ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३५९ म अंक ०१ दिसम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १८० अंक ३५९) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२२। सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 359 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१८) १.२.अंक ३५८ पर टिप्पणी (पृ. १९-२२) २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१ (गजेन्द्र ठाकुर) (पृ. २५-७९) २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना- धारावाहिक उपन्यास- आठम खेप (पृ. ८०-११४) २.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभाषामे शिक्षा अभियान आ जयकान्त मिश्र (पृ. ११५-१३२) २.४.रोशन जनकपुरी- समयके कथा (पृ. १३३-१४५) २.५.जगदीश प्रसाद मण्डल- आत्मबल (पृ. १४६-१५२) २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. १५३-१७२) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १६म खेप (पृ. १७३-१७८) २.८.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १०) (पृ. १७९-१८३) २.९.रमाकर चौधरी- एलरजी/ मनुष्यक रक्त/ विभिन्न प्रकारक रक्त सम्बंधित अन्य जानकारी/ रक्त समूह(Blood Group)/ उच्च रक्त चाप(Hypertension)/ प्रतिऔक्सीकारक(Antioxidant)/ पाचन तंत्र।(Digestive System)/ गैस्ट्रोओसोफेजिअल रिफ्लक्स बीमारी(GERD) (पृ. १८४-२०४) २.१०.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. २०५-२०८) २.११.राजदेव मण्डल ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. २०९-२१३) २.१२.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. २१४-२१९) २.१३.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. २२०-२२५) २.१४.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. २२६-२३५) २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- डऽर कथी के (पृ. २३६-२३७) ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- धोखा (पृ. २३९-२४१) ३.२.आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल (पृ. २४२-२४३) ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (षष्ठोच्छवासः) (पृ. २४५-२४८) 2
ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३५८ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ First Time for Maithili Diorama International Film Festival is going to be held from 30th November to 04th December The Venue is Instituto Cervantes, Hanuman Mandir Road, Connaught Place, New Delhi https://www.diorama.in/ https://watch.diorama.in/story-market/ https://watch.diorama.in/story/the-science-of-words/ DIORAMA 2022 PRESENTS Title: The Science Of Words (Three Maithili Stories translated into English by the Author himself) AUTHOR BIO: THE AUTHOR GAJENDRA THAKUR IS EDITOR OF VIDEHA Synopsis: The Sun is in the fifth sign of the zodiac, normally between the sixteenth of August to the sixteenth of September. If you want to dry something then it is the best time to do so, since during this period the most intense light and heat of the Sun falls on earth. During this fifth sign of the zodiac the palm leaves remain under the Sun, a part of Milu's fathers annual preservation plan, to instill life in these palm leaves. STEP 1: Click on the 'Register' Button at the top and make the payment. Once completed, you will get an email confirming the payment and you will get access to the platform within an hour. STEP 2: For the log-in process, enter your registered email address only that you have used while registering. STEP 3: The system will send an OTP to your registered email address. Once you have submitted the valid OTP and successfully logged in, you will be able to access all the content. STEP 4: If you have already registered and yet are unable to login to the website then: a. Ensure you are using your registered email address, without any extra space or characters. b. If you have recently bought the pass then please wait for at least 60 minutes for account activation c. Contact support team using our email festival(at)diorama.in २ राजदेव मण्डल पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी Parallel Literature in Maithili and Videha Maithili Literature Movement T.K. Oommen writes in the "Linguistic Diversity" Chapter of "Sociology", 1988, page 291, National Law School of India University/ Bar Council of India Trust book: "... the Maithili region is found to be economically and culturally dominated by Brahmins and if a separate Maithili State is formed they may easily get entrenched as the political elite also. This may not be to the liking and advantage of several other castes, the traditionally entrenched or currently ascendant castes. Therefore, in all possibility the latter groups may oppose the formation of a separate Maithili state although they also belong to the Maithili speech community. This type of opposition adversely affects the development of several languages." T.K. Oomen further writes: "... even when a language is pronounced to be distinct from Hindi, it may be treated as a dialect of Hindi. For example, both Grierson who undertook the classic linguistic survey of India and S. K. Chatterjee, the national professor of linguistics, stated that Maithili is a distinct language. But yet it is treated as a dialect of Hindi". (ibid, page 293) Parallel Literature The references to parallel literature are found in Vedas, where Narashanshi is referred to as parallel literature. Parallel Literature in Maithili The need for parallel literature in Maithili arose due to the constant onslaught on literature and dignity by the Public and Private Academies, for example, Maithili-Bhojpuri Akademi of Delhi, Maithili Akademi of Patna, Sahitya Akademi of Delhi, Nepal's Prajna Pratishthan, all of which are government Academies. In addition to these Academies, the onslaught on Maithili Literature and dignity was constantly done by the so-called literary associations which were recognised by the Sahitya Akademi and were the main tool for usurping all the literary space meant for this language. Besides these, the funding to these and other parochial associations and organisations led to the presentation of an interface in the name of Maithili, which was mediocre and non-representative. VIDEHA MAITHILI LITERATURE MOVEMENT AND A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE Therefore, the missing portions, the ignored and non-represented aspects of society, started to be chronicled. It led to the depiction marked by the richness of vocabulary and experiences and was a revolution in literature and art as far as people speaking Maithili are concerned. The quality now has not remained mediocre. The real power of the Maithili language was realised by the native speakers, mediocrity was replaced by excellence. This attempt at the writing of History of Parallel Literature for the Maithili Language arose as the mediocre agency (private and governmental) funded so-called mainstream literature, which has no readership, and no acceptance among the speakers of Maithili continued to be presented by these Akademies as representative literature. Literary journals like Museindia (www.museindia.com ) were also used for their sinister design. The mediocre interface of Maithili literature was presented by the government radio and television stations also. RAJDEO MANDAL- THE POET, THE NOVELIST The constant shedding of Tears -Maithili poem by Sh. Rajdeo Mandal - from his anthology of poems "Ambara" Out of the eyes of my beloved tears like a river always keep flowing and in that water of tears people plunge some feel cold and some feel hot some say wow! and some feel bad. but my blind-deaf accomplice does not care, her tears always keep flowing but after some time her tears stopped coming out now perhaps she has emptied herself of tear or is she storing it !? The verse is not a popular genre, but it is appreciated by a few. For a language like Sanskrit, the volunteers who are engaged in its popularisation, are using simple Sanskrit prose for it. They translate short stories and novels from other Indian languages into simple Sanskrit. Here the translation of the verse is barred as the verse is read by none. In a language, the number of speakers is so little that a need has been felt for organising camps for its spoken form, translation from verse into that language is considered a misuse of resources. In Maithili, the situation has become grave. If we envisage a situation where there are no villages left, the number of speakers of this language would become almost NIL. People would speak in Maithili only in seminars and sittings. The need is already being felt for pronunciation and vocabulary enrichment classes even for the authors and singers of Maithili. Then what is the purpose of writing verse in this language? What is the purpose and what is the need for it? People write verse due to paucity of time, as the other genres require the devotion of more time. The situation becomes even more grave when people give the reason for writing verses in this way. In this situation, the happenings of the neighbourhood, personal ambition, derogatory remarks about others; and the travelogue, all have become the subject matter of verse. But why not use prose for these kinds of subjects? The short stories are transformed into drama form to stage it. But what is the purpose of converting prose into a poem? The answer is both obvious and simple for those who know the so-called dried main channel of Maithili literature. The readers of the converted poems are only the partisan-critiques. And writers of those great poems themselves throw eulogies on themselves as they have understood the call for self-sufficiency in this way. Why depend on others for it? They write long prefaces in prose and add it to their collection of verses, declaring their verses as great and path-breaking! Who will understand the value of the creation of verse? The personal worldly experiences, if these are not allowed to percolate deep down, would not be able to transform into great poems, even though those might be in rhythm. The spiritual and other-worldly thinking, howsoever non-concrete would still not be able to mesmerise, if that is not able to meet the worldly and make itself relevant, even though it is non-rhythmic or subscribes to a particular partisan grouping or uses crutches of ideology. The essential needs of man are food, clothes and housing. And after that the spiritual thinking and related needs. When Buddha asked this question to all those who were seen participating in the festivities, asked whether they know the eventuality of death and if they do, how can they participate in those festivities. Likewise, the modern Maithili poets, when they find the base of their language-culture and economics missing behind their feet, even then they refuse to accept that truth and then they try to insert the -isms to the national-international happenings into their poems, they want to create patronising literature for the depressed classes and the natives, they want to become a benefactor and so it fails to have a cutting-edge effect. But when Rajdeo Mandal writes: From the percolating drops of blood The earth has become freshly-bathed The bird then asks Asks from its heart In the incoming heavy and pitch-dark night Would our species survive? , then it goes into our blood and the blood starts running fast. The species of the poetics of the poet or the species of that bird? No nod of partisan critiques or a self-obsessed preface is required for this poem. No cartel or crutches of ideology are required for this creation. So the poem needs excellence. It requires a base of language and culture. It does not need imported plots and subjects, which are imported to do favours to the poem. It also does not need the imported emotion, which would be a superficial attempt for searching for the disappearing language, and culture, which has gone missing; and during times of dwindling economy of the region. A good poem can be written on any subject, it can be written on the anxiety of Buddha, regarding the future of mankind, for consoling the heart also otherwise people will have to go to the pseudo-preachers, on and for the language, culture and economy otherwise we will soon have to start camps for Maithili. The transmigration of imagery is also required, otherwise, we will have to create an artificial atmosphere for the poet; for their poems, we will have to arrange stages, and a staging camp will have to be organised for their artificial vocabulary and ideology. And people would have to be trained for it. The poets of the so-called mainline of the dried drain are just doing that. The rhythm and ups and downs of the Maithili language, the cultural and professional superiority of its proletariat brimming with confidence, having all kinds of professional and cultural skills, the superiority of its cooperative living style, cultural conservatism, polity, daily affairs, social values, morality, economic situation and adaptation amid flood-ravaged economy; the religion and philosophy all should be the subject of Maithili poem. And if that does not happen it would become one-sided, it will get entrenched after getting lopsided, would become dead, fit to be framed and put onto the wall. To create poetry is a necessity, a literary urge for creation fulfilling this urge. When the people of Mithila would go to the camps for learning the Maithili language, then can only we start questioning the need for writing poems and the purpose for creating all types of verse forms. Only then we should discuss the futility of writing poems in Maithili. And that day must not come, for the poets would have to remain alert. And so is Rajdeo Mandal and that is why "Ambara" a collection of the poem written by him has become the best collection of this genre in the first decade of the 21st Century. His collection of poems "Vasundhara" is the next step. The excellence of verse created by Rajdeo Mandal is because of its foundation, the foundation of language and culture. The excellence is because he does not have to import the contents of his subjects. He does not import emotions either, you will find none. The expressions of his imagery lie in the rich vocabulary that he possesses. Creating a poem is the only way left for Rajdeo Mandal. He has to create poems, it's a literary hunger and essentiality of his literary existence. The emotions are poured out in a spinning rhythm and become his poetry. "Rahab Ahink Sang"- (Will remain with you only)- From "Ambara" Crying, calling My throat dried The lips dried As if I was thirsty The corpses all around Are laughing at me Nobody is listening to my voice Where has went My society It was necessary to break The conservatism Turning of direction For the future You all are yourself the Greats Move forward and leave the squabbling No interruption will be able to stop it I have not done any big crime Hey Respected you, come here Do not get angry I will not break any law henceforth I will not bother any of you now-on Keep your kingdom I do not want the headgear, the throne I will not change my colour anymore I will be with you all only, peacefully. RAJDEO MANDAL- THE FICTION WRITER "Paro" of Nagarjun-Yatri, (notwithstanding the unanswered question of whether it was written originally in Maithili or was a translation from Hindi into Maithili by the author himself) did depict first-hand hand account of the dwindling culture of his Maithil Brahmin caste of contemporary times. He did depict the socio-cultural situation of the period. The novel "Hamar Tol" (My quarter of the village) by Rajdeo Mandal is a first-hand account of his "Dhanuk" caste of Mithila and has been written in the settings of the socio-cultural situation that this caste is peculiarly placed in. He inserts everything in it, the belief, which is sometimes not rational; social reform, love, hate, hope as well as disappointment. There was a void after Lalit. The mainstream, as it is called, writers of the Maithili language got themselves into a maze due to their chosen subjects. The dark enveloped the literary scene wherein they found the exit tough, the going-on impossible. The "Hamar Tol" of Rajdeo Mandal purifies the account of the second-hand account by Lalit in "Prithviputra"; and as a result, the parallel movement of the stream was able to take along the main course of literature and moved it forward and made it relevant. The author, being a realistic writer, has been forced to make the ending a tragic one. He refuses to see some struggles or is not able to see those, or nobody can see these. But he gives details of those struggles too. "Everyone left the scene in a hurry. There began a fight between the Crow and the Myna. That fight remained unseen, only the tree saw it. And the tree saw many more things, but yet the tree remained silent". The complexity and perplexity of that silence could be refined and presented owing to the first-hand experiences of those unseen things by second-hand accounts. And that's why this novel has secured its position in the literary history of Maithili literature. Five short stories by Rajdeo Mandal Rajdeo Mandal adjudged the following five stories as the best of his short stories: Rusal Bauwa (An Angry Boy) Avak (Speechless) Bechuak Suiter (A Sweater for Bechua) Electionak Bhoot (The Ghost of Election) and Rakhbar (The Village Guard). The first one Rusal Bauwa (An Angry Boy) was written for the "82nd Sagar Raati Deep Jaray", a night-long short story recitation programme held every three months in the villages of Mithila, where the short-story writers read their new and unpublished short stories. Another writer critically acclaims the read short stories and the process goes from evening to morning. This time it was decided that only children's literature (short stories) would be recited and this event was held in my village. The criticism of Rajdeo Mandal's short story was assigned to Narayani. Narayanji noted that this short story reminded him of Premchand's famous short-story Idgah. The story goes on like that. The son of Fekan is angry, he wants new clothes otherwise he won't go to the Durga Pooja fair. The son of Dhirendra Babu has new clothes. Dhirendra Babu is rich but Fekan is poor, but his son is much ahead of Amit, son of Dhirendra Babu in every respect, be it study or sports. A discussion ensues between Fekan and his wife, his wife accuses him of not fulfilling his responsibility even towards his son. His son listens to all these discussions and consoles his father. Avak (Speechless) begins with some hilarious moments. Jitu reaches his in-law's house where his brother-in-law introduces him to his friend. This person seems to be part of the robber gang, and he saved his life. Bechuak Suiter (A Sweater for Bechua) deals with bonded labour, and poverty and hints at thinking along caste lines among the police force also. The boy at the teashop is a child labourer. It depicts entrenched corruption in the police force. Electionak Bhoot (The Ghost of Election) is a commentary on the electoral process and democracy. The craft where the protagonist depicts a sequence of events, which turns out to be happening in his dream, is a wonderful treat. Rakhbar (The Village Guard) is the story of Musba, the guard. His son gives a spear to his wife (Musba's daughter-in-law) and instructs her to pierce the body of Musba in case Musba quarrels with her. Musba, who is a terror outside is tamed inside his house. Then the wordplay extends to the story of Sumna who attacks him when he is behaving lecherously with her. In all the stories you will find the use of words and contexts which is absent in mainstream literature. The vibrant life, the story of gloom, and cultural paraphernalia even amid poverty were never heard of before the parallel tradition storytellers came to the scene. Issue No. 88 (November-December 2019) of Muse India at http://museindia.com/Home/PastIssue displays Maithili literature in a very poor light. Moreover, it wrongly claims to be a representative review of Maithili Literature, whereas it was only in line with the Sahitya Akademi, Delhi; a mere representation of the so-called "dried main-drain". It is expected that Muse India will correct itself by announcing an issue exclusively devoted to the parallel tradition of Maithili literature. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३५८ पर टिप्पणी अंक ३५८ पर टिप्पणी कल्पना झा, पटना १. शरदिन्दु चौधरीक संस्मरण साहित्य [बात-बातपर बात (I-IV)]/ २. शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक हास्य-व्यंग्य संग्रह- 'जँ हम जनितहुँ'३. शरदिन्दु चौधरीक तीनटा व्यंग्य संग्रह- 'बड़ अजगुत देखल..', 'गोबरगणेश' आ 'करिया कक्काक कोरामिन'- गजेन्द्र ठाकुर पर टिप्पण्णी बहुत नीक, समीचीन तीनू आलेख। एकहक टा बिन्दुकेँ फड़िछा कऽ लिखल गेल अछि। ई तीनू आलेख पढ़ि शरदिन्दु सरक व्यक्तित्व आ हुनका द्वारा रचित पोथी सभसँ लोक नीक जकाँ परिचित भऽ जाएत। बहुत मेहनतसँ तैयार कएल गेल तीनू आलेख, जे पढ़ैत रोचक सेहो लागल। माने बोरिंग नहि अछि। साधुवादक पात्र थिकहुँ अपने, बहुत मनोयोगपूर्वक तैयार कएल तीनू आलेख। मधुकान्त झा
विदेहक शरदेन्दु चौधरी विशेषांक मे चौधरी जी के "समय साल पत्रिका" संपादन पर अजीत झा जी के एक लेख अछि।चुंकि उक्त पत्रिका संचालन सं जुड़ल रहलहुं तें एकर चर्चा आह्लादित कयलक। अजीत जी कें धन्यवाद। समय साल पत्रिका गैर साहित्यकारो के मैथिली पढबा लिखबाक लेल उत्प्रेरक बनत से कामना राखि आरंभ भेल छल। एकर लाभ सभ सं बेसी हमरा भेटल से स्वीकार करैत छी। एहि लेल संपादक शरदेंदु जीक सदा आभारी रहब। समय साल जखन प्रकाशित होबय लागल तहिया मैथिली में एक पत्रिका नहिं रहि गेल छल। जहां धरि समय साल पत्रिका के अंतिम पृष्ठ के अश्लील हेबाक बात अछि से बात अनेक विशुद्धवादी लोक कहैत छलाह। अजीत जी सेहो चर्चा कयलनि। शरदेंदु जी जं ओकरा अश्लील नहि स्वीकार कयलनि तं ओकर कारण अछि। जीवन मे भोजन आ कामुकता (Food and Sex) सर्वोच्च स्थान रखैत अछि। कोन मैथिल बॉलीवुड सं प्रभावित नहिं?जतय सेक्सी फिल्म के बाढि बहैछ। कोन गाम अछि जतय अश्लील भोजपुरी आ पंजाबी हरियाणवी गीत दिन राति लाउडस्पीकर नहिं सुनबैत अछि। ब्लिज सनक नामी पत्रिका के अंतिम पृष्ठ एही सौंदर्य के प्रतीक छल। समय-साल मे वार्तालापक अंतिम पृष्ठ परदाक अंदर रहैत छल, अश्लील कहब कनी कठाइन लगैछ। समय संग चलबाक एक प्रयास छल।ओना अपन अपन मत। सच कहू तं ओहि अंतिम पृष्ठक "लतिका"हम स्वयं छलहुं। तें उपरोक्त गलत सफाई । ओना एकर प्रशंसक कम नहिं छला। हम उक्त पृष्ठ के दू पोथी के रूप मे प्रकशित कयल। लट लीला आ नटलीला। नामकरण अजित आजाद कयलनि। जकरा चाही पठा देब। ओतेक खराप नहिं लागत। पुनः अजीत जी के धन्यवाद। अपराध के क्षमा करी। केदार कानन शरदिंदु जी पर महत्वपूर्ण काज सम्पन्न कयलहुं अहांलोकनि। धन्यवाद क पात्र थिकहुं। शुभकामना। कामेश्वर चौधरी, विकासपुरी, नई दिल्ली प्रिय शरदेंदुजी पर विशेषांक नीक लागल।हुनक़ भाषा प्रेम, साहित्यक कर्मठता और मैथिली सेवा प्रेरणाप्रद रह अछि। हमर (ECRly) में पटना प्रवासक अंतरालमे घनिष्ठ सम्बन्ध रहल. UPSCक सिवल Service क लेल अपना खर्च पर किताब पठबथि। पूज्य पिताक अनुशरन करैत साहित्यकार रचना करैत रहलाह।मैथिली भाषा प्रसारमें हिमल भूमिका स्मरणीय रहत। हिनक दीर्घजीवनक शुभकामना आशीष अनचिन्हार विदेहमे रमाकर चौधरीजी द्वारा विभिन्न रोग पर जे चर्चा चलि रहल अछि से हरेक अंकमे एबाक चाही। एहि बेरक अंकमे जे मधुमेहक स्टेज-बाइ-स्टेज वर्णन अछि से उपयोगी अछि आ लगैए जेना रोगी अपन उपचार सरलतासँ अपनहि कऽ सकताह। कुमार मनोज कश्यप जी केर लघुकथा नीक अछि। डॉ विजयेन्द्र झा बाप रे बाप! अपने एतेक काज मैथिलीमे क' रहल छी, हमरा बुझने अपनेक काजक समक्ष मैथिली- साहित्य जगतमे प्रायः सभ झूस पडि जएताह। अपनेक एहि विराट आ' विशाल सामग्रीकें पढबाक लेल यथेष्ट समय आ' असीम धैर्य चाही। हमरा उत्सुकता बहुत अछि एकरासभकें पढबाक आ' हम अवश्य पढब । कनेक पलखति भेटैत अछि तखन। ता' हम सभटाकें 'सेभ' क' कए राखल अछि। हम एकटा अनुष्ठानमे लागल छी। शीघ्रहि एकरा निपटाए अपनेक एहि अमूल्य धरोहरसभक रसपान करब। बहुत-बहुत आभार, साधुवाद आ' प्रणाम! डॉ. प्रमोद कुमार, पॉन्डिचेरी विदेहक ३५८ वां अंक पढल । ई अंक श्री शरदेन्दु (शरदेन्दु चौधरी विशेषांक अछि। सबस' पहिने हम श्री गजेन्द्र ठाकुर जी (संपादक) कें कोटि कोटि धन्यवाद दैत छियैन्ह जे ओ, कोन कारण स' से नै जानि मुदा ओहन साहित्यकार, कवि , आलोचक वा पत्रकार पर विशेषांक निकालि रहल छथि जिनका गद्दी पर बैसल लोक या त' बिसरी गेलाह वा टारि देलखिन्ह। मैथिली भाषा साहित्यक विकास मे बहुतो एहनो मनीषी लोकनि भेलाह जे, जी जान स' माँ मैथिली केर सेवा कैलैन्ह । निः स्वार्थ। तेकर ई अर्थ नै जे हुनका कात क' देल जान्हि । श्री जगदीश चंद्र ठाकुर संग साक्षात्कार में वो स्वीकारैत छथि जे मैथिली में शीर्ष पुरस्कारक लेल मैथिलीक विकास में योगदान, साहित्यक कौशल, निपुणता वा मौलिकताक गुण रहनाई पर्याप्त नै, ओकरा लेल कलयुगिया गुणक खगता होइत छै। जे हुनका नै छन्हि आ तें हुनका अनदेखा कैल गेलैन। श्री कापरी जीक लेख निक लागल मुदा हमरा ओ लेख कम संस्मरण बेसी लागल। श्रीमती कल्पना झाक लेख ईमानदार लागल। ओ स्वयं कहैत छथि जे हुनका श्री शरदेन्दु जीक विषय में बेसी नै बुझल छलैन्ह । किताब मंगा का पढलाक बादे वो लिखली अछि। कुल मिला क' हमरा ई अंक बहुत निक लागल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१ (गजेन्द्र ठाकुर) २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना- धारावाहिक उपन्यास- आठम खेप २.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभाषामे शिक्षा अभियान आ जयकान्त मिश्र २.४.रोशन जनकपुरी- समयके कथा २.५.जगदीश प्रसाद मण्डल- आत्मबल २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १६म खेप २.८.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १०) २.९.रमाकर चौधरी- एलरजी/ मनुष्यक रक्त/ विभिन्न प्रकारक रक्त सम्बंधित अन्य जानकारी/ रक्त समूह(Blood Group)/ उच्च रक्त चाप(Hypertension)/ प्रतिऔक्सीकारक(Antioxidant)/ पाचन तंत्र।(Digestive System)/ गैस्ट्रोओसोफेजिअल रिफ्लक्स बीमारी(GERD) २.१०.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.११.राजदेव मण्डल ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१२.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१३.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१४.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- डऽर कथी के २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१ (गजेन्द्र ठाकुर) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१ नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- सुभाष चन्द्र यादवक समस्त साहित्य आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी राइटर्स ब्लॉक- मैथिलीक समानान्तर धाराक लेखन- सुभाष चन्द्र यादवक समस्त साहित्यक सन्दर्भमे सुभाषचन्द्र यादव (१९४८- ), जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल। मूल मैथिली लेखन पहिल चरण: घरदेखिया (१९८३) मूल मैथिली लेखन दोसर चरण: बनैत बिगड़ैत (विदेह ई-पत्रिकामे २००८ सँ २००९ धरि, फेर पुस्तकाकार २००९ मे), गुलो (मिथिला दर्शनमे प्रकाशन, २०१४, फेर पुस्तकाकार २०१५ मे), रमता जोगी (२०१९), मडर (२०२१), राजकमल चौधरी मोनोग्राफ (१९९६ साहित्य अकादेमी द्वारा रिजेक्ट, रचना पत्रिकामे २००५-०६ आ पुस्तकाकार २०२२ मे "नित नवल राजकमल" नामसँ), भोट (२०२२)। "जे सुनबैए खिस्सा से राज करैए ऐ संसारपर"- होपी अमेरिकी कबीलाक लोकोक्ति। आ सुभाष चन्द्र यादव खिस्सा सुनेनाइ छोड़ि देलन्हि। "स्वप्नसुन्दरी एण्ड द मैजिकल बर्ड्स ऑफ मिथिला" (गीता धर्मराजन, कथा, १९९६) मिथिलाक टुनमुनिया राजकुमारी स्वप्नसुन्दरीकेँ गाबैबला चिड़ै सभ बड्ड पसिन्न छलै। मुदा ओ माछ, बकड़ी आ गाय सभकेँ सेहो चिड़ै बना दैत छली। प्रजा सभ राजकुमारीकेँ उपराग देलक, राजकुमारी रूसि गेली आ चिड़ै बनेनाइ बन्न कऽ देलनि। ओ महलसँ बाहरो नै अबै छली। जादूबला देश मिथिलासँ जे बाँचल चिड़ै छल सेहो निपत्ता भऽ गेल। जनीजाति खेतमे अखनो गबैत छली, मुदा बिनु रङ-बिरङक चिड़ैक ई मिथिला आब ओ मिथिला नै लगैत छल। आ फेर आयल गाछक पैकार सभ, बिनु चिड़ै गाछक कोन काज, ई गप लोक सभकेँ बुझा, ठकि कऽ ओ सभ मिथिलाक सभटा गाछकेँ काटि कऽ लऽ गेल। जनीजाति सभ, सभटा जुगति भिड़ेलनि जे किछु गाछ बचि जाय, मुदा से भऽ नै सकल। बिनु गाछक सभटा धार सुखा गेल। बिनु गाछक लोक सभ होइत गेल गरीब आ पैकार सभ होइत गेल धनीक। जनीजाति सभ गेलीह राजकुमारी लग, कनैत, कहैत जे राजकुमारी, मदति करू, हम सभ गलत छलौं। स्वप्नसुन्दरी बैसल छली अपन कोठलीमे, जतऽ चारूकात देबालपर छल रङ बिरङक चिड़ै सभक चित्र। ओइ चिड़ैक चित्र सभकेँ देखैत मिथिलाक राजकुमारी स्वप्नसुन्दरी उदास भऽ बजली- नै, अहीं सभ ठीक छलौं। खाली चिड़ै हमरा सभकेँ प्रसन्न नै राखि सकैए। मुदा जनीजाति सभ बजली- बिनु चिड़ै सेहो हम सभ प्रसन्न नै रहि सकब, ओ चिड़ै सभ घुरा कऽ आनि दिअ राजकुमारी। मुदा राजकुमारी ततेक उदास छली जे ओ जादू नै कऽ सकली। तखन जनी-जाति सभ कहलन्हि- चिन्ता नै, हम सभ गाछ रोपब आ गाबैबला चिड़ै सभ घुरि आओत। आ ऐबेर ककरो बेइमानी सेहो हमरा सभ नै करऽ देबै। आ बताह सन खटऽ लागल सम्पूर्ण मिथिला। ककरो कोनो पलखति नै, आ ओ सभ गाबि कऽ नाचि कऽ रोपऽ लागल आ पटबऽ लागल गाछ। आ गाछ जेना-जेना बढ़ऽ लागल आ चकरगर होइत गेल सभ हँसऽ लगला, आ थोपड़ी पारऽ लगला। संग मिलि कऽ काज केलासँ हुनका सभकेँ खुशी होइन। आ ऐ सँ गाछो सभ नीकसँ आ जल्दीसँ बढ़ऽ लागल। आ स्वप्नसुन्दरीक देश मिथिलामे छोट-पैघ गाछ सभ मुस्की देमऽ लागल चारू कात। जादूबला संगीत चारू दिस पसरि गेल। लाल रङ्गक, जोमक रङगक, अकासी, पीअर, गुलाबी आ पनिसोखा सन सात रङक चिड़ै सभक डेरा बनत ई। राजकुमारी कहलनि जनीजाति सभसँ- हमर देशक बचियासभ पाठशाला जाथि, ई हमर सभ दिन सँ सपना अछि। जनीजाति सभ बजली- हँ राजकुमारी, जँ हम-सभ पढ़ल लिखल रहितौं तँ कोनो पैकार हमरा सभकेँ ठकि नै सकितय। मुदा आयल एकटा झमेल। जनीजातिमे सँ किछु कहलनि- मुदा तखन घरक काज के करत? तखन मिथिलाक राजकुमारी आदेश देलनि- बालक सभ बालिकाक काज सीखत आ बालिका सभ बालकक काज। मिलिये-जुलि कऽ आगाँ बढ़ैमे सभकेँ नीक लागत। आ स्वप्न सुन्दरी सभ पढ़ैबाली बालिकाकेँ देलन्हि एकटा साइकिल। स्वप्न सुन्दरी बुझेलखिन्ह- संसार भरिमे ओ सभ प्रसन्न छथि जे एक-ठामसँ दोसर ठाम जल्दी पहुँचि जाइ छथि, कारण तइसँ ओ सभ सभटा काज जल्दी-जल्दी पूरा कऽ लै छथि। जनीजाति सभ पुछलन्हि- की हम सभ साइकिल नै चला सकै छी? राजकुमारी कहलन्हि- किए नै? महिलाकेँ ओ सभ काज करबाक चाही जे ओकरा नीक लगै छै। किछु गोटे राजकुमारीसँ पुछलन्हि- मुदा टाका कतऽ सँ आओत? मुदा सभ ओकरा दबाड़ि देलक। सभटा काज राजकुमारिये करती? आ लगेलक सभ एकटा बड़का मेला। पाइ जमा भेल, आ बनल राजकुमारी स्वप्नसुन्दरीक पाठशाला। पाठशाला करैए जादू, ओतऽ बच्चा सभ जा कऽ बनि जाइत अछि जेना होथि रङ-बिरङक चिड़ै । अहूँ किए नै अबै छी पाठशाला राजकुमारी? राजकुमारी एक दिन पाठशाला एली, दोसर दिन एली आ सभ दिन आबय लगली। आ फेर ओ कहलनि जे बच्चा सभक माय बाबू सेहो आबथु पाठशाला। आ फेर राजकुमारी फेरसँ करऽ लगली जादू। मुद ऐबेर ओ खाली बेकार चीज सभकेँ बनबऽ लगली चिड़ै। आ बहुत रास कएक रङगक पाँखिबला चिड़ै सभ सेहो घुरि आयल अछि मिथिलामे, बिनु जादू कयने। सभ अपना लोलमे एक-एक हजार पोथी लेने, उल्लास आनैबला पोथी सभ, लाल, गुलाबी आ अकासी रङक। लाल, जोमक रङगक, पीअर, गुलाबी आ पनिसोखा सन सात रङक, कारण रेतक स्थान लऽ लेलक अछि हरियर कचोर गाछ सभ। आ चिड़ै सभ गाबि रहल अछि- बिनु ज्ञान सुन्दरता अछि सुखायल धार सन। आ ओइ टुनमुनिया राजकुमारीक मिथिला बनि गेल विश्वक सभसँ बेशी हरियर आ प्रफुल्लित देश। लोक सभ तँ ईहो कहैत छथि जे अही चिड़ै सभक कारण मिथिलाक हबामे रहैत अछि जादू सदिखन। आ जँ कहियो हमरो सभकेँ भेटि जाय एकटा एहेन स्थान, जतय महिला आ पुरुख सोचि सकथि पैघ-पैघ गप! ई जादूबला स्थान हमरा सभक लगे-पासमे तँ नै? ई स्थान जतऽ जादूबला बौस्तु सभ अछि, हमरे सन साधारण लोकक भितरे तँ नै अछि? जँ अहाँकेँ भेटय ई स्थान, जतऽ कतौऽ, तँ सूचित करू हमरा हमर ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर। सुभाष चन्द्र यादव खिस्सा सुनेनाइ छोड़ि देलन्हि। मुदा ओ १९८३ सँ अड़ल रहलाह असगरे, आइक तथाकथित निम्न वर्गक किछु लेखक सभ सेहो मैथिलीक आभासी वर्तनीक सङ्ग चलि गेला आ छोड़ि देलखिन्ह असगर हुनका, ओ सभ गैसलाइटिंगक शिकार भऽ गेला। पैकार सभ चारूकात सहसह करऽ लागल। ओइ टुनमुनिया राजकुमारी सन ओ देखैत रहलाह .. मुदा ०१.०१.२००८ सँ ८ सालक तैयारीक बाद विदेह- मैथिली ई-पत्रिका गाछ रोपब शुरू केलक, मिथिलामे, पक्ष-दर-पक्ष, आ घुरि कऽ आबय लागल रङ-बिरङक चिड़ै सभ। नचिकेता २५ बर्खक मौनभंगक बाद विदेह पाक्षिक ई-पत्रिका मे नो एण्ट्री: मा प्रविश प्रकाशित करय लगलाह आ ओही बर्ख २५ बर्खक बाद सुभाष चन्द्र यादव विदेहक पाठककेँ खिस्सा सुनबय लगलाह पक्ष-दर-पक्ष। सुभाष चन्द्र यादवक घरदेखिया आयल १९८३ मे आ २५ बर्खक बाद "बनैत बिगड़ैत" २००८-०९ मे विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद २००९ मे प्रिण्टमे सेहो आबि गेल। "जे सुनायत खिस्सा सएह राज करत ऐ संसारपर" आ समानान्तर धारा सुना रहल अछि खिस्सा। मिथिलाक कएक रङगक पाँखिबला चिड़ै सभ घुरि आयल जेना सन्दीप कुमार साफी, उमेश पासवान, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, उमेश मण्डल, राम विलास साहु, राजदेव मण्डल, नन्द विलास राय, जगदीश प्रसाद मण्डल, दुर्गानन्द मण्डल, रामानन्द मण्डल, ललन कुमार कामत, नारायण यादव, मुन्नी कामत, शिव कुमार प्रसाद, धीरेन्द्र कुमार, रामदेव प्रसाद मण्डल "झारूदार" एला रङ बिरङक कथा आ गीतक सङ। घुरि आयल अछि सभ अपना लोलमे एक-एक हजार पोथी लेने, उल्लास आनैबला पोथी सभ, लाल, गुलाबी, जोमक, पनिसोखाक सात रङक आ अकासी रङक। कारण रेतक स्थान लऽ लेलक अछि हरियर कचोर गाछ सभ। आ सुभाष चन्द्र यादव खिस्सा सुनेनाइ फेरसँ शुरू कऽ देलन्हि। बनैत बिगड़ैतक बाद आयल रमता जोगी, गुलो, मडर, भोट। साहित्य अकादेमी द्वार रिजेक्ट कएल राजकमल चौधरी मोनोग्राफ आयल "नित नवल राजकमल" नामसँ। आ तेँ सुभाष चन्द्र यादव छथि "नित नवल सुभाष चन्द्र यादव"। मैथिली स्टोरी साइंस (मैथिला कथाशास्त्र) आ सुभाष चन्द्र यादव मिशेल फोको (Foucault)क "अनुशासन संस्था" बा मनोवैज्ञानिक बार्टन आ ह्वाइटहेडक "गैसलाइटिंग" दुनूक लक्ष्य एक्के छै। मिशेल फोकोक "अनुशासन संस्था" अछि, सोझाँबलाकेँ अनुशासनमे आनू आ तइ लेल सभकेँ आपसेमे लड़ाउ, किछुकेँ पुरस्कृत करू आ जे अनुशासनमे नै अबैए तकरा आस्ते-आस्ते माहुर दियौ। गैसलाइटिंगमे सोझाँबला केँ विश्वास दिआओल जाइत अछि जे अहाँ जे यथास्थितिक विरोध कऽ रहल छी से कोनो विरोध नै, ई तँ सभ कऽ रहल अछि, अहाँ तँ विरोधक नामपर विरोध कऽ रहल छी आ से अपन कमी नुकेबा लेल। ऐमे समाजमे वर्तमान आधारभूत कमीक सहायता सेहो लेल जाइत अछि, आ आस्ते-आस्ते टारगेट बताह भऽ जाइत अछि बा पलायन कऽ जाइत अछि। से सुभाष चन्द्र यादवक राइटर्स-ब्लॉक सामान्य राइटर्स ब्लॉक नै छल, ई छल "गैसलाइटिंग"। मुदा एकर प्रतिकारमे अबैत अछि स्टोरी साइंस, कोन कथा सुनेलासँ लोक आ समाजपर की असर पड़त, ई ओइ आधारपर पूर्व-विश्लेषण करैत अछि। से समानान्तर धारा माहुरकेँ माहुरसँ काटबाक निर्णय लेलक। ओ मूलधाराक साहित्यकार सभ जे मानकीकरणक नामपर भाषाकेँ मरोड़ै छला, ओ स्टोरी साइंसक संग गैसलाइटिंगक आधारपर काज कऽ रहल छला। हुनकर उद्देश्य छल वर्तनीक भिन्नताकेँ अशुद्धताक नाम देब। रामदेव झा घरदेखियाकेँ लक्षित कऽ ई सभ लिखलन्हि जे, जे लिखब से बाजब असमियो मे असफल भेल से मैथिलीयोमे हएत। आ सुभाषचन्द्र यादव असगर पड़ि गेलाह। मुदा जखन रमानन्द झा 'रमण' अही स्टोरी-साइंसक प्रयोग बिसाँढ़क सङ केलन्हि, आ तकर आलोकमे जगदीश प्रसाद मण्डलक शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा वर्तनी-संशोधन कएल कथा (जइ ले ओ अशुद्धता दूर करबा लेल तीन दिन मेहनति कएल, अहि तरहक अहसान सेहो जतेलन्हि) उमेश मण्डलजी जखन हमरा पठेलन्हि तँ हमर कान ठाढ़ भऽ गेल। कारण सुभाष चन्द्र यादवक वर्तनीक कथा विदेहमे तावत ई-प्रकाशित भेनाइ शुरू भऽ गेल छल। हम उमेश मण्डल जी केँ स्टोरी-साइंसक मर्म बुझेलियन्हि आ बिनु तथाकथित शुद्ध कएल वर्तनीबला रूप विदेहमे छपब शुरू भेल [देखू दुध-पानि फराक-फराक (कथा एवं पाण्डुलिपि जगदीश प्रसाद मण्डल)- (छाया एवं सम्पादन- उमेश मण्डल)]। आ उमेश मण्डल सूचित केलन्हि जे वर्तनी शुद्धताक बाद जगदीश प्रसाद मण्डल जी गुम रहऽ लागल छलाह, आ जहियासँ ओ सुनलन्हि जे वर्तनीक शुद्धता बला रचना विदेहमे रिजेक्ट भऽ गेल छन्हि आ हुनकर असली वर्तनीबला वर्सन आब ई-प्रकाशित हेतन्हि तहियासँ हुनकामे नव उत्साह आबि गेल छन्हि। फेर उमेश मण्डल जीक गप सुभाष चन्द्र यादवसँ भेलन्हि, तँ सुभाष चन्द्र यादव जी सूचित केलखिन्ह जे मूलधारा बला सभ किछु लिखि दियौ, सुनबे नै करत काने-बात नै देत। राजमोहन झा भाइ साहेबपर सेहो बड्ड विश्वास कएल गेल रहय, मुदा ओ स्वयं साहित्य अकादेमी पुरस्कार लऽ कऽ अपनाकेँ राजनैतिक व्यक्तिवादी सिद्द केलन्हि। "तँ तकर उपाय?" "उपाय वएह जे अहाँ सभ कऽ रहल छी, माने लेखक बढ़ाउ।" आ स्टोरी साइंस सेहो सएह कहैए, जे कथा सुनायत से करत राज, आ जे जत्ते कथा सुनाओत से तत्ते आगाँ बढ़त। आ असगर बृहस्पतियो झूठ। मुदा ऐबेर दोसर चरणमे सुभाष चन्द्र यादव असगर नै रहथि। आ समानान्तर धारा कथा सुना रहल अछि १५ सालसँ आ मूलधारा सुनि रहल अछि। जखन कि मिशेल फोकोक सभटा डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशन "अनुशासन संस्था" जेना साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, आ साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त कथित लिटेरेरी असोसियेशन सभ मूल धारा लग छै। मुदा मिशेल फोकोक सभटा डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशन आ मूलधाराक गैसलाइटिंगक टेक्निक, गार्जियन बनबाक ऑफरक टेक्निक स्टोरी साइंस द्वारा खतम कऽ देल गेल छै। स्टोरी साइंस तारानन्द वियोगीक शब्दावली (१) जेना थोकक हिसाबें मैथिलीमे उपन्यास बहराइत अछि, (२) मेहतरक भाषा आ (३) कूड़ा-कड़कटक पहाड़ ठाढ़ करबाक साजिश बा रमानन्द झा "रमण"क शब्दावली (१) "हाट-बजारक भाषा" (डॉ. प्रमोद कुमारक 'कनकिरबा' क आमुखमे)केँ उघार केलक। ई सभ हतोत्साहित करबा लेल उपयुक्त गैस-लाइटिंग केर टेक्निक अछि जकरा समानान्तर धारा द्वारा स्टोरी साइंसक मदतिसँ खतम कऽ देल गेल अछि। तँ ई उदाहरण सिद्ध करैए जे मूल धारामे सभ जातिक लोक अछि आ समानान्तर धारामे सेहो। स्टोरी साइंसक मदतिसँ ब्राह्मणवादक संग गएर-ब्राह्मणक नव-ब्राह्मणवादकेँ सेहो चिन्हित कएल गेल अछि। आ सएह कारण छै जे मैथिली कथा सुनेबाक आयोजन "सगर राति दीप जरय"केँ साहित्य अकादेमी द्वारा गीड़ि लेबाक प्रयत्न भेल आ से विफल भऽ गेलापर रमानन्द झा 'रमण' सहित मूल धारा अपन मानसिक सन्तुलन बना कऽ नै राखि सकला। रमानन्द झा 'रमण' तँ सभटा सीमाक अतिक्रमण करैत एकटा ब्राह्मणवादी संस्थाक पत्रिकामे बिनु नाम लेने हमरा आ उमेश मण्डलकेँ अवाच कथा सेहो कहलन्हि आ तकर उपहार स्वरूप साहित्य अकादेमी ओइ संस्थाकेँ कथित लिटेरेरी एसोसियेशनक रूपमे मान्यता देलक। ई घटना स्टोरी-साइंसक प्रभावकेँ दर्शित करैत अछि। मुदा अशोक गत दस सालसँ 'सगर राति दीप जरय' केर आयोजन समानान्तर धाराक लेखक सभ द्वारा कएल जेबासँ आह्लादित छथि आ कहै छथि- "एकर प्रारम्भिक उद्देश्य रहै गाम-गाम गोष्ठी करबाक, से आबे जा कऽ भऽ रहल छै।" यएह गप हमर गाममे भेल ८२ म सगर राति दीप जरय [कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा (बाल साहित्य केन्द्रित) मेंहथ]मे शिवशंकर श्रीनिवास सेहो बाजल छला- "जखन हम सभ 'सगर राति दीप जरय' शुरू केने छलौं तखन एकर उद्देश्य छल जे ई गामे-गाम हुअय, मुदा ई तँ पटना-चेन्नै घुमऽ लागल।" आ ओम्हर रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' आ परमेश्वर कापड़ि सेहो पायापार नेपाल मे अड़ल छला। भारतक सरकारी संस्थाक संकलनमे हुनकर सभक रचना बाहरी (नेपालक) हेबाक कारण नै देल गेलनि मुदा ओही नेपालक दोसर लेखक, जे स्टेटस-को केर सङ छला, केर कथा देल गेलै । आब आउ सुभाष चन्द्र यादवक सभटा मूल रचनाक बेरा-बेरी पुनर्पाठ करी.... गुलो (गुलो मूल मैथिली आ गुलो हिन्दी अनुवाद (अंतिका प्रकाशन) क पाठपर आधारित।) गुलो हिन्दी अनुवाद पहिने गुलोक हिन्दी अनुवादपर टिप्पणी। (सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू हमर पोथी- मैथिली समीक्षाशास्त्रक मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त आ अनूदित साहित्यक समीक्षाशास्त्र, विदेह पेटार http://www.videha.co.in/pothi.htm मे उपलब्ध।) जेना कोनो हिट फिल्म जेना कन्नड़क "कनतारा" जँ अहाँ पी.वी.आर. मे देख लेने छी तँ की पाँचो मिनट तकरा अहाँ ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्मपर देखि सकै छी। जेना हरिमोहन झा केर "कन्यादान"क हिन्दी अनुवाद (विभा रानी द्वारा) देखि कय हुनकर पुत्र राजमोहन झा दुखी भऽ माथ पकड़ि लेने छला, सैक्रेड गेम्सक अनुराग कश्यप द्वारा घटिया वेब सीरीज रूपान्तरण देखि कऽ लेखक विक्रम चन्द्रा दुखी भेल छला, सएह अनुभूति गुलोक हिन्दी अनुवाद देखि कऽ हमरा भेल। मूल धाराक लोक बिनु अनुवाद सिद्धान्त पढ़ने अनुवाद करैए, मूल धाराक ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादी लेखक सभक जखन मौलिक लेखनेमे शब्द-भण्डारक सुखार रहै छै तँ अनुवादक कथे कोन। अनुवादक रमण कुमार सिंह लग ने मैथिलीक शब्द-भण्डार छन्हि आ ने हिन्दीक। अखबारी भाषामे ओ गुलोक अनुवादक पहिले पाँतीमे "तिला सकरांति"क अनुवाद "मकर संक्रान्ति" करैत छथि! की मकर संक्रान्ति मैथिलीक मूल धाराक ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादी लेखक सभ नै प्रयुक्त करैत छथि, आ गुलोक पहिल पाँतिमे "तिला-सकरांति"केँ सुभाष चन्द्र यादव "मकर संक्रान्ति" नै लिखि सकै छला? से जँ अहाँकेँ सुभाष चन्द्र यादवक गुलो केँ हिन्दी आ मैथिली दुनूमे पढ़बाक इच्छा हुअय आ गैसलाइटिंगक सिद्धांतक प्रयोग देखबाक हुअय तँ पहिने हिन्दी अनुवाद पढ़ू आ फेर मूल मैथिली पढ़ू। कारण मूल मैथिली जँ अहाँ पहिने पढ़ि लेलौं तँ अहाँकेँ सिनेमाकेँ पी.वी.आर.मे देखबाक अनुभूति हएत, आ जँ पहिने अहाँ मूल मैथिली पढ़ि लेब तँ हिन्दी अनुवाद एक्को पन्ना नै पढ़ि सकब, आ तखन गैसलाइटिंग केर प्रयोग केना देखि सकब? हमर इच्छा अछि जे अहाँ ई प्रयोग देखी। अही सन्दर्भमे २०२१ मे गएर-सवर्णकेँ पहिल बेर देल मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक चर्चा करब आवश्यक अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यास "पंगु" ओतऽ सँ शुरू होइए जतऽ यात्रीक बलचनमा खतम होइत अछि, आ मूल धाराक लोक छड़पटाय लगला जे जगदीश प्रसाद मण्डल यात्रीजी सँ आगू केना बढ़ि गेला आ ओ सभ यात्रीजी सँ पाछाँ बढ़ब तँ दूर पाछुए किए जा रहल छथि? २०१८ मे ई उपन्यास विदेहमे ९ खण्ड मे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह २१ मे (पृ. ६७७-७७९), फेर ओ पुस्तकाकार आयल ओही बर्ख, आ आब ओ विदेह पेटार मे सेहो उपलब्ध अछि। ऐ पोथीक हिन्दी अनुवाद रामेश्वर प्रसाद मण्डल द्वारा कयल गेल (पल्लवी प्रकाशन) आ हमर अनुरोध अछि जे ई हिन्दी अनुवाद अहाँ मूल मैथिली पढ़लाक बाद पढ़ू, अहाँ पूरा पोथी पढ़ि सकब। पंगुक मूल आ हिन्दी दुनू विदेह पेटार मे उपलब्ध अछि। फेर घुरू गुलोक हिन्दी अनुवाद पर, से अनुवाद केना भेल आ केना मैथिलीक इन्साइडर व्यू हिन्दी-अनुवाद वर्जनमे आउटसाइडर व्यू बनि गेल नव-ब्राह्मणवादक अनूदित-स्टोरी-साइंसक प्रयोग सँ, से नीचाँ टेबुलमे देल अछि। बहुत ठाम हिन्दी शब्दकोषक अकालक कारण शब्द लेल शब्द नै वरन् विवरण देल गेल अछि, सेहो बहुत ठाम अशुद्ध आ बहुत ठाम अनूदित भेबे नै कएल, आकि अर्थक अनर्थ करैत शाब्दिक/ अर्थानुवाद भेल। मूल मैथिली "गुलो" अनूदित हिन्दी "गुलो" तिला-सकरांति मकर संक्रान्ति एक्के ससपेन मे मुँह तोड़ि एक ही सस्पेन से मुँह तोड़ ओकरा टांसलकै उसका घी बनाया घरनियो* पत्नी भी टुकदुम-टुकदुम किसी तरह कबइ कबई मछली दबिया दाब देखबहक छौड़िए! देखेगी तू, देलियह आपको दिए अमाठी आम की टहनियाँ करची बाँस की छड़ियाँ कठुआयल स्तंभित दाब-दाब करैत रहै छै दबाव बनाए रखते हैं बात उनटा दइ छै** बात को पलट देती है पनिजाब पंजाब मुँह बाबि कऽ हताश सड़लाह खुट्टा घुन लगे खूँटे उपरेलक ढूढ़कर लाई गज्जन इज्जत ओगरइ-ए देखभाल करता है रमराहड़ि अरहर ठिठुआ*** ठिठुआ कोय लटेलक कोई उसे हथेली पर रगड़ता है भाकन जलकुम्भी परचारै छै ताना देती है भोटिया सुजनी भोमहैर लेतै काट खाएँगे हपकुनियाँ उंकड़ूं चास, समार आ चौकी*** चास, समार और चौकी टोन करइ-ए टुकड़े-टुकड़े करती है पांगय लागल काटने लगा खराय डंठल सूखकर सख्त गोसांइ डुमानी सूर्य डूबने पछड़ैत-पुछड़ैत किसी तरह सिदहा भोजन की सामग्री गुलो उकटि देलकै गुलो ने कहा जुमा कए निशाना साधकर हपसि-हपसि हाँफ हाँफ भासि गेल हिल गए पाढ़ि छप्पर को टेकनेवाला आधार हटहट पत्थर गिरहत दहित रहै गृहस्थ उदार था छील-मोठि छीलकर हड़ौथ हड़ौथ बाँस खढ़ उछाहि देलकै फूस उड़ गई कालीबंदीक सेवा कालीबंदी की पूजा कुशक कलेप*** कुश का कलेप पाट अंतर्धान आरा बगीचा गाछी आम के बगीचे गैढ़ काटकर छौड़ी कए समांगे ने होइ छै उसकी तबीयत ठीक नहीं है टाट घास फूस से बनी दीवार दोसर बिछेलक दूसरी बनाने लगा है आलन अस्तर जैराठो जड़ें दू गो सुपारी नोत मे आयल छै निमंत्रण की सुपारी मिली है बाछय लागल अलग करके रखने लगा टिरसि कए गुस्से में कननमुँह रुआँसा बीट लगाएत बाँस रोपेगा सिसोहि लेलकै तोड़ ले गया अरिकंचन*** अरिकंचन लाट मे झुनियो रहै झुनिया भी थी अढ़े-अढ़ चुपके से नौ बजे राति मे दस बजे रात में ओलैत चुनता झखइ अफसोस जता रहा डंगेलक उसे तैयार किया टपय आने जोगतै रखवाली कौन करेगा सात-आठ टा नभका खुट्टा काटि खूँटे काट रखे खिखिर नेवला पजोठने लेकर हाक दाए बुलाकर जुआयल*** जुआया हुआ गलि कए भात भाए जेतौ**** गलकर भात हो जाएगा तुम्मा*** तुम्मा अवाच कथा बुरी बात भूमकम भूकम्प***** भूकम्प भूकम्प***** ठठरी*** ठठरी ऊक मुखाग्नि हिन्नू हिन्दू करइ छै केना बोलता क्या है अरबा-अरबाइन*** अरबा-अरबाइन झोड़ा बटुआ टानि कए लेकर अखरा*** अखरा *सुभाष चन्द्र यादव पत्नी लेल घरनी आ जगदीश प्रसाद मण्डल भनसिया केर प्रयोग करै छथि, दुनू दू-स्थितिमे दू तरहक प्रयोग छै। अनुवादक की दुनू लेल "पत्नी" शब्दक प्रयोग करता? **बातकेँ पलटि देनाइ भेलै घुमा देनाइ, एतऽ छै छुटिते उनटा जबाब देनाइ। ***अनूदित नै भेल ****शाब्दिक अनुवाद *****अर्थानुवाद हिन्दी वर्जनमे अध्याय परिवर्तन सेहो पता नै चलैत अछि, मूल मैथिलीमे नव पृष्ठसँ विवरण शुरू कऽ, आ जतऽ जगह खाली छै ओतऽ फोटो पाड़ि कऽ अध्याय परिवर्तन स्पष्ट कएल गेल छै। डेनमार्कक शब्दकोष बड विस्तृत छै, प्रायः २३ वोल्यूम सँ बेशीमे छै, आप्रवासी प्रायः ओकर नागरिकता लेल लै जाएबला डेनिस भाषाक परीक्षामे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि। एकटा महिला जे डेनिससँ विवाह केने रहथि हुनकर बच्चा डेनमार्कक नागरिक भऽ गेल मुदा ओ कहलन्हि जे भाषा पेपर बड्ड कठिन होइ छै, डेनिस सेहो ओइमे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि। जनसंख्या वा क्षेत्रफलक छोट रहब डेनिस वोकाबुलेरी लेल हानिकारक नै भेलै। हिन्दी जै हिसाबे अपन भूगोल बढेलक अछि ओइ हिसाबे ओकर शब्दावली नै बढ़ल छै । अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे अपवाद , जकरा हिन्दीक पुरोधा लोकनि उपहासमे आंचलिक उपन्यास/ लेखन कहैत छथि आ एक तरहेँ नकारैत छथि, केँ छोड़ि हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्ट धरि सीमित रहए चाहै छथि, जखन कि जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइ छै। जइ भाषामे रामलोचन शरण १४-१५ हजार पाँतीक श्रीरामचरित मानसक अनुवाद सन् १९६८ (वि. २०२५) मे पूर्णभाव रक्षित मैथिली रूपमे केलन्हि ओत सन् २०२१ (वि. २०७८) मे गुलोक ऐ तरहक हिन्दी अनुवाद मोनकेँ विखिन्न करैत अछि। गुलो केर आमुख "आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा"- लेखक केदार कानन मूल मैथिली गुलोक प्रारम्भसँ पूर्व एकटा आमुख अछि "आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा"। ई अछि मूल धाराक कन्नारोहट आ ऐ बेर ओइ कन्नारोहटक भार छन्हि केदार काननक कान्हपर, आ ई लिखल गेल अछि तिला-संक्रान्ति दिन! मुदा सुभाष चन्द्र यादव तँ आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा लिखबे नै केने छथि। ई आमुख सुभाष चन्द्र यादवक लेखनीकेँ ओइपार ठाढ़ करबाक कुत्सित प्रयास अछि। ओ तँ लिखने छथि गुलो मण्डलक जीवनी, ओ गुलो मण्डल जे कहैत छथि- "हमरा चिन्है छिही? ने चिन्है छिही तऽ चीन्ह ले। हम छिऐ गुलो मण्डल। अही चौक पर घर छै। हमरा संगे ठेठपनी केलही तऽ बूझि ले। हम छिऐ गुलो मण्डल।" आ केदार कानन कऽ रहल छथि ठेठपनी गुलो मण्डलक सङ। "बड़का-बड़का ठोप-चानन कयनिहार भाषा कें दूषित करब मानैत छथि।"