VIDEHA — Issue 353 / अंक ३५३

Publication: VIDEHA · Issue: 353
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ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह: ३५३ म अंक ०१ सितम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७७ अंक ३५३) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२२। सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 353 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १. गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. १-४) अंक ३५२ पर टिप्पणी (पृ. ५-६) २.गद्य खण्ड (पृ. ७-९३) २.१.पाठक हमर पोथी किए पढ़थि- गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ८-६४) २.२.लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- जगदानन्द झा 'मनु'क बालकथा "माटिक बासन" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी (पृ.६५-७२) २.३.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ५) (पृ. ७३-७७) २.४.प्रणव कुमार झा- भगवान हमरा गरीब किए बनेलौं! (पृ. ७८-८२) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १०म खेप (पृ. ८३-८७) २.६.गजेन्द्र ठाकुर- बीहनि कथा- अपन-अपन भाग्य (पृ. ८८-८९) २.७.गजेन्द्र ठाकुर- गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास- द ... फाइल्स (पृ. ९०-९३) ३.पद्य खण्ड (पृ. ९४- ३.१.राज किशोर मिश्र- सत ओ झूठ (पृ. ९५-९९) ३.२.गजेन्द्र ठाकुर- अजीगर्त अछि दुर्भिक्ष- ३-४ (पृ. १००-१०३) ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- बिहारक दल - बदलू सरकार (पृ. १०४-१०६) ३.४.आशीष अनचिन्हार- २टा गजल (पृ. १०७-१०८) 2

