VIDEHA — Issue 356 / अंक ३५६

Publication: VIDEHA · Issue: 356
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ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह: ३५६ म अंक १५ अक्टूबर २०२२ (वर्ष १५ मास १७८ अंक ३५६) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२२। सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 356 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-५) १.२.अंक ३५५ पर टिप्पणी (पृ. ६-६) २.गद्य खण्ड २.१.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ.९-१६) २.२.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १७-२३) २.३.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. २४-३०) २.४.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ.३१-३९) २.५.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ४०-४७) २.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा (पृ. ४८-४९) २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- विचारक प्रबलता (पृ. ५०-५८) २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. ५९-८१) २.९.आशीष अनचिन्हार- व्यंग्य- परंपरावादी भोजन (एक शोध)(पृ. ८२-८७) २.१०.प्रेमशंकर झा "पवन"- पशुधनक देवता संत बाबा कारू खिरहर (पृ. ८८-९२) २.११.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-४) (पृ. ९३-९७) २.१२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १३म खेप (पृ. ९८-१०२) २.१३.डॉ शेफालिका वर्मा- पुरान टिहरीक दर्द (एकटा संस्मरण) (पृ. १०३-१११) २.१४.डॉ शेफालिका वर्मा-प्रवासी मजदूरक पीर आ मिथिला राज्य (पृ. ११२-१२०) ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- उपकार (पृ. १२२-१२७) ३.२.प्रदीप पुष्प- २ टा गजल (पृ. १२८-१३१) ३.३.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- गीत [पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता] (पृ. १३२-१३६) ३.४.चन्दना दत्त- बाढि आ बिहार (पृ. १३७-१३८) ३.५.रामकृष्ण परार्थी- ५ टा कविता (पृ. १३९-१४६) ३.६.अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'- मिथिला मैथिल और तिरंगा/ पाकल परोर- बाल गीत/ बदमाशी- बाल गीत (पृ. १४७-१५५) ३.७.उदय नारायण सिंह नचिकेता- जौ सोचिये लेलहुं चलिये जायब (पृ. १५६-१५८) ३.८.अखिलेश ठाकुर- कतअ गेलई ओ मिथिला के शान (पृ. १५९-१६०) ३.९.समता कुमारी- मैया आबि रहल छथि (पृ. १६१-१६२) ३.१०.गजेन्द्र ठाकुर- बहुत सुनेलियौ तोरा, आब सुनबौ तोहर सभ गप (पृ. १६३-१६६) ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (तृतीयोच्छवासः) (पृ. १६८-१७१) ५. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण (पृ. १७२-१७७) 2

ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३५५ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय गजेन्द्र ठाकुर १ ८२ बर्खक एनी एर्नौ केँ ऐ बेरुका साहित्यक नोबेल पुरस्कार देबाक घोषणा स्वेडिश एकेडमी केलक। स्वेडिश एकेडमी ओइसँ पहिने रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ एकटा ट्वीटमे मोन पाड़लक। "तितली मास नै, पल गानैत अछि, से ओकरा लग समये समय छै।" एनी एर्नौ पहिने आत्मकथात्मक उपन्यास लिखलन्हि मुदा शीघ्रे ओ मात्र आ मात्र संस्मरण लिखय लगलीह। ऐ बर्ख नोबेल पुरस्कार विज्ञानक क्षेत्रमे सेहो पुनः प्रकृतिक अनुकृतिक शोध लेल बहुत दिनक बाद देल गेल। २ कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथापर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी Five Stories- Kapileshwar Raut The snakebite, a local game which takes toll of a young boy, the old technique of farming and need for innovation, the feast of hermits, the language of animals, the little and great traditions, caste class and power, the feminism, rich and the poor, but no sign of despair, bold discussions on the epic stories, on cults, the language and vocabulary aptly used for describing all these, a language which is hard to translate as these things can be written in Maithili only ... Welcome to the mystical world of Parallel Literature in Maithili. Here you are reading five stories of Kapileshwar Raut which he has himself adjudged as his best. Kumari Bhojan (Feast for the Girl Child) begins in a festive atmosphere. During 10 day Durga Puja festival people bring special kind of glossy soil. The soil is used for making Earthen Mahadev and earthen lamp. The lady Siyawati got widowed when a snakebite took life of her husband. After three daughters a son was born to her. So he was very young as compared to his sisters. Siyawati got trapped in loan, as marriage of daughter costs much. And after all this description ensues a discussion which revolves round the actual meaning of tales, how a collective effort led to killing of Mahisasur. In Tharthari (Trembling) another discussion ensues, in a cold winter night, among the Zamindar and the tillers. And the setting is the open-land where Zamindar visits to oversee how the farming is being carried out. Barka Kheera (The big cucumber) delves deep into traditional and modern knowledge in carrying out farming. The boy who wandered calling ihait-ihait (a call to male animal for conjugation of their female cow or buffalo for procreation) became an agricultural scientist. The story Punarnava will remind you of "Jalikattu" game of Tamilnadu. During Jurisheetal festival a game of man-to-man combat causes a death and Basuni gets widowed. The feminists will search for the theories of feminism when the women starts taking decisions. And finally in "Bhumhur Aagi" you will again get test of local culture. The caste layers ... Chetan Das is from Mushar community. He got in touch with a hermit from Keot caste and became a hermit himself. He went to Ajab Das, who is apt in singing devotional songs, for inviting him for a grand feast meant for the hermits. But he puts conditions.. and Vivek Kumar says that it is all stratification, even he or Chetan Das would put the same conditions in case of people below in hierarchy. १.२. अंक ३५५ पर टिप्पणी जितेन्द्र झा, रिटायर्ड अधीक्षण अभियन्ता, बिहार सरकार पञ्जीक पातक डिजिटलाइजेशन काज अद्भुत अछि। विद्यार्थी सभ लेल एतऽ प्रचुर सामिग्री अछि। विदेहक समस्त काजक १० बर्ख बाद महत्व लोककेँ पता चलतै। अशेष शुभकामना। अशोक अविचल सार्थक डेग। साधुवाद। आशीष अनचिन्हार शंभु कुमार सिंह जीक कथा "थीमक खोज" लीकसँ हटि कऽ अछि। एहन कथा मैथिलीमे लिखल जेबाक चाही। समता कुमारी जीक आरो रचना पढ़बाक इच्छा अछि। २.गद्य खण्ड २.१.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.२.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.३.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.४.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.५.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- विचारक प्रबलता २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) २.९.आशीष अनचिन्हार- व्यंग्य- परंपरावादी भोजन (एक शोध) २.१०.प्रेमशंकर झा "पवन"- पशुधनक देवता संत बाबा कारू खिरहर २.११.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-४) २.१२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १३म खेप २.१३.डॉ शेफालिका वर्मा- पुरान टिहरीक दर्द (एकटा संस्मरण) २.१४.डॉ शेफालिका वर्मा-प्रवासी मजदूरक पीर आ मिथिला राज्य २.१.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक कपिलेश्वर राउत केर पाँचटा कथा कथा १

कुमारि भोजन मखनाक माए सियावती दुर्गापूजामे साँझ दइले केतौसँ एक पथिया चिकनी माटि अनने रहए। कलशथापनासँ पहिने एक दिन दूर्गा नोतल जेती आ ओही दिनसँ दूर्गास्थानमे साँझ-बाती पड़त। सियावती गरीब घरक स्त्रीगण रहए एकटा बेटा भेले रहै, बाप साँपकटीमे मरि गेलखिन। तीनटा बेटीए भेल रहैन। उमेर करीब पैसठ बर्खक रहैन। बोइन-बुता करि कऽ गूजर-बसर करै छेली। कोनो तरहेँ तीनू-बेटीकेँ बिआह केलैन। बेटी सभ सासुर बसए लगली। मखना जखनि बच्चे रहथि तहिएसँ दूर्गाजीकेँ पूजा करै छेलखिन। मनमे रहैन बच्चा सभ तरहेँ निरोग आ सूखी सम्पन्न रहत। मुदा तीनू बेटीकेँ बिआहक खर्चमे तेना ने कोढ़ तोड़ि देलकैन जे जमीन्दारक चंगुलमे फँसि गेला। जमीन्दार इन्द्रकान्त बाबू तेहेन ने चंठ जे जन बोनिहारकेँ गारि फजहैत, लोभ लालच कर्ज दऽ कऽ फसौंने रहै छल। तथापि सियावती अपन नेम-टेम नै छोड़ै छेली। जखनि बोइन-बुताक पैरूख नै रहलैन तँ बेसीकाल पूजे पाठमे बितबै छेली। बेटा मखना बोइन करि कऽ आनए तखनि गूजर करए। मखना छोट बेटा रहने बिआह नै केने रहए। बेटा धरि एतेक सपूत रहए जे माएकेँ माए बुझैत। अखुनका मजदूर जकाँ नै जे कमा कऽ अबै आ अदहासँ फाजिल ताड़ीए-दारूमे खर्च कऽ लैत। हँ ओकरा बीड़ी पीबैक आदति रहै, सेहो समैसँ। कलशथापनक बाद खष्टी दि‍न माने बेलनोती दि‍न, सप्तमीकेँ भगवतीकेँ डिम्‍हा पड़ैत। आँखि देला पछाति अष्‍टमी दिन निशाँपूजा होइए। नमीकेँ साँझमे जखनि सियावती साँझ दऽ कऽ एली तँ संजय पुछलकैन- "काकी, तूँ तँ सभ दिन दूर्गास्थान साँझ दइले जाइ छीही। कह तँ साँझ दइकाल भगवतीसँ कि सभ कहै छीही?" सियावती बजली- "तूँ की बुझबिहिन, अखनि नेना छँह।" संजय- "नै दादी कहए पड़तो, कह ने हमहूँ दूर्गाजीसँ माँगि लेब।" सियावती- "नै, नइ कहबो।" संजय- "नै, कहए पड़तौ।" दुनूमे जिद्दम-जिद्द भऽ गेल। अन्तमे सियावती कहए लगलखिन- "की कहबै, कहै छिऐ जे हे दूर्गा महरानी धिया-पुताकेँ समांग दिहेँ, विद्या दिहेँ, धन दिहेँ, सम्‍पति दिहेँ, हमरो निरोग रखिहेँ। सएह सभ कहै छिऐ।" संजय बाजल- "दादी गै, बिना कोनो काज केने सभटा दूर्गाजी दऽ दइ छथिन, तँ तोरा की भेलौं जे नेम-टेम आकि पूजा-पाठ करै छीही, से तँ आइ तक जवानीसँ बुढ़ापा ओहिना छौ। तोहर दिन किए अदिन भेल छौ?" सियावती बजली- "रौ छौड़ा, तूँ बड़ पाखंडी छँह। एक्को रती बजैत लाजो-सरम ने होइ छौ!" संजय- "नै दादी, तोहीं कह ने एतेक पूजा-पाठतँ भरि जनम करैत एलँह मुदा तइसँ की भेलौ?" सियावती जेना दिनेमे तरेगन गिनए लगली। किछु बजबे ने करै छेली। चूप देखि संजय पुछलकैन- "बौक किए भऽ गेलेँ। कौल्हका एकटा घटना दूर्गास्थानक कहै छियौ। काल्हि‍ मिठुआक माए दुलारी ब्राह्मण भोजन आ कुमारि भोजन करबैले दूर्गास्थान आएल छल। ओकरा अपना घरमे चूड़ा लेल अगहनीओ घान नै छेलै तँ रतीबाबूसँ कर्जा उठा‍ कऽ एक पसेरी धान सूदिपर अनने छल ओकरा अपनेसँ चूड़ा कुटलक आ पचीस रूपैए किलो महिंसक दूध तीन किलो अनलक आ दही पौड़लक। दोकानसँ चीनी अनलक आ काल्हि‍ अष्टमी दिन ब्राहमण भोजन आ कुमारि भोजन करेबैले गेल छल। संग लागल पोता वीरेन्द्र सेहो गेल छेलै जेकर उमेर बारह साल आ पोती डोली जेकर उमेर आठ साल छेलै ऊहो गेल छल। दूर्गास्थानमे कुमारि भोजन, ब्राह्मण भोजन, बटूक भोजनक एतेक ने भीड़ छेलै से कहल नै जाए! एक-एकटा ब्राह्मण कुमारि बटूक दस गोटेक नोत मानने छल दक्षिणाक लोभमे जेना उजैहिया चढ़ल होइ! भेल ई जे दुलारी जखनि अपना पुरहीतकेँ ठौंपर नारक बि‍ड़ी बना कऽ दूटा कुमारि, दूटा बटुककेँ केराक पातपर चुड़ा, दही, चिन्नी दऽ भगवतीकेँ भोग लगौलहा लड्डू दू-दूटा दऽ जखनि ओ लोकैन भोजन करए लगलखिन आकि पोती डोली कहए लगलै दादी हमहूँ चुड़ा-दही खेबौ। आकि दुलारी पोतीकेँ गालेपर एक चमेटा लगा देलकै आ बाजलि, चूप पहिने ब्राह्मण भोजन हेतै आ उगरतै तब तोरो देबौ। पोती हवो-ढेकार भऽ कऽ कानए लगलै। बकर-बकर मुहोँ तकै आ कनबो करए। एम्हर पुरहीत आ कुमारि बिना किछु सोचने निर्लज जकाँ खाइत रहल। एकोरती दया नै एलै डोलीपर! सवाल ठाढ़ भऽ जाइत अछि, तँए तूहीं कह, की डोली कुमारि नै भेल? की वीरेन्द्र बटूक नै भेल? जखनि कि शास्त्रो-पुरानमे लिखल अछि दस बरख यानी रजस्वबाला होइसँ पहिने कोनो जातिक लड़की कुमारि अछि। कुमारि भोजन करौल जा सकैत अछि। ई तँ कुमारि भोजनबला भेलौ गै दादी, एकटा और घटना देखलिऐ जे किछु स्त्रीगण धनुक टोलीक आ किछु स्त्रीगण बरई टोलक अपने धिया-पुताकेँ लऽ कऽ कुमारि भोजन ओही दूर्गास्थानमे करौलक। ब्राह्मणो सभ तँ अपने धिया-पुताकेँ कुमारि भोजन करबैत अछि। कह तँ ऐमे कोन पेँच छै जे ब्राह्मणेटा केँ धिया-पुताकेँ कुमारि आ बटूक कहल जाइत अछि?" "रौ संजय, कहै तँ छीही ठीके।" संजय फेर कहए लगल- "गै दादी, जइ दू्र्गाकेँ तूँ एतेक नेम-टेमसँ अर्चना करै छीही तेकरा बारेमे किछु बूझितो छिहिन आकि भेड़ि‍या धसान जकाँ सभकेँ देखै छिही तँए तहूँ करए लगैत छँह?" सुन महिषासूर, शूंभ, निशूंभ तँ एहेन आतातायी राजा छल जे केकरो बौह-बेटीकेँ इज्जत आबरू लूटि लइ छेलै। पहुलका रजो-महाराजो सभ एक-एक सए धौरबी रखै छल। तहिना अखुनका नेता आ बड़का अफसर सभ होइए। बहुत कमे नेता आ अफसर आकि जनता धोल पखारल भेटतौ। तेहने छल ओ महिषासूर, शूंभ, निशूंभ। जखनि बड़ अति‍याचार, बेवि‍चार राजमे बढ़ले आ लोकक नाकपर ठेकि‍ गेलै तखनि जा कऽ केकरो एकटा लड़की जनम लेलक ओ जनमि‍ते जेना प्रतिभाशाली छल, जेहने देखैमे सुन्दर तेहने काजोमे फूर्तिला जखनि जवानीपर एलै तखनि महिषासूर ओकरोपर अपन खराप नजरि‍ दौड़ौलक, मुदा ओ युवती इटक जवाब पत्थरसँ देलकै। जेतेककेँ महिषासूर सतौने छल ओ सभ ओइ युवतीकेँ संग देलक तँ देखै छिहिन दूर्गाकेँ दसटा हाथ छै आ सभ हाथमे अस्त्र छइ। सबहक सहयोगक प्रतीक छिऐ। जखनि सभ मिलि कऽ महिषासूरपर चढ़ाइ केलक तँ केतेक दिन तक लड़ाइ चलल अन्तमे महिषासूर मारले गेल। एम्‍हर जे महिषासूरक किला छेलै तेकरा ओ युवती ढाहि देलकै। तब ने ओइ युवतीकेँ नाओं दूर्गा राखल गेल। दूर्गाक लड़ाइ दस दिन तक चलल। संगठनेमे ने शक्ति होइ छइ। सएह शक्‍तिकेँ माने दूर्गाक पूजा होइ छइ।" सियावती बजली- "रौ बौआ, एना फरिछा कऽ कहाँ कियो अखनि तक कहलक हेन।" संजय बाजल- "गै दादी, केतेक कहबो। ओ सभ बुधियार छल, आगू बढ़ल। ओकरा सबहक तुलना करैमे धिया-पुताकेँ पढ़ा-लिखा अपना कर्मपर बिसवास करैत गेल। ओकरा पछुअबे ले तँ खिहारए पड़तो कि‍ने। ई जे साँझ दइ बेरमे कहै छिहिन से की केतौ राखल छै जे तोरा दऽ देतौ। तोहीं कह जे केतोसँ चिकैन माटि लऽ अनलेँ फटलहा कपड़ाकेँ बाती बना करूतेलमे भिजौने एलही आ एकटा अगरबतीसँ दूर्गास्थान साँझ दइले चलि गेलेँ। खरचा भेलौं चारिओ आना नै आ मांगि लेलहिन लाखोक सम्‍पति। केतएसँ भेटतौ। समाजमे जे अगुआएल अछि पहिनेसँ आ अखनो अछि ओ सभ अपना सुख-सुविधा लेल जाल बुनने अछि। अमरूख समाजक लोककेँ दिशाहीन बना कऽ अपन गोटी लाल करैए। हमहूँ तँ बूझि-सूझि कऽ कखनो काल भँसिआइए जाइ छी। जाति-धर्मक नाओंपर कोठलीमे कोठली छइ। जेतेक जाति तेतेक देवता। बड़काकेँ बड़का देवता, छोटकाकेँ छोटका देवता भरल अछि।" सियावती बजली- "ठीके कहलेँ बौआ, आब सोचि-समझि कऽ कोनो काज करब।" संजय कहए लगल- "गै दादी, भोजन-भात आकि रहन-सहन ने स्वर्गक रहब छिऐ। हम तूँ तँ कठपुतली जकाँ जेना-जेना नचबै छौ तेना-तेना नचै छेँ। तँए ने कहबी छै कमए लंगोटीबला आ खाए धोतीबला। तँए कहबौ, खूब कमा-खटा खूब खो-पी, धिया-पुताकेँ पढ़ा-लिखा जखनि धिया-पुता पढ़ि-लिखि‍ लेतौ आ नोकरी-चाकरी आकि‍ अपन काज-धंधा भऽ जेतौ तँ अपने देखबिहिन जे स्वर्गक भोग कऽ रहल छी। सूखे ने जिनगी छिऐ। कुमारि भोजन करा आकि‍ पूजा-पाठ कर, तीर्थ-बि‍र्त कर, नेम-टेम कर सभटा अपने बुधिए-विवेके काज देतौ। केकरो कष्ट नै दहिन, जहाँ तक भऽ सकौ केकरो उपकारे कऽ दहिन सएह सभसँ पैघ घर्म छिऐ। कोन झूठ-फूसि‍क फेड़मे पड़ल रहै छँह।" सियावती बजली- "रौ बौआ, एतेक जे पूजा-पाठ आकि धरम-करम होइ छै सभ झूठे छिऐ की?" संजय पुन: कहए लगलै- "गै दादी, सोझ शब्दमे बुझही जे अन्‍हारसँ प्रकाश दिस आनै सएह भेल पूजाकेँ शाब्दि‍क अर्थ आ नीके काज ने धर्म होइ छइ। भगवानक केतौ अन्तए छै ओ तँ तोरा हमरा आत्मामे बसै छथिन। वेद तँ बेवहारीक ज्ञान छी, शास्त्र-पुराणमे लिखल अछि जे भगवान कण-कणमे बास करैत अछि तँ कि हमरा तोरा छोड़ि क?" ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक कपिलेश्वर राउत केर पाँचटा कथा कथा २

