VIDEHA — Issue 357 / अंक ३५७

Publication: VIDEHA · Issue: 357
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ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३५७ म अंक ०१ नवम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७९ अंक ३५७) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२२। सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 357 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ.२-६) १.२.अंक ३५६ पर टिप्पणी (पृ. ७-७) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे (पृ.१०-१४) २.२.डा.(श्रीमती) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क परिचय - (प्रस्तुति श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल') (पृ. १५-२२) २.३.कुणाल- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' (पृ. २३-२६) २.४.कनुप्रिया- हमर बच्ची मौसी (पृ. २७-२८) २.५.मुन्नी कामत- मैथिलीक सशक्त रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र प्रेम (पृ. २९-३१) २.६.जया झा- हमरा लेल प्रेमलता दी (पृ. ३२-३३) २.७.उषाकिरण खान- हमर बच्ची (प्रेमलता) (पृ. ३४-३७) २.८.हितनाथ झा- ओ दिन ओ पल : प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' (पृ. ३८-४२) २.९.शुभनारायण झा- मैथिली रंग मंच के पितामही प्रेम लता मिश्र 'प्रेम' (पृ. ४३-४५) २.१०.विभा रानी- 'रंगमंच मे राजा किओ नहिं होइत छै' (पृ. ४६-५२) २.११.डॉ शिव कुमार मिश्र- मिथिलाक विदुषी परम्पराक अनुपम-स्तम्भ श्रीमती प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' (प. ५३-५६) २.१२.आशीष अनचिन्हार- कला लेल वरिष्ठता नै दक्षता मापदंड छै (पृ. ५७-५९) २.१३.आभा झा- रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रक साहित्यिक छवि- ओ दिन ओ पल (पृ. ६०-६६) २.१४.मनोज झा- नारी सशक्तिकरण के अग्रदूत, मैथिली नाट्य मंचक पहिल सशक्त महिला रंगकर्मी आओर मैथिली फ़िल्म मे ममता के साक्षात प्रतिमूर्ति डॉ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' (पृ. ६७-७२) २.१५.प्रेम कान्त चौधरी- डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' : मिथिलाक विलक्षण विदूषी आ प्रेरणात्मक व्यक्तित्व- जेना जनलियैन्ह (पृ. ७३-७७) २.१६.कमलेंद्र झा 'कमल'- मिथिलापुत्री (पृ. ७८-७९) २.१७.लक्ष्मण झा सागर- प्रेमलता बहिन (प. ८०-८४) २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क बहन्ने (पृ. ८५-९८) २.१९.अजित कुमार झा- मैथिली रंगमंचक प्रेरणास्रोत: श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम (पृ. ९९-१०३) २.२०.प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'सँ साक्षात्कार जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' द्वारा (पृ. १०४-१०८) २.२१.उदय चन्द्र झा 'विनोद'- प्रेमलता प्रसंग (पृ. १०९-११२) २.२२.प्रदीप पुष्प- मैथिल नारीक सांस्कृतिक- साहित्यिक स्वर - प्रेमलता मिश्र प्रेम (पृ. ११३-११६) ऐ अंकक अन्यान्य रचना ३.गद्य खण्ड ३.१.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ११८-१२३) ३.२.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १२४-१२९) ३.३.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १३०-१३२) ३.४.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १३३-१३७) ३.५.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १३८-१४२) ३.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- श्रद्धा-सम्मान (पृ. १४३-१४४) ३.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- अपन रचित रचना (पृ. १४५-१५२) ३.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. १५३-१६७) ३.९.रोशन जनकपुरी- बुढि़या आ झन्डाके खिस्सा (पृ. १६८-१७२) ३.१०.प्रेमशंकर झा 'पवन'- जनकवि 'मैथिली पुत्र प्रदीप' (प्रेम शंकर झा 'पवन'क मैथिली पुत्र प्रदीपपर आबैबला विदेह मोनोग्राफक अंश) (पृ. १७३-१७६) ३.११.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १४म खेप (पृ. १७७-१७८) ३.१२.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ८) (पृ. १७९-१८२) ३.१३.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-५) (पृ. १८३-१८७) ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र- बिआह-वर्णन (पृ. १८९-१९३) ४.२.समता कुमारी- हम छी नारी (पृ. १९४-१९५) ५.संस्कृत खण्ड ५.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (चतुर्थोच्छवासः) (पृ. १९६-१९८) ६. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण (पृ. १९९-२०३) 2

ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३५६ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ ई अंक प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' पर विशेषांक अछि। ऐ विषयपर सम्पादकीय कने नम्हर भऽ गेलै तेँ अलगसँ ओकरा देल जा रहल अछि। साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादेमी आ संगीत नाटक-अकादेमीक सम्मान/ पुरस्कारसँ बेशी महत्वपूर्ण विदेहक विशेषांक भऽ गेल अछि से उद्गार पाठक लोकनि सोशल मीडियापर व्यक्त केलन्हि अछि। सभ सहयोगी आ पाठकगणकेँ धन्यवाद। २ उमेश मण्डलक ५ टा कथापर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी Parallel Literature The references to parallel literature are found in Vedas, where Narashanshi is referred to as parallel literature. Parallel Literature in Maithili The need for parallel literature in Maithili arose due to the constant onslaught on literature and dignity by the Public and Private Akademies, for example, Maithili-Bhojpuri Akademi of Delhi, Maithili Akademi of Patna, Sahitya Akademi of Delhi, Nepal's Prajna Pratishthan, all of which are government Akademies. In addition to these Akademies the onslaught on Maithili Literature and dignity was constant done by the so-called literary associations which were recognised by the Sahitya Akademi and were the main tool for usurping all the literary space meant for this language. Besides these, the funding to these and other parochial associations and organisations led to the presentation of an interface in the name of Maithili, which was mediocre and non-representative. VIDEHA MAITHILI LITERATURE MOVEMENT AND A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE Therefore, the missing portions, the ignored and non-represented aspects of society, were started to be chronicled. It led to the depiction marked by the richness of vocabulary and experiences and was a revolution in literature and art as far as people speaking Maithili are concerned. The quality now not remained mediocre. The real power of Maithili language was realised by the native speakers, mediocrity was replaced by excellence. This attempt of writing of History of Parallel Literature for the Maithili Language arose as the mediocre agency (private and governmental) funded so-called mainstream literature, which has no readership, and no acceptance among the speakers of Maithili continued to be presented by these Akademies as representative literature. The literary journals like Museindia (www.museindia.com) were also used for their sinister design. The mediocre interface of Maithili literature was presented by the government radio and television stations also. The Short-Stories by Umesh Mandal Umesh Mandal is short story writer of parallel tradition. His language is rich with vocabulary, which is essential for presentation of intended thoughts and narratives. He has adjudged the following five stories as his best, which are mentioned below and have been presented in original side by side. 1. Kajak Satah Par (Evaluated on the basis of real work) 2. Bal-Bodhak Aagu Sikki Mauni (Who see our culture only in Sikki-Mauni crafts) 3. Jita ma Guha-Bhata aa Muila ma Doodha-bhaata...! (Disrespecting while alive and Idolising after death!) 4. Loke Chauppatt Achhi (The people themselves are hopeless) 5. Chaudaho Devan (The fourteen saviours) Kajak Satah Par (Evaluated on the basis of real work) The protagonist is trying to write a new short story to be read at the periodic nightlong story recitation assembly of Maithili Language short-story writers. During this endeavour, he plans and re-schedules those plans and in this exercise reproduces experiences and meetings. Bal-Bodhak Aagu Sikki Mauni (Who see our culture only in Sikki-Mauni crafts) Again the protagonist explains the characters, the ones who are good only at talking but the others who are really good. Jita ma Guha-Bhata aa Muila ma Doodha-bhaata...! (Disrespecting while alive and Idolising after death!) The discussion ensues at the teashop regarding the relevance of feast upon the death of a person and ends with ill-treatment of the person while alive. Loke Chauppatt Achhi (The people themselves are hopeless) The discussion again ensues at the teashop regarding freebies offered by the government. It is making people incompetent. However, the same is true regarding the ownership of ancestral property. Chaudaho Devan (The fourteen saviours) The discussion ensues regarding seasonal unemployment. In cities, one may survive through a single skill but in villages, you need more skills for livelihood, a single skill is not enough. १.२.अंक ३५६ पर टिप्पणी मनोज पाठक विदेह आब ब्राह्मी लिपिमे। एकटा आर उपलब्धि। प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.२.डा.(श्रीमती) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क परिचय - (प्रस्तुति श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल') २.३.कुणाल- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' २.४.कनुप्रिया- हमर बच्ची मौसी २.५.मुन्नी कामत- मैथिलीक सशक्त रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र प्रेम २.६.जया झा- हमरा लेल प्रेमलता दी २.७.उषाकिरण खान- हमर बच्ची (प्रेमलता) २.८.हितनाथ झा- ओ दिन ओ पल : प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' २.९.शुभनारायण झा- मैथिली रंग मंच के पितामही प्रेम लता मिश्र 'प्रेम' २.१०.विभा रानी- 'रंगमंच मे राजा किओ नहिं होइत छै' २.११.डॉ शिव कुमार मिश्र- मिथिलाक विदुषी परम्पराक अनुपम-स्तम्भ श्रीमती प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' २.१२.आशीष अनचिन्हार- कला लेल वरिष्ठता नै दक्षता मापदंड छै २.१३.आभा झा- रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रक साहित्यिक छवि- ओ दिन ओ पल २.१४.मनोज झा- नारी सशक्तिकरण के अग्रदूत, मैथिली नाट्य मंचक पहिल सशक्त महिला रंगकर्मी आओर मैथिली फ़िल्म मे ममता के साक्षात प्रतिमूर्ति डॉ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' २.१५.प्रेम कान्त चौधरी- डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' : मिथिलाक विलक्षण विदूषी आ प्रेरणात्मक व्यक्तित्व- जेना जनलियैन्ह २.१६.कमलेंद्र झा 'कमल'- मिथिलापुत्री २.१७.लक्ष्मण झा सागर- प्रेमलता बहिन २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क बहन्ने २.१९.अजित कुमार झा- मैथिली रंगमंचक प्रेरणास्रोत: श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम २.२०.प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'सँ साक्षात्कार जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' द्वारा २.२१.उदय चन्द्र झा 'विनोद'- प्रेमलता प्रसंग २.२२.प्रदीप पुष्प- मैथिल नारीक सांस्कृतिक- साहित्यिक स्वर - प्रेमलता मिश्र प्रेम २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे विदेह द्वारा 'जीबैत मुदा उपेक्षित' शृखंला केर अंतर्गत अगस्त 2022 केँ विदेह प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' आ शरदिन्दु चौधरी विशेषांक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक आ प्रस्तुत अछि ई विशेषांक जे कि केंद्रित अछि प्रेमलता मिश्रजीपर। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। एहि विशेषांकसँ पहिने विदेह 6 टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि हमरा लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत-अत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ सातम विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। 2015 सँ लऽ कऽ 2022 धरि सात टा विशेषांक प्रकाशित भेल मने बर्खमे एकटा। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक ई सातो विशेषांक केर अलावे आनो विषयपर विशेषांक प्रकाशित भेल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। विदेहक ई विशेषांक महिलाक उपर अछि। एहि विशेषांककेँ हम पहिल महिला विशेषांक कहब मुदा जँ हमर सभहक प्रयास सफल भेल रहैत तँ ई दोसर विशेषांक रहैत। विदेह 2016 मे परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक जीक उपर विशेषांक निकालबाक घोषणा केने रहए जे पूरा नै भऽ सकल आ किएक ने भऽ सकल से कहबासँ बेसी नीक जे हम अपनेकेँ दोषी मानी। एहि प्रयासकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी आ एकर फोटो निच्चा सेहो देल गेल अछि****। लेखक केर मूल्यांकन बहुत असान छै मुदा कारण ओकर रचनाकेँ मुद्रित हेबाक साधन बहुत छलै मुदा अभिनय केर मूल्यांकन कठिन रहै कारण रिकार्डिंग केर सुविधा बहुत बादमे एलै। अभिनय केर त्वरित मूल्यांकन संभव छलै। से चाहे रंगकर्मी पुरुष होथि वा कि महिला। मैथिलीमे ओनाहुतो महिला रंगकर्मीक आधुनिक इतिहास कम्मे दिन अछि (प्राचीन कालमे महिला रंगकर्मी छलथि वा कि नै से हमरा ज्ञात नै)। प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' रंगकर्मी छथि तँइ हम ई मानि कऽ चलि रहल छी जे हिनक 90% मूल्यांकन वर्तमानमे संभव नहि। तखन बाँकी दस प्रतिशत मूल्यांकन ओहन लोक सभ द्वारा कएल जा सकैए जे कि प्रेमलताजीक अभिनय पहिने वा कि एखन देखने छथि। हुनक अभियन केर किछु रिकार्डिंग सेहो छै जाहिसँ नव लोक सेहो मूल्यांकन कऽ सकै छथि। एकर अतिरिक्त प्रेमलताजी रचनाकर्मी सेहो छथि जाहिसँ लेखक वर्ग हुनक मूल्याकंन सेहो कऽ सकै छथि। एहन नै छै जे प्रेमलताजीपर लिखल नै गेलै मुदा ओ सभ एकट्ठा नै भऽ सकल छै तँइ ओकर प्रभाव हेड़ा गेल छै। एहि संदर्भमे हम कहि सकै छी जे विदेहक ई प्रस्तुत विशेषांक एहन पहिल प्रयास अछि जाहिमे ई बुझबाक प्रयास कएल अछि जे प्रेमलताजीक अभिनय वा रचना केहन छनि। ई अलग बात जे हम सभ कतेक सफल वा असफल भेलहुँ से पाठक कहता। एहि विशेषांक केर शुरूआत विदेहक आने विशेषांक जकाँ अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि।  मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा समाग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ।  हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेह अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता" केर नामसँ प्रकाशित भेल उम्मेद जे भविष्यमे प्रेमलताजीपर केंद्रित एहि विशेषांक केर पोथी रूप सेहो आएत। विदेह द्वारा 'जीबैत मुदा उपेक्षित' शृखंलामे प्रकाशित भेल आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)- 1) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 189 म अंक 1 नवम्बर 2015 (ई विशेषांक 2020 मे पोथी रूपमे सेहो आएल अछि) 2) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 191 म अंक 1 दिसम्बर 2015 3) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 319म अंक 4) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 333म अंक 5) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 6) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 जून 2022 अंक 352 **** अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.डा.(श्रीमती) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क परिचय - (प्रस्तुति श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल') डा.(श्रीमती) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क परिचय - (प्रस्तुति श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल') नाम : प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' माता : स्व. वृन्दा देवी पिता : पं. दीनानाथ झा ( वैद्यजी ) जन्म :  29.09.1948   स्थान : नैहर - रहिका ( मधुबनी ) सासुर : सिरसी ( सीतामढ़ी ) पति : स्व. महेश्वर मिश्र अन्य पारिवारिक सदस्य : पुत्र : प्रथम : मनमोहन मिश्र ( मुन्ना ), द्वितीय : रवि रंजन मिश्र (मन्टू ). तृतीय : सत्यजीत मिश्र (नन्हा ) पुत्री : अनुपमा ( अन्नू ) पुत्रवधू : प्रभा मिश्र, नीलिमा मिश्र आ नूतन मिश्र पौत्र : मानवेन्द्र, मानस आ मुकुन्द पौत्री : मेघना आ पीयूषी शिक्षा : मैथिलीमे स्नातकोत्तर, बी.एड., पी.एच.डी. सेवा : व्याख्याता, बाँकीपुर राजकीय बालिका द्वादशीय  विद्यालय, गोलघर, पटना ( सितम्बर 2008  मे अवकाश प्राप्त ) साहित्य सृजन  : प्रकाशित पोथी : एगो छलीह सिनेह ( कथा संग्रह / 2005 ) ओ दिन ओ पल ( संस्मरण संग्रह / 2005 ) शेखर प्रसंग ( शोध  प्रबंध ) अनेक पत्रिका / स्मारिका आदिमे कथा आ लेख प्रकाशित सम्पादन : 'सांध्य गोष्ठी' ( अनियतकालीन पत्रिका ) भंगिमा ( नाट्य विषयक अनियतकालीन पत्रिका ) जानकी (मैथिली महिला संघक स्मारिका ) सामाजिक \ सांस्कृतिक संस्था सभसँ सम्बद्धता : चेतना समिति, पटना भंगिमा, पटना अरिपन,पटना मैथिली महिला संघ, पटना वंदना रानी केन्द्र आदि संस्था सभमे अध्यक्ष \ उपाध्यक्ष \ सचिव \ कोषाध्यक्ष आदिक रूपमे समय-समयपर कार्यरत बिहार संगीत नाटक अकादमी,पटनाक कार्यकारिणी सदस्यक रूपमे कार्य सम्पादन मैथिली अकादमी,पटनाक सांस्कृतिक एवं लोकमंच समितिक सदस्याक रूपमे कार्य सम्पादन प्रसारण : आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ अनेक कथा, वार्ता, परिचर्चा आदिक प्रसारण रंगकर्मक क्षेत्रमे योगदान : 200 सँ अधिक नाटकमे अभिनय संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत अछि : रेडियो नाटक :  पं. सुधांशु शेखर चौधरी लिखित नाटक : 'आँखिक परदा', 'जय सोमनाथ', 'चाकरी', 'बहतर', 'परिवार', 'स'ख-सिहन्ता', 'कहाँ जाइछी डगरे- डगरे',    'सोनाक टुकड़ी', 'पड़ल काज', आ बीस सूत्री कार्यक्रमपर नाटक 'उडन-खटोला', 'उफाँटि', 'नव आँखि' आदि गौरी  कान्त चौधरी 'कान्त' लिखित नाटक 'महर्षि विश्वामित्र' भाग्य नारायण झा लिखित नाटक  'सोनक ममता', 'पहिली तारीख' आदि रेडियो धारावाहिक : 'सिंहासन बत्तीसी' ( लेखक - रवीन्द्र नाथ ठाकुर ) रंगमंचीय नाटक : सुधांशु शेखर चौधरी द्वारा लिखित नाटक-'लगक दूरी', 'पहिल साँझ', 'भफाइत चाहक जिनगी', 'लेटाइत आँचर' आदि प्रो. हरिमोहन झा लिखित नाटक 'ग्रैजुएट पुतोहु', 'विकट पाहुन'  आदि प.गोविन्द झा लिखित 'लोढ़ानाथ', 'अंतिम प्रणाम','पातक मनुक्ख'( डा. अरविन्द अक्कू द्वारा कथासँ नाट्य रूपांतरण ) 'रुक्मिणी-हरण' ( एहि नाटकक 17  बेर मंचन भ' चुकल अछि )आदि राजकमल लिखित 'ललका पाग' दिगम्बर झाक लिखल नाटक 'टुटैत लोकं' महेन्द्र मलंगिया लिखित नाटक 'एक कमल नोरमे', 'काठक लोक' आदि छत्रानंद सिंह झा (बटुक भाइ ) लिखित नाटक 'प्रायश्चित' ( परिवर्तित नाम 'सुनू जानकी' ) उषा किरण खान लिखित नाटक 'फागुन', 'चानो दाइ' आदि डा. अरविन्द अक्कू लिखित नाटक 'अन्हार जंगल', 'आगि धधकि रहल अछि' आदि स्व.ज्योत्स्ना चन्द्रम लिखित नाटक एसगर-एसगर विभूति आनन्द आ कुमार शैलेन्द्र लिखित नाटकक सेहो मंचन भेल अछि रेडियो सीरियल : मैथिली --सिंहासन बत्तीसी ( लेखक- रवीन्द्र नाथ ठाकुर ) दूरदर्शन,बिहार पर प्रसारित धारावाहिक : (हिन्दी) -पर्व भरा मिथिला, वीर कुंवर सिंह, विद्रोह, एक कहानी आदि मैथिली फिल्म : 'ममता गाबय गीत', 'सस्ता जिनगी महग सिनूर', 'ललका पाग', 'मिथिला मखान', 'बबीतिया' आदि हिन्दी फिल्म : प्रकाश झा द्वारा निर्मित फिल्म 'दामुल' आ  टेली फिल्म 'कथा माधोपुर की' ( पंचायत राजपर ), अन्य टेली फिल्म -'मर्यादा', 'जहाँ चाह वहाँ राह', 'देहाती दुनिया', 'रागिनी' आदि भोजपुरी फीचर फिल्म : 'दूल्हा गंगा पार के', 'बबुआ हमार' भोजपुरी सीरियल : 'साँची पिरीतिया' सम्मान : साहित्य,कला,संस्कृति,अभिनय आदि क्षेत्रमे उल्लेखनीय योगदान हेतु निम्नलिखित संस्था सभ द्वारा अभिनंदित आ सम्मानित : 1985  मे मैथिली रंगमंचमे विशेष योगदान हेतु चेतना समिति, पटना द्वारा सम्मानित 1987 मे मैथिली रंगमंचमे विशेष योगदान हेतु मिथिला विकास परिषद्, कोलकाता द्वारा 1988 मे चेतना समिति, पटना द्वारा  'शैलवाला पुरस्कार' 1988 मे अखिल भारतीय मिथिला संघ,दिल्ली एवं अरिपन, पटना द्वारा संयुक्त रूपसँ  सम्मानित 1992 मे बिहार आर्ट थिएटर, पटना द्वारा प्रख्यात रंगकर्मी 'अनिल कुमार मुखर्जी प्रथम शिखर सम्मान' 1992 मे बिहार प्रदेश भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन, पटना  द्वारा 'कलाश्री'क उपाधिसँ सम्मानित 1992 मे भानु कला केन्द्र, विराटनगर (नेपाल ) एवं अरिपन, पटनाक संयुक्त तत्वावधानमे आयोजित सप्तम नाट्य प्रतियोगितामे सर्वोत्तम चरित्र अभिनेत्रीक पुरस्कारसँ सम्मानित 1996 मे हिन्दी रंगमंच 'प्रांगण', पटना द्वारा आयोजित द्वादश पाटलिपुत्र महोत्सवक अवसरपर  विशिष्ट रंगमंचीय योगदान हेतु 'पाटलिपुत्र एवार्ड'सँ सम्मानित 2000 मे विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा द्वारा 'मिथिला विभूति सम्मान' 2000 मे 'प्रयाग  सांस्कृतिक संगम, इलाहाबाद' द्वारा 'मिथिला विभूति सम्मान' 2004 मे 'रोटरी पटना मिडटाउन', पटना द्वारा रंगमंचक माध्यमसँ समाज सेवा हेतु सम्मान 2007 मे अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन, दिल्ली द्वारा सम्मानित 2007 मे कला कक्ष, पटना द्वारा 'कलाकक्ष सम्मान'सँ सम्मानित 2009 मे हिन्दी नाट्य मंच 'प्रयास' द्वारा 'नूर फातिमा एवार्ड'सँ सम्मानित 2011 मे दिल्लीक नाट्य संस्था 'मैलोरंग' द्वारा प्रथम 'ज्योतिरीश्वर रंगशीर्ष सम्मान' 2011 मे अष्टम अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन एवं मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गोवाहाटी द्वारा       सम्मानित 2012 मे मैथिल समाज, रहिका द्वारा 'महेन्द्र झा सम्मान' 2012 मे अखिल भारतीय मिथिला संघ,दिल्ली द्वारा 'मिथिला विभूति सम्मान' 2016 मे बिहार राज्य फिल्म फिल्म विकास एवं वित्त निगम, पटना द्वारा -फिल्म विकासक क्षेत्रमे         उत्कृष्ट योगदान हेतु सम्मान 2021 मे शिवम् प्रोडक्शन प्रा. लि. द्वारा 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' 2013 मे 'भिखारी ठाकुर ( रंगमंच ) वरिष्ठ पुरस्कार' 2018 मे सांस्कृतिक समिति, अन्धराठाढ़ी द्वारा 'भामती स्त्री  सम्मान' 2022 मे 'नटराज सम्मान' 2022 मे   मैथिली साहित्य कला, रंगमंच महोत्सवमे उत्कृष्ट सहभागिता हेतु सम्मान आवास : एल. 2/33 , पी. आई. टी. कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना –800020, मो. नं. – 09931024819, ई. मेल. - premlatamishraprem@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.कुणाल- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' कुणाल प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' ई नाम हम कलकत्ते (सन् १९७५) सऽ सुनने छी। पटनामे भेल नाटक आ केनिहार लोकनिक ओत्तऽ चर्चा होइ। खास कऽ विद्यापति पर्व देखि कऽ गेलाक बाद। से पटना आबऽ सऽ पहिने बूझल छल जे औझुका नाटक-कर्मी सब के छइथ आ केहन नाटक करै छइथ। 'विद्यापति पर्व समारोह' चेतना-समिति, पटनाक सिग्नेचर-प्रोग्राम छल आ चेतना समिति दऽ हम मास्स्सैब (जीवकान्त) सऽ सुनने छी। ओ भरल क्लासमे बाजल छलथि जे ई संस्था 'ऑफिसर्स क्लब' छी। एतऽ ओ सब मैथिलीकेँ यूज आ एनज्वाइ करऽ जाइ छइथ!.. अक्षरशः सत्य वचन छलइन मस्सैबक। अस्तु, २०२२ तक अबैत-अबैत ई संस्था 'ऑफिसर्स क्लब' सऽ आगू विकास कऽ कऽ पूर्णकालिक-अल्पकालिक राजनीतिकर्मी लोकनिक 'मैथिली-डिस्को-रैप..' भऽ गेल-ए। विडम्बना ई जे एकरा साहित्यिक-संस्कृतिक संस्था कहइ जाइ छइथ।  माने 'मन किछु आन, वचन किछु आने, करनी पुनि किछु आन... प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' एहि संस्थाक अपरिहार्य अंग छइथ। किछु सत्र सऽ एकर उपाध्यक्ष पदकेँ सुशोभित कऽ रहल छइथ! हम अप्रैल १९८४ मे पटना एलौं आ तहिए सऽ संग छी। 'भंगिमा' सांस्कृतिक चेतनाक संवाहक नामे रङ-दल बनल जे पूर्णतः कलाकारक संस्था छल। संस्थाक पंजीकरण भेलै आ कार्यालय पता भेलै एल २/३३, पी.आइ.टी. कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-२०। ई प्रेमलता जी क आवास छी। आइयो इएह पता छइ! अर्थात् ३८ बर्ख पुरान एहि संस्थाकेँ अप्पन कहाए बला किराया पर्यन्तक स्थल नइ छइ। रिहर्सल-मीटिंग करक लेल 'विद्यापति भवन'क बलधिंगरो व्यवस्थापर आश्रित अइ। नाटकक प्रॉप्स आ कस्ट्यूम, पत्रिका, फोटो (जे लगभग एक ट्रककेँ भरबाक परिमाणमे छल) पहिने (पटना-जलमग्न भेलापर) हिनके डेरापर गेंटल रहइ छल। बादमे गगनक डेरा (सरकारी आवास) पर राखल गेल। आ आब तऽ जखन गगन स्वयं नइ रहला तऽ ओ सामान सब जतऽ ततऽ हैत! जहिना हो, जेहन हो ... संतोष करऽ पड़ै छइ... कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता (निदा फ़ाज़ली) भंगिमा अनवरत अइ। बहुत रास नव लोकक प्रवेश भेलइए- नवताक नइ। अनेक आरम्भे सऽ जुड़ल लोक आब नइ रहला.. कुमार शैलेन्द्र, केशव-नन्दन, लक्ष्मी रमण मिश्र 'राजन', कुमार गगन, बटुक भाइ.. सौभाग्येक बात ई जे 'भंगिमा'केँ प्रेमलता जी क अभिभावकत्व अद्यावधि प्राप्त छइ! मुदा ओ एत्तहि तक सीमित (चेनना-समिति, महिला समिति, भंगिमा...) नइ छइथ। एहि सब संस्था सऽ आगू, समस्त मैथिली रङ परिवारक आब ओ 'माँ' भऽ गेल छइथ। बटुक भाइ, 'प्रेमलता' कहइ छलथिन। हम दीदी कहइ छियइन। ओ, सब राखी-भरदुतिया दिन फोन कऽ कऽ मोन पाड़िते टा छइथ। हिनके संग भेला पर हमरा भेटलाह 'महेश्वर मिश्र'। विशुद्ध श्रोता, दर्शक आ पाठक। बड़ जिद केला पर अपन बेबाक अभिमत राखऽ बला।  हम 'मिसर जी' कहइ छलियइन। ओ सरेआम हमरा 'नटराज' कहइ छला.. से 'मिसर जी' सेहो नइ रहला.. ओहो.. हम तऽ 'डाउन द मेमोरी लाइन' पर चलल जा रहल छी। मुदा सम्पादक केँ तऽ संस्मरण नइ चाही.. परन्तु.. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' मे सऽ मिश्र आ प्रेम ऑफिसियल टा छइ। आब ओ माँ, दीदी, काकी, दादी, नानी आ प्रेमलता जी सऽ सम्बोधित होइ छइथ। हिनका लग आइब कऽ परिवारक अर्थ आ सीमा दुनू टूटइ  छइ। प्रायः प्रत्येक मैथिल घरक ई परिचित व्यक्तित्व छइथ। जे मिसियो भइर मैथिली-कला-संस्कृति सऽ छुइत रखइए से हिनका सऽ संपृक्त अइ। बिलकुल पारिवारिक-अनौपचारिक व्यवहारक संग। बड़ पैघ परिवार छइन हिनकर... एहि अद्भुत लोकप्रियता सऽ आनन्द आ इरखा (ईर्ष्या)  दुनू संगहि होइए... एहि अर्थमे ई हरिमोहन झा आ रवीन्द्र-महेन्द्रक समकक्ष छइथ... हम, शारदा सिन्हाक (कोनो भाषामे) गायनक ध्वनि 'मैथिली-ध्वनि' मानइ छी। तहिना, कामकाजी संस्कृति कर्मीक मैथिल-प्रतिमान छइथ दीदी प्रेमलता जी! प्रथमतः दीदी, अभिनय-शिल्पी छइथ। रेडियो आ रंगमंच सऽ आरम्भ कऽ कऽ टेलीविजन आ सिनेमा तक विस्तारित। हमरा तऽ लगइए जे एखन बनऽ बला पाँचमे सऽ तीन मैथिली सिनेमामे हिनकर रिजर्व-रोल होइ छइन। ... एहन व्याप्तिकेँ सम्हारब कने कठिन होइ छइ। बेसी काल ई माथ चढ़ि बैसइ छइ। मुदा दीदी बेस सहजता सऽ तकरा सम्हारने छइथ। आर एकर एकटा खास कारण छइ। ... मैथिलक 'कला-संस्कृति',  'मात्सर्य' 'पैसिव आ नॉन-मानिटरी' होइए।  लोक टिकट लऽ कऽ नाटक-सिनेमा-कन्सर्टमे नइ जाइए, पुस्तक-पत्रिका नइ कीनत। अपवाद छइ, तैं इएह नियम छी। एहिठाम, कला-संस्कृति-कर्मीक लेल कोनो सम्यक सम्मान नइ छइ। जे सब छइ से नितान्त बचकानी छी। दीदीक दोसर रूप अइ संगठनकर्ता के। अभिनयमे तऽ दोसर नाटककारक लीखल आ तेसर (निर्देशक- पमरियाक तेसर) क अनुसार कहइ-करइ छइथ। से किछु एना भेलइए जे ओ 'रूढ़-टाइप्ड' भऽ गेलीहए। हिनक अभिनयमे अहाकेँ विविधता आ प्रयोगधर्मिता नइ भेटत। असलमे एहन कोनो अपेक्षा मैथिली रङ-जगतमे छइहो नइ। प्रकारान्तर सऽ एहन कोनो अपेक्षा मैथिलीमे वा मैथिलीक नामपर होइत जाबंतो आयोजनमे सन्निहित नइ छइ। इएह नियम छियइ। बहुत पहिने बाते-बातमे अनिल अंशुमन (जसम) कहलक जे ई तऽ पूर्णतः एक्टिविस्ट छइथ। सत्य वचन। दीदी मैथिल एक्टिविस्ट छइथ। पटनामे महिला सबकेँ मंच तक आनऽ बाली मे सऽ प्रमुख छइथ। चेतना समितिक उपाध्यक्ष छथिहे । भंगिमाक अभिभावक छइथ। अन्य रङदलक अप्पन लोक छइथ। सन् २००० सऽ अपन डेरेपर एकटा पाक्षिक आयोजन करइ छथि- सांध्य गोष्ठी नाम सऽ। एहिमे मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मगही, भोजपुरीक रचनाकार लोकइन सहभागिता करइ छइथ। 'सांध्य-गोष्ठी' नाम सऽ पत्रिका सेहो बहार करइ छइथ। किछु पुस्तक सेहो प्रकाशित छइन। अहाँकेँ इच्छा हो तऽ पुस्तक-पत्रिकाक बिक्रीक मादे पुछबइन। ओ बेस सहजता सऽ कहती जे 'पेंशन'क पाइ भूट करइ छी। सैह कऽ रहल छइथ- छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई (शेख़ इब्राहीम ज़ौक़)। आब, वयस, परिस्थिति आ कालक माइर हिनकर गतिशीलताकेँ कम कऽ देलकइनए। मुदा सांध्य-गोष्ठी अनवरत छइन। मिसर जी, एहि गोष्ठीक अभिभावक-स्वागताध्यक्ष आ श्रोता होइ छलाह। हिनका गेलाक बाद हम कोनो सांध्य-गोष्ठीमे भाग नइ लऽ सकल छी। मुदा दीदी सूचना देनाइ नइ बिसरइ छइथ.. शर्त छइ जे संस्मरण नइ हो। परन्तु रंगमंच तऽ छीहे श्रुति-स्मृतिक विधा। संगठनक बारेमे सेहो इएह परिघटना लागइ छइ। की आरो कोनो उपाय विकसित केने छी हमरा लोकइन जाहि सऽ अभिनय-शिल्पी, कला-कर्मी, संगठन-कर्ता-एक्टिविस्ट सबहक कृतिकेँ आगूक पीढ़ीक परिचितिक लेल संरक्षित कएल जाए? - कुणाल- संपर्क-पटना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.कनुप्रिया- हमर बच्ची मौसी कनुप्रिया हमर बच्ची मौसी हमरा लेल थियेटर बालपनसँ शुरू भऽ गेल। माँ-बाबूजी कुमुद शर्माक बाल रंगमंचमे हमरा ६ बरखक आयुमे पहिल बेर पठेलखिन। पटनाक कॉन्वेंट स्कूलमे पढ़य वाली हम तीनू बहिन कखनो एक मुखी नय रहलहुँ। हाँ, शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यमसँ अवश्य भेल मुदा नृत्य,संगीत,साहित्यिक गोष्ठी,नागा बाबा ठाकुरबाड़ीक प्रवचन,दुर्गा पूजाक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम ,मैथिल महिला संघ केर आनंद मेला और विशेष रूपसँ मैथिली नाट्य संगठन 'भंगिमा' हमर सभक व्यक्तित्व के गढ़यमे विशेष भूमिका निभेलक। अहिमे प्रमुख भूमिका रहलनि बच्ची मौसी केर। आन लोक लेल 'प्रेमलता मिश्र प्रेम' हमर सभक 'बच्ची मौसी' वास्तवमे माँ (उषा किरण खान)केर छोट बहिन छथिन। साँझमे अपन स्कूलसँ साइडमे पर्स टाँगने मौसीक आकृति, माँ के 'बच्ची आउ आउ' कहनाइ आ फेर अँगनामे चाय आ भुज्जाक नाश्ता, अंतहीन विषयपर गप हमर मानसपर आइयो अंकित अछि! हमरा सभकेँ मैथिली मंचपर राति ९-९ बजे तक निश्चिंत भ' क' छोड़य के एक महत्वपूर्ण कारण बच्ची मौसी छलखिन। बच्ची मौसी माँ,पत्नी,पेशा स' टीचर परंतु मंच केर एक टा अत्यंत अनुभवी और प्रतिबद्ध अभिनेत्रीक रूपमे मिथिला समाजमे प्रसिद्ध छथिन। हमरा नै मोन अछि कि कखनो मौसीक मूँहपर क्रोध या एतेक स्वावलंबी हेबाक बावजूद कनिको दंभ देखने हएब। सदिखन दोसराकेँ आगू बढ़ाबएमे संलग्न हमर सभक बच्ची मौसी स्त्रीत्व केर एकटा अनुपम उदाहरण छथिन। आइ हम गर्वँसँ कहि सकै छी कि पटना के हमर कला यात्राक शुरुआत हमर बाबूजी, माँ आ बच्ची मौसीक कारणे भेल और आइ हम मात्र कलासँ अपन जीवन यापन कऽ रहल छी और करैत रहब एहन आशा अछि। प्रेमलता मिश्र प्रेम उर्फ़ बच्ची मौसीकेँ स्वस्थ क्रियाशील जीवन लेल अशेष शुभकामना। - कनुप्रिया- संपर्क-पटना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.मुन्नी कामत- मैथिलीक सशक्त रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र प्रेम मुन्नी कामत मैथिलीक सशक्त रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र प्रेम मैथिलीक अहि धरा पर कतेको विदुषी जन्म लेलैथ। जे अपन कर्म आऽ  सामर्थ्य,  सँ समाज कऽ नव बाट देखौलैथ। ठूंठ बांस आकाश तखने छुबि पबैत अछि जखन ओऽ आकाश दिस मात्र निहारि शान्त होयक  बदलामें ओकरा लपैक कऽ छुबैयक अथक प्रयास मऽ दिन - राति लैग जैत अछि। 40-50 कऽ दशक मऽ बाल विवाह सँ ग्रसित अहि समाज में स्त्री भेनाय पाप छल। ओहि समयमे स्त्री के रंगकर्मी होनाए असंभव छल। मुदा जखन मन सूर्य छुबैए लेल आतुर होय तँ आगि सँ दहकैत दिनकर अपन तेज कम कऽ लैत अछि।अहिना भेल प्रेमलता मिश्र प्रेम संगे जे अपन प्रारम्भिक शिक्षा समाज सँ नुका-चोड़ा कऽ ओहि समाजक बिच केलैथ। सब कलुषित देबाल कऽ ढ़ाहैत उच्च शिक्षा हासिल कैर अनेक अनपढ़क जीवन में ज्ञानक दीया जरौलैथ। माय - बाबू के एकमात्र सन्तान जे अपन बाबूअक सपना संगे उठैय छल आऽ कर्मपथ पर चलैथ छल। ओऽ अपन बाबूअक कंधा तखन बनलैथ जखन सरकारी शिक्षिका बैन राजधानी पटना मऽ बारवीं कक्षा तक के बच्चाके पढ़ौनी करौलैथ। लोग कि कहत ओहि बात करें पाछां छोड़ैत अपन रूचि संगे धरती नापैं लागल।बाल्यकाल सँ विद्यालयक प्रोग्राम मऽ नाट्य प्रस्तुत करे लागल। अहि सँ पहिने महिला पात्र कऽ अभिनय पुरूषे करैत छलैथ पर आब प्रेमलता मिश्र प्रेम अहि सोच मऽ बदलाव अपन अभिनय सँ अनलैथ। 29 सितम्बर 1948ई ग्राम रहिका मऽ जन्म लेनिहार *प्रेमलता मिश्र प्रेम* वास्तव मऽ प्रेमक सागर छथि। हुनकर वाणी कऽ मधुरता सहजता पूर्वक केकरो अपना बना लैत अछि। सफल अभिनय मऽ सिद्धहस्त अहि प्रतिष्ठित रंगकर्मी कऽ विवाह 12 सालक अवस्था मऽ सौराठ सभा सँ स्वर्गीय महेश्वर मिश्र जे 2018 मऽ दीदी कऽ असगर छोड़ि परलोक वासी भेलखिन हुनका संगे भेल छल। सुख -सम्मपन्न हुनकर दाम्यपत्य जीवन बहुत खुशहाल छल। संयुक्त परिवार मऽ ब्याहल दीदी चारि संतानक मातृसुख प्राप्त केलैथ। नैहर सँ सासुर तक अपन मृदुल स्वभाव कारण सबहक दिल मऽ राज केलैत। वर्तमानमे सेहो दीदीक परिवार रिस्ता आऽ जैतक देबाल ढ़ाहैत बहुत पैघ भऽ गेल अछि। जतय दीदी कऽ सबकोय दीदी माँ कैह संबंधित करैत अछि। अहि सँ पैघ सम्मान और कि भऽ सकैत अछि। हिनकर अभिनय में ओऽ शक्ति अछि जे श्रोता हिनकर अभिनय संगे ठाढ भऽ जैत अछि।एगो कलाकारक ई बहुत पैघ उपलब्धि अछि। दीदी माँ शिक्षिका छेली हुनका लग समयक अभाव छल। मुदा नाटक प्रति अपार प्रेम।हुनकर नस - नस मऽ अभिनय विद्यमान छल। स्कूलक समयक बाद ओऽ कोनो नाटकक रिहर्सल कैर रहैत छेली वा कोनो नाटकक मंचन। नाटक प्रति हिनकर झुकाव आऽ बेसी - सँ - बेसी महिला कऽ मंचन लेल प्रोत्साहित केनाइ मैथिली नाट्य साहित्य लेल हुनका द्वारा कैल अनुपम योगदान अछि। हिनका सँ प्रोत्साहित भऽ माता -पिता अपन बेटी कऽ सब क्षेत्र संगे नाटक क्षेत्र मऽ सेहो आगा बढ़बैं लागल। नैं तँ अखन धैर हमल समाज नाटक कऽ महिला पात्र मऽ पुरखे कऽ देखैत रहिता। प्रेमलता मिश्र प्रेम शायद समाजक सोंच बदलैय लेल अहि धरा पर अवतरित भेलि। जतय ओऽ ठार भेली सब हुनकर थोपरी बजा समर्थन केलैथ।आब समाजक रूप रेखा बदैल रहल अछि।नोनियैल देबाल ढ़ैह रहल अछि। दीदी सबसँ पहिने आकाशवाणी रेडियो सँ प्रसारित नाटक द्वारा अपन कैरियरक शुरुआत केलैथ। हिनकर सफलताक मूल आधार आकाशवाणी रेडियो छल।अतैय सँ हुनका अनेको मंच पर मंचनक अवसर प्राप्त भेल। दीदी अनेको नाटकक मंचन केलैथ जहि मऽ रुक्मिणी नाटक जे पंडित गोविन्द झा द्वारा रचित अछि दीदी अहि नाटकक 17  शो केलैथ । हिनका द्वारा अभिनित प्रसिद्ध नाटक कऽ नाम तँ बहुत अछि पर ओहि मऽ सँ जे अखनो सभहक सोझाँ ठार भऽ जैत अछि ओऽ नाटक अछि- सुनू जानकी, भफाइत चाहक जिनगी,पहिल सांझ,पाचक,मनुक्ख, अंतिम प्रणाम आदि। बाल्य कलाकारक माध्यम सँ बाल्य नाटक मऽ हिनकर योगदान सेहो अतुल्य अछि। राष्ट्रिय पुरस्कार सँ सम्मानित मैथिली सिनेमा *मिथिला मखान* मऽ माँ के पात्र मऽ हिनकर अभिनय पाठकक मनक अतल गहराई में अनंत काल तक घुसल रहल। तहिना भोजपुरी सिनेमा *दुल्हा गंगा पार* में सेहो हिनकर अभिनय सराहनिय अछि। * सांचि पिरितिया* धारावाहिक में हिनकर अभिनय के बिसैर सकैत अछि। मैथिली, भोजपुरी सँ लऽ हिन्दी सिनेमा * दामुल* संगे अनेको सिनेमा मऽ सेहो अपन अभिनय सँ श्रोताक प्रिय कलाकारक सुचि मऽ अपन नाम स्थापित कैली। हिनकर तीन टा पोथी सेहो प्रकाशित अछि।जहि मऽ १. शेखर प्रसंग (शोध पत्र) २. ओऽ दिन ओऽ पर(संस्मरण) ३. एकटा छलि सिनेह ( कथा संग्रह) वर्तमानमे *सांध्य गोष्ठी* 2008 में शुरु भेल ई पत्रिका जे अन्यतकालिन अछि ओकर संपादक छैथ। भंगिमा पत्रिका कऽ किछ दिन सेहो संपादन केने छैथ आऽ चेतना समिति पटना सँ जुड़ल अछि। अखनों मिथिला मैथिली कऽ सेवा मऽ समर्पित छैथ।नव पीढ़ी लेल हिनकर संघर्ष आ अपन कर्मक प्रति निष्ठा बाट देखा रहल अछि। -मुन्नी कामत- संपर्क-दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.जया झा- हमरा लेल प्रेमलता दी जया झा हमरा लेल प्रेमलता दी प्रेमलता मिश्र हमरा लेल एक अनजान शख्स छलीह। हम विद्यापति भवन विद्यापति प्रोग्राममे गेल रही। हम हॅालमे पहुँचलहुँ तँ अपन संगी-साथी सबकेँ ताकए लगलहुँ, ओ (प्रेमलताजी) हमर बगलमे बैसल छलीह ,ओहि समय खाना केर बेर भऽ गेल छल। तँभ प्रेमलता दीदी बड़ प्रेमसँ कहै छथि, पहिले खा लिय, संगी-साथी भेटि जेतीह। हमहूँ खाना लऽ कऽ एलहुँ, आ हुनके बगलमे खाए लगलहुँ। फेर हमरासँ हमर नाम, हमर बाबूजीक नाम, गाम-घर सब  पुछलथि। ओकर बाद हम हुनका लगसँ विदा भऽ कऽ प्रोग्राम देखऽ लगलहुँ। हम घर आबैत काल एकटा पत्रिका किनलहुँ "मैथिली अकादमी पत्रिका"। घर आबि कऽ जखन पढ़ै छी, तँ हुनको बारेमे लिखल छल, तखन बुझलहुँ जे हमरा कतेक नमहर शख्स आ कतेक स्नेहिल व्यवहार केर लोक भेटल रहथि। ई 2020 केर बात अछि। फेर आब तँ जखन भेंट होइत छी, हुनकर आशीर्वाद जरूर लै छी। संयोगसँ ओ कंकड़बागमे रहै छथि, आ हम राजेन्द्र नगरमे जे हमर घरक नजदीक अछि। हिनक प्रारम्भिक रंगमंचीय जिनगीमे "टुटैत लोक", "लेटाइत आँचर" आदिमे हिनक अभिनय बड़़ प्रशंसा भेटलनि। 1981 मे मैथिलीक पहिल फिल्म "ममता गाबय गीत" मे विधवा भाउज केर भूमिका केलथि। फेर "सस्ता जिनगी महग सेनूर" केलथि। डी डी पटना के लेल प्रमोद चौधरी द्वारा निर्मित धारावाहिक "पर्व भरा मिथिला", शिव पूजन सहाय केर देहाती दुनिया मे काज केलथि। मैथिली फिल्म ललका पाग लेल पहिल बेर कांट्रेक्ट साइन केने छलथि। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारसँ सम्मानित  मैथिली फिल्म "मिथिला मख़ान" मे हीरो केर माय बनल छलथि। अभिनयक संग प्रेमलता मिश्र दी सुपरिचित साहित्यकार सेहो छथि। हिनक रचना बहुत रास पत्रिका सबमे प्रकाशित भेल छनि। महिला रंगकर्मीक रूपमे प्रेमलता दी बहुत रास संस्था सबसँ जुड़़ल छथि जेना कि भंगिमा,अरिपन, चेतना समिति, मैथिली महिला संघ आदि। - जया झा- संपर्क-पटना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.उषाकिरण खान- हमर बच्ची (प्रेमलता) उषाकिरण खान हमर बच्ची (प्रेमलता) "एम.ए" मे रही आ रही जी.डी.एस होस्टल माने गणेशदत्त सिंह महिला छात्रावास जे पटना विश्वविद्यालयकेँ सब कॅालेज के वास्ते छात्रावासमे यात्री कका हमर लोकल गार्जियन रहथि। तखन ककाक डेरा रानी घाटमे रहनि। काकी रहै छलखिन तँ हमर ड्यूटी रवि दिन डेरापर आएब रहैक। एम.ए के छात्रापर पुछापूछीक संकट नै रहै। रात्रि विश्राम जँ बाहर करी तँ सूचना देबाक रहै। ओइ दिन जे गेलहुँ रानी घाट तँ काकी मेंही-मेंही सजमनि कटै छलीह आ लकड़ी बला चूल्हिपर लोहियामे जे लड़की दूध औंटै छलै से दूधे सन उज्जर छलै। हम काकी के गोर लागि ओहि ठाम धएल मचियापर बैसि गेलहुँ। ओ जारनि चूल्हिसँ बहार कऽ आँच कम केली आ आबि हमरा गोर लगली। "मिनी यै, ई बच्ची छथिन, हिनकर भतीजी" काकी कहए लगलीह जे कोन आँगनक किनकर बच्ची सोझे-सोझ ममियौत रहथिन कि पिसियौत। तरौनी के प्रत्येक आँगनक चर्च काकी तेना करथिन हमरा लग जेना बुझाइ जे हमरो जन्म ओही ठाम भेल हो। ई गप्प जरूर छै जे जावत हमर अपन ममियौत हुनकर जेठ जमाए भेलनि आ सद्यः जाउत ननदोसि तावत हम सौंसे बड़की टोलक संबंधी के, के कहए, पोखरि-झाँखरि, बाड़ी-झाड़ी, गाछ-बिरिछ आ डिहबार धरिकेँ चीन्हि गेल रहियनि। कका-काकीकेँ नहि रहलापर जे गेलहुँ तँ निपट सून तरौनीक उजड़ल-उपटल आँगन सभ कल्पनामे जीवंत भऽ गेल छल। "आ ई बच्ची छथि.." काकी हमर परिचय देती ताहिसँ पहिने बच्ची बाजि उठली "हम चीन्हि गेलियनि, ई मिन्नी बहीनि छथिन। अहाँ काल्हिसँ कतेक बेर कहलियै काकी जे रवि दिन मिनी औतीह।" बच्चीक चंचल स्वर हुनक उमेरि लायक छलनि। ओ पंद्रह-सोलह वर्षक रहथि आ हम बीस-एकैस के। बच्ची अपना पुत्रकेँ माए लग छोड़ि पटना पढ़ए आ जीवन आँगा बढ़बै के उद्येश्यसँ आएल छलीह। हमर बेटी सेहो हमरा माए लग छल, हम एम.ए करैत होस्टलमे रही। बच्ची हमरे जकाँ पितृहीन रहथि। हमर लोकल आ बच्चीक टोटल गार्जियन यात्री कका रहथिन। शोभाकांत, सुकांत, श्रीकामत, श्यामाकांत हमरा सभहक अनुज आ उर्मिल मंजुल बहिन। से सदा निमहल अछि। बच्ची मैट्रिक पास रहथि, मिसरजी बी.ए पास रहथिन। सुदर्शन, गंभीर युवक। किछु दिनुका बाद ओ एकटा पैघ किताबक दोकानमे काज केलनि। बच्ची कोनो स्कूलमे पढ़ेबा संगे इंटर, बी.ए, एम.ए आ पी.एच.डी धरि कऽ लेलनि। मिसरजी सेहो ट्रांसपोर्ट कॅार्पोरेशन केर स्थायी काजमे लागि गेलाह। बच्ची के दू टा आर पुत्र आ एकटा पुत्री अनुपमा भेलखिन। बच्ची एकटा घर पटनाक कंकड़बागमे अरजलनि। प्राथमिक, माध्यमिकसँ होइत इंटर स्कूलक शिक्षिका भऽ रिटायर केलीह। बच्चा सभ उच्च पदस्थ अधिकारी भेलनि। एतेक तँ प्रायः अध्यवसायी मैथिल कन्या कइए गुजरत। तखन एतेक टा विरुदावलीक की अर्थ? आ कका यात्रीजी, काकी अपराजिता देवीक आशीष कोना फलित होइत? बच्चीक माँ जे छलखिन से कहियो-कहियो रहिकासँ अबथिन। हम आइ धरि ओहि काकीसँ सुन्नरि-सलज्ज स्त्री नहि देखलहुँ। ओइ निराभरण स्त्री के मुखमंडल तेजोमय बुझाइ छलै। हमर स्वयं मात्रिक आ सासुर सभक लड़की-स्त्री, वृद्धा अपरूप रहथि मुदा काकी सन नै। काकी के जीवन छोट रहनि। बहुत जल्दी चल गेलीह। हम आकाशवाणीमे कविता पाठ करए सन् १९६० सँ जाए लागल रही। बच्ची १९६५ मे कका केर कहलासँ आकाशवाणीमे मैथिली नाटकमे भाग लेबए लगली। से ततेक नीक जकाँ मनोयोगसँ करए लगलीह कि कइएक बेर एंकरिंग आ प्रसारण सेहो करथि। आस्ते-आस्ते जखन मैथिली नाटक पटानमे मंचपर आबए लागल, तखन बच्ची मंचपर उतरि गेलीह। मंचपर सभसँ पहिने आदरणीय सुभद्रा झा (हरिमोहन झाजीक धर्मपत्नी आ राजमोहन झाक माँ) उतरल रहथि स्वल्प का लेल रेकार्ड मुदा भेलनि आ ओ प्रेरणा से भेलखिन। समय आगाँ बढ़लै, मुदा नुक्ताचीनी, मीन-मेख तँ निकालले जाइत छै। तइसँ की मिसरजीक उदार मोन आ यात्री ककाक -काकीक संग सब बाधा खारिज केलकै।  हमरा सन लोक समर्थनमे रहबे करी। हम स्वयं मंचपर कका संगे कविता पढ़ए बिहारक अनेक नगरमे संग जाइ। बच्चीमे अभियनक गजब के प्रतिभा रहनि। बच्चीक दुआरे लोक अपन बेटीकेँ नाटक करए देथिन। मैथिलीमे महिला कलाकार आगाँ जे एलीह तकर सोझे श्रेय हिनकहि देल जेतनि। हमर बेटी सभक आदिगुरू मंचपर बच्ची मौसी रहथिन। मैथिली मंचक सतत सतत अभिनेत्री बच्ची कुशल संगठनकर्ता सेहो रहलीह। अरिपन नामक नाट्य संस्थाक संग छलीह। भंगिमा नामक नाट्य संस्था प्रारंभ केलनि, परवान चढ़ौलनि। मैथिली-भोजपुरी सिनेमा सभमे बच्ची एक टा विशिष्ट अंश छथि। "ममता गाबय गीत" सँ लऽ कऽ मिथिला मखान धरि। बच्ची यानी प्रेमलता मिश्रा कुशल समाजिक कार्यकर्ता रहलीह। चेतना समीतिमे शुरुएसँ सक्रिय रहलीह एवं आइ उपाध्यक्ष छथि। चेतना समीतिक महिला शाखा के रूपमे कतेक दिन काज केलीह। फेर मैथिली महिला संघक फांउडर मेंबर सेक्रेटरी रहल छथि। आइ धरि सक्रिय छथि। बच्ची साहित्य केर अनन्य प्रेमी केएक ने रहतीह, यात्री ककाक किछु तँ प्रभाव रहतै। कतेक पोथी बहराएल छनि। सांध्य गोष्ठी नामक अनियतकालीन पत्रिका प्रकाशित करैत छथि, सहजहिं गोष्ठी होइत छनि। कतेक बालक-बालिकाकेँ रस्ता देखेलनि बच्ची बिनु कोनो श्रेय लेने। समाजचेता, संस्कृतिचेता,साहित्यानुरागी बच्ची सन निरंहकारी, निर्लोभी स्त्रीक बलपर आधुनिक मिथिला चलै छै। एहने लोकक तँ काज छै। हमर सभक ई जोर नहि चलि रहल अछि हिनका भारत सरकारक संगीत नाटक अकादेमीक पुरस्कार देबा लेल अथवा एकर प्रतिनिधि चुनबा लेल। जँ ओ चुपचाप अपना कर्तव्यपथपर चलैत जा रहल छथि तँ दायित्व छै मैथिलजनक कि हिनका लेल अवाज उठाबथि। एहन अपना छोट बहिन बच्ची के कोटिशः आशीर्वाद। - उषाकिरण खान- संपर्क-पटना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.हितनाथ झा- ओ दिन ओ पल : प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' हितनाथ झा ओ दिन ओ पल : प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' बात कोनो बहुत पुरान नहिं ,इएह 1961क , मात्र उनसठि वर्ष पूर्वक। एक गामक स्कूल छात्राक माँ-पिताक अनुमति भेटलाक बादो ,शिक्षकक प्रोत्साहन आ मार्गदर्शनक अछैतो ,  ओहि छात्राक पिताक मना कयलोपर ,गामक लोकक एक बिचार  होयब आ शिक्षक लोकनिकेँ मारि-पीट करबाक हेतु एक जुट भय जमा होयबाक बात जखन कानोकान स्कूल तक आयल तँ ओहि अबोध किन्तु नाट्यमंचन हेतु तैयार बालिकाकेँ बिना नाटक खेलबेनहिं , विद्यालयक पछुआर बाटें गामपर पहुँचा देल जयबाक घटना ,ओहि बालिकाक मन मस्तिष्कपर कतेक प्रभाव पड़ल हेतैक ,से स्वतः अनुमान लगा सकैत छी। बात ई भेल रहैक ,जे पहिने नाटकमे महिलाक पात्रक मंचन पुरुष कलाकार द्वारा कराओल जाइत छल ,किन्तु ओहि बेर ओहि बालिकाक प्रतिभा आ कलाक प्रति समर्पणकेँ देखैत ,प्रधान शिक्षक चन्द्रिका प्रसाद ई निर्णय लेलनि जे एहि बेर महिलाक पात्र महिलेसँ मंचित कराओल जायत। ओ बालिका कियो आन नहिं ,मैथिलीक चिर-परिचित रंगकर्मी ,सैकड़ो नाटक तथा अनेक मैथिली ,हिन्दी, भोजपुरी, फीचर फिल्म ,टेलीफिल्म आ धारावाहिकमे अभिनय कयनिहारि ,रेडियो नाटकमे सहभागी ,अनेको महिला कलाकारकेँ प्रोत्साहित कय मंचपर अननिहारि ,स्वभावसँ  सरल,सहज ,कतिपय साहित्यिक ,सांस्कृतिक ,नात्यसंस्थाक निवर्तमान आ वर्तमान पदाधिकारी डॉ0 प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'। पटनाक एक दिनक प्रवासक क्रममे आइ अपन मित्रक ओहिठाम एक किताबपर ध्यान गेल ,एकहि बैसकमे पढ़ि लेलहुँ ,से स्मरणक छल ,नाम *ओ दिन ओ पल *,लेखिका प्रेमलता मिश्र प्रेम। 2005क प्रकाशन। 15 वर्ष पुरान किताब रहितो हमरा एक कलाकारक संघर्षक कथाक स्मरण एतेक ने आकर्षित कयलक ,संगहि शीर्षस्थ कलाकारक ई स्वीकारब जे बिना रिहर्सलक नव कलाकारक संग नाट्यमंचन उपयुक्त नहिं ,से भारी मनसँ अस्वीकार कयलनि ,मैथिल समाज रहिकाक प्रस्ताव। लेकिन ओ पल हुनकर जीवनक कतेक  महत्वपूर्ण छल रहल होइतनि ,जतय अपनहिं नैहरमे , अपन स्कूलसँ पाछूक दरवाजा होइत पठा देल गेल छलनि ,ओतहि विशाल मंचपर उद्घाटन करबाक अनुरोधकेँ स्वीकारैत दौड़ल-दौड़ल दुसाधटोली होइत मंचपर अयलीह आ उद्घाटन भाषण देलनि। हिनक अभिनय कतेको बेर देखने छलियनि ,पहिल बेर ओकर आँगनक बारहमासासँ लय जे 1973मे  चेतना समिति पटना द्वारा मंचित भेल छल आ पहिल महिला कलाकार रूपमे अभिनय कयने छलीह। स्वाभाविक अछि ,नाटकसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अधिकांश संस्मरण एही विभागक लोकसँ हेतनि ,किन्तु से नहिं ,ई नीक कथाकारो छथि,संपादको छथि ,संगठनकर्मी सेहो छथि ,वृत्तिएँ शिक्षिका सेहोआ सर्वोपरि समर्पित गृहिणी। एक संग एतेक कार्यक सफल संपादन कोना कय लैत छथि ,से किछु झलक तँ एहि पुस्तकमे भेटिये जैत। खण्ड-खण्डमे अपन रंगकर्मीक रूपमे  यात्राक वर्णन,संगहिं नव महिला/पुरुष कलाकारकेँ एहि दिस आकर्षित करब आ मातृवत ओकर भविष्यक विषयमे सोचब ,तकरहि प्रतिफल अछि पटना आ आनो शहरक  एहि रूपमे अनेको नाट्य संस्था आ अनेको प्रतिष्ठित कलाकार। श्री विभूति आनन्दक बेर-बेर आग्रह आ पीठियाठोक तगादा पर ई संस्मरण लिखलनि अछि ,से बेर-बेर स्मरण करबैत छथि आ नाटकक बहन्ने अपन संघर्षक कथा तँ छनिहें ,उपकारक आभार प्रदर्शन सेहो अछि ,ओना ई इहो कहैत छथि ,उपकारक कृतज्ञता तँ मोनक वस्तु छैक ,प्रकटक नहिं। यात्रीजी हिनकर कक्का। कक्काक हिनका प्रति स्नेह,1964मे ई पटना अयलीह। यात्रीजीक आशीर्वाद हिनका सदत भेटैत रहलनि ,हिनक प्रतिभाकेँ ओ चीन्हि ,हिनका बहुत प्रोत्साहित केलखिन ,अपना संग कतेको ठाम लय गेलखिन ,से श्रीमती प्रमिलाजी बहुत छोट संस्मरणमे बहुत नव बात कहलनि अछि।वीकर सेक्शन के दुर्बल झा पाँजि कहि हास्यक पुट सेहो कतौ -कतौ अछि। हरिमोहन बाबूक संग हिनक सान्निध्य सेहो रहल ,ओहो पारिवारिक। सुख-दुःख सभमे। हरिमोहन बाबू जीवन आ साहित्यमे  बहुत भावुक छलाह। जे हुनका संग रहल अछि ,हुनका संग गप्प कयने अछि ,हुनकर  विषयमे कनेको जनैत अछि ,सभक मानस पटल पर ई अंकित हेबे करत।कोनो छोटो बातपर हुनका आँखिसँ नोर खसय लगैत छलनि। मुदा जखन महिलाक सशक्तिकरणक बात साकार होइत देखैत छथि ,तँ नोर खसब कोनो अप्रत्याशित नहिं ,से सभ भेटत एहि संस्मरणमे ,जीवन पक्षक बेसी। कोनो नाटककार ,यदि ओ नव नाटकक सृजनमे ओकर ध्यान कोनो नायक/नायिकपर केंद्रित भय कय लिखबाक हेतु प्रेरणा होइत हो ,तँ ओहि नायक/नायिकाक कलाक प्रति समर्पण बुझि सकैत छियैक ,आ से बुझबैक सुधांशु शेखर चौधरीक विषयमे हिनक संस्मरण देखि। जहिना कोनो नाटकक मंचनमे शीत-ताप सभ अबैत छैक ,तहिना हिनकर संस्मरणमे कला पक्ष आ जीवन पक्ष सभ समेटल भेटि जायत ,जीवनक सभ गति-नियति देखि सकब। देखि सकब इहो, पंडित जयनाथ मिश्र व्यक्ति नहिं,एक संस्था छलाह ,हिनको विषयमे पढ़ि ,एक झलक तँ लागिये सकत। नाटक आ पंडित गोविन्द झा ,हिनका लेल सभ दिन मोन रहतनि। जाहि नाटक मंचनसँ हिनका रोकि देल गेल रहनि रहिकामे , ओकर लेखक छलाह पं.गोविन्द झा आ नाटक छल "बसात"। ओ बसात तँ ओहि ठाम कनेक काल लेल रोकि देल गेल छल ,मुदा सिहकैत बसातकेँ के रोकि सकैछ ! से बसात तेना ने सुगंधित रूपमे बहैत पसरल, से सम्पूर्ण मिथिलामे मीलक पाथर गाड़ि देल। नाटकक चर्चा ,विकासक इतिहास ,महिला कलाकारक बढ़ैत डेग ,सभमे एक टा मजबूत खम्भा ,जकरहि इर्द-गिर्द आ ओकरहि संबल आ आदर्श मानि चलैत अछि ओ नाम थिक प्रेमलता मिश्र प्रेम। पं. गोविन्द बाबूक आशीर्वाद हिनका जे भेटलनि आ एखनो भेटैत छनि ,सभ भेटि जायत एतय। पं. त्रिलोचन झा ,श्री कान्त मण्डल ,रंगकर्मी प्रमिलाक आ प्रेमलताक बढ़ैत नाटकक रुचिमे  कोन रूपेँ ई लोकनि मनमे रचल-बसल छथिन ,कोना सहायक भेल छथि ,नीक -बेजाय सभ भेटत हिनकालोकनिक अनुभवक प्रसंग। ई पुस्तक 15 वर्षक पहिलुक थिक ,एकर बाद हिनकर संस्मरण अयलनि अछि कि नहिं ,हमरा नहिं पता ,जँ अयलनि अछि तँ हमरा पढ़बाक लेल रुचि जागृति करैत अछि आ यदि नहिं तँ एहि निवेदनक संग जे एक पाठकक बिनती मानि अपन पैघ अन्तरालक विषद संस्मरण लिखथि ,जाहिसँ आगूक पीढी हिनक सहृदय व्यक्तित्व ,कठोर अनुशासन ,नाटकक तँ सहजहिं ,मिथिला-मैथिलीक लेल समर्पण ,अनेको अक्षर-पुरुषक अशीर्वादक सौभाग्य प्राप्त श्रीमती प्रेमलता मिश्रजीकेँ जखन-जखन लोक पढ़त ,तँ ओकरोमे उत्साह बढत ,जीवनक लेल ,संघर्षसँ लड़बाक लेल आ समाजकेँ एक नव दिशा देबाक लेल। अनेको सम्मानसँ सम्मानित छथि ,मुदा सभ सम्मानसँ भारी एखन इएह पड़ैत छथि। हिनका जहिया 26 जनवरीकेँ सम्मान घोषित हेतनि ,तहिये मिथिलाक अभिनय सम्मानित हैत ,ओही विश्वासक संग सुदीर्घ जीवन सक्रियताक सहित माँ जानकीसँ प्रार्थना। --हितनाथ झा-संपर्क-09430743070 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.शुभनारायण झा- मैथिली रंग मंच के पितामही प्रेम लता मिश्र 'प्रेम' शुभनारायण झा मैथिली रंग मंच के पितामही प्रेम लता मिश्र "प्रेम" मिथिला क्षेत्रक प्रत्येक नर नारी प्राकृतिक रूपसँ कला केर कोनो ने कोनो प्रारूपमे जन्मजात कलाकार होइते अछि जाहिमे चित्र कला, संगीत कला, शिल्प कला, नाट्य कला इत्यादि प्रमुख अछि। ओना तँ मिथिलाक कोनो एहन गाम ने भेटत जाहि ठाम रंगकर्मसँ जुड़ल गतिविधि नै हो। नाच, नाटक गाम गाममे आयोजित होइते अछि। संवाद प्रधान, किर्तनिया शैली आ नाच शैली के विभिन्न प्रारूप जेना अल्हा रुदल, सल्हेश, शीत बसन्त, लोरिक इत्यादि। किंतु दुर्भाग्य ई छल जे रंगमंचपर नारीक भागेदारी नै जकाँ रहल। किछु आर्केस्ट्रा सबमे गीत नृत्यमे नारी कलाकार सब उपस्थिति  होइतो छल तँ सामाजिक प्रतिष्ठा के क्षेत्रमे उचित स्थान नै देल जाइत छल। आ तें पुरुष कलाकार नारी चरित्र निमाहैपर मजबूर होइथ। ओना  तँ कलाकार होमक नाते नारी चरित्र निमाहैमे अनुचित त नै छल किंतु राष्ट्रीय आ अंतरारष्ट्रीय रंगमंच के समक्ष मैथिली रंगमंचक ई मजबूरी पिछड़ल  स्तर के द्योतक छल। ताहि समय मैथिली रंगमंचपर 8 सालक उम्रमे रहिका मंचपर उदित भेल छली अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र प्रेम।जे बादमे पटनाक मंचसँ लगातार अभिनय करैत रहलथि। सज्जन सुशील मृदुभाषी आ सुंदर रूप के अभिनेत्री प्रेमलता जी लग मुख्य रूपसँ शिक्षिकाक रोजगार रहलनि आ अभिनय कला के प्रति अतीव समर्पण। पतिक भरपूर समर्थन आ सहयोगसँ हुनक हिम्मत मिथिलाक आन नारीमे जबरदस्त प्रेरणा के संचार केलक। परिणामतः बहुत रास मैथिल महिला आ धीया सब ऐ क्षेत्रमे आगू एली जकर परिणाम ऐ जे वर्तमानमे मैथिली रंगमंचपर शहरी क्षेत्रमे महिला कलाकार केर कमी नै अछि। हँ गमैया मंच एखनहु अभावमे अछिए। एहन बात नै छै जे ओ धप दऽ एली आ किछु तपस्या नै केली! मैथिली रंगमंच के सक्रिय रखबाक लेल जाड़मे,बर्षामे कि प्रचंड गर्मीमे पएरे चलि कऽ घरे-घर चंदा लेनायसँ लऽ दर्शक के अरियाइत कऽ हॉल तक लाबएमे ओ सतत लागल रहथि। मृदुल स्वभावक प्रेमलता जी ओना तँ भंगिमा रंगमंचसँ जुड़ल रहथि मुदा मैथिली नाटक हेतु पटनाक निर्देशकक पसंद के कलाकार छथि। ओ बात अलग जे पटनामे शिक्षिकाक नौकरी चलते देश के अन्य मंचपर सक्रिय नै देखल जाइ छथि। मैथिली नाटक हुनक जीविका नै रहनि अपितु ओ एकरा एक आंदोलन के रूपमे सदैव मैथिली रंगमंच के अंतराष्ट्रीय पहचान हेतु क्रियाशील रहली। एखन धरि कतेक मंचन कऽ लेली तकर गणना हुनकोसँ संभव नै छनि। मैथिली फिल्म "बबितिया' संग कार्य करबाक अवसर भेटल। फुर्सतमे पुछलियनि दीदी कतेक मंचन कऽ लेने हेबै? त कहली ' यौ शुभनारायण जी! जे कऽ लियै ओ पाछू भऽ जाय आ हम पिछला बिसरि कऽ आगू के काजपर लागि जाय तँ यादो रहत तहन ने किछु कहब? " तहिना नाट्य प्रेमी दर्शक के सेहो हृदयमे बास करै छथि ओ। समस्त नवतुरिया के 'माँ ' आ परिपक्व के द्वारा आदरसँ 'दीदी' के संबोधनसँ सतत संबोधित प्रेमलता जी के अतिथ्य प्रेम विलक्षण। 1985 के पटना प्रवास के समय 'अरिपन' नाट्य संस्था द्वारा आयोजित अंतराष्ट्रीय मैथिली नाट्य महोत्सवमे भंगिमा के प्रस्तुति "असगर असगर "मे जखन युवावस्थामे ७० बरखक वृद्ध  महिला के अभिनय देखने छी जे ओहिना एखनहु जीवंत नजरिक सोझा अछि। नाटकमे अभिनय के संग हुनक पहिला सुपरहिट मैथिली सिनेमा "सस्ता जिनगी महग सिंदूर"मे माता के भूमिका के खूब पसंद कैल गेल। किछु वर्ष पूर्व मैथिलीक पहिल राष्ट्रीय पुरष्कृत फिल्म 'मिथिला मखान'मे हिनक भूमिका प्रसंसनीय छल आ हालाहिमे प्रदर्शित महिला सशक्तिकरण आधारित मैथिली सिनेमा 'बबितिया' के काफी प्रसंसा कयल जा रहल अछि जाहिमे ओ केंद्रीय भूमिका दादी केर निमाहि चर्चामे छथि। ओना तँ ओ विभिन्न मैथिलीक सामाजिक संगठन केर जिम्मेवार पदसँ कियाशील छथि आ साहित्यमे सेहो बहुत रास काज करैत त्रैमासिक मैथिली पत्रिका तक संपादित करैत छथि। घर के बाल बच्चा के जिम्मेवारी निमाहैत आब पोता पोती तक हिनके संग सटल रहैत छनि। एक मैथिल महिला द्वारा अपन भाषा के प्रति एतवा अनुराग देखवामे नहि आवैत अछि। खाँटी मैथिल संस्कृतिमे जीवन जीवैत तीन पीढ़ी के कलाकार संग  काज करैत मैथिली रंग पटलपर हिनक सक्रियता के चालि एखनो झटकारल देखबामे आबि रहल अछि आ से देखि कखनो ई बुझबामे संदेह नै जे ओ चारिम पीढ़ी संग काज करैत नजर नै औती। मैथिल संस्थामे संलगन एक्कहु टा मनुक्ख एहन नै भेटत जिनकासँ जुड़ल कोनो विवाद नै हो मुदा हमरा जनैत प्रेमलता जी ओहि अवधारणा के गलत सिद्ध करैत एहन महिला छथि जे आजीवन चेतना समिति, मैथिली महिला संघ, भंगिमा आदि संस्थासँ जुड़ल तँ रहली किंतु निर्विवाद रहली। सर्वप्रिए आ सर्वत्र आदर पाबैत रहली। मैथिली नाटक, साहित्य आ मैथिली समाजिक आंदोलनमे बढ़ल-चढ़ल सेवा दै वाली एखनहु तक प्रयासरत महिला कलाकार के मैथिली रंग जगतक पितामही कोना ने कही? - शुभनारायण झा- संपर्क-दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.विभा रानी- 'रंगमंच मे राजा किओ नहिं होइत छै' विभा रानी 'रंगमंच मे राजा किओ नहिं होइत छै' 'के कहय कमजोर छें, अप्पन कन्हा मे जोर छौ, तरहत्थी मुंहजोर छौ......' राष्ट्रीय पुरस्कार स' सम्मानित फिल्म 'मैथिली मखान'क हमर लिखल एक टा गीत 'माटि कोड' रे बौआ....' स' लेल ई लाइन मैथिली रंगमंचक सशक्त हस्ताक्षर, मैथिली नाट्य विधाक धरोहरि डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' लेल बहुत समीचीन बैसै छै. मैथिली रंगमंचक आन बान आ शान बनल मैथिली समकालीन रंगमंचक प्रारम्भिक काले स' स्त्री पात्रक रिक्ति केँ अपन उपस्थिति स' भरयवाली मैथिली रंगलोकक वरिष्ठतम रंगकर्मी, लेखिका, सम्पदक, शिक्षक आ सिनेमाक स्क्रीन पर 'ममता गाबय गीत', 'दुल्हा गंगा पार के', 'पिंजरे वाली मुनियाँ', 'सस्ता जिनगी महग सेनूर', 'ललका पाग', 'मिथिला मखान', 'बबितिया' आदि सिनेमा मे अपन सहज, स्वाभाविक अभिनय स' आन लेल पर्याय बनल डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' मैथिलीक एकटा रंगकर्मी बनि मैथिली रंगमंच के बिकट परिस्थिति में सहेजि क' आगां बढैत गेलीह, अहि रंगयात्राक वर्णन कागज पर केनाइ असम्भव त' नहिं अछि. हं, जिनगी मे उतारल मुश्किल अवश्य छै. जाहि समय मे महिला सभ के घर स' निकलब मुश्किल रहै, ताहि समय में डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' रंगमंच के अपन कला सहित अपन धर्म-कर्म मानि समाजक सामने एकटा बड़ पैघ उदाहरण प्रस्तुत केलन्हि. अहि हिसाबें मैथिली रंगमंच में हिनकर अद्भुत एवं अमिट योगदान छै. मैथिली रंगमंच मे दिक्कति सदिखन स' चलैत आएल अछि. ओना रंगमंच अपने मे दिक्कतिक दोसर नाम छियै. मुदा, मैथिली मे एखनो धरि ई एक गोट बहुत पैघ दिक्कति छै- महिला कलाकारक उपस्थिति. एहेन भीषण दुष्कालक समय मे सम्भवत: वर्ष 1975- 76 मे एक युवा मैथिली रंगमंचक भूमि पर उतरैत छथि. नाटक करैत छथि. हुनका एला स' मैथिली रंगमंच जेना अपूर्व प्रकाश स' प्रकाशमान होब' लागै छै. हुनका एला स' आन- आन लोक सभ के भरोस भेंट' लागै छै जे हमरो बहिन- बेटी सभ मैथिली रंगमंच मे जा सकैत अछि, नाटक क' सकैत अछि. प्रेमलता जी अपने कहै छथिन्ह जे 'नाटक करैवाला सभ के धिया- पुताक परिवार के आश्वस्त कर' पडतै जे  रंगमंच आ ओकर कार्य-व्यापार एक पारिवारिक गतिविधि जकां छै. तखने ओ सभ अपन धिया- पुता, खास क' धिया के पठेतन्हि रंगमंच लेल.' उषाकिरण खान कहै छथिन्ह जे 'हुनके कारण हमर सभ टा बच्चा सभ मैथिली रंगमंच मे उतरल.' डॉ. उषाकिरण खान कहै छथिन्ह जे 'हम हुनक सभ टा नाटक देखने छियै. ओ एक टा 'एपीटोम' छथि.' उषा जी हुनका हुनक घरक नाम 'बच्ची' कहि क' सम्बोधित करै छथिन्ह. ओ कहै छथिन्ह-'बच्ची मैथिली रंगमंच पर 1974-75 मे एलीह. ताहि स' पहिने ओ रेडियो नाटक मे काज करैत छलीह. यात्री काका ओहि ठां ओ अबैत छलीह. मैथिली रंगमंच मे बच्ची अतुलनीय छथि. नहिं अभिनय, नहिं समर्पण मे हुनक परतर किओ क' सकै छै. ओ अतुलनीय छथि आ ई उपलब्धि ओ अपना दम- खम पर हासिल केलीह.' प्रेमलता जी जहन मैथिली नाटक कर' के आरम्भ केलीह, त' लगभग सभ टा नाटक मे ओ भाग लेलीह. 'काठक लोक', गाछ', आदि सहित गोविंद झाक 'रुक्मिणी हरण' सहित बहुत रास नाटक ओ केलन्हि. उषाकिरण खान लिखित 'चानो दाई', 'फागुन', 'भुसकौल बाला' मे ओ काज केलखिन्ह. हमर अपन दुर्भाग्य रहल जे हम हुनक एक्को टा नाटक नहि देखि सकलहुं. जहिया- जहिया पटना गेलहुं, ओहि समय मे हुनक कोनो नाटक नहिं भ' रहल छलै. पहिने त' अजुका समय सेहो नहिं छलै जे नाटकक रेकॉर्डिंग भ' सकितियै अथवा यूट्यूब पर अपलोड क' दितियैक. मुदा हुनक स्वाभाविक अभिनय हम सिनेमाक माध्यम से अवश्य देखल. 2021 के मार्च मे जहन हम किरण सम्मान लेब' रहिका पहुंचलहुं, त' देखल जे आयोजन स्थल पर प्रेमलता जी बैसल छथिन्ह. पहिल बेर बड्ड प्रेम स' भेंट- मुलाकात भेल. आयोजने स्थल स' ओ अपन घर देखबैत कहलखिन्ह जे 'अही ठां हमर घर अछि.' ओहि सांझ भरि पोख गप्प भेल हुनका स'. हुनक रंगयात्राक मादे हुनके स' जानकारी भेंटल. प्रेमलता जीक बड्ड स्पष्ट मनतब छै- 'पहिने त' अहां के अपना के बूझ' पडत जे हम की चाहै छी? आजुक लोक सभ लेल समय आ धैर्यक कमी छै. हमरा सभक समयक गप्प कनेक दोसर छलै. चेतना समितिक नाटक करैत काले हमरा सभ के दर्शकक अभाव कहियो नहिं रहल. मुदा आब छै. आब लोक आओरक सोझा मे बहुत रास विकल्प छै. बहुत तरहक सोशल मीडिया छै. तैं आब हमरा सभ के दर्शक के जोडि क' राखबाक प्रयास कर' पडतै. आ ई समस्त रंगकर्मी के एकजुट भ' क' कर' पडतै. ई मात्र नाट्य निर्देशकक काज नहिं छै. अहुनो रंगमंच मे राजा किओ नहिं होइत छै. सभ किओ कर्मी होइत छै. तैं सभ के मिलि- जुलि क' प्रयास कर' पडतै.' हम पूछबो केने छलियै जे 'आजुक युवा लेल परिस्थिति पहिने स' बेसी विषम छै. रोजगार कतहु नहिं छै आ नाटक मे त' रोजगार लगभग शून्ये सन छै.' प्रेमलता जी कहलखिन्ह जे 'एकरा लेल नाट्य कर्मी संगे समाज, संस्था, शिक्षण संस्था आदि सभ कें आगां आब' पडतै. रोजगारपरक रंगमंच लेल हमरा सभ के सोच' पडतै.' प्रेमलता जी प्रयोगधर्मी छथि. नाटक मे मात्र नाट्यालेखेक मंचन हुअए, ओ एकरा स' कनेक आगां बढत कहै छथिन्ह- 'ई आवश्यक नहिं जे नाटकेक मंचन हुअए. एतेक रास कथा सभ छै. तकर मंचन भेला स' लोक आओर के सेहो पता चलतै ई कथा सभक मादे, कियैक त' सभ के पढबाक अपन- अपन सीमा छै.' हिंदी मे कथा मंचन मे सभ स' अग्रणी नाम देवेंद्र राज अंकुर जीक छन्हि. प्रेमलता जी सेहो हरिमोहन झा जीक कथा 'मर्यादा हरण' पर नाटक केने छलीह. हमहूं संजीव जी, भीष्म साहनी, टैगोर, रमणिका गुप्ताक कथा सभक मंचन केने छी. किरण सम्मान आयोजन स' पूर्व अहिने छिटपुट रूप मे हुनका स' भेंट होबैत रहल. मुदा प्रणाम- पाती धरि सीमित रहल. किरण सम्मान आयोजन स' पूर्व हिनका स' एक बेर आओर हमरा भेंट भेल छल पिण्डारुच मे, जत' प्रभास कुमार चौधरीक जन्मदिन आ पुस्तक विमोचन आदि पर एक बहुत नीक आ पैघ दू दिवसीय प्रोग्राम प्रभास जीक धिया- पुता सभ मिलि क' आयोजित केने छलन्हि. हमहूं बजाओल गेल रही. बहुत मेही- मेही बजै छथिन्ह. ओ हमरा स' गप्प केलन्हि, अपन पत्रिकाक मादे कहलन्हि आ रचनाक मांग केलन्हि. तकरा बाद मुंबई घूरि क' हमहूं बिसरि गेलहुं, हुनकरो कोनो फोन अथवा रिमाइंडर नहि एलै. 'सांध्य दर्पण' हम खूब नीक जकां देखल, जहन ओ एकर एक अंक ओ अपन 'मिनी दीदी' अर्थात उषाकिरण खान पर निकालने छलखिन्ह. तहन पता चलल जे ओ एतेक नीक सम्पादक सेहो छथिन्ह. हम ओहि अंक पर लिखबो कएल. अहि साल लिली जीक निधनक बाद हमरा लग फोन आएल छल हुनका पर लिख' लेल. तकरो लेल हम रचना पठाओल. व्यक्ति जहन अपन चहुंमुखी विकास लेल साकांक्ष होइत छै त'  हुनक विविध रूप देख' मे अबै छै. प्रेमलता जी मात्र नाटके धरि नहिं रुकलीह. ओ समय अनुसारे अपन अध्ययन सेहो जारी रखैत एम ए, पी एच डी केलीह, नौकरी केलीह. रंगमंच आ सिनेमा सेहो संग- संग चलैत रहलै. घर- परिवारक जिम्मेदारी त' सभ स्त्रीक एक गोट अभिन्न अंग छैहे. ई सिद्ध करै छै जे यदि अहां अप्पन कोनो लीक के संधान' लेल कटिबद्ध छी त' ओ मुश्किल भने भ' जाओ, असम्भव नहिं छै. आ ईहो सत्य छै जे एतेक रास काज कोनो स्त्रिए स' सम्भव छै. प्रेमलता जी रंगमंच पर गप्प करैत एकर सर्वांगीण विकास पर गप्प करैत छथिन्ह. हुनक अनुसारे, 'रंगमंच एक सामूहिक प्रक्रिया आ प्रयास छै.' आजुक रंगमंच पर गप्प करैत ओ कहै छथिन्ह 'जे युवा वर्ग जहन लक्ष्य बना क' चलताह जे हमरा रंगकर्म करबाके अछि, फिल्म अथवा सीरियल मे जेबाक हमर उद्देश्य नहिं अछि, तहन रंगमंचक विकास हेबे टा करतै.' हुनक कहब छै, 'जे जहिया ओ रंगमंच शुरू केली, ओहि समय में स्त्रिक लेल रंगमंच आ सिनेमा में अभिनय केनाइ बड्ड दुर्लभ छल. मुदा अपन जिद आ परिवारक सहयोग स' ओ पढ़ाईक संग-संग रंगमंच केनाइ कहियो नै छोड़लीह।' अहि स' एक चीज त' बड्ड स्पष्ट रूपें दृष्टिग्चर होई छै- 'परिवारक सहयोग.' आई प्रेमलता जीक प्रशंसा मे जतेक विरुदावली गाबि लेल जाय, प्रेमलता जी लेल ई सभ धूरि समान हेतै, ई हमरा सहज विश्वास अछि. हुनका लेल अपन हेबाक उपलब्धि इयाहि हेतै, जहन मैथिलीक धिया सभ के रंगमंच, सिनेमा, गायन, नृत्य अथवा एहेने कोनो रचनात्मक काज लेल 'परिवारक सहयोग' भेंटतै. तहने हुनक 1975 से मैथिली रंगमंच लेल जगाओल अलख सार्थक हेतै. लोक आओर कहै छथिन्ह जे 'ओ चंदा मांगि क', भूंजा फांकि क', टोल-परोसक टिबोरी सुनियो क' ओ रंगमंच पर नव रेखा खिचैत रहलीह.' हम मनतब अछि जे भाई लोक! काज तहने होइत छै आ जहन काजक प्रति निष्ठा, समर्पण आ ईमानदारी रहै छै, तहन व्यक्तिक नाम हेबे टा करै छै. जीवित किम्वदंती अहिना लोक बनै छै- प्रेमलता जीक जकां. फिल्म 'मिथिला मखान' क निर्देशक नितिन नीरा चंद्रा मानै छथिन्ह जे प्रेमलता जी 'The most talented artist' छथिन्ह. ओ लिखै छथिन्ह- '(She) is a thorough professional and very hard working actor.' युवा रंगकर्मी आ मैथिली महिला एकल नाटक के बढावा देब' वाली सोनी नीलू झा कहै छथि जे 'रंगजगत मे योगदान हेतु जखन कोनो स्त्रीक गप होएत त' निस्संदेह प्रेमलता मिश्र जीक नाम सभसँ उपर आओत. खाम्ह छथि ओ मैथिली रंगकमंचक। ई गप हमर सभक नव पीढ़ी वा हमरो बला पीढ़ी मे बुझबाक बेस बेगरता अछि.' सितम्बर मास (जन्म 29 सितम्बर,1948) मे हिनक जन्मदिन मनाओल गेल. सभ किओ हिनक गुणगान कएल. रंगनायिका, मां, देवी आर समस्त स्तुति पढल गेल. 'जीवेत शरदः शतं शतम् सुदिनं सुदिनं जन्मदिनम्। विजयी भव सर्वदा जन्मदिनस्य हार्दिक शुभेच्छाः।।' क पाठ भेल. सही छै. हेबाको चाही. डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' अपन समस्त जीवन मैथिली रंगमंच के सम्वर्धन मे लागल रहलीह. सामान्यतया ई देखल जाइत छै जे हम स्त्री सभ तुरंते दीदी, मां, दादी आदि पद स' शोभायमान होब' लागैत छी. सम्भवत: हम स्त्रीगण सेहो एकरा किछु सौकर्यजनित मानि लैत छी- एक गोट सिक्यूरिटी- भाव! आब किओ किछु नहिं कहत. मुदा हमरा नहिं लगैत अछि जे प्रेमलता मिश्र लेल दीदी आ आब मांक सम्बोधन बहुत मायने राखैत हेतै. हमरा लगैत अछि जे हुनका प्रेमलता जी कहलो संते ओ ओतबे सहज भ' क' रहतीह आ अपन काज करैत चलतीह. अंतत: की हम सभ आन ककरो कक्का, चाचा, बाउजीक सम्बोधन हरसट्ठे देब' लागै छियै? आई फेर- फेर वएह गोल चक्कर पर जा क' हम रुकि जाइत छी, जे प्रेमलता मिश्रक जेना अपन युवावस्था मे मैथिली नाटक मे महिला कलाकार भीषण कमीक पूर्ति लेल उठि क' एलीह, तहिना हुनका दीदी, मां, दादी, रंगनायिका, देवी आदि स' सुशोभित कर'वाला से हम एक्कहि टा अनुरोध करब जे प्रेमलता मिश्र आ हुनका लेल देल गेल ई अभूतपूर्व विशेषण सभ लेल अपनो तैयार होथु आ अपना घरक माय, बहीन, बेटी, पुतौहु सभ के रंगमंच पर जाए लेल सहमति दौथु. हुनका लेल माहौल बनाबथु, जेना महाराष्ट्र मे होइत छै. हमर मित्र छलाह- विवेक भगत. ओ कहै छलाह-'माय- बाप अपन धिया- पुता के आंगुर पकडने हमरा लग ल' अबैत छथि. कहै छथि- 'राखि एकरा. आब जेना देखबाक छौ, देख एकरा, जे बनेबाक छौ, बना एकरा. हुनक ई विश्वास हमरा अहि धिया- पुता सभ के गढ' में मदति करैत अछि.' विवेक भगतक कहबक यथार्थ हम देखैत छियै जे मराठीक बाल कलाकार सभ सेहो एतेक सिद्धहस्तता स' अपन प्रस्तुति दैत छथि, जे हमर वयस्क कलाकार सभ सेहो नहिं द' पबै छथि अनेको ठाम. अही समय मे सार्थक होइत छथि डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' सनक व्यक्तित्व बननाई आ ओकर दोसर- तेसर, अनत- अनत खेपक तैयारी मे लगनाई. - विभा रानी-संपर्क-मुंबई अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.डॉ शिव कुमार मिश्र- मिथिलाक विदुषी परम्पराक अनुपम-स्तम्भ श्रीमती प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' डॉ शिव कुमार मिश्र मिथिलाक विदुषी परम्पराक अनुपम-स्तम्भ श्रीमती प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक संरक्षणक दृष्टिसँ पछिला छह दशकमे एकमात्र मैथिलानीक नाम लेल जाइत अछि, ओ नाम अछि प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'। जाहि मैथिल समाजकेँ रूढ़िवादिता ग्रसित कएने जा रहल अछि ताहि समाजसँ जऽ कोनो स्त्रीगण उच्च शिक्षा लऽ रोजगार पबैत छथि ओ एकटा बड़ पैघ घटना होइत छैक। ताहूसँ पैघ ई होइछ जखन कोनो ललना रंगमंचमे भाग लैत छथि। ओना मैथिल स्त्रीगणमे शिक्षाक अद्भुत विकास भेलैक अछि। पैघ-पैघ पद-प्रतिष्ठा सेहो भेटलैक अछि मुदा मैथिल रंगमंचक लेल मैथिल कन्याक संख्या नगण्य अछि। पटनाक रंगमंच तऽ आओर फिफिया रहल अछि। पछिला किछु सालसँ तऽ आओर स्थिति नीचाँ जा रहल अछि। एहन वातावरणमे एकटा उच्च शिक्षासँ युक्त विदुषी जऽ अपन परम्पराकेँ उघने छथि तऽ ओ मैथिल समाजक लेल सौभाग्यक बात अछि। प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' श्रद्धेय यात्रीजी, पद्मश्री उषाकिरण खान, छत्रानन्द सिंह झा 'बटुक भाई' प्रभृति मिथिलाक कतोक पुरोधा लोकनिक सम्पर्कमे रहि पछिला कतोक दशकसँ एकटा दक्ष शिक्षिकाक रूपमे नेना-भुटका ओ रंगकर्मी सभक लेल प्रस्तुत छथि। मिथिलाक कोनो साहित्यिक वा सांस्कृतिक आयोजनमे जऽ ओ उपस्थित होइत छथि तऽ ओ पवित्र भऽ जाइत अछि। साहित्यिक आयोजन 'सांध्य-गोष्ठी' अनवरत हुनक आवासपर मासक अन्तिम शनिक साँझमे आयोजित होइछ। एहि गोष्ठीमे प्रसिद्ध साहित्यकार लोकनिक संगहि नवोदित साहित्यकार सभ जुटैत छथि। साहित्यक रसपानक संगहि हुनका हाथक बनाओल पनपियाईक सेहो आनन्द लेल जाइत अछि। समय-समयपर 'सांध्य-गोष्ठी' पत्रिकाक प्रकाशन सेहो होइछ। किछु विशेषांक सेहो प्रकाशित भेल अछि जे कोनो विशिष्ट साहित्यकारक व्यक्तित्व ओ कृतित्वपर आधारित अछि। संस्थानक पंजीकरणक लेल हुनक अद्भुत प्रयास रहल अछि। कतोक साहित्यिक ओ सांस्कृतिक संस्थासँ सम्बद्ध प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' सन् १९६४ सँ आकाशवाणी पटनाक सम्पर्कमे छथि। आकाशवाणीक साहित्यिक ओ सांस्कृतिक गतिविधिमे सतत संलग्न रहैत ओ रंगमंचक एकटा पैघ स्तम्भ बनलीह। मैथिली रंगमंचक दृष्टिसँ हुनका अलावे दोसर कोनो मैथिलानीपर दृष्टिपात नहि होइछ जे एतेक समर्पित भावसँ अपन जीवन एहि पाछू उत्सर्ग कऽ देने होथि। आकाशवाणीक नाटक, वार्ता, कथा ओ कम्पीयरिंग प्रभृतिमे हुनक सहभागिता रहल तऽ १९७३ सऽ एखन धरि रंगमंचपर सैकड़ो मैथिली नाटकक विभिन्न भूमिका सभमे हुनक सक्रिय सहभागिता रहल। सन् १९८१ मे रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा निर्मित ओ निर्देशित पहिल मैथिली सिनेमा 'ममता गाबय गीत', प्रकाश झा द्वारा निर्मित हिन्दी सिनेमा 'दामुल', हिन्दी टेलीफिल्म 'कथा माधोपुर की', दूरदर्शनक हिन्दी धारावाहिक 'चौपाल', प्रमोद कुमार चौधरी द्वारा निर्मित एवम् निर्देशित 'पर्व भरा मिथिला', हिन्दी टेलीफिल्म 'मर्यादा', 'जहाँ चाह वहाँ राह', 'बारह बीघा', 'देहाती दुनियाँ', मैथिली धारावाहिक 'नैन नै तिरपित भेल', राजेश कुमार द्वारा निर्मित भोजपुरी दूरदर्शन धारावाहिक 'साँची पिरितिया', लक्ष्मण शाहाबादी द्वारा निर्मित ओ राजकुमार शर्मा द्वारा निर्देशित भोजपुरी फिल्म 'दुल्हा गंगा पार के', प्रमोद शर्माक भोजपुरी फिल्म 'बबुआ हमार', अरबिन्द रंजन दास द्वारा निर्देशित ओ निर्मित 'पिंजड़े वाली मुनियाँ', मैथिली फिल्म 'सस्ता जिनगी महग सिनूर' ओ 'मिथिला मखान' प्रभृति कतोक फिल्म ओ धारावाहिकमे हुनक अभिनय भेल अछि। मिथिला ओ मैथिलीसँ सम्बन्धित कतोक संस्थाक संस्थापक तऽ कतोक संस्थानक सक्रिय सदस्या छथि प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'। हिनक साहित्यिक ओ सांस्कृतिक सक्रियता हिनका एकटा संस्थानक रूपमे स्थापित कए देने अछि। चेतना समिति, भंगिमा, अरिपनक संगहि पटना ओ आन-आन स्थानक संस्थाक लेल हिनक सक्रिय सहभागिता रहल अछि तऽ मैथिली साहित्य संस्थानक कोनो विद्वत् संगोष्ठी प्रेमलताजीक सहभागिताक बिना अपूर्ण रहैछ। चेतना समितिक उपाध्यक्षक रूपमे हिनक जिम्मेदारी बेसी बढ़ि गेल छल, प्रत्येक कार्यकलापमे बढ़ि-चढ़ि कऽ सहयोग देबाक लेल सदिखन उपलब्ध रहैत छलीह। वर्तमानमे सेहो कार्यकारिणी समिति ओ कतोक आन-आन समिति एवं निर्णायक मण्डलमे हिनक सहभागिता बनल रहैछ। 'मिथिला मखान' नामक सिनेमाकेँ राष्ट्रीय सम्मान भेटल छल ताहिमे प्रेमलता मिश्रजीक अभिनय सेहो भेल छल। मैथिली साहित्य संस्थान, पटना द्वारा एकटा विशेष कार्यक्रम आयोजित कए ओहि सिनेमाक कलाकार श्रीमती 'प्रेम'केँ सम्मानित कएल गेल छल। एहि कार्यक्रममे प्रख्यात साहित्यकार पद्मश्री उषाकिरण खान द्वारा प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर हेतुकर झाक अध्यक्षतामे हिनका सम्मानित कएल गेल छल। २८ मई २०१६ कऽ बिहार रिसर्च सोसाइटीक सभागारमे ई कार्यक्रम आयोजित भेल छल जाहिमे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति प्रोफेसर साकेत कुशवाहाक अलावे प्रो. लेखनाथ मिश्र, पंचानन मिश्र, छत्रानन्द सिंह झा 'बटुक भाई' सहित राजधानीक शताधिक विद्वान जुटल रहथि। उपरोक्त संस्थानक अलावा मैथिली महिला संघ, पटना; बिहार संगीत नाटक अकादमी, पटना; मैथिली अकादमी, पटना; लोकमंच प्रभृति कतोक संस्थाक संचालन ओ क्रियाकलापमे श्रीमती प्रेमक सहभागिता बनल रहल अछि। उत्कृष्ट अभिनयक लेल श्रीमती प्रेमलताजीकेँ कतोक संस्थान द्वारा कतोक सम्मान ओ पुरस्कार प्रदान कएल गेल अछि जकर एकटा पैघ सूची अछि। मुदा एहन धरोहरि सेनानीकेँ सम्मानित कए कोनो संस्थान ओ संगठन अपना-आपेकेँ गौरवान्वित करैत अछि। मिथिलाक विदुषी परम्परा देशमे अद्भुत् अछि। भारतीय स्त्री-शिक्षाक आधार मिथिलाक विदुषीगणक क्रियाकलापे थिक। गार्गी, मैत्रेयी, सुलभा, वेदवती, भारती, जयन्ती  थेरी, वासेट्ठी थेरी, अम्बपाली, लखिमा देवी, विश्वास देवी, लखिमा ठकुराइन प्रभृति विदुषीक एकटा पैघ परम्परा मिथिलामे अछि, ताहि परम्पराक अनुपम स्तम्भ छथि- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'। सन् १९४८मे हिनक प्रादुर्भाव भेल, सन् २००८मे पटनाक बाँकीपुर राजकीय बालिका विद्यालयक शिक्षिकाक पदसँ सेवानिवृत्त भय साहित्य, संस्कृतिक संरक्षण लेल अपनाकेँ समर्पित कय देने छथि। एहन धरोहरि सेनानीक प्रति सादर नमन। ईश्वरसँ हिनका दीर्घायु करबाक कामना। -डॉ शिव कुमार मिश्र, मैथिली साहित्य संस्थान, पटना। मोबाइल- ९१२२६८६५८६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.आशीष अनचिन्हार- कला लेल वरिष्ठता नै दक्षता मापदंड छै आशीष अनचिन्हार कला लेल वरिष्ठता नै दक्षता मापदंड छै हम आन बात कहबासँ पहिने एकटा लिस्ट दऽ रहल छी। ई लिस्ट ओहन हिंदी फिल्म केर छै जकर निर्देशक पहिल छलाह। माने ओहि फिल्मसँ ओ लोकनि निर्देशन केर काज शुरू केलाह- Sooraj R Barjatya (Maine Pyar Kiya) (1989) ... Aditya Chopra (Dilwale Dulhania Le Jayenge) (1995) ... Karan Johar (Kuch Kuch Hota hai) (1998) ... Farhan Akhtar (Dil Chahta Hai) (2001) ... Rajkumar Hirani (Munna Bhai MBBS) (2003) ... Aamir Khan (Tare Zameen Par) (2007) जखन अहाँ ई लिस्ट देखबै तँ पता चलत जे निर्देशक केर फिल्म पहिल छै मुदा ओहि फिल्ममे अभिनय करए बला अभिनेता सभ नव-पुरान दुन्नू छै। ईहो पता चलत जे किछु अभिनेता निर्देशक रूपमे सेहो छथि आ ई गलत नै छै। ओ अभिनेता सभ अपन निर्देशकीय क्षमताक लोहा सेहो मनबेने छथि। सभकेँ अपन मनोनुकूल काज करबाक अधिकार छै। मुदा सोचियौ जँ राजकपूर जँ ई सोचने रहितथिन जे हम हिट हीरो छी, नीक अभिनेता छी तँइ हम हिट निर्देशक आ नीक निर्देशक सेहो छी तँ केहन लगितै। लागब तँ जे हो मुदा तखन निर्देशक रूपमे राजकपूर सफल हेबे नै करितथि आ ने शो मैन बनि पबितथि। अहाँ अही लिस्टमे देखू  Munna Bhai MBBS मे जँ संजय दत्त ई कहने रहितथि जे हम पुरान हिट हीरो छी तँइ राजकुमार हीरानीक निर्देशनमे काज नै करब तँ केहन लगितै। मुदा विश्वास मानू बॅालीवुडमे एहन बात हेबे नै करतै कारण ओहिठाम सभ प्रोफेशनल छै आ सभकेँ बूझल छै जे फिल्म लाइन केर हरेक काज लेल अलग-अलग दक्षताक जरूरति छै। ई बात सभ हमरा एहि दुआरे लिखए पड़ल अछि जे "आखर" केर कार्यक्रमक एकटा समाद हमरा पढ़बाक लेल भेटल जाहिमे प्रेमलताजीक भावना रहनि जे ओ "मैथिली नाटक लेल अपन कम उम्र केर निर्देशक तनुजा शंकरक भीतर कार्य केलीह"। प्रेमलताजीक एहि कथनसँ दू टा बात स्थापित होइत अछि पहिल जे मैथिलीपर ओहो इमोशनल अत्याचार करबासँ पाछू नहि हटैत छथि ई कहि जे "मैथिली नाटक लेल.." आ दोसर जे ओ कलामे दक्षताक स्थानपर वरिष्ठताकेँ अनुमोदन करै छथि। हमरा लागल जे ई भावना तँ प्रोफेशनल काजक ठीक विपरीत छै। रंगमंच आ रंगकर्मी हमरा लेखक वर्गक तुलनामे बेसी नीक बुझाइत छल मुदा एहि तरहक भावनासँ हमरा लागल जे रंगमंचोमे मैथिली साहित्य बला बेमारी आबि गेलै। मूलतः ई मनोवृति सभसँ बेसी मैथिली लेखकमे भेटैए आ ओहीठामसँ ई बेमारी आनो क्षेत्रमे आबि गेलै। हम एहि समस्यासँ बेसी काल मुठभेड़ करैत रहैत छी। हम गजलमे छी तँ हमरा सामनेमे ईहो दिक्कत आएल। किछु लेखक कहलाह जे हम ४०-४५ बर्खसँ मैथिली सेवामे लागल छथि तँइ हमर रचना गजल भेल। आब ई कहू जे गजल केर मापदंड अहाँ कतेक बर्खसँ लिखैत छी से कोना भऽ सकैए? एहन-एहन उदाहरण बहुत भेटत। मैथिलीमे सभसँ बड़का समस्या छै जे जँ कियो एक विशेष कलामे महारत हासिल केने छथि तँ ओ अपनाकेँ सर्वकला विशेषज्ञ मानि लै छथि। प्रेमलताजीक प्रति समस्त आदर ओ सम्मान रखैत हम कहए चाहैत छी जे एहि तरहक भावना मैथिली रंगमंचकेँ  नोकसान करतै। कते नोकसान भेल हेतै भूतकालमे तकर आकलन रंग आलोचक सभ करथि। मुदा एहि ठाम हम अपन हस्तक्षेप एहि कारणे केलहुँ जे एहि प्रवृतिसँ साहित्य तँ गर्तमे चलिए गेल छै कमसँ कम रंगमंच बाँचल रहए। जाहि ठामसँ हमरा आखर संबंधी समाद भेटल तकर लिंक अछि- https://news4nation.com/news/aakhar-dr-premlata-mishra-840062 -आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.आभा झा- रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रक साहित्यिक छवि- ओ दिन ओ पल आभा झा रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रक साहित्यिक छवि- ओ दिन ओ पल जखन लेखक अपन जीवनक अनन्त स्मृतिक धरोहरमेसॅं किछु रमणीय अनुभूतिकेॅं चित्रात्मकता ओ तटस्थताक संग कलात्मक शैलीमे लिखैत अछि त' ओ संस्मरण कहाइत अछि।मुदा संस्मरण तखनहिॅं अपन प्रभाव पाठकक म'न-मस्तिष्क पर छोड़ि सकैछ जखन संस्मरण-लेखक आत्मीयतासॅं कोनो स्मृतिकेॅं शब्दाकार परसैत अछि। संगहिं इहो आवश्यक जे लेखक कोनो पुरुष अथवा चरित्रक ओहि पक्षकेॅं मजगूतीसॅं सोझां आनि सकय जे  जेना ओ स्वयं ओहि क्षणविशेषकेॅं म'न पाड़बा लेल विवश भेल तहिना पाठककेर  सेहो तादात्म्य स्थापित भए सकए। संस्मरण शब्दक जॅं व्युत्पत्ति पर गौर करी त'  सम् उपसर्ग पूर्वक स्मृ  धातु संग ल्युट्  प्रत्यय लगलासॅं  संस्मरण शब्द बनैत अछि जकर अर्थ होइछ- संस्कार- जन्य -ज्ञान । अर्थात् ज्ञातवस्तुक अनुभवक अधीन संस्कारसॅं उत्पन्न ज्ञान,चिन्तन अथवा स्मृति। संस्मरणक एकटा महत्वपूर्ण विशेषता कृतज्ञता सेहो थिक। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति अपन जीवनमे प्रकृति,माता-पिता, परिवार -जनक अतिरिक्त अनेक अन्य लोकसॅं उपकृत होइत अछि,मुदा सभ ओकरा म'न नहिॅं राखैत अछि, किछु म'न रखितो ओकरा अभिव्यक्त नहिॅं कए सकैत अछि आ किछु लोक एहन होइत छथि जे  जरूरतिक समय किंवा कोनो सम-विषम परिस्थितिमे किनकहु द्वारा कएल गेल छोटसॅं छोट सहायता वा सेवा लेल हृदयमे ओहि व्यक्तिक प्रति आदर- भाव रखैत छथि, कृतज्ञता अनुभव करैत छथि आ निर्द्वन्द्वभावें  शाब्दिक आभार प्रकट करैत छथि। ओहने संवेदनशील कलाकार आ कलमकार छथि श्रीमती प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' जे स्वयंकेॅं मात्र सामान्य रंगकर्मी बुझैत छथि, साहित्यिक व्यक्ति नहिॅं। तैं सम्भवतः अपन लेखनक क्रममे बेर बेर विभूति जीक नाम लैत कहैत छथि-ओ हमरासॅं किछु तीत-मीठ अनुभव लिखबा लैत छथि, हमरा सॅं खिस्सा पिहानी लिखवा लैत छथि,नहिॅं त' हमरा त' मात्र भट्ठा धर' आयल अछि। ई थिक विनम्रता,ई थिक माटिसॅं जुड़ल रहबाक संस्कार आ इऐह थिक ओ मानवीय गुण जे मनुष्यकेॅं वस्तुत: मनुष्य बनबैत छैक।ई सत्य, जे प्रेमलता मिश्रक नाम लैत देरी मिथिलाक एकटा ओहेन महिलाक व्यक्तित्व आंखिक सोझां अबैत अछि,जे बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्धक शुरूहेमे (१९६४-६५)रंगमंचसॅं जुड़लीह, रंगमंचकेॅं जीवनक पर्याय बनौलनि आ तैंयों अपन पारिवारिक- सामाजिक जीवनमे तालमेल बनौने रहि सकलीह। निस्संदेह ताहि समयमे ई क्रान्तिकारी डेग छलै, जकर आलोचना -प्रत्यालोचना होइते रहलै, तथापि किछु शुभचिंतक आ पतिक सहयोगक बलें ओ ने मात्र स्वयं बढ़ैत रहलीह, अपितु भविष्यक बहुत रास स्त्री लेल प्रेरिका बनलीह।अपन सहज-सरल ममत्वपूर्ण स्वभावक कारणें ओ सभहक मातृतुल्या मानल जाइत छथि । आइ हुनक आभिनयिक नहिॅं, अपितु सरल हृदयक सोझ-सरल भाषामे लिखल संस्मरणक मादें हुनक व्यक्तित्वक कृतज्ञताक संग हुनक जीवनमे आयल किछु श्रेष्ठ जनक व्यक्तित्वक ओहि वैशिष्ट्य सभहक साक्षात्कार करबाक प्रयास करब,जे सामान्य बुझाइतो विशिष्ट अछि,नोटिस लेबा जोगर अछि आ आभार व्यक्त करबा जोगर अछि- संस्मरणक पहिल अध्यायमे ओ म'न पाड़ैत छथि यात्रीजीकेॅं,हुनक सिद्धान्तकेॅं,हुनक पितृवत्सलताकेॅं,हुनक अकारण वात्सल्य आ निश्छलताकेॅं! "जाबत धरि हम व्यवस्थित जिनगीमे नहि आबि गेलहुॅं,ताबत धरि हुनक बासा हमर शरणस्थली रहल... " "ओ हमर पिता छलाह, मित्र आकि मार्गदर्शक-हम निर्णय नहि ल' सकैत छी।" आकाशवाणीमे अपन प्रवेश लेल, भंगिमा, चेतना समिति आदिमे सक्रियता लेल,स्त्रीक म'नमे अधिकारक जागरूकता लेल प्रेमलताजी हुनका प्रति अपन कृतज्ञता बिसरैत नहिॅं छथि आ लोककेॅं ल' जाइत छथिन यात्री जीक साहित्यिक गुरुताक भूमिसॅं एकटा सहृदय- निश्छल- पितृतुल्य उदार भूमिमे,हुनक सैद्धांतिक कट्टरता आ यायावरी प्रवृत्तिसॅं फराक सिनेहसॅं सानल वात्सल्यक अकृत्रिम माटिमे ! संस्मरणक  दोसर फूल समर्पित छनि श्री हरिमोहन झाकेॅं,जनिकासॅं पटना में अपन भेंट आ तदनन्तर विकसित पितृव्य-भतीजी-संबधक स्नेहपूर्ण विवरण आ प्राप्त उचित मार्गदर्शनक उल्लेख करैत हुनकर प्रति अपन स्मरणाञ्जलि अर्पित कएने  छथि।हुनक भावप्रवण सिनेहक छिटकासॅं अभिसिंचित,हुनक पत्नीक(प्रेमलताजीक काकीक) घ'रक बाहर बढ़ल डेगसॅं प्रेरित मानैत बहुत श्रद्धा संग हुनका स्मरण करैत छथि। हरिमोहन झाक  स्त्री-समानताक स्वप्नकेॅं हुनकहि मुंहसॅं ओ सुनने छलीह -" आइ हमर सपना साकार भेल। एहि दिनक कल्पना हम कयने रही। मैथिल ललना लोकनि आब जागि गेलीह... एहिसॅं बढ़िक' खुशीक बात भइये की सकैत अछि!" सुधांशु शेखर चौधरी जीक प्रति अपन तेसर स्मृति- पुष्प अर्पित करैत ओ कहैत छथि-"कोनो नाटककारक निधन एकटा कलाकारक हेतु माय- बापक मृत्युसॅं कम नहि होइत छैक।" शेखरजीक वर्णन करैत ओ पुनः कहैत छथि-"एकटा नाटककार सेहो अपन नाटक लिखबाक समय ओकर प्रत्येक पात्रक भूमिकाक संबंधमे सोचैत अछि, ओकरा हेतु ओहि मात्र दू घंटाक वा किछु समयक नाटकमे किछु तेहने परिवेशक संरचना करैछ जाहिसॅं ओकर प्रत्येक पात्र दर्शकक हृदयमे दीर्घजीवी  भ' सकत।तकर निर्वाह शेखर जी अपन नाटकमे पूर्णरूपेण करैत छलाह, खाहे ओ 15-20 मिनटक रेडियो नाटक हो अथवा दू घंटाक रंगमंचीय नाटक।" प्रेमलता जी प्रायः सुधांशु शेखर चौधरी जीक सभ नाटकमे अभिनय कएलनि आ हुनका मुंहें अपन पात्रताक स्वीकारोक्ति हुनका अत्यंत मुदित कएने छलनि- " जखन हम नाटक लिखब आरंभ करैत छी,अहाॅं हमरा सोझां आबि जाइत छी आ ओ संवाद हम प्रेमलताक हेतु लिखैत छी।" हुनक साहित्य पर शोध करबाक प्रेमलता जीक स्वप्न छलनि आ ओ पूरा नहिॅं भेलनि। तैं ओ स्वयंकेॅं कटघरामे ठाढ़ बुझैत छथि।(एहि पोथीक अनुसार) पं जयनाथ मिश्रकेॅं स्मृति- तर्पण दैत ओ कहैत छथि- "पं जयनाथ मिश्र एक व्यक्ति नहि अपितु संस्थाक नाम अछि।" पुनः हुनक तुलना विशाल वटवृक्षसॅं करैत ओ कहैत छथि- "गाछ कोनो वर्ग-भेद, जाति-भेद ,धर्म -भेद नहि बुझैत अछि।ओहन व्यक्तिक हेतु कियो खास नहि होइत छैक, मुदा ओहि व्यक्तित्वक ई विशेषता होइत छैक जे लोक हुनका अपन खास हयबाक दाबी करए लगैत अछि।ओ अपन भाषा संस्कृतिक संगहिं संग मानवताक पुजारी छलाह।" तदुपरान्त ओ नारी-जागरणक अग्रदूत रूपमे पं गोविन्द झाकेॅं देखैत हुनका प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करैत छथि- "पं झाक नाटकक माध्यमें हमरा अपन अभिनय- कलामे विविधताक अवसर भेटल। बेसी नाटकमे एक रंगक भूमिकासॅं उपजल अकुलाहटिकेॅं दूर कए हमरामे स्फूर्ति आनि देलक।" "पंडित झाक नाटकक पात्र सभ तत्कालमे जे सामाजिक धारा चलि रहल अछि,ओकर धाराक विपरीत परिवर्तन चाहैत अछि।आइसॅं 40 वर्ष पूर्व जे नाटक लिखल गेल,ओहूमे ई भाव छल आ जे नवीनतम कृति (रुक्मणी हरण) छनि ओहूमे अछि।एहि नाटकक जन- बोनिहार यद्यपि अशिक्षित अछि,परंच लिलहा कोठीवलाक अत्याचारसॅं त्राण पएबाक हेतु एक संग भए संघर्ष करैत अछि। ओकरा लोकनिक एकतासॅं समाजमे परिवर्तन अबैत अछि।" "पंडित गोविंद झा ओहन सांस्कृतिक पुरुष छथि जनिक जीवनक समस्त स्नेह- बाती अनुज साहित्यकार- कलाकार लेल छनि।जतेक हिनकासॅं रंग-कर्मीकेॅं भेटलैक अथवा भेटि रहल छैक ओतेक आन-कोनो व्यक्तिसॅं नहिॅं।" गुरुजी रूपमे पं. त्रिलोचन झाक स्मरण करैत प्रेमलता जी कहैत छथि-"सन 1984 -85 मे गुरुजी कोलकाता महानगरी केॅं त्यागि पटनाकेॅं अपन वास- स्थान बनौलनि। हमरा लोकनिक समक्ष एक निर्देशकक रूपमे अयलाह 'चेतना समिति' द्वारा मंचित नाटकक माध्यमे। हुनक कार्यशैलीसॅं सभ कलाकार प्रभावित छल आ संगहि हुनक शिष्यत्व ग्रहण करबाक हेतु उताहुल सेहो।" मैथिली रंगमंचमे नवीन तकनीकक समावेश आ अभिनव प्रस्तुति द्वारा स्तरोन्नयनक संग रंगमंचकेॅं रोजगारक साधन बनयबा लेल आ पछाति पटनामे चेतना समितिक माध्यमसॅं रंगकर्मी लोकनिक मार्गदर्शन लेल प्रेमलता जी पं त्रिलोचन झाकेॅं श्रद्धाक संग म'न पाड़ैत छथि। रंगकर्मी श्रीकांत मंडलकेॅं ओ रंगमंचक सिपाही, अग्रदूत, नेता, अभिनेता, निर्देशक, चिंतक आदि विशेषणक संग म'न पाड़ैत छथि।हुनक असमय देहावसान मैथिली रंगमंचक दुनियांक सभ कलाकारक लेल व्यक्तिगत क्षति छल ई कहैत ओ उमेद रखैत छथि जे हुनक अपूर्ण काज पूरा करबा लेल निस्संदेह कोनो कलाचिन्तककेॅं श्रीकांत जी पठौताह। बालभंगिमाक निर्देशिका प्रमिला जी यद्यपि कहियो अभिनय लेल प्रत्यक्षतः मंच पर नहिॅं अयलीह, मुदा निर्देशन, अनुवाद,रूपसज्जा एवं प्रस्तुतिक लेल सभ टा दायित्व स्वेच्छासॅं वहन करैत ओ एवं अभिनय लेल सभ तरहक सहायता देनिहार हुनक पति श्री नारायण झाक प्रति अपन स्नेह आ कृतज्ञता प्रेमलता सन स्नेहिल व्यक्ति कोना बिसरितथि!खासकए अमैथिलीभाषी बच्चा सभसॅं मैथिली नाटक करयबामे प्रमिलाजीक परिश्रम,लगन आ सतत प्रयास स्मरण योग्य बुझैत छथि आ भंगिमा परिवारकेॅं प्रमिलाजीक ऋणी बुझैत छथि। एकर अतिरिक्त बटुक भाइ,हुनका संग व्यक्तिगत संबंध आ एहने अनेक व्यक्तिक प्रति ओ अपन कृतज्ञता ज्ञापित कएने छथि,जनिकासॅं हुनका  कनियों स्नेह, सम्मान,अवसर वा उपकार भेटलनि। अवश्य अल्पायुमे मातृ-पितृ-विहीन एकटा कन्या पटना सन शहरमे अपनाकेॅं स्थापित कए सकलीह,रंगकर्मकेॅं अपन जीवनक लक्ष्य बना सम्मान पाबि सकलीह,त' बहुत लोकक सहयोग भेटले हेतनि, किन्तु एहि सभ संघर्ष-यात्रामे हुनक आत्मबल, कठिन परिश्रम,अवसरक लाभ उठयबाक शैक्षणिक ओ अभिनयक जन्मजात क्षमताकेॅं नकारल नहिॅं जा सकैछ। हॅं,'ओ दिन ओ पल' लिखि कए ओ अपन व्यक्तित्वक सकारात्मकताक सबल परिचय देने छथि,समाजक प्रतिकूल धारणाक बादो ओहि क्षेत्रमे मजगूतीक संग ठाढ़ हयबाक प्रेरणा सेहो दैत छथि आ अपन जीवनमे सहायक रहल सभ श्रेष्ठ जनक प्रति कृतज्ञतापूर्ण स्वीकारोक्तिसॅं एकटा आदर्श सोझां रखने छथि। एहि संस्मरणकेॅं साहित्यक कसौटी पर कसलासॅं भ' सकैछ किछु जर्किंग अनुभव हो, मुदा हृदयक सहज-सरल भावुक उद्गार रूपमे 'ओ दिन ओ पल' अपन एकटा मानवीय पक्षक संग सबल परिचिति आ सशक्त उपस्थिति देखबैत अछि।एखन एतबहि। आभा झा २५.१०.२०२२ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.मनोज झा- नारी सशक्तिकरण के अग्रदूत, मैथिली नाट्य मंचक पहिल सशक्त महिला रंगकर्मी आओर मैथिली फ़िल्म मे ममता के साक्षात प्रतिमूर्ति डॉ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' मनोज झा