- केदार कानन लिखै छथि। मुदा ओइ ठोप-चानन कयनिहारक नाम लेबाक साहस केदार काननमे नै छन्हि। केदार कानन सभटा लाभ साहित्य अकादेमी आ मैथिली अकादेमीक ठोप-चानन कयनिहारसँ लैत छथि। आ आब जखन ओ ठोप-चानन कयनिहार मरनासन्न छथि, किछु वास्तविक रूपमे मरियो गेल छथि, तँ ओ अपनाकेँ ओकरासँ अलग देखाबय चाहैत छथि। आ ठोप-चानन कयनिहारक बाल बच्चा सभ जँ केदार काननकेँ, वीणा ठाकुरकेँ, अशोक अविचलकेँ आ आन लाखक-लाख टाकाक अनुवाद/ सम्पादनक असाइनमेण्ट आ साहित्य अकादेमीक बाल/ अनुवाद पुरस्कार लेनिहार केँ कृतघ्न कहि रहल छन्हि तँ ओ हुनका लोकनिक आपसी मामिला छन्हि। मुदा ठोप-चानन कयनिहारक बाल बच्चाक पुरखाक कृपासँ हुनका सभकेँ ई सभ भेटलन्हि से तँ सत्य छैहे। संगहि जँ अहाँ ठोप-चानन नै कऽ रहल छी, बा धोती-कुर्ता नै वरन् पेण्ट-शर्ट पहिरै छी बा अही आलेखमे कने ऊपर विश्लेषित नव-ब्राह्मणवादी छी तँ अहाँकेँ सभ छल-प्रपञ्चक अधिकार स्वतः भेटि जाइत अछि, से केदार काननक आमुख सँ जनतब भेटैत अछि। गुलो २०१५ मे प्रकाशित भेल केदार कानन जी केर आमुखक संग। २०१९क साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार केदार कानन जी केँ हिन्दी कविता संग्रह "अकाल में सारस" (लेखक- केदार नाथ सिंह)क मैथिली अनुवादपर देल गेल। आब अहाँ पहिने हमरा बताउ जे के एहन लोक अछि जे हिन्दीक कविता संग्रह नै पढ़ि सकैए आ से ओकरा मैथिली अनुवादक खगता छै? आ ऐ मे केदार काननकेँ अनुवाद असाइनमेण्ट आ पुरस्कार, डबल फएदा भेलन्हि सएह ने। कारण रमता जोगी (२०१९) मे केदार कानन निपत्ता छथि, मडर (२०२१) मे कोनो आमुख नै अछि। मुदा भोट (२०२२) मे केदार कानन बैक-कवरमे ८ पाँति लिखने छथि- मुदा एक्कोटा क्रान्तिकारी पाँति ओइमे नै अछि, किए? आब "गुलो" उपन्यासक सङ साहित्य अकादेमी की केलक। २०१६-२०२० मे प्रकाशित रचनाकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०२२ मे देल जयतै। माने गुलो रेससँ बाहर। माने गुलोक क्रान्तिकारी आमुख लिखनिहारकेँ साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार आ गुलो रेससँ बाहर। तँ गुलोक आमुख ब्लैकमेलिंग छल? बुझि तँ सएह पड़ैए। गुलोक आमुखमे आर बहुत रास कन्नारोहट अछि। 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा', मूल धाराक सभकेँ ई रटल छै, से केदार काननकेँ सेहो रटल छन्हि। मुदा अवहट्ठ तँ साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वर-पूर्व विद्यापति संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः सँ भिन्न छथि। सम्भवतः बिस्फी गामक बार्बर कास्टक श्री महेश ठाकुरक पुत्र। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विवरण- कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ "ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी" मे ओ विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत (रचना ११ फरबरी १२०६, देखू मध्यकालीन मिथिला, विजय कुमार ठाकुर)- श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पदावलीक भाषा छी। "जाव न मालतो कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।" आ "मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द"। ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०) षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥ अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ मे बिदापत केर उल्लेख करैत छथि। से विद्यापति ततेक प्रसिद्ध भऽ गेल रहथि जे ज्योतिरीश्वर तकर उल्लेख नचक रूपमे केलन्हि। केदार कानन तकर बाद गुलो उपन्यासक सारांश लिखै छथि। लगैए ओ ठीकसँ उपन्यास पढ़लन्हि नै बा अर्थ बुझि नै सकला। ओ लिखै छथि- "अनवरकेँ बूझल छैक जे बुढ़िया (सुखबाक माय) लग पाइ छैक। ओकर कोनो प्रयास निरर्थक नहि हेतैक। .. ऐंठ लेत" आर की की। मुदा उपन्यासमे से छैहे नै, अनवरे नै आनो पात्र एहेन नै करैए जे केदार कानन बुझाबय चाहै छथि। पलाइबला पाइ दैए जखन सभकेँ होइ छै जे ओ नै देत। पंखाबला पंखा बदलि कऽ दऽ दैए जखन गुलोकेँ सेहो आशंका रहय जे ओ नै बदलत। अनवर तँ कतेक बेर मदति केलकै, बादमे सतर्को केलकै जे गिद्ध सभ पाइ लेल मड़रा रहल छै। हँ कताक बेर पाइ नै भेटलापर/ भेटैमे देरी भेलापर एक बेर ओ अनठेने जरूर रहै। गुलो केर भाषासँ केदार कानन अचम्भित छथि, मूल धारा केर लोककेँ हेबाको चाही। मुदा से हुनकर मैथिली साहित्यसँ १५ सालसँ दूर होयब मात्र दर्शित करैत अछि। केदार काननकेँ आनो बहुत चीजपर आश्चर्य होइ छन्हि, उपन्यासक एकटा झगड़ाक बादक स्थितिपर ओ लिखै छथि जे "तथाकथित भद्र समाजमे एतबे टा घटना की सँ की कऽ दैत अछि मुदा सामान्य लोकक घरमे एहन घटना रहरहां."। केदार काननक ऐ तरहक अचम्भित होयबाक स्वाङ हास्य उत्पन्न करैत अछि, मूलधाराक ऐंठीक रूपमे हम एकरा देखैत छी। लगैत अछि जे ओ कोनो दोसर ग्रहसँ आयल छथि आ सुपौलक एकटा बड़का महलमे रहै छथि, दीन-दुनियाँ सँ दूर। ९ पन्नाक ई आमुख गुलोक पाठमे व्यवधान उत्पन्न करैत अछि। से अहाँसँ आग्रह जे पृ. सं१७ सँ सोझे गुलो पढ़नाइ शुरू करू। एक निसाँसमे उपन्यास पढ़ि जाउ। फेर घुरि कऽ ई आमुख बा कन्नारोहट हास्य आलेखक रूपमे पढ़ू। आ आउ गुलोपर। गुलो गुलो मे गिरहत आ मालिकक चर्च मात्र भेल अछि, जिनकर कलम-गाछी छन्हि, मुदा बस चर्चे अछि, आ एक बेर बभना कहि कऽ सम्बोधन अछि, माने ओ ब्राह्मण थिका। मात्र गुलोक मरलाक बाद डाक्टर मलिक अबै छथि, जे कानैत कहैत छथि जे आब हुनका मालिक के कहतन्हि, मानि लिअ ओ कायस्थ छथि, मुदा ऐ उपन्यासमे हुनकर जातिक विवरण नै अछि। से एकटा गिरहत/ मालिक दू-चारि बेर आ डाक्टर साहेब एक बेर। आ सभसँ पाइबला छथि पलाइ मिलक मालिक- दशरथ मण्डल। ई उपन्यास मोटा-मोटी १४ खण्डमे विभक्त अछि, आ फ्लैशबैकक संग गुलो मण्डलक जीवनक विवरण ओकर लगक वातावरणक विवरणक संग दैत अछि। उपन्यासक उद्देश्य काल-स्थानक विस्तारपूर्ण विवरण देबाक नै अछि, आ से समाज बा अर्थव्यवस्थाक अन्तर्निहित समस्याक विश्लेषण ई नै करैत अछि। गुलो मण्डलक चारू कात ई घुमैत अछि। गुलो मण्डलक आँखि, गुलो मण्डलक आभासी बा वास्तविक उपस्थिति जतऽ जतऽ जाइत अछि ततऽ ततऽ ई उपन्यास विचरैत अछि। कने काल लेल एम्हर-ओम्हर गेबो कएल तँ फेर आपस। मृत्युक बादो जखन लोक अनुकम्पा राशिमे अपन हिस्साक लेल जोगार कऽ रहल छथि, लेखक रिर्नियां लग घुरि अबैत छथि आ गुलोक हाक रिनियाँकेँ सुनाइ पड़ै छै, ओ बाबाक एकटा आर हाकक आसमे कान पथने अछि। "अकानैत रहइ-ए।" आ उपन्यास खत्म होइत अछि- "बबा तए चलि गेलइ। रिनियां कानइ-ए।" ई पोथी सामान्य उपन्याससँ भिन्न शब्द आ वाक्यक पाठ्यता (टेक्स्टुएलिटी) क रूपमे विश्लेषण मंगैत अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरी जे लेखक आ पाठककेँ जोड़ैत अछि आ उर्ध्वाधर धूरी जे ऐ पाठकेँ दोसर पाठ संग जोड़ैत अछि। जेक्स देरीदाक विखण्डनात्मक पद्धतिसँ जुलिया क्रिस्टोवाक पद्धतिक परिणामक जाँच कएल जायत। गुलो अध्यायमे विभक्त नै अछि, ई एकटा धार सन बहैत जाइत अछि, मुदा टाइपोग्राफीक प्रयोगसँ प्रिण्ट वर्सनमे अध्याय वा खण्ड पाठकक सुविधा लेल सम्भव कएल गेल अछि। ओना कए बेर खण्डक भीतर पैराग्राफ-स्पेस दऽ कऽ खण्डक भीतर उपखण्ड सेहो बनाओल गेल अछि। आब एकबेर गुलो केर पुनर्पाठ करी। गुलोक पहिल खण्ड पाठ शुरू होइत अछि तिला सकरांति सँ, मकर संक्रान्तिसँ नै! (अनुवादकक लेल ई गप अछि।) आङन नीपि रहल अछि रिनियां (गुलोक छोटकी बेटी), गीत गाबि रहल अछि। की अहाँकेँ कन्नारोहट बा कोनो हीन भावना गुलोक परिवारमे देखा रहल अछि। सिनोमेटोग्राफिक अनुभव लिअ, सोचू-गुणू, गीत गबैत नीपब, फेर पानिक फाहा जकाँ ओस, पछिया हवा, बड्ड जाड़, रिनियां पहिरने अछि खाली सलवार आ फराक आ मायक हाक- "ई छौड़ी हमरा जीअय नै देत। गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।" आ करू ऐ दृश्यक मंचन। मुदा नीपै कालमे चद्दरि लेटा जेतै, मैल लेटेलाक बाद हेतै (अनुवादकक लेल ई गप अछि।) आ आब सोचू जे ई गुलो मण्डल नै तथाकथित भद्र समाजक गुलो काननक घर अछि। तथाकथित भद्र समाजमे सेहो अहिना भोर होइ छै, अहिना तिला सकरांति बाजल जाइ छै, अहिना नीपल जाइ छै, आ अहिना माय चिचिआइ छै "ई छौड़ी हमरा जीअय नै देत। गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।" गुलोक परिवारक भोरुका आन सभ बात सेहो अहाँकेँ एतऽ भेट जायत। गुलोक दोसर खण्ड "हमरा चिन्है छिही? ने चिन्है छिही तऽ चीन्ह ले। हम छिऐ गुलो मण्डल। अही चौक पर घर छै। हमरा संगे ठेठपनी केलही तऽ बूझि ले। हम छिऐ गुलो मण्डल।" फ्लैशबैक एक पाराग्राफमे, गुलोक बाप मुनीलाल, गुलोक दूटा छोट बहीन, ओकर मायक मरब, बापक रेलवेक नोकरी छोड़ब, सहरसाक रेलवेक बड़ाबाबू बनरजी साहेबक मोन नै रहै जे मुनीलाल नोकरी छोड़य, ओकरा बड़का-बड़का जिन्दा कबइ के देतै?। मुनीलालक जेठकी बेटीक मांग तीन संतानक बाद पोछाय गेलै, मुनीलाल सभकेँ अपने लग लाए आनलक। नाति चरफर-चलाक रहै (महेन्दर).. बासडीह लिखा लेलकै। गुलो भागि कऽ कोसी चौक, सिपौल आबि गेल। बिहार सरकारक जमीनपर बसि गेल। रेलवे मे रहैत मुनीलाल लोहा-लक्कड़क बहुत सामान बनबेने रहय। छोट-पैघ खुरपी, कोदारि, खंती, दबिया, कुड़हरि, भाला, बरछी। ई सब अखनियो गुलोक घर मे छै। इएह ओकर बपौती छिऐ। बाप-पुरखाक छोड़ल और कुइछ नै छै। फेर रिनियांक चंचलता। ओकरा स्कूलमे पाँच सय टाका भेटल रहइ, पोशाक राशि।दीदीजी कहने रहइ- 'जुत्ता कीन लिहे।' मुदा गुलो दोसर बेगरतामे से खर्च भऽ गेलै, रिनियाँम् कहै छै.. सभटा चाटि गेलह। गुलोक तेसर खण्ड छोटुआ (गुलोक छोटका बेटा) आ रिनियांक काजक प्रति दृष्टिकोणक द्वन्द्व। गुलोक चारिम खण्ड एक मास पहिने गुलोक बड़का बेटा अरजुनमा पनिजाब (पंजाब नै) चलि गेलै। कंदाहावाली (अरजुनमाक बौह) आ सुजीत (अरजुनमाक बेटा)। रिनियाँक पेटमे चाली छै कारण ओ पचपच थूकै छै। नया साल दिन माछ बनल रहय, कारण नया साल आब उत्सवक दिन बनि गेल छै सभक लेल। ओइ दिन रिनियाँ माछ बोकरि देने रहय। ओना रिनियाँक आग्रह रहै मौंस खेबाक। गुलोक बगले मे अनवर एगो कठघरा मे बैठइ-ए। ऊ सुइया दै छै। एगो सुइया दइ के दस टका लै छै। गुलोक ससुरारि छै बेला आ ओकर पत्नीक नाम छै बेलावाली। पहिने गुलोकेँ गाजा पीऐत-पीऐत दम्मा उखड़ि गेलै। चारू कात माने गाजाक नशाक व्यापार होइत हेतै। से बेलास~ ओकर सरहोजि अपन ननदि माने गुलोक पत्नीके~ देखय आयल छै आ कहै छै- "ई गजपीआ हमर बहीन कए मारि देलक।" कंदाहावाली जरना उपरेलक (जोगार केलक, ताकि कऽ नै अनलक- अनुवादकक लेल टिप्पणी)। भगिनाक बियाहक नोत पुरबाक क्रम, साड़ी, साया, बिलाउज आ दू सय एकावन टाका दिअ पड़तै। ओ सोनक जाइए, छोटुआ आ रिनियां संग छै। रुनियाँ सेहो आयल छै, बहीन रिनियाँकेँ अपन सासुर लऽ जाय चाहै छै। मुदा ओ मना कऽ देलकै, लोक कहतै जे बाप रोगाह भऽ गेलै, दिन टगि गेलै तेँ पेट पोसै लए आयल छै। ओ बड्ड कानल, गुलो केँ छगुन्ता होइ छै, छौड़ी ई सब बात केना बूझि गेलै। कनियाँ दब छै मुदा मना करितै तँ कोनो गज्जन बाँकी रहितय (कोनो कर्म बाँकी रह्तय, इज्जत तँ छोट शब्द छै- अनुवादकक लेल टिप्पणी), "मारियो खइतौं..।" रिनियाँ लेल सोनक कोनो तीरथसँ कम नै कारण ओ अखैनधरि रेलगाड़ियो नै देखने-ए, माने चढ़ल तँ नहिये अछि, देखबो नै केने अछि, माने मात्र सुनने अछि। किछु गोटे लिखलन्हि जे रिनियां पहिल बेर रेलगाड़ीपर चढ़ल से ऐ उपन्यासमे नै छै, ओ मात्र सुनने हएत, बेशीसँ बेशी। से दूटा इण्डिया छै। गुलोक पाँचम खण्ड घूर-धुँआ। "अनवर कोनो जवाब नै दै छै। ऊ पहिने कएक बेर मदद केने छै, टाका देने रहै, दवाइ देने रहै, सुइया देने रहै। .. गुलो घुरबै के नाम नै लै छै।" गुलोक छअम खण्ड राजिनदर डीलर आ ओकर समदाही इनरा गानही। इनरा गानहीक जेठका डोमा किराना के दोकान करै छ॥ दोसर बेटा के पानक दोकान छै, सब तरहक चार्जर राखने-ए आ एकटा मोबाइल चार्ज करइ के पाँच टका लै छै। पुनरबास मे बहुत कए बिजली नै छै। तेसर बेटा मोबाइल रिचार्ज करइ-ए, फिलिम आ गाना डाउनलोड करइ-ए। फोटो एसटेट करइ-ए। फोटो खींचइ-ए। चारिम बेटा बरजेश दवाइ के दोकान करइ-ए। ओकर कहब छै- 'कोनो डाक्टर आ हमरा मे फरक एतबे चै जे डाक्टर कए डिगरी छै आ हमरा डिगरी नै छै। गुलोक सातम खण्ड कंदाहावालीकेँ मलहदक चाँपमे मखानक कमौनीक नव-रोजगार भेटलइ-ए। सुखबा अपन माय कए घर सए निकालि देलक। ओ छै इनरा गानहीक पितिया सासु। सुखबा माय कए घर लाए आनलक। गुलोक आठम खण्ड मूंगक बीया बाउग हेतै, हरवला चास, समार आ चौकी दइ के अढ़ाइ सय मांगै छै। कल ठीक करेबाक छै। "एमपी के एलेकशन छिऐ। कांगरेस रंजीता रंजन कए ठाढ़ केने-ए।"नरेशबा रंजीता रंजनसँ गुलो केँ एक हजार टका दिएतै, गुलोक घरमे छहटा भोट छै। मुदा नरेशबा निपत्ता भऽ गेलै।मुदा फुलबा मोदीकेँ जितेतै, मुदा गुलो नै जाएत मीटिंगमे "तोरा (फुलबाकेँ) मोटका गड्डी भेटल हेतौ। तू कर गे (मीटिंग)।" फेर घर झगड़ा, कंदाहावाली ससरफानी बनेलक आ गरदनि मे फँसा लेलक। कंदाहावाली बोइनवला गहूम डराममे बन्न कऽ ताला लगा नैहर चलि गेल। गुलोक नअम खण्ड गुलोक दूटा घर भासि गेलै। बाबा कहलकै, घरपर मरछाउर छीट देने छह। जंतर देलकै, मुदा ओ कोनो काजक नै। कालीबन्दीक सेवा, भगैत, फुलहासि। आब कुशक कलेपो नै लगतै। गुलोक दसम खण्ड छोटुआ काज करैए पिलाइ मालिक दशरथ मण्डल ओइठाम। कल ठीक करबैले १२०० टाका एडवांस मागैए, १००० भेटै छै। मुदा कल ठीक करेबाक बदला ओ साइकिल कीनि लैए कारण अरजुनमा अपन पाइसँ कीनल साइकिल बेचि लेने रहै। ओकरा देखेबाक छै। अनवर रिनियांक बोखार उतारबाक लेल गोली देलकइ। गुलोक दसम खण्ड गुलो केँ दूटा सुपारी दूटा नोत मे आयल छै- एकटा लालो पण्डित के पोती के बियाह , दोसर सारि के जैधी के बियाह। गुलोक एगारहम खण्ड गुलो मालिकसँ टौर्च मांगत, ओ नै देतै तऽ एक्को गो आम कि लुच्ची भोग नै हुअय देत। बाँस डेढ़ सय सए कम मे नै भेटै छै, गुलो चोरा कए बेचत तैं एक्के सय मे दिअय पड़तै। पाच टा बाँसक पाइ भेटलै, पान सय मे रिनियाँ पाठी किनलक। घड़िए घंटा मे पाठी रिनियाँ कए चीन्ह गेलै। गिरहत टौर्च नै देलकै, अपना पचास टका लगा कए किनलक। चोरबा सौंसे गाछक लुच्ची सिसोहि लेलकै। एकटा ठकुरबा सेनियल चोर छै। रिनियां, झुनियां आ बरस्सेरवाली लुच्ची चोरबैए। 'पकड़लकह बै?'- रिनियाँ पुछलकै। 'ऊ बभना हमरा पकड़त? .." (बरस्सेरवाली) गुलोक बड़की बेटी रुनियाँ बीनामे बियाहल छै। अनवरक मोबाइलपर फोन एलै ओकर। गुलो ओतऽ जाइए, छोटुआ सेहो सङ जाइ छै। रिनियांबला लुच्ची सनेस बनि जाइ छै। मूंगक पहिल तोड़ रिनियां सतलरेनमाकेँ देलक, ओ बीस टाका देलकै। रुनियाँ के दीयर नेरहू एलै, ओ चुपचाप रिनियां के देखैत रहइ-ए आ मुस्की छोड़इ-ए। दशरथ मण्डलक साढ़ूक लड़का नेपालमे छै, रिनियां लेल कथा अबै छै। मुदा गुलो चारि मासक टेम मंगैए, अरजुनमा नालायक छै मुदा तैयो ओकरासँ पुछतै। गुलोक बारहम खण्ड अनवरक मोबाइलपर फोन एलै अरजुनमाक, ओ रबाड़ि दै छै। गुलोकेँ खोंखी होइ छै, दू सय टाकामे दू कट्ठा थोकड़ा ओलइ के बात भेलै। कतेक गरदा फेफड़ामे गेल हेतइ। खौंत बाड़ि देलकै, दस टाकाक पंखा टूटि गेलै मुदा नंगड़ा दोसर बदलि देलकै। गुलोक तेरहम खण्ड एक बेर रिनियाँ गछपक्कू आम लाए कए गेल रहै तऽ मालिक पचास गो टाका देने रहै। मलिकानि खाइ लए देने रहै। बेलावालीक बोकार उतरिते नै छै। कोन छौड़ा, कोन मौगी काए टा आम लाए गेलइ। गुलो भरि राति छटपट करैत रहल। दम फुलइ आ खोंखी होइ। "बुढिया कए बोखार लागल छै। ओकरा (गुलो) अपना उठले ने होइ छइ।.. छुड़ी असकरे कखून घर तऽ कखनू गाछी दौड़ैत रहइ छइ। छौड़ा आठ बजे धरि सुतले रहै छै।" गुलोक अन्तिम खण्ड गुलो सात-आठ टा नभका खुट्टा काटि कए राखने-ए। .. आब तऽ सके ने लागइ छै जे कुछो करत। रिनियाँक पाठी खाइ-पीअइ नै छै। नै जानि की भाए गेलै। आन बेर गुलो रातिओ कए गाछी ओगरैत रहय। अ इ बेर नै ओगरि भेलै। आब ओत् पैरुख नै छै.. .. कंदाहावाली पहुँच गेलइ।'पपा, कल वला मिसतरी कए बजा आनथिन। ठीक काए देतै।' गुलो बाजल- 'कनियाँ, ओइ मे एक हजार लागतै। हमरा हाथ पर एक्को गो टका नै छै।' 'बजा कए आनथिन ने। जे लागतै से देबै।' अरजुन पनिजाब सए घूरि आयल। भगिना महिनदर जे बेइमानी सऽ गुलोक घराड़ी गुलोक बाप सऽ लिखबा लेने रहै से ठकहरबा भगिना सुनलकै जे ममा बेमार छै त भेंट करय एलै। गुलो ओकरा अवाच कथा कहि देलकै। महिनदर सतलराएन भगवानक पूजा करेलक। रिनियां ओतऽ गेल, भौजी रातिमे रोकि लेलकै। रिनियांकेँ पता चललै जे गुलोक मन बहुत खराप छै। ओ भोरे आबि गेल। ऐ उपन्यासक महा-अन्त.. कला देखू.. माय रतुका पूजा दिआ पुछलकै। औतौका हाल सुनबइ मे रिनियां कए मन नै लागलै। माए कए कहलक- 'माय, पैसा दही ने। बबा कए गोली लाबि दइ छिऐ।' .. रिनियां कनहा पकड़ि कए डोलेलकै- 'बबा!' कुइछ नै। कतौ कुइछ नै। 'माय, दौड़ गे। देखही ने बबा कए की भेलै गे! बबा हौ! हौ बबा! बबा हौ बबा!' .. 'हंसा उड़ि गेलै।' फेर पाइक अभावमे लकड़ी नै आ लकड़ीक अभावमे गुलोकेँ गाड़ि देल जेतै। ".. भूमकम होइ छै हौ!" परमेसर बाजल। .. भूकम्प फेर एलै। ऊक दइतिए ता दू गोटे मोटरसाइकिल सए एलै, कन्हैया आ जगदीस। फेर मृत गुलो अस्पताल जाइए, ओकर पोस्टमार्टम होइ छै, ओ भूकम्पसँ गुलो मरलै से पहिनहियेसँ अस्पतालमे हल्ला रहै, से कागच बनि गेलै। फेर दोबारा गुलोकेँ असमसान आनल गेलै। ऊक देलकै छोटुआ दुनू कोदरवाह माटि सए गुलोकेँ तोपि देलकै। किछु खरहू आ जनीजाति जे मुसलमान रहै से आगि दैत आ दफनो होइत देखि बाजै छै- ई हिन्नू हइ कि मुसलमान.. हिन्नुओ के कोनो धरम हइ!... धरम ले के की होतइ? पैसा होइ हइ त बालोबच्चा गुजर करिहइ।.. नेता/ मंत्री सभक भूकम्पक बाद अनुकम्पा राशि देबाक प्रतियोगिता। कोनो प्राकृतिक आपदा एलापर केना मुइल लोककेँ अनुकम्पा राशि देबालेल आपसमे प्रतियोगिता होइ छै आ से न्यूज मे रहबाक लेल, से लेखक एतऽ देखबऽ चाहै छथि। वाड कमिशनर पनरह सौ टाका.. एमपे .. पाँच हजार टाका.. मंत्री.. दस हजार.. सरकारी आदमी.. चारि लाखक चेक.. आ फेर ओइ पाइ लेल रगड़ा.. जगदीस केँ ओइमे सँ एक लाख चाही।मुदा लेखक घुरै छथि रिनियाँ लग। "रिनियां उदास अय। बबा मन पड़ै छै।.. दाइ गे! कते साफ अबाज रहै।.. ओकरा भेलै जे हाक दइ- बबा! हौ बबा!.." जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरी, जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरी जूलिया क्रिस्टोवा अपन पोथी "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मे इण्टर-टेक्स्टुअलिटी माने अन्तर-पाठ्यताक संकल्पना देलन्हि, मने कोनो पाठ एकटा देबारमे बन्न नै रहि सकैए। से ओ पाठकेँ संकलन कहै छथि। आब गुलोमे देखू, रंजीता रंजनसँ छह वोटक एक हजार टका नरेशबा दियेतै। मुदा ओ निपत्ता भऽ जाइ छै। फुलबा मोदीकेँ जितेतै। एम.पी. केर एलेक्शन छिऐ। से सुभाष चन्द्र यादव टेक्स्टक कनटेक्सट ताकि लेने छला २०१५ मे। से हुनका भीतर घुरियाइत हेतन्हि आ से विस्तृत रूपमे बहार भेल "भोट"मे एम.एल.ए. केर भेल एलेक्शनक संग २०२२ मे। से अन्तर-पाठ स्थापित करैत अछि अन्तर-विषयक विषय-वस्तु। ई सभटा पाठ आ विषय एक दोसरासँ रगड़ा लैत रहैए आ एक दोसराक प्रभावकेँ खतम करैत रहैए, कखनो कोनो पाठ आगाँ तँ कखनो दोसर। आ ऐ पाठकेँ अहाँ समाज आ संस्कृतिक आधारसँ अलग नै कऽ सकै छिऐ। से समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यक पाठ मिज्झर भऽ जाइत अछि। पाठ अभ्यास आ उत्पादनक विषय अछि। से पहिनेसँ समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यिक पाठ दू तरहक स्वर निकालैत अछि। विचारधाराक संघर्ष आ तनावकेँ पाठ समाहित करैत अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरीमे सोझे लेखक आ पाठकक बीच वार्ता होइ छै। माने लिफाफक बौस्तु आ लिफाफपर लिखल पता केर बीच सोझे वार्ता होइ छै। मुदा जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरीमे "पाठ" मूलधाराक साहित्य आ एकटा छोट कालावधिमे भेल घटनाक बीच वार्ता करैत अछि। माने पाठ आ ओकर सन्दर्भक बीच वार्ता होइ छै, एक लेखकक पाठ दोसरक लेखकक पाठ संग वार्ता करैए। ई दुनू धूरी जखन एक दोसराकेँ काटैए तखन शब्द बा पाठ उत्पन्न होइए जइमे कमसँ कम एकटा आर पाठ पढ़ल जा सकैए। जुलिया क्रिस्टोवा बोली-बानीकेँ यथावत राखबाक आ किछु पाठ जे मनुक्खसँ अलग अछि केर रूपमे लेखकक अधिकार आ कर्तव्यक वर्णन करैत छथि। (जारी..) अनुलग्नक-१ बनैत-बिगड़ैत-सुभाषचन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षा (विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in मे २००९ मे ई-प्रकाशित हमर आलेख) सुभाषचन्द्र यादवजीक "बनैत बिगड़ैत" कथा-संग्रहक सभ कथामे सँ अधिकांशमे ई भेटत जे कथा खिस्सासँ बेशी एकटा थीम लए आगाँ बढ़ल अछि आ अपन काज खतम करितहि अन्त प्राप्त कएने अछि। दोसर विशेषता अछि एकर भाषा। बलचनमाक भाषा ओहि उपन्यासक मुख्य पात्रक आत्मकथात्मक भाषा अछि मुदा एतए ई भाषा कथाकारक अपन छन्हि आ ताहि अर्थेँ ई एकटा विशिष्ट स्वरूप लैत अछि। एक दिस कथाक उपदेशात्मक खिस्सा-पिहानी स्वरूप ग्रहण करबाक परिपाटीक विरुद्ध सुभाषजीक कथाकेँ एकटा सीमित परिमितिमे थीम लऽ कए चलबाक, भाषाक शिल्प जे खाँटी देशी अछि पर ध्यान देबाक सम्मिलित कारणसँ पाठकक एक वर्गकेँ एहि संग्रहक कथा सभमे असीम आनन्द भेटतन्हि तँ संगे-संग खिस्सा-पिहानीसँ बाहर नहि आबि सकल पाठक वर्गकेँ ई कथा संग्रह निराश नहि करत वरन हुनकर सभक रुचिक परिष्करण करत। किछु भाषायी मानकीकरण प्रसंग- जेना ऐछ, अछि, अ इ छ । जाहि कालमे मानकीकरण भऽ रहल छल ओहि समय एहिपर ध्यान देबाक आवश्यकता रहए। जेना "जाइत रही" केँ "जाति रही" लिखी आ फेर जाति (जा इ त) लेल प्रोनन्सिएशनक निअम बनाबी तेहने सन ऐछ संगे अछि। मुदा आब देरी भऽ गेल अछि से लेखको कनियाँ-पुतरा मे एकर प्रयोग कए दिशा देखबैत छथि मुदा दोसर कथा सभमे घुरि जाइत छथि। मुदा एहिसँ ई आवश्यकता तँ सिद्ध होइते अछि जे एकटा मानक रूप स्थिर कएल जाए आ "छै" लिखबाक अछि तँ सेहो ठीक आ "छैक" लिखबाक अछि तँ "अन्तक 'क' साइलेन्ट अछि" से प्रोनन्सिएशनक निअम बनए। मुदा से जल्दी बनए आ सर्वग्राह्य होअए तकर बेगरता हमरा बुझाइत अछि, आजुक लोककेँ "य" लिखल जाए वा "ए" एहिपर भरि जिनगी लड़बाक समय नहि छै, जे ध्वनि सिद्धांत कहैत अछि से मानू, आ नहि तँ प्रोनन्सिएशनक निअम बनाऊ। "नहि" लेल "नञि" लिखब तँ बुझबामे अबैत अछि मुदा नइँ (अन्तिका), नइं (एन.बी.टी.) आ नँइ (साकेतानन्द - कालरात्रिश्च दारुणा) मे सँ साकेतानन्दजी बला प्रयोग ध्वनि-विज्ञान सिद्धांतसँ बेशी समीचीन सिद्ध होइत अछि आ से विश्वास नहि होअए तँ ध्वनि प्रयोगशाला सभक मदति लिअ।(वैज्ञानिक आ मानक मैथिली वर्णमालाक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइवक (http://www.videha.co.in/) विदेह ऑडियो लिंकपर डाउनलोड/श्रवण लेल उपलब्ध अछि।) "बनैत बिगड़ैत" पोथीक ई एकटा विशेषता अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजी अपन विशिष्ट लेखन-शैलीक प्रयोग कएने छथि जे ध्वन्यात्मक अछि आ मानकीकरण सम्वादकेँ आगाँ लए जएबामे सक्षम अछि। कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। कथामे असफलताक सम्भावना उपन्यास-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि "सोप ओपेरा" जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिए बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नहि दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नहि तँ खरापे-खराप। कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना एहि तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे "देवी को बलि" सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थिति आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नहि। वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक "डिसकसन" वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। आधुनिक कथा अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए ? कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक "मसनवी" फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय (!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत। कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी। मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत। सुभाष चन्द्र यादवक कथा-संग्रह बनैत बिगड़ैत: स्वतन्त्रताक बादक पीढ़ीक कथाकार छथि सुभाषजी। कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष तँ एहि स्थितिमे हिनकर कथा सभमे भेटब स्वाभाविके। कएक दशक पूर्व लिखल हिनक कथा "काठक बनल लोक" क बदरिया साइते संयोग हंसैत रहए। एहु कथा संग्रहक सभ पात्र एहने सन विशेषता लेने अछि। हॉस्पीटलमे कनैत-कनैत सुतलाक बाद उठि कए कोनो पात्र फेरसँ कानए लगैत छथि तँ कोनो पात्र प्रेममे पड़ल छथि। किनकोमे बिजनेस सेन्स छन्हि तँ हरिवंश सन पात्र सेहो छथि जे उपकारक बदला सिस्टम फॉल्टक कारण अपकार कए जाइत छथि। आब "बनैत बिगड़ैत" कथा संग्रहक कथा सभपर गहिंकी नजरि दौगाबी। कनियाँ-पुतरा- एहि कथामे रस्तामे एकटा बचिया लेखकक पएर छानि फेर ठेहुनपर माथ राखि निश्चिन्त अछि, जेना माएक ठेहुनपर माथ रखने होअए। नेबो सन कोनो कड़गर चीज लेखकसँ टकरेलन्हि। ई लड़कीक छाती छिऐ। लड़की निर्विकार रहए जेना बाप-दादा वा भाए बहिन सऽ सटल हो। लेखक सोचैत छथि, ई सीता बनत की द्रौपदी। राबन आ दुर्जोधनक आशंका लेखककेँ घेर लैत छन्हि। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद वैह सड़कक चौबटिया अछि आ वैह रेड-लाइटपर गाड़ी चलबैत-रोकैत काल बालक-बालिका सभ देखबामे अबैत छथि। मुदा आब दृष्टिमे परिवर्तन भऽ जाइत अछि। कारक शीसा पोछि पाइ मँगनिहार बालक-बालिकाकेँ पाइ-देने वा बिन देने, मुदा बिनु सोचने आगाँ बढ़ि जाएबला दृष्टिक परिवर्तन। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद की हुनकर दृष्टिमे कोनो परिवर्तन नहि होएतन्हि? बालक तँ पैघ भए चोरि करत वा कोनो ड्रग कार्टेलक सभसँ निचुलका सीढ़ी बनत मुदा बालिका ? ओ सीता बनत आकि द्रौपदी आकि आम्रपाली। जे सामाजिक संस्था, ह्यूमन राइट्स ऑरगेनाइजेशन कोनो प्रेमीक बिजलीक खाम्हपर चढ़ि प्राण देबाक धमकीपर नीचाँ जाल पसारि कऽ टी.वी.कैमरापर अपन आ अपन संस्थाक नाम प्रचारित करैत छथि ओ एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद ओहि पुरातन दृष्टिसँ काज कए सकताह? ओ सरकार जे कोनो हॉस्पीटलक नाम बदलि कए जयप्रकाश नारायणक नामपर करैत अछि वा हार्डिंग पार्कक नाम वीर कुँअर सिंहक नामपर कए अपन कर्त्तव्यक इतिश्री मानि लैत अछि ओ समस्याक जड़ि धरि पहुँचि नव पार्क आ नव हॉस्पीटल बना कए जयप्रकाश नारायण आ वीर कुँअर सिंहक नामपर करत आकि दोसरक कएल काजमे "मेड बाइ मी" केर स्टाम्प लगाओत? ई संस्था सभ आइ धरि मेहनतिसँ बचैत अएबाक आ सरल उपाय तकबाक प्रवृत्तिपर रोक नहि लगाओत? असुरक्षित- ट्रेनसँ उतरलाक बाद घरक २० मिनटक रस्ताक राति जतेक असुरक्षित भऽ गेल अछि तकर सचित्र वर्णन ई कथा करैत अछि। पहिने तँ एहन नहि रहैक- ई अछि लोकक मानसिक अवस्था। मुदा एहि तरहक समस्या दिस ककरो ध्यान कहाँ छै। पैघ-पैघ समस्या, उदारीकरण आन कतेक विषयपर मीडिआक ध्यान छै। चौक-चौराहाक एहि तरहक समस्यापर नव दृष्टि अबैत अछि, एहिमे स्टेशनसँ घरक बीचक दूरी रातिक अन्हारमे पहाड़ सन भऽ जाइत अछि। प्रदेशक तत्कालीन कानून-व्यवस्थापर ई एक तरहक टिप्पणी अछि। एकाकी- एहि कथामे कुसेसर हॉस्पीटलमे छथि। हॉस्पीटलक सचित्र विवरण भेल अछि। ओतए एकटा स्त्री पतिक मृत्युक बाद कनैत-कनैत प्रायः सुति गेलि आ फेर निन्न टुटलापर कानए लागलि। एना होइत अछि। कथाकार मानव जीवनक एकटा सत्यता दिस इशारा दैत आ हॉस्पीटलक बात-व्यवस्थापर टिप्पणी तेना भऽ कए नहि वरण जीवन्तता देखा कए करैत छथि। ओ लड़की- एहि कथामे हॉस्टलक लड़का-लड़कीक जीवनक बीच नवीन नामक युवक एकटा लड़कीक हाथमे ऐंठ खाली कप, जे ओहि लड़कीक आ ओकर प्रेमीक अछि, देखैत अछि। लड़की नवीनकेँ पुछैत छै जे ओ केम्हर जा रहल अछि। नवीनकेँ होइत छै जे ओ ओकरा अपनासँ दब बुझि कप फेंकबाक लेल पुछलक। नवीन ओकरा मना कऽ दैत अछि। विचार सभ ओकर मोनमे घुरमैत रहैत छै। ई कथा एकटा छोट घटनापर आधारित अछि...जे ओ हमरा दब बूझि चाहक कप फेकबाक लेल कहलक? आ ओ दृढ़तासँ नहि कहि आगाँ बढ़ि जाइत अछि। एकाकी जेकाँ ई कथा सेहो मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपर आधारित अछि। एकटा प्रेम कथा- पहिने जकरा घरमे फोन रहैत छल तकरा घरमे दोसराक फोन अबैत रहैत छल, जे एकरा तँ ओकरा बजा दिअ। लेखकक घरमे फोन छलन्हि आ ओ एकटा प्रेमीक प्रेमिकाक फोन अएलापर, ओकर प्रेमीकेँ बजबैत रहैत छथि। प्रेमी मोबाइल कीनि लैत अछि से फोन आएब बन्द भऽ जाइत अछि। मुदा प्रेमी द्वारा नम्बर बदलि लेलापर प्रेमिकाक फोन फेरसँ लेखकक घरपर अबैत अछि। प्रेमिका, प्रेमीक ममियौत बहिनक सखी रितु छथि आ लेखक ओकर सहायताक लेल चिन्तित भऽ जाइत छथि। एहि कथामे प्रेमी-प्रेमिका, मोबाइल आ फोन ई सभ नव युगक संग नव कथामे सेहो स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि। टाइटल कथा अछि बनैत-बिगड़ैत। तीन टा नामित पात्र । माला, ओकर पति सत्तो आ पोती मुनियाँ । गाम-घरक जे सास-पुतोहुक गप छै, सेहन्ता रहि गेल जे कहियो नहेलाक बाद खाइ लेल पुछितए, एहन सन। मुदा सैह बेटा-पुतोहु जखन बाहर चलि जाइत छथि तँ वैह सासु कार कौआक टाहिपर चिन्तित होमए लगैत छथि। माइग्रेशनक बादक गामक यथार्थकेँ चित्रित करैत अछि ई कथा। सत्तोक संग कौआ सेहो एक दिन बिला जएत आ मुनियाँ कौआ आ दादा दुनूकेँ तकैत रहत।प्रवासीक कथा, बेटा-पुतोहुक आ पोतीक कथा, सासु-पुतोहुक झगड़ा आ प्रेम ! अपन-अपन दुःख कथामे पत्नी, अपन अवहेलनाक स्थितिमे, धीया-पुताकेँ सरापैत छथि। रातिमे धीया-पुताक खेनाइ, खा लेबा उत्तर भनसाघरक ताला बन्द रहबाक स्थितिमे पत्नीक भूखल रहब आ परिणामस्वरूप पतिक फोंफक स्वरसँ कुपित होएब स्वाभाविक। सभक अपन संसार छै। लोक बुझैए जे ओकरे संसारक सुख आ दुःख मात्र सम्पूर्ण छै मुदा से नहि अछि। सभक अपन सुख-दुःख छै, अपन आशा आ आकांक्षा छै। कथाकार ओहन सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि, जे हुनकर अनुभवक अंतर्गत अबैत छन्हि। आत्मानुभूति परिवेश स्वतंत्र कोना भए सकत आ से सुभाष चन्द्र यादवजीक सभ कथामे सोझाँ अबैत अछि। आतंक कथामे कथाकारकेँ पुरान संगी हरिवंशसँ कार्यालयमे भेँट होइत छन्हि। लेखकक दाखिल-खारिज बला काज एहि लऽ कऽ नहि भेलन्हि जे हरिवंशक स्थानान्तरणक पश्चात् ने क्यो हुनकासँ घूस लेलक आ ताहि द्वारे काजो नहि केलक। हरिवंशक बगेबानी घूसक अनेर पाइक कारण छल से दोसर किएक अपन पाइ छोड़त ? लेखक आतंकित छथि। कार्यालयक परिवेश, भ्रष्टाचार आ एक गोटेक स्थानांतरणसँ बदलैत सामाजिक सम्बन्ध ई सभ एतए व्यक्त भेल अछि। आइ काल्हि हम आकि अहाँ ब्लॉकमे वा सचिवालयमे कोनो काज लेल जाइत छी, तँ यैह ने सुनए पड़ैत अछि, जे पाइ जे माँगत से दए देबैक आ तखन कोनो दिक्कत होअए तँ कहब ! आ पाइक बदला ककरो नाम वा पैरवी लए गेलहुँ तँ कर्मचारी ने पाइये लेत आ नहिये अहाँक काज होएत। एकटा अन्त कथामे ससुरक मृत्युपर लेखकक साढ़ू केश कटेने छथि आ लेखक नहि, एहिपर कैक तरहक गप होइत अछि। साढ़ू केश कटा कऽ निश्चिन्त छथि। ई जे सांस्कृतिक सिम्बोलिज्म आएल अछि, जे पकड़ा गेल से चोर आ खराप काज केनिहार, जे नहि पकड़ाएल से आदर्शवादी। पूरा-पूरी तँ नहि, मुदा अहू कथामे एहने आस्था जन्म लैत अछि आ टूटि जाइत अछि। हरियाणामे बापो मरलापर लोक केश नहि कटबैत अछि, तँ की ओकर दुःखमे कोनो कमी रहैत छै तेँ ? पंजाबक महिला एक बरखक बाद ने सिनूर लगबैत छथि आ ने चूड़ी पहिरैत छथि मुदा पहिल बरख कान्ह धरि चूड़ी भरल रहैत छन्हि, तँ की बियाहक पहिल बरखक बाद हुनकर पति-प्रेममे कोनो घटंती आबि जाइत छन्हि ? कबाछु कथा मे चम्पीबलाक लेखक लग आएब, जाँघपर हाथ राखब। अभिजात्य संस्कारक लोक लग बैसल रहबाक कारणसँ लेखक द्वारा ओकर हाथ हटाएब । चम्पीबला द्वारा ई गप बाजब जे छुअल देहकेँ छूलामे कोन संकोच। जेना चम्पीवला लेखककेँ बुझाइय रहन्हि जे हुनका युवती बुझि रहल छलन्हि। लेखककेँ लगैत छन्हि जे ओ स्त्री छथि आ चम्पीबला ओकर पुरान यार। ठाम-कुठाम आ समय-कुसमयक महीन समझ चम्पीवलाकेँ नहि छइ, नहि तँ लेखक ओतेक गरमीयोमे चम्पी करा लैतए। चम्पीवलाक दीनतापर अफसोच भेलन्हि मुदा ओकर शी-इ-इ केँ मोन पाड़ैत वितृष्णा सेहो। फ्रायडक मनोविश्लेषणक बड्ड आलोचना भेल जे ओ सेक्सकेँ केन्द्रमे राखि गप करैत छथि। मुदा अनुभवसँ ई गप सोझाँ अबैत अछि जे सेक्ससँ जतेक दूरी बनाएब, जतेक एकरा वार्तालाप-कथा-साहित्यसँ दूर राखब, ओकर आक्रमण ततेक तीव्र होएत। कारबार मे लेखकक भेँट मिस्टर वर्मा, सिन्हा आ दू टा आर गोटेसँ होइत अछि। बार मे सिन्हा दोस्ती आ बिजनेसकेँ फराक कहैत दू टा खिस्सा सुनबैत अछि। सभ चीजक मोल अछि, एहिपर एकटा दोस्तक वाइफ लेल टी.वी. किनबाक बाद फ्रिजक डिमान्ड अएबाक गप बीचेमे खतम भऽ जाइत अछि। दोसर खिस्सामे एकटा स्त्री पतिक जान बचबए लेल डॉक्टरक फीस देबाक लेल पूर्व प्रेमी लग जाइत अछि। पूर्व प्रेमी पाइ देबाक बदलामे ओकरा संगे राति बितबए लेल कहैत छै। सिन्हा एहि कथामे ककरो गलती नहि मानैत छथि, डॉक्टर बिना पाइ लेने किएक इलाज करत, पूर्व प्रेमी मँगनीमे पाइ किएक देत आ ओ स्त्री जे पूर्व प्रेमी संग राति नहि बिताओत, तँ ओकर पति मरि जएतैक। आब बारसँ लेखक निकलैत छथि तँ दरबानक सलाम मारलापर अहूमे पैसाक टनक सुनाइ पड़ए लगैत छन्हि। प्राचीन मूल्य, दोस्ती-यारी आ आदर्शक टूटबाक स्थिति एकटा एकाकीपनक अनुभव करबैत अछि। कुश्ती मे सेहो फ्रायड सोझाँ अबैत छथि, कथाक प्रारम्भ लुंगीपरक सुखाएल कड़गर भेल दागसँ शुरू होइत अछि। मुदा तुरत्ते स्पष्ट होइत अछि, जे ओ से दाग नहि अछि, वरन घावक दाग अछि। फेर हाटक कुश्तीमे गामक समस्याक निपटारा, हेल्थ सेन्टरक बन्द रहब, ओतए ईंटाक चोरिक चरचा अबैत अछि। छोट भाइ कोनो इलाजक क्रममे एलोपैथीसँ हटि कए होम्योपैथीपर विश्वास करए लगैत छथि, एहि गपक चरचा आएल अछि। लोक सभक घावक समाचार पुछबा लऽ अएनाइ आ लेखक द्वारा सभकेँ विस्तृत विवरण कहि सुनओनाइ मुदा उमरिमे कम वयसक कैक गोटेकेँ टारि देनाइ, ई सभ क्रम एकटा वातावरणक निर्माण करैत अछि। कैनरी आइलैण्डक लारेल कथामे सुभाष आ उपिया कथाक चरित्र छथि। एतए एकटा बिम्ब अछि- जेना निर्णय कोसीक धसना जकाँ। ममियौत भाइक चिट्ठी, कटारि देने नाहपर जएबाक, गेरुआ पानिक धारमे आएब, नाहक छीटपर उतारब, छीटक बादो बहुत दूर धरि जाँघ भरि पानिक रहब। धीपल बालुपर साइकिलकेँ ठेलैत देखि क्यो कहैत छन्हि- "साइकिल ससुरारिमे देलक-ए? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक"। दीदी-पीसा अहिठाम एहि गपक चरचा सुनलन्हि, जे कोटक खातिर हुनकर बेटीक विवाह दू दिन रुकि गेल छलन्हि आ ईहो जे बेसी पढ़ने लोक बताह भऽ जाइत अछि।सुभाष चाहियो कऽ दू सए टाका नहि माँगि पबैत छथि, दीदीक व्यवहार अस्पष्ट छन्हि, सुभाष आश्वस्त नहि छथि आ घुरि जाइत छथि। तृष्णा कथामे लेखककेँ अखिलन भेटैत छन्हि। श्रीलतासँ ओ अपन भेँटक विवरण कहि सुनबैत अछि। पाँचम दिन घुरलाक बाद ट्रेनमे ओ नहि भेटलीह। आब अखिलन की करत, विशाखापत्तनम आ विजयवाड़ाक बीचक रस्तामे चक्कर काटत आकि स्मृतिक संग दिन काटत। छोट-छोट भावनात्मक घटनाक विश्लेषण अछि कथा "कैनरी आइलैण्डक लारेल" आ "तृष्णा"। दाना कथामे मोहन इन्टरव्यू लेल गेल अछि, ओतए सहृदय चपरासी सूचित करैत छै जे बाहरीकेँ नहि लैत छै, पी.एच.डी. रहितए तँ कोनो बात रहितए। मोहनकेँ सभ चीज बीमार आ उदास लगैत रहए। फुद्दी आ मैना पावरोटीक टुकड़ीपर ची-ची करैत झपटैत रहए।प्रतियोगी परीक्षाक साक्षात्कारमे बाहरी आ लोकल केर जे संकल्पना आएल अछि तकर सम्वेदनात्मक वर्णन भेल अछि। दृष्टि कथामे पढ़ाइ खतम भेलाक बाद नोकरीक खोज, गाममे लोकसभक तीक्ष्ण कटाक्ष। फेर दक्षिण भारतीय पत्रकारक प्रेरणासँ कनियाँक विरोधक बावजूद गाममे लेखकक खेतीमे लागब। ई सभ गप एकटा सामान्य कथ्य रहलाक बादो ठाम-ठाम सामाजिक सत्य उद्घाटित करैत अछि। एतए गामक लोकक कुटीचाली अछि, जे काजक अभावमे खाली समय बेशी रहलाक कारण अबैत अछि। संगमे आइ-काल्हिक स्त्रीक शहरी जीवन जीबाक आकांक्षा सेहो प्रदर्शित करैत अछि। नदी कथामे कथ्य कथाक संगे चलैत अछि आ खतम भए जाइत अछि। गगनदेवक घरपर बिहारी आएल छै। शहरमे ओकरा एक साल रहबाक छै। गगनदेवकेँ ओकरा संग मकान खोजबाक क्रममे एकटा लड़कीसँ भेँट होइत छै। ओकरा छोड़ि आगाँ बढ़ल तँ ई बुझलाक बादो जे आब ओकरासँ फेर भेँट नहि हेतइ ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूतिसँ भरि गेल। परलय बाढिक कथा थिक, कोसीक कथा कहल गेल अछि एतए। बौकी बुनछेकक इन्तजारीमे अछि। मुदा धारमे पानि बढ़ि रहल छै। कोशीक बाढ़ि बढ़ल आबि रहल छै आ एम्हर माएक रद्द-दस्तसँ हाल-बेहाल छै। माल-जाल भूखसँ डिकरैत रहै। रामचरनक घरमे अन्नपानि बेशी छै से ओ सभकेँ नाहक इन्तजाम लेल कहैत छै। बौकूक घरसँ कटनियाँ दूर रहै। मृत्यु आ विनाश बौकूकेँ कठोर बना देलकैक, मोह तोड़ि देलकैक। मुदा बरखा रुकि गेलैक। बौकू चीज सभकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयत्न करए लागल। बात कथामे सेहो कथाकार अपन कथानककेँ बाट चलिते ताकि लैत छथि आ शिल्पसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत छथि। नेबो दोकानपर नेबोवला आ एकटा लोकक बीचमे बहस सुनैत लेखक बीचमे कूदि पड़ैत छथि। नेबोवलासँ एक गोटे अपन छत्ता माँगि रहल अछि जे ओ नीचाँ रखने रहए।दुखक गप, लेखकक अनुसार, बेशी दिन धरि लोककेँ मोन रहैत छै। रंभा कथामे पुरुष-स्त्रीक बीचक बदलैत सम्बन्धक तीव्र गतिसँ वर्णन भेल अछि। पुरुष यावत स्त्रीसँ दूर रहैत अछि तँ सभ ओकरा मेनका आ रम्भा देखाइ पड़ैत छै। मुदा जे सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि तँ बादमे लेखक केँ लगैत छन्हि जे ओ बेटीये छी।रस्तामे एक स्त्री अबैत अछि। लेखक सोचैत छथि जे ई के छी, रम्भा, मेनका आकि...। ओकरा संग बेटा छै, ओतेक सुन्नर नहि, कारण एकर वर सुन्दर नहि होएतैक। ओ गपशपमे कखनो लेखककेँ ससुर जकाँ, कखनो अपनाकेँ हुनकर बेटी तुल्य कहैत अछि। पहिने लेखककेँ खराप लगलन्हि। मुदा बादमे लेखककेँ नीक लगलन्हि। मुदा अन्तमे ओकर पएर छूबए लेल झुकब मुदा बिन छूने सोझ भऽ जाएब नहि बुझिमे अएलन्हि। हमर गाम कथामे लेखकक गामक रस्ता, कटनियाँ सँ मेनाही गामक लोकक छिड़िआएब आ बान्हक बीचमे अहुरिया काटैत लोकक वर्णन अछि। कोसिकन्हाक लोक- जानवरक समान, जानवरक हालतमे। कटनियाँमे लेखकक घर कटि गेलन्हि से ओ नथुनियाँ एहिठाम टिकैत छथि। मछबाहि आ चिड़ै बझाबऽ लेल नथुनी जोगार करैत अछि। जमीनक झगड़ा छन्हि, एक हिस्सेदारक जमीन धारमे डूमल छै से ओ लेखकक गहूमवला खेत हड़पए चाहैत अछि। शन आ स्त्रीक (!) पाछू लोक बेहाल अछि। स्त्रीक पाछू बिन कारण लेखक पड़ि गेल छथि जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रमे कथा कहैत-कहैत शूद्र आ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि। यावत सभ कमलक घूर लग कपक अभावमे बेरा-बेरी चाह पिबैत छथि, फसिल कटि कऽ सिबननक एतए चलि जाइ-ए। झौआ, कास, पटेरक जंगल जखन रहए, चिड़ै बड्ड आबए, आब कम अबैत अछि। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु, डोका सभ खतम भऽ रहल छै- जीवनक साधन दुर्लभ भऽ गेल अछि। साँझमे जमीनक पंचैती होइत अछि।सत्तोक बकड़ी मरि गेलैक, पुतोहु एकर कारण सासुक सरापब कहैत अछि। सासु एकर कारण बलि गछलोपर पाठी सभकेँ बेचब कहैत छथि। सत्तोक बेटीक जौबनक उभारकेँ लेखक पुरुष सम्पर्कक साक्षी कहैत छथि आ सकारण फेरसँ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, कारण ई धारणा लोकमे छै। सत्तोक बेटी एखन सासुर नहि बसैत छै। सुकन रामक एहिठाम खाइत काल लेखककेँ संकोच भेलन्हि, जकरासँ उबरबाक लेल ओ बजलाह- आइ तोरा जाति बना लेलिअह। कोसी सभ भेदभावकेँ पाटि देलक, डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सभ एके कलसँ पानि भरैत अछि। एके पटियापर बैसैत अछि। ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नहि। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जएत ? गीताक सप्पत खा कए झूठ बजनिहारक संख्या कम नहि। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भए जएत ? सभ प्रबुद्ध नहि होएताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओहि दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध होएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नहि, तँ ओकर ओहि परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि एहि तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत। आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत ? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि ? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। तँ कथा आदर्शवादी होअए, प्रकृतिवादी होअए वा यथार्थवादी होअए। आकि एहिमे सँ मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमएबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी होअए ? आ नहि तँ कथा प्रयोजनमूलक होअए। एहिमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त कएनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि। तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कए गढ़ल जएत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि। स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित होएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत। जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नहि छै। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह। कथा क्रमबद्ध होअए आ सुग्राह्य होअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नहि व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कए देलक। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक "अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम" सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत? जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या ? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। एहि बेरुका (२००८) कोसीक बाढ़िमे अनलकान्तजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। एहि परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा गाथापर सेहो एकटा गहिंकी नजरि दौगाबी। रामदेव झा जलधर झाक "विलक्षण दाम्पत्य" (मैथिल हित साधन, जयपुर, १९०६ ई.) केँ मैथिलीक आधुनिक कथाक प्रारम्भ मानलन्हि । पुलकित मिश्रक "मोहिनी मोहन" (१९०७-०८), जनसीदनक "ताराक वैधव्य" (मिथिला मिहिर, १९१७ ई.), श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा, तुलापति सिंहक मदनराज चरित, काली कुमार दासक अदलाक बदला आ कामिनीक जीवन, श्यामानन्द झाक अकिञ्चन, श्री बल्लभ झाक विलासिता, हरिनन्दन ठाकुर "सरोज"क ईश्वरीय रक्षा, शारदानन्द ठाकुर "विनय"क तारा आ श्याम सुन्दर झा "मधुप"क प्रतिज्ञा-पत्र, वैद्यनाथ मिश्र "विद्यासिन्धु"क गप्प-सप्पक खरिहान आ प्रबोध नारायण सिंहक बीछल फूल आएल। हरिमोहन झाक कथा आ यात्रीक उपन्यासिका, राजकमल चौधरी, ललित, रामदेव झा, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा, साकेतानन्द, विभूति आनन्द, सुन्दर झा "शास्त्री", धीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, रेवती रमण लाल, राजेन्द्र विमल, रामभद्र, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, प्रदीप बिहारी, रमेश, मानेश्वर मनुज, श्याम दरिहरे, कुमार पवन, अनमोल झा, मिथिलेश कुमार झा, हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, रामभरोस कापड़ि "भ्रमर", भुवनेश्वर पाथेय, बदरी नारायण बर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधाकर, जीतेन्द्र जीत, सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा "जिज्ञासु", श्याम सुन्दर "शशि", रमेश रञ्जन, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, परमेश्वर कापड़ि, तारानन्द वियोगी, नागेन्द्र कुमर, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, अनलकान्त, श्रीधरम, नीता झा, विभा रानी, उषाकिरण खान, सुस्मिता पाठक, शेफालिका वर्मा, ज्योत्सना चन्द्रम, लालपरी देवी एहि यात्राकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि। मैथिलीमे नीक कथा नहि, नीक नाटक नहि? मैथिलीमे व्याकरण नहि? पनिसोह आ पनिगर एहि तरहक विश्लेषण कतए अछि मैथिली व्याकरण मे, वैह अनल, पावक सभ अछि ! मुदा दीनबन्धु झाक धातु रूप पोथीमे जे १०२५ टा एहि तरहक खाँटी रूप अछि, रमानथ झाक मिथिलाभाषाप्रकाशमे जे खाँटी मैथिली व्याकरण अछि, ई दुनू रिसोर्स बुक लए मानकीकरण आ व्याकरणक निर्माण सर्वथा संभव अछि। मुदा भऽ रहल अछि ई जे पानीपतक पहिल युद्धक विश्लेषणमे ई लिखी जे पानीपत आ बाबरक बीचमे युद्ध भेल। रामभद्रकें धीरेन्द्र सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथाकारक रूपमे वर्णित कएने छथि, मुदा एखन धरि हुनकर कएक टा कथाक विश्लेषण कएल गेल अछि ? नचिकेताक नाटक आ मैथिलीक सेक्सपिअर महेन्द्र मलंगियाक काजक आ रामभद्र आ सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल। जाहि समय मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नहि भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भए, अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताक वातावरणकेँ भरिया रहल छथि, मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कए कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि, तखन स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि, स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि। जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल छथि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्म आ मिथिला राज्य आ संघक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि। ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिस्ट, महिला विरोधी मार्क्सिस्ट आ एहि तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि। क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि, तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक तँ क्यो सुमनजीक, आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि। यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नहि कएल गेल अछि- एहि तरहक अनर्गल प्रलाप ! क्यो तथाकथित विवादास्पद कथाक सम्पादन कए स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि। मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जाहि कवि-कथाकारकेँ विचलित कए रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे अएबाक बाद जाहि गतिसँ ओ ई सभ करतब कए रहल छथि, तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जएतन्हि से नहि जानि ? लोक ईहो बुझैत छथि जे हिन्दीक बाद जे मैथिलीमे लिखब , तँ स्वीकृति त्वरित गतिएँ भेटत ? जे मैथिलीक रचनाकारेँकेँ एहि तरहक भ्रम छन्हि आ आत्मविश्वासक अभाव छन्हि, अपन मातृभाषाक संप्रेषणीयतापर अविश्वास (!), तखन एहि भाषाक भविष्य हिनका लोकनिक कान्हपर दए कोन छद्म हम सभ संजोगि रहल छी ? सेमीनारमे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एहन जुझारू कथाकार, सम्पादक आ समालोचक सभकेँ अपन पुत्र-पुत्री-पत्नीक संग मैथिलीमे नहि वरन् हिन्दी मे (अंग्रेजी प्रायः सामर्थ्यसँ बाहर छन्हि तेँ) गप करैत देखि हतप्रभ रहि जाइत छी। मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल होएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि, से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कए हम कहि सकैत छी। ताहि स्थिति मे- ई विवाद रहए एहि कवितामे आ एहि कथामे- एहि तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दए अपन लेखनी चमकाएब ? आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल। मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा एहि सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, घरमे मैथिलीकेँ निष्कासित कए सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतए पाठक आ कोन विवाद ! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक एहि भाषासँ प्रेम करथि ताहि लेल कथा आ कविता कतए आगाँ अछि ? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। आ ओ घर-घरमे पहुँचए ताहि लेल कोन प्रयास भए रहल अछि ? सए-दू सए कॉपी पोथी छपबा कए , तकर समीक्षा करबा कए, सए-दू सए कॉपी छपएबला पत्रिकामे छपबा कए , तकर फोटोस्टेट कॉपी फोल्डर बना कऽ घरमे राखि पुरस्कार लेल आ सिलेबसमे किताब लगेबा लेल कएल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जाए स्थिर भए गेल अछि। जे अपन घर-परिवार नहि सम्हारि सकलाह से ढेरी-ढाकी भाषायी पुरस्कार लए बैसल छथि, मिथिला राज्य बनएबामे लागल छथि , पता नहि राज्य कोना सम्हारि सकताह आ ओकर विधान सभामे कोन भाषामे बजताह, जखन हुनका ओतए पुरस्कृत कएल जएतन्हि। जे घरमे मैथिली नहि बजैत छथि से लेखक आ कवि बनल छथि (हिन्दी-मैथिलीमे समान अधिकारसँ) हिन्दीमे सोचि लिखैत छथि आ तखन अनुवाद कए मौलिक मैथिली लिखैत छथि ! मैथिली कथा-कविता करैत छथि!! मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि , वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नहि अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नहि, मराठीमे कोनो बच्चासँ गप करबाक सामर्थ्य नहि छन्हि। आ मैथिलीमे हुनकर माथ फुटबासँ एहि द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कए समीक्षा करबैत छथि, से पाठक तँ छन्हि नहि। पाठक नहि रहएमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि। आ एहि पुरस्कार सभमे जूरी आ एडवाइजरी बोर्ड अपनाकेँ आगाँ करबामे जखन स्वयं आगाँ अबैत छथि तखन एहि सीमित प्रतियोगी लोकनिक आत्मविश्वास कतेक दुर्बल छन्हि , सएह सोझाँ अबैत अछि । सारंग कुमार छथि, तँ बलरामक चरचा फेरसँ कथाकारक रूपमे शुरू भेल अछि । आ जिनकर सन्तान साहित्यमे नहि अएलाह हुनकर चरचा फेर कोना होएत, हुनकर पक्ष के आगाँ राखत ? जीबैत धरि ने सभ अपन पक्ष स्वयं आगाँ राखि रहल छथि ? मुदा मुइलाक बाद ? मैथिली साहित्यक एहि सत्यकेँ देखार करबाक आवश्यकता अछि । आँखि मुनि कए सेहो एकर समाधान लोक मुदा ताकिये रहल छथि। क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि। कथा-कविता संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन कथाकार-कविक संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि , भने हुनकर कोनो पहिले संग्रह आएल होइन्हि वा कथा-कविताक संख्या हास्यास्पद रूपसँ कम होइन्हि। पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि। ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जाहि भाषामे लिखल जाइत होअए, ओतए एहि तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि। मार्क्सिस्ट आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करब आ अपन स्तरक न्यूनताक एहि तरहेँ पूर्ति करब, सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक ई हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी ? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही, धंधा तँ सुमन, राजकमल, यात्री, मणिपद्म, धूमकेतु......सभक शुरू भेल अछि। आ तकर कारण सेहो स्पष्ट। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ई देखबैत अछि जे संस्कृत, हिन्दी, मैथिली आ आन साहित्य कॉलेजमे वैह पढ़ैत छथि जिनका दोसर विषयमे नामांकन नहि भेटैत छन्हि, पत्रकारितामे सेहो यैह सभ अबैत छथि। प्रतिभा विपन्न एहने साहित्यसेवीकेँ साहित्यक चश्का लागल छन्हि आ हिनके हाथमे मैथिली भाषाक भविष्य सुरक्षित रहत? मुदा एहि वास्तविकताक संग आगाँक बाट हमरा सभक प्रतीक्षामे अछि। सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा आ स्त्री जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार होएबे टा करत। मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नहि। सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे "विदेह" ई-पत्रिकामे (http://www.videha.co.in) अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट एहि कथा सभकेँ भेटलैक जाहिमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल। एतए ईहो गप सोझाँ आएल जे शिक्षाक अभावक कारण सेहो, भाषाक उच्चारण आ वाचन मे अंतर अबै-ए। तकर ई मतलब नै जे बलचनमाक भाषा एखनो यादव जी बजैत छथि, आब जे ओ भाषा कथाक यादव पात्र लेल प्रयोग करब तँ शांकुन्तलम् केर संस्कृत नाटकक बीच जनसामान्यक लेल प्रयुक्त प्राकृत जेकाँ लागत, आ ओहि वर्गक लोककेँ अपमानजनक सेहो लगतन्हि। भाषा चलायमान होइत अछि आ लेखन परम्परा ओकर मध्य स्थिरता अनैत अछि। से सुभाषजीक भाषामे सेहो ई अन्तर स्पष्ट देखबामे अबैत अछि, हुनकर कथाक भाषा आ निबन्धादिक भाषा मध्य। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ तँ पाठक बनि रहिये नहि सकैत छथि, शीघ्र यात्रीक बादक एकमात्र जन उपन्यासकार आ कुलानन्द मिश्रक बादक एकमात्र सही अर्थमे कविक उपाधि लेल लालायित भए जाइत छथि। अपनाकेँ घोड़ा आ बाघ आ दोसरकेँ गधा आ बकरी कहबा काल ओ मूल दिशा आ समस्यासँ अपनाकेँ फराक करैत छथि। अपन कथा-कवितापर अपने समीक्षा कए आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आएल अछि। एहि एकमात्र शब्दसँ हमरा वितृष्णा अछि आ तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक विरुद्ध "विदेह" ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी। एतए साल भरिमे सएसँ बेशी लेखक जुड़लाह तँ पाठकक संख्या लाख टपि गेल। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर एहि गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि, ई भाषा जे मरि जएत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की होएतन्हि। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ एहि रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। आ एतए ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए प्रिंट फॉर्ममे आबि रहल अछि, कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लए। आ ई घटना सभ दिन आ सभ प़क्षमे मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना- धारावाहिक उपन्यास- आठम खेप संतोष कुमार राय 'बटोही' मंगरौना- धारावाहिक उपन्यास- आठम खेप
सभ कियो इस्कूल दिस दौड़ल जा रहल छै। "की भेलै ?" "इस्कूल दिस जेबहक त मालूम होएतै ने ?" " बड़ि गड़बड़ भेलै ?" "की भेलै ?" " एमडीएम मे कीड़ा मरि गेल छेलैक ...।" " किछु बच्चा खा लेलकै एमडीएम ।" " आब की हेतै ?" " आब की हेतै - हेडमास्टर पर कार्रवाई हेतै ?'
