एहन प्रसंगकेँ छोड़ि देल अछि। आब एहिसँ आगू बढ़ि एहि पोथीक रचनाक कथ्यपर सेहो बात कऽ ली से नीक रहत। ई बात हम बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे मैथिलीमे लगभग सभ रचाकारक कथ्य ठीक रहैत छनि तँइ अरविन्दजीक रचनाक कथ्य सेहो ठीक छनि मुदा एकटा अंतर हमरा देखाइए जे जतेक खुलल वा नीक विषय ई अपन कवितामे निर्वाह करैत छथि ततेक एहि कथित गजल सभमे नै अछि। ई बात तखन छै जखन कि एहि रचना सभमे छंदक निर्वाह नै भेल छै। जँ छंद रहितै तखन कहल जा सकैत छलै जे छंदक कारणे कथ्य बाधित भेलै मुदा बिना छंदक रचना रहितो अरविन्दजी अपन कविता बला तेवर एहिमे नै आनि सकलाह। जे पाठक अरविन्दजी नव कविता संग्रह "सबद मितारथ ध्याया" एवं ई कथित गजलक संग्रह पढ़ने हेता से हमर अइ कथनकेँ जाँचि सकै छथि। ओना अपवाद हरेक नियमक छै तँइ एहि संग्रहमे किछु एहनो पाँति सभ अछि जे नव छै जकरा नीक कविता वा पद्य मानल जा सकैए। एहन पाँति सभकेँ हम निच्चा लिखैत जा रहल छी— अहाँ इशारा करैत गेलौं, हम शत योजन धरि बुलिते गेलिऐ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX नर छै, मादा छै,हिजड़ा छै ई सत्ता, की छिअय किन्नहुँ नञि बुझि पएबह, लाख गत्तर देखि लएह XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX कतेक बाधा टपि ई लत्ती चार पर पहुँचल हेतय जेकर धन जिजीविषा, तेकरेसँ ई बुझल हेतय XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX छिटने छथि जे वीर्य अपन देहक बजारमे अक्षतयोनि कनियाँ संग कोहबर चाहय छथि एहि नीक पाँतिक संगे किछु एहनो पाँति सभ अछि जाहि ठाम हमर अनुभव नै पहुँचि सकल अछि। एहन पाँति सभ अछि— लड्डू जकाँ भिड़ल भैयारी गाम लुटय छै बुनियाँ रामा एहि दू पाँतिमे हमरा बिंबे उल्टा लागल। लड्डू तँ एकताक बिंब हेबाक चाही। कारण लड्डूक सभ घटक एकठाम रहैत छै। अही पोथीक दोसर रचनाक पाँति देखू जाहिमे बिंब ठीक अछि - सभ अंगुरी भए सघन सकत मुक्का भए जाइ छै एका तजि सक्कत पाथर गरदा भए जाइ छै हम पहिने कहने छी जे ई हमर अनुभवजन्य बाध्यता सेहो भऽ सकैए मुदा हम जे इशारा केलहुँ तकरा पाठक नीक जकाँ देखताह से हमरा विश्वास अछि। एहि उदाहरण सभक अतिरिक्त एहि पोथीक भाषोपर बात हेबाक चाही। जँ हम दरभंगा-मधुबनीक आँखिसँ पोथीक भाषाकेँ देखबै तँ एहि पोथीमे सुधारक जरूरति बुझाएत मुदा हमरा सभकेँ एहि पोथीक भाषाकेँ सरहसा-सुपौलक हिसाबसँ देखए पड़त तखने सही तथ्य एतै आ दुर्भाग्यसँ हम ओहि कातक भाषासँ ओतेक परिचित नै छी। मुदा अरविन्दजीसँ हमरा जतेक बात होइए तकर ध्वनि आधारपर हम कहि सकैत छी जे एहि पोथीमे ओहि क्षेत्रक स्थानीय पुट लेने अछि ई पोथी आ से मैथिली लेल शुभ अछि। हमर सभहक (समग्र विदेह पत्रिका) आग्रह हरेक लेखकसँ पहिनेहो रहैत छल आ एखनो अछि जे लेखक अपन परिवेशक भाषामे लीखथि। आ निश्चित तौरपर अरविन्दजी अपन परिवेशक भाषामे लिखने छथि तँइ हुनका द्वारा उठाएल भाषायी छूट (देखू प्वांइट-10) केर कोनो विशेष अर्थ नै लगैए। स पूर्व्यो महोनां वेनः क्रतुभिरानजे। यस्य द्वारा मनुः पिता देवेषु धिय आनजे।। (सामवेदक ई मंत्र अछि जकर मूल अर्थ अछि जे याज्ञिक आदिक सहयोगसँ हविष्यान्नक सेवन करबाक लेल सभ देवताक राजा इंद्र यज्ञ स्थलपर अबैत छथि। अही मंत्रक अनुकरण करैत हम कहि सकैत छी जे मैथिली पाठक एहि आलोचनाक आनंद प्राप्त करबाक लेल एहिठाम आएल हेताह) नोट- संस्कृत साहित्यमे हमर गति बेसी नै अछि। हम जतेक जे उदाहरण एवं अर्थ देलहुँ से पोथी सभसँ लेने छी। हँ, ओकर उपयोग कोन ठाम हो से विचार हमर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ज्ञानवर्द्धन कंठ भाषाक झौहरि डुमरा कोर्टमे महादेवक चाह-दोकानपर सँझुका साहित्यिक बैसार खूब जमैक।चारि- चारि खेप चाह चलि जाइक।कविता,कथा,विमर्श सभ किछु होइक।