ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह: ३५५ म अंक ०१ अक्टूबर २०२२ (वर्ष १५ मास १७८ अंक ३५५) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२२। सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 355 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.सम्पादकीय/ अंक ३५४ पर टिप्पणी (पृ.१-७) १.१.सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर (पृ. २-६) १.२.अंक ३५४ पर टिप्पणी (पृ. ७-७) २.गद्य खण्ड (पृ.८-६६) २.१.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ७) (पृ. ९-१३) २.२.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-३) (पृ. १४-१८) २.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १२म खेप (पृ. १९-२६) २.४.प्रेमशंकर झा "पवन"- लोक आस्थाकें केंद्र नवादा कें माँ हयहट्ट देवी भगवती स्थान (पृ.२७-३०) २.५.रोशन जनकपुरी- कथानक (पृ. ३१-३६) २.६.भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"- दू टा बीहनि कथा (पृ. ३७-३८) २.७.कुमार मनोज कश्यप- २ टा लघुकथा (पृ. ३९-४१) २.८.शंभु कुमार सिंह- थीमक खोज (पृ. ४२-४७) २.९.शिव शंकर- कथा- पाथर (पृ. ४८-५४) २.१०.आशीष अनचिन्हार- पसरल भ्रम खत्म हेतैः गजलक संदर्भमे (पृ. ५५-६६) ३.पद्य खण्ड (पृ.६७-८०) ३.१.राज किशोर मिश्र- कहू, उपराग दिअइ ककरा? (पृ.६८-७१) ३.२.शिव कुमार झा टिल्लू- ३ टा पद्य (पृ. ७२-७४) ३.३.समता कुमारी- मिथिला हम्मर (पृ. ७५-७६) ३.४.डा जियाउर रहमान जाफरी- २ टा आजाद गजल (पृ.७७-८०) ४.संस्कृत खण्ड (पृ. ८१-८५) ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (द्वितीयोच्छवासः) (पृ.८२-८५) 2
१.सम्पादकीय/ अंक ३५४ पर टिप्पणी १.१.सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर १.२.अंक ३५४ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय गजेन्द्र ठाकुर १ साहित्य अकादेमी, दिल्लीक मैथिली लिटरेरी एसोसियेशन पूर्ण रूपसँ गुप्त प्रक्रियाक तहत साहित्य अकादेमी मैथिलीक दूटा एसोसियेशन (साहित्य अकादेमीक शब्दावलीमे तथाकथित मैथिली लिटरेरी एसोसियेशन)केँ अपन लिस्टसँ हटा देलक आ तीन टा गएर लिटरेरी एसोशियेशन आर जोड़ि देलक। सुखायल जाइत मैथिली साहित्यक मूल धाराक 'राम नाम सत'क प्रारम्भक रूपमे एकरा देखल जा रहल अछि। पुरनका लिस्ट:- 1. The Secretary, All India Maithili Sahitya Samiti, Tirbhukti, 1/1B, Sir P.C. Banerjee Road, Allahabad-211 002; 2. The General Secretary, Akhil Bharatiya Maithili Sahitya Parishad, C/o Dr. Ganapati Mishra, Lalbag, Darbhanga-846 004; 3. The Secretary, Chetna Samity, Vidyapati Bhawan, Vidyapati Marg, Patna-800 001; 4. The Secretary, Mithila Sanskritik Parishad, 6 B, Kailash Saha Lane, Kolkata-700 007; 5. The Secretary, Vidyapati Seva Sansthan, Mithila Bhavan Parishar, Darbhanga-846 004; 6. The Secretary, Centre for the Study of Indian Traditions, Tantrabati Geeta Bhavan; Ranti House, Ranti, Madhubani-847 211 ऐ मे सँ क्रम १ आ ६ केर एसोसियेशनक मान्यता रद्द कऽ देल गेल आ नीचाँक क्रमांक ५,६ आ ७ केँ जोड़ि देल गेल। आमद ३-२=१. नोकसान- "सुखायल जाइत मैथिली साहित्यक मूल धाराक 'राम नाम सत'क प्रारम्भ"। (1)The General Secretary, Akhil Bharatiya Maithili Sahitya Parishad, Professors' Colony, Digahi West Opp. of Primary School,Darbhanga-846 004, (Bihar) 2) The Secretary, Chetna Samiti, Vidhya Pati Bhavan, Vidyapati Marg, Patna-800 001 (Bihar) 3) The Secretary, Mithila Sanskritik Parishad, 6B, Kailash Saha Lane, Kolkata-700 007, (West Bengal) 4) The Secretary, Vidhya Pati Sewa Sansthan, Mithila Bhavan Parishar, Darbhanga-846 004, (Bihar) 5) The Secretary, Anand, Samajik Sanskritik Sahityik Manch, Rajkumarganj (Mirzapur Chowk), Darbhanga-846 004, (Bihar) 6) The General Secretary, Mithila Sanskritik Parishad, Roseberi 5032, Sahara Garden City, Adityapur-2 Jamshedpur-831 014, (Jharkhand) 7) The General Secretary, Akhil Bharatiya Mithila Sangh, G-6, Hans Bhavan, Wing 2 I.T.O., Bahadurshah Zafar Marg, New Delhi-110 002, (Delhi) आब कने ऐ संस्था सभकेँ ध्यानसँ देखू, पहिलसँ अन्तिम मैथिली परामर्शदात्री समितिक अध्यक्षसँ जुड़ल ई संस्था सभ किछुओ हुअय लिटरेरी असोसियेशन तँ नहिये टा अछि। बांग्लामे अखनो धरि दुइयेटा लिटेरेरी असोसियेशन छै मुदा एकटा पदपर कब्जा लेल सभ साहित्य अकादेमी मैथिली परामर्शदात्री समितिक पूर्व अध्यक्ष एक एक टा अपन संस्था घोसियबैत गेला। ई सभटा कुकर्म हमर अंग्रेजी पोथी A Parallel History of Maithili Literature मे अभिलेखित कएल जा रहल अछि। २ वर्ण प्रकरण भाष्य-भूमिका दिल्लीमे मैलोरंगक एकटा सेमीनारमे स्व. मोहन भारद्वाज मूल धाराक व्याकरणाचार्यकेँ सम्बोधित कऽ कहने रहथि- 'मैथिलीमे एकटा व्याकरण किए नै अछि? की हम सभ ऐ जोकरक नै छी जे हमरा सभकेँ मैथिलीमे अप्पन एकटा व्याकरण भेटए?' मुदा मूल धारा हिन्दी आ संस्कृतक व्याकरणमे चिप्पी लगा कऽ आ ई संशोधित कऽ जे- हिन्दीमे 'हम' 'बहुवचन' होइए मुदा मैथिलीमे 'एकवचन'- अपन कर्तव्यक इतिश्री मानैत अछि। मुदा समानान्तर धाराक गोविन्दाचार्यजी ऐ तरहक फेंटुआ व्याकरणक विरुद्ध सुच्चा व्याकरणक निर्माण केलन्हि, से पाणिनि जकाँ हिनकर घुमक्कर प्रवृत्तिक कारण सम्भव भेल अछि। जेना संस्कृतमे दक्षिण भारतक 'नीर' आ उत्तर भारतक 'जल' दुनू पानि लेल प्रयुक्त होइए आ सम्भाषण संस्कृतमे जँ अहाँ दक्षिण भारतीयकेँ 'अहम् नीरं पीबामि' सिखेबै आ उत्तर भारतीयकेँ 'अहम् जलं पीबामि' तँ नीक मास्टर कहेबै आकि नै..? गोविन्दाचार्य- पं. बाल गोविन्द 'आर्य' प्रसिद्ध गोविन्द यादवक वर्ण प्रकरण भाष्य-भूमिका (मैथिली व्याकरण) सेहो मास्टर साहेब सभ लेल गुणकारी हेतन्हि। ३ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक उपन्यास पंगुकेँ साहित्य अकादेमी मूल पुरस्कार २०२१ सँ सम्मानित कएल गेल। विदेह ई-पत्रिकामे ९ खण्डमे ई उपन्यास २०१८ मे ई-प्रकाशित भेल आ फेर ई संकलित भेल विदेह-सदेह २१ मे । आब ई पोथी विदेह पेटारमे सेहो उपलब्ध अछि। १.२. अंक ३५४ पर टिप्पणी डॉ कीर्तिनाथ झा प्रिय गजेन्द्र जी, अत्यंत विपरीत परिस्थिति मे वजन घटयबा मे अहाँक सफलता अत्यंत प्रेरक अछि। अहाँक ई अनुभव आओर अधिक व्यक्तिक संग साझा हेबाक चाही। हार्दिक शुभकामनाक संग, सादर हेमन्द दास (एम.बी.ए., एन.एम.आइ.एम.एस., मुम्बई) नीक पत्रिका अछि। आशीष अनचिन्हारक छोट-छोट बहरमे गजल बहुत नीक अछि। २.गद्य खण्ड २.१.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ७) २.२.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-३) २.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १२म खेप २.४.प्रेमशंकर झा "पवन"- लोक आस्थाकें केंद्र नवादा कें माँ हयहट्ट देवी भगवती स्थान २.५.रोशन जनकपुरी- कथानक २.६.भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"- दू टा बीहनि कथा २.७.कुमार मनोज कश्यप- २ टा लघुकथा २.८.शंभु कुमार सिंह- थीमक खोज २.९.शिव शंकर- कथा- पाथर २.१०.आशीष अनचिन्हार- पसरल भ्रम खत्म हेतैः गजलक संदर्भमे २.१.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ७) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। अग्नि शिखा (भाग - ७) मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण/ मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण
चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा अपन राज्य सिंहासन पर आरूढ़ छलाह l हुनकर सभ सभासद सेहो अपन-अपन आसन पर विद्यमान छलl पुरूरवा के मुख पर चिंता के लकीर स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत छल l प्रधानमंत्रीक मुख पर गंभीरता व्याप्त छल l राजा अन्य सभ राजा के पराजित कs चक्रवर्ती सम्राटक पद ग्रहण कs नेने छलाह l कखनो-कखनो केओ दानव-राज प्रतिरोधक प्रयत्न केलक,मुदा प्रत्युत्तर में अश्वमेध यज्ञ होइत छल आ विश्वविजय करैत ओहि दानव-राज के पराजित कएल जाइत छल l अहि बेर राजदूत सूचना देलक जे दानव राज केशि राजा के चुनौती दs रहल अछि l केशि अस्त्र-शस्त्र सँs सुसज्जित भय युद्ध करवाक वास्ते सुराष्ट्रक भूमि पर पदार्पण कs चुकल अछि l ओ युद्धाभ्यास कs रहल अछि अपन सेना के सँग l ई सुनि पुरूरवा के अत्यन्त क्रोध भेलनि ओ तुरते युद्धक करवाक लेल तत्पर भs गेलाह मुदा जखन दानव गण के मायावी शक्ति सँs मन्त्री सभ हुनका परिचित करौलक, तखन ओ चिंतित भs गेलाह l मायावी शक्ति सँs विजित होयबाक लेल अनेकों प्रकारक दिव्यास्त्रक आवश्यकता होयत, जे राजा लग नहि छल l राजा तs अपन बाहुबल आ अपरिमित सैन्य शक्ति के सँग युद्ध कौशल सँs अखनि धरि सभ युद्ध जितने छलाह l चिंताक मुख्य कारण यैह छल l एकरा वास्ते बेर-बेर देव गण पर आश्रित भेनाई राजा के स्वीकार नहि छल l ओ स्वयँ ओहि मायावी शक्ति के मालिक होमय चाहैत छलाह l ओना तs देवगुरु बृहस्पति सँs ओ विभिन्न शस्त्रास्त्र विद्याक पर्याप्त ज्ञान प्राप्त केने छलैथ l मुदा एतवा सs हुनका संतुष्टि नहि छलैन,किएक तs स्वयँ इन्द्र दानव सs पराजित भs गेल रहथि l दानव राज केशि सs देवगण सहित स्वयँ इन्द्र पराजित भs चुकल छलैथ l फल स्वरुप स्वर्गक राज्य ओकर अधीन भs चुकल छल l इन्द्र आब ओकर कठपुतली मात्र रहि गेल छलाह l अहि दानव राज पर विजय प्राप्त केनाई एतेक आसान नहि छल l मन्त्री गण सँs विस्तृत सलाह कs राजा अपन प्रधानमन्त्री पर राज्य-भार सौंप देलनि आ स्वयँ हिमवान् पर्वत केर दिशा में भगवान विष्णु के तपस्या करवा हेतु प्रस्थान केलनि,कारण जे मात्र सर्वशक्तिमान विष्णु सs हुनका ओहि सभ दिव्यास्त्रक प्राप्ति भs सकैत छलनि,जेकर सहायता सs ओ त्रिलोक पर विजय प्राप्त कय सकैत छलाह l मुदा त्रिलोक-विजय हुनक उद्देश्य नहि छल,ओ मात्र भू-मन्डलक निष्कण्टक शासक बनs चाहैत छलाह l
