ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६१ म अंक ०१ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६१) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 361 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३६०पर टिप्पणी २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१-३ (गजेन्द्र ठाकुर) २.२.आचार्य रामानंद मंडल- रनिया भिखारीन २.३.आचार्य रामानंद मंडल- वारिस २.४.महाकान्त प्रसाद- रिपोर्ट २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी 'लव यू टू' २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- बुलन्दी २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास छअम पड़ाव) २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १८म खेप २.९.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १२) २.१०.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.११.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१२.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१३.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१४.नन्द विलास रायक १ टा एकांकी- जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- अपन-अपन संसार २.१६.वृषेश चन्द्र लाल- कथा- डीप डिप्रेशन २.१७. प्रेमशंकर झा- लघुकथा- नाकक नकलोल ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- सुखाएल पोखरि ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- एकटा विरहा- देहक सिंगार छी हमर ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- अभ्यास: सफलताक सीढ़ी ३.४.बद्रीनाथ राय- दूटा पद्य ३.५.कल्पना झा- छगुनता ३.६.आशीष अनचिन्हार- भक्ति गजल ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण 2
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३६०पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ मैथिलीक सात टा गएर लिटरेरी एसोसियेशनकेँ मान्यता दऽ कऽ साहित्य अकादेमी जे मूलधाराक मैथिलीक भुसाथरि बैसेबाक काज केलकै से आब सत्य भऽ रहल अछि। प्रेम मोहन मिश्रक परामर्शदातृ समितिमे विदेह द्वारा बैन कएल कथित चोर साहित्यकारक अतिरिक्त आर बहुतो तरहक भूप रहथि जे आब अशोक अविचलक परामर्शदातृ समितिमे छथि। ऐ तरहक लोक ब्लैकमेलक शिकार आरामसँ होइ छथि कारण अपन मेरिटसँ तँ ओ आबै नै छथि। फेर हुनका सेमीनार, अनुवाद, मोनोग्राफ आदि असाइनमेण्ट बाँटल जाइत अछि, जे अमरजीक अनुसार कियो पढ़ै नै छै, ओ सभ साहित्य अकादेमीक गोदाममे सड़ि जाइ छै। अइसँ दूटा पाइ होइ छै आ बायोडेटा भरिगर बनि जाइ छै, जे विद्यानन्द झा केर अनुसार, रचना तँ जे से, ओहेन भरिगर बायोडेटासँ सिद्धांत कएल जा सकैए। अशोक अविचल जी आ ई सातो गएर लिटेरेरी असोसियेशन एकटा नाम आगाँ अनलक अछि- डॉ. अजय कुमार झा। जेहने अशोक अविचल आ मूलधाराक आन साहित्यकार छथि, एन-मेन तकरे मिरर इमेज। मुदा मूलाधारा बला सभ कन्नारोहट उठेने अछि जे हिनका कियो चिन्हते नै छन्हि, ओ अशोक अविचलक भागिन छियथि तेँ। मुदा अनुवाद असाइनमेण्ट ओहो सभ जोगारेसँ लेने छथि, समानान्तर धाराक लेखक सभक हककेँ मारि कऽ, तँ सएह असाइनमेण्ट डॉ. अजय कुमार झा सेहो लेने छथि। अशोक अविचल छथि रहुआक आ डॉ. अजय कुमार झा उमरीक, तँ माम-भागिन होथि बा ममियौत-पिसयौत समानान्तर धारा लेल धनि सन। हम पहिनहिये कहने छी जे एहेन लोक मुदा ब्लैकमेलक शिकार भऽ जाइ छथि से डॉ. अजय कुमार झा केर ब्लैकमेलिंग शुरू भऽ गेल छन्हि, ओ सोशल मीडियामे मूलधाराक के-के लोक सभ हुनका गरियेलकनि, तकर लिस्ट बना कऽ ओकरासँ भेंट करब शुरू कऽ देने छथि आ जँ अगुलका खिस्सा पढ़ी तँ से एक तरहेँ ठीको छै, ओ सभ दूटा पाइ, पुरस्कार आ बायोडेटा लेल अपस्याँत रहता आ अहाँकेँ बकसि देता। एकटा राजकुमारी रहय, परी द्वीपक राजकुमारी, बड्ड काबिल, तीव्र बुइधवाली। एकटा दैत्य ओतुक्का परी सभकेँ बड्ड तंग करै। परी सभ राजकुमारी लग गेलि, रक्षा करू। राजकुमारी कहलनि- आब जे दैत्य आबय तँ हमरा खबरि करब। दैत्य आयल तँ राजकुमारी हुनकर सोझाँ आबि गेलि। दैत्य आन परीकेँ छोड़ि राजकुमारीक पाछाँ धऽ लेलक। राजकुमारी ओकरा द्वीपक दक्षिण भाग लऽ गेलि। चारू तरफ सोना, से देखि दैत्य राजकुमारीकेँ बिसरि सोना खोदऽ लागल। राजकुमारी घुरि एली। परी सभकेँ कहलनि- आब निश्चिन्त रहू, आब ओ दैत्य मरैत काल धरि सोना खोधैत रहत, अहाँ सभकेँ तंग नै करत। साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिपर एकटा नाटको लिखल गेल अछि, नाम छै धूर्त समागम। ई तेरहम शताब्दीमे लिखने रहथि ज्योतिरीश्वर, ८-९ सय साल बाद होइबला घटनाक आभास रहन्हि हुनका आ तेँ ने ओ छथि एत्तेक पैघ नाटककार! तँ पढ़ू ओइ नाटकक सारांश आ चिन्हू ओकर पात्र सभकेँ आ जँ चीन्हि ली तँ खबरि करू ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर (स्थान आ पात्रक नाममे ज्योतिरीश्वर लेखकीय स्वतंत्रता लेने छथि)। धूर्त्तसमागम: ई नाटक तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल जे संस्कृत आ मैथिलीमे उपलब्ध अछि। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक संस्कृत धूर्त्तसमागममे सेहो मैथिली गीतक समावेश अछि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि। मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्ण अथवा हुनकर वंशधरक चरितपर अवलंबित आ हरण आकि स्वयंवर कथापर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागमक सभ पात्र एकसँ एक धूर्त छथि। तइ हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि। प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइए तइ हेतु ऐमे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि। ऐमे सूत्रधार, नटी, स्नातक, विश्वनगर, मृतांगार, सुरतप्रिया, अनंगसेना, असज्जाति मिश्र, बंधुवंचक, मूलनाशक आ नागरिक मुख्य पात्र छथि। सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि। फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। ऐमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि जे नितांत आधुनिक अछि आ ऐमे जे लोच छै से एकरा लोकनाट्य बनबै छै। विश्वनगर स्त्रीक अभावमे ब्रह्मचारी छथि। शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटै छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइ छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लऽ गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइ छन्हि। गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्र लग जाइ छथि, मिश्रजी लंपट छथि जे जुआ खेलाएब आ संगम ईएह दूटाकेँ संसारक सार बुझै छथि। असज्जाति मिश्र पुछै छथि जे के वादी आ के प्रतिवादी? स्नातक उत्तर दै छथि- अभियोग कहबाक लेल हम वादी थिकौं आ शुल्क देबाक हेतु संन्यासी प्रतिवादी थिकाह। विश्वनगर अपन शुल्कमे स्नातकक गाजाक पोटरी प्रस्तुत करै छथि। विदूषक असज्जाति मिश्रक कानमे अनंगसेनाक यौनक प्रशंसा करैत अछि। असज्जाति मिश्र अनंगसेनाकेँ बीचमे राखि दुनूक बदला अपना पक्षमे निर्णय लैत अछि। एम्हर विदूषक अनंगसेनाक कानमे कहैत अछि- ई संन्यासी दरिद्र अछि, स्नातक आवारा अछि आ ई मिश्र मूर्ख तेँ हमरा संग रहू। अनंगसेना चारूक दिशि देखि बजैछ- ई तँ असले धूर्तसमागम भऽ गेल। विश्वनगर स्नातकक संग पुनः सुरतप्रियाक घर दिशि जाइ छथि। एमहर मूलनाशक नौआ अनंगसेनासँ साल भरिक कमैनी मंगैए। ओ हुनका असज्जाति मिश्रक लग पठबैत अछि। मूलनाशक असज्जाति मिश्रकेँ अनंगसेनाक वर बुझैत अछि। गाजा शुल्कमे लऽ असज्जाति मिश्रकेँ गतानि कऽ बान्हि तेना मालिश करैत अछि जे ओ बेहोश भऽ जाइ छथि। ओ हुनका मुइल बुझि कऽ भागि जाइत अछि। विदूषक अबैत अछि आ हुनकर बंधन खोलैत अछि आ पुछैत अछि जे हम अहाँक प्राणरक्षा कएल अछि आ जे किछु आन प्रिय कार्य हुअए तँ से कहू। असज्जाति कहैए जे छलसँ संपूर्ण देशकेँ खएलौं, धूर्त्तवृत्तिसँ ई प्रिया पाओल, सेहो अहाँ सन आज्ञाकारी शिष्य पओलक, ऐसँ प्रिय आब किछु नै अछि, तथापि सर्वत्र सुखशांति हुअए तकर कामना करैत छी। ओना ज्योतिरीश्वर सन हमहूँ अपन महिसबार ब्राह्मणक गाम कथामे ऐ निर्लज्जताक चर्चा केने छी- "कारण पुछबन्हि तँ ओ सभ कारण कहती जे ई सभ निर्लज्ज होइए आ से ऐ कारणसँ जे जन्मेपर एकरा सभक पाछू ...मे थूक दऽ देल जाइ छै, जइसँ कथूक लाज कोनो गत्रमे नै हेतै।" २ तीनटा द्रोण जइमे पहिल बेर एकटा महिला द्रोण साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग द्वारा तीनटा द्रोणाचार्यक नियुक्ति भेल एकलव्यक औंठा कटबाक लेल। तीनटा द्रोणमे विश्व इतिहासमे पहिल बेर एकटा महिला द्रोण सेहो नियुक्त भेली ऐ घृणित कार्य सम्पन्न करबाक लेल। ई तीनू गोटे तिहार जेलक जल्लाद सन अपन कार्य पूर्ण निष्ठासँ सम्पन्न केलनि। जल्लादक कोनो दोष नै, ओकरा तँ फाँसी देबा लेल पाइ दै छै सरकार। दोष अछि द्रोण सभक आ ओइ साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक जकरा नियुक्त करैत अछि सात टा कथित लिटेरेरी एसोशियेसन। अविलम्ब ऐ सातो लिटेरेरी एसोशियेसनक मान्यता रद्द कएल जाय आ अंग्रेजी सन, जइमे कोनो लिटेरेरी एसोशियेसन नै छै मुदा ओकर काज नीक जकाँ चलै छै, ई काज करय। आ अहाँकेँ इच्छा नै अछि जे ई द्रोण सभ के छथि आ एकलव्य के छथि? द्रोण- डॉ. देवकान्त झा, डॉ. मन्त्रेश्वर झा आ डॉ. शेफालिका वर्मा। एकलव्य- राजदेव मण्डल। द्रोण सभ कहता जे राजदेव मण्डलक पोथी तँ हुनका सभ लग एबे नै केलनि तँ ओ सभ दोखी केना? ई तीनू द्रोण डिसेण्ट नोट दऽ सकै छला, मना कऽ सकै छला। आ ई तीनू प्रतीक छथि सम्पूर्ण साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक तेँ। आर विस्तृत उत्तर देल जायत विदेहक आबैबला साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक मे। विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १. साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका (घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २. व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३. प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५. स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७. लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८. दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय।
-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ आब अहाँ पुछब जे तकर प्रतिकार समानान्तर धारा केना केलक, ओ तँ कन्नारोहट नै करैए, तँ तकर उत्तर अछि हमर ३ टा पोथी जे १११म सगर राति दीप जरय मे लोकार्पित भेल ३१ दिसम्बर २०२२ केँ, वएह सगर राति दीप जरय जकरा साहित्य अकादेमी गत दस बर्खसँ गीड़ि लेबाक प्रयास कऽ रहल अछि। अहाँसँ ऐ तीनू पोथीपर टिप्पणी ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। पहिल दू पोथी मे राजदेव मण्डल आ सुभाष चन्द्र यादवक साहित्यक समीक्षा अछि जे हमर तेसर पोथी मैथिली समीक्षशास्त्रक सिद्धांतक आधारपर कएल गेल अछि। तीनू पोथीक लिंक नीचाँ देल गेल अछि। Rajdeo Mandal- Maithili Writer (Now with Supplement I & II) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (मिथिलाक्षर) मैथिली समीक्षाशास्त्र मैथिली समीक्षाशास्त्र (तिरहुता) ४ Parallel Literature in Maithili and Videha Maithili Literature Movement नन्द विलास रायक चारिटा कथा आ एकटा एकांकीपर हमर टिप्पणी Four Short stories and One Act Play by Nand Vilas Roy The following four short stories and one One-Act Play have been adjudged as his best by the author Nand Vilas Roy. 1.Four Short Stories- A Doctor Son (Doctor Beta), The Wooden Cycle (Kathi Cycle), The Burden (Bhar), and Jeans Pant (Jeans Pant). 2.One-Act Play- The Honour (Pait) Welcome to the exciting world of parallel literature. Nand Vilas Roy explains the intricacies of the modern materialistic world in his short story 'A Doctor Son,' where the son is so busy minting money that he forgets to even call his ailing mother. The father, who spent everything to educate his son, has been not able to contact his son even telephonically. The daughter on the other hand fulfils her responsibility. In 'The Wooden Cycle' is the story of Jiyalal and his immense faith in education. Though one generation fails (actually his brother gets the benefit, but he becomes overage) to get the benefits yet he does not dither from his belief and finally succeeds. The Wooden Cycle is the symbol of his belief. In 'The Burden' he exposes the hypocrisy of his society which is his near and dear one vis-a-vis widows' re-marriage, yet he finds a way. In 'Jeans Pant' the result of optimum use of land for commercial agriculture has been emphasised along with the intricacies of social relationships. His One-Act Play- 'The Honour' is written for theatre and that is evident from the beginning, with the introduction of the artists along with a vivid description of their clothes, and buffalo grazers playing cards while the buffaloes are grazing. It shows the preference for clothes across generations. The play begins with the entry of Fudan, in the time of Corona. The grazers inform him of a marriage ceremony scheduled on that very day of his arrival. The demonetisation of currency led to some complications. However, the defaulter party later repented. The one-act play consists of six scenes, the dialogues are crisp, and the scenes are easily enactable. It gives a social message too. - Gajendra Thakur, editor, Videha (Be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast list.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३६०पर टिप्पणी अंक ३६० पर टिप्पणी उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' अहाँक ऊर्जा ईर्ष्या केर कारण भऽ सकैये कतेको लोगक लेल। कल्पना झा, पटना आशीष अनचिन्हार जी द्वारा मैथिलीक मूल समस्या पर लिखल आलेख, एकटा नीक, सार्थक चर्चा करैत आलेख लागल। सत्ये, ई आलेख मैथिलीक मूल समस्या दिस इंगित करैए तँइ ई हरेक समयमे प्रासंगिक अछि। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-२ मे बहुत फड़िछा क' लिखलनि अछि-"जेना-जेना ब्राम्हण-कायस्थ ओ छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत गेलै ब्राम्हणवादी सभ ओकरा मैथिली मानबासँ अस्वीकार कऽ देलक। ऐ कट्टर ब्राम्हणवादी सभहँक नजरिमे ई छलै जे भाषाक भेदसँ ब्राम्हण वा छोट जातिमे भेद छै। आजुक समयमे अंगिका ओ बज्जिका भाषाक जन्म ब्राम्हणवादक एही प्रवृतिसँ भेल अछि।" आगाँ भाषा केर मनोविज्ञान भाग-३ मे स्पष्ट केलनि अछि,जे ब्राह्मणवादक संबंध मात्र ब्राह्मण जाति सँ नहि छैक। ई मात्र मानसिकता छैक, जे कोनो जातिमे भ' सकैए। ब्राम्हणवादक लक्षण सभपर सेहो चर्चा केलनि अछि। केकरो आगू नै बढ़ऽ देब,मात्र अपने टाकेँ नीक बुझब,परिवारवाद, ब्राह्मणवादक मुख्य लक्षण अछि,जकर कारण आपसी द्वेष अछि। एहन विषय पर आलेख कम लिखाइत अछि,तैँ विशेष लागल। आचार्य रामानंद मंडल जीक रचना "सामरथ के दुख नाहि गोसाईं" नीक अछि मुदा सभठाम "मे" केँ "में" लिखल देखलहुँ। ई अशुद्धि पढ़बाक फ्लो मे बाधक बुझाएल। हमरा बूझल अछि मैथिली लिखैत काल "मे" अनुस्वारक प्रयोग नहि होइत छैक। नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- सुभाष चन्द्र यादवक समस्त साहित्य आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी पढ़ैत रोचक लागल। सुभाष चन्द्र यादव जीक जीवन-यात्रा आ हुनकर लेखनी सँ संबंधित जनतब सभ भेटैत छै,एहि सीरीज केँ पढ़ला सँ। समग्र रूप सँ नीक अंक लागल,जकरा पढ़ि किछु नब जनतब सेहो भेटल। मात्र एंटरटेनमेंट वा टाइमपास बला सामग्री नहि भरल रहैत अछि, विदेहक अंक मे, से विदेहक बड़का विशेषता। एह िलेल विदेह टीम साधुवादक पात्र छथि। प्रसन्न झा, देहरादून
अबारा नहितन तारामण्डलमे एन.बी.टी.क स्टॉलसँ लेने रही, एक्के निसाँसमे पढ़ि गेल रही। विदेहक केदार नाथ चौधरी विशेषांक प्राप्त भेल, हम लज्जित छी जे किए बीचमे विदेहक संपर्कसँ किछु दिन लेल दूर भऽ गेल रही। कुणाल ऐमे आब कोनो संदेह नै जे विदेह मिथिला मिहिर बनि गेल अछि। प्रोफेसर उषा चौधरी ठाकुर जी, अपनेक ई विदेह बेजोड़ पत्रिका थिक। एहिमे मैथिली साहित्यक संबर्धनमे अतुलनीय योगदान देवाक सामर्थ्य थिक।जय मां मैथिली। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१-३ (गजेन्द्र ठाकुर) २.२.आचार्य रामानंद मंडल- रनिया भिखारीन २.३.आचार्य रामानंद मंडल- वारिस २.४.महाकान्त प्रसाद- रिपोर्ट २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी 'लव यू टू' २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- बुलन्दी २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास छअम पड़ाव) २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १८म खेप २.९.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १२) २.१०.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.११.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१२.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१३.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१४.नन्द विलास रायक १ टा एकांकी- जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- अपन-अपन संसार २.१६.वृषेश चन्द्र लाल- कथा- डीप डिप्रेशन २.१७. प्रेमशंकर झा- लघुकथा- नाकक नकलोल २.१.नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१-३ (गजेन्द्र ठाकुर) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव- भाग-१-३ Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant- Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (राइटर्स ब्लॉक- मैथिलीक समानान्तर धाराक लेखन- सुभाष चन्द्र यादवक समस्त साहित्य) सुभाषचन्द्र यादव (१९४८- ), जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल। मूल मैथिली लेखन पहिल चरण: घरदेखिया (१९८३) मूल मैथिली लेखन दोसर चरण: बनैत बिगड़ैत (विदेह ई-पत्रिकामे २००८ सँ २००९ धरि, फेर पुस्तकाकार २००९ मे), गुलो (मिथिला दर्शनमे प्रकाशन, २०१४, फेर पुस्तकाकार २०१५ मे), रमता जोगी (२०१९), मडर (२०२१), राजकमल चौधरी मोनोग्राफ (जनवरी १९९७ मे साहित्य अकादेमी द्वारा रिजेक्ट, रचना पत्रिकामे दिसम्बर २००५- मार्च २००६ अंकमे आ पुस्तकाकार २०२२ मे "नित नवल राजकमल" नामसँ), भोट (२०२२)। "जे सुनबैए खिस्सा से राज करैए ऐ संसारपर"- होपी अमेरिकी कबीलाक लोकोक्ति। आ सुभाष चन्द्र यादव खिस्सा सुनेनाइ छोड़ि देलन्हि। "स्वप्नसुन्दरी एण्ड द मैजिकल बर्ड्स ऑफ मिथिला" (गीता धर्मराजन, कथा, १९९६) मिथिलाक टुनमुनिया राजकुमारी स्वप्नसुन्दरीकेँ गाबैबला चिड़ै सभ बड्ड पसिन्न छलै। मुदा ओ माछ, बकड़ी आ गाय सभकेँ सेहो चिड़ै बना दैत छली। प्रजा सभ राजकुमारीकेँ उपराग देलक, राजकुमारी रूसि गेली आ चिड़ै बनेनाइ बन्न कऽ देलनि। ओ महलसँ बाहरो नै अबै छली। जादूबला देश मिथिलासँ जे बाँचल चिड़ै छल सेहो निपत्ता भऽ गेल। जनीजाति खेतमे अखनो गबैत छली, मुदा बिनु रङ-बिरङक चिड़ैक ई मिथिला आब ओ मिथिला नै लगैत छल। आ फेर आयल गाछक पैकार सभ, बिनु चिड़ै गाछक कोन काज, ई गप लोक सभकेँ बुझा, ठकि कऽ ओ सभ मिथिलाक सभटा गाछकेँ काटि कऽ लऽ गेल। जनीजाति सभ, सभटा जुगति भिड़ेलनि जे किछु गाछ बचि जाय, मुदा से भऽ नै सकल। बिनु गाछक सभटा धार सुखा गेल। बिनु गाछक लोक सभ होइत गेल गरीब आ पैकार सभ होइत गेल धनीक। जनीजाति सभ गेलीह राजकुमारी लग, कनैत, कहैत जे राजकुमारी, मदति करू, हम सभ गलत छलौं। स्वप्नसुन्दरी बैसल छली अपन कोठलीमे, जतऽ चारूकात देबालपर छल रङ बिरङक चिड़ै सभक चित्र। ओइ चिड़ैक चित्र सभकेँ देखैत मिथिलाक राजकुमारी स्वप्नसुन्दरी उदास भऽ बजली- नै, अहीं सभ ठीक छलौं। खाली चिड़ै हमरा सभकेँ प्रसन्न नै राखि सकैए। मुदा जनीजाति सभ बजली- बिनु चिड़ै सेहो हम सभ प्रसन्न नै रहि सकब, ओ चिड़ै सभ घुरा कऽ आनि दिअ राजकुमारी। मुदा राजकुमारी ततेक उदास छली जे ओ जादू नै कऽ सकली। तखन जनी-जाति सभ कहलन्हि- चिन्ता नै, हम सभ गाछ रोपब आ गाबैबला चिड़ै सभ घुरि आओत। आ ऐबेर ककरो बेइमानी सेहो हमरा सभ नै करऽ देबै। आ बताह सन खटऽ लागल सम्पूर्ण मिथिला। ककरो कोनो पलखति नै, आ ओ सभ गाबि कऽ नाचि कऽ रोपऽ लागल आ पटबऽ लागल गाछ। आ गाछ जेना-जेना बढ़ऽ लागल आ चकरगर होइत गेल सभ हँसऽ लगला, आ थोपड़ी पारऽ लगला। संग मिलि कऽ काज केलासँ हुनका सभकेँ खुशी होइन। आ ऐ सँ गाछो सभ नीकसँ आ जल्दीसँ बढ़ऽ लागल। आ स्वप्नसुन्दरीक देश मिथिलामे छोट-पैघ गाछ सभ मुस्की देमऽ लागल चारू कात। जादूबला संगीत चारू दिस पसरि गेल। लाल रङक, जोमक रङक, अकासी, पीअर, गुलाबी आ पनिसोखा सन सात रङक चिड़ै सभक डेरा बनत ई। राजकुमारी कहलनि जनीजाति सभसँ- हमर देशक बचियासभ पाठशाला जाथि, ई हमर सभ दिन सँ सपना अछि। जनीजाति सभ बजली- हँ राजकुमारी, जँ हम सभ पढ़ल लिखल रहितौं तँ कोनो पैकार हमरा सभकेँ ठकि नै सकितय। मुदा आयल एकटा झमेल। जनीजातिमे सँ किछु कहलनि- मुदा तखन घरक काज के करत? तखन मिथिलाक राजकुमारी आदेश देलनि- बालक सभ बालिकाक काज सीखत आ बालिका सभ बालकक काज। मिलिये-जुलि कऽ आगाँ बढ़ैमे सभकेँ नीक लागत। आ स्वप्न सुन्दरी सभ पढ़ैबाली बालिकाकेँ देलन्हि एकटा साइकिल। स्वप्न सुन्दरी बुझेलखिन्ह- संसार भरिमे ओ सभ प्रसन्न छथि जे एक-ठामसँ दोसर ठाम जल्दी पहुँचि जाइ छथि, कारण तइसँ ओ सभ सभटा काज जल्दी-जल्दी पूरा कऽ लै छथि। जनीजाति सभ पुछलन्हि- की हम सभ साइकिल नै चला सकै छी? राजकुमारी कहलन्हि- किए नै? महिलाकेँ ओ सभ काज करबाक चाही जे ओकरा नीक लगै छै। किछु गोटे राजकुमारीसँ पुछलन्हि- मुदा टाका कतऽ सँ आओत? मुदा सभ ओकरा दबाड़ि देलक। सभटा काज राजकुमारिये करती? आ लगेलक सभ एकटा बड़का मेला। पाइ जमा भेल, आ बनल राजकुमारी स्वप्नसुन्दरीक पाठशाला। पाठशाला करैए जादू, ओतऽ बच्चा सभ जा कऽ बनि जाइत अछि जेना होथि रङ-बिरङक चिड़ै । अहूँ किए नै अबै छी पाठशाला राजकुमारी? राजकुमारी एक दिन पाठशाला एली, दोसर दिन एली आ सभ दिन आबय लगली। आ फेर ओ कहलनि जे बच्चा सभक माय बाबू सेहो आबथु पाठशाला। आ फेर राजकुमारी फेरसँ करऽ लगली जादू। मुद ऐबेर ओ खाली बेकार चीज सभकेँ बनबऽ लगली चिड़ै। आ बहुत रास कएक रङक पाँखिबला चिड़ै सभ सेहो घुरि आयल अछि मिथिलामे, बिनु जादू कयने। सभ अपना लोलमे एक-एक हजार पोथी लेने, उल्लास आनैबला पोथी सभ, लाल, गुलाबी आ अकासी रङक। लाल, जोमक रङक, पीअर, गुलाबी आ पनिसोखा सन सात रङक, कारण रेतक स्थान लऽ लेलक अछि हरियर कचोर गाछ सभ। आ चिड़ै सभ गाबि रहल अछि- बिनु ज्ञान सुन्दरता अछि सुखायल धार सन। आ ओइ टुनमुनिया राजकुमारीक मिथिला बनि गेल विश्वक सभसँ बेशी हरियर आ प्रफुल्लित देश। लोक सभ तँ ईहो कहैत छथि जे अही चिड़ै सभक कारण मिथिलाक हबामे रहैत अछि जादू सदिखन। आ जँ कहियो हमरो सभकेँ भेटि जाय एकटा एहेन स्थान, जतय महिला आ पुरुख सोचि सकथि पैघ-पैघ गप! ई जादूबला स्थान हमरा सभक लगे-पासमे तँ नै? ई स्थान जतऽ जादूबला बौस्तु सभ अछि, हमरे सन साधारण लोकक भितरे तँ नै अछि? जँ अहाँकेँ भेटय ई स्थान, जतऽ कतौऽ, तँ सूचित करू हमरा हमर ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर। सुभाष चन्द्र यादव खिस्सा सुनेनाइ छोड़ि देलन्हि। मुदा ओ १९८३ सँ अड़ल रहलाह असगरे, आइक तथाकथित निम्न वर्गक किछु लेखक सभ सेहो मैथिलीक आभासी वर्तनीक सङ्ग चलि गेला आ छोड़ि देलखिन्ह असगर हुनका, ओ सभ गैसलाइटिंगक शिकार भऽ गेला। पैकार सभ चारूकात सहसह करऽ लागल। ओइ टुनमुनिया राजकुमारी सन ओ देखैत रहलाह ... मुदा ०१.०१.२००८ सँ ८ सालक तैयारीक बाद विदेह- मैथिली ई-पत्रिका गाछ रोपब शुरू केलक, मिथिलामे, पक्ष-दर-पक्ष, आ घुरि कऽ आबय लागल रङ-बिरङक चिड़ै सभ। नचिकेता २५ बर्खक मौनभंगक बाद विदेह पाक्षिक ई-पत्रिका मे नो एण्ट्री: मा प्रविश प्रकाशित करय लगलाह आ ओही बर्ख २५ बर्खक बाद सुभाष चन्द्र यादव विदेहक पाठककेँ खिस्सा सुनबय लगलाह पक्ष-दर-पक्ष। सुभाष चन्द्र यादवक घरदेखिया आयल १९८३ मे आ २५ बर्खक बाद "बनैत बिगड़ैत" २००८-०९ मे विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद २००९ मे प्रिण्टमे सेहो आबि गेल। "जे सुनायत खिस्सा सएह राज करत ऐ संसारपर" आ समानान्तर धारा सुना रहल अछि खिस्सा। मिथिलाक कएक रङगक पाँखिबला चिड़ै सभ घुरि आयल जेना सन्दीप कुमार साफी, उमेश पासवान, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, उमेश मण्डल, राम विलास साहु, राजदेव मण्डल, नन्द विलास राय, जगदीश प्रसाद मण्डल, दुर्गानन्द मण्डल, आचार्य रामानन्द मण्डल, ललन कुमार कामत, नारायण यादव, मुन्नी कामत, शिव कुमार प्रसाद, धीरेन्द्र कुमार, रामदेव प्रसाद मण्डल "झारूदार" एला रङ बिरङक कथा आ गीतक सङ। घुरि आयल अछि सभ अपना लोलमे एक-एक हजार पोथी लेने, उल्लास आनैबला पोथी सभ, लाल, गुलाबी, जोमक, पनिसोखाक सात रङक आ अकासी रङक। कारण रेतक स्थान लऽ लेलक अछि हरियर कचोर गाछ सभ। आ सुभाष चन्द्र यादव खिस्सा सुनेनाइ फेरसँ शुरू कऽ देलन्हि। बनैत बिगड़ैतक बाद आयल रमता जोगी, गुलो, मडर, भोट। साहित्य अकादेमी द्वार रिजेक्ट कएल राजकमल चौधरी मोनोग्राफ आयल "नित नवल राजकमल" नामसँ। आ तेँ सुभाष चन्द्र यादव छथि "नित नवल सुभाष चन्द्र यादव"। मैथिली स्टोरी साइंस (मैथिला कथाशास्त्र) आ सुभाष चन्द्र यादव मिशेल फोको (Foucault)क "अनुशासन संस्था" बा मनोवैज्ञानिक बार्टन आ ह्वाइटहेडक "गैसलाइटिंग" दुनूक लक्ष्य एक्के छै। मिशेल फोकोक "अनुशासन संस्था" अछि, सोझाँबलाकेँ अनुशासनमे आनू आ तइ लेल सभकेँ आपसेमे लड़ाउ, किछुकेँ पुरस्कृत करू आ जे अनुशासनमे नै अबैए तकरा आस्ते-आस्ते माहुर दियौ। गैसलाइटिंगमे सोझाँबला केँ विश्वास दिआओल जाइत अछि जे अहाँ जे यथास्थितिक विरोध कऽ रहल छी से कोनो विरोध नै, ई तँ सभ कऽ रहल अछि, अहाँ तँ विरोधक नामपर विरोध कऽ रहल छी आ से अपन कमी नुकेबा लेल। ऐमे समाजमे वर्तमान आधारभूत कमीक सहायता सेहो लेल जाइत अछि, आ आस्ते-आस्ते टारगेट बताह भऽ जाइत अछि बा पलायन कऽ जाइत अछि। से सुभाष चन्द्र यादवक राइटर्स-ब्लॉक सामान्य राइटर्स ब्लॉक नै छल, ई छल "गैसलाइटिंग"। मुदा एकर प्रतिकारमे अबैत अछि स्टोरी साइंस, कोन कथा सुनेलासँ लोक आ समाजपर की असर पड़त, ई ओइ आधारपर पूर्व-विश्लेषण करैत अछि। से समानान्तर धारा माहुरकेँ माहुरसँ काटबाक निर्णय लेलक। ओ मूलधाराक साहित्यकार सभ जे मानकीकरणक नामपर भाषाकेँ मरोड़ै छला, ओ स्टोरी साइंसक संग गैसलाइटिंगक आधारपर काज कऽ रहल छला। हुनकर उद्देश्य छल वर्तनीक भिन्नताकेँ अशुद्धताक नाम देब। रामदेव झा घरदेखियाकेँ लक्षित कऽ ई सभ लिखलन्हि जे, जे लिखब से बाजब असमियो मे असफल भेल से मैथिलीयोमे हएत। आ सुभाषचन्द्र यादव असगर पड़ि गेलाह। मुदा जखन रमानन्द झा 'रमण' अही स्टोरी-साइंसक प्रयोग बिसाँढ़क सङ केलन्हि, आ तकर आलोकमे जगदीश प्रसाद मण्डलक शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा वर्तनी-संशोधन कएल कथा (जइले ओ अशुद्धता दूर करबा लेल तीन दिन मेहनति कएल, अहि तरहक अहसान सेहो जतेलन्हि) उमेश मण्डलजी जखन हमरा पठेलन्हि तँ हमर कान ठाढ़ भऽ गेल। कारण सुभाष चन्द्र यादवक वर्तनीक कथा विदेहमे तावत ई-प्रकाशित भेनाइ शुरू भऽ गेल छल। हम उमेश मण्डल जी केँ स्टोरी-साइंसक मर्म बुझेलियन्हि आ बिनु तथाकथित शुद्ध कएल वर्तनीबला रूप विदेहमे छपब शुरू भेल [देखू दुध-पानि फराक-फराक (कथा एवं पाण्डुलिपि जगदीश प्रसाद मण्डल)- (छाया एवं सम्पादन- उमेश मण्डल)]। आ उमेश मण्डल सूचित केलन्हि जे वर्तनी शुद्धताक बाद जगदीश प्रसाद मण्डल जी गुम रहऽ लागल छलाह, आ जहियासँ ओ सुनलन्हि जे वर्तनीक शुद्धता बला रचना विदेहमे रिजेक्ट भऽ गेल छन्हि आ हुनकर असली वर्तनीबला वर्सन आब ई-प्रकाशित हेतन्हि तहियासँ हुनकामे नव उत्साह आबि गेल छन्हि। फेर उमेश मण्डल जीक गप सुभाष चन्द्र यादवसँ भेलन्हि, तँ सुभाष चन्द्र यादव जी सूचित केलखिन्ह जे मूलधारा बला सभ किछु लिखि दियौ, सुनबे नै करत काने-बात नै देत। राजमोहन झा भाइ साहेबपर सेहो बड्ड विश्वास केने रहथि। "तँ तकर उपाय?" "उपाय वएह जे अहाँ सभ कऽ रहल छी, माने लेखक बढ़ाउ।" आ स्टोरी साइंस सेहो सएह कहैए, जे कथा सुनायत से करत राज, आ जे जत्ते कथा सुनाओत से तत्ते आगाँ बढ़त। आ असगर बृहस्पतियो झूठ। मुदा ऐबेर दोसर चरणमे सुभाष चन्द्र यादव असगर नै रहथि। आ समानान्तर धारा कथा सुना रहल अछि १५ सालसँ आ मूलधारा सुनि रहल अछि। जखन कि मिशेल फोकोक सभटा डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशन "अनुशासन संस्था" जेना साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, आ साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त कथित लिटेरेरी असोसियेशन सभ मूल धारा लग छै। मुदा मिशेल फोकोक सभटा डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशन आ मूलधाराक गैसलाइटिंगक टेक्निक, गार्जियन बनबाक ऑफरक टेक्निक स्टोरी साइंस द्वारा खतम कऽ देल गेल छै। स्टोरी साइंस तारानन्द वियोगीक शब्दावली (१) जेना थोकक हिसाबें मैथिलीमे उपन्यास बहराइत अछि, (२) मेहतरक भाषा आ (३) कूड़ा-कड़कटक पहाड़ ठाढ़ करबाक साजिश आ रमानन्द झा "रमण"क शब्दावली (१) "हाट-बजारक भाषा" (डॉ. प्रमोद कुमारक 'कनकिरबा' क आमुखमे)केँ उघार केलक। ई सभ हतोत्साहित करबा लेल उपयुक्त गैस-लाइटिंग केर टेक्निक अछि जकरा समानान्तर धारा द्वारा स्टोरी साइंसक मदतिसँ खतम कऽ देल गेल अछि। तँ ई उदाहरण सिद्ध करैए जे मूल धारामे सभ जातिक लोक अछि आ समानान्तर धारामे सेहो। स्टोरी साइंसक मदतिसँ ब्राह्मणवादक संग गएर-ब्राह्मणक नव-ब्राह्मणवादकेँ सेहो चिन्हित कएल गेल अछि। आ सएह कारण छै जे मैथिली कथा सुनेबाक आयोजन "सगर राति दीप जरय"केँ साहित्य अकादेमी द्वारा गीड़ि लेबाक प्रयत्न भेल आ से विफल भऽ गेलापर रमानन्द झा 'रमण' सहित मूल धाराक आन लोक अपन मानसिक सन्तुलन बना कऽ नै राखि सकला। रमानन्द झा 'रमण' तँ सभटा सीमाक अतिक्रमण करैत एकटा ब्राह्मणवादी संस्थाक पत्रिकामे बिनु नाम लेने हमरा आ उमेश मण्डलकेँ अवाच कथा सेहो कहलन्हि आ तकर उपहार स्वरूप साहित्य अकादेमी दिल्लीक ओइ संस्थाकेँ कथित लिटेरेरी एसोसियेशनक रूपमे मान्यता देलक। ई घटना स्टोरी-साइंसक प्रभावकेँ दर्शित करैत अछि। मुदा अशोक गत दस सालसँ 'सगर राति दीप जरय' केर आयोजन समानान्तर धाराक लेखक सभ द्वारा कएल जेबासँ आह्लादित छथि आ कहै छथि- "एकर प्रारम्भिक उद्देश्य रहै गाम-गाम गोष्ठी करबाक, से आबे जा कऽ भऽ रहल छै।" यएह गप हमर गाममे भेल ८२ म सगर राति दीप जरय [कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा (बाल साहित्य केन्द्रित) मेंहथ]मे शिवशंकर श्रीनिवास सेहो बाजल छला- "जखन हम सभ 'सगर राति दीप जरय' शुरू केने छलौं तखन एकर उद्देश्य छल जे ई गामे-गाम हुअय, मुदा ई तँ पटना-चेन्नै घुमऽ लागल।" आ ओम्हर रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' आ परमेश्वर कापड़ि सेहो पायापार नेपाल मे अड़ल छला। भारतक सरकारी संस्थाक संकलनमे हुनकर सभक रचना बाहरी (नेपालक) हेबाक कारण नै देल गेलनि मुदा ओही नेपालक दोसर लेखक, जे स्टेटस-को केर सङ छला, केर कथा देल गेलै । जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरी, जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरी/ जेक्स डेरीडा- उत्तर संरचनावाद माने विखण्डनात्मक सिद्धान्त कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि, आ से मैथिलीयो मे अछि। ऐ सम्बन्धमे सुभाष चन्द्र यादवक निम्न विचार छन्हि: "मैथिली मे लोक-कथा पर बड़ कम काज भेल अछि। लोक-कथाक किहुए संकलन उपलब्ध अछि आ से स्मृतिक आधार पर लिपिबद्ध् कयल गेल अछि, फील्ड वर्कक आधार पर नहि । लोक-साहित्यक कोनो इकाइ हो, ओकर एक सँ अधिक रूप विद्यमान रहैत छैक, जे फील्ड वर्क कयले सँ प्राप्त भऽ सकैत अछि । स्मृति मे ओकर मात्र एकटा रूप रहैत छैक, जकरा सर्वोत्तम रूप मानि लेब गलत भऽ सकैत अछि । लोक-कथा क जतेक संकलन अखनधरि भेल अछि, से अपूर्ण अछि । मैथिली मे लोक-गीत, लोक गाथा आ लोक देवता क लेल तऽ किछु फील्ड वर्क कयलो गेल, लोक कथाक लेल भरिसक्के कोनो फील्ड वर्क भेल अछि । आब जखन एक पुश्त सँ दोसर पुश्त मे लोक साहित्यक अंतरण दिनोदिन संकटग्रस्त भेल जा रहल अछि, तैं एकर संरक्षण जरूरी अछि । लोकसाहित्यक संरक्षण मात्र एहि लेल जरूरी नहि अछि जे ओ अतीतक एकटा वस्तु थिक; ओ अपन समयक विमर्श आ आत्मवाचन सेहो होइत अछि आ एकटा प्रतिमान उपस्थित करैत अछि । ओकर रूपक, प्रतीक, भाव आ शिल्पक उपयोग लिखित साहित्य मे हम सभ अपन-अपन ढंग सँ करैत रहैत छी। तहिना लिखित साहित्य सेहो लोक-साहित्य केँ प्रभावित करैत रहैत अछि । लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन मुख्यत: स्थान आ कालक निर्धारण पर केन्द्रित रहल अछि। ओकर कार्य, अभिप्राय आ अर्थ सँ संबंधित प्रश्न अखनो उपेक्षित अछि । मैथिली मे तऽ लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन अखन ठीक सँ शुरुओ नहि भेल अछि। जे पोथी अछि, ताहि मे लोक-साहित्यक परिभाषा आ सूची उपस्थित कयल गेल अछि। लोक-कथाक उपलब्ध संकलन सभ मे ओहन कथाक संख्या बेसी अछि जे देशांतरणक कारणेँ मैथिली मे आयल अछि। मैथिलीक अपन लोककथा, जकरा खाँटी मैथिल कहि सकैत छिऐक, से कम आयल अछि। रामलोचन ठाकुर द्वारा संकलित मैथिली लोक-कथा, जकरा हम अपन एहि अत्यंत संक्षिप्त अध्ययनक आधार बनौने छी, ताहू मे खाँटी मैथिली लोक-कथा कम्मे अछि। लोक-कथाक अभिप्राय आ अर्थ संबंधी अपन बात कहबाक लेल जाहि दूटा कथाक चयन हम कयने छी, से अछि- एकटा बुढ़िया रहय आ एकटा चिनिया खेलिऐ रओ भैया। एहि दुनू कथाक वातावरण विशुद्ध मैथिल अछि। दुनूक विमर्श, आत्मवाचन आ प्रतिमान मैथिल-मानसक अनुरूप अछि। दुनू कथाक विमर्श न्याय पर केंद्रित अछि। पहिल कथाक बुढ़िया दालिक एकटा फाँक लेल बरही, राजा, रानी, आगि, पानि आ हाथी केँ न्याय पयबाक खातिर ललकारैत अछि, किएक तऽ खुट्टी ओकर दालि नुका लेने छैक आ दऽ नहि रहल छैक। कथाक विमर्श पद्यात्मक रूप मे एना व्यक्त भेल अछि- हाथी हाथी हाथी! समुद्र सोखू समुद्र। समुद्र ने अगिन मिझाबय, अगिन। अगिन ने रानी डेराबय, रानी। रानी ने राजा बुझाबथि, राजा । राजा ने बरही डाँड़थि, बरही। बरही ने खुट्टी चीड़य, खुट्टी। खुट्टी ने दालि दिअय, दालि। की खाउ, की पीबू, की लऽ परदेस जाउ। जाइत अछि। खुट्टी तैयार भऽ जाइत छैक। फेर तऽ खुट्टीक डरेँ हाथी, हाथीक डरेँ समुद्र, समुद्रक डरेँ आगि, आगिक डरेँ रानी, रानीक डरेँ राजा, राजाक डरेँ बरही न्याय करक लेल तैयार भऽ जाइत छैक आ खुट्टी बुढ़िया केँ दालि दऽ दैत छैक। ई कथा रामलोचन अपन माय सँ सुनने छलाह। ओ कहलनि जे माय वला वृत्तांत मे बुढ़िया हाथिए लग सँ घूरि जाइत छैक। लिपिबद्ध करैत काल ओ एकर पुनर्सृजन कयलनि। हुनक लिपिबद्ध कयल वृत्तांत मे बुढ़िया हाथियो सँ आगू खुट्टी धरि जाइत अछि। बुढ़िया केँ खुट्टी धरि लऽ गेनाइ कथाक व्यंजना मे विस्तार अनैत छैक। लेकिन लोक कथाक एहन प्रलेखन कतेक उचित अछि? एहि कथाक आत्म वाचन बुढ़ियाक माध्यमे प्रकट भेल अछि । अपन स्थितिक प्रति बुढ़िया जे प्रतिक्रिया करैत अछि, सएह एहि कथाक आत्म वाचन थिक। एकटा दालिक बल पर बुढ़िया परदेस जेबाक नेयार करैत अछि। राजा-रानीक सेर भरि दालि देबाक प्रस्ताव केँ तिरस्कृत करैत अछि । समुद्र सँ हीरा मोतीक दान नहि लैत अछि। दालि पर अपन अधिकार लेल लड़ैत रहैत अछि। तात्पर्य ई जे सपना देखबाक चाही। भीख आ दयाक पात्र नहि हेबाक चाही। दान लेब नीक नहि। स्वाभिमानी हेबाक चाही आ अपन हक लेल लड़बाक चाही। कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे न्याय संघर्षे कयला सँ भेटैत छैक। 'एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया' न्यायक विवेकशीलता पर विमर्श करैत अछि। मुनिया (चिड़ै) केँ एकटा चीन खेबाक अपराध मे प्राणदंड भेटै वला छैक । ई विमर्श पद्यात्मक रूपमे चलैत छैक, जाहि मे ओकर दारुण अवस्था सेहो चित्रित भेल छैक । बरदवला भाइ! परबत पहाड़ पर खोता रे खोंता भुखै मरै छै बच्चा एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया तइ लए पकड़ने जाइए। फेर घोड़ावला अबै छै, हाथीवला अबै छै, खुद्दी-वला अबै छै। मुनिया सभ सँ मिनती करैत अछि। ओहो सभ खेतवला केँ पोल्हबैत छैक; छोड़बाक बदला मे बड़द, घोड़ा, हाथी देबऽ लेल तैयार छैक, लेकिन खेतवला टस सँ मस नहि होइत अछि। जखन भूखे-प्यासे जान जाय लगै छैक, तखन खुद्दीक बदला मे मुनिया केँ छोड़ि दैत अछि। मुनिया करुणा आ मानवीयताक आवाहन करैत अछि। मनुस्मृति मे कहल गेल छैक जे चुपचाप ककरो फूल तोड़ि लेब चोरि नहि होइत छैक; तहिना ककरो एकटा चीन खा लेब कोनो अपराध नहि भेल। इएह कथाक आत्मवाचन थिक। कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे सभक जीवक मोल बराबर होइत छैक । असहाय आ निर्धनो केँ जीबाक अधिकार छैक। एहि संसार मे ओकरो लेल एकटा स्पेस (जगह) हेबाक चाही।" कथामे असफलताक सम्भावना उपन्यास-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि "सोप ओपेरा" जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिये बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नै दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नै तँ खरापे-खराप। कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना ऐ तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे "देवी को बलि" सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थिति आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नै। वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कऽ विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्द्वात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक "डिसकसन" वा द्वन्द्व जइमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहियेसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कयनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कयने छलाह- बादमे ऐसँ पलटि गेलाह। कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ा (द्वन्द्व) सँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन बाद ओ ऐ मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य अखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स डेरीडा भाषाकेँ विखण्डित कऽ ई सिद्ध केलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नै लगा सकैत छी। