ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३५८ म अंक १५ नवम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७९ अंक ३५८) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२२। सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 358 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. १-७) १.२.अंक ३५७ पर टिप्पणी (पृ. ८-१०) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे (पृ. १२-१४) २.२.शरदिन्दु चौधरीक परिचय - (प्रस्तुति श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल') (पृ. १५-२०) २.३.शरदिन्दु चौधरी जी केर साक्षात्कार जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' द्वारा (पृ. २१-२५) २.४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक सेवक नहि, मैथिली भाषाक सेवकः शरदिन्दु चौधरी (पृ. २६-३०) २.५.राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर'- हमर ज्ञान-पिपाशाक स्रोत: शरदिन्दु चौधरी (पृ. ३१-३४) २.६.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- ओहिना नहि तमसाइत छथि शरदिन्दु चौधरी (पृ. ३५-३८) २.७.विभा रानी- शरदिंदु भाईक गम्भीर सिद्धांतप्रियता! (पृ. ३९-४४) २.८.डा. नारायणजी- विसंगतिक विरुद्ध प्रतिरोधक-स्वर (पृ. ४५-४७) २.९.मुन्नी कामत- भाषाविद् श्री शरदिन्दु चौधरी (पृ. ४८-५०) २.१०.गौरीनाथ- शरदिन्दु चौधरी हेबाक माने (पृ. ५१-५५) २.११.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- कथ्य, तथ्य आ सत्यक चिन्तन (पृ. ५६-६२) २.१२.अजित कुमार झा- 'समय-साल' केँ अकानैत: शरदिन्दुजीक संपादन ओ संपादकीय (पृ. ६३-६९) २.१३.अशोक- शरदिन्दु जी (पृ. ७०-७३) २.१४.शिवशंकर श्रीनिवास- जेहने मधुर तेहने दृढ़ (पृ. ७४-७८) २.१५.केदार कानन- हमर शरदू भैया (पृ. ७९-८२) २.१६.आशीष अनचिन्हार- मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान (पृ. ८३-८७) २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक संस्मरण साहित्य [बात-बातपर बात (I-IV)] (पृ. ८८-९८) २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक हास्य-व्यंग्य संग्रह- 'जँ हम जनितहुँ' (पृ. ९९-१०६) २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक तीनटा व्यंग्य संग्रह- 'बड़ अजगुत देखल..', 'गोबरगणेश' आ 'करिया कक्काक कोरामिन' (पृ. १०७-११२) २.२०.लक्ष्मण झा सागर- खाँटी मैथिलीस्ट शरदू जी! (पृ. ११३-११८) २.२१.जगदानन्द झा 'मनु'- सत्य देखल (पृ. ११९-१२४) २.२२.श्रीधरम- शरदिन्दु कुमार चौधरीक साहित्य : 'स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती' (पृ. १२५-१३४) ऐ अंकक अन्यान्य रचना ३.गद्य खण्ड ३.१.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १३७-१४९) ३.२.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १५०-१५५) ३.३.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १५६-१६०) ३.४.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १६१-१६४) ३.५.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १६५-१६९) ३.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- परिस्थितिजन्य (पृ. १७०-१७१) ३.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- थाहल संग(पृ. १७२-१७९) ३.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. १८०-१९३) ३.९.रमाकर चौधरी- मधुमेह (पृ. १९४-२०८) ३.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १५म खेप (पृ. २०९-२१२) ३.११.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- बिना बहर आ काफिया गजल कोना भेलै (पृ. २१३-२३५) ३.१२.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ९) (पृ. २३६-२३८) ३.१३.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-६)(पृ. २३९-२४४) ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र- कहक' अह (पृ. २४५-२४९) ५.संस्कृत खण्ड ५.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (पञ्चमोच्छवासः)(पृ. २५०-२५२) ६. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण (पृ. २५३-२५७) 2
ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३५७ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ ई अंक शरदिन्दु चौधरी पर विशेषांक अछि। साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादेमी आ संगीत नाटक-अकादेमीक सम्मान/ पुरस्कारसँ बेशी महत्वपूर्ण विदेहक जीवित रचनाकार/ कलाकर्मी पर विशेषांक भऽ गेल अछि, से उद्गार पाठक लोकनि सोशल मीडियापर व्यक्त केलन्हि अछि। सभ सहयोगी आ पाठकगणकेँ धन्यवाद। २ राम विलास साहुक ५ टा कथापर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी Parallel Literature and Videha Maithili Literature Movement 1 The Book of Bihari Literature (Abhay K. Editor) This book contains five translations from Maithili into English by Vidyanand Jha. Nagarjun (Maithili's Yatri) and Usha Kiran Khan are from the Hindi quota though both got the Sahitya Akademi prize from the Maithili quota. Vibha Rani and Rajkamal Chaudhary are from the Maithili quota though both wrote in Hindi also. This book is edited by Abhay K. who has read Samskrit only upto high school. Yet he pretends to translate Arthashastra directly from Samskrit into English. I am Kovid in Samskrit and from the quality of the translation, I can presume that he has used some intermediary language in translating Samskrit texts into English. It is a matter of ethics to acknowledge the source. Vidyanand Jha's translation is below par, for example, he has no inkling what would be the English word for 'olak sanna', and there are plenty of such instances. I have some suggestions for him: First, read A Bird's Eye View on Mithila by Rajnath Mishra, it mentions all the terms for which you could not find English equivalents. Then go to the Videha archive (www.videha.co.in) and look for Umesh Mandal's Picture Dictionary containing vegetation, animals and skill sets of Mithila, here you will find the actual photographs too. Further, under A Parallel History of Maithili Literature (Videha www.videha.co.in) you will find sample English translations of some Maithili short stories. Therefore, what Vidyanand Jha is presenting as exotic is the original thing of Maithili Language (but not that of Maithili literature, as was two decades ago). Interestingly his choice of short stories reminds me of Contemporary Maithili Short Stories (Maithili short stories translated into English) edited by Murari Madhusudan Thakur and published by the Sahitya Akademi in 2005. It seems that the stories in this selection are leftover material of that collection. Rip Van Winkle awoke after two decades but Vidyanand Jha is still in slumber not realizing the changes that have happened during the period. If you compare the translation of this selection vis a vis the English translation of Latin American Spanish literature, you would be able to understand the difference. But these types of selections are not known for their literary excellence, Harper Collins publishes these types of selections for five-star hotels and Airport lounges. The publishers made the announcement for this book on March 22, 2022. So in 6-7 months you will get old materials only. 2 The Bride: The Maithili Classic Kanyadan by Harimohan Jha (1908-1984) translated into English by Lalit Kumar (Assistant Professor, Department of English, Deen Dayal Upadhyaya College, University of Delhi) I have pre-ordered the book. I will comment on it after the book is delivered to my kindle account on the 1st of December 2022. 3 Bharti's Cat: Translation of Braj Kishor Varma 'Manipadma's original Maithili novel Bhartik Biladi- by Yogendra Pathak Viyogi (available on Amazon Kindle). Yogendra Pathak Viyogi has done a wonderful job. The translation seems to carry the soul of the original language. Folktales of Mithila & Gonu Jha of Mithila: (Tales of wit and humour) both by Yogendra Pathak Viyogi (both are available on Amazon Kindle). 4 The Short-Stories by Ram Vilas Sahu Now come to the exciting world of parallel literature. In 'Kamtia Haveli' the story teller explains the oral history. The Haveli's were just the outposts. In Mithila the Cornwallis appointed permanent settlement award holders are called Maharajadhiraj etc. Actually, the chain of rent collectors was all over Mithila and they made their posts for farming as well as collecting rent. So the Madina Didi explains it to Janaki. And while all these are going on the nuances of village life are depicted in a language that seems exotic to those people who stopped reading Maithili literature two decades ago. In second short story 'Dudhbechni' depicts the sacrifice of Rita who donates all her land and property for building scholl and cow-shelter. In 'Swargak Sukh' the story of the family of Bauku Saday, a family from the Mushhar community (called deridingly as rat-eaters by some part-time field workers turned litterateurs) ravaged by flood has been told intricately. In 'Ghusha Ghar' you will find mention of the corruption in Indira Awas Yojana. In 'Shikshak Mahat' the flood-ravaged village leading to migration, the importance of education and the mean-mindedness of the elite all has been interwoven into a single thread. ३ गाम-गामक सत्यकथा आ फकड़ा एकर अन्तर्गत गाम-रुद्रपुर, जिला मधुबनीक सत्य कथा देल जा रहल अछि जे ओइ गामक लोकक कण्ठमे आइयो बसल अछि। (सूत्र आ नैरेटर- श्री श्रीमोहन चौधरी- गाम रुद्रपुर।) मंगनिया मायक तेल (करू तेल)- रुद्रपुरक सभ जातिक सभ गोटेमे ई फकड़ा बनि गेल अछि। मंगनिया- जातिक गुआर। गाम रुद्रपुर, मधुबनी, ८०-९० बर्ख पुरान घटना जखन सोना ५० रुपयामे एक भरि (१० ग्राम) भेटैत छलै। मंगनिया बच्चे छल, बड्ड मेहनत आ मितव्ययी। अपन मेहनतिसँ पैघ भेलापर १० बीघा खेत किनलक, ३-४ बजे भोरे उठि सभटा काज सम्पन्न कऽ लैत छल आ जखन हरवाहि लेल जाइ छल तँ लोक पुछै छलै तँ कहै छलै, मालिक ओइठाम सुस्ताइ लेल जाइ छी ३-४ घण्टा सुस्तायब (हरवाहि करबकेँ सुस्तेनाइ कहै छल, हरवाहिमे कोन भीड़ होइ छै।) जुलुम ठाकुरक बाप घटक ठाकुर- दोकानदार (जाति- ब्राह्मण)। भोरे भोर मंगनिया माय घटक ठाकुरक दोकानपर जाइए आ उपराग दैए। “ऐं हौ, तूँ कतेक तेल दू पाइक देलेँ जे कनियेटा जितवाहनकेँ चढ़ेलिऐ आ बच्चाक (मंगनियाक) पएरमे लगेलिऐ, आ पहुनाकेँ तरुआ तरि कऽ देलिऐ। आ रातिमे शीसीक मुन्ना जे खुजले रहि गेलै से बोंगमरना कुकुड़ रातिमे भुभुआ-भुआ कऽ पीलक। दू पाइमे कतबी तेल देलऽ जे एक्के दिनमे एतबी काजमे सठि गेल।“ फकड़ा जे बड्ड घेंघाहि से बड्ड बड़की दाइ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३५७ पर टिप्पणी मनोज पाठक सादर नमन, सस्नेह स्मरण। जखन लिंक आयल छल तऽ वेबसाइट पर जा कऽ देखने रही। नीक अंक बनल अछि। पढने जें कि दुइये टा आलेख रही, श्री आशीष जीक आ कुणाल भैयाक। आब पीडीएफ प्रति मोबाइल संग संग घूमैत रहत आ पूरा अंक पढि टिप्पणी करब। अहांक माध्यमसं मैथिली साहित्य जगतमे व्यापक परिवर्तन अयलैक अछि। तथाकथित आलोचक आ विद्वान एकरा नहि गछता मुदा मैथिली भाषा ओ साहित्य अपन डिजिटल स्वरूपमे जे एखन घनगर भेल अछि ओहिमे अहांक एकान्त अनवरत तपक प्रभाव सर्वाधिक छैक। विदेह संख्यात्मक ओ गुणात्मक दुनु तुला पर प्रचुर साहित्य रचलक। एकर निरन्तरता ओ नव नव संभावना लेल सदैव खुजल अबाधित मंच मीलक पाथर अछि मैथिली भाषा ओ साहित्यक लेल। सस्नेह। शुभ नारायण झा सर पढ़लौं। सबहक आलेख। बहुत नीक लागल। अपने सब एते पुण्य कायल जे कोनो रंगकर्मी हेतु विशेषांक निकालल । भले हुनक साहित्यिक प्रतिभा के ध्यान राखि अपने ई अंक निकालने होइ। बहुत बहुत धन्यबाद। (शुभ नारायण जी- ओना तँ प्रेमलता मिश्र प्रेम विशेषांक हुनकर साहित्यिक नै मात्र रंगमंचीय प्रतिभाकेँ ध्यानमे रखैत निकालल गेल अछि, मुदा हुनकामे साहित्यिक प्रतिभा मूल धाराक बहुत साहित्यकारसँ बेशी छन्हि, खास कऽ हुनकर संस्मरणात्मक साहित्य, संजोग देखू जे ऐ बर्खक साहित्य लेल नोबल एकटा महिलाकेँ मात्र संस्मरण लिखबा लेल भेटल छन्हि। मूल धाराक रंगमंचकर्मीमे मूल धाराक साहित्यकार सन बहुत रास समस्या छन्हि मुदा ओ मूलधाराक साहित्यकार सन कोनो हालतिमे अकर्मण्य नै छथि।- सम्पादक) ग्रुप कैप्टन (डॉ) विवेकानन्द झा क्षमा करू गजेंद्र बाबू ! कने टा विज्ञान व औषधि शास्त्र की पढ़लहुँ कि मैथिली साहित्य सं वंचित भऽ गेल छी। ३० वर्ष के वायुसेना सेवा व ७ वर्ष के वैज्ञानिक अनुसंधान व विकास कार्य हमरा साहित्य सं बहुत दूर पहुँचा देने अछि। हमर मैथिली साहित्यिक ज्ञान बड़ ओछ अछि। संलग्न विषय वस्तु हमर समझ के परे अछि, कोनो मंतव्य देमे मे असमर्थ छी। क्षमा करू। आशीष अनचिन्हार "मैथिलीपुत्र प्रदीप" जीपर केंद्रित मोनोग्राफ जे प्रेमशंकर झा "पवन" द्वारा लिखल जा रहल अछि तकर स्वागत। आगू ई केहन रहत तकर उत्सुकता बनल अछि। जेना कि मोनोग्राफ प्रमाणिक होइत छै तँइ पवनजीसँ उम्मेद जे ओ हरेक तथ्यकेँ लिखता, हुनकर हरेक पोथीक चाहे ओ प्रकाशित हो कि अप्रकाशित ओकर सूची एहिमे देताह। हुनकर जीवन केर ओहन पक्ष जे एखन धरि नै आएल समाजक सामनेमे सेहो ओ देताह। आगूक अंश आ पूरा मोनोग्राफ पढ़बाक लेल जल्दिए भेटत से उम्मेद अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। शरदिन्दु चौधरी विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.२.शरदिन्दु चौधरीक परिचय - (प्रस्तुति श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल') २.३.शरदिन्दु चौधरी जी केर साक्षात्कार जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' द्वारा २.४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक सेवक नहि, मैथिली भाषाक सेवकः शरदिन्दु चौधरी २.५.राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर'- हमर ज्ञान-पिपाशाक स्रोत: शरदिन्दु चौधरी २.६.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- ओहिना नहि तमसाइत छथि शरदिन्दु चौधरी २.७.विभा रानी- शरदिंदु भाईक गम्भीर सिद्धांतप्रियता! २.८.डा. नारायणजी- विसंगतिक विरुद्ध प्रतिरोधक-स्वर २.९.मुन्नी कामत- भाषाविद् श्री शरदिन्दु चौधरी २.१०.गौरीनाथ- शरदिन्दु चौधरी हेबाक माने २.११.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- कथ्य, तथ्य आ सत्यक चिन्तन २.१२.अजित कुमार झा- 'समय-साल' केँ अकानैत: शरदिन्दुजीक संपादन ओ संपादकीय २.१३.अशोक- शरदिन्दु जी २.१४.शिवशंकर श्रीनिवास- जेहने मधुर तेहने दृढ़ २.१५.केदार कानन- हमर शरदू भैया २.१६.आशीष अनचिन्हार- मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक संस्मरण साहित्य [बात-बातपर बात (I-IV)] २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक हास्य-व्यंग्य संग्रह- 'जँ हम जनितहुँ' २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक तीनटा व्यंग्य संग्रह- 'बड़ अजगुत देखल..', 'गोबरगणेश' आ 'करिया कक्काक कोरामिन' २.२०.लक्ष्मण झा सागर- खाँटी मैथिलीस्ट शरदू जी! २.२१.जगदानन्द झा 'मनु'- सत्य देखल २.२२.श्रीधरम- शरदिन्दु कुमार चौधरीक साहित्य : 'स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती' २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे विदेह द्वारा 'जीबैत मुदा उपेक्षित' शृखंला केर अंतर्गत अगस्त 2022 केँ विदेह "शरदिन्दु चौधरी" विशेषांक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक आ प्रस्तुत अछि ई विशेषांक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। एहि विशेषांकसँ पहिने विदेह 7 टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि हमरा लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत- अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ आठम विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। 2015 सँ लऽ कऽ 2022 धरि 8 टा विशेषांक प्रकाशित भेल मने बर्खमे एकटा। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक ई आठो विशेषांक केर अलावे आनो विषयपर विशेषांक प्रकाशित भेल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। शरदिन्दु चौधरी मैथिलीक मुख्यधारामे रहितहुँ उपेक्षित छथि आ तकर कारण जनबाक लेल पाठककेँ हुनकर पोथी पढ़ए पड़तिन हुनकर आचरण ओ लेखन केर संबंध देखए पड़तनि। मैथिलीमे किछुए लेखक छथि जिनकर लेखन ओ आचरण एकसमान छनि जाहिमेसँ शरदिन्दुजी एकटा सेहो छथि। एहन नै छै जे शरदिन्दु जीपर लिखल नै गेलै मुदा ओ सभ एकट्ठा नै भऽ सकल छै तँइ ओकर प्रभाव हेड़ा गेल छै। एहि संदर्भमे हम कहि सकै छी जे विदेहक ई प्रस्तुत विशेषांक एहन पहिल प्रयास अछि जाहिमे ई बुझबाक प्रयास कएल अछि जे शरदिन्दु जीक रचना केहन छनि। ई अलग बात जे हम सभ कतेक सफल वा असफल भेलहुँ से पाठक कहता। एहि विशेषांक केर शुरूआत विदेहक आने विशेषांक जकाँ अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेह अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता" केर नामसँ प्रकाशित भेल उम्मेद जे भविष्यमे शरदिन्दुपर केंद्रित एहि विशेषांक केर पोथी रूप सेहो आएत। विदेह द्वारा 'जीबैत मुदा उपेक्षित' शृखंलामे प्रकाशित भेल आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)- 1) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 189 म अंक 1 नवम्बर 2015 (ई विशेषांक 2020 मे पोथी रूपमे सेहो आएल अछि) 2) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 191 म अंक 1 दिसम्बर 2015 3) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 319म अंक 4) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 333म अंक 5) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 6) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 जून 2022 अंक 352 7) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 1 नवम्बर 2022 अंक 357 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.श्री शरदिंदु चौधरी क परिचय- (प्रस्तुति श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल') नाम-शरदिंदु चौधरी माता : स्व.मोती देवी पिता : पं.सुधांशु शेखर चौधरी स्थान : मिश्रटोला, दरभंगा, बिहार जन्म तिथि : 7-10-1956 शिक्षा : एमए (राजनीति शास्त्र ) पटना विश्वविद्यालय, एलएलबी (मगध विश्वविद्यालय, गया) वृत्ति- पत्रकारिता : 1981-84-मिथिला मिहिर,सप्ताहिक 1984-86-मिथिला मिहिर, दैनिक 1987-89-मिथिला मिहिर,मासिक 1995-2002-आर्यावर्त्त, हिन्दी दैनिक,(फीचर संपादक ) 2000-2014-समय-साल, मैथिली द्वैमासिक पूर्वोत्तर मैथिल, गुआहाटी, 2015-16 मैथिली-हिन्दीमे लेखन व्यस्थापक,संचालक ----शेखर प्रकाशन,पटना (मुद्रक,प्रकाशक एवं पोथी विक्रय केन्द्र) शरदिन्दुजी चौधरीक परिवारक अन्य सदस्य : पत्नी : श्रीमती चित्रा चौधरी पुत्री : 1.स्वाति शेखर (पत्नी श्री सुशीम मिश्र) २.प्रीति शेखर (पत्नी विवेक आनन्द ठाकुर) ३.सुश्री दीप्ति शेखर पुत्र : राजाशेखर प्रकाशित कृति मौलिक: (एखन धरि शरदिन्दुजीक जतेक मौलिक पोथी प्रकाशित भेलनि से विदेह पोथी डाउनलोडपर राखल गेल अछि आ एहिठाम जे पोथीक लिस्ट देल गेल अछि ताहिमे पोथीक नामपर क्लिक करबै तँ ओ पोथी खुजि जाएत) जँ हम जनितहुँ (२००२) बड़ अजगुत देखल (२००५) गोबरगणेश (२०११) करिया कक्काक कोरामिन (२०१६) बात-बातपर बात खण्ड-१ (२०१९) मर्मान्तक-शब्दानुभूति (बात-बातपर बात खण्ड-२) (२०२०) हमर अभाग: हुनक नहि दोष (बात-बातपर बात-३) (२०२१) साक्षात् (बात-बातपर बात-४) (२०२१) प्रकाशित कृति सम्पादन: मैथिली पत्रकारिता-दशा ओ दिशा साक्षात्कारक दर्पणमे-सुधांशु शेखर चौधरी विद्यापति गीतिका ( दू भाग ) मैथिली गद्य गौरव ( दू भाग ) अभिमत ( हिन्दी ) बीससँ बेसी स्मारिकाक सम्पादन, जाहिमे चेतना समितिक स्मारिकाक 9 बेर, भंगिमाक 3 बेर, अरिपनक 2-3 बेर। अन्य प्रकाशन-प्रसारण: आकाशवाणी आ दूरदर्शन,पटनासँ दर्जनो वार्ता प्रसारित, मैथिली तथा हिन्दी पत्र - पत्रिका सभमे सयसँ बेसी रचना प्रकाशित आर्यावर्त, हिन्दुस्तान,प्रदीप,नव भारत टाइम्स आदि दैनिक समाचार पत्रमे सम्पादकीय पृष्ठपर साठिटासँ बेसी राजनीतिक आलेख प्रकाशित। पत्रिका सभमे व्यंग्य लेखन: मिथिला मिहिर, देश-कोस, अंतिका, घर-बाहर, समय-साल आदिमे। शेखर-सम्मानक संचालन: साहित्यकार आ सम्पादक पिता पं।सुधांशु शेखर चौधरीक स्मृतिमे साहित्यसँ इतर क्षेत्रमे उल्लेखनीय योगदान हेतु उपयुक्त व्यक्तिकें पुरस्कारक रूपमे एगारह हजार टाका,शाल आ प्रशस्ति पत्र देल जाइत छनि। वर्ष 2004सँ 2008 धरि आ 2019 तथा 2022 मे निम्नलिखित व्यक्ति सभकें पुरस्कार देल गेल छनि: श्री पंचानन मिश्र, नरेन्द्र झा, राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर', विद्यानाथ झा, रमण कुमार झा और स्नेहा झाकें क्रमशः अनुसंधान एवं ज्ञानवर्धक गैर-साहित्यिक आलेख हेतु, मिथिलाक आर्थिक स्थिति आ सुधारपर आलेख हेतु, पत्रकारिता हेतु, मिथिलाक जैविक सम्पदा माछ,मखान,पान आदिक प्रोसेसिंग आदि विषयपर सैकड़ो आलेख हेतु, मैथिलीक विद्यार्थीकें प्रतियोगी परीक्षाक तैयारी हेतु उपयुक्त पोथीक लेखन हेतु आ टीवी पत्रकारितामे प्रशंसनीय विश्लेष्णात्मक प्रस्तुतिकरण हेतु देल गेलनि अछि। विशेष: बी पी एस सी और यू पी एस सीक प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीमे प्रतियोगी सभकें मैथिली विषयक लेल समुचित मार्गदर्शन आ पोथी उपलब्ध करबैत छथि। एहि फोटोमे वामा कातसँ (श्रीमती चित्रा चौधरी, श्री शरदिन्दु चौधरी, प्रीति शेखर, विवेक आनंद ठाकुर ओ श्री जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल) एहिमे बामसँ दहिन छथि सुशीम मिश्र ( आत्मज सुकान्त सोम आत्मज यात्रीजी), दीप्ति शेखर(आत्मजा शरदिन्दु चौधरी), शरदिन्दु चौधरी,प्रीति शेखर (आत्मजा शरदिन्दु चौधरी),विवेक आनन्द (आत्मज जगदीश चन्द्र ठाकुर)राजा शेखर(आत्मज शरदिन्दु चौधरी),श्रीमती चित्रा चौधरी(पत्नी शरदिन्दु चौधरी)आ स्वाती शेखर(पत्नी सुशीम मिश्र) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.शरदिन्दु चौधरी जी केर साक्षात्कार जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' द्वारा मैथिली आ मिथिलाक लेल निर्भीक, स्वाभिमानी, जागरूक, ज्ञानी आ दृष्टि-संपन्न पत्रकार चाही - शरदिन्दु चौधरी जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : भाषा आन्दोलन एवं राज्य आन्दोलन केर दिशा की छै? शरदिन्दु चौधरी : माटिपर काज कहाँ भ' रहल अछि ! काज छै, गाम-गाममे मैथिलीक प्रति लोककें जागरूक बनेबाक,मैथिली पढ़बाक आ पढयबाक लेल उचित व्यवस्था करब, पाठ्य पुस्तकक प्रकाशन आ लोक लग ओकर उपलब्धता सुनिश्चित करब त लोक दिल्ली जाक' फोटो खिचयबामे लागि जाइत अछि, आन्दोलनक नामपर अपनाकें प्रदर्शित करबामे लागि जाइत अछि। जन सामान्यसँ कोनो सरोकार नहि,ए सीमे बैसिक' सर्वहारा आ जन सामान्यक बात करैत लोक अपन व्यवसाय चलबैत अछि। मिथिलामे पान दोकानबला, चाह दोकानबलासभ मैथिलीमे नहि गप करैत अछि, कतहु साइन बोर्ड मैथिलीमे नहि अछि, के देखतै? अधिकांश मैथिल मैथिली भाषाक प्रयोग छोड़ि चुकल छथि, ने पढैत छथि,ने लिखैत छथि मात्र भाषण दैत छथि- हुनक परिवारमे देखू, हुनक साहचर्यमे रहिक' देखू मैथिल समाजकें मार्गदर्शन करबाक लेल मैथिली पत्रकारिताकें समृद्ध होयब आवश्यक अछि। मैथिलकें, मिथिलाकें आ मैथिलीकें अपन अस्मिताक रक्षा करैत अपन भूभागकें सुसंपन्न बनयबाक लेल पत्रकारिताक धारकें, स्वरकें तेज करहि पड़तैक आ ताहि लेल निर्भीक,स्वाभिमानी, जागरूक,ग्यानी आ दृष्टि-संपन्न पत्रकार चाही, पत्रकारिता समाजकें प्रभावित करयबला सशक्त माध्यम अछि, पत्रकारिताक काज होइछ समाजकें साकांक्ष राखब आ नीक बाटपर ल' जयबामे मार्गदर्शन करब, त्याज्य अथवा खराब काजक निन्दा करब आ नीक काज करबाक लेल प्रोत्साहित करब, समाजमे पसरल ईर्ष्या,द्वेष,साप्रदायिकता,भेद-भाव,जातीयता आदिक चातुर्यपूर्ण ढंगसँ विरोध करैत समाजमे सौहार्द बनौने रहब, शिक्षा, स्वास्थ्य आ समाजोपयोगी सभ सुविधा बहाल रहय ताहि हेतु तथा जनोपयोगी विषयक संचालन,देख-रेख ठीकसँ भ' रहल अछि कि नहि ताहिपर नजरि रखैत ओहि विषयक प्रति जनमानसकें आकृष्ट करब। मैथिलीमे सशक्त दसोटा पत्रकार तैयार होथि त मैथिली आ मिथिलाक कल्याण भ' सकैत अछि जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : मैथिलीमे पुरस्कारक राजनीतिपर अपनेक कि कहब अछि? शरदिन्दु चौधरी : राजनीतिए पुरस्कारक माध्यम बनि गेल अछि। पोथीपर पुरस्कार नहि देल जाइत अछि। जिनकर पोथी नीक छनि, हुनको रानीतिएक मजबूरीसँ पुरस्कार भेटैत छनि। पहिने तय भ' जाइ छै जे पुरस्कार किनका देबाक अछि, शेष प्रक्रियाक औपचारिकता मात्र होइत अछि। एकटा पैघ विद्वान सम्पादकीयमे लिखैत छथि जे मैथिलीक सभसँ पैघ पुरस्कार कीनल जाइत अछि, अगिला बेर हुनका पुरस्कार द' देल जाइत छनि, ओ खुशीसँ ल' लैत छथि आ चुप भ' जाइत छथि जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : की पुरस्कार प्रदान करब अथवा स्वीकार करब अपराध थिक? शरदिन्दु चौधरी : हमर अभिप्राय अछि पोथीपर पुरस्कारक निर्णय हो, व्यक्तिपर नहि, चयन प्रक्रिया स्वस्थ हो से लोककें लगबाक चाही,जूरीमे उपयुक्त लोक रहथि आ हुनकापर कोनो दबाब नहि होनि। रचनाकर्मक उत्कृष्टता सुनिश्चित करबाक बदला साहित्यकार लोकनि पुरस्कार लुझबाक लेल गोल-गोलैसीमे लागि जाइत छथि आ उपकृत करबाक लेल पुरस्कार देल जाइत अछि,से अनुचित अछि। संस्था सभ सेहो एहि खेलमे शामिल भ' गेल अछि, 'अहाँ हमरा अपन संस्थामे सम्मानित करू, हम अहाँकें अपना संस्थामे सम्मानित करब' यैह खेल चलि रहल अछि, ई उचित नहि अछि। जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : मैथिलीमे वर्तमान व्यंग्य कोम्हर जा रहल अछि? शरदिन्दु चौधरी : व्यंग्य त आबे लिखा रहल अछि, पहिने त व्यंग्यक नामपर एकटा ख़ास वर्गक खिधांसमात्र लिखाइत छल। एमहर सक्रियता कम भेल अछि।बटुक भाइ नहि रहलाह,ओहो किछु सालसँ सक्रिय नहि छलाह, मन्त्रेश्वर बाबू, वैद्यनाथ 'विमल', वीरेंद्र नारायण झा आ हमरो सक्रियता कम भेल अछि एमहर नवकृष्ण ऐहिक, राज कुमार मिश्र छथि, हिनका लोकनिसँ बेसी आशा कयल जा सकैत अछि जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : मैथिलीमे अकादमीए नै, संस्था,पत्रिका सभपर सेहो बारि देबाक राजनीति छै, एहिपर अपनेक की कहब अछि? शरदिन्दु चौधरी : सभ ठाम 'ग्रुप' बनि गेल छै। मैथिली आ मिथिलाक कल्याण लक्ष्य रह्तै तखने अनियमितता दूर भ' सकैत अछि, अहू लेल सक्षम पत्रकारिताक आवश्यकता अछि। जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : मैथिलीमे प्रकाशनक स्थितिपर अपनेक की विचार अछि? शरदिन्दु चौधरी : प्रकाशन त बहुत भ' रहल अछि,किन्तु सार्थक प्रकाशन बीस प्रतिशत मात्र अछि। भाषाक विकास लेल विद्यार्थी आ मैथिली पाठ्यक्रमक अनुरूप पोथी छापल जयबाक चाही। मैथिली पाथ्यक्रमक पोथी विद्यार्थी वर्गकें उपलब्ध नहि भ' रहल छनि। साहित्यकार आ प्रकाशक दुनूक दायित्व छनि जे पाठकक संख्या निरंतर बढय, से सोचथि। लेखनक क्षेत्रमे अयबाक लेल सभसँ पहिल शर्त अछि भाषाक ज्ञान आ शब्द सामर्थ्य, शुद्ध आ प्रांजल भाषा त लेखनक लेल आवश्यक अछिये। मैथिलीक दुर्भाग्य अछि जे जिनका शब्दक ज्ञान नहि छनि,सेहो महान साहित्यकारक कोटिमे आबिक' बैसि जाइत छथि आ हुनक चारण भ' क' ज्ञानी लोक ओत' उपस्थित रहैत छथि। एकटा लेखक जखन गुट बना सकैत छथि, गुट बदलि सकैत छथि, पाइ खर्च क' क', पैरवी क'क' पुरस्कार-सम्मान पाबि सकैत छथि त कनेक मेहनति क'क' अपन शब्दकें सम्मान नहि द' सकैत छथि? शब्द सामर्थ्यक धनीक साहित्यकारक संख्या आंगुरपर गन'बला अछि तखन एतेक रास प्रकाशन कोन काजक? जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : शेखर प्रकाशन की सभ केलक आ वर्तमानमे की सभ क' रहल अछि? शरदिन्दु चौधरी : शेखर प्रकाशन प्रकाशक आ मुद्रक दुनू रूपमे काज करैत आयल अछि, 52 टा महत्वपूर्ण पोथी अपना दमपर छपलक, आधा-आधी खर्चपर लगभग तीन दर्जन पोथी छपने अछि। एकर महत्व भाषा संस्थान,मैसूर,साहित्य अकादमी,दिल्ली आ मैथिली अकादमी, पटना जनैत अछि। प्रतियोगी परीक्षा सभमे मैथिली विषयक संग सफल भेनिहार विद्यार्थी लोकनि जनैत छथि। साहित्यसँ इतर क्षेत्रमे उल्लेखनीय योगदान हेतु उपयुक्त व्यक्तिकें पुरस्कारक रूपमे एगारह हजार टाका,शाल आ प्रशस्ति पत्र देल जाइत छनि। वर्ष 2004सँ 2008 धरि आ 2019 तथा 2022 मे अनुसंधान एवं ज्ञानवर्धक गैर-साहित्यिक आलेख हेतु, मिथिलाक आर्थिक स्थिति आ सुधारपर आलेख हेतु, पत्रकारिता हेतु, मिथिलाक जैविक सम्पदा माछ,मखान,पान आदिक प्रोसेसिंग आदि विषयपर सैकड़ो आलेख हेतु, मैथिलीक विद्यार्थीकें प्रतियोगी परीक्षाक तैयारी हेतु उपयुक्त पोथीक लेखन हेतु आ टीवी पत्रकारितामे प्रशंसनीय विश्लेष्णात्मक प्रस्तुतिकरण हेतु क्रमशः श्री पंचानन मिश्र, नरेन्द्र झा,राम भरोस कापड़ि'भ्रमर',विद्यानाथ झा,रमण कुमार झा और स्नेहा झाकें ई पुरस्कार देल गेलनि अछि। जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : अपनेक घरमे मैथिलीक की स्थिति अछि? शरदिन्दु चौधरी : हमर सभ धिया-पुता मैथिली बजैत अछि, मैथिली विषय राखि क्यो पढैत से पढ़ाइए ठीकसँ नहि होइत छलै। जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' : राज्य सरकार द्वारा पत्रकार लोकनि लेल जे पेंशन योजना स्वीकृत भेलै तकर लाभ अपनेकें किए नहि प्राप्त भेल? शरदिन्दु चौधरी : हम जखन बुझलिऐ आ आवेदन प्रस्तुत करितहुँ त कहलक समय समाप्त भ' गेलै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक सेवक नहि, मैथिली भाषाक सेवकः शरदिन्दु चौधरी कल्पना झा मैथिली साहित्यक सेवक नहि, मैथिली भाषाक सेवकः शरदिन्दु चौधरी एही बर्ख (२०२२)१६ सँ १९ अप्रैल धरि, तृतीय "चेतना रंग उत्सव"क आयोजन चेतना समिति पटना द्वारा विद्यापति भवनमे कएल गेल छलए,जे सुधांशु शेखर चौधरी जीकेँ समर्पित छलनि। एहि आयोजनक प्रचार-प्रसार किछु साहित्यिक व्हाट्सएप समूह सभमे देखलहुँ,त' हमरो मोन लोभाएल। सुधांशु शेखर जी द्वारा रचित नाटक सभक मंचन सेहो होएबाक घोषणा छलैक। एही "रंग उत्सव"मे हमरा पहिल बेर शरदिन्दु सरकेँ दर्शन भेल। फेसबुक पर मित्र-सूचीमे छलाह,शेखर प्रकाशनमे कोनो पर्टिकुलर पोथीक उपलब्धता अछि वा नहि,ताहि संदर्भमे गप्प सेहो भेल छलए मुदा दर्शन नहि भेल छलए। ओहि रंग उत्सव आ तकरा उपरान्त "उपमान" पत्रिकाक विमोचनक अवसर पर,आ फेर एक-दू बेर विद्यापति भवनमे दर्शन भेल,शरदिन्दु सरकेँ। जतबा काल देखलियनि,सुनलियनि,एकटा बात गौर केलहुँ हम,जे शरदिन्दु सर बाजैत कम छथि,सुनैत बेसी छथि। सोझाँ बैसल लोकक आ वस्तु-स्थितिक ऑब्जर्वेशन करैत रहैत छथि आ सभ किछु जेना मोन-मस्तिष्कमे स्टोर करैत जाइत छथि। एकदम साधारण पहिरन-ओढ़न। कोनो तरहक दिखावा नहि,ने ब्रांडेड कपड़ा-जुत्ताक,ने अपन ज्ञान-बुद्धिक। जखन कि एहि कलयुगमे जतबा रहैत छै,ताहि सँ बेसीक दिखावा करबाक चलन छै,चाहे ओ धन-वित्त होअए कि ज्ञान-बुद्धि। एमहर जखन शरदिन्दु चौधरी जी पर विशेषांक निकालबाक घोषणा सोझाँ आएल(फेसबुक पर),त' हुनकर रचना सभ ताकि ताकि पढ़ब शुरु केलहुँ। एहिलेल 'विदेह' टीम साधुवादक पात्र छथि,जे उपेक्षित रचनाकार सभपर विशेषांक निकालबाक पहल केलनि अछि।एहि सँ लोक ताकि ताकि क' ओहन रचनाकार लोकनिक रचना सभ पढ़ए लागैत अछि। हुनकर रचना पर किछु लिखथि वा नहि लिखथि,से बादक बात। हँ,त' कहि रहल छलहुँ जे शरदिन्दु जीक सभटा रचना,बात- बात पर बात(१-४),बड़ अजगुत देखल,जँ हम जनितहुँ,करिया कक्काक कोरामिन,गोबरगणेश, बेरा-बेरी पढ़ि गेलहुँ। हुनकर रचना सभ पढ़लाक उपरान्त हुनकर ओहने व्यक्तित्वक झलक भेटल,जेहन हुनकर दर्शन क' मोनमे धारणा बनल छलए। शरदिन्दु जीक अधिकांश रचना चूँकि संस्मरणात्मक छनि,तैँ सत्य पर आधारित छनि आ हुनकर व्यक्तित्वक परिचय सेहो दैत छनि। यथार्थ लिखब माने सत्य लिखब,बड़ कठिन काज छै,कारण सत्य अधिक काल कटुए होइत छै।आ तेँ ई काज बहुत कम लोक करैत छथि। शरदिन्दु सर अपन संस्मरणात्मक पोथी "बात-बात पर बात" चारू भागमे आ हास्य व्यंग्य "जँ हम जनितहुँ"मे समाजसँ जुड़ल(विशेष रूपसँ साहित्यिक जगतक) सत्यकेँ त' उजागर कएनहि छथि,कोनो व्यक्ति विशेषक नामक संग हुनकर कुकृत्यकेँ देखार करबामे सेहो संकोच नहि कएलनि अछि। आ एतबे नहि,अपना विषयमे सेहो सभटा स्पष्ट कहि देलनि अछि, "साक्षात्" शीर्षक पोथीमे।अपन दिनचर्या पर्यन्त बेझिझक पाठकक सोझाँ कहि देलनि अछि, घरक साफ-सफाइक बात होअए, कि गंदा बरतन सिंकमे राखि साफ करबाक बात,किछु सार्वजनिक करैत संकोच नहि कएलनि अछि।एहन स्पष्टवादी लोक भेटब कठिने नहि असंभव बात छै एखनुक दिखावायुक्त समयमे। शरदिन्दु जी रचित सभटा पोथी पढ़लाक उपरान्त सोचमे पड़ि गेलहुँ, जे कोन पोथी पर समीक्षात्मक आलेख लिखल जाए। यथार्थ लिखैत बहुत रास रहस्योद्घाटन सेहो कएल गेल अछि पोथी सभमे,जाहि पर बहुत किछु लिखल जा सकैछ।मैथिली संस्था सभक पोल खोलल गेल अछि,महान साहित्यकार लोकनिक किरदानीक चर्चा भेल अछि।एतेक रास मुद्दा देखि/पढ़ि मोन उलबुका सन गेल।अंततः हम निर्णय नहिए क' सकलहुँ आ शरदिन्दु सरकेँ जतबा बुझि सकलियनि,हुनक लेखनीक माध्यमसँ आ हुनका साक्षात् देखि/सुनि,ताही आधार पर अपन मोनमे आएल भावक अभिव्यक्ति क' रहल छी, संक्षेपमे। "बात-बात पर बात-१"मे मैथिली-भाषा,साहित्य आ प्रकाशनसँ अपन बात शुरु करैत अपन मान्यता स्पष्ट रूपेँ रखलनि आछि,जे-"मैथिले मैथिलीक बाधक अछि-दुनू स्तरपर,भाषाक स्तरपर आ साहित्यक स्तरपर।"आ हमर मान्यता अछि जे हिनक एहि मान्यतासँ बहुत लोक सहमति रखताह,हम त' पूर्णतः सहमति राखैत छी। तहिना "मूर्खक लाठी माझ कपार"मे मैथिली साहित्यक दुर्भाग्यक समीचीन विवरण देलनि अछि आ एकर कारण ओ निवारण पर सेहो विचार केलनि अछि। अक्षरशः सत्य लिखलनि अछि-"हमर मैथिलीक दुर्भाग्य अछि जे जकरा शब्दक ज्ञान नहि छैक सेहो सभ महान साहित्यकारक कोटिमे आबिक' बैसि जाइत छथि आ हुनक चारण भ' क' ज्ञानी लोक सभ ओत' उपस्थित रहैत छथि।" मैथिली साहित्यक एही दुर्गतिक कारणेँ प्रायः हुनक भाव किछु एना बहार भेल छनि-"हमरा एकोरत्ती कचोट नहि अछि जे हम मैथिली साहित्यक सेवक नहि छी। हमरा गर्व अछि जे हम मैथिली भाषाक सेवक छी।" राजनीतिमे जतेक राजनीति नहि होइत छै,ततेक राजनीति मैथिली साहित्यिक जगतमे व्याप्त छै,पुरस्कार लोलुपतामे कोन तरहक खेल सभ होइत छै,से सभ बहुत लोक देखैत-सुनैत-बुझैत गबदी मारने रहैए। मुदा शरदिन्दु सर ई सभ देखि/सुनि चुप नहि रहि सकलाह। किंवा ई सभ देखि/सुनि आहत भेल हेताह,तखनहि एना लिखबालेल विवश भेल हेताह। असहनीय स्थिति भ' जाइत छै,तखन मोनक बात स्वतः बहरा जाइत छै। बुद्धिजीवी लोकक संकीर्ण मानसिकताकेँ देखार करैत लिखैत छथि- "सौतिया डाहो सँ बेसी एक-दोसराकेँ देखबाक प्रवृत्ति, अपन रचनाकेँ मीठ,अनकर रचनाकेँ तीत कहबाक रीति आ गोधियाँवाद,संबंधवाद,गुटवाद पर साहित्यकेँ गीजबाक-मथबाक जे नीति चलल अछि, से साहित्यक संग संग समाजकेँ सेहो पाताले दिस ल' जा रहल अछि।" ओना एहन बात मर्यादित भाषामे,ककरो अपमानित नहि करैत लिखब कठिन छै,तथापि भाषाकेँ संयमित रखबाक प्रयास केलनि अछि शरदिन्दु सर,से सराहनीय। मुदा संयमित भाषाक प्रयोगक प्रयास रहितहु कतहु कतहु कनि अमर्यादित भाषाक प्रयोग भ' गेल छनि,जकरा इग्नोर नहि कएल जा सकैए। बुद्धिजीवी लोकक द्वारा एहन भाषाक प्रयोग अशोभनीय छै। गारि आ मारिकेँ गप्प मूर्ख लोककेँ शोभा दैत छै। हम क्षमायाचनाक संग ई बात लिखि रहल छी। आदरणीय छथि आ सभदिन रहताह शरदिन्दु सर हमरालेल। "जँ हम जनितहुँ"क "इहो पुरुष अलबत्ते"मे देखल जाए-"कते महानुभावक दाबी रहैत छनि जे वैह टा दूधक धोअल छथि आ शेष सभ पातकी।हुनका सँ गप्प होएत त' ओ एक्के लाड़निए अपना छोड़ि सभ वर्गक लोककेँ भ्रष्ट प्रमाणित क' देताह।गप्पक क्रममे हुनक वाक्पटुता, देहक संचालन आ विषयक प्रस्तुति देखि होएत, जे वस्तुतः महान छथि आ हुनक आक्रोशो उचिते छनि।मुदा जँ हुनक धोअल चरित्रक पता लागि जाएत,त' स्वतः थूक फेका जाएत...."सभटा गप्प सत्य लिखल अछि। वास्तवमे एहन लोक बहुतो छथि मुदा "थूक फेका जाएत..."कनि अभद्र सन लागल हमरा। तहिना "हमर अभाग:हुनक नहि दोष"क "इर्ष्या, द्वेष नहि समन्वय चाही"मे ई लिखब कनि अमर्यादित सन लागल-"अहाँकेँ एहिठाम बाँसमे बान्हिक' पीटी त' कोनो हर्ज नहि ने।" व्यंग्य वा कटाक्ष रूपमे ककरो किछु कहब क्षम्य छै,मुदा स्पष्ट रूपेँ ककरो नाम उजागर करैत एना पिटबाक बात कहब/लिखब एकरत्ती अशोभनीय कहल जाएत। "साक्षात्" बात-बातपर बात-४ एकटा नब प्रयोग सन लागल।स्वयं द्वारा स्वयंकेँ साक्षात्कार लेब रोचक सेहो अछि। एकर भूमिकामे लिखने छथि - "कहैत छथि बिहारक अंग्रेजी पत्रकारिताक भीष्म पितामह पंडित स्व. दीनानाथ झा-इंटरव्यू लेनिहारकेँ बोर देबए पड़ैत छैक।