ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६० म अंक १५ दिसम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १८० अंक ३६०) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२२. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२२. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 360 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१०) १.२.अंक ३५९ पर टिप्पणी (पृ. ११-१४) २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-२ (गजेन्द्र ठाकुर) (पृ. १७-४०) २.२.आचार्य रामानंद मंडल- सामरथ के दुख नाहि गोसाईं (पृ. ४१-४८) २.३.आशीष चमन- आदि नदी-कथा कहैत स्त्री (पृ. ४९-५५) २.४.आशीष अनचिन्हार- तीन टा बिन्दु (पृ. ५६-६०) २.५.जगदीश प्रसाद मण्डल- विश्वासहीन (पृ. ६१-६८) २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. ६९-९३) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १७म खेप (पृ. ९४-९६) २.८.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ११) (पृ. ९७-१००) २.९.डॉ बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (७म भाग) (पृ. १०१-१०९) २.१०.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ११०-११६) २.११.आचार्य रामानन्द मण्डल ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ११७-१२०) २.१२.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १२१-१२६) २.१३.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १२७-१३०) २.१४.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १३१-१३४) २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- समानान्तर रेख (पृ. १३५-१३६) २.१६.आचार्य रामानंद मंडल- राजनीति आ अपराध (पृ. १३७-१३८) २.१७.जगदानन्द झा 'मनु'- अनमोल झा जीक पोथी 'टेकनोलजी'क समीक्षा (पृ. १३९-१४२) ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- नव-बसात (पृ. १४४-१४९) ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (सप्तमोच्छवासः) (पृ. १५१-१५३) 2
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३५९ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ Parallel Literature in Maithili and Videha Maithili Literature Movement The Bride: The Maithili Classic Kanyadan by Harimohan Jha (1908-1984) translated into English by Lalit Kumar (Assistant Professor, Department of English, Deen Dayal Upadhyaya College, University of Delhi)- Harper Perennial (Harper Collins Publishers) I had pre-ordered the book, which was scheduled to be delivered to my kindle account on the 1st of December 2022, but the delivery date was postponed and it was ultimately delivered to my account on the 14th of December 2022. When Maithili was recognised by the Sahitya Akademi (National Academy of Letters- of India) way back in 1965, Late Ramanath Jha stated that his Maithili language is saved now (Maithilik Vartman Samasya, Ramanath Jha). The same mistake has been committed by Sh. Harish Trivedi. In his foreword Harish Trivedi writes- "In Hindi, the language to which Maithili is the closest (and of which it was indeed an integral part until it was granted recognition as a separate language by the constitution in 1993)..". Harish Trivedi refers to the inclusion of Maithili in the 8th schedule of the constitution of India. Here the year mentioned should be 2003 instead of 1993. Moreover, Maithili was a separate language in 2003, 1993, and 1965 and also during the time of pre-Jyotirishwara Vidyapati. The status granted to Maithili by Sahitya Akademi and the Constitution of India, on the other hand, strengthened the hands of the obscurantist elements like Ramanath Jha, Shardananda Jha (he is not a famous person but why I have taken his name, I will explain it later) and others who gaslighted Harimohan Jha. Harimohan Jha's Khattar Kakak Tarang, Pranamya Devata, Rangshala and Charchari all these books were eligible for the Sahitya Akademi Award initiated in 1966 for Maithili (as a result of recognition given to Maithili by Sahitya Akademi in 1965. But a philosophy treatise was awarded the prize in 1966, this philosophy book itself is a horrific one, and if one has read the book to understand the nuances of Indian Philosophy, then he will have to unlearn first to be able to grasp the philosophical concepts from a new book on Indian Philosophy. In 1967 no award was given for the Maithili Language. Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example (because Lalit Kumar also seems to have followed in his footstep, though he gives credit for his ignorance to some other writers). He was casteist, conservative and confused. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us on google books in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila"- "The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name.", which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha. So how would this casteist-conservative-confused allow the award to be given to Sh Harimohan Jha? So the Sahitya Akademi saved the Maithili Language by recognizing it, as asserted by Prof. R. Jha, is wrong and so is the assertion made by Sh. Harish Trivedi. Mr Lalit Kumar is a young person, but he is being misused by some obscurantist elements, who gaslighted Harimohan Jha. Harimohan Jha stopped writing in Maithili following the recognition of it by Sahitya Akademi and was awarded the Sahitya Akademi prize for his autobiography in 1985, after his death, which means nothing. Mr Lalit Kumar writes- "Yoganand Jha's Bhalmanusha (1944) and Shardananda Jha's Jayabara (1946) attack such social divisions that played a decisive role in marriages." Yoganand Jha's Bhalmanusha (1944) was indeed a pathbreaking novel but Shardananda Jha's novel was reactionary. Prof Radha Krishna Choudhary rightly observes- "Yoganand Jha's 'Bhalamanusa' deals with the social problems mainly connected with the problem of marriage. As a reply to this novel, Shardanand Jha wrote a second-rate novel 'Jayabara', having little literary merit. (RADHAKRISHNA CHOUDHARY A Survey of Maithili Literature) Mr Lalit Kumar for his Panji-related ignorance gives credit to Mm. Parmeshwar Jha's ''Mithila Tattva-Vimarsha". Prof Radha Krishna Choudhary rightly observes-"Mm. Parmeshwar Jha's 'Mithila Tattva-Vimarsha' is the history of Mithila in Maithili prose and is based mainly on tradition. Mm. Mukunda Jha Bakshi's 'Mithilabhashamaya Itihas' gives an account of the Khandawala dynasty. From the point of view of modern Maithili prose, these two works are important, though from the historical point of view, are unreliable. (RADHAKRISHNA CHOUDHARY A Survey of Maithili Literature) The following excerprt from Our Panji Paband ((part I&II) is being reproduced below for ready-reference:- महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। So the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjīkara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panjī records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014]. Later these Panji Manuscripts were uploaded to google books in 2009). The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So before 1800 CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning. Mr Lalit Kumar further tries to put his agenda by writing- " Harimohan choose a middle ground in his reformist agenda". He gives laughable reasons for his contention viz. "he espouses the significance of local traditions, languages, scripts, education system, and moral values" thereby meaning that these are conservative values! (All the referred books are available for free pdf download from the link http://videha.co.in/pothi.htm ) (to be continued) २ आचार्य रमानन्द मण्डलक ५ टा लघुकथापर हमर टिप्पणी Five short stories by Acharya Ramanand Mandal Acharya Ramanand Mandal has adjudged the following five short stories as his best: 1. Munhfatpan (The Outspoken) 2. Sharab aa Shabab (The wine and the flesh) 3.Mahayajna (The great ritual) 4. Harbah (The ploughman) and 5. Jhapan (The Veil). Acharya Ramanand Mandal is a retired headmaster and a social thinker. He writes in pure Maithili spoken in the birthplace of Goddess Sita (Sitamarhi). The first story deals with a strict officer, who is praised by some and hated by others for his outspokenness. As a result of his outspokenness, he is wrongly trapped. The vigilance department makes a false case and the witnesses are made to sign the proceedings. A decade later, when the case comes up for hearing the witnesses turn hostile. The officer gets clean chit but his life is ruined. It is a comment not only regarding the proceedings of the law enforcement agencies but it is also a comment on our lethargic judicial system. The second short story describes the moral turpitude of a bank staff, who is initially not only a good person but also a good mathematician. The third short story deals with Gayatri Mahayajna, the case factor comes into play but rays of hope are found everywhere and within everyone. The fourth short story is the best out of these five short stories. The bonded labourer system was being perpetuated in the name of a tradition, which the storyteller has unfolded. It was challenged by the younger generation towards the end of the story. The role of education has been emphasised which became the enabling factor. The tradition was never discussed in Maithili literature to date. The fifth short story discusses many things, from unmatched marriage to the life of a widow. This short story needs improvement. Acharya Ramanand Mandal's strength lies in his vocabulary and deep interaction with the good and bad traditions of society. He needs to emphasise that part. His abrupt ending of the stories does not satisfy the readers fully. It is expected from him that he will describe every aspect in its totality using his strong points and that is only possible when he gives time for his characters to evolve. - Gajendra Thakur, editor, Videha (Be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast list.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३५९ पर टिप्पणी कल्पना झा, पटना नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१ क सम्बन्धमे- बहुत नीक लिखल, सत्य कहल,मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ तँ मात्र पाठक बनि रहिए नहि सकैत छथि..सुभाष चन्द्र यादव जीक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक विषयमे बूझल नहि छल। आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सह साहित्यकार सीतामढ़ी विदेहक नित नवल सुभाष चन्द्र यादव -भाग-१ विशेषांक पर मंतव्य- कनिका दिन पहिले हिंदी के प्रसिद्ध लेखक गीतांजलिश्री के उपन्यास रेत समाधि के अंग्रेजी अनुवाद टूब आफ सैंड के लेल अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिलल त कहल गेल कि अंग्रेजी साहित्य के समानान्तर साहित्य भे गेल हए। तहिना मैथिलीक समानान्तर धाराक लेखन -सुभाष चंद्र यादव साहित्यिक संदर्भ मे इ-विदेह पत्रिका के संपादक गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी पर मंतव्य कि सुभाष चन्द्र यादव हांसिया के समाज अर्थात पचपनिया समाज के मैथिली जे पहिले रार आ बैद्यनाथ मिश्र यात्री के शब्द मे शूद्र के मैथिलीय हय।जैइ मैथिली के मानक मैथिली माने शोषक वर्ग के मैथिली से निकृष्ठ मानल गेल।जौं कि इ बहुजन मैथिल के मैथिली हय।अइ मैथिली मेयो साहित्य रचना भेल हय। परंतु एकरा उपेक्षा कैल गेल हय।इंहा तक कि महाकवि विद्यापति अही मैथिली मे रचना कैले रहलन। परंतु आइ मानक मैथिली में संशोधन कैल गेल हय। वरिष्ठ साहित्यकार सुभाष चन्द्र यादव गुलो उपन्यास के रचना क के पचपनिया मैथिली के मानक मैथिली के समानान्तर मैथिली रुप प्रदान क के समानान्तर मैथिली साहित्य के आगा बढौलन।आइ के समय मे इ-विदेह पत्रिका समानान्तर मैथिली साहित्य के पल्लवित पुष्पित करे ला जे गाछी रोप रहल हतन।जेइ पर रंग -विरंग के चिड़ैय अप्पन रंग -विरंग के शैली मे मैथिली साहित्य के समृद्ध क रहल हय।अइ दिशा मे पंगु के उपन्यासकार जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश मंडल,राजदेव मंडल, संदीप कुमार साफी, उमेश पासवान,बेचन ठाकुर,कपिलेश्वर राउत, रामबिलास साहु, नंदविलास राय,ललन कुमार कामत,शिव कुमार प्रसाद, धीरेन्द्र कुमार, रामदेव प्रसाद मंडल झाड़ूदार, नारायण यादव, मुन्नी कामत आ आचार्य रामानंद मंडल के समानान्तर मैथिली साहित्य मैथिली साहित्य मे मील के पाथर बनत। कनिका दिन पहिले समानान्तर मैथिली साहित्य के जगदीश प्रसाद मंडल कृत उपन्यास पंगु के २०२१साल के साहित्य अकादमी के मूल पुरस्कार से पुरस्कृत कैल गेल।इ डेग मैथिली समानान्तर साहित्य के लेल आजादी के अमृतकाल के समान समानान्तर मैथिली साहित्य अमृत काल मानल जायत।आबि कोनो सुभाष चन्द्र यादव के मैथिली समानान्तर साहित्य गुलो,रमता जोगी,मडर आ भोंट के गैस लाइटिंग आ स्टोरी साईंस बदल न सकैय हय। मैथिलीक समानान्तर धारा वा शैली के विकास में इ-विदेह पत्रिका आ संपादक गजेन्द्र ठाकुर के अविस्मरणीय योगदान के भुलाय न सकैय हय। सधन्यवाद।
प्रणव झा विदेह पत्रिका पाक्षिक पत्रिका त निकालइते रहईत अछि जै मे नव-पुरान सब तरहक लेखक सब के रचना छपय अछि संगहि संपादकीय टीम बीच बीच मे मैथिली आ मिथिला संबंधी साहित्य के सँजो क पाठक तक पहुंचाबे के काज सेहो करैत रहई छैथ। एहि क्रम मे दू टा प्रयास के चर्चा करऽ चाहब- विदेह के माध्यम स गजेन्द्र ठाकुर एकटा प्रयास केलाह अछि किछ अङ्ग्रेज़ी फेरी स्टोरी के सचित्र मैथिली अनुवाद के द्वारा बच्चा सब के मैथिली से अङ्ग्रेज़ी वा अङ्ग्रेज़ी से मैथिली सीखेबाक। किछ कहानी हम पढ़लहु - अनुवाद सब बहुत निक भेल अछि। हमारा लगई अछि जे ई प्रयोग धिया-पूता लेल बेस उपयोगी भ सकई अछि। अधिकांशतः बच्चा सब मैथिली से अङ्ग्रेज़ी वा अङ्ग्रेज़ी से मैथिली के यात्रा हिंदी के माध्यम से होइत करे छईथ, ऐ तरहक पुस्तक गाम-घर के छोट बच्चा के मैथिली से सीधे अङ्ग्रेज़ी आ विदेश मे वा अङ्ग्रेज़ी समाज मे पैघ होइत बच्चा के अङ्ग्रेज़ी से सीधे मैथिली सीखेबा मे सहायक भ सके अछि। विदेह अपन आर्काइव के माध्यम से मैथिली साहित्य आ मिथिला क्षेत्र से जुडल अनेको पोथी के एलेक्ट्रोनिक माध्यम से सब के लेल उपलब्ध करेलक अछि। एहि क्रम मे हाल-फिलहाल विदेह द्वारा श्री दिनेश कुमार मिश्र के किछ किताब सब उपलब्ध कराओल गेल अछि। श्री दिनेश कुमार मिश्र बिहार के नदी सब के विषय मे चलैत-फिरइत एनसाइक्लोपीडिया छईथ आ बिहार के नदी सब पर बहुत काज केने छईथ। मिथिला के क्षेत्र नदी प्रधान क्षेत्र अछि आ अनेको नदी मिथिला के विभिन्न इलाका से सहसत्रो साल से बहि रहल अछि। अपनेक पुस्तक सब मे ऐ नदी सब के भौगोलिक, ऐतिहासिक, आ सामाजिक पक्ष के बड्ड निक विवरण भैटईत छईक। दिनेश कुमार मिश्र जी के पुस्तक पाठक के नै खाली अपना क्षेत्र के नदी सब के विषय मे रोचक जानकारी उपलब्ध कराबई अछि अपितु लोक के अपन क्षेत्र के भूगोल, जलश्रोत आ संस्कृति के प्रति जुड़ाव सेहो उत्पन्न करे अछि। दिनेश जी के किछ पुस्तक पढ़ने रहि कोशी आ बलान नदी के संबंध मे। कमला नदी के विषय मे पोथी विदेह के आर्काइव के माध्यम से पढ़बाक अवसर भेंटल। विदेह टीम के साधुवाद।
आशीष अनचिन्हार किछु अंकसँ विदेहमे रौशन जनकपुरीजीक कथा सभ पढ़ि छी। ई कथा सभ निश्चित रूपसँ हमरा सभहक उपयोगी हएत कारण एहि कथा सभसँ हम सभ नेपालक मैथिली मनिविज्ञान केर झलक भेटैत अछि। रौशनजी कथा केर संगे आलोचना-आलेख सेहो पठाबथि। ई आरो नीक रहत।
सियाराम झा 'सरस',राँची प्रिय गजेन्द्र, इंजीनियर दिनेश कुमार मिश्रक लेखनी आ ब्यक्तित्व दुनू सँ कैक बेर आमने-सामने भेल छी,प्रभावितो छी। अहाँक "विदेह "ई पत्रिका मे एक संग एतेक रास नदी-तीरकेँ आम पाठकक लेल उपलब्ध कराएब ऐतिहासिक सेवा थिक, एकटा गौरव-बोध भय रहल अछि। अहाँक पारखी दृष्टिक आ सामाजिक सरोकारक अभ्यर्थना करैत छी। साधुवाद ओ शुभाशीष। पढ़ि कय फेर किछु कहि सकब। बहुत नीक डेग।
मनोज पाठक सुभाष चन्द्र यादव आ दिनेश कुमार मिश्रक पोथी विदेह पेटारमे एलाक सम्बन्धमे। साहित्यकार लोकनि जं एना उदारतासं अपन समग्र सङ्कलन दऽ सकथि आ विदेह पर उपलब्ध भऽ जाय तं पढैवला लेल बहुत नीक रहत। स्वागत
परमेश्वर झा प्रहरी गजेंद्र बाबू, विदेह केँ नीक सँ पढ़ि बुझि अपन लेख पठायब। एतेक प्रशस्त पत्रिकाक सामग्रीक आनंद लऽ रहल छी। साधुवाद। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-२ (गजेन्द्र ठाकुर) २.२.आचार्य रामानंद मंडल- सामरथ के दुख नाहि गोसाईं २.३.आशीष चमन- आदि नदी-कथा कहैत स्त्री २.४.आशीष अनचिन्हार- तीन टा बिन्दु २.५.जगदीश प्रसाद मण्डल- विश्वासहीन २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १७म खेप २.८.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ११) २.९.डॉ बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (७म भाग) २.१०.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.११.आचार्य रामानन्द मण्डल ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१२.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१३.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१४.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- समानान्तर रेख २.१६.आचार्य रामानंद मंडल- राजनीति आ अपराध २.१७.जगदानन्द झा 'मनु'- अनमोल झा जीक पोथी 'टेकनोलजी'क समीक्षा २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-२ (गजेन्द्र ठाकुर) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-२ नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- सुभाष चन्द्र यादवक समस्त साहित्य आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी भाग-२ भाग-१ मे ९ पन्नाक केदार काननक आमुख 'आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा' जे उपन्यास शुरू हेबासँ पूर्व मूल मैथिलीमे देल गेल अछि, केर चर्चा अछि आ ई कहल गेल अछि जे ई आमुख गुलोक पाठमे व्यवधान उत्पन्न करैत अछि आ अहाँसँ आग्रह कएल गेल अछि जे पृ. सं१७ सँ सोझे गुलो पढ़नाइ शुरू करू। एक निसाँसमे उपन्यास पढ़ि जाउ। फेर घुरि कऽ ई आमुख बा कन्नारोहट हास्य आलेखक रूपमे पढ़ू। गुलोक हिन्दी अनुवादमे केदार काननक आमुख 'आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा' केर अनुवाद उपन्यासक अन्तमे देल गेल अछि आ तइ लेल गौरीनाथ धन्यवादक पात्र छथि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरी, जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरी जूलिया क्रिस्टोवा अपन प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मे इण्टर-टेक्स्टुअलिटी माने अन्तर-पाठ्यताक संकल्पना देलन्हि, मने कोनो पाठ एकटा देबारमे बन्न नै रहि सकैए। से ओ पाठकेँ संकलन कहै छथि। आब गुलोमे देखू, रंजीता रंजनसँ छह वोटक एक हजार टका नरेशबा दियेतै। मुदा ओ निपत्ता भऽ जाइ छै। फुलबा मोदीकेँ जितेतै। एम.पी. केर एलेक्शन छिऐ। से सुभाष चन्द्र यादव टेक्स्टक कनटेक्सट ताकि लेने छला २०१५ मे। से हुनका भीतर घुरियाइत हेतन्हि आ से विस्तृत रूपमे बहार भेल "भोट"मे एम.एल.