थरथरी ओना तँ ऋृतु छहटा होइत अछि‍। गृष्‍म, वर्षा, शरद, हेमन्‍त, शि‍शि‍र आ वसन्‍त। मुदा बेवहारमे लोक तीनटाकेँ मानै छै गरमी, वर्षा आ जाड़। सभ ऋृतुकेँ अपन अलग-अलग गुण अवगुण होइ छइ। मुदा जाड़केँ एकटा अपन अलगे गुण अवगुण अछि‍। कोन भगवान जाड़केँ जनम देलैन‍ से नै कहि‍। आन ऋृतुमे तँ लोक हर्ष-वि‍षम, रंग-रभस आ वर्षाक फूहारक आनन्‍द लऽ कऽ बिता दइ छइ। मुदा जाड़ तँ कोढ़केँ कँपा दइ छइ। गरीब लेल मारूख आ धनि‍कक वास्‍ते वि‍‍लासक ऋृतु बनि जाइए। घुटर एक दि‍न एहने समैमे सुरेशबाबूक खेत जे मनखप केने छल पटबैले गेल। समए छेलै माघ मासक शुरूआतक। जहि‍ना २००३ई.मे शीतलहरी छेलै तहि‍ना अहू बेर भेलै। पछि‍या बोहैत जाड़ सुसकारी दैत रहए। सुरूजो भगवान केतए नुका रहला तेकर ठेकान नहि। कुहेस लागल रहए। पानि‍क बून जकाँ वर्फ झहरैत रहए। लोक हरिदम घूरे लग आगि तपैत रहै छल। ठि‍ठुरल घास-पात खेलासँ माल-जालकेँ पीठ पाँजर बैस गेलै। आ बिमारो पड़ए लगल। तन्नुक चि‍ड़ै-चुनमुनी सभ जहि‍ंपटार मरए लगल। साँप सभ कोनो बीलमे तँ कोनो आड़ि‍क कातमे मूइल पड़ल। जीनाइ लोककेँ कठीन भऽ गेलै। एक पनरहि‍यासँ जे शीतलहरी चलल से लदले रहि गेल। एहने समैमे घुटर मनखप गहुम केने छल। तेकरा पटबैले बोरिंगबला जोखन संगे विदा भेल। बोरिंगमे जखनि पम्‍पसेटसँ पानि‍ धराबए लगल पानि‍ धऽ लेलके। पलास्‍टि‍क पाइपसँ पानि‍ लऽ गेनाइ छेलै से जहाँ कि‍ पाइप पम्‍पसेटमे धराबए लगल आकि‍ पानि‍ दोसर दि‍सामे फूच्चूका मारलके आकि‍ घुटर आ जोखन दुनू गोटाकेँ भीजा देलके। तथापि‍ कोनो तरहेँ पाइपकेँ बान्‍हि‍ लेलक। जाड़े दुनू गोटे थरथर काँपए लगल। घुटर खेत जा एक किआरीमे पानि‍ खोलि‍ देलके। आ आगिक जोगारमे घुटर बगलमे कलमवाग छेलै ओतए नार राखल छेलै जइमेसँ एक पाँज नार थरथराइते अनलक। आब जखने सलाइसँ आगि धराबऽ लगल आकि‍ तेहेन जाड़ होइत रहै जे सलाइक काठी खर्ड़ले ने होइत होइ। थरथरीसँ सलाइक काठी मुझा जाइत। जँ कठीमे आगि धरे तँ नारमे धरबेकाल मि‍झा जाइ। खाएर, कोनो तरहेँ आगि धरौलक आगि धधका दुनू गोटे आगि तापए लगल। थोड़ेक काल पछाति होश भेलै। सुरेशबाबू खेत देखैले वि‍दा भेला। पएर लग तक कोट देने, पएरमे मोजा-जुत्ता लगौने, जाँधमे ट्रोजर देने कानमे मोफलर लगौने तैपर सँ माथमे टोपी देने आँखिओमे चश्‍मा छेलैन‍। तैयो जाड़े थरथराइत छला। जखनि बोरिंग लग एला तँ देखलखि‍न जे दुनू गोटे आगि तापि‍ रहल अछि‍। सुरेशोबाबू हाथ महक दस्‍ताना नि‍कालि आगि तापए लगला। आ बजला- "घुटरा केहेन समए भऽ गेलै जे केतनो कपड़ा देहमे देने छि‍ऐ तैयो जाड़ जेना जाइते ने अछि‍। तूँ सभ केना कऽ रहै छीही।‍" घुटर बाजल- "यौ मालिक, गरीबक जि‍नगी कोनो जि‍नगी छि‍ऐ। एक तँ दैवि‍क मारल छी, दोसर सरकारोक बेवस्‍था तेहेन ने छै जे की कहब। कमाए लंगोटीबला आ खाए धोतीबला।‍ देहमे देखै छि‍ऐ जेतने कपड़ा अछि‍ तइसँ राति‍क जाड़मे गुजर करै छी। घरवाली परसौती भेल अछि‍। एकेटा रहैक घर अछि‍। दोसर बकरी आ गाएले अछि‍। तइमे एक कोनमे जारनि‍-काठी रखै छी। सेहो बकरीबला घरक टाट टुटल अछि।‍" सुरेशबाबू बजला- "तब तँ बर दि‍क्कत होइत हेतौ?" घुटर- "यौ मालि‍क, की कहौं। खएर जाए दि‍यौ। हमरा सभले तँ एकटा ऊपरेबला छैथ‍‍। मुदा हे एकटा बात कहै छी जे केतनो अहाँ सभ कपड़ा लगाएब, बि‍जलीक गरमीमे रहब मुदा तीनबेर अहूँ सभकेँ जाड़ पछारबे करत।" सुरेशबाबू अकचकाइत पुछला- "केना रौ।‍" घुटर- "नै बुझै छि‍ऐ, नहाइ, खाइ आ झाड़ा फि‍रै कालमे।‍" सुरेशबाबू- "ठीके कहै छेँ।‍" घुटर- "मालि‍क, हमरा सभकेँ कोन अछि‍। खूब मोटगर कऽ लार बीछा दइ छि‍ऐ तैपर सँ कुछो बी‍छा दइ छि‍ऐ आ चद्दैर ओढ़ि‍ लइ छी आ तखनो जँ जाड़ होइए तँ झट्टासँ बनेलहा पटि‍या-गोनरि ओढ़ि‍ लइ छी। बगलमे गोरहन्नी आ खड़ड़न-मड़ड़नकेँ ओरिया कऽ रखने रहै छी नै भेल तँ ओकरो पजारि दइ छि‍ऐ। भरि राति‍ सुनगैत रहल घर गरमाएल रहल। अहाँकेँ तँ बुझलै हएत जे बोरैसक आगि केहेन होइ छइ। ठाठसँ सुतै छी।‍" सुरेशबाबू- "तहन तँ एअर-कण्‍डीशन‍ बना कऽ घरमे रहै छेँ। बड़ नीक अहि‍ना जाड़सँ बँचैक कोशि‍श करिहेँ। नै तँ सत्तो डाक्‍टर जकाँ हेताै, वेचारा कालिखि‍न पैखानासँ आएल, कलपर कुरूड़ करिते रहए आकि‍ ठंढ़ा मारि देलकै। टांगि-टुंगि कऽ डाक्‍टर लग लऽ गेलै। तँए कहलियो जे जाड़सँ बँचि‍ कऽ रहिहेँ। बकरी आ गाएकेँ सेहो झोली ओढ़ा कऽ रखि‍हेँ।" मुड़ी डोलबैत घुटर बाजल- "ठीके कहै छी मालि‍क।" सुरेशबाबू- "रौ घुटर, धियो-पुतोकेँ हाँटि-दबारि दि‍हैन जे ठंढ़ासँ बँचि कऽ रहतौ।‍" घुटर- "से छौड़ा मानि‍ते ने अछि‍। खन गुल्‍ली डण्‍टा, खन क्रि‍केट तँ खन कबड्डी खेलाइत रहैए। की करबै। हम तँ कहबे ने करबै मालि‍क।‍" सुरेशबाबू- "सएह हम कहबो ने।‍" घुटर- "हम तँ भरि दि‍न काज-धन्‍धामे लागल रहलौं। अहीं सबहक बँसबि‍ट्टीमे बाँसक ओइद उखारि चीर-फार कऽ लइ छी। जइसँ देहमे घाम फेकैत रहैए।‍ आ राति‍ कऽ बौरेसबला आगि गरमेने रहैए।" सुरेशबाबू- "ठीक करै छेँ। जान छौ तँ जहान छौ।‍ शरीर नै तँ कि‍छु नहि। अच्‍छा एकटा कह जे योगासन करै छेँ आकि‍ नै?" घुटर- "यौ मालि‍क, हम मूर्ख आदमी की जानए गेलि‍ऐ‍ योगासन आकि‍ परनियाम। हमरा सभले देहे धूनब योगासन आ परनि‍याम होइ छइ। खटनीए सँ ने देह दुहाइत रहैए।" सुरेशबाबू बजला- "ईहो बात ठीके छौ।‍" घुटर- "मालि‍क अगहनमे मारि-धुइस‍ क‍ऽ कमेलौं, खूब धान कटलौं जइसँ घरमे एक कोठी धानो अछि‍ आ थोड़ेक चाउरो अछि‍। खेतसँ खेसारी साग, बथुआ साग, सेरसो साग, तोरी साग सबहक तीमन कऽ लइ छी। कहि‍यो काल अल्‍लू, कोबी, भाँटा, मुरै सेहो सबहक तीमन खा लइ छी आ बम-बम करैत रहै छी।" सुरेशबाबू- "तहन तँ नीके वस्‍तु सभ खाइ छेँ।‍" घुटर- "अहाँ सभ जकाँ की अण्‍डा, मौस-तौस आकि‍ दूध-दही हमरा सभकेँ भेटै छइ। हमरा सबहक देह तँ बैशाख-जेठक रौद, भादवक वर्षा आ माघ मासक जाड़सँ ठाेकाएल-ठठाएल अछि‍। अहाँ सभ जकाँ की गाइद परहक बाँस जकाँ मोटगर नै ने अछि‍ जे तागत कि‍छु ने। केहनो भीरगर काज देखा दि‍अ कऽ देब।‍ हँ अहाँ सभ जकाँ पोथी-पतरा नै ने पढ़ने छी। थमहू खेत देखने अबै छी।" कहि‍ खेत आबि‍ दोसर किआरीमे पानि‍ खोलि‍ फेर घूर तर चलि‍ आएल आ गप-सप्‍प करैत बाजल- "यौ मालि‍क, अहाँ सभ जकाँ की हमरा सए बीघा खेत अछि‍। लऽ दऽ कऽ अपन दस कट्ठा खेत अछि‍। कनीमे तरकारी-फड़कारी, कनीमे दलि‍हन-तेलहन, कनीमे साग-पात केने छी। धान-गहुम तँ अहीं सबहक खेतमे मनखप कऽ के गुजर करै छी।‍" सुरेशबाबू- "एकटा कहाबत छै जे लड़ा-चड़ा धन पाइए बैठे देगा कौन। हे बड़ जाड़ होइ छै जल्‍दी खेत पटा ले आ घरपर जो। हमहूँ आब अधि‍क घूम-फिड़‍ नै करब घरेपर जाइ छी।‍" घुटर कहलक- "जँ गपे-सप्‍प करै छी तँ एकटा गप औरो सुनि‍ लि‍अ। हम तँ पंजाब-भदोही आकि‍ दि‍ल्‍ली-बम्बइ नै ने कमाइले गेलौं। देखै छि‍ऐ जे ढबाहि‍ लागल लोक देासर मुलुक जाइत अछि‍। हँ ओतएसँ पाइ तँ अनैए मुदा परिवारसँ हटल रहैए। जबकि‍ सरकारो खेतीपर वि‍शेष धि‍यान देलकै हेन। खेत अफर-जात पड़ल अछि‍ केनि‍हारक चलैत। कम उपजा भेने तंगी तँ बढ़बे करत गाममे माए-बाप से हकन कानै छइ। मालिक अहीं अपन दशा देखि‍ओ ने, एते खेत अछि‍ आ धि‍या-पूता सभ वि‍देशमे नोकरी करैए। मालकि‍न बूढ़मे कन्ना कऽ भानस भात करैत हेती से वएह जनैत हेती।‍" सुरेशबाबू बजला- "से तँ ठीके कहैत छेँ। कखनो कऽ हमरो मनमे होइत अछि‍ जे कथीले एते कमेलौं आ एते जमा केलौं।‍ अच्‍छा छोर ई सभ बात। हम जाइ छियौ।" कहि‍ सुरेशबाबू घर दि‍स वि‍दा भेला। आ घुटर अंति‍म किआरीमे पानि‍ काटए लगल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक कपिलेश्वर राउत केर पाँचटा कथा कथा ३ बड़का खीरा कहबी अछि, पुरुखक भाग आ स्‍त्रीक चरित्र कखन‍ बदैल‍ जाएत तेकर कोन ठेकान। सएह भेलै जुगुतलालक जिनगीमे। करिया काकाकेँ तीनटा बेटीपर सँ एकटा बेटा भेलैन‍। पहिल पुत्र भेने परिवारमे खुशीक माहौल बनि गेल। छठिहारे दिन पमरिया तीन गोटेसँ आबि ढोलकी-कठझालि आ मजिरा लऽ अँगनामे नाचए लगल। केना ने पमरिया अबैत ओहो तँ गामक चमाइन आ अड़ोसी-पड़ोसीसँ सूर-पता लगबैत रहैए। से भनक लगिते पहुँच गेल। कखनो बधैया गीत तँ कखनो सोहर, कखनो समदौन गाबए लगल। अँगनामे लोकक भीड़ लागि गेलइ। करिया काका कोनो तरहेँ एक सए रूपैआ आ सबा किलो अरबा चाउर निछौरमे दऽ पमरियाकेँ विदा केलैन‍। कियो पड़ोसी टीप देलकैन‍- "भाय साहैब पत्‍थरपर दुभि जनमल हेन तँए दसटा साधु-सन्तकेँ आ अड़ोसी-पड़ोसीकेँ नोत दऽ भोज-भात खुआएब, जइसँ बच्चाकेँ असिरवाद देत तँ बच्चाकेँ नीक हेतइ।" करिया काका बजला‍- "ठीक छइ।" छठिहारक रातिमे दसटा साधु-सन्तकेँ आ दसटा अड़ोसियो-पड़ोसीकेँ नोत दऽ भण्‍डाराक इन्तजाम केलैन‍। छठिहारक विधि-बेवहार भेला बाद दादा-दादी बच्चाक नाओं रखलैन जुगुतलाल। विहान भेने लौअनियाँकेँ साड़ी-साया-बेलौज आ एक सए टाका दऽ विदा केलैन‍। करिया काकाकेँ मात्र एक बीघा खेत। चारि कट्ठा चौमास बाँकी धनहर। कोनो दू-फसिला तँ कोनो एक-फसिला। खेतीक नव-नव तरिका एलाक बादो करिया काका पुरने ढंगसँ खेती करैथ‍। छह-सात गोटेक परिवार लेल बीघा भरि खेत कम नै भेल। जँ खेती करैक ओजार आ पानिक साधन रहए। वैज्ञानिक तरिकासँ खेती करैक लूरिक अभाव छेलैन‍ करिया काकाकेँ। तैपर सँ प्रकृतिक प्रकोप सेहो। कोनो साल दाही तँ कोनो साल रौदी अलगे तबाह केने। तथापि परिवारकेँ कोनो तरहेँ खिंचैत चलै छला। गामोक लोक सभ पुरने ढंगसँ खेती करैत रहए। परिवार मात्र सात गोटेक। अपने दुनू प्राणी, पिता रामधन आ माता-सुमित्रा, आ तीनटा धिया-पुता। एकटा बेटी सासुरे बसैत। करिया कक्काक मन छेलैन‍ जे बेटा पढ़ि‍-लिखि कऽ ज्ञानवान बनए, मुदा अपना सोचलासँ की हएत। जेकरा प्रति हम जे सोचै छी तेकरो मन आ लगन ओहेन होइ तखन‍ ने। जहिना जेठुआ हाल भेने किसान तँ धानक बीहैन‍ खेतमे खसा लैत अछि आ रौदी भेलापर वएह बीहैनकेँ काटए पड़ै छइ। सएह हाल करिया काकाकेँ भेलैन‍। बेटा जुगुतलालकेँ पढ़ैले स्‍कूल पठबैत छेलखिन। मुदा जुगुतलाल स्‍कूल जाइक बदला रस्‍तेमे कहियो कबड्डी तँ कहियो तास-तास तँ कहियो गोली-गोली खेलए लगैत। अवण्ड जकाँ करैत रहए। चालि-चलैन केहेन तँ केहनो फुनगीपर पाकल आम किए ने होइ जुगुतलालक लेल तोड़नाइ बामा हाथक खेल छल। केकरो बाड़ी-झाड़ीमे लतामक गाछसँ लताम कहुना तोड़ि‍ संगी-साथीकेँ खिआ दइत। कोनो चिड़ै-चुनमुनीक खोंता उजारि अण्‍डाकेँ छुबि सड़ा दइत। कियो गाए वा भैंसकेँ पाल खुअबैले विदा हुअए आ जुगुतलाल जँ देखैत तँ ओकरे संग लागि इहैत-इहैत करैत घुरए। गैवार-भैंसवारसँ कहबो करैत नीक साँढ़-पारासँ पाल खुआउ जइसँ बाछा हुअए आकि बाछी, पारा हुअए आकि पारी नीक नश्‍लक हएत, दुधगर माल हएत, नहि तँ पुष्टगर बाछा वा भैंस हएत। एवं तरहेँ कोनो ने कोनो उपराग, उलहन माए-बापकेँ सभ दिन सुनए पड़ै। तंग भऽ गेल माए-बाप। जुगुतलालक उमेर आब बारह-चौदह बर्खक भऽ गेल छल। जहिना पहिल सीख केकरो माए-बापसँ भेटै छै, दोसर सीख समाजसँ आ तेसर स्‍कूल आ देश-विदेशसँ भेटै छै, तइमे जेकर बुधि, विवेक, ज्ञान जेहेन रहै छै से अपनाकेँ ओइ रूपमे ढालि लइए। मुदा जुगुतलाल लेल धनिसन। ठेलि-ठुलि कऽ सतमा तक पढ़लक। किएक तँ सरकारो दिससँ मास्टर सभकेँ आदेश भेटल छै जे ’केकरो फेल नै कएल जाए।’ समए बीतैत गेल, जखन‍ जुगुतलाल सोलह-सतरह बर्खक भेल तँ माए-बाप सरस्वती कुमारी नामक लड़कीसँ बिआह करा देलकै। करिया कक्काक मनमे रहैन‍ जे बिआह करा देबै तँ कहीं पत्नी एलासँ सुधरि जाएत। मुदा भेलै उलटा बिआहक बाद तँ जुगुतलाल मोबाइल लऽ हरिदम गीते-नादक पाछू अपसियाँत रहए लगल। माए-बाप सोचैथ‍ जे उझट बात आकि एक थप्पर मारि देबै आकि हाँट-दबार करबै तँ कहीं केतौ भागि ने जाए। मन मसोसि कऽ रहि जाए। संयोग भेलै एक दिन रमेश- जुगुतलालक पित्ती- एकटा बिजू आमक गाछक थल्‍ला काटि‍ रहल छला। जुगुतलाल देखैत छल। देखलक जे बिजू आमक थल्‍लाकेँ कलकतिया आमक गाछ लग गाड़ि‍ देलकै आ कलकतिया आमक नीचला डारिकेँ चक्कूसँ कनियेँ छीलि कऽ आ सरहीकेँ सेहो छीलि दुनूकेँ सटा कऽ बान्‍हि‍ देलकै। कनी दिनक पछाति बिजू मुड़ीकेँ बन्‍हलाहासँ कनी ऊपर काटि‍ देलकै। आब भऽ गेल सरहीसँ कलमी। जुगुतलालक माथामे जेना चोट पड़लै। जहिना माघक शितलहरीमे कड़गड़ रौद उगिते सभ रौद तापए दौगैत अछि, तहिना जुगुतलालकेँ भेलइ। बाड़ीमे चारिटा सजमैनक गाछ तीन-चारि हाथक भेल छेलै कनियेँ हटि‍ कऽ तीन गो खीराक लत्ती छेलै ऊहो दू तीन हाथक भेल छेलइ। सजमैन आ खीरा, दुनू लत्तीकेँ सुतरीसँ बान्‍हि‍ देलकै। जड़ि‍क बगलमे सड़लाहा गोबर दऽ माटि‍ चढ़ा देलकै। पिता तँ पहिनै खेतकेँ एकसलिया गोबर सड़ा कऽ छीटने छला आ खेत तैयार केने छला। कीड़ाक प्रकोप द्वारे पहिने नीमक पत्ताकेँ सड़ा, तमाकुलक डाँटकेँ डाहि, गाइयक गोंतक संग मिला कऽ खेतमे छीटने छला। सजमैन आ खीरा दुनूक लत्ती भोगगर भेलइ। बरसातक बुढ़ापाक समए छल। पानिक जरूरत कमे पड़लै। जाबे अपन मन कोनो काजक दिस आगू नै बढ़त, ताबे अनका जोरे-जबरदस्तीसँ बुधिक गठरी नै ने खुलै छइ। बीस-पचीस दिनक बाद सजमैनक मुड़ीक बन्‍हलाहाकेँ एक ठुट्ठी ऊपरसँ काटि‍ देलकै आ खीराक मुड़ीकेँ रहऽ देलकै। नीक जकाँ जखन‍ गाछ लागि गेलै आ फूल-बतियाक समए एलै, तखैन‍ गाछक जड़ि‍मे डेढ़ बीत हटा कऽ डी.ए.पी खाद लगभग सए ग्राम सेहो छीटि‍ देलकै आ थोड़ेक पानि देलकै। एक-एक हाथसँ ऊपरेक खीरा फड़लै। अड़ोसी-पड़ोसी मचानसँ लटकल खीरा फड़ल देखै तँ बिसवासे ने होइ जे खीरा छिऐ आकि कैता आकि सजमैनक बतीया। मुदा जखन‍‍ लग जा कऽ देखै तँ छगुन्‍ता लगि जाइ। पिताकेँ फुट्टे छाती जुड़ाइ जे आब बुझि पड़ैए जुगुतलाल सुधरत। सरकार दिससँ ओही साल मधुबनी स्‍टेडि‍यममे फल-फूल, तरकारी-फड़कारीक प्रतियोगिता, जिला स्‍तरपर आयोजन कएल गेल छल। सरकारक उदेस छल हरित क्रान्ति‍ दिस किसानकेँ प्रोत्साहित कऽ देशकेँ आगू बढ़ेबाक। जिला भरिक किसान अपन-अपन जे नीक कदीमा, सजमैन, मुरै, ओल, मिरचाइ इत्यादि सभ तरहक तरकारी लऽ लऽ पहुँचल छल। सभ कियो अपना-अपना आगूमे जेकर जे सामान छेलै से लऽ कऽ बैसल छल। मुरैए छेलै तँ दू-दू हाथक, सजमैने छेलै तँ दू-दू हाथक, कदीमे छेलै तँ तीस-तीस-चालिस-चालिस किलोक, ओले तँ पनरहसँ बीस-बीस किलोक। मिरचाइयोक गाछ छेलै तँ एक हाथक गाछ आ लुधकी लगल मिरचाय फड़ल, फूले रहै तँ रंग-बिरंगक। रंग-बिरंगक दोकान जकाँ फल, फूल सजौल छल। जुगुतलाल सेहो अपन तीनटा खीराकेँ लटकौने छल, बाँकी पथियामे रखने छल। खीरा देख ‍-देख ‍ एके-दुइए देखनिहारक भीड़ लगि गेल। पूसा फार्मक कृषि‍ वैज्ञानिक सभ सेहो छला। ऊहो लोकैन‍ जुगुतलालक खीरा देखलैन‍। हुनको सभकेँ छगुन्‍ता लगि गेलैन‍। जुगुतलालक संग राय-मसबीरा केलैन‍। स-विस्‍तार जुगुतलाल खीराक उपजाक बारेमे कहलकैन‍। अन्तमे पुरस्कारक बेर जिलाधिश महोदय घोषणा केलैन‍ जे खीराक उपजामे प्रथम पुरस्कार जुगुतलालकेँ देल जाइए। अही तरहेँ केकरो अल्‍लू, तँ केकरो कदीमा, तँ केकरो सजमैनमे, जेकर जेहेन बौस रहै तेहेन पुरस्कारक संग प्रशस्ती-पत्र देल गेलइ। पूसाक वैज्ञानिक, जुगुतलालकेँ संग लऽ पूसा फार्म लऽ गेलखिन। आ फार्ममे कृषि उन्नैत‍ खोज विभागमे कोनो पदपर पदस्थापित कऽ देलकैन‍। शनि-रविकेँ अठबारे जुगुतलाल गाम आबए, फार्ममे नीक-नीक तरकारी आ फल-फूल, धानक बीज इत्यादिकेँ उन्नैत‍ किसिमक सभ बनबऽ लागल। आइ वएह जुगुतलाल दस कट्ठा भीठबला जमीन खरीद रंग-बिरंगक कलमी आम गुलाबखास, अम्रपाली, सिकूल, सिपिया, गुलाब भोग आदि तैसंग गुल जामुन, बेल, धात्रीम, लताम, अनार, शरीफा इत्यादि रंग-बिरंगक फल सभ लगौने अछि। अपन चारि कट्ठा चौमासमे शोध केलहा कोबी, सजमैन, खीरा, मुरै ओल सबहक खेती करैत अछि। समाजोमे क्रान्ति‍ जगलै, देखौंस केलक तँ समाजक रंगे बदैल‍ गेलइ। करिया काकाकेँ जुगुतक खेती देख छाती तँ जुड़ाइये गेलै जे केतौ-केतौ बजबौ करथिन- "देखू, ढहलेलहा जुगुतलालकेँ, की करैत की भऽ गेलइ।" लोको कहै- "तँ ठीके, केलासँ की नै होइ छइ।" आब तँ जुगुतलालसँ जुगुतलाल बाबू भऽ गेल। भगवानोक लीला अजीव अछि, तइमे कर्मेक प्रधानता देल गेल अछि। कर्म करबै तँ फल निसचित भेटत। भाग भरोसे केतेक दिन जीब। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक कपिलेश्वर राउत केर पाँचटा कथा कथा ४ पुनर्नवा बसुन फूल डाली लऽ भोरे-भोर किरिण उगैसँ पहिने फूल लोढ़क लेल विदा भेली। घरेलग एकटा महादेवक मन्‍दिर छल। कनियेँ हटि कऽ दूर्गाक मन्‍दिर सेहो छेलइ। बसुनकेँ नियम छेलै भोरे व्रह्म मुर्हूतमे उठि नित्य क्रियासँ निवृत्त भेलाक बाद फूल आनि, स्‍नान कऽ भगवती आ महादेवक पूजा कऽ कोनो ने कोनो धर्मग्रन्थक गीता रामायण पाठ करी। तेकर कारण छेलै वेचारीकेँ बिआहक मासे-दू मासमे विधब होएब। आब ने विधवा बिआहक सुरूआत भेलै हेन, सती प्रथा बन्न भऽ गेल हेन, पहिने इ बेवस्था नै ने छेलइ। पहिने तँ पतिक मूइलाक बाद ओकरे संगे ओही अछियापर पत्नीयोँकेँ बलजोरी जरा देल जाइत छेलइ। नहि तँ उजरा साड़ी-साया-बेलौज पहिरा, हाथक चुड़ी फोरि, माँगक सिन्दुर मेटा एक बेर खेनाइ, किछु फलहारी केनाइ, परिवार छोड़ि कोनो दोसर मर्दसँ गप-सप्पपर प्रतिबन्ध लागल छेलइ। चन्द्रकला जे बसुनक माए छेली, ओ आइ बसुनक ई दशा देख बसुनसँ पुछलक भोरे केतए जाइ छी। फूल लोढ़क लेल बसुन बाजल। चन्द्रकलाकेँ कोढ़ फाटि गेलै, आँखिसँ नोर ढब-ढबा गेलइ। केना ने हएत। बसुनक बिआह 17 बर्खक उमेरमे केने छल। अखन बसुनकेँ जवानी चढ़ले छेलइ। गुलाबक कलीसँ फूल सन खिलल चेहरा गोर-नार देह कसल-कसल डेन-पाँखुर, तकरा उजरा नुआ पहिरने हाथ सून, माँग सून देख कऽ आँखिसँ नोर ढब-ढबा गेल छेलै कोंढ़ फाटि गेल छेलइ। बसुनोकेँ माइक चेहरा देख कऽ आँखिसँ नोर ढब-ढबा गेल छेलइ। फूलडाली नेने अक-बकाकेँ ठाढ़ भऽ गेल। जहिना एका-एक कोनो घटना-घटने ठकमुड़ी लागि जाइ छै तहिना ठाढ़ छल। दुनूकेँ दुनू देखैत मुदा बजैत कियो ने। कनीकालक बाद बसुन फूलडाली लऽ कऽ बिदा भऽ गेल। चन्द्रकलाकेँ बेटीक बिआहसँ लऽ कऽ आइ तकक घटना मोन पड़ि गेल छेलइ। घटना छेलै उदयचन्द्र बाबू बेटी बसुनक बिआह परिहारपुरक अनमोल बाबूक लड़का श्यामचन्द्रसँ भेल छल। चन्द्रकला बिआहमे अपने हाथसँ साँठ-राँज केने छेली। बापो उदयचन्द्र बेटी-जमाइक लेल दान-दहेजमे कोनो कोताही नै केने छला। केना ने करितैथ, दुनू परिवार जमीनदार तँ नहि, मुदा दसबिघा खेतक मालिक तँ छलाहे। उदयचन्द्र बाबूकेँ एकटा लड़का सूर्यदेव आ एकटा लड़की बसुन, तँए बेटा-बेटीमे कोनो फर्क नहि बुझि अपना सामरथक मोताबिक बसुनक बिआह केने छला। अनमोल बाबूकेँ दू लड़का। एकटाकेँ नाम छल श्यामचन्द्र आ दोसरकेँ नाम छल विद्याचन्द्र। दुनू लड़का जेहने देखैमे सुन्दर तेहने देह दशा छेलैन। जेठ लड़का श्यामचन्द्रसँ बसुनक बिआह भेल छल से आइ माएकेँ बितलाहा घटना मोन पड़ल छेलइ। परिहारपुरक अगल-बगलमे बिसुनपुर, रूद्रपुर, व्रहमपुर, कनकपुर, कमलपुर इत्यादि। जुड़शीतलक समए छेलइ। आन गाम सभमे ने सुकराती दिन निमूह सुग्गरक बच्चाकेँ एकटा लाठीमे बान्हि माल-जालसँ हुरियाहा खेल खेलाएल जाइ छै मुदा उत्तरभर माने परिहारपुर दिस जुड़शीतलकेँ मनुख-मनुखमे खेल खेलाएल जाइ छै। जुड़शीतलसँ एकदिन पहिने सतुआ खा चैतमे, बिहान भेने बैसाखक पहिल दिन नीक-निकुत माने बर-बरी, मुनगा देल दाइल भात, दही-चीनी खा कऽ आन गाम सभमे जंगली-जानवरक शिकार होइ छै मुदा एहि गाम सभमे एकटा नमहर खस्सीकेँ चारि-पाँच गामक बीचक बाध वा खेलक मैदानमे ललका झण्डा लगा, खस्सीकेँ बान्हि दैत छइ। आ जोर अजमाइस कएल जाइत छइ। ई सभ जोगार पाँचो सात गामक लोक विचारि, सामूहिक चन्दा करि कऽ करैत अछि। तागतक बले झण्‍डासँ खस्सी खोलि लिए। दू-चारि गामक लोक एक तरफ, दू चारि गामक लोक दोसर तरफ, तमसगीरक करमान लागल रहै छै, पुलिस वा प्रसाशनक बेवस्था सेहो रहैत छइ। तमसगीरक सुरक्षा लेल। दुनू दलमे शर्त रहै छै, खस्सी खोलक बेरमे केतनो केकरो मारि लगै वा खुन कियाक नै भऽ जाइ तेकर कोनो केस फौदारी नै हएत। सभ मिलकेँ मारि खेनिहारक इलाज करौत, से एहि बेरका जुड़शीतलमे रूद्रपुरक हँसेरी दिससँ लम्बोदर ललकारा देलकै जे जेकरा माए दुध पियौने हौ से खस्सी खोइलकेँ लऽ जो। लम्बोदर जहिना नाम तहिना पाँच हाथ लम्बा, गाँठल-गाँठल देह-हाथ-पएर, बड़का-बड़का मोछ ऐंठने, माथपर ललका कपड़ाकेँ मुरेठा देने, माथमे ललका ठोप, हाथमे पाँच हाथक हरोथिया लाठी लेने ललकारा देने छेलइ। परिहारपुरो दिसक जे हँसेरी छेलै सेहो लाठीसँ लैश छेलैहे, 50-100 केँ। तमसगीरो सभ 100 गज हटि कऽ तमासा देख रहल छल। अनमोल बाबूक लड़का श्यामचन्द्र केँ जवानीक जोश छेलैहे वहए अपनामे इशारा केलक आ ललकारा दैत आँगा बढ़ि गेल आ खस्सी खोइल लेलक। झण्डा उखारि कऽ जहाँ कि आँगा बढ़ल कि पछेसँ कियो तेहेन ने लाठी चलौलक जे श्यामचन्द्रकेँ कपारेपर लगलै ठामे चीत भऽ खसि पड़ल। हर-विर्रो मचि गेल। तहि फँकामे लम्बोदर खस्सी लऽ कऽ अपना गूटमे चलि गेल। कोनो तरहक कनाइरो तँ एहने-एहने मौकामे नै सुतारल जाइ छइ। श्यामचन्द्रकेँ सभ मिल अस्पताल लऽ गेल मुदा श्यामचन्द्रक प्राण तँ पहिनहि चलि गेल छेलइ। माए चन्द्रकलाकेँ बसुनक दुर्दशा देख कऽ घटना मोन पड़ि गेल छेलइ। सोचै लेल मजबूर छल। वेचारी बसुनकेँ दुइए मास बिआह भेना भेल छेलइ। आब एकर कोन दशा हएत। बसूनोकेँ आँखिसँ नोर खसै छेलै सेहो देखने छल। माएकेँ एका-एक जोश एलै ठाढ़ भऽ असगरेमे बाजल- "ठहर, ई जे सड़ल-गलल नियम मर्द सभ बनौने अछि तेकरा तोड़ैक अछि। अपने मर्द सभ विधुर भेलाक बादो दूटा बिआह करत आ स्‍त्रीगणक लेल प्रतिबन्ध। की ओकरा कोनो सोगारथ नहि छइ? ओकरा कोनो अधिकार वा कर्तव्यक बोध नै छइ? की माल-जाल जकाँ कतौ खुटेसल रहत? आकि विधवा सबहक लेल बनारस वा काशीए मुक्तिक स्थान छै, जेतए वेश्यावृतिक अड्डा बनल छइ। नै ऐ कानून सभकेँ तोड़ैक अछि। हम नारी संगठन बनेबै आ सड़ल-गलल कानून सभकेँ हटेबै। आ समान अधिकार कर्तव्यक लेल लड़ाइ लड़ब।" बसूनक माए सएह केलक, स्वयं सहायता समूहक स्थापना कऽ स्‍त्रीगण सबहक बैसार केलक। सभ स्‍त्रीगण अपनामे दुख-सुखकेँ चर्चा करइ...। बुधनी बाजल- "हइ चन्द्रकला दाय, मर्दसँ कहीं स्‍त्रीगण एकरूपता करत से सम्भव छइ। मर्दक बनाबट दोसर छै, स्‍त्रीगणक बनाबट दोसर छइ। काजो-धन्धा अलगे-अलगे छै से केना हएत। चन्द्रकला उत्तर दैत कहए लगली ठीके स्‍त्रीगणक दुश्मन स्‍त्रीगणे होइत अछि। कहियो कोनो बातकेँ विचारबो केलक हेन। जहिये बेटी जन्‍म लैत अछि तहियेसँ ओकरा हेय दृष्‍टिसँ देखल जाइ छइ। कहैले तँ भगवतीकेँ, लक्ष्‍मीकेँ, कालीकेँ, सरस्वतीकेँ जन्‍म भेल हेन मुदा बेवहार केहेन करैत अछि से तँ सबहक नजैरपर छह।" कनी सोचलाक बाद बुधनी कहलकै- "है दाय, ठीके कहै छह। फेर चन्द्रकला कहए लगली तूँ जे कहलहक से तँ ठीके छै, मर्दकेँ जखन जे मनमे हएत तेहेन बेवहार करैत रहै छइ। दुनियाँ केतए-सँ-केतए भागल जा रहल अछि आ हम सभ घर आँगनसँ लऽ कऽ चुल्हि-चिनवारमे ओझराएल रही। कतेक दिन तक कौल्‍हुक बरद जकाँ कौल्‍हुमे घुमैत रहब। "तखन कहह जे कोन तरहें ओझरौलहा कानून सभ सँ आगाँ जाएल जाएत।" -बुधनी बाजल। चन्द्रकला कहै लगली- किछु तोड़ल जेतै, किछु जोड़ल जेतै, कोनो ठाम भिरानीयो हएत, समाजक बेवस्था तँ दुनू (मर्द आ औरत) मिलिए कऽ ने सुचारू रूपसँ चलौत। गाड़ीक दुनू पहिया नै रहने गाड़ी केना ससरत। खेतसँ लऽ कऽ खरिहाँन, घर-घरसँ लऽ कऽ दलान तक सभ काजमे हाथ बँटबए पड़त। सुगौना वाली बजली- "नीक विचार अछि, हम सभ संग देब।" कोइलख वाली सेहो हँ मे हँ मिला देलक। पन्द्रह गोटेकेँ समूह बनि गेल। अध्यक्ष चन्द्रकलाकेँ सर्व-सम्मैतसँ चुनि लेलक। समए बीतैत गेल, एक दिनका बैसारमे बिआहक चर्च-बर्च चललै। चन्द्रकला उठि कऽ कहै लगली- "सुनै जाउ, काल्हि हम आँगा बढ़ि कऽ एकटा काज करब तइमे सभकेँ संग देबाक छह। भूख-प्यास आ इज्जत खरिदल नै जाइ छइ। पानि, अनाज आ जीश्‍म खरीद सकैत अछि।" लालदाय बजली- "कोन काज अछि कहूँ ने।" "अपना गामक जे किसान सलाहकार छैथ शेखर ओकरो संग भगवानक देल डाँग पड़ल छइ। ओकरे संग बसुनकेँ बिआह करब से की विचार।" चन्द्रकला बजली। अखन तक चुप छेली चमेली दाय, उठि कऽ बजली- नीक विचारि अछि हम आ विपती (जे मसोमात छल) सभ संग देब। बुधनी बाजल- शेखरकेँ कोन भगवानक डाँग पड़ल छै से तँ बुझले ने अछि आ ओ कोन जातिक अछि। चन्द्रकला बजली- भूतक चर्चा करब तँ भूते ने धरत। वर्तमानकेँ सम्‍हारब तखने ने भविष्यो बनत। मर्द जँ विधुर होइत अछि तँ कियाक ने विधवे जकाँ समए बितबैत अछि। पहिने मर्दक वर्चस्व छेलै, जेना-जेना मन भेलै तेना-तेना कानून कैदा बनबैत गेल। है दाय सभ जँ औरतकेँ प्रसव पीड़ाटा नै करऽ पड़ै तँ एकोटा काज धरतीसँ अकास तकमे नै अछि जे महिला नै कऽ सकैत अछि। अपन विकासक लेल अपने आगू बढ़ए पड़त। गप-सप्पसँ किछु नै होइ छै। काज केने गुण-अवगुण बुझबहक। जाति तँ दूइएटा छै मर्द आ औरत। और सभ तँ बनौआ छिऐ। शेखरक बारेमे पुछै छह तँ कहै छिअ। शेखर आ बसून एके स्कूलसँ मिडिल आ उच्च विद्यालयमे पढ़ै छल। बसुन 11मीं तक पढ़लक आ शेखर कौलेज तक पढ़लक (बी० ए०)। मुदा बसुनक बिआहक कारणे 11मी पास केलाक बाद नै पढ़ि सकल। शेखरोकेँ बिआह भेलै मुदा ओ पढ़ैमे चन्सगर छल पढ़िते रहल। ओकरा संगे भेलै ई जे बिआहक बाद कनियाँ सासूर एलइ। परिवारमे पैखाना घर तँ छेलै नहि, बाहर-भीतर लेल कनियाँ बाड़ी दिस गेलै, कोनो विषधर साँप काटि लेलकै, वेचारीकेँ केतनो झाड़-फूक भेलै, अखुनका जकाँ पहिने सँपकट्टीक दवाइ सभ अस्पतालमे नहि भेटै छल तँए वेचारी मरि गेलइ। से तँ बड़ अन्याय भेलै ओकरो संगे। बुधनी बजली- "हम शेखर आ ओकरा बाबूसँ विचार-विमर्श केलौं हेन। बिना दान-दहेजकेँ आदर्श बिआह करक लेल तैयार अछि। तँ तूँ सभ संग दएह तँ हम विधवा प्रथाकेँ तोड़ि देबइ।" सभ कियो समर्थन दऽ देलकै। आ काल्हिये नअ बजे दिनक समय बनि गेलइ। बुधनी बजली- जँ मर्द सभ विरोध करत तखन। सबहक ठीकेदारी तोरे छौ, काल्हि जे हेतै से देखल जेतइ। पुरबा हवा वहों की पछिया। उखैरमे मुड़ी देलौं तँ मुसराक कोन डर। देखल जेतै चन्द्रकला बजली- ठीक छै बुधनी बजली- बिहान भने गीत-नादक संग बसुन आ शेखरक दूर्गामन्‍दिरमे पुजेगरी आ गामक स्‍त्रीगणक समक्ष जयमाला आ मंत्रोचारणक संग बिआह सम्पन्न भेल। पुजेगरी आ स्‍त्रीगण सभ दूर्वाक्षत देलक। बसुन आ शेखरकेँ पियर वस्त्र पहिरल आ गरदैनमे फूलक माला देख चन्द्रकलाकेँ खुशीसँ दहो-बहो नोर आँखिसँ ढब-ढबा गेलइ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि कपिलेश्वर राउतक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक कपिलेश्वर राउत केर पाँचटा कथा कथा ५ भुमहुर आगि विवेक कुमार अखबार पढ़ि रहल छल। समय करीब 9 बजेक छेलइ। तखने चेतन दास टहलैत पहुँचल। चेतन दास जातिक मुसहर। पहिने बाध-बोनमे रखवारि आ बोइन-बुत्ता कऽ कऽ गूजर करै छल। हालेमे कियोट कुलक एकटा बबाजीसँ सीख भेल, बबाजी भेल। बबाजी भेला पछाइत कहियो काल दलो पुरि लैत अछि। अखाढ़ मासक समय, मनमे चेतन दासकेँ एलै जे बबाजी तँ बनलौं मुदा कहियो दस मुर्तेक भनडारा नइ करा सकलौं। से नहि तँ अही आमक समयमे किए ने दस-बीस मुर्तेक भनडारा कऽ ली। विचार पक्का भऽ गेल। दस-पनरह किलो चूरा मोल अनलक, 25 किलो दूधक दही पौरलक। सात किलो चीनी आ दू साए सपेता आम अनलक। आ गामसँ बाहरो बुध दिन कलौआ भण्‍डाराक दल गुरु महराजजीकेँ पचासटा टुक दऽ देलकै। चारिमे दिन, बुध दिन छेलै, भण्‍डाराक इंजाम केने छल। बुध दिन भोरे झंझारपुरक हाटसँ अल्‍लू आ परोर आ ओकर मसाला इत्यादि आनैले बेटाकेँ कहलक। दस-दसटा टुक गाममे बबाजी सभकेँ दल देबाक छेलै तँए टुक दइले चेतनदास अपने विदा भेल। दल दैत-दैत अजब दासक ओइठाम पहुँचला। अजब दास घरेपर छला। हाक देलखिन। अजब दास अँगनेमे किछु काज करै छल। तखने अवाज एलैन। लगले दरबज्जापर आबि चेतन दासकेँ चौकीपर बैसैक आग्रह केलखिन। दुनू गोरे चौकीपर बैसला। अजब दास पुछलकैन- "की बात, केमहर एलौं हेन?" चेतन दास बजला- "अपनेक ओइठाम एलौं। साठि मुर्तेक भण्‍डारा करैक विचार भेल हेन से अपनेकेँ टुक दइले एलौं हेन आ हे अपने तँ भजन-भाव सेहो करै छी से दू-चारिटा भजन सेहो हेतै, तँए दस बजे तक आबि जाएब।भण्‍डारा चारि बजे साँझमे हेतइ।" अजब दास बजला- "ठीक छै टुक तँ लऽ लइ छी, मुदा एकटा बात कहू- भण्‍डारा केतए हेतइ?" चेतन दास कहलकैन- "केतए हेतै, अपने एकचारी अछि आ आगाँमे सरकारी चबुतरा अछि ओतै हेतै और केतए हेतइ।" "तहन हम दल नै मानब, जँ बजरंगबली स्थानमे भण्‍डारा करैक इंजाम करब तँ दल लेब, तहूमे साग बनौनिहार कियो पनिचल्‍ला हेता तखने।" कहैत अजब दास सुपारी आपस करैत चेतन दासकेँ हाथमे दऽ देलकैन। चेतन दास बौक भऽ किछु नहि बाजल। चोटे चौकीपर सँ उठि गेल आ विदा भऽ गेल। विवेक कुमारक घर लग दऽ कऽ जाइ छल कि विवेक कुमारपर नजैर पड़लै। कुशल-समाचारक लेल विवेक कुमार लग पहुँचल। नमस्कार-पाती भेला बाद विवेक कुमार अपने चौकीपर बैसैक आग्रह केलकैन। चेतन दास चौकीपर बैस गेल। विवेक कुमार अखबार राखि पुछलकैन- "केमहर चललिऐ हेन, मुँह सुखल अछि?" चेतन दास बाजल- "की कहौं भाइ साहैब। भण्‍डारा करैक विचार भेल से साठि मुर्तेक दल देलिऐ आ भजनियॉं मुर्ते अजब दासकेँ दल दइले गेल छेलौं से अजब दास कहलक जे तोरा ऐठीम हम नै खेबह जँ बजरंगबली स्थानमे भण्‍डारा करबह तखने हम जेबह। सएह छगुन्‍ता लागि गेल। जे कहू सभ ठाम जाति-पाति, ऊँच-नीच, छुआ-छुतक भेद-भाव छैहे। हमरा होइ छल जे बबाजी तँ ई सभ तियागि कऽ बबाजी होइत अछि, ओकरामे कोनो तरहक भेद-भाव नै होइ छइ। ओकरामे दया-भाव रहै छइ। सभकेँ एक-समान बुझैत अछि। मुदा ओकरो हड्डीमे जाति-पाति ढुकले छइ।" विवेक कुमार कहलकैन- "हौ चेतन दास, पुरना इतिहास सभ बुझबहक ने तँ हेतह जे एहेन बिजकाठी सभकेँ सोझे गोली मारि दिऐ।" चेतन दासकेँ जेना जिज्ञासा बढ़लैन तहिना पुछलखिन- "से की?" विवेक बाजए लगला- "तँ सुनह हम दू-चारिटा मोट-मोटमे घटना कहै छिअ। किएक तँ तहूँ औगताएल छह, घरपर भण्‍डारा छिअ। पचास मुर्तेकेँ दल देने छहक। तँए मोटेमे कहै छिअ- सतयुगमे विष्‍णु आ महादेवकेँ झगड़ा होइते छेलैन।" बिच्चेमे, अकचकाइत चेतन दासक मुहसँ निकैल गेल- "भगवानो सबहक बीच झगड़ा होइ छेलइ!" "हँ, हौ। महादेवेक बेटा गणेशकेँ पूजा पहिने होइ छै आ देवतामे सभसँ पैघ महादेवकेँ सभसँ अन्तमे होइ छैन, अखन एतबे कहबह।" "हँ, से तँ गणेशेक पूजा पहिने होइ छइ।" -चेतन दास बाजल। "त्रेत्रामे राम संवूककेँ गरदैन काटि देलकै किएक तँ सुद्र छल। संवूक बरक गाछमे पएरकेँ ऊपर आ मुड़ीकेँ निच्‍चाँ कऽ कऽ तपस्या करै छल। ऊँच वर्गक लोककेँ नै देखल गेलइ। रामकेँ वरगलेलक। राम सनक राजा ओही संबूककेँ गरदैन काटि देलकै।" विवेक बाजल। "ई तँ बड़ अन्‍याय भेलइ।" चेतनदास बजला। एतबेमे चकविदोर लगै छह। विवेक कुमार पुछलकैन आरो सुनह द्वापरमे द्रोणाचार्य आ एकलव्यक खिस्‍सा बुझल छह किने? "नहि!" चेतन दास बाजल- "तँ सुनू, द्रोणाचार्य कौरब-पाण्डवक गुरु छला। कूरू वंशक सभकेँ शिक्षा देने छेलखिन। एकलव्यकेँ मन भेलै जे हमहूँ शिक्षा ग्रहण करी। तइ लेल द्रोणाचार्य लग शिक्षा लेबए लेल गेल। मुदा द्रोणाचार्य सुद्र कहि ओकरा शिक्षा दइसँ इनकार कऽ देलक। तखन एकलव्य प्रण केलक, जँए शिक्षामे गुण छै तँए ने द्रोणाचार्य शिक्षा नइ देलैन। आ अपना आश्रममे नै रखलैन। से नै तँ शिक्षा ग्रहण करबे करब आ जंगलमे जा द्रोणेचार्यक माइटक मूर्ती बना गुरु मानि अस्त्र-शस्त्रक अध्ययन आ अभियास करए लागल। एहेन चन्‍सगर निकलल जे द्रोणाचार्यक शिष्‍यमे एकोटा ओहन वीर नहि छल। एहेन वीर छल एकलव्य।" विवेक फेर बाजल- "हँ हौ, आगाँ सुनह एक दिन द्रोणाचार्य अपने आ किछु शिष्‍य सभकेँ लऽ कऽ जंगल दिस घुमैले गेल। संगमे एकटा कुत्ता सेहो छेलइ। अनजान आदमीकेँ देख कुत्ता भुकए लगल। एहेन कुत्ताकेँ सोभाव होइते छइ। से एकलव्य तेहेन वाण मारलक जे कुत्ताकेँ मुहेँक ऊपरसँ निच्‍चाँ-मुहेँ मुँहमे गँथा गेलइ। कुत्ता दौड़ल द्रोणाचार्य लग गेल। कुत्ताक दशा देख द्रोणाचार्यकेँ छगुन्‍ता लागि गेलइ। कुत्ताक संग एकलव्यक नजदीक आएल।" "एना कऽ मारलकै तीर!" चेतनदास बाजल। "हँ हौ, तहन की भेलै से बुझबहक तँ दाँते ओंगरी कटबह।" विवेक बाजल। "कहू-कहू की भेलइ।" चेतनदास पुछलकैन। "द्रोणाचार्य गुरु दक्षिणा मंगलकै, एकलव्य सिधे कहलकैन जे आदेश होइ। सहए ने, तँ तूँ अपन दहिना हाथक औंठा काटि कऽ दे।" -द्रोणाचार्य आदेश देलखिन। तूरन्त एकलव्य बिना सोचने-विचारने अपन दहिना हाथक औंठा काटि कऽ द्रोणाचार्यकेँ दऽ देलकैन।" "ई तँ बड़ अन्‍याय केलैन द्रोणाचार्य।" -चेतनदास बाजल। "से तँ तूहीं बुझबहक।" विवेक कहलकैन। "हे हौ चेतन भाय, ई तँ सतयुग, त्रेता-द्वापरक खिस्‍सा कहलियह। आब कलयुगक खिस्‍सा कहै छिअ। बाबा साहैब भीम राव अम्‍बेदकरक नाम तँ सुनने हेबह?" "हँ सुनने छिऐ, अपना देशक संविधान निर्माणमे हुनको योगदान छेलैन। 15 अगस्‍त आ 26 जनवरीकेँ धिया-पुता अम्‍बेदकरक नाम लैत अछि।" चेतनदास कहलकैन- "हँ, ठीके छिऐ। हुनका कहियो स्‍कूलमे ऐगला सीटपर नै बैसऽ देलकैन। जहन कि सभ क्‍लासमे फस्‍टे करै छला। जातिक छल तँए। मुदा अम्‍बेदकरमे लगन छेलै, प्रतिभा छेलै, देशक प्रति ममता छेलइ। तब ने एहेन महान पुरुष भेला। जाति-पातिक कानून लऽ कऽ गाँधियोजी सँ झगड़ा भऽ जानि। जातिये-पाति लऽ कऽ वौद्ध धर्म मरै बेरमे स्‍वीकार केलैन अम्‍बेदकरजी।" -विवेक बाजल। "अरौ तोरीकेँ! एहेन-एहेन किरदानी सभ भेल छइ!" -चेतन दास बाजल। विवेक आगाँ बाजल- "हँ हौ, सत्य बात छिऐ तहन और सुनह। अपना देशक जे राष्‍ट्रपति छला ए.पी.जे. अब्‍दूल कलाम साहैब, हुनको संग क्‍लासक मास्टर अम्‍बेदकरे जकाँ केलकैन। मुदा ओ मास्टर, कलामसँ घटी मानलकैन। अखन हालमे हैदरावादक महाविद्यालयमे रोहित बेमूलाक संग अहिना भेलै हेन। रोहित बेमूला महा दलित वर्गक लोक, ओकरा संग जाति-पाति लऽ कऽ दुरबेवहार केलकै। वेचारा आत्‍महत्या कऽ लेलक।" "किए आत्‍म हत्या केलक?" चेतन दास पुछलकैन। "नइ बुझलहक, यएह सवर्ण आ अवर्णक चलैत। आब तूँहीं कहह जे अजब दास दल नै मानलक तँ एतेक आक्रोश छह। आ तूहीं डोम आकि चमारक ओइठाम खेबहक गे। नहि ने। ई बेवस्थाक दोख छिऐ। एक वर्ग शोषक अछि आ दोसर वर्ग शोषित अछि। भुमहुर आगि जकाँ तरे-तरे दुनू आक्रोशित अछि। शासन केनिहार कखनो नहि चाहत जे हमरा आगाँ दोसर ठाढ़ भऽ जाए। तहिना शोषित वर्ग सेहो आगू-मुहेँ जाए चाहैत अछि। कोठलीमे कोठली आ तइमे कोठली अछि। एतेक ने जाति-पाति अछि आ एक-दोसरासँ घृणा करैत अछि जेकर पारावार नहि। केतेक कहबह। मुइल माल-जालकेँ उठा कऽ फेकलक, तँए चमार अछोप भऽ गेल। आ जे जीतहे बकरी कटलक आ खेलक ओ के भेल।" चेतनदास बाजल- "यौ भाय साहैब, तहन ई सभ केना मेटाएत?" विवेक कहलकैन- "केना मेटाएत, से की दालि-भातक कौर छिऐ जे चट-पट सानू आ मुँहमे दऽ दियौ। शास्त्र-पुराणमे ऋृषि-मुनी सभ मनुषके जीबैक क्रिया कलाप लिखलैन, तेकरा कठपिंगल सभ दोसर-दोसर रूपमे बेवहार करऽ लागल। विचारे दूषित भऽ गेलइ। तेकरे ई दुदर्शा छिऐ। जखने ऊपरका कनी निच्‍चाँ दिस झूकत आ निचला ऊपर-मुहेँ ससरत, जइसँ बीचमे आबि कऽ दुनूकेँ मुँह-मिलानी हेतै, कोनो द्वेष-भाव नै रहतै। सभ-सभकेँ सुख-दुखमे संग देत, समाज आकि देश नीक जकाँ चलतै।" "तोरो भण्‍डाराकेँ इन्तजाम करबाक छह। दोसर दिन निचेनसँ गप-सप्प हेतै, तखन विस्‍तारसँ कहबह।" "ठीक छै भाय साहैब अखन जाइ छी।"

  अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा बाबा हाथिक सिक्कड़ि "पापा! आहाँ कहैत रही जे अपना ओहिठाम डेग-डेग पर पोखरि माछ आ मखान स' भरल; से एतेक बेर गाम गेलहुँ मुदा आहाँ कहियो देखेलहुँ नहिं?" "आहाँ के जन्म सँ किछुए बर्ख पहिने तक छलै बौआ .... आब नहिं रहलै! सड़कक ओहि कात पँचगच्छा लग जे धानक खेत छै से पोखरिये छलै.....ओम्हर चौमुहानी लग पोखरिक टूटल जाठि एखनो ओहिना ठाढ़े छै। अपने गाम मे नहियों किछु तs पाँच टा सs कम्म पोखरि नहिं रहै। से सभटा तकतीहानक बिनु भासि गेलै। गाम सs लोक शहर चलि गेलै ...... पोखरि-झाखरि के के देखितै? पोखरिये मे माछ आ मखान होई.....से जखन पोखरिये नहिं तखन माछ-मखान कोना हेतै?" गहींर उसास छोड़ैत गोलू के प्रश्नक उत्तर दैत हमर दगधल मोन कलपि गेल। मुदा बात ऐल पानि, गेल पानि जकाँ जल्दिये खतमो भs गेल। गोलू सेहो अपन संगी संग खेलबा लेल पड़ा गेल। आई ऑफिस सs घर मे पैर दैते देखैत छी गोलू के कुर्सी पर चढ़ि एड़ी उचकेने देबाल पर 'पग-पग पोखरि माछ मखान' वला पोस्टर के पेन सs दकचै मे अपस्याँत। हम जड़वत, सुन्न, अवाक्... एक टक ओहिना ओकरा देखिते रहि गेल रही। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- विचारक प्रबलता जगदीश प्रसाद मण्डल