जिला परिषद, मुखिया , वार्ड मेंबर आदि लोकनि पहुँचल छलाथि इस्कूल। इस्कूल के प्रधानाध्यापक केँ कक्ष मे हो हंगामा भ रहल छेलैक। ग्रामीण केँ शिकायत छलन्हि जे जब बच्चा देखि गेलै जे एमडीएम मे गिरगिट पड़ल छै तs खाना नहि खाय दैतियैह। अगर खा लेलकै तs उ चारू बच्चा के तुरंत इलाज क्याक नहि केल गेलै ? कमरा मे बन्न कsके क्याक रखलियै ?
" हम किछु नहि कहब आब ; हम बीआरसी जा रहल छी ।" " किछु भs गेलैक बच्चा सभ केँ तs नीक नहि होयत देवीजी ।"
देवीजी बाहर निकैल कs फटफटिया गाड़ी पर चढ़ि कs अंधरा दिस विदा भेलिह । इस्कूल पर यूट्यूब चैनल वाला सभ आबि गेल छल। उलटा - पुलटा खबर बना कs सोशल मीडिया पर डालि देलथिन्ह। दोखी दोखी नहि ! ग्रामीण केँ यूट्यूबर दबंग घोषित केलाथि और हेडमास्टर आओर भनसिया केँ निर्दोखी।
इ घटना पैघ नहि तs छोटो नहि कहल जा सकैत अछि। अंधरा मे उपचारक बाद चारू बच्चा घर आबि गेलै। जान बचलै चारू केँ। किछु नहि भेलै। देवीजी कमरा मे चारू बच्चा केँ बन्न केने छलाथि इ पैघ जुर्म छेलैक। सभ मामला आब रफा-दफा भs गेलै । गाम शांंत भs गेल छल। इस्कूल मे बेवस्था ठीक रहक चाही। साफ-सफाई पर धेयान देबाक चाही। भनसिया सभ सतर्क रहक चाही। कियाक तs भारत केँ भविष्य के निर्माण ओकर इस्कूल केँ कक्षा मे भs रहल छै।
दस दिन धरि इ घटना गामक आकाश मे कोलाहल केने रहलै। परंच आब गाम शांत भs गेल छै। ओहिना चौक-चौराह छै। सभ लोकनि धान कटनी मे लागि गेल छथि। अगहन मास आबि गेलै। धानक खेत मे नव दुल्हिन जकाँ घोघ तानि कs ठाड़ धानक पाँति देखै मे नीक लागि रहल छै। रौद मे धानक शीष सोना जकाँ चमैक रहल छै।
धान कटनिहार नहि भेट रहल छै आब। सभक घर अन्न सँ भरल छै। गरीब केँ घर अन्र सँ भरल छै । राशन दुकान पर फ्री में चौर-गेहूँ भेट रहल छै आब। आब ककरो पेटक चिंता नहि रहि गेलैक। बाहर सँ दस हजार टाका आबि जाएत छै, तs आब कोनहु तकलीफ नहि रहलै गरीब केँ। प्रधानमंत्री आवास योजना सँ घर आओर शौचालय बनि रहल छै। गरीब आब गरीब नहि रहलाह, परंच शिक्षा ततेक मँहग भ गेलै जे गरीबक बच्चा आब डागडर नहि बनि सकैत अछि। दस लाख फीसक जुटान कतs सँ होएतै। गरीब मजूरी कsके खायत रहताह।
गाम मे आब कियो बोनिहार नहि रहि गेलाह अछि। सभ कियो ईंटक घर बना रहल अछि। घर मे टाइल्स लागि रहल छै। घर केँ निर्माण पर सभक धेयान औखनधरि बेसी छन्हि। गाम शहर माफिक बनि रहल छै। परञ्च भीम भैय्या केर दालान अखनो धरि ताश खेलनिहारक केन्द्र बनल अछि। ओहिना अखनो लोकनि ओतs ताश खेलाथि छथि। गाम मे अखबार आबि रहल छै। गाम मे पुस्तकालय खुलि गेल छै , ओहि पुस्तकालय केँ कियो उपयोग केनिहार नहि छथि। विद्यार्थी सभ तेलिया कलम ओगरने रहैत छथि। पुल-पुलिया, अर्जुनक कलम हुनकर अड्डा बनल छन्हि। गाजा, भांग, दारू पीबि केँ विद्यार्थी सभ मस्त रहैत छथि।
बड़ि दिनक बाद चारिटा ग्रामीण बिहार सरकार मे नियोजित शिक्षक भेलाह अछि। इ चरचा गाम मे भs रहल अछि। गाम मे दोसर क्षेत्र मे विद्यार्थी के गमन नहि भs रहल छै। आब तs सेना मे चारि सालक नौकरी आबि गेलै , तकर तैयारी कियो नहि करैत छथि। गामक कोचिंग संस्थान विद्यार्थी के पढ़ा रहल अछि। नीक विद्यार्थी निकैल रहल छथि। गाम मे फस्ट डिविजन वाला सभ के किछु लोकनि पुरस्कार दsके प्रेरित कs रहल छथि।
बासुदेव जी प्लस टू में साइंस टीचर छथि । गामक शिक्षा बेवस्था के निखारै लेल जीजान सँ लागल रहति छथि। मैट्रिक आओर इंटर केँ विद्यार्थी केर तैयारी करवा मे मदद करैत छथिन्ह। दुर्गा-स्थान मे डेरा जमौने रहति छथि। मैट्रिक आओर इंटर केँ परीक्षा मे उत्तरपुस्तिका मे बड़ि रास चीज भरs पड़ैत छै। ओकर अभ्यास घर पर जरूरी छै , नहि तँ कॉपी पेंडिंग भs सकैत छै। शिक्षा केँ क्षेत्र मे अपन बेस कीमती समय देनिहार सभ केँ ' मंगरौना ' ऋणी रहत। गामक शिक्षा बेवस्था के दुरूस्त केनिहार सभ लोकनि के धन्यवाद देल जाऊ।
माँ दुर्गा केँ असीम कृपा सँ गामक विकास भ रहल छै। सलहेस महाराज केँ गहवर केँ पक्का घर बना कs चारू दिस सँ छहर दिवाली देल गेलै। अइ गहवर केँ बनौलाथि श्री रविकांत राय ' शास्त्री ' जी। ओ बड़ि नीक कथावाचक छथि। गामक महौल केँ नीक करवा मे धार्मिक स्थान केँ उद्धार केनै जरूरी होएत छै। इ मानि कs ओ लागल छथि धार्मिक स्थान केँ चिकन्न करवा मे। बरहम बाबा स्थान मे कृष्ण प्रणामी मंडप केर निर्माण ओ केलाथि। गामक उत्तर मे श्री श्री 108 बाबा नीलकंठ महादेव केँ मंदिर निर्माण मे हुनकर सहयोग रहलन्हि । गामक पुस्तकालयक साज-सज्जा केर लेल ओ किछु राशि दान केलाथि। -संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम - मंगरौना (मंगरौना उपन्यासक पहिलसँ सातम खेप पाठकक सुविधा लेल नीचाँ देल जा रहल अछि।- सम्पादक।)
पहिल खेप इ मंगरौना गाम छियैय। अमात जातिक राजधानी कहल जाएत छै। इ गाम राजनीति, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक आओर आर्थिक रूप सँ ठीक-ठाक कहल जा सकैत अछि। इ गाम दरिभंगा राज्य केँ समय मे बसौल गेल छल। वर्तमान दरिभंगा जिला के भरौड़ा गाम के आसपास सँ आबि कs पाँच भाई (पाँच पांडव) उपजाऊ क्षेत्र देखि कs अइ जगह बसि गेलाह। वो पाँच भाई छलाह- ऋषि खवास, हुलास खवास, तारा खवास, भंजन खवास आओर भिक्षुक खवास। हिनकर पिताजीक नाम की छलन्हि से अज्ञात अछि। सुनवा मे आबि रहल अछि जे इ पाँचों भाई दरिभंगा राजा के ओहिठाम खवासी करैत छलाह।
ऐतिहासिक आओर सामाजिक दृष्टि सँ ' ख़वास' शब्द विशेष अर्थ रखैत छै। परञ्च 'ख़वास' शब्द अखुनका समय मे निगेटीव अर्थ मे लेल जाएत छै। ख़वास यानी सेवा करै वाला दास। 'ख़वास' खास शब्दक विकृत रूप अछि। खास माने विशेष होएत छै। ख़वास लोकनि राजा केँ खासमखास ख़िदमतगार लोकनि होएत छल । जिनकर काज छलन्हि- राजा के ख़िदमत करनै यानी अंगरक्षा करनै।
ऐतिहासिक दृष्टि सँ ख़वास राजा केँ सबस निकट रहै वाला लोकनि छलाह । अइ सँ जाहिर अछि जे सामाजिक रूप सँ ख़वास उच्च मानल जाएत छल। युद्ध कौशल मे निपुण रहला केँ कारने इ पाँचों भाई राजाक खास छलाह। राजाक समीपताक कारने इ क्षत्रिय छलाह अइ गप्प सँ हम मुँह नहि मोरि सकैत छी। कहल जाएत छै जे इ जगह दरिभंगा राजा युद्ध मे सहयोग के एवज मे पाँचों भाई के दान देने रहथिन्ह।
वरगद गाछ के समीप अपन पहिल निवास बनौलथि पाँचों भाई। वरगद गाछ अखनो धरि छेबे करै। ओइ गाछ के आसपासक क्षेत्र फुलवारी कहल जाएत अछि। फुलवारी मे फूल तs हम नहि देखैत छियैय। पहिनहौं फुलवारी मे फूल नहि छेलै।
अंग्रेजी शासन काल मे मंगरौना दरिभंगा राज्यक अंग छेलै। झंझारपुर थाना छेलै। झंझारपुर पुरना बाजारक हाट व्यवसायक केन्द्र छल। धानक खेती बेसि होएत छेलै।लोक गेहूँ कम उपजाबैत छलाह। मरुआ , तेबखा, राहैर, बदाम वगैरह खूब उपजै छेलै। सरसोंं के खेती खूब होएत छेलै। वो पाँचों भाई अपना संगे लौवा आओर चमार के बसौलन्हि। तेली सहो बाद मे बैस गेल। एकटा घर यादव आओर एकटा घर केवट केँँ छन्हि।
अंग्रेजी शासन काल आओर देशक आजादी के बाद 1960 धरि गाम गृहयुद्ध मे फँसल रहल। 1957-58 के दरमियान लक्ष्मीनारायण राय जी केँँ हत्या केँ बाद गाम मे किछु साल तक अशान्ति रहल। फेर किछु सालक बाद गाम शांत तs भ गेल, परञ्च गाम दुटा खेमा मे बँटले रहल।
भिक्षुक खवास के बेटा नहि भेलन्हि। हुनका बेटीए टा छलन्हि। ओ बेटीक ब्याह कोन गाम केलन्हि तकर कोनहु जानकारी नहि अछि। ऋषि, हुलास तारा आओर भंजन के वंश आगाँ बढ़लन्हि। आजु भरि गाम जे शोर भs रहल छै इ लोकनि हुनके वंशज छियाह। बाद मे किछु भगिमान बैस गेलाह। किछु दोसर गाम सँ आबि कs बैस गेलाह।
इ गाम शैक्षणिक दृष्टि सँ केरल कहल जा सकैत अछि। एकटा वैज्ञानिक, एकटा जेलर, एकटा विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार बनल छथि। शिक्षक ढ़ेर रास अछि। एयरफोर्स मे एकटा, बीएसएफ मे एकटा, एकटा एमबीबीएस डॉक्टर अछि। चीन आओर पाकिस्तान के संग युद्ध के समय तीन टा नौजवान सेना मे भर्ती भेलाह- हवलदार रामह्रृदय राय,हवलदार तेतर ठाकुर आओर हवलदार किशन ठाकुर।
गामक चौहद्दी अछि - उत्तर मे गनौली,दक्खिन मे शिवा, पछिम मे सहुरिया आओर पूरब मे पस्टन। गाम मे गौड़गामा नामक जगह पर एकटा हाई स्कूल छै, मखनाही (माखनपुरा टोल) पर मिडिल स्कूल आओर पुरनी पोखरि पर संस्कृत स्कूल अछि। गामक पहिल नेतृत्वकर्ता युगेश्वर राय छलाह ।तदुपरांत श्री उमाकांत राय, श्री सर्वेश्वर राय, श्री विश्वेश्वर राय आदि नेतृत्व केलन्हि। अखैन गाम अनाथ अछि।
1999 मे राजेश्वर राय मास्टर साहब केँँ हत्या भs गेलन्हि। हुनकर हत्यारा अखनो धरि पुलिस के गिरफ्त सँ बाहर अछि।
गाम मे पाँच टा पोखैर अछि। गामक बाहर सिमराहा पोखैर, निमैछपोखैर, गौड़गामा पोखैर, सुगौना पट्टी पोखैर, शिवसागर पोखैर आओर अगरबल्ला पोखैर अछि। गाम मे चारि टा मंदिर अछि - दूटा हनुमान मंदिर , एकटा महादेव मंदिर आओर ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर।
इंजीनियर बहुत रास अछि। आईआईटी पास केलाह अछि- श्री अखिलेश्वर निराला,श्री हेमंत कुमार राय ।पीएचडी केलाह अछि - डॉ० गौरीशंकर राय, डॉ० वेद प्ररकाश राय, डॉ० सुधांशु राय, डॉ० कृष्ण कुमार राय, डॉ० बासुदेव राय, आओर दूटा लेडिज ।रिसर्च स्कॉलर छथि- श्री संतोष कुमार राय, श्री अखिलेश्वर निराला, श्री अखिलेश राय।
गाम मे जनवितरण प्रणाली केँ दूटा डीलर छथि - श्री सुरेश राय आओर श्री बेचन राम। गाम मे पहिल ईंट उद्योग छलन्हि स्व० उमाकांत राय जी केँ आओर दोसर छन्हि श्री कौशल राय जी केँ। श्री मनोज राय माछक व्यवसाय सँ जुड़ल छथि।
गाम मे सबसँ महत्त्वपूर्ण अछि -' दुर्गा मंदिर'। 2016-17 मे विवादक केंद्र मे रहल इ मंदिर। गाम दू भाग मे खंडित भs गेल। मंगरौना इतिहास मे इ बड़ि पैघ घटना छल। गाम मे घृणाक वातावरण बनि गेल। अपन गाम मे अपन लोक सँ गप्प बन्न भs गेल। एक-दोसरक मुँह देखनै बन्न भs गेल। भात-पानि बन्न भs गेल। 1957-58 टिस के परिणति 2016-17 मे फेर बेसि भs गेल।
"की अहाँ पठैत बनबै?" "सोचि कs कहैत छी ।" " गामकs सभ दिस सँ अइ टीम मे लोक केँ जोड़ु।" "हँ, जोड़ल जेतै...।"
कलश यात्रा निकैल रहल छै। गाड़ी पर डीजे पीछा जा रहल अछि। आगाँ-आगाँ कतारबद्ध कलश भरनिहारिन-भरनिहार जा रहल छथि। सबस आगाँ गंगाजल छिड़कैत एक जन बढ़ि रहल छथि। दोसर जन 'चर' डोलबैत जा रहल छथि। पुजारी, आचार्यजी, अन्य पंडितगण, पंच मुख्य कलश भरनिहार आगाँ छथि।
" दुर्गा महरानी की।" "जय।" "महिषासुरमर्दिनी की।" "जय।" "रमंत महराज की।" "जय।" "महादेव बाबा की ।" "जय...।"
सभ कियो आगाँ कमला दिस पड़ाइत जा रहल छथि। माखनपुरा टोल सँ लकs शिवा चौक धरि कतारबद्ध लोक जा रहल छथि। घड़ीघंट, शंख बाजि रहल अछि। 'माँ शेरावली की जय' केँ नारा लागि रहल अछि। सभहक मुँह पर खुशीक रेखा देखि सकैत छी। छोट-छोट बालक-बालिका कूदि-कूदि कs अपन खुशी जाहिर कs रहल छथि। शिवा चौक सँ घोंघरड़िया होएत गाड़ी आओर कतार छहर टपि कमला दिस जा रहल अछि।
इ दृश्य धार्मिक आस्थाक छी। धर्म लोक केँ एकताक सूत्र मे बन्हैत छै। धर्म लोक केँ जोड़ैत छै। धर्म सभ अहंकार केँ दूर भगा कs लोक केँ भाईचाराक बन्हन मे बांधैत छै। धर्म प्रेम आओर स्नेहक दोसर रूप छियैय। इ घृणा, द्वेष वगैरह केँँ दूर करैत छै। परञ्च गाम मे भात-पानि बन्न भs गेल छै।गाम मे केस-केसामैल भs गेल छै। अहंकारक पराकाष्ठा इ थिक। गामक इज्ज़त अखबारक पेज पर बिका रहल अछि। 'दुर्गा मंदिरक विवाद मे कोतवाल का हाथ टूटा' अखबारक इ सुर्खी अछि।
गाम बौरा गेल। लोक बौरा गेल। इ सौ सालक सामंतवादक विरूद्ध आम लोकक आवाज़ छियैय। दुर्गा मंदिर एकटा बहाना छियैय। गरीब-गुरबाक सामंतशाही लोकक विरूद्ध धधकैत आगि छियैय इ मंदिर विवाद। जे गामक विभाजन कs देलकै। दोखी केँ छथि ? इ भविष्य निष्कर्ष देत। मंगरौना आब मंगरौना नहि रहल। गरीबक आवाज़ केँ अहाँ कतेक दिन दबा सकैत छी ? (दोसर खेप)
आचार्यजी मंत्र पढ़ा रहल छथिन्ह। पुजारी बाबा पीछा-पुछा पढ़ि रहल छथि।
"ओम् इदं दुर्वादलं .....नम:।" "ओम् इदं एष पुष्पम् श्री दुर्गा देव्यै नम:।" वगैरह-वगैरह मंत्रोच्चारणक बीच सभ कियो कलश भरनिहारिन-भरनिहार कतारबद्ध कमला केँ जल कलश मे भरि रहल छथि। सभ कियो केँ माथ पर ललका पगड़ी नीक लागि रहल छन्हि। फुलकी वाला पगड़ी। कमला किनारे पूजा भेलाक बाद आचार्यजी, पुजारी बाबा आगु-आगु बढ़ि रहल छथिन्ह। एकटा साइड मे चर डोलाबति आओर दोसर साइड मे गंगाजल सँ भूमि के शुद्ध करैत दू जने आगा बढ़ि रहल छथिन्ह।
तारापट्टी होएत कलश यात्रा घोंघड़रिया आबि गेल। अइ गामक लोकनि अपन-अपन घरक सोझा मे रस्ता केँ पानि सँ धोने छथि।
"गणेश भगवान की....।" "जय...।" "कार्तिक भगवान की।" "जय।" "दुर्गा महरानी की।" "जय।" "सरस्वती माँ की।" "जय।" वगैरह-वगैरह नारा लगबैत कलश यात्रा आगाँँ आबि रहल अछि। घड़ीघंट, शंख वगैरहक बीच पूरा गाम भक्ति मे डुबल अछि। कलश यात्रा के पूरा गाम मे घुमौल गेल।
"हौ , कलश कतारबद्ध राखल जेतै।" "ठीक छै चाचाजी।" "सरोज, मुख्य कलश ऊपर लs जाउ।" "ठीक छै।" "बाकी कलश के मंदिर केँ चारू ओर कतारबद्ध राखल जाउ।"
सभटा कलश केँ मंदिरक बेसमेंट के चारू ओर राखल गेलै।
"माता-बहिन, ध्यान देबै- शरबत पी केँ जायब।" "माँ शेरावाली की।" "जय।" सभ कियो एनाउंसर के संग देलथिन्ह।
मेला लागि गेल छै। नाच, नाटक, थियेटर, बड़का झूला, मिठाई दुकान, मनिहारा , पान वाला वगैरह मेलाक रौनक केँ बढ़ा रहल छै।
ऐं रौ संतोख , माँ कतs गेल छौ ?" "हमरा नहि बुझल अछि बाबा।" "धानक तीन बरख लेला भs गेलै। कहिया देतै ?" "हमरा नहि बुझल अछि बाबा।"
गरीबक जिनगी नरक होएत छै। घर मे एको कनमा धान नहि छै। मरूआ खेत बाबू बेच देलथिन्ह। सुगौनापट्टीक खेत बिका गेलै। ओतs राहैर आओर मरूआ उपजैत छलै। अगहन सँ पहिने इ जान बचाबैत छलै। अगहन मे बोइन सँ ठीकठाक धान भs जायत छलै। धानक कटनीक बाद घर मे धानक ढेर लागि जायत छलै। गरीबक घर भरि जाएत छलै।
कमाय वाला कियो नहि। खाय वाला न टा लोक। परिवारक की दशा हेतै से अंदाजा लगा सकैत छी। पहिल बेटिक ब्याह मे सुगौनापट्टी बिका गेलन्हि । दोसर बेटिक ब्याह मे कमलाजीत बिका गेलन्हि। पछबैर बाधक आओर जमतरक खेत फुसिंयौंहक ज्ञान बघारैत बाबूजी बेचलाथि।
"बेटा मरतौ।" "गै बेटखौकी , तोरे बेटा मरतौ ।" "हे सूरू सरकार निसाफ करियह..।" "आगि नहि उठाबही गै बेटचोदी... जमाए मरतौ।" "एकटा अलंग जाबे नहि तोड़बौ, ताबे आब हम शान्त नहि हेबै।"
इ गामक सोहर छियैय। साझँ-विहंसर गुहाँ गिज्जर भs रहल छै। एक धुर जमीनक लेल झगड़ा भs रहल छै। अमीन लौल गेल छेलै, परञ्च अमीन केँ गप्प बुढ़िया फुसि भs गेलै।
किछु बच्चा स्कूल जैत छल। संस्कृत स्कूल पार करैत दुर्गा स्थान दिस निछोह भागि रहल छलै। मखानपुरा टोल पर राजकीय प्राथमिक विद्यालय छै। इ स्कूल मंगरौना गामक शिक्षा बेवस्थाक रीढ़क हड्डी कहल जा सकैत अछि। स्कूल केँँ स्थापना मे राम अवतार मास्टर साहब केँ बड़ि भूमिका रहलन्हि अछि। स्कूल आब राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय शिवा-मंगरौना भs चुकल अछि।
स्कूल के अपग्रेड भेलाक बादो स्कूल मे पढ़ाई-लिखाई नहि होएत छै। स्कूल केँ पीछा मे कलम मे विद्यार्थी सभ खेलाति रहैत छै आओर मास्टर सभ टेबुल केँ चारू दिस बैस कs गोलमेज सम्मेलन करैत छथिन्ह। हुनका लोकनि केँ कहै वाला कियो नहि छन्हि जे मास्टर साहब पढ़बै क्याक नहि छियैय। फिलहाल वीणा देवी प्रधानाध्यापक छथिन्ह।
वीणा देवी आँखि पर चश्मा लगौने रजिस्टर मे घुसल रहति छथिन्ह आओर बाकी माहटर गप्प करवा मे मसगुल रहति छथिन्ह। टाइम पास कोना केल जाएत अछि से अइ माहटर सभ सँ सीख सकैत छी। विद्यालय केँ गप्पशाला बनौने छथि।
मिड-डे मिल स्कूल के लेल आओर स्टाफ के लेल दुधारू गायक समान योजना अछि।खा-खा कs सभ कियो अलसैत छथि। पढ़ाई-लिखाई जाउ भाँड़ मे।स्कूल के सेक्रटरी सेहो खुश आओर माहटर सेहो खुश।वाह रे! मुर्गा भात।मिड-डे मिल योजना गरीब छात्र केँँ स्कूल सँ पौष्टिक आहार भेटवाक योजना छल। बड़ि पैघ सोच छल सरकार केँ अइ योजनाक पीछा मे।
गरीबक घर मे पौष्टिक आहार धिया-पुता केँ नहि मिललाक कारने कुपोषण के शिकार नेना-भूटा सभ बेमार होएत रहति छथि। जिनगीभरि फिरिशान। खिचड़ी, फल, अंडा वगैरह केँँ घोटाला पूरा देश मे स्कूल मे भs रहल छै, परञ्च अइ पर तेसर आँखि के राखत ? सभ लुटि खौ सरकारक धन। कनी अहाँ खौ, कनी हम खायब , कनी वो खेताह, कनी मालिक खेताह , कनी हाकिम, ऊपर सँ नीचा धरि सभ हाकिम खौ। सुशासनक सरकार अछि देश मे आओर राज्य मे।
विद्यार्थीक खाता पर आयल पै पर सेहो डाका पड़ति छै। चाह आओर नाश्ता लेल भीख माँगवा मे ऊपर सँ नीचा धरि हाकिम सभ महारत हासिल केने छथि।
"ऐं यौ , हुनका देलियन्हि , हमरो बनै छै; किछु तँ हमरो देल जाउ।" "हँ, सर ! अहुँ केँ भेटत।"
सभटा निर्लज्ज भs चुकल अछि हाकिम। अइ भ्रष्टाचार पर नकेल के कसत ? जे नकेल कसै के कोशिश करैत छथि ,वो मारल जाएत अछि।
बेनीपट्टी मे की भेलै अविनाश केँ ? आओर झंझारपुर मे की भेलन्हि एडीजे प्रथम अविनाश केँँ ? बिहार मे सभ किछु भs सकैए- कुता की की ने करौत। जनता मरि रहल अछि। दुनिका मे जे जतेक बड़का ठग अछि ओकर ओतेक बेसी विकास।
कतेक बेर रामधनी सेहो परयास केलन्हि अछि जे हमहु बेलॉक मे कोनो हाकिम भs जाउ, परञ्च घुस देबाक पै हुनका जोगाड़ नहि भेलन्हि।
"अहाँ , एना नहि मारियौ। छौड़ा मरि जेतै। की अपराध केलक ?" "सार मारि देबौ, दोसर दिन हमर कलम दिस नहि अबिएँह।" " की केलक हमर बउवा ?" "छौड़ा केँ समहैल ले, नहि तँ घेंट तोड़ि देबै कुनो दिन।" "से बिना कारने अहाँ कोना तोड़ि देबै ?" " सार, हमर नबका कलम मे भिड़ल क्याक ?" " माटिक भीता मे कनेक भिड़े गेलै, तँ तों एना मारबहक ।" "तोड़ो, तोड़ि देबौ।" " रौ सार, माएक दूध पीने छैं, तँ फरचिया ले।"
आब लतम- जुतम भs रहल छै। किछु लोकनि धड़हरिया छथि। दुनु के बीच बचाव करैत छथिन्ह। इएहा गाम 'मंगरौना' छियैय- 'मंगरौना'; ऐतिहासिक गाम ; जतs दुर्गा मंदिर छै। नेपाल सँ लकs पूरा बिहार भरि मे चैती दुर्गा मेला लेल ख्यात छै।
चिरंजीव व्यास जी गुजैर गेलाह। गरीब छलाह। चारिटा बेटा रहैतहुँ हुनका मुखाग्नि अपन बेटाक हाथ सँ नसीब नहि भेलन्हि। छोट बेटा दरिभंगा में पढ़ैत छलन्हि। बड़का बेटा सारक ब्याह मे मधुबनी मे आयल छल, परञ्च गाम पर किनको नहि खबर। बाप मरि गेल छन्हि आओर वो सारक ब्याह मे लागल छथि। घोर कलियुग !! ठीके कहल गेल छै- 'न टा बेटा राम के एक्को टा नहि काम के' ।
आइ व्यासजीक नहकेश छियन्हि। बड़का बेटा पहुँच गेलाह अछि। उतरी आब हुनका गला जेतन्हि। तेरहवीं भs गेलन्हि अछि। बाप बाप होएत छै।
बाप मुइला पर संतोख बौक भs गेलाह अछि। छोट बहिनक ब्याहक कार्यभार आब संतोख पर आबि गेलन्हि। संतोख साइंस मे केमेस्ट्री ऑनर्स सँ आर के कॉलेज मधुबनी मे दाखिला तँ लs लेलाथि ,परञ्च छोट बहिनक उमर बेसि भ रहल छन्हि इ सोचि ओ पगला गेलाथि। संतोख पागल भs गेलाथि। कोनहुँ धरानी बहिनक ब्याह संपन्न भेलन्हि जबदी मनोज राय सँ।
'जीते जी गुँहा भत्ता- मरिते दुधा भत्ता' ठीके कहल जाएत छै। एगारह दुना बाईस जन आओर टोलबैया लकs भोज केलथि तीनु भाई।
छह साल सँ संतोख दिल्ली ओगरने छथि। झलकू बाबा केँ डर सँ ओ गाम नहि आबैत छलाह अछि।दिल्ली मे वो मनतोख बाबा केँ दस हजार देने छलथिन्ह आओर किछु हजार हुनकर बड़ भैय्या देलथिन्ह, परञ्च झलकू बाबा नहि मानलकन्हि अछि।
2009 मे संतोख अपने हाथ सँ 21,000 हजार रूपया दकs महाजन सँ फारकति भेलाथि। तीन साल मे दस हजारक सुदि-मुरि पैंतीस-छत्तीस हजार देमs पड़लन्हि।
इ 'मंगरौना' गाम छियैय । गरीबक खाल उतारै वाला गाम। तिला संक्रांति मे 'लाई' केँ लेल मोनू ठाकुर केँ जान चलि गेलन्हि अछि। गरीबक जानक कोनहु मोल नहि। बेचारा झपकी पोखैर में शीतलहरी मे पोखैर मे 'लाई' खेवाक इच्छा सँ हेलकs ओइ पार सँ दोसर पार जेबाक क्रम मे जान गमा देलाथि।
चिउरा-मुरही-लाई खेवाक सजा भेटलन्हि हुनका वा गरीब हेवाक सजा ? 'मंगरौना' बड़ि रास अपराधी केँ पचा लेने छथि। गामक एकता अइ मामला मे बेजोड़ अछि।
बलुआहा बान्ह पर साँझ मे छौड़ा सभ भड़ल रहति छै ; आओर देर राति धरि भड़ल रहति छै। किछु महान काजक योजना बनि रहल छै अर्जुनक कलम लग बम्मा पर देर राति मे।
'मंगरौना' गामक भविष्य शिवा चौक पर बनति अछि। गामक आओर पंचायतक विकासक योजना शिवा चौक पर लिखैत अछि। बड़ि नीक ! ढेर रास नीक - 'फलाँ छौड़ी भागि गेलै फलाँ छौड़ा संग' इ विकासक योजना छियैय।
(तेसर खेप)
"लव माने प्रेम होएत छै कि प्यार ?" "हमरा से नहि बुझल अछि।" " नीतू अहाँँ, अहाँ बताउ।" "बहिन, हमरा लगैत अछि-'प्रेम' ।"
इ छियैय आर के कॉलेज के प्रांगण। दू गोट सहेली बीए पार्ट वन मे पढ़ि रहल छथिन्ह। पहिल साल मौज-मस्ती मे बीत जाएत छै । विद्यार्थी के पता नहि चलैत छै। शीतलहर के बीच कॉलेज मे दोसरे मजा छै।
" नीतू, बुझौल छौ- अमीना छेलहु ने, वो गोलू के संग भागि गेलै।" "हँ, ओकरा दुनू केँ बीच बड़ि दिन सँ खिचड़ी पकि रहल छेलै। हमरा तs पहिने सँ बुझल छल।" "मोन मे हमरो गुदगुदी भs रहल अछि। " "दु साल सँ उ दुनू कबड्डी खेलैत छेलै।" "तुहों तs गुल खिला रहर छैं रोहित केँ संग।" "नहि गै, हम ओहिना गप्प करैत रहैत छी।" "कॉलेज के पीछा हरिजन हॉस्टल मे के गेल रहै।" "धत्, तूं तs सभटा उघैरे देलही।" " हँ, तू लवकी पोखैर पर की करैत छेलही ?"
दुनू छौड़ी के मोन मे गुदगुदी भs रहल छै। दुनू गिलेशन बाजार जै केँ योजना बनौलथि। पैर गिलेशन दिस दुनू बढ़ा देलथि। आइ-काल्हि कॉलेज मे पढ़ाई-लिखाई सँ बेसी ब्वॉय-गर्ल फ्राइंड बनबै के ट्रेंड चलि रहल छै। पढ़ाई-लिखाई गेलै तेल लबै लेल।
मोनू आओर श्रेया केँ बीच चारि साल सँ प्रेम प्रसंग छै। कतेक बेर पछबैर बाध मे देखल गेलै एक संग। एक दिन देवहार मे मुक्तेश्वर स्थान मे मूरही-कचड़ी खैत छलि ओकरा संग। अंधरा मे कुमार टॉकिज मे फिल्म देखै लेल जैत छलीह। मोनू एम ए मे छथि। गाँजा पिबति छथि अर्जुन कलम मे जा कs। किछु आओर छौड़ा सभ सेहो संग दैत छन्हि।
गाम मे दारू भेट रहल छै। गाजा पीबै वाला बेसी अछि गाम मे।रतन एक दिन गिनलक-' गाम मे 23 टा पागल छै।' दिमागी रूप सँ लोचा वाला लोक ज्यादा गाम मे देखल जा रहल छै।
दुर्गा दारू पीब कs अंधरा मे लुढ़ैक गेल छलै। ओकरा लाबै लेल तीन आदमी अंधरा भेजल गेलै। इ हाल छै युवा केँ। पढ़ै के नाम पर सभटा बोकवा भs रहल छै। चारि-पाँच पाँति शुद्ध-शुद्ध लिखल नहि होएत छै आ वो एम ए पास छथि।
"हौ गजब भs गेलै।" "से की भेलै ?" " रेवती भागि गेलीह राति मे।" "केकरा संगे ?" " तेतरू संगे।" "ओकर माए सतवरती बनल छलीह।" "हँ, कियो अगर हुनका कहैत छलन्हि जे रेवती जवान भs गेल काकी, तँ जवाब दति छलथिन्ह -" तोड़ो बहिन जवान भs गेल छौ।" " देश-दुनिया खराब नहि भेलैए, बल्कि लोक सभ खराब करबा मे लागल छै।" "हँ,....।"
गाम मे भागा-भागी बेसी बढ़ि गेलैए। जवान छौड़ा-छौड़ी नयन-मटक्काक खेल बेसी खेलs लागल अछि। गामक फलाँ केँ बहिन केँ ओ बहिन मानै लेल तैयार नहि छै।
गामक वातावरण केँ बिगाड़ै मे डीजे केँँ भूमिका मैन छै। डीजे पर बजैत अश्लील गीत जवनका सँ बेसी बुढ़बो केँ हड्डी मे जान लाबि दैत छै।
बाबा बाँस तs दारूबाज, गँजेरी, नशेरी केँ अड्डा बनि गेल छै।
इ थिक गाम 'मंगरौना'। उदय जी केँ सरकारी जॉब भेटलाक बाद गिनाउ जे कियो कम्पीटीशन पास कैने होएत , नहि ने ? इ गामक विकास छियैय। गाम बौरा गेलै। बैजू राम केँ लड़का भांग खाकs पागल भs रहल छै। सभ युवा भटैक रहल छै। गार्जियन रोकवा मे असमर्थ छथि।
संचार क्रांति युवाक लेल नीक छै तँ खराबो छै। ज्यादातर युवा मोबाईल घांटै मे लागल रहति छथि। इ छियैय युवाक नशा। सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप लिखनै केँ ओ अपन धर्म समैझ रहल छथि। साँझ-विहनसर विद्यार्थी के अपन-अपन दलान पर वा घर मे पढ़ै केँ रबाज़ छेलै से खतम भs गेलै। कियो नहि पढ़ैत अछि । सभ कियो बिना पढ़ने विद्वान भs गेलाह अछि।
"की रौ, पटलौ की नहि ?" "की कहलीह ?" " पटबैत पटबैत पानि निकैल गेल, परञ्च इ बेबी डॉल भावे नहि दति अछि। की करीयै ?" " एक दिन पकड़ि केँ ला ने।" " खूब कs दति छियैए।" " डर नहि होएत छौ।" "जे डरि गेलै से मरि गेलै।"
पुलिस केँँ गाड़ी लागल छै। पवन केँ मारि कs भैटला बान्न के पुलिया तर मे फेक देने छेलै। माथा पर जेना पाथर सँ चोट मारने छै। पुलिस केँ कैमरा मैन फोटो खिचलथिन्ह। पुलिस पोस्टमार्टम लेल लाश केँ मधुबनी भेज देलथिन्ह। प्रेम मतलब 'मर्डर' होएत छै मिथिला मे।
"पछमी सभ्यताक नकल आओर शहरी वातावरण के नकल सँ गाम खराब भs जा रहल छै।" "सभटा उघैरे केँ चलनै ठीक छियैय ?" " मोबाईल नेना-भुटा सभ लग छै। चौदह बरख होएत छै आओर ओ परेम करs लगैत अछि। " "ओकरा बुझैत छै परेम माने घिच्चम-तिरा।"
मधु आओर जगत गप मे लागल छलाथि। परंपरा, मिथिलाक रहन-सहन, संस्कृति वगैरह दुनिया केँ आन कोना सँ अलगे छै। भगा-भग्गी गाम मे बढ़ि गेल छै।
घोंघड़रिया मे कार्तिक मेला मे छौड़ा सभ उत्पात मचौने रहै। खूब मारि खेलाथि। थुथुन फुलि कs फूटबाल भs गेल छलन्हि। गामक इज़्ज़त-आबरू पर हाथ डालनै कतहुँ उचित नहि कहल जा सकैत अछि। ढेर रास मारि लगलन्हि।
भागि कs ब्याह करै केँ परंपरा बढ़ि रहल छै। समाज मे इ स्वीकारोक्ति बढ़ि रहल छै। परिवार आओर समाज नहि स्वीकार करतिहीन तँ हुनका लग चारा कोन छन्हि। तँ जो बाउ जिनगी तोहर जिबै के तोहर अधिकार छौ। मारि-दंगा सँ इ रोकल नहि जा सकैत अछि। संस्कार आओर परबरिस एकर जिम्मेदार अछि। ओना तँ इ रोकनै कठिन छै।
"की हालचाल अछि ?" "गरीबक हाल की पूछैत छियैय मालिक ?" "गरीब लुटि लबैए आओर कुटि खैत अछि।" "संतोष पढ़ैत छथि, ने ?" "हँ, मालिक दरिभंगा मे पढ़ैत अछि।" " पढ़s दिऔ।"
सीएम साइंस कॉलेज मे पढ़लाक बाद ओ जयपुर चलि गेलाह। जयपुर मे पहिल काज नवका मकान मे पुताई वाला किछु दिन धरि केलाह। तदोपरांत होटल मे किछु दिन काज केलाह। तीन अक्टूबर, 2003 केँ ओ दिल्ली चलि गेलाह। दिल्ली मे काज नहि भेटैत छलन्हि तs हुनकर बड़ भाई कहलकन्हि, "तू गाम चलि जा।"
अहि बीच गार्डक नौकरी हिनका भेटलन्हि।इ गार्डक नौकरी करs लागलाथि लाजपत नगर मार्किट मे। लगभग 12 साल धरि इ गार्डक नौकरी केलाथि।संग मे दिन मे जामिया मे पढ़ैत छलाह। किछु ट्यूशन दैत छलथिहिन। जिनगी बड़ि संघर्षक नाम छियैय। अनाथ छलाथि संतोख। बाबूजी केँ मरला केँ बाद विखंडित परिवार मे कमौवा रहलाक बादो एकटा होनकार केँ पढ़ौल नहि भेलन्हि किनको। गाम समाज केँ कोन मतलब।
"जिन्दगी किराये का घर है, सबको एक दिन जाना पड़ेगा।"
निरगुन गबैत सियालाल बाबा मटैक रहल छथिन्ह। सियालाल बाबा बेजोर गबैत छलथिहिन- "अपने खैंहें माछक कुटिया , पिया के दियैह झोर। बेटी कहियो नहि होइहैं कमजोर।"
लोक कलाकार छलाथि सियालाल बाबा। थानतर हुनकर प्रोग्राम बड़ि नीक छलन्हि। ओ खिस्सा कहैत छलथिन्ह - इस्कूल पीछा मे मालिक केँ महिस चरवाहा महिस चरावैत छल। गरीब रहबाक कारने ओकरा पढ़ल नहि भेलै। तैं ओ इस्कूले पीछा मे महिस चराबैत छल जे किछु ज्ञान तs भेटे जाएत। ओ किछु नहि सीखलक सिबाय- 'यस आओर नो' केँ। एक दिन मालिक केँ घर मे चोरी भेलन्हि। पुलिस-दरोगा तहकीकात करवाक लेल एलथिन्ह।
" बताइए, आपको किस पर शक है ?" " सर, घर मे तो बाहरी कोई नहि है।" " फिर चोरी कैसे हुआ ?" " नहि मालूम सर।" " किसी ने नहि देखा ?" "नहि सर।" " घर मे मंगरूआ छोड़ि कs आओर बाहरी कोई नहि है।" " ये मंगरूआ कोन है ? बुलाइए उसको।"
मंगरूआ इ सुनि कs कि दरोगा हमरा बुलौलकs पेंटे मे मुति देलकै।
" हँ, मालिक।" " तुम्हारा नाम क्या है ?" " मंगलदेव ।" " तो फिर ये मंगरूआ कोन है ?" " हमही छियैय मालिक।" " तो बताओ घर में तुमने चोरी की है ?"
दरोगा के हिंदी मे बाजैत सुनि कs मंगरूआ सोचलक क्याक नहि हमहुँ इस्कूल केँ पीछा मे महिस चरबैत भेटल ज्ञान केँ भँझौव। मंगरूआ प्रत्युत्तर देलकै -
" यस सर।"
आब तs मंगरूआ केँ खैर नहि। दरोगा बजलाह - " चोर मिल गया।"
आब मंगरूआ केँ लाठी परs लगलन्हि - " माए गै माए....। बाप रौ बाप....।"
मंगरूआ हाक मारि कs कानs लागल - " यौ मालिक, बचौ ने यौ। माए गै माए...। बाप रौ बाप....।"
दरोगा फेर दू लाठी मंगरूआ केँ मारलकिहीन आओर पूछलथिन्ह -""बताओ, माल कहाँ छुपा कर रखा है ?"
" बाप रौ बाप...। हमरा मारि देलक...। हमरा नहि बुझल अछि मालिक... यौ मालिक...।"
"साले तुम्हेंं नहि पता है तो किसको पता होगा।"
"नो....नो सर।"
इ इस्कूल केँ पीछा मे महिस चरबैत पढ़लाहक परिणाम छलैह।
(चारिम खेप)
स्वर्गीय उमाकांत राय जी केँ मोन रहन्हि जे गाम मे किछु हेबाक चाही जाहि सँ गामक नाम हुए। ओ चैती दुर्गा पूजा केँ शुरुआत गाम मे केलाथि। कोलकाता सँ मिस्त्री (मूर्तिकार) शंभू पाल आओर हुनकर टीम केँ लौलाथि। अखन जे दुर्गा मंदिर अछि ओही केँ पछबरिया भाग रस्ता केँ बगल मे चैती दुर्गा पूजा शुरू भेल । इ पूजा ' मंगरौना' केँँ इतिहास केँ सभसँ ललितगर चीज छल।
देश-विदेश केँ लोक मेला देखै लेल अबैत छलाह। नेपाल धरि लोक अबैत छलाह। अइ चैती दुर्गा पूजा मे बड़ि भारी टसमटस रहति छलैह।वॉलंटियर मेला मे सुरक्षा देबा मे तबाह रहति छलाह । नेना-भुटा सभ देर राति धरि दुर्गा स्थान ओगरने रहति छलाह। जहिया सँ मिस्त्री अबैत छलथिन्ह तहिए सँ दुर्गा स्थान मे भीड़ रहति छल।ऐतिहासिक दृष्टि सँ चैती दुर्गा पूजा मंगरौना केँ लेल पैघ चीज छियैय। गामक एकता केँँ सूत्रधार इ पूजा छियैय तँ गामक पार्टिशन के सूत्रधार सेहो इ पूजे आओर मंदिर छियैय।
गनौली पंचायत मे ब्राह्मण केँ एकछत्र राज्य केँ खतम केनिहार मंगरौना छल। सीताराम झा जी के मुखिया चुनाव मे हरेनिहार मंगरौना छल। स्वर्गीय युगेश्वर राय जी सीताराम मुखिया जी केँ खिलाफ अपन भाई श्री विश्वेश्वर राय जी के चुनाव मे उतारि कs मुखिया चुनाव जीतौलाथि। वर्ण-बेवस्था केँ बीच नीचला जातिक एकता सीताराम झा जी के भारी पड़लन्हि आओर मुखिया केर पद पर सोलकन्ह बैठलाह।
गनौली केर ब्राह्मण केँ विद्वता मे मंगरौना सदैव चुनौती देलाथि। स्वर्गीय कालीचरण राय आओर स्वर्गीय चिरंजीव राय 'व्यासजी' ब्राह्मण केँँ शास्त्रार्थ मे पदा देलथिन्ह। सहुरिया मे अपछ दास केँ चुनौती केँ स्वीकार करैत 'व्यासजी' हुनका चारोनाल चीत केलाथि। मंगरौना मे विद्वता मे कोनहु कमी नहि छल। गामक मान-सम्मान बढ़ाबै मे पूर्वजक बड़ि पैघ भूमिका रहलन्हि अछि।
'मंगरौनाक कौवो पढ़ल छै' इ अवधारणा विकसित भेल छल। ओ आब किछु कम भेल जा रहल अछि।कारण अछि युवा अपन पथ सँ भटैग गेलाह अछि। भांग, गांजा, दारू वगैरह-वगैरह नशा मे ओ संलिप्त रहति छथि। परिणाम अछि - गामक इतिहास पर बंट्टाधार लागि रहल अछि। नंग्गे नाचबाक प्रवृत्ति बढ़ि रहल अछि। मंगरौनाक नाक कटि गेल आब। गाम बौरा गेल । गाम अनाथ भs गेल। गाम मे पार्टिशन भs गेल।
"हँ, कहू की केल जाए ?" " हमर विचार अछि सभ कियो एकरा रोकवाक प्रयास करू।" " हँ, ठीक कहैत छियैय।" " राति मे एकटा मिटिंग राखू आओर ओइ मे जे निर्णय होएतै से सभ कियो स्वीकार कs लेबै।" "ठीक छै।"
मंदिर विवाद एतेक बढ़ि गेलै जे दुनू पार्टी केँ लोक एक-दोसर केँ मारै लेल उतारू भs गेलाथि। भूमि पूजनक बाद मंदिर निर्माणक काज बान्हक पूरूब शुरू भेल। 2017 मे नवका मंदिर मे प्रतिमा स्थापित केल गेल। विवादक क्रम मे केश-फौदारी भेलै। एसपी आओर डीएसपी केँ समझ दुनू पार्टी केँ लोक बयान देलथिन्ह। अगिला दिन इ ख़बर अख़बार केँ सुर्खी बनल- 'मंगरौना में मंदिर विवाद में दो पक्षों में झड़प' ।
लंगटू माहटर साहेब के मुइला (हत्या) केँ बाद दोसर बेर अख़बार केँ पन्ना पर ' मंगरौना' केर नाम आयल छलै। गामक कौवा पढ़ल, परञ्च गामक संस्कार जेना बिका गेल छै। ककरो कियो मोजर नहि दैत छथिन्ह। सिनियर-जुनियर माने किछु नहि। सब धान बाईस पसेरी। लंगटू माहटर साहेब केँ हत्या केर फाइल की भेलै से नहि पता। गाम मे इ घटना हेनै नीक नहि छेलै। गामक इज़्ज़त बड़ि बिका गेलै अख़बार मे।
"जम तर केँ जमीन लिखs।" "नहि लिखब, अहाँ राज मे बसल छी की ?" " जs नहि लिखबीहि तs चलिऐंह बापक बपौती दकs। " हमहुँ गामक पाँच हिस्सेदार मे एकटा हिस्सेदार छियैय।"
गाम मे सामंतवाद केँ इएह रूप छेलै। दरवारी बाबा के जमतर करीब छह कट्ठा जमीन छलन्हि से मायादत्त कहति छलन्हि जे लिख दे। एक दिन कामेश्वर बाबा के महिस रोकि देने छलथिन्ह ओ। तब युगेश्वर बाबा केँ पक्ष लेला पर ओ शांत भेलाह। लाठी केँ बल पर दोसरक जमीन लिखौनिहार केँ आब गाम मे कोनहु मोजर नहि छन्हि। सामंतवादक रस्सी जैर गेलै। नवयुवक समाज मे शोषणक बान्ह केँ ढैह देलथिन्ह।
'मंगरौना' सs एकटा वैज्ञानिक सेहो भेलाह अछि -'श्री अरूण राय' । इ छथि गामक मान बढ़ेनिहार। जखन हम छोट छलहुँ तs ओ पटना सs अबैत छलाह तs हम सभ गणित बढ़वाक लेल हुनका लग जाएत छलहुँ। करीब पाँच फूट केँ गोर-नार वो छथि। नीक छवि केँ लोक छथि जिनका नाम सँ गामक मान-प्रतिष्ठा बढ़ैत छै। इ छथि स्वर्गीय उमाकांत राय जीक ज्येष्ठ पुत्र।
संतोष 2007 जामिया मे दाखिला लेलाथि। जामिया मे बढ़वाक इच्छा केँ जगौलाथि कृष्ण कुमार जी। ओही समय मे एंट्रेंस फॉर्म केर दाम 200 टाका छेलै। दूटा फॉर्म भरलक संतोष । एकटा बी ए हिंदी ऑनर्स केँ आओर दोसर बी ए मास मीडिया केँ। मास मीडिया केँ फॉर्म भरवाक लेल कृष्ण जी टाका देलथिन्ह आओर बी ए हिंदी ऑनर्स लेल ओ स्वयं फॉर्मक टाका देलथिन्ह। मास मीडिया वेटिंग लिस्ट मे हिनकर नाम चलि गेलन्हि। मार्क्स सीट आओर सिर्टिफिकेट छोड़ाबs लेल ओ दरिभंगा आबि गेलाह।
बिहार मे बरसातक समय छेलैह। बाढ़ि आयल छेलैह। किछु दिनक लेल हुनका लेट भs गेलन्हि। ताबत धरि वेटिंग लिस्ट क्लीयर भs गेलै आओर ओ सातम क्रम पर छलाह परञ्च चौदह स्थान वाला दाखिला लs लेलाथि। संतोष मुँह ताकैत रैह गेलाह। ओही बीच बीए हिंदी ऑनर्स केर परिणाम आबि गैलै। ओ एंट्रेंस टॉप केलाथि आओर हिंदी विषय सँ जामिया मे दाखिला लेलाथि।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया गंगा-यमुना तहज़ीब केँ लेल जानल जाएत छै। संतोष केँ नसीब नीक छलन्हि जे ओ अतेक नीक विश्वविद्यालय सँ पढ़लाक अछि। कियो नहि बुझैत छथिन्ह जे सभ विश्वविद्यालय केँ रंग जामिया जकाँँ हेवाक चाही।ओखला क्षेत्र मे इ संस्थान अबैत छै। देश-विदेश केँ लोक अइ मे पढ़ैत छथि- फ्रांस, फिजी, अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरिशस वगैरह। नीक लैब्रेरी, एसी/हीटर लगलाहा रीडिंग रूम, कम्प्युर लैब, सस्ता कैंटीन आदि-आदि जामिया केँ गरीब-गुरबा केँ लेल बनौल गेल अछि।
साल 2007 धरि ओ जामिया सँ जुड़लाहा। तीनटा डिग्री ओ जामिया सँ लेलाह। जामिया हुनका लेल मंदिर साबित भेलन्हि। जिनगी केँ पटरी पर लेबाक लेल मार्गदर्शन होएत छै से इ संस्थान संतोष केँ देलकन्हि अछि। गरीबी प्रतिभा केँ केतक दिन रोकि सकैत अछि ?
जामिया केँ कैंपस जानवरों केँ मनुख हेवाक लेल शिक्षा दैत छै। परञ्च 2019-20 केँ घटना जामिया केँ लेल आओर अइ संस्थान सँ जुड़ल मनुख केँ लेल बड़ि दुखद रहलै। मनुख केँ मनुख नहि बुझिनिहार , देशक गंगा-जमुना सन तहज़ीब केँ माटि पलित केनिहार केँ इतिहास माफ़ नहि करतन्हि।
देश बाँटि कs नहि चलतै। देश केँ चलेबाक लेल मनुख चाही। लुच्चा-लफंगा सँ देश नहि चलैत छै। भांग सँ दिमाग पगला जाएत छै। आक-धतुर खा कs महादेव सभ नहि बनि सकैत अछि। देश चलेवाक लेल विख केँ पीबs पड़ैत छै।
दिल्ली केँ इ दंगा अबै वाला समय मे सभ दोगला सँ सवाल पूछतन्हि जे इ क्याक भेलै । जाहि देश मे महात्मा बुद्ध आओर महावीर जैन सन महापुरुख भेलाह अछि। अहिंसा केँ उपदेश देनिहार हमरे सभहक वंशज छेलाह अछि। ओतs दंगा नीक नहि कहल जा सकैत अछि।
जामिया सँ संतोषे टा केँ जिनगी नहि सुधरलन्हि ।ओत पढ़ि कs लाखो लोकनि आबाद भेलाह अछि। लगैत अछि मनुख हेवाक लेल किछु अलग करs पड़ैत छै। केन्द्रीय विश्वविद्यालय मे पढ़नै केँ अलगे मजा छै। आजुक समय मे एहेन विश्वविद्यालय मे दाखिला लेनै सपना जँका भs गेल छै। सरकार सभ किछु केँ महगा केने जाएत छै। शिक्षा बड़ महग भs गेल छै। गरीब लड़का डाक्टर आओर इंजिनीयरिंग केँ कोर्स नहि कs सकैए। मिड डे मिल गरीब-गुरबा के लेल छियैए। मजदूरो केँँ कनेक पढ़ल-लिखल हेतै तब नs गलत-सलत पर साइन करवा कs ठेकेदार सभ टाका ठकतिन्ह। पूरा देश मे शिक्षा बिकाउ भs गेल छै।
इ छियैए शिक्षा केन्द्र जाहि सँ पढ़ि कs हम सभ पास भेल छी - ' जनता हरि हर दत्त उच्च विद्यालय गौड़गामा '। 1971 मे स्थापित केल गेल छै। तहिया सँ इ संस्थान अइ परोपाटा केँ लोक केँ शिक्षा देलकै। लगभग 20 टा गामक विद्यार्थी अइ संस्थान सँ पढ़ि चुकल अछि आओर पढ़ि रहल अछि। अखन अइ संस्थान मे नवाँ आओर दसवाँ केँ पढ़ै भs रहल छै। मास्टरक अभाव रहितहुँ इ विद्यालय अपन नाम केँ नीचा नहि गिरs देलकै। 1996-97 सँ प्राइवेट मास्टर राखि कs विद्यालय चलि रहल छै। विज्ञान, गणित , अंग्रेजी आओर संस्कृत केँ मास्टर अखनो धरि नहि छै।
पहिने श्री मोहन मास्टर साहब आओर श्री सियाराम मास्टर साहब विद्यार्थी आओर अन्यान्य मास्टर साहब केँ सहयोग राशि सँ पढ़बैत छलथिन्ह। फेर मोहन मास्टर साहब के सरकारी उत्क्रमित मध्यविद्यालय मे नौकरी भs गेलन्हि। तs शिवा केँ नवयुवक मो० खालिद विज्ञान आओर गणित पढ़ाबs लगलथिन्ह।
अखन बिहार केँ सभ विद्यालय मे मास्टरक अभाव छै। बिहारक शिक्षा-बेवस्था लंगरैत छै, परञ्च बिहार सरकार सुतल छथि। मास्टर केँ बहाली केँ 2017 सँ लटकौने छथि। गौड़गामा उच्च विद्यालय प्राइवेट मास्टर के बदौलत चलि रहल अछि। आब माखन टोल पर उत्क्रमित विद्यालय मे सेहो प्राइवेट मास्टर साहब पढ़ा रहल छथि। विद्यार्थी सभ मिल कs हुनका बीस टाका महीना देतैन्ह। नीक बेवस्था ! सरकार केँ मुँह पर गोबर !
