VIDEHA — Issue 354 / अंक ३५४

Publication: VIDEHA · Issue: 354
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ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह: ३५४ म अंक १५ सितम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७७ अंक ३५४) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२२। सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 354 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.सम्पादकीय/ अंक ३५३ पर टिप्पणी (पृ.१-७) १.सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली मे पहिल बेर १.पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता आ २.शेप बा कंक्रीट (आकार) कविता (पृ. २-६) अंक ३५३ पर टिप्पणी (पृ. ७-७) २.गद्य खण्ड (पृ. ८-६२) २.१. गजेन्द्र ठाकुर- वजन प्रबंधन - एकटा व्यक्तिगत प्रयोग एवं अनुभव (पृ.९-१३) २.२.लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी (पृ. १४-२६) २.३.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ६) (पृ.२७-३०) २.४.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (प्रस्तावना क आगू) (पृ.३१-३६) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- ११म खेप (पृ.३७-४०) २.६.गजेन्द्र ठाकुर- २ टा बीहनि कथा (भूरा बाल, कर्तव्य पालन) (पृ. ४१-४२) २.७.गजेन्द्र ठाकुर- गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास- द ........ फाइल्स (पृ. ४३-४५) २.८.महाकान्त प्रसाद- ३ टा बीहनि कथा (गरमी, प्रश्न, बत्तू) (पृ. ४६-४७) २.९.जगदानन्द झा 'मनु'- माएक भक्त (पृ. ४८-६०) २.१०.पूनम झा 'प्रथमा'- मोनक बात (पृ. ६१-६२) ३.पद्य खण्ड (पृ. ६३-८२) ३.१.राज किशोर मिश्र- अप्रदीप्त इजोत (पृ. ६४-६९) ३.२.गजेन्द्र ठाकुर- अजीगर्त अछि दुर्भिक्ष- ५ (पृ. ७०-७१) ३.३.निर्मला कर्ण- अपन सन्तान (पृ. ७२-७३) ३.४.आशीष अनचिन्हार- २टा गजल (पृ. ७४-७६) ३.५.सुषमा ठाकुर- स्वतंत्रता, मुस्कान (पृ. ७७-७९) ३.६.महाकान्त प्रसाद- नियोजितक चान (पृ. ८०-८२) ४.संस्कृत खण्ड (पृ. ८३-८७) ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (प्रथमोच्छ्वासः) (पृ. ८४-८७) 2

१.सम्पादकीय/ अंक ३५३ पर टिप्पणी १.सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली मे पहिल बेर १.पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता आ २.शेप बा कंक्रीट (आकार) कविता अंक ३५३ पर टिप्पणी १.सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली मे पहिल बेर १.पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता आ २.शेप बा कंक्रीट (आकार) कविता १ पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता पाँतिक छन्दमे लिखल कविता भेल पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता। की अछि पाँतिक छन्द:- ई भेल कोनो बेर-बेर पुनरावृत्ति हुअयबला पद्य रचना। ऐ मे ध्वनिक पुनरावृत्ति आवश्यक नै अछि, खाली पाँतिक लम्बाइक पुनरावृत्ति होइत अछि। उदाहरण: जाइत जाइत जाइत जाइत जाइ छी बड़ी दूरस्त देश धरि जे घुरि ने सकी पहिने कएक बेर घुरि अयलौं अइ ठाम बुझलौं जे छल अदहे रस्ता घुरि जे एलौं से बिदा भेलौं जाइले दूरस्त ततेक दूर दूरस्त देश जे घुरि ने सकी जे घुरबऽ जायत थाकि जायत अदहा तकरो अदहा रस्तामे आ जँ बढ़त आगाँ देखत बिलाइत रस्ता ने कोनो बाटे छोड़ब आ ने कोने चिन्हासी आ ने कनियो आस छोड़ब अदहा रस्ताक बादक धांगैत-तोड़ैत बाट आ बढ़ैत हम आ बिलायल जाइत रस्ता केलक काज संपन्न एकटा काजक हएत आब फेरसँ आरम्भ नव वातावरण नव लोक संग प्रयोगेक प्रयोग आनत कोनो अजगुत परिणाम आकि फेर धकेलत हमरा दूरस्त देश आ हम घुरि कऽ तँ नै आबि जाएब फेर अपन पुरने देश जतऽ ने रहत ओ पुरनका डेरायल लोक ने पुरनका पिरौंछ गाछ-बृच्छ परिणामेक प्रमाण रुसल सन अछि ई हमरासँ लोक गाछ-बृच्छ सभ नव नवके ई देश ने कोनो चिन्हासी ने आस आ ने कोनो चिन्हार बाट २. शेप बा कंक्रीट (आकार) कविता पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविताक विपरीत ई एकटा आकारक स्वरूप धारण करैत अछि आ तेँ पाँतिक छन्दमे लिखल कविता भेल पैटर्न (पुनरावृत्ति) एतऽ नै भेटत वरन कोनो आकृति देखा पड़त। जेना नीचाँक गाछक आकृति देखू। बिलाइत आसक चेन्हासी देखैत गाछ दुनू कात संगे जाइ रस्ताक संग गाछक छाह कऽ रहल घन हमर चेन्हासी घन होइत पक्का हएत मुदा घ न ग र हो इ त चे न्हा सी अन्हार गुज्ज भऽ जाइत अछि हमर आसक चेन्हासी बिला जाइत अछि अंक ३५३ पर टिप्पणी आदरणीय वीरेन्द्र मल्लिकजीक पहिल कविता संग्रह छपलनि (ई पहिल पोथी छलनि) तँ ओकर नाम छलै 'अग्निशिखा'। आब निर्मला कर्णजीक धारावाहिक रचना अही नामसँ पढ़ि रहल छी। नीक क्रम अछि, चलैत रहबाक चाही।