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सभ राज चिन्ह के परित्याग कs पुरूरवा हिमालय पर्वतक श्री-शोभा देखैत आगू बढ़ल जाइत छलाह l मार्ग में ओ हिमालय सँs नि:श्रित अथाह जल सs परिपूर्ण गंभीर वेग सs प्रवाहित होइत अत्यन्त मनोहारिणी ऐरावती नदी के देखलनि l ओहि में अनेकानेक अप्सरा आ गंधर्व जल-क्रीड़ा करैत छल l दूसर कात तपस्वी सबहक आश्रम बनल छल l काश पुष्प आ अनेक विशाल वृक्ष सँs ओ आश्रम सुशोभित छल l मुदा राजा के मोन ओ दृश्य मोहित नहि कs सकल l ओ ओहि स्थान पर नहि ठहरलाह,सुन्दर दृश्यावली देखैत ओ आगू बढ़ि गेलाह l आब धवल-पीत वर्ण सँs युक्त हिमवान पर्वत श्रेणी हुनक नेत्रक परिधि में आबय लागल छल l ओ स्थान अनेक नदीक प्रवाह सँs युक्त छल l नदीक कलकल निनाद सँs गुंजित छल ओ स्थान l श्वेत बादलक मुकुट धारण कएने श्वेत बर्फ सs आच्छादित ओ पर्वत नभ में इन्द्रधनुष सन अनेकों वर्ण के बिछेने छल l पर्वतक घाटी में सूर्य देव नुका-छिपी खेलैत छलाह l कतहु अनेकों विद्याधर क्रीड़ा मग्न छलाह तs कतहु किन्नरक गान होइत छल l कतहु-कतहु गंधर्व आ अप्सराक संगीत-नृत्य होइत छल l ओहि मनोरम दृश्य के देखैत पुरूरवा आगू बढ़ैत रहलाह l अचक्के एक स्थान पर राजा सिंह के फल-फूल खाइत देखलैथ l ओतहि निर्भय मुद्रा में अनेकों गाय-बकरी के चरैत देखलैथ ओ l ओहि ठाम दू-तीन गोट विप्र वटु के भूमि कोरियावैत ओ देखलैथ l राजा के बुझना में आबि गेलनि अहि जगह पर अवस्से कोनो महर्षिकआश्रम होयत l एक विप्र वटु सs पुछना पर हुनका ज्ञात भेलनि एतह महर्षि भृगु केँ आश्रम अछि l राजा ओतहि ठहरवाक निश्चय केलैथ l आश्रम प्रांत में महर्षि भृगु राजा के अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक स्वागत केलनि तत्पश्चात हुनक एतह अयबाक उद्देश्य पुछलथि l राजाक पवित्र उद्देश्य जानि प्रसन्न भs हुनका निकट में अवस्थित एक गुफा के अवलोकन करौलथि l ओ गुफा मालती लता सँs आच्छादित छल l अन्दर माणिक,मूँगा,सुवर्ण,चांदी इत्यादिक भंडार छल l मणि के कांति सँs ओ विवर प्रकाश युक्त छल l लगहि में एक रमणीक पुष्करिणी देखाओल जे निर्मल जल आ कमल दल सँs परिपूर्ण छल l राजा पुरूरवा महर्षि भृगु के आज्ञा सs ओतहि तपस्या करवाक निश्चय केलैथ l ओ अपन आहार क परित्याग कs देलनि l एक टाँग पर ठाढ़ भs भगवान विष्णु के ध्यान लगाओल आ तपश्चर्या में लीन भs गेलाह l बहुत दिन धरि ओ ओहि मुद्रा में तपश्चर्या करैत रहलाह l तपश्चर्या के अंतिम चरण में स्वर्ग सs आयल अप्सरा सबहक द्वारा विघ्न उपस्थित कएल गेल l सामान्य मनुष्य तs ओहि में रमि कs अपन उद्देश्य सs भटकि जैइतथि,मुदा पुरूरवा जे एखनि धरि ब्रह्मचारी छलाह,हुनका पर कनिको असर नहि परलनि l अप्सरा सबहक विभिन्न प्रकार केँ अश्लील चेष्टा देख कs ओ अनदेखी करैत रहलाह l गंधर्व आ अप्सराक मैथुन क्रिया के देखि आँखि बंद कs लैथ,मधुर गीत के आवाज पर कनिको ध्यान नहि दैथ l जखनि हुनका सबहक द्वारा कएल गेल सभ प्रयास विफल भs गेलनि,तखन सभ गंधर्व आ अप्सरा हारि-थाकि कs समीपस्थ भगवान विष्णुक मूर्ति के पूजा अर्चन कय ओतs स वापस स्वर्गलोक प्रस्थान केलथि l राजाक शरीर आब मात्र अस्थि के ढाँचा रहि गेल छल,तखनो हुनका अपन शरीरक सुधि नहि छलैन्ह l हुनक कठिन तपस्या सँs भगवान विष्णु प्रसन्न भs गेलाह,आ अपन चतुर्भुज विग्रह में राजा के समक्ष प्रकट भs गेलाह l "वत्स! अपन आँखि खोलु, हम अहाँ सs अत्यंत प्रसन्न थिकहुँ" - ई आवाज सुनि अनायास हुनक नेत्र कमल फुजि गेल l गद्गद् वाणी में भगवान विष्णु के स्तुति करs लगलाह ओ l भगवान विष्णु कहलखिन्ह - " हम अहाँक मनोरथ बुझि रहल छी,अहाँ के किछू बाजि कs बतबै के आवश्यकता नहि l अहाँक मनोरथ पूर्ण होयत l अहाँ त्रिलोकक ऐश्वर्य प्राप्त करब l सभ दैत्य के जीतs के सामर्थ्य अहाँ में होयत l अहाँ संपूर्ण भूमंडल के अधिपति बनब l अहाँक जीवन में सभ किछु अलग आश्चर्यजनक होयत,जे सामान्य पुरुष में नहि भेल हेतै l अहाँक अर्द्धांगिनी केओ सामान्य रमणी नहि होयत,वरन् अप्सरा में श्रेष्ठ अप्सरा अहाँक वरण स्वेच्छया करत"| भगवान विष्णुक गंभीर वाणी किछु देरी तक गुंजैत रहल l फेर हुनक श्री विग्रह सहित वाणी विलुप्त भय गेल l राजा पहलहुँ सs बेस बलिष्ठ सौंदर्य वान भव्यताक प्रतिमूर्ति भs गेलाह l क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-३) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (तृतीय प्रभाग) डा. बिपिन कुमार झा (संस्थापक आ सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई-शोधपत्रिका) (एहि सँ पूर्व महाकवि भास केर लिखल कर्णभारम् जे कर्णक मनोव्यथा पर लिखल गेल प्राचीनतम एकांकी अछि, संस्कृत में लिखल एहि ग्रन्थ क ओहि स्थल विशेष तक अध्ययन कयल जतय महारथी कर्ण अपन सारथी सँ निवेदन करैत छथि जतय अर्जुन छथि ओतहि हमर रथ कें लय चलू एतावत् धरिक मैथिली रूपान्तर पढने रही अहाँ सब आई ओहि सं आगू) कर्णः -- अहोतुखलु, कर्ण: अरे ! ई कोना, अन्योन्यशस्त्रविनिपातनिकृत्तगात्र- यौधाश्ववारणरथेषु महाहवेषु । क्रुद्धान्तकप्रतिमविक्रमिणो ममापि वैधुर्यमापतति चेतसि युद्धकाले ॥ ६॥ युद्धस्थल में दुनू पक्ष सँ शस्त्र प्रहार भेला पर जेकर द्वारा अनें क योद्धा , घोडा, रथ, और हाथी क शरीरकऽ खण्ड-खण्ड कय देल जाइत अछि। जेकर अतुलनीय पराक्रमक तुलना क्रोधित यमराजक पराक्रम स कयल जा सकैत अछि एहि तरहें हमर मन में आय युद्धकाल आबि गेला पर ई कायरता कियाक आबि रहल अछि? भोः ! कष्टम् । ओह ! अत्यन्त कष्टक गप्प। पूर्वं कुन्त्यां समुत्पन्नो राधेय इति विश्रुतः । युधिष्ठिरादयस्ते मे यवीयांसस्तु पाण्डवाः ॥ ७॥ प्रथमतः कुन्ती सँ उत्पन्न भय हम राधा क बेटा क रूप मं प्रथित भेलहुँ। एहि तरहें युधष्ठिर आदि पांचो पाण्डुपुत्र हमर छोट भाई हेताह । अयं स कालः क्रमलब्धशोभनो गुणप्रकर्षो दिवसोऽयमागतः । निरर्थमस्त्रं च मया हि शिक्षितं पुनश्च मातुर्वचनेन वारितः ॥ ८॥ ई ओ समय अछ जकर प्रतीक्षा हम बहत दन सं कय रहल छलहुँ। गुण केर प्रकर्ष कें देखवय बला ओ समय आजु उपस्थित भय गेल अछि। किन्तु हमर अस्त्र शिक्षा एहि समय व्यर्थ सिद्ध भय रहल अछि। और की कहू हमर माय सेहो मना केने छथि। भो मद्रराज ! श्रूयतां ममास्त्रस्य वृत्तान्तः । हे मद्रराज हमर अस्त्र वृत्तान्त सुनल जाउ। शल्यः -- ममाप्यस्ति कौतूहलमेनं वृत्तान्तं श्रोतुम् । शल्य- कहू हमरो कुतूहलता अछि सुनबाक कर्णः -- पूर्वमेव चाहं जामदग्न्यस्य सकाशं गतवानस्मि । कर्ण- पहिने हम जामदग्न्य के निकट गेल रही शल्यः -- ततस्ततः । शल्य- ओकर बाद। कर्णः -- ततः, कर्ण: ओकर बाद विद्युल्लताकपिलतुङ्गजटाकलापम् उद्यत्प्रभावलयिनं परशुं दधानम् । क्षत्रान्तकं मुनिवरं भृगुवंशकेतुं गत्वा प्रणम्य निकटे निभृतः स्थितोऽस्मि ॥ ९॥ बिजली क लता क समान जिनक जटा छिडियायल छल, उदीयमान सूर्य क आभा स घेरालय मुनिश्रेष्ठ भृगुवंशश्रेष्ठध्वजाक समान क्षत्रिय के नाश केनिहार परशुराम के निकट जा कऽ प्रणाम कय चुपचाप ठाढ भय गेलहुं। शल्यः -- ततस्ततः । शल्य- ओकर बाद कर्णः -- ततस्तेन जामदग्न्येन ममाशीर्वचनं दत्त्वा पृष्टोऽस्मि, को भवान् किमर्थमिहागत इति । कर्ण- ओकर बाद परशुराम हमरा आशीर्वाद दय पुछलथि के छियऽ कियाक अयलह एतय? शल्यः -- ततस्ततः । शल्य- ओकर बाद कर्णः -- भगवन् ! अखिलान्यस्त्राण्युपशिक्षितुमिच्छामीत्युक्तवानस्मि । कर्ण- गुरुवर! समस्त शिक्षाग्रहण करबाक हेतु आयल छी ई कहि चुप भय गेलहुं। शल्यः -- ततस्ततः । शल्य- ओकर बाद कर्णः -- तत उक्तोऽहं भगवता, ब्राह्मणेषूपदेशं करिष्यामि, न क्षत्रियाणामिति । कर्ण- ओ कहलथि हम ब्राह्मणे टा क शिक्षा दैत छी क्षत्रिय के नैं शल्यः -- अस्ति खलु भगवतः क्षत्रियवंश्यैः पूर्ववैरम् । ततस्ततः । शल्य- हां ऋषि के क्षत्रिय संग पहिनें सं शत्रुता छन्हि। कर्णः -- ततो नाहं क्षत्रिय इत्यस्त्रोपदेशं ग्रहीतुमारब्धः । कर्ण- हम नहि ई कहि शिक्षा प्रारम्भ कयल। शल्यः -- ततस्ततः । शल्य- ओकर बाद निरन्तर... ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १२म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १२म खेप १२ "आचार्य! लगैत अछि हमसभ लखनपुरक सीमामे प्रवेश कए रहल छी ।" "से अहाँ केना बूझि रहल छी?" "कहू, इहो कोनो कहबाक गप्प भेलैक? जाहि माटि-पानिमे जन्म लेलहुँ,जतए नेनामे दोस्तसभक संगे खेलेलहुँ,जकर पोखरिमे जूड़शीतल दिन कए माटि-पानि-कादोसँ जुड़ाइत रहलहुँ ताहि गामकेँ कोना नहि चिन्हबैक ? वायुमण्डलमे आमक मज्जरक सुगंध पसरि रहल अछि । निश्चय हमसभ गोपी आमक गाछक लगीचमे ठाढ़ छी।" "अहुँक जबाब नहि अछि । अपन जन्मभूमिक माटि-पानिसँ अहाँक सिनेह प्रशंसनीय अछि ।" जयन्तकेँ मोन पड़ैत छलनि नेनाक समय। कतेक निश्छल होइत अछि नेनाक मोन । केना कतेको दिन शीला हुनका अपना संगे अपन घर लेने जाइत छलनि । कतेको कालधरि ओ सभ गोटरस खेलाइत रहैत छलाह । कैक दिन जखन पाठशालामे भोजनक कोनो ओरिआओन नहि होइक तँ ओ अपन पिताक मारफत सभ किछु पठओने बिना नहि मानैत छलि । कतेको बेर ओकरा मना कएल गेलैक जे ई पाठशालाक नियमक विरुद्ध थिक। मुदा ओकरा लेल धनिसन । समयक संगे हुनका लोकनिक आपसी सिनेह गहींर होइत गेल । आइ कतेको बरखक बाद जखन ओ अपन गामक सीमानपर पहुँचलाह अछि तँ सभसँ पहिने हुनका शीला मोन पड़ि रहल छनि । "आचार्य! जँ अपने अन्यथा नहि ली तँ एकटा गप्प कही।" "अवश्य कहू । मोनक बात हमरा नहि कहब तँ कहबै ककरा । एही लेल तँ हम अहाँक संगे एतए धरि अएलहुँ।" "एहि कलमसँ सटले शीलाक घर छैक । की ओकरासँ भेंट भए सकैत अछि?" "के शीला?" "हमर नेनाक संगी । हमसभ संगे-संग भठ्ठा धेने रही । "हम प्रयास करैत छी । ताबे एहि गाछक छाहरिमे विश्राम कएल जाए ।" गोपी आमक गाछक छाहरिमे जयन्त आ हुनकर संगे आएल शिष्यलोकनि सुस्ताइत छलाह । आचार्य एकटा शिष्यक संगे शीलाक पता लगेबाक हेतु आगू बढ़लाह । शीलाक पिता इलाकाक मानल बैद छलाह । हुनकर घरोक स्थिति सुभ्यस्त छल । बैदजीक एकमात्र संतान शीला छलखिन । मातृहीन संतानक माता-पिता दुनूक काज ओएह कए रहल छलाह। ओ क्रमश: बढ़ैत गेलीह । आब हुनकर बिआह करबाक बएस भए गेल छलनि। बैदजी बहुत मनओलखिन । मुदा शीला नहि मानथि । बैदजीकेँ किछु समाधान नहि भेटलनि तँ ओहो चुप भए गेलाह । कइए की सकैत छलाह? एकमात्र संतानक मोहक आगू लोक-लाज पाछू छुटि गेल । "जकरा जे कहबाक छैक से कहओ,हम अपन संतानक जान तँ नहि लए सकैत छी?"