नारी सशक्तिकरण के अग्रदूत, मैथिली नाट्य मंचक पहिल सशक्त महिला रंगकर्मी आओर मैथिली फ़िल्म मे ममता के साक्षात प्रतिमूर्ति डॉ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'

मैथिली नाट्य मंचक पहिल सशक्त महिला रंगकर्मी आ मैथिली, भोजपुरी व हिन्दी फिल्म मे अभिनय केनिहारि प्रेमलता मिश्रक प्रारंभिक जीवन संघर्षपूर्ण रहल अछि। बाल कालहि सऽ हिनक अभिरुचि नाट्य मंच स प्रेरित रहल। हिनक जन्म 29 सितंबर 1948 ई. मे मधुबनी जिला मे प्रखंड मुख्यालय रहिका गामक दछिनवारि टोल मे भेल अछि। हिनक पिताक नाम पंडित दीनानाथ झा आ माता बिन्दा देवी छलीह। हिनक पिता अपना इलाका के विख्यात वैद्य छलाह। हिनका लग दूर दूर स लोक उपचार लेल अबैत छल आ स्वस्थ होइत छल। प्रेमलता अपन माता पिताक असगरे संतान छथि। रहिका गाम तत्समय आ हाल धरि नाटकक मंचन लेल विख्यात रहल अछि। एकरा जन्मभूमिक माटि के गुण कही अथवा विधना द्वारा मैथिली रंगमंचक लेल रचल गेल महिला कलाकारक साक्षात प्रतिमूर्ति। हिनक रंगमंचीय जुड़ाव लगातार बढ़िते गेल। जखन कि हिनका अपन गामहि के स्कूल मे मंच पर उतरबाक विरोध मुखर होइत रहल अछि। विरोधी स्वरक मुखरता के कारणें एक-दू बेर त नाटक के मंचन तक नहि भ सकल।

खैर, पहिलुक स्थापित परंपरा अनुसार बाल कालहि मे 12म बयसि मे हिनक विवाह सीतामढी जिलाक सिरसी गाम मे भेल। हिनक पढाई लिखाई गाम के स्कूल मे भेल। जतय पढ़ि ई मैट्रिक मे फर्स्ट डिवीजन स पास भेलीह। हिनक पतिदेव रहिका के स्कूल मे शिक्षक छलैथ। हिनका परिवार मे तीन टा पुत्र एकटा पुत्री छथिन्ह। हिनक ज्येष्ठ बालक मनमोहन मिश्रा इंटेलिजेंस ब्यूरो मे कार्यरत छथिन्ह। दोसर बालक रवि रंजन मिश्रा आईएलएफएस नामक प्रतिष्ठित फाइनेंस कंपनी मे वाइस प्रेसिडेंट, तेसर बेटी अनुपमा सेहो म्यूजिक मे एमए आ गायन विधा स जुड़ल छथि। एहन बुझना जाइत अछि जे प्रेमलताक जन्म मैथिलीक लेल भेल अछि। रंगमंच स हिनकर जुड़ाव बढिते रहल। विदित हो जे तत्समय मे रंगमंचीय विधा मे अभिनय लेल स्त्री पात्रक घोर अभाव छल। पुरुष सब नारीक भेष मे अभिनय करैत छलाह। एहि खगता आ बेगरता के भरबा लेल प्रेमलता आगां अयलीह।

अपना गाम रहिका मे 'बच्ची दीदी' के नाम स विख्यात प्रेमलता मिश्र अपन अध्यापन कालहि सँ स्वतंत्र विचारक भावना स ओत प्रोत रहलीह। नारी सशक्तिकरण के दिशा मे हिनक अविस्मरणीय योगदान के कखनो नकारल नहि जा सकैत अछि। जाहि समय मे रंगमंच पर लड़की के चढ़नाइ वर्जित छल आ एकरा गलत नजरि स देखल जाइत छल। ओहि समय गाम मे कइएक बेर हिनका विरोधाभास के सामना करय पड़ैत रहलैन। मुदा ई अपन संकल्प पर अडिग रहि अपना अभियान के बल दैत रहलीह। अपन गाम रहिका स्थित यूएनवीन उच्च विद्यालय मे प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ई रंगमंच पर स्त्री पात्र के रुप मे पुरुष वर्ग के अभिनय करैत देखि विचलित होइत छली‌। हिनका मोन मे एकटा टीस उठैत छलैन जे मंच पर स्त्री पात्रक रुप मे कोनो लड़की किएक नहि अबैत अछि। बताबैत चली जे तत्समय रहिका उच्च विद्यालय नाट्य विधाक केन्द्र बिन्दु के रुप मे जानल जाइत छल आ सगरों चर्चित छल। जतय मधुबनी निवासी सर चन्द्रिका प्रसाद सन नाट्य प्रेमी डाइरेक्टर स्कूल के हेड मास्टर के रुप मे मौजूद छलथि। चन्द्रिका बाबू के नाट्य निर्देशक के रुप मे पाबि रहिका गामक संग आसपास इलाका मे सेहो नाट्य विधा के खूब पसार भेल। हिनका एहि विधा मे पारंगत करबा व रंगमंचक प्रेरणा मे चन्द्रिका बाबूक अतुलनीय योगदान रहल अछि।

जीवनक क्रम मे हिनका गॉडफादर के रुप मे मिथिला मैथिलीक अमूल्य धरोहर यात्री नागार्जुन कें सानिध्य भेटल आ हुनके कहला पर 'प्रेम' अपन पति के संग पटना शिफ्ट कयलथि। यात्री जी के छत्रछाया मे हिनकर प्रतिभा मे निखार आबय लागल। जतय किछु दिनक बाद हिनका पति के नौकरी प्रकाशन कार्य मे लागि गेल आ प्रेमलता सेहो पटना के एकटा स्कूल मे शिक्षिका के रुप मे काज करय लगलीह। मुदा हिनक पढ़ाई सेहो अनवरत चलैत रहल। आ ई पीएचडी धरि के डिग्री हासिल कऽ डाक्टर के उपाधि ग्रहण कयलीह। पटना के बांकीपुर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मे मैथिलीक व्याख्याता के रुप मे काज करबाक मौका सेहो हिनका भेटल। जतय स ई अवकाश ग्रहण कयलीह।

कवि नागार्जुन 'यात्री' जी चुंकि हिनक पिताक पिसियौत छलखिन्ह त सहजें प्रेमलता हिनका कक्का जी कहि संबोधित करैत छलीह आ यात्रीजी सेहो हिनकर प्रतिभा स प्रभावित, एकटा बेटीक मुख्य मार्गदर्शक जकां सतत प्रयत्नशील रहैत छलाह। आ एक दिन हिनका बांहि पकड़ने आकाशवाणी लऽ गेलाह आ कहलनि जे आहां एहि ठाम आकाशवाणी मे होबय वला विभिन्न कथा-गोष्ठी, संगोष्ठी, वार्ता, परिचर्चा आदि मे अपन सहभागिता प्रारंभ करु। आ ओतहि स प्रारंभ भेल प्रेमलताक नव जीवन। प्रेमलता आकाशवाणीक कार्यक्रम सभ मे अपन सहभागिता देबय लगलीह। दिनानुदिन हिनक प्रतिभा निखरैत गेल। आकाशवाणी सऽ हिनक जुड़ाव हिनका लेल संजीवनी के काज कयलक आ ओहि ठाम हिनका विभिन्न प्रसारण के संगहि रेडियो मे होबय वला नाटक सभ मे सेहो भाग लेबाक मौका हाथ आबय लागल। तत्समय त आकाशवाणी विभिन्न तरहक कार्यक्रम प्रसारण आदिक केन्द्र बिन्दु मानल जाइत छल, जतय मैथिली रंगमंचीय बड़का नामी गिरामी कलाकार लोकनिक आबा जाही होइत रहैत छल। जतय शनैः शनैः हिनक परिचय आ सम्पर्क बढैत गेल। हुनका सबके सम्पर्क हिनक चेतना समिति स जुड़ाव के मार्ग प्रशस्त कयलक। तदुपरांत हिनका नाट्यमंच आ रंगकर्म सऽ जुड़बाक मौका भेटल। रंगकर्मी लोकनिक सम्पर्क स प्रेमलता अनेरो बहुत रास नाट्य संस्था आदि स जुड़ि गेलीह। तकरा बाद हिनक रंगयात्रा अनवरत चलायमान रहल आ ई अपन किर्ति के पसार करैत अभिनय के छाप छोड़ैत गेलीह। पटना मे मैथिलीक सुदृढ़ चेतना समितिक मंच पर कइएक टा नाटक मे स्त्री पात्रक सजीव मंचन कय खुब प्रशंसा बटोड़लैन। महिला रंगकर्मीक रुप मे ई बहुत रास संस्था सब सं जुड़लथि आ एखनो कोनो ने कोनो रुप मे एहि संस्था सं जुड़ल छथि। वर्तमान मे ई चेतना समिति पटना के उपाध्यक्ष पद पर सेहो निर्वाचित भेल छथि।

रंगमंचक यात्रा के क्रम मे हिनक रविन्द्रनाथ ठाकुर सं भेंट मुलाकात हिनका मुंबई ल गेल। जतय हिनका मैथिली फ़िल्म इतिहासक सफलतम फिल्म 'ममता गाबय गीत' मे अभिनय करबाक मौका हाथ लागल आ हिनका अभिनयक बले फिल्म सफलता प्राप्त कयलक। तकर बाद हिनक फिल्मी अभिनय यात्रा जोर पकड़लक आ ई लगातार हिन्दी आ भोजपुरी फिल्म आदि मे अभिनय करय लगलीह‌। जाहि मे हिन्दी फिल्मक सफलतम नाम प्रकाश झा के फ़िल्म दामूल, कन्यादान, भोजपुरी फ़िल्म 'दूल्हा गंगा पार के' , माटी, 'बबुआ हमार' आ पिंजरे वाली मुनिया आदि फिल्म मे अभिनय केलीह। तकर बहुत दिन बाद बालकृष्णक मैथिली फिल्म 'सस्ता जिनगी महग सेनूर' आ 'ललका पाग' मे सेहो अपन अभिनय के छाप छोड़बा मे सफल भेलीह। एतबे धरि नञि डॉ प्रेमलता डीडी पटनाक प्रसारण धारावाहिक 'पर्व भरा मिथिला' आ 'देहाती दुनिया' मे सेहो अभिनय कऽ प्रशंसित भेल छथि। हालहि मे वर्ल्डवाइड प्रदर्शित राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त एतिहासिक मैथिली फ़िल्म "मिथिला मखान" हिनक जीवनक उत्कृष्ट फिल्म के रुप मे याद कएल जाइत रहत।

रंगमंच आ अभिनय के संग-संग प्रेमलताक नाम मैथिलीक एकटा सुपरिचित साहित्यकारक रुप मे सेहो जानल जाइत अछि। हिनका हाथे मैथिलीक विभिन्न पत्र पत्रिका के सम्पादन सेहो भेल अछि आ एखनो लेखन शील छथि। हिनक रचना विभिन्न पत्र पत्रिका सभ मे प्रकाशित भेल अछि। हिनक प्रकाशित कथा संग्रह 'एगो छली सिनेह' आ 'शेखर प्रसंग' प्रमुख अछि। (शेखर प्रसंग) जे हिनक पीएचडी के विषय सेहो छल। रंगमंच, साहित्य, कला, संस्कृति आ अभिनय लेल बहुत रास सम्मान स सम्मानित डॉ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' मिथिला मैथिलीक अमूल्य धरोहर के रुप मे एखनो अपन क्रियाशीलताक संग हमरा लोकनिक बीच विद्यमान छथि। नव पीढ़ीक लेल आदर्श प्रेमलता मिश्र कें चेतना समिति पटना, मिथिला सांस्कृतिक परिषद कलकत्ता, अखिल मिथिला संघ दिल्ली, विद्यापति सेवा संस्थान दरभंगा, मैथिल समाज रहिका आदि संस्था द्वारा 'मिथिला विभूति' सम्मान देल गेल अछि। एहिके अलावे हिनका 'पाटलिपुत्र सम्मान', 'नूरफातिमा सम्मान' समेत हिन्दी भाषाक कइएक टा प्रतिष्ठित सम्मान स नवाजल जा चुकल अछि। दिल्लीक नाट्य संस्था मैलोरंग द्वारा 'ज्योतिरीश्वर' सम्मान स हिनका सम्मानित कयल गेल अछि। वर्ष 2018 मे मधुबनी के ठाढ़ी गाम मे आयोजित मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल मे तत्कालीन डीएम शीर्षत कपिल अशोक द्वारा हिनका 'भामती स्त्री सम्मान' प्रदान कयल गेल। एतबे नञि डॉ प्रेमलता कें बिहार सरकार द्वारा भिखारी ठाकुर 'राज्यकला सम्मान, मैथिली लोक संस्कृति मंच लहेरियासराय द्वारा मिथिला सेवा 'ताम्र पत्र सम्मान', हिनक 5 दशकऽक नाट्य यात्रा लेल हिनका वर्ष 2019 मे थियेटर वाला नाट्योत्सव द्वारा प्रतिष्ठित नाट्य सम्मान 'अजीत कुमार गांगुली एवार्ड' स सम्मानित कएल गेल।

एकटा 'प्रेम' मे एतेक रास विधाक वास विधनाक अनमोल कृत्य अछि। तत्समय के पुरुष प्रधान समाज मे नारी सशक्तिकरण लेल कएल हिनक त्याग आ योगदान युग युगांतर धरि गुंजैत रहत। निःसंदेह डॉ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' मिथिला मैथिलीक अमूल्य धरोहर छथि। जनिका सहेज क रखबाक अहम जिम्मेदारी हम सब मिथिलावासी के दायित्व अछि। -मनोज झा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, मिथिला लोकतांत्रिक मोर्चा, सम्पर्क - 7701948646 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.प्रेम कान्त चौधरी- डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' : मिथिलाक विलक्षण विदूषी आ प्रेरणात्मक व्यक्तित्व- जेना जनलियैन्ह प्रेम कान्त चौधरी डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम': मिथिलाक विलक्षण विदूषी आ प्रेरणात्मक व्यक्तित्व- जेना जनलियैन्ह चलनिहार संयोगवश पथ पर पिछड़ि खरैछ। सुजन सम्हारथि हाथ धय, दुर्जन देखि हँसैछ॥ उपरका दुनू पाँति डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क 'शेखर-प्रसंग' नामक लिखल किताबक लेखकीय उद्गार मे व्यक्त कयल गेल अछि। अन्तिम दू पाँति मे जीवनक रहस्य छिपल अछि। आइ हऽम जाहि व्यक्तित्वक सन्दर्भ मे किछु कहबाक लेल कलम उठौलहुँ अछि ताहि लेल हम अज्ञानी व्यक्ति छी। मुदा साहस करब आ जोखिम मोल लेनाय हमर काजक क्षेत्र रहल अछि। ताहि सँ नञ हऽम हुनक महान व्यक्तित्व मे समायल शिक्षाक विश्लेषण करब आ नञ हुनक कलाकारक विधा के। आ नञ हुनक विभिन्न संस्था समितिक संगठनात्मक क्षमता केँ। आ नञ हुनक साहित्यिक जीवन यात्राक। आ नञ हुनक पारिवारिक गाछ के विशाल परिवेश के। हम तँ हुनका मे समायल उपर्युक्त सभ तथ्यक आलोक मे हुनक स्नेहिल-आत्मीय संवेदनशील अतुलनीय प्रतिभाक जे प्रेरणात्मक अछि। ताहि पर अपन संस्मरण लिखऽ चाहब। कहऽ चाहब जे डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' केर जन्म 29 सितम्बर, 1948 ई. मे रहिका, जिला मधुबनी, मिथिला, बिहार मे पिता पं. दीनानाथ झा आ माता पूजनीया वृन्दा देवीक सुपुत्रीक रूप मे भेलैन्हि। आरम्भिक शिक्षा गाम मे भेलैन्ह। तत्पश्चात् विवाहोपरान्त सोलह बरख मे पति श्रीमान महेश्वर मिश्र जीक संग पटना आबि गेलीह। ओ जखन विद्यालय मे पढ़ैत छलीह तखने सँ गायन आ अभिनय सँ लोक-समाज परिचित भेल। 1964 ई मे जखन पुरस्कार सँ सम्मानित सँ भेलीह तऽ विद्वत समाज मे अपन भिन्न पहचान बनौलकीह। धीरे-धीरे अपन शिक्षा पूर्ण करबाक क्रम में मैथिली सँ एम.ए. आ एम.एड सेहो कयलीह। राजकीय बालिका विद्यालय, बाकीपुर, पटना सँ व्याख्याता के पद पर सँ अवकाश प्राप्त कयलीह। एम्हर हुनक अभिनय मे अभिरुचि केँ कारण कलाकारक यात्रा से हो चलि रहल छल। लगभग दूइ सय सँ बेसी नाटक, बहुत रास मैथिली, भोजपुरी आ हिन्दी फीचर फिल्म टेलिफिल्म आ धारावाहिक सभ मे सफल अभिनय करैत रहली। आकाशवाणी पटना सँ कथा-वार्ताक वाचनक संगहि रेडियो नाटक मे सेहो हुनक सहभागिता रहलनि। कम्पीयरिंग नैमित्तिक उद्घोषणाक कार्य सेहो करैत रहलीह। हालाँकि प्रेमलता जी केँ यात्री जी (जे हुनक कक्का छलथिन) बड्ड मानैत रहथिन वयैह हुनका आकाशवाणी लऽ जा केँ अधिकारी लोकनि सँ परिचय करौलथिन। डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क साहित्यिक यात्रा मे 'ओ दिन ओ पल' (संस्मरण), 'एगो छलिह सिनेह' (कथा प्रसंग) आ शोधग्रंथ 'शेखर प्रसंग' तऽ उल्लेखनीय अछिए, आ संग-संग संध्या गोष्ठी केँ सम्पादन सेहो अनवरत चलि रहल अछि। डॉ. प्रेमलता जीक पारिवारिक परिवेश सेहो भरल-पुरल अछि। आदरणीय (स्व.) महेश्वर बाबू 2018 ई. मे संग छोड़ि देलखिन ओ बैकुण्ठधामवासी भऽ गेलाह। हम हुनका निधन सँ किछु समय पूर्व पटना गेल रही तऽ हुनक दर्शन कऽ आशीर्वाद प्राप्त कयने रही। जेठ सुपुत्र मनमोहन मिश्र, केन्द्र सरकार मे कार्यरत छथि। दोसर सुुपुत्र रविरंजन मिश्र केन्द्र सरकारक प्रतिष्ठान मे छथि। छोट सुपुत्र सत्यजीत मिश्र छन्हि। सुपुत्री अनुपमा मिश्र आ जमाय डॉ. चन्द्र नाथ मिश्रक संग-संग पौत्र-पौत्री, नातिन सभ सँ भरल-पुरल परिवारिक पृष्ठभूमि छन्हि। डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' जाहि साहित्यिक वातावरण मे पैघ भेलीह ताहि मे अनेको संस्था, समिति सँ सरोकार रहनाय भेनाय स्वाभाविक प्रक्रिया छैक। अपने अनेको संस्था मे अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्षक रूप मे अपन सेवा देलियै। चेतना समिति, पटना, भंगिमा आ अरिपन (नाटक), मैथिली महिला संघ, पटना, बिहार संगीत नाटक अकादमी, पटना, वंदना रानी केन्द्र शामिल अछि। वर्तमान मे पुन: चेतना समितिक उपाध्यक्ष निर्वाचित भेलीह अछि। डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' जाहि सांस्कृतिक संसार सँ अपन सरोकर रखलैथ अछि ताहि मे बहुतरास सँ सम्मानित भेनाय स्वभाविक छैक। ओ सभ संस्था समिति धन्य भेल जे अपनेक सम्मानित कयलक अछि। जाहि मे- चेतना समिति- पटना, अरिपन- पटना, मिथिला विकास परिषद- कलकत्ता, अखिल भारतीय मिथिला संघ- दिल्ली, बिहार आर्ट थियेटर-पटना, प्रांगण- पटना, विद्यापति सेवा संस्थान- दरिभंगा, मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति- गुवाहाटी, असम, मिथिला सांस्कृतिक संगम- प्रयाग, भारतीय छात्र संगठन-पटना, बिहार आ पटना रोटरी क्लब शामिल अछि। डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' केँ जेना हम देखलियैन्ह चिन्हलियैन्ह आ आशीर्वाद भेटल ओ सभ बात बीच मे मोन पड़ैत अछि। ओ गृहलक्ष्मी, शिक्षिका, मैथिली-भोजपुरी-हिन्दी रंगमंच, सिनेमाक माँजल कलाकार छथि, जे विश्व पटल पर अंकित अछि। ओ स्वयं मे अद्भुत अतुलनीय सशक्त साहित्य-संस्कार संस्कृतिक धरोहर छथि। विलक्षण प्रतिभाक चिरस्मरणीय विदूषी स्वर्ण हस्ताक्षर छथि। ओ हमरा इ कहबा मे कनियो असौकर्य नहि कि, ओ सम्पूर्ण मिथिलाक स्वर्णिम हस्ताक्षर छथि। हुनका लेल कहल जा सकैछ अछि जे- 'को नहि जानत है जग मेें कपी संकट मोचन नाम तिहारो'। ओ मिथिलाक ललना लेल- भूत, वर्तमान आ भविष्यक प्रेरणाक स्रोत छथि। 1976 ई. मे जखन हम पटना आगु के पढ़ाई लेल आयल रही तखन राजेन्द्र नगर पटना के राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मे नामांकन भेल छल। पहिल बेर 1977 ई. मे चेतना समितिक 'विद्यापति स्मृति पर्व समारोह' देखने रही। जे हार्डिंग पार्क मे भेल छऽल। देखने रही रवीन्द्र जी-महेन्द्र जीक जोड़ी मायानन्द बाबूक तिजोरी, तेसर दिन नाटक। समय बीतैत गेल हमहूँ हाई स्कूल आ कॉलेज सँ अपन पढ़ाई पुरा कयलहुँ। अनेको विद्वान लोकनि केँ दूर सॅँ देखैत रहलहुँ। डॉ. प्रेमलता मिश्र सँ पहिलबेर नजदीक सँ हमर साक्षात् 2001 ई. मे चेतना समितिक सपत्नी आजीवन सदस्य बनलाक बाद भेल, कियैक कि नौकरी-चाकरी के चक्कर मे पटना-गुवाहाटी करैत छलहुँ। मुदा 2001 सँ 2005 ई के अगस्त धरि पटना मे रहबाक कारणे चेतना समितिक कार्यालय मे समय-समय पर गेनाय रहैत छल। जाहि ठाम मैथिली-मैथिल विद्वत मंडली सँ भेट-घाँट भेनाय आम बात छल। ओहि समय मे डॉ. प्रेमलता मिश्र जी सँ भेट-घाँट भेल। हुनकर व्यक्तित्व सँ एतेक प्रभावित भेलहुँ कि की कहू? सदैव स्नेहाशीष सँ हऽम लाभान्वित रहलहुँ। हुनक एतेक आशीर्वाद रहैत छल जे कहियो काल बेली रोड घर पर आबि जाथि। कल्पना (हमर धर्मपत्नी) के सेहो स्नेहाशीष दैत रहलथीन। हमहु हुनक निवास स्थान पर कतेको बेर गेल होयब। अहि प्रकारेँ जखन 2005 के अगस्त मे हम सभ पुन: पटना सँ गुवाहाटी आबि गेलहुँ तखनो प्रेमलता जीक आशीर्वाद भेटैत रहल। कोनो एहन अपना सभक पावन-तिहार नहि बीतल, जाहि मे हुनकर फोन नहि आयल होय, चाहे कल्पनाक मोबाइल पर वा हमरा पर। खास कऽ के जखन हमर अध्यक्षता काल मे मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति विद्यापति स्मृति पर्व समारोह 2012 ई. के दिसम्बर मास मे मुख्य अतिथिक रूप मे मंच पर ओ विराजमान भेलीह। तखन मिथिलाक समस्त पूर्वोत्तर मे रहनियार मैथिलजन हुनका लग सँ देखि सकलाह। समाजक बहुत लोक सभ हमरा धन्यवाद ज्ञापित कयलाह, जे ऐहन विलक्षण व्यक्तित्व सँ भेेट भेलन्हि आ करीब सँ देख सकलैथ। गुवाहाटी आगमनक हुनकर पहिल शर्त छऽल कि हम होटल मे नहि रहब- ओ कहली हमरा होटल मे नीक नहि लगैत अछि, हऽम तँ अहिँक घऽर मे कल्पना संग रहब। हम स्वीकार कऽ लेनय रही। हमरा सभक भाग्य जे ओ तीन दिन धरि कार्यक्रमक बाद घऽर मे संगेहि छलीह। दोसर बेर सेहो 2014 मे पैघ सुपुत्र मनमोहन जी केँ संग गुवाहाटी आयल छलीह। आबै सँ पहिने पटना सँ हमरा फोन कयलीह जे हम नवम्बर मे गुवाहाटी आबि रहल छी। मनमोहन बाबू तँ होटल मे रहताह, मुदा हऽम तँ होटल मे नहि रहब। हम आग्रह आ निवेदन कैलियैन्ह जे अहाँक घऽर तऽ गुवाहाटी मे अछिये, अहाँ होटल में कियाक रहब। फेर हऽम सम्मानपूर्वक घऽर अनलियैन्ह। दू दिनक प्रवास मे हऽम दुनू प्राणी फेर एकबेर हुनक सान्निध्य सँ लाभान्वित भेलहुँ। सच कहि त जखन पहिल बेर हमरा भेट भेल छलीह तखने हमरा लागल जे हमर जेठ बहिन मुद्रिका के आभास भेल छल। अन्तर खाली लम्बाई मे छल। हम सभ भाय-बहिन कनी लम्बे-लम्बे छी। जेठ बहिनक छवि देख हमरा बड्ड नीक लागल आ आत्मीयसुख भेटल। अत: प्रेमलता जी केँ हम अन्त:मन सँ पैघ बहिन मानैत छियैन्ह। मुदा कल्पना तँ 2012 मे हुनकर गुवाहाटी प्रवासक समय अपन सम्बन्ध फरिया लेनय छलीह- दीदी कहि कऽ। ओना मिथिला मे तँ 'दीदी' के मतलब पिताक बहिन भेल। मुदा बंगाल मे 'दीदी' के मतलब पैघ बहिन भेल। कल्पनाक नेनपन बंगाली बहुल क्षेत्र मे बीतल अछि ताहि दुआरे 'दीदी' वला बात फरिछौत कऽ लेलथि। हऽम तँ बेसी समय पहिने सँ पटना मे रहल छी तैँ ओतहु सभ बड़की बहिन केँ 'दीदी' कहैत अछि। सार्वजनिक रूप सँ हमहुँ पैघ बहिनक उत्तरदायित्व आब सँ हुनके देलियैन्ह। अंग्रेजी मे कहल जायत अछि- 'लिविंग लिजेंड' से छथि हमरा सभक लेल डॉ. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'। सादगी पूर्ण जीवन, उच्च विचार, सात्विक व्यवहार, चिर-स्मरणीय कलाकार, अनुपम-अनमोल धरोहर! -प्रेम कान्त चौधरी, मो. : 7002605261 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१६.कमलेंद्र झा 'कमल'- मिथिलापुत्री कमलेंद्र झा 'कमल' मिथिलापुत्री

जिनकर तन-मनमे मिथिलांचल कमला-कोसी नयन विशेष! मुट्ठीमे आकाश भरल हो आँचरमे धन-धान्य अशेष!!