शिक्षक बहाली लेल नियोजित शिक्षक अभ्यर्थी पटना केँ गर्दनीबाग मे जमल छथि। हुनका पर बिहार सरकार लाठियो बरसौलथि, परञ्च बहाली लेल तारीख-पर-तारीख बढ़ा रहल छथिन्ह। शिक्षा मामला मे बिहार पूरा भारत मे नीचला पायदान पर अछि। नीतीश सरकार केँ अइ सँ कोनहुँ फ़र्क नहि पड़ैत छन्हि। सुतल छथि कान मे तेल डालि कs।
अमीर तs प्राइवेट मे पढ़ा रहल छथि। नीक शिक्षा आओर संपूर्ण शिक्षा नहि भेट रहल छै गरीबक धिया-पुता केँ। गोबरक छाता जकाँ स्तरहीन ट्युशन सेंटर खुजि गेल छै। पढ़बै के लुरि छन्हि नहि भs गेलाह माहटर साहब। गारजन सेहो नहि बुझैत छथिन्ह। बिहार सरकार अखनो धरि अंग्रेजी के अनिवार्य विषय नहि घोषित केलाथि ।
"हलो , मेय आई टॉक टू संतोष रॉय ?" "या, सर ।" " आई एम कार्तिकेय , कॉलिंग फ्रॉम ग्लोबल प्लेसमेंट, न्यू देल्ही।" "या....।" " सर , एक्च्युअली आई एम कॉलिंग रिगार्डिंग टीचिंग जॉब इन मल्टिनेशनल एजुकेशनल इंस्ट्युट, इन हांगकांग। डू यू इंटेरेस्टेड सर। यू कैन गेट गुड सैलरी , एचआर , फोर व्हीलर टू ट्रैवेल एंड अदर ऑल फैसिलिटीज यू नीड। वी हैव सेलेक्टेड योर रिज्यूम फॉर दिस फ्रॉम नौकरी डॉट कॉम। यू आर एम एम, बीएड....., आई एम राइट सर ?" " या...., बट दिस टाइम आई एम बिजी , सो आई एम नॉट इंटरेस्टेड इन योर जॉब। एक्चुअली आई हैव नॉट पासपोर्ट । "आफ्टर गेटिंग पासपोर्ट आई'ल कॉल यू लेटर। हैव अ' नाइस डे।"
संतोष केँ नौकरी लेल बड़ि रास फोन अबैत छन्हि, परंच ओ घरमुँहा भs गेल छथि। दिल्ली केँ नौकरी छोड़लाक बाद हुनकर मोन छन्हि जे अपन डीहडाबर पर रहि कs नौकरी करी, से पूरा हेतन्हि।बीजेपी 2020 केँ बिहार विधान सभा चुनाव केँ समय अपन चुनावी मेनिफेस्टो मे लिखने छेलाथि जे 19 लाख लोक के रोजगार देबै , से कहिया ? ...बुढ़ारी मे।
2017 सँ बिहार मे माहटरक बहाली कमला मे डूबकी लगा रहल छै। कतेक शिक्षक अभ्यर्थी बहालीक आस मे परलोक सेहो गेलाह अछि। परंच नीतीश कुमार ठेका आओर होम डिलेवरी रोकवाक लेल फिरिशान छथि। आब पंचायत मे दारू के बन्न करेवाक लेल सीसीटीवी लगतै। मदिरा की की नहि करौत...। बिहारक अर्थ बेवस्था केँ सेहो लूटलक आओर सरकार केँ नग्न नचवाक लेल सेहो फिरिशान केने छथि।
"आँऐं यौ दारू बन्न भs गेलै , तs की भेलै।" " किछु नहि, बिहारक अर्थ तंत्र डुबि गेलै आओर पुलिस, प्रशासन, दारू माफिया, गाँजा, भांग बेचनिहार मालामाल भs गेलै।" " होम डिलेवरी भs रहल छै। मदिरा बन्न नहि भs सकैत अछि। अखनो घर मे दारूबाज हो-हल्ला कैरते अछि। दारू पीब कs छौड़ा सभ तमाशा कैरते अछि। बाबा बाँस गजेरी केँ अड्डा बनल अछि।" " दारू केँ जीएसटी केँँ उच्च स्लाइव मे डालि कs लाभ हेतै की ? या किछु नहि.... अइ कानून केँ वापिस नहि कs सकैत अछि सरकार की ?" " हँ, क्याक नहि ? 'पोटा' कानून जँका दुनू सदन मे अइ कानून केँ वापिस करवाक बिल लैब कs वापिस केल जा सकैत अछि ।" "दिल्ली सरकार जँका ऊपर सँ आओर टैक्स लगा कs राज्यक खजाना भरि सकैत छी।" फुदुक्की आओर विक्कू अइ विषय पर बतियात शिवा चौक सँ गाम दिस अबैत छलाह कि देखैत छथिन्ह 'दुर्गा' रस्ता किनारे ओंघराएल छथि।
(पाँचम खेप)
कोलकाताक बंगाली मानुस केँ दाद देवाक चाही जे अखनो धरि बंगाल मे मनुख बाँचल छै।संतोषक परिवारक बर्बादी मे कोलकाताक सेहो करिश्मा रहल छै। 1992 मे ओ अपन माए संग कोलकाता गेल छलाथि। कोलकाता कालीघाट मे रहल छलाथि। ओही समय मे दोसरा वा तीसरा मे गामक विद्यालय मे ओ पढ़ैत छलाह अछि। गाम सँ शहर जेवाक कारण छलन्हि - परिवारक गरीबी। 'व्यासजी' कमैत नहि छलथिहीन।
1993 मे गाम वापिस भेल छल ओ। 'मंगरौना' गाम ओह गाम छल जकर नाम बिकैत छेलैह। बिहार मे स्वर्गीय जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री छलाह । मंगरौना कांग्रेस केँँ झंडा केर नीचा खड़ा छल। झंझारपुर विधानसभा सीट सँ स्वर्गीय उमाकांत राय चुनाव मे ठाड़ भेलाथि। अमातक पहिल आदमी ओ छलाह जे विधानसभा लेल ठाड़ छलाथि। पूरा अमात जाति मे गौरव केर गप्प छेलैह। परञ्च भगवान जनतिन्ह जे ओ चुनाव मे बैस गेलथिन्ह। शिवा चौक दिस जगन्नाथ जी सँ नेताजी केँ की गप्प भेलन्हि ?
राजनीति जमीन पर मंगरौना केँ इ हार छल। जातिक छवि केँ बंटाधार लागि गेलै। फेर जिनगीभरि नेताजी केँ ऊपर उठवाक मौका नहि भेटलन्हि। मंगरौना केँ थू-थू भेलै। हम विश्वास हारि गेदहुँ अछि। मंगरौना अपन इतिहास माटि पलित कs लेलक। मंगरौना नाम पर लोक धूर-छिया करs लगलै।
2021 केँ पंचायत चुनाव मे श्री रामानंद जी केँ जिला परिषद् सीट संख्या -46 सँ विजय हेनै 'मंगरौना' केँ इतिहास केँ पुनर्जीवित केनै भेलैह। राजनीति मे मंगरौना पछुएल छल। इ हिनकर चारिम प्रयास छलन्हि।
मंगरौना मे किछु भs सकैत अछि। एकटा नवयुवक रिक्शा पर मूरैय के महादेव बाबा जँका रूप लकs भरि गाम सँ महादेव बाबा केँ नाम पर चंदा वसुल लैत छथि। हुनका कियो किछु कहनिहार नहि। दानी लोकनि दानों दति छन्हि। ओ नवयुवक लाउडस्पीकर मे सस्वर मे मूरैय वाला भोला बाबा केँ उत्पत्ति केँ वर्णन करैत छथिन्ह।
"सुनलियौ मंजू, तोरा गाम मे महादेव उखड़थिन्हहें।" "नहि गै, के कहलथुहुन तोरा।" " झबरी केँ माए बजैत छलथिहिन।" " हँ, एकटा छौरा, झूठ-मूठ केँँ मूरैय केँ महादेव बाबा बना कs लोक सभ केँ ठगि रहल छै। आस्था केँ नाम पर ठगि रहल छै। लोक सेहो ठगा रहल छथि।"
लक्ष्मीनारायण केँ मर्डर मे कतेक लोक बर्बाद भs गेलै। इ छथि - 'लालबत्ती देवी'। ओई मर्डर कांड मे हिनकर सभटा गहना गनौलीक कोतवाल ठगि लेलकिहिन। लक्ष्मीनारायण केँ मर्डर मे उपयोग केल गेल पंचकमियाँ, फरसा भाला वगैरह सतनजीव काका केँ द देलकन्हि जे जो तू घर मे मचान पर नुका दिहै। ओ इ गप्प सँ अनजान जे एकर की परिणाम हेतै। झंझारपुर पुलिस केँ रेड गाम मे पड़s लगलै। चारू दिस सभ भागि गेलाह। ओइह हथियार केँ चबहच्चा पोखरि मे कटहर गाछ लग नीचा पानि मे छुपौल गेल ।
लालबत्ती देवी बथान पर ठाड़ बाछी केँ लकs अपन नैहर घंघोर जाएत छलीह। माथ पर मोटा मे दस-बारह टा गहना छलैक। गनौली मिडिल स्कूल पर किछु चीजक चुनाव छेलैक। कोतवाल एक गोट नवकनिया केँ जैत देखि कs हुनका लग जाकs हुनका डरा-धमका कs ओ सभटा गहना छिन लेलकैन्ह। इ घटना व्यासजी केँ परिवार मे कलह पैदा केलकन्हि। आओर परिवार बर्बाद भs गेलैक। लालबत्ती केँ जिनगी भरि गहना लेल मन लगले रहि गेलन्हि अछि। परञ्च बूढ़ाढ़ी में नाक मे नथ आओर गला मे चेन खरीद कs संतोष हुनकर गहना पहिरवाक सपना पूरा केलथिहिन।
लक्ष्मीनारायण के मर्डर मे मोदी लाल लगभग तीन साल झंझारपुर जेल मे बितौलथि । परिणाम मे हिनका किछु नहि केल भेलन्हि अछि। परिवार बरबाद भs गेलन्हि हुनकर। इ घटना मंगरौनाक व्यथाक घटना छियैय। स्वर्गीय मोदी लाल राय दोसर लेल बेमतलब केँ जेल खटलाथि। परञ्च जेकरा लेल ओ जेल गेलाथि आओर परिवारक विकास अवरूद्ध भेलन्हि ओ लोकनिक संतान तानाशाही हुनकर संतान केँ प्रति केलन्हि। इ मंगरौना छियैय।
श्री राजेन्द्र राय हार नहि मानलकिन्ह। 1984 (काल्पनिक) मे सूद पर लेल टाकाक सूद मूरि जोड़ि कs केतक गामक पंच मे हुनका कहलकिन्ह, परञ्च ओ पंचक फैसला नहि मानलकिन्ह। तकर भूगतान हुनका बाद मे सामाजिक बहिष्कार रूप मे भेलन्हि।
व्यास जीक विषय कीर्तन मे करेकमान लोकनि भवानीपुर मे सुनि रहल छथिन्ह। विषय छन्हि - 'होलिका केँ दहन'। ओ कहति छथिन्ह सबको बहिन होलिका सन होई जे अपन भैय्या केँ आदेश पर आगि मे जरै लेल तैयार भs जाएत छथिन्ह -
" बहिन हो, तो होलिका जैसन ,जो भाई हरिण्यकशिपु के एक आदेश पर आग में जल गयी।"
होलिका केँ वरदान केँ की भेलन्हि ? असत्यक संग देनै केँ कारने वरदान बुढ़ियाफुंसि भs गेलन्हि।
'31 ए सतीश मुखर्जी रोड' कतेक केँ जिनगी सँवारलकै अछि। अइ बासा मे मंगरौना केँ संग आनो गामक लोकनि गुजर-बसर केने छथि। इ बासा अइ रूपे ऐतिहासिक अछि। 'कालीघाट' हरैलो-भुतलैहो आबि - जा सकैत अछि। बिहारी लेल इ प्रसिद्ध जगह अछि जेना दिल्ली केँ शकुरपुर मे बिहारी चौक।
इ बासा दोसरक लेल वरदान साबित भेलन्हि, परञ्च हमरा लेल अभिशाप ! इ ककरो जिनगी केँ उठान देलकैन्ह, हमर जिनगी के बेपटरी केलक। पटना मे साइंस रैख कs पढ़वाक इच्छा केँ इ बासा खा गेल। परिवार मे आगि लगौनिहार सभहक करेज शीतल भेलन्हि। हम नीक छात्र रहितौंह नहि पढ़ि पैलहुँ। 'घरक भेदिया लंका डाह' इ हमर जिनगी मे घुन लगौलक अछि।
जिनगी बड़ि खेल खेलैत छै वा लोक जिनगी के खेल बना देत छै। आइ हम इंजीनियर रहितहुँ , परञ्च हम गाम ओगरने छी। चारि भैय्यारी रहितहुँ हमर परिवरिश अनाथ जँका भेल। आँखिक नोर बहैत रहि गेल । ख्वाब ख्वाबे बनि कs रहि गेल।
मधुबनी मे आर के कॉलेज मे केमेस्ट्री सँ बी एससी दाखिला लs कs जयपुर भागs पड़लन्हि संतोष केँ। संतोष केँ जिनगी नरक बनाबै मे हुनकर भौजाई केँ हाथ रहलन्हि । शिक्षा केँ बड़ि जरूरत पड़ैत छै। निरक्षर आओर नासमझ लोकनि नीक विद्यार्थी केँ जिनगी नरक बना दैत छै।
(६ वाँ खेप)
कलियुग मे सभ कियो अपन नीक देखैत छथिन्ह। नीक लोक केँ बड़ि सताउल जाएत छै। भिनभिनौज आओर जड़-जमीन केर बँटवारा सभ सs पैघ अधकपाड़ छियैए। संतोष केँ जिनगी मे बड़ि दु:ख छलैन्ह। व्यासजी केँ कोंरियाही बेमारी छलैन्ह। भाई सभ अधपागल , दोसरक गप्प सुनियार भौजै छलैन्ह। जखन संतोष इंटर मे पढैत छलाह तँ हुनकर मैझली भौजाई नियारलीहि जे एकरा नहि पढ़s देबै। हमर स्वामी केँ कमेलाहा पर इ डाकटर भs जेताह, मूरख के लाठी बीचे कपाड़ । फेर की भेलै ? ओ सियालदह केँ गाड़ी पकड़ि कs कलकत्ता पहुँच गेलीह। मंगरौना केँ मरद अपन कनिया केँ गुलाम।
संतोष कुनौह धरानी आई एससी मे दरिभंगा मे सी एम साइंस कॉलेज मे नामांकन लेलाह आओर पढ़s लगलाह। आई एससी केलाह। घरक गरीबी आओर आगा पढ़वाक कोनहु चारा नहि छलैन्ह। बाबूजी फुसिंयौह केँ व्यासजी! कर्महीन व्यासजी ! हुनकर माए आओर बहिन मिलि कs हिनका पढ़ौलकैन्ह। माए केँ दोसरक घर मे कुटौन-पिसौन करs पड़लैन्ह।
बहिन केँ उमिर बेसी भ' रहल छलैन्ह। हुनका सँ छोट चचेरी बहिन केर ब्याह भs गेलैन्ह। व्यास जी बेमार भेलाक बाद 2001 मे गुजैर गेलाह। धर्म नीक काज छियैए, परञ्च कर्म सँ मुँह नहि मोड़क चाही । ओ पार उतैर गेलाह। अपन लीला समाप्त केलाह। 2002 मे संतोष केर बड़ भाई अपन बेटी केर ब्याह कs लेलैत। बहिन हुनकर बेटी सँ पैघ छलैन्ह। कलियुग मे सभ आचार-विचार पर जेना डोम मूति देने छै ! घोर कलियुग !!
पुत्रक की कर्म होएत छै, सेहो लोक विसैर रहल छथिन्ह। एकर सबूत 'वृद्धाश्रम' अछि। व्यास जी केँ गाँड़िक धोती तक हुनकर बड़ लड़का छिन्न लेलकैन्ह। व्यास जी धोती, गमछा आदि उतैर कs बड़ लड़का केँ सोझा मे फेंक देलकीहिन। चारि टा दशरथ केँ एको टा नहि काम केँ। भूख आओर पै केँ अभाव मे दवाई-दारू नहि भेलैन्ह। आओर ओ बेमार भs गेलाह। पिता केँ की मतलब होएत छै से संतोष केँ जामिया मे विशेष खललैन्ह। पै सँ बेसी जरूरत विचार केँ अखनो होएत छै। विचार सँ जग जीत सकैत छी।
मंगरौना मे पैर खींचनाहर बेसी अछि। राजनीति पुरूख बेसी छथि। गाम बौरा गेल छै। जेकरा जे मोन से करैत छथि। 'शिष्टाचार' शब्द गाम सँ निपत्ता भs गेल छै। सभ कियो विद्वान भs गेल छथि। गप्प छोड़वा मे गोनू झा केँ पितामह भs गेलाह अछि। सभ कियो। दारू केँ ठेका गाम मे चलि रहल अछि। समाज, परिवार, व्यक्ति सभ कियो दिशाहीन भs गेलाह छथि। मुँहा-ठिट्ठुर, गुँहा-गिज्जर आम गप्प भs गेल छै। भाई-बहिनक रिश्ता खत्म भs गेल छै। समाजक प्रतिष्ठा दाऊ पर लागल छन्हि, परञ्च अइ गप्प सँ किनको किछु मतलब नहि छन्हि। सभ कहैत छथि - '' अपन माथा साहौर-साहौर करू।"
गाम शहर भs सकैत अछि ? परञ्च संस्कार केँ शहरी नहि होमs देल जाउ। मनुख केँ मनुख बुझल जाउ। चिटिंगबाजी समाज केँ दिशाहीन कs सकैत अछि। बेसी सँ बेसी लोक फिरिशान भs सकैत अछि। सत्य कुंठित भs सकैत छै, परञ्च सत्य केँ जीत हेबे करतै - 'सत्यमेव जयते' । सामाजिक समरसता केँ कृत्रिमता खतम कs रहल छै।
गाम मे फुँसियौंह केँ राजनीति भs रहल छै। पद केँ की गरिमा होएत छै, जिम्मेदारी की होयत छै से बुझिनिहार कियो नहि छथि। बस, हुनका अपन पेट भरवाक चाही आओर सभ किछु जाउ भाँड़ मे। गाम मे सभ किछु मे राजनीति केनिहार सामाजिक मेलजोल के खतम कs रहल अछि। बड़ि दुखक गप्प छियैय जे गाम मरि रहल छै। कियो देखनिहार नहि छै।
संतोष केँँ गरीबी मे जन्म भेलन्हि। हुनकर बाबू जी गुमान मे छलाथि जे चारिटा पुत्र अछि। परञ्च विद्वान रहितौंह ओ अपन संतान केँ नीक संस्कार देवा मे असफल रहलाह। तकरे परिणाम भेलन्हि जे चारि टा बेटा रहैतहुँ हुनकर अकाल मृत्यु भेलन्हि।
हुनकर तेसर बेटा दसवीं पास कsकेs को़लकाता में काज करs रगलाहा। ज्ञान केँ अभाव मे एवं पारिवारीक विखण्डन केँ कारणे ओ पथ सँ भटैक गेलाह आओर 'डोली मोंडल' सँ ब्याह केलाथि। काली मंदिर मे मंगरौना केँ किछु बिगाड़ै वाला लोकनि मिलि कs किशन केँ ब्याह करवा देलकन्हि। ब्याहक कय्यैन सालक बादो हुनका मुसरियो नहि गिरलन्हि। 'डोली मोंडल' केँ ओ छोड़ि देलथिन्ह।
हिनकर देखादेखी हुनकर भतीजा नीतीश आओर अभिषेक केलाथि । दुनू भैय्यारी बिन दहेज केँ 'लव मैरीज' केलाह। देहज-प्रथा केँ खतम कके मिसाल देलाथि। हुनकर माए-बाप केँ मोन लगले रहि गेलन्हि जे बेटा केँँ ब्याह धूमधाम सँ करताह। बकरी बकरी होएत छै ; सूअर सूअर । से समाज केँ बुझs पड़तन्हि। जिनगी अनमोल होएत छै। बेपटरी पर रेलगाड़ी नहि चलि सकैत छै।
गामक छौड़ा शहर जाकs 'इंटरकास्ट मैरीज' कs रहल छथि। वैदिक वर्ण-बेवस्था आओर जाति-प्रथा के तोड़ि रहल छथि। आब कुनहुँ रोक-टोक नहि छै। जिनका जे मोन होएत अछि से करू। गाँड़ि खोलि कs नाचू ; नहि देखल जेतन्हि तँ जिनका शरम हेतैन्ह , ओ आँखि बन्न कs लेताह। घोर कलियुग बीत रहल अछि ! मंगरौना बताह भs रहल अछि। भांग खा कs ; गांजा पीबि कs आओर दारू पीबि कs लोक बौरा रहल अछि। युवाजन भोला बाबा बनि रहल छथिन्ह। आक-धतूर खेनै आम गप्प भs गेल छै।
गामक शरम बिका रहल अछि - "झिनि-झिनि बिनि चदरिया ।" परेम केँ खुल्लेआम प्रदर्शन भs रहल छै। देह केँ नुमाईश खुल्लेआम भs रहल छै। इतिहास मे नीक छवि दर्ज़ हुइए इ कोशिश करकs चाही। युवा धरम केँ प्रति आग्रह भ रहल छथि। ओ करम सँ दुरि बनौने जा रहल छथि। जे कर्तव्य सँ विमुख हेताह ओ मिट जेताह। घड़ीक पहिया नाचि रहल अछि।
(सातम खेप)
'घरक भेदिया लंका डाह' इ कहबी ठीके सही छै। दुनिया नीक नहि छै। बड़ि ठकनाहर लोकनि छथि। परञ्च किछु निको लोकनि छथि। मंगरौना गाम मे भगिनमान केँ कोनहुँ इतिहास मे नाम नहि छै। वंश वृक्ष बेनिहार सभ केँ अइ गप्प पर ध्यान देवाक छलैह। सभ कियो अपन पूर्वज केँ खोजि सकैत छथि। तर्पण केनिहार सभ सँ विशेष निवेदन हेबाक चाही जे कम-सँ- कम सात पुश्त धरि नाम याद रहक चाही।
गाम मे बूढ़-वृद्धा केँ देखनिहार बड़ि कम रहलै। अपन बेटा-पुतौह बूढ़ माए-बाप केँ नहि देखि रहल छै। आइ दुर्गा स्थान मे धीरू राम भेटलाह।
हम पूछलियन्हि, " की समाचार अछि ?" ओ कहलाह, " की कहू बउवा , कियो नहि देखनिहार अछि। देखैत छियैय - एकटा आँखि खराब भ गेल अछि। तीनों छौड़ा मे सँ कियो नहि देखा दैत अछि। बूढ़ाड़ी मे गिर-पइर केँ मरि जायब। इएहे रहि गेल आब जिनगी मे।
मुइला पर लोक कंटाहा आओर पुरहित केँ कतेक दान करैत अछि। परञ्च जिला पर दुखे-दुख। कियो देखनाहर नहि। समाज आओर परिवार आब मरि रहल अछि। संवेदना आब हरा गेल छै। सभ कियो हबड़-हबड़ मे लागल छथि। कथि केँ हबड़-हबड़ छै जे अनबुझ अछि। माए-बाप तड़पि रहल छन्हि आओर अपने एश-मौज मे लागल रहति छथि। इएह कलियुग छियैय। जिअल मे गुहाँ भत्ता मरल मे दूद्धा भत्ता।
रामपरी कहियो सासु केँ सेवा नहि केलीह, परञ्च मुइला पर हुनकर साँरा पर जुड़ी-शीतल मे जल चढ़ाबैत छथि। जिन्दा मे सासु केँ झोंटा उखैर लेलकै। मंगरौना मरि रहल अछि; धधकि रहल छै मंगरौना । मुइला पर जबार न्यौता देलाह सँ किछु नहि होएत। माए -बाप सँ बढ़ि कs किछु नहि होएत छै।।
गाम गाम नहि रहि गेलै। गाम शहर भs रहल छै। शहर जकाँ आचार-विचार छौर भs रहल छै। इज्जत केँ गुँह-गोबर भs रहल छै। आँखि कन्हा केने रहs पड़ैत छै। डीजे मे ' लॉली पॉप' वाला गीत बजला सँ सभ कियो देखार भs जाएत छथि। होएत छन्हि धोती- कुरता फाड़ि कs नाची। ललनवा के भरि देह गुदगुदी होएत छै। होएत छै कखन बरूआ कें गाड़ी मे सँ कूदि कs कुरता फाड़ि दियै। रौशन तs डीजे गाड़ी पर चढ़ि कs गरदा उड़ा देलकै। इ भेलै नाच ! लबड़ा नाच ! हाथ केँ तेना घुमबै छै जे ओ बिरजू महराज केँ फेल कs देतै। इ की भेलै - मारि फँसि गेलै। गारि- गराबैल भs रहल छै।
" तोरा माय ....।" " तोरे बहिन....।"
लाठी निकैल गेलै - मार त मार सार के...। प्लास्टिक केँ कुर्सी एक- दोसर केँ देह पर तोड़ि रहल छथि नचनियाँ सब। ब्याह मे इ सभ आइ-काल्हि हेबे टा करैत छै। बरयातिया सभ दारू पीब कs शेर भs जाएत छथि। दोसर गाम जाकs हिरिंग -भिरिंग केलक कि दे घुस्सा...दे घुस्सा... दे लाठी...दे लाठी ।चारू नाल चित ! शेर बकरी भs क मिमियैत छथि। वाह रे ! डीजे वीर !
मिथिला संस्कृति मे छेद भs गेल अछि। पारंपरिक ब्याह पद्धति समाप्त भ रहल अछि।विधि-विधान मे कटौती भs रहल छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभाषामे शिक्षा अभियान आ जयकान्त मिश्र रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभाषामे शिक्षा अभियान आ जयकान्त मिश्र जयकान्त बाबू मिथिलाक प्रसिद्ध व्यक्ति छथि । साइते केओ शिक्षित व्यक्ति होएत जे हुनका बारेमे नहि सुनने होएत,कोनो-ने-कोनो तरहेँ हुनकासँ नहि जुड़ल रहल होएत । चाहे हुनकर मैथिली आन्दोलनक सहभागी रहल होथि,चाहे हुनकर आलेख वा किताब पढ़ने होथि,चाहे मैथिलीक हित साधन हेतु साहित्यिक गतिविधिमे हुनका संगे भाग लेने होथि । मिथिलाक लोक हुनकासँ कहुना-ने-कहुना सालो-साल जुड़ल रहल । तकर एकटा महत्वपूर्ण कारण इहो छल जे ओ दिन-राति मिथिलाक गाम-गाम घुमैत रहलथि। पानि हो,अन्हड़ हो,रेलमे आरक्षण हो, नहि हो मुदा ओ चलबे करताह,रुकताह नहि । सोचल जा सकैत अछि जे मैथिलीक हेतु हुनकर कतेक समर्पण छलनि। जयकान्त बाबूक समस्त जीवन कहुना-ने-कहुना मैथिलीक विकासमे लागल रहलनि । ताहि हेतु मूलतः ओ दू दिशामे लागल रहलथि । एक तँ अपन लेखनीक माध्यमसँ । दोसर जन आन्दोलनक माध्यमसँ । दुनू दिशा अपना-आपमे सही आ जरूरी छल । रहल सफलताक बात ,से लोकसभ अपना-अपना हिसाबसँ तकर आकलन करैत छथि। हमरा हिसाबसँ ओ अपन लेखनीक माध्यमसँ जे प्रयास केलाह ताहिमे ओ ऐतिहासिक सफलतासभ प्राप्त केलनि । मैथिली साहित्यक इतिहास जयकान्त बाबू सन्१९४८मे A short History of Maithili Literature and the influence of English on it विषयपर इलाहाबाद विश्वविद्यालयसँ पीएचडी केलनि । एकरे आधारपर मैथिली साहित्यक इतिहास पहिने अंग्रेजीमे आ बादमे मैथिलीमे छपल । ई मैथिली साहित्यक प्रथम इतिहास थिक । एहि पुस्तकक माध्यमसँ देश-विदेशक विद्वानलोकनि मैथिली भाषाक स्मृद्ध परंपराक बारेमे जानकारी प्राप्त केलनि । साहित्य अकादमीमे मान्यतासँ लए कए संविधानक अष्टम सूचीमे मैथिलीकेँ सामिल करबा धरिमे ई पुस्तक बहुत सहयोगी साबित भेल । साहित्य अकादमीमे मैथिलीक मान्यता साहित्य अकादमीमे मैथिलीक मान्यताक हेतु ९ दिसम्बर १९६३सँ ११ दिसम्बर १९६३ धरि दिल्लीमे आयोजित मैथिलीपुस्तकसभक प्रदर्शनीमे ओ तत्कालीन प्रधानमंत्री,पंडित जवाहरलाल नेहरुकेँ बजओने रहथि । ओहि प्रदर्शनीक आयोजन हेतु अपन जीपीएफसँ एगारह हजार रुपया निकालि कए तकर व्यवस्था केने रहथि । हुनकर दुटा सहोदर भाइ एहि आयोजनक हेतु हुनका संगे मजदूर जकाँ काज केने रहथि । किताबसभकेँ प्रदर्शनीक हेतु ओरिओने रहथि,व्यवस्थित केने रहथि । तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु उपरोक्त प्रदर्शनी देखि जयकान्त बाबूकेँ लिखने रहथि- "I was happy to inaugurate yesterday the Maithili Book exhibition and to see the large collection of books and manuscripts in Maithili. This demonstrates that Maithili has been for a long time and is today a living language among the people of that area. The language deserves encouragement." (काल्हि मैथिली पुस्तकसभक प्रदर्शनीक उद्गाटन कए आ मैथिलीमे पोथी आ पाण्डुलिपिक पैघ संग्रह देखि हमरा अतीव प्रसन्नता भेल । एहिसँ ई प्रमाणित होइत अछि जे मैथिली भाषा बहुत दिनसँ विद्यमान रहल अछि आ आइ-काल्हि ओहि इलाकाक लोकक हेतु एकटा जीबंत भाषा थिक । एहि भाषाकेँ उत्साहित कएल जेबाक चाही ।) अंग्रेजीक अपन विलक्षण ज्ञानक उपयोग करैत साहित्य अकादमीक विभिन्न कार्यक्रममे सहभागी विविध भाषाक विद्वानलोकनिकेँ ओ ततेक प्रभावित केलाह जे ओ सभ सहर्ष मैथिलीकेँ साहित्य अकादमीमे स्वीकार केलनि,ओकरा सम्मानित स्थान देलनि । साहित्य अकादमीमे मैथिलीकेँ मान्यता भेटल । हुनके निरंतर प्रयासक परिणाम अछि जे सन् १९६५सँ मैथिलीक पुस्तकसभकेँ सभवर्ष आन-आन भाषाक पुस्तकक संगे पुरस्कारसभ भेटि रहल अछि। मैथिलीमे कतेको पुस्तक साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित भए रहल अछि । कतेको पुस्ककसभक मैथिलीमे अनुवाद भए रहल अछि । ई कोनो मामुली उपलव्धि नहि अछि । संविधानक अष्टम सूचीमे मैथिलीकेँ सामिल करब जयकान्तबाबूक नेतृत्वमे सतत् संघर्षक दोसर महत्वपूर्ण उपलव्धि भेल-संविधानक अष्टम सूचीमे मैथिलीकेँ सामिल करब । एहि हेतु पृष्ठभूमि तैयार करबामे हुनकर कलमक जबरदस्त योगदान छल । निश्चित रूपसँ ई काज कोनो एकदिने तँ भेल नहि। सालक-साल कतेकोगोटे एहि हेतु लागल रहलाह । जयकान्त बाबूक लगाओल गाछमे पानि,खाद दैत रहलाह । परिणाम सामने अछि । आइ मैथिली समस्त भारतवर्षक मुकुटमे विराजित छथि । आब हमरा लोकनिक उपर निर्भर करैत अछि जे हमसभ एहि सुअवसरसँ कतेक लाभान्वित होइत छी । जयकान्तबाबू सही कहैत छलाह जे मात्र संविधानमे मान्यता भेटिए गेलासँ सभकिछु नहि भए जाएत । तकर बादो बहुत किछु करबाक जरूरी रहत । हमसभ जखन मैथिली बजबे नहि करब, धिआ-पुताकेँ मैथिली बाजले नहि हेतैक,कालेज-इसकूलमे मैथिलीक विद्यार्थी रहबे नहि करत तखन मान्यते भेलासँ की होएत ? एहि बातकेँ बूझबाक प्रयोजन अछि। जनआन्दोलनक प्रभाव जयकान्त बाबू सालक-सल प्राथमिक इसकूलमे मैथिली भाषाक हेतु आन्दोलनमे अपन सभकिछु खपा देलाह । हुनकर एहि काजमे समर्पण कोन हद धरि छलनि से जयकान्त-जयन्तिकामे छपल श्री कमलेश झाक आलेखसँ उद्धृत निम्नलिखित अंशसँ बुझाइत अछि- "सन् १९९६ ई०क बरसातक समय । दरभंगाक समस्त रस्ता झीलमे बदलि गेल छल । ताहूमे दिग्घी पश्चिम वला सड़कक हाल बेहाल छल । भिनसरक आठक अमल । हम मारवाड़ी कालेज दिस जा रहल छी आ ओ हाथमे एकटा बाँसक छिपाठ लेने, नङराइत आस्ते-आस्ते चलैत ओहि रास्तापर आबि रहल छलाह । हम दूरेसँ हुनक हालत अटकरलहुँ । हमर अन्तरातमा चीत्कार कए उठल । हम हुनका लग गेलहुँ । कहलिअनि जे कियैक एते कष्ट उठा रहल छी? की समस्या अछि? ओ समस्या कहलनि । कहलनि जे एकटा सभा आइ हमरा दरभंगामे करबाक अछि। सभा हमर समस्या थिक ।" तकर बाद कमलेश बाबू हुनकर इच्छानुसार सभाक आयोजन केलनि जाहिमे दरभंगाक कतेको विद्वान लोकनि भाग लेलाह। कहबाक माने जे मैथिलीक काजक हेतु ओ किछु करबाक हेतु तैयार रहैत छलाह । ओ चाहितथि तँ सेवानिवृत्तिक बाद प्रयागराजमे अपन घरमे रहि निचैन समय बिता सकैत छलाह । ओतहिसँ चिठ्ठी लिखि-लिखि अपन मोनकेँ मना सकैत छलाह । मुदा हुनका बुझाइत छलनि जे मैथिलीक विकासक हेतु माटि-पानिसँ जुड़ब बहुत जरूरी अछि । एक-एकटा लोकसँ संपर्क साधब बहुत जरुरी अछि । एही संदर्भमे श्री कमलेश झाजी लिखैत छथि- "जयकान्तबाबूक समस्त जीवन पढ़ब-लिखब, चिंतन-मनन करब रहलनि, तखन फेर सुर-सुर आ मुर-मुर कियैक? कियैक ओ बुढ़ारीमे एतेक यातना सहबाक लेल विवश छलाह?अइ गूढ़ रहस्यक अन्वेषण करय पड़त हमरा लोकनिकेँ। हमरा बुझने ओ रहथि दार्शनिक । दर्शन एकटा वस्तु आ राजनीति दोसर वस्तु,सिद्धान्त एकटा वस्तु आ व्यवहार दोसर वस्तु । तहिना आदर्शवाद एकटा वस्तु आ यतार्थवाद दोसर वस्तु ।" असलमे बात ई रहैक जे जयकान्त बाबू मैथिलीक हेतु पूर्ण समर्पित व्यक्ति छलाह । ओ जीवन भरि मिथिलाक गाम-गाम मैथिलीक प्रचार-प्रसार हेतु घुमैत रहलाह । ताहि लेल कोनो मान-सम्मान,सुविधा-असुविधाक ध्यान नहि रहनि । सन् १९९३ मे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक राँचीमे आयोजित मैथिलीक आयोजनमे ओ मात्र एकटा पैम्फलेट देखि कए पहुँचि गेल रहथि । मैथिलीक काज हेबाक चाही। बस एतबे हुनकर उद्येश्य रहैत छलनि। एहि लेल ओ न्यायालयमे केसो केलाह । सालक-साल गामे गाम घुमैत रहलाह । चुनाओमे मैथिली समर्थक उम्मीदवारकेँ ठाढ़ करबाक प्रयासो केलाह । हुनके आग्रहपर निर्दलीय उम्मीदबारक रूपमे एकगोटे एम.एल.एक चुनाओ लड़लाह । जयकान्त बाबू संगे आर कैकगोटे हुनकर चुनाओ प्रचार करैत रहलाह,मुदा परिणाम ढाकक तीन पात । लोकसभ हुनकर बैसारमे जरूर अबैत छल । हुनका आदरो करैत छलनि,मुदा ततबे। भोट देबा कालमे सभ बिसरि जाइत गेलनि । मैथिली समर्थक हुनकर उम्मीदवार चुनाओमे हारि गेलाह । कहबाक माने जे भावनामे एक दिन,दूदिन केओ नीक-नीक बात भने कए लैत छल,मुदा ओकर कोनो सार्थक काजमे परिणति नहि भेल । किएक नहि भेल? एहि लेल जरूरी रहैक जे लोकक अपना भीतरसँ मैथिलीक प्रतिए ज्वारि उठैक । मुदा से हेतैक कोना? एहिठाम तँ घर-घर,गाम-गाम जातिमे विखंडित भेल अछि । मिथिलामे जाति भाषापर बहुत भारी पड़ैत अछि। ई बात बूझबाक प्रयोजन अछि जे जाधरि मिथिलाक सभवर्गक लोक एहि प्रयाससभमे सामिल नहि हेताह,ताधरि एहि तरहक आन्दोलनसभक इएह हाल रहत । जयकान्तबाबू मैथिलीक सेवा निःस्वार्थभावसँ जीवन भरि करैत रहलाह । ताहि हेतु सर्वस्व दावपर लगा देलाह । मान-अपमान सभकिछु बिसरि गेलाह । पेसमेकर लागि गेल रहनि,स्वास्थ्य अनुकूल नहि रहनि,परिवारक लोक चिंतामे पड़ल रहैत छलाह,मुदा ओ एकसर मैथिलीक काजे दिन-राति एक केने रहैत छलाह । प्रयागराज-दरभंगा,कोलकाता-जतए कतहु मैथिली संवंधी कार्यकर्म होइत ओतए बिना बजओनहु पहुँचि जाइत छलाह । एकबेर हम इलाहाबादसँ पटना जाइत रही। स्लीपरमे हमर आरक्षण छल। डॉक्टर जयकान्त मिश्रजीकेँ देखलहुँ। ओहिना ठाढ़, बिना सीटेक यात्रा कए रहल छलाह। पटनामे कोनो मैथिली कार्यक्रममे भाग लेबाक हेतु जाइत छलाह। बहुत आग्रह केलापर ओ हमर सीट लेबाक हेतु तैयार भेलाह। कहथि जे ओ अहिना चलि जेताह। ई छल हुनकर उत्साह- मैथिली कार्यक्रमे भाग लेबाक। मुदा छलाह तँ ओहो मनुक्खे । दिन-राति मिथिला-मैथिलीक हेतु काज करैत-करैत कखनहु काल ओ उदास भए जाइत छलाह । कारण जे रहल होइ । संभवतः एतेक परिश्रमक बादो अनुकूल परिणाम नहि भेटैत होनि, किंवा अपनहि लोकसभसँ अपेक्षित सहयोग नहि भेटैत होनि । एहने कोनो क्षंणमे अस्सी वर्षक बूढ़ जयकान्त बाबू पटनामे श्री शरदेन्दु चौधरीजीकेँ साक्षात्कार दैत छथि आ कहैत छथि- "हमर बएस आगाँ जा रहल अछि,देह काज नहि करैत अछि,आँखि संग नहि दैत अछि,आब हृदयक धड़कन सेहो थीर नहि रहए दैत अछि तैओ मैथिली हितक नामपर इलाहाबादसँ दिल्ली,पटना आ दरभंगा दौड़ लगा रहल छी । मुदा काज नहि भए रहल अछि । नहि भए रहल अछि काज आ जकरा-जकरा लग अपन लोक बुझि दौड़ैत छी सैह धोखा दैत अछि,सैह फूसि कहि कए टारि दैत अछि,बहटारि दैत अछि। लोकसभ बइमान भए गेल अछि आ मैथिलीक नामपर गोलैशीटा करैत अछि । मैथिलीकेँ स्थापित करबाक प्रयास नहि करैत अछि,खाली ओहिसँ पाबए चाहैत अछि । की कहू,की कहू अहाँकेँ,मैथिलीक रेल पटरीपर अबैत-अबैत उतरि जाइए आ लोक मूक भए बैसल रहैए ।" निश्चित रूपसँ उपरोक्त कथनमे जयकान्तबाबूक निराशाक भाव झलकैत अछि,निराशा जे अपन लोकक मैथिलीक प्रतिए उपेक्षाभावसँ उत्पन्न भेल अछि । तकर ई माने नहि जे ओ तकर बाद बैसि गेल रहथि । तकर बादो कतेको साल धरि,कहि सकैत छी जीवनक अंतिम साँस धरि मैथिलीक हित साधना हेतु परेसान रहलाह,चिंतित रहलाह । मृत्युसँ किछु समयपूर्व नीकसँ बाजल नहि होनि,तखनहु जयकान्त बाबू जे किछु कहलथि तकर अभिप्राय इएह छल जे मैथिलीक की हाल अछि,मैथिली आन्दोलन केना चलि रहल अछि,मिथिला राज्य कहिआ धरि बनत? कहबाक माने जे जीवनक अंतिमो क्षणमे ओ मैथिलीक हित चिंता करैत रहथि । एहन छलनि हुनकर मातृभाषाक प्रतिए लगाव। मुदा ई संभव नहि अछि जे सभकेँ मैथिलीक प्रतिए ओहिना लगाव होइक। सभ मातृभाषाक विकासक हेतु ओहिना अपन सर्वस्व अर्पण करबाक हेतु आतुर रहए । मुदा अपन भाषाक प्रति एकटा सामन्य अनुराग तँ हेबेक चाही । अपन मातृभाषामे बाजि कए ,ओहिमे लिखल पोथीसभ पढ़ि कए आत्मसम्मानक भाव जगबेक चाही । अपन धिआ-पुतासँ मैथिलीएमे गप्प-सप्प हेबेक चाही । मुदा से भए रहल अछि की? एकर जबाब बहुत मोसकिल नहि अछि । अधिकांश सुशिक्षित परिवारसँ मैथिली नदारद भए गेल छथि । प्रवासी मैथिली भाषी लोकनि घरसँ बाहर तँ हिन्दी वा अंग्रजीमे बजबाक हेतु मजबूर भए सकैत छथि , कारण तखनहि जीविका चलतनि । मुदा दरभंगा मे,मधुबनीमे,किंवा सहरसामे तँ ई मजबूरी नहि हेबाक चाही । सहरसभक बात तँ छोड़ू गामक हाटपर आपसमे ,किंवा दोकानपर दोकानदारसँ केओ मैथिलीमे गप्प नहि करैत अछि । गामो-घरमे काकाक बदलामे आब चच्चा ,काकीक बदलामे चाची बाजल जा रहल अछि । ई की भए रहल अछि,किएक भए रहल अछि? जखन अपने घरमे नेनासभ मैथिली नहि बाजत,नहि सिखि सकत तँ इसकूल की करत आ किएक करत? मातृभाषामे प्राथमिक शिक्षाक समर्थन आइ-काल्हि अंग्रेजी माध्यमसँ बच्चाकेँ प्राथमिक शिक्षा देबाक जोर अछि । लोकक ई धारणा अछि जे एहिसँ बच्चाक भविष्य बढ़िआँ होएत । ओकरा बेहतर नौकरी भेटतैक। मुदा ओ सभ ई बात नहि बूझि पबैत छथि जे मातृभाषामे शिक्षा नहि देबाक कारण बच्चाक अधिकांश बौधिक क्षमताक उपयोग नहि भए पबैत अछि । केओ अंग्रेजी भाषा बाजि लेत ताहिसँ ई जरूरी नहि अछि जे ओकर बौधिक क्षमता सेहो उत्कृष्ट होइ । भाषा मात्र अभिव्यक्तिक माध्यम होइत अछि । अंग्रेजी बजनिहार लोककेँ बेसी बुधिआर मानि लेब मूलतः अपन मातृभाषाक प्रति उचित सम्मानक अभाव आ ताहिसँ उत्पन्न हीन भावना होइत अछि । ई कोनो जरूरी नहि अछि जे अंग्रेजीमे फटर-फटर केनहार बौद्धिको रूपसँ विशिष्ट होथि,मुदा हुनका ज्ञानी मानि लेबाक एकटा परंपरा भए गेल अछि । दुनिआ भरिक शिक्षाविदलोकनि मातृभाषामे प्राथमिक शिक्षाक समर्थन करैत रहलाह अछि । महात्मा गांधी कहने रहथि- "भारतीय भाषामे पढ़ल विज्ञानी आ विशेषज्ञ देशक सही मानेमे सेवक हेताह । ओ विदेशी नहि, अपितु आम जनताक भाषा बजताह । ओ जे ज्ञान प्राप्त करताह से आन नागरिक हेतु सुलभ होएत।" गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर कहने रहथि- "भारतीय संस्कृति एकटा विकसित सतदल कमलक समान अछि जकर प्रत्येक पंखुड़ी हमर प्रादेशिक भाषा थिक । कोनो पंखुड़ीक नष्ट भेलासँ कमलक शोभा नष्ट भए जाएत । हम चाहैत छी जे प्रादेशिक भाषा रानी बनि कए अपन राज्यमे विराजमान रहथि आ हिन्दी तकरसभक बीचमे मध्यमणिक रूपमे सुशोभित होअए।" मातृभाषामे -मिक शिक्षा देलासँ बच्चाक चिंतन,मननक शक्ति बढ़ैत अछि । ओ कोनो विषयकेँ मौलिक रूपसँ बूझि सकैत अछि,ओहिपर अपन स्वतंत्र विचार राखि सकैत अछि । मातृभाषामे प्राथमिक शिक्षा भेटत तँ बच्चाक बौधिक क्षमता बेसी प्रखर होएत । इएह कारण छल जे जयकान्तबाबू प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मैथिली बनेबाक हेतु एतेक संघर्ष करैत रहलाह । मैथिलीभाषी बच्चाकेँ प्राथमिक शिक्षा मैथिलीमे भेटैक ताहि लेल ओ तत्कालीन राज्यसरकारक उदासीनताक विरुद्ध न्यायालय धरि पहुँचि गेलाह । जयकान्त मिश्र बनाम राज्य सरकार बिहार( LAWS(PAT)-2002-9-113) जयकान्त मिश्र बनाम राज्य सरकार बिहारक मामिलामे निर्णय दैत माननीय उच्च न्यायालय पटनाक तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि एस धवन आ न्यायमूर्ति आर.एन.प्रसादक पीठ कहलथि जे राज्य सरकार राजभाषा,राष्ट्रभाषा आ मातृभाषाक विभेदकेँ नहि बूझि पाबि रहल अछि । संबिधानक अनुच्छेद ३५०(क)मे स्पष्ट कएल गेल अछि जे प्रत्येक राज्य सरकार एवम् स्थानीय निकाय ई सुनिश्चित करत जे भाषायी अल्पसंख्यक समुदायक बच्चाकेँ अपन मातृभाषामे प्राथमिक शिक्षा लेबाक सुविधा होइ। मुदा एहिठाम तँ राज्य सरकार मैथिलीक मान्यतेपर विवाद ठाढ़ कए देने अछि आ ताहि लेल न्यायालयमे गलत तथ्य राखल गेल अछि आ सही बातकेँ न्यायालयक पहुँचिसँ दूर रखबाक प्रयासमे संबंधित परिपत्रक सही रूप न्यायालयमे राज्य सरकार नहि देलक अछि । चारिसाल धरि राज्य सरकार एहि मामिलामे न्यायालयमे अपन जबाब नहि दाखिल केलक । न्यायाधीश महोदयक दबाबमे जखन ओ जबाब देलक तँ ओहिमे गलत-सलत बात कहल गेल । राज्य सरकारक हिसाबे मैथिली भाषाक माध्यमसँ प्राथमिककक्षाक बच्चासभकेँ शिक्षा देब जरूरी नहि अछि कारण सरकार द्वारा जारी कएल गेल परिपत्रकसँ एहि लेल निर्धारित मैथिलीक अहर्ता समाप्त भए गेल अछि । न्यायमूर्तिलोकनि ई स्पष्ट आदेश देलनि जे मैथिलीभाषी बच्चाकेँ अपन मातृभाषामे शिक्षा लेबाक पूर्ण आधिकार अछि। संबिधानक अनुच्छेद ३५०क क अनुसार मैथिलीभाषी प्रत्येक बच्चाकेँ प्राथमिककक्षा धरि मैथिलीमे शिक्षा लेबाक हेतु राज्य सरकार व्यवस्था करबाक हेतु वाध्य अछि । सरकारक ई संबैधानिक दायित्व अछि जे तकर व्यवस्था करए । ओसभ इहो स्पष्ट केलनि जे एहिसँ हिन्दीक महत्व कोनो तरहें कम नहि होएत आ राष्ट्रभाषाक रूपमे हिन्दीक स्थान आ मातृभाषाक महत्वमे कतहु विरोधाभाष नहि अछि । माननीय न्यायाधीश लोकनि एहि बातकेँ संज्ञानमे लैत स्पष्ट केलनि जे सरकारक कहब ठीक नहि अछि । राज्य सरकार द्वारा न्यायालयमे मैथिली भाषाक प्रति भेदभाव करबाक प्रयास निरस्त कए देल गेल । माननीय न्यायाधीश लोकनि अपन आदेशमे स्पष्ट केलनि जे राज्य सरकारक कोनो एहन काज जाहिसँ मैथिली भाषाक महत्व कम कएल जाइत अछि,असंबैधानिक अछि । न्यायालय द्वारा आवेदनकर्ताक याचिका स्वीकार कए लेल गेल । विनय कुमार मिश्र बनाम राज्य सरकारक मामिलामे माननीय उच्च न्यायालय बिहार,पटनाक समक्ष विहार लोक सेवा आयोग पटनामे मैथिली विषयकेँ लोक सेवा आयोगकक परीक्षासँ हटा देबाल मामिला उठाओल गेल छल। राज्य सरकार मैथिलीकेँ उपरोक्त परीक्षासँ मात्र एहिलेल हटा देलक जे एकटा अन्य मामिला(राकेश कुमार बनाम राज्य सरकार(C.W.)C NO 6582/1981) लंवित छल । माननीय न्यायालयक खंडपीठ राज्य सरकारक आशयपर प्रश्नचिन्ह लगबैत स्पष्ट केलनि जे राज्य सरकार अनावश्यक हड़बड़ीमे ई गलत आदेश पारित केलक । राज्य सरकार एकटा अनुभाग अधिकारीक मारफतसँ अपन जबाब देलक । न्यायालयक जबाबमे कहल गेल जे मूल अभिलेख जाहि आधारपर आयोगमे मे मैथिली भाषाक मान्यता देल गेल छल, नहि भेटि रहल अछि । मामिलाक गहन अध्ययनक बाद माननीय न्यायालय आवेदनकेँ स्वीकार करैत राज्य सरकारकेँ आदेश देलनि जे विहार लोक सेवा आयोग पूर्वस्थिति बहाल करए । मैथिलीसँ संबंधित आनो-आनो मामिलामे राज्य सरकारक रुखि कमोबेस ओहने छल । मौलिक दस्ताबेजकेँ न्यायालयमे नहि देल जाइत छल,किछु-किछु कहि मामिलाकेँ लटकाबक प्रयास कएल जाइत छल । उच्च न्यायालयमे जखन राज्य सरकार हारि जाइत छल तँ तकर विरुद्ध उचच्तम न्यायालयमे अपील कए देल जाइत छल जाहिसँ मामिला लटकल रहल । उचित समयपर न्याय नहि भेल । अंततोगत्वा,जखन एहिसभ मामिलामे जीत भेवो कएल तँ ओकरा नीकसँ लागू नहि कएल गेल। सोचल जा सकैत अछि जे राज्य सरकारक एहन रुखिक कारण की छल? मातृभाषामे तकनीकी शिक्षा भारत सरकारक नवीन शिक्षा नीतिमे मातृभाषामे शिक्षापर विशेष जोर देल गेल अछि । किछुदिन पूर्व मध्यप्रदेश सरकार द्वारा हिन्दीमे प्रथम वर्ष एमबीबीएसक शिक्षा प्रारंभ कएल गेल अछि । आठविभिन्न भारतीय भाषा(तमिल,तेलगु,मलयाली,गुजराती,मराठी,बांग्ला,हिंदी आ असमिआमे इजीनियरिंगक पढ़ाइक ओरिआन कएल जा रहल अछि । नीट आ यूजीसी द्वरा आयोजित परीक्षा बारहटा भारतीय भाषामे देबाक व्यवस्था भेल अछि । एहिसभसँ स्पष्ट अछि जे वर्तमानमे केन्द्र सरकारक नीति मैथिलीक हेतु अनुकूल अछि । जरूरी एहि बातक अछि जे हमसभ अपन-अपन घरमे बच्चासभक संगे मैथिली बाजी जाहिसँ ओ सभ अपन मातृभाषाकेँ बूझथि आ ओकरा प्रतिए सम्मानक भाव राखथि । तखनहि संविधान आ कानूनक मदति लए मैथिली भाषाक उचित स्थान भेटि सकैत अछि । ताहे लेल हमरा लोकनिकेँ सजग होएब जरूरी अछि । नवपीढ़ी जखन मैथिली जानत,ओहिमे रूचि राखत तखनहि ओकर आगू भविष्य नीक भए सकैत अछि । दुनिआक तमाम विकसित देशसभ अपन विद्यार्थीलोकनिकेँ तकनीकी आ विज्ञानोक शिक्षा अपन भाषामे दैत छथि । जर्मनी,जापान,रूस, चीन सभ अपन भाषामे शिक्षा दए कतेक विकासित भए गेल । हमरा लोकनिकेँ एहि बातसँ प्रेरणा लेबाक चाही । कोनो विदेशी भाषा सिखबामे कोनो परहेजक जरुरति नहि छैक । मुदा अपन मातृभाषाक पहिचान आ सम्मान अबस्स बनओने रही । मैथिलीक अपन स्वतंत्र लिपि तिरहुताक्षर मैथिलीक अपन स्वतंत्र लिपि अछि । मैथिली भाषाक अपन लिपि छैक जकरा विभिन्न नामसँ अभिहित कएल जाइत छैक-मैथिली लिपि,मैथिलाक्षर,मिथिलाक्षर किन्तु ओकर उचित नाम छैक तिर्हुता,यद्यपि कोनो अनभिज्ञ सज्जन एकरा बङलाक विकृत रूप अथवा बिहारक ओझा ब्राह्मणलोकनिक द्वारा मुख्यतः प्रयोग कएल जाए बाला ओझा लिपि सेहो कहने छथि । तिर्हुता नामसँ ज्ञात होइत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक थिक तथा एकर विकास तीरभुक्ति वा तिर्हुत नामक व्यवहार आरम्भ भेलाक पश्चात पूर्णताकेँ प्राप्त भेल होएत । बहुत दिन धरि एही लिपिमे मैथिली लिखल जाइत रहल । हमरा मोन अछि जखन हम बच्चा रही तँ नोत-पिहानी तिरहुतेमे लिखि पठाओल जाइत छल । सभागाछी वा घरकथासँ बिआह ठीक भेलापर सिद्धान्त तिरहुतेमे लिखल जाइत छल। मुदा आब तँ प्रायः ओहोसभ लुप्तप्राय भए गेल अछि । जयकान्तबाबू तिरहुताक्षरक प्रचार-प्रसार हेतु बहुत प्रयास केलनि । तिरहुताक्षरक वर्णमाला पोथीक हजारो प्रति छापि कए बटलनि । आरो कैकगोटे एहि दिशामे प्रयास केलनि। आधुनिक समयमे आदरणीय गजेन्द्र ठाकुरजी एहि दिशामे अद्भुत काज केलनि अछि । ओ कंप्युटर हेतु तिरहुताक्षरक फान्ट तैयार करबा कतेको पोथीकेँ तिरहुताक्षरमे छपलनि अछि जे विदेहक पेटारमे उपलव्ध अछि आ डाउनलोड कएल जा सकैत अछि। एतेक प्रयासक अछैत तिरहुता लिपिक उपयोग सामान्य रूपे नहि भए रहल अछि । इसकूलसँ लए कए विश्वविद्यालय धरिक मैथिली पाठ्यक्रममे तिरहुता लिपिमे यदि पुस्तकसभक उपयोग होइत तँ कम सँ कम मैथिलीक अध्यापक/प्राध्यापक लोकनि तिरहुता लिखबा/पढ़बामे निष्णात रहितथि आ हुनकासँ बहुत रास विद्यार्थीसभमे ई क्षमता विकसित होइत । से तँ तखने होइत जखन कि मैथिलीक टेक्सटबुक निर्धारण केनिहार समितिक सदस्यलोकनि एहिमे रुचि लितथि । मुदा साइत ओ सभ देवनागरी लिपिक उपयोग करब बेसी पसिंद केलनि । तकर परिणाम सामने अछि । भारत सरकारक शिक्षा मंत्री एकटा संसदीय प्रश्नक उत्तरमे संसदमे कहलनि जे मैथिली भाषाक अपन स्वतंत्र लिपि नहि अछि । तकर बाद जखन एकर विरोध भेल,हुनका सही जनतब देल गेलनि तँ एकटा मैथिली भाषा आ ओकर लिपिक प्रचार-प्रसार आ संरक्षण लेल प्रतिवेदन बनेबाक लेल समिति बनल । ओकर प्रतिेवेदन भारत सरकारक शिक्षा मंत्रालयकेँ भेटि चुकल अछि । समिति के महत्वपूर्ण सिफारिश अछि: 1. दरभंगामे कोनो एकटा विश्वविद्यालय (कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय वा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय) मे लिपि आ पाण्डुलिपि केंद्र स्थापित करब । 