भाषाक बन्हन सेहो नहि रहैक।जाहि भाषामे मोन हुए,लिखू आ प्रस्तुत करू।अपन रचनापर प्राप्त समालोचना सुनि केओ रुष्ट नहि होथि।बड्ड आपकता रहैक। एक दिन एकटा गाहक ओतय चाह पीब' लेल बैसल रहथि।एकटा किशोरकेँ साइकिलसँ जाइत देखि ओ गर्द केलनि- "रे हे!कहमा जाइ हते सालकिल से?" ओ उत्तर देलकनि- "अमधुर-लूची लाबे!" एहि संवादक उपरांत ओतुक्का गोष्ठीमे बड़का विवाद भ' गेलैक।चाँदनीजी ओहि गोष्ठीमे नवे प्रतिभागी छलीह।कलेक्टोरेटमे हालहिमे ओ जॉइन कयने रहथि।ओ पुछि देलथिन- "ई कोन भाषा छियैक एतुक्का?" बेचैनजी कहलथिन-"मैथिलीए छियैक।ओकरे बोली भेलैक।" शीतांशुजी कहलथिन-"एकरा बज्जिका कहै छैक एतय। ई मैथिली..." उग्रेशजी बमकलाह-"ई मैथिली कोना भेलैक?साइकिलकेँ 'सालकिल',लतामकेँ 'अमधुर' आ लीचीकेँ 'लुच्ची' कहल जाइत छैक मैथिलीमे?अहाँ लोकनि त' मैथिलीक हाड़-पाँजर तोड़हेपर लागल छियैक।" आब लालेंद्रजी लाल भ' गेलाह-"ठीके ई मैथिली न हइ।मैथिलीमे 'परेशान' 'फिरसान' हो सकैय','स्कूल' 'इस्कूल' हो सकैय','कागज' 'कागत' हो सकैय',बलु 'साइकिल' 'सालकिल' न हो सकैय'।काहे त' हीन जे कह-बोल देलन ऊ मानक हो गेल आ एन्नेकारी के लोग बोल देलक त' न ऊ मैथिल,न ओकर भाषा मैथिली।वाह रे जबाना!" शीतांशुजी कहलथिन-"नहि-नहि,मैथिलीएक बोली भेलैक ई बज्जिका।" लालेंद्रजी-"अब इहाँ लगली पटियाबे।बज्जिका अलगे भाषा हइ, ऊ मैथिली कल्ला जतइ कहाबे?" बेचैनजी बेचैन भ' गेलाह।बजलाह-"यौ,किएक अपनेमे घोंघाउज करै जाइ छी?हिंदी जेहन दिल्ली-हरियाणामे बाजल जाइए,की बिहारमे सेहो ओहिना बजै जाइ छैक?सभ ठामक बोली भिन्न छैक,मुदा पोथीक भाषा की रहैत छैक?ओकर एकटा मानक छैक।संवादमे बोलीक प्रयोग भ' सकैए,मुदा लेखकीय भाषा मानक-आधारित हेतैक।" लालेंद्रजी-"त' धो-धो चाटल जाउ अपना मानककेँ।मानक अइसन होबे के चाही जे सभ के जोड़े।तोड़ेबला मानक के हमनी न मानब।" ई विवाद बढ़' लगलैक।आरो लोक एहिमे कूदि पड़लाह।चारि प्रकारक समूह बनि गेल। पहिल समूह मैथिलीक ओहि स्वरूपकेँ मानक लेल तैयार छल जे 'मिथिला मिहिर'मे लिखाइत रहैक। दोसर समूह मैथिलीक मानक स्वरूपकेँ मानैत संवादमे मैथिलीक विविध बोलीकेँ बढ़ेबा देबाक पक्षमे छल। तेसर समूह मूल मैथिलीक रूपेँ मिथिलाक समस्त क्षेत्रमे बाजल जाइबला मैथिलीकेँ स्वीकार करबाक आ करेबाक पक्षधर छल। चारिम समूह 'बज्जिका','अंगिका','ठेठी',सुरजापुरी आदिकेँ स्वतंत्र आ मैथिलीसँ फराक मानबाक पक्षमे छल। झौहरि होइत रहलैक।सभ अपने कहैपर छलाह,केओ ककरो सुन'लेल तैयार नहि छलाह। ई विवाद से रंग पकड़लक जे ताहि दिनसँ महादेवक चाह-दोकानक ओ बैसार उसरि गेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.दिनकर कुमार- दस टा कविता ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर दू टा कविता ३.३.डाॅ किशन कारीगर- किछो ने करू (हास्य कविता) दिनकर कुमार दस टा कविता (1) प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि साँझ होइते देरी रस्ताके कातमे अर्द्ध निर्मित मंदिरमे एकटा मजदूरक सिद्धहस्त अंगुरी सभ पुरनका हारमोनियम पर भागैत रहैत अछि एकटा मजदूर ढोलक बजबैत अछि और शेष मजदूर सभ थपरीके थाप संगे सुरमे उझलैत रहैत अछि प्राण
प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि 'कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ....' 'की लयके शिवके मनायब हे शिव मानत नाही...' एहन बहुत रास गीत जे गाम सS विदा होइत काल ओ सभ स्मृतिके पोटरीमे जोगाके अनने छल
प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि आओर भरि दिन बहाओल गेल घामके पीड़ाके बिसरबाक चेष्टा करैत अछि अगिला दिन भिनसरे जिनगी सS दू दू हाथ करबाक लेल स्वयंके प्रस्तुत करैत अछि