जेहन बोर तेहन माछ।" एहि हिसाबेँ,स्वयंकेँ देल बोर सँ स्वयं माछ सन फँसब,रोचक। आगाँ एही भूमिकामे इहो बात कहने छथि - "प्रस्तुत साक्षात्कार स्वयं हम अपने लेने छी साक्षात्कार लेबाक अनुभवक कारणेँ। देखी सुतरैत आछि कि नहि।" खूब सुतरल अछि सर। एकदम बेबाक इंटरव्यू अछि। एहि भूमिकामे एकटा निवेदन केलनि अछि जे सभ पत्र-पत्रिका मे एकटा साक्षात्कार अवश्य राखल जाए। ई दर्पण जकाँ होइत छैक। से सत्ते। हिनक निवेदनकेँ गम्भीरतासँ लेल जाए से हमर निवेदन । आ शरदिन्दु सरसँ निवेदन जे एहिना निर्भीकतापूर्वक आगाँ सेहो नब-नब संस्मरण लिखि पाठकक सोझाँ परसैत रहथि। साहित्यिक जगतमे व्याप्त राजनीति,पुरस्कार लोलुपताक खिस्सा सभसँ पाठकगणकेँ अवगत करबैत रहथि,जाहिमे मैथिलीक प्रतिष्ठित संस्था सभक सेहो संलिप्तता रहैत छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर'- हमर ज्ञान-पिपाशाक स्रोत: शरदिन्दु चौधरी राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' हमर ज्ञान-पिपाशाक स्रोत: शरदिन्दु चौधरी हमरा मोन नहि अछि- शरदिन्दु चौधरीसँ कहिया भेंट भेल, हेम-छेम बढ़ल आ बादमे अन्तरंग भऽ गेलहुँ। हम नेपालमे, जनकपुरधाममे मैथिली भाषा, साहित्यक एकटा जिज्ञाशु पाठक रहलहुँ अछि। किछु पढ़बाक, जानबाक ललक हमरा मैथिली पुस्तक विक्रेताक पाछाँ बेहाल करैत रहल। ई आदति हमरा हाईस्कूलक पढ़ाईसँ लागि गेल रहए। डॉ. धीरेन्द्रक सान्निध्यमे मैथिली पुस्तक, विक्रेता आ भेटबाक स्थान सभ ज्ञात होइत रहल आ हम तकरा लेल अपस्यांत होइत रहलहुँ। पहिने तँ दरभंगाक टावर चौक लग ग्रन्थालय प्रकाशन हमर स्रोत रहय। जे पुस्तक खोजी ओ सभ उपलब्ध करबैत रहलाह। तकरा बाद मिथिला पुस्तक भण्डार आ सभसँ बेसी स्रोत बनलाह आदरणीय रमानन्द रेणुजी। हम आगाँ बढ़ैत गेलहुँ। कैम्पसमे गेलहुँ। तकरा बाद पढ़ाईक संगहि हमर लेखन सघन रूपसँ आगाँ बढ़ल। सन् १९६४ मे छपल हमर बालकथा 'इमान्दार बालक' सँ मिहिरक लेखक बनलहुँ आ तकरा बन्न होएबा धरि दर्जनों लेख-रचना प्रकाशित होइत रहल। ताहु बीच अनेकों जिज्ञासा उठैत रहल आ तकरा शान्त करबा लेल पुस्तक विक्रेता आ भण्डारकेँ खोजैत रहलहुँ। ताही खोजीक क्रममे हमरा शरदिन्दुजी सँ भेँट भेल। हमरा लगैत अछि परिचय मिहिर कार्यालयसँ भेल छल। आत्मियता हुनका घरेमे सजायल पुस्तक सभक बीच बढ़ल जे हमर ज्ञानपिपाशाक महत्वपूर्ण स्रोत छल। मैथिलीक नवप्रकाशन होइक, शब्दकोष हो अथवा कोनो संग्रह शरदिन्दु चौधरीसँ हम प्राप्त करैत रहलहुँ। हम अपन पुस्तक सेहो हुनका विक्रयक हेतु दैत रहलहुँ। एहिमे दुनू दिश एकटा सम्बन्ध विकसित भेल ओ एखन धरि बन्हने अछि। पुस्तकक विक्री-वितरणमे एकटा सभसँ पैघ अवरोध होइछ- किताब लऽ कऽ- विक्रेताक तकर पाइ सोझ भऽ रचनाकारकेँ देबऽ नहि चाहब। ई दुर्गुण लगभग सभ विक्रेतामे देखल गेल अछि। जहाँ धरि शरदिन्दु जीक सबाल छैक हमरा कठिनाई नहि भेल। सामान्यतः हम अदला-बदलीक रूपमे पुस्तकक लेन-देन करैत रहलहुँ अछि। हमर आवश्यक पुस्तक हुनक 'शेखर प्रकाशन'सँ लऽ लैत छी, तहिना अपन प्रकाशन दऽ दैत छियनि। एहिसँ कोनो कठिनता नहि होइत अछि। शरदिन्दु चौधरीक नाम बहुतो मैथिली सेवीक लेल अनोन लागि सकैत छैक। तकर कारण छैक हुनक लेखनी। ओ सामान्यतः मोलाहिजा कऽ ककरो कृति, व्यक्तित्व वा कारनामाकेँ लिखबाक जरूरति नहि बुझलनि। जे कही ठाँए पटाका। एहिसँ सम्बन्धित पक्षकेँ छनछना कऽ लागब अस्वभाविक नहि। ई काज हुनकर नीक छन्हि से हमर कहब नहि, तखन सत्य बात अवश्य लिखी मुदा कोना भाषा आ साहित्यक लेल लिखी तकर ज्ञान हयब जरूरी। आ कखन किछु लिखी तकरो महशूस कएल जएबाक चाही। तकर विचार नहि रखने ओ अनेरे विवादित भऽ जाइत छथि। जखन कि हुनक उद्देश्य प्रायः ककरो चोट पहुँचाएब नहि रहैत छन्हि, अनटोटल बातकेँ मात्र विरोध करब रहैत छन्हि। जहिया मधुकान्त जीक सहयोगे ओ समय-साल निकालैत छलाह तहियो अपन कटाक्षपूर्ण टिप्पणीसँ कतेकोकेँ नजरिमे खटकैत रहलाह। हम यद्यपि नियमित हुनक आग्रहपर लिखैत रहलहुँ समय-सालमे। कहियो कोनो तरहक असुविधा नहि भेल। हुनक टिप्पणी सभ अबैत रहैत अछि। खास कऽ व्यंग्य विधापर हुनक कलम नीक चलैत छन्हि। मुदा व्यंग्य जतऽ विनोद उत्पन्न करैत छैक, हुनक व्यंग्य कतेकोकेँ सुइया जकाँ भोंकइत छैक आ तएँ शरदिन्दुजी कतेकोकेँ नजरिमे खटकैत रहलाह अछि। ओ किताब लिखैत छथि, पुस्तकक सम्पादन करैत छथि, पत्रिका सभक सम्पादन करैत रहलाह अछि- एहि मानेमे ओ साहित्यकार, पत्रकार आ नीक सम्पादक छथि। मनुक्खकेँ चिन्हबाक हुनक नजरि 'डोकहरक आँखि' जकाँ तेज थिक। आ हुनक इएह नेत्र आ घ्राण शक्तिक कारणेँ हमहुँ एक बेर उपकृत भेल छी। मोन पड़ैत अछि २००६ साल नवम्बर ३ क ओ दिन जखन हमरा 'शेखर सम्मान' भेटल छल। आवश्यक नहि साहित्य अकादेमी, प्रबोध साहित्य सम्मान अथवा आने कोनो कथित प्रतिष्ठित सम्माने सम्मान योग्य होइत अछि। कोनो संघ-संस्थाक निष्ठापूर्वक दैत आएल सम्मान आन कोनो विवादित सम्मान-पुरस्कारसँ पैघ महत्व रखैत अछि। से शेखर प्रकाशनसँ प्राप्त हमर ओ सम्मान जे पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रक हाथे भेटल छल ताहिमे उद्घृत वाक्य हमरामे ऊर्जा उत्पन्न कएने छल- आखिर हमर काजकेँ एहि तरहेँ मूल्यांकन तँ भेल अछि। निश्चय एहि प्रक्रियामे गठित चयन समितिक हाथ भऽ सकैछ, मुदा शरदिन्दु चौधरीजी सँ हमर एतेक नम्हर सम्बन्ध, हमर साहित्य, हमर पत्रकारिता (३९ वर्षसँ गामघर साप्ताहिकक निरन्तर प्रकाशन)क बारेमे हुनका सभकेँ कोनो धारणा बनएबामे सहायक भेल होइक। कहबाक अर्थ- मात्र कटु बाते नहि, प्रतिभाकेँ मूल्यांकनक नजरि आ परबाह सेहो छन्हि शरदिन्दुजीमे जे हुनका आनसँ फूट बनबैत अछि। शरदिन्दु चौधरी विभिन्न परीक्षामे शामिल होबऽ बला परीक्षार्थी लोकनिक हेतु सन्दर्भ सामग्री सेहो उपलब्ध करएबाक काज करैत आएल छथि जे महत्त्वपूर्ण भेल करैत अछि। एखन मैथिली साहित्यक विक्री वितरणक काजमे शेखर प्रकाशनक माध्यमसँ कएल जा रहल हुनक काज सराहनीय मात्र नहि बहुतोकेँ लेल सन्दर्भ ग्रन्थक उपलब्धिक स्रोत उपलब्ध करएबाक काज थिक जाहिसँ हिनक प्रतिष्ठा बढ़ल अछि। एहिठाम एकटा आर घटनाक चर्च करब जे हमरा बेसी प्रभावित कैने रहए। नेपालमे मधेश आन्दोलन तेजीमे रहैक। लगभग डेढ़ दशक पूर्वक बात छै। भारतीय मिडियामे एहि आन्दोलनकेँ नेपालसँ फूट होबऽ बला आन्दोलन बता एकटा भ्रम सृजन कयल जाइत रहै। अथवा भऽ सकैए- भारतीय मिडिया एहि आन्दोलनकेँ गम्भीरतासँ बुझि नहि पौने रहए। तखन एत्तऽ नियार भेलै जे भारतीय मिडियाकेँ मधेश आन्दोलनक वास्तविकतासँ अवगत कराओल जाए। आ साथी लोकनि एहि काजमे हमरे चुनलनि। हुनका सभकेँ ई विश्वास रहनि जे पटनामे हमर नीक सम्बन्ध अछि, ताहिसँ पत्रकार लोकनिक जुटानमे आ बातकेँ बुझबाक गम्भीरतामे ई सहायक हयतैक। हम सभ पटना गेलहुँ। हमर लक्ष्य रहए- शरदिन्दु चौधरी, जनिक सहयोगसँ पत्रकार सभकेँ जुटाओल जा सकैछ। रातिमे २ बजे डेरापर पहुँचलहुँ। घनघोर वर्षा। दोसर दिन कार्यक्रम रखबाक नियार। समयक नितान्त अभाव। जे से भिनसर भेल तँ भोरे शरदिन्दुजीकेँ सभ बात कहलियनि। ओ हमरा निशिन्त कयलनि, हम सम्पर्क करै छी। हम संतुष्ट तँ भेलौं मुदा विश्वस्त नहि। कारण एतेक कम समयमे पत्रकार लोकनि की आबि पओताह। तएँ एकटा कोठरीमे पाँच-छवटा कुर्सी लगा इन्तजार करऽ लगलहुँ। प्रायः ९ बजेक समय रहैक। कहबाक जरूरति नहि- समयपर पत्रकार सभक जे जुटान होबऽ लागल तँ अगल-बगलसँ कुर्सी आदि खोजैत बैसबाक व्यवस्था करऽ पड़ल रहैक। प्रिण्ट आ इलेक्ट्रोनिक मिडियाक पत्रकारसँ कोठरी भरि गेल रहैक। मोन प्रसन्न भऽ गेल रहए। तखन हम मधेश आन्दोलनक सत्य सभक सामने रखने रहिऐक जे दोसर दिनक भोरका संस्करणमे लगभग सभ अखबारमे छपल छल। एतहु हमरा शरदिन्दु चौधरीक आप्तता नीक सहयोग कएने रहए। अर्थात् ओ मात्र कठोर नहि, मित्र सभक हेतु खुआ बनि जाइत छथि। ई सत्य छै जे मैथिली साहित्य हुनका ओतेक मोजर नहि देलकनि जकर ओ हकदार रहलाह अछि। एखनो हुनक एकांत सेवा मैथिली प्रकाशन क्षेत्रमे सदैव प्रशंसित रहतनि- रहबाक चाही। हम हुनक सेवाक निरन्तर विस्तारक कामना करैत छी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- ओहिना नहि तमसाइत छथि शरदिन्दु चौधरी जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' ओहिना नहि तमसाइत छथि शरदिन्दु चौधरी आर्यावर्त बंद भ' गेलै. नोकरी छुटि गेलनि. दिल्ली, मुंबइ कि कोलकाता नहि भगलाह. पटनेमे रहिक' जीविकोपार्जनक लक्ष्य बनौलनि, शेखर प्रकाशनक केलनि स्थापना आरम्भ केलनि मैथिलीक सेवा पोथी प्रकाशन आ पोथी बिक्रयक काज साहित्यकार लोकनिसँ छलाह परिचित सबहक सहयोगक रहनि भरोस किछु गोटे करबो केलखिन निष्ठापूर्वक सहयोग किछु गोटे छपा लेलखिन पोथी द'क' किछु पाइ गेलखिन से घूरिक' फेर नहि एलखिन नै देलखिन शेष राशि नै ल' गेलखिन शेष किताब किछु त ल' गेलखिन सभटा किताब द'क' मात्र आश्वासन शीघ्रे राशि पठयबाक तकिते रहि गेलाह हुनक बाट मासक मास आ सालक साल एहेन स्थितिमे कहू त तामस कोना ने हेतनि ! एकटा सज्जन हिनका पोथी देबे ने केलखिन आ मंचपर बाजि देलखिन जे फल्लाँजी एखन तक पोथीक दाम नै देलनि एहेन स्थितिमे कहू त तामस कोना ने हेतनि ! विशेषांक लेल एकटा संस्थाक काज केलनि पारिश्रमिकक बदला पौलनि दू सय अस्सी टाकाक चेक एहेन स्थितिमे कहू त तामस कोना ने हेतनि ! एकटा संस्था केलकनि पुरस्कार देबाक घोषणा कहलखिन अध्यक्ष हुनका देबनि पुरस्कार त माहुर खाक' मरि जायब हम एहन स्थितिमे कहू त तामस कोना ने हेतनि ! क्यो अप्पन रचनाक प्रशंसा छद्म नामसँ करथि स्वयं क्यो अप्पन पोथीसँ बेसी महत्वपूर्ण नामहि कें बूझथि एहन स्थितिमे कहू त तामस कोना ने हेतनि ! पत्रकारिता- धर्मक पालन नै करता क्यो सम्पादकीयमे फोटो लेकिन रह्य अबस्से शुद्ध-शुद्ध लिखबा केर बदला करथि गोलैसी पुरस्कार लुझबा केर खातिर वेकल रहथि क्यो एहन स्थितिमे कहू त तामस कोना ने हेतनि ! क्यो जीविते अपना नामपर चलाबथि पुरस्कार क्यो रचना नहि छपलापर भ जाथि मारि करबाक लेल तैयार कियो अपन अपकर्मके मानथि सदाचार एहन स्थितिमे कहू त तामस कोना ने हेतनि ! मिथिला आ मैथिलीक बाटपर काँट बहुत अछि से के बूझत ! से के देखत ! कहिया देखत ! बहुत बात अछि शेष बढ़ाबय रक्त चाप जे ओहिना नहि तमसाइत छथि शरदिन्दु चौधरी ! -संपर्क-8789616115 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.विभा रानी- शरदिंदु भाईक गम्भीर सिद्धांतप्रियता! विभा रानी शरदिंदु भाईक गम्भीर सिद्धांतप्रियता! मैथिली हमर भाषा नहिं छल. हमरा घर मे सभ किओ हिंदी बाजै छल. हमर मोहल्लावाला सभ बस्ती- बलिया स' माइग्रेट क' के आएल छल. ओ सब भोजपुरी बजैत छल. हमरा कान मे मात्र हमर घर मे पूजा कराबए लेल आबएवाला पंडित जी बच्चा झा छलखिन्ह, जिनका स' हम सभ शुद्ध मैथिली सुनैत छलहुं. बीए मे गेलाक बाद बोध भेल जे मैथिली सीखबाक चाही. असल मे, जहन हम आरके कॉलेज मे गेलहुं त' टीचिंग स्टाफक अतिरिक्त सभ किओ मैथिलीए मे बाजय छलखिन्ह. आब हुनका हिंदी मे जवाब देनाई अथवा हुनका सभ स' हिंदी मे गप्प केनाई हमरा बड्ड अबूह लागै छल. अही अबूहक चक्कर मे हम भोजपुरी सीखि गेल छलहुं. कलकत्ता मे बांग्ला सीखि गेलहुं. महाराष्ट्र मे मराठी नहिं सीखि सकलहुं, कियैक त' अहि ठां लोग आओर हिंदी- अंग्रेजी मे गप्प करैत रहलन्हि आ हमहू एक गोट सुभीतगर कोना ताकि क' अजगर बनि पडि रहि गेलहुं. मुदा ओ कॉलेजक दिन छलै. तैं हम तय कएल जे हम आब मैथिली सीखब. टूटल- फ़ूटल मैथिली बाज' लागल छलहुं. आब जहन बाज' लागलहुं, त' दिमागी कीडा काटय लागल. एक गोट कथा सेहो लिखि लेलहुं. मुदा, एतेक भरोस नहिं छल अपन मैथिली पर. साओन के जनमल बेंग भादो मे कहल जे एहेन दाही त' हम कहियो देखबे नहिं कएल. याहि हमर स्थिति छल. मोन हुदबुद क' रहल छल जे की करी? घर मे आर्यावर्त अबैत छल. ओही मे एक गोट विज्ञापन देखल- मिथिला मिहिरक नवतुरिया लेखन अंक लेल. आब हुदबुद्दी कछ्मच्छी मे बदलि गेल. हम त' भाई नवतुरिये छी. हमर ई पहिल कथा अछि. उमिर मे सेहो नवे छी. एम ए मे पढि रहल छी. त' सभ मामिले फिट. कथा लिखि लेने छलहुं. की लिखने छलहुं, सेहो नहिं बूझल छल. मात्र ईयाहि टा बूझल छल जे हम मैथिली मे एक गोट कथा लिखि नेने छी. फेर सएह यक्ष प्रश्न! देखाबी ककरा स'? बच्चा झा पंडी जी त' अहि मे सहायक नहिं हेताह. मोन एलन्हि दोसर झा जी. सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया मे काज करै छलाह. बड्ड गर्व स' अपना के कहैत छलाह जे हम CBI मे काज करै छी. लोक सभ चौंक जाए छलै- आंय! CBI? माने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन?' ओ शुद्ध मैथिली बाजै छलखिन्ह पूरा परिवार सहित. हमर घरक सोझे मे आएल छलाह किराया पर. नवयुवक. तुरंते बियाह भेल छलन्हि. कनिया सेहो खांटी मैथिली बजै छलखिन्ह. कॉलेजक स्टाफ के बाद झा जीक कनियां स' हमर स्पोकेन मैथिलीक अभ्यास चलि रहल छल. एक दिन सांझ मे जहन ओ बैंक स' घुरलाह, हम हुनका ओहि ठां पहुंचि गेलहुं. ओ चूडा भूंजाक नाश्ता क' रहल छलाह. हम हुनका स' कहलियन्हि जे हम एक गोट मैथिली मे कथा लिखलहुंए. अहां कनेक ओकरा जांचि देबै?' ओ कहलन्हि- 'हम त' नोकरिया, बैंक वाला आदमी छी. बैंकिंगक परीक्षाक रीजनिंग टेस्ट पूछब त' बता देब. ई खिस्सा- कहानी सभ हम की जान' गेलहुं? हम हिम्मति नहिं हारल. कहल- 'कथा नहिं, अहां कनेक भाषा चेक क' दियऊ.' हुनकरो सम्भवत: हिम्मति बढलन्हि. सकारि लेलन्हि. हम हुनका अपन हस्तलिखित कथा द' देलियै. तहिया कोन कम्प्यूटर आ टाइपिंगक व्यवस्था? दू दिन बाद फेर सांझ मे हम हुनका ओहि ठां पहुंचलहुं. कहल- 'कथा देखि नेने होयब त' द' दियौ. हम ओकरा 'मिथिला मिहिर' मे पठेबाक सोचने छी. तारीख देल छै. एखनि हम एकरा फेयर करब, तहन पठायब. डाक स' मधुबनी स' पटना पहुंच' मे सेहो समय लगतै.' आब लोक सभ लोके की भेलाह जे अनुरोध करी आ तत्क्षण काज क' दौथु. मुदा, ओ हमर टाइम लाइन सुनलन्हि आ ओहि हिसाबे करेक्शन क' देलन्हि. हम कनेक आश्वस्त भेलहुं जे लाल पेन स' पेज सभ चिर्री- चोथ नहिं भेल छल. कतहु- कतहु निशान लागल छलै. से त' एखनो लोक सभ निशान पाडि दैत छथि आ हम तकरा लेल तैयार सेहो रहै छी. कथा फेयर कएल आ 'शुभे हो शुभे' करैत 'मिथिला मिहिर' के पठा देलियन्हि. कोनो जवाब नहिं आयल. हमर हुदबुद्धी बढ' लागल छल. मुदा कही त' ककरा स' कही? ककरो कह' मे सेहो संकोच होइत छल जे कही जे हम कथा लिखलहुंए. ओना हिंदी मे लिखबाक शुरुआत भ' गेल छल. मुदा लिखबाक काज कोनो नोटिस कर'वाला काज त' होइत नहिं छै. आ एक दिन डाक स' हमर नाम स' डाक पहुंचल. तहिया अपना नामे चिट्ठी सेहो एक गोट अजगुत घटना होइत छलै. तहिया चिट्ठी सेहो केयर ऑफ क' के अबै छलै. हमर डाक सेहो आएल. पता चलल जे 'मिथिला मिहिर'क 'नवतुरिया लेखक विशेषांक'क पहिले अंक मे हमर कथा 'कौआहंकनी' छपल अछि. हम त' मारे खुशी के बताह भ' गेलहुं. सांझ मे झा जी के देखेलहुं. ओहो बड्ड प्रसन्न भेलाह आ हमर मैथिली लेखनक यात्राक शुरुआत भ' गेल. आब कहै छी जे एतेक पैघ राम कहानी हम कियैक लिखलहुं? 'जाना था जापान, पहुंच गए चीन, समझ गए ना!' लिख' आएल छलहुं हम शरदिंदु शेखर चौधरी पर आ लिख' लगलहुं अपन कथा पर. मुदा से नहिं छै. शरदिंदु शेखर चौधरी पर लिख' लेल आ हमरा संगे हुनकर केहेन नाता छलै, ई बुझबा लेल एतेक पैघ भूमिका स' पास होयब ज़रूरी छै. शरदिंदु शेखर चौधरी ओहि समय 'मिथिला मिहिर' मे छलाह. मैथिली मे लिखबाक संकट कोनो अजुका संकट नहिं छै. ओहू समय मे नवतुरिया लोक सभक आगम कम छलै. तकरे बढावा देब' लेल 'मिथिला मिहिर' ई योजना निकाललक आ एकर जिम्मा शरदिंदु शेखर चौधरी आ टीम पर द' देल गेलै. होइत छै स्वाभाविक रूपें जे कोनो योजना निकलला पर ओही बहाने रचनाकर्म भ' जाइत छै, जेना कथा- लेखन कम भेला पर प्रभास कुमार चौधरी आन- आन लोक सभ संगे मिलि क' 'सगर राति दीप जरय' केर आंदोलन शुरु केलन्हि, एखनि श्रीधरम आ अंतिका प्रकाशन उपन्यास लेखन के बढावा देब' लेल 'लक्ष्मी- हरि स्मृति उपन्यास लेखन' योजना कार्यांवित क' रहल छथि. 'मिथिला मिहिर' मे सेहो नवतुरिया लेखन अंक लेल बहुत रास कथा सभ पहुंचल छलै. हमरा बहुत बाद मे पता चलल जे हमर कथा 'कौआहंकनी' कोना क' पहिले अंक मे छपलै. आब फेर कहब जे ओहि समय कोनो सोशल मीडिया त' छलै नहिं जे लोक आओर पता क' लौथु जे फलां व्यक्ति के छै? सम्पादक ल'ग मात्र रचनाकारक रचना छलै. आ ई त' नवतुरिया लेल छलै, तैं आओरो पता लगायब मुश्किल जे के सभ के आ की छथि. हमर कथा शरदिंदु भाई के बहुत पसंद पडलनि. हुनका संगे सम्भवत: अग्निपुष्प जी सेहो छलखिन्ह. आओर एक दू गोट सेहो, जिनकर नाम हमरा मोन नहिं. सम्पादक मंडलक पैघ- पैघ लोक सभ लेल ई छलै जे ई कोन विभा रानी? कोनो सरनेम नहि. कोना क' बुझल जाओ जे ई के छथि? शरदिंदु भाई कहलखिन्ह जे अहां सभ व्यक्ति आ हुनक सरनेम के छाप' चाहै छी अथवा रचना के? व्यक्तिक सरनेमक गुणवत्ता चाही अथवा रचनाक गुणवत्ता? मातबर लोक सभ तैयो थथमथ छलाह. शरदिंदु भाई अंत मे कहलखिन्ह जे 'ई कथा बहुत नीक छै. ई कथा भविष्य मे मीलक पाथर साबित हेतै. बहुत सम्भावनावान कथा छै.' हुनका फेर कहल गेलै जे 'ठीक छै. एतबे अहांक जिद अछि त' एकरा दोसर अंक मे छापि लेब.' शरदिंदु भाई फेर कहलखिन्ह जे 'नहिं, रचना छपतै त' इयाहि अंक मे. आ यदि ई रचना अहि अंक मे नहिं छपतै, तहन हम अपना के अहि योजना से अलग करै छी.' हम बताह सन लोक. आइयो ओहने बताह छी. भितुरका गप्प स' कोनो सरोकार नहिं राखयवाली. 'कौआहंकनी'क त' जे प्रसिद्धि भेंटलै, तकर त' कोनो चर्चे नहिं. हम राताराति जेना मैथिलीक सेलेब राइटर भ' गेलहुं. हमरा लग पाठकीय पत्रक ढेरी लागि गेल. सभ किओ खोज पुछारी कर' लागलै जे ई विभा रानी के? हमरा लग सभ ठाम से रचना पठेबाक पत्र आब' लागल. हमर मास्टर (बैंकवाला झा जी)जीक जिम्मेदारी आओर बढि गेलै. मिथिला मिहिर मे हमर छपब बढि गेल. ओही छपबाक क्रम मे हमर परिचय भेल मैथिलीक अन्यान्य दिग्गज सोमदेव जी, जीवकांत भाई, मायानंद मिश्र, उषाकिरण खान, मोहन भारद्वाज, राजमोहन झा, कुणाल भाई, अग्निपुष्प भाई, विभूति आनंद जी, अशोक, शिव शंकर श्रीनिवास, रमेश, तारानंद वियोगी सहित अनेकानेक लेखक सभ स'. शरदिंदु भाई स' हम एखनो बहुत धखाइत छी. ओ बहुत गम्भीर रहै छथि, हम जतेक हुनका परिलक्षित केलहुं. बहुत कम, ज़रूरति भरि बाजै छथि. बहुत कम बाजयवाला स' हमरा ओहुनो बड्ड भय होबैत रहैये. 'मिथिला मिहिर' बंद होबैत धरि ओ ओत' रहलाह. तकर बाद 'समय-साल' पत्रिका स' जुडलाह. बाद मे हुनक शेखर प्रकाशन एलै. हम एक बेर पटना गेलहुं त' हुनक प्रकाशन मे सेहो गेलहुं आ हुनक मैथिलीक प्रति प्रेम आ निष्ठा देखि अभिभूत भ' गेलहुं. एतेक निस्वार्थ भाव स' किताबक प्रकाशन आ बिक्री मे लागल छथि. किताब स' वास्ता राखनिहार आब कतेक लोक छथि, सभ किओ जनैत छथि. मुदा शरदिंदु भाई जेना संकल्प नेने होथु मैथिलीक सेवा करबाक. ओ मैथिली प्रकाशन के उपयोगी सेहो बनेलन्हि. बीपीएससी आ अन्य परीक्षा मे काज आबयवाला किताब सभक प्रकाशन, उपलब्धता आदि मे ओ लागि गेलन्हि. हम जतेक काल ओत' रहलहुं, देखल जे छात्र सभ आबि क' किताब सभ पूछैत गेलन्हि आ कीनैत गेलन्हि. कोनो कोनो किताब नहिं रहला पर ओ कहलन्हि जे किताब नहिं अछि, अहां फोटोकॉपी करा लिय'. छात्र खुशी- खुशी किताब ल' क' चलि गेलन्हि फोटोकॉपी कराब' लेल. हम पूछबो केलियन्हि, जे 'यदि नहिं घुराबय?' ओ अपन दाढीक भीतर स' मंद मुस्कान स' कहलन्हि- 'जायत कत'? मैथिली किताब सभ ओकरा आओर के आओर भेंटतै कत' स'? आई चलि जायत त' काल्हि ओकरा एबाक मुंह रहतै आ यदि आबियो गेल त' की ओकरा स' फेर मांगब पार लागतै?' हमरा जनितब, ककरो स' किछु कहबाक, मंगबाक हुनक स्वभाव नहिं छै. अपन सिद्धांत पर ओ कोनो व्यवस्था स' भीडि जायवाला लोक छथि, चाहे ओ हमर कथा छापबाक समय छल अथवा पटनाक आन- आन महत्वपूर्ण संस्था सभ स' भिडबाक. कुणाल जी कहै छथिन्ह जे 'ओ अपन प्रतिबद्धताक धनी छथि.' मैथिली मे एहेन सिद्धांतवाला लोक सभ त' दीया के कहय, सुरुजक प्रकाश ल' क' ताक' जाऊ, तहनो मुश्किल स' भेटायत. हुनक शेखर प्रकाशन एक गोट स्तम्भ छै मैथिलीक छात्र- छात्रा लेल, मैथिलीक आन- आन लोक सभक अड्डाबाजी लेल सेहो. सुनल, जे एखनि हुनक मोन बेसी खराब रहै छै. हम फोन कएल. ओ फोन नहिं उठेलन्हि. लागल, जे ई खबर सत्य छै. शारीरिक अस्वस्थता मन्हुष्य के भीतर स' उदास आ अवसन्न करै छै. शेखर भाई जल्दी स्वास्थ्य लाभ करथु, ई हमर कामना. अपन सिद्धांतक दीप चतुर्दिक लेसथु, ई हमर कामना! -संपर्क-मुंबई अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.डा. नारायणजी- विसंगतिक विरुद्ध प्रतिरोधक-स्वर डा. नारायणजी विसंगतिक विरुद्ध प्रतिरोधक-स्वर श्री शरदिन्दु चौधरी, जे व्यक्ति छथि, आ जिनका मैथिली साहित्यसँ,प्रकाशन,वितरण आ सम्वर्द्धनसँ आइयो प्रगाढ़ प्रेम छनि,हुनका हम थोड़ जनैत छियनि।तकर कारण अछि, जे हम सभदिनसँ गाममे रहैत छी आ ओ राजधानी पटनामे।आ कोनो तेहन नहि काज रहबाक कारणेँ,अथवा रहलो पर अपन असमर्थताक कारणेँ हम पटना थोड़ गेल -आएल छी।तेँ व्यक्ति भाइ शरदिन्दु चौधरीकेँ थोड़ जनैत छियनि। मुदा,जेँकि मैथिलीक आधुनिक दृष्टि -सम्पन्न कवि -कथाकार श्री पूर्णेन्दु चौधरीक मातृक हमर गाम छियनि आ ओ शरदिन्दु चौधरीक पितियौत भाए छथि, तँ से हुनकासँ भेट होइत छल आ, अपन भेटमे एकदिन ओ गपक क्रममे कहलनि जे हम शरदू (शरदिन्दु चौधरी)केँ कहने रहियनि जे मैथिली साहित्यक संरक्षण आ सम्वर्द्धनमे रुचि राखह, मुदा ताहि लेल शहीद जुनि भए जाह।से सुनि निश्चितरूपसँ भाइ शरदिन्दु चौधरीक एक टा निर्लोभी आत्मोत्सर्गित व्यक्तिक स्वभाव आ स्वरूप हमर सोझाँ उजागर भेल छल,जाहिमे मैथिली साहित्यकेँ संरक्षित करबाक सदिश निष्ठा आ संकल्प देखाएल छल,आ से हुनकर छवि हम आइ धरि पाबि रहल छी। श्री शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक निबंधक पुस्तक - 'हमर अभाग : हुनक नहि दोष' हमर सोझाँ एखन अछि।महकवि विद्यपतिक ई पंक्ति कृष्णक प्रति गोपीक आत्मव्यथाकेँ प्रकट करैत अछि,जाहिमे कृष्णक प्रति गोपीक सम्पूर्ण समर्पण छनि।मुदा,भाइ शरदिन्दु चौधरीक चर्चित उक्तिक अर्थमे मैथिली साहित्यक सृजनसँ जुड़ल विभिन्न प्रक्रिया आ ओहि प्रक्रियासभमे व्याप्त ओहि विसंगतिसंँ परिचय कराएब थिक,जतए मानवता नष्ट होएबाक नहि मात्र मंद हाहाकार अछि, अपितु,मानवता जगएबाक तीक्ष्ण प्रहार अछि।आ से एहि सम्पूर्ण पुस्तकमे लेखकक एहन विशिष्ट दृष्टि -केन्द्रित अभिव्यक्ति प्रशंसनीय थिक। श्री शरदिन्दु चौधरी एहि पुस्तकक भूमिकामे अपन विसंगति -बोधक दृष्टिक अभिव्यक्तिक चयन लेल जे निर्णय लेलनि,ताहि सम्बन्धमे स्पष्ट करैत कहैत छथि, '..लेखनकालमे जिनकापर हमर कलम चलैत अछि, तिनक श्याम-पक्षपर केन्द्रित अवश्य रहैत अछि,मुदा हुनका अपमानित करब चेष्टा कथमपि नहि।' श्री शरदिन्दु चौधरी अपन एहि पुस्तकक 'नव घर उठय - पुरान घर खसय ' शीर्षक निबंधमे नव वर्षक आब होइत आयोजनमे विसांस्कृतिकरणक चिन्ता जनबैत नेनासभमे प्राचीन आ अपन पारम्परिक मूल्यक ज्ञान देबापर बल देलनि आछि,तँ 'हमर अभाग : हुनक नहि दोष'मे मान्य साहित्यकारक अशोभनीय महात्वाकांक्षाकेँ देखबैत छथि।संगहि,'सम्पादक आ पाठकीय पत्र' शीर्षक निबंधमे तँ साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करबाक लेल साहित्यकारक घोर लिप्साकेँ आ आचरणकेँ निस्संकोच उजागर करैत देखाइत छथि।ओ कटूक्ति संग मैथिलीक साहित्यकारक ओहि ज्ञानक उपहास करैत नहि थकैत छथि जिनका कौमा आ पूर्ण विराम धरिक ज्ञान नहि छनि,से ज्ञान बघारैत देखल जाइत छथि। पोथीक ' पैघत्वक अकारण प्रदर्शन...' होअय अथवा 'बइमान होयबाक घोषणा 'शीर्षक निबंध पढ़ि तखन आर बेसी कचोटैत अछि, जखन सुविचारित कोनो स्मारिकासँ कोनो आलेख प्रायः: स्तरहीन बुझि अस्वीकारि देल जाइत अछि,मुदा,जखन वैह आलेख कतहु दोसर ठाम छपि जाइत अछि,तखन नहि अत्यन्त मूल्यवान बूझल जाइत अछि,अपितु, यूपीएससी लेल सेहो अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होइत अछि।पुस्तकक अन्तिम निबंध 'ईर्ष्या द्वेष नहि - समन्वय चाही'क विचार अवश्य मैथिली भषा आ साहित्यक समुचित विकास लेल समन्यक आवश्यकताक अनुरोध करैत अछि। मुदा,समग्रतामे पुस्तकक सम्पूर्ण केन्द्रीय स्वर मैथिली साहित्यक आजुक विकासक क्रियाकलापमे व्याप्त विसंगतिक प्रति निर्भीकतापूर्वक उदाहरण सहित प्रतिरोधक -स्वरकेँ देखार करब थिक,जाहि स्वरकेँ निचेनसँ अकानल जएबाक चाही। - संपर्क-9431836445 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.मुन्नी कामत- भाषाविद् श्री शरदिन्दु चौधरी मुन्नी कामत भाषाविद् श्री शरदिन्दु चौधरी सत्यक बाट पर पाथर हजार, हजुरे-हजूर मठाधिस बनल सत्य केँ टारैय संसार। आय हम बात कऽ रहल छी पत्रकार, संपादक एवं साहित्यकार ,ओना ओऽ कतेको साहित्यक रचना करैयक बादों स्वयं केँ साहित्यकार नै मानैत छथि से हिनकर बड़पन्न अछि। नाम - शरदिन्दु चौधरी,गाम - मिश्रटोला दरभंगा। श्री शरदिन्दु चौधरी जी अपन लेखनक जादुगरी लेल जानल जाएत अछि। हिनकर कलम कहियो हिनका मन सँ समझौता नै केलक आऽ सत्यक श्याहि संगे दौड़ैत रहल। माँ सरस्वती के उपासक हिनकर समस्त परिवार ज्ञान अर्जन कऽ सबसँ पैघ धन मानलक। हिनकर बाबूजी पंडित सुधांशु शेखर चौधरी जे अपन लेखन सँ मैथिली साहित्य कऽ विभिन्न विधा सँ समृद्ध् केलैथ। हिनकर बाबा पंडित शशि नाथ चौधरी जे मैथिली केँ पैघ विद्वान छेलैथ। तँ हम निधोक कहि सकैत छी जे साहित्यक ई स्नेह हिनका विरासत मऽ भेटल छैथ। श्री चौधरी जी पॉलिटिकल साइंस सँ ूूएम ए केलखिन आऽ वकालतक डिग्री हासिल केलैथ। मुदा जे खून मऽ रहैत अछि सोझाँ एबिए जैत अछि। साहित्य हिनका खून मऽ सनल छल अहि सँ लाख कोशिश कऽ बादों ई अहि सँ मुक्त नै भऽ पौलखिन। वकालतक पढ़ौनी करैके बाद जखन ओऽ अहि क्षेत्र मऽ अपन किस्मत अजमाबैय लेल दू - चारि दिन कोट गेलखिन तँ हिनका भान भेल जे अहि पैसा मऽ झूठक सिवा किछ नै अछि। हिनका ऐहन झूठक खेल नै खेलबाक छल। जे सत्य आऽ भ्रष्टाचार्य कऽ तार -तार करैय लेल अपन भेल नौकरी कऽ इंटरव्यू काल मऽ घेंट दैब देलक से शरदिन्दु जी वकालत कोना करैथ। हिनकर ई सत्यक सिनेह हिनका बेर -बेर पिछा धकलैत रहल, मुदा ओऽ अपन बाट नै बदललैथ।न सत्यक लाट छोड़लैथ। हीनकर लेखन हिनकर सत्यताक प्रमाण अछि। हिनकर प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह अछि *बड़ अजगुत देखल* , *करिया कक्का कोरामिन* , *गोबर गणेश* संस्मरणात्मक रचना अछि *बात -बातपर बात* ,*हमर अभाग: हुनकर नहि दोष* ,*मर्मान्तक शब्दानुभुति* आकाशवाणी दूरदर्शनसँ दर्जनों वार्ता। मिथिला मिहिर पत्रिका साप्ताहिक, दैनिक, मासिक कऽ संपादक। आर्यावर्त हिन्दी दैनिक पत्रिका कऽ फीचर संपादक। तीन दशक सँ साहित्यिक गतिविधि मऽ सक्रिय रहितो हिनका बेसी मंच सँ अलग - थलग देखल गेल। हिनकर विचार समाजक व्यवस्थाक विपरित अछि जे ओहि व्यवस्था केँ बनेनाहर सभ के विरुद्ध अछि जे हिनकर व्यंग्य संग्रह मऽ सहजे देखल जा सकैत अछि। अपना कऽ पाग आऽ दोपटा सँ स्वतंत्र रखबाक लेल ई आजिवन कोनो संस्था सँ सम्मानित नै हेबाक सपथ नेने छैथ। स्वतंत्र भऽ बिन किछ लेबाक इच्छा सँ अपने सद्खिन मिथिला आऽ मैथिली लेल अपन लेखन सँ काज करैत रहलैथ। उद्देश्य मात्र अतबे जे अपन धरोहर कऽ मिथिला मैथिल नामक खाल पहिर दिम्मक कऽ नै खा देब। अहि लेल ओऽ अपन लेखनी सँ अहि दिमक सभ केँ चेतौनी दैत रहैत छैथ। चौधरी जी अहि समाज सँ नै समाजक व्यवस्था सँ व्यथित छथि। साहित्यिक गतिविधि जे वर्तमान में चैल रहल अछि ओहि गतिविधि पर क्षुब्ध छथि।जिनका भाषा कऽ ज्ञान नै से मठाधिस अछि आऽ जे ओहि भाषा कऽ गरहैत छैथ से अन्चिनहार अछि। वर्तमान मऽ मैथिली भाषा सँ पढ़ौनी केनिहार विद्यार्थी सब लेल शेखर प्रकाशन केँ व्यवस्थापक एवं संचालक श्री शरदिन्दु चौधरी कऽ नाम सबसँ ऊपर अछि। ओऽ विद्यार्थी सबहक मन मऽ हिनका प्रति जे सम्मान अछि से बनावटि नै अछि।ई सम्मान हिनकर हक अछि जे हिनकर काज हिनका दियौलैथ। हिनकर स्मारिका, व्यंग्य, संस्मरण जखन पढ़ब तँ किछ काल लऽ ठमैक जरूर जैब आऽ सोचए परत जे शरदिन्दु जी गलत कतए कहलैथ। हिनकर यैह कला हिनकर रचना कऽ अमर बनाबैत अछि। - संपर्क- साहिबाबाद (गाजियाबाद) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.गौरीनाथ- शरदिन्दु चौधरी हेबाक माने गौरीनाथ शरदिन्दु चौधरी हेबाक माने शरदिन्दु चौधरी। जिनकर बात मे नोनक कमी आ मिरचाइक तासीर खूब कड़गर आ झाँसिगर लागि सकैत अछि, मुदा मिठास तकै लेल बड़ परिश्रम कर' पड़य। कतेको गोटे लेल माहुर चढ़ाओल व्यंग्य-वाण जेना हिनक जिह्वा पर सदति तैयारे रहैत छनि! ई नइँ जे दुर्वासा महाराज जाइत-जाइत अपन तामसक बोरा बुद्धमार्गक कोनो गाछ पर सँ हिनके माथ पर उझलि गेल छलाह! साफ-साफ बात करयवला एहन सहृदय आ सहयोगी मानुस पटनाक मैथिली-परिसर मे कमे भेटताह। विद्यापति भवनक विद्यापति बाबाक बर्खी मे अबैत-जाइत मैथिलीक साहित्यकार लोकनि भने हिनका सँ बिदकैत होथि आकि केओ-केओ आरोप लगबैत होथि जे शरदिन्दु जी "साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादमी आ चेतना समिति केँ भयादोहन क' " कमाइत छथि!... मुदा सत्त तँ ई अछि जे शरदिन्दुजी अपन परिश्रमक कमाइ धरि कतेक मिठबोलिया मैथिली साहित्यकारक उधार खाता मे बोहाबैत रहलाह अछि। अक्कत तीत आ तीख बजैत-बजैत हुनक स्वास्थ्य तते खराब भ' गेलनि जे बेसी काल बीपी बढ़ल रहै छनि, मुदा मैथिलीक तथाकथित साहित्यकार लोकनि लेलधनसन! एहन कय टा स्वनामधन्य कवि-साहित्यकार भेलाह जे एक निश्चित राशि तय क' हिनका सँ किताब छपा लेलनि आ पाइ देब' बेर मे अपन मैथिली सेवी हेबाक बखान करैत हिनका 'चूना'लगा गेलाह। एहन-एहन अनेक लेखक सँ पीड़ित शरदिन्दु जी मैथिलीक खाँटी पाठक आ छात्र-छात्रा लोकनिक प्रिय छथि तँ अपन श्रम, लगन आ ईमानदारी के बल पर।मैथिली पोथीक प्रकाशन आ वितरणक अव्यवस्थित दुनिया मे हिनक योगदान केँ भनहि मैथिलीक साहित्यकार लोकनि नइँस्वीकार करथि, छात्र-छात्रा आ खाँटी पाठकक मन मे हिनका लेल हम बड़ आदर अनुभव कयलहुँ अछि। दूर-दूर सँ केओ कोनो दुर्लभ पोथीक खोज करैत अछि, तँ हुनका बस एक टा व्यक्तिक नंबर दैत छी- शरदिन्दु जीक। किछु दिन बाद पोथी प्राप्त क' चुकल ओ व्यक्ति धन्यवाद-ज्ञापन करैत हिनक तारीफ जाहि भावना सँ करैत अछि, ओकर मर्म सब नइँ बूझि सकैत अछि। "बालपन मे भरि पेट अन्न लेल तरसब, किशोरावस्था मे प्लूरिसी सन बीमारी सँ ग्रस्त होयब, एम.ए. मे पढ़ैत काले मायक देहान्तक मर्मांतक पीड़ा भोगब, 34-35क बयस मे नोकरीक छूटब, बेकारी-लचारीक समय मे पिताक संसार सँ उठि जायब, चारि गोट संतान आ पत्नीक संग सालो-साल आर्थिक कष्ट सँ जूझब आ आब बुढ़ारी मे जीवन-यापन लेल संघर्ष करैत-करैत परीक्षाक अर्थ की होइत छै से बुझय लगलहुँ अछि। शेष जीवन मे आर कतेक पर-इच्छाक पालन करय पड़त से बूझल नहि अछि मुदा हम सदा तत्पर छी अग्रिम परीक्षा देबाक हेतु आ से पूर्ण मनोबलक संग।" 14 अप्रैल, 2020 केँ 11.20 बजे राति मे कोरोना लॉकडाउनक पीड़ा बीच लिखल हुनक ई डायरी-अंश हुनक मनोदशा साफ-साफ बतबैत अछि। ई एक टा संघर्षशील मनुक्खक मनोव्यथाक अभिव्यक्ति थिक। शरदिन्दु जी केँ विगत पैंतीस वर्ष सँ हम बहुत निकट सँ देखैत आबि रहल छी।खासक' किछु पुस्तक मेला सभक क्रम मे दस-बारह दिनक निरंतर भेंटघाट सेहो रहल, भोर सँ साँझ धरि। हम हुनक दैनिक जीवनक उतार-चढ़ाव आ मनःस्थिति केँ ओहि क्रम मे बेसी निकट सँ अनुभव क' सकलहुँ। घनघोर अर्थ-संकट आ कैक तरहक शारीरिक परेशानीक बादो ओ अपन नैतिक-आत्मबल पर सदा अडिग देखाइत रहलाह अछि। सेवा-भाव सँ भरल। विचलन कतहु ने। संघर्ष-पथतेना प्रिय जे कखनो कोनो हालति मे हुनका असत्यक संग दैत नइँ देखलहुँ। 'अंतिका' मे प्रकाशित हुनक रिपोर्ट सब सेहो तकर गवाह अछि जे ओ जाहि व्यक्ति आ संस्थाक काज अपन आर्थिक लाभ लेल करैत छलाह, तकरो विरुद्ध कलम चलबैत ओ कोनो संकोच कहियो नइँ कयलनि। एखन हमरा सामने मे शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक निबंध 'बात-बातपर बात' आ एकर दोसर खंड 'मर्मान्तक-शब्दानुभूति' अछि। बहुत झुझुआन सन कायाक पोथी। मैथिली प्रकाशन जगत, मैथिल संस्था सभक किरदानी आ एकर साहित्यकार लोकनिक गोलैसी मादे शरदिन्दु जीक जे विस्तृत जानकारी आ अनुभव-संसार रहलनि अछि, तकरा देखैत तँ एहि पोथीक काया आरो निराश करैत अछि। एहि परिक्षेत्रक जे जानकारी हिनका लग छनि, से अन्यत्र कतहुँ नइँ। जँ ई विस्तार सँ लिखितथि तँ कतेको मुँहपुरुख केँ मुँह नुकब' पड़तनि, कतेको तथाकथित सम्मानित साहित्यकार अपन सम्मानक पोटरी बान्हि पेटी मे नुकब' लगितथि। मारते रास एहन सत्यसभ सभक सोझाँ अबैत जाहि सँ मैथिलीक अधिकांश गोटे अनभिज्ञ छी। मुदा से नइँ भेल अछि!... हम जनै छी, हिनका लग से सब इत्मीनान सँ लिखबाक ततेक पलखति नइँ छनि। शरदिन्दु जी केँ अनेक ओहन साहित्यकारक अशुद्ध पांडुलिपि केँ शुद्ध क' छपबाक छनि जिनका जल्दी सँ पुरस्कारक लाइन मे लगबाक हड़बड़ी रहैत छनि, बीपीएससी-यूपीएससीक छात्र-छात्रा लेल किताबक पैकेट बान्हि क' पोस्ट करबाक रहै छनि। ककरो स्मारिका, ककरो किताबक तैयारी मे लगबाक रहै छनि। अपन शरीर केँ मैथिली पोथी आ प्रकाशन पाछू तिल-तिल गलबैत रहल एहि व्यक्तिक मन दूर बैसल कोनो छात्र-छात्राक सफलता सँ पुलकित होइत अछि। प्रकाशन-व्यवसाय आ पोथी दोकान सँघर-गृहस्थी चलेबा लेल हिनक नोन-तेलक जोगाड़ तँ जरूर होइ छनि, मुदा एतबा बचत नइँ भेलनि जे बेटी ब्याहक अवसर पर पिताक अरजल जमीन बेचबाक तकलीफ सँ बाँचल रहितथि। हिनक एहन-एहन मारते रास दुख बुझबाक लेल एहि पोथी केँ बहुत बारीकी सँ पढ़ब जरूरी अछि। अपन व्यथा-कथा कहैत कैक ठाम हिनक तामस तेना लहरि जाइ छनि जे ई विस्तार सँ कोनो बात राखि नइँ पबैत छथि। बिना विस्तार मे गेने, बहुत मेंही-मेंही छोट-पातर सूत्र केँ पकड़ि क' हिनक बात केँ बुझब तखने हिनका ढंग सँ जानि सकै छियनि। जँ से धैर्य नइँ तँ ई पोथी अहाँ लेल कोनो काजक नइँ हैत। केओ कहि सकै छथि जे शरदिन्दु चौधरी सन एक टा मामूली प्रकाशक आकिताबक छोटछिन दोकान चलब'वला केँ जानि क' की लाभ? तेहन कठपिंगल लेल ई किताब दुइयो कोड़ीक नइँ अछि आ हुनका बुझायब सेहो कठिन! मुदा जिनका एहि दुर्लभ कोटिक मनुक्खक प्रति कनेको जिज्ञासा होनि, ओहि व्यक्ति लेल एहि दुनू किताबक बड़ महत्त्व अछि। संक्षेप मे बहुत काजक बात कहल गेल अछि। आबयवला समय मे एहन पुस्तकप्रेमीक घनघोर अभाव हैत। मिथिला-मैथिली के नाम पर जय-जय करयवला बहुत भेटत, मुदा एतेक कम लाभ पर जीवन-यापन करयवला शरदिन्दु चौधरी सन दोसर केओ नइँ भेटत। शरदिन्दु चौधरी मैथिलीक ख्यात साहित्यकार आ 'मिथिला मिहिर'क संपादक सुधांशु शेखर चौधरीक पुत्र छथि जिनक जन्म 07 अक्टूबर 1956 केँ दरभंगाक मिश्रटोला मे भेलनि। ओ पटना विश्वविद्यालय सँ राजनीति शास्त्र मे एमए आ मगध विश्वविद्यालय सँ एलएलबी कयने छथि। कतेको साल विभिन्न पत्र-पत्रिका आ अखबार मे पत्रकारिता कयने छथि। ई सब हुनक ओ परिचय छी जे प्रायः सब जनै छथि। एकरा बाद लोक बसएतबे जनै छथि ओ शेखर प्रकाशन नाम सँ एक टा प्रकाशन आ किताबक दोकान चलबै छथि। बड़ तीत आ कड़ू लगैवला भाषा मे बजै छथि आ संस्था सभक असलियत जनै के कारणें ओकर भयादोहन करै छथि! एकरा बाद आरोप-दर-आरोप कि जकरे किताब छपै छथि तकरे नाँगट करै छथि! कथी लेल तँ कखनो बकियौता पाइ लेल तगेदा क' दै छथि, कखनो अशुद्ध लिखै लेल बोकियबै छथि!... एहन लोक केँ ई पता नइँ हेतनि आ नइँ से पता करबाक उहि हेतनि जे ई व्यक्ति ऑटो-रिक्शा चलब'वला एक टा मजदूर कोटिक लोक लेल तेहन खतरा मोल ल' सकैत अछि जेहन स्थिति मे सहोदरोक प्रति कतेक के डेग पाछु भ' जायत। जखन अहाँ हिनक जीवन मे नीक जकाँ उतरब आ हिनक संघर्ष केँ देखब-गमब तखने बूझि सकब जे शरदिन्दु चौधरी हेबाक माने की होइत छै!... अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- कथ्य, तथ्य आ सत्यक चिन्तन जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' कथ्य, तथ्य आ सत्यक चिन्तन बात-बातपर बात सीरीजक अंतर्गत 63 ,48,40 आ 32 पृष्ठक चारिटा पोथीक कुल 183 पृष्ठमे लेखकक जीवनक व्यथा-कथा अथवा संस्मरणात्मक निबंध अछि. शास्त्र कहैत अछि, ग्यानी लोकनि कहैत छथि जे जीवनमे जतेक दुख हम सभ भोगैत छी से अपन अग्यानताक कारणे आ जतेक सुख पबैत छी से परमात्मा अथवा अस्तित्वक प्रसाद अछि. पोथी पढैत काल कतेक ठाम किछु प्रश्न मोनमे उठैत अछि. किछु बात पढ़िक' लगैत अछि जे एना कोना भ' सकैत छैक,अवश्य कतहु सम्वादहीनताक स्थिति आएल हेतैक, कतहु-कतहु लगैत अछि जे अतिशयोक्ति अलंकारक प्रयोग भेल अछि. एहने-सन किछु प्रसंगक उल्लेख एकटा पाठकक रूपमे हम करय चाहैत छी. 1, अपन वाल्यावस्थाक चर्च करैत कहैत छथि जे पिताजीकें मिथिला मिहिरक व्यस्तता तते रहैत छलनि जे हमरा सभकें प्रातःकाल जगबासँ पहिने निकलि जाथि आ रातिमे जखन सूति रही तखन ओ घर आबथि, हम सभ हुनका रविदिन किछु काल देखियनि. ( पृष्ठ : IV / 26 ) पटनामे आवास आ कार्यालय दुनू रहनि तखन कहियो-कहियो एहेन स्थिति आएब स्वाभाविक भ' सकैत छैक मुदा तीन बरख धरि एहेन स्थिति रहब अस्वाभाविक लगैत अछि. 2. एकठाम कहल गेल अछि जे पेट नहि होइतैक त मनुष्य व कोनो जीव-जंतु संघर्ष नहि करैत,कोनो काज नहि करैत. ( पृष्ठ : II / 42 ) देखल गेल अछि जे जकरा भोजनक समस्या नहि छैक,सेहो विना कोनो काज केने नहि रहि सकैत अछि.भोजन मात्र जीवनक खगता नहि छैक. 3.एक ठाम कहल गेल अछि जे हमरासँ जुड़ल 95 प्रतिशत लोक हमरासँ घृणा करैत अछि. ( पृष्ठ : II / 41 ) ओही ठाम ईहो कहल गेल अछि 'हम अपना जनैत ककरो विषयमे ने खराब सोचैत छी आ ने अपन क्रियासँ ककरो अहित करैत छी '. ( पृष्ठ : II / 41 ) ई दूनू बात परस्पर विरोधी अछि. शास्त्र कहैत अछि, चिन्तक लोकनि कहैत छथि जे जँ अहाँ ककरो विषयमे ने खराब सोचैत छी, ने करैत छी त अहूँक लेल ककरो मोनमे खराब भावना नहि आबि सकैत छैक. तें हमरा जनैत ई 95 प्रतिशतक गनना अशुद्ध अथवा अतिशयोक्ति अछि. 4.एक ठाम कहल गेल अछि 'हमर प्रयास रहैत अछि जे शान्ति भावमे रही, मनोवल उच्च बनल रहय, सकारात्मक सोच बनल रहय, सुखक अभिलाषा नहि,सुविधाक पाछाँ भागब स्वभाव नहि तैयो शान्ति दूर अछि, ई किए अछि? ई ककरासँ पूछू ? ( पृष्ठ : II /40 ) एहने प्रश्न कुरुक्षेत्रक मैदानमे अर्जुनक मोनमे उठल रहनि आ आइयो सभ मनुक्खक अथवा अधिकतर लोकक मोनमे ई प्रश्न उठैत छैक, तकर समाधान गीतामे भगवान द्वारा देल जा चुकल अछि. 5.कहल गेल अछि जे अनुचितक प्रति क्रोध उत्पन्न होइछ. ( पृष्ठ : II / 30 ) प्रश्न उठैत अछि जे अनुचित की अछि ? की हम जकरा अनुचित बुझैत छी सैह अनुचित अछि ? भ' सकैत छैक, हम जकरा अनुचित बुझैत छी से बहुतोक लेल उचित होइ. शास्त्रमे त क्रोधक कारण कामनाक पूर्तिमे उत्पन्न बाधाकें कहल गेल अछि. 6. कहल गेल अछि जे हम अपन अधिकारसँ बेसी कर्तव्यकें श्रेष्ठ मानलहुँ अछि तें प्रायः आजुक समाजमे अपनाकें अनफिट पबैत छी आ बरमहल असहज स्थितिमे आबि जाइत छी. ( पृष्ठ : II / 26 ) कर्त्तव्यकें श्रेष्ठ मानब आ अपनाकें अनफिट अथवा असहज स्थितिमे पायब दुनू एक दोसरक विरोधी लगैत अछि. असहज स्थितिमे अयबाक दोसर कोनो कारण भ' सकैत अछि. 7. कहल गेल अछि जे एकटा पड़ोसी रिक्शाबला टेम्पू लेब' चाहैत छल, ओकरा बैंकसँ लोन नै भेटलै त अपना नामपर लोन ल'क' ऑटो रिक्शा ओकरा दिया देलिऐ ओकर उपयोग करबाक लेल आ तीन सालमे लोन चुका देबाक लेल, मुदा दू सालक बाद ओ लोन चुकयबामे आनाकानी करय लागल, ओहि लेल डटलिऐ त तमसाक' ऑटो हमरा दलानपर लगाक' चल गेल आ अंततः हमरा एक लाखसँ बेसी लोन चुकाब' पड़ल. ( पृष्ठ : II / 22-23 ) कोन योजनामे ई लोन नेने रहथिन से लीखल नहि छैक, जँ शासकीय योजनाक अंतर्गत नेने हेथिन त बैंकक नियमानुसार ई अनुचित अछि, तें परिणाम मनोनुकूल नहिए हेबाक छलनि. जँ गैर-शासकीय योजनामे लोन नेने हेथिन, त एहिमे व्यवसायक रूपमे अतिरिक्त सावधानी, देख-रेख आ नियंत्रणक आवश्यकता छलै जे नहि भ सकल हेतनि ! जकरा प्रति सहानुभूति रखैत मदति केलखिन आ ओ विश्वासक रक्षा नहि केलकनि, ओकरो अपन कृत्यक फल भेटिए गेलै जे ओ फेर रिक्शा चलब' लागल. 8. कहल गेल अछि जे विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा पत्रकारिताक क्षेत्रमे सेवाक लेल हमरो नामक घोषणा केलक,प्रेस विज्ञप्ति जारी भेलै, सभ अखबारमे सम्मानक लेल चयनित लोक सबहक नाम छपलै, तकर बाद अध्यक्ष महोदय कहलखिन जे सम्मानक सूचीसँ जँ शरदिंदु चौधरीक नाम नहि हटाओल जाएत त हम जहर खा लेब आ हारिक' सचिव महोदय द्वारा नाम वापस ल' लेल गेल. ( पृष्ठ : I / 31-32 ) एहि कथ्यपर जखन विचार करैछी त प्रश्न उठैए जे विना अध्यक्षक सहमतिसँ सम्मानक सूची कोना अखबारमे प्रकाशित भ' गेलै. ईहो प्रश्न उठैए जे अध्यक्ष महोदय जे मैथिलीक एकटा प्रतिष्ठित व्यक्ति छलाह से एहन बात किए कहलखिन जे हम जहर खा लेब ! लगैत अछि जे तथ्य आ सत्य किछु दोसर छल हेतै जे प्रकाशमे नहि एलै. 9.कहल गेल अछि जे पुरस्कार आ सम्मानक लोभमे एहनो लोक शामिल भ' गेलाह जिनका योग्यताक आगाँ साहित्य अकादमी पुरस्कार तुच्छ अछि.(पृष्ठ:I /56-57) सुनैछी देवतो सभ भावक अर्थात सम्मानक भूखल होइत छथि, तें योग्य व्यक्तिकें एकर लोभ होयब अनुचित नहि कहल जा सकैछ, परन्तु ई त अतिशयोक्ति लगैछ जे पुरस्कार व सम्मान नहि भेटबाक कारणें ओ मैथिली बजनाइ छोड़ि देलनि आ कहने भेल घुरथि 'मैथिली बईमानो की भाषा है !' 10. धार्मिक पत्रिका 'कामाख्या सन्देश'क तीनटा अंकक छपाइ आदिक खर्च तीस हजार नहि भेटलनि. ( पृष्ठ : I /59 ) पहिल अंकक बकायाक बाद सावधान होयब आवश्यक छलनि. तीन अंक तक बकाया रहबामे व्यवस्थापकीय असावधानीकें स्वीकार करबाक चाही. बकायाक वसूली हेतु दोसर व्यक्तिक माध्यमसँ नहि, सम्बंधित व्यक्तिसँ प्रत्यक्ष पत्राचार करबाक प्रक्रियाक अनदेखी भेल. 11. एकटा साहित्यकारसँ (जे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त छथि ) एकटा पोथीक प्रकाशनमे 1675 टाका प्राप्त नहि भेलनि. ( पृष्ठ : I /61 ) दोसर व्यक्ति द्वारा कहबयबाक स्थानपर जँ स्वयं हुनकासँ पत्राचार कएल गेल रहितनि त हमरा नै लगैए जे समाधान नै भेल रहितनि, बकाया रहबाक आनो किछु उदाहरण सभमे इएह लगैत अछि जे व्यवसायक किछु नियमक पालन नहि भेलासँ परिणाम अप्रिय भेल. 12. मैथिली अकादमीमे एकटा विशेषांकक प्रकाशनक समय दू टा प्रिय लोकक कह्लापर सम्पादनक काज देखलनि लेकिन ने नाम भेलनि ने उचित पारिश्रमिक भेटलनि. ( पृष्ठ : III /12 ) संस्थाक काजमे मौखिक नहि, लिखित सभ किछु होइ छै, अकादमी पत्रिकाक सम्पादनक काज बिना कोनो अधिकारीक आदेशपर करबाक परिणाम जे भ' सकैत छैक सैह भेलनि.कोनो कर्मचारीक व्यक्तिगत अनुरोधक सरकारी काजमे की महत्व भ' सकैत छनि ! 280 रु.के चेक भ' सकैए मार्ग व्ययक नामपर द' देल गेल हेतनि. 13.एकटा प्राध्यापक मैथिली विभाग हेतु 5000 रु. के पोथी ल'क' बिल पर राशि पावतीक रूपमे हिनक हस्ताक्षर ल'क' गेलखिन ई कहिक' जे तुरत राशि पठा देब, मुदा बिसरि गेलखिन. ( पृष्ठ : III /39 ) एतेक उच्च पदपर आसीन व्यक्तिस वसूली नहि भेलनि से आश्चर्यजनक बात लगैत अछि. पन्द्रह साल बाद भेंट भेलापर स्मरण करौलाक बादो राशि नहि प्राप्त भेलननि . होइत अछि जे हुनकासँ लगातार पत्राचार कयल गेल रहितनि त ओ अबस्से पठा देने रहितथिन. भ' सकै छै दू बेर अथवा तीन बेर पत्राचार करय पड़ितनि. एके तरहक गलती बेर-बेर कयल गेल आ तें आनो कय ठाम बकाया राशि बढैत चल गेलनि. ( III /25 ) पहिल बेर बकायाक अनुभवसँ आगाँ बढल रहितथि त बकाया एतेक नहि बढल रहितनि. 