2. भारतीय भाषाक प्रौद्योगिकी विकास (टीडीआईएल) द्वारा मिथिलाक्षरक यूनिकोड लिपि सँ संबंधित काजक शीघ्र समापन आ... 3. मिथिलाक्षर लिपि पढ़ेबाक लेल श्रव्य-दृश्य शिक्षण सामग्री तैयार करब। देखा चाही जे एहि अनुशंसा कार्यान्वयन कहिआ धरि होइत अछि । तिरहुताक्षर छोड़ि देवनागरी लिपिमे मैथिली लिखबाक निर्णय मैथिलीक हेतु बहुत हानिकारक साबित भेल। देवनागरी लिपिमे लिखल जेबाक कारणे मैथिलीक स्वतंत्र भाषाक रूपमे मान्यता देबएमे कतेको मैथिली विरोधी लोकनिकेँ अवसर भेटि गेलनि आ मैथिलीक संघर्ष बेसी कठिन भए गेल । मैथिली एकटा स्वतंत्र भाषा थिक एतबा कहब आवश्यक बुझाइछ जे आइ-काल्हि मैथिली देवाक्षरमे लिखल जाए लागल अछि तथा बिहार सरकारक भाषानीतिक कारण ई भ्रान्ति होएबाक अवसर भेटैत छैक जे मैथिली हिन्दीसँ बेसी आर बंङला-असमिआ-उड़िआसँ कम मिलैत अछि । आधुनिक जीवनक आदान-प्रदानओ देशक यातायात एवं राजनीतिक धारासभक कारण भाषा-भाषामे भेद कम भेल जाइछ विशेषतः हिन्दी बङला आदि अधिक उन्नत भाषासभक समकक्ष मैथिली आदि कम उन्नत भाषा भ्रान्त स्थिति उत्पन्न कए सकैछ । किन्तु तथ्य तँ तथ्ये रहत-मैथिली एकटा स्वतंत्र भाषा थिक। एहि संबंधमे ग्रिअर्सन साहेबक उक्ति बहुत प्रासांगिक अछि- ई(मैथिली) उत्तर पश्चिम प्रान्तक(आधुनिक उत्तर प्रदेशक)हिन्दीक वर्गक अपेक्षा बङला वर्गसँ बेसी निकट अछि । बङला,उड़िआ एवं असमिआ जकाँ ई साक्षात प्राचीन मागधी प्राकृतसँ बहराएल थिक-प्रायः सभसँ बेसी लगसँ बहराएल थिक,तथा एहि तीनू भाषासँ एकरा रूपावलीमे ततेक अधिक साम्य छैक जे चारू भाषाक एकटा सम्मिलित व्याकरण बनाओल जाए सकैछ । (मैथिली साहित्यक इतिहाससँ उद्धृत(पृ०२२) मिथिला-मैथिलीकेँ मेटा देब सहज नहि छैक किछुगोटे ई प्रचार करैत रहैत छथि जे मैथिली आब विलुप्त भाषा भेल जा रहल अछि । ई कोनो तरहें सही नहि अछि । मिथिलामे रहनिहार आ प्रवासी लोकनि जे समाजक गरीब,पिछड़ल वर्गकक छथि से मैथिलीए बजैत छथि आ बजैत रहताह । समस्या किछु उच्च वर्गक छनि जे ओ सभ आधुनिकता आ संपन्नताक कारणे मैथिलीमे बाजब अपन अपमान बुझैत छथि । अपन बच्चासभकेँ मैथिली नहि सिखा पबैत छथि । जे काज परिवारक छैक से इसकूल थोड़बे करत? परिणाम अछि जे आइ इसकूल,कालेजमे मैथिलीक शिक्षक तँ छथि,मुदा विद्यार्थीए नहि छथि। एहिसभ परिस्थितिक अछैत मैथिली आबाद छथि आ रहबे करतीह । ताहि हेतु जयकान्त बाबूक कथन ध्यान कएल जाए- "मिथिला-मैथिलीकेँ मेटा देब सहज नहि छैक । ओकर जड़ि ततेक पसरल, ततेक गहींर छैक जे थोड़ बहुत अकाल-दुर्भिक्ष पड़ने, कनेक-मनेक बिहाड़ि-पाथर भेने ई उखड़ि नहि सकैत अछि।" (कटकमे मिथिला-उत्कल समाजक अधिवेशनमे जयकान्तबाबू द्वारा देल गेल भाषणसँ उद्धृत) उपसंहारः निश्चित रूपसँ जयकान्त बाबू मैथिलीक हेतु जे किछु कए सकलाह से केलाह । मैथिलीक प्रतिए एहन समर्पण भाव हुनकामे अपन पूर्वजेसँ प्राप्त भेल छलनि । हुनकर कैक पुस्त एक सँ एक विद्वान तँ छलाहे,मैथिलीक हेतु पूर्णतः समर्पित रहल छलाह । तेँ नेने सँ हिनकोमे ओ संस्कार छलनि जे मृत्युपर्यंत बनल रहलनि । आइ जखन हमसभ हुनकर जन्म शताव्दी मना रहल छी,हुनकर कृतिसभक संस्मरण कए रहल छी,तखन हमरा सभकेँ सोचबाक प्रयोजन अछि जे कोन तरहें हुनकर मैथिलीक पुनर्जागरणक स्वप्नकेँ साकार करी । मातृभाषामे शिक्षाक महत्व ओ जनैत छलाह । तेँ ताहि हेतु ओ प्रवल संघर्ष केलाह । हुनका लगलनि जे राजनीतिक समर्थन आ सहयोगक बिना एहि लक्ष्यकेँ प्राप्त करब संभव नहि अछि। तेँ मिथिला राज्यक निर्माण हेतु चलि रहल आन्दोलनक समर्थन केलाह,ओहिमे सम्मिलितो भेलाह । मुदा अखन धरि हुनकर ई स्वप्नसभ साकार नहि भए सकल । जीवनमे सफलता-असफलता लागले रहैत अछि । जे चढ़ैत अछि,सएह खसितो अछि । ओ बहुत किछु कए गेलाह आ बहुत किछु आगूक पिढ़ीक हेतु करबाक लेल छोड़ि गेलाह । ई कहबाक प्रयोजन नहि अछि जे चाहे मैथिलीकेँ शिक्षाक माध्यमक विषय होइक,चाहे मिथिला राज्यक निर्माणक बात होइक,ई सभ ताधरि संभव नहि होएत जाधरि अपन समाजक सभ वर्ग,समुदाय आ जातिक लोक एहि आन्दोलनकेँ अपन बूझि एकरा सफल करबाक हेतु प्रयत्नशील नहि हेताह । ओना देशमे कानूनक राज्य अछि । मैथिली भाषा आब संविधानक आठम सूचीमे आबि गेल अछि । ककरो कानून सम्मत एकर उपयोगसँ रोकल नहि जा सकैत अछि। मुदा पहिनेसँ बनि गेल धारना जे ई जाति विशेषक भाषा थिक,तकरा मेटाएब बहुत जरूरी अछि। क्षेत्रीयता आ जातिगत संकीर्णतासँ जाधरि हमरा लोकनि ऊपर नहि उठब,ताधरि मैथिलीक सही मानेमे विकास संभव नहि अछि । किछु दिनसँ अंगिका,बज्जिकाकेँ मैथिलीसँ पृथक भाषा साबित करबाक कुचेष्टा भए रहल अछि । मैथिलीसँ जुड़ल अधिकांश संस्थासभमे गुटबंदी भरल अछि । बेसक एहिसभसँ किछुगोटेक स्वार्थपूर्ति होइत होनि ,मुदा मैथिली भाषाक अहित भए रहल अछि । एहिमे राजनीतिक कारण तँ अछिए,आरो-आरो कारणसँ हमसभ सही दिशामे नहि बढ़ि पाबि रहल छी । जरूरी अछि जे समाजक सभअंगक लोककेँ आपसमे जोड़ल जाए,सभकेँ उचित सम्मान आ अधिकार देल जाए,तखनहि जयकान्त बाबूक स्वप्न साकार भए सकतनि। तखनहि मिथिला राज्य बनि सकत। सही मानेमे मैथिलीक उचित स्थानो तखनहि भेटि सकत । आशा करैत छी जे विद्वान लोकनि एहि विषयपर अबस्स चिंतन-मनन करताह आ मैथिली आन्दोलनमे समाजक सभवर्गक लोककेँ जोड़बामे सफल भए सकताह । निश्चय ओ मैथिली भाषाक हेतु स्वर्णिम दिन होएत । रबीन्द्र नारायण मिश्र mishrarn@gmail.com m-9968502767 संदर्भ: 1.जयकान्त जयन्तिका-संपादक-श्री गोविन्द झा 2.मैथिली साहित्यक इतिहास-लेखक डा. जयकान्तमिश्र 3.Jaykant Mishra-Selected writings on Maithili Literature 4.Blog of Dr Dhanakar Thakur 5.Jaykant Mishra Jayakant Mishra - Wikipedia https://en.wikipedia.org/wiki/Jayakant_Mishra 6. anadianant.uk https://anadianant.uk/ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.रोशन जनकपुरी- समयके कथा रोशन जनकपुरी समयके कथा "भाग न रे बोङबहरा ! अयलौ बाप सुन् ।"- अंगना आगूके सड़कपर रुकल गाड़ीमे स उतरैत सेनाके जत्था पर नजर परिते पटिया बीनैत बु ढ़िया मध्धिम स्वरमे चिचिययलै । मचन्ना पर स रोहित बारी दिस छड़प' चाहलकै, मुदा सरकारी गोली ओकरा मौका नइँ देलकै । गोली रोहितके पिठ्ठी छेदैत कर्चीके टाट छेदैत मकैबारीमे कतौ हेरा गेलै । रोहित मचन्नेके निच्चामे गुरैक गेल । बुढ़बा मुदा मकैबारीमे छड़प'मे सफल भ'गेल । ओ सेनाके एकतरफी ध्यानके फयदा उठौलक । अंगनामे बैसल बुढ़िया आ भन्सा घरक दुहाइर पर ठाढ़ ओकर बेटीके जेना बकझड़ लाइग गेल छलै । सेनाके जत्था फायर करैत मकैबारी दिस दौगल । कहाँ दुन बुढ़बा दौगैत रहैतै त बाँइच जाइत । मुदा बूढ़ देह बेसी दूरतक दौग नइँ सकलै । ओहू पर हँफनीके बिमारी । बुढ़बा मकैबारीके ओइपार आइर पर एकटा जिलेबीके गाछक निच्चा बैस गेल आ घेरा गेल आ मारल गेल । अंगनामे बुढ़िया के त खाली अवाजे सुनायल रहे । ओ त' जगता कहलकै जे 'सरबा सुन कको के माइर देलकै', तब ओ दौगल रहै । सेनाके दूटा जवान बुढ़बाके लाशके उठयने गाड़ी दिस ल'जाइत रहै । बुढ़बाके आँइख खुलले रहै, भय मिश्रित, दर्द स चियारल । आगू-पाछू डोलैत गर्दन दिस बुढ़ियाके ध्यान गेल रहै । ओकरा एक क्षणके लेल बुझयलै जेना बुढ़बा चियारले आँइख ओकरे दिस ताइक रहल छै । दूटा आओर सेना रोहितके लाशके सेहो गाड़ीके पाछू ट्रेलर पर कोनो बोरा जका फेकलक - 'धम्म' । रोहित दोसर गामक पार्टी कार्यकर्ता छल । आ गाड़ी आगू बइढ़ गेल, अरोसिया-परोसियाके सकदम्म आ बुढ़िया आ ओकर बेटीके हकरोर पारैत छोइर क' । दश वर्ष बीत गेलै अइ घटनाके । मुदा बुढ़ियाके दिमागमे अखनो ओहिना अइछ । रोहितके पिठ्ठी स बौछार मारैत लेहू, बुढ़बाके उनटा मूँहे लटकल आगू पाछू हीलैत गर्दन, ओ दर्द स चियारल आँइख, जेना अखनो बुढ़बा ओकरे दिस ताइक रहल अइछ । कतेको बेर, राइतके कोनो पहरमे ओ चेहा क' ऊठल अइछ आ राइत भइर जगले रहिगेल अइछ । "गे माई ! आ, चाह पी "- भन्सा घर स बेटीके अवाज ओकरा वर्तमानक भुइँयाँ पर पटैक देलक । एकटा नम्हर साँस खीचैत ओ भन्सा घर दिस तकलक । अपने गति स पटिया बीनैत ओकर हाथ अस्थीर भ'गेलै । तखने सड़क पर एकटा बुल्लू रंगके गाड़ी रुकल आ ओहिमे स उतैर क' चाइर गोटे पुलिसक संग इन्सपेक्टर अंगनामे आयल । पुछलक - "गनपति माट्साबके घर इहे हइ किने ?"- बुढ़बा मास्टर रहै । बुढ़िया 'हँ मे मूँड़ी हिलौलक । बेटी भन्सा घरके दुहाइर पकैरक' ठाढ़ भ' गेलै । "अहाँ मास्टर्नी साहेबनी छी ?" - इन्सपेक्टर मुस्काइत फेर पुछलक आ जबाबके प्रतीक्षा बिनु कयनही नमस्कार सेहो कयलक । बुढ़िया दुनू हाथ जोइरक' नमस्कारक जबाब देलक । "हमसब गणतन्त्र दिवसके अवसर पर शहीद परिवारसबके सम्मान कार्यक्रम रखले छी । अपनेहु अइतियइ त निमन होइतइ ।" - इन्सपेक्टर बाजल । "होत्तै । कहाँ रखले छी ?" - बुढ़िया पुछलक । "थने मे हइ । सबेरे चइल अइती, त निमन होइतइ ।" - आमन्त्रण पत्र दैत इन्सपेक्टर बाजल । "होतै, हम सबेरे पहुँच जायब ।" -बुढि़या जबाब देलक आ इन्सपेक्टर लौट गेल । बुढ़िया देवाल पर टाँगल बुढ़बाके फोटो दिस तकलक । गोलमोल मूँह आ नम्हर, मोट आ हँसैत आँइखबला बुढ़बा फोटोमे मुसैक रहल छल । "गे बुढिया ! अखनी हमरासबके गरियबै छे । कहियो जिला जबारके लोकसब फूलमाला ल'क' अयतौ ।" - बुढ़ियाके याद परलै बुढ़बाके कौचर्य । ओकरा अपन गाल भीजल बुझयलै । हाथ स छूलक, नोर अपने मने आँइख स टघैर रहल छल । आँचर स ओ नोर पोछलक । "ले चाह ।" - बेटी हाथमे चाहक गिलास पकड़ा देलकै तखने । ओ देखलक बेटियो के आँइख पनियायल छल । बेटियोके मन शायद ओकरे जका व्यग्र अइछ । ओ बेटीके पिठ्ठी पर स्नेह स हाथ फेरलक । "तोहर बाप बड़का दैब पुरुख छलौ ।"- ओकर ठोर बुदबुदायल । पच्छिममे सुरुजक चक्का अन्तिम साँस ल' रहल छल । जहिया स बुढ़बा भूमिगत भेल छल, अहिना सुरुजक चक्का डूइब गेलाक बाद लुकझुक अन्हार होइत काल अबैत छल । चाइर वर्षक बेटी, पन्द्रह वर्षक बेटा आ छोट छीन खेतक जिम्मेवारी बुढि़या के खौँझाह बनादेने छल । तैँ ओ सबबेर बुढ़बाके स्वागत गारिए स करैत छल - ''बजरखसुवा, कोइढ़फुट्टा, जन्माक' छोइर गेल, कइला अबै छै, ओम्हरे मइर जाइत', एहनेएहने । आ अंगनामे बैसल बुढ़बा मुस्काइत रहैत । बुढ़बाके अंगनामे देइख क' बुढ़िया आरो खौँझाइत -"जयबे भितरी कि रहबे अंगनेमे, अयतौ कही तोहर पुलिसबा बाप सुन् त टिङ द' पाइद जयबे ।" बुढ़बा मुस्कियाइत बजैत -" मया त हउ हमर ।" "हँ, हँ, हमरा कोनो मया दरेग हय से !" - बुढ़िया खौँझाइत बजितै । बुढ़बा ओकर बाँहि पकैरक' भितरी ल' जइतै । घरमे बुढ़बाके छाती पर मूँड़ी राइख क' बुढ़िया कतेको बेर कानल रहय - " ई त चइल जाइ हइ। ई बालबच्चा, खेतपथार, केना चलइ हइ से हमही जनै छी । हम एगो मौगी जाइत, फेनु एकरा किछो भ' गेलै त हम कत्त भ'क' रहब !" आ बुढ़बा ओकरा लगमे खीच क' पिठ्ठी पर हाथ सोहर'बैत समझायल करै – दुनियाँ जहानके बात, देश, समाज, गणतन्त्र, जनताके राज, गरिबहासबके मुक्ति, वर्ग संघर्ष, माओवाद, कीदनकीदन । बुढ़िया सब बात त नइँ बूझै, मुदा एतेक जरुर बुइझ जाइ जे ओकर बुढ़बा राजाके राजके विरोधमे लड़ै छै आ चाहैछै जे जनताके राज होइ, गरिबहाके केओ दुःख नइँ दइ । सबबेर एहि प्रेम प्रसंगक अर्ध विराम बु ढ़ियाके मुस्कान स होइ । ओ त धियापुताके भार, खेतीके झंझट आ पुलिसबाके डरत्रास छल जे बुढ़ियाके किचकिचाह बनादेने छल । ओकरा मनमे ई त रहै जे बुढ़बा ओकरे संगे रहैत, खेतीबारी करैत आ बालबच्चा पालैत त नीक होइतै, नइँ त ओ बूझैत छल जे ओकर बुढ़बा समाजेके लेल लड़ि रहल छल । उपर स ओ कतबो गरियबौ, ओकरा अपन बुढ़बा पर गर्व रहै । कतेको बेर अधरतियामे उइठक' ओ, सुत्तल बुढ़बाके मूँहठान एकटक निहारैत छल । गोलमोल मूँहठानमे बुढ़बाके मोट आ नम्हर आँइख मुनलोमे हँसैत बुझाइ ओकरा । कतेकबेर भोढ़ढ़ियामे अन्हरौखे बुढ़बा उठबै छलै ओकरा । मुस्काइत गम्भीर नजर आ भाव स कहै छलै - "हमर त कोन ठीक । लौटियो सकै छी, नहियो लौट सकै छी । ई बेटा-बेटी, घरदुआर सब तोरे जिम्मा छौ कुर्थाबाली । जाबे तक जीत नइँ होतै, लड़ाई चलतै । साथीसब अयतौ त सहयोग करियही ।" - बुढ़बा ओकरा छाती स लगबै आ मकै बारीमे हेरा जाइ । ओ अनमनायलसन बैसले रहिजाइ असोरा पर, भोरका चक्का ऊग'तक, जाबे तक ओकर बेटी चाहे बेटा टोइक नइँ दइ । बुढ़बाके मरलाके किछु दिनतक त जेना समये सुन्न भ'गेल होइ बुढ़ियाके लेल । किछु दिन त ओ बदहवास जका रहल । एक दिन लुकझुक अन्हारमे चाइर गोटे मकै बारी स अंगनामे अयलै । बुढ़िया अकचकायल आ डेरायल सेहो । मुदा एकटा अधबयसु पुरुष बाजल - " भाउजू ! नइँ डेराउ, हमसब मास्साहेबके साथी छी । राइत भइर रहब, भोरे चइल जायब ।" बुढ़बा मोन पइर गेलै बुढ़ियाके -"साथीसब अयतौ त सहयोग करियही।" "खाना ख'बै कि न ?" -बुढ़िया पुछलक । "हँ, हमसब दिने स भुखले छी ।" - ओ अधबयसु बाजल । बुढि़या खाना बनयलक आ खुअयलक । अधरतिया तक ओ अधबयसु, बुढ़िया, ओकर बेटी, बेटा बतियाइत रहल । घरदुआरके बात, देशविदेश, राजा, राजनीतिक पार्टीसब, धनीगरीब, गणतन्त्र, जनताके राज, दुनियाँजहानके बात । ओहिना जेना ओकर बुढ़बा बतियायल करै । ओकरा बुढ़बा मोन पइर गेलै । मनके भीतर बर्फ जेना टुइट रहल छल । जमल समय जेना पिघैल रहल छल । ओ आँचरक कोर स नोर पोछलक । "भाउजू, दाजू महान छेलै । गरीबगुरुबाके खातिर शहीद भ्या'गेलै । हमसब त मुरुख गरीब किसान छेलियै । दाजुए हमरासबके सिखेलकै । हमसब लड़बै भाउजू ! जाबेतक देशमे गणतन्त्र आ ओतबे नइँ जनताके राज नइँ एतै, हमसब लड़बै । चाहे जत्ते शहीद होब' परइ । देखै छी भाउजू ! हमरसबके पार्टी एक दिस छै आ बाँकीसब दोसर दिस । ओकरासबके गरीब जनताके कोनो मतलब नइँ छै । सब राजाके दास भ' गेल छै आ विदेशीके दलाल । लेकिन जनताके आगूमे किओ नइँ टिकतै । देखबै भाउजू, एक न एक दिन गरीब जनताके राज अयबे करतै .......।"- अधबयसू बजैत जा रहल छल । बुढ़बाके स्मृति बुढ़ियाके भीतर स आर्द्र आ उद्दिग्न बनारहल छल । बेरबेर नोराइत आँइख पोछैत बुढ़िया बाजल - "राइत बेसी भ'गेलै बौआ । जाउ सूतूग' सब गोरे, फेन भोरे जाहू परत ।" ओ सब सूत' चइल गेल । ओइ राइत असोरे पर सुत्तल बुढ़िया अन्हारेमे निःशब्द सुबुइकसुबुइक क' खूब कानल । ओकर मन भइर बुढ़बाके स्मृति चित्र भरल छल । अन्हरौखेमे बुढ़ियाके फुसफुसाइत स्वरमे केओ उठौलकै -" भाउजू, हमसब जाइछी । दाजू त शहीद भ्या' गेलै । ऊ लौट के त नइँ अ'तै । लेकिन हमसब अहीँके धीयापुता छी । जखनी जरुरी परत, जगताके दुआरा खबर पठायब । ऊ पार्टीके आदमी छै । हमसब एम्हरेओम्हरे घूमैत रहै छी ।"- अधबयसू पुरुष प्रणाम कयलक आ चारुगोटे मकैबारीमे पैसगेल । बुढ़िया बहुत देर तक असोरे पर बैसल रहिगेल । सुरुजके चक्का पुरुबमे उग' लागल रहै । ओ देखलक, मोटका आ हँसैत आँइखबला बुढ़बा फोटोमे मुस्का रहल छल । पता नइँ किया, ओइ दिन स बुढ़ियाके धैरज बन्हा गेलै । बीचमे पुलिसबासब आइबक' हरान कर' लगलै त ओ बेटोके पार्टीएमे पठादेलक । ओइ अधबयसू कामरेडसंगे ओकर बेटा ओकरा गोर लाइग क' जखन मकै बारीमे पैसैत रहइ, तखन ओकर करेज चनकल रहै, मुदा ओ कइस क' मनके बन्हलक । ओ बुढ़बाके फोटो दिस तकलक । बुढ़बाके स्मृति आब ओकरा पीड़ा नइँ, प्रेरणा जका भ'गेल छलै। 'हजारौ हजारके बेटा छै त किछु नइँ, हमर बेटा छै त की भेलै । कोनो खराब काम नइँ, नीके काममे छै ओकर बेटा ।' जनताके राज लाब'के सपना आब ओहो देख' लाग' छल । जइ दिन गणतन्त्र घोषणा भेलै, ओकरा बुझयलै जे सपना पूरा भ'गेलै । ओइ दिन ओ कानल रहे । ओकरा बुझायल रहइ फोटोमे नइँ, ओकरे लगमे ठाढ़ भ'क' हँइस रहल छै ओकर बुढ़बा । किछु दिनक बाद ओकर बेटो लौट आयल रहै । ओकर अंगना आब भरल रहै छल लोकसब स । ओकर बेटा आब खाली गामेके नइँ क्षेत्रेके नेता भ'गेल छल । बुढ़बे जका गोलमोल मूँहठानबला ओकर बेटा आब बापे जका देशदुनियाँके बात कर' लागल छल । जगता त जेना हरदम सटियायल रहै छलै । कहियो सुनसान रह'बला ओकर आंगनक आगूमे मोटरसाइकल आ गाड़ीसब लाग' लागल छलै । लोक सबहक आबाजाहीमे भोर स साँझ कखनी भ'जाई से पते नइँ चलै । "चाह पीले ? गिलास ला ।" - बेटीके आवाज ओकरा फेर वर्तमानमे ठाढ़ क' देलकै । अन्हार गहीँर भेल जा रहल छल । ओकर बेटीद्वारा बारल गेल डिबिया आ लालटेनक सीमित इजोत अन्हार स लइड़ रहल छल । गाममे पार्टी कार्यालय खुललाके बाद किछु महिना स ओकर बेटा ओम्हरे बैस' लागल छल । तैँ आब अंगनामे भीड़ कम आ प्रायः नहिए जका रहैत छल । सड़क पर एकटा मोटरसाइकल अस्थीर भेल, आ ओकर बेटा अंगनामे प्रवेश कयलकै । ओ रुकल नइँ, सोझे कोठरी दिस जा रहल छल। "लबका निस्पेटर आइल रहलैय । गनतन्तर दिवसके कारकरममे हमरो आबेके कहैत रहलैय ।" - बुढ़िया बाजल । "हँ, चइल जइयही ।"- अपने गतिमे ओकर बेटा बाजल । ओकरा लगलै बेटाके पैर लड़खड़ा रहल अइछ । "बिहान तू रहबिही कि न ?" - बुढ़िया पुछलकै । "हँ, हमहूँ रहबै ।" - कहैत, ओकर बेटा धड़ाक् स केबारी बन्द क' लेलक। "केना अन्हारेमे सूइत रहलै । लमटेनो त बाइर लितै ।" - बुढ़िया खौँझाइत बाजल । किछु दिन स लगातार अहिना भ' रहल छल । बुढ़ियाके नइँ नीक लगलै । ओ परोसियाके हाक पारलकै - "रे जगता !" "हँ काकी ! कथी कहै छे ?" - जगता अयलै । "रे ई छौँड़ाके कथी भ'गेल हइ ? राइत क' अतौ, ख'तौ न पीतौ, पट् द' केबारी लगा लेतौ ।" "हमरा नइँ बूझल हउ काकी, आब हमरा संगे कहाँ रहैहउ, आब त ऊ बड़का लोकसुन् जोरे रहैहउ" - जगता जबाब देलक । बुढ़िया चुप्पे रहल । मन मुदा व्यग्र भ'गेल छल । ओकरा साँसमे किछु दिक्कत महसूस भेलै । किछु दिन स हँफनी बइढ़ गेल छलै , बुढ़बे जका । गोटी खयलक, किछु ठीक बुझयलै, मुदा मन अशान्ते छल । ओकरा ओ अधबयसु कामरेड मोन पइर गेलै । एक दिन दिनेमे ओ आयल रहै । बुढ़िया ओकरा चाह देलकै । "गणतन्त्र त अयलै, लेकिन सोँचल सन के नइँ भेलै भाउजू ! नेतासब बिगैड़ गेलै, बुझाइछै आरो लड़' परतै"- ओ बाजल रहे । बुढ़ियोके नीक नइँ लाइग रहल छल, तैयो ओ बाजल -"गनतन्तर त आइब गेलै, आब कथिला लड़बै ?" "नइँ बुझलियै भाउजू , गणतन्त्र त आइब गेलै, लेकिन नेतासब बुझाइछै जुगजुगके भुखायल बाघ । गरीब जनताके कत्त हित करतै, उनटे सब अपने घर भर'मे लागल छै ।" अधबयसू कामरेड मनक पीड़ा उझिललक । " त आब की करबै ?" - बुढ़िया अबोध प्रश्न कयलक । "करबै की भाउजू ! दाजू एक्केटा बात कहने छेलै, जनताके राज आब'तक आन कोनो विकल्प नइँ छै । पहिने त नेतासबके सुधार'के कोशिस करबै । नइँ सुधरतै त संघर्ष करबै ।" - अधबयसू अपन निष्ठा, प्रतिबद्धता आ संकल्प प्रस्तुत कयलक । बुढि़या चुप्पे रहल । ओ अधबयसू फेर उदास स्वरमे बाजल - "एकटा बात कहू भाउजू ! बौवोके संघत बिगैर रहल छै । ओकरा पर धियान देब' परतै । आखिर गनपत मास्साहेबके बड़का नाम छेलै ।" जबाब नइँ देने रहे बुढ़िया, मुदा किछु दिन स ओकरो अहिना बुझा रहल छल । आई किछु बेसिए बुझायल । गुनधुनाइत बुढ़िया राइतमे कखन निन्न परल से बुझबे नइँ कयलक । ओेहि राइत सपनामे कखनो हँसैत, त कखनो दर्द स आँइख चियारने बुढ़बा, कखनो बहुत आदमीके भीड़मे भोज खाइत हँसैत ओकर बेटा, त कखनो भलभल लेहू बहैत रोहितके लाश, कखनो झण्डासब नेने बहुत आदमीके भीड़, त कखनो गाड़ीसब पर दौगैत सेनापुलिससब बुढ़ियाके कखनो खुशी त कखनो दुःखी करैत रहलै । बुढि़या कने देरिए स सूतल छलै, तैँ उठबो कयल कने देरिए स । पुरुबमे ललौन पसैर रहल छल । मुदा अकास आई किछु मेघौन सेहो बुझा रहल छल । जेना सुरुजक ललौनके किछु बादलके टुकड़ा झाँप'के कोशीस क'रहल हो, अकास किछु एहने बुझा रहल छल । आठ बजे जगता अयलै -" काकी ! जयबे थना दिस ?" "हँ, चल । हम तोरे रस्ता तकै छलियौ ।"- बुढ़िया बाजल आ जगता संगे आंगन स निकैल गेल । चौक पर खासे चहलपहल नइँ रहै, लेकिन थानाके देवालसब तूलबैनर स छारल रहै । ओ देखलक परमेसरा पानबला, गंगबा हलुवाई, रतना हजाम अपनअपन काममे व्यस्त छल, आने दिन जका । बुढ़ियाके देइख क' गंगबा प्रणाम कयलकै । "गनतन्तर दिवसमे नइँ जइबही रे गंगबा ?"- बुढ़िया ओकरा आशीष दैत पुछलकै । "न, अपनेही सुन् जाउ माहटर्नी चाची । अब्भी थनेमे गणतन्त्र अ'लैय । हमरा बहुते काम हय । चाह पुगाबे त हम आइए जायब ।"- गंगबाके मुस्कानमे कटाक्ष बुझायल बुढ़ियाके । बिना जबाब देने ओ थानामे पैस गेल । ओत्त सामियानामे सजलधजल मंच बनल छल । इन्सपेक्टर मुस्काइत ओकरा प्रणाम कयलकै आ अगिलका लाइनमे कुर्सीपर बैसादेलकै । जगता पाछुए बैसगेल । "अगाड़ी आ न !"- बुढ़ियाके बजौलाके बादो जगता आगू नइँ अयलै । बुढ़िया नजर दौगयलक, ओकर बेटा अखनो धइर नइँ आयल छलै । बुढ़ियाके साँस किछु बढ़ल बुझा रहल छल । हँफनी किछु दिन स बेसिए परेशान कयने छल । बेटा रहैत त दबाई कीन क' लाइब देब'ला कह'के मन छल ओकर । ''रहौक, आब कार्यक्रमके बादे दबाई खायब' ।- बुढ़िया मनेमन सोचलक । कार्यक्रम शुरु भेल । बुढ़ियाके नइँ नीक लगलै । मंचपर ओहोसब छल जे पंचायतीकालमे राजाके विरोध कर'बलाके मरबयने छल, ओहोसब छल जे गणतन्त्रके लेल हथियार उठाब'बला सबके मारनेमरबयने छल, आ ओहोसब छल जे गणतन्त्रके पक्षमे लड़ल छल । सीडियो प्रमुख अतीथि छल । बुढ़िया बगलमे बैसलसंगे खौँझ उतारलक -"धौर, कोनो नेता न रहलैय, जे सीडियोके परमुख अतीथि बनलकैय ।" "ई सरकारी गणतन्त्र हइ मास्टर्नी साहेबनी !"-बगलबला शायद मजाकिया छल । ई सब देइख क" बुढ़ियाके मन तीत भ' रहल छल । कार्यक्रमके बीचमे ओकर बेटा आयल । ओकरा मंचपर बैसाओल गेल । किछुकालक बाद उद्घोषक घोषणा कयलक जे प्रमुख अतिथि द्वन्द पीडि़तसबके सरकार दिस स राहत प्रदान करत । "ई द्वन्द पीडि़त कथी होइछै ?"- बगलबला स बुढ़िया पुछलकै । " राजा आ पुरना सरकारसंगेके लड़ाईमे जेसब मारल गेलै से सब ।"-बगलबला समझाब' के कोशीस कयलक । "विरोध करेबला सुन से मारल गेलै से कि सरकार मारलकै सेहो सुन ?"- बुढ़िया आशंकित प्रश्न कयलकै । "दुनू !"-बगलबला बाजल । "त शहीद के भेलै ?"-बुढ़िया फेर प्रश्न कयलक । "आब.....आब....।"-बगलबलाके आगू नइँ फुरयलै -"....आब सरकार अहिना कहै छै ।"-हँसैत ओ बाजल । देख'मे ओ पढ़ललिखल बुझाइत छल । बुढि़याके मनमे किछु खौल' लागल छलै । सीडियो मंचपर 'द्वन्द पीडि़त'सबके साड़ीधोती आ राहत रकम 'प्रदान' क'रहल छल । उद्घोषक बुढ़ियाके नाम बजौलक । ओकरा ऊठ'के मन नइँ भेलै । उद्घोषक फेर नाम बजौलक । "अपनेके नाम बजबैय मास्टर्नी साहेबनी, जाउ न !"-बगलबला ओकरा कहलकै । मंचपर स ओकर बेटा हाथ हिलाक' ओकरा बजारहल छल । ओ धीरेधीरे मंचपर पहुँचल । सीडियो मुस्काइत साड़ीके पैकेट आ सरकारी राहत रकम ओकरा दिस बढ़ौलक । बुढ़िया बाजल -"हम पहिने किछु बोलब " । सीडियोके आँइखमे किछु आशंका आ अप्रसन्नता छल, तैयो ओ माइक लग स हइट गेल । बुढ़ियाके कन्ठमे जेना गोला अटैक रहल छल । मनके व्यग्रता, आक्रोश आ घुरमैत बातसब स छाती धक्धक् क'रहल छल । ओकरा अपन साँस सेहो बढ़ल बुझयलै । अपनाके सम्हारैत बुढ़िया माइक पकरलक -"हमर बुढ़बा माहटर साहेब जहिया जीबैत रहै, हमरा कहलकै जे हम मइर जबौ त तोरा शहीदके घरबाली कहतौ । लोकसुन सम्मान करतौ । ऊ रजाके बिरुध लड़लै । रजाके पुलिससेनासुन ओकरा माइर देलकै । रजासंगेके लड़ाईमे बहुते गोरे मरलै । रजाके बचाबेबला कुछके करान्तीकारीसुन मारलकै आ बहुतेके रजाके सेनासुन । हमर बुढ़बा कहै जे करान्तीकारीसुन मारल जाइहइ त शहीद होइ हइ । ई निस्पेटरो काइल्ह सँझियामे हमरा ओइय गेल रहे त कहलक शहीद परिवारके सम्मान कार्यक्रम रखले छी । की यौ निस्पेटर साहेब ......" - बुढ़िया इन्सपेक्टर दिस तकलक । इन्सपेक्टरके किछु नइँ फुरयलै, ओ अपने मनेमने बुदबुदायल -'सरकार द्वन्द पीडि़ते कहै हइ त.....।' बुढ़िया जेना अचानक बहुत बुधियार भ'गेल छल । ओ आगू बाजल "......रजाके बचाब'बला जे सब मारल गेलै, ओकरा परिवारके सरकार तोकभरोस देलकै, ई बढि़याँ बात हइ । लेकिन जे सुन रजाके विरोधमे आ जनताके पक्षमे लड़लै आ मरलै, ओकर परिवारसुन खाली द्वन्द पीडि़त नइँ शहीद परिवार हइ । हमर बुढ़बा लड़लै आ मरलै त ई गनतन्तर अ'लैय । ऊ शहीद भेलै । हम त मुरुख छी, अहाँसुन् पढ़लहबा आ बुधियार सुन् छी । जनतोके खातिर मरेबला , गनतन्तरोके खातिर मरेबला आ बढि़याँ कामके खातिर मरेबला खाली द्वन्द पीडि़ते होतै त शहीद के होतै ?.......।" गणतन्त्रके कार्यक्रमके जेना ठन्ढी माइर देने छल । बुढि़या बजैत जा रहल छल -"......जदी हमर बुढ़बासुन् शहीद न हइ, आ हमसुन् खाली द्वन्द पीडि़ते परिवार छी त हमरा सुन ला अखनी गनतन्तर आब'के बाँकिए हइ । ठिके कहै छलै गंगबा हलुवाई जे अखुनी खाली थनेमे गनतन्तर अ'लैय । सीडियो साहेबके लागि, निस्पेटर साहेबके लागि । सबके लागि गनतन्तर आयल रहितै त थनामे नइँ, चौक पर कारकरम होइतै । गंगबा हलुवाई, रतन हजाम, परमेसरा पानबला सुन् सेहो खुशी मनइतइ । सीडियो साहेब ! अपनेके, अपनेके गनतन्तरके धनबाद जे हमरा बोलइली । हम खाली द्वन्द पीडि़त नइँ छी । जइ दिन रतना हजाम सुनके गनतन्तरके सरकार अ'तै, ओइ दिन जरुरे हमरा बुढ़बाके शहीद कहतै आ हमरा शहीद परिवार कहतै । अभित्ता ई समानसुन् हम नइँ लेब। सबके परनाम ।" मंचपर आ निच्चा, लोकसबके बकझड़ लागले रहै । बुढ़िया मंचपर नजर दौगयलक । ओकर बेटा मूँड़ी निहुरयने बैसल छल । ओ धीरेधीरे मंच स निच्चा उतैर गेल । ओकरा अपनेपर आश्चर्य लाइग रहल छल , एतेक बात केना कहिगेल, तेज भ'रहल साँसके बावजूदो । साँसके गति किछु बेसिए बइढ़ रहल बुझयलै । कहुना मंच स उतैर त गेलै ओ, मुदा आब डेग उठयनाई पहाड़ बुझा रहल छलै । आब त बकारो फुटनाई मोसकिल बुझा रहल छलै । ओ हाथ स जगताके अपना लग आब'के ईशारा कयलक । बुढ़ियाके भाषण करैत देइख क' जगताके सेहो चकबिदोर लाइग गेल छलै । अचानक ओकर भक्क टूटलै आ ओ दौगल । बुढ़ियाके स्थिति बिगैड़ रहल छलै । ओकर साँसक गति असामान्य भ'गेलै, आँइख सेहो उपरनिच्चा कर' लागल छलै । ओकरा लगलै कहीँ ओ मइर नइँ जाय, लेकिन ओकरा मनमे अपन कामक प्रति सन्तोष छलै। लेकिन पीड़ा सेहो । ओकर बुढ़बा अखनो तक शहीद नइँ छै, गणतन्त्र अयलाके बादो । ई केकर गणतन्त्र छै ? जगता समयपर नइँ पहुँचैत त बुढ़िया निच्चेमे खइस परितै । जगता कोरामे लोइक लेलकै । किछु कालक लेल कार्यक्रम बाधित भ'गेलै । खबर थाना स बहरा सेहो पसैर गेलै । परमेसरा, गंगबा आ रतना आ आरो लोकसब आएल । बुढ़ियाके उठाक' हेल्थ पोस्ट तक पहुँचायल गेल । हँफनी शायद अन्तिम दम लगा रहल छलै । अधमुनायल आँइख स देखलक बुढ़िया । जगता, रतनासबके पाछूमे ठाढ़ ओकर बेटा डाक्टर स बतिया रहल छल। बुढ़ियाके माथा सुन्न परल जा रहल छल । कन्ठमे गोला बढ़ले जा रहल छलै । ओकरा लगलै ओ मइर रहल छै । क्षण भइरके लेल ओकर मन भेलै जे ओकर बुढ़बाके अधबयसु साथीके देखैत । फेर बुढ़बाके मोट आ हँसैत आँइखबला चित्र अभरलै, मुदा निमिष मात्रके लेल । कन्ठमे गोला आओर बइढ़ गेलै, सउँसे देह जेना अपस्याँत भ' रहल होइ । ओकरा अपन गर्दन लटकल बुझयलै, शायद केओ ओकर माथक तर स तकिया हटा देने छलै । ओकरा मोन परलै भलभल लेहू बहैत रोहितक लाश आ फेर स्मृति पटलपर अभरलै सेनासबहक कान्ह पर ओकर बुढ़बाके एम्हरओम्हर झूलैत गर्दन आ दर्द स चियारल आँइख, जेना ओकरे दिस तकैत हो निरन्तर.....निरन्तर .....। गंगबा बजलै -"माहटर्नी चाचीके दम्मा छलै । ई बड़ खतरनाक बिमारी होइ हइ । मौके नइँ दइ हइ ।" ▪▪ ▪▪ ▪▪ दोसर दिन । एकटा गाममे बुढ़बाके अधबयसु साथी अपन साथीसब संगे बैसल छल। ओ बाजल -"काइल्ह गणतन्त्र दिवसके दिन माहटर्नी भाउजूके देहान्त भ्या'गेलै । साथीसब, गणतन्त्रके लड़ाईमे ओ बड़ सहयोगी छेलै । आउ सब गोटे मिलिक' ओकरा श्रद्धान्जली अर्पण करी !" आ बुढ़ियाके श्रद्धान्जलीमे सबहक मुट्टी आकाश दिस उठल । ओहिमे जगता सेहो छल आ परमेसरा, गंगबा आ रतना हजाम सेहो। जनकपुर धाम्, विक्रम सम्वत २०७०३१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.जगदीश प्रसाद मण्डल- आत्मबल जगदीश प्रसाद मण्डल
आत्मबल आने गाम जकाँ मिथिलाक गाममे एकटा जीताएलपुर गाम सेहो अछि। जीताएलपुर गामक अपन विशेषता अछि। ओना, एहेन विशेषता कोनो एक्के गामक रहल अछि सेहो बात नहियेँ अछि। बोनाएल-सँ-बोनाएल आ झँपाएल-सँ-झँपाएल गाम किए ने हुअए, तँए ओ गाम आने गाम जकाँ गोटि-पङरा डॉक्टर, गोटि-पङरा प्रोफेसर वा गोटि-पङरा खास-खास गुणकेँ प्रदर्शित नहि केलक, से नहि। करितो अछि आ करैत आबियो तँ रहले अछि। ऐठाम एकटा बात आरो अछि ओ अछि जे खुदरा-खुदरी जखन सभ गुण सभ गाममे अछिए, तखन जँ सभ मिलाकऽ देखब तँ सोल्होअना भइये जाइए। जखन सभ गुण सभ गाममे अछिए तखन गाम सौंस भेल की नहि? जेकरा सभगुण सम्पन्न बुझै छी, मानी वा नइ मानी ई अहाँक विचार भेल जे कहबै जे सजमनिया टोल एकटा गाम अछि, जइ गाममे एकोटा परिवार एहेन नइ अछि जे अरबमे नोकरी नइ करैत हुअए। ओना, जीताएलपुर रूआवी गाम अछि, रूआव ऐ मानेमे रखने अछि जे 'सुतिकऽ उठबौ आ ऐँठकऽ चलबौ।' खाएर जे जेतए अछि ओ ओइ गामक बातो भेल आ काजो भेल, मुदा जीताएलपुरक बच्चा-बच्चा जानियोँ रहल अछि मानियोँ तँ रहले अछि जे कोनो गाममे विद्यालय तीन-चारि साए बरख पूर्वसँ अछि, रूप चाहे जे होउ, मुदा जीताएलपुरमे विद्यालय बनल देश स्वतंत्र भेला पछाइत। जखन एकटा स्वतंत्रता सैनानी अपन अन्तिम समयमे माने वृद्धपन एलापर जीताएलपुर गाममे विद्यालय स्थापित केलैन। ओही गामक छैथ सुचित भाय। बच्चेसँ सुचित भाय ओहन बाल विद्यालयकसँ बच्चा जकाँ रहला जे गामक विद्यालयमे अपन फुलवारी लगौलैन। माने जइ समय विद्यार्थीक माध्यमसँ विद्यालय परिसरमे फूलक खेती होइ छल। अखन तँ मलिछामक नककट्टा महादेव जकाँ, बान्ह-सड़क आ नहर भेने, कोनो गामक नाके कटि गेल अछि तँ कोनो गामक मुहेँ कटि गेल अछि। तैठाम आब चरचे की करब। पहिलुका अपेक्षा गामक रूपमे बदलाव आएल अछि। एहेन परिस्थितिमे गामक खेतकेँ, गामक उत्पादित पूँजीकेँ, उपजाऊ भूमि बनबैक स्थिति पैदाकऽ रहल अछि। सरकारक डोराडोरि देखिये रहल छी जे कोसीक नहरबला फाटकक आयु समाप्त भऽ रहल अछि आ नहरक शाखा-प्रशाखा अखनो कोसीए मे झिलहोरि खेल रहल अछि। जहिना बाल-बोध बच्चा बाल-विद्यालय लऽ कऽ अप्पन परिवार धरिक बीच अपन जीवन धारण करैक लूरि सीखि लइए तहिना सुचित भाय सेहो सीख लेलैन। ऐठाम ई नहि बुझब जे माता-पिताक बीच एहेन दोष पैदा केना लऽ लेलक जे काजक अढ़ान बेटीपर दिअ लागल आ बेटाकेँ आरक्षित कोटाक लाभ देलक। जहिना बाल मनक जीवन अपन दुनियाँ देख आत्मबल पैदा करैए तहिना सुचित भायकेँ सेहो भेलैन। ओना, जीवनक संग आत्मबल केतौ टुटबो करैए आ केतौ लेबान होइत अप्पन रक्षा स्वयं करैत अपन जीवनकेँ बँचाइयो लइए। ऐठाम एकटा विचार आरो अछि, ओ अछि आत्मा छी की, किए ने अहूले डॉक्टरी चिकित्सा होइए। जखन शरीरक सभ अंगक प्रत्यारोपण हुअ लगल अछि तखन आत्मोक किए ने होइए? किए ने लोक बुधिविचड़ीमे लागल रहत। बुधि-विचड़ियेसँ ने विचारमे एकरूपता औत आ ओ मिलल-जुलल विचारधाराक रूपमे सामूहिक विचार प्रवाहित हएत। अखन तक मिथिलाक किसान-परिवारमे शहर-बाजार जा नोकरी करैक धारणाक जन्म नइ भेल छल। एकर माने ई नइ बुझब जे परिवेश ओहन नइ बनल अछि जइमे देशक किसानक बेटा इंजीनियर बनि बाहर जा कऽ गाड़ीक ड्राइवरी नइ करै छैथ आ अपनाकेँ इंजीनियर घोषित करैत चालीस हजार डॉलर महिना नइ कमाइ छैथ। एकर माने एतबे नइ बुझब जे पहिने बड़का लोक, बड़का लोकक माने डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक इत्यादि, विदेश नोकरी करए जाइ छला आ अखन औंठा छाप देनिहार गरीब-गुरबा सेहो विदेश जा कऽ नोकरी करए लागल अछि। खाएर तइ सभसँ सुचित भायकेँ कोन मतलब छैन। कौलेजक पढ़ाइ, माने स्नातक, (बी.ए.) सम्पन्न केलाक बाद जखन परिवारक जिनगी अंगीकार करैक बीच सुचित भाय पहुँचला, तइसँ पहिनहि हुनक पिता बिआह-दुरागमन करा अप्पन अन्तिम सन्तानक परिवार रोपणक स्थितिमे सुचित भायकेँ पहुँचा चुकल छेलैन। तैबीच साले-साल, आइ पचास बर्खसँ प्रत्येक कातिक मासक दिवाली दिनसँ एक पनरहिया भागवत कथा अपना दरबज्जापर करबैत आबि रहल छैथ। दरबज्जाक एते महत्व तँ अछिए जे जँ कियो दरबज्जापर आबि कोनो बात कहै छैथ तँ ओ सत्य मानले जाइए। आनक मनमे माने सुनिहारक मनमे जे भेल होनि, मुदा सुशील कक्काक अपने मन अपने धिरकारि कहलकैन जे 'अनेरे कोन मायाक जालमे घोंसियाएल जा रहल छह। अही भागवतक मंचपर सँ समाजकेँ जना दिऐन जे अप्पन परिवारक जेते भार छल ओ सम्पन्न भऽ गेल। माने माता-पितासँ बेटा-बेटी धरिक, अपन परिवारक प्रति जवाबदेहीक भार मेटा गेल। आब तँ ओ भार ओइ बेकतीक भेल जेकर परिवार निर्माण हएब अछि। परिवारमे दू तरहक काज होइए, एक सृजनात्मक आ दोसर उपयोगक। माने उत्पादनसँ उपभोग धरिक। उपयोग आ उपभोगमे अकास-पतालक दूरी बनले अछि आ बनबो तँ कएले अछि। बाल-बच्चाकेँ कोन तरहक जीवन देल जा सकैए ओ तँ निर्भर करैए परिवारक आमदनीपर, माने उत्पादनपर। मिथिलांचलक कृषिक ओ अवस्था बनियेँ गेल अछि जेकरा ढलानोन्मुख कहल जाइए, कोनो परिवारमे जँ एहेन विचारक जन्म होइए जे बेटा-बेटीक पढ़ाइ-लिखाइ, शादी-बिआहमे करोड़ोक खर्च करी आ माता-पिता ले साधारणो जीवनक बेवस्था उपलब्ध नहि करा सकिऐन। ई केतौसँ उचित नइ अछि। सुशील काका सुचित भायकेँ दबज्जापर बैसा माइयक सोझ, माने सुशील काका अपन पत्नीक सोझमे कहला- "बौआ, दरबज्जापर एक पनरहिया भोज-भातक संग कातिक मासमे भागवत जहिना करैत एलौं हेन तहिना तोंहू निमाहैत चलिहह। पिता छियह तँए एते कहि दइ छिअ जे जहिना अप्पन बेदाग जीवन रहल तहिना तोंहू निमाहि चलिहह।" अपना विचारे सुशील काका की कहलखिन आ सुचित भाय की बुझलैन, ई तँ दुनू गोरेक बीचक भेलैन तँए तेसर जे बुझैथ। मुदा पिताक विचार सुनि सुचित भाय बजला किछु नहि, बजबो किए करितैथ, परिवारक बीचक बेकतीक एक क्रम छी, जे सभक संग अछि। जीवनक हर क्षेत्र समयक संग संचरित होइत चलबे करैए। ओना, सुशील काका अपन विचार व्यक्त करैत ऐ आशमे रहबे करैथ जे बेटाक अप्पन मुहसँ सुनि नेने आत्माकेँ तुष्टि भेटत। तुष्टियो तँ तखने ने भेटैए जखन जीवनक पद्धति घोषित करैत कियो अपन जीवन स्थापित करैए। आत्माक तुष्टिक कारण ई जे विचारस्वरुप आत्मा एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे संचरित होइत अप्पन स्वरूप निर्धारित करैत चलैए। बेटाक मुहसँ सुनैक दोसरो कारण छेलैन, ओ ई छेलैन जे लोकक मनमे हजारो रंगक बातो अछि आ विचारक संग काजो अछिए, मुदा से तँ बजला पछातिये ने कएलपर नजैर दौड़त। जँ किछु करबे ने करब, तखन तँ ओहिना ने रहि जाएब जेना दुनियाँमे गाछ-बिरीछ, पोखैर-झाँखैड़, गाए-महींस अछि। सभ तँ जनिते छी जे कर्मे धर्म आ धर्मे कर्म छी, तैठाम जँ कियो अपन धर्मेमे बट्टा लगा बटमारि कऽ लैथ वा घाटा लग घटवारिये करैथ। ई तँ अपन-अपन मनक बीचक धार भेल। ओना, सुचित भाय, पिताक विचारसँ एक्को पाइ अलग नहि छला, किए तँ कौलेजक अध्ययनक क्रममे मिथिलाक परिवारक गढ़नक विशाल रूप पढ़ि चुकल छला, जइमे लूल्ह-नाँगर, अकलेल-बकलेल सभक मानवीय सम्बन्ध निहित अछि। जहिना धर्म ओ थिक जे धार्मिक जीवन प्रदान करए, तहिना कर्म ओ थिक जे धर्म बनि सदैत प्रवाहित होइत चलए। बजैक क्रममे सभ बजिते छी जे दुनियाँ फुसिआहक भऽ गेल अछि, मुदा अपने की छी से तँ अपने ने देखब। किछु समय गुमा-गुमीक पछाइत सुचित भाय बजला- "पिताजी, अखन धरिक धाराक अनुकूल जे धारणा, धारणा दुनू रूपमे काजोक रूपमे आ विचारोक रूपमे, बनल आबि रहल अछि, तइ अनुकूल अपने कहलौं, जे पिताक शब्दसँ एको अक्षर कम-बेसी बुझिमे अबैत तखन ने किछु बजितौं, से तँ नहि अछि। अहाँ मुहसँ कहि भार दी वा नहि दी, मुदा परिवारक ऐगला भागक भागीदार हमहीं ने छी।" जीवनक अन्तिम दौड़मे सुचित भाय पहुँच गेल छैथ। अपन जीवनसँ पूर्ण सन्तुष्ट छैथ। मनमे भेल जे सुचित भाय सन लोक जे पाकल आम जकाँ छैथ, माने भरपूर गुण सम्पन्न, ई नइ जे सड़ल-सड़ाएल आम जकाँ झुलि रहल छी, कखन खसब तेकर ठीक नहि। गामक रत्न जँ मानल जाए तँ ओ सुचित भाय छैथ। जेहेन जहिया समय रहलैन तेहेन तहिया अपन जीवन धारण करैत समयक संग चलैत आबि रहला अछि। एकाएक मन एते उत्तेजित भऽ गेल जे सुचित भाय ऐठाम विदा भऽ गेलौं। दरबज्जेपर सुचित भायकेँ देखलयैन जे जेना अपन परिवारक नक्शा देख रहला होथि तहिना बुझि पड़ला। कनी फरिक्केसँ कहलयैन- "भाय, गोड़ लगै छी।" धड़फड़ाएल लोक जकाँ पहिनहि केना कहि दतिऐन जे भाय किछु पुछए आएल छी। जहिना बजलौं तहिना सुचित भाय, बिऔहती कनियाँ-बर जकाँ हमर चेहरा निहारए लगला। सुचित भाइक नजैरिक दौड़ देख अपनो सियनगर बर जकाँ रूप बना हुनका आगूमे ठाढ़े रहलौं। -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) चारिम पड़ाव कुशेसर ऐठामसँ विदा होइकाल माता-पिताकेँ माने कुशेसरक माता-पिताकेँ मिसियो भरि मन मलिन नहि भेलैन जइसँ मुँहक विचलनक कोनो रूप नहि बदललैन। तेकर कारण छेलैन कमासुत बेटाक कमाउपन। गप-सप्पमे तँ लोक बजिते छैथ जे गामक परिवार सभ उजरल जा रहल अछि। मुदा उजरल की जा रहल अछि तेकरा तर दबा कियो देखिये ने पेब रहला अछि। अपने जिलाक जंक्शन समस्तीपुर, स्टेशन छी जे देखले इलाका अछि तँए देवनक मनमे कोनो दोसर नव विचार उठबे ने कएल। देवन अखन थोड़े किसानक जीवन आ किसानक वृत्तिकेँ बुझलक अछि। पिताक संग-संग देखसी करि-करि कोनो-कोनो काज करैक ऊहि किसानीक भेलैए। ने ते मधुबनी इलाकाक गाम आ समस्तीपुर इलाका गामक किसानीमे की अन्तर अछि, से जँ बुझैत रहैत तँ ईहो ने बुझैत रहैत जे समस्तीपुर इलाकाक गामो आ गामक खेतो-पथार बारहो मास हँसैत रहैए आ अपन इलाकामाने मधुबनी इलाकाक खेतमे काज केनिहार लोककेँ डेढ़ मास अखाढ़ आ एक मास अगहन, पहिलुका हिसाबे, बारह मासक सालमे अढ़ाइ मास काम-काजी भेल, बाँकी साढ़े नअ मास चौक-चौराहापर गप-सप्पमे वा ताश-शतरंजपर बैस बीतैए। किसानी जिनगी तखन ने आगू बढ़त जखन अढ़ाइ मासक काज बढ़ि कऽ बारह मासक हएत। एकरा अहुना कहि सकै छिऐ जे जखन बारहो मासक समय किसानक कृषिसँ संलग्न हएत तखन ने खेतिहरक संग-संग खेतो-पथार जागत। भौगोलिक दृष्टिसँ अपन ओहन इलाका अछि जैठाम तीनटा मौसम स्पष्ट रूपमे अछि। माने जाड़, गरमी आ बरसात। आन देशमे से नहि अछि। कोनो देशमे मात्र एक रंगक मौसम अछि, तँ कोनोमे दू रंगक। हँ, चीनक किछु इलाका एहेन अछि जइमे तीनू रंगक मौसम अछि। साँझू पहर जखन कुशेसर दुनू भाँइ समस्तीपुर स्टेशनपर कलकत्ताक गाड़ीमे बैसल, तखन स्टेशनपर तँ किछु इजोत रहबे करइ मुदा गाड़ीक कोठरीमे झल अन्हार रहइ। टिकट पहिनेसँ बनल रहै तँए गाड़ीमे बइसैक जगह भेटैमे कोनो असोकर्ज नहियेँ भेलइ। गाड़ी खुजैसँ पहिने देवनकेँ कुशेसर कहलक- "देवन, आब कलकत्तेमे खाएब-पीब, तँए किछु खाइक विचार छह तँ बाजह।" जखनसँ देवन स्टेशनपर मकैकेँ ओराहैत देखलक तखनसँ ओकर हीय ओइमे गड़ि गेल छेलै मुदा अपनाकेँ अनुशासित रखने किछु बाजि नहि रहल छल। मुदा जखन कुशेसरक मुहेँ खाइ-पीबैक बात सुनलक तखन अपनाकेँ अनुशासित करैत बाजल- "भैया, गाड़ी-सवारीमे हौलके-फौलके खेनाइ नीक हएत, तँए दू-दू टाक हिसाबसँ बालि कीन लिअ। भने एक-एकटा दानाकेँ छोड़ा-छोड़ा मुहोँमे देब जइसँ सुआदो बुझैत चलब आ रस्तो कटैत चलत।" ओना देवनक बात सुनि कुशेसरक मनमे खीझ उठल जे सात-आठ घन्टाक गाड़ीक सफर अछि तइमे दूटा मकैक बाइलसँ केना काज चलत। मुदा इच्छोक तँ अपन मन छइहे। पियास लगलोपर पानि नहि पीब से केतेक उचित। देवनकेँ कलकत्ताक रस्ता नइ बुझल छै तहूमे कहि देलिऐ जे आब ऐगला खेनाइ कलकत्तेमे खाएब। भऽ सकैए जे ओकरा मनमे ईहो आबि गेल होइ जे जहिना भिनसुरका जलखै आ दुपहरियाक कलौ खेनाइमे दुइये-तीनियेँ घन्टाक अन्तर होइए, दुपहरियाक खेनाइ आ बेरुका जलखैमे सेहो तहिना होइए। तैसंग कुशेसरक मनमे ईहो उठलैन जे कोनो कि समस्तीएपुरटा एहेन स्टेशन अछि जैपर खाएब-पीबक वस्तु भेटैए आ आगूक स्टेशनपर नहि भेटत, सेहो तँ नहियेँ अछि। सेहो तँ अछिए। जँ भूख लागत तँ ओहीठाम कीनि-बेसाहि लेब। एक-एक आनाक हिसाबसँ चारिटा मकैक बाइल कुशेसर चारिअनामे कीनलैन। दूटा बाइल देवनोकेँ देलैन आ दूटा अपनो लैत कुशेसर बजला- "देवन, देखते-सुनिते कलकत्ता पहुँच जाएब।" 