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भऽ अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्द्वात्मक प्रणाली जकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। आधुनिक कथा अछि की? ई केहन हेबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि हेबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाय ? कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे हेबाक चाही। मुदा संगमे ओइ समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ ऐमे ओइ समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कऽ रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक "मसनवी" फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। आजुक कथा ऐ सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नै अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित हेबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत। मनोविश्लेषण आ द्वन्द्वात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ डेरीडाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भऽ समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत। ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नै। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जायत ? गीताक सप्पत खा कऽ झूठ बजनिहारक संख्या कम नै। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भऽ जायत ? सभ प्रबुद्ध नै हेताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओइ दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध हएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नै, तँ ओकर ओइ परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि ऐ तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत। आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जइसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन हुअए। आकि ऐ परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि्? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। ऐमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नै अछि जे रोशनाइसँ कागचपर जेना-तेना उतारि देलिऐ। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। तँ कथा आदर्शवादी हुअय, प्रकृतिवादी हुअय वा यथार्थवादी हुअय। आकि ई मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमयबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी हुअय? आ नै तँ कथा प्रयोजनमूलक हुअय। ऐमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त केनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि। तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कऽ गढ़ल जायत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि पाओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबय पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करय पड़तन्हि। स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित हएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत। जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नै छै। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह। कथा क्रमबद्ध हुअय आ सुग्राह्य हुअय तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नै व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कय देलक। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास हेबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नै, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। ऐसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओइसँ पृथक ओ किछु नै अछि, स्वतंत्र हेबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर हएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित केने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करय पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक "अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम" सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आयल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा (बीहनि कथा), कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत? जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नै पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओइ मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नग्र-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आयल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करय पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नै वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नै होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नै होइत अछि। ऐ सम्बन्धमे सुभाष चन्द्र यादवक निम्न विचार छन्हि: "कोनो लेखक सँ ई अपेक्षा केनाइ जे ओ अपन रचनाक स्पष्टीकरण आ व्याख्या करए एकटा अनुचित अपेक्षा होएत। ई काज लेखकक नहि थिकैक। रचना चाहे कतबो दुर्बौध्य आ विवादास्पद हो, लेखक ओहि लेल जिम्मेदार तऽ होइत अछि, मुदा ओकर भाष्यकार हेबाक लेल बाध्य नहि। लेखक ककरा-ककरा अपन रचना बुझेने फिरत आ किएक? की ई सम्भव छैक? लेखक जँ चाहए तऽ अपन जीवनकालमे रचनाक संदर्भमे किछु सम्वाद स्थापित कऽ सकैत अछि, मुदा मृत्योपरांत? पाठक अपन बोध आ विवेकक अनुसार रचनाक पाठ करैत अछि। हरेक युगक सेहो अपन भिन्न बोध होइत छैक। तँ ई पथ भिन्नता आ परिवर्त्तनशीलता हरेक समर्थ रचनाक आनिवार्य गुण होइत अछि। समय के संग-संग रचनाक संवेदनात्मक अभिप्राय बदलैत रहैत छैक। तँ ई युग बदलला पर रचनाक व्याख्या सेहो बदलि जाइत छैक। एहि तरहेँ कोनो एकटा रचना के एक्के टा आ समान पाठ नहि होइत अछि; मूल्यवान रचनाक पाठ अनंत होइत अछि। पाठ पर लेखकक नियंत्रण नहि होइत छैक। तँ ऐ पाठ भिन्नताक लेल ओकरा सफाइ आ स्पष्टीकरण देबाक कोनो बेगरता नहि हेबाक चाही। हमर अपन अनुभव तऽ ई अछि जे जाधरि कोनो घटना कलात्मक विजनसँ दीप्त नहि होएत ताधरि ओ रचनामे रूपांतरित नहि भऽ सकत। ओहि आरंभिक विजनकेँ पाठक भिन्न-भिन्न रूपेँ पकड़ैत अछि आ अलग-अलग व्याख्या करैत अछि। हमरा लगैत अछि जे कोनो रचनाक विजन आ दर्शनकेँ पाठक भले नहि बुझि पबैत हो, ओकर मर्मकेँ जरूर पकड़ि लैत अछि; ओकर संवेदनात्मक तत्वकेँ हृदयंगम कऽ लैत अछि। लोककथा सँ उदाहरण ली तऽ बात बेशी स्पष्ट होएत। एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया तइ ले पकड़ने जाइए'- एहि उक्तिमे न्याय आ समानताकेँ जे विमर्श आ दर्शन छैक, तकरा पाठक भले नहि बूझि पबैत हो, मुदा स्वतंत्रताक लेल जे फुद्दीक आर्तनाद छैक तकर अनुभव पाठक अवश्य कऽ लैत अछि। तहिना हमर कथा 'नदी' आ 'कनियाँ पुतरा'मे जीवनदायिनी शक्तिक रूपमे प्रेमकेँ जे विजन (दर्शन) छैक तकरा बूझब ओतेक आसान जँ नहियो होइ, तैयो नेहक अनुभूति तऽ पाठक करिते अछि। साहित्यमे असली चीज ईएह संवेदना या मर्म होइत छैक। कोनो विचार (या दर्शन) संवेदनेक माध्यमसँ पाठक धरि पहुँचबाक चाही; कोनो नीरस विमर्श या नाराबाजीक रूपमे नहि। हमरा बुझने धर्म आ संस्कृतिक भित्ति प्रेमे थिक। प्रेमसँ बढ़ि कऽ एहि संसारमे कोनो दोसर भाव नहि अछि। हमर कथा सभ कोनो विचारधारात्मक या आचारशास्त्रीय आग्रह लऽ कऽ नहि चलैत अछि। ओ अपन समयकेँ आचार-विचारकेँ व्यक्त तऽ करैत अछि, मुदा ओहि सँ बद्ध नहि अछि। हमर धारणा अछि जे कलाकृति कोनो क्रांति नहि अनैत अछि। ओ मनुक्खक भावात्मक अभिवृत्ति आ दृष्टिकेँ बहुत सूक्ष्म ढ़ंगसँ बदलैत अछि आ दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्त्तनक घटक होइत अछि। एकर अतिरिक्त आर किछु नहि। जे आलोचक एहिसँ इतर कोनो अपेक्षा आ आग्रह (जेना मैथिलीक चेतनावादी हठ) लऽ कऽ साहित्य लग जाएत, से अपनोकेँ ठकत आ दोसरोकेँ धोखा देत।" आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल। मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आयल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आयल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकायल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ ऐ सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आयल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कऽ ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कयने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लऽ ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। २००८क कोसीक बाढ़िमे गौरीनाथजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहय मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भऽ गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? गुलोमे सेहो अहाँ मोबाइल चार्ज करबाक बिजनेसक चर्चा देखैत छी। डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नै मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भऽ सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। मैथिलीमे नीक कथा नै, नीक नाटक नै? मैथिलीमे व्याकरण नै? पनिसोह आ पनिगर ऐ तरहक विश्लेषण कतऽ अछि मैथिली व्याकरण मे, वएह अनल, पावक सभ अछि ! सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल। जइ समय मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नै भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भऽ, अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताक वातावरणकेँ भरिया रहल छथि, मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कऽ कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि, तखन स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि, स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि। जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल छथि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्मक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि। ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिस्ट, महिला विरोधी मार्क्सिस्ट आ ऐ तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि। क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि, तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक, आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि। यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नै कएल गेल अछि- ऐ तरहक अनर्गल प्रलाप ! क्यो तथाकथित विवादास्पद कथाक सम्पादन कऽ स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि। मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जइ कवि-कथाकारकेँ विचलित कऽ रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे एबाक बाद जइ गतिसँ ओ ई सभ करतब कऽ रहल छथि, तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जेतन्हि से नै जानि ? लोक ईहो बुझैत छथि जे हिन्दीक बाद जे मैथिलीमे लिखब , तँ स्वीकृति त्वरित गतिएँ भेटत ? जे मैथिलीक रचनाकारेँकेँ ऐ तरहक भ्रम छन्हि आ आत्मविश्वासक अभाव छन्हि, अपन मातृभाषाक संप्रेषणीयतापर अविश्वास (!), तखन ऐ भाषाक भविष्य हिनका लोकनिक कान्हपर दऽ कोन छद्म हम सभ संजोगि रहल छी ? मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल हएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि, से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कऽ हम कहि सकैत छी। तइ स्थिति मे- ई विवाद रहय ऐ कवितामे आ ऐ कथामे- ऐ तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दऽ अपन लेखनी चमकायब? आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल। मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा ऐ सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतऽ पाठक आ कोन विवाद ! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक ऐ भाषासँ प्रेम करथि तइ लेल कथा आ कविता कतऽ आगाँ अछि ? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। सय-दू सय कॉपी पोथी छपबा कऽ , तकर समीक्षा करबा कऽ, सय-दू सय कॉपी छपयबला पत्रिकामे छपबा कय, तकर फोटोस्टेट कॉपी फोल्डर बना कऽ घरमे राखि पुरस्कार लेल आ सिलेबसमे किताब लगेबा लेल कयल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जा स्थिर भऽ गेल अछि। जे अपन घर-परिवार नै सम्हारि सकला से ढेरी-ढाकी भाषायी पुरस्कार लऽ बैसल छथि, मिथिला राज्य बनेबामे लागल छथि , पता नै राज्य कोना सम्हारि सकताह । मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि , वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नै अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नै, मराठीमे कोनो बच्चासँ गप करबाक सामर्थ्य नै छन्हि। आ मैथिलीमे हुनकर माथ फुटबासँ ऐ द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कऽ समीक्षा करबैत छथि, से पाठक तँ छन्हि नै। पाठक नै रहयमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि। आ ऐ पुरस्कार सभमे जूरी आ एडवाइजरी बोर्ड अपनाकेँ आगाँ करबामे जखन स्वयं आगाँ अबैत छथि तखन ऐ सीमित प्रतियोगी लोकनिक आत्मविश्वास कतेक दुर्बल छन्हि , सएह सोझाँ अबैत अछि । जिनकर सन्तान साहित्यमे नै अयलाह हुनकर चरचा फेर केना हएत, हुनकर पक्ष के आगाँ राखत ? मैथिली साहित्यक ऐ सत्यकेँ देखार करबाक आवश्यकता अछि । आँखि मुनि कऽ सेहो एकर समाधान लोक मुदा ताकिये रहल छथि। कथा-कविता-नाटक-निबन्ध संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि । पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि। ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जइ भाषामे लिखल जाइत हुअय, ओतय ऐ तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि। मार्क्सिस्ट आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करब आ अपन स्तरक न्यूनताक ऐ तरहेँ पूर्ति करब, सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक ई हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी ? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही। आ तकर कारण सेहो स्पष्ट। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ई देखबैत अछि जे संस्कृत, हिन्दी, मैथिली आ आन साहित्य कॉलेजमे वएह पढ़ैत छथि जिनका दोसर विषयमे नामांकन नै भेटैत छन्हि, पत्रकारितामे सेहो यएह सभ अबैत छथि। प्रतिभा विपन्न एहने साहित्यसेवीकेँ साहित्यक चश्का लागल छन्हि आ हिनके हाथमे मैथिली भाषाक भविष्य सुरक्षित रहत? मुदा ऐ वास्तविकताक संग आगाँक बाट हमरा सभक प्रतीक्षामे अछि। सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा आ स्त्री जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार हेबे टा करत। मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नै। सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे "विदेह" ई-पत्रिकामे (http://www.videha.co.in) अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भऽ हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट ऐ कथा सभकेँ भेटलैक जइमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल। एतऽ ईहो गप सोझाँ आयल जे शिक्षाक अभावक कारण सेहो, भाषाक उच्चारण आ वाचन मे अंतर अबै-ए। तकर ई मतलब नै जे बलचनमाक भाषा एखनो यादव जी बजैत छथि, आब जे ओ भाषा कथाक यादव पात्र लेल प्रयोग करब तँ शांकुन्तलम् केर संस्कृत नाटकक बीच जनसामान्यक लेल प्रयुक्त प्राकृत जेकाँ लागत, आ ओइ वर्गक लोककेँ अपमानजनक सेहो लगतन्हि। भाषा चलायमान होइत अछि आ लेखन परम्परा ओकर मध्य स्थिरता अनैत अछि। से सुभाषजीक भाषामे सेहो ई अन्तर स्पष्ट देखबामे अबैत अछि, हुनकर कथाक भाषा आ निबन्धादिक भाषा मध्य। जूलिया क्रिस्टोवा अपन प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मे इण्टर-टेक्स्टुअलिटी माने अन्तर-पाठ्यताक संकल्पना देलन्हि, मने कोनो पाठ एकटा देबारमे बन्न नै रहि सकैए। से ओ पाठकेँ संकलन कहै छथि। आब गुलोमे देखू, रंजीता रंजनसँ छह वोटक एक हजार टका नरेशबा दियेतै। मुदा ओ निपत्ता भऽ जाइ छै। फुलबा मोदीकेँ जितेतै। एम.पी. केर एलेक्शन छिऐ। से सुभाष चन्द्र यादव टेक्स्टक कनटेक्सट ताकि लेने छला २०१५ मे। से हुनका भीतर घुरियाइत हेतन्हि आ से विस्तृत रूपमे बहार भेल "भोट"मे एम.एल.ए. केर भेल एलेक्शनक संग २०२२ मे। से अन्तर-पाठ स्थापित करैत अछि अन्तर-विषयक विषय-वस्तु। ई सभटा पाठ आ विषय एक दोसरासँ रगड़ा लैत रहैए आ एक दोसराक प्रभावकेँ खतम करैत रहैए, कखनो कोनो पाठ आगाँ तँ कखनो दोसर। आ ऐ पाठकेँ अहाँ समाज आ संस्कृतिक आधारसँ अलग नै कऽ सकै छिऐ। से समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यक पाठ मिज्झर भऽ जाइत अछि। पाठ अभ्यास आ उत्पादनक विषय अछि। से पहिनेसँ समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यिक पाठ दू तरहक स्वर निकालैत अछि। विचारधाराक संघर्ष आ तनावकेँ पाठ समाहित करैत अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरीमे सोझे लेखक आ पाठकक बीच वार्ता होइ छै। माने लिफाफक बौस्तु आ लिफाफपर लिखल पता केर बीच सोझे वार्ता होइ छै। मुदा जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरीमे "पाठ" मूलधाराक साहित्य संगे सेहो आ एकटा छोट कालावधिमे भेल घटनाक बीच वार्ता करैत अछि। माने पाठ आ ओकर सन्दर्भक बीच वार्ता होइ छै, एक लेखकक पाठ दोसरक लेखकक पाठ संग वार्ता करैए। ई दुनू धूरी जखन एक दोसराकेँ काटैए तखन शब्द बा पाठ उत्पन्न होइए जइमे कमसँ कम एकटा आर पाठ पढ़ल जा सकैए। जुलिया क्रिस्टोवा बोली-बानीकेँ यथावत राखबाक आ किछु पाठ, जे मनुक्खसँ अलग अछि, केर रूपमे लेखकक अधिकार आ कर्तव्यक वर्णन करैत छथि। जूलिया क्रिस्टोवाक प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मिखाइल बाखतिनक संकल्पनाकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। संगहि जुलिया क्रिस्टोवा भाषाक संकेत आ प्रतीकक रूपमे सेहो विश्लेषण करैत छथि। जखन बच्चा संकेतक रूपमे, लयसँ गप करैत अछि तँ ओइमे संरचना नै होइ छै, अर्थ नै होइ छै। मुदा जखन ओ पैघ होइए तँ ओकरा अपना आ आनमे अन्तर बुझाइ छै, ओ बाजऽ लगैए आ अङनासँ बहराइए। आ तकरा बाद ओ अपनाकेँ मायसँ दूर करैए। मुदा ओ लाक्षणिक सँ एकदम्मे दूर नै होइए वरन् लाक्षणिक आ प्रतीकात्मकक बीचमे झुलैत रहैत अछि। लाक्षणिक स्त्री गुण, संगीतमय, कविता आ लय सँ युक्त; आ प्रतीकात्मक पुरुष गुण, विधि आ संरचनासँ युक्त रहैत अछि। से चलचित्र आदिमे महिलाक शरीरक आ ओकर किरदारक जे अवमूल्यन पुरुष द्वारा कएल जाइत अछि से मायक शरीर द्वारा ओकर अस्तित्वक खतराक डर अछि। मुदा बेबी चाइल्ड अपन मायसँ लग रहैत अछि से ओ लाक्षणिक स्त्री गुण, संगीतमय, कविता आ लय सँ बेशी युक्त रहैत अछि, से ओ मायकेँ अस्वीकार तँ करैत अछि मुदा ओकरेसँ अपनाकेँ परिभाषित करैत अछि। जेक्स डेरीडा योनि केन्द्रित विखण्डनात्मक सिद्धान्तसँ नारीवादी विचारधारामे जे हस्तक्षेप करै छथि तकर कोर्नेल समर्थन करैत छथि आ गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक स्वागत। किछु दार्शनिक विचारधारा जइ प्रकारसँ योनीकेँ अप्रत्यक्ष रूपेँ महत्व दइए ततऽ डेरीडा द्वारा योनि-केन्द्रित दृष्टिकोणक सीमाक प्रति ध्यानाकर्षण एकटा सार्थक हस्तक्षेप अछि आ तइसँ प्रतीकक घटकक फेरसँ एकटा प्रक्रियाक अन्तर्गत परिभाषा देब सम्भव भेल अछि। डेरीडा आपसमे होइबला सम्वादक गुणनखण्डक असम्भाव्यताकेँ देखबै छथि, ओकरा सरल नै कएल जा सकैए। से स्त्रीकेँ अनुमान आ ज्ञानक वस्तुक रूपमे नै देखल जेबाक चाही। पुरुषत्वक सापेक्ष नारीवादकेँ नै देखबाक चाही वरन नारीवाद लेल एकटा अलगे मोहाबरा बनेबाक खगता अछि। से पाठ, डेरीडा कहै छथि, मोटामोटी एकटा राजनैतिक कार्य अछि जे शक्ति-सम्बन्ध बा तकरा लेल होइत वार्ताक रूपमे परिभाषित कएल जा सकैए। मुदा डेरीडापर आरोप अछि जे ओ नारीक अबाजकेँ पुरुष द्वारा अधिगृहीत करबाबय चाहैत छथि, नारीक एतेक यत्नसँ जे बकार फुटल छन्हि, जे ओ अपना लेल बाजि रहल छथि, से अधिकार ओकरासँ छीनऽ चाहैत छथि। डेरीडाकेँ महिलाक दिन-प्रतिदिनक होइत समस्या आ शक्तिहीनतासँ कोनो मतलब नै छन्हि। डेरीडा विखण्डनात्मक पद्धतिकेँ नीक आ धनात्मक रूपमे लइ छथि आ नारीवादकेँ अस्तित्वक तत्त्वमीमांसाक/ तर्कक द्वैधक रूपमे राखैत छथि, जेना पुरुष स्त्री। डेरीडा पाश्चात्य दर्शनक केन्द्र आधारित संरचनाक मोहकेँ उघार करैत छथि। सुसियोक भाषाविज्ञानसँ प्रेरित संरचनावाद सांस्कृतिक अस्तित्वक वैज्ञानिक विश्लेषणक प्रयास करैत अछि। लेवी स्ट्रॉसक संरचनात्मक मानव विज्ञान सएह लोकगाथा लेल करैत अछि। तहिना साहित्यमे गद्य आ पद्य लेल संरचनात्मक विश्लेषणक प्रयास कएल जाइत रहल अछि। मुदा डेरीडा एकरा उघार करैत छथि, संरचनावाद अपन विश्लेषण लेल एकटा ठोस आधार ताकैत अछि, व्यवस्थाक बाहर एकटा केन्द्र जइसँ ओ एकर वैज्ञानिक विश्लेषण कऽ सकय, मुदा से मात्र दार्शनिकक आभास मात्र अछि। माने कोनो लोकगाथाक कोनो स्थायी बा निर्धारित संरचना केना भऽ सकैए। से लोककथा बा लोक गाथाक संरचनाक अध्ययन करबा लेल अहाँकेँ ओ विचार बा ओ केन्द्र, जकर आधारपर अहाँ एकर विश्लेषण करऽ चाहैत छी, निर्धारित करऽ पड़त। डेरीडा कहै छथि जे कोनो संरचना लेल ओकर संकल्पना-विचार आवश्यक अछि, फेर टुकड़ी-टुकड़ी जोड़ि कऽ अहाँ ओकरा बनायब। मुदा बिनु अन्त सोचने संरचना सम्भवे नै अछि। आ से साहित्यमे सेहो अछि। यावत अहाँ कोनो रचना लेल एकटा स्वयंसिद्ध अर्थ नै ताकि लैत छी ओकर संरचना अहाँ नै ताकि सकै छी, कारण अर्थ माने अन्त ओकर संरचनाकें निर्धारित करैत अछि। से संरचनावादीकेँ अर्थ पहिनहियेसँ पता रहै छै आ तखने ओ ओकर विभिन्न अंग आ तकर आपसी सम्बन्धकेँ विश्लेषित कऽ सकैए। आ यएह विश्लेषणसँ पहिले ज्ञात स्वयंसिद्ध अर्थ अछि डेरीडाक केन्द्र। आ डेरीडा कहै छथि जे यएह निर्धारित करैत अछि जे पाठक संरचना केना बनत, कोन अंगकेँ लेल जायत आ कोन अंगकेँ छोड़ल जायत। से जखन हम साहित्यक संरचनाक विश्लेषण करैत छी तँ ओकर अर्थ आ ओकर प्रभावक गप करैत छी तँ हम ओइ संरचनासँ ओइ तत्त्व सभकेँ चिन्हबाक, फराक करबाक प्रयास करैत छी जे ओइ प्रभाव लेल उत्तरदायी अछि, से ओइ सम्भावित पैटर्नकेँ हम छोड़ि दैत छी जे ओ प्रभाव नै आनत। से ई केन्द्र आरम्भिक स्थल अछि संरचनाकेँ बुझबाक हेतु। मुदा ई विश्लेषणकेँ सीमित सेहो करैत अछि। कारण केन्द्र अपनाकेँ स्थिर रखबाक लेल स्तरीकरणक निर्माण करैत अछि, आ ओकरा पर नियंत्रण करैत अछि। आ ई अर्थक पूर्व ज्ञान पाठकक पूर्व इतिहास आ समकालीन आलोचना सिद्धान्त आ विचारधारापर निर्भर सेहो करैत अछि, ईहो सभ तँ संस्कृतिक अंग अछि तखन केना एकरा सभकेँ संरचनासँ दूर राखल जाइए जे एकरा सभकेँ सीमित करैए मुदा अपने एकरा सभसँ सीमित नै होइए? से अपन विश्लेषणक आधार कोनो स्थायी केन्द्रकेँ बनायब एकटा नुस्खा देब सन अछि आ ई प्रतिक्रियावादी बा यथास्थिवादी स्थिति अछि। आ ऐ सँ मानक आ गएर-तुलनात्मक स्वतंत्र अर्थ निकालबाक मात्र इच्छा सिद्ध होइए। से ई भ्रम जे हम संरचना ताकि रहल छी भ्रमे अछि, वास्तवमे अहाँ पाठ्य सामग्रीसँ संरचनाक निर्माण कऽ रहल छी। से डेरीडाक उत्तर संरचनावादमे सेहो केन्द्रक बिना प्रारम्भ नै भऽ सकैत अछि मुदा ओ ऐ सिद्ध नै भेल स्वयंसिद्धक विखण्डनात्मक विश्लेषणक आधारपर ओइ केन्द्रकेँ दोसर केन्द्र द्वारा स्थानापन्न करैत अछि मुदा ई नव केन्द्र सेहो स्थायी नै रहत। तहिना सुसियो (Saussure) अपन प्रतीक सिद्धान्तमे प्रतीकक विश्लेषण करैत छथि जे कोनो शब्द जेना बिलाड़ि- बिलाड़ि बिलाड़ि अछि कारण ओ किछु आन नै अछि। से शब्द अछि प्रतीक चिन्ह आ जकरा ओ दर्शाबैत अछि से अछि बौस्तु/ प्रतीक। मुदा डेरीडा कहै छथि जे अहू लेल पहिने एकटा संकल्पना आनऽ पड़ैत अछि। आ जँ अहाँ प्रतीक चिन्हकेँ निरपेक्ष बना देब जे ओकर कोनो प्रतीकसँ सम्बन्ध नै छै, जे स्वयंमे एकटा स्वतंत्र संकल्पना अछि आ कोनो प्रतीक/ बौस्तुसँ ओकर कोनो प्रत्यक्ष सम्बन्ध नै छै, मुदा तखन ई संकल्पना सभ प्रतीक चिन्हकेँ पार कऽ जायत आ किछुओ सूचिते नै करत। आ जँ हम प्रतीक आ प्रतीक चिन्हकेँ एक्के मानी तँ प्रतीक चिन्हक जड़ियेपर चोट पहुँचत। से सुसियोक सिद्धान्त तर्काधारितक विपक्षमे अछि जखन ओ कहैत अछि जे प्रतीक चिन्हमे अहाँ प्रतीकक कोनो लक्षण नै देखू। मुदा जखन ओ कहैत छथि जे प्रतीक चिन्ह प्रतीककेँ लक्षित करबा लेल मात्र प्रयुक्त होइत अछि आ तेँ ओकर अधीन अछि ओ तर्क आधारित सिद्धान्तक पक्षमे बुझाइत छथि। से डेरीडा कहैत छथि जे प्रतीक आ प्रतीक चिन्हक ई स्पष्ट भेद मान्य नै अछि, आ प्रतीककेँ प्रतीक चिन्हक ऊपर देल वरीयता सेहो उनटबाक खगता अछि। प्रतीक चिन्हमे अर्थ पहिनहियेसँ विद्यमान नै रहै छै। आ पूर्ण अर्थ कोनो एकटा प्रतीक चिन्हमे नै भेटत। से पाठकेँ अहाँकेँ घोर-मट्ठा करऽ पड़त, आ ई अनन्त खोज दिस अहाँकेँ धकेलत। से ई प्रतीक चिन्ह दोसर प्रतीक चिन्हसँ अपन अन्तरक आधारपर प्रतीक निर्धारण करैत अछि, जतेक बेशी अन्तर ततेक लग अहाँ प्रतीकसँ होइ छी। मुदा ई कहियो नै हएत जे अहाँ सभटा अन्तर ताकि सकब। मुदा प्रतीक चिन्हमे बारम्बारता हेबाक चाही, तखनो जखन एक प्रतीक चिन्ह भिन्न प्रतीकक निर्धारण करैत अछि। आ ऐ लेल ओइ प्रतीक चिन्हक लिखित इतिहास जानब आवश्यक। से प्रतीक चिन्ह विभिन्न अर्थ आ कखनो काल उल्टा अर्थ सेहो देत। डेरीडा लिखै छथि जे प्लेटोसँ सुसियो (Saussure) आ लेवी स्ट्रॉस धरि सभ लिखलाहासँ ऊपर बजलाहाकेँ राखै छथि, कारण लिखब एकटा माध्यम अछि, असल चीज तँ वाणी अछि। सुसियो लिखित रूपमे उच्चारण त्रुटिपर ध्यान दियाबैत छथि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सभ विशेषता जे वाणीमे छै से लेखनमे सेहो छै। आगाँ ओ कहै छथि, प्रतीकक विलुप्ति वाणीमे विचारक प्रत्यक्ष रहबाक भ्रम उत्पन्न करैए। मुदा जँ बाजल वाणीकेँ हम रेकॉर्ड कऽ कय सुनी तँ ओहो लिखल अक्षर सन प्रतीकक शृंखले अछि, जइमे विभिन्न प्रतीककेँ ओकर एक-दोसराक अन्तर सँ चिन्हल जा सकैए। आ लेखन सेहो सामान्य लेखन आ चित्रसँ बुझा कऽ कएल लेखन, ऐ दू तरहेँ भऽ सकैए। 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा' एकर सभक पाछाँ अछि। पाश्चात्य दर्शनक 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा'मे जे मुख्य अछि से अछि सद्यः अनुभव- मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे एहेन कोनो अनुभव परा-भाषा स्तरपर नै होइत अछि, कारण ई अनुभव भाषाक माध्यमेसँ चिन्हल जाइत अछि। फेर ई जे दैवीय चेतनासँ हम परम सत्यकेँ बुझैत छी मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे ई मात्र सर्जकक सृजन अछि। फेर ईहो जे कोनो बौस्तुक पाछाँ सत्य नुकायल अछि, मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे तेहन कोनो स्वतंत्र अस्तित्व नै होइ छै, सभटा निर्माण आ पुनर्निर्माण व्यवस्था द्वारा होइ छै। से सुसियोक स्वतः उपस्थिति किछु नै अछि कारण सभटा व्यवस्थाक अन्तर्गत निर्मित अछि। डेरीडा कहैत छथि जे तर्क ऐ सभटा दार्शनिक चिन्तनक आधार अछि, से कोनो अन्तिम सत्य आ विश्वात्माक परिकल्पना देल जाइत अछि जे सर्वज्ञानी अछि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सिद्ध नै भेल केन्द्रकेँ कखनो गॉड, कखनो विचार आ कखनो विश्वात्मा कहल गेल आ ओ अपनासँ नीचाँ विभिन्न स्तरक निर्माण केलक। से धर्म गॉडकेँ परम सत्य मानलक आ मनुक्ख आ आन रचनाकेँ ओ अपूर्ण, विरोधी आ ई सभटा केन्द्र बनल जे अपना हिसाबे विचार-व्यवस्था बनेबाक दावा केलक। मुदा एकरा सभकेँ व्यवस्थासँ ऊपर हेबाक चाही। से गॉडक स्वतंत्र रूपसँ धर्मक बाहर उपस्थिति हेबाक चाही। उत्तर संरचनावादी विखण्डनवाद एहेन कोनो परासत्यक उपस्थितिकेँ आभासी मानैत अछि उत्तर संरचनावादी भाषाक सिद्धांतक परिणाम मानैत अछि । से ऐ प्रतीक चिन्ह सभक आपसी खेलमे किछु अर्थ कोनो विचारधाराक हस्तक्षेपसँ उच्च स्थान प्राप्त करैत अछि आ ओकर दोसर अर्थ तकर पाछाँ जेबा लेल धकेल देल जाइत अछि। स्वतंत्रता, गणतंत्र, न्याय आदि सन विचारधारा हमरा सभक जिनगीक भाग छी मुदा लागैए जे ओइ सभसँ हमरा सभक जिनगीक बहुत रास अर्थ निकलल मुदा अन्वेषणक उपरान्त ओ सभ दोसर विचारसँ बहार भेल बुझायत। कोनो संकल्पना एहेन नै अछि जइमे दोसर विचारक अवशेष नै भेटय। देखी गुलोक पाठ केना शुरू होइत अछि, ई शुरू होइत अछि तिला सकरांति सँ, आङन नीपि रहल अछि गुलोक छोटकी बेटी रिनियां। गुलो उपन्यासक आरम्भ रिनियाँ सँ किए भेल, गुलोक बेटासँ किए नै भेल। कारण जुलिया क्रिस्टोवाक अनुसारे बेटा अपनाकेँ मायसँ दूर करैत अछि, मुदा बेटीमे ओ लय, ओ गुण रहिते छै से ओ दूर होइतो मायसँ, संस्कृतिसँ लग रहैत अछि। कोनो आन प्रकारसँ ऐ उपन्यासक एतेक नीक आरम्भ नै भऽ सकैत छल। गीत गाबि रहल अछि रिनियाँ, फेर पानिक फाहा जकाँ ओस, पछिया हवा आ मायक चिन्तित हएब। "गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।" बादोमे बेटी आ बेटामे अन्तर छैहे- छौड़ी असकरे कखून घर तऽ कखनू गाछी दौड़ैत रहइ छइ। छौड़ा आठ बजे धरि सुतले रहै छै। आ फेर अबैए जुलिया क्रिस्टोवाक पुरुख, ओकर ऐंठी।"ने चिन्है छिही तऽ चीन्ह ले।" की ई हेंठी अहाँ लुटियन्स जोनमे नै देखै छिऐ, सगरे ई हेंठी भेटत। मानव समाजमे, खास कऽ पुरुख पात्रमे। अपन कथा-कवितापर अपने समीक्षा कऽ आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आयल अछि। ऐ एकमात्र आ पहिल शब्दसँ हमरा वितृष्णा अछि आ तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक विरुद्ध "विदेह" ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर ऐ गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि, ई भाषा जे मरि जायत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की हेतन्हि। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ ऐ रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। आ एतऽ ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक फिक्शन कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लऽ लगातार आबि रहल अछि। आ ई घटना मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि। आब आउ सुभाष चन्द्र यादवक सभटा मूल रचनाक बेरा-बेरी पाठ करी..... घरदेखिया घरदेखियामे ३५ टा लघुकथा अछि। ऐमे दसम नम्बरपर 'काठक बनल लोक' अछि जे नौमा-दसमाक बिहार विद्यालय परीक्षा समितिक पाठ्यक्रममे गल्प गुच्छ कथा संग्रहमे छल आ तेँ ई कथा सभसँ बेशी लोकप्रिय रहल अछि, सभसँ बेशी लोक एकरा पढ़ने छथि, 'घरदेखिया' कथासँ सेहो बेशी। प्रकाशकीय मदनेश्वर मिश्र, अध्यक्ष मैथिली अकादमीक अछि। ओ लिखै छथि जे ओ जाहि वर्गक लोकक सुख-दुख, आशा-आकांक्षा, उदासीनता, आक्रोश एवं सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमिक चित्रण कयलनि अछि से एखन तक उपेक्षिते जेकाँ छल आ ईहो जे हिनक कथा बहुत मार्मिक, शैली सहज एवं स्पष्ट तथा भाषा सरल तथा सभक हेतु बोधगम्य रहैत अछि। १ अभाव (१९७१) लेखकक रचना लिखबाक, कविताकेँ कएक तरहसँ लिखबाक प्रयास। सुभाष चन्द्र यादव ओना तँ कविता नै लिखै छथि मुदा सन् १९७१ मे लिखल प्रस्तुत कथामे छोट-छोट तीनटा कविता लिखि गेल छथि जे साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त मूल आ अनूदित कविता संग्रहक कविता सभसँ कोनो तरहेँ न्यून नै अछि:- पहिल कविता हमर बाँहि आ पीठपर लगाओल गेल बिल्ला बिजली जकाँ छिटक' लागल छल। आ हम कँपैत रहलहुँ आ वचावक दिशामे एहि कोनसँ ओहि कोन धरि भगैत रहलहुँ जाहि कोठलीमे गेलहुँ ओकर देबाल धधक' लागल छलैक कोठलीसँ निकलिते मौसम बदलि गेलैक आ हम मरुभूमिसँ नदी आ पहाड़क अन्तहीन दूरी नपैत रहलहुँ दोसर कविता शब्द संग नहि देलक कहियो इच्छित सन्दर्भसँ अलग बनैत अर्थक दुर्गम पहाड़ असफल रहलहुँ हम कतहु पहुँचबामे एक टा यातनामय संसारमे जीबनक आरम्भ तेसर कविता हमर पहुँच ओत' अछि जाहि मोड़परसँ शब्दक अर्थ परिवर्तित आकारमे आब' लगैत छैक मुदा कविता ऐसँ आगाँ नै बढ़लैक।.. तखन ओ सोचने रहय जे काव्य-रचनाक लेल तीव्र दुःखात्मक आवेग आवश्यक छैक। व्यंग्यात्मक कविता लिखबाक प्रयास केलक मुदा सतही आक्रोश मात्र लिखयलैक। आइ-काल्हिक कथित व्यंग्यकारपर सेहो ई लागू होइत अछि। २ असंगति (१९७८) कुकी आवाज देलकैक... ओकरा हाथमे तराउपरी दूटा कप राखल रहैक। 'आर यू गोइंग टू दैट साइड?' नवीनकेँ तामस उठलैक- कहलैक 'नो', मुदा ओकरा मोनमे होइत रहलैक जे कुकी ओकर बगय देखि के कप लऽ जा कऽ राखय लेल कहय चाहै छल। ३ आँचर (१९६९) आइ फेर नै उबेर भेलैक- डबल सतरिया। आसिन मास जँ बहय इसान, घर-घर कानय गाय-किसान। ओकर साँय सेहो कहै छै- बाजत ने भुकत आ बैसल-बैसल टुकटुक तकैत रहत। सभ ओकर सुखल आँचरकेँ लक्ष्य करै छै। ने धीया ने पूता, की करतैक। रौद कड़गर भऽ गेल छलैक। ओकरा बुझयलैक जेना तुलसी .. फेर पानि ढारऽ पड़तैक। ४ उत्तर मेघ (१९७२) ५ गोटे मौजी, शीबू, कामू, देबू आ विजेन्द्र। एकरे सभक संगे कथा आगाँ बढ़ैत अछि। तीन टा मौगी, तीनू मुसहरनी, ओइमेसँ एकटा बुढ़िया। रुसिनिहारि बुढ़ियाक बेटी। बहुत रास नोछारक चेन्ह चेहरापर। आङीक अभाव आ ध्यान नै देलाक कारण दुनू स्तन झूलि रहल छलैक, शीबू, कामू आ विजेन्द्र ओइ दिस तकैत छल। घरक झगड़ा, पति सेहो रहै जकरा दिस बुढिया संकेत करै छै। पाँचू आगाँ मेला दिस बढ़ि गेल। फेर आगू एकटा बूढ़ लोक भेटलै, .. एकटा मास्टरनीक जासूसी कऽ घुरल छल। आगाँ एकटा करिक्की अधवयसू मौगी।.. मौगी छप्पावला पियरका साड़ी आ लाल ब्लाउज पहिरने छलि।.. एकटा पुरुष संगे एकटा कोठलीमे चल गेलैक। ट्रेनसँ एकटा परिवार उतरलैक, तीन-चारिटा एकतुरिया छौँड़ी सभ.. एक्कोटा नीक नै छैक!- कामू कहलकैक। अहाँक आस-पास की सभ भऽ रहल अछि के की रोजगार कऽ रहल अछि, बेशी लोककेँ ई नै बूझल रहै छै। ५ एक टा दुःखान्त कथा (१९७७) सुगियाक पति अनतऽ गेल रहै, ओ दिअर संगे सम्बन्ध बनबैए, ग्लानि होइ छै। किछु दिनक बाद फेरसँ सभ किछु शुरू भऽ गेल। पाप आकि कोनो पाप नै, दुविधा। ६ एकटा प्रयोग ओहिना (१९७०) ओ दू घण्टासँ होटलमे बैसल कोनो निर्णय लेबासँ असमर्थ दू बेर चाह पीबि चुकल अछि। शिक्षा, राजनीति, कृषि, बेकारी आ बहुत रास सामयिक प्रसंगक चर्चाक स्वर कानसँ निरन्तर टकराइत छै.. जेबीमे बीसटा पाइ होयब.. मित्र आठ आना देने रहैक। सासुर जायत आ पाइ माङत.. जाड़ मास छोड़ि कोनो मौसममे ओ दिनमे सासुर नै जाइत छल। ओकर सासुर पूरा एक्के कोठलीमे रहैत छैक। से जाड़मे दिनोमे छतपर बैसल रहि सकैत अछि। सासु हितोपदेशक मोटरी लऽ कऽ बैसि गेलैक। ७ एक टा सम्बन्धक अन्त (१९७६) खेल शुरू.. प्रदीप, रागिनी दत्ता आ विपुल- जे हारतै से कबाब खुएतै, कबाबमे आठ टाका.. से 'हम' चुप्पे रहलथि, पाइ नै छलन्हि। प्रदीप आ 'हम' एक दिस विपुल आ दत्ता दोसर दिस। विपुल दत्ताक ब्वाय-फ्रेण्ड छल, ओकर व्यवहार मुदा ब्वाय-फ्रेण्डक हिसाबे 'हम'केँ विचित्र आ अनभोआर लगलन्हि। ८ एक दीनक घर (१९७३) ट्रेनक आस, ट्रेन कखन खुजतै, आ जखन खुजलै तँ आउटर सिग्नलपर रुकि गेलै। छोटी लाइन आ कखनो काल बड़ी लाइनक ट्रेन-गाड़ीमे ऐ तरहक घटना होइत रहैत छलै/अछि। बसमे तँ कमसँ कम पता चलैत रहैत छै जे कोन कारणसँ ओ ठाढ़ अछि, मुदा ट्रेनमे नै। तकरे मनोविश्लेषण कएल गेल अछि। ९ कल्पित मृत्यु (१९७०) पति-पत्नी सम्वाद, ससुरक हाकपर पत्नीक जायब। ससुर द्वारा टाका दऽ तँ देब मुदा घुरेबाक अवधि निर्धारित केलापर पतिक खिन्न हएब। आ पत्नीक कहब जे जँए ओ तँए सम्बन्ध आ जऽ पत्नी मरि जाथि तँ फेर ससुरक संग पतिक कोन सम्बन्ध बाँचत।... की अहाँ हमर बहीनसँ कऽ लेबै बियाह? १० काठक बनल लोक (१९७६) ऐ कथा संग्रहक सर्वश्रेष्ठ कथा। रामीक ब्लॉक जायब, घरखस्सीक पचास टाका लेल। ओकर बेटा बदरिया छै काठक बनल, मारि खेलोपर एको ठोप नोर नै खसै छै, आँखि धसल, छातीक सभटा हाड़ जागल, कम्मे बाजै, खेलेबो नै करै, तेना भऽ कऽ ताकै जेना किछु मोन पाड़ैत हो। मुदा जखन रामी रातिकऽ एलै तँ ओ काठक बनल बदरिया पूछै छै-'अँय हौ बाबू, कखन एलहक?" - बाउ हौ, ऊठि गेलहक। आबऽ आबऽ आगि लग आबह। हम तँ अखनियैं एलियै बेटा। -साँझे किएक नै एलहक? ओकर ऐ प्रश्नपर बेलोबाली आ रामीकेँ लगलैक जेना सभटा दुख-संताप मेटा गेल हो। ओ दुनू दिन भरिमे पहिल बेर मुक्त भऽ कऽ हँसलैक। ११ कोनो पतापर (१९७४) परदेशीकेँ चारिटा बच्चाक मायक आ ओकर पत्नीक सन्देश आ उलहनक चिट्ठी। १२ गजखोर आ मजमुङर (१९६८) बेचनीक सासुरमे सभ ओकर दुल्हाकेँ अबारा कहै छै आ ओकरो सभ ओल सन बोल सुनबैत छै, बेचनीकेँ कहै छै गजखोर आ ओकर साँयकेँ मजमुङर। १३ घरदेखिया (१९७४) टाइटल कथा। जगदीश प्रसाद मण्डल सेहो घरदेखिया लिखलन्हि विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ गामक जिनगी (२००९) कथा संग्रहमे संकलित भेल। बिमला, सतरहम साल लगलै, देखलासँ मुदा नै लागै छै, मुँह-कान सुखायल छै। ओकरे देखैले लड़िकाबला सभ आयल छै, कम खर्चामे सभ काज होइ छै। लड़की पसिन्न पड़लै। लड़का डरेबर नै टरकपर खलासी छै। लड़की पसिन्न पड़ै गेलै। लड़का हालेमे कलकत्तासँ गाम आयल छलै एखन तुरते समाद पठाकऽ मङौनाइ खर्चाक घर भऽ जेतै। लगनसँ दस दिन पहिने आबि जेतै, जिनका देखऽ के हेतै, देखि लेतै। १४ चेहरापर जमैत कुहेस (१९७२) प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) आ ओ बालिका। '..