14. कहैत छथि : लेखन कालमे जिनकापर हमर कलम चलैत अछि हुनक श्याम पक्षपर केन्द्रित अवश्य रहैत अछि मुदा हुनका अपमानित करबाक चेष्टा कथमपि नहि.हम मुद्दा आधारित विरोध करैत छियनि चाहे कियो होथि. जीवित छथि तिनकर सोच,व्यवहार-व्यसनपर अवश्य लीखल जयबाक चाही जाहिसँ ओ अपन श्वेत आ श्याम दुनू पक्ष अपन आँखिए देखि सकथि आ अन्तिमो समयमे सन्मार्गक अनुशरण क' सकथि. ( पृष्ठ : III / 8 ) श्याम पक्ष भेल राति, अन्हार, निन्नमे चल जायब, सूति रहब. जँ समयपर पत्राचार द्वारा अथवा व्यक्तिगत संपर्क द्वारा अपन प्रिय ग्राहक साहित्यकार लोकनिकें जगौने रहितथि त कोनो साहित्यकार-ग्राहकसँ शिकायत नहि रहितनि. लेखक अपनाकें पत्रकार मानैत छथि, पत्रकारक काज होइछ लोककें समयपर जगयबाक. यदि स्वयं समयपर अपन चूककर्ता साहित्यकार-ग्राहक लोकनिकें अपन प्रभावी पत्राचार द्वारा जगौने रहितथि त अपनो हानिसँ बचि जैतथि आ हुनको लोकनिकें एकटा कलंकसँ बचा लीतथि. कय बरखक बाद एहि बातकें प्रकाशमे अनबाक मतलब भेल संख फूकिक' लोककें जगायब. जँ एखनो किनको निन्न नहि टुटलनि त मान' पड़तनि जे पछिला कोनो जन्ममे हिनका लोकनिसँ किछु कर्ज नेने छल हेथिन जे चुका देलनि ! -संपर्क-8789616115 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.अजित कुमार झा- 'समय-साल' केँ अकानैत: शरदिन्दुजीक संपादन ओ संपादकीय अजित कुमार झा 'समय-साल' केँ अकानैत: शरदिन्दुजीक संपादन ओ संपादकीय मैथिलीक द्वैमासिक पत्रिका 'समय-साल' केर जून- जुलाई 2004 अंक मे प्रतिक्रिया स्तंभ मे ' एकटा उपराग: संपादकक नाम' छपल छल। उपराग एतबहि छल जे ओहि लेखक केर कोनो एकटा कथा केँ अहि पत्रिका मे स्थान नहि भेटल छलै। लेखक केँ ओहि कथाक भविष्यक चिन्ता छलनि। खैर किछु हद तक स्वाभाविको छैक ई चिन्ता किएक त' जाहि लेख केँ स्थान नहि भेटैत छैक ओकरा लौटाबय केर प्रथा नहि अछि। खैर पुनः ओहि उपराग दिस आबी जे कि पूरा एक पृष्ठक छल आ अगिला पन्ना मे संपादक जी अर्थात् श्री शरदिन्दु चौधरी जी केर जवाब छलनि। ओहि मे सँ किछु पाँती उद्धृत करय चाहब: 'अपनेक उपराग हमरा प्रेरित एवं उत्साहित कयलक अछि मुदा हमर किछु विवशता सेहो अछि।.............. दोसर बात ई जे 'समय-साल' साहित्यिक पत्रिका नहि थिक से एकर मुखपृष्ठे कहैत अछि। तथापि अपने लोकनिक एकरा प्रति अगाध प्रेमे अछि जे प्रेमवस उपराग दैत छी। उपराग हमरा नीक लगैत अछि तैँ एकरा हम सार्वजनिक क' रहल छी। मैथिलीक लेखक-प्राध्यापक सर्वज्ञ, सर्वगुण सम्पन्न एवं सर्वकालिक होइत छथि आ प्राय: तेँ सभठामक आसन सुलभ प्राप्त करय चाहैत छथि। मुदा पत्रकारिता एकटा एहन विधा छैक जाहि मे बड़ त्याग तपस्या आ उपेक्षा भेटैत छैक। एही कारणे प्राध्यापक प्रवर लोकनि साहित्यकार, लेखक तँ होयबाक सख पोसैत छथि मुदा अपने बलें पत्रिका चलयबाक साहस नहि क' पबैत छथि। अतिथि संपादक बनि सत्कार पाबि गद्गद् रहैत छथि। एहू सब पर सोची से आग्रह। अपनेक कथाक मादे कि कही - अपने लोकनिक कथा सँ मैथिली कतेक सशक्त भेल अछि से कि कथाक इतिहास नहि कहैत अछि?' वास्तव मे कोनो पत्रिकाक संपादन बड्ड दुरुह कार्य थिक ओहू मे मैथिलीक। हमरा पास कोनो आँकड़ा त' नहि अछि मुदा जतेक बुझबा मे अबैत अछि ताहि केँ आधार पर कहि सकैत छी जे मैथिली मे कथा, कविता, गीत, गजल, नाटक एवं आलेख केर पोथी त' धुरझार छपि रहल अछि मुदा पत्रिका आँगुरे पर गनय लायक। मैथिली पत्रिका सब विशेष रूप सँ अल्प जीवी होइत अछि। पाठक केर संख्या लगभग नगण्य कहल जाय। ओहि सँ बेसी संख्या लेखक केर रहैत अछि। पत्रिका छपैत त' अछि मुदा बिकाइत नहि अछि। एहन मे आखिर कोना कोनो पत्रिका दीर्घ जीवी होयत? अपन संतुष्टि हेतु अपन पोथी त' लोग बिलहैते छथि मुदा पत्रिका कोना बिलहल जाओ। मंगनी मे देबैक आ लोग पढ़ि लेताह सेहो नहि होइत छैक। जौँ संभव होइतैक त' एकटा सर्वे करबा क' देखबाक चाही जे भारतवर्ष मे मैथिलीक कतेक प्राध्यापक छथि आ छोट छिन सँ ल' क' नामी गिरामी कतेक लेखक मैथिली केँ क्षेत्र मे कार्य क' रहल छथि? अहि सँ इएह जानकारी प्राप्त करबाक अछि जे कि अपन सबहक कोनो भी मैथिली पत्रिका केर ओतेक प्रति बिकाइतो छैक कि? नगण्य ही सही किछु त' विशुद्ध रूप सँ पाठको केर संख्या हेतैक? हमर कहबाक तात्पर्य इएह अछि जे पत्रिकाक संपादन निश्चित रूप सँ बड्ड कठिन कार्य अछि आ अहि कठिन कार्य केँ तन्मयता सँ करैत रहलनि हँ श्री शरदिन्दु चौधरी जी। एहन नहि जे ओ अपन पोथी नहि लिखलनि। हिनकर प्रकाशित पोथी केर नाम छन्हि ' जँ हम जनितहुँ' , बड़ अजगुत देखल, गोबरगणेश आ करिया कक्काक कोरामिन' । बस व्यंग्य संग्रह " करिया कक्काक कोरामिन' हमरा पढ़बाक अवसर भेटल। श्री शरदिन्दु चौधरी जी सन् 1981 सँ निरन्तर पत्रकारिता क्षेत्र सँ जुड़ल छथि। 'मिथिला मिहिर' लेल कार्य कयलनि एवं ओहि केँ पश्चात हिन्दी दैनिक ' आर्यावर्त ' मे फीचर संपादक केँ रुप मे कार्य कयलनि। एखनधरि लगभग बीसटा सँ बेसी स्मारिकाक संपादन कयलनि अछि। गुवाहाटीक मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समितिक पत्रिका ' पूर्वोत्तर मैथिल ' केर संपादन सँ जुड़ल रहलाह। आजुक चर्चाक हमर मुख्य विषय अछि मैथिली द्वैमासिक पत्रिका ' समय-साल ' जकर संपादक छलथि श्री शरदिन्दु चौधरी जी। एक तरहें कहल जाय त' संपादन कला हिनका विरासत मे भेटल छन्हि। 10 फरवरी 2000 केँ मैथिली द्वैमासिक पत्रिका "समय-साल' केर पहिल अंक केर प्रकाशन केर साथ मैथिली पत्रकारिता मे एकटा न'ब अध्याय जुड़ि गेल छल। सन् 2003 सँ ल' क' 2008 धरि अहि पत्रिकाक हम नियमित पाठक छलहुँ। प्रतिक्रिया, संपादकीय, यत्र-तत्र-सर्वत्र, समसामयिक, खेल, सिनेमा, पोथी परिचय एवं स्तरीय आलेख सब अहि पत्रिकाक मुख्य आकर्षण छल। मैथिली मे सामाजिक एवं राजनैतिक चेतनाक संवाहक छल ई पत्रिका। एहन नहि छैक जे अहि पत्रिका मे हमरा सब किछु नीँके बुझायल मुदा तखन इहो सही छैक जे नीँक बेजाय किनको व्यक्तिगत सोच होइत छैक। जे हमरा नीँक लगैत अछि से सबकेँ नीँक लगतन आ जे हमरा बेजाय लगैत अछि से सबकेँ बेजाय लगतन से त' संभव नहि छैक। मुदा एत्तह हम अपना नजरि मे जे नीँक बुझायल तकरा नीँक कहब आ जे बेजाय बुझायल तकरा बेजाय कहब। विभिन्न तरहक कथा-कहानी, गीत-गजल, समसामयिक विषय पर आलेख आ संपादकीय अद्भुत लागल। तखन राजनीतिक रुप सँ एकटा पार्टी केर प्रति झुकाव सेहो बुझायल। प्रतिक्रिया मे किछु अहि विषय पर पत्र सेहो समय-समय पर अभरल। हम 'समय-साल' केँ मात्र सामाजिक एवं राजनैतिक चेतनाक संवाहकेटा नहि मुदा एकटा पारिवारिक पत्रिका सेहो बुझैत छी आ हमरा ख्याल सँ एहन पत्रिका मे निधोख भ' क' अश्लील छवि त' रहिते छल मुदा अंतिम पृष्ठक आलेख सेहो अश्लीलता सँ भरल रहैत छल। 'लतिका' संभवतः छद्म नाम रहल होयत जाहि नाम सँ ई आलेख अबैत छल। ई आम पाठक केर पसन्द छल आ कि एहि तरहक नियमित स्तंभ कोनो मजबूरीवश छल से नहि जानि। हमरा ख्याल सँ एहन सामग्री एवं छवि अहि पत्रिकाक मान-सम्मान केर अनुरूप नहि छल। ओना नीँक अथवा बेजाय ई किनको भी व्यक्तिगत सोच होइत छैक। संपादकीय निस्संदेह समसामयिक विषय पर निधोख लिखलनि अछि। संबंधित व्यक्ति केँ ठेस त' पहुँचल हेतनि मुदा एकटा संपादक जौँ उचित बात केँ निधोख भ' क' नहि लिखता त' फेर केहन पत्रकारिता? जहाँ मैथिली पत्रिका केँ अल्प जीवी होयबाक श्राप छैक ओत्तह लगातार चौदह वर्ष धरि 'समय-साल' केर प्रकाशन बिनु लगन आ मेहनत केर कोना संभव होइत? अहि दुरुह काज लेल हिनक जतेक प्रशंसा कयल जाय से थोड़बे होयत। विभिन्न अवसर पर विभिन्न विषय सँ संबंधित हिनकर संपादकीय केर किछु अंश बानगी के रुप मे अपने सबहक समक्ष प्रस्तुत क' रहल छी आ आशा करैत छी जे विविध विषय पर हिनक बेबाक टिप्पणी हृदय केँ झंकृत अवश्य क' देत। साहित्य अकादेमी पुरस्कार सभ बेर किछु तीत, किछु मीठ बात ल' क' अबैए मुदा अहि बेरक पुरस्कारक क्रम मे जे बात सभ सोझां आयल अछि से स्पष्ट क' देलक अछि जे पुरस्कारक प्रतिस्पर्धी सँ ल' क' निर्णायक मंडलक सदस्य लोकनि तक एके रंग मे रंगल सियार छथि जे सोझे डेगे चलिये ने सकैत छथि। फरवरी-मार्च 2003 प्रायः क्रिकेट छोड़ि आन कोनो क्षेत्र नहि अछि जाहि मे कर्म सँ पहिने देबाक एहन अन्धाधुन घोषणा होइत हो। लसख टाका केँ के पूछय करोड़क करोड़ भारतक विभिन्न कम्पनी आ सरकार देबाक घोषणा पहिने क' देने छल। परिणाम ई भेल जे निर्णायक मैच मे बेसी खेलाड़ी गेन्द नहि देखि करोड़ोक राशि देखय लागल छलाह मुदा जखन सपना टुटलनि तँ गेन्द विकेट उखाड़ि लेने छलनि आ ओ लोकनि अपन भाभट समेटि भारतीय दर्शकक अनुगूंज 'कम आन इंडिया' सुनि बिना कप नेने वापस आबि गेलाह। अप्रैल-मइ 2003 जहिया-जहिया जनता जागल अछि तहिया-तहिया सरकार उलटल-पलटल अछि, प्रशासन नतमस्तक भेल अछि। सामाजिक परिवेश मे राजनीतिक गुंडागर्दीक विरोध मे जावत स्वयं जनता ठाढ़ नहि होयत तावत अहिना लाठी पर तेल पियबैत सरकार पर बैसल एहन-एहन नेता जनता केँ अपन सुख-सुविधा जुटयबा लेल डेंगबैत रहत आ शासन पर बैसि कुहैत रहत। जून-जुलाई 2003 बिहार मे नेताक कमी नहि, अभिनेताक कमी नहि, चिकित्सक आ अभियंताक कमी नहि, बुद्धिजीवी महंथक कमी नहि अछि। मुदा करोड़ो लोकक बीच मे मनुक्खक कमी भ' गेल अछि जे अपन मातृभूमि, जन्मभूमिक विषय मे सोचि सकय, किछु क' सकय, ओकर रक्षा क' सकय। अक्टूबर-नवम्बर 2003 ई कोनो न'ब घटना नहि अछि जाहि मे बिहारीक सभ तरहें मान-मर्दन भेल अछि, क्षति भेल अछि, बिहारी लोकक बलिदान भेल अछि। जँ बिहार सरकार अपन नागरिकक सुरक्षा अपन देश मे करयबाक लेल सक्षम नहि भ' सकत, बिहारी अस्मिताक रक्षा नहि क' सकत, अपन युवा सदक्तिक मान-अपमानक अनुभव नहि क' सकत तँ अहि सँ दुखद विषय की भ' सकैछ? दिसम्बर-जनवरी 2003-04 ध्यान देबाक बात ई थिक जे जे नेता लोकनि पाँच वर्ष धरि जातिवाद, सम्प्रदाय, हिंसा, भ्रष्टाचार, वंशवाद आदिक विरुद्ध विषवमन करैत नीति, सिद्धांत, लोकाचार, विचारक बात एवं समाज सेवा अपना केँ सर्वश्रेष्ठ घोषित करैत छलाह से चुनावक देहरि र अबितहि देश, समाज, क्षेत्रक मान-सम्मानक परवाहि कयने बिना दल बदल सँ ल' क' सभ तरहक छल-छद्म अपना नीति-सिद्धांत केँ त्यागि विजय श्री पयबा लेल उताहुल छथि। अप्रैल-मइ 2004 अपन भाषिक परिचिति बनल रहय ताहि हेतु हमरा लोकनि कनिकों चिन्तित नहि रहलहुँ, आबो नहि छी। परिणाम सभकेँ बूझल अछि। मिथिलाक्षर लुप्त भ' गेल आ सभ निश्चिंत छी। मैथिलीक साहित्यकारगण, प्रध्यापक लोकनि, शिक्षक लोकनि अथवा ई कही जे मैथिली लेखन सँ जुड़ल समाज मात्र साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादेमी, भारतीय भाषा संस्थान आ अन्य मैथिली संस्था दिस चकभाउर दैत निश्चिंत भ' जाइत अछि। ................ मैथिली बेर-बेर जे संकट मे पड़ैत अछि, सीता जँका कहियो अपहृत होइत अछि तँ कहियो बनवास भोगैत अछि तकर मूल कारण ई अछि जे मैथिली भाषी अपन मैथिली केँ हृदय सँ लगा क' रखबा मे अक्षम रहल अछि, लाभ लेबा लेल एकर उपयोग कयलक अछि, एकर परिचिति सँ अपन परिचिति बनयबाक प्रयास नहि कयलक अछि। अप्रैल-मइ 2006 सवाल उठैत अछि जे सरकार बेर-बेर एहि आरक्षणेक मामिला ल' क' देशोद्धारक प्रयत्न किएक करय चाहैत अछि? जातिहीन, वर्गहीन आ धर्मनिरपेक्षताक असूल पर चलनिहारि नेता लोकनि किएक सार्वजनिक संस्थान मे जातिक आधार पर नामांकन अथवा नोकरीक पर्चा बटबाक लेल उताहुल रहैत छथि। आजुक स्पर्धात्मक युग मे विकासक एक्केटा मार्ग सुरक्षित छैक - मेधा शक्तिक सम्मान। आ जँ से नहि कयल जायत तँ ई शक्ति नकारात्मक पथक अनुसरण करत आ परिणाम होयत हिंसा, अशांति आ कानूनक उल्लंघन । जून-जुलाई 2006 विकासक आड़ मे प्रकृति सँ छेड़छाड़ करबाक कारणे आइ वर्षा ऋतु अपन चक्र बदलि रहल अछि, पानि पातालोन्मुखी भ' गेल अछि, जंगल आ पहाड़ अपन प्रवृति, प्रकृति आ स्वरूप त्यागि रहल अछि, सूर्य अपन ताप मे वृद्धि कयलक अछि तथा भूमि अपन उर्वरता केँ गमौने जा रहल अछि। अप्रैल-मइ 2007 आब प्रश्न उठैत अछि जे जाहि देशक राष्ट्रपति महिला होअय, प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री सहित अनेक पद केँ महिला सुशोभित करय ताहि देशक युवती सामाजिक-पारिवारिक जीवन प्रारंभ करबाक पहिने अपना केँ मात्र एकटा वस्तुक रुप मे ठाढ़ पाबय ताहिठाम ई दंभ भरब जे नारीक उत्कर्ष चरमोत्कर्ष पर अछि, नारी शक्ति अलौकिक रूप मे प्रतिबिम्बित भ' रहल अछि - कतेक हास्यास्पद लगैत अछि। अगस्त-सितम्बर 2007 - संपर्क-9472834926 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.अशोक- शरदिन्दु जी अशोक शरदिन्दु जी वर्ष १९८७ ई. के गप छी। शरदिन्दु जी ओहि समय मिथिला मिहिर मे उपसम्पादक रहथि। हम एकटा कथा मि. मि. मे प्रकाशन लेल पठौने रही। शरदिन्दु जी कहने रहथि जे ओ कथा छपि रहल अछि। मुदा ओ कथा हमरा भीतर एखन चलिए रहल छल। लगैत रहय जे कथाक अन्त ठीक नहि भेल अछि। ओहि मे हम चारि-पाँच पाँती आर जोड़बाक निर्णय लेलहुँ। एक दिन हम ओ पाँती सभ लीखि कऽ मिथिला मिहिर कार्यालय पहुँचलहुँ। शरदिन्दु जी बैसल रहथि। हुनका कहलियनि तऽ ओ कनेकाल लेल गुम भऽ गेला। कहलनि जे, 'आब तऽ पूरा अंकक प्रूफ फाइनल भऽ गेल अछि। छपै लेल चल गेल अछि।' हम फेर हुनकासँ कोनो उपाय निकालबाक अनुरोध केलहुँ। जँ कोनो गुंजाइश होइ तऽ देखिअउ। ओ कनेकाल सोचलनि आ कहलनि, 'ठीक छै। चलू प्रेसमे नींचा। जँ छपबाक प्रक्रिया शुरू नहि भेल हेतै तऽ ओहीठाम करेक्शन कऽ देबै।' हम सभ नीचामे प्रेसमे गेलहुँ। बड़का-बड़का मशीन सभ रहै। घर्र-घर्र आबाज भऽ रहल छल। ककरो आबाज सुनबामे दिक्कत होइत रहै। ओही बीचमे ओ कोनो कर्मचारी सँ बात कऽ देखलाहा प्रूफ के कागज हमरा आनि कऽ देलनि। देखलहुँ प्रूफ मे संशोधनक हिसाबसँ कम्पोजर द्वारा करेक्शन सेहो भऽ चुकल छैक। छपबाक प्रक्रियामे आब अगिला काज बाँकी रहै। हम ओहीठाम ठाढ़े-ठाढ़ कथाक अन्तमे पाँच-छहटा पाँती जोड़लहुँ। कम्पोजर लगले कम्पोज केलनि। शरदिन्दुजी प्रूफ देखि कऽ ओ.के. केलनि। ओ कथा रहय 'नचनियाँ', जे मिथिला मिहिरमे एहि प्रकारेँ प्रकाशित भेल। शरदिन्दु जी सँ एहि घटनाक पुर्वेसँ परिचय-पात रहय। हमरा हुनकर सानिध्य आ बात-विचार नीक लगैत रहय। ओ एक पत्रकार के रूपमे साँच-साँच बात कहबाक आ लिखबाक पक्षपाती रहथि। ककरो ठकुरसुहाती करब, जेना ओ सिखनहि नहि छथि। सोझ-सोझ, साँच-साँच गप बाजब हुनका पसिन्न छनि। एहि कारण ओ बहुधा विभिन्न लोकक द्वारा निन्दा-आलोचना सुनैत रहला आ सहैत रहला अछि। कतेक लोक हुनकासँ दूरी बना लैत रहल। मुदा शरदिन्दु जी छथि जे बात हुनका अनसोंहात लगैत छनि, तेकरा ओ व्यक्त करैत रहैत छथि। बाद के समयमे ओ इण्डियन नेशन संग निकलैत आर्यावर्त दैनिक अखबार आ मिथिला मिहिर मे सेहो काज केलनि। मिथिला मिहिर मे ओ अन्त धरि रहथि। ओकर बन्द हेबाक कारण सभसँ क्षुब्ध छला। अन्ततः हुनकर नोकरी सेहो एहि क्रममे छुटि गेलनि। वस्तुतः हुनका संग मैथिली साहित्य, ओकर विकासमे योगदानक जीवित इतिहास आ व्यक्तिक रूपमे स्प्ष्टवादिताक विरासत छलनि। एहि बात के ओ कहियो ने बिसरला। मैथिली साहित्यमे साहित्यकारक बहुत कम परिवारमे दोसर पीढ़ीक लोक सहज रूपमे ओहि विरासत पर गौरव-बोध करैत, ओकरा सम्हारि कऽ रखबाक लेल आ आगू बढ़ेबाक लेल प्रतिबद्ध रहला। शरदिन्दु जी एहन व्यक्ति छथि जे नहि केवल ओकरा सम्हारि कऽ रखलनि अपितु मनोयोगसँ ओकरा व्यापक बनेबाक लेल सचेष्ट रहला अछि। शेखर प्रकाशन ओकर प्रतिफल छी। मैथिली मे ई एक विरल उदाहरण थिक जे अपन पिता सुधांशु 'शेखर' चौधरीक बाद एक सुयोग्य पुत्र रूपमे शरदिन्दु जी समय के चिन्हैत, मैथिलीक प्रयोजन के गमैत तदनुसार काज करबाक लेल अपना के झोंकि देलनि। हुनकर आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहि रहनि। बहुतो अभाव सभ रहनि मुदा बिना कोनो समझौता के ओ परिवारक भरण-पोषण संग मैथिलीक काजमे लगातार लागल छथि। से सभ अपन शर्त पर। शेखर प्रकाशन नामसँ ओ पटनामे मैथिली पोथीक दोकान सेहो खोललनि स्टेशन लग। एहि व्यवसायमे ओ सम्पूर्ण निष्ठाक संग लागल छथि। पोथी सभक प्रकाशन केलनि। विभिन्न प्रकाशक सभक पोथी के विक्री केलनि। जखन यू.पी.एस.सी. आ बी.पी.एस.सी. मे मैथिली साहित्य सम्मिलित भेल तऽ ओकर सिलेबस के अनुसार पोथी सभ प्रतियोगी छात्र सभ के उपलब्ध करौलनि। सिलेबसक हिसाबसँ पोथी सभ लिखबा कऽ वा सम्पादित करा कऽ ओकर प्रकाशन केलनि। जे पोथी 'आउट आफ प्रिंट' भऽ गेल छल, ओकर फोटो कॉपी बना के छात्र सभ के उपलब्ध करौलनि। कतेको छात्र सभ के उपयोगी सुझाओ सभ दऽ अथवा मार्गदर्शन कऽ परीक्षामे सफल हेबामे मदति केलनि। एहन किछु छात्र सभ केँ हम हुनका एहि लेल अपूर्व सम्मान दैत देखने छी। शरदिन्दु जी मैथिली सँ जुड़ल सरकारी आ गैरसरकारी संस्था सभक अनटोटल बात सभ पर व्यवस्था सम्बन्धी कुप्रबन्ध सभ पर सदैव लिखैत रहला अछि। से चाहे साहित्य अकादेमी हो वा मैथिली अकादमी अथवा चेतना समिति, लेखक संघ हो। हुनकर तर्क सभ अचूक होइत छनि। ओ कोनो व्यक्तिक पाखण्ड वा अनटोटल काज पर विस्तार सँ लिखैत रहल छथि। से चाहे पत्रकारक रूपमे अथवा व्यंग्यकारक रूपमे। एहि सँ कखनहुँ के हमहूँ नहि बँचल छी। हमर एक लेखमे तैंतालीसटा सन्दर्भ-संकेत रहय। ओहि पर ओ चारि पाँतीक आलोचनात्मक कविता लीखि ओही पत्रिकामे पाठकीय पन्नामे छपौलनि। चेतना समितिक कोनो काजक क्रममे जँ हमर कोनो क्रियासँ हुनकर असहमति रहलनि तऽ अपन लेखमे ओकर चर्च केलनि। ई कहब जे एहिसँ हमरा कोनो दुख नहि होइत छल तऽ से बात नहि, दुख कनेकाल लेल अवश्य होइत छल। मुदा शरदिन्दु जी के हम चिन्हैत रहियनि, एहिमे हुनकर कोनो अन्यथा भाव नहि रहल करनि, तेँ हुनका संग बात-व्यवहारमे कोनो अन्तर कहियो नहि आयल। ओ हमरा कतेको अवसर पर सहायता सेहो खूब केने छथि। सुझाओ देने छथि। से बिना कोनो लाग-लपेट के। हमरा लगैत छल जे ओ उचित कहि रहल छथि। हमर मान-सम्मान लेल सेहो ओ गुप्त रूपसँ सक्रिय रहला अछि। अपना प्रसंगक ई सभ बात एहि कारणे कहि रहल छी जे एहि सँ शरदिन्दु जी केँ बूझल जा सकैत अछि। ओ समाचार-विचारक पत्रिका 'समय-साल'क कतेको वर्ष धरि सम्पादन केलनि। मैथिली पत्रकारिता केहेन भऽ सकैत अछि, से उदाहरण एहि सँ ओ कायम केलनि। ओ पोथी सभक सम्पादन केलनि। व्यंग्य सभ लिखलनि। अपन जीवनानुभव के छोट-छोट टिप्पणीक रूपमे दर्ज कऽ किताब छपौलनि। बहुत दिन धरि हुन्दुस्तान अखबारमे 'ठाँहि-पठाँहि' कालममे मैथिलीमे व्यंग्य लिखैत रहला। एही संग ओ मैथिलीमे पत्रकारिता लेल नीक योगदान करबाक हेतु पत्रकार के सम्मानित करबाक उद्देश्यसँ 'शेखर पत्रकारिता सम्मान' सेहो दैत रहला अछि। एम्हर ओ किछु दिन खूब अस्वस्थ रहला। कठिन परिश्रम नहि कयल होइत रहनि, तथापि जतबा सम्भव भेलनि मैथिलीक काजमे संलग्न रहबे केलाह। प्रयत्नशील रहला। हुनकर शेखर प्रकाशन सभ दिन साहित्यकार सभक लेल, पाठक ओ छात्र सभ लेल उपयोगी रहल अछि। पटनाक एकमात्र मैथिली लेल महत्वपूर्ण स्थान अछि शेखर प्रकाशनक ओ स्थान जतऽ शरदिन्दुजी बैसल रहैत छथि। बहुधा समय भेटला पर अथवा कोनो प्रयोजन भेला पर हम ओहिठाम जाइत रहल छी। गति-विधि सभ बुझैत रहल छी। शरदिन्दु जी के मनोयोगसँ सुनैत रहल छी। शेखर प्रकाशनक एहेन महत्ताक श्रेय शरदिन्दुजीक एहन व्यक्तित्व के जाइत छनि। हुनका संग चलैत विरासत के जाइत छैक। पटनाक जीवनमे, मैथिलीक कार्यकलापमे बहुतो व्यक्ति सभक सहभागिता-सहयोग हमरा भेटैत रहल अछि, से एक उचितवक्ता मित्र रूपमे शरदिन्दुजी सँ सेहो लगातार भेटैत रहल अछि। से हमरो लेल एक महत्वपूर्ण बात छी। संपर्क-8986269001 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.शिवशंकर श्रीनिवास- जेहने मधुर तेहने दृढ़ शिवशंकर श्रीनिवास जेहने मधुर तेहने दृढ़ ओहि दिनमे शरदिन्दु चौधरी मिथिला-मिहिरक संपादक मंडलीमे रहथि। १९८२-८३ केर गप्प छियै। तहिया मिथिला-मिहिर साप्ताहिक प्रकाशित होइत रहै। ओहि समयमे मिहिर कथा विशेषांक प्रकाशित करैत रहए। दू-तीन मास पहिनेसँ ओहि विशेषांक लेल प्रचार-प्रसार होइत रहै। कथाकार लोकनि कथा पठबै जाथिन। ओहि विशेषांकमे कथा प्रकाशित हएत ई बात ओहि काल हमरा सन कथाकारक लेल बहुत प्रसन्नताक विषय रहै। एकटा उत्कंठा पहिने होइ जे हमर कथा आबि रहलैए कि नहि। हम पटना गेल रही। मिथिला-मिहिरक कार्यालय गेल रही। देखलहुँ गोर-नार छड़हरे सुंदर युवक बैसल किछु लिखैत हमरा दिस तकैत कहलनि- "आउ श्रीनिवासजी"। ओ युवक आर केओ नहि शरदिन्दु चौधरी रहथि। ओना हमरा शरदिन्दुजीसँ भेंट-घाँट छल। हमरा चिन्हैत छलाह। किछु-किछु कएलाक बाद पुछलियनि-कथाक अंक आबि रहलैए? ओ उत्तर देलाह- हँ अगिला सप्ताह बहरा जाएत। मुदा, एखन ई नहि कहब जे कोन-कोन आ किनकर-किनकर कथा आबि रहलैए। "नहि कहू", हम पुनः पुछलियनि- हमर कथा भेटल की? ओ बिहुँसि उठलाह। शरदिन्दुजीक बिहुँसब ई सहजहि प्रतीत करा देत जे ओ अपन भंगिमासँ स्नेह प्रकट भऽ रहलाह। आ वएह भंगिमासँ कहलनि-नीक कथा अछि। कथाक कथ्य सेहो मार्मिक अछि "आ...."। हमरा हुनक एहि "आ.."पर अटकब हमर उत्कंठा बढ़ा देलक। हम पुछलियनि-की? ओ कहलनि-"जाहि कथाक प्रत्येक पंक्ति कथाकेँ आगू बढ़ाएब ओ कथा पढ़बामे ओतेक रुचि दैत अछि। एहन कथाक पाठकीयता बढ़ि जाइत अछि। से अहाँक कथामे अछि। हमरा नीक लागल"। शरदिन्दुजीक उक्त उक्ति हमरा बहुत मार्मिक लागल। ओ बात-बातमे कथाक विशेषताक बहुत बात कहि गेलाह। हम आगू कथाक उक्त बात धेआन रखैत रहलहुँ। कथा लिखैत काल अनायासे हमरा हुनक ओ "बात" आ "ओ" मोन पड़ि जाइत रहलाह। हमरा लगैए ई आलोचना विधामे जँ लिखतथि तँ मैथिली आलोचना साहित्यकेँ बहुत लाभ होइत। एक बेर नहि आनेको बेर ओ एहन गप कहने हेता जाहि आधारपर हम ई कहै छी। एक बेर ओ कहलनि जे कोनो लेखककेँ एक बेर सुच्चा पाठक रूपमे अपन रचनाकेँ पढ़क चाही, ओ पढ़लाक बाद अपने अपन रचनाक प्रति निर्णय करथि। शरदिन्दु सदा हमरा गंभीर आ सचेतन लगलाह। एक बेर हमरा ओ कहलनि जे अहाँ गोविन्द दासक जतेक पद छनि ओकर व्याख्या कऽ कऽ दिअ। पोथी रूपमे आबि जेतै तँ छात्र सभकेँ बड़ उपकार हेतै। ओकर किछु दिनक बाद हम से करऽ लगलहुँ। किन्तु किछु दिनपर किशोर केशव कहलनि जे "गोविन्द दासपर लीखि कऽ दिअ"। शरदिन्दुजीसँ हमरा गप भेल अछि अहाँ लिखै छी"। हम कहलियनि- हँ, किन्तु हम तँ हुनक प्रत्येक पदक व्याख्या करैत रहल छी। किशोर कहलनि- नहि एखन आलेख दिअ। आ से हम हुनका लीखि पठा देलियनि आ ओ अक्षर-पुरषमे छपल, किन्तु ओ व्याख्या अनठा गेल।शरदिन्दुजीसँ अहाँक कतबो मधुर संबंध अछि, यदि अहावक रचना नीक नहि अछि तँ ओ नहि छपताह। जखन ओ "समय साल" केर संपादक रहथि तँ कतेको रचनाकार अपन रचना नहि छपबाक कारणे हुनका पत्र लिखथिन। ओहि पत्रकेँ ओ पाठकीय कॅालममे प्रकाशित करथि आ ओकर उत्तर सेहो देथि। अपन निर्णयपर ई सदा दृढ़ रहऽ बला लोक रहलाह। कोनो स्वार्थसँ उपर ई साहित्य ओ साहित्य जगत कार्यकेँ रखलनि। हिनक सभसँ खूबी अछि जे हिनकासँ जँ कोनो चूक भेलनि तँ ओ ओहि चूककेँ सार्वजनिक करैत क्षमा मँगैमे सेहो ई नहि हिचकता। एहन कतेको उदाहरण देखल-सुनल अछि। हिनक पोथी " हमर अभागः हुनक नहि दोष" पढ़ि सेहो ई बात बुझि सकै छी। एक बेरक गप्प कहै छी, हिनक संपादित पोथी "मैथिली गद्य गौरव" हम एकटा विद्यार्थीक हाथमे देखलियै। ओ लऽ हम पढऽ लगलहुँ तँ देखलहुँ कथापर एकटा आलेख अछि। लेखक एकटा प्रसिद्ध लेखक छथि। ओ लेख पढ़ैत लागल जे ई तँ हमर लेख छी। हम तात्काल शरदिन्दुजीकेँ कहलियनि जे एना किएक? ओ कहलनि अहाँक लेख छी तकर प्रमाण? "हमर ई लेख नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडियासँ प्रकाशित पोथीक संपादकीय अंश थिक" ओ कहलनि- हम थोड़े कालमे फोन करै छी, एखन राखू। किछु कालक बाद हुनक फोन आएल जे "ठीके अँहीक रचना छी। हमरासँ गलती भेल. जे कही। हम कहलियनि- गलती एहिना भऽ जाइ छै। कोनो बात नहि। एकरा ठीक कऽ दियौ। "ओ ठीक भऽ जेतै। किन्तु जाहि व्यक्तिक नाम एहिपर छनि हुनका पोथी देलियनि तँ धन्यवाद दैत रचना देखलीह आ पोथी राखि लेलनि। किछु कहलनि नहि। अद्भुत अछि"। हमरा हँसी लागल। ओ कहलनि- अहाँ हँसै छी श्रीमान। हम तँ लज्जित छी। नहि ई कहि हम गपइ बदलि देल किन्तु ओ बेर-बेर एही गपपर अबैत रहलाह। एक सप्ताहक बाद हम हुनक प्रकाशन गेलहुँ तँ देखल जे हमर नाम छापि पोथीक ओहि आलेखक लेखक क्रममे साटि देने छलाह। बादक संग्रहमे तँ सहजहिं हमर नाम आबि गेल। कहबाक जे एतेक तत्पर आ उचित निर्णयकेँ कार्यान्वित करबाक क्षमता जे हुनकामे छनि से कदाचिते लोकमे भेटत। शेखर प्रकाशन कहू वा हुनक पोथी विक्रय केंद्र, ओतऽ जहिया गेलहुँ तहिया ओ ततेक हिलसि कऽ स्वागत केलनि जे बुझाएल हमहूँ लेखक छी। अद्भुत स्नेह आ से तेहन जे सतत स्वजनक बोध होइत रहल। ई असलमे हुनक भाषा-साहित्यक प्रति प्रबल प्रेम अछि। हुनका जीवनमे नीक नौकरी भेल रहनि किन्तु ओ नहि गेलाह, ओ अपना लेल उक्त बात (आर्थिक दृष्टिएँ) नीक नहि केलनि किन्तु मैथिली साहित्यिक विकास लेल हुनक ओहि नौकरीमे नहि जाएब बहुत फलदायी भेल। खास कऽ कऽ छात्र सभहक लेल हुनक प्रकाशन जतेक कार्य केलक अछि ओ प्रसंशनीय अछि। शरदिन्दु चौधरी माने स्नेहसँ भरल लोक। एकटा एहन लोकजेँ अपन भाषा-साहित्य संवर्धन लेल अपब भविष्यकेँ बुझितो अपन पूरा जीवन लगा देलनि। एहन सत-पुरुषकेँ अभिननंदन करैत हुनक स्वस्थ जीवनक शुभकामना करैत छी। - संपर्क-9470883301 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.केदार कानन- हमर शरदू भैया केदार कानन हमर शरदू भैया के लिखताह अहाँ पर शरदू भैया? सबहक तँ थौआ उठौने छियै अहाँ। बिढ़नीक खोता आ सांपक बिल मे जानि-बूझि केँ के हाथ देतै। सभक भीतर डर... साहित्य मे जे सभ अपन कल्ला अलगौने छथि, बड़का-बड़का मठ पर सँ जे डाकनि दऽ रहल छथि आइ, अहाँ ओकर आदि अन्त केँ जनैत छी। सबहक बारे मे खुल्लम-खुल्ला लिखने छी, जतऽ बजबाक अवसरि भेटल, ततय ठांहि-पठांहि कहने छी। तेँ के लिखताह अहाँ पर। अपने पयर पर कुड़हरि चलौने छी। हम की कहब आ की लिखब? ओ कहैत छथि, राम-राम! की शरदू-फरदू पर लिखब अहाँ? कोनो दोसर काज नहि अछि अहाँ केँ? नहि भाइ, एखन कोनो दोसर काज नहि अछि हमरा। शरदू भैया पर जँ नहि लिखब, तँ आत्मा धिक्कारैत रहत हमरा। तेँ हुनका पर लिखब हमरा लेल आवश्यक अछि। आइये भोरमे अपन मित्र आ व्यंग्यकार वैद्यनाथ विमल जी सँ गप होइत छल। हम कहलियनि जे शरदू भाइ पर लिखलह? ओ कहलनि जे ओ हमर ततेक आत्मीय स्वजन छथि जे हमरा सँ लिखले नहि हैत। कतऽ सँ शुरू करब, कतय खतम करब। एक तरहेँ बात ओ ठीके कहैत छथि। मोन पड़ैत अछि जे १९८०-८१ क आसपास हुनका सँ परिचय भेल छल। जखन पटना मे पढ़ैत रही। कहियो काल ओ अभरथि। ओना सघन-सामीप्य तँ बहुत बाद मे भेल। आ जखन भेल तँ हुनक सूचीभेद्य अन्हार मे डूबल सीढ़ी पर सँ होइत जखन ऊपर जाइ तँ शेखर प्रकाशन सँ पहिने सिलाइ मशीनक घर्र-घर्र मे गोंतल दू-तीन टा मानुष केँ देखी। ओ सभ अपन मूड़ी निहुरौने सिलाइ-फराइक काज मे लागल रहै छल। ठीक तकर बाद बला कोठली मे शेखर प्रकाशनक बोर्ड। अन्हार मे डूबल ओहि सतरह टा सीढ़ीकेँ पार करैत ऊपर मे इजोते-इजोत सँ अहाँक भेँट होइत। ज्ञान आ विद्या-वैभवक इजोत। चारूकात किताबक रैक आ बीच मे कुरसी पर उज्जर दाढ़ी-मोंछ मे बैसल शरदू भाइ। आउ, आउ- कहि स्वागत करैत। आत्मीयता मे बोरल शब्द, मिठास भरल। बिस्कुट-चाह मंगबैत छी। चटकी सँ उठि ओहि कोठली सँ लागल दोसर कोठलीक रेलिंग पर सँ बिस्कुट-चाहक आर्डर। एकटा दुब्बर-पातर सनक छौंड़ा चाह आ बिस्कुट लेने हाजिर। पहिने, बहुत पहिने शीशाक गिलास मे चाह अनैत छल बाद मे कागत बला कप मे आबऽ लागल। जहिना-जहिना साँझ गहराइ, लेखक लोकनिक (जिनक संख्या कमे होइ) अबरजात शुरू होइ। ओतहि हमरा अनेक खेप भाइ वैद्यनाथ विमल, डॉ. योगानन्द झा, बच्चा ठाकुर जी, जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल जी सँ भेंट होइ। बच्चा ठाकुर जी बरमहल भेटैत छलाह। ओ लगभग प्रतिदिन अबैत छलाह। हुनक ओजस्वी भाषण हिन्दी, मैथिली, अंगरेजीमे धाराप्रवाह। बीच-बीच मे संस्कृतक पुट। हम चकित रही, हुनका एहि चारू भाषाक कतेक रास कविता यादि रहनि। ओ कतहु अटकैत-रुकैत नहि छलाह। अलबत्त। ई सब किछु शरदू भाइक सान्निध्य-लाभक सौजन्यसँ हमरा सहजहि प्राप्त भऽ जाइत छल। प्राथमिक शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालय, बाढ़ मे कार्यरत रही। प्रतिदिन बाढ़-पटना आ पटना सँ बाढ़। दू-अढ़ाइ बर्खक अबरजात। पटना रेलवे स्टेशन पर उतरि सोझे शेखर प्रकाशन पहुँचैत रही। लगभग प्रतिदिन। शनि-रवि तँ गाम चलि जाइत रही। ओत्तहि एकदिन साँझ मे पहुँचलहुँ तँ शरदू भाइ सूचना देलनि जे महाप्रकाश जी अस्वस्थ भऽ कऽ एकटा प्राइवेट अस्पताल मे भरती छथि। फेर ओत्तहिसँ, हुनके संग महाप्रकाश जी केँ देखय गेल छलहुँ। मोन पड़ैत अछि माया बाबूक अस्वस्थताक खबरि वैह देने रहथि। हुनक हृदयक तार सब लेखक सँ जुड़ल रहनि। हुनक संवेदनशीलताक अनेक खिस्सा मोन पड़ैत अछि। ओ सबहक लेल फिफिरिया कटैत रहथि। सुनल अछि जे मार्कण्डेय प्रवासीजीक स्थायी अड्डा शेखरे प्रकाशन छलनि अन्तिम समयमे। हुनका लेल शेखर प्रकाशनक दोसर कोठलीमे बजाप्ता एकटा खटिया आ ओछाइनक प्रबन्ध शरदू भाइ कऽ देने छलाह, जतय दूपहरक बाद हारल-थाकल प्रवासी जी आबि कऽ आराम करैत छलाह। शरदू भाइ सबहक सोह रखैत छथि। वैचारिक भिन्नताक बात अलग थिक, ओतय ओ कोनो प्रकारक समझौता नहि करताह। हुनका दिमागमे जे बात सही लगतनि, ओ सैह करताह। एकदम अडिग-अविचल। हुनक रीढ़क हड्डी तनल रहतनि, झुकबा लेल तैयार नहि। कतेक रास मैथिलीक लेखक हुनक पाइ मारि लेलकनि, पोथी छपबाय पाइ नहि देलकनि। चालीस-पैंतालीस फर्मा टाइप करबा लेलकनि, भुगतान नहि केलकनि। किछु गोटेकेँ जीवनक तन्नुक क्षणमे बढ़ि-चढ़िकेँ सहयोग केलनि, मुदा सहयोग लऽ कऽ ओ सब विमुख भऽ गेलाह। आब शरदू भाइकेँ के पूछैत अछि? ओ अपन घर, ई अपन घर। मुदा, सहयोग करबाक जकरा लुतुक लागल छैक, ओ मानय बला नहि। एखनो सहयोगक मुद्रा मे ओ बैसल रहैत छथि। ओ एकान्त सेवक जकाँ मैथिलीक सेवा मे अहर्निश लागल छथि। शरीर आ स्वास्थ्य संग नहि दैत छनि मुदा तखनो ओ मैथिलीएक चिन्ता मे अपस्यांत रहताह। मैथिली पढ़य बला लेल, बी.पी.एस.सी.; यू.पी.एस.सी.क तैयारी करय बला छात्र सबहक लेल तँ ओ ठीके सब सँ बेसी सोचैत आ करैत छथि। हुनक रपट सब सँ आहत भेल, सत्यक उद्घाटन करैत रपट सँ पीड़ित अनेक संस्था आ लेखक-मित्र लोकनि केँ ओ फुटलीयो आँखि नहि सोहाइत छथिन। मुदा, ताहि सँ की? ओ अपन अनुभव मे कोनो हिस्सेदारी नहि चाहैत छथि। कर्जा सँ लदल रहितो ओ अपन पिताक लगभग सबटा कृति केँ नव साज-सज्जा मे प्रकाशित करौलनि। अनेक अप्रकाशित कृति केँ मैथिली पाठक लेल प्रकाश मे अनलनि। ई हुनक महत्त्वपूर्ण योगदान थिक। अपनहुँ अनेक व्यंग्य रचना लिखलनि। प्रकाशन जगतक भयावह आ अन्हार दुनिया केँ प्रकाश मे अनलनि। अपन जीवनक कटु-मधु अनुभवकेँ बेबाकीसँ लिखलनि। ई सब हुनक साहसक परिचायक थिक। जे काज आन नहि कऽ सकैत अछि, तकरा ओ सहजतापूर्वक कयलनि। हुनक व्यक्तिगत दुनिया आ जीवन अन्हार मे डूबल छनि मुदा ओ सबहक लेल प्रकाशक संधान मे लागल छथि। कतेक रास बात मोन मे औनाइत अछि। कतेक रास बात ठोर पर आबि-आबि हुलकी मारैत अछि। मुदा, तकरा फेर लिखब भैया। एखन एतबे कहब जे दुनिया भरिक झंझट सँ अनथक संघर्ष करैत अहाँ जे प्राप्त कयलहुँ अछि, से दोसराक लेल चुनौती जकाँ ठाढ़ रहतै। अहाँक संघर्ष आ अहाँक समर्पणक प्रति नत भेल छी। -संपर्क-7004917511 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१६.आशीष अनचिन्हार- मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान जखन कोनो नौकरी करए बला, वा कि बिजनेस करए बला वा कि घूस लेबए बला सरकारी अफसर सभ रचना लीखि कऽ लेखक कहा लैत अछि ठीक तखने पोथी केर मुद्रण, प्रकाशन आ वितरण करए बला शरदिन्दु चौधरीक रचनाकेँ कात कऽ ई कहि देल जाए जे साहित्यमे हिनकर योगदान किछु नै छनि मुदा पोथी जल्दी उपल्बध करबा दै छथि। तखन हम ई सोचबा लेल बाध्य भऽ जाइत छी जे आखिर लेखक हेबाक परिभाषा की छै? आ शरदिन्दु चौधरीक साहित्यिक योगदान किछु नै छनि से हमरा स्थापित लेखक सभ कहलाह जखन हम एहि विशेषांक लेल हुनकासँ शरदिन्दुजीपर लेख मँगलियनि। ई आर बेसी खतरनाक प्रवृति छै। तँइ हम आन विषयपर लीखब छोड़ि मात्र इएह लीखब जे मैथिली साहित्यमे शरदिन्दु चौधरी केर योगदान की छै आ से हम दुइए-चारि प्वांइटमे देब। १) मैथिली साहित्यमे नव प्रवृतिकेँ जन्म देनाइ- प्रायः साहित्यिक रचनामे पात्र केर असल नाम दऽ ओकर खंडन नै कएल जाइत छै। संस्मरणमे असल नाम देल जाइत छै मुदा ओहिमे जिनकापर संस्मरण छै तिनकर नकारात्मक पक्ष नै लीखल जाइत छै। शरदिन्दु चौधरी अपन पात्र केर असले नाम रखलाह अपन संस्मरणमे आ जिनकापर संस्मरण छनि तिनकर श्यामपक्षकेँ खूब लिखने छथि। एकटा बैमानी हम उजागर कऽ रहल छी एहि संदर्भमे। २००४ मे हिंदी भाषामे काशीनाथ सिंह केर पोथी छपलनि "काशी का अस्सी", एहि पोथीक सभ पात्र असल नामक संग छल आ सेहो वास्तविक भाषा ओ वास्तविक करनी संग। आ ई छपिते हिंदीमे अनघोल मचि गेलै। एकरा नव प्रवृति मानल गेलै आ मानए बलामे मैथिलीक लेखक आ हिंदी-मैथिलीक उभय लेखक सभ छलाह वा छथि मुदा काशी का अस्सीसँ ठीक दू वर्ष पहिने २००२ मे शरदिन्दु चौधरी केर पोथी आएल "जँ हम जनितहुँ" मुदा वएह मैथिल लेखक सभ चुप भेल छथि। काशीनाथ सिंह जे प्रयोग हिंदीमे केलाह से प्रयोग मैथिलीमे शरदिन्दु चौधरी पहिनहि केलथि। श्रेय देबाक बदला मैथिली आ मैथिली-हिंदीक उभय लेखक सभ शरदिन्दु चौधरीक योगदाने मानबासँ अस्वीकार कऽ रहल अछि। जेना बहुत मामिलामे मैथिली हिंदीसँ आगू अछि ठीक अहू तरहक साहित्यमे मैथिली आगू अछि आ एकर एकमात्र श्रेय शरदिन्दु चौधरीकेँ जाइत छनि। २) सच ओ साहस केर दुर्लभ संयोग-साहित्यमे सच ओ साहस तँ हेबाके चाही। मुदा दिक्कत ई जे एहि सच ओ साहसकेँ नपबाक एखन धरि कोनो मापदंड नै अछि। शरदिन्दुजीक सच ओ साहस जनबाक लेल हम एकटा नव फर्मूला (सूत्र) दऽ रहल छी। ई सूत्र मात्र शरदिन्दुएजी नै सभ लेखक केर रचना लेल समान रूपसँ काज करत। हमर एहि सूत्र लेल तीन टा तत्व रहत, पहिल) जँ रचना व्यक्ति केंद्रित अछि, दोसर) जँ रचना कोनो विषय केंद्रित अछि, तेसर) जँ रचना तथ्य केंद्रित अछि। आब एहि तीनू तत्वकेँ फरिछाबैत छी- अ) व्यक्ति केंद्रित रचना केर दू भाग भेल पहिल समकालीन व्यक्ति आ दोसर पूर्वज। समकालीन मने जे लेखन कालमे आ ओकर बादो जिंदा छथि। जँ रचना समकालीन व्यक्ति केंद्रित छै तखन ई देखल जेबाक चाही जे लीखए बला लेखक आ जकरापर लीखल गेल छै तकर दूरी कतेक छै, दूरी मतलब प्रभाव पड़बाक संदर्भमे। कम दूरी बला लेखक बेसी दुर्दशा भोगत आ बेसी दूरी बला दुर्दशा नै भोगत। उदाहरण दैत छी मानि लिअ लेखक लिखलाह जे यूक्रेनपर हमला अमानवीय छै आ पुतिन खलनायक अछि। आब सोचियौ जे एहि प्रकारक रचनासँ पुतिनकेँ की फर्क पड़तै? किछु नै। लेखक तँ ई लीखि अपनाकेँ साहसी साबित करबा लेला। मुदा जखन पुतिनपर लीखए बला वएह लेखक लिखता जे वीणा ठाकुर वा कि अशोक अविचल केर समयमे खराप पोथी चूनल गेलै तँ लेखक अकादेमीसँ बहिष्कृत कऽ देल जेता कारण एहिमे कम दूरी छै। एकर दोसर उदाहरण अछि हरेक ठाम पत्रकारक हत्या। एहन हत्या बिहारोमे भेल छै। किएक? एकर एक मात्र कारण छै जे पत्रकारक जे सच छलै आ जकरापर लीखल गेल रहै तकर दूरी कम रहै। ओही ठाम दक्षिण आ महाराष्ट्रमे किछु लेखक केर सेहो हत्या भेलै। बिहारमे एकौटा लेखक केर हत्या नै भेलै आ ओहिमे मैथिली केर लेखक सेहो अछि। तँ जाहि रचनामे लेखक ओ जकरापर लीखल गेल छै ओहिमे जँ दूरी कम छै तँ लेखककेँ साहसी ओ सच लीखए बला मानल जेबाक चाही, आ जँ दूरी बहुत छै तँ ओकरा मात्र भाँज पुरा लेब मानल जेबाक चाही। जँ कोनो लेखक अपन पूर्वजपर लीखि रहल छथि तँ जँ ओ प्रमाण दऽ कऽ लीखै छथि तँ हुनका साहसी ओ सच लीखए बला मानल जेतनि। आ) जँ रचना विषय केंद्रित छै-- जँ कोनो लेखक अपन भाषामे अप्रचलित विषय वा विधाकेँ प्रमाणिक ओ लोकप्रिय बना देलकै तँ ओकरा साहसी मानल जेबाक चाही। जँ ओ ओहिमे तथ्य राखि देकलै तँ ओकरा सच लीखए बला सेहो मानल जेबाक चाही। इ) जँ रचना तथ्य केंद्रित अछि-- एहि कोटिमे प्रमाण ओ असल नाम दूनू महत्वपूर्ण छै। जँ एकौटा गाएब तँ साहस ओ सच केर अभाव मानल जाएत। ई तत्व सभ लेखन केर हरेम माध्यम जेना प्रिंट, इंटरनेट आदि लेल समान रूपसँ लागू अछि। संगे-संग रचनामे कथित मानवतावाद नपबाक लेल इएह सूत्र काज करत। आब हम शरदिन्दुजीक रचना सभकेँ उपरमे देल गेल तत्वसँ जाँच कऽ रहल छी। "जँ हम जनितहुँ" नामक पोथीमे शरदिन्दुजी प्रायः अपन समकालीन लेखक सभहक नाम लैत लिखने छथि आ ओहिमेसँ अधिकांश एखनो जिबैत छथि। मतलब एहि तत्वमे "साहस ओ सच केर एहि मापदंड" शरदिन्दुजीक रचना पास भेल अछि। संस्मरण विधाकेँ प्रमाणिक बनेबाक श्रेय हिनके छनि आ ई एकटा कठिन काज छलै। मैथिलीमे तँ संस्मरणक रूप एहन बना देल गेल छलै जेना कोनो काल्पनिक कथा लिखा रहल हो। संस्मरणक बहन्ने अपनाकेँ महान कहबाक प्रचलन बहुत भेल। मुदा शदिन्दुजी संस्मरण विधाकेँ मर्यादामे अनलाह। एहू अधारपर शरदिन्दुजीक रचना "साहस ओ सच केर एहि मापदंड"पर पास भेल अछि। संस्मरण शरदिन्दुजीक मूल विधा बनि कऽ आएल अछि ओ जकरा व्यंग्य कहैत छथिन सेहो सभ अपने-आप संस्मरण बनि गेल छै आ एहि संस्मरण सभमे शरदिन्दुजी असल नामक संग पूरा तथ्य अपन समकालीन सभहक नाम लैत लिखने छथि। के पोथी छपा कऽ पाइ नै देलकनि आ के कोन घात केलकनि से सभ किछु। "साहस ओ सच केर एहि मापदंड" शरदिन्दुजीक रचना सभ पास भेल अछि। अधिकांश लेखक केर रचनामे सच ओ साहस केर अभाव रहैत छै। मैथिलीक ई सौभाग्य जे एकरा शरदिन्दु चौधरी सन लेखक भेटल छै जिनकामे सच ओ साहस दूनू छनि आ से पहिल दिनसँ लऽ कऽ एखन धरि। पत्रिकारितामे तँ शरीरक हत्या भऽ जाइत छै। साहित्यमे शरीरक नहि योग्यता, बाजिब चर्चा केर हत्या होइत छै आ शरदिन्दुजीक योग्यता, बाजिब चर्चा केर हत्या भेल अछि। उपरमे जे हम सूत्र देलहुँ तकरासँ पाठक आनो लेखक केर रचनामे सच-साहस तकता से हमरा विश्वास अछि। ओना फेसबुकपर मजाके-मजाकमे हम एहि सूत्रकेँ अपने नामपर "अनचिन्हार फर्मूला" देलहुँ मुदा पाठक एकर जे नाम देबए चाहथि से दऽ सकै छथि। ३) समानान्तर धाराक संवाहक- हरेक समाज, हरेक भाषा, हरेक साहित्यमे सत्ता पक्ष केर सामने एकटा समानान्तर धारा रहैत छै आ से मैथिलियोमे रहलैक अछि। ओना तँ समानान्तर धारा शब्द विदेह पत्रिका (२००८) संगे समानान्तर धाराकेँ पुष्ट करबाक काजो विदेहे द्वारा भेल अछि। मुदा जहाँ धरि प्रवृतिमे समानान्तर धारा तकबै से मैथिलीमे विदेहसँ पहिनेसँ छै। बल्कि मैथिली भाषाक जन्मेसँ। आ ताही समानान्तर प्रवृतिक संवाहक छथि शरदिन्दु चौधरी। समानान्तर धाराकेँ अहाँ विपक्षी बूझि सकैत छी कारण साहित्यमे राजनीतियोसँ बेसी राजनीति होइत अछि। आ विपक्षी भेनाइए अपना-आपमे एकटा साहित्यिक योगदान छै। कारण विपक्षी हेबाक लेल साहस चाही आ जाहि लेखकमे साहस हेतै सएह नव-नव आयाम जोड़ि सकतै साहित्यमे। ४) सनातन धर्ममे नारीकेँ पापक खान कहल गेल छै। नारीक प्रति ई द्वेष मात्र सनातने नै कबीर सन दलित ओ समानान्तर धाराक कवि सेहो केने छथि। कबीरक रचनामे नारीक प्रति भक्ति आ द्वेष दूनू छै। सनातनमे सेहो नारी लेल आदर ओ घृणा छै। की तुलसी, की कबीर सभ अपना-अपना ढंगे नारीकेँ केखनो नीक आ केखनो खराप कहने छथि। पुरुष स्त्रीसँ जन्मैत अछि मुदा नारीकेँ अपवित्र मानैत अछि तेनाहिते लेखक पोथीक प्रकाशन लेल मुद्रक, प्रकाशक लग जाइए, पाठक धरि पहुँचेबाक लेल वितरक लग जाइए आ अंतमे कहैए जे मुद्रक-प्रकाशक-वितरक केर साहित्यमे की योगदान छै। शरदिन्दु चौधरी जँ लेखन नहियो केने रहितथि तँ हुनकर वितरण प्रणालीसँ मैथिलीक कतेक पाठक बढ़लै सएह साहित्यिक योगदान मानल जइतै। आ से शरदिन्दुए चौधरी किएक मैथिलीक पोथीक मुद्रण, प्रकाशन ओ वितरणमे जे-जे लागल छथि तिनको साहित्यिक योगदान रहबे करतनि। कुल मिला कऽ मैथिली साहित्यमे शरदिन्दुजीक ओतबे योगदान छनि जतेक योगदान कोनो मौलिक आ बिना सोंगर बला लेखक केर होइत छै। कोनो सोंगर बला लेखक कि गुट आ कि कोनो मठ-मठाधीश हुनका इग्नोर कऽ सकैए मुदा शरदिन्दुजी लेखन हुनका सभ लेल सूर्यक समान रहत जकरा ओ सभ झाँपि ने सकताह। -संपर्क-8876162759 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक संस्मरण साहित्य [बात-बातपर बात (I-IV)] गजेन्द्र ठाकुर शरदिन्दु चौधरीक संस्मरण साहित्य [बात-बातपर बात (I-IV)] "बात-बातपर बात खण्ड-१"; "मर्मान्तक-शब्दानुभूति (बात-बातपर बात खण्ड-२)"; "हमर अभाग: हुनक नहि दोष (बात-बातपर बात-३)" आ "साक्षात् (बात-बातपर बात-४) ई चारिटा पुस्तिका शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक निबन्धक संग्रह छन्हि, पहिल २०१९मे दोसर २०२०मे आ तेसर आ चारिम २०२१मे प्रकाशित भेल। संगहि २००२ मे प्रकाशित "जँ हम जनितहुँ" हुनकर हास्य-व्यंग्य युक्त संस्मरणात्मक निबन्धक संग्रह छन्हि जे पुरस्कार-लोलुप मूल-धाराक साहित्यकारक नामसँ युक्त अछि आ हुनकर सभक किरदानी तँ तेहेन छन्हिये जे ओ संस्मरण हास्य-व्यंग्यक संग्रह अनायासे बनि जायत, मुदा ई पोथी शुद्ध संस्मरणक पोथी नै थिक, ऐमे नोन-मिर्च सेहो अछि मुदा कम मात्रामे। एतऽ ई संतोषक विषय अछि जे शरदिन्दु जी केँ समानान्तर धारामे एक्कोटा लोलुप व्यक्ति नै भेटलन्हि। एकर अतिरिक्त २००५ मे प्रकाशित "बड़ अजगुत देखल", २०११ मे प्रकाशित "गोबरगणेश" आ २०१६ मे प्रकाशित "करिया कक्काक कोरामिन"केँ करिया कक्का व्यंग्य शृंखला कहि सकैत छी, कारण ऐ तीनू पोथीमे खट्टर कक्का सन करिया कक्का विराजमान भेटता, मुदा एतौ किछु आलेखमे करिया कक्का नै छथि, जेना गोबरगणेश संग्रहक 'तावत काल','गोलैसी- अर्थात्' आ 'सीडी समीक्षा '। मुदा ई तीनू संग्रह सेहो मोटा-मोटी संस्मरण आधारित अछि मुदा नोन-मिर्चक सङ आ सेहो पुष्टसँ। एतऽ 'करिया कक्काक कोरामिन' क लेखकीय मे ओ लिखै छथि जे (करिया कक्का)केँ 'जे फुरेलनि सैह कयलनि मुदा ई ध्यान अवश्य रखलनि जे... अश्लीलताक आरोप नहि लागय..." मुदा ऐ पोथीसँ ५ साल पूर्व प्रकाशित 'गोबरगणेश' क 'सीडी समीक्षा ' मे साहित्य अकादेमी द्वारा कथित लिटेरेरी एसोशियेशन सभ द्वारा चयनित मैथिली परामर्शदात्री समितिक अध्यक्ष विद्यानाथ झा 'विदित'क सम्बन्धमे लिखल गेल अछि, '.. ओ तँ स्वयं रसिया छथि। प्रवासीजी संग संध्यावंदन करताह, ठकुराइन संग युगलबंदी करताह...'