ए. केर भेल एलेक्शनक संग २०२२ मे। से अन्तर-पाठ स्थापित करैत अछि अन्तर-विषयक विषय-वस्तु। ई सभटा पाठ आ विषय एक दोसरासँ रगड़ा लैत रहैए आ एक दोसराक प्रभावकेँ खतम करैत रहैए, कखनो कोनो पाठ आगाँ तँ कखनो दोसर। आ ऐ पाठकेँ अहाँ समाज आ संस्कृतिक आधारसँ अलग नै कऽ सकै छिऐ। से समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यक पाठ मिज्झर भऽ जाइत अछि। पाठ अभ्यास आ उत्पादनक विषय अछि। से पहिनेसँ समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यिक पाठ दू तरहक स्वर निकालैत अछि। विचारधाराक संघर्ष आ तनावकेँ पाठ समाहित करैत अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरीमे सोझे लेखक आ पाठकक बीच वार्ता होइ छै। माने लिफाफक बौस्तु आ लिफाफपर लिखल पता केर बीच सोझे वार्ता होइ छै। मुदा जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरीमे "पाठ" मूलधाराक साहित्य आ एकटा छोट कालावधिमे भेल घटनाक बीच वार्ता करैत अछि। माने पाठ आ ओकर सन्दर्भक बीच वार्ता होइ छै, एक लेखकक पाठ दोसरक लेखकक पाठ संग वार्ता करैए। ई दुनू धूरी जखन एक दोसराकेँ काटैए तखन शब्द बा पाठ उत्पन्न होइए जइमे कमसँ कम एकटा आर पाठ पढ़ल जा सकैए। जुलिया क्रिस्टोवा बोली-बानीकेँ यथावत राखबाक आ किछु पाठ, जे मनुक्खसँ अलग अछि, केर रूपमे लेखकक अधिकार आ कर्तव्यक वर्णन करैत छथि। जूलिया क्रिस्टोवाक प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मिखाइल बाखतिनक संकल्पनाकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। संगहि जुलिया क्रिस्टोवा भाषाक संकेत आ प्रतीकक रूपमे सेहो विश्लेषण करैत छथि। जखन बच्चा संकेतक रूपमे, लयसँ गप करैत अछि तँ ओइमे संरचना नै होइ छै, अर्थ नै होइ छै। मुदा जखन ओ पैघ होइए तँ ओकरा अपना आ आनमे अन्तर बुझाइ छै, ओ बाजऽ लगैए आ अङनासँ बहराइए। आ तकरा बाद ओ अपनाकेँ मायसँ दूर करैए। मुदा ओ लाक्षणिक सँ एकदम्मे दूर नै होइए वरन् लाक्षणिक आ प्रतीकात्मकेक बीचमे झुलैत रहैत अछि। लाक्षणिक स्त्री गुण, संगीतमय, कविता आ लय सँ युक्त; आ प्रतीकात्मक पुरुष गुण, विधि आ संरचनासँ युक्त रहैत अछि। से चलचित्र आदिमे महिलाक शरीरक आ ओकर किरदारक जे अवमूल्यन पुरुष द्वारा कएल जाइत अछि से मायक शरीर द्वारा ओकर अस्तित्वक खतराक डर अछि। मुदा बेबी चाइल्ड अपन मायसँ लग रहैत अछि से ओ लाक्षणिक स्त्री गुण, संगीतमय, कविता आ लय सँ बेशी युक्त रहैत अछि, से ओ मायकेँ अस्वीकार तँ करैत अछि मुदा ओकरेसँ अपनाकेँ परिभाषित करैत अछि। जेक्स डेरीडा- उत्तर संरचनावाद माने विखण्डनात्मक सिद्धान्त जेक्स डेरीडा योनि केन्द्रित विखण्डनात्मक सिद्धान्तसँ नारीवादी विचारधारामे जे हस्तक्षेप करै छथि तकर कोर्नेल समर्थन करैत छथि आ गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक स्वागत। किछु दार्शनिक विचारधारा जइ प्रकारसँ योनीकेँ अप्रत्यक्ष रूपेँ महत्व दइए ततऽ डेरीडा द्वारा योनि-केन्द्रित दृष्टिकोणक सीमाक प्रति ध्यानाकर्षण एकटा सार्थक हस्तक्षेप अछि आ तइसँ प्रतीकक घटकक फेरसँ एकटा प्रक्रियाक अन्तर्गत परिभाषा देब सम्भव भेल अछि। डेरीडा आपसमे होइबला सम्वादक गुणनखण्डक असम्भाव्यताकेँ देखबै छथि, ओकरा सरल नै कएल जा सकैए। से स्त्रीकेँ अनुमान आ ज्ञानक वस्तुक रूपमे नै देखल जेबाक चाही। पुरुषत्वक सापेक्ष नारीवादकेँ नै देखबाक चाही वरन नारीवाद लेल एकटा अलगे मोहाबरा बनेबाक खगता अछि। से पाठ, डेरीडा कहै छथि, मोटामोटी एकटा राजनैतिक कार्य अछि जे शक्ति-सम्बन्ध बा तकरा लेल होइत वार्ताक रूपमे परिभाषित कएल जा सकैए। मुदा डेरीडापर आरोप अछि जे ओ नारीक अबाजकेँ पुरुष द्वारा अधिगृहीत करबाबय चाहैत छथि, नारीक एतेक यत्नसँ जे बकार फुटल छन्हि, जे ओ अपना लेल बाजि रहल छथि, से अधिकार ओकरासँ छीनऽ चाहैत छथि। डेरीडाकेँ महिलाक दिन-प्रतिदिनक होइत समस्या आ शक्तिहीनतासँ कोनो मतलब नै छन्हि। डेरीडा विखण्डनात्मक पद्धतिकेँ नीक आ धनात्मक रूपमे लइ छथि आ नारीवादकेँ अस्तित्वक तत्त्वमीमांसाक/ तर्कक द्वैधक रूपमे राखैत छथि, जेना पुरुष स्त्री। डेरीडा पाश्चात्य दर्शनक केन्द्र आधारित संरचनाक मोहकेँ उघार करैत छथि। सुसियोक भाषाविज्ञानसँ प्रेरित संरचनावाद सांस्कृतिक अस्तित्वक वैज्ञानिक विश्लेषणक प्रयास करैत अछि। लेवी स्ट्रॉसक संचनात्मक मानव विज्ञान सएह लोकगाथा लेल करैत अछि। तहिना साहित्यमे गद्य आ पद्य लेल संरचनात्मक विश्लेषणक प्रयास कएल जाइत रहल अछि। मुदा डेरीडा एकरा उघार करैत छथि, संरचनावाद अपन विश्लेषण लेल एकटा ठोस आधार ताकैत अछि, व्यवस्थाक बाहर एकटा केन्द्र जइसँ ओ एकर वैज्ञानिक विश्लेषण कऽ सकय, मुदा से मात्र दार्शनिकक आभास मात्र अछि। माने कोनो लोकगाथाक कोनो स्थायी बा निर्धारित संरचना केना भऽ सकैए। से लोककथा बा लोक गाथाक संरचनाक अध्ययन करबा लेल अहाँकेँ ओ विचार बा ओ केन्द्र, जकर आधारपर अहाँ एकर विश्लेषण करऽ चाहैत छी, निर्धारित करऽ पड़त। डेरीडा कहै छथि जे कोनो संरचना लेल ओकर संकल्पना-विचार आवश्यक अछि, फेर टुकड़ी-टुकड़ी जोड़ि कऽ अहाँ ओकरा बनायब। मुदा बिनु अन्त सोचने संरचना सम्भवे नै अछि। आ से साहित्यमे सेहो अछि। यावत अहाँ कोनो रचना लेल एकटा स्वयंसिद्ध अर्थ नै ताकि लैत छी ओकर संरचनाक अहाँ नै ताकि सकै छी, कारण अर्थ माने अन्त ओकर संरचनाकें निर्धारित करैत अछि। से संरचनावादीकेँ अर्थ पहिनहियेसँ पता रहै छै आ तखने ओ ओकर विभिन्न अंग आ तकर आपसी सम्बन्धकेँ विश्लेषित कऽ सकैए। आ यएह विश्लेषणसँ पहिले ज्ञात स्वयंसिद्ध अर्थ अछि डेरीडाक केन्द्र। आ डेरीडा कहै छथि जे यएह निर्धारित करैत अछि जे पाठक संरचना केना बनत, कोन अंगकेँ लेल जायत आ कोन अंगकेँ छोड़ल जायत। से जखन हम साहित्यक संरचनाक विश्लेषण करैत छी तँ ओकर अर्थ आ ओकर प्रभावक गप करैत छी तँ हम ओइ संरचनासँ ओइ तत्त्व सभकेँ चिन्हबाक, फराक करबाक प्रयास करैत छी जे ओइ प्रभाव लेल उत्तरदायी अछि, से ओइ सम्भावित पैटर्नकेँ हम छोड़ि दैत छी जे ओ प्रभाव नै आनत। से ई केन्द्र आरम्भिक स्थल अछि संरचनाकेँ बुझबाक हेतु। मुदा ई विश्लेषणकेँ सीमित सेहो करैत अछि। कारण केन्द्र अपनाकेँ स्थिर रखबाक लेल स्तरीकरणक निर्माण करैत अछि, आ ओकरा पर नियंत्रण करैत अछि। आ ई अर्थक पूर्व ज्ञान पाठकक पूर्व इतिहास आ समकालीन आलोचना सिद्धान्त आ विचारधारापर निर्भर सेहो करैत अछि, ईहो सभ तँ संस्कृतिक अंग अछि तखन केना एकरा सभकेँ संरचनासँ दूर राखल जाइए जे एकरा सभकेँ सीमित करैए मुदा अपने एकरा सभसँ सीमित नै होइए? से अपन विश्लेषणक आधार कोनो स्थायी केन्द्रकेँ बनायब एकटा नुस्खा देब सन अछि आ ई प्रतिक्रियावादी बा यथास्थिवादी स्थिति अछि। आ ऐ सँ मानक आ गएर-तुलनात्मक स्वतंत्र अर्थ निकालबाक मात्र इच्छा सिद्ध होइए। से ई भ्रम जे हम संरचना ताकि रहल छी भ्रमे अछि, वास्तवमे अहाँ पाठ्य सामग्रीसँ संरचनाक निर्माण कऽ रहल छी। से डेरीडाक उत्तर संरचनावादमे सेहो केन्द्रक बिना प्रारम्भ नै भऽ सकैत अछि मुदा ओ ऐ सिद्ध नै भेल स्वयंसिद्धक विखण्डनात्मक विश्लेषणक आधारपर ओइ केन्द्रकेँ दोसर केन्द्र द्वारा स्थानापन्न करैत अछि मुदा ई नव केन्द्र सेहो स्थायी नै रहत। तहिना सुसियो (Saussure) अपन प्रतीक सिद्धान्तमे प्रतीकक विश्लेषण करैत छथि जे कोनो शब्द जेना बिलाड़ि, बिलाड़ि बिलाड़ि अछि कारण ओ किछु आन नै अछि। से शब्द अछि प्रतीक चिन्ह आ जकरा ओ दर्शाबैत अछि से अछि बौस्तु/ प्रतीक। मुदा डेरीडा कहै छथि जे अहू लेल पहिने एकटा संकल्पना आनऽ पड़ैत अछि। आ जँ अहाँ प्रतीक चिन्हकेँ निरपेक्ष बना देब जे ओकर कोनो प्रतीकसँ सम्बन्ध नै छै, जे स्वयंमे एकटा स्वतंत्र संकल्पना अछि आ कोनो प्रतीक/ बौस्तुसँ ओकर कोनो प्रत्यक्ष सम्बन्ध नै छै, मुदा तखन ई संकल्पना सभ प्रतीक चिन्हकेँ पार कऽ जायत आ किछुओ सूचिते नै करत। आ जँ हम प्रतीक आ प्रतीक चिन्हकेँ एक्के मानी तँ प्रतीक चिन्हक जड़ियेपर चोट पहुँचत। से सुसियोक सिद्धान्त तर्काधारितक विपक्षमे अछि जखन ओ कहैत अछि जे प्रतीक चिन्हमे अहाँ प्रतीकक कोनो लक्षण नै देखू। मुदा जखन ओ कहैत छथि जे प्रतीक चिन्ह प्रतीककेँ लक्षित करबा लेल मात्र प्रयुक्त होइत अछि आ तेँ ओकर अधीन अछि ओ तर्क आधारित सिद्धान्तक पक्षमे बुझाइत छथि। से डेरीडाक कहैत छथि जे प्रतीक आ प्रतीक चिन्हक ई स्पष्ट भेद मान्य नै अछि, आ प्रतीककेँ प्रतीक चिन्हक ऊपर देल वरीयता सेहो उनटबाक खगता अछि। प्रतीक चिन्हमे अर्थ पहिनहियेसँ विद्यमान नै रहै छै। आ पूर्ण अर्थ कोनो एकटा प्रतीक चिन्हमे नै भेटत। से पाठकेँ अहाँकेँ घोर-मट्ठा करऽ पड़त, आ ई अनन्त खोज दिस अहाँकेँ धकेलत। से ई प्रतीक चिन्ह दोसर प्रतीक चिन्हसँ अपन अन्तरक आधारपर प्रतीक निर्धारण करैत अछि, जतेक बेशी अन्तर ततेक लग अहाँ प्रतीकसँ होइ छी। मुदा ई कहियो नै हएत जे अहाँ सभटा अन्तर ताकि सकब। मुदा प्रतीक चिन्हमे बारम्बारता हेबाक चाही, तखनो जखन एक प्रतीक चिन्ह भिन्न प्रतीकक निर्धारण करैत अछि। आ ऐ लेल ओइ प्रतीक चिन्हक लिखित इतिहास जानब आवश्यक। से प्रतीक चिन्ह विभिन्न अर्थ आ कखनो काल उल्टा अर्थ सेहो देत। डेरीडा लिखै छथि जे प्लेटोसँ सुसियो (Saussure) आ लेवी स्ट्रॉस धरि सभ लिखलाहासँ ऊपर बजलाहाकेँ राखै छथि, कारण लिखब एकटा माध्यम अछि, असल चीज तँ वाणी अछि। सुसियो लिखित रूपमे उच्चारण त्रुटिपर ध्यान दियाबैत छथि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सभ विशेषता जे वाणीमे छै से लेखनमे सेहो छै। आगाँ ओ कहै छथि, प्रतीकक विलुप्ति वाणीमे विचारक प्रत्यक्ष रहबाक भ्रम उत्पन्न करैए। मुदा जँ बाजल वाणीकेँ हम रेकॉर्ड कऽ कय सुनी तँ ओहो लिखल अक्षर सन प्रतीकक शृंखले अछि, जइमे विभिन्न प्रतीककेँ ओकर एक-दोसराक अन्तर सँ चिन्हल जा सकैए। आ लेखन सेहो सामान्य लेखन आ चित्रसँ बुझा कऽ कएल लेखन, ऐ दू तरहेँ भऽ सकैए। 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा' एकर सभक पाछाँ अछि। पाश्चात्य दर्शनक 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा'मे जे मुख्य अछि से अछि सद्यः अनुभव- मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे एहेन कोनो अनुभव परा-भाषा स्तरपर नै होइत अछि, कारण ई अनुभव भाषाक माध्यमेसँ चिन्हल जाइत अछि। फेर ई जे दैवीय चेतनासँ हम परम सत्यकेँ बुझैत छी मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे ई मात्र सर्जकक सृजन अछि। फेर ईहो जे कोनो बौस्तुक पाछाँ सत्य नुकायल अछि, मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे तेहन कोनो स्वतंत्र अस्तित्व नै होइ छै, सभटा निर्माण आ पुनर्निर्माण व्यवस्था द्वारा होइ छै। से सुसियोक स्वतः उपस्थिति किछु नै अछि कारण सभटा व्यवस्थाक अन्तर्गत निर्मित अछि। डेरीडा कहैत छथि जे तर्क ऐ सभटा दार्शनिक चिन्तनक आधार अछि, से कोनो अन्तिम सत्य आ विश्वात्माक परिकल्पना देल जाइत अछि जे सर्वज्ञानी अछि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सिद्ध नै भेल केन्द्रकेँ कखनो गॉड, कखनो विचार आ कखनो विश्वात्मा कहल गेल आ ओ अपनासँ नीचाँ विभिन्न स्तरक निर्माण केलक। से धर्म गॉडकेँ परम सत्य मानलक आ मनुक्ख आ आन रचनाकेँ ओ अपूर्ण, विरोधी आ ई सभटा केन्द्र बनल जे अपना हिसाबे विचार-व्यवस्था बनेबाक दावा केलक। मुदा एकरा सभकेँ व्यवस्थासँ ऊपर हेबाक चाही। से गॉडक स्वतंत्र रूपसँ धर्मक बाहर उपस्थिति हेबाक चाही। उत्तर संरचनावादी विखण्डनवाद एहेन कोनो परासत्यक उपस्थितिकेँ आभासी मानैत अछि उत्तर संरचनावादी भाषाक सिद्धांतक परिणाम मानैत अछि । से ऐ प्रतीक चिन्ह सभक आपसी खेलमे किछु अर्थ कोनो विचारधाराक हस्तक्षेपसँ उच्च स्थान प्राप्त करैत अछि आ ओकर दोसर अर्थ तकर पाछाँ जेबा लेल धकेल देल जाइत अछि। स्वतंत्रता, गणतंत्र, न्याय आदि सन विचारधारा हमरा सभक जिनगीक भाग छी मुदा लागैए जे ओइ सभसँ हमरा सभक जिनगीक बहुत रास अर्थ निकलल मुदा अन्वेषणक उपरान्त ओ सभ दोसर विचारसँ बहार भेल बुझायत। कोनो संकल्पना एहेन नै अछि जइमे दोसर विचारक अवशेष नै भेटय। रमता जोगी यात्रा विवरणी, डायरी रूपमे। लेखक लिखै छथि-[०५.०३.२०१९] "मैथिलीमे अखनधरि जे यात्रा साहित्य लिखल गेल अछि, ताहिमे अधिकांश नीरस आ बेजान अछि। अनावश्यक विवरण आ महत्वहीन सूचनाक भण्डार अछि। ओहिमे इतिवृत्तात्मकता बेसी आ आख्यानपरकता कम छैक। डायरी शैलीमे लिखल एहि वृत्तांतमे इतिहास आ पुरातत्वक बारीक आ ब्यौरेवार अन्वेषण नहि अछि। विभिन्न देशक जीवन-शैली आ संस्कृतिकेँ आलोकित करऽवला रोचक मानवीय प्रसंग अछि।" लेखक आस्ट्रेलियासँ प्रभावी छथि- 'आस्ट्रेलिया विकसित, समृद्ध, स्वच्छ, शुद्ध आबोहवा आ उन्नत जीवन स्तर बला देश अछि।.. गरीबी, अशिक्षा आ सामाजिक भेदभाव नहि रहलाक कारणे ओतौका जीवनमे बहुत शान्ति छैक।' हमरा मोन पड़ैए जे एकटा हमर संगी कोनो परीक्षा दइले दरभंगा गेल आ यूनिवर्सिटी एरिया घूमि कऽ चलि आयल, कहलक जे दरभंगासँ नीक शहर तँ पूरा बिहारमे कोनो नै छै। ओना तँ लेखक कहै छथि जे हुनकर ऐ यात्रावृत्तान्तमे इतिहास आ पुरातत्वक बारीक आ ब्यौरेवार अन्वेषण नहि अछि, मुदा उपरका अनुच्छेदक आलोकमे हम ऐपर ध्यान दिआबऽ चाहब जे जखन सन् १७७८ मे ब्रिटेन अमेरिकाक कॉलोनीसँ हाथ धो लेलक तँ अपराधी सभकेँ पठेबा लेल वर्जीनिया आब ओकरा लग नै रहलै। से कैप्टन फिलिप तीन जहाजमे पशु, बीआ, भेड़ा, हर आ ६ टा छोट जहाज आ १४०० महिला पुरुष जइमे सँ अदहा अपराधी रहथि, लऽ कऽ २६ जनवरी १७८८ केँ वर्तमान सिडनीक तटपर पहुँचला, आ आस्ट्रेलियाक चारू कात समुद्र तटसँ मूल आदिवासीकेँ भीतर परती दिस धकेल देलनि, ओकर वाटरहोल (जलस्रोत) पर कब्जा कऽ लेलन्हि, आ आइयो जखन २६ जनवरी ओतऽ ऑस्ट्रेलिया दिवस मनाओल जाइए, मूल आदिवासी ओइ दिन शोक दिवस मनबैत छथि, आब ओ रिजर्वेशन (अधूसूचित बोन) मे रहैत छथि। मुदा जेम्स कुक जखन न्यूजीलैण्ड गेला तँ ओतुक्का मूल निवासी माओरी सभक संग नीक व्यवहार केलन्हि। आब आउ रमता जोगी पर- [३०.०९.२०१८] अपन पुत्र कुमार सौम्य संगे बिजनेस क्लासमे ओ मेलबॉर्न बिदा भेलाह। पैघ बेटा संतोष कुमारकेँ पहुँचलापर फोटो पठबैत छथि। बेटा कुमार सौम्य सी.ए. छथिन्ह आ पुतोहु मधुलिका (मधु) सॉफ्टवेयर इंजीनियर, बेटा जातियेमे बियाह केने छन्हि से देखेबा लेल लेखक निम्न वाक्यक प्रयोग करैत छथि- "भाटा-अदौरीक तीमन बनल छैक। अदौरी मधुलिकाक मम्मी जयमाला यादव..."। सैंक्चुअरी लेकक किछु भारतीयक दोकानक चर्चा अछि आ पतंजलि उत्पादक सेहो। चारि माससँ सौम्य कैंसर पीड़ित मायक मृत्योपरान्त सेवा केलन्हि आ आब पिताकेँ संग अनने छथि। सौम्य कहै छथिन्ह जे संतोलाकेँ ऑस्ट्रेलियामे ऑरेन्ज नै मेंडेरिन कहैत छैक। प्वाइंट कुक मेलबर्नक पछबरिया भाग छिऐक। एतय इंडियन आ अफ्रीकन बेसी रहैत अछि। क्राइम सेहो होइत छैक (तेँ होइत छैक- से लेखक नै लिखने छथि।) स्वस्तिका गोयनका (सी.ए.) आ आनन्द गोयनका (सॉफ्टवेयर इंजीनियर)क चर्चा अछि। हिन्दी फिल्म 'सुईधागा'ऑस्ट्रेलियामे लागल छै। डोसा हटमे सब सुन्दर भारतीय युवती वेट्रेस छै। एकटाक मुस्की लम्बा छलै... लेखक सोचैत छथि- ओ किएक मुस्कायलि?... जे हो, सुखायल जीवनमे एहन तरल आत्मिक अनुभूति किछु क्षणक लेल सुख दऽ जाइत छैक। भारतसँ सुखद समाचार एलनि, यूनिवर्सिटी पेंशनक बकाया राशिक भुगतान लेल तत्पर भेल। दूर-दूर जाइबला ट्रेनकेँ एतऽ बिलाइन ट्रेन कहल जाइत छैक, ताहूमे दुर्घटना नहि घटैत छैक। सिटीमे ट्राम चलैत छैक, कलकत्ते टामे ट्राम नै छै, मुदा एतुक्का ट्राम नीक छै। केदार काननक भातिज राहुल वत्ससँ गप भेलनि। ओ आ हुनकर पत्नी अश्विनी, दुनू इंजीनियर छथि आ मेलबर्नमे नोकरी करैत छथि, बेटी अयस्का। किशनपुरक अहमद नोमानीसँ सेहो गप भेलनि। दू टा हब्सी आ महिलाक चिचियायब सुनलन्हि। निग्रो आ हब्सी अपमानजनक शब्द छिऐ जेना मधुबनीक सिमराक गिदरमा़ड़ा, ओकरा बंजारा कहियौ, जेना पाकिस्तानमे पश्तूनकेँ अपमानित करैलेल पठान कहै छै, मुदा भारत मे लोक पठान टाइटल सेहो राखैए। आगाँ जा कऽ लेखक मुदा हब्शी शब्दक कहलासँ अपनाकेँ दूर करै छथि। ससुर पुतोहुक (सासु-पुतोहु नै) केर सम्बन्ध फरिछायल अछि। "कतेक गार्जन धियापूता लग गेल तऽ ओहि देशक मुद्रा पहिनहि कीनि लेलक। अहूँ जँ ओहिना करितहुँ तऽ हमरा बड्ड खराब लगैत। मधु थोड़े आउट स्पोकेन छथि।" मेलबर्नक रॉकबैंडक दुर्गापूजा। -एहिठाम हिंसाक कोनो स्थान नहि छैक। चारि साल पहिने केदार कानन, सुस्मिता, टुस्सी आ रमण कुमार सिंह संगे तारानन्द वियोगी लग महिषी महाअष्टमी मे गेल रहथि, माँ ताराक दर्शन, बलि प्रदान, फेर कारूथान , लोक दूध चढ़बैत अछि। वियोगी कहैत छथि- ताराथानमे रक्त बहैत छैक आ कारूथानमे दूध बहैत छैक! कार ड्राइवर बेसी महिले। "ऑफिसक शराब पार्टी, मधु हैंगओवरमे छलीह। " सौम्य ऑस्ट्रेलियामे बसय चाहैत छथि तीन साल भेल छन्हि, चारि साल पूरा हेतन्हि तँ नागरिकता लेल अप्लाइ करताह। एक्केटा चद्दरिमे एक दोसरसँ सटल दू टा स्त्री सड़कपर चलल जाइत छलि। बहुत सम्भव जे लेस्बियन हो।" शशि कपूर अपन विदेशक अनुभवमे कहने छलाह जे हुनकर दोस्त सभ एक दोसरासँ छूबि कऽ हँसी मजाक करैत छला तँ ओतुक्का लोककेँ होइ छलै जे ओ सभ गे छथि। से लेखक ठीके भजियेने हेताह। सौम्य ओतऽ बसऽ चाहैत छथि मुदा मधुकेँ डर होइत छन्हि। लेखकक प्रोफेसर महेन्द्र झा सँ गप भेलनि, जून-जुलाइक पेंशन आयल छन्हि। ओ चाहै छथि आ केदार, कामता, विनय कुमार झा, वैद्यनाथ झा चाहै छथि जे ओ ओतऽ खूब साहित्य लिखथि। मडर उपन्यासक पहिल अंश अंतिकामे मार्च २०१६ मे आयल, फेर नहि आयल। २४.१०.२०१८ केँ एकटा नव उपन्यास लिखब प्रारम्भ केने छथि। नाम फुरायल नै छन्हि। सच्चिदानन्द सच्चूकेँ 'मडर' के अंश बहुत नीक लागल छलनि। मैसेज पठौने छलखिन्ह। लेखकक पुनर्वास (सुपौल) वला खेतक धान कटि जेतन्हि, बटाइ देने छथिन्ह। भरेबाक छन्हि, जँ बटेदार फेर किछु बाउग कऽ देलकन्हि तँ फेर कए मास लटकि जेतन्हि। दू गोटेसँ गप भऽ रहल छन्हि, पाइ टानि कऽ ठकि लेतन्हि तकरो चिन्ता छन्हि। मधु तीन गिलास ह्वाइट वाइन (देसी शराब)क ऑर्डर दैत छथिन्ह, स्वादा ताड़ी जकाँ छैक। सौम्य एकटा जापानी व्यंजन सुसी (बसिया भात आ मुर्गाक बनल) ऑर्डर करैत छथि। समुद्री माँछ बारामुंडी, मुदा पोखरि, चाँप आ धरक माछ सन स्वाद नै। रमण कुमार सिंहकेँ 'फेरसँ हरियर' काव्य संग्रहपर कोनो पुरस्कार भेटल छन्हि (पुरस्कारक नाम नै लिखल छै), ओ गुलो केर हिन्दी अनुवाद कऽ रहल छथि (२८.१०.२०१८)। २९.१०.२०१८- चारि पेज लिखलन्हि एतबो रोज लिखि लेताह तँ एक मासमे उपन्यास तैयार (जापानी उपन्यासकार हारुकी मुराकामी प्रतिदिन बिनु नागा केने १० जापानी पन्ना लिखैत छथि- मोटामोटी १६०० शब्द)। नगर परिषदकेँ ऐठाम विनढम कहैत छै। अफ्रेकी अभिवादन- मुट्ठीपर मुट्ठी टकरेलक। माइकी कार्डसँ अहाँ मेट्रो, बस आ ट्राममे सफर कऽ सकैत छी। एकटा स्टेशनक अजीब नाम- एयरक्राफ्ट। डिब्बामे एकटा मांगैबाली चढ़ल, सौम्यकेँ भेलनि जे ओ ड्रग्स केर खातिर मंगैत होयत। फेर नीचाँमे ओकरा देखलनि, सिगरेट मुँहमे दबेने अबैत, छातीकेँ मललक जेना लाइटर ताकि रहल हो.. भरिसक कामुक इशारा..। लेखककेँ हेमोग्लोबिनक स्तर सामान्य राखक लेल मासमे एक बेर एनफो इंजेक्शन लेबऽ पड़ैत छनि। आइ नोत अछि। विकास, प्रियंका, अभिषेक, निधि आ अश्विनी..। विकास आ अश्विनीक नोकरीपर खतरा छैक। टाटासँ निधिक मायक फोन आयल छैक। नौआक दोकान... एकटा महिला दोकानक हिसाब-किताबमे लागल अछि। तकलक.. बुझेलै जे हम पहिनहिसँ देखि रहल छिऐ। ... ओ हमरा दिस तकलक। हम ओकरा दिस तकलिऐ। हमरा डर भेल। ओकरा की भेलै? अफ्रीकनकेँ जँ हब्शी या ब्लैक कहबै तऽ ओ नाराज भऽ जायत। सब अफ्रीकन कारी आ लंबा होइत अछि। बहुत कम्मे एहन होइत अछि जकर गढ़नि नीक होइत अछि। ई संयोगे छिऐ जे रेस्त्राँमे महजूद अफ्रीकी युवती सुन्दर छलि। सौम्यक मित्र जसवंत सिंह, बियाह ईसाइ एंजेलीनासँ। धर्म परिवर्तन केर कोनो चक्कर नै, यज्ञो हेतै आ चर्चमे प्रार्थना सेहो। सौम्य आ मधु स्नोरकेलिंग..स्कूबा... दुनूमे भाग लै छथि। रीफक दर्शन, बोटक पेनीमे शीसा लागल छै। जेस टिया आ बेकी बॉलडॉक.. एक दोसरसँ गला मिलैत छी। आरम्भ जेस टिया करैत अछि। बेकी के आलिंगनमे एकटा चुम्बकीय तरंग छैक। फ्रॉग्स रेस्त्राँमे घड़ियाल के माउस खा सकैत छी। कंगारू के खाल कीनि सकैत छी। आस्ट्रेलियाई आदिवासीकेँ प्राचीन डिजेरिडू वाद्य बजबैत सुनि सकैत छी। एतऽ अपनेसँ पेट्रोल भरय पड़ैत छैक। आइ पहिल दिन पोर्क (सुग्गरक माउस) खा रहल छी। पैंग्विन पैरेड... भोरे केदार के मैसेज देखलहुँ। डी एम साहेब गप्प करऽ चाहैत छह।... हुनका खाली जिज्ञासा रहनि जे मेलबर्नमे कोना छी। हमहूँ निश्चिन्त भेलहुँ। देखलिऐ दूटा लड़की एक दोसरकेँ कसिकऽ पकड़ने चुम्मा-चाटी लऽ रहल अछि। बुझाइ-ए लेस्बियन अछि। आस्ट्रेलियामे समलैंगिकता वैध छै। गे गे संगे आ लेस्बियन लेस्बियन संगे विवाहो कऽ सकैत अछि। अंकुर आयल छथि। ओ मधु संगे पढ़ै छलाह। दूटा जनानी डिब्बामे चढ़लि। मधु बतेलथि ई सभ रेभलर्स अछि। निशां वला सुइया लऽ कऽ मस्ती करैत रहैत अछि। दू बीत के गोलमटोल झबरा कोआला एगो ठाढ़िपर गबदी मारने बैसल अछि... आलसी जीव। कंगारू.. सहमिलू एमू चिड़ै.. उज्जर पेलिकन..लायर बर्ड.. तस्मानिया डेविल्स (लुप्तप्राय)। ऑस्ट्रेलियासँ कुआलालम्पुर फेर होची मिन्ह सिटी। एक करोड़ जनसंख्या बला शहरमे ७० लाख दुपहिया। दक्षिण वियतनाम, मैकोंग नदी। पहिल बेर धानक कटनी मशीनसँ देखलिऐ। वियतनाममे साँपो, कुकुड़ो खाइत छैक। कुत्ता के माउंस पुंसत्व बढ़बैत छै से ओतऽ विश्वास छै। वियतनाममे महाप्रकाश बड्ड मोन पड़ि रहल अछि.. सिटी टूर, चीनी पगोडा, जकरा बाल बच्चा नै होइ छै से चिड़ै कीनि कऽ उड़ा दैत छै। मधु एकटा चिड़ै कीनि कऽ उड़ा दैत छथि। होची मिन्ह सिटीसँ हनोइ, उत्तरी वियतनाम। ओतुक्का नदी रेड रीवर। मधु के सखी रुचि आ पति गौरव ओतऽ भेटलन्हि। यात्रा वृत्तान्तबला नोटबुक हेरा जाइ छन्हि फेर भेट जाइ छन्हि। रुचि ब्राह्मण छथि आइ.ए.एस. ऑफिसरक बेटी, गौरव राजपूत। प्रेम विवाह केने छथि। रुचिक पिता ऐ विवाहक घोर विरोध केलनि। कठपुतली, कखनो सोंसि तऽ कखनो बोच बनैत अछि। रुचि संगे विदाइ के आलिंगन होइत अछि। कम्बोडिया अंगकोर वात हिन्दू आ बौद्ध धर्मक सम्मिश्रण अछि। भाइ योगेन्द्र पाठक वियोगी अंगकोर वातक बहुत सूक्ष्म आ विस्तृत अन्वेषण कयने छथि। पब स्ट्रीट के चौराहा.. पैंतीस सालक आदमी.. वांट गर्ल सर? थर्टी डालर फॉर वन आवर। सिक्सटी डालर फॉर वन नाइट।.. नो आइ डोंट वांट।स्पेनिश महिला.. उनोस, दोस, त्रेस... (एक दू तीन) पुछलिऐ- दोंदे भिभा उस्तेद (अहाँ कतय रहैत छी?) कहलक- एसपान्या (स्पेन)। ..रातिमे तरल बेंग चिखैत छी। बंकाक, सुवर्णभूमि एयरपोर्ट.. बीचमे समुद्र मंथन के बिम्ब ठाढ़ करैत मूर्ति.. हिन्दीओमे चेतावनी लिखल छै.. कोई टिप्स नहीं। बैंकाकक लम्बा वात अरुण मन्दिर। पटाया.. कृशकाय जर्जर बुद्ध.. बुद्धक एहेन मूर्ति नै देखने छलिऐक। रातिमे एक बजे मुम्बई पहुँचब। सम्राट रिसीव करताह। [०४.०१.२०१९] परिशिष्ट- अंडमान डायरी सितम्बर २०१२- माझिल बालक संजय सपत्नीक पोर्ट ब्लेयर जा रहल छथि, बजेलथि। हम सहरसासँ ओ मुम्बईसँ, पोर्टब्लेयर एयरपोर्टपर भेंट होयत। टैस्की लऽ कऽ अन्नादुर्रै ठाढ़ अछि, ओ चेन्नैमे लऽ कऽ घर बना रहल अछि, ओकरा होइ छै अंडमान कहियो समुद्रमे डूबि जेतै। ओकर राँचीक ड्राइवर बादमे अबै छै उदय। पोर्टब्लेयरमे राँची नाम्ना एकटा मोहल्ले छै। अंडमानमे सभसँ बेशी बंगाली अछि फेर तमिल। नॉर्थ बे, बिसटकही नोट पर जे फोटो छपैत छैक से अही टापूक पहाड़ आ जंगल के। एतऽ स्नोरकेलिंग, स्कूबा डाइविंग, स्पीड बोट सभ छै। कोरल रीफ छै। ग्लासबोट (पेनीमे ग्लास) बैसल-बैसल सागरक जीवन देखि सकै छी। जॉली ब्वायमे प्लास्टिक प्रतिबन्धित छै। बरटंग जारवा अदिवासी। मित्र लल्लन (विनय कुमार झा, आइ.ए.