-ओ मोने-मोन सोचथि। हुनका ई बात बूझल रहनि जे शीलाक जयन्तक संग दोस्ती छैक । मुदा से एतेक अंतरंग अछि तकर अंदाज हुनका कोना होइतनि ? "ई बात सभ तँ झाँपले-तोपले रहए सएह नीक।"- से ओ सोचथि । तेँ एकर चर्चो कतहु नहि करथि । हुनका मोनमे होनि जे समयक संगे शीला स्वयं एकरा बिसरि जेतीह आ तखन हुनकर बिआह सुयोग्य बरक संगे कएल जाएत । मुदा से समय कहिओ नहि आएल । शीला गुम्मे रहि गेलीह । आइ एतेक दिनक बाद गामक सीमानपर अबितहि जयन्तकेँ सभसँ पहिने ओकरे ध्यान अएलनि । आचार्यजी हुनकर बात मानि गाममे शीलाक पुछारी करबाक हेतु आगू भेले रहथि कि एकटा वृद्धकेँ देखि पुछैत छथि- "की अपने शीलाकेँ जनैत छिअनि?" "अपने के छी आ शीलासँ अपनेकेँ की प्रयोजन अछि?" "मान्यवर! हम छी जानकीधामक शारदाकुंजक आचार्य । अपन प्रिय शिष्य जयन्तक शिक्षा संपन्न भए गेलाक बाद हुनका संगे हुनका अरिअबैत एहिठाम धरि आबि गेलहुँ ।" "ई तँ बहुत नीक बात भेल । आचार्यक अपन शिष्यक प्रति एहन सिनेह तकनेसँ भेटत ।" "बात से नहि अछि । असलमे हुनका संगे एकटा दुर्घटना भए गेलनि जाहि कारणसँ हमरा हुनका संगे एहि गाम धरि आबए पड़ल।" " हमरा बहुत चिंता भए रहल अछि । सभटा बात फरिछा कए कहू। " आचार्यजी हुनका सभटा बात कहलखिन । इहो कहलखिन जे गामक सीमानमे अबितहि जयन्त सभसँ पहिने शीलाक चर्च केलनि अछि आ ओ हुनकासँ भेंट करबाक हेतु बहुत व्यग्र छथि । से बात सुनि ओ बजैत छथि- "हम छी शीलाक पिता मधुकान्त । हम बैदक काज करैत छी । गामेमे एहि कलमसँ सटले हमर औषधालय अछि ।" "तखन तँ हम बहुत सही जगहपर पहुँचि गेल छी ।" "मुदा शीलासँ भेंट तँ अखन संभव नहि अछि।" "से की?" "ई एकटा दुखद वृतांत अछि । कखनहुँ चैनसँ बतिआएब । पहिने अपने जयन्तकेँ आश्वस्त करू । अपनोसभ बहुत थाकि गेल छी। थोड़ेकाल विश्राम कए लिअ । फेर गप्प-सप्प हेतैक ।" "जयन्त हमर प्रतीक्षा कए रहल हेताह।" "कोनो बात नहि, हमहु ओतहि चलैत छी । सभगोटे संगे आइ हमरे ओहिठाम चलू ।" आचार्य बैद मधुकान्तक संगे गोपी आमक गाछतर सुस्ताइत जयन्त लग पहुँचलाह । "हम छी बैद मधुकान्त।" "ओ! प्रणाम करैत छी । शीलाक समाचार कहू । ओ नीके छथि ने?" बैद मधुकान्त गुम्म पड़ि गेलाह । हुनकर गुम्मीसँ जयन्त बहुत चिंतित बुझाइत छलाह । "अहाँसभ हमरे ओहिठाम चलू । फेर आओर गप्प-सप्प हेतैक।" "जाबे हम शीलाक समाचार नहि सुनि लेब ताबे कतहु नहि जाएब।"-जयन्त बजलाह । आचार्यजीकेँ ई बहुत आश्चर्य होनि जे गाम अएलाक बाद ओ अपन माता-पिता वा कोनो श्रेष्ठ लोकनिक चर्चा नहि कए शीलाक पाछू पड़ि गेल छथि । जखन हुनका नहि रहल गेलनि तँ पुछिए लेलखिन- "हमरा हिसाबे सभसँ पहिने अपन घर चलू । ओतए अपनेक परिवारक लोक प्रतीक्षा कए रहल हेताह ।" "ततेक भाग्यवान हम नहि छी आचार्यवर! हमर माता-पिता बहुत पहिने हमरा छोड़ि गेलाह । सुनैत छी जे मृत्युसँ किछुदिन पूर्व हमर पिता बाजल रहथि - "ई बालक परम यशस्वी ओ प्रकाण्ड विद्वान हेताह ।" से कहि ओ एहि नश्वर शरीरकेँ त्याग कए देलथि। हुनकर आकस्मिक मृत्युसँ हमर माए बहुत दुखी भेलीह । ओ अन्न-जल त्यागि देलीह आ कतबो केओ मनओलक नहि मानलीह । तीनमास धरि बिना अन्न-जलकेँ रहलीह । ई बात इलाकामे पसरि गेल । लोकक करमान लागि गेल । सभ एतबे कहए- "एहि समयमे एहन लोक भेटब मोसकिल ।" कतबो केओ आग्रह केलक ओ टस सँ मस नहि भेलीह आ कार्तिक शुक्ल त्रयोदशीक प्राण त्यागि देलीह। एहि तरहें थोड़बे दिनक भीतर हम अपन माता-पिताक छत्र-छायासँ दूर भए गेल रही । " " ई तँ बड़ अनर्थ भेल ।"-आचार्यजी बजलाह । जयन्तक आँखि नोरसँ भरि गेल । ओ किछु बजबाक स्थितिमे नहि रहथि । "जखन ई हाल छल तँ गाम की करए अएलहुँ? ओतहि भने आश्रमेमे छलहुँ । कालीकान्त से ओतेक आग्रह केलाह। ओतहि रहि अपन अध्ययन-अध्यापनक काजमे लागल रहितहुँ।"-आचार्यजी पुछलखिन । हुनकर बात सुनि कए जयन्तक छाती फाटि गेलनि । ओ ठोह पाड़ि कए कानए लगलाह । आचार्यजी बहुत असमंजसमे पड़ि गेलाह । अफसोच होबए लगलनि जे बेकारे ओहि बातसभक चर्चा केलहुँ । "जयन्त स्वयं विद्वान छथि। अपन नीक-बेजाएक बारेमे सोचि सकैत छथि । मुदा आब की कएल जाए?"- ओ सोचथि । बैद मधुकान्त एतेक कालधरि चुपचाप सभटा देखैत-सुनैत रहथि। हुनका आओर नहि रहल भेलनि । "अहाँ हमरे ओहिठाम चलू । ओतहि अहाँक सेवा होएत।" "हम कतहु नहि जाएब । हमरा सोझे पाठशालापर लए चलू । ओतहि हमरा शांति भेटत ।" "ठीक छैक । हमसभ ओतहि चली।"-आचार्यजी बजलाह । जयन्त पाठशाला लग पहुँचितहि माटिपर दण्डवत भए प्रणाम करए लगलाह । अपन पूर्वजक एहि कृतिक जीर्णोद्धार करबाक हेतु ओ कहिआसँ सोचि रहल छलाह । जानकीधाममे शारदाकुंजमे विद्या ग्रहण करैत दिन-राति ओ एतबे चिंतामे लागल रहैत छलाह । जयन्तक कतेको पुस्त एहीठाम विद्यादान करैत जीवन बितओने रहथि। संयोग एहन भेल जे जयन्तक पिताक देहांतक बाद पाठशालाक गतिविधिमे विराम लागि गेल । जयन्त ओहि समय नेने रहथि । तेँ किछु नहि कए सकलाह । पाठशाला किछु शिष्यसभ यथासाध्य प्रयास केबो केलनि । मुदा ओ चलल नहि। अंततोगत्वा, पाठशाला बंद भए गेल । विद्यार्थी लोकनि यत्र-तत्र चलि गेलाह । आइ सालों बाद ओहिठाम जयन्त अपन आचार्यक संग आएल छथि सेहो केहन स्थितिमे । आँखि साफे मुनल छनि । चारूकात अन्हारे-अन्हार पसरल बुझाइत छनि । मुदा ताहिसँ की? हुनकर अंतर्मनक ज्योति बहुत प्रखर अछि । हुनका एहिठाम आबि बहुत गौरवक बोध भए रहल छलनि। "आचार्यजी क्षमा करब । हम तँ अपनेकेँ बहुत कष्ट दए देलहुँ । अपनेक स्वागत की करब उल्टे अहीं हमर सेवा करएमे लागल छी ।" "एहि हेतु अहाँ चिंता नहि करू । बैदजी कहैत छथि जे अहाँक आँखिक ज्योति वापस भए सकैत अछि। हमरा विचारसँ सभसँ पहिने तकर प्रयास कएल जाए । शेष काज होइत रहत ।" जयन्त किछु नहि बाजि सकलाह । "सही कहि रहल छथि आचार्यजी । हम मास दिनक भीतरे अहाँक नेत्रमे ज्योति आनि कए रहब ।"-बैद मधुकान्त बजलाह । जयन्त चुप रहि मौन स्वीकृति देलखिन । दोसरदिन भोरेसँ बैदजी हुनकर इलाज प्रारंभ केलनि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.प्रेमशंकर झा "पवन"- लोक आस्थाकें केंद्र नवादा कें माँ हयहट्ट देवी भगवती स्थान प्रेमशंकर झा "पवन" लोक आस्थाकें केंद्र नवादा कें माँ हयहट्ट देवी भगवती स्थान मिथिलाँचल कें अनेक पवित्र स्थान मे सँ एक नवादा कें माँ हयहट्ट देवी भगवती स्थान, जे एकटा प्रसिद्ध शक्तिपीठ के रूप मे जानल जाइत अछि । नवादा भगवती स्थान दरभंगा जिलाकें बेनीपुर प्रखंड सँ लगभग पाँच किलोमीटर उतर-पश्चिम मे नवादा गाँव मे अवस्थित अछि। माँ हयहट्ट देवी दुर्गा स्थान 52 सिद्ध पीठ मे शामिल एकटा आस्था कें केंद्र अछि। एहि दुर्गा स्थान सँ जुड़ल अनेक मान्यता अछि जाहिमे सँ एक अछि, शिव प्रिय सती सँ जुडल मान्यता। एहि शक्तिपीठ कें वर्णन देवी भागवत पुराण आ मत्स्य पुराण मे सेहो भेटैत अछि । जाहिमे वर्णन अछि जे सती कें वाम स्कन्ध एतहि खसल छलनि। कहल जाइत अछि जे जखन सती पिताकें व्यवहार सँ क्षुब्ध भए गेलीह आ पिताक द्वारा आहूत यज्ञक हवन कुँड मे अपन आहूति दए देलनि। तखन महादेव सतीक अधजरू शव केँ कान्ह पर लए अर्द्ध-विक्षिप्तावस्था मे दौड़लाह ओहि काल भगवतीक बामा कान नवादाक अहि स्थान पर खसल, जतय आइ दुर्गाजीक भव्य मंदिर अछि। जकर प्रमाण अखनो भेटैत अछि जे सिंहासनक विद्यमान रूप कानक आकारकेँ अछि। एहन मान्यता अछि जे लगभग 600 वर्ष पहिने राजा हयहट्ट कें द्वारा एतय जगदम्बाक मूर्ति स्थापित भेल छलनि। मुदा आब दुर्गा देविक ओ मूर्ति एतय नहि अछि. कारण बहेरी प्रखंडक हावीडीह गामक एकटा साधक प्रति दिन साधना-आराधना लेल एहिठाम अबैत छलाह। बाद मे जखन ओ वृद्ध भए गेलाह आ एतय आयबा मे सेहो असमर्थ होमय लगलाह त' एक दिन स्वप्न देखलखिन जे माँ जगदम्बा स्वंय हुनका कहैत छथिन जे आब तोहर अवस्था एतेक चलि एहिठाम आबयवाला नहि छौक आ दुर्बल कायाक कारण शरीर सेहो एहि लायक नहि छौ ताहि तोरा आब एतय अएबाक जरुरत नहि तों आब घरहिं सँ हमर पूजा आराधना करह मुदा साधक एहि बात कें मानक लेल तैयार नहि भेलखिन जे बिना मैया कें मूर्त रूपकें पूजा अर्चना केने ओ रहताह। कहाबत छै भक्त कें आगू भगवान सेहो झुकि जाइत छथिन. तखन मैया कहलखिन जे आब तोरा अयबाक जरुरत नहि. तों हमरा अपना संग नेने चलह. भक्त भगवतीक प्रेरणा सँ सिंघासन सँ मूर्ति उठाकए हावीडीह लए गेलाह, जतय अखनो ओहि मूर्तिक पूजा कयल जाइत अछि। ओहि ठाम सँ उठायल गेल भगवती कें प्रतिमा आ अन्य सब वस्तु गुप्तकालीन अछि। अहि सिद्धिपीठ मे मात्र सिंघासन शेष रही गेल अछि जिनकर पूजा वर्तमान मे होइत अछि। एहि मंदिर मे जगदम्बाक निराकार रूपक पूजा होइत अछि। तेरहम शताब्दी मे एहि मंदिर कें बहुत प्रसिद्धि छल, जाहिसँ नवादा दुर्गा स्थानक प्राचीनताक आकलन कयल जा सकैत अछि। कोना पहुँचब नवादा भगवती स्थान नवादा भगवती स्थान दरभंगा जिलाकें बेनीपुर प्रखंड सँ मात्र लगभग पाँच किलोमीटर उतर-पश्चिम मे नवादा गाम मे प्राचीन काल सँ अवस्थित छनि। बेनीपुर प्रखंड सँ सीधे सड़क नवादा दुगा स्थान तक गेल अछि एहि ठाम सँ ऑटो पकरु आ पहुँच जाउ नवादा भगवती स्थान। दरभंगा सँ सेहो सीधे कैब बुक कए एहिठाम जा सकैत छी। नवादा भगवती स्थान कें धार्मिक आ ऐतिहासिक महत्व ओना त' एहि दुर्गा मंदिरक प्राँगण मे बारहो मास पूजाक लेल आस्थावान लोकक भीड़ लागल रहैत अछि, मुदा शारदीय नवरात्रा मे एहिठाम भक्त दूर दूर सँ अबैत छथि आ मैया कें पूजा अर्चना करैत छथि। संगहि मैया के दरबार मे जरुरत के हिसाब सँ मनोकामना करैत छथि । एहन मान्यता अछि जे एहिठाम कयल मनोकामना अवश्य पूरा होइत अछि। मनोकामना पूरा भेलाक बाद भक्त पुनः एहिठाम आवि मनौती करैत छथि । जाहि कारण सालो भरि भक्तक आवा जाही लागlले रहैत अछि मुदा नवरात्रा मे विशाल मेला लगैत अछि आ सांस्कतिक कार्यकर्म सेहो होइत अछि। नवरात्रा कें दशो दिनक वातबरण एहिठाम बड़ रमनगर भ' जाइत अछि। नवादा भगवती स्थान कें ऐतिहासिक महत्व कें अंदाज एहि बात सँ लगायल जा सकैत अछि जे राजा हयहट्ट कें द्वारा एहि मन्दिर मे मूर्तिक स्थापना भेल छलनि जाहि कारण मैया कें नाम हयहट्ट देवी परलनि एहि शक्तिपीठ कें वर्णन देवी भागवत पुराण आ मत्स्य पुराण मे सेहो भेटैत अछि जाहि कारण सँ एहि स्थान के ऐतिहासिक महत्व बढ़ि जाइत अछिl लोक आस्थाक केंद्र बनल एहि स्थान कें पर्यटक कें मान्यता भेटबाक लेल सेहो प्रयास भए रहल अछि। मुदा एहिमे कतेक समय लागत तकर कोनो ठीक नहि, कारण राज्य सरकार एहि क्षेत्रक विकास कें लेल ओतेक सक्रीय नहि छथि जतेक हेबाक चाही। -प्रेमशंकर झा "पवन" संगम विहार, दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रोशन जनकपुरी- कथानक रोशन जनकपुरी कथानक