'देखते-सुनिते कलकत्ता पहुँच जाएब' सुनि देवनक मनमे जिनगीक पूर्ण आशा जागि चुकल। जहिना कोनो बेरोजगारकेँ रोजगार सुनलापर मनमे खुशीक लहरि संचारित हुअ लगैए तहिना देवनोकेँ भेल। बाजल- "भैया, राता-राती जखन कलकत्ता पहुँच जाएब तखन तँ काल्हि भोरसँ काज करब शुरू कऽ देब किने?" काजक प्रति देवनक आकर्षणकेँ हियाबैत कुशेसर बाजल- "हँ, से तँ कइये सकै छी मुदा..!" देवन बाजल- "की मुदा?" विचारकेँ सोझरबैत कुशेसर बाजल- "अखन समस्तीयेपुरमे छी, अनका पैरक सफर अछि। तहूमे लोहे-लकड़ीक गाड़ी छी, रस्तामे केतौ जँ कोनो भङ्गठी भेल तहूठाम देरी लागत, तैसंग कलकत्ता पहुँचलापर काजोक भाँज लगबैक अछि, तँए अखन कौल्हुका काजक विचार छोड़ह। जँ संयोग नीक रहत माने सभ किछु समयानुसार चलैत रहत, तखन काल्हिसँ काज कइयो सकै छी।" इंजन जोड़िते गाड़ी कनी घुसैक कऽ रूकि गेल। गाड़ीकेँ रूकिते देवन बाजल- "भैया, गाड़ी किए ठाढ़ भेल?" कुशेसर बाजल- "गाड़ीमे इंजन जोड़ल गेल अछि। थोड़ेकाल ऐठाम आरो रूकत पछाइत आगू बढ़त।" गाड़ी खुजि गेल, कुशेसर अपन सीटपर बैसल। दुनू गोरेक सीटक बीचमे तीनटा यात्री बैसल छल। तँए गप-सप्प करैक वा पूछ-आछ करैक अवसर देवनक समाप्त भऽ गेल। कुशेसर चुप चाप बैस देवनक विषयमे सोचए लगल। दुनियाँक बुधियार तँ अपनो बुधियारीसँ बुधियार बनि सकैए मुदा देवन सन ढहलेल-बकलेल लोककेँ जँ अपन जिनगी जीबैक कला देल जाए तँ यएह ने विधि-विधानक संग कलाकारक मुख्य कलाकारी भेल। लगले अपने मन कुशेसरकेँ कहलकैन मनुख की कोनो अकासमे उड़ैत चिड़ै छी जे लगले धरतीसँ उड़ि अकासमे पहुँच जाएत। ओकर तँ अपन दृष्ट-दिशा छै। पहिने ओ अपने ताड़-खजूर जकाँ बारह बर्खे जड़ि बान्हत तखन ने धरतीसँ उठि परिवारकेँ परिवारक साँचमे सँचियबैत परिवारकेँ समाज बनौत...। कुशेसरक मन देवनक शरीरक क्रिया-शक्तिकेँ अँकैत प्रफुल भऽ गेल जे जाबे तक देवनकेँ काज करैक अवसर नहि भेटत ताबे लूरि-बुधिक अभाव अछि। जखने काजक अवसर भेटतै तखन काजे ने हाथ पकैड़ लूरि देतइ। जखने अवसर भेटतै तखने श्रमक शक्ति जागि जाएत। जखन श्रमक शक्ति जागत आ ओकर फल माने मजूरी देखत तखने ने कौरब-पाण्डव जकाँ जिनगीक जुआक पाशापर बैस अपन गोटी भाँजत। कुशेसरकेँ हटि कऽ बैसल देख देवनक मन हहरए लगल जे एक तँ जहिना गाड़ीमे अन्हार अछि तहिना कोठरियोमे, बन्न रहने माने बन्धनक बीच जीवन रहने अन्हार अछि, जइसँ दुनियोँ अन्हार बनियेँ गेल अछि, तैठाम जँ कियो बोलो-भरोस दइबला नहि रहता तँ अनेरे ने जीवन घुटि-घुटि माने घटि-घटि, मरबे करत। मुदा मनुक्खोक बुधि तँ अजीव अछिए, केहनो विचार वा प्रश्न सुनिते किछु-ने-किछु बात लोक अनेरो बाजिये दइ छैथ। भलेँ ओ टेँढ़े-बौकली आकि झुसे-झास, माने झूठे-फुइस किए ने होउ। कृष्णकेँ धुन्धकारीक परिचय होइते जहिना धुन्धकार जकाँ चारू दुनियाँ पसैर गेल रहैन तहिना देवनक चारू कात सेहो पसैर गेल। पसैर गेल ई जे बगलमे बैसल अनठिया सभसँ गप-सप्प नहि हएत। तहूमे गाम-घरमे सुनियेँ नेने छी जे गाड़ीमे एक-सँ-एक ठको आ गीरहकटो सभ रहैए। एते दिन जेबी काटि रूपैआ बहार कऽ लइ छल आ आब मोबाइलसँ खिंचैए। देवनक मन मानि गेल जे भरमे-सरम अपन मुँह बन्न करि अनके मुँहक गप-सप्प सुनब। भेल तँ मुँहकेँ कहुना चलैक चाही, से कियो बात-विचारसँ चलाबए आकि किछु खाइत-पीबैत चलाबए। खाएब मनमे अबिते देवन विचारलक जे भने एकान्त भेलौं। एक-एकटा मकैक दाना छोड़ा-छोड़ा मुँहमे दैत मुँहकेँ चलबैत गाड़ीक सफर काटिये लेब। ओना, यात्रीसँ भरल गाड़ीक कोठरी रहितो देवन असगर अनभुआर जकाँ छेलाएहे। कियो जान-पहचान वा गामे-समाजक चिन्हारए रहैत तखन ने गपो-सप्प करैत। लोक भलेँ अथबल जकाँ किए ने बैसल रहए मुदा मन तँ से नहि छी। मन तँ घड़ीक सुइयासँ बेसी चलनिहार होइए। साठि सकेण्ड-मिनटक बीच घड़ी चलैए, मुदा मन तँ तेकर हजार गुणा बेसी गतिक होइए। देवनक मनमे उठल- अपनो भैयारीमे, माने समाजसँ परिवार धरिक भैयारीमे, ओना भैयारी कतेको गोरेक अछि मुदा अखन तँ मात्र कुशेसरे भैया टा ने संगे कलकत्ता लऽ जा रहला अछि। अपना सिरे अपन सभ भार उठा जिनगीक मोड़पर आनि ऐगला बाट पकड़ा पीठ ठोकि आगू बढ़ौता। जखने कलकत्ता सन शहरमे रहए लगब तखने ने दस गोरेसँ चिन्हो-परिचय हएत आ गप-सप्प भेने बुधियोक बाट खुजत। कुहेस वा धुनि लगल रहलापर जहिना हवा उठि कुहेस वा धुनिकेँ फारि फरीच बना दइए, भलेँ फेर कुहेसे किए ने पुन: पकैड़ लिअए, तहिना देवनकेँ सेहो भेल। अपना गतिये गाड़ियो चलि रहल अछि आ गाड़ीमे सवार आन-आन यात्रीक संग देवनो आ कुशेसरो चलिये रहल छैथ। गाड़ीक गति देख कुशेसर अन्दाजि लेलैन जे अढ़ाइ बजे रातिमे गाड़ी अपना स्टेशनपर पहुँचा देत। माने कलकत्ता जंक्शनपर। कलकत्ता कि कोनो गाम-घर छी जे पहिने सूर्ज उगैए पछाइत लोक बिछान छोड़ैए। एकर माने ई नहि भेल जे गाम-घर ऋृषि-मुनिक बास स्थल नहि छी। सेहो छीहे। एके माटि-पानि, हवा-वसात आ एके विधि-विधान रहितो जहिना फुलवाड़ीमे सुगन्धित-सँ-सुगन्धित फुलोक संग-संग बाग-बगीचामे मीठगर-सँ-खटगर धरि फलो होइते अछि तखन मनुक्खोमे हएब सोभाविक अछिए। कुशेसरक मन देवनक जीवनक छोर पकैड़ गाड़ीसँ उतरला पछातिक कार्यक्रम तैयार कऽ रहल छला। अढ़ाइ-पौने तीन बजे गाड़ी अपना स्टेशन, माने जैठाम उतरब, पहुँच जाएत। कलकत्ता कि कोनो गाम-देहात छी जे साँझ पड़िते अन्हरा जाइए जइसँ काम-काज ठप हुअ लगैए। अखनो धरि गमैआ विचारो अछि आ गपो-सप्पक चलैनमे अछिए जे 'राति सुतैक छी', माने दिन भरि जे करब से करू आ राति माने दिनक आधा समयमे, हाथ-पएर जोड़ि सुतू। कलकत्ता तँ कलकत्ता छी, ओइठाम दिन-रातिक भेद मेटा गेल अछि जइसँ मनुक्खक जीवन शैली सेहो बदलिये गेल अछि। कियो राति-केँ कारखानामे ड्यूटी करै छैथ आ दिन-केँ अवकाश भेटै छैन, ओ तँ रौतुका जगैक ओरियान दिनेमे करता किने। ओना, कुशेसरक मनमे ई नहि उठल जे अपना ऐठामक माने मिथिलाक ऋृषि-मुनि घर-दुआर छोड़ि जंगल पकैड़ लइ छला आकि गामे-घरमे बास करै छला। जहिना जनक तहिना भारद्वाज इत्यादि छेलाहे। तीन बजे भोर छी कि राति, कुशेसरक मनमे उठि गेल। मनमे उठिते रंग-बिरंगक विचार जागए लगलैन। कियो चारि बजे भोर तक रातिक सीमा बना सुतै छैथ तँ कियो आठ बजे दिन तक, मुदा पौने तीनकेँ भोर किए ने मानल जाए। किए तँ अपन जे पूर्वज ऋृषि-मुनि छला ओ तीन बजे ओछाइन छोड़ि अपन जीवन क्रियामे लागि जाइ छला। तैठाम तीनेक पौआ कम अंश ने पौने तीन भेल, तखन पौने तीन सेहो ने भोरेक सीमापर अछि। जखने तीन पौआ होइए तखने ओ पौन सेर वा किलो कहबए लगैए। स्टेशनपर गाड़ीसँ उतैर पहिने प्लेटफार्मेपर अपन भोरक क्रियासँ निवृत्त हएब। पछाइत प्लेटफार्मसँ निकलब। निकैलते जखने चाहक दोकानपर जाएब तखने केतेको चिन्हा-परिचयक लोक भेटिये जाएत। अपने इलाकाक लोक बेसी चाहोक दोकान कलकत्तामे केने छैथ, रिक्शो चलबै छैथ आ उठा-पटकक काज सेहो करिते छैथ। महिना दिनपर गामसँ एलौं हेन, तइ बीच ऐठाम (कलकत्ता) की भेल नइ भेल से तँ गप-सप्प भेला पछातिये ने बुझब। जीवनमे जँ ओछाइन छोड़ैसँ पहिने माने सुति-कऽ उठैसँ पहिने, अपन दिन भरिक माने ओछाइनपर अबैसँ पहिने तकक, अपन कर्मगत काजपर नजैर (दृष्टि) दौड़ा ओकर कारण निकालि सफल दिनक अनुभव होइते अछि। आ इहए दिन-दिनक सफलता ने जीवनकेँ समत्व रूपक बाटकेँ निरमबैत सेहो चलिते अछि। मने-मन कुशेसर विचारिये रहल छला कि गाड़ी जैसीडीह स्टेशनपर पहुँच गेल। ऐठामसँ दोसर गाड़ी देवघर जाएत। गाड़ीकेँ रूकिते स्टेशनपर बोल बम, बोल बमक आवाज गूँजि उठल। दुनू दिसक यात्रीक मिलानक बीचक स्वर ध्वनि छेलैहे। कुशेसरकेँ बुझले अछि जे ऐठाम अपना दिसक, माने गाड़ीक हिसाबसँ, यात्री देवघर बाबाकेँ दर्शन करए अबै छैथ, आ पूब दिसक माने कलकत्ता दिसक वापसी यात्री जाइ छैथ। तइ बीचमे जे बोल बमक आवाज होइए वएह हल्ला छी, जे दस मिनटक पछाइत माने गाड़ी खुजलापर शान्त भऽ जाएत। वापसी यात्री अपन घरमुहाँ भेल घरक विचारमे आबए लगै छैथ। पूजाक विहीत बदलैत परिवार आ जीवनक विहीत मनमे जागए लगैत। देवनकेँ से नहि भेल, ओ गाम-घरक रहनिहार, तँए गाम-घरमे एहेन हल्लाकेँ कोनो अन्होनी घटना बुझि हल्ला करैए। तहूमे रौतुका मसीमक हल्ला, जइमे चोरी-छिनरपनक संख्या बेसी रहिते अछि। ओना, रौतुका आगियो-छाइक हल्ला होइते अछि मुदा ओकरा लोक इजोतसँ परेखैए। अकचकाइत देवन बाजल- "भैया, केतौ चोरि-तोरि भेल हेन, हल्ला कथीक छी?" तइ बीच जे दोसर तीनू यात्री बैसल छला, ओइमे एकटा देवनकेँ बाल-बोध बुझि चुप्पे रहला, मुदा दोसर जे जागल छला, माने रातुक हिसाबसँ, ओ असथिरेसँ मनाही करैत बजला जे 'गाड़ी-सवारीमे एना हल्ला किए करै छह।' मुदा तेसर जे अधनीना छला ओ डपैट कऽ बजला- "तोहींटा भाड़ा देने छहक आकि हमहूँ देने छिऐ.!" अबूझ, अबोध देवन, यात्रीक बात नहि बुझि सकल। तैसंग कुशेसर भाइक बीच छल। तँए अपनाकेँ छोट भाए सदृश अनुशासित रहि चुपे रहल। यात्रीकेँ बउसैत कुशेसर बजला- "जहिना अहाँ अधनीनामे छेलौं तहिना ओहो अधनीनेमे छल, तँए अहीं जकाँ चौंकैत बाजल। तइले अहाँ अनेरे ने आगि-अङोरा होइ छी।" एक तँ देवघर जेबाक मोड़, तैसंग देवन कलकत्ता कमाइले सेहो जाइए रहल अछि, तेसर जे यात्री गरैज कऽ डपटने छला से सहजे सुतिये रहला। देवन अपने मने बाजल- "जय शिव, जय शिव।" देवनकेँ शान्त करैत कुशेसर बजला- "गाड़ी-सवारी छी, तहूमे दिनुका रहैत तँ तरो-तरकारीवालीक नाम लगैत जे वएह सभ हल्ला करैए आ अनकर हल्ला ओइमे घोरा जाइए। से तँ नइ छी। रौतुका समय छी तँए चुपचाप भेल रस्ता काटह। भेल तँ बीचमे एकटा आरो बर्दमान स्टेशन अछि।" कुशेसरक बात सुनि देवन शान्त भऽ गेल। कुशेसर मने-मन देवनक विचार करए लगला जे कलकत्ता पहुँचलापर की सभ करैक अछि। जखने गाड़ीसँ उतरब तँ भोर जकाँ भइये गेल रहत। कोनो कि हेराएल जगहपर रहै छी जे जाइमे अबूह लागत। सभ देखले-सुनल अछि। अपन जीवनक काजक जे प्रक्रिया अछि तइ अनुकूल अपनाकेँ चलबैक अछि। दुनियाँ तँ ओ दुनियाँ छी जे समुद्रे जकाँ अछि जेकर थाह पएब कठिन अछिए। थाह पबैक धरतियो ने चाही। कहब जे पानियेँ समुद्र छी आकि समुद्रो पानि छी, ई तँ जेहेन मन रहत तेहने मानत। नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधला वस्तु किए ने हुअए मुदा ओ एक-दोसराक बीच उनैट-पुनैट जाइते अछि। देखते छिऐ जे भातकेँ लोक सुभितगर भोजन बुझै छैथ आ रोटीकेँ भितगर, मुदा गैस्टिक जेते भतभोजनमे होइए तेते रोटभोजनमे थोड़े होइए। ई तँ अपन मनोक बात भेल जे रामझिमनी ठाढ़ वृक्षनुमा फल रहितो, जेकर लम्बाइ-मोटाइ देख लोक झिमनी कहैए, आ झिमनी तँ सहजे लत्तीनुमा छीहे जेकरा माटिसँ ठाढ़ होइक डाँड़मे जोड़े (डोराडोरिये) नहि छै, ओकर लम्बाइ-मोटाइक देखौंस करबैत रामझिमनीक शकले-सूरत ने बिगाड़ै छी। कहू जे जइ रामझिमनीकेँ एतेक शक्ति छै जे खेसारी सन चिमाइठ दालिकेँ अपन गुणक गति दऽ अपने सन तेज गतिमे आनि सरपट घोड़ा जकाँ बनबैए, ओ केना लतिगर झिंगुनी बुते हेतइ, जे सहजे अपनो चिमाठिये अछि..! एकाएक कुशेसरक विचारमे मुड़ियाएल मोड़ बुझि पड़लैन जइसँ मुड़ियाएल मनक विचार जगलैन। जखन काजक भार माने देवनक काजक भार अपन सिरपर सवार केने चलि रहल छी तखन पहिने ओकरा माथपर सँ भार उतारि निच्चाँमे माने धरतीपर राखि दोसर दिस ताकब आकि सिरक भारकेँ सिसैक-सिसैक भरियेने रहब। जखन माथे भरियाएल रहत तखन दोसर दिस ताकि हएत.? एकाएक उनटा गिनती जकाँ माने 'सैयाँ-निनानबे' जकाँ कुशेसर अपन भारक भरपनपर नजैर दौड़ौलैन। देवनकेँ दिन-दिनक काज माने सभदिन जोकर काज धड़बैक अछि। अपनो तँ काज करिते छी, यएह काज देवन सेहो करत। जहिना कोनो काजक फल माने मजदूरी, पनरह रूपैआ अपना भऽ रहल अछि आ तइसँ परिवार चलि रहल अछि तहिना ने देवनोक चलए लगत। जँ एतबो काज देवनो करत तँ पनरह रूपैआक फल ओकरो भेटबे करत किने। जहिना गुलाम देशमे रोजगारमे फौती अबै छै तहिना ने जीवनोमे अबिते छै। अपने थोड़े ओहन छी जे डपोरशंख जकाँ दिन-राति दीक्षा बाँटब जे एते दानक एते पून आ एते मानक एते शून्य। धरतीपर जखन बास करै छी तखन धरतीकेँ पकैड़ जीवन-यापन करब आकि चिड़ै जकाँ अकासमे उड़िते-उड़िते सुतबो करब आ आरामो उड़िते-उड़िते करब। ..एकाएक कुशेसरक मन ठण्ढाएल पानि जकाँ तापसँ तपतपेलैन। तपतपाइते देवनक जीवनपर नजैर पड़लैन। एकाएक मन कहलकैन, कियो अपने जोकरक ने भार उठा दोसरोकेँ भार उठबैक बिसवास करा सकैए। कम-बेसी अपन करनीसँ सेहो होइते अछि। जैठाम माने बंगाल सरकारक अन्नक गोदाममे अपने काज करै छी तैठाम दू-चारि आदमीक घटी रहिते अछि, तहूमे जहियासँ पाँच किलो चाउर-गहुमक अधिकार जनमानसकेँ भेटल तहियासँ गोदामक काज सेहो बढ़िये गेल अछि। मुदा, ई समय माने अखुनका समय, ओ नहि छल जइ समयक चर्च छी। आजादीक आन्दोलनक समय छल। काजपर सँ कुशेसरक नजैर ससैर देवनक सुतै-बैसैक जगह माने रहैपर एलैन। टुटलो धर्मशाला अछि तैयो तँ ओहन अछिए, जइमे अपने सभ रहै छी। एते तँ अछिए ने जे मुम्बइ सन शहरमे लोक एक रूपैआक अखबार कीनि सड़कपर सुतैए, तैठाम एते तँ अछिए ने जे दस गोरे एकठाम बैस भानसो कऽ लइ छी, निचेनसँ सुतितो छी आ देवालमे काँटी गाड़ि झोराक सामान सेहो लटका कऽ रखै छी, पानियोँक दूटा टंकी आ दूटा लेटरीनो अछिए। आवासक सुविधा देख कुशेसरक मन आगू बढ़लैन। गाड़ी हावड़ा स्टेशन पहुँच गेल। दू रंगक यात्री गाड़ीसँ उतरला। एक रंगक ओ जिनका अपन घर-दुआर छैन, तैसंग जे भाड़ा लऽ कऽ रहै छैथ आ सभ सुविधा अपना छैन, ओहन यात्री गाड़ीसँ उतैर सोझे घरमुहाँ भेला। दोसर रंगक ओहन यात्री, जिनका अपन ठौर-ठेकान नहि छैन ओ मुसाफिरखानामे अँटैक अपन भोरक कर्म करैले रूकि गेला। एहेन यात्री कम छला आ अपना ऐठाम जाइबला यात्री बेसी छला। गाड़ीसँ उतैर कुशेसर विचारलैन जे अपना डेराक भरोसे रहब तँ बिलम हएत तइसँ नीक अहीठाम पहिने मुहोँ-हाथ धोइ ली, चाहो पीब ली। पछाइत बुझल जेतइ। कुशेसरक मनमे काजक भारीपन सेहो नहियेँ छेलैन किए तँ सभ काजकेँ सुढ़िपर चढ़ने सुढ़ियाएले बुझि पड़ि रहल छेलैन। स्टेशनसँ निकैलते कुशेसरकेँ गुलेती देखलकैन। गुलेती अपने इलाकाक छिया, कलकत्तामे रिक्सा चलबै छैथ आ ओही धर्मशालामे सेहो रहै छैथ जइमे कुशेसर रहै छैथ। यात्रीकेँ स्टेशन पहुँचाबए गुलेती आएल छला। कुशेसरकेँ देखते गुलेती बजला- "कुशेसर, डेरे चलबह। आबह अही गाड़ीपर बैस जाह।" श्रमिक वर्गक लोक, ठाँहि-पठाँहि बजैबला, कुशेसर बजला- "गुलेती, दू भाँइ छिअ। तहूमे पहिने चाह पीबह तखन आगू बढ़बह.!" गुलेतीक मन अपने भीतरसँ खुशी छल। ओना, दुनियाँमे जेते जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ मनुख धरि अछि, सभ खुशीसँ रहए चाहिते अछि, भलेँ जीवन जेहेन हुअए। गुलेती ऐ दुआरे खुश छल जे तेसर खेप यात्री लऽ कऽ आएल छला, जइसँ मनमाना कमाइ भेल छेलैन। मनमाना कमाइक माने भेल जे समय परक काज ने बन्हौटा होइए मुदा असमयक काज तँ मनमाना भइये जाइए। रौतुका यात्री, तँए गुलेतीकेँ तीन दिनक कमाइसँ बेसीए कमाइ भऽ गेल छेलैन। गुलेती बजला- "चाहो के की कोनो सीमा-नाङैर अछि। चलह ने पहिने तीनू भाँइ चाह पीअब, पान खाएब पछाइत रिक्सासँ डेरा चलब। केकरो बान्हल छिऐ जे ओकरा मने काज करब। कमो कमाइ छी तँ कमाइ छी। केकरो बन्हौटा नइ ने छिऐ।" कुशेसरक मनमे उठलैन जे गुलेतीसँ महिना दिनक हाल-चाल बुझैत, चाह पीबैत, पान खाइत-खाइत भोरो भइये जाएत। आगू बढ़ैत कुशेसर चाहक दोकानपर पहुँचला। चाहक दोकानपर पहुँचते कुशेसरकेँ एकटा अपने गोदामक, अपन गोदामक माने भेल जे जइमे कुशेसर मटियाक काज करै छैथ, तही गोदामक दोसर मटिया, भेटलैन। ओहो चाह पीबए आएल छल। कुशेसरकेँ देखते सुकदेव बाजल- "गाममे बड़ देरी लगलह, कुशेसर?" कुशेसर बजला- "गाम गेलापर कि अबैक मन होइए, तहूमे माया-जालबला लोक छी, सबहक भेँट-घाँट करैमे समय लगबे करत किने। काजक की हाल-चाल छह?" सुकदेव बाजल- "काल्हिये साँझमे बारहटा गाड़ी आबि गेल।" बारहटा गाड़ी, माने अन्नक ट्रक सुनि कुशेसरक मन मानि गेलैन जे जहिना देवनकेँ अनलौं तहिना एकठौर तक पहुँचा सेहो देबे केलौं। माने काज करैक जगह भेट गेल। डेरा गेलापर झोरा राखि पहिने बनर्जीदादासँ मिलि लेब नीक रहत। जाबे अपने डेरा पहुँचब ताबे चारि सेहो बाजिये जाएत, ओहो गोदाम आबिये गेल रहता, भने दुनू गोरे निचेनसँ सभ गप कऽ लेब। तैबीच सुकदेव दोहरा कऽ बाजल- "आ हँ, एकटा बड़का समाचार अछि.!" बड़का समाचार सुनि कुशेसर अचम्भित होइत पुछलखिन- "से की?" सुकदेव बजला- "मनेजर साहैब तँ कमाल कऽ देलखिन।" कुशेसर बजला- "की कमाल कऽ देलखिन।" सुकदेव बजला- "नव-नव एम.ओ. जिलामे एला अछि। जैठामसँ एला अछि ओ लहटगर जिला रहलैन। खाइ-पीबैक नीक जोगार छेलैन। वएह मैनेजर साहैब माने 'बनर्जीदादा'केँ उनटा-सीधा पाठ पढ़बए लगलखिन। तैपर 'दादा' दू थापर मुहेँमे मारलखिन। ओहो असगरे छला, मुदा मैनेजर साहैब दिससँ हम सभ पहुँच गेलौं। एम.ओ. थकथका कऽ विदा भऽ गेला।" कुशेसर बजला- "पछाइत की भेल?" सुकदेव बजला- "की हएत। नाङैर पटपटौने एम.ओ. डी.एम. साहैब लग पहुँचल। दादो पीठेपर पहँचला। पहुँचते एम.ओ. सकपका गेला। पहिने की सभ एम.ओ. साहैब डी.एम. साहैब लग बाजल छला से तँ बनर्जीदादा अपना काने नहि सुनलैन। मुदा बनर्जीदादाकेँ देखते डी.एम. साहैब डपैटकऽ एम.ओ. साहैबकेँ कहलखिन बनर्जीदादाकेँ पहिने चीन्ह लिऔन। तखन हुनका संग काज करैक ढंग धड़त। कहि डी.एम. साहैब एम.ओ. साहैबक सभ बात घोंटैत बनर्जीदादाकेँ कहलखिन- 'जे भेल से भेल से भूलि जाउ। सभकेँ एक्केठाम रहि काज करैक अछि। तँए सभ भाए-भैयारी जकाँ रहि अपन काजकेँ आगू बढ़ाउ।" कुशेसर बजला- "तैपर दादा किछु कहलखिन की नहि?" सुकदेव बजला- "की कहितथिन, गैयाह लोक छथिए हँसि कऽ उड़ा देलखिन।" पान खा कुशेसर तीनू गोरे रिक्सासँ धर्मशाला विदा भेला। मनमे खुशी रहलासँ जहिना काज करैमे खुशपन अबैए जइसँ खुशी जीवनक फल भेटैए तेहने फलक आशा कुशेसरक मनमे जागि गेलैन। हाँइ-हाँइ झोरा देवालमे लटका बनर्जीदादासँ भेँट करए विदा भेला। पाछू-पाछू देवनो विदा भेल। आने दिन जकाँ बनर्जीदादा चारि बजे गोदाम पहुँच अपन काजमे जुटि गेल छला। गोदाममे मैनेजरक पदपर बनर्जीदादा जीविका-ले नोकरी करै छैथ, मुदा वास्तविक रूपसँ ओ समाज सेवक छैथ। अपन नियमित रूटिंगक बीच अपनाकेँ रखने छैथ। चारि बजे भोरे गोदाममे आबि, अपनेसँ गेटोक आ गोदामोक ताला खोलि अपन दिनभरिक काज दू घन्टामे निपटा, छह बजे मटिया सभकेँ काज सुमझा अपने रमि जाइ छैथ। हँ, एते जरूर मटिया सभसँ सम्बन्ध रखने छैथ जे अपने नहियोँ रहने नियमित काज मटिया सभ करबे करै छैथ। तैसंग मैनेजर साहैब एते अपना मुहेँ कहिये देने छथिन जे बोराक हिसाबमे केतौ गड़बड़ी ने हुअए। फटल आकि कटल बोरासँ जे चाउर आकि गहुम खसै, ओ अहाँ सबहक भेल। ओकर हिसाब मजूरीमे नहि हएत। जइसँ प्रत्येक मटियाकेँ तीन सेरसँ बेसीए चाउर-गहुम प्रतिदिन भइये जाइ छैन। जे कमाइसँ बाइली आमदनी भेलैन, तँए मटियो सबहक जीवनमे किछु-ने-किछु खुशहाली जरूर अबिते अछि। आन मजदूरक हिसाबे जे मजदूर ओहन मजूरीबला छैथ जिनका उलफी आमदनी नहि छैन। तीन सेर अन्नक आमदनीसँ मटिया सबहक भोजनक समस्या मेटाइये जकाँ गेल छैन। जहिना चाउर-गहुम प्रति बेकतीकेँ पाँच किलो प्रतिमासक अधिकार भेटने जन-मानसक जीवनमे थोड़-मोड़ खुशहाली एबे कएल अछि जइसँ भोजनक समस्या कमने जे बचत हुअ लगल अछि ओइसँ दोसरो समस्याक समाधानक किछु-किछु साधन भइये जाइए। चाउर-गहुम मिला एक-एक बेकतीकेँ पाँच किलो भेट रहल अछि ओ ओहिना थोड़े भेट रहल अछि। ऐठाम भेटैक माने भेल संवैधानिक अधिकार भेटब। सत्ता-समाजमे जेतेक एकरूपता अबैए तेतेक स्वतंत्रता भेटब भेल। ई अनेको बर्खक आन्दोलनक फलस्वरूप भेटल अछि। जइ आन्दोलनमे केतेको गरीब जहल गेला, मारि खेलैन आ अनेको तरहक यातनाक शिकार बनल छैथ। तेकर फल छिऐन पाँच किलो चाउर-गहुम महीनाक भोजन। आठम-नवम् दशक माने 1980-90 इस्वीक बीच, खाद्यान्नक मामलामे देश आत्म-निर्भर भेल। तइसँ पहिने बाहरसँ अन्नक आयात होइ छल। एक तँ हजारो बर्खक गुलामीक जीवन जन-गणक छेलैन तैपर खेतीक समुचित बेवस्था सेहो नहि छेलैन जइसँ खेतक उपज बढ़ितैन। अछैते सम्पैत तंगहाली छल। जनसंख्याक वृद्धि तँ जलवायुपर निर्भर करिते अछि जइसँ जनसंख्याक वृद्धि हएब सोभाविक अछिए। किए तँ दुनियाँमे जेते रंगक जलवायु भारतमे अछि ओ आन देशमे नहि अछि। जँ से रहैत तँ कनाडा सन देश, जेकर रकबा भारतक रकबासँ बहुत बेसी छै, मुदा जनसंख्या ऐठामक एकटा राज्यक बरोबरियो ने छइ। जैठाम भारतक जनसंख्या एक अरब तीस करोड़सँ बेसी अछि तैठाम कनाडाक जनसंख्या चारि-पाँच करोड़ अछि। जीवनक मूल समस्या माने भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा रहितो देशवासीकेँ पहिल जे समस्या भोजनक छी सेहो ने छेलैन। ओना, अखनो भरपूर नहियेँ छैन, मुदा नहिमे किछु तँ छैन्हे। जइसँ जीवनमे किछु-ने-किछु सुधार भेबे कएल छैन। सभ जनिते छी जे जैठाम गरीबी रहै छै तैठामक लोक अन्ने बेसी खाइए। अपना ऐठाम भोजो-काजमे लोक आधा किलोक हिसाबसँ अन्नक सूची बनैबते छैथ। मोटा-मोटी दस किलो अन्न एक गोटाक दस दिनक भोजन भेल। सुभितगर परिवारमे अन्नक एते खपत नहि अछि, किए तँ गरीब लोक जकाँ ने देहक श्रम बेसी छैन आ ने अन्ने टाक भोजनपर आश्रित छैथ। खेबा-पीबाक अनेको विन्यास छैन्हे जे अभावी लोककेँ उपलब्ध नहि होइ छैन आ सुभ्यस्तकेँ होइ छैन। जैठाम, जीवनक जे मूल समस्या भोजन अछि, आइ पचहत्तैर बर्खक आजादीक, स्वतंत्र जीवन भेटला पछातियो भोजनक समस्याक समाधान नहि भेल अछि, तैठाम जे आगूक समस्या अछि, माने वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा आ सुरक्षा ओ अकास कुसुम बनल रहबे करत किने। देवनकेँ संग केने कुशेसर गोदाम पहुँचला। जहिना परिचित कुशेसर 'बनर्जीदादा'क छेलैन तहिना बनर्जीदादा कुशेसरक छेलैन। खुजल गोदाम, माने गोदामक मुख्य द्वारा खुजल, देख कुशेसर सोझे बनर्जीदादा लग पहुँचला। बनर्जीदादा अपन बारहो गाड़ीक हिसाब मिला रहल छला। कनी फरिक्केसँ कुशेसर बजला- "प्रणाम दादाजी।" ओना, जखने कुशेसर गेटक भीतर प्रवेश केलैन तखने बनर्जीदादा बुझि गेला, जइसँ आँखि उठा चीन्हि, अपना काजमे पुन: लागि गेल छला। कुशेसरक संगमे देवनकेँ अनठिया देखितो मनमे कोनो उत्सुकता बनर्जीदादाकेँ नहियेँ जगलैन। किए तँ अधिक दिन ओहन होइते अछि जइ दिन चिन्हारए जेबो करै छैथ आ अनठिया एबो तँ करिते छैथ। जहिना कुशेसर फरिक्केसँ प्रणाम केलकैन तहिना बनर्जीदादा हाथक कलमकेँ कागजपर सँ उठा कुशेसर दिस देखैत मुड़ी झूका बजला- "प्रणाम।" बुधियार लोक जहिना कम-सँ-कम शब्दमे अपन विचार व्यक्त करए चाहै छैथ तहिना बनर्जीदादा सेहो केलैन। ओना, बनर्जीदादासँ कुशेसर परिचित छथिए जे काजक विचारपर बेसी नजैर दादाक रहै छैन। देवनक काजक जिज्ञासा कुशेसरक मनसँ मेटा गेल छेलैन किएक तँ काजक भरमार सोझामे आबिये गेलैन जे काजक कोनो समस्ये ने अछि। बारह गाड़ी सामान अछि, आठटा मटिया काज करै छी, केतबो झोंकि कऽ काज करब तैयो चौथाइसँ बेसी गाड़ीक काज रहिये जाएत। कुशेसर बजला- "दादा, गामसँ एबे केलौं अछि। रस्ते-रस्ते सुनलौं जे एम.ओ. साहैबसँ झगड़ा भऽ गेल, तँए अपन हाजरी पुरबए रस्ते-रस्ते चलि एलौं।" कहब जे झगड़ा भीड़मे गेलौं नहि आ झगड़ामे संग देलौं, एना केना हएत? हँ, किए ने हएत? मानि लिअ कियो झगड़ाक जगहपर नहि रहने, ने देखलैन आ ने लगले सुनलैन, तखन झगड़ाक हिस्सेदार केना बनता। किए ने बनता, जखन कानमे एलैन माने सुनलैन, तखनसँ जे ओइ झगड़ाक खोद-वेदमे लागि जाथि तँ किए ने हिस्सेदार बनि सकै छैथ। जिनगीक सामान्य गतिमे जहिना रंग-बिरंगक समस्या एने, कर्त्ता अपन समयानुकूल समाधान करैत अपन गतिये आगू बढ़ै छैथ तहिना बनर्जीदादा सेहो केलैन। जइसँ जीवनक गति-विधिमे कोनो बेसी हलचल नहियेँ एलैन। बनर्जीदादा बजला- "कोनो खास झगड़ा नहि छल। सामान्य छल। तँए जहिना आएल तहिना गेल।" ओना, बनर्जीदादा कुशेसरसँ गप-सप्प कऽ रहल छला मुदा नजैर देवनपर छेलैन। देवनक विषयमे कुशेसर किछु नहि बाजल छला तँए बनर्जीदादा अपन विचारमे देवनकेँ सम्मिलित नहि केलैन, मुदा देवनकेँ देख कऽ मन तिरपित भइये गेल छेलैन। क्षेत्र कोनो किए ने हुअए, माने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक वा आने-आन जेना- विज्ञाने, साहित्ये इत्यादि, मुदा कोनो नव आदमीकेँ लगमे एलासँ माने सम्बन्ध बनलासँ, एकटा ओहन आदमीक निर्माण तँ भइये सकैए जेहेन ओ अपने रहल। ओना, समाजमे एहनो चलैन अछिए जे सोना भेटिनौं प्राश्चित करए पड़ै छै आ हरेनौं तँ करए पड़िते छै। खाएर सोनाक गप सोनाक भेल, मूल्यवान रहितो ओ चेतनहीन अछिए मुदा मनुख तँ से नहि छिया, मनुख मूल्यबानक संग चेतनशील सेहो छथिए। खाएर जे छैथ तइसँ बनर्जीए-दादा आकि कुशेसरेकेँ कोन मतलब छैन। अपन जीवन छैन, जइसँ सरोकार राखि अपन यापन कऽ रहला अछि। कुशेसर बजला- "गाड़ीसँ उतरला पछाइत, माने गामसँ एला पछाइत स्टेशनक बगलेमे सुकदेव चाहक दोकानपर भेटला, वएह कहलैन तँए मनमे भेल जे पहिने दादासँ भेँट करैत किए ने निश्चिन्त होइ।" कुशेसरक विचार सुनि बनर्जीदादा मने-मन खुशी भेला मुदा बजला किछु खास नहि, बजला बस एतबे- "गामक की हाल-चाल अछि कुशेसर?" गामक हाल-चाल सुनि कुशेसर बजला- "गामक की हाल-चाल रहत दादा, बिनु बरक मड़बा जेहेन रमणगर होइ छै, तहिना गाम अछि।" ओना, कुशेसरक बात सुनि बनर्जीदादा बुझि गेला जे गामक अमूल्य बौसे हेरा रहल अछि, मुदा अनकर नीक-अधलाक चर्च अपना मुहेँ उचित नहि बुझि बजला- "से की कुशेसर?" कुशेसर बजला- "गाम तँ ओहिना अछि, किछु-किछु गाम कोसी-कमलासँ कटि-खोंटि बीरान जकाँ जरूर बनि गेल अछि मुदा केतबो बीरान भेल अछि तैयो हाड़-मांस तँ वएह छिऐ। मुदा असल जे..?" 'असल' कहि कुशेसर चुप रहि गेला। जहिना अपना घरक निन्दा केनिहारकेँ कुल्टा मनुख बुझल जाइए तहिना कुशेसरक मनमे भेलैन। बनर्जीदादा सेहो अपन नियमित जीवनक समयपर धियान रखनहि छला। माने ई जे अपन जे दिनानुदिनक काज छैन, ओकरा ओ ओही तरहेँ निष्पादित करिते छैथ जे जखन जइ काजक समय आएल ओकरा ओही काल निपटबैत जाइ छैथ। जइसँ सैंकड़ो काज किए ने रहए मुदा कनियोँ हदिआइ नै छैथ। गामक जिज्ञासा माने कुशेसरक गामक जिज्ञासा बनर्जीदादाकेँ तेते जोर मारि देलकैन जे विचार बेकाबू भऽ गेलैन। मनक मनाही भेला पछातियो मन नहि मानलकैन। बजला- "से की कुशेसर?" कुशेसर बजला- "गामक लोके गाम छोड़ि पड़ाए रहल अछि तखन गामक उन्नति केना हएत।" कुशेसरक बात सुनि बनर्जीदादा महसूस केलैन जे कुशेसर देखल-भोगल बात बाजि रहला अछि, तँए किछु पुछब उचित नहि हएत। सबहक सोझक दृश्य छी, तँए अपना-अपना दृष्टिये देखैक सेहो अछिए। देखिते छी जे गामेक विद्यार्थी जखन डॉक्टर बनै छैथ वा इंजीनियर बनै छैथ तखन ओ गाम छोड़ि शहर पसिन करै छैथ आ जा कऽ बसितो तँ छथिये। विचारणीय प्रश्न अछि जे सभ तरहक विपरीत स्थितिमे गामक लोककेँ रहने बीमारीक बाढ़ि रहिते अछि, मुदा डॉक्टर नहि अछि। तहिना किसानक देश रहितो खेतमे ने मशीन अछि ने इंजीनियर आ ने कृषि विशेषज्ञ। यएह स्थिति गामक अछिए। ढोलबज्जा ढोल बजैबते छैथ जे देशक पैदावार उच्चकोटिक अछि। एकरा दू दृष्टिये देखियौ- पहिल, देशमे कृषियोग्य भूमि दू करोड़ अस्सी लाख हेक्टेयर अछि। ओना, अपना ऐठाम राज-राज्यक कोन बात जे एक राज्यक भीतर दर्जनो रंगक जमीनक नापक चलैन अछि तँए स्पष्ट रूपेँ तँ नहि, मुदा जँ हेक्टेयरकेँ अढ़ाइ बीघा मानि लइ छी, तखन ओइ जमीनक माने देशक उपजाउ जमीनक अन्नक उपज जापान, जर्मनी इत्यादि देशक हिसाबे तीन अरब टन अन्नक पैदावार हएत, मुदा उपजैत केतेक अछि? की तीसो करोड़ टन अखन होइए? खाएर जे अछि से अछि, तइसँ बनर्जीदादा आकि कुशेसरेकेँ कोन मतलब छैन। मतलब एतबे छैन जे सरकारी अन्नक गोदाम जँ ठाढ़ रहल तँ अपनो ठाढ़ रहबे करब। अपन ऐगला काजकेँ ठिकियबैत बनर्जीदादा बजला- "आइसँ तँ काजपर आएब किने कुशेसर?" बनर्जीदादाकेँ अनुकूल होइत देख कुशेसर बजला- "असगरे किए आएब, दुनू भाँइ आएब।" 'दुनू भाँइ' सुनि बनर्जीदादाक मनक जे पहिलुका जिज्ञासा छेलैन ओ जोर मारलकैन। देवनकेँ पुछलखिन- "बाउ, अहूँ काज करए एलौं अछि?" देवन मुड़ी डोलबैत बाजल- "हँ।" देवनक मुहसँ 'हँ' सुनि बनर्जीदादाक मन चौंकलैन। चौंकलैन ई जे जहिना दुनियाँमे परिवर्तन होइत चलैए तहिना तँ मनुक्खो आ मनुक्खक जीवनोमे तँ होइते अछि। मुदा तेकरा लोक नीक जकाँ अकाइन कानपर नइ लइ छैथ। जइसँ आस-निरासक बीच जिनगी झुलैत रहै छैन। लगले सन्तुष्ट तँ लगले असन्तुष्ट होइत चलै छैथ। मुदा जँ परिवर्तनकेँ दिशाक धार बनबैत जीवन ताकि ली तँ वएह भेल अपन जीवनक खोज। जखने मनुख अपन जीवनधार खोजि लेता तखने ओइमे प्रवाहित होइत समुद्रमे मिलबे करता। मुदा से अखन देवन थोड़े बुझत। ओकरा तँ क्रमे-क्रमे जखन काजोक आ विचारोक बोध करौल जाएत तखन ओ अपन मानवीय मूल्य बुझत। लगले अपने मन बनर्जीदादाक कहलकैन जे साधारण लोहोकेँ चुमक लोहा अपना दिश आकर्षित करैत सटबैए, मुदा चुमकक गुण ओकरामे ताबे तक नहि अबैत अछि जाबे तक ओकरा आगिमे तपा जोड़ल नहि जाइए। जखन देवन सम्पर्कमे आबि गेल, एतेक बढ़िया हृष्ट-पुष्ट शरीर छै, तखन तँ भेल जे ओइ शरीरमे शरीरीकेँ केना जागौल जाए। बनर्जीदादा देवनकेँ पुछलखिन- "बौआ, परिवारमे के सभ छैथ?" देवन बाजल- "बाबूओ आ माइयो छैथ। बहीन सासुर बसैए। दोसर भाए नइ अछि।" अखन तक बनर्जीदादा बुझै छला जे देवन कुशेसरक सहोदर भाए छिऐन मुदा देवनक मुहसँ सुनिते बजला- "कुशेसर के हेता?" देवन- "भाय।" ओना, बनर्जीदादाक मनमे उठलैन जे एक दिस देवन अपन भाइक चर्च नहि केलक आ दोसर दिस कुशेसर भाय कहै छैथ? मुदा लगले अपने मन जोर दैत कहलकैन जे भाए खाली सहोदरे नहि, सहोदरक संग अपन अंगीतक सेहो भाइये होइ छैथ, तैसंग भाए-भैयारीक लेल तँ दुनियेँ पसरल अछि। भाय तँ वएह ने जे निर्भय जीवन गढ़ैक शक्ति सृजन कऽ दिअए। बनर्जीदादा बजला- "कुशेसर, आने दिन जकाँ छह बजे तक अपने गोदाममे रहब। किसानक आन्दोलन चलि रहल अछि। ओइमे शामिल हेबाक अछि तँए हमर समयक कोनो ठेकान नहि अछि।" कुशेसर बजला- "दुनू भाँइ आबि जाएब।" बनर्जीदादा बजला- "बड़बढ़ियाँ। जँ समय भेटत तँ फेर आएब नहि तँ काज रोकैक नहि अछि।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १६म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १६म खेप १६ सुधाकर चारू लठैतक संगे अपन दरबाजापर पहुँचलाह । हुनकर वयोवृद्ध पिता भाङ घोटि रहल छलाह। तकरबाद पोखरि दिस जाथि । ओ अनकर हाथक घोंटल भाङ कहिओ नहि पीबैत छलाह ,संतोखे नहि होइत छलनि । भाङ पीलाक बादे ओ पोखरि दिस जाथि आ ओमहरेसँ महादेव स्थान चलि जाथि । सायंकालक चारि-पाँचटा बूढ़सभ ओतए नियमित एकत्र होइत छलाह । गप्प-सप्प होइत । महादेवक आरती होइत । तखनसभगोटे मिलि कए नचारी गबितथि । तकरबाद अपन-अपन घर वापस चलि अबितथि। सुधाकर दरबाजापर अबितहि हुनकापर चिचिआएल- "कहैत रही जे पाठशालाक जगहपर घर बना लिअ । मुदा अहाँ ध्यान नहि देलहुँ । आब ओ लफङ्गा कहाँसँ घुमैत-फिरैत आबि गेल अछि। ओहिठाम फेरसँ पाठशाला बनाओत । हम ई बात कदापि नहि होबए देबैक, चाहे जान रहए की जाए ।" "मुदा ओ जगह तँ पाठशालेक थिकैक । तोरा ओहिमे भाङठ नहि करक चाही ।" "अहाँक तँ बुद्धिए भ्रष्ट भए गेल अछि । जखन अहाँ अपने एना बजबैक तँ अनकासँ की उम्मीद कए सकैत छी? सौंसे गाम हमरा संगे ठाढ़ अछि । हुनका एकटा गबाह नहि भेटतनि ।" "ई गामक विषय नहि थिक । जयन्त महाविद्वान छथि आ हुनकर आदर हेबाक चाही । फेर ओ कोनो व्यक्तिगत काज हेतु ओहि जमीनक उपयोग नहि करए चाहैत छथि । "हम किछु सुनबाक हेतु तैयार नहि छी । अहाँ सभदिन हमरा सभकेँ बिलटा कए रखलहुँ । ई पूर्वजक देल घराड़ीक जमीन अछि । हम किन्नहु एकरा ककरो नहि देबैक ।" "हौ तूँ एतेक तमसाइत किएक छह? हमरा जयन्तसँ गप्प करए दएह । कोनो समाधान हेबे करतैक।" "से जकरासँ गप्प करबाक होअए से करैत रहू । मुदा समाधान एतबे भए सकैत अछि जे ओ जमीन हमर अछि आ हमरे रहत । यदि अहाँ किछु उलट-पलट करब तँ बेटासँ हाथ धो लेब, किछु उम्मीद नहि राखब । बात जानी साफ।" सुधाकरकेँ एना बजैत सुनि देवीकान्त ठामहि अड़रा कए खसलाह । चारू लठैत दौड़ल। गाममे चारूकात हल्ला भए गेल । लोकसभ किदनि-किदनि बाजए लागल । महादेव मंदिरपर नचारीक समय भए गेल छल । देवीकान्त नहि अएलाह?" -हुनकर संगीसभ सोचैत रहथि, ताबे केओ बाजल- "ओ तँ दरबाजापर बेहोस पड़ल छथि ।" "की भेलैक?" " सुनबामे आएल जे सुधाकर बहुत फज्जति केलकनि ।" बूढ़ासभ नचारी बीचेमे छोड़ि देवीकान्तक हाल-चाल लेबए बिदा भेलाह । गाममे सभकेँ अपसियाँत देखि जयन्तक ध्यान सेहो ओमहर गेलनि । "की बात छैक? अहाँसभ एना परेसान किएक छी?"-जयन्त पुछलखिन । "अहाँक पित्तीकेँ किछु भए गेलनि अछि । सएह सुनि लोकसभ दौड़ रहल अछि ।"- एकटा युवक बजलाह । "भेलैक की?" "कहि नहि सकैत छी? ओतए गेनहि पता लागि सकैत अछि।"-दोसर युवक बजलाह । जयन्त अध्ययन कए रहल छलाह । सभ किछु छोड़ि दौड़लाह । हुनकर पित्ती देवीकान्तकेँ ताबे होस आबि गेल रहनि । किछुगोटे हुनका घेरने अखनहु बिअनिसँ हवा कए रहल छलाह । किछु गोटे लग-पासमे बतिआ रहल छलाह । सुधाकर सेहो अपन लठैतसभक संगे किछु विमर्शमे लागल छलाह कि जयन्त हड़बड़ाएल ओतए पहुँचलाह । दरबाजापर लोक करमान लागल छल । जयन्तके देखितहि सुधाकर बजैत छथि- "सभटा झंझटिक जड़ि तूँ छह । तोरे कारण बाबूकेँ ई दशा भेलनि । ने तूँ गाम अबितह, ने ई फसादसभ होइत ।" जयन्त की बजितथि? ओ देवीकान्त लग पहुँचि हुनका प्रणाम केलथि । ताबे हुनका होस आबि गेल रहनि । "की भेल काका?" "किछु नहि, चक्कर आबि गेल छल । आब ठीक छी ।"-देबीकान्त बजलाह । ताबे सुधाकर ओहिठाम ससरि कए आबि गेलाह । हुनका मोनमे अखनो शंका रहनि जे कहीं हुनकर पिता जयन्तक बात मानि ने लेथि। कारण हुनका ई बात बूझल रहनि जे हुनकर पिता पाठशालाक समर्थक छथि ।" "तोरे चलते ई दुखित पड़लाह। ने तूँ पाठशालाक चर्चा उठबितह ने हिनकर मोन खराब होइत ।"-सुधाकर बजलाह । "से की?" "बेसी चलाक नहि बनह । तोरा बूझल छह जे पाठशालाक जमीन हमरासभक हिस्सामे आबि गेल अछि सेहो कहि नहि कहिआसँ, तखन ओहिपर पाठशाला बनेबाक चर्चा करबाक की औचित्य छल?" "मुदा पाठशाला बनतैक कतए? ओ जगह तँ कतेको पुस्तसँ पाठशालाक रहल अछि ।" "जे छल से छल । आब ओ पाठशालाक जगह नहि अछि। हमरा लोकनिक घराड़ी अछि । ई बात तोरा बूझक चाही।" सुधाकर आ जयन्तमे चर्चा होइत सुनि लग-पासमे बहुत लोकसभ जमा भए गेल । मुदा केओ किछु नहि बाजए । ककरो साहस नहि रहैक जे सुधाकरक गप्पमे टोकारा देत । "ई जमीन पाठशालाक थिक । मुदा ओहूसँ जरूरी अछि जे काकाक जान बाँचनि । अखन अहाँ हुनका अस्पताल लए जाउ। हुनकर नीकसँ इलाज कराउ । तकरबाद आओर बात सभ पर चर्चा हेतैक । ने हम कतहु जा रहल छी, ने अहीं । तखन परेसानीक की बात छैक? दुनूगोटे बैसि कए समाधान निकालि लेब ।" "बेसी कबीलती नहि करह । आगि लगा कए आब पानि ढ़ाड़ए अएलाह अछि । नीक चाहैत छह तँ जानकीधाम वापस चलि जाह । जे फदका पढ़क होअ से ओतहि चैनसँ सँ पढ़ियह । ई गाम छैक । एहिठाम तोरासन ढोंगीक कोनो काज नहि छैक ।" "पाठशाला अपन जगहेपर चलत .... ।" औ बाबू! ओ एतबे बाजल छलाह कि सुधाकर गहुमन साँप जकाँ छड़पल । ओकरा संगे ओकर लठैतसभ लाठी भाँजि रहल छल । सुधाकर जयन्तक नरेठी पकड़ि लेलनि । ई दृश्य देखि उतरबारिटोलक दूटा युवक कुदलाह॒ । "खबरदार! बहुत भए गेल । आब जँ एक शब्द हिनका किछु कहबनि तँ गेल घर छी ।" " तोहर ई साहस । सरेआम हमरा चुनौती देबैं । आबो सम्हरि जो । भाग एहिठामसँ, नहि तँ जान नहि बँचतौक।" सुधाकर लठैत सभकेँ इसारा केलक । लठैत सभ दुनू युवक दिस बढ़ल । ताबे उतरबारिटोल दिस सँ लोकक हुजुम लाठी,भाला ,गराँस ,बरछी लेने ओहि दुनू युवकक समर्थनमे आबि गेल। सुधाकर आ ओकर समर्थक लठैतसभ सर्द भए गेल । "एहन हेतैक, से नहि सोचने रहिऐक ।"-सुधाकरक लठैत बाजल । "रे कायरसभ! एहीलेल तोरासभकेँ घी पिया-पियाक पोसने छी जे संकट देखितहि हाथ ठाढ़ कए देबैं।"-सुधाकर बाजल। "बेसी फटर -फटर नहि करह । जल्दीसँ पाठशालाक बात मानि लएह नहि तँ.... ।"-दुनू युवक बाजल। "तूँ सभ के छह? हमर दिआदी लड़ाइमे किएक हस्तक्षेप कए रहल छह?-सुधाकर पुछलखिन । "हम सभ एही माटि-पानि केँ छी । मुदा अहाँ जकाँ स्वार्थे आन्हर नहि भए गेल छी । "से की?" "इहो कहबाक काज छैक? पाठशाला कोनो नव नहि बनि रहल छैक । कैक पुस्तसँ ई चलि रहल छल । बीचमे संयोगसँ बंद भए गेलैक । जयन्त सन विद्वान एकरा फेरसँ चलबए चाहैत छथि तँ तोरा की परेसानी छह?" उतरबारिटोलक समस्त युवकमंडली गोविंद आ माधवक संग सहमतिमे बाजए लागल । ओकरासभक आबाज सुनि दछिनबारिटोलक लोकसभ सेहो जय जयन्त!जय जयन्त! करए लागल । माहौल गरमाइत देखि जयन्त स्वयं सभकेँ बुझबैत कहलखिन- " शांत होइत जाउ । पाठशाला तँ समाजक चीज छैक । सभक इच्छा छैक तँ बनबे करतैक । हम तँ अपन जीवन एही हेतु उसरगि चुकल छी । काकाजी बहुत अस्वस्थ छथि । फिलहाल सभसँ पहिने हुनकर इलाज कराओल जाए ।" "हम आब पूर्ण स्वस्थ छी ।"-देवीकान्त बजलाह । "हमहु पाठशालाक पक्षमे छी । ओएह हमर सही इलाज अछि । जयन्त कौलिक मर्यादाक अनुकूल काज कए रहल छथि। हम हुनकर समर्थन कए रहल छी ।" हुनकर बात सुनि माहौल एकदमसँ बदलि गेल । जयन्तक आग्रहपर सभगोटे अपन-अपन घर दिस बिदा भेलाह । सुधाकर चोटाएल साँप जकाँ अपन पिता दिस देखलथि आ बिना किछु बजने लठैतसभक संगे मोछ फरकबैत ओहिठामसँ प्रस्थान कए गेलाह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १०) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग - १०) पूर्व कथा पुरूरवा भगवान विष्णु के आशीर्वाद संs एकसय आठम अश्वमेघ यज्ञ सम्पन्न केलथि एवम ओहि क्रम में दानव राज केशि के युद्ध में परास्त कs पृथ्वी के सातो द्वीप पर विजय प्राप्त केला उपरान्त विश्व विजेता बनि गेल छलाह l हुनक एहि उपलब्धि के देखैत हुनका पृथ्वीक सम्राट घोषित कएल गेलनि ।
आब आगू क्रौंचवन में पुरूरवाक सेनापति अरुण मित्र एकटा वृक्षक शीतल छाया में बैसल छलाह l हुनकर समक्ष छलाह पुरूरवाक प्रधान आमात्य कृष्णध्वज l ओ दुनु गोटे राजा पुरूरवाक प्रतीक्षा करैत छल l सम्राट पुरूरवा स्वयं एक आततायी शेर के हनन करवाक वास्ते किछु सैनिकक संग शिकारीक भेस में आगू गेल छलाह l ओ हिनका सभ के अतहि बैस कs प्रतीक्षा करवाक वास्ते निर्देशित कs गेल छलैथ l तीनू महत्वपूर्ण व्यक्ति कुलगुरु वशिष्ठ मुनिक दर्शन हेतु निकलल छथिन l हुनक अस्वस्थताक समाचार जानि पुरूरवा चिंतित भs गेलाह l ओ तs तखनाहि हुनक आश्रम जाई के लेल उद्यत भेल छलाह l मुदा प्रधान आमात्य के सलाह पर सेनापति के संग किछुक सैनिक कें लेबाक कारण प्रातः प्रस्थान केलथि । एहि वन संs गमन करs,काल पुरूरवाक दृष्टिपथ में एकटा शेर आयल l राजा पुरूरवा के देखितहि देखैत में ओ एक गोट गाय पर झपटैत ओकर पेट फाड़ल आ रुधिर पान करs लागल l एहि शेर के आतंक संs वन्यजीव संग वन्य मानव पर्यंत आतंकित छलाह l महर्षि अगस्त्य एकर जानकारी पुरूरवा के देने छलथि,परंच अपन घोर व्यस्तताक कारण ओ एखनि धरि ओहि शेर के मारि नहि पयने छलाह l एहि कार्य के हेतु अनेकानेक शिकारी छलाह,परंच किनको ओ एहि कार्य हेतु आदेशित नहि केने छलथि l अन्य केओ बिन राजाज्ञा अपन मोन ओहि शेरक शिकार करs के प्रयास नहि केलनि l आई ओहि शेर पर दृष्टि पड़इत मात्र पुरूरवा के ओकर शिकार कs अन्य वन्यजीव के संरक्षण देवाक अवसर देखेलैन्ह,ताहि संs राजा ओहि शेरक पाछू अपन अश्व के दौड़ा देलथि l वरुण मित्र कृष्णध्वज संs कहलथि - "मंत्री प्रवर अपन सम्राट की ताजीवन अविवाहित रहता"? प्रधान आमात्य - "हमरो किछु एहने सन प्रतीत होईत अछि l हम कतेको बेर हुनका संs एहि विषय पर चर्चा कएल, परंच ओ सदिखन अनसुनाह सन केलथि हमर बात के"| सेनापति - "कतेको राजागण अपन कन्याक विवाह संबंध राजा पुरूरवा संs जोड़वाक हेतु अनुरोध केलथि स्वयं आबि कs,परंच हुनका सभ के निराश भs आपस होमs पड़लनि"| "हंs ई बात तs आहां सत्ते कहैत थिकहुं" - प्रधान आमात्य कहलथि | सेनापति - "किएक नहि अपना सभ किछु गहन सोच विचार कs कोनो एहेन सन रस्ता निकाली जाहि संs अपन राजा विवाह करsवास्ते प्रस्तुत भs जाइथ l कोनो एको टा तs एहेन मार्ग भेटत अपना सबके जाहि मार्ग पर चलि हम सभ महराज के विवाह करs वास्ते तैयार कs सकब"| प्रधान आमात्य - "हंs हमहूं यैह सोचैत छी,कोनहुना अत्यन्त सुंदरी बाला सभ के हुनका निकट जमघट लगाबी, तखन कोनो एको गोट सुंदरीक सौंदर्य हुनका अवश्य आकर्षित करत l आ ओ ओहि सौंदर्यवती संs विवाह करवा हेतु अवश्य प्रस्तुत भs जेताह"| सेनापति - "मुदा एहन सन कोनो आयोजन में नृपति उपस्थित किएकए होयताह महामात्य जी"! प्रधान आमात्य - "बात तs आहांक सत्य अछि सेनापति जी ! अपन राजा एहि तरहक आयोजन में सम्मिलित होंई के कोनो उत्सुकता एखनि धरि नहि देखौलथि । ओ पासिन्न नहि करताह एहन आयोजन । मुदा किछु मार्ग तs निकालहि के परत"| सेनापति - "हमरा एक टा मार्ग बुझाईत अछि महामात्य जी"| "कथि ! कोन मार्ग अछि बताऊ !" - प्रधानमंत्री ने पूछा प्रधान आमात्य - "एक मास उपरान्त बसंत पंचमीक दिन बसंत उत्सवक त्यौहार होयत l ओहि दिन कुमार वन में देश भरि के अतरिक्त द्वीप द्वीपांतर संs राजागणक लाडली राजकुमारी सभ औतीह l ओहि समारोहक उद्घाटन कार्य किएक नहि राजा पुरूरवा संs करवायल जाय"? सेनापति - "मुदा महराज पुरूरवा एकर लेल सहमत नहि हेता"| प्रधान आमात्य - "प्रत्येक वर्ष इंद्र ओहि समारोहक उद्घाटन करैत रहथिन l अहि बेर ओ नहि आबि सकेथिन्ह,किएक तs एखन ओ देव-दानव युद्ध में वे पूर्ण रूपेण व्यस्त छथिन्ह l ई युद्ध तs एखन एतेक शीघ्र समाप्त होयत नहि"| सेनापति - "हंs यौ ! आहांक ई बात तs सत्ते थिक | ई युद्ध तs तखनहि समाप्त होयत जखन राजा पुरूरवा सहयोग करताह,परंच ओ बिना इंद्र के निमंत्रण के स्वर्ग लोक पर हस्तक्षेप केनाई उचित नहि बुझैत छथिन्ह"| प्रधान आमात्य - "तखन वसंतोत्सव के एहि पावन तिथि पर ओकर उद्घाटन कार्य हेतु इंद्र के बाद अपन राजा पुरूरवा एकमात्र सुयोग्य व्याक्ति छथि l एहि कार्य हेतु स्वयं च्यवन ऋषि हुनका संs आग्रह करथिन्ह l हमरा सभ तs चुप्पे रहि कs मात्र ओहि दृश्यक अवलोकन करब "| सेनापति - "च्यवन ऋषि किएक आग्रह करथिन्ह भला"? प्रधान आमात्य - " वैह तs एहि समारोहक शुभारंभ केने रहथि l ओ एहि के प्रारंभ करैत काल में कहने रहथिन्ह जे एकर उद्घाटन कार्य प्रत्येक वर्ष भूमंडलक केओ अद्वितीय व्यक्ति करताह l किंवा भूमंडल पर एहेन व्यक्ति अनुपलब्ध होय तखनहि इन्द्र एकर उद्घाटन करताह"| सेनापति - "हंs पहिले तs केओ सप्त द्वीपक एकाकी सम्राट छलथि नहि l आब अपन राजा पुरूरवा भs गेलथि l ताहि संsआब हुनकर अतिरिक्त केओ आन एहि कार्य लिए हेतु नहि छथि"| प्रधान आमात्य सेनापति संग एहि प्रकारें विचार-विमर्श कs रहल छलाह कि अश्व के टापक स्वर वायुमंडल में प्रवाहित होमय लागल l किछुए काल में राजा पुरूरवा सभ सैनिक संग समक्ष आबि गेलाह l दूनू राजपुरुष उठि कs ठाढ़ भs गेलथि l राजा के मुख पर श्वेद-कण झिल-मिला रहल छल | प्रधान आमात्य पुछलाथि - "महराज ! ओ शेर मारल गेल"? "हंs कृष्णध्वज जी ! पहिने ओ भागैत भागैत महिष्वती गुफा तक चलि गेल छल l ओकरा मारि कs हम ओतहि छोइड़ देल"| "बहुत प्रसन्नता भेल ई बात के जानि कs,आब हमरा सभ के वास्ते की आदेश अछि"? - प्रधान आमात्य पूछलथि l "आब हमरा सभ के गुरुदेव के दर्शनार्थ शीघ्र प्रस्थान कs देमक चाही,बहुत विलंब भs गेल अछि"| दूनू राज पुरुष सहमति प्रगट केलथि | अपन-अपन अश्व पर सवार भs ओ सभ आगू चलि भेलाह l