१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रसंग (युवा आ बाल पुरस्कार २०२२)- मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। १ युवा-पुरस्कार प्रसंग "अंततः"( मुन्नी कामतक कविता संग्रह)अंतिम रेस धरि पहुँचल- ओतऽ हारि गेल बा हरा देल गेल। देखी अगिला साल की होइए। मुन्नी कामतक किछु पोथी http://www.videha.co.in/archive.htm पर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। लेखक धोआ- धोती- साड़ी नै वरन कोरा-धोती-साड़ी परम्पराक छथि। हिनकर रचनामे असली नारी-विमर्श तँ भेटबे करत, किछु एहेन विषय सेहो भेटत जे मूल परम्परामे अखन धरि सोचलो नै गेल अछि, जेना ड्रग-टेस्टिंग लेल गरीब लोकनिक वेक्टरक रूपमे प्रयोग आ ओकर मृत्यु। खएर... २ बाल-साहित्य पुरस्कार प्रसंग ऐ पर कोनो चर्चे व्यर्थ, अगबे धुआ धोती-साड़ीक उज्जर दप-दप फार्महाउस चिकन लोकनिक पोथी सभ रेसमे रहय। छपबेने तँ कोरा धोती बलो सभ रहथि मुदा बच्चा सभ लेल, जूरी लेल नै। के सभ-ग्राउण्ड लिस्ट तैयार केलक की तकर नाम सार्वजनिक कयल जायत? की ओकरा स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित कयल जायत? नै कयल जायत तखन मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल कोना रहि सकत? ऐ बेर मूल पुरस्कार पहिल बेर कोरा-धोती परंपराक उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकें हुनकर उपन्यास "पंगु" लेल देल गेलन्हि, आ से साहित्य अकादेमीक इतिहासमे पहिल बेर भेलै। मात्र धोआ-धोती बला लेल ई पुरस्कार रिजर्व रहै। विदेहमे ई धारावाहिक रूपें ई- प्रकाशित भेल फेर पुस्तकाकार आयल। ई पोथी संकलित भेल विदेहःसदेह २१ मे जे ऐ लिंक http://www.videha.co.in/archive.htm पर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। युवा पुरस्कार मुन्नी कामत कें सेहो देल जेबाक चाही छल, पुरस्कार शिव कुमार प्रसादकें सेहो अनुवाद लेल देल जेबाक चाही छल मुदा एक्के बरिख दू-दू, तीन-तीन टा कोरा-धोती-साड़ी परम्पराबला कें ई नै देल जा सकत। एक्के टा कोरा-धोती बलाकें देल गेलै तहीमे अगरा-पिछड़ा दुनूक धोआ-धोतीधारी आ वर्णशंकर साहित्यकार (बायोलॉजिकल वर्णशंकरता सँ एकर कोनो सरोकार नै) कन्नारोहट उठेने छथि। मुदा एक्के बरिख दू-दू टा कोरा-धोती परम्पराबला कें ई नै देल जा सकत। एक्के टा कोरा-धोती बलाकें देल गेलै तहीमे अगरा-पिछड़ा दुनूक धोआ-धोतीधारी आ वर्णशंकर साहित्यकार (बायोलॉजिकल वर्णशंकरता सँ एकर कोनो सरोकार नै) कन्नारोहट उठेने छथि। अछि।श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, श्री बेचन ठाकुर (क्रमसँ मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ जीवित कथा-उपन्यासकार, कवि आ नाटककार), श्री उमेश पासवान, श्री उमेश मण्डल, श्री रामदेव प्रसाद मण्डल "झाड़ूदार", श्री दुर्गानन्द मण्डल केँ कोनो असाइनमेन्ट नै? मुदा की मैथिली एडवाइजरी बोर्ड द्वारा मैथिलीकेँ खतम करबाक षडयंत्र मैथिलीकेँ मारि देत? नै, कारण? कारण जै तरहेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, श्री बेचन ठाकुर , श्री उमेश पासवान, श्री उमेश मण्डल, श्री रामदेव प्रसाद मण्डल "झाड़ूदार", श्री दुर्गानन्द मण्डल आ आन गोटे अपन तन-मन-धनसँ मैथिलीक जड़िकेँ अपन खून-पसीनासँ पटा रहल छथि..ई षडयंत्र- मैथिलीकेँ मारबाक- नै सफल हएत। ई भाषा जिबैत रहत। अविलम्ब एडवाइजरी कमेटीक सभ सदस्य अपन अपन असाइंमेंट वापस करथि / करबाबथि (अपन माने अपन , अपन परिवार / बच्चा / चेला चपाटी), नै तं हिनका सभ पर त्यागपत्र देबाक लेल दवाब बनाओल जाए, हिनकर सबहक घरक सोझां अष्टजान कएल जाए, राष्ट्रगीतक गाओल जाए, राष्ट्रगीतक अष्टजाम कएल जाए / मिथिला राज्य जं ऐ स्थिति मे बनत तं यएह दस परिवार मिथिला कें भूजि खा जाएत / मिथिला राज्य संघर्ष समिति सभ ऐ छद्म अनुवाद सभकें अपन सभामे जराबथि / तखने ओ सिद्ध का' सकता जे ओ मिथिला राज्य बनेता आकि मैथिली राज्य / धोआ-धोती धारी लोकनिकें साहित्य अकादेमीक अपन-अपन अनुवाद-असाइनमेंट आपस कऽ देबाक चाही आ ओ सभ असाइनमेंट नंद विलास राय, राजदेव मण्डल, रामबिलास साहु, धीरेंद्र कुमार, दुर्गानंद मण्डल, मनोज कुमार मण्डल, शिव कुमार प्रसाद, उमेश पासवान, संदीप कुमार साफी, बेचन ठाकुर, मेघन प्रसाद, किशन कारीगर, लालदेव महतों, उमेश मण्डल, शारदानंन्द सिंह, सुभाष कुमार कामत, मुन्नी कामत आदि कें देल जाय, आ से केलासँ मैथिली लेल अग्निवीरक एकटा फौज तैयार भऽ जायत। मेघन प्रसाद विदेह मे अपन आलेखमे ई इच्छा व्यक्त केने छलाह मुदा तखनो हुनका अनुवाद-असाइनमेंट नै देल गेल। अशोक अविचल कें एक तिहाइ बधाइ, कारण तीनटा कोरा धोती-साड़ीक बदला हुनकर कार्यकालमे एक्केटा कोरा-धोतीकें पुरस्कार भेट पेलै। आब अगरा-पिछड़ा दुनू दिसुका धोआ-धोती बला मायावी सभ कोन-कोन बहन्ने की-की उकबा उड़ेतन्हि आ अगिला बर्खसँ फेर सँ एकछाहा धोआ-धोतियाइन साहित्य अकादेमी भऽ जायत बा नै तकर उत्तर तँ भविष्यक कोखिमे अछि। अंक ३५२ पर टिप्पणी विद्यानन्द झा केदारनाथ चौधरी जी पर जे किछु कहल गेल, सरिपहुँ सत्य, आइ धरि सम्मान, सहयोगक मामलामे ग्रुपबाजी एतेक होइत अछि जे उचित कथाकार अवहेलनाक शिकार भऽ जाइत छथि। बहुत बेर एहन देखऽ लेल भेटाइए जे साहित्य अकादमीक सम्मानमे एहन निम्न स्तरीय रचना केँ चुनल जाइत अछि जे पढ़ि कऽ आँखि नोरे-नोर भऽ जाइत अछि। सादर नमन केदार बाबूक लेखनी, व्यक्तित्व आ कृतित्वकेँ। प्रणव झा विदेह समय-समयपर मैथिलीक लेखक सभक साहित्यिक जीवनपर विशेषांक निकालैत रहैत अछि जइसँ नै खाली भाषा-साहित्यमे विभिन्न लेखक सभकक योगदानकेँ स्थापित करबामे ई भूमिका निभा रहल अछि अपितु नवतुरिया कम जानकारी बला पाठक सभमे ऐ सभ साहित्यकार एवं हुनकर कृतिक परिचय प्रस्तुत कऽ ओइमे रुचि जगाबक काज सेहो कऽ रहल अछि। एहि क्रम्मे ई केदारनाथ चौधरी विशेषांक सेहो छल। ऐ सँ पहिनेहो कतेको रचनाकारक परिचय हमरा सन पाठककेँ विदेहक माध्यमसँ प्राप्त भेल अछि। यद्यपि पुवारि गाँव (नेहरा) क चौधरी खानदानसँ हमर संपर्क रहल अछि मुदा एखन धरि हम श्री केदारनाथ चौधरीक साहित्यिक जीवन सँ परिचित नै छलहुँ। विदेहक माध्यमसँ हुनक परिचयक संगे किछु वृत्तांत आ हुनक रचना पढ़बाक सेहो अवसर भेटल। "अबारा नहितन" पढ़ि कऽ आजादीक तत्काल बादक अनेको सामाजिक आ राजनैतिक परिस्थितिक भान होइत छैक। ईहो जे मिथिला राज्यक मांग कतेक पुराण छैक। पूर्वमे एकर की कारण आ भूमिका सब रहलै अछि। ऐ अंकमे श्री केशव भारद्वाजक संस्मरण आ कथा (खेलौना) सेहो बहुत रोचक छैक। खेलौना कथामे लेखक ग्रामीण जीवनक एकटा पूरा पीढ़ीक समयावधिकेँ, विभिन्न परिस्थिति आ घटनाक मानवीय भावनाक पहलू आ नोस्टाल्जियाकेँ नीक जेकाँ बान्हने छथि। विदेह टीमकेँ श्री केदारनाथ चौधरी विशेषांक लेल बधाइ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य खण्ड २.१.पाठक हमर पोथी किए पढ़थि- गजेन्द्र ठाकुर जेम्स जॉयसक ओना तँ पोथी सभ प्रकाशनसँ पूर्वे प्रसिद्ध हेबऽ लागल छलन्हि मुदा एक बेर एहनो भेल जखन हुनका अपन रचनाकेँ व्याख्यायित करऽ पड़लन्हि आ प्रश्न उठल जे लेखक अपन रचना लिखलाक बाद ओइपरसँ अपन समीक्षाक अधिकार छोड़ि दिअए आ ओकर समीक्षा आने लोक मात्र करथि, जेम्स जॉयसक उत्तर छल- नै। आ तइ अनुरूपेँ "पाठक हमर पोथी किए पढ़थि"- लेखक द्वारा अप्पन पोथी/ रचनाक समीक्षा सीरीज मे पहिल खेपमे अहाँ पढ़लौं "आशीष अनचिन्हारकेँ:- http://www.videha.co.in/new_page_89.htm १. आशीष अनचिन्हार ०१ अगस्त २०२१ दोसर खेपमे "गजेन्द्र ठाकुर" लिखि रहल छथि जे लोक हुनकर पोथी सभ किए पढ़न्हु। २. गजेन्द्र ठाकुर ०१ सितम्बर २०२२ पाठक हमर पोथी किए पढ़थि- गजेन्द्र ठाकुर पहिल गप जे रचना सुनने छिऐ नीक छै मुदा पोथी भेटत केना? पहिने नेपाल पठेलापर डाकखर्च भारते जकाँ रहै आब तँ पोथी/ पत्रिकासँ महग डाकखर्च से आब नेपाल पोथी नै जाइए। हम न्यू जर्सीमे रहै छी, मधुबनी-दरभङ्गामे मैथिली पोथी-पत्रिका भेटिते नै अछि तँ यूगाण्डा, यू.एस.ए. आ ऑस्ट्रेलियामे कतऽ भेटत। तइ लेल अहाँ सभकेँ हम कहब जे हमर सभटा रचना अन्तर्जालपर उपलब्ध अछि ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_90.htm , से भौगोलिक सीमाक समाप्तिक घोषणा भेल, उपलब्ध्ताक सेहो कोनो स्टॉक लिमिट नै। आब हम अपन पोथीक विवरण देब निम्न खण्डमे- मूल पद्य (सामान्य कविता, गीत-प्रबन्ध, गजल आ बाल कविता-गजल) गद्य (सामान्य कथा-उपन्यास-समालोचना-निबन्ध-प्रबन्ध-नाटक-सम्पादकीय आ बाल साहित्य) अनूदित गद्य- हमर अनूदित सामान्य कथा आ बाल साहित्य पद्य- हमर अनूदित पद्य साहित्य पहिने पद्य पर आबी, उदय नारायण सिंह जी हमर किछु पद्यकेँ उद्घृत केने छलाह, हुनका नीक लागल छलन्हि, हुनकर विश्लेषण नीचाँ दऽ रहल छी- "कतेको पंक्ति भरिसक पाठकक मोनमे ग्रंथित-मुद्रित भऽ जएतन्हि, जेना कि "ढहैत भावनाक देबाल खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़ आकांक्षाक बखारी अछि भरल प्रतीक बनि ठाढ़ घरमे राखल हिमाल-लकड़ीक मन्दिर आकि ओसारापर राखल तुलसीक गाछ प्रतीक सहृदयताक मात्र" अथवा, निम्नोक्त पंक्ति-येकेँ लऽ लिअ : "सुनैत शून्यक दृश्य प्रकृतिक कैनवासक हहाइत समुद्रक चित्र अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द क्यो देखत नहि हमर ई चित्र अन्हार मे तँ सुनबो तँ करत पात्रक आकांक्षाक स्वर" मिथिलेक नहि अपितु भारतक कतेको संस्कृतिक प्रभाव देखल जा सकैछ हिनक कथा-कवितामे। एहिसँ मैथिली क्रियाशील रचनाक परिदृश्य आर बढ़ि जाइछ, आ नव-नव चित्र, ध्वनि आ कथानक सामने आबि जाइत अछि । कवि कोन मन्दाकिनी केर खोजमे छथि जे कहैत छथि- "मन्दाकिनी जे आकाश मध्य देखल आइ पृथ्वीक ऊपर..." अपन विशाल भ्रमणक छाप लगैछ रचनामे नीक जकाँ प्रतीत होइत अछि । आ आर एकटा बात स्पष्ट अछि  कोषकार गजेन्द्र ठाकुर आ रचनाकार गजेन्द्र ठाकुर भिन्न व्यक्ति छथि, व्यक्तित्वमे सेहो फराक... जतए कोशकारितामे सम्पादकत्व तथा टेक्नोलोजी �सँ सम्बन्धित व्यक्तिक छाया भेटिते अछि, मुदा सृजनक मुहुर्तमे से सभटा हेरा जाइत छथि । अनेको रचनामे मात्र गोल-मटोल कथे नहि, राजनीतिक भाष्य सेहो लखा दैत अछि। ताहिमे हिनका कोनो हिचकिचाहटि नहि छन्हि। ओना देखल जाए तँ कुरुक्षेत्र क कतेको महारथी छलाह = प्रत्येक वीर-योद्धा अपन-अपन क्षेत्र आ विधाक प्रसिद्ध पारंगद व्यक्ति छलाह, क्यो कतेको अक्षौहिणी सेनाक संचालनमे, तँ क्यो तीरन्दाजीमे, आदि आदि । सभ जनैत छलाह जे धर्म आ अधर्मक भेद की होइछ मुदा तैयो सभ क्यो जेना आसन्न विपर्यायक सामने निरुपाय भऽ गेल छलाह। आजुक सन्दर्भमे सेहो कथा मे तथा व्याख्यामे एहन परिस्थितिक झलक देखल जाइत अछि । सैह एहि महा-पाठक (मेटाटेक्सट) खूबी कहब। नहि तँ ओ कियेक लिखताह- देखैत देशवासीकेँ पछाड़ैत मंत्र-तंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल गुनधुनी बला स्वप्न बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान दमसाइत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त कारिख चित्रित रातिक निन्न टुटैत-अबैत-टुटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य ... एहि महापाठकेँ एकटा एक्सपेरीमेन्ट केर रूपमे देखी तँ सेहो ठीक, आ सप्तर्षि-मंडलक निचोड़ अथवा सप्त-काण्डमे विभाजित आधुनिक महा काव्य रूपमे देखी तँ सेहो ठीक हएत। ।" राजदेव मण्डल लिखै छथि:- "सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर बैसल अहाँ जि‍नगीक खेल देख रहल अछि‍। गहन अन्‍वेषण करैत एक-एकटा चि‍त्रक रचना कऽ रहल छी आ ओइ उमंगमे डूबि‍ रहल छी। असीम समुद्रक कातक दृश्‍य हृदय भेल उमंगसँ पूरि‍त....। अहाँक अन्‍तरक कवि‍ रवि‍क चि‍त्र उपस्‍थि‍त करैत कहैत अछि‍- "सूर्य कि‍रण पसरि‍ छल गेल कतेक रहस्‍य बि‍लाएल ति‍मि‍रक धुँध भेल अछि‍ कातर मुदा ई की.......।‍ संग्रहमे कि‍छु हैकू पढ़बाक सुअवसर भेटल। कि‍छु सुआद बदलबाक लेल....। मि‍थि‍लांचलक गमकसँ अहाँक कवि‍ता हमरा सबहक मोनकेँ गमका रहल अछि‍ : "‍मोन पाड़ैत छी धानक खेत झि‍ल्‍ली कचौड़ी लोढ़ैत काटल धानक झट्टा ओहि‍ बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालझड़ी जेकरे नाओं लाल छड़ी आ सत धरि‍आ खेल....।" प्रवासमे रहैत स्‍मरण होइत गाम घर। ऐ पाँति‍मे वि‍योगक ओइ व्‍याथाक वर्णन भेटैत अछि‍। एकटा नवीन लयक संग- "‍पता नहि‍ घुरि‍ कऽ जाएब आकि‍ एतहि‍ मरि‍-खपि‍ बि‍लाएब.....।" ऐ व्‍यंग्‍यमे स्‍पष्‍ट दृष्‍टि‍गोचर भऽ रहल अछि‍। "लाठी मारबामे कोनो देरी नहि‍ बाछी भेलापर शोको थोड़ नहि‍ परन्‍तु छी पूजनीया अहाँ....।‍" बाढ़सँ उत्‍पन्न भेल समस्‍या आ ओकरा छोट-छीन पाँति‍मे समेटनाइ गागरमे सागर भरबाक प्रयास ऐ पाँति‍मे परि‍लक्षि‍त भऽ रहल अछि‍- "ठाम-ठाम कटल छल हठहर ऊपरसँ बुन्नी पड़ि‍ रहल सभटा धान चाउर भीतक कोठी टटि‍ खसल पानि‍क भेल ग्रास...।‍" नव-नव बि‍म्‍बसँ कवि‍ता सभ पूरि‍त अछि‍- "सहस्‍त्रबाढ़नि‍ जकाँ दानवाकार घटनाक्रमक जंजाल फूलि‍ गेल साँस हड़बड़ा कऽ उठलहुँ हम....।‍" हड़बड़ा कऽ नै बल्‍कि‍ अहाँ सचेत भऽ कऽ उठलहुँ। नव-नव चि‍त्र ध्‍वनि‍ लऽ कऽ नवीन दृष्‍टि‍क संगे। पता नै कतऽ धरि‍ जाएब। कतऽ गन्‍तव्‍य अछि‍ अहाँक। "वि‍श्‍वक मंथनमे होएत कि‍छु बहार आब.... पथक पथ ताकब..... प्रयाण दीर्घ भेल आब....।‍"" ई सभ कविता अहाँकेँ भेट जायत हमर पोथी "सहस्राब्दीक चौपड़पर" मे। आब हमर पोथी "सहस्रजित्" सँ दू टा कविता प्रस्तुत अछि। नजरि लागि जाइ छै माए कहै छथि जे नजरि लागि जाइ छै बेटाकेँ देखि जे लागैए ओ आइ सुन्दर साँझमे छाह पड़ि जाइ छै ओकर मुँहपर से तँ सत्ते! हमरा सन ककर बेटा मुदा मोनमे ई अबिते नजरि लागि जाइ छै कोनो काज शुरू करैए मारिते रास काज एक्के बेर खतम हेबा धरि सुधि नै रहै छै कियो कहैए जे कतेक नीक अछि अहाँक बेटा तँ माएक करेज धकसँ रहि जाइ छै करेज बैसऽ लगै छै की करै छै? कोन सुन्दर छै? मुदा कहैत रहै छथि माए जे नजरि लागि जाइ छै बाते-बातपर हमर बेटाकेँ कनियाँ कहै छथि सासुकेँ माँ अहाँक बेटा घबराइ बला नै अछि दुष्टक नजरि नै लगै छै अहाँक बेटाकेँ माए मुदा शनि दिन, सरिसौ-तोरी आ मेरचाइ जड़बै छथि सुरसुरी लागि जेतै ओकरा तँ बुझब जे नजरि नै लागल छै आ सुरसुरी जे नै लागतै तँ बुझब जे नजरि लागि जाइ छै कने काल सुरसुरी नै लगलापर माए होइ छथि चिन्तित देखियौ ने, हमरा बेटाकेँ नजरि लागै छै छोटो-छोट गपपर.. नजरि लागि जाइ छै... बाते-बातपर हमर बेटाकेँ... मुदा तखने छिकैत छन्हि बेटा, ओकरा सुरसुरी लागि जाइ छै माएक मुँहपर अबै छन्हि मुस्की सरिसौ-तोरी आ मेरचाइ सरबामे कनेक आर दऽ दै छथि... कहलियन्हि ने माँ दुष्टक नजरि नै लगै छै अहाँक बेटाकेँ कटिहारी १ कनकनी छै बसातमे हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे गोइठामे आगि जे अनलन्हिहेँ सुमनजी राखि देल नीचाँ कनकनाइत पानिमे डूम दऽ गोइठाक आगिसँ आगि लऽ शरीरकेँ गति-सद्गति देबा लेल कऽ देलन्हि अग्निकेँ समर्पित तृण, काठ आ घृत समेत घुरि कऽ जेता सभ लोह, पाथर, आगि आ जल नांघि, छूबि डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने माएकेँ छोड़ि घर सभ घुरै छथि एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक भोरमे मुदा नै छै कोनो अन्तर पहिरावा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ महिलाक अवस्था देखू ऐ कनकनाइत बसातसँ बेशी मारुख हाड़मे ढुकल जाइत अछि कमला कात नै यमुनाक कात हजार माइल दूर गामसँ आबि मिज्झर होइत अछि खररखवाली काकीक श्वेत वस्त्र साठि साल पूर्वक वएह खिस्सा वएह समाज मात्र पहिराबा बदलि गेल मात्र नदी-धार बदलि गेल सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल एकटा परिवार फेरसँ बनबए पड़त आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी ऐ बसातक कनकनीसँ बड्ड बेशी सर्द २ गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड गंगाजल कुश पसारल भूमि तुलसी गाछ लग उत्तर मुँहे पोस्टमार्टम कएल शरीर सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहीरि जनौ, उत्तरी पहीरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि आ ओइ जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबै छथि तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन कपोतवेश मृतक पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दै छथि कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर सतकठिया लऽ सात बेर प्रदक्षिणा कऽ कुरहरिसँ ओइ ऊकक सात छौ सँ खण्ड कऽ सातो बन्धनकेँ काटि सातो सतकठिया आगिमे फेंकि बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ एड़ी-दौड़ी बचबैत नहाइले जाइ छथि तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ बिनु देह पोछने आ फेर मृतकक आंगनमे द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि स्पर्श कऽ घर घुरि जाइ छथि मणिकान्त दास लिखलन्हि "त्वञ्चाहञ्च" बड्ड नीक लागल। हमर गजल ओम प्रकाश झा लिखैत छथि- "ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः- कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि।" ओ लिखि रहल छथि अ रचनाक मादेँ- बाल गजल कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी बोने-बोने फिरैए जे दैता सभ वनसप्तो लऽ घूरलि मानू बार्बी सात रंग लऽ भोर भेले गाममे परी रहैए गाम अकानू बार्बी कननी दूर हेतै बच्चा सभमे भरल आँखि बिसरी ठानू बार्बी पानि अकास धरती जा-जा घूमी पंख लगा टिकुली अकानू बार्बी धम्म गुड़िया संग खेलू कूदू राति सपनाउ निन्न आनू बार्बी सुता दियौ ऐ गुड़ियाकेँ आ सुतू चढ़ि ऐरावत दिन गानू बार्बी ई संकलित अछि हमर मोटा-मोटी सय पन्नाक गजल संग्रह "धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ" जइमे गजल ४० पन्नामे छै आ ६० पन्नामे मैथिली गजलशास्त्र छै। ऐ पोथीक "टाइटल गजल" एतऽ दऽ रहल छी- अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ धतालबूढ़ प्रेमकेँ बोहेलक दुनू हाथजँ निर्मल आंगुरसँ छूबै जे ओकर पुठपुरी फरफैसी पसारै निदरदी अगिलकण्ठ जँ निमरजना प्रेम जे छलै धपोधप निश्छल बिदोरै लेल प्रेमीकेँ छलै ओ कड़ेकमान तँ अकरतब कर्तव्यमे भेद नै बुझलकै जे जराउ प्रेमक गप्प नै कहियो नुकेलकै जँ खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ मुन्ना जी हमरासँ साक्षात्कारमे पुछने छलाह जे उपलब्ध अछि विदेह:सदेह ३३ पृ. ४१५ पर ओकर किछु अंश दऽ रहल छी मुन्नाजी:एतेक काज केलाक पछातियो एखन धरि अहाँक कोनो मूल्यांकन (व्यक्तित्व आ कृतित्व दुनूक) नै भऽ सकल। अइ सँ अपनाकेँ प्रभावित तँ नै पबै छी? गजेन्द्र ठाकुर: नै, एहिसँ हम सहमत नै छी। हमरा प्राप्त ई-पत्र आ चिट्ठी सभ, पाठकक प्रशंसापत्र, पाण्डुलिपि सभक परिरक्षणक हमर योजनाक सफलता आ भाषा-विज्ञानक हमर शोध ई सभ हमरा संतुष्टि देने अछि। खराब लोक सेहो अहाँकेँ नीक कहत से कोना सम्भव? से हमरा चाहबो नै करी। व्यक्तित्व आ कृतित्व दुनूक मूल्यांकन मैथिली की आनो भाषामे मृत्युक बादे होइ छै। मन ऐसो निर्मल भयो जैसे गंगा नीर। पीछे पीछे हरि फिरें कहत कबीर कबीर।। (कबीर) (मोन एहन निर्मल भऽ गेल जेना ई गंगाक जल अछि। पाछाँ-पाछाँ भगवान कबीर-कबीर कहैत पछोर धेने छथि।