"एकटा कथानक चाही मित्र ! रियलिस्टिक ।" "कथा किया नइँ ? हमरे स किया ? आ रियलिस्टिके किया ?" "माने किछु अलग हइट क' होइ । कथानकमे किछु अपना हिसाबे हेरफेरके गुन्जाइस रहैछै । कथामे ई सुविधा नइँ होइछै । आ सब स बेसी अहाँ सन रियलिस्टिक लेखकसब सस्तमे पइट जाइछै ।" "मुदा कहब त हम अपने बात !" "हेतै ।" "तहन ठीक छै । एकटा प्लौट मनमे तैयार अइ, सुनाउ ?" "हेतै ।" "ठीक छै । मुदा धैर्य राखब, बीचमे टोकटाक नइँ करब ......." .................... ........ अन्हार राइत, डइनियाँके बेटा कदम तर मरल परल छै । नीक लोक 'बढ़म' तर चिबा रहल छै डइनिया बेटाके । .......... भयावह चियारल आँइख, गुँह मूत आ करिखामे लेभरायल, टपटप, टपकैत लाल लाल लेहु स ललाइत धरती, आ ललायल डइनियाँके मइल झोल फाटल नूआँ, आ ओकरा चारुकात मनसायल हाँकल भीड़के ठहक्कैत बर्बर मुहठानसब, आ खिड़की स मुहियारी दैत नीक लोकक तस्वीर छपल अइछ अखबारमे । नीक लोकसब पढ़ैत अइछ अखबार । मुहँ बिचक'बैत अइछ- "एक्कइसमे शताब्दीमे सेहो एना ?" . .................. नीक लोक नवका, चकचक कपड़ा पहिरैत अइछ । जाइत अइछ 'बढ़म' तर । मौर चढ़बैत अइछ । श्रद्धा स नत् होइत अइछ -"रच्छा करु हे बढ़म ! दुष्टात्मा, भूत प्रेत, पिशाच पिशाचिनी, डाइन जोगिन स रच्छा करु हे जगदम्बा ! हे काली ! संहार करु ओहि सब दुष्ट प्रवृत्तिके !" धूप गुग्गुल स धुआँइत आहुतके धुआँ हाथमे भरैत बालबच्चाके माथ हँसोतैथ अइछ नीक लोक । बढ़म थानक गहबर स बहराइत धामी छूबैत अइछ नीक लोकक माथ । सिन्दुरक लाल टीका वा छाउरक कारी टीका लगबैत अइछ सबहक भालपर । पढ़ैत अइछ शुभमस्तु मन्त्र । कामनामे गोहाइर करैत अइछ -"डाकिनी पिशाचिनीके नाश हो !" जयजयकार स गुंजायमान भ'जाइत अइछ बढ़मथानक उत्सव । ........................ घैलमे असंख्य भूँड़ छै । भूँड़सबमे स असंख्य इजोतक कमजोर टिमटिम बहरा रहल अइछ । घैलक उप्परके ढकनामे के धधराक इजोत उप्परे हवामे हेरा रहल अइछ । पिलपिल इजोतमे घेरा बनौने, डइनियाँसन मुँहकान बालीसब, चिन्हाइत नइँ अइछ, बस भीड़सन देखाइत अइछ, नाँइच रहल अइछ । गाइब रहल अइछ -"हे अन्हार राइत झिझिया । नीकलोक नाक सुकरैत अइछ -"अइछ त ई हमरे सँस्कृति, मुदा पुरान अइछ । मजा नइँ आइब रहल अइछ ।" बढ़मथानक धर्मध्वज पर टाँगल माइक स गूँजैत अइछ फ्यूजन संगीत -'चल चल गे डइनियाँ कदम तर, तोरा बेटाके खयबौ बढ़म तर ।' ....................... नीक लोक माइत गेल अइछ । की बोर्ड आ ड्रमसेटक बेसक धकधक छातीके कोँढ़ कोँढ़ छिटका रहल अइछ । मत्त नीक लोकसब, बिजलीजका नाँइच रहल अइछ । बढ़मथानक छत पर स छिड़ियाइत फ्लड लाइटक इजोतक बाइढ़मे बहि रहल अइ नीकलोकक मन, उद्दाम । चारु दिस जयजयकार हुङकार अइछ -'चल चल गे डइनियाँ कदम तर, तोरा बेटाके खयबौ बढ़म तर ।' ............................ राइत मुदा अन्हरिए अइछ । डइनियाँके गाममे त आओर घन अन्हार । शताब्दियो पुरान, जर्जर झिझियाक मरल इजोत, माथपर लदने नाँइच रहल डइनिएसन लोकसबहक जीवनक अन्हार स नइँ जीत सकल अइछ । कतबो ओ गाबओ -'तोहरे भरोसे बढ़म बाबा झिझिया बनौलियो हो ।' सबबेर डइनिएँके बेटा मरैत अइछ । सबबेर डइनिएके मुँह नाक स भभकैत अइछ लेहू । अहूबेर इहे भेल अइछ । सबबेर जका अहूबेर नीक लोके नइँ, ओकर अपनो लोकसब भगाब' चाहैत अइछ ओकरा गाम स -'ई गाम स भाइग किए नइँ जाइछै !' ओकर अपन लोक, जेकरा डर छै जे डइनियाँके बहन्ने ओकरो बेटा नइँ मइर जाय । नीक लोकके कहीँ ओकरोसबमे डइनियाँ नइँ देखा जाय ।...." "मुदा डइनियाँके बेटा किया मरल ? चाहे डइनियाँ, डइनियाँ किए भेल ?" "आखिर धैर्य टुटिए गेल ! एकर जबाब अनेक भ' सकैत अइछ । डइनियाँ महिला अइछ, चाहे डइनियाँ छोट जाइत ....." "छोट जाइत ?" "एह ! एना बजैछी, जेना अहाँ इङ्गलैन्ड स आयल होइ । हँ छोट जाइत ! नीक लोकसब मेहनत करैबला सबके छोट जाइत कहैछै ।" "मेहनत त हमहूँ करैछी ।" "मुदा अहाँ गूँह त नइँ उठबै छी ने महोदय ! अहाँ म'र त नइँ ने उठबै छी महोदय ! अहाँ बिच्छन त नइँ ने उखारै छी, अहाँ जुत्ता त नइँ ने सीबै छी, अहाँके किछु रुपैया वा किछु सेर अन्नक खातिर आनक राइत रङ्गीन करबाब' लेल विवश त नइँ ने कयल जाइय ..... !" "भेल ! भेल ! आगू बढ़ू !" "... त डइनियाँ गरीबो भ' सकैय । डइनियाँ विदेशियाके असगरुआ ब'हु सेहो भ' सकैय , वा डइनिया नीक लोककलेल अटेरी सेहो भ'सकैय ।" "तब ?" "तब की ! अन्हार राइत, डइनियाँके बेटा मरल परल छै । नीक लोक बढ़म तर डइनियाँके बेटाके चिबा रहल छै ।" "ओह ! बन्द करु ई पुरना राग । हमर माथ फाइट जायत ।" "बस ! एतबेमे टेँ बाइज गेलहुँ ? जे युग युग स ई भोइग रहल अइ, ओकर की हाल होइत हेतै ? .....कथानक नइँ चाही ? रियलिस्टिक ?" "ओह ! ओ त चाहबे करी । मुदा कनेक दम्म त धर' दिय ! ओह कते भयानक ! ....आब कहू !" "त, अन्हार राइत ..." "फेर ओहे ?" "हँ, कतौ स बात त आगू बढ़ाबही परतै ने !" "हँ, होउ !" "ठीक छै । मुदा टोकु नइँ बीचमे । ध्यान भटैक जाइछै । ....., डइनियाँके बेटा मरल परल छै । गूँह, मूँत आ करिखा स लेभरायल आ माथ स पैर तक युगीन यातनाके समाधि बनल अइ ओ । ओ मनमे अइ दुनियाँके सराध सहेजने अइ आ ओकर आँइखमे एकटा आक्रोशित प्रश्न प्रक्षेपित अइछ । एकटा युगके प्रश्न ! - नीक लोक किया चिबा गेल ओकर बेटाके ? कहिया अन्त होयत ई नीक लोकक दुनियाँ ? कहिया बनत ई दुनियाँ नीक, सबहकलेल ?" समयके भालपर एकटा तख्ती टाँगल अइ - एकइसम् शताब्दि ! आ ओइ तख्तीमे लटैक रहल अइ डइनियाँ आ ओकर बेटा , पेन्डुलम जका झूलैत । .................................... अखबारक मुँहपर एकदिस डइनियाँक लेहू स लथपथ दृश्य अइछ, त दोसर दिस उत्सवमे मातल जयजयकार करैत नीक लोकक दृश्य छपल अइछ । शिर्षक अइछ -'तोहरे भरोसे बढ़म बाबा । ......' ............................ "ओह ! ओह ! बन्द करु ! ई कथानक !" "हँ, अइ स बेसी कहले की जा सकैय ? अइ स आगू त किछु करबाक जरुरी होइछै ।" "की करबाक जरुरी छै ?" "अइ सड़ल, मातल नीक लोकक दुनियाँक ध्वंस आ सबहकलेल नीक दुनियाँक निर्माण ।" "ओह ! कते भयानक ! एहन कथानक बजारमे चलतै ?" "ई त अहाँ जानी । हमरा त कथानक सुनयबाक छल, से सुना देलहुँ ।" "एना किया बजैछी ? आब अहुँ हमरा अपरिचितसन बुझा रहल छी । एतेक पीड़ा, एतेक आक्रोश अहाँ कथानकमे कोना भरलहुँ ? आश्चर्य अइछ !" "ठीक कहलहुँ ! हमहुँ ओही युगीन यातनाके एकटा हिस्सा छी । हमहुँ एकटा डइनियाँके बेटा छी, जेकर माय अपन बेटाके बचाब'मे अपन जान द' देलक ।" "ओह !" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"- दू टा बीहनि कथा भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"
दू टा बीहनि कथा १ खानापूर्ति
घूड़न कक्आक पोता पठैत छल टोकैत पूछलखिन बौआ रे इ खानापूर्ति कखानापूर्त ककरा बाजल जायत छल? बौआ समझाबैत देखियौ बाबा खानापूर्ति वेह अछि जखन पप्पा खायक लेल बैइसै छथिन आ पहिल परसन केर बाद जखन दाइल तरकारी आ रोटी भात मां से मंगैय छथिन तकरे बाजल जायत छल खानापूर्ति। कक्आ अप्पन जेबि टटोलैत दू टाका निकाललखिन आ दैत बाजलखिन जाऊ ललटूनमा दोकान सं दू टा चौकलेट लऽ लेब आ एकटा अहौं खायब आ एकटा हमरो देब। बौआ चिंहूक पाड़ैत हमर जबाब नीक छल। २ देह बान्हल हाथ बाहर