विचारक प्रबलता

गाम-घरमे जहिना कोनो जोगाड़ी बाल-बोध बच्चा अपन मनकेँ एकठाम करैत माने एकाग्र करैत बाध-बोनसँ ओहन नब जनमित वा नब कलशित गाछक पात देख नब बुझि अपन बाग-बगियामे रोपि सजबैए तहिना कुलानन्द भाय अपन बाग-बगियामे नब-नब चीज सजबैत जीवानन्द भाइकेँ मनक बगियामे रोपलैन। अखन धरिक जे साहित्यिक प्रवाह मैथिलीक अछि ओ समाजक प्रवाहसँ थोड़-थाड़ हटलो अछि आ थोड़-थार सटलो अछिए। अही धाराक प्रवाहमे कुलानन्द भाइक सम्बन्ध जीबानन्द भायसँ भेलैन। ओना, उमेरक हिसाबसँ दुनूमे पचीस बर्खक अन्तर छैन। अखन तकक जीवनमे, माने सम्बन्ध बनैसँ पहिने धरिक जे जीवन दुनू गोरेक अपन-अपन छेलैन तइमे, बुनियादी अन्तर छैन। ओना, जीवन माने बेवहारिक जीवनक संग वैचारिक जीवन सेहो होइए मुदा तइमे बाधा बीचमे घेरतो अछि आ नहियोँ घेरैए। ओ निर्भर करैए जीवनक गति-विधिपर। जीवनक दू अवस्था बीचक दू जीवनक सम्बन्ध अछि। एक जीवन ओहन अछि जे जीवनक नीचमुँह ढालपर अछि आ दोसर जीवनक ऊपर मुँह चढ़ाइपर। समय अपना गतिये चलबे करत तँए फौतियो एबे करत आ भदबारि सेहो एबे करत। अखन धरिक जीवन, जीवानन्द भाइक जे पचपन-साइठक बीचक छेलैन, ओ माटिपर सँ माने सहीट जीवनपर सँ उठल जीवन छेलैन, तँए पहाड़ जकाँ धरतीसँ जुड़ल छेलैन जइमे दुर्घटना वा खसै-पड़ैक डर कम छेलैन। तँए कहब जे ओतबे ऊपरमे जँ हवाइ-जहाजपर रहब तखन तँ खसै-पड़ैक सम्भावना नै रहैए से नहि, ओइ अपेक्षा बेसी रहिते अछि। समय अपना गतिये चलिये रहल अछि। परिवेशमे मोड़ एने किछु कारोबार, खेती-गिरहस्तीक संग आनो-आन, मारियो खेलक आ किछु बढ़बो तँ करबे कएल अछि। जहिना कबीर बाबा कहने छैथ जे 'दो पाटन के बीच में, बाँकी बचे ने कोई' तहिना परिवेश बनि रहल अछि। एक दिस हवाइ जहाजपर बिआहक मड़बा सजैए, भोज-भात होइए तँ दोसर दिस साबे जौड़क बान्हल खरही-बत्तीक बनौल मड़बापर सेहो बिआह रचल जाइते अछि। खेतमे काज करैबला वा करबैलाक ऐगला पीढ़ी, अपना ऐठाम मोटा-मोटी बीस बर्खमे पीढ़ी बदलैए, खेतसँ हटि कारखाना पहुँच रहल अछि, जइसँ जीवनमे मोड़ आबि ऐगला पीढ़ी पैछला पीढ़ीक वैचारिक पद्धतिकेँ मोड़ि रहल अछि। सोभाविक अछि, जीवनमे मोड़ एने एना हेबे करत, तेकर अनेको कारण अछि, आर्थिक आमदनीक बढ़ोत्तरीक संग ओहन नब जगह जे जीवनक मूल आवश्यकताकेँ पूर्ति करैबला बनि गेल अछि, तैठाम ग्रामीण जीवन आ शहरी जीवन पद्धतिक मोड़ वर्तमान जीवनकेँ मोड़बे करत। अखन धरिक अपना ऐठामक जे जीवन पद्धति चलैत आबि रहल अछि, तइमे सामाजिक रूपक संग वैचारिक दुनियाँमे समरसपन अछि जइसँ समाजक धुरी गतिशील अछि। मुदा जे जीवन नब पद्धतिसँ उठिकऽ ठाढ़ हुअ चाहि रहल अछि वा भेल अछि, तैठाम तँ एहेन प्रश्न अछिए किने जे जीवन पद्धति मशीनक गतिये नहि चलि सकैए। सामाजिक जीवन जहिना समाजक संग जुड़ै-बनैमे समय लगबैए तहिना ने ओकरा छोड़बोमे समय लगबे करत। राता-राती मशीन दस गुणा आगू बढ़ि सकैए, मुदा मनुक्खक जीवनमे से थोड़े सम्भव अछि.! खाएर जेतए जे अछि से अछि तइसँ जीवानन्द भाय आ कुलानन्द भायकेँ तइसँ कोन मतलब छैन, कोन मतलब छैन जे मिथिलाक पंचदेवोपासनाक बीचक रग्गड़मे अनेरे पड़ल रहता। जीवन जीवन छी जे सभ अपन कल्याण चाहैए। जीवन जीबैक ढंग जहिना धर्म छी तहिना धर्मक ढंग सेहो तँ जीवन छीहे। संगी भेटने मनमे होइते अछि जे दुनियाँमे जीबैक एकटा थम्ह, ओना, केरा-गाछकेँ थम्ह कहल जाइए मुदा थम्हक दोसर माने ईहो अछिए जे कोनो वस्तु वा विचारकेँ थाम्हब, भेटल। जखने एकसँ आगू बढ़ि, माने अपनासँ आगू बढ़ि दोसरक थम्ह जीवनमे भेटैए तखने विचारक संग काजमे सेहो थम्हपन अबिते अछि। सभ जनिते छी जे मनुक्खकेँ अपन लेख-जोख अपन हाथ-पैरक संग काज दइते अछि। जीवानन्द भाय आ कुलानन्द भाइक बीचक सम्बन्धमे, माने बेकतीगत वैचारिक जीवनक सम्बन्धमे, तेते प्रगाढ़ता आबि गेलैन जे जीवनक सम्बन्ध चतुर्मुर्खी पुष्पित-फलित भऽ गेलैन। एक संग घन्टो-घन्टो बैस दुनू बेकती अपन जीवन-मरणक विचार-विमर्शसँ लऽ कऽ गाम-समाजक बीचक जीवन-मरणक संग सुख-दुखकेँ निवाड़ैक रास्ताक खोज सेहो करए लगला। पारिवारिक जीवनक संग, पारिवारिक गति-विधिमे सेहो एक-दोसरक मददगार भेला। जखने दुनियाँमे संगी भेटैए तखने संगपनक प्रगाढ़ता बढ़िते अछि। ओना, दू रंगक बेवहारक बीच दुनूक जीवनो रहलैन आ दू रास्तासँ ठाढ़ सेहो छैथ। एकक जीवन माने कुलानन्द भाइक जीवन ओहन रहलैन माने ओइ परिवेशक परिवार रहलैन जइमे सभ तरहक सुविधा रहैत अछि। माने ई जे पढ़ल-लिखल माता-पिताक संग विद्वज्जनक परिवार-समाज सेहो रहलैन, दोसर दिस जीवानन्द भाइक जीवन ओहन रहलैन जे स्वनिर्मित होइत अछि। तहू स्वनिर्मितमे सामाजिकता सेहो प्रमुख रहलैन। सामाजिकता ई जे समाजकेँ वास्तविक जीवनधारामे आनि विकासोन्मुखी केना बनाएल जाए। यएह धारा बेकतीगत जीवनमे सेहो चलैए जे समाजसँ जुड़ल सेहो चलिते अछि, तहिना सामाजिक जीवन सेहो होइए जे समाजक धाराकेँ बेकतीगत धार धारामे प्रवाहित करैत गतिशील सेहो बनैबते अछि। खाएर जे अछि, जेतए अछि से तेतए रहउ। तइसँ जीवानन्दे भाय आकि कुलानन्दे भायकेँ कोन सरोकार छैन। सरोकार छैन अपन दुनू संगीक संग संगपन निमाहबसँ। बेवहारिक रूपमे जहिना अपनाकेँ दुनू गोरे इमानदारीक बीच सम्बन्ध ठाढ़ केलैन तइमे अखन तक दुनूक बीच कोनो मन-मनान्तर आकि इमानक संग हत्या नइ भेल अछि। सामाजिक परिवेशमे सम्बन्धक भीतर किछु विद्रूपन एबे कएल, जइसँ सम्बन्धमे दूरी बनब शुरू भेल। मुदा दूरी बनलाक पछातियो विचारमे कमी नहि आएल अछि। हँ, ईहो नकारल नहियेँ जा सकैए जे थोड़-बहुत मनान्तर काजकेँ बाधित नहि केलक अछि। जइसँ दुनू संगीकेँ किछु-ने-किछु घाटा भेबे केलैन अछि। सामाजिक परिवेश एते तँ दुनू गोरेकेँ, माने जीवानन्दो भाय आ कुलानन्दो भायकेँ, वैचारिक रूपमे प्रबलता आनिये देलकैन जे मनुक्ख असगरो धरतीपर हँसी-खुशीसँ, माने जइ दुनियाँमे बसै छी तहू दुनियाँमे जीवन बसर कइये सकैए। जखने मनुक्ख अपन जीवनकेँ थाहि लइए, तखने थाहे-थाह थाहैत, केहनो-केहनो धार पार कइये लइए। अनाड़ी-धुनारीक जीवनक संग आ जग-जगाएल जीवनक संग सम्बन्धमे अन्तर अछिए, एकमे जहिना खीचपन रहने टुटैक बेसी सम्भावना रहैए, तहिना विचारक प्रबलता रहने दोसरमे से नइ होइए। अपन विचारक अनुकूल भविष्यमे जखन बाधा अबैए तखन विचारकर्ताक मनमे पुन: विचारैक खगता आबिये जाइए। ओना, जीवानन्द भाय निरविचारी लोक छैथ, तँए ई अपन विचारानुकूल जीवन यात्रा कइये रहल छैथ, जइमे बिघ्न-बाधाकेँ टबकब सोभाविक बुझिते छैथ। जइसँ यात्राक बीचक गतिमे केतौ तेजी रहै छैन तँ केतौ मन्दक संग विलमाउ-ठहराव सेहो अबिते छैन, जेकरा ओ लेनिनक ओइ विचारक अनुकूल अंगीकार करैत मानिकऽ चलै छैथ जे एक कदम आगू, दू कदम पाछू, अपन जीवनानुकूल अनुभवक आधारपर कहने छैथ। संयोग बनल, कुलानन्द भाइक विचारमे ठहराव एने, दृष्टिमे सेहो दृश्य एलैन जइसँ मन मानि गेलैन जे चलैक बाटमे, जीवन जीबैक रास्तामे केतौ-ने-केतौ कमी जरूर अछि। सहज जीवनकेँ लोक अपन सहजतासँ आगू बढ़ैबते अछि, मुदा असहज जीवन भेने दोसराक जरूरत सेहो पड़िते अछि। दुनियाँ तँ दुनियेँ छी जे सात अरब लोकसँ भरल अछि। तहूमे अपन मिथिला तँ सहजे मिथिला छीहे, पचासो बर्खसँ अबैत सरकार परिवार नियोजन अखन तक नियंत्रित नहियेँ केलक अछि, केतबो चोरा-नुका कऽ भ्रूण-हत्या किए ने होइए, मुदा तइ सभसँ लोकक बढ़वारि थोड़े कमल अछि आकि कमत। कहब जे केना कमि सकैए? कमैक असान ढंग अछि। ओ अछि मनुक्ख अपन बुनियादी जीवनकेँ पकैड़ जखने भविष्योन्मुख हेता तखने अपन जीवनानुकूल जीवन आ परिवार बना चलए लगता, से जखने चलए लगता कि अनेरे ने परिवारसँ लऽ कऽ समाज धरि नियंत्रण हुअ लगत। खाएर जे से, तइसँ जीवानन्दे भाय आकि कुलानन्दे भायकेँ कोन मतलब छैन, मतलब छैन अपन जीवनक जहानसँ। कुलानन्द भाइक मनमे अपन बीतल जीवन नचलैन। नचिते मन मन्तव्य देलकैन जे संगीक परीक्षा तँ संगपन जीवन दइए। संग-संग चललासँ नीक-सँ-नीक जीवन पेब सकै छी आ संग-संग नहि चललासँ केतबो केला-पछाइत कमी सेहो रहिते अछि। कुलानन्द भायकेँ विचारक प्रबलता जोर मारि कहलकैन जे जीवानन्द भाइक संगपन जीवन संजीवन छी तँए...। विरहाएल बटोही जकाँ कुलानन्द भाय जीवानन्द भाय ऐठाम पहुँचला। चेहराक बदलाव किछु भ्रमित दुनू गोरेकेँ केलकैन मुदा केतबो करियाएल भौम्हरा किए ने हुअ, चिन्हारए तँ दुनूक बीच अछिए। आगतक सुआगत करैत जीवानन्द भाय बजला- "भाय, केतबो मायाकेँ अपनासँ दूर राखए चाहै छी मुदा से भऽ नै पबैए। केना-ने-केना छाँह जकाँ अगुआ-पछुआ पकैड़िये लइए।" कुलानन्द भाय बजला- "से की?" जीवानन्द भाय बजला- "कहू जे परपोताक भार हमरा ऊपर किए रहत। आठम दिन ओकर मूड़न वैष्णव देवीमे हएत, तइमे परिवारक सभ एकमुहरी एकमत छैथ जे जीवानन्द बाबा बिना केना हएत।" मने-मन कुलानन्द भाय विचारि लेलैन जे जहिना परिवारक वृहत काज, माने हटल काज एक-दोसरक बीच सम्बन्ध बनबैत अछि तहिना खगता सेहो, माने जीवनक खगता सेहो सम्बन्ध बनैबते अछि। सुअवसर अछिए तँए किए ने संग पूरि दिऐन। (०१ अगस्त २०२२) -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022' रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) पहिल पड़ाव अंगरेजी शासनक अवसानक समय। जहिना सत्ताक हस्तांतरण भेने शासनक संक्रमण होइए तहिना जन-गणो आ समाजोक बीच संक्रमणक स्थिति बनियेँ गेल छल। एक दिस विदेशी शासनक अन्त आ अपन शासनक आगमनक उत्साहसँ जनगणक मन लबालब भरल तँ दोसर दिस शासनसूत्रसँ बँधल गाम-समाजक सत्ता सेहो उखैर रहल छल। देश सेवाक भावना कहियौ आकि समाज सेवाक भावना, भारतक आइ धरिक इतिहासमे सभसँ उत्साहित छेलैहे। रंग-रंगक कल्पना जनगणक मनक बीच पकड़नहि छल। ओही परिवेशमे कामेसर अछि। मिथिलाक गामक पहचान, देशक कोनो राज्य हौ आकि राज्यक दोसर क्षेत्र, अप्पन अछिए। एक तँ देशक ग्रामीण इलाकामे मिथिला जहिना जनसंख्याक घनत्वमे सघन अछि तहिना कामो-बेवहारोमे अछिए। यएह छी मिथिला। एक्के काजकेँ अनेको ढंगसँ करैक कला मिथिलामे सभ दिनसँ आबि रहल अछि आ अखनो अछि। यएह बौद्धिक स्रोत मिथिलाक रहल जेकर परिमरजनक संग अपन क्रियाक परिमार्जन करैत समयक संग सभ दिनसँ चलैत आबि रहल अछि। खाएर जे अछि, पलारपुर सेहो एकटा गाम मिथिलाक बिच्चेमे अछि। ओना, ई गाम तीन परगनाक बीचक मोड़मे अछि, माने पलारपुरक पच्छिमक टोल जे जमीनक हिसाबसँ पछबरिया परगनामे पड़ैए, आ गामक पुबरिया टोल, जे छी तँ पलारपुरे गामक टोल, काजो-उदम पलारपुरेबलाक संग अछि मुदा परगनाक हिसाबसँ पुबरिया परगनामे पड़ैए। परगना-परगनाक बीच किछु सामाजिक बेवहारो आ विचारो विचारसँ एक रहितो किछुमे दूरी बनले अछि। पछबरिया परगनाक खेतो आ खेत नपैबला लग्गियो दोसर परगनासँ नमहर अछिए। तहिना पुबरिया परगनाबलाकेँ मालगुजारी आठअना कट्ठा बेसी आन परगनाबलासँ लगैए। खाएर जे अछि से अछि मुदा पलारपुरोक अपन पहचान नहि अछि सेहो बात नहियेँ अछि। आन केतेको गामसँ केतेको मानेमे पलारपुर नीको अछि माने अगुआएलो अछि आ केतेको मानेमे आन गामसँ पछुआएलो तँ अछिए। बेवसायिक हिसाबसँ माने जीवनक क्रियाक हिसाबसँ जे जाति विभाजित समाजमे अछि तइमे पलारपुरक दुर्भाग्य रहल जे खेतमे काज करैबला जे जाति अछि ओ कम अछि आ आन-आन वृत्तिसँ जुड़ल जाति बेसी रहने गामक आधासँ बेसी जमीनमे गाछी-कलम तड़बोनी, खजुरबोनी अछि आ बाँकीमे बाड़ी-झाड़ी घराड़ीक संग किछु जोतसीम जमीन अछि। खाएर जे अछि से अछि। लोकोकेँ ते एते स्वतंत्रता अछिए किने जे अपना गाछीमे नीक आमक गाछ लगाबह कि ताड़े-खजुरक बोन लगाबह आकि सागवाने-सखुआ लगाबह। तेहेन विचार पलारपुरबलामे नहि छैन, सेहो तँ छैन्हे। जहिना जोड़ा लगा-लगा ताड़क गाछ रोपने छैथ तहिना खजुरोक रोपनहि छैथ, मुदा पछबरिया परगनाबला जकाँ गुड़ बनबैक लूरि नहि छैन। तँए कहब जे पलारपुरबलाकेँ गुड़ बनबैक लूरिये नहि छैन सेहो बात नहियेँ अछि। कुशियारक खेती करिते छैथ, कौल्ह-कराह सेहो रखनहि छैथ जइसँ अपन गुड़ो बनबै छैथ आ टीनक-टीन राव सेहो बनैबते छैथ। देशक आजादीक पहिनेसँ मिथिलांचलक लोक गरीबीक चलैत चाकरी करए बंगालक ढाकासँ लऽ कऽ आसाम, मोरंग धरि जाइ छला। मुदा जाइ छला मरदा-मरदी, स्त्रीगण परिवारमे रहि परिवार चलबै छेलखिन। माने ई जे खेती-बाड़ीसँ लऽ कऽ माल-जालक संग अपनो बच्चा-बुच्चीक सेवा करैत अपन परिवारोक सुरक्षाबल बनले आबि रहल छैथ। जहिना आर्थिक दृष्टिसँ पलारपुर गाम पछुआएल छल तहिना शैक्षणिक दृष्टिसँ इलाकामे अगुआएलो छल आ अखनो अछि। ओही गामक मध्यमवर्गीय जाति, ऐठाम मध्यमवर्गीयक माने आर्थिक दृष्टिसँ नहि समाजक जातीय दृष्टिसँ अछि, जइमे देवनक परिवार सेहो छैन। ओही देवनक परिवारमे कामेसरक जन्म 1946 इस्वीमे भेल। आजुक परिवेशमे तँ अधिकांश परिवारक बच्चाक छठियारक समय अस्पतालेमे बीतैए तँए छठियार की हएत आ दाइये-माइ भवितव्य की लिखती वा भोजे-भात की हएत। मुदा से कामेसरकेँ नहि भेल। दुनू भेल। माने दाइ-माइ बैस छठियार दिन कामेसरक नामकरणो केलैन आ भवितव्य सेहो लिखबे केलैन। तहिना नहि पान तँ पानक डंटीए जकाँ भोज सेहो भेबे कएल। जहिना देशक भीतर अनेको रंगक संस्था अछि आ अपन-अपन क्षेत्रक सीमामे सभ काज करैए तहिना समाजक भीतर दाइ-माइक संस्थाक सीमा सेहो छैन, जहिक अन्तर्गत अपन विधो-विधान लिखबे करै छैथ। माने भेल जे छठियारक राति जे दाइ-माइ एकठाम बैस धरतीपर आएल छह दिनक बच्चाक भाग्य-रेख लिखै छैथ ओ बच्चाक समाजक ओकातिक हिसाबसँ लिखै छैथ। जेहेन परिवारमे जन्म तेहेन भाग्य रेखा। पढ़ल-लिखल सम्पन्न परिवार हुअ आकि धन-बीत सम्पन्न परिवार हुअ, ओहन परिवारक भाग-रेखा लिखैकाल दाइ-माइकेँ जेहेन कलमक प्रयोजन होइ छैन तेहेन कलमक प्रयोजन मूर्ख वा विपन्न परिवारमे नहियेँ होइ छैन। बजैकाल सभ बजिते छैथ जे 'तोहर भाग्य मोटका कलमसँ लिखल छह ते महींका बात केना बुझबहक।' तहिना महींका कलमसँ लिखेलहा सेहो कहिते छैथ जे 'तोरा जकाँ कि हमरा कपारमे मोटका घँसल अछि.!' खाएर ई तँ गप-सप्प भेल। कामेसरक भाग्य-रेख लिखैकाल जे दाइ-माइ एकठाम बैसली तँ ओहने दाइ-माइ ने बैसली जे ने राजाघर कहियो देखने छेली आ ने बनिया घर। तँए किए राज-सत्तेक विचार आकि कल-कारखानेक विचार मनमे अबितैन। देवन सन ओहन मटिया-मजदूर, मटिया-मजदूर ओ भेला जे कोनो गोदाम वा कार्यालयमे वस्तुक उठा-बैसी करै छैथ। माने एक गोदामसँ अन्न वा कोनो आने वस्तुक बोरा वा आने वस्तु उठा दोसर गोदाममे वा आने ठाम लऽ जाइ छैथ। पचीस बर्खक देवन पाँच बर्खसँ कलकत्ताक सरकारी गोदाममे मटिया मजदूरक काज करैत आबि रहल छला। खाएर देवन जे छला से रहौथ, मुदा निष्पक्ष दाइ-माइक कचहरीमे तँ कामेसर ओहने बेटाक रूपमे जन्म नेने छल, जहिना परब्रह्म परमेश्वर राम वा कृष्ण, दशरथ आ नन्दक परिवारमे जन्म नेने छला। मुदा दाइ-माइक प्रवल विचार रहितो जीवनक विचार माने जेहेन जीवनक परिवार अछि, तही अनुकूल ने केकरो भाग्य-रेख लिखती। एते तँ दाइ-माइक बीच सहमत बनले छैन जे समझदार चिलकौर अपन समझदारीसँ बच्चाक सेवा करत। जहिना बिनु दूधोक, माने कोनो कारणेँ माएकेँ दूध नहि भेने, चिलकौर बच्चाकेँ ओहिना पोसि-पालि दुनियाँक रंगमंचपर ठाढ़ करै छैथ जेना सभ तरहक सम्पन्न चिलकौर करै छैथ। दाइ-माइक समूहक बीच सहमत ई बनल छेलैन जे मनुक्खक बच्चा छी तँए मनुक्खे जकाँ फुलेबो-फड़बो करए आ मनुक्खेक वृक्ष जकाँ ऐगला पीढ़ीक जीवनो दिअए। सर्वसम्मति विचार लिखलैन जे बच्चा अपन पूर्ण औरुदाक जीवन पाबए। दोसर विचार जखन जीवन आ जीविका दिस एलैन तखन किछु गोरेक विचार रहैन जे एक लोढ़ी बोनि लिखल जाए, तँ किछु गोरेक विचार रहैन जे जँ भीख मांगि गुजर करत तँ विधि-विधान फुसि भऽ जाएत। जीवन तँ दुनू रंगक अछिए। ..तत्-मत् करैत सभ अही विचारपर सहमत भेली जे जेहेन अपन लूरि-मुँह हेतइ तेहेन जीवन बना अपन दुनियाँ ठाढ़ करैत जीब लेत। सएह भेल कामेसरक छठियार रातिक भाग्य-रेख। पलारपुर ओहन गाम अछि जइमे विविधतोक भरमार अछि आ एकरूपतो ओहन अछिए जेहेन सभ गाम-समाजमे रहैए। देखबे करै छी जे जखन केतौ आगि लगै छै, गाम समाजक दृष्टिये, बजारू समाज बदैल कऽ ओइठाम पहुँच गेल अछि जे एक मकानक बीच एक डेरामे जँ गौंओं-घरूओ रहै छैथ तँ भेँट होइ छैन मास दिनपर। खाएर ई तँ गौंआँ-घरूआक बात भेल, जे अपन परिवारक भीतर भैयारियो आ बालो-बच्चाक बीच ओहन जीवन बनले जा रहल अछि जे महिना-महिना एक-दोसरमे गप-सप्प भेला भऽ जाइए। सबहक अपन-अपन कारोबार, जइसँ अपन-अपन जीवन सेहो बनियेँ रहल अछि, तइसँ वैचारिक दूरी बनब सोभाविके अछि। मुदा आगि-छाइक समय सभकियो एक भऽ जाइए। आने गाम जकाँ पलारपुरोमे व्यक्तिगत रूपमे दरबज्जो आ पूजो घर बेकता-बेकती सेहो अछि तहिना सामाजिक रूपमे मन्दिर, मस्जिदक संग ठकुरबाड़ी, गहबर, दीना-भद्री आ सलहेसक स्थान इत्यादि सेहो अछिए। जहिना पूजाक दोहरी रूप, धर्मक दृष्टिये, परिवार-परिवारमे अछि तहिना सार्वजनिक माने सामाजिक रूपमे सेहो अछिए। अनेको देवी-देवता ओहन छथिए जे सामाजिक रूपमे सर्वमान्य छैथ, तँ ओहन नहि छैथ जे जातीय रूपमे विभाजित भऽ खास जाइतिक छैथ, सेहो छथिए। सार्वजनिक रूपमे जहिना देवी-देवताक परसाद सर्वमान्य अछि तहिना जातीय रूपमे विभाजित भऽ अमान्य नहि अछि सेहो बात नहियेँ अछि। ओना, जातीय रूपमे विभाजित जे देवी-देवता छैथ तैसंग समाजिको जे छैथ, अपन-अपन मनकामनानुसार कबुला-पाती सेहो करिते छैथ, फल जेहेन भेटौन वा जे भेटौन से तँ अपन-अपन सभकेँ भेटतैन। बेकतीगत रूपमे जे दरबज्जा बनल अछि ओ बेकतीगत घरक (परिवारक) सामाजिक रूपमे अछि। परिवारक जे घर होइए माने आश्रमी घर ओइमे दोसरक आवाजाही आन जकाँ होइए मुदा दरबज्जाक रूप से नहि अछि। दरबज्जाक रूप समाजक घरक रूपमे अछि। जैठाम आनो (अनठियो) केँ पहुँचला पछाइत घरवारी माने दरबज्जा बनौनिहार, खेबा-पीबासँ लऽ कऽ आराम करै धरिक भार उठबै छैथ तहिना विचार-विमर्शक संग जीवन-मरणक सहारा सेहो बनिते छैथ। यएह छी मिथिलाक दरबज्जा। जइ दरबज्जाक रूप रहल जे कनैतकेँ हँसा विदा करब। जे दरबज्जाक मान प्रतिष्ठा भेल। ओना, लक्ष्मीनाथ गोसाईं सेहो अनेको गाममे अनेको दरबज्जा बनैलैन मुदा हुनकर दरबज्जाक रूखियो आ बेवहारो दोसर छेलैन। हुनकर दरबज्जाक रूखि छेलैन दरबज्जाक आगूक पोखैर। जे पोखैर जनसमूहक सहारासँ खुनबै छला। आ दरबज्जाक नाम बदैल 'कुट्टी' वा 'स्थान' रखै छला, जइमे जीवनक मूल-तत्त्वक प्रवचन सेहो करै छला आ मूल-तात्विक सेहो सहयोगीकेँ बनबै छला, जइसँ जाति-पाँजिकेँ लथाइर मनुक्खक जीवनकेँ श्रेष्ठ मानै छला। अपन जीवनकालमे लक्ष्मीनाथ गोसाईं बीससँ ऊपर रौदी, जेकरा मिथिलांचलमे अकाल सेहो कहल जाइए; लगसँ देख-भोगि चुकल छला तँए पानिक की महत्व जीवनमे अछि तेकरा नीक जकाँ ओ जनैत रहैथ। अपन ऐ विचारकेँ दोसरोकेँ जना लक्ष्मीनाथ गोसाईं पोखरिक निर्माण करबो केलैन आ करेबो केलैन। शिक्षण संस्थानक रूपमे पलारपुरमे मात्र एकटा संस्कृत विद्यालय अछि, बाँकी विद्यालय माने सामान्य विद्यालय गाममे नहि अछि। पलारपुर, सोनवरसा, नवनगर, धनकरही इत्यादि सात गाम मिला सोनवरसा नामक पंचायत अछि। मिडिल स्कूल तकक पढ़ाइ पंचायतमे होइए। पलारपुरक संस्कृत विद्यालयमे गामोक किछु खास जातिक आ आनो-आन गामक लोक पढ़िते छैथ। कामेसर जइ जातिक अछि तइ जातिक बच्चा सभ गामक विद्यालयमे नहि पढ़ैए। ओना, संस्कृत विद्यालयमे जहिना नीक शिक्षा भेटैए तहिना बच्चाकेँ, छात्रकेँ भोजनो आ पढ़ै-लिखैक किताबो-कॉपी विद्यालयेसँ भेटैए। सभसँ पैघ विचार अछि जे शिक्षको आ छात्रो एक्के भोजनालयक भोजनो करै छैथ आ एक्के ओछाइन-बिछाइनपर रहितो छैथ। तँए कहब जे परिवार नहि छैन सेहो बात नहियेँ अछि। लग-पासक जे शिक्षक छैथ ओ अपन परिवारेसँ, माने गामेसँ विद्यालय अबै छैथ मुदा जे बाहरक छैथ ओ छात्रेक संग जीवनधारण केने छैथ। यएह छी जीवनक संक्रमणक क्रिया। चौबीस घन्टा, माने दिन-राति नियमित रूपसँ जीवन जेहेन चलब गढ़ब तँ ओहने जीवन ने ठाढ़ हएत। खाएर जे हएत से पलारपुरबला अपन सीखता। पलारपुर गामोमे आ परोपट्टोमे माने आनो-आन गाममे जहिना किछु क्रियामे एकरूपता अछि तहिना बहुरूपतो अछिए। तइ बीच ईहो प्रक्रिया चलिते अछि जे जहिना किछुमे तोड़ होइए तहिना जोड़ सेहो भइये जाइए। यएह तोड़-जोड़ जे अछि ओ गतिशीलतो अनैए आ गतिहीनो तँ बनैबते अछि। आने गाम जकाँ पलारपुरमे बेटा-बेटीक बिआहो-दुअरागमन आ बेटाक मूड़नोमे जहिना एकरूपता अछि तहिना बहुरूपता सेहो अछिए। ओना, जहिना आन समाजक (आन गामक जातीय समाजक) किछु बेवहार पलारपुरोमे अछि तहिना पलारपुरक बेवहार आनो गाममे अछिए। तेतबे नहि अछि, गामक बीचक बेवहारमे सेहो विविधता अछि, एक जातिक क्रियाक चलैन किछु आरो अछि आ दोसर जातिक क्रियागत चलैन किछु आर। तेतबे नहि अछि जइ जातिक बीच एक चलैन अछि ओहू बीचमे आर्थिक ओकातिक हिसाबसँ सेहो विभिन्नता अछिए। यएह विषमता समाजक नियमसूत्र बनबैए जइसँ समाज भविस दिस बढ़ैत ठाढ़ रहैए। अपना ऐठाम माने मिथिलामे, समाजक बीच जे चलैन अछि ओ एक काज वा बेवहार रहितो अनेक रूपमे लतरल-चतरल सेहो अछिए। तँए केतौ एक साए आठक चलैन अछि तँ केतौ सोझे आठक चलैन अछि। एक यज्ञ-जपक अनेको रूप अछि। जइसँ कहल जाइए जे भावमे जँ पूर्ण पान अछि, जेकर खेबाक चलैन भोजनक पछातिक अछि, तैठाम ईहो तँ अभावमे कहले जाइए जे नहि पान तँ पानक डंटियोसँ यज्ञ पूर्ति कऽ लेबाक चाही। बिआहो-दानमे देखते छी जे जैठाम एक गोटाक बरियातीसँ विवाह यज्ञ पूर्ण होइक सम्पूर्णता प्राप्त करैए तैठाम सइयो गोटाक बरियातीसँ अपूर्णता नहि प्राप्त करैए सेहो बात नहियेँ अछि। तैठाम ई कहब जे पलारपुरमे बरियातीक धमगज्जर नहि होइए, सेहो बात नहियेँ अछि। एकठाम जहिना देखै छी जे पितो अपन इमान बँचा पुत्रकेँ अपनो योग्य बनबैक परियास नहि करै छैथ तैठाम इमान गमा नहि बनबै छैथ सेहो बात नहियेँ अछि सेहो बनैबते छैथ। ऐठाम इमानक अनेको रूप गुणानुकूल अछि, तँए अखन से नहि। अखन एतबे जे सबहक सभकेँ माने जहिना पुत्रकेँ तहिना पिताकेँ माने जन्मदाताकेँ अपने ऊपरसँ अपन बिसवास कमल जा रहल अछि। तैठाम आन तँ सहजे आन भेला। किए अपना ऊपरसँ सबहक बिसवास अपने उठल जा रहल अछि? की ओइ बिसवासकेँ पुन: घुमा कऽ नहि आनल जा सकैए सेहो बात नहियेँ अछि। आने गाम जकाँ पलारपुरोमे रंग-रंगक गुरुआइ करैबला गुरु-गोसाईं सबहक आगमनो छैन्हे। तैसंग गामक अपनो गुरुआइ करैक धन्धा नहि अछि सेहो बात नहियेँ अछि। जहिना जाति-धर्मक नामपर तहिना कर्म-क्रियाक नामपर गुरुक वन पसरले अछि। माता-पिता लगसँ जे गुरुआइ बच्चाकेँ शुरू होइए ओ परिवार समाज होइत देश-दुनियाँक सेहो होइते अछि.! एक समाज रहितो कियो कहता 'माछ खाएब शरीरक लेल हितकर अछि' तँ कियो कहता, 'माछ खाएबे पाप छी।' कियो कहता, 'बेसी खाएब अहितकर अछि' तँ कियो कहता, 'कम खाएब अहितकर अछि।' तँ कियो कहता, 'कम खाएब हितकर अछि।' एहेन-एहेन मुँह फँसौल झगड़ा-झंझट आने गाम जकाँ पलारपुरोमे अछिए। सिंहेश्वर दास, मनधन दास, कृत्तिधर दास आ रघु दास चारू गोटा अपन-अपन सम्प्रदायक बेना उठा दिन-राति लगले रहै छैथ। चारूक अपन-अपन चास-बास छैन्हे। चारू अपन-अपन इलाका जोति-कोरि महंथाइयो करै छैथ आ अपन पंथक प्रचार-प्रसार सेहो करिते छैथ। एक-सँ-एक चारू महंथक महंथाइक इतिहास समाजमे ओहिना जगजगा रहल छैन जेना कोनो आन गामक जगजगाइए। पहिल महंथ- सिंहेश्वर दासक अपन गुण छैन। माने बिआह-दुरागमन भेला पछाइत अपने मनमे पत्नीसँ वैराग्य जगि गेलैन। जगिते सोझे जा कऽ अपन ससुरकेँ कहलखिन जे अपन बेटीक दोसर बिआह करा दियौ, हमहूँ सोझामे बैसल रहब। अपन पत्नीकेँ अपने सोझामे दोसराइतक संग लगा अपने ओहिना महंथाइ कइये रहला अछि। पहिने माने शुरूमे तँ सालमे मास-दू मास अपन पितृभूमि बुझि गाममे रहबो करै छला मुदा आब तँ तेते भारी महंथ भऽ गेला जे दस-दस सालक पछाइत गोटे दिन ले गाम अबै छैथ। तँए कहब जे ओहन महंथ नहि छैथ जे तीन-तीनटा बिआह नहि केलैन वा पुलिसक हाथे मारि नहि खेने छैथ। सेहो छथिए। आने गाम जकाँ पलारपुरमे सेहो सालमे एक बेर अष्टयाम-कीर्तन महावीरजीक स्थानमे होइए तहिना महादेव स्थानमे सेहो नवाहो आ शिवरातिक उत्सव होइते अछि तैसंग दुर्गास्थानमे आसीनक नवरात्रा होइए तँ ठकुरवाड़ीमे सौनक शुक्ल एकादशीसँ पूर्णिमा दिन तक झूला सेहो होइते अछि। जहिना गाममे अनेको जाति अछि तहिना घरे-घर माने परिवारे-परिवार अनेको रंगक देवी-देवताक पूजा सेहो होइते अछि। जइसँ किछु-ने-किछु एक-दोसरमे अन्तर सेहो अछिए। स्पष्ट रूपेँ दूटा अन्तर तँ देखिये पड़ि रहल अछि। पहिल अछि जे देवी-देवताक अपन-अपन खास फूलो आ फलोसँ सिनेह रहने किछु-ने-किछु अन्तर अछिए। ओना, एहनो चलैन अछिए जे खास फूल-फल पसिन रहितो सहरगंजा माने सतरंगा फूलो आ फलोक जहिना चढ़ौआ तहिना पूजो होइते अछि। मुदा किछु अछि आ केतबो अछि तैयो सौंसे गामक लोक एकटा अपृथक समाज बनि एकठाम बास करिते छैथ। जहिना गाममे अष्टयाम, कीर्तन, पूजा-पाठ होइए तहिना कबीरपंथक माने निर्गुण पंथक बेकतीगतो आ सामूहिको रूपमे सेहो चौको-पान आ भनडारो होइते अछि। रमाउत पंथक सेहो भनडारो आ रामो-धुन होइते अछि। तैसंग दीनाभद्रीक (दादाजीक) गहबरो आ सलहेसो, धर्मराज स्थानमे सेहो सालमे एक बेर भगैत-भगताइ होइते अछि। जे सामाजिक रूपमे सेहो होइते अछि। खाएर जे अछि मुदा एते तँ स्पष्ट अछिए जे जेते परिवार पलारपुरमे छैथ ओ सभ कोनो-ने-कोनो पंथो-सम्प्रदाय आ जातियोसँ जुड़ल छथिए। तँए कहब जे समाजमे एकरूपता नहि अछि सेहो बात नहियेँ अछि, सेहो अछिए। जहिना जातीय भोजन-भजन बेकतीगत अछि तहिना सामाजिक सेहो अछिए। भलेँ श्राद्धक भोजकेँ जातीय भोज मानि पितृक उद्धार मानल जाइए मुदा एगारह जन कहि समाज नहि मानल जाइए, सेहो बात नहियेँ अछि। सेहो अछिए। जहिना पंथ-पथीक पथक बीच समाजमे सीमा-रेखा खिंचल अछि तहिना विधि-बेवहारसँ लऽ कऽ समाजक जीवनक संग कला-कौशल-साहित्य-संस्कृतिमे सेहो अछिए। पलारपुर गाममे चारिटा नाच-नाटकक मेड़िया अछि। ओना, कीर्तनिया-मण्डली आ छकरवाजीक मेड़िया सेहो अछि मुदा ओ मेड़िया नहि मेड़ जकाँ छोट आँटक अछि। माने ई जे जहिना नचनिया तहिना बजनिया अछि। जहिना कीर्तन केनिहारक संग एकटा तबला वा ढोलक बजौनिहार, एकटा झालि-मजीरा बजौनिहार रहै छैथ तहिना छकरवाजीमे सेहो बजनियाक संग झलिवाह रहिते छैथ जिनकर सहयोगसँ छकरवाजी चलैत अछि। मुदा नाट्य पार्टी से नहि होइए। अनेको जातीय भावक संग अनेको कलाकारो आ कलाकारक कलाकारी, माने कौशलक कौशल मिश्रित भऽ चलिते अछि। रामलीला पार्टीमे जहिना दर्जनो कलाकार अपन-अपन भार फुटा कियो राम तँ कियो रावण बनि अपन जीवनक अदाकारी देखैबते छैथ। मुदा से रासलीला आ कदमलीलामे नहि होइए। जहिना ज्ञानी ब्रह्मानन्दमे लीन होइ दिस बढ़ै छैथ तहिना भक्त प्रेमानन्द दिस बढ़िते छैथ। खाएर जे जे छैथ ओ तँ अपन-अपन मनराजक बात भेल। ऐठाम तँ मात्र पलारपुर गामेक बात टा अछि। जहिना आन-आन गाममे बेकतीसँ समाज आ समाजसँ बेकती बनैक अनेको रास्ता अछि तहिना पलारपुरमे सेहो अछिए। जीवनक सभ क्षेत्रमे एहेन रास्ताक ढबाहि लगले अछि जइमे एक-दोसरक बीच संक्रमण होइते रहैए। अखन स्वतंत्रता दौड़क, माने अंगरेजी शासनसँ मुक्त हेबाक दौड़क, समयक चर्च भऽ रहल अछि तँए ने बहुत पाछूक चर्च भऽ रहल अछि आ ने बीर्तमानक, जे आजादीक बहत्तैर-तिहत्तैर बर्खक पछातिक अछि। जहिना मिथिलांचलक भूमि सभ दिन उर्वर रहल तहिना जनसंख्याक बाढ़ि सेहो रहबे कएल। जइसँ गरीबक बीच गरीबियो सभ दिनसँ आबिये रहल अछि। अपना ऐठामक लोक जेर बना-बना माने सामूहिक रूपमे दस-बीस, पचीस-पचास, किसानी जीवनसँ जुड़ल काज करैले नेपालक पुबरिया इलाकासँ लऽ कऽ आसाम, बंगाल धरि कमाइले जाइ छला। पलारपुरक लोक सेहो साले-साल माने सालक छह मास, धनरोपनीसँ धनकटनी धरि करैले ग्रामीण इलाकामे जाइ छला। कलकत्ता शहरक रूप औझुका जकाँ तँ नहि छल, मुदा कलो-कारखाना आ कारोबारक उद्योगो-धन्धा तँ चलिते छल। गमैया मजदूर, खेतमे काज करैबला मजदूर जखन कलकत्ता जाए लगला तखन हुनकर हाथक काज बदललैन। जइसँ रिक्सा, ठेला चलौनाइक संग उट्ठा श्रमक श्रमिक, उट्ठा श्रमिक भेल जेकर ने काजक समय निर्धरित अछि आ ने मजदूरी निर्धारित अछि, बनि काज करै छला। जैठाम जेहेन काज रहल तैठाम तेहेन मजदूरी भेटै छेलइ। किछु दिन पूर्व तक माने जखन देशक बीच आजादीक आन्दोलन चलि रहल छल, मुदा ग्रामीण इलाकामे ओ रूप नहि पकैड़ पेने छल जे 1942 इस्वीक पछाइत पकड़लक, ताधरिक जे समय छल तइ समयक चर्च छी। एक्के-दुइये, गामसँ, मुदा परोपट्टाक समूह रूपमे, माने दस-बीस, पचीस-पचासक जेर बनि कलकत्ता सेहो जाए लगल छला। पलारपुरसँ सेहो पान-सात आदमी साले-साले, माने सालक आठ-नअ मास, कलकत्ता मटिया-मजदूरक काज करए जाइ छला। बरसातक समयमे काजमे किछु कमी अबै छल, माने जखन काज कमि जाइ छल, तखन ओ सभ गाम आबि खेतीक काजसँ पुन: जुड़ि जाइ छला। बंगालमे अपना सभसँ बेसी बरखा होइए, से एके-दुइये साल नहि, सभ साल होइए। बंगालक खाड़ीसँ जेहेन मानसून बनैए ओही अनुकूल अपना सभकेँ बरखा होइए। अठारह बर्खक देवन, किसानी जीवनक अनेको काज सीख नेने छल। अपना ऐठामक जे किसानक जीवन छल ओ ओहन बनले छल जे बरखा भेलापर धनरोपनी चलै छल आ अगहनमे जखन धान तैयार होइ छल माने धान पाकि जाइ छल, तखन धनकटनी होइ छल। जहिना अपना ऐठाम लोकक (जन संख्याक) सघनता अछि तहिना गामोक सघनता अछिए जइसँ उपजाउ भूमि कम अछिए। अखन मध्य मिथिलाक चर्च भऽ रहल अछि। मध्य मिथिलामे जहिना लोकक सघनता अछि तहिना गामोक अछिए। जे आन भागमे नहि अछि। मिथिलांचलक जे पुबरिया-उतरबरिया भाग अछि ओइमे जहिना जनसंख्याक पतराहट अछि तहिना गामो पतराएल अछिए। जेकर जीवन्त रूप अखनो एहेन अछि जे जहिना कोस-कोस भरिपर गाम अछि तहिना मध्य भागमे कोसक बीच चरि-चरि पँच-पँचटा गाम अछि। अखन तक देवन खेतोक मजदूर ओहन नहि बनि सकल छल जे अपन उकीतसँ काज करैत। अपन उकीतक माने भेल ओहन श्रमिक जिनका कोनो काजक पूर्ण ज्ञान छैन। माने भेल जे जिनका काज करैक तौर-तरीकाक दक्षता छैन। जिनका से नहि छैन जे अपन उकीते कोनो काज सिरैज ओकरा अन्तिम सीमापर पहुँच फल नहि पेलौं। कोनो काज करैक दक्षता मनुक्खमे जखन आबि जाइए तखन ओइ काजक तीत-मीठ माने नीक-बेजाए सेहो बुझए लगैए। काजोक तँ अपन चरित्र अछिए। कोनो काज एहेन अछि जइमे श्रमसँ बेसी श्रमिक भेटैए आ कोनो काज एहनो तँ अछिए जइमे श्रमक अपेक्षा श्रमिक कम भेटैए। देवन अखन ई बात नहि बुझैए। ओ एतबे बुझैए जे बाप-दादा जेना करैत एला अछि तहिना करैत आगू दिस बढ़ैत चली। ओकरा ई उकीत नहि छै जे गतिशीलक संग गतिशील बनए पड़ैए। अपन काजक किछु ऊहि सेहो बनैबते अछि। मुदा तैयो एते तँ भइये रहल अछि जे जहिना दोसर श्रमिककेँ मजदूरी भेटै छै, तेते देवनकेँ सेहो भेट जाइए। ऐठाम एकटा बात आरो अछि, ओ अछि जे बारह-तेरह बर्खक जहिया देवन छल तहियेसँ अपनो आ परिवारोक स्थिति देख पिताक संग बोइन करए जाए लगल छल। ओना, धनुषधारीक मनमे ईहो रहैन जे जखन अपना खेत-पथार नहि अछि तखन तँ वएह जीवन ने देवनोकेँ जीबए पड़तै जे अपन अछि। तइले ते जहिना अपने जे लूरि सीखने छी ओ जखन देवनोकेँ भऽ जाएत तखन ने ओकरो अपने जकाँ सभ दिन कमाइक आशा बनने जीवन चलैत रहत। सइयो रंगक काजसँ बेधल गामो आ समाजो अछिए। माने अन्न-पानिक खेती-पथारीक काजसँ लऽ कऽ गाछी-बिरछी, खढ़-खरहोरिक संग मालो-जाल आ घरो-दुआर बनाएबक संग अनेको काज गाममे अछि। जइसँ बारहो मास कोनो-ने-कोनो काज चलैक समय रहिते अछि। मुदा से सभ ले नहि।