प्रणव झा बीच-बीचमे अबैत छथि हिनका, लगातार एबाक चाही। -आशीष अनचिन्हार मो.8134849022 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१. गजेन्द्र ठाकुर- वजन प्रबंधन - एकटा व्यक्तिगत प्रयोग एवं अनुभव २.२.लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी २.३.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ६) २.४.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (प्रस्तावना क आगू) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- ११म खेप २.६.गजेन्द्र ठाकुर- २ टा बीहनि कथा (भूरा बाल, कर्तव्य पालन) २.७.गजेन्द्र ठाकुर- गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास- द ........ फाइल्स २.८.महाकान्त प्रसाद- ३ टा बीहनि कथा (गरमी, प्रश्न, बत्तू) २.९.जगदानन्द झा 'मनु'- माएक भक्त २.१०.पूनम झा 'प्रथमा'- मोनक बात २.१. गजेन्द्र ठाकुर- वजन प्रबंधन - एकटा व्यक्तिगत प्रयोग एवं अनुभव गजेन्द्र ठाकुर वजन प्रबंधन - एकटा व्यक्तिगत प्रयोग एवं अनुभव ई कथा २००० ई. मे शुरू होइत अछि, ओइ सालक उत्तरार्धमे, जखन हम १०० किलोक नै ७८-८० किलोक छलौं। फेर हम एक सालसँ बेसी छुट्टीपर छलौं, एकटा संदिग्ध-स्थितिक सड़क-दुर्घटनाक बाद, जखन सरकारी काजसँ घुरैत काल नव-सहस्राब्दी शुरू हेबासँ पहिने ओइ दुर्घटनामे हमर "जांघक-हड्डी" दू भाग मे टूटि गेल। दुर्घटनाक राति ब्लड प्रेशर ६०-४० भेलाक बाद डॉक्टर ऑक्सीजन इमरजेंसी घोषित केलन्हि  २ बजे राति मे। बादमे आन तरहक भयावह परिस्थिति अबैत गेल, जेना ए.आर.डी.एस. डायगनोस भेनाइ आ तकरा लेल १५ दिन धरि वेंटिलेटरक हमरा ऊपर प्रयोग। फेर एक साल मे तीन बेर ऑपरेशन भेल आ फेर डेढ़ साल बाद बैसाखीसँ बेंतपर आबि सकलौं। फेर आयल १५ अगस्त, ओइ साल रक्षाबंधन सेहो अही दिन छल, आ ओही दिन हम फेरसँ गाड़ी चलाबय लगलौं। आ ऐ समयावधिमे हमर ओजन ८०सँ बढ़ि कऽ १०० किलो भऽ गेल, माछ-भात खाइ आ सुतय कऽ अलाबे कोनो शारीरिक श्रम नै हेबाक कारण। आ ई बढ़लाहा ओजन अगिला १८ बर्ख धरि ओतबे बनल रहल। ओना हम कहि दी जे आब हम फेर ८० किलोक भऽ गेल छी। ओजन कम हेबाक एकटा कथा अछि। हमर स्थानांतरण ६ मास लेल दोसर विभागमे कोनो आवश्यक काज लेल कएल गेल छल। ओइ विभागमे हमर सभ सहयोगी आ अधीनस्थ सेहो अर्धसैनिक बलक छलाह। हम १०० मीटरक दूरी सेहो दौगि नै सकैत छलौं, आ ओ सभ हमरा वजन कम करय लेल दौगय लेल कहैत छलाह, आ एक दिन जखन हमर समय आबि गेल तँ हम हुनका सभकेँ कहलियनि जे तीन मासमे हम हम अपन ओजन फेरसँ ८० किलो कऽ लेब। हम जे ई कहलियनि तकर पाछू एकटा ठोस आधार छल। पछिला १८ साल मे हम विभिन्न प्रकारेँ प्रयास केलौं जइमे जलखै छोड़नाइ, दिनमे मात्र खीरा खा कऽ रहनाइ, मुदा हम लगभग पूर्ण रूपसँ ओजन घटेबामे विफल रहलौं। तखन हमर अनचोक्के ३ मासमे ओजन कम करबाक विश्वास कतऽ सँ आयल? तकर पाछू की रहस्य छल? एतय आब हमरा लग एकटा उदाहरण छल, हमर बेटा क लंबाइ ६ फीट ३ इंच छन्हि, आ हुनकर एन.डी.ए. मे उम्र-लम्बाइ-वजनक अनुपातक अनुसार अपन ओजन १०० सँ घटा कऽ ६७ किलो करबाक छलन्हि। आब अहाँ सभ बुझि गेल हएब जे हुनकर ओजन सेहो १०० किलो छलन्हि। हमरा हुनकर भावी असफलताक पक्का विश्वास छल, ओ फेल भेलाह मुदा ओ अपन वजन ६७ नै कऽ सकलाह मुदा ७१ किलो धरि अवश्ये आनि लेलन्हि। ई हमरा लेल एकटा पैघ आघात छल। हम हुनका सँ किछु रहस्य सिखलौं आ तीन मास मे हमर ओजन ८० किलो भऽ गेल। हम एतय सेहो इएह रहस्य सझिया कऽ रहल छी। रहस्योद्घाटन तीन मासमे हम पूरा दिन मात्र पानि आ ब्लैक कॉफी (बिनु चीनी आ दूधक) सँ काटि लेलौं। साँझमे संशोधित-कीटो-डाइट क आधार पर हम मात्र एक घंटा (८-९ क बीच रातिमे) क मध्य कोनो कार्बोहाइड्रेट, भात आ चिक्कसक सोहारी-रोटीक सेवन नै केलौं। हमरा लेल निर्धारित छल जे चर्बी (चिकन, माछ, पनीर) आ फल मे मात्र तरबूज खाइ। एक मासक बाद हमर ओजन ८६ किलो भऽ गेल। अगिला शॉक अगिला शॉक लेल तैयार रहू। रस्ता सेहो ओतेक आसान नै अछि। वजन घटैक ई प्रक्रिया बंद भऽ गेल। आ ऐ वजन नै घटबाक चक्रक अंत एक महीना चलल। मुदा हमर टारगेट तीन मासक छल। एहन होइत अछि जे शरीरक जल आदिक घटनाइ सहज अछि, तेँ ८६ किलो धरिक बाट सहज अछि, तकरा बाद शरीरक जिद्दी तत्वकेँ कम करय पड़त। आ तखने कठिन बाट शुरू होइत अछि। संशोधित कीटो-डाइटक प्रराम्भक दू मासक बाद फेर वजन घटब शुरू भऽ गेल। संगहि कहि दी जे ऐ कालावधिमे हम साँझमे भोजन करबासँ पहिने एक घंटा दौगैत छलौं। ई दौगनाइ १०० मीटरसँ बढ़ि कऽ २ किलोमीटर भऽ गेल (हमर पार्क पहाड़ी जेकाँ अछि, तइ लेल ई अहाँक पार्कक हिसाबे ३ किलोमीटरक बराबर भेल)। हम दोसर महलापर रहैत छी। पहिने जँ गाड़ीमे किछु छुटि जाइ छल आ ओइ दिन शुक्र दिन रहैत छल तँ हम सोम दिनक प्रतीक्षा करैत छलौं आ ओही दिन ओ छुटलाहा बौस्तु अनैत छलौं, कारण दोसर मंजिल पर चढ़ैत काल हमर दम फुलऽ लगैत छल। आब तँ हम दिनमे चारि बेर ऊपर-नीचाँ जाइत-अबैत छी। वैज्ञानिक आधार ऐ अवधिमे कीटोसँ भेल म्ऋत्युक विषयमे सेहो सुनलौं। से जिनका को-मॉर्बिडिटी छनि हुनका डॉक्टरसँ सलाह लेबय पड़तनि। ऐ संबंधमे हम दूटा सलाह देबय चाहब जे हम पैघ-पैघ डॉक्टरसँ सुनने छी। पहिल छथि आइ.एल.बी.एस. केर निदेशक सरीन साहब। दूरदर्शनमे हुनका कहैत सुनने रही जे ५० वर्षक उमेरक बाद लीवरकेँ स्वस्थ रखबाक लेल दिनमे मात्र एक बेर भोजन करबाक चाही। संगे-संग ओ ईहो कहलनि जे कॉफी इंडस्ट्री मे हुनकर कोनो हिस्सेदारी नै छन्हि मुदा जँ बिना दूध आ चीनीक कतबो बेर ब्लैक कॉफी पीबी तँ ई लिवर लेल फायदेमंद अछि। आ ओ घी (!) खएबाक सलाह सेहो देलनि किएक तँ लीवर-निवसित नीक बैक्टीरिया लेल घी लाभकारी होइत अछि! संगे-संग ऑल इंडिया रेडियोक एफ.एम. मे सुनलौं एकटा डॉक्टर (जिनकर नाम हमरा मोन नहिं अछि) साहेबकेँ जे कीटोक विषयमे कहलनि जे कीटो डाइटक दौरान कार्बोहाइड्रेट नै खयलासँ ऊर्जा सेहो शरीरक वसा घमैत अछि, आ ऐसँ फैटी लीवरक समस्या सेहो खतम भऽ जाइत अछि। ओ को-मोर्बिडिटी केर मरीज सभसँ मेडिकल सलाहक संग कीटो डाइट करबाक सलाह देलनि आ तीन माससँ बेसी कीटो-डायटिंग नै करय लेल कहलन्हि। आइ-काल्हि आइयो हम दिन मे कतेको बेर मात्र ब्लैक कॉफी (बिना चीनी आ दूधक) पीबैत छी्। दिनमे पानि छोड़ि किछु नहि खाइत छी आ नहिये पिबैत छी। दिनमे हम एक घंटा बैडमिंटन खेलाइत छी आ ओइ लड़का सभकेँ सेहो हरा दै छी जे हमरासँ २० बर्ख छोट छथि। रातिमे भात (घी केर संग), रोटी, माँछ आदि खाइत छी। सप्ताहमे एक बेर चीट-डे सेहो होइत छैक, जइमे हम दूध-चीनीक संग चाह, कॉफी, पिज्जा आदि खाइत-पिबैत छी. आ हम पहिने कहि चुकल छी जे हमर वजन दू साल पहिने ८० किलो छल, जे आइयो बरकरार अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज केर अन्तर्गत पहिल आ दोसर खेपमे छल:- १.   कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी २.   जगदानन्द झा 'मनु'क बालकथा "माटिक बासन" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी आब तेसर खेपमे प्रस्तुत अछि:- ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी "जिन्दगीक मोल" विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह १३ (पृ. ४१२-४२०) मे, जे उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर । आब पहिने ऐ एकांकीक पुनर्पाठ करी:- मुन्नी कामत एकांकी- जिन्दगीक मोल प्रथम-दृश्य राम रतन- बाबू सुतल छिऐ? भिक्खन- कि कहै छहक बउआ? जागले छिऐ, बाजऽ, बहुत परेशान लागि रहल छहक। राम रतन- बाबू, हम बाहर कमाइ लेल जाइ के सोचि रहल छी। तोहर की विचार छऽ। भिक्खन- नै बउआ, हम अतेक दिन तक तोरा नै कतौ जा देलियऽ। आबो नै जा देबऽ। तोरा सिवा हमरा के छै। तोहर माइ तोरा हमरा कोरामे दऽ कऽ दुनिया छोड़ि देलक। तहियासँ हमर सभ कुछ तूँ छहक। हम तोरासँ एक पल खातिर दूर नै रहि सकै छी। राम रतन- बाबू आब हम १८ बरसक भऽ गेलिऐ। हम अपन ख्याल राखैमे सक्षम छी। हमरा बाहरक दुनियाँ देखै कऽ एगो मौका दऽ दिअ, बस एक बेर जा दिअ, फेर अहीं संगे रहब। भिक्खन- नै, अबकी बैशाखमे तोहर बियाह करै कऽ अछि। बियाह करि लऽ, फेर तोरा जतऽ जाय कऽ मन हेतऽ जायहक। राम रतन- बाबू आब माइनो जाउ। किछु दिनक तँ बात छै। फेर अहाँ जेना कहब हम तहिना करब। भिक्खन- ठीक छै, अहाँक हठक आगू हमरा झुकइये पड़तै। ककरा संगे आ कतऽ जेबहक? राम रतन- बाबू, काल्हि फुलचनमा हिमाचल जा रहल छै। हम ओकरे संगे हिमाचल जाएब। भिक्खन- ठीक छइ, काइले जेबहक तब तँ पाइ कौरीक ओरियान करऽ पड़तै। कखुनका गाड़ीसँ जेबहक। राम रतन- रातिक ११ बजे निर्मली सँ गाड़ी पकड़बै। आब हम जाइ छी, अपन कपड़ा-लत्ता साफ करै लऽ। । पटाक्षेप। दोसर दृश्य भिक्खन- बउआ हइए..... फूलचन एलऽ। राम रतन- आबैय छी बाबू। कपड़ा पिनहै छी। भिक्खन- बउआ फूलचन। तूँ तँ ओतै रहै छहक। तोरा तँ ओतौका सभ किछु कऽ पता हेतऽ। फूलचन- हउ कक्का, तूँ चिंता नै करऽ। राम रतन हमरे संगे रहतै। ओतऽ ओकरा कोनो चीजक तकलीफ नै हेतै। भिक्खन- तूँ तँ दवाइबला कम्पनीमे काज करै छहक नऽ! कथीक काज करै छहक? फूलचन- हँ कक्का। दवाइयेबला कम्पनीमे छिऐ। ओइमे तँ बहुत तरहक काज होइ छै। जे काज भेटल सएह करि लेलौं। भिक्खन- अच्छा चलऽ, ठीक छै। राम रतन- चल फूलचन! भिक्खन- बउआ सभ किछु ठीकसँ लऽ लेलहक नऽ? आ सभ िदन हमरा फोन करैत रहिअ। बाहर जाए छहक, गाड़ी-घोड़ा देख कऽ चलइहक। राम रतन- ठीक छै बाबू, अहाँ चिंता बिलकुल नै करू। अपन ख्याल रखब। समय-समयपर खाना खाइत रहब आ बेसी काज नै करब। हम जल्दी घुइम-फिर कऽ आबि रहल छी। सबहक प्रस्थान! ।पटाक्षेप। तेसर दृश्य (हिमाचल पहुँच कऽ) राम रतन- फूलचन, आइ गामसँ एला छऽ दिन भऽ गेलैए। तूँ तँ काम पर चलि जाइ छऽ आ हमरा असगर पहाड़ जकाँ समय लगै यऽ। हमरो कतउ काज लगा दे नऽ। फूलचन- अच्छा ठीक छै। काल्हि हम अपन मालिकसँ तोरा लऽ बात करबउ। दोसर दिन फूलचन- राम रतन, काल्हिसँ तूँहो चलियहन हमरा संगे। ८ हजार मासिक तनखुआ पर हम तोरा लऽ बात केलियौहँ, मंजूर छउ नऽ। मन लगा कऽ काज करबही तँ अओर तनखुआ बढ़ेतउ। राम रतन- ई तँ हमरा लऽ बहुत खुशीक बात अछि। अखने हम बाबूकेँ ई शुभ समाचार दै छी। पटाक्षेप। चारिम दृश्य कम्पनीक कैनटिंगमे बैठ राम रतन आ फूलचन खाना खाइत गप्प करैत अछि। राम रतन- फूलचन अतऽ कोन काज होइ छै। हमरा सँ आइ कोनो काज नै करेनकैए। डॉक्टरबला कोट पहिरने एगो आदमी एलै आ हमरा एगो गोली खिया कऽ चलि गेलै। कुछो समझमे नै आबै छै, उ हमरा कथीक दवाइ देलकैए। ओतऽ चारि-पाँच गरऽ अओर छेलै, सभकेँ वएह दवाइ देलकैए। फूलचन- अतऽ अलग-अलग बिमारीक दवाइ बनै छै, ओकरे जाँच खातिर कम्पनी किछु लोककेँ नौकरी पर रखै छै, जइमे सँ एगो तुहो छी। राम रतन- ओइ दवाइसँ कोनो हानि तँ नै होइ छै? फूलचन- नै! अगर हेबे करतै तँ अतऽ डॉक्टरक आ दवाइयक कोनो कमी छै? जे खर्चा ओकर इलाजमे लगतै सभ कम्पनी देतै। हमहूँ तँ कतेक साल तक यएह काज केलिऐ, कहाँ किछु भेलै। एक आदमी- फूलचन, राम रतनकेँ पठाउ, डॉक्टर साहेब बजेने छै। फूलचन- जी। (रामरतनसँ) जो देखहीं की कहै छउ। राम रतन डॉक्टरक चेम्बरमे जाइत अछि। राम रतन- साहेब अहाँ बजेलौं। डॉक्टर- ई दवाइ खा लिअ आ एतऽ पड़ि रहू, किछु इन्जेक्सन लगेबाक अछि। दवाइ खा कऽ राम रतन सुइ लइ लऽ मेज पर लेट जाइए! २ घंटा बाद डॉक्टर- राम रतन ओ राम रतन उठू। डॉक्टर राम रतनकेँ हिलाबैत अछि आ फेर नब्ज देखऽ लागैत अछि! डॉक्टर- ई की, ई तँ मरि गेल। कियो अछि, डॉक्टर खुरानाकेँ बजाउ। डॉक्टर खुराना- की भेल? डॉक्टर- सर, एकरा देखू, की भऽ गेलै, नब्ज नै चलै छै। डॉक्टर खुराना- ओह नो! ई मरि गेल। कोन दवाई देलौं एकरा? डॉक्टर-सर ई तीनू। डॉक्टर खुराना- की अहाँ पागल छी? एक साथ एतेक दवाइ, सेहो पहिले बेरमे। पहिने अहाँ एकरा नींदक गोली खुएलौं, तकर बाद एतेक पावरक दू-दू इन्जेक्सन दऽ देलौं? डॉक्टर-सर आब की हएत? डॉक्टर खुराना- हमरा सभ ऐठाम तँ ई रोजक बात अछि। एकर परिवारबलाकेँ मुआवजा दऽ कऽ चुप करा दियौ, आ हँ जखन सभ चलि जाए तखन बॉडी बाहर निकालब। ता तक एकर मरबाक खबर ऐ चहरदिवारीसँ बाहर नै एबाक चाही, बुझि गेलौं। रातिक ९ बजे फूलचन- सर, राम रतन कतऽ अछि, ओकर छुट्टी नै भेल? डॉक्टर- आइ एम सॉरी फूलचन, राम रतन आब ऐ दुनियाँमे नै रहल। हमरा एकर अफसोस अछि। ओकर परिवारबलाकेँ कम्पनी एक लाख रूपैया मुआवजाक तौरपर देत। हम ओकरा नै बचा पेलौं। फूलचन मने-मन सोचैत अछि -आब हम की जबाब देब कक्काकेँ। केना कहब कि ओकर जिअइ कऽ सहारा छिन गेल। केना जिथिन ओ, हे भगवान, एना केना भऽ गेल। पटाक्षेप! अंतिम-दृश्य फूलचन- हेल्लो.. कक्का, तूँ जेना छहक तहिना अखने गाड़ी पकड़ि लए। राम रतन बहुत जोर बीमार छऽ। भिक्खन- बउआ, एक बेर हमरा राम रतन सँ बात करा दए। की भेलैए हमर बाबूकेँ। हम तँ देखनइयो नै छिऐ हिमाचल तँ केना एबऽ। फूलचन- कक्का, हमर छोटका भाइ तोरा लऽ कऽ एतऽ। ओ अखने तोरा घर आबि रहल छऽ, तूँ बस जल्दी आबि जा। भिक्खन- हम अबै छिअ बउआ, तूँ हमरा बउआक ख्याल रखियहक। फूलचन- ठीक छै, आब फोन रखै छिअ। कहैत-कहैत फूलचन कानऽ लगैत अछि दोसर दिन हिमाचल पहुँच कऽ भिक्खन-बउआ........बउआ राम रतन कतऽ छहक? फूलचन- कक्का पहिले अहाँ किछो खा लिअ। राम रतन ठीक यऽ। भिक्खन- पहिले हम अपना बेटाकेँ देखब तब किछो मुँहमे लेब। फूलचन भिक्खनक गला पकड़ि कानऽ लगैए आ सभ किछु बता दइए। भिक्खन- फूलचन, हमरा बेटाक जीवनक सौदा तूँ ८ हजार मे केलहक। तूँ सभ किछु जानै छेलहक, तइयो ओइ मौतक मुँहमे हमरा बेटाकेँ धकेल देलहक। तूँ हमर सभ किछु लऽ लेलहक, हमरा निष्प्राण बना देलहक। हमर बेटाक मौतपर हमरा १ लाखक भीख तोहर कम्पनी देतऽ, उ ओकरे मुँह पर फेक दिहक। हमरा नै चाही कोनो भीख। आइ हमर बेटा मरल, काल्हि ककरो अओरक बेटा मरत। आखिर ई मौतक खेल किए खेलल जाइए? जे दवाइक परीक्षण जानवरक ऊपर करबाक चाही ओकरा भोला-भाला गरीब मनुष्यक ऊपर करैत अछि। कि अकरा रोकै लेल कोनो कानून नै अछि? एक घार रूदनक संगे पटाक्षेप एकांकीक विवेचना पहिने बता दी जे आब दवाइक प्रयोग लेल बजारमे एबासँ पहिने ओकर प्रभाव आ दुष्प्रभाव केर जाँच लेल मनुक्खकेँ वेक्टर बनेबापर भारत सरकार प्रतिबन्ध लगा देने अछि, मुन्नी कामत सन-सन बहुत रास लोक ऐ लेल धन्यवादक पात्र छथि। जेना हमर उपन्यास "सहस्रशीर्षाक" नायक मोहन गबैय्या सन-सन बहुत लोक सूचनाक अधिकार दियेलन्हि, मुदा किछु लोक असगरे तकर क्रेडिट लेबाक लेल अपस्याँत छथि, किछु तेहने सन। ई एकांकी एक अंक आ पाँच दृश्यक अछि। एकांकीक नायक राम रतन १८ बर्खक होइते देरी हिमाचल बिदा होइ छथि। हिमाचल प्रदेश आ उत्तराखण्डमे बहुत रास दवाइ केर कम्पनी छै, जे भारत सरकारक टैक्समे छूट केर लाभ लेबा लेल एतऽ खुजल अछि। राम रतन बियाह करबा लेल तैयार नै होइत अछि आ आठ हजार टाकामे जे नोकरी ओकरा भेटै छै से अछि दवाइक प्रयोग लेल बजारमे एबासँ पहिने ओकर प्रभाव आ दुष्प्रभाव केर जाँच लेल वेक्टर बनब। ओकरा शंका छै मुदा फूलचन कहै छै जे ओहो पहिने यएह करैत छल।  ओकर मृत्यु होइ छै, डॉक्टर खुरानाक सम्वाद सिद्ध करैत अछि जे एहेन बहुत रास मृत्यु पहिनहियो भेल छै, एक लाख टका अनुकम्पामे दऽ मामिला खतम कऽ देल जायत। भिक्खनकेँ लाख टका नै चाही, ओ कहै छथि- "जे दवाइक परीक्षण जानवरक ऊपर करबाक चाही ओकरा भोला-भाला गरीब मनुष्यक ऊपर करैत अछि। कि अकरा रोकै लेल कोनो कानून नै अछि?" तँ भिक्खनकेँ हमर उत्तर अछि जे भारत सरकार कानून बना देलक अछि अहाँक लाख टका केँ ठोकर मारब सरकारकेँ मजबूर केलक, आब वेक्टर जानवर बनत मनुक्ख नै, आ सेहो सुरक्षाक संग,  ईहो मांग पूर्ण भेल। हम अपन नोकरीक कार्यपालनमे सेहो एकटा एहेन केस पकड़ने रही जइमे नामी हॉस्पीटल सभ सेहो संलग्न रहथि। मुदा भिक्खनकेँ हम ई किए कहि रहल छी। ओ तँ मुन्नी कामतक एकांकीक एकटा पात्र छथि, काल्पनिक पात्र। झूठ, भिक्खन तँ नाम छथि, हम बहुत रास भिक्खनकेँ देखने छी आ बहुत रास राम रतनकेँ सेहो, मुदा मूलधाराक नाटककार नहिये "बिसाँढ़" खेने छथि नहिये राम रतन देखने छथि तँ मलंगिया जी "बुझता है कि नहींं"मे अपन प्रतिभाक इतिश्री कऽ लेलन्हि, जँ हमर "छुतहा घैल"क आलोचनापर ओ ध्यान दइतथि तँ एतेक प्रतिभा तँ हुनकामे छलन्हि जे अइ दस सालमे हुनको भिक्खन भेटि जइतन्हि। मलंगिया जी केँ व्यंग्य आ जातिवादी आक्षेपक अन्तर दस साल बादो बुझऽ मे नै आयल छन्हि आ हमर समालोचनाक बाद मलंगिया जीक परिवार आ जातिवादी रंगमंचक लोक जे काण्ड केने रहथि से तँ विदेहमे अभिलेखित अछिये। एकांकीक विवेचना- समाजशास्त्रीय पक्ष तँ भिक्खन कोरा धोती परम्पराक छथि- ओ अगड़ो भऽ सकै छथि आ पिछड़ो। मलंगिया जी जकाँ मुन्नी कामतकेँ ओकड़ा राड़ बा पिछड़ा कहबाक खगताक अनुभव नै भेलन्हि। किए? किएक तँ हुनकामे प्रतिभा छन्हि, ओ कला-एकांकीकेँ लोक देखिते नै अछि, पढ़िते नै अछि- बाजि कऽ अपन कमीकेँ नुकबै नै छथि, हुनका बुझल छन्हि जे कला-एकांकी सेहो लोकप्रिय हएत जँ ओइमे कथानक हेतै। से ओ एहेन कथानक अनलन्हि। आब आउ ऐ एकांकीक भाषाक समाजशास्त्रीय विश्लेषणपर आ तुलना करू अइ एकांकीक भाषा आ मलंगिया जीक छोटका लोकक लेल गढ़ल गेल कृत्रिम-भाषापर। मुन्नी कामत कोनो धुआ-धोती धारीक प्रवेश अपन एकांकीमे नै हुअय दैत छथि, हुनका बुझल छन्हि जे ई ट्रेजेडी छिऐ, जँ धुआ-धोतीक आगमन हेतै आ भाषाक एकरङाह रूप आ एकांकीक सत्यानाश दुनू संगे हएत। से ओ सतर्क छथि। मुदा मलंगियाजी तँ निशाँमे छथि, दुनियाँ आगू बढ़ि गेलै मुदा ओ आ हुनकर जातिवादी रङमंचक निर्देशकक नजरिमे दु-रङागह भाषा आवश्यक, आ से नाटकक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत (जेना बाङ्ला आदि भाषाक लेखक करै छथि) नै  वरन् हँसी उड़बैले आ आक्षेप लगबैले, नै तँ जातिवादी दर्शक थोपड़ी पाड़त केना? मलंगिया जी आ जातिवादी रंगमंच अखनो समालोचनाकेँ रचनात्मक रूपमे लिअय, मुन्नी कामतक ऐ रचनाकेँ बेर-बेर पढ़य आ ऐ मे देल भाषायी समाजशास्त्रक स्वरूपकेँ चिन्हय आ ओकर अनुकरण करय, तदनुसार अपनामे सुधार करय तँ विदेह ओकर स्वागत करत। एकांकीक भाषायी विश्लेषण भिक्खन बजै छथि- "नै, अबकी बैशाखमे तोहर बियाह करै कऽ अछि। बियाह करि लऽ, फेर तोरा जतऽ जाय कऽ मन हेतऽ जायहक।" "अबकी बैशाखमे"- ऐ प्रयोगमे अहाँकेँ कनियो समस्या भेल? नै भेल, मुदा जँ ई जातिवादी रंगमंचक टटका संग्रहकेँ देखी (आधुनिक मैथिली नाट्य सञ्चयन- सङ्कलन-सम्पादन रमानन्द झा 'रमण' जे ऐ लिंक पर ४६५ भा.रु. मे उपलब्ध अछि) तँ यएह प्रयोग एना हएत- धुआ धोतीधारीक प्रवेश- "की हौ भुक्खन, बेटा हिमाचल कमाइले जाइ छह, रौ रामरतन, ओतहिये कोनो मेमसँ बिया नै कऽ लिहेँ।" भिक्खन- "नै, अबकी बैशाखमे रामरतन के बियाह करै कऽ अछि।" आब भिक्खन वएह गप जे मुन्नी कामतक कलमसँ प्रवाहयुक्त रहै, से छोटहा लोकक लेल प्रयुक्त अहाँकेँ लागत, आ सेहो नाटककार द्वारा सायास, नाटककार देखार हेता, आ मैथिलीक अपमान हएत। मुन्नी कामत सन लेखक से नै हेमऽ देतीह। मुदा जातिवादी रंगमंच मिझेबासँ पहिने अपन समस्त दुष्टताक संग साहित्य अकादेमीक लाखक लाख टकाक असाइनमेण्टक सहयोगसँ "आधुनिक मैथिली नाट्य सञ्चयन" क रूपमे आयल अछि, अइ ४६५ भारतीय रुपयाक पोथीमे चालिसो पाइक सामिग्री नै छै, आ नव युवाकेँ ई आर कट्टर बनाओत, हुनका पतो नै चलतन्हि जे ऐ लेल भाषाक कोन समाजशास्त्रक एतऽ प्रयोग कएल गेल अछि। मुदा एकटा संतोष अछि जे चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर' लिखने रहथि जे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित मैथिली पोथी गोदामेमे सड़ि जाइए। से जेना बुद्ध, दुष्ट गामक लोककेँ एक्के ठाम रहबाक आ सज्जन गामक लोककेँ पसरबाक वरदान देने रहथि से हमहूँ ऐ जातिवादी नाट्य सञ्चनकेँ गोदामे मे रहबाक आ कतहु नै पसरबाक कामना करैत छी। एकांकीक कमजोर पक्ष जेना उपन्यासक प्लॉट होइ छै तहिना नाटकोक प्लॉट होइ छै। एकांकी तँ बीहनि कथे भेल, विविध भारतीक "हवा-महल" कार्यक्रमक झलकी सन। से आशा करैत छी जे मुन्नी कामत बा समानान्तर धाराक अन्य रचनाकार कमसँ कम चारि अङ्कक नाटक ऐ बा एहने आन विषय पर लिखता। मुन्नी कामत लग एतेक सनगर विषय वस्तु छन्हि, भाषाक समाजशास्त्री स्वरूपक ज्ञान छन्हि तँ हुनकासँ तँ ई सम्भव अछिये। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ६) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन

अग्नि शिखा (भाग - ६) मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण/ मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण

त्रिभुवन के दिग-दिगंत् में पसैर गेल छल जे राजा पुरूरवा अश्वमेध यज्ञक विराट आयोजन कs रहल छथि l सभ ऋषि-मुनि आमंत्रित कएल गेलाह l सभ देवता के आमंत्रित कएल गेलनि l देवर्षि नारद यज्ञ दिवस के पूर्वहि राज भवन में आबि गेलाह l हुनक आगमन केँ शुभ समाचार ज्ञात भेला पर पुरूरवा प्रसन्नता सs पुलकि भs उठल l ओ विधिपूर्वक हुनक सेवा-सत्कार कएलक l तदुपरांत देवर्षि नारदक धीर-गंभीर वाणी प्रस्फुटित भेल - "नृपति,यज्ञक हेतु श्रेष्ठ अश्व केँ आवश्यकता होयतह l सर्वप्रथम तोंs एकर व्यवस्था करह"| उत्साहित होइत पुरूरवा बाजल - "देवर्षि हमर अश्वशाला में बहुतो श्रेष्ठ अश्व बंधायल परल अछि l कृपया अपनहि ओहि में सँs सर्वोचित अश्वक चयन कs लेल जाय"| देवर्षि नारद स्वयँ अश्व शाला के देखलन्हि l वास्तव में ओतह अनेको अद्भुत अश्व छल l ओहन अश्व एतेक सँख्या में अन्यत्र भेटनाई असम्भव नहि तखन कठिन अवश्य छल l परंच यज्ञ के निमित्त श्याम कर्ण अश्व केँ आवश्यकता छल,जे गिनती में मात्र पाँच रहैक l ओहि में सँs एक अश्व केर चयन कय देवर्षि अलग कs लेलथि l यज्ञक अश्व केर रक्षाक भार स्वयं पुरूरवा उठौलक l नियत दिवस कs सभ आमंत्रित व्यक्ति,ऋषि,देवगण,तथा ऋत्विज आबि गेलाह l सबहक ओ खूब नीक सँs सेवा सत्कार कयलक l पाराशर,देवल,च्यवन,याज्ञवल्क्य,वृहस्पति,अगस्त्य,वामदेव,मैत्रेय लोमश,शुक्राचार्य, जैमिनी,भृगु,अकृतवर्ण,जावालि,पुलसत्य, पुलह,मरीचि,जमदग्नि,कश्यप,भारद्वाज, अत्रि,मुनि वशिष्ठ,विश्वामित्र आदि ऋत्विज उपस्थित भेलाह l पुरूरवा सबहक पूजन कयलक l तदनंतर ब्रह्मा जीक आज्ञा सँs बहुतों ब्राह्मण मीलि सोना केर हर सँs यज्ञक भूमि जोतलथि,एवँ पिंडारक तीर्थक निकट विधिपूर्वक राजा केँ यज्ञक दीक्षा देल गेल l चार योजन धरि विशाल भूमि के जोतवायल गेल,तखन राजा पुरूरवा ओतs यज्ञक वास्ते मंडप बनबाओल l योनि एवँ मेखला सँs युक्त मध्य कुण्डक निर्माण कय ओहि में विधि पूर्वक अग्नि देवक स्थापना भेल l तत्पश्चात शस्त्र-धारी कतेको शूरवीर सबहक संग राजा पुरूरवा अश्व शाला में जा स्वर्ण-सांकल सँs बंधायल श्याम कर्ण अश्व केँ बंधन मुक्त कएल l ओ अश्व मंथर गति सँs चलैत यज्ञशालाक दिशा में बढ़य लागल l ओहि अश्व के मुख लाल नाङ्गरि पीयर आ कान श्याम वर्णक छल l मुक्ता फलक अनेकानेक माला सँs सुशोभित ओ दिव्य अश्व अत्यंत मनोहर बुझना जाइत छल l ओ श्वेत छत्र सँs युक्त एवँ चामर सँs अलंकृत छल l यज्ञशाला में मुनि गण सभ मीलि अश्वक स्थापना कयलनि l ओकरा पर केसर,चंदन,फूल माला एवँ चावल चढ़ाओल गेल l धूप निवेदित कएल l सुधा कुंडलिका आदि अन्यान्य खाद्य पदार्थक नैवेद्य लगायल l अश्व के विधि पूर्वक पूजा करला उपरान्त आरती उतारल गेल l तत्पश्चात राजा पुरूरवा केँ दान करवा हेतु प्रेरित कएल गेल l प्रचुर दान पाबि सभ जन प्रसन्न भेलाह l अश्व के ललाट पर राजा के द्वारा स्वर्ण-पत्र बान्हल गेल l ओहि पत्र में राजा पुरूरवाक प्रशस्ति अंकित छल,संगहि अश्वमेध यज्ञक उद्देश्य सेहो अंकित छल l आब वेद मन्त्रक उच्चारण ऋषि गण प्रारम्भ कयलनि एवँ अग्नि में आहुति देमs लगलाह l पुरूरवा के मन्त्रपाठ पूर्वक स्नान करायल गेल l ओकरो मन्त्र सँs अभिसिंचित कएल गेल l राजा के भाल पर मन्त्रोच्चार के मध्य तिलक लगायल गेल,तत्पश्चात अनेक प्रकारक अस्त्र-शस्त्र प्रदान कएल गेल l यज्ञाश्वक रक्षा के लेल ऋषि-मुनि मंगल पाठ कयलनि l अनेको प्रकारक वाद्य यन्त्रक ध्वनि एवँ वेद-मन्त्रक घोष के संग यात्रा करैत राजा पुरूरवा अपन राजधानी के पार कयलक l ओकरा साथ में अनेकों वीर योद्धा छल l ओ विश्व के समस्त राजा सँs सम्मानित भेल l यदि केओ ओहि श्यामकर्ण अश्व के पकड़वाक साहस देखौलक,ओकरा सीधा यमपुरी पठायल गेल l अनेक दानव राजा ओकर विरोध कयलक,फलस्वरूप ओकरा सभ सँs घमासान युद्ध भेल l दिग्विजय करैत काल कतेको राजा पुरूरवा सँs प्रसन्न भय अपन पुत्री के वरण करवाक प्रस्ताव ओकरा देलथि मुदा पुरूरवा ओ सभ आमंत्रण के अस्वीकृत केलक l ओ एखन विवाह-बंधन में पड़s नहि चाहैत छल l अनेक राजकुमारी राजाक पुरुषोचित सौन्दर्य एवँ वीरता सँs मोहित भेलीह l राजाक अस्वीकृति सुनि ओ विरह ज्वाला में दग्ध भय मृत्यु के वरण कएलीह,परंच पुरूरवा केकरो दिशि दृष्टि उठाकs देखबो नहि केलक l अनेक बाधा विघ्न के झेलैत पुरूरवा अश्वमेध यज्ञ समाप्त केलक l अश्वमेध यज्ञ सँs राजा के ख्याति दिग्-दिगंत में पसरि गेल | पुरूरवा के आब जेना नशा सन भs गेल रहैक दिग्विजय के l जखनि केओ राजा ओकर बराबरी करवाक प्रयास केलक,तखनहि मात्र ओकरहि सँs सीधा युद्ध नहि कए अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ कs दैत छल राजा पुरूरवा l ओ राजा अधीनता स्वीकार करिते छल,अन्य राजा ओकर शक्ति देखि पुनः ओकरा समक्ष ठाढ़ होई के हिम्मत नहि कs पाबै l एक प्रकार सँs अश्वमेध यज्ञ राजा पुरूरवाक वास्ते घोलका मालीक खेल भs गेल छल l सदिखन अश्वमेध यज्ञक आयोजन कs राजा पुरूरवा अपन शक्ति के प्रदर्शन करैत रहैत छल l