एकटा पुरुष केर बाबूजी गुजैर गेलाह। उ कनैत रहथिन हो बाबू हो बाबू तोरा बिना कोना रहबै। क्रिया कर्म केर समान एकत्रित कयल गेल। चचार बनल आ लास के सुतायल गेल। पंडी जी पुछलाह अहाॅंक बाबूजी केर कोनो एहन इच्छा जे नहिं पूर भेल हैत सेह बाजू। उ आदमी बाजल हेह हमर बाबूजी सिकंदर महान केर बड़का भक्त रहथिन आ कहियो काल बजैत रहथिन जे हम मरब तऽ हमर विदाई सिकंदर महान जकां करब हमर हाथ बाहर कऽ देब। पंडी जी तऽ बेस की देह बान्हल रहअ दियौ आ हाथ बाहर कऽ दियौ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.कुमार मनोज कश्यप- २ टा लघुकथा कुमार मनोज कश्यप २ टा लघुकथा १ ऐल पानि, गेल पानि आई पे कमीशन के एरियर बँटेलै। लोक निराश त' छलैहे जे आशानुरूप पे कमीशन अपन रिपोर्ट नहिं देलकै आ सरकारो आश पर पानिये ढ़ारलकै; मुदा अपन कोन वश! जैह हाथ सैह साथ! एकमुश्त तीस हजार पाबि क' ओ रोमांचित भ' रहल छल। जेब के फेर तजबीज क' क' देखलक..... ऊँच बुझा रहल छै ऊपर स' । बस मे पॉकेटमारी ओहिना बेसी! विचारलक घर जेबा काल पैघ लिफाफ मे राखि क' दू-तीन भत्ता मोड़ि क' कसिया क' हाथ मे पकड़ने रहत। आई ओ रोमांचित छल! लगै जे कखन समय होई आ ओ घर पहुँचि क' कनियाँ के लिफाफ़ थम्हाबै। दरमाहा के त' सभ पाई उधारी चुकता करै मे गरम लोहिया मे पड़ल पानिक बून्न जकाँ क्षण मे निपत्ता भ' जाईत छै..... फेर उधारीक दुष्चक्र एहिना मास-दर-मास, साल-दर-साल चलैत रहैत छै। आई ई अतिरिक्त पाई पाबि ओ कतेक खुश हेतै! अपन कोनो सख-मनोरथ त' बेचारी सोचबे ने करैत छै कहियो! ओ बस स्टैंड स' झटकारने घर पहुँचल। केबाड़ खोलिते कनियाँ के लिफाफ थम्हा देलकै एकटा गहींर पैघ मुस्कान संग। - 'कि छियै?' - 'खोलि क' देखियौ तखन ने बुझबै! ' - 'कि देखियौ अखने मकान मालिक कहि क' गेलै जे एक साल के किराया अगाऊ देबै लै, नहिं त' मकान खाली क' देबै लै ....... बाप के हार्ट के आपरेशन करेतै। एम्हर बौआ के ट्यूशन से पढ़ेनाई जरूरी छै....... रिजल्ट ख़राब भ' रहल छै। बाबू गाम सँ कैक बेर कहलखिन जे सीरक रित्ती-रित्ती भ' क' फाटि गेलैन ...... जाड़े सिरसिराई छथिन। घरो मे ककरो देह पर सुरेबगर गरम कपड़ा.........!!' कनियाँ बजैत रहलै मुदा ओ बहीर .. जड़वत ..पाथर बनल ठाढ़! ख़ुशी एतेक क्षणिक होई छै ओ सोचनेहों ने रहै। लिफाफ टेबुल पर ओहिना पड़ल छलै। २ गृह-प्रबंधक पार्टी रिसेप्शन के छलै आ एहि बहाने एक-दोसरा के परिवार स' परिचय-पात सेहो भ' रहल छलै। पंतजी अपन कनियाँ के दोस्त-महीम स' परिचय शुरूआत करैत कहलखिन - 'हिनका स' मिलु, मिसेज कावेरी ! हमर धर्मपत्नी! स्टेट बैंक मे सीनियर मैनेजर छथि।' गर्वोन्नत मिसेज कावेरी सभ दिस तकलनि। शर्माजी सेहो कोना पाछाँ रहितथि; हुनको कनियाँ त' उप-निदेशक के पद पर छलखिन! मिसेज शुक्ला जे सीमा सुरक्षा बल मे डेपुटी कमांडेंट छलीह स्वयं अपन परिचय देलनि। सभक कनियाँ के बढ़ि-चढ़ि क' परिचय दैत देखि मिसेज सिन्हा हीनभावना स' जमीन मे धँस' लगलीह। सभ एक-स-एक उच्च पदस्थ कामकाजी महिला छै; ताहि मे हिनकर अपन परिचय मे कहब जे हम किछु नहिं करैत छी, तुच्छता बुझेलनि। लाजे धाड़ खसि पड़लनि। श्रीवास्तवजी पुछलखिन - 'सिन्हाजी आब आहाँ ने अपन कनियाँ स' सबके परिचय करबियौन?' 'हँ.... हँ.... अवश्य। सुगंधा हमर धर्मपत्नी नहिं; अर्धांगिनी छथि! .. आधा कि सरिपहुँ हमर सम्पूर्ण शरीरक स्वामिनी! हिनक हमर जीवन मे योगदानक जते प्रशंसा कैल जाय; कम्मे हैत! ई हिनके कुशल गृह-प्रबंधन के कमाल छनि जे हमरा सभ आनंदमय जीवन-यापन क' रहल छी आ दुहू बच्चा प्रशानिक अधिकारी अछि ।' सुगंधा के छाती गर्व स' फूल' लगलनि। अन्य महिला सभ कोनो ने कोनो बहाने ओत' स' सहटबाक बाट ताक' लगलीह। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.शंभु कुमार सिंह- थीमक खोज शंभु कुमार सिंह थीमक खोज तार्किक रूपेँ जँ देखल जाए तँ मैथिली साहित्यक ज्ञानक्षेत्रमे हम 'गोबर गणेश' छी। शून्य छी। ओ शून्य जे प्रायः कोनो संख्याक बाम भागमे रहैत अस्तित्वहीन रहैत अछि। मुदा मैथिली साहित्यक ख्याति-लब्ध साहित्यकार, विदेह ई-पत्रिकाक प्रमुख संपादक महोदय आदरणीय श्री गजेन्द्र बाबू से मानबाक लेल तैयार नहि छथि। हुनका भ्रम छनि जे जँ एहि शून्यकेँ घीच कए कोनो संख्याक दहिना भागमे बैसा देल जाए तँ ओहि संख्याक मान 10 गुणा बढ़ि जेतैक (एतए कोनो संख्याकेँ मैथिली भाषा मानल जाए)। मुदा हम की छी से हमरासँ नीक के जानि सकैत अछि? 'गोबर गणेश' हेबाक स्पष्ट प्रमाण हमरा तखन भेटि जाइत अछि जखन हम अपनहि किछु छिटफुट कविता, कथा, निबंध आदि मूल्यांकन करैत छी। एकटा दीर्घ अंतरालक पश्चात् आइ ओ पुनः मेल पठौने छथि: "रचना सादर आमंत्रित अछि। गजेन्द्र, व्हाट्सैप..."। एक मोन भेल, मेलकेँ इग्नोर क' दियैक। फेर मोनमे आएल जे जखन हमरो सन रचनाकारक रचनाकेँ फोकटमे किओ छापि दैत छथि तँ हर्जे की। मुदा प्रश्न छल जे हम हुनकी की पठबिअनि? अनुसंधानात्मक लेख तँ हमरा बसक बात नहि थिक, तखन? बहुत देर धरि गुनधुनमे लागल रहलहुँ। निर्णय केलहुँ जे कोनो नव कथा लिखि कए पठा दैत छियनि। मुदा लाख प्रयासक बावजूद हमरा कोनो एहन 'थीम' (विषय) बुझ'मे नहि आएल जेकरा पर हम अपन कलम चला सकी। तखनहि मोनमे एकटा युक्ति सुझल! आइ कार्यालयसँ घर जएबाक क्रममे एक-एक वस्तु, दृश्य, घटना आदिक गहन अवलोकन करैत जाएब, कतहुँ-ने-कतहुँ सँ कोनो 'थीम' तँ भेटिए जाएत। सीआईआईएल केर मुख्य द्वार हाइवे सँ एकदम सटल छैक। सड़कक आकृति चौबटिया जकाँ छैक। पैदल पार पथक कोनो निर्देश नहि हेबाक कारण गाड़ी-घोड़ाक आवाजाहीक बीच लोककेँ आर-पार करब एतए कठिन चुनौती सन छैक। हम सड़कक कातमे ठाढ़ भए सड़क खाली हेबाक प्रतीक्षा करए लागलहुँ। चूँssssss, भड़ाक! आह! ओह! एकटा स्कूटी सवार कामिनी सोझाक गाड़ीमे धक्का मारि देने रहैक। दुर्योग जे ओहि कामिनीक पाछू बैसल लगभग 20-22 वर्षीय ओहि युवकक पयरक हड्डी टूटि गेल छलैक, जखन की ओ कामिनी आंशिक रूपसँ चोटिल भेल छलीह, एहन बुझाइत छल। हुनका उठएबाक आ सहारा देबाक लेल कैकटा हाथ एकहि संग उठि गेल रहैक जखन की गंभीर रूपसँ घायल ओहि युवकक दिस कम्मे लोकक ध्यान रहैक। बीच सड़क पर भीड़ जमा भ' गेलैक। ई त' कहू जे हुनका सभक भाग्य नीक छलनि जे एतएसँ महज 100 गजक दूरी पर बीएम अस्पताल रहैक, जतए हुनका दुनू गोटे केँ प्राथमिक उपचारक हेतु पठा देल गेलनि। सड़क पार कएलाक बाद लिंगराजक चाहक दोकान छनि। चाह पीबाक लाथे हमहुँ ओतए बैसि गेलहुँ। एकटा सुन्दर, सौम्य महाशय दनादन सिगरेटक कश लगा रहल छलाह। हुनक खोंखी एहि बातक स्पष्ट संकेत दए रहल छल जे सिगरेट अपन रंग देखाएब आरंभ कए देने छल। जखन कोनो तेहल्ला द्वारा हुनक अभिवादन कएल गेलनि तँ पता लागल जे 'महाशय' बीएम अस्पतालमे डॉक्टर छथि। संतोष भेल, चलू सिगरेट हिनक की बिगाड़ि लेत? ई तँ स्वयं डॉक्टर छथि। एकटा गरीब-सन लोक पानिक खाली बोतलमे अपन बीमार पत्नीक लेल चाह लए रहल छलाह जे बगलक बीएम अस्पतालमे भर्ती छलीह। हुनका संग कुपोषणक शिकार एकटा 5-6 वर्षीय कनकिरबी रहनि। मैल वस्त्र, ओझराएल केश, आँखिमे काँची, धनुषाकार टाँग आ कदीमा-सन पेट। कोनो बिस्कुटक पैकैट दिस इशारा क' रहल छलीह। "कतेक दाम छैक एकर?" बाप दोकानदारसँ पुछलकैक। "दस रूपैया।" .................. बेचाराक चेहरा उतरि गेलैक। केकक दिस इशारा करैत ओ फेर पूछलक-एकर? "दू रूपैया।" 'एकटा द' दिऔक।" बाप अपन कनकिरबीकें ओ केक द' कए ओकरा बहलएबाक असफल प्रयास कए रहल छलाह मुदा ओ नहि मानलक। ओ कनकिरबी केक घुमाकए दूर फेकि देलक। बाप केक उठाकए ओकरा झारि-पोछि अपना जेबीमे राखि लेलक। कनकिरबीक अविरल रूदन जारी रहैक। बापक ध्यान आब ओमहर नहि छलैक। ओ अकारणेँ हमरा दिस देखैत बाजए लागलाह: "की कही भाय! ई अस्पताल वला डकैत छैक, डकैत! रातिक बारह बजे सरकारी अस्पतालमे कोनो डॉक्टर नहि रहैक एहिलेल हम एहि डकैतक फेरमे पड़ि गेलहुँ। एखन धरि 2,500 रू. खर्चा करा देलक अछि आ पता नहि...।" "भगवान गरीब लोककेँ बीमारी दैते किएक छथिन?" ई बात ओकरा हलकसँ नहि निकलि सकलैक। हम ओतएसँ आगू बढ़लहुँ। आब हम दोसर मुख्य सड़क पर छलहुँ। एतए सड़कक बाम भागमे एकटा डॉक्टरक प्राइवेट क्लिनिक छलनि। ओ प्रायः अपन केहुनी टेबुल पर टिकौने अपन गाल थाम्हने बैसल रहैत छथि। सड़कसँ आवाजाही करए वला शायते कोनो लोक हेतैक जेकरा ओ गिद्ध-दृष्टिएँ नहि देखैत होथि। हुनका लोकबागकेँ स्वस्थ देख ईर्ष्या होइत छलनि (संभवतः)। ओ (संभवतः) मोनहि- मोन सोचैत रहैत छलाह, "ई लोक सभ स्वस्थ किएक छैक? बीमार भए हमरा लग ईलाजक हेतु किएक नहि अबैत अछि?" हम आगू बढ़ैत छी। किछु दूर चललाक पश्चात्, सड़कक दहिना कात एकटा बुढ़िया फुटपाथ पर साग बेचि रहल छलीह। हुनका छिट्टामे कुल मिलाकए तीन तरहक साग, 15-20 नेबो आ किछुएक किलोक लगपास हरियर मिरचाई छलनि। ओतए एकटा गाड़ी रूकल। ओहि गाड़ीसँ निकलए वला युगलक ठाठ देखबा योग्य रहैत। पुछला पर बुढ़िया कहलकैक, "साग 5 रू. मुट्ठा"। दाम सुनि ओहि युगलकेँ लागलैक जेना ओ बुढ़िया 5 रू. मुट्ठा साग बेचिकए कोनो क्राइम क' रहल छलैक। आब शुरू भेलैक मोल-मोलाय आ अंततः सागक दर तय भेलैक 4 रू. मुट्ठा। युगल एक मुट्ठा साग लेलक 4 रू.केर छुट्टा पाइ ओकरा थमबैत, चलैत बनल। हम ई सभ घटनाक्रम देख चुकल छलहुँ, एहिलेल दर जानब आब हमरा लेल आवश्यक नहि रहि गेल छल। हमहुँ दू मुट्ठा साग लेलहुँ आ दू-टकियाक चारिटा सिक्का ओकरा थमा देलिऐक। एहिपर बुढियाक धैर्य टूटि गेलैक। ओ बाजलि-बाबू टू टका आर दिऔक। हम कहलिऐक, "एखने तँ अहाँ ओकरा सभकेँ दू टके मुट्ठा साग देने छियैक।" ओ बाजलि-"बाबू, 300 टकाक माल आनने छलियैक, कच्चा सौदा छैक, आइ बुझाइत नै छैक जे पूँजिओ ऊपर भ' सकतै।" हम कहलियैक, "अच्छा अहाँ एहन करू, हमरा पाँच मुट्ठा साग आर द' दिअ।" ई कहि हम ओकरासँ पूर्वमे देल गेल पाइ घुरा कए 35 टका द' आगू बढ़लहुँ। ओतएसँ बढ़लाक बाद हम मोनहि-मोन अपन तुलना ओहि कार वलासँ धनिक लोकसँ कए रहल छलहुँ। हमरा नजरिमे ओ तुच्छ लागि रहल छलाह। जखन कि हम स्वयंकेँ बहुत बड़का दयावान बुझि रहल छलहुँ। "आखिर सागक पाँचटा अतिरिक्त मुट्ठा कीनि ओहि बुढ़िया पर उपकार जे केने छलहुँ।" आब हम धीरे-धीरे अपन घरक (किरायाक) सीढ़ी चढ़ि रहल छलहुँ। कपड़ा बदलि हाथ पयर छोलहुँ, किछु कालक बाद टी.वी ऑन केलहुँ तँ "कौन बनेगा करोड़पति अर्थात् केबीसी" प्रसारित भ' रहल छलैक। हॉट-सीट पर बैसल छलीह महाराष्ट्रक कोनो छोट-सन गामसँ आएल एकटा 30-35 वर्षीय विधवा। कार्यक्रमक संचालक श्री अमिताभ बच्चनसँ गपशपक क्रममे ओ बतौलनि जे, "हुनक पति एक साधारण किसान छलाह, ओ कपासक खेती हेतु बैंकसँ 2 लाख टका ऋण लेने छलाह। ऋण-वसूली हेतु बैंकक ततेक दवाब बढलैक जे ओ दूई वर्ष पूर्व आत्महत्या क' लेलथि। आब हम स्वयं खेतमे काज करैत छी। जँ केबीसी सँ किछु रकम जीत सकलहुँ तँ क्रमशः सात आ तीन वर्षीय बचियाक लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा आदि पर खर्च करब।" घड़ी देखलहुँ तँ पता चलल जे रातिक 10 बजैत रहैक। कनेक कालक बाद आँखि मुनि चिंतनक मुद्रामे सोचए लागलहुँ जे उक्त घटनाक्रम सभमे सँ कोनो "थीम" उठाओल जा सकैत अछि की? सत्य कही तँ एहि सभ घटनाक्रम मे सँ ई सभ "थीम" तँ भ'ए सकैत छल-विपरीत सेक्सक प्रति सहजाकर्षण, व्यसन विवेककेँ नष्ट कए दैत छैक, गरीबक दुर्भाग्य : बीमारी, बिना विज्ञापन वला डॉक्टर, दयावान, किसानक दुर्दशा आदि। ...