मस्तक हो उत्तुंग हिमालय पदतलमे बंगालक वेश! अंतर्तम चर-चाँचर विस्तृत भाव भरल लोरिक सलहेस!!

श्वास तथा प्रश्वास मलययुत दृष्टि प्रभात-साँझ अवशेष! वाणी सीताराम समर्पित आठो याम उमाशैलेश!!

ई केयो नहि आन---सभक प्रिय प्रेमलता दीदी भावेश 'कमल' अकिंचन 'मिथिलापुत्री' नमन,समर्पण काव्य-सनेस!!

-कमलेंद्र झा 'कमल', दिनांक २९/१०/२२ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१७.लक्ष्मण झा सागर- प्रेमलता बहिन लक्ष्मण झा सागर प्रेमलता बहिन सही मे अपन बहिन जेकाँ वा कही तऽ ताहू सं पैघ जं कोनो सहोदरा सम्बन्ध होइ छै से छथि हमरा लोकनिक आदरनिया जेठकी बहिनदाइ डा प्रेमलता मिश्र प्रेम। से हमरे टा नै।मैथिली साहित्य संसारक हमरा सन कतेको लोकक दीदी बनलि छथि प्रेमलता जी। असल मे अपन माए बापक एकसरि संतान छथि प्रेमलता दीदी। तेँ अपने कहैत छथिन जे हम एकसरि नै छी। सम्पूर्ण मैथिलीक साहित्यकार के अपन भाय बहिन कहैत छथिन। आ से जे बात छियै सब गोटे हिनका तहिना स्नेह आ सम्मान दैत छनि। हिनक जन्म २९.९.१९४८ ई के भेल छलनि दरभंगा जिलाक रहिका गाम मे। कहि सकैत छी जे स्वतन्त्र देश भारत मे। पिताक नाम रहनि दीनानाथ झा जिनका लोक सभ वैद्य जी कहनि। मायक नाम रहनि वृन्दा देवी। माय हिनक नीक कुल शीलक लोक रहथिन। नेने सं शास्त्रीय संगीत मे रूचि रहनि। हिनक माम चण्डेश्वर खाँ के इलाका मे सब चिन्हैत रहनि। नीक चलता पुर्जा वाला लोक आ दस उपकारी रहथिन। माताराम ताहि जमानाक मिडिल पास रहथिन। संस्कृत परहैत आ अलजेब्रा बनाबैत अपन माय के देखने रहथि प्रेमलता जी। हिनक वियाह १२ बर्खक उमेर मे माहेश्वर मिश्र जी सं भेल रहनि। सासुर रहनि सीतामरही लग सीरसी प्रखंड क नामपुर गाम। हिनकर वियाहक खेरहा बर रोचक अछि। सभागाछी सं वियाह भेल रहनि। वियाहक कोनो पूर्व सूचना हिनका नै रहनि। बारह बरखक वयस कोनो वियाहक थोड़बे होइत छलैक। ई अपन गामेक ईसकुल मे लिखाइ परहाइ करैत छलीह। सांझ भरली आने दिन जेकाँ खाय पी के सुति रहल छलीह। सुतली राति मे हिनका जगौल गेल। आ गीत नादक संग बेदी गारि के पण्डित के बजाय के हिनक वियाह भऽ गेल रहनि। ने बरियाती ने सरियाती ने कोनो शहनाइ आ ने कोनो शोभा सुन्नर। वियाहक साले भरिक बाद प्रेमलता जीक जिनगी मे एकटा बरका अन्हर बिहारि आयल। माय आ बाप दुनू गोटे हिनका छोरि ऊपर चल गेलखिन। गामक लोक कहैक जे प्रेम के वियाहे दुआरे माय बाप जीबैत छलखिन। तहन तऽ बेचारी प्रेम लता जेकाँ मिसरजी संग लिपैट गेल रहथि। बोलो भरोस दै वाला लोक अपन कियो नै छलनि। सगर तलाब मे एसगर ईचना मांछ बनलि छलीह। अपन भागे आ माय बापक आशीर्बाद सं हाथ पकरिनिहार  मिसर जी आ सासु ससुर धरि बर नीक भेटलखिन जे हिनका कहियो कोनो वस्तु वा बातक तकलीफ नै हुअय देलखिन। प्रेमलता जी पर मायक संस्कारक असरि भेलनि। नेने सं हिनक सोच विचार आ क्रिया कलाप प्रगति गामी होइत रहल।हिनका जिनगी मे किछु नीक काज करबाक अभिलाषा जागल रहलनि। जहन लोक अपन धि बेटी के घर सं बाहर एकसरि नै निकलय दैत छल ताहि समय मे प्रेमलता जी नाटक के रिहर्सल करैक लेल एकसरि बाहर जाइत रहलीह। आ एकटा समय एलैक जहन प्रेमलता मिश्र प्रेम एहन पहिल मैथिल महिला भेलीह जे नाटक मे स्त्रीक भूमिका करय लगलीह। से एक नै अनेको। आब तऽ चलचित्र मे सेहो मायक भूमिका मे रहय लगलीह अछि। आइ जे हमरा सभक बीच मैथिलानी रङकर्मीक एकटा बरका फौज तैयार भेलीह अछि तिनका सभक जरि मे कोनो मे कोनो रूपमे प्रेमलता मिश्र प्रेमक योगदान अछि से बात किनको सं छपित नै अछि। मुदा, एतबी हिनक परिचय नै अछि।पटना मे रहि के नाटको करै छलीह आ परहाइ सेहो जारी रहलनि। एम ए केलनि। पी एच डी केलनि। डा प्रेमलता मिश्र प्रेम भऽ गेलीह। तहिया बांकीपुर वालिका उच्च विद्यालय पटना नगर निगम के अधीन छल।बाद मे बिहार सरकारक अधीन भऽ गेल। तै ईस्कुल मे  शिक्षिका बनलि नोकरी केलनि। फेर लेक्चरर भेलीह। ४० बरख ईस्कुल कौलेज मे अपन सेवा दैत २००८ ई क सितम्बर मे अवकाश ग्रहण केलनि। नोकरी मे छलीहे तखने सं यात्री जीक (कक्का कहैत छलीह) कहला पर पटना आकाशवाणी मे अपन कार्यक्रम करैत छलीह। वटुक भाइ सं तहिये सं सम्पर्क रहय लागल छलनि। वटुक भाइ सेहो नाटक के लोक। दुनू गोटे नोकरीयो करथि आ नाटको खेलाइथ। नाट्य संस्था (अरिपन आ भंगिमा) क कोनो नाटकक आयोजन होइक त वटुक भाइ आ प्रेमलता जी पूर्ण रूपेँ सक्रिय रहैत छलीह। से समय प्रेमलता जीक रङकर्मीय जीवनक स्वर्णिम काल छल। अपन सब रङ्कर्मी भाइ बन्धु संग हिनक आत्मिक लगाव रहलनि सभ दिन। सब गोटे हिनका मानितो तहिना रहनि। रङकर्मक नव तुरक ई मेंटर बनलि छथि। मैथिली रङकर्मक कोनो इतिहास हिनका छोरि के अधुरा अछि आ रहत। अपन अवकाश ग्रहण के समीप अबैत देखि हिनका मोन मे एकटा विचार अयलनि जे आब घर पर बैसि कोना समय बीतत। प्रेमलता जी अपन एकटा सुझाव वटुक भाइ, रामानंद झा रमण आ अजित आजाद जी सं शेयर केलनि जे मास मे हमरा लोकनि एक ठाम बैसै जाइ। आपसी कुशल क्षेम हो। साहित्यिक चर्च वर्च हो। सब गोटे अपन टटका रचना आनी। पाठ करी। ताहि पर विचार हो। विमर्श हो। बात सब गोटे कें जंचि गेलनि। बात रहल जे कतय बैसी। प्रेमलता जी अपना घर पर ले बैसार गछि लेलखिन। आ तकर बाद हुनका घर पर सब गोटे मास मे एक दिन के सांझू पहर गोष्ठी करय जाय लगलाह। ई क्रम एखनो जारी अछि। एहि गोष्ठी मे मैथिली सं बेसी आब हिन्दीक साहित्यकार सब आबय लगलाह अछि। कालक्रमे एकटा आर नव आ नीक बात सबहक सोंझा आयल। निर्णय भेल जे कियैक ने साल मे एकटा पत्रिका निकालल जाय। सत्रह अप्रैल २००८ जूरि शीतल दिन सं सांध्य गोष्ठी नामक पत्रिका प्रेमलता मिश्र प्रेम जीक संपादन मे पटना सं निकलय लागल जे अध्यावधि निकलि रहल अछि। एहि पत्रिकाक प्रत्येक अंक महत्वपूर्ण त अछिये जे लोक सभ धराऊ जेकाँ सब अंक सहेजि के अपन अपन घर मे रखैत छथि।ई अपना आप मे प्रेमलता मिश्र प्रेम जीके एक कुशल आ प्रखर संपादिका  हेबाक पुष्टि करैत अछि। हिनका जीवन मे ११.८.२०१८ एकटा कारी स्याह दिन बनि के आयल। अही दिन हिनका सीथक सिनुर मेटायल गेल। हाथक चूरी फोरल गेल। अपन तीन टा बेटा आ एकटा बेटीक संग हिनका छोड़ि के मिसर जी ततेक दूर चलि गेलाह जतय सं कियो आपस नै अबैत अछि। तहन त दुनियाँक जे रीति छै से हिनको मानि के संतोख करय पड़लनि। आब त अपनो जीवनक अमृत महोत्सव के नजदीक आबिये गेलीह अछि। मैथिलीक नाट्य संसार हिनक कृत्य सं हिनका माथ पर रखने छनि। एहेन सम्मान बर कम्मे लोक के नशीब होइ छै, से हिनका भेल छनि आ ताहि सम्मान सब सं प्रेमलता जी जीविते किम्बदन्ती बनि गेल छथि। हमरा हिनका सं पहिल भेंट आ परिचय पात मित्रवर कुणाल जी करेने छथि पटनाक विद्यापति भवन मे १९८६ ई मे। हम सपरिवार असाम सं गाम अबैत काल पटना मे यात्रा के तोरैत सांझ मे विद्यापति भवन देखय गेल रही। ओही ठाम भेंट भेल छल। हमर सार ब्रह्मानन्द सेहो संग मे रहथि। मात्र परिचय टा भेल छल। कोनो गप सप नै। गप सप भेल कोलकाता मे गिरीश पार्क वाला बैजू जीक कार्यक्रम मे। रामलोचन ठाकुर जी, प्रेमलता जी आ हम खूब नीक जेकाँ बरी काल धरि बतियाइत रहलौं। तकर बाद भेंट अछि मधुबनी मे २०१७ ई मे दिलीप कुमार झा जीक कार्यक्रम मे जाहि मे हमरा सम्मानित कैल गेल। अंतिम भेंट अछि कोलकाता मे वटुक भाइ संगे एकटा कार्यक्रम मे आयल छलीह। मुदा, सम्बन्ध मे जे प्रगाढ़ता हेबाक चाही से भेल रामलोचन ठाकुर जीक निखोज भेला पर। प्रत्येक दिन फोन करैत रहैत छलीह। ठाकुर जीक बारे मे अपडेट लैत छलीह। हम अनुभव कैल जे प्रेमलता जी ठाकुर जीकें बर मानैत छलीह। जहिया ठाकुर जीक देहांतक सूचना भेटलनि तहिया जे फोन पर हुनक विलाप सुनल से कहल नै जाय सकैत अछि। ठाकुर जी सेहो नाटक के लोक छलाह। तेँ हुनका सं भैयारी सम्बन्ध रहनि। हम देखल अछि आ अनुभव कैल अछि जे प्रेमलता मिश्र प्रेम एक असाधारण महिला छथि। अपन भू भाषाक लेल पूर्ण रूपेँ समर्पित छथि। एखनो कोनो नाटक आ सिनेमा लेल ककरो नै नहि कहैत छथिन। बहुत सरल, सहज आ मिलनसारि स्वभाव छनि। घमंड तऽ एक पाइ नै छनि। धिया पुता सब सैतल आ सुर्हियायल छनि। हाले मे चेतना समिति, पटना के उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित भेलीह अछि। माँ मैथिली हुनका दीर्घायु राखथि! अंत मे हम विदेह परिवारक समस्त टीम कें विशेष रूपेँ आयुष्मान आशीष अनचिन्हार जीक प्रति कृतज्ञ छी जे हमरा मिथिलाक एहेन स्वयं प्रभा पर लिखबाक लेल उपयुक्त बुझलनि। आ हम चेष्टा कैल अछि जे अपन बिषय पर केन्द्रित रहैत विदेहक पाठक कें किछु नव जानकारी भेटनु। -लक्ष्मण झा सागर, कोलकाता/ २९.१०.२०२२ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क बहन्ने गजेन्द्र ठाकुर प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क बहन्ने बहुत पुरान गप्प। पटनामे स्कूलक संगी सभ मैथिली भाषीकेँ सांस्कृतिक रूपमे श्रेष्ठ हएब मानि गेल छल। मिथिला चित्रकला बा सिक्की-मौनीक कारण नै। हम पुछने रहियै- "से की भेलौ अनचोक्के?" ओ मगही भाषी छल, उत्तर देलक- "पटनामे तोरा सभक कार्यक्रम गेल रही, कुमारि, बियाहल महिला सभ मंचपर सांस्कृतिक कार्यक्रम आ नाटकमे भाग लऽ रहल छली। तूँ सभ बड्ड एडवान्स छेँ।" ओ कोनो मैथिलीक पर्व समारोह गेल छल आ नीलम चौधरीक नृत्य देखने छल आ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क अभिनय सेहो। कतेक मुश्किलसँ महिला मंचपर जाइ छथि आ आंगुरपर गानल जा सकैत छथि, ऐसँ ओकरा कोनो मतलब नै रहै, ओ हमरा सभकेँ एडवांस मानि लेने छल। हमहूँ कएक बेर ऐ समारोह सभमे गेल रही, प्रायः १३ बर्ख आ २१ बर्खक बीचक उमेरमे। आ एक्सपर्ट कमेण्ट सुनैत रही। "ऐं यौ, पर्दा कहाँ छै, कोठियामे अरुण बाबू सभजे नाटक खेलाइ छथि ओइमे तँ रङ-बिरङक पर्दा रहै छै।" "बाबू कुणाल डाइरेक्टर छथि, खाली प्रकाश आ अन्हारक प्रयोगसँ सीन बदलै छथि। नाटकक बड्ड जानकार, हुनकर मानब छन्हि जे पर्दाक प्रयोग भेल नै आकि नाटक आधुनिक नै कहाओत।" "आ बीच-बीचमे कॉमिक?" "से सभ किछु नै, कुणालक नजरिमे ओ सभ नकली नाटक भेल।" तखने लाइट चलि गेलै, मुदा पेट्रोमेक्स तैयार आ अक्कूक कॉमिक लाल आ हरियर सिन्दूरबला हास्य-कणिका जइ महिलाक पति प्रायः रेलवेमे छलै, से शुरुह भेल, बीचेमे। "पहिल दिन नै एलौं?" "पहिल दिन कोनो काजक कार्यक्रम नै होइ छै, धोइध बला सभक भाषण आ सड़ल-पाकल कविता के सुनत?" मुदा सोङरपर ठाढ़ कएल गेल छै ऐ नाट्य-संस्था आ समारोह सभकेँ, साहित्योकेँ, तइसँ हमर संगीकेँ कोनो मतलब नै रहै। कानक सुनलपर ओ विश्वास करत आकि आँखिक देखलपर। मैथिलीक साहित्य उन्नत, ओतऽ महिला मंचपर अबैत छथि, प्रवासी मैथिलमे एकता छै तेँ नेँ। एक्के जाति छै तेँ की, दोसर जातिक पात्र तँ नाटकमे छैहे किने? थोपड़ी ओकरे देखि कऽ तँ पड़ै छै, भले अपमानित करैबला डाइलोग घोसिया कऽ। २००९ ई. क कोनो दिन। एकटा फोन आयल- "हमर नाम छी छत्रानन्द सिंह झा, नै चिन्हने हएब, हमरा लोक बटुक भाइ कहै छथि।" "हम छत्रानन्द सिंह झा नामसँ अहाँकेँ बेशी चिन्है छी। ओइ समय 'भारती' कार्यक्रम आकाशवाणी पटनासँ होइ छलै, साढ़े पाँच बजे साँझसँ ६ बजे साँझ धरि। बृहस्पति आ रवि दिन। दिनो हमरा मोन अछि, कारण चितकोहड़ामे हाट लगै छलै ओही दू दिन, से तरकारी किनै लऽ हम दुनू भाँइ जाइत रही झटकारि कऽ, जे साढ़े पाँच बजे धरि घुरि कऽ आबि जाइ। आ ओइ कार्यक्रममे अहाँक नाम बटुक भाइ कहियो नै छल।" "हम प्रेमलताजीक डेरापर छी, कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल शुभकामना आ लिअ प्रेमलता जी सेहो गप करती।" प्रेमलता जी सेहो शुभकामना देलन्हि। मंत्रेश्वर झा जी समय-साल मे हमर बिनु नाम लेने एकटा व्यंग्य लिखलन्हि, जे एक गोटेक पञ्जीपर मोटका किताब आयल छन्हि, आ ओ पञ्जी आधारित व्यवस्थाक पुनः उद्धार करऽ चाहैत छथि। पढ़ि कऽ ओ लिखैत छथि, तखन किए ओ से लिखलनि? मुदा जखन पहिले अध्याय (प्राक्कथन)क दूषण पञ्जीक चर्च आ ओइमे नव्य-न्यायक जनक गंगेश उपाध्यायक पिता मृत्युक ५ साल बाद जन्म आ चर्मकारिणीक विवाह सहित मारते रास विवरणक चर्च शुरू भेल आ हम ईहो खुलासा केलौं जे केना रमानाथ झा ऐ विवरणकेँ "हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिला"क लेखकसँ झूठ बाजि नुकेने छला, हुनका सहित सभ गोटे गुमकी लाधि देलनि, कारण पञ्जीक पोथीक आरम्भिक विरोधक असल कारण सोझाँ आबि गेल। विदेह आगाँ बढ़ैत गेल, आ साहित्य अकादेमी सहित ओकर फण्डिंगबला एसोसियेशन/ संस्था सभ सोङ्गरेपर ठाढ़ रहल, हुकहुकाइत, मुदा ऐँठ-ऐँठ कऽ बजैत। हमरामे कमी अछि जे हम कोनो सभा-संस्थामे कम जाइ छी, मुदा २०१२ मे एकटा साहित्य-अकादेमी फण्डेड कार्यक्रमक बाद हमरा ई अनुभव भेल जे हुकहुकाइत संस्था सभमे सुधारक एकोरत्ती सम्भावना नै छै, आ मोटामोटी ई सभ हमरा आ विदेहसँ घृणा करैत अछि। ओहुनो हम कम्मे जाइ छलौं, से बन्दे कऽ देलिऐ। फोन अखनो अबैत रहैत अछि, कवि सम्मेलन लेल, सेमीनार लेल, वेबीनार लेल, हम मना करैत छियन्हि (एतऽ धरि जे फेसबुकोपर फ्रेण्ड आ ग्रुपमे जखन हम मना करैत छियन्हि तखनो) आ ओ सभ ऐ लऽ कऽ उनटा-पुनटा बाजै छथि हमरा विषयमे, सभ नै किछु गोटे। हमर तँ एक्केटा शर्त अछि, मनुक्ख बनि जाउ आ हम अपन स्वाभावक विपरीतो आयब, ओना स्वभावक अनुसार हम ऐ सभ स्थानमे कम आबै जाइ-छी। मनुक्ख केना बनी पहिने साहित्य अकादेमी प्रसंग। किछु गोटे लिखने छला जे साहित्य अकादेमी हमरा आ विदेहकेँ मोजर नै दैत अछि तेँ हम सभ ओकर विरोध करै छी। से स्पष्ट भऽ गेल जे ओ सभ मोजर दै छथि आ विरोधक कारण अछि चोर-साहित्यकारकेँ, जकरा विदेह बैन कऽ देलक, तकरा साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक परामर्शदात्री सदस्य जातिक कारण बनेनाइ, ओइ जातिक जकर ऐ अकादेमीक मैथिली विभागपर एकछत्र राज्य छै, जकरा द्वारा मान्यताप्राप्त सातो लिटेरेरी एसोसियेशन ओही जातिक लोकक छै, जकर अनुवादसँ लऽ कऽ सभ असाइनमेण्ट दोसर जातिक लेल प्राप्त करब असम्भवे छै, जकर नाटक-निबन्ध-कथासँ लऽ कऽ सभटा संकलनमे एक्के जातिक ९९% रचना छै (ओना ई सभ गोदाममे सड़बा लेल छापल जाइ छै)। साहित्य अकादेमीमे मैथिलीक प्रवेश लेल कोनो संस्थाक कोनो योगदान नै छै, ई एकमात्र जयकान्त मिश्रक व्यक्तिगत प्रयाससँ सम्भव भेल, आ तेँ ओकर कोनो फाएदा मैथिलीभाषीकेँ नै भेलै। एक जातिक किछु लोक पचास हजार- लाख टाकाक अनुवाद असाइनमेण्ट लैत छथि, आ ओहीपर हुनका अनुवाद पुरस्कार सेहो भेटि जाइ छन्हि से पचास हजार टाका आर। भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूचीमे मैथिलीक प्रवेश हुअय बा विकीपीडियामे मैथिली बा गूगल ट्रान्सलेटमे मैथिली बा तिरहुता आ कैथीक यूनीकोड, मूलधाराक कोनो संस्थाक कोनो योगदान ऐमे नै छै। भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूचीमे मैथिलीक प्रवेश केना भेल तकर अभिलेखन हमर अंग्रेजी पोथी "A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE" मे कएल जा रहल अछि। हँ ऐ संस्था आ लोक सभसँ गूगल डेरा गेलै, विकीपीडिया डेरा गेलै आ भारत सरकार डेरा गेलै से फेसबुकपर पढ़बामे आबि जाएत। ओना जकरा बुते माछीयो नै मरै छै तकरासँ के डरतै? एकटा बात सेहो स्पष्ट हेबाक चाही जे मैथिली लेल विद्यापति पर्वसँ बेशी महत्व दुर्गापूजाक छै, एक तँ विद्यापति पर्वक जतेक प्रचार कएल जाइ छै अखबारमे से एकर लोकप्रियताक द्योतक नै अछि, ई मात्र एकर कर्ता-धर्ताक मीडियापर कब्जाकेँ देखबैत अछि। दोसर मात्र नाटक आ कुञ्जबिहारी लऽ कऽ दसटा लोक जुटै छै, नाटक बहुत ठामसँ निपत्ते छै। तेसर ऐमे जनसहयोग लगभग शून्य छै, आ एकर स्वरूप सेहो साहित्य अकादेमी सन छै बा एकरा सन साहित्य अकादेमीक छै, आ दुनू समाजमे कट्टरता पसारि रहल अछि। दुर्गापूजा गामे-गाम होइ छै, लोकक सहभागिता रहै छै, सांस्कृतिक कार्यक्रम नाच आदि क माध्यमसँ ई समाजक सभ अंग आ महिला-पुरुषकेँ जोड़ने अछि, ई विद्यापति पर्व आ साहित्य अकादेमी आ ओकर संपोषित संस्था सभ द्वारा पसारल जा रहल घृणाकेँ न्यूट्रल करैत अछि आ तइसँ आगाँ समरसता पसारैत अछि। ई जानकारी विद्यापति पर्वक आयोजनकर्ता लेल अछि जे फाँड़ बान्हि कऽ कहने फिरै छथि जे दोसर जातिमे औकाति छै तँ ओहो अप्पन नायकपर पर्व करय। एतऽ स्पष्ट कऽ दी जे विद्यापतिक जे फोटो ऐ संस्था सभ द्वारा प्रस्तुत कएल जा रहल अछि सएह त्रुटिपूर्ण अछि। संगहि ओ लोकनि अवहट्ठ आ संस्कृतबला विद्यापतिकेँ कविकोकिल विद्यापतिक रूपमे असफल रूपेँ ढोल बजा-बजा कऽ प्रस्तुत कऽ रहल छथि। तँ की चारू कात अन्हार अछि? नै, नै तँ प्रेममोहन मिश्र किए साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक परामर्शदात्रीक पदसँ त्यागपत्र दइतथि। कॉलेज सभक कटऑफ देखबै तँ सभसँ कम हिन्दी आ मैथिलीक कटऑफ भेटत, आ ओइ परामर्शदात्री समितिमे वएह सभ सहसह करैत छथि। आ जतऽ साँप सहसह करत ओतऽ मनुक्ख केना रहि सकैए। से रसायन विज्ञानी  प्रेममोहन मिश्र त्यागपत्र दऽ देलन्हि। सहसह करैत साँपक बीच मनुक्ख केना बनी प्रेमलता जीक तीनटा पोथीक समीक्षासँ पूर्व हुनकर सहसह करैत साँपक बीच हथियार छोड़ि देबाक चर्च करब आवश्यक। कारण ई अंक प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक अछि, अभिनन्दन ग्रंथ नै। प्रेमलता जी कलाकार छथि, महिला कलाकार छथि, उच्च जातिक महिला कलाकार छथि। हमरा आशा छल जे ओ कलाकार रहितथि, सुच्चा कलाकार, बेशीसँ बेशी महिला कलाकार। मुदा परीक्षा काल ओ नै कलाकारे रहि सकली नहिये महिला कलाकार। भऽ गेली मात्र एकटा षडयंत्रक शिकार, जतऽ हुनका अपन महिला होयबाक आइडेण्टिटी आ अपन कलाकार होयबाक आइडेण्टिटी दुनू त्यागऽ पड़लन्हि। घटना साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार २०२२, तीनटा जूरी रहथि, दूटा पुरुष (केष्कर ठाकुर आ राजन कुमार सिंह) आ एकटा महिला (प्रेमलता मिश्र 'प्रेम')। मुन्नी कामतक कविता संग्रह "अंततः", मुन्नी कामत- जिन्दगीक मोलक लेखिका आ असली फेमिनिज्मक कविता लिखनिहारि। ने रचनाक गुणवत्ता ने फेमिनिज्मक कोनो महत्व, मात्र जाति भारी पड़ल, ऐ पोथीकेँ केष्कर ठाकुर आ राजन कुमार सिंहक तँ छोड़ू प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क सेहो वोट नै भेटलै। सभकेँ दाम चुकाबऽ पड़ै छै, साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यताप्राप्त कथित लिटेरेरी एसोसियेशनक उपाध्यक्ष बनबाक दाम चुकेलन्हि प्रेमलता मिश्र 'प्रेम', नै अड़ि सकलीह, अपन वोट अप्पन होइ छै, मुदा हिनकर वोट पुरुष बहुमतक, जाति बहुमतक संग चलि गेल। शेखर प्रसंग, ओ दिन ओ पल आ एहो छली सिनेह शेखर-प्रसंग 'सुधांशु शेखर चौधरी' पर हुनकर शोधक आधारपर रचित पोथी अछि। 'ओ दिन ओ पल' आत्मकथा होइत-होइत बचि गेल अछि आ ई अछि संस्मरण संग्रह। 'एगो छली सिनेह' अछि कथा-संग्रह जकर किछु कथा हमरा आश्चर्यचकित केलक। शेखर प्रसंग शेखर-प्रसंग 'सुधांशु शेखर चौधरी' प्रसिद्ध सम्पादकजी पर हुनकर शोधक आधारपर रचित पोथी अछि, पहिल अध्यायमे व्यक्तित्व आ कृतित्व, दोसर अध्यायमे कृति विवेचन, तेसर अध्याय मे हुनकर हिन्दी रचना आ चारिम अध्यायमे उपसंहार अछि। ऐ पोथीक उपसंहारमे एक ठाम वर्णित भेल अछि जे केना उदयचन्द्र झा विनोद हुनकासँ भेँट करबाक लेल मिथिला मिहिर कार्यालय गेल छलाह मुदा ओ वाम हाथसँ लिखबामे तल्लीन छलाह। ओ एक्के बेर रचना फेयर कऽ लैत छलाह, मोनेमे काँट-छाँट कऽ लैत छलाह। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ तँ ततेक तेजीसँ सोचैत छलाह जे ओ शॉर्टहैण्डमे लिखैत छलाह जे तारतम्य नै टूटय, आ हुनकर पर्सनल असिसटेण्ट ओकरा लौंहहैण्डमे टाइप करथिन। मिथिला मिहिर लेखकक एकटा सेना तैयार केलक, सहस्राधिक लेखकक। ओ दिन ओ पल ऐ मे १२ टा संस्मरण अछि। हमर कक्का:यात्रीजी- ऐ संस्मरणमे एकटा घटनाक चर्चा करब आवश्यक अछि। यात्रीजीक जेठ बेटीक संग प्रेमलताजी भानस करथि, मुदा यात्रीजी हुनका दुनू गोटेकेँ एक दिन सप्ताहमे छुट्टी देलखिन्ह आ ओइ दिन हुनकर जेठ बेटा शोभा मिसर भानस करथिन्ह से निर्णय देलन्हि।  प्रेमलता जी लिखैत छथि- "अधिकारक बोध करओलनि कक्का।" सत्य, जतऽ आइयो जनसंख्यामे डोमेस्टिक काजकेँ बेरोजगारी बा बिनु अर्जनबला काज मानल जाइ छै, ई गप आह्लादित केलक। कक्का नहि रहलाह। काका, काकी आ...: ऐमे ने काकाक नाम छन्हि ने काकीयेक। हम ई ऐ दुआरे कहि रहल छी जे हमरा रहिकाक ऐ भगिनमानक नाम जनबाक उत्कण्ठा अछि। किए अछि? कारण ऐ संस्मरणमे काकीकेँ सम्बोधित कऽ प्रेमलता जी लिखैत छथि- "ओ प्रथम मैथिल महिला मंच पर आयलि छलीह, आ से हमरा लेल सभदिन प्रेरणाक आधार रहल अछि।" से हुनकर नाम जनबाक सभकेँ इच्छा हेतन्हि आ प्रेमलता जी से करतीह से आशा अछि, ओना लोकक जिनगी बीति जाइ छै काकी-काकी करैत मुदा ओकर नैहर गामक पता तँ चलैत छै, काकीक नाम नै पता चलै छै। अही संस्मरणमे सोङरपर ठाढ़ नाट्यमंचक प्रमाण सेहो देल गेल अछि जतऽ प्रेमलता जी पर कटाक्ष करैत कियो कहै छथि- "... हरिमोहन बाबू चाली केँ फूकि कऽ साँप बना रहल छथि।" कठघरामे ठाढ़ हम: ई संस्मरण सुधांशु शेखर चौधरी पर अछि। ओ हिनका एकबेर कहने रहथिन्ह जे नाटक लिखबा काल प्रेमलता जेना हुनका सोझाँ आबि जाइ छथिन्ह आ ओ सम्वाद ओ प्रेमलते लेल लिखैत छथि। स्मृति-तर्पणक दू शब्द: ई संस्मरण पं. जयनाथ मिश्रक छन्हि प्रेमलता जीक अनुसार जनिकर मानसपुत्री 'मैथिली महिला संघ' अछि। नारी-जागरणक अग्रदूत, नचैत रहल ओ क्षण सभ, बेर-बेर भसिया जाइत छी: ई तीनू संस्मरण हुनकर नैहर रहिकाक अछि। अही क्रममे ई तीनू संस्मरण नै अछि मुदा एकटा कारणसँ हम एकरा एक ठाम रखने छी। पहिलमे शिक्षक आ पिता रंगमंचपर हिनकर प्रवेशक पक्षधर रहथि, मुदा गौँआ सभक कारण ई सम्भव नै भेल, दिन मे ओना रिहर्सल कालमे गीतपर नृत्य केने रहथि, उमेर रहन्हि १३ बर्ख (सन् १९६१)। नाटक गोविन्द झा क 'बसात' रहै, से संस्मरणमे गोविन्द झा सेहो सम्मिलित भेलाह जखन प्रेमलता जी पछाति पटना गेलीह आ गोविन्द झा क कएकटा नाटकमे अभिनय केलन्हि। दोसरमे हिनकर उमेर रहन्हि ३७-३८ बर्ख  (सन् १९८५-८६) आ वएह गौँआ सभ हिनका २४-२५ बर्ख बाद गामक विद्यापति पर्वमे मुख्य अतिथि बनेलकन्हि आ हिनकर बेटी अन्नूकेँ मंचपर गाबय लेल बजेलकन्हि। आ स्टेजसँ उतरलाक बाद २३ बर्ख बाद हिनका अपन गुरुजी सीतानाथ झाक दर्शन भेलन्हि जे प्रेमलता जीक नाम पुकारल जेबाक बाद अदहे खेनाइपरसँ उठि कऽ झटकारि कऽ आबि गेल छलाह। तेसर संस्मरणमे बिनु सह-कलाकार संग रिहर्सलक रहिकेमे नाटकमे अभिनयक गौंआ उदय चन्द्र झा 'विनोद'क आग्रहकेँ अस्वीकार केलन्हि, नाटक महेन्द्र मलंगियाक छल आ नाटक छल- 'ओकर आंगनक बारहमासा', ईहो लिखै छथि जे सभखन सभकेँ प्रसन्न नै राखल जा सकैए (उदय चन्द्र झा 'विनोद' अही अंकमे लिखै छथि जे प्रेमलता जी मानि गेल छलीह, मुदा गौँआ सभक प्रबल विरोधक कारण ओ दर्शके दीर्घामे रहलीह आ प्रेमलता जीक ई अपमान हुनका एतेक खराप लगलन्हि जे रहिकाक त्रिदिवसीय विद्यापति पर्वमे तकर बाद कोनो नाटक नै भेलै।)। तेसरे संस्मरणमे कोनो नजदीकी महिलाक चर्चा अछि जे हिनका कहलखिन्ह जे धन्य बटुक भाइ जे अहाँक बेटीक बियाह भऽ गेल आ आब अहाँ किछु बेशी बाजऽ सेहो लागल छी। रंगयात्रासँ महायात्रा धरि:मैथिली नाटकक निर्देशक पं. त्रिलोचन झा प्रसिद्ध गुरुजी क संस्मरण ऐ आलेखमे अछि। ऐ सँ पहिने हिन्दीसँ निर्देशक आयातित होइत छलाह। पहिने ओ राजदरभंगाग थियेटरमे रहथि, ओ बन्द भऽ गेल। फेर चर्चा अछि कलकत्ताक मूनलाइट थियेटरक आ ओहो बन्द भऽ गेल तखन ओतुक्के 'यात्रा पार्टी'मे गेलाह मुदा ओतऽ मैथिली रंगसंस्था 'मिथियात्री (सहयोगी दयानाथ झा, गुणनाथ झा आ श्रीकान्त मण्डल)' सँ जुड़लाह। यात्रा पार्टीमे घुमब जखन पार नै लगलन्हि तँ कमलनाथ सिंह ठाकुरक माध्यमसँ पटना चेतना समितक रंगमंच विभागसँ जुड़ि गेलाह। मुदा एतऽ सेहो सोंगरपर ठाढ़ मैथिलीक चर्चा भेटैत अछि- ".. परिवारक अन्य सदस्यकेँ रंगमंचसँ वा रंगमंचक चर्चासँ फराक रखलनि।" श्रीकान्त मण्डल: ७ जनवरी १९९४, श्रीकान्त मण्डलक मृत्यु। राजकमल चौधरीक 'ललका पाग' कथापर फिल्म बनेबा लेल फाइनेन्सर ताकि लेने छलाह, कन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर भऽ गेल, गीत रेकर्ड भेल। प्रेमलता जी लिखै छथि जे ई गीत ओइ बर्खक विद्यापति पर्वमे लोक सुनबो केलक। मुदा एकटा व्यक्तिक मृत्यु माने एकटा संस्थाक मृत्यु, से ने ओ गीते आब अछि आ नहिये ओ फिल्म बनल। मात्र व्यक्तिगत प्रयाससँ सोंगरपर ठाढ़ कएल काज, श्रीकान्त मण्डल सोंगर छलाह, ओ गेलाह आ हुनकर आ हुनकर गीतक चेन्हासी धरि मेटा गेल, बा मेटा देल गेल। रंगकर्मी प्रमिला: श्रीनारायण झा प्रसिद्ध 'सर' आ हुनकर पत्नी आ बाल-भंगिमा (भंगिमा नाट्य संस्थाक बाल विभाग)क प्रभारी प्रमिला जीक संस्मरण अछि। संगमे सोनू आ मोनू (प्रमिला जीक दुनू पुत्र) आ भवनाथ झा (नाबार्ड)क सेहो चर्चा अछि आ ठहाका कार्यक्रमक सेहो । फेर प्रमिला जीक असमय मृत्यु भऽ जाइत अछि। किछु तीत, किछु मिट्ठ: किछु चहटगर घटना सभक चर्चा अछि ओहने सभ जे कपिल शर्मा शो मे अहाँ सभ देखने हएब। एकटा रंगकर्मीक यात्रा: पहिल बेर चेतना समितिक तत्त्वाधानमे आ बटुक भाइ कहलापर १९७३ ई मे प्रेमलता जी आ दस बर्खक भारती अभिनय केलन्हि। १९७४ मे शामिल भेलीह नृत्यांगना रमा दास। पुरुष कलाकारक चर्चा सेहो अछि- छत्रानन्द सिंह झा (बटुक भाइ), वेदानन्द झा, फनन्त झा, हृदयनाथ झा, सी.पी.झा, मोदनाथ झा, अशर्फी अजनबी, गोलोकनाथ मिश्र, बन्धुजी, शम्भुदेव झा। चेतना समितिक अतिरिक्त नाट्य संस्था रंगलोक, नवांगन, अरिपन, भंगिमा, आंगन, कला समिति  क चर्चा भेल अछि आ जिम्मा लेनिहारमे रवीन्द्र नाथ ठाकुर, कौशल कुमार दास, छत्रानन्द, कुमार शैलेन्द्र, प्रशान्तकान्त, रवीन्द्र राजू, मनोज मनुज, विभूति आनन्द, कुणाल, उमाकान्त, किशोर केशव, रोहिणी रमण, जगन्नाथ लाल दास, कौशल मिश्र आ तरुण प्रभातक चर्चा भेल। महिला अभिनेत्रीक चर्चा केलनि- मंजू चौधरी, सुधा दास, तनुजा शंकर, विनीता, संगीता, निवेदिता, मंजू झा, आभा झा, पूनमश्री। मृदुला सिन्हाक चर्चा भेल अभिनयक संग निर्देशन आ आलेखन लेल सेहो। मंत्रेश्वर झा द्वारा 'अरिपन'क माध्यमसँ नाट्य प्रतियोगिताक आयोजन। मुदा... मंजू चौधरी रंगमंचे नै ओइसँ जुड़ल लोकोसँ कुशल छेम-धरि पुछबासँ परहेज केलनि,मृदुला सिन्हा, सुधा दास, पूनमश्री, प्रभा झा, नूतन झा सभ एकाएकी छोड़ैत गेलीह। सुरेन्द्र आचार्य धरि संग रहलाह। तनुजा शंकर अभिनय आ निर्देशन दुनूमे छलीह मुदा ओ दिल्ली दूरदर्शनक सीरयल सभसँ जुड़ि गेलीह, हुनकर छोट बहीन कनुप्रिया शंकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयसँ जुड़ि गेलीह। शामिल भेलीह स्नेहा पल्लवी, शिल्पी आ रश्मि, तीनू सुपुत्री हरिहर प्रसाद (हिन्दीक कथाकार, फिल्मकार आ स्क्रिप्ट राइटर)। आनन्द मोहन झा आ हुनकर माय वैदेही झा केर सेहो चर्चा अछि। मधूलिका आनन्द, सोमा आनन्द आ दीपा आनन्द, सुप्रीता दास, ज्योति, सुनीता झा, अलका, नीतू, शारदा सिंह, नीलम सिंह, प्रीति, रश्मि मिश्र, अन्नू, मन्नू, बरखा सिंह, स्वाती सिंहक सेहो चर्चा अछि। फेर चर्चा अछि हुनका सभक जे अपन परिवार, अपन पत्नीकेँ उत्साह आ गर्वक संग शामिल कयलनि- लल्लन प्रसाद ठाकुर (जमशेदपुर), अशोक कुमार झा (मिथिला विकास परिषद, कोलकाता), रोहिणी रमण झा (आंगन, पटना), प्रदीप बिहारी (बेगूसराय), चतुर्भुज आशावादी (विराटनगर, नेपाल) आ श्याम सुन्दर सिंह (भंगिमा, पटना)। एगो छली सिनेह: ऐ कथा संग्रहमे १२ टा लघुकथा अछि, जइमे एकटा कथा अछि 'एगो छली सिनेह', जे विधवा सिनेहक कमलेश संग शारीरिक सम्बन्ध, कमलेशक धोखा दऽ भागि जायब आ ओइ सम्बन्धसँ होइबला बच्चाकेँ जन्म देबाक जिदपर आधारित अछि। कताक साल बाद ओ घुरि कऽ एलि आ ओही भैंसुरकेँ अपन घराड़ी लिखि देलनि जे हुनका काटि कऽ गाड़ि देबाक निर्णय सुनेने छलखिन्ह। ऐ संग्रहक एकटा आर कथा 'ब्यूटीपार्लर' विवाहेत्तर शारीरिर सम्बन्धपर आधारित अछि जइमे पुरुखकेँ बियाहल रहलोपर कुमारिसँ अफेयर करबाक छूट छै। 'वापसी' कथामे सासु-पुतोहुक खिस्सा छै। जे बेटा-पुतोहुकेँ सासु घर खाली करेलन्हि सएह सेवा केलकन्हि आ फेर वापसी भेल। 'अभागल'मे कोनो बातपर बच्चा घरसँ भागि गेल रहै आ फेर घुरि कऽ आबि गेलै तकरे कथा अछि। 'चँचरी पुल' मे बाढ़िक इलाका, चचरी पुलक गायब हएब आ फेर मरम्मति हएब, चँचरी पुल आ प्रकृतिक मिलि कऽ समाजमे एक सूत्रमे बन्हबाक वर्णन अछि। एम्हर पछिला साल एकटा समाचार आयल छल जे बिहारमे लोहाक पुलकेँ चोर काटि कऽ लऽ गेलै। से स्थिति अखनो ओहने छै, चँचरी पुल चोरि होइ छलै, आब लोहाक पुल चोरि होइ छै। 'मैयाँ' कथामे मैयाँ आ किसुनमाक आत्मीय सम्बन्धक चर्चा भेल अछि। 'वैतरणी'मे वएह गामक खिस्सा अछि, मरलाक बाद भोजमे मदति करू आ सभटा निकहा खेत लिखबा लिअ। 'जुमरातन' स्कूलक सेविका, एक तरहसँ ओकर चरित्र चित्रण कएल गेल अछि। 'छाहरि'मे सुधा आ रधियाक कथाक बहन्ने स्त्री-विमर्श आ जाति विमर्श दुनू आयल छै, आ ईहो जे महिलापर एकर दोबरा मारि पड़ैत छैक। 'ठेस'मे शहरमे बन्दक घोषणाक बाद महिला कर्मचारी सभक आपसी गपशपक विवरण छै। 'गृह-प्रवेश'मे केना इमोशनल कऽ सोझ लोकसँ काज लेल जाइ छैक तकर विवरण अछि। 'उदास आँगन' मे काकीक मृत्युक अवसरपर हुनकर खगता, नवका छौड़ी सभ तँ सिनेमाक भासपर गीत उठबैत अछि, काकीकेँ से नै सोहाइत छलन्हि। हुनकर अन्तिम संस्कारमे सौंसे टोलक छौड़ा सभ हुनक चितापर तिकुला-मज्जरसँ लदबद ठारि काटि कऽ धऽ देलक, जँ काकी ऐबेर नै छै तँ ककरो अँचार-आमिल नै बनबऽ दइ जेतै। काकीसँ प्रेम.. स्वर्गमे बैसि खूब चटनी बनबिहेँ... ८२ बर्खक एनी एर्नौ केँ ऐ बेरुका साहित्यक नोबेल पुरस्कार देबाक घोषणा स्वेडिश एकेडमी केलक। स्वेडिश एकेडमी ओइसँ पहिने रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ एकटा ट्वीटमे मोन पाड़लक। "तितली मास नै, पल गानैत अछि, से ओकरा लग समये समय छै।" एनी एर्नौ पहिने आत्मकथात्मक उपन्यास लिखलन्हि मुदा शीघ्रे ओ मात्र आ मात्र संस्मरण लिखय लगलीह। प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'क किछु कथा जेना 'एगो छली सिनेह', 'ब्यूटीपार्लर' बोल्ड अछि तँ आ 'छाहरि' आ 'उदास आँगन' मे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अछि। मुदा हुनकर मजगूत पक्ष छन्हि 'संस्मरण' आ जतेक खजाना हुनका लगमे छन्हि से ओ एनी एर्नौ जकाँ संस्मरण लिखिये कऽ सधा सकैत छथि। आशा अछि जे हुनका कलमसँ ढेर रास संस्मरण आर निकलतन्हि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१९.अजित कुमार झा- मैथिली रंगमंचक प्रेरणास्रोत: श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम अजित कुमार झा मैथिली रंगमंचक प्रेरणास्रोत: श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम

हिन्दी सिनेमा 'आनन्द' मे एकटा डायलॉग छल जकरा मैथिली मे एना कहि सकैत छी- 'दुनिया एक रंगमंच छैक आ हमसब मात्र कठपुतली जकर रास ऊपर वाला केँ हाथ मे छन्हि'। शायद अही लेल ई कहबी प्रचलित छैक जे- ' सबहिं नचाबत राम गोसाईं '। जौँ कागज कलम ल' क' लिखनाई शुरु करी त' शायद हम सब लिखबा मे सक्षम नहि होएब जे एक्कहि समय मे कतेक रोल हम सब निमाहि रहल छी। ओना सच त' ई छैक जे कतेक रोल मे हमरा सब केँ ऊपर वाला नचा रहल छथि से बुझबाक सामर्थ्य हमरा सब केँ कहाँ अछि। ओना आइ हम ओहि नाटक केर चर्चा नहि क' रहल छी जकर पात्र, कथा, पटकथा, दृश्य, स्थान, लाइट, साउंड, म्यूजिक आ अन्य समस्त चीजक निर्देशन सर्व शक्तिमान एवं सर्व विद्यमान ईश्वर केँ द्वारा होइत अछि। जी हम चर्चा क' रहल छी जे अपन अपन गाम मे, विद्यालय मे संभवतः अधिकांश व्यक्ति कोनो-न-कोनो रुप मे खेलायल छी। ओहि समय गाम घर मे मनोरंजनक ई सब सँ प्रचलित माध्यम छल। मनोरंजन केर साथ-साथ समाज मे जागरुकता आनय केँ लेल विभिन्न तरहक नाटक केर मंचन होइत छल। आम जनता जतेक आसानी सँ कोनो विषय वस्तु केँ समझि जाइत छलथि ओतेक कोनो पोथीक माध्यम सँ संभव नहि छल। समाज मे व्याप्त कुरीति सब केँ केन्द्र मे राखि आम जनता मे जागरुकता अनबाक सब सँ सशक्त माध्यम अछि नाटक। ओना समय बदललै आ संगहि लोक सबहक सोच सेहो बदलि गेलै आ गाम सँ नाटक बुझू जे बिला गेल आ केहनो पवित्र पावनि त्यौहार केँ अवसर पर फूहड़ आर्केस्ट्रा आ डी जे बजा वर्तमान मे अपन विकृत मानसिकताक परिचय देल जा रहल अछि। शायदे कोनो गाम मे आब नियमित रुप सँ नाटक होइत अछि। नाटक आब विभिन्न शहर केर रंगमंच धरि सिकुड़ि क' रहि गेल अछि। समाज मे अदौ काल सँ कुरीति रहलै अछि आ समय केँ साथ बहुत बदलाव अयलै मुदा आधुनिकताक दंभ भरनिहार हम सब एखनहुँ बहुत तरहक सोच केँ बदलय मे सफल नहि भेलहुँ अछि। अहि मे एकटा प्रमुख रुप सँ जौँ चर्चा करी त' एखनहुँ बेटा-बेटी मे भेदभाव होइत अछि। स्थिति मे बहुत सुधार भेलैया मुदा एखनहुँ बहुत बदलाव केर आवश्यकता अछि। पुरुष प्रधान समाज मे आइ एहन कोनो क्षेत्र नहि अछि जाहि मे मिथलाक ललना एत्तह केँ पुरुष सँ टक्कर नहि ल' रहल छथि? चाहे शिक्षा केर क्षेत्र होइक अथवा ज्ञान विज्ञानक, चाहे फौज होइक, राजनीति होइक अथवा कलाक क्षेत्र सब मे अपन मेहनत सँ पुरुषक समकक्ष अपना आप केँ साबित कयलनि हँ। आइ हम चर्चा क' रहल छी मिथिलाक ओहि ललना केर जिनका हुनक कार्यक्षेत्र मे सब माँ कहि संबोधित करैत छन्हि। जी बूझिए गेल हेबै जे हम जिनकर चर्चा क' रहल छी से भेलीह मैथिली रंगमंचक एक सशक्त हस्ताक्षर, निस्सन कलाकार आ नबका पीढ़ीक महिला कलाकार लेल प्रेरणास्रोत श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम। हँ आइ ओ कोनो परिचयक मोहताज नहि छथि मुदा अपन जीवन मे अहि मुकाम पर पहुँचय लेल निस्संदेह कतेक संघर्ष करय पड़ल हेतन अहि पुरुष प्रधान क्षेत्र मे तकर सहजहि अनुमान लगायल जा सकैत अछि। रहिका निवासी पंडित दीनानाथ झा आ हुनक पत्नी श्रीमती वृंदा देवीक एकमात्र संतान प्रेमलता केर जन्म सन् 1948 मे भेल छलन्हि आ मात्र बारहम बरख मे हिनकर विवाह सेहो भ' गेलनि मुदा हिनक पति देव केँ इच्छाक अनुरुप हिनकर पढ़ाई जारी रहलनि। गाम समाज अपन नाटक देखाबय सँ कहाँ बाज अबितथि मुदा हिनकर ध्यान सदैव अपन लक्ष्य पर केंद्रित रहलन्हि। माता पिताक सहयोग, पति देवक प्रोत्साहन आ अपन लगन सँ सन् 1963 मे प्रथम श्रेणी सँ मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण भेलीह। ओहि केँ बाद पटना चलि अयलीह आ परम श्रद्धेय यात्री जी केँ अभिभावक रुप मे पाबि निरंतर अपन प्रतिभाक परिचय दैत रहलीह। परम श्रद्धेय यात्री जी केर प्रेरणा सँ आकाशवाणी पटना सँ जुड़ि गेलीह। रेडयो सँ हिनक नाटक केँ प्रकाशन होबय लागल। लोग मात्र आवाजे टा सुनैत छलन्हि, चेहरा त' नहि देखैत छलन्हि ताहि बातक निश्चिंतता छलन्हि मुदा बहुचर्चित बटुक भाई आ अन्य किछु व्यक्तित्व हिनका रंगमंच पर आबय लेल प्रेरित करैत रहलनि। ओ समय काल केँ विषय मे मोन पाड़ि सकैत छी जे मंच पर महिला केँ प्रवेश नहि छलनि आ स्त्री पात्रक रोल सेहो पुरुषे करैत छलाह। बाद मे जा क' अन्य भाषा भाषी महिला लोकनि मैथिली रंगमंच पर आबय लगलीह मुदा सब विधपुराओन लगैत छल। अपन माटि पानिक सुवाश कत्तहु नहि छल। कोनो मिथिलानी लोक लाजक भय सँ अतेक साहस नहि जुटा पाबि रहल छलीह। हिनका मोन मे सेहो लोक लाजक भय छलन्हि तैँ किछु असमंजस मे छलथि मुदा सबहक प्रोत्साहन सँ हिम्मत जुटाबय मे सफल भेलीह आ बाँकी त' सब इतिहासे अछि। ओना त' कोनो बात जे बीति गेल से इतिहास अछि मुदा इतिहास सबहक नहि लिखाइत छैक। इतिहासक पन्ना पर स्वर्णाक्षर सँ हुनके नाम अंकित होइत अछि जे विषम-सँ-विषम परिस्थिति मे भी हिम्मत जुटा लीक सँ हटि क' काज करैत छथि अथवा धाराक विपरीत हेलैत छथि आ आबय वाला पीढ़ी लेल न'ब प्रतिमान गढ़ैत छथि। एहने सन विषम परिस्थिति मे हिम्मत जुटा क' मैथिली रंगमंच पर पदार्पण कयलनि अपन माटि पानि एवं संस्कृति केँ हृदय मे जोगौने मिथिलाक ललना श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम। 10 नवम्बर 1973 केँ विद्यापति पर्व समारोहक पावन अवसर पर शहीद स्मारक स्थान, पटना मे चेतना समितिक मंच पर पंडित दिगम्बर झा द्वारा लिखल आ श्री गणेश सिन्हा केर निर्देशन मे ' टुटैत लोक ' नाटक मे पहिल बेर मैथिली रंगमंच पर एक मैथिल ललना केर पदार्पण भेल। पहिल प्रस्तुति मे धखायल त' हेतीह मुदा दर्शक वृन्द केँ अपन अभिनय पर चर्चा करबाक लेल विवश जरुर क' देलनि। एकबेर आबि गेलीह त' फेर पाछू घुरि क' तकबाक प्रयोजन नहि पड़लनि। चेतना समिति, अरिपन, भंगिमा एवं देशक समस्त राज्यक मैथिली रंगमंच पर निरन्तर एक-सँ-बढ़ि एक प्रस्तुति द्वारा अपन अभिनय प्रतिभाक अमिट छाप छोड़ैत गेलीह। एखनधरि लगभग दू सै सँ बेसी नाटक मे अभिनय केलनि अछि आ समय-समय पर विभिन्न मंच सँ पुरस्कृत होइत रहलीह। अहि क्षेत्र सँ जुड़ल शायदे एहन कोनो पुरस्कार होएत जे हिनका हाथ मे आबि गौरवान्वित नहि भेल होएत। मुदा सब सँ पैघ पुरस्कार अछि दर्शक वृन्दक थोपड़ी जे हिनका एखनधरि भेटैत आबि रहल छन्हि। हिनका सँ प्रेरित भ' नहि जानि कतेको मैथिल ललना अहि मंच पर आबय केँ साहस जुटाबय मे समर्थ भेलीह आ शान सँ मैथिली रंगमंच पर न'ब प्रतिमान गढ़ि रहल छथि । मैथिली नाटक सँ जे भी व्यक्ति जुड़ल छथि अथवा मिथिला मैथिली आन्दोलन मे कोनो-न'-कोनो रुपें अपन योगदान द' रहल छथि तिनका अवश्य ज्ञात हेतन जे सन् 2007 केँ चनौरा गंज मे श्री बेचन ठाकुर द्वारा पहिल बेर हरेक पुरुष पात्र केर महिला द्वारा अभिनय करयबाक अभिनव प्रयोग भेल छलै, आ तकरा बाद निरन्त लगभग सभ बर्ख ओ सरस्वती पूजाक अवसरपर ई दोहराबैत आयल छथि।** ओतहि तकर बहुत बाद मिथिला मैथिली आन्दोलनक एपिसेन्टर (उपरिकेंद्र) शहर कलकत्ता, जे आब कोलकाताक नाम सँ जानल जाइत अछि, केर प्रसिद्ध रथीन्द्र मंचक प्रेक्षागृह मे 21 नवम्बर 2019 क' नवआयाम' केर पहिल प्रस्तुति श्री रुपेश त्योंथ द्वारा लिखल आ श्रीमती किरण झा निर्देशित मैथिली नाटक 'कनफुसकी' केर सफल मंचन भऽ सकल, जइमे समस्त पात्र चाहे पुरुष हो अथवा महिला सबहक अभिनय मैथिल ललना द्वारा भेल छल। जौँ पहिल डेग श्रीमती प्रेमलता मिश्र मैथिली रंगमंच केँ तरफ नहि उठौने रहितथि त' शायद एहन आयोजन होबय मे एक शताब्दी लागि सकैत छल अथवा ओहू सँ बेसी से कहनाई असंभव।*** मैथिली भाषाक पहिल फिल्म ' ममता गाबय गीत ' सँ ल' क' राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ' मिथिला मखान ' धरि अनेको फिल्म मे हिनकर जीवंत अभिनय दर्शक द्वारा निरन्तर सराहल गेल अछि। एक शिक्षिका, तखन आकाशवाणी पटना, ओहि केँ उपरांत मैथिली रंगमंच सँ होइत मैथिली फिल्म धरि केँ सफर मे संघर्षक माध्यम सँ अपन उचित स्थान बनौलनि आ निस्संदेह ओ सम्मान भेटलनि जिनकर ई हकदार छलीह । साहित्यक प्रति सेहो हिनकर रुचि रहलनि। हिनकर कथा संग्रह केर नाम छन्हि ' एगो छली सिनेह '। परम श्रद्धेय सुधांशु शेखर चौधरी पर हिनकर शोध ग्रन्थक नाम छन्हि ' शेखर प्रसंग'। समय-समय पर लिखल संस्मरण केर संग्रह छन्हि ' ओ दिन ओ पल '। एतबहि नहि पटना मे ' सान्ध्य गोष्ठी ' केर संपादन एवं प्रकाशन सँ सेहो जुड़ल छलीह। लगभग 75 बरखक वयस मे भी जाहि तरहें ई मैथिली रंगमंच मे सक्रिय छथि आ अपन पारिवारिक जिम्मेदारी केर बखूबी निर्वहन करैत मिथलाक माटि पानि आ संस्कृति सँ सुवासित हिनकर अभिनय देखि ई कहबा मे कोनो असोकर्य नहि भ' रहल अछि जे निस्संदेह ई एकटा समर्पित एवं सम्पूर्ण कलाकार छथि। ईश्वर हिनका दीर्घायु एवं स्वस्थ रखथुन जाहि सँ आगू आओर नीँक अभिनय सँ मैथिली रंगमंच केँ पुष्पित एवं पल्लवित करैत रहथि। -अजित कुमार झा, मुजफ्फरपुर, 9472834926 **बेचन ठाकुरक पहिल बेर ई २००७ नै वरन् २२.०१.१९९९ केँ भेल छल (नाटक भाए-बहीन) जइमे पुरुष-महिला सभ पात्र महिला द्वारा अभिनीत भेल, समानान्तर नाटक ऐ मामिलामे बहुत आगू अछि। देखू विदेह मैथिली नाट्य उत्सव (प्रकाशन वर्ष २०१२) पृ. सं ४० आ आगाँ अही लिंकपर।- सम्पादक ***ई कथन मुख्य धाराक रंगमंचपर लागू होइए। समानान्तर धाराक नाटक आ नाटककारक नाम मुख्य धाराक लोक जानियो कऽ अनठेने छथि। जतऽ धरि समानान्तर धाराक नाट्य मंचक प्रेमलता जीसँ प्रभावित भऽ एहि तरहक आयोजन कएल जयबाक गप अछि तँ हुनकासँ प्रभावित भेनाइ तँ दूर हुनकर नामो समानान्तर धाराक लोक नै सुनने छल, आ तइ लेल मूल धाराक लोके दोखी छथि, कलाकारसँ मंगनीमे जिनगी भरि विद्यापति पर्व समारोहमे ढोलक बजबाबैत छथि कन्यादान करा देबाक लालच दऽ कऽ, मुदा ओकर संगीतक चर्च (अभिलेखन) नै करैत छथि। - सम्पादक अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२०.प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'सँ साक्षात्कार जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' द्वारा प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'सँ साक्षात्कार जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' द्वारा जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': रेडियो नाटक आ रंगमंचसँ जुड़बाक लेल प्रेरणाक श्रोत किनका मानैत छियनि? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम':  रहिका हाइ स्कूलक शिक्षक लोकनि आ खास कऽ प्रधानाचार्य श्री चन्द्रिका प्रसादजी जे स्वयं कलाकार सेहो छलाह। हमरा सभकें छब्बीस जनवरी, पन्द्रह अगस्त,सरस्वती पूजाक अवसरपर कथा पाठ, कविता पाठ,गीत-नाद प्रतियोगिता आदि सांस्कृतिक गतिविधिमे भाग लेबाक लेल प्रोत्साहित करैत छलाह। गोविन्द बाबूक लिखल 'बसात' नाटकमे भाग लेबाक लेल तैयारी कराओल गेल छल। माय-बाबू सेहो समर्थन करैत छलाह, मुदा  गामक लोक सबहक विरोधक कारण ओइ नाटकमे भाग नहि लऽ सकलहुँ, मुदा ओ जे अभ्यास भेल छल से पटना एलाक बाद रेडियो नाटक आ रंगमंचक  अभिनयमे काज देलक। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': पटनामे रंगमंचसँ कोना जुड़लहुँ? पहिल रेडियो नाटक कोन  छल ? रेडियो नाटकमे के सभ सहकर्मी छलाह? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम':  हम 1963 मे मैट्रिक फर्स्ट डिवीज़नसँ पास केने रही,1964 मे पटना एलहुँ, यात्री कक्का आकाशवाणी नेने गेलाह आ मधुकर गंगाधर जीसँ परिचय करौलनि, ओ हिन्दीक प्रोड्यूसर छलाह, सांस्कृतिक कार्यक्रम सभमे भाग लऽ चुकल छलहुँ, रेडियो नाटकमे भाग लेबामे असौकर्य नै भेल। पहिल रेडियो नाटक कोन छल से मोन नहि अछि। मासमे दूटा नाटक होइ छलै एकटा मैथिली कार्यक्रम 'भारती'मे आ एकटा 'चौपाल'मे। आर्यावर्त, आकाशवाणी,सचिवालय,विधान सभा  आ अन्य विभिन्न संस्थान  जेना स्कूल, कॉलेज,  बैंक  आदि सभमे  काज करैबला लोक सभ अथवा हुनक परिवारक लोक सभ रहैत छलाह जेना  शिवकांत झा (कु. शैलेन्द्रक पिता),बेचन झा (किशोर केशवक पिता), इन्द्रकान्त झा, दीना झा, प्रभास कुमार चौधरी, वेदानन्द झा, गोलोक नाथ मिश्र, महिला सभमे छलीह कविता देवी, सावित्री देवी, आशा मिश्र, मंजुला सिंह आदि। गोपेशजी सक्रिय छलाह, बटुक भाई एलाह, उमाकान्तजी छलाह। इएह कलाकार सभ चेतना समितिक मंचपर सेहो अभिनय करय लगलाह, बादमे और कते कलाकार सभ जुटैत गेलाह। चेतना समितिक मंचपर 1972 सँ स्त्री-पात्रक अभिनय महिला लोकनि द्वारा होमय लागल। चेतना समितिक मंचसँ पहिल नाटक 'टुटैत लोक'मे भाग नेने रही। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': रंगमंचक विकास लेल संस्था सबहक योगदान की रहल अछि? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम':  आधुनिक रंगमंचक  विकास चेतना समितिक मंचसँ बेसी भेलै, मन्त्रेश्वर झाजीक समय 'अरिपन' द्वारा प्रचार-प्रसार बेसी भेलै, अंतर्राष्ट्रीय नाट्य सप्ताह महोत्सव भेल जाहिमे कोलकाता, दिल्ली, विराटनगर, जनकपुर, जमशेदपुर, बेगुसराय आदि स्थानसँ सेहो नाट्य संस्था सभ भाग लैत छल।दिल्ली,काठमांडू, विराटनगर सेहो सक्रिय भेल।  पटनोमे कयटा संस्था शूरू भेल।  भंगिमा सेहो बहुत प्रस्तुति देलक। कला समिति, गर्दनीबागक 'नवांगन', रोहिणी रमण झा क 'आँगन' आदि। मन्त्रेश्वर बाबूक बाद किछु दिन ठप्प भऽ गेलै, किछु दिन लेल भंगिमो ठमकल। एखन सक्रिय अछि महेन्द्र मलंगियाक 'मिथिलांगन; 'बारहमासा' प्रकाश झाक 'मैलोरंग' आदि, पटनामे 'चेतना समिति', 'भंगिमा', 'अरिपन' तीनू काज कऽरहल अछि, 'चेतना नाट्य महोत्सव तीन सालसँ कार्यक्रम करैत अछि, किछुए मास पूर्व सुधांशु शेखर चौधरी जी पर केन्द्रित छल कार्यक्रम जाहिमे शेखरजीक  लिखल कयटा नाटकक मंचन भेल अछि जाहिमे कोलकातासँ आ किछु और ठामक संस्था सभ सेहो भाग नेने छल। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': मैथिली रंगमंचक भविष्य केहेन लागि रहल अछि? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम':  मैथिली रंगमंचक भविष्य नीक लागि रहल अछि, युवा वर्ग लेल नीक अछि, सभ आयु-वर्गक लोक संगे काज करबाक अवसर भेटैत छैक, अनुशासित रहैए लोक, जीविकोपार्जन लेल सेहो किछु करबाक प्रेरणा भेटैत छैक। रंगमंच और विकसित हएत। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': कोन मैथिली सिनेमामे पहिने काज केलहुँ?  मैथिली सिनेमाक भविष्य कहन लगैए ? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम':  सभसँ पहिने 'ममता गाबय गीत'मे काज केलहुँ, विवेकानंद झा, ललितेश झा आदि छलाह, फिल्म 'मिथिला मखान'कें नेशनल एवार्ड भेटलै, एहिसँ बहुत लोक आकर्षित भेल छथि। नव-नव फिल्म सभ बनि रहल अछि। नीक फिल्म बनतै त भविष्य नीके हेतै। आनक नकल नै होइ, अपन संस्कृतिक अनुकूल फिल्म बनबाक चाही। हम मैथिली फ़िल्मक नीक भविष्यक हेतु आशान्वित छी। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': अहाँ घर-गृहस्थीक अतिरिक्त लेखन, सम्पादन,अभिनय सभसँ जुड़ल छी,गीतो नीक गबैत छी, परिवारमे और किनको साहित्य संगीत, अभिनय आदिसँ लगाव छनि ? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम': हमरा परिवारमे सभकें साहित्य-संगीतसँ सिनेह छै, हुनको नीक लगैत छलनि, बड़ी-बड़ी राति तक कवि सम्मेलन आ सांस्कृतिक कार्यक्रम देखैत छलखिन, गोष्ठीमे रहैत छलाह, पत्रिका कीनैत छलाह, पढैत छलाह। धिया पुता सभ रेडियो नाटक आदिमे भाग लैत रहल अछि, सभसँ छोट पुत्र तबला बादनमे ग्रेजुएशन केने छथि, दू टा पुत्र गीतो गबैत छलाह, बेटी सुगम संगीत, लोक गीतक कलाकार अछि। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': अहाँ एखन जे सभ करैत छी से नहि करितहुँ त की करितहुँ? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम': अभिनयक अतिरिक्त संस्था कोना चलतै, तकर व्यवस्थाक काज बेसी देखलिऐ, चन्दा मङनाइ, दर्शककें बजेनाइ,कलाकार सबहक व्यवस्थाक काज, पत्रिका छपेनाइ आदि। जे सभ करैत आएल छी से नहि करितहुँ त हम शास्त्रीय संगीत दिस जैतहुँ, हमरा शास्त्रीय संगीत आ सुगम संगीत प्रिय अछि।, कविता,कथामे सेहो हमर रूचि अछि। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल': विभिन्न संस्था द्वारा देल गेल पुरस्कारक निर्णयक आलोचना होइत रहैत अछि, अहाँक की कहब अछि? प्रेमलता मिश्र 'प्रेम':  गुण आ दोष त व्यतियोमे रहै छै, संस्थोमे आ निर्णयोमे भऽ सकै छै, मुदा, अनेरे विरोधो नै हेबाक चाही। मन्त्रेश्वर बाबूकें भेटलनि ओहू समय  किछु गोटे द्वारा  कहल गेलनि जे लेखक संघक प्रताप सँ भेटलनि अछि। किनको भेटतनि त किछु गोटे अप्रसन्न हेबे करथिन। दरभंगा महाराज साहेबक देल अँकुरीकें सेहो दूसल गेल छनि, सभकें बूझले अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२१.उदय चन्द्र झा 'विनोद'- प्रेमलता प्रसंग उदय चन्द्र झा 'विनोद' प्रेमलता प्रसंग आशीष अनचिन्हार जखन प्रेमलता प्रसंग किछु लिखबाक आग्रह कयलनि, हम इतस्ततः मे पड़ि गेल रही। जाहि व्यक्तिक अहाँ आत्यन्तिक परिचय रखैत छी, जाहि व्यक्तिक संग अहाँ रहैत छी, जकर सम्पूर्ण जीवन अहाँकेँ लगसँ देखल अछि, तकरा प्रसंग किछुओ निजगुत भऽ कहब बहुधा कठिन भऽ जाइ छै। रंगकर्मी छथि प्रेमलता, विलक्षण रचनाकार छथि, कतेको वर्षसँ पत्रिका बहार करबाक सनक श्रमसाध्य काज करैत छथि, सांध्यगोष्ठी नामक अनियतकालीन पत्रिका अपना सम्पादनमे बहार करैत छथि। मैथिली रंगमंचपर महिलाक अवतरणक इतिहास भने हरिमोहन झाक धर्मपत्नी सुभद्राजी सँ प्रारम्भ होइत हो मुदा एकरा सार्वजनीन बनौलनि प्रेमलता। ताहिसँ पूर्व कलकत्ताक रंगमंचपर वंगकन्या सभ अबैत छली मुदा दकियानूस मैथिल अपन बहिने-बेटीकेँ मंचपर उतारबाक लेल तैयार नहि छल। प्रेमलतेक प्रसादात पटनाक रंगमंच पूर्ण भेल आ तकर देखाउसमे बाला सभ अबैत गेली। सुप्रसिद्ध कवि मंत्रेश्वर झाक नेतृत्वमे अरिपन नामक नाट्यसंस्था लगातार नाटक आ रंगमंचक काज कयलक। तकर लगले मित्रवर छत्रानन्द सिंह झा प्रसिद्ध बटुकभाइ आ प्रेमलता मिश्रक सदाशयताक प्रसादात पटनामे भंगिमाक स्थापना भेल जाहिमे कुणाल, विभूति आनन्द प्रभृति गोटेक दर्जन रंगकर्मी अपन योगदान दैत अयलाह अछि। आइयो ई संस्था अपन काज करैत अछि, अधिक काल नव नाटकक मंचन करैत अछि। मैथिलीक प्रतिष्ठित संस्था अछि भंगिमा, स्मारिको छपैत अछि, ब्रह्मानन्द किशोर केशव प्रभृति दर्जनों रंगकर्मी हमरा सुलभ भेल छथि। बटुक भाइ तँ चलि गेलाह मुदा प्रेमलता आइयो बेश सक्रिय रहैत छथि। एहि ठाम निम्न घटनाक चर्च करब प्रायः अवान्तर प्रसंग नहि होयत। मैथिल समाज, रहिका ग्रामीण अंचलमे अवस्थित प्रायः एकमात्र संस्था थिक जे एहि बेर अपन स्वर्ण जयन्ती मनाबय जा रहल अछि अर्थात् पचास वर्षक संस्था भऽ आयल अछि। अपन त्रिदिवसीय वार्षिक समारोह मे ई संस्था व्यापक स्तरपर कवि सम्मेलन, सेमीनार एवं नानाविध सांस्कृतिक आयोजन करैत अछि मुदा नाटकक मंचन नहि करैत अछि। तकरा पाछाँक कारण अछि प्रायः नवम दशकक बात थिक। विचार भेल जे महेन्द्र मलंगियाक नाटक 'ओकरा आंगनक बारहमासा'क मंचन कैल जाय। गोटेक पन्द्रह दिन हम अपने गाम रहि रिहर्सल कराओल। नाटकमे दू गोट नारी पात्र छैक। ताहि लेल प्रेमलता तैयार भेली। एहि ठाम ई कहि दी जे प्रेमलता रहिकेक बेटी थिकी, एही ठामक स्कूलसँ प्रथम श्रेणीमे मैट्रिक कयने छथि। नाटकक तैयारी जोरशोरसँ भेल मुदा कोनो नारीकेँ नाट्यमंचपर नहि उतारल जा सकल। स्थानीय विरोध ततबा भयानक छल जे अन्ततः पुरुषे केँ नारी बना उतारय पड़ल आ दर्शक दीर्घामे बैसल प्रेमलता नाटक देखैत रहली। एहि घटनाक हमरापर से प्रभाव पड़ल जे हम हारि मानि लेल। नाटक नहि करैत छी।** कथाकार छथि प्रेमलता, बेश लिखैत छथि। मैथिल समाजक मानकेँ स्वर देबामे ई सर्वथा समर्थ लगैत छथि। जनैत छथि जीबाक कला, चलितो तंग नहि होइत छथि, हिनका नाटकमे मंचपर जे क्यो देखने हेताह से हिनक सहजता आ स्वाभाविकताक प्रसंग प्रशंसा अवश्ये करताह। मैथिली फिल्मोक क्षेत्रमे जे किछु थोड़-बहुत प्रयास भेल अछि ताहिमे ई सबल स्वरूपमे भेटती। जागरणमे विश्वास रखैत छथि प्रेमलता, आयोजन करैत रहैत छथि। सांध्य गोष्ठीक आयोजन मासिक करैत एही नामसँ अनियतकालीन पत्रिका बहार करैत छथि। हालेमे उषा किरण खाँ विशेषांक देखल गेल अछि। नानाविध पुरस्कारसँ सम्मानित छथि प्रेमलता।  मैथिल समाज, रहिका सेहो हिनक रंगकर्मीकेँ 'महेन्द्र सम्मान'सँ सम्मानित कऽ चुकल अछि। रहिका आ पटनामे रहबाक कारणेँ हम एहि साधिकाकेँ गढ़ाइत लगसँ देखल अछि। रहिकामे सेहो ई पिताक घराड़ीपर घर बनौलनि अछि आ एखनहु सालमे दू-चारि बेर रहिका अबैत छथि, हमरो भेँट भऽ जाइत छथि। पटना समेत मैथिली जगतक हालचाल हिनकासँ बूझि तुष्ट भऽ जाइत छी। पटना रहैत छथि प्रेमलता, रहिका रहैत छथि, संगहि सीतामढ़ीमे अपन सासुर सिरसी सेहो जाइत-अबैत रहैत छथि। स्वर्गीय पतिदेव मिसरजीक दीर्घ अस्वस्थतामे हिनक तीमारदारी देख चमत्कृत भेल छी। बरोबरि पुनरान्वेषणमे जागल रहैत छथि, नारी विमर्शक एहि युगमे नारी चेतनाक प्रतिनिधि छथि प्रेमलता। चेतना समिति पटनाक आइयो पदाधिकारी छथि, बरोबरि सक्रिय रहैत अयली अछि। हिनका एखनो लगैत छनि जे अपन एहि व्यवस्थामे नारी आइयो सुरक्षित नहि अछि। आ तकर मुख्य कारण मानैत छथि अशिक्षा। कनेक टा अंश देखल जाय- "सभक मूलमे अछि शिक्षा। शिक्षाक अभावमे स्त्री अपन अधिकारसँ अनभिज्ञ अछि । जँ स्त्री शिक्षितो अछि तऽ अपन स्त्री शक्तिक ज्ञान ओकरा नहि छैक। तेँ देखल जाइत अछि जे बेटाक जन्मपर बेशी ढोल स्त्रीगणे पीटैत अछि। सभ के बेटा चाही, बेटी ककरो नहि।" एहन दृष्टिसम्पन्न नारीकेँ एक रंगकर्मी, एक रचनाकार, एक सम्पादक, रूपमे पाबि हम सभ धन्य भेल छी। मैथिल ललनाक टॉर्चलाइट छथि ई, पटनामे से नारी मण्डली संस्थाक माध्यमे बरोबरि काज करैत रहैत छथि। हिनका प्रसंग एक कवितामे कवि वैद्यनाथ मिश्र केहन दिव्य कहैत छथि से देखल जाय- हँ दीदी कतय भेटल प्रेमक ई अजस्त्र स्रोत जकर पानि कहियो केहनो जरती-धाहीमे सुखाइत नहि छै सुगर-फ्री जकाँ ककरो अभिघात नहि करैत छै सभक लेल लाभदायक छै। प्रेमलता हमरा पीसा कहैत छथि, हुनक नैहर हमर सासुर, हमर पत्नी हुनक पीसी अस्तु हम पीसा। हिनका एखनो देखि सत्ते कहै छी, कृतार्थ होइत रहैत छी। एहन कर्मठ गृहिणी, संगहि सक्रिय रंगकर्मी भेटब दुर्लभ। जय मैथिली। **प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' अपन संस्मरण संग्रह 'ओ दिन ओ पल' केर संस्मरण 'बेर-बेर भसिया जाइत छी' मे ऐ घटनाक विपरीत वर्णन केने छथि। ओ लिखैत छथि जे बिनु सह-कलाकार संग रिहर्सलक रहिकामे अभिनयक गौंआ उदय चन्द्र झा 'विनोद'क आग्रहकेँ ओ अस्वीकार केलन्हि, नाटक महेन्द्र मलंगियाक छल आ नाटक छल- 'ओकर आंगनक बारहमासा'। ओ लिखै छथि जे सभखन सभकेँ प्रसन्न नै राखल जा सकैए, आ ईहो जे एकर हुनका दुख छन्हि। - सम्पादक अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२२.प्रदीप पुष्प- मैथिल नारीक सांस्कृतिक- साहित्यिक स्वर - प्रेमलता मिश्र प्रेम प्रदीप पुष्प मैथिल नारीक सांस्कृतिक- साहित्यिक स्वर - प्रेमलता मिश्र प्रेम

प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' जी बेस परिचित नाम छथि। हिनका मैथिली रंगमंचक पहिल महिलाकर्मी हेबाक गौरव प्राप्त छन्हि। हिनक व्यक्तित्व बहुआयामी छन्हि। जहिना भावप्रवणा अभिनेत्री तहिना कोमल हृदय साहित्यकार। दुनू ठाम भावना पक्ष प्रधान।

हिनक जन्म मधुबनीक रहिकामे भेलनि आ मात्र बारह बरखक अवस्थामे बिवाह सेहो भ' गेलनि सीतामढीक धाधी - सिरसी नामक गाममे। हिनक जीवनक प्रारंभ अति विषमतापूर्ण रहलन्हि।स्वनामधन्य वैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक कहला पर ई पटना रहय लगलीह।शनै- शनै हिनक अध्ययन सेहो व्यवस्थित होइत गेल आ ई मैथिलीमे एम. ए. केलनि तकरा बाद पी. एच. डी सेहो। पटनाक बांकीपुर राजकीय प्लस टू बालिका विद्यालय मे अपने अध्यापिकाक पदकेँ सुशोभित केलौं। ओतहिसँ सेवानिवृत भ' विभिन्न गतिविधिमे सक्रिय छथि। हिनका बहुतो रास साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था सम्मानित केलकनि जाहिमे चेतना समिति पटना, अरिपन पटना, विद्यापति सेवा संस्थान दरभंगा सेहो उल्लेखनीय अछि। प्रेमलता जी बहुतो मैथिली, हिंदी आ भोजपुरी नाटक, धारावाहिक आ फिल्ममे अपन अभिनयक बल पर छाप छोड़लनि।

हिनका मैथिल नारीक सांस्कृतिक साहित्यिक स्वर कहबाक अभिप्राय ई जे जाहि समयमे मैथिल नारी घरमे बंद रहैत छलीह, कोनो बाहरी गतिविधि खास क' कला आ संस्कृति सँ जुड़ल हो ओइमे नारीक उपस्थिति शून्य रहैत छल, चौखटिसँ बाहर पयर द' केओ मंच पर अभिनयक सपना नै देखि सकैत छलीह ताहि अप्रत्यक्ष घेराबंदी बला समय- कालमे हिनक पदार्पण भेल आ पटनाक मैथिली रंगमंचकेँ पहिल स्त्री कलाकार भेटलीह- प्रेमलता मिश्र प्रेम। हिनक कुशल अभिनय, किरदारमे डूबि जेबाक कला, संवादक कुशल उतार- चढाव नाटक वा चलचित्रमे प्राण आनि दैत छल। छोटसँ छोट भूमिकामे हिनक उपस्थिति भेला उत्तर ओ भूमिका अर्थपूर्ण भ' जाइत छल।

मूलत: कलाकार हेबा कारणे प्रेम जीक कलापक्ष सौन्दर्यबोधक परिणीति थिक जे साहित्यक रूपमे सेहो प्रकट होइत अछि आ से खूब नीक जकाँ प्रकट होइत अछि जहन दरभंगाक जखन- तखन हिनक दूटा पोथी एक्कहि संग प्रकाशित करैत अछि- ओ दिन, ओ पल( संस्मरण) आ एगो छलीह सिनेह( कथा संग्रह) । ओ पल, ओ दिन होऊ वा एगो छलीह सिनेह दुनू पोथीक दुटा अलग विधा हेबाक बादो दुनूमे एकटा समानता देखल जा सकैत अछि। ओ समानता थिक कहबाक बेछप शैली। संस्मरण पढू वा कथा, लेखिकाक मूल तत्व छन्हि भावुकता आ कलात्मकता से दुनू पोथीमे देखल जा सकैए।हिनक संस्मरण सेहो कथे जकाँ अछि आ कथा सेहो संस्मरणे जकाँ। पढबा काल पाठकक सोझा सद्य चित्र उपस्थित करबाक एकमात्र लेखिकाक अभीष्ट। एनामे, कथाक अंत किछु होऊ ओकर 'फिनिशिंग' कने कम नोंकगर हो से संभव मुदा ओकर प्रभाव चित्रमय होइते अछि ।उपरोक्त दुनू पोथी एकटा तत्कालीन मैथिल नारी समाजक जीवनक विविध चित्र उपस्थित करैत अछि। हिनक शोध ग्रंथ आधारित एकटा तेसर पोथी सेहो अछि- शेखर- प्रसंग। अइमे प्रेमलता जी वरेण्य साहित्यकार, पत्रकार सुधांशु शेखर चौधरीक व्यक्तित्व आ कृतित्व केर मूल्यांकन केने छथि।सुधांशुजीक विपुल अवदान छन्हि। जहिना मैथिलीक विशिष्ट गद्यकार तहिना प्रसिद्ध पत्रकार सेहो। मैथिलीक संगहि ओ हिंदी मे सेहो खूब लिखलाह। जेनाकि प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाज जी पोथीक भूमिकामे कहैत छथि-'एहेन शोध ग्रंथ मे रचनात्मक विश्लेषणसँ बेसी जोर ओकर ऐतिहासिकता आ प्रमाणिकता पर रहैत अछि' तहिना अइ पोथीमे सुधांशुजीक समस्त व्यक्तित्वक क्रमबद्ध उल्लेख भेटैत अछि आ ई पोथी समीक्षाक नीक पोथी बनैत अछि।

कोना एकटा छोट - छिन प्रोत्साहन ककरो नामी कलाकार बनबाक, साहित्यकार बनबाक बीजारोपण करैत अछि से जँ बुझबाक अभीष्ट अछि त' हिनक पोथी सभ पढबाक चाही। हिनक जीवन संघर्ष कतेको मैथिल नारीलेल प्रेरणा स्रोत अछि आ तेँ हिनक पोथी ओकर आवश्यक अंग।हिनक पोथीक साहित्यिक मूल्य जे होऊ, एकटा कलाकारक जीवन यात्राक परिचायक रूपमे बेस महत्व छैक। - प्रदीप पुष्प, ननौर( मधुबनी) संपर्क- 7903496553 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ऐ अंकक अन्यान्य रचना ३.गद्य खण्ड ३.१.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.२.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.३.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.४.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.५.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- श्रद्धा-सम्मान ३.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- अपन रचित रचना ३.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) ३.९.रोशन जनकपुरी- बुढि़या आ झन्डाके खिस्सा ३.१०.प्रेमशंकर झा 'पवन'- जनकवि 'मैथिली पुत्र प्रदीप' (प्रेम शंकर झा 'पवन'क मैथिली पुत्र प्रदीपपर आबैबला विदेह मोनोग्राफक अंश) ३.११.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १४म खेप ३.१२.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ८) ३.१३.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-५) ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र- बिआह-वर्णन ४.२.समता कुमारी- हम छी नारी ५.संस्कृत खण्ड ५.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (चतुर्थोच्छवासः) ६. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण ३.१.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि उमेश मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक उमेश मण्डल केर पाँचटा कथा कथा १

काजक सतहपर भोरे, जखन बिछौनपर कम्मल ओढ़ि कऽ रही पड़ले मुदा रही आँखि तकैत जागल, मनमे 25 दिसम्बर नाचल। गोष्ठी लगिचाएल जा रहल अछि मुदा कथा कहाँ लिखलौं? गोष्ठीक माने 'सगर राति दीप जरय'क 107म कथागोष्ठी। आइ 24 दिसम्बर भऽ गेल मुदा अखन तक कथा लिखैमे हाथो ने लगेलौं हेन.! महान लेखक जकाँ एक्केबेर मे अर्थात् एक्के खेपमे कथा लिखि कऽ फाइनलो तँ नहियेँ कएल होइत अछि.! बुझू जे चिन्तित जकाँ भऽ गेलौं। रातिमे थोड़ेक अबेर भऽ गेल रहए सुतैमे। अबेरक माने दुनू दिस होइए। माने, जैठाम 10 बजे रातिमे सुतैले बिछौनपर चलि जाइ छी तैठाम जँ 11 बाजि गेल, एकटा अबेर ई भेबे कएल। मुदा जँ 10 बजेक बदला नबे बजेमे सुतैले चलि गेलौं तँ एकरा की कहबै? सबेर कहबै, मुदा भेल तँ ईहो अबेरे, माने बेरपर नहियेँ भेल। खाएर अबेर-सबेरमे नहि पड़ि हम अपन खिस्सा जे सुनबए चाहै छी से सुनल जाए। कहबे केलौं लिखैसँ पूर्व चिन्तित जकाँ भऽ गेल रही। 'सगर राति दीप जरय'क मंचपर कथा पाठक अवसरि भेटत अछि। एकाएक गोष्ठीक मूल भावनापर नजैर गेल। केतेको महान साहित्यकार लोकैन ऐ मंचसँ बाजि चुकल छैथ जे ऐ गोष्ठीक परसादे रचनाकारकेँ नव कथा लिखबाक संयोज बनै छैन। वास्तवमे अपनौं ई अनुभव भेले अछि। अही गोष्ठीक बहन्ने किछु कथा अपनो लिखि पेलौं अछि। जहिना सभ कथाकारकेँ नव कथा लिखबाक विवस्ता भऽ जाइ छैन तहिना अपनो भेल। काल्हिए गोष्ठी छी आ अखन धरि कथा नहि लिखलौं। इच्छा भेल जे अखनेसँ लिखब शुरू करी। मुदा आसकैत लागि गेल कि की, कम्मल तरसँ निकलैक मन नहि भेल। मुदा मनो तँ असगर नहियेँ अछि। मनोवैज्ञानिक लोकैन तीन प्रकारक मनक चर्च केनहि छैथ। एक मन कहलक जे कम्मल तरसँ अखन नइ निकलैक मन होइए तँ नहियेँ निकलू। मुदा दोसर मन कहलक, तखन कथा केना हएत? वास्तवमे, कोनो क्रियाक विरोधमे माने बदलामे विकल्प तँ चाहबे करी, नहि तँ शान्ति केना भेटत। विकल्प ठाढ़ करैत तेसर मन कहलक- "लिखैक मन अखन नहि होइए तँ नहि लिखू मुदा लिखब की, अखन सएह विचारि लिअ, पछाइत लिखि लेब।" मने-मन विचार तय कऽ लेलौं। ठीक छै अखन विषय-वस्तुकेँ ठिकिया लइ छी। कोनो रचनाक मूल तत्त्व ओकर विषय-वस्तुए ने होइत अछि। कम्मल ओढ़ने पड़ले-पड़ल कथाक विषय-वस्तु आ उद्देश्यक पाछू मन चलए लगल। मन तँ मने छी। मनक विषयमे अही बीच, एकटा पोथीमे पढ़ने रही जे मनुक्खक मन हजारो बेर एक्को उखराहामे तरपैए। मोन पड़ि गेल भाय साहैबक गप। एकटा नव मित्रसँ काल्हिखन मोबाइलपर गप-सप्प भेल छल। हुनका हम 'भाय साहैब' कहै छिऐन। भाषा आ साहित्यक विषयमे ओ बहुतो बात बाजल छला। जइमे एकटा बात ईहो बजला जे, जे भाषा एतेक मधुर अछि तइ भाषा-भाषीक बेवहारिक पक्ष किए एना कमजोर अछि, माने बेवहारमे ओहन मधुरता किएक ने छइ? देखै छी बजैकालमे केतेक नीक बाजि लैत अछि आ करैकालमे ठीक ओकर उन्टा करैत रहैत अछि। एना किए? भाय साहैबक विचार तँ विचारणीय बुझिए पड़ल। तँए अखनो धरि मनमे बेर-बेर उझुक्का मारि-मारि कऽ उठि रहल अछि। कनेक असथिर भऽ जखन विचारए लगलौं कि आरो अनेको बातक संग अनेको परस्थिति नजैरिक सोझमे आबए लगल। मुदा तही बीचमे बुझि पड़ल जेना हमरो मन तरैप रहल अछि। ओह.! एना जँ मन तरपैत रहत तखन कथा तैयार हएत? किन्नहुँ नहि कथा तैयार हएत.! बिछौनपर सँ उठि मुँह-कान धोइ चाह दिस बढ़लौं। पत्नी बुझि गेली। जाबए अपने कपड़ा पहीरिकऽ कम्प्यूटर ऑन करबाक लेल अग्रसर भेलौं, तैबीच पत्नी चाह नेने लगमे एली। मन भेल पहिने चाह पीब लइ छी, पछाइत खनहन मने अप्पन चाहक काज करब। चाह पीलाक पछाइत मन खनहन भेल। मुदा तेतेक खनखना गेल जे स्वभाविक तौरपर मन निर्णय कऽ लेलक जे आब तँ घुमै-फिरैक समय भऽ गेल। भिनसर भऽ गेल। अखुनका काज तँ घूमब-टहलबक छी। सभ काजक समय होइए किने। टहलैले विदा भेलौं। बिछौनपर जहिना कथाक विषय-वस्तुपर विचार करब पहिल काज सोचि कम्प्रोमाइज कऽ लेने रही तहिना पुन: मन बना आगू बढ़लौं। घरसँ निकैल कनीए आगू बढ़लौं कि एकटा बेकती संग भऽ गेला। ओ हमर पड़ोसी छैथ। नाओं छिऐन धनपति। पुछलयैन- "की समाचार, धनपतिजी?" ओ बजला- "समाचार गड़बड़े अछि।" हम अकचकाइत पुछलयैन- "से की?" हमर अकचकाएबसँ आकि की, ओ बजला- "ऐ बीच हमर पएर-हाथ झुनझुनाए लागल अछि। मन व्याकुल भऽ गेल तँए काल्हि डाक्टर साहैब लग गेल छेलौं।" एतबे बाजि कऽ जेना ओ ठमैक गेला तहिना आगू किछु किछु बजबे ने केलाह। पुछलयैन- "तखन की भेल? माने की सभ कहलैन डाक्टर साहैब?" "पहिने तँ पुछलैन जे राति-के कए बेर लगही होइए। भूख-पियास केहेन अछि, नीन्न होइए कि नहि। कहलयैन सभ किछु। पछाइत रंग-बिरंगक जाँच लिखि देला।" धनपतिजी पुन: पहिलुके जकाँ आगू बाजब बन्न कऽ मुँह चुप कऽ लेला। अपना बुझि पड़ल जाँचक बादक बात सुनौता। मुदा से किछु नहि, एकदम सकदम्मे रहला। हम पुछलयैन- "जाँच कराकऽ डाक्टर साहैबसँ देखौलिऐन की नहि? "हँ, देखौलिऐन तँ.. मुदा.!" "मुदा की?" धनपतिजी जेना खूब चिन्तामे पड़ल रहैथ। अपना बुझि पड़ल जनु कोनो भारी बेमारी धनपतिजीकेँ पकैड़ लेलकैन अछि। एहेन बात लोक केतौ जल्दी बाजितो नहि अछि। मुदा अपने मन कहलक जँ तेहेन कोनो बात रहैत तँ धनपति बजबे करितैथ जे हम डाक्टरसँ देखेलौं, जाँच करेलौं अछि। हिम्मत करि कऽ पुछलयैन- "तखन की भेल?" ओ बजला- "यौ भाय, हमरा मुँहमे जाबी लागि गेल.! डाक्टर साहैब कहलैन अहाँकेँ डायविटीज भऽ गेल अछि।" पुछलयैन- "आरो की सभ कहलैन.?" धनपतिजी बजला- "पनरह-बीस दिन तक आलू-चीनी-चावल बिलकुल बन्न करू। एकबेरमे तीनटा सोहारी आ छोटकी कटोरी भरि दालि खा सकै छी। तरकारी कनी बेसियो खाएब तँ कोनो बात नहि। बीस दिनक पछाइत एकबेर फेर जाँच कराएब आ तेकर बाद कनी-मनी भात खा सकब। सेहो जाँच देखला बाद कहब। आलू-चीनी तँ सोल्हन्नी बन्ने कए दियौ।" धनपतिजीक बात सुनि हमरा मोन पड़ि गेल अपन मित्रक एकटा बात। हमर एकटा मित्र डॉक्टर छैथ। ओ एकदिन हमरा बुझा कऽ कहने छला जे डायविटीज दू प्रकारक होइत अछि। टाइप वन आ टाइप टू। वर्त्तमानमे जे डायविटीज लोककेँ भऽ रहल छै ओ प्राय: टाइप-टू डायविटीज छी। ऐ मे वितरणक समस्या होइ छै, उत्पादनक नहि। हलाँकि ऐ बातकेँ एक बेरमे हम नीक जकाँ नहि बुझि सकल रही। तँए डाक्टर साहैबकेँ पुछने रहिऐन- "ई उत्पादन आ वितरण की..? नहि बुझलौं?" तैपर कहलैन- "टाइप-वन डायविटीजमे प्राय: इंसुलिन बनैमे दिक्कत होइ छै आ टाइप-टू डायविटीजमे इंसुलिनक प्रसारमे, माने वितरणमे समस्या अबै छै। माने टाइप-टू डायविटीजमे शरीरक पेनक्रियाज ठीक रहल। खाली जीवन-शैलीकेँ, माने रहन-सहन, खान-पान आ सोचै-विचारैक तरीका ठीक केलासँ ई पूरा कन्ट्रोल भऽ जाइ छै। एहेन रोगीकेँ बेसी चिन्ता नहि करक चाही। ओना, चिन्ता किनको नहि करक चाही। चिन्तासँ आरो समस्या बढ़िये जाइ छै।" हम धनपतिजीकेँ कहलयैन- "दूर्र.! कोनो चिन्ता नहि करू। काज, भोजन आ आरामक सहतकेँ एकरंग करि लिअ, सभ समस्याक अन्त भऽ जाएत।" ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि उमेश मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक उमेश मण्डल केर पाँचटा कथा कथा २