राति केबाड़ खुलले राखब।' सूत्रधार कहै छथि, मुदा कहि कऽ बिसरि जाइ छथि। 'केबाड़ खुलल छलैक, कुकूर ढुकि जइतैक तखन?' 'खुलले छलैक!' प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)केँ जेना विश्वासे नै भऽ रहल छलन्हि। १५ चौबटिया (१९६९) प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) होटलमे बैसल, भूखसँ माथ धऽ लेने छन्हि। गाम जाइ छथि, काकाक अलग खिस्सा- तीन माससँ खाली रोटिये खाइत अछि। भातक आँखि नै देखलक अछि। प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)केँ तामस उठै छन्हि- एतेक जनमाकऽ ढेरी कऽ देने छथि आ आबो संयम नै करऽ अबैत छनि। काकाकेँ होइ छन्हि जे प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)केँ खूब रुपैय्या छन्हि, ओ पाइ मंगै छथिन्ह आ पुरनका पाइ मादे कहै छथिन्ह जे पटुआ बटाइ कयने छथि, बेचिकऽ हुनके दऽ देथिन्ह ता दस टाका मांगै छथिन्ह। मुदा प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) तँ पाइक अभावमे दू-दू साँझ भूखल रहि जाइत छथि। बिनु खयने बिदा भऽ जाइत छथि, कोनो संगी सँ पाइ मंगैत छथि, पहिने ओ देनहियो छन्हि, चरियो आना देबा लेल कहैत छथि मुदा ओ एक्को पाइ नै दैत छन्हि। दोसर संगी यदुनन्दन, एक टाका दू बर्ख धरि नै दऽ सकल छलथिन्ह, ओ काते दऽ चलि गेलन्हि। तेसर कालीचरण मुदा ओहो नै कहै छन्हि, फेर होटल, बहुत पहिलुका पाइ बिसरि गेल हेतन्हि, मुदा ओत्तऽ दोसर छौड़ा बैसल अछि।.. कतेक आरामदेह चौबटिया अछि! १६ जासूस कुकूर आ चोर (१९७३) चोरी, थानाकेँ खबरि आ भ्रष्टाचार, जासूसी कुकुरक नामपर दरोगा पाइ मंगै छै, .. कुकुर चोरकेँ धऽ लेतै। सिपाही ५ सय मंगलकै आ तीन सयपर तय तफसिला भेलै। मुदा कुकुर? १७ झालि (१९७३) धनकटनी, आइ नहायल नै भेलै रामाकेँ तँय जरौन लागय लगलैक। गाजा.. दुसधटोलीमे लरमाहा.. चारिये चिलममे लऽ कऽ उड़ि गेलै। बिन्दुआ कहै छै। दुसधटोलीक बिजनेस, मौगी-छौड़ीसभ दिन आ भिनसुरको कऽ कोइला बिछैत छै। मरदसभ दिनमे गाजा बेचैमे रहतऽ आ छौड़ी सभ रातिकऽ। छिनरो भाय दरोगा पहुँचि गेलै, ... पचास टाका चट सिन लऽ लेलकै।.. जट्टा बाला गाजामे निसाँ बड़ जल्दी चढ़ैत छैक। अमेरिकोमे अफ्रीकन-अमेरिकनमे ड्रगक ब्योपार होइ छै, की किछु समानता देखा पड़ल? १८ टिप (१९७४) होटलमे टिप देलापर मोजर आ नै देलापर? १९ डर (१९६९) डरक मनोविज्ञानक विश्लेषण। २० तीर्थ (१९६९) बलबाबालीक अंगनाक खिस्सा। कोनो डाक्टर ओकरा बताहि नै कहतैक... मुदा ओ बताहि अछि। जहिये ओकर दुरागमन भेलैक तहियेसँ भूत लागऽ लगलैक। 'देखैत छिही कुसुमाकेँ। ओकर परतर कहियो हेबही तोरासभ?' से कुसुमा बलबाबाली भऽ गेलि। चारिटा बच्चा, मुदा सोइरी-घरमे सभ बेर मड़ुआक रोटी आ साग भेटैत रहलैक। दिअर पाइ नै दएलकै तैयो सासुकेँ तीर्थ करेतै, ओकरा देखा देतै। प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)सँ किछु टाका मांगै छन्हि, प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)क हाथ छूछ छन्हि, पाइ नै भेटै छै। मुदा ओ बैजनाथजी जेबे टा करतैक। एक-दू सेर चूड़ाक दामे की होयतैक, नेङरा दिअरकेँ देखा देतै। .. मुदा हरहर-खटखट कऽ कय जेनाइ ठीक नै होइतै तेँ ओ नै गेलि। २१ धुंधमे घटना (१९७०) कथाक पहिल दोसर तेसर स्थिति, फेर कथा संयोजकक दूटा समाद। आ कथाक अन्तिम स्थिति। पहिल स्थितिमे भावकेँ छुबैत बा नै छुबैत पुरबा-पछबा, वातवरण टिनहा मकान, गुलमोहरक गाछ, घास, दूभि। दोसर स्थितिमे साँझ, बगड़ाक खोंता आ मकड़ाक जाल। पुरान बिन मतलबक कागच। भरि दिन फाइल उघलाक बाद कोठलीसँ एक आदमी बजार गेल छथि। तेसर स्थितिमे एकटा महिला जे कथा शुरू होइसँ पहिने कोठली छोड़ि देने छथि, ओ जँ आबि जेतीह तँ की-की हएत से सभ। अन्तिम स्थितिक पहिने दूटा समाद- पहिल फाइलेरिया ग्रस्त प्रकाश- माने पिरौंछ आ दोसर गर्भसँ बहार होइत मृत बच्चा। आ कथाक अन्तिम स्थितिमे सड़कक लेल 'वेश्या सड़क' कहल गेल छै, एकर लतमर्दन होइ छै तेँ शाइत। पएर सुन्न आ भारी मुदा सांत्वना लेल वाक्य सभक टुकड़ी बनि-बनि आयब। मुदा प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) केँ चाहियन्हि भीड़, इजोत। मुदा अदहा रस्ता आबि भागब बेकार। फेर सुखायल धारक बिम्ब, तकर भित्तापर ठाढ़। चारू दिस कुहेस, ने गाम, ने लोक, ने प्रकाश, ई सभ सभ दिशामे थोड़े-थोड़े दूरपर छै, मुदा एखन से सभ व्यर्थ, अखन धुन्ध आ शून्य मृत्यु सन। की अहाँकेँ 'वेटिङ फॉर गोडो'(सेम्युल बेकेट) मोन नै पड़ैए? २२ धुक्कड़ (१९७०) बस खुजबाक समय नै बुझल अछि। बस आइ भरि दिन एही ठाम रहतैक? कंडक्टरकेँ सभ ठकि लै छै, प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) सेहो। बड्ड कम टिकट बुक होइ छै। मुदा फेर ओ कंडक्टर प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)केँ नै भेटै छन्हि, कि पता नोकरी छोड़ि देने होइ। २३ परिचय (१९७१) नेताजी अपन घर चलबाक आग्रह केलखिन्ह, प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) केँ बुझेलन्हि जे ओ हुनका मोजर देलखिन्ह मुदा संगी संगे जखन ओ हारि थाकि बिदा भेला तँ संगी नाटक कम्पनीक साँझ बला शो देखबाक जिद्द कयलन्हि आ ओतऽ नेताजी... २४ पेट (१९७१) कलीऽऽम!, ओ भीड़मे हेरा जाइत अछि।तीन घण्टा पहिने विनयकेँ हाक, मुदा ओ ध्यान नै देने छल। भूख .. होटलमे ऑर्डर दऽ दिऐ, मुदा पानि मात्र बाजि पाबै छी। दिनक अपेक्षा मोहल्ला शान्त छै। देबालसँ सटल नल कियो खुजले छोड़ि देने छै, हल्ला सहल नै होइत अछि, मुदा ईहो बुझल अछि जे भोरमे बेसी हल्ला हेतै। २५ फँसरी (१९६९) भेलबाबाली काकी, सय बर्खसँ बेसी उमेर, आँखि कमजोर (प्रायः मोतियाबिन्द), खाली छाहे टा देखैत छलीह। कातिक मासक बिम्ब अहू कथामे अछि। अगहनमे धनकटनी होइ छै, ओइसँ एक मास पूर्व माने अगहनक बादक ११म मास, बड्ड कठिन, पैसाक टाँट। प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) लग जाइ छथि, तमाकुल लेल चूना लेल काकी सोर कऽ रहल छथि, भोरेसँ किलोल कऽ रहल छथि। दू-तीन दिनसँ खाली चूने-चून भुकै छथि, चून रहतैक तखन ने कियो देतैक। प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) कनेक चून आनि देलखिन्ह, खैनी चुनाइयो देलखिन्ह। मालिक (बेटा)क खोज करैत छथि,सुपौल जाइबला रहै, मुदा एत्तै छै, माथ फुटैत रहैत छन्हि। पुतोहुकेँ होइ छन्हि जे शिकाइत कऽ रहल अछि, सहन नै कऽ सकलि। मुदा बुढियाक कान सेहो कमजोर छै, सुनि नै सकलि। अखन मरि जेतै तँ भोजो-भात कोना हेतै, बाइस टा झंझटि छै- प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) कहै छथिन्ह। काकी तीन-चारि दिन गरदनिमे फसरी लगौने रहलथि, माहुर सेहो एक दिन खेलथि तइयो नै मुइलथि, फसरी कसले नै गेलैक तँ केना मरितथि। २६ फुकना (१९७०) प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) मामागाममे छथि, मुदा हुनका ओतऽ दू रङक व्यवहार बुझना जाइ छन्हि। स्कूलसँ आबि बेरहट करबाक बदला दोआरि खरड़ैत रहलाह। भौजीकेँ गारि पढ़लन्हि तँ ओ हिनका बुझेलखिन्ह जे ओ छोटकी भौजी नै छथि एक्के चाटमे मुँह लाल कऽ देथिन्ह। नानी बचबिथिन्ह मुदा हुनकर कान-आँखि दुनू खराप छलन्हि। साइकिलक मिस्त्रियाइ शुरू केलन्हि आ बॉलपिन उड़ि गेलै। बॉलपिन भेटलन्हि तकर बदलामे तीन दर्जन फुकना किनलन्हि। रविन्दरकेँ किछु फुकना भेटलै, जेबीमे भूर छलन्हि, ओ नै गछलकन्हि तँ ओकरा पिटलन्हि। बाबू मोन पड़लन्हि। नानीकेँ पुछलखिन्ह- बाबू कहिया औथिन? २७ बाँझ (१९६८) साओन मास, थाल कीच, दुआरि अङना सगरो, चाली सोहरैत। दुखनीक पहिल साओन आ तखनो ओकरा सासुरेमे छोड़ि देलिऐ? दुखनी मायकेँ रामपुरवाली पुछलकै। डेढ़ बीघा जमीन बाँचल छै, सेहो दर-दियाद हड़पऽ चाहै छै। पतिक अवसान, दुखनीक बियाहक झंझटि- अरर मरर के झोपड़ी, सीता माइक खोपड़ी राखि लैह- राखि लैह। चार हटाओल गेल, दुखनी माय मुइल पड़ल। संयोगसँ दुखनी पड़ाकऽ आयलि, ओही दिन साँझमे। रामपुरबाली आन माउग लग तकर प्रचार केलनि- आन आने होइ छै- कहलकै- चास दी बास नै दी। दुखनी बिदा भऽ गेलि। मौसी ओहिठाम दुखनीक बड्ड आदर भाव होइ छलै, मौसा-मौसीक स्वार्थ भावकेँ ओ नै बूझि सकल। मुदा उड़न्ती उड़ऽ लगलै तँ मौसी पुछलकै जे सासुरसँ कियो किए नै अबै छै। -ओ सभ हमरा बाँझ बुझै छथि। मौसा-मौसी ओकर जमीन लिखबा लेलकै, लोक पुछतै तँ कहि देतै जे बियाहमे खर्च भऽ गेलै, बियाहक खर्च तँ बुढ़बे वरकेँ लगतै ऊपरसँ पाँचसय रुपैय्यो देतै। २८ बेर-बेर (१९७९) हरिवंश आ रघुवंश फस्ट क्लासमे आधा दूरीसँ बेशीक टिकट कटा लेने रहय। आब दस टा टीशन आर पार करबाक छलै। मुदा हरिवंशकेँ टी.टी. पकड़ि लेलकै। ओकरा जहल भऽ गेलै, मुदा एक दिन रघुवंश आबि कऽ ओकर जुर्माना भरि देलकै। २९ महिमा (१९७५) मीटिंग करै काल पुलिस पकड़ि कऽ सुखदेवकेँ लऽ गेलै जेल। एक मासमे छुटलै, मीसामे पकड़ायल रहै। ओ थोड़े दिन नक्सली रहै आ सरकारी बान्ह काटबाक कारणसँ पहिनहियो आठ दिन जेलमे छलै। भोटमे कतेक गोटे सँ टाका ठकने रहै। लड़ाइ-झगड़ा खूब होइ, नै ककरो तँ नरकटियेबालीकेँ धुमधुमा दै। जेलसँ नै किछु तँ चारि सय केर कपड़ा लऽ कऽ घुरल हेतै। ३० रामनिहोर (१९७५) मेसक हेल्पर रामनिहोर फैजाबाद जिलामे कोनो स्त्रीकेँ प्रतिमास दू सय टाका पठबैत छल। प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)सँ होल्डाल मांगि दस दिनक छुट्टीपर गाम गेल, दस दिन भऽ गेलै, साँझ धरि ओ आबि सकैए, होल्डाल ले एतेक चिन्तित नै हेबाक चाही। ३१ लिफ्ट (१९८०) मिसेज कपूरसँ लिफ्ट लेब मनोजकेँ भारी पड़ि गेलै, कारण दिवाकरकेँ ओ जनै छली, ओकरा संगे मनोज किए गाड़ीमे चढ़ि गेल। ३२ संकेत (१९७४) रूम नम्बर नाइनमे छह टा सीट छै। ओकरा उठऽ दहिक तँ बेड बिछा लिहेँ। ओना क्यो सूति रहतौक। ३३ सहरसा दुपहर राति (१९७२) सुभाष, महाप्रकाश आ सुकान्त। सुकान्त भीड़सँ भागय चाहैत अछि, सुभाष निर्णयहीन अछि। महाप्रकाशकेँ ओतेक सोचय नै पड़ैत छैक। सुभाष कोनो छौड़ीक पीठपर जड़ैत सिगरेटक टुकड़ी फेकय चाहैत अछि। तीनूकेँ रातिमे घुमबाक लेल पुलिस पकड़ि लैत अछि। ३४ सिकरेट (१९६९) सिकरेटक तलब, नोकरसँ मंगैत अछि मुदा ओ तँ मालिकक अधकट्टी निकालि कऽ पिबैत अछि। आ एकटा परिचित, किछु चतुरताइ आ विल्स फिल्टर भेटि गेलै। ३५ सुरंग (१९७२) प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) आ किशोरी भाय पहुँचला शीला आ ओकर इंजीनियर पति लग। की इंजीनियर शंकालु भेल शीला आ किशोरी भायक प्रति? शीला किए नैहरमे रहय लगली। बेनी डेढ़ बरखक, एकटा अबोध बच्चाक दूध आ बिस्कुट छीनिकेँ ओ कोन प्रतिशोध लेबऽ चाहैत अछि, से चिट्ठीमे प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) पढ़ने रहथि। मुदा ओतऽ इंजीनियर बेबी संगे खेला रहल अछि। इंजीनियर लैम्प वर्क्समे काज करैत अछि। किशोरी भाय सिक्सटी वॉटक बल्ब प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) केँ पकड़बैत बिदा होइ छथि मुदा आगाँ गेलापर प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)केँ पता चलैत छन्हि जे ओ फ्यूज छै, से प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार)केँ ओकरा बदलि अनबा ले कहै छथिन्ह। घरदेखियाक कथा सभक थीम देखू, बदरियाक रेखा चित्र देखू (काठक बनल, मारि खेलोपर एको ठोप नोर नै खसै छै, आँखि धसल, छातीक सभटा हाड़ जागल, कम्मे बाजै, खेलेबो नै करै, तेना भऽ कऽ ताकै जेना किछु मोन पाड़ैत हो।), विवाहेत्तर सम्बन्धक कथा, प्रोटैगोनिस्टक गरीबी, खेखनियाँ। कएक टा कथा मे सुभाष अबै छथि आ एकटा कथामे सुभाष, महाप्रकाश आ सुकान्त तीनू [सहरसा दुपहर राति (१९७२)]। नित नवल राजकमल (राजकमल मोनोग्राफ) [राजकमल चौधरी मोनोग्राफ (जनवरी १९९७ मे साहित्य अकादेमी द्वारा रिजेक्ट, रचना पत्रिकामे दिसम्बर २००५- मार्च २००६ अंकमे आ २०२२ मे "नित नवल राजकमल" नामसँ प्रकाशित)] राजकमल जी (विनिबंध) क प्रकरण कान मे पडल तँ छल, से कतोक वर्ख भऽ गेलै आब। मुदा से एहन कुरूप छैक से अहींक समादमे स्पष्ट भेलय। तें एकर धन्यवाद अहीं केँ दैत छी गजेन्द्र जी। ओना वास्तविकता तँ ई जे सम्पूर्ण पढबासँ पहिने मोन 'विरक्त' भऽ गेल | नै पढ़ि भेल आगाँ! नीक केलौहेँ नेट पर दऽ कऽ। समकालीन आ आगत पीढ़ी सेहो बुझओ ई कारी-कथा! हमरा सन लोकक विडम्बना देखू जे पूरा प्रकरण अपन अनुज-मित्र-अग्रज सँ जुडल अछि। से एहन ऐतिहासिक दुर्घटना भऽ गेल अछि! उत्तरदायी व्यक्तिगत हम कतहु सँ नै। मुदा साहित्यिक पीढ़ीक नैतिकता सँ "अपराध बोध" सहबा लेल अभिशप्त छी। उपाय?- सस्नेह, गंगेश गुंजन ११ सितम्बर २०१२ (विदेह ११७) राजकमल मोनोग्राफ साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग द्वारा मोहन भारद्वाजक किरदानी आ राजमोहन झा केर सहयोगसँ अस्वीकृत भेल छल सन् जनवरी १९९७ ई मे आ तइ कृत्य लेल राजमोहन झाकेँ साहित्य अकादेमी द्वारा १९९६ ई. क मैथिलीक मूल पुरस्कारसँ पुरस्कृत कएल गेल सन् १९९७ मे। संगहि ओही कृत्यक सम्पादन लेल मोहन भारद्वाज साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक सदस्य बनाओल गेले छलाह। नित नवल राजकमल (राजकमलक जीवन) समर्पित अछि- धर्मप्राण संतोष कुमार कुन्दन सुव्रता गिरिवर कृष्ण राधे राधे । नित नवल राजकमल - दन्तकथाक नायक राजकमल चौधरी (मणीन्द्र नारायण चौधरी प्रसिद्ध फूल बाबू) १९२९-१९६७, महिषी, सहरसा। रचना- आदि कथा, आन्दोलन, पाथर फूल (उपन्यास), स्वरगंधा (कविता संग्रह), ललका पाग (कथा संग्रह), कथा पराग (कथा संग्रह सम्पादन)। भूकम्प, बंगाली संन्यासिन आ रासलीलाक चित्र राजकमलक आत्मवक्तव्यपर आधारित अछि। १९३४क भूकम्पक स्मृति, धरती कड़कड़ायल आ हुनकर माय बाबू अपन जानक चिन्तामे लागि गेला हिनका छोड़ि देलखिन्ह। फेर ओइ भूकम्पक थोड़बे दिन बाद आयलि एकटा बंगाली संन्यासिन, कोनो तीर्थमे हुनकर माँ सँ ओइ संन्यासिनक भेँट छलनि। हुनका ओ अपना संगे चलै ले कहलखिन्ह आ ओहो जाय चाहैत छला। एकटा रासलीलाक चित्र देखलन्हि कृष्ण आ कएकटा गोपी। राजकमल ऐ सभ गपकेँ हवा देलन्हि। सभ अपन व्यक्तित्व लेल/ विचारधारा लेल कोनो बहन्ना तकैत अछि। राजकमल ई मार्केटिंग स्ट्राटेजी सेहो छल। नित नवल राजकमल - जीवन कोनो खास नै, वएह पहिल पत्नीमे बच्चा नै, से दोसर विवाह (रामपुर हवेली राजकमलक माय) मायक मृत्यु आ पिताक दोसर फेर तेसर बियाह हिनकर उमेरक युवतीसँ । राजकमल अपन पिता मधुसूदन चौधरीकेँ लाल कक्का कहै छला। तेसर विवाहक एकटा पुत्री मदालसा जीवित रहलखिन्ह, हुनकासँ राजकमलकेँ स्नेह छलन्हि। पिता आज्ञा, उपदेश आ मारिपीटक माध्यमसँ ब्राह्मण संस्कारमे दीक्षित केलखिन्ह। राजकमल केँ मैट्रिक पास करबासँ पूर्वे गीता आ दुर्गासप्तशतीक सभटा श्लोक कंठस्थ भऽ गेलन्हि। पिताक ट्रांसफरक संग एत्तऽ सँ ओत्तऽ घुमैत रहलथि, नवादासँ पटना एला बी.एन.कॉलेजमे नामांकन, पिता ४४२ टा निषेध मंत्र देलखिन्ह जे की-की नै करिहऽ। प्रेम सम्बन्ध- पहिल प्रेम सम्बन्ध पटनामे शोभना झा संगे। एक बेर आइ. कॉममे फेल, फेर बी. कॉममे एक बेर फेल। १९५१ मे चानपुरा (दरभंगा)क शशिकान्ता सँ विवाह। बी. कॉम केर बाद पढ़ाइ समाप्त। विवाहक बाद किछु दिन पटनामे कोनो अखबारमे प्रूफरीडर, फेर सचिवालयमे लोअर डिवीजन क्लार्क। दरभंगा, पटना, दिल्ली, मसूरी, फेर कलकत्ता। ओतहियेसँ मसूरीक सावित्री शर्मासँ पत्राचार, १९५६मे हुनका संग विवाह, फेर संतोष नामक स्त्री (प्रायः सावित्रीक भतीजी) सँ प्रेम, गर्भावस्थामे सावित्रीकेँ छोड़ि ३ जुलाइ १९५७केँ मसूरीसँ पलायन। फेर पटना, दरभंगा आ नवादा तीन- चारि मास धरि आ तखन कलकत्ता, हिन्दी लेखक छेदीलाल गुप्तक नामे यात्रीक चिट्ठी लऽ कऽ। बाबू साहेब चौधरीक मिथिला दर्शनसँ जुड़ि गेला। फेर भारतीय ज्ञानपीठ (कलकत्ता), पत्नी संगे छलथिन्ह। फेर नोकरी छोड़ि रागरंग बहार केलन्हि मुदा ओ बन्द भऽ गेल। छओ बर्खक कलकत्ता प्रवासमे बहुत साहित्य लिखलनि। शरीर दुर्बल, पेट पर जे लम्प छलन्हि से कलकत्ते मे शुरू भेलन्हि। फेर दिल्ली। कीर्ति नारायण मिश्र, जीवकान्त आ हंसराज संग पत्र व्यवहार होइन्हि। फेर अक्टूबर ६३ मे ओ पटनामे स्थिर भऽ गेलाह। १९६६, शशि, दिव्या, मुक्ता,नीलू नवादासँ भेँट करैले एलखिन्ह। बनारसक अलका संगे पत्राचार, अन्तिम प्रेम प्रसंग। नवम्बर १९६६ क पहिल सप्ताहमे ओकरासँ भेँट करय बनारस गेलाह। साम्यवादी आलोचक नामवर सिंह एक टा पोस्टकार्डो देब उचित नै बुझलनि, नईं कहानियाँमे मधुकर गंगाधरक वक्तव्य छपल जे राजकमलक बीमारीक इलाज चलि रहल अछि, ओ अभाव आ उपेक्षाक बहाना कए लोकसँ पाइ ऐंठय चाहैत छथि। ओ चिट्ठी लिखि कऽ लहरक सम्पादक प्रकाश जैन आ मनमोहिनीकेँ सेहो भड़कौलनि। राजकमल डायरीमे लिखलनि- मधुकर एण्ड लहर पीपुल्स हैभ जोइण्ड हैण्ड्स इन डर्टी प्रोपेगैण्डा अगेंस्ट मी। एक दिन डॉ चतुर्वेदी हुनका कहलकनि जे अहाँक शिश्न मे यूरेथ्रल कैंसर भऽ सकैत अछि आ जँ से भेल, तखन शिश्न काटय पड़ि सकैत अछि। राजकमल डायरीमे लिखलनि- इफ आइ हैभ टू कट माइ पेनिस, आइ विल कमिट सूसाइड। सभसँ बेशी सेवा चन्द्रमौलि उपाध्याय दुनू व्यक्ति केलखिन्ह, आर्थिक रूपेँ सेहो, राजकमलक मृत्युक बहुत दिन बाद चन्द्रमौलि उपाध्याय दुनू व्यक्ति आत्महत्या कऽ लेलनि। राजकमलक देहगाथा हिनके दुनू गोटेकेँ समर्पित अछि। हंसराज आ आलोक धन्वा देखैले अबथिन्ह अस्पताल। राजकमलक चारि भाँय पटनामे रहथिन्ह, तीन भाँयकेँ नोकरी सेहो रहन्हि मुदा एक पाइक दबाइयो अनबाक कष्ट ओ सभ नै केलन्हि। जून १९६७मे मृत्यु। नित नवल राजकमल - मैथिली साहित्य राजकमल एक सय कविता, तीनटा उपन्यास, ३७टा कथा, तीन टा एकांकी आ चारि टा आलोचनात्मक निबन्ध लिखलनि। स्वरगंधामे राजकमलक नवम्बर १९५७ सँ अप्रैल १९५८ धरिक कलकत्ता प्रवासमे लिखल गेल कविता संकलित अछि। ओ यात्रीकेँ अर्वाचीन होइतो आधुनिक नै मानैत छथि। राजकमल उपन्यास लिखलनि आन्दोलन, पाथर फूल आ आदिकथा। लिली रेक रंगीन परदा हुनका एमाइल जोलाक उपन्यास लज्जाक स्मरण करा देलकन्हि। रमानाथ झा परम्परावादी चिन्तनक कारणेँ राजकमलक साहित्यक सम्पूर्ण शिल्पकेँ कृत्रिम घोषित कऽ देलन्हि। बनैत बिगड़ैत सुभाषचन्द्र यादवजीक "बनैत बिगड़ैत" कथा-संग्रहक सभ कथामे सँ अधिकांशमे ई भेटत जे कथा खिस्सासँ बेशी एकटा थीम लऽ आगाँ बढ़ल अछि आ अपन काज खतम करिते अन्त प्राप्त कएने अछि। दोसर विशेषता अछि एकर भाषा। बलचनमाक भाषा ओइ उपन्यासक मुख्य पात्रक आत्मकथात्मक भाषा अछि मुदा एतए ई भाषा कथाकारक अपन छन्हि आ तइ अर्थेँ ई एकटा विशिष्ट स्वरूप लैत अछि। एक दिस कथाक उपदेशात्मक खिस्सा-पिहानी स्वरूप ग्रहण करबाक परिपाटीक विरुद्ध सुभाषजीक कथाकेँ एकटा सीमित परिमितिमे थीम लऽ कऽ चलबाक, भाषाक शिल्प जे खाँटी देशी अछि पर ध्यान देबाक सम्मिलित कारणसँ पाठकक एक वर्गकेँ ऐ संग्रहक कथा सभमे असीम आनन्द भेटतन्हि तँ संगे-संग खिस्सा-पिहानीसँ बाहर नै आबि सकल पाठक वर्गकेँ ई कथा संग्रह निराश नै करत वरन हुनकर सभक रुचिक परिष्करण करत। किछु भाषायी मानकीकरण प्रसंग- जेना ऐछ, अछि, अ इ छ । जइ कालमे मानकीकरण भऽ रहल छल ओइ समय ऐपर ध्यान देबाक आवश्यकता रहय। जेना "जाइत रही" केँ "जाति रही" लिखी आ फेर जाति (जा इ त) लेल प्रोनन्सिएशनक निअम बनाबी तेहने सन ऐछ संगे अछि। मुदा आब देरी भऽ गेल अछि से लेखको कनियाँ-पुतरा मे एकर प्रयोग कऽ दिशा देखबैत छथि मुदा दोसर कथा सभमे घुरि जाइत छथि। मुदा ऐसँ ई आवश्यकता तँ सिद्ध होइते अछि जे एकटा मानक रूप स्थिर कएल जाय आ "छै" लिखबाक अछि तँ सेहो ठीक आ "छैक" लिखबाक अछि तँ "अन्तक 'क' साइलेन्ट अछि" से प्रोनन्सिएशनक निअम बनय। मुदा से जल्दी बनय आ सर्वग्राह्य हुअय तकर बेगरता हमरा बुझाइत अछि, आजुक लोककेँ "य" लिखल जाए वा "ए" ऐपर भरि जिनगी लड़बाक समय नै छै, जे ध्वनि सिद्धांत कहैत अछि से मानू, य व्यंजन थिक आ ए स्वर, से एकक बदला दोसरक सर्वभौम प्रयोग असम्भव। आ सेनै हुअय तँ प्रोनन्सिएशनक निअम बनाउ। "नहि" लेल "नञि" लिखब तँ बुझबामे अबैत अछि मुदा नइँ (अन्तिका), नइं (एन.बी.टी.) आ नँइ (साकेतानन्द - कालरात्रिश्च दारुणा) मे सँ साकेतानन्दजी बला प्रयोग ध्वनि-विज्ञान सिद्धांतसँ बेशी समीचीन सिद्ध होइत अछि आ से विश्वास नै हुअए तँ ध्वनि प्रयोगशाला सभक मदति लिअ। "बनैत बिगड़ैत" पोथीक ई एकटा विशेषता अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजी अपन विशिष्ट लेखन-शैलीक प्रयोग कएने छथि जे ध्वन्यात्मक अछि आ मानकीकरण सम्वादकेँ आगाँ लऽ जेबामे सक्षम अछि। स्वतन्त्रताक बादक पीढ़ीक कथाकार छथि सुभाषजी। कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कऽ कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष तँ ऐ स्थितिमे हिनकर कथा सभमे भेटब स्वाभाविके। कएक दशक पूर्व लिखल हिनक कथा "काठक बनल लोक" क बदरिया साइते संयोग हंसैत रहय। एहु कथा संग्रहक सभ पात्र एहने सन विशेषता लेने अछि। हॉस्पीटलमे कनैत-कनैत सुतलाक बाद उठि कऽ कोनो पात्र फेरसँ कानय लगैत छथि तँ कोनो पात्र प्रेममे पड़ल छथि। किनकोमे बिजनेस सेन्स छन्हि तँ हरिवंश सन पात्र सेहो छथि जे उपकारक बदला सिस्टम फॉल्टक कारण अपकार कऽ जाइत छथि। आब "बनैत बिगड़ैत" कथा संग्रहक कथा सभपर गहिंकी नजरि दौगाबी। कनियाँ-पुतरा- ऐ कथामे रस्तामे एकटा बचिया लेखकक पएर छानि फेर ठेहुनपर माथ राखि निश्चिन्त अछि, जेना माएक ठेहुनपर माथ रखने हुअय। नेबो सन कोनो कड़गर चीज लेखकसँ टकरेलन्हि। ई लड़कीक छाती छिऐ। लड़की निर्विकार रहय जेना बाप-दादा वा भाय बहिन सऽ सटल हो। लेखक सोचैत छथि, ई सीता बनत की द्रौपदी। राबन आ दुर्जोधनक आशंका लेखककेँ घेर लैत छन्हि। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद वएह सड़कक चौबटिया अछि आ वएह रेड-लाइटपर गाड़ी चलबैत-रोकैत काल बालक-बालिका सभ देखबामे अबैत छथि। मुदा आब दृष्टिमे परिवर्तन भऽ जाइत अछि। कारक शीसा पोछि पाइ मंगनिहार बालक-बालिकाकेँ पाइ-देने वा बिन देने, मुदा बिनु सोचने आगाँ बढ़ि जाएबला दृष्टिक परिवर्तन। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद की हुनकर दृष्टिमे कोनो परिवर्तन नै होयतन्हि? बालक तँ पैघ भऽ चोरि करत वा कोनो ड्रग कार्टेलक सभसँ निचुलका सीढ़ी बनत मुदा बालिका ? ओ सीता बनत आकि द्रौपदी आकि आम्रपाली। जे सामाजिक संस्था, ह्यूमन राइट्स ऑरगेनाइजेशन कोनो प्रेमीक बिजलीक खाम्हपर चढ़ि प्राण देबाक धमकीपर नीचाँ जाल पसारि कऽ टी.वी.कैमरापर अपन आ अपन संस्थाक नाम प्रचारित करैत छथि ओ ऐ कथाकेँ पढ़लाक बाद ओइ पुरातन दृष्टिसँ काज कऽ सकताह? ओ सरकार जे कोनो हॉस्पीटलक नाम बदलि कऽ जयप्रकाश नारायणक नामपर करैत अछि वा हार्डिंग पार्कक नाम वीर कुँअर सिंहक नामपर कऽ अपन कर्त्तव्यक इतिश्री मानि लैत अछि ओ समस्याक जड़ि धरि पहुँचि नव पार्क आ नव हॉस्पीटल बना कऽ जयप्रकाश नारायण आ वीर कुँअर सिंहक नामपर करत आकि दोसरक कएल काजमे "मेड बाइ मी" केर स्टाम्प लगाओत? ई संस्था सभ आइ धरि मेहनतिसँ बचैत अयबाक आ सरल उपाय तकबाक प्रवृत्तिपर रोक नै लगाओत? असुरक्षित- ट्रेनसँ उतरलाक बाद घरक २० मिनटक रस्ताक राति जतेक असुरक्षित भऽ गेल अछि तकर सचित्र वर्णन ई कथा करैत अछि। पहिने तँ एहन नै रहैक- ई अछि लोकक मानसिक अवस्था। मुदा ऐ तरहक समस्या दिस ककरो ध्यान कहाँ छै। पैघ-पैघ समस्या, उदारीकरण आन कतेक विषयपर मीडिआक ध्यान छै। चौक-चौराहाक ऐ तरहक समस्यापर नव दृष्टि अबैत अछि, ऐमे स्टेशनसँ घरक बीचक दूरी रातिक अन्हारमे पहाड़ सन भऽ जाइत अछि। प्रदेशक तत्कालीन कानून-व्यवस्थापर ई एक तरहक टिप्पणी अछि। एकाकी- ऐ कथामे कुसेसर हॉस्पीटलमे छथि। हॉस्पीटलक सचित्र विवरण भेल अछि। ओतय एकटा स्त्री पतिक मृत्युक बाद कनैत-कनैत प्रायः सुति गेलि आ फेर निन्न टुटलापर कानय लागलि। एना होइत अछि। कथाकार मानव जीवनक एकटा सत्यता दिस इशारा दैत आ हॉस्पीटलक बात-व्यवस्थापर टिप्पणी तेना भऽ कऽ नै वरण जीवन्तता देखा कऽ करैत छथि। ओ लड़की- ऐ कथामे हॉस्टलक लड़का-लड़कीक जीवनक बीच नवीन नामक युवक एकटा लड़कीक हाथमे ऐंठ खाली कप, जे ओइ लड़कीक आ ओकर प्रेमीक अछि, देखैत अछि। लड़की नवीनकेँ पुछैत छै जे ओ केम्हर जा रहल अछि। नवीनकेँ होइत छै जे ओ ओकरा अपनासँ दब बुझि कप फेंकबाक लेल पुछलक। नवीन ओकरा मना कऽ दैत अछि। विचार सभ ओकर मोनमे घुरमैत रहैत छै। ई कथा एकटा छोट घटनापर आधारित अछि...जे ओ हमरा दब बूझि चाहक कप फेकबाक लेल कहलक? आ ओ दृढ़तासँ नै कहि आगाँ बढ़ि जाइत अछि। एकाकी जेकाँ ई कथा सेहो मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपर आधारित अछि। एकटा प्रेम कथा- पहिने जकरा घरमे फोन रहैत छल तकरा घरमे दोसराक फोन अबैत रहैत छल, जे एकरा तँ ओकरा बजा दिअ। लेखकक घरमे फोन छलन्हि आ ओ एकटा प्रेमीक प्रेमिकाक फोन अयलापर, ओकर प्रेमीकेँ बजबैत रहैत छथि। प्रेमी मोबाइल कीनि लैत अछि से फोन आयब बन्द भऽ जाइत अछि। मुदा प्रेमी द्वारा नम्बर बदलि लेलापर प्रेमिकाक फोन फेरसँ लेखकक घरपर अबैत अछि। प्रेमिका, प्रेमीक ममियौत बहिनक सखी रितु छथि आ लेखक ओकर सहायताक लेल चिन्तित भऽ जाइत छथि। ऐ कथामे प्रेमी-प्रेमिका, मोबाइल आ फोन ई सभ नव युगक संग नव कथामे सेहो स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि। टाइटल कथा अछि बनैत-बिगड़ैत। तीन टा नामित पात्र । माला, ओकर पति सत्तो आ पोती मुनियाँ । गाम-घरक जे सास-पुतोहुक गप छै, सेहन्ता रहि गेल जे कहियो नहेलाक बाद खाइ लेल पुछितए, एहन सन। मुदा सैह बेटा-पुतोहु जखन बाहर चलि जाइत छथि तँ वएह सासु कार कौआक टाहिपर चिन्तित होमए लगैत छथि। माइग्रेशनक बादक गामक यथार्थकेँ चित्रित करैत अछि ई कथा। सत्तोक संग कौआ सेहो एक दिन बिला जायत आ मुनियाँ कौआ आ दादा दुनूकेँ तकैत रहत। प्रवासीक कथा, बेटा-पुतोहुक आ पोतीक कथा, सासु-पुतोहुक झगड़ा आ प्रेम! अपन-अपन दुःख कथामे पत्नी, अपन अवहेलनाक स्थितिमे, धीया-पुताकेँ सरापैत छथि। रातिमे धीया-पुताक खेनाइ, खा लेबा उत्तर भनसाघरक ताला बन्द रहबाक स्थितिमे पत्नीक भूखल रहब आ परिणामस्वरूप पतिक फोंफक स्वरसँ कुपित हएब स्वाभाविक। सभक अपन संसार छै। लोक बुझैए जे ओकरे संसारक सुख आ दुःख मात्र सम्पूर्ण छै मुदा से नै अछि। सभक अपन सुख-दुःख छै, अपन आशा आ आकांक्षा छै। कथाकार ओहन सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि, जे हुनकर अनुभवक अंतर्गत अबैत छन्हि। आत्मानुभूति परिवेश स्वतंत्र कोना भऽ सकत आ से सुभाष चन्द्र यादवजीक सभ कथामे सोझाँ अबैत अछि। आतंक कथामे कथाकारकेँ पुरान संगी हरिवंशसँ कार्यालयमे भेँट होइत छन्हि। लेखकक दाखिल-खारिज बला काज ऐ लऽ कऽ नै भेलन्हि जे हरिवंशक स्थानान्तरणक पश्चात् ने क्यो हुनकासँ घूस लेलक आ तइ द्वारे काजो नै केलक। हरिवंशक बगेबानी घूसक अनेर पाइक कारण छल से दोसर किएक अपन पाइ छोड़त ? लेखक आतंकित छथि। कार्यालयक परिवेश, भ्रष्टाचार आ एक गोटेक स्थानांतरणसँ बदलैत सामाजिक सम्बन्ध ई सभ एतऽ व्यक्त भेल अछि। आइ काल्हि हम आकि अहाँ ब्लॉकमे वा सचिवालयमे कोनो काज लेल जाइत छी, तँ यैह ने सुनऽ पड़ैत अछि, जे पाइ जे माँगत से दऽ देबैक आ तखन कोनो दिक्कत हुअय तँ कहब ! आ पाइक बदला ककरो नाम वा पैरवी लऽ गेलौं तँ कर्मचारी ने पाइये लेत आ नहिये अहाँक काज हएत। एकटा अन्त कथामे ससुरक मृत्युपर लेखकक साढ़ू केश कटेने छथि आ लेखक नै, ऐपर कएक तरहक गप होइत अछि। साढ़ू केश कटा कऽ निश्चिन्त छथि। ई जे सांस्कृतिक सिम्बोलिज्म आयल अछि, जे पकड़ा गेल से चोर आ खराप काज केनिहार, जे नै पकड़ाएल से आदर्शवादी। पूरा-पूरी तँ नै, मुदा अहू कथामे एहने आस्था जन्म लैत अछि आ टूटि जाइत अछि। हरियाणामे बापो मरलापर लोक केश नै कटबैत अछि, तँ की ओकर दुःखमे कोनो कमी रहैत छै तेँ ? पंजाबक महिला एक बरखक बाद ने सिनूर लगबैत छथि आ ने चूड़ी पहिरैत छथि मुदा पहिल बरख कान्ह धरि चूड़ी भरल रहैत छन्हि, तँ की बियाहक पहिल बरखक बाद हुनकर पति-प्रेममे कोनो घटंती आबि जाइत छन्हि ? कबाछु कथा मे चम्पीबलाक लेखक लग आयब, जाँघपर हाथ राखब। अभिजात्य संस्कारक लोक लग बैसल रहबाक कारणसँ लेखक द्वारा ओकर हाथ हटायब । चम्पीबला द्वारा ई गप बाजब जे छुअल देहकेँ छूलामे कोन संकोच। जेना चम्पीवला लेखककेँ बुझाइय रहन्हि जे हुनका युवती बुझि रहल छलन्हि। लेखककेँ लगैत छन्हि जे ओ स्त्री छथि आ चम्पीबला ओकर पुरान यार। ठाम-कुठाम आ समय-कुसमयक महीन समझ चम्पीवलाकेँ नै छइ, नै तँ लेखक ओतेक गरमीयोमे चम्पी करा लितय। चम्पीवलाक दीनतापर अफसोच भेलन्हि मुदा ओकर शी-इ-इ केँ मोन पाड़ैत वितृष्णा सेहो। फ्रायडक मनोविश्लेषणक बड्ड आलोचना भेल जे ओ सेक्सकेँ केन्द्रमे राखि गप करैत छथि। मुदा अनुभवसँ ई गप सोझाँ अबैत अछि जे सेक्ससँ जतेक दूरी बनायब, जतेक एकरा वार्तालाप-कथा-साहित्यसँ दूर राखब, ओकर आक्रमण ततेक तीव्र हएत। कारबार मे लेखकक भेँट मिस्टर वर्मा, सिन्हा आ दू टा आर गोटेसँ होइत अछि। बार मे सिन्हा दोस्ती आ बिजनेसकेँ फराक कहैत दू टा खिस्सा सुनबैत अछि। सभ चीजक मोल अछि, ऐपर एकटा दोस्तक वाइफ लेल टी.वी. किनबाक बाद फ्रिजक डिमान्ड अएबाक गप बीचेमे खतम भऽ जाइत अछि। दोसर खिस्सामे एकटा स्त्री पतिक जान बचबय लेल डॉक्टरक फीस देबाक लेल पूर्व प्रेमी लग जाइत अछि। पूर्व प्रेमी पाइ देबाक बदलामे ओकरा संगे राति बितबय लेल कहैत छै। सिन्हा ऐ कथामे ककरो गलती नै मानैत छथि, डॉक्टर बिना पाइ लेने किए इलाज करत, पूर्व प्रेमी मँगनीमे पाइ किए देत आ ओ स्त्री जे पूर्व प्रेमी संग राति नै बिताओत, तँ ओकर पति मरि जेतै। आब बारसँ लेखक निकलैत छथि तँ दरबानक सलाम मारलापर अहूमे पैसाक टनक सुनाइ पड़ऽ लगैत छन्हि। प्राचीन मूल्य, दोस्ती-यारी आ आदर्शक टूटबाक स्थिति एकटा एकाकीपनक अनुभव करबैत अछि। कुश्ती मे सेहो फ्रायड सोझाँ अबैत छथि, कथाक प्रारम्भ लुंगीपरक सुखायल कड़गर भेल दागसँ शुरू होइत अछि। मुदा तुरत्ते स्पष्ट होइत अछि, जे ओ से दाग नै अछि, वरन घावक दाग अछि। फेर हाटक कुश्तीमे गामक समस्याक निपटारा, हेल्थ सेन्टरक बन्द रहब, ओतय ईंटाक चोरिक चरचा अबैत अछि। छोट भाइ कोनो इलाजक क्रममे एलोपैथीसँ हटि कऽ होम्योपैथीपर विश्वास करय लगैत छथि, ऐ गपक चरचा आयल अछि। लोक सभक घावक समाचार पुछबा लऽ एनाइ आ लेखक द्वारा सभकेँ विस्तृत विवरण कहि सुनओनाइ मुदा उमरिमे कम वयसक कएक गोटेकेँ टारि देनाइ, ई सभ क्रम एकटा वातावरणक निर्माण करैत अछि। कैनरी आइलैण्डक लारेल कथामे सुभाष आ उपिया कथाक चरित्र छथि। एतऽ एकटा बिम्ब अछि- जेना निर्णय कोसीक धसना जकाँ। ममियौत भाइक चिट्ठी, कटारि देने नाहपर जयबाक, गेरुआ पानिक धारमे आयब, नाहक छीटपर उतारब, छीटक बादो बहुत दूर धरि जांघ भरि पानिक रहब। धीपल बालुपर साइकिलकेँ ठेलैत देखि कियो कहैत छन्हि- "साइकिल ससुरारिमे देलक-ए? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक"। दीदी-पीसा ऐठाम ऐ गपक चरचा सुनलन्हि, जे कोटक खातिर हुनकर बेटीक विवाह दू दिन रुकि गेल छलन्हि आ ईहो जे बेसी पढ़ने लोक बताह भऽ जाइत अछि।सुभाष चाहियो कऽ दू सय टाका नै मांगि पबैत छथि, दीदीक व्यवहार अस्पष्ट छन्हि, सुभाष आश्वस्त नै छथि आ घुरि जाइत छथि। तृष्णा कथामे लेखककेँ अखिलन भेटैत छन्हि। श्रीलतासँ ओ अपन भेँटक विवरण कहि सुनबैत अछि। पाँचम दिन घुरलाक बाद ट्रेनमे ओ नै भेटलीह। आब अखिलन की करत, विशाखापत्तनम आ विजयवाड़ाक बीचक रस्तामे चक्कर काटत आकि स्मृतिक संग दिन काटत। छोट-छोट भावनात्मक घटनाक विश्लेषण अछि कथा "कैनरी आइलैण्डक लारेल" आ "तृष्णा"। दाना कथामे मोहन इन्टरव्यू लेल गेल अछि, ओतय सहृदय चपरासी सूचित करैत अछि जे बाहरीकेँ नै लैत छै, पी.एच.डी. रहितय तँ कोनो बात रहितय। मोहनकेँ सभ चीज बीमार आ उदास लगैत रहय। फुद्दी आ मैना पावरोटीक टुकड़ीपर ची-ची करैत झपटैत रहय। प्रतियोगी परीक्षाक साक्षात्कारमे बाहरी आ लोकल केर जे संकल्पना आयल अछि तकर सम्वेदनात्मक वर्णन भेल अछि। दृष्टि कथामे पढ़ाइ खतम भेलाक बाद नोकरीक खोज, गाममे लोकसभक तीक्ष्ण कटाक्ष। फेर दक्षिण भारतीय पत्रकारक प्रेरणासँ कनियाँक विरोधक बावजूद गाममे लेखकक खेतीमे लागब। ई सभ गप एकटा सामान्य कथ्य रहलाक बादो ठाम-ठाम सामाजिक सत्य उद्घाटित करैत अछि। एतय गामक लोकक कुटीचाली अछि, जे काजक अभावमे खाली समय बेशी रहलाक कारण अबैत अछि। संगमे आइ-काल्हिक स्त्रीक शहरी जीवन जीबाक आकांक्षा सेहो प्रदर्शित करैत अछि। नदी कथामे कथ्य कथाक संगे चलैत अछि आ खतम भऽ जाइत अछि। गगनदेवक घरपर बिहारी आयल छै। शहरमे ओकरा एक साल रहबाक छै। गगनदेवकेँ ओकरा संग मकान खोजबाक क्रममे एकटा लड़कीसँ भेँट होइत छै। ओकरा छोड़ि आगाँ बढ़ल तँ ई बुझलाक बादो जे आब ओकरासँ फेर भेँट नै हेतइ ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूतिसँ भरि गेल। परलय बाढिक कथा थिक, कोसीक कथा कहल गेल अछि एतय। बौकी बुनछेकक इन्तजारीमे अछि। मुदा धारमे पानि बढ़ि रहल छै। कोशीक बाढ़ि बढ़ल आबि रहल छै आ एम्हर मायक रद्द-दस्तसँ हाल-बेहाल छै। माल-जाल भूखसँ डिकरैत रहै। रामचरनक घरमे अन्नपानि बेशी छै से ओ सभकेँ नाहक इन्तजाम लेल कहैत छै। बौकूक घरसँ कटनियाँ दूर रहै। मृत्यु आ विनाश बौकूकेँ कठोर बना देलकै, मोह तोड़ि देलकै। मुदा बरखा रुकि गेलै। बौकू चीज सभकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयत्न करऽ लागल। बात कथामे सेहो कथाकार अपन कथानककेँ बाट चलिते ताकि लैत छथि आ शिल्पसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत छथि। नेबो दोकानपर नेबोवला आ एकटा लोकक बीचमे बहस सुनैत लेखक बीचमे कूदि पड़ैत छथि। नेबोवलासँ एक गोटे अपन छत्ता मांगि रहल अछि जे ओ नीचाँ रखने रहय। दुखक गप, लेखकक अनुसार, बेशी दिन धरि लोककेँ मोन रहैत छै। रंभा कथामे पुरुष-स्त्रीक बीचक बदलैत सम्बन्धक तीव्र गतिसँ वर्णन भेल अछि। पुरुष यावत स्त्रीसँ दूर रहैत अछि तँ सभ ओकरा मेनका आ रम्भा देखाइ पड़ैत छै। मुदा जे सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि तँ बादमे लेखक केँ लगैत छन्हि जे ओ बेटीये छी। रस्तामे एक स्त्री अबैत अछि। लेखक सोचैत छथि जे ई के छी, रम्भा, मेनका आकि...। ओकरा संग बेटा छै, ओतेक सुन्नर नै, कारण एकर वर सुन्दर नै होएतैक। ओ गपशपमे कखनो लेखककेँ ससुर जकाँ, कखनो अपनाकेँ हुनकर बेटी तुल्य कहैत अछि। पहिने लेखककेँ खराप लगलन्हि। मुदा बादमे लेखककेँ नीक लगलन्हि। मुदा अन्तमे ओकर पएर छूबए लेल झुकब मुदा बिन छूने सोझ भऽ जाएब नै बुझिमे अएलन्हि। हमर गाम कथामे लेखकक गामक रस्ता, कटनियाँ सँ मेनाही गामक लोकक छिड़िआएब आ बान्हक बीचमे अहुरिया काटैत लोकक वर्णन अछि। कोसिकन्हाक लोक- जानवरक समान, जानवरक हालतमे। कटनियाँमे लेखकक घर कटि गेलन्हि से ओ नथुनियाँ ऐठाम टिकैत छथि। मछबाहि आ चिड़ै बझाबऽ लेल नथुनी जोगार करैत अछि। जमीनक झगड़ा छन्हि, एक हिस्सेदारक जमीन धारमे डूमल छै से ओ लेखकक गहूमवला खेत हड़पऽ चाहैत अछि। शन आ स्त्रीक (!) पाछू लोक बेहाल अछि। स्त्रीक पाछू बिन कारण लेखक पड़ि गेल छथि जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रमे कथा कहैत-कहैत शूद्र आ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि। यावत सभ कमलक घूर लग कपक अभावमे बेरा-बेरी चाह पिबैत छथि, फसिल कटि कऽ सिबननक एतऽ चलि जाइ-ए। झौआ, कास, पटेरक जंगल जखन रहय, चिड़ै बड्ड आबए, आब कम अबैत अछि। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु, डोका सभ खतम भऽ रहल छै- जीवनक साधन दुर्लभ भऽ गेल अछि। साँझमे जमीनक पंचैती होइत अछि। सत्तोक बकड़ी मरि गेलैक, पुतोहु एकर कारण सासुक सरापब कहैत अछि। सासु एकर कारण बलि गछलोपर पाठी सभकेँ बेचब कहैत छथि। सत्तोक बेटीक जौबनक उभारकेँ लेखक पुरुष सम्पर्कक साक्षी कहैत छथि आ सकारण फेरसँ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, कारण ई धारणा लोकमे छै। सत्तोक बेटी अखन सासुर नै बसैत छै। सुकन रामक ऐठाम खाइत काल लेखककेँ संकोच भेलन्हि, जकरासँ उबरबाक लेल ओ बजलाह- आइ तोरा जाति बना लेलिअह। कोसी सभ भेदभावकेँ पाटि देलक, डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सभ एके कलसँ पानि भरैत अछि। एके पटियापर बैसैत अछि। गुलो (हिन्दी अनुवाद) [गुलो हिन्दी अनुवाद (अंतिका प्रकाशन) क पाठपर आधारित।] पहिने गुलोक हिन्दी अनुवादपर टिप्पणी। (सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू हमर पोथी- मैथिली समीक्षाशास्त्रक मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त आ अनूदित साहित्यक समीक्षाशास्त्र, विदेह पेटार http://www.videha.co.in/pothi.htm मे उपलब्ध।) जेना कोनो हिट फिल्म जेना कन्नड़क "कनतारा" जँ अहाँ पी.वी.आर. मे देख लेने छी तँ की पाँचो मिनट तकरा अहाँ ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्मपर देखि सकै छी? जेना हरिमोहन झा केर "कन्यादान"क हिन्दी अनुवाद (विभा रानी द्वारा) देखि कऽ हुनकर पुत्र राजमोहन झा दुखी भऽ माथ पकड़ि लेने छला, सैक्रेड गेम्सक अनुराग कश्यप द्वारा घटिया वेब सीरीज रूपान्तरण देखि कऽ लेखक विक्रम चन्द्रा दुखी भेल छला, सएह अनुभूति गुलोक हिन्दी अनुवाद देखि कऽ हमरा भेल। मूल धाराक लोक बिनु अनुवाद सिद्धान्त पढ़ने अनुवाद करैए, मूल धाराक ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादी लेखक सभक जखन मौलिक लेखनेमे शब्द-भण्डारक सुखार रहै छै तँ अनुवादक कथे कोन। अनुवादक रमण कुमार सिंह लग ने मैथिलीक शब्द-भण्डार छन्हि आ ने हिन्दीक। अखबारी भाषामे ओ गुलोक अनुवादक पहिले पाँतीमे "तिला सकरांति"क अनुवाद "मकर संक्रान्ति" करैत छथि! की मकर संक्रान्ति मैथिलीक मूल धाराक ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादी लेखक सभ नै प्रयुक्त करैत छथि, आ गुलोक पहिल पाँतिमे "तिला-सकरांति"केँ सुभाष चन्द्र यादव "मकर संक्रान्ति" नै लिखि सकै छला? से जँ अहाँकेँ सुभाष चन्द्र यादवक गुलो केँ हिन्दी आ मैथिली दुनूमे पढ़बाक इच्छा हुअय आ गैसलाइटिंगक सिद्धांतक प्रयोग देखबाक हुअय तँ पहिने हिन्दी अनुवाद पढ़ू आ फेर मूल मैथिली पढ़ू। कारण मूल मैथिली जँ अहाँ पहिने पढ़ि लेलौं तँ अहाँकेँ सिनेमाकेँ पी.