(2) सोमालियामे जेन फोंडा सोमालियामे प्राण त्यागैत एकटा बालकके हाथ पकैर लेलक अछि जेन फोंडा जेन फोंडा बालकके आंखिमे मृत्युके छाहके चिन्हबाक चेष्टा करैत अछि आओर मृत्युके तीव्रता सS अबैत देखैत ची
जेन फोंडाके आंखिमे दुख अछि ई दुख हॉलीवुडके सिनेमाक दुख सS भिन्न प्रकारक दुख छी फोटोग्राफरके समूह एहि क्षणके कैमरामे बंदी बना रहल अछि
प्रति मिनट मरय बला पंद्रह टा शिशुमे ओ बालक सेहो सम्मिलित अछि जेकर हाथ अखन जेन फोंडा पकड़ने अछि किछु सेकेंडके पश्चात ठंडा भ' क' खसि पडत ओहि बालकके कोमल हाथ
(3) जगजीत सिंहके सुनलाक पश्चात वायलिनके स्वर बरसैत रहैत अछि अवसादके दीर्घ रात्रिमे मधुर दिन सभक स्मृति नेनाकालक साओन मास युवाकालक चंद्रमा प्रियतमाके मुखड़ा विरहके वेदना
वायलिनके स्वर बरसैत रहैत अछि आ हम भीजैत रहैत छी पिघलैत रहैत छी पथरायल आंखि भीज जाइत अछि संवेदनाके सुखायल माटि ऊर्वर भ' जाइत अछि
(4) अरे ओ अभागल अरे ओ अभागल छोट छोट हाथ सS केना स्पर्श करब अकासके केना उठायब दुखके पहाड़के फेर केना चलि सकब सोझ भ' क'
एहन नमहर नमहर स्वप्न आंखिमे ल' क' तुच्छताके पृथ्वी पर कहिया धरि करैत रहब छोट छोट गपके लेल समर्पण कहिया धरि अन्हारके भार सहन करैत अनुभव करैत रहब विवशताके ग्लानि
अरे ओ अभागल विचलित करय बला परिवेशमे केना संभारब संवेदनाके गंभीर करुणाक दृष्टि हृदयमे स्पंदित प्रेम
(5) हमरा नहि झुलायब हमरा नहि झुलायब सराहनाके झूला पर हमरा भ' सकैत अछि मिथ्या अहंकार हम हेरा सकैत छी अपन संतुलन हम मुग्ध भ' सकैत छी स्वयंके प्रति
जं द' सकैत छी त' देब कनीक नेह हमर क्लांत अस्तित्वके कनीक छाहैर हमर भीजल स्वप्नके कनीक रौद विषादक क्षणमे दू टा मीठ बोली
हमरा नहि झुलायब सराहनाके झूला पर हम बिसैर सकैत छी अपन मार्ग हम भ्रमित भ' क' पड़ावके बूझि सकैत छी लक्ष्य हम विस्मृत क' सकैत छी अपन आदर्श
हमरा नहि झुलायब सराहनाके झूला पर
(6) ई जे प्रेम अछि सांझ सेहो आहत भेल छल बांसुरीवादकके विषाद सS मेघ नोर खसाके व्यक्त केलक अपन शोक ककरो प्रतीक्षा क' रहल छल राति जेकरा बिछाके सूति रहल छल भिखमंगा धुआं सS आच्छादित जनपदके मानचित्रमे स्पंदित भ' रहल छल जीवन सभ ठाम मारि खेलाक बाद मनुख बिसरल नहि छल प्रेम
(7) हमर सतरंगी सपना हम हेरायल वस्तु सभके ताकयके लेल निकलल छलौंह सरिसो फूलक खेत चोरेने छल नेनाकालक किछु पियर सपना
हम पहिल बेर बुझलौंह जे पियर मात्र रुग्ण मुखके रंग नहि होइत अछि पियर रंग इन्द्रधनुषके रंग भ' सकैत अछि फूलके रंग सेहो भ' सकैत अछि
जलकुंभी सS भरल पोखरि चोरेने छल नेनाकालके किछु हरियर सपना
हम सभ बारंबार पोखरिमे डुबकी मारिके जलपरीके संधान केने छलौंह ओहि सुरंगके संधान केने छलौंह जे जाइत चल सोन चांदीके देशमे
हम नील अकास आ कुहेसके शुभ्रतामे नील आ शुभ्र सपनाके संधान केलौंह
हमर सतरंगी सपना गाम सS नगर धरि पसरल छल आ हमरा आंखिमे तकैत पूछि रहल छल-- टूटबाक कोनो वेदना होइत अछि?
(8) करुणा सम्हारिके राखू करुणा सम्हारिके राखू आपातकालके लेल
अंग्रेजी पत्रिकाके रंगीन पृष्ठके रक्तरंजित चित्र अहांके विचलित नहि क' सकैत अछि ससरैत घिसियाइत लोक सभ आ ओकर सभके चित्कार सS घमैत नहि अछि अहांके अंदर संवेदना चतुर्दिशके स्तब्धता हताश झरकल मुख भंगिमा अहांके मोनमे कोनो प्रभाव उत्पन्न नहि क' सकैत अछि
सम्हारिके राखू करुणा लाभके व्यापार करैत काल ककरो दास बनबैत काल काज आयत करुणा
(9) घृणाके संगे सहवास संभव नहि घृणाके संगे सहवास संभव नहि संभव नहि अपन इच्छाके विपरीत कीट जेंका जीवन यापन
आदेश-अध्यादेशमे विलीन भ' चुकल अछि भविष्य आ बीमाके किस्तमे विभाजित भ' चुकल अछि स्वप्न
अपन स्वर लगैत अछि अपरिचितके स्वर अपन छाह लगैत अछि शत्रुके छाह
एहिना बनबैत छी जाल एहिना अपन अस्तित्वके बंदी बनबैत छी हम सभ जीवनके उज्ज्वल बनबयके लेल