ओना, अपना इलाकामे माने मिथिलांचलमे बाढ़ि-रौदीक प्रकोप आइये नहि सभ दिनसँ रहल अछि। तेकर जड़ि कारण बंगालक खाड़ीसँ उठल मानसून आ उतरबरिया पहाड़ अछि। माने हिमालयक हिमखण्ड भागसँ निकलल बर्फीली पानिसँ पैघ-छोट नदीक जाल बिछाएले अछि। सुनले-बुझल बात अछि जे बारह बर्खक रौदी भेला पछाइत त्रेतायुगमे मिथिला नरेश राजा जनक जखन अपने हाथे हर जोतलैन, तखन रौदियो मेटाएल आ सीता सन जग-जननी बेटियो भेटलैन। यएह तँ जीवन छी, अपन हाथ जखन अपन देहो आ मनोक भार हथिया लेत तखने योगिराज जनक जकाँ एकटा हाथ अग्निकुण्डमे तँ दोसर हाथ प्रेमक छाती पेब सकैए। अपना संग देवनक काज देख धनुषधारीकेँ एतेक बिसवास मनमे जगिये चुकल छेलैन जे जँ बेटा ओहुना चलैत रहत तैयो परिवारमे कहियो दुख-दरिद्रा नहि औत। ऐठाम पिताक चर्च भऽ रहल अछि, ओना आजुक परिवेशमे परिवारक माने पैछला पीढ़ीकेँ तोड़ि ऐगला पीढ़ीक संस्कारक अंगीकार भेल जा रहल अछि। जखने माता-पिताकेँ स्वस्थक अवस्थामे कोनो खगता भेने, बेटा-पुतोहुसँ संतोषजनक पूर्ति होइए तँ माता-पिताक बिसवास बेटा-पुतोहुपर बढ़िते अछि, जइसँ ओ श्रद्धाक पात्रक रूपमे हृदयमे अंकित भइये जाइए। बीस बर्खक अवस्थामे देवनकेँ अपन मसियौत भाय- कुशेसरसँ भेँट भेलैन। कुशेसर तीन सालसँ कलकत्तामे रहि रहल छैथ। अखन तकक जीवनक दुनियाँ जे देवनक छल तइमे एकाएक जेना अन्हार रातिमे चान निकलल, तहिना कुशेसरसँ भेँट भेलापर देवनकेँ भेल। कुशेसर अपन पैछला, माने कलकत्ता जाइसँ पहिलुका जिनगीक खिस्सा सुनबैत अखुनका जिनगीपर आबि तखन अँटकल जखन मुहसँ अपने खसलै- 'देह धुनि जखन देहक सेवा करैक अछि तखन दुनियाँ केतबो रंगक किए ने हुअए मुदा चलनिहार ले ते एक्केरंग अछि।' ओना, कुशेसरक बात देवन नहि बुझि पेलैन, मुदा अपना मनमे जे भाइक जीवन देख-देख नाचि रहल छेलैन ओ तँ जगले छेलैन। बजला- "भैया, भरि दिन काज करै छिऐ तँ केते कमाइन होइए?" देवन अखन सोल्होअना गामक ओहन लोक अछि जे ने सेर-पसेरीक हिसाब बुझैत आ ने अगुआएल-पछुआएल काज। मुदा कुशेसरक देहक चिष्टा आ कपड़ो-लत्ता देख देवनक मन एकाएक डोलि गेल छेलैन। ओना, डोलबोक दू रूप अछि, एक अछि अनका देख, माने अपन परिवारसँ इतरकेँ देख डोलब आ दोसर अछि अपन लगक माने परिवारक लोककेँ देख डोलब। कुशेसरकेँ देख देवनकेँ तहिना भेलैन। ओना, तहूमे जँ आयुक बेसी दूरी रहैत तखन जे रूप होइत ओ दोसर रंगक होइत मुदा एकउमेरिया रहने, भैयारीमे एक उमेरिया रहने आकर्षित हएब सोभाविक भइये जाइए, सएह भेलैन देवनकेँ। अपन बदलल जीवनक पूर्वक जीवनकेँ पकैड़ कुशेसर बजला- "बौआ, दुनू भाँइ एकउमेरिये छी, साले भरिक जेठाइ-छोटाइ दुनू भाँइमे अछि, तँए मनमे ई नहि हुअ जे कुशेसरक ऊपरमे जीन चढ़ि गेल अछि आकि मनुखदेवा। तोरे जकाँ हमहूँ जखन गाममे रहै छेलौं तखन जहिना तोरा भरि दिनक बोइन भेटै छह तहिना हमरो भेटै छल। मुदा जहियासँ कलकत्ता गेलौं आ ओइठाम काज करए लगलौं तहियासँ घरो थीर भेल आ अपनो मन थीर भेल। नहि तँ गाहीक-गाही खगताक भूर जहिना घरक माने परिवारक छल तहिना अपन शरीरक।" कुशेसर सेहो देवने जकाँ बिनु पढ़ल-लिखल लोक मुदा कलकत्ता गेलापर देखलैन जे गामसँ सभतरहेँ कलकत्ता अगुआएल अछि। जखने पछुआएल ससैर कऽ आगू बढ़ैए तखने सभ चीज अगुआ जाइते छइ। एकर माने ई नहि बुझब जे सोलह साए एकतीस इस्वीसँ पूर्व कलकत्ता ऐसँ भिन्न छल। ओइ समयमे जहिना अपना सबहक पूर्वज छला तहिना हुनको सभक छेलैन। कुशेसरक पिता छह साल पहिने मरि गेल छेलखिन तँए कुशेसरपर परिवारक भार पड़ि गेने, परिवारक जे अनुभव कुशेसरकेँ छेलैन से देवनकेँ नहि छेलैन। किए तँ देवनक पिता धनुषधारीकेँ जीवित रहने परिवारक भार देवनपर नहि पड़ल छेलैन तँए जे अनुभव कुशेसरकेँ छेलैन से देवनकेँ नहि छल। अपन अनुभवक हिसाबसँ कुशेसर बाजल छला। गाहीक-गाही भूरक अर्थ देवन नहि बुझि बजला- "भैया, हमहूँ कलकत्ता जाएब। अहीं संगे रहब।" कुशेसर बजला- "हमरा संगे जाइमे कोनो हर्ज नहि। जखन देहे धुनि केतौ खेबह तँ जैठाम चिड़ै जकाँ लोल बेसी भरत तैठाम ने रहब नीक हएत। मुदा बिना माता-पिताक विचार नेने केना जेबह।" देवन बाजल- "जाइमे केते खर्च हएत?" कुशेसर बजला- "खर्चक कोनो बात नहि, अपना नइ हेतह ते तत्खनात हमहीं देबह आ कमा कऽ वापस कऽ दिहह। मुदा माता-पिताक विचार नेने बिना जे हम लऽ जेबह तँ हमहीं ने दोखी हएब। सभ यएह ने कहता जे फल्लॉं फुसला कऽ देवनकेँ लऽ गेलै आ जे कमेतै से ठकि-ठकि लेतइ।" अपना जनैत कुशेसर अपन ऐगला जिनगी देख बाजल छला मुदा से देवन नहि बुझि पेलैन। ओना, देवनमे अखन ओ विचार नहि जागल छैन जे माता-पिता की छीया आ हुनकर विचार आ जीवन की छिऐन। तँए कुशेसरक विचारकेँ परवाहि केने बिना देवन पुन: बजला- "भैया, जहिया कलकत्ता जाए लगब तहिया हमरो कहब। हमहूँ जाएब।" देवनक जिद्द देख कुशेसर बजला- "बौआ, बाबूकेँ तूँ नहि पुछबुहुन तँ हमहीं पुछबैन मुदा बिनु विचारे केना लऽ जेबह।" देवन बजला- "हमहीं कहबैन। अहाँ कथी-ले कहबैन।" देवनक बात सुनि कुशेसरक मन मानि गेलैन जे भने अपन दुनू बापूतमे विचारि लेत से बेसी नीक हएत। पनरह दिनक पछाइत कुशेसर जखन कलकत्ता जाइक तैयारी केलैन तँ मनमे उठलैन जे नीक हएत जे दू दिन पहिनहि देवन ऐठाम जा दुनू बापूतक बीच सोझा-सोझी गप-सप्प करब। मनमे ईहो उठलैन जे जखन मेहनतक जिनगी बनौने छी तखन चोरा-नुकी चालि पकड़ैक कोन खगता अछि। काजे ने लोकक जिनगियो आ समयोक गवाही दइ छइ। एते दिन कुशेसरकेँ कलकत्ता जाइमे संगीक जरूरत होइ छेलैन, मुदा आब ओ बुझि गेल छैथ जे समस्तीपुरमे जे गाड़ी पकड़ब वएह गाड़ी हावड़ा वा सियालदह जंक्शन पहुँचा देत। समस्तीपुर तँ सहजे अपन जिले छी..। जइ दिनक विचार माने कलकत्ता जाइक विचार, संगी सभक संग कुशेसर केने छला तइ दिनक समाद सासुरसँ आबि गेलैन जे सासु भेँट करैले कहलैन अछि। कलकत्ता जीवनक बीच कुशेसर काजक महत्व बुझि गेल छैथ जे काजक महत्व जीवनमे सभसँ ऊपर अछि। तँए कलकत्ताक संगीक समय छोड़ि अपन समय कुशेसर मने-मन बनौलैन जे एक तँ सासुरक तहूमे सासुक समाद छी, नइ केना जाएब। कलकत्ता जाइक संगी चलि जाएत तँ चलि जाह, असगरो तँ जाइये सकै छी, तहूमे जँ देवन जाएत तँ ओहो संगी हेबे करत। भेल तँ संगीक जरूरत एतबे ने जे गाड़ीमे गप-सप्प केनिहार होथि आ जखन बाहरक काज, माने गाड़ीसँ बाहरक, करए निकलब तखन झोरा-झोरीक ओगरवाहि हुअए जे चोर ने चोरा लिअए। दुनू काज कोनो असाध थोड़े छी। जखन मनुख छी, संगमे मुँह अछि तखन जँ लगमे बैसल मुँहबला मनुक्खसँ मुँहमिलानियोँ नहि कएल हएत तखन कि गामे गोबरबैले जन्म नेने छी...। सोचैत विचारैत कुशेसर अपन विचार, कलकत्ता जेबाक विचार, सीकपर लटका कऽ रखि लेलैन जे पहिने सासुर जाएब, ओइठामसँ एला पछाइत देवन ऐठाम जाएब आ ओइठाम जे विचार हएत तइ अनुकूल समय बना कलकत्ता जाएब। अपन निर्धारित समयपर कुशेसरक संगी सभ कलकत्ता चलि गेला। अपन परिवारक काज सम्हारैमे कुशेसर पछुआ गेला। मुदा मनमे मिसियो भरि सन्देह नहि उठलैन जे संगी दुआरे कलकत्ता नहि जा हएत। कलकत्तामे चारि सालसँ रहि कुशेसर एते तँ बुझिये गेल छैथ जे जीवनमे अहिना आगू-पाछूक संगीक संग जीवनक गाड़ी चलिते अछि। परिवारोमे तहिना ने होइए जे कहियो पिताक अभिभावकत्वमे परिवार चलैए तँ कहियो अपना अभिभावकत्वमे आ कहियो पुत्रक अभिभावकत्वमे सेहो चलबे करत। अपन-अपन सभक सीमा छैन्हे। कलकत्ता जाइसँ दू दिन पहिने कुशेसर देवनक ऐठाम जा मौसा लग पहुँच प्रणाम करैत बजला- "मौसा, परसू कलकत्ता जाएब, देवन सेहो कहने रहए जे हमहूँ जाएब, से अहाँक की विचार?" कुशेसरक बात सुनि धनुषधारीक मन आगू-पाछू देखए लगलैन। पैछला जीवन की छल आ अखुनका की अछि..? अपने तँ ओहन जीवनक अभ्यस्त बनि गेल छी जे जएह अछि तहीमे दिन काटै छी, मुदा ऐगला पीढ़ीले तँ ऐगला जिनगी चाहबे करी। अपन भार कुशेसरपर दैत धनुषधारी बजला- "बौआ, तोहूँ कोनो आन नहियेँ छह। बेटा बनि देवन जखन जन्म लेने अछि तखन दुनियाँमे केतौ रहि अपन जीवन सुधारैत चला सकैए। मुदा उन्नैस-बीस बर्खक रहितो देवनकेँ साए तक अपने ने गनए अबै छै आ ने अपन नामे-गाम लिखए अबै छै, तखन गाम छोड़ि बाहर केना जाएत।" धनुषधारीक विचार सुनि कुशेसर मने-मन विचारलैन जे अपनो तँ एहने छेलौं, मुदा सतसंग भेने एते तँ भइये गेल अछि जे अपन जीवन-मरणक बात बुझए लगलौं अछि। कुशेसर बाजल- "मौसा, एहेन कि देवनेटा अछि आकि एहेन लोकसँ गामे समाज भरल अछि। कलकत्ता गेलापर सभ सीख लेत।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.आशीष अनचिन्हार- व्यंग्य- परंपरावादी भोजन (एक शोध) आशीष अनचिन्हार व्यंग्य परंपरावादी भोजन (एक शोध)

(प्रस्तुत शोध पटना आ दरभंगाक विश्वविद्यालय केर प्रोफेसर द्वारा भेल अछि आ बिहारक अन्य विश्वविद्यालय ओ प्रोफेसर सभ द्वारा अनुमोदित अछि। संगे-संग ई शोध भोजनक फोटो देखि कऽ भेल अछि। एहिसँ पहिने शोधकर्ता डायरी देखि कऽ फल्लाकेँ लेखक बना गेल छथि, तँइ फोटो देखि कऽ ओहिपर शोध करबाक लेल ई उपयुक्त पात्र छथि)। शोधक पहिल चरण-फोटो परिचय- एहि फोटोमे आएल भोजन "अनचिन्हारक गुटक" नेता द्वारा बनाएल गेल अछि आ गुप्त सूत्रसँ ई फोटो हमरा भेटल। आब एहि भोजनक विवरण देखू--

1) भात- फोटो केर आधारपर ई ज्ञात होइत अछि जे ई आसाममे प्रमुखतासँ भेटए बला चाउर "सोनाशक्ति"सँ भात रान्हल गेल अछि। चाउरक नाम दू वस्तुसँ मिलल छै 'सोना' आ 'शक्ति'। सोना मने धन, मने ई चाउर मँहग अछि। आ जिनका लग सोना तिनके लग शक्ति रहत ने। एहि चाउरसँ ई बुझाइत अछि जे "अनचिन्हार गुटक" ई नेता सामंतवादी आ दबंग अछि। प्रस्तुत भात रान्हल अछि अर्थात एहिमे कोनो नव प्रयोग नहि भेल अछि। एहिसँ ईहो साबित भेल जे ई नेता प्रगतिशील नहि अछि आ परंपरावादक पोषक अछि। भात केर मात्रा देखलासँ ई साफ होइए जे ई कथित नेता शोषक वर्गसँ अछि। आनो केर हिस्सा अपने थारीमे राखि लेने अछि। ओना एहि चाउरक भात हमहूँ खेने छी एक बेर साहित्य अकादेमीक दिससँ। अकादेमीक बेसी कार्यक्रम आब पूर्वोत्तरेमे होइत छै तँइ बुझल अछि हमरा। ओना एहि भातकेँ खेलासँ हम परंपरावादी नै बनलहुँ कारण ओ अकादेमी दिससँ देल गेल रहै। उपरमे हम देखलहुँ जे भातमे कोनो नव प्रयोग नै भेल अछि। आखिर २२म सदीमे एहन कोन बाध्यता छै जे आधा घंटा धरि चाउरकेँ गर्म पानिमे राखल जाए। ई प्राणि विरोधी कृत्य सेहो भेल। हमर कहब अछि जे चाउरकेँ शीतल पानिमे राखि ओकर भात बनाएल जेबाक चाही। ई नव प्रयोग भेल आ इएह प्रगतिशीलता छै। नियमकेँ सरल बनेबाक चाही, जटिल नियम हटा देल जाएत।

2) दालि- फोटोक आधारपर दालि मूँग ओ मसुरीक मिश्रणसँ बनल अछि जाहिमे टमाटर ओ नेबो सेहो देल गेल अछि। भाते जकाँ दालियोकेँ परंपरावादसँ बनाएल गेल छै। तँइ फेर साबित भेल जे ई नेता कट्टर परंपरावादी ओ प्राणि विरोधी अछि। भाते जकाँ हमर कहब जे दालिकेँ शीतल पानिमे दऽ कऽ बनाएल जाए। ईएह प्रगतिशीलता हेतै। आखिर नियम किएक छै लोके लेल नै। तँ फेर भोजनक नियम सेहो संशोधन हेबाक चाही।

3) तरकारी- फोटोक आधारपर बुझाइए जे ई आलू-पड़ोरक तरकारी थिकैक। ईहो परंपरेवादी नियमसँ बनाएल गेल अछि। ताहूमे अमानवीय तरीकासँ बनाएल गेल छै। सोचियौ जखन आलू आ पड़ोर गर्म तेलमे पड़ल हेतै तखन ओकरा कतेक दर्द भेल हेतै। हमर वश चलैत तँ ई अनचिन्हार गुटक नेताकेँ सेहो हम गर्म तेलमे धऽ देने रहितहुँ। साफे-साफ शोषक ओ परंपरतावादी। ई नियम आब नहि चलत। आलू-पड़ोर हो कि आन कोनो तरकारी सभकेँ मात्र शीतल जलमे धऽ कऽ सीधे थारीमे रखबाक चाही।

4) साग- फोटोमे जे साग अछि जे साफ-सफ ढ़ेकिया साग अछि जे कि मात्र असामे दिस भेटैए आ ईहो हम अकदेमिए दिससँ खेने छी। चूँकि ई साग मात्र एक क्षेत्रमे भेटैए थँ थारीमे भेटब ई सूचक अछि जे उक्त नेता क्षेत्रवादी सेहो अछि। एकक्षेत्र लेल लड़ैए। देखनेहे हेबै जे एकटा खास विधा लेल ओ बंदूको निकालि लैए। हमर मानब अछि जे विविधतापूर्ण प्रोफेसरी लेल ई एकविधावादी, एकक्षेत्रवादी नेता खतरनाक अछि। हमरा सभकेँ जे विधा मोन हएत से लीखब आ से प्रगतिशील बनि कऽ लीखब मने बिना नियमकेँ लीखब। ई सागो केर निर्माण साबित करैए जे उक्त नेता परंपरेवादी अछि कारण सागो परंपरेसँ बनाएल गेल अछि। एहि २२म सदीमे सागकेँ सीधे काटि कऽ थारीमे राखल जेबाक चाही। इएह प्रगतिशीलता भेलै।

5) अचार- फोटोसँ ई बुझाइए जे अचार धात्रीक थिक। आ ईहो साबित करैए जे उक्त नेता शोषक आ सामंतवादी अछि। आमक अचारकेँ हम सर्वहारा वर्गक मानै छी करण ई सुलभ छै। धात्रीक अचार सभ लग सुलभ नै तँइ ई नेता निश्चित तौरपर शोषक अछि एवं आमक अचार लग अपन दबंगइ देखा रहल छै। ई अचार सेहो परंपरागत ढंगसँ बनल अछि, एकरो नियम सरल हेबाक चाही।

6) सन्ना- फोटोमे देल गेल आलूक सन्ना तँ अछि सर्वहाराक मुदा एकरो निर्माण परंपरेसँ भेल अछि तँइ ईहो नीक नै। ओना सन्ना देलासँ ई साबित होइए जे उक्त नेता फैशने केर तौरपर मुदा अपना लग सर्वहारा राखए चाहैत अछि। ई ठीक ओहने बात भेल जे हम मुख्यधारा बला सभ अपना लग फैशनक रूपमे एक-दू टा कोनो दलित वा मुसलमान लेखककेँ राखि ओकर नाम गना मानि लै छी जे मैथिली सभ वर्गक छै, मिथिला सभ जातिक छै। ई तँ साफे-साफ हमर सभक देखौंस भेल। ओना फेर कहब सन्नो बनेबाक नियम सरल हेबाक चाही।

7) पाकल आम- फोटोमे पाकल आम राखि उक्त नेता ई साबित कइए देल जे ओ घनघोर शोषक वर्गसँ अछि आ एहि फोटोक माध्यमसँ ओ सर्वहारा वर्गक मजाक उड़ेलक अछि। कारण कोनो सीजनल वस्तु या तँ अपन शुरुआती समयमे मँहग होइत छै या जाए बला समयमे। निश्चित तौरपर उक्त नेता मध्यकालीन मानसिकता अछि।

ओना एहि ठाम पाठक प्रश्न उठा सकैत छी जे एतेक इंतजाम भेलाक बाद एहि फोटोमे पापड़ ओ दही किएक ने छै। तँ हम सूचित करी जे हमर गुप्त सूत्र कहलक जे पापड़ ओ दही सेहो छलै मुदा ओकरा एहि फोटोमे नहि लेल गेलै। उक्त नेता अपनाकेँ ओहिना सर्वहारा वर्गक घोषित करबए चाहैत अछि जे मैथिलीक मुख्यधारा लेखक सभ घूसक पाइसँ अलाशीन मकान बना सुख-सुविधामे रहैत मात्र रचनामे गरीबक चर्चा कए कऽ अपनाकेँ सर्वहारा वर्गक मानि लैत अछि। एहि ठाम उक्त नेता फेर हमर सभक देखौंस कऽ रहल अछि। आखिर ई नेता हमरे सभक देखौंस किए करैए।

निष्कर्ष (अंतिम अछि ई, आ पेन ओ की बोर्ड तोड़ि लिखल गेल अछि)- उक्त नेता जकर नाम गुप्त सूत्रक अनुसार 'आशीष अनचिन्हार' छै, आ जे अपनाकेँ 'अनचिन्हार गुटक' नेताक घोषित केने अछि से साफे-साफ घोर परंपरावाद, मध्यकालीन मानसिकताक ओ शोषक वर्गक अछि। संगे-संग देखौंस करए बला आ अप्रगतिशील अछि। एकरा हाथसँ, एकर मूँहसँ कोनो नव बात नहि निकलै छै। एकरा लेल फाँसी केर सजा सेहो कम छै मुदा हम सभ मानवतावादी छी तँइ एहि बड़बोला नेताकेँ साहित्यिक दुनियाँसँ बहिष्कार करैत छी। आ उम्मेद करैत छी जे हमर गुटक कोनो लोक आइसँ एकर नाम नहि लेत, एकर चर्च नहि करत। इएह सजा छै आ सहित्य केर मानवीय दृष्टिकोणसँ सही छै।

नोट- इम्हर गुप्त सूत्रसँ ईहो पता लागल अछि जे ई अनचिन्हार "फीनिक्स" बनबाक चक्करमे अछि। ई फीनिक्स एकटा एहन पक्षी अछि जे अपन पंख नोचि पुनः अपनाकेँ तागतवर बना लैत अछि। ई पक्षी अतेक खतरनाक जे जँ जरियो जाइत छै छै तँ ओकर छाउर सेहो फेरसँ पक्षी बनि जाइत छै। तँइ मुख्यधाराक सभ लेखकसँ आग्रह जे अनचिन्हारकेँ फीनिक्स बनबासँ रोकथाम लेल आइ रातिमे जूम मीटिंगपर आबी आ विमर्श करी जे ओकरा कोना रोकल जाए। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.प्रेमशंकर झा "पवन"- पशुधनक देवता संत बाबा कारू खिरहर प्रेमशंकर झा "पवन" पशुधनक देवता संत बाबा कारू खिरहरि

ओना त' हिन्दू धर्महि मे अलग-अलग समस्याक समाधान लेल अलग-अलग देवी देवताकें पूजा आराधना कयल जाइत अछि, ताहूमे मिथिलाँचल एहिमे अपन विशेषताक लेल आदि काल सँ जानल जाइत अछि। जेनाकि विद्याक लेल माँ सरस्वती, धनकें लेल माँ लक्ष्मी आ बलकें लेल बजरंगवलीक आराधना कयल जाइत अछि, तहिना पशुधनक लेल पशुधनक देवता संत बाबा कारू खिरहरिकें पूजा अर्चना कयल जाइत अछि। संत बाबा कारू खिरहरिकें भव्य मन्दिर सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक महपुरा गाममे कोशी नदीक किनार पर स्वस्थित अछि। बाबा कारू खिरहरि बहुत पैघ शिव भक्त छलाह। ओ पशुधनक रक्षाक लेल हरदम शिव अराधना मे लागल रहैत छलाह, जाहि कारण लोक हुनका संत शिरोमणि कहैत छनि। संत बाबा कारू खिरहरिकें आराध्य देव बाबा नाकुचेश्वर महादेव छलनि। जे महिषी प्रखंड क्षेत्रमे अवस्थित महाभारत कालीन मन्दिर अछि। बाबा नाकुचेश्वर महादेव मन्दिरक शिवलिंग कलाकृतिक लेल सुप्रसिद्ध अछि। कहल जाइत अछि जे एहिमे पांडव पुत्र नकुल पूजा केने छलाह जाहि कारण एहि मन्दिरक नाम नाकुचेश्वर महादेव मन्दिर परलनि। कोनो समयमे एहिठाम धनधोर जंगल छल। आस पासक लोक एहि जंगलमे गाय चरेबाक लेल अबैत छलाह। जाहिमे सँ एकटा गाय नित्य अपन थनसँ एहि स्थल पर दूधाभिषेक करैत छल। एक दिन चरवाहा इ दृश्य देखलक त' ओहि स्थानकें कोरबाक कोशिश केलक, ओकरा एकटा पाथर नजरि एलैक मुदा निकालि नहि सकल। परेशान भय चरवाहा पाथरकें ओहिना छोरि चलि गेल। मुदा ओ दृष्य राति भरि ओकरा बेचैन केने रहल आ भगवान ओकरा सपनामे आवि ओहि शिव लिंगकें पूजा करवाक लेल कहलखिन। ताहि दिनसँ ओहि स्थान पर पूजा अर्चना होमय लागल। धीरे-धीरे इ स्थान प्रसिद्ध शिव मन्दिर "बाबा नाकुचेश्वर महादेव" सम्पूर्ण मिथिलामे जानल मानल स्थानक श्रेणीमे आवि गेल। ओना त प्रतिदिन एहि मन्दिरमे श्रद्धालुकें आवा जाही लागले रहैत अछि, मुदा महाशिवरात्रि, सावन आ नरक निवारण चतुर्दशीक अलावा सब रैव दिनकें मेला लागल रहैत अछि। महाशिवरात्रि पर मन्दिरमे शिव विवाहक उत्सव सेहो मनायल जाइत अछि। महाशिव रात्रिक दिन शिव भक्तक लेल खास होइत छनि, जाहि कारण शिवधुन अष्टजाम संकृतन सेहो कयल जाइत अछि।

संत बाबा कारु खिरहरिकें पशुधनक रक्षाक लेल वरदान भेटल छलनि। कहल जाइत अछि जे बाबा कारु भोरे उठि नहाकें नाकुचेश्वर महादेवकें जलाभिषेक करैत छलाह। जाहिसँ हुनकर आराध्यदेव नाकुचेश्वर महादेव प्रशन्न भए दर्शन देने छलखिन आ वरदान मँगवाक लेल कहलखिन त' बाबा कारू असहाय पशुकें जीवनदान देवक वरदान मंगलनि। तकर बाद बाबा कारू पशुधनकें रक्षा करय लगलाह आ लोक देवताकें रूपमे पूजनीय भय गेलाह।

वर्तमान मे संत बाबा कारू खिरहरिकें मन्दिर में सम्पूर्ण मिथिलाँचल आ नेपाल सँ भक्त पशुधनक स्वास्थ्य लाभ लेल मनोकामना करैक लेल अबैत छथि आ मनोकामना पूर्ण भेलाक बाद गायक दूध सँ बाबा कारूकें दुग्धाभिषेक करैत छथि। इ अनवरत सालो भरि चलैत रहैत अछि मुदा शारदीय नवरात्राक महासप्तमीकें महपुरा स्थित संत बाबा कारू खिरहरिकें मन्दिर मे अपार भीड़ इकट्ठा होइत छनि आ बाबाकें दुग्धाभिषेक कयल जाइत अछि। एहन मान्यता अछि जे एहि दिन दुग्धाभिषेक केला सँ सब मनोकामना पूरा होइत अछि। जाहि कारण एहि दिन हजारोकें संख्यामे लोक इकट्ठा भ' हजारो लीटर दुग्धाभिषेक करैत छथि जे मन्दिरक पाछू मे बहैत कोशी नदीमे समाहित भय जाइत अछि। दूधकें अलावा बाबा कारुकें मिठाइ, चावल, लाठी, खड़ाम आ फूल फलकें संग पूजा अर्चना कयल जाइत अछि। पूजा अर्चनाकें संग भक्त भाव सेहो करैत छथि जाहि सँ मन्दिर परिसर भक्तिमय भय जाइत अछि। महासप्तमीकें मन्दिर परिसरमे गाय दूधसँ बनल खीरकें महाप्रसाद बनैत अछि। महाप्रसादक लेल बड़ नमहर कतार लगैत अछि आ भक्त घंटो तक इंतज़ार कय महाप्रसाद पवैत छथि। जाहि लेल महिषी पुलिसकें बहुत परिश्रम करय परैत छनि। एहि दिन भीड़कें देखैत वाहनकें ठहराव दू किलोमीटर पहिने कोशी तटबंध पर कयल जाइत अछि आ ओहिठाम सँ भक्त पैदल मंदिर परिसर तक पहुँचैत छथि।

कोना पहुँचब बाबा कारू खिरहरि मन्दिर

सहरसा रेलवे स्टेशन, जतय देशकें सब जगह सँ ट्रेन अबैत अछि पहुँचि, ओतय सँ २० किलोमीटर बाबा कारू खिरहरिकें मन्दिर छनि। देश कें प्रमुख शहर सँ सीधे बस सँ सेहो सहरसा पहुंचि एतय सँ ऑटो बुक कय बाबा कारू खिरहरि मन्दिर आसानी सँ पहुँचल जा सकैत अछि। स्थानीय नेता लोकनिकें प्रयाससँ इ जगह पर्यटक स्थलकें रूपमे सेहो विकसित भय चुकल अछि, ताहि एहिठाम सब सुविधा उपलब्ध अछि। ओना त' मिथिलाक माटिए मे भक्ति भाव रसल बसल अछि ताहू मे एहि क्षेत्र मे किछु विशेष अछि, ताहि एकवेर एहि स्थल कें परिभ्रमण जरूर करी।