एस.) बहुत जोर देने रहथि, जारवाकेँ जरूर देखिहेँ। हैवलॉक आइलैंड। भोट भोटमे लेखक- प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) केँ भातिज (ओ प्रोटैगोनिस्टक भातिज छथिन्ह तकर खुलासा बादमे होइए) यदुवंश्, जे बहुत पहिने एमेले एक बेर भेल रहय (एकरो चर्चा बादमे छै) केँ लोक विधायकजी कहै छै, केर फोन अबैत छन्हि। प्रोटैगोनिस्ट सुभाष जी क नीक लोकमे गिनती छन्हि से ओ हिनकासँ सहायता मांगैत छन्हि। करिहो पहुँचै छथि। राजद नेता राजिनदर कहै छन्हि जे सबहक ऐठाम एक-एक कप चाह पीबि लेता तहीमे बेड़ा पार। एमेले चुनावमे राजद, जदयू आ कांगरेस पाटी के गठबंधन छै। यदुवंश कुमार यादव पिपरा विधान सभासँ उम्मेदवार छिऐ, ई राजद के हिस्सामे पड़ल छै। करिहो पहिने सुपौलमे पड़ैत रहइ। अइ बेर काइट कए पिपरा विधान सभामे दाए देलकइए, विजेनदर यादव एतऽ सऽ जितैत रहइ, तैं एतौका बेसी भोटर जदयू के छै। राजिनदर यादव एतऽ सऽ मुखिया के एलेक्शन लड़ल रहय। जीत नै सकल, मुदा योग्य आदमी छै, गएर सरकारी कौलेजमे नाम छै, मासमे दू-चारि दिन कौलेज जाइए आ हाजरी बना कऽ चैल आबइए। जहिया कहियो अनुदान आबै छै तए थोड़े आमदनी भाए जाइ छै। लाट बना कऽ सभ घूमैए। प्रोटैगोनिस्ट सेहो सङमे घूमै छथि। हरदी के परोग्राम बनत तऽ प्रोटैगोनिस्ट कामता (जदयू) संगे निकलि जेता, मुदा ने दीना पाठक (जदयू)केँ किछु पता छै ने एकटा आन कांगरेसीये केँ। प्रोटैगोनिस्ट कामताकेँ कहै छथि जे ऐ तरहेँ सोचलासँ राजद, जदयू आ कांगरेसक गठबन्धन कमजोर भऽ जेतै। कामता हरदी जाइले तैयार भऽ जाइए। फेर हरदासँ करिहो। एलेक्शनक परचारक प्रोटैगोनिस्टक ई पहिल अनुभव छन्हि। यदुवंश कहै छन्हि जे पैसा नइ अय। प्रोटैगोनिस्टकेँ ई चिन्तित करै छन्हि। बिनु पाइक चुनाव केना लड़त? प्रोटैगोनिस्ट कतेक चन्दा दऽ सकतिन्ह ५-१० हजार, ओइसँ तँ नीक जे परचारमे ओत्तेक खर्च कऽ देथि, चाह-पानमे की कोनो कम खर्च होइ छै! सोचै छथि जे करिहोक खर्चाक भार उठा लेथि, मुदा फेर होइ छन्हि जे नै जानि कत्ते खर्च हेतइ। प्रोटैगोनिस्ट आ कामता सुपौलमे पढ़ैत रहथि आ यदुवंश रफीगंजमे, तकर एकटा खिस्सा प्रोटैगोनिस्ट सुनबै छथि, कामताक साइकिलसँ प्रोटैगोनिस्ट आ यदुवंश एकडारा गेलथि ओत्तऽ साइकिल चोरि भऽ गेलै, कामता यदुवंशकेँ मोन पाड़ैत अछि, यदुवंश आब ओकरे क्षेत्रक एमेले बनतै, एक दोसर के बेगरता पड़तै। मुदा पाटी लाए कए दूरी छै, शीर्ष नेता सभ समझौता कऽ लेलकै मुदा एतेक दिनक कटुता तुरन्ते भाफ जकाँ केना उड़ि जेतै? बिन्दुलाल दास मखौलिया अय। खिस्सा सुनबै छै, चाह दोकानबलाक नाम बीडियो छै, घूस जे लेलकै, से ससपेन भाए गेलै। तहिया सए चाह बेचइ छै। सभ भभारो हँसलै, बीडियो मिडिलो पास नइ-ए। बीडियोसँ प्रोटैगोनिस्ट पूछै छथि, ओ ककरा भोट देत, मुदा ओ टेढ़ जबाब दइ छन्हि- ककरा देबै आ ककरा नै देबै, से तोरा कहि कए! बीजेपी के कंडीडेट विश्वमोहन छिऐ, एक बेर एमपी भएल रहइ, दोसर बेरा हारि गेलै, एतुक्क एमेले ओकर कनियाँ सुजाता छिऐ। विश्वमोहन कीयट छिऐ। एक बेर दिलेसर कामत जीतल रहै, ओहो कीयटे रहइ। ओना सोशलिस्ट पाटी के नेता विनायक यादवक जमाइ दीनबन्धु यादव सेहो एक बेर जीतल छै। पिपरामे कीयट के जनसंख्या बेशी छै। दोसर नम्बरपर धानुक आ तेसर नम्बरपर जादव छै। धानुक जातिके अपन कोनो कंडीडेट नै छै, से ओकर भोट बँटतै, चौधरी भेलै बनियाँ आ बीजेपी भेलै बनियां पाटी, ऊ बीजेपी छोड़ि कतय जेतै? हँ पाइ पर कियो ढूइल जाइ तँ.. समाजवादी पाटी के कंडीडेट सत्यनारायण गुप्ता, ऊ तेली छिऐ, तेली के बेसी भोट ओकरे जेतै। वामपंथी के उमेदवार नागेसर यादवक कोनो चरचा नै छै। मुसलमान बीजेपी सए भड़कै छै, ऊ सब छेहा गठबंधन के भोटर छिऐ। तहिना बाभन गठबंधन सए भड़कै छै। सुखदेव बीजेपी मे छै, ओना ओकर उमेदवार सए जनता नराज छै। शिवजीक चाहक दोकान छै, नै नीक चाह बनबै छै, निशांमे रहै छै, परधानमंतरी तक के गारि दै छै, प्रोटैगोनिस्टकेँ कहै छन्हि खरचा करै ले- तोरे कोन कमी छह! ओकर बेटी लछमी जीन्स आ टॉप पिन्हइ छै। लिट्टी चाह बनबइ आ गैंहकी सम्हारइमे ओस्ताज भाए गेल छै। प्रोटैगोनिस्टकेँ शिवजी लछमीसँ पढ़ाइक टेस्ट करबैत अछि, प्रोटैगोनिस्ट पूछै छथिन्ह पुष्प माने की? उत्तर- फूल। शिवजी, बेटी पढ़ैमे तेज छौ! प्रोटैगोनिस्ट कंडीडेट संगे अपन सम्बन्ध सभकेँ बता देनहि छथि, ता बात पसरइ छै, दस दिनुका बाद फेर एता। घरनी कहै छथिन्ह- घुचघुच जाय कए की हेतै। अहाँ के कहने लोग भोट दाए देतै? दाइ सकइए। सौ-पचास भोट के फरक पड़तै। तए फैदा हेतै यदुवंश कए। अहाँ कए यदुवंश की देत?.. अपन काम करतै तए दू गो पैसो हेतै। परचार केने सए पेट भरतै? सब कुइछ पैसे नै ने छिऐ। नै छिऐ तए जाउ। ओनही बैठल रहब।.. आइ हम नै काम देबै तए काइल्ह ऊ हमरा काम देतै? जे मन होइ-ए सएह करू- घरनी आजिज भेल कहइए। यदुवंश नामांकन दाखिल केलक। प्रभास प्रभारी छिऐ। चुनाव लगिचा गेलै, प्रोटैगोनिस्ट करिहो पहुँचै छथि। कामता मंत्रीजी के परचार करय गेल अय, ओ ओकर पाटी जदयू के उमेदवार छिऐ, क्षेत्र बदैल गेलै, लेकिन पाटी तए नै बदललै। बिन्दू मास्टरी करइए। पराइविट। .. पचास टके मेहीना। .. कोय दइ छइ, कोय नइ दइ छइ। .. जैह भेटल, सैह लाए लेलक। चाउरे देबें, दूधे देबें, जरने देबें..। एक बेर ऊ पंचायत समिति के सदस्य भेल। मुखिया कए कहि कए पब्लिक के कोनो-कोनो काम.. इनरा आवास तए ककरो बिरधा पिलसिन। काम भए गेला पर.. कोय दस, कोय बीस।.. लेकिन अगिला चुनाव जातीय गोलबन्दी के ओजह सए हाइर गेल। मन्नू.. मालजाल के पैकारी करइ-ए। खाली खरचा-पाइन के इंतजाम केने जाहक.. मन्नू हमरा मुल्हा तए ने बूइझ रहल अय। मन्नू भाय, पहिने चुनाव कते चिक्कन आ शान्त होइत रहइ।.. आब स्वार्थ के उठा पटक छै। आइ सभक टारगेट मुसहरी आ डोमराही रहै। करिहोमे मुसहर के दूटा घनगर टोल छै।.. सटले डोमराहियो छै।.. सब भोटर के दुआर पर जाउ।.. हमरो भेलू देलक। हमरो पुछलक। करिहो के दुनू टोल आ बगहीओ के मुसहरी धांगलिऐ।.. साँझ पैड़ गेलै।.. चंदेसरी चाह-पान के पैसा तए हमरा सए लेबे केलक; मुसहरी के एगो नेता खातिर सौ टका और लेलक।.. नीतीश कुमार भोटर के नाम जे अपील केने छै से, सात निश्चय बला घोषणा-पत्र, बैलेट पेपर के नमूना आ कलेंडर लाए कए निकलै छी।.. भाइजी गड्डी के गड्डी आनने छह।.. हम अपन आटा गील काए रहल छी।.. महिला कए ठीक सए बुझाबहक। कहिहक नीतीश आ लालू मिल गेलै। दुनू एक भाए गेलै। अइ बेर एतय तीर के निशान नै रहतै। लालटेम रहतै।.. अइ बेर लालटेमो मे देबहक तए नीतीशे जिततै। पुछलक- नीतीश मुखमंतरी बनतै ने? महिला खातिर बहुत कुइछ केलकइए। जनीजाति नीतीश के कट्टर समर्थक छै। सफीना आयल हइ!- जमील सुनबइए। सफीना केहन-केहन के आँड़ गलाय दइ छै। फेर सफीनाक एकटा खिस्सा।.. मुखियोमे ठाढ़ भेल। लोक चिन्हलकै। चंदेसरी सफीना के भक्त रहय, संगे घूमइमे चंदेसरी कए खूब मन लागइ। ओकरा भोट के देतै! चंदेसरी सोचइए.. कहिया काम पर भोट देतै? सफीना बेसी पढ़ल लिखल नै छै, फोकानियां पास छै,..। विश्वमोहन के घर कटैये छै। ओतय पान सय टका भेटै छै। संजय आ जयप्रकाश दुनू बीजेपी के समर्थक छिऐ। अखबारमे रोज समाचार.. गड्डी के नोट आ शराब के बोतल पकड़ल जाइ छै। गगना- दारू आ माँस चलै छै। बीजेपी जितले छै। सिपौल.. राहुल गाँधी के भाषण रहइ। पूरा गांधी मैदान भरल रहइ.. कहलकइ मोदी चोर छइ.. दंगा करबै छै, हिन्नू-मुसलमान कए लड़बै छै।.. गठबंधने जिततै। समाजवादी पाटी.. सत्यनारायण साह.. कामता खौंझाइए.. भोटकटुआ.. विश्वमोहनो के झाड़लक कामता.. जदयू.. फेर राजद.. कहियो बीजेपी कहियो बंगला छाप.. नीतीश महिला लए बड्ड काज केलकै, सौ मे तैंतीस टा सीट, साइकिल देलकै। पाठक टोल के छै.. परचा घुराय देलक। लालटेन नै, कमल। हम- लालटेम। ऊ- कमल।कमल। मोदी की कहलकइ। लालू कए बदनाम करइ वला बात। अपहरण, बलात्कार आ हत्या.. साँझ पड़ैत लोग घर मे बन्न.. लोक मोदी आ लालू के नकल करइ छै। .. बीजेपी जिततै तए रिजरभेसन खतम काए देतै।.. समीक्षा हेबाक चाही से गप मोहन भागवत बाजलइए।.. मतलब एक्के.. मंडल के विरोध मे कमंडल..। एमेलसी हारुण रशीद- बाभन के जनसंख्या कते? दूइए-अढ़ाइ परसेंट ने? आ नौकरी मे.. सगरे तए वएह छै! चंदेसरी.. सफीना बेसी गोर भाए गेल छै.. सब पाटी पैसा लै छै, तब टिकट दै छै। ओकरा लेट भाए गेलै। ताधैर टिकट बिक गेल रहइ।.. चंदेसरी.. सफीना के अंग-अंग निहारय लागल।.. बीजेपी मुसलमान कए भगबय चाहय छै। मुसलमान डरल छै- सफीना कहलकइ।.. जेना हिटलर यहूदी कए कतल केलकै, तहिना मोदियो मियाँ कए काइट देतै।.. अइ देस मे गिद्ध उड़तै। बीजेपी अनधुन खरचा काए रहलइए।..जमील.. मोदी तए एक नम्मर के झुट्ठा छै! रामधन बात लोकइ छै। आइ परभास आयल रहइ। बूथ-खरचा के सात हजार टका दाए गेलइ। दूटा बूथ छै। राम मन्दित तए बीजेपीए बनेतै।.. चुनलकै से मंदिरे बनबै लए?.. हम मोदिए कए भोट देबै।.. पकिया अंधभक्त.. सूर्यनारायण कौमनिस्ट.. नीतीश गनगुआइर छिऐ.. एगो मुँह भाजपा.. दोसर राजद। कमल दास बीजेपी समर्थक छिऐ। ..छप्पन इंच के छाती.. पाकिस्तान कतौ भारत मे ठठलइए!... चीन के लगही भाए जेतै.. रामदेव के गप पर सब हँसइए। भोट खातिर मोदी पाकिस्तान पर हमलो काए सकइए। .. बीजेपी लड़ाइ किए करतइ? हिन्दुए खातिर ने करतै?.. मुसलमान के पाकिस्तान भेजल जाए। लाल पाठक विस्फोट केलकै।.. राष्ट्रवादी लाल तए आइबिए गेल॒! आब मनुवादिए टा के कमी छै। दीना पाठक.. मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप नै लागल.. मोदी तए महाभ्रष्टाचारी छै। सुधीर चाह दहक- कामता के ई उदारता माहौल कए एकदम बदैल देलकै। परचार खतम भाए गेलइ।.. शान्त.. सब चीज भुम्हूर जकाँ तरेतर सुनगै छै। लोग एक घण्टा पहिनइ लाइन मे लागय लागल। बेचना ककही दाए कए महिला भोटर पटियाबैत रहइ, सिपौल बजार मे पोलिंग कम भाए रहलइए। ई समाचार बीजेपी समर्थक कए चिन्तित केलकइ। शहरमे कमल के भोटर बेसी छै। सफीना भोट गिरबै लए आयल छै। .. काइल्ह एबह- कहि कए चंदेसरी निकैल गेल। सफीना मुस्कुरायल। बिहान भने चंदेसरी नवटोल गेल। सफीना संगे चुनाव के गप होइत रहलै।.. भाजपा कहै छै हम जितबै। गठबंधन कहै छै हम जितबै। आब जे होइ।सफीना दू-तीन दिन मे दिल्ली चैल जायत। चंदेसरी पुछलकै- एबहक कहिया? सफीना बाजलै- भाजपाई रोज नया-नया काण्ड करै छै।.. चंदेसरी- एना हीया हारने जिनगी चलतह? सफीना छगुनैत रहल.. लड़ैत-लड़ैत मैर गेनाइ नीक छै।.. मरनाइए, जिनाइ छिऐ। गुलो, रमता जोगी आ भोट पाठ शुरू होइत अछि तिला सकरांति सँ, आङन नीपि रहल अछि गुलोक छोटकी बेटी रिनियां। गुलो उपन्यासक आरम्भ रिनियाँ सँ किए भेल, गुलोक बेटासँ किए नै भेल। कारण जुलिया क्रिस्टोवाक अनुसारे बेटा अपनाकेँ मायसँ दूर करैत अछि, मुदा बेटीमे ओ लय, ओ गुण रहिते छै से ओ दूर होइतो मायसँ, संस्कृतिसँ लग रहैत अछि। कोनो आन प्रकारसँ ऐ उपन्यासक एतेक नीक आरम्भ नै भऽ सकैत छल। गीत गाबि रहल अछि रिनियाँ, फेर पानिक फाहा जकाँ ओस, पछिया हवा आ मायक चिन्तित हएब। "गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।" बादोमे बेटी आ बेटामे अन्तर छैहे- छौड़ी असकरे कखून घर तऽ कखनू गाछी दौड़ैत रहइ छइ। छौड़ा आठ बजे धरि सुतले रहै छै। आ फेर अबैए जुलिया क्रिस्टोवाक पुरुख, ओकर ऐंठी।"ने चिन्है छिही तऽ चीन्ह ले।" की ई हेंठी अहाँ लुटियन्स जोनमे नै देखै छिऐ, सगरे ई हेंठी भेटत। मानव समाजमे, खास कऽ पुरुख पात्रमे। घूर-धुँआ, छल प्रपंच, आ गुलोकेँ सरकारी जमीनपर बसऽ पड़लै। ओकर बाप मुनीलालक छोड़ल बपौती सम्पत्ति रहै छोट-पैघ खुरपी, कोदारि, खंती, दबिया, कुड़हरि, भाला, बरछी। आइ काल्हि बालिकाकेँ पढ़बैमे सरकार लागल छै, रिनियांकेँ स्कूलमे पाँच सय टाका भेटल रहइ, पोशाक राशि। मुदा गुलो चाटि गेलै। गुलोक बेटी आ गुलोक छोटका बेटाक घरक काजक प्रति दृष्टिकोणक द्वन्द्व। मुदा फेर जखन बाँस चोरा कऽ ५०० टाकामे गुलो बेचैए तखन ओइ पाइसँ रिनियाँ पाठी कीनैए। गुलोक बड़का बेटाक रोजगार लेल पनिजाब पलायन। पूरा बजार राजिनदर डीलरक समदाही इनरा गानही आ ओकर चारिटा बेटा। फेर बजारसँ बाहर आउ, बेला, बीना आ सोनक। आ तखन गुलो केँ दूटा सुपारी दूटा नोत मे आयल छै- एकटा लालो पण्डित के पोती के बियाह , दोसर सारि के जैधी के बियाह। गुलोक ससुरारि छै बेला आ ओकर पत्नीक नाम छै बेलावाली। पहिने गुलोकेँ गाजा पीऐत-पीऐत दम्मा उखड़ि गेलै। चारू कात माने गाजाक नशाक व्यापार होइत हेतै। भगिनाक बियाहक नोत पुरबाक क्रम, साड़ी, साया, बिलाउज आ दू सय एकावन टाका दिअ पड़तै। ओ सोनक जाइए, छोटुआ आ रिनियां संग छै। गुलोक बड़की बेटी रुनियाँ बीनामे बियाहल छै। रुनियाँ सेहो सोझे बीनासँ आयल छै, बहीन रिनियाँकेँ अपन सासुर लऽ जाय चाहै छै। मुदा ओ मना कऽ देलकै, लोक कहतै जे बाप रोगाह भऽ गेलै, दिन टगि गेलै तेँ पेट पोसै लए आयल छै। ओ बड्ड कानल, गुलो केँ छगुन्ता होइ छै, छौड़ी ई सब बात केना बूझि गेलै। आ अन्तिममे बेटी रिनियांकेँ पता चललै जे गुलोक मन बहुत खराप छै। ओ भोरे आबि गेल।माय रतुका पूजा दिआ पुछलकै। औतौका हाल सुनबइ मे रिनियां कए मन नै लागलै। माए कए कहलक- 'माय, पैसा दही ने। बबा कए गोली लाबि दइ छिऐ।' कनियाँ दब छै मुदा गुलोक चलती छै ओतऽ ओकर बॉडी लैंगुएज बदलल छै। कोन कोन रोजगार छै से देखाबैले उपन्यासकार पुतोहु कंदाहावालीकेँ मलहदक चाँपमे मखानक कमौनीक नव-रोजगार भेटलइ-ए, ओतऽ लऽ जाइ छथि। छोटुआ काज करैए दशरथ मण्डलक पिलाइ मिलमे। मूंगक बीया बाउग हेतै, हरवला चास, समार आ चौकी दइ के अढ़ाइ सय मांगै छै। फेर गुलोक मृत्युक प्रारम्भ एना करै छथि गुलोकेँ खोंखी होइ छै, दू सय टाकामे दू कट्ठा थोकड़ा ओलइ के बात भेलै। सुखबा अपन माय कए घर सए निकालि देलक, फेर बदनामी भेलापर आपस लऽ गेल।। ओ छै इनरा गानहीक पितिया सासु। स्थानीय संस्कृति देखबैले कालीबन्दीक सेवा, भगैत, फुलहासि। आब तकरा बाद कुशक कलेपो नै लगतै। गुलो मालिकसँ टौर्च मांगत, ओ नै देतै तऽ एक्को गो आम कि लुच्ची भोग नै हुअय देत। गिरहत टौर्च नै देलकै, अपना पचास टका लगा कए किनलक। बाँस डेढ़ सय सए कम मे नै भेटै छै, गुलो चोरा कए बेचत तैं एक्के सय मे दिअय पड़तै। पाच टा बाँसक पाइ भेटलै, पान सय मे रिनियाँ पाठी किनलक। घड़िए घंटा मे पाठी रिनियाँ कए चीन्ह गेलै। एक बेर रिनियाँ गछपक्कू आम लाए कए गेल रहै तऽ मालिक पचास गो टाका देने रहै। मलिकानि खाइ लए देने रहै। चोरबा सौंसे गाछक लुच्ची सिसोहि लेलकै। एकटा ठकुरबा सेनियल चोर छै। रिनियां, झुनियां आ बरस्सेरवाली लुच्ची चोरबैए। 'ऊ बभना हमरा पकड़त? ..' (बरस्सेरवाली) से सभटा गाछी बभना लग छै। रुनियाँ के दीयर नेरहू एलै, ओ चुपचाप रिनियां के देखैत रहइ-ए आ मुस्की छोड़इ-ए। दशरथ मण्डलक साढ़ूक लड़का नेपालमे छै, रिनियां लेल कथा अबै छै। मुदा गुलो चारि मासक टेम मंगैए, अरजुनमा नालायक छै मुदा तैयो ओकरासँ पुछतै। से रिनियां तऽ लग छैहे गुलोक, पुतोहु जे झगड़ा कऽ कय गेल रहै सेहो एकदम्मे दूर नै छै, देखू एतऽ- ..कंदाहावाली पहुँच गेलइ। 'पपा, कल वला मिसतरी कए बजा आनथिन। ठीक काए देतै। जे लागतै से देबै।'आ फेर अरजुनमा लेल गुलोक विचार- अरजुनमा नालायक छै मुदा तैयो ओकरासँ पुछतै। लेखक अहाँकेँदूर आ लग सभ ठाम लऽ जाइ छथि। केन्द्र कखनो गुलो रहैए, कखनो रिनियां आ कखनो कन्दाहावाली। दशरथ मण्डल पाइबला छै, मुदा एक्के बेरमे गुलो हँ नै कहलकै, अरजुनमासँ पुछतै। (जारी..) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आचार्य रामानंद मंडल- सामरथ के दुख नाहि गोसाईं आचार्य रामानंद मंडल सामरथ के दुख नाहि गोसाईं रामखेलावन महतो अपना गांव के पूर्व जमींदार छोटन बाबू के खेती गृहस्थी के काज देखत रहे।छोटन बाबू लगभग सौ बीघा जमीन के मालिक रहे। हवेली आ कम्पाउण्ड मिला कै दूं बीघा में रहे। लगभग अढाइ बीघा में बगीचा रहै,जैय में तरह तरह के आम,जामून आ लुची के गाछी रहे। टाइम पर आम, जामून लुची खूब फरे।शेष जमीन पर धान गेहूं,तेलहन आ दलहन के खेती होय। खेती गृहस्थी के सभ काज राम खेलावन कराबै।जन मजदूर के बोइन भी रामखेलावन ही देवे। छोटन बाबू खाली पंचायत के राजनीति करे। हालांकि कहियो वो मुखिया में न जीत लन। कोई कोई हुनकर लगुआ भगुआ वार्ड मेम्बर में जरूर जीत जाय। आ वोइ वार्ड मेम्बर के माध्यम से वार्ड में परे वाला स्कूल के हेडमास्टर के खूब परेशान करें।स्कूल से चले वाला मध्याह्न भोजन , छात्रवृत्ति आ पोशाक योजना सभ में जबरदस्ती कमीशन लेबे। छोटन बाबू,राम खेलावन के खेती गृहस्थी कराबे के बदले दरमाहा न देवे।वोकरा बदला में पांच बीघा जमीन देले रहे।जैमै दू बीघा जमीन के पूरा उपजा रामखेलावन के होय आ तीन बीघा बटाई पर। मतलब कि आधा उपज छोटन बाबू के।राम खेलावन भी अइ आमदनी से छोटन बाबू से ही दू बीघा जमीन खरीद ले ले रहे।राम खेलावन भी सुखित गर हो गेल रहे। छोटन बाबू के छोटके परिवार रहें। अपने, घरवाली सुलोचना आ एगो खूब सुंदर गोर बेटी पिरिया।तहिना रामखेलावन के भी परिवार में अपने, घरवाली पारवती आ एगो खूब सुंदर श्यामला रंग के बेटा परेम। पिरिया आ परेम गांव के स्कूल में पढ़े।परेम पढ़ें मे बड़ा तेज रहे।उ क्लास में फर्स्ट करे ।पिरिया पढ़े मे मध्यम रहे।परेम, पिरिया के पढ़े में खूब मदद करें।पिरिया भी परेम के कापी, किताब, पेंसिल से मदद करें।दूनू साथे साथे खेलबो करे।चोर सिपाही,लुका छिपी,भगडिलो भगडिलो, राजा रानी। राजा रानी मे त परेम राजा आ पिरिया रानी बने। मिडिल तक त दूनू अपना गांव में पढलक। हायर सेकंडरी स्कूल गांव से दो किलोमीटर दूर रहे।दूनू पैदलै स्कूल जाय। परेम क्लास टेन आ प्लस टू में भी फर्स्ट आयल।आ पिरिया सेकेंड डिवीजन से पास भेल। अब डिग्री में परेम सीतामढ़ी के गोयनका कालेज में नाम लिखैलक।परंच नम्बर कम होय के कारण पिरिया के एडमिशन गोयनका कालेज में न हो सकल।पिरिया के एडमिशन राम सकल सिंह महिला कालेज, डुमरा में भे गेल।पिरिया कालेज के गर्ल्स होस्टल में रहे लागल।आ परेम गोयनका कालेज के हास्टल में रह के पढ़े लागल। बीच बीच में दूनू के भेंट सीतामढ़ी मार्केट में होइत रहे। परेम बीए राजनीति शास्त्र आनर्स में बिहार यूनिवर्सिटी में टाप रहल आ पिरिया समाजशास्त्र आनर्स फर्स्ट क्लास में पास कैलक। पिरिया अब पटना में जाके वोमेन्स कालेज में एम ए में नाम लिखैलक।परेम एम ए में नाम न लिखा के यूपीएससी के तैयारी करे लागल। पटना के आइ ए एस तैयारी कराबे वाला कोचिंग सुपर फोर्टी में नाम लिखा लेलक। जैइ दिन पिरिया के एम ए फाइनल के रिजल्ट निकलल।वैहै दिन परेम के युपीएससी के फाइनल रिजल्ट निकलल।जंहा पिरिया फर्स्ट क्लास से पास कैलक। परेम आइएस में पांचवा स्थान पर रहे। एक दोसर के समाचार सुनि के दूनू खुश रहें।दूनू परिवार भी खूश रहे। अब पिरिया घर पर रहे लागल।आ परेम ट्रेनिग में चल गेल।छोटन बाबू आ हुनकर घरबाली सुलोचना के पिरिया के शादी के चिंता सताबे लागल। एक रात दूनू गोरे पलंग पर लेटेल रहे। सुलोचना बोललन-न सुनै छी।सुत रहली कि!छोटन बाबू आंख मूंद ले कहलन-अब हमरा नींद कंहा अबै हए।जेकरा घर में पढल लिखल जवान बेटी होतै।वोकरा बाप के आंख में नींद कंहा से अतै। सुलोचना बोललक-हां यौ।हमरो नींद न अबैय। झूठे के आंख मुंदले रहै छी। अंहा के नजर में पिरिया के लेल लड़िका न हए । छोटन बाबू कहलन-अब जर जमिंदार के धिया पुता पढबे कंहा करै छैय। इंटर बीए कैलै रहत।परंच योग्यता न रहै छैय। ज़मीदारी त हैय न।गुमाने टेढ रहैत हए।अब अपना जिला में त न हए। मुजफ्फरपुर, मोतिहारी में पता लगवै छी।कुछ दोस्त मुजफ्फरपुर आ कुछ मोतिहारी में भी हए।बिहान होय दू। डायरी में मोबाइल नं खोजब। सुलोचना अपन हाथ छोटन बाबू के छाती पर रखैत बोललन-आबि सुत रहु। कोनो चिंता न करु। महादेव पर ध्यान रखूं। महादेव जे करथिन निके करथिन।छोटन बाबू कहलथिन-अंहु सो जाउ। पिरिया अपना रूम में जगले पलंग पर परल रहे।अपन बाबू माय के खुसुर फुसुर सूनैत रहें।अपना बिआह के लेल बाबू माय के चिंता से चिंतित हो गैल।पिरिया के परेम के याद आबे लागल।वोकरा संग बितायल एक एक क्षण याद आवे लागल।आइ तक परेम के एक साथी के रूप में देखले रहे।आइ परेम,परेमी लागे लागल।जीवन साथी लागे लागल।पिरिया के नींद उड़ गेल। केना इ बात बाबू माय के कहब। बाबू माय की सोचत।फेर पिरिया सोचे लागल,इ केना हम सोच लेलीयै।परेम हमरा चाहबो करै कि न।कनिको हमरा से परेम करबो करै कि न।हमर याद अयबो करै छैय कि न।पिरिया अब सोचे लागल कि वो एसडीएम बनता एसडीएमीन के चाहता।वोकरे से विआह करता।आइ के जमाना में कपूल नौकरी चाहैत हए।सेम नौकरी त सोना में सुगंध होय छैय।अइ सोचे में पिरिया इ भूला गेल कि हम दूनू दू जाति के छी। वोहु में हमरे खेती गृहस्थी देखेवाला करपरदाज के बेटा ।माय बाबू परेम के स्वीकारत की न।इ सोचते सोचते पिरिया के आंखि लग गेल। घड़ी के सूई सुवह के आठ बजा रहल रहे। सुलोचना बोललक-पिरिया।पिरिया।उठे न।आठ बज गैलै।केबारी के ढक ढकाबे लागल। पिरिया आंख मिजैत बोलल-हां।मम्मी।उठ गेली। सुलोचना बोलल-ठीक। परेम के ट्रेनिंग खतम भे गेल रहे।अब वो रोहतास सबडिवीजन के एसडीएम पद पर ज्वाइन कै लेलक।आइ रात में परेम के पिरिया के खूब याद आ रहल हए।परेम अइ बीच में ट्रेनिंग के चलते एतै न बीजी भे गैल रहे के पिरिया के याद करे के फूरसत न रहे। लेकिन आइ बहुत याद आ रहल हए। बचपन से लेकर पढ़ाई लिखाई तक के हर क्षण याद आबे लागल।एगो साथी के रूप में।परंच आइ पिरिया हृदय के धडकन लागै लागल।फैर दूनू दू जाति के छी।हमर बाबू पिरिया के बाबू के यहां खेती गृहस्थी देखेवाला करपरदाज।केना हम दूनू गोरे एक हो सकै छी।आइ हम एक एसडीएम छी।नियम कानून जनै छी। कानूनी रूप से हम आ पिरिया शादी कर सकै छी। हमर बाबू माय,पिरिया के बाबू माय आ समाज की कहतै। इ सोचते सोचते परेम के नींद पड़ गेल। चपरासी के साहेब साहेब के आवाज से नींद खुलल। आइ रात में अचानक परेम के मोबाइल घनघनायल।देखै त पिरिया के काल हैय।परेम बोलल-हेलो!पिरिया।उधर से आवाज आयल।हेलो-परेम।परेम तू बहुत याद आ रहल छा।ज्वाइन त कै लेला।तोहर बाबू जी हमरा बाबू जी कै बतैयब रहलन रहे। परेम बोलल-हं।काल्हे रोहतास सबडिवीजन के एसडीएम पद पर ज्वाइन कैली हए। पिरिया बोललन-आब तू त बड़का आदमी हो गेला। एग सबडिवीजन के मालिक बन गेला। हमरा तू अब केना याद करबा।परंच तू त हमरा बड़ा याद आबैछा। हमारा रात में नींदो न आबैय हए ।तू बड़ा याद आबैछा । परेम बोलल-एना ना कहा पिरिया।काल्हि रात में हमरो नींद न आयल।तोरे बारे में सोचैत रहै छी। हमरा इ न मालूम कि हमरा की हो रहल हए। पिरिया बोलल-अइ मर्म कै मर्द न जान सकै छैय। इ एगो स्त्री जानै छैय।परेम इ परेम छैय। अब अहिना मोबाइल पर बात होय लागल परेम परवान चढ़े लागल। तीन महीना बीत गेल।पिरिया के माय बाबू,पिरिया के बिआह लेल परेशान रहे।दूनू दोस्त से बात कैलक। लेकिन दूनू कहलक,पिरिया के लायक लड़का न मिलत हए। इ बात जान के पिरिया मने मने खूब खुश होय।पिरिया मन में सोचलक कि आइ परेम से विआह के बारे में बात करब।आ मोबाइल पर परेम के नम्बर पर रिंग कैलक। परेम बोलल-हेलो।पिरिया।पिरिया बोलल-हैलो!परेम। आइ एगो खास बात करब। हमरा पूरन विश्वास है कि तूं मान जायब।परेम बोललन-कहा न कि बात हए!पिरिया बोललन-पहिले इ कहा कि तू हमरा से परेम करै छा कि न।परेम बोललक-कहा न।हम तोरा से बहुत परेम करै छी। पिरिया बोलल-पहिले आइ लव यू बोला।तब कहब। परेम बोललक-तू कहै छा त हम बोलै छी।आइ लव यू। अब बोला। पिरिया खुश होके बोलल-आइ लव यू।आइ लव यू। हम तोरा से बिआह करै के चाही छी। तूं अब एगो सबडिविजन के मालिक त हैयबे करा।हमरो दिल के मालिक बन जा। परेम बोलल-पिरिया तू पगला त न गेला हए।इ केना होतै। तोहर बाबू माय मानतो।समाज की कहतैय। पिरिया बोलल-हा।हम तोरा परेम में पागल भे गेल छी। देखा बाबू माय के हमरा पर छोड़ दा।ऐगो बात और सुन ला। बाबू माय नै यो मानतै,तैयो हम बिआह तोरे से करबो।हम दूनू गोरे बालिग छी।कानून हमरा साथ हए। परेम बोलल-कानून हमरा साथ हइ।इ बात हमहु जनै छी।इ त अंतिम बात हए।परंच तू अपना बाबू माय के राजी करा।हमर बाबू माय त जे हम कहबै वोकरा मान लेथिन। पिरिया बोललक-ठीक हए।हम अपना बाबू माय के मना लेव। अच्छा।आइ लव यू।आ लाइन काट देलक। परेम बड़ा खुश रहें।सोचे लागल पिरिया के बाबू माय पिरिया के खुब मानै हए।पिरिया अकेली बेटी जे रहे। पिरिया के बाबू माय पिरिया के शादी के बारे में बात करैत रहे। लेकिन लड़का न मिले के कारण चिंतित रहे। एक दिन सांझ में छोटन बाबू एगो पंचैती में लागल रहे।माय के अकेला पाय के पिरिया माय के घर में गेल। माय पलंग पर परल रहे।पिरिया बोलल-माय माथा दुखाय छौ कि। माय बोलल-हल्का हल्का।ला जांति देउ छीयो।पिरिया बोलल।माय एगो बात कहियो।माय कहलक-कहे न। पिरिया बोललक-हम परेम से परेम करै छी।परेम हमरो से परेम करै छैय। सुलोचना बोललक-इ तू कि कहै छिहे।अब परेम बड़का आदमी भे गेल हए।वो अब एसडीएम हए वो तोरा से बिआह कर तौ। पिरिया कहलक-ह़।माय।वो हमरा से परेम करै हए।वो हमरा से विआह करतैय।हम बतिआ ले ली छी।माय कहलक-ठीक आइ रात में तोरा बाबू जी से बतियाब। परंच माय के बात सुनके पिरिया के बड़ा आश्चर्य लागल। माय आइ जाति पाति के नाम न लेलक।आब बाबू जी की करथिन्ह। रात में सुलोचना,छोटन बाबू से बोललन-कि भेल कोनो लड़का के पता चलल।छोटन बाबू कहलन-कंहा पता चलल। सुलोचना बोललक- एगो बात कहु। बिगडब त न। छोटन बाबू कहलन-सुलोचना। आइ तक हम न त़ोरा पर बिगड़ली हए न तोहर कोनो बात कट ली हए। सुलोचना बोललक- हम पिरिया के लेल लडका ढूंढ ले ली हए।