बाल-बोधक आगू सिक्की-मौनी बाल-बोध, बाल-मन, किशोर-किशोरी इत्यादि शब्दक प्रयोग जिनगीक पहिल एवम् दोसर अवस्थाक श्रेणीबला लेल कएल जाइत अछि। अहिना तेसर एवम् चारिम अवस्थाक श्रेणीमे सेहो अनेको शब्दक सम्बोधन होइते अछि। ओना, हमर मानब बेवहारिक पक्षपर आधारित अछि। तँए, अपन मनतब ईहो अछिए जे बाल-बोध हुअ कि बाल-मन, दुनूकेँ वैचारिक-बेवहारिक दुनू दृष्ट्रीए देखले जा सकैए, जे सभ अवस्थामे सभ रंगक लोक समाजमे छैथ। बहुतो बच्चा एहेन छैथ जे सियानक कान काटै छैथ आ बहुतो सियानक संग वृद्ध लोकैन सेहो ओहन छथिए जे स्वच्छ बाल-मन सदृश अपन जीवनक धारमे प्रवाहित भऽ रहला अछि। आ ओ केतौ तेज धारा पाबि फूल जकाँ हल्लुक देखैमे औत आ केतौ मंथर रहने भरियाएल नै देखबामे अबै छैथ, सेहो नहियेँ कहल जाएत। तहूमे मिथिलामे, जैठाम अनेको धार दच्छिन मुहेँ प्रवाहित भइये अछि। हँ! ई बात अलग जे कोनो धार बारहो मास बहैए, कोनो नअ मास बहैए, कोनो छहमसुए अछि आ कोनो तीनमसुआ सेहो अछिए। अखने, जैठाम अपना सभ छी, दू धारक बीचमे छीहे। पच्छिममे 'बलान' आ पूबमे 'तिलजुगा' अछि। दुनू धारक रूप-रेखा सेहो देखते छी, दू रंगक अछिए। तहिना जँ कनी आरो पूब भऽ कोसीकेँ देखी वा कनीए पच्छिम भऽ कमलाकेँ देखब तँ तहू दुनूक क्रिया-कलाप दू रंगक देखेबे करत। माने कोसी धारक क्रिया-कलाप आ कमला धारक क्रिया-कलापमे अन्तर अछिए। खाएर.., जे अछि ओ सबहक सोझहेमे अछि। नीको अछि अधलो अछि। जहिना धार नीक-अधला दुनू अछि तहिना मनुक्खो अछिए। एहनो मनुक्ख अछि जे बीघाक-बीघा खेत रहितो चाउर बेसाहिये कऽ खाइ छैथ आ एहनो मनुक्ख तँ छथिए जिनका कट्ठो भरि अपना खेत-पथार नहि, मुदा अप्पन उपजाएल अन्न खाइत जीवन-वसर कऽ रहला अछि। भलेँ ओहन खेतिहरक गिनती सरकारक किसानक सूचीमे नै अछि। अनतए जे हौउ मुदा मिथिलामे तँ से नहियेँ अछि, ऐठामक रचनाकारक सूचीमे हुनका 'बँटाइ-किसान' कहले जाइए। ओना, रचनाकार सेहो धारे जकाँ भदबरिया, तीनमसुआसँ लऽ कऽ बरहमसुआ-सबदिना बहैबला सेहो छथिए। मुदा ओ देखनिहारपर निर्भर करैत अछि। एहनो देखनिहार छैथ जे नामे-नाम देखै छैथ आ एहनो देखनिहर छैथ जे क्रिया-कलापकेँ देखै छैथ...। जे क्रिया-कलापकेँ देखैत देखै छैथ, ओहन देखनिहारकेँ 'दृष्टि सम्पन्न' लोक मानल जाइत अछि। हमरा गाममे किसुन काका सेहो ओहने रचनाकार छैथ जिनका 'दृष्टि सम्पन्न' बुझल जाइ छैन। किसुन काका आत्मनिर्भर संस्कृतिक एक-एक पहलूकेँ नीक जकाँ बुझैमे अपन जीवनक अधिकांश समय लगा देलैन। जेकर फला-फल लोकक नजैरमे जे होउ मुदा स्वयं ओ मजगूत दृष्टिबला लोक अपनाकेँ मानै छैथ। किसुन काका जीवनक उत्तरार्द्धमे आबि साहित्य रचना करब शुरू केलैन। ई अपन जीवन प्रत्येक पहलूकेँ जखन लिखब शुरू केलाह तँ हिनक इमानकेँ देख ओझराएल विचारक रचनाकार, ओझराएल विचारक रचनाकार ओ भेला जनिक मंसा-वाचा आ कर्मणामे मेल नइ छैन, ओ सभ हिनकासँ छाँह काटए लगला। किसुन कक्काक एहेन मानब शुरूए-सँ रहलैन जे जे करै छी, सएह बजबो करी आ सएह रचबो करी..। आजुक बदलैत समयमे एहेन भइये गेल अछि जे किनको ऊपर कियो अपन विचार तेना कऽ प्रस्तुत करैए जे शब्दिक रूपेँ बहुसंख्यकेँ समीचिन लगिये जाइ छैन। ओना, शब्दक गहराइकेँ बुझनिहार किसुन काका ओहन विचारक लोकक स्थान मात्र गपे-सप्प भरिमे दइ छथिन। चाहे ओ गौआँ होथि कि अनगौआँ...। प्रसिद्ध रचनाकार बेचन काका सेहो हमर ग्रामीणे छिया। हिनको लग हम बेसी काल बैसै छी। शाब्दिक रूपेँ, माने गप-सप्पमे किसुन कक्काक प्रति बेचन कक्काक सुन्दरे भाव रहै छैन। मुदा क्रिया-कलापमे से नहि रहै छैन। बेचन काका रचनाकार रहितो, रचना करैसँ बेसी अपन प्रसिद्धिक पाछू समय लगबै छैथ। ऐसँ एकटा आरो लाभ हुनका होइ छैन। किछु आमदनी सेहो भइये जाइ छैन। एक हिसाबे ओ अपन जीविकोर्पाणेक साधन बनौने छैथ। कखनो कोनो संस्थाक अध्यक्ष तँ कखनो कखनो संस्थाक सचिवक पदक पाछू अपन जीवनक अधिकांश समय बीतबै छैथ। बेचना काका लग जखन-कखनो बैसलौं, माने जहिया-कहियो गाममे बेचन काका रहला, तँ ओ दूटा बात जरूर सुनेबेटा करै छैथ। पहिल- जेहेन हवा बहए तेहने पीठ ओड़ी। आ दोसर बाज बजैत रहै छैथ- पाइ जँ रहत ने तँ सभ किछु हेबे करत। बाल बोधे आकि की, बेचन कक्काक पहिल बातकेँ नीक जकाँ हम कहियो ने बुझि सकलौं, मुदा पाइबला गप अपनो नीक बुझिये पड़ए। किशुन काका लग बैसैक अवसर बेसी भेटैए। ग्रामीण जीवन अछि आ जीविकोर्पाण कृषि, जखन मन भेल जा कऽ भेँट करि अबै छी। किसुन काका कोनो विचारकेँ सोल्होअना नहि मानि तर्क-वितर्क करिते छैथ। से नीक जकाँ हमरेटा नहि सभकेँ बुझल छैन। हलाँकी किशुन कक्काक सभ बात किछु बुझबो करै छी आ किछु नहियोँ बुझि पबै छी। बेचन काकाकेँ किसुन काका नीक जकाँ जनै छथिन, जे बेचन भरि दिन पाइये पाछू रहैए। ओना, अपना सभ दिन यएह बुझि पड़ैत रहल अछि जे जनु बेचन कक्काक प्रसिद्धिक चलैत किसुन काकाकेँ पटरी नइ खाइ छैन। पैघ चलतीबला साहित्यकार बेचन काका छथिए। खाएर...। कहियो काल जखन दुनू गोरेमे गप-सप्प होनि तँ देखिऐन जे बकझक सेहो भऽ जाइन। बेचन कक्काक करीब-करीब सभ विचारकेँ बेवहारिक कसौटीपर आनि दइत रहैन जइसँ स्वत: हुनके विचार कटि जाइत रहैन। मुदा से अपने तखन बुझि पाबी, जखन किसुन कक्काक संग बेचन काकाकेँ तर्क-विर्तकक बीच संजोग बनइ छल। बहुत दिन धरि अही उहापोहमे रही जे किसुन काका केना खट-दे कोनो विचारकेँ खोइया छोड़ा दइ छथिन..! ऐ चीजकेँ बुझैक जिज्ञासा अखनो ओहिना अछि। खाएर...। किसुन काका लग एतेक तँ अपन बनले अछि जे जँ कोनो ओछो विचार बात होइत निकलैए तँ तेकरा सुधारि बुझा-सुझा कऽ सोझरा दइ छैथ। मनमे सदैत ऐ चीजकेँ बुझैक जिज्ञासा रहबे करए जे आखिर बेचन कक्काक संग किसुन कक्काक विचार-भेदक कारण की छैन? संजोग, कथा गोष्ठी लगिचा गेल छल। कथा गोष्ठी लगिचेने किसुन काका लेखन कार्यसँ थोड़ेक निचेन होइ छैथ। बुझल अछिए जे अखन जँ किछु पुछबैन तँ आरो खोइया छोड़ा नीकसँ बुझा देता। अपन दरबज्जा आ किसुन कक्काक दरबज्जा सटले अछि। विदा भेलौं। दरबज्जापर पहुँचते दूरेसँ बजलौं- "गोड़ लगै छी काका..!" बोली अकाइन, किसुन काका बजला- "आबह-आबह रमेश, नीके हेबह।" कक्काक लगमे जा बैसलौं। हुनकर मन खनहन देख बुझि पड़ल जे अखन जे किछु पुछबैन तँ सहजतासँ पारिवारिक भाषामे बुझा देता। पारिवारिक भाषाक ई गुण होइत अछि जे जँ किनको विषयमे किछु बुझए चाहब तँ ओकर बेकती-चित्रक संग बुझाएल जाइए। किसुन काकासँ पुछलयैन- "काका, बेचन कक्काक विषयमे नीकसँ बुझए चाहैत रही, मुदा..?" किसुन काका बजला- "हौ, ओहन-ओहन लोककेँ बुझब सबहक लेल असान थोड़े अछि।" किसुन कक्काक बातसँ बेचन काकाकेँ चिन्हब आरो जबुड़िया बुझि पड़ल। मन मानि गेल आइयो खोलि कऽ नै किछु कहता। मुदा कक्केक बातकेँ बिटिया बजलौं- "काका, जँए असान नहि अछि तँए ने अहाँसँ पुछलौं?" किसुन काका बजला- "कोनो बेकतीक असली पहचान ओकर बेवहारिक जीवनकेँ देखला पछातिये सम्भव अछि। बातक दौड़मे तँ सभ नीके बुझि पड़तह..! मुदा ओहो बुझनिहार-बुझनिहारपर निर्भर अछि।" प्रसिद्ध बेचन कक्काक विषयमे बुझै-जानैक जिज्ञासा आइसँ नहि, तहूमे हुनक मुँहक विचारकेँ जखन-कखनो किसुन काका लग बजलौं तँ अनेरो आरो बात सोझमे आबि गेने ओझराइते रहलौं। अखनो ओझराइये रहल छी। मनमे भेल, आइ किसुन काकाकेँ छोड़बैन नहि, बजलौं- "काका, कनी फरिछा कऽ कहियो ने?" बजला- "पहिने ई कहह जे गोष्ठीमे चलबह किने?" मुड़ी डोला 'हँ' कहि देलिऐन। हमर 'हँ' सुनिते काका अपन बातकेँ जारी रखलैन- "देखहक रमेश, बेचन सन चरित्रक लोक समाजमे बेसी अछि। बेसी की अछि जे बजै-भुकैबला बेसी लोक ओहने अछि। तँए, देखबहक जे सिक्कीए-मौनीटा मे मिथिलाक संस्कृति हुनका सभकेँ देखा पड़ै छैन।" किसुन कक्काक बात कनी-मनी बुझबो केलौं आ कनी-मनी नहियोँ बुझलौं। 'बजै-भुकैबला बेसी लोक बेचने काका सन छैथ।' ई तँ बुझलौं मुदा 'सिक्की-मौनी'मे आबि ओझरा कऽ चुप रहि गेलौं। हमर चुप्पीकेँ जनु काका आँकि लेलाह, हुनका बुझि पड़लैन जेना रमेश निरास भऽ रहल अछि। आस भरैत किसुन काका बजला- "गोष्ठीमे जाइत-अबैत रहबह किने रमेश, तँ सभ बात बुझि जेबहक।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि उमेश मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक उमेश मण्डल केर पाँचटा कथा कथा ३ जितामे गूहाँ-भाता आ मुइलामे दूधा-भाता..! शिशिर ऋतु अपन वसन्ती वयारसँ वातावरणकेँ बदलैत-बदलैत ई स्पष्ट करबामे समक्ष भऽ चुकल छल जे मौसम केना परिवर्तनशील होइए। गप निज औझुके भोरुका छी, नहि-नहि! भोरुका नहि.! भिनसुरका। भिनसुरका माने जखन टहैल-बुलि कऽ घरमुहाँ भऽ चाह पीबैले निर्धारित जगहपर पहुँच रहल रही। हम चारू भागक अपन संगी सभक संग, माने भिनसुरका संगी सबहक संग, करीब-करीब नित्य एकबेर, चाहक दोकानपर बैसते छी। ओना, आइ अपने कनी देरी भऽ गेल ओइठाम पहुँचैमे। सभ कियो जगहपर पहुँच चाह पीब रहल छला। गप-सप्प चलि रहल छेल। वातावरणमे गर्मपन आबि गेल रहइ। मौसमी गर्मपनक बात नहि करै छी, ओना, ओहो तँ रहबे करइ, मुदा से नहि, ऐठाम हम गप-सप्पक वातावरण-दे कहलौं अछि। आजुक बैसारमे, जहिना राधाजी किछु बेसीए आवेशमे बुझि पड़ला तहिना दुर्गाजी सेहो अपन अनुभवकेँ गप-सप्पक माध्यमसँ स्थापित करए चाहि रहल छला। ओना, दुर्गाजीक शैलीए आवेशपूर्ण छैन, वास्तवमे ई आवेशमे जल्दी नहियेँ अबै छै। खाएर, कारण जे रहल हौ मुदा दुर्गोजीक चेहरापर तमतमी सन बुझिए पड़ल। सबहक-सभ जेना तवाह रहैथ। हमर नजैर पवनपर पड़ल, कहलिऐ- "पवन लाबह एक कप चाह। आइ अपने कनी पछुआ गेल छी।" पवन चाहक कप हमरा हाथमे दैत, फुसफुसा कऽ कहलक- "औझुका गप-सप्पमे बुझू इतिहासे उखड़ल अछि।" कान ठाढ़ तँ रहबे करए। लगैए तँए, दू-चारि घोंट चाह पीला पछाइत थोड़े-थोड़े विषयसँ भिज्ञ हुअ लागल रही। सराधी भोजक गप चलि रहल छेलइ। एक पक्षक कहब रहइ, 'मृत्यु भोज उचित नहि।' आ दोसर पक्ष विषयक भितुरका रहस्यकेँ पकैड़ अड़ल छला। ओ एतबए कहैत जे 'ऐमे की अनुचित छै सेहो ने कहबे? "ऐ मे की अनुचित छै.! से अहाँ नै बुझै छिऐ जे निरर्थक धनक क्षति होइ छै। जितामे गूहाँ-भाता आ मुइलामे दूधा-भाता..!" अपना जेना बुझि पड़ल, एक पक्षक करीब-करीब चारू-पाँचू गोरे अपन बिनु चिन्तन कएल बातकेँ बाजि रहल अछि। मुदा बातो तँ बनौल वातावरणक मजगूत रहस्यमे लिप्त रहिते अछि। वातावरणमे लिप्त ई जे कोनो चीजक नीक-बेजा दुनू पक्ष होइत अछि किने। आइ जइ तरहेँ हमरा-सबहक बीच सामाजिक सम्बन्ध मोट भऽ रहल, मनुक्खमे सामाजिकताक ह्रास भऽ रहल छै, अवसादसँ ग्रस्त मात्र बेकतीए नहि, गाम-समाज सेहो भेल जा रहल अछि। की एहेन स्थितिमे हमरा लोकनिक कर्तव्य किछु नहि? एतबो नहि जे एक-दोसराक बीच आपसी बैठ-उठ केना बढ़त, की हम सभ तइपर किछु ने सोची-विचारी। मुदा जे माहौल बनि गेल अछि तइमे अपनाकेँ सकदमे राखब उचित बुझि हम चुप रहलौं। कियो करए आप-ले माए-ले ने बाप-ले। तखनहि दोसर पक्षसँ प्रश्न उठल- "सराधी भोजमे जे धनक क्षति होइ छै ओ तँ सबहक नजैरपर चढ़ै छह मुदा कर्मक नाओंपर जे तरे-तरे लाखोमे फुकाइ छै ओ धनक क्षति नहि ने भेल? अहूठाम हमरा लोकनि किए ने बजै छी- जितामे गूहाँ-भाता आ मुइलामे दूधा-भाता..!" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि उमेश मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक उमेश मण्डल केर पाँचटा कथा कथा ४ लोके चौपट्ट अछि बुझिते छिऐ चाहक दोकानपर कोनो गपकेँ मात्र चलै भरिक देरी रहैए। एक-पर-एक समीक्षक-आलोचक कि टिप्पणीकार, ओइठाम रहिते छैथ। जेतए चाह अछि तेतइ ने राहो अछिए। चाहक दोकानपर किछु-ने-किछु समीक्षा-आलोचना होइते अछि। आइयो सएह भेल। ओइठाम की भेल से कहै छी, मुदा तइसँ पहिने अपन एक शुभचिन्तक केर बात सुना दइ छी। शुभचिन्तक बेसी काल बजैत रहै छैथ जे वर्तमानमे बेसी लोकक मानसिक स्थिति ठीक नहि अछि। जँ गौर करिकऽ देखब तँ बुझि पड़त पागले लोक बेसी अछि। हँ, तखन पागल जेकरा सामान्य तौरपर बुझि रहल छी तेकर फलकपर विचार कऽ लिअ पड़त। आब अहाँ कहब जे अनेरे पागलपर विचार करब हमरा सबहक काज थोड़े छी, ओ रॉंची-कॉंकेक हिस्सामे अछि। नहि, जँ पागलक स्तरपर विचार करब तँ स्पष्ट बुझि पड़त जे जे काज जनता-सँ-सरकार धरिक जिम्मामे अछि, माने सरकारक अपन आ जनताक अपन, तहूमे पगलपन्नी खेल पसैर जाइए। हँ, से तँ अछिए। सबहक अपन-अपन काज अछि तँए सभकेँ अपन किरदानीपर विचार करैये पड़त। हलाँकि अनका दोखी बनाएब केकरो लेल आसान होइते अछि, तँए अपनाकेँ बँचाइयो सकिते छी। ई कहि बँचा सकै छी जे, जे काज फल्लाँक छिऐ तैपर अनेरे हमसभ कथी-ले मगजमारी करब। खाएर जे जे करी। सभ अपन-अपन कर्मक मालिक छैथ। आब आउ चाहक गप-सप्पपर। भिनसरे जखन चाहक दोकानपर पहुँचलौं तँ देखै छी महेशजी आ दुर्गाबाबूक बीच हॉट टॉक चलि रहल छैन। महेशजीक कहनाम रहैन, तीन किलो चाउर आ दू किलो गहुम जे सरकार फ्रीमे आकि कम दाममे दऽ रहल अछि, से सभकेँ काहिल बना रहल अछि। भाय, जखने केकरो कमाएल भेटतै, पुड़बैले अपना मिहनत नहि करए पड़तै, माने पेटसँ निचैन भऽ जाएत तँ किए ओ श्रम करत। जखन श्रमे नहि करत तँ देशक विकास केना हएत? दुर्गाबाबूक कहब रहैन जे सरकार केकरो कोढ़ि-काहिल बनबए नहि चाहि रहल अछि। असलमे, अनाज दुइर भऽ रहल छेलै, तँए गरीब लोकक बीच ओकरा बॉंटिये देब नीक बुझलक। हमरा बैसते देरी पवन चाहक गिलास हाथमे धरा देलक। पीबए लगलौं। मुदा मनक पकड़मे चाहक स्वादसँ बेसी दुनू गोरेक गप आबि रहल छल। जखन दस घोंट चाह पीलौं कि एकाएक मुहसँ निकैल गेल- "अनेरे अहाँ दुनू गोटा कथीले चाउर-गहुमसँ लऽ कऽ सरकारक पाछू पड़ल छी। औझुका मौसम-दे सुनबो केलिऐ जे सॉंझखन अन्हर-बिहाड़ि अबैबला अछि।" महेशजी बजै-भुकैबला लोक छथिए। हिनक पिता दरभंगा राजमे रहथिन, जमीनदार लोक, मुदा एकलखाइत सभ जमीन कोसीमे कटि गेने अखन से नहि छैथ ओ फराक बात। महेशजी बजला- "मौसम विभागक सभ बात सोल्हन्नी सत्ये नहि होइए, डाकडर साहैब।" डॉक्टर नहि आ ने डाक्टर, 'डाकडर' बजला महेशजी। मुदा, महेशजीक मनमे शब्द सम्बन्धी कोनो ओझरी नहि रहैन। ओना, शब्दकेँ ओझरा-ओझराकऽ खाइबला लोक लेल ओझरियो होइते अछि। मुदा महेशजी सभ डॉक्टरकेँ 'डाकडर' माने डाकडरे कहै छथिन, एकरूपता रहने अनेरे ओम्हर कथीले जाएब। महेशजी आगू बजला- "अन्हर-बिहाड़ि कि पानि-पाथर आकि भुमकम-अनडोलन जे अबै-के हेतै एबे करत। ओकरा सभकेँ छोड़ू। अखैन जे गप चलि रहल अछि तैपर आउ।" "की गप चलि रहल अछि?" हम पुछलयैन। तइ बिच्चेमे एक व्यक्ति, हुनक नाओं केना कहब, चिह्नते ने छेलिऐन। ओना, ओ चेहरा-मोहरा आ लत्ता-कपड़ासँ महात्मा सदृश बुझिये पड़ि रहल छला। जेहने लाल टुहटुह चेहरा तेहेन तँ नहि मुदा तइसँ थोड़ेक मधिम रंगक एकरंगा कपड़ा पहिनहि रहैथ। ओ महत्माजी बिच्चेमे बजबाक उपक्रम केलैन कि दुर्गाबाबू रोकैत अपन बात बाजए चाहला। जे हमरा नीक नहि बुझि पड़ल। मना करैत दुर्गाबाबूकेँ कहलयैन- "दुर्गाबाबू, महात्माजी जे बाजए चाहै छैथ से सुनि लिअ तखन बाजब।" महेशजीक चेहरा देखबैत, माने इशारा करैत महात्माजी खूब तरंगि कऽ बजला- "ओ जे कहि रहला हेन, अक्षरस: सत्य कहि रहला हेँ। अँइ यौ, सरकारक घरमे अनाज दुइर हेतै तँ हेतइ। देखै छी जे प्रत्येक थानामे लाखोक गाड़ी-घोड़ा सड़ि रहल अछि। कहाँ एको रती केकरो ममत छै। देशेक धन माटि भऽ रहल अछि किने। असलमे मनुक्खकेँ काहिल बनबैक परियास छी अनाज देब। भाय, जखने बैसले-बैसल पेट भरतै तँ लोक कोढ़ि हेबे करत ने।" आब अहाँ एना नहि सोचए लागब जे पेटे भरब मात्र मनुक्खक उद्देश्य थोड़े छी? नइ छी, मुदा ई ओइ स्तरमे पहुँचल जगह परक गप हएत। अखन अपन सबहक बीचक बात दोसर अछि। महेशजीक चेहरापर जेना खुशी छिटकए लगलैन। हुनका बुझि पड़लैन जे हमर विचार ऊपर भेल। महात्माजीक विचारसँ स्पष्ट भइये गेल जे केहेन गरीब लोकक महात्मा छैथ। मन तँ भेल किछु कहिऐन। मुदा तइ बिच्चेमे एकगोरे, जनु हुनका महात्माजीक तरङब नहि सोहेलैन, बाजए चाहला। महेशजी हुनका रोकए चाहलैन, मुदा तइ बिच्चेमे अपने महेशकेँ रोकैत बजलौं- "चाह पीबैक जगह छी। सबहक मनमे किछु ने किछु अछि, जँ ओ बाजए चाहै छैथ तँ हुनको सुनि लियौन।" ओइ बेकतीकेँ जेना आरो सह भेटलैन, महात्माजी दिस मुखातिब होइत बजला- "महात्माजी, कोन एहेन परिवार अछि माने माए-बाप अछि जे अपना बेटा-पोता ले जमा करिकऽ रखने नइ छैथ आकि रखैले भरि दिन अपसियाँत नइ रहै छैथ। जहाँ तक कि नीक-बेजाए कि बेजाए-नीक, सेहो करैले बुधिक प्रयोग करिते छैथ, तैठाम किए ने हम सभ बुझि पबै छी जे ओहो मनुक्खकेँ काहिल बनबैत हेता?" हम चुप्पे रहि गेलौं। बात समीचीन बुझि पड़ल। हमरा अपन शुभचिन्तक विचार मोन पड़ए लगल। चाह तँ कखन ने खतम भऽ चुकल छल। महात्माजी अपन चालिये कि महेशजीकेँ पाबि आकि की सोइच, एकाएक संस्कृतमे श्लोक-पर-श्लोक बाजए लगला। अपना हाथमे खाली गिलासटा रहए, कहबे केलौं चाह सठि गेल छल। खाली गिलासकेँ ब्रेंचतर राखि पान दिस बढ़ि गेलौं। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.उमेश मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि उमेश मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक उमेश मण्डल केर पाँचटा कथा कथा ५ चौदहो देवान साँझू पहर। टहलै-बुलैले निकलल रही। ओना, घुमतीक बेर भऽ गेल छल माने टहैल-बुलि कऽ आपस होइत रही। एकहाथमे मोड़ल छत्ता रहए आ दोसर हाथमे मोबाइल। हलाँकि मेघ एक्कोबेर झिसियोबो ने कएल। छत्ता जहिना मोड़ल लऽ कऽ चलल रही तहिना मोड़ले छल। दुनूकेँ एक हाथसँ दोसर हाथमे फेड़-बदल करैत लफरल चलैत रही। जहिना अपने लफरल चलैत आबि रहल रही तहिना सड़कक कातक खेतमे टरटराइत बेंगक बोलीक टाँस लाखो प्रश्न ठाढ़ कइये रहल छल। आखिर ओकरो सभकेँ मौका भेटल छै किने, अपन बात अपना शब्दमे रखैक अधिकार की ओकरा नइ छै, छेबे करइ। ओना, कखनोकाल टरटरीक टाँस अनसोहाँत सेहो लगि जाइ छल। छत्ताकेँ एक हाथसँ दोसर हाथमे लैत रही कि तखने मनमे उठल, अनेरे एकरा हाथ लगा विदा भेलौं। नहि जानि, बेंगक टरटरी आकि अजबाड़ल दुनू हाथक कारणेँ, एकाएक मनमे अफरा-तफरी उत्पन्न भेल। मन जेना औगताए लगल। मुदा बिच्चेमे शान्त मन मोन पड़ैत कहलक- "बिसैर गेलौं, केना माथपर गहुमक मोटरीकेँ एक हाथे पकैड़ दोसर हाथमे छत्ता लऽ कऽ मिलपर पिसबैले जाइत रही.? अखन तँ मात्र साए ग्रामक मोबाइल अछि।" वास्तवमे, यएह बरसाती समय छेलइ। रस्ता-पेरा बुझू चलै जोग नहि छल। थाल-किच जे रहै से तँ रहबे करइ जे सड़कक कटाइर-खोंरा एक-दोसरकेँ काटि देने छल। माने, कटल सड़क रहने एक-टोलक लोकसँ दोसर टोलक लोक प्राय: कटल-हटल रहै छल। एक टोलसँ दोसर टोल जाएब कठिन छेलइ। मुदा खाँहिंसो तँ एक्के रंगक होइत नहि अछि। जिनगीसँ जोड़ल खाँहिंसकेँ कोनो धरानी पुरबए पड़िते छइ। आइ ने पीच झलैक रहल अछि...। मन सुहकारि लेलक। असथिर भेल। चालिमे तेजी आएल। दस डेग जखन आगू लफरलौं कि बुझि पड़ल कियो दू बेकती अपनामे गप-सप्प करैत आगूए बढ़ि रहल अछि। आगू बढ़ब बुझि धियान हुनका सबहक गपपर केन्द्रित भेल। ओना, लगले बोलीसँ चिन्ह गेलिऐ जे धीरू आ सुरेन्द्र छिया। अपने पाछू-पाछू रही, तँए टोकब उचित नहि बुझि सुनए लगलौं। सुरेन्द्र बाजल- "धीरू, जहियासँ गंगाक गाड़ी चलबए लगलौं तहियासँ बुझू जे...।" सुरेन्द्रकेँ रोकैत बिच्चेमे धीरू बाजल- "थम्ह, कनी लगही करए दे।" सड़कक कातमे ठाढ़ भऽ धीरू पेशाव करए लगल। ऐगला गप सुनैक जिज्ञासामे कि की, हमहूँ अपन डेग छोट कए लेलौं। अन्हार रहबे करइ। मुदा अन्हराएल रहलौं नहि, मोबाइल टनटनाए लगल। मोबाइलकेँ सैलेन्टो केना करितिऐ, पत्नीक फोन छल। रिसिभ करैत पुछलयैन- "कहू।" पत्नी बजली- "इभनिंग वाक करै छी कि नाटइ वाक?" कहलयैन- "आबिये रहल छी।" कहब ठीके रहैन। अन्हार बढ़ि रहल छल। ताबतमे सुरेन्द्र आ धीरू पाछू घुमि आगूमे ठाढ़ भेल। अन्हार रहने दुनूमे सँ कियो ने बुझि सकल छल जे हमहूँ पाछूए-पाछू छिऐ। मुदा मोबाइलपर जे बजलौं तइ बोलीकेँ अकानि दुनू गोरे बुझि गेल जे रमेश छी। केतबो अन्हार किए ने रहए मुदा देखैबलाकेँ तँ देखले जाइए किने। संयोगसँ दुनू गोरे एक्के स्वरमे बाजल- "रमेश?" बजलौं- "हँ।" धीरू बाजल- "चलू तीनू गोरे संगे गप-सप्प करैत चली।" पुछलिऐ- "सुरेन्द्र की बजै छला?" सुरेन्द्र अकचकाइत बाजल- "नइ बुझलौं, भाय साहैब।" तैबीच धीरू मोन पाड़ि देलकै- "कहै जे छेलही, गंगबाक ड्राइवरी-दे।" तइ बिच्चेमे कहलिऐ- "हँ, हँ सुरेन्द्र। की कहै छेलहक सेहो कहक आ चलबो करह।" सुरेन्द्र बाजल- "नइ रमेश भाय, अहूँकेँ तँ बुझले अछि किने जे गंगा भैयामे आइ सात-आठ महिनासँ डरेबरी करै छी। दिल्लीसँ आब गामे आबि गाड़ी चलबै छी। सएह धीरू भायकेँ कहै छेलिऐन जे देखियौ गंगा कहलक भरि बरसात गाड़ी नै चलत, ताबे कोनो दोसर काज पकैड़ ले।" सुरेन्द्रक बात जहिना चुप भऽ सुनै छेलौं तहिना थोड़ेकाल आरो चुप्पे रहि गेलौं। मनमे गंगाक बात सभ जे आएल से तँ एबे कएल मुदा सुरेन्द्रक जिनगी सेहो आगूएमे छल। यएह रोड छीऐ जइमे एतए-सँ गामक ओइ पार तक सात-आठटा कटाइर रहै छेलै। आ तइमे सुरेन्द्र भरि बरसात माछ मारि गूजर करै छल। मुदा आब जहिना पीच बनल तहिना सुरेन्द्र ड्राइवर भऽ गेल अछि। बेचारा ने ओतेक पुजिगर अछि आ ने लूरिगर। लऽ दऽ कऽ खाली गाड़ी चलबऽ अबै छइ। गाड़ी-घोड़ाक लॉनोक हिसाब-किताब साधारण लोकक हिसाबसँ बनौल नहि अछि...। एकाएक मन तमतमाएल। भाय! शहरमे ने एक्कोटा लूरिक बलेँ लोक जीब लैत अछि। मुदा से गाममे थोड़े हएत। गाममे एक लूरिक बलेँ जीब कठिनाह अछि। गाम तँ गाम छी। ऐठाम तँ चौदहो देवान खेलल जाइए। मन भेल सुरेन्द्रकेँ कहिऐ- सुरेन्द्र, हमरा-तोरा सन लोक लेल दू-तीन-चारि तरहक लूरिक खगता अछि। मुदा लगले दोसर मन ईहो कहबे केलक जे- कोनो नीको विचार समय पाबिये कऽ कहलापर नीक होइए, नहि तँ 'प्रवचन' बनि कि कोनो कम नीक-नीक विचार ओंघराएल अछि...। तँए, चुप्पे रहलौं। मुदा तइ बिच्चेमे सुरेन्दक मोबाइल टनटनेलै, गंगाक कॉल देख सुरेन्द्र सभ बातकेँ बिसैर बाजल- "हँ गंगा भैया?" "सुरेन्द्र, ओना तँ भरि बरसात मना कए देने छेलियह मुदा काल्हि कोणी जाइक अछि, छुट्टी छह तँ चलह।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- श्रद्धा-सम्मान कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा श्रद्धा-सम्मान धनानंद मुंबई मे सी० ए० डी० एन० मिश्रा नाम सँ सुव्यवस्थित आ बेस चिन्हलगर...... चाहे ओ व्यावसायिक क्षेत्र हो, सामाजिक सहयोग हो आ कि सांस्कृतिक मंच .... हुनकर उपस्थिति सभ ठाँ निश्चये बुझू। गामक लोक ताहू मे भातिज .... आ तैं मुंबई जा कs हुनका सँ बिनु भेंट-घाँट केने आपस आबि जाई से नीक नहिं.... ताहू सs पैघ बात जे रहबाक ठेकानक तलाश तs छलाहे हमरा। फोन सs पता बुझि सीधे स्टेशन सs अंधेरी हुनकर ऑफिस पहुँचलहुँ। बेस अइल-फैल सुसज्जित ऑफिस। मुदा हमर ध्यान आकृष्ट केलक सामने देवाल पर हुनकर पिता के मुस्कियाईत पैघ फोटो पर लटकल माला! मोन घिड़नी जकाँ नाचि गेल असाध्य कष्ट मे हुनकर कुहरि-कुहरि कs काटल अंत समय! .... बेड सोर!! ..... दिन-राति दर्द सँ चिकरैत!!! घर ततेक गन्हाइत जे ओम्हर हुलकियो देब कठिनाह। देख-भाल लै राखल नर्स अपन नाक-मुँह बान्हि निन्नक सूईया भोंकि कहुना अपन कर्तव्य पूरा करय। तकरा बाद थोड़ेक काल शांत .... फेर वैह क्रम! सभक ठोर पर एक्के बात.... बूढ़ा लेल भगवानक घर मे जगह के अकाल पड़ि गेल छनि!...... एहन नारकीय कष्ट सs उठा लेथिन से नहिं!! .... नहिं जानि कोन जनमक पापक भोग भोगा रहल छथिन......!!! " कक्का कोन ध्यान मे चलि गेलहुँ? चाहो सेरा रहल अछि! " " नहिं ... नहिं! बाटक झमाड़ल ओहिना कने आँखि लागि गेल। " " चलू डेरा पर स्नान-भोजन कs आराम करब। " पाछू-पाछू बिदा होईत हम एक बेर फेर ओ फोटो आ ओहिपर लटकल माला के देखने रही। मोन थीरे नहिं भs रहल छल। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- अपन रचित रचना जगदीश प्रसाद मण्डल