लोक आस्थाकें केंद्र बाबा कारू खिरहरि स्थान

एहन मान्यता अछि जे बाबा कारू खिरहरि मन्दिरमे जे कियो भक्त मनोकामना करैत छथि ओ जरूर पूरा होइत अछि। जाहि कारण एतय दूर-दूर सँ भक्त आवि मनोकामना करैत छथि आ मनोकामना पूरा भेलाक बाद पुनः आवि बाबाकें दूध चढ़बैत छथि जाहिसँ रोज खीर बनैत अछि आ भक्त प्रसाद ग्रहण करैत छथि। मन्दिरमे बाबा कारू खिरहरिकें बगल में हुनक छोट भाइ बाबा लक्षण कें मूर्ति सेहोस्थापित छनि। दुनू भाइक बीच अगाध प्रेम छलनि। बाबा खिरहरि स्थान में गांजा सेहो चढ़ाओल जाइत अछि। मन्दिरकें पुजारी कहैत छथि जे बाबा गांजा कें प्रेमी छलाह जाहि कारण दू चीलम गांजा रोज चढ़ाओल जाइत अछि। मन्दिर कोशी नदीक बिलकुल किनार पर रहलाक बादो कोशी नदीक उग्र धारा अखन तक बाबाक मन्दिरकें कोनो छति नहि पहुँचेलनि अछि। इ बाबा कें चमत्कार छनि जे हर साल कोसी नदीक बाढ़ि मन्दिरकें बिना कोनो नुकसान पहुँचेने चलि जाइत अछि। इ स्थान केवल धर्म स्थानेटा नहि अपितु मिथिलाक एकटा सांस्कृतिक बिरासत सेहो अछि। -प्रेमशंकर झा "पवन" संगम विहार, दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-४) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (चतुर्थभाग) डा. बिपिन कुमार झा (संस्थापक आ सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई-शोधपत्रिका) (एहि सँ पूर्व महाकवि भास केर लिखल कर्णभारम् जे कर्णक मनोव्यथा पर लिखल गेल प्राचीनतम एकांकी अछि, संस्कृत में लिखल एहि ग्रन्थक तृतीयप्रभाग धरि मैथिली रूपान्तर पढने रही अहाँ सब, आई ओहि सं आगू) कर्णः- ततः कतिपयकालातिक्रमे कदाचित्फलमूलसमित्कुशकुसुमाहरणाय गतवता गुरुणा सहानुगतोऽस्मि। कर्ण- ओकर बद किछु समय क बाद गुरूजी संग फल-मूल-समिधा-फूल आदि अनबाक हेतु हम गेल रही शल्यः- ततस्ततः। शल्य- ओकर बाद कर्णः- ततः स गुरुर्वनभ्रमणपरिश्रमान्मदङ्के निद्रावशमुपगतः। कर्ण- ओकर बाद ओ गुरूजी जंगल में अधिक थाकि जेबाक कारण हमर कोडा में सुति रहला शल्यः- ततस्ततः। शल्य- ओकर बाद कर्णः- ततः कर्ण ओकर बाद कृत्ते वज्रमुखेन नाम कृमिणा दैवान्ममोरुद्धये निद्राच्छेदभयादसह्यत गुरोर्धैर्यात्तदा वेदना। उत्थाय क्षतजाप्लुतः स सहसा रोषानलोद्दीपितो बुध्वा मां च शशाप कालविफलान्यस्त्राणि ते सन्त्विति ।। 10 ।। ओकर बाद दुर्भाग्यवश बज्रमुखनामक कीडा हमर दुनू जांघ में काटि लेलक, तैय्यो गुरूजी के निद्रा भंग नहि भय जानि एहि डर सं हम ओहि असह्य वेदना क धैर्यपूर्व सहि लेलहुं। ओकर बाद खून सं लथपथ भय गेलाक कारण ओ उठि कें बैस गेला आ हमर क्षत्रिय बुझ क्रोधाग्नि सं धधकैत शाप देलथि कि समय एलापर अहाँ क अस्त्र विफल भय जायत। शल्यः- अहो कष्टामभिहितं तत्रभवता। शल्य- ओह् ई त बहुत कष्टकर गप्प कहि देलथि। कर्णः- परीक्षामहे तावदस्त्रस्य वृत्तान्तम्। (तथा कृत्वा) एतान्यस्त्राणि निर्वीर्याणीव लक्ष्यन्ते। अपि च। कर्ण- ताबत धरि हम अपन अस्त्र कथा के परीक्षण करैत छी। ई सब शक्तिरहित लागि रहल अछि और... इमे हि दैन्येन निमीलितेक्षणा मुहुः स्खलन्तो विवशास्तुरङ्गमाः। गजाश्च सप्तच्छददानगन्धिनो निवेदयन्तीव रणे निवर्तनम् ।। 11 ।। अपन दीनता सं आंखि बन्द केने ई घोडा अपन विवशता सं बारम्बार रास्ता में पिछडि रहल अछि। सप्तच्छदगन्ध क समान कटुमधुधारा बला हाथीराज सेहो दीनहीन भय कए युद्धस्थल सं मानू भागि जेबाक हेतु कहैत अछि। शङ्खदुन्दुभयश्च निःशब्दाः। शंख तथा दुन्दुभि सेहो निश्शब्द भय गेल शल्यः- भोः कष्टं किं नु खल्विदम्। शल्य: ई त महान् कष्ट अछि ई की भय रहल अछि। कर्णः- शल्यराज! अलमलं विषादेन। कर्ण- शल्यराज! अखनि विषाद व्यर्थ अछि। हतोऽपि लभते स्वर्गं जित्वा तु लभते यशः । उभे बहुमते लोके नास्ति निष्फलता रणे ।। 12 ।। युद्ध में मरला सं स्वर्ग भेटै छै जितला सं राज अतएव युद्ध में हानि नै कियाक त संसार में दुनू मान्य अछि। अपि च और .. इमे हि युद्धेष्वनिवर्तिताशा हयाः सुपर्णेन समानवेगाः। श्रीमत्सु काम्बोजकुलेषु जाताः रक्षन्तु मां यद्यपि रक्षितव्यम् ।। 13 ।। जिनका स युद्ध में निराश नै भय सकैत छी एहेन गरुड समान वेगबला तथा शोभावला ई शोभायमान काबुली घोडा जिनक रक्षा हमरा करबाक चाही ओ हमर रक्षा करय। क्रमश... अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १३म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १३म खेप १३ बैद मधुकान्तक उपचार कारगर सिद्ध भेल । मास दिन बीतैत-बीतैत हुनकर दुनू आँखिक ज्योति वापस भए गेल । जयन्तक प्रसन्नताक अंत नहि छल । आब हुनका विश्वास भेलनि जे ओ अपन पूर्वजक ॠण चुका सकताह । कठोर परिश्रमसँ अर्जित विद्याक उपयोग समाज कल्याण हेतु कए सकताह । मासदिनसँ ओ कतहु गेल नहि रहथि ने हुनकासँ ककरो भेंट करबाक अनुमति रहैक। बैदक कहब रहनि जे इलाजक समयमे हुनका मानसिक तनावसँ बचाएब बहुत जरूरी अछि । तेँ बहुत संयमपूर्वक हुनका रहए पड़लनि । मासदिनसँ आचार्यजी सेहो एतहि रहथि । जयन्तकेँ ओहिना छोड़ि कए चलि जाएब हुनका उचित नहि बुझानि । मुदा ओतहु आश्रमक काजसभ हुनके पर चलैत छल । समादपर समाद अबैत रहल । संगे जे हुनका संगे आएल छात्रलोकनि सेहो वापस जएबाक हेतु व्याकुल रहथि । अंततोगत्वा,ओ लखनपुरसँ बिदा हेबाक इच्छा प्रकट केलनि । " कालीकान्त सेहो कए बेर समाद दए चुकल छथि । आश्रमक स्थिति से गड़बड़ा रहल अछि । तेँ आब हमरा जएबाक अनुमति दिअ।"-आचार्यजी जयन्तसँ कहलखिन । जयन्त की बजितथि? ओ तँ आचार्यजीक उपकारसँ दबल छलाह । तैओ कहलखिन- "आचार्यवर! अपनेक चलि गेलाक बाद तँ हम सरिपहुँ अनाथ भए जाएब । माता-पिताक देहावसानक बाद अपनहि हमरा शरण देलहुँ, एहि योग्य बनओलहुँ जे हम आइ छी ।  मुदा अपनेक ॠण तँ ठामहि अछि, ओकर एकहु अंश हम नहि चुका सकलहुँ आ अहाँ आब वापसो जा रहल छी ।" "जयन्त ई संसार छैक । एहिठाम आवागमन लागल रहैत अछि । केओ सभदिन ककरो संगे नहि रहि सकैत अछि । हमरा लोकनिकेँ ईश्वरक एहि नियमकेँ स्वीकार करबाक चाही । हमरा विश्वास अछि जे अहाँ अपन कौलिक मर्यादाक अनुकूल एहि पाठशालाकेँ फेरसँ सशक्त करबामे पूर्ण सफल होएब । हमरा लेल एहिसँ पैघ प्रसन्नताक गप्प आओर की भए सकैत अछि?" "हमरा तँ अपनेक बिना एको डेग ससरब मोसकिल बुझा रहल अछि । आचार्यवर! हम जे किछु छी आ जे किछु एखन धरि कए सकलहुँ से अहींक कृपा थिक । आब तँ किछु फुरा नहि रहल अछि जे केमहर जाइ। यद्यपि अपनेक आशीर्वाद आ बैदजीक अथक प्रयाससँ हमर नेत्रक ज्योति वापस भए गेल अछि ।  मुदा ...." "मुदा की? अहाँ तँ परमविद्वान आ ज्ञानी छी । स्वयं अपन मार्ग प्रशस्त कए सकैत छी आ करबे करब। फेर हम कतहु अन्यत्र थोड़े जा रहल छी । शारदाकुंज तँ अपनेकेँ सतत स्वागत करबाक हेतु तत्परे रहत । " "बहुत मोसकिलसँ शोधग्रंथ बँचि सकल । एहिठाम एकर रक्षा के करत? कहीं ओ दुष्टसभ एतहु पछोड़ केलक तखन ?" "बेसी चिंता नहि करू । समय अपन समाधान स्वयं करैत अछि ।" एतेक गप्प केलाक बादो जयन्तक चित्तमे चिंता रहबे करनि । हुनका चिंतित आ उदास देखि आचार्यजी पुछलखिन- "अहाँक चिंताक कारण किछु आओर बुझा रहल अछि जे अहाँ प्रकट नहि कए रहल छी ।" "संकोचवश नहि कहि पाबि रहल छी आचार्यवर!" "हमरा-अहाँक संवंधमे संकोच कहिआ पैसि गेल? अपन मोनक गप्प कहब नहि तँ हमसभ बुझबैक कोना?समाधान होएत केना?" "हम शीला लए कए बहुत दुखी छी । ओ हमर बालसखा थिकीह । गाम अएला मासदिनसँ बेसी भए गेल । मुदा आइधरि ई नहि बुझि सकलहुँ जे ओ की हालमे छथि, छथिहो कि नहि छथि?" "हम बैद मधुकान्तसँ एहि विषयपर कैकबेर चर्चा करबाक प्रयास केलहुँ परंतु आ बात केँ कतहु दोसर दिस घुमा दैत छलाह । कहि नहि ओ एना किएक करैत छलथि?" "हमरा शीलाक प्रति अहाँक जिज्ञासा बूझल अछि। तेँ हम बहुत चेष्टा केलहुँ जे सही सूचना अहाँकेँ दी । मुदा से संभव नहि भेल । गामोक लोकसभ एहि प्रश्नपर मौन भए जाइ छथि । कहि नहि एहन कोन बात छैक जे ओ सभ हमरा कहबासँ बँचि रहल छथि । मुदा अहाँ धैर्य राखू। आब तँ गामेमे रहब । सभबात अपने पता लागि जाएत ।" "पता लागए जोगर हेतैक तखन ने? नाना प्रकारक अनिष्टक आशंका भए रहल अछि । अन्यथा बैदजी एना चुप्प किएक रहितथि?" "बात जे होइक । मुदा अहाँसन विद्वान ओ विवेकी पुरुषकेँ उद्वेलित भेनाइ उचित नहि अछि । ई जीवन ईश्वरक वरदान अछि। से बूझि जे परिस्थिति अछि ओहीमे अपन आओर समाजक उद्धार करबे उचित अछि।" आचार्यक बात सुनि जयन्त किछु आश्वस्त भेलाह। शोधग्रंथक सुरक्षा लए कए आचार्य सेहो चिंतित रहथि ।  मुदा ओहिठाम रहिओ कए ओ की कए लितथि? जानकीधाममे तँ सभगोटे रहबे करथि तथापि की भेल? तरह-तरहसँ जयन्तकेँ बुझा-सुझा कए आचार्यजी अपन शिष्यसभक संगे जानकीधाम हेतु प्रस्थान केलाह। गामक के कहए इलाकाक लोक आबि कए हुनकासभकेँ गामक सीमानसँ बहुत दूर धरि अरिआति देलक। केओ वापस हेबाक हेतु तैयारे नहि होइत छल ।  जयन्तक तँ बाते छोड़ू । ओ तँ नेना जकाँ कानि रहल छलाह। हुनकर आँखिसँ निरंतर नोर झहर-झहर खसि रहल छल। धारक पार होइतहि आचार्यजी शिष्य संगे आगू बढ़ि गेलाह। गामक लोकसभ सेहो लौटि गेलाह । जयन्त अखनहु धारक कातेमे बैसल रहथि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.डॉ शेफालिका वर्मा- पुरान टिहरीक दर्द (एकटा संस्मरण) डॉ शेफालिका वर्मा पुरान टिहरीक दर्द (एकटा संस्मरण)

जखन टिहरी बाँध बनि गेल , सब नागरिक के पुरान टिहरी सं 'नयी टिहरी' मे स्थापित क' देल गेल तँ खुशीक जगह एकटा नमहर सांस निकलल ओ मंदिर सब सत्येश्वर महादेव ,बद्री केदारक , भैरव मंदिर केओ अपना के नै बचा सकलैथ ; मुदा ओहि पुरान टिहरीक साक्षी हम सब -- दर्द दर्द आ दर्द अक्टूबर क दशहरा मे वर्मा जी के महाप्रयाणक उपरान्त हमरा बच्चा सब दिसम्बर मे दिल्ली ल' अनलक , तरुणा विकास जीक मसूरी जेवाक जिद्द भ' गेल . तुरते ई छोड़ि गेल छलाह , हम विक्षिप्तावस्था मे छलौं। हम मना क' देलौं तो सब जो हमरा छोड़ि। हम ते तोरे कारण जेवा ले चाहैत छी मम्मी , सब भाई बहिन तोरा संगे ते रहबो , राजीव संजीव के जेवाक खूब मोन छल खाली जया अलसा रहल छलीह , आरुषि अदिति उछलि रहल छलीह संस्कृति सात मासक मात्र । २३ दिसंबर क भोरभोर टेन सीटर क़्वालिश गाड़ी से हम सब विदा भेलौं। जाहिठाम कुहेसक कारण ट्रेन सब आठ दस घंटा लेट चलि रहल छल , ओहिठाम बच्चा सभक पहाड़ पर जेवाक जिद्द दुस्साहसे छल ने। गाड़ी मे दस आदमी ते छलौं मुदा ओहु से बेसी शाल ,कार्डिगन, कोट सब भरल छल। मेरठ शहर से बाहर एकटा चाहक दोकान पर गाड़ी रुकल - हम सब चाह पीवैत रहलौं आ तरुणा गाडी सं तरह तरह केर जलखै चाँदी सन चमचमाइत प्लेट निकालि ओहि मे पूड़ी भुजिया, तरह तरह के अँचार सभके दिय लगलीह। हमर आँखि नोरा गेल ---आय तरुणा के पापा रहितैथ तँ तुरत- आर की सब छौ गुड़िया निकाल निकाल --तरह तरह केर भोजन हुनका बड्ड प्रिय छल। मोन पड़ि आयल पटना मे एक बेर हम नेहा हिनका संग मौर्यालोक मे मार्केटिंग कर' गेल छलौं घूरती बेर बजलाह आब चलु अन्नू सं भेंट करैत घर जायब। अन्नू हमर भौजाय शरद केर पत्नी जे रेलवे मे एकौंट्स के बड़का पोस्ट पर छल। हम बजलौं ई कोनो टाइम छी जेवाक --दिन मे लन्च मे सेंटू आयल होयत। ओ खेवा लेल जिद्द कर' लगतीह , एतेक सासुर जेवाक कोन तुक छै ----एकटा मासूम नेना जकाँ नेहा के बजलाह -- जिद्द करत अन्नू ते की हेतैक खा लेब --देखैत छी नेहा हमरा तोहर मम्मी सासुरो जेवा से रोकैत छौ। अन्नु खाय ले ज़िद्द करत ते हम नय खायब .?? हम चुप्प गाड़ी सीधे श्री कृष्णा नगर के गेट पर रुकल। अन्नू खेवा लेल नै कहैत छैक सीधे थारी लगा दैत छै . अन्नू लग कतेक मासूमियत से हमर शिकायत क' देने छलाह ! स्मृति के झटकाय --हम चुपचाप अपन नोरायल आँखि बच्चा सब सं नुका लेलौं। रुड़की पहुँचि निर्णय भेल जे टिहरी डैम देखैत मसूरी जायब। हरिद्वार ऋषिकेश होयत टिहरी लेल पहाड़ परक चढ़ाई शुरू भ' गेल। चारु कात रौद मुदा हवा बरफ , ठीक हमर जीवन -हम बरफ जकाँ जमि गेल छलौं, बच्चा सभ सुखद रौद। हिमालयक धरती पर बनल टेढ़ मेढ जंगलक बीच सं हम सब भागि रहल छलौं। गाड़ी मे आरुषि अदिति आ विकास जी अंत्याक्षरी खेलि रहल छलाह। चम्बा मे चाह पिवा लेल रुकलोँ। आदि ( अदरख ) कतेक ससत छल दस टाका किलो - एतेक सुन्दर चाह स्पेशल ! साँझ भ' गेल छल अन्हरिया सघन जेना सौंसे पर्वत प्रदेश के सलमा सितारा सं भरि देने होइ। पहाड़ पर उंच नीच बस्ती सब मे टिमटिमाइत बिजली प्रकाश-दीप सन अपूर्व लागि रहल छल। हम सब नयी टिहरी पहुँच गेलौं टिहरी पर्वत श्रृंखलाक सब सं उंच चोटी पर टिहरी गेस्ट हाउस छल जाहि मे गर्म पानि , टी वी सब सुविधा छल सब कमराक दरवज्जा पूब दिसि खुजैत छल आगू मे बड़का टेरेस , छुटकी अदिति हमरा कात ल अकास दिस देखवैत बाजल --दादी माँ ओ तारा जे चमकि रहल अछ ओ दादा जी छथिन , हमरा सब के देखि रहल छैथ, हम भरि पाँज ओकरा पकड़ि लेलौं ; भोरे भोर भुरुकवा चमकि रहल छल हम चुपचाप टेरेस पर स देख' लगलों। आगूक दृश्य देखि आँखि जेना चकोर भ' गेल , मन मधुकर सघन अन्हार के चिरइत ऊषाक नुआक लाल पीयर किनारी झलकि रहल छल हम अवाक भ गेलौं जेना मिथिलाक बिहौती कनिया निःशब्द कोहबर घर से बाहर निकलि रहल होइ। इजोतक रश्मि राशि चारु दिस जँगलक गाछ बिरिछ पर पसरि गेल छल। गाछ बिरिछ मुस्की मार' लागल , हिमालयक शुभ्र हिमाच्छादित शिखर , ओहि पर नचैत सूरजक किरण ,एकटा विचित्र सम्मोहन वन -प्रान्त अलोकलोक मे जगजगार भ' गेल। ओहि पर्वत सभक प्रति हम कृतज्ञ भाव सं भरि जायत छी जे सहस्र बरिस सं साधना , तपस्याक उपरान्त विराट आ भव्य बनि गेल जिनक कोर मे खेलाइत नदी- झरना अपन शक्ति सं समस्त वसुधा केँ प्राणदान दैत अछ . नयी टिहरी विस्थापितक शहर थीक , बाँस ,बुरुस , चीड़ देवदार सं हरियर हरियर पहाड़ीक मध्य ई नवीन बस्ती --पुरान टिहरीक विस्थापितक गाम ! हमर सभक गाडी उंच नीच सर्पाकार सड़क पर नीचा दिस भागि रहल छल .गढ़वालक पहाड़ीक सघन अरण्य के चिरइत भागल जा रहल छल . दुरहि सं गढा मे टिहरी डैम क दृश्य बड़ मनोरम लागि रहल छल। भांति भांति क मशीन सं पहाड़क छाती के चिरी ओकरा समतल मैदान जकाँ चौरस आ समतल बना देल गेल छल . ट्रक , मोटर ,क्रेन आदि मशीन सब नीचा मे कीड़ा मकोड़ा जका लागि रहल छल।कहल जाइत छल जे २८०. ५ मी . ऊँच टिहरी बांधक स्थान विश्व केर सब सं ऊँच बांध मे सं पाँचम स्थान होयत . हिमालयक कोर मे बनि रहल ई बांध ऋषिकेश सं अस्सी किलोमीटर उत्तर मे भागीरथी अ भिलंगना नदीक उद्गम स्थान सं करीब डेढ़ किलोमीटर नीचा टिहरी मे बनि रहल छल। एहि बांध सं करीब ३२८०० यूनिट बिजली निकालवाक आ ६८५ लाख हेक्टर खेत पटेवाक योजना छल। एहि बांध लेल स्यात ३५३९० लाख क्यूबिक मीटर पानि जमा कयल जायत। एकरा लेल अन्दाज़ कयल गेल जे एकर तल मे ११२८ मीटर चाकर आ सब सं उपर २० मी- चाकर नदी घाटीक चट्टानी जलाशयक निर्माण भ' रहल छल . पुरान टिहरी पहुंचवा लेल भागीरथी पर बनल काठक पुल हमर सभक इंतज़ार क' रहल छल , मुदा पुल पर गाड़ी एवा जेवाक रोक छल . भागीरथीक जल पुलक सतह के छुवि रहल छल बाम दिस सं अवैत मलिन वसना भागीरथी पुल केर दहिन भाग मे पोखरि जकाँ बान्हल पड़ल। अचरज भेल हिमालयक चंचल बेटी जेकरा सम्हारबा लेल शिव के अपन जटा जूट खोल' पड़लैक ,आय मिथिलाक ग्राम बधू जकाँ ' पराधीन सपनेहु सुख नाही ' केर द्योतक निसाँस भरेत रहलीह। सरिपों इयैह तँ बाँधक जीत थीक , पुरुषक अहँकार ; सृजन के लेल नारी शक्तिक दुरूपयोग। सुन्दर लाल बहुगुणाक कुटिया जलमग्न छल मुदा ओहि पर लागल पताका एखनो ओहि मनीषिक चिंतन दर्शा रहल छल . बाँधक एके गेट खोलल गेल छल वोहि मे पानिक सतह एतेक उंच उठि गेल जे हुनका लेल सबसे ऊँच पहाड़ पर नई टिहरी बनाओल गेल . चारु कात सं उंच उंच पहाड़ सं घेरल टिहरीक एकटा पहाड़ दिस इशारा करैत विकास जी बजलाह --मम्मी ई सामने जे उंच पहाड़ देखैत छी एतवे गहीर एखन भगीरथीक जलस्तर अछ राजीव बाजि उठल जखन बांध बनि जायत ते जतेक पहाड़ देखैत छी सभ टा जलमग्न भ' जायत --कल्पने सं हम सिहरि गेल छलौं पुल पार क टिहरी गेलौं ते बाटक दुनू कात तरह तरह के दोकान लागल छल। ठीक दिल्लीक कमलानगर ,पटनाक न्यू मारकेट आ लन्दनक सॉउथ हॉल जकाँ ---कैसेट ,जेवर ऊनी कपड़ा , तरकारी , ठेला पर चाट , गुपचुप---की नै बिकैत छल ,,हमरा सब के देखतहि हुनकर सभक आँखि चाकर भ' गेल --आब कोन अनचिन्हार सब आबि गेलैथ हमरा सब पर बज्रपात करवा लेल - हम सब विकास जीक एकटा चिन्हार लोगक घर मे बैसलोँ भागीरथी के पुरान नाम भीलगंगा थीक। एहि बाँधक नाम सं एहि ठामक निवासी मे अद्द्क पैसि गेल --ओ सब बुझि रहल छलाह जे देशक भलाई लेल बनैत ई परियोजना एक दिन विनाशक कारण बनि जायत .ओहि दिन से एहि बाँध के विरोध क' रहल छल ओ लोकनि। एकटा सुदर्शन चेहरा भव्य वयक्तित्व अपन मोहक मुस्कान सं अभिसिक्त आबि गृहस्वामी हमर सभक अभिवादन केलनि . . चाह नस्ताक संग संग ओ कह लगलाह -१८०४ ईस्वी मे मे टिहरी शहर बसल छल। ओहि समय राजा सुदर्शन शाह केर घोड़ा एहिठामक भैरव मंदिर लग रुकल छल ,तखन ओ एहि टिहरी शहर के बसौने छलाह। अहाँ सब एहिठाम आयल छी तँ भैरव मंदिर अवस्य देखि लेब . एहि ठाम बद्री केदारक ऐतिहासिक मंदिर अछ ,सत्येश्वर महादेव कें पशुपति महादेव जकाँ पूजल जायत अछ। ई बांध बनि जायत तँ हमर सभक सांस्कृतिक , ऐतिहासिक विरासत सभटा जलमग्न भ' जायत।

दोसर व्यक्ति बाजि उठल --डैम बनवा मे एखन बड्ड देर अछ करीब करीब ३०० करोड़क काज होयत। ठाम ठाम सीपेज भ' रहल अछ सुनैत छलौं १९० करोड़क स्कीम छल आब ते हजारो से ऊपर करोड़क स्कीम बनि गेल। एकटा युवा बाजल --जनताक विरोध भ' रहल अछ जखन कि सरकारे फेल भ' रहल अछि। ---गामक लोग जुमि गेल छल , सभक चेहरा पर आक्रोश आ विवशता । धृतगंगा , भिलंगना आ भागीरथीक संगम स्थल पर बनल सत्येश्वर महादेवक मंदिर जखन हम सब पहुंचलौं तँ ओहिठाम पीयूसीएल के सदस्य गण बांध विरोधी नाराक संग धरना पर बैसल छलाह। बड़का बैनर टाँगल छल --- ' हम तो इस झील की गहराइयों से पार पा जायेंगे , लेकिन हमारे ओ अपने कहाँ जायेंगे ! हमे तो अपने ही ले डूबे इस बात का गम किसे, ऐसा कौन सा शख्स है जो नज़र हमसे मिलाये , लोग टूटते जाते हैं एक घर बनाने मे , कोई थकता नही बस्तियाँ उजाड़ने मे टिहरी उजड़े लोगों का शहर है ----------' (हम तं एहि झीलक गहिर कें पार क लेब ; मुदा हमर ओ अपन कतय जायत , अपनहि लोग हमरा ल डूबल एहि बात केर दुःख ककरा ; के अछि जे हमरा सं आंखि मिलायत , लोक टूटी जायत अछि एकटा घर बनयबा मे , केओ थाकैत नय अछि गाम घर उजाड़बा मे ; टिहरी उजड़ल लोकक शहर अछि) हमर सभक परिचय सुनतहि ओ सब दौगल एलैथ --अहाँ पटना सं आयल छी , अहाँ सब दिल्ली से --अहाँ सब ओते जा हमर सभक व्यथा सुनाबू, लोग एकटा कटोरो किनैत अछ ते ओकरा सं लगाव भ' जायत छैक , ई ते हमर सभक अप्पन शहर छी। माय जकाँ पूजने छी एकरा , बद्री केदार जका पूजल जायत अछ ई मंदिर, ऐतहासिक सांस्कृतिक दस्तावेज सभ विनष्ट भ' जायत. हुनका सभक संग हमरो सभक आँखि नोरा गेल --- हम सब सुनैत छलौं गढ़वालीक जाहि नवचेतनाक भाव ब्रिटिश गढ़वाल मे छल ओ रियासती गढ़वाल मे नै मुदा आब राष्ट्रिय जागरणक चेतना टिहरी गढ़वाल मे आबि गेल छैक ,हम सब अनुभूत क रहल छलौं जे आब ई सब जागि गेल अछ , अपन अधिकार बुझ' लागल। संघर्ष समितिक मोताबिक टिहरी डैमक निर्माण एतेक आस्ते आस्ते भ' रहल छैक जे पुनर्वासक रफ़्तार एतेक आस्ते छैक जे विस्थापनक क्रिया ओतवे समय घीचि रहल छैक। एहिठामक वासी लेल मानसिक यंत्रणाक कारण बनि गेल अछ सभक बोली मे सरकारी कार्यक गतिविधि लेल तीव्र विरोध छल ; हमसब बद्री केदार मंदिर गेलौं एतेक पुरान बड़का टा मंदिर अनुपम कलाकृति--की ई सब डूबि जायत ! विचित्र लागि रहल छल --जेना विश्वास नै क' सकैत छलौं। भैरव मंदिर एहि मंदिर सब सं हँटि के छल , पुरान जमानाक छोट छीन मंदिर जाहि ठाम सुदर्शन शाह केर घोड़ा रुकल आ टिहरी आबाद भेल .. विचित्र सम्मोहन छल कण कण मे ... रास्ता भरि राजीव ,विकास जी ,संजीव सभक गप्प भ' रहल छल----------- ---जाहिठाम बांध बनि रहल छल ओहिठाम भूकम्पनक सक्रिय वेग छैक । कतेक पढ़ल लिखल लोग सब बजैत छल -एतेक पैघ बाँधक लेल जलाशय मे एकत्रित पानि प्रकृति ले नीक नै अछि। भागीरथी आ भीलांगना नदी बर्फ सं भरल पहाड़क ओहि दक्षिणी ढलान सं बहराइत अछ जकरा मे भूक्षरण बेसी भ' रहल छल कारण जलग्रहण क्षेत्र सं जंगल खत्म भ' रहल छल तैं भूक्षरण सेहो बेसी भ' रहल छल। पहिने टिहरी बाँधक समय सय बरिस कहल जाइत छल आब लोग बजैत छैथ ३०--४० बरिस सं बेसी नै टिकत , हिमालयक एहि टूटल भांगल कतेको कमजोर देरार छैक जकरा एतेक पैघ जलग्रहणक क्षमता नै भ' सकत --- हिनकर सभक बात सुनि सुनि हमरा मोन पड़ि गेल जे हम सब जखन कोसी बराज देखवा ले बीरपुर गेल छलौं नेपाल आ भारत सरकारक सामंजस्य से बनल छल , बावन फाटकक लौह पाश मे आबद्ध कोसी वार करवा लेल ,प्रहार करवालेल उत्तेजित -उन्मादित उधियाइ रहल छलीह धार सं श्वेत फेन -गुच्छ निःसृत भ' रहल छल, साक्षात भैरवीक शंखनाद ' कट कट विकट ओठ फुट पाँड़रि -लिधुर फेन उठ फोका - क्रुद्ध सर्पिणी जकाँ बेर बेर डंक मारवा लेल उद्धत ,उन्मत्त असीम के ससीम करैत देखि कोसीक छाती सं चंडी जकाँ ,काली जकाँ हुंकार निकलि रहल छल --बराजक समय खत्म भ' रहल छल , जाहि दिन ई बाँध टूटत नै जानि कोसी की क' बैठतीह-, !!! --१२-१३ बरिखक आरुषी बाल सुलभ प्रश्न केलक तखन ई बांध टूटत तँ की होयत --प्रश्न बच्चा केलक मुदा गाड़ी मे बैसल सब चौंकि गेल। सात मासक संस्कृति अचक्के कान लागल ,शबनम ओकरा चुप करवा मे लागि गेल , जया आ तरुणा क गप्प ओहिठाम खत्म , राजीव ,संजीव आ विकास जी के मध्य जे टिहरी बान्हक बहस चलैत छल सब चुप्प ,पांच -छह बरिखक अदिति कोनो अंदेसा सं बकर बकर सभक मुंह तकैत यानि चुप्पी क एकटा मोहर सभक ठोर पर सटि गेल छल ,एकटा अद्द्क करेज मे दुनू स्थिति मे बिहार की ? दिल्ली की ? समस्त उत्तर भारत केर संस्कृति गर्त मे चलि जायत . ----------