लड़का एसडीएम हए। छोटन बाबू हंसैत कहलन-हं।हं।अपन परेम न।अरे वो बड़का आदमी बन गैल हए। एसडीएम हए। सुलोचना बोललक-त कि भे गैले।अपन पिरिया परेम के परेम करै छैय।परेम भी पिरिया से परेम करै छैय। इ बात पिरिया हमरा बतैलक हए वो दूनू बिआह करै लैल राजी हए। छोटन बाबू बोललन-त हमहु तैयार छी। इ बात सून के सुलोचना बोललक-हमरा आश्चर्य लगैय अ कि अंहा जाति पांति के मानै वाला विआह के लैल केना तैयार भे गैलीये। छोटन बाबू बोललन-देखू। बड़का आदमी में जाति पाति न होय छैय। पहिले हम बड़का आदमी रही।अब परेम भी बडका आदमी भे गैले। अब व एसडीएम हए। रामखेलावन भी एसडीएम के बाप बन गैलैय हए।अब हम दूनू परिवार समान छी। अब शादी ब्याह में कोई बाधा न हए।काल्हि खुनमी रामखेलावन बाबू से बात करब। इ सभ बात पिरिया सुन लेकर आ राते में मोबाइल से परेम से बतिआ ले लेलक।दूनू खुश रहें। इ सभ बात राते में सुलोचना पिरिया के बता देलक। काल्हि दोपहर में मौका देख के छोटन बाबू सभ बात रामखेलावन बाबू के कहलन। रामखेलावन बाबू कहलन कि परेम जे चाहेत हए वोहै होते।वोकर बात हम न काटब। तय समय पर पटना के मौर्या होटल में परेम,पिरिया के मांग में सिंदूर भर देलन।पिरिया आ परेम एक भ गेल। पूरा समाज ऐइ क्षण के गवाह भेल।सभ कहें-सामरथ के दुख नाहि गोसाईं। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.आशीष चमन- आदि नदी-कथा कहैत स्त्री आशीष चमन आदि नदी-कथा कहैत आजुक स्त्री अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.आशीष अनचिन्हार- तीन टा बिन्दु आशीष अनचिन्हार तीन टा बिंदु आशीष अनचिन्हारक प्रस्तुत आलेख विदेहक 150म अंक, 15 मार्च 2014मे प्रकाशित भेल छल आ मुदा ई आलेख मैथिलीक मूल समस्या दिस इंगित करैए तँइ ई हरेक समयमे प्रासंगिक अछि। तँइ पहिल प्रकाशन केर बादो ई विदेहेमे एकरा दू-तीन बेर देल गेल आ अहू अंकमे दऽ रहल छी (संपादक)। मिथिला-मैथिलीकेँ तोड़बामे पुरस्कारक की भूमिका छै ताहि हिसाबसँ ई मैथिलीमे पहिल प्रयास छलै जकरा हम सात बर्ख पहिने लिखलहुँ। एहिसँ पहिने कोनो लेखक-विचारक एहन तथ्य उजागर नहि केने छलाह। बादमे पता चलल जे राजद केर नेता मनोज झाजी २०१८ मे अही बातकेँ उठेलाह तँ खुशी भेल हमरा जे कतहुँ ने कतहुँ हमर विचार जिंदा छै। ईहो खुशी भेल जे भने लोक क्रेडिट नहि दिअए मुदा सही विचार पसरिते छै। आब तँ ईहो देखि रहल छी जे विगत किछु बर्खसँ विदेहक विरोधी लोकनि सभ सेहो यत्र-कुत्र लीखि रहल छथि जे पुरस्कारक कारणे मिथिला-मैथिली टूटल। मुदा ईहो सभ मूल आलेख वा हमर नाम नै लऽ रहल छथि। खएर नाम हो वा कि नै हो मुदा विचार पसरबाक चाही। तँ आउ पढ़ू एक बेर ई पुरने आलेख (लेखक) भाषा केर मनोविज्ञान भाग-1 जखन केओ कहै छै जे "मैथिली मधुर भाषा थिक" तखन हमरा ओहिसँ बेसी बड़का गारि किछु नै बुझाइत अछि। कोनो भाषा मधुर वा खटगर वा नुनगर की तेलगर होइते नै छै। आ जँ मधुर होइ छै तँ किएक? ऐ प्रश्नपर एबाक लेल बड़ साहस चाही। मध्यकालीन मिथिला सामंती छल। सामंत बैसल की चमचा सभ घेरि अपन समस्या सुनबए लागैत छलाह। आ जखन केकरो अहाँ अपन समस्या सुनेबै वा की केकरो चमचइ करबै तखन भाषा तँ मधुर राखहे पड़त। हमरा जनैत मैथिली अहीठाम मधुर भाषा थिक। कारण मैथिल चमचइ कर'मे बहादुर होइ छथि। मधुर बोल तँ राखहे पड़तन्हि। ठीक विपरीत मिथिलाक दलित ओ गैर-सवर्णक भाषामे चमचइ नै छै तँए ओहिमे टाँस बेसी बुझि पड़ै छै आ ब्राम्हण-कायस्थ सभ ओकरा रड़बोली कहै छथि।मुदा हमरा जनैत ई मात्र दृष्टिगत भेद अछि। जकरा अपन बाँहिपर विश्वास छै ओकर बोली ओ भाषामे टाँस रहबे करतै--जेना मिथिलाक दलित वर्गक मैथिली।आ जे चमचइमे लागल रहत तकर बोली ओ भाषामे मधुरता रहबे करतै--जेना मिथिलाक ब्राम्हण ओ कायस्थ वर्गक मैथिली। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-2 ई हम दू मिनट लेल मानि लै छी जे ब्राम्हण-कायस्थ महातेजस्वी होइ छथि तँ हुनके टा पुरस्कार भेटबाक चाही। मुदा की ब्राम्हण-कायस्थ दरभंगे-मधुबनी-सहरसामे छै वा मिथिला मने की दरभंगे-मधुबनी-सहरसा छै। ऐ समस्यापर जखन हम दृष्टिपात करै छी एना बुझाइए---- १) जेना-जेना दरभंगा-मधुबनी-सहरसाक क्षेत्र खत्म होइत जाइए तेना-तेना ब्राम्हण-कायस्थ ओ आन छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत जाइए (१००मे ९७टा केसमे)। चाहे ओ सीतामढ़ी हो की मुज्फफरपुर हो की पूर्णिया हो की भागलपुर हो की समस्तीपुर हो की बेगूसराय हो की चंपारणक किछु क्षेत्र (झारखंडक क्षेत्र बला लेल एहने बुझू, राजनैतिक बाध्यताकेँ देखैत नेपालीय मैथिलीक उल्लेख नै क' रहल छी)। २) जेना-जेना ब्राम्हण-कायस्थओ छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत गेलै ब्राम्हणवादी सभ ओकरा मैथिली मानबासँ अस्वीकार क' देलक। ऐ कट्टर ब्राम्हणवादी सभहँक नजरिमे ई छलै जे भाषाक भेदसँ ब्राम्हण वा छोट जातिमे भेद छै। आजुक समयमे अंगिका ओ बज्जिका भाषाक जन्म ब्राम्हणवादक एही प्रवृतिसँ भेल अछि। किछु दिन पहिने नरेन्द्र मोदी द्वारा मुज्फफरपुरमे भोजपुरीमे भाषण देब एही ब्राम्हणवादक विरोध अछि आ हम एकर स्वागत करै छी तथा ओहि दिनक बाट जोहि रहल छी जहिया ओ दरभंगा-मधुबनीमे भोजपुरी बजता। जँ ठोस विचारक रूपमे आबी तँ निश्चित रूपें कहि सकै छी जे मैथिलीकेँ तोड़बामे ई ब्राम्हणवादी सभ १०० प्रतिशत भूमिका निमाहला। जँ कदाचित् ई ब्राम्हणवादी सभ दरभंगा-मधुबनी-सहरसासँ हटि क' सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ पुरस्कार देने रहितथि तँ कमसँ कम मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहैत। ई अकारण नै अछि जे रामदेव झा, चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आदि एहन महान ब्राम्हणवादीक कारणे दरभंगा रेडियो स्टेशनसँ बज्जिकामे कार्यक्रम शुरू भेल। ३) आ जँ मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहितै तखन मिथिला राज्य लेल एतेक मेहनति नै कर' पड़ितै। कारण चंपारणसँ गोड्डा धरि सभ अपन भाषाकेँ मैथिली बुझितै। ऐ ठाम हम ई जोर द' क' कहब चाहब जे पुरान होथि की नव राज्य आंदोलनी सभ सेहो ब्राम्हणवादी छथि। अन्यथा ओ सभ सेहो रामदेव झा. चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आकी आन-आन मैथिली विघटनकारी सभहँक विरोध करतथि। आखिर की कारण छै जे धनाकर ठाकुर अपन मानचित्रमे चंपारण वा गोड्डाकेँ तँ लै छथि मुदा ओहि क्षेत्रक साहित्यकार लेल पुरस्कारक माँग नै करै छथि। ई प्रश्न मात्र धनाकरे ठाकुरसँ नै आन सभ राज्य आंदोलनीसँ अछि। ऐठाम ई बिसरि जाउ जे पुरस्कार कोनो छोट जातिकेँ देबाक छै। जँ ब्राम्हणे-कायस्थकेँ देबाक छल तखन फेर सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण, बेगूसराय आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ किएक नै ? तँ आब ई देखबाक अछि जे के-के मिथिला राज्य आंदोलनी ब्राम्हणवादी छथि आ के-के साँच मोनसँ मिथिला राज्यकेँ चाहै छथि। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-3 लोक जखने ब्राम्हणवादक नाम सुनै छथि हुनका बुझाइत छनि जे सभ ब्राम्हणकेँ कहल जाइत छै। मुदा हमरा लोकनि बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे ब्राम्हण आ ब्राम्हणवादक कोनो सम्बन्ध नै। कोनो चमार सेहो ब्राम्हणवादी भ' सकै छथि। ब्राम्हणवाद जाति विशेष नै भेल ई मात्र मानसिकता भेल जे कोनो जातिमे भ' सकैए। ब्राम्हणवादक प्रमुख तत्व वा लक्षण एना अछि--- १) केकरो आगू नै बढ़' देब------ एकटा छलाह स्व. रमानाथ मिश्र "मिहिर"। ई नीक हास्य-व्यंग केर कविता लीखै छलाह। मुदा ई मैथिली साहित्यमे आगू नै बढ़ि सकला। कारण? कारण हिनक दोख छलनि जे ई चंद्रनाथ मिश्र " अमर" जीक भातिज छलखिन्ह। दालि आ देयाद जते गलत तते नीक। साहित्यक स्तरसँ ल' क' पारिवारिक स्तरपर रमानाथ मिश्रजीकेँ पददलित होम' पड़लनि। ब्राम्हणवाद मात्र दलिते लेल नै छै। बहुत रास ब्राम्हण अपनो जाति केर लोककेँ आगू नै बढ़' दैत छै। २) मात्र अपने टाकेँ नीक बुझब--- जँ साहित्य अकादेमीक लिस्ट बला झा-झा सभ प्रतिभावान छथि तँ फेर मैथिली साहित्य विश्वक छोड़ू भारतीय साहित्य केर समकक्ष किएक नै अछि। आ जँ प्रतिभे छै तखन तँ श्री विलट पासवान "विहंगम" भारतीय राजनीतिसँ ल' क' मैथिली साहित्य धरि योगदान देने छथि। की विहंगम जी प्रतिभाहीन छथि। विहंगम जी सन-सन आर बहुत बेसी नाम अछि। ३) परिवारवाद---- रामदेव झा जखन रिटायर भेलाह तँ साहित्य अकादेमीमे ओ अपन ससुर चंद्रनाथ मिश्र अमरकेँ बैसा देलाह। तकर बाद अमर जी अपन समधि विद्यानाथ झा विदितकेँ बैसेलाह। आब विदितजीक निकट संबंधी (चेलाइन) छथि। कारण-- ब्राम्हणवादक एकमात्र कारण हीन भावना अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.जगदीश प्रसाद मण्डल- विश्वासहीन जगदीश प्रसाद मण्डल
विश्वासहीन किसान परिवारमे जन्मो भेल आ अप्पन जीवनो किसानी छीहे। जेठक अन्तिम समय, मड़ुआ रोपिकऽ बारह बजेमे घरपर आबि नहेलौं, धोलौं, खेलौं आ ओछाइनपर जा पड़ि रहलौं। जेना थाकल रही तेना नीन जल्दी अबैत, से नइ भेल। खानक खनिज खुननिहार जहिना पाथर तोड़ला पछातियो आँखिक नीनकेँ रोकैले नशा-पान करैए तहिना किसानो परिवारमे अछिए। जइ परिवारमे माल-जालक पोस नइ अछि, ओइ परिवार ले बेरुका उखड़ाहा माने दुपहरक पछातिक समय, छुट्टीक पहर होइते अछि जे अपनो अछिए। ओछाइनपर पड़ल-पड़ल नीन दिस ताकी जे केतए नुका गेल अछि जे बारह बजे तक टहटहौआ रौदमे मड़ुआ रोपिकऽ एलौं हेन आ नीन पड़ाएल अछि। लगले मनमे उठल जे मड़ुए ने रोपिकऽ एलौं हेन। जइ मड़ुआक गिनती अन्नमे अछिए नहि। मुदा दू सालसँ सुनबे करै छी जे मड़ुआक गिनती मोटका अन्नमे भऽ गेल। विचारे विचारमे मन घुमि गेल। घुमि ई गेल जे धानमे तँ मोटका-महीका, नमका-छोटका सभ रंगक होइए मुदा कहबैत तँ अछि पतरके माने महीक्के अन्न। एक अन्न रहितो मोट-मेही वा नमहर-वौना भेल। मुदा मड़ुआ केना मोटका अन्न भऽ गेल से बुझिमे ऐबे ने कएल। धान दिस नजैर दौड़ाबी तँ मोट-मेही बुझि पड़ए, मुदा मड़ुआ दिस देखी तँ देख पड़ए जे जँ मड़ुआ मोटका अन्न भेल तँ मोटाएल किए ने अछि। मड़ुआक विपरीत महीका महीका अन्न कोन भेल? मुदा अपने मन कहलक, घोड़ाक दाना बदामो एकरा मानैले तैयार थोड़े हएत, जे हम मड़ुआकेँ मेही अन्न बनबैले तैयार छी। मन तँ कछमछाइते रहए मुदा देहक थाकैन देहकेँ जँतने छल तँए पड़ल रही। कछमछाइत-कछमछाइत तीन बजेक समय पार भेलौं। ओना, धरमागती पुछी तँ स्कूल-कौलेज अपने नइ देखने छी। तँए कहब जे चौपट्टेनाथ छी सेहो बात नहियेँ अछि। खेती करैक लूरि अछिए, खाइ-पीबैक वौस उपजाइये लइ छी, ई सभ करै छी भिनसुरका पहरमे, माने दुपहरसँ पहिने, तँए दुपहरक पछातिक समय खलिया जाइए, ओकरा पुरबैले बेररुपहर कियो गांजा-भांग, ताश-सतरंज वा जुआपर बैसै छैथ मुदा अपने से नइ करै छी। अपने यएह करै छी जे पँचकोसीमे केतौ जँ नाच-तमाशा होइए तँ तइ पाछू भरि-भरि राति गमा दइ छी। तहिना, महिनाक महिना दिन भागवत कथासँ रामलीला, रासलीला देखै-सुनैमे सेहो लगैबते छी। परोपट्टामे जेतए-केतौ कबीर पंथीक सत्संग-भजन होइए तँ तहूमे अरबैध कऽ जाइते छी। यएह ने अपना सभक किसान परिवारक जीवन अछि। ओना, पन्नालालक नौटंकी आ उमाकान्तक नाटकसँ लऽ कऽ भिखारी दासक नाच देखैमे सेहो मन लगिते अछि। गाममे सोमेश्वर काका छैथ। अपन रूटिंग बना नेने छी जे जँ केतौ कोनो तरहक नाच-तमाशा सत्संग-भजनमे जँ नइ जा भेल तँ सोमेश्वर काका ऐठाम जा कऽ बेरुका समय बितबै छी। हँ, आइ दुपहरमे मड़ुआक चास लगाकऽ आएले रही, जइसँ मनमे बेसी खुशी रहए तँए नीन पड़ाएल रहए आकि देह अपन थाकैनकेँ देहेमे पचा नीन रोकने छल, से बुझिमे ऐबे ने करए। किछु छी तँ दोसराक सिखौल ने अप्पन बुधि छी। जखन अपना सिखै-सिखबैक लूरि भऽ जाएत तखन ने से होइत। मुदा से तँ होइत स्कूल-कौलेज गेने, से तँ भेल नहि। एकलव्य जहिना अक्षर बोधक अभाव रहितो धनुरधर वोध सीख लेलक, तहिना अपने छी। धानक बीआ कहिया खेतमे पाड़ल जाइए, से तँ नइ बुझै छी मुदा बीआ पाड़ैक लूरि नइ अछि, मन से किए मानत। ई सभ लूरि अछिए। सोमेश्वर कक्काक शरणस्थली पेब जएह जीवन अछि, तहीमे मस्तीसँ रहिये रहल छी। ओछाइनपर पड़ल उठैक विचार कइये रहल छेलौं कि पत्नी लगमे आबि डपैट कऽ बजली- "केतेकाल सँ चाह राखल अछि आ अहाँकेँ ओछाइन छोड़ले ने जाइए, जेना लगैए देहमे सटि गेल अछि।" भकुआएल तँ नइ रही मुदा ठकुआएल जरूर रही, तँए मुहकेँ बन्ने राखब नीक बुझलौं। ओना, ओछाइनपर सँ उठैक मन नइ हुअए, किए तँ बुझले अछि ने जे जीवनमे सभकियो सुख चाहैए। सुखसँ रहबे ने जीवन भेल। सुखो तँ सुखे छी, केतए सुखा जाएत आ केतए पनैप जाएत तेकर ठेकान नहि अछि। आलसकेँ जैठाम जीवनक दुश्मन बुझै छी, तैठाम मन अलिसा सुख नइ पबैए, सेहो बात नहियेँ अछि। ई दीगर जे दिव्य सुखक अप्पन उच्च महत्व अछिए। ओछाइनपर सँ उठि चापाकलपर नइ गेलौं, किए तँ पत्नी गिलासमे चाह आ लोटामे पानि लइये कऽ आएल छेली। मुँह-हाथ धोइ, लोटाक बाँकी पानि पीब चाह पीबए लगलौं। जहिना मुहमे चाह गेल तहिना मनमे चाह उठल जे आन दिनसँ भिन्न पत्नीक रूप किए छैन? किए डपैट कऽ बजली जे 'चाह राखल अछि आ अहाँक देह ओछाइनमे सटि गेल अछि?' रंग-बिरंगक विचार मनमे उठए लगल। मडुआक चास लगा आएल रही तँए मनमे खुशी रहबे करए। होइतो अहिना छै जे मन खुशी रहल तँ खुशी-खुशी काज केलौं आ खुशियालियो परसलौं। मनमे स्वत: बुझि पड़ल जे पत्नीक डपटमे आनन्द अछि। सभ पत्नी कमासुत पति चाहै छैथ। ई दिगर जे हिप्पीबला बर आ कोठाबला घर चाहैवाली सेहो बहुत छैथ। चाहबो किए ने करती? विवाह पद्धति साधारण एकरारनामा नइ ने छी, जिनगीक एकरारनामा छी किने। की पति-पत्नीक बीचक प्रेमकेँ बाँटल जा सकैए। ओना, सखो-सन्तान आ पत्नियोँकेँ लाड़-झाड़ करैक अधिकार नइ छैन, सेहो बात नहियेँ अछि। अपनोपर तँ सेवाक भार अछिए। तखन जँ ओ डपैट कऽ बाजबे केली तँ ओहो अपनाकेँ आन बुझि थोड़े बजली। अखन तक पत्नी आगूमे ओहिना ठाढ़े छेली, जेना किछु अढ़ाइये कऽ जेती। भाय अढ़ाइयोमे अढ़ाइ तँ होइते अछि किने। चाह पीबैत-पीबैत मन खनहन भइये गेल छल। अगुआ कऽ बजलौं- "अनेरे केतेकाल रोकने रहब। सोमेश्वर काका ऐठाम जाइमे अबेर भऽ जाएत। झब-दे पान लगेने आऊ।" जहिना बजलौं तहिना पत्नी पान आनए गेली। जाबे अपने तैयार होइ-होइ तइ बिच्चेमे पत्नी पान नेने आबि बजली- "केतौ अनतए नइ ने जाएब।" पान खेला पछाइत मनक फूलक पाँखुर फलकिये गेल छल। बजलौं- "कहुना छी तँ पुरुख छी किने। गाममे रही कि बाहर जाइ, मुदा घर तँ अहींक ने छी। घरनीए घर किने।" पत्नीक मनक गहवरमे जे सिनेह नुकाएल छेलैन ओ प्रस्फुटित हुअ चाहलकैन मुदा तेकरा ओ मनेमे दाबिकऽ रखने छेली। ओ सिनेह छेलैन पारिवारिक जीवनक उपार्जनक। अन्न कोनो किए ने हुअए मुदा अन्न तँ जीवनक सभसँ पैघ प्राणदाता छीहे। जखने जीवनदाताक उपार्जनकर्ता मनुक्ख स्वयं बनि जाइए तखने जीवन चक्रक गतिसँ चलए लगैए। धड़फड़ाएले बजलौं- "आब नइ रूकब। खेती-पथारीक बहुत बात-विचार सोमेश्वर काकासँ करब अछि।" पत्नी बजली किछु नहि, मुदा हुनक नजैरिक अंजादसँ बुझि पड़ल जे जेबाक आदेश दऽ रहली अछि। उठिकऽ ओतएसँ विदा भेलौं। जहिना सोमेश्वर काकासँ भेँट करए घरसँ विदा भेलौं तहिना एक्के सुरकुनियामे ओइठाम माने सोमेश्वर काका-ऐठाम पहुँच गेलौं। कनी हटलेसँ कक्काक नजैर दिस तकलौं तँ बुझि पड़ल जे मनमे कोनो विचार घुरिया रहल छैन, जे केकरो कहैले ताकि रहला अछि। कनी हटलेसँ बजलौं- "काका, गोड़ लगै छी।" अन्तर्यामी जकाँ सोमेश्वर काका बुझि गेला जे रघुनाथ भरिसक कोनो नब चास लगा आएल अछि तँए मनमे बासक विश्वास उपकल छै। ओना, अपनो मनमे सोमेश्वर काकाकेँ रहबे करैन जे कमसँ कम एको गोरेकेँ अप्पन जीवनक हिसाब दइये दिऐन। जखन जिनगीक कोनो ठेकान नइ अछि तखन जँ मनक विचार मनेमे रहि जाए, सेहो नीक नहि। बुझल बात अछिए जे रावण सनकेँ सेहो सेहन्ता लगले रहि गेलैन जे जीवनक काज अधुरा रहि गेल जे मने संग जा रहल अछि। जखन रावण सनकेँ मन नइ भरल तखन अपने कोन खेतक मुरै छी। जहिना साल भरिक बच्चा, जे उठिकऽ ठाढ़ होइक अवस्थामे रहैए, ठेहुनक बलेँ अंगना-घर घुमि-फिरि टहैल-बुलि लइए, तेहेन बच्चाकेँ जहिना माए खेबाकाल अप्पन आँगुरसँ धरतीपर इशारा करैत बैसैले कहैए तहिना सोमेश्वर काका आगुएक धरतीपर माने चौकीपर लगमे बैसैले कहलैन। दुनू हाथ जोड़नहि रही जे सोमेश्वर काका आसिरवाद देता तखन ने छातीपर सँ दुनू हाथ हटाएब। मुदा से भेल नहि, तैबीच सुचिता काकी चाह नेने दरबज्जापर पहुँच गेली। पत्नीकेँ आगूमे चाह नेने ठाढ़ देख सोमेश्वर काका कहलखिन- "जहिना अहाँकेँ काजक चाह अछि तहिना अपनो काजेक चाह अछि, तँए अहूँ अपन चाह एतइ नेने आऊ। संगे-संग दुनू गोरे चाहो पीब आ गपो-सप्प करब।" सुचिता काकी नाकर-नुकर नइ केली। पतिक सोझमे आन स्त्रीगण जकाँ चाह पीबैसँ नहि धकमकाइ छैथ। ओना, अपना मनमे ई होइत रहए जे सभसँ पहिने काकाकेँ अप्पन बात कहिऐन, मुदा लगले ईहो हुअए जे जखन सोमेश्वर कक्काक आगूमे बैसल छी तखन हुनका मनमन्त केनहि बिना केना किछु बाजब। तँए मुँह बन्ने राखब नीक बुझी। ओना, मनमे ईहो होइत रहए जे अनेरे की पुछबैन। केता दिन मड़ुआ खेतीक विषयमे कहनहि छैथ। ईहो तँ वएह कहने छैथ जे मड़ुआ बीआ उपजाबैमे पनरह दिन पानिक पटौनी साँझ-भोर लगैए। पटौनी ले खेतमे वा सुखाएल-पोखैर-झाँखैरमे कूप खुनै छला, जइमे पनरह-बीस घैल पानि प्रतिदिन होइ छेलैन। ओहन खेती, तहूमे बिनु खेतबला लेल जे उपजाक अधा-अधीपर बटाइ करै छला। उपजा की तँ मड़ुआ, जे अन्नक श्रेणीमे अछिए नहि। अपना सभ ओही पूर्वजक ने सन्तान छी। जे गबै छला जे 'मड़ुआमे जब ढेँसर भेल, सभ परिवार परमेसर गेल।' बिच्चेमे सोमेश्वर कक्काक मन बजैले चटपटा रहल छेलैन। हुनकर चटपटी देख नइ रहल गेल। बजलौं- "काका, पहिने अपने मुँहक परसादी बाँटि लिअ। पछातिक नम्बर हमर रहत।" जहिना छनाकेँ माने मक्खनकेँ नब वस्त्रमे लपेट पानिकेँ निचोड़ि-गाड़ि मल-मल रूप सजैत, तहिना सोमेश्वर काका बजला- "रघु, अपन बेकतीगत जीवन हुअए कि पारिवारिक आकि सामाजिके, कखनो हीन विचार वा विश्वासकेँ लग नहि आबए दिऐ।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) पाँचिम पड़ाव तीन मास बीत गेल। पिताकेँ तेसर खेप रूपैआ पठबैक जोगार देवनकेँ भऽ गेल। देवन ऐ ताकमे छल जे गाम दिसक जँ कियो गाम जाइबला भेटता तँ हुनके हथौटी रूपैआ पठाएब। जहिना पिता धनुषधारी माने देवनक पिता, तहिना जलेसरीक मन मानि गेलैन जे जेना देवनकेँ अवढ़ंग बुझै छेलौं, तेना ओ नहि, आब ढंगर भऽ गेल। जँ एहेन किरदानी रहल तँ जरूर परिवार सम्हारि लेत, जइसँ परिवार आगू मुहेँ ससरबे करत। जहियासँ धरतीपर मनुख भेला आकि परिवार बनल तहियासँ तँ अपनो परिवारो आ पूर्वजो ने जीवित रहबे कएल अछि। जँ से नहि, तँ अपन उदय केना भेल। यएह ने आइ धरिक इतिहास रहल अछि, ओकरे ने आजुक परिवेशमे समयानुसार बना चलैक अछि। जे जिम्मा सबहक कान्हपर अछिए..। अपन दू मासक बीतल जीवनमे संतोख पेब धनुषधारी पत्नीकेँ कहलैन- "देवनक बिआह करब जरूरी भऽ गेल।" ओना, जलेसरीक मनमे ई धारणा बनले छेलैन जे जहिना गाममे केतेको लोक देवन सन-सन ढहलेल-बकलेल अछिए, जेकरा ने बिआह-दान भेल आ ने कोनो ठौर-ठेकान अछि। ओही धारणानुकूल जलेसरी बजली- "देवनाकेँ के पुछत जे बिआह हेतइ?" पत्नीक विचार सुनि धनुषधारीक मनमे नमहर द्वन्द्व उठलैन, किए तँ एक दिस गाम-समाजमे देखैथ जे देवनक कोन बात जे देवनोसँ नीक-नीक देह-दशाबलाकेँ माने जे शारीरिको आ आर्थिको रूपेँ नीक अछि तेकरो, बिआह-दान नहि भऽ रहल अछि आ देवना तँ सहजे ओइसँ दब अछिए। ऐठाम ई नहि बुझब जे पुरुखक अपेक्षा महिलाक संख्या कम रहने बिआह नहि होइए। तँए महंथो महंथाना बेसी अछि आ महंथ तँ सहजे छथिए। ऐठाम ई अछि जे जँ बिआह करै छी तँ भविसक बाल-बच्चा आ तत्काल दोसरक (पत्नीक) भार कन्हापर आबि रहल अछि, तेकर निमरजना करैक लूरि-बुधिक खगता तँ अछिए। एकाएक धनुषधारीक मनमे ओहन सुर्जक उदय भेलैन जेहेन मेघक झँपौन आ शीत-पालाक कुहेससँ मुक्त सुर्जक उदयक होइए। धनुषधारीक मनमे उठलैन, जखन देवनक देह-हाथ एते सुन्दर अछि, तैसंग एते नीक कमा-खटा लगल अछि जइसँ माता-पिताक माने अपने दुनू परानीक खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ रहैयोक आ बर-बेमारीमे दवाइयोक जे दुख रहल अछि ओ तँ दू माससँ, सोल्होअना समाप्त भलेँ नहि भेल हुअए मुदा पहिनेसँ तँ असान जरूर बनियेँ गेल अछि..! एकाएक मनक उत्साह जेना धनुषधारीकेँ जगलैन जइसँ तुष्टपन भरल विचार मनमे एलैन। एलैन ई जे जे बेटा माता-पिताक भार श्रवण कुमार जकाँ अपन कन्हापर उठा सकैए माने सेवा कऽ सकैए, ओ अपन स्त्री आ बाल-बच्चाक सेवा किए ने कऽ सकैए। तहूमे अखन देवनकेँ तीनियेँ मास कलकत्ता गेना भेल अछि। जेना-जेना लूरि-बुधि बढ़तै, तेना-तेना अपन परिवारक क्रियागत चिष्टो ने बढ़तै। जखने चिष्टा बढ़तै तखने ने चेष्टगर जकाँ सचेष्ट बनत आ सचेष्ट जिनगी पौत..। धनुषधारी बजला- "केकरा बेटासँ हमर बेटा अधला अछि जे बिआह नहि हएत। एहेन-एहेन कमासुत बेटा ले ते बरतुहार सभ डाक-डाकौऐल कऽ दइए आ देवनेक बिआह नहि हएत।" अपन विचारमे मोड़ दैत जलेसरी बजली- "हँ, से तँ देखबे करै छी जे करांकुल जकाँ सोमन बाबूक देह छैन, मुदा धनक लोभे केहेन सुन्नरि कनियाँ रीझल रहै छैन।" अपनो-विचार आ पत्नियोँक विचारक दूरीकेँ पाटैत धनुषधारी बजला- "जाबे तक लोक देवनक विषयमे नहि बुझलक अछि, ताबे तक अन्हार अछि, जखने लोक देवनकेँ बुझत-जानत तखन कि देवन देवन रहत। ओ तँ देशक ओहन योद्धा बनि जाएत जे पाँचसँ ऊपर लोकक परिवारकेँ ऐ रूपेँ सम्हारि कऽ चला लेत जेहेन केहनो-केहनो दाँव-घाँउ करैबला बुते नहि चलैए।" ओना, अपना जनैत धनुषधारी नीक विचार पत्नीक सोझमे रखलैन मुदा जलेसरीक उनटल मन रहैन तँए उनटा कऽ ओहिना बुझि गेली जहिना कियो कोइलीकेँ कारी रंग देख कौआक बच्चा बुझि जाइ छैथ। जखन कि बुझैक बात भेल जे कौआक पूर्वक वंश कोयली छी तेकरा छोट देख सभ कौआक बच्चा बुझिते छैथ। ओना, खिस्सा-पीहानीमे मुँह देख बिलाइकेँ बाघक मौसी कहले जाइए। भलेँ बाघ जकाँ बिलाइ सोल्होअना मांसाहारी हुअए वा नहि, मुदा मुँहक रूप देख मौसी तँ कहबे करैए। जलेसरीक मनमे जेना एकाएक मोड़ एलैन। माने जहिना जीवनमे तहिना जीवनक बाटमे मोड़ एने एकाएक ओकर शकल-सूरत बदैल जाइए तहिना जलेसरीकेँ सेहो भेलैन। बजली- "ढहलेलो-बकलेल जँ अपन बेटा अछि, तँ कहुना मांगक सिनूर तँ बँचल अछिए किने। जे कियो निपुतरी थोड़े कहत आकि मुइला पछाइत मुँहमे आगि नहि देत, आकि किरिये-करम नहि करत।" जलेसरीक बदलल विचार देख धनुषधारी बजला- "आइयो आ आइसँ पहिनौं, मनुक्खकेँ लोथसँ लऽ नाँगर आ नाँगरसँ लुल्ह धरि सन्तान होइत रहल अछि, कहाँ कियो एहेन बजनिहार भेला जे ओकरा अघटमे फेक दइले कहलैन अछि।" संजोग बनल, तहीकाल धनुषधारीक ममियौत भाए रामेसर पहुँचलैन। उम्रमे छोट रहने रामेसर दुनू परानी धनुषधारीकेँ गोड़ लागि बैसैत बाजल- "भैया, पाँच दिनसँ गौरी भाय चैन नहि हुअ देलैन अछि, तही दुआरे एलौं।" रामेसरक मनक बेचैनी सुनि धनुषधारीक मन सेहो बेचैन हुअ लगलैन। बजला- "किए ने गौरी भाय चैन हुअ देलखुन?" रामेसर बाजल- "भैया, देवनक बिआह कऽ लिअ। घरो बढ़ियाँ आ कुलो-खनदान बढ़ियाँ अछि।" ऐठाम गाए-महींस आकि फल-वृक्षक कुल-खनदान नहि बुझब, मनुक्खक खनदानक चर्च छी। 