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आजुक दिन वसंतोत्सव अछि l प्रत्येक वर्षक भांति एहि वर्ष दिग्-दिगांतर, द्वीप-द्वीपांतर संs राजकुमारी सभ आयल छथि ! सुंदरता में केओ एक दूसर सs कम नहि ! देखवा संs प्रतीत होईत अछि जेना त्रिभुवनक सुंदर तरुणी सभ में प्रतियोगिता होइक ! कुमार वन के प्रकृति अपना हाथें बनाओल एवम ईश्वर स्वयं ओकर श्रृंगार कएल ! एक संs एक सुन्दर मनोरम पुष्प, लता आ वृक्ष ओतs ठाढ़ अछि ! ब्रह्मपुत्र नदीक जल रजत सन उज्जवल अछि l स्वयं सुंदरता में स्नान करवाक प्रतियोगिता भेल छल! किछु तरुणी स्नान केलाक उपरान्त एक विशाल अशोक वृक्ष केs निकट उपस्थित भs गेल छलीह l सभ तरुणी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवाक दर्शनार्थ व्यग्र छथि l ओ सभ पुरूरवाक प्रतीक्षा में आकुल व्याकुल छथि । ओ सभ सम्राट पुरूरवाक गुण, शील,सौंदर्य के विषद वर्णन सुनने छथि । हुनका सभ के ज्ञात छनि पुरूरवा अत्यन्त मनोहर आ रूपवान छथि l हुनक सौंदर्य के समक्ष स्वयं कामदेव लज्जित छथि l पराक्रम एवम शौर्य में इंद्र सs बाढ़ल छथि l एतेक गुण-शील-शौर्यवान होइतहु ओ एखन धरि अविवाहित छथि, एवम ब्रम्हचर्य के पालन कs रहल छथि l नहि जानि एहन के भाग्यवती तरुणी होयतीह जे हुनक पत्नी बनती l सम्भवत: राजा हुनके अपन जीवनसंगिनी बना लेथि l सभ तरुणी बाला के मन में यैह भावना तरंगित होइत छल l जखनि सs सुनलथि कि राजा पुरूरवा एहि उत्सवक उद्घाटन करताह, तखनहि सs सभ सुंदरी कुमारिक हृदय में मधुर-मधुर कल्पना अपन जाल ओछाब लागल ! हृदय में मधुर टीस उठल ! विशाल अशोक वृक्ष के छाया तर सभ राजकुमारी किछु काल में उपस्थित भs गेलीह l आब हुनका सभ के राजा पुरूरवाक प्रतीक्षा छलैन्हि l
क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.रमाकर चौधरी- एलरजी/ मनुष्यक रक्त/ विभिन्न प्रकारक रक्त सम्बंधित अन्य जानकारी/ रक्त समूह(Blood Group)/ उच्च रक्त चाप(Hypertension)/ प्रतिऔक्सीकारक(Antioxidant)/ पाचन तंत्र।(Digestive System)/ गैस्ट्रोओसोफेजिअल रिफ्लक्स बीमारी(GERD) रमाकर चौधरी, सेवानिवृत्त चीफ मैनेजर, भारतीय स्टेट बैंक एलरजी/ मनुष्यक रक्त/ विभिन्न प्रकारक रक्त सम्बंधित अन्य जानकारी/ रक्त समूह(Blood Group)/ उच्च रक्त चाप(Hypertension)/ प्रतिऔक्सीकारक(Antioxidant)/ पाचन तंत्र।(Digestive System)/ गैस्ट्रोओसोफेजिअल रिफ्लक्स बीमारी(GERD)
१ एलरजी एंटीजन, एंटीबॉडी, एलरजीन इत्यादि। परेशानी जखन रहैत अछि तखन अपनो आ लोको सब एहि विषय मे बतबैक प्रयास करैत छथि। एही सब संदर्भित किछु जानकारीक चर्चा क रहल छी।
एलरजी*
जखन एकाएक कियो किछु बेसिये छिक्का करय लागैत छथि, नाक आँखि सँ पैन निकलय लगैत छनि। एहि सब सँ परेशानी होइत छन्हि। किनको किनको किछु खेला पिला सँ सेहो परेशानी होमय लगैत छन्हि।
ई सब होइत अछि व्याप्त एंटीजन तथा एलर्जिनक कारण सँ। ई ओहेन पदार्थ थिक जे शरीरक अंदर और वातावरण दुनू ठाम व्याप्त रहैत अछि। ओ शरीरक प्रतिरक्षा प्रणाली के एंटीबॉडी हेतु सक्रिय करैत अछि ।एंटीबॉडी ओहि वाहरी पदार्थ सँ लरि ओकरा समाप्त करैत अछि या चेष्ठा करैत अछि। बनल एंटीबाडी के एकटा प्रकार के IgE कहल जाइत अछि। किनको किनको प्रतिरक्षा हेतु बनल IgE किछु अधिके प्रतिक्रिया करय लगैत अछि । तेँ हुनका लोकनि के किछु बेसिये प्रभाव देखवा मे अबैत अछि। वाहर सँ शरीर मे एलर्जिन , विषाणु (वायरस, बैक्टीरिया इत्यादि) प्रवेश करैक संभावना रहैत अछि जाहि सँ शरीरक अंदर प्रतिरक्षा तंत्र केर सक्रियता बढैक सम्भवना भ जाइत अछि। वाहरी एलर्जिन तथा वाहरी विषाणु सँ अगर बाँचि के रही त संभव अछि जे एहि परेशानी सभ सँ बाँची। किनको किनको लेल वाहरी एलर्जिन हेतु संभाव्य बस्तु या स्थिति होइत अछि । ओकरा सँ बाँचि के रही । ओ सुरक्षा लेल सर्वोत्तम होइत अछि।
जेना कि 1. धूल कण 2.पराग 3.खाद्य पदार्थ सँ किनको किनको एलर्जी होइत छन्हि। उदाहरण अछि दूध, माछ, अंडा, गहूम, इत्यादि। ओहि पर ध्यान देबाक चाही जे कोन खाद्य सँ परेशानी बढि जाइत अछि। 4. लेटेक्स 5. दवाइ इत्यादि अनेकानेक स्थिति अछि।
विषाणु, और अन्य तरहक संभाव्य एलर्जिन सुरक्षा हेतु समेकित साफ सफाई पर ध्यान देनाइ आवश्यक अछि। कपड़ा, लत्ता,, ओछाइन -विछाओन , घरक फ्लोर, घरक अन्य राखल बस्तु सभ खूब साफ रहबाक चाही।
जँ कदाच परेशानी भ जाइत अछि आ ओ बढ़ल रहैत अछि तखन ओकर प्रतिकार चिकित्सक लोकनि एनटीहिस्टामिनिक/ स्टेरवाइड दबाई माध्यम सँ करैत छथि।
सुरक्षात्मक निदान सर्वोत्तम निदान अछि। संगहि शरीरक प्रचुर इम्युनिटी लेल प्रयासरत रहब सेहो आवश्यक। एहि सँ अनावश्यक दवाइ सभक प्रयोग करवा सँ दूर रहब आ दवाइक दुष्प्रभाव सँ वांचब। ओना परिस्थितिवस कुशल चिकित्सक सँ संपर्क ,सुझाव आ समुचित दवाइ तँ आवश्यक छैहे।
२ मनुष्यक रक्त शरीर भारक 7 प्रतिशत अंश रक्त होइत अछि। रक्त एक विशेष प्रकारक कोशिका होइत अछि जाहि मे 55% प्लाज़मा होइत अछि आ शेष 45% मे आवश्यकीय तत्व , स्वेत रक्त कण, लाल रक्त कण और प्लेटलेट होइत अछि। प्लाज़मा मे करीब 91प्रतिशत जल तथा करीब 9 प्रतिशत आन आन आवश्यकीय तत्व रहैत अछि । एहि तरहेँ रक्तक मुख्य घटक निम्नलिखित अछि। 1.प्लाज्मा:- शरीरक जाहि अंग के जल के आवश्यकता होइत छैक ओकरा दैत रहैत छैक। ओहि सँ रक्त चाप तथा रक्त संचार उचित रूप सँ बनल रहैत अछि। शरीरक अन्य हिस्सा मे हॉर्मोन, प्रोटीन तथा पौस्टिक तत्व सभ के आपूर्ति मे सहयोग करैत अछि। ऑक्सीजन और कार्बनडाईऑक्साइड के आदान प्रदान मे सेहो सहयोग करैत अछि। शरीरक तापमान सामान्य बनल रहैक , अहू प्रक्रिया मे सहयोग करैत अछि। 2. स्वेत रक्त कण:- मुख्य रूप सँ स्वेत रक्त कण के कार्य होइत अछि कोनो तरहक संक्रमण और बीमारी सँ शरीर के बचेनै। सुरक्षा ओकर मुख्य कार्य। स्वेत रक्त कण मे 5 प्रकारक घटक होइत अछि। ग्रेनुलोसाइट (न्यूट्रोफील, एसीनोफील, और बसोफील), मोनोसाइट तथा लिम्फोसाइट (टी कोशिका और बी कोशिका) स्वेत रक्त कण के लियूकोसाइट सेहो कहल जाइत अछि। 3.लाल रक्त कण:-लाल रक्त कण के ऐरीथ्रोसाइट सेहो कहल जाइत अछि। ओकर मुख्य कार्य होइत अछि फेफड़ा (Lungs) सँ ऑक्सिजन शरीरक सभ अँग मे पहुंचेनै संगहि लौटती मे कार्बनडाईऑक्साइड फेफड़ा तक पहुचेनै जे स्वास द्वारा छोड़ल(exhale) जा सकै। 4. प्लेटलेट:- प्लेटलेटक कार्य अछि थक्का बनेनै। जखन कखनो कतौ शरीर मे कैट फैट जाइत अछि तखन शरीर प्लेटलेट के खबरि करैत अछि । प्लेटलेट ओहि कटल जगह पर थक्का जमा दैत अछि आ रक्त बहनाइ रुकि जाइत अछि। तें रक्त बहनै रोकैक लेल एकर भूमिका प्रमुख अछि। शरीर स्वस्थ रहैक लेल रक्तक एहि चारु घटक कें स्तर सामान्य राखब आवश्यक होइत अछि। रक्त शरीरक सभ अंगक प्रत्येक कोशिका मे निरन्तर संचरित होइत रहैत अछि तेँ ओकरा मे विद्यमान कोनो तरहक असामान्य पदार्थ या असामान्य प्रोटीन ई संकेत दैत अछि जे शरीरक कोन अंगक स्थिति सामान्य सँ खराब अछि। कारण रक्त परीक्षण में क्षतिग्रस्त अंगक कोशिका रक्त मे उपस्थित होमय लगैत अछि।ओही कारण सँ चिकित्सक चेस्टा करैत छथि जे रक्त परीक्षण सँ बुझी जे मोटामोटी खराबी कतय अछि।रक्तक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होइत अछि । ओकरा बारे मे ज्ञान रखनाइ जरूरी अछि। रक्त कोना सामान्य स्थिति में रहत ओकर चेस्टा हेतु समुचित खान पान अर्थात संतुलित डाइट की होयत ओकरो जानकारी आवश्यक अछि। ३ विभिन्न प्रकारक रक्त सम्बंधित अन्य जानकारी लाल रक्त कण संख्याक एक सामान्य शीमा होइत अछि । ओहि सँ बेसी कम या बेसी अधिक भेनाइ ठीक नहि। ई सामान्य शीमा नीचा लिखल जा रहल अछि। महिला लेल -42 लाख सँ 54 लाख(लाल रक्त कोशिकाक संख्या)प्रति माइक्रो लीटर। पुरुष लेल- 47 लाख सँ61 लाख(लाल रक्त कोशिकाक संख्या)प्रति माइक्रो लीटर। ओही तरहेँ स्वेत रक्त कण संख्याक सामान्य शीमा नीचा निर्दिष्ट अछि। 4500 सँ 11000 प्रति माइक्रो लीटर। प्लेटलेट संख्याक शीमा होइत अछि150000 सँ 450000 प्रति माइक्रो लीटर।
लाल रक्त कोशिका, स्वेत रक्त कोशिका एवं प्लेटलेटक निर्माण अस्थि मज्जा मे होइत अछि। लाल अस्थि मज्जा मे मूल कोशिका(stem cell) होइत अछि तकरा हेमोसाइटो ब्लास्ट कहल जाइत अछि। लाल रक्त कोशिकाक सभ तत्व ओही हेमोसाइटोब्लास्ट सँ बनैत अछि। स्वेत रक्त कोशिकाक निर्माण अस्थि मज्जाक नरम टिसू मे होइत अछि आ ओकर विकास थाइमस ग्लैंड, लिम्फ नोड, और स्प्लीन मे टी कोशिका तथा बी कोशिका रूप मे होइत अछि। प्लेटलेटक निर्माण सेहो अस्थि मज्जा मे होइत अछि। ओ मेगाकैरियोसाइट्स नामक कोशिका जे अस्थि मज्जा मे पाओल जाइत अछि ,ओकरा द्वारा निर्मित होइत अछि आ तद उपरान्त रक्त प्रवाह मे प्रवेश करैत अछि। एहि तरहेँ अस्थि मज्जा रक्त निर्माणक स्थल थिक।
लाल रक्त कोशिका मे एक प्रोटीन रहैत अछि तकरा हीमोग्लोबिन कहल जाइत अछि। हीमोग्लोबिनक मुख्य कार्य होइत अछि फेफड़ा सँ ऑक्सीजन ल लेनाइ आ शरीरक प्रत्येक अंगक टिसू कें ऑक्सीजन आपूर्ति केनाय। अर्थात ऑक्सीजन केर वाहक हीमोग्लोबिन होइत अछि।
हीमोग्लोबिन 2 टा चीज सँ युक्त होइत अछि हेमो और ग्लोबिन। हेमो मे आयरन एटम रहैत अछि आ ग्लोबिन प्रोटीन छियैक। तें सामान्य हीमोग्लोबिन हेतु आयरन और प्रोटीन के कमी नहि हेबाक चाही।
फोलिक एसिड तथा विटामिन बी कम्प्लेक्स लाल रक्त कोशिका बनवै मे सहयोग करैत अछि। फोलिक एसिड कमी सँ हीमोग्लोबिनक कमी भ जाइत अछि।
लाल रक्त कोशिकाक संख्या आ सामान्य हीमोग्लोबिन स्तर शरीरक सभ अंग मे सुचारू रूप सँ ऑक्सीजन आ सब पौस्टिक तत्व पहुँचाबैक लेल जरूरी अछि।
हीमोग्लोबिन के सामान्य स्तर निम्नलिखित अछि।
पुरुष:-13.2 सँ16.6 ग्राम प्रति डेसी लीटर। महिला:-11.6 सँ 15 ग्राम प्रति डेसी लीटर।
सभ तरहक रक्त, हीमोग्लोबिन सामान्य रहय ताहि लेल सचेष्ट रहैक चाही। एहि सब लेल कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन , वसा के अलावा विटामिन तथा पौस्टिक खनिज सँ प्रति दिनक आहार युक्त अछि कि नहि ओहि पर अवश्य ध्यान देबाक चाही। विटामिनक निर्माण शरीरक अंदर स्वयं नहि होइत अछि। तेँ फल, और हरियर सब्जी सब ओहि लेल अवश्य खेबाक चाही।
सब प्रकारक रक्त ( लाल, स्वेत , प्लेटलेट) जँ अपन सामान्य स्तर पर रहैत अछि तँ बुझू अधिक संभावना अछि मोटामोटी पूर्णरूपेण स्वास्थ्य ठीक अछि। तेँ ओहि लेल सचेष्ट रहब आवश्यक। ४ रक्त समूह(Blood Group) लाल रक्त कोशिका मे उपस्थित या अनुपस्थित एन्टीबॉडी तथा आनुवांशिक रूप सँ माता पिता सँ विरासत मे प्राप्त या अप्राप्त एंटीजन जे कि लाल रक्त कोशिकाक बाहरी सतह पर रहैत अछि , एहि सब आधार पर रक्तक विभिन्न समूह होइत अछि। मुख्यतया एहि सब आधार पर रक्तक चारि टा समूह होइत अछि। A, B, AB, और O अनुवांशिक रूप सँ विरासत मे लाल रक्त कोशिकाक बाहरी सतह पर प्रोटीन उपस्थित या अनुपस्थित सेहो रहैत अछि। जँ ई प्रोटीन उपस्थित रहैत अछि त ओकरा पॉजिटिव रक्त समूहक श्रेणी मे राखल जाइत अछि। जँ ई प्रोटीन अनुपस्थित रहैत अछि त ओकरा नेगेटिव रक्त समूहक श्रेणी मे राखल जाइत अछि। एकरा आर एच फैक्टर सेहो कहल जाइत अछि।
एहि तरहेँ 8 प्रकारक रक्त समूह होइत अछि। "ए"पॉजिटिव "ए"नेगटिव "बी "पॉजिटिव "बी" नेगेटिव "एबी"पॉजिटिव "एबी"नेगेटिव "ओ" पॉजिटिव "ओ "नेगेटिव रक्त समूह" ए" मे ए एंटीजन लाल रक्त कोशिकाक वाहर मे तथा प्लाज्मा मे "एन्टी -बी "एंटीबॉडी होइत अछि। रक्त समूह "बी" मे बी एंटीजन लाल रक्त कोशिकाक बाहरी सतह पर तथा प्लाज्मा मे "एन्टी ए" -एन्टीबॉडी होइत अछि। रक्त समूह" एबी" मे दुनू एंटीजन ए और बी रहैत अछि आ एंटीबाडी अनुपस्थित रहैत अछि। रक्त समूह "ओ" मे एंटीजेन अनुपस्थित तथा दुनू तरहक एन्टी बॉडी "एन्टी ए" तथा "एन्टी बी" प्लाज्मा मे उपस्थित रहैत अछि। जखन किनको रक्त चढेवाक आवश्यकता होइत छैक तखन रक्त समूहक जांच आवश्यक होइत छैक, रक्त दाता तथा रक्त प्राप्त कर्ता दुनू लेल। रक्त समूह केर मिलान जरुरी छैक अन्यथा वेमिलान(un matched) रक्त समूह सँ विपरीत एंटीजन -एन्टी बॉडी कारण खतरनाक भ सकैत अछि। "ओ" नेगटिव वला व्यक्ति कोनो रक्त समूह वला व्यक्ति के अपन रक्त दय सकैत अछि। तहिना "एबी" पॉजिटिव वला व्यक्ति कोनो रक्त समूह वला ब्यक्ति सँ रक्त लय सकैत अछि।
रक्त के कमी (अनीमिया) मे जखन ककरो गंभीर स्थिति भ जाइत छैक तखन रक्त चढेवाक आवश्यकता होइत छैक। पूर्वहि सँ अगर रक्त समूहक जानकारी हुए त ई श्रेयस्कर। सुरक्षा उद्देश्य सँ सभ केंअपन अपन रक्त समूह केर जानकारी हेबाक चाही।
५ उच्च रक्त चाप(Hypertension) उच्च रक्त चाप देश मे अत्यधिक रफ्तार सँ बढि रहल अछि। एहि हेतु सजगता हेतु एकरा विषय मे जानकारी परम आवश्यक अछि। रक्त चाप शरीरक ओहेन स्थिति कें कहल जाइत अछि जखन रक्त केर दवाव धमनी पर बढ़य लागैत अछि। 120/80 सामान्य रक्त चाप होइत अछि। जखन ई 139/89 शीमा या ओहि सँ बढ़ैत अछि तखन विशेष ध्यान देनै आवश्यक भ जाइत अछि। ई एहि बीमारीक प्रथम अवस्था थिक। 180/120 या ओहि सँ अधिके तँ गम्भीर स्थिति होइत अछि। कम रक्त चाप भेनाइ सेहो ठीक नहि होइत अछि परञ्च एकर अति गम्भीर हेबाक संभावना रक्त चाप अत्यधिक (हाइपरटेंशन) तुलना मे किछु कम होइत अछि।
रक्त चाप इंगित संख्या मे जे संख्या ऊपर दर्शायल अछि ओकरा सिस्टोलिक कहल जाइत अछि आ जे नीचा दर्शायल अछि ओकरा डायस्टोलिक कहल जाइत अछि। सिस्टोलिक, धमनी पर दवावक ओ पैमाना अछि जखन हृदय धडकैत अछि। डायस्टोलिक, धमनी पर दवावक ओ पैमाना छी जखन हृदय आराम स्थित मे होइत अछि आ,अर्थात 2 हृदय धड़कन केर मध्य स्थिति मे।
जखन रक्त चाप बढ़ल रहैत अछि ओहना स्थित मे धमनी मे रक्त प्रवाह सामान्य रखैक लेल हृदय कें अधिक सक्रिय भ अधिक बेर धड़कय पड़ैत अछि अर्थात हृदय पर अधिक बोझ पड़ि जाइत अछि। सामान्यतया अधिक सिस्टोलिक के अधिक रक्त चाप कहल जाइत अछि परञ्च सिस्टोलिक अथवा डायस्टोलिक कोनो या दुनू बढ़ल स्थित रहय त ओ अधिक रक्त चाप थिक।
रक्त चाप ओहेन व्यक्ति कें हेवाक बेसी संभावना रहैत अछि जिनकर जीवन दिनचर्या अनियमित रहैत छन्हि । एहि सँ सुरक्षित रहैक लेल निरन्तर व्यायाम करैक चाही, मधुमेह बीमारी नहि हो ताहि लेल खान पान पर ध्यान देबाक चाही , मोटापा नहि हुए ताहू पर ध्यान देबाक चाही इत्यादि।
अधिक रक्त चाप अक्सरहाँ कोनो वाह्य लक्षण प्रकट नहि करैत अछि। ई चिकित्सक द्वारा नपला सँ पता चलैत अछि । निरंतर रक्त चाप बढ़ल रहनाइ लक्षण एकाएक नहि होइत अछि। क्रमिक रूप सँ बढ़ल रक्त चाप शरीरक सभ अंग पर कुप्रभाव करैत अछि। तें कुशल चिकित्सक सँ परामर्श लय चिकित्सा प्रारम्भ करा लेबाक चाही।
अधिक रक्त चाप सँ धमनी सब क्षतिग्रस्त होइत अछि आ ताहि सँ ओ खूब पातर(narrow) भ जाइत अछि या बंद(block) भ जाइत अछि। धमनी सभक लोच (elastic)प्रकीर्ति सेहो नष्ट होमय लगैत अछि। एहि सब सँ रक्त परिवहन मे बाधा होमय लगैत अछि। सभ अंग के ऑक्सीजन आ भोजन सामान्य रूप सँ नहि पहुँच पवैत अछि। क्रमिक रूप सँ आगाँ चलि हृदय केर ऐरोटा सेहो प्रभावित भ जाइत अछि। धमनी सभ क्षतिग्रस्त भेला सँ हालांकि सभ अंग प्रभावित होइत अछि मगर हृदय के क्षति हेबाक अधिक संभावना अछि कारण रक्त संचालन हेतु हृदय के प्रमुख भूमिका होइत अछि। अधिक रक्त चाप सँ हृदय घात तथा मस्तिष्क घातक डर रहैत अछि। किडनी तथा आँखि पर सेहो अधिक कुप्रभाव पड़ैत अछि अधिक रक्त चाप कारणें।
ओना अधिक रक्त चापक पहचान त चिकित्सक द्वारा नाप केला उपरान्त सुनिस्चित होइत अछि। तैयो किछु लक्षण इंगित कय रहल छी।
दृष्टि मे झिलमिलाहट। हल्का हल्का माथ दर्द। थकान थकान सनक अनुभूति। माथा मे चक्कर जकाँ आ रद्द(vomiting) हेबाक प्रविर्त्ति। कखनो काल नाक सँ रक्त श्राव।
अपन देश मे करीब 1 करोड़ लोक अधिक रक्त चाप सँ प्रति वर्ष ग्रसित भय जाइत छथि। एकर उपचार हेतु श्रेयस्कर ई अछि जे सुरक्षा(प्रीवेंशन) पर विशेष ध्यान दी। ओहि लेल जानकारी रहव तथा तद अनुकूल सावधानी राखव आवश्यक होइत अछि। निरन्तर शारीरिक व्यायाम , समुचित खान -पान, शरीर मे ग्लूकोज़ स्तर नियंत्रित, बढ़ैत मोटापा पर नियंत्रण इत्यादि सुरक्षा हेतु कारगर होइत अछि। रक्त चाप भ गेला पर ई वर्षों या जीवन पर्यन्त रहि सकैत अछि। चिकित्सक सुझाव अति महत्वपूर्ण अछि ओकर कुशल प्रवन्धन आ नियंत्रण हेतु।
चिकित्सक ओकर दवाइ द्वारा उपचार हेतु निम्नलिखित तरहक दवाइ दय सकैत छथिन्ह। विना चिकित्सक केर सुझाव सँ ई सब दवाइ नहि प्रयोग करैक चाही। जेना कि
1. एकटा एंजाइम होइत छैक जकर नाम "एंजियोटेनसिन परिवर्तित एंजाइम " कहल जाइत अछि। ओ रक्त वाहिका के संकुचित करैत अछि।
चिकित्सक ओकर अवरोध लेल एसीइ अवरोधक दवाइ (ACE inhibitor) सुझाव करैत छथि। एहि दवाइ केर खराब असर सेहो देखल गेल अछि तेँ चिकित्सक केर निगरानी मे दवाइक प्रयोग आवश्यक होइत अछि।
2. जरूरत सँ अधिक ब्लाडर मे एकत्रित पानि तथा सोडियम केर निकासी हेतु डाइयूरेटिक दवाइक सुझाव दय सकैत छथि। ओहो दवाइ चिकिसक केर सुझाव विना नहि खेवाक चाही।
3. हृदय के धड़कन कें थोरे धीमा करैक लेल जाहि सँ रक्त चाप कमि जाय ताहि लेल बीटा ब्लॉकर दवाइ हेतु सुझाव करैत छथि। इहो दवाइ विना चिकित्सक केर सुझाव कथमपि प्रयोग नहि करवाक चाही।
4.कैल्शियम आपूर्ति कें अवरोध कय रक्त चाप कम करैक हेतु दवाइक सुझाव चिकित्सक कय सकैत छथि। इहो दवाइ विना चिकित्सक सुझाव कथमपि नहि खेबाक चाही।
5. एकटा दवाइ होइत अछि वाहिकाविस्फारक (vasodilator).
रक्त चाप कम करैक लेल इहो दवाइ चिकित्सक द्वारा सुझाव कएल जाइत अछि। एहि दवाइ सँ रक्त वाहिका केर आकार बढ़ा देल जाइत अछि आ ओहि सँ रक्त चाप कम भ जाइत अछि। चिकित्सक केर सुझाव विना ई दवाइ बिल्कुल नहि खेबाक चाही।
एहि तरहेँ रक्त चाप मे चिकित्सक लोकनि द्वारा जे दवाइ सभ के अक्सर सुझाव होइत अछि तकरा बारे मे चर्चा कयलहुँ।
अपने सँ दवाइ के प्रयोग त नहिये टा करबाक चाही। हँ, तखन पथ्य, परहेज , व्यायाम, नूनक न्यून प्रयोग, व्यायाम-प्राणायाम, कम चिंता फिकिर , धूम्रपान निषेध, मद्यपान निषेध इत्यादि तँ श्रेयस्कर अछिये।
६ प्रतिऔक्सीकारक(Antioxidant) प्रतिओक्सीकारक। ओना ओकर अंग्रेजी नाम बहुत प्रचलित अछि जे कि एन्टीऑक्सीडेंट होइत अछि। अधिकतर चिकित्सक आ आहार विशेषज्ञ कहैत रहैत छथि जे फल खौ, हरियर सब्जी सब खौ, तरह तरह के लाभकारी चीज, जेना नेबो, आमला, आदी, लहसुन, हल्दी इत्यादि के अपन डाइट मे सम्मिलित करी ताहि लेल कहैत छथि। ओ कहैत छथि जे एहि सब चीज सँ एन्टीऑक्सीडेंट भेटत। आखिर एन्टीऑक्सीडेंट की होइत अछि ओकरा बारे मे जननै आवश्यक।
एन्टीऑक्सीडेंट के बारे मे जानकारी सँ पूर्व जरूरी ई अछि जे सर्वप्रथम "फ्री रैडिकल" विषय मे जानी। "फ्री रेडिकल" शरीर मे मुक्त कण एकल कोशिकाक रूप मे होइत अछि। ई एकल कोशिका युग्म कोशिका होइ लेल भुखायल रहैत अछि। एहि लेल ओकर सतत प्रयास रहलाक कारण स्वस्थ कोशिका के क्षति पहुँचैत रहैत अछि। एहि तरहेँ स्वस्थ कोशिका ओकरा कारण निरन्तर क्षतिग्रस्त होइत रहैत अछि आ फलस्वरूप बीमार भ जाय लेल अधिक संभावना भ जाइत अछि।
"फ्री रैडिकल"(मुक्त कण) शरीर मे पाचन क्रियाक फलस्वरूप बनैत रहैत अछि। प्रदूषण, धूम्रपान, ओजोन, एक्स- रे, औद्योगिक प्रदूषण तथा अनेक रसायनिक पदार्थक संसर्ग सँ सेहो "फ्री रेडिकल" शरीर मे बढ़ैत अछि। महत्वपूर्ण बात ई अछि जे "फ्री रेडिकल " अधिक रहनाइ त शरीर लेल खराब होइत अछि परञ्च ओकर उपस्थित रहनाइ आवश्यको अछि। शरीरक इम्मयून सिस्टम ओकरे (फ्री रेडिकल्स) सहयोग सँ शरीरक सुरक्षा करैत अछि। तेँ जरूरी ई अछि जे फ्री रैडिकल्स ने ज्यादा रहय ने कम , बल्कि बिल्कुल संतुलित रहय। ओहि संतुलन हेतु संतुलित एन्टीऑक्सीडेंट के सेहो जरूरत पड़ैत अछि ताकि आवश्यकता सँ अधिक फ्रीरैडिकल सामान्य भ जाय।
फ्री रेडिकल आवश्यकता सँ अधिक रहला सँ मधुमेह, हृदय सँ सम्बंधित बीमारी, कैंसर इत्यादि अनेक बीमारीक संभावना बढ़बैत अछि।
एंटीऑक्सीडेंट एक प्रकारक अणु(मॉलिक्यूल) होइत अछि जे फ्री रेडिकल सँ लड़ि ओकरा बेअसर करैतअछि । शरीर खुद- बखुद अपनो एन्टी ऑक्सीडेंट बनवैत अछि, अपन सुरक्षा हेतु। एन्टीऑक्सीडेंट वाहरी खाद्य पदार्थ जेना फल , हरियर सब्जी , तथा अन्य पौधा जनित खाद्य मे पाओल जाइत अछि। विटामिन सब सेहो एंटीऑक्सीडेंट अछि। विटामिन "सी" आ विटामिन "ई " प्रभावी एंटीऑक्सीडेंट अछि। कियो कियो समय पूर्व जे अधिक उमरगर लगैत अछि ,ओ एही "फ्री रैडिकल" के कारण सँ। एहि तरहेँ शरीर कें स्वस्थ रखैक लेल एन्टीऑक्सीडेंट बला समुचित आहार आवश्यक अछि। फ्री रेडिकल असंतुलित भ, जँ बहुत बढि जाइत अछि तँ शरीर ऑक्सीकरण युक्त तनाव (oxidative stress) मे आबि जाइत अछि । ओहि सँ डीएनए सेहो कुप्रभावित भय सकैत अछि आ ओहि सँ तद संदर्भित बीमारी भs सकैत अछि। फ्री रेडिकल तथा एंटीऑक्सीडेंट दुनू शरीर मे बिल्कुल संतुलित रहैक चाही। एहि लेल जीवनचर्या आओर दिन प्रति दिनक आहार अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। सप्लीमेंटक रूप मे एन्टी ऑक्सीडेंट लेनाइ सँ श्रेयस्कर पौधा जनित खाद्य होइत अछि। हँ, जखन कोनो एन्टी ऑक्सीडेंटक स्पष्ट कमी होइत अछि तखन त सप्लीमेंट खइए पड़ैत छैक।
किछु एंटीऑक्सीडेंट युक्त खाद्य पदार्थक नाम लिखि रहल छी । जेना ग्रीन टी, कॉफ़ी, कारी चॉकलेट, ब्लू बेरी, हल्दी, ऑलिव तेल, फल, तरकारी सब आ सब पौधा जनित अन्य खाद्य जाहि मे अनेकानेक एन्टी ऑक्सीडेंट पाओल जाइत अछि। ओहि सभ सँ शरीरक फ्री रेडिकल तथा एंटीऑक्सीडेंट कें आसानी सँ संतुलित राखल जा सकैत अछि। एहि सँ बहुत तरहक बीमारी सँ बाँचल जा सकैत अछि।
७ पाचन तंत्र।(Digestive System) पूरा शरीरक सबसँ छोट इकाई कोशिका होइत अछि। खड़बो कोशिका मिलि शरीरक संरचना करैत अछि। प्रत्येक कोशिका भोजन सँ पोषक तत्व लए ओकरा ऊर्जा मे परिवर्तित करैत अछि आ अपन अपन विशिष्ट कार्य करैत अछि।
कोशिका सब मिलि उत्तक(tissue) बनवैत अछि। उत्तक सब मिलि अंग बनवैत अछि। अंग सब मिलि शरीरक अंगतंत्र बनवैत अछि। अंगतंत्र सब मिलि पूरा शरीर होइत अछि।
ओही अंग तंत्र मे एक अंग तंत्र होइत अछि पाचन तंत्र। एकर अलावा सम्पूर्ण शरीर मे अलग अलग तंत्र काज करैत अछि। सब तंत्र अगर समुचित रूप सँ काज करैत अछि तँ शरीर पूर्ण स्वस्थ रहैत अछि। सब तंत्रक विषय मे कनियो मनियो जानकारी अगर होयत तँ आभास होयत जेअपनहि शरीर मे कतेक तरहक कार्य कतेक पद्धतिवार ढंग सँ भय रहल अछि। ई सब कार्य परमेश्वर द्वारा रचित प्रत्येक जीव मे स्वयं होइत अछि। ई सब परमेश्वरक व्यवस्थित शक्ति सँ होइत अछि। अगर हम सब कनी उपरो सँ अपना आप के खान पान तथा रहन सहन व्यवस्थित कय लेब तँ जीवन पर्यन्त स्वस्थ रहि सकैत छी। पाचन तंत्रक अलावा जे तंत्र सब होइत अछि ओ थिक परिसंचरण तंत्र, अंतःस्रावी तंत्र, उत्सर्जन तंत्र, प्रजनन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, श्वसन तंत्र, कंकाल तंत्र और मासंपेशी तंत्र।
*पाचन तंत्र।*
पाचन तंत्रक संरचना विशिष्ट अछि। हम सब जे भोजन करैत छी , ओकरा ओ तोड़ि पोषक तत्व मे परिवर्तित करैत अछि। शरीर एहि पोषक तत्व सँ उर्जा निर्मित कय ओहि सँ अपन बृद्धि संग संग कोशिका सभक मरम्मत(repair) करैत रहैत अछि।
पाचनतंत्र मे रास्तानुमा एक जठरांत्र पथ( गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल ट्रैक्ट) होइत अछि जे कि मुख सँ गुदा तक होइत अछि। ओहि मे आरो सव महत्वपूर्ण अंग होइत अछि जे विशिष्ट और महत्वपूर्ण कार्य करैत अछि। 1. मुँह:- जठरांत्र पथ (गैस्ट्रो इंटेटिनल ट्रैक्ट) मुँह सँ प्रारम्भ होइत अछि। पाचन क्रिया मुँह सँ शुरू भ जाइत अछि। जखने कोनो भोजन ग्रहण करैत छी, मुँह मे चिबा चिबा कए भोजन कें छोट छोट टुकड़ा मे तोरल जाइत अछि । मुँह सँ श्रावित लार आ
ओहि मे उपस्थित अनेक प्रकारक एंजाइम, भोजन तत्व कें आँत द्वारा अवशोषित करवाक हेतु उपयुक्त बनेनै मुँह सँ प्रारम्भ कय दैत अछि। 2. गला:- पाचन तंत्र मे मुँहक बाद कएल भोजन कें आगाँ तरफ जाय लेल दोसर स्थान गला होइत अछि।
3. ग्रसिका (esophagus ) :- लगभग 25 सेंटीमीटर लंबा एक नली होइत अछि जे गला(Pharynx) सँ प्रारम्भ भs आमाशय तक पहुँचैत अछि।ओहि नली सँ भोजन आगाँ तरफ बढि आमाशय मे पहुँचैत अछि। ग्रसिका नली माँसपेशी सँ बनल रहैत अछि। माँसपेसी कें संकुचन और विश्राम सँ भोजन आगाँ बढ़ैत रहैत अछि। एहि प्रक्रिया के पेरिस्टलसिस कहल जाइत अछि। आमाशय सँ ठीक पहिले ग्रसिका मे एक स्फिंक्टर वाल्व होइत छैक जे भोजन वापस आमाशय सँ ग्रसिका मे नहि आबय दैत छैक।
4. आमाशय(stomach):-
आमाशय थैलीनुमा होइत अछि। एकर देवाल माँसपेसी सँ बनल रहैत अछि आ काफी मजबूत होइत अछि। आमाशय मे भोजन के बुझू जे मिक्सर ग्रिनडर जकाँ मथल जाइत अछि। आमाशय मे अम्ल तथा एंजाइम सब द्वारा भोजन के और नीक जकाँ तोड़ल जाइत अछि ताकि भोजन तत्व सब आँत द्वारा अवशोषित भs सकय। आमाशय मे भोजन अर्धतरल / पेस्ट रूप मे भs जाइत अछि आ एहि तरहेँ छोटकीआँत मे जाय लेल तैयार भय जाइत अछि।
5.छोटकी आँत(क्षुद्रांत्र):-मात्र एकर नाम छोटकी अछि परञ्च एकर लंबाई 20 फीट सँ अधिक होइत अछि। ई आँत पेट मे माँसपेसी सँ बनल नलीक लच्छा रूप मे रहैत अछि। मुख्यतया एकर तीन खंड (सेगमेंट) होइत अछि। पहिल के डियूडेनम कहल जाइत अछि। दोसर के जेजुनम, आ तेसर के इलियम कहल जाइत अछि। आँत मे आमाशय सँ आयल भोजन अगर और टूटै योग्य अछि ओकरा अग्न्याशय सँ श्रावित बहुतों एंजाइम सब से तथा यकृति सँ श्रावित पित्तक सहयोग सँ ओकरा तोरैत अछि तथा पोषक तत्व अलग कs अवशोषित करैत अछि। पोषक तत्व सब अवशोषित भs रक्त मे प्रवेश एही आँत मे करैत अछि। भोजन तुटब प्रक्रिया डियूडेनम मे होइत अछि। अवशोषण के कार्य जिजुनुम तथा इलियम मे होइत अछि। यकृति सँ श्रावित पित्त द्वारा वसा के पाचन होइत अछि संगहि ओ रक्त मे उपस्थित अपशिष्ट (waste) पदार्थ के हटवैत अछि।
छोटकी आँत मे सेहो संकुचन आ विश्रामक प्रक्रिया सँ पेरिस्टलसिस(क्रमाकुंचन) होइत रहैत अछि ताकि श्रावित पाचक रस सभ संगे भोजन नीक तरहेँ मिश्रित भs बढियां जकाँ पचि जाय।
6. पाचन तंत्र मे यकृति, अग्न्याशय तथा पित्तक थैली ई तीन अंग बहुत महत्व रखैत अछि। यकृति तँ पित्त श्रावित होइत अछि जे कि वसा के पाचन तथा रक्त के वेकार पदार्थ के हटवैत अछि। अग्न्याशय एंजाइम श्रावित करैत अछि आ आँत के दैत छैक जाहि सँ कार्बोहायड्रेट, प्रोटीन , वसा इत्यादि पचि जाइत अछि । आँत द्वारा पोषक तत्व अवशोषित भs रक्त मे जाइत अछि। पित्तक थैली यकृति के ठीक पाँछा मे रहैत अछि। यकृति द्वारा श्रावित पित्त ओहि थैली मे जमा होइत अछि। जखन हम सब भोजन करैत छी तखन पित्तक थैली संकुचित भs पित्त रस आँत के दैत अछि ताकि पाचन क्रिया मे सहयोग होइक। पित्तक थैली यकृति सँ एक वाहिनी (duct) द्वारा जुरल रहैत अछि जाहि माध्यम सँ पित्त यकृति सँ पित्तक थैली मे जमा होय लेल अवैत रहैत अछि। बुझू त पित्तक थैली पित्त केर संग्रह स्थल (store)थिक।
7. बड़की आँत(बृहदान्द्र):- ओकरा कोलोन सेहो कहल जाइत अछि। कोलोनक लंबाई 5 सँ 6 फीट होइत अछि। कोलोन माँसपेसी सँ बनल एक नली होइत अछि जे बड़की आँतक प्रथम भाग सिकम(cecum) सँ जुरल रहैत अछि आ ओकर अंतिम भाग मलाशय सँ जुरल रहैत अछि। सिकम सँ अपेंडिक्स (अनुबन्ध) जुड़ल रहैत अछि। छोटकी आँत मे जखन पोषक तत्व सब अवशोषित भs जाइत अछि, अधिकतर पानिक अंश सेहो निकलि जाइत अछि तखन जे किछु भोजनक शेष बचैत अछि ओ बड़की आँत मे आबि जाइत अछि।
बड़की आँत मे सेहो किछु बाँचल खोंचल पाचन क्रिया भ जाइत अछि तखन जे बेकार अवशेष बाँचल रहैत अछि ओ तरल तथा मल रूप मे संकुचन आ विश्रमक प्रक्रिया (पेरिस्टलसिस ) सँ आगाँ बढ़ैत अछि । तकर बाद जखन कोलोन मल सँ भरैत अछि त ओ मलाशय मे आबि जाइत अछि। एहि सब कें मलाशय तक जाय मे करीब 36 घंटा लागि जाइत अछि। मल मे भोजनक बेकारअवशेष (Debris) तथा बैक्टीरिया सब रहैत अछि। ई बैक्टीरिया सब विटामिन संश्लेषण मे सहयोग करैत अछि। ई बैक्टीरिया सब हानिकारक बैक्टीरिया सँ सेहो रक्षा करैत अछि। 8. मलाशय:- मलाशय करीब 8 इंचक एक माँसपेसी सँ बनल एक प्रकोष्ठ होइत अछि जे कोलोन सँ जुरल रहैत अछि आ गुदा सँ सेहो। मलाशय के कार्य अछि जे कोलोन सँ मल प्राप्त केनाय और ओकरा खाली करैक हेतु मस्तिष्क कें संदेशक माध्यम सँअनुभूति कराबय। जाबत धरि मल खाली नहि भ जाइत अछि ताबत धरि ओ मलाशय मे रहैत अछि। जखन कखनो मलाशय मे मल या गैस प्रवेश करैत अछि तखन शरीरक ग्रहणशील (sensor) मस्तिष्क कें सुचित करैत अछि आ मस्तिष्क निर्णय करैत अछि कि खाली करैक स्थिति अछि या नहि। खाली करैक निर्णय भेला पर स्फिंक्टर माँसपेसी विश्रामक(relax) स्थिति मे अबैत अछि आ मलाशय संकुचित होइत अछि। ताहि सँ मलाशय खाली भ जाइत अछि। ई क्रिया भेलाक बाद खाली करवाक अनुभूति अन्त करैत अछि आ तखन स्फिंक्टर संकुचित होइत अछि तथा मलाशय सामान्य स्थिति मे आबि जाइत अछि। 9. गुदा:- पाचन तंत्रक अंतिम अंग गुदा होइत अछि। मल कखन बाहर हुए, कखन बाहर नहि हुए , मलाशय सँ ठोस या तरल या गैस ककर वेग अछि इत्यादि सभक जानकारी ,गुदा क्षेत्रक माँसपेसी आ स्फिंक्टर माँसपेसी दैत अछि। एहि तरहेँ आइ हम पाचन तंत्रक बारे में चर्चा कयलहुँ।
८ *गैस्ट्रो ओसोफेजिअल रिफ्लक्स बीमारी*
पाचन तंत्र सँ सम्बंधित ई एक प्रमुख बीमारी अछि। ई बीमारी खान -पानक गड़बड़ी आ अनियमित दिन चर्याक कारणे अधिक लोक कें भs जाइत छन्हि। बस्तुतः जखन अमाशयक अम्ल बारम्बार उल्टा तरफ ओसोफेगस (मुँह सँ अमाशय तकक नली) मे आबय लागैत अछि तखन ओसोफेगस नलीक अन्तः देवाल पर जलन होमय लगैत अछि। एहि तरहक असामान्य स्थिति कें गैस्ट्रो ओसोफेजिअल रिफ्लक्स बीमारी* कहल जाइत अछि।
लक्षण:-छाती मे जलनक अनुभूति होइत अछि। सामान्यतया खेलाक बाद ई जलन बढि जाइत अछि । राति मे लेटल अवस्था मे खास केs बढि जैत अछि।खायल भोजनक किछु अंश या खट्टा तरल मुँह मे ऊर्ध्वनिक्षेप होमय लागैत अछि। पेटक ऊपरका भाग मे तथा छाती मे दर्द भs सकैत अछि। भोजन घोंटै (swallow) मे सेहो दिक्कत भs सकैत अछि। एहि तरहक अनुभूति सेहो भs सकैत अछि जे , गला मे किछु लटकल अछि। अधिकतर लोक अपन एहि तरहक असामान्य स्थिति कें खान पान मे आ रहन सहन मे सुधार कय सुधार कs लैत छथि, किछु कें चिकित्सक द्वारा सुझाव कएल दवाइ खेला सँ सुधार भ जाइत छन्हि।
किछु लोक कें विशेष परिस्थिति मे शल्य चिकित्सा करेबाक प्रयोजन सेहो पड़ि सकैत अछि, मुदा सामान्य रूपें एकर जरूरत कम्मे होइत अछि।
होइत ई अछि जे ओसोफेगसक निचला भाग जतय ओ आमाशय सँ मिलैत अछि, ओहिठाम ओसोफेगस नलीक अंदर माँसपेसी सँ बनल गोलाकार बैंड होइत अछि। ओही ठाम एक टा स्फिंक्टर होइत अछि जे वाल्व(valve) के काज करैत अछि। भोजन कें ओसोफेगस सँ आमाशय मे जाइत काल ई बैंड विश्राम(relax) करैत अछि आ भोजन घोंटा आमाशय मे चल जाइत अछि। ओकर तुरन्त बाद स्फिंक्टर बन्द क दैत छैक एहि बैंड कें। आब आमाशय मे गेल भोजन वापस ओसोफेगस मे नहि भ सकैत अछि। ई प्रक्रिया अछि घोंटैक। जखन बैंड आ स्फिंक्टरक माँसपेसी कमजोर भ जाइत अछि तखन भोजन या तरल पदार्थ उल्टा अर्थात आमाशय सँ ओसोफेगस तरफ जा सकैत अछि।
एकरे जखन गंभीरता बढि जाइत अछि तँ शल्य चिकित्साक प्रयोजन पड़ैत अछि।
संभावित परिस्थिति सभ, जखन ई बीमारी एवं ओकर लक्षण औरो अधिक बढ़ि सकैत अछि ई नीचा लिखि दय रहल छी। 1. जँ मोटापा बढैत अछि। 2.जँ आमाशय केर उपरका भाग नमहर भ जाइत अछि या ओहि मे उभार (bulging) आबि जाइत अछि। इहो एकटा बीमारी होइत अछि जकरा हियाटल हर्निया(Hiatal hernia) कहल जाइत अछि। 3. स्त्रीगण कें गर्वावस्था मे एकर लक्षण बढि सकैत अछि। 4. संजोजी उत्तक(connective tissue) संबंधित बीमारी जकरा कारण सँ माँसपेसी कमजोर होइत अछि , ताहू सँ ई गैस्ट्रोओसो फेजिअल रिफ्लक्स बीमारी भ सकैत अछि। स्फिंक्टर कनेक्टिव टिश्यू सँ बनल रहैत अछि।
5. धूम्रपान सँ ई बीमारी बढि सकैत अछि। सामान्य सँ अधिक भोजन केला सँ, राति मे देरी सँ खेला सँ, तरल भूजल पदार्थ अर्थात अधिक वसायुक्त चीज सब खेला सँ सेहो ई बीमारी बढ़ैत अछि। तरह तरह के पियै बला तरल(beverage) बाजार मे आबि गेल अछि जेना कि ठंढा पेय(कोल्ड ड्रिंक) ओहो सब एहि लेल खराब अछि। मदिरा पान सेहो एहि बीमारी मे लाभ नहि करत बल्कि अधिके खराबी करत।
बहुत दिन तक अगर ओहि बीमारी कें नीक सँ ध्यान नहि देल जाय तँ ओसोफेगस सुजि जाइत छैक, नली पातर भ जायत छैक, आ गंभीर स्थिति केर लक्षण सब सेहो आबय लागैत छैक। तेँ हेतु तत्पर भs नीक सँ ध्यान दय ओकरा बढ़ै सँ रोकबाक चाही। समय पर उपचार, एवं पथ्य, परहेज सँ ई बीमारी पूर्ण रूपेण ठीक भs सकैत अछि।
चिकित्सक एहि बीमारी कें विभिन्न तरहक परीक्षण जेना एनडोस्कोपी एक्स -रे इत्यादि सँ करैत छथि। एहि बीमारीक प्रतिकारक लेल चिकित्सक सबसँ पहिले सुझाव दैत छथि जे जीवन चर्या आ खान पान मे परिवर्तन करी। जखन ओहि सँ आराम नहि होइत अछि तखन ओ नीचा लिखल किछु दवाइ हेतु सुझाव दैत छथि। कोनो दवाइ विना चिकित्सकक सुझाव के प्रयोग नहि करक चाही।
दवाइ सब एहि तरहेँ अछि।
1.एंटासिड:- ई दवाइ ओसोफेगस आ आमाशयक अम्ल के वेअसर करै मे सहायक होइत अछि। छातीक जलन सेहो कम होइत अछि।
2. एच -2 ब्लॉकर(H2 ब्लॉकर) : ई दवाइ सँ आमाशय मे अम्ल श्रावित होइ सँ रोकल जाइत अछि। एहि दवाइक प्रयोग पुरान(chronic) रिफ्लक्स बीमारी मे होइत अछि। मरीज बहुत दिन सँ छाती जलन सँ परेशान रहैत छथि तखन चिकित्सक हुनका एहि दवाइ लेल सुझाव कs सकैत छथिन्ह। विना चिकित्सक परामर्श ई दवाइ कथमपि नहि खेबाक चाही।
3.प्रोटोन पंप अवरोधक(Proton pump inhibitor):- आमाशय मे अम्ल बनैक लेल एक प्रोटीनक जरूरत पड़ैत छैक। ओहि प्रोटीन के अवरुद्ध करैक हेतु एहि दवाइक सुझाव चिकित्सक दs सकैत छथि। इहो दवाइ विना चिकित्सक परामर्श कथमपि नहि खेबाक चाही।
4.ऊपर किछु अंग्रेजी दवाइक चर्चा केलहुँ अछि। एकर अलावा अपन किचन मे बहुत ओहेन पदार्थ सेहो उपलब्ध रहैत अछि जे कि सेहो लाभ क सकैत अछि। इहो सब जानकार आयुर्वेदिक चिकित्सकक परामर्श सँ उपयोग करी तँ श्रेयस्कर। किचनक पदार्थ अछि, जीर,आद, अजमाइन, हींग इत्यादि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राजदेव मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राजदेव मण्डल केर पाँचटा कथा कथा १ राजदेव मण्डलक पाँचटा कथा-
रूसल बौआ दुर्गापूजाक मेला शुरू भऽ गेल छइ। अष्टमी बीत गेलै, आबो नै हेतै मेला। मेलामे तँ होइते छै, खुशी, उत्साह, मनोरथ, मिलन। घर-घर बनि रहल छै मेवा-मिष्टान, तरुआ-भुजुआ आर कते चीज-बोस। रंग-बिरंगक नुआ-बस्तर पहिरने धिया-पुताक मुँहपर खुशी नाचि रहल अछि। सभ मेला देखबाक लेल तैयार भऽ रहल अछि। फेकन हड़बड़ाइत अँगना आएल आ पत्नीसँ पुछलक- "बेचू बौआ कहाँ अछि? खेलक आकि भुखले अछि?" पत्नीक मोनमे तामस औनाइते छलै। एकबेर तामससँ भरल आँखिए ताकलक आ बजल किछो नै। ओकरा दिश बिनु देखनहि फेकन फेर बजल- "एकोटा रुपैया तँ घरमे छलै नै। सोचलौं- छौड़ा मेला देखैले जाए लगितै तँ मांगबे करतै। एक गोड़ेसँ हथपैंच लेलौं। आ बौआकेँ देखबे नै करै छी। कते गेल अछि?" "जेतै कते, कने छलै। दुआरिपर रुसल बैसल छइ।" "की भेलै से?" "हेतै की, लवका पेण्ट-शर्ट लेतै।" "ओह, अखनी तँ पैसाक बड्ड अभाव छइ। ओकरा समझा-बुझा दैतिऐ से नै।" "अहाँक धिया-पुताकेँ के समझाइत। कहै छलै जे अमितकेँ लवका पेण्ट-शर्ट ओकर बाबू आनि देलकै। ओ भोरेसँ देखा-देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबैत अछि। औंठा देखा कऽ इहू-इहू कहैत अछि।" "अहाँकेँ कहबाक चाही ने जे अमितक बाप धीरेन्द्र बाबू बड़का लोक छथि। पलिबारमे सरकारी नौकरीयो छइ। जमीनो हमरासँ बहुत बेशी छइ। हुनकर बराबड़ि हम केना करबै?" "से गप्प हम कहलिऐ। रौ बौआ, अमित बड़का लोक छिऐ। उनटे तमसाकेँ बजल- "अमितवा कद-काठीमे हमरासँ छोट अछि। परीक्षामे हमरासँ कम नम्बर लाबैत अछि। खेलो-कूदमे हमरासँ हारले रहैत अछि। ऊ हमरासँ नम्हर केना भेलै। आब अहीं कहू जे केना बुझेबै? की कहबै?" बझल कंठे फेकन बजल- "आ हमहीं की करबै? एक साल रौदी तँ एक साल दाही। जी-जान लगा कऽ काज करै छी, तइयो उपजा ओतने होइत अछि। देह रोगाएल रहैत अछि। बाहरो कमेबाक लेल केना जाएब। हमरा सन छोट गिरहतकेँ देखनिहार कियो नै। अहाँ तँ देखबे करै छी। घरक खर्चा नै जुमैत अछि, तइयो धिया-पुताकेँ पढ़बै छी।" पत्नीक सुरमे तामस भरल छल- "हमर सऽख-सेहन्ता तँ डहि-जरि गेल। आब धीयो-पुतोक वएह गति भऽ रहल अछि। अहाँ कोनो करमक लोक नै छी। अहाँ बुत्ते नै किछो भेल आ नै हएत।" अहाँ कोनो करमक लोक नै छी, ई वाक्य जेना फेकनक कलेजामे बरछी बनि गड़ि गेलै। तन-मनसँ समर्पित भावे काज केनिहारकेँ जँ फलक रूपमे दुत्कार भेटै तँ एकर प्रतिकार की? फेकनक मोन औना रहल छइ। बेवश, लचार। ओकरा आँखिसँ भरभरा कऽ लोर खसि पड़लै। आसमे जेना आगि लागि गेल होइ। ओकर बेचू बेटा अढ़मे ठाढ़ भऽ कऽ सब किछो सुनै छलै। बापकेँ कनैत देख नै रहल गेलै तँ लगमे जा कऽ बाजल- "बाबू अहाँ नै कानू। कोनो कि अंगे-पेण्टसँ लोक मेला देखै छइ। ऊ लवका पेण्ट-शर्ट देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबै छइ। हम परीक्षामे ओकरासँ बेसी नम्बर लाबि कऽ ओकरा बुड़बक बनेबै।" सपना सन..। क्षण भरिक लेल जेना नम्हर-छोट, ऊँच-नीच एके रंग बुझेलै। फेकन बेटाकेँ भरि पाँज पकड़ि लेलक। बाप-बेटा मिलैत देख पत्नी मुस्की मारलक जे बाप-बेटा दुनूक लेल प्रश्न बनि ठाढ़ भऽ गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.राजदेव मण्डल ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राजदेव मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राजदेव मण्डल केर पाँचटा कथा कथा २