-कबीर) खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ (लोककेँ काज केलाक बाद दाम भेटै छै हमरा अगूबारे पेने छी।) जगदानन्द झा "मनु"- "गजेन्द्र ठाकुर जीक ई उक्ति सय टका ठीक छैन -"जे जतेक बच्चा बनि जेता ओ ओतेक नीक बाल गजल कहता|" चन्दन कुमार झा- "गजेन्द्र जी गजल व्याकरणकेँ पुष्ट करैत नहि खाली गजल लिखलाह अपितु सरल वर्णिक आ' सरल मात्रिक बहरक रूप मे मैथिली गजल संसार केँ दूटा अनमोल बहर वा गजल-छंदक ढाँचा देलखिन्ह जे हमरा सन-सन कतेको नवतुरिया आ' नवसिखुआ केs लेल गजल लिखबा हेतु सहायक सिद्ध भेल अछि.एहि सँ मैथिली गजल केँ अभूतपूर्व समृद्धि भेटि रहल छैक।" आशीष अनचिन्हार लिखै छथि- "मुदा हालहिमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा बहरे-मुतकारिबमे सफलतापूर्वक गजल लिखल गेल। तँए आब एकर चर्चा आवश्यक। ओना मैथिलीमे वार्णिक बहरक खोज सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल अछि जकर अनुकरण प्रायः हरेक नव गजलकार कए रहल छथि।" ओ गजल नीचाँ देल जा रहल अछि। बहरे मुतकारिब बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ रुक्न फ ऊ लुन (U।।) चारि बेर अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे हहारो उठेलौं उदासी गबेलौं सिहाबै किए छी मदारी अनेरे जतेको नबारी छबारी बुरैए घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे घरोमे उपासे बहारो निरासे दहारे अकाले नचारी अनेरे चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे भसाठी अबैए विचारी अनेरे आ अही गजल संग्रहक गजल सभसँ किछु शेर अहाँ लेल, जँ अन्त जाइत-जाइत कना जाय तँ नीचाँमे देल ई-मेलपर अवश्य सूचित करी। उड़ैए चिड़ै आ बहैए अनेरे ऐ नील अकाश बिच ऐरावत-मन जखन उधियाइए अङेजब कोना देखल जानल सेहो आइए रक्षादीप से मिझा रहल अछि ककरा की कहबै के पतिआएत गह-गहमे अर्थात बहुत अछि अनठेने नै दै छी कान बात किए यौ घृणो तँ करू जँ सएह भरल अछि चिन्ताक मोटगर रेख कपारपर छल छोट से बनल आब छेबगर आकांक्षाक पजरैत अग्निक बिच पैघ छी तकर चेन्हासी कहलहुँ आजुक बात खतम होएत यौ भोरुका बसात से बिर्रो बनल पूछू सभसँ आ छोड़ू नै ककरो नव विहान किए छल रोकल आस्ते सँ जे सिहकि उठल ई बसात अन्तर्मनक शक्ति बदलि देत सत्तै माँछ बिनु पानिक उन्टा प्रेम हम्मर प्रेम पाबि खटबताह बनल अछि तेजगर छी से छद्म ज्ञान भेल खिखिर कटाबै भौकी प्रतिपल नटुआ बिपटा बनि हँसै अछि तोहूँ हमरे सन अछि देखल डरक घाट नहाएल छी हम से सहब दहोदिश अत्याचार ऐरावत देखैत इजोतक बिर्रो बाढ़ि दुर्भिक्ष ग्रहणक ई सूर्य थाकल देखै छी चोन्हराएल चन्द्रमाक इजोतक चर्च तँ बड़ होइ छै एहि पिरौँछ इजोतक खेरहा कहलक आरि-धूर बाटे चली आ जा कऽ पहुँची बीच सड़क ठाढ़ छै रोकि ने सकितौं आ देखल मेघक टिक्कर खसि रहल छै अकासमे हुलसि ताकल खेत दिस उल्लास पर्वत चढ़ल ऐ जाऊ कत्तऽ टिटही सेहो इजोरियामे भागल अन्हरिया राति आ जिनगी झूर-झाम जे भेल इजोरिया छैक कतबो छै तँ रातिये सगरो दिनोमे ग्रहण आ सगरो अन्हार पसरल हनिकय फेकी विचार मोनक फड़िच्छ भेने बेसम्हार भऽ गेलै गोंहि आएल अछि हमरा टोल जलसमाधि तँ व्योपार भऽ गेलै ऐरावत गज-ग्राहक गज नै दुनूमे मेलक नियार भऽ गेलै आँखि ओङठल जाइए कहू की करी नै बुझलौं तमसाइए कहू की करी धान छै खखरी बनल अहिठाम आ धानी आगि धुधुआइए कहू की करी देखि छूबि अनुभूतिक क्षण ई पाँती इतिहास बनत नै बान्हक कातमे घर बनेने बाट जोही बाट बिसरि कऽ नै बिलमैए हमरा की झूठक बहैत धार छै जे थमकल उनटि बहलै तँ डाह दैए रहि रहि डंकक अबैत चोट सुनैत भेल दिन कतेक ऊहि अबिते अबैत विभिन्न भेल उसरि गेल लच्छनो तँ बापक जिद्द गुनलकै नीक तीक भूलि सएह बनलिऐ बूझि सकलौं नै निशाभाग राशिक खेरहा लूझि सकलौं नै परातीक पाँतिक खेरहा बझाओल गेलैए चिड़ैया एना रे कहैए हितैषी ई शिकारी बड़ा रे क्रूर स्वप्न आ सुन्दर जीवन देखलौं निन्नसँ जगलापर कोना हम मानब जँ कियो ई कहलक किछु नै बदलैए कहैए ई मिलेबै आइ नोरोमे कने गोला जँ भांगे पीबि एतै भावना पीतै लगैए ई कोन पक्का रंगसँ ढौराबी जे धोखराए नै मोनक रंगो धोखराइए चलू घुरि चली भोरे उदासी उड़ियाइत जाइत जे बुन्नी बुनिऐल छिच्चा अहीं तँ छी चरको परियानि ई बनेलौं कएक बेर उबेरक बाट ताकी आ सुरुज कहाइ छी ओकरा देखि बुझलहुँ गढ़निक सोपान बनैत बनैत बनै मूर्ति अहाँ देखाइ छी कोनटा बचल नै एकान्ती ले एकोटा अन्हरोखे उठै छी आ गनती गनै छी पिआ गेलाह देशान्तर दूरस्त देस कियो नै घुरै अछि से आसो नै तकै छी उचरि नव रूप अपन लिखैब तखन किने उतर दछिन डगहर    बहैब तखन किने कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने जे देखलक बरियारक गाछ कहलक बिरदाबन ईहे उड़कुस्सी लागै दलानपर छै आब उजड़नहिए नीक जकरा कतहु ने छै पुछारी से अछि सौराठक नोतिहारी चन्द्रोगत नै प्रेम अछिञ्जल से आब बिसरनहिए नीक हाथी अपने पएरे भारी चुट्टी अपने पएरे भारी अछि ऐरावत प्रेम-जिंजीरसँ छारल तैं ठोकरेनहिए नीक आदति जे लागल वेदना सहबाक गेंठ बनैए से सोहनगर लगैए बनि माँछ अकुलाइ छी बाझब जालमे कक्खन जँ फँसि त्राण पाएब आँखि बओने से देखतै ओ नै बुझलिऐ ई एते बढ़ल अछि बात देखल आइ जे ओ भँसिया रहल अछि हमरासँ कते की माँगै छल रहरहाँ जे जुमल ओ बिनु लेने जा रहल अछि ओकर हाक्रोस हमर चुप्पी सुनै छल बाजब से बिनु सुनने जा रहल अछि आब आउ हमर किछु हाइकू/ शेनर्यू/ टनका/ हैबून बीहनि कथा सन ई विधा सीरियस नै मानल जाइ छै।मुदा जँ निचुलका रचना सभ (हमर पोथी "सहस्रजित्" सँ) अहाँकेँ गम्भीर लगैए तँ बुझू जे हमर काज सफल भेल। १ प्रकृति रोष कुश तिल जलसँ विधवा बनि सधवा की विभेद दूबि अक्षत जल (टनका/ वाका) करबीरसँ घर गाछ पहाड़ घेरल अछि (हाइकू) बनैया लोक घरक पनिबह बिदति नहि (शेनर्यू) करहड़ उपारि कऽ खाउ, प्रकृतिकेँ घरमे बसाउ, फुलवारी बनाउ, पहाड़क फोटो बना कऽ घरमे लटकाउ। आ भऽ जाउ प्रकृति प्रेमी। गामकेँ नग्रमे लऽ आउ, चित्रकारीसँ, कलाकारीसँ, बुधियारीसँ। खेलाइ हम करियाझुम्मरिमे नीचाँ अकास एकपेड़िया सड़क कतऽ पाबी आब, आब तँ चारि लेन सेहो कम चकरगर मानल जाइए। छह लेन, आठ लेन। अकास मलिछोंह, गाछक हरियरी मलिछोंह। मोन मलिछोंह। मुदा सड़क, घर सभ फोटो सन चिक्कन चुनमुन।                                                                                                                                                                                                                      लिखी चित्रसँ घरक खाका आइ छी जङलाह (हैबून) २ १. तागि प्रकृति ताकैले भेलौं पार सुखल पात (हाइकू) २. ई फूल फल चढ़ैत जाइ आगाँ कम होइए उनटि देखी फेर लगमे कम दूरे बेशी (टनका/ वाका) ३. रंग छाड़ल पहाड़ आर गाछ मुदा जीवन (शेनर्यू) ४. झझायल रंग कतेको वर्णक। बच्चाक किताबोसँ बेशी चमकैए ई प्रकृति, फूल, पात, बाट आ अकास। आ एकरा सभकेँ तँ छोड़ू ई बरफ, जे रेगिस्ताने ने छी, बालुक बदला बरफ। मुदा नै अछि ऑक्सीजन आ नहिये फूल-पात। मुदा एकर सेहो देखियौ शान। जइ रस्तासँ अबै छलौं से ओतेक कहाँ चमकै छल। जखन ओइ प्रकृतिक लग छलौं तँ कहाँ ओकर रूप निङहारि पाबै छलौं। कियो दूरसँ देखैत हएत तँ निङहारि पबैत हएत हमरो, प्रकृतिक बीचमे हमहूँ प्रकृति बनल हएब। मुदा ऐ शिखरपर आबि जे सनगर लगैए ई प्रकृति। गाछ भेल छै असगरुआ बौआ पात भेल छै खिलौना प्रकृतिक शिखर देखि मुदा आब ऐ शिखरपर एलाक बाद लगैए जे बेकारे एलौं एतऽ। ऐ शिखरकेँ ओइ ठामसँ देखै छलौं तँ कतेक सुन्नर लगै छल ई शिखर। मुदा शिखरपर एलाक बाद आब तँ वएह गाम नीक लगैए। तुलना तखने ने हएत जखन गामक प्रकृतिकेँ शिखरसँ देखबै। गामसँ शिखर आ शिखरसँ गाम। मुदा लिलसासँ हाइ रे हाइ। आब चलै छी शिखरक ओइ पार। देखै छी ओइ दिसुका लोक समाज। दूरसँ लगैए दुनू कातक गाम नीक, तराउपड़ी। मुदा ओइ कातक गामसँ शिखर ओतेक सुन्नर लागत जतेक ऐ पारक गामसँ लगैए। नै ठाढ़ होउ चलू चली घुरैले बनिजार छी लोकक बीचमे छी जाइत घुरैत छी (हैबून) ३ चतरल छै/ लतरल टाट ई/ झोरा कऽ खाउ ई बिजलौका/ जड़िक शिरा सन/ पसरैए जड़िसँ फूटि /ई कड़कड़ाइत/ दिग दिगन्त/ पसरत सगरे/ करत आच्छादित कारण नै छै/ हारि लेल, विजय/ लेल नै गर्व लोक पताली/ जहाज अकासमे / उनटि गेल / विश्व लोक ब्रह्माण्ड / बात विचार सभ जल दुनियाँ/ समुद्र तलपर/ अद्भुत रंग बिनु हरदि/ चाणक्यक बिखाहि / विषकन्या ओ बिनु हरदि/ बनलि बिखाहि ओ / विषकन्या जे/ पालित भेल छलि/ बिनु हरदिक जे हरदि, गुणे-गुण, सर्दी भेल, दूधमे घी आ हरदि दियौ आ आँखि मूनि घोंटि जाउ। चोट लागल हरदिमे डोकाबला चून मिलाउ आ लेप दियौ। हरदि बिना ने दालि आ ने खिच्चरि लागत पियरगर। खिच्चरि भऽ जाएत मरसटका आ दालि भटरंग। देखैमे लगैए जेना वैजयन्ती फूलक गाछ हुअए, मुदा ई बाड़ीमे होइए, वैजयन्ती सन पोखरिक महारपर नै। हरदि गाछ/ नुकौने जड़िमे ई/ अपन गुण (हैबून) ४ आसक अछि/ पनिसोखा उगल/ चलू बढ़ै छी (हाइकू) भेल उबेर/ उगल पनिसोखा/ काज करै छी/ बहराइ घरसँ/ बाट भेटल अछि (टनका) पनिसोखा ई/ उगल अकासमे/ उपरे ऊपर! (शेनर्यू) आह, आब हएत उबेर, उगि गेल अछि पनिसोखा, खुजि गेल अछि बाट, बनिहार बिदा भेल बनिज करए, आ किसान बीया उखारि रोपनि लेल आ हम बिदा भेलौं कोनो अकाजक काज लेल, अन्तहीन बाटपर, सुकाजक काज लेल , दिशाहीन ठमकल चौबटिया दिस। बाट तकैत ताकी अकास दिस विचित्र भ्रम जेना ई पनिसोखा उगि खोलत बाट तखन फेरसँ ताकब, हेरब अपन समान, आ बर्खा होइ धरि चलैत रहब। तँ ई कहब जे बर्खा होइ धरि चलैत रहब कोनो पलायन तँ नै। पनिसोखा उगले अछि, बाट खुजले अछि आ हम बाट ताकि रहल छी आबैबला बर्खाक? सतरंगिया अछि ई आस उगैए आस डुबबाले अकास बनि गेल संत्रास (हैबून -दू टा गद्य आ दूटा टनका युक्त) फेर कुण्डलिया (हमर पोथी "सहस्रजित्" सँ) कुण्डलिया १ सत असत मे भेद करू, राखू नै किछु रोख ततमत नै करू कनियो, जे छै होनी लेख जे छै होनी लेख, हुए से नीक निकेना सत्यक जीत हएत, जँ करबै अकसतिकस ने डर संग असत केर, डर ढाहू मध्य हृदयक ऐरावतक बुझैत, यएह छी असत्यक सत २ छत्ता घुरछा पल्लौसँ, भेल दिने अन्हार। दिन बितलापर घर घुरी, काल भेल विकराल॥ काल भेल विकराल, पोरे-पोर सिहरैए। सुनत केओ सवाल, बोल बगहा लगबैए। ऐरावत बेहाल, बोल कतऽ भेल निपत्ता। घुरियाए बनि काल, पैसि बिच घोरन छत्ता।। ३ विजय बिन गर्व हएत जँ, बुझू तखन ई नीक हारि भेने घबराउ नै, बात बुझू ई मीत बात बुझू ई मीत, हुअए जँ एक झमेला हारि मानि बढ़ि जाउ, करू ने फेर बखेरा भेल काज प्रसन्न जतऽ, नीक अछि टा सएह मोन ऐरावत बुझि, देखि ली हारि-विजय ४ बोल वचन हुअए नीक, बूझि बाजी जँ बात गुम्म रहनाइए  ठीक, हुए जँ नमहर जाल हुए जँ नमहर जाल, लेत ओ लप दऽ भीतर हल्ला बनि जाएत, नै अछि जँ बेर उचित पर सुनू हमर ई बात, बात होइए अनमोल ऐरावत कहि जाय,  कहू नै ओल सन बोल आब पढ़ू मिथिलाक ध्वज ग़ीत (सहस्राब्दीक चौपड़पर सँ) मिथिलाक ध्वज ग़ीत मिथिलाक ध्वज फहरायत  जगतमे, माँ रूषलि,भूषलि,दूषलि, देखल  हम, अकुलाइत छी, भँसियाइत अछि मन। छी विद्याक उद्योगक कर्मभूमि   सँ, पछाड़ि आयत सन्तति अहाँक पुनि, बुद्धि, चातुर्यक आ शौर्यक   करसँ, विजयक प्रति करू अहँ शंका जुनि। मैथिली छथि अल्पप्राण भेल  जौँ, सन्ध्यक्षर बाजि करब हम  न्योरा, वर्ण स्फोटक बनत स्पर्शसँ  हमर, ध्वज खसत नहि हे मातु मिथिला। (विद्यापति शब्दावलीक प्रयोग) आब ऐ बाल-गीतक माध्यमसँ सभ जानवर-चिड़ैक बोली सीखू (बाङक बङौरा सँ) बड़द करैए दाउन ने यौ हाथी अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि हिर्र-हिर्र सुग्गर चलू संग घर घुरि ती-ती परबा उड़ि गेल ऊपर लिह लिह बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ अतू कुकुड़ कुत-कुत डॉगी कैटी पिसू-पिसू आएत की? चेहै-चेहै सुनि पारा दौगल, भागी छोड़ि बाट हम ताकी अर्र बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ ढेहै-ढेहै कऽ नहि खौंझाबू साँढ़ आओत खरिहानमे यौ आव ठामे रे हे, हौरे हौ बड़द करैए दाउन ने यौ आब बीहनि कथा जँ बीहनि कथाक नामपर अहाँ हास्य-कणिका पढ़ने छी तँ ई विधा अहाँकेँ सीरियस नै लागत। तँ पढ़ू एकटा बीहनि कथा (गल्प गुच्छ सँ), आ एकसँ बेशी बेर पढ़ए पड़ए तँ पढ़ू, आ हमरा विश्वास अछि जे हाइकू-हैबून सन अहाँ एकरो गम्भीरतासँ लेमऽ लागब। बहुपत्नी विवाह आ हिजड़ा "मरि गेलि बेचारी "। गौआँ सभ फलना बाबूक तेसर कनिआँक मुइलापर कहलन्हि । "फलना बाबू तेसर कनियाँक गरदनि काटि लेलन्हि"। एक गोटे कहलान्हि। "से ठीके कहैत छी । पहिल कनियाँमे बच्चा नहि भेलैक तँ दोसर बियाह कएलक । मुदा जखन दोसरोमे बच्चा नहि भेलैक तँ बुझबाक चाही छलए ने"।- दोसर गोटे कहलन्हि । "हँ आ उनटे तेसर कनियाँकेँ कहैत रहथि जे भातिज सभकेँ नहि मानैत छिऐक तेँ भगवान बच्चा नहि देलन्हि । बुझू"?-तेसर गोटे कहलन्हि । "हिजड़ा सार"।- चारिम गोटे सभा समाप्त करैत बाजल । मुदा चारि गोटेक ई महा-सम्मेलन एहि गपपर सहमति मे छल जे पहिल दू टा बियाह करब उचित रहए। हमर उपन्यास शिव कुमार झा "टिल्लू" "मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण" निबन्धमे लिखैत छथि- "गजेन्द्र ठाकुरक "सहस्त्रबाढ़नि"मे दम्माक जड़ी एकटा आदिवासी द्वारा आनव आ िकछु वर्ख वाद ओ जड़ी जंगलमे नै भेटब वोन कम होएवा दिस संकेत करैत अछि तँ हुनकर "सहस्त्रशीर्षा"मे मिथिलाक लगभग सभ दलित जातिक विष्तृत विवेचना करैत अछि। तीनटा घरक रहलोपर धोविया टोली एकटा टोल बनि गेल अछि। झंझारपुर धरि मारवाड़ीक कपड़ा एतए साफ कएल जाइत अछि। महिसवार ब्रह्मण सभ जे बरियातीमे बेलवटम झाड़ि कऽ सीटि-सीटि कऽ निकलैत छथि से कोनो अपन कपड़ा पहिरि कऽ। बैह मंगनिया कपड़ा, महगौआ मारवाड़ी सभक। मारवाड़ी सभक ई कपड़ा रजक भाय दू दिन लेल भाड़ापर हिनका सभकेँ दैत छथिन्ह। कोरैल बुधन आ डोमी साफी, धोवि। डोमी साफी आब डोमी दास छथि, कारण कबीरपंथी जोतै छथि। फेर एकटा आर टोल, चमरटोली अछि। चमार- मुखदेब राम आ कपिलदेव राम। पहिने गामसँ बाहर रहए, बसबिट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाॅस काटि कऽ उपटाए देने अछि आ लोकक वसोबास बढ़ैत-बढ़ैत एहि चमरटोली धरि आबि गेल अछि। घरहट आ ईंटा-पजेबा सभ अगल-बगलमे खसिते रहैत अछि। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ सि‍ंगा बजेबा धरिमे हिनकर सबहक सहयोग अपेक्षित। गाए-माल मरलाक बाद जा धरि ई सभ उठा कऽ नहि लऽ जाइत छथि लोकक घरमे छुतका लागले रहैत अछि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान, दुसाध। गेना हजारीक निचुलका खाड़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्वर स्थानमे एकटा कुशपर गाए द्वरा आबि कऽ दूध दैत देखने रहथि तँ ओहि स्थानकेँ कोड़ए लगलाह, महादेव नीचाँ होइत गेलाह, सीतापुत्र कुश द्वारा स्थापित ई महादेव गेना हजारीक ताकल। मुकेश पासवानक बेटी मालती बैंक अधिकारी छथिन्ह आ जमाए मथुरानंद डी.पी.एस. स्कूलक प्रचार्य छथि, वसंत-कुंज लग फार्म हाउसमे रहै जाइ छथि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि। 1967ई.क अकालमे जखन सभटा पोखरि, गड़खै सुखा गेल मुदा डकही पोखरि नहि सुखाएल प्रधानमंत्री आएल रहथि तँ हुनका देखेने रहन्हि सभ जे कोना एतए सँ बिसॉढ़ कोड़ि कऽ मुसहर सभ खाइत छथि। चर्मकार मुखदेव रामक बेटा उमेश सेहो ओहि मुक्ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि, रहैए मुदा किशनगढ़मे। चप्पल, जुताक मरो-म्मतिक अलावे तालाक डुप्लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीखि लेने अछि। कुंजी अछि तँ ओकर डुप्लीकेट पंद्रह टाकामे। कुंजी हेरा गेल अछि तँ तकर डुप्लीकेट सए टाकामे। आ जे घर लऽ जएवन्हि तँ तकर फीस दू सए टाका अतिरिक्त। मुसहर बिचकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीखि लेने अछि। वसंत कुंजक एकटा व्यवसायीक ओहिठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि किसनगढ़मे। डोमटोलीक बौधा मल्लिक बेटा श्रीमंत सेक्टरक मेन्टेन्सक ठेका लेने छथि। हुनका लग दू सए गोटे छन्हि जे सभ क्वार्टरक कूड़ा सभ दिन भोरमे उठेवाक संग रोड आ पार्किगक भोरे-भोर सफाइ करै छथि। एहिमे सँ किछु गोटे विशेष कऽ नेपालक भोरे-भोर लोकक शीसा महिनवारी दू सए टाकामे पोछै छथि आ अखबारक हॉकर बनल छथि। रहै छथि किशनगढ़मे मुदा अपन मकानमे- मुसहर बिचकुन सदाय।" दुर्गानन्‍द मंडल लिखै छथि- "वि‍देह पत्रि‍काक सम्‍पादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जीक सि‍नेहसँ हमरा अपनामे सृजनात्‍मक शक्‍ति‍क संचार भेल। बहुत रास एहेन शब्‍द सभ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अप्रयुक्‍त छल। जेकरा ठेंठ कहल जाइ छलै ओ जखन ठाकुर जीक लि‍खल पोथी कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक पढ़ि‍ देलखहुँ आ जनलहुँ तँ आरो वि‍श्‍वास भऽ गेल।" राजेन्द्र कुमार प्रधान लिखै छथि- "श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक उपन्यास- सहस्रबाढ़नि ढेर रास रजनैतिक आ ब्यूरियोक्रेटिक उथाल-पुथलक गबाह अछि, तँ हुनकर सहस्रशीर्षा दलित गबैय्या मोहनक भारतक स्वतंत्रतासँ सूचनाक अधिकार धरि गीतक माध्यमसँ राजनैतिक चेतना पसारबाक अद्भुत सफल प्रयास अछि, तँ एकर बीचमे सन्हिआएल गामक आ बाढ़िक राजनीति गामसँ दिल्ली धरि पसरल अछि।" एकटा काल्पनिक मुदा मिथिलाक गाम "गढ़ नारिकेल" उपन्यास-त्रयीमे सहस्रशीर्षाक बाद दोसर उपन्यास सेहो विदेहपर धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि। जगदीश प्रसाद मंडल लिखै छथि- "गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक।" उमेश मण्डल लिखै छथि- "गजेन्द्र ठाकुर जीक लिखल "सहस्त्रवाढ़नि" उपन्यासक आखर-आखरमे संवेदनाक स्वर झलकैत अछि। संवेदनाक बिम्ब उद्दाध आ सम्यक अर्थनीतिसँ भरल मार्मिक चित्रण- जाहिमे एकटा कर्तव्यनिष्ट आ इमानदार व्यक्ति नन्दकेँ गृहस्त धर्मक संग-संग सामाजिक दायित्वक पालन करवाक क्रममे उद्वेलित व्यथा प्रस्तुत कएल गेल अछि।" सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) सहस्रशीर्षा (उपन्यास) लघुकथा सर-समाज आ बाणवीर पढ़ू गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) सँ सिद्ध महावीर, शब्दशास्त्रम्, दिल्ली आ तस्कर पढ़ू- शब्दशास्त्रम् (लघुकथा संग्रह) सँ योगानन्द झा लिखै छथि- "कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक- ई पोथी श्री गजेन्द्र ठाकुरक विभिन्न विधाक रचनाक संकलन थिक। एकर सातम खंडमे बालकथाक रूपमे तेइस गोट कथा संग्रहीत अछि। ऐ कथा सभमे अधिकांश मिथिलाक लोकनायक सबहक कथा िथक तथापि अाधा दर्जनक लगभग कथाकेँ बाल-लोककथा कहल जा सकैछ, यद्यपि ओकरो सबहक भाषा पूर्णत: शास्त्रीय प्रकृतिक अछि। बाललोक कथाक संकलनक क्षेत्रमे चलैत प्रयास सबहक नमूनाक रूपमे एकरा महत्वपूर्ण कहल जा सकैछ।" सुभाष चन्द्र यादव लिखै छथि- "गजेन्द्र ठाकुर अद्भुत व्यक्ति छथि। प्रखर मेधा आ प्रचण्ड ऊर्जा सँ सम्पन्न।