लाख प्रयास केलहुँ जे एहिमे सँ कोनो एक थीमकेँ आधार बनाकए किछु लिख ली, मुदा कलम नहि चलि सकल। आब बुझ'मे आबि रहल अछि जे कोनो आन रचनाकारक कविता कथा पर (खराब, आलोचनात्मक नहि) टिप्पणी कए देब कतेक आसान छैक, मुदा अपना बेरमे...। हम निष्कर्ष पर पहुँच गेल रही जे, "किछु लिखबाक लेल मात्र 'थीम' नहि अपितु भाषा आ अभिव्यक्ति-कौशल सेहो चाही, जेकर हमरामे सर्वथा अभाव अछि।" आब जँ गजेन्द्र बाबू फेर कहिओ तगेदा करताह तँ ईमानदारीसँ क्षमा प्रार्थना क' लेबनि। आर सक्के की? -डॉ. शंभु कुमार सिंह, वरीय रिसोर्स पर्सन, राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, भारतीय भाषा संस्थान, मैसुरू संपर्क सूत्र- 9986890429 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.शिव शंकर- कथा- पाथर शिव शंकर कथा- पाथर -शिव शंकर, म.नं.१७१९, सेक्टर-२, पानी टंकी के निकट, फरीदाबाद, बल्लभगढ़, हरियाणा। ई-पत्र- shivshankar0040@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.आशीष अनचिन्हार- पसरल भ्रम खत्म हेतैः गजलक संदर्भमे आशीष अनचिन्हार पसरल भ्रम खत्म हेतैः गजलक संदर्भमे 1 अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) 2022 मे फेर अपन सुपरहिट क्विज शो 'कौन बनेगा करोड़पति (Kaun Banega Crorepati)' सँ टीवीपर एलाह। एहि "कौन बनेगा करोड़पति" केर प्रोमोमे एकटा कंटेस्टेंट अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan KBC)क सामने हॉट सीटपर बैसल छथि आ बिग बी कंटेस्टेंटसँ सवाल कऽ रहल छथिन। बिग बी कंटेस्टेंटसँ पूछै छथिन- 'एहिमेमेसँ कोन वस्तुमे जीपीएस केर टेक्नोलॉजी लागल छै?' एहि संगे बच्चन जी कंटेस्टेंटकेँ चारिटा ऑप्शन दै छथिन। अमिताभ बच्चन एहि सवालक जवाब के लिए ऑप्शन दैत छथिन- 'A) टाइपराइटर, B) टेलीविजन, C) सैटेलाइट, D) 2 हजारक नोट.' सामने बैसल कंटस्टेंट एहि प्रश्नक जवाबमे D ऑप्शन यानी 2 हजारक नोटकेँ चुनैत छथि। एहिपर बिग बी कहलखिन जे ई जवाब गलत अछि मुदा कंटेस्टेंटकेँ एहिपर विश्वास नै होइत छै। ओ कहै छै 'अहाँ हमरा संग मजाक (प्रैंक) कऽ रहल छी ने" एहिपर बिग बी कहैत छथिन जे अहाँक उत्तर सचमे गलत अछि। कंटेस्टेंट फेर कहै छनि जे हम न्यूजमे तँ इएह देखने रहियै तँ एहिमे हमर कोन गलती? गलती तँ पत्रकार सभहक छै। अमिताभ बच्चन एहिपर कहैत छथिन-गलती पत्रकारक हेतै मुदा नोकसान तँ अहाँक भेल ने, ओ आगू कहैत छथिन जे फेक खबरिसँ सदिखन बचबाक चाही। ओ कहलखिन- 'ज्ञान जहाँसँ भेटए बटोरि ली मुदा ओहिसँ पहिने ओकरा चेक कऽ ली जे ई सही छै वा कि नै"। प्रोमो शेयर करैत सोनी टी.भी द्वारा ई लिखल गेल कैप्शन छल- 'हम सभ एकटा एहन लोककेँ जानै छी जे हमरा अनवैरिफाइड सनसनी खबरि सुनाबैए। ओहन लोककेँ कमेंटमे टैग करू आ हुनकासँ कहू जे-'ज्ञान जहाँसँ भेटए बटोरि ली मुदा ओहिसँ पहिने ओकरा चेक कऽ ली जे ई सही छै वा कि नै"। ई पूरा भीडियो एहि लिंकपर देखि सकैत छी- https://www.youtube.com/watch?v=r5JS2fZU70U 2 उपरमे हम टीवी बला प्रसंग एहि लेल लेलहुँ जे बर्ख 2021 मे प्रकाशित तारानंद झा 'तरुण' जीक कथित गजल संग्रह "घर-घर इजोत रहय" केर भूमिका पढ़बाक लेल भेटल। भेटल तँ पूरा पोथी मुदा हम भूमिके धरि रहब। एहि संग्रहमे कुल दूटा भूमिका छै पहिल गंगेश गुंजन जीक लिखल आ तकर बाद दोसर अपने लेखक द्वारा। तरूणजी अपन भूमिकामे लिखै छथि (पृष्ठ-11)- "ओना गजलक किछु व्याकरण सेहो होइत छैक। जेना किछु विद्वान साहित्य प्रेमीक अभिमत छनि। ताहि सँ हम पूर्णतः अनभिज्ञ रहल छी। विगत कतेको दशक सँ पत्र-पत्रिका मे छिड़ियैल गजल सभ पढ़बाक सुयोग भेटल अछि, वैह हमर लिखल गजलक आधार रहल अछि। तैं जँ गजलक व्याकरणक अनुरूप ई गजल सभ अनफिट हो तँ ताहि लेल क्षमा चाहब" तरुणजीक लिखलसँ ई स्पष्ट अछि जे ओ पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित गजल पढ़ि एहन लिखलनि। आ तँइ अमिताभ बच्चनकेँ कहए पड़ैत छनि- ज्ञान जहाँसँ भेटए बटोरि ली मुदा ओहिसँ पहिने ओकरा चेक कऽ ली जे ई सही छै वा कि नै"। आ ताहिमे तरुणजी फेल भऽ गेल छथि आ एहि उम्रमे जा कऽ सभ मेहनति नोकसान भऽ गेलनि। । ओना हम तँ कहब जे तरुणजी सहीसँ कोनो पत्रिका नै पढ़ने हेता कारण जँ पढ़ने रहितथि तँ हुनका जीवन झा, कविवर सीताराम झा, मधुपजी आदिक गजल भेटल रहितनि आ हुनका गजलक व्याकरणसँ परिचय सेहो भेल रहितनि। आश्चर्य जे तरुणजी "भारती मंडन" सन पत्रिकासँ जुड़ल छथि आ ओ अध्य्यन करबामे पछुआएल रहै छथि। गंगेश गुंजनजी अपन भूमिकामे गाएले गीत गेने छथि ओहिमे कोनो नव बात नै छै। बस हमरा हुनकासँ एकटा बात पुछबाक अछि जे जीवन झा, कविवर सीताराम झा, मधुपजी आदि सभ गजलक व्याकरणपर गजल लिखने छथि तइ हिसाबे ओहो सभ आधुनिक गजल पंडित कहेता कि नै कहेता (देखू पृष्ठ-8)। कुल मिला कऽ "घर-घर इजोत रहय" नामक पोथीमे जे रचना सभ अछि से गजल नै अछि, कारण ओहिमे बहर-काफिया आदि जे गजलक अनिवार्य तत्व छै तकर पालन नहि भेल छै। ओ रचना सभ कविता, गीत आ कि आन किछु भऽ सकैए मुदा गजल नै अछि। जिनका ई बुझाइत होइन जे एहिमे बहर छै ओ बहरक निर्धारण मात्रा सहित कऽ देथि।। 3 मनोज शाण्डिल्य केर कथित गजल संग्रह "बाजब बदलि रहल छै" केर भूमिकाक अंश देखल जाए-- "हमरा लेल गजलमे मुख्यतः दूटा तत्व आवश्यक अछि, जकर हम यथासंभव अनुपालन करैत छी। प्रथम अछि, गजलक पारम्परिक शिल्पक आधारपर, मतला, बहर, रदीफ आ काफियाक अनुपालन। एतय दूटा बिन्दुपर हम छूट लैत छी- पहिल ई जे, हम मकतामे तखल्लुसक प्रयोग नहिए जकाँ करैत छी आ दोसर ई जे हम बहरक अनुपालन अंकगणितीय पद्धतिक बजाए स्वरक आधारपर करैत छी। से एहि कारणे जे हम मानैत छी जे तखल्लुसक प्रयोग कयने गजलमे कोनो गुणात्मक वृद्धि नहि होइत छै आ जहाँ धरि बहरक सवाल छैक तँ मात्रा-गणनाक उद्देश्य इहो होइत छैक जे उच्चारणमे संतुलन बनल रहै, जकर अनुपालन हम स्वरक आधारपर करिते छी। दोसर आवश्यक तत्व जे हमरा लेल अछि से अछि कथ्य। एहि मामिलामे हम हिन्दीक कालजयी गजलकार दुष्यंत कुमारक 'स्कूल'क अनुगामी छी", (पृष्ठ-9) एहि अंशमे सभ भ्रमे-भ्रम अछि मुदा दू टा नमहर भ्रमपर हम बात करब। पहिल भूमिकामे जे बहरक अनुपालन स्वरक आधारपर करबाक बात भेल छै से आखिर की छै? कोन छंद, कोन बहर, कोन एहन मीटर छै जे कि स्वरक निश्चित आधारपर नै छै। सभ छै जे मात्रिक छंदमे दोहेकेँ लिअ तँ 13-11 केर अलावे ओहिमे आरो नियमक पालन करए पड़ैत छै। तँइ जे कियो ई कहथि जे हम स्वरक आधारपर गजल लिखैत छी तँ सीधे बूझि लिअ जे ओ सुविधावादी छथि आ अपना हिसाबें बाजि रहल छथि कारण जखन कोनो निश्चित स्वरपर रचना हेतै तँ ओ छंदोबद्ध हेतै जेना अनुष्टुप, दोहा, सवैया, गजल आदि। मुदा जँ अनिश्चित स्वरक आधारपर रचना हेतै तँ ओ आधुनिक कविता, गीत आदि हेतै। एहि भूमिकाक सभसँ आपत्तिजनक बात ई जे लेखक अपन कमजोरी नुकेबाक लेल दुष्यंत कुमार केर नाम लऽ लेलाह। दुष्यंत कुमार हिंदी गजलमे कथ्य केर परिवर्तन केलाह मुदा बहरक संगे। जी हाँ, अंकगणीतीय बहरक पालन करैत। हम अनेक ठाम उदाहरण देने छी वएह उदाहरण सभ एहू ठाम दऽ रहल छी- हो गई है / पीर पर्वत /-सी पिघलनी / चाहिए, इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए एहि गजल बहर अछि 2122 / 2122 / 2122 / 212 आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ उपरा कऽ जाँचि सकैत छी।
मत कहो आकाश में कुहरा घना है यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
एहि गजल बहर अछि 2122 / 2122 / 2122 आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ उपरा कऽ जाँचि सकैत छी। एकर अतिरिक्त दुष्यंत कुमारक आनो गजलकेँ अहाँ सभ अपने जाँचि सकैत छी। मैथिलक स्वाभाव होइत छै जे जखन एकटा सबूत भेटि जाइत छै तखन ओ दोसर नाम लऽ लेत तँइ हमरा बूझल अछि जे मनोज शाण्डिल्य केर भविष्यक पोथी सभमे अदम गोंडवी आ कि आनो नाम लीखल भेटत तँइ हम अही ठाम अदम गोंडवीक दू टा गजल आ ओकर बहर देखा रहल छी-
ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में
एहि गजल बहर अछि 1222 / 1222 / 1222 / 1222 आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ उपरा कऽ जाँचि सकैत छी।
भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो
एहि गजल बहर अछि 2122 / 2122 / 2122 / 212 आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ उपरा कऽ जाँचि सकैत छी। कुल मिला कऽ देखी तँ मनोज शाण्डिल्य अपन कमजोरीकेँ दुष्यंत कुमारपर आरोपित कऽ भ्रम पसारने छथि। पाठककेँ तय करबाक छनि जे एहन भ्रमित लेखक केर रचना संगे की करबाक चाही। कुल मिला कऽ एक बेर फेर हम कही जे "बाजब बदलि रहल छै" नामक पोथीमे जे रचना सभ अछि से गजल नै अछि कारण एहिमे बहरक पालन नै अछि। ओ रचना सभ कविता, गीत आ कि आन किछु भऽ सकैए मुदा गजल नै अछि। 4 "नब युद्धक ओरिआन" ई पोथी छनि प्रेमचंद पंकजकेँ। एहिमे संकलित रचना सभकेँ हमरा "कथित गजल" कहबामे सेहो लाज होइत अछि। एहि पोथीक भूमिका लेखक छथि कमलमोहन चुन्नू। चुन्नूजीक कथित गजल संग्रहक आलोचना हम कऽ चुकल छी आ जे पढ़ने हेताह से बुझिते हेताह जे चुन्नूजीक लिखल भूमिका बला पोथीक रचनाक स्तर केहन हेतै खास कऽ जखन कि ओकरा जखन गजल कहल गेल हो। कुल मिला कऽ बुझिए गेल हेबै जे अहू पोथीक रचना सभ गजल नै अछि। 