। ओही पोथीक 'तावत काल' आलेखमे लिखल गेल अछि- 'एहने सन प्रयोग साहित्य अकादेमी सेहो कयलक जे जकरा होटल रहतैक सेहो परामर्शदातृ समितिक सदस्य बनि सकैत छथि।" तावत काल केर वर्णन अश्लील नै अछि मुदा सीडी समीक्षाक विवरण स्पष्टतया अश्लील अछि। ई स्पष्ट अछि जे साहित्य अकादेमी द्वारा कथित लिटेरेरी एसोशियेशन सभ द्वारा चयनित मैथिली परामर्शदात्री समितिक सभ अध्यक्ष मैथिलीकेँ रसातल पहुँचेबाक काज केलन्हि अछि मुदा एकटा महिलो ओइमे छथि तँ ओ सत्य हरिश्चन्द्र किए बनथु? आ ओइपर सेक्सिस्ट कमेण्ट ईएह देखबैत अछि जे लेखक बा सम्पादक साहित्यमे आ सार्वजनिक स्थलपर महिला बा पुरुषेत्तर लिंगक प्रति सम्वेदनशील नै छथि। 'करिया कक्काक कोरामिन'मे 'सरकारक लिंग परीक्षा ' मे सेहो ई असम्वेदनशीलता देखल जा सकैए जतऽ 'स्त्री-गुणसँ परिपुरित सरकार' विनोद कुमार झा [देखू 'ईर्ष्या द्वेष नहि- समन्वय चाही'- 'हमर अभाग: हुनक नहि दोष (बात-बातपर बात-३)' पोथीमे- सरकार (विनोद कुमार झा, आब कवि सम्राट)] लेल प्रयुक्त कएल गेल अछि। १ बात-बातपर बात खण्ड-१ "बात-बातपर बात खण्ड-१" क "श्रेय आ प्रेय" मे मैथिलीक पुनः बिहार लोक सेवा आयोगमे प्रवेश आ ओकर पाठ्यक्रमक सम्बन्धमे श्यामानन्द चौधरीक योगदानक ओ चर्चा केलन्हि। शरदिन्दु जी ओ पाठ्यक्रम जे आयोग कार्यालयमे हरा गेल रहै, आयोगक गेटपर स्थित "झा जी बुकसेलर की दुकान" क नामसँ दोकान चलबैला स्व. चौधरी जी सँ लऽ कऽ श्यामानन्द चौधरीजी (तत्कालीन विशेष अधिकारी, बिहार लोक सेवा आयोग)केँ देलन्हि। श्यामानन्द चौधरी जी २० दिसम्बर २०१८ केँ कहलनि जे कोनो संस्था (मैथिलीक) ऐ सम्बन्धमे सरकारकेँ कोनो लिखित प्रस्ताव नै देलकै। मुदा चेतना समिति विधिवत एकर श्रेय लैत प्रसन्न्ता व्यक्त केलक! "हम आभारी छी"मे वैद्यनाथ चौधरी 'बैजू' द्वारा प्रेस रिलीज/ घोषणाक बादो २०१० क 'मिथिला रत्न' सम्मान सूचीसँ शरदिन्दु चौधरीक नाम बादमे हटा देबाक चर्च अछि। ई संस्था छल साहित्य अकादेमी द्वारा कथित लिटरेरी एसोशियेशन रूपमे मान्यता प्राप्त विद्यापति सेवा संस्थान, सम्मान निर्णायक मण्डलमे रहथि डॉ. भीमनाथ झा, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र 'रमण' आ कमलाकान्त झा, जँ शरदिन्दु चौधरीकेँ सम्मान देल जायत तँ ओ जहर खा लेता, ई धमकी देलन्हि साहित्य अकादेमी द्वारा कथित लिटरेरी एसोशियेशन रूपमे मान्यता प्राप्त विद्यापति सेवा संस्थानक अध्यक्ष पं चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर'। "हम नहि कहि सकैत छी..." मे साहित्य अकादेमी द्वारा कथित लिटरेरी एसोशियेशन रूपमे मान्यता प्राप्त करबा लेल असफल भेल संस्था 'मैथिली लेखक संघ ' आ विनोद कुमार झा केर राजनीति केर चर्चा अछि। पंजीयनमे ओना विनोदजीक अलाबे सभक बबुआने बनल रहबाक चर्चा अछि। मंत्रेश्वर झा पर मीटिंगमे अनेक आरोप लगाओल जयबाक, प्रेमलता मिश्र 'प्रेम', इन्दिरा झा आ पन्ना झा केर मूर्तिये सन व्यवहार (बुद्धिजीवी बनबाक लौलमे) केर चर्चा अछि। मैथिली लेखक संघमे आब स्थायी अध्यक्ष आ स्थायी सचिव छथि मुदा संघ स्वयं बिलायल अछि। से अकादेमीक कथित लिटेरेरी असोसियेशन सभक सेहो यएह खेरहा छै। विद्यानाथ झा 'विदित' तत्कालीन साहित्य अकादेमीक ५ साल धरि रहल मैथिली पदाधिकारी सेहो शरदिन्दुक 'सक्रिय सहयोग'(!)क अभिलाषी रहथि। "हमर दुर्गुण आ क्रोधक दुष्प्रभाव"मे लहेरियासरायक एकटा युवा लेखक/ पत्रकारक छद्म नामे अखबारमे लिखबाक चर्चा अछि जे शरदिन्दु साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादमी आ चेतना समितिकेँ भयादोहन कऽ कमाइत छथि। चेतना समितिक सम्बन्धमे ओ लिखै छथि- "... हम पत्रकार नहि रहितहुँ तँ हमरा संग किछु गोटे मारपीट सेहो करितथि। समितिक एकटा पूर्व सचिवक विरोध कयलापर हुनक कोना अभद्र रूपे गंजन भेल छल से लोककेँ बूझल छैक तथापि से स्थिति हमर नहि भेल।" "समय-सालक जन्म आ साहित्यिक-राजनीतिक कुचक्र"मे विनोद बिहारी लालक पत्रक चर्चा अछि, ओ लिखलखिन्ह जे चलू 'सम्पादक रूपमे इतिहासमे अहाँक नाम अयबाक सख पूरा भऽ जायत।' २००१ ई.मे स्व. बबुआजी झा अज्ञातकेँ 'प्रतिज्ञा पाण्डव' महाकाव्यपर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक विरोधमे राजमोहन झा द्वारा अभियान आ झूठ प्रचार जे ओ पोथी छपबे नै कएल अछि, ओइ हस्ताक्षर अभियानमे शरदिन्दु हस्ताक्षर नै केलन्हि आ तइपर राजमोहन झा 'अंतिका'मे अनाप-शनाप लिखलन्हि तकर चर्च अछि। एतऽ ई बता दी जे शरदिन्दु ओ छपलाहा पोथी ऊपर केलन्हि आ पटनाक अपन दोकानमे ओकरा प्रदर्शितो केलन्हि। मुदा फेर राजमोहन झाक चूक मानबाक आ शरदिन्दुक हुनका प्रति मोन फेरसँ निर्मल हेबाक चर्चा अछि। "नोकरी नहि करबाक निर्णय"मे अग्निपुष्पक चर्चा अछि, "एहन काज तँ अग्निपुष्प सन-सन पत्रकार कऽ सकैत छलाह जे आर्यावर्तमे हाथि कटबाक धमकी भरल स्वर निकालथि आ जागरणमे नांगरि सुटकाकऽ सेवानिवृति धरि काज कयलनि।" अहीमे प्रेसक मैनेजर सह कम्पोजीटर शिव कुमार ठाकुरक चर्चा अछि- "जे-से, ओ कम्पोजिटरसँ मालिक भेलाह- हमरा यैह प्रसन्नता अछि।" हमरा विचारे ओ शिवकुमार ठाकुरक प्रति कने बेशी 'हार्श' भऽ गेल छथि, चेतना समितिक विद्यापति भवन, बहुत गोटे मात्र हुनके (शिवकुमार ठाकुरक), पोथीक दोकान दुआरे जाइ छल, चेतना समितिकेँ सेहो नै अरघलै, अपने तँ ओ मैरेज हॉल बुक करैमे लागल रहैए, से पोथी किए बेचत, मुदा शिवकुमार ठाकुरक दोकान बन्न जरूर करबा देलकै। जे.. से..। "जीवन युद्धक भूमिका"मे मित्र दिलीप, अजित आजाद, अभय झा, पं. ताराकान्त झा, मंत्रेश्वर झा, बासुकी बाबू क सहयोगी, मदति केनिहार आ परामर्श देनिहारक रूपमे चर्चा अछि। "सम्मानक भूख"मे मूलधाराक पुरस्कार लोलुप साहित्यकारक वर्णन भेल अछि- "आदरणीय गोविन्द बाबूक खिस्सा प्रायः लोककेँ बुझले छैक जे पुरस्कार नहि भेटलापर मैथिली बाजब छोड़ि हिन्दीमे बाजल करथि जे 'मैथिली बईमानो की भाषा है'। "मैथिलक अविश्वसनीयता" मे मैथिल तांत्रिक बटेश महराज जीक 'कामाख्या संदेश'(मासिक) छपबाइयो कऽ ३० हजारसँ बेशी टाका नै देबाक चर्चा भेल अछि। "तीत लागय वा कड़ू"मे उदयचन्द्र झा 'विनोद' १५७५ टाका नै देलखिन्ह मात्र ११०० टाकामे २०० पोथी लऽ गेलखिन्ह शेष ने पाइये देलखिन्ह ने पोथीये लऽ गेलखिन्ह, तकर चर्चा अछि। २ मर्मान्तक-शब्दानुभूति (बात-बातपर बात खण्ड-२) "मर्मान्तक-शब्दानुभूति (बात-बातपर बात खण्ड-२)"क "महाकालक वज्राघात' कोरोना लाकडाउनमे २६.०३.२०२०केँ लिखल गेल ४१ बर्ख पुरान घटनाक वर्णन अछि, मिश्रजीक बैंकक पाईक उनटफेरमे फँसब, नोकरी जायब, मायक मानसिक स्थितिक खराप हएब आ फेर हुनकर मृत्यु। "शेखर"क अवसानमे पिताक चर्च अछि, प्रभासजी, मुखियाजी, बटुक भाइ केर बरमहल सुधांशु शेखर चौधरीजी सँ भेँट करबा लेल अयबाक चर्चा अछि मुदा "हँ, ओ अंतिम साल भरि प्रवासी जीसँ गप्प करय चाहथि मुदा से सम्भव नहि भेलनि। हमरा कहलोपर प्रवासीजी भेँट नहि कयलथिन अन्त धरि।" माताक मृत्युक वर्णनक अगिला संस्मरण पिताक मृत्युक ई विवरण कोरोना लाकडाउनमे २७.०३.२०२०केँ लिखल गेल। "अग्रलेखसँ भेंट"मे मिथिला मिहिरमे शरदिन्दुजीक आगमन (ओना नियुक्ति आर्यावर्तमे) आ तकरा भीमनाथ झा द्वारा अपन पदोन्नत्तिक मार्गमे बाधक बुझल जयबाक चर्चा अछि आ भीमनाथ झा ऐपर 'लंगूर' कविता लिखलन्हि जे सुधांशु शेखर चौधरी आ शरदिन्दु चौधरीकेँ बेधलकन्हि । भीमनाथ झाकेँ लगलन्हि जे हुनकासँ जूनियर गोकुल बाबूकेँ भीमनाथ झासँ टपा कऽ सहायक सम्पादक बना देल गेल आ सुधांशु शेखर चौधरी अपन पुत्र शरदिन्दु चौधरीकेँ नोकरी दिआबय खातिर से बर्दाश्त केलन्हि, जखनकि गोकुल बाबूक पैरवीकार रहथि कुमार साहेब (अखबार-प्रेसक मालिक)क नाना आ गोकुल बाबू रहथि कुमार साहेबक मौसा। एम्हर गोकुल बाबू धोती-कुर्ता छोड़ि सफारी सूटमे आबय लगलाह, से भीमनाथ झाकेँ आर असह्य भऽ गेलनि, मुदा फेर हुनकर नोकरी मिथिला विश्वविद्यालयमे लागि गेलनि। सुधांशु शेखर चौधरी (शरदिन्दुक पिता जिनका ओ लालकक्का कहैत छला) २ अक्टूबर १९८२केँ सेवानिवृत्त भऽ गेलाह आ शरदिन्दु आ दिलीप (दिलीप सिंह झा) गोकुल बाबूक टेम्पो बनि रहि गेलाह। (आर्यावर्त, इण्डियन नेशन आ मिथिला मिहिरक राजनीति आ कोना ई राष्ट्रीय अखबार सभक पटना आगमनक बाद धराशायी भऽ गेल! सुनै छिऐ भाङ घोटल जाइ छलै ओतऽ बेरू पहर, किछु आर संस्मरण ऐपर एबाक चाही!) "सफलता ओ विफलताक कारण" मे पं हीरानन्द झा शास्त्री आ स्वं गजेन्द्र नारायण चौधरीसँ भेटल सम्पादकीय दायित्व आ अधिकारक ज्ञान भेटबाक चर्च अछि। मैथिलीक लेखक आ हिन्दीक पत्रकारक बेइमानीक चर्च अछि जे साहित्य अकादेमीक गोष्ठीमे मैथिली पत्रकारिताक श्रेय देसकोस आ विनोद कुमार झा केँ देलनि आ मिथिला दैनिकक बेरमे 'जँ ओकरा दैनिक मानि लेल जाय' कहि ओकर उपलब्धिकेँ न्यून कऽ देलथिन। पाखण्डी युगक प्रतिनिधि रचनाकारक रूपमे बैद्यनाथ विमल केर चर्चा अछि आ कोनो ने कोनो सोंगरपर चतरयवला आलोचक/ सम्पादकक रूपमे रमानन्द झा 'रमण'क। ३ हमर अभाग: हुनक नहि दोष (बात-बातपर बात-३) 'भूमिका- श्यामपक्ष ओ हमर लेखन' मे ओ लिखैत छथि "हम जे लिखैत छी से प्रायः क्यो नहि लिखैत छथि। हँ कहियो काल लक्ष्मण झा 'सागर' क किछु-किछु एही तरहक आलेख पढ़बाक सौभाग्य भेटैत अछि।" "हमर अभाग: हुनक नहि दोष" मे 'मैथिलीपुत्र प्रदीप प्रभुनारायण झा ' पर निकलल मैथिली अकादमी पत्रिका विशेषांकक चर्चा अछि, काज सभटा शरदिन्दु जी केलन्हि सम्पादकमे नाम दिनेशचन्द्र झा केर छपलनि आ मेहनति केर मोल २८० टाका शरदिन्दुजीकेँ भेटलन्हि। "सम्पादकीय आ पाठकीय पत्र"मे बिनु नाम लेने रमेशक चर्चा अछि जे अबोध आ दुर्बोध मिश्रक नामसँ पाठकीय पत्र पठाबथिन आ शरदिन्दु आ हुनकर पिताक विषयमे अनाप-शनाप लिखैत छलाह कारण शशि बोध मिश्र 'शशि'क रचना समय-सालमे छपलासँ ओ आहत छलाह। बादमे कोना ओ केदार काननक पैरवीसँ पूर्वोत्तर मैथिलमे (जखन शरदिन्दु ओतऽ सम्पादक बनलाह) छापल गेलाह, ".. आब.. ओ जमीनपर छथि। नीक लिखैत छथि।" मधुकान्त झासँ प्राप्त पैरवीक आधारपर कोनो प्रोफेसर साहेबक कविता समय-सालमे छापलखिन्ह मुदा ई रमेश सन नीक नै लिखैत छथि, बड्ड दब कविता लिखैत छथि मुदा साहित्य अकादेमीक पुरस्कारक अन्तिम राउण्ड धरि तीन बेर पहुँचलाह- शरदिन्दु स्मरण करैत छथि। "मैथिलीक बदलैत स्वरूप"मे श्याम दरिहरेक पहिने अपने, फेर पोथी आ अन्तमे मैथिलीकेँ स्थान देबाक चर्चा अछि। "पैघत्वक अकारण प्रदर्शन किएक"मे कीर्तिनारायण मिश्र द्वारा 'अर्थान्तर' पोथी छपयबाक आ मोहन भारद्वाजक सोझाँमे मात्र ९००० टाका देबाक आ शेष ३५०० टाका नै देबाक चर्चा अछि जखनि कि सभटा पोथी हुनका घरपर पहुँचबा देल गेलन्हि। अहीमे साहित्य अकादेमीक 'मीट द ऑथर्स' केर चर्चा अछि जे ओकरा द्वारा मान्यता प्राप्त कथित लिटेरेरी एसोशियेसन चेतना समितिक प्रेक्षागृहमे आयोजित भेल। "कीर्ति बाबू सेहो हिन्दी-मैथिलीमे बजलाह। दावी जे हिन्दी-मैथिली दुनूक हम लेखक छी मुदा राजकमल-यात्री छोड़ि ककर हिन्दीमे कोन स्थान रहलैक से देखल-बूझल अछि। ... हमर बेधक आ सटीक प्रश्न छल- अपने एतेक श्रेष्ठ साहित्यकार छी जे आइ अपनेपर साहित्य अकादेमी सन शीर्ष संस्था ई कार्यक्रम आयोजित कयलक अछि तखन अहाँ अपन नामपर जीविते किए 'कीर्तिनारायण मिश्र सम्मान' प्रारम्भ करौलहुँ, की अपनेकेँ भय अछि जे मरणोपरान्त क्यो स्मरण नहि करत तेँ जीविते अपन प्रचार-प्रसार देखबाक सेहन्ता छल? हमर एहि प्रश्नपर ओ विचलित भऽ उठलाह आ बजलाह- हमर पारिवारिक सदस्यक इच्छा रहनि। .. चेतना समितिक सम्पूर्ण पदाधिकारी एकर विरोध करय लगलाह आ ओतऽ स्वर गूँजय लागल- ई सम्मान कोनो हालतिमे निरन्तर चलैत रहत। एकर कारण रहैक ओ चेतना समितिकेँ पुनः डेढ़ लाख टाका पुरस्कार राशि बढ़यबा लेल टाका लऽ कऽ आयल रहथिन।" चेतना समिति द्वारा पुरस्कारक नामपर, पुरस्कार जिनका नामपर देल जाइत अछि हुनका आ हुनक परिवारसँ पाइ दोहनक ई एकटा फर्स्ट हैण्ड अकाउण्ट अछि, एहेन आर संस्मरण सोझाँ एबाक चाही। "बइमान होयबाक घोषणा"मे 'साहित्यिकी ' (सरिसवपाही)पाहीक कोनो जगदीश मिश्रक चर्चा अछि, जे ख्यात साहित्यकार अशोककेँ १० टा पोथी शरदिन्दुजीकेँ देबा लेल कहने रहथिन्ह मुदा ओ विद्यापति भवनमे शिव कुमार ठाकुरकेँ दऽ देलन्हि आ ओ पोथी बेचिकऽ पाइ हुनका दऽ देलथिन्ह। मुदा ई जगदीश मिश्र माइक पर घोषित केलन्हि जे शरदिन्दु पोथी बेचि कऽ पाइ नहि देलनि आ ई सूचना रमानन्द झा 'रमण' शरदिन्दु जीकेँ देलन्हि। एक गोट घटना मोन पड़ैत अछि जे एक गोट रचनाकार अइ संस्थाकेँ 'सोइतिकी' कहैत छलाह आ जखन हुनकर पोथी ई संस्था छापि देलकन्हि तखने ओकरा 'साहित्यिकी ' कहलन्हि। 'हमर अभाग: हुनक सौभाग्य"मे भीमनाथ झा द्वारा फूलचन्द्र मिश्र 'रमण'केँ लेसि देबाक चर्चा अछि, कथित लिटरेरी असोशियेशन चेतना समिति द्वारा कोनो स्मारिकामे (स्मारिकाक राजनीति!) सत्यनारायण मेहता जी हुनकर रचना छाँटि देने रहथिन्ह। "मैथिलीक राजनीतिक कृपा"मे भारतीय भाषा संस्थानक अजित मिश्र आ अदिति मुखर्जीक वर्णन अछि। भारतीय भाषा संस्थानक 'सेमीनार सह वर्कशाप' मे हिनका आ मधुकान्त झाक नामपर दोसर गोटे द्वारा पाइ उठा लेबाक चर्चा अछि आ हेतुकर झाक पुत्र तेजकर झा केर सूचना जे शेखर प्रकाशनकेँ भारतीय भाषा संस्थानक अनुवाद मिशनक काज नै भेटौक से मैथिलीक २ टा विद्वान संस्थानक मीटिंगमे कहलन्हि। ९ टा पोथीक अनुवाद, प्रूफरीडिंग, प्रकाशन आ वितरणक भार शेखर प्रकाशनकेँ भेटल रहै, मुदा संस्थान एक-दूटा चमचाक कहलापर सम्पादकक चयन बिना शरदिन्दुसँ राय लेने चुनि लेलक, आ ओइ प्रकाशक-सम्पादकक मीटिंगमे हुनका नै बजाओल गेल। बादमे किछु काज नोवेल्टीक नरेन्द्र कुमार झा केँ भेटलन्हि, फेर पं सीताराम झाजीक पौत्र श्री चन्द्रनाथ झा जी हिनका कहलखिन्ह जे हुनकासँ ओ अनुवाद करा लेलखिन्ह आ कनी-मनी दऽ कऽ टारि देलखिन्ह। "ईर्ष्या द्वेष नहि- समन्वय चाही"मे परमेश्वर कापड़ि द्वारा ५ हजार टाकाक किताबक लऽ कऽ राम भरोस कापड़ि भ्रमरक कहलो उत्तर पाइ नै देब केर चर्चा अछि। केदार काननक कएकटा शिष्य सेहो एहिना केलखिन्ह। तारानन्द वियोगीक चर्चा अछि जे फेसबुकपर जाति विशेष (ब्राह्मण) लेल 'सभ बापूत' शब्दक प्रयोग खुलि कऽ करैत छथि। " .. ओ जाहि परिचर्चामे भाग लैत छथि ओहूमे ७० प्रतिशत वैह लोक भाग लैत छथि (ब्राह्मण) जकर पुरुखाकेँ ओ उकटैत छथिन... हम लोहा मानबनि श्री वियोगीजीक तखन जखन अपना सदृश बीसो टा व्यक्तित्वक निर्माण ओ अपना समाजसँ ठाढ़ कऽ देखाबथु। मात्र उकटा पैंची कयलासँ...।" मुदा हुनकर ई लिखब जे ओ परमेश्वर कापड़ि जीकेँ कहलनि- "अहाँकेँ एहिठाम बाँसमे बान्हि कऽ पीटी तँ कोनो हर्ज नहि ने। ओतऽ सरकार (विनोद कुमार झा, आब कवि सम्राट- व्यंग्यात्मक प्रयोग) आ युवा कवि बालमुकुन्दजी सेहो छलाह। "- मुदा बाँसमे बान्हि कऽ पीटी तँ कोनो हर्ज नहि ने- एकर कोनो तरहेँ समर्थन हम नै कऽ सकैत छी। ४ साक्षात् (बात-बातपर बात-४) ऐमे शरदिन्दुजी स्मरण करैत छथि जे केना ".. एक गोटा हमरा पुरस्कार प्रक्रियाक स्तरहीनताक गप्पक क्रममे एहिमे लागल लोक सभकेँ माय-बहिनकेँ गारि-पढ़ैत कहलनि जे कोनो हालतिमे साहित्य अकादमिये वा कोनो पुरस्कार हम नहि लेब, मुदा लगले छओ मासक अभ्यंतर पुरस्कार ग्रहण कऽ गदगद भऽ गेलाह। हम पूछैत छी एहिसँ हुनकर क्षमता, विद्वतामे कतेक अभिवृद्धि भेलनि। तखन अनेरे अर्र-दर्र बजने की लाभ! सेटिंग करैत रहू आ गारियो पढ़ैत चलू।" मैथिली साहित्यमे हिनका किरण, मधुप, सुमन, मणिपद्म, जयकान्त मिश्र, प्रभास, गुंजन, मन्त्रेश्वर, अमर, जीवकान्त, गोविन्द बाबू, बासुकी बाबू, प्रवासी, राजमोहन, बच्चा ठाकुर, भीम बाबू, रामदेव बाबू,शेखरजी, हेतुकर बाबू, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, उषाकिरण खान, शेफालिका वर्मा, श्यामानन्द चौधरी, रंगनाथ दिवाकर, कमलमोहन चुन्नू, अजित आजाद, अशोक मेहता, सुरेन्द्र राउत, रमण कुमार झा, मुकुन्द मयंक आ बालमुकुन्द प्रभावित केलकन्हि। ओ ईहो कहैत छथि जे ".. पत्रकारिता माने आब बलिदान बूझल जाय लगलैक अछि। क्यो कहैत छथि- हमरा पत्रिका निकालबामे आठ-दस लाख खर्च भऽ गेल। युवा ललित नारायण (मिथिला मिरर) एही वयसमे रिपोर्टिंगक क्रममे कहैत छथि- हम हड्डी गला रहल छी। जखन कि हमरा हिसाबें एखनेसँ प्रोफेशनल पत्रकार भऽ गेलाह अछि ओ।" ओ कहैत छथि "जे प्रकाशक ओकरा कहैत छैक जे अपन पाइसँ अनकर किताब छापय आ मुद्रक ओकरा कहैत छैक जे पाइ लऽ कऽ काज करय। आ जे ई दुनू काज करय से अपनाकेँ मुद्रक आ प्रकाशक दुनू कहबैत अछि... शेखर प्रकाशन ई दुनू काज दुनू स्तरपर कयलक अछि। हमरा जनैत यैह काज पूर्वमे पुस्तक भण्डार आ ग्रन्थालय सेहो करैत छल।... कुल ५२ पोथी अपन दमपर छपने छी। आधा-आधी खर्चपर सेहो लगभग तीन दर्जनसँ बेसी पोथी छपने छी।..." अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक हास्य-व्यंग्य संग्रह- 'जँ हम जनितहुँ' गजेन्द्र ठाकुर शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक हास्य-व्यंग्य संग्रह- 'जँ हम जनितहुँ' हास्य-व्यंग्य संग्रह तँ फेर ई संस्मरण साहित्य केना भेल? एकर उत्तर शरदिन्दु स्वयं दैत छथि- "जँ हम जनितहुँ जे साहित्यिक क्षेत्रमे सेहो राजनीतिये जकाँ खेल होइत छैक तँ कथमपि एहि क्षेत्रमे पैर रखबाक दुस्साहस नहि करितहुँ मुदा आब तँ फँसि गेल छी आ दूध-माछ दुनू बांतरवला परि सन भऽ गेल अछि। ने उगिलते बनैछ आ ने घोँटिते।" आ आगाँ ओ लिखैत छथि- "... जनिक चरित्र, हमरा हास्य-व्यंग्यमे फर्क छैक से नहि बुझय देलक आ जनिक सम्भाषण हमर लेखनक कथ्य बनल।... हमर पत्रकार प्रवृत्ति जहिया जे देखलक से लिखलक।" से सिद्ध भेल जे ई संस्मरणक पोथी थिक आ कॉमाक भीतर देल वक्तव्यमे कोनो नोन मिर्च नै-छै, हँ संस्मरणक हेडिंगमे आ इनवर्टेड कॉमाक बाहर नोन-मिर्च छै मुदा सेहो कने मने। ऐ पोथीमे ११ टा संस्मरण अछि जे पुरस्कार लोलुप मैथिलीक मूल धाराक साहित्यकार, जइमे सभ जातिक साहित्यकार छथि, केर किरदानीक कारण हास्य-व्यंग्य संग्रह बनि गेल अछि। साहित्यकार सभक असली साहित्यिक नाम ऐ संग्रहमे देल गेल अछि जे एकर प्रामाणिकताकेँ बढ़बैत अछि, ई पोथी २००२ मे प्रकाशित भेल मुदा २०२२मे सेहो ओइ वर्णित साहित्यकार सभक ओहने छिच्छा छन्हि। १ अथ ऑपरेशन साहित्य अकादेमी ऐ संस्मरणमे मात्र सम्वाद अछि, इनवर्टेड कॉमाक भीतर। से कोनो नोन मिर्च नै, हेडिंग सेहो कम नोन-मिर्चक, 'अथ' संस्कृतक शब्द छिऐ, बिस्म्मिल्लाहक पर्याय, से 'अथ ऑपरेशन साहित्य अकादेमी'मे के सभ कलाकार छथि? विवरण नीचाँ अछि- मुख्य कलाकार- मोहन भारद्वाज (आब स्वर्गीय) आ रमानन्द झा 'रमण' किरदानी- लोकक (साहित्यकारक साहित्यक कुण्डली बाचब) मुदा बेसी काल आपसेमे टाल-गुल्ली खेलायब। सहायक कलाकार- एकटा 'साठा तब पाठा' कवि, एकटा ससुर-जमायक जोड़ी। किरदानी- पहिलुके पोथीसँ पुरान कवि सभकेँ मूर्च्छित करब, साहित्य अकादेमीक अकासमे विचरण। टेक्निक- एक दोसाराक पोथीक ढिलहो, चेतने समिति जकाँ कतबो कटाउझ होउ, राज कक्केक आकि भातिजेक। २ अपील मुख्य कलाकार- मोहन भारद्वाज (आब स्वर्गीय), बासुकीनाथ झा आ रमानन्द झा 'रमण' किरदानी- मैथिली अकादमी आ चेतना समितिक प्रकाशन गतिविधिपर कब्जा। सहायक कलाकार- पाठकजी, दिनेशजी, इन्द्रकान्त जी। किरदानी- क्रमसँ क्रोधी, भोगी आ लोभी। टेक्निक- विद्वताक ढेकार करैत कठहँसी। ३ ईहो पुरुष अलबत्ते मुख्य कलाकार- एकटा संस्थाक उच्चाधिकारी किरदानी- काज बेरमे हाथ थरथरेनाइ। सहायक कलाकार- रिक्त। टेक्निक- कनफुसकीसँ प्रेरित भऽ समाज-सुधार आ भाषाक उद्धारक स्वांग। ४ देखल एकटा शूटिंग मुख्य कलाकार- उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास', मधुकान्त झा, मोहन भारद्वाज, रमानन्द झा 'रमण', रामदेव झा, पुर्णेन्दु चौधरी, चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर'। किरदानी- मैथिली अकादमी आ चेतना समितिक साहित्यक गतिविधिपर कब्जा। 'अंग्रेजी फूलक चिट्ठी' प्रसंग। सोमदेव, रमानन्द रेणु आ हंसराजकेँ बालिग नै होमऽ देब। चटिसारक चेला भीमनाथ, जयमन्त आ मदनेश्वर। सहायक कलाकार- जयकान्त मिश्र, देवकान्त झा, कुलानन्द मिश्र, राजमोहन झा, उदय चन्द्र झा 'विनोद', अशोक, अग्निपुष्प, केदार, तारानन्द वियोगी, रमेश, शिवशंकर। किरदानी- राजमोहन झा द्वारा भीम भाइसँ पहिने पुरस्कार प्राप्ति लेल अपन कोरपच्छु अशोक, अग्निपुष्प, केदारकेँ आगाँ करब। शरदूक एक्के बोलपर विजय कुमार मिश्र आ विवेकानन्द मैदानसँ बाहर, वीरेन्द्र झा द्वारा अमरेश पाठककेँ पानि पिआयब। गोकुलनाथ द्वारा प्रवासीकेँ लुढ़कायब। मदारी- छत्रानन्द सिंह झा (बटुक भाइ), गोपेशजी। नेपथ्यमे (संरक्षक)- उषाकिरण खान आ मंत्रेश्वर झा। अन्तिम प्रस्तोता- गुंजनजी। टेक्निक- मोहन भारद्वाज द्वारा भीम भाइ आ रामदेव झाकेँ लड़ायब आ स्वयं साहित्य अकादेमी परामर्शदातृ समितिमे घुसब, रमणजी द्वारा गोविन्द झा अभिनन्दन ग्रंथ सहित आन-आन ठाम ऐ कोठीक धान ओइ कोठीमे करब आ चेतना समितिकेँ सोधब। पुरस्कार लोलुपक तीर्थ स्थल (सन २००२ धरि)- पटनाक गुरुद्वारा (आर-ब्लॉक), दरभंगाक श्यामा मन्दिर (राजकुमार गंज) आ प्रयाग (पी.सी. बनर्जी रोड)। ५ स्वास्थ्य-रक्षा पुरस्कार कार्यक्रमक प्रेरणा- बिनाका गीतमाला। उद्घोषक- मैथिलीक अमीन सयानी छत्रानन्द मुदा हुनकर बटुक हेबाक कारण ई भार अशोककेँ देल गेल। प्रश्न- गोविन्द झाकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार किए? प्रश्नमंचमे के सभ शामिल नै?- रमानन्द रेणु, हंसराज, पूर्णेन्दु चौधरी, आ रहिकाक दुलहा उदयचन्द्र झा 'विनोद'। एक सदस्यीय निर्णायक मण्डल- सुमनजी। के सभ बहिष्कार केलन्हि?- उपेन्द्रनाथ झा व्यास, डॉ. अमरेश पाठक आ आनन्द मिश्र (एक सदस्यीय निर्णायक मण्डलमे नै रखबाक कारणसँ)। सुमनजी द्वारा जारी १६ सदस्यीय प्रतियोगीक सूची- सुरेश्वर झा, राजमोहन झा, मार्कण्डेय प्रवासी, मोहन भारद्वाज, भीमनाथ झा, प्रभास कुमार चौधरी, जीवकान्त, शेफालिका वर्मा, कीर्तिनारायण मिश्र, मन्त्रेश्वर झा, अग्निपुष्प, सुभाषचन्द्र यादव, मायानन्द मिश्र, डॉ धीरेन्द्र, सोमदेव आ केदार कानन। स्वागत गीत- बुद्धिनाथ मिश्र आ शान्ति सुमन। उत्तर- राजमोहन झा- गोविन्द झा द्वारा हिन्दीमे लिखल जयबाक आशंकाक (धमकीक) कारण। घोषणाक उपरान्त- विनोद कुमार झा, अग्निपुष्प आ वियोगीक राजमोहन झाक कनहापर खुशीसँ झूमब। सुरेश्वर झा- जेँ हम प्रतिनिधि तेँ गोविन्द झाकेँ पुरस्कार। रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा महेन्द्रकेँ तलाक दऽ अशोक संग झूमब। प्रभास कुमार चौधरी- जेँ गोविन्द बाबू मनि लेलनि जे हुनकर कथा हमर आ मामा (गुंजन) सँ घटिया छनि, तेँ। अक्कूक ब्लड-प्रेसरक हाइ होयब, लटुआ कऽ खसब। विभारानीक आँचरसँ हवा करब, किशोर, रमेश आ कुमार शैलेन्द्रक ईर्ष्या। अशोक लंगूरभक्त भीमनाथकेँ आकृष्ट करैत छथि। सुमनजी द्वारा अशोककेँ कहब- जयकान्त बाबूक जमाना नहि छनि जे सब काज पाइयेपर हेतै, आब किछु पैरबीयोपर हेतै। अशोक- उमानाथ बाबू, चेतकर बाबू, सुभद्र बाबूकेँ देखिकेँ डरा जायब आ स्वास्थ्य रक्षा पुरस्कारक गप कहब। ई उत्तर ककर से लेखनाथ मिश्र आ डॉ. बासुकीनाथ झा द्वारा पूछब। मोहन भारद्वाज द्वारा आत्मप्रशंसा आ सुमनजी सँ फगुआ शिरोमणिक पुरस्कार। कुलानन्द मिश्र प्रतिज्ञा पूरा भेलापर अपन दाढ़ी छटयबाक लेल उपेन्द्र ठाकुरक घर दिस बिदा होइत छथि। ६ धन्य लालूजी जे आइ.. पं. ताराकान्त झा द्वारा मैथिलीकेँ बिहार लोक सेवा आयोगमे फेर सँ शामिल करबाबैले पटना उच्च न्यायालयमे जीत मुदा लालूजी द्वारा तकरा सर्वोच्चा न्यायालयमे लसकायब। ७ सम्पादकक नाम... फचांड़ि मिसरक पत्र ८ एकालाप मोहन भारद्वाजक साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै भेटलापर आर्त्तनाद- राजमोहन झा अहाँक रक्षा ने गौरीनाथ ने अग्निपुष्प ने सुभाषचन्द्र यादव कऽ सकत। भांग पिबैत शिष्य सभ: अशोकक नेतृत्वमे रमेश, वियोगी आ श्रीनिवास। तारानन्द वियोगी (अशोककेँ)- लड़ाइये देलिअइ अशोक भाइ अहाँ दुनू पीठाचार्यकेँ (मोहन भारद्वाज आ राजमोहन झा)। पुनश्च: बादमे विद्यानाथ झा 'विदित'क उपन्यास 'विप्लवी बेसरा'क कलमतोड़ (गदगदी आ पलंगतोड़ समीक्षाक पर्याय) समीक्षाक बादो ओ हुनका पुरस्कार नै दियेलखिन्ह। ९ सफेदपोशक भतार हवाला, यूरिया, वर्दीकाण्ड, पशुपालन, अलकतरा आदि घोटालाक वर्णन। १० जँ हम जनितहुँ मूलधाराक मैथिलीक साहित्यकारकेँ देखबाक, चिन्हबाक आ भजारबाक अवसर। ११ प्लेटोक सपना, भारत आ कौमार्य-राजनीति प्लेटोक रिपब्लिकक फिलास्फर किंग आ आइ-काल्हिक अविवाहित व्यक्तिक आचरणपर मनन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- शरदिन्दु चौधरीक तीनटा व्यंग्य संग्रह- 'बड़ अजगुत देखल..', 'गोबरगणेश' आ 'करिया कक्काक कोरामिन' गजेन्द्र ठाकुर शरदिन्दु चौधरीक तीनटा व्यंग्य संग्रह- 'बड़ अजगुत देखल..', 'गोबरगणेश' आ 'करिया कक्काक कोरामिन' 'बड़ अजगुत देखल..' प्रकाशित भेल २००५ मे, 'गोबरगणेश' प्रकाशित भेल २०११ मे आ 'करिया कक्काक कोरामिन' प्रकाशित भेल २०१६ मे। तीनू पोथी करिया कक्का शृंखलाक व्यंग्य पोथी थिक आ हुनकर संस्मरण साहित्यसँ ई दू तरहेँ भिन्न अछि। करिया कक्का ओइ लोलुपताक प्रतीक छथि जकरा अहाँ चीन्हि सकै छियन्हि मुदा ओ कोनो असली नाम नै छथि, मुदा किछु आलेखमे करिया कक्का निपत्ता छथि आ किछुमे असली नामबला भूप सभ सायास प्रयन्तोक बादो जबरदस्ती आबिये जाइ छथि। मुदा लेखक ऐ तीनू पोथीमे सँ 'बड़ अजगुत देखल..'केँ स्पष्टरूपेँ संस्मरणे कहै छथि। 'बड़ अजगुत देखल..'मे 'मुक्ति पयबाक प्रयत्न' आमुखमे ओ लिखैत छथि- "हम जे नै कऽ पौलहुँ, जे नहि सोचि पौलहुँ मुदा देखबामे आयल- सैह अछि- बड़ अजगुत देखलमे।" १ 'बड़ अजगुत देखल..' की मथै छी? "... हमर मैथिली.. जमाय-ससुरक बहिकिरनी बनबा लेल विवश अछि... किछु सामाजिक कार्यकर्ताक आमदनीक साधन बनल अछि।" दर्शन-सुदर्शन "...चलू महाकवि विद्यापतिक चेतना समिति स्थित वासा... .. 'अयं यौ के छथि नेपालवला नाटककार?' 'महेन्द्र मलंगिया दिया पूछै छी सर।' ..'दऽ दियौ ओही नाटककारकेँ एहि बेरुक चेतना पुरस्कार।' ..'मुदा हुनकासँ सीनियर...' 'ककरो तँ देबे करबै, छोट होइ की पैघ।..' 'कवि-सम्मेलने बन्न भऽ जयबाक चाही। लोक रहिते ने छैक ओहिकालमे। ... होयबाक चाही तँ टाका जुटबियौ ने।... मैथिली अकादमी.. कवि-सम्मेलनक नामपर पाँच हजार गछलक मुदा देलक दुइये हजार। बाँचत कतऽ सँ डाँरेसँ घाटा लागि गेल छल।.. छपलाहा किताब सभमे दीवार लागल छै..।" .. नहि भागू यौ, यात्रीजी एकर स्थापना कऽ भागि गेलाह। आइ हुनकर फोटो टांगल छनि मुदा संस्थापकक दावेदार कैक गोटे भऽ गेलाह... २ 'गोबरगणेश' बोर्ड लागल टाटपर, सूतल छी खाटपर मैथिली अकादमीक दलानपर। ओहो वैह फगुआ गाबि रहल छह। दुनूटा भाषणमालामे अपन परामर्शीयेकेँ भाषणबाज बना देलकौह आ कहाँदन तेसरसँ सभटा पोथीक सम्पादन करा रहल अछि (अशोक, तारानन्द वियोगी आ मोहन भारद्वाजकेँ लक्ष्य कऽ)। तावत काल 'एहने सन प्रयोग साहित्य अकादेमी सेहो कयलक जे जकरा होटल रहतैक सेहो परामर्शदातृ समितिक सदस्य बनि सकैत छथि।.. पटनोमे खूब कचरम कूट होइत। लेखक संघकेँ सम्मानक टाटक नहि करय पड़ितैक।.. मैथिली लेखक संघ.. खाली अभिनन्दन-वन्दन, ने कोनो स्पन्दन आ ने कोनो गर्जन। मात्र कलहंत जकाँ अभावक अरण्य-रोदन।" गोलैसी- 'अर्थात्' जाहि आलोचनाक पोथीकेँ लोकोक्तिक बैसाखी नहि चला सकल, जाहि आलोचनाकेँ 'अखियासल ', 'बेसाहल ', 'भजारल ' (रमानन्द झा 'रमण'क अर्द्ध-समालोचनाक पोथी सभ) नहि भजा सकल तकरा गोलैसीक प्रतिमाने टा मानल जा सकैछ ने! सीडी समीक्षा 'रमण'जी ओतऽ जायब जरूरी अछि, ओ असक छथि... भारद्वाजजीक लेखनीकेँ सक्रिय करबा लेल पंचलीटरा मोबिल लेबऽ लेल घेंटाजोड़ी कयने अशोक आ तारानन्द वियोगी नचिकेता मालिकसँ नेहोरा कऽ रहल छलाह मुदा मुंशी रामलोचन कहि देलथिन जे एक बेर देलियनि (मोहन भारद्वाजकेँ प्रबोध सम्मान चयन समितिमे रहितो प्रबोध सम्मान लेबा/ देबाकेँ लक्ष्य करैत) तँ उत्फाल मचि गेल छल आब देबनि तँ मिथिलो दर्शन लोककेँ नहि करा सकबैक।.. जीवकान्तक जोगीरा आ अमरक विरहाक मिक्सर होयत, भीमनाथक गुलगुल्ला आ रामदेवक वाइप्रोडक्टक लीला होयत आ होयत पन्ना-इन्दिरा-नीता-सुशीला आ वीणाक झंकार.. मन्त्रेश्वरजीक बाँहि पकड़ल- फरब-फुलायब। मुदा सख-सेहन्ता नहि पूरल। .. नर इन्द्र लग गेलहुँ .. मुदा ओ तँ आर किदन निकललाह।... हुनका हीरा-पन्नासँ फुरसतिए नहि। .. ई अग्निपुष्प थिक, एकरेसँ शृंगार करू.. कुणाल, सुकान्त आ साकेतानन्द.. ओ सभ समलैंगिक छथि.. विदितजी.... ओ तँ स्वयं रसिया छथि। प्रवासीजी संग संध्यावंदन करताह, ठकुराइन संग युगलबंदी करताह...'। पाहुन इन्द्रकान्त झा.. झाजी वीरेन्द्र.. तार नेपालक उपराष्ट्रपतिसँ सोझे सोझ जुड़ल.. पं. योगानन्द झा.. वैद्यनाथ मिश्र, गणेश झा.. हमर मान-मर्दन करैत छथि.. बच्चा ठाकुरक नेतृत्वमे सुरेन्द्रनाथ, केदार कानन, रमेश चिचिआइत...फेर अजित (आजाद) बाजय लगलाह- .. जतऽ होइ ततहिसँ एस.एम.एस. कऽ एहि सरकारक ओहिना मदति करियनि जेना राजमोहन झा आ प्रेमशंकर सिंहकेँ एस.एम.एस. क बलपर सरकारक दर्जा दैत रहलियनि। ३ 'करिया कक्काक कोरामिन' बुद्धिक बखारीक वर्गीकरण मात्र दू गोत्र (भारद्वाज-रमण) पाँजिक लेखक छोड़ि कऽ, कारण ई मैथिलीक पैथिलॉजिस्ट श्रेणीमे अबैत छथि। 'लीव इन रिलेशन'सँ जनमल सुन्नर नेना पटनाक विख्यात समितिक विषपिपड़ी पी.आर.ओ. साहित्यकार एहू समारोहमे शामिल भऽ नेपाली साहित्यकार-समाज संग तेहन ने राजनीति कयलनि जे क्षुब्ध भऽ ओ लोकनि बटुआमे आनल 'नेरू' (नेपाली रुपया) सहयोग राशि ओहिना आपस अपना संगे लऽ गेलाह। 'सरकार'क लिंग परीक्षण मैथिलक एक पुरुषवेश धारीकेँ अपन 'सरकार' (विनोद कुमार झा केँ लक्ष्य करैत) बनौलह मुदा एक्कोटा काज ओ पुरुषवला कऽ सकलथुन। कहियो आचार्य अरिष्टनेमीक बहिकिरनी बनि दिन कटलनि तँ आब एकटा संघमे द्रोपदी बनि सौभाग्यवती बनल छथुन। व्यंग्य लिखबाक व्योंत आचार्य अरिष्टनेमीक चर्च एतहु भेल अछि। लुटन... आचार्य अरिष्टनेमी (चन्द्र नाथ मिश्र 'अमर') क दरबारी बनि मंच सभक तिरपेच्छन कयलह।... कोरामे नेना, नगरमे सोर 'ई गोलैसिये ने छै हौ जे पुरना सरकार ठकैत-ठकैत सत्ता रूपी गाछसँ तुबि कऽ नीचाँ खसि पड़ल मुदा भेद नहि खोललक आ आब देखह जे नवको सरकार वैह धुन गाबि रहल अछि। पुरस्कार विज्ञानक फलाफल योगानन्द चुटकी लैत बजलाह- 'अहाँ डाक्टर साहेबसँ पोथी विमोचन करेबै आ मिश्रटोलाक श्रीमान् आ हुनकर ओझाजीक वर्चस्व स्वीकार नहि करबैक तँ गाछसँ सेव नीचे मुँहे किए खसैत छैक से कोना बुझबै।'... वीणा-वादनक अभ्यासक संगहि 'इदं रसे, इदं गुद्दे'क सम्बोधनसँ मिश्रजी आ ओझाजीकेँ प्रसन्न करबाक प्रयास करथु... अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२०. लक्ष्मण झा सागर- खाँटी मैथिलीस्ट शरदू जी लक्ष्मण झा सागर खाँटी मैथिलीस्ट शरदू जी आइ हम एहन ओझरौटमे पड़ल छी जे की कहू। हमरा श्री शरदिंदु चौधरीजीपर लिखबाक अछि। की लिखबाक अछि से मोनमे सरिया नै रहल अछि। एहन सन स्थिति हमरा एहिसँ पहिने किनकोपर लिखबाक बेरमे नै भेल छल। हिनकापर एना कियै भऽ रहल अछि? कारण हमरा जनैत ई भऽ सकैत अछि जे शरदू जीसँ हमर जान पहचान कहिया भेल, कोना भेल आ कियै भेल से हमरा स्मरण शक्तिमे क्रमवार सैंतल नै अछि। तेँ की हम हुनकापर लिखब छोड़ि देब? नै, हम लिखब। लिखबाक चेष्टा करब। जहिना हैत तहिना लिखब। जेना-जेना जे-जे फुरत से-से लिखब। मैथिलीमे बहुत एहन साहित्यकार सभ छथि जे बाबा बले फौदारी करैत छथि। शरदू जी से नै करैत छथि। ई बात सत्य अछि जे हिनका शरीरक रक्त नलिकामे अपन पिता स्व सुधांसु शेखर चौधरी जीक लहू बहैत रहैत अछि। सम्पादक जीक नामसँ विख्यात मिथिलाक महान व्यक्तित्व शेखर जी मिथिला मिहिर , पटनाक सम्पादनसँ आधुनिक मैथिली साहित्यक वर्तनीक एकटा एहन डड़ीर पारि देलनि जे मैथिली साहित्यक मानक वर्तनी बनि गेल। आ मैथिली साहित्यक रचना ताहि स्वरूपमे आइ धरि भऽ रहल अछि। से नहियो भऽ सकैत छल जँ हुनका एकमात्र पुत्र रत्न शरदू जी सन उत्तराधिकारी नै भेल रहैत। शरदू जीक जीवनक सबसँ पैघ उपलब्धि ई छनि जे अपन पिताक अधिकांश साहित्यिक रचनाक पोथी प्रकाशित केलनि। एखनो ताकि-हेर कइए रहलाह अछि। एहि पोथी सबकेँ एलाक बादे मैथिलीक साहित्यकार सभ कें शेखर जीक बहुआयामी प्रतिभाक मादे विशेष परिचय भेलनि। एहि कृत्य लेल शरदूजीकें जँ आधुनिक मिथिलाक श्रवण कुमार कहल जाय तँ कोनो विस्मय नै हेबाक चाही। मात्र ततबे नै। पिताक एहन आज्ञाकारी पुत हैब दुर्लभ नै तँ मुश्किल जरूर अछि। राजनीति शास्त्रसँ एम.ए केलनि। सचिवालयमे सरकारी नोकरी भऽ रहल छलनि। पिता कहलखिन जे ई नोकरी नै करू। सत्य नै बाजि सकब। निर्भीक बनल नै रहि हैत। हिन्दी लिखय-बाजय पड़त। नै केलनि से नोकरी। अपन हृदयपर हाथ राखि सब गोटे सोचू जे कै गोटे छी हम सब जे मैथिली लेल अपन जीवन के दाँवपर लगेने छी। शरदू जी से लगेने छथि। मिथिला-मिहिर, पटनाक सम्पादन विभागमे अपन योगदान देलनि। अपन जीवन-यापन लेल अल्प दरमाहाकेँ अपन बोइनि बूझि खूब मोन लगा कऽ सम्पादन विभागमे पहिने प्रशिक्षण आ पछाति नोकरी करय लगलाह से ताधरि केलनि जा धरि इन्डियन नेशन प्रेस चलैत रहल। हमर परिचय शरदू जीसँ तहियेसँ अछि। दुनू गोटेक बीच खूब पत्राचार होइत रहैत छल। पिता हिनक दरभंगाक जे अपन मरौसी जमीन-जायदाद छलनि तकरा बेच-बिकनि कऽ पटनामे घर बनेलनि। पिताक देहांत के बाद शरदू जी अपन घरक मुखिया भेलाह। हिनको एकमात्र पुत्र आयुष्मान राजाशेखर चौधरी एखन बेंगुलुरूमे कार्यरत छथि। चारि टा पुत्रीमे छोटकी एखन उच्च शिक्षा ग्रहण कऽ रहल छनि पटनेमे। लगमे वैह बेटी आ पत्नी रहैत छथिन। एकटा बेटीक बियाह मैथिलीक स्वनामधन्य गजलकार श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल जीक पुत्रसँ भेल छनि। दोसर बेटीक वियाह मैथिलीक दिवंगत कवि सुकांत सोमक बालकसँ भेल छनि। सभ गोटे सुखी आ सम्पन्न छथिन। आमदनीक जरिया घरक किराया आ शेखर प्रकाशनसँ प्राप्त आय छनि। ने बड़ सुखी आ ने तेहेन दैन्य स्थिति छनि। अपन सब आवश्यक खर्च जुमि जाइत छनि। शरीर आ स्वास्थ्यसँ सब दिन कमजोर रहैत आयल छथि। तीन बेर हृदयपर आघात भेल छनि। अस्पतालमे भर्ती हुअय पड़ल छनि। मुदा,अपन आत्मबल आ जीजिविषाक जोरपर सब बेर स्वस्थ भऽ कऽ घर आबि जाइत छथि। बहुत साहसी लोक छथि शरदू जी। नब्बेक दशकमे हम अपन कम्पनीक काजसँ पटना गेल रही। होटलमे रूकल रही। शरदूजीकें फोनपर खबरि केलियनि जे भेंट करय चाहैत छी। हमरा कहलनि जे ४ बजे जमाल रोडमे श्री विनोद कुमार झा जीक (देसकोस वाला) कोरियरक दुकानमे आबि जाउ। हम समयपर चल गेल रही। विनोद जीसँ (कलकत्तेसँ परिचय रहय) गप-सप करिते रही कि देखैत छी दू गोटे आबि गेलाह। दुनू हमरा लेल अनजान। विनोद जी परिचय करेलनि। उज्जर दप-दप केश आ झुनकुट पाकल दाढ़ी वाला लक-लक पातर शरदू जी रहथि। संगमे रहथिन युवा पत्रकार अजित आजाद। गोर-नार,शुभ्र- शाभ आ आकर्षक व्यक्तित्व बला छवि। परिचय पातक बाद शरदू जी हमरा (आग्रह आ अधिकारक मुद्रामे) कहलनि जे अजितकेँ कतहु नीक नोकरी लगा दियनु। हम अनुभव कैल जे शरदू जी मैथिलीक नव लोक लेल कतेक उपकारी छथि। आ हुनक ई स्वभाव एखनो बदस्तूर कायम अछि। श्री उदय चन्द्र झा विनोदजीकेँ अपन पोथी प्रकाशित करेबाक रहनि। पाइक अभाव रहनि। शरदू जी लग गेलाह। शरदू जी उधारी पोथी छापि देलखिन। एखनो धरि हिसाब नै फरियेलनि अछि। श्री केदार कानन कोनो मुसीबतमे फँसि गेल छलाह। शरदूजीकें पता लगलनि। तुरत श्री मंत्रेश्वर झाजीकेँ लऽ जा कऽ न्यायाधीश श्री मति मृदुला मिश्राजीसँ पैरवी करबेलनि। मामिला रफा-दफा भेल। केदारजीकें फारकती भेटलनि। एवं प्रकारें शरदूजी मैथिलीक बहुतो साहित्यकारककेँ उपकार करैत रहलाह अछि। मुदा, हुनक हस्त रेखामे यश नै लिखल छनि। हुनका लग एहन करीब १५० टा साहित्यकारक लिस्ट छनि जिनका लग हिनक पाइ बाँकी छनि। एक दिन कहैत छलाह जे हम एकटा पत्रिका निकालब। नाम रखबै पोल-खोल। सबहक नाम छापि देबैक। आइ जे सब गोटे अपनाकेँ मैथिलीक महन्थ कहैत छथि से सब कतय भऽ के रहताह? मुदा, से शरदू जी करताह नै। कियैक तँ हुनकर हृदय जहिना उदार छनि तहिना साफ सेहो छनि। शरदूजीकें हम मूलत: पत्रकार मानैत छियनि। से कोनो इड्डी-गुड्डी वाला पत्रकार नै। एकदमसँ निष्पक्ष,निर्भीक,सचेतन आ प्रखर छवि वाला पत्रकार। जे कियो हिनक संपादनमे प्रकाशित समय-साल, पुर्वोत्तर मैथिल (गुवाहाटी), चेतना समिति, पटनाक स्मारिका देखने आ पढ़ने हैब से जनैत हैब हिनक सम्पादनक वैशिष्ट्य। हिनक सम्पादकीय केर धार। हिनक मानक मैथिलीक छटा। रचनाक संरचना। सामयिक टिप्पणी जे राजशेखरक नामसँ टिपैत रहथि। मुद्दा राजनैतिक हो, मैथिलीक विकासक हो, गाम-घरक खेतीक समस्या हो, शहरक विद्रूपता हो शरदू जीक बेबाक लेखनीसँ सब गोटे परिचित छीहे। हिनक मारुख कटाक्ष सत्ताक गलियारीमे गुँजैत रहल अछि। शरदू जी कोनो राजनैतिक दलक लोक नै छथि। एकटा तटस्थ विचारधाराक हस्ती छथि। हुनका कियो अपन सिद्धांतसँ झुका नै सकैत छथि। आ ने ओ किनको लादल विचारसँ प्रभावित होइ वाला जीव छथि। यदि शरदू जीक स्वभावमे कनियों लचीलापन रहितनि त आइ ओ पटनामे मैथिलीक धारे झा रहितथि। मैथिलीक साहित्यकार सभक दरबार होइत हिनका लग। मैथिली सेवी संस्थाक अधिकारी सभ हिनक चारण रहितनि। चेतना समिति, पटनामे जे चाहितथि से करबा सकैत रहथि। घर-बाहर पत्रिकाक सम्पादक बनि गेल रहितथि। कैक टा सम्मान आ प्रशस्ति पत्र घरमे जमा भेल रहितनि। मुदा, से सब किछु नै भेलनि। पटनाक हनुमान जी मंदिर लग एकटा साधारण पोथिक दोकान छनि। ताहि ठाम बैसल रहैत छथि। मैथिलीक गतिविधिकेँ अकानैत रहैत छथि। पटनाक साहित्यकारक नजरिमे उफाँटि बनल एकोर भेल रहि रहल छथि शरदू जी। शरदू जी बनब सभक वशक बात नै अछि। समकालीन साहित्यमे अपन व्यंग्य विधाक मौलिक पोथी सभ लिखि एकटा स्तरीय साहित्यकारक श्रेणीमे हिनक नाम उल्लेखनीय रहल अछि। करिया काकाक कोरामिन, जँ हम जनितहुँ, साक्षात्कारक दर्पणमे आदि-आदि हिनक पोथी प्रकाशित छनि। सभटा पढ़बाक प्रयोजन अछि, हिनक लेखनक विशेषता के जनबाक लेल। हिनक शैली, शिल्प आ बिम्ब-विधान हिनक अप्पन छनि। रजनी-सजनी आ हल्लुक-उत्थर बात नै लिखलनि कहियो। जे लिखलनि जतबा लिखलनि से समय साक्षेप लिखलनि। समाजोपयोगी लिखलनि। अपन सम्पादनमे दू टा पोथी प्रकाशित केलनि जे बहुत महत्वपूर्ण काज भेल अछि। एक तँ पत्रकारिताक दशा आ दिशा जे लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल सहयोगी पोथी अछि। दोसर मिथिलाक ज्वलन्त समस्या मिथिला राज्य लेल पक्ष आ विपक्षपर भेल परिचर्चाक संकलन। मिथिला राज्य अभियानी लोकनि लेल मीलक पाथर अछि। हम अधिकारपूर्वक ई बात कहबा ले बाध्य भेल छी जे शरदू जी कोनो पुरस्कार आ सम्मान लेल कहियो रेसमे नै रहलाह। सब दिन मैथिलीक सेवामे अपस्यांत रहैत छथि। संघीय लोक सेवा आयोग आ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षार्थी सभ लेल चयनित पोथी सभक जोगार करेबामे दिन भरि लागल रहैत छथि। एक दिन रातुक १२ बजे हमरा फोन केलनि जे मणिपद्म जीक लोरिक विजय बजारमे उपलब्ध नै अछि। विद्यार्थी सभ परेशान आ चिंतित छथि। कोर्समे लागल छैक। एहि पोथिक प्रकाशक कलकत्तेक मिथिला सांस्कृतिक परिषद अछि। अहाँक मदति चाही। तावत हम अपना लग जे एक प्रति बाँचल अछि तकरे जेरॉक्स करा कऽ हम बिद्यार्थी सभकें वितरित कय रहल छी। से सहीमे अपन खर्च कऽ कऽ नि:शुल्क विद्यार्थी सभकें बँटैत छलथि। एना हम स्व किशोरीकांत मिश्रजीकें आग्रह कय पोथिक दोसर संस्करण प्रकाशित करबाय दोसर सालक लेल उपलब्ध करबा देने रहियनि। माटिपरक काज करैत छथि शरदू जी। एक दिन कहलनि जे हमरा एहिसँ पैघ उपलब्धि आर की हैत जे हमरा सहयोगसँ देश विदेशमे रहनिहार आइ.