डॉ शेफालिका वर्मा- A -103 , सिग्नेचर व्यू अपार्टमेट्स, डीडीए एच आई जी फ्लैट्स, डॉ मुखर्जी नगर , दिल्ली 110009. मो. ९३११६६१८४७ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.डॉ शेफालिका वर्मा-प्रवासी मजदूरक पीर आ मिथिला राज्य डॉ शेफालिका वर्मा प्रवासी मजदूरक पीर आ मिथिला राज्य अचक्के होइ बला कोनो विध्वंसकारी घटना चाहे मानव निर्मित हो वा कि प्रकृति निर्मित ;-आपदा एकरे कहल जाइत छैक . जेना बाढ़ि , सुखाड़ , अन्हर बिरड़ो , समुद्र मे आयल चक्रवाती तूफान , भूकम्प आकि कोनो महामारी। ई कोनो नव बात नय अछि ई सब होयत रहल अछि आ भ रहल अछि। मुदा, हम खाली बिहारक गप्प मुख्यतः करब चूँकि हम बाल्यकाल सं यानि 1955 सं आय धरि देखैत आबि रहल छी। 1955 सं लगभग 80 के दशक धरि बिहार धन धान्य सं परिपूर्ण छल . कारण जे बिहार मे एतेक कल-कारखाना छल , जेना चीनी मिल , राइस मिल , पेपर मिल , छोट मोट कतेको उद्योग धन्धा छल , दरी फैक्ट्री ,गुड़िया फैक्ट्री आदि आदि। सहरसा दरभंगा के अकास मे हवाई जहाज ओहिना उड़ैत छल जेना सड़क पर बैलगाड़ी। आ आय हम सब हवाई जहाज , हवाई अड्डा के मांग करैत करैत थाकि रहल छी . भनहि ओ सरकारी हवाई जहाज होइ उतरैत त छल सहरसा हवाई अड्डा पर। चूँकि हम सब अपने कतेको बेर सहरसा से कबीना मंत्री लहटन चौधरी जी संग हवाई जहाज सं सहरसा सं पटना गेल छी। आय सब किछ बन्द भ गेल , पेट भरवा लेल गामक गरीब गुरबा सब रोजी रोटी लेल आन आन राज्य भगैत अछि , अपन परिवारक गाम सं ल शहर धरि परिवारक भरण पोषण करैत अछि , मुदा रोजी रोटी देव बला राज्य आपद काल मे नय ते ओकरा कोनो सुरक्षा दैत छैक आ नय ते सुविधा। आर ते आर ओकरा कोनो आदरो नहि दैत छैक जे कखन भगा देत ई डर सदिखन लागल रहैत अछि। एकर ज्वलंत उदाहरण एखुनका कोरोना के महामारी थीक . गरीब मजदूर जे जाहि ठाम अछि ओहि ठाम सं ले लंक पड़ायल , जानक परवाह केने बिन। . जाहि ठामक नून खायत छी पड़ल रहितो अहाँ ओहिठाम। निज घर छोडि कांख तर बच्चा बक्सा पर बच्चा हज़ार हज़ार मील पैरे पैरे जा रहल छी लगैत छैक जेना कोनो प्रलयंकर बाढ़ि आबि रहल अहाँक पाछा पाछा, जेना कतहु कोनो अगिलग्गी खेहारि रहल पाछा पाछा , तखन मोन मे कोन प्रलय जगैलों कखनो ट्रेन कखनो बस कखनो ट्रैक्टर सं प्राण गवैलों किएक ने तखन मन मे सोचलौं अपन हाथक हुनर अपन दिमागक लेखा जोखा जे हेतियैक से हेतियै , अपन ठाम पर पड़ल रहितो खाली एक दोसरा सं कनि अलग रहितौं मुइनाय तँ सबके अछि मुदा, पलायन कायर बना गेल अहाँके , अपने नय अपना सँग कोरोना सनेस नेने गेलौं अहाँ तँ। एहि सँ नीक जाहि ठाम रही ओहिठाम सँ चिचियेतो 'अहाँ हमर अपन गाम मे रोजगार दिय अहाँ सबटा मिल सबटा संस्थान खोलि दिय अहाँ''- तखन बुझतौं अहाँक हिम्मत ,अहाँक एकतावाद के आबहु सोचु अपन विश्वकर्मा रूप के भरोस राखु अपन दुनू हाथक इंजीनियरिंग गुण पर ।

बिहार मे सबटा कल कारख़ानाक अधोगति भेल छैक , पुरैना मे लोहा के तार , कांटी आदि बनेवाक फैक्ट्री छल , सुगर मिल , राइस मिल , पेपर मिल आदि बिहार के जीवंत बनेने छल , सुगर मिल के कारण कुसियारक खेती किसान करैत छल आ अपन एकटा फराक व्यक्तित्व बनेने छल . सब सं पैघ बात जे आय सब टा मिल खोलि देल जाय त अपन लोग बेद के जीवनक विकास ते होयत संगे दोसरो ठाम के इंजीनियर एहि ठाम काम ले ललायित रहत। अर्थ व्यवस्था मे देश के सब सं पैघ सहायक होयत , एकरा एकटा लघु उद्योग के रूप मे विकसित कयल जाय। एखन भारत सरकार एहि दुनू उद्योगक विकास लेल प्रयत्नशील छथि , एहि से खाली अर्थ व्यवस्था नय मुदा जकरा लोक तथाकथित पिछड़ल , अनुसूचित जाति , जनजाति बुझैत छथि , हुनको जीवन-स्तर , एहि व्यवस्था सं विकसित भ सकैत अछि । माछ मखानक खेती सब मे लागत कम आ नफा बेसी। माछक खेती के ई हाल छल जे 1970 के दशक मे सहरसा मे फिशरीज विभाग सं मत्स्य पालन के ट्रेनिंग हम स्वयं लेने छलौं --कहवाक तात्पर्य जे कोनो राज्य मे रोजगार के कमी नय छैक , सवाल छैक ओकरा विकसित करवाक . कटैया पावर हाउस , बथनाहा , ,निर्मली , डगमारा आदिक परियोजना के फेर सं चालू कयल जाय तँ बड़का बड़का पोस्ट पर बाहर सं लोग सभक नौकरी देवाक योग्य भ जायत-- मखानक एक्सपोर्ट इम्पोर्ट होइ --चूँकि हम सुगर मिल , पेपर मिल , राइस मिल , कटैया पावर हाउस सभक चमकैत स्वरूप देखने छी --सवाल छैक सरकार सोचथि। मजदूर अपन महत्व नहि बुझैत छथि , वो नहि रह्तैथ तँ ई महल अटारी कोना के बनि जेतियैक ,चाकर चाकर सड़क, जगमगाईत फ्लाई ओवर , ई मेट्रो टीशन कोना के बनतैक । अपन अपन क्षेत्रक इंजीनियर वो स्वयं ! शहर महानगरक विश्वकर्मा वो स्वयं , नहि पढ़लनि आइटी कि बीआईटी मुदा मजदूरक सोझा सब व्यर्थ , इएह एकटा गुण ओ अपन बुझि , अपन राज अपन गाम मे हड़कम्प मचा देतियईथ, इएह एकता वो देखाबितेथ , अपन राज अपन गाम मे हड़कम्प मचेने --- खोलू सुगर मिल ,हम करब कुशियारक खेती , सब टा रोजगार हमरा अपन राज्य बिहार मे चाही । काश ,एहि बात पर सोचने रहितैथ - पलायन कइ अपनाक दीन हीन नय बनाबी ,,, एहि सँ नीक जाहि ठाम छलाह ओहिठाम सँ चिचियेतो - हमर अपन गाम मे रोजगार दिय, सबटा मिल सबटा संस्थान खोलि दिय अहाँ-- तखन अहाँक हिम्मत ,मजदूर एकता मे चारि चान लागि जेतियैक , अपन विश्वकर्मा रूप के भरोस राखि अपन दुनू हाथक इंजीनियरिंग गुण के चिन्हैत . मिथिला प्रसिद्द अछि माछ यानि मछली , मखाना लेल कोशिश करू गाँव पर फ़ोकस करवाक लेल । मिथिला राज्य तँ बादक बात छैक ।राज्य बनब उन्नति के गारंटी नै दैत छैक। झारखंड के देख लिऔ । । किन्तु ध्यान राखू जे आर्थिक उन्नति आ बढैत राजनैतिक महत्वाकांक्षा के बीच आपसी सद्भाव मे कमी नै हेवाक चाही , मुखिया आ सरपंच विकास के प्रथम कड़ी होएत छैक। ईमानदारी सँ काज केनै, बहुत विकास संभव छैक। फ़ेसबुक, यु ट्यूब पर बहुत उदाहरण भेटत एहेन कर्मठ मुखिया सरपंच के। गामक विकास के लेल मुखिया/सरपंच कर्मठ आ ईमानदार भेनाय ज़रूरी छैक। ईश्वर के कृपा सँ गामक युवा सब जीवन मे बहुत नीक कय रहल छैथ। बहुत राजनैतिक आ सामाजिक रूप सँ सेहो सक्रिय छैथ ।सबहक सामूहिक प्रयास सँ गाम ज़रूर उन्नत हेतैक। समाजक विकास मे व्यक्तिगत असुविधा के किछु अनदेखी कयल जाय तखने आगू जेना काश्मीर मे डल झील व्यापारक केंद्र बनल अछि , ओहिना ते कोसीक धार अछि , ओकरा सेहो टूरिस्ट सभक आकर्षण क केन्द्र बनाओल जा सकैत अछि। जखन नदी शांत रहय तं झलहेर खेलवा लेल , बाढ़ि आबय ते मोटर बोट मे नदीक करेण्ट पर रैफ्टिंग करत सैलानी सब। इहो सब टा खेल टूरिस्ट विभागक थीक। दरभंगा मे जतेक पोखरि अछि ओकरो टूरिस्टक आकर्षण केंद्र बनाओल जा सकैत अछि। सहरसाक मत्स्यगंधा एकटा अनमोल दर्शनीय स्थान बनौलक टूरिस्ट विभाग , मुदा देख रेख के अभाव मे मत्स्यगंधा अप्पन हाल पर आठ आठ नोर खसा रहल अछि। कोनो चीज बना लेनाय एक बात थीक मुदा ओकरा सम्हारि के रखनाय एक बात। राजा महराजाक महल दोमहलाक दरभंगा , पूर्णिया आदि मे कमी नै मिथिलांचल मे । मुदा दुःख ते ई अछ जे उत्तर बिहार क व्यक्तित्व बनेने छल . सब सं पैघ बात जे आय सब टा मिल खोलि देल जाय त अपन लोग बेद के जीवनक विकास ते होयत संगे दोसरो ठाम के इंजीनियर एहि ठाम काम ले ललायित रहत। अर्थ व्यवस्था मे देश के सब सं पैघ सहायक होयत , एकरा एकटा लघु उद्योग के रूप मे विकसित कयल जाय। एखन भारत सरकार एहि दुनू उद्योगक विकास लेल प्रयत्नशील छथि , एहि से खाली अर्थ व्यवस्था नय मुदा जकरा लोक तथाकथित पिछड़ल , अनुसूचित जाति , जनजाति बुझैत छथि , हुनको जीवन-स्तर , एहि व्यवस्था सं विकसित भ सकैत अछि । माछ मखानक खेती सब मे लागत कम आ नफा बेसी। माछक खेती के ई हाल छल जे 1970 के दशक मे सहरसा मे फिशरीज विभाग सं मत्स्य पालन के ट्रेनिंग हम स्वयं लेने छलौं --कहवाक तात्पर्य जे कोनो राज्य मे रोजगार के कमी नय छैक , सवाल छैक ओकरा विकसित करवाक . कटैया पावर हाउस , बथनाहा , ,निर्मली , डगमारा आदिक परियोजना के फेर सं चालू कयल जाय तँ बड़का बड़का पोस्ट पर बाहर सं लोग सभक नौकरी देवाक योग्य भ जायत-- मखानक एक्सपोर्ट इम्पोर्ट होइ --चूँकि हम सुगर मिल , पेपर मिल , राइस मिल , कटैया पावर हाउस सभक चमकैत स्वरूप देखने छी --सवाल छैक सरकार सोचथि। मजदूर अपन महत्व नहि बुझैत छथि , वो नहि रह्तैथ तँ ई महल अटारी कोना के बनि जेतियैक ,चाकर चाकर सड़क, जगमगाईत फ्लाई ओवर , ई मेट्रो टीशन कोना के बनतैक । अपन अपन क्षेत्रक इंजीनियर वो स्वयं ! शहर महानगरक विश्वकर्मा वो स्वयं नहि पढ़लनि आइटी कि बीआईटी मुदा मजदूरक सोझा सब व्यर्थ , इएह एकटा गुण ओ अपन बुझि , अपन राज अपन गाम मे हड़कम्प मचा देतियईथ इएह एकता वो देखाबितेथ , अपन राज अपन गाम मे हड़कम्प मचेने --- खोलू सुगर मिल ,हम करब कुशियारक खेती , सब टा रोजगार हमरा अपन राज्य बिहार मे चाही । काश ,एहि बात पर सोचने रहितैथ - पलायन कइ अपनाक दीन हीन नय बनाबी ,,, एहि सँ नीक जाहि ठाम छलाह ओहिठाम सँ चिचियेतो - हमर अपन गाम मे रोजगार दिय, सबटा मिल सबटा संस्थान खोलि दिय अहाँ-- तखन अहाँक हिम्मत ,मजदूर एकता मे चारि चान लागि जेतियैक , अपन विश्वकर्मा रूप के भरोस राखि अपन दुनू हाथक इंजीनियरिंग गुण के चिन्हैत . मिथिला प्रसिद्द अछि माछ यानि मछली , मखाना लेल कोशिश करू गाँव पर फ़ोकस करवाक लेल । मिथिला राज्य तँ बादक बात छैक ।राज्य बनब उन्नति के गारंटी नै दैत छैक। झारखंड के देख लिऔ । । किन्तु ध्यान राखू जे आर्थिक उन्नति आ बढैत राजनैतिक महत्वाकांक्षा के बीच आपसी सद्भाव मे कमी नै हेवाक चाही , मुखिया आ सरपंच विकास के प्रथम कड़ी होएत छैक। ईमानदारी सँ काज केनै, बहुत विकास संभव छैक। फ़ेसबुक, यु ट्यूब पर बहुत उदाहरण भेटत एहेन कर्मठ मुखिया सरपंच के। गामक विकास के लेल मुखिया/सरपंच कर्मठ आ ईमानदार भेनाय ज़रूरी छैक। ईश्वर के कृपा सँ गामक युवा सब जीवन मे बहुत नीक कय रहल छैथ। बहुत राजनैतिक आ सामाजिक रूप सँ सेहो सक्रिय छैथ ।सबहक सामूहिक प्रयास सँ गाम ज़रूर उन्नत हेतैक। समाजक विकास मे व्यक्तिगत असुविधा के किछु अनदेखी कयल जाय तखने आगू जेना काश्मीर मे डल झील व्यापारक केंद्र बनल अछि , ओहिना ते कोसीक धार अछि , ओकरा सेहो टूरिस्ट सभक आकर्षण क केन्द्र बनाओल जा सकैत अछि। जखन नदी शांत रहय तं झलहेर खेलवा लेल , बाढ़ि आबय ते मोटर बोट मे नदीक करेण्ट पर रैफ्टिंग करत सैलानी सब। इहो सब टा खेल टूरिस्ट विभागक थीक। दरभंगा मे जतेक पोखरि अछि ओकरो टूरिस्टक आकर्षण केंद्र बनाओल जा सकैत अछि। सहरसाक मत्स्यगंधा एकटा अनमोल दर्शनीय स्थान बनौलक टूरिस्ट विभाग , मुदा देख रेख के अभाव मे मत्स्यगंधा अप्पन हाल पर आठ आठ नोर खसा रहल अछि। कोनो चीज बना लेनाय एक बात थीक मुदा ओकरा सम्हारि के रखनाय एक बात। राजा महराजाक महल दोमहलाक कमी नै मिथिलांचल मे मुदा दुःख ते ई अछ जे उत्तर बिहार केर दुर्दशा केकरो देखायल नै जायत छैक , दक्षिण बिहारक गौरवमय अतीत दर्शाय बिहार के गौरव बनि जायत अछ। यदि मूंगक खेतक कात दोकान खुजि जाय झा मूंग वाला , रामजी मखान वाला , लाला मूंग, मिश्र मूंग, वर्मा मूंग,यादव मखान। ई हमर अप्पन परिकल्पना थीक , आ जा कल्पना ऊँच नय होयत ,विकास नय होयत , कारन जे गिरहथ बेचैत छथि ते कनि बिजिनेस के प्रकार बदलैत ओकरा बेचवाक ,प्रचार करवाक एहेन ढंग होइ जे टूरिस्ट आकर्षित भ' जाय। मिथिलाक सनेस खजूर ,पिड़किया , निमकी ई सब मिथिलाक विशेष पकवान थीक जे मास मास धरि ख़राब नै होयत अछ। अपनों देश लेल आ विदेशो के पर्यटक लेल विशिष्ट सनेस भ' जायत। विकासक सोच विशिष्ट हेवाक चाही। टूरिस्ट विभागक सब टैक्सी ड्राइवर ट्रेंड रहय जे पर्यटक के कत कत ल जेनाइ छैक । टूरिस्ट ऑफिस रहय ,जाहि मे मिथिला धामक तमाम सूचना रहैक ; सभ ठामक पैम्पलेट ,बुकलेट रहय - स्मृति मे आबि जायत अछि इंग्लैंड मे डॉ कलाधर झा सं मिथिला राज्य पर गप्प --- कलाधर झा हेरोगेट, इंग्लॅण्ड . मे हड्डी रोगक शल्य चिकित्सक डॉ. कलाधर झा एवं हुनक पत्नी डॉ. पूनम झा ओतए बैसल छलौं..कलाधर झाजीक पिता श्री जगधर झा जी पटना सायंस कॉलेजक प्रथम तीन टा विद्यार्थी मे सँ छलाह . श्री जगधर झा, डॉ.शीतल प्रसाद, जे दरभंगा मेडिकल कॉलेजक गॉड फादर मानल जाइत छलाह आ श्री वाई एन झा ऐ तीन टा विद्यार्थी सँ पटना सायंस कॉलेज खुजल छल. डॉ. पूनम झा , कलाधर जीक पत्नी ,जे जीपी छलीह ,हुनक नाना श्री सी. एस. झा आइ.सी.एस. छलाह,आ पिता श्री महानंद झा इंजीनियर छथि.... :अपने मिथिला राज्यक विषयमे की सोचैत छी, हेबाक चाही कि नै ? कलाधर जी हमर प्रश्न पर चौंकैत -हं किएक नै, जरुर हेबाक चाही ,मुदा ,एखन नै, ... हम --- से किएक ? कलाधर झा हमर प्रश्न पर छुटतहि बाजि उठलाह .जाधरि मिथिलांचलकेँ आर्थिक स्वाधीनता नै हेतैक ताधरि नै.. जेना ? -- हम अकचका के पुछ्ल.--- कलाधर जी हमर प्रश्न पर कनिक काल हमर मुंह देखैत रहलाह , फेर बाजि उठलाह .--- .हम अपना सँ किछु निर्भर भऽ जाइ, सीधे सरकारक सोझा मुंह बाबि ठाढ़ भऽ जाइ ई तँ कोनो नीक बात नै..अलग राजसँ घाटा फाएदा दुनु छैक ,सत्ताक विकेंद्रीकरण लेल मिथिला योग्य नै...आर्थिक स्वाधीनता जेना अहाँ पहिने कृषिकेँ उन्नत करू, चीनी मिल, पेपर मिल, यानि नेचुरल रिसोर्सेसकेँ देखू , अहाँ अपनासँ की सभ कऽ सकैत छी..देखू शेफालिका जी, लोग हमरा एंग्री मैन कहैत अछि , किन्तु हम नीक जकां जनैत छी जे सरकार हमर कोनो मदद एहि मे नै करत. --- तखन सरकार हमर की करत, से ते बाजू,--- कलाधर जी हमर बात पर चोट्टे जबाब देलाह- हँ किएक ने, सुनु, सरकारसँ हम तीन बातक मदति लऽ सकैत छी ..कानून आ व्यवस्था , परिवहन, एनेर्जी , यदि ऐ तीनूक आपूर्ति सरकार कऽ दैक तँ बंद मिल की मिथिलामे तं एतेक शक्ति छैक जे नव नव मिल खोलि देत,फैक्ट्री खोलि देत, मिथिलाक माछ आ मखानक खेतीसँ तँ मिथिला विश्वक सम्पदा कीनि लेत............... डॉ शेफालिका वर्मा- A -103 , सिग्नेचर व्यू अपार्टमेट्स, डीडीए एच आई जी फ्लैट्स, डॉ मुखर्जी नगर , दिल्ली 110009. मो. ९३११६६१८४७ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- उपकार ३.२.प्रदीप पुष्प- २ टा गजल ३.३.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- गीत [पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता] ३.४.चन्दना दत्त- बाढि आ बिहार ३.५.रामकृष्ण परार्थी- ५ टा कविता ३.६.अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'- मिथिला मैथिल और तिरंगा/ पाकल परोर- बाल गीत/ बदमाशी- बाल गीत ३.७.उदय नारायण सिंह नचिकेता- जौ सोचिये लेलहुं चलिये जायब ३.८.अखिलेश ठाकुर- कतअ गेलई ओ मिथिला के शान ३.९.समता कुमारी- मैया आबि रहल छथि ३.१०.गजेन्द्र ठाकुर- बहुत सुनेलियौ तोरा, आब सुनबौ तोहर सभ गप ३.१.राज किशोर मिश्र- उपकार राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी उपकार

स्वा र्थ, लो भवश, सज्जनता के, पकड़ि लैत अछि ग्री व, हि ला देबए चा हैत अछि , मा नवता के नी व।

कतहु देखलि ऐ माँ ग -पत्र ल ' घूमि रहल नि ज लेल, उपका र? ओ त' अछि बैरा गी , मन सँ, ओकरा कथि क, छैक दरका र?

को न पुण्य भा री अछि एहि सँ, एहि पुरहर सँ, सुन्दर भृङ्गा र? अछि को न फूल, एहि सँ सुन्दर, बढ़ेलक, मनुषता क सिं गा र?

जा हि पुण्य मय -क्षेत्र मे, बहैत अछि उपका रक जल -धा र, ओहि सँ नि र्मल पा नि कतय, पा बि सकैत अछि ई संसा र?

का ल कहि ओ बि सरि सकैत अछि ऋषि दधी चि क अस्थि -दा न? इति हा स मे अछि अंकि त कतेको , महा न उपका रक प्रमा ण।

उपका रक हरेक नि वेश के, हो इत अछि एकहि उदेस, बेसी सँ बेसी घटए, मा नवता क' कलेस।

उपका रक 'परि वा र मे, परहि त, मदति , प्रभृति समा ङ, केवल सेवा -भा वना , सेवकक'नहि नि ज को नो माँ ग ।

उपका र के नहि हो इत छै, स्वा र्थ संग को नो संधि , सबतरि पसरैत रहैत छै, जनसेवा -भा व -सुगंधि ।

नहि आबि सकैत अछि , उपका री -घर, लो भ, क्रो ध, मद, द्वेष, अनुमति -पत्र ने पा बि सकैत अछि , कि एक ने बदलि लि अए ओ भेष।

दया , क्षमा , उदा रता , इएह सभ छथि न्ह उपका रक , 'सर -कुटुम, दो सरक भल करैत रहैत छथि , अपना ऊपर सहि ओक'जुलुम।

कतए भेटत उपका र? एकर, नि श्चि त कहाँ पता अछि ? नि र्धन या धनगर तरु पर, कत' ,लतरल दि व्य लता अछि ?

उपका र, जे देवत्व -भा व, जि नकर व्यक्ति त्त्वक बनै अछि अंश, अनकर हि त त' हो इते छै, हो इत छन्हि अपनो , खूब भा भंस।

मनुष्यता क शी र्षस्थ वि न्दु पर, छथि बैसल उपका र , हि नक श्रेष्ठता , सर्वसम्मति सँ, जगत् करैछ, स्वी का र।

उपका र त' अर्पण जनैत अछि , ग्रहण नहि संस्का र मे, अनकर संता प, अपन बुझैत अछि , जनु, लि खल अपने कपा र मे।मे

की लि खि सकब हम का गत पर, उपका रक 'महा न उदा रता ? कहैत छि ऐन्ह आका श के, ओ त' लि खब, सका रता ?

उपका री क की र्ति , गूँजैत अछि , सरङ, भूतल, पा ता ल मे, चमकैत अछि जस के आखर , लि खल व्यो मक' भा ल मे।

लो क रहैत छथि असो थकि त, फि री सा नी उघैत अपन सा ती , अनसो हाँ त लगैत छन्हि सुनबो , अनकर दुः ख क' एको पाँ ती ।

के सका रत दुनि या मे, अनकर दुः खक पठा ओल साँ ठ? उपका री , नि ज मा थ पर, लै छथि , अनकर कष्टक गाँ ठ।

उपका री क ' उदा र -पा त्र मे, घटल कहि ओ ने सि नेह , लो क क' आशी र्वा द सँ, भरि गेल हुनकर, गेह।

मनुक्खक सभ सँ श्रेष्ठ सो च उपका र -प्रवृत्ति , ई अछि वरदा न, जि नका मे ई दि व्य -गुण, वएह त' छथि असली वि द्वा न ।

कि छु ने चा ही बदला मे, बुझि कर्त्तव्य, छथि का ज करैत, सुख पबैत छथि ओकर सेवा मे, कष्ट सँ जे अछि कुहरैत।

बहरा इत रहैत अछि उपका री क मा ड़रि सँ, दि व्य, अलौ कि क तेज, स्वा र्थ ओ संकी र्णता , आबए सँ ओतय, करैछ परहेज।

मन बैरा गी , नि ष्का म कर्म, प्रति फलक ने को नो आस, परहि त -सेवा , सर्वो परि , उपका री क' वि श्वा स।

पी ड़ा मेटला पर, दुखि या के मुह सँ जे, बहरा इत अछि बो ल, उपका री लेल, आशी र्वचन, ओकर, को न सम्पत्ति देत मो ल?

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.प्रदीप पुष्प- २ टा गजल प्रदीप पुष्प २ टा गजल १ जकरा बस तुकबंदी आधार तइ बेबहराकेँ गर्दा झाड़ हरिणक पोछय छै सुग्गर पीठ दुन्नू जा भगतै जंगल पार करतै ओकालति ओ कोना क' अपने सबदिन जे पोथी-फाड़ छै पटरी लगमे पाथर ढेर तकरा की शिव बूझै संसार छै गणना आवश्यक सबदिनसँ बिनु गिनती विज्ञानो बेकार उन्नति माने कहियो ने भेल जे बाबूजीकेँ कहियौ यार बिन बेंटक खुरपी हाँसू छैक नाँ दयबतिया कीदनि ऊघार नियमक तकरे ने खगता हैत जेकर नियमित हो लोकाचार काया- आत्मा सम छंदो -भाव गजलक वास्ते दुन्नू दरकार (बहरे-विदेह) २ जकरा कहबा ले' कोनो नव बात रहल हेतै ओ भीड़ बनल नै हेतै कात रहल हेतै हमरा मारत से कोनो शत्रुक तागति नै निश्चित ई कोनो मित्रक घात रहल हेतै बारिक चिन्है छै पहिने गेने की हेतै सबहक बादे सोझामे पात रहल हेतै प्रतिभा रहितो ओ नै भेल सफल जीवनमे साइत छिटकी मार' बला लात रहल हेतै सोलह चक्का ट्रक तर बचलै कोना छौंड़ा ओकर माँक लगै जितिया प्रात रहल हेतै जे खिच्चड़ि रान्हि क' कहतै बनलै पायस ई ओकर लूरि जरूर मसोमात रहल हेतै काका आ भैयाक बलेँ जे करतै रचना ओकर गजलो बस भोजे- भात रहल हेतै भाव बपौती नै छै कोनो खासे लोकक चेतन छै भावक त' अबरजात रहल हेतै बन्हन केर समझ तहने ने एतै ककरो भींजल पैजम्मामे छुल छुल गात रहल हेतै (बहरे-मीर) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- गीत [पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता] जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' अहाँकेँ मोन हएत विदेहक अंक ३५४ मे हमर सम्पादकीय "मैथिली मे पहिल बेर १.पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता आ २.शेप बा कंक्रीट (आकार) कविता"- आ ऐ अंक ३५६ मे जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल पुनः सिद्ध केलन्हि जे ओ बहर बला असली गजलो लिखि सकै छथि आ पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता सेहो- सम्पादक) गीत [पैटर्न (पुनरावृत्ति) कविता] जिम्मर उखाड़ि ल' गेल कियो हरियर जजात क्यो चरा लेलक क्यो आरि छाँटि धकिआय रहल क्यो चन्दा लेल हरान करय क्यो लाठी हाथे खोलि लेलक खुट्टापरसँ बरद-महींस अनुरोध हमर नहि काज देलक फूटल  कपार  हम्मर  देखू अछि धरतीपर अन्याय बढ़ल भगवान अहाँ दौड़ू-दौडू | क्यो पानि बहाबय सड़केपर क्यो बीच ठाम गोबर राखय क्यो माथेपर चूड़ा कूटय क्यो बिना बहरकेर गजल कह्य क्यो आइ जहलसँ छूटि रहल दोसर दिन ककरो लूटि रहल सभ देखबैए भाला-गराँस ककरा-ककरासँ मारि करू अछि धरतीपर अन्याय बढ़ल भगवान अहाँ दौड़ू-दौडू | क्यो सर्फ़ दूधमे मिला रहल क्यो फल दबाइमे पका रहल नकली दबाइ क्यो बना रहल क्यो चान-तरेगन चोरा  रहल सभ गंगामे स्नान करय पूजा भगवानक करा रहल सम्हारि सुदर्शन राखि लेब क्यो चोरा सकैए ओहो प्रभू अछि धरतीपर अन्याय बढ़ल भगवान अहाँ  दौड़ू-दौडू | क्यो रचना ककरो चोरबैए क्यो खाता ककरो उड़ा रहल क्यो सड़के पर अनशन ठनलक ए टी एम ल' क' भागल क्यो क्यो चीरहरण क्यो शीलहरण क' क' ठोकैए पीठ अपन क्यो बड़का कूकुरसँ डेरबय ककरा-ककरासँ मारि करू अछि धरतीपर अन्याय बढ़ल भगवान अहाँ दौड़ू-दौडू | क्यो बेचि रहल अछि स्वाभिमान क्यो नैतिकता रखलक भरना क्यो लुटा रहल अछि पवित्रता ककरो लहासपर नाचय क्यो क्यो बनय पूतना सूर्पनखा शापित क्यो रह्य अहिल्या-सन उत्पात बढल महिषासुरकेर जल्दी हे देव निदान करू अछि धरतीपर अन्याय बढ़ल भगवान अहाँ दौड़ू-दौडू | मुरली नहि  एखन बजाउ अहाँ शतरंज ने एखन खेलाउ अहाँ नहि मक्खन एखन चोराउ अहाँ रासो नहि एखन रचाउ अहाँ छथि जते सड़कपर  गोमाता सभ वृन्दावन ल' जाउ अहाँ अछि रंग विरंगक दुरजोधन जल्दी सबहक निपटान करू अछि धरतीपर अन्याय बढ़ल भगवान अहाँ दौड़ू-दौडू | ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.चन्दना दत्त- बाढि आ बिहार चन्दना दत्त