(अनुवर्तते) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (प्रस्तावना क आगू) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (प्रस्तावना क आगू) डा. बिपिन कुमार झा (संस्थापक आ सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई-शोधपत्रिका) (एहि सँ पूर्व महाकवि भास केर लिखल कर्णभारम् जे कर्णक मनोव्यथा पर लिखल गेल प्राचीनतम एकांकी अछि, संस्कृत में लिखल एहि ग्रन्थक प्रस्तावना धरि मैथिली रूपान्तर पढने रही अहाँ सब आई ओहि सं आगू) (ततः प्रविशति भटः।) तदनन्तर सैनिक प्रवेश करैत अछि। भटः- भो भोः! निवेद्यतां निवेद्यतां महाराजायाङ्गेश्वराय युद्धकाल उपस्थित इति। सैनिक-हे निवेदन करियौन्ह, निवेदन करियौन्ह महाराज अंगेश्वर सं जे युद्धक समय आबि गेल। करितुरगरथस्थैः पार्थकेतोः पुरस्तात् मुदितनृपतिसिंहैः सिंहनादः कृतोद्य। त्वरितमरिनिनादैर्दुस्सहालोकवीरः समरमधिगतार्थः प्रस्थितो नागकेतुः ।। 3 ।। अर्जुनक ध्वजा क आगू हाथी, घोडा एवं रथ पर सावारी कय प्रसन्न चित्त ई राजा सभ सिंहनाद कय रहल छथि। शत्रुसभक सिंहनाद स दुःसह एकटा योद्धा और हाथी क ध्वजा बला ई दुर्योधन सभ गप्प बुझि कें शीघ्र युद्ध हेतु प्रस्थान कय रहल छथि। (परिक्रम्य विलोक्य) अये अयमङ्गराजः समरपरिच्छदपरिवृतः शल्यराजेन सहस्वभवनान्निष्क्रम्येत एवाभिवर्तते। चारू दिस घुमिके । अरे ई त अंगराज कर्ण युद्धोचित वस्त्रपहिर शल्यराजक संग अपन महल सं एम्हरे आबि रहल छथि। भोः! किं नु खलु युद्धोत्सवप्रमुखस्य दृष्टपराक्रमस्याभूतपूर्वो हृदयपरितापः। एष हि सुनल जाउ! जिनकर पराक्रम देखने छी एहेन युद्ध के उत्सव माननिहार के एहेन हृदयताप �. ई निश्चित रूप सँ- अत्युग्रदीप्तिविशदः समरेऽग्रगण्यः शौर्ये च संप्रति सशोकमुपैति धीमान्। प्राप्ते निदाघसमये घनराशिरुद्धः सूर्यः स्वभावरुचिमानिव भाति कर्णः ।। 4 ।। अत्यन्त प्रखर तेज सं जाज्वल्यमान युद्धस्थल में  तथा पराक्रम में  सदैव अग्रणी एवं बुद्धिमान होइतो शोकाकुल भय कर्ण ओहिना लागि रहल छथि जेना ग्रीष्म ऋतुक सूर्यक प्रभाव मेघ सं आच्छादित भेलाक कारण मन्द भय जाइत अछि। यावदपसर्पामि। तावत आगू बढैत छी (निष्क्रान्तः।) सभ चलि जाइत अछि। (ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टः कर्णः शल्यश्च।) ओकर बाद जेना पहिने कहल गेल, ओहि अनुरूप कर्ण आ शल्य प्रवेश करैत छथि। कर्णः- मा तावन्मम शरमार्गलक्षभूताः संप्राप्ताः क्षितिपतयः सजीवशेषाः। कर्तव्यं रणशिरसि प्रियं कुरुणां द्रष्टव्यो यदि स भवेद्धनञ्जयो मे ।। 5 ।। शल्यराज! यत्रासावर्जुनस्तत्रैव चोद्यतां मम रथः ।। कर्ण- नीक होयत कि आय जीवित ई राजा महाराजा हमर बाण के रास्ता में नहिं आबथि। अतः युद्धस्थल में अर्जुन के देखला सं हमरा कौरवक अभीष्ट कार्य पूरा करब । शल्यराज! यत्रासावर्जुनस्तत्रैव चोद्यतां मम रथः ।। हे शल्यराज! जतय ओ अर्जुन अछि ओतय हम रथ लऽ क चलू। शल्यः- बाढम्। (चोदयति) शल्य- नीक गप्प (रथ आगू लय जाइत छथि। (अनुवर्तते) (पाठक सुविधा लेल पहिल भाग सेहो नीचाँमे देल जा रहल अछि- सम्पादक) महाकवि भास- कर्णभारम् अनुवादकर्ता एवं ग्रन्थ परिचय:- अनुवादक बिपिन कुमार झा, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानित विश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर पुरी, ओडिशा केर साहित्य विभागमे अध्यापनरत छथि। संस्कृत केर प्रमुख ग्रन्थक अनुवाद मैथिलीमे करब अनुवादकक सहज रुचि मात्र छन्हि। यदि अनुवाद केर कोनो अंश समुचित नहि लालगए तँ अवश्य सूचित करी। एतय प्राप्त श्लोकक भावानुवाद गद्येमे देल गेल अछि । ई ग्रन्थ चौखम्भा पब्लिशर्स, वाराणसीसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि। 'कर्णभारम्' महाकवि भास रचित एकटा एकांकी अछि। जतय कर्णक उदात्त चित्रण कएल गेल अछि।

नाटकक पात्र केर परिचय पुरुष पात्र

कर्ण- कौरव केर सेनापति (अङ्गदेश केर राजा)।

शल्य- कर्ण केर सारथी (मद्र देश केर राजा)।

भट- सिपाही

इन्द्र- ब्राह्मणरूपधारी इन्द्र

देवदूत- इन्द्रक ब्राह्मणरूपधारी दूत।

(नान्दीपाठक अन्त मे सूत्रधारक प्रवेश।) सूत्रधार-

जाहि भगवान विष्णुक नरसिंह अवतारक शरीर के देखि के नर-नारी, राक्षस, देवतालोकनि और पाताललोक सेहो आश्चर्य मे पडि गेलाह। जे अपन वज्रक समान कठोर नहक अग्रभाग सँऽ दैत्यराज हिरण्यकश्यप केर छाती विदीर्ण कयलथि। एहेन राक्षसी सेनाक विनाश करयबला भगवान श्रीधर अहाँ सभ कें कल्याण करथु।।१॥

एहि तरहें हम अपने सभ कें सूचित करैत छी जे (घूमि कें आ कान द कें सुनैक अभिनय करैत) अरे ! सूचना देबा मे व्यस्त हमरा ई कोन तरहक आवाज सुनाई दरहल अछि। ठीक! देखियै तऽ!

(नेपथ्य मे)

महाराज अङ्गराज कर्ण सँ निवेदन कयल जाय; निवेदन कयल जाय।

सूत्रधार- ठीक अछि। बुझि गेलहुँ।

भयंकर लडाई शुरू भय गेला पर; व्याकुल आ हाथ जोडैत परिचारक, दुर्योधनक आज्ञा सँ कर्ण के समाद दय रहल अछि॥२॥

(सब चलि जाइत अछि।)

॥प्रस्तावना खत्म भेल॥ ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- ११म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- ११म खेप ११