ए.एस, आइ.एफ.एस आ आइ.आर.एस करीब १५०सँ ऊपरे। ओ सभ फोनपर हमरा सर कहैत छथि आ हमर हाल समाचार पुछैत छथि। बी.डी.ओ, सी.ओ ,कलक्टर आ एस.पी तँ बूझू जे हमर दासो-दास बनल रहैत छथि। के छथि मैथिलीमे एहन कलामी से हमरा देखाउ तँ। एकटा आर बात कहि कऽ हम विराम लेब। शरदू जी पराकाष्ठाक इमानदार लोक छथि। एक बेर पूर्वोत्तर मैथिल पत्रिकाक बिक्री मूल्य सब मिला कऽ हम हुनका ५०० रुपैयाक चेक कोरीयरसँ पठेलियनि। हुनका भेट गेलनि से निस्तुकी रूपेँ हम निचैन भऽ गेल रही कियैक तँ पावतीमे हुनक पुत्र राजा शेखर दस्तखत केने छल। हम समय-समयपर अपन बैंक बैलेंस मिलबैत रहैत छलहुँ। हमर बैलेंस घटि नै रहल छल। जहन छह मास बीत गेलै तखन हम फोन कऽ हुनका पुछलियनि जे चेक हमर वाला बैंकमे जमा नै केलियै तँ फटसँ हमरा कहैत छथि जे प्रेमकांत चौधरी जी हमरासँ मँगबे नै केलनि तँ हम कोना आ कियै जमा करितहुँ। भेटत एहन लोक मिथिलामे? अंतमे हम अपन अनुज तुल्य शरदू जीक उत्तम स्वास्थ्य लेल माँ मैथिलीसँ मंगल कामना करैत छियनि आ विदेहक समस्त टीमकें हार्दिक आभार व्यक्त करैत छी जे मैथिलीक एकांत साधक श्री शरदिंदु चौधरी जीपर विशेशांक बहार कऽ अहाँ लोकनि मैथिलीक बड़ पैघ उपकार कैल अछि। -संपर्क-लक्ष्मण झा सागर, कोलकाता/ १३.११.२०२२ 9903879117 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२१.जगदानन्द झा 'मनु'- सत्य देखल जगदानन्द झा 'मनु' सत्य देखल श्री शरदिन्दु चौधरी जीक जीवन एकटा पत्रकारिता व साहित्य केर विद्यार्थिक लेल मीलक पाठर साबित भय सकैत अछि। श्री शरदिन्दु चौधरी एक गोट श्रेष्ठ पत्रकार, समृद्ध लेखक आ साहित्यकार तँ छथिए संगे संग ओ छथि एकटा कोमल करेजाक स्वामी। जखन ओ देखत छथि समाजमे धर्म आ राजनीतिकेँ ओटमे लोक फरेब आ कारी व्यापार कय रहल अछि तँ ओ दुख फेंटल आश्चर्य संगे तमसा सेहो जाएत छथि आ ई सब हुनक मोनक भाव हुनक लेखनीसँ साक्षात्कार होइत अछि। हुनक भाषा आ भाषाशैली चाहे ओ पत्रकारक रूपे हुएथि व्यंग्यकार बा साहित्यकार रूपे सहज आ मधुर अछि। हमरा एहेन जीवन भरि मिथिला मैथिलीसँ दूरो रहै बला विद्यार्थिकेँ करेजामे हुनक एक एकटा आखर मउध जकाँ मीठ घोलैत पसरि जाइत अछि। ओ जतए जे कहै चाहैत छथि ओ कियो सहजतासँ बुझि सकैत अछि। एहि गुणक कारण भय सकैत अछि हुनक विताएल तीन दशकसँ बेसी समय जे पत्रकारिताक मात्र सेवेटा नहि रहल वरन ओ मैथिली पत्रकारिताक लेल एकटा साक्षात्कार रहला। रहल जस अपजसक गप्प तँ ई अप्पन हाथमे नहि छैक। हम सभ ओनाहितो बुझै छीयैक जे मैथिली साहित्यमे गुणसँ बेसी गालबजाउन, गुटबंदी आ तूँ हमरा दें हम तोरा देबौकेँ चलन बेसी छैक। मिथिला मैथिलीक समाजक एहनेसन रंग देख कय शरदिन्दु चौधरीक मुँहसँ निकलल होएत "बड़ अजगुत देखल"। शरदिन्दु चौधरीक पोथी "बड़ अजगुत देखल" कहै लेल ई व्यंग्य संग्रह अछि मुदा वास्तवमे ई कामदेवक वाण सनक अछि। जाही वाणक घावसँ सोनीत बहैत कियौ नहि देखै छैक मुदा मनकेँ तार तार कय दै छैक। आओर इहे हाल होएत अछि एकटा सुधि आ निष्पक्ष पाठकक जखन ओ शरदिन्दु चौधरी जीक व्यंग्य संग्रह "बड़ अजगुत देखल" पढ़ैत छथि। असलमे कही तँ "बड़ अजगुत देखल" पढ़ला बाद बुझना जाइत अछि जेना सत्य देखने होई वा सत्यसँ साक्षात्कार भेल हुए। लेखक स्वयं पोथीक भूमिका "मुक्ति पायबाक प्रयत्न"मे कहैत छथि, "ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, हमर कहबाक एकटा ढंग अछि।" आ जँ हम कही तँ, "ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, शरदिन्दु चौधरीक कहबाक एकटा ढंग अछि। जाहिमे देखाइत छैक सभकेँ अपन कर्तव्य आ काज मुदा परचट्ट जकाँ सभकियो आँखि कान केने अपन बंद अछि। एही व्यंग्य संग्रहकेँ तरकशमे कुल बीस गोट व्यंग्य रूपी वाण राखल अछि, जे समाजक अगुआ, नेता, मठाधीश, संगठाधीश, सभक कृतकेँ देखार कय रहल अछि आ एहिमेँ शरदिन्दु चौधरी जीक कहैक ठंग आ लेखनीक जतेक प्रसंशा कएल जेए से कम। पहील व्यंग्य, "जनहित"मे कोना करिया कक्का बाढ़ि सहाय काजमे आयल करोड़ो रूपया संतोष झाक द्वारा गवन कय लेलाक कारणे तमसाएल लोकसभकेँ कोना शांतेटा नहि कएला, संतोष झाक कुकर्मकेँ झंपैत अपन अपन धरकेँ भरैकेँ पुरा इंतज़ाम कय सेला। आजुक समयमे सगरो एहिना भय रहल छैक। तूहुँ खो हमहुँ खाइ छी, जनता जेए चुल्ही तअर। दोसर व्यंग्य "धन्यवाद ज्ञापन" कोना दुर्गा पूजाक उत्सब धूम धामसँ मनाएल गेल। भांगड़ा, डांडिया, गरबा, बिहू, पहाड़ी नाच सहित देश विदेशक सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत नीकसँ प्रस्तुत केएल गेल। नहि प्रस्तुत रहेए तँ मिथिला मैथिलीक गीत संगीत कला लोककथा आ सांस्कृतिक कोनो कार्यक्रम। सब कार्यकर्ता संयोजक आ कलाकार सभकेँ धन्यवाद ज्ञापन दै काल एकरा स्वीकार करैत कोना करिया कक्काक गला अवरुद्ध भ गेलनि । "मोआबजाक खोजमे" वस्तुतः मिथिलाक बाढ़ि आ माओवादीक संकट आ सरकार द्वारा कोनो निवारण नें कय कोना छूच्छे मोआबजा द क अपन इतीश्री बुझैत अछि। मोआबजा सेहो की तँ पाँच शेर अनाज वा किछु सय टाका। एहि बहाने एहीठाम मिथिलाक धरती परक लोकक मूल्य लगाएल गेल अछि। वस्तुतः रोचक सत्य, अकल्पनीय आ चिन्ताजनक। वास्तवमे शरदिन्दु चौधरी जीक कहबाक ढंग ज़बरदस्त अछि। 'की मथै छी।' 'मिथिला।' 'की तकै छी।' 'मैथिली।' 'भेटल ?' 'नइं।' ई उत्कृष्ट संवाद थिक "की मथै छी ?"सँ ज़बरदस्त। प्रतेक बर्ख विद्यापति पर्वमे मिथिला मैथिली विकासक निमित्त काज आ ओकर विभिन्न पक्षकेँ देखाबैत "की मथै छी?" व्यंग्य व्यंग्य नहि भय कऽ वास्तविक चित्रण अछि जेकरा लेखक अपन शव्दमे कहि हमरा सबहक गालपर एकटा जोड़गर थापर मारैत सुतल मिथिलाबासीक आँखि खोलैक पूरा प्रयास केने छथि। "दिव्य ज्ञानक प्राप्ति"मे स्तनपान सप्ताहकेँ केन्द्रित करैत कतेक आसान शव्दमे लेखक सबहक सामने गप्प राखैमे सफल छथि। संगे चिन्तित सेहो। समाजमे स्त्रीकेँ कोना एकटा वस्तु बुझल जा रहल अछि। स्त्री सेहो ओहिमे खुस भ अपनाकेँ वस्तु मानि, हुनक वस्तु नहि खराप भ जाइन तेँ डरे कोना बच्चाकेँ ईश्वर प्रदत अमृतसँ दूर राखि अपन एकटा नव प्रवृत्तिक निर्माण कय रहल छथि। "दर्शन सुदर्शन"मे दुकान जकाँ मिथिला मैथिलीक संस्थान/ विद्यापति पर्वक संस्था, पुरस्कार वितरण, कवि सम्मेलनक वास्तविकताकेँ उजागर केएल गेल अछि। ख़ास कय पटनाक चेतना समितिक कार्य प्रणाली आ अवरुद्ध मिथिला मैथिलीक विकास कार्यकेँ कटाक्ष करैत सम्पूर्ण व्यवस्थाकेँ नांगट कय देने अछि। शरदिन्दु चौधरी जीक शव्देमे एकटा निष्पक्ष आ निरगूट साहित्यकारक लेल" जाइत छी तँ जाउ, मुदा ई जानि लिअ जे कतबो लिखब, कतबो पढ़ब अहूँक वैह गति होएत जे विद्यापतिकेँ भेलनिहें। अहूँ ओहिना कोनो कोनटामे मुँह नुकोने नुकायल रहब। नाम सभ अवश्य लेत, सप्पत भने अहाँक खायत, संकल्पो अहीँक नामपर लेत, मुदा करत वैह जे ओकरा मोन होयतैक। पड़ाइत रहब तँ एहिना पड़ाइते रहि जायब।" "हम मैथिल छी" मे उजागर केने छथि देश सहित मिथिला आ खासकय मिथिलाक गामक बेरोज़गारीक मार्मिक दृश्य। संगे जाहि काजमे मैथिल सबसँ आँगा अछि ओकर ज्ञान करबैत छथि, आ ओ काज अछि राय देनाई। चुनावी तुक्कामें आजुक समयकेँ राजनीति, चुनाव आ चुनाव व्यवस्था, नेता आ जनताक बीचक सम्बंध एक एक टाक खोंइचा छोरा कय ओकर वास्तविकताकेँ देखार केएल गेल अछि। कोना नेता लोकनि भोटरकेँ भेंड़ा बुझि ओकरा अपना पक्षमे करबा लेल जाति पातिक फूटवार कय अप्पन लक्ष साधैमे निपुण छथि। ओतय जनता सेहो आब बूझनुक होयबाक चेष्टामे लागल अछि। जाति पातिसँ उपर भ जीवन रक्षाक बातपर, बात करैक लेल तैयार भ रहल अछि। कोना नेतासभ काजक बलपर नहि टाकाक बलपर जनताकेँ किनैक चेष्टा करैत अछि। कोना पार्टी सभक प्रदेश कार्यालयमे टिकटक बिक्री आ ओकर बादो असफल भेलापर कोना पार्टीक अदला-बदली होइत छैक। रौदी दाहीक कारणक संगे कोनो उद्योग धंधाक नहि रहने कोना मिथिला समाजक युवाशक्ति रोज़गारक खोजमे पंजाब हरियाणा ओगरने छथि, आ गाममे बचल लोग आवयबला मनीआर्डर पर वकोध्यान लगोने रहैत छथि। कोन मुँहे नेतासभ एहि मूलभूत आवश्यकताकेँ नहि देख पबैत छथि। नेता की नेता जनतो सब अपन अपन वास्तविकता व मूलभूत समस्याकेँ नहि देखि जातिपातिकेँ राजनीतिमे ओझरा अपन विकाससँ दूर पड़ेल जाएत छथि। राजनीति पार्टीमे चोर बनोलक अधिकता आ झगड़ाक एतेक नीकसँ लेखक उजागर केने छथि से वास्तविकतासँ साक्षात्कार करबैत, हमरा सभकेँ अपन राजनीति आ समाजीक व्यवस्थापर एकबेर फेरसँ सोचै लेल विवश कय दैइए। "हम की करबै सरकार" मे जनताक संगे संग व्यापारी वर्गक व्यथाकेँ बहुत नीकसँ उजागर कएल गेल अछि। कोना व्यापारी सभ महंगाई संगे हाटक चुंगीं, बाजारक रंगदारी संगे संग चुनाव टेक्स सेहो सहैत अछि। चुनाव टेक्स नहि देलापर जानमालकेँ से हानि, आ ई ककरोसँ छूपल नहि छैक। उपरसँ ग्राहकक चिखनापर चिखनाक मांग। समाजक सब पक्षक अव्यवस्थापर एतेक सटीक आ सूक्ष्म ध्यान देनाई ई शरदिन्दु चौधरी जीक कलमकेँ अलावे आन ठाम नहि देखा सकैत अछि ओहो एतेक सहज आ व्यंग्यक रूपमे। मिथिलाक घूरतर बैसल लोकसभ सेहो आइ काल्हि आर्थिक आ राजनीतिक व्यवस्थासँ व्यथित भय एहने गप्पसप्प करैत छथि। मिथिलाक आमलोकेँ एखन धरि चुनावक गरमी ओतेक नहि गरमा सकलै जे ओ घूर छोड़ि चुनावक मैदानमे उतरि, समाजक विकास लेल काज क सकै। ओ तँ पचास वर्षसँ चुनाव आ ओकर कार्यक्रमक आदि भ चुकल अछि। कोनो नेता आबैत हुनका लेल सब एकसमान जेहने नागनाथ, तेहने साँपनाथ। आ एहि नागनाथ साँपनाथकेँ झगड़ा आ तुलनात्मक अध्ययन करैत हम सब शरदिन्दु जीक एहेन हीराक चमककेँ नहि देखैत हुनका ओ मान सम्मान नहि द पेएलिअनि जिनकर ओ हक़दार छथि। ईहे विडम्बना अछि मिथिला मैथिलीक साहित्य, समाज आ राजनीतिक, नागराज सांपराजमे ओझराएल, ओहिसँ बाहर निकैल आगू देखैक आवश्यकता हमरा सबकेँ अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२२.श्रीधरम- शरदिन्दु कुमार चौधरीक साहित्य : 'स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती' श्रीधरम शरदिन्दु कुमार चौधरीक साहित्य : 'स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती' आदिकाल सँ मुख्य रूपें दू प्रकारक साहित्यकार होइत रहलाह अछि। पहिल राजा-महाराजा आकि सत्ताक लेल चारण कोटिक साहित्य लिखनिहार आ दोसर समाजक लेल जनसाहित्य लिखनिहार। ओना कलावादी ललित-साहित्यकारक सेहो अपन ख्यात परंपरा रहल अछि। राजा-महाराजा सँ भेटय बला अशर्फी-तमगाक स्थान आब लोकतंत्री सरकारी पुरस्कार ल' लेलक अछि। वर्तमान मे एहन 'अधसर' लेखक-कवि सभक पैघ संख्या अछि जे सामाजिक यथार्थ आ जन-साहित्य लिखबाक स्वांग मात्र करैत छथि, मुदा भीतर-भीतर पुरस्कार-तमगा पयबाक लेल कुचक्रक नाली मे डुबकी लगबैत रहैत छथि। ओना सभ काल मे एहन लेखक-बुद्धिजीवी होइत रहलाह अछि जे 'संतन को कहाँ सीकरी सों काम ?...' कहि सत्ताक अभिमान कें मर्दित करैत रहलाह। साहित्यक इतिहास मे दुनू प्रकारक उदहारण उपलब्ध अछि। मैथिली साहित्य सेहो एहि प्रवृत्ति सँ विलग नइँ अछि। मैथिलीक-साहित्यक दुर्भाग्य ई छै जे जेना-जेना ई भावुकताक शिकार भ' 'मां-मैथिली' बनि किछु खास वर्ग आ जातिक चाँगुर मे फँसैत गेल, तेना-तेना एकरा सँ पाठक छिटकैत चलि गेल। आलोचना पर पुरस्कारक गोलैसी हावी होइत चलि गेल आ साहित्य-लेखनक उद्द्येश्य अकादेमी आ अन्य पुरस्कार पयबा लेल तोड़-जोड़ धरि सिमटि क' रहि गेल। एहना मे इमानदार साहित्यकार लेल कुंठित होयब सेहो स्वाभाविक अछि। साहित्यकारक लेल कथनी आ करनी मे एकरूपता होयब परम आवश्यक। ओना एहन साहित्यकार कें आंगुर पर गानल जा सकैत अछि। पोथीक संख्या किंवा ओकर ओजन सँ कोनो साहित्यकारक लेखनक गुणवत्ताक नइँ मूल्याङ्कन कयल जा सकैत अछि। शरदिन्दु कुमार चौधरी एहने लेखक-पत्रकार छथि जिनकर लेखनक पन्ना चाहे कम छनि, पोथीक ओजन चाहे बहुत कम छनि मुदा हुनकर शब्दक ओजन एतेक भारी छनि जे कहियो ओकरा मैथिली साहित्य सँ मिटायल नइँ जा सकैत अछि। शरदिन्दु जीक लेखनक आत्मा व्यंग्य छनि जाहि मे हास्य ठोर पर अबै सँ पहिने बिला जाइत अछि। ताहू मे ओ व्यंग्य कें संस्मरण आ रिपोर्ताज संगे गुँथि दैत छथि। व्यंग्य लीखब अपना आप मे तलवार केर धार पर चलब होइत छै। जकरा व्यक्तित्व मे ईमानदारी नइँ छै, कथनी आ करनी मे फाँक छै, तकरा लेल व्यंग्य लिखब असंभव अछि। व्यंग्यकार कें सब सँ पहिने अपन लेखन के कीमत गमाब' पड़ैत छै। से कीमत निःसंदेह ई लेखक सेहो गमेने हेताह, ताहि मे कोनो शंका नइँ। व्यंग्य मूलतः प्रवृतिगत होइत अछि, व्यक्तिगत नइँ। व्यंग्य मे व्यक्ति-चरित्र अंततः प्रवृत्ति बनि जाइत अछि। ई अलग बात जे शरदिन्दु जीक व्यंग्य मे कएक ठाम व्यक्ति, चरित्र आ प्रवृत्ति पर भारी पड़ि जाइत अछि। शरदिन्दु कुमार चौधरीक चारि टा व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित छनि- 'जँ हम जनितहुँ', 'बड़ अजगुत देखल', 'गोबर गणेश' आ 'करिया कक्काक कोरामिन'। एहि व्यंग्य सभ मे साहित्य सँ समाज धरिक विद्रूपता पसरल अछि। लेखक 'जँ हम जनितहुँ' के भूमिका मे लिखैत छथि जे ओ मैथिलीक जाहि व्यक्ति सभक संपर्क मे अयलाह सैह हुनकर व्यंग्यक आलंबन बनैत गेलाह। हुनके शब्दें- "हुनका लोकनिक (व्यक्तित्वक) आकलन करब जतेक कठिन बुझायल अछि ताहि सँ सरल फूसि बाजब बुझाइत अछि। दोहरी चरित्रक निर्वाह करब जतेक सरल बुझायल ताहिसँ बेसी कठिन हास्य आ व्यंग्य कें फरिछायब बुझायल।" यैह कारण थिक जे हिनकर व्यंग्य मे एक सँ एक व्यक्तिचित्र भेटैत अछि से प्रतीक अथवा छद्म रूपें नइँ अपितु अपन मूल नामक संग मुदा असली चरित्र मे बेनकाब होइत। जहिया सँ साहित्य अकादेमीक तोड़ा मैथिली कें भेट' लागल तहिया सँ प्रायः अधिकांश पाठक उर्फ लेखक केर क्रांति एही 'तोड़ा' धरि पहुँचबा लेल सीमित होइत गेल। एहि क्रम मे एक सँ एक प्रतिभा कें कतियाबैत एहि पुरस्कारक बन्दरबाँट होइत रहल। शरदिंदु जीक एहि पोथीक पाहिले शीर्षक थिक 'अथ ऑपरेशन साहित्य अकादमी'। ई व्यंग्य दू शताब्दीक मुहाँन पर लिखल गेल अछि जे 'साहित्य अकादमी' पुरस्कारक तोड़-जोड़ आ गोलैसी कें रेखांकित करैत अछि। मैथिली मे जे व्यक्ति साहित्य अकदेमीक प्रतिनिधि होइत अछि से कोना ओकरा अपन बपौती मानि अपन संतति अथवा कुल-खानदान कें अकादमिया-लेखक बना दैत अछि तकर प्रमाण अछि ई व्यंग्य। एहि मे दू व्यक्ति लेखक बनबाक आ अकादेमी हथियेबाक प्लान बना रहल अछि- "हम आ तों, भोला आ बमभोला मिलि क' तेहन-तेहन ने गोला छोड़ब जे बड़का-बड़का पागधारीक मुँह तौला जकाँ खुजले रहि जयतनि आ हम आ तों सर्र द' आकाश चढ़ि जायब जेना एखन एकटा ससुर-जमायक जोड़ी साहित्य अकादमीक अकाशमे विचरण क' रहल छथि।" मैथिलीक नाम पर जतेक सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था सभ अस्तित्व मे आयल तकर कर्ता-धर्ता दिनानुदिन वर्ण-व्यवस्था जकाँ जन्मना आ मजगूत होइत गेल। वर्णव्यवस्था भले कनेमने ढील भेल हो मुदा एहि संस्था सभक व्यवस्था पर एखनो खानदानी राज कायम छै- "जेना चेतना-समितिमे कतबो कटाउझ होइ छै, तैयो ओकर बागडोर एक्के (काका-भातिज) घरमे रहैत छै तहिना हमारा भेटय की तोरा, रहत तँ अपने घरमे ने।" अकादेमी पुरस्कारक अंतर्व्यूह रचना पर जँ शोध कैल जाए त' एकर माठाधीसी परंपराक कतेको गूढ़ रहस्य पर सँ पर्दा उठि सकत। ई अलग बात जे कतेको उल्लेखनीय पोथी कें ई पुरस्कार भेटल अछि मुदा प्रश्न ई अछि जे की ओ पुरस्कार उचित आ ईमानदार प्रक्रिया सँ भेटल आकि माठाधीसक सामने दंडप्रणामी सँ, से उल्लेखनीय अछि। पहिने एहि पुरस्कारक आकर्षण नकदी छल मुदा आब मैथिलीक लेखक-कवि सभ त' अयाची, यात्री, चंद्रभानु टाइप त' रहलाह नइँ, तें कैक बेर सुनबा मे ईहो अबैत अछि जे अभ्यर्थी पुरस्कारक मूल राशिक त्याग करैत सूद मे होटल-बोतल आदिक बलें अकादमीक मोमेंटो आ प्रशस्तिपत्र पयबा मे सफल होइत अछि। एमहर त' ईहो सुनल गेल जे पुरस्कार पयबा लेल मृतक सेहो उठि बैसल आ पोथी लिखि क' अपन झंडा बुलंद केलक। आब एहि सँ अधिक माँ मैथिलीक सेवा की भ' सकैत अछि? असल मे शरदिन्दु कुमार चौधरीक लेखन भने ऊपर सँ प्रतिगामी बुझाइत अछि मुदा कने विलमि क' सोचू त' हुनका भीतरक मातृभाषा प्रेमक सोता देखा पड़त जे एकटा नैतिक आ ईमानदार कलमे टा सँ संभव अछि। शरदिन्दु जीक चिंताक केंद्र मे अछि मैथिल समाज, मैथिल पाठक, तें ओ मैथिली उद्धारक नाम पर मैथिली कें अहित कर' बला व्यक्ति आ प्रवृत्ति पर बेर-बेर चोट मारैत छथि आ एहि क्रम मे ओ कोनो छद्म आवरण आकि प्रतीक के सहारा नइँ लैत छथि। मैथिलीक संस्था हो आकि मैथिलीक पत्रकारिता, अध्यापन हो आकि लेखन-सब ठाम लालची आ भ्रष्ट लोकनिक जुटान अछि। एक-दोसराक रचना कें अपन मरौसी बनेबाक लेल उताहुल। आ सभ सँ बत्तर स्थिति तँ मैथिलीक अध्यापक-अकादमिक दुनिया के अछि जत' किछु अपवाद कें छोड़ि क' एक सँ एक पोंगापंथी सभ भरल अछि। 'अपील' शीर्षक व्यंग्यक ई पंक्ति एहि क्षेत्रक बखिया छोड़ेबाक लेल काफी अछि- "जहिया मैथिली पढ़बा लेल पटना विश्वविद्यालयमे नाम लिखौलहुँ तहिये श्रीमान् पाठकजी सन क्रोधी, श्रीमान् दिनेशजी सन भोगी आ श्रीमान् इन्द्रकांत जी सन लोभी गुरुजीसँ भेंट भेल छल। परिणाम ई भेल जे मैथिलीक पढ़ौनीसँ मन उचटि गेल आ मैथिली सँ प्रेम भ' गेल।" शरदिन्दु जी मैथिलीक स्वनामधन्य रचनाकार आ सम्पादक सुधांशु शेखर चौधरीक पुत्र छथि। साहित्य आ मैथिली प्रेम हुनका विरासत मे भेटलनि। आ यैह हुनकर कमजोरी सेहो बनि गेलनि। ओ राजनीतिशास्त्र मे स्नातकोत्तरक संग एलएलबीक डिग्री सेहो लेने छथि। ओ जँ चाहितथि त' कोनो विश्वविद्यालय मे प्रोफेसरी क' सकैत छलाह, कोनो कोर्ट मे वकील बनि तीन-पाँच क' सकैत छलाह। से सब किछु छोड़ि क' मैथिली प्रकाशनक मरुस्थल मे आबि, जीवन यापन करबाक हुनक जिद निःसंदेह मैथिली भाषाक प्रति अटूट प्रेमक परिणाम रहल होयत। मुदा एत' आबि जखन एहि दुनियाक खुरपैंची सँ ओ अवगत भेल होयताह त' मोहभंगक स्थिति स्वाभाविक अछि। यैह कारण अछि जे हुनक व्यंग्य अथवा संस्मरण यथार्थक धार सँ माँजल एतेक नग्न अछि जे कैक बेर पाठको कें अनसोहाँत सन बुझा सकैत छै। असल मे पाठक जाहि रचनाकारक रचना पढ़ि हुनका अपन प्रिय बना लैत अछि, भावनात्मक रूपें हुनका सँ जुड़ि जाइत अछि, हुनकर व्यक्तित्व पर कोनो दाग लगिते ओ ढाल बनि ठाढ़ भ' जाइत अछि। आ एत' त' एक्को घर नइँ बारल गेल अछि। हमरा जनैत यैह कारण रहल होयत जे शरदिन्दु जीक रचनाक जे मूल्याङ्कन हेबाक चाही छल से नइँ भ' सकल। सभ क्यो चर्चा कर' सँ कतराइत रहल होयताह। कोनो समाज अथवा राष्ट्रक जनता भ्रष्ट भ' जाय त' ओकरा लेखक आ बुद्धिजीवी वर्ग रस्ता पर अनैत अछि, मुदा जँ लेखके बुद्धिजीवी भ्रष्ट भ' जाय त' ओहि समाजक केहन अराजक स्थिति भ' सकैत छै, तकर कल्पना कैल जा सकैत अछि। यैह कारण अछि जे शरदिन्दु जीक कलम केर नोक पर सब सँ पहिने लेखक-बिद्धिजीवी वर्ग अबैत अछि- "गुंडा-बदमाश कें हल्ला-गुल्ला, मारि-पीटि करैत देखैत छिऐक तँ ई होइत अछि जे जँ बुद्धि रहितैक तँ ऐना नइँ करितय। मुदा पढ़ल-लीखल साहित्यकार, ओकील, नेता-अभिनेता, डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी-पदाधिकारी आदि बुद्धिजीवी कें जखन आपसमे कटाउझ करैत, तू-तू, मे-मे करैत देखैत छिऐक तँ हठात कुकुरक हेंज मोन पड़ि जाइत अछि।" आ फेर एहि पंक्ति पर ध्यान दी- "एहन-एहन नेताजीकें होइत छनि जे जेँ हम छी तेँ मैथिली टिकल अछि आ संस्था चलि रहल अछि मुदा हुनका ई नइँ सूझैत छनि जे जाहि पदपर ओ छथि तत' सँ एकोरत्ती जँ जोर लगा देथिन तँ एकटा संस्था कें के पूछय कैकटा संस्था कें उसाहि देथिन। साहित्यकारक बीच उतराचौरी आ पछाड़-सम्हार आदि प्रवृत्तिक सम्यक विवेचन फगुआक बहन्ने 'देखल एक शूर्टिंग' आ 'स्वास्थ्य रक्षा पुरस्कार' मे भेल अछि। 'एकालाप' शीर्षक व्यंग्य सेहो अही कड़ीक विस्तार थिक। असल मे ई लेखक, बुद्धिजीवी चारित्रिक आ नैतिक पतन सब सँ अधिक खिन्न छथि से वर्त्तमान मे बहुत प्रासंगिक अछि। आइ जाहि तरहें बुद्धिजीवी-लेखक-पत्रकार सभ सत्ताक पाछाँ पीकदान ल' चारण परंपरा कें चरम धरि पहुंचा क' लोकतंत्रक चटनी बना रहल छथि, एहना मे शरदिन्दु जीक चिंता प्रासंगिक भ' उठैत अछि- "आ आब तँ ई बुद्धिजीवी वर्ग चारिम खंभा बनिक' सभ हलकान मे 'रंभा हो, रंभा हो' क ताल पर नृत्य करैत 'तहलका' मचा रहल अछि।" शरदिन्दु कुमार चौधरीक राजनीतिक चेतना स्पष्ट छनि। ई अलग बात जे अस्मितावादी विमर्शक एहि समय मे हुनक किछु वक्तव्य आकि 'टोन' एहन अछि जकर पक्ष मे नइँ गेल जा सकै अछि। हुनकर एक टा व्यंग्य छनि 'प्लेटोक सपना, भारत आ कौमार्य-राजनीति'। ई निबंध भले लगभग बीस साल पुरान हो मुदा एकर अनुगूँज एखनो सूनल जा सकैत अछि। एहि आलेख सँ साम्प्रदायिकताक प्रति लेखकक आलोचनात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट रूपें सामने आबि जाइत अछि। एहिना लेखकक स्त्रीक प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण 'अहाँ की करबै?' शीर्षक व्यंग्य मे देखल जा सकैत अछि जत' आधुनिक सामाजिक परिवर्तनक नजरिए दाम्पत्य जीवनक हास-परिहासक बीच एक टा गीतक मादे स्त्री-चेतना कें रेखांकित कैल गेल अछि। करिया कक्का कें काकीक ई जवाब ध्यातव्य अछि- "कहलहुँ ई जे स्त्रीगन मे जे धैर्य, काजक प्रति निष्ठा आ लगाव होइत छैक से पुरुष मे कत' सँ हेतैक ओ तँ एके छड़पान मे झंडा गाड़य जनैत छैक आ से जँ नहि भेलैक तँ एहिना कोनो गप्प उछाह' लगैत छैक।" मैथिली मे 'गोलैसी' शब्द आलोचनाक पारिभाषिक शब्दावली बनि गेल अछि। बिना गोलैसी के मैथिलीक पुरस्कार अथवा समीक्षा आकि पत्रकारिताक कल्पने नइँ कैल जा सकैत अछि। अपन एही शीर्षक निबंध में शरदिंदु जी एहि शब्द कें एहि रूपें परिभाषित करैत छथि- "ओना शाब्दिक अर्थ कें छोड़ि जँ ठेंठ अर्थ भजिआओल जाय तँ 'गोलैसी ओहि निति कें कहल जाइछ जाहिमे एकटा व्यक्ति वा गुट दोसर व्यक्ति, गुट, समूह वा व्यक्तिक निंदा करैत अपन गुट अथवा अपन स्वार्थ पूर्ति लेल निर्लज्ज भ' ओहि व्यक्ति अथवा समाजक अहित कारबामे आनंद अनुभव करय।" गोलैसीक एहि परिभाषा मे जे व्यंग्य निहित अछि तकर गूंज मैथिली साहित्य मे 'अनुरणन ध्वनि' जकां सुनल जा सकैत अछि। 'बात बात पर बात' चारि सीरिज मे छपल शरदिंदुजीक संस्मरण छनि। मुदा ई संस्मरण सभ पारंपरिक विधा सँ अलग टिप्पणी छनि। एहि टिप्पणी सभ लेल ओ कहैत छथि जे 'जत' प्रवृत्ति दुष्प्रवृत्ति बनि प्रगट भेल हो ओत' हमर बात कने कटु अवश्य भ' गेल अछि। ओ भूमिका मे अहू बात कें रेखांकित करैत छथि जे "हमर बात सभ मुख्यतया अथवा पूर्णतया सत्य पर आधारित अछि तें किछु गोटे कें अप्रिय अवश्य लगतनि मुदा ई सत्य किछु गोटेकें प्रिय सेहो लगतनि। हँ जिनका अप्रिय लागनि से अवश्ये अपन छाती पर हाथ राखि सोचथि जे हम कतहु सत्य सँ दूर त' नहि भेल छी।" शरदिंदुजीक एहि संस्मरण सभ कें ध्यान सँ पढ़ला सँ स्पष्ट होइत अछि जे मैथिली आन्दोलन, प्रकाशन, शिक्षण, साहित्य आ समाज कें ल' क' हुनक चिंता आ सरोकार जमीनी आ तटस्थ छनि। ओ पत्रकार छथि तें एहि समस्या सभक प्रति भावुकताक शिकार नइँ होइत छथि आ मैथिलीक नाम पर पसरल गोलैसी, भाई-भतीजावाद आ व्यक्तिक गिरगिटिया-चरित्र कें स्पष्ट रूपें रेखांकित करैत छथि। हुनकर चिंताक केंद्र मे मैथिलीक पाठक आ विद्यार्थी सभ अछि जाहि पर बहुत कम ध्यान देल जाइत अछि। पाठक निर्माणक लेल प्राथमिक स्तर पर मैथिलीक शिक्षण आ पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन पहिल शर्त जकाँ छै, जाहि लेल वर्तमान मे बहुत कम प्रयास भेल आ भ' रहल अछि। जे व्यक्तिगत प्रयास एहि क्षेत्र मे भेल तकरो अपन सीमा छै। मैथिली पत्रकारिता के सन्दर्भ मे शरदिंदु जीक चिंता बहुत जेनुइन अछि- "दुर्भाग्य मैथिलीक छै जे पत्रकारिता जगत में पचास प्रतिशत सँ बेसी मैथिल कार्यरत छथि मुदा ओ मैथिली भाषा मे किछु नइँ लिखताह। मानहानि अथवा स्तरहीनताक बोध हुनका होइत छनि। ख़ासक' ओ मैथिली लेखनकें हीन बुझैत छथि। तें आइ स्थिति ई छनि जे ओ दोसरक खेत तामैत-कोड़ैत छथि आ दोसर हुनकर खेतकें चरिकें चलि जाइत छनि।" शरदिंदु जीक एहि चिंता संग ईहो जोड़ब उचित जे ई पत्रकार सभ मैथिली में किएक नइँ लिखैत छथि। जा धरि आर्थिक उपार्जनक साधन मैथिली पत्रकारिता नइँ बनत, ताधरि ई चिंता बनले रहत। जीवन यापन लेल प्रेम सँ पहिने अर्थक आवश्यकता होइत छै। "मैथिल संस्था : 'छी छा' सँ 'दूर-दूर छिया-छिया' धरि" मे लेखक मैथिली संस्था सभक पोस्टमार्टम करैत छथि। ओ सूचना दैत छथि जे भारत भरि मे लगभग डेढ़ सौ मैथिली संस्था अछि मुदा सभ अपन-अपन डपोरशंख फूकबा मे व्यस्त आ मस्त। विद्यापति पर्वक नाम पर गीत-नाद, नाच-गान धरि सीमित एहि संस्था सभ द्वारा समवेत रूपें जँ पोथी आ पत्रिका लेल ठोस पहल होइ त' निःसंदेह मैथिलीक कल्याण भ' सकैत छै। मिथिला मे लाखो रुपैया लगा क' एक सँ एक यज्ञ होइत अछि, श्राद्धक नाम पर लाखो बुकि देल जाइत अछि मुदा एक टा पत्रिका अथवा पोथी कीनबाक इच्छा कतेक लोक मे होइत छै? असल मे मिथिलाक वृहत्तर समुदायक बीच 'मैथिल जातीयता'क विकासक लेल कोनो प्रयास नइँ भेल, जकर परिणाम आइ सोझाँ अछि। 'मर्मान्तक' मे किछु व्यक्तिगत आ पारिवारिक संस्मरणक संग सामाजिक-सांस्कृतक विषय सभ पर टिप्पणी कैल गेल अछि जाहि मे शरदिंदु जीक वृहत्त्तर सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारक दिग्दर्शन होइत अछि। भाव अथवा मनोभाव पर लिखब अत्यंत कठिन होइत अछि। मानव स्वभाव सँ अंतर्मुखी आ अपना प्रति व्यामोह सँ ग्रस्त रहैत अछि तें ओ दोसराक भीतर बेसी झांकैत अछि। लेखक एहि संकलन मे आस्था, भय, चित्तवृत्ति, सुख-शांति, घृणा, पीड़ा, इच्छा, तनाव आदि विषय पर जे टिप्पणी करैत छथि से दार्शनिकता, मनोवैज्ञानिकताक संग-संग अनुभव आ मानवता सँ ओतप्रोत अछि। कोनो रचनाकार लेल अपन जातीय-धार्मिक सीमा सँ ऊपर उठि मनुष्य बनब पहिल शर्त थिक। कोरोना महामारी सम्पूर्ण दुनिया कें ठमका देलक। मंदिर, मस्जिद, गिरिजा आ गुरुद्वारा सभ पर ताला लगा देलक। मुदा की आस्थाक नाम पर समाज मे पसरल कट्टरता कें कोरोना कम क' सकल? शरदिंदु जी अपन आस्था शीर्षक टिप्पणी मे लिखैत छथि- "की आस्था मरि जायत। की आस्थाक रूप में परिवर्तन होयत! की आस्थाक प्रति कट्टरतामे कमी आओत! की आगाँ विभिन्न सम्प्रदायमे आस्थाक टकराहटि कम होयत। कोरोना आगाँ जे करय, आस्थाकें घर-घर पसारि दिअय वा समेटि क' एकठाम क' दिअय एखन तँ आस्था एकेठाम केन्द्रित अछि- कहुना हमर प्राण बाँचि जाय बादमे सोचल जायत जे कतय माथ झुकाबी।" मुदा ई देखल गेल जे जेना-जेना कोरोना घटैत गेल तेना-तेना आस्थाक नाम पर घृणा आ तकरारक खेती पुनः शुरू भ' गेल। एहि सँ ईहो स्पष्ट होइत अछि जे आब लोक 'आस्तिक' सँ बेसी 'धार्मिक' भ' गेल अछि। 'हमर अभाग हुनक नइँ दोष' मे किछु एहन व्यक्तिगत प्रसंगक चर्चा अछि जे व्यक्तिक दोहरापनक संग, लोलुपता आ 'विषकुम्भम पयोमुखम' बला चरित्र कें सोझाँ अनैत अछि। बिच्छू कखनो पाछाँ सँ नइँ डंक मारैत अछि, आकि साँप कखनो पीठ पर नइँ डसैत अछि, किएक त' एकरा सभ लग मानव जकाँ विकसित दिमाग नइँ होइत छै। ई सौभाग्य मनुष्ये कें भेटल छै। आ बुद्धिजीवी लोकनिक दिमाग त' सामान्य सँ किछु बेसिए विकसित होइत अछि तें हुनकर 'विष' अन्तःसलिला रहैत अछि। वर्ष 2021 मे मैथिली अकादेमी अपन पत्रिकाक प्रूफ पढ़बा लेल 280/- रुपैया दैत अछि सेहो कतेक तागेदाक बाद। जँ सरकारी संस्थाक ई आर्थिक हालत छै, तखन बिहारक नेता सभ कें मैथिलीक संस्था सभ कोन मुहें पाग-डोपटा पहिरा क' मंच पर बैसा चारण-गान करैत अछि से विचारणीय अछि। एहने किछु प्रसंग सभक चर्चा एहि खंड मे भेल अछि जे लेखकीय इमानदारी आ तटस्थताक प्रमाण थिक। एहिना 'साक्षात्' मे स्वयं द्वारा लेल गेल अपन साक्षात्कार अछि। जाहि मे एक टा प्रसंग एहन मार्मिक अछि जे एहि बात दिस इशारा करैत अछि जे कोनो व्यक्ति जँ मैथिली सेवाक (प्रकाशन, पत्रकारिता आकि लेखन) बलें अपन जीवन यापन कर' चाहत त' ई समाज ओकरा कतेक रिटर्न देतै। अपन जीवनक सब सँ पैघ गलती आ कचोट कें अभिव्यक्त करैत ओ लिखैत छथि- "हम अपन एकमात्र पुत्र राजशेखर कें इंजीनियरिंगक पढ़ाइक खर्च नइँ द' सकलियनि जे कि हुनकर सभ सँ पैघ लक्ष्य रहनि। ओ इंटरक बाद ओहि हेतु चयनित सेहो भ' गेल छलाह मुदा...। आ एतहिए सँ हमर जीवनक दिशा ओ दशा बदलि गेल, हम निर्जीव-निराकार मनुष्यक रूप मे अपन काया ल' क' पृथ्वीक भार बनल जीव रहल छी। अहाँ एकरा पुत्र-मोह कहि सकैत छी, से तँ छैके, मुदा एहि 'केस' मे हम दायित्व आ कर्तव्य सँ च्युत भेल छी।" असल मे 'बात बात पर बात' चारि खंड मे प्रकाशित शरदिन्दु जीक संस्मरणात्मक आत्मकथा थिक जकरा पढ़ैत ह्रदय मे एक टा टीस उठैत अछि जे मैथिली आ मिथिलाक लेल एक टा जेनुईन चिंता कर' बला व्यक्ति कें ई समाज कतेक प्रतिदान करैत अछि। 'विदेह' ई अंक निकालि क' शरदिंदु कुमार चौधरीक लेखनक मूल्याङ्कन करबाक आरम्भ केलक अछि, ताहि लेल हुनक कर्ता-धर्ता लोकनि कें बहुत बहुत आभार आ धन्यवाद। शरदिन्दु जीक रचना सभ कें पढ़ैत तुलसीदासक ई पंक्ति बेर बेर मन पड़ैत अछि किएक त' तुलसी देवतो लोकनिक चारित्रिक दुर्गुन पर व्यंग्य कर' सँ नइँ चुकैत छथि- "सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।। सम्पर्क- डॉ श्रीधरम, असिसटेण्ट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज, धौलाकुँआ (दिल्ली विश्वविद्यालय), निवास- बी-२७७-ए, वसंत कुंज एनक्लेव, नई दिल्ली ११००७०, मो. ९८६९३२५८११ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ऐ अंकक अन्यान्य रचना ३.गद्य खण्ड ३.१.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.२.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.३.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.४.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.५.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर ३.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- परिस्थितिजन्य ३.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- थाहल संग ३.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) ३.९.रमाकर चौधरी- मधुमेह ३.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १५म खेप ३.११.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- बिना बहर आ काफिया गजल कोना भेलै ३.१२.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ९) ३.१३.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-६) ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र- कहक' अह ५.संस्कृत खण्ड ५.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (पञ्चमोच्छवासः) ६. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण ३.१.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राम विलास साहु केर पाँचटा कथा कथा १ कमतिया हबेली जानकी घोलाति आ मधुमाछी जकाँ भनभनाइत रस्ता धेने घर जाइ छेली। रस्ते कातमे मदीना दादी बैस किनको बाट जोहि रहल छेली। मदीना दादी झुनकुट बुढ़, सौंसे गामक लोक दादी कहि उद्बोधन करै छैन। नजैर पड़िते मदीना दादी जानकीसँ पुछि देलखिन- "जानकी केतए-सँ अबै छहक। एकटा काज कऽ दाए तखन जइहह।" जानकी बजली- "दादी एकटा की दू-चारिटा कऽ देब मुदा घरपर कियो नइए आ ओसरापर चिल्हकाकेँ सुता कऽ गेल छेलौं। बहुत अबेर भऽ गेल, कनैत हएत।" मदीना दादी बजली- "हइ, तूँ बड़ हड़बड़िया छह, एतेक देर तोरा कोनो चिन्ते ने छेलह आ हम टोकि देलियह तँ हड़बड़ी लगि गेलह! हमरो घरपर कियो नइए, हमरा चाह पीबैक मन भऽ गेल। चुल्हिपर पानि खोला दूध दऽ चाहक पत्ती देलिऐ, चीनीक डिब्बा खोलि जखन चीनी दैतिऐ तँ चीनीए नहि। लेधुरिया सभ डिब्बा खोलि सभटा चीनी खा गेल। तूँ कनी चुल्हबा दोकानसँ दू टकाक चीनी लाबि दाएह। चाह बनिते अछि हमहूँ पीब आ तोहू पीबि लिहह।" जानकी बजली- "दादी, दोकान दूर अछि हम अपने ऐठीम जाइ छी चिल्हको लऽ लेब आ चीनीओं नेने अबै छी, तखने बैस गप्पो करब आ चाहो पीब।" मदीना दादी निराश नइ भऽ आश भरल नजैरसँ निहारैत बजली- "जा तूँ कोनो कम गहींरगर छह।एके तीरे दूटा शिकार करए चाहै छह।" जानकी रमकैत-दमकैत घर दिश विदा भेली। घरसँ दूरे छेली कि चिल्हकाकेँ कनैक अवाज सुनली। अवाज अकानिते दुलकी दैत आँगन जाधैर पहुँचली ताधैर चिल्हका कनैत फफचीहारि काटि, उनैट-पुनैट ओसारसँ निच्चा आँगनमे गिर गेल छल। हाँइ-हाँइ नूनू बौआ कहि जानकी कोरामे लऽ छातीसँ सटा दूध पीबए लगली। चिल्हका दूध पीबिते अलिसा गेल। कागतक टुकड़ीमे चीनीक पुड़िया बना एक हाथमे लऽ चिल्हकाकेँ कोरामे सम्हारि-पकैड़ मदीना दादीक घर दिश विदा भेली। मदीना दादी चुल्हिपर कखनो चाहो निहारैत आ कखनो रस्तोपर नजैर दौड़बैत रहैथ जे जानकी कखनी चीनी लऽ कऽ आएत जे चाह बनत। जानकीकेँ कनी देरी भेलासँ चुल्हिपर चाहो उधिया-उधिया अधजरू भऽ गेल। मदीना दादी आश लगौने ने अगुतेली आ ने घबड़ेली। ओ जनै छेली जे जानकी चिल्हकौर छी चिल्हकाक लटारममे लगि गेली। मदीना दादीक मन खुद-बुद होइते छेलैन कि जानकी हहाइते पहुँचली आ बजली- "दादी की कहू, कनियोँ अँगना जाइमे देरी होइतए तँ हमर चिल्हका प्राण तियागि दइतए। ओकरे सम्हारैमे लटारम भऽ गेल, तँए देरी लगल।" मदीना दादी बजली- "से तँ तूँ बड़ होशियारि-सुतिहारनी छह। जे मनमे ठानै छह से कए कऽ दम मारै छह। लाबह चिल्हकाकेँ हम पकड़ै छी, तूँ चाहमे चीनी दऽ छानि दूटा गिलासमे नेने आबह। चाहो पीअब आ गप्पो करब।" जानकी चुल्हिपर चाह देखलक तँ ओ खदैक-खदैक कऽ अधजरू भऽ गेल छल। सुगन्धो चहाइन-चहाइन, जल्दीसँ तीन-चारि चुटकी चीनी दऽ हिला-मिला कऽ उताइर दूटा गिलासमे लऽ मदीना दादी लग एली। एक गिलास मदीना दादीकेँ आ दोसर गिलास अपने लेली। चाह तँ जरि कऽ जराइन भऽ गेल छल मुदा पीबैमे सुअदगर रहइ। दू-चारि घोंट लैत मदीना दादी जानकीकेँ टोकलखिन- "जानकी तूँ तखनी केतए-सँ अबै छेलहक से तँ नै बजलह?" जानकी बजली- "दादी, की कहू! अपन हारल, हाथतर गेने कहैमे अपने संकोच होइए। मुदा हिनका नै कहबैन से उचित हएत। जा कहब नै ता समाधानो केना हएत। बहुत दिनक बाद मालिकक हबेली गेल छेलौं।" बिच्चेमे मदीना दादी बजली- "की कोनो पैघ बात वा काज छेलए की?" जानकी बजली- "दादी, हमरासँ तँ बेसी अनुभव हबेलीक अहींकेँ हएत।" मदीना दादी बजली- "हबेलीकेँ तँ हम आब नाओं चर्च नै करै छी। ओकरे मारल तँ तीन पीढ़ीसँ दुख काटि रहल छी। पहिने तूँ कहऽ ने जे हबेली किए गेल छेलह?" जानकी बजली- "दादी, अहूँ खैन-खा कऽ हमरेपर लगल छी। कहुना छी तँ गामक मालिकक हबेली छी किने, जँ कनियोँ बाजबमे हुसि जाएब तँ गामोमे ने बास हुअ देत।" मदीना दादी बजली- "तोरा ने डर होइ छह, हम तँ हबेली कहियो ने मानलिऐ आ ने मानै छिऐ। ओइसँ नीक तँ गामक गरीब-दुखिया जे जाइते मातर टुटलोहो ओछाइन बिछा आदरसँ बैसा कऽ हाल-चाल पुछबो करैए आ एक गिलास पानि-चाह पीआ कऽ विदा करैए। दुखो-सुखक धड़ीमे सोझहा आबि मदैत करैए। मुदा जेकरा तूँ हबेली कहै छहक आ आनो सभ कहै छै तेकरा हम कमतिया बुझै छी।" जानकी बजली- "से केना दादी! जे गामक मालिक जमीन्दार छैथ ओ कमतिया केना भेल?" मदीना दादी बजली- "तूँ बुझबहक केना, तोहर उमेरे की भेलह हेन। ओ की गामक डीहबासू छी। ओ तँ बाहरसँ आबि गाममे बसि कऽ सबहक जमीन हरैप जमीनदार बनि गेल आ गामक लोककेँ गुलाम जकाँ दिन-राति खटबए लगल। जेतेक शोषण आ दुख ने कमतिया सभ समाजक लोककेँ देलकै जे समाज टुटि छिड़िया गेल। तेकर नाम तोँ ऊँचगर करै छह, तोरा अखनी परिचय नै लगलह हेन।" जानकीक मोनमे जिज्ञासा बढ़लै आ अचरज सेहो भेलै तखने मदीना दादीसँ पुछि पड़ली- "दादी नै बुझलौं कमतिया हबेलीक किरदानी। कनी फरिछा कऽ बता दिअ।" मदीना दादीक मनमे जेना उमकी एलैन तहिना उमकैते बजली- "तूँ बुझबहक केना! भरि दिन तँ अपन दुख-धन्धामे लगल रहै छहक, ओइसँ जे समय भेटै छह तँ फहरदवाल मारि ऐ अँगनासँ ओइ अँगना गाल बजबै छहक। कहियो ई भेलह जे गामक बुढ़-बुजुर्गक लगमे बसि गामक बितलाहा दिनक चर्च करी आ ओहन-ओहन बातक कान धरी जे आगू काज देत।" जानकी बजली- "दादी, जहियेसँ होश आ बोध हएत तहियेसँ ने सीखब-बुझब। एतेक दिन तँ गरीबीए-मे दिन काटलौं, अखैन धीए-पुतामे ओझराएल रहै छी। जहियासँ हबेली छोड़ि दुनू परानी अपन काजकेँ गहि कऽ पकड़लौं तहियासँ महड़ा भादोकेँ खाइ छी। घरबला छह मास घरक काज करैए आ छह मास परदेश कमा लबैए, तँए दू सेर अन्नो देखै छी आ दूटा रूपैओ।" मदीना दादी बजली- "हबेलीक काज किए छोड़ि पड़ेलह?" जानकी बजली- "की कहबैन दादी, जाबे हबेलीक काज करै छेलौं ताबे पेटो ने भरए। काजक मजूरीबला काज कम, बेगारीए बेसी खटै छेलौं। दुपहरिया लगा कऽ दुनू परानी खटै छेलौं आ बोइन तँ दूर रहए, पनपिआइयो ने भरि बुत्ता भेटै छेलए। खेतीक काज करै छेलौं तँ बोइनो ऐ सालक पौंरुका, पौंरुकाबला बोइन तेंसरा झझमझेसँ दइ छेलए। कहियो भाभंस नै भेल जे दुनू साँझ चुल्हि पजारितौं।" मदीना दादी बजली- "आइ किए, कथी-ले कमतिया ऐठीम गेल छेलहक से ने कहह।" जानकी बजली- "दादी, अहाँसँ छाम की। हमरा तँ मन जरैए। जँ अहाँकेँ कहब तँ सुनिते अहूँकेँ देहमे आगि नेसि देत।" मदीना दादी बजली- "तूँ की कहबह कमतियाक किरदानी, हम तँ सभ खेल-बेल देखने-भोगने छी आ देह लगा मारने छी। मुदा बताबह ने तोरा की भेलह।" जानकी बजली- "दादी, पौंरुका साल अखाढ़-सौनमे हबेलीबला मालिक दुहारिक माटि बुझू खाए गेल। भोरमे अन्हरौखे आबि निहोरा करैत कहै लगल जे हमर खेत अफारे रहि जाएत। गोरहा खेत छी कहुना धनरोपनी कऽ दएह। चास नहि लगत तँ बास केना हएत। सुनि हमरो मन ढलि गेल। हमर घरबला हर जोति गजार-कादो करए आ हम किछु बोनिहारक संगे धनरोपनी कऽ देलिऐ। एक दू दिन नै दुनू परानी बीस दिन खटि देलिऐ। बीस दुनी चालीस पेसरी बोइन भेल। माने पाँच मन भेल। पाँच मनमे तीन मन तँ कहुना कहि-सुनि देलैन मुदा दू मन धान अखन धरि नै देलक। सालसँ बेसी भऽ गेल। एक तँ आसीन-कातिक मास अहुना सालक तेरहम मास होइए, तहुमे एतेक रास पाबैन-तिहार...। खर्चे-खर्च...। घरबला बाहर कमाइले जाएत। सोचलौं हबेलीमे दू मन धान कमाएल बोनि अछिए, आनि कऽ एक पसेरी धान चूड़ा-ले ताड़ि देबै आ एक पसेरी धान भाड़ि-ताड़ि कऽ मुरहीक चाउर बना लेब। हाथे मुसरे चूड़ा कुटि लेब दोसर दिन मुरही भुजि देबै जे घरबलाक बटखर्चा दऽ देबइ। जे धान बँचत तेकरा उसैन सुखा कुटि लेब। ओइ चाउरसँ कातिक खेप जाएत।" मदिना दादी बजली- "की भेलह, देलकह आकि नै देलकह?" जानकी बजली- "की कहूँ दादी, कोनो की एक दिन बोइन-ले हबेली गेलौं हेन। जाइत-जाइत टॉंग टुटि गेल। बोइन जोखैमे घिघरी कटबैए। अखैन तक नै देलक। जखन जाइ छी तँ बेगारीए काज अढ़ा दइए। कहु ने हम अपने चिल्हकौर छी। सक-बुत्ता लगबे ने करैए, केना भिरगर काज कऽ देबइ। अही खातिर हमर घरबला आनठाम काज करैए मुदा हबेलीक काज नै करैले जाए चाहैए।" मदीना दादी बजली- "आब तूँ बुझि गेलह, बोइन आनैमे तेरह डिबिया तेल जरि जेतह। हमरो घरबला ऐ कमतिया हबेलीक अढ़ौती आ बेगारी खटैत-खटैत दुनियाँसँ चलि गेला। एक मन मरूआ आ दू मन धान कर्जामे नेने रही तेकर सुदिक सुदि जोड़ि कऽ कर्जे तरमे दस कट्ठा चौमास आ दू कट्ठा बासडीहो लिखा हरैप लेलक। ई जे हमर डीहबास देखै छहक से सरकारीए परती छिऐ। घरबलाक मुइला पछाइत जखन बास डीहपर सँ भगा देलक तखन हमर दुनू बेटा माथपर छिट्टामे माटि उघि-उघि भरि कऽ बाँस-खुट्टा ऐ समाजसँ मांगि-चांगि कऽ घर बनौलक आ हमहूँ बुढ़ारीमे राति दिन संग देलिऐ। दुनू बेटा कमतिया हबेली आइ धरि घुमि नै गेल। काजे ने एतेक सीखौने छी जे कहियो बैस नै खाइए। काजक लूरि रहने काजे चढ़ल रहैए। तूँ हबेलीक फेरमे लगले छह।" बिच्चेमे जानकी बजली- "दादी, हम कमेलहा बोइन नै छोड़बै। हमरोसँ सूदिक सूदि जोड़ि नेने अछि। आइ जँ हमहूँ कहिये देलिऐ जे बोइन राखू दू मनक तीन मन असूल कऽ लेब, अहाँक अन्नो-पानि दुना-तिगुना बढ़ि जाइए आ गरीबक बोइन जे छह मास, साल भरिक पछाइत देबै तँ ओकर सूदि नइ हेतइ। हमहूँ सूदि लगा कऽ लेब।" मदीना दादी बजली- "सुना कऽ कहलहक की नहि?" जानकी बजली- "सुना कऽ! चिकैर कऽ कहलिऐ। जहाँ ने कि सुनलक कि जेना बिढ़नी कटलापर लोक छिटपिटा उठैए तहिना छिटपिटा लगल। मुदा किछु कहैक साहस नै भेलइ। जँ किछु बजितए तँ समाजसँ दस बेकतीकेँ बजा पानि उताइर दैतिऐ।" मदीना दादी बजली- "साँझ पड़ि गेल। छोड़ह अखैन हबेलीक गप-सप्प। जेते काल ओझराएल रहब तेते काल घरक काज पाछु पड़ि जाएत। सौंझुका पहर बीतल जाइए, पहिने घरमे साँझ-बाती देखा लइ छी।" जानकी बजली- "दादी, हमहूँ जाइ छी साँझ-बाती दइले। अबेर भऽ गेल। चिल्हको सम्हारब आ भानस-भात करब। काजपर सँ घरबला अबै छैथ तँ सबेरे खा कऽ सुतै छैथ। मुदा कमतिया हबेलीक किरदानी कहियो फलिसँ सुना देब।" मदीना दादी बजली- "कहियो किए बजलह, आइ अबेर भऽ गेल आ अखन गपक बेर नै काजक बेर छी तँए, अखन तहूँ जा काल्हिये दुपहरियामे अबिहह फलिसँ सभ गप सुना देबह।" मदीना दादीकेँ गोर लागि जानकी अपन घर दिस विदा भेली। कमतिया हबेलीक किरदानी बुझैक जिज्ञासा मनमे बढ़िये गेल छेलैन। मनमे होइत रहैन जे कखनी राति बितत जे काल्हि दुपहरमे दादी लग जाएब। सभ काज सम्हारि भानस-भात कऽ पतिकेँ खीआ अपनो खा कऽ सुति रहली। भिनसरे उठि हाँइ-हाँइ काज कऽ पनपिआइ आ खेनाइ बना काजसँ निवृत्त भऽ गेली। चिल्हका नेने दुपहरियेमे दादी लग पहुँचली। मदीना दादी नहा-खा हुक्कामे चिलम बोझि सोंट मारि सुनगबै छेली। दादी जानकीकेँ अबैत देख बजली- "कनियाँ, पुबरिये ओसरापर बैसह। किए तँ तोरा कोरामे चिल्हका छह एतए बच्चाकेँ हुक्काक धुइयाँ लगि जेतह। हमहूँ उठि कऽ पुबरिये ओसरपर अबै छी। अखैन कोनो काजो नहियेँ अछि। निचेनसँ गप-सप्प करब।" जानकी बजली- "दादी, अहाँ ने काजसँ निचेन छी मुदा हम तँ असगरूआ छी, बहुत काज पछुआएल अछि। तोहूमे अपने परदेश जाइबला छैथ। हुनको ओरियान करए पड़त। हम तँ कमतिया हबेलीक किरदानी जनैले अहाँ लग एलौं हेन। काल्हि ने हमरा आ ने अहाँकेँ समय रहए जे बता दइतौं।" मदिना दादी बजली- "चटपट नै करह कनियाँ, पहिने कनी हुक्का पीअ दएह तखन निचेनसँ गप करब।" मदीना दादी जोर-जोरसँ सोंट मारि हुक्का पीबए लगली। चिलमक कंकर जरि गेल तखन हुक्का मोख लग गड़ लगा ठाढ़ कऽ पुबरिया ओसारपर आबि चटकुनी बिछा बैसली। दुनू गोरेमे चौबगलीक गप-सप्प शुरू भेल। जानकी चारू कातक गपक भूमिका बान्हि कमतिया हबेलीक केन्द्र बिन्दु बना मदीना दादीसँ पुछि देलखिन। मदीना दादी बजली- "जखन भागवतक कथा जकाँ कहबह तँ सुनबहक तँ मुदा एक कानसँ सुनबहक आ दोसर कानसँ बोहि जेतह। से नहि तँ तपसी जकाँ धियान लगा सुनबहक तखने किछु जानबो करबहक आ हमरा मुइला पछाइत गाममे तोहू ने दादी हेबहक, जेना आइ हम छी। गाममे केहेन-केहेन कारनामा सभ भेल मुदा लोक सहैत रहल, ने कियो बुझैले तैयार आ ने कियो विरोध केलक। मुदा आजुक दिन किछु बदैल गेल आ लोकोमे विचारो बदललैए। जे नजायजकेँ विरोध करए लगलैए। तैयो समाजमे पछुआएलकेँ मौजरे केतेक छै जे विरोध करत। अखनेा गरीब लोकक डेग-डेगपर शोषण होइ छै आ ओ देह लगा सहैत रहैए, ओकर संगो दइबला कियो ने तैयार होइ छइ।" कनखरल जानकी बिच्चेमे पुछि देलखिन- "दादी, की गरीबक मुँहमे बोली नै छै, की विवेकक कमी छै जे एतेक दुख सहितो शोषित होइए। आखिर एकर कारण की अछि?" मदीना दादी जोरसँ हुंकार भरैत बजली- "सुनह तेकर कारण कोनो एकेटा छै जे झब-दे कहि देबह। बहुत रास कारण छै। एकरा लग महाभारतो फेल अछि। मुदा हमरा जे बुझल आ अनुभव कएल अछि तेकर एकटा अंश कहै छिअ। पहिने- राजा महाराजाक शासन चलै छेलै हुनका सबहक कानून बड़ कठोर! छोट-छोट गलती करैबलाकेँ नमहर-नमहर सजा भेटै छेलइ। लोक ओइ कठोर दण्डक डरसँ विलाइ बनल रहै छल। खेतक मलगुजारी बड़ करगर छेलइ। जइ साल उपजा होइ छेलै तइ साल तँ कहुना लोक मलगुजारी दइये दइ छेलै मुदा जइ साल रौदी वा दाही होइ छेलै तँ मलगुजारी चुकता नै कऽ पबै छेलइ। पहिने खेतीक अलावा ने दोसर कोनो साधन छल आ ने कोनो रोजगार, जइसँ लोक कमा कऽ पेट भरैत। गामक गाममे भुखमरी होइ छेलइ। गरीब लोक सभ बाल-बच्चा आ अपन घर-परिवार छोड़ि ढाका-मुंगेर, मोरंग कमाइले चलि जाइ छल। गामक जमीनदार कर्जे तरमे गरीबक सभटा जमीन लिखा हड़ैप लेलक। मलगुजारी नइ देलापर राजा सेहो खेत सभकेँ निलाम कऽ लइ छल। ओ जमीन सभ अपन लगुआ-भगुआ सभकेँ दऽ दइ छल। ओही निलामीबला जमीनक जागीर बना केतेको जमीनदार बनल। किछु लोक मुंशी-मनेजर आ शर्कलक हाकीमसँ मिलि कऽ गरीब आ किसानक जमीन जे निलाम होइ छेलै ओ कनी-मनी रूपैआ दऽ अपना-नामसँ जमीनक पट्टा बना लइ छेलइ। ऐ तरहेँ मिथिलाचंलक मूलवासी गरीब भऽ गेल। बहुतो डीहबासु सभ भूमिहीन बनि बिलैट गेल। जे जमीनबला छेलै से गरीब मजदूर भऽ गेल आ बाहरसँ आबि कमतिया सभ जमीनदार भऽ गेल। ओ सभ अपन-अपन कामत बना रहए लगल। ऐठामक भूमिहीन मजदूर पेटक खातिर कमतिया सबहक खेतमे मजदूरी, बेकारी, नोकरी-चाकरी करै छल। कमतिया सबहक धिया-पुता पढ़ि-लिख आनठाम हाकिम-हुकाम बनि शहरमे रहैए आ कामतक जमीनक उपजासँ नेहाल भऽ गेल। तैयो संतोख नै भेलै। ऐठामक गरीब-मजदूरकेँ कर्जेतरे बेगारी खटैत-खटैत कहियो पर नइ भेलै जे विरोध करितै। जखन देश अजाद भेल तेकर किछु बर्खक पछाइत गरीब-मजदूरक यूनियन बनलै। कम्युनिष्ट पार्टीक लोक सह देलकै। गामे-गाम कमतिया सबहक जमीनपर लाल झंडा गारि डंका बजा-बजा चुनौती देलकै। खेतक उपजाकेँ लूटिस करौलक। तखन किछु कमतियाकेँ कमेदाममे जमीन बेचए पड़लै। मुदा जे कमतिया अपना सबहक समाजमे हिल-मिल रहए लगल ओ सभ कोठा-सोफा बना डीहबासु भऽ गेल। मुदा चालि-चलैन पूर्णत: नै बदललै। कहबी छै- चालि, प्रकृति आ बेमाए ई तीनू मुइने जाए। लोक सभ जे कहौ मुदा हम तँ सभ दिन कमतिया कहलिऐ आ अखनो कहै छिऐ। तूँ सभ ने धनिक आ कोठा-सोफा देख हबेली कहै छहक।" बिच्चेमे जानकी बजली- "दादी, अहाँक बात सुनि बहुत जानलौं मुदा अहाँ कमतिया कहै छिऐ आ हम हबेली कहै दिऐ, तखन दुनू जोड़ि कऽ कमतिया हबेली बाजब नीक नै हएत की?" मदीना दादी बजली- "बजबाक लेल मुँहक कोनो भाड़ा-खर्चा लगै छै, जे मन हुअ से बाजह मुदा उचित बुझि बाजबह तखन ने समाजोक लोक सीखत। इएह उनटा-पुनटा भेने ने आइ मिथिलाक लोक आनठामसँ बेसी गरीब अछि। जेकर सुधि आइ धरि कियो ने लेलक।" ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राम विलास साहु केर पाँचटा कथा कथा २