'खनदान' सुनि धनुषधारीक मन एकाएक घिरनी जकाँ नाचि उठलैन। अपने नचैत मन कहलकैन जे जेकरा ढहलेल-बकलेल बुझै छी तइ बेटाक मांग आन गाममे केना भेल? ओ केना बुझलैन जे देवन अविवाहित अछि, जेकरा संग अपन बेटीक बिआह करए चाहि रहला अछि। धनुषधारीक मनमे ई एबे ने केलैन जे जखने बेटा काम-काजी बनए लगैए तखने ओकर प्रचार-प्रसार सेहो हुअ लगैए। कलकत्तामे देवनक केतेको संगबे माने अपन इलाकाक लोक सेहो देखिये रहल छेलैन जे नव लोक (कलकत्ताक लेल) रहितो देवन पुरान लोक माने अनुभवी लोक जकाँ कमाइयो रहल अछि आ मासे-मास माता-पिताकेँ अपन कमाइ सेहो पठा रहल अछि। रामेसरक विचार सुनि धनुषधारी मने-मन विचारए लगला जे बेटा हमर देवन जरूर छी, मुदा कुशेसरे ने ओकरा रस्तापर आनि ठाढ़ केलक अछि, तैठाम बिना कुशेसरसँ विचार नेने 'हँ' कहब उचित नहि हएत। तहूमे देवनो जुआन भेल, तँए ओकरो विचार लेब जरूरी अछिए। भलेँ पिता बुझि अपन भार किए ने सुमझा दिअए, मुदा अपनो तँ किछु करतब अछिए। बेटा बिआहक विचार सुनि जलेसरीक मन खुशीसँ तर-ऊपर होइते छेलैन। धनुषधारी चुप्पे छला मुदा जलेसरी बजली- "किए ने देवनक बिआह करब?" ओना, जलेसरीक विचार सुनि रामेसरक मन सोल्होअना मानि लेलकैन जे काज माने देवनक बिआह, हेबे करत। नीक (शुभ) यात्रा बना घरसँ चलल छेलौं, तँए सुभर फल भेटल। कथा-कुटमैतीक गप-सप्प छी माने दू-समाज, दू परिवारक बीचक किरिया-कलापक चर्च छी तँए धड़फड़ा कऽ किछु बाजब नीक थोड़े हएत। रामेसर बाजल- "भैया, कथा-कुटुमैतीक काज छी, तँए धड़फड़ेने थोड़े हएत। तखन तँ एते बुझू जे एकटा कन्यागतक दिससँ बेटा बिआहक नम्बर लगेलौं अछि।" जहिना सभ माता-पिताकेँ सुशील बेटाक कामना रहिते छैन जइसँ पढ़ब-लिखब, कर-कमौनीक बिसवाससँ मनक तुष्टिक रूप प्रगाढ़ होइत सन्तुष्टिक सीमानपर पहुँचिये जाइ छैन तहिना दुनू परानी धनुषधारीकेँ सेहो भेलैन। अपना आँखिये अपन बेटाक काज आ काजक फलक संग विचार आ विचारैक विदपन देख माए-बापकेँ खुशी हएब सोभाविके अछि। दुनू परानी धनुषधारीकेँ बेटाक प्रति सेहो तहिना भेलैन। विसमित होइत धनुषधारी बजला- "बौआ रामेसर, कहुना भेलह तँ तूँ छोट भाए भेलह। तोरा संग झूठ-फूस बाजब गाइक हत्या बरबैर भेल तँए एहेन काज करब नीक नहियेँ भेल। तोंही कहह जे आब देवन जवान कमासुत बेटा भेल, अपन कमाइसँ केहेन परिवार गढ़त, तेते अबगैत तँ ओकरो आब भइये गेल किने?" धनुषधारीक विचार आ समाजक बीच पसरल परिवेशक बीच रामेसरक मन ओझरा गेलैन। किए तँ एक दिस मनमे उठैन जे जे पिता अपन बेटा बिआहक भार अपने नहि उठा सकै छैथ ओ पिते केहेन अबंड भेला.! बातो ठीक अछि। जखन गुलामीक समयमे मनुक्खक जीवन नाभरोस बनि गेल छल तखन माता-पिता अपन पैतृक धर्म निमाहै दुआरे बाल-विवाहक गढ़ैन केलैन। ओ ऐ दुआरे केलैन जे जेतबे जीवन तेकरे आसमे, तँए अपन पितृ-कर्तव्यकेँ निमाहैत आबि रहल छैथ तँ दोसर दिस पचहत्तैर बर्खक देशक आजादीक परिवेश, विचारमे एते तँ मजगूती आनिये देलक अछि जे लड़का-लड़की माने बेटा-बेटी अपन माता-पिताक देल वैवाहिक विचारकेँ उल्लंघनो कइये रहल अछि। तँए नीक की आ अधला की से कहब कठिन अछिए। बिआह-दानक बीच दान-दहेज एहेन खाधि समाजमे ठाढ़ कऽ देलक अछि जे मनक सभ सपना चूरम-चूर सभक भइये रहल अछि। विचारोक तँ अपन कड़ी अछि, जइ माध्यमसँ एक-दोसर जुड़ल अछि। तैठाम जँ एकटा सोनाक कड़ी आ दोसर लोहाक कड़ीकेँ बीचमे जोड़ए चाहब तँ की ओ समतुल्य भऽ सकैए? केना भऽ सकैए, ई मूल प्रश्न भेल। जीवनक कोनो काज नीकसँ नीकतम किए ने हुअए, मुदा आगूक जँ दोसर-तेसर काज नीकक रस्तासँ पिछैड़ अधला रस्ता पकैड़ ऐगला काज करत, तखन की पैछला काज ओहिना जगजियार रहत आकि मटमैल जकाँ भऽ जाएत..! जीवन-मरणक बीच ठाढ़ भेल रामेसर बाजल- "भैया, देवनकेँ अहूँ पुछि लिऔ आ हमहूँ पुछि लेबइ। जे कहत तइ अनुकूल आगू करब।" शान्तचित्तक विचार रामेसरक मुहसँ सुनि धनुषधारी बजला- "बौआ रामेसर, जहिना हम देवनक जन्मदाता छिऐ तहिना ने कुशेसरो कर्मदाता भेल, तँए कुशेसरकेँ एते जरूर कहबै जे रामेसर कियो आन नहि छिया, जँ ओ परिवारकेँ अपन परिवार बुझि काजमे सहयोग करए चाहि रहला अछि तँ ओ घीवोसँ चिक्कन भेल किने। अपन श्रमक संग समयोक बचत तँ हेबे करत।" ओना, लगमे बैसल जलेसरीक मन भीतरे-भीतर खौंझाइत रहैन। खौंझाइक कारण रहैन, गाममे जे आन-आन परिवारमे देखैथ जे अपना विचारे माता-पिता बेटा-बेटीक बिआह करै छैथ तैठाम अपन इज्जत अपने किए गमाएब। इज्जतक रूप चाहे जे हुअए जेहेन हुअए मुदा जलेसरीक मनमे ओहन रूप तँ बनले छेलैन जेहेन आन-आनक मनमे सेहो बनै छैन। जलेसरी बजली- "की आन बेटाक माए-बाप जकाँ हम (अपने) मरि गेल छी, जे दोसरसँ पुछि कऽ अपन बेटाक बिआह करब।" जलेसरीक विचार सुनि जहिना रामेसरक मनमे अपन एलहा-केलहा फलक एहसास भेलैन तहिना धनुषधारीक मनमे पत्नीक प्रति क्षोभ जगलैन। क्षोभ ई जगलैन जे जे देवन कुशेसरकेँ पेब मनुखक रूपमे ठाढ़ भेल तेकरा बिना पुछने ओकर बिआह करब उचित नहि हएत। मनमे ईहो होनि जे एहेन रोगसँ कि जलेसरीए-टा रोगाएल छैथ से बात थोड़े अछि। समाजे रोगाएल अछि। जहिना अपना फुरने बजली तहिना अपना केने पुरौती। मने-मन जलेसरीक विचारकेँ मनसून-कनसून करैत धनुषधारी बजला- "बौआ रामेसर, सभ तँ अपने लोक भेलौं। तइ बीच काज बजड़ल अछि। सभ कियो नीक जकाँ विचारि काजकेँ भसा देब। अपनो बाल-बच्चाक भारसँ उरीन भऽ जाएब।" तीन मासक बीच देवनकेँ पेब बनर्जीदादा एते विश्वस्थ तँ भइये गेला जे जँ देवन संगमे रहत तँ अपने कार्यमुक्त माने सेवा निवृत्त जकाँ रहबे करब। एहने सोचक कारणेँ बनर्जीदादाकेँ मनमे भेल छेलैन जे जहियासँ देवन गोदाममे प्रवेश केलक, तहियासँ आन-आन श्रमिकक (मटियाक) अपेक्षा ओकरामे किछु विशेष गुण आबिये गेल अछि। एक तँ देवन सन इमानदार, ऐठाम इमानदारक माने खाली मुखौटिये इमानदार नहि क्रियागत सेहो अछि, लोक दुनियाँमे कम अछि। कम्मो केना ने रहत, जैठाम समाजमे दीक्षा पहिने देल जाइए आ शिक्षा, माने ज्ञान-लूरि ले पछातिक समय राखल जाइए तैठाम जँ दुषित समाज नहि बनत तँ की ओ समाज दुसैबला बनत जैठामक जीवन समयक संग जुड़ि क्रियागत रूपमे चलैए। खाएर जे अछि, जेतए अछि ओ तैठामक भेल। तइसँ बनर्जीए-दादा आकि देवनेकेँ कोन मतलब छैन।
देवनक काज देख बनर्जीदादा एते तँ वशीभूत भइये गेल छैथ जे देवनकेँ जे कोनो जीवनक बात कहै छिऐ तेकरा ओ अख्यिाइस कऽ आँखिपर चढ़ा करै पाछू लागि जाइए। केते सुन्दर विचार देलक जे दू साए मीटरक (गजक) दूरीपर गाड़ी (ट्रक) सँ अनाज अनलोड करि गोदाममे रखै छी, तइ बीच जे साए किलो, माने एक क्वीन्टलक बोरा पीठपर लादि लोक उघै छैथ, तइसँ नीक ने हएत जे पीठपर उघैक बदला ठेलासँ उघब बेसी असनगर हएत। दू साए गजक (मीटर) बीच जे मनुक्खक पीठपर लादल सौ किलोक बोरा रहल आ बीचमे जँ केतौ धक-चुक भऽ गेल तँ ओ आदमी मरबे करत किने, जँ नहियोँ मरत तँ अपलांग-विकलांग भइये सकैए। जँ एहेन खतरा मेटबैक दोसर असान उपाय अछि तँ किए ने ओहन उपाय कएल जाए। ओना, बनर्जीदादाकेँ अपना मनमे गलानियोँ होनि जे जिनका पाछू सदिकाल बेहाल रहै छी तिनकर समस्ये नीक जकाँ नहि बुझि पेब रहल छी। भाय दुनियाँ देखैक चीज छी, सभ देखैए, मुदा असल देखब तँ तखने ने होइए जखन लोक अपने-आपकेँ देख दुनियाँ देखए विदा होइए। दुनियोँ ऊबर-खाबर, पहाड़-समुद्रसँ तँ भरले अछि। देवनक काजसँ बनर्जीदादा गोदामक काजमे एते निधैन-निफिकिर भइये गेल छैथ जे जँ सरकारी अतिथि आबैथ आकि अपन संगी-साथीक संग कुटुम-परिवारक स्वागत-बेवहार हुअए से गुण तँ देवनमे आबिये गेल अछि। बनर्जीदादाक अपनो मन एते कहबे करै छैन जे भाय माइटिक मुरुत जकाँ मनुक्खो अछि, तहीमे ने ओहन प्राण-प्रतिष्ठा भरैक अछि जे ओ देवक्रिया पकैड़ देवतुल्य भऽ जाए आकि सोझे मनक स्नानसँ देहक मैल छोड़ा लेब। देहक मैल तँ हाथसँ मललापर छुटैए। देवन केना विधाताक निरमौल विधिपूर्ण जीवनधारक बनत, एहेन प्रश्न बनर्जीदादाक मनमे सदिकाल नचैत रहै छैन। जहिना दुनियाँक भौतिक वस्तु परिवर्तित होइत रहैए तहिना ने मनुक्खोक जीवन छी। अबोध बच्चाक रूपमे जन्म भेल। समयक संग बढ़ैत गेल। माने खेलब-धुपबसँ शुरू भेल, पछाइत विद्यालय आएल, तेकर पछाइत परिवार, समाज इत्यादि आएल। अपनो शरीर बच्चासँ टेल्हुक भऽ सियान होइत वृद्ध हएत। सबहक शरीरक यएह गति छी, आ अही बीच शरीरी सन शक्ति सेहो अछि। जखन अपनेकेँ नहि देख पाएब तखन दुनियाँकेँ तँ एहेन विकट गंथले अछि जे सभ नहि देख पबैए। केना देख पौत। मने-मन तँ सभ सुखे-चैनसँ जीबए चाहै छी, मुदा परिवारक नून-तेलक झखैन तेहेन धेने रहैए जे झखड़ल डारिक आम जकाँ डंटीक रसं (पानि) तेना सुखा गेल अछि जे कखन छी आ कखन नहि छी, तेकर कोनो ठेकाने ने अछि। पाँच सालसँ कुशेसर कलकत्तामे रहने अपन चिष्टासँ चिष्टा गेने एतेक तँ नीक जकाँ बुझिये रहला अछि जे मनुखकेँ उमेरो आ मेहनतोक हिसाबसँ, जँ सम्भव भऽ सकै तँ आरामो आ भोजनो करबेक चाही। मुदा से तँ सम्भव तखन भऽ सकैए जखन बिसवासू जीवन क्रिया-कलाप बनत। ओना, अपन-अपन उपार्जनक अनुकूल सभ कियो अपन-अपन जीवन गढ़िये लइ छैथ, मुदा ओही गढ़ैनकेँ नीकसँ गढ़लापर नीक होइए आ नीकसँ नहि गढ़लापर झुकि-झुकि झकैत-झकैत विपरीत भइये जाइए जइसँ विपरीत जीवनक निर्माण भऽ जाइए। जखने कोनो बउसे वा मनुक्खेक विपरीत दिशामे निर्माण हएत तखने ओ विपरीत बउसो आ जीवनोक निर्माण सेहो करत। ओना, की विपरीत आ की रीत तेकरा फड़िछाएब असान सेहो नहियेँ अछि। कहब जे किए ने अछि? सोझेमे देखै छी जे गाछे-बिरीछक जड़िक सिर माइटिक तरमे अछि आ मनुक्खक सिर ऊपर अकासमे अछि। गाछ-बिरीछ केहनो दाता-फलदाता किए ने हुअए मुदा माटिमे गरल अपन जीवनक फलकेँ केते दूर धरि बाँटि-छिड़िया सकैए? ई दीगर भेल जे मिथिलाक फल गाड़ी-सवारीसँ, देशक कोन बात जे आनो देश पहुँचैए मुदा तइ बीच मनुक्खोक करामात तँ चाहबे करी। मनुख ओहन मनक मनु छी जे अपन जीवनक अपने भार उठा चलैए।
कलकत्ता प्रवासक बीच जे अपन जीवनक अनुभव कुशेसरकेँ भेल छेलैन, ओ अनुभव वैचारिक रूपमे देवनकेँ सेहो दिअ चाहैथ। मुदा काजक व्यस्तता मनक यादास्त शक्तिकेँ बेठौर बना देने छेलैन जइसँ जखन मोन पड़ै छेलैन तखन दोसर काजमे लगल रहै छला आ जखन कहैक समय अबै छेलैन तखन मनेसँ विचार हेरा गेल रहै छेलैन जइसँ तेसर मास पूर्ण भऽ गेलैन मुदा मनक बात मनेमे झाँपल कोनो शिशुपन पौधा जकाँ तरेतर तँ अपन वृद्धि करै छेलैन, जइसँ खसल मुँह रहने निच्चेँ-निच्चाँ औनाइत-मुड़ियाइत रहि जाइ छेलैन। संजोग बनल। औझुके दिन माने औझुके तारीखकेँ गोदाम क्रियागत भेल। माने औझुके तारीखकेँ गोदामक काज गोदामक रूपमे शुरू भेल, जइसँ साले-साल औझुका दिन गोदाममे छुट्टी रहैए। ओना, काज बन्द रहने उट्ठा काज करैबला जे मटिया-मजदूर छैथ तिनका आमदनीमे, माने उपार्जनमे बाधा हेबे करै छैन मुदा से एते बेवस्था गोदाममे बनल अछि जे जे मासिक वेतनभोगी नहि छैथ, हुनका उपहार स्वरूप ओते अर्थ देल जाए, जेते काज-दिनक आमदनी होइए। मुदा तैयो एते घाटा तँ मटिया-मजदूरकेँ होइते अछि जे काजक दिन जे काटल-फाटल बोरासँ जे अन्न होइ छेलै, जे श्रमिकक हिस्सा मानल जाइ छल, से नहि होइ छेलैन। ओना, देहकेँ मेहनतो तँ नहियेँ करए पड़ै छेलैन। गोदामक स्थापना दिन रहने सरकारो-विभागक आ गोदाममे काज करैबला मटियो-मजदूर एकठाम बैस उत्सवो मनबै छैथ आ जीवनक गप-सप्प सेहो करिते छैथ। जइसँ मनुक्खोक जीवन आ शासनोक (सत्तोक) जीवनक चर्च चलिते अछि। संजोग एहेन बनल जे सरकारक एकोटा पदाधिकारी कार्यक्रममे नहि पहुँच सकलाह। लॉक-डॉनक समय, सभ स्वास्थ्य-विभागमे ओझराएल छला। बनर्जीदादा टा मात्र सरकारक पदाधिकारीक रूपमे रहला। बेवस्था नीक छेलैहे। बेवस्था माने खेबा-पीबाक आ बैसैक ओरियान। एक दिन पहिनहि बनर्जीदादा सभ श्रमिककेँ कहि देने छेलखिन जे सभकेँ रहब अनिवार्य अछि। ओना, काज बन्द रहत मुदा विभागक की किरिया-कलाप अछि तइ विषयपर चरचो हएत, हँसियो-मजाक हएत आ भोजो-भात तँ हेबे करत। तैसंग एते उपहारो भेटबे करत जेते दिनक कमाइ होइए। तेकरा मजदूरीक मिनहा बुझब। ठीक समयपर सभ गोदामक आगू बनल सभागारमे उपस्थित भेला। समारोहक आयोजन करैमे जहिना बनर्जीदादा तहिना देवनक नीक योगदान छेलैन। बैसक शुरू होइसँ पहिने जलपानो आ चाहो-पान चलल। होइतो अहिना छै जे जखन दस गोरेकेँ सम्मिलित रूपमे एक रंग खान-पान भेल रहत तखन मनक सुआदो बुझैक-विचारैक, एक रंग भवन रहिते अछि। अपन सुअवसर बनर्जीदादा बुझि मने-मन खुशी छला जे आइ अपने मटिया-श्रमिक बनि श्रमिकेकेँ पदाधिकारी बना गप-सप्प करब। ओना, आन दिन समय पेब श्रमिक सभसँ बनर्जीदादा भरि मन गप करिते छैथ जइसँ हिनका बुझल छेलैन्हे जे जेते मनुख दुनियाँमे छैथ सबहक एकटा दुनियाँ सेहो छैन आ बेकता-बेकती मनुक्खक दुनियाँ सेहो अछि। मुदा से केना अछि तैठाम भकचका जाइ छला। भकचकाइक कारण होइ छेलैन जे ओहन समाजक विचारसँ अपन विचार स्थापित कऽ नेने छैथ जइसँ केतौ-केतौ विपरीत भऽ जाइ छैन, तखन अपन विचारपर मनमे ग्लानि ईहो होइते छैन जे अपन बुधिये कँचकूह अछि। मुदा मन तैयो ने मानैन, सदिकाल मन कहबे करैन जे जिनकर पक्षधर बनि ठाढ़ हुअ चाहै छी तिनके गरदैनकट्टी भऽ जाइ छैन। तँए ओइ श्रमिकक वास्तविक अपन जीवनक की दुनियाँ अछि, माने जीवन अछि तही तहमे जखन विचार करब तखन मूलकेँ बुझि सकै छी। समयो अनुकूल अछिए, अपने दुनूक बीचक जे सीमा भेल वएह भेल जीवनक रास्ता। ओही रास्तापर ठाढ़ भऽ अपन दशा-दिशा देखैत चलब। ई बात बनर्जीदादाकेँ बुझले ने रहैन जे कृति, स्मृति आ विनिर्गत ज्ञान केना अपन कर्मक संग चलैए। ज्ञानक समटल रूप बनर्जीदादाकेँ मनमे रहैन तँए आगूक झलअन्हारकेँ आँखि पार नहि कऽ पबैत रहैन। चाह-पान तक चलि चुकल छल मुदा अखन तक समारोहक विधिवत रूप बनबे ने कएल। जहिना सभ दिनसँ सभक बीच चलि अबैत जीवनक गप-सप्प छल तहिना गपे-सप्पमे समारोहक विधि-विधान तर पड़ि गेल। सभ दिन एहेन क्रिया-कलाप रहिते अछि जे दोकानमे बैस जलपानो आ चाहो-पान संग मिलि सभ करिते छी तइमे कोन एहेन काज भेल जे समारोहक कोनो तरहक विघटन भेल। तहूमे सभ बुझिते छी जे समारोहक ताम-झाम मिडियाक माध्यमसँ होइए, तइले दसटा फोटो आ समारोहक विधिवत् सूत्र प्रक्रिया लीखि कऽ पठा देब, बस भऽ गेल समारोहक विधि-विधान। काना-कानी आ फुसा-फुसी जहिना जलपानक दोकानमे होइए, चाह-पानक दोकानमे होइए तहिना बैसारमे चलिये रहल छल। सभ अपने ताले बेहाल, तँए जेते बजनिहार तेतबे सुननिहारो भेला। माने दू-दू गोरे गप-सप्प करए लगला। आँखि उठा जखन बनर्जीदादा बैसार दिस तकलैन तँ बुझि पड़लैन जे समारोहमे ने वक्ताक कमी अछि आ ने श्रोताक, तखन अपन बात (विचार) के सुनत.? तैसंग ईहो मनमे होनि जे तखन के केकर बात सुनता आ के केकर सुखे-दुख बुझता आकि जीवनेक गति-विधि बुझता..! बैसले-बैसल बनर्जीदादा विचारक ओहन सघन वनमे हेरा गेला जैठाम मात्र दुइये गोरे, बनर्जीदादा अपने आ देवन रहैथ। सेहो दुनू गोरे ऐ दुआरे बँचल रहैथ जे समारोहक बेवस्थाक पाछू लागल छला। बनर्जीदादाकेँ हेराएल मनमे भेटलैन जे जखन सभ अपन-अपन धुनिमे मस्त छैथ तखन अपनो दुनू गोरे किए ने अपने धुनी लगा एक-एक जीवनकेँ धुनि-धुनि धुनिया बनी। एक-एक श्रमिकक (मटियाक) भेद-भेदिया जीवनक रस्साकेँ पकड़ी। तैसंग काज देख बनर्जीदादाक मनमे ईहो खुशी एलैन जे जीवने ने जान आ जाने ने जहान दइए। मुदा मनुक्खो तँ मनुख छी जे गैंची माछसँ बेसीए पीछराह होइए। कखन पानिमे सुरकुनियाँ मारि किम्हर ससैर जाएत आ लगले थालमे केना थुसकुनिया मारि साँस छोड़ए लगत, तेकर कोनो ठीक अछि। फेर अपने मन बनर्जीदादाकेँ कहलकैन जे केतबो गैंची माछ जकाँ मनुख गैंचियाह किए ने हुअए, मुदा जे जीवनी मछबार छैथ ओ पकैड़ नहि पबै छैथ सेहो बात नहियेँ अछि। पानिमे रहए आकि थालमे, ओ पकड़ा जाइते अछि। दसे-बारहटा मटिया गोदाममे काज करै छैथ जइसँ बैसारोक आकार छोटे छल। मुदा किछु छल, गिनतीमे जहिना एक साए तक गिनती सीखैले साएटा बउसो चाही, नहि तँ साएटा अंक तँ चाहबे करी। जाबत से नहि हएत ताबत साएक माने मुखौटीए ने रहत। एक-एक जीवनकेँ जखन साइयो ढंगसँ गनए शुरू करब तखने जीवनकेँ सही ढंगसँ पकैड़ पएब। नहि तँ बारहमासा आ चौमासाक भेदे ने बुझि सकब। सभ जनिते छी जे बारहमासामे जाड़, गरमी आ वर्षा तीनू मौसमक सुख-दुखक वृतान्त कहल जाइए, जखन कि चौमासामे मात्र एक मौसमक। भलेँ स्वरलहरी एक्केरंग किए ने लहरैत हुअए। अपन धियानकेँ समेट, धियान माने भेल विषय-वस्तु, बनर्जीदादा एकाग्र केलैन। एकाग्र होइते अपन मन विचारमे विचरण करैत बनर्जीदादाकेँ कहलकैन जे मनुक्खक शकल-सूरत जहिना बाहरी अछि, माने ऊपरसँ देखैमे अछि, तहिना भीतरमे सेहो अछिए। अनेको रंगक गुण अवगुण जहिना बाहरी अछि तहिना भीतरियो तँ अछिए। बउसो (वस्तुओ) आ विचारो एहेन छीहे जे एकठाम एकगोरे-ले गुणकारी होइए तँ दोसरठाम बदैल अगुणकारी नहि होइए सेहो बात नहियेँ अछि। मुदा बीचमे जे कारीगिरी छिपल अछि ओ तँ वएह करि सकै छैथ जिनका कारीगिरीक करीनापनक बोध होइन। ओ तँ छिड़ियाएल अछिए। एकरंग मनुक्खक शकल-सूरत रहितो जहिना विचारमे तहिना जीवन क्रियामे सेहो भेद बनियेँ गेल अछि। जेम्हर-जेम्हर बनर्जीदादाक मन जीवनमे विचरण करैन तेम्हर-तेम्हर यएह देखैथ जे एक्के सीमापर ठाढ़ भेल सभ अपनेमे घौंचाल कऽ रहला अछि। जइसँ मनमे अकछो उठि कहैन जे अनेरे कोन लपौड़ीमे पड़ल छी। सभ अपन-अपन सीमापर ठाढ़ रहितो अपने सीमा नहि बुझि पेब रहला अछि आ आनक सीमा सरहद कायम करए चाहि रहला अछि। भाय, बाधमे सइयो बीघा जमीनो अछि आ सइयो जमीनबला सेहो तँ छथिए। अपन-अपन जमीनक आड़ि-पाटि सभकेँ बनले छैन, जइसँ अपन-अपन खेतक परिचय सेहो सबहक बनल छैन्हे। जखन-कखनो कोनो काजे वा देखबेक खियालसँ बाध जाइ छी तँ अपने खेतक आड़िपर ने पहुँच जाइ छी। तहिना जँ अपन जीवनक आड़ि बनि जाएत तखन ने अपन खेतेक उपज जकाँ अपन कर्तव्यबोध सेहो ज्ञात हएत जे अपने की छी आ अपन कर्तव्य की अछि। तँए ईहो ने अपने सोचैत-विचारैत-करैत आगूक बाट, जीवनक बाट, बनबैत अपना जीवनकेँ आगू मुहेँ ससारैत चलब। मुदा अन्हारो तँ ओहन अछिए जे कहलो जाइते अछि जे संगेमे वैद मियाँ मरता है..! मुदा एहेन कहबो कि ओहिना बनि चलि रहल अछि, सेहो बात नहियेँ अछि। नीक विचार मनमे रहितो, सभठाम बजैसँ परहेज करए पड़ैए। से खाली बाजबे धरि रहैत तखन तँ ओइसँ किछु-ने-किछु बिगड़ैत मुदा जीवनकेँ तेना सघन अन्हार छानि कऽ पकैड़ नेने अछि जे कखन मुहसँ दिनकेँ राति आ रातिकेँ दिन कहत तेकर ठेकाने ने रहि गेल अछि। अपने विचारक दुनियाँमे बनर्जीदादा विसमित भऽ गेला। विसमित होइते बनर्जीदादाकेँ अपने मन विचार देलकैन जे सबहक मनमे रहिते छैन जे भरि दुनियाँक प्रेम भेटए आ अपनो प्रेमसँ दुनियाँक पूजन-अर्चन करी। मुदा..। ऐठाम अबैत-अबैत बनर्जीदादा देवनकेँ हाथक इशारासँ लगमे बजौलैन। लगमे अबिते देवन बजला- "दादा, समारोहक रूखि नीक बुझि पड़ैए?" ओना, देवनक विचार बनर्जीदादाक मनमे कठाइन लगलैन। कठाइन ई लगलैन जे जखन सभ अपने ताले बेताल अछि तखन समूहक विचार केना एकरंग हएत? जाबे सामूहिक विचारमे एकरूपता नहि रहत ताबे सामूहिक विचार बनि समाजमे ठाढ़ केना हएत। मुदा लगले बनर्जीदादाक अपने मन देवनक जीवनकेँ आँकि विचार देलकैन जे अखन देवनक जीवन निरमेबे केते केलैन अछि जे सोल्होअना बुझता। अखन तँ जीवनमे पहिले-पहिल डेग उठौलैन अछि। अपन विचारकेँ मुड़ियबैत बनर्जीदादा बजला- "देवन, जेहेन सुआद भेटक चाही से नहि भेट रहल अछि।" बनर्जीदादाक विचारक अभयन्तरकेँ देवन बुझि नहि सकला। मुदा आगूमे उठल प्रश्नक जवाब तँ देबे छेलैन। बजला- "एको वस्तुक सुआद कि सभकेँ एक्केरंग लगै छैन।" ओना, देवनक विचारमे बनर्जीदादाकेँ अमूल्य रस सेहो देख पड़लैन मुदा देवन ओइ रसक भेद बुझि बजला आकि गपक (विचारक) क्रममे बजला, ई दुविधा मनमे जागिये गेल छेलैन। होइतो अहिना अछि जे विषय कोनो वा केहनो किए ने हुअए माने ओकरा नीक जकाँ बुझैत होइ आकि नहि बुझैत होइ, मुदा विचारक क्रममे माने गप-सप्पक क्रममे बिनु बुझनिहारो एहेन प्रश्न चालिये दइ छैथ, माने उठाइये दइ छैथ जे ओइ विषयक महत्वपूर्ण घटक होइ। विचारक दौड़मे बनर्जीदादाक अपने मन आगू-पाछू हुअ लगलैन। आगू-पाछू होइत मनकेँ थीर करैत बनर्जीदादा बजला- "देवन, अखन ऐठाम जेते गोरे बैसल छी, सभ मजदूरे छी, भलेँ ओकरा खेतक काजमे बोनिहार, गोदामक काजमे मटिया वा अन्य काजमे आन-आन नाम किए ने हुअए, मुदा उद्देश्य तँ सबहक एक्के होइ छैन जे जीवन-यापन ले उपार्जन करी।" बनर्जीदादाक सोझराएल विचार सुनि देवन बजला- "हँ! से तँ अछिए।" देवनक मुहसँ 'हँ से तँ अछिए' सुनि बनर्जीदादाक अपन मनक बिसवास जागि गेलैन जे देवन अपन जीवनक सीमापर ठाढ़ भऽ रहल छैथ। बजला- "देवन, अखन जे दसो-बारहो मजदूर एकठाम बैस गप-सप्प कऽ रहल छी, की सभक ध्येय एक्केरंग अछि।" बनर्जीदादाक विचार महाभारतक ओइ कराहक सोझे टाँगल माछक आँखिपर, जहिना अर्जुन छोड़ि किनको नजैर नहि पड़लैन, तहिना बनर्जीदादाक विचारक आँखिपर देवनक आँखि नहि पड़ि सकलैन तँए गुमे-गुम चुपे रहला। जे बात बनर्जीदादा बुझि गेला। मुदा तैयो किछु क्षण प्रतीक्षा करब नीक बुझलैन। किछु समय बीतला पछाइत बनर्जीदादा बजला- "देवन, ऐठाम जेतेक मटिया-मजदूर छी तइमे अनेको गुण-सोभाव अछिए, मुदा अखन से नहि, अखन मोटा-मोटी एतबे देखैक अछि जे अपन मन की कहै छैन।" 'देखब' सुनि देवनक मन उछैल गेलैन जइसँ बिच्चेमे बजा गेलैन- "मोटा-मोटी की देखैक अछि?" देवनक प्रश्न सुनि बनर्जीदादा मने-मन विचारकेँ मनेमे घोंटलैन तँ बुझि पड़लैन जे देवनकेँ अखन अपनो मनक विचार व्यक्त करैक शब्दकोष नहि अछि, जइसँ अपन भावना व्यक्त कऽ सकता। मुदा भावनाक संग भावन तँ छैन्हे। जइसँ शब्द भलेँ व्यक्त नहि कऽ पबैथ मुदा अपन हाव-भाव तँ व्यक्त कइये सकै छैथ। बनर्जीदादा बजला- "देवन, जेतेक मजदूर ऐठाम छी तइमे गौर करियौ जे केते गोरे केते दिनसँ एक वृत्तिमे लगल छैथ, पछाइत दोसर विचार करब।" तीनियेँ मासक देवन, माने तीनियेँ माससँ गोदाममे काज करै छैथ, तँए सबहक विषयमे बुझल छेलैन नहि, सुपुट मुहेँ बजला- "दादा, जखन अपने नव छी तखन पुरानक विषयमे की बुझब। नहि बुझै छी।" सोझमतिया देवन, तहूमे गमैया बकलेल, अपन विचार सादा कागज सदृश बनल छेलइ। देवनक सोझपन देख बनर्जीदादाक मन मजगूतीसँ विचार देलकैन जे अखन देवन नव अछि, जँ काजक मर्म बुझि जाएत तँ जीवनोक मर्म बुझिये सकैए। तँए किए ने देवनकेँ जीवन देखा, जीवन निरमबैक रास्ता सुझा दिऐ। देखाएबे धरि ने अपन कर्तव्य-कर्म भेल आकि ओकर हाथ-पएर पकैड़ अपना हाथ-पैरमे जोड़ि करा देब। हँ, एते तँ सम्भव अछिए जे ओइ काजकेँ अपना हाथे करि कऽ देखा दिऐ। जैठाम खगता हेतै आ अपन हाथ-पएर लाड़ला-चाड़लासँ जँ भऽ जेतै, वएह ने भेल उचितक संग उपकार। उचित-उपकार जाबे एक-दोसरक बीच नहि हएत ताबे समाजक बीच एकरूपता केना औत। उपकारक माध्यमसँ कर्मक विचरण होइए, माने जेहेन काजक उपकार करब, ओइ काजक तँ अपन ऐगला-पैछला जीवन सेहो अछिए। ओ तँ बीचक काज भेल। देवनकेँ आँखिक इशारा दैत पाछूक पतियानीपर खिड़बैत बनर्जीदादा बजला- "देवन, चारू गोरे जे पाछूमे बैसल छैथ, ओ तीस बर्ख ऊपरेसँ ऐठाम काज कऽ रहला अछि।" जहिना सर्व-साधारण बुझै छैथ तहिना बुझि देवन बजला- "तखन तँ आब रिटायर करै-जोकर भऽ गेला?" देवनक बात सुनि बनर्जीदादाकेँ हँसी लगलैन। हँसीक कारण खुजली-दिनाए केर घाओ जकाँ भेलैन। जहिना खुजली-दिनाए कुरियबैकाल मनमे गुद-गुदी लगैए मुदा ओकर जलइनमे जलन नहि अबैए सेहो बात नहियेँ अछि। अबिते अछि, तहिना बनर्जीदादाक मनमे भेलैन जे देवन अखन दुनियाँक रीति-नीति नहि बुझि पेब रहल छैथ तँए एना बजला अछि। जँ से बुझैत रहितैथ तँ ईहो बुझबे करितैथ किने जे दुनियाँमे एक घर हँसैए तँ दोसर कनबो करिते अछि। तैबीच अपने केतए छी आ कोन गुण अलापै छी। विचारकेँ समटैत बनर्जीदादा बजला- "देवन, गोदामक मटिया-मजदूरकेँ रिटायरमेन्ट नहि होइ छैन, ओ अपने थाकि हारिकऽ चलि जाइ छैथ। सरकारीकर्मी जकाँ हुनका पेंशन नहि भेटै छैन।" पैछला पतियानीपर नजैर उठा कऽ देखैत देवन बजला- "दादा, एक गोरेकेँ अहीठाम बजेने अबै छिऐन।" बनर्जीदादा बजला- "नीक हएत। भने ओ अपन विचार सभक बीचमे रखता।" हरदेव लग जा देवन कहलकैन- "गुरुजी, दादा बजा रहल छैथ।" ऐठाम गुरुजीक माने अखड़ाहाक खलीफा आ दर्जीक शिष्य सदृश अछि। हरदेव-सहदेवक जोड़मे गप-सप्प करै छला। हरदेवकेँ बजाहटिसँ सहदेव सेहो उठिकऽ ठाढ़ होइत आगू बढ़ैत बजला- "चलू! दुनू भजार संगे चलै छी।" हरदेवो आ सहदेवो, बनर्जीदादा लग पहुँचला। लगमे दुनूकेँ पहुँचते बनर्जीदादा बजला- "हरदेव दादा, ऐठाम सभसँ पहिनेसँ अहीं काज करै छी?" हरदेव बजला- "हम आ सहदेव, दुनू भजार एक्के दिन गामसँ कलकत्तो एलौं, एक्के गामक सेहो छी आ संगे-संग गोदाममे काज सेहो शुरू केलौं। बनर्जी भाय, अहाँकेँ अबैसँ पहिनहिसँ ऐ गोदाममे काज करै छी।" ओना, बनर्जीदादाकेँ अपनो बुझले रहैन तँए दोहरा कऽ नहि पुछि सोझे बजला- "केते दिनसँ अहाँ दुनू गोरे ऐठाम काज करै छी?" हरदेवसँ सहदेव बजैमे बेसी चड़फड़। हरदेव मने-मन साल मोन पाड़ए लगला, तइ बिच्चेमे सहदेव बजला- "बड़का भुमकम ओही साल भेल छेलइ।" 