5 "टाँगल मोलायम रौद" ई कथित गजल संग्रह छनि रामेश्वर निशांत जीक। एहि पोथीमे कुल दू टा भूमिका अछि पहिल रामलोचन ठाकुरजीक आ दोसर निशांतजीक अपने। संगहि-संग शारदा सिन्हाजीक आशीर्वचन सेहो छैक पोथीक पछिला कभर पेजपर। रामलोचनजी अपन भूमिकामे लिखै छथि जे " मतला, काफिया, बहर आदि एकर बाधा नहि होइत छैक" (पृष्ठ-6), रामलोचन जी गजल विधाक नहि छलाह तइयो एहन बात साहसपूर्वक लीखि सकैत छलाह। रामेश्वरजी अपन भूमिकामे लिखै छथि जे ".. तैं बहर (छंद)क दृष्टिएँ जटिल रहितो कोनो भाषामे लिखल गजल श्रेष्ठ आ सुंदर भ' जाइछ", (पृष्ठ-9), आ ई बात सही छै मुदा दुख अतबे जे रामेश्वर जीक कथित गजल सभमे बहरक कोनो ठोस प्रमाण नहि भेटल। यत्र-कुत्र बहरे मीरक प्रवाह सन बुझना जाइत छै मुदा ओहो कोनो सायास रूपमे नहि छै। संभवतः आने जकाँ निशांतजी इएह बूझै छथि जे जेहन पाँति लिखा गेलै सएह बहर (छंद) भऽ गेलै। कुल मिला कऽ अहू पोथीक रचना सभ गजल नहि अछि कारण एहिमे बहरक पालन नै अछि। मुदा हमरा ई मानबामे कोनो संकोच नहि जे एहि संग्रह रचना सभमे काफिया ओ रदीफ नीक जकाँ निर्वाह कएल गेल छै (किछु अपवाद छोड़ि)। तँइ हमरा नजरिमे मैथिलीमे कथित गजलक जे शृंखला छै ताहिमे ई पोथी अछि। सुधांशु शेखर चौधरी, बाबा बैद्यनाथ, अरविन्द ठाकुर एवं बैकुंठ झा बाद ई पाँचम एहन लोक छथि जिनकर रचना कम्मे मेहनतिसँ गजल बनि सकैए। जँ हमर बात निशांतजी लग कहियो पहुँचनि तँ जरूर ओ एहि बातपर गौर करथि। एहि पोथीमे शारदा सिन्हाजीक आशीर्वचन की मानि कऽ लेल गेल छै से नहि पता। जँ संगीतक कोनो पोथीपर शारदाजीक वचन रहितनि तँ ओ मानबाक बाध्यता हमरा रहैत मुदा एहन नै छै जे शारदा सिन्हाजीक लिखलासँ कोनो रचना गजलमे बदलि जेतै। कुल मिला कऽ देखी तँ रामेश्वरजीक रचना गजल तँ नहि छनि मुदा गजलसँ बेसी दूरो नहि छनि। 6 "सजना सिनेहिया" केर लेखक छथि सतीश साजन। एहि पोथीमे गीत बेसी अछि आ एहन रचना जकरा गजल कहल गेल छै से कम। ओना ई सभ गजल छैहो नै। एहि पोथीमे कुल दू टा भूमिका अछि पहिल अजित आजाद आ दोसर लेखक केर अपने। स्वभावतः जखन भूमिका लेखक अजित आजाद छथि ओ उपन्यासोकेँ गजल कहि सकैत छथि, कोनो भारी बात नै। ई स्पष्ट अछि जे एहि पोथीमे गजल विधाक कोनो रचना नै अछि। 7 "स्वेद-राग" ई कथित गजल संग्रह धीरेन्द्र प्रेमर्षिजीक संपादनमे प्रकाशित भेल छनि। एहि पोथीमे नेपालक युवा सभहक रचना सभ गजलक नामसँ आएल अछि। एहि युवा सभमेसँ किछु युवा मेहनती भऽ सकै छलाह मुदा ओ सभ प्रेमर्षिजीक पसारल भ्रममे फँसल छथि। आइ हम कि कियो युवा सभकेँ ई कहि उत्साहित कऽ सकैत छी जे चलू काल्हि भेने ई सभ मेहनति करता। मुदा अपन कमजोरी नुकेबाक अछि तँइ युवो सभ मेहनति नै करथि एहन बात सोचब साहित्य संगे छल हेतै। युवा सभकेँ मेहनति करबाक चाही मुदा एहि संग्रहमे प्रेमर्षिजी अपन भ्रम, अपन कमजोरीकेँ नेपालक युवा लेखकपर लादि देने छथि आ उम्मेद करै छथि जे युवाक कमजोरी बहन्ने हम सुरक्षित बचि जाएब। हिनक किछु भ्रम, कमजोरी आ कुंठा हिनके लिखल भूमिकामे भेटैए। पृष्ठ- 13 पर प्रेमर्षिजी लिखै छथि- "तथापि प्रश्न उठैत अछि जे जकरा हम गजल कहि रहल छियैक वा जे रचना सभ एहिमे सङ्ग्रहित अछि से की गजले छियैक? जँ आइसँ डेढ़ दशक पहिने ई प्रश्न अबैत तँ एक नजरि देखितहिँ केओ कहि, दितए-बिल्कुल, ई गजले छियैक। मुदा पछिला समय बगय-बानि आ आन्तरिक गुणवत्तापर मात्र नहि भऽ गजलक गणितपर सेहो किछु काज होबऽ लागल छैक। आ जखन गणितीय सूत्रसभक खाँचपर कोनो रचना दुरुस्त नहि बैसैत छैक तँ ओकरा गजल कहबासँ परहेज कएनिहार एकटा जमात सेहो सक्रिय अछि सम्प्रति। ओहि जमातक विचार आ अभियानक सेहो सम्मान करैत छी हम। हमर धारणा अछि जे सूत्रबद्ध काजक अभ्यास कालान्तरमे विशेष गतिशीलताक मार्ग सेहो प्राप्त करत। कोनो फसलक बीज कतहुसँ आएल हुअए, जाहि जमीनमे ओकरा बुनल गेल छैक ओहि माटिक उर्वराशक्ति एवं रौद-बसात ओकरा जाहि रूपें जनमऽ, पनपऽ आ फौदाएमे प्रभाव पाड़ैत छैक से ओहि फसलक गुण होइत छैक। ई प्राकृतिक नियम छियैक। मैथिली भाषाक स्वरूप, सुगन्ध आ सौष्ठव गजलकेँ कोन रूपें अंगेजने अछि आ समय-क्रममे होइत रहल बाउग किंवा रोपनीसँ हरिआइत गजल-वृक्षमे कोन तरहक फल लागल अछि; उएह मैथिली गजलक सुच्चा सुआद आ स्वरूप भऽ सकैत छैक। आइ जँ पं. जीवन झा सदृश प्रारम्भिक गजलकारलोकनि अपन मानसक माटिमे सानिकऽ मैथिलीक चाँचरमे गजलक बाउग नहि कएने रहितथि तँ जानि नहि सोमदेव, सियाराम झा 'सरस', कलानन्द भट्ट, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ. राजेन्द्र विमल, डॉ. तारानन्द वियोगी, फजलुर्रहमान हाशमी, डॉ. रामचैतन्य धीरज, जगदीशचन्द्र ठाकुर 'अनिल', डॉ. धीरेन्द्र धीर, धीरेन्द्र धीरज, जनार्दन ललन, डॉ. देवशङ्कर नवीन, रामभरोस कापडि 'भ्रमर', डॉ. विभूति आनन्द, डॉ. रामदेव झा, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. शेफालिका वर्मा, डॉ. कमलमोहन चुन्नू, डॉ. नरेन्द्र, रोशन जनकपुरी, अजित आजाद, जियाउर्रहमान जाफरी, अशोक दत्त सदृश रचनाकारलोकनि गजल नामसँ किछु लिखबाक साहस करितथि वा नहि! जँ उल्लिखित साहित्यकारसभक अतिरिक्तो सैकड़ो रचनाधर्मी गजलमे कलम नहि भँजैत रहितथि तँ राजीवरञ्जन मिश्र, नवलश्री पङ्कज, दीपनारायण विद्यार्थी, आशिष अनचिन्हार, मैथिल प्रशान्त, प्रदीप पृष्प, अमित मिश्र, कुन्दनकुमार कर्ण, बालमुकुन्द, अभिलाष ठाकुर, सुमित मिश्र आदिसन रचनाकार जानि नहि गजल अध्ययन-लेखनदिस प्रवृत भऽ पबितथि वा नहि।" हुनकर एहि भूमिकाक शुरुआतमे एहन जमात केर चर्चा करै छथि जे बिना नियम रचनाकेँ गजल कहबासँ परहेज करैए मुदा प्रेमर्षिजीमे एतेक साहस किएक ने छनि जे ओ बिना नाम लिखने चर्चा करै छथि। साहित्यमे छथि तँ एकौ पौआ साहस रहबाक चाही प्रेमर्षिजी लग। भूमिकाक दोसर भागमे प्रेमर्षिजी गजलक इतिहासकेँ गलत करबाक कुत्सित प्रयास केलाह अछि। एहि प्रसंगमे मैथिली गजलक काज सेहो सार्वजनिक अछि आ प्रमर्षिजीक कथन सेहो हम देलहुँ। पाठक तय कऽ लेताह। एकर अतिरिक्त अही भूमिकामे प्रेमर्षिजी लिखै छथि (पृष्ठ-14)- "मुदा ओकरा (रचनाकेँ) खारिज करबाक करबाक अधिकार वा सामर्थ्य ककरो नहि रहैत छैक।" एहि कथनक की मतलब छै से हमरा नहि बुझाएल। रचनाकेँ कियो खारिज कइए ने सकैए मुदा कोनो रचनाकेँ लेखक जबरदस्ती लेबल लगा कऽ परसबाक प्रयास करै छथि तँ ओहि लेबलकेँ खारिज करबाक अधिकार समीक्षक-आलोचककेँ जरूर देल गेल छै समाज द्वारा। आ तँइ ई कहबामे कोनो संकोच नै जे एहि पोथीक रचना गजलक मापदंडपर नै अछि। छोट कालखंड लेल प्रेमर्षिजी निमाहि लेताह मुदा भविष्यमे जखन मेहनती युवा सभहक फौज रहतै तखन हुनकर काजक नामोनिशान नहि बचतनि। 8 "विश्वग्रामक बलिवेदीपर" ई कथित गजल संग्रह छनि अजित आजाद केर। एहि पोथीमे कोनो भूमिका नै अछि। आन लोकक कथित गजलपर लीखए बला, संग्रहमे भूमिका लीखए बला अजितजी अपन संग्रहमे कोनो भूमिका किए ने देलाह से बात जँ गजलक नामपर किछुओ लीखि देबए बला लोक सभ बूझि जाए तँ आधा समस्या ओहीठाम खत्म भऽ जेतै। एहि संग्रह रचना सभ सेहो गजल नै अछि। 9 हम पहिनेहो कहने छी जे व्यक्तिगत तौरपर हमरा कोनो आजाद कि बरबाद रचनासँ दिक्कत नै अछि। एकटा पाठक तौरपर हम ओकरो सभकेँ पढ़ैत छी। हमरा दिक्कत तखन होइए जखन कि कोनो विधाक नामपर भ्रम पसारल जाइत छै। अपन कमजोरीकेँ नुकेबाक लेल विधाक नियम संगे मजाक कएल जाइत छै। उपरमे जतेक पोथी जतेक लेखक केर नाम हम गनेलहुँ से सभ अपन कमजोरी नुकेबाक लेल भ्रम पसारने छथि। आब पचास-सए रचना छै तँ कोने ने कोनो रचना कथ्य हिसाबें नीक हेबे करतै, किछु पाँति नीक लगबे करतै मुदा तकर नाम गजले टा किएक? कविता राखि लिअ नाम जखन नियम केर पालन करिते नै छी तखन ओ गजल कोना? नमहर-नमहर भूमिका लिखल जाइए मुदा जँ एकौ पाँति ओहिमे अपन कमजोरीक बारेमे लीखि देल जाए तँ एहन थोड़े छै जे कोनो पाठक कि कोनो आलोचक लेखककेँ फाँसी लगा देतै। मुदा जँ ई सभ अहिना भ्रम पसारैत रहता तँ कोनो ने कोनो आलोचक हिनका सभकेँ नपैत रहत, आ अहिना बेकार कहैत रहत। लेखक अपन कमजोरीकेँ सार्वजनिक करैत रचना लीखथि ई बेसी इमानदार ओ साहसी काज हेतै। गजल नियम यदि सभ लेल छै तँ ओकर छूट सेहो सभ लेल छै। मुदा छूटक उपयोग वएह कऽ सकैए जे कि अनुशासित होथि। बाँकी आलसी लोक लेल छूट की आ नियम की? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- कहू, उपराग दिअइ ककरा? ३.२.शिव कुमार झा टिल्लू - ३ टा पद्य ३.३.समता कुमारी- मिथिला हम्मर ३.४.डा जियाउर रहमान जाफरी- २ टा आजाद गजल ३.१.राज किशोर मिश्र- कहू, उपराग दिअइ ककरा? राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी कहू ,उपराग दिअइ ककरा ?
लय ति मि र -पा त्र, छी घूमि रहल,
भरबा क अछि ई इजो त सँ, भरि क'जखने बन्द करैत छी , तम भरि जा इछ, को नो बेओँत सँ। सँ
इजो त -अन्हा रक -सम्बन्ध के सो झरा बय लेल कहि ऐन्हि कि नका ?
एहि , ओझरो ट के लेल पुनि , कहू, उपरा ग दि ऐन्हि कि नका ?
बा दरि बि ला गेलै हथि या मे, छै सुखा रहल , खेत मे धा न, मेघ नि पत्ता भेल, गेल कत '? बरसय, दैक धा न मे प्रा ण।
देखि लि औ, छै केहन भेल? जलवा हक अनसो हाँ त, नखरा , कि नका कहि ऐन्हि ? की कहि ऐन्हि ?
कहू, उपरा ग दि अइ ककरा ?
पूर्व का लक नी क कतेको , टुटल जा इत अछि परम्परा ,
नहि बुझा इत अछि , कि नका कहि ऐन्हि ,
कहू ,उपरा ग दि अइ ककरा ?
भैबाँ ट जमी नक अङकुर मे, उसरा ही खेत 'पड़ल बखरा , कहू, उपरा ग दि अइ ककरा ?
लुक्खी गा छ पर आम खो धि , अपने सँ करैछ, बाँ ट-बखरा कहू, उपरा ग दि अइ ककरा ?
अनुमा नो ने भ' पबैत छै, भ'जेतै कखन धरती -कंपन, बजि तो नहि छथि ,वसुन्धरा ,
हो इत छन्हि कि एक, काँ पय के मन?
कि नका पूछि अन्हि ? के, की कहता ? ई उपरा ग, कि एक कि ओ सुनता ?
बजओने बि नु, दुर्भा ग्य आबि , कि एक बेसा हैत अछि रगड़ा ? हमरा दि स सँ नेओँत छलै की ? कहू ,उपरा ग दि अइ ककरा ?
कएगो ट अंधवि श्वा सक द्वा रे,
डगमगा एल, मि थि ला -मा थक पा ग, वैज्ञा नि क सो च अनसो हाँ त छन्हि जि नका ,
हुनकर दुर्भा गक जा गल भा ग।
वि ज्ञा न पर वि श्वा स नहि जि नका , कहू, उपरा ग दि ऐन्हि कि नका ?
तपत चा ह पि बैत का ल,
पा कि जा इत छन्हि मुह जि नका , अहीं कहू, ओ की करता ? जा क' उपरा ग देथि न्ह कि नका ?
ता मि -को ड़ि खेत हम रो पलहुँ, उगि गेल अपने सँ खगरा , कहू, उपरा ग दि अइ ककरा ?
सि नेह कतए सँ घो रि दि अइ? ति लको ड़, मा छ ,मखा न मे, गेल कतए ओ अपनैती ? परसा इ छल सभक दला न मे,
अपनैती , मो न, हि रदयक भा व अछि , बढ़त को ना , कहि ऐन्हि कि नका ? कहू, उपरा ग दि ऐन्हि कि नका ?