दुधबेचनी चलितर आ पवितर दुनू भाँइक समल्लिते कमौआ परिवार अछि। माए-बाप पहिनहि स्वर्गवास भऽ गेलखिन। एकटा बहिन- रीता जुआन अछि। बड़ लूरिगर-कमासुतनी सुन्नर अछि। मुदा पढ़ल-लिखल नै रहने बिआहक गड़े ने लगैए जे लग्न ठेकत। नारेदिगरमे सम्पन्न परिवार हिरालालक छैन। हुनका एकेटा बेटा- सोनेलाल, परिवारो नीक गुणगर अछि आ धनक कोनो कमीए ने। मुदा बेटा मतिछिन्नु, बिआह हेबे ने करए। चलितर-पवितरकेँ गड़ लगल, ओ अपन बहिनक बिआह सोनेलालसँ बिनु दहेजक केलक। रीता सासुर बसए लगली। समय पाबि सासु-ससुरक सेवा टहल सेहो करए। उत्तम विचार मनमे रखने आ करितो। दू बर्खक पछाइत वसन्त पंचमी दिन रीताकेँ जौंआँ दूटा बेटा भेल। परिवारमे सभ कियो खुशीक माहैल बनौने। छठीहार दिन भोज-भण्डाराक सरमजान करए लगल। धुमधामसँ छठीहार मनौल गेल। गौंआँ सभ कहए जे भगवानो जेकरा दइ छथिन तेकरा छप्पर फारि कऽ। मुदा रीताक परिवारमे ई खुशी बेसी दिन नै रहल। तीनिये बर्खक पछाइत सोनेलालक मति आरो बिगैड़ गेल। राज-राजक इलाज आ सिद्ध ओझा-गुनीसँ झाड़-फूक करौलक मुदा सुधरल नहि, मरि गेल। पुत्रक सोगमे हिरालाल दुनू परानी सेहो मरि गेला। पति, सासु-ससुरक इलाज श्राद्ध-कर्म आ भोज-भातमे तेते ने खर्च भेल जे रीताक धन हहैर गेल। बहुतो घरक समान आ जमीन-जत्था बीकि गेल। ने घरमे बुढ़-बुजुर्ग रहला आ ने गार्जन। मसोमाती राज, ने कियो कहनिहार ने सुननिहार। तैयो रीता धीर-गम्भीर बनि अपन सुझ-बूझसँ परिवारकेँ आगू मुहेँ ससारैत रहली। दुनू बेटाक लालन-पालनमे कोनो कोताही नइ हुअ देलक। पाँच बर्खक पछाइत दुनूकेँ गामक स्कूलमे पढ़बए लगल। घर-गिरहस्ती आ खेतीक काजक लूरि रीता नैहरेमे सीखने छेली, तँए घर भरल-पुरल रखने। मुदा 1954 ईस्वीमे कोसीक बाढ़ि-पानि तेतेक ने आएल जे सम्पूर्ण नारेदिगरकेँ तहस-नहँस कऽ देलक। रीताक जमीन कोसीक पेटमे समा गेल आ जे बँचल से बालुक बुर्जा बनि गेल। खट्ठा, काश, पटेर आ झौआक बोनक अलाबे किछु ने देख पड़इ। रीताक चास बिलैट गेल। अल्हुआ, सुथनी, मरूआ, कौउन आ कोदो उपजा कऽ रीता जीवन चलबए लगली। दुख-पर-दुख बढ़ितो रीता जिनगीसँ हारि नै मानली। किछु दिनक पछाइत जन- मजूरी कऽ घरक खर्च चलबए लगली। रीताक मन मोहिया कऽ घुरियाए लगल। मोहियाइते मन घुमि कहलकै- दू-चारिटा लगहैर गाए-महींस पोसब। रीता अपन गहना बेच दूटा महींस आ तीनटा गाए कीनि सेवा करए लगली। घासक कोनो कमीए ने छल। घास काटि-काटि गाए-महींसक आगू ओगारबो करए आ एक साँझ चरेबो करए। दूध बेच कऽ गुजर करए लगली। नीक आमदनी हुअ लगल। दूधक कारोबार देख रीताकेँ लोक दुधबेचनी कहए लगल। दुधबेचनी सुनि रीताकेँ खुशीए होइत। मनमे होइत रहैन घूसखोरनी आकि घूसखौकासँ सात कच्छे नीक अछि किने। बेटाकेँ पढ़बै खातिर रीता दिन-राति अपन काजमे मनसँ लागल रहै छेली। दुनू बेटा जहिना देखै-सुनैमे नीक तहिना पढ़ैयोमे चन्सगर। बपटुगर रहितो दुनू बेटाकेँ रीता दरभंगामे राखि पढ़बए लगली। कोनो दिक्कत नै भेने फस्ट डिविजनसँ पास करैत एक भाँइ बी.एस-सी आ दोसर बी.कॉम कऽ नोकरी तलाशए लगल। नोकरीक कम्पेटिशन परीक्षामे एक भाँइ रेलबेमे आ दोसर भाँइ बैंकमे कमप्लिट केलक। दुनू बेटाकेँ आन प्रदेशमे नोकरी भेल। दुनू भाँइ अपन-अपन बिआह अपने मने परदेशेमे कऽ लेलक आ परिवार बसा-बसा दुनू भाँइ सुख-मौजसँ रहए लगल। बुढ़ माएकेँ के देखैए। दुनू भाँइ अपन-अपन काज आ परिवार लऽ कऽ उगए-डुमए लगल। धीरे-धीरे अपन गरीबीकेँ जहिना बिसरए लगल तहिना माइक कष्टकेँ सेहो बिसैर गेल। झुनकुट बुढ़ भेने रीताक समांग खसि पड़ल। समांग खसने रीताकेँ ने काज करैक शक्ति आ ने गाए-महींसक सेवा-टहल करैक इच्छा-शक्ति रहल। अपन आगूक जिनगी केना चलत आ के सहारा करत तेकर चिन्ता बढ़ि गेल। शारीरिक शक्ति घटने रीता सोचए लगली जे अपन कर्तव्य तँ हम इमान राखि बेटा लेल केलौं मुदा बेटाक धरम ने चाही जे अपन माइक दूधकेँ मोन राखत। जे बेटा दूधक कर्ज नै चुका सकैए ओ...। बेटा लेल जेते केलौं तेते जँ समाज लेल करितौ तँ अपन कल्याण संगे समाजोकेँ कल्याण होइतए। बेकती खराप भऽ सकैए मुदा समाज नहि। तखन समाजक शरणमे जा कसि कऽ पकड़ब सही हएत। ओना, समाजोमे तँ अपन प्रतिष्ठा अछिए। ने केकरो धारने छी आ ने केकरोसँ उकटा-पुकटी कहियो भेल। हम अपन जिनगीकेँ काजमे लगौने छी तखन के हमरा अकठाह की अनटाह कहत। हम की कोनो जिनगीकेँ उखठाह बनौने छी जे कियो जरत-मरत। अपन जिनगी तँ सरल सरस अछिए, जरूर समाज संग देबे करत। रीता सोचि विचारि दोसर दिन समाजक लोक सभकेँ बैसा बजली- "हम समाजक बीच रहि जिनगी बितेलौं। अपन शरीरसँ कमा परिवारकेँ आगू ससारलौं। मुदा हमर समांग खसि पड़ल। बेटा-पुतोहु सभ जे करैए से अहाँ सभक सोझहेमे अछि। जखन बेटा लेल एते केलौं तँ हमर धरम बनैए जे समाजक लेल सेहो किछु करी।" तैबीच बेचन बाजल- "अपनेक इच्छा की अछि से खोलि कऽ आगू बाजू।" रीता बजली- "हमर अन्तिम इच्छा अछि जे अपन खेत-पथार-डीह-डाबरक संग गाए-महींस सभ किछु समाजकेँ सौंपि दी। जइमे एकटा गोशाला आ एकटा स्कूल बना दिऐ, जेकर कागज हम समाजकेँ बना देब।" समाजक सभ कियो सर्व-सम्मैतसँ विचार मानि लेलक। तैबीचमे रामरीत आगू आबि बाजल- "गोशाला आ स्कूल, दुनूक खगता समाजमे अछि। गोशालाक आमदनीसँ गरीबक धिया-पुता पढ़बो करत आ गाए-महींसक सेवो करत।" बिच्चेमे एक बेकती ठाढ़ होइत बाजल- "बड़ सुन्नर विचार। जखन एकटा दुधबेचनी एतेक तियाग करैले तैयार अछि समाजक खातिर तँ हम समाज मिलि हिनकर सभ सेवा-टहल जिनगी भरि निमाहब। दुधबेचनी गामक इज्जतकेँ बढ़ौलक। धन आ ज्ञान दुनूकेँ बढ़बैले जे प्रण लेली अछि ओ साक्षात् लक्ष्मी-सरस्वतीक देवी भेली किने।" समाजक लोक देवी रूपमे दुधबेचनी- रीताकेँ माला पहिरा समाजमे घुमबए लगल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राम विलास साहु केर पाँचटा कथा कथा ३ स्वर्गक सुख कोसी नदीक छीटपर बौकू सदाय खोपड़ी बना रहै छल। अगल-बगलमे आरो लोक सभ काश-पटेरक खोपड़ी बना रहै छल। कोसीक कटनियाँ भेने मुसहरी टोल उजैर गेल। माघ मासक समए। वस्त्रक अभावसँ जाड़क मारल बौकू ठिठुरैत घूर तपै छल। जखने घूरमे आगि देलक आकि बौकूक बेटा-बेटी सटि कऽ बैस आगि खोरि-खोरि तापए लगल। पत्नी बलबावाली खोपड़ीसँ बकरी निकालैत जोरसँ बजली- "रातियोँ सिदहाक अभावमे सभ कोइ भुखले सुति रहलौं, आब दिनोमे बाल-बच्चा की खाएत। भूखसँ तरैप की बाल-बच्चाक संगे कोसीमे डुमि मरब।" बौकू सदाय बाजल- "भोरे-भोर एहेन अशुभ बात नइ बाजू। शीतलहरी भरि कोनो तरहेँ परान बँचाउ। परान बँचत तँ लाखो उपए करब। कनिक्को समए फरिच हेतै तँ खाइ-पीबैक जोगार करब। एक तँ कोसी मैयाक मारल छी दोसर भगवानो बेमुख अछि।" शीतलहरीक कोनो ठेकान नइ अछि मुदा भूख तँ समैपर लगिये जाइए। बेटा-बेटी रातिमे किछु ने खेलक। भिनसर होइते जोर-जोरसँ खाइले माँगए लगल। बलबावाली पड़ोसीसँ दू सेर अल्हुआ पैंच आनि घूरक आगिमे पका-पका बेटा-बेटीकेँ देलक। अपनो दुनू परानी खेलक। ऊपरसँ पानि पीब-पीब भूख मेटेलक। कुहेस कमिते रौदक दर्शन भेल। बलबावाली पतिकेँ कहलकैन- "दू दिनसँ सुखल रोटी आ अल्हुआ खा कऽ कोनो तरहेँ दिन कटलौं मुदा आइ भातक कोनो जोगार करू।" बौकू जाड़क कोनो परवाह नइ करैत धोतीक तर-ऊपरा ओढ़ैत बाजल- "सब मिलि चलू परसा चौरीमे धानो लोढ़ब आ घोंघी-डोका सेहो बीछि आनब।" साबिकेसँ परसा चौरीक सिंगरा-बेलौड़ आ सतराज धान नामी अछि। चौरी पहुँचते बौकू बेटा-बेटीकेँ कहलक- "तूँ सभ घोंघी-डोका बीछि-बीछि छिट्टामे राख आ हम दुनू गोरे धान बीछै छी।" दुनू गोरे मिलि करीब पसेरी भरि धान लोढ़लक। बेटा-बेटी घोंघी-डोका छिट्टामे उठौलक। जखन घर चलैले तैयार भेल तँ बौकूक पत्नी बजली- "सुतैले एकेटा गोनैर अछि। किछ नार सेहो नेने चलू। बिछौना मोटसँ देबै। " नार बीछैकाल बौकू एकटा अढ़ैया भरिक कौछकेँ देखलक। देखते बौकू कौछकेँ उनटौलक। कौछकेँ उनटा देने भागल नइ होइ छइ। उठा कऽ तौनीमे बान्हलक। धान आ नार पत्नीक माथपर देलक आ अपने बौकू घोंघी-कौछ लऽ बेटा-बेटीकेँ संग केने विदा भेल। घर पहुँचते धान रौदमे पसारलक। पड़ोसीसँ उक्खैर-समाठ आनि धान-कुटि कऽ चाउर तैयार केलक। कौछक मासु बना रान्हलक। दोसर बरतनमे भात रान्हलक। सभ कोइ संगे खेनाइ खाइले बैसल। जाड़क समयमे सिंगरा-बेलौड़ आ देसहरिया धानक चाउरक लाल-लाल भात तेलगर आ स्वादिष्ट होइते अछि। तैपर सँ कौछक मासु अपने तेलसँ ऐंठल-ऐंठल, भातपर पड़िते भातो तेलसँ तर-बतर भऽ गेल। बौकू बमरोटिया हाथसँ भात-मासु बँटबो करए आ खेबो करए। खेनाइ अधपेटा भेल तँ पानि पीब पियास मिझा नहमर साँस लैत बाजल- "एहेन खेनाइ भागशालीए लोक खाइए। राजा-महराजाकेँ नशीव नइ होइ छइ। ई खेनाइ देखते केहेन-केहेन साधु-बबाजीकेँ सेहो मन ललिचा जेतइ।" भोजन केलापर बौकू घूर पजारि देह टनकौलक। बलबावाली अरामसँ सुतैले ठेहुन भरि नार बिछौलक आ बाल-बच्चाक संग ओइपर सुतल। आ ऊपरसँ गोनैर ओढ़ि लेलक। कनीकालक पछाइत सबहक देह गरमा गेलइ। बलबावाली हाफी करैत पतिकेँ कहली- "औझका मेहनत साफल भेल। एहेन बिकट समयमे एहेन खेनाइ आ एहेन ओढ़ना बिछौना मिलल।" नीक अवसर देख बौकू बाजल- "ई छी स्वर्गक सुख। एहेन सुख रजो-रजबारकेँ सुन्दर महल आ सजल पलंगपर नइ भेटैए। अपना देखियो तर नारायण आ ऊपर गोविन्द छै आ बीचमे बौकूक परिवार अरामसँ सुतल छइ। नइ कोनो डर-भर छै आ बगलेमे कासी मैयाक दिन-राति पहरा पड़ै छइ।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राम विलास साहु केर पाँचटा कथा कथा ४ घुसहा घर मुखियाजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल ढोल्हो दियौलैन। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचला। सभाकेँ सम्बोधित करैत मुखियाजी बजला- "ऐ बैसारमे सभ कियो मिल निर्णए लिअए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जिनकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ, ओइ बेकतीक सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्दिरा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतैन।" वार्ड सदस्यक सहयोगसँ मुखियाजी लग इन्दिरा आवासबला सूची पहुँचल। बिहानेसँ मुखियाजीक दलाल सभ सूचीमे नामांकित बेकतीसँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि देलक जे फार्म भरि कऽ मुखियाजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दिअए पड़त। तखन इन्दिरा आवास भेटत।बहुत गोटे तँ अपन गाए-महींस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। किछु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचित रहि गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक। किछु दिनक बाद रघिया मसौमात इन्दिरा-आवास ले फार्म भरि मुखिया जी लग पहुँचली। मुखियाजी फार्म पढ़ि बजला- "पहिले इन्दिरा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालिस हजार भेटै छै मुदा आगूसँ साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्चीसमे पाँच हजार आ अखन चालिसमे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।" रधिया सुनिते कानि-कलैप कऽ अपन मजबूरी सुनौलकैन। मुखियाजी मुड़ी डोलबैत बजला- "यइ काकी, हमरे केने नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकिम-हुकुम बैसल छइ। ओहो तँ कटिया सोन्हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतइ। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे निमहै छिऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।" रधिया सभ बात सुनि परिस्थिति बुझि आपस आबि गेली। बुधनी बुढ़िया गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनियेमे घरबला बाढ़िमे डुमि कऽ मरि गेलखिन। दूटा बेटाक संग बुधनी कहियो हिम्मत नै हारली। संघर्ष करैत आत्म-निर्भरतापर धियो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छैथ। हलाँकि आर्थिक रूपे कमजोरे छैथ। एक दिन मुखियाजीक नजैर बुधनी बुढ़ियापर पड़लैन आ देखते पुछलखिन- "गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन आ दोसर इन्दिरा आवासक।" बधनी बजली- "ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?" मुखियाजी- "हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच साए आ इन्दिरा-आवासमे पनरह हजार।" बुधनी- "हम ई लाभ नै लेब।" मुखियाजी- "किए नै लेब?" बुधनी- "घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?" मुखियाजी आ बुधनी बुढ़ियाक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधिया मसोमात सुनैत छेली अपना मनकेँ बुझबैत बजली- "इन्दिरा आवास किए घूसहा घर कहियो ने।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.राम विलास साहुक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राम विलास साहु केर पाँचटा कथा कथा ५ शिक्षाक महत जीबछ घरजमैया छल। हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि छल। रधियाक पिताकेँ चारि बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल। खेती-बाड़ीसँ जिनगी चलै छेलैन। सोझमतिया रहने कोनो छल-कपट नै रहैन। पितमरू छला। परिवारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहैन खाली जीबछ ट-ब कए कऽ साक्षर छल। रधियाक पिता जरूरत पड़लापर जखन समाजमे कोनो लेन-देन करै छला तँ औंठेक निशान दइ छला। एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि-पानिसँ दहि गेलइ। ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलइ। दोसर साल रौदी भऽ गेलइ। एक तँ बाढ़िक मारल, दोसर रौदीक जरल। गरीब-गुरबाकेँ गुजर कटनाइ पहाड़ भऽ गेलइ। केतेको परिवार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा किछु दिन समए कटलक। मुदा ई सुविधा सबहक नशीव नै छेलइ। गामक नमहर जमीनदार, मालिक-गुमस्ता जे छला हुनका तँ पहिलुके सालक पुरना अन्न बखारीक-बखारी भरल छेलैन। हुनका सभकेँ कोनो चिन्ता नै छेलैन। रधियाक माए-बाप बुढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत। ओ दुनू गामेमे मालिकसँ कहियो मरूआ तँ कहियो धान तँ कहियो छाँटी चाउर कर्जा लऽ समए काटै छल। कर्जा देनिहार मालिक सभ विपतिक समयमे गरीबक शोषण सेहो करैत। एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत। तेकर बादो औंठाक निशान एकटाकेँ के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लइ छेलखिन। गरीब अपन परान बँचाएत आकि छापक परबाह करत। कर्जा खेनिहार थोड़े बुझै छल कि छाप देबै कागतपर आ हमर जमीन जत्था चलि जेतै तक्खापर। एक दू साल समए बितलै। जीबछ अपन सोसराइरेमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी कऽ गुजर-बसर करै छल। किछु समए पछाइत सासु-ससुर मरि गेलखिन। श्राद्ध-कर्मसँ निवृत भेले छल आकि गामक मालिक-गुमस्ता लोकैन अपन-अपन कागत लऽ जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला। कर्जा तँ करारीपर देने रहैन। ओ समय बीति गेल छल। कर्जा खेनिहार पहिले कागतपर छाप देने रहैन। ओइ कागतपर मालिक-जमीनदार लोकैन जमीनक खाता-खेसरा रकबा लिखि कऽ अपन नाओं कऽ लेलैन। गरीब सबहक जमीन मालिक-गुमस्ता हरैप लेलकैन। जइमे रधियाक जमीन सेहो चलि गेल। आब जीबछ-रधियाकेँ दूटा बेटी, एकटा बेटा आ परिवारक भरन-पोषण करनाइ कठिन भऽ गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि गेल। बाहरमे पढ़ल-लिखल आदमीकेँ नोकरी जल्दीए होइ छेलै आ बेसी दरमाहा सेहो भेटै छेलइ। जीबछ बेसी पढ़ल तँ नै मुदा साक्षर छल। जइसँ शिक्षाक महत जिनगीमे केतेक होइ छै से मोने-मन महशूस करै छल। जीबछ ट-ब-ट काए कहुना कऽ चिट्ठी लिखि घर पठेलक। ओइमे बेटा-बेटीकेँ पढ़बैले रधियाकेँ प्रेरित करैत कहै छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए कऽ पठाएब मुदा अहाँ धिया-पुताकेँ पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब। रधियो मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शिक्षाक बड़ महत छइ। जे हम आ हमर माए-बाप जँए नै पढ़ल छेलौं तँए ने सभटा जमीन मालिक-गुमस्ता हरैप लेलैन। जखन पढ़ल रहितौं तँ ई मुसिबत नै अबिताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा धिया-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब। अइले हमरा जे परिश्रम आ तियाग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दिन अपन धिया-पुताकेँ समैपर संगे जा स्कूल पहुँचाबए लगली। रधियाक टोलेमे बुच्ची बाबू छला। बुच्ची बाबू अंचलमे बड़ाबाबू छैथ। छुट्टीमे घर आएल छैथ। हुनका काल्हि भोरे ट्रेन पकैड़ ड्यूटीपर जेबाक छेलैन से रधियाकेँ कहलखिन- "रधिया, किछु समान अधिक अछि। गाममे कएक गोटेकेँ कहलिऐ जे काल्हि भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी समान स्टेशनपर पहुँचा दिअ, मुदा कियो तैयार नै भेल। तूँ कनी पहुँचा दइ। हम तोहर बड़ उपकार मानबो।" रधिया बाजल- "ठीक छै, कअए बजै चलब। कहि दिअ हम समान पहुँचा देब।" बुच्ची बाबू बजला- "सात बजे भोरेमे चलब। किएक तँ आठ बजेमे ट्रेन छइ। तीन-चारि किलो मिटर स्टेशन दूरो छइ।" रधिया भोरे उठि सभ काज कऽ जलखै बना धिया-पुताकेँ खाइले दऽ बजली- "तूँ सभ जल्दीसँ खो, आइ कनी पहिनहिये तोरा सभकेँ स्कूल पहुँचा दइ छियौ, तखन बुच्ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब।" एम्हर बुच्ची बाबू तैयार भऽ रधियाक बाट तकै छला। पाँच मिनट पछाइत रधिया पहुँचली। बुच्ची बाबू तमसाइत बजला- "रधिया, तोरा कहने छेलियौ साते बजै चलैले, देरी भऽ गेल। ट्रेन छुटि जाएत। तोरा कोनो चिन्ता नहि।" रधिया बजली- "अपने तमसाउ नहि। धीरे-धीरे बढ़ू हम समान लेने लफरल पिट्ठेपर आबि रहल छी। कनी धिया-पुताकेँ स्कूल पहुँचबैमे देरी लागि गेल।" बुच्ची बाबू- "पहिले समान पहुँचा दइतैं, हमरा ट्रेन छुटि जाइत। एक दिन तोहर बेटा-बेटी स्कूल नै जेतौ तँ की हेतइ। एक्के दिन कोनो पढ़ि कऽ कलक्टर बनि जेतौ?" रधिया मोने-मन सोचए लगली, कहै छिऐन आगू बढ़ैले से उठिये ने होइ छैन। हम तँ लफरल हिनकासँ पहिनहि पहुँच जाएब। ट्रेन थोड़े छुटतैन। अपने बेगरते आन्हर छैथ। अनेरे गछलौं। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- परिस्थितिजन्य कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा परिस्थितिजन्य सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के पुरस्कार लऽ मंच सऽ उतरिते प्रेसक कैमरा के असंख्य चमक आ पत्रकार सभ स' घेरा गेलाह। प्रश्नक झड़ी मे एकटा प्रश्न एलै - 'आहाँ ब्लॉग लिखबा लेल कोना प्रेरित भेलहुँ?' किछु पल गुम्म रहि भहरल स्वरें बाजब प्रारम्भ केलनि - 'सत्य पूछी .... तऽ हमर परिस्थिति .... मजबूर कऽ कऽ .... धकेलि देलक हमरा एहि दिस। हमर जीवन-संगिनी ...... जीवन भरि हमर संग नहिं दऽ .... बिच्चे मे .... असगर छोड़ि चलि गेलीह। बेटा-बेटी के .... अपन-अपन परिवार; अपन-अपन दुनियाँ! .... जेनेरेशन गैप से फराके...... आ स्वभाविको! हमर के सुनय? सेवा-निवृतिक पछाति .... हमर संपूर्ण दुनियाँ मे रहि गेल एकमात्र भरथा! .... ओहो नहिं जानि पूर्व जन्मक हमर ऋणी छल वा की....... से नहिं कहि! वैह हमर मित्र, हमर सेवक, हमर सहच र....... जे बुझी .......सभ किछु! ओ भानस बनबैयै .... आ तैं हम खाईत छी। कान सऽ ओ ऊँच सुनैयै .... तैँ ओकरा संग गप्प कईये ने सकैत छी। तैं ....... दिन कटबा लेल ब्लॉग अनमेना बनल.........!' गहींर निसाँस छोड़ि शून्य मे ओ किछु ताकय लगलाह। आब प्रश्न आ उत्तर दुहू बौक छल। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- थाहल संग जगदीश प्रसाद मण्डल
थाहल संगी सुजीत काका विचारक ओइ दुनियाँक पहुँचल लोक, जैठाम पहुँचला पछाइत नइ बुझि पड़ैत जे ओ दोस्त-दुश्मनक बीच छैथ कि दुश्मनेक बीच छैथ आकि दोस्तेक बीच छैथ। आनकेँ बुझैमे जे होनि मुदा सुजीत काकाकेँ अपनो तँ बुधि-विवेक छैन्हे। अपने बुधि-विवेक ने अपन दोस्तो छी आ दुश्मनो छीहे। नीकक बाट पकैड़ दोस्त बनैए आ अधला बाट पकैड़ चलने दुश्मन बनैए। ओना, सुजीत कक्काक अपन जीवनो छैन आ जहानो छैन्हे। जीवनो तँ जीवन छीहे, असगरोक होइए आ समूहोक होइए। भलेँ दुनू रंगक किए ने हुअए मुदा दुनूक बीच अपन-अपन सीमा सेहो अछिए। आने दिन जकाँ सुजीत कक्काक दरबज्जा लोकसँ भरल रहैन। अपने पहुँच देखलौं तँ बुझि पड़ल जे आधासँ बेसी लोक ओहन छैथ जे भरि दिन, परोछमे अदखोइ-बदखोइ सुजीत कक्काक बजै छैथ आ ऐठाम ठहाका मारि हँसबो करै छैथ आ भरि मुँह गप्पो-सप्प करिते छैथ। मने-मन सुजीत काकापर तामसो उठि रहल छल जे जहिना कोनो बाल-बोधकेँ चेष्टगर सियान झूठ-फूस बाजि पोल्हेबो करै छैथ आ प्रबोधवो तँ करिते छैथ, सएह स्थिति छैन। मुदा बजलौं किछु ने। महादेव जकाँ मने-मन अपन बीख पीब लेलौं। अखन तक ठाढ़े-ठाढ़ सभ तमासा देख रहल छेलौं। बजैत-बजैत सुजीत काका मुड़ी उठा तकलैन तँ सोझामे ठाढ़ देखलैन। अप्पन विचारक कड़ीकेँ मुँहक शब्दसँ जोड़नहि रहला मुदा हाथक इशारासँ लगमे आबि बैसैले कहलैन। आगू बढ़ि सुजीत कक्काक लगमे जा कऽ बैसलौं। मुदा मन चकोना होइते रहए। नजैरकेँ दौड़ा-दौड़ा सभपर दी, माने जेते गोरे सुजीत कक्काक दरबज्जापर बैसल रहैथ, रंग-बिरंगक चेहरा बुझि पड़ए। कियो घनिष्ठ संगी सुजीत कक्काक बुझि पड़ैत तँ कियो घोर-विरोधी। देख-देख मन कछमछाइते छल जे एहनाठाम किछु बाजब केना? देखते छी जे गाममे नीको काज होइए आ अधलो काज होइए। नीकक फल नीक होइए आ अधलाक फल अधला होइए। कहलो गेल अछि जे रोपे गुण फल होइत अछि। ऐठाम तँ नीको केनिहार छैथ आ अधलो केनिहार छथिए। नीक केनिहारकेँ नीक कहबेक अछि मुदा 'अधला केनिहारकेँ की कहब? जँ 'अधला' कहबै तँ अनेरे रक्का-टोकी हएत। रक्का-टोकीक की आड़ि-मेड़ अछि जे केते हएत। संयोग भेल, तैबीच सुजीत काका कबीर दासक विचारमे पहुँच बजला- "कबीर बाबा कहने छैथ, बिना साबुनक धुआइयेसँ, लगमे विरोधीकेँ रहने मनक धुआइ होइए।" ओना, सभ दिन सुजीत काका लग डेढ़-दू घन्टा बैस, अपनो जे नइ बुझै छी से पुछि लइ छिऐन आ आन-आनक संग सुजीत कक्काक विचार सेहो सुनै छी। सुजीत कक्काक विचार सुनि मनमे भेल जे पुछिऐन, मनक धुआइ भेने क्रिया-कलापक सेहो धुआइ भऽ सकैए। जँ मन साफे अछि मुदा क्रिया-कलाप गड़बड़, तखन एक-दोसराक सम्बन्ध-सूत्र केहेन बनत? आ जँ सम्बन्धे-सूत्र ढील-ढीलाह बनत तखन मजगूत जीवन केना बनि सकैए? मुदा लगले फेर अपने मनमे भेल जे अपने तँ पाछूकऽ एलौं हेन, जँ कहीं ऐगला एनिहारक विचारक क्रममे सुजीत काका होथि, तैबीच जँ अपने डीलरक दोकान जकाँ पैछला एनिहार पहिने लिअ चाहत तँ झंझट हेबे करत किने। ओह! जानिकऽ दोखी बनब नीक नहि। चुपे रहलौं। ओना, जानि-अनजानि लोक अपनो दोखी बनैक अधिकारी अछिए मुदा दोखी बनैसँ पहिनौं बहुत प्रक्रिया अछि। तहूमे प्राकृतिक प्रकोप तँ आरो बेसी अछि। देखते छी जे यएह दुनियाँ छी जखन लोक पत्थरकेँ पत्थरपर घँसि-घँसि हथियार बना शिकार करै छल, पछाइत लाखो बर्खक बीच की सभ भेल आ अखन देखते छी जे लाठी-फराठी कमि गेल अछि आ बम-बारूद बेसी भऽ गेल अछि। तहूमे ओहन-ओहन जइसँ गौंआँ-घरुआ आ अड़ोसी-पड़ोसीक कोन बात जे हजारो कोस हटल देश दोसर देशकेँ घरैया शिकार जकाँ शिकार करिते अछि। अपने बीतल एकटा बात, माने अपने जे गाममे भेल, मोन पड़ि गेल। भेल ई छल जे एकगोरेकेँ, दोसराक संग गलती करैत देख मुहेँपर कहि देने रहिऐ जे एहेन छुछुड़पना काज किए करै छह। अखन तक अपने बुझबे ने करै छेलौं जे शब्दक मिलानी मात्रसँ समाजो आ सत्तो चलैए। प्रीतमलाल माने जेकरा कहने रहिऐ, गामक छअचक्री लोक, कृष्ण जकाँ सुदर्शन चक्र नहि, मात्र ओइमे छबेटा डाँरि खिंचल छै, से भेल छहचक्री। तरे-तर कि केना भेल, से जखन तीन मासक जहल कटलौं तखन बुझलौं। अपनेटा बात नइ कहै छी, अपना सन-सन केतेको गोरे केतेको गाममे एहेन जहल कटने छैथ। आजुक परिवेश ओइ मोड़पर आबि ठाढ़ भऽ गेल अछि, जैठाम विनास-विकास दुनू अछि। मन तेना अपने घुरिया-मुड़िया गेल जे रसे-रसे दृढ़ भऽ गेल जे अबेर-सबेरक विचार केने बिना सुजीत काका ऐठामसँ नहि जाएब। पाछू-के एलौं, तँए हमर मनक प्रश्न पछुआ गेल, मुदा आवश्यक तेते अछि जे बिनु बुझने अन्न-तीमनक सुआद थोड़े बुझब, सोझे गीर लेब हएत। ओना, मन ईहो कहैत रहए जे अखन उचक्का सभ लगमे अछि, जँ सोझामे बाजी आ फेर जहल कटबैक ओरियान कऽ देत, तइसँ नीक जे अपन विचार पाछू काल-के राखब। जखने विचार पछुआएत तखने कच्छड़-मच्छड़ कटैबला सभ पड़ाएत। अपन विचारक प्रश्न छी अपने मुहसँ काकाकेँ पुछबैन, अपने कानसँ हुनक विचारो सुनब, पछाइत समयानुकूल डेग उठाएब। साँझक आठ बजि गेल। सौंझुका पूजाक घड़ीघन्ट केतेको देवस्थानमे बजि गेल। बेरुका मदभक्षी सभक मदक खुमार सेहो कमि गेलैन। जइसँ भोजन केला-पछातिक आराम करैक विचार मनमे उठि गेलैन। गामक बैसार कि कोट-कचहरीक बैसार छी जे निसचित समयपर चलत, ओ तँ गमैया धार जकाँ अछि जे छअ मास सुखल रहत आ छअ मास बहैत चलत। दुइये गोरे रहलौं, माने अपने आ सुजीत काका रहला। मनमे भेल जे अपने तँ जवान छी, तँए देहो ओते शक्ति पैदा करिते अछि, जइसँ एकाध घन्टा विलैमियोँ सकै छी, तहूमे मनक जिज्ञासा प्रबल रहबे करए। मुदा सुजीत काका तँ से नहि छैथ। श्रेष्ठ छैथ, उमरदार छैथ, जइसँ शिष्टपनसँ मानिते छिऐन, मुदा एते तँ पुछले जा सकैए जे 'काका, बड़ीकालसँ बैसल छी, पियास लगि गेल हएत।' मुदा सुजीत काका तँ अपने शिकारी छैथ, ओ मने-मन बुझि गेला जे किछु एहेन विचार मनोहरक मनमे उठि गेल अछि जेकर जवाब सुनैले मन कच्छड़ काटि रहल छइ। अपनो मन मानियेँ रहल छेलैन जे जखन जिनगीक कोनो ठेकाने ने अछि तखन तँ जे कऽ लेब तेतेकक हकदार तँ हेबे करब। सभ जनिते छी जे कियो करे आप ले माए ले ने बाप ले। संयोग नीक बनल, बुधियारि काकीकेँ जेना बुझले रहैन आकि की, दू-दूटा बिस्कुट दूटा प्लेटमे आँगनसँ दरबज्जापर पानिक संग पहुँचा गेली। जाबे दुनू बापूत बिस्कुट खा पानि पीलौं, ताबत दू कप चाहो बुधियारि काकी पहुँचा गेली। अपना बुझि पड़ल जे चाह-बिस्कुट खेला पछाइत दुनू गोरेक मन, माने अपनो आ सुजीतो कक्काक, एक्केरंग भऽ गेल। एकरंग होइते बजलौं- "काका, हमरे भ्रम भऽ रहल अछि आकि अहीं भरमा गेल छी, से बुझिये ने पेब रहल छी।" ओना, सुजीत काका बुझि गेला मुदा बुझल बातकेँ मनेमे दाबि बजला- "से की मनोहर?" बजलौं- "काका, अहाँ भलेँ बिसैर गेल होइ, मुदा अपने तँ भुक्तभोगी छी तँए जीवनमे केना बिसरब।" सह दैत सुजीत काका बजला- "हँ, से बिसरबोक नइ चाही।" सुजीत कक्काक विचार सुनि मन आरो दनदना गेल। दनदनाइत बजलौं- "काका, कनिये पहिने, जेते गोरेकेँ दरबज्जापर बैसल देखलौं, तइमे आधासँ बेसी ओहन लोक छल जे धोखाबाज अछि। एहेन लोक कखन संग रहत आ कखन वौआकऽ धोखा दऽ पड़ा जाएत, तेकर ठेकान नहि।" ओना, अपन विचारकेँ सुजीत काका कद्र केलैन मुदा अप्पन जीवन आ विचार तेतेक ऊपर उठि गेल छैन जैठाम एहेन-एहेन विचारो आ काजोकेँ तुच्छ मानल जाइए। तुच्छ मानब सोभाविको अछिए। कियो एकदिना जहल जाइए आ कियो नेलशन मंडेला जकाँ तीस बरख जहल काटैए, तैठाम दुनू गोरेक जहल काटब थोड़े एकरंग हएत। मुस्की मारि सुजीत काका बजला- "मनोहर, कियो चोर अछि कि डकैत अछि कि झुठे-फूस बजनिहार लबड़ा-लुच्चा अछि आकि छल-प्रपंची धोखेबाजे किए ने अछि, तेकर दुख-सुख अपने भोगत कि आन, हमर की लेत।" ओना, शब्दक शैलीमे सुजीत कक्काक विचार नीक लागल मुदा अप्पन तीन मासक जहल मनमे मनाही करिते रहल जे ऐठाम सुजीत काका विचारकेँ झाँपिकऽ बजला अछि। बीतल दिनक प्रमाण सभकेँ मने-मन एकत्रित करैत बजलौं- "काका, अपनो मानै छी जे पूर्वज सभ कण्ठ फारि-फारि कहने छैथ जे जे जेहेन करत से तेहेन पौत। रोपे गुण फल होइते अछि। मुदा...।" अपन सभ विचारकेँ हौंरि-हाँरि सुजीत काका बजला- "मनोहर, भने अखन दुइये बापूत छी, तँए जीवनक मूल मर्मकेँ कहि दइ छिअ।" सुजीत कक्काक विचार सुनि मनक जिज्ञासा तेते फुनफुनाकऽ जगि गेल जे हुअए कखन सुजीत कक्काक मुँहक बात सुनी। बजलौं- "की मर्म कहलिऐ काका?" सुजीत काका बजला- "मनोहर, अपन जीवनधार ओहन बना प्रवाहित करी जे स्वयं निर्मित हुअए। जखने अपन प्रवाह अपना अनुकूल चलत तखने दुनियाँक आन-बीरानक भेद मेटा जाएत। रहत मात्र अपन कर्म (काज)। से तँ अपन-अपन विभाजित रहबे करत। एक्केटा नमहर काज माने एकसँ अधिक गोटेक बीचक, रहैए जे नीको होइए आ अधलो होइए मुदा केनिहारक सिरे किछु ने कहल जाइए, सेहो बात नहियेँ अछि। सेहो कहल जाइते अछि।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) तेसर पड़ाव पिताक विचार सुनि देवनक मनमे जीवनक ओहने प्रेम जगल जेहने अपन स्वतंत्र जीवन भेटलापर जगैए। अपन कमाइपर जे करब सएह ने भेल अपन जीवनक कर्म। माता-पिताक संग बाल-बच्चाक सेवा करब सभक ऊपर अछि। किए तँ हम सभ पारिवारिक जीवन जीबैक अभ्यासी छी। विचार तँ असान अछिए सेवा करब, कहब। मुदा सेवाक जखन विराट रूप सोझाँमे अबैए तखन मनमे थरथरी अबिते अछि। ओना थरथरियो दू रंगक होइए, पहिल होइए भरक थरथरी आ दोसर होइए निर्भरक थरथरी। निर्भरक थरथरीक विकल्प यएह ने भऽ सकैए जे अपन जेते शक्ति अछि तइ अनुकूल सेवा करब। मानि लिअ जहिना युग-युगान्तरसँ गुलामी शासनक संग गुलामी बेवस्थामे परिवारक परवरिस भेल अछि, तही अनुकूल ने सभक जीवन बनल अछि। ओही सीमाक दायरामे ने अपन जीवनक संचालन करब। देवनक मनमे उठल जे बाबू कहला अछि जे जाबे तक मनुक्खकेँ अपन हाथ-पएर चलबै-जोकर साधन नइ भऽ जाइए, ताबे धरि ओकर हाथ-पएर ओहिना छटपटाइए जेना पानि बिनु माछ। एकाएक देवनक मनमे कलकत्ताक प्रति राग जगल जइसँ परिवारसँ विराग भेल। विराग जगिते देवनक मन मने-मन कहलक- 'बाबूकेँ देखा देबैन जे देवन केहेन ढहलेल-बकलेल अछि। जखन देह धुनने सभ कथुक प्राप्ति लोक करिते अछि तखन देवनो किए ने करत। कमाइले जखन घरसँ निकैल रहल छी, तखन कमा कऽ गामबला सभकेँ देखा देबैन जे देवनो सन लोक गाममे अछि।' ओना, वैचारिक रूपमे देवन पछुआएल अछि, मुदा कलकत्ता जा कमेबाक विचार जहियासँ मनमे जगलै आ रसे-रसे बढ़ए लगलै तहियासँ जेना देवनक मन छलाँग मारि दौड़ैक कोशिश करए लगल। प्रात: काल, माने दोसर दिन, सूर्यक दर्शन होइते देवनक मन ओहिना ललौन भऽ गेल जहिना दुरागमन दिन कनियाँकेँ होइए। भाय, मन ललौन हेबे ने करतैन, परिवार गढ़ैक भार ने कन्हापर लऽ निकैल रहल छैथ। ओना, जलेसरी माने माए, बेटाकेँ लगले बिसैर गेली जे देवन आइ घरसँ निकैल कलकत्ता जाएत। बिसरैक कारण भेलैन जे जहिना उड़न्ती सुनने छेली जे देवन कलकत्ता जाएत तहिना पतिक मुहसँ सुनि पुरन्ती सेहो भइये गेल छेलैन मुदा देवनकेँ लगमे देख बिसैर गेली। जँ मन रहितैन तँ भोरेसँ जहिना विदागरी कनियाँक भोजनक ओरियानमे माए लगि जाइ छैथ तहिना ने जलेसरियो लागि गेल रहितैथ, मुदा से नहि भेलैन। जलखै बेरमे देवन बाजल- "माए, आइ हम चलि जेबौ।" देवनक मुहसँ 'जाएब' सुनि जलेसरीक मन एकाएक चौंकलैन जे हाइ रे वा! देवनकेँ ते वएह जलखै देलिऐ जे सभ दिन दइ छेलिऐ..! अपन बिसरबपर जलेसरीक नजरिये ने पड़लैन। नजैर पड़ि गेलैन सोझामे बैसल देवनपर। बजली- "से जे तोरा जाइ-के छेलह ते भोरे कहि दइतह ने?" भावुक माइक विचार सुनि देवनक मनमे उठल जे मुँहतोर चाबुक मारब उचित नहि, बाजल- "बिसैर गेल छेलौं, तँए नै कहलियौ।" उपदेशक बनि जलेसरी बजली- "एना कियो बिसरै। एहने बिसरनिहारकेँ ने लोक भुसकौल कहैए।" उपदेशी माएकेँ देवन उत्तर देलकैन- "माए, घर-आँगनमे कियो थोड़े भुसकौल होइए, ई तँ काज करैक जगह छी। भुसकौल होइए लोक इसकूल-कौलेजमे।" देवनक विचार नीक जकाँ जलेसरी नहि सुनली। किए तँ मनमे नचै छेलैन जे जलखै बेरमे जे देवनकेँ भेल, से भेल मुदा कलौ खाइ बेरमे पाँचटा तड़ुआ बेटाकेँ खाइले नहि देब, एहेन अदत्त माए की हमहीं छी। अपन चूक मेटबैत जलेसरी बजली- "बौआ, की हेतइ अपन घर छिअ। जे किछु खाइले देलियह ओ बिसैर जइहह जे माए हमरा घरसँ विदा हेबा दिन एहेन खाइले देने छल। भगवान नीक करथुन जे जहिना हँसैत घरसँ जाइ छह तहिना दुनियाँमे केतौ रहिहह, अहिना हँसैत रहिहह।" माइक विचारकेँ असिरवाद बुझि देवन किछु ने बाजल। बाजल तँ किछु ने देवन, मुदा भूखल गाइयक बच्चा जकाँ गाए दिस माने माए दिस, जरूर तकलक। बेटाक देखबकेँ जलेसरी देवी जकाँ बिचड़ए लगली- "बौआ, हम दुनू परानी तँ बुढ़ भेलयह। बुढ़क ठेकाने कोन.! कहियो आँखि देखब छोड़ि देत, तँ कहियो कान सुनब, मुदा परिवारक तँ तूँ से नहि भेलह। तोहीं ने अपन भार बुझि श्रवणकुमार जकाँ माता-पिताकेँ सातो धाम कन्हापर भार बना देखेबह।" माइक बात सुनि देवनक मन भीतरे-भीतर हिल गेल, मुदा हिलबकेँ थीर केलक। हिलब माने मनक हिलब जे दू रंगक होइए, एकटा होइए नीक हिलब माने जीवनोपयोगी आ दोसर होइए अनुपयोगी। काजक बात जे मनकेँ संकल्पित करैए ओ भेल जीवनोपयोगी आ दोसर भेल कोनो अधला काजमे अपन जीवनक समयकेँ नष्ट करब जइसँ जीवन गमा हिलब। जेकर भरपाइ जीवनमे नहि भऽ पबैए जइसँ जीवन खलियाएल जकाँ रहि जाइए। एहने हिलब दोसर भेल। से तँ देवनमे छल नहि। माइयक विचारकेँ अंगीकार करैत देवन बाजल- "माए, जखन जे मनमे नीक-अधला होउ, कहिहेँ। हमरासँ जे काज भऽ सकत हम सएह ने पुरा पेबौ, मुदा रोगक भोग जहिना सभकेँ भोगए पड़ै छै से तँ भोगए पड़तौ। कियो केकरो थोड़े बाँटि पबैए।" अपना जनैत अपन विचारक भार देवन माएपर फेकलक, मुदा माइयो तँ माइये ने परिवारक भेली। माए बजली- "बौआ, आब तोहूँ जुआन-जहान भेलह, कमेबह-खटेबह परिवारकेँ देखबह तखन ने अपनो मनमे बिसवास हएत। तोरो बिआह-दान हेतह। बाल-बच्चा हेतह, सभक निमरजना तोरे ने करए पड़तह।" ओना, जलेसरी परिवेशक प्रवाहमे बाजल छेली, मुदा अपन परम्पराक जे दायित्व माता-पिताक निर्धारित भेल चलि आबि रहल अछि, ओ अछि, बेटा-बेटीक घर बसा माने बिआह-दान भेला पछाइत, अपनाकेँ बेटा-बेटीक भार वा कर्जसँ मुक्त हएब। देवनक मनमे कलकत्ताक रंग-बिरंगक रूप नाचिये रहल छल, जइसँ मन प्रस्फुटित प्रफ्फुलित भइये रहल छल, बाजल- "माए, जहिना कुशेसर भैया पाँचे बर्खक कमाइमे ईंटाक घर बना लेलैन आ बहिनक बिआहो कऽ लेलैन तहिना हमहूँ कमा कऽ देखा देबौ। अपना तँ बहिनक बिआह अछि नहि, तँए दस कट्ठा खेते कीनि लेब।" अखन धरि बोनिहारिन जलेसरीक मनमे सपना बनल छेलैन जे अपनो दस कट्ठा खेत होएत जइसँ परिवारक परवरिस अपना आगिये-पानियेँ निमाहि अपन जीवन शिखरपर चढ़ितौं माने किसानक जीवन पबितौं, मुदा जिनगीक अन्तिम पड़ावमे माने बुढ़ाड़ीमे जखन बेटाक मुहसँ जलेसरी सुनलैन तखन मनमे ओहने बिसवास जगलैन जेहेन भोरक सपना (कल्पना) देख कियो अपन सपना पूर्तिक दिशामे बढ़ि क्रियाशील होइ छैथ। जलेसरी बजली- "बौआ, अपना जँ ओतबो खेत-पथार होइत जइसँ सागो-पात खा गुजर करितौं माने जीवन चलैबितौं, तँ अपनो परिवारकेँ ने किसान परिवारक मानो-प्रतिष्ठा होइत आ अपनो मान-मरजादा बढ़ैत।" देवनक मन तेना उड़ल छल जे माइक बात सुनबे ने केलक। मुदा माइयक प्रश्नक उत्तर तँ बेटाकेँ देब छल। बाजल- "माए! ऐ हाथ-पएर सँ जे भऽ सकत, तइमे हम थोड़े बेइमानी करब जे तूँ बैमान कहमेँ। जे कमेबौ तोरा हाथ-के देबउ।" बेटा कमाएल पाइक आशा देख जलेसरीक मनमे ओहिना आशाक आश लागि गेलैन जेना निर्वस्त्रकेँ कपड़ा दोकानमे मनमाना कपड़ा लइक अधिकार भेटैए। वृन्दावनक कदमक गाछक झूलाक आश जहिना कृष्णकेँ तहिना ब्रजवालाकेँ जे लगै छेलैन तहिना देवनक आश जलेसरीकेँ आ जलेसरीक आश देवनकेँ लागि रहल छल। सभ जनिते छी जे कृष्ण ओहने ने गोपालक छला जेहेन एकटा ओहन लोक जे गाइयक जीवन सदृश