अपन रचित रचना बच्चेसँ दीनबन्धु भायमे आनसँ भिन्न एकटा विशेष गुणक विशेषता रहलैन। ओना, ईहो नहि कहल जा सकैए जे एहेन विशेष गुण विशेषित रूपमे दीनबन्धुए भायटा मे छैन आ दोसरमे नहि अछि। किछु-ने-किछु सभमे अछि। मुदा सभमे जगजिआर नइ भऽ पबैत अछि। या तँ तरे-तर सड़ि जाइए वा अधकच्चू भऽ रहि जाइए। किछुए एहेन लोक होइ छैथ जिनकामे सौन मासक फुहार जकाँ सालो भरि फुहराइत रहै छैन। बच्चेसँ दीनबन्धु भायमे, जखन पाँचे-छअ बर्खक रहैथ, आन बच्चासँ भिन्न एकटा गुण प्रस्फुटित भेलैन। ओ भेलैन जे जहिना कोनो बच्चा आकासक आवाज सुनि, आकासक आवाजक माने भेल दूरसँ सुनल आवाज, कविताक स्वर गुनगुनाए लगैए, तँ कियो कॉपीपर कलमसँ लिखए लगैए, कोनो बच्चा कुम्हारक चाकपर गढ़ल वर्तन जकाँ अपन बाटी-गिलासमे गरदा-माटिकेँ भरि गढ़न करए लगैए, माने गिलासेक अकारकेँ गढ़ए लगैए आदि-इत्यादि। मुदा तइ सभसँ हटि जखन दीनबन्धु भाय पाँचे-छअ बर्खक छला, तखने छोट-छोट गाछ सभकेँ चिन्हैक बाट पकड़लैन। प्रकृति तँ गजब अछिए। जहिना हजारो-लाखो रंगक जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ गाछ-बिरीछ रहनौं एक-दोसरसँ भिन्न सेहो अछिए तहिना एक-एक रंगक जीवमे सेहो हजारो- रंगक रूपो आ गुणो अछिए। मनुक्खे छी, रंगे दिस देखब तँ कोन रंगक मनुक्ख नहि भेटत। तहिना ओकर शकल-सूरत दिस देखियौ तँ हजारो रंगक सेहो भेटत। केकरो साढ़े आठ फीटक लम्बाइ देखबै तँ केकरो फीटोसँ कम, तहिना कुत्ता-बिलाइ, गाए-महींस इत्यादि दिस देखबै तँ सेहो तहिना अछि। एहने अजब दुनियाँकेँ देख दीनबन्धु भायकेँ सेहो अपन शक्तिक धुन सवार भेलैन। दीनबन्धु भाय बच्चेमे केकरो मुहेँ सुनने छला जे मनुक्ख तँ मनुक्ख छी, ओ अनका भरोसे थोड़े जन्म लइए। ओ तँ अपना बाँहि-बलक आशामे रहैए। अपना भरोसे जन्म लइए आ अपन शक्तिक अनुकूल दुनियाँ निरमबैत निर्माण कार्य पूर्ति करैत आगू बढ़ैए। कहब जे अप्पन भरोस आ अनकर भरोस की भेल? अप्पन भरोस भेल स्वनिर्मित जीवन बना चलब आ अनकर भरोस भेल, दोसरपर जीवन बिताएब। जेना, देखबो करै छी आ सुनबो करै छी, आश्रय आश्रित जीवन। सोभाविक अछि, खेती-पथारी हुअ कि माल-जाल आकि गाछीए-कलम, जे हम अपनाबै छी, लगबै छी, से तँ अपने ने ओकर गुण-दोष देख कऽ, माने चुनि-चुनिकऽ, बुझि-सुझिकऽ। प्रकृतिमे तँ सभ किछु पसरले अछि। दुनियेँ पसरल अछि, नीक-बेजाएसँ भरल अछि। तँए, चुनि-चुनिकऽ आनब सोभाविक अछि। बुझल बात तँ अछिए जे एक-दिस वेदक निर्माणकर्ता भेला आ दोसर दिस चार्वाक सन विरोधी सेहो भेला। दीनबन्धु भाइक विषयमे बहुत तँ नइ बुझल अछि, मुदा जे बुझल अछि, माने जे देखै छी तइमे दीनबन्धु भाय समाज मे असगरे देख पड़ै छैथ। ओना, दीनबन्धु भाइक विषयमे बेसी ऐ दुआरे बेसी नइ बुझल अछि जे आइसँ पचास बरख पूर्वेसँ ओ समाजक संग जुड़ल रहला। अपने तँ तीन साल पहिने कौलेज छोड़ि निकलबे केलौं अछि, जैबीच खेत-पथारक आड़िकेँ मात्र छुलौं अछि। तँए कहब जे माटियो छुबि लेलौं, सेहो बात नहियेँ अछि। खेत-पथारक तरमे माटि अछि किने जे रंग-रंगक गुणो आ रूपो बनौनहि अछि। ओकरा वएह ने छुबि सकैए जे खेतमे कूप खुनि, पानि निकालि मड़ुआ बीआ पटा, मड़ुआक खेती बटाइ करैए आ काँटू-पुत्ती लऽ कऽ घर अबैए। यएह तँ श्रमक दुर्गैत अछि। जेकर गिनतियो माने मड़ुआक गिनती, अन्नमे नहि अछि। पैछला साल मोटका अन्न मानल गेल अछि, भलेँ मड़ुआ सभ अन्नसँ मेहिये किए ने हुअए मुदा मोटका अन्न कहबैए..! यएह तँ दुनियाँक खेल छी, मोटका मेही अछि आ महीका मोट बनि गेल अछि। ओना, दीनबन्धु भाइक चर्च, आन-आनक मुहेँ जे सुनैत एलौं हेन तइमे तेते हुनकर धाख मनमे पकैड़ नेने अछि जे जखन हुनका लग जाएब तखन की पुछबैन, आगूमे प्रश्न बनि ठाढ़ भऽ जाइए। मुदा आइ, जहिना कोनो जिज्ञासाक झलक मनमे झलकैए आ तखन जे मनक उत्सुकता जगैए तहिना अपनामे भेल। मने मनकेँ धिरकारए लगल जे मनुक्ख जँ मनुक्ख लग बैस दुनियाँ-जहानक विचार नहि करत तँ दोसर के करत। ऐठाम एहेन धोखा नइ हुअए जे सभसँ जे नमहर जीव अछि से करए, तखन शदूल पंछी आ हाथी जानवर छोड़ि दोसर कइये के सकैए। तइसँ थोड़े काज हएत। ..तरे-तर मनकेँ समगम करैत विचार करिकऽ दीनबन्धु भाय ऐठाम विदा भेलौं। एकाएक मनमे उठल जे अप्पन तइस बर्खक उमर अछि आ ओ माने दीनबन्धु भाय आइसँ तीस साल पहिने कौलेज छोड़ला पछाइत गाममे किसानीकेँ अंगीकार करैत अपन मानवीय मूल्यक निर्वहन करैत जीवन-यापन कऽ रहला अछि। कखनो कऽ मन पाछुओ ससैर जाए आ कखनो कऽ आगुओ ससरए लगए। मन भलेँ आगू पाछू ससरल मुदा जहिना आगू मुहेँ विचार चलि रहल छल तहिना डेगो संगे-संग चलल। दीनबन्धु भाइक दरबज्जासँ जखन कनी पाछुए रही कि नजैर आगू बढ़ि दीनबन्धु भायपर पड़ि गेल। दीनबन्धु भाय अपन दरबज्जाक आगूमे सिंगहार-फुलक गाछकेँ देख रहल छला। देखलयैन जे गाछकेँ भाय देखबो करै छैथ आ ठोर बिजका-बिजका गुनगुनाकऽ बजबो करैथ, 'हाय रे प्रकृति, केकरो भोरमे फुलबैए आ केकरो साँझमे। केकरो बारह बजे दिनक टहटहौआ रौदमे तँ केकरो बारह बजे गुप-गुप अन्हार रातिमे.! फूलक गाछपर सँ एकाएक दीनबन्धु भाइक नजैर हमरापर पड़लैन। ओ ठकमकेला। ठकमकाइक कारण छेलैन मनकेँ मानि जाएब जे भरिसक ई अपने गामक अछि, तँए गौंए भेल। मुदा नीक जकाँ चीह्न नहि रहलिऐ हेन। अपने मन ईहो कहैन जे तखन गौंआँ केना भेल? गौंआँ तँ ओ भेल जे संग मिलि चलए। दरबज्जाक आगूमे दीनबन्धु भाय लग पहुँच बजलौं- "भाय साहैब, गोड़ लगै छी।" गोड़ लागबकेँ अपना विचारे अपने बुझि रहल छेलौं जे अपना सभक जे पारिवारिक-सामाजिक बेवहार अछि तइ अनुकूल बजलौं। मुदा दीनबन्धु भाय अपना मने बुझि रहल छला जे गोड़ लगैक माने भेल संग-संग चलब। मनमे भलेँ जे दीनबन्धु भायकेँ उठैत होनु मुदा बेवहारिक पक्ष मजगूत छैन्हे। आसिरवाद दइसँ पहिने बजला- "पहिने चौकीपर बैसह। पछाइत सभ किछु हेतइ।" ओना, मनमे भेल जे कहिऐन, भाय, आब तँ कुरसीक चलैन भऽ गेल अछि, चौकीक प्रथा तँ पुरान पड़ि गेल। मुदा लगले अपने मन रोकलक जे एहनो तँ सम्भव भइये सकैए जे बेकती-बेकतीक दूरीपर, माने सामाजिक, साम्प्रदायिक, जातीय इत्यादि, लगमे बैस विचार-विमर्श करी। तँए चुप्पे रहब नीक बुझलौं। तैबीच मनमे एकटा विचार अपने उपैक गेल। उपकल ई जे जखन गप-सप्पक क्रम शुरू हएत तखन तेहेन प्रश्न भाइक आगूमे राखि देबैन, जेकरा पुरबै आ करैमे मासो दिनसँ बेसी समय लगतैन। अनेरे तँ कनियेँ कालक पछाइत, जखन बजैसँ मन अकछेतैन तँ बजबे करता जे 'दोसर दिन ले रहए दहक', अनेरे ने सम्बन्ध-सूत्र बनि जाएत। जइसँ आवाजाहीक दुआर खुजि जाएत। बैसते दीनबन्धु भाय बजला- "बौआ, अनचिन्हार तँ नहि मुदा अधचिन्हार तँ जरूर छह, तँए पहिने अपन परिचय दऽ दाए।" तैबीच आँगनसँ कुसुमांगिनी चाह नेने दरबज्जापर पहुँच चौकीपर चाह राखि आगूमे ठाढ़ भऽ गेलैन। पत्नीकेँ ठाढ़ भेल दीनबन्धु भाय देखलैन जरूर मुदा तैयो आगू बजला- "बौआ, अपना सभक जे नैतिक पक्ष अछि, ओ ऐ रूपक अछि जे तोरा चाह पीआएब हमरा बरजित करक चाही, मुदा परिवेश एहेन बनि गेल अछि जे ओ अपमानजनक मानल जाएत।" दीनबन्धु भाइक विचार जेना ठाँहि-दे कपारमे लागल तहिना मन झनझना गेल। अपने किछु ऐ दुआरे नइ बाजी जे आगूमे एला पछाइत जँ बाजब जे चाह नइ पीबै छी, से तँ सरासर झूठ हएत। तँए, पहिने दीनबन्धु भायकेँ चाह हाथमे लिअ देलिऐन, पछाइत अपने लेलौं। दीनबन्धु भाय बजला- "अप्पन परिचय पहिने दाए, बौआ।" परिचय दिऐन, मुदा की परिचय दिऐन..! अग-दिगमे पड़ि गेलौं। अपने मनकेँ सक्कत करैत विचारलौं जे जहिना कौलेजमे शिक्षकक आगू कोनो प्रश्ने रखै छेलौं आकि उत्तरे दइ छेलिऐन तहिना पुछबो करबैन आ उत्तरो देबैन। बजलौं- "भाय साहैब, तीन साल पहिने बी.ए. पास कए कौलेज छोड़लौं। कौलेज छोड़ैत-छोड़ैत मनमे उठि गेल जे नोकरी जीवन बान्हल जीवन होइए। जे जीवन शुरू करब वएह जीवन अन्त तक बनल रहत। मुदा मनक मालिक मनुक्ख तँ से नहि छी, कखनौं अपन रूप बदैल जीवन बदैल सकैए। तखन तँ जीवनक संग मनक झगड़ा हएत। मनक झगड़ाक रगड़ाक भार देह थोड़े उठा सकैए, ओ तँ तरे-तर गलि जाएत। तँए गामेमे रहि स्वनिर्मित रचना अपने जकाँ करए चाहै छी।" हमर बात सुनि दीनबन्धु भाइक मन ओहिना अलिसा गेलैन जेना कोनो सागेक पात आकि फूले-पत्ती, गाछसँ हटला पछाइत अलिसा जाइए। किछु पुछैसँ पहिने दीनबन्धु भाय हियासि-हियासि हमर चेहरा दिस देखए लगला। तैबीच अपने मन कहि देलक जे जखन अखन तकक जीवनमे दीनबन्धु भायसँ कोनो सम्बन्ध-सरोकार नइ रहल अछि, तखन तँ जहिना हमरा प्रति ओ निर्मल-निश्छल छैथ तहिना तँ हमहूँ छीहे। तइसँ जीवनक भूमि सहिट अछिए। अपन चेहराकेँ ओहिना बनौने रहलौं जेना कौलेजमे शिक्षकक आगू बनौने रहइ छेलौं। मध्ययुगीन कवि जकाँ नख-सिख रूप सेहो देखलौं आ सिख-नख रूप सेहो देखबे केलौं, भलेँ जीवनक सिख-नख आकि नख-सिख परेख पेलौं वा नहि। मुदा दीनबन्धु भाय से नहि, ओ वर्तमानक बीर्तमान रूप देखलैन। दीनबन्धु भाय बजला- "बौआ, अपने जकाँ की कहलहक?" नीक जकाँ किछु बुझल रहैत तखन ने, से तँ नीक जकाँ किछु बुझल छल नहि, कन्हा झाँकैत बजलौं- "भाय साहैब, अपनेसँ भेँट करैक यएह कारण अछि।" सभ बात सुनि दीनबन्धु भाय बजला- "बौआ, हरि अनन्त हरि कथा जकाँ दुनियाँ अनन्त अछि। दुनियाँमे सात अरब मनुक्खक शकले-टा नहि, सात अरब रंगक बुद्धि-विवेक सेहो छइ। एहेन अथाह दुनियाँमे के केते अपनाकेँ थाहि सकत, यएह भेल मनुक्खक बुइधिक बुद्धिमता।" दीनबन्धु भाइक विचार सुनि जेना मनक भाव भूमि बदलए लगल। संक्रमित होइत भाव-भूमि देख मन चहैक उठल- "भाय साहैब, अपन रचना?" दीनबन्धु भाय बजला- "बेवहारमे की देखै छहक, मनमे कोनो कथा-पिहानीक चित्र छह, आ सोझामे ओइसँ विचित्र रूप देखै छहक, एहेन परिस्थितिमे अपने मन ने स्वनिर्मित रास्ता बनौत।" नशा-पान केलाक पछाइत जेना मनक विचार उगडुम करैत घुमए लगैए तहिना अपनो मनमे भेल। दीनबन्धु भाइक विचारकेँ अंगीकार करैत बजलौं- "मुदा?" दीनबन्धु भाय बजला- "मनुक्ख स्वतंत्र प्राणी छी। तँए स्वतंत्र जीवन बना दुनियाँमे किछु करब अछि। बस, एतबे।" (०७ अगस्त २०२२) -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) दोसर पड़ाव मौसी ऐठाम कुशेसर रूकला नहि। गप-सप्प केलाक पछाइत माने मौसासँ विचार लेला पछाइत, कुशेसर जहिना गेल छला तहिना लगले अपन गाम घुमियोँ गेला। ऐठाम ई नहि बुझब जे कुशेसरकेँ मौसे कि मौसीए आकि देवने, रहैले नहि कहलकैन। सभ कहलकैन, मुदा काजुल लोकक जीवन काजमे तेना जुलि बन्हा जाइए जे अपन सुधि-बुधि सभ बिसैर काजक संग दौड़ए लगैए। चारि-पाँच सालक कलकत्ता प्रवासक अनुभवी जीवन कुशेसरकेँ तेना सिखा देने छेलैन जे बुझि गेला जे मनुख सैकड़ो बन्धनसँ बन्हाएल अछि, मुदा गाए-महींस जकाँ डोरी गरदैनमे नहि लगल छै। कुशेसर नीक जकाँ बुझए लगल छैथ जे सइयो कि हजारो बान्ह-छेकमे मनुख बान्हल अछि मुदा ओ अछि जीवनक क्रिया, बेवहार आ विचारमे। मुदा से अखन नहि, अखन एतबे जे कुशेसर कौल्हुके भरि समय देख माने बीचक एक दिन, अपनो तैयारीक संग परिवार-समाजसँ भेँट करैत, अपन अनुपस्थितिक भार परिवार-समाजपर देला पछाइत गाम छोड़ि बाहर जेता। बीच रस्तामे, माने देवन ऐठामक रस्ताक बीचमे, जखन कुशेसर पहुँचला तखन देवनक कलकत्ता ठौर-ठेकानपर नजैर गलैन। नजैर जाइते बुझि पड़लैन जे जहिना कोठीमे चाउर रहने केहनो भुखल-दुखल अभ्यागत वा केतबो अभ्यागत किए ने दरबज्जापर आबैथ मुदा तइसँ कि घरबैयाक मुँह जहिना थोड़बो मलीन नइ होइए तहिना कुशेसरक मनमे सेहो उठलैन। मनमे उठलैन जे जखन कमासुत बनि जन्म नेने छी तखन काजक कमी दुनियाँमे अछि। काजक कमी तँ ओकरा ले अछि जे जीबलाह पुरुख आकि भरछुलाहि स्त्रीगण जकाँ काजक टिपौड़ी होइए। मुदा जे काजक कर्ता अपनाकेँ बुझैए, ओ अपन कीर्तपन देख मानवक रूप देखैए। जखन मानवीय दृष्टिसँ दुनियाँ दिस तकैए तखन सौंसे दुनियाँ एक्के रंग ने देखबामे आबए लगै छइ। कुशसेरक मनमे जहिना-जहिना एका-एकी प्रश्न सभ उठए लगलैन तहिना खण्डन-मण्डन करैत जवाबो सभ मनमे बिचड़ए लगलैन जइसँ गामक रस्ताक ठेकाने ने रहलैन जे केते रस्ता कटि गेल माने टपि गेलौं आ केते बाँकी अछि। देवनक प्रति पहिल पश्न कुशेसरक मनमे उठलैन जे एकटा ओहन मनुक्खक भार कान्हपर चढ़ि रहल अछि जेकरा ने नाम-गाम लिखऽ अबै छै आ ने साए तक गनले होइ छै। मनमे जहिना कुशेसरकेँ विस्मय भेलैन तहिना अपन जीवन-दशापर ग्लानियोँ भेबे केलैन मुदा अपने मन कहलकैन जे पहाड़ी इलाकामे गदहा-सवारी पाथर टुकड़ाक भार लादि जखन अपन कर्तव्य बिनु पहरूदारोक निमाहि सकैए तखन देवन किछु छी तँ मनुक्खक बच्चा छी किने। मनुक्खे ने माइक पेटेमे सुखदेव सन ज्ञानी पुरुष बनला। तैठाम देवन किछु छी तँ मनुख छी किने। जे जे देखत तेकरा सिखबैत चलबै जे फल्लाँ-फल्लाँ छी आ एकर काज फल्लॉं ठाम होइ छै, जखने परिचय आ पात दुनू संगे दैत चलबै तखने ने देवनो देवते जकाँ बनैत जाएत.! कुशेसरक मन मानि गेलैन जे देवन जहिना देह धुनैले तैयार भेल अछि तहिना कबीर बाबा जकाँ तेहेन धुनियाँ बना देब जे बिनु डन्डिये-तराजू सौंसे दुनियाँकेँ तौलैत रहत। कबीर बाबापर नजैर पहुँचे कुशेसरक मन बिहुसलैन। लगले दोसर प्रश्न कुशेसरक मनमे उठलैन जे देवनकेँ कोन काज करैक जोगार लगाएब? अखन तँ सोल्होअना अनाड़ीए अछि। काज तँ ढेरो पसरल छै। जहिना अपन गौंओ आ पड़ोसियो कियो छाती परक रिक्सा चलबैए, ऐठाम बिनु कलकत्ता रहनिहार बुझिते छैथ जे अपना ऐठाम तीन पहिया साइकिल रिक्सा होइए तइसँ भिन्न कलकत्तामे अछि, अपना ऐठामक जहिना घोड़ा गाड़ी, टमटम, होइए जे घोड़ाक संग गाड़ी चलैए तहिना कलकत्तामे मनुख रिक्सा अछि। जे छाती बलेँ खीचैए। तँ कियो डेरे-डेरे, माने परिवारे-परिवारमे सीक-पटैपर टीनमे पानि भरि उघि-उघि तीन मंजिला मकान तक पहुँचबै छैथ। तँ कियो दोकान-दौड़ीमे तँ कियो प्राइवेट गोदाम तँ कियो सरकारी गोदाममे बोरा उघै छैथ। किछु एहनो लोक तँ छथिए जे हिन्द मोटर कारखानासँ लऽ कऽ एवरेडी बैटरी-कारखाना तकक चिमनीसँ लऽ कऽ ऑफिसक हिसाब-बारी करैक काज सेहो करिते छैथ। तैसंग एहनो लोक तँ छथिये जे पइचों-उधार करि कऽ अपन स्वतंत्र कारोबारी छैथ। रंग-बिरंगक काज कलकत्तामे पसरले अछि। यएह ने हएत जे आम कीनैकाल वा कोनो खेबाक वस्तु कीनै काल सुआदक अन्देशा भेलापर पहिने लोक ओकरा खा कऽ जहिना परेख लइए तहिना ने हएत। अपने इलाकाक लोक सभ काज करै छैथ। जँ सम्भव हएत तँ पहिने काजक रंग-ढंग देवनकेँ बुझा देबै जँ मन मानि जेतै तँ दोसर दिन संग लगा काजपर पहुँचा देबइ। शुरूमे जहिना सभकेँ किछु समय, किछु मेहनत आ किछु खर्च बेसी होइते छै तहिना ने देवनोकेँ हएत। अपन जे काज अछि, सरकारी अन्नक गोदाममे मटियागिरी, ओ गामक हिसाबसँ थोड़ेक अबेवहारिक अछिए, किए तँ गाममे बोझ (वजनदार वस्तु) उघैक चलैन माथ आ कन्हापर लऽ कऽ चलैक अछि। नारो-धानक बोझ आ जारनो-काठीक बोझ लोक माथपर लऽ कऽ चलै छैथ। तैसंग लकड़ी वा बाँस आकि कोनो आने वस्तु कान्हपर उघै छैथ, मुदा अन्नक गोदामक काज तँ पीठपर बोरा उठा उघैक अछि...। उनटैत-पुनटैत कुशेसरक मन अपने काजपर एलैन तँ मोन पड़लैन जे अपनो तँ ओहिना छेलौं जहिना अखन देवन अछि। जहिना अपना देहमे ताकत अछि तहिना ने देवनोक देहमे छै, तखन किए ने काज कऽ सकैए। जखने देवनक काज करै दिस कुशेसरक नजैर बढ़लैन कि ढलानपर जहिना गाड़ीक गति तेज भऽ जाइए तहिना भेलैन। भेलैन ई जे गोदामक काजक मजूरी कोनो कि समयमे बान्हल अछि जे एते घन्टा काज करू तेकर बदला एते मजूरी देब। गोदामक काज तँ ओहन अछि जइमे बोराक हिसाबसँ, माने एकठामसँ दोसर ठाम करैक, मजूरी भेटैए। जखने कमाइक बढ़ोत्तरी देखत तखने ने ओइ दिस मनो बढ़तै, किए तँ अखन तक जे जीवन देवनक रहल अछि ओ कम आमदनीबला परिवारक रहल अछि। जइमे समयक संग परिवारकेँ चलैमे सइयो कि हजारो गीरह-गाँठ अछिए जेकरा खोलब कि तोड़ब कनी भीरहगर अछिए...। विचरण करैत कुशेसरक मनमे जहिना अक्का-बोनमे पहुँचला पछाइत कोनो उपयोगी वस्तु देखने मनमे हर्षपन जागि जाइए तहिना कुशेसरोकेँ जगलैन। जइसँ कुशेसरक मन मानि गेलैन जे देवन किछु छी तँ मनुक्खक बच्चा छी किने। मनुख जहिना पहाड़ोपर चढ़ैए आ पाथरो तोड़ैए, तहिना ने जलमग्न समुद्रो उपैछते अछि.! पहाड़-समुद्रक बीच अबिते कुशेसरक मन हलैस कऽ नव मुड़ी जकाँ कलशलैन- 'जखन अपने तत्पर छी तखन तँ भेल अपने जकाँ देवनकेँ तत्पर बनाएब।' कुशेसरक मनक विचार आरो आगू विचड़न करैत बढ़लैन जे जखन काजक ओरियान भऽ जाएत तखन बाँकी रहत खाइ-पीबै आ रहैक ओरियान। खाइ-पीबैपर नजैर पहुँचते कुशेसरक मनमे उठल जे कलकत्ता कलेपर ठाढ़ अछि, ओकर कलकेँ पकैड़ अपन कलाकारी करब। जहिना अपन सुभ्यस्त समय भेलापर माने काज करैक अनुकूल समय भेने काजो करै छी आ उकड़ू समयमे माने प्रतिकूल समयमे, अरामो करै छी तहिना देवनोकेँ सिखा देब। सिखा की देब जे संग मिलि करैत-करैत अपने अभ्यस्त बनि जाएत। मुदा से तँ हएत तखन जखन अपन काजक संग रहत। आन काजक तँ आन रूपो आ बेवहारो तँ अछिए। भेल तँ एतबे ने जे देवनकेँ काजक प्रति आकर्षित करैत कहबै, 'बौआ, जखन गामसँ संगे कलकत्ता अबैकाल मौसा जहिना सोल्होअना तोहर भार हमरा सुमझा देलैन तहिना ने अपनो आ तोरो निमाहैक छह। जहिना अपन उमेरो अछि आ शरीरक काँइतो अछि तहिना ने तोरो छह, तखन एक रंग काज किए ने दुनू भाँइ कऽ सकै छी। एते तँ गोदामक काजमे अछिए जे जहिना गोदामक मैनेजर साहैब सहमेलू छैथ तहिना काजोक कमी नहियेँ अछि। तैसंग बोराक गिनतीक हिसाब ने होइए, फाटल आकि काटल बोरासँ जे अन्न खसै छै ओ तँ अपने सभकेँ ने हएत। जइसँ एते तँ हेबे करत जे खाइक ओरियान भऽ जाएत। अभावमे पलैत जीवनकेँ जखने पेटक भूख मेटाइक बेवहारिक उपाय भऽ जाइए तखने ने ओकरा मनमे जीवनकेँ ठाढ़ होइक आशा सेहो जगै छै। आशे ने आस लगा जीवनक झूलाकेँ कदमे-कदम कदमक गाछक डारिमे झुलबए लगैए। ..विचड़ैत कुशेसरक मनमे उठल जे जाबे मनुक्खकेँ अपना प्रति अपन शासक नहि जागत ताधैर अनुशासित केना भऽ सकैए? जाधैर अनुशासित जीवन नहि हएत ताधैर जीवनक नीति केना बुझत आ जाबे नीति नहि बुझि अपनाकेँ नीतिक रस्तापर नहि आनत ताधैर नैतिक केना बनत आ जाबे नैतिक नहि बनत ताधैर नीतिगत कर्तव्य केना बुझत? कुशेसरक मन मानि गेलैन जे चारि पैरबला पशु कुत्ता, जे मनुक्खक जीवनक शुरूक संगी रहल अछि, अखनो अछि, जखन कि ओकरा शरीरकेँ पाँचम तत्त्व (बौद्धिक) प्राप्त नहि छै, तखन जब एते अनुशासित अपनाकेँ बना रखने रहैए, (ऐठाम अनेरूआ कुत्ता माने आवारा कुत्ताक चर्च नहि अछि) तखन तँ मनुख मनुखे छिया किने, जिनका शरीरक सभ तत्त्व प्राप्त छैन..! ओना, मनुक्खक दू-दिशिया गति सेहो अछि। माने भेल जे किनको कोनो काज वा विचारकेँ सीख-बुझि चलब, आ दोसर अछि जे जीवनक गतिकेँ अँकैत ओहन रास्ता तकैले कहबैन, जइसँ अखन तकक जीवनमे भेँट नहि छैन। जखने एहेन प्रश्न जीवनमे उठैए तखने ने जीवन पौनिहार अपन जीवनक अनुसन्धाता बनि अनुसन्धानक बाट पकड़ै छैथ। कुशेसरक मन मानि गेलैन जे जे देवन अपने जीवनक जिज्ञासासँ कलकत्ता जाइक संगी बनैले तैयार भेल ओ जरूर संगे-संग जीवनक पथक पथिक बनि पथे-पथ चलबे करत। जखने हरक जोड़ा बरद जकाँ मनुक्खो संग मिल चलब शुरू करत तखन हारल हरीक जीवनमे हरितपन एबे करत। ..कुशेसरक मनक बिसवास जेना खिल उठलैन। खिलते जीवनक गतिपर दृष्टि पड़लैन। दृष्टि पड़िते जीवन ले भोजनक महत्व बुझलैन। भोजनपर दृष्टि पड़िते कुशेसरक मनमे देवनक भोजन एलैन। कुशेसरक अपने मन देखल दृष्टिक अनुकूल मानि गेलैन जे कलकत्ता कलकत्ता छी, ओ मुम्बइ आकि दिल्ली नहि छी। ओना, कहैले जहिना कलकत्ता महानगर छी तहिना मुम्बइ आ दिल्ली सेहो छीहे, मुदा भोजनक जे सुविधा कलकत्तामे अछि ओ थोड़े मुम्बइ आकि दिल्लीमे अछि। जेते समयमे अपन भोजन बनाएब तेते समयक उपयोग जँ काजमे करब तँ भोजनक संग किछु आमदनीए बढ़त। भोजनक जे सस्ती कलकत्तामे अछि ओ आन महानगरमे नहियेँ अछि। कुशेसरक मनमे उठलैन जे जहिना अपने दिनक भोजन दोकाने-दौड़ीमे करै छी तहिना देवनोकेँ करैले कहबै। कहबै की, जखने संग मिलि देवन काज करत तखने ने जहिना जीवनी बरदक संग सीखल अनाड़ियो बरद ओहिना काज करए लगैए जेना हरक बरद करैए। जहिना अपने अपन हाथ-पैरक कमाइसँ अपनो आ परिवारोकेँ सीमापर आनि ठाढ़ केलौं तहिना ने देवनो अपन परिवारो आ अपनोकेँ सीमापर ठाढ़ करत। भोजनपर, देवनक भोजनपर आबि कुशेसर अपन जीवन-चर्याक उपयोग बुझि देवनोक जीवनक उपयोगकेँ उतारब नीक बुझलैन। माने ई जे दिनुका भोजन दोकाने-दौड़ीमे आ रौतुका जहिना अपन दसो मेड़िया एकठाम बैस बना करबो करै छी आ खेबो करै छी तहिना देवनोक हेतइ। भेल तँ दससँ एगारह हएत। भोजनक बेड़ा पार- माने जीवनक नाव पार होइते कुशेसरक मन हरैक कऽ आवासपर एलैन। आवासपर अबिते मनमे उठलैन जे केते गोरे भाड़ा-किराया दऽ रहै छैथ तँ केते गोरे अपन छोट-मोट झुग्गी-झोपड़ी बना सेहो रहिते छैथ मुदा अपन दुनूक अनुकूल ओहन ओकाइत नहि अछि। तहूमे जखन बड़ा बाजारमे अपन दरभंगिया धर्मशाला अछिए तखन कहुना-ने-कहुना देवनोक अँटाबेस भइये जाएत। भेल तँ बरखा-पानि आ शीत-रौदसँ अपन रक्षा करब अछि। जहिना गरमी मासमे गरमीसँ बँचैले छाहैरिक खगता होइए तहिना पानि-बुन्नी आ जाड़-ठाढ़क सेहो अछि। ऐठाम दरभंगिया धर्मशालाक चर्च अछि। बड़ा बजारक महल्लाबला सभ अपन दसगरदा काज करैले एकटा धर्मशाला बनौने छला। जइमे करीब साए आदमी सुति-बैस सकै छी। जाबे तक धर्मशालाक मुँह-कान चिक्कन रहल माने जाबे तक धर्मशाला दसगरदा काज करै-जोकर रहल, ताबे तक महल्लाक लोक अपन उपयोग केलैन। दसगरदा काज तँ सभ दिन नहियेँ होइए तँए बाँकी दिन खालीए रहै छल। मिथिलांचलक लोक जखन कलकत्ता जाइ छला आ बड़ा बाजारमे उट्ठा काज करै छला, तखन खाली बुझि ओही धर्मशालामे रहै छला। ओइमे जहिना रहैक सुविधा तहिना भोजन बनबैक संग पानियोँ-पैखानाक सुविधा छेलैहे। धर्मशाला तँ बनल मुदा औझुका जकाँ साए बर्खक औरुदा लऽ कऽ जन्म नहि नेने छल, तँए किछु दिनक पछाइत मकानमे (धर्मशालामे) फाट-फुट, टुटब-झड़ब शुरू भेल जइसँ महल्लाबला अपन काज (पैघ काज) मे धर्मशालाक उपयोग कम करैत गेला। तैसंग ईहो भेल जे बाजारक चलती रहने महल्लाबला सभ दोसरो-तेसरो धर्मशाला बना लेलैन आ ओइ धर्मशालाकेँ सोल्होअना छोड़ि देलैन, वएह धर्मशाला दरभंगिया धर्मशाला छी। अपना ऐठामक जे उट्ठा काज करैबला लोक छैथ ओ ओही धर्मशालामे रहबो करै छैथ काजो करै छैथ आ भजन-कीर्तनक संग अपन गामो-घरक गप-सप्प करिते छैथ। तेतबे नहि, तैसंग सौराठे सभा जकाँ ओइ धर्मशालासँ साले-साल साए-पचास कथा-कुटुमैती सेहो होइते रहल अछि। अपन गामक सीमापर पहुँचैत-पहुँचैत कुशेसरक मन मानि गेलैन जे देवनकेँ कलकत्ता लऽ गेने एते तँ अपनो लाभ हेबे करत जे एकटा खगल परिवारक माने अपन अंगक परिवारक, जिनगी ऐगला बाट पकैड़ लेत। गाममे काज केनिहार तँ अछि मुदा काजे नहि छइ। ओना, जँ समुचित ढंगक जीवन रहत तँ काजक कमी सेहो नहियेँ रहत। तहूमे मिथिलांचलमे। जैठाम सालक तीन मौसम स्पष्ट रूपसँ अपन चरि-चरि मासक विभाजन कइये नेने अछि। किछु फलोवृक्ष आ अन्नो-तीमन, अधिक दिनक खेती होइए तँ किछु कमो दिनक होइते अछि। जइसँ चारि मासक बीच सइयो रंगक अन्नो, फुलो-फलो आ तीमनो-तरकारीक खेती अछिए, जइ उपजसँ धनमण्डल भइये सकैए। ओना, मौसमकेँ प्रतिकूल बनबैक सेहो अनेको कारण अछिए जे मौसमकेँ कम-बेसी सेहो कइये दइए। जेना अधिक पानि-बुन्नी भेने बाढ़ि अबैए तहिना कम भेने वा नहि भेने रौदी सेहो होइते अछि, जइसँ सूत्रवद्ध खेतीक सूत्रता सेहो बिखण्डित होइते अछि। तहिना अधिक जाड़क ठण्ढ-पाला खसने फसलक (उपजक) क्षति सेहो होइते अछि जइसँ किसानी जीवन क्षतिग्रस्तो होइते अछि। खाएर जे अछि, एते तँ अछिए जे मनुखो तँ मनुखे छीया जिनका अपन बुधिक संग विवेको आ कर्मक संग हाथो-पएर छैन्हे, तँए कोनो-ने-कोनो रूपमे अपन जीवन धारण केनहि रहै छैथ, तँए कहब जे नोकसान (क्षति) नहि होइ छैन सेहो बात नहियेँ अछि, सेहो होइते छैन। मुदा सभ कथुक बावजूदो मिथिलांचलक गामो आ गामक आवादियो अखनो ओहिना अछि जहिना अदौसँ चलियो आबि रहल अछि आ अपन जीवन्तताक परिचय सेहो देनहि अछि। कुशेसरक नजैर देवनपर सँ हटिते अपन गाम-समाजक संग दुनियाँ-दारी दिस बढ़लैन। दुनियाँक बीच मध्यमे अपन गाम-समाजकेँ देख कुशेसरक मन बिहुसि गेलैन। बिहुसि ई गेलैन जे जहिना मनुख तहिना ने गामो समाज दुनियाँक बीच विषुवत रेखा जकाँ बीचमे ठाढ़ अछि। जहिना विषुवत रेखाकेँ उत्तर वा दच्छिन भेने, पूबे-पच्छिमे विषुवतो रेखा आ कर्को-मकर अछिए, आधा दुनियाँक जिनगीमे बदलाव अनिते अछि। ओना, बदलाव सौंसे दुनियाँक माने पूर दुनियाँक होइए मुदा से होइए दुनू दिशामे। जहिना आधाक उत्थान होइए तहिना आधाक पतन सेहो होइते अछि। बेकतीगतो जीवनमे आ गाम-समाजक जीवनमे सेहो होइए। माने ई भेल जे बेकतीगत जीवनमे जहिना ज्ञान भेने अज्ञान मेटाइए, निर्भय भेने भय मेटाइए, सुचरित्र वा सुचित्र बनने कुचरित्र वा कुचित्र मेटाइए तहिना ने गामो-समाजमे, जे धनीक-गरीबक बीच बँटल अछि, तइमे एकरूपता एने जहिना एकटाकेँ क्षय होइए तँ दोसर अक्षय सेहो बनिते अछि..! एकाएक कुशेसरक नजैर देवनक जीवनक भारपर पहुँचलैन। भारपर पहुँचते अपने मन कहलकैन जे मनुख केतौ मनुक्खक भार थोड़े बनैए। ओ तँ अपन भार अपने कन्हेठ वा सिर चढ़ा चलैबला छैथ तखन दोसरक भार बनि केना सकै छैथ। हँ, एते सम्भव अछिए जे जे मनुख अपन जिनगी आ अपन किरिया-कर्मक संग अपन हाथ-पैरक गुण-अवगुण नहि बुझि पेला अछि ओ जखने अपन किरिया-कर्म आ अपन हाथ-पैरक संगे उपयोगक शक्ति बुझि जाइ छैथ, तखने भयभीत रूपमे भयमुक्तक संचरण हुनकामे हुअ लगै छैन जइसँ भयमुक्त होइत अभय सेहो बनिते छैथ। भेल तँ एतबे ने जे देवनकेँ मनुक्खक जिनगीक किरिया-कर्ममे तेना कऽ साटि दिऐ जे ओइमे सटल अपन आगूक डेग उठबैत चलए। मनुख जखने अपन अस्तित्व माने अपन सीमा-सरहदकेँ बुझि लेत जे दुनियाँक बीच ठाढ़ छी, भौगोलिक दृष्टिसँ सेहो आ मानसिक दृष्टिसँ सेहो। माने ई जे दुनियाँक आकार गोल अछि। गोल वस्तुक बीच केतौ रहने मध्य भेबे कएल। जहिना पूब दिस दिशो तहिना पच्छिम दिस दिशा आ तहिना उत्तरो दच्छिन सेहो अछिए। तँए जखन बीचमे माने दुनियोँक बीचमे, ठाढ़ छी तखन बीच आ अपन बीचमानि करबे करत किने। बीचमानिक माने भेल नीक बेजाएकेँ बेरबैत बीचो-बीच चलब। घरपर अबैत-अबैत कुशेसरक मन मानि लेलकैन जे देवन भार नहि भार उठबैबला संगी बनत। बीचमे एतबे करब अछि जे देवनोकेँ रास्तापर आनि ठाढ़ करैत पाछूसँ पीठ ठोकि आगू बढ़बैत चलिऐ, जइसँ ओ अपन जीवनमे दौग-दौग दौगैत चलत। जखन केकरो माने एक्को आदमीकेँ, अपन सहक सेवासँ पीठ ठोकि दौड़ा देब तखन अपन मानवीय जीवनक मूल्य सेहो देखैमे एबे करत। जीवनक मूल्य अपने बनौलासँ ने बनैए। जेना कागज कागज छी मुदा ओइपर शील-मोहर लगिते ओ रूपैआ बनि जाइए। दुनियाँ मानए वा नहि मानए मुदा अपन अभ्यन्तरक मन तँ मानियेँ लइए। यएह मन ने दुनियाँक मनक एक अंश-मन छी। समूहक रूपमे विश्वपन भेल आ बेकतीगत रूपमे बेकतीपन भेल जे विश्वमनक अंश भेबे कएल किने। यएह मानब ने अपन मानव मनक सीमा छी, जेकरा जानि-पहचानि जीवन धारण करैत चलैक अछि। कुशेसरकेँ गेला पछाइत माने अपन मौसी-मौसा ऐठामसँ, जलेसरी पति लग आबि चुपचाप ठाढ़ भऽ गेली। जलेसरीकेँ, माने धनुषधारीक पत्नीकेँ, भनक लगलैन जे देवन कलकत्ता जाएत, गाममे नहि रहत। भनक माने भेल उड़न्ती सुनब, मुहाँ-मुहीं गप-सप्प नहि भेल रहल। पति लग ठाढ़ जलेसरीक मनमे अनेको सोग-पीड़ाक जाल पसरल छेलैन्हे। जइसँ शोक विषादसँ बोझिल छेली। अनेको रंगक विचार, सौनक बरखा-पानिक बुलबुला जकाँ जलेसरीक मनमे कखनो उठैन आ कखनो पानिक झटकासँ तँ कखनो अपन जीवनेक झटकासँ जहिना फुटैए तहिना फुटबो करैन। गाइयक आगू वा कोनो आने पालतू जानवरक बच्चाकेँ आगूसँ लऽ गेने वा चलि गेने जहिना आँखिसँ नोर खसबैत माए डिरिआए लगैए तहिना जलेसरीक मन सेहो देवनकेँ लगसँ हटैक बात सुनि डिरिआइत रहैन। मुदा मुँह खोलि जलेसरीकेँ डिरिएबोमे (माने बजबोमे) असोकर्ज होइते रहैन। असोकर्ज ई होइत रहैन जे जहिना अपन पति भेला तहिना देवनो आ कुशेसरो ने भेल, तीनू बापूत पुरखा-पुरखी विचार केलैन तइमे किछु बाजब उचित नहि हएत। जलेसरी थोड़े बुझै छैथ जे जीवन की छी, दुनियाँ की छी, जइ दुनियाँमे जन्म भेल तही दुनियाँमे ने जीवनो बिताएब अछि। साढ़े तीन हाथक अरबो मनुक्खक दुनियाँ अरबो रंगक अछिए। मातृत्व और पितृत्वक बीचमे खाधि अछिए। बच्चाकेँ बेर-बेर भूख-पियास ले अन्न-पानि चाही। ओ तँ माइयेसँ भेटैए, आ माइयोक मन बच्चाक जीवनो भोजने भरि समटा जाइ छैन, जइसँ बाहरी जीवन आ बाहरी दुनियाँ दिस नजैर चढ़िते ने छैन। आने-क माए जकाँ जलेसरियोक मनमे उठैन जे बच्चा (देवन) कलकत्ता जाएत, खाएत की? ओ थोड़े बुझै छेली जे खाइयेक जोगारमे देवन कलकत्ता जाएत। पत्नीकेँ आगूमे ठाढ़ देख धनुषधारी बजला- "मन मारि किए आगूमे ठाढ़ छी।" तइ समय धनुषधारी देवनक प्रवासक जिनगीपर विचार कऽ रहल छला जे गाममे देवन अपना लग रहैए, तँ मुहोँसँ कहि आ हाथो पकैड़ काजक लूरि-बुधि माने कलाक संग कलाकारी सिखबै छिऐ। कलकत्ता गेलापर केना सीखत..? लगले अपने मन उत्तरो देलकैन जे कुशेसरो तँ देवने जकाँ छल, पाँचे साल कलकत्ता गेना भेलैए, केहेन सुन्दर घरो बना लेलक, बहिनक बिआहो सम्हारि लेलक। आगू दिस बढ़िते माने विचारक आगू, अपने मन धनुषधारीक उत्साहित भऽ गेलैन जे देवन कहुना भेल तँ उन्नैस-बीस बर्खक नौजवान भेल। आब दूधमुहाँ बच्चा थोड़े रहल जे केतौ हेरा जाएत। तहूमे की कलकत्ताक लोक नहि बुझता जे मैथिली भाषी देवन छी तँए मिथिलांचलक दोसर मैथिलसँ भेँट करा गाम-घरक भाँज लगबैत लग तक पहुँचा देतइ। जवान भेल, एकरामे तँ एते शक्ति अखन भरले छै जे देशक सीमाक संग दुनियोँक सीमाक भार सम्हारि सकैए, अपना ले अपन की भेल। फूल सन हल्लुक जीवनो भेल आ परिवारो तँ भेबे कएल। तैबीच जलेसरी बजली- "जखनसँ एकटा बात सुनलौं तखनसँ मनमे उड़ी-बिड़ी लगि गेल अछि सएह पुछए एलौं हेन।" धनुषधारी बजला- "की सुनलौं?" जलेसरी बजली- "बौआ कलकत्ता जाएत।" धनुषधारी बजला- "हँ। अपने मन छै जे कलकत्ता कमाइ ले जाएब तँ हम थोड़े रोकबै। गामोक लोक सभकेँ देखै छिऐ जे अमेरिका, इंग्लैंड, कहाँ-कहाँ ने कमाइ ले जाइ छैथ, तैठाम कलकत्ता तँ सहजे अपन घर भेल। जहियासँ बंगाल-बिहारक विभाजन भेल माने 1912 इस्वीसँ, तहियासँ ओ दोसर राज्य भेल। तइसँ पहिने सभ एके राजक बासी ने छेलौं। तँए ने बोलियो-वाणी, चालियो-ढालि आ लीख-लिखिया सेहो एकरंगाहे अछि।" तहीकाल देवन सेहो कुशेसरकेँ विदा करैत वापस पहुँचल। जहिना एकटा अक्षर सीखलासँ जे मनमे खुशी होइ छै तहिना देवनक मनमे कलकत्ता प्रवासक खुशी छेलइ। कलकत्ताक केते बात कुशेसरक मुहसँ रस्तामे सुनि नेने छल। ईहो सुनि नेने छल जे आजादीक समय माने 1947 इस्वीमे कमे गाम एहेन बाँकी अछि, जइ गामक लोक कलकत्ता नइ जाइ छला तँए गामो-गामक आ अपन बेकतिगतो कुटुम-परिवारक लोक सेहो भेटबे करै छैथ..! देवनकेँ देखते अपन मनक बोझकेँ कम करैत धनुषधारी बजला- "बौआ, केना कि जाइक विचार केलह। कलकत्ता जाइले तोहर मन खुशी देखै छिअ आ माइयक मन खसल देखै छिऐन तँए किए ने दुनू माए-बेटा मुँह-मिलानी पहिने कऽ लेबह।" पतिकेँ बीचसँ हटिते माने देवनक कलकत्ता जाइक विचारसँ, जलेसरी थकथकेली। थकथकेली ई जे हम किछु भेलौं तँ माइये भेलौं किने मुदा पिता तँ वएह छथिन। वएह सभ ने अपन परिवारो आ अपन कुलो-मर्यादाकेँ जीआ कऽ रखता.! देवनक मनमे खुशीक लहैर छेलैहे। माएकेँ वौसैत बजला- "माए, मन लागत तँ रहब नइ तँ चलि आएब। तइले अनेरे ने सोग-पीड़ा करै छेँ। बुझिहेँ जे कोनो कुटमे ऐठाम पाँच दिन ले गेल छेलौं।" देवनक बजैक कारण छल जे जहिना बच्चा लगसँ हटला पछाइत गाए वा आने पशुकेँ होइ छै आ कानि-खीज बिसैर पुन: अपन जीवन अनुकूल बना लइए तहिना माइयोकेँ भऽ जाएत। बेटाक मुँहक हल्लुक माने साधारण बात हौ कि भारी, झूठ हौ कि साँच, माइक मन एक्के कसौटीपर कसि एक्के रंग बिसवास करै छैथ..। ऐठाम ई बुझब जे कोनो बेटाकेँ दुतकार लगौल जाइए से नहि। तहिना जँ बेटो माता-पिताक प्रति बिसवासी होथि तँ किए आजुक परिवेशमे जे माता-पिता खढ़क बोझ जकाँ बोन-झाड़, गाछी-बिरछीमे फेकाएल-छिटाएल रहै छैथ? ऐ बीचमे एकटा आरो प्रश्न अछि, ओ अछि समयानुसार परिवर्तनक, जइसँ विचारो आ बेवहारोमे किछु बदलाव ऐबेक चाही। समाजमे अखनो अन्धविश्वासमे पड़ल बहुसंख्य लोक छैथ, मुदा जखने अन्धविश्वास बिसवासमे बदैल जाइए तखने ने जीवनमे ज्ञानक संग परिवर्तन सेहो होइते अछि। गप-सप्पक विचार, माने पिता-पुत्रक गप-सप्पक विचार, सुनि जलेसरी हवामे डोलल पानि जकाँ असथिर होइत-होइत थीर भऽ गेली। धनुषधारी देवनकेँ पुछलैन- "बौआ, अखन तक अपन गाम आ अपना घरमे रहलह, मुदा आब आन गाम आ आनक घर रहैले जाइ छह, तँए केना अँटाबेस करबह से नीक जकाँ मनमे विचारैत रहिहह।" सादा कागज जकाँ देवनक मन छेलैहे। तहूमे कुशेसरक मुहसँ जे कलकत्ताक सम्बन्धमे सुनने छल तइसँ मन आरो मोहित भइये गेल छेलै जइसँ उधकी धइये नेने छल। बाजल- "जेना-जेना कुशेसर भैया कहता आ करता तहिना-तहिना देख-देख हमहूँ करब।" ऐठाम ई नहि बुझब जे, अखनो गाम समाजमे एहेन भ्रान्ति पसरले अछि जे आन जे कहैथ से करी, मुदा हुनकर करैत काजक देखौंस नहि करी। अही भ्रान्तिमे पड़ल धनुषधारी बजला- "कुशेसर जे करैले कहतह से ठीक भेल मुदा देखसी करब तँ..!" पिताक सोच-विचारसँ देवनकेँ कोन मतलब छेलैन, मतलब अपन मनक छेलैन, बजला- "जखन काज करैले जाएब तखन जहिना-जहिना कुशेसर भैयाकेँ करैत देखबैन तहिना-तहिना अपनो करब। जँ केतौ कोनो गड़बड़ हएत तँ पुछियो लेबैन आ अपनो सोझेमे रहता, देखबो तँ करबे करता।" देवनक विचार सुनि धनुषधारीक मनमे बिसवास जगलैन जे जे भाइक प्रति माने कुशेसरक प्रति, समर्पण देवनकेँ मनमे जगल अछि, जँ ऐ समर्पणकेँ समर्पित रूपसँ करैत रहत तँ जीवनमे नीक छोड़ि अधला नइ हेतइ। जीवनक ऐगला माने परिवारक ऐगला, काज दिस धियान जगबैत धनुषधारी बजला- "बौआ, मनुखक जीवन एहेन जीवन छी जइमे लोक किछु कऽ सकैए। जहिना नीकसँ नीकतर कऽ सकैए तहिना अधलासँ अधतरो तँ कइये सकैए। आन जीवन जे अछि, माने मनुक्खसँ इतर आन देहधारी जीवक, ओकरामे यएह शक्ति नइ छै, तँए असंखो-संखो जीवनमे मनुक्खक सभसँ श्रेष्ठ जीवन अछि।" पिताक विचार देवन नीक जकाँ ने सुनलक आ ने बुझलक। किए तँ कलकत्ता जेबाक खुशी मनमे तेना मोहैन चला देने छेलै जे घिरनी जकाँ मन घुमि रहल छेलइ। देवन बाजल- "बाबू, गाममे काज नइ अछि मुदा ओइठाम तेते काज अछि जेते लोक करए चाहत। जखन पाँचे बर्खक कमाइमे कुशेसर भैया एतेक केलैन तँ हम की ओइसँ कम करब। आइ जँ तीनियोँ-चारि साल पहिने गेल रहितौं तँ कुशेसरे भैया जकाँ ने हमहूँ भऽ गेल रहितौं। जेना ओ बहिनक बिआहमे खर्च केलैन तहिना हम खेते कीन लइतौं।" 'खेत' सुनि जहिना धनुषधारीक मनमे उठलैन जे अपन जँ घर-घराड़ी आ चास-बास माने जीबैक साधन भऽ जाए आ ओइ बीच जँ अपन स्वतंत्र जीवनक रूप धारण केने समयक अनुकूल चलैत जीवन बिताबी, यएह ने स्वतंत्र देशक परम स्वतंत्र जीवन भेल। जेकर खगता मनुख जीवनकेँ अछि। ..धनुषधारी बजला- "परसू गाड़ी पकड़ैक विचार कुशेसर कहने छल, तूँ काल्हिये साँझूपहर कुशेसर ऐठाम चलि जइहह।" देवनक मनमे होइ जे अखने चलि जाइ जे दू दिनमे रस्ता-पेरासँ लऽ कऽ कलकत्ता धरिक गप-सप्प सुनैत रही, मुदा केतौ जाइसँ पहिने माने जेते दिनक हिसाबसँ जा रहल छी, तइ बीचक जे सामाजिक सरोकार अछि, ओकरो तँ सूत्रवद्ध करए पड़ै छइ। देवन बाजल- "कुशेसरो भैया सएह कहलैन जे काल्हिये साँझू पहर चलि अबिहह, दुनू भाँइ घरसँ संगे निकलब।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.९.रोशन जनकपुरी- बुढि़या आ झन्डाके खिस्सा रोशन जनकपुरी बुढि़या आ झन्डाके खिस्सा

जाढ़ मासमे शहीद दिवस । दिनभइर भाषण भीषण । शहीद ई कयलक, शहीद ओ कयलक । शहीद महान । 'आइ जे ई देश अइ, ओही शहीदसबके बलिदान अइ ।' ....की ....की...की...की....! स्वतन्त्रता आ समृद्धिके सपना । नेताजीके महानता । गाड़ी आ कार्यकर्ताके जुलूस । सड़कसब गूँजैत रहल दिनभइर, मन्त्रीजी, जे नेतो छैथ, हुनक जयजयकार आ संगसंग शहीदसबके नारा स । भव्य मञ्चपर बिराजमान मन्त्रीजी, निच्चामे बैसल लोकसब दिस तकैत मुस्किया रहल छलाह, निरन्तर । मञ्चके निच्चामे बैसलसबके लगै छलै जे हमरे देख क' मुस्किया रहल छैथ मन्त्रीजी, आ सब हुनका अपना अपना ढंग स अभिवादन, सलाम आ प्रणाम क' रहल छल । मञ्चपर बैस'के एतेक फैदा त छै, जे अहाँ कोम्हरो तकैत होइ, निच्चाबलाके बुझाइछै, अहाँ ओकरे दिस ताइक रहल छी । भीड़मे पैसल मन्त्रीजीके स्थानीय कारिन्दासब बीचमे नारा लगा रहल छल -"...मन्त्रीजी जिन्दाबाद ।" आ उत्साहित भीड़ दोहर'बैत छल -"जिन्दाबाद ! जिन्दाबाद !!" दिनभइर चलल कार्यक्रम । चौराहापर मन्त्रीजी विशाल झन्डा फहरौलैन । ठार हावाके झोँका स झन्डा फरफरा उठल - 'फरफर फरफर' । सबहक मुहठानपर गर्वके भाव । मन्त्री स सन्तरीतक झन्डाके सलामी देलक -'स'तरक्, गोरा फाट, सलामी दे !' देश जिन्दाबाद । शहीद अमर रहौथु ! मन्त्रीजी जिन्दाबाद ! तगमा बँटाएल । मिठाई बँटाएल । भीड़ स किछु दूर हटि क' एकटा बुढ़िया गौर स झन्डाके निहाइर रहल छल । विशाल आकारके, जेना घरे झाँइप लेत, तेहन झन्डा । ठार हावा स जूझैत फरफराइत झन्डाके देखैत, ओइ बुढ़ियाके आँइखमे एकटा खुशी छल । तखने केओ ओकरा हाथमे एकटा लड़ू ध'देलकै -"लीउ बुढ़ीमाई लड़ू !" ई सड़कछाप बुढ़िया खाली बुढ़िए नइँ होइत अइछ । एहन राष्ट्रीय दिवसके दिन सरकार, मन्त्री, घरैया नेता आ ओकर कार्यकर्तासबके बड़प्पन आ सहृदयता देखाब'के साधन सेहो होइत अइछ । एहन दिनमे अइ सड़कछाप बूढ़-पुरानके मन्त्री आ नेतासंगेके फोटो सेहो छपै छै पत्रिका आ टीभीमे । अइ स मन्त्रीजी बड़ दयावान, सुहृदय आ जनप्रिय छैथ से जनतापर प्रभाव परै छै । मन्त्रीजीके धुँआधार भाषणक बिच्चेमे सुरुज पच्छिममे ढइल गेल । शहीद दिवस खतम भ'गेलै । लोकसब अपन अपन ठाम लौटगेल । चौराहा क्रमशः शान्त होइत गेल । आब बढ़ैत राइतसंगे जाढ़ सेहो बढ़ैत जा रहल छल । कखनोकाल निस्तब्धता तोड़ैत दौड़ैत गाड़ी । नइँ त, निस्तब्ध चौराहा, हाड़के भीतरतक थरथर'बैत जाढ़, ओ बुढ़िया आ फरफर आवाज करैत झन्डा मात्र छल ओतह । बुढ़िया चौराहाके पुर्बारी कातक पोखैरके भीरपर बनल बरसातीमे रहैत छल । गर्मीमे त अइ बरसातीमे कय गोटे सूतैत छल, जाढ़मे प्रायः ओ असगरे भ'जाइत छल । अइबेर जाढ़ बेसी छल । बुढ़ियाके जाढ़ स सबूर नइँ भ' रहल छल । ओ एम्हर ओम्हर स किछु प्लास्टिक, किछु कूट आ किछु जाड़ैन जमा कयलक । डाँड़मे स सलाई निकाइल क' बारलक । धधरा भेलै । ओकरा कने सबूर भेलै । समयके माइर स पतरा गेल फाटल गदेल्ला आधा बिछा क' आधा ओइढ़ क' बरसातीमे ओ पसैर गेल । धाहक आसमे एकटा कुत्ता सेहो ससैर क' ओकरा लग चइल अयलै । ई आइग बेसीकाल नइँ टिकत, ओ जनैत छल । ओ उठल । मधुआइत धाहसंगे जाढ़ फेर ओकर गरस' लागल छलै । सड़कपर ओ एम्हर ओम्हर तकलक । दुनूकात दूरतक कतौ केओ नइँ छल । ओ चौराहापर पहुँचल । चक्कु स झन्डाके डोरी काइट देलक । झन्डा निच्चा खइस परलै । ओ झन्डा खोइल क' ल' आयल । तीन दोब्बर कयलाके बादो नम्हरे छलै झन्डा । बुढ़िया ओइमे गदेल्ला लपेटलक आ ओइढ़लेलक । आब आइग कतेकाल रहतै, तकर ओकरा मतलब नइँ छलै । जाढ़ अयलाक बाद आइ पहिलबेर ओ गर्माक' सुत्तल । गदेल्ला आ झन्डा मिला क' जे ओकरा गर्माहट भेट रहल छल, से अपूर्व आनन्दमय छल । बुढ़िया आइ जल्दिए घोड़ा बेच क' सूइत रहल । ............ ............. ........... भोरे चौराहापर हंगामा । झन्डा गायब । राइतके डिउटीबला हबल्दार बाजल - "सला, हमर नोकरी गेलौ ! सार, खोज ! भेटतै त सारके दाहा नइँ बनैली त फेर की !" 'कोनो 'आतंकवादी' अइ की !' 'कोनो 'पृथकतावादी' अइ की !' चारुदिस फोन खड़खड़ाय लागल । बीच चौराहा स झन्डा गायब केना भेल ? रिपोर्ट निच्चा स उप्पर गेल । तत्काले उप्पर स निच्चा तक आदेश जारी भेल । 'जेना होइ तेना खोजल जाय झन्डा । झन्डा चोरपर राज्यद्रोहके मुकदमा चलायल जाय । ककर लापरबाही छल ? ओकरो नइँ छोड़ल जाय !' हबल्दार पुलिसके गरिययलक -"सार तोँ कत्त छले ? आब गेलौ तोरो आ हमरो जागीर ।" पुलिसके दोष एतबे रहै जे ओ जाढ़क कारणे सामनेबला मन्दिरमे ओँगैठ गेल आ औँघाइत सुइत रहल छल । कि तखने केओ कहलकै -"झन्डा ओइढ़ क' त एक गोटे बरसातीमे सुत्तल हइ !" हबल्दार, पुलिस आ लोकसब बरसाती दिस दौड़ल । ठिके ! हबल्दार ठैयाँ स टोहकारलक - "हय उठ्ठ ! के सार छे ? " बहुत दिनक बाद गर्मा क' एहन गहीँर निन्न सुत्तल छल बुढ़िया । तीनबेर टोहकारलाक बाद उठल । मुँह उघारलक त चारु दिस पुलिस आ लोकसबके देखलक । झन्डा तर मे स बुढ़ियाके निकलैत देख हबल्दारके 'दाहा' बनाब' के मनसुब्बा पर पाइन पइर गेलै । ओ क्रोध स सड़क पर लाठी बजारलक - "दुः सारके !" आब अइ बुढ़ियाके केना 'दाहा' बनाओत ! तैयो कड़ैक क' बाजल -"झन्डा ओढ़ैत काल डर नइँ भेलौ ? मारियौ चाइर डन्टा ?" "बड़ जाढ़ रहै हबल्दार साहेब !" - बुढ़िया बाजल । हबल्दारके हालत देख'बला छल । ओ अपन माथ नोँचो कि कपार फोड़ो । उप्पर रिपोर्ट कयलक । पकैर क' हाजिर कर'के आदेश भेलै । सीडियो एसपीके आगू हाजिर कयलगेल बुढ़िया । "झन्डा खोलैत काल डर नइँ भेलौ बुढ़िया ?" - सीडियो पुछलकै । "जाढ़ बड़ छलै हजूर ! अइ झन्डाके कपड़ा बड़ मोट रहै ! आ हमरा त कोनो मोटका कपड़ो नइँ हय ! घरो नइँ हय ।.....सड़कपर बड़ जाढ़ होइछै हजूर !"- बुढ़िया नम्हरे जबाब देलकै । "त तोँ झन्डे खोइल क' ओइढ़लेबे ?"- सीडियो पितायलसन बाजल । "कथी करु त ! जाढ़ स सबूरे नइँ भेल हजूर !"- बुढ़िया मजबूरी व्यक्त कयलक । "राष्ट्रीय झन्डाके सम्मान कयल जाइछै, से तोरा बूझल नइँ छौ ? कानून लगैछै !" - सीडियो किचकिचा क' बाजल । "जाढ़ बड़ रहै हजूर !"- बुढ़िया समझाब'के कोशिस कयलक । "ई अपढ़, गँवार की जनतै सम्मान आ कानून ! छोड़ू !" - एसपी बुधियारी देखबैत सीडियो स कहलक -"एहन बूढ़के सजायो कथी देबै !" बुढ़ियाके मन भेलै जे केओ पूछैत -'घर कथिला नइँ छौ ? सड़कपर कथिला रहैछे ? केना सड़कपर अयले ?' लेकिन सीडियो एसपीके एहन प्रश्नसब स कोना काम ! ओ सब त कानूनके रखबार अइ । रखबारी करैत अइछ । केओ नइँ पुछलकै । आ तयँ बुढ़ियो नइँ किछु कहलकै । बुढ़ियाके छोइर देलगेलै । लेकिन ओकरा स झन्डा छीन लेलगेलै । दयावान सीडियो ओकरा एकटा ओढ़ना देलकै, अप्पन पाई स कीनल । लेकिन ई ओढ़ना झन्डा स छोट छलै । झन्डा बड़का छलै । दोबराइयो क' ओइढ़ सकैछी । बुढ़ियाके दुःख छलै जे ओकर झन्डा छिनागेलै । अइ झन्डामे जे गदेल्ला लेपटालइ छलै, त बड़ गरम छलै । ओकरा बड़ दुख्ख भेलै मन मे । ....................... दोसर साल । फेर जाढ़ अयलै । फेर शहीददिवस मनलै । फेर मन्त्रीजीके भाषण भीषण भेलै । जयजयकार भेलै । मिठाई बँटेलै । झन्डा फरफरयलै । बुढ़िया अहूबेर चौराहेपर ठाढ़ छल । ओ ठार हवामे फरफराइत झन्डाके अहूबेर देख रहलछल । हाड़ कँपबैत जाढ़ स ओकरा अहू बेर सबूर नइँ भ'रहल छल । लेकिन अइबेर झन्डा देखि क' ओकरा आँइखमे कोनो भाव आ अपेक्षा नइँ छल । ओ बुइझ गेल छल, जे ई झन्डा ठार हवामे फरफराइत, थपेड़ा सहैत, चिथरी चिथरी उइड़ सकैय, लेकिन ककरो गर्मा नइँ सकैय । जाढ़ स राहत नइँ द' सकैय । बुढ़िया आब किछु दोसरे सोँइच रहल छल । एहन, जइमे लेपटा क' ओ गर्मा क' निश्चिन्त भ' सकैय । बुढ़िया मनेमने सोँचलक -'ईहो कोनो झन्डा ! झन्डा त ऊ, जे ओइढ़ क' गर्मायल जा सके आ फहरायल जा सके ।' -०७७ पुस २५ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१०.प्रेमशंकर झा 'पवन'- जनकवि 'मैथिली पुत्र प्रदीप' (प्रेम शंकर झा 'पवन'क मैथिली पुत्र प्रदीपपर आबैबला विदेह मोनोग्राफक अंश) प्रेमशंकर झा "पवन" जनकवि "मैथिली पुत्र प्रदीप" (प्रेम शंकर झा "पवन"क मैथिली पुत्र प्रदीपपर आबैबला विदेह मोनोग्राफक अंश)