वी.आर.मे देखबाक अनुभूति हएत, आ जँ पहिने अहाँ मूल मैथिली पढ़ि लेब तँ हिन्दी अनुवाद एक्को पन्ना नै पढ़ि सकब, आ तखन गैसलाइटिंग केर प्रयोग केना देखि सकब? हमर इच्छा अछि जे अहाँ ई प्रयोग देखी। अही सन्दर्भमे २०२१ मे गएर-सवर्णकेँ पहिल बेर देल मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक चर्चा करब आवश्यक अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यास "पंगु" ओतऽ सँ शुरू होइए जतऽ यात्रीक बलचनमा खतम होइत अछि, आ मूल धाराक लोक छड़पटाय लगला जे जगदीश प्रसाद मण्डल यात्रीजी सँ आगू केना बढ़ि गेला आ ओ सभ यात्रीजी सँ आगाँ बढ़ब तँ दूर पाछुए किए जा रहल छथि? २०१८ मे ई उपन्यास विदेहमे ९ खण्ड मे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह २१ मे (पृ. ६७७-७७९), फेर ओ पुस्तकाकार आयल ओही बर्ख, आ आब ओ विदेह पेटार मे सेहो उपलब्ध अछि। ऐ पोथीक हिन्दी अनुवाद रामेश्वर प्रसाद मण्डल द्वारा कयल गेल (पल्लवी प्रकाशन) आ हमर अनुरोध अछि जे ई हिन्दी अनुवाद अहाँ मूल मैथिली पढ़लाक बाद पढ़ू, अहाँ पूरा पोथी पढ़ि सकब। पंगुक मूल आ हिन्दी दुनू विदेह पेटार मे उपलब्ध अछि। फेर घुरू गुलोक हिन्दी अनुवाद पर, से अनुवाद केना भेल आ केना मैथिलीक इन्साइडर व्यू हिन्दी-अनुवाद वर्जनमे आउटसाइडर व्यू बनि गेल नव-ब्राह्मणवादक अनूदित-स्टोरी-साइंसक प्रयोग सँ, से नीचाँ टेबुलमे देल अछि। बहुत ठाम हिन्दी शब्दकोषक अकालक कारण शब्द लेल शब्द नै वरन् विवरण देल गेल अछि, सेहो बहुत ठाम अशुद्ध आ बहुत ठाम अनूदित भेबे नै कएल, आकि अर्थक अनर्थ करैत शाब्दिक/ अर्थानुवाद भेल। मूल मैथिली "गुलो" अनूदित हिन्दी "गुलो" तिला-सकरांति मकर संक्रान्ति एक्के ससपेन मे मुँह तोड़ि एक ही सस्पेन से मुँह तोड़ ओकरा टांसलकै उसका घी बनाया घरनियो* पत्नी भी टुकदुम-टुकदुम किसी तरह कबइ कबई मछली दबिया दाब देखबहक छौड़िए! देखेगी तू, देलियह आपको दिए अमाठी आम की टहनियाँ करची बाँस की छड़ियाँ कठुआयल स्तंभित दाब-दाब करैत रहै छै दबाव बनाए रखते हैं बात उनटा दइ छै** बात को पलट देती है पनिजाब पंजाब मुँह बाबि कऽ हताश सड़लाह खुट्टा घुन लगे खूँटे उपरेलक ढूढ़कर लाई गज्जन इज्जत ओगरइ-ए देखभाल करता है रमराहड़ि अरहर ठिठुआ*** ठिठुआ कोय लटेलक कोई उसे हथेली पर रगड़ता है भाकन जलकुम्भी परचारै छै ताना देती है भोटिया सुजनी भोमहैर लेतै काट खाएँगे हपकुनियाँ उंकड़ूं चास, समार आ चौकी*** चास, समार और चौकी टोन करइ-ए टुकड़े-टुकड़े करती है पांगय लागल काटने लगा खराय डंठल सूखकर सख्त गोसांइ डुमानी सूर्य डूबने पछड़ैत-पुछड़ैत किसी तरह सिदहा भोजन की सामग्री गुलो उकटि देलकै गुलो ने कहा जुमा कए निशाना साधकर हपसि-हपसि हाँफ हाँफ भासि गेल हिल गए पाढ़ि छप्पर को टेकनेवाला आधार हटहट पत्थर गिरहत दहित रहै गृहस्थ उदार था छील-मोठि छीलकर हड़ौथ हड़ौथ बाँस खढ़ उछाहि देलकै फूस उड़ गई कालीबंदीक सेवा कालीबंदी की पूजा कुशक कलेप*** कुश का कलेप पाट अंतर्धान आरा बगीचा गाछी आम के बगीचे गैढ़ काटकर छौड़ी कए समांगे ने होइ छै उसकी तबीयत ठीक नहीं है टाट घास फूस से बनी दीवार दोसर बिछेलक दूसरी बनाने लगा है आलन अस्तर जैराठो जड़ें दू गो सुपारी नोत मे आयल छै निमंत्रण की सुपारी मिली है बाछय लागल अलग करके रखने लगा टिरसि कए गुस्से में कननमुँह रुआँसा बीट लगाएत बाँस रोपेगा सिसोहि लेलकै तोड़ ले गया अरिकंचन*** अरिकंचन लाट मे झुनियो रहै झुनिया भी थी अढ़े-अढ़ चुपके से नौ बजे राति मे दस बजे रात में ओलैत चुनता झखइ अफसोस जता रहा डंगेलक उसे तैयार किया टपय आने जोगतै रखवाली कौन करेगा सात-आठ टा नभका खुट्टा काटि खूँटे काट रखे खिखिर नेवला पजोठने लेकर हाक दाए बुलाकर जुआयल*** जुआया हुआ गलि कए भात भाए जेतौ**** गलकर भात हो जाएगा तुम्मा*** तुम्मा अवाच कथा बुरी बात भूमकम भूकम्प***** भूकम्प भूकम्प***** ठठरी*** ठठरी ऊक मुखाग्नि हिन्नू हिन्दू करइ छै केना बोलता क्या है अरबा-अरबाइन*** अरबा-अरबाइन झोड़ा बटुआ टानि कए लेकर अखरा*** अखरा *सुभाष चन्द्र यादव पत्नी लेल घरनी आ जगदीश प्रसाद मण्डल भनसिया केर प्रयोग करै छथि, दुनू दू-स्थितिमे दू तरहक प्रयोग छै। अनुवादक की दुनू लेल "पत्नी" शब्दक प्रयोग करता? **बातकेँ पलटि देनाइ भेलै घुमा देनाइ, एतऽ छै छुटिते उनटा जबाब देनाइ। ***अनूदित नै भेल ****शाब्दिक अनुवाद *****अर्थानुवाद हिन्दी वर्जनमे अध्याय परिवर्तन सेहो पता नै चलैत अछि, मूल मैथिलीमे नव पृष्ठसँ विवरण शुरू कऽ, आ जतऽ जगह खाली छै ओतऽ फोटो पाड़ि कऽ अध्याय परिवर्तन स्पष्ट कएल गेल छै। डेनमार्कक शब्दकोष बड विस्तृत छै, प्रायः २३ वोल्यूम सँ बेशीमे छै, आप्रवासी प्रायः ओकर नागरिकता लेल लइ जायबला डेनिस भाषाक परीक्षामे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि। एकटा महिला जे डेनिससँ विवाह केने रहथि हुनकर बच्चा डेनमार्कक नागरिक भऽ गेल मुदा ओ कहलन्हि जे भाषा पेपर बड्ड कठिन होइ छै, डेनिस सेहो ओइमे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि। जनसंख्या वा क्षेत्रफलक छोट रहब डेनिस वोकाबुलेरी लेल हानिकारक नै भेलै। हिन्दी जइ हिसाबे अपन भूगोल बढेलक अछि ओइ हिसाबे ओकर शब्दावली नै बढ़ल छै । अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे अपवाद, जकरा हिन्दीक पुरोधा लोकनि उपहासमे आंचलिक उपन्यास/ लेखन कहैत छथि आ एक तरहेँ नकारैत छथि, केँ छोड़ि हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्ट धरि सीमित रहए चाहै छथि, जखन कि जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइ छै। जइ भाषामे रामलोचन शरण १४-१५ हजार पाँतीक श्रीरामचरित मानसक अनुवाद सन् १९६८ (वि. २०२५) मे पूर्णभाव रक्षित मैथिली रूपमे केलन्हि ओत सन् २०२१ (वि. २०७८) मे गुलोक ऐ तरहक हिन्दी अनुवाद मोनकेँ विखिन्न करैत अछि। गुलो केर आमुख "आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा"- लेखक केदार कानन मूल मैथिली गुलोक प्रारम्भसँ पूर्व एकटा आमुख अछि "आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा"। ई अछि मूल धाराक कन्नारोहट आ ऐ बेर ओइ कन्नारोहटक भार छन्हि केदार काननक कान्हपर, आ ई लिखल गेल अछि तिला-संक्रान्ति दिन! मुदा सुभाष चन्द्र यादव तँ आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा लिखबे नै केने छथि। ई आमुख सुभाष चन्द्र यादवक लेखनीकेँ ओइपार ठाढ़ करबाक कुत्सित प्रयास अछि। ओ तँ लिखने छथि गुलो मण्डलक जीवनी, ओ गुलो मण्डल जे कहैत छथि- "हमरा चिन्है छिही? ने चिन्है छिही तऽ चीन्ह ले। हम छिऐ गुलो मण्डल। अही चौक पर घर छै। हमरा संगे ठेठपनी केलही तऽ बूझि ले। हम छिऐ गुलो मण्डल।" आ केदार कानन कऽ रहल छथि ठेठपनी गुलो मण्डलक सङ। "बड़का-बड़का ठोप-चानन कयनिहार भाषा कें दूषित करब मानैत छथि।"- केदार कानन लिखै छथि। मुदा ओइ ठोप-चानन कयनिहारक नाम लेबाक साहस केदार काननमे नै छन्हि। केदार कानन सभटा लाभ साहित्य अकादेमी आ मैथिली अकादेमीक ठोप-चानन कयनिहारसँ लैत छथि। आ आब जखन ओ ठोप-चानन कयनिहार मरनासन्न छथि, किछु वास्तविक रूपमे मरियो गेल छथि, तँ ओ अपनाकेँ ओकरासँ अलग देखाबय चाहैत छथि। आ ठोप-चानन कयनिहारक बाल बच्चा सभ जँ केदार काननकेँ, वीणा ठाकुरकेँ, अशोक अविचलकेँ आ आन लाखक-लाख टाकाक अनुवाद/ सम्पादनक असाइनमेण्ट आ साहित्य अकादेमीक बाल/ अनुवाद पुरस्कार लेनिहार केँ कृतघ्न कहि रहल छन्हि तँ ओ हुनका लोकनिक आपसी मामिला छन्हि। मुदा ठोप-चानन कयनिहारक बाल बच्चाक पुरखाक कृपासँ हुनका सभकेँ ई सभ भेटलन्हि से तँ सत्य छैहे। संगहि जँ अहाँ ठोप-चानन नै कऽ रहल छी, बा धोती-कुर्ता नै वरन् पेण्ट-शर्ट पहिरै छी बा नव-ब्राह्मणवादी छी तँ अहाँकेँ सभ छल-प्रपञ्चक अधिकार स्वतः भेटि जाइत अछि, से केदार काननक आमुख सँ जनतब भेटैत अछि। गुलो २०१५ मे प्रकाशित भेल केदार कानन जी केर आमुखक संग। २०१९क साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार केदार कानन जी केँ हिन्दी कविता संग्रह "अकाल में सारस" (लेखक- केदार नाथ सिंह)क मैथिली अनुवादपर देल गेल। आब अहाँ पहिने हमरा बताउ जे के एहन लोक अछि जे हिन्दीक कविता संग्रह नै पढ़ि सकैए आ से ओकरा मैथिली अनुवादक खगता छै? आ ऐ मे केदार काननकेँ अनुवाद असाइनमेण्ट आ पुरस्कार, डबल फएदा भेलन्हि सएह ने। कारण रमता जोगी (२०१९) मे केदार कानन निपत्ता छथि, मडर (२०२१) मे कोनो आमुख नै अछि। मुदा भोट (२०२२) मे केदार कानन बैक-कवरमे ८ पाँति लिखने छथि- मुदा एक्कोटा क्रान्तिकारी पाँति ओइमे नै अछि, किए? आब "गुलो" उपन्यासक सङ साहित्य अकादेमी की केलक। २०१६-२०२० मे प्रकाशित रचनाकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०२२ मे देल जयतै। माने गुलो रेससँ बाहर। माने गुलोक क्रान्तिकारी आमुख लिखनिहारकेँ साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार आ गुलो रेससँ बाहर। तँ गुलोक आमुख ब्लैकमेलिंग छल? बुझि तँ सएह पड़ैए। गुलोक आमुखमे आर बहुत रास कन्नारोहट अछि। 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा', मूल धाराक सभकेँ ई रटल छै, से केदार काननकेँ सेहो रटल छन्हि। मुदा अवहट्ठ तँ साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वर-पूर्व विद्यापति संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः सँ भिन्न छथि। सम्भवतः बिस्फी गामक बार्बर कास्टक श्री महेश ठाकुरक पुत्र। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वर पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विवरण- कश्मीरक अभिनव गुप्त द्वारा (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ) लिखल ग्रन्थ अछि "ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी" जइमे ओ विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत- (रचना ११ फरबरी १२०६, देखू मध्यकालीन मिथिला, विजय कुमार ठाकुर)- श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद एतऽ उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पदावलीक भाषा छी। "जाव न मालतो कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।" आ "मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द"। ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०) षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥ अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ मे बिदापत केर उल्लेख करैत छथि। से विद्यापति ततेक प्रसिद्ध भऽ गेल रहथि जे ज्योतिरीश्वर तकर उल्लेख नाचक रूपमे केलन्हि। (विद्यापतिक चित्र: विदेह चित्रकला सम्मानसँ पुरस्कृत पनकलाल मण्डल द्वारा)। केदार कानन तकर बाद गुलो उपन्यासक सारांश लिखै छथि। लगैए ओ ठीकसँ उपन्यास पढ़लन्हि नै बा अर्थ बुझि नै सकला। ओ लिखै छथि- "अनवरकेँ बूझल छैक जे बुढ़िया (सुखबाक माय) लग पाइ छैक। ओकर कोनो प्रयास निरर्थक नै हेतैक। .. ऐंठ लेत" आर की की। मुदा उपन्यासमे से छैहे नै, अनवरे नै आनो पात्र एहेन नै करैए जे केदार कानन बुझाबय चाहै छथि। पलाइबला पाइ दैए जखन सभकेँ होइ छै जे ओ नै देत। पंखाबला पंखा बदलि कऽ दऽ दैए जखन गुलोकेँ सेहो आशंका रहय जे ओ नै बदलत। अनवर तँ कतेक बेर मदति केलकै, बादमे सतर्को केलकै जे गिद्ध सभ पाइ लेल मड़रा रहल छै। हँ कताक बेर पाइ नै भेटलापर/ भेटैमे देरी भेलापर एक बेर ओ अनठेने जरूर रहै। गुलो केर भाषासँ केदार कानन अचम्भित छथि, मूल धारा केर लोककेँ हेबाको चाही। मुदा से हुनकर मैथिली साहित्यसँ १५ सालसँ दूर हएब मात्र दर्शित करैत अछि। केदार काननकेँ आनो बहुत चीजपर आश्चर्य होइ छन्हि, उपन्यासक एकटा झगड़ाक बादक स्थितिपर ओ लिखै छथि जे "तथाकथित भद्र समाजमे एतबे टा घटना की सँ की कऽ दैत अछि मुदा सामान्य लोकक घरमे एहन घटना रहरहाँ..."। केदार काननक ऐ तरहक अचम्भित होयबाक स्वाङ करब हास्य उत्पन्न करैत अछि, मूलधाराक ऐंठीक रूपमे हम एकरा देखैत छी। लगैत अछि जे ओ कोनो दोसर ग्रहसँ आयल छथि आ सुपौलक एकटा बड़का महलमे रहै छथि, दीन-दुनियाँ सँ दूर। ९ पन्नाक ई आमुख गुलोक पाठमे व्यवधान उत्पन्न करैत अछि। से अहाँसँ आग्रह जे पृ. सं १७ सँ सोझे गुलो पढ़नाइ शुरू करू। एक निसाँसमे उपन्यास पढ़ि जाउ। फेर घुरि कऽ ई आमुख बा कन्नारोहट हास्य आलेखक रूपमे पढ़ू। गुलोक हिन्दी अनुवादमे केदार काननक आमुख "आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा" केर अनुवाद उपन्यासक अन्तमे देल गेल अछि आ तइ लेल गौरीनाथ धन्यवादक पात्र छथि। गुलो (मूल मैथिली) गुलो मे गिरहत आ मालिकक चर्च मात्र भेल अछि, जिनकर कलम-गाछी छन्हि, मुदा बस चर्चे अछि, आ एक बेर बभना कहि कऽ सम्बोधन अछि, माने ओ ब्राह्मण थिका। मात्र गुलोक मरलाक बाद डाक्टर मलिक अबै छथि, जे कानैत कहैत छथि जे आब हुनका मालिक के कहतन्हि, मानि लिअ ओ कायस्थ छथि, मुदा ऐ उपन्यासमे हुनकर जातिक विवरण नै अछि। से एकटा गिरहत/ मालिक दू-चारि बेर आ डाक्टर साहेब एक बेर। आ सभसँ पाइबला छथि पलाइ मिलक मालिक- दशरथ मण्डल। ई उपन्यास मोटा-मोटी १४ खण्डमे विभक्त अछि, आ फ्लैशबैकक संग गुलो मण्डलक जीवनक विवरण ओकर लगक वातावरणक विवरणक संग दैत अछि। उपन्यासक उद्देश्य काल-स्थानक विस्तारपूर्ण विवरण देबाक नै अछि, आ से समाज बा अर्थव्यवस्थाक अन्तर्निहित समस्याक विश्लेषण ई नै करैत अछि। गुलो मण्डलक चारू कात ई घुमैत अछि। गुलो मण्डलक आँखि, गुलो मण्डलक आभासी बा वास्तविक उपस्थिति जतऽ जतऽ ओ जाइत अछि ततऽ ततऽ ई उपन्यास विचरैत अछि। कने काल लेल एम्हर-ओम्हर गेबो कएल तँ फेर आपस। मृत्युक बादो जखन लोक अनुकम्पा राशिमे अपन हिस्साक लेल जोगार कऽ रहल छथि, लेखक रिर्नियां लग घुरि अबैत छथि आ गुलोक हाक रिनियाँकेँ सुनाइ पड़ै छै, ओ बाबाक एकटा आर हाकक आसमे कान पथने अछि। "अकानैत रहइ-ए।" आ उपन्यास खत्म होइत अछि- "बबा तए चलि गेलइ। रिनियां कानइ-ए।" ई पोथी सामान्य उपन्याससँ भिन्न शब्द आ वाक्यक पाठ्यता (टेक्स्टुएलिटी) क रूपमे विश्लेषण मंगैत अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरी जे लेखक आ पाठककेँ जोड़ैत अछि आ उर्ध्वाधर धूरी जे ऐ पाठकेँ दोसर पाठ संग जोड़ैत अछि। गुलो अध्यायमे विभक्त नै अछि, ई एकटा धार सन बहैत जाइत अछि, मुदा टाइपोग्राफीक प्रयोगसँ प्रिण्ट वर्सनमे अध्याय वा खण्ड पाठकक सुविधा लेल सम्भव कएल गेल अछि। ओना कए बेर खण्डक भीतर पैराग्राफ-स्पेस दऽ कऽ खण्डक भीतर उपखण्ड सेहो बनाओल गेल अछि। आब एकबेर गुलो केर पुनर्पाठ करी। गुलोक पहिल खण्ड पाठ शुरू होइत अछि तिला सकरांति सँ, मकर संक्रान्तिसँ नै! (अनुवादकक लेल ई गप अछि।) आङन नीपि रहल अछि रिनियां (गुलोक छोटकी बेटी), गीत गाबि रहल अछि। की अहाँकेँ कन्नारोहट बा कोनो हीन भावना गुलोक परिवारमे देखा रहल अछि। सिनोमेटोग्राफिक अनुभव लिअ, सोचू-गुणू, गीत गबैत नीपब, फेर पानिक फाहा जकाँ ओस, पछिया हवा, बड्ड जाड़, रिनियां पहिरने अछि खाली सलवार आ फराक आ मायक हाक- "ई छौड़ी हमरा जीअय नै देत। गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।" आ करू ऐ दृश्यक मंचन। मुदा नीपै कालमे चद्दरि लेटा जेतै, मैल लेटेलाक बाद हेतै (अनुवादकक लेल ई गप अछि।) आ आब सोचू जे ई गुलो मण्डल नै तथाकथित भद्र समाजक गुलो काननक घर अछि। तथाकथित भद्र समाजमे सेहो अहिना भोर होइ छै, अहिना तिला सकरांति बाजल जाइ छै, अहिना नीपल जाइ छै, आ अहिना माय चिचिआइ छै "ई छौड़ी हमरा जीअय नै देत। गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।" गुलोक परिवारक भोरुका आन सभ बात सेहो अहाँकेँ एतऽ भेट जायत। गुलोक दोसर खण्ड "हमरा चिन्है छिही? ने चिन्है छिही तऽ चीन्ह ले। हम छिऐ गुलो मण्डल। अही चौक पर घर छै। हमरा संगे ठेठपनी केलही तऽ बूझि ले। हम छिऐ गुलो मण्डल।" फ्लैशबैक एक पाराग्राफमे, गुलोक बाप मुनीलाल, गुलोक दूटा छोट बहीन, ओकर मायक मरब, बापक रेलवेक नोकरी छोड़ब, सहरसाक रेलवेक बड़ाबाबू बनरजी साहेबक मोन नै रहै जे मुनीलाल नोकरी छोड़य, ओकरा बड़का-बड़का जिन्दा कबइ के देतै? मुनीलालक जेठकी बेटीक मांग तीन संतानक बाद पोछाय गेलै, मुनीलाल सभकेँ अपने लग लाए आनलक। नाति चरफर-चलाक रहै (महेन्दर).. बासडीह लिखा लेलकै। गुलो भागि कऽ कोसी चौक, सिपौल आबि गेल। बिहार सरकारक जमीनपर बसि गेल। रेलवे मे रहैत मुनीलाल लोहा-लक्कड़क बहुत सामान बनबेने रहय। छोट-पैघ खुरपी, कोदारि, खंती, दबिया, कुड़हरि, भाला, बरछी। ई सब अखनियो गुलोक घर मे छै। इएह ओकर बपौती छिऐ। बाप-पुरखाक छोड़ल और कुइछ नै छै। फेर रिनियांक चंचलता। ओकरा स्कूलमे पाँच सय टाका भेटल रहइ, पोशाक राशि। दीदीजी कहने रहइ- 'जुत्ता कीन लिहे।' मुदा गुलोक दोसर बेगरतामे से खर्च भऽ गेलै, रिनियाँ कहै छै.. सभटा चाटि गेलह। गुलोक तेसर खण्ड छोटुआ (गुलोक छोटका बेटा) आ रिनियांक काजक प्रति दृष्टिकोणक द्वन्द्व। गुलोक चारिम खण्ड एक मास पहिने गुलोक बड़का बेटा अरजुनमा पनिजाब (पंजाब नै- अनुवादकक लेल टिप्पणी) चलि गेलै। कंदाहावाली (अरजुनमाक बौह) आ सुजीत (अरजुनमाक बेटा)। रिनियाँक पेटमे चाली छै कारण ओ पचपच थूकै छै। नया साल दिन माछ बनल रहय, कारण नया साल आब उत्सवक दिन बनि गेल छै सभक लेल। ओइ दिन रिनियाँ माछ बोकरि देने रहय। ओना रिनियाँक आग्रह रहै मौंस खेबाक। गुलोक बगले मे अनवर एगो कठघरा मे बैठइ-ए। ऊ सुइया दै छै। एगो सुइया दइ के दस टका लै छै। गुलोक ससुरारि छै बेला आ ओकर पत्नीक नाम छै बेलावाली। पहिने गुलोकेँ गाजा पीऐत-पीऐत दम्मा उखड़ि गेलै। माने चारू कात गाजाक नशाक व्यापार होइत हेतै। से बेलासँ ओकर सरहोजि अपन ननदि माने गुलोक पत्नीकेँ देखय आयल छै आ कहै छै- "ई गजपीआ हमर बहीन कए मारि देलक।" कंदाहावाली जरना उपरेलक (जोगार केलक, ताकि कऽ नै अनलक- अनुवादकक लेल टिप्पणी)। भगिनाक बियाहक नोत पुरबाक क्रम, साड़ी, साया, बिलाउज आ दू सय एकावन टाका दिअ पड़तै। ओ सोनक जाइए, छोटुआ आ रिनियां संग छै। गुलोक बड़की बेटी रुनियाँ सेहो सासुरसँ सोझे ओतऽ आयल छै, बहीन रिनियाँकेँ अपन सासुर लऽ जाय चाहै छै। मुदा ओ मना कऽ देलकै, लोक कहतै जे बाप रोगाह भऽ गेलै, दिन टगि गेलै तेँ पेट पोसै लए आयल छै। ओ बड्ड कानल, गुलो केँ छगुन्ता होइ छै, छौड़ी ई सब बात केना बूझि गेलै। कनियाँ दब छै मुदा मना करितै तँ कोनो गज्जन बाँकी रहितय (कोनो कर्म बाँकी रहितय, इज्जत तँ छोट शब्द छै- अनुवादकक लेल टिप्पणी), "मारियो खइतौं..।" रिनियाँ लेल सोनक कोनो तीरथसँ कम नै कारण ओ अखैनधरि रेलगाड़ियो नै देखने-ए, माने चढ़ल तँ नहिये अछि, देखबो नै केने अछि, माने मात्र सुनने अछि। से दूटा इण्डिया छै। गुलोक पाँचम खण्ड घूर-धुँआ। "अनवर कोनो जवाब नै दै छै। ऊ पहिने कएक बेर मदद केने छै, टाका देने रहै, दवाइ देने रहै, सुइया देने रहै। ... गुलो घुरबै के नाम नै लै छै।" गुलोक छअम खण्ड राजिनदर डीलर आ ओकर समदाही इनरा गानही। इनरा गानहीक जेठका डोमा किराना के दोकान करै छै। दोसर बेटा के पानक दोकान छै, सब तरहक चार्जर राखने-ए आ एकटा मोबाइल चार्ज करइ के पाँच टका लै छै। पुनरबास मे बहुत कए बिजली नै छै। तेसर बेटा मोबाइल रिचार्ज करइ-ए, फिलिम आ गाना डाउनलोड करइ-ए। फोटो एसटेट करइ-ए। फोटो खींचइ-ए। चारिम बेटा बरजेश दवाइ के दोकान करइ-ए। ओकर कहब छै- 'कोनो डाक्टर आ हमरा मे फरक एतबे छै जे डाक्टर कए डिगरी छै आ हमरा डिगरी नै छै। गुलोक सातम खण्ड कंदाहावालीकेँ मलहदक चाँपमे मखानक कमौनीक नव-रोजगार भेटलइ-ए। सुखबा अपन माय कए घर सए निकालि देलक। ओ छै इनरा गानहीक पितिया सासु। सुखबा माय कए घर लाए आनलक। गुलोक आठम खण्ड मूंगक बीया बाउग हेतै, हरवला चास, समार आ चौकी दइ के अढ़ाइ सय मांगै छै। कल ठीक करेबाक छै। "एमपी के एलेकशन छिऐ। कांगरेस रंजीता रंजन कए ठाढ़ केने-ए।" नरेशबा रंजीता रंजनसँ गुलो केँ एक हजार टका दिएतै, गुलोक घरमे छहटा भोट छै। मुदा नरेशबा निपत्ता भऽ गेलै। मुदा फुलबा मोदीकेँ जितेतै, मुदा गुलो नै जाएत मीटिंगमे "तोरा (फुलबाकेँ) मोटका गड्डी भेटल हेतौ। तू कर गे (मीटिंग)।" फेर घरक झगड़ा, कंदाहावाली ससरफानी बनेलक आ गरदनि मे फँसा लेलक। कंदाहावाली बोइनवला गहूम डराममे बन्न कऽ ताला लगा नैहर चलि गेल। गुलोक नअम खण्ड गुलोक दूटा घर भासि गेलै। बाबा कहलकै, घरपर मरछाउर छीट देने छह। जंतर देलकै, मुदा ओ कोनो काजक नै। कालीबन्दीक सेवा, भगैत, फुलहासि। आब कुशक कलेपो नै लगतै। गुलोक दसम खण्ड छोटुआ काज करैए पिलाइ मालिक दशरथ मण्डल ओइठाम। कल ठीक करबैले १२०० टाका एडवांस मांगैए, १००० भेटै छै। मुदा कल ठीक करेबाक बदला ओ साइकिल कीनि लैए कारण अरजुनमा अपन पाइसँ कीनल साइकिल बेचि लेने रहै। ओकरा देखेबाक छै। अनवर रिनियांक बोखार उतारबाक लेल गोली देलकइ। गुलोक दसम खण्ड गुलो केँ दूटा सुपारी दूटा नोत मे आयल छै- एकटा लालो पण्डित के पोती के बियाह, दोसर सारि के जैधी के बियाह। गुलोक एगारहम खण्ड गुलो मालिकसँ टॉर्च मांगत, ओ नै देतै तऽ एक्को गो आम कि लुच्ची भोग नै हुअय देत। बाँस डेढ़ सय सए कम मे नै भेटै छै, गुलो चोरा कए बेचत तैं एक्के सय मे दिअय पड़तै। पाच टा बाँसक पाइ भेटलै, पान सय मे रिनियाँ पाठी किनलक। घड़िए घंटा मे पाठी रिनियाँ कए चीन्ह गेलै। गिरहत टौर्च नै देलकै, अपना पचास टका लगा कए किनलक। चोरबा सौंसे गाछक लुच्ची सिसोहि लेलकै। एकटा ठकुरबा सेनियल चोर छै। रिनियां, झुनियां आ बरस्सेरवाली लुच्ची चोरबैए। 'पकड़लकह नै?'- रिनियाँ पुछलकै। 'ऊ बभना हमरा पकड़त? .." (बरस्सेरवाली) गुलोक बड़की बेटी रुनियाँ बीनामे बियाहल छै। अनवरक मोबाइलपर फोन एलै ओकर। गुलो ओतऽ जाइए, छोटुआ सेहो सङ जाइ छै। रिनियांबला लुच्ची सनेस बनि जाइ छै। मूंगक पहिल तोड़ रिनियां सतलरेनमाकेँ देलक, ओ बीस टाका देलकै। रुनियाँ के दीयर नेरहू एलै, ओ चुपचाप रिनियां के देखैत रहइ-ए आ मुस्की छोड़इ-ए। दशरथ मण्डलक साढ़ूक लड़का नेपालमे छै, रिनियां लेल कथा अबै छै। मुदा गुलो चारि मासक टेम मंगैए, अरजुनमा नालायक छै मुदा तैयो ओकरासँ पुछतै। गुलोक बारहम खण्ड अनवरक मोबाइलपर फोन एलै अरजुनमाक, ओ रबाड़ि दै छै। गुलोकेँ खोंखी होइ छै, दू सय टाकामे दू कट्ठा थोकड़ा ओलइ के बात भेलै। कतेक गरदा फेफड़ामे गेल हेतइ। खौंत बाड़ि देलकै, दस टाकाक पंखा टूटि गेलै मुदा नंगड़ा दोसर बदलि देलकै। गुलोक तेरहम खण्ड एक बेर रिनियाँ गछपक्कू आम लाए कए गेल रहै तऽ मालिक पचास गो टाका देने रहै। मलिकानि खाइ लए देने रहै। बेलावालीक बोखार उतरिते नै छै। कोन छौड़ा, कोन मौगी काए टा आम लाए गेलइ। गुलो भरि राति छटपट करैत रहल। दम फुलइ आ खोंखी होइ। "बुढिया कए बोखार लागल छै। ओकरा (गुलोकेँ) अपना उठले ने होइ छइ।.. छौड़ी असकरे कखून घर तऽ कखनू गाछी दौड़ैत रहइ छइ। छौड़ा आठ बजे धरि सुतले रहै छै।" गुलोक अन्तिम खण्ड गुलो सात-आठ टा नभका खुट्टा काटि कए राखने-ए। .. आब तऽ सके ने लागइ छै जे कुछो करत। रिनियाँक पाठी खाइ-पीअइ नै छै। नै जानि की भाए गेलै। आन बेर गुलो रातिओ कए गाछी ओगरैत रहय। अइ बेर नै ओगरि भेलै। आब ओते पैरुख नै छै.. ...कंदाहावाली पहुँच गेलइ। 'पपा, कल वला मिसतरी कए बजा आनथिन। ठीक काए देतै।' गुलो बाजल- 'कनियाँ, ओइ मे एक हजार लागतै। हमरा हाथ पर एक्को गो टका नै छै।' 'बजा कए आनथिन ने। जे लागतै से देबै।' अरजुन पनिजाब सए घूरि आयल। भगिना महिनदर जे बेइमानी सऽ गुलोक घराड़ी गुलोक बाप सऽ लिखबा लेने रहै से ठकहरबा भगिना सुनलकै जे ममा बेमार छै त भेंट करय एलै। गुलो ओकरा अवाच कथा कहि देलकै। महिनदर सतलराएन भगवानक पूजा करेलक। रिनियां ओतऽ गेल, भौजी रातिमे रोकि लेलकै। रिनियांकेँ पता चललै जे गुलोक मन बहुत खराप छै। ओ भोरे आबि गेल। ऐ उपन्यासक महा-अन्त... कला देखू.. माय रतुका पूजा दिआ पुछलकै। औतौका हाल सुनबइ मे रिनियां कए मन नै लागलै। माए कए कहलक- 'माय, पैसा दही ने। बबा कए गोली लाबि दइ छिऐ।' ... रिनियां कनहा पकड़ि कए डोलेलकै- 'बबा!' कुइछ नै। कतौ कुइछ नै। 'माय, दौड़ गे। देखही ने बबा कए की भेलै गे! बबा हौ! हौ बबा! बबा हौ बबा!' ... 'हंसा उड़ि गेलै।' फेर पाइक अभावमे लकड़ी नै आ लकड़ीक अभावमे गुलोकेँ गाड़ि देल जेतै। "... भूमकम होइ छै हौ!" परमेसर बाजल। ... भूकम्प फेर एलै। ऊक दइतिए ता दू गोटे मोटरसाइकिल सए एलै, कन्हैया आ जगदीस। फेर मृत गुलो अस्पताल जाइए, ओकर पोस्टमार्टम होइ छै, भूकम्पसँ गुलो मरलै से पहिनहियेसँ अस्पतालमे हल्ला रहै, से कागच बनि गेलै। फेर दोबारा गुलोकेँ असमसान आनल गेलै। ऊक देलकै छोटुआ, दुनू कोदरवाह माटि सए गुलोकेँ तोपि देलकै। किछु खरहू आ जनीजाति जे मुसलमान रहै से आगि दैत आ दफनो होइत देखि बाजै छै- ई हिन्नू हइ कि मुसलमान.. हिन्नुओ के कोनो धरम हइ!... धरम ले के की होतइ? पैसा होइ हइ त बालोबच्चा गुजर करिहइ।... नेता/ मंत्री सभक भूकम्पक बाद अनुकम्पा राशि देबाक प्रतियोगिता। कोनो प्राकृतिक आपदा एलापर केना मुइल लोककेँ अनुकम्पा राशि देबालेल आपसमे प्रतियोगिता होइ छै आ से न्यूज मे रहबाक लेल, से लेखक एतऽ देखबऽ चाहै छथि। वाड कमिशनर पनरह सौ टाका.. एमपी .. पाँच हजार टाका.. मंत्री... दस हजार.. सरकारी आदमी.. चारि लाखक चेक.. आ फेर ओइ पाइ लेल रगड़ा.. जगदीस केँ ओइमे सँ एक लाख चाही। मुदा लेखक घुरै छथि रिनियाँ लग। "रिनियां उदास अय। बबा मन पड़ै छै।.. दाइ गे! कते साफ अबाज रहै।.. ओकरा भेलै जे हाक दइ- बबा! हौ बबा!.." रमता जोगी यात्रा विवरणी, डायरी रूपमे। लेखक लिखै छथि-[०५.०३.२०१९] "मैथिलीमे अखनधरि जे यात्रा साहित्य लिखल गेल अछि, ताहिमे अधिकांश नीरस आ बेजान अछि। अनावश्यक विवरण आ महत्वहीन सूचनाक भण्डार अछि। ओहिमे इतिवृत्तात्मकता बेसी आ आख्यानपरकता कम छैक। डायरी शैलीमे लिखल ऐ वृत्तांतमे इतिहास आ पुरातत्वक बारीक आ ब्यौरेवार अन्वेषण नै अछि। विभिन्न देशक जीवन-शैली आ संस्कृतिकेँ आलोकित करऽवला रोचक मानवीय प्रसंग अछि।" लेखक आस्ट्रेलियासँ प्रभावी छथि- 'आस्ट्रेलिया विकसित, समृद्ध, स्वच्छ, शुद्ध आबोहवा आ उन्नत जीवन स्तर बला देश अछि।.. गरीबी, अशिक्षा आ सामाजिक भेदभाव नै रहलाक कारणे ओतौका जीवनमे बहुत शान्ति छैक।' हमरा मोन पड़ैए जे एकटा हमर संगी कोनो परीक्षा दइले दरभंगा गेल आ यूनिवर्सिटी एरिया घूमि कऽ चलि आयल, कहलक जे दरभंगासँ नीक शहर तँ पूरा बिहारमे कोनो नै छै। ओना तँ लेखक कहै छथि जे हुनकर ऐ यात्रावृत्तान्तमे इतिहास आ पुरातत्वक बारीक आ ब्यौरेवार अन्वेषण नहि अछि, मुदा उपरका अनुच्छेदक आलोकमे हम ऐपर ध्यान दिआबऽ चाहब जे जखन सन् १७७८ मे ब्रिटेन अमेरिकाक कॉलोनीसँ हाथ धो लेलक तँ अपराधी सभकेँ पठेबा लेल वर्जीनिया आब ओकरा लग नै रहलै। से कैप्टन फिलिप तीन जहाजमे पशु, बीआ, भेड़ा, हर आ ६ टा छोट जहाज आ १४०० महिला पुरुष जइमे सँ अदहा अपराधी रहथि, लऽ कऽ २६ जनवरी १७८८ केँ वर्तमान सिडनीक तटपर पहुँचला, आ आस्ट्रेलियाक चारू कात समुद्र तटसँ मूल आदिवासीकेँ भीतर परती दिस आस्ते-आस्ते धकेल देल गेल। मूल निवासीक वाटरहोल (जलस्रोत) पर कब्जा कऽ लेल गेल, आ आइयो जखन २६ जनवरीकेँ ओतऽ ऑस्ट्रेलिया दिवस मनाओल जाइए, मूल आदिवासी ओइ दिन शोक दिवस मनबैत छथि, आब ओ रिजर्वेशन (अधूसूचित बोन) मे रहैत छथि। मुदा जेम्स कुक जखन न्यूजीलैण्ड गेला तँ ओतुक्का मूल निवासी माओरी सभक संग नीक व्यवहार केलन्हि। आब आउ रमता जोगी पर- [३०.०९.२०१८] अपन पुत्र कुमार सौम्य संगे बिजनेस क्लासमे ओ मेलबॉर्न बिदा भेलाह। पैघ बेटा संतोष कुमारकेँ पहुँचलापर फोटो पठबैत छथि। बेटा कुमार सौम्य सी.ए. छथिन्ह आ पुतोहु मधुलिका (मधु) सॉफ्टवेयर इंजीनियर, बेटा जातियेमे बियाह केने छन्हि से देखेबा लेल लेखक निम्न वाक्यक प्रयोग करैत छथि- "भाटा-अदौरीक तीमन बनल छैक। अदौरी मधुलिकाक मम्मी जयमाला यादव..."। सैंक्चुअरी लेकक किछु भारतीयक दोकानक चर्चा अछि आ पतंजलि उत्पादक सेहो। चारि माससँ सौम्य कैंसर पीड़ित मायक मृत्योपरान्त सेवा केलन्हि आ आब पिताकेँ संग अनने छथि। सौम्य कहै छथिन्ह जे संतोलाकेँ ऑस्ट्रेलियामे ऑरेन्ज नै मेंडेरिन कहैत छैक। प्वाइंट कुक मेलबर्नक पछबरिया भाग छिऐक। एतय इंडियन आ अफ्रीकन बेसी रहैत अछि, क्राइम सेहो होइत छैक (तेँ होइत छैक- से लेखक नै लिखने छथि।) स्वस्तिका गोयनका (सी.ए.) आ आनन्द गोयनका (सॉफ्टवेयर इंजीनियर)क चर्चा अछि। हिन्दी फिल्म 'सुईधागा'ऑस्ट्रेलियामे लागल छै। डोसा हटमे सब सुन्दर भारतीय युवती वेट्रेस छै। एकटाक मुस्की लम्बा छलै... लेखक सोचैत छथि- ओ किएक मुस्कायलि?... जे हो, सुखायल जीवनमे एहन तरल आत्मिक अनुभूति किछु क्षणक लेल सुख दऽ जाइत छैक। भारतसँ सुखद समाचार एलनि, यूनिवर्सिटी पेंशनक बकाया राशिक भुगतान लेल तत्पर भेल। दूर-दूर जाइबला ट्रेनकेँ एतऽ बिलाइन ट्रेन कहल जाइत छैक, ताहूमे दुर्घटना नै घटैत छैक। सिटीमे ट्राम चलैत छैक, कलकत्ते टामे ट्राम नै छै, मुदा एतुक्का ट्राम नीक छै। केदार काननक भातिज राहुल वत्ससँ गप भेलनि। ओ आ हुनकर पत्नी अश्विनी, दुनू इंजीनियर छथि आ मेलबर्नमे नोकरी करैत छथि, बेटी अयस्का। किशनपुरक अहमद नोमानीसँ सेहो गप भेलनि। दू टा हब्सी आ महिलाक चिचियायब सुनलन्हि। निग्रो आ हब्सी अपमानजनक शब्द छिऐ जेना मधुबनीक सिमराक गिदरमा़ड़ा, ओकरा बंजारा कहियौ, जेना पाकिस्तानमे पश्तूनकेँ अपमानित करैलेल पठान कहै छै, मुदा भारत मे लोक पठान टाइटल सेहो राखैए। आगाँ जा कऽ लेखक मुदा हब्शी शब्दक कहलासँ अपनाकेँ दूर करै छथि। ससुर पुतोहुक (सासु-पुतोहु नै) केर सम्बन्ध फरिछायल अछि। "कतेक गार्जन धियापूता लग गेल तऽ ओहि देशक मुद्रा पहिनहि कीनि लेलक। अहूँ जँ ओहिना करितहुँ तऽ हमरा बड्ड खराब लगैत। मधु थोड़े आउट स्पोकेन छथि।" मेलबर्नक रॉकबैंडक दुर्गापूजा। -ऐठाम हिंसाक कोनो स्थान नै छैक। चारि साल पहिने केदार कानन, सुस्मिता, टुस्सी आ रमण कुमार सिंह संगे तारानन्द वियोगी लग महिषी महाअष्टमी मे गेल रहथि, माँ ताराक दर्शन, बलि प्रदान, फेर कारूथान , लोक दूध चढ़बैत अछि। वियोगी कहैत छथि- ताराथानमे रक्त बहैत छैक आ कारूथानमे दूध बहैत छैक! कार ड्राइवर बेसी महिले। "ऑफिसक शराब पार्टी, मधु हैंगओवरमे छलीह।" सौम्य ऑस्ट्रेलियामे बसय चाहैत छथि तीन साल भेल छन्हि, चारि साल पूरा हेतन्हि तँ नागरिकता लेल अप्लाइ करताह। एक्केटा चद्दरिमे एक दोसरसँ सटल दू टा स्त्री सड़कपर चलल जाइत छलि। बहुत सम्भव जे लेस्बियन हो।" शशि कपूर अपन विदेशक अनुभवमे कहने छलाह जे हुनकर दोस्त सभ एक दोसरासँ छूबि कऽ हँसी मजाक करैत छला तँ ओतुक्का लोककेँ होइ छलै जे ओ सभ गे छथि। से लेखक ठीके भजियेने हेताह। सौम्य ओतऽ बसऽ चाहैत छथि मुदा मधुकेँ डर होइत छन्हि। लेखकक प्रोफेसर महेन्द्र झा सँ गप भेलनि, जून-जुलाइक पेंशन आयल छन्हि। ओ चाहै छथि आ केदार, कामता, विनय कुमार झा, वैद्यनाथ झा चाहै छथि जे ओ ओतऽ खूब साहित्य लिखथि। मडर उपन्यासक पहिल अंश अंतिकामे मार्च २०१६ मे आयल, फेर नै आयल। २४.१०.२०१८ केँ एकटा नव उपन्यास लिखब प्रारम्भ केने छथि। नाम फुरायल नै छन्हि। सच्चिदानन्द सच्चूकेँ 'मडर' के अंश बहुत नीक लागल छलनि। मैसेज पठौने छलखिन्ह। लेखकक पुनर्वास (सुपौल) वला खेतक धान कटि जेतन्हि, बटाइ देने छथिन्ह। भरेबाक छन्हि, जँ बटेदार फेर किछु बाउग कऽ देलकन्हि तँ फेर कए मास लटकि जेतन्हि। दू गोटेसँ गप भऽ रहल छन्हि, पाइ टानि कऽ ठकि लेतन्हि तकरो चिन्ता छन्हि। मधु तीन गिलास ह्वाइट वाइन (देसी शराब)क ऑर्डर दैत छथिन्ह, स्वादा ताड़ी जकाँ छैक। सौम्य एकटा जापानी व्यंजन सुसी (बसिया भात आ मुर्गाक बनल) ऑर्डर करैत छथि। समुद्री माँछ बारामुंडी, मुदा पोखरि, चांप आ धारक माछ सन स्वाद नै। रमण कुमार सिंहकेँ 'फेरसँ हरियर' काव्य संग्रहपर कोनो पुरस्कार भेटल छन्हि (पुरस्कारक नाम नै लिखल छै), ओ गुलो केर हिन्दी अनुवाद कऽ रहल छथि (२८.१०.२०१८)। २९.१०.२०१८- चारि पेज लिखलन्हि एतबो रोज लिखि लेताह तँ एक मासमे उपन्यास तैयार (जापानी उपन्यासकार हारुकी मुराकामी प्रतिदिन बिनु नागा केने १० जापानी पन्ना लिखैत छथि- मोटामोटी १६०० शब्द)। नगर परिषदकेँ ऐठाम विनढम कहैत छै। अफ्रीकी अभिवादन- मुट्ठीपर मुट्ठी टकरेलक। माइकी कार्डसँ अहाँ मेट्रो, बस आ ट्राममे सफर कऽ सकैत छी। एकटा स्टेशनक अजीब नाम- एयरक्राफ्ट। डिब्बामे एकटा मांगैबाली चढ़ल, सौम्यकेँ भेलनि जे ओ ड्रग्स केर खातिर मंगैत होयत। फेर नीचाँमे ओकरा देखलनि, सिगरेट मुँहमे दबेने अबैत, छातीकेँ मललक जेना लाइटर ताकि रहल हो.. भरिसक कामुक इशारा..। लेखककेँ हेमोग्लोबिनक स्तर सामान्य राखक लेल मासमे एक बेर एनफो इंजेक्शन लेबऽ पड़ैत छनि। आइ नोत अछि। विकास, प्रियंका, अभिषेक, निधि आ अश्विनी..। विकास आ अश्विनीक नोकरीपर खतरा छैक। टाटासँ निधिक मायक फोन आयल छैक। नौआक दोकान... एकटा महिला दोकानक हिसाब-किताबमे लागल अछि। तकलक.. बुझेलै जे हम पहिनहिसँ देखि रहल छिऐ। ... ओ हमरा दिस तकलक। हम ओकरा दिस तकलिऐ। हमरा डर भेल। ओकरा की भेलै? अफ्रीकनकेँ जँ हब्शी या ब्लैक कहबै तऽ ओ नाराज भऽ जायत। सब अफ्रीकन कारी आ लंबा होइत अछि। बहुत कम्मे एहन होइत अछि जकर गढ़नि नीक होइत अछि। ई संयोगे छिऐ जे रेस्त्राँमे महजूद अफ्रीकी युवती सुन्दर छलि। सौम्यक मित्र जसवंत सिंह, बियाह ईसाइ एंजेलीनासँ। धर्म परिवर्तन केर कोनो चक्कर नै, यज्ञो हेतै आ चर्चमे प्रार्थना सेहो। सौम्य आ मधु स्नोरकेलिंग..स्कूबा... दुनूमे भाग लै छथि। रीफक दर्शन, बोटक पेनीमे शीसा लागल छै। जेस टिया आ बेकी बॉलडॉक.. एक दोसरसँ गला मिलैत छी। आरम्भ जेस टिया करैत अछि। बेकी के आलिंगनमे एकटा चुम्बकीय तरंग छैक। फ्रॉग्स रेस्त्राँमे घड़ियाल के माउस खा सकैत छी। कंगारू के खाल कीनि सकैत छी। आस्ट्रेलियाई आदिवासीकेँ प्राचीन डिजेरिडू वाद्य बजबैत सुनि सकैत छी। एतऽ अपनेसँ पेट्रोल भरय पड़ैत छैक। आइ पहिल दिन पोर्क (सुग्गरक माउस) खा रहल छी। पैंग्विन पैरेड... भोरे केदार के मैसेज देखलहुँ। डी एम साहेब गप्प करऽ चाहैत छह।... हुनका खाली जिज्ञासा रहनि जे मेलबर्नमे कोना छी। हमहूँ निश्चिन्त भेलहुँ। देखलिऐ दूटा लड़की एक दोसरकेँ कसिकऽ पकड़ने चुम्मा-चाटी लऽ रहल अछि। बुझाइ-ए लेस्बियन अछि। आस्ट्रेलियामे समलैंगिकता वैध छै। गे गे संगे आ लेस्बियन लेस्बियन संगे विवाहो कऽ सकैत अछि। अंकुर आयल छथि। ओ मधु संगे पढ़ै छलाह। दूटा जनानी डिब्बामे चढ़लि। मधु बतेलथि ई सभ रेभलर्स अछि। निशां वला सुइया लऽ कऽ मस्ती करैत रहैत अछि। दू बीत के गोलमटोल झबरा कोआला एगो ठाढ़िपर गबदी मारने बैसल अछि... आलसी जीव। कंगारू.. सहमिलू एमू चिड़ै.. उज्जर पेलिकन..लायर बर्ड.. तस्मानिया डेविल्स (लुप्तप्राय)। ऑस्ट्रेलियासँ कुआलालम्पुर फेर होची मिन्ह सिटी। एक करोड़ जनसंख्या बला शहरमे ७० लाख दुपहिया। दक्षिण वियतनाम, मैकोंग नदी। पहिल बेर धानक कटनी मशीनसँ देखलिऐ। वियतनाममे साँपो, कुकुड़ो खाइत छैक। कुत्ता के माउंस पुंसत्व बढ़बैत छै से ओतऽ विश्वास छै। वियतनाममे महाप्रकाश बड्ड मोन पड़ि रहल अछि.. सिटी टूर, चीनी पगोडा, जकरा बाल बच्चा नै होइ छै से चिड़ै कीनि कऽ उड़ा दैत छै। मधु एकटा चिड़ै कीनि कऽ उड़ा दैत छथि। होची मिन्ह सिटीसँ हनोइ, उत्तरी वियतनाम। ओतुक्का नदी रेड रीवर। मधु के सखी रुचि आ पति गौरव ओतऽ भेटलन्हि। यात्रा वृत्तान्तबला नोटबुक हेरा जाइ छन्हि फेर भेट जाइ छन्हि। रुचि ब्राह्मण छथि आइ.ए.एस. ऑफिसरक बेटी, गौरव राजपूत। प्रेम विवाह केने छथि। रुचिक पिता ऐ विवाहक घोर विरोध केलनि। कठपुतली, कखनो सोंसि तऽ कखनो बोच बनैत अछि। रुचि संगे विदाइ के आलिंगन होइत अछि। कम्बोडिया अंगकोर वात हिन्दू आ बौद्ध धर्मक सम्मिश्रण अछि। भाइ योगेन्द्र पाठक वियोगी अंगकोर वातक बहुत सूक्ष्म आ विस्तृत अन्वेषण कयने छथि। पब स्ट्रीट के चौराहा.. पैंतीस सालक आदमी.. वांट गर्ल सर? थर्टी डालर फॉर वन आवर। सिक्सटी डालर फॉर वन नाइट।.. नो आइ डोंट वांट।स्पेनिश महिला.. उनोस, दोस, त्रेस... (एक दू तीन) पुछलिऐ- दोंदे भिभा उस्तेद (अहाँ कतय रहैत छी?) कहलक- एसपान्या (स्पेन)। ..रातिमे तरल बेंग चिखैत छी। बैंकाक, सुवर्णभूमि एयरपोर्ट.. बीचमे समुद्र मंथन के बिम्ब ठाढ़ करैत मूर्ति.. हिन्दीओमे चेतावनी लिखल छै.. कोई टिप्स नहीं। बैंकाकक लम्बा वात अरुण मन्दिर। पटाया.. कृशकाय जर्जर बुद्ध.. बुद्धक एहेन मूर्ति नै देखने छलिऐक। रातिमे एक बजे मुम्बई पहुँचब। सम्राट रिसीव करताह। [०४.०१.२०१९] परिशिष्ट- अंडमान डायरी सितम्बर २०१२- माझिल बालक संजय सपत्नीक पोर्ट ब्लेयर जा रहल छथि, बजेलथि। हम सहरसासँ ओ मुम्बईसँ, पोर्टब्लेयर एयरपोर्टपर भेंट होयत। टैस्की लऽ कऽ अन्नादुर्रै ठाढ़ अछि, ओ चेन्नैमे घर बना रहल अछि, ओकरा होइ छै अंडमान कहियो समुद्रमे डूबि जेतै। ओकर राँचीक ड्राइवर बादमे अबै छै उदय। पोर्टब्लेयरमे राँची नाम्ना एकटा मोहल्ले छै। अंडमानमे सभसँ बेशी बंगाली अछि फेर तमिल। नॉर्थ बे, बिसटकही नोट पर जे फोटो छपैत छैक से अही टापूक पहाड़ आ जंगल के। एतऽ स्नोरकेलिंग, स्कूबा डाइविंग, स्पीड बोट सभ छै। कोरल रीफ छै। ग्लासबोट (पेनीमे ग्लास) बैसल-बैसल सागरक जीवन देखि सकै छी। जॉली ब्वायमे प्लास्टिक प्रतिबन्धित छै। बरटंग जारवा अदिवासी। मित्र लल्लन (विनय कुमार झा, आइ.ए.