अवाक अन्हरिया राति। लगै छेलै जेना आसमान अन्हार उगैल रहल होइ। ऊपरसँ हाँइ-हाँइ बहैत हवा गाछ-बिरिछकेँ झिकझोरि रहल छेलइ। तैपर कखनो-काल टिपटिपाइत पानिक बून..। कखैन समय ठीक भऽ जेतै आ कखैन अधला तेकरा कोन ठेकान। ऐपर केकर वश चलि सकै छै? ओ तँ..। जितू ऊपर मुहेँ तकलक। लगलै मेघ उनटल आबि रहल अछि। देखते ओकरा टाँगमे पाँखि लगि गेलइ। एहेन खराप समय आ दू कोसक रस्ता! बान्ह-सड़क बनिते छेलै तँए ओइ गाम बस-ट्रक तँ जाइते ने छल। एहेन बिगड़ल समैमे रिक्शा, टेम्पू जेबे नै करतै। पैदले जाए पड़त। केकर कपार खराप हेतै जे एहेन समैमे निकलत। जितू निकलल छल ठीके समैपर। ओकरा की पता छेलै जे बाटमे बस भँगैठ जेतै आ बसक डरेबरसँ जातरी सभकेँ झगड़ा-फसाद भऽ जेतै। तइ कारण बसकेँ दू घण्टा बेमतलब ठाढ़ केने रहतै। आ जातरी सभकेँ एते समस्या हेतइ। तइसँ बसबलाकेँ मतलबे की। सभ तँ अपने सुआरथमे डुबकी मारैत अछि। सुआरथ पूर भेल तँ वाह नइ तँ आह। अनकासँ केकरो की मतलब। ओ सोचलक- मुदा हम तँ स्वार्थमे नै छी। बेमार सारि बारम्बार फोन कऽ रहल छेली जे- "हम जीअब की मरब तेकर कोनो ठेकान नहि। एक बेर भेँट कऽ जाउ।" ओइठाम केना नै जाएब, जैठाम जेनाइ कर्तव्य अछि। 'केतबो लिखब लेख, परेमक रूप अनेक।' भेँट होएत। ओइ भेँट करबामे नै जानि केतेक सुख छइ। केतेक आनन्द छइ। सूचना मिललाक उपरान्त जितूकेँ कछमछी लगलै से अखनो धरि लगलै छेलइ। ओकरा यादि पड़लै। अँगनासँ निकलैत-काल पत्नी टोकने रहइ। "केतए जाइ छिऐ। कोनो ओइठाम लोक नै छइ।" पत्नी जेना तमसाएल रहइ। शंकामे औनाइत मन! तामसे फड़फड़ाइत! जितू मिलबैत बाजल- "कोनो आनठाम जाइ छिऐ जे एना तमसाएल छी। अहींक गाम तँ जाइ छी।" हँसैत जितू निकैल गेल छेलइ। सड़कपर ऐबते दोस टोकि देने रहइ- "हे यौ, सासुर अछि पच्छिम आ जाइ छिऐ उत्तर मुहेँ।" "कनी बैंकसँ टको-पैसा लेबाक अछि। अखैन हम नै रूकब।" कहैत आगू बढ़ि गेल रहइ। जितूकेँ मनमे आएल। जतरा पहर टोकि देने रहए तँए शायद बाटमे एना बाधा भऽ रहल अछि। पुन: सारिक संगे बिताएल समय ओकरा स्मरण हुअ लगलै। हँसी-खेल, फगुआक रंग-अबीर, आमक मास, मधुमास। ओकर रूप, गुण, बोली आ मुस्की मारैत मुख..। किछुकाल लेल जेना ओ स्वर्गक सागरमे डुमकी मारए लगल। सुखकेँ यादि केलासँ लोक किछु पलक लेल पुन: सुखी भऽ जाइत अछि भोगल सुखक नव रूप! सुनमसान बाट आ बिकट समय। जेना सभ किछु बिला गेल छेलइ। एकाएक मेघक गर्जनासँ जितूकेँ धियान भंग भऽ गेलइ। जेना फेर चारू-भरसँ अन्हार घेर लेलकै। एहने समैमे घटल घटनाक सबहक चित्र आगूमे आबए लगलै। ओकरा मन पड़लै। एकबेर सासुरेमे सारक दोस कहने रहए- "हे यौ, इलाकामे जँ कुसमय केतौ फँसि जाएब तँ हमर नाम सुमैर लेब।" सारक मुहसँ दोसक बड़ाइ खूबे सुनने रहए। जितूकेँ बुझेलै जेना कातमे किछो छेलइ। मुदा ओ अन्हारमे किछो नहि देख रहल छल। पएर थरथराए लगलै। कथी छेलै- भूत-प्रेत आकि चोर-डकैत। पता नै ओतए पहुँच सकब आकि बाटेमे प्राण बिला जाएत..। फेर भट्ट दऽ किछो खसल। डेराइते ओम्हर तकलक। देखते जेना मनकेँ भरोस भऽ गेलइ। कियो आगूमे बाट धेने धड़फड़ाइत जा रहल छेलइ। जहिना लटछुटु माल दोसर माल-जालकेँ देखते स्थिर भऽ जाइत अछि तहिना जितूकेँ सन्तोख भेलै। शंका सभ मेटाए लगलै। डेग बढ़ौलक जे संगे चलब, लगमे जाइते ओ उनैट कऽ कर्कश अवाजमे पुछलक- "रेऽऽ ठाढ़ रह! केतऽ रहै छी?" तखने बिजली चमकल। ओही इजोतमे जितू ओकर भयंकर रूप देखलक। भागल भय जेना फेरसँ देहमे समा गेल। डरे देह थराराए लगल। पेटक हवा निकास लेल गोंगिया उठल मुदा ओहो डरसँअन्दरेमे बिला गेल। अनायासे मुहसँ निकलल- "हौ, अही अगिला गाम हमर सासुर अछि। हमहूँ तोरा चिन्हते छिअ आ तहूँ हमरा चिन्हते हेबहक। एना किए करै छहक।" "आ रे तोरी-के, कोनए गेलै रौ, चेला सब, ई तँ सभकेँ चिन्हते छौ। जुलुम भेलौ। सभटा भेद खोलि देतौ। सभ किछो छीन-ले आ सारकेँ साफ कऽ दही।" "हौ बाप, हम केकरो नहि चिन्हैत छी।" "चुप..।" तड़ाक-तड़ाक मुँहपर चमेटा खसए लगल।लगलै जेना बजर गिरैत अछि। जितू धड़फड़ा कऽ भूमिपर खसि पड़ल। "देखै छी पाछूमे इजोत1 पुलिस आबि रहल छौ। सभ किछो छीन-ले आ गरदैन काटि दही। हम आगू निकलै छियो।" एकटा चेला तरूआरि लेने जितू दिश बढ़ल आर सभ तेजीसँ आगाँ बढ़ि गेल। चेला जितू लग आबि सभ जेबीक तलाशी लेलक आ उठैत बाजल- "यौ गुरू ई तँ थप्परेसँ मरि गेलै। मारबै की। भागू जल्दी, पुलिसक इजोत लगीच आबि गेल।" सभ पड़ा गेल। जितू चिन्हल अवाज सुनि कुहरैत उठल। मन घृणासँ भरि गेलइ। अचरजमे डुमल स्वर निकललै- "धनक लेल लोक एतेक नीचाँ गिर सकैत अछि। केकरा कहबै के पतिएतै, जेकरे कहबै सएह लतिएतै।" जेना लगलै केतौ किछु नहि, कोनो सम्बन्ध नहि। मनुख केहेन आ जानवर केहेन। के नीक? अनायासे ओकर हाथ ओहइ जेबी दिस गेलै जइमे आठ हजार टका रखने रहए। सभ टका-पैसा सुरक्षिते रहइ। ओ अवाक् भऽ गेल। सोचलक- केतौ आ केकरो लग इमान रहि सकैत अछि। बुढ़-पुराणक बात मोन पड़लै- केतबो काटबहक जड़ि इमानक सोर पताल धरि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राजदेव मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राजदेव मण्डल केर पाँचटा कथा कथा ३ बेचुआक सुइटर "बेचुआऽऽऽ। गिलास धो कऽ जल्दी ला।" माघक जाड़ हाड़ेमे लगै छै। दिसम्बरक हाड़ थरथराबैबला जाड़ ऊपरसँ पछिया हवा। गामक चौबटिया। कचिया सड़कक कात विभिन्न वस्तुजातक छोट-पैघ आठ-दसटा दोकान ठाढ़ अछि। सभसँ दक्षिणवरिया कातमे गरभूक चाहक छोटका दोकान। पुरना ब्रेंचपर जाड़क डरे सुटैक कऽ बैसल लोक चाह सुड़ैक रहल अछि। जाड़मे चाहक बिक्री बढ़ि जाइ छै। गहिंकीक संख्या बेसी देख गरभू आइ खुशी अछि। ओ अपना अधपकुआ मोछकेँ बारम्बार सोझ कऽ रहल अछि। संगहि चाहो बना रहल अछि। ओकर नोकर बेचुआ चटा-चैट ऐंठ-कुठ गिलासकेँ धो रहल अछि। ओकरा देहपर फाटल-पुरान मैल कमीज छै। नमगर केशकेँ उ दस बर्खक छौंड़ा गमछासँ लटपटौने छै। बारम्बार ठरल पानि छूलासँ ओकर हाथ कठुआ गेल छै। बहैत नाककेँ सुड़कैत तैयो ओ काजकेँ धेने अछि। दोकानक आगू इस्कुलिया ड्रेस पहिरने धियापुता गप्प हाँकैत घर जा रहल अछि। बेचुआ ओइ धिया-पुता दिस देखैत अछि। मनक दबल लिलसा जेना चमैक उठै छै। ओहो अहिना ड्रेस पहिरने स्कूल जाइत। किन्तु स्कूलक फीस केतए-सँ देतइ? ओकरा लग तँ लत्तो-कपड़ा नहि छै। परन्तु ओकरा विश्वास छै जे आइ गरभू मालिक जरूर सुइटर कीनि देतइ। ओकर बाप अपने आबि मालिककेँ कहि गेल छै। टनाक! गिलास हाथसँ गिरलै आ फूटि गेलइ। बेचुआकेँ डरसँ थरथरी धऽ लेलकै। फूटल गिलासकेँ ओ मालिकसँ चोराकऽ फेकऽ चाहलक। धड़फड़ीमे शीशाक टुकड़ी अँगुरीमे गड़ि गेलै आ खून चूबए लगलै। देरी लगैत देख गरभूकेँ धियान ओनए चलि गेलइ। "रौ सार तोड़ि देलही ने गिलास? एकटा नहि दू-दूटा? घाटा-पर-घाटा दऽ रहल छेँ?" चटाक.. बेचुआक गालपर चमेटा मारैत कहलकै- "एक किलो खाइ छेँ आ गिलासो नइ उठै छौ?" बेचुआकेँ बुकौर लागि गेलइ। लहू पूरा हाथपर पसैर गेल छेलइ। चाह पीनिहारमे सँ एक गोरे बाजल- "धिया-पुता छै। एते नहि मारियौ। हाथ कटि गेलै साइत। कनी आराम करए दियौ।" दोसर बाजल- "जाड़क कारणेँ तँ थरथरा रहल छै। कनी हाथ सेद लिअ दियौ।" तामसे गरभू चिचिया कऽ बजैत अछि- "अहाँ सभ नहि बुझबै। सार नाटक करैए।" फेर बेचुआ दिस घुरि कऽ बाजल- "आब एनए बघुआकऽ की देखै छीही? फुटलाहा गिलास फेक एमे कि लगेबौ चमेटा?" बेचुआ पछुआर दिस गिलास फेकैले चलल, जेतए ऐंठ-कुठ पर कुत्ता सभ झमझौहरि कऽ रहल छेलइ। बेचुआ सोचैत अछि- भागियो कऽ केतए जाएब? किछु दिन पहिने अहिना भेल छेलइ। टेबुलपर चाहसँ भरल केतली राखल छेलइ। ओकरे गलतीसँ टेबुल गिर पड़लै आ केतली उनैट गेलै। ओहू दिन केतेक चमेटा लागल रहइ से यादो नहि छै। बादमे ओ भागि कऽ अपना घर चलि गेल छल। घन्टो नहि बीतल हेतै आकि गरभू पाछूसँ पहुँचि गेलै। गारि-सराप दैत। ओ डरे खाट तरमे नुका रहल, किन्तु बाप ओकरा ताकि कऽ निकालिये लेलकै। माइ माथकेँ हँसोति बुझबए लगलै- "की करबहक बौआ? तोहर बाप गरभू मालिकसँ करजा लेने छह। करजा नहि सधतै तहिया तक दोकानपर खटऽ पड़तह।" गरभू मालिक दिस घुरि बाबू कहने रहै- "छौड़ाकेँ जाड़ होइ छै। तँए भागि कऽ चलि आएल। एकरा सुइटर कीनि दियौ।" "हँ-हँ, कीनि देबइ। अखन तँ जाड़ शुरू भेबे केलैए।" ओकर माए-बाप डबडबाएल आँखिसँ देखैत रहलै जे गरभू ओकरा धकियाबैत अपना संगे लऽ जा रहल छेलै। ओ जखन उनैट कऽ अपना माए-बाप दिस तकलक तँ गरभू डपटैत कहने छेलै- "बाप दिस उनैट कऽ की देखै छँह? ऊ तँ हजार रूपैआ करजा लेने छौ। पहिने खटि कऽ सब रूपैआ चुकता कऽ दही तब गुल्ली-डण्टा खेलिहेँ। रे तों तँ पाँच भाए-बहिन छेँ। तोहर बाप गोनमा तोरा सभकेँ केतए-सँ बैठा कऽ खिएतौ?" आ ओइ दिनसँ काज केनाइ, थप्पर-मुक्का खेनाइ आर असगरेमे कननाइ, इएह तँ ओ करैत आबि रहल अछि। गरभूकेँ बाजब सुनि ओकर धियान टुटलै। "बेचुआ रेऽऽऽ। ओनहिं मरि गेलेँ की?" ओ नोर पोछैक बाजल- "आबै छी मालिक।" दोकानपर गहिंकीक भीड़ बढ़ि गेल छेलै। जमादार के.पी. सिंह एकटा सिपाहीक संगे ओकरा दोकानपर पहुँचि गेल अछि। ओ गरभूक पाछाँ ब्रेंचपर बैस गेल अछि। गरभू चाह बनाबैमे मस्त अछि तँए ओकरा नहि देखलक। जमादार साहैब दू बेर पानि माँगि चुकल छैथ। किन्तु हुनका आवभगत नहि भऽ रहल छैन। तँए तामसे भीतरे-भीतर फुलि रहल छला। स्टोवक सनसनाहटि, गिलासक टनटनाहटि आ लोकक झनझनाहटिक बीच के केकर सुनै छै? पुलिसिया नजैर चारूभर दौड़ रहल छल। वरदीबलाकेँ देख किछु लोक ससैर रहल अछि। एक गोरे जाइत-जाइत गरभूकेँ इशारा केलक। तखने जमादारक कड़कड़ाएल स्वर सुनबामे आएल। "रे चाहबला, बहीर छें। पानि मागै छियौ, सुनै किए ने छेँ?" गरभू उनैट कऽ देखैत अछि आ डरा कऽ सलाम करैत अछि। "बेचुआऽऽऽ, गिलास साफ कऽ बढ़ियासँ जल ला। साहेबकेँ पियास लागल छैन।" बेचुआ नाकर-नुकर करैत पानि लाबैत अछि। जमादार साहैब कानूनी दाओ-पेंच खोजि रहल छला। बेचुआकेँ देखते हुनकर आँखि ललिया गेल। से आँखि बेचुआक देहपर नाचि रहल छल। "रे अइ छौंड़ासँ काज कराबै छेँ? बालश्रम अधिनियम बुझै छिही कि नहि? बच्चाक शोषण? कानूनक विरुद्ध बात। के छिऐ ई छौंड़ा?" "नोकर छी हजूर।" "एकर बाप केहेन छै? बित्ताभरिक छौंड़ाक कमाइ खाइ छै? एहेन बच्चाकेँ तँ पढ़ेबाक चाही।" एकटा गहिंकी बाजल- "सरकार, हमरा गामक एतेकटा छौड़ा तँ बनारसक फैक्ट्रीमे काज करैत अछि।" जमादार साहैब डपटैत बजला- "सुनने नहि रही, हमर डी.एस.पी. साहैब ओतएसँ एक दरजन बच्चा सभकेँ छोड़ा कऽ अनने रहैथ। बालश्रम मुक्ति कानून छै। केहेन गाम अछि। अखबारो कियो पढ़ै छै कि नहि? नेतो सभ नहि बुझबै छौ?" पड़ोसिया दोकानदार कहलकै- "अहाँ तँ लव-लव एलिऐ हजूर। अहाँसँ पहिले राम साहैब जमादार जी आएल रहैथ। कहाँ एतेक केदा-कानून कहियो..।" "रे ऊ राम ताम कानून की बुझतै? हम सिंह साहैब छी सिंह, बुझलेँ?" जमादार साहैबक पूरा गप्प गरभू बुझि नहि रहल छल, तैयो बाजल- "सरकार, बच्चासँ कोनो गलती भऽ गेल की?" "गलती ओकरासँ नहि, तोरासँ भेल छौ। बच्चासँ काज करबै छेँ। कोनो कायदा-कानून मालूम नहि छौ तोरा?" "सरकार, एकर बाप हमरासँ करजा लेने छै आर सेहए सधेबाक लेल अपना बेटाकेँ हमरा लग राखि देने छै।" "करजा-के बदलामे बच्चाकेँ बन्धक बनाकऽ रखने छें? बच्चाक खरीद-बिक्री? गलतीपर गलती। गैर कानूनी बात तँ हम अपना इलाकामे देखऽ नहि चाहै छी। तोरा हमरा संगे थानापर जाए पड़तौ।" "हे यौ साहैब, हमरासँ कोनो गलती नहि भेल अछि। हमरा समाजक नियम अहिना छै। अहाँ जबरदस्ती फँसा रहल छी हमरा।" जमादार साहैब तामसे फोंफिया उठला- "जबरदस्ती फँसा रहल छी? सिपाही, मुँह की ताकै छेँ। लऽ चल पकैड़ कऽ। जेलक भीतर जेतै तब पता चलतै एकरा।" सिपाही ओकरा दिस बढ़ैत अछि। गरभूकेँ डरे लगही लागि गेलइ। सिपाही ओकरा पकैड़ एकान्तमे लऽ जाइत अछि। किछु देर गप्प भेलाक बाद आपस अबैत अछि। फेर जलपान, चाहक बाद, पान गुलठैत आ ढेकरैत जमादार साहैब सिपाहीक संग जा रहल छैथ। ओम्हर माथपर हाथ धेने गरभू बैसल अछि। गँहिकी एक-एक कऽ सहटल जा रहल अछि। तैबीच बेचुआ पुछै छै- "मालिक, आइ सुइटर कीनि देबै ने?" 'चटाक' ओकरा गालपर थप्पर मारैत गरभू चिचिया उठैत अछि- "चुप सार! तोहर सुइटर तँ सिपाही लऽ गेलौ।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राजदेव मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राजदेव मण्डल केर पाँचटा कथा कथा ४ एलेक्सनक भूत निन्नक निशामे मातल सूतल छी आ सपना देख रहल छी। जुलूस जा रहल अछि। इनक्लाब जिन्दाबाद....। राजनीतिक पार्टी आ पाटीक तरफसँ ठाढ़ नेताक लेल वोट माँगएबला जुलूस। आगूमे नेताक बदला प्लाईवुडक आदमकद फोटो। दुनू जाँघक बीच मोटका लाठी धोंसिया कऽ फोटोकेँ ऊपर उठौने। गर्दमिसान करैत भीड़ निकट आबि रहल अछि। "जीतबे करता-जीतबे करता हमर नेता जीतबे करता। नेताजीक माइर कऽ गोली, बन्न नै कऽ सकत हमर बोली।" भीड़मे एक दोसरासँ पूछैत अछि- "नेता जीकेँ गोली लगि गेलै की?" "हँ भाय, साँझमे। गोली तँ अजमा कऽ छातीमे मारलकै। लेकिन हुसि गेलै। टाँगमे गोली लगलैक। होसपिटलमे पड़ल छथि। इलाज चलि रहल छै। तइ दुआरे नेता जीक फोटो लऽ कऽ प्रचार कऽ रहल छिऐ।" "सभटा एण्टी पाटीक किरदानी हेतै।" हमर धियान आदमकद फोटोपर अछि। आरे तोरीकेँ, ई फोटो तँ हमरे छी। हू बहू। लगल जेना हम उछलि कऽ फोटोमे ढुकि गेलौं। फोटोक बदलामे हमहीं ठाढ़ छी। आ ऊ अगत्ती छौड़ा लाठीपर टँगने हमरा ऊपर नीचा कऽ रहल अछि। दरदक अनुभव होइत अछि। बेसुमार दरद। हम चिचिया रहल छी- "हे रौ, हमरा नीचा राख। एना किएक नाहकमे जान लैत छँ।" भीड़केँ कोनो आँखि-कान होइत छै। के सुनत हमर कानब? मुड़ी उठेलौं। आगूमे देखै छी जे एण्टी पाटीक किछु लफंगा सभ घुरिया रहल अछि। किछु लोकक हाथमे झण्डा आ डण्टा अछि। आ रे तोरीकेँ ई सभ तँ डाँड़सँ पेस्तौल निकालि रहल अछि। कियो बम पटकि पड़ाएल। "धुम.. धुम.. धड़ाम।" सभ भागल जहिंपटार। हमरा लाठी सहित गन्हकैत नालीमे फेंकि देलक। ओइ भभकैत नालीमे हम लसकल छी, नाक मूनने। हल्ला कऽ कहि रहल छिऐ- "हओ, ठाढ़ हुअ। हमरो संग नेने चलह।" किन्तु के सुनत? संकटकालमे तँ लोक केहनो प्रिय बेकतीकेँ संग छोड़ि दैत छैक। आ हम तँ नेता छी...। तँए हम तँ सबहक प्रिय। किन्तु कियो नै अबैत अछि। महकैत नालीमे धँसल जा रहल छी। 'हे देव, डुमै छी। तँ हाथ पएर मारह।' नालीसँ निकलबाक लेल हाथ-पएर जोर-जोरसँ चलेलौं। स्त्रीकेँ झकझोरबसँ निन्न टुटि गेल। तामससँ थरथराइत पत्नी बाजि रहल अछि- "दिन कऽ गारि आ रातिमे माइर। हमरा ई जिअ नै दैत। हम आब रहि नै सकैत छी।" "देखू एना नै बाजू। पड़ोसिया सुनत तँ की कहत। हमरा तँ मोने नै रहल जे घरमे अहाँ लग सूतल छी। हम तँ सपनामे कतए सँ कतए बौआ रहल छलौं। आब अहाँ जे कही।" "अच्छा, अच्छा बुझलौं। भोर भऽ गेल छै। दुआरपर सँ कियो सोर पाड़ि रहल अछि। उठू, देखियौ।" "की देखबैक। वएह सभ हेताह।" "के सभ?" "आइ तँ नमनेशन देबाक लेल जाइक छै ने। संगे-संग जइबला संगी-साथी सभ।" "ठीके तँ अछि। अहूँ नहा-सोना कऽ तैयार भऽ जाउ। चलि जाउ सवेरे।" "धुर, हमरा राजनीति करनाय ठीक नै लगैत अछि। ई कोनो नीक करम नै अछि।" "हेओ, अहाँ सपनामे धसना खसैत तँ नै देखलिऐ। आकि एलेक्सनक भूत चाँपि देलक। काल्हि तक जइ राजनीति-के गुण-गान करैत छलिऐ, आइ ओकरा अधलाह कहैत छिऐ।" स्वरकेँ अकानैत फेर बजली- "अच्छा जाइयौ, दुआरिपर सँ सोर पाड़ैत अछि।" हाथ-मुँह धो कऽ हम दुआरिपर पहुँचलौं। देखैत छी- गौआँ-घरूआ, सँगी-साथी किछु नव सिखुआ नेता सभ एका-एकी दुआरिपर जमा भऽ रहल अछि। एकटा छोटका भीड़ सन। भीड़सँ स्वर निकैल रहल अछि- "अँए यौ, अखनी तक अहाँ तैयार नै भेलौं। कागज-पत्तर लिअ। आ जल्दी चलू। सभसँ पहिले।" "हाँ-हाँ सभसँ पहिलुक नमनेशन अपने सभकेँ दाखिल हेबाक चाही।" "जल्दी नमगरहा कुरता लगाऊ। अरे, मुँह की तकै छेँ। छिपगरहा लग्गामे झण्डा बान्ह।" हमरा ठाढ़े भेल देख एक गोटे बजल- "रौ तोरीकेँ, नेताजी अहाँ ठाढ़े छी। जल्दी करू। साम-दामक संग चलैक छै।" तैयो हम असमंजसमे ठाढ़ छी। पच्छिमभर सँ चटपटिया काका अपस्यिॉंत हएत पहुँचल। भीड़केँ देख ओकर पएर ठमकल। ओ जोरसँ बजल- "हौ, एकटा गप्प बुझलहक। पछबरिया सड़कक कातमे एकटा नेताजी केँ टाँग-हाथ तोड़ि कऽ राखि देने छै। ओ नुए बसतरे सभ करम केने पड़ल अछि।" "धुर सभटा फूसि। खाली झूठे बजै छी- अहाँ।" "नै हौ, देख आबहक, अपनेसँ। किरिया खा कऽ कहै छिअ। कुहरै छै। अखने पानि पिआ कऽ एलिऐ।" "छोड़ ऐ गप्पकेँ। सभ एलेक्सनमे तँ अहिना होइ छैक। कतेक नेता मरतै-हारतै। अन्तमे जे बचत आ जीतत। तेकरे राजतिलक लगतै।" "चलू बहादूर, डर नै राखू।" "यौ ठकमुड़ी किए लगल अछि।" हमरा लगैत अछि- ई सभ आब नै मानत। हमरा जबरदस्ती ने लऽ जाए। हम कोनो शर्तपर नै जाएब। हमरा नस-नसमे डर ढुकल जा रहल अछि। मिटिंगमे नेताजी कहने रहैथ- "पहिले शिक्षा प्राप्त करू। संघर्ष करू आ तब बढ़ू सत्ता दिस।" तँ कि हम शिक्षित नै छी। एकता करबाक लेल प्रयास करैत रहलौं। आब जे समए आएल तँ सत्ता प्राप्त करैक लेल कोशिशमे लगलौं। फेर ई डर कतएसँ आबि गेल। लगैत अछि तरे-तर कण्ठ मोकने जा रहल अछि। बेकार एलेक्सनमे ठाढ़ हेबाक हवा फैला देलिऐ। सात दिनसँ सुनि रहल छी- विपक्षी सबहक गपशप। शाइत ऐ एलेक्सनमे हमर मौत लिखल अछि। गामक सम्पन्न आ दबंग मालिक सिंहजी सेहो कहैत रहए- हमरा बेटाक एण्टीमे ठाढ़ हएत ओकरा साफ कऽ देबै। चारिम दिन सिंह जीक भाय हमरा समझाबैत कहने रहए- "हौ धिया-पुताकेँ पढ़ाबह-लिखाबह आ घर दुआरि नीकसँ बनाबह। किएक राजनीतिक फेरमे पड़ल छह। राजनेती छिऐ आन्हर बिहाड़ि। तोहर घर-परिवार तगतगर नै छह। ऐ बिहाड़िमे अपनो उड़ि जेबहक आ परिवारो नाश भऽ जेतह। तोरा पासमे राजनीति करैबला सामरथ कहाँ छह। छोट जातिमे जनमल, छोट परिवारक लोक छह। तोरा बुत्ते ई नै हेतह।" लगैत अछि हमर धीया-पुता अनाथ भऽ जाएत आ पत्नी विधवा। संगी-साथीक की हेतै। फाँटिपर तँ हम चढ़बै। धुर नै ठाढ़ हएब हम। कहि दैत छिअ साफे-साफ। जोरसँ बजै छी- "हे यौ, हम एलेक्सनमे नै ठाढ़ हएब। दोसरे गोटेकेँ ठाढ़ करू। हम समर्थन करबै।" सभ अवाक्। भीड़ बजैत अछि। "गाछ चढ़ा कऽ छह मारै छेँ। कतौ मुँह देखेबाक जोग रहब-हम सभ। नै, आब से नै हेतह। ठाढ़ हुअए पड़तह।" सोचै छी- हमरा पासमे बड़का माथ नै अछि। कनियो हुसि जाएब तँ जेल जाएब। आब हमरा भागए पड़त दोसर कोनो उपाइ नै। देह जेना थर-थराए लगल। जोरसँ बजलौं- "हमरा बोखार लगि गेल। अहाँ सभ चलि जाउ। हमरा बुत्ते एलेक्सन लड़ल नै हएत।" ओतएसँ पड़ेलौं आँगन आबि बिछौनपर धाँइ दऽ खसि पड़लौं। खिसिआएल लोक किछुसँ किछु बजैत एका-एकी जा रहल अछि। सभ चलि गेल तँ निचेन भऽ निसाँस छोड़लौं। पत्नी लगमे आबि हमरा निहारि रहल अछि। पुछलिऐ- "एना किए तकै छी?" बजलीह- "देखै छी जे अहाँ मौगी छी की मरद। अहाँ एतेक मौगियाह छी, हमरा पता नै छल। आब तँ हमरा लाज होइए जे एहेन मौगाक संग केना कऽ जिनगी काटबैक। अहां घरेमे रहू एलेक्सनमे ठाढ़ हेबाक लेल हमहीं जाइ छी।" कहैत ओ फुरतीसँ निकैल गेली। हमरा भीतरीमे जेना तूफान सन उठए लगल। मोनमे आबए लगल किछु शब्द सभ- डेरबुक.... साफ कऽ देब.. बिहाड़ि.. परिवारक नाश.. सत्ता.. राजनीति.. मौगियाहा..! किछु काल तक मोन औनाइत रहल। फेर जेना भीतरमे किछु उगल। मेघकेँ फाड़ि जेना सूरूज उगि गेल हो। धड़फड़ा कऽ उठलौं। कुरता पहिरिलौं। झोरा कान्हमे लटकेलौं। आ आँफिस दिस दौगैत जा रहल छी। मुहसँ जोरगर स्वर स्वत: निकैल रहल अछि- "चलू जल्दी चलू। हम एलेक्सनमे ठाढ़ हेबाक लेल जा रहल छी।" फेर दौड़ए लगलौं। एतेक पछुआएल छी तँ दौड़हि ने पड़त। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.राजदेव मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.नन्द विलास राय ६.जगदीश प्रसाद मण्डल ७.दुर्गानन्द मण्डल ८.रामानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राजदेव मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक राजदेव मण्डल केर पाँचटा कथा कथा ५ रखबार धानसँ भरल खेतमे गाछ सुतल अछि। पैछला साल तेहेन भंयकर बिहाड़ि आएल जे एक्के थप्परमे गाछकेँ सुता देलक। तहियासँ ई सुतलो अछि आ जगलो अछि। एकर पाँचटा डारि पहरुदार जकाँ ठाढ़ अछि आर टकटकी लगौने सौंसे बाधक पसरल गम्हराएल आ पाकल धान दिस ताकि रहल अछि। "खबरदार, कियो भरल चासमे हाथ लगेबेँ तँ भारी डण्ड-जुरिमाना लगतउ।" ई शब्द सुनमसान बाधमे हवापर हेल रहल अछि। आ ऐ शब्दकेँ सभ नहि सुनैत अछि। सुनैत अछि चोरि कर्ममे संलग्न बेकती। ओकरा तँ अन्हारमे ठाढ़ गाछ लोक सन आ भुक-भुकाइत भकजोगनी हथबत्तीक इजोत सन बुझि पड़ैत अछि। चंचल मन आ भितरिया डर..। चोर कहूँ इजोत सहए। ओना, लोक कहैत अछि- "जे ई गाछ संगहि ई बाध देवगनाह अछि। आ गाछक खाली जगहमे ई पाँचोटा मोटका डारि केतेक दिनसँ ठाढ़ अछि। ओ मुइल वा जीअत रखबार थोड़े भऽ सकत।" ऐ भरल दुपहरियामे असल रखबार तँ भेटत गामपर। चौबटिया गाछतर। सरूपा, गणेशी, भोली और चोरेबाल ताशक पत्ता फेंकैमे अपसियाँत। बुधिक कैंची चलबैत पूरा तागतक संग। जे हारि जाएत ओकरा साँझमे मुढ़ी जलखै आ चाह पीआबऽ पड़तै। तँए सभ अपन दाव-पेंच लगबैमे सतर्क। ओना, चिन्ताक कोनो गप नहि। किछु गिरहतक धान पाकि गेल अछि। दू-चारि दिनमे कटि जेतइ। कटतै किए नहि। ओ सभ बुधिगर आ चंखार गिरहत अछि। धानक बीआ शहर-बाजार आ बाहरसँ मंगाकऽ समयसँ पूर्व लगौने अछि। मास दिन पहिने काटियो लेत। नवका धान, ब्लौकिया बीज। बुढ़ सभ ओहिना चिचिआइत रहत जे ऐ अँगरेजिया धानमे तागत नहि होइ छै। ई पुरनका राग अलापलासँ देश-दुनियाँ ठाढ़ थोड़े रहत। ई तँ आगू बढ़ैत रहल अछि आ बढ़ैत रहत। नव अविष्कारकेँ रोकि सकैत अछि। किन्तु ऐ नवका धानक चोर बड़ बेसी। चिड़ै-चुनमुनी आ जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ लोक-वेद धरि। चोरा कऽ धान छोपता रखबार। मुरही लेता आ चाह पीबता आ नाम लगतैन चोरकेँ। चोरेबलाकेँ गामक लोक कहबामे सुभीताक लेल चोरबा कहैत अछि। चोरबा नाम रहितो ओ इमनदार अछि। किछु खेतीसँ आ किछु रखबारिक धन बचा कऽ हरेक साल जमीन कीनैत अछि। अहिना ढोलाय मड़र परिश्रम करैत आर इमानक संग रखबारि करैत छल। आइ ओ सम्पन्न गिरहत बनि गेल। तहिना चोरबो बनि जाएत। किए नहि बनत? ओ अपन इमान बचौने अछि। लगन लगा कऽ काज करैत अछि। असल चोर आ लुच्चा तँ अछि मुसबा रखबार। केकर जजाति आ फसिल कखन काटि-छोपि लेत वा कटबा देत से केकरो पता नहि। गामक केतेक लोक विरोध केलक जे मुसबाकेँ ऐगला बरिस रखबारसँ हटा देबइ। किन्तु ऐगला बरिस पुन: रखबारिक लेल एक नम्बरपर मुसबाक नाम। एकर सभसँ पैघ कारण रामशरण सिंह। सिंहजी गामक सभसँ पैघ गिरहत। सभ दृष्टिकोणसँ। हुनक खेत-पथारकेँ देखबा-सुनबा और रखबारिक पूर्ण जिम्मेवारी मुसबेपर रहैत अछि। बारहो मासक लेल। मुसबाकेँ नामो बदैल गेल अछि। सभ गोटे ओकरा रखबारे कहै छइ। मुसबाकेँ रखबार रहलासँ सिंहजी केँ दूटा फैदा। रखबार सौंसे गामक किन्तु सिंहजीक खेतीकेँ विशेष देखभाल। दोसर ई जे बारह मासक मजदूरी मुसबाक भेटबाक चाही। किन्तु सिंहजी तीन मासक मजदूरी कम दइ छल। आ ई कहि संतोख दइ जे तीन मासक लेल तँ तू गामक रखबार रहै छी। तोरा गाम दिससँ रखबारिमे अनाज भेटते छौ। तँए तीन महिनाक काटि कऽ भेटतौ। सभ गप बुझितो मुसबा अपना समांग जकाँ सिंहजीक खेती-पथारीकेँ देखैत छल। आर अपनाकेँ धन्य बुझै छल। ओ सोचै छल जे सिंहजीक किरपा रहत तँ हमरा कियो रखबारिसँ हटा नहि सकैत अछि। संगे समाजमे जे नीक-अधलाह करैत छी वा बजै छी तेकर बादो हमरापर किछु नहि होइत अछि। सिंहजीक परभावसँ बचल रहै छी। आब रखबारो चुनैत काल गाममे बड़ राजनीति होइत अछि। के बेकती कोन पैघ गिरहतसँ मिलल अछि आ केकर गपक परमुखता समाज देतइ। केकरा रखबार राखि लेत आ केकरा हटा देतइ से कहब मोसकिल। पहिले ई सामाजिक बेवस्था छल जे गामक पंचायतमे सभसँ बेसी जमीनबला मालिक जेकरा सभकेँ चुनि दइ छल ओ सभक रखबार भऽ जाइ छल। किन्तु बादमे ऐ गपक विरोध भेलइ। धन आ शिक्षा बढ़लासँ सभ जाति अपन-अपन सिर उठौलक। तँ आब सभ जातिसँ एक-एकटा रखबार राखल जाइत अछि। जेकर संख्या कम अछि तँ दू जाति मिलि एकटाकेँ राखल जाइत अछि। एनामे के रखबार रहता के हटता से कहब मोसकिल। कोन गिरहतसँ केकरा बेसी परेम भाव अछि। जे ओकरा लेल पंचायतमे लड़त। आ ओकर गप रहिये जाएत, कहब कठिन। ओना रखबार बनैले बहुत गोरे तैयार रहैत अछि। ऐसँ दूटा लाभ। अपना खेतीकेँ रखबारि नीक जकाँ तँ होइते अछि। संगे, रखबारिसँ प्राप्त विशेष आमदनियोँ। तँए ऐ काजक लेल बहुत गोटे तैयार। किन्तु बनताह तँ भाग्यबला। तैयो किछु एहनो तेज आ गुणी बेकती अछि जे सभ साल रखबार बनबे करत। ओहने बेकती अछि मुसबा। पाँचो रखबार मिलि रखबारिबला धान मुसबा ऐठाम जमा राखत। ओइठाम दौनी करा कऽ पाँचटा कुड़ी लागत आ सभसँ बड़का कुड़ी मुसबे उठा कऽ लऽ जाएत। मुसबाक परिवारोमे कोनो बेसी काज नहि। रखबारिक लेल एकदम ठीक बेकती। राति-बिराति ने चोर-डकैतक डर आ ने साँप-कीड़ाक। चाकर-चौरठ, भुटगर कारी देह। पैंतालीस बरख उमेर भेलाक बादो जुआन सन लगैत अछि। अकेल खड़ खाइबला। गाममे मारा-पीटी केलाक कारणेँ दू बेर जहलसँ खिचड़ी खा कऽ आपस आएल अछि मुसबा। पत्नी दमा रोगक कारणेँ दिन-राति खोंखियाइत पड़ल रहैत अछि। चारि बरख पूर्व एक राति पुतोहुसँ थप्पर-मुक्का करैत छल। जुआन बेटा किम्हरोसँ आएल। पत्नीकेँ बेसी मारि लगैत देख ओहो मुसबाकेँ मारए लगल। मुसबा करोधमे आबि मोटका डेढ़हत्थीसँ बेटाक कपार फोड़ि देलक। ओही दिनसँ बेटा-पुतोहु भीन भऽ गेल। बेटा दिल्लीमे कमाइ छइ। आ जाति काल ओ अपना पत्नीकेँ भाला-बरछी देने गेल अछि। आर कहि गेल अछि- जँ हमर बाप तोरासँ झगड़तौ तँ सीधे भाला भोंकि दिहैन। ओ तोहर ससुर नहि काल छियौ। ऐ गपक पूरा पता मुसबाकेँ छै। तँए ओकरा केतौ डर नहि किन्तु आँगनमे डेरा जाइ अछि। हेओ अपनो गाछी बड़ भुताह। भरि दिन मुसबा बाधक ओगरबाहि करैत अछि आ साँझखिन चौकपर सँ ताड़ी पीब अबैत अछि। आ निशाँमे मातल अधरतियोमे अल्हा-रुदलक गीत गाबए लगैत अछि। चोर-चहार घसवहिनी बाध जाइते ओकरा डरे थरथर काँपए लगैत अछि। कहीं मुसबा आबि गेल तँ की हएत तेकर पता नहि। बेसी काल मुसबा ओही सुतलाहा गाछक झोंझमे बैसल रहैत अछि। किन्तु अखन तँ ओइठाम अछि सिहारवाली सुमनी अर्थात जोखनक पुतोहु। कद-काठी बेस नमगर-छरगर गोर पतरिया चमरी। ओकर पति फेकुआ चारि मास बाहर खटैत अछि तँ दू मास गामपर रहैत अछि। अगहन आ अखाढ़क समयमे गिरहतक काज करैत अछि। सुमनीकेँ तीन बरख पहिने एकटा सन्तान भेल रहइ। तेकरो छठिहारक राति पछुआ दाबि देलकै। तेकर बादसँ कोखि नहि भरल। किन्तु सुमनी ऐ बातसँ निराश नहि अछि। ओ बुझैत अछि जे आइ ने काल्हि बाल-बच्चा हेबे करत। आब तँ शहरमे बड़का-बड़का डागदर बैसैत अछि। ओकरा बाल-बच्चासँ अधिक चिन्ता खेती-पथारी बढ़ेबाक अछि। ओ माल-जालसँ उन्नैत करबाक लेल परेशान रहैत अछि। तँए दुपहरियाक टह-टह करैत रौदमे सुमनी घास छिलबाक लेल निकलल अछि। की करत बेचारी। घर-अँगनाक काज ओकरे करए पड़ै छइ। बुढ़िया साउस हरदम बीमारे रहैत अछि। ससुर कखनो-काल खेत-पथार देख अबैत अछि। से बात ठीक किन्तु दुआरपर अबिते बुढ़बाकेँ अस्सी मन दुख सवार भऽ जाइ छैन। आ अनका दरबज्जापर खूब गप हाँकैत रहै छैथ। सभकेँ फरिया कऽ कहैत रहै छथिन- "बेटाकेँ बाहर चलि गेलासँ बेसी काजक भार अपनेपर पड़ि गेल अछि। एको पल पलखैत नहि रहैए।" किन्तु सभटा फूसि। सभसँ अधिक खटनी सुमनीकेँ। तैयो सुमनी अपना साउस-ससुरकेँ निरादर नहि करए चाहैत अछि। कारण ई अछि जे बिआहमे सुमनीक बापसँ एकोटा रूपैआ दहेजक नाओंपर नहि लेलक। बादोमे ऐ बातक लेल उलहन-उपराग नहि देलक। संगे, सुमनी जँ बीमार पड़ैत अछि तँ ओकरा ससुर दबाइ-विर्रो करबामे एकोरत्ती कोताही नहि करैत अछि। साउस दिन-राति सुमनीक सेवा-टहलमे लागल रहैत अछि। सुमनी सभ दिनसँ कनी झनकाहि आ बजै-भुकैमे टेँटियाह। किन्तु साउस -ससुर ओकर बातकेँ सहज भावसँ स्वीकार करैत अछि तँए साउस-ससुर आ पुतोहुमे खूब गाढ़ परेम छइ। जहिना माइक दुलारि तहिना साउसक दुलारी। कोनो बातमे अड़ि जाएब। अपना मोनक अनुकूल। ई लक्षण ओकरा बेदरेसँ अछि। मात्र दू दिन दियारीकेँ रहि गेल अछि। जइसँ काज आरो बढ़ि गेल अछि। जिनकर घर टाट-बाँसक अछि। दिनभरि घर-आँगनमे गोबर-माटिसँ घरबा-दुअरबा खेलैत रहू। केतबो नीपब-पोतब तैयो एकटा कोनचर टुटले रहत। तैयो सभ अपना पड़ोसियासँ प्रतिस्पर्द्धा करैत काजमे व्यस्त। गाछक छाँहमे बैसल सुमनी सोचि रहल अछि। सोचबाक नहि चाही। चोरिसँ पूर्व जँ कियो सोचए लागत तँ चोरि हेबै नहि करत। फेर पुलिस-दरोगा कोन काज, कोर्ट-कचहरीक कोन काज। किन्तु चोरोकेँ कखनो-काल सोचए पड़ैत अछि। खास कऽ नवका चोरकेँ। चोरो तँ बहुत प्रकारक होइत अछि। तहूमे ई तँ चोर नहि चोरनी छल। तँए बेसी सोचै छेली- "लार-पुआरक अभाव भऽ गेलासँ गाए-मालकेँ सभसँ बेसी दिक्कत। आब जँ टगली बेरमे घास छिलब तँ साँझ तक घास छिलैत रहि जाएब। बगलमे खसलाहा धान अछि। छाँहमे धान तँ हएत नहि। ओहो गाछतर दबल अछि। एतेक बड़का गिरहतक अछि। दस मुट्ठी छोपि लेलासँ एकर की बिगड़तै। किन्तु हमर तॅं बिगड़त। दुधगर गाएकेँ खाइक तिरोटी भेलासँ दूध सुखि जेतइ। दोसर बहनजोर बाछीकेँ भरि पोख घास नहि भेटलासँ ओहो कमजोर भऽ जाएत। अखन तँ बेबस आ नाचार छी, नचारक आगू विचार की। एकरा कुकरम नहि कहल जा सकै छइ। ऐ बेरसँ हम अपना पतिकेँ बाहर कमाइले नहि जाए देबै। रूपैआ कमा कऽ अनबे करता। एकटा आरो गाए खरीद देबइ। तीनू गाएकेँ पालब-पोसब आ दूध चौकपर उठौना लगा देबइ। तेना कऽ रस्ता लगेबै जे एकटा बिआएल रहत तँ दोसर गाभिन। आब एकरे पालि बढ़ेबाक अछि। सम्हारल नहि हएत तँ एक-आधटा केँ बेचि खेतो कीनि लेब। चाराक दिक्कत अछि तँ पछुआरक बाड़ीमे घासक बीआ बुनि देबइ।" ओ कलेजाकेँ मजगूत केलक। रखबारसँ कन्नी काटि कऽ आएले रहए। हाँइ-हाँइ धान छोपए लागल। पहिलेसँ काटल घासक पथियाक लगमे गेल। गम्हराएल छोपल धन पथियामे रखलक, ऊपरसँ घास फुलका कऽ राखि देलक जइसँ धान देखबामे नहि आबि सकइ। तरका धान ऊपरका घाससँ झँपा गेल। तब जेना भीतरुका थरथरी कम हुअ लागल। सुमनीकेँ बुझेलै जेना पाछूमे कियो ठाढ़ भेल हो। आ ओकर सभटा अधलाह काज देखैत हो। फेर सोचलक जे एतेक टह-टह करैत दुपहरियाक रौदमे के एता। ई सोचैत सन्तोख भेलइ। खर्र-खर्र जेना पाछूमे किछु खड़खड़ाएल हो। सुमनीकेँ डर पैस गेलइ। मनमे उठलै- साइत भूत-प्रेत छी। घुमिकऽ पाछू उनैट देखलक आ देखते रहि गेल। मुँहक बोली बन्न भऽ गेलइ। छातीक धुक-धुकी तेज भऽ गेलइ। हाथ-पएर जेना कठुआ गेलइ। किन्तु एहेन स्थिति बेसीकाल तक नहि रहल। तत्क्षण आएल परिस्थितिसँ लड़बाक क्षमता मनुक्खमे आबि जाइ छै। ई क्षमता किनकोमे किछु कम किनकोमे किछु बेसी। मुदा रहै छै जरूर। अपना देह आ मनकेँ सामान्य करबाक चेष्टा करैत सुमनी घासक पथिया उठेबाक चेष्टा केलक। मुसबाक कड़कैत सवर निकलल- "ऐ, घासक पथिया उठा नहि सकैत छेँ। आइ धरा गेलँह। दस दिन चोरकेँ तँ एकदिन साधुकेँ। ओइ दिन गामक लगीचमे रही तँ गारि दैत गामपर चलि गेलँह। अखन चिचिएबो करबीही तँ एतेक दूरसँ कियो सुनतौं।" यादि पड़ल सुमनीकेँ ओइ दिन मुसबा सुमनीकेँ देखैत ऐँठ कऽ बाजल रहए- "बाधमे धान रहए चाहे घसबहिनी। सबहक मालिक मुसबा। जे मन हेतै से करबै।" इएह सुनिकऽ सुमनी गारि दैत चलि गेल रहइ। सुमनीकेँ चुप देख मुसबा फेर बाजल- "आब तँ तोरा जरिमाना लगबे करतौ। कियो नहि बँचा सकै छौ।" सुमनीकेँ स्मरण भऽ उठल। ससुरक लाठीक हूर। साउसक खोंरनीक मारि। भरल पंचायतमे छौड़ा सबहक पिहकारी। जरिमाना जे लगत से अलगे। तैयो ओ हिम्मत बान्हलक- "हम दोसराकेँ खेतमे हाथ नहि देलिऐ। हमरा पथियामे कहाँ किछु अछि। लोक घासो नहि कटतै। माल-जालकेँ एतेक दिक्कत छइ। हमरा बेर भेल जाइत अछि। हम जा रहल छी। हमरा कियो नहि रोकि सकैत अछि।" पथिया उठा कऽ सुमनी चलल। करोधमे आबि मुसबा घासक पथिया ठेल कऽ गिरा देलक। आ घास उझैल कऽ छिड़ियाबैत बाजल- "ई की छियौ? आब केना बँचमेँ?" सुमनी लाजे कठुआ गेल मुदा कोनो बहन्ना तँ करए पड़त सुमनीकेँ। बाजल- "ई धान हम अपना खेतमे कटलौं। माल-जालकेँ बँचेबाक लेल तँ कोनो उपाए करए पड़त।" मुसबा ओकरा देहकेँ गहिकी नजैरसँ देख मुड़ी हिलबैत बाजल- "हँ, अपना मालक जान बँचा आ दोसरकेँ गरदैन काट। गे कहै छियौ आबो लत हो। हमर बात सुन। साँपो मरि जाएत आ लाठियो नहि टुटत।" समनी सोचलक, कहीं कोनो नीके गप कहैत हुअए। डुमैत काल तिनका भेट जाए। पुछलक- "अच्छा की कहए चाहै छहक।" मुँहक सुपारीकेँ चपर-चपर करैत, आँखि-मुँह चमकाबैत मुसबा बाजल- "कहबौ की। केतेक दिनसँ आस लगौने छी। केतेक बेर तोरा इशारासँ कहबो केलियौ। एक बेर हमरा मनक आस पूरा कर आ तब देख तोरा कोनो गपक दुख-तकलीफ नहि हुअ देबउ। की मौगियाह फेकुआकेँ पाला पड़ल छेँ। सुन्नर जुआनीकेँ गारथ कऽ देतौ।" सुमनी थरथर काँपैत, ललियाएल आँखिये मुसबा दिस तकलक आ सोचलक- उमेर देखहक आ पपियाहाक गप सुनहक। जँ इज्जत नहि रहत तँ जीब कऽ की करब। किन्तु लगैत अछि जे आइ जाबे देवी महरानी नहि बँचाएत ताबे नहि बँचब। अपन शक्तिकेँ संग्रह करैत कड़ैक कऽ सुमनी बाजल- "रे तोरा बाजै-के ठेकान छौ कि नहि। सभ धन बाइसे पसेरी बुझै छीही। बड़ खेत खेने छी। आइ सभटा बोकरा देबउ।" कठहँसी हँसैत मुसबा एकरा मौगीक मलार बुझि लपैक सुमनीकेँ बाँहि पकड़लक। ऐ बातमे मुसबा पहिनहिसँ अभ्यस्त छल। केतेकोकेँ साथे कुकरम केने छल, किन्तु आसक विपरीत मुसबाकेँ सुमनी एक ऐड़ मारलक। मुसबा फेर उठि सुमनी दिस बढ़ल। ओकरा बुझेलै घोड़ापर सवारी करबाक लेल एक-दू चौतार तँ सहए पड़ैत अछि। धाक छुटल नहि छइ। कनी बलजोरी कऽ देबै तँ की कऽ सकैत अछि, ऐ सुन-मसान बाधमे। बात बढ़तै तँ सिंहजी गिरहत अछिए। ओकर किरदानी देख सुमनीक सौंसे देह आगि नेस देलक। आँखि लाले-लाल थरथर कँपैत शरीर। बाजल- "सोझहासँ भागि जो नहि तँ..।" किन्तु मुसबा नहि रूकल। आगू बढ़ल हँसुआ नेने सुमनी हुड़कल। चर-चर-चराक हँसुआक प्रहार कुरताक संगे मुसबाक कनेक छातीयो चिरा गेल। आँखि उठा कऽ देखलक तँ बुझि पड़ल ओ सोझामे सुमनी नहि कियो आन ठाढ़ अछि। साइत गाछक झोंझसँ कोनो देवी ओकरापर सवार भऽ गेल। हाथमे खूनसँ भीजल हँसुआ नेने, साड़ीक ढठा बन्हने करोधसँ करियाएल मुख, लाल-लाल आँखि, थर-थर कँपैत मुसबा दिस बढ़ल आबि रहल अछि। गरजैत बाजल- "आइ सभटा खून बोकरा देबौ। सभटा पाप पेट फारिकऽ निकालि देबौ, ठाढ़ रह ओहीठाम।" मुसबाकेँ बुझेलै जे आब प्राण बँचाएब मोसकिल अछि। ओ खिखिर जकाँ पाछू उनैट पड़ाएल। धाँइ-धाँइ खसैत पड़ा रहल अछि। ओकरा बुझि पड़ैत अछि जे पाछूसँ खूनमे भीजल आँखि आ हँसुआ नेने सुमनी दौड़ल आबि रहल अछि। आबि रहल अछि। निश्चय मनुक्ख नहि देवी चढ़ल छै ओकरा देहपर। ओ चिचिया उठल- "हौ मालिक, हौ गिरहत, दौड़कऽ आबह हौ।" किन्तु केतौ कियो नहि अबैत अछि। ओ अपस्यिॉंत भऽ गेल अछि। हलफ सुखि रहल अछि। आँखिक आगू अन्हार सन बुझि पड़ैत अछि। फेर मोन पड़िते जोर-जोरसँ पाठ करए लागल- "जय हनुमान ज्ञान गुण सागर.. जय कपीश तिहुँ लोक उजागर.!" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- डऽर कथी के कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा डऽर कथी के चहुदिस घुप्प अन्हरिया! पूसक कुहेस स्ट्रीट लाइट के इजोतो के अप्रभावी बना देने छलै। अल्पना घड़ी देखलक - साढ़े आठ! बस स्टैंड सुनसान तऽ नहिं छलै .. एक कात किछु पुरुख आ दोसर कात किछु स्री...... पुरुष सऽ स्त्री के संख्या किछु बेसिये । दुहू पक्ष जेना पूर्वपरिचित तहिना हँसि-हँसि बात करैत। एकरा नीक तऽ नहिं बुझेलै तैयो स्त्रीगणे दिस ठाढ़ हैब उचित बुझलक। बस के कोनो पता नहिं छलै। एकटा बस एबो केलै तऽ बिलमलै नहिं । एकर खौंझी बढ़ल जा रहल छलै। आन दिन अबेर भइयो जाई तऽ ऑफिसक गाड़ी घर छोड़ि आबै। आई त' ऑफिस मे कोनो गाड़ी छलैहे नहिं। ओ फेर घड़ी दिस देखलक .... पौने नौ! एकटा ऑटो आबि क' ओकरा लग रूकलै आ ड्राईवर ईशारा केलकै बैऽ लेल। यंत्रवत ओ ऑटो मे बैस गेल बिना किछु सोचने वा कहने। ऑटो चलैत रहलै। "मैडम! आहाँ गलत जगह पर ठाढ़ छलहुँ। ओ सभ नीक घरक स्त्रीगण नहिं रहै छै। आहाँ के जेबाक कतऽ अछि?" ऑटोबाला पुछलकै तखन ओकर ध्यान भंग भेलै। ओ भीतर तक डरे सिहरि गेल। आई नहिं जानि की भ' जइतै! मुदा एखनो ओ सुरक्षित अछि? अनजान ऑटो ..... वीरान बाट ...... किछुओ भ' सकैत छै.... निर्भया, उबेर ..असंख्य घटना!!! ओकर देह भुलकि गेलै.. रोआँ ठाढ़ भ' गेलै। "मैडम कतऽ जेबै से कहलियै नहिं?" - ड्राईवर फेर पुछलकै तऽ ओ हड़बड़ैल "चर्च रोड....... विगर जिम के बगल मे।"फेर सऽ संभावित अनिष्टक आशंका के सोचैत ओ अपन सुध-बुध बिसरऽ लागल .... एक दिस इनार दोसर दिस खाधि....... दुनू अथाह! ओकर ध्यान भंग भेलै कॉलोनी के पूवरिया गेट देखि कऽ "रोकऽ....रोकऽ .... हमरा एतहि उतरै के अछि।" ऑटो के ब्रेक लगबै स पहिने ओ सौ रूपया के नोट ड्राईवर के पकड़ा बदहवास दौड़ैत जकाँ गेट मे घुसि गेल .... बिना एम्हर-ओम्हर देखने ! ऑटो ड्राईवर बदहवास पड़ायल जाईत अल्पना के आ फेर अपन हाथक सौ रूपया के नोट के देखलक। ओ सोचैत घुरि रहल छल .... साईत डरा गेल छल; मुदा ककरा स?? -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- धोखा ३.२.आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल ३.१.राज किशोर मिश्र- धोखा राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी धो खा
वि श्वा स -दी प जरैत रहए, देखब, कखनो ने मि झा इ, अन्हर -बि हा रि सेहो अओतए, मुदा टेमी , जरि ते जा इ ।
अछि ने ई सा मा न्य दी प, ई बा ती छै वि श्वा स क' वि श्वा स -इजो त फल छै एकर बर्खक बर्ख प्रया सक।
भरो सा क' मुख -मंडल पर, हो इत अछि नहि , छल -छद्मक' दा ग, सदि खन ऊँच रहैत छै मूड़ी , सुशो भि त ओहि पर नि ष्ठा -पा ग।
अधि का र -पत्र ओ शपथ -पत्र लए की करतै वि श्वा स? ई अछि सुच्चा ओहि ना , जहि ना अछि नि र्मल आका श।
मजबूत एहेन एकर बन्धन, अटूट जतय वि श्वा स, टूटि सकय नहि ई ता धरि , जा धरि , तन मे श्वा स
भरो सा के जे पा त्र नहि , सबतरि , पबैत अछि अपमा न, कतबो दस्ता वेज दि आ देत, वि श्वा स क' स्था न?
भा ङ्गल वि श्वा स धो खा अछि , शा र्गि द जकर छै, छल -प्रपंच, भरो सा तो ड़ए के नेआर , षड्यंत्र करैत अछि ,सञ्च -मञ्च।
धो खा -क्षेत्र मे उगैत अछि , वि श्वा सघा त के शूल, क्रूरता ओ कपट हो इत छै, एहि केँ सभ सँ मूल।
हृदय छद्म -छल सँ भरल, षड्यंत्र बनल, भुजदण्ड, लो भ -का लि मा सँ पो तल, कुटि ल -मुह, महा प्रचण्ड।
धो खा -मुख, मी ठ सँ भरल, अछि ई परञ्च भुजंग, अवसर पा बि कटबे करत, देखा देत नि ज रंग।
धो खा के अछि जे नगरी , ओ मि थ्या मा णि क्य सँ रहैछ सजल, हो इत रहैत छै सदि खन ओत ' षड्यंत्रेक को नो चहल -पहल।
कनक -आसन सभ अछि बनल, फुला एल, कुटि ल कपट -शतदल, बनसी , मी न हेतु जेना पा थल, भो जनो ओहि ना अछि परसल।
अति थि -सत्का र मे व्यस्त लो क, कि ओ आर नहि , ओ सभ अछि शठ, अवसर जखने भेट गेलै, छो ड़ैत नहि अछि , धो खा के हठ।
छद्म भरल एहि नगरी मे, वि श्वा स क'रक्त बहा ओल जा इछ, मी ठगर -मी ठगर गी त गा बि , छल - -वि जय -उत्सव मना ओल जा इछ।
मुदा , कलंक वि श्वा सघा त के, सा टल अछि जकर कपा र, के पति आओत ओकरा पुनि , के, करत पुनः ओकरा स्वी का र?
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल १ खिचने गेलै जिंदा खाल लगुआ भगुआ जहरीलाल
भीतर लगलै कसगर चोट बाहर खाली कादो थाल
इम्हर चूबै अगबे घाम उम्हर बाजै सुर लय ताल
कानूनक अछि नवका नाम टूटल हाथक फाटल जाल
एकै टा छथि सभहँक नाथ अतबे आसा सालो साल
सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। २
कविता बहुते जेबीमे सुविधा बहुते जेबीमे
लक्षणा व्यंजना संगे अभिधा बहुते जेबीमे
अपने खातिर रखने छी दुविधा बहुते जेबीमे
हुनका मोनक हवन कुंड समिधा बहुते जेबीमे
तंत्र मंत्र जोगी संगे मुखिया बहुते जेबीमे
सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (षष्ठोच्छवासः) ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (षष्ठोच्छवासः) चम्पूसाहित्ययशो विलासः (षष्ठोच्छवासः) डा. दीपिका (स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च) [चम्पूसाहित्यवाग्विलासस्य षष्ठेऽह्नि भवतां भवतीनां च समेषां हार्दं स्वागतं व्याहृत्य अद्यतनीयविषयवस्तुमादायात्र प्रस्तुताऽस्मि। अद्य महाकविभोजराजपरिचयानन्तरं महाकविभोजराजकृतचम्पूरामायणविषये ग्रन्थानुगुणं विदुषां तत्र भवतां भवतीनाञ्चामोदप्रमोदाय किञ्चित्प्रस्तौमि।] तत्रादौ सर्वप्रथमं ग्रन्थपरिचयः- ग्रन्थे महाकविभोजराजकृतपञ्चकाण्डानि वर्तन्ते एभिस्सहैव षष्ठमं काण्डम् आचार्य लक्ष्मणसूरि विरचितं वर्तते। ग्रन्थोऽयं यस्य संस्करणस्य समुद्धरणं मया दीयते स तु निर्णयसागरप्रेसतः 1898 तमे वर्षे प्रकाशितः वर्तते। अस्य सम्पादकः आचार्यकाशिनाथपाण्डुरंगः वर्तते। 1. बालकाण्डम् 2. अयोध्याकाण्डम् 3. अरण्यकाण्डम् 4. किष्किन्धाकाण्डम् 5. सुन्दरकाण्डम् 6. युद्धकाण्डम् उपर्युक्तानि षट्काण्डानि ग्रन्थकारेण लिखितानि अपि च सप्तमं काण्डं श्रीलक्ष्मणसूरिभिः लिखितम इति आचार्याः स्वयमेवामनन्ति। यथा- साहित्यादिकलावता शनगरग्रामावतंसायित श्रीगङ्गाधरधीरसिन्धुविधुना गङ्गाम्बिकासूनुना। प्राग्भोजोदितपञ्चकाण्डविहितानन्दे प्रबन्धे पुनः काण्डो लक्ष्मणसूरिणाविरचितः षष्ठोऽपि जीयाच्चिरम्॥ अनेन सहैव आचार्यवेङ्कटपण्डितेन लिखितः उत्तरकाण्डोपि वर्तते बालकाण्डस्य आदौ एव मंगलपद्ये मूलग्रन्थकारः भगवतः गणेशस्य चरणद्वयं स्तौति। स निगदति यत् वेदरूपशाखाव्याप्तौ वेदान्तप्रतिपादितौ श्रीगणेशस्य पादयुगलौ यौ कमलानां सौन्दर्याभिमानं दूरी कर्तुं प्रभवतः अपि च इह जागतिकविविधकायाक्लेशनाशयितुं समर्थौ स्तः तादृशौ श्रीदायकौ गणेशपादाम्बुजौ श्रीविस्तरं कुरुतः इति। लक्ष्मीं तनोतु नितरामितरानपेक्ष मङ्घ्रिद्वयं निगमशाखिशिखाप्रवालम् हैरम्बमम्बुरुहडम्बरचौरनिघ्नम् विघ्नाद्रिभेदशतधारधुरन्धरं नः॥ एवमेव द्वितीये श्लोके ग्रन्थकारः ब्राह्मणसमुदायः स्तवीति। चम्पूरामायणे पूर्ववर्तिविदुषां ख्यातिख्यापनं करोति। ग्रन्थकारः चित्रकाव्यप्रियो वर्तते। अनेन सहैवास्मिन् चम्पूकाव्ये श्लेषस्य प्राचुर्येण प्रयोगो दृश्यते। प्रसादगुणस्य निदर्शनम् अपि च ऋतुवर्णनं बहुशः दृश्यते। अस्य ग्रन्थस्य अनेके पाठाः मिलन्ति अतः क्वचित् पाठभेदोऽपि दृश्यते। वाल्मीकिरामायण-चम्पूरामायणयोर्मध्ये अनेकशः श्लोकसाम्यमपि प्राप्यते यथा हि- क्रमः वाल्मीकिरामायणम् चम्पूरामायणम् सन्दर्भः 1. 'गच्छता मातुलकुलं भरतेन तदानघः ......प्रीतिपुरस्कृतः' 'गच्छता दशरथेन ......इत्यादि' अयोध्याकाण्ड 2. 'प्रविश्य तु महारण्यं .....आश्रममण्डलं' 'प्रविश्य विपिनं ........ इत्यादि' अरण्यकाण्ड 3. 'सतां पुष्करिणी......आकुलेन्द्रियः' 'सतां सतां ......जातकम्पः' किष्किंधाकाण्ड 4. 'ततो रावणनीतायाः......पथि' 'ततो हनूमान.....चारणानां' सुन्दरकाण्ड क्रमशः.. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 248 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३५९ म अंक ०१ दिसम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १८० अंक ३५९)|| 247
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