एहि धरणी पर माँ जगदम्बाकेँ अनुकम्पा सँ कखनो-कखनो एहन व्यक्तिकेँ जन्म होइत छनि जे अपन कृतित्वसँ समाजमे सदाकेँ लेल आदर्श बनि जाइत छथि।ओहिमेसँ एक छथि प्रभु नारायण झा "प्रदीप", जिनका "मैथिली पुत्र प्रदीप" साहित्यिक नाम सँ सम्पूर्ण मिथिलाँचलमे जानल जाइत छनि। प्रसिद्ध कवि, लेखक आ रचनाकार मैथिली पुत्र प्रदीप केँ पूरा नाम प्रभू नारायण झा "प्रदीप" छलनि। मुदा हमरा लेल त' ओ छोटका बाबा रहथि। "छोटका बाबा" अहि नाम सँ हम सभ परिवारक लोक सम्बोथित करैत छलियनि हुनका। अहि बातक बोध त' बादमे भेल जे, बाबाक छोट भाई रहथि ताहि छोटका बाबा भेलथि। मैथिली पुत्र प्रदीप जीक जन्म दरभंगा जिलाक तारडीह प्रखंडकें कैथवार गाम मे ३० अप्रिल १९३६ मे भेल छलनि। पिता स्व. स्वरूप नारायण झा, एकटा साधारण किसान रहबाक कारणे, छात्रे जीवन सँ ट्यूशन कय के अपन पढ़ाइ-लिखाइ पूरा कयलनि। माता स्व. सीता देवी बाल्यावस्था मे हिनका छोरि स्वर्गवासी भय गेलखिन। मुदा ज्येष्ठ भ्राता स्व. देवनारायण झा जे दसकोसी मे अपन स्वच्छ छवि आ मखौलिया स्वभावकें कारण जानल जाइत रहथि, हुनक प्यार-दुलार आ प्रोतसाहन हिनका भेटैत रहलनि। जाहि कारणसँ इ अपन पढ़ाइ निरंतर जारी रखैत दू विषय सँ ओहि समय में एम. ए. केने रहथि जहिया अपना समाज में बहुत कम लोक आर्थिक तंगी के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करैत छलथि। हिनक बाल सखा संत हृदय मित्र नारायण झा सँ हिनका नेनपनकें बारे मे जे जानकारी भेटल ताहिमे, नेनपनेसँ कर्तव्यनिष्ट, धार्मिक आ सादा जीवन रहनि मुदा विचार हरदम उच्च रहलनि। बहुत कम बाजब आ अनुचित त' कखनो नहि बाजथि जाहि कारण टोल परोस मे हिनका "महोदय जी" सेहो कहल जाइत छलनि। बिहार सरकार मे शिक्षककें नौकरी करैत मिथिला-मैथिलीक लेल हरपल लड़ैत रहलाह। हिनकर इक्क्षा छलनि जे दरभंगा आकाशवाणी सँ नित्य दिन मैथिलीमे कविता पाठकें समय अलगसँ भेटय आ मैथिली कार्यक्रम के समय बढ़ाओल जाय। दरभंगा मिथिलाकें सांस्कृतिक केंद्र रहितो, दरभंगा आकाशवाणीमे मैथिली उपेक्षित रहल, जाहि कारणसँ मैथिली पुत्र प्रदीप दरभंगा आकाशवाणीकें त्यागि देने रहथि। हिनकर विचार रहनि जे मैथिल बच्चाकें मैथिलीमे शुरुआती शिक्षा भेटत त' ओ जल्दी बुझत आ ओकर बौद्धिक विकास जल्दी होयत। मुदा बहुत अरचन आ तत्कालीन सरकारकें मैथिलीक प्रति उदासीन रहबाक कारण, से संभव नहि भय सकल। तकर बादो ओ मिथिला मैथिली के लेल समर्पित रहलाह आ हुनकर समर्पण अविस्मर्णीय अछि। कविता आ गीत लिखनाइ ओ छात्रे जीवन सँ शुरू कय देने रहथि, हुनकर पहिल पुस्तक "गुलाब के बहार" १९५५ मे प्रकाशित भेल छलनि। "जगदम्ब अहि अबलंब हमर" कें प्रकाशन १९७८ मे भेल छलनि। जाहिमे भगवती गीतकें संग्रह केने रहथि। "जगदम्ब अहि अबलंब हमर हे माय अहा बिनु आस ककर" विद्यापति के "जय जय भैरवी" कें बाद सबसँ लोकप्रिय भगवती गीत, मैथिली पुत्र प्रदीप जीक कालजयी रचना छनि। मिथिलाँचले नहि दुनियाकें हर कोनमे जतय मैथिल रहैत छथि, इ गीत कोनो भी शुभ कार्य मे गायल आ सुनल जाइत अछि। शुरूआती दिनक हिनक लिखल किछु गीत जे स्टेज पर फरमाइस होइत छल आ गायकक मुंहसँ सुनलाक बादे पता चलल जे, इ हुनकेँ रचना छियनि। जाहिमें खड़रा सँ खड़रय छें पात लच लच लचकौ कमरिया, आ पहिर लाल साडी उखारय खेसारी प्रमुख छल। "टुनी दाईकें सोहाग" पोथीमे छपल एकटा प्रसिद्ध गीत जे मदोश्रावणी मे हास-परिहास मे गायल जाइत छल, चलै चलू बहिना हकार पुरै ले टूनी दाइक वर एलनि टेमी दागै ले" बड़ चर्चित रहनि। एहि किताब लगाकेँ मैथिली पुत्र प्रदीप जीकें लिखल कुल उन्न्तीस गो पुस्तक प्रकाशित भेल छनि, जाहिमें गीत प्रदीप, एक घाट तीन बाट, राम हृदय, श्रीम्भगवद्गीता आ दुर्गा सप्तशतीकें मैथिली अनुवाद प्रमुख अछि। एकर अलाबा किछु अप्रकाशित सेहो छनि आ दूटा प्रेस प्रतिक्षारत अछि। शिक्षकसँ अवकाश प्राप्त केलाक बाद मैथिली पुत्र प्रदीप, समाज कल्याणक लेल मिथिलाँचलमे घुमि-घुमि यज्ञ आ सप्ताहिक धार्मिक अनुष्ठानमे अपन जीवन लगा देने रहथि। धार्मिक अनुष्ठानकें माध्यमसँ बहुत गरीब ब्राह्मण बच्चाकें बिना कोनो खर्च यज्ञ मंडप पर उपनयन संस्कार सेहो करेने छलाह। एहि कार्य में श्री रामशंकर झा हिनका तन मनसँ सहयोग करैत रहलखिन। अपना जीवन कें अंतिम समयमें छोटका बाबा मैथिली पुत्र प्रदीप एकटा साधककें जीवन व्यतीत करय लगलाह। नहि बाजब (मौन ब्रत), नहि खायब, फलहार कयकें रहि जायब, इ हिनकर दिनचर्या बनि गेल छलनि। जाहि कारण हिनका लोक संत कवि सेहो कहैत छलनि आ अखनो हजारोकें संख्यामे हिनकर बनायल शिष्य हिनकर गुणगान करैत छनि। ३० मई 2020 कें मैथिली पुत्र प्रदीप अपन आवास स्वयं प्रभा निकुंज, स्वयं प्रभा नगर, दरभंगा में अंतिम साँस लेलनि। हुनकर अंतिम संस्कार पैतृक गाम कैथवारमे हनुमान पुस्तकालयकें प्रांगण मे भेलनि। हनुमान पुस्तकालय सेहो मैथिली पुत्र प्रदीप द्वारा स्थापित समाजक लेल एकटा उपलब्धि अछि। जाहिमे हिनकर द्वारा लिखल किताबक अलावा बहुत रास दूर्लभ पोथी सेहो संरक्षित अछि, जकर लिस्ट हम आइ सँ तक़रीबन तीस बरख पहिने तैयार केने रही। इ मनोरम जगह कैथवारमे सबसॅं दक्षिण बिदेस्वर-घनश्यामपुर सड़कक कात, गणेश मंदिरकें बगलमे अवस्थित अछि। ७ जून २०२२ कें हिनक प्रतिमाकें अनावरण, हिनकर समाधि स्थल (कैथवार) हनुमान पुस्तकालयकें प्रांगण मे भेलनि। मैथिली पुत्र प्रदीप कें हुनकर रचना आ मिथिला-मैथिलीक हेतु कयल गेल त्यागक लेल, अनेक सम्मानसँ सम्मानित कयल गेल छलनि। जाहिमे मिथिला रत्न, मिथिला शिरोमणि, सुमन साहित्य सम्मान, मिथिला गौरव, भोगेन्द्र झा सम्मान आ वैदेही सम्मान मुख्य अछि। एकर अलावा हुनका बरिष्ठ रचनाकार, सरस्वती पुत्र, संस्कृत शिरोमणि आ मिथिला पुत्र आदि अनेक सम्मान सँ सम्मानित कयल गेल छलनि। महान पुरुषक जीवनी हमरा यादि करबैत अछि जे हुनकर बतायल रस्ता पर चलि हमहू समाजकें कोनो ने कोनो रूपमे उपकार कय सकैत छी। आइ हम जे किछु छी ताहिमे "छोटका बाबा", मैथिली पुत्र प्रदीप जीकें बहुत बेसी योगदान छनि। हमही नै परिवार आ समाजक बहुत लोक हिनका सँ उपकृत भेल छथि। बहुतो लोककेँ अपन जान-पहचान आ सूझबूझ सँ नौकरी लगौने छथि, जे अखनो हुनकर गुणगान करैत छनि।

-प्रेम शंकर झा "पवन"- कैथवार, तारडीह, दरभंगा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.११.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १४म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १४म खेप १४ जहिना-जहिना जयन्तक आँखिक ज्योति वापस आबि रहल छल,तहिना-तहिना हुनका पाठशालाक काज आगू करबाक चिंता जोर पकड़ने जा रहल छल । कहबी छैक जे मनुक्ख सोचैत अछि किछु आ विधाता करैत छथि किछु । से नहि होइतैक तँ भगवान राम सन महान व्यक्तिकेँ दुर्गति किएक होइतनि? कालि भेने हुनका राजगद्दी हेबाक छल ,ओ चक्रवर्ती राजा होइतथि । मुदा भावी प्रबल । कहाँसँ कैकेयीकेँ कुबुद्धि सबार भेलनि आ सभटा खिस्से पलटि गेल । राजगद्दीके बदला हुनका चौदह बरखक वनबास जाए पड़ल। आचार्यजीकेँ चलि गेलाक बाद ओहुना जयन्तक मोन उदास छलनिहे । सोचलाह जे पाठशालाक काजमे लागि जाएब तँ मोन हल्लुक भए जाएत । अस्तु,एहि बातकेँ कार्यान्वयन करबाक हेतु औ सौंसे गामक लोकसभकेँ बैसार केलाह । बैसारमे ओ किछु कहितथि ताहिसँ पहिने हुनकर पितिऔत सुधाकर चिचिआ उठलाह- "कतए कहाँसँ एतेक दिनपर गाम घुरलाह । आब तरह-तरहक फदकासभ पढ़ि रहल छथि। अहाँसभ हिनकर बात पर नहि जाउ।" सुधाकर बेस मोट-सोट कदकाठीक व्यक्ति छलाह । जँ एकबेर ककरो एक चमेटा मारि देथि तँ उठि कए पानि पीबाक होस नहि रहतनि । हुनका संगे चारिटा लठैत सदिखन रहैत छल । लग-पासमे जकरा ककरो कोनो फसाद करबाक होइक तँ सुधाकर लग पहुँचैत छल । हुनकर लठैत सदिखन तैयारे रहैत छल । सुधाकरके एना बमकैत देखि गौंवा सर्द भए गेलाह । सभ एक-दोसरक मुँह ताकि रहल छलाह । केओ किछु नहि बाजए । हारि कए बैद मधुकान्त बजलाह- "तूँ की कहए चाहैत छह?" "अहाँ अनेरे टपर -टपर नहि करू । अहाँ अपन घर सम्हारि लिअ सएह समाजक बड़का उपकार होएत।" सुधाकर जे से बजैत रहलाह आ केओ हुनका किछु नहि कहि सकल । बैदजी किछु बजबाक साहस केलाह तँ हुनके पाछू पड़ि गेल । "बिना बात बुझने तोरा एना बाजब उचित नहि अछि । जयन्त विद्वान छथि आ पाठशालाक माध्यमसँ समाज सेवा करए चाहैत छथि । एहिमे तमसेबाक कोन बात भेलैक?" "जतबे बुद्धि अछि, ततबे बाजू । ई बैदगिरी नहि थिकैक जे कोनो लेप लगा देबैक आ घाव ठीक भए जेतैक । आखिर पाठशाला बनतैक कतए? पहिने से तँ फड़िछाए?"-सुधाकर मोछपर ताव दैत बजलाह । एतेक बजितहि सुधाकर इसारा केलथि । औ बाबू चारू लठैत बैद मधुकान्तकेँ घेर लेलकनि । ओहिमे सँ एकटा हुनकर गट्टा पकड़लक ,दोसर डाँड़क धोती धेलक ,तेसर फाँढ़ बन्हैत चेतौनी देबए लागल- "चुप रहबह की......" "ई सभ करबाक कोनो काज नहि छैक । बैदजी बुधिआर लोक छथि । तूँ सभ कात भए जाह ।"-सुधाकरक बात सुनि लठैतसभ बैदजीकेँ छोड़ि देलक । मुदा माहौल ततेक गरमा गेल छल जे जयन्त स्वयं ओहि बैसारसँ उठि गेलाह । सभा बिना कोनो विमर्शकेँ स्थगित भए गेल । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१२.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ८) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग - ८) "राजा पुरूरवाक तपस्या पूर्ण भs गेल, ओ अपरिमित शक्ति सs संपन्न भय गेलाह एवं भगवान विष्णुक वरदान सs युक्त अद्भुत श्री शोभा पाबि रहल छथि" - ई समाचार प्रतिष्ठान पुर में विद्युत तरंग सन व्याप्त भय गेल l नृपति पुरूरवा के स्वागत करवा हेतु प्रधान आमात्य राज पुरुष एवं सैनिकक संगे नगर सs बाहर उपस्थित छलाह l नृपति पुरूरवा अद्भुत रथ जे भगवान विष्णु के द्वारा हुनका उपहार स्वरूप भेटल छलैन्ह, ओहि पर चढ़ल आबि रहल छलाह l पुरूरवाक ओ रथ आकाश में निर्विघ्न उडि सकैत छल l भूमि पर रथ आ वायुमंडल में विमानक रूप ग्रहण करैत छल ओ दिव्य रथ l पहिले त पुरूरवाक रथ के देखि प्रधान आमात्य आश्चर्यचकित रहि गेलाह परंच निकट अयला पर ओ नृपति के चीन्ह गेल l नगर के कन्या एवम युवति सभ राजाक मार्ग में पुष्प बिछबैत छलीह l मार्ग भांति-भांति के पुष्प सs आच्छादित छल l सुरभि युक्त पवन स्वागत में मंद-मंद मकरंद बहबैत छल l स्वर्ग सs पुष्प वृष्टि दिव्य विमान द्वारा कएल जाईत छल l सब दिस प्रसन्नता पसरल छल l सम्पूर्ण नगर आनंद सरोवर में सराबोर भेल छल l प्रसन्नताक एहि अवसर पर मुक्त हस्त सs सोना आ चांदी के सिक्का लुटायल जाईत छल,परंच ओ सिक्का लेमई बला केओ नहि छल l ओ तs बस मार्गक शोभा वृद्धि करईत छल l राजप्रासाद में राजाक अभ्यर्थना कएल गेल,तत्पश्चात अनेक वाद्य बाजय लागल l सम्पूर्ण प्रजा एहि आनंद उत्सव में भाग नेने छल l संगीत आ नृत्य के एहि विशाल आयोजन के गुप्त रूपे देखवा हेतु स्वयं देव गण आयल छलाह,परंच पुरूरवा अपन राज्य कक्ष में प्रस्थान कs गेल छलाह l हुनका एहि सभ में कनिको रुचि नहि छलैन्ह l

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दोसर दिन राजा के दानव राज केशिक गर्व-पूर्ण चुनौती भरल पत्र प्राप्त भेलैन्ह l राजा क्रोध सs उद्वीप्त होमय लगलाह l ओ प्रधान आमात्य के अपन कक्ष में बजौलैन्ह l गंभीर मुद्रा में प्रधान आमात्य आबि कs अपन आसन पर बैसि गेलाह l पुरूरवा हुनका सs पूछलैथ - "अखनि धरि हम कतेक अश्वमेध यज्ञ कएलहुं अछि"? "नृपवर अखनि धरि 107 अश्वमेध यज्ञ श्रीमान् संपन्न कएल थिकहुं "| "हम पुनः अश्वमेध यज्ञ करs चाहैत छी l ई हमर अंतिम अश्वमेध यज्ञ होयत l ओहि अश्वमेधक ब्याज सs दानव राज केशि सs युद्ध होयत l ओ बेरि-बेरि हमरा चुनौती दैत रहैत अछि l ओ इन्द्र के परास्त कs देलक अछि,एहि गर्व संs गर्वित भय ओ हमरा ललकारि रहल अछि l परंच आब हम सामान्य सम्राट नहि रहि गेलहुं,भगवान विष्णु के कृपा हमरा पर अछि, हुनकर कृपा सs हम केशि के अवश्य परास्त करब l गोमेदक द्वीप,पुष्कर द्वीप और शाल्मल द्वीप पर हमर आधिपत्य नहि भs पायल अछि l हम एहि सातों द्वीप पर अपन एकाधिपत्य चाहैत छी l हमरा संपूर्ण भूमंडलक अधिपति होयवाक अछि । एहि सs हम अपनेक उचित परामर्शक अभ्यर्थी थिकहूं"| प्रधान आ मात्य नृपति पुरूरवा के महत्वाकांक्षा सs अत्यन्त प्रभावित भेलथि l ओ राजाक स्वप्न के साकार करवा हेतु उचित परामर्श दैत रहलाह,आ राजा हुनक परामर्श पर युद्धक भावी योजना बनबैत रहलाह l तत्पश्चात अन्य अश्वमेध यज्ञक अपेक्षा एहि यज्ञ के वृहद ढंग सs करवा हेतु महर्षि अगस्त सs उचित परामर्श लेमय हेतु जाइ के तैयारी करs लगलाह राजा l

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राजा पुरूरवा के आगमनक समाचार सुनि कs महर्षि अगस्त्य हर्षोल्लसित होइत हुनक स्वागत करवाक लेल स्वयं अयलाह l महर्षि के देखि कs राजा नतमस्तक भय सादर चरण स्पर्श करैत हुनक चरण धूलि के अपन मस्तक पर राखि हुनका सs पूछलाह - "गुरुदेव अतः आहां के कोनो प्रकारक विघ्न-बाधा तs नहि होइत अछि? "नहि पुत्र तोहरा सन् न्याय प्रिय आ धर्म परायण शासक के अंतर्गत हम ऋषि-मुनि सभ के कनिको कोनो कष्ट नहि अछि"| "सब कुशल मंगल सs तs छथिनवन में"? " सब सकुशल अइछ l तों अपन कहs,शिकार खेलवाक उद्देश्य सs अयलह छह"? "नहि गुरुदेव,हम शिकार नहि खेलाईत छी l राजकार्य में ततेक ने व्यस्तता रहैत अइछ कि आन कोनो व्यर्थ के काजक लेल समय नहि भेटैत अछि l ओहुना हमरा शिकार खेलवा में कनिको रुचि नहि अछि"| "ओह,अच्छा ! आबह राजन् एतह आसन पर बैसह"| "गुरुदेव हम विशेष प्रयोजन सs आई अपनेक सेवा में उपस्थित भेलहुँ अछि" - आसन पर बैसला उपरान्त नृप कहलथि l "कहु वत्स अवश्य कहु एहन कोन विशेष प्रयोजन आबि गेलह तोहर जाहि लेल एतेक दूर आबs पड़लह"? "गुरुदेव हम एक सौ आठम अश्वमेध यज्ञ करs चाहैत छी l ई अश्वमेध यज्ञ पूर्व के अन्य अश्वमेध यज्ञ सs किछु भिन्न करवाक इच्छा अछि l कृपया एहि के वास्ते उचित मार्गदर्शन कएल जाय"| " आई तक केयो सम्राट एक दू टा अश्वमेध यज्ञ सs बेसी नहि कs पौलक परंच तों एखनि धरि अतेक अश्वमेध कs चुकल छह l हमर विचार सs आब अश्वमेधक वास्ते एतेक परेशान होयवाक व्यग्रता उचित नहि छह l आब कनेक शांति धरह,एहि के अतिरिक्त आब तों विवाह कs गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करह l एतेक उम्र धरि केयो राजा अविवाहित नहि रहाल अछि"| "नहि गुरुदेव ! हमरा कृपया ब्रह्मचर्य व्रत के पालन करवा में बाधा नहि आबय दिय l हम ब्रह्मचर्य व्रत के पालन करs चाहैत छी । गृहस्थी के जाल में हमरा नहि बान्हू "। राजा दुनू हाथ जोsरि विनती केलाह एल "ठीक थिकहु,आब जेहन तोहर मोन होउक"। एकर बाद दुनू गोटे मौन भs गेलाह l उपरान्त राजाक उचित आदर सत्कार भेल l तत्पश्चात अगस्त्य मुनि यज्ञक वास्ते आवश्यक निर्देश देमय लगलाह l हुनका अश्वमेध यज्ञ आयोजनक निमित्त आवश्यक परामर्श देलथि l ध्यान पूर्वक राजा सब निर्देश सुनि रहल छलाह l प्रधान आमात्य किछु-किछु लिखैत छलाह बीच बीच में l

क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१३.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-५) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (पञ्चम भाग) डा. बिपिन कुमार झा (संस्थापक आ सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई-शोधपत्रिका) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (पञ्चम भाग) (एहि सँ पूर्व महाकवि भास केर लिखल कर्णभारम् जे कर्णक मनोव्यथा पर लिखल गेल प्राचीनतम एकांकी अछि, संस्कृत में लिखल एहि ग्रन्थक चतुर्थप्रभाग धरि मैथिली रूपान्तर पढने रही अहाँ सब, आई ओहि सं आगू) अक्षयोऽस्तु गोब्राह्मणानाम्। अक्षयोऽस्तु पतिव्रतानाम्। अक्षयोऽस्तु रणेष्वपराङ्मुखानां यौधपुरुषाणाम्। अक्षयोऽस्तु मम प्राप्तकालस्य। एष भोः प्रसन्नोऽस्मि। गौ आ ब्राह्मण के कल्याण हो, पतिव्रता स्त्री क कल्याण हो, युद्ध में विमुख नै होइ बला योद्धा क कल्याण हो एहि शुभावसर प्राप्त करयबला क कल्याण हो। आब हम प्रसन्न छी। समरमुखमसह्यं पाण्डवानां प्रविश्य प्रथितगुणगणाढ्यं धर्मराजं च बद्ध्वा। मम शरवरवेगैरर्जुनं पातयित्वा वनमिव हतसिंहं सुप्रवेशं करोमि ।। 14 ।। पाण्डव के सेना क अग्रभाग मे सब के समान प्रवेश कय गुण समूह स प्रसिद्धि प्राप्त करय बला युधिष्ठिर के बान्हि के संगहि अपन तीव्र प्रखर बाण स अर्जुन के युद्धभूमि में खसाय कें भयानक सिंह के मरि गेलाक उपरान्त निरापद वन के समान समस्त रणभूमि के सुगम बना देव। शल्यराज! यावद्रथमारोहावः। शल्यराज! तावत् रथ पर चढै छी शल्यः- बाढम्। (उभौ रथारोहणं नाटयतः।) शल्य- ठीक दुनू चढबाक अभिनय करै छथि कर्णः- शल्यराज! यत्रासावर्जुनस्तत्रैव चोद्यतां मम रथः। कर्ण- जतय ओ अर्जुन छथि ओतय रथ लय चलू। (नेपथ्ये) नेपथ्य मे भो कण्ण! महत्तरं भिक्खं याचेमि। (भोः कर्ण! महत्तरां भिक्षां याचे।) हे कर्ण पैघ भिक्षाक याचना करै छी कर्णः- (आकण्र्य) अये वीर्यवान् शब्दः। कर्ण (सुनि के) अरे ई त महनीय शब्द लगैत अछि श्रीमानेष न केवलं द्विजवरो यस्मात्प्रभावो महा- नाकण्र्य स्वरमस्य धीरनिनदं चित्राप्रिताङ्गा इव। उत्कर्णस्तिमिताञ्चिताक्षवलितग्रीवार्पिताग्रानना- स्तिष्ठन्त्यस्ववशाङ्गयष्टि सहसा यान्तो ममैते हयाः ।। 15 ।। ई केवल साधारण ब्राह्मण नहि किन्तु ऐश्वर्य सम्पन्न सेहो छथि। अत एव ई प्रभाव महत्वपूर्ण छैक एकर गम्भीर घोष सुनि के हमर चलैत एहि घोडा कान ठाढ कय निर्निमेष दृष्टि सं गर्दैन टेढ कय मुख के आगू कय चित्रवत् भय गेल अछि अपन शरीर पर नयन्त्रण नै भेला स विवश भय गेल अछि। आहूयतां स विप्रः। न न। अहमेवाह्वयामि। भगवन्नित इतः। बजाओल जाए ओहि ब्राह्मण के... नै नै हमही बजबैत छी (ततः प्रविशति ब्राह्मणरूपेण शक्रः।) ओकर बाद ब्राह्मण रूप में इन्द्र प्रवेश करैत छथि। शक्रः- भो मेघाः। सूर्येणैव निवर्त्य गच्छन्तु भवन्तः। (कर्णमुपगम्य) भो कण्ण! महत्तरं भिक्खं याचेमि। (भोः कर्ण! महत्तरां भिक्षां याचे।) इन्द- हे मेघ सूर्य जकां निवर्तित भय जाउ अहां, कर्ण लग जा कय हे कर्ण महत्वपर्ण भिक्षा मंगै छी कर्णः- दृढं प्रीतोऽस्मि भगवन्! कर्ण हम प्रसन्न छी यातः कृतार्थगणनामहमद्य लोके राजेन्द्रमौलिमणिरञ्चितपादपद्मः। विप्रेन्द्रपादरजसा तु पवित्रमौलिः कर्णो भवन्तमहमेष नमस्करोमि ।। 16 ।। अनेक प्रतापी राजा क मुकुटमणि सं जिनक चरणकमल शोभित अछि जे कृतकृत्यता प्राप्त करय बला राजा क श्रेणी म छथि, ब्राह्मणक चरणरज स पुनीत माथ बला ई कर्ण अहां के प्रणाम करैत अछि। शक्रः- (आत्मगतम्) किं नु खलु मया वक्तव्यं, यदि दीर्घायुर्भवेति वक्ष्ये दीर्घायुर्भविष्यति। यदि न वक्ष्ये मूढ इति मां परिभवति। तस्मादुभयं परिहृत्यं किं नु खलु वक्ष्यामि। भवतु, दृष्टम्। (प्रकाशम्) भो कण्ण! सुय्ये विअ, चन्दे विअ, हमिवन्ते विअ, सागळे विअ, चिट्ठदु दे जसो। (भोः कर्ण! सूर्य इव चन्द्र इव हिमवान् इव सागर इव तिष्ठतु ते यशः।) इन्द्र (मन में) हमरा की कहबाक चाही, यदि  दीर्घायु होऊ ई कहबै त दीर्घायु होयत। यदि नै कहब त मूर्ख बुझत। त दुनू छोडि ई कहैत छी चलु देखैत छी (सभक सामने) हे कर्ण! सूर्य जकां चन्द्र जकां हिमालय जकां सागर जकां अहांक यश रहय। क्रमशः... अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र- बिआह-वर्णन ४.२.समता कुमारी- हम छी नारी ४.१.राज किशोर मिश्र- बिआह-वर्णन राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी बिआह-वर्णन

हमर अभि न्न मि त्रक 'बेटी के बि आहक शुभ -दि न नि जगुत भेल, हमहूँ त' तकि ते छलहुँ बा ट, आमंत्रण हमरो देल गेल।

पहुँचि गेलहुँ हम उचि त समय पर, सपरि वा र, वि वा ह-स्थल, जुमि रहल छला ह आरो गो टे, रहथि , उत्सव मे नो तल।

दूरहि सँ छलै चमकि रहल मुख्य दो आर के मस्तक, सजल बि जुरी बल्ब सभ बा ट तकै, सूर्य अस्तक।

वृत्ता का र, वर्तुला का र मे ना चि रहल छल कृत्रि म इजो त, छो ट बल्ब सभ वि वि ध रंग मे, जेना , दैत छल प्रभा -नेओँत ।

भव्य तो रण दो आर लगैत छल, परसि रहल हो स्वा गत -भा व, सिं ह-द्वा र क' शो भा सन, ओ देखा रहल छल नि ज प्रभा व,

स्वस्ति -चि न्हि त मंगल -घट स्थि त दो आरक दूनू का त, शि ष्टता सँ लि बल दुइ -जन जेना लगै स्वा गत् ,सा क्षा त् ।

दूर -दूर धरि कुर्सी -टेबुल सजि -धजि पाँ ति लगओने छल, पा हुन -परक, सुवि धा नुकूल, नि ज -नि ज आसन पअओने छल।

ऊँच मंच छलै स्था पि त, ला गल आसन ,वधू-वरक हेतु, स्वजन -परि जन सँ बाँ चल नहि छल, जगह ति लो धरक हेतु।

ता कू ऊपर ,अका स नहि , पंडा ल सजल छल वृहदा का र, कनका भ -मंडि त झूमर सभ चमकि रहल, कतेको प्रका र।

जगह पा बि हम बैसि गेलहुँ, बा रि क सभ घूमथि बा रम्बा र, अपना रुचि सँ लैथ लो क सभ, बटा इत रहए जे स्वल्पा हा र।

रमणी य छल वा ता वरण, आमंत्रि त पा हुनक भी ड़ छल, रंग -वि रंग परि धा न पहि रि , परि चि त सँ मि लए अधी र छल।

कि छुए का ल बा द, संगी तक तुमुल -ध्वनि सँ उठल अनघो ल, वर -बरि आती आबि गेला ह, बैंड -बा जा के, इएह छल बो ल।

की नृत्य करैत छलैथ बरि आती ? आनन्द बरसि रहल छल, रो म हर्षक शुभ -गी त -स्वर, मां गल्य परसि रहल छल।

स्वा गत मे, कन्या गत लो कनि करए लगला ह मंगल -ना द, आब, ना री गण सेहो शुरु कएदेलखि न्ह वर -परि छनि -संवा द।

बैसि गेला ह वर, ऊच्चा सन पर, अएलि ह कन्या , लेने जयमा ल, जयघो ष भेलै, जयमा ल पहि रि भ' गेलथि प्रणय सँ दूनू नेहा ल।

अति थि लो कनि क हेतु आएल, ई आवश्यक सूचना , भो जन हेतु प्रस्था न करथि , इच्छा भरि खा थि , अपना जेना ।

छलै बुफे व्यवस्था , भो जन के, अपने सँ परसि -परसि सभ खा उथ, रंग -वि रंगक भो जन ला गल, उत्तर भा रती य, वा सा उथ।

भाँ ति -भाँ ति क मि ठा ई सभ, कतेको तरहक छलै व्यंजन, को न खा इ आ को न छो ड़ि दी , एहि सँ हो इ छल मन -गि ञ्जन।

पंडि त जी प्रा रम्भ केलन्हि , कन्या दा नक प्रकरण, बढ़ल बि धि आ संग हो इत गेल वैदि क मंत्रो च्चा रण।

अग्नि -शपथ लए जि म्मा लेलन्हि , कनि आँ -वर, दा म्पत्य जी वनक, सुख -दुः ख मे, संग नि बा हए के, ता कब उपा य सभ वि घ्नक।

भ' रहल छल प्रणय गी त उठैत छल भा व -तरंग, ला गि रहल छल प्रेम -रंग, परि वेशक अंगे -अंग।

एहि अनमो ल बंधन के नि बा हक अटूट प्रण छल, जी वन -रण केँ जी तय के, प्रति ज्ञा , तन -मन-धन छल।

वर -कनि आँ केँ श्रेष्ठ लो कनि , भरि -भरि क' देलखि न्ह आशी र्वा द, वि दा भेला ह अति थि गण द 'द', आति थेय के धन्यवा द।

ई मंगलमय वा ता वरण , छल दय रहल आशी ष, 'अहि बा त अखंड रहै सदा , वर देथि जगत् के ईश। '

दए क' आशी र्वचन, हमहूँ चललहुँ सपरि वा र, शुभ अवसर छल, भरल ,मो न मे सुखक पा रा वा र।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.२.समता कुमारी- हम छी नारी समता कुमारी हम छी नारी हम छी नारी, हमरा अप्पन पहचान चाही। माय बहिन पुतहु कानियाँ बेटी, अइ से अलग अप्पन एकटा नाम चाही, पुरुखक ई समाज में, हमरो उचित स्थान चाही।। पूजई छथ देवी के नौओटा रूप, लेकिन घर में ने नारी के मोल।। जे बाहर में नारी शक्ति पर, बड़का बड़का भाषण दई छथ। हुनको ओत्त नई सुनबाक भेटल, हुनकर घरक नारी के बोल।। हम कोमल छी पर अबला नई, हम कमजोर नई हम बेचारी नई। कोनो क्षेत्र छुटल नई अछी, जहां हम्मर पहुंच नई।। जौं केओ अत्याचार करत, ओकरा लाए हम दुर्गा छी। त्यागक मूर्ति सीता त, प्रियतमा रूप में राधा छी।। जौं लोक मान देतन त, हुनका लाए प्राणक आहुति द देव। लेकिन जे अपमान करता, हुनका लेल काली रूप लेव।। बस अछी विनती की हमरो, हम्मर मान चाही। हम छी नारी, हमरा अप्पन पहचान चाही।। -समता कुमारी, शिक्षिका,समस्तीपुर , बिहार। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ५.संस्कृत खण्ड ५.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (चतुर्थोच्छवासः) डा. दीपिका (स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च) (विगते उच्छ्वासे अस्मिन् ग्रन्थे यानि अनेकानि वैशिष्ट्यानि दृग्गोचरीभवन्ति मया तेषां विवरणं प्रदत्तम्। प्रकृते उच्छ्वासे वर्णनवैचित्र्यस्य नैषधदृशा तुलनात्मकं विवरणं प्रस्तूयते।) सामान्येन नलचम्पूग्रन्थे नैषधदृशा क्वचिच्छाम्यं तु क्वचित् वैषम्यं धारयति। साम्यम् *नैषधे नलदमयन्तीभ्यां प्रणयवर्णनम् अस्ति तथैव नलचम्पूग्रन्थे नलदमयन्तीभ्यां प्रणयवर्णनम् अस्ति *निषधदेशस्य[1] वर्णनम् उभयत्र वर्तते *हंसवर्णन[2] वर्णनम् उभयत्र वर्तते वैषम्यम् *नैषधे नलदमयन्तीभ्यां प्रणयवर्णनम् उभयत्र अस्ति विवरणम् अत्यन्तं भिन्नं दृश्यते। *नैषधीयचरिते नलः एकान्तवासाय उपवनं याति[3] अत्र नलः शूकरवधार्थं[4] गच्छति निषधदेशस्य निषधानगर्याः[5] वर्णनं केवलं अत्रैव वर्तते न तु नैषधीयचरिते प्राप्यते *हंसवर्णन[6] वर्णनम् उभयत्र वर्तते किन्तु नैषधीयचरिते हंसविलापो[7] दृश्यते किन्तु अत्र आकाशवाणी भवति यत् अयं हंसः एव दमयन्तीं प्रति तव सहायकः भवति। *एवमेव नलचम्पूग्रन्थे हंसिनी नलं धिक्करोति। *नैषधीयचरिते प्राकृतिकवस्तूनां पदे-पदे वैलक्षण्येन वैचित्र्यवर्णनं वर्तते[8] किन्तु नलचम्पूग्रन्थे वर्षर्तूनामेवेदं[9] वर्णनम् इत्थं चम्पूकाव्यस्य विशिष्य नलचम्पूवर्णनं नैषधदृशा अस्माभिः दृष्टम्। विस्तृतविवरणार्थं ग्रन्थद्वयोरालोकनमेव वरमिति शम् । [1] नलस्य पृष्टा निषधागता गुणान्मिषेण दूतद्विजबन्दिचारणाः । निपीय तत्कीर्तिकथामथानया चिराय तस्थे विमनायमानया ॥ १.३७ ॥ [2] न वासयोग्या वसुधेयमीदृशस्त्वमङ्ग यस्याः पतिरुज्झितस्थितिः । इति प्रहाय क्षितिमाश्रिता नभः खगास्तमाचुक्रुशुरारवैः खलु ॥ १.१२८ ॥ [3] अकारि तेन श्रवणातिथिर्गुणः क्षमाभुजा भीमनृपात्मजालयः । तदुच्चधैर्यव्ययसंहितेषुणा स्मरेण च स्वात्मशरासनाश्रयः ॥ १.४४ ॥ [4] किं स्यादञ्जनपर्वतः स्फटिकयोर्द्वन्द्वं दधदीर्घयोः। [5] तस्य विषयस्य मध्ये निषधो नामास्ति जनपदः प्रथितः। [6] पयोधिलक्ष्मीमुषि केलिपल्वले रिरंसुहंसीकलनादसादरम् । स तत्र चित्रं विचरन्तमन्तिके हिरण्मयं हंसमबोधि नैषधः ॥ १.११७ ॥ [7] मदेकपुत्राजननी जरातुरा नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी । गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयन्नहो विधे त्वां करुणा रुणद्धि न ॥ १.१३५ ॥ [8] नवा लता गन्धवहेन चुम्बिता करम्बिताङ्गी मकरन्दशीकरैः । दृशा नृपेण स्मितशोभिकुङ्मला दरादराभ्यां दरकम्पिनी पपे ॥ १.८५ ॥ [9] अथ कदाचिदुन्नमत्पयोधरान्तर्.... अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ६. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण सूचना १ "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला" आगामी दू टा विशेषांक लेल जतेक सुझाव आयल ओइमे सँ "प्रेमलता मिश्र प्रेम" आ "शरदिन्दु चौधरी" ऐ दू नामक चयन भेल। हिनका दुनू गोटे पर दुनू विशेषांक विदेहक अलग-अलग अंकमे रहत। दुनू विशेषांक कार्तिक धवल त्रयोदशी धरि ई-प्रकाशित करबाक विचार अछि मुदा से निर्भर करत जँ न्यूनतम आलेख संख्या भेट जाय संगहि वर्ड फाइलमे टाइप कयल रचना जतेक बेशी रहत ततेक जल्दी ई दुनू विशेषांक ई-प्रकाशित भऽ सकत। विदेह मासमे दू बेर (१ आ १५ तिथिकेँ) ई-प्रकाशित होइत अछि। विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। अहाँसँ आग्रह जे जतेक जल्दी हुअय "प्रेमलता मिश्र प्रेम" आ "शरदिन्दु चौधरी" दुनू गोटेक काज, रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। घोषणा: प्रेमलता मिश्र प्रेम पर विशेषांक विदेहक ३५७म अंक माने ०१ नवम्बर २०२२ आ शरदिन्दु चौधरी पर विशेषांक विदेहक ३५८म अंक माने १५ नवम्बर २०२२ केँ बहार हएत। १५ नवम्बर २०२२ क लगाति आगामी नव विशेषांकपर निर्णय हएत। अहाँसँ ऐ लेल सुझाव सादर आमंत्रित अछि।  -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA २ "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला विदेह अपन जीवित रचनाकार पर विशेषांक शृंखलाक अन्तर्गत (१)अरविन्द ठाकुर, (२)जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, (३)रामलोचन ठाकुर, (४) राजनन्दन लाल दास, (५)रवीन्द्र नाथ ठाकुर आ (६) केदार नाथ चौधरी विशेषांक निकालने अछि। अही सन्दर्भमे छबो साहित्यकार पर "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत "मोनोग्राफ" आमंत्रित कयल जा रहल अछि। "विदेह मोनोग्राफ" शृंखलाक विवरण निम्न प्रकार अछि: (१) इच्छुक लेखक ऊपरमे कोनो एक रचनाकार पर अपन मोनोग्राफ लिखबाक इच्छा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छथि। मोनोग्राफ लिखबाक अवधि सामान्यः एक मास रहत। (२) विदेह छह रचनाकारपर छह लेखकक नाम मोनोग्राफ लिखबाक लेल चयनित कऽ ओकर सार्वजनिक घोषणा करत। "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक निअम: (१) मोनोग्राफ पूर्ण रूपेँ रचनाकारपर केन्द्रित हुअय। साहित्य अकादेमी, एन.बी.टी. आ किछु व्यक्तिगत रूपेँ लिखल मोनोग्राफ/ बायोग्राफीमे लेखक संस्मरण आ व्यक्तिगत प्रसंग जोड़ि कय रचनाकारक बहन्ने अपन-आत्म-प्रशंसा लिखैत छथि। "विदेह मोनोग्राफ" फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल सन रहत। फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल एहेन एकमात्र टूर्नामेण्ट अछि जतय कोनो "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" सेरीमनी नै होइत छै आ तकर कारण छै जे "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" मे टूर्नामेण्टमे नै खेला रहल लोक मुख्य अतिथि/ अतिथि होइत छथि आ फोकस खिलाड़ी सँ दूर चलि जाइत अछि। फीफा मात्र आ मात्र फुटबाल खिलाड़ीपर केन्द्रित रहैत अछि से ओकर टूर्नामेण्ट "ओपेनिंग सेरीमनी" नै वरन् सोझे "ओपेनिंग मैच" सँ आरम्भ होइत अछि आ ओकर समापन "क्लोजिंग सेरीमनी"सँ नै वरन् "फाइनल मैच आ ट्राफी"सँ खतम होइत अछि आ फोकस मात्र आ मात्र खिलाड़ी रहैत छथि। तहिना "विदेह मोनोग्राफ" मात्र आ मात्र ऐ "छबो रचनाकार"पर केन्द्रित रहत आ कोनो संस्मरण आदि जोड़ि कऽ फोकस रचनाकारसँ अपनापर केन्द्रित करबाक अनुमति नै रहत। (२) मोनोग्राफ लेल "विदेह पेटार"मे उपलब्ध सामग्रीक सन्दर्भ सहित उपयोग कयल जा सकैए। (३) विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' ई-पत्रिकामे प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। (४) "विदेह मोनोग्राफ"क फॉर्मेट: रचनाकारक परिचय (रचनाकारक जन्म, निवास-स्थान आ कार्यस्थलक भौगोलिक-सांस्कृतिक विवेचना सहित) आ रचनावली (समीक्षा सहित)। घोषणा: "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत (१) राजनन्दन लाल दास जी पर मोनोग्राफ निर्मला कर्ण, (२) रवीन्द्र नाथ ठाकुर पर मुन्नी कामत आ (३) केदार नाथ चौधरी पर प्रेम मोहन मिश्र द्वारा लिखल जायत। मैथिली पुत्र प्रदीप पर "विदेह मोनोग्राफ" लिखताह प्रेमशंकर झा "पवन"। शेष ३ गोटेपर निर्णय शीघ्र कएल जायत। घोषणा २: ओना तँ मैथिली पुत्र प्रदीप पर विदेह विशेषांक नै निकालने अछि, मुदा हुनकर अवदान केँ देखैत प्रेमशंकर झा "पवन"क हुनका ऊपर "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक विचार आयल तँ ओकरा स्वीकार कयल गेल। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ विदेह ब्रॉडकास्ट लिस्ट विदेह WWW.VIDEHA.CO.IN सम्बन्धी सूचना लेल अपन whatsapp नम्बर हमर whatsapp no +919560960721 पर पठाउ, ओकर प्रयोग मात्र विदेह सम्बन्धी समाचार देबाक लेल कएल जाएत। ४ विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १.साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५.स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७.लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८.दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय।

-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA 204 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३५७ म अंक ०१ नवम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७९ अंक ३५७)|| 203

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