अपन जीवन धारण केने पंचामृतो दइए आ अपन पंचामृतक सिरजन करैत अपनो जीवनक दिनचर्या निमाहिते अछि। अपन भार उतारैत जलेसरी बजली- "बौआ, मरैकाल नानी जहिना कहली तहिना हम ओकरा आँचरक-खूटमे गीरह बान्हि मनमे रखने छी। कोन दिन ले राखब। कहुना हम भेलियह ते माइये बाप ने भेलियह। अपना मुहसँ जँ अवाच निकालब आ तोरा विसा जा, तँए एहेन कि हमहीं गौ-खौक माए हएब जे तोरा अधला हुअ देबह।" माइक बात सुनि देवनक मन मानि गेल जे माइयो अपन स्वीकृतिक विचार दए रहली अछि। देवन बाजल- "माए, घाट-बाट जाइक अछि तँए सभ चीज तूकपर माने समयानुसार काज कर। खेला पछाइत कनी ओछाइनपर हाथ-पएर नहि मोड़ि लेब सेहो नीक हएत।" जलेसरी बिना किछु बजने अपना काज दिस बढ़ि गेली। देवनक मनमे उठल जे पितोसँ किए ने मुँह-मिलानी करैत घरसँ निकली। ओना, जलेसरी देवन लगसँ हटि अपन भानसक ओरियानमे लागि गेली मुदा मन जेना सीकपर लटैक गेल होनि तहिना भेलैन। मनमे ई उठलैन जे जहिना अण्डा बेचनिहारकेँ अण्डाक लाभसँ बकरी कीनैक मन भेलैन जे बकरीक पोसक लाभसँ गाए कीनब। मुदा जलेसरीक मनमे से नहि उठलैन। उठबो केना करितैन? जीवनक अन्तिम पड़ावमे माने बुढ़ापामे पहुँच जलेसरी देख रहल छैथ जे एते दिन तँ अपनो दुनू परानीक देहमे हूबा छल जे रसे-रसे निच्चेँ मुहेँ ससैर रहल अछि। एकटा बेटा देवन अछि, सेहो बकलेले-ढहलेल अछि तेकर आशा केते करब। लगले फेर अपने मन कहलकैन जे किछु अछि अपन तँ आशा वएह अछि। कियो नीके अछि आकि सुन्नरे अछि, ओ अपना केते काज देत। मुइलो पछाइत मुँहमे मुखवाती वएह ने लगौत..! अभावसँ अपन जर्जर जीवन देख जलेसरीक मनमे उठलैन जे कहुना देवना एतबो कमा लिअए जे दुनू परानीकेँ माने माता-पिताकेँ मरैबेर तक भूखे पेट नइ तड़पऽ दिअए। घरे बनाएत आकि खेते कीनत आकि अपन बिआहे-दान करत, ओ तँ अपन करत, अपना ले करत। ओना, माता-पिताक सेवा सेहो अपने कर्तव्यक सीमामे अछि मुदा तेकर फलाफल तँ दोसरेकेँ ने भोगए पड़ै छै। अखन तक जइ आशासँ देवनक सेवा केलौं तइमे जे ओ जीबैत भरि रोग-वियाधि आ भूखसँ तरसऽ नहि दिअए तँ बुझब जे बेटा निमिते जे सेवा केलौं तेकर फलाफल अपनो मेवा भेटबे कएल। अपन आशाक फल देख जलेसरीक मनमे मातृत्व शक्ति जगि गेलैन। जइसँ विचार उठलैन जे भगवान देवनाकेँ सुमति देथुन जे जाबे ओकरा कमाइक लूरि नीक जकाँ नहि भेल अछि से पहिने सीख लिअए। जखने काज करैक लूरि भऽ जेतै तखने ने ओ लूरि ओकरा हाथ पकैड़ करेबो करतै। काजे ने राज छी, राजे ने काज छी। जखन ओकरा कमाइक लूरि भऽ जेतै तखन ओकरा ओइ जोकर अपन बुधियो ने भऽ जेतइ। जखन से भऽ जेतै तखन ओ अपन बुधि-विवेकसँ विचार करत जे बेटा तँ तखन ने बेटा जखन ओ बेटा-धर्मक पालन करत। जखने से करए लगत तखने ने अपन विवेको कहतै जे जाबे जीबैक साधन नहि छल ताबे बाहर जाइक खगता छल मुदा जखन से भऽ गेल तखन ओकर व्यय धरमोचित्त नहि करब तँ ओकरो माने साधनकेँ ने पापोचित्त उपयोग हएत। दुनियाँक कतौक बासी किए ने होइ आ केतौसँ केतौ बास किए ने करी, मुदा जखन जीवनक (मनुक्खक जीवनक) बीच बास करए लगब, तखन वएह ने अपन बासभूमि मातृभूमि रूपमे सेहो लतरत-चतरत। मन बहलबैक खियाल अलग छी, मुदा तँए सही क्रिया नहि छी सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। कहैले अपना सभ तँ कहिते छी जे सुख-दुखमे सभ संग छी, मुदा दुख केना सुख बनत माने दुखक संचरण सुखमे जे हएत, तइ बीचक जे प्रक्रिया अछि तइमे के केतए छी, सेहो ने देखए पड़त। ओना, सभ जनिते छी जे जे जन्म लेलक से मरबे करत। तहूमे मनुक्खक जिनगीए केतेटा अछि। तहूमे केते कालक गारंटी अछि? क्षणोमे क्षणाक तँ होइते अछि। एकटा भौतिक विज्ञानकेँ जँ ताकए निकलब तँ दमाइन जकाँ पन्ना-मे-पन्ना आ सिर-मे-सिर तेते भेटत जे सही सलामत दमाइन उखाड़ि देवउठौन पाबैनमे डाल-डाली साजि लेब, बाल-बोधक खेल थोड़े छी। ई मानि लेब जे भौतिक विज्ञानक पूर्व पीठ अध्यात्म विज्ञान छी जेकरा जीवन विज्ञान सेहो कहै छिऐ, मुदा ओ लगले थोड़े बुझिमे अबैए। खाएर जे आबए मुदा जलेसरीक मनमे एते तँ खुशी उठिये गेलैन अछि जे बेवहारिक जीवनमे नारी माने बेटी, तीन तरहक सहयोगीक जीवनक संग जीवन बितबैए। माने भेल माता-पिताक बीच जन्मसँ लऽ कऽ जाबे बिआह-दान नहि भेल रहल। बिआह-दानक पछाइत माता-पिताक रूपमे सासु-ससुरकेँ पबै छैथ आ सहयोगीक रूपमे पतिकेँ। ओना, अरबो-अरब लोकमे अरबो-अरब जीवनक संग अरबो-अरब रूप-विधान सेहो अछिए मुदा अखन से नहि। अखन एतबे जे साधारण दृष्टिये जे जीवन चलि रहल अछि, बस तेतबे। माता-पिताक बीचक जे बेटीक जीवन अछि ओ सेवा रूपमे भावक अछि जइसँ जे अभिभावकक बेवहार बनल अबैए, माने बेटीक जीवनमे जे अभिभावकक बेवहार रहैए, सासुर एला पछाइत ओइमे अनेको दिशा दिस परिवारक बेवहार अबिते अछि। माने किछु एहेन परिवार अछि जइमे पुतोहुकेँ बेटी सदृश बुझि-मानि माता-पिता माने सासु-ससुर अपन ओहन आचरण बना चलै छैथ जइसँ परिवारमे बेटा-पुतोहुक बीच प्रेम बढ़ने विवाद कम अछि। मुदा दोसर तरहक जे परिवार अछि, माने ओहन परिवार जइमे बेटाकेँ तँ अपन रक्त-बीज बुझि एक तरहक बेवहार रखनौं छैथ मुदा पुतोहुकेँ आन बीज रूप बुझि तइ रूपमे नहि बुझै छैथ, जइसँ परिवारक गहींर-सँ-गहींर दोखपूर्ण वातारणक सेहो सृजन होइते अछि। ओना, बहुसंख्य परिवार गाम-समाजक एहेन अछि, जइमे माता-पिता अपना खुशीसँ बेटा-पुतोहुक सम्बन्ध तोड़ि भीन-भीनौज भऽ जीवन भरिक अपन सभ रीति-नीति तियागि दइते छैथ। खाएर गामो-गामक आ गामो-घरक अपन-अपन लीला अछिए आ सभ अपन-अपन लीलाक लीलाधर छीहे, कियो अपन-अपन जीवन लीला पसाइर वृन्दावनक कृष्ण जकाँ रास रचैत रहथु। जलेसरीकेँ तइ सभसँ कोन मतलब छैन। लोककेँ मरैत देखै छथिन तँ जलेसरीकेँ अपनो मनमे होइ छैन जे जहिना सभ मरैए तहिना अपनो मरब। ई थोड़े बुझै छैथ जे केकर मृत्यु केहेन भेल? सोझे प्राण तियागकेँ मृत्यु बुझै छैथ। लगले फेर ईहो आशा माने जीवनक आशा, सेहो देखलासँ माने जीवितकेँ देखलासँ, जागिये जाइ छैन जे जान-प्राण पेब जखन जिनगी पेलौं तखन मरब किए। जइसँ मृत्युक डर मनसँ हटिये जाइ छैन आ सोझामे जे दुनियाँ देखै छैथ तइमे अपन आस-बास-चास तकैत जिनगी दिस बढ़ए लगै छैथ। तखन ई आशा, माने जिनगीक आशा, ओहिना जीब जाइ छैन जेना कहियो मरबे ने करब। जहिना सभ जीबैए तहिना हमहूँ जीबे करब। बेचारी जलेसरी बुझियो केना पेबती जे जीवनक मृत्यु सिर्फ चेतन शक्ति हटि चेतन शून्य बनबे टा मृत्यु नहि छी। ई तँ पंचभौतिक शरीरक क्रियाक बीचक भेल। जे अखन तक आँखि ताकि दुनियोँ देखै छिऐ, कानसँ किछु सुनितो छी आ हाथ-पएर लारि-चारि भूखो-पियास मेटबै छी। शरीरक संग मनुक्खमे आत्माक बास सेहो अछिए। जेकर अपन दुनियोँक रंग आ रीति-नीति सेहो छइहे। जेकरा पकैड़ मनुख अपन मानवीय जीवनक सार्थकताकेँ पकड़ै छैथ। आँखि बन्न केलाक पछातियो दुनियाँ देखै छैथ आ कान बन्न केलोपर सभ किछु सुनै छैथ। खाएर जे छैथ, तइ सभसँ जलेसरीकेँ कोन मतलब छैन। मतलब एतबे छैन जे आइ देवन घरसँ निकैल परदेश जा रहल अछि, केतए रहत, की खाएत-पीअत आ केना सुतत-बैठत.? ऐठाम आबि जलेसरीक मन हारिकऽ हहरए लगै छैन। मुदा लगले मन ईहो कहै छैन जे देवन किछु छी, केहनो बकलेल-ढहलेल किए ने अछि मुदा छी तँ अपने कोखिक सन्तान ने..! ओकरा जँ कोनो तरहक मने वा देहेमे चोट-कचोट लगतै आ देहक रूइयाँ तड़पतै तँ ओइसँ की अपन मन नहि तड़पत.? ऐठाम अबैत-अबैत जलेसरीक मन देवनक ओइ आश भरल जीवन लग पहुँच गेलैन, जे अखन तक सुतल छेलैन। जलेसरीक मनमे उठलैन जे औझुके दिनक भोजन (खाएब) देवनकेँ गामो मोन पाड़ने रहत। जखने गाम मनमे औत तखने ने मातो-पिता आ सरो-समाज मोन रहतै। तँए आइ देवनकेँ ओहन खेनाइ ओइ रूपेँ खुआएब जे सभ दिन मोन रहतै। मोने टा नहि रहतै, कलकत्तामे रंग-रंगक मिठाइ तँ देखत मुदा रंग-रंगक तड़ुआ-बघड़ुआ मिथिला जकाँ थोड़े देखत। जँ से रहैत तँ एकोटा रोहु कलकत्ताबला अनको खाए दइत। गुण अछि जे तड़ुआक महिरमे ने बुझैए। देवन अपन विचारक अनुकूल सोझे पिता लग पहुँचल। पिताक हाथ तँ काजमे लागल छेलैन मुदा मनमे देवनक जीवनक गति तेना नाचि रहल छेलैन जे विचार घनघना रहल छेलैन। ओना, अभ्यस्त जीवन रहने धनुषधारीक काज तँ अपना ढंगेँ चलि रहल छेलैन, मुदा चेतनशून्य जकाँ चलै छेलैन। माने ई जे मन केतौ छेलैन माने देवनक जीवन देख रहल छेलैन आ दैनिक क्रिया, दिन-दिनक काज, हाथ कऽ रहल छेलैन। अभ्यासो तँ अभ्यास छीहे। जखने अभ्यास बनैए तखने अभ्यासी जीवन बनैत अभ्यस्त बनियेँ जाइए। जखने अभ्यस्त कर्म समयक संग पकैड़ आगू बढ़ैत चलैए तखने ने ओ भेल समयक गतिक संग गति पकैड़ गतिशील जीवन बनि चलब। ओना, जाबे तक देवन माइक संग गप-सप्प करै छल ताबे तकक बोलो-वाणी आ विचारोक जे रूतबा छल ओ पिता दिस मुड़ि रसे-रसे रसाइत रस बनि रिसए लगलै। अखन धरिक पिताक सिनेहक स्वरूप देवनक मनकेँ तेना मथि देलकै जे भयावह रूप बनि देखते देवनकेँ मनमे बघजर जकाँ लागिये गेल। जइसँ कोनो तरहक किछु विचार मुहसँ निकलबे ने कएल। देवनक मनकेँ जहिना अपन बघधल विचार पकैड़ नेने छल, जइसँ बकार बन्न छेलै, तहिना धनुषधारीकेँ सेहो देवनपर नजैर पड़िते बधजल जकाँ मनमे कुदए लगलैन। धनुषधारीक बधजलक कारणसँ अपने मनमे ग्लानि उठए लगलैन जइसँ अपना ऊपर तामसो उठैन आ भयावह रूप देख डरो होइन। ग्लानिसँ गलित होइत मन कहलकैन, 'की अपने अखनो तक अपन सीमा बुझि सकलौं अछि। एकटा बेटा अछि सेहो गाम-घर छोड़ि कलकत्ता जा रहल अछि। नहि जाएत तँ खाएत की आ जीवन केना चलतै। तहूमे तेहेन बकलेल-ढहलेल अछि जे बिआहो-दान हेतइ की नहि हेतइ। अखन अपने दुनू परानी जीबै छी तँ कहुना-के संग मिलि जीवन बीता लइ छी। मुदा जखन परोछ हएत तखन केना जीवन चलत।' धनुषधारीक मन विचारसँ तेना घेरा गेल छेलैन जे अपनहि बेकाबू बनि गेल छेलैन, तँए मुहसँ कोनो विचार निकालब, उचित-अनुचितक बीच फँसि गेल छेलैन। तैबीच मनमे ईहो भय होनि जे जइ देवनकेँ गामक लोक बकलेल-ढहलेल बुझैए ओ केना कलकत्ता सन शहर-बाजारमे रहि पौत। तेते गाड़ी-सवारी चलैए जे बुधियारोकेँ जान बँचब कठिन रहैए, देवन तँ सहजे देवन छी..! आगू बढ़ि अपने मन कहलकैन माने धनुषधारीक मन कहलकैन- जखन देवन कलकत्ता पहुँच जाएत तखन चिट्ठी पठबैले सेहो कहि देबै आ ईहो कहि देबै जे सप्ताहमे नहि तँ पखो-पख जरूर चिट्ठी लिखए। एकाएक धनुषधारीक धियान अपन वंशपर तड़ैप ओइठाम पहुँच गेलैन जैठामसँ अपन जीवनक बात मोन पड़लैन। अपन पैछला पीढ़ी माने बाबासँ ऊपर, बिनु देखल छेलैन, तँए जहिना मनमे जगलैन तहिना बिलीन भऽ हेरा गेल छेलैन। जहिना कोनो सुनल देवेस्थान आकि तीर्थेस्थान मनसँ हेरा जाइए माने बिसैर जाइ छी, मुदा आँखिक देखल ता-जिनगी थोड़े हेराइए, ओ तँ छठियारीक दूध जकाँ मृत्युक सीमा धरि मोन रहैए। जखन धनुषधारी पाँच बर्खक भेला तखन बाबाक संग पितो आ दादीक संग माइयोकेँ संगे-संग खेतक आड़िपर जा खेलाइ छला आ सभ कियो काज करै छला। ओही जीवनमे बाबो आ दादियोक मृत्यु देखलौं। पछाइत पिताक संग अपनो ओहिना जीवन बितबए लगलौं जहिना बाबाक संग पिताकेँ बीतल छेलैन। आइयो ओहिना पेट-बोनिया बनि जीवन जीब रहल छी। अहीठाम सँ ने देवन परिवारक रूखिकेँ मोड़ए चाहैए। खगतो छइहे। तइले ते जेतए-जेतए परिवार घुड़ैछ गेल अछि तेतए-तेतए बिनु मोड़ देने काजो चलब तँ कठिन अछिए। एकाएक धनुषधारीक मनमे जगलैन जे किए ने आइ देवनेसँ सभ किछु पुछि अपन हिसाब माने पिताक दायित्वक हिसाब, फड़िछबैत चली। जिनगी की छी आ एकर मुक्ति केना हएत? यएह ने जे नहि हमर बंकियौत दुनियाँपर रहल आ ने दुनियाँक हमरा ऊपर रहलै। जहिना खाली हाथ आएल छी तहिना सिकन्दर जकाँ दुनू हाथ झुलबैत चलि जाएब। तइले किए केकरो लटपटीमे लटपटाएल जिनगीक हिसाब राखब। धनुषधारी बजला- "बौआ, कलकत्ता जेबे करबहक?" धरती दिस गड़ल देवन अपन नजैर (आँखि) उठा अकास दिस ताकि बाजल- "बाबू, कुशेसर भैयाकेँ कहि देलिऐन, ओहो लऽ जाइले तैयार भेला। तखन?" धनुषधारी- "तोरा बुते काज कोन कएल हेतह?" जहिना कुशेसरक मुहेँ सुनने छल तहिना देवन बाजल- "जखन दुनियाँक आने मनुख जकाँ अपनो जन्म भेल अछि तखन दुनियाँमे कोन काज एहेन मनुक्खक अछि जे अपना बुते नहि हएत।" देवनक बात धनुषधारी बुझि गेला जे बिनु बुधिक सुगो जखन सीताराम, सीताराम राधेश्याम, राधेश्याम करिते अछि, चिट्ठी-पत्तरी सेहो एक राज्य-सँ-दोसर राज्य उघिते अछि तखन देवनो ओही कुशेसरक सिखौलहा सुग्गा जकाँ बाजि रहल अछि। मन मानि गेलैन माने धनुषधारीक मन मानि गेलैन जे देवन कलकत्ता जेबे करत। धनुषधारी बजला- "बौआ, जखन गाम छोड़ि जाइ छह, तखन सबेर-सकाल गामक सीमा छोड़ि आन गामक सीमा पकैड़ लएह। जएह अपन गाम वा परिवारक सीमा छी, सएह ने दोसर गामो आ दोसर परिवारोक सीमा भेल।" कलकत्ता जेबाक एक-एक बातक जनतबकेँ माने काजक बातकेँ देवन अखियासय लगल। अखन धरिक जे समग्रता, परिवार वा समाजक प्रति, देवनमे जे किछु आबि रहल छल, ओ समटा एकाग्रक (कलकत्ता जेबाक विचार) बाट पकैड़ नेने छल। पिता लगसँ उठि देवन माए लग आबि बाजल- "माए, अखन बहुत काज बाँकी अछि तँए पहिने खाइले दऽ दे। ने तँ काजक धुमसाहीमे जखन पड़ि जाएब तखन खेनाइये बिसैर जाएब।" जलेसरीक अपनो मन मानियेँ रहल छेलैन जे किछु क्षण ले देवन घरबैया अछि, ने ते ओ आब बहरबइये भेल किने। अखुनका खेनाइ बेटा जकाँ अपना सोझामे खुआएब मुदा रौतुका थोड़े खुआ पएब। अपन रूटिंगक हिसाबे देवन घरपर सँ विदा भऽ गेल। जहिना मनुखदेवा चढ़ने लोकक हाथो-पएर बिनबिना लगै छै आ बुधियो-विचार झुनझुना लगिते छै, तहिना देवनोक भइये गेल छल। काज आ मजदूरी मनसँ हटि देवनक मन ओइठाम अँटैक गेल छल, जैठाम अपने सन भाइ भाइयक दशा रहितो माने कुशेसरक जीवन पाँचे बर्खमे एते काज कऽ लेलक पारिवारिक काज, जइसँ जहिना माए-बाबू चैनसँ रहै छैन, तहिना ने अपनो माए-बाबू छैथ। नीक-बेजा सोचैक दौड़मे देवनक रास्ता कटि गेल। देवनकेँ देखते कुशेसरक मनमे खुशीक लहरि उठि गेल। एकटा संगी जँ भेट जाए तँ दुनियाँक भ्रमण वास्को डि गामा जकाँ कइये सकै छी। कुशेसर बाजल- "बढ़ियाँ केलह जे समयसँ पहिने चलि एलह।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.९.रमाकर चौधरी- मधुमेह रमाकर चौधरी, सेवानिवृत्त चीफ मैनेजर, भारतीय स्टेट बैंक मधुमेह/ ग्लायसेमिक इंडेक्स और ग्लायसेमिक लोड/ मधुमेह बिमारीक प्रथम चरण स्थिति/ मधुमेह बिमारी केर दोसर चरण (ऽtage)/ मधुमेह बिमारीक तेसर चरण/ मधुमेह बिमारीक चारिम अवस्था(ऽtage)/ मधुमेह बिमारीक पाँचम अवस्था(ऽtage)/ मधुमेह बिमारीक छअम अवस्था (stage) १ मधुमेह आइ हम मधुमेह बिमारी पर किछु आवश्यकीय बात बता रहल छी। सामान्यतः लोक सभ ई मानि रहल छथि जे, जं मधुमेह बिमारी भ गेल त ओ कहियो जरि सं ठीक नहि होयत आ सभ दिन दवाई खाईये पड़त। ई बात किछु हद्द तक सत्य मानल जा सकैत अछि, कारण अधिकतर लोक अपन स्वास्थ्य लेल नहि त जागरूक होमय चाहैत छथि आ ने अनुशासित। आइ देखि रहल छी जे ई मधुमेह बिमारी दिन प्रति दिन अपना आगोश मे क्रमिक रुपेण अधिक सं अधिक लोक के लऽ रहल अछि। हमरा जानतबे मधुमेह बिमारीक विषय मे पूर्ण जानकारी वैज्ञानिक दृष्टि सं हासिल करवाक चाही। ओकर पूर्णतया उन्मूलन हेतु खान-पान मे और रहन-सहन मे अनुकूल परिवर्तन केनाय आवश्यक अछि। एहि लेल जानकारी संग खान-पान आ रहन-सहन लेल स्वयं मे अनुशासित रहब सेहो परम आवश्यक अछि। ई बिमारी आइये नहि भेल अछि। ओकर इतिहास पुरान अछि। तखन आधुनिकता आओर विकासक क्रमे खान पान मे परिवर्तनक फलस्वरूप ओकर बहुतायता मे वृद्धि भेल अछि। आधुनिकताक क्रमे विज्ञानक क्षेत्र मे सेहो अधिकाधिक विकास भेल अछि। स्वास्थ्य विज्ञान मे शोध आओर अन्वेषणक फलस्वरूप अनेकानेक जटिल आओर गंभीर बिमारीक इलाज सहज आ बिमारी जरि सं उन्मूलन योग्य अछि। ओहि मे हमरा बुझने मधुमेह बिमारी सेहो उन्मूलन योग्य अछि। बहुत पूर्व मे वैद्य लोकनि बिमारी सभक इलाज जड़ी - बुटी, विभिन्न तरहक भस्म आ पथ परहेज सं करैत छलाह। ओ लोकनि मुख्यतया लक्षण आधारित इलाज करैत छलाह। बहुत पहिले मामूली संक्रमण आओर दुर्घटना सं लोक सभ बीमार होइत छलाह। कोनो कोनो संक्रमण ओहेन होइत छल जे गामक गाम साफ भ जाइत छल। स्वास्थ्य विज्ञान मे प्रगति भेला सं ई सब नियंत्रित भ गेल। ओही तरहें मधुमेह बिमारी हेतु सेहो वैज्ञानिक लोकनि सकारात्मक दिशा मे आगां बढि रहल छथि। सर्वप्रथम ई देखल गेल जे ओहेन मरीज जे खूब पानि पिवईत छलाह और हुनका अधिक पेशाव होइत छल। शरीर के तौल धीरे धीरे कम भ जाइत छल। किछु महिना मे हुनक मृत्यु भ जाइत छलनि। तत्कालीन चिकित्सक लोकनि हुनका उपवास करा, कम पानि पर राखि, मात्र हरियर तरकारी इत्यादि खुवा लक्षण आधारित इलाज करैत छलाह। बाद मे पाओल गेल जे ओहेन मरीज के पेशाव मे चुटटी लुधकैत अछि। तखन चिकित्सक लोकनि ओहि बिमारी केर नाम मधुमेह रखलनि। एहि बिमारीक कारण हेतु ओहि समय मे तरह तरह के अनुमान लगायल गेल। कियो अनुमान लगेलनि जे ई पाचन तंत्र केर खराबी सं, कियो कहलनि किडनी के खराबी सं, कियो कहलनि मस्तिष्क के खराबी सं। क्रमिक रूप मे अन्वेषण भेल गेल आ वैज्ञानिक लोकनि ओहि निष्कर्ष पर पहुँचलाह जे अगन्याशय (Pancreaऽ) मे इन्सुलिन नामक हॉर्मोन होइत अछि तकर कमी सं मधुमेह बिमारी होइत अछि। बाद मे त ई हॉर्मोन वैज्ञानिक लोकनि प्रयोगशाला मे बनेवा लेल सफल भेलाह। ओहि सिद्धांत पर मरीज के इलाज केलनि, किछु हद्द तक सफलता जरूर भेटल परंच ई स्थायी इलाज संभव नहि भ सकल। वैज्ञानिक अन्वेषणक क्रम मे कार्बोहाइड्रट, प्रोटीन, वसा, खनिज और विटामिन एहि सभक भूमिकाक संदर्भ मे विस्तृत ज्ञान भेल आओर पाओल गेल जे खान पान मे उपलब्ध कार्बोहाइड्रट और चीनी केर अधिकता शरीरक रक्त मे चीनीक परिमाण बढ़वैत अछि। मधुमेह बिमारीक संदर्भ मे पूर्ण जानकारी लेबा सं पूर्व किछु निम्नलिखित जानकारी आवश्यक अछि। कार्बोहाइड्रेट शरीर संचालन हेतु शक्ति (Energy) केर आवश्यकता होइत छैक जे कार्बोहाइड्रेट सं भेटइत अछि। हम सब जे किछु भोजन करैत छी, ओकर कार्बोहाइड्रट अंश पाचनतंत्र मे विखंडित भ शक्ति केर सरलतम भाग ग्लूकोज मे परिवर्तित होइत अछि आओर ओ शोणित मे चल जाइत अछि। शोणित के माध्यम सं शरीर के प्रत्येक अंग मे शक्ति प्रदान करैक हेतु ग्लूकोज पहुँचि जाइत अछि। शोणित मे एहि ग्लूकोज के परिमाण सामान्य सं जाखन अधिक होइत अछि त हम कहैत छियैक जे ई मधुमेह थिक। रक्त परीक्षण मे जं परिमाण ७० से १०० मिली ग्राम प्रति डेसी लिटर अछि त ई सामान्य अछि। कखनो काल ग्लूकोज स्तर सामान्य सं नीचा सेहो आबि जाइत अछि जकरा निम्न रक्त सर्करा कहल जाइत अछि। अर्थात सर्करा असंतुलन मधुमेह बिमारी थिक। इन्सुलिन जखन शोणित मे ग्लूकोज के आवक प्रारंभ होइत अछि, ओकरा शरीर के प्रत्येक अंगक कोशिका मे प्रवेश करवैक लेल वाहक के रूप मे इन्सुलिन के काज पड़ैत छैक। एहि प्रक्रिया लेल हमर अगन्याशय सक्रिय भ ओहि लेल इन्सुलिन के आपूर्ति करैत छैक। मधुमेहक प्रकार टाइप -१ मधुमेह : जखन आनुवांशिक या अन्य कोनो कारण सं शरीर के अपन इन्सुलिन आवश्यकता सं बहुत कम रहैत छैक तखन शोणित के ग्लूकोज इन्सुलिन के अभाव मे कोशिका सभ मे नहि जा पवैत छैक आओर रक्त परीक्षण मे ग्लूकोज बढल अवैत छैक। एहि तरहक बढल ग्लूकोज स्तर के टाइप -१ मधुमेह कहल जाइत अछि। उपचार : एकर उपचार लेल चिकित्सक समीचीन खोराक मे इन्सुलिन दैत छथि। टाइप -२ मधुमेह : जखन शरीरक अपन इन्सुलिन उपलब्धता प्रयाप्त रहलाक वावजूद शोणित मे सर्करा या ग्लूकोज स्तर सामान्य सं अधिक अवैत अछि त ओकरा टाइप-२ मधुमेह कहल जाइत अछि। उपचार : एकर उपचार लेल चिकित्सक समीचीन खुराक मे दवाई लेवाक हेतु सुझाव करैत छथि। ई दवाई सं अपन अगन्याशय सक्रिय भ और अधिक इन्सुलिन आपूर्ति करैत अछि ताकि रक्त मे उपस्थित ग्लूकोज के शरीर के कोशिका सभ मे पहुंचा दैक आ रक्त मे उपस्थित सामान्य सं अधिक ग्लूकोज अपन सामान्य स्तर पर आवि जाय। विशेष गर्भित तथ्य : (१) जखन शरीर मे प्रचुर मात्रा मे इन्सुलिन उपलब्ध अछि तखन कोन कारण सं टाइप-२ मधुमेह होइत अछि ? एकर उत्तर अछि शरीर कोशिका मे इन्सुलिन प्रतिरोध उत्पन्न भ गेलैक अछि, अर्थात कोशिका मे ग्लूकोज प्रवेश करेवाक हेतु अगन्याशय द्वारा सामान्य रुपेण उत्सर्जित इन्सुलिन हॉर्मोन सक्षम नहि भ पावि रहल छैक। दवाई देला उपरान्त अगन्याशय के सक्रियता बढ़ा और अतिरिक्त इन्सुलिन आपूर्ति होइत छैक। ओहि सं शोणित मे उपस्थित अधिक ग्लूकोज अगन्याशय द्वारा प्रदत्त अतिरिक्त इन्सुलिन के सहयोग सं कोशिका सभ मे चल जाइत छैक। फलस्वरूप शोणित केर ग्लूकोज स्तर सामान्य भऽ जैत अछि। (२) आखिर शरीरक कोशिका इन्सुलिन प्रतिरोध कोन कारण सं करैत छैक? कोशिका के आवश्यकता सं अधिक ग्लूकोज नहि चाही। अगर जबरदस्ती अधिक ग्लूकोज कोशिका मे जेतैक तखन लिपिड, कॉलेस्टॉरोल और ट्राइग्लीसराइड् अधिक वनय लगतैक। एहि सब कारण सं कोशिका प्रतिरोध करय लगैत छैक। अगर खान पान मे नियंत्रण नहि आ सिर्फ दवाई पर निर्भर भऽ मधुमेह प्रवंधन करैत छी ई उचित नहि। तें मधुमेह के एक प्रोग्रेसिव बिमारी कहल गेल अछि। क्रमिक रुपेण पहिले मधुमेह फेर रक्त चाप फेर लिपिड प्रचुरता फेर हृदय ,किडनी लिवर संबंधित अनेकानेक बिमारी। (३) की सम्भव अछि जे मधुमेह के पूरा पूरी ठीक कयल जा सकैत अछि? बिल्कुल सम्भव अछि। खान पान सं अगर कोशिका द्वारा इन्सुलिन प्रतिरोध शून्य कऽ लैत छी त संभव अछि जे मधुमेह पूर्णतया ठीक भऽ जायत। खान पान ओहेन हेबाक चाही जाहि मे कार्बोहाइड्रट कम होइक आ प्रोटीन इत्यादि अधिक। एहि सब पर ध्यान देबाक लेल कोनो खाद्य पदार्थ के ग्लाईसेमिक लोड आओर ग्लाईसेमिक इंडेक्स कतेक अछि ई बुझि प्रति दिन आहार लेबाक चाही। अगर मधुमेह नहि भेल हो तं अधिकतम १०० ग्लाईसेमिक लोड खाना प्रति दिन, जं मधुमेहपूर्व (Prediabetic ) के स्थिति मे छी तं कुल ५० ग्लाईसेमिक लोड खाना प्रति दिन आओर जं मधुमेह सं ग्रसित छी तं कुल २५ ग्लाईसेमिक लोड खाना प्रति दिन समुचित होयत। एहि तरहें मधुमेह पूर्णतया नियंत्रित भ सकैत अछि। २ ग्लायसेमिक इंडेक्स और ग्लायसेमिक लोड वास्तविक मे जतेक खाद्य पदार्थ उपलब्ध अछि, ओहि मे कार्बोहायड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज एवं विभिन्न प्रकारक विटामिन सभ पाओल जाइत अछि। कार्बोहायड्रेट सर्करा या ग्लूकोज़ केर मुख्य स्रोत होइत अछि। चीनी या ग्लूकोज शोणित मे बहुत तेज रफ्तार सँ शोणित मे प्रवेश करैत अछि। तें सर्करा एवं ग्लूकोज के प्रवेश रफ्तार के मानक मानल गेल अछि। अर्थात जँ कियो १०० ग्राम चीनी ग्रहण करैत छथि त हुनक शोणित ग्लूकोज १०० के गति सँ बढ़ैत अछि। ओही मानक अनुसार प्रत्येक खाद्य मे उपलब्ध कार्बोहाइड्रेट आओर ओहि मे युक्त चीनी कतेक तेजी सँ शोणित मे चीनीक स्तर बढ़बैत अछि ओ ग्लाइसेमिक इंडेक्स कहल जाइत अछि। जाहि खाद्य के ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होइत अछि ओ शोणित केर चीनी स्तर कम बढ़बैत अछि। तें मधुमेह युक्त व्यक्ति के कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स बला खाद्य के चुनाव कऽ खेबाक चाही। चाउर, गहूम, मकई इत्यादि के ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा अछि। करीब ७५ सँ ८०। तें ओकर आटा मे अगर कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स बला आंटा मिला देल जाय त श्रेयस्कर। जेना कि चना, सोया, ओट, बाजरा इत्यादि केर आंटा। ग्लाइसेमिक लोड एकर एकटा सूत्र अछि। ग्लाइसेमिक लोड = (ग्लाइसेमिक इंडेक्स x कार्बोहाइड्रेट)/१०० अर्थात कोनो खाद्य मे ओकर कार्बोहायड्रेट और ओहि खाद्य के कतेक ग्लाइसेमिक इंडेक्स होइत अछि एहि दुनू पर निर्वर करैत अछि ग्लाइसेमिक लोड। तें कोनो खाद्य चयन सँ पूर्व ओकर विश्लेषण करवाक छैक जे ओहि खाद्य मे कार्बोहायड्रेट कम रहैक आ ओकर ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम सेहो रहैक।एहि सँ स्वाभवतः शरीर मे आवश्यकतानुसार ग्लाइसेमिक लोड प्रति दिन खा सकैत छी। ३ मधुमेह बिमारीक प्रथम चरण स्थिति- कोना - कोना मधुमेह बिमारी क्रमिक रूप सं बढल चल जाइत अछि। जखन स्वास्थ्य हमर बिल्कुल ठीक रहैत अछि अर्थात मधुमेह नहि प्रारंभ भेल अछि, तखन जे भोजन करैत छी हम सभ, तत्क्षण हमर अग्न्याशय समीचीन मात्रा मे इन्सुलिन रक्त मे भेज दैत अछि। ई समीचीन इन्सुलिन रक्त मे प्रविष्ट ग्लूकोज/ चीनी कऽ रक्त नलिका माध्यम सं विभिन्न अंगक कोशिका सभ मे शरीरक शक्ति उद्येश्य पूरा करैक लेल पहुंचा दैत अछि। कखनो नियमित, कखनो अनियमित खान -पानक कारणे भोजन सं प्रदत्त चीनी /ग्लूकोज आओर अग्न्याशय सं स्रावित इन्सुलिन केर मात्रा असंतुलित होमय लगैत अछि। शरीरक कोशिका सभ धीरे धीरे इन्सुलिन लेल प्रतिरोध करय लगैत अछि। ओहि स्थिति मे, रक्त मे खान पान सं बनल ग्लुकोज / चीनी सामान्य रूप सं कोशिका सभ मे नहि जा पवैत अछि। तखन रक्त मे चीनी कम बेसी होमय लगैत अछि। प्रारंभ मे त हमर अग्न्याशय बिल्कुल ठीक रहैत अछि। कदाचित जं किछु अधिक कार्बोहाइड्रेट या अधिक ग्लायसेमिक लोड बला खाना खा लैत छी त ओहि सं बनल अधिक ग्लुकोज सेहो आसानी सं इन्सुलिन द्वारा कोशिका सभ मे चल जाइत अछि कारण अग्न्याशय अधिक ग्लूकोज अनुरूप अधिक इन्सुलिन स्रावित करैत अछि। परंच ई शिलशिला किछु समय बाद अवरुद्ध भ जाइत अछि कारण कोशिका इन्सुलिन हेतु प्रतिरोध करए लगैत छैक । कोशिका के आवश्यकता सं अधिक ग्लुकोज नहि चाही तें ओ प्रतिरोध करय लगैत अछि। ई स्थिति ४-५ साल धरि रहि सकैत अछि आओर भ सकैत अछि जे कोनो लक्षण सं हमसभ अनभिज्ञ सेहो रही। कोशिका द्वारा इन्सुलिन प्रतिरोधक प्रारंभ मधुमेह केर प्रथम चरण होइत अछि। ४ मधुमेह बिमारी केर दोसर चरण (ऽtage) प्रथम चरण मे जे शरीरक कोशिका सभ द्वारा इन्सुलिन प्रतिरोध प्रारंभ होइत अछि ताहि सं रक्त नलिका मे इन्सुलिन अधिकता होमय लगैत अछि। तें दोसर चरण के हाइपरइन्सुलिनोमिया सेहो कहल जाइत अछि।रक्त मे आवश्यकता सं अधिक इन्सुलिन होयब शरीर लेल ठीक नहि। ई बढल इन्सुलिन पहिने छोट छोट रक्त नलिका जे प्रायः शरीरक सब महत्वपूर्ण अंग तक पहुंचैत अछि, ओकरा क्षति पहुंचेनाई प्रारंभ क ऽ दैत अछि। पातर - पातर रक्त नलिका मस्तिष्क मे, आँखि मे और अनेक महत्वपूर्ण अंग मे होइत अछि। इन्सुलिन केर कुप्रभाव सं एहि पातर पातर रक्त नलिकाक आंतरिक झिल्ली, जकरा एन्डोथेलिअम झिल्ली कहल जाइत अछि ओ क्षतिग्रस्त होमय लगैत अछि। ओहि क्षतिग्रस्त स्थान पर खइठी (Plaque) परि जाइत अछि। एहि खइठी सं रक्तक सामान्य प्रवाह ओहि अंग मे वाधित होमय लगैत अछि। मधुमेह केर दोसर चरण मे किछु किछु लक्षण सेहो आवय लगैत अछि। अकारण थकान - थकान सनक अनुभूति ,वजन मे बृद्धि, मोटापा, गर्दैन क्षेत्र मे बहुत हल्का हल्का कारीपन इत्यादि इत्यादि लक्षण सभ आबि सकैत अछि। एहि दोसर चरण केर पुष्टि रक्त परीक्षण सं कइल जा सकैत अछि। मधुमेह के दोसर चरण स्थिति ३-४ साल धरि रहि सकैत अछि। तें ओहि चरण मे अगर ध्यान दी आ तद अनुकूल अपन खान - पान रहन सहन मे सुधार कए ली त ऽ बहुत श्रेयस्कर। ओहि सं मधुमेह के प्रवेश निषेध भ जायत। जे छोट मोट समस्या आवय लागल छल ओहो पूर्ण रुपेण ठीक भऽ जायत। ५ मधुमेह बिमारीक तेसर चरण एखन तक के स्थिति मे भऽ ई रहल छल जे असंयमित खान- पान के कारणे एक तरफ रक्त मे ग्लूकोज़ बढि रहल अछि आ दोसर तरफ इन्सुलिन सेहो। मगर शरीरक कोशिका सभ इन्सुलिन लेल निरंतर प्रतिरोध क ऽ रहल अछि । दिनानुदिन प्रतिरोध बढिये रहल अछि। एही क्रम मे अग्न्याशय आओर ओहि सँ श्रावित होई वला इन्सुलिन अनियंत्रित(unregulated) होमय लगैत अछि। अर्थात कखनो कम्मे आओर कखनो आवश्यकता सँ अधिके इन्सुलिन श्रावित होमय लगैत अछि। कखनो काल भोजन उपरान्त अग्न्याशय खूब अधिक इंसुलिन श्रावित क दैत अछि। ई जे स्थिति अबैत अछि ओहि मे जखन रक्त मे चीनी केर परीक्षण करबैत छी त भुखल पेट वला परीक्षण रिपोर्ट सामान्य सँ कम अबैत अछि आ भोजन उपरान्त जतेक बढ़ल अबैक चाही एहि सँ बहुत कम। एहनो होइत अछि जे भुखल पेट वला रक्त परीक्षण रिपोर्ट स्तर सँ भोजन उपरान्त वला रक्त परीक्षण रिपोर्ट परिणाम कम्मे अबैक। ओहेनका स्थिति जँ अबैत अछि त ओकरा हाइपोग्लाइसीमिया कहल जाइत अछि। अर्थात न्यून सर्कराक स्थिति। ओहि स्थिति मे कोनो संदर्भित कुशल चिकित्सक सँ परामर्श क लेबाक चाही जाहि सँ सुनिश्चित भ सकय कि आखिर की बात छैक। मधुमेह के तेसर चरण मे किछु लक्षण सब सेहो परिलक्षित भ सकैत अछि। जेना कि भूख के बहुत तीब्र अनुभूति। कनियो देरी भेला पर चिड़चिड़ापन अर्थात अनावश्यक क्रोध। सदिखन किछु ने किछु खाय लेल मोन छुछवैत रहनै। वजन और मोटापा बढि सकैत अछि। सदिखन बिना कारण , थाकल - थाकल जकाँ लगैत रहनाइ। रक्त चाप सेहो बढ़ल के क्रम मे भऽ सकैत अछि। भोजन केलाक उपरान्त बहुत आनन्दक अनुभव । भोजन उपरान्त ओंगही लागय लगैत अछि। मिठाई खेबाक इच्छा होइत रहैत अछि। एहि चरण मे होइत ई अछि जे हम बुझैत छी हम्मर चीनी त कम अछि। थोरे मोरे मिठाई या चीनी खायल करब त ओ अपने ठीक भ जायत। किछु लोक सभ सेहो ओहने परामर्श दैत छथि। मगर ई बात बिल्कुल नहि। रक्त परीक्षण और कुशल चिकित्सक सँ परामर्श आवश्यक अछि ओहि स्थिति मे। हँ, खान पीन ओहेन जरूर हेबाक चाही जे कर्बोहायड्रेट कनी कम( प्रति दिनक लेल समुचित ग्लाइसेमिक लोड अनुरूप)। ओहेन अनाज जाहि मे प्रोटीन इत्यादि ज्यादा होइक आ कार्बोहायड्रेट बहुत ज्यादा नहि। हरियर तरकारी सब , शुष्क फल सभ( नट्स)। जकर ग्लायसेमिक इंडेक्स और तदनुरूप शुद्ध ग्लाइसेमिक लोड कम होइक ओहेन फल सभ सेहो खा सकैत छी। मधुमेह बिमारी बिल्कुल छुटय तरफ भ जा सकैत अछि जँ अपन खान पान ग्लाइसेमिक इंडेक्स और ग्लाइसेमिक लोड आधारित उपयुक्त डाइट लेनाइ प्रारम्भ करैत छी। ओना कुशल चिकित्सक सँ परामर्श आवश्यक अछि एहि सभ लेल। ६ मधुमेह बिमारीक चारिम अवस्था(ऽtage) एखन तक रक्तक ग्लूकोज स्तर क्रमिक रूप सँ बढि रहल अछि, इन्सुलिन सेहो बढि रहल अछि कारण कोशिका द्वारा प्रतिरोधक क्रम सेहो बढि रहल अछि। यद्यपि एखन तक कोनो खास अधिक गंभीर लक्षण परिलक्षित नहि अछि और हम सब एकरा बिल्कुल हल्लुक मे लैत छी। आब तेसर चरण के बाद रक्त परीक्षण मे भुखल पेट मे ग्लूकोज़ स्तर १२५ तक और नास्ता भोजन उपरान्त २०० तक आबय लागैत अछि। ओहि परिस्थिति मे अंदर -अंदर खराबी बढि रहल अछि परञ्च एखनो ऊपर -ऊपर हल्लुक़ फल्लुक लक्षण देखा पड़ि रहल अछि। जेना कि रक्त चाप बढ़ल आबि सकैत अछि, थकान लागि सकैत अछि, भूख प्यास बेसी जोड़ सँ लागि सकैत अछि , कोलेस्ट्रॉल सेहो बढ़ल आबि सकैत अछि, मोटापा और शरीरक वजन इत्यादि इत्यादि बढि सकैत अछि। इहो स्थिति २-३ साल धरि रहि सकैत अछि। वास्तविक मे ई चरण बिल्कुल डायबिटिक चरण एबाक पूर्व के चरण होइत अछि। ओहि स्थिति के उलटेनाय(reverऽe केनाय) हेतु जे आवश्यक छैक ओ अवश्य प्रारम्भ क देवाक चाही। ई पूर्ण डायबिटिक स्थित पहुँचबाक शीमा(बोर्डेर) अछि। खान- पान, रहन सहन मे अनुकूल परिवर्तन केनाय परम आवश्यक। कोनो चिकित्सक सँ परामर्श कय ई सुनिश्चित क लेबाक चाही जे वास्तविक मे कोन चरण मे ओ बिमारी अछि। जँ चिकिसक परामर्श सँ भुखल पेट ग्लूकोजक परीक्षण, भोजनक बाद ग्लूकोज़ परीक्षण, ५ घंटा बला जीटीटी इन्सुलिन सहित परीक्षण, एचबीए१सी परीक्षण करायल जाय त सुनिश्चित भेल जा सकैत अछि जे आखिर कोन स्थिति तक मधुमेह पहुँचल अछि। सभ रिपोर्टक विश्लेषण कय चिकित्सक बता सकैत छथि जे अहाँ अमुक ने अमुक स्थिति मे छी। परिमार्जन हेतु अहाँ की सब करी , चिकित्सक उचित परामर्श अवश्य देताह। ओना कार्बोहायड्रेट और ग्लाइसेमिक लोड आधारित डाइट अर्थात कम कार्बोहायड्रेट , कम ग्लाइसेमिक इन्डेक्स बला खाद्य पदार्थ अपन डाइट मे शामिल करी। ई ध्यान मे अवश्य राखल जाय जे भरि दिनक आहार मे हमर कुल ग्लाइसेमिक लोड समुचित सँ विशेष नहि होइक। ई हम बारम्बार पुनरावृत्ति क रहल छी कारण डायबिटीज हेतु मुख्य कारक चीनी और कार्बोहायड्रेट मे विद्यमान ग्लूकोज़ अछि। तें ओहि पर ध्यान देनाय अति आवश्यक अछि। ७ मधुमेह बिमारीक पाँचम अवस्था(ऽtage) मधुमेह बिमारीक पाँचम अवस्था, पूर्व मधुमेह स्थिति (prediabetic ऽtage) के बादक अवस्था थिक। एहि स्थिति मे आब रक्त ग्लूकोजक स्तर खाली पेट १२५ सँ ऊपर तथा नास्ता खाना बाद २०० सँ ऊपर होमय लगैत अछि। कुशल चिकित्सक सँ देखेलाक बाद ओ(चिकित्सक) आब मोहर लगा दैत छथि अर्थात सुनिश्चित कऽ कहि दैत छथि जे मधुमेह भए गेल। निवारण हेतु चिकित्सक दवाई सेहो प्रारम्भ करवाक सुझाव दैत छथि। एहि अवस्था के नाम चिकित्सा क्षेत्र मे टाइप २ मधुमेह (Type-२ Diabeteऽe Milletuऽ) कहल जाइत अछि। मरीज बुझैत छथि जे हमरा आब मधुमेह बिमारी भय गेल आ आब हमरा सभ दिन दवाइ पर आश्रित रहय पड़त। किछु मरीज भयभीत सेहो भय जाइत छथि जे ई बिमारी त निरन्तर बढ़ै बला (Progreऽऽive) होइत अछि तें आब ओकर निदान हेतु विशेष ध्यान देव आवश्यक भऽ गेल। वास्तविक मे ई अवस्था एकाएक नहि आयल अछि। ओकरा अबै मे १० -१५ साल लागि गेल हेतैक । जखन ई बिमारी आयल अछि त ई बुझू जे बीस प्रतिशत हमर आँखि के क्षति पहुचा देलक। आन आन महत्वपूर्ण अँग के किछु ने किछु क्षति पहुँचेने सेहो होयत। आधुनिक शोध और अन्वेषण केर संकल्पना (concept) अनुसार इहो अवस्था अयलाक उपरान्त विशेष डरक कोनो बात नहि। आधुनिक शोध कहैत अछि जे ई बिमारी कोशिका सभ द्वारा प्रेषित इन्सुलिन प्रतिरोधक स्थिति उतपन्न केला सँ उत्पन्न भेल अछि। जँ क्रमिक रूप सँ एहि प्रतिरोध के नियंत्रित कऽ लैत छी तँ एहि स्थिति के पलटा(reverऽe) कऽ सामान्य अवस्था के प्राप्त कऽ सकैत छी। कुशल चिकित्सक परामर्श अनुसार दवाइ संग - संग अपन डाइट के जँ अनुमोदित कार्बोहायड्रेट और ग्लाइसेमिक लोड आधारित सुधार कऽ लैत छी त सम्भव अछि जे एहि बिमारी सँ निजात पाबि जै। मात्र जँ दवाइ पर आश्रित रहैत छी आ खान पान पर ध्यान नहि दैत छी तँ क्रमिक रूप सँ शरीर मे इन्सुलिन बढ़ैत चल जायत जे कि धीरे धीरे शरीर मे आन आन तरहक क्षति पहुचेबाक क्रम रखनहिये रहत। दवाइ सँ ई प्रबन्ध होइत अछि जे अग्न्याशय सक्रिय भ इन्सुलिन श्राव करय। एहि सँ ( इन्सुलिन श्राव सँ) रक्त मे उपस्थित असामान्य ग्लूकोज कोशिका सभ मे प्रवेश करै मे सक्षम भ जाइत अछि। आ एहि तरहेँ शरीरक ग्लुकोज़ नियंत्रण दृष्टिगत होइत अछि। ग्लूकोज त नियन्त्रित भ जाइत अछि परञ्च दवाइ मर्फ़द श्रावित और अधिक इन्सुलिन त आन आन खराबी पहुँचा सकैत अछि। तें हेतु जँ खान पान सेहो समुचित करैत चल जायब तखन चिकित्सक कें सुविधा होयतन्हि जे ओ दवाइ खुराक के कुशल प्रवन्धन कऽ सकता । ओ (चिकित्सक) समुचित आओर कम से कम शक्तिक दवाइ आ कम सँ कम दवाइक खुराक केर सुझाव दऽ बिमारी के निदान करैक लेल परामर्श दऽ सकता। एहि सँ ई होयत जे अग्न्याशय मे विद्यवान बीटा सेल जे इन्सुलिन श्रावित करैत छैक ओकर क्रमिक क्षरण कम सँ कम होयत । अग्न्याशय बहुत जल्दी खराब नहि होयत। ई भेल पाँचम अवस्था अर्थात टाइप २ मधुमेह। ८ मधुमेह बिमारीक छअम अवस्था (stage) ई अवस्था थिक शरीर मे इन्सुलिन केर अभाव। जखन अग्न्याशय इन्सुलिन के लगातार श्राव करैत करैत अपन सक्षमता कम करय लगैत अछि आ बहुत कम इन्सुलिन श्राव क पवैत अछि तखन छठम अवस्था केर आगमन प्रारम्भ भs जाइत अछि। अग्न्याशयक बीटा कोशिकाक संख्या न्यून भ जेबाक कारणे ई होइत अछि। इन्सुलिनक निर्माण त बीटा कोशिकाक माध्यमे सँ होइत अछि । ओ न्यून भ गेल तँ स्वाभवतः बहुत कम इन्सुलिनक निर्माण भ रहल अछि एहि अवस्था मे। इन्सुलिन केर भूमिका रक्त सँ शरीरक कोशिका सभ मे ग्लूकोज़ के उघि ल जेनै अछि जेकि दिन प्रति दिनक आवश्यक शक्ति लेल परम जरूरी होइत अछि। अर्थात इन्सुलिन ग्लूकोज केर वाहक( carrier) थिक। शरीर मे अपन अनुकूल इन्सुलिनक अभाव मे आब चिकित्सक मरीज लेल बाहर सँ इन्सुलिन हेतु सुझाव करैत छथिन्ह । कारण ई जे आब बाहरी दवाइ अग्न्याशय के इन्सुलिन बनेबा हेतु सक्रिय नहि क पवैत अछि । आब अग्न्याशय इन्सुलिन सँ अभावग्रस्त भ गेल अछि। ई जे अवस्था थिक ओ मधुमेहक छठम अवस्था कहबैत अछि। एहि में निदानक हेतु एक मात्र विकल्प वाहर सँ इन्सुलिन लेब अछि। ई अवस्था नहि आवय ताहि लेल पाँचम अवस्था, आ सम्भव हुए तँ ओहि सँ पूर्वहि सँ अपन खान पान दुरुस्त क ओकरा हेतु निवारण करी। ई सुरक्षात्मक सर्वोत्तम प्रयास होयत। एहि तरहेँ हम मधुमेह बिमारी आ ओकर सभ अवस्थाक विस्तृत चर्चा कयलहुँ अछि। पूरा देश मे जाहि तरहेँ एहि मधुमेह बिमारीक द्रुत प्रसार भs रहल अछि ओ बहुत चिन्ताक विषय अछि। हमर एहि आलेखक मुख्य उद्देश्य ई अछि जे आम लोक सभ मे सजगता आवनि ताकि एहि बिमारी सँ पूर्ण रूपेण बाँचल जा सकय। भरोस जरूर अछि जे एहि आलेख सँ किछु ने किछु लाभ लोक के जरूर होयतन्हि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १५म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १५म खेप १५ साँझमे सुधाकर चारू लठैतक संगे पाठशाला लग पहुँचलाह । पाठशाला तँ ओ नामेक छल । फूसक बनल ओकर चार खसबा हेतु उद्यत छल । कतेको सालसँ ओकर देख-रेख नहि होइत छल । पुस्तकालयक स्थानपर तरकारी रोपल छल । सजमनि,कदीमा,रामझिमनी ,टमाटर,कोबी सभ तरहक तरकारीक समावेस केने छलाह । सुधाकरक सालभरि तरकारी ओहिठामसँ उपजि जाइत छलनि । कागजी नेबोक गाछ ततेक झमटगर छल जे सौंसे साल नेबो अपनो खाइत छलाह आ हाटपर बेचितो छलाह। कोनपर टाभनेबोक गाछमे बड़का-बड़का टाभनेबो फड़ल छल । असलमे जहिआसँ जयन्त गाम अएलाह आ ओहि पाठशाला लग रहए लगलाह तहिएसँ सुधाकर परेसान छलाह । हुनका मोनमे तरह-तरहक बातसभ घुमए लगलनि । "केहन बढ़िआँ जानकीधाममे पढ़ैत-लिखैत छलहुँ । एहिठाम की राखल छैक जे अनेरे अपसियाँत भेल छी।"-सुधाकर बजैत छथि । जयन्तसँ जेठ छलखिन सुधाकर । दुनूक पिता सहोदरे भाए रहथि । जयन्तकेँ गामसँ चलि गेलाक बाद पाठशालाक जमीनपर सोलहो आना हक सुधाकरक कायम भए गेल रहनि । एहिमे आब जयन्त एतेक दिनक बाद आबि कए बाधा करथि से हुनका कोना नीक लगितनि? सुधाकरक व्यवहारसँ जयन्तकेँ ततेक कष्ट भेलनि जे ओ गुम्म पड़ि गेलाह । तखनसँ पेटकुनिआ देने पड़ल रहथि । बिना किछु खेने-पीने सौंसे दिन बीति गेल । तकर कोनो चिंता सुधाकरकेँ नहि भेलनि । ओ तँ पाठशालाक जगह पर अपन कब्जा कायम रखबाक हेतु व्यग्र रहथि । सुधाकरक बाजब सुनि जयन्त छगुंतामे रहथि । बकर-बकर हुनका देखैत रहि गेलाह । ताबतेमे पानि होबए लगलैक । पाठशालाक घर तँ बुझू खसले छल । कोनपर नान्हिटा चार बाँचल छल जाहिमे कैकटा सोंगर लागल छल जाहिसँ ओ कहुना कए लटकल छल। तकरे तरमे जयन्त आइ एकमाससँ पड़ल छलाह । एकहु बेर सुधाकर हाल-चाल लेबए नहि अएलाह। ई सुनिओ कए जे हुनका आँखिमे समस्या छनि ओ हटल-हटल रहलाह । मुदा जखन पाठशाला हेतु बैसार भेल तँ ओ समस्त पुरषार्थसँ प्रकटे नहि भेलाह,अपन लठैतक सहयोगसँ बैसारमे हड़बिड़रो मचा देलाह । जयन्त सपनोमे नहि सोचि सकल रहथि जे हुनकर पैतृक स्थानमे बनल पाठशाला पुनर्निर्माण करबाक हुनक प्रयासमे सभसँ पैघ बाधक हुनके पितिऔत सुधाकर भए जेताह । मुदा स्वार्थमे लोक आन्हर भए जाइत अछि । फेर जखन अनकर संपत्ति भोगबाक आदति पड़ि जाउक तँ ओहिपरसँ बेदखल होएब बहुत कष्टकारी भए जाइत अछि । जयन्तक पिताक हिस्सामे पाठशालाक अतिरिक्त पाठशालासँ सटले मात्र पाँच कठ्ठा जमीन रहनि । ओहीसँ ओ सालभरि गुजर करैत छलाह । कहिओ ककरोसँ किछु याचना करब हुनक स्वभावमे नहि छल । सुधाकर पाठशाला आ लगीचक जमीन कतेको सालसँ कब्जा कए लेने रहथि । पाठशालाक जगहपर एकदिस माल-जाल बान्हल करथि । खाली जगहमे तिमन-तरकारी उपजाबथि । मुदा सुधाकरकेँ आब बड़का चिंता भए गेल रहनि । "कहुना कए जयन्तक झंझट खतम होअए तँ चैन होइ।"-सुधाकर सोचल करथि । सुधाकरके लठैतक संगे आएल देखि जयन्तकेँ किछु नहि फुराइनि । ओ अबाक भेल चार दिस देखैत रहि गेलाह । "आइ नौ-छऔ कइए लेब । एही पार की ओही पार । विद्वान छथि तँ अपना घरमे । हमरा ताहिसँ की मतलब? पढ़ि -लिखि कए नव-नव झंझट बेसाहि रहल छथि । ई कोन नीक बात भेलैक?"-सुधाकर मोने-मोन सोचथि । जखन जयन्त किछु नहि बजलाह तँ सुधाकर तमसाइत बड़बड़ाइत चलि गेलाह- "कान खोलि कए सुनि लएह । ई संपत्ति हमर अछि । बाबा मरैत काल साफ कए गेल रहथि जे ई सभटा चीज-वस्तु सुधाकरकेँ हेतनि । स्टाम्पपेपरपर सभटा लिखि गेल छथि । ताहिपर जे तूँ अनुचित प्रयास करबह से नहि चलतह।"- से कहि सुधाकर लठैतसभक संगे बाहर भए गेलाह । जयन्त टुकुर-टुकुर देखैत रहलाह । सुधाकर अपन लठैत सभक संगे आगू बढ़ि गेलाह । "अहाँ कही तँ एकरा एकहि बेरमे धारक पार फेकि आबी।"-एकटा लठैत बाजल । "एकर सही इलाज तँ हमरा लग अछि ।-दोसर लठैत बाजल। "हमरा तँ होइए जे भोर होइत-होइत ओ अपने साफ भए जाएत । ककरो किछु करबाक काज नहि पड़त ।" -तेसर लठैत बाजल । "से की?" " देखैत नहि छहक । ई चार कखनो खसि सकैत छैक । जयन्तकेँ लेने-देने साफ ।" -चारिम लठैत बाजल । "तूँ सभ सभदिन मूर्खे रहि गेलह । हमरा जयन्तसँ की मतलब अछि । जीबए-मरए, जतए जाए । हमर चीज-बस्तुपर सँ हटि जाए । बेसी लफरासँ कोन मतलब?"