बाढि आ बिहार

बाबा हौ बाबा, चलहक ने ! हौ फुलचुन, कि भेलह हौ, बुझाइये प्रेत देखि ऐलह तौ! कि बैसल छह, चलह ने हालि हालि, ई कोसी बताह जे भेल छै से रौदी ककाके दुनू पोता के समा लेलकै पेटमे, सौंसे टोल ओन्हरे दौगल गेल है पुलिसवाला नाव आर आयल हय चलहक ने , सभटा गिरने जाय हय हौ दैव ! आयं आयं के कहलकौ रै ,ई अनर्थ केर गप्प, रौ रौदीक पोता आर त पटनामे पढय हय तौ हमरा ठकय छै, रौ हम कि तोहर ठकदरबा छियौक, धेलै था अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.रामकृष्ण परार्थी- ५ टा कविता रामकृष्ण परार्थी ५ टा कविता १ जागै जाइ जा हौ हँ, हम जागि रहल छी एहि निसबद, निसोदंड राँतिमे देख रहल छी संसारिक सभ गतिविधि अन्याय, अत्याचार, अपराध हरेक जुर्मक विरोधमे करैत रहैत छी गर्जना इंकिलाब जिंदाबाद मुदा सुतली राँतिमे नहि कियो सुनैत अछि हमर आवाज तइयो लहास बनल निसभेर सुतल लोककेँ करैत रहैत छी रखबारी 'जागै जाइ जा हौ'- कही बेर-बेर करैत रहैत छी किलोल सावधान करैत रहैत छी देशक लोककेँ- 'हौ एहने निसोदंड राँतिमे अबैत छैक चोर' मुदा जानि ने लोक सभकेँ कैँ कहि देने छैक- 'ई छैक स्वर्णकाल, एहन समयमे नहि होइत छैक चोरी, डकैती आ लुटपाट' आ एहि स्वर्णकालक भ्रममे लोक काटि रहल अछि नम्हर-नम्हर फोंफ जेना अदौ कालसँ  निनबासल अछि हमरा देशक लोक आ ओम्हर, 'निर्मोछिया गाबय गीत हौ कोइ ने जाने' गाबि चोरबा तरे-तरे काटि रहल अछि सँइन खिंच रहल अछि बोराक-बोरा क' रहल अछि एहि कोठी धान ओहि कोठी आ जे किछु जागल लोको अछि त" ओ चोरबाक गीतक भावसँ अनजान ओकरे सुरमे सुर मिलाबैत भरि रहल अछि तान आ हम खिसिआएल भनभना रहल छी मोने-मोन- 'सुतल रहैय जाइ जा कुम्भकर्णी निन्नमे जखन होतह बिहान तखन बुझै जाइ जइहक अपना-अपनीकेँ नोकसान' २ हमरा गामक बरमोतरक बाध सोचैत छी कहिओ हम अपना गामक बरमोतर बाधक आरि पर बैसि लिखि एगो कविता कवितामे होइक ओहि बाधक माटिक सोन्हगर सुगंध कवितामे होइक किसान-मजूरक पसेनाक गंध कवितामे होइक बाधमे भरल सगतोरनी आ घसवाहिनीक चर्च ऋतु होइक वसंत सिहकैत होइक फगुनहैट पछिया बसात आ एहि बसात संग झूमैत होइक आरि-धूर पर रहरिक गाछ फूलायल होइक सरिसओक पीयर-पीयर फूल कविता लिखाय त' एकदम ओहि बाधक प्रकृतिक अनुकूल भागम-भाग जिनगी आ अंध-प्रतियोगितासँ बड़ी दूर आरोप-प्रत्यारोप,आक्रोस-प्रतिरोधसँ हटिक' ओहि प्राकृतिक वातावरणमे ली हम चैनक सांस अपना पुरखा'क अरजल ओहि बाधक छ: कठवा खेतक आरि पर बैसि एकांत आ लौट जाइ अपना नेनपनमे यादि करि ओहि बाधसँ जुड़ल अपना नेनपनक एक-एकटा दृश्य जाहिसँ नहि रहय किछु चिंता-फिकिर आ फेर प्रफुल्लित मनसँ लिखि हम कविता कवितामे लिखि हम खेत-खरिहानक गप्प कवितामे लिखि हम मजूर-किसानक दुख-दर्द ऋतु वसंतोमे करि हम बर्खाक ऋतु कल्पना कल्पनामे सिहकैत होय पूर्वया शीतल बसात मेघ बरसैत होय मूसलाधार धान रोपैत जौन-मजूर गाबैत होय बारहमासा नाङट-उघार बाल-बुतुरुक झुण्ड आरि-धूरमे गोंजारैत होय डोका कवितामे लिखि हम मढ़ुआ गहुँम धान कवितामे लिखि हम किसान-मजूर होइत छैक साक्षात भगवान कवितामे लिखि हम चैत-बैसाखक दुपहरियामे जे हर जोतने छी तेकर स्वानुभूति कविता राखैक पूसक अधरतियामे अपना खेतक ओगरबाहि करैत किसानक संग सहानुभूति आ एहि स्वानुभूति-सहानुभूतिकेँ बीच बाँचल रहय हमरा कवितामे बाधक प्रकृति ताहि लेल हम ओहि आरि पर बैसिक' निहारय चाहैत छी डूबैत सूरुजक सुंदर दृश्य ओहि आरि पर बैसि हम सुनय चाहैत छी चारबाहक मुँहसँ लोरिक-सलहेसक कर्णप्रिय गीत ओहि आरि पर बैसि'क  हम लोकसँ कहय चाहैत छी बिनु प्रकृति प्रेमसँ नहि छैक मनुक्खक अस्तित्व। ३ कायर'क बस्ती ई कायर'क बस्ती छैक भाइ एतय निर्भीक आदमीकेँ रहबाक नहि छैक अधिकार जँ कियो सुनत इंकिलाब-जिंदाबाद त' लगा देल जाओत अहाँक अभिव्यक्ति'क आजादी पर प्रतिबंध देशद्रोही कानूनमे फँसा क' चलाओल जाएत अहाँ पर अभियोग सच्च पर रहितों अहाँ अपनाकेँ नहि सिद्ध क' सकैत छी निर्दोष जँ एहि बस्तीमे रहबाक अछि त' स्वीकारय पड़त कायर'क संस्कृति त्यागै पड़त अपन पुरुषार्थ अन्याय-अत्याचार देखिओ क' अहाँ नहि उठा सकैत छी प्रतिरोधक आवाज एतय जी-हुजूरीकेँ छैक रीति रिवाज एहि बस्ती लोककेँ क्रांति नहि छैक पसिन एकरा सभक संग अहांकेँ कहय पड़त दिनकेँ राँति आ राँतिकेँ दिन जँ कायरता अछि स्वीकार त' एतय मिल जाएत सभ हक-अधिकार आ जँ धिक्कारैत अछि अहाँक अपन पुरुषार्थ त'छोड़ु एहि बस्तीकेँ आने त' फेर जान तरहत्थी पर राखि करु क्रांति'क शुरुआत। ४ अपना लोकसँ दूर छी हम अपना लोकक बीच रहिओ क' अपना लोकसँ बड़ी दूर छी हम कारण, अपन सिद्धांत, विचारसँ मजबूर छी हम हम नहि क' सकैत छी समझौता अपना अभिव्यक्तिक आजादीसँ आ ने जड़ताकेँ ठहरा सकैत छी जायज सामाजिक न्याय लेल प्रतिबद्ध हम जाति-पाति आ वर्णव्यवस्थाकेँ कोना ठहरा सकैत छी जायज अपन आत्म स्वाभिमानसँ मजबूर छी हम अपना लोकसँ बड़ी दूर छी हम हँ, अपना लोकसँ बड़ी दूर छी हम कियैककि, लोक पाखण्ड-आडंबर पर प्रहारकेँ बुझैत छैक अपराध दलित विमर्श पर प्रश्न पूछब छैक महापाप तर्कशीलताकेँ लोक अनुशासनहीनता कहैत छैक मूढ़ताकेँ बुझैत छैक विसवासक-पात्र एतय हरिणकेँ अपन इतिहास लिखब मनाही छैक आ शिकारी पढ़बैत छैक अहिंसाक पाठ दलित, शोषित,वंचितक साहित्य लिखबा लेल मजबूर छी हम अपना लोकसँ बड़ी दूर छी हम। ५ जितबाक जिद्द हारिकेँ हराक' जे फेर चलि पड़य, ओ वीर अछि जेकरा जितबाक जिद्द नहि, ओकर मुर्दा शरीर अछि हारि-जीतक द्वंदमे, जे फँसि गेल अधीर अछि वीर हारि देखिक' नहि, होइत कखनो विचलित अछि जँ कुदि गेलहुँ रणमे त, समर मात्र एक विकल्प जान तरहत्थी पर राखिक', लक्ष्यकेँ करु सफल जीत गेलहुँ त' लोक सभ, जय-जयकार लगाओत मुइला पर शहीदमे, नाम अमर भ' जाएत परिस्थिति गुलाम ओकर, जेकर उद्देश्य मात्र जीत अछि मोनक विश्वास ओकर, होइत बहुत मजगूत छैक हँ, ओ वीर अछि, जे संघर्षसँ बदलैत अछि कपारकेँ कायर अकर्मण्य भ' कोसैत रहैत अछि संसारकेँ कायरकेँ होइत छैक, हारिकेँ मारिते  विकल्प वीर त' सदति चलैत अछि सदिखन संघर्ष-पथ वीरक लेल कोइ लक्ष्य, मोसकिल नहि ई जानि लिअ लाबि सकैछ आकाश धरती पर, जँ मोनमे अहाँ ठानि लिअ। -साहित्यिक नाम- रामकृष्ण परार्थी, मूल नाम:- रामसिफीत पासवान, पिता- स्व पशुपति पासवान, माता- श्रीमती मुनरी देवी, जन्म तिथि- 04-04-1977, शिक्षा- बीए प्रतिष्ठा (इतिहास), वृति:-भारतीय रेल,   स्थायी पता- ग्राम- बिचखाना, पोस्ट -एकतारा, थाना- अरेड, जिला- मधुबनी (बिहार) 847222, पत्राचार पता- रेलवे कॉलौनी रमना, जिला- गढवा, झारखण्ड, मोबाईल/ वाट्सेप- 7766906778, ईमेल- rkparthi04041977@gmail.com, साहित्य उपलब्धि:- कर्त्तव्य पथ (हिन्दी काव्य संग्रह)वर्ष 2019, अहिंसात्मक प्रतिशोध ( हिन्दी उपन्यास) 2019, दू पटरीक बीच (मैथिली काव्य संग्रह) वर्ष 2020।  सम्मान एवं पुरस्कार- क) साहित्य शिल्पी सम्मान (नराकास,  धनबाद), 2019, ख) मैथिली साहित्यिक सांस्कृतिक समिति, मधुबनी द्वारा वर्ष 2021 केँ नवहस्ताक्षर पुरस्कार अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'- मिथिला मैथिल और तिरंगा/ पाकल परोर- बाल गीत/ बदमाशी- बाल गीत अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी' १ मिथिला मैथिल और तिरंगा पोखर माछ मखान ह्रदय मे वाणी मे मोधक गंगा ठोड़ पर मिथिला मैथिल अछि मोन मे अछि तिरंगा।। सीता माता जेतय के बेटी विद्यापति के अछि जे धरती बायढ़ सँ मारल रहल हमेशा रहल अकाल स परती। सरकार नेता के कुनो मतलब नै बैन क बैसल मूर्ति बोल नै मुंह मे पान भरल नै देखैत नाक मे सुर्ती।। पोखर माछ मखान ह्रदय मे वाणी मे मोधक गंगा ठोड़ पर मिथिला मैथिल अछि मोन मे अछि तिरंगा। मिथिला मे दुर्लभ देखूं आयओ पानी, बिजली, शिक्षा काज धंधा के कुनो पता नै ने स्वस्थ्य के कुनो रक्षा। सब सुख सुविधा हमरो भेंटा मोन मे रहल इक्षा अंधकार मे जीवन आयओ प्रगतिक अछि प्रतिक्षा।। पोखर माछ मखान ह्रदय मे वाणी मे मोधक गंगा ठोड़ पर मिथिला मैथिल अछि मोन मे अछि तिरंगा।। पेट मे अन्न के दाना नै आ देह पर नै अछि अंगा भारत माँ के हमू संतान हमरो सपना सतरंगा।। पोखर माछ मखान ह्रदय मे वाणी मे मोधक गंगा ठोड़ पर मिथिला मैथिल अछि मोन मे अछि तिरंगा।। पोखर माछ मखान ह्रदय मे वाणी मे मोधक गंगा ठोड़ पर मिथिला मैथिल अछि मोन मे अछि तिरंगा।। अप्पन हक़ के बात करै छी हम नै छी भिखमंगा आब बर्दास किनो नै करब कूनो व्यवहार दूरंगा। मैथिल हित के बात नै करता हुनका देबैन ठेंगा मिथिला के जे माथ पर रखता नबका धोती रंगा।। पोखर माछ मखान ह्रदय मे वाणी मे मोधक गंगा ठोड़ पर मिथिला मैथिल अछि मोन मे अछि तिरंगा।। २ पाकल परोर - बाल गीत सूनू पाकल  परोर किया नैन मे अछि नोर, चिचियाई छी जोर जोर कुनो मोन मे अछि चोर? कनी हंसू बाजू हमर गड्डी कड़ोड़, कनी झूमू नाचू हमर अंगना के मोर| सांझे सा रुसल छी होई छई आब भोर, कान पकरै छी लगय छी अहां के गोर| कनी हंसू बाजू हमर गड्डी कड़ोड़, कनी झूमू नाचू हमर अंगना के मोर| कनी  करेजा  सा  सटू हमर  बउवा बेजोड़, कनी  कोड़ा मे  आउ हमर  आइन्खाक  इजोर| कनी हंसू बाजू हमर गड्डी कड़ोड़, कनी झूमू नाचू हमर अंगना के मोर| ३ बदमाशी - बाल गीत उक्खों उखों क क अहाँ ओकाशी करै छी सुनू यौ बौवा बड आहा बदमाशी करै छी| जांय होय या तांई हम ओकाशी करै छी हे यौ कक्का हम नै बदमाशी करै छी|| रोज नब नब अहाँ रूप धरै छी कहियौ बनी डॉक्टर कहियौ बिगबी बनै छी| डाक्टर, बिगबी बैन क हम खूब खेलै छी खुश रहै छी हरदम मस्त रहै छी|| डाक्टर बैन क अहाँ बड़का ढोंग करै छी सुईया भोइंक भोइंक क बड़ा तंग करै छी| पैघ बैन क बनबई डाक्टर तै ढोंग धरै छी सुनू यौ कक्का हम नै अहाँ के तंग करै छी|| रोज घुमअ जेबाक आहा जिद्द धरै छी दुलारु बच्चा जेना प्रसिद्द भा रहल छी| कियो ने घुमाबैया तांई हम जिद्द धरै छी दुलारू छी सबके ताई प्रसिद्द भा रहल छी|| रोज खेलौना किनै लेल अहाँ नाटक करै छी जे नै कीन दी त जोर जोर काना लगाय छी| खेलौना हमरा नीक लगैया ताई नाटक करै छी आहा नै किन दय छी त काना लगे छी|| आहा के इ बचपन पर हम खूब हँसेय छी आहा त हमर आइन्ख आ ह्रदय मे बसई छी| सब गप सोइच क आहा के याद करै छी हे यौ बौवा आहा के हम धन्वाद करै छी|| आकाश छुबू आहा याह सपना राखै छी नाम करू आहा सेह भगवन सा माँगे छी| हँसू, खेलु, कूदू, करू जे करै छी पढू, लिखू, बढ़ू, आशीष द रहल छी|| - अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी', मूल रूपसं मधुबनीक कपिलेश्वर स्थान लगक सीमा गांव, जर्मनी मे बसल मैथिल अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.७.उदय नारायण सिंह नचिकेता- जौ सोचिये लेलहुं चलिये जायब उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' पहिल बेर, अपनहि बांग्ला कविता मैथिली मे लिखितहुं त कोना देखाओत, से विदेह क पाठकवर्गक लेल- नचिकेता जौ सोचिये लेलहुं चलिये जायब १ जौ सोचिये लेलहुं चलिये जायब,/ सबटा निपटा कय/ तखन आब देर कथी ले?/ धरू वैह गीत/ जे गायन ल जायत ईश्वर केर पास/ जाहि गीत मे सुनाओत अपनहि धमनी केर तान/ जकरा मे रहत किछु कारसाज/ सजायब अहां के ओही गीत सै। २ जौ सोचि ली ई सब भुर्जपत्र/ एत्तेक रास गणितक खाता/ सबटा व्यर्थ होयत एक बेरि जाढ़ चलि गेला पर/ गीत एहन जाहि सौं वसंत झलकै अपने आप/ जाहि गीत मे देखाय छइ पलाश केर फूल, अड़हुल केर सेहो/ जकरा गाबी त देखाओत वैह परिचित चाहनी/ बजायब अहाँ कें एहने कोनो गीत पर, साज जेकां। ३ जौ कही आब नहि आयब कहियो एहि पथ पर/ तखन कियै करै चाहब आबहु समझौता?/ जाहि गीत मे रास्ता जाओत कटि सहजहि/ जाहि गान मे क्लांत देहें पुनः देखा देब अहां/ धरू सैह गीत कोनो अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.८.अखिलेश ठाकुर- कतअ गेलई ओ मिथिला के शान अखिलेश ठाकुर कतअ गेलई ओ मिथिला के शान कतअ गेलई ओ मिथिला के शान। नै भेटाई छै ओ पान मखान।। अपनो लोक सब अंग्रेजी बाजत, नै बाजत किओ मैथिल बोल । अहि में सब गर्व बुझई छथ, छोड़ क गामक मिठक बोल।। नईं रहलै आब ई मिथिला में , पाहुन के ओ आगत भागत। तिलकोरक तरुआ ओ, भात आ रहू माछक झोड़।। नईं भेटई छै आब ओ सुग्गा, बजाइत छल जे वेदक बोल । कतअ गेलई ओ अरिपन सुंदर , नईं छै आब ओ मैथिल गीतक बोल।। आमक गाछी के मचान कतअ छई, कतअ गेलई ओ कानियाँ पुतरा के खेल। दादी नानी के क़िस्सा कतअ छै , नईं छई काकी पिसी स्नेहक बोल।। जागु हे मिथिला के बासी, हम करई छी विनती कर जोरी। मिथिला मैथिली बाट जोहइया, जोरू आब स्नेहक डोरी।। -अखिलेश ठाकुर, शिक्षक, समस्तीपुर , बिहार। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.९.समता कुमारी- मैया आबि रहल छथि समता कुमारी ।।मैया आबि रहल छथि।। माता आबि रहल छथ, सिंह पर सवार भ क। भक्तन के पुकार सुनिक ना। हम सब मां के पूजन करी। कल जोर ई विनती करी।। सबहक सुख आ शांति हेतु। मां के हमसब गोहरायब ।। नौ दुर्गा के आह्वान क, कलश बइसा। आरती क,मैया के मनायब ।। अष्टभुजा धारी मैया, खड़ग खप्पर लेने मैया । मैया आबि रहल छथ, मुंडमाल धारी क। भक्तन के पुकार सुनिक ना।। काली हे मां दुर्गा भवानी, हमसब के ई विनती सुनू। मिथिला के कल्याण करू, सबजन के उद्धार करू।। हमहुं मिथिलावासी पर, स्नेहक बौछार करू। लिय अपन शरण में हे मां, इ धरा पर आबिक।। भक्तन के पुकार सुनील ना।। -समता कुमारी, शिक्षिका,समस्तीपुर , बिहार। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१०.गजेन्द्र ठाकुर- बहुत सुनेलियौ तोरा, आब सुनबौ तोहर सभ गप गजेन्द्र ठाकुर बहुत सुनेलियौ तोरा, आब सुनबौ तोहर सभ गप हमरा हँसैत देखि जे आबि गेलौ तोरा नोर कत्तेक बुझबियौ जे ठीक छी हम तोहीं तँ कहैत रहेँ आगो बढ़बा लेल बिसरि जेबा लेल सभ किछु आ हम नै मानियौ तोहर गप। आ आब जखन मानि गेलियौ तोहर गप आ एते भेलाक बादो हँसि रहल छी आगाँ बढ़ि रहल छी तँ तोहर आँखि किए नोरा गेल छौ। तोरा किए लागि रहल छौ जे हमर हँसी अछि हारिक प्रतीक लोक तँ जितलाक बाद हँसैत अछि, हँसिते अछि तोरा दाबी छौ जे तूँ हमरा चिन्है छेँ एतेक जल्दी तोहर गप आब मानि जाइ छियौ तेँ ई हँसी हमर हारि अछि तँ सुन, हमरा बूझल अछि जे हम हारि गेल छी मुदा कोनोटा प्रयास हम बाँकी नै छोड़लौं प्रयासमे कोनो बेइमानी नै केलौं मुदा हारि तँ गेलौं ने जे जीतल ओहो डेरायल अछि, अखनो, से तँ ठीके मुदा हारि तँ गेलौं ने आ ई हँसी तोरा लेल अछि कनबाक मोन होइत अछि मुदा जखन हमर हँसीसँ तोरा कननी बहराइ छौ तँ हमर कननी तोहर की हाल करतौ तँ रहऽ दे अहिना बढ़ऽ दे आगाँ, जेना तूँ चाहै छलेँ आ अपनाकेँ दोखी नै बूझ तोरा दुआरे हमर हारि नै भेल आगाँ बढ़ै ले प्रयास कम नै कएल तोरा होइ छौ जे तोहर गपपर कान-बात देलासँ हम हारलौं मुदा से नै छै मुदा तोहर गप हारलाक बाद कऽ कय देखलौं ईहो जिनगी कोनो बेजाय नै छै ओ कुकुड़ जेकरा सभ दुत्कारितो अछि आ ऐंठ किछु दैयो दैत अछि, तेहने सन तेहने सन ई जिनगी कोनो बेजाय नै अछि डेरायल जे सभ अछि हमर हारिक बाद हमर विजय जँ होइत तँ की डेरायल रहैत सएह ने कहै छलेँ तूँ मुदा तकर अनुभव हारलाक बाद केना हएत से हँसऽ दे हमरा कऽ देलियौ स्वतंत्र तोरा तोरा की सभकेँ बहुत सुनेलियौ तोरा, आब सुनबौ तोहर सभ गप काटा-काटीक आदति छौ, से कने दिन अनछज्जल लगतौ घुरि कऽ के जायत ओइ रस्ता ई जिनगी कोनो बेजाय नै अछि अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (तृतीयोच्छवासः) ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (तृतीयोच्छवासः) चम्पूसाहित्ययशो विलासः (तृतीयोच्छवासः) डा. दीपिका (स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च) (विगते उच्छ्वासे आर्यावर्तस्य सामान्यो परिचयो मया प्रदत्तः। प्रकृते उच्छ्वासे वर्णनवैचित्र्यं प्रस्तूयते।) नलचम्पूनामधेयः ग्रन्थः नितरां शोभाशाली वर्तते । अस्मिन् ग्रन्थे अनेकानि वैशिष्ट्यानि दृग्गोचरीभवन्ति यथा हि- पदाना अप्रचलितार्थे प्रयोगः- नलचम्पू-इत्यस्मिन् ग्रन्थे निषधापुरीवर्णनक्रमे देशार्थे विषयपदप्रयोगो दृश्यते। सामान्यतया एवं वर्णनं कुत्रचिन्नैव प्राप्यते। तस्य विषयमध्ये निषधो नामास्ति जनपदः प्रथितः तत्र पुरी पुरुषोत्तमनिवासयोग्यास्ति निषधेति ॥ अत्र प्रथमायां पङ्क्तौ विषयपदप्रयोगः आर्यावर्तदेशार्थे वर्तते। अनुष्टुप्-छन्दसां प्रयोगः यद्यप्यस्मिन् प्रबन्धे विविधानां छन्दसां प्रयोगो दृश्यते तथापि अनुष्टुप्-छन्दसां प्रयोगे ग्रन्थकारस्य महती दृष्टिर्वतते। विविधेषु स्थलेषु अनुष्टुप्-छन्दसां प्रयोगः एवं द्रष्टुं शक्यते- सारस्वतश्रोतवर्णने अनुष्टुप्-छन्दसां प्रयोगः- अगाधान्तः परिस्पन्दमिति वाण्याः वर्णनप्रसंगे प्रसन्नाःकान्तिहारिण्यो इति काव्यगुणप्रसंगे किं कवेस्तेन काव्येन कुकवि वर्णनप्रसंगे अप्रगल्भा पदन्यासे दुष्टजनानां विवरणप्रसंगे अक्षमालापवृत्तिज्ञा विदुषामादरप्रसंगे रोहणं सूक्तरत्नानां सज्जनदुर्जनयोर्मध्ये को भेदः इति विवेचयितुम् अत्रिजातस्य या मूर्तिः सरसकाव्यमहत्वाख्यापने निश्चितं ससुरः कोपि आदिकविवाल्मीकिप्रशस्तिप्रसंगे सदूषणापि निदोषा वेदव्यासस्तुति सन्दर्भे व्यासः क्षमाभृतां श्रेष्ठो महाभारतमहत्वाख्यापने कर्णान्तविभ्रमभ्रान्त गुणाढ्यप्रशस्तिक्रमे शश्वद्बाणद्वितीयेन एवमेव आचार्य त्रिविक्रमभट्टः शतशः स्थलेषु अनुष्टुप्-छन्दसां प्रयोगो विहितः। सभङ्गश्लेषवर्णनम् यस्यां च विविधमणिनिर्मितवासभवनभव्यभित्तिषु स्वच्छासु स्वां छायामवलोकयन्त्यः कृतापरस्त्रीशङ्काः कथमपि प्रत्यानीयन्ते प्रियैः प्रियतमाः । यस्यां च दिव्यदेवकुलालंकृताः स्वर्गा इव मार्गाः, सततमपांसुवसनाः सागरा इव नागराः. समत्तवारणानि वनानीव भवनानि, सुरसेनान्विताः स्वर्गभूपा इव कूपाः, अधिकन्घरोद्देशमुद्भासयन्तो हाराः इव विहाराः। एवं प्रकारेण नलचम्पू इत्याख्ये प्रबन्धे विविधवैशिष्ट्यानि द्रष्टुं शक्यते यानि हरन्ति चेतांसि, ददति आमोदामोदानि तर्पयन्ति मनांसि विमलमानसामिति मे मतिः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ५. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण सूचना १ "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला" आगामी दू टा विशेषांक लेल जतेक सुझाव आयल ओइमे सँ "प्रेमलता मिश्र प्रेम" आ "शरदिन्दु चौधरी" ऐ दू नामक चयन भेल। हिनका दुनू गोटे पर दुनू विशेषांक विदेहक अलग-अलग अंकमे रहत। दुनू विशेषांक कार्तिक धवल त्रयोदशी धरि ई-प्रकाशित करबाक विचार अछि मुदा से निर्भर करत जँ न्यूनतम आलेख संख्या भेट जाय संगहि वर्ड फाइलमे टाइप कयल रचना जतेक बेशी रहत ततेक जल्दी ई दुनू विशेषांक ई-प्रकाशित भऽ सकत। विदेह मासमे दू बेर (१ आ १५ तिथिकेँ) ई-प्रकाशित होइत अछि। विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। अहाँसँ आग्रह जे जतेक जल्दी हुअय "प्रेमलता मिश्र प्रेम" आ "शरदिन्दु चौधरी" दुनू गोटेक काज, रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। घोषणा: प्रेमलता मिश्र प्रेम पर विशेषांक विदेहक ३५७म अंक माने ०१ नवम्बर २०२२ आ शरदिन्दु चौधरी पर विशेषांक विदेहक ३५८म अंक माने १५ नवम्बर २०२२ केँ बहार हएत। १५ नवम्बर २०२२ क लगाति आगामी नव विशेषांकपर निर्णय हएत। अहाँसँ ऐ लेल सुझाव सादर आमंत्रित अछि। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA २ "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला विदेह अपन जीवित रचनाकार पर विशेषांक शृंखलाक अन्तर्गत (१)अरविन्द ठाकुर, (२)जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, (३)रामलोचन ठाकुर, (४) राजनन्दन लाल दास, (५)रवीन्द्र नाथ ठाकुर आ (६) केदार नाथ चौधरी विशेषांक निकालने अछि। अही सन्दर्भमे छबो साहित्यकार पर "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत "मोनोग्राफ" आमंत्रित कयल जा रहल अछि। "विदेह मोनोग्राफ" शृंखलाक विवरण निम्न प्रकार अछि: (१) इच्छुक लेखक ऊपरमे कोनो एक रचनाकार पर अपन मोनोग्राफ लिखबाक इच्छा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छथि। मोनोग्राफ लिखबाक अवधि सामान्यः एक मास रहत। (२) विदेह छह रचनाकारपर छह लेखकक नाम मोनोग्राफ लिखबाक लेल चयनित कऽ ओकर सार्वजनिक घोषणा करत। "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक निअम: (१) मोनोग्राफ पूर्ण रूपेँ रचनाकारपर केन्द्रित हुअय। साहित्य अकादेमी, एन.बी.टी. आ किछु व्यक्तिगत रूपेँ लिखल मोनोग्राफ/ बायोग्राफीमे लेखक संस्मरण आ व्यक्तिगत प्रसंग जोड़ि कय रचनाकारक बहन्ने अपन-आत्म-प्रशंसा लिखैत छथि। "विदेह मोनोग्राफ" फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल सन रहत। फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल एहेन एकमात्र टूर्नामेण्ट अछि जतय कोनो "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" सेरीमनी नै होइत छै आ तकर कारण छै जे "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" मे टूर्नामेण्टमे नै खेला रहल लोक मुख्य अतिथि/ अतिथि होइत छथि आ फोकस खिलाड़ी सँ दूर चलि जाइत अछि। फीफा मात्र आ मात्र फुटबाल खिलाड़ीपर केन्द्रित रहैत अछि से ओकर टूर्नामेण्ट "ओपेनिंग सेरीमनी" नै वरन् सोझे "ओपेनिंग मैच" सँ आरम्भ होइत अछि आ ओकर समापन "क्लोजिंग सेरीमनी"सँ नै वरन् "फाइनल मैच आ ट्राफी"सँ खतम होइत अछि आ फोकस मात्र आ मात्र खिलाड़ी रहैत छथि। तहिना "विदेह मोनोग्राफ" मात्र आ मात्र ऐ "छबो रचनाकार"पर केन्द्रित रहत आ कोनो संस्मरण आदि जोड़ि कऽ फोकस रचनाकारसँ अपनापर केन्द्रित करबाक अनुमति नै रहत। (२) मोनोग्राफ लेल "विदेह पेटार"मे उपलब्ध सामग्रीक सन्दर्भ सहित उपयोग कयल जा सकैए। (३) विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' ई-पत्रिकामे प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। (४) "विदेह मोनोग्राफ"क फॉर्मेट: रचनाकारक परिचय (रचनाकारक जन्म, निवास-स्थान आ कार्यस्थलक भौगोलिक-सांस्कृतिक विवेचना सहित) आ रचनावली (समीक्षा सहित)। घोषणा: "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत (१) राजनन्दन लाल दास जी पर मोनोग्राफ निर्मला कर्ण, (२) रवीन्द्र नाथ ठाकुर पर मुन्नी कामत आ (३) केदार नाथ चौधरी पर प्रेम मोहन मिश्र द्वारा लिखल जायत। मैथिली पुत्र प्रदीप पर "विदेह मोनोग्राफ" लिखताह प्रेमशंकर झा "पवन"। शेष ३ गोटेपर निर्णय शीघ्र कएल जायत। घोषणा २: ओना तँ मैथिली पुत्र प्रदीप पर विदेह विशेषांक नै निकालने अछि, मुदा हुनकर अवदान केँ देखैत प्रेमशंकर झा "पवन"क हुनका ऊपर "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक विचार आयल तँ ओकरा स्वीकार कयल गेल। ३ विदेह ब्रॉडकास्ट लिस्ट विदेह WWW.VIDEHA.CO.IN सम्बन्धी सूचना लेल अपन whatsapp नम्बर हमर whatsapp no +919560960721 पर पठाउ, ओकर प्रयोग मात्र विदेह सम्बन्धी समाचार देबाक लेल कएल जाएत। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह: ३५६ म अंक १५ अक्टूबर २०२२ (वर्ष १५ मास १७८ अंक ३५६)|| 177 176 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA

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