एमहर शोधग्रंथ भेटि जएबाक उत्सव मनाओल जा रहल छल तँ ओमहर षड़यंत्रकारीसभ सेहो बैसल नहि छल। त्रिकुट भवनक अन्दरक बात छलैक । एहिपार नहि तँ ओहिपार। ओकरोसभकेँ बूझले रहैक जे कालीकान्त आब नहि छोड़ताह, दण्ड तँ भेटबे करत । तेँ ओ सभ अंतिम प्रयास कए लेबे उचित बुझलक। कहि नहि ज्योतिषीजीक पाछूके सभ सहयोगी छल ? किछु गोटे जयन्त केँ एकांत पाबि गछारि लेलक । हुनका धारक कातमे एकांतमे लए गेल। हाथ-पैर बान्हि देलकनि आ तकर बाद हुनका दुनू आँखिमे किछु ढ़ारि देलकनि । जयन्त चिचआइत रहलाह परंतु जे हेबाक छल से भेल । हुनकर दुनू आँखि बंद भए गेल । हुनका किछु नहि देखाइत छलनि । लठैतसभ हुनका ओहिना बान्हल-छानल छोड़ि कए भागि गेल । आचार्यजीक संगे कालीकान्त शोधग्रंथ भेटि जएबाक प्रसन्नतामे आश्रममे जयन्त सँ भेंट करबाक हेतु पहुँचलाह। मुदा ई की? ओ तँ कतहु नहि छलखिन । चारूकात विद्यार्थीसभ हुनका ताकि आएल । मुदा हुनकर कोनो पता नहि चलल । आचार्यजी बहुत चिंतित भए गेलथि । " लगैत अछि फेर किछु अनर्थ भेल ।" "जयन्त छथि कतए?" "ओएह तँ नहि बुझा रहल अछि । विद्यार्थी सभ चारूकात छानि लेलनि । कतहु कोनो पता नहि चलि सकल। आबकी कएल जाए?" "हमरा तँ एहिमे ओकरेसभक हाथ लगैत अछि ।" "कहि नहि सकैत छी । एना हेबाक तँ नहि चाही ।" "ई कलियुग थिक । किछु भए सकैत अछि ।" ओ दुनू गोटे गप्प कैए रहल छलाह कि दूटा विद्यार्थी दौड़ल अएलाह- "की बात छैक? एना अपसियाँत किएक छह?"-आचार्यजी पुछलखिन । जुलुम भए गेल ।" "परिछा कए बाजह ने जे की भेलैक?" "जयन्तकेँ लठैतसभ हाथ-पैर बान्हि कए धारक कातमे फेकि देलक अछि ।" " तूँसभ की करैत छलह? हुनका लेने किएक नहि अएलह?" "हमसभ प्रयास केलिऐक । मुदा लठैत सभ हमरासभकेँ पाछू पड़ि गेल । हमसभ जान बचा कए भगलहुँ ।" ओहि समयमे कालीकान्त स्वयं आश्रमेमे रहथि । तुरंत सदल-बल ओहि विद्यार्थीसभक संगे धारक कात दिस बिदा भेलाह। धारक कात पहुँचितहि हुनकासभक नजरि भूलंठित भेल जयन्त पर पड़ल। जयन्त बेहोस पड़ल छलाह । "कहि नहि जीबितो छथि कि नहि?"-आचार्यजी बजलाह । किछुगोटे हुनकर छातीपर हाथ देलक आ चिकरि उटल-"अखन बाँचल छथि । साँस चलि रहल छनि ।" किछुगोटे हुनका उनटओलक । दुनू आँखि बंद छल । "लगैत अछि हुनकर आँखिक ज्योति चलि गेलनि।"-एकटा विद्यार्थी बजलाह । "हमरो सएह बुझा रहल अछि ।-दोसर विद्यार्थी बजलाह । "एहन जुलुम नहि देखलहुँ । कहू ई ककर की बिगाड़लथि जे एहन दुष्टता केलक ।" सभगोटे हुनका उठा-पुठा कए बैदक ओहिठाम लए गेलथि। हुनकर अथक प्रयाससँ जयन्तक जान तँ बाँचि गेल । मुदा आँखि ओहिना छलनि। कालीकान्तकेँ बहुत अफसोच होनि जे ओ जयन्तकेँ गाम जएबासँ किएक रोकलखिन । पहिनहि चलि गेल रहितथि तँ साइत एहि दुर्घटनासँ बँचि जाथि । बैद बहुत प्रयास केलाह जे हुनकर आँखिक ज्योति लौटि जानि । मुदा सफल नहि भेलाह । जयन्त कालीकान्तक आज्ञा लए गाम बिदा भेलाह । हुनका संगे आचार्यजी स्वयं रहथि । संगहि कालीकान्तक दिससँ प्रयाप्त सुरक्षाक व्यवस्था कएल गेल । हुनका जएबाक काल कालीकान्त टैर गाड़ी भरि कए बस्तुजातसभ देबए चाहलाह । मुदा जयन्त अड़ि गेलाह- " क्षमा कएल जाए । हमर कौलिक परंपराक प्रति ई घोर अन्याय होएत । " "अहाँसन विद्वानक रक्षाक दायित्व हमरा लोकनिक अछि । हमसभ तँ मात्र अपन धर्मक निर्वाह कए रहल छी। अपनेकेँ एकरा स्वीकार करबाक चाही । फेर ई बस्तुजात सभ तँ पाठशाला पर रहत । ओतहि खर्च होएत । एहिमे तँ किछु गलत नहि अछि।" "क्षमा कएल जाए । हम अपन वंशमे कलंक नहि लगाएब । ओहि पाठशाला निर्वाह हमर पुरखा लोकनि अपने केलथि । कहिओ ककरो सँ किछु सहायताक प्रयोजन नहि भेल । फेर हमरे ई कलंक किएक लगा रहल छी?" "हिनकर बात मानि लेल जाए ।"-आचार्यजी बजलाह । कालीकान्तकेँ जेना-तेना मना कए आचार्यजी किछु विद्यार्थिक संगे जयन्तक संगे हुनकर गाम बिदा भेलाह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.गजेन्द्र ठाकुर- २ टा बीहनि कथा (भूरा बाल, कर्तव्य पालन) गजेन्द्र ठाकुर २ टा बीहनि कथा १ भूरा बाल गूगल सर्च करू आ अगड़ा जातिक ऐ शॉर्ट फॉर्मक पूर्ण विवरण भेट जायत। बिकछा कऽ बुझबाक हुअय तँ "भूरा बाल जाति" सर्च करू। चारि संगी मुदा ओइमे एकटा ऐ भूरा बालसँ बाहरक छल। ओ बाजि रहल छल- -पहिलमे शरीफ, दोसरमे अकलमन्द आ चारिममे इमानदार मोश्किलेसँ भेटै छै। -तेसरक विषयमे नै बतेलौं, आ अपन जातिक विषयक फकरा सेहो तँ बता। -तेसरक विषयमे तँ पुराण-महाकाव्ये सभ लिखल जा रहल छै। आ हमर जाति पाछू छल तेँ फकड़ा नै बनल छल। आब कनी-मनी आगू बढ़ल अछि, आब बनतै। आ जखने बनतै पहिल-पहिल तोरे सुनेबौ। २ कर्तव्य-पालन संगी येल्लो लाइट क्रॉस केलक आ बिच्चेमे रेड लाइट आबि गेलै। संगी सतर्कता विभागक बड़का अधिकारी, मुदा सिपाही गाड़ी आगाँ ठाढ़ करबा लेलकै। हवलदार आयल तँ संगी ओकरा पाँच सयक नोट देखेलकै आ छोड़ि दैले कहलकै। हवलदार बाजल- "गामक असगर सरकारी कर्मचारी छी हम, बहुत इज्जत अछि हमर गाममे। ई पाइ राखू, छोड़ि रहल छी अहाँकेँ। जखन अहाँ आगाँ बढ़लौं तँ "येलो लाइट" छल तेँ छोड़ि रहल छी, नै तँ छोड़बो नै करितौं।" हवलदारक ओइ आत्म-गौरवक खिस्सा हमर संगी सुनबैत नै थाकैत अछि खास कऽ ओतऽ जतऽ पैघ पदाधिकारी "प्रेसर"मे कर्तव्य-पालन नै कऽ सकबाक कन्ना-खिज्जी करैत रहैत छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.गजेन्द्र ठाकुर- गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास- द ........ फाइल्स गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास गजेन्द्र ठाकुर द ........ फाइल्स प्रभाकरण सुन्दरमक अंग्रेजी बड्ड नीक रहै। बाजै काल ओकर हाथ ओकर मुँक संग एकटा संगीत उत्पन्न करैत रहै। भारत स्वतंत्र भेल १५ अगस्त १९४७ केँ। पुरनका शासक ब्रिटेन हमरा सभक नीति निर्धारंअ करैत छल। ओकर राजनैतिक आ सामाजिक दुनू सिस्टम हमरा सभसँ पूर्ण रूपेँ विलग रहै। आ ओइ नीति सँ हम सभ गरिबहा चक्रव्यूहमे पड़ि गेलौं। कम कमाइ आ कम खाइ। कम बचेनाइ आ कम पूँजी, आ तेँ कम उत्पादन। बजार हाटे भरि सीमित। मुदा तखनो हमरा सभक उद्योग अपन समानक गुण लेल विश्व भरिमे प्रसिद्ध छल। तँ पहिने हमरा सभकेँ लोकक आय बढ़बऽ पड़त। फेर ओकरा एकसँ बेशी विकल्प देबऽ पड़त। हमरा सभकेँ लोकक सहयोग चाही, ओकरा बुझबऽ पड़त जे ई जे नव अर्थव्यव्स्था आबि रहल अछि से ओकरा लेल नीक छै। एकर विरोधी सभ जतऽ ततऽ ठाढ़ भऽ जेता, मुदा हुनका लग सम्पूर्ण भारतमे कोनो व्यवस्था कोनो संगठन नै छन्हि। सरकार लग गाम स्तरपर संगठन छै। मुदा ओकरा ई नै लागै जे ई विज्ञापन छी। जाबे विरोध शुरू हुअय ताबे लोकमे एहेन वातावरण बनि जाय जे एकर विरोधी लोकक विरोधी छथि। कतेक नीक कार्यक्रम पहिनहियो शुरू भेल मुदा विरोधक कारण सरकारकेँ ओ सभ बिच्चेमे रोकऽ पड़लै। मुदा ई नै छै जे कोनो समस्या नै आओत। जँ अहाँ सभकेँ रोजगार देबै, तँ बौस्तु सभक मांग बढ़त आ ओतेक बौस्तु उपलब्ध नै रहत। आ ऐ सँ बौस्तुक दाम बढ़त। तँ बौस्तुक दाम ऊपर नै जाय तै लेल गामे-गाम जे जनता-दोकान सरकार खोलने अछि ओकर उपयोग बेशी करऽ पड़त। बेशी रोजगार भेलासँ बेशी आयात हएत, कारण लोकक आय बढ़त, ओ खर्च बेशी करताह आ आयातित बौस्तुक गुणवत्ता नीक हेबाक कारण ओकर मांग बढ़त। अंग्रेजक राजमे भारतीय समानक उत्पादन घटि गेल छल, भारत कच्चा मालक बजार छल। आब ई स्थिति पलटी मारत। मुदा अंग्रेजी राजमे हमर समान गुणवत्ता लेल विश्व भरिमे प्रसिद्ध छल, मुदा से स्थिति आब नै अछि आ ऐ क्षेत्रमे हमरा सभकेँ काज करऽ पड़त। आर्थिक उन्नति भेलासँ समानक उत्पादन बढ़त, मुदा तइ लेल हमर उद्योग कच्चा मालक लेल आयात दिस अग्रसर हेबे करत, कारण अपन देशमे ओतेक कच्चा माल उपलब्ध नै छै। मुदा तइसँ विदेशी मुद्राक कमी भऽ जायत। से बौस्तुक निर्यातपर सेहो ध्यान देबऽ पड़त। (अनुवर्तते) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.महाकान्त प्रसाद- ३ टा बीहनि कथा (गरमी, प्रश्न, बत्तू) महाकान्त प्रसाद, नौआबाखर, मधुबनी-८४७४०२. सम्प्रति : वाट्सन +२उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मधुबनी-८४७२११.

३ टा बीहनि कथा

१. गरमी

-शरबत पियाउ! -किएक? गेल तऽ छलहुँ दलकल! ओहिठाम ओरियान नहि छलैक? -यै, ओरियान तऽ छलैक, मुदा जिनकर उत्सव मनाओल गेलैक हुनकहि परपोताकेँ खुटसि देलकै। क्यो भीतर-बाहर आन-जान नहि कऽ सकैत छल। हाॅल गुमसि गेलै। गरमी बढ़ि गेलै। -हँ, से तऽ सत्ते। बड्ड गरमी छै ओकरा सभमे। लिअ शरबत पिऊ। २. प्रश्न

-कोन नगर सँऽ अएलहुँ? 'पटना सँऽ..।' -कोन नगर जाएब? 'दिल्ली..।' -कोन बाट धऽ कऽ जाएब? 'लोकतंत्र बाटे..।' जखन आएब-जाएब लागल छह, तखन डगर किएक खराप करैत छहक? '???!!..' ३. बत्तू

-आबौ नेऽ..! -कत्तऽ? -लग मे, आर कत्तै? -किएक? -जाड़ छै, कनकनी छै। -सोझ मने कहौ ने जेऽ..! -धौर, लाज होए छै की नहि, बोता नहितन!