घृणाके संगे सहवास संभव नहि आ वनवासके सभ मार्ग अवरुद्ध अछि घृणाके आलिंगनमे कोमल भावनाके जीवित बचनाइ संभव नहि अछि
(10) पछिला शताब्दीके रेलगाड़ीमे पछिला शताब्दीके रेलगाड़ीमे अपन जनपद दिस जाइत काल हम कनैत देखलौंह विस्थापित स्वप्न सभके
पलायनके पश्चात प्रत्यावर्तनके यात्रामे हमर जनपदके श्रमिक सभके मुख पर लिखल छल यातना-तिरस्कार-शोषण पछिला शताब्दीके रेलगाड़ी वर्तमानके पटरी पर घुसैक रहल छल
जरि रहल छल भूमंडल आ स्थिर भ' गेल छल गाछ-लता तापके आगिमे झरैक रहल छल यात्रीगण पंखा सभ खराब छल आ कतौ खाली स्थान नहि छल ठीक सS पयर रखबाक लेल
संपर्क: दिनकर कुमार, 4-बी-1, ग्लोरी अपार्टमेंट, तरुण नगर मेन रोड, गुवाहाटी-781005(असम), फोन-9476844365 (दिनकर कुमार क जन्म 5-10-1967 के ब्रह्मपुरा गाम, प्रखण्ड मनीगाछी, जिला दरभंगामे भेल। नेनाकालमे गुवाहाटी आबिके कर्मभूमि बनेलैथ। 32 वर्ष धरि पत्रकारिता, लेखन आ अनुवादके अनुभव। हिन्दीमे दस टा कविता संग्रह, दू टा उपन्यास, असमियाके साठि टा पोथीके हिन्दी अनुवाद प्रकाशित। पुश्किन सम्मान सहित विभिन्न पुरस्कार।) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। संतोष कुमार राय 'बटोही' केर दू टा कविता १. पहिल परेम ओ घासो तक नहि डालैत छलीह, हम लागि परानि केँ हुनका पाँछा पड़ल छलहुँ, इ हमर जिनगी बनि गेल छलीह, हम मजनू बनि हुनकर दिदार कs रहल छलहुँ। जिनगी नरक बनि गेल अछि , करेज मे कुहुक-कुहुक दरद उठि रहल अछि, इश्क भेल अधकपाड़ , नहि मरैत छी, नहि जीवैत छी। नजरि लागि गेल अछि, के करतीह टोना-टापर हमरा लेल ? पहिल परेम छियैए जिनगी केर, अतबे उमिर मे की की नहि भेल ? २. के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? के छथि राजा, के छथि जन, की हेतै अइ गण के ? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? घुन लगलै मुलुक मे, बंटाधार भेलै बेवस्था के, कोतवाल चोर भेलै, के बचौतै अइ धन के? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? भीम फेर जनम लेतै देश मे, कर्ण सन मित के हेतै फेर की हेतै भीष्म केँ प्रण के ? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? मंथरा के दोख देनिहार लोकनि, विचार करौथ कि केकैयी केँ मोन साफ छेलैन्ह ? मिथ्या मरयादा ! के भेजलकै सीता केँ वन के ? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? -संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम - मंगरौना ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। डाॅ किशन कारीगर किछो ने करू (हास्य कविता) अहांके कोन चिंता? तै हरदम चुपे रहू अहां सब चितें टा करू समस्या नेदान मे किछो ने करू जोगारी पुरूस्कारी बनू, हरदम लाॅबिक पछोड़ धेने रहू मैथिली मे एहिना होइत एलै, विरोध भेला पर लोक के ठकैत रहू मानकीकरण स मैथिली के खंडित करू अहिं टा काबिल ज्ञानी अनकर लेखनी के कोनो मोजर ने दियौ आयोजन टा मे पाग पहिर बमकल फिरू अहीं टा किताब लिखने पढने लिखलौ अनका बेर इ कहू जे ओहिना लिखलकै के रोकि लेत अहाँ के? सब अहिंक दियाद संगे ठार मैथिली मे खूम वर्ग भेद भैइए रहलै हमरो अहाँ के हइ बूझल विरोधक कोन बेगरता के करत राड़ कारीगर के कहबाक भाव ने बुझू आन जाति ने अकदामी मे सोनहिया जाए ओकरो कहूं नाम ने भ जाइ पिछलगुआ बना ओकरा भरमेने रहू अपना सुआरथे निब्बदी मारने चूप्पे रहू पिछलगुआ किए बिरोध करत जी हजूरी के फिराक मे रहत अहूँ त सैह चाहि जे ओ हो हो करै आ मैथिली बपौती मे हमहीं टा रही मिथिला मैथिलीक आयोजन करू टाइटल जातिक षडयंत्र अहिंक रचल किशन बड्ड अलूइर ने? ओहेन की प्रभावी लिखत? सब मंचदौग्गा साहित्यकार बनल रहू. -डाॅ किशन कारीगर (मूल नाम- डाॅ कृष्ण कुमार