एस.) बहुत जोर देने रहथि, जारवाकेँ जरूर देखिहेँ। हैवलॉक आइलैंड। मडर साहित्यप्रेमी सम्राट आ नेहा लेल सपर्पित ई पोथी पुरुष-स्त्री सम्बन्ध आ पुरुष प्रतिनायक मदनक संदेह केना ओकरा हत्यारा बना दै छै, तइपर आधारित अछि। फेर अपराधी बैकग्राउण्डक सम्बन्धी ओकरा शरण दै छै, से मदनक दुरुपयोग कएल जेतै ओइ सम्भावना आ मदनक मानसिक उद्वेलनक संगे उपन्यास खतम होइत अछि । मदनक पत्नी राधा सिलाइ-फड़ाइ कऽ कय घर चला रहलि अछि। ओकर बड़की बेटी शनिचरी शनि दिन जनमल रहै। मुदा ओकर कत्तौ पता नै, गम्हरियाबालीक ब्लाउज सिया गेल छै, से दऽ अबितै तँ बीस टाका भेटितिऐ आ चाउर-अल्हू बेसाहि कऽ लऽ अनैत। अपने जायत तँ मदन जँ देखि लेलकै तँ ओदबाद कऽ देतै, ओ राधाकेँ कत्तौ जाय नै दै छै। ओकर माथामे संदेहक कीड़ा घुरघुराइत रहै छै। मुदा पहिने एना नै रहै, मदन तकतान करैत रहै जे राधाक तेल-साबुन सठलै कि छै। ओकर बाप कामेसर आजाद अपन जमानाक इण्टर पास। बाप-पित्ती जरे रहै, पचास-साठि बिगहाक जोतदार। मुदा मुदा कामेसरक पित्तीक मृत्युक बाद भिन-भिनाउज आ कामेसरक हिस्सामे पाँच बीघा जमीन पड़लै, दू-बेटा, दू बेटी आ अपने दू परानी। सामाजिक काज रोगीक इलाजमे कामेसरकेँ बड मोन लागै। दुनू बेटा जेना-तेना बी.ए. केलक। मदन बम्बइ भागि गेल, ओतऽ राधा मोन पड़ै। ओतऽ बड्ड खटनी से घुरि आयल, राधा नैहर चलि गेल रहै। ओ सासुर गेल, राधा सिनेमा देखऽ गेल रहै, ओकर जेठका साढ़ू संगे आ अत्तैसँ संदेह शुरू भेलै। राधाकेँ विदागरी करा कऽ कामेसर आनलक। शनिचरी भेलै, करमू भेलै। मुदा मदनक संदेह कम नै भेलै, पहरा आ मारि-पीट शुरू। मदन आ किशोर दुनू भाय भिन्न भाय गेल। कलममे आड़ापर एकटा शीसोक गाछ सूखि गेलै, ओकर दाम-छाप केलक मुदा किशोर अड़ंगा लगा देलक, गहिकी भड़कि गेलै।फेर बिकेलै। मदन आ कमलामे मारि बझलै, मदन ओकर कान काटि पड़ा गेल। कमला केस काय देलकै, कामेसर २-३ सय टाका दय पुलिसकेँ शान्त केलक। पीसा मदनकेँ टेम्पो जोगार काय देलकै, पिपरासँ सिपौल आ सिपौलसँ पिपरा चलबऽ लागल। कामेसर राधाकेँ विदागरी करा कऽ आनि देलक मुदा माय ओकरा लेसि देलकै- "ओकरा सैंत, नै तँ नाक कटा देतौ।" फेर मारि-पीट आ राधा नैहर तिनटोलिया चलि जाइए। राधा के पएर भारी रहै। मैट्रिक पास केला पर राधा इंटर मे नाम लिखेने रहय। तकर परीक्षा के फारम भराइ छै। ओकर सखी सासुर सए अही खातिर आयल छै। कौलेज राघोपुर मे छै। राधा फारम भरइ-ए.. एकटा एहनो समय रहइ जे ... मदन ओकरा निर्वस्त्र काए दइ। .. अइ सए बढ़ि कए और कोनो आनन्द जीवन मे नइँ छै। लेकिन आब नइँ। आब तकलीफ होइ छै। राधा कए होइत रहै कतहु भागि-पड़ा जाय। ककरो संगे उढ़रि जाय। अशोक.. ओकर आँखि मे अपना लेल सिनेह देख इ-ए।... राधा कए शनिचरी मोन पड़ै छै। करमू मोन पड़ै छै। कोर के दुधपीवा बच्चा कय की हेतै? राधा कए कैक टा लड़का मोन पड़ैत छै जे ओकरा चाहैत रहइ।.. बेर तोड़इ, जिलेबी तोड़इ, आम दइ जामुन दइ।.. ने कहियो देह मे सटइ।... करजइन वला अपन बहनोइयो...। मिठबोलिया छै। एक बेर जाड़ मे नेपाल सए बड़ सुन्नर कनटोपी आनने रहइ। इंटर के रिजल्ट निकललै। राधा कए इंटरो मे फस्ट डिविजन भेलै (माने मैट्रिकोमे फस्ट डिवीजन भेल रहै)। राधा के ससुरारि पथरेमे महावीर के घर सए थोड़े हटि कए छै। पथरा के दू टा लड़की इंटर के परीक्षा देने रहइ। मगर ककरो फस्ट डिवीजन नै भेलइ। महावीर के फस्ट डिवीजन भेलै, पथरा पंचायत के प्राइमरी इसकूलमे मास्टरी लए दरखास देत। मुखिया कहलकै हाकिमके कने पैसा-तैसा दिअ पड़तै, जँ ४-५ हजार लगतै तँ पनरह सौ मानदेय भेटतै, ३-४ महीनामे टका ऊपर भाए जेतै। ओ तिनटोलिया अपन बहीन के विदाइ करबय आयल-ए। महावीर ओकरा कहलकइ जँ दरखास देत तए राधा कए पथरा इसकूल मे मास्टरी भेट जेतइ। ससुरो समाद पठेने रहइ। राधा कए अपनो मोन रहइ। इंटर के परीक्षा खतम होइते राधा कए एगो बेटी भेल रहइ। राधा नौकरी धाए लेलक। आब मदन गारि-मारि बिसरि गेल रहय। महावीर कए ओही इसकूल मे नौकरी भेट गेलै। रेखा सेहो ओतहि आबि गेलै, ऊ राधाक बहिना रहय, ओकरो ससुरारि पथरे रहइ। मुदा मानदेयक खोज पुछारीक बहन्ने मदन राधाक पहरेदारी करय। ..एगो रघुनाथ सहनी रहइ। ऊ सब कए कहने घुरइ- गोढ़नीक कोनो बिसबास नै!.. रघुनाथ निछच्छ बताह रहइ। मदन बताह नै छै। ...नोकरी छोड़बा देलकै। राधा घर बैठ गेल। मदन ममहर गेल मदति लेल मुदा पान सय टाका भेटलै। मास्टरक मानदेय बढ़ि कऽ चारि हजार भऽ गेलै। राधा बेसी पछताय लागल। फेरसँ नोकरी भऽ जाइ, महावीर कहलकै हेडमास्टर आ मुखिया सऽ भेँट करइ लेल, हेडमास्टर कहलकै मुखिया सऽ भेँट करइ लेल। कामेसर मुखिया लग गेल, मुदा मुखिया साफ नकारि गेलै कारण बहुत दिन भाए गेलै। मदन महावीर सऽ राधाक भेँटपर शंकालु होइ छै। कामेसर चरचित लैत रहै छै। की घटलइ, कोन दुख तकलीफ छै। ससुर संगे ओ किए खुसुर-फुसुर करैए, मदन पुछै छै। राधाकेँ दुख होइ छै। मदन बहीन लग गेल। बहनोइ राजकुमार इंटर कौलेज मे पढ़बइ छै। दरमाहा नै भेटै छै। लेकिन टीसन खूब चलै छै। बहनोइ पुछलकै- कनियाँ कए नौकरी किए छोड़ाय देलिऐ?.. अहाँ बलौ संदेह करइ छिऐ। मदन चैल देलक। घर पहुँचल.. राधा.. मटिया तेल ढारि कए देह मे आगि लगाय लेने रहइ। कामेसर जे राधा के सेवा केलकइ.. दुनू मे जरूर कोनो लटपट छै। मदन बहीन लग जाइत रहय तए राधा भनभनाइत रहय- ससुरो-भैंसुर कए नै छोड़लक।.. आगि लगा लेब... .. कामेसर छौंड़ा कए लाए जाइ छै। .. राधा लेल टॉनिक कीनै छै। ओकर बाप ओइ दुनू लए एतेक चिन्ता.. मदन सोचैत रहइ-ए। ओकर संदेह पक्का भेल जाइ छै। राधा कहइ छै- पिपराही वाली दीदी सए चाउर लाए ने आबौ। दीदी पाँच किलो चाउर देलकै.. मदन कए रीस उठलै। अपन चाउर राख.. खाली ई मौगी केलक। बुढ़बा भतार लग सूतइ खातिर बैलाय देलक।.. बापक हाथमे दबिया देखि शनिचरी कए डर भेलै- माय कए नै मारहक हौ पप्पा।.. राधाक गरदनि कटि गेलै। मदन निकलि गेल। रामपुरमे मदन के मामक ससुरारि छै। ममा के मझिला सार तए अपराधी सभक सरदार छिऐ। ऊ ममाक जेठका सार लग गेल जेठका के कनियाँ डरि गेलै। मझिला ओत्तहि रहइ। बाजलै- एकरा हम राखबै। पड़ल-पड़ल कखनू आँखि लागि गेलइ। राधा फेर आयल छै। उज्जर नूआँ पहिरने। गला मे खूँट लपेटने। निन्न टूटि गेलइ। राधा कतौ नइँ छै। लेकिन ओकरा बुझाइ छइ राधा सामने ठाढ़ छै। भोट भोटमे लेखक- प्रोटैगोनिस्ट (सूत्रधार) केँ भातिज (ओ प्रोटैगोनिस्टक भातिज छथिन्ह तकर खुलासा बादमे होइए) यदुवंश्, जे बहुत पहिने एमेले एक बेर भेल रहय (एकरो चर्चा बादमे छै) केँ लोक विधायकजी कहै छै, केर फोन अबैत छन्हि। प्रोटैगोनिस्ट सुभाष जी क नीक लोकमे गिनती छन्हि से ओ हिनकासँ सहायता मांगैत छन्हि। करिहो पहुँचै छथि। राजद नेता राजिनदर कहै छन्हि जे सबहक ऐठाम एक-एक कप चाह पीबि लेता तहीमे बेड़ा पार। एमेले चुनावमे राजद, जदयू आ कांगरेस पाटी के गठबंधन छै। यदुवंश कुमार यादव पिपरा विधान सभासँ उम्मेदवार छिऐ, ई राजद के हिस्सामे पड़ल छै। करिहो पहिने सुपौलमे पड़ैत रहइ। अइ बेर काइट कए पिपरा विधान सभामे दाए देलकइए, विजेनदर यादव एतऽ सऽ जितैत रहइ, तैं एतौका बेसी भोटर जदयू के छै। राजिनदर यादव एतऽ सऽ मुखिया के एलेक्शन लड़ल रहय। जीत नै सकल, मुदा योग्य आदमी छै, गएर सरकारी कौलेजमे नाम छै, मासमे दू-चारि दिन कौलेज जाइए आ हाजरी बना कऽ चैल आबइए। जहिया कहियो अनुदान आबै छै तए थोड़े आमदनी भाए जाइ छै। लाट बना कऽ सभ घूमैए। प्रोटैगोनिस्ट सेहो सङमे घूमै छथि। हरदी के परोग्राम बनत तऽ प्रोटैगोनिस्ट कामता (जदयू) संगे निकलि जेता, मुदा ने दीना पाठक (जदयू)केँ किछु पता छै ने एकटा आन कांगरेसीये केँ। प्रोटैगोनिस्ट कामताकेँ कहै छथि जे ऐ तरहेँ सोचलासँ राजद, जदयू आ कांगरेसक गठबन्धन कमजोर भऽ जेतै। कामता हरदी जाइले तैयार भऽ जाइए। फेर हरदासँ करिहो। एलेक्शनक परचारक प्रोटैगोनिस्टक ई पहिल अनुभव छन्हि। यदुवंश कहै छन्हि जे पैसा नइ अय। प्रोटैगोनिस्टकेँ ई चिन्तित करै छन्हि। बिनु पाइक चुनाव केना लड़त? प्रोटैगोनिस्ट कतेक चन्दा दऽ सकतिन्ह ५-१० हजार, ओइसँ तँ नीक जे परचारमे ओत्तेक खर्च कऽ देथि, चाह-पानमे की कोनो कम खर्च होइ छै! सोचै छथि जे करिहोक खर्चाक भार उठा लेथि, मुदा फेर होइ छन्हि जे नै जानि कत्ते खर्च हेतइ। प्रोटैगोनिस्ट आ कामता सुपौलमे पढ़ैत रहथि आ यदुवंश रफीगंजमे, तकर एकटा खिस्सा प्रोटैगोनिस्ट सुनबै छथि, कामताक साइकिलसँ प्रोटैगोनिस्ट आ यदुवंश एकडारा गेलथि ओत्तऽ साइकिल चोरि भऽ गेलै, कामता यदुवंशकेँ मोन पाड़ैत अछि, यदुवंश आब ओकरे क्षेत्रक एमेले बनतै, एक दोसर के बेगरता पड़तै। मुदा पाटी लाए कए दूरी छै, शीर्ष नेता सभ समझौता कऽ लेलकै मुदा एतेक दिनक कटुता तुरन्ते भाफ जकाँ केना उड़ि जेतै? बिन्दुलाल दास मखौलिया अय। खिस्सा सुनबै छै, चाह दोकानबलाक नाम बीडियो छै, घूस जे लेलकै, से ससपेन भाए गेलै। तहिया सए चाह बेचइ छै। सभ भभारो हँसलै, बीडियो मिडिलो पास नइ-ए। बीडियोसँ प्रोटैगोनिस्ट पूछै छथि, ओ ककरा भोट देत, मुदा ओ टेढ़ जबाब दइ छन्हि- ककरा देबै आ ककरा नै देबै, से तोरा कहि कए! बीजेपी के कंडीडेट विश्वमोहन छिऐ, एक बेर एमपी भएल रहइ, दोसर बेरा हारि गेलै, एतुक्क एमेले ओकर कनियाँ सुजाता छिऐ। विश्वमोहन कीयट छिऐ। एक बेर दिलेसर कामत जीतल रहै, ओहो कीयटे रहइ। ओना सोशलिस्ट पाटी के नेता विनायक यादवक जमाइ दीनबन्धु यादव सेहो एक बेर जीतल छै। पिपरामे कीयट के जनसंख्या बेशी छै। दोसर नम्बरपर धानुक आ तेसर नम्बरपर जादव छै। धानुक जातिके अपन कोनो कंडीडेट नै छै, से ओकर भोट बँटतै, चौधरी भेलै बनियाँ आ बीजेपी भेलै बनियां पाटी, ऊ बीजेपी छोड़ि कतय जेतै? हँ पाइ पर कियो ढूइल जाइ तँ.. समाजवादी पाटी के कंडीडेट सत्यनारायण गुप्ता, ऊ तेली छिऐ, तेली के बेसी भोट ओकरे जेतै। वामपंथी के उमेदवार नागेसर यादवक कोनो चरचा नै छै। मुसलमान बीजेपी सए भड़कै छै, ऊ सब छेहा गठबंधन के भोटर छिऐ। तहिना बाभन गठबंधन सए भड़कै छै। सुखदेव बीजेपी मे छै, ओना ओकर उमेदवार सए जनता नराज छै। शिवजीक चाहक दोकान छै, नै नीक चाह बनबै छै, निशांमे रहै छै, परधानमंतरी तक के गारि दै छै, प्रोटैगोनिस्टकेँ कहै छन्हि खरचा करै ले- तोरे कोन कमी छह! ओकर बेटी लछमी जीन्स आ टॉप पिन्हइ छै। लिट्टी चाह बनबइ आ गैंहकी सम्हारइमे ओस्ताज भाए गेल छै। प्रोटैगोनिस्टकेँ शिवजी लछमीसँ पढ़ाइक टेस्ट करबैत अछि, प्रोटैगोनिस्ट पूछै छथिन्ह पुष्प माने की? उत्तर- फूल। शिवजी, बेटी पढ़ैमे तेज छौ! प्रोटैगोनिस्ट कंडीडेट संगे अपन सम्बन्ध सभकेँ बता देनहि छथि, ता बात पसरइ छै, दस दिनुका बाद फेर एता। घरनी कहै छथिन्ह- घुचघुच जाय कए की हेतै। अहाँ के कहने लोग भोट दाए देतै? दाइ सकइए। सौ-पचास भोट के फरक पड़तै। तए फैदा हेतै यदुवंश कए। अहाँ कए यदुवंश की देत?.. अपन काम करतै तए दू गो पैसो हेतै। परचार केने सए पेट भरतै? सब कुइछ पैसे नै ने छिऐ। नै छिऐ तए जाउ। ओनही बैठल रहब।.. आइ हम नै काम देबै तए काइल्ह ऊ हमरा काम देतै? जे मन होइ-ए सएह करू- घरनी आजिज भेल कहइए। यदुवंश नामांकन दाखिल केलक। प्रभास प्रभारी छिऐ। चुनाव लगिचा गेलै, प्रोटैगोनिस्ट करिहो पहुँचै छथि। कामता मंत्रीजी के परचार करय गेल अय, ओ ओकर पाटी जदयू के उमेदवार छिऐ, क्षेत्र बदैल गेलै, लेकिन पाटी तए नै बदललै। बिन्दू मास्टरी करइए। पराइविट। .. पचास टके मेहीना। .. कोय दइ छइ, कोय नइ दइ छइ। .. जैह भेटल, सैह लाए लेलक। चाउरे देबें, दूधे देबें, जरने देबें..। एक बेर ऊ पंचायत समिति के सदस्य भेल। मुखिया कए कहि कए पब्लिक के कोनो-कोनो काम.. इनरा आवास तए ककरो बिरधा पिलसिन। काम भए गेला पर.. कोय दस, कोय बीस।.. लेकिन अगिला चुनाव जातीय गोलबन्दी के ओजह सए हाइर गेल। मन्नू.. मालजाल के पैकारी करइ-ए। खाली खरचा-पाइन के इंतजाम केने जाहक.. मन्नू हमरा मुल्हा तए ने बूइझ रहल अय। मन्नू भाय, पहिने चुनाव कते चिक्कन आ शान्त होइत रहइ।.. आब स्वार्थ के उठा पटक छै। आइ सभक टारगेट मुसहरी आ डोमराही रहै। करिहोमे मुसहर के दूटा घनगर टोल छै।.. सटले डोमराहियो छै।.. सब भोटर के दुआर पर जाउ।.. हमरो भेलू देलक। हमरो पुछलक। करिहो के दुनू टोल आ बगहीओ के मुसहरी धांगलिऐ।.. साँझ पैड़ गेलै।.. चंदेसरी चाह-पान के पैसा तए हमरा सए लेबे केलक; मुसहरी के एगो नेता खातिर सौ टका और लेलक।.. नीतीश कुमार भोटर के नाम जे अपील केने छै से, सात निश्चय बला घोषणा-पत्र, बैलेट पेपर के नमूना आ कलेंडर लाए कए निकलै छी।.. भाइजी गड्डी के गड्डी आनने छह।.. हम अपन आटा गील काए रहल छी।.. महिला कए ठीक सए बुझाबहक। कहिहक नीतीश आ लालू मिल गेलै। दुनू एक भाए गेलै। अइ बेर एतय तीर के निशान नै रहतै। लालटेम रहतै।.. अइ बेर लालटेमो मे देबहक तए नीतीशे जिततै। पुछलक- नीतीश मुखमंतरी बनतै ने? महिला खातिर बहुत कुइछ केलकइए। जनीजाति नीतीश के कट्टर समर्थक छै। सफीना आयल हइ!- जमील सुनबइए। सफीना केहन-केहन के आँड़ गलाय दइ छै। फेर सफीनाक एकटा खिस्सा।.. मुखियोमे ठाढ़ भेल। लोक चिन्हलकै। चंदेसरी सफीना के भक्त रहय, संगे घूमइमे चंदेसरी कए खूब मन लागइ। ओकरा भोट के देतै! चंदेसरी सोचइए.. कहिया काम पर भोट देतै? सफीना बेसी पढ़ल लिखल नै छै, फोकानियां पास छै,..। विश्वमोहन के घर कटैये छै। ओतय पान सय टका भेटै छै। संजय आ जयप्रकाश दुनू बीजेपी के समर्थक छिऐ। अखबारमे रोज समाचार.. गड्डी के नोट आ शराब के बोतल पकड़ल जाइ छै। गगना- दारू आ माँस चलै छै। बीजेपी जितले छै। सिपौल.. राहुल गाँधी के भाषण रहइ। पूरा गांधी मैदान भरल रहइ.. कहलकइ मोदी चोर छइ.. दंगा करबै छै, हिन्नू-मुसलमान कए लड़बै छै।.. गठबंधने जिततै। समाजवादी पाटी.. सत्यनारायण साह.. कामता खौंझाइए.. भोटकटुआ.. विश्वमोहनो के झाड़लक कामता.. जदयू.. फेर राजद.. कहियो बीजेपी कहियो बंगला छाप.. नीतीश महिला लए बड्ड काज केलकै, सौ मे तैंतीस टा सीट, साइकिल देलकै। पाठक टोल के छै.. परचा घुराय देलक। लालटेन नै, कमल। हम- लालटेम। ऊ- कमल।कमल। मोदी की कहलकइ। लालू कए बदनाम करइ वला बात। अपहरण, बलात्कार आ हत्या.. साँझ पड़ैत लोग घर मे बन्न.. लोक मोदी आ लालू के नकल करइ छै। .. बीजेपी जिततै तए रिजरभेसन खतम काए देतै।.. समीक्षा हेबाक चाही से गप मोहन भागवत बाजलइए।.. मतलब एक्के.. मंडल के विरोध मे कमंडल..। एमेलसी हारुण रशीद- बाभन के जनसंख्या कते? दूइए-अढ़ाइ परसेंट ने? आ नौकरी मे.. सगरे तए वएह छै! चंदेसरी.. सफीना बेसी गोर भाए गेल छै.. सब पाटी पैसा लै छै, तब टिकट दै छै। ओकरा लेट भाए गेलै। ताधैर टिकट बिक गेल रहइ।.. चंदेसरी.. सफीना के अंग-अंग निहारय लागल।.. बीजेपी मुसलमान कए भगबय चाहय छै। मुसलमान डरल छै- सफीना कहलकइ।.. जेना हिटलर यहूदी कए कतल केलकै, तहिना मोदियो मियाँ कए काइट देतै।.. अइ देस मे गिद्ध उड़तै। बीजेपी अनधुन खरचा काए रहलइए।..जमील.. मोदी तए एक नम्मर के झुट्ठा छै! रामधन बात लोकइ छै। आइ परभास आयल रहइ। बूथ-खरचा के सात हजार टका दाए गेलइ। दूटा बूथ छै। राम मन्दिर तए बीजेपीए बनेतै।.. चुनलकै से मंदिरे बनबै लए?.. हम मोदिए कए भोट देबै।.. पकिया अंधभक्त.. सूर्यनारायण कौमनिस्ट.. नीतीश गनगुआइर छिऐ.. एगो मुँह भाजपा.. दोसर राजद। कमल दास बीजेपी समर्थक छिऐ। ..छप्पन इंच के छाती.. पाकिस्तान कतौ भारत मे ठठलइए!... चीन के लगही भाए जेतै.. रामदेव के गप पर सब हँसइए। भोट खातिर मोदी पाकिस्तान पर हमलो काए सकइए। .. बीजेपी लड़ाइ किए करतइ? हिन्दुए खातिर ने करतै?.. मुसलमान के पाकिस्तान भेजल जाए। लाल पाठक विस्फोट केलकै।.. राष्ट्रवादी लाल तए आइबिए गेल॒! आब मनुवादिए टा के कमी छै। दीना पाठक.. मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप नै लागल.. मोदी तए महाभ्रष्टाचारी छै। सुधीर चाह दहक- कामता के ई उदारता माहौल कए एकदम बदैल देलकै। परचार खतम भाए गेलइ।.. शान्त.. सब चीज भुम्हूर जकाँ तरेतर सुनगै छै। लोग एक घण्टा पहिनइ लाइन मे लागय लागल। बेचना ककही दाए कए महिला भोटर पटियाबैत रहइ, सिपौल बजार मे पोलिंग कम भाए रहलइए। ई समाचार बीजेपी समर्थक कए चिन्तित केलकइ। शहरमे कमल के भोटर बेसी छै। सफीना भोट गिरबै लए आयल छै। .. काइल्ह एबह- कहि कए चंदेसरी निकैल गेल। सफीना मुस्कुरायल। बिहान भने चंदेसरी नवटोल गेल। सफीना संगे चुनाव के गप होइत रहलै।.. भाजपा कहै छै हम जितबै। गठबंधन कहै छै हम जितबै। आब जे होइ।सफीना दू-तीन दिन मे दिल्ली चैल जायत। चंदेसरी पुछलकै- एबहक कहिया? सफीना बाजलै- भाजपाई रोज नया-नया काण्ड करै छै।.. चंदेसरी- एना हीया हारने जिनगी चलतह? सफीना छगुनैत रहल.. लड़ैत-लड़ैत मैर गेनाइ नीक छै।.. मरनाइए, जिनाइ छिऐ। घरदेखिया, राजकमल मोनोग्राफ (नित नवल राजकमल), बनैत बिगड़ैत, गुलो, रमता जोगी, मडर आ भोटक पुनर्पाठ ऊपर देल गेल घरदेखिया, राजकमल मोनोग्राफ (नित नवल राजकमल), बनैत बिगड़ैत, गुलो, रमता जोगी आ भोटक सैपलसँ अहाँकेँ सुभाष चन्द्र यादवक शैली, प्रतीक आ प्रतीक चिन्हक प्रयोग, सदा परिवर्तित होइत वृत्तक केन्द्र, दृश्यात्मक आ ध्वन्यात्मक चित्र ई सभ स्पष्ट भऽ गेल हएत। सलहेसक भगता सन लोकदेवता लेखकक भीतर प्रवेश करैत छन्हि आ ओ टीपऽ लगै छथि, खोंचारि कऽ सभ चीज-बौस्तु बहार आनऽ लगैत छथि, अभिलेखित करऽ लगै छथि। तँ सुभाष चन्द्र यादवक शैली भेल भगता शैली। मुदा घरदेखियाक महिमामे (सन् १९७५ मे लिखल) सुखदेव भोटमे कतेक गोटे सँ टाका ठकने रहै। से भोट उपन्यास बनल २०२२ मे, १९७५ सँ २०२२ मे किछु अन्तर तँ एलै कारण प्रोटैगोनिस्ट कहै छथि भोट (२०२२ मे)- मन्नू भाय, पहिने चुनाव कते चिक्कन आ शान्त होइत रहइ।.. आब स्वार्थ के उठा पटक छै। मुदा १९७५ मे सेहो ओ कहै छथि- अछरकटुआ भऽ कऽ सुखदेव केन एत्ते कमा लै छै। भोटमे कतेक गोटे सँ टाका ठकने रहै। घरदेखियेक धुंधमे घटना (सन् १९७१ मे लिखल) 'वेटिङ फॉर गोडो'(सेम्युल बेकेट) क मोन पाड़लक से कोनो पोस्टमॉडर्न उपन्यास बनि सकैए। हुनकर घरदेखियाक तर्जपर जगदीश प्रसाद मण्डल लिखलन्हि अपन तर्जक घरदेखिया। से पाठ एकटा दोसर लेखसँ सम्वाद स्थापित केलक जे उमेरमे तँ हुनके बराबरक छथिन्ह (एक साल पैघे) मुदा लेखन हुनकासँ तीस साल बाद शुरु केलन्हि। से हुनकर पाठ काल-स्थानमे अपन पाठसँ सम्वाद करैए, तँ दोसर लेखकक पाठसँ सेहो। सुभाषचन्द्र यादवक घरदेखिया- लड़का हालेमे कलकत्तासँ गाम आयल छलै एखन तुरते समाद पठाकऽ मङौनाइ खर्चाक घर भऽ जेतै। लगनसँ दस दिन पहिने आबि जेतै, जिनका देखऽ के हेतै, देखि लेतै। जगदीश प्रसाद मण्डलक घरदेखियाक ई अंश देखू- "दुनू जोड़ धोती नागेसर आंगनसँ आनि आगूमे रखि देलकनि। धोती देखि डोमन बजलाह- ''समैध, कतबो गरीब छी तेँ की मुदा इज्जति बचा कऽ रखने छी। बेटीक दुआरपर कोना धोती पहिरब?'' टाटक भुरकी देने लुखिया देखैत रहिथ। डोमनक बात सुनि दोगसँ बाजलीह-'समैधकेँ कहिअनु जे जखन बेटी आओत तखन ने बेटीक घर हेतिन, ताबे तँ हमर छी कीने। हम दैत छिअनि'। ठहाका दैत डोमन बजलाह- ''जखन हमर बेटी एहि घर आओत तखन ने ओ समधीन हेतीह आकि अखने?'' जेना रिनियाँ अमाठी, करची, पतलो, जहिया भेटि गेलै आनैए, तहिना सुभाष चारू कातसँ तथ्य एकट्ठा करैत छथि आ आख्यान, महाआख्यान सृजित करैत छथि। से गुलोक नायक गुलो नै रिनियाँ अछि, रिनियाँसँ प्रारम्भ, रिनियाँ सँ अन्त। आ से रिनियाँ ई स्थान अपनेसँ बनेलक, लेखक ओकरा लेल एकटा सह-कलाकारक भूमिका निर्धारित केने रहथि, मुदा ओ अपन समर्पणसँ लेखककेँ विवश कऽ देलक नायिका बनाबै लेल। गुलोक बेटी आ गुलोक छोटका बेटाक घरक काजक प्रति दृष्टिकोणक द्वन्द्व। छौड़ी असकरे कखून घर तऽ कखनू गाछी दौड़ैत रहइ छइ। छौड़ा आठ बजे धरि सुतले रहै छै। मुदा फेर जखन बाँस चोरा कऽ ५०० टाकामे गुलो बेचैए तखन ओइ पाइसँ रिनियाँ पाठी कीनैए। लेखक से नै लिखै छथि जे ई वएह ५०० टका छिऐ, मुदा गुलो जइ आसानी सँ रिनियाँकेँ ओ पाइ दऽ दैत अछि तइसँ रिनियाँक आत्मविश्वास सोझाँ अबैत अछि। गुलोक बाप गुलो लेल छोड़ि गेलै छोट-पैघ खुरपी, कोदारि, खंती, दबिया, कुड़हरि, भाला, बरछी। घूर-धुँआ, छल प्रपंच, आ गुलोकेँ सरकारी जमीनपर बसऽ पड़लै। गुलोक मरलाक दुखो सभसँ बेशी रिनियेँकेँ भेलै, से लेखक प्रारम्भ आ अन्त दुनूमे रिनियाँक उपस्थिति रखने छथि। गुलोक बड़का बेटाक रोजगार लेल पनिजाब पलायन। पूरा बजार राजिनदर डीलरक समदाही इनरा गानही आ ओकर चारिटा बेटा। फेर बजारसँ बाहर आउ, बेला, बीना आ सोनक। आ तखन गुलो केँ दूटा सुपारी दूटा नोत मे आयल छै- एकटा लालो पण्डित के पोती के बियाह , दोसर सारि के जैधी के बियाह। गुलोक ससुरारि छै बेला आ ओकर पत्नीक नाम छै बेलावाली। पहिने गुलोकेँ गाजा पीऐत-पीऐत दम्मा उखड़ि गेलै। चारू कात माने गाजाक नशाक व्यापार होइत हेतै। भगिनाक बियाहक नोत पुरबाक क्रम, साड़ी, साया, बिलाउज आ दू सय एकावन टाका दिअ पड़तै। ओ सोनक जाइए, छोटुआ आ रिनियां संग छै। गुलोक बड़की बेटी रुनियाँ बीनामे बियाहल छै। रुनियाँ सेहो सोझे बीनासँ आयल छै, बहीन रिनियाँकेँ अपन सासुर लऽ जाय चाहै छै। मुदा ओ मना कऽ देलकै, लोक कहतै जे बाप रोगाह भऽ गेलै, दिन टगि गेलै तेँ पेट पोसै लए आयल छै। ओ बड्ड कानल, गुलो केँ छगुन्ता होइ छै, छौड़ी ई सब बात केना बूझि गेलै। आ अन्तिममे बेटी रिनियांकेँ पता चललै जे गुलोक मन बहुत खराप छै। ओ भोरे आबि गेल।माय रतुका पूजा दिआ पुछलकै। औतौका हाल सुनबइ मे रिनियां कए मन नै लागलै। माए कए कहलक- 'माय, पैसा दही ने। बबा कए गोली लाबि दइ छिऐ।' भगिनाक बियाहमे गुलो सोनक जाइए। गुलोक ओतऽ चलती छै ओतऽ ओकर बॉडी लैंगुएज बदलल छै। कनियाँ दब छै मुदा ओ डाँटि-डपटि दैए, बियाह हेतै, नै तऽ गज्जन होइतै। कोन कोन रोजगार छै से देखाबैले उपन्यासकार पुतोहु कंदाहावालीकेँ मलहदक चाँपमे मखानक कमौनीक नव-रोजगार भेटलइ-ए, ओतऽ लऽ जाइ छथि। छोटुआ काज करैए दशरथ मण्डलक पिलाइ मिलमे। मूंगक बीया बाउग हेतै, हरवला चास, समार आ चौकी दइ के अढ़ाइ सय मांगै छै। फेर गुलोक मृत्युक प्रारम्भ एना करै छथि गुलोकेँ खोंखी होइ छै, दू सय टाकामे दू कट्ठा थोकड़ा ओलइ के बात भेलै। पारिवारिक सम्बन्ध, वृद्धावस्थाक समस्याक विवरण देखैले सुखबा लग जाउ, ओ अपन माय कए घर सए निकालि देलक, फेर बदनामी भेलापर आपस लऽ गेल। ओ छै इनरा गानहीक पितिया सासु। स्थानीय संस्कृति देखबैले कालीबन्दीक सेवा, भगैत, फुलहासि। आब तकरा बाद कुशक कलेपो नै लगतै। गुलो मालिकसँ टौर्च मांगत, ओ नै देतै तऽ एक्को गो आम कि लुच्ची भोग नै हुअय देत। आ एतबी नै आर देखू- बाँस डेढ़ सय सए कम मे नै भेटै छै, गुलो चोरा कए बेचत तैं एक्के सय मे दिअय पड़तै। आ चोर सेहो छै। चोरबा सौंसे गाछक लुच्ची सिसोहि लेलकै। एकटा ठकुरबा सेनियल चोर छै। से गुलोक बाँसक चोरि आ ठकुरबाक चोरिमे अन्तर छै। गुलोक मुख्य धंधा छै चाहक दोकान, बाँसक चोरि तँ सालमे एकाध बेर मुदा ठकुरबा सेनियल चोर छै। रिनियां, झुनियां आ बरस्सेरवाली लुच्ची चोरबैए। 'ऊ बभना हमरा पकड़त? ..' (बरस्सेरवाली) से सभटा गाछी बभना लग छै। गाछीक मालिक कियो आन छै। आदिवासी इलाकामे ओ सरकारक रहै छै आ फॉरेस्ट एक्टमे आदिवासीकेँ ओतऽ जाड़नि, महुआ, वन्य-उत्पाद बिछबाक अधिकार देल गेल छै। मुदा सिपौलमे गाछी सरकारक नै छिऐ। से एतुक्का सर्वहाराक स्थिति आरो खराप, फॉरेस्ट एक्ट एतऽ लागू नै अछि। से एक बेर रिनियाँ गछपक्कू आम लाए कए गेल रहै तऽ मालिक पचास गो टाका देने रहै। मलिकानि खाइ लए देने रहै। रुनियाँ के दीयर नेरहू एलै, ओ चुपचाप रिनियां के देखैत रहइ-ए आ मुस्की छोड़इ-ए। दशरथ मण्डलक साढ़ूक लड़का नेपालमे छै, रिनियां लेल कथा अबै छै। मुदा गुलो चारि मासक टेम मंगैए, अरजुनमा नालायक छै मुदा तैयो ओकरासँ पुछतै। दशरथ मण्डल पाइबला छै, मुदा एक्के बेरमे गुलो हँ नै कहलकै, अरजुनमासँ पुछतै। माने संस्था वर्तमान छै। से रिनियां तऽ लग छैहे गुलोक, पुतोहु जे झगड़ा कऽ कय गेल रहै सेहो एकदम्मे दूर नै छै, देखू एतऽ- ..कंदाहावाली पहुँच गेलइ। 'पपा, कल वला मिसतरी कए बजा आनथिन। ठीक काए देतै। जे लागतै से देबै।' लेखक अहाँकेँदूर आ लग सभ ठाम लऽ जाइ छथि। केन्द्र कखनो गुलो रहैए, कखनो रिनियां आ कखनो कन्दाहावाली। रमता जोगीमे सुभाष चन्द्र यादव किछु एहेन चीजक अनुभव करै छथि जे बहुत लोक आनो ठाम करैत अछि (भारतकेँ छोड़ि कऽ), जेना जेब्रा क्रॉसिगपर मनुक्खकेँ जाइत देखि गाड़ी सभक रुकि जायब, जेना सिंगापुरमे। यूरोपमे जँ अहाँ जाइ तँ सड़कक तिराहाबला कॉर्नरपर अहाँकेँ देखि दोसर गाड़ी सभ ठाढ़ भऽ जायत, अपन ऐठाम लोक अपन गाड़ी आगाँ बढ़ा लैए, ऐ आशामे जे दोसर पाछाँ आबैबला सदाशयता देखाओत। लेखक सिगरेट बहुत पीबै छथि, से हुनका ईहो बुझना गेलन्हि जे ओतय निअम छै जे पूरा बा अल्प घेराबाबला जगहपर अहाँ सिगरेट नाइ पीबि सकै छी, मुदा सार्वजनिक स्थलपर सिगरेट नै पीब आब भारतोमे स्वीकृत भऽ गेल छै, पहिने लोक ऑफिसमे सिगरेटक धुँआक छल्ला बनबैत छल आ आब जँ बाथरूमोमे नुकाकेँ पीबऽ चाहैए तँ लोक आँखि गुराड़ि कऽ देखै छै। घरदेखिया कथा संग्रहक प्रोटैगोनिस्ट सेहो खूब सिगरेट पीबैए, से सिगरेट पीबाक हिस्सक लेखकमे पुरान बुझाइत छन्हि, आ तेँ पुतोहु मधुलिका सेहो ऐ लऽ कऽ चिन्तित होइत छथिन्ह। फेर सुपौलसँ फोन अबिते रहैत छन्हि, डी.एम. गप करै छन्हि, खाली केना छथि से पुछै छन्हि तखने जा कऽ निश्चिन्त होइ छथि। माने पुलिस-प्रशासन कुशल क्षेम पुछत से अखनो लोककेँ विश्वास नै होइ छै। घरदेखियाक 'एक दीनक घर (१९७३)'मे मनोविश्लेषणात्मक पद्धतिक प्रयोग कएल गेल छल, घरदेखियेक 'तीर्थ (१९६९)' मे कथाकार लिखै छथि बलबाबालीक अंगनाक खिस्सा। कोनो डाक्टर ओकरा बताहि नै कहतैक... मुदा ओ बताहि अछि। मडर (२०२१) मे ई पद्धति विस्तार पेलक। !.. रघुनाथ निछच्छ बताह रहइ। मदन बताह नै छै। ... आ स्त्री-विमर्श, मदनक कनियाँ राधाक फर्स्ट डिविजनमे पास हएब मुदा चाहियो कऽ अपन शरीरपर अधिकार जतबैत मदनकेँ रोकि नै सकब, घुरब, नोकरी छोड़ब, मुदा ओकर हत्या। आ ओइ हत्याक प्रयासकेँ रोकबा लेल लेखक शनीचरीकेँ आगाँ करैत छथि- "माय कए नै मारहक हौ पप्पा।" लेखक मदनकेँ मुदा बेनीफट ऑफ डाउट नै दै छथि, ओ घोषित कऽ दै छथि जे मदन बताह नै छै। मुदा ओकरा शरण भेट जाइ छै, मामाक ससुरारिमे, ओ सभ दबंग छइ, मझिला सार तए अपराधी सभक सरदार छिऐ। आ ओ शरण दऽ दै छै। ओ किए शरण दै छै, पाठक बूझि जाइए, ओकरासँ अपराध करबेतै तेँ ने। से लेखक माहौल बना कऽ कथाक पाठ आ पुनर्पाठ करबा लेल पाठककेँ छोड़ि दै छथि। आ डेरीडाक विखण्डनवाद तँ छोड़ू एतऽ खेतक विखण्डन सेहो भेल छै- मदनक बाप कामेसर आजाद अपन जमानाक इण्टर पास। बाप-पित्ती जरे रहै, पचास-साठि बिगहाक जोतदार। मुदा मुदा कामेसरक पित्तीक मृत्युक बाद भिन-भिनाउज आ कामेसरक हिस्सामे पाँच बीघा जमीन पड़लै। आ से भाषामे सेहो हेतै। जे ठेंठी/ पचपनिया बाजै बला पनिजाबकेँ पंजाब बाजबे करत आ लिखबे करत आ केदार काननक कथित अभिजात्य वर्ग सेहो जखन डेंगू बजै छथि तँ अंग्रेजी बाजैबला ओकरा डेंगी कहि सुधार कऽ दैत छन्हि। लैटिन आ संस्कृत व्याकरण भषाकेँ स्थिर केलक मुदा आधुनिको कालमे संत ज्ञानेश्वरक मराठी ज्ञानेश्वरी पढ़ैले मराठी भाषीकेँ भाष्यक मदति लेबऽ पड़ि रहल छन्हि। डेरीडाक विखण्डनवाद भाषाक संगे ध्वनि, इतिहास आ संस्कृतिकेँ पाठक अंग मानैत अछि। गुलोमे अहाँकेँ लागत जे ने कियो शोषक छै ने कियो शोषित, आ से भाषासँ लागत, गुलो एक्को टा लुच्ची मालिककेँ भोग नै हुअ देतै, बाँसो काटि लेलकै आदि आदि। मुदा तखने अहाँकेँ वातावरण मोन पड़त जे सिपौल तँ फॉरेस्ट एरिया छिऐ नै आ बभना मालिक छिऐ। मुदा पलाइ मिल दशरथ मण्डलक छिऐ, चौक चौराहापर सौंसे व्यापार गएर बाभन कऽ रहल छै। बाबा कहलकै, घरपर मरछाउर छीट देने छह। जंतर देलकै, मुदा ओ कोनो काजक नै। जंतर मे ठका गेलै तमसेबो केलै, अहाँकेँ लागत जे अन्धविश्वास खतम भऽ गेलै मुदा फेर कालीबन्दीक सेवा, भगैत, फुलहासि। आब कुशक कलेपो नै लगतै। से संस्कृतिमे सेहो परिवर्तन भेलै, अर्थशास्त्रमे सेहो। घरदेखियाक काठक बनल लोक अहाँ पढ़ब तँ लागत जे गुलो पढ़ि रहल छी। घरखस्सीक पाइ सरकार देतै। मडरमे देखेबे केलौं जे स्त्री विमर्श कोना राधाक इण्टरमे फेर फर्स्ट डिवीजन भेलैसँ सोझाँ आयल माने मैट्रिकोमे आयल हेतै। एक्के पाठकेँ अहा~ कएक तरहेँ पढ़ि सकै छी। गुलो मण्डलक जाति नै बतायल गेल छै, टाइटिल सँ जे अन्दाज लगेबाक हुअय लगाउ, मंडल कमीशनक मंडल यादव रहथि आ पश्चिम बंगालमे मंडल दलितमे अबैत छथि। केदार कानन गुलोक चाह दोकानपर सुभाष चन्द्र यादव जी केँ देखने छथिन्ह आ कुमार पवनक 'पइठ' सभ पढ़लक मुदा हुनकर गौँआ सभ कहलक जे अहाँ सभ ओ कथा पढ़ने छी हम सभ सद्यः देखने छी, अपन गाममे घटित होइत। मडरमे तँ लेखक आरो सतर्क छथि, कामेसरक बाप पित्ती लग ५०-६० बिगहा जमीन रहै, मडर केलाक बाद मदन मामाक ससुरारि गेल, ओ सभ दबंग सभ छै। तँ गुलोक कएक तरहक पाठ भऽ सकैए आ मडरक सेहो आ सएह जेक्स डेरीडाक विखण्डनवाद कहै। दक्षिण भारतमे कतेक आदिवासी समाजक पुरोहित ब्राह्मण बनि गेला, कालीबन्दीक सेवा, भगैत, फुलहासि पुरोहित अबैत छथि, गएर ब्राह्मण हेता ब्राह्मणो भऽ सकै छथि, जे फील्डवर्क बिनु केने बजता से कहता ब्राह्मण केना गहबर आ भगता बनत, मुदा ग्राम-रुद्रपुर (भाया तुलापतगंज, जिला मधुबनी) मे गहबरक सेवा ब्राह्मण भगैत करैत छथि। मिथिलामे पसरल सतार (संथाल) समुदायमे मुर्मु पण्डित लयमे सिन्धु नदी घाटी सभ्यताक कालक ग्रन्थक बिनती पढ़ैत छथि, से संथाल समुदायक लोक अहाँकेँ बतेता। ई एकटा तरीका अछि अपन लिपि, इतिहास आ सभ्यताक पुरातनता आ निरन्तरता सिद्ध करबाक। से रहि रहि कऽ दू टा द्वन्द्व आपसमे वार्तालाप प्रारम्भ करऽ लगैत अछि, आ से स्थान, समय आ लोकक अनुसार मुदा कोनो स्थिर केन्द्रक बदलैत रहैत अछि। साहित्य, लोक संस्कृति, मौखिक परम्परा, इतिहास आ विज्ञान मिज्झर भऽ जाइत अछि। अंग्रेजक गेलाक बाद भारतक लोक अपन इतिहास, संस्कृति आ एकर सैद्धान्तिक आधारक नव परिभाषा बनबय लगला। मुदा ऋगवैदिके कालसँ भारतमे नाराशंसीक रूपमे, आख्यानक रूपमे समानान्तर परम्परा रहल छै। मुदा मैथिलीमे सभटा स्पेस एकटा खास मानसिकताक लोक लेबऽ चाहलक। अपन अज्ञानताक भारसँ ओइ स्पेसकेँ दलमलित करऽ चाहलक। मुदा मिशेल फोकोक डिसिप्लिनरी संस्था सभक अछैत आब ओ सम्भव नै छै, आ तइ लेल अन्तर्जालक अपन महत्व छै। मुदा देखल गेल जे महिला आ वंचितक अन्तर्जालमे उपस्थिति सभ भाषायी स्पेसमे कम छै, से मैथिलीक समानान्तर धारा ओइपर बेसी काज केलक, आ आइ परिणाम सभक सोझाँ अछि। जे मूलधारा समानान्तर धाराक नोटिस नै लै छल, काने-बात नै दै छल आइ समानान्तर धारा द्वारा नोटिस लेल जयबाक आकांक्षी भऽ गेल अछि। आ से आयल डेमोक्रेसीसँ, आ से अछि भोट आधारित। आब 'भोट' पर आउ। एकरो कएक तरहक पाठ भऽ सकैए। कतेक तरहक समीकरण बनैत देखने हएब ऐ उपन्यासिकामे। कोनो केन्द्र स्थायी नै। जमीनी स्तरपर सभ एक दोसराक विरोधी मुदा ऊपरमे निर्णय किछु आरे भऽ गेल। स्त्री विमर्श आब पलटी मारलक, मडरमे राधा फर्स्टे डिव्जन करै छली मुदा दबियासँ गरदनि उतारि देल गेल। मुदा नीतीश महिला लेल बड्ड कऽ रहल छै। फिफ्टी पर्सेंट भोट ओकर छै तेँ किने। रिनियाँकेँ पोशाकक ५०० टाका भेटल रहै से अहाँ गुलो मे पढनहिये रही। आब भोटमे ३३% रिजर्वेसन महिला लेल, साइकिल बचिया सभ लेल। आ तेँ जखन राजद, कांग्रेस आ जदयू केर महागठबंधनक कैंडीडेट ठाढ़ भेलै तँ प्रोटैगोनिस्ट कहै छथि- लालटेनो केँ भोट देलासँ नीतिशे मुख्यमंत्री बनतै से महिला सभकेँ बतेनाइ जरूरी छै। भोट आ इलेक्शनमे लाख कमी होइ, मुदा ई सभ ५ सालपर एकटा नव सामाजिक तत्त्वकेँ हिलोड़ैत अछि आ तइसँ जे वंचित वर्ग अछि, महिला जइमे सम्मिलित अछि तकरा शक्तिशाली हेबाक अनुभव होइ छै। मुसलमान बी.जे.पी. सँ भड़कै छै, बाभन महागठबन्धनसँ भड़कै छै, बी.जे.पी. बनियाँक पार्टी छिऐ, सभ पार्टी टिकट बेचै छै, ई सभटा गप पिपराक चाहोक दोकानप होइ छै आ दिल्लीक लुटयन्स जोनमे सेहो। 'चिल्लर पार्टी' फिल्मक ओइ बाल मजदूरक गप मोन पड़ि गेल जे कहैत अछि- सभकेँ सिखायल जाइ छै जे झूठ नै बाजू आदि आदि, मुदा पैघ होइए तँ सभ झूठ बाजैए आदि आदि, तखन की फर्क पड़लै साब जे क्यो पढ़लक आ कियो नै पढ़लक! गुलो: कला आ भाषा 'गुलो: कला आ भाषा' सम्पादित केने छथि नव-ब्राह्मणवादी तारानन्द वियोगी आ ब्राह्मणवादी केदार कानन, दुनू साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत आ मोटगर-मोटगर असाइनमेण्ट प्राप्त। आ तेँ पचपनिया बा ठेंठी लिखनिहार एकोटा व्यक्तिकेँ ऐ पोथीक आलेख लिखबा लेल निमंत्रित नै कएल गेल कारण ओ सभ समानान्तर धारासँ छथि जे सम्पादक द्वयक ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादी दुनुक काल अछि आ तेँ दुनू विचारधाराक लोक आपसमे तँ गारा-गारी करै छथि मुदा समानान्तर धाराक बेरमे मिलि जाइ छथि, आ तेँ ई भतबरी (ई आगाँ जा कऽ आर स्पष्ट कएल जायत)। ६७ पन्नाक 'गुलो' मे ९ पन्नाक आमुख लिखने रहथि केदार कानन (आखिरी विपन्न मनुक्खक गाथा), आब से भार 'गुलो: कला आ भाषा'मे तारानन्द वियोगीक कान्हपर छन्हि (५ पन्नाक भूमिका)। सुभाष चन्द्र यादवक अनुसार तारानन्द वियोगीक विचारधारा (आइडियोलोजी)मे स्थिरता नै छै, मुदा हमरा विचारे हुनकर आइडियोलोजी स्थिर छन्हि, आ से छन्हि वएह केदार काननक ब्लैकमेलिंग बला। ब्राह्मणवादी संस्था सभमे बहुत रास दुर्गुण छै, आ सएह ओकरा सभकेँ ब्लैकमेलिंग लेल वलनरेबल बनबै छै। कोनो ब्राह्मणवादी संस्था नै अछि जकरा तारानन्द वियोगी दू-चारि मासपर गरियाबै नै छथिन्ह आ सम्मान भेटलापर फेर ढाकीक ढाकी प्रशंसा नै करैत छथिन्ह। उदाहरण स्वरूप चेतना समिति आ साहित्य अकादेमीक उदाहरण देल जा रहल अछि। ओ एकठाम लिखै छथि- 'ब्राह्मणवादक जन्मदाता भने ब्राह्मण होथि मुदा एकर गछाड़ मे पचपनियां सेहो छथि, दलित सेहो। ने तं ई कोना होइतय जे दू सौ के करीब संख्या मे दलित-पचपनियां लोकनि मैथिली मे लिखैत ठीक-ठीक वैह बात, ओही भंगिमा मे लिखि रहला अछि जे ब्राह्मणवादक इष्टसिद्धि मे साधक छैक। एहन दलित लोक कें अहां ब्राह्मणसभा मे अध्यक्षता करैत सेहो देखि सकै छियनि, सम्मान पबैत सेहो। ' आ अहाँकेँ लागत जे ई सभ गप ओ अपनेपर लिखि रहल छथि, हुनकर भाषा, हुनकर साहित्य, हुनकर विषय-वस्तु, हुनकर कथित गजल सभ, छल-प्रपंच, पुरस्कार लोलुपता, व्यवहार सभ विशुद्ध ब्राह्मणवादी अछि, हुनके ब्राह्मणवादी संस्थाक सभामे अध्यक्षता करैत सभ देखै छन्हि, आ सम्मान पबैत सेहो। मुदा सुभाष चन्द्र यादव अड़ल रहलाह। कारण हुनकर एकटा आइडियोलोजी छन्हि। 'गुलो: कला आ भाषा'क ५ पन्नाक भूमिका सेहो गुलोक समीक्षाकेँ आगाँ नै बढ़बैत अछि वरन् ओ ब्राह्मणवादी संस्था सभक ब्लैकमेलिंगक एजेण्डाकेँ आगाँ बढ़बैत अछि, आ ऐ बेर हुनकर लक्ष्य छन्हि 'मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कलकत्ता'। मुदा ऐ बेर हुनकर प्रयास व्यर्थ जेतन्हि किए से आगाँ स्पष्ट हएत। पहिल जे हरिमोहन झा ब्राह्मणवादी संस्था आ व्यक्तिक निशानापर रहथि, यात्री नै। रमानाथ झाक दुश्मन रहथि हरिमोहन झा, से ओ हुनकर गैसलाइटिंग केलखिन्ह आ साहित्य अकादेमीमे मैथिलीक प्रवेशक बाद हरिमोहन झा मैथिली लिखनाइ छोड़ि देलखिन्ह, पुरस्कार देबाक तँ कोनो प्रश्ने नै! (विशेष विवरण देखू हमर पोथी Rajdeo Mandal- Maithili Writerमे जे विदेह आर्काइवमे http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर सेहो उपलब्ध अछि)। महाकवि विद्यापति ठाकुर १३५०-१४३५ (मैथिलीक आदि कवि ज्योतिरीश्वर-पूर्व विद्यापतिसँ भिन्न, संस्कृत आ अवहट्ठमे लेखन), विद्यापति ठक्कुरः विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। चित्रक आधार मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता द्वारा कोनो कलाकारसँ बनबाओल, कलाकारक नाम ६०-७० सालसँ अज्ञात कारणसँ गुप्त राखल गेल अछि। मुदा ई संस्था मिथिला सांस्कृतिक परिषद यात्रीक नजदीकी संस्था रहन्हि। यात्रीजीक नजदीकी रमानाथ झासँ सेहो रहथिन्ह आ साहित्य अकादेमीसँ सेहो रहन्हि। ओ तँ ब्राह्मणवादी संस्था सभक मुख्य अतिथि रहै छला, ब्राह्मणवादी संस्था सभकेँ हरिमोहन झा सँ समस्या रहै यात्रीसँ नै। तारानन्द वियोगी लग मिथिला सांस्कृतिक परिषदपर यात्रीक कोनो तरहक आरोपक प्रमाण नै छन्हि, से ओ गपाष्टक शुरू करै छथि आ मोहन भारद्वाजक खचरपनी बला भाषाक प्रवेश करबै छथि। मोहन भारद्वाज आ तारानन्द वियोगी द्वारा मिथिला सांस्कृतिक परिषदपर खचरपनीक आरोप आ पाण्डुलिपि हरा देबाक आरोप क्रिमिनल एक्ट अछि। मोहन भारद्वाज बा तारानन्द वियोगी लग प्रमाण छन्हि? उत्तर अछि नै। मिथिला सांस्कृतिक परिषदमे आर बहुत रास कमी छै मुदा यात्री आ मणिपद्मक साहित्यकेँ मिथिला सांस्कृतिक परिषद बिना कोनो सरकारी मदतिक प्रकाशित केलक, आ से नैतिकता ने मोहन भारद्वाजमे छन्हि आ ने तारानन्द वियोगीमे। मोहन भारद्वाज तँ माफी मांगैले जीवित नै छथि मुदा जँ तारानन्द वियोगीमे किछुओ नैतिकता बाँकी छन्हि तँ ओ अविलम्ब मिथिला सांस्कृतिक परिषदसँ माफी मांगथि। मिथिला सांस्कृतिक परिषद पर तारानन्द वियोगी अनेरे समय व्यर्थ कऽ रहल छथि, ओ घोषित ब्राह्मणवादी संस्था छिऐ तहिना जेना चेतना समिति आ विद्यानाथ झा विदित जकर ओ काज सुतरलाक बाद ढाकीक ढाकी प्रशंसा करैत छथि। मुदा ओकर आर्थिक स्थिति एहन नै छै जे चट पाण्डुलिपि दियौ आ पट छापि देत। बलचनमाक लेखक नागार्जुनकेँ ओइ पोथीसँ कोनो समस्या नै रहन्हि नहिये हुनकर पुत्र शोभाकान्त (जकरा यात्रीजी शोभा मिसर कहैत छला) ओइ पोथीकेँ मैथिली पोथी मानै छथि आ तेँ 'यात्री समग्र' (राजकमल प्रकाशन) मे ओ संकलित नै अछि। मिथिला सांस्कृतिक परिषद चेतना समिति सन पाइबला संस्था नै अछि, चन्दा भेटै छै तखने ओ पोथी छापै छै, कोनो कंस्पिरेसी थ्योरी लेल कोनो स्थान नै। फेर ओ किशोरीकान्त मिश्रक नवीन प्रिण्टिंग प्रेसमे एकटा कोठली मासमे एक बेर मासिक 'बैसार' लेल खोलै छै। तेँ ऐ संस्थाक ब्लैकमेलिंगसँ कोनो सम्मानक आशा सेहो बेकार। तेसर जे ओ बिहारमे नै छै, से बिहारक ब्राह्मण सभ बिहारक वर्तमान राजनीतिकेँ देखैत कने मने डेराइयो जाइत अछि मुदा कलकत्ताक ऐ संस्थाकेँ तकरो भय नै। आब हुनका मोन पड़ैत छन्हि जे ई समीक्षाक पोथी तँ अछि सुभाष चन्द्र यादवक 'गुलो'पर जिनकर पाइपर ओ छहर-महर कऽ रहल छथि तखन ओ गुलोपर घुरैत छथि- मुदा फेर ओ जगदीश प्रसाद मण्डल नाम लेने बिनु (ब्राह्मणवाद आ नव-ब्राह्मणवादमे मे नाम नै लेबाक दूटा कारण छै, दू नै तीनटा कारण छै, पहिल साधंश नै हएब, दोसर प्रमाणक अभावमे किछु लोक आदिक बाजि कऽ अपन एजेण्डा रूपी स्टोरी चलायब आ तेसर कारण छै हीन भावना, जे हम नाम लऽ लेबै तँ ओइ व्यक्तिक चलती बढ़ि जेतै, तीनू तीन भिन्न स्थितिमे होइ छै) बाइ मे आबि जाइ छथि- "जेना थोकक हिसाबे मैथिली मे उपन्यास बहराइत अछि.."