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.जगदानन्द झा 'मनु'- माएक भक्त जगदानन्द झा 'मनु' माएक  भक्त दिल्लीसँ पटना जएबाक सम्पूर्ण क्रांतिक द्वितीय श्रेणीक स्लीपर किलासक डिब्बा, भीड़सँ खचा-खच भरल। तीन सीटक जगहपर पाँच-पाँचटा लोक बैसल। साँझक साढ़े पाँच बजे ट्रेन अपन नियत समयसँ चलल। दना-दन पूर्ण गतिसँ ट्रेन चलि रहल छल। रातिक लगभग आठ बजे पेंटीगार्ड बला हाथमे एकटा पुर्जी नेने "भोजन, भोजन बाजू।" अबाज दैत, पुर्जीपर सीट नम्बर लिखैत आगू बढ़ि रहल छल। संतोष, ठीक-ठाक भेष-भूषामे देखै कए समृद्ध घरक लागि रहल छल। जखन पेंटीगार्ड बला संतोष लग गेल तँ संतोषक बगलमे बैसल तीन गोटेक ग्रुपमे सँ एकटा २०-२१ बर्खक युवक चट्टे बाजि उठल, "हम तँ गरीब आदमी छी एतेक महग खाना नहि लेब।" संतोषक मोन ओहि नवयुवकक उतरसँ आहत भेलै आ तैँ ओ ओहि युवकसँ बाजि उठल, "एहि दुनियाँमे कियो अमीर गरीब नहि छैक, ई सबटा लोकक अपन-अपन मनक भ्रम छैक। आजुक घड़ीमे सभ कियो अमीरे अछि, बस अपनामे बिस्वास आ किछु नम्हर करैक इक्षा होबाक चाही।" "हम सभ पाँच-सात हजार रुपैया महिना कमाइ बला तँ गरीबे भेलहुँ ने।" "गरीब कोना भेलहुँ ? अप्पन एकटा हाथ एक लाखमे देबै।" "नहि।" "दोसर हाथक एक लाख रुपैया आओर भेटत।" "नहि।" आगू संतोष ओकरासँ किछु आओर बुझिते वा किछु गप्प करिते की संतोषक आगूक सीटपर बैसल एकटा बेस पुष्ट, चानन ठोप टिकी रखने भेष भूषासँ नीक विद्वान लागि रहल छला, झटसँ बाजि परला, "हमरा एक लाख रुपैया दिअ हम अप्पन हाथ दै छी।" "एना नै भए सकै छै, एक लाख रुपैयामे कियो स्वस्थ जबान आदमी अपन हाथ कोना देतै।" "हम देब ने, लाबू हमरा एक लाख रुपैया।" दोसरो दोसरो सभ, "नहि ! एना तँ नहि भऽ सकैए, कियो एक लाख रुपैयामे अपन हाथ कोना दए देतै।" संतोष, "जकरा अपन भगवानपर आ अपनापर विश्वास छै, अपन माए-बाबू धिया-पुतासँ सिनेह छै ओ एक लाखमे कि कड़ोरो रुपैयामे अपन अंग नहि देतै।" "देतै किएक नहि, दुनियाँमे देखियौ आइ लोक सय-सय रुपैया लेल दोसरक जान लऽ लय छै।" "हाँ ई गप्प सत छै, सय-सय रुपैयामे लोक लोकक जान लऽ लय छै। एक्सीडेंटमे छन्नमे लोकक जान चलि जाइ छै। हारी बीमारी, दाही रौदीमे परिवारक परिवारक खत्म भऽ जाइ छैक। डिफ्रेशनमे लोक अपने जान अपने लऽ लय छै। ई सभ एकटा भिन्न विषय बस्तु छैक मुदा एक गोट व्यक्ति मात्र एहि द्वारे कि ओ गरीब अछि अपन अंग बेच देतै, हमरा हिसाबे ई तँ नहि हेतै।" सामने बलाकेँ भरिसक बुझाबैक चेष्टामे संतोष बाजल, मुदा ओ जिद्द आ बहसकेँ आगू रखैक चेष्टामे एकदम तनैत बाजल, "ई सभ रहै दिऔ ने, अहाँ एक लाख रुपैया दिअ हम अपन हाथ दै छी।" हुनक जिद्द आ तामससँ मिश्रित गप्पसँ संतोष अपनापर काबू नहि राखि सकल आ खिसिया कए बाजल, "उतरु अगिला स्टेशनपर अपन हाथ कोनो चलैत ट्रेनकेँ सोझाँ राखू, हाथ कटैत मांतर हम अहाँकेँ एक लाख रुपैया देब।" "नहि एना नहि पहिने पाइ राखू।" "से किएक, पहिने एटीएम मशीनमे कार्ड दै छै तकर बाद ने पाइ अबै छै, तेनाहिते अहाँ अप्पन हाथ ट्रेनक निच्चा राखू हाथ कटैत देरी हम एक नहि दस लाख रुपैया देब।" "रहए दियौ रहए दियौ, दस लाख रुपैयाक अहाँक ओकाइतो अछि।" "हमर ओकाइत छोरु, अपन हाथ काटू  हाथ कटैत देरी हम अहाँकेँ दस लाख रुपैया देब।" "---- बस एनाहिते, जे सभ नहि बजबा चाही सेहो सभ दुनूमे होबए लागल करीब आधा घंटाक बहसकेँ बाद दोसर दोसरकेँ हस्तक्षेपक बाद बहस कनीक शांत भेल ख़त्म नहि। "अहाँ एखन दुनियाँ नहि देखलिऐए लोक पाइ द्वारे की की करै छै, अपन किडनी धरि बेच दैत छै।" "हाँ बेच दै छै मुदा ओहेन ओहेन लोककेँ किछु विशेष मजबूरी वा परिस्थिति होइत छैक अथवा ओकरा भगवान आ अपनापर तनिको भरोसा नहि हेतै।" "तँ हमर कि मजबूरी अछि अहाँ बुझै छीऐ ?" "नहि हम तँ अहाँक मजबूरी किछु नहि बुझै छी।" "तहन अहाँ कोना कहैत छी जे हम दस लाखमे अपन हाथ नहि देबै।" "देखयौ अहाँक मजबूरी हमरा ठीके नहि बुझल मुदा रुपैयासँ कतेक दिन चलत आ एहि हाथसँ जीवन भरि कमा खा सकै छी।" "अहाँक गप्प ठीक अछि मुदा जखन ओहेन परिस्थिति अबैत छैक तँ लोककेँ आगू पाछू ताकैक शामर्थ खत्म भऽ जाइ छै।" संतोष, "अपना जगह अहूँ ठीके छी, बिचमे हम बहुत कटू बजलहुँ, क्षमा करब  मुदा एतेक काल तक नीक बेजए बहसक बाद हम एतेक तँ जानैक उम्मीद रखै छी जे अहाँ अपन मजबूरी हमरा बताबी।" "हमर माए दू बर्खसँ बहुत दुखीत छथि। दरिभंगासँ पटना, पटनासँ आब दिल्ली एम्सक पाँच माससँ चक्कर काटि रहल छी। कोनो समाधान नहि।" "एम्समे कि कहैत अछि ?" "कहैत छैक प्रोस्टेज बढ़ल छनि ओपरेशन हेतैन, पतनोमे इहे कहलक मुदा ओतए ओपरेशनक व्यबस्था नहि। दिल्लीमे चारि माससँ खाली तरह तरहकेँ टेस्ट कएला बाद आब कहैत अछि जे ओपरेशन हेतैन आ ओपरेशनक तारीख आँगा छह मास बाद देने अछि। छह महिनामे हुनका कि हेतैन ....। प्राइवेटसँ ओपरेशन कराबी तँ लाख रुपैयाक खर्चा आ हमरा सभ लग जे किछु छल पहिने बेच-बिचुन कए सबटा लगा देलीऐ।" ई कहैत माएक प्रति सिनेह आ अपन लचारीसँ हुनक आँखि नम भए गेलन्हि। "आगू दिल्ली कहिया जाएब ?" "ओपरेशनक तारीख तँ छह महिना बादक भेटलन्हि मुदा दबाइ खाइत महिनामे एक बेर एम्स आबैक लेल कहने अछि।" "आब कहिया एम्स जा रहल छी ?" "इहे मासम दिन बाद पन्द्रह तारीख केर टिकट अछि।" "आब एम्स जाएब तँ हमरा फोन कए लेब, भए सकत तँ हम किछु सहायक होएब।" "कोना, कोनो डॉक्टरकेँ चिन्है छीयै।" "हाँ।" "तँ हमरा हुनकर फोन नम्बर दए दिअ, नहि तँ हमरा एखने एक बेर गप्प करा दिअ।" एखन नहि हम गप्प करा सकैत छी आ नहि हम हुनकर नम्बर दए सकै छी किएक तँ केकरो नम्बर देनाइ एलाव नहि छैक। हाँ अहाँ जखन जाएब हमरा फोन करब हमर फोन नम्बर लए लिअ। एकटा मनुक्ख बुते जतेक सहायता भऽ सकैत छै, अहाँकेँ भेटत बांकी माँ भगवतीक हाथमे।" "रहए दियौ, अहाँ एनाहिते बड़का बड़का फेकै छी, कनिक काल पहिने एक हाथक बदला दस लाख रुपैया दैत छलहुँ आ आब एम्समे अहाँक जान पहचान भए गेल। डॉक्टरक नम्बर मांगै छी तँ एलाव नहि छैक। एलाव किएक नहि रहतै एखनो हमरा लग चारि-चारिटा डॉक्टरक नम्बर अछि मुदा किनकोसँ कोनो मदत नहि भेटल।" "अहाँ एहेन बड़का बड़का फेकै बला गप्प कहि कए हमारा उलाहना किएक दैत छी। ई गप्प अहाँ जखन कहितहुँ जखन हम अहाँक किछु गछि कए नहि दैतहुँ आ कि नहि करितहुँ। एहन तँ नहि भेलए। हाथ बला गप्पमे अहाँक हाथ अहाँ लग आ हमर पाइ हमरा लग। रहल एम्स बला गप्प तँ महिने महिने अहाँ जाइते छी, एक बेर हामरोसँ गप्प कए लेब किछु सहायक भेलहुँ तँ ठीक नहि तँ अहाँकेँ नुकसाने की ? हाँ ओकर बादक अप्पन दुनूक भेटमे अहाँ हमरा एहि तरहक अनरगल गप्प कहि सकैत छी।" ई कहि संतोष एकटा पुर्जापर अपन नाम संतोष आ मोबाईल नम्बर लिख हुनका दए देला। सामने बला सेहो अनमोनो मने ओहि पुर्जाकेँ अपन जेबीमे राखि लेला। एक महिना बाद, दिल्ली एम्समे। ओहे संतोषक सामने बला सबारी, अप्पन माएक संगे। हाथमे मो० फोन रखने आ ओहिमे संतोषक नम्बर शेव कएने एहि गुनधुनमे कि फोन करू की नहि, "झुठ्ठेकेँ ठकि गेल होएत, ठकनेहेँ होएत तँ हमर की लय लेत, एक बेर फोन कइए लै छी।" नम्बर लगेलक चट्टे घंटी बाजल, "ट्रिन ट्रिन ......." "हेलो" दोसर कातसँ "के संतोषजी ?" "जी हाँ, अहाँ के ?" "जी हम मुरारी, महिना भरि पहिने अपन दुनू दिल्लीसँ पटना जाए काल ट्रेनमे भेट भेल रही। अहाँ हमर एक हाथक बदला दस लाख रुपैया दै लेल तैयार रही।" "हाँ हाँ मुरारीजी हमरा सबटा इआद आबि गेल, कहू की समाचार, माए केहएन छथि?" "समाचार की कहू, ओहे माएकेँ लऽ कए दिल्ली आएल छी। सोचलहुँ एक बेर अपनेकेँ कहि दी।" "हाँ हाँ बड्ड नीक केलहुँ, एम्स कहिया अबै छी ?" "एखन एम्सेमे छी।" "अच्छा ! कोन यूनिटमे देखाबैक अछि ?" "प्रो० एस० चौधरीक यूनिटमे।" "अच्छा, माता जीक की नाम छनि ?" "सरोज देवी।" "ठीक छैक, अहाँ आबू।" उम्हरसँ फोन बंद। मुरारीजी सोचै लागला, "भेल, सभ गप्प सुनला बाद फोन बंद कए देला। हिनको बुते किछु नहि होएत।" मोन मसुआ कए आगू बिदा भेला। करीब आधा घंटा पएरे चलला बाद साढ़े दस बजे ओपीडी पुर्जापर तारीखक मोहर लगा कए प्रो० एस० चौधरी यूनिट पहुँचला। पुर्जा डॉक्टर कक्षकेँ द्वारिपर ठार अर्दलीकेँ दऽ बाहर वेटिंग कुर्सीपर माए संगे अपनों बसि रहला। हुनकासँ पहिने करिव ४०-४५ गोते वेटिंग कुर्सीपर बैसल। भीर देखि ओ सोचए लागला, "भेल फोन करक चक्करमे आधा घंटा देरी भए गेल आ ओकर परिणाम आइ दू बजेसँ पहिने नम्बर आबैक कोनो भरोसा नहि।" मुरारीजी बीतल दू बर्खक दिक्कत आ कष्टक खाका मोने मोन तैयार करैत रहथि। एगारह बजे अर्दली अबाज देलक, "सरोज देवी।" मुरारीजी हरबरा कऽ उठला, "ई की कतए दू बजे नम्बर आबैक उम्मीद छल आ कतए ११ बजे न० आबि गेल। हमरासँ पहिलुक सभ तँ एखन ओनाहिते बैसल अछि। मुस्किलसँ तीनो गोटा नैँ देखेलकैए।" दिमाग सोचैत मुदा शरीर एतबामे माए सहीत डॉक्टर लग। माए डॉक्टर लग जा पेशेंटक बास्ते बनल टूलपर बसि रहली। मुरारीजी हुनकेँ पांजर लागि ठार। डॉक्टर माएक पुर्जापर हुनक नाम देखते मातर पहिने हुनका दुनू हाथ जोरि प्रणाम कएलनि आ ओकर बाद धियानसँ हुनकर पुरनका पुर्जा सभ देखला बाद अंदर केबिनमे लए जा कए नीकसँ जाँच केलनि। केविनस बाहर आबि आठ दसटा जाँचक पुर्जा बना कए दैत, अर्दलीकेँ अबाज देलन्हि, अर्दलीकेँ लग एला बाद, "माँ जीक संगे जाउ आ सबटा टेस्ट एखने अपने संगे पूरा करा कए हाथो हाथ नेने आबू।" "जी" कहैत अर्दली डॉक्टरसँ पुर्जा सभ लेला बाद माएसँ, "चलू।" मुरारीजी आ हुनकर माए अर्दलीक पाँछा पाँछा स्वचालित मसीन जकाँ बिदा भए गेला। जतए जतए अर्दली लए गेलनि ततए ततए जाइत रहला करीब दू घंटा बाद सबटा टेस्ट जेना इसीजी, अल्ट्रासाउन्ड,एक्स-रे, खून पेशाब आदिक जाँच भेला बाद पुनः ओहिठाम डॉक्टर लग आपस एला। डॉक्टर सबटा रिपोर्टकेँ गंभीरतासँ देखला बाद, "हाँ रिपोर्ट सबहक अनुसार प्रोस्टेज बढ़ल छनि आ ओकर जल्दी ओपरेशन नहि भेलासँ किडनी डेमेज भऽ सकैए। एना करू (किछु हुनक पुर्जापर लिखैत) ई ई दबाइ खेला बाद परसु आबि कए माँ जीकेँ भारती करा दियौन। परसु एगारह बजे ओपरेशन हेतनि।" मुरारीजी हक्का बक्का ई कि भए रहल छैक जाहि ओपरेशनकेँ लेल छह महिना बादक तारीख भेटल छल ओ आइ दू दिन बाद कोना। भारतमे चिकित्सा व्यवस्था एतेक चुस्त दुरुस्त कोना भए गेल ओहो एम्स एहेन सरकारी अस्पतालक। अपन उत्सुकतापर ओ नियन्त्रण नहि राखि पएला आ डॉक्टरसँ पुछिए बैसला, "डॉक्टर साहब माफ करब एकटा गप्प पुछि रहल छी, जाहि ओपरेशन कराबै लेल हम सभ दू बर्खसँ हरान आ निरास छलहुँ, अहूँ लग करीब छह महिनासँ दौर रहल छलहुँ, पिछला महिना अहीँ छह महिना आगूक तारीख देने रहि। आइ दू घंटामे सबटा टेस्टक रिपोर्ट हाथे हाथ आ दू दिन बाद ओपरेशन ई चमत्कार कोना।" "एहिमे चमत्कार केर कोन गप्प, पहिने हमरा सभकेँ कहाँ बुझल जे अपने प्रोफेसर साहबकेँ सम्बन्धी छियनि।" "कुन प्रो० साहब।" "अरे अपन प्रो० साहब जिनक ई यूनिट अछि, प्रो० एस० चौधरी।" "प्रो० एस० चौधरी आ हमर सम्बन्धी।" मुदा एहि गप्पकेँ मुरारीजी अपन मोनेमे रखने रहला मुँहसँ बाहर नहि निकालला। आगू डॉक्टरसँ, "अपनेसँ कनी निवेदन छल।" "की कहू ने।" "कनिक प्रो० साहबसँ भेट भऽ जाइते।" "किएक नहि, हमरा सबहक दिससँ अपनेक सेवामे कोनो कमी तँ नहि रहल।" "नै नै, ई कि कहै छी, बस कनी हुनकासँ भेट करक लौलसा छल।" डॉक्टर साहब अर्दलीकेँ कहैत, "हिनका भीतर प्रोफेसर साहबकेँ केबिनमे नेने जइयौन्ह।" मुरारीजी आ माए अर्दली संगे बिदा भेला, पाँच मिनट पएरे चलला बाद एकटा लग्जरी एसी केविन, बाहर बोर्डपर लिखल, यूनिट प्रो० डॉ एस चौधरी। अर्दली केबार खोललक तिनु भीतर गेला। भीतर प्रो० एस चौधरी केबारक दिस पीठ कए कऽ एकटा नम्हर लग्जरी कुर्सीपर बैसल आ हुनकर सामने बैसल तीनटा डॉक्टर हुनकासँ परामर्श लैत। केबार खुजलासँ हुनको धियान उम्हर गेलनि। घूरि देखला तँ मुरारीजी आ हुनका बुझैमे देरी नहि लगलनि जे हुनक संगे हुनकर माए छथिन चट्टे गोर लागि आशीर्वाद लेलनि। माएकेँ गोर लागैत देख बांकीकेँ तीनु डॉ सीटसँ उठि ठार भए गेल। डॉ एस चौधरी आन डॉक्टरसँ,  "excuse me, we wil meet after five minute later"   तीनू डॉक्टर कक्षसँ बाहर चलि गेला। मुरारीजी आश्चर्जसँ, "अहाँ आ एहिठाम, एस चौधरी यानी संतोष चौधरी।" संतोष हुनका दिस देखि मंद मंद मुस्काइत। मुरारीजी संतोषक पएरपर झुकैक चेष्टामे मुदा ओहिसँ पहिने संतोष हुनका उठा अपन करेजासँ लगा लेलनि। मुरारी, "हमरा क्षमा कए देब, अहाँक बारेमे हम कि कि सोचैत छलहुँ, ओहि दिन ट्रेनमे हम नै जानि कि कि कहि देलहुँ, क्षमा कए दिअ।" संतोष, "की सभ अनाप सनाप बजै छी। ओहि दिनका गप्प सप्पकेँ बिसरि जाउ। आब ई कहू जे माएक इलाजमे कोनो कमी तँ नहि।" "कमी, आब कोनो कमी नै, परसु ओपरेशन होबैक निश्चित भेले।" "हाँ, हमर आइ आ काल्हि केर समय पहिने बुक छल, परसु करीब दू घंटाक समय हमरा लग खाली छल ओहिमे हम माँजीक ओपरेशन करबनि।" "अहाँक ई उपकार हम जीवन भरि नहि बिसरब, हमरा लेल तँ अपने साक्षात भगवान बनि एलहुँ।" ई की आब अहाँ हमर दोस्त छी आ दोस्तीमे कोनो उपकार कोना आ ओनाहितो ई अस्पताल हमर तँ नहि सरकारक अछि।" "अहाँ जे कहू सरकारक हिसाबे तँ ओपरेशनक छह महिना बादक समय भेटल छल।" "हमहूँ सभ की करबै, एतेक भीड़ भार छैक जे नम्बर लगाबए परैए छैक एक दिनमे सात आठटा ओपरेशन होइत छैक एहि हिसाबे एवरेज निकाइल कए ककरो तारीख देल जाइ छैक। सिस्टमे एहन छैक। एकरा सभकेँ छोरु, ई कहू ठहरल कतए छी, कोनो दिक्कत तँ नहि।" "नहि, कोनो दिक्कत नहि जे दिक्कत छल अपने दूर कए देलहुँ आब माँ भगवतीक हाथमे।" "ठीक छै तँ परसु फेर भेट हेतै।" "ठीक मुदा एकटा प्रश्न पूछब अपनेसँ।" "की ?" "एतेक पघि डॉक्टर भए कऽ अहाँ ओहि दिन द्वितीय श्रेणीक स्लीपर किलासमे किएक ?" संतोष हँसैत हँसैत, "हा हा हा, द्वितीय श्रेणीक स्लीपर किलासमे नहि रहितहुँ तँ अपनेसँ कोना भेट होइते। (गप्पकेँ बदलैत) हम अपने जकाँ माएक एतेक भक्त तँ नहि छी जे अपन हाथ कटवा दि मुदा एतेक सिनेह तँ अपन माएसँ करिते छी जे हुनका लेल द्वितीय श्रेणीक स्लीपर किलासमे एक दिन यात्रा कए सकी।" "से की नहि बुझलहुँ ?" "बात ई कि हम सभ मुलतः मधुबनी जिलाक छी मुदा २५-२६ बर्ख पहिने हमर बाबूजी पटना शिप्ट कए गेला। एखन हमर परिवार सभ पटनेमे छथि। ओहि दिन भोरे एकाएक पटनामे हमर माएक मोन बड्ड खराप भए लेल रहनि। आब १०-१२ घंटामे नहि कोनो एयरलाइंसक टिकट आ नहि कोनो ट्रेनक प्रथम वा कोनो एसीक टिकट भेटल मुदा गेनाइ जरूरी छल तहन कोनो दलालसँ एकटा द्वितीय श्रेणीक स्लीपर किलासक टिकट भेटल आ ओहि बिधि अपनेसँ भेट होबैक उपरबलाक कोनो प्रयोजन रहल हेतनि। किएक तँ घर पहुचैत पहुचैत माएओ एकदम ठीक छली। दिनभरि रहि अगिला दिन भोरे हवाई जहाजसँ आपस आबि ड्यूटी केलहुँ।" -जगदानन्द झा 'मनु'- मोबाइल/ वाट्सअप न०  9212461006 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.पूनम झा 'प्रथमा'- मोनक बात पूनम झा 'प्रथमा', कोटा, राजस्थान