राय) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ....................................................................................................................... संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री [STUDY MATERIALS FOR UPSC (UNION PUBLIC SERVICE COMMISSION) & BPSC (BIHAR PUBLIC SERVICE COMMISSION) EXAMS- MAITHILI (COMPULSORY & OPTIONAL) AND OTHER OPTIONALS AND GENERAL STUDIES (ENGLISH MEDIUM)] Videha e-Learning पेटार (रिसोर्स सेन्टर) शब्द-व्याकरण-इतिहास MAITHILI IDIOMS & PHRASES मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमाकान्त मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) मैथिली शब्द संचय MAITHILI DICTIONARY- RAMDEO JHA (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक) ENGLISH MAITHILI COMPUTER DICTIONARY MAITHILI ENGLISH DICTIONARY अणिमा सिंह -Shishu_Geet_Khel_Anima_Singh डॉ. रमण झा मैथिली काव्यमे अलङ्कार अलङ्कार-भास्कर आनन्द मिश्र (सौजन्य श्री रमानन्द झा "रमण")- मिथिला भाषाक सुबोध व्याकरण BHOLALAL DAS मैथिली सुबोध व्याकरण- भोला लाल दास राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature ........................................................................................................................ मूलपाठ तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) Surendra Jha Suman दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस) प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL SITE ........................................................................................................................ समीक्षा सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ शिव कुमार झा "टिल्लू" अंशु-समालोचना डॉ बचेश्वर झा- B_JHA_Nibhand_Nikunj.pdf डॉ. देवशंकर नवीन- Adhunik_Sahityak_Paridrishya डॉ. रमण झा- भिन्न-अभिन्न प्रेमशंकर सिंह- मैथिली भाषा साहित्य:बीसम शताब्दी (आलोचना) डॉ. रमानन्द झा 'रमण' हिआओल अखियासल CIIL SITE दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु RAMDEO JHA दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा SHAILENDRA MOHAN JHA परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा ........................................................................................................................ अतिरिक्त पाठ पहिने मिथिला मैथिलीक सामान्य जानकारी लेल एहि पोथी केँ पढ़ू:- राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:- केदारनाथ चौधरी चमेलीरानी माहुर करार कुमार पवन पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा) (साभार अंतिका) डायरीक खाली पन्ना (साभार अंतिका) याेगेन्द्र पाठक वियाेगी- विज्ञानक बतकही रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा SAHITYA AKADEMI http://sahitya-akademi.gov.in/publications/e-books.jsp http://sahitya-akademi.gov.in/general/Digitalbooks.jsp CIIL http://corpora.ciil.org/maisam.htm अखियासल (रमानन्द झा रमण) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI1.pdf जुआयल कनकनी- महेन्द्र http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI2.pdf प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI3.pdf सृजन केर दीप पर्व- सं केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI4.pdf मैथिली गद्य संग्रह- सं शैलेन्द्र मोहन झा http://corpora.ciil.org/pdf/maidhilipdf/MAI5.pdf JNU http://sanskrit.jnu.ac.in/maithili/index.jsp http://sanskrit.jnu.ac.in/student_projects/lexicon.jsp?lexicon=maithili ARCHIVE.ORG https://archive.org/details/%40vijay_deo_jha?