। ई अछि तारानन्द वियोगीक नव-ब्राह्मणवादी होयबाक एकटा आर प्रमाण, हमरा अलाबे दोसर गएर ब्राह्मण केना साहित्य अकादेमी पुरस्कार लऽ लेलक, हम तँ टैलेण्टेड छी जन्मना, मुदा ओ.. मुदा नाम नै लेब। सएह तँ केदारो कानन केलन्हि जखन ओ सुरेन्द्र झा 'सुमन', चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर', रमानाथ झा, विद्यानाथ झा 'विदित', मायानन्द मिश्र आदिक बिनु नाम लेने लिखलन्हि- "बड़का-बड़का ठोप-चानन कयनिहार भाषा कें दूषित करब मानैत छथि।" भऽ सकैए आगाँ जा कऽ हुनकामे हिम्मति एतन्हि। मुदा ऐमे सँ सभ सम्पादक द्वयक करीब छथि/ रहथि, तखन अपनाकेँ कतिआयल कहब लोककेँ कोना अरघत, ई सभ तथ्य इतिहासक शुद्धता लेल अभिलेखित कएल जा रहल अछि। ब्राह्मणवाद आ नव-ब्राह्मणवाद एक्के रङ छल-प्रपंचक सङ एक दोसराकेँ पल्लवित-पुष्पित कऽ रहल अछि, आ दुनू समानान्तर धाराक विरोध करबामे एक दोसराक सहयोगी अछि। तारानन्द वियोगीक ऐ 'गुलो: कला आ भाषा'क भूमिकाक ५ पन्नामे गुलोक विषयमे मात्र ५ पाँती लिखल गेल अछि। केदार नाथ चौधरी आलेख लिखबामे असमर्थता व्यक्त केलन्हि। मुदा फणीश्वर नाथ रेणुक चिट्ठीक चर्चा नीक लागल। मंत्रेश्वर झा पन्ना पुरेलन्हि। हुनका गुलो मर्मस्पर्शी लागलन्हि, सटीक चित्रण बुझेलन्हि, मुदा ऐ लेल कागत खर्च करबाक कोनो बेगरता हमरा नै बुझाइत अछि। गंगानाथ गंगेशक प्रिय कथाकार राजमोहन झा सेहो रहलखिन्ह अछि, सम्पादक द्वय ऐमे एडिट कऽ सकै छला, सरकार जहिया राजमोहन झा केँ ई दुनू गोटे सम्पादित करता तहिया लिखब, मुदा सुभाषो चन्द्र यादव गंगानाथ गंगेशक प्रिय छथिन्ह से देखि शाइत पाँती नै काटलखिन्ह। मुदा ई पोथी तँ सुभाषो चन्द्र यादवोपर नै छन्हि मात्र हुनकर गुलो पर छन्हि। आ आब अहाँ बुझि गेल हेबै जे ६९ पन्नाक गुलोपर ५ पन्नाक समीक्षा आ २०२ पन्नाक आलेख सम्पादक द्वय कोना पुरेलन्हि। ओना ओ डेढ़ पन्नाक बाद गुलोपर अबै छथि। शोभाकान्त (प्रायः शोभा मिसर) स्वयं स्वीकार करै छथि जे ओ साहित्यक कोनो विधाक लोक नै छथि, मुदा ओ नीक जकाँ सारांश लिखने छथि। रामलोचन ठाकुर मिथिला दर्शनमे गुलोकेँ छपने छला, आ से ओ संस्मरण लिखलन्हि, पहिने मिथिलाक विषयमे किछु तथ्य देलाक बाद। अशोक मूलतः कथाकार छथि से ओ रस लेलन्हि अछि, मुदा समीक्षा नै कऽ सकल छथि। नारायणजी संस्मरण सेहो घोसियेने छथि। केदार काननक संस्मरण जापानी उपन्यासकार हारुकी मुराकामीक 'नोवेलिस्ट एज ए वोकेशन' उपन्यास केना लिखल जाइत अछि, सन लागल। ओना समीक्षाक दृष्टिसँ ऐ मे किछु नै छै, मुदा पाठककेँ ई पाठ सुभाष चन्द्र यादव बा आन उपन्यासकार देथि तँ ओ एकटा नवीन गप हएत। तारानन्द वियोगी की लिखऽ चाहै छथि हुनका स्वयं तकर ज्ञान नै छन्हि। पन्ना पुरेलासँ हुनकर मतलब रहैत छन्हि, लोक, किछु लोक आदि लिखि कऽ ओ स्कोप बरकरार राखै छथि। रमानाथ झा केर बाद मैथिली समीक्षा बुरबक बाट पकड़लक सँ हम आंशिक रूपमे सहमत छी, रमानाथ झाये सँ मूलधाराक समीक्षा, जइमे तारानन्द वियोगी सेहो सम्मिलित छथि आ हुनकर सहयोगी मोहन भारद्वाज सेहो, (प्रमाण- देखू साहित्य अकादेमी प्रायोजित 'मैथिली पत्र पत्रिका' पोथी जइ मे ऐ महानुभाव सभक ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण आर फरिच्छ भऽ गेल अछि, मोहन भारद्वाज मिथिला सांस्कृतिक परिषदपर खचरपनीक आरोप लगबै छथि मुदा सएह ओ सभ ऐ पोथीमे केलनि अछि), बुरबक बाट पकड़लक। (विशेष विवरण देखू हमर पोथी Rajdeo Mandal- Maithili Writerमे जे विदेह आर्काइवमे http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर सेहो उपलब्ध अछि)। एतऽ सेहो तारानन्द वियोगी आ सुभाष चन्द्र यादवक विचारधाराक विपरीतता सोझाँ अबैत अछि, सुभाष चन्द्र यादव नित नवल राजकमलमे रमानाथ झा केर समीक्षाकेँ परम्परावादी कहने छथि, आ ईहो जे ओ राजकमल चौधरी संग न्याय नै कऽ सकल छलाह। रमेश ललित-किसुन-मायानन्द कहि एक्के तराजू पर सभकेँ राखि दै छथि, कतऽ ललित आ कतऽ किसुन आ मायानन्द। मुदा बैलेंस बनेबाक छन्हि नै तँ आलेख छपबे नै करतन्हि, मूलधारामे समीक्षा माने बड़ाइ। कृष्णमोहन झा 'मोहन' फेर सारांश लिखै छथि, वैद्यनाथ झा केँ तँ मैथिली उपन्यासकार सभ नामो नै बुझल छन्हि, कुमार मनीष अरविन्द अखने गुलो समाप्त केने छथि आ समीक्षाक नाम पर ओ बैलेंस बनबै छथि- 'उपन्यासक शैली कोनो बेशी उन्नत नै छैक। एकर गढ़नि सेहो बहुत संगठित नै। एक दिस सँ सभटा बात केँ बेरा-बेरी कहि देल गेलैक अछि। सांठबाक कोनो प्रयास नै छैक। मुदा भाषा तेहेन सटीक छैक..।" आ फेर बैलेंस, ई भाषा ईएह भाषा सुच्चा। समानान्तर धाराक मैथिली नै पढ़लासँ सोझे कलम उठा कऽ लिखब आरम्भ कऽ देलासँ हुनका सन लेखक अचम्भित होइते रहैत अछि। ऐ संग्रहक एकमात्र काजक आलेख अछि विद्यानन्द झा केर "लटकल छी मुदा बाँचल छी: बाँचल रहबाक महाआख्यान, गुलो", केदार कानन, तारानन्द वियोगी आ अनका मुँहपर ओ प्रहार करै छथि जखन ओ कहै छथि जे-"दुखक पॉरनोग्राफी नै छी।" पोथीक क्षीणकाय होयबापर सार्थक टिप्पणी आयल अछि। ई विपन्न वर्गक नै वरन् मिथिलाक महाआख्यान अछि। विद्यानन्द झा केँ आलोचनामे एबाक चाहियनि मुदा मूल धाराबला सभ द्वारा बारि देबाक डरसँ ओ से नै कऽ सकताह, कारण ओ सरल मार्गक अभ्यासी छथि। मुदा ओ जे प्रहार केलन्हि अछि तकर गूँज सम्पादक द्वयकेँ बहुत दिन धरि सुनाइत रहतन्हि। रमण कुमार सिंह तारानन्द वियोगी सन पेट्रोनाइजिंग करबाक अभ्यासी छथि, आलोचक लोकनि ई सोचताह, हरबिर्रो मचि गेल आ "यदा यदा हि धर्मस्य.." हएत तारानन्द वियोगी आ रमण कुमार सिंहक आगमन हएत आ संसार बचि जायत। आ जे हुनकर आलोचना/ समालोचना करताह से भेला ब्राह्मणवादी। आ अही तरहक लोककेँ हम कहै छ्ऐ नव-ब्राह्मणवादी। ई मुख्यतः पुस्तक परिचय लिखै छथि जकरा ओ समीक्षाक नाम दैत छथि, कवर नीक, कथ्य नीक, सुन्दर चित्रण, भाषा नीक। सभटा बड्ड नीक बड्ड सुन्दर। नव-ब्राह्मणवादी सभक कन्नारोहटक बीच मुदा अरुण कुमार सिंह लिखै छथि- "१९८३ मे प्रकाशित 'घरदेखिया आ २००९ मे प्रकाशित 'बनैत बिगड़ैत'मैथिली कथा संग्रहक भाषा मादे विद्वान लेखक सँ हुनक मैसूर प्रवासक दौरान हमर जिज्ञासोपरांत ओ कहने छलाह जे हुनक कथा मे भाषाक पाछु जनपदीय माहौल रहैत अछि, जकरा हम धरतीक माहौल कहैत छी।" से विद्यानन्द झा केर समीक्षा सेहो उघार केलक जकरा हम सम्पादक द्वयक मुँहपर प्रहारक रूपमे वर्णित केलौं। सतीश वर्माक "मेहनतकश बहुजन समाजक महाकाव्य" मे ओ दुनियाँक सभ इकोनोमिक सिद्धांत के फेल होइत देखबैत छथि। ओ उद्घृत करै छथि- गुलोक बेटा छोटुआ मुँह मे ऊक देलकै। गुलो कें माटि सँ तोपि देल गेल। कुछ जनीजाति जे ई सब तमाशा देखैत रहै, ओहि मे सँ एगो मुसलमान दोसर मुसलमान सँ बाजल 'ई सब हिन्नू हई कि मुसलमान? आगो दै हइ आ दफनो करइ है। दोसर मुसलमान बाजल'या अल्लाह! तू देखलहू ना। एक बार गाड़ के ले गेलइ, फेनू से गाड़लकै हइ। कहाँ दुन पैसा भेटतइ। हिन्नुओ के कोनो धरम हई।' तेसर मुसलमान बाजल 'धरम ले के की होतइ? पैसा होइ हइ त' बालो-बच्चा गुजर करिहइ।' आ अपन निर्णय दैत छथि- "कबीर जकाँ समाज संगे धार्मिक-राजनीतिक संवाद सेहो स्थापित करैत छथि।" आ ई निर्णय ठीक अछि, मुल्ला बांग दे बला, पहिने मुस्लिम सुपीरियोरिटी लऽ कऽ एक गोटेक बाजब फेर दोसर द्वारा ओकरा पोलिटिकली करेक्ट करब, आ ओ दोसर सतीश वर्माक हिसाबे कबीर सुभाष चन्द्र यादव छथि। अरुणाभ सौरभक 'यातनापूर्ण विपन्नताक यथातथ्" मे फेर कन्नारोहट शुरू। "मैथिली साहित्य मे उपन्यास कम लिखल जा रहल अछि।" भऽ गेल निर्णय जखन कि तथ्य एकर उलट अछि, आइ काल्हि कविताक बाद सभसँ बेशी उपन्यास लिखल जा रहल अछि। मुदा हुनका शंको छन्हि जे कहीं लिखाइतो हेतै तँ से तकरो इन्तजाम- "जौं लिखले गेल अछि त'पाठकक मोनक कछमछी आ छटपटी सँ सोझे जुड़बा मे बहुत समर्थ नै बुझाएल।" बिनु पढ़ने बिनु अध्ययनक आलेख लिखबामे यएह सभ समस्या छै। दू तीन पन्नाक कन्नारोहटक बाद हिनको मोन पड़ैत छन्हि जे गुलोक विषयमे सेहो लिखबाक अछि। गलती हिनकर नै सम्पादक द्वयक छन्हि जे सम्पादनकेँ मात्र प्रूफ रीडिंग बुझैत छथि। तकर बादो कन्नारोहट खतम नै भेल अछि जे हुनकर अध्ययनक अभावकेँ देखार करैत अछि खास कऽ समानान्तर साहित्यक अध्ययनकेँ। आशीष चमन लिखैत छथि- "ऐ कथाक जे पृष्ठभूमि अछि से 'समाजक आखिरी विपन्न आदमी'कथा सँ आयल छैक ओकर वर्णन हू-ब-हू ओकरे सभक मुँह सँ कएल गेल छैक।" हम पहिनहिये लिखने छी जे गुलोक केदार काननक आमुख गुलोक पाठकेँ बाधित करैत अछि, से बाधिते नै विकृत आ प्रभावित सेहो केलक अछि से आशीष चमनक आलेखसँ देखबामे आओत। रघुनाथ मुखिया 'गुलोक बहन्ने मैथिली भाषा पर विचार' करैत छथि मुदा सभटा भार छन्हि सुभाष चन्द्र यादवक कान्ह पर आ समानान्तर धाराक कान्हपर, रघुनाथ मुखिया अपने तारानन्द वियोगी सन 'विशुद्ध' मैथिली लिखैत रहताह। तारानंद वियोगीक मोन नै भरल छन्हि, ओ एकटा आर आलेख "पचपनिया मैथिली: एक जमीनी परिचर्चा- फेसबुक पोस्ट आ ताहि पर प्रतिक्रिया आ विवाद" लऽ कऽ अबैत छथि, ओना ओ कोन नोकरी करैत छथि से नै जानि, भरि दिन फेसबुक ओगरने रहैत छथि। मुदा मैथिलीमे फेसबुकपर ओ कोनो डिसकसन करै नै छथि, ओ तुरत्ते कन्ना-खिज्जी करऽ लगैत छथि, जे डिसकसन होइतो छै (मूलधारामे) से तइमे ५-१० टा सँ बेशी कमेण्ट नै, विदेह फेसबुक ग्रुपमे २०० सँ बेशी ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादी आइ.डी. हम सभ बैन केने रही, आ आइक तिथिमे ओ सभ इनैक्टिव अकाउण्ट छै, कारण चोरि पकड़ि लेलिऐ, मुदा ई सभ कहियो एक्टिव मोडमे आबि सकैए, से ऐ स्लीपर सेल सभपर समानान्तर धाराक नजरि छै। मुदा फेरो वएह गप जे ब्राह्मणवाद आ नव-ब्राह्मणवाद कोनो काज तँ करैत नै अछि खाली माहौल बनेबापर विश्वास करैत अछि आ तकरा देखार करबा लेल हम ई अभिलेखित कऽ रहल छी जे ५-७ टासँ बेशी लोक कोनो डिसकसनमे नै रहै छै आ ई प्रतिक्रियाकेँ विवाद कहब आ अपन पीठ अपने ठोकब भेल। आ फेर वएह गप हमरा दोहराबऽ पड़ि रहल अछि- "मुदा सभटा भार छन्हि सुभाष चन्द्र यादवक कान्ह पर आ समानान्तर धाराक कान्हपर, रघुनाथ मुखिया आ तारानन्द वियोगी विशुद्ध मैथिली लिखैत रहताह।" मुदा अपनाकेँ विक्टिम देखायब आ अपनाकेँ पचपनिया मैथिली संग जोड़ब, सुभाष चन्द्र यादवक जे गैसलाइटिंग केलन्हि तकरा संग मिलि प्रपंच आ तइयो अपनाकेँ सुभाष चन्द्र यादवक विचारधाराक कहब, से कतेक झूठ हिनका बाजऽ पड़ैत छन्हि आ तइ लेल कतेक निर्लज्जता चाही, से सभक लेल सम्भव नै। तारानन्द वियोगी टा सँ से सम्भव अछि। ओना ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्मणवादीक बीचक ई कन्नारोहट अहाँकेँ पढ़बाक चाही। ई दुनू वर्ग स्प्लिट पर्सनेलिटीक शिकार अछि, आपसमे रगड़घस करैत रहैत अछि, आपसमे गारा-गारी करैत रहैत अछि (कारण गरिखर अछि) मुदा समानान्तर धाराक विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक विरुद्ध ई सभ एक भऽ जाइत अछि। ब्राह्मणवाद आ नव-ब्राह्मणवाद छल-प्रपंचमे तरा-उपरी अछि मुदा दुनू एक दोसराकेँ पल्लवित-पुष्पित करैत रहैत अछि। आ अन्तमे "पचपनिया मैथिली" मे सुभाष चन्द्र यादव पुनः साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त सम्पादक द्वयपर प्रहार करै छथि जखन ओ लिखैत छथि- "एक बेर प्रोफेसर इन्द्रकान्त झा फोन केलनि- अहाँ कें साहित्य अकादेमी पुरस्कार पहिनहि भेटि जेबाक चाही छल। अहाँ डिजर्व करैत छी। अहाँक कथाक हम प्रशंसक छी। अहाँक 'बनैत-बिगड़ैत'रेस मे शीर्ष पर अछि। मुदा एकर भाषा ठीक नहि अछि। पुरस्कारक लेल अहाँ कें एकटा और संग्रह देबय पड़त, जकर भाषा दोसर हो।"एहि प्रसंग मे उल्लेखनीय तथ्य ई अछि जे 'बनैत बिगड़ैत' मे पहिल कथा अभिजात मैथिली आ शेष समस्त कथा पचपनिया मैथिली मे लिखल गेल अछि। आ समय मोन पड़ल? ई वएह समय छल जखन वएह साहित्य अकादेमीक दल "विदित"क नेतृत्वमे नङटे नाचि रहल छल, आ ओही समय मे तारानन्द वियोगीकेँ वएह दल पुरस्कृत केने छल, हुनकर 'विशुद्ध' मैथिली भाषापर, आ ओइ विदितक ढाकीक ढाकी प्रशंसा केने छलखिन्ह तारानन्द वियोगी। ओइ "बनैत-बिगड़ैत"क आमुख लिखने छलौं हम, जकर बलि-प्रदान कएल गेल छल। ओ छथि "काठक बनल लोक" कथाक लेखक जे हम पढ़ने रही १९८३ आ १९८४ मे नौमा आ दसमामे, ओ अड़ल रहता। घरदेखियाक बाद बनैत बिगड़ैत २५ सालक बादो ओ अड़ल रहथि, आ आब गुलो, मडर आ भोट। आ देखियौ लीला, इन्द्रकान्त झा केर गालपर समधानि कऽ प्रहार तखन पड़ल जखन जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ठेंठी/ पचपनिया वर्तनी पर 'पंगु' उपन्यास लेल मैथिलीक साहित्य अकादेमीक मूल पुरस्कार २०२१ देल गेल। आ अन्तमे "पचपनिया मैथिली" मे सुभाष चन्द्र यादव पुनः साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त सम्पादक द्वयपर प्रहार करै छथि जखन ओ लिखैत छथि- डॉ. रमानन्द झा 'रमण'अपन नोटबुक मे टिपने छलाह-'ब्राह्मण कहैत छथि सोइत छी, सोल्हकन कहैत अछि बाभन छी। हम की कही जे की छी?' एहि टीप मे सोल्हकन लेल जे निरादर व्यक्त भेल अछि, से आर किछु नहि; जातीय विद्वेष आ घृणाक भाषिक अभिव्यक्ति थिक। सुभाष चन्द्र यादवकेँ उत्तर देलखिन्ह रमानन्द झा 'रमण' १० दिसम्बर २०२२ केँ हमर विदेह मे 'नित नवल सुभाषचन्द्र यादव (भाग-१)' ०१ दिसम्बर २०२२केँ ई प्रकाशित भेलाक बाद आ तकर विरोध केलखिन्ह नेपालसँ दिनेश यादव आ समर्थन केलखिन्ह भारतसँ ललितेश मिश्र। रमानन्द झा 'रमण' - बिना पढ़ने अमीनी: खेतक नापी अमीन करैत छथि। अमीनी गीत नहि थिक जे केओ गाबि लेत वा रिरिआ लेत। ओ एक विद्या थिक, बिना अमीनी विद्या सीखने जड़ी-कड़ीक महत्त्व की छैक, से नहि बूझि सकैत छी। एक कड़ी एमहर-ओमहर भेलापर भाइ-भाइमे कपर-फोड़ौअलि भए जाइत अछि। ओहिना भाषाक नापी केनिहारकेँ भाषाशास्त्र वा भाषाविज्ञानक ज्ञान अर्जित करए पड़ैत छनि। ओएह कहि सकैत छथि ई भाषा थिक, ई भाषिका थिक, ई मिश्रभाषा भेल, ई क्रिओल थिक आदि। ओएह कहि सकैत छथि जे उच्चरित भाषा आ लिखित भाषा, सामान्य भाषा आ साहित्यिक भाषा, पात्रक भाषा आ लेखकक भाषामे की अन्तर छैक। रमानाथ झा मानैत छथि जे 'मिथिला भाषा आजुक भाषा नहि थिक। जकर स्वरूप कालक्रमेँ स्थिर होएत। छओ सए वर्षसँ लिखल जाइत परम्परा एम्हर आबि एहि पचास वर्षमे हिन्दीक प्रभावसँ भ्रष्ट भेल जाइत अछि। लिपि पहिने गेल, आब भाषाक स्वरूप नष्ट होएबा पर अछि। भाषा एक गोटाक थिकैक नहि जे सभ व्यक्ति सभ रंगक लिखत, तखन भाषा रहत नहि।' सामाजिक सम्पत्तिक सुरक्षा आ उपयोगक लेल एक अनुशासन होइत छैक। जेना खेतक पटौनीक लेल पौटी आवश्यक अछि, ओहिना राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मंचपर भाषाक प्रतिष्ठा आ स्वीकार्यताक लेल पौटीक महत्त्व अछि। मिथिला भाषाक अमीन सभ ई काज कएने छथि। जॉर्ज अब्रहम ग्रिअर्सन मिथिला भाषाकेँ भाषावैज्ञानिक आधारपर चिन्हि एक स्वतन्त्र भाषा घोषित कए, ओकर भाषिका सभक विशेषता निर्धारित कएलनि। महावैयाकरण दीनबन्धु झा, म.म. उमेश मिश्र, आचार्य रमानाथ झा, डा. सुभद्र झा, पण्डित श्री गोविन्द झा, डा. रामावतार यादव, उदयनारायण सिंह 'नचिकेता, योगेन्द्र प्रसाद यादव, डा. सुनील कुमार झा आदि ओहि शास्त्रक अध्ययन कए वैश्विक स्तरपर मिथिला भाषाकेँ व्याप्ति आ प्रतिष्ठा दिऔलनि। किन्तु, सम्प्रति एहन धुक्कर उठल अछि वा उठाओल गेल अछि जे केओ ककरो मोजर नहि दैत अछि। ने ओ पण्डित श्री गोविन्द झाकेँ मानैत छथि आ ने डा.रामावतार यादवकेँ। ओ मैथिलीक कवि छथि, कथाकार छथि, उपन्यासकार छथि, आलोचक छथि, राजनीति प्रेरित सामाजिक कार्यकर्ता छथि, आ सबसँ बढ़ि बिना शास्त्र पढ़ने भाषावैज्ञानिक बनि गेल छथि। दिनेश यादवक उत्तर देखू: सर्वप्रथम,भाषा खौका सभके खोजी कयल जाए, निष्कर्ष पर शिघ्र पहुँचबाक आसानी होएत । ब्याकरण चाहि मुदा केहेन, मानक चाहि मुदा निर्धारण कोनाके करी ? बभनौटी शैली, भाष्य किंवा मानक आब लोकजन अस्वीकार कए देलैथ । मैथिलीभाषी लोकजन आब पहिने जका निछाह मुर्ख नै रहला, सभ बुज्नुक भऽगेला अछि। हम मैथिली लिखैत आ पढैत छी, मुद्दा हमर बोली, शैली आ भाषिका के मानक जातिवाला महानुभाव लोकैन मान्यता नय दैत छैथ..... ! तई अइ तरहे पुरातन सोच , आ दरिद्र मानसिकताके परित्याग करैत नव शिरा सऽ आगा बढबाक जरूरी छैक । आब स्तुति, गणेश परिक्रमा कके पुरस्कृत होमेवाला परिपाटिके अन्त्येष्ठी करैटा पड़त । समाजशास्त्रीय, मनोविज्ञानशास्त्रीय दृष्टिकोण जाधरि नै बनत,ताधरि मैथिली जातिय दर्शन, मान्यता आ विचारके घेराबन्दीमे रहत । जै घेरासऽ मैथिलीके मात्र क्षति आ क्षति होएत । वैज्ञानिक सोच, समान व्यवहार, सर्वजातिय मान्यता, विविध भाषिकासऽ समेटनाइ आदि मैथिलीके हुकहुकी बचेबाक दबाई थिक, एकरा अंगिकार कके आगा बढल जाय त अखनो विलम्भ नै भेल अछि । मैथिली चमकत आ दमकत ! मुदा ललितेश मिश्रक समर्थन भेटल रमानन्द झा 'रमण' केँ, मुदा हुनकर कुटिलता, जे ओ एहेन स्वांग करै छथि जे ओ ई सुभाष चन्द्र यादवकेँ नै नवतुरिया/ फेसबुकिया दिया कहि रहल छथि। तेँ हम हुनकर ऐ व्यवहारकेँ "पौराणिक समीक्षा'क नाम देने छी, मंच सापेक्ष। जेहेन मंच तेहेन समीक्षा, गरुड़ पुराणमे गरुड़ ब्रह्मा-विष्णु-महेशसँ ऊपर आ मत्स्य पुराणमे मत्स्य ब्रह्मा-विष्णु-महेशसँ ऊपर। ललितेश मिश्रक रमानन्द झा 'रमण' क समर्थन ... सभहि कें मार्ग दर्शनक अवश्यकता नहि छनि. ओएह जन अपनेक मार्ग दर्शन क'देताह. ओ लोकनि सभ बिषयक वेत्ता स्वयं कें मानैत छथि. कोनो भाषाविद्क हुनका प्रयोजन नहि. मैथिलीक बेस विकास भेलैक अछि.नव ज्ञान संपन्न युग अएलैक अछि.आब रास्ता देखयबाक जरूरति नहि छैक. ज्ञान बखारब गंजन कें आमंत्रित करब होएत. मुदा हमर मायो कम नै- मैथिलीक लोकोक्तिक किताबमे लिखल रहै- "दस ब्राह्मण दस पेट, दस राड़ एक पेट" तँ ओ सिखेलन्हि जे ई गलत छै, ई ब्राह्मण कहै छै, ब्राह्मण लेल दोसर वर्ग कहै छै- "दस ब्राह्मण एक पेट।" रमानन्द झा 'रमण' आ ललितेश मिश्रकेँ कोन तरहक शिक्षा भेटल छन्हि नै जनि। मुदा दुनू गोटे की कऽ रहल छथि से हुनका सभकेँ बुझल छन्हि, आ तकरा एत्तऽ उघार कएल जा रहल अछि। रमानन्द झा 'रमण' लिखै छथि- ओएह कहि सकैत छथि ई भाषा थिक, ई भाषिका थिक, ई मिश्रभाषा भेल, ई क्रिओल थिक आदि। अहाँकेँ कोनो षडयंत्र ऐमे देखा पड़ैए? तँ देखू ई कोन षडयंत्र अछि। अंग्रेजी सेहो बाजल जाइए कएह तरहक मातृभाषा आ द्वितीय भाषा केर रूपमे, आ तकर अतिरिक्त कएक तरहक पिडगिन अंग्रेजी आ क्रेयोल अंग्रेजी सेहो छै। पिडगिन अंग्रेजी सेहो दू वर्गमे विभक्त छै- अटलांटिक पिडगिन आ प्रशान्त पिडगिन। अटलांटिक पिडगिन अंग्रेजी पश्चिमी अफ्रीकामे विकसित भेल आ दास-व्यापारक माध्यमसँ वेस्ट इण्डीज आ अमेरिका पहुँचि गेल, मुदा ऐ क्षेत्रमे पिडगिन बाजनहारकेँ मूर्ख आ सुस्त मानल गेल। मुदा से प्रशान्त पिडगिन लेल सत्य नै अछि, ई हवाइ, पापुआ न्यू गिनी आ दोसर ब्रिटिश उपनिवेशमे विकसित भेल, व्यापारक विवशताक कारण, न्यू गिनीमे क्रेयोल ओकर राष्ट्रिय भाषा छै, कारण ई विकसित भऽ गेल, अपन शब्द भण्डार बढ़ा लेलक आ वाक्य संरचना सेहो। आ पिडगिन छिऐ की? ई एकटा संचार माध्यम अछि जे दू तरहक लोकक बीचमे, जे दू विभिन्न भाषा बजैत छथि, संचारक माध्यम बनैत अछि, पिडगिन ककरो मातृभाषा नै अछि। कालान्तरमे पिडगिन किछु लोकक मातृभाषा बनि जाइत अछि, आ तखन ओकरा क्रेयोल कहल जाइत अछि। अंग्रेजी आधारित पिडगिन आ क्रेयोल ब्रिटिश उपनिवेशमे पसरल जतऽ ई अंग्रेज मालिक आ स्थानीय लोकक मध्य संचारक माध्यम बनल। पिडगिन आ क्रेयोलकेँ अंग्रेजीक अमानकीकृत रूप कहल जाइत अछि। ई सभ सीमित व्यवस्था सन अछि, जइमे संरचना आ शब्द भण्डार सेहो सीमित रहैत अछि। आब हम बूझि रहल छी जे अहाँकेँ रमणक अज्ञानतापर हँसी लागि रहल हएत, जे २००० शब्दक शब्द भण्डार आ ५० टा वाक्य संरचनाक आधारबला मैथिलीकेँ मूल आ लाख शब्दसँ ऊपर शब्द भण्डार आ हजारसँ ऊपर वाक्य संरचनाबला समानान्तर धाराबला मैथिलीकेँ क्रेयोल कहि रहल छथि। मुदा अहाँ पेट पकड़ि कऽ बैसल रहू कारण अहाँकेँ रमानन्द झा 'रमण' आ ललितेश मिश्र अज्ञानतापर आर हँसी छूटयबला अछि। हवाइ केर पिडगिन अंग्रेजी-समटाइम्स देयर इज अ गुड रोड. हवाइ केर पिडगिन- समटेम, गुड रोड गेट अंग्रेजी- समटाइम्स थेयर आर थिन्ग्स लाइक बेण्ड्स, एंग्ल्स, राइट? हवाइ केर पिडगिन- समटेम, ओलसेम बेन गेट, एनगुरू गेट, नो? कैमरून केर पिडगिन अंग्रेजी- गो. कैमरून केर पिडगिन- गो. (कोनो परिवर्तन नै) अंग्रेजी- डॉण्ट गो. कैमरून केर पिडगिन- नो गो. अंग्रेजी- दे कैन गो. कैमरून केर पिडगिन- डेम फिट गो. अंग्रेजी- दे काण्ट गो. कैमरून केर पिडगिन- डेम नो फिट गो. अंग्रेजी- नोबडी केम. कैमरून केर पिडगिन- नो मैन नो बिन काम. नाइजीरियन पिडगिन अंग्रेजी- गवर्नमेण्ट! ऑल आवर रोड्स आर रुइण्ड कम्प्लीटली. नाइजीरियन पिडगिन- गोफ्रूमेण्ट! ऑल आवर रोड्स डोन यामुटु फिनिस. अंग्रेजी- प्लीज मेक समबडी कम फ्रॉम द गवर्नमेण्ट ईवन इफ इट इज फ्रॉम कानो. नाइजीरियन पिडगिन- बिको मेक समबडी गोफूमेण्ट एफेन इ फिट फ्रॉम कानो कम सेफ. अंग्रेजी- अनीवन हू इज अवलेबल सर, लेट हिम जस्ट गेट समथिंग डन. नाइजीरियन पिडगिन- अनीवन्स एट ऑल अफलाबुलु सा, मेक इ जुस फाइण्ड समटिन्स डन फॉर. अंग्रेजी- ऑल दीज रोड्स आर इन अ वोफुल स्टेट. नाइजीरियन पिडगिन- ऑल दिस रोड डेम वे डन वोवो फिनिस. चीनक तटीय पिडगिन अंग्रेजी- ही इज/ वाज वेरी सिक. चीनक तटीय पिडगिन- ही प्लेण्टी सिक. अंग्रेजी- आइ एम द चीफ बॉय. चीनक तटीय पिडगिन- मै ब्लोन्ग नेम्बर- वान बोज. अंग्रेजी- दिस इज एन एक्सेलेण्ट बुक. चीनक तटीय पिडगिन- दिस अ नोम्बा वान गुड बुक. (क्रिस्टल डी.: द इंग्लिश लैंगुएज, पेंगुइन बुक्स, इंगलैण्ड, १९९०) आब आउ षडयंत्रपर। से रमानन्द झा 'रमण' कहऽ की चाहै छथि? मालिक नोकरक सम्बन्ध भाषामे, बा पिडगिन मैथिली क्रेयोल मैथिली बनि गेल अछि से? बा ओ किछु नै कहऽ चाहै छथि कारण ऐ विषयपर हुनका कोनो ज्ञान छन्हिये नै, अज्ञानतासँ मात्र दलमलित करऽ चाहै छथि? ऐ तरहक गपकेँ हमरा गाममे बकथोथी कहल जाइ छै आ नीक नै मानल जाइ छै। आ तेँ रमानन्द झा 'रमण' जे बिना पढ़ने अमीनी कऽ रहल छथि आ अपना पक्षमे जे रामावतार यादव, योगेन्द्र प्रसाद यादव, सुनील कुमार झा आदिक नाम गनौने छथि (जकरा दिल्लीमे नेमड्रॉपिंग कहै छै आ नीक नै मानल जाइ छै) से ई सिद्ध करैत अछि जे ओ बिनु हुनकर सभ पोथी पढ़ने बिबलियोग्राफी बनौने छथि, गूगल सर्चमे कीवर्ड दऽ कऽ। योगेन्द्र प्रसाद यादवक तँ अंग्रेजी आलेख विदेहमे सेहो ई-प्रकाशित भेल अछि, सएह पढ़ि लेने रहितथि तँ दृष्टि किछु फरिच्छ भेल रहितन्हि, सुभाष चन्द्र यादवक पक्षमे रामावतार यादवक शोध अछि, तखन बिनु पढ़ने अमीनी के कऽ रहल अछि से स्पष्ट भेल। सुभाष चन्द्र यादव लिखै छथि- मैथिलीक वैयाकरण सभ संस्कृताह आ हिंदिआह व्याकरणिक ढाँचा तैयार कयलनि। ओ सभ दलित मैथिलीक विशिष्टता आ भिन्नता कें विचार-योग्य नहि बुझलनि। डॉ. रामावतार यादव एकमात्र एहन भाषाशास्त्राी छथि जे एहि पर थोड़े विचार कयने छथि। सुभाष चन्द्र यादव पुनः लिखै छथि- एक बेर अनुग्रह नारायण सिन्हा सामाजिक संस्थान, पटना मे एकटा कार्यक्रम भेल। केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूर एहि कार्यक्रमक आयोजन कयने छल। कार्यक्रमक मूल चिन्ता मैथिली भाषाक विकास छल। विकास कोना हो, ताहिपर अनेक वक्ता अपन-अपन वक्तृता देलनि। डॉ. मेघन प्रसाद सेहो अपन विचार रखलनि। हुनक भाषा मे ओतेक आदरसूचकता नहि छलनि, जतेक विद्वत समूह कें अपेक्षा रहनि। फल ई भेल जे हुनक भाषिक स्खलन लेल भाषणक बिच्चहि मे बहुत अशिष्टतापूर्वक हुनकर हँसी उड़ाओल गेल। ई दृश्य हमरा विचलित कयने छल आ एहि तरहक भाषिक असहिष्णुताक प्रतिकार हम तत्क्षण कयने रही। अही केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूर क सेमीनारक एकटा आलेख जे मेघन प्रसाद पढ़ने छला, से रमानन्द झा 'रमण'क कथित लिटेरेरी एसोशियेसनक पत्रिका 'घर बाहर' मे बिनु पहिल पैराग्राफक छपल (ऐ काजमे रमानन्द झा 'रमण' उस्ताद छथि), मुदा ओ आलेख अविकल रूपमे विदेहमे बादमे ई-प्रकाशित भेल। आ अहाँकेँ बूझल अछि जे ओइ कुटिलता द्वारा कोन तथ्य सेंसर कएल जेबाक प्रयास छल? मेघन प्रसाद लिखने छला जे ओ कएक बेर साहित्य अकादेमीसँ अनुवाद असाइनमेण्ट लेल इच्छा व्यक्त केने रहथि मुदा साहित्य अकादेमीकेँ हुनकासँ प्रेम छै से कोनो असाइनमेण्ट कहियो नै भेटलन्हि। आब अहाँकेँ बूझऽमे आबि गेल हएत जे मूलधारा आ साहित्य अकादेमी लेल मेघन प्रसाद आ सुभाष चन्द्र यादव किए बारल छथि आ तारानन्द वियोगी किए स्वीकार्य। सुभाष चन्द्र यादव लिखै छथि- पाग-दोपटावला मैथिली चल जायत, लेकिन गोलगलावला मैथिली जीबैत रहत। आ गोलगलाबला विद्यापतिक चित्र जे ऐ विनिबन्धमे अहाँ देखलौं से बनाओल गेल विदेह सम्मानसँ सम्मानित पनकलाल मण्डल द्वारा, पदावलीबला विद्यापति, ज्योतिरीश्वर-पूर्वबला विद्यापति, जे अछि विदेहक लोगो। संस्कृत आ अवहट्ठ बला पाग-दोपटाबला चित्र मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता द्वारा कोनो कलाकारसँ बनबाओल गेल, आ ओइ कलाकारक नाम ६०-७० सालसँ अज्ञात कारणसँ गुप्त राखल गेल अछि। सुभाष चन्द्र यादव हमरा हमर पिता मोन पाड़ि देलन्हि- मृत्युक २७ बर्ख बाद, पता नै कतऽ सँ नोर घुरि आयल अछि हमरा आँखिमे- पिताक सत्यकेँ लिबैत देखने रही स्थितप्रज्ञतामे तहिये बुझने रही जे त्याग नै कएल हएत रस्ता ई अछि जे जिदियाहबला। माय रतुका पूजा दिआ पुछलकै। औतौका हाल सुनबइ मे रिनियां कए मन नै लागलै। माए कए कहलक- 'माय, पैसा दही ने। बबा कए गोली लाबि दइ छिऐ।' (गुलो, उपन्यास २०१५) १९९५, हम ट्रेनिङ सँ बिना कोनो कारण घर आबि गेलौं, मोन उचटि गेल छल। माय पुछलक ट्रेनिङक विषयमे, ओतुक्का गप करैक हमरा मोन नै भेल। पिताक मोनक विषयमे पुछलिऐ। ओ खाटपर सूतल छथि। ३ बजे चाह पिआबैले उठेबन्हि। खाइले परसल थारी, हम दोसर थाड़ीसँ झाँपि कऽ राखि देलिऐ, पिता सूतल छथि, रवि दिनुका दुपहरिया। ओ उठता तखन हम खायब। मोन ठीक छन्हि ने। ३ बजे चाह लऽ कऽ पिताकेँ माय उठबैले गेली.. पिता नै उठलथि। (हमरा सङ घटल सत्य घटना, १९९५) (सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ हुनकर समस्त साहित्य विदेह पेटार http://videha.co.in/pothi.htm पर उपलब्ध अछि।) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आचार्य रामानंद मंडल- रनिया भिखारीन आचार्य रामानंद मंडल रनिया भिखारीन
कहीं से आके एगो भिखारीन प्रखंड मुख्यालय गोपालपुर बस स्टैंड में रहे लागल।वो दुधिया गोर रंग के पचीस बरस के युवती रहे।दुबर पातर शरीर रहे।वो वांया अंग से पोलियो ग्रस्त भी रहे।वाया पैर से थोड़ा घिसिया के चले त बायां हाथ भी झूलैत रहे।वो बस स्टैंड में के होटल सभ मे मांग के खाइत रहे। हम स्थानीय वित्त रहित इण्टर कालेज में डिमान्सट्रेटर रही।बस स्टैंड के बगल में भाड़ा के मकान में रही। कालेज आइत जाइत हम वोकरा देखी।बस स्टैंड के किनारे भूइयां पर फाटल चिटल गुदरी पर कभी परल त कभी बैठल रहे। कभी कोनो होटल पर खाना लेल खड़ा रहे।होटल वाला वोकरा खाना देबे त वोही जमन बैठ के खा लेबे आ कल पर जा के पानी पी लेबे।
एक बात और रहे जे वो साफ सुथरा से रहे।बस स्टैंड के बगल में के पोखरी में नहाय आ कपड़ा भी खीच लेबे। किराना दुकानदार से साबून भी मांग लेबे।बस स्टैंड के सभ दुकानदार वोकरा से सहानुभूति रखे। दुकानदार सभ वोकरा रनिया कह के पुकारे।
एक दिन वोकरा बस स्टैंड में लागल खाली बस से उतरैत देखली। हमरा आश्चर्य लागल।हम जै होटल में खाइ,वोइ होटल वाला मनोहर के इ बात कहली।त वो कहलक - हं। दयानंद बाबू।रनिया बस में झांरू मारै छैय।बस के साफ कै दैय छैय त कंडक्टर वोकरा कुछ पैसा दे देइ छैय।
कुछ दिन बाद देखै छी कि रनिया में शारीरिक परिवर्तन आ रहल हए।वोकर शरीर धीरे धीरे फुलल जा रहल हए।गाल लाल लाल होके उभर रहल हए।छाती के उभार भी उन्नत हो रहल हए।केश भी खोल ले कमर तक लटकै ले रहल हए। होंठ पर मुस्कान रहै हए। कुछ अजीब पन हमरा लागे लागल।
कुछ और दिन बाद वोकरा पेट में उभार देख ली। हम फेर होटल वाला मनोहर के रनिया के बारे में बतैली।त होटल वाला मनोहर कहलक-इ सभ बस के कंडक्टर के करदानी हए। कंडक्टर रनिया के यौन शोषण करे छैय।परंच रनिया के मन लगै छैय। हम कहली-कि कंडक्टर रनिया के संगे बलात्कार न त कैले हए । होटल वाला मनोहर कहलक-कंडक्टर बलात्कार न कैले हए।हम सभ बस स्टैंड में रहै छी। बलात्कार करितै त रनिया हो हल्ला जरूर करितै आ हमरा सभ के जरूर बतै तैय।बस स्टैंड के सभ दूकानदार सभ रनिया के मानै छैय। कंडक्टर रनिया के फुसला के आ वोकर नारी गत कामवासना के जगा के यौन शोषण करै छैय। रनिया के जवानी आ वोकर शारीरिक भूख के फायदा कंडक्टर उठा रहल हए।देखैय न छियै रनिया आबि केते खुश रहै हए।
रनिया के पेट काफी बढ़ गेल।बस स्टैंड में खुसर फुसर होय। स्थानीय पुलिस दारोगा, संभ्रांत लोग सभ देखे बतिआय परंच विरोध में कुछ न बोले।
नव महिना पुर गेल। रनिया खुब सुंदर गोर लैइका के जनम देलक।आबि वो माय बन गेल। कोई महिला कोतुक बश लैइका के मांगे त वो लैइका के वोकरा न देबे।हर समय बच्चा के पहरा दैत रहै।
एगो नारी जौं माय बनै छैय त वो सिरफ माय होय छैय।चाहे वो बच्चा प्रेम के होय!कि यौनशोषण से होय! आ कि बलात्कार से होय!
आइ जौं कि अविवाहित माय समाज के डर से अपना बच्चा के फेंक दैय छैय!मार दैय छैय।परंच रनिया अपना बच्चा के प्यार करै छैय।भले वो बच्चा अबैध भेल होय। परंच रनिया के बच्चा रनिया के शरीर के हिस्सा लगैय।हर समय बच्चा के निघारैत आ चुम्मैत रहैत रहे।त कभी स्तनपान करवैत रहैत रहे। रनिया में मां के रूप सत्य, वात्सल्य शिव आ ममता सुन्दर लगै छैय। रनिया आइ पूर्ण नारी लगैय हए। रनिया आइ भिखारीन नै रानी लगैय हए।
रनिया आबि बस स्टैंड छोड़ के कहीं दोसर जगह चलि गेल। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.आचार्य रामानंद मंडल- वारिस आचार्य रामानंद मंडल वारिस
महेंद्र प्रताप लखनपुर गांव के जमींदार रहलन।वो तीन सौ बीघा जमीन के मालिक रहलन।जमीन तीन गांव में रहे।तीनू गांव में कचहरी रहे।सभ कचहरी में जेठरैयत रहे ,जे वोही गांव के रहे। महेंद्र प्रताप चार महीना पर मुयाना करैत रहलन। महेंद्र प्रताप पटना विश्वविद्यालय से एमए कैले रहलन। हुनकर विआह भगवानपुर के जमींदार विश्वनाथ प्रताप के एकलौती बेटी मेनका से भेल रहे। मेनका मुजफ्फरपुर के बिहार विश्वविद्यालय से एमए कैले रहे। शादी के बाद दूनू गोरे राज सी जीवन जीयत रहे। मेनका के भरल जवानी पर महेंद्र प्रताप दिवाना रहे। मेनका खुलल विचार वाली युवती रहे।गांव के लोग मेम साहब कहैत रहे। शादी के पांच साल के बाद महेंद्र प्रताप अपन पिताजी तेज प्रताप के मरला के बाद जमींदारी करे लगनन। अब वो शराब पीये लगनन। अब हुनकर नजर मेनका के खवासिन पारो पर रहे।पारो मेनका के समवयस्क रहे।उ सुंदरता में मेनका से बीस रहें। मेनका जहां गेहूंआ रहे, वहां पारो दुधिया गोर रहें। धीरे-धीरे महेंद्र प्रताप पारो के नजदीक आवे लगनन। एक दिन मेनका, महेंद्र प्रताप आ पारो के एक साथ आलिंगन बद्ध देख लेलक।पित्त मार के मेनका रह गेल।अइ बारे में केकरो से कुछ न कहलक। लेकिन वोहे रामा खटोला, मेनका बार बार देखे लागल। एक दिन रात में मेनका, महेंद्र प्रताप के इ सभ बात कहलन-हम पंद्रह दिन से अंहा पारो के चलैत संबंध के देख रहल छी।एना न करूं। हमरा में कि न हय,जे पारो में हए। एगो औरत सभ कुछ देख सकै हए ।लेकिन अपना पति के दोसर औरत के संग न देखि सकत हए।अब अंहा संभल जाउ। महेंद्र प्रताप हां हूं कहिके मेनका के अपना बाहों में ले लेलन। परंच महेंद्र प्रताप के आंख में त बासना के भूत सवार रहे।पारो अब सुन्दरी नै अतिसुंदरी लागे लागल रहे। अब त हर समय पारो के संग रहे के कामेक्षा जागै लागल। अब त दूनू गोरे हबस के भूख मिटाबे लागल। एक दिन मेनका, महेंद्र प्रताप आ पारो के एक साथ विछावन पर आलिंगन बद्ध देख लेलक। मेनका पारो के डपटैत महेंद्र प्रताप के कहलक-अंहा के कि बुझाई हय कि हम जमींदार के बेटा छी,त हमहु जमींदार के बेटी छी। अंहा एम ए छी त हमहु एम ए छी। अंहा शराब पीयै छी त आइ से हमहु शराब पीबै। अंहा हमरा खबासिन के साथ रहै छी त हमहु अंही के खबास जौडे रहब।जे जे अंहा करै छी वोहे हम भी करब। अब अंहा देखब। महेंद्र प्रताप भी तैश में कहलन- अंहा के जे मन हए से करू।हम त पारो के साथ ही रहब। मेनका लम्बा सांस लैत,गेहूमन जेका फुफकार आ फनफनाइत दोसर रूम चल गेल। अब मेनका महेंद्र प्रताप के खबास पर डोरा डारे लागल।खबास राम बुझावन महेंद्र प्रताप के ही तुरिया रहे।गांव के ही स्कूल से पांचवा पास रहें।लम्बा चौड़ा जवान। श्यामला रंग। चौड़ा सीना।बडका मोंछ। मेनका के रंग ढंग आ प्रेमक व्यवहार से वो मेनका के मोह पाश में बंधाय लागल। एक दिन मेनका साफ साफ महेंद्र प्रताप के साथ अपन संबंध में बता देलक।आ कहलक-तू निश्चित हो जा। हम अब तोरा से प्यार करै छी। हमरा मन पर आ तन पर तोहर अधिकार हौअ। आ इ अधिकार तोरा हम देय छियौ।आ इ कहैत रामबुझावन के अपना बाहों में ले लेलन। रामबुझावन महसूस कैलक कि मलकिनी शराब पीले हए आ मदहोश हए। जवान मर्द के जब कोई जवान मदहोश औरत अपना बाहों में जकडत त भला उ मर्द जकडन के तोड़ सकै छैय। धीरे-धीरे मेनका आ रामबुझावन वासना आ प्रेम में आगे बढैत चल गेल।समय अपन चाल में चलैत रहे। मेनका गर्भवती भे गेल। महेन्द्र प्रताप के ज्यादा शराब पीये के कारण लीवर खराब हो गेल। एक दिन अचानक दुनिया छोड़ देलन। मरला के सात महीना के बाद मेनका के लडका पैदा भेल।सभ लोग कहे कि मालिक महेंद्र प्रताप वारिस देके अपने असमय चल गेलन। लेकिन लोग वारिस के राज के न जान पायल।सारा राज काज वारिस वालिग होय तक मेनका आ खवास बाबू राम बुझावन देखैत रहे। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.महाकान्त प्रसाद- रिपोर्ट महाकान्त प्रसाद रिपोर्ट दरिभंगा,२०/१२/२०२२ हिन्दी समाहार मंच दरभंगा आइ स्वतंत्रता सेनानी कुलानंद वैदिक स्मृति उत्सव अखिलेश कुमार चौधरीक अध्यक्षता मे शंभु अगेही स्मृति पुस्तकालय, शुभंकरपुर दरभंगा मे मनौलक। मुख्य अतिथि अमरेश्वरी चरण सिन्हा कहलनि -"वैदिकजीक स्वतंत्रता आंदोलन मे महत्त भूमिका छल। ओ प्रतित्युपन्नमति व्यक्तित्वक संग १९४२ केर आंदोलनक दरिभंगाक महानायक छलाह। ओ मात्र देशक स्वतंत्रताक हित नहि अपितु देशक लोक केँ एकसूत्र मे बान्हबाक स्तुत्य प्रयास अपन गुरुवर कमलेश्वरी चरण सिन्हाक मार्गदर्शन मे करैत छलाह।" दामोदर कमालपुरी कहलनि- 'कुलानंद वैदिक देश स्तरक स्वतंत्रता सेनानी छलाह। ओ दरिभंगाक गौरव स्तंभ छलाह।' वैदिकजीक पुत्र वेद प्रकाश वैदिक जनौलनि जे "बाबूजी कहैत रहैत छलाह जे जे क्यो जेल यात्रा कएलन्हि ओ लाभार्थी भेलाह, मुदा अगणित ओहन लोक भेल जे राष्ट्र भावना सँऽ एहि राष्ट्रीय यज्ञ मे भाग लेलनि परंच हुनक नाओ स्वतंत्रता सेनानी सूची मे नहि छन्हि, जनिक दुःख हमरा अछि।" मैथिली साहित्यकार चन्द्रेश कहलनि - ओ सांच ओ संत क्रांतिकारी छलाह। मैथिलीक कवि महाकान्त प्रसाद अपन काव्य रचना "हम भारतक लोक" केर माध्यम सँऽ दरिभंगाक धरा पर स्वतंत्रताक अलख जगौनिहार सेनानी सभक प्रति सम्मान ओ गौरव प्रकट कएलन्हि। एहि अबसर पर चन्द्र मोहन पोद्दार, अमिताभ कुमार सिन्हा, संतोष दिवाकर, शेखर कुमार श्रीवास्तव, डाॅ.सतीश चन्द्र भगत, अरुण कुमार वर्मा, पुनीत कुमार सिन्हा, मंजर सिद्दीकी, हीरालाल सहनी, डाॅ. नवीन कुमार, शंभु नारायण चौधरी, मुश्ताक एकबाल, संतोष श्रीवास्तव आदि अपन विचार व्यक्त कएलन्हि। कार्यक्रमक संचालन सचिव अमिताभ कुमार सिन्हा ओ धन्यवाद ज्ञापन संयुक्त सचिव महाकान्त प्रसाद कएलन्हि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी 'लव यू टू' संतोष कुमार राय 'बटोही' डायरी 'लव यू टू'
२५-०१-२०१३ सँ २५-१२-२०१४ धरि
जामिया : हमर माय-बाप
जामिया मिल्लिया इस्लामिया हमर जिनगी केर धरम स्थल अछि। हमर जिनगी केँँ पटरी पर अनवा मे अइ शिक्षण संस्थान केँ बड़ि पैघ भूमिका छै। 2007 सँ 2013 धरि जामिया केँ कैम्पस मे रहि कs भारतीय तहजीब सँ रू-ब-रू भेलहुँ हम। जामिया हमर माय-बाप बनल। बिहार केँ एकटा छोट गाम 'मंगरौना' सँ जामिया केर सफर सरिपहुँ अद्भुत रहल अछि। 2007 मे केन्द्रीय विश्वविद्यालय जामिया मे हिंदी विषय सँ बीए हिंदी ऑनर्स केँ एंट्रेस टॉपर हम भयलहुँ अछि। पढ़वाक हमर जिनगी केर मकसद रहल ; तकरे इ परिणाम छियैय जे गाम सँ जयपुर , जयपुर सँ दिल्ली केर यात्रा करs पड़ल ।
हमर पारिवारीक महौल हमरा कविता आओर कहानी सँ दोस्ती करा देलक। सातम-आठम क्लास सँ हम कविता लिखैत छलहुँ, तकरे परिणाम छियैय जे हिंदी सँ लगाव बढ़ि गेल। जामिया केँ कैम्पस अइ केँ निखारै मे सहयोग देलक। कविता लेखन आओर वाचन करैत जामिया मे कहानी सेहो लिखs लगलहुँ। लोक गीत गायन प्रतियोगिता मे हम भाग लैत रहलहुँ अछि। भाषण प्रतियोगिता, निबंध लेखन प्रतियोगिता आओर सेमिनार आदि मे भाग लैत रहलहुँ अछि। बड़ रास पुरूस्कार आओर सर्टिफिकेट भेटल जामिया मे।
संजय कुमार पौद्दार हमर मित्र बनि गेलाह जामिया मे। इ मित्रता अखनो धरि कायम अछि। बीए हिंदी ऑनर्स मे तीस क्लासमेट छल। हिंदी सँ ऑनर्स क्लीयर कएलाक बाद एम ए हिंदी में जामिया मे दाखिला लेलहुँ, परञ्च जामिया के बीएड एंट्रेंस सेहो क्लीयर भs गेल छल ताहि दुआरे बीएड मे दाखिला करवा कs एम ए हिंदी केँ दाखिला केँ कैंसिल करेलहुँ अछि। इ हमर पैघ निर्णय छल जे बीएड कयलहुँ अछि।
बीएड सफलतापूर्वक पूरा केलाक बाद हिंदी एम ए केर लेल जेएनयू मे एंट्रेस देलहुँ, परञ्च जेएनयू हमरा अवसर नहि देलक। फेर जामिया मे हिंदी एम ए केँ एंट्रेंस क्लीयर कsके पढ़ाई कंटिन्यू केलहुँ अछि। एम ए हिंदी मे केलाक दरमियान हिंदी सँ नीक जकाँ रू-ब-रू भेलहुँ अछि। उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, रिपोर्ताज, डायरी लेखन, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, काव्य, आलोचना वगैरह विधा सँ रू-ब-रू भेलहुँ अछि।