1934 इस्वीक भुमकमकेँ अँटकारि बनर्जीदादा बजला- "तखन तँ तीस बर्खसँ बेसीए भऽ गेल.!" सहदेव बजला- "से तँ नीक जकाँ ठेकान नहि अछि मुदा जहिया लौहकिये वयस छल तहियेसँ जे काज धेलौं से अखनो धेनहि छी।" एकटा जीवन भेटने जहिना रंग-रंगक लोककेँ रंग-रंगक खुशी होइ छै तहिना अपन स्वभावानुकूल सहदेवक जीवनमे बनर्जीदादा खुशी पेलैन। जइसँ मनमे एते खुशी पनपिये गेलैन जे समुद्र मथन करैक निर्णय केलाह। मुदा सहदेवक जीवन लीलाकेँ केतए-सँ शुरू करितैथ तइ करैमे बनर्जीदादाकेँ मने उजगुजा गेलैन। दू पाँतीक शायरी सुनि अन्हरो-बहिरा जहिना 'वाह-वाह' करए लगैए तहिना दादाक मनक एकटा कोणमे उठि गेलैन। मुदा तेकरा दोसर कोणक मन दाबैत विचारकेँ समतूल बना देलकैन। बनर्जीदादा बजला- "आइ जे अपना सभ एकठाम बैस समारोह मना रहल छी ओ खुशीक अछिए। मुदा दुर्भाग्य कहियौ कि सौभाग्य, भने कियो बाहरी लोक नहि एला। अहाँ दुनू गोरे सभसँ बेसी दिनसँ ऐठाम काज करै छी, अखन तकक जीवनमे की सभ देखलौं आ की सभ मोड़ आएल, तेकरा एका-एकी (क्रमश:) शुरूहेसँ सभकेँ सुना दियौन। किनको जँ कोनो घटना वा विचार बुझैमे नहि औतैन, तेकरा ओ अपन प्रश्न बना पछाइत अहाँसँ पुछि लइ जेता।" बनर्जीदादाक विचार सुनि सहदेवक मनमे ओहिना भेलैन जहिना सभकेँ होइ छैन जे अपन दुखनामा तँ सभकेँ सुनबए चाहै छैथ मुदा सुखनामाकेँ चोराकऽ राखि लइ छैथ। सहदेवकेँ एकाएक अपन कलकत्ता प्रवासक ओ दिन मोन पड़लैन जे गाम छोड़ैसँ पाँच दिन पूर्वक छल। ओ दिन छी उन्नैस साए चौंतीस इस्वीक, जहिया भुमकम भेल छल। तिलासंक्रान्तिक दिनक घटना छी जइमे गामक सुन्दरता माने गामक खेत-पथार, बाड़ी-झाड़ी, गाछ-बिरीछ इत्यादि, एकाएक भुमकमक एहेन प्रभाव भेल जे सभकिछ नष्ट भऽ उजैड़ गेल। जनकजीक फुलवाड़ी जकाँ फूल-फलक वृक्षसँ भरल अपन लछमीपुर गाम छल, अन्नक भण्डार खेत छल, पनरहसँ ऊपरे पोखैर छल आ पच्चीससँ ऊपरे इनार, जे अपन गामक सबलता रहए। मुदा भुमकमक एहेन प्रभाव भेल जे सभचीज नष्ट भऽ गेल। से खाली लछमियेपुरटाक नहि, काठमाण्डूसँ मुँगेर तकक अधिकांश गामक सभकिछ तहस-नहस भऽ गेल। छोट-छीन गाछ-बिरीछ तँ लछमीपुर गाममे गोटि-पङ्गरा बँचबो कएल मुदा दस बर्खसँ ऊपरबला आमक एकोटा गाछ नहि बाँचल। घरक चरचे की, पजेबाक घर तँ गाममे छले नहि, माइटिक भीतघर आ खुट्टा-खाम्हीक टटघर छल, धरतीक एहेन डोल एलै जे सभटा तहस-नहस भऽ जमीन फाटि गेल। माइटिक नीचला परतक बालूसँ गामक उपजाऊ भूमि झँपा गेल, माने उपजाऊ माइटिक ऊपरमे बालू पसैर गेल। पोखैर-इनारक भथन भऽ गेल। जे लछमीपुर कहियो लछमीपुर छल ओ एकाएक कालीपुरमे बदैल गेल। लोकक जीवन-यापन दुभर भऽ गेल। की खाएत, की पीत आ केतए रहत, सभकिछु बेठेकान भऽ गेल। जीब तँ तखने सकै छी जखन जीबैक साधन रहत। आजुक परिवेश छल नहि जे भारी-भारी काज करैक मशीन बनि गेल अछि। ओना, जखन भारी काज करैक साधन बनियोँ गेल अछि तखनो देशक केते उपजाऊ भूमि बालूतरमे आकि नदी-नालाक सड़ैन-गड़ैनमे मारल अछि, सेहो तँ सबहक सोझमे अछिये। गामक आशा तोड़ि दुनू गोरे (हरदेव-सहदेव) कलकत्ता आएल छेलौं। सहदेव बजला- "बहुत दिन भऽ गेल, तँए सभ बात मनो नहियेँ अछि, मुदा जे मोन अछि से कहै छी।" सहदेवक विचार सुनि बीचमे बैसल एक गोरे बजला- "अनेरे पैछला दुखकेँ जड़ि खोदि जे दुख मोन पाड़ब तइसँ नीक ने जे जइ वर्तमानमे जीबै छी मात्र तेतबेसँ काज चलाएब।" ओना, तार्किक लोक बनर्जीदादा छथिए तँए कोनो विचार कानमे अबिते तर्क-विर्तक करए लगै छैथ। मनमे उठि गेल छेलैन जे जँ पैछला बातकेँ बिसैर जाएब वा जानि कऽ छोड़ि देब तखन पूर्वक महत्व की रहल आ एते जतनसँ लोक पूर्वक इतिहासकेँ मथै किए छैथ। दिनेशक विचारकेँ खण्डित करैत बनर्जीदादा बजला- "जखन सहदेव बाजए चाहै छैथ तखन हुनकर सब विचार सुनियौन।" जखने बनर्जीदादा दिनेशक विचारमे ब्रेक लेलैन तखने दुरुस्त गाड़ी जकाँ दिनेशक विचार रूकि गेल। तैबीच सहदेव पुन: बाजब शुरू केलैन- "गाममे बाल-विवाहक चलैन छल, तँए अपन बिआह बच्चेमे भऽ गेल रहए, मुदा दुरागमन नहि भेल छल। स्त्री नैहरेमे छेली। लछमीपुर गामक अपेक्षा सासुरमे क्षतियो कम भेल छल।" 'सासुर' सुनि हरदेव बजला- "भजार, दुनू संगीक विचार संगे-संग चलए दियौ।" अपन विचारमे सुधार करैत सहदेव बजला- "दुनू भजारक रहैक गाम तँ एक्के छी मुदा सासुरक गाम लगे-लग रहला पछातियो दू गाम छी। आन चीजमे तँ दुनू गाम एक्केरंग अछि मुदा दू परगाना रहने जहिना खेत नपैक लग्गामे अन्तर अछि तहिना मलगुजारीमे सेहो कमी-बेसी अछिए।" विचारमे सामंजस करैत बनर्जीदादा बजला- "चारिये घन्टाक कार्यक्रम अछि, तँए समयकेँ धियानमे रखैत आगू बढ़ू। माता-पिता जीवित छेला?" सहदेव बजला- "हमर पिता मरि गेल छला आ भजारक माए मरि गेल छेलैन। ओना, हमर माए तेते काजुल छेली जे सदिकाल घर-अँगनाकेँ चमकौने रहै छेली। तहिना भजारक पिता एकबोलिया लोक छेलखिन, स्त्री मुइला पछाइत गामक लोक हुनका केतबो कहलकैन जे दोसर बिआह करि लिअ। मुदा ओ एक्केठाम अड़ि गेला जे सौंसे दुनियाँ एक भाग किए ने भऽ जाए मुदा हम अपन विचार नहि तोड़ब।" सहदेवकेँ बहलाइत देख बनर्जीदादा बजला- "अहाँक दुरागमन कहिया भेल?" 'दुरागमन' सुनि सहदेव बजला- "कलकत्ता एलापर जखन कमाए-खटाए लगलौं आ माएकेँ रूपैआ पठबए लगलिऐ तखन साल भरिक पछाइत हमर दुरागमन भेल।" विचारकेँ समटैत बनर्जीदादा बजला- "केते दिनसँ मटियाक काज करै छी?" अपन निचोरल विचार व्यक्त करैत सहदेव बजला- "जहिया कलकत्ता एलौं तहिया जे काज धेलौं से अखनो धेनहि छी।" बनर्जीदादा बजला- "जखन लोक कमाए-खटाए लगैए आ आमदनी होइ छै तखन काजोकेँ सुधारैत चलैए, माने भरिगर काजकेँ हल्लुक बनबैत चलैए। तैठाम अहाँ?" सहदेव बजला- "जहिना शरीरमे काज पचि गेल तहिना कमाइयो जीवनमे पचि गेल। केतए जइतौं आ की करितौं। मनमे जे विचारने रही ओ सभटा मनेमे मेटा गेल जइसँ दुनियाँ अन्हार जकाँ लागए लगल।" 'अन्हार जकाँ लगए लगल' कहि सहदेव चुप भऽ गेला। जेना मनक रूचि उखड़ल रंग जकाँ भऽ गेलैन तहिना मुँहक सुरखी सेहो मौलाएल गाछक फूल जकाँ ऐलसा लगलैन। ओना, अनुमानसँ बनर्जीदादा सहदेवक विचारमे बहुत किछु बुझलैन जरूर, मुदा समारोहमे बैसल अधिकतर लोक नहियेँ बुझलैन। बुझबो केना करितैथ? इनारमे रहैबला बेंग गतिशील नदी (धार) वा लहराइत लहरैत बात बुझियो केना सकै छल। जीवने ने सभ किछु सिखबैए। पढ़निहारकेँ किताबक ज्ञान, रणमे रणधीरकेँ रणक कला, गायककेँ गायन कला आ चोरकेँ चोरिक कला सिखैबते अछि। समारोहमे बैसल मटिया-मजदूरोक तँ जीवन इनारेक बेंग जकाँ बनल अछि, तखन ओ अपनाकेँ केना परिवर्तित करैत आगू बढ़ि सकैए। ओना, बनर्जीदादाक मनमे एहेन भाव प्रवल रूपमे जागिये गेल छेलैन जे जाबे मनुख अपन प्रवाहित होइत जीवनधारकेँ समुचित ढंगसँ नहि बुझता ताबे अपन भूतसँ अबैत जीवनकेँ भविष्येक आशापर ने कियो अपन जीवन ठाढ़ करैत संकल्पित होइ छैथ। मुदा एहेन विचार मनुक्खमे तखन ने अबैए जखन हुनकामे अपन मनुखपनक विचार जगै छैन। से तँ जगैए जागल मनुक्खमे मुदा जे जीवन मृतप्राय बनि सुति रहल अछि। ओहन विचार तँ ओही सीमाक भीतर ने होइए, जेहेन बहैत धार धारा मरि बालुक बुर्जा बनि मरल-पड़ल रहैए। विचारकेँ आगू बढ़बैत बनर्जीदादा गम्भीर रूपमे सहदेवकेँ पुछलखिन- "परिवारमे के सभ छैथ?" 'परिवारमे के सभ छैथ' सुनि जहिना सहदेव तिलमिला गेला तहिना हरदेव सेहो मौलाए लगला। मुदा कुशेसरो आ कुशेसरे जकाँ तीन-चारि गोरेक मन चटपट करए लगलैन जे अपन परिवारक बात हम बाजी। मुदा से नहि, मौलाएल मने सहदेवे बजला- "बनर्जी बौआ, एहेन दुख लोक छातीमे मुक्का मारि सहि लइए मुदा केकरो कहए नहि चाहैए। ओना, दस गोरेक बीच जखन अहाँ पुछलौं तखन ऐ बुढ़ाड़ीमे चुपो रहब नीक नहि बुझै छी।" सहदेवक विचार सुनि बनर्जीदादाक मन मानि गेलैन जे सहदेवक जीवनक धारमे केतौ मोनि फुटने प्रवाह मरि गेल छैन, मुदा एकटा हमरे बुझने मनक मोनि थोड़े भरतैन। तहूमे दुनियाँ अरबो-अरब ब्रह्माण्डक बनले अछि। तखन तँ भेल जे अपन जीवनमे संभलपन आनैत दोसरोक जीवनकेँ सम्हारैक परियास ओते जरूर करक चाही जेते अपन शक्ति अछि। बनर्जीदादा बजला- "चुप रहब कि नीक नहि बुझै छी। जखन कियो फाँसीपर मृत्युक करीब आबि जीवनदाता बनै छैथ, तखने ने हुनका मुहसँ स्वाती नक्षत्र जकाँ अमृतक वर्षा झहरै छैन।" मने-मन बनर्जीदादा विचारि रहल छला, मुदा आगूमे बैसल सघन जीवन तँ सबहक ओहने अछि जेकरा बुझैक आ करैक खगता अछि। सहदेव बजला- "बनर्जी बौआ, अहाँक जन्म केतौ भेल अछि आ हमर जन्म सेहो केतौ भेल अछि। कहुना-कहुना जँ जन्मभूमिकेँ गज-मीटरसँ नापब तँ सइयो किलोमीटर दूरी बीचमे अछिए। मुदा जिनगीक अधिकतर हिस्सा तँ दुनू गोरेक संगे बीतबो कएल अछि आ बीतबो करत, तँए कहए चाहै छी।" की कहए चाहै छैथ सहदेव, तइ सुनैले सभक कान ठाढ़ भेलैन। अनुकूल परिस्थिति देख बनर्जीदादा बजला- "ऐठाम सभ कियो भाइए-भैयारीक रूपमे छी, जँ कोनो अवाचो वाच बजा जाएत तँ ओकरा अवाच कहि छोड़ि देब, मुदा जे सुवाच अछि ओ तँ एक ने एक दिन जीवनमे काज एबे करत। तँए ओहन विचार निर्भय होइत बाजू।" बनर्जीदादाक सह पेब सहदेव बजला- "बनर्जी भाय, जेहने जीवनक भागक हिस्सा हमर अछि तेहने हरिदेव भजारक सेहो छैन। मुदा दुनूक दिशाक मुँह दू दिस अछि।" बीचमे बैसल घनश्याम उठिकऽ ठाढ़ होइत सहदेवकेँ पुछलखिन- "की दू दिस अछि, गुरुजी?" सहदेव बजला- "बौआ, एकसंग मृतप्राय जीवन हमरा दुनू गोरेक रहितो, कारण अपन-अपन अछि।" नव विचार वा नव कथा-कहानी सुनने जहिना बाल-बोधक जिज्ञासा आरो उग्र होइत बढ़ैए तहिना नव-तूरक मटिया-मजदूरकेँ सेहो भेलैन। एक गोरे उठिकऽ ठाढ़ होइत बाजल- "गुरुजी, जखन आइ काज छोड़ि गोदामक स्थापित-दिनक समारोह मना रहल छी, तइमे जे समय भेटल तेकरा तँ अपन जीवनानुकूल बनाएबे अछि किने?" सिंहेसरक विचार सुनि जहिना बनर्जीदादाकेँ जीवनक सार्थक रस भेटने मन मीठेलैन तहिना नव-तूरक आगूमे अपन हारल जीवनकेँ बजैमे सहदेवक मन तितेबे केलैन। मुदा मनोक बेग तँ ओहन होइते अछि जे अछियापर पड़ल लहासो जखन जरौनिहारकेँ खिहारए लगैए तखन सहदेव तँ सहजे अखनो पीठपर क्वीन्टलिया बोरा उठैबते छैथ। गुनधुनमे सहदेवकेँ पड़ल देख बनर्जीदादा खोरनी चलबैत बजला- "चुपा-चुपीमे समय नष्ट नहि करू। दू-अढ़ाइ घन्टा बीत गेल। मात्र एक-सबा घन्टा समय बँचल अछि।" सहदेवक मनमे अपन परिवारक माने बेटा-पुतोहुक संग अपन सम्बन्ध धीरे-धीरे मटियामेट हुअ लागल छेलैन मुदा अपन शेष जिनगीक दिनक विचार प्रवल हुअ लगलैन। बजला- "समारोहमे जे छी, माने गोदामसँ जुड़ल जे छी, सभकेँ हम अपन परिवार बुझै छी। तँए बजैमे कोनो संकोच नहि। पहिने अपन परिवारक आ हरदेवक विषयमे कहब।" सहदेवक विचारमे बनर्जीदादाकेँ गम्भीरपन बुझि पड़लैन तँए अपनाकेँ सोल्होअना साकांच करैत एकाग्र होइत बजला- "भाय साहैब, ने कोनो बात बजैसँ लजाउ, ने केकरोसँ डराउ आ ने समूहकेँ आगूमे बैसलसँ धखाउ। जीवन छी, अपन जीवनक बात किए ने बाजब। आ जँ से नहि बाजब तँ दुनियाँ देखत केना आ सुनत केना।" एक तँ अहिना सहदेवक मनमे नव परिवारक सम्बन्ध-सूत्र बनने खुशी उपकले छेलैन, तैपर बनर्जीदादाक भर सेहो सहयोग केलकैन। निरमोही होइत सहदेव बजला- "बहुत आशा बेटा-पुतोहुपर छल। मनमे सोल्होअना बनल रहए जे अखन जहिना बेटाक सेवा कऽ रहल छी तहिना बुढ़ाड़ीमे अपनो हएत। मुदा सभ पानिमे चलि गेल। सात-आठ बर्ख पत्नीकेँ मुइना सेहो भऽ गेलैन। असगरे गामसँ बाजार धरि पड़ल छी। कियो सुधि-बुधि लेनिहार दुनियाँमे नहि अछि।" विचारकेँ साफ करैक खियालसँ बनर्जीदादा बजला- "की आशा बेटा-पुतोहुपर छल आ की भेल?" सहदेव बजला- "दुनू छोड़िकऽ बम्बै शहर पकैड़ लेलक। जहिना हमरा जीवित रहैत छोड़ने अछि तहिना हरदेव भजारकेँ, पत्नी तँ जीवित छैन मुदा नि:सन्तान रहने कियो देखनिहार नै छैन।" समारोह समाप्त भेल। सभ कियो चलि गेला। बनर्जीदादा, देवन आ कुशेसर रहि गेला। बनर्जीदादा दुनू गोरेकेँ माने देवनो आ कुशेसरोकेँ सम्मिलित रूपमे पुछलैन- "एक तरहक काज करितो एक-दोसरक जीवनमे जे दूरी बनल अछि, तेकरा एकरसमे केना पाटल जाएत?" वैचारिक चटसारपर बैसनिहार कुशेसर तँ छला नहि आ देवन तँ सहजे तीनियेँ मासक अनुभवी छैथ। कुशेसरक अपन समय तेना अपन जिनगीमे बन्हा गेल छैन जे अपन सुख-दुख छोड़ि दुनियाँमे दोसर किछु देख नहि पबै छला, जइसँ आनो जीवनक जान-पहचान होइतैन। मुदा समारोहमे सुनल किछु विचार तँ मनकेँ मथिये रहल छेलैन। अपन विचारक इमान-धर्म बँचबैत कुशेसर बजला- "दादा, एक दिनक भोजे की आ एक दिनक राजे की। जीवन तँ जीवन छी ओकरा जइ रूपेँ गहिकऽ गहियबैत, महियबैत रहब तेहने ने बनत। मुदा से तँ गहियबै-महियबैकेँ बुझैयोक अवसर ने भेट रहल अछि। बनर्जीदादा, अपने सभ तरहेँ विचारवानो छी आ क्रियमानो तँ छीहे। जड़िक बात कने..?" कुशेसरक जिज्ञासा देख बनर्जीदादा बजला- "ओना, बेकता-बेकती जीवन अपन-अपन अछि, मुदा अखन से नहि, अखन एतबे जे मोटा-मोटी तीन रंगक विचार मटिया सबहक बीच छैन। पहिल जे पुरान पीढ़ीक छैथ, दुनियाँक सभ किछु हारि, शक्ति नहि रहितो, देहक शक्तिकेँ जीबैले जानकेँ दाँवपर लगा काज कऽ रहला अछि। दोसर ओहन छैथ जे परिवारक बीच तेना ओझरा कऽ बोहिया गेल छैथ जे दुनियाँकेँ देखिये ने पेब रहला अछि आ तेसर ओ छैथ जे अपना संग अपन परिवारोकेँ सुधार करैत भविस दिस डेग उठा रहल छैथ। मुदा तइ बुझै आ करैले अनवरतता चाही। आगूओ विचार-विमर्श होइत रहत। अबेर भऽ गेल। जाइ जाउ।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १७म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १७म खेप १७ एकटा समय छलैक जे उतरबारिटोलक लोकसभ दछिनबारिटोलक गिरहथसभक ओहिठाम हर जोतैत छल,जन-बनिहार रहए ,घरसँ लए कए बाहरधरिक सभटा काज करैत छलए आ बोनिक नाम पर जकरा जे भेटि जाइ,नहि भेटेक तैओ कोनो बात नहि । ककरो बाबा पाँचटा टका कर्ज लेने रहैत ,ताहि ॠणकेँ सधेबामे कैक पुस्तकक श्रम लागि गेल । मुदा कर्जा ठामहि छलैक। मुदा समयक चक्र बदलैत छैक,से बदललैक । आब ओ उतरबरिआ टोल नहि अछि । केओ दछिनबारिटोलक जन-बनिहार नहि अछि। ओहि टोलमे बीए-एमए पास लोक छैक । मास्टर,अफसर,की-की ने बनि गेल छैक छौंड़ासभ। तेँ ने ओहि दिन जखन पाठशालाक बिबाद भेलैक तँ ओहिटोलक युवकसभ छढ़पि कए जयन्तक समर्थनमे आबि गेल । जयन्तक पितिऔत लठैतक सहयोगसँ ओहि जगहकेँ किन्नहु छोड़बाक हेतु तैयार नहि छल। ताहि हेतु ओ अपन वयोवृद्ध पिताक अवहेलना करबामे सेहो नहि बाज आएल । आब सोचिऔक जे भेलैक ने परिवर्तन । मुदा जहिना उतरबारिटोलक लोकसभकेँ विकास भेलैक तहिना दछिनबारिटोलक लोकक गर्त दिस बढ़ि रहल अछि । साँझ होइत देरी सौंसे टोल तारीक दुर्गंधसँ महमह करए लगैत अछि । किछु बूढ़सभ महादेवक मंदिरपर शरण लेने रहैत छथि , कोनो आओर समाधानो नहि छनि । किछु गोटे जे अखनहु सक्षम छथि से सुधाकर सन लंठक आगू सकदम छथि। कहुना कए समय बिता रहल छथि । जयन्त नहि सोचि सकलथि जे हिनकर मातृभूमि एतेक बदलि गेल हेतनि । फेर हुनका ककरोसँ किछु लेबाक नहि रहनि । ओ तँ अपन ज्ञान समाजकेँ बिना कोनो लोभ-लालचकेँ बितरित करए आएल छथि। ताहि हेतु एकटा स्थान चाही । पाठशाला पूर्वहिसँ स्थापित छल । ओ तकर गौरवकेँ आगू करए चाहैत छलाह। मुदा हुनकर जानकीधाम प्रवासक अवधिमे एतेक घटना-दुर्घटना भए गेल अछि से ओ की जाने गेलाह? जन्मभूमिक निःस्वार्थ सेवा करबाक हार्दिक इच्छासँ ओ कालीकान्तक आग्रहकेँ अस्वीकार कए देने रहथि । ताहि बातक हुनका कोनो दुख नहि रहनि । मुदा जखन अपने पितिऔत केँ एना हिंसक भेल देखि रहल छथि तँ दुखी होएब स्वभाविके। ओहि दिनक फसादक बाद ओ पाठशाला आबि कए मौन भए गेलाह। तकरबादसँ केओ किछु पुछनि ओ बजबे नहि करथि। ई समाचार सुनि सुधाकर बहुत प्रसन्न रहथि । " अहाँ तँ अनेरे चिंता करैत रहैत छी । एक इसारा दिऔक हमसभ एकरा जानकीधाम पहुँचा देबैक । ककरो हबो नहि लगतैक।"-एकटा लठैत बाजल । "हमसभ जानकीधाम पहुँचेबाक कोनो ठेका लेने छिऐक। जतए जएबाक होनि ततए जाथु । मुदा पाठशालाक लफड़ा छोड़थु।"-दोसर लठैत बाजल । "मुदा उतरबारिटोलबलासभ जे टपर-टपर कए रहल अछि, तकर की करबहक?"-तेसर लठैत बाजल। "हमरा हिसाबे तँ ओ दुनू अगत्ती छौंड़ासभकेँ किछु सबक सिखाएब जरूरी अछि, नहि तँ कखनो उकबा उठि सकैत अछि।"-चारिम लठैत बाजल । ओकरा सभकेँ ठीक केनाइ आब आसान बात नहि छैक । पुलिस-थाना सभ ओकरेसभ दिस भए जाइत छैक । तोरासभक संग के देतह? सोचि विचारि कए काज करह । एहन ने होअए जे मुँहे भरे खसी ।"-सुधाकर बजलाह । "हमरा लगैत अछि जे जयन्त शीघ्रे जानकीधाम वापस चलि जेताह । बातो सही छैक, एहि गाममे आब की राखल छैक? एहिठाम शास्त्र पढ़निहार अछि के ? सभ तँ साँझ होइते तारी पीबि कए बमकए लगैत अछि,ताहिठाम हिनकर पोङापंथीकेँ ककरा काज हेतैक?"-सुधाकर बजलाह । "तखन कएल की जाए?"-पहिल लठैत बाजल । "तूँ सभ पता तँ लगाबै जे उत्तरवाइटोलमे की चलि रहल अछि? जाहि प्रकारसँ ओ दुनू छौंड़ा बाजि रहल छल ताहिसँ हमरा बहुत चिंता भए रहल अछि । कहीं पाठशालाक नामपर ओ सभ पुरना ओलि ने चुकाबए लागए ।"- सुधाकर बजलाह। "ठीक कहि रहल छी । हमसभ ओमहरे जाइत छी, देखैत छी जे हवाक रुखि केमहर अछि?"-से कहि लठैतसभ उतरिबारिटोल दिस बिदा भेल । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- ११) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग - ११) पूर्व कथा कुमार वन में वसंतोत्सव मनायल जाईत छल,जाहि में सम्मिलित होयवाक लेल देश देशांतर संs राजकुमारी सभ आयल छलीह,आ एखनि ओ सभ राजा पुरूरवाक व्यग्रता संs प्रतीक्षा करैत छलीह l अब आगू एहि कुमार वन में आई वसंतोत्सव के समारोहक दिन पुरुषक प्रवेश वर्जित छल । मात्र उद्घाटन कर्त्ता अपने किछु सहयोगीक संग उद्घाटनक अवसर पर किछु समय लेल जा सकैत छलाह l ऋषिराज च्यवन के पत्नी अशोक वृक्षक पूजन केलथि। अगर धूप दीप संs पूजनोपरांत मदन देवता के पूजन कs भोग अर्पण केलथि l तदुपरांत उद्घाटन समारोह के लेल राजा पुरूरवा के आमंत्रित करवा हेतु एक प्रतिहारिणी के पठाओल गेल l पुरूरवा अनेक राजा सबहक संग प्रवेश द्वार संs अंदर प्रविष्ट भेलथि l कुंवारि कन्या सभ पुरूरवाक जयघोष केलथि,पुनः हुनक स्वागत में मधुर गान युवती सबहक द्वारा गाओल गेल l तत्पश्चात पुरूरवा संs अशोक वृक्ष में पदाघात करवा हेतु कहल गेल l ओ अशोक वृक्ष में जखनहि अपन पदाघात केलथि,राजाक जयकाराक उद्घोष संs दिग्दिगंत गुंजित भs गेल l तत्पश्चात सभ राजकुमारी पुष्पवर्षा राजा पुरूरवा पर पुष्पवर्षा केलथि l सभ राजकुमारी एक-दूसर के पछुआ स्वयं राजाक सम्मुख अयवा हेतु एक-दूसर संग धक्का मुक्की करs लगलीह l पुरूरवाक दृष्टि हुनका सभ दिस क्षण मात्र लेल उठल छलन्हि अवश्य परंच पुनः हुनक दृष्टि झुकि गेलन्हि l हुनक नेत्र जिनका सभ के ओहि क्षण मात्र में देखलक ओ सभ राजकुमारी अपना के धनो धन्न सन मानs लगलीह l राजा के पुरुषोचित सुंदरता पर सभ राजकुमारी विमोहित सन भेल छलीह l कतेको राजकुमारी मूर्छित भs भू लुंठित भs गेलीह l एक तो राजा के चरण तल में चेतनाहीन भs गेल छलीह l ऋषि राज च्यवन के पत्नी ओकरा उठौलीह,एवम उचित चिकित्सा हेतु ओहि सुन्दरी के लs कs आगू बढ़ि गेलीह l पुनः च्यवन ऋषि सs अनुमति लs पुरूरवा अन्य राजा सबहक संगे वन प्रांत संs वापस भs गेल छलाह l किछुए देरी के बाद ओ प्रवेश द्वार संs बाहर भs गेलाह l राजा पुरूरवा समुद्र सन गंभीर बनल छलालाह l हुनक मुख पर कनियों भाव परिवर्तन नहि भेलन्हि,पूर्ववत बनल रहलन्हि हुनक मुखमण्डल l महान पुरुषक हृदय सामान्य तरुणी पर विमोहित नहि भs सकत l ओहो एहेन पुरुष जे इंद्रलोक के अप्सराक सुंदरता सौंs विचलित नहि भेलथि,आ अपन तपस्या पूर्ण केलथि,हुनक तs बात किछु अलग होयत l हुनका संबंध में एहेन सोचनाई असंगत होयत l
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किछु दिवस बाद एक दिन महामात्य सेनापति सौंs कहलथि - "सेनापति जी, हमरा बुझाईत अछि जे अपना सबहक सम्राट आजीवन कुमारे रहि जेताह"| "हमर विचार अपने सौंs किछु भिन्न नहि अछि,किएक तs देखलियैक जे ऋषि मुनि सभ अनेक प्रकार सौंs समझाओल राजा के l वंश के आगू बढ़ायब आवश्यक अछि । पितृ ऋण चुकायब पुरुष के वास्ते अत्यावश्यक थिक जाहि लेल पुत्रक आवश्यकता अछि l पुँगव नरक सौंs परित्राणक साधन पुत्र होइता अछि - ई पर्यंत कहलन्हि l परंच राजा पुरूरवा अपन ध्येय पर अडिग रहलाह"| सेनापति चिंतित स्वर में बाजि उठलाह l "काल्हिये तs शाकलद्वीप के प्रसिद्ध नरेश कृतवर्माक संदेश आओल छल l 'हुनक पुत्री विवाह करतीह तs सम्राट पुरूरवा सs,अन्यथा ओ आजीवन कुँमारी रहतीह' - ई प्रण ओ राजकुमारी नेने छथि l ई बात बतबैत नृपति के पत्र करुण रस सौंs भरल परल छल l परंच राजा पुरूरवा ओ पत्र पढ़ला उपरान्त अस्वीकृति भरल पत्रोत्तर दs देलन्हि l लगैत अछि जे अपन राजा नि:संताने रहि जेताह"| महामात्य धीर गंभीर छलाह l "किएक संतान उत्पन्न करवाक क्षमता हुनका में नहि छैन्हि की"? सेनापति किलोल करैत बाजि उठल छलाह | महामात्य किंचित क्रोधित होइत बाजि उठलाह सेनापति पर - "जखनि हुनक हृदय में कोनो तरुणी के प्रवेश होयत तखनहि तs एहन भs सकत ! परंच उनका हृदय ! ओ तs ऋषि-मुनि सभ सs अधिक स्थिर छैक l विश्वामित्र च्यवन ऋषि सब पथभ्रष्ट भेलाह,परंच अपन सम्राट के अखनि धरि तs केयो नहि आकृष्ट कs पयलिह l बुझना जाइत अछि भविष्यो में केयो सुंदरी एहि उपलब्धि के प्राप्त नहि कs सकतीह"| "देखू आगू की होयत ई तs समय बताएत"- सेनापति मुस्कुरा उठलाह l "हंs सोमवंश के लिए एक पुत्रक आवश्यकता थिक,एकर पूर्ति तs कोनहुना अवश्य होयत,ई बात तs निश्चित अछि,कारण अनेकों ज्योतिषाचार्य भविष्यवाणी केलन्हि जे ई वँश युग युगान्तर तक पृथ्वी पर फलत l एहि सौंs निश्चित अछि जे भविष्य में केयो सुन्दरी राजाक हृदय पर विजय अवश्य प्राप्त करतीह । परंच ओ सुन्दरी के छथि आ ओ छथि कतह ? यैह बुझना में नहि अबैत अछि" - गहन विचार पूर्ण मुद्रा में आकाश दिस देखैत बजलाह प्रधान आमात्य l बुझाईत छल जेना ओ ईश्वर सs पूछि रहल होथि ई प्रश्न l प्रधान आमात्य आ सेनापति दूनु मीलि विचार-विमर्श करैत रहलाह राजा पुरूरवाक विवाह के संबंध में ! हुनक प्रणय आ परिणय के संबंध में ! हुनक मस्तिष्क थाकि गेल मुदा हुनका एहन कोनो मार्ग नहि भेटलन्हि जाहि सौंs कोनहुना कोनो सुन्दरी के प्रति राजा के आकृष्ट करवायल जाय,आ ओहि सुन्दरी के विवाह राजा सs करवायल जाय । तखनहि तs राजा गृहस्थ धर्मक पालन करताह l