&sort=-publicdate&page=2 VIDEHA MAITHILI BOOKS/ PICTURE-AUDIO-VIDEO ARCHIVE http://videha.co.in/new_page_15.htm https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ALL INDIA RADIO DOORDARSHAN आकाशवाणी दूरदर्शन http://prasarbharati.gov.in/ http://newsonair.com/ https://doordarshan.gov.in/ आकाशवाणी मैथिली पोडकास्ट http://prasarbharati.gov.in/podcast.php?filterlang=Maithili&from=1947-08-15&fromwp=2020-08-29&to=2050-12-31&search=GO आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-1 http://newsonair.com/RNU-NSD-Audio-Archive-Search.aspx आकाशवाणी पटना/ दरभंगा मैथिली रेजनल न्यूज टेक्स्ट डाउनलोड-2 http://newsonair.com/Regional-Text.aspx आकाशवाणी दरभंगा http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=282 आकाशवाणी दरभंगा यू ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/channel/UCGdNveEFmv4pPolWiTEMxVA आकाशवाणी भागलपुर http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=359 आकाशवाणी पूर्णियाँ http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=256 आकाशवाणी पटना http://prasarbharati.gov.in/playersource.php?channel=122 IGNCA http://ignca.nic.in/coilnet/mithila.htm http://ignca.nic.in/coilnet/kalyani.htm (MAITHILI ENGLISH DICTIONARY) http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/mithila.htm MITHILA DARSHAN https://mithiladarshan.com/ (online pdf of Maithili journal) I LOVE MITHILA https://www.ilovemithila.com/ (online maithili journal) मैथिली साहित्य संस्थान https://www.maithilisahityasansthan.org/ https://www.maithilisahityasansthan.org/resources (online pdf of Reasearch Papers/ books) ........................................................................................................................ VIDEHA e-LEARNING YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UC4abVKqMj2pDWIAkXiOHp7A विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) ९७म अंक Videha_01_01_2012 Videha_01_01_2012_Tirhuta 97 ८) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ९) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 १०) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ११) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १२) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १३) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १४) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 १५) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- २१७ म अंक ०१ जनवरी २०१७ Videha_01_01_2017 १६) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक VIDEHA 313 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला १७) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-२ VIDEHA 317 १८) रामलोचन ठाकुर विशेषांक VIDEHA 319 १९) रामलोचन ठाकुर श्रद्धांजलि विशेषांक VIDEHA 320 २०) राजनन्दन लाल दास विशेषांक VIDEHA 333 लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 "पाठक हमर पोथी किए पढ़थि"- लेखक द्वारा अप्पन पोथी/ रचनाक समीक्षा सीरीज १. आशीष अनचिन्हार 'विदेह' क ३२७ म अंक ०१ अगस्त २०२१ एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक ६५ टा पोथीक नव संस्करण विदेहक २३३ सँ २५० धरिक अंकमे धारावाहिक प्रकाशन नीचाँक लिंकपर पढ़ू:- Videha_15_05_2018 