हुनक प्रतिभाक पसार बहुत व्यापक छनि। ओ भाषा, साहित्य आ समाजक उत्थानमे जी-जान सँ लागल छथि। गजेन्द्र ठाकुर बहुभाषाविद् छथि। हुनक ई गुण शब्दकोश-निर्माण, अनेक भाषा मे पारस्परिक अनुवाद आ विभिन्न प्रकारक अनुसंधान मे प्रतिफलित भऽ रहल अछि। ओ मैथिलीक पहिल ई-पत्रिका "विदेह"क जनक छथि। "विदेह" मैथिली केँ वैश्विक मंच प्रदान कयलक अछि। मैथिल संस्कृतिक संरक्षण आ विकासक लेल ओ एकटा विलक्षण आर्काइवक निर्माण कयने छथि जे निरन्तर संवर्धनशील अछि।सात खंड मे प्रकाशित "कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक" गजेन्द्र ठाकुरक सृजन आ विमर्शक फुलबाड़ी थिक। साहित्यक कोनो विधा गजेन्द्र बाबू सँ छूटल नहि छनि। हुनक साहित्यिक बहुरंगी दुनिया बहुत प्रांजल आ लोकहितकारी अछि।बाल-साहित्य मे तऽ हुनक कलाक उत्कर्ष आ निखार अनुपम अछि।" आ आब जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (विदेह:सदेह ३५ पृ. ११०५-१२५०) ० सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्र त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम... जन्म भेल रहए एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाममे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी... गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हमर नाटक उल्कामुख उल्कामुख (नाटक) -गंगेश आ वल्लभाक प्रेम ऐ नाटकक विषय अछि। मुदा पहिल दू अंकक बाद तेसर आ चारिम अंक बदलि जाइए। आ आबि जाइ छथि सोझाँ उदयन, दीना, भदरी, आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह, आचार्य सरभ, शिष्य साही, शिष्य खिखिर, शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी। आ शुरू भऽ जाइए इतिहासक एकटा षडयंत्रक अनुपालन। मुदा चारिम कल्लोलक अन्तमे भगता कहि दै छथि अपन शिष्यकेँ एकटा रहस्य.......जे विस्मरणक बादो आबि जाएत स्मरणमे।...बनि उल्कामुख... - पाँचम कल्लोलसँ संकेतक बदला वास्तविकता, कल्पनाक बदला सत्य... -पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाएल घन राखल रहत, पाँचम कल्लोलसँ भूत आ कल्पनाक प्रतीक ओइ संकेतक बदला वास्तविकताक प्रतीक गोला राखल रहत। - गंगेशक तत्त्वचिन्तामणिपर ढेर रास टीका उपलब्ध अछि, गंगेशकेँ कहल जाइ छन्हि तत्वचितामणिकारक गंगेश; मुदा हुनकर कविता भऽ गेल छन्हि "उल्कामुख"!!! मैथिली नाटककेँ..................... नाटकक नव युगमे प्रवेश प्रवेश करबैत अछि....... उल्कामुख......................................................... विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे मंचित............................ निर्देशक रहथि बेचन ठाकुर.................................................................. मंच परिकल्पना रहए भरत नाट्यशास्त्रक अनुरूप .. मैथिली समीक्षाशास्त्र, मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त, मैथिली गजलशास्त्र अतुलेश्वर लिखै छथि- हेमनिमे गजेन्द्र ठाकुरक एकटा पत्र आयल छल जे ई षडयंत्र नहि थिक जे कोनो गोष्ठी  (सगर राति दीप जरए, जे वर्तमानमे कथा गोष्ठी सँ बेशी अनर्गल गोष्ठी भ गेल अछि ) मे एहि तथ्य पर नहि आलोचना होइत अछि जे एहि कथामे कोन कमजोरी अछि वा कोन-कोन नव तथ्य आयल अछि, बल्कि जाइत, खाइतकेर सङ्ग रमानाथी-शैली पर चर्चा कएल जाइत अछि? मायानन्द मिश्र लिखलन्हि- "कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... " समालोचनाकेँ विरोधमे लेब की उचित? मैथिली समीक्षाशास्त्र (सिद्धांत लेल) मैथिली समीक्षाशास्त्र (विदेह:सदेह ३५ पृ. १३२२-१४१६) (प्रयोग लेल) बूच जीक कविताक -मार्क्सवाद, ऐतिहासिक दृष्टि, संरचनावाद, जादू-वास्तविकतावाद, उत्तर-आधुनिक , नारीवादी आ विखण्डनवाद दृष्टिसँ अध्ययन संगमे भारतीय सौन्दर्यशास्त्रक दृष्टिसँ सेहो अध्ययन विदेह:सदेह ३३ पृ. २०१-२०६) मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त (विदेह:सदेह ३० पृ. १३१-१३५) मैथिली गजलशास्त्र मैथिली गजलशास्त्र (विदेह:सदेह ३५ पृ. १२५१-१३२१) विद्यापतिक बिदेसिया विदेह:सदेह ३३ पृ. १९२-१९८ प्रतियोगी परीक्षार्थी लेल NTA-UGC/ UPSC/ BPSC MAITHILI OPTIONAL- गजेन्द्र ठाकुर [Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)] (Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates) (ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।) (बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली) (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति) (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति) (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी) (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत) (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री) (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण) (वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास) (वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार) (तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास) अनुलग्नक-१-२-३    अनुलग्नक- ४-५ (मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-"ए", क्रम-५]) [मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल] NTA_UGC_NET_MAITHILI_01- गजेन्द्र ठाकुर NTA_UGC_NET_MAITHILI_02- गजेन्द्र ठाकुर TEST SERIES-1- गजेन्द्र ठाकुर TEST SERIES-2- गजेन्द्र ठाकुर GS (Pre) TOPIC 1 - गजेन्द्र ठाकुर हमर अनूदित साहित्य हमर जोर आन भाषासँ मैथिली अनुवादक बेशी रहल अछि ओना मैथिलीसँ अंग्रेजीमे हम सेहो अनुवाद केने छी। तकर पाछाँ हमर दूटा उद्देश्य अछि। पहिल जे ऐ सँ मैथिली समृद्ध हएत आ दोसर जखन हम अपन आ अनकर भाषाक साहित्य नै पढ़ब तँ आन किए पढ़त। नीचाँक पहिल लिंक सामान्य पाठ लेल अछि आ एतऽ मैथिलीमे अनूदित एकटा कथा आ किछु कविता अछि। दोसर लिंक ३५ टा बाल साहित्यक सचित्र पोथी अछि आ सायास द्विभाषिक (मैथिली-अंग्रेजी) राखल गेल अछि। १ अनूदित साहित्य (आन भाषासँ)- गजेन्द्र ठाकुर विदेह:सदेह २७ (गजेन्द्र ठाकुर आ रवि भूषण पाठकक आन भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य- अंक १-३५० सँ) २ बाल साहित्य (अनुवाद- द्विभाषिक- मैथिली-अंग्रेजी)- गजेन्द्र ठाकुर टोस्ट बड़ीटा! कनियेटा! एतऽ हम सभ रहै छी भारतोल्लक राजकुमारी भारतोल्लक राजकुमारी (बिनु शब्दक) वुयो कच-कच कचाक चुन्नू-मुन्नूक नहेनाइ नेना जे बैलूनसँ डेराइत छल अद्भुत फिबोनाची अंक-शृंखला हारू अखन नै, अखन नै! जन्मदिनक उत्सव भोज मोट राजा पातर-दुब्बड़ कुकुड़ बचिया जे अपन हँसी नै रोकि सकैत छलि अंग्रेजी हम सूंघि सकै छी छोट लाल-टुहटुह डोरी करू नीक, भोगू नीक ई सभटा बिलाड़िक दोख अछि! चोभा आम! हमर टोलक बाट जखन इकड़ू स्कूल गेल माछी फेर आउ टाटा! अमाचीक जुलुम मशीन सभ टिंग टोंग पाउ-म्याऊ-वाह कुकुड़क एकटा दिन हमरा नीक लगैए रीताक नव-स्कूलमे पहिल दिन कनी हँसियौ ने! लाल बरसाती भूत-प्रेतक नाट्यशाला आउ पएर गानी कतऽ अछि ई अंक ५? मुन्ना जी हमरासँ साक्षात्कारमे पुछने छलाह जे उपलब्ध अछि विदेह:सदेह ३३ पृ. ४१५ पर ओकर किछु अंश दऽ रहल छी मुन्नाजी:अहाँक मैथिली पत्रकारिताकेँ दूरि हेबासँ बचेबाक वा सत्यक खोजक कारणेँ गारि-गंजनक पछातियो एक स्टंपपर अड़ल रहबाक दृढ़ संकल्प कतेक दिन धरि निमहता हएत? गजेन्द्र ठाकुर: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक समर्पणमे हम लिखने रही- पिताक सत्यकेँ लिबैत देखने रही स्थितप्रज्ञतामे तहिये बुझने रही जे त्याग नहि कएल होएत रस्ता ई अछि जे जिदियाहवला। आ ई पढ़ि गामक बहुत गोटे कानए लागल छलाह। हुनका सभकेँ बुझल छन्हि, मुदा अहाँकेँ हम यएह कहि सकै छी जे एकर निर्धारण भविष्य़ करत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- जगदानन्द झा 'मनु'क बालकथा "माटिक बासन" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज केर अन्तर्गत पहिल खेपमे छल:- http://videha.co.in/new_page_89.htm १.   कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी दोसर खेपमे प्रस्तुत अछि:- २.   जगदानन्द झा 'मनु'क बालकथा "माटिक बासन" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- जगदानन्द झा 'मनु'क बालकथा "माटिक बासन" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी माटिक बासन विदेह मे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह ३२ (पृ. २-५) मे जे उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर http://videha.co.in/new_page_89.htm आब पहिने ऐ कथाक पुनर्पाठ करी:- जगदानन्द झा 'मनु', ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी माटिक बासन केदार प्रसाद गामक एकटा कुशल कुम्हार । माटिक बासन जेना घैल, ढाकन, मटकुरी बना अपन जीवन यापन करै छलाह । माटिक बासन बनेनाइ मात्र हुनक आजीवकाक साधन नहि भऽ कऽ हुनका लेल  एकटा सुन्नर कारीगरी छल । अपन काज करैकाल ओ एना तनमय भऽ जाइ छलाह जेना एकटा भक्त अपन अराध्य देवताक ध्यानमे अपन तन-मनक सुधि बिसैर जाइत छैक । ओ अपन स्वयं-साधनासँ धिरे-धिरे छठि मैयाक सुन्नर व आकर्षित हाथी सेहो बनबए लगला । हुनकर बनाएल माटिक बासन आ छठिक हाथीक बड्ड प्रशंसा होइत छल। धिरे-धिरे गामक परिवेश बदलए लागल । माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल । केदार प्रसादजीक आमदनी कम होबए लगलन्हि मुदा ओ अपन काजक प्रति  निष्ठा आ समर्पणक दुवारे कुम्हारक काज नहि छोड़ि पएला । हुनक सुन्नर सुशील बेटा बिभू नेन्नेसँ अपन पुस्तैनी काजमे माँजल । ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे ओ अपन बाबूओ सँ बीसे । केदार प्रसादजी एहि गपकेँ नीकसँ  बुझैत अपन होनहार पुतक गुणसँ मोने-मोन खुश छलाह आ चिंतित सेहो । चिंतित एहि दुवारे की कुम्हारक काजक कि बर्तमान छैक आ कि भबिष्य हेतै से हुनका बुझल मुदा बिभूक हस्तकौशल देखि ओकरा एहि काजसँ बाहर केनाइ उचित नहि बुझलाह । बिभू सेहो इस्कूल पढ़ाइक संगे-संग अपन बाबूक सभटा गुणकेँ  अंगीकार केने गेल ।  अपन  बाबूक छठिक हाथीसँ आगू बढ़ि ओ मूर्तिकलामे अपन हस्तकौशलक उपयोग करै लागल । ओकर बनाएल मूर्तिक चर्चा गाम  भरिमे होबए लगलै। जतए ओकर बाबूक बनाएल छठिक हाथीकेँ एगारह टाका भेटन्हि ओतए ओकर बनाएल छोट-छोट कनियाँ- पुतड़ा सभकेँ सय-सबासय टाका भेटअ लगलै । बिभू अपन बाबूक देख-रेखमे मूर्तिकलामे दिनो- दिन आगू बढ़ए लागल । आब ओकर बनाएल माए सरोस्वती, कृष्णाष्टमी, विश्वकर्मा पूजाक मूर्तिक माँग चारूकातक बीस गाम तक होबए लगलै मुदा बिभूक बाबू तैयो ओकर बनाएल मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकालि आ ओकरा अओर बेसी नीक मूर्ति बनाबैक प्रेरणा देथिन । बिभू सेहो हुनक गपकेँ मन्त्र मानि आगू आरो नीक मूर्ति बनाबएमे लागि जाए। बिभू दसम वर्गक बाद इस्कूली पढ़ाइ छोड़ि पूर्णतः मूर्तिकलामे अपनाकेँ समर्पित कए लेलक । अठारहम बरखक पूर्ण बुझनूक भऽ गेल, आब ओकरा नीक बेजाएक ज्ञान भऽ गेलै । ओकर मूर्तिक प्रशंसा आब गाम नहि, जिला नहि राज स्तरपर होबै लगलै । आब  तँ ओकर बनाएल एक-एकटा मूर्तिकेँ दू-दू तिन-तिन हजार टाका भेटए लगलै । मुदा ओकर बाबू एखनो ओकर मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकालि ओकरा आर सुन्नर मूर्ति बनाबैक निर्देश देथिन । पहिले बिभू हुनक गपकेँ मन्त्र मानि कमी दूर करैक चेष्टामे लागि  जाइ छल मुदा आब हुनक गपसँ ओकर मोन कतौ-ने-कतौ आहत होइत छलै । मुदा बिरोध करैक सहास नहि, तेँ मोनकेँ मारि हुनक बताएल निर्देशमे लागि जाइ छल  । जेना-तेना काज आगू बढ़ैत रहल आ ओकर बनाएल गेल मूर्तिक चर्चा आब राजक सीमासँ निकैल बाहर दस्तक देबए लगलै । राजसरकारकेँ गृहमंत्रालयसँ बिभूकेँ पत्र एलै जाहिमे ओकर बनाएल गेल मुर्तिकेँ अखिल भारतीय मूर्ति प्रदर्शनीमे राखक व्यवस्था कएल गेल रहैक । सभटा खर्चा राजसरकारक आ विजेताकेँ देशक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकारक सम्मानक संगे-संग एक लाख टाकाक नगद इनाम सेहो। ई पत्र पाबि बिभूकेँ बड्ड प्रसन्ता भेलै । सभसँ पहिले दौड़ल-दौड़ल अपन बाबूकेँ एहि गपक सुचना देलक । केदार प्रसादजी सेहो बड्ड प्रसन्य भेलाह हुनकर जीवन भरिकेँ मेहनत रंग लाबि रहल छल । बिभू राति-राति भरि जागि-जागि कए अपन मार्गदर्शक गुरु बाबू संगे लागि गेल । एकसँ एक नीक-नीक मूर्ति बनेलक मुदा केदार प्रसादजी सभ मूर्तिमे कोनो ने कोनो कमी निकाइले देथिन । केदार प्रसादजीक बताएल कमीकेँ दूर करैकेँ बदला बिभूक मोनमे आब नकारात्मक प्रवृति घर करए लगले । हुनक बताएल कमीपर आब ओ सबाल-जबाब करए लागल । काइल्ह प्रतियोगता लेल मूर्ति भेजैक अंतिम दिन आ आइ बिभू अपन बनाएल मूर्ति सभमे सँ एकटा सभसँ नीक मूर्तिकेँ अंतिम रूप देबएमे लागि गेल । केदार प्रसादजी बारीकीसँ ओहि मूर्तिकेँ निरीक्षण करैत, बिभूक दिमागमे हलचल चलि रहल छल - "हाँ आब तँ ई कोनो ने कोनो गल्ती बतेबे करता ।" ततबामे केदार प्रसादजी अपन चुप्पीकेँ तोड़ैत बजलाह -"सुन्नर ! आइ तक बनाएल गेल मूर्ति सभमे सर्बश्रेष्ठ ।" कनीक काल चुप रहला बाद फेर -"मुदा।" मुदा की? आब  तँ  बिभूक मोन बिफैर गेलै- "अबश्य कोनो ने कोनो कमी गनेता।" केदार प्रसादजी अपन गपकेँ आगू बढ़ाबैत- "ई जँ एना रहितेए तँ आरो बेसी नीक, आ ई रंग जँ फलाँ फलाँ रहति तँ जबरदस्त होइते।" नैन्हेटासँ जिनक गपकेँ मन्त्र मानि पूरा करैमे जि-जानसँ लागि जाइ छल आइ हुनक गपकेँ नहि पचा पएलक। बिफैर कए बाजि उठल -"रहै दियौ! अहाँकेँ तँ एनाहिते दोख निकालए अबैए, अपन बनेएल ढाकन बसनी तँ कियो एको टाकामे नहि किनैए आ हम केतबो नीक मूर्ति बना ली कोनो ने कोनो दोख अबश्य निकालि देब्।" बिभूक गप सूनिते मातर केदार प्रसादजीक शांत मुद्रा भंग भए सोचनीए भऽ गेलनि । एकटा नमहर साँस लैत बिभूक पीठ ठोकैत बजलाह- "बस बेटा बस ! जहिया व्यक्तिकेँ अपन पूर्णताकेँ आभाष भऽ जाइ छैक ओकर बाद ओकर जीवनक विकास ओतहिए रुकि जाइ छैक। पूर्णताकेँ आभास दिमागक आगू बढ़ैक चेतनामे लकबा लगादै छैक।" किछु छन चुप्प, दुनू गोटे शांत । बिभूक आँखिसँ नोर टघरैत जे आइ ई की कए लेलहुँ, ओकरा अपन गल्तीक ज्ञान भऽ गेलै । केदार प्रसादजी आगू - "हमर सपना छल जे हमर बेटा राजक आ देशक नहि वरण दुनियाँक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकार बनत.....मुदा नहि । कोनो गप नहि हमराकेँ जनै छल ? कियो नहि । हमर बेटाकेँ पूरा राज जनैत अछि एकटा नीक मूर्तिकारकेँ रूपमे । हमरा लेल बड्ड पैघ गप अछि । मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भऽ गेला । कथाक विवेचना कथाक पहिल पाराग्राफक बाद अबैत अछि- "माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल।" आ ई देखिते हमरा मोन पड़ि गेल "जिगरी"- एकटा तेलुगु उपन्यासक अंग्रेजी रूपान्तरण ("जिगरी"- तेलुगु उपन्यास मूल लेखक पेडिण्ती अशोक कुमार आ अंग्रेजी अनुवाद "फ्रेण्ड्स फॉरएवर" नामसँ पी. जयलक्ष्मी द्वारा)। ओइमे भालू नचबैबला एकटा परिवारक चर्चा छै, भालु आ मनुक्खक दुनूक बीचमे जे लगाव छै तकर चर्चा छै। आ जखन सरकार ऐपर प्रतिबन्ध लगा देलकै तँ कोना ओइ गौण संस्कृतिक खाली स्मृति टा शेष रहि गेलै, कारण ओइ परिवारक पुनर्वास लेल बहुत रास सीमारेखा (राजनैतिक आ सांस्कृतिक) पार करऽ पड़लै। कथाक धनात्मक पक्ष मुदा ऐ कथामे लेखक ऐ परिवर्तनकेँ नीक मोड़ देलन्हि। बेटा माटिक ढाकन-बसनीक बदलामे मूर्ति बनबय लगैत अछि। दोसर जे माटिक बासन बनेबापर सरकार कोनो प्रतिबन्ध नै लगेलकै, उनटे अहाँकेँ मोन हएत जे रेलगाड़ीमे माटिक कुल्हड़मे चाह बेचबाक आ ओइमे पीबाक फैशन छै, सरकार ओइमे मदति केलकै। मुदा ओइ गौण संस्कृतिक स्मृति तँ हमरो अछि, अहूँकेँ हएत आ कथाकारोकेँ छन्हि। मुदा ओ ऐ कथाकेँ आगाँ लऽ गेलाह आ लोककथाक सन्दर्भसँ जोड़लन्हि जइमे नैतिक उपदेश बाल साहित्यक उद्देश्य रहैत छै। अहाँकेँ मोन हएत शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र"(मिथिलाक लोककथापर आधारित बालकथा), जे विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह ४ मे (पृ. १३८-१४१) आ उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर http://videha.co.in/new_page_89.htm मुदा श्रीनिवास जीक बालकथा घोषित रूपमे लोककथापर आधारित अछि, मुदा "माटिक बासन" केर अन्तिम भाग मात्र लोककथासँ प्रेरित अछि आ गौण-संस्कृतिक आधुनिकीकरणक प्रयासक ऐ कथाक उद्देश्य नै अछि, उद्देश्य वएह श्रीनिवासजी बला अछि, ओ लोककथाक पुनर्लेखनक माध्यमसँ केलन्हि आ जगदानन्द जी गौण-संस्कृतिक आधुनिककरणक प्रयास मध्य मूल कथा-प्लॉट छोड़ि वएह टॉपिक आगाँ बढ़ेलन्हि। कथाक ऋणात्मक पक्ष जगदानन्द जीक बाल-उपन्यासक हम चर्चा पहिनहियो केने छी, आ ओ छी हुनकर "चोनहा"। विदेहमे जगदानन्द झा "मनु"क एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह:सदेह ९ (विदेह शिशु उत्सव पृ. १०९-१२६) मे संकलित भेल, आ उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर http://videha.co.in/new_page_89.htm ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे ऐ उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। मुदा "माटिक बासन"मे जगदानन्द जी निराश केलन्हि, हुनकासँ हमरा चाही छल पेडिण्ती अशोक कुमारक "जिगरी" सन बौस्तु मुदा भेटल साधारण सन शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र"। ई सत्य जे "माटिक बासन" बाल बीहनि-कथा अछि, मुदा जकरा लग प्लॉट रहतै- "माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल।"- से ओइ कथाक अन्त करथि- "मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भऽ गेला ।" ई हमरा स्वीकार्य नै। आ तेँ एकटा अद्भुत प्लॉट एकटा नीक मुदा मेडियोकर कथा बनि कऽ रहि गेल। विश्लेषण ऐ कथाकेँ विस्तृत करबाक आवश्यकता अछि, शब्दमे विस्तारो दऽ कऽ ई भऽ सकैए, आ अही शब्द-संख्याक अन्तर्गत रहि कऽ कथ्यकेँ विस्तार देल जा सकैए। मुदा लक्ष्यसँ जेना ओ भटकि गेला- "माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल।" केँ विस्तार नै दऽ सकला से "चोनहा"क लेखकसँ हम आशा नै केने छलौं। ऐ कथाक पुनर्लेखन लेखककेँ करैए पड़तन्हि आ तइमे ई बीहनि कथा रहत बा लघुकथा बा दीर्घकथा बा उपन्यासो बनि जायत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ५) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन

अग्नि शिखा (भाग - ५) मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण/ मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण

पूर्व कथा महर्षि अत्रि राजा पुरूरवा के हुनक जन्म जन्मान्तरक कथा सुना रहल छथि l आब आगू सुधर्मा नामक एक बहुत धनिक व्यापारी जे अत्यंत गुणवान एवं विद्वान रहथि, हुनक निवास मद्रदेशक शाकल नामक उत्तम नगर में रहनि l एक बेर ओ व्यापार करई हेतु अपन सँपूर्ण संपत्ति लगा बहुत रास समान कीनि सुराष्ट्र दिशि विदा भेलाह l मरुभूमि में भयंकर डाकू सब हुनका पर आक्रमण कय हुनक समस्त मूल्यवान वस्तु छीन लेलक l ओ घायल अवस्था में कोनहुना अपन प्राण बचा भूखल-पियासल शूरसेन नामक सुंदर देश में पहुंचि गेलाह l ओ कठिन परिश्रम कs पुनः धन अर्जन केलथि l एक ब्राम्हण के परामर्श पर ओ श्रावण द्वादशीक व्रत करै लगलाह l ई व्रत करिते-करिते ओ आयु पूर्ण भेला पर मृत्यु के प्राप्त भेलाह l अपन पुण्य के फल स्वरूप हुनका गंधर्व लोक के प्राप्ति भेलनि l पुण्य क्षीण भेला पर हुनक जन्म पुनः मानव योनि में भेल l एहि जन्म में ओ शाकलपुरीक सम्राट भेलाह l पूर्व अभ्यास वश ओ एहि जन्म में सेहो श्रावण द्वादशीक व्रत करय लगलाह l पुनः मृत्यु उपरांत ओ स्वर्ग लोक गेलाह l ओतय बहुत दिन तक रहला उपरांत पुनः मृत्यु लोक में क्षत्रिय कुल में जन्म भेलनि l क्षत्रियोचित कार्यक धर्म पूर्वक पालन करैत ओ बहुत रास दान-पुण्य केलाह l ओ गाय'क अपहरण करै बला शत्रु सँs युद्ध करैत आ गायक रक्षा करैत मृत्यु के प्राप्त भेलाह l एकर फल स्वरुप हुनका स्वर्ग लोकक प्राप्ति भेलनि l पुनः पुण्य क्षीण भेला पर ओ मृत्युलोक में शाकल देश में ब्राह्मण के रूप में जन्म लेलाह l ओ ब्राह्मण अपन जीवन में संपूर्ण शास्त्र के अध्ययन कैलथि मुदा हुनका ब्राह्मण वृत्ति पसंद नहीं रहैन्हि l एहि कारण राज्य प्राप्तिक कामना सँs ओ द्वादशी तिथि के उपवास कय भगवान विष्णुक आराधना करय लगलाह l एक बेर ओ व्रत के क्रम में अपन पूरा शरीर में तेल लगा कs स्नान कs लेलथि l एहि कारण ओ भगवान विष्णुक कोप भाजन बनलथि l एहि बेर मृत्युक उपरान्त ओ पुनः ब्राह्मण कुल में जन्म ग्रहण केलथि l एहि जन्म में हुनक नाम परलैन्हि पुरूरवा l अपन पूर्व जन्म के व्रतक महात्म्य सँs ओ मद्रदेशक निष्कंटक राज्य प्राप्त केलैन्ह l परंच हुनक रूप अत्यंत विद्रूप रहैन्हि l अत्यन्त सुंदरी ब्राम्हण कन्या सँs हुनक विवाह भेल मुदा हुनक विवाहिता स्त्री रूप हीनता के कारणे सदिखन हुनका तिरस्कृत करैत छलीह l एक कुशल प्रशासक होइतहुँ प्रजा जन के अनुराग हुनका प्रति ओहन नहि रहैन्हि l एहि सब सँ खिन्न भय ओ राज्य भार अपन मंत्री सभ के सौंपि स्वयं हिमालय पर्वत दिस प्रस्थान केला आ अत्रि मुनिक आश्रमक समीप समाधिस्थ भs गेलाह l नियम पूर्वक भगवान विष्णुक आराधना एवं तपश्चर्या करैत ओ अपन समय व्यतीत करय लगलाह l फल स्वरूप हुनका अद्भुत पराक्रम, कुशल सम्राट,इंद्र केँ अर्धासनक प्राप्ति एवँ अनुपम सुंदरताक वरदान भेटलैन्हि l वैह पुरुरवा मृत्यु उपरांत एहि पुरुरवाक (अहाँक) रूप में पुनः जन्म ग्रहण केलैन्हि l अपन पूर्व जन्म में तs वरदानक उपभोग ओ नहि कs सकलाह मुदा वर्तमान जन्म में ओहि वरदानक उपयोग अहाँ कs सकब | महर्षि अत्रि केँ कथाक पीयूष प्रवाह समाप्त भय चुकल छल l पुरूरवा आत्मविस्मृत सन अपन जन्म जन्मांतरक जीवन वृत्त केँ झांकी देखैत रहलैथ l जखन ऋषिक अधरोष्ठक कम्पन ठहरल तखन पुरूरवा केँ अपन स्थितिक ज्ञान भेलैन्हि l ओ गंभीर स्वर में आदर पूर्वक ऋषि के धन्यवाद ज्ञापन केलैथि l महर्षि किछु क्षण उपरांत पुनः बजलाह - "पुत्र कतेक जन्म में अहाँ सम्राट रहलहुँ, अहाँकेँ कुशल शासक होयबाक वरदान सेहो प्राप्त अछि l आब अहाँ व्यर्थ अकुशलताक बहाना जूनि करू l अहाँ अपन स्थिति के बूझू आ राज्य संचालन में रूचि लिय l अहाँ देखब हमर बात पूर्ण सत्य होयत l हम अहाँक अकर्मण्यताक कारण विस्मित रही ताहि सौं अहाँ केँ सभ बात बतबै लेल हमरा आबय परल"| "जन्म-जन्मांतरक अभ्यास वश जीव आहार, निद्रा एवं मैथुन कार्य बिना केकरो बतौनहि संपादित करैत अछि l भय, शोक, प्रसन्नता इत्यादि भावनाक तरंग में बहैत अछि l पूर्व जन्म में अर्जित उत्कृष्ट गुण एवं पुण्य केँ फल स्वरूप भावी जन्म में ओकर उपयोग कs सकैत अछि l परंच कोन गुण ओ पूर्व जन्म में संचित केने छल l एकर जानकारी भावी जन्म में व्यवहार में आनहि उपरान्त ज्ञात भs सकैत अछि l जेहि कार्य एवँ गुण में ओ अपना केँ निपुण व सुयोग्य बुझैत छैथ, बूझक चाही जे ओ हुनक पूर्व जन्म के संचित गुण एवं कृत कार्य छैन्ह"| नृपति पुरूरवा बारंबार महर्षि अत्रि के चरण कमल के स्पर्श करैत हुनक चरण धूलि अपन मस्तक पर लगबैत प्रेमाश्रु बहबैत रहलैथ l हुनक मुख पर प्रसन्नता एवं नयन में अश्रु भरल छलैन्ह l ओ महर्षि सँ कहलैथ - "ऋषिवर, अपनेक कृपा सँs हम अपना के चीन्ह गेलहुँ l आई सँs हम उत्कृष्ट कर्म के द्वारा त्रिलोक में प्रसिद्धि प्राप्त करब l आब हमरा मोन में अपन माता-पिताक प्रति कनिको रोष नहि रहल l आब हम अकर्मण्य नहि रहब"| प्रसन्नता व्यक्त करैत महर्षि अत्रि प्रस्थान करै लेल व्यग्र भेलाह l पुरूरवा हुनका ससम्मान सम्मान विदा केलखिन l ऋषि के जाए के बाद पुरूरवा राज सिंहासन पर बैसि अपन सभासद ओ मंत्री गण सँs विस्तृत विचार विमर्श करs लगलाह l ताहि उपरांत ओ अश्वमेध यज्ञ करवाक घोषणा केलैन्ह l (अनुवर्तते) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.प्रणव कुमार झा- भगवान हमरा गरीब किए बनेलौं ! प्रणव कुमार झा