बीहनि कथा- मोनक बात

"हे यौ ! आब बड्ड भs गेल। हम जाई छी ।" "कतय जाई छी ?" "जतय मोन हैत ततय जाई छी ।" "से की भेल ? एना किया खौंझायल छी ?" "बस हमरा रहैत अहांके हमर कद्र नहि अछि । जखन चलि जायब आर अपने सं सबटा करय-देखय परत तखन बुझबए हमर कद्र ।" ई कहि घरवाली अपन पर्श उठा कs बाहर निकलि गेलीह आ ध्यान केबारे दिश लागल छलैन्ह । मुदा घर बला के एतेक बनरभवभकी दs कs निकललाक बादो जखन बाहर आबैत नहि देखलखीन तs तामसे बिष भेल घुईर एलीह आ मोनेमोने बरबराईत 'सचमें हिनका आब हमरा रहने वा नै रहने कोनो फर्क नै पड़य छैन्ह।' ई सोचिते घर में प्रवेश केलीह तs भनसा घरसं बर्तनक आवाज सुनाई परलैनि । कनि ठमकि गेलीह की उमहर सं आवाज आयल "एलौं ? बस चाय बनि गेल।" "ऐं यौ ! अहां की बुझलियै जे हम चाय लेल खिसियाएल छी ?" "नै यै हम बुझए छी आई हमर सबहक मैरेज एनिवर्सरी छै, आ अहां कतौ घूमए जाए चाहै छी ।" आब घरबाली मुसकियाईत बजलीह "धमकी के ई असर ? जे डरो नै भेल जे हम कतौ चलि जाई तs ?" "चालिस साल में यदि आई लव यू हम नहि कहलौं या अहां नहि कहलौं तकर मतलब ई त नञ जे हमरा सबके एक दोसर पर विश्वास नहि अछि ?" घरवाली गर्वित भए दूटा कप आनि चाय छानए लगलीह । ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- अप्रदीप्त इजोत ३.२.गजेन्द्र ठाकुर- अजीगर्त अछि दुर्भिक्ष- ५ ३.३.निर्मला कर्ण- अपन सन्तान ३.४.आशीष अनचिन्हार- २टा गजल ३.५.सुषमा ठाकुर- स्वतंत्रता, मुस्कान ३.६.महाकान्त प्रसाद- नियोजितक चान ३.१.राज किशोर मिश्र- अप्रदीप्त इजोत राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी अप्रदीप्त इजोत

पुष्प-कोँढ़ी मे, सञ्च-मञ्च, बैसल अछि अति सुन्दर प्रसून, कुसुमित होबए सँ अनठेने, की पाबि रहल ओहि मे सुकून?

जा धरि नहि पुष्पित होएत ओ, सुन्दरता कोना देखतै संसार? गुण रहले सँ त' हेतै नहि , जा धरि नहि हेतै ओकर प्रसार।

जखन हेतैक प्रस्फुटित फूल , मधुकर अओतए ताकए पराग, हवा, सुगंध लए, सबतरि बँटतै, गम-गम करतै पूरा बाग।

सौंदर्य देखि-देखि ओहि कुसुमक, वर्णन करता श्रृंगार-कवि , के नहि मोहित होएत बिलोकि , फुलाएल पुहुपक, सुंदर छवि ?

मुदा, के सजाओत बिआह-मंडप? अपुष्पित फूलक माला सँ, आ, के चुमाओत वर-कनिआँ के? अकुसुमित फूल ध', डाला सँ।

प्रस्फुटित कुसुम सँ हार बनैत अछि , बढ़बैत अछि कंठक सुन्दरता , जा धरि रहता अपुष्पित, ता धरि, देवक'सीस नहिए चढ़ता।

राखल-राखल त' गुण सेहो , रहि जाइत अछि, ठामहि-ठाम, फुलाएल फूल पसारै सुगंध, पूरब-पच्छिम, दक्षिण-वाम।

पकैड़ लैत छै घुन क्षमता मे, लेल ने जाए जँ कोनो काज, बढ़तै गाछ, तखन ने अओतए , फूल-फल, इएह छै रेबाज।

जेना खाद आ पानि पड़ैत छै, नमहर होइत जाइछ पादप, ओहिना, गुणक' विकास हेतु, आवश्यक करब अछि कर्मक' तप।

लोक बिसरि जाइछ ओहि गुण के, पुष्पित नहि भ' बनि सकल फूल, ऋद्धि-पुष्प केँ सभ देखैत अछि , जग के रीतक' इएह अछि, मूल।

गुण के बीआ, रहले सँ की? जँ, बढ़ि क नहि भ' सकल गाछ, मौलाएल-मेधा, कतए प्रशंसित? सुनैत अछि ओ, अगबे कटाछ।

दीआ मे, टेमी, तेल सँ, की?

जा धरि नहि बरत, निकलत इजोत, की, देखाएत हूबा , नाविक के? जा धरि नहि सिंधु मे उतरत पोत।

की होएत, गुण के रहले सँ? जँ बढ़ल ने ओ, ने आएल काज, जनि तो नहि रचलक चारु चित्र, के करत, ओहि चित्रकार पर नाज?

पड़ल-पड़ल मरि जाइत अछि मेधा, भ' जाइत अछि, पूरा भोथ, जे, आलस सँ नहि चलता-फि रता , ओ त' हेबे करता लोथ।

के कहतन्हि वाक्ऋषभ हुनका? मौका पर नहि होइ छन्हि बाजल, के करतै ओहि गुण के बड़ाई? गुण रहितहुँ जे अछि नहि माँजल।

ओहि फूलके, होइत अछि बड़ा ई, जे, फुलाएल, गमकल आ सुंदर, जग गाबि रहल अछि विरुद-गीत, जे गुणी संग, आ ओकर धुरंधर।

परिमार्जन बाद, बनैत अछि कंचन, अहिबाती-सि उँथि क', चूड़ामणि , पूर्ण द्युति सँ, चमकैत तखन छथि , अबैत छथि जखन नभ-मध्य, तरणि ।

ओ मेधा, जे बनि सकैत अछि विश्व-क्षितिज पर ज्ञान-नक्षत्र, जँ, बिन विकसित भ', पड़ल रहल, ओँघड़ा एत रज मे, यत्र-तत्र।

की लाभ भेलै गुण रहलो सँ? जे रहि गेल, अलसाएल, सूतल, प्रभा-स्त्रोत, बिनु बरल, व्यर्थ भेल, क' सकैत प्रकाशित, छल भूतल।

संघर्ष, विकास-यात्रा-पथ पर, सहयोग, कुसुम बनि ,स्वतः उगत, अड़चन, अन्हार बनि आओत त', इच्छा-बल, इजोत-स्तम्भ, बनत।

राखले रहि जाइत अछि गुणक खान,

जँ नहि प्रयुक्त हो अवसर पर, बिनु रेआज, होथि केहनो गायक, भ' जाइत छन्हि भोथ, स्वर हुनकर।

सभ जनैछ, इजोत रखैत अछि , तिमिर भगाबए के सामर्थ्य, दीप्ति-स्त्रोत जँ बारल नहि जाए, तखन, इजोतक'छै कोनो अर्थ?