क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.डॉ बिपिन कुमार झा- महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (७म भाग) महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद (७म भाग) डा. बिपिन कुमार झा (संस्थापक आ सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई-शोधपत्रिका) (एहि सँ पूर्व महाकवि भास केर लिखल कर्णभारम् जे कर्णक मनोव्यथा पर लिखल गेल प्राचीनतम एकांकी अछि, संस्कृत में लिखल एहि ग्रन्थक छठम प्रभाग धरि मैथिली रूपान्तर पढने रही अहाँ सब, आई ओहि सं आगू) शक्रः- अविहा अविहा (अविहा अविहा।) इन्द्र-एहेन अनर्थ जुनि करू कर्णः- न भेतव्यं न भेतव्यम्। प्रसीदतु भवान्। अन्यदपि श्रूयताम्। कर्ण- नै भयभीत होऊ, नै भयभीत होऊ, प्रसन्न होऊ, और सुनल जाउ अङ्गैः सहैव जनितं मम देहरक्षा देवासुरैरपि न भेद्यमिदं महास्त्रै:। देयं तथापि कवचं सह कुण्डलाभ्यां प्रीत्या मया भगवते रुचितं यदि स्यात् ।। 21 ।। अंगक संग हमर देहरक्षा हेतु कवच संग कुण्डल सेहो उत्पन्न भेल जे देव-दानव सं सर्वथा दुर्भेद्य अछि यदि अहां लिय चाहैत छी त हम प्रसन्नतापूर्वक ई दय दी। शक्रः- (सहर्षम्।) देदु, देदु। (ददातु, ददातु।) इन्द्र प्रसन्न भय- दिय दिय कर्णः- (आत्मगतम्) एष एवास्य कामः। किं नु खल्वनेककपटबुद्धेः कृष्णस्योपायः। सोऽपि भवतु। धिगयुक्तमनुशोचितुम्। नास्ति संशयः। (प्रकाशम्) गृह्यताम्। कर्ण- मनहि मन.. यैह हिनक इच्छित छैन्ह... अवश्य कपटव्यवहार बला कॄष्णक ई षड्यन्त्र छन्हि चलू त यैह उचित। धिक्कार अछि जे ई अनुचित विचार कयल कोनो संशय नै करबाक चाही (प्रकट) त ई लेल जाउ। शल्यः- अङ्गराज! न दातव्यं न दातव्यम्। शल्य- अंगराज ई नै दियौ ई नै दियौ कर्णः- शल्यराज! अलमलं वारयितुम्। पश्य कर्ण- शल्यराज नै रोकू देखू शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात् सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः। जलं जलस्थानगतं च शुष्यति हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति ।। 22 ।। विपरीत समय में शिक्षा समाप्त भय जाइत अछि मजबूत जैड बला गाछ सेहो उखडि जाइत अछि। जल जलस्थान जाक सुखा जाइत अछि। किन्तु देल गेल उचित हवि या दान सतत् विद्यमान रहैत अछि। तस्मात् गृह्यताम्। (निकृत्य ददाति।) एहि कारण लेल जाउ (निकालि के दैत छथि) शक्रः- (गृहीत्वा आत्मगतम्।) हन्त गृहीते एते। पूर्वमेवार्जुनविजयार्थं सर्वदेवैर्यत् समर्थितं तदिदानीं मयानुष्टितम्। तस्मादहमप्यैरावतमारुह्यार्जुनकर्णयोद्र्वन्द्वयुद्धं पश्यामि। (निष्क्रान्तः।) इन्द्र- (लय के मन मे) ओह ई लय त लेलहु किन्तु हम पूर्व समय में अर्जुन विजय हेतु प्रतिज्ञा केने रही ओ काज आय पूरा भय गेल आब हम ऐरावत पर चढि कें अर्जुन आ कर्णक युद्द्ह देखब चलि जाइत अछि शल्यः- भो अङ्गराज! वञ्चितः खलु भवान्। शल्य- अंगराज अहां ठकल गेलहुं कर्णः- केन। कर्ण- केकरा द्वारा शल्यः- शक्रेण। शल्य- इन्द्र के द्वारा कर्णः- न खलु। शक्रः खलु मया वञ्चितः। कुतः, कर्ण- नै नै इन्द्र हमरा सं ठकल गेला कियाकि अनेकयज्ञाहुतितर्पितो द्विजैः किरीटिमान् दानवसङ्घमर्दनः। सुरद्विपास्फालनकर्कशाङ्गुलि- र्मया कृतार्थः खलु पाकशासनः ।। 23 ।। (प्रविश्य ब्राह्मणरूपेण) अनेक यज्ञ में आहूति दय ब्राह्मण जेकरा प्रसन्न करैत अछि जे किरीट धारण करैत छथि एवं दानवसमूह के विनाशक छथि एतवे नै ऐरावत के पीठ थपथपेनहार जिनक हाथ आंगुर कठोर भेल अछि एहेन इन्द्र आय हमरा द्वारा स्वयं उपकृत भेलाह ई हमरा लेल प्रशंसाक गप्प अछि। देवदूतः- भोः कर्ण! कवचकुण्डलग्रहणाज्जनितपश्चात्तापेन पुरन्दरेणानुगृहीतोऽसि। पाण्डवेष्वेकपुरुषवधार्थममोघमस्त्रं विमला नाम शक्तिरियं प्रतिगृह्यताम्। देवदूत- हे कर्ण कवच कुण्डलक प्रतिग्रहजन्य पछतावा क कारण इन्द्र अहापर अनुग्रह केलथि पांचो में कोनो एक पाण्डववध हेतु विमला नामक अमोघ अस्त्र स्वीकार करू। कर्णः- धिग्, दत्तस्य न प्रतिगृह्णामि। कर्ण- धिक्कार अछि दान दय के वापस किछ नै लैत छी देवदूतः- ननु ब्राह्मणवचनाद् गृह्यताम्। देवदूत- त ब्राह्मणवचन मानि लय लिय कर्णः- ब्राह्मणवचनमिति। न मयातिक्रान्तपूर्वम्। कदा लभेय। कर्ण- ब्राह्मणवचन.. हम कहियो उल्लंघन नै कयल। कखनि भेटत देवदूतः- यदा स्मरसि तदा लभस्व। देवदूत- जखैन स्मरण करब तखने भेटत कर्णः- बाढम्। अनुगृहीतोऽस्मि। प्रतिनिवर्ततां भवान्। कर्ण बड्ड नीख हम उपकृत भेलहु अहां जाउ देवदूतः- बाढम्। (निष्क्रान्तः।) देवदूत- नीक गप्प (चलि जाइत अछि) कर्णः- शल्यराज! यावद्रथमारोहावः। कर्ण शल्यराज! रथ पर चढी शल्यः- बाढम्! शल्य ठीक अछि (रथारोहणं नाटयतः) रथारोहण अभिनय करैत कर्णः- अये शब्द इव श्रूयते। किं नु खल्विदम्। कर्ण- अरे शब्द जकां सुनाइ पडिरहल अछि शङ्खध्वनिः प्रलयसागरघोषतुल्यः कृष्णस्य वा न तु भवेत्स तु फाल्गुनस्य। नूनं युधिष्ठिरपराजयकोपितात्मा पार्थः करिष्यति यथाबलमद्य युद्धम् ।। 24 ।। प्रलयकालिकसमुद्रवत् अतिगम्भीरशब्दबला ई कृष्णक शंख अछि अथवा अर्जुनक शंखध्वनि अछि? निश्चिते युधिष्ठिरक पराजय के सुनि पराजित ई अर्जुन हमरा सं पूर्णशक्ति सं युद्ध करताह। शल्वराज! यत्रासावर्जुनस्तत्रैव चोद्यतां मम रथः। शल्यराज जतय अर्जुन अछि ओतय हमर रथ लय चलू। शल्यः- बाढम्। शल्य ठीक (भरतवाक्यम्) भरतवाक्य सर्वत्र सम्पदः सन्तु नश्यन्तु विपदः सदा। राजा राजगुणोपेतो भूमिमेकः प्रशास्तु नः ।। 25 ।। संसार में सर्वत्र सम्पत्ति परिपूर्ण रहय विपत्ति सर्वदा समाप्त भय जाय राजा राजाक गुण सं युक्त हो आ एहि पृथ्वी पर शासन करय आ हमरा सभक रक्षा करथु (निष्क्रान्तौ।) चलि जाइत अछि कर्णभारमवसितम् कर्णभारम् ई ग्रन्थक सम्पूर्ति भेल अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा १ मुंहफटपन दयानंद प्रसाद प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत्त होयला के बाद अपना डेरा मुरलियाचक में रहे लगनन।हम दूनू गोरे एक ही स्कूल फुलहर में योगदान कैले रही। बाद में दूनू गोरे के दू गो स्कूल में बदली भे गेल। हमहु प्रधानाध्यापक पद से रिटायर हो के बसबरिया में डेरा पर रहे लगली।एक दिन हम दयानंद बाबू के डेरा पर मां जानकी जन्मभूमि मंदिर,पुनौरा धाम दर्शनसे लौटती में भेंट घाट करे गेली। दयानंद बाबू आइ कालि अस्वस्थ्य छथि। जब हम डेरा पर पहूंचली आ डोर बेल बजैयली।त वो घरे में से बजला-के छी। हम बोल ली-घनश्याम महतो। अंदर से दयानंद बाबू के आवाज आयल-घनश्याम बाबू। दयानंद बाबू ग्रिल दरवाजा खोलैत बोललन-आउ घनश्याम बाबू।बहुत साल पर मिल ली हैय।कहु की हाल चाल हए। आ बीचे में अपना बेटा संजय से बोललन-संजय अपना मम्मी से कहा नाश्ता चाय बनाबे के लेल। हमर साथी घनश्याम बाबू हमरा से भेंट करे आयल छथि। अब घनश्याम बाबू बोललन-कहु दयानंद बाबू कि हाल चाल हए लैइका सभ कि करैत हए। संजीव आ संजय कि करैत हए।वो दूनू के त हम छोटकारी में ही देखले रही। दयानंद बाबू बोललन-हां। संजीव त पंचायत शिक्षक हए आ संजय कम्पीटीशन के तैयारी करैत हए। घनश्याम बाबू बोललन-सुनले रही कि जौं अहां बाजपट्टी में रही त उंहा के बीइओ घूस लैत पकड़ा गेल रहै।कि भेलै वोइ बीइओ के। दयानंद बाबू बोललन- हं। जौं राजीव गांधी पंचायती राज के स्कूली शिक्षा दे देलकै त पंचायती राज के चुनाव के बाद शिक्षक सभ के सामूहिक बदली भेलैय। हमर बदली रीगा से बाजपट्टी ब्लौक में भे गेल। उहां के बीइओ राम खेलावन राय दिल के साफ रहे लेकिन मूंहफट रहे। कुछ शिक्षक हुनकर दिल सफाई से खुश रहे त कुछ शिक्षक हुनकर मूंहफटपन से नाखुश रहे। बाजपट्टी के मुख्यालय स्थित स्कूल सह सीआरसी सह बीआरसी में प्रखंड शिक्षक के नियोजन कार्यालय भी रहे।बीइओ कार्यालय भी रहे।बीइओ अपना काज इहें करैत रहलैन। एक दिन शिक्षक सभ के संकुल स्तरीय प्रशिक्षन होयत रहे। अचानक बीइओ साहेब के आवाज सुनाई पड़ल-बचाबा हो।बचाबा हो। सभ शिक्षक प्रशिक्षन छोड़ के कमरा से निकल गेल। हम देखै छी कि चार गो आदमी हाथ में पिस्तौल लहरैवैत बीइओ साहेब के बाहि पकड़लै घिसियबैत रोड पर ले जाइत। कुछ टीचर बीइओ साहेब के छोड़ाबे लेल बढल कि बीइओ साहेब के गूंडा सभ अपहरन के ले लेते जा रहल हए। तभीये पिस्तौल वाला कहलक-हम सभ निगरानी विभाग से हए।बीइओ के घूस लेइत पकड़ली हए। अंहा सभ नै आउ।न त अहू सभ सरकारी काज के बाधा देवे में फंस जायब।हमर इ देखूं परिचय पत्र । परंच शिक्षक सभ के विश्वास न भेल। शिक्षक सभ कहलक-जौ तक स्थानीय पुलिस न पहूचत,बीइओ साहेब के न लेय जाय देब। कनिके देर के बाद स्थानीय पुलिस आ गेल। अब सभ के विश्वास भे गेल कि बीइओ साहेब के निगरानी पकड़ के ले गेल। परंच इ पता न लागल कि कैला बीइओ साहेब पकड़ायल। निगरानी पुलिस सीआरसी पर से एगो शिक्षक के अपना गाड़ी में बिठा के सीतामढ़ी थाना में ले गेल। सांझ में फेर एगो गाड़ी से पुलिस आयल कि एगो शिक्षक और चाही।सीजर लिस्ट पर दस्तखत के वास्ते। एगो शिक्षक के पहिले ही ले गेल छी। परंच शिक्षक सभ के पुलिस से डर लागे।कोई जाय लेल तैयार न।तब पुलिस मनाबे लागल। अंहा सभ के डरे के जरूरत नै हए।खाली सीजर लिस्ट पर दस्तखत करै के हए। बाद में सभ शिक्षक कहे लागल-दयानंद बाबू।अंही के सीतामढ़ी जाय के हैय।अंही चल जाउ पुलिस के साथे आ सीजर लिस्ट पर दस्तखत करि देबै। हम निगरानी पुलिस के गाड़ी में सीतामढ़ी थाना में चल गेली।उंहा पुलिस कागजी काम करैत रहे।बीइओ साहेब के पुलिस हाजत में बंद देख ली। एकदम गमगीन।मुरझायल चेहरा। इक दू घंटा के बाद पुलिस बोलैलक- शिक्षक दयानंद आइए। पांच छह पन्ना पर लिखल स्टेटमेंट पढ़े के लेल आतुर भेली कि पुलिस कहलक-दस्तखत करा की.. हम डर से दस्तखत कर देली। रुपया नोट पर भी दस्तखत कर देली। पुलिस कह लक कि अइ बोतल पर दस्तखत कर दा।अइ में बीइओ साहेब के हाथ के धोयाल लाल पानी हए।इ रूपए में लागल केमिकल से हिनकर हाथ में केमिकल लागल रहे जे पानी से धोयला पर लाल हो गेल हए।हम बोतल पर दस्तखत कर देली। हमरा देखा देखी पहिले आयल शिक्षक अजय कुमार भी दस्तखत कर देलन। पुलिस कहलक-आबि अंहा सभ जाऊं। अब हम अजय बाबू से पुछली-कि अंहा के सामने में बीइओ साहेब के हाथ धोलाइ गेल रहे ।हमरा त बाद में पुलिस लायल रहे। अजय बाबू कहलन- न। हमरा त ओनी बाहरे बिठा देले रहल हए।हम त किछू न देखि लियै हए। लगभग एगारह बरस के बाद पटना निगरानी कोर्ट से चिट्ठी मिलल कि अमूक तारीख के जज साहब के इंहा गवाही हए।हम अजय बाबू बस से पटना गेली। पहिले सरकारी वकील से मिल ली। सरकारी वकील कहलक-घटना सभ याद हैय न।हं। बढ़िया से याद करे लेल पांच छह पन्ना मे लिखल कागज पढे ला देलन। हम दूनू गोरे कागज के पढ ली।कागज में लिखल रहे कि पकड़ते समय देखली कि रूपया ले रहल हए। आ पकड़ाए वाला स्थान पर हाथ धुलबैत देख ली आ सारा कागजी काम भेल। हम दूनू गोरे वकील साहब के कहली कि इ सभ काज हम सभ न देखली हए।हम दूनू गोरे सीतामढ़ी थाना पर डर से केवल दस्तखत कैले छी। दस्तखत हमर सभ के हैय। वकील साहब कहलन- जौं आप दूनू गोरे दस्तखत कैले छियै त लिखल सभ बात स्वीकार करें के पड़़त।हम दूनू गोरे पेशोपेश में पड़ गेली। परंच हम दूनू गोरे सोच ली कि चाहे जो जाय।हम सभ सचे कहब।जब हम देखबे न कैली।त केना कहबै कि हम देख ली हए। वकील साहब कहलन-अंहा दूनू गोरे कोर्ट में चलूं। हम अंहा दूनू गोरे गोरे के बुला लेब। हम दूनू गोरे कोर्ट कम्पाउन्ड में बैठ गेली आ वकील साहब के फोन के इंतजार करे लगली। कोर्ट के समय खतम होय लागल।त हम दूनू गोरे जज साहेब के इजलास में गेली। वकील साहब उंहा रहे। वकील साहब कहलन-अंहा दूंनू गोरे कंहा रहली हए। अब समय समाप्त भे गेल हए।अब दोसर तारीख पर आबै के होयत। हम दूनू गोरे कहली कि हमरा सभ के हाजरी त ले लू।न त हम दूनू गोरे एबसेंट हो जायब। वकील साहब आ पेशकार बोललक-न न।अब हाजरी न होयत।हम सभ जज साहब के कहली।वो सभ देखैत सुनैत रहैति। जज साहब पेशकार के हाजरी ले लेवें के कहलन।पेशकार हाजरी लेके दोसर तारीख दे देलक। हम दूनू गोरे के नजर बीइओ साहेब पड़ल। गमगीन,मुरझायल चेहरा,फाटल जुत्ता आ फाटल सर्ट पहिनले। याद आ गेल उ हंसैत चेहरा, दमदार आवाज,कलफदार पैंट सर्ट आ वुडलैंड के जूता पहने गौरव पूर्न डिलडौल। अगिला तारीख पर अजय बाबू संगे पटना गेली। सरकारी वकील से भेंट कैली। वकील साहब कहलन-सभ बात याद हए न।जो कागज में हए वोहे बात जज साहब के नजदीक बोलिया। हम दूनू गोरे कहली-जी। समय पर बुलाहट भेल। हम गवाह के बनायल कठधेरा में गेली। पहिले जज साहब पूछलन- अंहा रूपया लेइत देखली-जी न।हम पुलिस के बीइओ साहेब के पकड़ के घिसियबत रोड पर ले जाइत देखली। जज साहब पूछलन-नोट पर अंहा के ही दस्तखत हए । हम कहली-जी। पुलिस के कहला पर सीतामढ़ी थाना पर डर से दस्तखत कै देलियै। जज साहेब कहलन-अंही के सामने मे हाथ धुलायल गेल। हम कहली-जी न। हम सीतामढ़ी थाना में लाल रंग के पानी भरल बोतल पर पुलिस के कहला पर डर से दस्तखत कै देलीयै। जज साहब पुछलन-अइ सीजर लिस्ट पर अंही के दस्तखत हए। हम कहली-जी। पुलिस के कहला पर डर से हम दस्तखत कर देलिय।वकील साहब कहलन-अंहा बात से मुकरैय छि। हम कबीर साहब के उद्धृत करैत कहली-तू कहता कागद के लेखी।मै कहता अंखियन के देखी। जज साहेब मुस्कुरैलन। आ शिक्षक अजय के बुलैलन। अजय बाबू गवाही वाले कठघरे में गेलन वो भी हमरे जेका सभ बात के दुहरा देलन। वकील बोललन-केश होसटाइल हो गेल। हम दूनू गोरे बयान वाला कागज पर दस्तखत क के कोर्ट से निकल गेली। फेर से हमरा दूनू गोरे के नजर बीइओ साहेब पर पड़ल। गमगीन आ उदास चेहरा पर कनिका खुशी के एकटा लहर। हम दूनू गोरे सोचे लगली।समय समय के बात हैय। बात अब तक खुल गेल कि बीइओ साहेब के मूंहफटपन से कुछ नाराज लोग फंसा देले रहै।कहल गेल हए-न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम अर्थात् जे सच बात अच्छा न लगे,न बोले के चाही। दयानंद बाबू कहलन- बहुत बाद में मालूम भेल कि बीइओ साहेब केश जीत गेलन। परंच केश जितीयो के जीवन में हार गेलन। मुंहफटपन बीइओ साहेब के जीवन बर्बाद कै देलक। नास्ता चाय के बाद हम अपना डेरा बसबरिया चल अइली। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.आचार्य रामानन्द मण्डल ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा २
शराब आ शबाब सेन्ट्रल बैंक आफ इंडिया में विमलेश ठाकुर कैशियर रहथि।वो गनित से एम. एस सी. रहलन।हम चार गो साथी मिल के सेकेंडरी कोचिंग सेंटर खोल ली,त मैथ पढाबे लेल कहली,त वो मार्निंग सिफ्ट में पढ़ावे लेल तैयार हो गेलन।हुनकर पढावे के शैली से विद्यार्थी सभ खुश रहे। कोचिंग में विद्यार्थी के संख्या बढ़े लागल।हम जब मेहताना देबे के लेल कहली तो वो कहला- दयानंद बाबू हम मेहताना न लेब।हम अंहा सभ के मदत करै छी। अंहा सभ एगो वित्त रहित महाविद्यालय में पढ़बै छी। अंहा सभ के वेतन न मिलै हए। हमरा त बैंक में नौकरी हए आ वेतन मिलै हए।वो एक नेक दिल इंसान रहैत। बैंक के पार्टी फंक्शन में वो कभी-कभी शौकिया शराब पी ले रहैत। धीरे धीरे हुनका शराब के लत्त पड़ गेल।वो बड़का शराबी बन गेलन।अब त तीन बजे भोर से पीये लगला। बैंक आवर में भी पीये लगलन। अब शराब के नशा में शबाब भी चाही।शबाब के लेल हुनकर नजर कपड़ा धोयवाली महिला पर पड़ल।वो मैइल कपड़ा लावे आ साफ कैल कपड़ा देवे, डेरा में अबैत रहे।तीस बर्षीय महिला नाटी, मोटी आ कारी रहे। गोल मुंह , पीठ पर लटकैत कारी केश,छोटकी छोटकी आंखि, मोट होंठ ,ताड़ के फल जेका उरोज ,हकलाइत आवाज आ हथिनी अइसन चाल रहे।मानो बासना के मूर्ति रहे।काम कला के मर्मज्ञ आ कामशास्त्र के रचयिता रिसि वात्स्यायन के अनुसार हस्तिनी श्रेणी के स्त्री रहे। धीरे धीरे स्त्री के साथ हुनकर वासनात्मक संबंध जुड़ गेल। शराब आ शबाब के लेल आबि विमलेश ठाकुर के धन (रुपया) के जरूरत पड़े लागल।वेतन कम पड़े लागल। कारण कि वो बाल बच्चेदार रहैत। सुंदर पत्नी भी रहे।परंच शराब के लत। जौं बैंक के अन्यकर्मी आ मैनेजर छुट्टी पर रहैत त विमलेश ठाकुर कैशियर के संगे मैनेजर के भी काज करैत। बैंक में तीनेटा कर्मचारी रहे।एगो मैनेजर,एकटा क्लर्क आ एगो कैशियर ठाकुर जी स्वयं। ठाकुर जी कोनो ग्राहक के नाम पर भाउचर भरके आ वोकरा पास क के राशि(रुपया) निकाल लेबै। रूपया से खूब शराब पीये आ महिला संग ऐश करे। महिला के खूब रुपया देबे लागल। बैंक के जौं औडिट भेल त गड़बड़ी पकड़ल गेल।लेखा बही के पन्ना फाड़ल भेटल।भाउचर गायब। ठाकुर जी पर आरोप लागल। ठाकुर जी कहलन हम इ काज न कैली हए।इ काज मैनेजर साहब कैलन हए।आडिटर कहलन-जै दिन अंहा गड़बड़ी कैली हए।वोइ दिन के उहे खास भाउचर गायब हए आ कैश बुक के पन्ना फाटल हए।वोइ दिन मैनेजर साहब आ क्लर्क छुट्टी पर हए। केवल अहीं ड्यूटी पर छी आ वोकर नाजायज फायदा उठैली हए। विमलेश ठाकुर शांत पड़ गेलन आ रोय लग लन। मैनेजर साहब थाना में फोन कैलन। कुछ देर बाद दारोगा दू टा पुलिस के साथ आ बैंक में आ धमकल। कैशियर विमलेश ठाकुर पर एफआईआर दर्ज भेल। पुलिस हथकड़ी लगा के थाना में ले गेल।बाद में कोर्ट में पेश क के जेल ले गेल। विमलेश ठाकुर बैंक सेवा से बर्खास्त भे गेलन। शराब आ शबाब के कारन एक नेक दिल इंसान ठाकुर जी के जीवन बर्बाद हो गेल।अइ से लोग के दूर रहे में ही भलाई हए। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा ३ महायज्ञ आइ भाई समान राम बिलास ठाकुर जी बड याद आवैय हैय। फेसबुक एकटा पोस्ट से मालूम भेल कि परसुयेअइ दुनिया के छोड़ देला।वो बड़ा बीमार छल आ अंतिम समय में अपन नौकरीहा बेटा संग विशाखापट्टनम में रहैत रहलन। हुनका संग बितायल समय मन के चित्र पट पर आबे लागल। वित्त रहित कालेज घनश्यामपुर में काम करैत,आइ से सैंतीस बरस पहिले गायत्री महायज्ञ के। ठाकुर जी गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार से जुड़ल रहथि।वो परिव्राजक रहथिन।हुनकर मन घनश्यामपुर में गायत्री महायज्ञ कराबे के भेल।वो हमरा अपना मन के बात बतैलन। महायज्ञ के जगह जमीन के लेल घनश्यामपुर बस स्टैंड के बगल के जमीन वाला कपल साह से बातचीत कैली।वोइ जमीन पर हुनके बनायल महादेव मठों हए। कपल बाबू महायज्ञ के लेल जमीन देबे के लेल तैयार हो गेलन।कपल बाबू कहलन-हम चंदा देब आ लोग सभ से देबाबे में मदत करब। अब यज्ञ के प्रचार-प्रसार आ चंदा संकलन के लेल टीम बनल। पहिले हम दूनू गोरे पैसा लगा के हैंड बिल आ पोस्टर छपबैली। ठाकुर जी कहलन- दयानंद बाबू प्रचार यही के करें के हए।एगो रिक्शा आ लाउडस्पीकर भाड़ा पर लेके प्रचार -प्रसार पर निकल गेली।माइक से हम ही प्रचार करे लगली।हम हाथ में माइक लेके बोल ली-हेलो।हेलो। घनश्यामपुर में पहिल बेर गायत्री महायज्ञ बस स्टैंड में पांच फरवरी उन्नीस सौ पचासी के हो रहल हए।सभ कोई महायज्ञ में भाग लूं आ पूण्य के भागी बनूं। महायज्ञ में सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार, नामाकरन संस्कार,विद्यारंभ संस्कार, पुंगनवन संस्कार और अन्य सभ संस्कार भी कैल जायत।यज्ञ के सफल बनाबे के लेल यथा शक्ति सहयोग करु जाव। लोग सभ उत्सुकता आ आश्चर्य से देखें। अइ क्षेत्र में में गायत्री महायज्ञ न भेल रहे।इ क्षेत्र बाभन बहुल क्षेत्र भी रहे। बाभन सभ में आंतरिक प्रतिक्रिया भी भेल। लेकिन खुल के बिरोध न कैलन।काना फूसी जरूर शुरू भे गेल। गायत्री महायज्ञ सोलकन सभ केना करतै। आबि महायज्ञ मंडप के लेल बांस आ खरही के जरूरत भेल। मालूम भेल कि बगल के गांव सियानानी जे नेपाल में परैय हए वहां के महनजी के बांस आ खरही बहुते हए। हम दूनू गोरे महनजी के यहां गेली।दंड परनाम भेल।हम सभ अपन परिचय देली कि हम सभ घनश्यामपुर कालेज में पढवै छी आ घनश्यामपुर में गायत्री महायज्ञ करवा रहल छी।यज्ञ मंडप बनाबे के लेल बांस खरही के जरूरत हए।मंहजी अपना जिरितिया सियावर झा के बुलैलन आ कहलन-हिनकर सभ के काज कै दिऔ। सियावर झा कहलन-अंहा सभ परसौ आउ। हमरा से सियावर झा के बेटा टिउशन पढे।वो आठवां पढैत रहे। जौं हम दूनू गोरे परसौ सियावर झा से मिलली त बतैलैन कि-अंहा सभ के मालूम हए। सियानानी संस्कृत कैंपस के गुरु जी सभ महनजी से मिल के कहलन हए कि गायत्री महायज्ञ के मंडप बनाबे के लेल बांस आ खरही नै दूं।अइला कि इ गायत्री महायज्ञ सोलकन सभ क रहल हए।सोलकन के गायत्री यज्ञ करे के अधिकार नै हए। महनजी हुनका सभ के कोई उत्तर न देलथिन हए।गुरु जी सभ के चल गेला के बाद हम महनजी के कहैलियन कि गायत्री महायज्ञ घनश्यामपुर कालेज के विद्वान शिक्षक सभ करैत छथि।हुनका मदत करनाइ जरुरी हए।न त बड़का बबाल हो जायत। बैकवर्ड फारबर्ड के लड़ाई हो जायत।अपन गांव सियानानी त बैकवर्ड बहुल हए।खाली सोलकने सोलकन।सभ पढल-लिखल। महनजी कहलन-सियावर जी अंहा के जे मन हए से करु। बाद में सियावर झा हमरा कहलन- दयानंद बाबू अंहा हमरा बेटा के गुरुजी छी। अंहा हमरा इहा आयल छी।हम अंहा के मांग के नै टाल सकै छी। अंहा दूनू गोरे जाउ।हम स्थान के ट्रैक्टर से आइ सांझ में बांस आ खरही यज्ञ स्थल पर गिरा देब।हम दूनू गोरे घनश्यामपुर चल अइली। सांझ में सियावर जी ट्रैक्टर से बास आ खरही गिरा देलन।अइ बीच में पर्याप्त चंदा भी जमा भे गेल। खूब सुंदर यज्ञ मंडप बन के तैयार भ गेल।तीन फरवरी के सांझ में शांति कुंज हरिद्वार से संगीत मंडली पहूच गेल। चार फरवरी के सुबह में मुख्य यजमान कपल साह आ हुनकर धर्म पत्नी के नेतृत्व में यज्ञ के लेल एक सय एक कुंवारी कन्या के साथ मंगल कलश यात्रा निकलल। लाउड स्पीकर से ऊ भूर्भुवः स्व के उद्घोस होइत रहे।बगल के धौंस नदी के जल से घड़ा भरल गेल। नदी के किनारे के सुंदर दृश्य देखे लायक रहे। भक्त सभ कैमरा से फोटो खींचै आ खींचाबे लागल। मंगल कलश यात्रा यज्ञ मंडप तक आके समाप्त भे गेल। प्रसाद लेके लोग सभ अपन अपन घर चल गेल। पांच फरवरी के सुबह से लाउडस्पीकर से भक्ति गीत बजे लागल।पूरा वातावरन भक्तिमय हो गेल।यज्ञ देखे आ करे लेल भक्तन के भीड़ बढ गेल। गायत्री परिवार के परिव्राजक राम विलास ठाकुर के पौरिहित्य में पंचकुंडीय महायज्ञ शुरू भेल।बारी बारी से समूह में भक्तसभ आहुति देबे लागल। यज्ञ मंडप के भक्त सभ परिक्रमा करै लागल। आश्चर्य त तब लागल जब सियानानी संस्कृत कैंपस के गुरु जी सभ हाथ जोड़ के यज्ञ मंडप के परिक्रमा करै लगनन।जे यज्ञ के विरोधी रहैत। कुछ चिन्हा परिचय के लोग सभ गुरु जी के कहलकै कि गुरूजी अंहा सभ त सोलकन के यज्ञ कहि के महनजी से यज्ञ मंडप लेल बांस आ खरही के लेल मना कै देले रहलिये कि गायत्री यज्ञ करे के सोलकन अधिकारी नै हैय।त अंहा सभ सोलकन यज्ञ में परिक्रमा कैला करे अइली हैय। गुरु जी कहलन-हं।हम सभ विरोध जरुर कैली हैय।परंच आबि गायत्री महायज्ञ शुरू हो गेलैय। गायत्री माता के आह्वान हो गेलैय। गायत्री माता के जौ पदार्पन हो गेलैय त हम सभ विरोध नै कर सकै छी। विरोध कै के हम सभ राक्षस नै बन सकै छी।अब त हम सभ भी पूर्नाहुति क के ही जायब।सभ लोग उत्तर सुनके खुश हो गेल। यज्ञ होइत रहे। आहुति कार्यक्रम के बाद सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार, नामांकरन संस्कार, पुंसवन संस्कार, विद्यारंभ संस्कार आदि संस्कार कैल गेल।बाद में पूर्नाहुति भेल। बहुत भक्त दीक्षा ले लेलन। प्रसाद बंटायल। भंडारा भेल। संध्या में हरिद्वार से आयल संगीत मंडली भक्ति संगीत आ युग संगीत प्रस्तुत कैलक। लोग सभ गायत्री महायज्ञ में भाग लेके गायत्री परिवार से जुड़ गेल। भाई साहब ठाकुर जी के प्रयास से वोइ यज्ञ स्थल पर कपल बाबू के सहयोग से पक्का पंचकुंडीय यज्ञशाला बन के तैयार हए ।