भगवान हमरा गरीब किए बनेलौं ! (मैथिली खिस्सा)

एकटा गाम मे दू टा ब्राह्मण रहै छलाह; दुखमुख झा आ सुखमुख झा। दुनू दियाद छलाह मुदा एकटा गरीब त दोसार सुखी सम्पन्न। गरीब ब्राह्मण अपन सुखी-सम्पन्न दियाद केँ देख के सदिखन जड़ैत रहै छलाह आ भगवान केँ कोसैत रहै छलाह जे "हे भगवान हमरा गरीब किएक बनेलौं आ एकरा एत्तेक धन-संपईत देलिऐ !" एकदिन भगवान हुनकर बात सुनि लेलखिन आ सम्पन्न ब्राह्मण के संपईत पर बज्र खसा देलखिन। आब दुनू दियाद गरीब भ गेल छलाह। बराबर के औकात बला। भगवान दुनू केँ दस टा पठरू(बकरी के बच्चा) द क दुखमुख झा से कहलखिन जे देखह आब हम तोहर गोहार मानि लेलीयह आ आब तोहर दियादो गरीब भ गेल छथुन। हम दुनू केँ 10-10 टा पठरू द रहल छिय जीवन यापन लेल। एकदम बराबर-बराबर। तखन आब हमरा से फेर शिकायत नई करिह जे हम देब मे दूनैति केलहु अछि।

सम्पन्न ब्राह्मण जे आब गरीब भ गेल छल बहुत दुखी भेल। मुदा नियति मानि के भगवान के देल 10 टा पठरू ल क सोचय लागल जे आब आगा की कैल जाय। ओ 10 टा मे से 2 टा पठरू दू हजार रुपे के भाव से बेच देलक ओय से जे पाई भेटल ओकरा से परिवार के न्यूनतम जरूरत पूरा करय के प्रयत्न करय लागल आ आठ टा पठरू केँ पोसय लागल। ओकर धिया-पूता जे प्राइवेट स्कूल मे पढ़ई छल तकर नाम कटि गेलई मुदा ओ धियापुता केँ पढ़ेनाई नै छोड़ौलक अपितु सरकारी स्कूल मे ओकरा सब केँ नाम लिखा पढ़ेनाई चालू राखलक। एमहर गरीब ब्राह्मण मनोरथ पूर्ण भेलो पर (दियाद्क संपईत खाक भ जाय के) खुश नै छल। ओ भगवान केँ फेर कोसय लगलाह: "ईह! भगवानों बड्ड घाघ छईथ ओकर संपईत पर बज्र भले खसा देलाह मुदा हमरा धनिक बनेनाइ नै भेलइन। देबहे के छलइन त ई नै जे सोना-असर्फी दितथिन, देलाह की त 10 टा पठरू। बुझु त, एकर हम की करब! हुंह।"

"लाल बौआ त पठरू पोसता, किए ने अपनो सब पोसी" ब्राह्मण के कनियाँ बजली। "धुर जाउ ओ त पतीत अछि, किछु क सकई ये, ब्राह्मण भ क कहीं छगर-पाठी पोसी! राम राम राम" अस्तु, ई विप्र सभटा पाठा दू हजार टाका के दर से बीस हजार टाका मे बेच देलाह, आ ओई पाई से किछ दिन छहर-महर केलाह।

किछु मास बितला पर बाजार मे खस्सी के मांग बढ़ल, रेट चढ़ल। सुखमुख झा के पाठा सब बढि के दनदना रहल छल। ओ आठो खस्सी के दस हजार के भाव से अस्सी हजार टाका मे बेचलाह। आब हिनका लग किछु पाई आबि गेल छल। मुदा ओ ई पाई मे से चालीस हजार टाका के चालीस टा पठरू कीनि लेलाह। दस हजार टाका खर्च क के पठरू सब के राखs लेल एकटा ढंगक बथान बनेलाह। दस हजार टाका बकरी-पालन के लेल भविष्य मे होबय बला खर्च लेल राखलाह। आ बचल बीस हजार टाका घरक आवश्यक खर्च लेल राखलाह। ई देख पहिल विप्र के कनियाँ के सेहनता भेलइन जे एह अपनो सब एहिना करितौ!

विप्र बजला जे भगवान एहन अवसरो दितथीन तखने ने। खाय लेल त आब पाई ने भ रहल अछि। कहुना पूजा-पाठ आ भोज-भात के बले जिनगी घिचा रहल अछि। छोड़ू ई सब बात। मुदा हुनकर कनिया भगवान के नेहउरा केलीह त भगवान प्रसन्न भ क एक बेर फेर ओकरा 10 टा पठरू देलखिन।

दुखमुख झा ऐ बेर मोन मारि ओकरा सबकेँ पोसय लगलाह। मुदा हुनका घर मे सब आलसी लोक। आ माल-जाल पोसय मे त पचीस तरहक झंझट रहिते छैक। जा समय से घास-पात दाना-पानी नै हेतई ता माल-जाल कोना केँ पोसेतई! पठरू सब के देख-रेख मे दिक्कत होबय लागल आ एकरे ल क छोट-छोट बात पर घर मे महाभारत सेहो होबय लागल। एक दिन विप्र खौझा के बजलाह जे "हम पहिनेहे कहने रही जे ई सब अधलाह काज कहीं ब्राह्मण करई! जहिया से ई छगर-पाठी पोसय के काज शुरू भेल घर मे अशांति आ कलह आबि गेल अछि। आब बहुत भ गेल। बेस आब हम एकरा सब केँ उपटाए देब।" बस विप्र दसू पाठा के चालीस हजार टाका मे बेच एलखिन। आ जे टाका भेटल तै से फेर परिवार चलाब लगलखिन।

एमहर सीजन आबई तक सुखमुख झा के खस्सी सब पईघ आ खूब गुदगर भ गेल छल, यद्यपि हुनकर दू टा पठरू बीमार भ के खराब भ गेल छल। समय एला पर ओ चारि लाख टाका मे एकर सौदा केलाह। ऐ बेर सुखमुख झा सवा लाख टाका खर्च क के सौ टा पाठा आ चारि टा बकरी किनला। पचास हजार टाका खर्च क के दू टा आरो बथान बनेला आ काज मे सहयोग के लेल दू टा छौरा काज पर राखि लेलाह। एक लाख टाका छौरा सब के दरमाहा आ छागर-पाठी के पोसय मे भविष्य मे आबय बला खर्च के लेल राखि लेलखिन। पचीस हजार टाका से कनियाँ लेल किछ गहना किनला आ धिया-पूता लेल नव कपड़ा। बाँकि के डेढ़ लाख परिवार के खर्च आ बेर-कुबेर के लेल उपयोग केलाह। ओ एखनो आपण धिया-पूता के पढ़ाई चालू रखने छलाह।

एहिना समय बीतय लागल। ऐ बेर छौरा सब के लापरवाही आ प्रतिकूल मौसम के कारण सुखमुख झा के दस टा पाठा खराब भ गेल छलई। मुदा तखनो सुखमुख झा ऐ साल नौ लाख टाका के कारोबार केलाह आ तीन सीजन से बकरी पालन करैत-करैत अपन अनुभव से ऐ काज के लेल बहुत किछ कौशल सीखि नेने छलाह। आब छौरो सब के ठीक-ठाक ट्रेन क रहल छलाह। ऐ बेरक टर्न ओवर मे से ओ चारि लाख टाका बिजनेस कैपिटल के मद मे द देने छलखिन आ पाँच लाख टाका परिवार के मद मे। अपन घर के ठीक ठाक करेलाह। रंग-ढ़ोर करेलाह। धियापुता के सोनपुर मेला आ काबर झील सेहो घूमेलखिन। ऐ तरहे सुख एकबेर फेर सुखमुख झा के दुआरि पर घूरि आयल छल।