-सुधाकर बजलाह । एहिना गप्प-सप्प करैत ओसभ चलि गेलाह । जाइत-जाइत अपन-अपन लाठी जोर-जोरसँ पटकैत जयन्त दिस आँखि तरेरैत पाठशालाक चारक एकटा सोंगर हटा देलक । कहुना कए लटकल ओ चार आओर एकहाथ आगू ससरि गेल । बीचक फाँकसँ पानि झहर-झहर खसए लागल । जयन्त अखनो ओही चार तर बैसल रहथि । दोसर कोनो उपाय नहि छल। चारसँ खसैत बरखाक पानिसँ सौंसे देह भिजि रहल छल । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.११.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- बिना बहर आ काफिया गजल कोना भेलै जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' बिना बहर आ काफिया गजल कोना भेलै (ई आलेख साहित्य अकादेमीसँ मान्यता प्राप्त कथित लिटेरेरी एसोसियेशन चेतना समितिक पत्रिकामे काँट-छाँटक संग प्रकाशित भेल छल। एतऽ ओइ आलेखक मूल आ प्रामाणिक संस्करण देल जा रहल अछि।- सम्पादक) साहित्यमे गद्यमे कथा, नाटक, उपन्यास, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, समीक्षा, आलोचना आदि लिखल जाइत अछि, पद्यमे दोहा, कविता, गीत, गजल, खंड काव्य आ महाकाव्य आदि लिखल जाइत अछि। सभ विधाक अपन-अपन विशेषता छै, जाहि कारणे ओ अस्तित्वमे अछि। बच्चा सभ अपन माय-बाबू,दादा-दादी,कक्का-काकी,टोल पडोसक आन बच्चा सभसँ बजनाइ सिखैत अछि । बादमे शुद्ध बजनाइ आ लिखनाइ सिखैत अछि । व्याकरणक उपेक्षा क'क' शुद्ध बाजब आ लीखब संभव नहि भ' सकैत छैक । साहित्य सृजनमे व्याकरणोक महत्वपूर्ण योगदान छै । गजल सेहो भारतीय भाषामे लोकप्रिय स्थान ग्रहण क' चुकल अछि । हिन्दीमे सेहो गजलक व्याकरण पचासो बरख पहिने आबि चुकल अछि । किछु पढ़िक' आ सूनिक' हम 1983 मे मैथिलीमे गजल कहब आरम्भ केलहुँ । किछु रचना मिथिला मिहिर आ माटि-पानिमे छपबो कएल, मुदा अपना संतुष्टि नै भेल । हिन्दीमे सेहो लिखय लगलहुँ । किछु रचना कोनो-कोनो पत्रिकामे छपबो कएल, मुदा व्याकरणक जानकारीक अभाव खटकैत रहल । आर.पी.शर्मा 'महर्षि'क लिखल हिन्दी गजलक व्याकरण देखलहुँ, मुदा मैथिलीमे गजलक जानकारी मैथिली गजल आ शेरो-शायरीक लेल समर्पित ब्लॉग 'अनचिन्हार आखर' पर पर्याप्त सामग्री देखि हर्षित भेलहुँ। एहि ब्लॉगपर एके ठाम तेरह खण्डमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा प्रस्तुत गजल शास्त्रमे गजलक विवेचन मैथिली भाषाक तत्वपर कएल भेटल । तकर बाद 22.07.2011 आ 21.09.2011 के बीचमे आशीष अनचिन्हार द्वारा पच्चीस खण्डमे मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास 'गजलक संक्षिप्त परिचय'क अंतर्गत प्रस्तुत कएल गेल । कतेक रास गजलकारकें एक मंचपर अनबाक काज केलक ई मंच। ई ब्लॉग मैथिली गजलक व्याकरणकें सहजतासँ लोकक समक्ष आनि शुद्ध गजल लिखबाक बाट प्रशस्त केलक। जाहि समयमे मैथिली गजलक व्याकरण उपलब्ध नहि छल, तखनो शुरुआतमे स्वस्थ गजल कहल गेल छल जे कि ओहि समयक गजलकारक ज्ञानक परिचायक अछि। मुदा बीचमे किुछु बेसिए बर्ख मैथिली गजलक एहन अवस्था रहलै जाहिमे जकरा जाहि तरहे भेलै ओ गजलकेँ गीजि देलकै आ से केखनो क्रांतिक नापर, केखनो कथ्यक नामपर तँ केखनो प्रगतिशीलताक नामपर। आब जखन गत बारह बरखसँ मैथिलीमे गजलक व्याकरण उपलब्ध अछि, तखन आब गजलक स्वास्थ्य सुनिश्चित करबाक आवश्यकता अछि। काफिया आ बहरक लेल थोड़ेक अभ्यास आ सावधानी रखैत एहि लक्ष्यकें प्राप्त कयल जा सकैत अछि । हमरा गजलक व्याकरणक जे जानकारी अछि तकर मुख्य स्रोत मैथिली गजलक लेल समर्पित ब्लॉग 'अनचिन्हार आखर' अछि। आशीष अनचिन्हार द्वारा प्रस्तुत 'मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास' और 'मैथिली गजलक रेडी रेकनर' मे सेहो विस्तारसँ मैथिली गजलक सभ पक्षपर विचार प्रस्तुत कएल गेल अछि । हमरा ओकर बहुत थोड़ जानकारी अछि । हमरा गजल लेखन लेल जे न्यूनतम जानकारी अपेक्षित लागल अछि से एतय प्रस्तुत कएल जा रहल अछि : 1. गजल लेल मूल तत्व अछि (i)सही काफिया (II) एक समान बहर आ (iii) दमदार कथन । बहर,काफिया आ रदीफ : एकटा गजलक शेर सभ देखू : लोक नीचाँ उतरि जाइए मारि सभठाँ बजरि जाइए ई गजलक पहिल शेर अछि । एहि शेरक दूनू पाँतीक अन्तमे समान शब्द अछि 'जाइए' आ एहि शब्दक पाछाँ पहिल पाँतीमे अछि शब्द 'उतरि' आ दोसर पाँतीमे अछि शब्द 'बजरि' अर्थात दूनू शब्दमे 'रि' आ ओकरा पाछाँ 'अ' ध्वनि/ मात्रा समान अछि । अतः शब्द 'जाइए' भेल एहि गजलक रदीफ आ 'अ' ध्वनिक संग 'रि' भेल काफिया । पहिल शेरकें मतला कहल जाइत अछि, शेरक दूनू पाँतीकें अलग-अलग मिसरा कहल जाइत अछि । दूनू पाँतीमे मात्राक्रम अछि : 2122-12-212 यैह भेल एहि गजलक बहर अर्थात छंद । आ जे बहर मतलामे लेल गेल अछि तकरे निर्वाह पूरा गजलमे हेबाक चाही। तेनाहिते आन गजलमे जे बहर हो सएह बहरक निर्वाह हेतै। एकटा गजलमे एकसँ बेसी मतला भ' सकैत अछि । एहि गजलमे दोसर आ तेसर शेर सेहो पहिल शेर जकाँ दूनू पाँतीमे रदीफ, काफिया आ समान मात्राक्रमसँ युक्त अछि, आ तें ईहो दूनू शेर मतला अछि - गाछ कहियो मजरि जाइए फेर कहियो झखड़ि जाइए आगि सभठाँ पसरि जाइए खेल सभटा उसरि जाइए आब नीचाँक शेर सबहक दोसर पाँतीमे समान रदीफ, काफिया आ सभ पाँतीमे समान मात्राक्रम देखल जाए : पाइ राखू अहाँ बैंकमे पाइ हाथसँ ससरि जाइए मूनि राखब कथी कोनठाँ मूस सभटा कुतरि जाइए लोक कतबो हुए जोरगर एक दिन सभ नचरि जाइए अतः उपरोक्त गजलमे 'जाइए' शब्द रदीफ अछि, 'अ' ध्वनिक संग 'रि' काफिया भेल आ बहर भेल मात्राक्रम 21-22-12-212. गजलक अंतिम शेर जाहिमे गजलकारक नाम / उपनाम रहैत अछि ओकरा मकता कहल जाइछ । एखन धरि ई गजल बिना मकताक गजल अछि । मकताक रूपमे ई शेर लेल जा सकैत अछि : मास अगहन अबै छै 'अनिल' लोक कातिक बिसरि जाइए उपरोक्त उदाहरणक संग रदीफ, काफिया आ बहरक निम्नलिखित परिभाषा देल जा सकैछ : रदीफ़ : गजलक मतलाक दुनू पाँतीक अन्तमे आ बाद बला शेर सभक दोसर पाँतीक अन्तमे कोनो समान वर्ण अथवा शब्द अथवा शब्दक समूह होइत अछि । काफिया : गजलक मतलाक दुनू पाँती आ बादक सभ शेरक दोसर पाँतीमे रदीफसँ पहिने स्वर साम्य युक्त तुकान्तक होइत अछि काफिया । ई कोनो ध्वनि( मात्रा)क संग कोनो वर्ण अथवा किछु वर्णक समूहक रूपमे अथवा मात्र कोनो ध्वनिक रूपमे रहैत अछि । बहर : गजलक सभ पाँतिमे समान मात्राक्रमकें बहर अर्थात छंद कहल जाइत अछि । 2. मात्राक गणना : ह्रस्व अथवा लघु मात्राकें 1 आ दीर्घ अथवा गुरु मात्राके 2 सँ प्रदर्शित कएल जाइत अछि । ह्रस्व वर्ण ( 1 मात्रा बला ): अ,इ,उ, क सँ ङ, च सँ ञ, ट सँ ण, त सँ न, प सँ म, य सँ ह धरि, चंद्रविन्दु बला वर्ण । दीर्घ वर्ण ( 2 मात्रा बला ) : आ,ई,ए,ऐ,ओ,औ,अं,अ:,ऐकार,ओकार,औकार,अनुस्वार,विसर्ग बला वर्ण, संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला वर्ण (से चाहे एक शब्दमे हो वा कि दू अलग-अलग शब्दमे)। एहिकेँ अरितिक्त गजलमे (मात्र गजलमे) कोनो शब्दमे एकै संग बाजल जाए बला दू टा लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जाइत छै जेना "गड़बड़" ई शब्द संस्कृतक हिसाबें 1111 छै मुदा गजलमे एकरा 22 मानल जाइत छै। संस्कृतक छंद एवं अन्य प्राचीन छंदमे गड़बड़ शब्दकेँ 22 मानब निषेध छै। गजलक अरूजी सभ गजलमे प्रवाह अनबाक लेल एहन व्यवस्था केने छथि। 3.सही काफिया-शब्दक उदाहरण : पहिल शेर / मतलामे काफिया-शब्द अन्य शेर सभलेल उपयुक्त काफिया पातक / बाटक बालक / पालक / चालक / हाथक बाटपर / खाटपर हाटपर / घाटपर / टाटपर पानिक / आनिक हानिक / हाथमे / पातमे बाटमे / भातमे / कातमे / चासमे कलमसँ / पतनसँ गगनसँ / चलनसँ / मननसँ /पवनसँ बसन्त / अनन्त दिगन्त / भिड़न्त / चलन्त जीवन / तीमन भोजन / पहिरन / अनमन घर / डर हर / तर / चर / अखबार / बाजार संसार / उपहार / लाचार / व्यापार 4. (i) मात्राक गणनाक उदाहरण : कमल / कते / सुनू / कहू / चलू / अहाँ / बिना : 12 सदाशिव / महाजन / निशाकर / दनादन / चकाचक : 122 देखल / सूनल / भागल / नोतल / कान्हा / सदिखन / निश्चित : 22 ध्यान / नाम / मेघ / राति / अन्त / धोन्हि / लोक / : 21 प्रत्यक्ष : 221 / आवश्यक : 222 (ii) मात्राक्रमक उदाहरण : 'सदाशिव'- एहि शब्दमे सदा आ शिव शब्दक स्थान परिवर्तन केलासँ कतेक शब्द अथवा शब्दक समूह बनि सकैत अछि आ तदनुसार ओते तरहक मात्राक्रम सेहो । जेना निम्नलिखित शब्द-समूह आ ओकर मात्राक्रमक अवलोकन कयल जाए : शब्द समूह मात्राक्रम सदा शिव शिव 1222 सदा शिव सदा 12212 सदा सदाशिव 12122 एहि शब्द समूहक कय बेर आवृति सेहो एहि प्रकारें भ' सकैत अछि : सदा शिव सदा शिव 122-122 सदा शिव सदा शिव सदाशिव 122-122-122 सदा शिव सदा शिव सदाशिव सदाशिव 122-122-122-122 सदाशिव शिव-सदाशिव शिव 1222-1222 सदाशिव शिव-सदाशिव शिव सदाशिव शिव 1222-1222-1222 सदाशिव शिव-सदाशिव शिव सदाशिव शिव सदाशिव शिव 1222-1222-1222-1222 सदा शिव सदा- सदा शिव सदा 12212-12212 सदा शिव सदा- सदा शिव सदा- सदा शिव सदा 12212-12212-12212 सदा शिव सदा- सदा शिव सदा- सदा शिव सदा- सदा शिव सदा 12212-12212-12212-12212 सदा सदाशिव सदा सदाशिव 12122-12122 सदा सदाशिव सदा सदाशिव सदा सदाशिव 12122-12122-12122 सदा सदाशिव सदा सदाशिव सदा सदाशिव - सदा सदाशिव 12122-12122-12122-12122 ऊपर अंकित विभिन्न मात्राक्रममे अर्थात विभिन्न बहरमे गजल कहबाक अभ्यास कयल जा सकैत अछि । पहिनेसँ डेढ दर्जनसँ अधिक बहर चलनमे अछि । उदाहरण आ अभ्यास करबाक लेल किछु गजलक पहिल शेर प्रस्तुत अछि (उदहारण सभ देबासँ पहिने ई स्पष्ट कऽ दी जे गजलमे बहरकेँ पालन करैत काल जे अनुशासित रहैत छथि तिनका लेल किछु नियम शैथिल्य (वा कि छूट) सेहो भेटैत छनि आ एकर संपूर्ण जानकारी आशीष अनचिन्हारक "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास" नामक पोथीमे भेटत। उदाहरण दैत काल हम ई नियम शैथिल्य केर सेहो उल्लेख केलहुँ अछि जाहिसँ पाठककेँ बुझबामे सुविधा होइन।) : (1) जखन घूरि पाछाँ तकै छी (122-122-122 ) अहाँ मोन हमरा पड़ै छी ( 122-122-122 ) ( काफिया 'ऐ'क मात्रा अछि ) (2) हसै छी कनै छी गजल गीतमे हम (122-122-122-122 ) अहीकें तकै छी गजल गीतमे हम ( 122-122-122-122 ) अथवा हमर मैथिली ई हुनक मैथिली ई ( 122-122-122-122 ) अहँक मैथिली ई सभक मैथिली ई (122-122-122-122 ) (काफिया 'अ' ध्वनिक संग 'क' अछि ) (3) मोनमे गाम अछि गाममे आम अछि ( 212-212-212-212 ) गाछपर आम अछि देहपर घाम अछि (212-212-212-212 ) (काफिया 'आ' मात्राक संग 'म' अछि ) (4) गामो कहय जय मैथिली ( 2212-2212 ) शहरो कहय जय मैथिली ( 2212-2212 ) ( काफिया 'ओ'क मात्रा अछि ) उपयुक्त काफियाक संग एहि चारू पहिल शेरक अनुसार अन्य कम-सँ-सम चारिटा शेर कहि गजल पूर्ण कयल जा सकैत अछि । मने गजलमे कमसँ कम 5 टा शेर रहबाक चाही। 5. मीर-बहर : ई बहर एकटा नियम शैथिल्य केर तहत बनल छै जकर उद्येश्य छै नव गजलकारकेँ सुविधा होइन। उर्दू आ हिंदी दूनूमे सेहो एहि बहरक प्रयोग कएल जाइत छै। एहिमे गजलक पहिल शेरक दुनू पाँतीमे दूटा अलग-अलग शब्दक लघु वर्णकें मिलाक' एकटा दीर्घ मानल जा सकैए यदि आन सभ शेरक सभ पाँतिमे सेहो दीर्घक संख्या पहिल शेरक दुनू पाँतिक दीर्घक संख्याक समान भ' जाइ । एहि बहरकें मीर-बहर कहल जाइत अछि । अहिना और बहर अथवा छन्द और काफियाक जानकारीक लेल 'अनचिन्हार आखर'ब्लॉगपर स्थित गजल शास्त्र आ व्याकरणक अध्ययन कयल जेबाक चाही । 6. अपन पसंदक बहर : अपन पसंदक बहरमे सेहो गजल कहल जा सकैत अछि । अपना पसंदक एक पाँती लिखू जाहिमे रदीफ़ आ काफिया हो, ओकर मात्राक्रम देखू, ओही मात्राक्रममे दोसर पाँती सेहो लिखू । गजलक पहिल शेर भेल । आब अही मात्राक्रममे कम-सँ-कम और चारिटा शेर लिखिक' गजल पूर्ण क' सकैत छी । उदाहरण : माटि-पानि मिथिला केर बाजय जय मिथिला जय मैथिली 21 21 22 21 22 2 22 2 212 गाछ-पात मिथिला केर गाबय जय मिथिला जय मैथिली बाजय आ गाबय केर अनुरूप पाबय, मानय,जानय, लाबय आदि शब्दक उपयोग काफियाक लेल कय 'जय मिथिला जय मैथिली' रदीफ रखैत अही मात्राक्रममे और चारिटा शेर पूर्ण कय गजल पूर्ण कएल जा सकैत अछि । 7. बिना रदीफक गजल भ' सकैत अछि । उदहारण लेल एकटा गजलक पहिल शेर देखल जाए : कौआकें कौआ कहि देल बूझू बड़का गलती भेल एहिमे 'देल' आ 'भेल' काफियाक शब्द अछि । दूनू पाँतीमे मात्रा क्रम 22222221 अछि । यैह भेल बहर । एहिमे रदीफ नहि अछि । आब आगाँ एहि गजलक दोसर,तेसर,चारिम,पंचम शेर अर्थात चारिम छठम,आठम,दसम आदि पाँतीमे काफिया 'देल' आ 'भेल' सँ मिलैत-जुलैत शब्द हेबाक चाही । एकर संगहि सभ पाँतीमे मात्रा क्रम 22222221 रहबाक चाही । जेना मुइला बहुतो जन महगीसँ आ हुनकर वेतन बढ़ि गेल उपरोक्त दुनू पाँतीमे सेहो मात्रा क्रम अछि : 22222221 अहिना सभ शेरमे समान मात्रा क्रम रखैत काफियाक लेल खेल / जेल / तेल राखि गजल पूर्ण कएल जा सकैत अछि । आब एकटा दोसर गजलक पहिल शेर देखल जाए : अपन-अपन लाचारी छै दुख सबहक बड़ भारी छै एहिमे दुनू पाँतीक अंतिम शब्द 'छै' अछि । यैह 'छै' रदीफ अछि । दुनू पाँतीमे 'छै' सँ पहिने 'आ' मात्राक संग 'री' अक्षरबला शब्द अछि, ई काफिया भेल । आब दोसर,तेसर,चारिम,पांचम शेरक दोसर पांतीमे रदीफ 'छै' रहबाक चाही और 'आ' उच्चारणक संग री' अक्षर बला शब्दक काफिया हेबाक चाही जेना सरकारी / सबारी / अनारी / उधारी आदि । आब एहि शेरमे बहर देखू : अपन-अपन लाचारी छै (12-12-2222) दुख सबहक बड भारी छै (222-2222) पहिल पाँतिक मात्रा क्रम अछि : 12-12-22-22 एहिमे दूटा लघु छै(1-1) जकरा एक दीर्घ ( 2 ) मानल जा सकैत अछि । तखन एकरो मात्रा क्रम 222-2222 भ' जाएत । अहिना शेष सभ शेरक दूनू पाँतीमे मात्राक्रम 222-2222 रखैत गजल पूर्ण कएल जा सकैत अछि । 8. मैथिलीमे 'ग' आ 'ज' आदिमे नुक्ता नहि लगैत छैक, तें मैथिलीमे गजल शब्दमे 'ग' आ 'ज' मे नुक्ता नै देल जाइ छै । 9. गजलमे अर्द्ध-विराम अथवा विरामक उपयोग नै होइत अछि । 10. गजलक कोनो शीर्षक नहि रहैत अछि । 11.पत्रिका सभमे गजलकें गजल जकाँ छापल जेबाक चाही, कविता जकाँ नहि । दूटा शेरक बीच स्थान रहबाक चाही । 12. बहरक नाम अथवा मात्राक्रमक उल्लेख रहबाक चाही । 13.अनुभवी लोक सभक कहब छन्हि जे शब्द सबहक संग किछु दिन खेलाइत-धुपाइत एहेन स्थिति अबैत छैक, जे जे पाँती मोनमे उतरैत छै सभ बहरमे रहैत छै । निम्नलिखित गजल सभमे आवश्यक तत्वक उपस्थितिक समीक्षा कयल जा सकैत अछि । (1) दूभि और धान छी अहाँ पान आ मखान छी अहाँ कूदि-फानि थाकि गेल छी दूर आसमान छी अहाँ बेर-बेर गाबि देखलौं वेद आ पुराण छी अहाँ भोरकेर सूर्य छी अहीं रातिकेर चान छी अहाँ पैघ-पैघ बात मोनमे एकटा निदान छी अहाँ आँखि मूँह कान छी अहीं देह हम परान छी अहाँ एहि गजलमे (i) रदीफ़ अछि 'छी अहाँ' (ii) पहिल शेरक दुनू पांति आ शेष सभ शेरक दोसर पांतिमे काफिया अछि 'आ' ध्वनिक संग 'न' / 'ण' वर्णसँ अन्त बला शब्द धान, मखान,आसमान,पुराण,चान,निदान,परान । (iii) बहर अर्थात मात्राक्रम अछि 21-21-21-21-2 2. आनन्दित राखय जे सदिखन से रस्ता नहि देखल छल दुखमे सुख छै सुखमे दुख छै से हमरा नहि बूझल छल नीके सोची नीके बाजी नीके देखी से सिखलौं नीकक फल नीके नहि होइछ से दुनियाँमे सूनल छल हमरा भाग्यक निरमाता दोसर नै क्यो अपनहि छी हम जै पोखरिमे डूबल छी से अपनहि हाथें खूनल छल ध्यानी ग्यानी आ विज्ञानी केलनि लोकेलय सभटा से सभटा पौलक जीवनमे जे जै खातिर भूखल छल जैलय सदिखन झगड़ा-झाँटी से गाछी हमरो सबहक किछु हमरो सबहक रोपल अछि किछु बाबाके रोपल छल अपने चुनलौं हम अपनालय आमक टिकुला सन जीवन सीखै छी सभदिन किछु नव-नव जे पहिने नहि सीखल छल एहि गजलमे- (i) रदीफ़ अछि 'छल' (ii) पहिल शेरक दुनू पाँती आ शेष सभ शेरक दोसर पाँतीमे काफिया अछि 'अ' ध्वनिक संग 'ल' वर्णसँ अन्त बला शब्द सभ - देखल / बूझल / सूनल / खूनल भूखल / रोपल / सीखल । (iii) बहर अर्थात मात्राक्रम अछि 2222 2222 2222 222 3. कखनो लाठी कखनो भाला कखनो तीर-कमान गजल कखनो लागय ईंटा-पाथर कखनो पान-मखान गजल कखनो खुरपी कुडहरि खंती ऊखड़ि और समाठ बनल कखनो बाड़ी कखनो गाछी कखनो भेल मचान गजल कखनो आङनमे अरिपन-सन कखनो नार-पुआर जकाँ कखनो बाढ़नि कखनो चालनि कखनो सूप समान गजल कखनो गामक चौबटिया लग मंदिर और इनार जकाँ आ कखनो सीमापर लडइत देशक वीर जवान गजल कखनो मौनी आ पौतीमे साँठल जीर-मरीच जकाँ कखनो कोसीमे हलचल आ छटपट कोटि परान गजल किनको खातिर मुरही कचरी जामुन आम लताम 'अनिल' हमरा खातिर दीयाबाती छठि आ देव-उठान गजल एहि गजलमे (i) रदीफ़ अछि 'गजल' (ii) पहिल शेरक दुनू पांति आ शेष सभ शेरक दोसर पांतिमे काफिया अछि 'आ' ध्वनिक संग 'न' वर्णसँ अन्त बला शब्द : कमान / मखान / मचान / समान / जवान / परान / उठान । (iii) बहर अर्थात सभ पाँतीमे मात्राक्रम अछि : 2222- 2222 - 22-21-121-12 (iv) एहिमे दू टा लघु (1-1) क बदला एक दीर्घ (2) सेहो लीखल जा सकैत अछि । तखन मात्राक्रम भ' जाएत 2222 2222 2222 222 (v) एहि गजलक अंतिम शेरमे गजलकारक नाम अछि । एहि अंतिम शेरकें मकता कहल जाइत अछि । 4. ताम-झाम आ तड़क-भड़क चलिते रहलै अहंकार नव कीर्तिमान गढ़िते रहलै छिति जल पावक गगन पवन सभ ठाँ धूआँ ऐ दुरदिनमे सभकें सभ ठकिते रहलै ख़तम ने कहियो भेल महाभारत जगमे पाण्डव आ कौरवक युद्ध चलिते रहलै जकर पसेनासँ होइए धरती हरियर से हकन्न अहिना सभ दिन कनिते रहलै महिषासुरके भेष मात्र बदलैत रहल नयनसँ नोरो निरभयाक झड़िते रहलै लाल किला तँ सभदिन ताल ठोकैत रहल जन्तर-मन्तरपर धरना पड़िते रहलै काँपय धरती नव नव असली रावणसँ नकली रावण त सभ साल जरिते रहलै एहि गजलमे (i) रदीफ़ अछि 'रहलै' (ii) पहिल शेरक दुनू पाँती आ शेष सभ शेरक दोसर पाँतीमे काफिया अछि 'इ' ध्वनिक संग 'ते' सँ अन्त बला शब्द सभ --------- चलिते / गढिते / ठकिते / चलिते / कनिते / झड़िते / पड़िते / जरिते । (iii) बहर अर्थात मात्राक्रम अछि 2222 2222 222 (iv)दू टा अलग-अलग लघुकें एकटा दीर्घ मानल गेल अछि । (v)तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घक गिनती लघुमे भेल अछि । (vi)अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुक गिनती दीर्घमे कएल गेल अछि । (5) माछ-दही जतरालय की ई दुनिया ककरालय की जे दै छै देबे करतै नै कहतै हमरालय की किछु बाजत आ नठि जायत बिपटा आ लबरालय की कतहु बैसिकय खा लेतै ठाँ-पीढ़ी बगड़ालय की एके ठाँ सुतबो करतै मारि-गारि झगड़ालय की देशक खातिर लडू-मरू भैयारी बखरालय की दुनियाँलय फगुआ आ ईद बकरी आ बकरालय की अहाँ भोज कय नाम करू जे मुइलै तकरालय की एहि गजलमे (i) रदीफ अछि 'की' (ii) पहिल शेरक दुनू पाँति आ शेष सभ शेरक दोसर पाँतिमे काफिया अछि 'अ' ध्वनिक संग 'रालय' सँ अन्त बला शब्द सभ । (iii) बहर अर्थात मात्राक्रम अछि 2222 222 (iv)दू टा अलग-अलग लघुकें एकटा दीर्घ मानल गेल अछि । (6) नक्षत्र-ग्रहक फेरमे पड़बाक काज नै छै भदबा आ दिगशूल सँ डरबाक काज नै छै सभ शास्त्र आ पुराणक अमृत बचाक' राखू तन-मनमे थाल-कादो भरबाक काज नै छै सभ थिकाह अपने सदिखन से ध्यान राखी नामपर जाति-धर्मक लड़बाक काज नै छै परमातमाक संतति अहीं देवता आ देवी धन लेल मारबाक आ मरबाक काज नै छै पावन ई भूमि मिथिला ई मैथिलीक नैहर एहि ठाँ कोनो मोकदिमा करबाक काज नै छै तप त्याग और शीलक संस्कार अछि जरूरी ई स्वर्ण वस्त्र भोज और मड़बाक काज नै छै विष थीक मांस-मदिरा पापड़ अँचार चिन्नी तिलकोरकेर तड़ुआ तड़बाक काज नै छै शब्दक नशामे भेटत आनन्दकेर खजाना संगति शराब भाङक धरबाक काज नै छै ज्ञानेक गंग-धारा तन-मन करैछ पावन थिक आगि भय आ चिन्ता जरबाक काज नै छै एहि गजलमे (i) रदीफ अछि 'काज नै छै' (ii) काफियाबला शब्द सभ अछि जकर अन्तमे 'अ' उच्चारणक संग 'रबाक' अथवा 'ड़बाक' वर्ण-समूह अछि : पड़बाक / डरबाक / भरबाक / लड़बाक / मरबाक / करबाक / मडबाक / तरबाक / धरबाक / जरबाक । (iii) बहर अछि : सरल वार्णिक बहर, प्रत्येक पाँतिमे वर्णक संख्या अछि : 17 उपरोक्त सभ उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे व्याकरण-सम्मत मैथिली गजल कहबाक मार्ग सामान्य अछि, जटिल नहि। संपर्क : 8789616115 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१२.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ९) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग - ९) पूर्व कथा राजा पुरूरवा एक सय आठम अश्वमेध यज्ञ के लेल आवश्यक निर्देशन लेमय के वास्ते ऋषि अगस्त्य के आश्रम में अपन प्रधान आमात्य के संग जाई छथि,आ हुनका संs निर्देशन लैत छथि ।
आब आगू यज्ञक घोड़ा जंबूद्वीप के निर्विघ्न पार कs गेल छल । आब ओ शाकद्वीप में आगू बढ़ल जाईत छल l ईहो द्वीप निर्विघ्न पार कs लेलक l एहि तरहें क्रौंच द्वीप,शाल्मल द्वीप,गोमेदक द्वीप आ पुष्कर द्वीप के पार करैत ओ श्याम कर्ण अश्व आब कुश द्वीपक सीमा के अंतर्गत विशाल सागर के पार करैत आगू बढ़ल l एतवा में पताल लोक संs दानव राज केशि निकसि पड़ल l ओकर एक गोट सहयोगी विरोचन यज्ञक अश्व के लगाम थामि लेल,आ ओहि अश्व के लs कs पताल लोक दिस विदा भेल l ओकरा पाछू पुरूरवा के सभ योद्धा भागल l तलवारक खनखनाहट संग भाला बरछीक ठन-ठनाहट संs दिग दिगंत् गुंजित भs उठल । देखिते देखैत दानवक जत्थाक जत्था उमड़ि गेल l दानव राज केशि पुरूरवा के युद्धक निमित्त ललकारलक l दानव गणक सम्मिलित भयंकर निनाद संs पृथ्वी एवं गगन मंडल गुंजित भs उठल l गदा लs पुरूरवा केशि राज संs युद्धरत भेलाह l दानव राज केशि कुड़हड़ि लs द्वंद युद्ध करs लागल l एम्हर मुसड़ि एवं प्रास लs शंकु दानव गण केंs हsर संs झीक झीक कs एहि प्रकारें नष्ट करय लगलाह किंवा न्यायप्रिय मंत्री कोनो अनाचारी अपराधी के अन्त करैत होय । तलवार आ ढाल धारण कएने वीर पुण्य दंत दैत्य एवं दानव गण पर प्रहार कs रहल छलाह । ओ केकरो दू दू आ केकरो तीन-तीन टुकड़ी में विभक्त करैत चलि गेलाह । कतेको दानव के अनेक खंड में विभक्त कs देलथि ओ l पिंगल दंड उठाकs जतह-जतह दौड़लथि,ओतह-ओतह दैत्य के शवक ढेरी लागैत गेल | पञ्चशिख मुग्दर घुमाs घुमाs बलपूर्वक शत्रु सबहक संहार करैत छलाह l ओ प्रबल वेगवान् गिरि भेदी थप्पड़क भीषण प्रहार कs ओकर आघाते संs सवार सहित हाथी एवँ रथी सहित रथ के चूर्ण-विचूर्ण करs लगलाह | बलवान नाड़ी जंघ, पएर, मुष्टि प्रहार एवं वज्र के समान ठेहुनक प्रहार संs असुर के मारय लागलाह l अपन असीम सेना दल के पराजय संs डेराएल केशि सेनापति बना जम्भ के पठौलक l ओकर सेनापतित्व में युद्ध आर भयंकर भs गेल l जम्भ दानवी मायाक सहारा लेल l चहुं दिश घनघोर अन्हार पसरि गेल l ई देख मतिमान आग्नेयास्त्रक प्रयोग केलथि l चतुर्दिक् तीव्र प्रकाश संs झमकि गेल छल l एहि में अनेक मानव आ दानव दुनुक भीषण संहार भेल l जम्भक माया संs आकाश मार्ग संs मांसक लोथड़ा आ रुधिरक वर्षा होमय लागल l पुरूरवा के प्रोत्साहन संs कुमार कृतु के सेनापतित्व में सर्पास्त्रक प्रयोग कएल गेल,जाहि संs सर्पक वृष्टि होमय लागल l अनेक सर्प दानवगण के अपन ग्रास बनबs लागल । एम्हर जम्भ जृम्भक अस्त्र केंs प्रयोग केलक । फल स्वरुप सभ मानव योद्धा में आलस्य भाव आबि गेल,ओ निद्राक अनुभव करय लागल । ई देखि कुमार कृतु सभ वीर के प्रोत्साहित केलथि। हुनक प्रोत्साहन के सकारात्मक प्रभाव परल,निद्रा के झटकि पुरूरवाक शूरवीर राक्षस सभ पर प्रहार करय लागल l मायावी राक्षस मायायुद्ध प्रारंभ केलक, जाहि संs आब एकहि गोट राक्षस अनेक संख्या में दृष्टिगोचर होमय लागल l एहि मायायुद्ध के कुजम्भ तोड़लथि l एहि प्रकारें ई मायावी युद्ध पन्द्रह दिन तक होइत रहल l बहुतायत में अपन असुर सैनिक के हताहत होईत देखि दानव राज केशि युद्ध छोड़ि कs समुद्र मार्ग सs पाताल लोक चलि गेल l अपन राजा के एहि तरहें युद्ध भूमि संs कायर सन पड़ाइत देख कs हताश भs शेष दानव योद्धा अपन राजा के अनुगामी भेल । ओहो सभ श्याम कर्ण अश्व के छोड़ि कs भागि पड़ायल । दानव राज केशि जे देवराज इंद्र केंs पराजित कएने छल,ओ पुरूरवा संs हारि गेल l यज्ञक अश्व आब निर्विघ्न कुश द्वीप में आगू बढ़s लागल l आब किनको ओहि अश्व के रोकवाक हिम्मत नहि भेलनि l तत्पश्चात निर्विघ्न पृथ्वीक परिभ्रमण कs ओ अश्व सात माह उपरान्त यज्ञ सभा में उपस्थित भेल l ऋषिगण विधिवत् यज्ञक पूर्णाहुति देलनि l तत्पश्चात विशाल रंगारंग कार्यक्रमक आयोजन भेल,जाहि में राजा पुरूरवा के सातो द्वीपक चक्रवर्ती महान सम्राट घोषित कएल गेल l देवर्षि नारद विशेष रूप संs प्रसन्नता व्यक्त केलनि l ओ ऋषिगण के प्रति श्रद्धा ज्ञापित केलनि l सम्पूर्ण महिपाल उचित व्यक्ति के सम्राट बनई सs ईर्ष्या रहित भाव संs अत्यन्त प्रसन्न छलाह l एहि अवसर पर गंधर्व,किन्नर,अप्सरा,आदि आकाश के विभिन्न दिशा संs आबि पुष्प वर्षा करs लगलाह l भगवान विष्णु पर्यंत आकाश मार्ग में अपन रथ पर आरूढ़ भय स्वस्ति वाचन कएलाह । हुनका स्वस्ति वाचन करैत देखि ब्रह्मा एवम भगवान शंकर स्वयं आबि राजा पुरूरवा के आशीर्वाद देलनि l उत्सव समाप्त भs गेल l सभ आगत अतिथि अपन-अपन निवास स्थलक दिशा में चलि भेलथि l आई पुरूरवाक मनोकामना पूर्ण भेल,भगवान विष्णु के कृपा संs ओ सातो द्वीप सहित संपूर्ण पृथ्वीक सम्राट घोषित भs गेल छलाहl तीनू लोकक ऎश्वर्य हुनका भेट गेल छलनि l क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१३.डा. बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (भाग-६) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (छअम भाग) डा. बिपिन कुमार झा (संस्थापक आ सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई-शोधपत्रिका) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (छअम भाग) (एहि सँ पूर्व महाकवि भास केर लिखल कर्णभारम् जे कर्णक मनोव्यथा पर लिखल गेल प्राचीनतम एकांकी अछि, संस्कृत में लिखल एहि ग्रन्थक पांचम प्रभाग धरि मैथिली रूपान्तर पढने रही अहाँ सब, आई ओहि सं आगू) कर्णः- भगवन्! किं नं वक्तव्यं दीर्घायुर्भवेति। अथवा एतदेव शोभनम्। कुतः- हे भगवन् ! दीर्घायु होऊ ई कियाक नहि आशीर्वाद देलहु। अथवा यैह ठीक अछि कियाक त- धर्मो हि यत्नैः पुरुषेण साध्यो भुजङ्गजिह्वाचपला नृपश्रियः। तस्मात्प्रजापालनमात्रबुद्ध्या हतेषु देहेषु गुणा धरन्ते ।। 17 ।। व्यक्ति के धर्मक साधना विशेष रूप में करबाक चाही कियाक त राजलक्ष्मी त सर्पजिह्वा होइत छथि एहि कारण प्रजापालननिमित्त जे राज करैत छथि ओ मरलो पर गुणप्रभाव सं जीवित रहैत छथि। भगवन्, किमिच्छसि। किमहं ददामि। हे भगवन् ! अहां की चाहैत छी? हम की दय सकैत छी? शक्रः- महत्तरं भिक्खं याचेमि। (महत्तरां भिक्षां याचे।) इन्द्र : बहुत पैघ भिक्षाक याचना करैत छी कर्णः- महत्तरां भिक्षां भवते प्रदास्ये। श्रूयन्तां मद्विभवाः। कर्ण : याचित भिक्षा देव। हमर विभव सुनल जाउ । गुणवदमृतकल्पक्षीरधाराभिवर्षि द्विजवर! रुचितं ते तृप्तवत्सानुयात्रम्। तरुणमधिकमर्थिप्रार्थनीयं पवित्रं विहितकनकश्रृङ्गं गोसहस्रं ददामि ।। 18 ।। गुणशालिनी ब्राह्मण द्वारा प्रार्थित सोना सं मढल सिंघबाली अमृतमय दूध देनिहारि तृप्त वच्छा सहित हे द्विजवर यदि अहां के इच्छा हो त एहेन हजारो गाय दय सकैत छी। शक्रः- गोसहस्सं त्ति। मुहुत्तअं खिरं पिबामि। णेच्छामि कण्ण! णेच्छामि। (गोसहस्रमिति। मुहूर्तकं क्षीरं पिबामि। नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।) इन्द्र : हजार जाय... किछ दिन दूध पीयब.... नै चाही कर्ण .. नै चाही कर्णः- किं नेच्छति भवान्। इदमपि श्रूयताम्। कर्ण : की ई नै चाहैत छी अहां? औरो सुनू रवितुरगसमानं साधनं राजलक्ष्म्याः सकलनृपतिमान्यं मान्यकाम्बोजजातम्। सुगुणमनिलवेगं युद्धदृष्टापदानं सपदि बहु सहस्रं वाजिनां ते ददामि ।। 19 ।। सूर्य किरण केर समान राजलक्ष्मीक साधन समस्त राजा द्वारा मान्य कम्बोज कुल में जनमल वायु समान वेग बला युद्ध में पीठ नै देखेनिहार हजारो घोडा सपदि दैत छी। शक्रः- अस्स त्ति। मुहुत्तअं आळुहामि। णेच्छामि कण्ण! णेच्छामि। (अश्व इति। मुहूर्तकमारोहामि। नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।) इन्द्र : घोडा.... कनि दिन चढब.... नै चाही कर्ण नै चाही कर्णः- किं नेच्छति भगवान्। अन्यदपि श्रूयताम्। कर्ण : की ई नै चाहैत छी अहां? औरो सुनू मदसरितकपोलं षट्पदैः सेव्यमानं गिरिवरनिचयाभं मेघगम्भीरघोषम्। सितनखदशनानां वारणानामनेकं रिपुसमरविमर्दं वृन्दमेतद् ददामि ।। 20 ।। निरन्तर मदचुबैत छै जेकर कपोल बला, भौंरा स सेवित पर्वतीय भूमि में सहज दौडयबला मेघ जकां चिग्घार करय बला अपन श्वेत नखदन्त सं शत्रुसमूह के मर्दन करै बला हाथीसमूह दैत छी। शक्रः- गअ त्ति मुहुत्तअं आळुहामि। णेच्छामि कण्ण! नेच्छामि। (गज इति। मुहूर्तकमारोहामि। नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।) इन्द्र : हाथी.... कनि दिन चढब... नै चाही कर्ण नै चाही... कर्णः- किं नेच्छति भवान्। अन्यदपि श्रूयताम्। अपर्याप्तं कनकं ददामि। कर्ण : की ई नै चाहैत छी अहां? औरो सुनू अपर्याप्त सोना दैत छी शक्रः- गहिणअ गच्छामि। (किंचिद्गत्वा) णेच्छामि कण्ण! णेच्छामि। (गृहीत्वा गच्छामि। नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।) इन्द्र : ग्रहण कय.... नै चाही कर्ण ...नै चाही कर्णः- तेन हि जित्वा पृथिवीं ददामि। कर्ण : त जीत कय पृथ्वी दैत छी शक्रः- पुहुवीए किं करिस्सम्। (पृथिव्या किं करिष्यामि।) इन्द्र : धरती लय की करब? कर्णः- तेन ह्यग्निष्टोमफलं ददामि। कर्ण : त अग्निष्टोमफल दैत छी। शक्रः- अग्निट्ठोमफळेण किं कय्यं। (अग्निष्टोमफलेन किं कार्यम्।) इन्द्र : अग्निष्टोमफल क कोन काज? कर्णः- तेन हि मच्छिरो ददामि। कर्ण : त हम अपन मूडी दिय? क्रमशः... अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र- कहक' अह राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी कहक' अहि
दुः खक' बादरि जाहि म न मे, उठैत रहैत अछि घुमड़ि -घुमड़ि , ओ मेघ तरल भ' नयन सँ बनि नोर खसैत अछि झहरि -झहरि ।
पानि भरल सरो वर मे, कहाँ भिजैत अछि पुड़ैनिक' पात, बिनु भिजने अन्हार सँ, इजोत बहराइत अछि , बनि परात।
छल क' निमंत्रण-पत्र पर, हर शब्द अछि षडयंत्र, आ', 'निवेदन' क्रूर विपत्ति के लिखल हाथ सँ पत्र।
अंधविश्वास जे पसरल अछि , अछि, ईहो एक तरहक अपराध, भ' जाइ एकर देहावसान , आ, सब मिलि कए दिऐ सराध।
अनकर विपत्ति के देखि कए, होइत अछि मोन हर्षित जिनकर, मद्दति पेबाक अधिकार नहि , दुः ख आबए जखन, हुनकर सिर पर।
नहि समान होइत अछि , सभदिन अलग-अलग छै ढंग, श्रृंग, रसातल आ समतल, जगहेक सभ अछि रंग।
मानल जाइत अछि शिष्टाचार, कोनो सभ्यता के राजदूत, प्रथमहि सुन्दर परिचय सँ, भविष्य -छवि , होइत अछि मजबूत।
औपचारिकता आवश्यक, मुदा, रहैछ यथार्थ सँ दूर, हँसब, घुघनो लटकल मे, करइ छै इएह, मजबूर।
ढोंग पसारैत अछि भाभट, बनि क' खूब, गड़ार, भाभंसो किछु ने होइत छै, आ, अंत मे होइछ देखार।
अजबारि लेथि ओ मोन के, जिनका मे भरल अछि डाह, नहि त' करतन्हि , धधकि -धधकि , अपनहि सर्वस्व सुड्डाह।
इतिहास प्रमाण लए ठाढ़ अछि , बुझबए लेल ई बा त, अन्हेरक 'जिनगी नहि रहलै, बढ़ि क' राति सँ प्रात।
जाधरि , रहैत अछि इजो त, नहि आबि सकैत, अछि अन्हा र, मुदा, इजोत जखन चाहए, अन्हार के क' दैछ, बहार।
अपनैती सँ जीतल जाइछ मोन, जीतल ने जाइछ बरजोरी , मोम घमैत अछि पाबि धा ह, नहि घमत, कतबो खखोरी ।
नहि जनैत छी , भवि ष्य-को ख मे, अछि एकछाहे, फूल कि काँट, मुदा , प्रकृतिक नियम इएह अछि , अगबे दुः ख ने, पड़ै छै फाँट।
मृत्यु -लोक मे कीर्ति टा , कएने अछि अमृत -पान, माटि क' घट, फुटि जाइत अछि , मुदा , कीर्ति ने जाइछ मसान।
दुःख के द्वारा देल निमंत्रण, की करतइ कि ओ स्वीकार? मुदा , कुमति , जिनकर पोसल, जा दैछ,विपत्ति , हकार।
सज्जनता -व्यवहा र -पत्र, अछि शि ष्टा चा र-मो सि सँ लि खल। सुवि चा रक, उपका रक आखर, मो ती सन, ओहि पर अछि नि खरल।
सत्य -खेत मे उपजल, सुख के दा ना मे अछि नैति कता -स्वा द, हि तैषी आओर सदा मुदि तकर, कल्या णका री , नि र्वि वा द।
आएल जखन अन्हर -बि हा रि , पकड़ि लेलहुँ हम धैर्यक खा म्ह, नचि ते आपस गेल, मुदा हम भेलहुँ ने टस-मस, अपन ठा म।
वि ना श, शां ति क दला न पर आएल,कए क' वि ध्वंस, शां ति कहलि -'अएलहुँ बजबए , जखन भेलहुँ नि र्वंश '?
बएन पठौ लथि जे घर -घर मे, अपना पनक' ओ आशी र्वा द, बढ़ि गेलैन्हि मां गल्य हुनक घर, भेलैन्ह ने कहि ओ, को नो हरमा द।
जि नकर करतब -कवच ओहन, जे, हो इछ अदि नता -घा त, बेका र, बदलब जनैत छथि भा ग क रेघा , लि खलो जँ दुर्दि न, हुनक कपा र।
मनो रथ ककर ने हो इत छै? सदि खन रहए सुख संग, पर, छुच्छे सुख भेटलै ककरो ? सूर्यो छथि , ग्रहण सँ तंग।
इजो त सँ टुटि जा इत अछि , अन्हा रक नमहर अहंका र, प्रभा -परि धि मे हा रल तम पर, इजो त क' हो इत अछि जयजयका र।
नभ-जलक वि षम बटबा रा सँ, उठल मेघ पर, नमहर वि वा द, कतहु भूमि सुखा एल अछि रौ दी कतहु, कतहु आबा द ।
भू पर सुखला हा मरुभूमि , ई त' मेघ लेल अछि खि धां स, अल्प -सीं चल, व्यंग्य, आ जत 'पूर्ण वृष्टि , से त' यशां श।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ५.संस्कृत खण्ड ५.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (पञ्चमोच्छवासः) चम्पूसाहित्ययशो विलासः (पञ्चमोच्छवासः) डा. दीपिका (स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च) [चम्पूसाहित्यवाग्विलासस्य पञ्चमेऽह्नि भवतां भवतीनां च समेषां हार्दं स्वागतं व्याहृत्य अद्यतनीयविषयवस्तुमादायात्र प्रस्तुताऽस्मि। अद्य महाकविभोजराजकृतचम्पूरामायणविषये विदुषां तत्र भवतां भवतीनाञ्चामोदप्रमोदाय किञ्चित्प्रस्तौमि।] तत्रादौ सर्वप्रथमं महाकविभोजराजपरिचयः- महाकविः भोजराजः परमारवंशीयः क्षत्रियः आसीत् । सरस्वतीकण्ठाभरणे भोजदेवः स्वकीयवंशस्य परिचयं दत्तवान् अस्ति। परमारवंशः अग्नितः उद्भूतः इत्यनेन मन्यते। अस्य अनेकानि ताम्रपत्राणि अथ च भूर्जपत्राणि प्राप्यन्ते येषां प्रकाशनं काव्यमालायां प्राचीनलेखमालानाम्ना मुद्रापितानि। भोजस्य राजकालः राजमृगाङ्केन सिध्यते। राजमृगाङ्ककालः 1099 विक्रमाब्दः वर्तते। अलबरूनी अपि भोजस्य राजकालः एवमव प्रस्तौति अनेन सहैव जयसिंहः अपि एवमेव स्वीकरोति। प्रथितः वल्लालपण्डितः भोजविषये लिखितवान् यत् पञ्चाशत् पञ्चवर्षाणि सप्तमासं दिनत्रयम्। भोजराजेन भोक्तव्यः सगौडो दक्षिणापथः॥ भोजराजः देशविशेषे देवमन्दिरं निर्मापितवान् । राजतरङ्गिण्यां महाकविकह्लणः नगदति- मालवाधिपतिर्भोजः प्रहतैः स्वर्णसञ्चयैः। अकारयद्येन कुण्डयोजनं कपटेश्वरे॥ वस्तुतस्तु भोजदेवः स्वकीये शासने विक्रमादित्योपाख्यायुतः आसीत्। तस्य राजद्वारे कवीनां सम्यक् सत्कारः आसीत् । एतस्मिन् सन्दर्भे एका भणितिः श्रूयते "प्रत्यक्षरलक्षं ददौ"। यद्यपि एषा भणितिः अत्युक्तिरूपा स्यात् किन्तु नैव निर्मूला। भोजराजेन नैके रचनाः लिखिताः तेषु केचन् प्रसिद्धाः सन्ति- क्रम. ग्रन्थाः विषयः 1 आदित्यप्रतापसिद्धान्तः ज्योतिषम् 2 राजमार्त्तण्डः ज्योतिषम् 3 राजमृगाङ्कः ज्योतिषम् 4 विद्वज्जनवल्लभः ज्योतिषम् 5 आयुर्वेदसर्वस्वम् वैद्यकम् 6 विश्रान्तविद्याविनोदः वैद्यकम् 7 चाणक्यनीतिः नीतिशास्त्रम् 8 नामतालिका कोषशास्त्रम् 9 तत्वप्रकाशः शैवशास्त्रम् 10 शिवतत्वरत्नमालिका शैवशास्त्रम् 11 युक्तिकल्पतरुः शैवशास्त्रम् 12 सिद्धान्तसंग्रहः शैवशास्त्रम् 13 राजमार्त्तण्डः पातञ्जलयोगसूत्रटीका 14 व्यवहारसमुच्चयः धर्मशास्त्रम् 15 चारुचर्या धर्मशास्त्रम् 16 शालिहोत्रम् अश्ववैद्यकम् 17 शब्दानुशासनम् व्याकरणम् 18 समराङ्गणसूत्रधारः शिल्पशास्त्रम् 19 सुभाषितप्रबन्धः सुभाषितम् 20 सरस्वतीकण्ठाभरणम् अलङ्कारग्रन्थः 21 चम्पूरामायणम् चम्पूकाव्यम् 22 हनुमन्नाटक (Catalogues Catalogarum ग्रन्थे) ----- क्रमशः.. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ६. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण सूचना १ "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला" ३१ दिसम्बर २०२२ क लगाति आगामी नव विशेषांकपर निर्णय हएत। विशेषांकमे रचनाकार/ कलाकर्मीक काज, रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) देल जायत। अहाँसँ ऐ लेल सुझाव सादर आमंत्रित अछि ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA २ "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला विदेह अपन जीवित रचनाकार/ कलाकर्मी पर विशेषांक शृंखलाक अन्तर्गत (१)अरविन्द ठाकुर, (२)जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, (३)रामलोचन ठाकुर, (४) राजनन्दन लाल दास, (५)रवीन्द्र नाथ ठाकुर, (६) केदार नाथ चौधरी, (७) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' आ (८) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक निकालने अछि। अही सन्दर्भमे आठो साहित्यकार पर "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत "मोनोग्राफ" आमंत्रित कयल जा रहल अछि। "विदेह मोनोग्राफ" शृंखलाक विवरण निम्न प्रकार अछि: (१) इच्छुक लेखक ऊपरमे कोनो एक रचनाकार पर अपन मोनोग्राफ लिखबाक इच्छा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छथि। मोनोग्राफ लिखबाक अवधि सामान्यः एक मास रहत। (२) विदेह आठ रचनाकारपर आठ लेखकक नाम मोनोग्राफ लिखबाक लेल चयनित कऽ ओकर सार्वजनिक घोषणा करत। "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक निअम: (१) मोनोग्राफ पूर्ण रूपेँ रचनाकारपर केन्द्रित हुअय। साहित्य अकादेमी, एन.बी.टी. आ किछु व्यक्तिगत रूपेँ लिखल मोनोग्राफ/ बायोग्राफीमे लेखक संस्मरण आ व्यक्तिगत प्रसंग जोड़ि कय रचनाकारक बहन्ने अपन-आत्म-प्रशंसा लिखैत छथि। "विदेह मोनोग्राफ" फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल सन रहत। फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल एहेन एकमात्र टूर्नामेण्ट अछि जतय कोनो "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" सेरीमनी नै होइत छै आ तकर कारण छै जे "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" मे टूर्नामेण्टमे नै खेला रहल लोक मुख्य अतिथि/ अतिथि होइत छथि आ फोकस खिलाड़ी सँ दूर चलि जाइत अछि। फीफा मात्र आ मात्र फुटबाल खिलाड़ीपर केन्द्रित रहैत अछि से ओकर टूर्नामेण्ट "ओपेनिंग सेरीमनी" नै वरन् सोझे "ओपेनिंग मैच" सँ आरम्भ होइत अछि आ ओकर समापन "क्लोजिंग सेरीमनी"सँ नै वरन् "फाइनल मैच आ ट्राफी"सँ खतम होइत अछि आ फोकस मात्र आ मात्र खिलाड़ी रहैत छथि। तहिना "विदेह मोनोग्राफ" मात्र आ मात्र ऐ "सातो रचनाकार"पर केन्द्रित रहत आ कोनो संस्मरण आदि जोड़ि कऽ फोकस रचनाकारसँ अपनापर केन्द्रित करबाक अनुमति नै रहत। (२) मोनोग्राफ लेल "विदेह पेटार"मे उपलब्ध सामग्रीक सन्दर्भ सहित उपयोग कयल जा सकैए। (३) विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' ई-पत्रिकामे प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। (४) "विदेह मोनोग्राफ"क फॉर्मेट: रचनाकारक परिचय (रचनाकारक जन्म, निवास-स्थान आ कार्यस्थलक भौगोलिक-सांस्कृतिक विवेचना सहित) आ रचनावली (समीक्षा सहित)। घोषणा: "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत (१) राजनन्दन लाल दास जी पर मोनोग्राफ निर्मला कर्ण, (२) रवीन्द्र नाथ ठाकुर पर मुन्नी कामत आ (३) केदार नाथ चौधरी पर प्रेम मोहन मिश्र द्वारा लिखल जायत। मैथिली पुत्र प्रदीप पर "विदेह मोनोग्राफ" लिखताह प्रेमशंकर झा "पवन"। शेष ५ गोटेपर निर्णय शीघ्र कएल जायत। घोषणा २: ओना तँ मैथिली पुत्र प्रदीप पर विदेह विशेषांक नै निकालने अछि, मुदा हुनकर अवदान केँ देखैत प्रेमशंकर झा "पवन"क हुनका ऊपर "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक विचार आयल तँ ओकरा स्वीकार कयल गेल। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ विदेह ब्रॉडकास्ट लिस्ट विदेह WWW.VIDEHA.CO.IN सम्बन्धी सूचना लेल अपन whatsapp नम्बर हमर whatsapp no +919560960721 पर पठाउ, ओकर प्रयोग मात्र विदेह सम्बन्धी समाचार देबाक लेल कएल जाएत। ४ विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १.साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५.स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७.लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८.दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय।
-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३५८ म अंक १५ नवम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १७९ अंक ३५८)|| 243 244 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA
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