जेएनयू मार्क्सवादी विचारधारा केँ प्रश्रय दैत छै। हमर लेखन केर कला मे मार्क्सवाद नहि आबि सकलै । एम ए हिंदी सँ पूरा केलाक बाद एमफिल लेल जेएनयू, डीयू आओर जामिया केँ एंट्रेंस देलहुँ , परञ्च अइ बेर जेएनयू, डीयू केर एंट्रेंस क्लीयर नहि भेल। जामिया केर एंट्रेंस सेहो क्लीयर नहि भेल । फेर 2014 मे एमफिल लेल जेएनयू , जामिया आओर डीयू मे परयास केलहुँ मुदा एमफिल केँँ लेल जामियाक एंट्रेंस क्लीयर भेल। एमफिल सिनॉप्सिसक टॉपिक जामिया मे इंटरव्यू टीम केँ नीक नहि लगलन्हि आओर हमरा एमफिल करवा सँ रोकलथि।
01.09.2013
प्राइवेट स्कूल : बिजनेसक अड्डा
बड़ि नीक गप छियैय जे 'आरव' सैॅटजैवियर कंवे॔ट स्कूल में पढ़ रहल छथि। हुनकर मायक इच्छा पूरा भs रहल छन्हि। परञ्च अइ स्कूल केर मास्टर साहब बदलैत रहैत छथिन्ह। पातर किताबक दाम देखि कs आँखि चौंधिया जायत। खुलम- खुला लूटि रहल छै प्राइवेट स्कूल। पढ़ाई केर नाम पर अंगूठा। ठगवाक लेल डायरी मैंटन चिक्कन-चुनमुन रहैत छै। सभ क्लास मे पढ़ाई भेल वा नहि परञ्च डायरी मे ' होमवर्क ' लिखल रहित छै। बिजनेसक पूरा तामझाम। कहियो-कहियो टीचर केर अभाव मे को-करिकुलर एक्टिविटी बेसी होयत छै प्राइवेट स्कूल मे - 'सर्वांगीण विकास'। 'अवरऑल डेवलपमेंट' - सभ तरहें विकास। खून चुसि कs सभ तरहें विकास कोना भ' सकैत अछि।
शिक्षा आब सस्ता नहि रहि गेलै। गरीब आदमी केर कतौह जगह नहि छै। मजदूरक संतान मजदूरी कके मरि जेताह एकर पैघ षड़यंत्र भ चुकल अछि। समाजवाद केर नाम पर पूँजीवाद केँ ताजपोश भ रहल अछि। समाजवादक नाम पर नौटंकी केनिहार सभ कौवा जँका टुकुर-टुकुर ताकि रहल छथि। सभतरि लूटि मचल छै। के कतेक लूटि सकैए। ओ अतेक नीक कमौवा कहल जा रहल अछि। औखन लूटनै सभ सँ पैघ कलाकारी बनि चुकल छै।
विद्यार्थी मशीन बनि रहल अछि। रिमोट दबाउ सभ किछु हाजिर। जतेक टाका खरच करबै ओतबे सेवा देत। टाटा लुटाउ तमाशा देखु। मशीन बनलाक बाद कतेक विद्यार्थी मशीनगन बनि रहल अछि। 'संवेदना' मरि रहल छै। 'संस्कार' मरि रहल छै। ओ विद्यार्थी किनको मोजरे नहि दैत छथिन्ह । मशीन बनवा सँ रोकवा लेल कोनहु बेवस्था करs पड़तै।
मशीन बनलाक बाद सभ कियो माय-बापक लार-दुलार भुला रहल छथि। अइ सँ यदि नहि बचाउल गेलै तँ सरकार केँ सभ सँ पैघ खरच 'वृद्धा-आश्रम' पर करs पड़तन्हि। शहर सँ बेसी गाम मे वृद्धा-आश्रम खोलs पड़तन्हि। आब उलटबाँसी सभ कियो गौताह - पढ़ल-लिखल केँ लाठी बच्चे कपाड़। गाम मे नान्हिटा धियापुता सभ बंदूक-बंदूक खेलाति रहैत अछि।
(डायरी केर शेष अंश अगिला खेप मे)
लेखक :- संतोष कुमार राय 'बटोही'- ग्राम : मंगरौना पाठक केर सुविधा हेतु संतोष कुमार राय 'बटोही'क विदेहमे अखन धरि ई-प्रकाशित डायरी नीचाँ देल जा रहल अछि।- सम्पादक संतोष कुमार राय 'बटोही' केर (डायरी) 'लव यू टू' 24.04.2007 लाइफ मीन्स परेम आइ हम जामिया मे बैसल इ सोचि रहल छी जे लल्ली केँ हम नहि बुझि पउलियै। ओ शकूरपुर छोड़ि कs किछु नहि जनैत अछि। दुनिया कतs सँ कतs चैल गेलैक अछि, परञ्च ओ अखनो धरि गाम मे डूबल छथि। पहिल परेम ठीके मे लोक नहि भूलि सकैए। पहिल परेम 'ठुमरी' छियैए। जिनगी केँ तमाशा बनौल जाएत छै। इस्कूल मे पढ़ैत ओ सीखलीहि जे हम ओकर पहिल परेम छियैए। ओना तs इ समाजक लेल हजम करनै इजी नहि छै कि किताब मे पढ़ौल चीज प्रैक्टिकल हेवाक चाही। सभ धर्म मे कहल गेल छै कि परेम सभ सँ ऊपर होएत छै, परञ्च इ दैहिक नीक नहि होएत छै। हम तs टुटि गेल रही। लल्ली के पढ़बैत हम ओकरा लेल अपन दिल कहिया हारि गेलहुँ से हमरा नहि बुझल अछि। दिल्ली केँ सरदी मे कुक्कुर जँका कुकुआइत रहि हम । दुनिया मे भरम छै -" माला फेरत जग मुआ.....।" दैहिक परेम करनै मतलब तलवार केँ धार पर चलनै बुझू। रसखान अपन रचना 'प्रेम वाटिका' मे परेम के लेल बड़ि रास लिखलकिन्हैं - "प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोय। जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोय।" 25.07.2007 एकटा अनार सौ लोकनि बेमार नीक लड़की देखला सँ सभ कियो केँ आँखि हुनके पर टिकल रहैत छन्हि। जखन ओ गली सँ निकैल कs इस्कूल दिस जाएत छलीह तँ कनहा-कोतरा सभ केँ आँखि चौंधिया जाएत छलैह। सभ लफंगा इस्कूल धरि हुनकर पाँछा जाएत छल। इस्कूल केँ छुट्टी केँ समय ठीक दू बजे लफंगा सभ इस्कूल केँ गेट पर आँखि टिकौने रहैत छलाह। इ दैहिक खिंचाव छेलैक। लल्ली इ दृश्य देखि कs फिरिशान छलीह। जेकरा परेमक अ आ नहि बुझल सेहो हुनका पीछा करैत छलन्हि। इस्कूल मे आइ फंक्शन छेलैक - 'गीत-नादक आओर नृत्यक'। सभ लड़की घरे सँ सजि-धजि कs गेल छलीह। लल्ली आइ नृत्य लेल अपन तैयारी केने छलीह। ओ ततेक बढ़िया नचलीहि जे मैडम हुनका पहिल स्थान देवाक लेल कनिको पाँछा नहि भेलीह। इस्कूल सँ अबितँहें मातर ओ हमरा फोन केलीह - "आज हमारा प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा। मुझे नृत्य में प्रथम स्थान मिला है। आप बधाई नहीं दोगो ?" हम बड़ि खुश भेलहुँ अछि। लल्ली हमर जान छलीह। हम हुनका फोने पर कहलियैन्ह - " मैं तुमसे मिलकर बधाई देना चाहता हूँ। तुम कब मिलोगी ?" " अच्छा ठीक है, अभी मम्मी नीचे आ गयी है। मैं फोन रखती हूँ। आपसे बाद में बात करूंगी,तब बताऊंगी। बाय... आई लव यू।" "लव यू टू "- मे हम जवाब देलियैन्ह। 14.02.2008 वेलेंटाइन द ग्रेट पार्क में हम बैठल छी। इ खिज़राबाद केँँ अशोका पार्क छियैय। लायंस हॉस्पीटल केँँ बगल वाला पार्क।हमरा नहि बुझल छल जे 'वेलेंटाइन डे' सेहो किछु छियैय। रोज डे, टैडी डे, चॉकलेट डे ....हग डे, प्रॉमिस डे वगैरह किछु छियैय की ? गाम सँ दिल्ली सन शहर मे आयल हम गोबरे छलहुँ। की परेम मनावै लेल स्पेशल दिवस सेहो होएत छै ? हम खुद सँ प्रश्न केलहुँ अछि। मिथिला मे मधु श्रावणी परब तँ होएत छै। परञ्च देशक राजधानी मे इ नवका शब्द हमरा लेल बड़ि राशि रोमांचक छल। जामिया केँ कैंपस मे प्रेमी युगल केँ देखि कs हमरो मोन भयल जे हमहुँ अइ शब्द के भजा कs देखियै। परेम करवाक लेल दू आदमी चाही। परेम लौकिक आओर पारलौकिक होएत छै। भगवान सँ परेम हमरा एहेन नास्तिक तs नहि कs सकैत अछि। ओहनायोंं भगवान सs परेम दिव्य लोकनि करैत छथि। कालिका मंदिर मे उमड़ल लोकनि तकर आँखिक देखल हाल कहि सकैत अछि। हम तs नरक वाला परेम के लेल बौरायल छी। हम लैला-मजनू जँका परेम नहि कs सकैत छी। 'परेम न बारी उपजै , परेम न हाट बिकाय....।' परेम केर बिना दुनिया शून्य अछि। मधु श्रावणी मे परेम केर परीक्षा होएत छै। मिसरामी टेमी सँ हाथ केँ दागल जाएत छै। हम बैसल छी। आकाश दिस ताकि रहल छी। आकाश मे मेघ केँ रूइया जँका रूप देखि रहल छी। लल्ली केँ मुँह सन मेघ ; भागि रहल अछि मेघ ; फागुनक हवा अगिया बेताल भेल छै। 'हवा हूँ हवा हूँ बसंती हवा हूँ' केर गीत गबैत सरसरैत पछुआ हवा। लल्लीक परेम दैहिक नहि छल। नैसर्गिक चोरनुकबा परेम जाहि मे परेमी बगुला बनल रहति छथि। फोनक रिंग टोन बाजल 'ओ लम्हे....' । हम हबड़हबड़ फोन रिसीव केलहुँ। 'हलो..लो...' । इ मिठगर बोली केँ सुनि कs हमर करेज फाटि गेल। हमर फुरा गेल 'अहाँ बिनु सजनी...'। " कैसे हो आप ?" हम अइ प्रश्न केँ सुनि कs तमतमा गेलहुँ , परञ्च दिल पर बंदूक तानि कs आहिस्ता सँ कहलियै , " मैं ठीक हूँ।" मोन तs अपन कब्जा मे छल नहि। आओर की कहियै! इ 'वेलेंटाइन डे' बनेनिहार बुरिबक छलाह। भरि साल चोरनुकबा परेमक गेम खेलाउ आओर माघक जाड़ मे हगलाहा, पदलाहा 'हग डे' , 'किस डे' मनाउ।मिथिला केँ लोक इ नहि मनाउत। लल्ली हमरा सँ लगभग छह महीना बाद गप्प केलीह अछि। कोन इ बेमारी छियैय से हमरा नहि बुझल। वेलेंटाइन कहियो 'वेलेंटाइन द ग्रेट' नहि भs सकैत अछि। 20.03.2008 लव लेटर टू गॉड लल्ली आइ विहंसर मे चाह मे नून डालि देलकै। हुनकर पापा कहलथिन्ह, " बेटा तबीयत ठीक है, न ?" एतेक कहि कs ओ नांगलोई ड्यूटी निकैल गेलथिन्ह । लल्ली अवाक् रहि गेल छलीह। पापा ड्यूटी सँ साँझ मे एलाह तँ लल्ली केँ माए हुनका सँ पूछलथिहीन, "विहंसर मे की भेल छल ?" मूच्छर के हँसि-हँसि कs हालत खराब भs गेलैन्ह। ओ लाहालोट होएत बजलाह अछि , " चाह मे चीनी नहि, नून देने छलीह लल्ली।" काल्हि जखन साँझ मे हम लल्ली केँ फोन रिसीव नहि केलियैन्ह। तखने सँ हुनकर मोन मनुहैल छेलैन्ह।हुनकर ध्यान हमरे दिस छेलैक। इ 'ओ' परेमिका छलीह ! काल्हि सँ कोनहुँ काज मे हुनका मोन नहि लगैत छलैन्ह। ओ आइ हमरा चारि पेजक लिखल किछु कागज पकड़ा देलाथि। हम काँपति ओकरा पेंटक जेबी मे ठुसि देलियै। जखन जे ब्लॉक जाकs ओकरा पढ़ि लेल बैसलहुँ तँ ओइ मे महीन महीन भूकभूकैत आखर मे 'हीर-राँझा' लिखल छलैह । तखन तँ हम नहि बुझलियै, परञ्च अगिला दिन लल्ली फोन केलीह , "हलो ! क्या हुआ ? आप ठीक हैं, न ?" "हम अकवका के कहलियैन्ह ," क्या ठीक रहूंगा ? अब तो रोग लग गया है।" इ चिट्ठी छेलैक जकरा आजन्म हम नहि भूलि सकैत छी। लेटर हमरा लेल लिखल छलैह, परञ्च पता मे 'लव लेटर टू गॉड' लिखल छेलैह। 07.04. 2008 लाठी बीचे कपाड़ आइ लल्ली केँ पढ़ा कs हम निकलि गेलहुँ अछि। गलती हमर इ छल जे हम हुनका प्रति मोहित भs कs 'किस' कs लेललियैन्ह। इ गुनाह महग पड़ल। लल्ली अपन माए केँ इ गप्प कहि देलथिन्ह। बस आब की भेलैह - बेल्ट सँ पीटल गेलहुँ। हुनकर माए करौछ सँ पजरा मे मारलीहि। इ छियैय परेमक फल। परेमक नशा उतरि गेल। परेम मे धोखा मिलल। लल्ली अइ 'किस' केँ हवस केँ संज्ञा देलथिन्ह। ओ लव लेटर आओर ओही मे लिखल 'लैला - मजनू' केँ मतलब हम आइ धरि नहि बुझलियै। मारि खेलाक बाद हम अइ लव स्टोरी केँ अंत बुझि रहल छी। 27.09.2008 अमृता चुलबुली संजय , अमृता, खुशबू सक्सेना आओर हम गालिब पार्क जामिया मे बैठल छी। विषय किछु नहि छै। 'टाइम पास' कs रहल छी। दिल हमर टुटि गेल अछि। हम पहिल परेम केँ भुलि नहि सकैत छियैय, परञ्च एकरा यादो रखनै उचित नहि लगैत अछि। एक सप्ताह सँ नीक जँका भोजन नहि केलहुँ अछि। परेम मे धोखा खायल इंसान छी हम। आब हमर हिम्मत नहि अछि जे किनको सँ परेम करबैन्ह। इ छथि हमर क्लासमेट अमृता। हिनका दिस झुकाव तँ हमरो छल, परञ्च संजय हुनका पसंद करैत छलाह। हमरा हुनकर चुलबुलापन नीक लगैत छल। 03.02.2009 आई एम सॉरी...आई एम सॉरी राति केँ साढ़े आठ बाजि रहल छै। हम जे ब्लॉक मे छत पर ओछान कs केँँ सुतै लेल प्रयासरत छलहुँ। बगल मे एकटा ड्रायवर छथि। हम दुनू गोटे नेपाल मे माओवादी विषय पर विचार कs रहल छी। माओवादी नेपालक लेल नीक छियैय वा नहि ओ तs भविष्य तय करतै। ओही बीच हमर फोनक रिंग टोन बाजल। हम फोन उठौलहुँ । ओनs सँ आवाज़ आयल, - " आई एम सॉरी... आई एम सॉरी." कनेक देर हम विस्मित भेलहुँ। ओ फेर बजलीहि, " हमे माफ नहि करोगे।" हम बुझैत छेलियै- हमर परेम सच्चा परेम छल। हम जवाब देलियैन्ह, - "इट्स ओके। हमने कब का तुम्हें माफ कर दिया है।" ओनs सँ ओ फोन काटि देलीह। 25.07.2010 सेकेण्ड डिविजन आइ बीए के फैनल रिजल्ट निकललैए। चारिटा विद्यार्थी पास भेल छै। हमर तेसर नंबर अछि -'सेकेण्ड डिविजन 50.5℅' । अइ रिजल्टक पाँछाक कारण छल - पहिल गरीबी, दोसर परिवारक उच्च शिक्षाक बैकग्राउंड नहि, तेसर नमहर परिवार, चारिम परिवारक कलह, पाँचम समाजक गिरल मानसिकता आओर अंतिम लल्ली संग परेम आओर धोखा। राति केँँ नौकरी आओर दिन केँ जामिया। असंतुलित जिनगी अछि हमर। पढ़ि कs किछु नीक करी से विचार अछि। जेएनयू केँ एंट्रेंस कतेक बेर देलियै, परञ्च हम गांधीवादी लोक आओर ओ मार्क्सवादी विचारधाराक संस्थान, तैं एंट्रैंस क्लीयर नहि भेल। जामिया मे बीएड मे दाखिला लेलहुँ अछि। 12.12.2010 दरियागंज बाया जामा-मस्जिद, दिल्ली आइ 'पहिल लेसन प्लान' नवाब पटौदी मध्य विद्यालय , दरियागंज मे डिलिवर केलहुँ अछि। हमरा हेड बना कs जामिया अइ इस्कूल भेजने अछि। हेड केँ कुर्सी केँ सम्मान दैत हम 'लेसन प्लान' डिलिवर कs रहल छी। आइ अली मुहम्मद सर हिंदी केँ क्लास मे हमरा सुपरवाइज केलाथि। इ पच्चीस नंबर केँ लेसन प्लान छल। ओ कतेक नंबर देलथिन्ह हमरा नहि पता। त्रिवेणी एकटा दृष्टि बाधित विकलांग छेलाथि। हुनकर जिनगी केँ गाड़ी अली मुहम्मद सर पटरी पर सँ उतारि देलथिन्ह। हम सभ कतेक प्रयास केलियैन्ह जे ओ लेसन प्लान डिलिवर कs सकैत, परञ्च अली मुहम्मद सर सँ ओ ततेक ने डरा गेलाह जे ओ जामिया छोड़ि देलथिन्ह। इ छियैय लोकतांत्रिक देश मे निसाफ। 04.06.2011 नो डिक्टेटरशिप विदेशक बैंक मे ब्लैकमनी केँ जमा केनिहार आओर सरकार केँ आँखि खोलै लेल पूरा देश केँ यात्रा करैत एवं जनसमर्थन जुटबैत योग गुरु स्वामी रामदेव बाबा रामलीला मैदान, दिल्ली मे अन्नशन शुरू केलाथि। इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर हुनका मनमोहन सरकार केँ पैघ मंत्री प्रणव मुखर्जी, पी चिदंबरम आओर कपिल सिब्बल अन्नशन नहि करै लेल मनवै केँ प्रयास केलथिन्ह। परञ्च बाबा रामदेव आइ अन्नशन पर बैठ गेलाह। कानून मंत्री कपिल सिब्बल बाबा रामदेव केँ सहयोगी बालकृष्ण केँ दस्तखत केलहा एकटा चिट्टी मीडिया केँ देखौलकीहिन जाहि मे एक दिन योग लेल परमिशन भेटल छेलैन्ह। राति मे करीब बारह बजे गृह मंत्री केँ आदेश सँ आइ पुलिस केँ लाठी चार्ज होम लगलै। पुलिस केँँ लाठी सँ अपनाआप केँ बचेवाक लेल ओ मंच पर सँ नीचा कुदलाहा। दोसर दिन उत्तराखण्ड मे सलवार-सूट मे मीडिया केँ समक्ष देखेलाहा। बाबा रामदेव के भक्त राजबाला बाबा केँ बचेवाक क्रम मे घायल भेलीह आओर अपन प्राण त्याग देलथिन्ह। वतन केँ टाका दोसर देश मे नुकौल गेल उचित नहि छियैय। कियो अइ लेल बाजैत छथि, तँ अहाँ लाठी मारबै से लोकतंत्र छियैय डिक्टेटरशिप नहि। हिटलरशाही नहि चलतन्हि अइ देश मे। 31.08.2011 मैं अन्ना हूँ इ रामलीला केर मैदान छियैए। नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन, दरियागंज, दिल्ली गेट वगैरह नजदीके मे छै।कमला मार्किट केँ ठीक बगल मे इ मैदान छै। दशहरा मे रामलीला केँ मंचनक लेल इ मैदान जानल जाएत छै, परञ्च राजनीतिक पार्टी अपन रैली लेल अतs अबैत छथि। 16 अगस्त केँ दिल्ली पुलिस केँ स्पेशल सेल मयूर विहार सँ अन्ना हजारे, मनीष सिसोदिया, अरविन्द केजरीवाल केँ विहंसरे गिरफ्तार कs तिहाड़ जेल भेज देलथिहीन। जनलोकपाल आओर भ्रष्टाचार केँ खिलाफ़ इ आंदोलन केँ समर्थन पूरा देश सँ मिललन्हि। हम 19 अगस्त केँ 'मैं अन्ना हूँ' वाला टोपी पहिर कs रामलीला मैदान पहुँच गेलहुँ। इ आंदोलन सड़क सँ शुरू भेल छै। पूरा देश मे जनता सड़क पर छै। गरीब-गुरबा, मजदूर, सिनेस्टार सभ कियो अइ आंदोलन केँ समर्थन देलथिन्ह। पहिल मउगी आईपीएस किरण वेदी मंच सँ तिरंगा झंडा फहरबैत छलीह। 05.10.2011 मुसलमान बनि गेलहुँ अछि मुसलमान हेनै नीक गप्प छियैए या नहि से हमरा नहि बुझल अछि। परञ्च जहिया सँ जामिया मे दाखिला लेलहुँ तहिया सँ किछु लोकनि हमरा मुसलमान कहs लगलाथि। इ कोन मानसिकता छियैए ? हिन्दुस्तान मे अइ सोच केँ ढेर रास लोक छथि। किछु लोकनि हमर मजाक उड़ाबैत छथि - " देखियौ, संतोष मुसलमान भs गेलाह।" जामिया मे दाखिला लेलाक बाद किछु ओछी मानसिकताक लोकनि 'अस्सलाम वलैकुम' कहि कs हमरा फिरिशान करैत छथि। हम जामिया सँ हिंदी ऑनर्स , बी०एड० कs रहल छी। कोनहुँ धरम आओर विरादरी केँ लेल हमरा मोन मे खोंट कहियो नहि रहल। हमर बाबूजी केँ ढोलकिया मुसलमान छलथिन्ह। मंगरौना मे सब्जी वाली काकी मुसलमान छथिन्ह।मुहर्रम केँ समय हमर माए झरनी पर गावै वाला गीत गावैत छथिन्ह। दरिभंगा मे सी एम साइंस कॉलेज मे बड़ि रास सहपाठी मुसलमान छलथिन्ह। हमरा मोन मे किनको लेल कहियो पाप जनम नहि लेलक। जामिया सँ हम नीक संस्कार लेलहुँ अछि। अबै वाला समय डिसाइड करतै कि हम कोना मुसलमान बनि गेलहुँ अछि। 27.12.2011 अपवित्र आख्यान बाया राजघाट लल्ली आइ राजघाट पर आयल छलीह। हिनका नॉर्थ कैम्पस, डीयू बस स्टैण्ड सँ रिसीव केलियैन्ह। बस सँ उतैर कs ओ हमरा दिस अइलीह। हम दोसर बस एला पर ओही बस मे चढ़ि गेलहुँ अछि। ओहो ओई बस मे चैढ़ गेलीह। राजघाट बस स्टैण्ड पर हम दुनु गोटे उतैर गेलहुँ। राजघाट बड़ि नीक सँ सजौल गेल छै। गांधीजी केँ समाधि पर 'हे राम' लिखल छै। नाथुराम गोडसे जखन गांधी जी केँ गोली मारलखिहीन , तँ हुनका मुख सँ निकलल अंतिम वाक्यांश छलैह ' हे राम'। इ गांधीवाद केँ मूलमंत्र 'रामराज्य' केँ परिकल्पना थिकैक। लल्ली एकटा नीक जगह देखि कs बैस गेलीह। अपन बैग मे सँ 'कुछ मीठा हो जाय' के मूड मे 'मदर डेयरी' केँ चौकलेट निकैल कs हमरा दिस बढौलाथि - 'लीजिए'। इ प्रेमिका केँ तरफ सँ प्रेमी केँ मुँह मिठाई करेवाक रिवाज़ छल। हम गदगद मोन सँ हुनकर गिफ्ट केँ स्वीकार केलियैन्ह। ओ कनखी आँखि सँ हमरा देखलीह। अपन बड़ि रास खिस्सा हमरा सुनौलीह। किछु परेमक छल , किछु परिवारक आओर किछु समाजक आओर देशक। 02.01.2012 आँखिक नोर आइ हम मसुएल छी। मोन होएत अछि फोंफकारि मारि कs कानी । ओ राजघाट पर आयल त छलीह, परञ्च हमरा करेजा मे सूईआ भोंकि कs चलि गेलीह अछि। हम खानपुर केँ अइ मरल बिल्डिंग मे पड़ल टेंसन मे छी। जिनगी बड़ि परीक्षा लैत छै। एकटा तँ गरीबी सँ मारल छी, दोसर प्रेमिका केँ कछुआ स्वाभाव सँ फिरिशान छी हम। लल्ली केहने प्रेमिका छलीह !! तीन-चारि महीना कोनो अता-पता नहि। नहि फोन-फान, नहि लेटर ! प्रेमी के धीरज केँ परीक्षा छल ई वा प्रेमी केँ कुहरा-कुहरा केँ मारबाक उपाय। मारबाक मीठगर हथियार ! हम अबोध बालक जँका 'वेट एंड वाच' केँ मुद्रा मे बिछान पर ओंघरयाह मारि रहल छी। ओनs लल्ली दूध-भात खैत छथि। ई छियैए ' लैला-मंजनू' के धोबिया घाट । प्रेमी कपड़ा जँका धोएत अछि प्रेमिका जूनक रौद मे प्रेमक अँचार केँ सूखाबैत अछि। आब धीरज टुटि गेल हमर। हमर करेज जलि रहल अछि। माथा फाटि रहल अछि हमर । लागि रहल अछि आब हम नहि छी। तीन दिन सँ देह तापि रहल अछि। जामिया केँ क्लास मिस भs रहल अछि। हे देव ! ई की भs रहल अछि। आँखि डबडबा गेल अछि। नोर बहि रहल अछि। आँखिक नोर मोती जँका ढरैक रहल अछि। 15.01.2012 बेदरदी बालम आइ दिव्या केँ रोहिणी अम्बेडकर हॉस्पीटल मे जनम भेलैन्ह। ई ब्लॉक के दोसर फ्लोर पर हम रूम मे लेटल छी । सोचि रहल छी - अइ जिनगी केर की हेतै ? कोनहुँ रस्ता नहि सुझा रहल अछि आब। एम ए मे दाखिला लs लेलहुँ अछि हम। लल्ली हंसराज मे पढ़ैत छथि। दिव्या केँ आइ छठियार छियैन्ह। आइ ई ब्लॉक केँ अइ बिल्डिंग मे लघु पार्टी भs रहल छै। लल्ली सेहो आयल छथि। हमरा सँ करीब पाँच महीना सँ हुनका गप्प नहि होएत छन्हि। ओ पार्टी सँ चलि गेलीह । हम छत पर बिछान केने छी। लेटल छी। चिंता मे छी कि हमरा परेम करकs चाही वा नहि। ई संशय बनि गेल अछि। परेम मे संशय पैघ दरार कहल जा सकैए। हमरा ब्रह्म फाँस लागल अछि। ओनs लल्ली केँ किछु तकर फर्क नहि पड़ैत छन्हि। बड़ि भs गेलै इम्तिहान परेमक । हे देव ! आब कतेक सतेबहक अइ गरीब के ? हम शक्तिविहीन भs चुकल छी। ' प्यार क्या तो डरना क्या' इ सिर्फ मुहावरा छियैए आओर किछु नहि। बालम केँ विरह मे हम पगलैल छी। नागमती हम भेल छी। जायसी तँ हम छी नहि जे बारहमासा लिखs कs नागमती के विरह केँ संग अपन विरह केँ अमर बना ली। हे देव ! बेदरदी हमर बालम । कोन गली नुकायब हम ? कोन जादू- टोना करब हम ? कोना रहब आब हम ? के डायन हमर बालम केँ हमरा सँ दूर केलक ? दरद...महादरद !! 27.02.2012 हवस : मुरदा परेम इ हम की केलियै ? किछु नहि बुझलियै हम। परेम माने कबीर साहबक परेम - 'निराकार' । रूपहीन, गंधहीन परेम ! हवा माफिक परेम ! अइ परेम मे जिस्म केर किछु दालि नहि गलतन्हि। विशुद्ध आत्मा-परमात्मा वाला परेम ! परञ्च मनुख आओर मनुख केर बीच परेम तँ जिस्मानी होएत छै ; जाहि मे देह मिलन केर उल्लेख भेल छै। इ ' लौकिक' परेम छियैय । लल्ली हमर परेम केँ ' हवस' केर संज्ञा देलक। ओ कहलीह -" आप पागल हो। "हम सरिपहुँ पागल छलहुँ ओकरा परेम मे। उ परेम 'पारलौकिक छेलैक आ कि जिस्मानी ' से इतिहास आओर समय पर छोड़ि दैत छियैय। अगर मनुख-मनुख के बीच अथवा नर- मादा केर बीच जिस्मानी परेम छै, तँ ओ गलत नहि छै। जिस्मानी परेम मे दैहिक आगि केँ बुझौनै गलत नहि छै। हवस ओ शब्द थिक जाहि मे बलजोरी जिस्मानी मेल होइए। सहमति माने आँखि केर इशारा एवं मोनक नि:शब्द सहमति ' लौकिक' परेम छियैय, 'हवस' नहि। लल्ली हमरा पर हवस केँ आरोप लगौलीह। राति मे मैसेज मे ओ ' हवस' केँ आरोप लगौलीह। हम बड़ि निराश भेलहुँ अछि। मोन दुखि भयल। इ हम की कs देलियै। बड़ि पैघ पाप हमरा सँ भs गेल मने। परञ्च लल्ली हमरा बीच तँ जिस्मानी मेल नहि भेल छल। हम लल्ली केँ ' किस' टा केने रहियै। तँ की लल्ली ओकरे 'हवस' कहि रहल अछि आओर हमरा पर मिथ्या आरोप। हमरा झूठमूठ केँ हवसी बना रहल अछि। हम अपना केँ पापी मानि कs 'फाँसी' पर चढ़वा लेल तैयार छी ,अगर अपन प्रेमिका केँ ' किस' करनै माने हवस होएत छै तँ ? हम कखनहुँ इ पक्ष मे नहि छलहुँ जे लल्ली केँ देह सँ हमरा खेलवाक अछि, ओकरा अपवित्र करवाक अछि। ओकरा मोनक अपमान करवाक अछि। ओकरा कोनहुँ फिरिशान करवाक अछि। हमर परेम विशुद्ध पवित्र छल। कोनहुँ दैहिक संसर्ग नहि। ' किस' नमस्ते- सलाम केर एकटा भाषा छियैय जे भारतीय आओर मैथिल लोकनि केँ बुझवा मे अखनो धरि टाईम लगतैन्ह। लल्ली बाद मे बुझि जेतीह जे हवस किछु आओर होएत छै। ओ मुरदा होएत छै। हवसी मृत लोकनि छथि - ' संवेदनहीन' मनुखक देह मे मालजाल छथि ओ हवसी लोकनि। 23.04.2012 लल्ली माई हर्ट हम ओकरा नहि भूलि सकैत छियैय।ओ हमर सभ किछु छथि। माँ केँ समान्तर तँ कियो नहि छथि अइ दुनिया मे हमर, परञ्च माँ केँ बाद ओकर जगह हमर दिल मे जरूर बनि गेल छै। ओ हमरा लेल फिरिशान छथि, तँ हम ओकरा लेल फिरिशान छी। इ कुन रोग छियैय जकर इलाज बाहर नहि छै। ओकर इलाज अंदर छै। मिलन ओकर इलाज छियैय माने। विछोह ओकर बेमारी। सचहों कतौ नरक होएत छै। राजघाट हमरो जिनगी में इतिहास भs गेल अछि। हमर दुनिया सँ खुशी ओही दिन बिला गेल जहिया ओ कहलीहि - " अब कभी नहीं मिलूंगी ।" राति मे ओकर मैसेज हमरा वेदना केर सागर मे डूबा देलक। हमर विहंसर ओकरा कॉल केलियै, परञ्च ओ कॉल रिसीव नहि केलीह। ओकरा हमर कोनहुँ परवाह नहि छै। हम मरि या जीवि से हम बुझियौ। अतेक कठोर !! महा-कठोर ! ओ हमरा लिखलीहि - " Take care of yourself ." ओ हमरा सँ परेम करैत छलीह ; हमरा सभ किछु मानैत छलीह । आजु ओ रूसि गेल छथि। ओ आब हमरा सँ गप्प नहि करतीह। भs सकैत अछि ओकर नवका दुनिया मे हमर कोनहुँ जगह नहि छै। ओकर अइ दुनिया मे सभ कियो हेताह- हेतीह, परञ्च हम ओकर आब नहि होएब किछु। ओ बनावटी दुनिया हेतै जाहि मे ओ जीबै केर नाटक करतीह। ओ सभहक सोझा मे हँसवाक अभिनय करतीह। ओ हँसनाई कृत्रिम हेतै। असली खुशी ओही मे नहि होएतै।पति तँ ओकरा भेटतै ,परञ्च प्यार नहि। सिन्नूर केँ कारण हक तँ मिलतै, परञ्च परेमक एहसास नहि। इ जिनगी दोजख सन होएतै। समय बलवान होएत छै। समय ओकरा ' सच ' बतौतै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- बुलन्दी जगदीश प्रसाद मण्डल
बुलन्दी जहिना दिन-राति संग मिलि बारहो घन्टा संग रहि चौबीसो घन्टाक बारहो मौसमक बीच बसन्त गीत गबैत अछि तहिना अस्सी बर्खक रूपचन काका रूपौली गाममे, जे मध्य मिथिलाक बीचक गाम छी दिन-रातिक समय बितबै छैथ। बाढ़ि-रौदी, सुखार-दुखार आइये नहि, सभ दिनसँ अजन्मा सन आने गाम जकाँ रूपौलीमे सेहो रहबे कएल अछि। भुमकम, ठनका ई तँ कहियोकाल होइए, तँए बिसरबो नीक नहियेँ हएत मुदा अनिवार्य रूपमे नहियोँ मानल जा सकैए। 1934 इस्वीक जनवरी मासक तिलासकराँइतसँ एक दिन पूर्व, ओइ समयमे तँ भुमकमक नाप-नूप नहि छल, मुदा नोकसानक पैमाना तँ कएले जा सकैए। नेपालक काठमाण्डू, जे पहाड़क ऊपर बसल शहर छी, तेकरो छाती हिलेबे नइ तोड़बो केलक। तैसंग नेपालक तराईसँ लऽ कऽ बिहारक मुंगेर जिला तकक धरतीकेँ सेहो तेना हिलेलक जे घर-दुआर, गाछ-बिरीछ, जीव-जन्तु सभक अवघात भेल। ओहिना दोसर बेर भुमकम भेल 1988 इस्वीमे। ताधैर भुमकमक नाप-जोख आबि गेल छल। मुदा जहिना चौंतीस इस्वीक भुमकम तहिना अट्ठासी इस्वीक भुमकम जँ मानि लइ छी तँ औसतन पचास बर्खपर ओहन भुमकम हएब मानि लिअ। से मानि लिअ बितलाहा, माने भेलहामे, ऐगलाक कोनो गारंटी बेपारीक खलिया डिब्बा जकाँ नहियेँ देल जा सकैए। ई तँ भेल एक नम्बर भुमकक, तइसँ निच्चाँ नअ नम्बरक संख्या अछि। एक नम्बरसँ दोसर नम्बरक आक्रमण तीस हजार गुनाक अछि। खाएर, ओना ई भेल अपना ऐठामक भुमकमक घटना। एहेन-एहेन आफद-आसमानीकेँ मैथिल आ मैथिलानी मोजर कहिया देलैन जे अखनो देता कि देती। अपना गतिये जहिना प्रकृति चलैए तहिना रूपौली गामो चलैए आ रूपौली गामक रूपचन काका सेहो चलिते छैथ। बाढ़िक इलाका छीहे। कहब जे धारे-धार बाढ़ि अबैए आ चलि जाइए से नहि, मिथिलांचलकेँ पहियाकऽ उत्तरसँ शुरू करैए आ दच्छिनमे गंगामे जा ठेका दइए। वएह गंगा ने जीवनक वैतरणी सेहो पार करै छैथ। बुझले बात अछि जे सतासीक बाढ़िमे गंगासँ उत्तर झंझारपुर तकक पानिक एक लेभेल भऽ गेल रहइ। माने एकरंग जलो-दीप छल। ई तँ भेल बाढ़िक गति, मुदा तैसंग झाँट-बिहाड़ि सेहो अछिए। मौसमक हिसाबसँ भरि गरमी माने मार्चसँ नवम्बर तक दू रूपमे झाँट-बिहाड़ि अबैए। सुखारक समयमे सेहो आ बरसातक समयमे सेहो अबिते अछि। अप्पन रूपक ठेकान एकरो ने अछि, माने केते विराट रूपमे औत आकि साधारण रूपमे। तँए कहब जे मैथिल ऐ सभसँ डेरा जेता से बात नहि अछि। मिथिला-भूमि अखनो वएह भूमि अछि जे परिवार नियोजन सन सरकारक योजनाकेँ कोनो मोजरे ने दइए, आ अप्पन जनसंख्याक बढ़वारिकेँ बे-लगाम घोड़ा जकाँ छोड़ि देने अछि। एकर माने ई नइ बुझब जे मिथिलांचल मनुक्खेक उपजा टाक भूमि छी। मिथिलाक भूमि जीवनक विचारक संग जीवन-निर्माणक भूमि सेहो छीहे। बुझल बात अछिए जे जेते मन बढ़त तेते ओझरी जिनगीमे सेहो बढ़बे करत। खाएर जे अछि, अपना ऐठाम झाँट-बिहाड़ि मात्र समुद्रेटा सँ नहि, धरतीसँ सेहो पैदा लइए। चैत-बैशाखक सूर्जक तापसँ तपित भऽ धरती बिर्ड़ो-बिहाड़िक सृजन सेहो करैए। जेकर फलाफल मिथिलांचलकेँ ई भेटैत रहल जे गामक-गाम चैत-बैशाख आ जेठक आगिमे स्वाहा भऽ जाइ छल आ लोक गाछ-बिरीछक संग-रौद-तापमे मासो-मास जीवन-यापन करै छला। तहिना वरसातक समयमे सेहो झाँट-बिहाड़िक प्रकोप होइए, तइले सभकेँ बुझले अछि जे हथियाक झाँट केहेन होइत आबि रहल अछि, गाम-गामक घर-दुआर खसि पड़ै छल आ लोक झाँट-बिहाड़िमे खुलल असमानक बीच मासो-मास दिन गुदस करै छला, अखनो करै छैथ। यएह छी मिथिलाक साधना भूमि जे दुनियाँमे केतौ ने अछि। ने मिथिलांचल जकाँ उपजाऊ भूमि अछि आ ने मौसम। अन्नसँ लऽ कऽ तीमन-तरकारी, फल-फलहरीक जे बढ़वारि मिथिलांचलमे अछि ओ आनठाम नइ अछि। अपना ऐठाम जहिना अन्नक खेती बारहो मास होइए, तहिना तीमन-तरकारी, फल-फलहरीक सेहो अछि। बरहमसिया जहिना फल अछि तहिना फूल सेहो अछिए। प्रकृति जहिना रंग-रंगक जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ चर-अचर निरमबैए तहिना मनुक्ख बुधिसँ लऽ कऽ बेवहार सेहो निरमैबते अछि। अही प्रक्रियाक बीच रूपौली गामक रूपचन काका छैथ। कौलेज छोड़ला पछाइत रूपचन कक्काक मन विचारसँ एते भरि गेलैन जे गामक बीच एकलव्य जकाँ अपन साधना भूमि निर्धारित केलैन। ओना, कौलेज तक रूपचन कक्काक जीवनमे कोनो नबपन नइ आएल छेलैन मुदा कौलेज-जीवनक पछाइत अपना जीवनकेँ तीन दिशामे विभाजित केलैन। पहिल अपन बेकतीगत जीवन केना पारिवारिक बनत आ पारिवारिक जीवन केना सामाजिक जीवन बनि पथ-प्रदर्शन करत। मध्यम श्रेणीक किसान परिवारमे रूपचन कक्काक जन्म भेल छैन। शुरूमे पिताक बेवहार माने रूपचन कक्काक पिताक, ओते नीक नहि छेलैन, जेतेकक जरूरत परिवार-समाजमे अछि। मुदा बेटाकेँ माने रूपचन काकाकेँ, जखन कौलेजमे नाम लिखा देलखिन तखन विचारक संग बेवहारोमे बदलाव अनलैन। बदलाव अनैक परिस्थिति ई बनलैन जे बेटाकेँ घरसँ बाहर पढ़ैले पठाएब, एक समाजसँ दोसर समाजमे जाएत, केना मेल-मिलानसँ रहत इत्यादि। ओना, तैबीच जे संघर्ष रूपचन काकाकेँ भेलैन ओ नीक जकाँ एकपीढ़ीए-लोक बुझलकैन। जेना, मध्यवर्गीय किसान परिवारमे कौलेजक शिक्षा केतेक भारी छल, ओ पछिले पीढ़ीक लोक ने देख-बुझिकऽ वा भोगनिहारे ने नीक जकाँ जानि रहला अछि। रूपचन काका अप्पन जीवनक शुरूआत किसानी कार्यसँ कए किसानक रूपमे जीवन स्थापित केलैन। दुनियाँ दिस ताकब छोड़ि अपना दिस नजैर निखारलैन। ओना, कौलेजक जीवनमे रूपचन काका एते सुनिकऽ सीख नेने छला जे भूत-सँ-भविष्य धरि केना मन दौड़ैए। मुदा अनुकूल स्थान नहि भेटने विचारकेँ विचारेक पौतीमे सैंतिकऽ रखने रहला। जहिना कोनो घटना स्थलपर देखल घटना, महिनो-सालो बाद धक-दे मोन पड़ि जाइए तहिना रूपचन काकाकेँ अपन जीवनक दिशा धक-दे मोन पड़लैन। किसानियोँक तँ विराट रूप अछिए। तइमे अपने बसि ब्रजवासी जकाँ केना जीब, यएह मूल प्रश्न छी। हथिया नक्षत्र चलि रहल अछि। उत्तरवारि टोल कोबी बिआ आनए गेल रही। टोपर बान्हि मेघ लटकल छल, मुदा गामेक काज तँए किए परहेज करितौं। मेघे छी, बरैसियो सकैए आ नहियोँ बरैस सकैए। मुदा से भेल नहि, रूपचन कक्काक घर लग जखन गेलौं कि बरसाक बून तेज भेल। दौड़कऽ रूपचन कक्काक दरबज्जापर पहुँचलौं। रूपचन काका दरबज्जापर बैसल एकटा बाल्टीन आगूमे रखने रहैथ। जइ बाल्टीनमे दरबज्जाक चुबाठ-पानि टप-टप छतसँ खसैत रहइ। दरबज्जापर पहुँचते रूपचन काका बजला- "तूँ सभ ते नबका लोक भेलह। देहपर गमछा रखिते ने छह।" कहि, रूपचन काका एकटा गमछा देह पोछेले, माने पानि जे पड़ल रहए तेकरा पोछैले, देलैन। देह पोछि, गमछा राखि रूपचन काकाकेँ हियासए लगलौं। दू ढंगसँ हिसास करए लगलौं। पहिल जे रूपचन कक्काक प्रति अपन विचार केहेन अछि आ दोसर, गीता वा आध्यात्म सोच जकाँ आध्यात्म आ जीवनक सम्बन्ध रूपचन कक्काक केहेन छैन। तइ बीचमे रूपचन काका बजला- "चाह पीबह?" ओना, अपना मनमे भेल जे कहि दिऐन 'नइ पीब', मुदा अपने मन रोकैत विचार देलक जे जँ कहीं रूपचन काका अपनो चाह नइ पीने होथि आ हमरा देख अपनो चाहक आग्रह भेल होइन। तँए, समाजेक लोक जकाँ अपनो विचार भेल जे सभसँ भला चुपे रहब नीक। चुप तँ भऽ गेलौं मुदा मन दू-बटियामे फँसि गेल। एक दिस देखी जे रूपचन काका अपन जुआनीक तावमे बाजि रहला अछि, जुआनीक ताव भेल नित्य सृजनमान शक्ति जागब। आ दोसर दिस देखै छी जे अखन तक अपना रहैले दरबज्जो ने भेलैन अछि.! देखते छी जे बाल्टीन आगूमे रखने छैथ, जइमे छप्परक पानि चुबि रहल छैन। कबीर बाबाक दू पाटनक बीच जकाँ अपनो मन फँसि गेल। तइ बिच्चेमे रूपचन काका बजला- "ऐ बेर हथिया नक्षत्र बीतला चारि दिनक पछाइत दूर्गापूजा शुरू हएत।" अपने यएह बुझै छी जे हथिया आ आसीनक दूर्गापूजा संगे-संग चलैए। तइ बीचमे रूपचन काका की बाजि देलैन। अबाक् भेल बैसल रहलौं। रूपचन कक्काक विचार कोनो भाँजेपर ने चढ़ल। हथिया नक्षत्रक चारि दिनक पछाइत दूर्गापूजा शुरू हएत, तेकर खगता अखन कोन अछि। अखन तँ खगता अछि जे बरसाक पानि जे दरबज्जाक बीचमे चुबि रहल अछि तेकर निराकरणक। मन नइ मानलक। बजलौं- "काका, आब तँ अन्तिम समयमे पहुँच गेलौं। अखनो तक दरबज्जाक यएह गति अछि।" हमर बात सुनि रूपचन काका मिसियो भरि मर्माहत नहि भेला। जखन मर्माहत नइ भेला तखन घबड़ाइक जरूरते की। जेना जीवन-पद्धतिक अनुकूल अपनाकेँ पेब रहल छला। गाम-समाजक रीते अछि जे एक-दोसर लग कानियोँ-कानि आ हँसियो-हँसि बजबे-भुकबे करैए। ऐठाम ई नइ बुझब जे महिलाटा केँ कहै छिऐन आ पुरुखकेँ नहि कहै छिऐन। मौगमेहरा पुरुखोक संख्या कि कम अछि। तिनका जरूर कहै छिऐन। रूपचन काका बजला- "बौआ, की कहबह। जिनगीक मूले जेना लोककेँ छुटल अछि, जइसँ जीवन सेहो दुरुह भइये गेल अछि। तखन तँ..?" मने-मन विचारए लगलौं जे जिनगीक मूल की भेल? बजलौं- "से की काका?" बुलन्दीसँ रूपचन काका बजला- "बौआ, जीवनक मूल आवश्यकतामे भोजन अछि। तोंही कहह जे केतेक लोककेँ उचित भोजन भेटैए। हम ई नइ कहै छिअ जे केतेकेँ उचितोसँ बेसी भेटैए। तैठाम जँ घरक छत नहियेँ बनल अछि तँ की हेतइ। जएह अछि तेहीसँ ने जिनगीक निमरजना करब।" रूपचन कक्काक विचार तीर जकाँ हृदयकेँ बेध देलक। अनायास मुहसँ निकैल गेल- "हँ, से तँ अछिए।" हँसैत रूपचन काका बजला- "बौआ, जहिना अपने बुलन्दीसँ जिनगी पार केलौं तहिना तोंहूँ बुलन्दीसँ जिनगी पार करह, यएह हमर शुभकामना छह।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास छअम पड़ाव) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) छअम पड़ाव
बारह बर्खक पछाइत, तैबीच देवनक मातो-पिता मरि गेलखिन आ पत्नी, दू बच्चाक संग नव परिवारो बनि चुकल छेलैन। बारह बर्खक बीचक जे सम्बन्ध देवन आ बनर्जीदादाक बीच रहलैन ओ दिन-रातिक बीचक सम्बन्ध जहिना होइए तहिना रहलैन। देवन गोदामक मटिया रहितो, विचारो आ बेवहारोसँ सोल्होअना नव मनुक्खक रूपमे ठाढ़ हुअ चाहै छला, मुदा जीवनक जे मूल खगता अछि, जेकरा पुरबैमे दुनियाँ बेहाल अछि, देवनोक संग तँ छेलैन्हे। ओना, बनर्जीदादाक अपन जीवन छेलैन, नियमित बेतन छेलैन। तैबीच अपनाकेँ बान्हि-राखि चलै छैथ, मुदा देवनक तँ से नहि छल। कलकत्ता एला पछाइत देवन चारि-पाँच बर्ख तक बनर्जीदादाक विचारकेँ सुनैत रहला मुदा अपन विचारैक जगह अन्ध रहने देखा नहि पड़लैन। मुदा पाँच बर्खक पछाइत बनर्जीदादाक मुँहक सुनल बातकेँ मने-मन देवन खोद-बेद करैत-करैत नव-नव विचारो आ काजो देखए लगला। जइसँ अपन जिनगीक गतिक सभ अनुभव हुअ लगलैन। आब वैचारिक दौड़मे देवन बुझि गेला जे गामक जीवन बिनु पाइयो-कौड़ीक चलैए, मुदा शहर-बजारक जीवन तेना नहि चलि सकैए। शहर-बाजारमे एक दिन बिताएब माने बिना पाइ-कौड़ीक, जीवनक दुर्ग बनियेँ जाइए। तँए परिवारकेँ गाममे राखब जीवनानुकूल अछि। धीरे-धीरे देवनक विचारमे ओ शक्ति जागि चुकलैन जे अपन जीवनक भविसकेँ हियासि सकै छैथ। जखने भविसकेँ हियासैक शक्ति विचारमे आबए लगैए तखने ने मनुख अपन मनुष्यत्वक सीमा निर्धारित करए लगैए। जीवनक मूल पाँच तत्त्व- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य आ शिक्षा एक-एक मनुक्खक जीवनक आधार छीहे। ओना, अहू पाँचो तत्त्वमे सभ समाने नहि अछि। एक-दोसरसँ कम-बेसी अछिए। जइसँ जइ तरहक जीवन रहल ओइ अनुकूल अपन जीवन निर्धारित कइये लइए, मुदा ओ जीवन मानवीय जीवन नहि रहि पशुवत जीवन बनले रहि जाइए। पशुवतो जीवन केना ने बनल रहत? जहिना पशुकेँ खाइ-के, रहै-के आ बीमारीक भय बनल रहैए तहिना ओकरो रहबे करैए। भलेँ ओ बुझह वा नहि बुझह। मुदा मनुख तँ से नहि छिया। बुझैक शक्ति रहने भोजनो आ वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य आ शिक्षाक महत सेहो बुझिते छैथ। देवनो जीवनक मूल तत्त्वकेँ सदिकाल मनमे रोपि विचार करबे करै छैथ जे अपन समाज-परिवारक बीच एकाकी जीवन बनले अछि, ओकरा सम-गम बनाएब तँ अपना संग परिवारे लोकक ने काज भेलैन।