किछुए साल मे सुखमुख झा फेर से सुखी-सम्पन्न भ गेल छलाह। आब हुनका लग बड़का टा बकरी फार्म छल जै मे कईएक टा लोक नौकरी क रहल छल। फेर से नीक घर, गाड़ी सब भ गेलइन।

एमहर दुखमुख झा के एखानो गरीबी घेरने छलइन। धिया-पूता के सेहो ईस्कूल छोड़ा के अपना संगे जजमानी करय आ भोज खाय मे लगेने छलाह। अपने आ की बच्चे सब के कमसेकम ढंग से संस्कृत आ कर्म-कांड सब आबितईन तखन ने यजमानियों ढंग से चलतइन, आ नै कहियो एकरा खातिर प्रयास केलाह, नै धिये-पूता के निक शिक्षा देलखिन। कहुना दिन काटि रहल छलाह, आ पुनश्च पुनश्च भगवान के कोसै छलाह जे "भगवान हमरा गरीब किए बनेलौं !" ऐ रचनापर अपन तव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १०म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १०म खेप १०

आरती समाप्त होइतहि आचार्यआश्रममे जयन्तक कोठरी दिस गेलाह। जयन्तक किछु अता-पता नहि छल । आश्रमक सभ समान यथाबते छल । मुदा जयन्तक स्वलिखित शोधग्रंथ नहि छल। आचार्यजीकेँ आब विश्वास भए गेलनि जे जयन्त शारदाकुंज छोड़ि गेलाह। "मुदा ओ जाइतकाल भेंट तँ कए सकैत छलाह, बिना किछुकहने चलि गेलाह ।" मोने -मोन से सोचि ओ बहुत दुखी छलाह । एतबहिमे एकटा शिष्य दौड़ल आएल- "आचार्यवर!" "की बात छैक, बहुत अपसियाँत लागि रहल छह?" "बहुत गड़बड़ भए गेल.... ।" " साफ-साफ किएक नहि बजैत छह?" "हम सभ अखने नदीमे स्नान करए गेल रही । ओहिठाम तीन-चारिटा लठैतकेँ जयन्तकेँ गोलिओने देखलिऐक। हम सभ हुनका बचेबाक प्रयासो केलहुँ । मुदा ओ सभ बलिष्ठ आ अस्त्र-शस्त्रसँ लएस छल । हम सभ जान बचा कए भागि गेलहुँ ।" ई बात सुनि आचार्य बहुत चिंतामे पड़ि गेलाह । कनीकाल सोच-विचार केलथि। फेर कहैत छथि- "लगैत अछि लठैत सभ जयन्तक अपहरण कए लेलक । हुनकर प्राण संकटमे अछि । कालीकान्तकेँ तुरंत सूचित करबाक चाही । ओएह किछु कए सकैत अछि ।" आचार्यक आज्ञानुसार हुनकर तीनू शिष्य कालीकान्तक ओहिठाम पहुँचि गेलाह । ताबे कालीकान्त महादेवक दर्शनक हेतु मंदिर चलि गेल रहथि । शिष्यलोकनिकेँ उत्तेजित देखि गौरी पुछलखिन- "अहाँसभ बहुत परेसान लागि रहल छी । किछु विशेष बात छैक की?" "हमसभ आचार्यजीक आदेशानुसार कालीकान्तसँ भेंट कए हुनका आचार्यक समाद देबए चाहैत छी ।" "मुदा कालीकान्त तँ पूजा करबाक हेतु मंदिर गेल छथि आ हुनका वापस अएबामे किछु समय लागत ।" "ताबे तँ अनर्थ भए जाएत ।" "से की?" शिष्यलोकनि सभटा बात हुनका कहलखिन । गौरी तुरंत कालीकान्तसँ भेंटकरबाक हेतु मंदिर दिस बिदा भेलीह। संयोग छल जे कालीकान्त पूजा कए वापस आबि रहल छलाह । दुनू गोटेक भेंट त्रिकुट भवनक मुख्यद्वारे लग भेलनि । आचार्यजीक शिष्य सभ सेहो हुनक संगे रहथि । गौरीसभटा बात कालीकान्तकेँ कहलखिन। कालीकान्त ई बात सुनितहि तामस सँ आगि भए गेलाह। "सएह कहू। लठैत सभक ई साहस? ओकर सभक अंत आब लगीच लगैत अछि ।" कालीकान्त तुरंत सदल-बल बिदा भेलाह । हुनका अबैत देखि लठैत सभ इएह- ले, ओएह- ले जान लए भागल। जयन्तकेँ ठामहि कुहरैत छोड़ि देलक। जाइत-जाइत हुनकर बामा पैरमे जोरसँ धक्का मारलक जाहिसँ ओ चित्ते भरे खसलाह। ताबे कालीकान्त आ हुनकर सिपहसलार सभ आबि गेल छलाह। ओ सभ जयन्तकेँ ऊठेबाक प्रयास केलक मुदा ओ तँ दर्दसँ परेसान छलाह, पैर उठने ने उठि रहल छल। बैद बजाओल गेलाह। जयन्तक हालत देखि बैदजी बजलाह- "लगैत अछि हिनकर पैरक हड्डी टुटि गेलनि अछि। हिनका हमर आरोग्यशालामे लए चलू। ओतहि हिनकर शल्य चिकित्सा करए पड़तनि तखने ई ठीक भए सकताह।" बैदजीक बात के काटैत? एमहर जयन्त दर्दसँ बफारि तोड़ि रहल छलाह। कहुना कए उठा-पुठा कए हुनका बैदजीक आरोग्यशाला आनल गेल। ओहि ठाम दस दिन धरि हुनकर इलाज चलल। जयन्त ठीक तँ भए गेलाह मुदा हुनकर बामा पैर अखनहु नङराइते छलनि। बैदजीक कहब जे क्रमशः ठीक भए जेतनि, मुदा किछु समय लगतनि। कालीकान्त, आचार्य आशारदाकुंज समस्त शिष्य गण एहीसँ प्रसन्न रहथि जे चलू हिनकर जान तँ बाँचल । "सही कहलहुँ श्रीमान! जँ अपने समयपर ठाढ़ नहि होइतहुँ तँ कहि नहि लठैतसँ हिनकर की हाल करैत?" "मुदा लठैत सभ एना केलक किएक?"- कालीकान्त पुछलखिन। ताबे जयन्त उठि कए बैसि गेल रहथि। हुनका तुरंत अपन शोधग्रंथ ध्यान आएल। ओएमहर-ओमहर देखैत छथि। किछु ताकि रहल छथि । फेर चिंतित स्वरमे बजैत छथि- "हमर शोध ग्रंथ कतहु नहि देखा रहल अछि?"- से सुनितहि आचार्य सन्न रहि गेलाह। कतेको सालसँ जयन्तआचार्यक संगे एहि काजमे लागल छलाह। हुनका लोकनिक शोध अंतिम चरणमे छल। ई बात केना-ने-केना लठैत सभकेँ पता लागि गेलैक। तकरे समाधान करबाक हेतु ओ सभ जयन्तक अपहरण करए आएल छल। जयन्त तँ बँचि गेलाह मुदा हुनकर शोध ग्रंथ लए जएबामे ओ सभ सफल रहल। "अनर्थ भए गेल।"- आचार्य बजैत छथि। आब ई स्पष्ट भए गेल छल जे लठैत लोकनिक उद्देश्य जयन्तक अपहरण करब नहि अपितु हुनकर शोधग्रंथकेँ छीनब छल। "मुदा लठैत लोकनिकेँ एहि शोधग्रंथसँ की मतलब?"- आचार्य बजैत छथि। "ई बात अपने सही कहि रहल छी। मुदा इहो तँ भए सकैत अछि जे केओ अपने लोक हुनका सभकेँ एहि काज करबाक हेतु पीठ ठोकने होथि।"- कालीकान्त बजलाह। "ई बात तँ भए सकैत अछि। कारण जयन्तसँ इर्ष्या केनिहारक कमी नहि अछि।" "से बात बुझितहुँ अपने हमरा नहि कहलहुँ? आखिर एहन महत्वपूर्ण शोधपत्रक रक्षाक दायित्व तँ हमरो सभक अछि कि नहि?" "ई गलती तँ भेल। हम नहि सोचि सकलहुँ जे केओ एतेक नीचाँ जा सकैत छथि।" "ई कलियुग छैक आचार्यवर! एहि बातकेँ नहि बिसरल जाए।" हिनका लोकनिमे गप्प-सप्प चलिए रहल छल कि पुलिस एकटा लठैतकेँ कतहुसँ पकड़ने चलि आएल। "इएह ओ व्यक्ति थिक।"- पुलिस बाजल। "मुदा शोधग्रंथ कतए अछि?"- कालीकान्त पुछैत छथि। ओहि लठैतकेँ किछु बाजले नहि होइक। इसारासँ किछु कहैत छल जेबुझले नहि जाइक। "ई तँ बौक अछि। "- आचार्य बजैत छथि। " "कोनो बात नहि। ई जेना-जेना इसारा करैत अछि, तेम्हरे चलू। साइत पता लागि जाए।"- कालीकान्त बजलाह। सभ गोटे ओहि लठैतक पाछा-पाछा बिदा भेलाह। ओ इसारा करैत गेल। जाइत-जाइत सभ गोटे त्रिकुट भवनक उतरबरिआ कातबाला गेटपर पहुँचि गेलाह। "ई की देखि रहल छी?- कालीकान्त बजलाह। "हमहु किछु नहि सोचि पाबि रहल छी। ई तँ हमरा सभकेँ त्रिकुट भवनक लगीचमे लए अनलक। आब की होएत? कहि नहि के सभ एहि कुकाण्डमे सामिल छथि?" ताबतेमे ज्योतिषीजी बहराइत छलाह। लठैत हुनका भरि पाँज पकड़लक। "ई की कए रहलछैं?"- ज्योतिषीजी बजलाह। मुदा लठैत हुनका छोड़बे नहि करए। बात साफ भए गेल। थोड़बे कालमे शोधग्रंथ कालीकान्तक हाथमे आबि गेल। कालीकान्त हुनका तुरंत पुलिसकेँ सुनझा देलथि । "हद भए गेल। एहन षढ़यंत्र हम सोचिओ नहि सकैत छलहुँ।"- कालीकान्त बजलाह। "शोधग्रंथ भेटि गेल सएह कोन कम?"- आचार्य बजलाह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.गजेन्द्र ठाकुर- बीहनि कथा- अपन-अपन भाग्य गजेन्द्र ठाकुर बीहनि कथा- अपन-अपन भाग्य हमर एकटा संगीक बेटा आ दोसर संगीक कनियाँमे गप भऽ रहल छलै आ हम आर.के. लक्ष्मणक "कॉमन मेन" जेकाँ बौक भेल सुनि रहल छलौं। अहाँकेँ ई कहि दी जे दुनू संगी बी.डी.यो. छलाह, पहिल जिनकर बेटा पात्र छथि से उत्तर प्रदेशमे पदस्थापित रहथि आ दोसर जिनकर कनियाँ पात्र छथि से बिहारमे पदस्थापित। गप पुरान छै, तखुनका गप छिऐ जखन बिहारमे झारखण्ड छल आ उत्तर प्रदेशमे उत्तराखण्ड। उत्तर प्रदेशमे ऑफिसरकेँ पनिशमेण्ट पोस्टिंगमे पहाड़पर पठाओल जाइत छलै जे भाग आब उत्तराखण्डमे छै। मित्रक पुत्र- ओइ समय जनकल्याण सिंहक सांप्रदायिक सरकार रहै, हमर पिताकेँ पनिशमेण्ट पोस्टिंग कऽ देलकन्हि टिहरी पहाड़पर, सुक्खा-सुक्खीमे। मुदा बाबू, भाग्यमे पाइ लिखल छलै, आबि गेलै भूकम्प, पाइये-पाइ भऽ गेलै। मित्रक पत्नी- सएह देखू, हिनकर पोस्टिंग कऽ देलकन्हि कुशेश्वर स्थान, सुनै छलिऐ डुमले रहै छै। मुदा ई जहियासँ गेलखिनहेँ ने सुखारे एलै आ नहिये दहार। अपन-अपन भाग्य। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.गजेन्द्र ठाकुर- गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास- द ... फाइल्स गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास गजेन्द्र ठाकुर द ........ फाइल्स ३ प्रभाकरण सुन्दरमक भाषण "आदरणीय प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री आ सलाहकार (वित्तीय) महोदय, आइ भारत विश्व अर्थव्यवस्थामे अपन स्थान किए नै बना सकल अछि। किए हमरा सभक वृद्धि दर २-३ प्रतिशत मात्र अछि? किए हमर सभक परियोजना शुरू तँ होइए मुदा पूर्ण नै होइए? ऐ लेल हमरा लग किछु सुझाव अछि। पहिल जे आयकर, खास कऽ कॉरपोरेट टैक्सकेँ कम कयल जाय। दोसर सुझाव अछि जे शिक्षा आ ट्रेनिङपर बेशी खर्च कयल जाय। तेसर जे प्रोजेक्टक टेण्डर देलासँ पूर्व हमरा सभकेँ ऐ गपपर ध्यान देमऽ पड़त जे सभसँ कम पाइपर टेण्डर उठाबऽ बला लग ओइ प्रोजेक्टकेँ पूर्ण करबाक तकनीकी योग्यता छहियो बा नै।..." तखने वित्तीय सलाहकार टोकि देलखिन्ह- "मुदा प्रभाकरण, से कोना सम्भव हएत, सतर्कता आयोगक यएह निर्देश छै जे सभसँ कम पाइबला टेण्डरकेँ प्रोजेक्ट देल जाय। जे अहाँ कहि रहल छी से हमर सभक हाथमे तँ अछिये नै।" हमरा मुँहपर मुस्की आबि गेल। हम सभ यएह प्रश्न तँ चाहैत रही। आ एकर उत्तर सेहो तैयार केने रही। "सएह तँ हम कहै छी। सभ सतर्कता आयोगसँ डेरायल अछि, तँ हम कोना आगाँ बढ़ब। हमरा सभकेँ सतर्कता आयोगसँ सलाह लऽ कऽ ऐ टेण्डर प्रक्रियाकेँ दू भागमे बाँटऽ पड़त।" वित्तीय सलाहकार फेर हाथ उठेलथि मुदा प्रधानमंत्री इशारा कऽ देलखिन्ह। आ जे भारतक नव आर्थिक नीति आबय बला छलै तकर निर्माण करैबला छल प्रभाकरण सुन्दरम, आ से हमर, माने गोप कुमारक फाइल पढ़ि कऽ। दिन तेजीसँ बीतऽ लागल। द्विस्तरीय टेण्डरक परिभाषा, ई सुनिश्चित करत भारतक आर्थिक प्रगतिकेँ, ई सुनिश्चित करत जे जइ प्रोजेक्टक शिलान्यास भेलै तकर पुनः शिलान्यास रंग ढौरि कऽ नै हेतै, वरन् तकर उद्घाटन हेतै। ई निर्धारित करत जे एकटा तेसर-पक्ष रहत जे प्रोजेक्टक तकनीकी पक्षक जाँच करत, माने ईंटा-गिट्टीबला ठिकेदार अलग आ दिमागी ठिकेदार अलग। आ तकर नाम हेतै कन्सल्टेन्सी फर्म। ओ ईंटा-गिट्टीबला ठिकेदारक भीतर नै काज करत वरन् ओकरा पाइ देतै सरकार। द्विस्तरीय टेण्डरमे दू तरहक टेण्डर भरऽ पड़तै सभकेँ, ई ईंटा-गिट्टीबला ठिकेदार सभ भरत, तकनीकी आ पाइबला। पहिने ओकर सभक तकनीकी टेण्डर खोलल जेतै, ई देखल जेतै जे ओकरा सभकेँ ओइ काजकेँ पूर्ण करबाक योग्यता आ समचा छैहो आकि नै। आ जँ से नै हेतै तँ ओतहिये ओकरा अयोग्य घोषित कऽ देल जेतै। आ तखन ओ कतबो कम पाइक द्विस्तरीय वित्तीय टेण्डर भरने हुअय, ओ खुजबे नै करत। तँ काज अपना नामसँ अलॉट करबा कऽ प्रोजेक्ट अधखड़ू छोड़बाक झमेले खतम। आ टेण्डर प्रक्रिया सतर्गता आयोगक निगरानीमे हएत से सतर्गता आयोगक डरो खतम। अभियंत्रण कॉलेजमे प्रभाकरण सुन्दरमक भाषण शुरू भेलै, प्रशिक्षणपर जोर। किताबी ज्ञानक संग नव कन्सल्टेंसी फर्मक हिसाबसँ प्रायोगिक शिक्षण। सरकार लग अभियंत्रण संस्थानक अभाव रहै, से कन्सल्टेंसी फर्मकेँ विदेशी अभियन्ता रखबाक अनुमति देल गेलै, आ सभ प्रोजेक्टमे एक लाख डॉलर सलाना विदेशी मुद्रा ऐ लेल खर्च कएल जा सकैत छल। निजी इंजीनियरिङ कॉलेजकेँ लाइसेंस देल गेलै। कम्प्यूटर साइंस आ सूचना प्रौद्योगिकीक सीट ऐ कॉलेज सभमे बढ़ा कऽ देल गेलै, जतऽ पहिनेसँ एकर पढ़ाइ होइ छलै ततऽ सीट बढ़ा देल गेलै। जँ प्रधानमंत्री बुधियार हुअय, काजुल हुअय तँ शेरपा सभ स्वयं नियंत्रणमे आबि जाइत अछि। (अनुवर्तते) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- सत ओ’झूठ राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी सत ओ' झूठ दोख लगैत रहैत अछि झूठक, सत पर बेर -बेर, ग्रहण बाद, उगरास जेना , सत चमकय ओहिना, फेर। मणि के मलिन कए सकैत अछि? चढ़ाओल माटिक' लेप, अयस् कनक की भए सकत , धोएल जाए कतबो खेप? मोसकिल, कखनो होइत छै, चिन्हब मिथ्या-कपट-भेष, होइछ कठिन कतेको के, जानब एहि के, बिनु लगने ठेस।