समचा रहला सँ की हेतै? जँ कएल ने जाए, प्रज्वलित अनल, एहि मे की दोख इजो तक'छै? कि ओ कहतै, अपने किए ने बरल?

कखनो ने गुण के दोख छै, दोषी त' अछि गुणधारक, बैसा, गुण मे लगबै छै घुन, बनबै छै दोषी, बेकारक।

दीप्त-इजोत, तैयार रहैत अछि , लड़ए,सघन अन्हार सँ, कतबो कुहेलिका पसरि जाउ, नहि प्रभा दबत, ओहि भार सँ।

गुण रहितहुँ, जे गुण बढ़ि ने सकल, मानव-मेधा के क्षति अछि , सद्गुण बढ़ला सँ सभक लाभ, आ, गुणक' सेहो सदगति अछि ।

प्रतिभा संगे अन्याय होएत, जँ रहि गेल इजोत, अप्रदीप्त, मेधा-क्षितिज पर चमकए बला , रहि जेतै नक्षत्रक'जगह, रिक्त।

  अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.गजेन्द्र ठाकुर- अजीगर्त अछि दुर्भिक्ष- ५ गजेन्द्र ठाकुर अजीगर्त अछि दुर्भिक्ष ५ आ आब तँ सभटा मिज्झर भेल जा रहल अछि, कोनो घाटनाक विवरण देबा काल लोक कखनो काल पूछि दै छथि- "नै, हम कहाँ रही ऐ घटनामे" आ तखन हम गुमकी लाधि दै छी, की बुझायब हुनका, जे अहूँ छलौं, मुदा ओ घटना तँ स्वप्न मे भेल से कहबै तँ बताहे बुझत। आ स्वप्नमे यएह तँ रहय, कतेक बुझनुक मुदा ओतय एकरा अखुनका गप कहबै तँ मोन नै पड़तै। आ हमरे कतऽ मोन रहैत अछि आब दुनू मिज्झर भऽ गेल अछि। (अनुवर्तते) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.निर्मला कर्ण- अपन सन्तान निर्मला कर्ण, राँची, झारखण्ड

अपन सन्तान

माता-पिताक जान अछि सन्तान परिवारक मान अछि सन्तान अल्हड़ चञ्चल यौवन के गरिमामयी रुप देलक सन्तान यदि स्त्री मातृत्व पाबि पूर्ण भेली पुरुष के पितृत्व बनेलक गरिमामयी जीवन में गम्भीरता स्थिरता आनयवला के नाम अछि सन्तान ओ राम होथि वा लव-कुश कृष्ण होथि वा अभिमन्यु शभ रुप में प्रिय होइत अछि सन्तान ओ काली दुर्गा होथि वा सरस्वती या फेर होथि माँ लक्ष्मी स्वरूपा सब रुप आह्लादकारी अछि ईश्वर सबहक सन्तति के स्वस्थ राखथु सुखी राखथु बनथि परिवारक मान बढ़ाबथि शान सबहक सन्तान अपन सन्तान के अवश्य बनाबू सुशिक्षित सुयोग्य परञ्च पहिले बनाऊ हुनका इन्सान शिक्षाक सँगहि भरु सँस्कार ओ बनता देश समाजक शान माता-पिता होयताह गौरवान्वित पाबि एहेन संस्कारी सुयोग्य सन्तान अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.आशीष अनचिन्हार- २टा गजल आशीष अनचिन्हार

२ टा गजल १

मूँहो केहन केहन भातो केहन केहन

टूटै छै राग भास गीतो केहन केहन

बुझबे करतै कहियो आसो केहन केहन

इच्छा कीनत बेचत हाटो केहन केहन

सदिखन उठबै असगर बोझो केहन केहन

किछु कथा मोन पड़लै मीतो केहन केहन

सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानि लेबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि।

घड़ी दू घड़ी जे बिता गेल भमरा बहुत बात हमरा सिखा गेल भमरा

गमक लीखि देबै मधुर रस परागो जदी गाछ फूलक पटा गेल भमरा

निमाहब कठिन छै हलाहल समाने अपन आन खातिर बिका गेल भमरा

हमर टीस लेलक अपन टीस देलक तकर बाद किम्हर नुका गेल भमरा

रहै दाग पुरना मुदा दर्द नवके हवन कुंड लग सकपका गेल भमरा

सभ पाँतिमे 122-122-122-122 मात्राक्रम अछि (बहरे मुतकारिब मोसम्मन (चारि सालिम वा बहरे मुतकारिब सालिम अठरुक्नी)। यदि=जदि केर उच्चारण रूप जदी लेल गेल अछि। वर्तनी रूपमे “यदि“ सही छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.सुषमा ठाकुर- स्वतंत्रता, मुस्कान सुषमा ठाकुर १

स्वतंत्रता

बहुत गौरवक बात ऐछ सब भारतवासी के लेल जे सब क्यो स्वतंत्रताक पचहत्तरवां अमृत महोत्सव मना रहल छी। अखुनका समय में भारत हरेक क्षेत्र में आगू बढि रहल ऐछ। विश्व में अपन अलग नाम अलग छाप छोड़ने ऐछ। बहुत संघर्ष और त्याग बलिदानक बाद भारत माता के अंग्रेजक चंगुल से मुक्त कराओल गेलैन आओर भारत माता स्वतंत्र भेली ।मुदा एकटा प्रश्न सदिखन मोन मे चलैत रहैये कि स्वतंत्र देश में रहितो बहुतो भारतवासी स्त्री अपन स्वतंत्रता के लेल संघर्ष कऽ रहल‌ छैथ। बहुत दुर्भाग्यपूर्ण ऐछ। जाबेत धरि हिनका सबके अपन जीनगीक जीयै के पूरा अधिकार नहि भेटतैन ताबेत धरि स्वतंत्र देश में रहितो परतंत्र छैथ। प्रयास करू सब क्यो जे इ असमानता दूर हुवे आओर ओहो सब अपना के स्वतंत्र बुझहैथ। जहिया इ असमानता दूर भऽ जाएत तहिया सही रूपमे हरेक भारतवासी स्वतंत्र कहायब। जय हिन्द जय भारत २ मुस्कान नहि जानि कतए हेरायल मुस्कान एमहर ओमहर सगरो ताकल बाट-बटोही सबतैर पुछल हारि-थाकि के विवश भऽ बैसल कतौ नहि भेटल मुस्कान नहि जानि कतए हेराएल मुस्कान सोइच-सोइच के मोन अकुलाएल भूख-प्यास ,नीन्न , सुख शांति पराएल कोन कोण में ऐछ नुकाएल भटकि रहल मुस्कान नहि जानि कतए हेराएल मुस्कान राति ओ सपना में आएल देखि के ओकरा नयन जुड़ाएल हर्षित भऽ नोर डबडबाएल घुरि घर आ मुस्कान नहि जानि कतए हेराएल मुस्कान ब्यर्थ चिंतन के तऽर दबाओल सचेत चेतना के सुताओल ब्यथित भऽ ओ अंतर्मन के घर बनाओल रूसिके ठोर छोड़ि भागि गेल मुस्कान नहि जानि कतए हेराएल मुस्कान। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.महाकान्त प्रसाद- नियोजितक चान महाकान्त प्रसाद, नौआबाखर, मधुबनी-८४७४०२. सम्प्रति : वाट्सन +२उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मधुबनी-८४७२११. नियोजितक चान

चान हे,आबह चान हे, आबह लालटेनक बदला मे दान दैएह किछु ज्योति सूरुज अशोथकित भेल बैसल अछि ।

चान हे, आबह काल्हि शिक्षक दिवस छै मनाएब तोहर इजोत मे तोरे सँऽ पैंच लऽ ज्योति ज्ञान-ज्योति बँटबाक अछि हमरा दाता बनबाक अछि।

चान हे, आबह दूध-भात लेने आबह मुख्यमंत्रीक मुँह मे घुटुक खोआबह हमरा नहि चाही किछुओ हुनकर पेट नमहर भेल अछि।

चान हे, आबह कने सनेस लऽ लिहऽ ओकरा घर मे शिक्षक लेल किछुओ नहि छै शेष शिक्षा मंत्री द्ररिद्र भेल मन सँऽ वाक् सँऽ वाचाल अछि।

चान हे, आबह तोहर स्निग्धता हमरे चटियासभसन छह हम कोना छोड़ि दैबैक ओकरा एहि कंटकपूर्ण बाटपर एकसर हम आत्महत्या नहि करबै।

चान हे, आबह लेने अबिहे एकटा माहुर मंडित धनुष ओ तीर आब कलम नहि चलाएब हम प्रत्यंचा पर तीर कऽ तीरि बेधब एहि सुशासन केँ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (प्रथमोच्छ्वासः) ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (प्रथमोच्छ्वासः) (विदेह मे पूर्व कालमे मैथिली-संस्कृत शिक्षाक कॉलम छल, मुदा बादमे रचनाक अभावमे ओ बन्द करय पड़ल, आब पुनः ओ स्तम्भ शुरू कएल जा रहल अछि। आशा अछि जे ई स्तम्भ ऐ बेर दीर्घ काल धरि चलत। प्रस्तुत अछि दोसर फेजक ई पहिल खेप डॉ दीपिकाक लेखनीसँ- सम्पादक) चम्पूसाहित्ययशो विलासः (प्रथमोच्छ्वासः) डा. दीपिका (स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च) परिचयः लेखनस्य द्विविधा शैली आदिकालादेव सन्दृश्यते। तत्र पद्यं भावनाप्रधानम् अपि च गद्यं विचारप्रधानं भवति प्रायेण। ऋग्वेदभारती पद्यस्य आहार्यप्रसाधनमुररीकृत्य समागच्छति तदनु यजुष्-उपनिषद्-सूत्रग्रन्थ-पतञ्जलि-शबर-शङ्कर-वाचस्पति-श्रीहर्ष-चित्सुखाचार्यग्रन्थेषु तथा च नव्यन्यायाश्रित्य आचार्यगङ्गेश-गदाधर-जगदीश-मथुरानाथाद्याचार्यप्रणीतग्रन्थेषु गद्यप्रयोगो दृश्यते। कालक्रमानुगुणम् एका अभिनवा सन्दृश्यते- इयं विधा भवति चम्पूविधा। आचार्यः दण्डी स्वकीये अनुपमे ग्रन्थे काव्यादर्शे निगदति- गद्यपद्यमयी काचिच्चम्पूरित्यभिधीयते (का.1/31) इत्थं गद्यपद्याश्रितं मिश्रितं काव्यं चम्पू अस्तीति निश्चप्रचम्। कालनिर्धारणम् लक्षणनिर्माणं तदैव भवदि यदि क्वचित् लक्ष्यग्रन्थो भवेत्। आचार्यो दण्डी यदि चम्पूकाव्यस्य लक्षणं प्रस्तौति तर्हि निश्चयेन तत्पूर्वं क्वचित् चम्पूकाव्यस्य अस्तित्वं स्यादेव। आचार्यदण्डिनः कालः षष्ठमशताब्द्यां वर्तते। तर्हि निश्चयेन चम्पूतत्पूर्वमेव अस्तित्वे आसीत्। गुप्तकालीनशिलालेखे तु निर्दिश्यते यत् चतुर्थशताब्द्यां निश्चयेन चम्पूकाव्यमासीदिति। प्रथमं चम्पूकाव्यम् यद्यपि प्रथमशताब्दीतः चम्पूकाव्यस्यास्तित्वं सन्दृश्यते किन्तु दशमशताब्द्यां आचार्यत्रिविक्रमभट्टेन यत् नलचम्पूकाव्यं रचितं तदेव लक्षणपरिघटितं प्रथमं चम्पूकाव्यम्। तदनु पञ्चदशताब्दीं यावत् सामान्यतया रचनायाः गतिः मन्थरा एव किन्तु षोडशशताब्दीतः अष्टादशशताब्दीं यावत् प्राचुर्येण ग्रन्थरचना जाता। आहत्य 245 रचनायाः उल्लेखो प्राप्यते। तेषु काव्य्षु केचन महनीयाः वर्तन्ते यथा हि- 1. आनन्दकन्दचम्पू-मित्रमिश्र 2. उदयसुन्दरीकथा-सोड्ढल 3. कीर्तिकौमुदी-सोमेश्वर 4. गंगावंशानुचरित-वासुदेवरथ 5. जीवन्धरचम्पू-हरिचन्द्र 6. नलचम्पू-त्रिविक्रमभट्ट 7.नीलकण्ठविजयचम्पू-नीलकण्ठदीक्षित 8. पारिजातहरणचम्पू-शेषकृष्ण 9. भागवतचम्पू-अभिनवकालिदास 10.भागवतचम्पू-चिदम्बर 11.भारतचम्पू-अनन्तभट्ट 12.मदालसाचम्पू-त्रिविक्रमभट्ट 13.यशस्तिलकचम्पू-सोमदेव 14.रामायणचम्पू-भोज 15.वरदाम्बिकापरिणयचम्पू- वरदाम्बिका इत्थम् अस्मिन् उच्छ्वासे चम्पूकाव्यस्य सामान्यः परिचयः मया प्रदत्तः। अग्रिमे उच्छ्वासे कश्चन् विशेषो परिचयः दास्यते विद्वज्जनतोषाय आमोदविनोदाय चेति शुभम्। (अनुवर्तते) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह: ३५४ म अंक १५ सितम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७७ अंक ३५४)|| 87 86 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA

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४.संस्कृत खण्ड (पृ. ८३-८७) ४.१.डा. after चम्पूसाहित्ययशो विलासः (प्रथमोच्छवासः) (पृ. ८४- U9) 7 |