आबि हर पूर्निमा के भक्त सभ गायत्री यज्ञ करैत हए। हर साल वसंत पंचमी के गायत्री महायज्ञ होइत हए। आइ गायत्री परिवार के बड भाई रामबिलास ठाकुर जी बड़ा याद आवै हए। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा ४ हरबाह भजन अप्पन सिमरा गांव के ठोस गिरहस शेखर प्रताप के हरबाह रहे।हर साल सिरि पचैय के अप्पन मालिक के हर खड़ा क के साल भर के लेल बंधुआ हरबाह बन जाय। बोइन में पांच सेर अनाज मिलैय।अनाज में धान त कहियो गहूंम,त कहियो मरुआ,त कहियो मकैइ,त कहियो अलुआ मिले।वोकर घरोवाली मजदूरिन के काम करे। खास के धनरोपनी,कमौटी आ कटौनी। और समय में अपन घर के काम करे। भजन गिरहस के हरबाही करैत आबि अधबैस भे गेल।परंच दमा के कारण बुढ जका भे गेल।भजन के एगो बेटा हैय मनोहर।जे आबि इक्कीस साल के हए।मनोहर अपना गांव के स्कूल से आठवां पास हए।आबि वो चाहै हैय कि दिल्ली जा के कमाई।गांव के वोकर उमर के मोहन,पदारथ आ बदरी कमाय के लेल दिल्ली जा रहल हए। सभ सिरी पंचैय के दिल्ली जाय के प्लान बनैले हए । सिरी पंचैय के एक दिन पहिले सांझ मेंं भजन गिरहस शेखर प्रताप के इहां गेल आ कहलक-मालिक।मनोहर कालि अपना संगी सभ के संगे दिल्ली कमाय जाइत चाहैय हए। मनोहर के भाड़ा-खरचा के लेल हमरा एक हजार रूपया दूं।जैयसे मनोहर दिल्ली जाइ सकै।हम इ रुपया जल्दीये सधा देव।हम त अंहा के हरबाही करबे करै छी। शेखर प्रताप बिगड़ैत कहलन-तोरा मनोहर के दिल्ली कमाय लेल भाड़ा खरचा के लेल रुपया चाही। आ हमर इंहा हरबाही के करतै।तू आबि दमा के कारण हरबाही में न सकै छे।आबि तोहर बेटा मनोहरा हरबाही करतौउ।कालि सिरी पचैय हैय।कालि तोरा बदले मनोहरे हर उठैतेउ।मनोहरा दिल्ली न जतौउ।करजा लेले से आइ तक न सधलौउ हए। भजन गिरगिराइत बोलल- मालिक। मनोहर के कमाय जाय दिल्ली जाय दिऔ।सभ करजा हम सधा देव।तेज प्रताप बोलल-तोहर बाप करजा लेके हरबाही करैत न सधा पैलक।तू अपना बाप के आ अपन करजा न सधा पैलै।आ तू आब बेटा के लैल करजा लेबे। अपने त अब काज में सकै छे न।आब तोरा बेटा के कालि हर खड़ा करे के परतौउ। भजन आ तेज प्रताप में बात होइत मनोहर आ वोकर संगी सभ सुनलक।जे तेज प्रताप के इहां देखे अपन संगी सभ के संगे अपन बाबू के बुलावे आयल रहे।वोकरा सभ के दिल्ली जाय के लेल तैयारी करे के रहे। मनोहर के एगो संगी बदरी कुछ ज्यादा होशगर आ निडर लैइका रहे। घर से थोडा मजबूत भी रहे।वोकर बाबू अर्द्ध सरकारी हाई स्कूल के चपरासी रहे। बदरी कहलक-चला घरे भजन काका। मनोहर के दिल्ली जाय के भाड़ा खरचा हम देबैइ।इ तेज प्रताप बाबू कैला मनोहर के दिल्ली जाय देतौ।हिनका त बंधुआ मजदूर चाही।जे साल भर पांच सेर अनाज पर हरबाही करैत रहे।इ मिथिला में जमींदार के परथा कि सिरी पंचैय के जे मजदूर हर खड़ा करतै ,उ हरबाह बन के साल भर मालिक खेत जोत तैइ।उ बीच में हरबाही न छोड़ सकै छैय।इ एगो परंपरा बना देले हैय।आबि इ बंधुआ मजदूर बनाबे के प्रथा बन गेल हए।इ दास प्रथा हए । अइ दास प्रथा के चलते आइ तक कोनो मजदूर के करजा न सध ले हए।आबि अइ चंगुल में मनोहर न फंसतैय। मनोहर हरबाह न बनतैय। मनोहर भी कहलक हम हरबाह न बनबैय।भजन आ मनोहर सभ संगी के संगे अपना घरे चल आयल।तेज प्रताप मूंह तकैत रह गेल। सिरी पंचैय के मनोहर सभ संगी के साथ दिल्ली चल गेल। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक आचार्य रामानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा ५ झापन विनिता हंसमुख आ बातूनी लैइकी रहे।वो दू बहिनी रहे। विनिता बड़ आ शमिता छोट रहे।एगो भाइ मोहन रहे।जे विनिता से छोट रहे। पनरह बरख के विनिता जौं नवमा में पढैत रहे तब विनिता के बाबू शिव प्रसाद वोकर बिआह संवलपुर के विधुर जयकांत से कै देलथिन।जयकांत ग्राम सेवक रहे।हुनका एकटा बेटी आ एकटा बेटा रहे। बेटा बहुत बहुत बाद में भेल रहे। बेटी त विनिता के उमर के रहे। बेटी सुजाता के बिआहो भे गेल रहे। बेटा मोहन पांच बरस के रहे त जयकांत के पत्नी के अकस्मात मृत्यु भे गेल रहे। विनिता अब हंसमुख आ बातूनी नै रह गेल।वो आबि गंभीर आ मितभाषी बन गेल।आबि त वो तीनटा लैइकी आ एकटा लैइका के माय बन गेल।एतबे न वो सास भी बन गेल।एगो लैइकी के बिआह के बाद पारिवारिकता आ सामाजिकता के निर्वाह त करिहे के पडैय छैय।भले वो उमर आ अनुभव में परिपक्व भले न होय। दू बरख बीत गेल। अचानक जयकांत के मृत्यु भ गेल। विनिता विधवा भे गेल।हाथ के चुड़ी टूट गेल।मांग के सेनुर धो आ गेल।उजरि सारी पहने के भेल। चेहरा उजरि आ सपाट भे गेल।कनैत कनैत आंखि के गढ़ा कारी हो गेल।पेटकोनीय पलंगरी पर परल रहे लागल। बहुत कर कुटुंब सभ समझैलक। बाबू माय समझैलक। मृत्यु केकरो हाथ में न हैय।बिधना के जे लिखल हैय।वोहे होय छैय।अपना लिखल के बिधना न मिटा सकै छैय।आबि त अहिना जीबै पड़तैय।आबि बाल बच्चा के देखे के पड़तौअ। विनिता के आंसू सुख गेल। सामाजिक आ पारिवारिक काज मे लागि गेल।गम आबि काज में धीरे धीरे गुम होय लागल।आबि कभी कभी कोनो बात पर हंसे भी लागल।उन्नीस बरख के औरत आबि अपन रूप निखारे लागल। कभी कभी अपन बिआह बाला सारी आ गहना भी पेन्हे लागल। आंखि में काजर भी लगा लेबे। परंच परिवार के लोग कुछ न कहे। बल्कि सांत्वना दैत आह भी भरे कि भरल जवानी में बेचारी बिधवा भे गेल।घाव भी समय पर भरि जाय छैय।इ त जवान हए। धीरे धीरे विनिता आबि अपन देयाद में के देवर मनिकांत में रूचि लेबे लागल। हालांकि मनिकांत भी बाल बच्चेदार रहे।परंच विधवा भाभी के मन लगाबे के लेल वोहो मजाक करे लागल। धीरे धीरे इ मजाक आबि शारीरिक छेड़छाड़ तक पहुंच गेल। जौं इ देबर भाभी के हंसी मजाक होय लागे त परिवार के लोग वोइ जगह से हट जाय। कि देवर भाभी के हंसी मजाक आ गपशप में बाधा न होय। परिवार के इ डर होय कि एतबा छूट न देबै त विनिता के मन कोनो दोसर युवक के संग लग सकै हए। कारन कि विनिता अभी जवानी से गुजर रहल हए ।जवानी के समय बीत गेला पर सभ ठीक हो जतैय। जवानी के आगि त विधवा के राखि से झपल रहै छैय। कोनो जवान पुरुष के प्रेम हवा से वो आगि प्रज्वलित होय जाय छैय।जवान विधवा के पैर घर से बाहर निकल सकै हैय।त वोइ से सामाजिक इज्जत पर आंच आबै छैय।तैइला घर में कुछ छूट देल जाय छैय। कारण कि कुलिन वर्ग में विधवा के बिआह करे पर सामाजिक रोक हए। विनिता आ मनिकांत के इ छूट शारीरिक संबंध बनाबे के लेल सहायक बनल।आबि त दूनू के शारीरिक सम्बन्ध के चर्चा घर में होय लागल।परंच घर के बड़ बुजुर्ग के कहल रहे के जै परिस्थिति में विनिता हैय ।अइ स्थिति में झापन देना आवश्यक हए।इ कुल आ परिवार के इज्जत बचाबे के लेल जरूरी हए। विनिता आइ साठ बरख में मोहन के धिया पुता के बुढ़िया दादी बन गेल हए।आइ वो पारिवारिक आ सामाजिक इज्ज़तदार महिला मानल जाइ हए।" -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- समानान्तर रेख कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा समानांतर रेख राघवेंद्र प्रताप सिंह जमींदारक वारिस तैं छोट पैघ सभ मालिक के नाम सs बजबैत। जमींदारी ख़तम भेला के बादो हजार बीघा के चास.....टुटलो हथिसार तैयो नौ घरक साङ्गह। हुनकर पूर्वज के शिकारक सौख तकर प्रमाण देवाल पर नाना प्रकारक बन्दूक टाँगल। राघवेंद्र के पुरान ऐतिहासिक वस्तु संग्रह के सौख से एक कोठली म्यूजियम जकाँ ऐतिहासिक वस्तु सभ सँ सुसज्जित। हँ ! एतs जनतब दs दी जे राघवेंद्र हमर सहपाठी तैं हम गामक आन लोक जँका मालिक नहिं कहि, राघवेंद्र कहैत छियै। गाम गेल रही तs घुमैत-घुमैत ओकरो ओतs गेलहुँ। ओ देखाबs लागल अपन ऐतिहासिक संग्रह ...... बतबैत गेल ओकर इतिहास ......प्राचीनता.....महत्त्व.....कोना आ कतs स प्राप्त केलक इत्यादि-इत्यादि। एहि क्रम मे हुलसित आ गौरवान्वित भs कs देखेलक राणा सांगा के कटार जे हालहि मे नीलामी मे खरीदने छल.....दस लाख मे! तखने नोकरनी चाय टेबल पर राखि एक कात मे ठाढ़ भs गेलै। "जो तों .... एतs ठाढ़ कियैक छैं? घरक काज देखही गs।" "माsssलिक ........!" "की छियौ .......?" "मालिक ...... बुधनी बाप के आई हपता दिन सs बोखार नै छोड़ै है ...... कोनो डाकदर सs देखबितियै......।" " तs देखबही गs .... हम पैर बन्हने छियौ?" " माsssलिक ......पाँच सय ......sss!" " एक्को पाई के नाम नै ले तों.....एखनो तोरा पर दस हजार सs ऊपरे बकाया हैत! चुकायल पार लगैत नहिं छैन आ बात-बात पर पाईये चाहियैन!" सभक मनोदशा तत्क्षण बदलि गेल छलै। निःशब्द हम चाय सुड़कैत रहलौं। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१६.आचार्य रामानंद मंडल- राजनीति आ अपराध आचार्य रामानंद मंडल राजनीति आ अपराध माया देबी एगो दबंग नारी रहे।इ दबंगई वोकरा मे छोट मोट झगरा मे बलुआरी से आयल।देखहु में भारीभरकम रहे।मोट कद काठी के रहे।मरदाबा लेखा बोल चाल भी रहे। जहां देखु वोकरा कोनो न बात मे जोर जोर से बोलैत रहे।चाहे वो सरकारी रासन के दोकान हो वा सरकारी इस्कूल।रासन के दोकानदार के घटतौली आ फरजी रासनकार्ड पर नजर रखे।अइ बदला में दोकानदार वोकरा मंगनी में चामल-गहुम दे देबे।तहिना इस्कूल मे के मध्यान्ह भोजन के रूप मे गहुम बंटवारा के घटतौली आ छात्र के संख्या पर नजर रखे।तैय डर से हेडमास्टर भी गहूम दे देबे। पहिले आइ लेखा इस्कूल में मध्याह्न भोजन न बने। माया देवी पंचायत के राजनीति में भी भाग लेबे।परंच कहियो वार्ड मेम्बर भी न बन पायल। पंचायत के लोग सभ के सहायता के बहन्ने प्रखंड मुख्यालय भी जाय लागल। छूट भैया नेता के सम्पर्क में अयला के बाद जिला के राजनीति से भी जुड़ गेल। नेता सभ के हवस के शिकार भेल।बाद में नेता सभ के हबस पूरा करे में भी सहायक बनल।माने कि लरकी सभ के भी सप्लाई करे लागल।इहां तक कि अपन संबंधी लरकी सभ के भी फुसला के कमाई आ सरकारी नौकरी मिले के बहन्ने नेतवन सभ के हबस के लेल भेजे लागल। कोई कोई लोग त कहे कि माया देबी केते गरीब आ असहाय के बेटी के बेच देलक। केते लरकी त लौट के अपन घर कहियो न आयल। अइ सभ काम के लेल माया देवी अपन गांव में न रह के पुपरी शहर में भाड़ा पर डेरा लेके रहे लागल। आ सफेदपोश बनके वेश्यावृत्ति कराबे लागल। अइ काम मे पुपरी से पटना तक दौड़ा करे। माया देवी कहे कि राजनीति में यौनशोषण आ सफेदपोश बेश्यावृति आवश्यक हो जाइ छै।अइ के बिना कोई काम न हो सकै छई।अइ मे चोली दामन के संबंध हए। नेताइन पर त नेता के गिद्ध दृष्टि रहै हए। केना न केना माया देवी के सम्पर्क अपराधी सभ से भी हो गेल।लूट पाट के बंदरबांट में बेइमान साबित भेल आ गोली से मारल गेल।कहल गेल हए न गलतो काम मे इमानदारी आवश्यक होइ छई। राजनीति आ अपराध माया देवी नेताइन के प्रान लेलकै। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१७.जगदानन्द झा 'मनु'- अनमोल झा जीक पोथी 'टेकनोलजी'क समीक्षा जगदानन्द झा 'मनु' अनमोल झा जीक पोथी "टेकनोलजी"क समीक्षा मिथिला संस्कृतिक परिषद, कोलकत्ता द्वारा प्रकाशित श्री अनमोल झा जीक लघुकथा संग्रह "टेकनोलजी" एखन हमरा हाथेमे अछि। पाँछाक तीन दिनसँ लगातार एकरा पढ़ि रहल छी। सुन्नर कवर पेंजसँ सजल तेहने भीतरक कथा सभ एकसँ एक उपरा उपरी। सबसँ पहिने अनमोल जीकेँ एहि --- कथा संग्रह हेतु बहुत बहुत बधाइ आ संगे संग मंगल कामना जे मैथिली साहित्यमे दिनो दिन ओ शुक्ल पक्षक चाँन जकाँ उदयमान होइत रहथि। पोथीक समीक्षा केनाइ हमरा लेल ई कठिन काज आ ओहूसँ बेसी कष्टकर छल बिना कोनो पक्ष बिपक्षमे गेने तटस्थ एहि पुस्तककेँ समीक्षा केनाइ। हमरामे कौशल आ शहास दुनूक अभाब मुदा माँ सरोस्वती आ गुरुदेवकेँ सुमिरैत अपन आँखिकेँ पोथीक पन्नापर आ कलमकेँ कागदपर चलबए लगलहुँ। अनमोल जीक समर्पण देख मोन गदगद भए गेल। जतए आजुक नव पीढ़ी अपन माए बाबूकेँ बोझ बुझि रहल अछि ओहिठाम अनमोल जीक ई पोथी हुनक पूज्य बाबूजीक श्रीचरण कमलमे समर्पित अछि। नवका पीढ़ी लेल ई एकटा नव रस्ता काएम करत। आगू पोथी पढ़ैसँ पहिने एकटा बात मोनकेँ कचोटलक, जे अनमोल जीक एहिसँ पहिने दूटा बीहनि कथा संग्रह प्रकाशित भए चुकल अछि। हुनक नाम मैथिली साहित्यमे एकटा स्थापित बीहनि कथाकारकेँ रूपमें लेल जा रहल अछि तकर बादो ओ अपन एहि नव बीहनि कथा संग्रहकेँ, बीहनि कथा संग्रह नहि कहि लघु कथा संग्रह कहि रहल छथि। जखन की आइ बीहनि कथा एकटा स्थापित विधाकेँ रूपमे मैथिली साहित्यमे स्थापित भए चुकल अछि। बीहनि कथा आब कोनो तरहक परिचय लेल मोहताज नहि अछि। दुनियाँक बड़का-बड़का भाषा एहि दिस सोचै लेल बिबस अछि। अंग्रेजी एकरा "सीड स्टोरी" कहि सम्बोधित केलक। हिंदी अंग्रेजीमे जकर कोनो स्थान नहि ओहेन एकटा नव बिधाक अग्रज मैथिली साहित्य आ ओ बिधा, "बीहनि कथा"। बीहनि कथा आ लघु कथामे बहुत फराक अछि। बीहनि अर्थात बिया। बिया वटवृक्षकेँ सेहो भऽ सकैए आ सागक सेहो। तेनाहिते मोनक बिचारक बिया जे कोनो आकारमे फूटि सकैए, बीहनि कथा। बीहनि, बिया, सीडमे सँ केहन गाछ फुट्टै कोनो आकारक सीमा नहि। लघु कथा मने एकटा छोट कथा जेकर आरम्भ आ अन्त दुनू छैक। अनमोल झा जीक एहि संग्रहक एक एकटा कथा जबरदस्त बीहनि कथा अछि। तहन लघु कथाक जामा किएक ? हाँ, किछु गोट लघु कथाक श्रेणीक कथा सेहो अछि मुदा अल्प मात्रामे, जेना पृष्ट संख्या ७६ पर "बढ़ैत चलू", ७९ पर "समाज", ८० पर "मर्माहत", ८२ पर "सपूत सब", ८३ पर "शोध", ८५ पर "प्रायश्चित", ९० पर "बड़का लोक", ९५ पर "समय समय केर बात" आ पृष्ट संख्या १०१ पर "अप्पन जकाँ"। पृष्ट संख्या ८८ पर "मिथिला राज्यक" तँ नहि बीहनि कथा अछि आ नहि लघु कथा, एहिपर जँ कनीक आओर मेहनत कएल गेल रहथि तँ एकटा नीक आलेख अवश्य भए सकैत छल। प्रकाशक, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकत्ता केर मन्त्री श्री गंगाधर झाजी अपन प्रकाशकीयमे "लघु कथा"केँ एकटा नवीन विधा कहि सम्बोधित कए रहल छथि, एहिठाम जँ ओ बीहनि कथा कहितथि तँ साइद उचितो रहितए मुदा लघु कथा आ नवीन विधा हास्यपद। हम एहि कथा संग्रहक कथाकेँ आँगाक उल्लेखमे बीहनि कथा कहि सम्बोधित करब। "टेकनोलजी" बीहनि कथा संग्रह रूपी मालामे कुल १५५ गोट कथा गाँथल गेल अछि। संग्रहक पहिले बीहनि कथा "टेकनोलजी" एकरे नामपर संग्रहक नामकरण भेल अछि। अनुपम बीहनि कथा, बीहनि कथाक सभटा गुण कुटि-कुटि कए भरल अछि। जतेक प्रसंशा करी कम। ऐ बीहनिमे, कोना एकटा परदेशीया पुतहु अपन ससुरकेँ मात्र एहि द्वारे पाइ पठाबैक इक्षा रखैत छथि, जाहिसँ समाजमे हुनक नाम होइन। ऐ द्वारे ओ नव टेकनोलजी बैंकिंगकेँ छोरि मनीआडर द्वारा पाइ पठबै छथि। "टेकनोलजी" नाम धरी ई बीहनि कथा संग्रह नामक भ्रम उत्पन्य कए रहल अछि। पहिल नजरिमे टेकनोलजी नामसँ एना बुझा रहल अछि जे विज्ञान, टेकनोलजी आदिसँ सम्बंधित विषय बस्तु होएत मुदा एहन कोनो गप्प नहि। समस्त पोथीमे एकसँ एक नीक, रुचिगर बीहनि कथा अछि मुदा टेकनोलजी, विज्ञान, तकनीकीसँ सम्बंधित एकौटा नहि। बीहनि कथाक मुख्य अंग संबाद अछि आ अनमोल जीक विहनि कथा संबादसँ डूबल अछि, जबरदस्त ! मुदा संबाद "--------" इनवरटेड कोमामे बन्द कए कऽ नहि लिखल अछि, एकर अभाब सम्पूर्ण पोथीमे अछि। दोसर कमी जे हमरा सम्पूर्ण पोथीमे, कथासँ प्रकाशकीय तक लागल, विभक्ति। विभक्ति अप्पन पहिलुका आखरसँ हटा कए लिखल अछि जाहि कारण कतौ कतौ अर्थकेँ फरिछौंतमे असमंजसकेँ स्थिति उत्पन्न भऽ रहल अछि। पृष्ट १३ पर लिखल बीहनि कथा "टेकनोलजी" आ २७ पर लिखल "लोक बुझाउन" दुनू एक्के सन कथा थिक मात्र नामेटा बदलल अछि। एहि संग्रहमे कोनो एहन पक्ष नहि जाहिपर अनमोल जीक कलम नहि चलल होइन। मनक भावसँ समाजकेँ बिडम्बना धरि, अन्तरंग सम्बन्धसँ हँसी ठठा धरि सभ पक्षक उचित स्थान देल गेल अछि। पृष्ट ३३ पर "ड्यूटी", ३८ पर "चिन्ता (एक)", ३९ पर "बेटा बेटी", ४३ पर "दुख", ४५ पर "खोराकी", ४६ पर "गोहारि", ५८ पर "भीख", ६० पर "मोनमे", ९८ पर "अन्हरजाली", १०१ पर "अप्पन जकाँ", १०३ पर "मनुक्ख के कुकुर के", मनकेँ छुबैत करेजाकेँ मोम जकाँ गला कए आँखिक रस्तासँ बाहर अबैपर मजबूर कए कऽ मोनक कोनो कोनामे एकटा टीस छोरि दै छैक। ओतए पृष्ट संख्या ३२ पर "एकदम ठीक" आ ३७ पर "टास्क" समाजक कुप्रथाकेँ देखार कए रहल अछि। पृष्ट ३४ पर "सुरक्षित (एक)", ४० पर "मन्त्र", ७७ पर "आन्हर", आ ८७ पर "व्यवस्था", आजुक राजनीति आ व्यवस्थापर प्रहार करैत उत्तम बीहनि कथा अछि। तँ दोसर दिस पृष्ट ३५ पर "जागरण", ४२ पर "चेतना(एक)", ४६ पर "विज्ञान", आजुक जागरूक लोकक सत्य बीहनि थिक। बाल मोनकेँ कागदपर उतारैत अनमोल जी एहि पोथीक पृष्ट ६५ पर "प्रश्न (दू)", आ ६९ पर "चिन्तित", वास्तबमे मोनकेँ चिन्तामे झोँकैक लेल प्रयाप्त अछि। ओतए ६३ पर "उत्तर" आ ७१ पर "भरम"केँ सवाल जबाव एहन अछि जेना शेरपर सबा शेर। सम्बन्धकेँ उजागर करैत पृष्ट ४८ पर "बुद्धू", ६७ पर "महक", आ ८१ पर "श्रधा" अछि तँ ३६ पर "सअख" आ ६० पर लिखल "युद्ध" पढ़ि हँसीसँ मुँह मुनेबे नहि करत। कनीक साहित्यक पक्षकेँ छोरिदि तँ कुल मिला कऽ नीक बीहनि कथा संग्रह। पाठकक मोनमे शिक्षा संगे संग जिज्ञासा आ रूचि जगबैमे पूर्ण सफल। एक बेर किनको हाथमे ई पोथी आइब गेल तँ बिना पूरा पढ़ने चेन नहि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- नव-बसात ३.१.राज किशोर मिश्र- नव-बसात राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी नव - बसा त
नव -बसा त के बहए दि औ, आब, आबए नव -स्पंदन, सड़ल, गन्हा इत जे अछि प्रवा त , कि ए, करि ऐ ओकरो वंदन?
जेतै आब, उत्सा हही न, था कल, ठेहि आएल बसा त, ऊर्जा चा ही , ऊर्जि त हुला स, आ, धुंध-मुक्त चा ही परा त।
नि रो ग हवा के बा ट छेकि , कि ए बैसल कि ओ बुधि आर? दुषि त वा यु सँ मो ह कि ए? जे करए जि नगी पर, वा र।
बहए दि औ, टटका बसा त, उत्सा ह, उमंग भरल छै , ता कि रहल छी को न प्रा ण? जे वा यु, वि वर्ण पड़ल छै।
सूँघि -सूँघि बा न्हल हवा सँ बढ़ि गेल तन मे व्या धि , बेमा र बसा त के जा ए दि औ, करबै की ओकरा , सा धि ?
नव -स्पंदन सँ, डरा जा ए, आ भा गि जा ए सनकल अन्हा र, छम -छम नचैत आबए परा त, जी तक' लगैक पा वनि -ति हा र।
आबए दि औक नव-मौ सम के, शि शि र भेल बूढ़, अओतए मधुमा स, नव -नव चिं तन, नव जी वन -पथ, टूटए ने,नवल-पुरा तन-समा स।
कतेक पुरा न गि रह सभ के, खो लत, ई नव -युग के बसा त, टटका वि चा र लए सि हकत, आ दला ने -दला न, घूमत प्रवा त।
गेलहे गी त कतेक गा एब? लगा उ आब, नव -सुर के सा ज, तूलि का मे नऽव रंग हो , का ज क' बा त क' उठए अबा ज।
नव -नव वि षय, नूतन चि न्तन, गप हो उत्था नक' कि एक पतन?
हम छी तटस्थ, अरि आतए लेल अएलहुँ अछि ,नवल -बसा त के, बि तलै रा ति , स्वा गत करि औ आब, आबए बला परा त के।
व्यर्थ बा त के धेने छी , नि रर्थक अंधवि श्वा स, बेका जक भेल रेबा ज जे, हम कि एक बनल छी दा स?
जे, सुन्दर , स्वस्थ परंपरा , ओकरा बना उ, सि र -पा ग, मुदा , कि एक उघने चली , जे री ति बनल अछि दा ग?
व्यर्थ, कुतर्क, घमरथन मे, की ला भ? गमा ओल जा ए समय, फरि छा सकैछ, जुआएल फसा द, हो नव -चिं तन मे, मेलक 'लय।
जे री ति , नि रर्थक घि घरी कटैछ, ओ, समय -संग असंगत अछि , कि ए, मो टरी ऊघी ,बेमतलब? ई प्रगति शी ल लो कक'मत अछि ।
आनलक समी र संग मे हुला स, नहि मो न ककरो , छै खनहन, बंधन खो लि उन्मुक्त भेल, अछि ना चि रहल, वा ता वरण।
बहकए नहि ओ, नूतन बसा त, सि हकय , त' झूमए गा छ -पा त, स्पर्श सुखद, अनुभव सब के, टूटए आलस, ला गए परा त।
मुदा , सतर्क त' रहए पड़त , ई वा त, कहुँ ने बनए उद्दण्ड, चि न्हतो ने छि ऐ, कहुँ वि ड़रो बनि , देब ' ने ला गै , दण्ड।
ई अबढङ नबका प्रवा त, ओ पी बए, सुसंस्का रक 'घृत, अपन संस्कृति क साँ स पर, रहए पड़तैक ओकरो आश्रि त।
छुच्छे नवका बसा त त' ओ आओत बनि क' अनचि न्हा र, जे सभ ल'क' , चलल संग मे, वएह आ ओहने हेतै वि चा र।
मुदा , धरो हरि मे पहि ने सँ, रा खल जे,सुंदर संस्का र , जँ नहि अपना ओत ओहि के ओ, लो क को ना करतै स्वी का र?
बनए बवंडर आगू चलि , जँ नव्य पवन भ' उच्छृंखल, नहि रो कू, ओकरा जा ए दि औ, करतै,तै छुच्छे नूतन, की भल?
नवका बि हा रि , की हो पुरना , दुहू त', एकहि बा त भेलै, उधि एबे करब, एना की ओना , वि ना शे के त' बरि सा त भेलै।
अलसा एल, ओझरा एल प्रवा त, पेटका न्ह लधने अछि पड़ल , नवल अनि ल स्पर्शन सँ, असमञ्जस मे ओ , अछि अवि रल।
सा मञ्जस्य नव -पुरा न के हो , सो झरा उ बा त, महो दय! समा यो जन, ने कि प्रति क्रि या , एक -दो सरक त्रुटि के धो दए।
संस्कृति सभक गठबंधन हो , नव्य आओर पुरा न, खौं झा इ नहि एक दो सर पर, आ, हो इ मेल -मि ला न।
स्वच्छन्दता , ई अछि बन्हा एल, सदैव, उत्तरदा यि त्व संग, वि चा रक नूतनता के मतलब, हो इ नहि छै, रभसल उमंग।
के छूटल अछि परि वर्त्तन सँ? कहु, एहि नश्वर संसा र मे, मुदा , केहेन दि शा छै, बुझना जा इत अछि जगत् -व्यवहा र मे।मे
करि औन्ह स्वा गत, नवका के, देथि पुरा तन आशी र्वा द, हि लि -मि लि , आगू बढ़ैत चली , कि एक हेतैक, को नो वि वा द?
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.संस्कृत खण्ड ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (सप्तमोच्छवासः) ४.१.डा. दीपिका- चम्पूसाहित्ययशो विलासः (सप्तमोच्छवासः) चम्पूसाहित्ययशो विलासः (सप्तमोच्छवासः) डा. दीपिका (स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च) [चम्पूसाहित्यवाग्विलासस्य सप्तमेऽह्नि भवतां भवतीनां च समेषां हार्दं स्वागतं व्याहृत्य अद्यतनीयविषयवस्तुमादायात्र प्रस्तुताऽस्मि। अद्य ग्रन्थपरिचयानन्तरं महाकविभोजराजकृतचम्पूरामायणविषयवस्तुविवरणं ग्रन्थानुगुणं विदुषां तत्र भवतां भवतीनाञ्चामोदप्रमोदाय किञ्चित्प्रस्तौमि।] यथा पूर्वस्मिन् उच्छ्वासे निगदितम् आसीत् ग्रन्थस्य विभागाः एवम् अस्ति। अस्य ग्रन्थस्य विषयवस्तु रामायणीकथा सदृशी एव वर्तते तदेव कारणं यत् टीकाकारः स्पष्टतया एतस्य व्याख्यानस्य विषये न्यक्करोति। 1. बालकाण्डम् 2. अयोध्याकाण्डम् 3. अरण्यकाण्डम् 4. किष्किन्धाकाण्डम् 5. सुन्दरकाण्डम् 6. युद्धकाण्डम् ग्रन्थे आदिकविवाल्मीकिगुणकीर्तनं दरीदृश्यते- वाल्मीकिगीतरघुपुंगवकीर्तिलेशै स्तृप्तिं करोमिकथमप्यधुना बुधानाम् गंगाजलैर्भुवि भगीरथयत्नलब्धैः किं तर्पणं न विदधाति नरः पितॄणाम् अनेन श्लोकद्वारा भगीरथस्योपमां प्रस्तौति। एवमेव नारदवचनविषये अपि ग्रन्थकारः विमर्शं प्रस्तौति यथाहि- वाचं निशम्य भगवान् स तु नारदस्य प्राचेतसः प्रवचसां प्रथमः कवीनाम् माध्यन्दिनाय नियमाय महर्षिसेव्यां पुण्यमवाप्य तमसां तमसां निहन्त्रीम्॥ एवमेव चम्पूरामायणस्य द्वितीये काण्डे अयोध्याकाण्डे राज्याभिषेकसज्जायाः वर्णनं विदधाति- "तदनन्तरमसौ संमन्त्र्य मन्त्रिभिः सह पौरवृद्धान्..........." एवमेव अरण्यकाण्डे रावणस्य स्थितिनिरूपणक्रमे यद्वर्णनमस्ति तत्तु अलंकारादिदृशा चम्पूरामायणस्य हृदयवद्वर्तते- विपिनमवजगाहे राक्षसानांकरोटी रसकृदसकृदाभिर्वाष्पमालोक्य शोचन्। कृतरुचिरिव वर्त्मन्यंकुशानां कुशानां पथिकचरणलाविन्यंकुरे न्यंकुरेषः। उपर्युक्तानि यानि उदाहरणानि अत्र प्रदत्तानि तानि दृग्दर्शनार्थमेव केवलम् । विस्तृतम् अध्ययनं तत्र चम्पूरामायणरसास्वादाय तत्र कर्तुं शक्यते इत्यलम्। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३६० म अंक १५ दिसम्बर २०२२ (वर्ष १५ मास १८० अंक ३६०)|| 151 152 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA
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