रचि षड्यंत्र, जाए चाहैत अछि , सत्तक' सात्विक गेह, जोड़य जाइत अछि सत्य सँ,सँ अशुद्ध नेत सँ, नेह। मिझरेबाक कोशिश करैत अछि , चाहैत अछि, सत्यमे फेँटा जा इ, छल सँ सत्तक' स्वत्व पर, सत्यक आखर सभ मेटा जाइ। पर, सत्य क' चेन्ह होइत अछि , पाथर पर रेघा पाड़ल, की झाँपल जा सकैत अछि , भास्कर इजोत जे बारल? जखन धनुखसँ हो इत अछि , सत्य-वाण, संधान, की झूठक मिथ्या-देह मे, बाँचि पबैत अछि प्राण? ।

झूठक जाधरि जीवन रहैछ, करैत अछि सत्य पर अत्याचार, करैत अछि ओकर जड़ि खोध' लेल दुरभि संधि ओ दुष्प्रचार। झूठक अरुदा छोट बहुत, मुदा, तंग करैछ भरि जीवन- काल, जीत नहि सकैत अछि कहि ओ, पर, रहए ने दैछ ककरो खुशहाल। धोखा देब, फरेब करब, झूठक इएह अछि काज, नी क लो क के तंग करब सँ, अबैछ ने कखनो बाज। राखए, नहि चाहैत अछि सत, मिथ्या सँ कोनो सरोकार, ओकर नेओँत -पिहान के, कथमपि ने करैछ स्वीकार।

जरा दैत अछि झूठ के, निकलल सत्य सँ धाह, आगि क' ताप पाबि कए, जेना घमैत अछि लाह। बहुत कठोर होइत अछि सत , आ, होइत अछि ई बड़ कड़ूगर, एसगरे ठाढ़ रहैत अछि सदिखन, चाही ने कोनो सोङर। सत्य-सत्ता, अछि अटल, आ, झूठ अछि क्षणभंगुर, मिथ्या तन बाँचत कोना ? मरत 'त' झूठ जरूर। जाहि सभा मे सत्य स्वयं हो , आएल हो झूठ, लड़ए लेल ढूसि, झुकिए जाइत अछि सीस सभ झूठक , कतबो ने कि एक बैसल हो फूसि ।

चलैत छथि जे, सत ध'क', रहै छथि सदिखन ओ सकुशल, मिथ्या-पथ पर चलए बला, भाग्यो रहैत छै, ओकर रुसल। काल-लेखनी सँ अछि लिखल, सत्य, ब्रम्हांडक पटल पर, सृष्टि ओ प्रलय, दूनू काल मे, ई, अमिट, अकाट्य, अटल, पर।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.गजेन्द्र ठाकुर- अजीगर्त अछि दुर्भिक्ष- ३-४ गजेन्द्र ठाकुर अजीगर्त अछि दुर्भिक्ष ३ के छी ओ जे अहाँकेँ बड्ड मानैए? कहियो सोझाँ तँ नै आयल, अहीं तँ नै छी इहो आ उहो जकर आइ काल्हि मनोचिकित्सक कहै छथि "सप्लिट पर्सनेलटी"

प्राश्निकसँ प्रश्न नै करू, फेर अहाँ कहब जे अहूँ हमहीं छी।

तँ सुनू तीन सय गाय लेल अजीगर्त बेचि देलक शुनःशेपकेँ ई कहब नै अछि सत्य। देखू पहिने हरिश्चन्द्र मांगै छथि वरुणसँ पुत्र बलि देबा लेल जखन बलि दऽ देता तँ मांगलन्हि किए? आ वरुण दऽ कऽ घुरबऽ ले कहलन्हि किए? खुजत रहस्य पहिने १० दिन, फेर दाँत हेबा धरिक समय, फेर दुद्धा दाँत खसबा धरिक, फेर नव दाँत हेबा धरिक। मुदा शस्त्रधारी होएबा धरिक समय मांगलन्हि किए हरिश्चन्द्र आ पलखति देलन्हि किए वरुण। ई ओ खिस्सा नै जतऽ रोहितकेँ जरेबा लेल बिनु द्रव्यक नै तैयार भेलाह हरिश्चन्द्र बनि डोमराज। ई खिस्सा अछि रोहितकेँ शस्त्रधारी बनेबाक ई खिस्सा अछि रोहितक निर्णयक ओकर तीर-धनुष लऽ कऽ बोन जेबाक। मुदा असल खेल तँ केलक शुनःशेप ओ छल ने बापेक प्रिय ने मायेक प्रिय से बिका गेल सय गायमे। बान्हबा लेल सय गाय आर आ वध लेल सय गाय आर मुदा तैयो मृत्युदण्ड तँ नहिये कहियौ एकरा, ओ ने मायक प्रिय रहय आ ने बापक की ई रहै ओकर गलती? आ दण्ड तँ गलतीये लेल देल जाइ छै। तँ मृत्यु दण्ड तँ नहिये टा रहै। आ बलि? नै बलि मे तँ इच्छा पूछल जाइ छै अनिच्छुकक बलि तँ भइये नै सकैत अछि आ तेँ ने बन्धन खुजैत गेलै शुनःशेपक ई थोरबे छिऐ छागरक बलि, घुरल इन्द्र पुरुषक रूपमे कहल, जे मनुष्यक बीचमे रहने नीक सेहो अधलाह भऽ जाइए। मुदा हरिश्चन्द्र बलि दऽ दितिऐ रोहितक तखन ने ओ अधला होइतय दुद्धा दाँत बला रोहितक होइतय बलि ओकरा शस्त्रधारी बनलापर तँ बलि बिना इच्छाक सम्भव नै छल। से प्रश्न शुनःशेपक छल मुदा उत्तर रोहित लेल देलौं शुनः शेपक कथा तँ अछि तपक, आ जँ रहितय ओ मायक प्रिय पुत्र तँ कऽ सकितय ओतेक तप। ओकर तँ नै बलि देल जा सकैए आ ने भेटि सकैए मृत्य्दण्ड। मुदा ई खिस्सा पिहानी किए सुना रहल छी। की अहूँक बलि क्यो मांगि रहल अछि। हमहूँ करै छी प्रेम अहाँसँ, जखन अहाँ जागल रहै छी कियो तमसा कऽ बाजत तँ हमहूँ नै करबै बरदास्त। आ एकटा गप्प जे अहूँ केँ नै बूझल अछि से सुनू। ओ जे सूतल अछि से जागि जाइत अछि अहाँक सुतलापर आ सूति जाइत अछि हमरा उठा कऽ अहाँक जगलापर। से कहू जे कहबाक अछि, कहऽ पड़त हमरेसँ। कारण ओ तँ अहाँक सुतलेपर उठत। आजीगीर्त भेल दुर्भिक्षक लक्षण दुर्भिक्षेमे पुत्रहंता कियो बनि सकैए से नै करियओ ओकरा आर बेशी कलंकित ओहिना थू-थू भऽ रहल छै ओकर ४ मोन पाड़ैत रहि जाइ छी खिस्सा पिहानी मुदा सभक सारांश अछि एक्केटा कियो दोखी नै आ सभ दोखी सभटा चक्रचालि सभटा प्रोग्रामिङ अपनो नै बुझल अछि परिणाम सालक साल बाद पुछै अछि सवाल हमरोसँ हमहूँ अजीगर्त सन घोषित कएल जाइ छी दोषी मुदा एकटा अहीं छी जे ओकरा घोषित केलहुँ दुर्भिक्ष आ से जँ नै करितौं तँ हम टूटि जइतौं हमरा विश्वास भऽ गेल अछि जे अहूँ छी जे करै छी प्रेम हमरासँ

तखन सुनू हम तँ बुझै छलौं जे अपना मोने काज कऽ रहल छी आब बुझाइए जे हम तँ कऽ रहल छलौं प्रोग्रामिङ किछु नीको बहार भेल किछु वायरस सेहो तैयार भेल अहाँ दुनू मुदा सङ रहलौं ओकरासँ तँ सुतलेमे स्वप्नेमे भेँट होइए मुदा अहाँ तँ छी जगलाक बादक सङी(अनुवर्तते) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- बिहारक दल - बदलू सरकार श्याम बिहारी मिश्र- वरिष्ठ लेखाकार, स्नातकोत्तर (वाणिज्य), राघोपुर, सकरी, दरभंगा, बिहार -847239, सम्प्रति -दिल्ली

बिहारक दल - बदलू सरकार

भाजपाक संग छोड़ि नीतीश बाबू , तेजस्वी केँ गला लगायल, बनायल महागठबंधनक सरकार। बिहारक राजनीतिमे बहल बयार, फेर चर्चा मे आयल दल-बदलू सरकार।।

शिक्षा व्यवस्था चौपट भेल अछि, स्वास्थ्य सुधार केर नहिं अछि आस, सत्ताधारीक सत्ताक अंधकारमे, सपना केलक बिहारक विकास। बिहारक राजनीतिमे बहल वयार, फेर चर्चामे आयल दल-बदलू सरकार।।

छात्र राज्यसँ बाहर जा आइ.आइ.टी. आ आइ.ए.एस. मे परचम लहराबथि, अपन प्रतिभा आ कुशलताक दमपर दुनियाभरिमे नाम कमाबथि, जँ रहैत व्यवस्था अपनहि घरमे, किए जाय पड़ितय दूर-दराज, बिहारक राजनीतिमे बहल बयार, फेर चर्चामे आयल दल-बदलू सरकार।।

समय छल नालंदा आ विक्रमशिला केर नाम चलैत छल, सम्पूर्ण विश्वमे बिहारक डंका बजैत छल, शिक्षाक वास्ते ह्वेनसांग आ इत्सिंग अबैत छल, महात्मा बुद्ध आ महावीर जनम लऽ बिहारक इतिहास रचैत छल राजनीतिक दुष्प्रभाव जे सभ भेल बेकार। बिहारक राजनीतिमे बहल बयार, फेर चर्चामे आयल दल-बदलू सरकार।।

देशक पहिल गणतंत्र लिच्छवीक निर्माता अछि बिहार, भारतक पहिल साम्राज्य मौर्यक सृजनकर्ता अछि बिहार, दुनियाक सभसँ शक्तिशाली शासक सम्राट अशोक केर जन्मदाता अछि बिहार, एतय आर्यभट्ट सन गणितज्ञ शून्यसँ परिचय करा दुनियाभरिमे बिहारक करौलनि जय-जयकार, एतेक समृद्ध इतिहास रहितो बिहार भऽ रहल शर्मशार, बिहारक राजनीतिमे बहल बयार, फेर चर्चामे आयल दल-बदलू सरकार।।

दर-दर ठोकर खा रहल युवा बिहारमे, पाबैक लेल अपन रोजगार, बेर-बेर रोजगारक झाँसा दऽ चुनाव जीति कऽ, सत्ताधारी सभ कऽ रहल अकुशल व्यवहार, आब कतेक दिन सहैत रहब, बेरोजगारी, स्वास्थ्य आ अशिक्षाक मार। बिहारक राजनीतिमे बहल बयार, फेर चर्चामे आयल दल-बदलू सरकार।।

समय आबि गेल अछि बदलाबक, एक-एकटा वादा केर हिसाबक समय रहिते एहि्पर जनता करू विचार, आब बढ़ल जा रहल अछि अत्याचार, ठाम-ठाम भऽ रहल भ्रष्टाचार, बिहारक राजनीतिमे बहल बयार, फेर चर्चामे आयल दल-बदलू सरकार।। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.आशीष अनचिन्हार- २टा गजल आशीष अनचिन्हार २ टा गजल १ खूब गरजैए सच केर दलाल खूब ठहकैए सच केर दलाल

छै चानन अनकर आनन हुनकर खूब चमकैए सच केर दलाल

केखनो एहन केखनो ओहन खूब बदलैए सच केर दलाल

किछु भेटत तकरे प्रत्याशामे खूब लिबलैए सच केर दलाल

अपने सच्चा अनका झुट्ठा कहि खूब बिकलैए सच केर दलाल

सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। २

पुछारी करा गेल हेतै बुढ़ारी बना गेल हेतै

अचानक मिझा घूर भागल जरूरे दगा गेल हेतै

कनी देखलहुँ बाट सरगक दिबारी जरा गेल हेतै

अबैए गमक किछु अजीबे कि सुइटर बुना गेल हेतै

विलंबित रहल ताल सभहक कहीं द्रुत गबा गेल हेतै

सभ पाँतिमे 122-122-122 मात्राक्रम अछि (बहरे मुतकारिब मोसद्दस (तीन) सालिम वा बहरे मुतकारिब सालिम छहरुक्नी)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह: ३५३ म अंक ०१ सितम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७७ अंक ३५३)|| 107 108 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA

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