Videha_01_05_2018 Videha_15_04_2018 Videha_01_04_2018 Videha_15_03_2018 Videha_01_03_2018 Videha_15_02_2018 Videha_01_02_2018 Videha_15_01_2018 Videha_01_01_2018 Videha_15_12_2017 Videha_01_12_2017 Videha_15_11_2017 Videha_01_11_2017 Videha_15_10_2017 Videha_01_10_2017 Videha_15_09_2017 Videha_01_09_2017 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन: विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) देवनागरी विदेह: सदेह: १ (२००८-०९) तिरहुता विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) देवनागरी विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) तिरहुता विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०)देवनागरी विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]देवनागरी विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] तिरहुता विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ]- दोसर संस्करण देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ]देवनागरी विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] तिरहुता विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ]देवनागरी विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] तिरहुता विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ]देवनागरी विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] तिरहुता विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ]देवनागरी विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] तिरहुता विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ]देवनागरी विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] तिरहुता विदेह:सदेह ११ विदेह:सदेह १२ विदेह:सदेह १३ The readers of English translations of Maithili Novel "sahasrabadhani" and verse collection "sahasrabdik chaupar par" has intimated that the English translation has not been able to grasp the nuances of original Maithili. Therefore the Author has started translating his Maithili works in English himself. After these translations are complete these would be the official translations authorised by the Author of the original works.-Editor Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ विदेह सम्मान: सम्मान-सूची (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित) सूचना/ घोषणा "विदेह सम्मान" समानान्तर साहित्य अकदेमी पुरस्कारक नामसँ प्रचलित अछि। "समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार" (मैथिली), जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक गएर सांवैधानिक काजक विरोधमे शुरु कएल छल, लेल अनुशंसा आमन्त्रित अछि। अनुशंसा २०१९ आ २०२० बर्ख लेल निम्न कोटि सभमे आमन्त्रित अछि: १) फेलो २)मूल पुरस्कार ३)बाल-साहित्य ४)युवा पुरस्कार आ ५) अनुवाद पुरस्कार। पुरस्कारक सभ क्राइटेरिया साहित्य अकादेमी, दिल्लीक समानान्तर पुरस्कारक समक्ष रहत, जे एहि लिंक sahitya-akademi.gov.in पर उपलब्ध अछि। अपन अनुशंसा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्: VIDEHA: AN IDEA FACTORY (c)२००४-२०२२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-2022 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। ५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् 'विदेह' ३३९ म अंक ०१ फरबरी २०२२ (वर्ष १५ मास १७० अंक ३३९) विदेह:मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA
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