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.शिव कुमार झा टिल्लू - ३ टा पद्य शिव कुमार झा टिल्लू ३ टा पद्य
१ मुरदैया'के कछेर मे रजिपुत शासनक काल छल धम्म'सँ सनातन बेहाल छल मूरति नै पूजब मुदा - शरणम् गच्छामि केर ललकार छल ! शैव शाक्त वैष्णव आक्रांत छल फुराइत नै न्याय तर्क दर्शन सिद्धांत छल तखने जनमल सीताक धरती पर चनहा सोती स्वरूपा मुरदैया के कोखि'सँ एकटा चिलका .. जाहि सोती मे मात्र साओन भादो'मे पानि ओकरे कछेर मे रोपि देलक न्याय केर कुसुम फेर की भेल ? ई जानथि जगरनाथ सनातन दर्शन कहलकनि ई चिलका नै आचार्य छथि - सनातन केर रक्षक उदयनाचार्य मुदा एखन मात्र दर्शन आ वैशेषिक शोध मात्र केर विषय जे बनि गेल छथि बरौनी के तरल तेल शोधक जकाँ सोधा रहल छथि !!!!! कांकड़ पाथर भरल अपन डीहपर श्रद्धा भावक नोर'सँ नित पूजै छनि उनित साहु सन करियन गामक किछु जन -जननी लोकनि
२ अतुकान्त टहलि रहल छलहुँ प्रगीतक फुलबारी'मे रंगबिरहा फूल केर सुगंधक आनंद लैत आकि फुरा गेल -एकटा गीत ! सोच' लगलहुँ विषय- विमर्श कथी'पर लिखल जाए..? कतहु बाढ़िक ककरोस त' कोनो'ठाम सोहाओन साओनक आनंद तुकबंदी मिलान करैत रहलहुँ लिखि लिखि क' पन्ना फाड़ैत रहलहुँ नीक'सँ नीक रचबाक प्रयास जे छल कि अचके झनझना उठल देह लागि गेल छल मोजरक थापर ड'र'सँ मोन अपस्यांत कहलक हीया -छोड़ि ने दियौ फेर लिख' लगलहुँ -- अतुकांत ३ अविरल स्मृति (गीत)
बीतल क्षण फेर घुरिक' आबय ओकरे संग'मे दौड़ी अय चलू सखी किछु काल'ले नैहर खेलब चित्ती कौड़ी अय ! प्रेमक चटकन बाबूके हाथे माय सिनेहक डंटा अय चलू भायसंग फेरो करबै जे बिसरल ओ टंटा अय हमरा दिश तँ दाइ ठाढ़ छथि कहथि ई पोती गौरी अय ! सुन गे मुनियाँ किए कनै छें जो खेलें कित्ती कित्ती ढाढसके अहिबात जड़ाक' कहथि हमर छोटका पित्ती एहिठां बहुआसिन बनि गेलहुँ आंजुर करम फुलौड़ी अय ! सासुमाय नहि विधिक धाय छथि प्रेमक पथ संघोर अय ह'म सूतलि छी अपन सेजपर चाह बनाबथि भोर अय हे शिव जैघर बेटी बनलौं ओहिठां प्रेम तिलौड़ी अय ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.समता कुमारी- मिथिला हम्मर समता कुमारी मिथिला हम्मर -समता कुमारी, शिक्षिका, समस्तीपुर, बिहार। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.डा जियाउर रहमान जाफरी- २ टा आजाद गजल डा जियाउर रहमान जाफरी २ टा आजाद गजल १ देखब हुनका रूप अपार करब मुदा नहि हुनका पियार
राधा गोरी जाइ रहल अछि जहाँ पे बैसल नंदकुमार
बरखा मे नहि पानी तनिको की प्रकृति के व्यवहार
केवल हमहीं मैथिली बाजब कनि करू ते अहाँ विचार
झूठक दिल्ली की बाजैत अछि रोज बढ़ैत अछि नरसंहार
हमहुँ दोषी हमहुँ दागी सहि रहल छी अत्याचार
नहि सोचथि हम भविष्यक लेल नहि हमरा मे कछु सुधार
२ हम बाजैत छी पियारक गप्प कोनो शुभ संस्कारक गप्प
हमरा नहि समीचीन बूझैत अछि दिन मे ई अंधकारक गप्प
एक स्वर मे हम मानै छी संभव नहि उद्धारक गप्प
कन्याक संख्या कम जे होइत बदलि जाइत इंकारक गप्प
राजनीति के हम जानैत छी हत्या, खून, संहारक गप्प
हमरा जुनि अहाँ भेंटैत छी भ' जाइत अखबारक गप्प
कोनो दशा नहि बाकी रखलक पापी ई संसारक गप्प सम्पादकीय टिप्पणी- जियाउर रहमान जाफरी जखन हिंदी-उर्दूमे गजल लिखै छथि तखन पूरा बहर-काफिया रहै छनि मुदा हुनक मैथिलीमे गजलमे बहर नै रहैए। जाफरी जी एकटा हिंदी गजल देखू। ऐ गजलमे २१२२-२१२ केर पालन केने छथि हरेक पाँतिमे आ काफिया ई ध्वनि साम्यताक संग छै। - डा जियाउर रहमान जाफरी, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, मिर्जा गालिब कॉलेज गया बिहार, 823001, 9934847941 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (द्वितीयोच्छवासः) ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (द्वितीयोच्छवासः) चम्पूसाहित्ययशो विलासः (द्वितीयोच्छवासः) डा. दीपिका (स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च) चम्पूसाहित्यजगति आचार्यत्रिविक्रमभट्टस्य नलचम्पू-नामधेयः ग्रन्थः प्रथमं चम्पूकाव्यम् अस्ति इति प्रथितः एव। दशमशताब्द्याम् अस्य ग्रन्थस्य रचना जाता। अस्मिन् ग्रन्थे मूलतः त्रिविक्रमभट्टरचिताः सप्त-उच्छवासाः वर्तन्ते। एवं जनश्रुतिः वर्तते यत् आचार्यत्रिविक्रमभट्टः वाग्देवी कृपावशात् सप्त-उच्छवासपर्यन्तमेव लेखनं कृतवान्। अतः ग्रन्थोऽयम् अपूर्णः। तत्र प्रथमे उच्छवासे विविधविषयाणां वर्णनं वर्तते। आदौ आहत्य पञ्चविंशतिश्लोकाः वर्तन्ते। येषु श्लोकेषु शिवस्य स्तवनं वर्तते। एवमेव कामदेवस्य वर्णनं, सरस्वत्याः स्तवनं, काव्यवैशिष्टयं, कुकविनिन्दा, दुर्जननिन्दा, विद्वत्जनानां वन्दना, सज्जनदुर्जनयोः पार्थक्यम्, आदिकवि स्तुतिः, वेदव्यासस्तुतिः, महाभारतकथावर्णनं, बाणभट्टगुणाढ्ययोः प्रशंसा, संभगश्लेषवैशिष्टयादीनां विवरणम् ऐषु श्लोकेषु दत्तवान् अस्ति आचार्यः। एवमेव गद्यप्रभागे मध्ये-मध्ये पद्यप्रयोगपुरस्सरं कविवंशादिवर्णनम्, आर्यावर्तवर्णनं, निषधापुरीवर्णनं, नलवर्णनं, महामन्त्रिवर्णनं, नृपविलासवर्णनं, वर्षावर्णनं, शूकरोत्पातवर्णनं, मृगया-विहार-निश्चयवर्णनं, मृगयावर्णनं, शूकरदर्शनं, शरवर्षणं, द्वन्द्वयुद्धं वर्णनं, शूकरजयो राज्ञो विश्रामवर्णनं, पथिकस्यागमनं, राज्ञाकौतुहलं, विदर्भवर्णनं, राजपुत्रीवर्णनं, राज्ञश्चिन्तावर्णनं, पथिकविसर्जनं, राजदशावर्णनं प्रभृतीनां विशदरूपेण विस्तृतवर्णनम् अस्मिन् ग्रन्थे सन्दृश्यते। ऐषु वर्णनेषु इदम्प्राथम्येन आर्यावर्तस्य यद्वर्णनम् अस्ति तन्निश्चयेन भारतवर्षस्य मूलस्वरूपं प्रस्तौति। यस्य निदर्शनम् अधोलिखितेषु गद्येषु-पद्येषु च द्रष्टुं शक्यते। अस्ति समस्तविश्वम्भराभोगभास्वल्ललामलीलायमानः, समानः सेव्यतया नाकलोकस्य, ग्राम्यकविकथाबन्ध इव नीरसस्य मनोहरः, भीम इव भारतालङ्कारभूतः, कान्ताकुचमण्डलस्पर्श इवाग्रणीः सर्वविषयाणाम्, अनधीक्तत व्याकरण इवादृष्टप्रकृतिनिपातोपसर्गलोपसवर्णविकारः, पशुपतिजटावन्ध इव विकसितकनककमलकुवलयोच्छलितरजः पुञ्जपिञ्जरितहंसावतंसया प्रचुरचलच्चकोरचक्रवाककारण्डवमण्डलीमण्डिततीरया भगीरथभूपालकीर्ति-पताकया, स्वर्गगमनसोपानवीथीयमानरिङ्गतरङ्ग्या गङ्गया पुण्यसलिलः प्लावितश्चन्द्रभागालङ्कृतैकदेशश्च, सारः सकलसंसारचक्रस्य, शरण्यः पुण्यकारिणाम्, आरामो रामणीयककदलीवनस्य, धाम धर्मस्य, आस्पदं सम्पदाम्, आश्रयः श्रेयसाम् आकरः साधुव्यवहाररत्नानाम्, आचार्यभवनमार्यमर्यादोपदेशानामार्यावर्तो नाम देशः। आर्यावर्तस्य प्रजाः कीदृशाः इत्यपि वर्णनम् अत्यन्तं समीचीनतया कृतमिह- यस्मिन्नवरतधर्मकर्मोपदेशशान्तसमस्तव्याधिव्यतिकराः पुरूषायुषजीविन्यः सकलसंरसुखभाजः प्रजाः तथाहि- कुष्टयोगो गान्धिकापरोषु, स्फोटप्रवादो वैयाकरणेषु, संनिपातस्तालेषु, ग्रहसंक्रान्तिर्ज्जोतिःशास्त्रेषु, भूतविकारवादः सांख्येषु, क्षयस्तिथिषु, गुल्मवृद्धिर्वनभूमिषु, गलग्रहो मत्स्येषु, गण्डकोत्थानं पर्वतवनभूमिषु, शूलखसम्बन्धश्चण्डिकायतनेषु, दृश्यते न प्रजासु ।। यत्र चतुरगोपशोभिताः सङ्ग्रामा इव ग्रामाः, तुङ्गसलकलभवनाः सर्वत्र नगा इव नगरप्रदेशाः, सदाचरमण्डनानि नूपुराणीव पुराणि, सदानभोगाः प्रभञ्जना इव जनाः, प्रियालपनसाराणि यौवनानीव वनानि, विटपिहिताश्चटिका इव वाटिकाः, निर्वृतिस्थानानि सुकलत्राणीवेक्षु क्षेत्रसत्त्राणि, जलाविलक्षणाः पशुपुरूषा इवाप्रमाणास्तडागभागाः, कूपितकपिकुलाकुलिता लङ्केश्वरकिंकरा इव भग्नकुम्भकर्णघनस्वापाः कूपाः, पीवरोधसः सरित इव गावः, सतीव्रतापदोषाः सूर्यद्युतय इव कुलस्त्रियः ।। यत्र च मनोहारिसारसद्वन्द्वास्तत्पुरूषेण द्विगुना चाधिष्ठिताः कादम्बरीगद्यबन्धा इव दृश्यमानबहुव्रीहयः केदाराः । किं बहुना। नास्ति सा नगरी यत्र न वापी न पयोधरा। दृश्यते न च यत्र स्त्री नवापीनपयोधरा।। अपि च भवन्ति फाल्गुने वृक्षशाखा विपल्लवाः। जायन्ते न तु लोकस्य कदापि न विपल्लवाः।। उक्तवर्णनं न केवलं तत्कालीनभारतस्य वैशिष्टयं प्रस्तौति। समसामयिकराष्ट्रस्य विनिर्माणम् अपि उक्तधरातले एव कर्तुं शक्यते इति निश्चप्रचम्। आर्यावर्तस्य देशः पुण्यतमोद्देशः कस्यासौ न प्रियो भवेत्। युक्तोऽनुक्रोशसंपन्नैर्यो जनैरिव योजनैः।। (अनुवर्तते) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह: ३५५ म अंक ०१ अक्टूबर २०२२ (वर्ष १५ मास १७८ अंक ३५५)|| 1 2 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA
हम मिथिला के ava, 'बाजब हम्मर मैथिली अछी। मंडन मिश्र के आंगन में भारती , शंकराचार्य के हरौलन अछी। विद्यापति लेल जहां महादेव , rT बनी ऐला। Wer मिथिला गाम हम्मर , जहां सीता मां जन्म लेला। थानेश्वर , कुशेश्वर अछी , बाबा के धाम | Sess, श्यामा आ अहिल्या , माता के स्थान । माछ, दही , पान, मखान , अछी भोजन प्रधान। UM, खराम से होई छड़ ,
दा Ras Fs se था HAs उपरान्त AS sa Tem Sette डौरुत are | Saas AS, Js स्मयानुक Gia are eet ‘ope समय पर dq ate -स्मय पर सरीं, समय पर आर्मी ait समय पर बरसात | सुदा saa Mai स्वार्थ सँ Ssfeid HS कड पकुसिकें, साथ डा न । ang ga परिणाम TE, विपरीत Sitter आदत Site | Iw | Deg ste ah रकटा बेटा 4S Tray sR | DST बैठी SoH MAS (ANS GH महाभारत | विकरात्न रूप धारण FS oa ATT He -play? Malte, पाले Araya So AAT जा रहल्त ST de aig Aer Qs- dees दंस्वड नहि,चाहत हल Sag aviator रवि Sap पोयटा पंच बजाकूड | Aap किडुक Seay $38 tH TS रिन सौझखन Ue Rap धपरत्ताह -adaia GUT 2ुर WH | खेत -पंथारि, HO - STE. T-TEST THEA, | atau HS Jim । बड़का dad, वीनटा धर ,डोटका Sats वीनठा धर, Sod MNS धपा VF) धरक | दाम qatar Step | HAS तक of सभा THE TSH | sig OM ATR AT सभा gos NS जलन GH- Ser Sap HE SIT as Tier | ata | राति ars drm att पंच Sep ayaa धर थानि उपलताह् | = — | दरवाज़ा पर से नरेडा Sey STTTAT, अपना RTT Tem sate धरक gary पर Gap अत पर | alg gift पाई diay (Saeed धरि जातक बेंटबारा | Je oy om. Naty ककरों ne Te EM) War tia GLA Gags त्लाजन, dead TEs |
8:36 भर te wil Sil GD4 Q — @ ijanmahotsav.blogspot. @ € ९ ३ a = 2.008908 ८: जय क्र सम्मान पत्र: SS ‘ae है (ग़ज़ल) - डा. जियाउर रहमान जाफरी = अत & 0 ie >> | / an . इस तरफ भी तीर है मसअला गंभीर है लिन मुश्किलें जितनी रहें हे + hfe हाथ में तदबीर है ly, # तोडनाही है. उसे | हाँ मगर ज़ंजीर है ४४६ मुस्कुराहट होंठ पर के अब और दिल में पीर हे >» (eon क्या यही तदबीर है शेर अब उससे. बढ़े water हीर है (7 ra) Like QO Comment AR Share
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'हम्मर अप्पन पहचान। ait, कमला , बलान बहै , feat, wet, सामा गीत। मधुबनी पेंटिंग विश्वविख्यात , आ जाट - जट्टीन खेल। मिथिला हम्मर जन्मभूमि , ई हम्मर पहचान अछी। सदीखन मिथिला ary बडा, मनक इच्छा प्रधान अछी। समता कुमारी शिक्षिका, समस्तीपुर, बिहार। ||
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48 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA २.९.शिव शंकर- कथा- पाथर शिव शंकर कथा- पाथर Var SS} 2 : a por eS 7 प् # हि परापद्वाम assy aaa मकानक ओड़ा नहि ‘eet. दर दिखे पता sat जाइत EM, Sh कोनी अवाब नि (ave-@eres पहाड़ set cg. वस-खे-मखस। | मकान Gad चर्चित इल्त - Vata नागे मिथित्मा Stor 'पढ़ि Stat ( ey ee THEM बाजूक sori aN (eat था धार सभा Qe शब्य EM - दहन ST TaN early बेस TST amt shay andt-taang gs ds बरिस्ातिक ABT, Sa, TP SG FOU SAT कल्तान SAA AAS ऊन्यदान करवा THM EMT VOW - समयमे gag sah स्वरूप रंगीन 4s ही EM, GHA अयार PEO OWT Sor । दूँकि औओहि dit Aga HY तरहक स्थान TS इन AS कि Say Heh ATs इत्सवक धायोजन ATH SH HOM AT सकेत EM, le तड Hr TH ऊनवासा Eh था ate as कोना वरहक स्कूल्ने कृत | STRING Doar item Fey em मुदा झा दौलसें Fx. Gey इत्न, कर कि बारी ates HAT Sua te EAT | Tanta aga TATA Fay CaaS SIT ARTE Bay सरवानका Sees इनके करवाजा पर कि zea eer दो नम Heit संचेती दुझासर as मिथ AGH दाल पर VIA eS eae eqs sweet ged oe aed em, as चारि aise) Tats पार्टी उलनाम-बीबी :रुक्का- eRe, जणितमें sige, अपना Se जीतैबाक दावेदारीमे रड़ी-साटीक और era ze : 4
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