एक-एक तत्त्व, जीवनक पाँचो मूल तत्त्व, ओना ऐ पाँचोक अतिरिक्तो अनेक तत्त्व अछि, मुदा से अखन नहि, अखन एतबे जे जइ परिवारक जीवन देवन गूदस कऽ रहला अछि ओ धारक बहैत धाराक नाहपर चढ़ल मल्लाह जकाँ कोन रूपेँ सम्हारि रहला अछि..। सभकेँ अपन-अपन जीवनयात्रा करैक छैन्हे। अपन कमाइकेँ माने अपन मजदूरीकेँ प्रति दिनक आवश्यकताक पूर्तिक हिसाब जोड़ने देवनकेँ स्पष्ट देख पड़ैन जे जीवनक पहिल आवश्यकता, माने भोजन, जे अछि तेकरो समुचित ढंगसँ पूर्ति नहि कऽ सकै छी। माने भेल जे एहनो जीवन अछि जे भोजनक मूल तत्त्वकेँ नहि पेब जीबैले, माने प्राणक रक्षा-ले, जे भेटल तहीसँ जीवन निर्वाह सेहो कइये रहल छैथ। ओना ऐ बीच एकटा बात आरो अछि जे ओहन जीवन जीनिहारो ओहने छैथ जे भोजनक गुण-अवगुणकेँ बुझबो नहियेँ करै छैथ। मुदा जेना-जेना समय आगू बढ़ैए तेना-तेना विचारमे परिवर्तन नइ अबैए सेहो बात नहियेँ अछि, सेहो अछिए। मुदा जे जेतए अछि से तेतए रहऽ तइसँ देवनकेँ कोन मतलब छैन। मतलबो किए रखता। दुनियाँक बनाबटो अजीव अछिए। जे जेतेक रक्षक अछि से तेतबे ने भक्षक सेहो अछिए, तही बीचमे ने देवनो रहै छैथ...। देवन अपन प्रतिदिनक आमदनीक हिसाब प्रतिदिनक भोजनकेँ मिलौलैन तँ बुझि पड़लैन जे समुचित भोजन करै-जोकर अखन नहि भेलौं हेन। मनमे उठलैन, चारि गोरेक परिवार अछि आ सन्तुलित भोजनक जे मूल्य अछि तेते कहाँ कमा रहल छी? मुदा जीवनो गूदस तँ अही झुलैत आमदनीमे करबाक अछि आ समयसँ चलबाको तँ अछिए। सामंजस करैत देवन शहर-बाजार आ गाम-देहातकेँ समतुल्य करैत मजगूतीसँ विचारि लेला जे परिवारकेँ गामेमे राखब कल्याणकारी हएत। अखन तकक जे अपन जीवन रहल, तइमे अपन बिआह-दानक संग परिवारमे दूटा मजगूत खपड़ैल घर बनेलौं। ऐठाम घर चुबैए आकि खिड़कीसँ पानि-बिहाड़िक झटका मारैए से नहि बुझब। ऐठाम अखन ओहिना बुझू जे जहिना ईंटा-सीमेन्टक घर बनबैकाल एकटा समय निर्धारित करै छी। तहिना..। तखन माइटिक देवाल आ खपड़ाक छाड़बला घरक माने भेल पचास बर्ख ठाढ़ रहैबला घर। तेहेन घरो बनेलौं। तइ संग सभसँ पैघ काज ई केलौं जे जहियासँ कमाए लगलौं तहियासँ माता-पिताकेँ कहियो किछु खलए नहि देलिऐन जे आँखिसँ नोर खसितैन। मुइला पछातियो क्रिया-कर्म सेहो ओहन कइये देलिऐन जे सइयो मुँह जश देबे केलैन। देवन जहिना परिवारक संग सामंजस कऽ जीवन बनौलैन तहिना पचास बर्खक औरुदाक दूटा घर सेहो आँखिक सोझमे देखिये रहल छला जइसँ जीवनक प्रति मनमे तृप्ति सेहो उपकले छेलैन। वस्त्रक ओहन समस्याकेँ समस्या नहियेँ बुझै छैथ, किए तँ आइ भलेँ लोक अपन वस्त्रकेँ बेहिसाब किए ने बना लिअए मुदा देवनक परिवारक तँ अपन वएह जीवन रहलैन जे साल भरिपर जहिना धोती तहिना परिवारमे साड़ी बदलै छैथ। सालमे एक बेर गाम जाइकाल कलकत्तेमे सभ वस्त्र कीनि कऽ लऽ जाइ छैथ आ साल भरि निचेन रहै छैथ। दवाइ-दारू तँ अन्हा-गाहींस अछिए। जरूरत भइयो सकैए आ नहियोँ भऽ सकैए। अपन जीवनक हिसाब देख जखन देवन गामक समाजकेँ हियासिकऽ देखला तँ बुझि पड़लैन जे बहुत नीक नहि तँ बहुत अधलो नहियेँ छी। जँ मजदूरो बनि जीबै छी तँ अपन बाँहिक बले ने जीबै छी। अपन बाँहिक बलक तुष्टिसँ देवनक मनमे सन्तुष्टि जगलैन। देवनक मनमे सन्तुष्टि अबिते बजर्नीदादाक पाँच साल पूर्वक विचार धक-दे मोन पड़लैन। मोन पड़िते मन बिहुँसि गेलैन। बिहुसैक कारण भेलैन अपना सोझामे बेटाकेँ माने कामेसरकेँ धुरझाड़ किताब पढ़ैत देख रहल छैथ। आइसँ पाँच बर्ख पूर्व बनर्जीदादा देवनक जीवनकेँ देख फूलक माला जकाँ गँथैत कहने छेलैन- "देवन, परिवार गामेमे रहए दियौ। किए तँ मिथिलाक गाम छी। आएब-जाएबक अपनो सम्बन्ध बनल रहत मुदा पैछला पीढ़ीमे जे भेल से भेल, नीक भेल सेहो बढ़ियाँ आ अधला भेल सेहो बढ़ियाँ। किए तँ ओ भूत बनि भूतियाएल। मुदा ऐगला पीढ़ीपर नीक जकाँ धियान राखू।" बजैक क्रममे बनर्जीदादा बाजि गेला मुदा पछाइत मोन पड़लैन जे जीवनक तँ बनर-बाँट करैबला सेहो अछिए। कखनो ऐ रोटीकेँ हबक मारि झूस बना दइए तँ कखनो ओइ रोटीकेँ, आ खाइत-खाइत सभटा वएह खा जाइए। बनर्जीदादाक ओ विचार देवनक हृदयकेँ चुहैट कऽ पकैड़ लेलकैन। अपनो पाँच बर्खसँ परिवारक सिराकेँ नव सिरासँ विचारए लगला। बिनु बजने देवन बनर्जीदादाक सोझामे मने-मन संकल्प केलैन, माने मनमे रोपलैन जे बेटाकेँ कलकत्ते आनि पढ़ा कऽ एकटा पढ़ल-लिखल मनुख बना परिवारमे ठाढ़ करब। जइ बच्चाक माए मरि जाइए कि पिता ओकरा केतौ-के फेक अबै छैथ आकि अपन पितृक दायित्वकेँ पुत्रवत निर्वहन करै छैथ। हमहूँ अपन दायित्वकेँ ओहिना बुझि ताधैर निमाहब जाधैर बेटाकेँ नव रूपमे युगानुकूल मनुख नहि बना लेब। यएह ने भेल परिवारकेँ समयक संग जोड़ब। एक-एक मनुख अपन चीतानुकूल घटैत-बढ़ैत रहला अछि। प्राकृतिक शक्ति एते प्रवल अछिए जे जीवन भरिक कमाईकेँ क्षणमे क्षणाक कऽ दइए। घर-परिवारक सेवामे अपन जिनगी खपबै छी, मुदा क्षणमे बाढ़ि, क्षणमे भुमकम आबि ओकरा तोड़िकऽ नष्ट कऽ दइए, तँए आगूक पीढ़ीक जीवन केहेन आ केना बनत? अपन वौआइत विचारकेँ जहिना कृष्ण रथक सातो घोड़ाक छोर एक्केबेर खिंच, अपन जीवन लग आनि ठाढ़ केलैन तहिना देवनो अपन मनकेँ केलाह। देवन अपना आगूमे देख रहल छला जे पढ़ै-लिखैक रंग-रंगक जे संस्थान सभ अछि तइमे हमरो सन लोकक बेटा तँ विद्यालयमे पढ़िते अछि, तखन हम अपना बेटाकेँ इंजीनियरिंग कौलेजमे किए ने दाखिला दिया सकै छी। सभ बेवस्था विद्यालय केनहि अछि। यएह ने जे खर्च हएत। ओना, खरचो तँ सभ रंगक अछिए। कोनो विद्यालयमे बेसी खर्च अछि आ कोनोमे माने साधारण विद्यालयमे कम खर्च अछि। भलेँ बाढ़िक पलाड़िक पानियेँ जकाँ जड़िपनियेँ किए ने हुअए मुदा भेल तँ बाढ़ियेक पानि। जइ दिन बनर्जीदादाक विचारसँ देवन प्रभावित भेल रहैथ, तइ दिन कामेसरक उम्र कम रहने काजमे बाधा देखिये रहल छला मुदा गीध दृष्टि तँ अपन बेटाक विषयमे रहबे करैन। तीन साल पूर्व धरि जे मनमे अँटकल छेलैन ओ पूर्ति केलैन। संयोग बनल, संजोग कि बनल जे समय पुरला पछाइत कामेसरकेँ कलकत्ता आनि देवन विचार केलाह जे जहिना यशोदा मैया कृष्णकेँ भोर-साँझ बेटा बुझि भेँट करै छेली, तहिना भोर-साँझ अपनो जा कऽ सभ दिन सभ बातक हिसाब सेहो बुझैत रहब। पुछबै जे बौआ आइ की सभ पढ़लेँ। एतबे नहि जे बौआ पासबुक ठीक छौ किने। दिन-दिनेक काजक रूप ने जिनगीकेँ ठाढ़ करैत चलैए। आइ तीन साल कामेसरकेँ पूरि रहल अछि। अपन ओकातिक अनुकूल, माने भेल अपन शक्तिक अनुकूल, कामेसरकेँ देख देवनक मनमे एतेक खुशी उपैक गेलैन जे बेटाकेँ कलकत्ता अबैक तेसर साल-गीरहपर भोज करैक विचार भेलैन। भोज कि जे विद्यालयक सभ शिक्षक भेला आ गोदामक सभ श्रमिक। ओना, जवाबदेहीक पदपर रहितो अपनाकेँ बनर्जीदादा श्रमिके मानै छैथ। देवन बनर्जी दादाकेँ कहलखिन- "दादा, कामेसरकेँ कलकत्ताक माटि-पानि धाइर गेल। बेटाकेँ देख मन तिरपीत अछि तँए समारोहपूर्वक भोज करब।" देवनक मनक उद्गार देख बनर्जीदादाक अपनो मन उद्गरित भऽ गेलैन। किए तँ जेहने दाता तेहने भोक्ता अपनाकेँ देख बनर्जीदादा बजला- "जेते टाका खर्च करबह तही अनुकूल ने सभ किछु करब।" मने-मन बनर्जीदादा विचारए लगला जे कामेसरकेँ ऐठाम तक एबामे माने आइ धरि जे भेल तइमे अपनो विचारक निर्वहन तँ भेबे कएल अछि, तँए खर्चक आधा सहयोग कऽ देब, जइसँ मनक उद्गार सेहो दोबर भइये जाएत। समारोह नीक भेल। कामेसर सेहो दोसर विद्यालयमे पहुँच गेल। कामेसरक पढ़ैक जतन देख जहिना शिक्षक तहिना देवन अपनो छथिए। समय बीतैत गेल। कामेसर सेहो एक इंजीनियर युवकक रूपमे तैयार भऽ गेल। कामेसरक संग हजारो इंजीनियर कलकत्तामे तैयार भऽ गेला। सभकेँ नोकरी चाहिऐन, सरकारक संग नोकरीक समस्या उठल। अन्तमे समझौता भेल जे प्रत्येक इंजीनियरकेँ दू-दूटा ट्रेक्टर अनुदानक संग बैंकक माध्यमसँ देल जाएत। आइ कामेसर ओइ सीमापर आबि ठाढ़ भेल अछि जेतए एक दिस छह मास पूर्व पिताक मृत्यु भेल छेलैन तँ दोसर दिस अपन बिआह मास दिन पूर्व भेलैन, माइक मृत्यु दू साल पहिनहि भऽ गेलैन। बनर्जीदादाक सम्पर्कमे रहने कामेसर अपन उजरल-उपटल गाम-समाज दिस झुकि चुकल छल, जइसँ मनमे आस्ते-आस्ते रोपा रहल छेलै जे अखन तक कलकत्ता सन शहरमे, इंजीनियरिंग कौलेजक विद्यार्थीक रूपमे जे मान-प्रतिष्ठा रहल ओ गाममे थोड़े हएत। एक तँ इंजीनियरक काज नहि रहने गामक लोक इंजीनियरकेँ नीक जकाँ जानि नहि रहल अछि, तैपर हम तँ सहजे गाम-समाजसँ सभ दिन हटल रहलौं। अखन तक जे गाम जेबो-एबो करै छेलौं तँ बस पाहुन-परक जकाँ अपना घर-अँगनामे बैसल रहै छेलौं आ समय बीतलापर उठि कऽ विदा भऽ कलकत्ता आबि जाइ छेलौं..! महाभारतक कौरब-पाण्डवक लड़ाइ जकाँ कामेसरक मनमे गाम-शहरक बीचक दूरीक द्वन्द्व उठि चुकल छल। मुदा मनक दृढ़ता गामक प्रति कामेसरकेँ एते जागि चुकल छेलै जे नइ जाइक सभ बाधाकेँ जहिना पोड़ो-सागक लत्तीकेँ हँसुआ खड़ैर कऽ काटि दइए तहिना विचारक हँसुआ खड़ैर कऽ काटि देलक। एकाएक कामेसरक मनमे विचारक नव उत्साह जागल जे जहिना पिताजी गामसँ पड़ाकऽ माने जीवन नइ चलने, कलकत्ता एला तहिना हमहूँ कलकत्तासँ इंजीनियर बनि गाम जा रहब। मुदा हमरो तँ बुझए पड़त जे जैठाम अपन जीवनकेँ स्थापित करए चाहै छी तैठाम अनुकूल परिवेश केना बनत? अनेको प्रश्नक संग अनेको उत्तर कामेसरक विचारकेँ घेरनहि छल। तैपर पत्नी सुभद्रा बजारोन्मुखी छथिन। रहबो किए ने करती। सुभद्रा जिलास्तरक ऑफिसरक परिवारक पलित-पोसित छैथ। ओना, मनक संकल्पो तँ ओहन बन्धन छीहे जे अनका तोड़ने नहि, अपनेटा तोड़ने टुटैए। तहूमे विद्यालयसँ निकलल टटका नवयुवकक संकल्प। कलकत्ताक अन्तिम विदाइक भेँटक रूपमे कामेसर बनर्जीदादासँ असिरवाद लिअ हुनका ऐठाम पहुँचल। सात साल पहिने बनर्जीदादा सरकारी सेवासँ निवृत्त भऽ गेल छला। समयक अनुकूलता पेब माने वेतनक बढ़ोत्तरी भेने बनर्जीदादा अखनो पेंशनक रूपमे ओते रूपैआ मासे-मास उठैबते छैथ जेते शुरूमे सेवारत् वेतन उठबै छला। मुदा महगाइ बढ़ने, किछु कम तँ भेबे केलैन। ओना, जखन वेतनभोगी जीवन छेलैन तखन परिवारक भारो बेसी छेलैन जेकरा निमाहब अनिवार्य रहैन, से आब नहि रहलैन। तहूमे दुनू बेटा तेना कमाइ छैन जे मुँहमंगा पाइ दइले तैयार रहै छैन मुदा अपनहि पेंशन ओते भेटि जाइ छैन जे बेटाक मदैतिक खगते ने छैन। तँए सदिकाल खुशी-खुशी कहैत रहै छथिन जे बौआ, अपन कमाइसँ अपन जीवन गढ़ू। आजुक परिवेशमे खगता नहि छैन, कने कठाइन सन प्रश्न अछिए। आजुक तेहेन आर्थिक परिवेश बनि गेल अछि जे सभकेँ माने धनीक-गरीब सभकेँ, पाइक खगता सदिकाल रहिते अछि, किए तँ जिनगीक फालतू आवश्यकता तेते बढ़ि गेल अछि जे अनेरो लोक श्रमकेँ हीन बना भोगकेँ अपना रहल छैथ। मुदा से बनर्जीदादाकेँ नहि छैन। शुरूहेसँ जीवनक गठन तेना गढ़ि लेने छैथ जे जनेउ जकाँ गठिया गेल छैन, तँए साँझ-भोर गायित्री जाप करैमे सरपट दौड़ चलै छैन। बनर्जीदादाक ऐठाम कामेसर पहुँचला तँ पता लगलैन जे अपने दस बजे दिनसँ वौड़ाएल छैथ, केतए छैथ तेकर कोनो ठेकान नहि। बान्हल जिनगीक ने निर्धारित जीवनो होइए आ जगहो निर्धारित रहैए, मुदा खुलल-खिलल जीवनक आड़ि-धुर अछि नहि। ओना, कामेसरक मनमे उठि चुकल छल जे जखन काल्हि कलकत्ता छोड़ि जाएब अछि तखन दोहरा कऽ अबैक आशा करब नीक नहि। एहनो तँ सम्भव भइये सकैए जे विदाइक तैयारीमे बिसैर जाइ। तैबीच बनर्जीदादाक पत्नी सुनलैन जे एक गोटा भेँट करए आएल छैन। सुनिते सुवोधनी कोठरीसँ निकैल कामेसर लग आबि बजली- "चलू, दरबज्जापर बैसू। जे घड़ी जे पहर ने अपने पहुँचला अछि।" निर्भीक भऽ कऽ सुवोधनी बाजल छेली, किए तँ मन गवाही दइये देने छेलैन जे निश्चितकेँ ने समय होइए मुदा अनिश्चितकेँ समय की हएत। कहलो जाइ छै, 'उढ़ड़ाकेँ गामक ठेकान!' अखनो आबि सकै छैथ आ दू घन्टाक पछातियो आबि सकै छैथ। हम अनुमानसँ बजलौं अछि आकि हुनकर माने पतिक, काज सम्हारैत बजलौं अछि। ओना अपना मिथिलांचल आ बंगालक महिलाक बीच दूरी अछिए। कारण अनेको अछि, शहर-देहातक हुअए कि साक्षर-निरक्षरक दूरी, कि सम्पन्न-विपन्नक दूरी हुअए आकि जीवनक मर्मक संघर्षमय जीवन हुअए। मुदा से अखन नहि। कामेसरकेँ दरबज्जापर बैसते सुवोधनीक पोती, चाहो आ पानियोँ नेने पहुँचली। तैबीच बनर्जीदादा सेहो पहुँचला। दिन भरिक थाकल, तँए मनमे रहैन जे पहिने नहाएब, पछाइत जे हएत से हएत। बनर्जीदादाकेँ देखते कामेसर बाजल- "दादा, काल्हि कलकत्ता छोड़ि गाम चलि जाएब। जहिना पिताजी जीबैले कलकत्ताक बाट पकड़लैन तहिना हमहूँ गामक बाट पकैड़ गाम चलि जाएब। जीबैक रास्ता भेट गेल, दुनियाँमे केतौ स्वतंत्र रूपमे जीब सकै छी।" एकसंग कामेसरक विचारमे बनर्जीदादाकेँ सभ किछु भेट गेलैन। सभसँ पैघ विचार 'स्वतंत्र जीवन पएब' छेलैन। बनर्जीदादा एक्के शब्दमे बजला- "अहाँ संग हमर शुभकामना अछि, कामेसर..!" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "गामक जिनगी" लघु कथा संग्रह लेल "विदेह सम्मान- 2011", "गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- "टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011", मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- "वैदेह सम्मान- 2012", विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "नै धारैए" उपन्यास लेल "विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014", साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा "कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015", मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- "वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" सम्मान- 2016", रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- "कौमुदी सम्मान- 2017", मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा "स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018", चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध "यात्री चेतना पुरस्कार- 2020", मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा "राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020", भारत सरकार द्वारा "साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021" तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा "अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022"
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १८म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १८म खेप १८ उतरिबारि टोलमे पाकड़िक झमटगर गाछ छल । ओकरे छाहरिमे सौंसे टोलक लोकसभक बैसार छल। गोविंद आ माधव ओहि बैसारक अगुआ छलाह । ओना ओहिठाम कीर्तन करबाक हेतु साँझमे लोकसभक जुटान होइते रहैत छल । मुदा ओहि दिनक बात किछु विशेष छल । गोविंद आ माधव एकतुरिआ छलाह । इसकूलसँ लए कए कालेज धरि एकहि संगे पढ़लाह । एमए पास केलाक बाद नौकरी नहि करब ,समाजक सेवा करब ,ताहि बिचारसँ प्रेरित भए गाम वापस आबि गेलाह । एहन लोक कमे होएत जे भेल नौकरीकेँ लात मारि गाम-घर घुरि जाएत । मुदा ओ सभ से केलाह। गाम आबि तँ गेलाह, मुदा एहिठामक स्थिति तँ बहुत खराब रहैक। केओ ककरो सुनबाक हेतु तैयार नहि । सभ अपना-आपमे परिपूर्ण। "गरीब छी तँ छी, मूर्ख छी तँ छी, हम ककर की बिगाड़ैत छिऐक? जे मोन होएत से करब । हम ककरो नौकर छिऐक की? हमरासभकेँ जे बुझबैत अछि से पहिने अपने घर सम्हारि लिअ तँ बुझबैक जे बहुत केलक।" तरह-तरहक फकरासभ लोक बजैत रहैत। ई सभ सुनबाक हेतु गोविंद आ माधव पहिनहिसँ तैयार रहथि । गाम केहन होइत अछि से ओ सभ स्वयं देखने-भोगने रहथि। समाज सुधार करबाक हेतु सहनशीलता चाहबे करी । दस तरहक लोक छैक,सभकेँ मिला कए लए जएबाक हेतु धैर्य चाहबे करी । से सभ सोच-बिचारि कए दुनूगोटे गाम वापस आएल रहथि। गोविंद आ माधवक सतत प्रयाससँ गाममे बहुत परिवर्तन भेल । लोकसभक शिक्षाक प्रति आकर्षण भेलैक । तरह-तरहक नव व्यवसाय लोक शुरु केलक । एहिसभसँ लोकसभक आर्थिक स्थितिमे सुधार भेल। गोविंद आ माधवक एहिमे बहुत योगदान रहलनि । जाहि कारणसँ उतरबरिआ टोलक लोकमे ओ सभ बहुत लोकप्रिय भए गेलाह। पाठशाला ककरो व्यक्तिगत वस्तु नहि होइत अछि । फेर ई कोनो आजुक तँ अछि नहि । कैक पुस्तसँ इलाकाक लोक एहिठाम शिक्षा लैत रहलाह अछि । उचित तँ ई छल जे सुधाकर स्वयं एहि काजकेँ आगू करितथि। दछिनबारिटोलक लोकसभ हुनकर संग दैत । मुदा भेल उलटा । सुधाकर पाठशालाक जगहकेँ कोनो स्थितिमे छोड़बाक हेतु तैयार नहि छथि ,अपितु तरह-तरहक षड़यंत्र कए जयन्तकेँ गामसँ भगा देबए चाहैत छथि जाहिसँ ओ निश्चिंत भए हुनको हिस्साक खेत-पथारकेँ कब्जा कए सकथि । छैक ने अन्याय? फेर पाठशाला रहलासँ सभक फएदा हेतैक । गामेमे लोक उच्च शिक्षा प्राप्त कए सकत । जयन्त सन विद्वान व्यक्तिसँ शिक्षा ग्रहण करबाक नीक अवसरकेँ हमरा लोकनि हाथसँ नहि जाए देबैक । एहि हेतु हमसभ जानपर खेल सकैत छी ।"-गोविंद बाजल। माधव ओकर बातकेँ समर्थन करैत आगू कहलक- "जाहि तरहें जयन्तकेँ अपने लोकसभ तंग कए रहल छनि ओ संपूर्ण समाजक हेतु कलंक बात अछि। अपसोचक बात अछि जे दछिनबारिटोलक लोकसभ मूकदर्शक बनल छथि ।" "ओ सभ आब छथिहे कोन जोगर । तारी-दारूसँ फुरसति हेतनि तखन ने किछु आओर सोचताह।"-बैसारमे सँ केओ बजलाह। "सत्य वचन ।"-दोसर गोटे बजलाह । "मुदा हमरा लोकनि चुप नहि रहि सकैत छी । ई नागबाबाक टोल अछि । ओ नागबाबा जे सौंसे जानकीधाममे अलख जगओने छथि। जयन्तक जान नागेबाबा बचओने छलाह।"-तेसर बाजल । "से केना?"-चारिम पुछलकैक । ई बात ककरा ने बूझल छैक । नान्हिएटामे जयन्त घरक परिस्थितिसँ तंग भए कए धारमे डुबए जाइत रहथि । संयोगसँ नागबाबा हुनका देखि लेलखिन आ बुझा-सुझा कए हुनका अपना संगे जानकीधाम लेने चलि गेलखिन । ओएह हुनकर नाम जानकीधामक प्रसिद्ध शारदाकुंजमे लिखओलथि । जँ नागबाबा नहि देखने रहितथि तँ कहि नहि जयन्तक की हाल होइत?"-पाँचम लोक बाजल । "तखन तँ जयन्तपर हमरा लोकनिक अधिकार सिद्ध अछि। ओ अपनसभक लोक छथि । हुनकर रक्षा अवश्य हेबाक चाही ।" "एवमस्तु! "-सभ एकस्वरसँ बाजल । तकर बाद सर्वसम्मतिसँ प्रस्ताव पास भेल जे गामक युवकसभ पार लगा कए जयन्तक सुरक्षाक देखभाल करताह । हुनकर नित्यप्रतिक आवश्यकता हेतु गामेसँ व्यवस्था कएल जाएत। इहो निर्णय भेल जे पाठशाला ओतहि चलत जतए चलैत रहल अछि। ताहि हेतु जे करए पड़तैक से कएल जाएत ।" लठैतसभ सभटा समाचार सुधाकरकेँ देलकनि । सुधाकरक सिटीपीटी गुम्म छल । आब की कएल जाए?"-सुधाकर लठैतसभकेँ पुछलखिन। "अहाँ चिंता नहि करू । हमरा लगमे एहि समस्यासभक सही इलाज अछि।"-एकटा लठैत बाजल। "तँ बजैत किएक नहि छह?"-सुधाकर कहलक । "जयन्तक जान ओहि शोधग्रंथमे अछि । जँ ओकरा चोरा ली तँ जयन्त बताह भए जाएत, अपने गामसँ पड़ा जाएत वा भए सकैत अछि जे धारेमे कुदि जाए ।"-दोसर लठैत बाजल । "ई बात तँ हम पहिनेसँ बुझैत छी । हम तँ जानकीधाममे कहने रही जे शोधग्रंथ लेने चलू तँ अहाँसभ ज्योतिषीजीकेँ दए देलिऐक आ ओ पकड़ाओ गेल ।" "जे बीति गेल, से गेल । आब की कएल जाए ताहिपर विचार करैत जाह ।"-सुधाकर बाजल । "एहिमे विचारबाक की छैक? जयन्तक सिरमासँ कहुना कए शोधग्रंथकेँ चोराएल जाए । फेर देखैत रहू तमासा ।"-तेसर लठैत बाजल । चारू लठैत आ सुधाकर एकमतसँ एहि प्रस्तावपर सहमत भेलाह । -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १२) निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १२) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँs सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग - १२) पूर्व कथा राजा पुरूरवा संग विवाह हेतु अनेकानेक सुंदरी लालायित छलीह । मुदा राजा पुरूरवा एहि संs निर्लिप्त राजकाज में व्यस्त छलाह । आब आगू
स्वर्ग के सिंहासन पर पुरंदर देवगण के समूह में बैसल छलाह l हुनक मुख मण्डल पर गहन चिंता परिव्याप्त छल l दिन प्रति दिन के राक्षसक आक्रमण संs ओ टूटि चुकल छलाह l दानवराज केशि के अधीनता ओ स्वीकार कs चुकल छलथि l एकर अतरिक्त अन्य कोनो मार्ग हुनका नहि सुझायल छलैन्हि । एकर कारण लगभग प्रतिदिन राक्षस गण के मनोभिलषित वस्तुक आपूर्ति हुनका करs परैत छलैन्हि l दानवक अनुचित मांग के पूरा करैत-करैत हुनका मोन में अपना प्रति हीन भावना भरल जा रहल छलैन्हि l देवगुरु बृहस्पति यदि एहि अवसर पर स्वर्ग लोक में रहितथि,तखन देवगण के दानव राज सs पराजित नहि होमय परितैन्हि,मुदा गुरुदेवक अनुपस्थिति पराजय के कारण बनि गेल l किछु आवश्यक कार्य संपादित करवा हेतु गुरुदेव ब्रह्मलोक में विधाता संग परामर्श एवम अन्य अनेकों विमर्श हेतु गेल छलाह l हुनक अनुपस्थितिक ज्ञान राक्षस राज के भs गेल छल,आ एहि अवसर के लाभ उठा लेलक दानवराज केशि l तीन वर्षक घमासान युद्ध में इंद्र के स्थिति सोचनीय भs गेलनि । ओ पराजित भेलाह,संगहि हुनक मनोबल टूटि चुकल छल l देवत्वक तेज समाप्तप्राय भs गेल छलनि । शांत बैसल इंद्र के कर्ण गह्वर में - "नारायण-नारायण" के चिर-परिचित आवाज आ वीणाक मधुर नाद गुंजित भs उठल l इंद्र के मुख कमल प्रसन्नता संs प्रफुल्लित भs गेल l अपन सिंहासन सs उतरि ओ नारदक प्रसन्नता पूर्वक स्वागत केलन्हि,एवम भांति-भांति संs हुनक पूजा अभ्यर्थना केला उपरान्त अपन समीप एक मणि माणिक्य जड़ित स्वर्ण-सिंहासन पर हुनका सादर बैसाओल l नारद स्वर्ग लोकक तत्कालीन स्थिति संs पूर्ण अवगत छलाह तथापि ओ जिज्ञासा पूर्वक इंद्र संs पुछलन्हि - "कोन कारण थिक अमरपति ! स्वर्गलोक के श्री-शोभा विहीन पाबि रहल छी ? सभ देवगण के मुख पर अज्ञात भय पसरल अछि ! नहि कोनो प्रकारक रास-रंग भs रहल अछि,आ नहि कोनो उत्सवक आयोजन अछि ! अमरपुरी में तs प्रतिदिन कोनो ने कोनो प्रकार के उत्सव मनाओल जाइत रहैत छल ! अनवरत चहुं दिशा में प्रसन्नता व्याप्त रहैत छल ! स्वर्ग अबैत काल मार्ग में असुर सभ के मंदाकिनी के तीर पर स्वच्छंद विचरण करैत देखलहुं ? एक असुर पारिजात पुष्पक हार पहिरने छल ! स्वर्गक ई अस्त-व्यस्त व्यवस्था ! आहांक उपस्थिति में ! हम आश्चर्य चकित छी,आहांक एहि अकर्मण्यता पर ! यदि अपनेक शासन के प्रति यैह उदासीनता रहल तखन ओ दिन दूर नहि जखनि अमरपुर मर्त्यपुर बनि जायेत या असुरपुर"! दु:खी होइत इंद्र बजलाह - "देवर्षि आहां तs अंतर्यामी थिकहुं ! सब किछु जनितहुं हमरा अकर्मण्यताक उपाधि दs रहल छी ! की आहां के ज्ञात नहि थिक कि असुर देवलोक के पराजित कs देलक ? हम दानवराज केशि संs पराजित भs गेलहुं"? "हूं ! ई बात हमरा ज्ञात अछि । मुदा ई भेल कोना ! की आहां में असुर गण के स्वर्ग लोक में एहि प्रकार स्वच्छंद आगमन विचरण के रोकवाक शक्ति नहि ? आहां एवम समस्त देवगणक बाहु-शक्ति मृत भs गेल ? हमरा ज्ञात अछि कि देव गुरु बृहस्पति एखनि स्वर्ग लोक में नहि थिकाह,मुदा की आहां हुनके शक्ति पर स्वर्गक अधिपति छी ? हुनक अनुपस्थिति में स्वर्गक सत्ता असुर गण के हाथ विक्रय कs देलहुँ ? "हमरा किछु नहि सुझाइत अछि देवर्षि ! हम किंकर्तव्य विमूढ़ भेल छी ! कृपया हमर मार्गदर्शन कएल जाय देवर्षि"। "आहां के मात्र अपनहि शक्ति पर अपार गर्व अछि । यैह कारण थिक जे आहां किनको सहायता लेमय में असमर्थ छी । मुदा आहां एक सूत्र विस्मरण करैत छी, जखनि दुश्मन के समक्ष अपन शक्ति कम भs जाय तखनि कोनो शक्तिशाली भद्र जन के सहायता अवश्य लेमक चाही । एहि संs गुरेज नहि कारवाक चाही । मुदा आहां अपन समक्ष अन्य किनको शक्ति सम्पन्न सहायता देमय योग्य नहि बुझैत छी,तखनि तs यैह ने होयत ! की आई तक देवता भूमंडल के नरेश्वरक सहायता अनेकों बेर नहि लेलथि,फेर अखनि आहां के अपन शक्ति पर एतेक गर्व कियेक भेल अछि"? "पृथ्वी पर एहन कोनो नरपति नहि अछि देवर्षि,जेकरा सs हम सहायता लs सकी"| "हूं ! त्रिलोक में मात्र एक अहीं तs परम पराक्रमी शासक छी ! देवेन्द्र ! आहांक पराक्रम के समक्ष पृथ्वीक नृपति भला कोना ठाढ़ भs सकत "? "नहि नहि ! एहन कोनो बात एहन नहि अछि देवर्षि"! "आहां मिथ्या आवरण के अपन मुख एवम हृदय संs हटा दिय देवेन्द्र ! हम सब बुझैत छी। आहां सरिपहुँ छल-कपट आ दम्भक सहारा लैत रहलहुं । पृथ्वी के तपस्या लीन मानव एवम ऋषि गण संs भयभीत रहलहुं । आहां में ओ विशाल ह्रदय कहां,जे पृथ्वी निवासी में पाओल जाइत अछि ! पृथ्वी के तs एक-एक नरेश्वर आहांक सहायता करवा में समर्थ अछि l लेकिन अपन सहृदयता के कारण ओ स्वर्गक दिशा में देखइत तक नहि छथि"| इंद्र के मुख पर आशाक किरण लहरायल l ओ पुछलाह - "देवर्षि की अपने पृथ्वी के कोनो एहन नृपति के नाम बतायब जे पराक्रम में हमरा संs बढ़ल-चढ़ल होय"? "अवश्य ! कीएक नहि ! पृथ्वी पर एहि समय एक एहन चक्रवर्ती सम्राट छथिन ,जिनक समता आहां सन सहस्त्र इंद्र सम्मिलित भs जायेब तखनहु नहि कs सकब"| "की अपने हुनक विषय में किछु आर विशेष जानकारी देबाक कृपा करब देवर्षि"? "अवश्य ! कीएक नहि ! हमर कार्य अछि अनवरत त्रिलोक-भ्रमण करैत रहनाई ! हम एक स्थान पर स्थिर नहि रहि पबैतछी,मुदा एहि बेर भ्रमण के क्रम में भूमंडल पर हम किछु दिन ठहरि गेल रही l कहू तs विवश भs गेलहुं ओतs किछु दिन विश्राम करs के लेल ! ओतहि सs एखन हम आबि रहल छी । ओतs के अद्भुत शासन व्यवस्था संs हम अत्यन्त प्रभावित भेलहुं ! ओह ! कतेक शांति परिव्याप्त अछि ओतह"! "ऋषिवर नारद ! शांति ! पृथ्वी पर ! असम्भव ! शांति के साम्राज्य पृथ्वी पर सोचि कs विस्मय होईत अछि ! ई केहन असम्भव बात भेल अपनेक"? "आहां भला स्वर्ग में बैसल-बैसल कोना बूझब पृथ्वी आ आन कोनो ग्रहक बात ! आहां तs बस अपनहि गर्व में लिप्त छी, ताहि संs आहां के किनको महानता,किनको वीरता देखाईत नहि अछि ! आब आहां ध्यान सs सुनब जे हम बतबै छी आहांके"| इंद्र उत्सुक भs नारद ऋषि के आख्यान सुनs लगलाह । सभा मंडप में किछु आर देवता-गण आबि गेल छलाह l संगे किछु अप्सरा-गण पर्यन्त आबि गेल छलीह, ओ सभ इंद्र के गंभीर मुद्रा में देखि मौन भाव धेने एक कात में बैस गेलिह l देवर्षि नारद के ओष्ठ काँपि रहल छल आ हुनक मुख संs राजा पुरूरवाक प्रशंसा के शब्द अमृत बून्द सन छिटकि-छिटकि कs सभ के कर्ण गह्वर में प्रविष्ट होइत जा रहल छल l क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नन्द विलास रायक चारिटा कथा आ एकटा एकांकी जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नन्द विलास रायक चारिटा कथा कथा १ डॉक्टर बेटा रामकुमार चटिया सभकेँ पढ़ा अँगना एला तँ पत्नीकेँ कनैत देखलैन। देखते ओ अकबका गेला। पुछलखिन- "की भेल?" पत्नी कनिते कहलकैन- "छिटहीसँ बाबूजी फोन केने रहथिन, माएकेँ लकबा मारि देलक। बजबो-भुकबो ने करै छइ।" रामकुमार पुछलकैन- "कहिया लकबा मारलक?" पत्नी कहलकैन- "परसू रातिमे। बाबूजी बजै छेलखिन जे बँचत कि नै तेकर कोनो ठीक नहि। अपना सभकेँ परसू रातिएसँ फोन लगबै छेलखिन मुदा फोने ने लगलैन।" रामकुमार बाजल- "तखन तँ आइए छिटही जाए पड़त। माएक उमेरो तँ अस्सीसँ कम नै हेतैन। कोन ठीक कखन चलि जेती। चलू दस बजीआ बस पकैड़ ली। ओना तँ गहुमक दौनी करब जरूरी अछि। रहि-रहि कऽ मेघ अबै छइ। जँ बरखा भऽ जाएत तँ बुझू गहुमक खिजानैत भऽ जाएत। थ्रेसरबला शम्भु कल्हुका नाओं कहने रहैथ। मुदा अपना नै रहने दौनी केना हएत। शंभुकेँ फोन लगा कहि दइ छिऐन जे हम काल्हि नै रहब अन्तए जा रहल छी। ओतएसँ एला पछाइत दौन कराएब। अच्छा जे हएत से हएत। माएक जिज्ञासा करब तँ जरूरीए अछि। हुनका सभकेँ के छैन। एकटा बेटो छैन जे पटनामे डॉक्टरी करै छथिन, परिवार लऽ कऽ ओतइ रहै छथिन।" छिटहीवाली बजली- "एकटा काज करू, खेखनाकेँ बजा गहुमक बोझ कड़ीआ दियौ आ ऊपरसँ तिरपाल ओढ़ा झाँपि दियौ। बरखो हएत तँ नोकसान नै हएत। छिटहीसँ कहिया आएब तेकर कोन ठेकान।" रामकुमार कहलकैन- "ठीके कहै छिऐ। तिरपाल तँ अछिए कनी मेहनति करए पड़त। दसबजीआ बस नै पकैड़ बरहबजीआ पकड़ए पड़त। गहुम झाँपल रहने चिन्ता नै रहत।" सएह केलैन। गहुमकेँ सेरिआ झाँपि देल गेल। गौरकेँ पड़ोसीआक जिम्मा लगा, घरमे ताला मारि दुनू परानी बेटाकेँ लऽ छिटही विदा भेला। रामकुमार एकटा छोट किसान। मात्र दू बिघा खेतक मालिक। ओना तँ एम.ए. पास छैथ। मुदा बेरोजगार। कतेको बेर सरकारी नौकरी लेल परियासो केलैन मुदा ऐ जुगमे भगवान भेटब असान अछि मुदा सरकारी नौकरी कठिन। की करता, खेतीक अलाबा चटिया सभकेँ टिशन पढ़ा कोनो धरानी अपन गुजर करै छैथ। परिवारमे मात्र तीनिए गोरे। दू परानी अपना आ एकटा दस बर्खक बेटा कन्हैया। मालो जालक नाओंपर एकटा मात्र गौर। पत्नीओ मध्यमा परीक्षा पास केने मुदा ऊहो बेरोजगारे। नौकरी हेबो केना करितैन। जखन बी.ए., एम.ए.बला सभ झख मारैए तखन मैट्रिक-मध्यमाक कोन गप। छिटहीवालीक पिता रवि कान्त जमानाक मैट्रिक छैथ। हुनका एकटा बेटा आ एकटा बेटी। बेटाक नाओं फूल कुमार आ बेटीक सुमित्रा। रवि कान्त रजिष्ट्री ऑफिसमे मुनसीक काज करै छला। पहिने तँ हुनका पाँच बिघा खेत छेलैन मुदा आब घराड़ीक अलाबे मात्र दस कट्ठा बँचल छैन। बेटा फूल कुमार पटना मेडिकल कौलेजमे डॉक्टर। नौकरीक अलाबे खानगीओ क्लिनीक खोलने छैथ। प्राय: पाँच हजारक आमदनी भरि दिनक छैन। मुदा एक नम्बरक मक्खीचूस आ अबेवहारिक। बहिन-बहनोइसँ कोनो सरोकार नहि। माए-बाबू फोन-पर-फोन करैत रहै छैन मुदा हुनका लेल धैनसन। गाम एबो केना करता। कमतीमे चारि दिन तँ लगतै जे बीस हजारक अामदनीपर पानि फेड़त, कहबीओ छै बाप बड़ो ने मैया सभसँ पैघ रूपैआ। झलअन्हारीमे राम कुमार परिवारक संग सासुर पहुँचला। गामक बीचमे सुमित्राक पिताक घर। अँगनामे पच्छिमसँ पूब मुहेँ एकटा ओ दोसर घर पूबसँ पच्छिम मुहेँ। ईंटाक देबाल आ ऊपरसँ खपड़ा। अँगनाक उत्तर आ दछिनसँ देबाल दऽ घेरल। उत्तरवरिये कातसँ अँगना एबा-जेबाक रस्ता। दछिनबरिया देबालपर एकचारी जइमे भानस-भात होइए। पछबरिया ओसारपर चौकी जइपर सुमित्राक माए सूतल छेली। रवि कान्त बुढ़ीक पाँजरमे बैसल छला। ओसारिक बत्तीमे लालटेन टाँगल छल। राम कुमार सुमित्रा आ कन्हैया अँगना पहुँचला। सभ गोरे रवि कान्तक पएर छूबि गोर लगलकैन। सुमित्रा बेटी, जमाए आ नातिकेँ देख रवि कान्तक छाती सूप सनक भऽ गेल। ओ कुरसी आनि जमाएकेँ बैसैले देलखिन। सुमित्रा माएक पाँजरमे जा बैसली। रवि कान्त चाह बनबैले चुल्हि पजारए लगला। राम कुमार कहलखिन- "बाबूजी, अखन चाह बनेनाइ छोड़ि देथुन पहिने एतए आबथु।" माएक पाँजरमे बैसल सुमित्रा माएकेँ हिलबैत बजली- "माए, माए। माए गै, माए।" मुदा बुढ़ीक शरीरमे कोनो हरकति नै भेलैन। सुमित्राक आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल। हुनकर बाबूजी कहलखिन- "गै बताहि। आब माए थोड़े बजतौ। दू-चारि दिनक मेहमान छियौ। परसू रातिमे जे खसलौ से खसलै छौ। कखनो-कखनो आँखि खोलि चारू दिस तकै छौ। ठोरो पटपटबै छौ मुदा मुहसँ अवाज नै निकैन पबै छइ।" पिताक बात सुनि सुमित्रा बोम फाड़ि कानए लगली। राम कुमार ससुरसँ पुछलखिन- "डॉक्टर भैयाकेँ फोन नै केलखिन?" रवि कान्त जवाब देलकैन- "परसूए जखन अहाँक सासु गिरल तखने फूलबाबूकेँ फोन केलौं तँ ओ कहलक, अखन बड़ बिजी छी, घंटा भरि पछाइत फोन करब। अहाँ सभकेँ लगेलौं तँ सुइच ऑफ कहलक।" रामकुमार कहलखिन- "हँ परसू मोबाइलक बैटरी चार्ज नै रहए। की कहबैन, हमरा गाममे ने बिजलीए छै आ ने जेनरेटरे। नरहिया नै तँ निर्मली जा मोबाइल चार्ज करबै छी। काल्हि निर्मली गेल रहिऐ तँ ओतइ चार्ज करौलिऐ। अच्छा तँ, रातिमे डॉक्टर साहैबसँ बात भेलैन?" रवि कान्त कहलखिन- "रातिमे फोन लगौलिऐ तँ सुइच ऑफ कहलक। भिनसर भेने जखन फोन लगेलौं तँ कनियाँ उठबैत कहली जे अखन एकटा रोगीमे लगल छैथ। बारह बजे करीब फोन करए कहली। बारह बजे फोन केलौं तँ फूलबाबूसँ गप भेल। कहलक, कोनो डॉक्टर बजा माएकेँ देखा दियनु आ डॉक्टर जे कहता से हमरा फोनपर बताएब। जौं पाइ-कौड़ीक अभाव हुअ तँ ताबए इंजाम कऽ काज करब पछाइत हम पठा देब। चौकपर सोम आ शुक्र दिन एकटा डॉक्टर अबै छथिन। ओना तँ हुनकर क्लिनीक सिमराही बजारमे छैन मुदा हाटे-हाट रमण जीक दबाइ दोकानपर रोगी सभकेँ देखै छथिन। काल्हि सोम रहने डॉक्टर साहैब लग गेलौं तँ देखलिऐ भाड़ी भीड़। रोगी सभकेँ देखैत-देखैत साँझ पड़ि गेलैन। सिमराहीओ जेबाक रहैन। मुदा रमणजीकेँ कहलयैन तँ डॉक्टर साहैबकेँ कहलखिन जे हिनको बेटा डॉक्टर छथिन तखन अपना ऐठाम एला। आला लगा देखलखिन, ब्लडपेसर सेहो जँचलखिन आ कहला जे बढ़ल छैन जइसँ लकबा मारि देलकैन। दबाइ सभ लिखि कहलखिन चलए दियौ। काल्हिसँ आइ धरि दस बोतल पानि चढ़ि गेलैन मुदा कोनो सुधार नै भेलैन। खाली कखनो-कखनो आँखि खोलि तकैत रहै छथिन जेना केकरो खोजैत हुअ।" ई कहैत कहैत रवि कान्तकेँ बुकौर लगि गेलैन। आँखिसँ टप-टप नोर झहरए लगलैन। पिताकेँ कनैत देख सुमित्रा सेहो कानए लगली। रामकुमार फेरो पुछलकैन- "डॉक्टर भैयाकेँ फेर फोन केलिऐन आकि नहि?" रवि कान्त कहलखिन- "रातिएमे फोनपर सभ बात बतौलिऐ। तैपर फूलबाबू कहलक, काल्हि दू बजै सिमराही जा डॉक्टर साहैबकेँ सभ बात कहिहक। मुदा अपनासँ फूलबाबू फोन कऽ माएक हालति नै पुछलक। जेते बेर फोन केलौं हमहीं केलौं।" बिच्चेमे सुमित्रा पिताकेँ पुछलखिन- "भौजियो ने फोन केलक?" रवि कान्त बजला- "गै बताहि, जौं अपन जनमल नै पुछलक तँ आनक कोन बात। तोरा तँ सभ गप बुझले छौ जे केते कठिनसँ ओकरा पढ़ैलौं।" सुमित्रा बजली- "से कोनो हमरा नै देखल अछि। अहाँक कमाइसँ पूरा नै भेल तँ माएक सभटा गहना-जेबर बेचि कऽ दऽ देलिऐन। तहूसँ नै भेल तँ जमीनो बेचि दऽ देलिऐन। हँ तँ सिमराहीवला डॉक्टर लग गेलिऐ तँ ओ की कहलैन?" रवि कान्त बजला- "कहलैन जे लकबा मारने छैन। उमेरो अस्सीसँ ऊपरे हेतैन से आब उठब मोसकिल छैन। अपना जानि जे सेवा कऽ सकबैन से करियनु।" रातिमे सुमित्रा सबहक खेनाइ बनौलक। खेनाइ खा रामकुमार कन्हैया आ रवि कान्त सुतैले चलि गेला। सुमित्रा माएक पाँजरमे बैसल छेली। रातिम एगारह बजे बुढ़ीक शरीरमे हरकति भेल। आँखि ताकि बजली- "बौआ नै आएल? डाकडर बौआ हौ डाकडर बौआ?" सुमित्रा टोकलकैन- "माए हम छियौ, सुमित्रा गोर लगै छियौ।" "के, बुच्ची? कखन एलँह? पाहुनो एलखुन हेन?" "हँ ऊहो आएल छथिन आ कन्हैयौ आएल अछि।" तखने रवि कान्त एलखिन आ राम कुमार सेहो। "गोर लगै छिऐन माए।" रामकुमार बुढ़ीक पएर छुबैत कहलखिन। "नीक्के रहथु। जुग-जुग जीबथु। डाकडर बौआ नै आएल। आब ओकर मुँह नै देखबै। पोताक देखैक सिहन्ता नेनहि मरि जाएब।" रामकुमार कहलखिन- "हिनका किछु नै हेतैन। हम भिनसरे डॉक्टर भैयाकेँ फोन कऽ गाम बजाएब।" बुढ़ी कहलखिन- "अच्छा!" अच्छा कहिते बुढ़ीकेँ हिचकी उठलैन आ गरदनि सिरमापरसँ गिर पड़ल। सुमित्रा माए-माए कहैत कानए लगली। रामकुमार बुढ़ीक नारी देखैत बजलखिन- "माए चलि गेली!" ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नन्द विलास रायक चारिटा कथा आ एकटा एकांकी जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नन्द विलास रायक चारिटा कथा कथा २
कटही साइकिल "केतेक दिन ऐ पुरनका कठही साइकिलपर चढ़बह। कहह दुनियाँ केतए-सँ-केतए चलि गेल आ तूँ बीस-बाइस बर्खक ऐ पुरनका साइकिलपर चढ़ै छह!" -गेनालाल जियालालकेँ कहलकैन। जियालाल हँसैत बजला- "हौ भाय, तोहर बेटा सभ जे कमाइ छह ने, तँए तोरा हरियरी सुझै छह।" तैपर गेनालाल बजला- "आ तोरा जे कोचिंग सेन्टर आ चटिया सभकेँ टीशन पढ़ेलासँ आठ-दस हजारक महिनवारी आमदनी होइ छह से की करै छहक। कमतीमे एकटा सकेण्डो हेण्ड फटफटिया कीनि कऽ चढ़ह। हौ मरबह तँ किछ लऽ कऽ दुनियासँ नै जेबह। जेतबे सुख-मौज ऐ धरतीपर करबह ओतबे संग जेतह।" जियालाल बजला- "हौ भाय, अखन हमरा बड़ समस्या अछि तँए अखन हमरा अही साइकिलपर चढ़ह दएह।" चाहक दोकानदारो दुनू संगीक गप सुनैत रहए ओ बाजल- "मर्र! ऐ लोहाक साइकिलकेँ कठही साइकिल किए कहै छिऐ?" तैपर गेनालाल बजला- "ऐ साइकिलमे पाइडिल देखै छिऐ, काठक छी आ ऐ साइकिलपर जखन चढ़बै तँ जहिना कठही बैलगाड़ीक धुरामे सोन-तेल नै रहलापर चलैकाल कों-काँए, पों-पाँएक अबाज निकलै छै तेनाहिये ऐ साइकिलसँ अबाज निकलै छइ।" चाहक दोकनदार पुछलकैन- "से अहाँ केना बुझलिऐ?" गेनालाल जवाब देलखिन- "एक दिन हम निर्मली बसेसँ गेल रही। एक बोरा नोन कीनि अही साइकिलपर राखि बस स्टैण्डपर गेल रही। बस स्टैण्डपर नोन रखि जखन साइकिल पहुँचाबए जियालालक कोचिंग सेन्टरपर गेलौं तँ बुझाएल जे ई लोहाक नहि, काठक साइकिल छी। तहियेसँ हम एकरा कठही साइकिल कहै छिऐ।" जियालाल बजला- "हौ भाय कनेको पलखैत नै भेटए जे साइकिलकेँ भंगठियो करा लेब। दू दिन भंगठी करैले मिस्त्री ओतए साइकिल छोड़ि देलिऐ मुदा साँझमे जखन साइकिल लाबए गेलौ तँ साइकिल ओहिनाक-ओहिना राखल।" तैपर गेनालाल हँसैत कहलकैन- "धुर्र बुड़ि, तोरा कपारमे सुख लिखले ने छौ। कमा-कमा पाइ बैंकमे जमा कर मुदा भोग तँ तोरा बेटाकेँ लिखल छौ।" जियालाल हँसैत जवाब देलखिन- "ठीके कहलीही भाय, हमरा भागमे सुख नै लिखल अछि।" ई गप-सप्प गेनालाल आ जियालालक बीच भूतहा चौकपर चाहक दोकानमे होइत रहइ। गेनालाल आ जियालाल हाइ स्कूलसँ लऽ कऽ कौलेज धरिक संगी। गेनालालक घर झिटकी गाममे जखैन कि जियालालक घर नवटोली गाममे। दुनू गोरेक छठा किलाससँ एगारहम किलास धरि बनगामा हाइ स्कूलमे संगे पढ़लैथ। संगे मैट्रिक पास केलैन। मैट्रिक पास केला पछाइत दुनू गोरे निर्मली कौलेजमे इन्टरमे नाओं लिखौलैन। निर्मली कौलेजमे बी.ए. धरि दुनू गोरे संगे पढ़ला। गेनालाल पास कोर्सक विद्यार्थी छला जखैन कि जियालाल अंग्रेजी आनर्सक छात्र। बी.ए. पास केला पछाइत गेनालाल नौकरीक लेल परियास करए लगला।मुदा तीन बर्ख धरि परियास केला बादो जखन नौकरी नहि भेलैन तँ खेती-गृहस्तीमे भीर गेला। ओ अपना बापक एकलौता बेटा। पाँच बिघा जोतसीम जमीनक मालिक। ऊपरसँ गाछ-कलम-बाँस-पोखैर सभ किछु। नौकरी नहियोँ भेलापर गुजर-बसरमे कोनो दिक्कत नहि होइन। गेनालालकेँ दूटा बेटेटा। जे मैट्रिक केला पछाइत दिल्लीमे काज करै छैन आ दरमाहा भेटलापर अपन खर्चा राखि बापक बैंक-खातामे पठा दइ छैन। बेटा सबहक कमाइ आ खेतक उपजासँ गेनालाल आनन्दपूर्वक जिनगी बितबै छैथ। सुखक जिनगी बितबैक कारण ई जे परिवार छोट छैन। दुनू बेटा अखन अविवाहिते छैन जे दिल्ली खटै छैन। घरपर मात्र अपने आ पत्नी। खेतो सभ मनकूतपर लगौने छैथ। हँ, दूध खाइ वास्ते एकटा दोगला गाए जरूर पोसने छैथ। गेनालाल अपना बेटा सभकेँ मैट्रिकसँ आगाँ ऐ दुआरे ने पढ़ौलखिन जे पढ़ल-लिखल आदमीकेँ नौकरी नै भेटलापर समाजमे जे दुरगैत होइए से देखैत छथिन। जखन कि कम्मो पढ़ल-लिखल लोक दिल्ली, मुम्बइ, कलकत्तामे प्राइवेटो नौकरी कऽ शानसँ अपन जिनगी बितबैत अछि। मुदा जियालालक सोच ऐसँ बिलकुल भिन्न छैन। हुनकर कहब ई जे जइ पढ़ल-लिखल बेकतीमे टाइलेन्ट रहत ओ विद्यार्थीके ट्यूशनो पढ़ा अपन जिनगी शानसँ चलौत। पटनामे एकसँ एक कोचिंग संस्था अछि जेकर आमदनी लाखोमे अछि। जियालाल सीमान्त किसानक बेटा। हुनका बाबूजीकेँ मात्र अढ़ाइ बीघा खेत। जियालाल दू भाँइ। जेठ जियालाल अपने आ छोट पन्नालाल। पन्नालाल जखन मैट्रिकमे पढ़ैत रहैथ तखने हुनकर पिताजी परलोक चल गेला। मुदा पन्नालालकेँ पिताजीक स्वर्गवासक बादो पढ़ाइ-लिखाइमे कोनो दिक्कत नै भेलैन। जेठ भाय जियालाल ट्यूशन पढ़ा छोट भाएकेँ माने पन्नालालकेँ एम.ए. धरि पढ़ौलकैन। एम.ए. पास केलाक तीनियेँ मासक पेसतर पन्नालालक बहाली शिक्षा मित्रक पदपर भऽ गेलैन।शिक्षा मित्रमे बहाल भेलाक दू मासक भीतर पन्नालालक बिआह एकटा डीलरक बेटीसँ भेलैन। जियालाल अंगेजी आनर्सक संग बी.ए. केला पछाइत नौकरीक लेल काफी परियास केलखिन मुदा सफलता नइ भेटलैन। जइ समैमे सरकार शिक्षा मित्रक बहाली केलक ओइ समैमे जियालालक उमेर चालीस पार कऽ गेल रहैन। तँए शिक्षा मित्रमे बहाली होइसँ वंचित रहि गेला। जखन सरकार शिक्षा-मित्रकेँ मानदेय पनरह साएसँ बढ़ा कऽ चारि हजार कऽ देलकैन आ एगारह मासक नौकरीकेँ साठि बर्खक उमर धरि स्थायी कऽ देलकैन तँ पन्नालालक पत्नी अपना दुल्हाकेँ सिखा-पढ़ा परिवारमे भीन-भिनौज करा देलकैन। जखैन जियालाल आ पन्नालालमे भीन-भिनौजी भऽ गेलैन तँ जियालालकेँ एक बिघा जोतसीम खेत आर घराड़ी आ कलम-गाछी मिला कऽ पाँच कट्ठा हिसा भेल रहैन। हुनकर पाँच गोरेक परिवार। जेठ दूटा बेटी तैपर सँ एकटा बेटा आ दू परानी अपने। एक बिघा जेातसीम खेतसँ जखन परिवारक गुजर-बसरमे कठिनाइ होमए लगलैन तँ जियालाल ट्यूशन पढ़ाबैपर बेसी जोर देलखिन। ओना तँ दस बर्ख पहिनहिसँ निर्मलीमे एकटा कोचिंग संस्थामे अंग्रेजी पढ़बैत रहैथ। कोचिंग आ ट्यूशनक कमाइसँ जियालाल अपन दुनू बेटीकेँ पढ़ा-लिखा कऽ बिआह कऽ देलखिन। दुनू बेटियो आ जमाइयो टी.इ.टी. पास कऽ शिक्षकमे बहाल छैन। एकटा बेटाकेँ नीक पढ़ाइ खातिर पटना बी.एन.कौलेजमे नाओं लिखौने छेलखिन। बेटो विवेक पढ़ैमे चन्सगर। ओ पटना विश्वविद्यालयसँ मैथिलीमे एम.ए. कऽ प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीमे लागल छथिन। आइ फेर गेनालालक भेँट भूतहा चौकपर चाहक दोकानपर जियालालसँ भऽ गेल। गेनालाल चाहक दोकानपर पहिनेसँ बैसल रहैथ। जखन जियालाल निर्मलीसँ टीशन पढ़ा भूतहा चौकपर एला तँ चाह पीबैले चाहक दोकानक आगूमे साइकिल ठाढ़ करिते रहैथ कि गेनालालक नजैर जियालालपर पड़लैन, ओ बजला- "कह भाय, समाचार। आबो धरि वएह पुरनका साइकिलपर चढ़ै छेँ। रौ पूरा दुनियाँ सुधैर जेतै मुदा तूँ नहि सुधरबेँ। हे मरिहेँ ने तँ सभ किछ लाधि कऽ नेने जइहेँ। पचपन-छप्पनक उमेरमे ऐ कठही साइकिलपर चढ़ै छेँ। रौ तोरा बुझाएब आ दिल्ली पएरे जाएब बरबैर अछि। आ-आ चाह पीब ले।" जियालाल हँसैत कहलकैन- "तोहर जे बेटा कमा-कमा पाइ पठा दइ छौ ने तँए तोँ मोछमे घी लगबै छेँ।" तैपर गेनालाल बजला- "आब तँ तोरो बेटाक पढ़ाइ खतम भऽ गेल छौ। तोँ तँ तेसरे साल कहने रहँ जे विवेक पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए.मे फस्ट क्लाससँ उतीर्ण भेल हेन।" ई गप-सप्प होइते रहए कि एकटा स्कारपियो गाड़ी आबि चाह दोकानक बगलमे रूकल। ड्राइवर गाड़ीसँ निकैल बीचला गेट खोललक। एकटा युवक गाड़ीसँ निच्चाँ उतरल। ओ पैन्ट-कोर्ट-टाइ लगौने रहए। जखने ओइ युवकक नजैर जियालालपर गेलैन ओ दुनू हाथे पएर छुबि हुनका गोर लगलकैन। "बौआ विवेक! अच्छा काकाकेँ गेार लगहुन।" गेनालाल दिस इशारा करैत जियालाल बजला। विवेक गेनालालोकेँ पएर छुबि गोर लगलकैन आ बजला- "बाबूजी, हमर चौथे दिन ट्रेनिंग खतम भऽ गेल। परसू बीरपुर डी.एस.पी. पदपर योगदान केलौं हेन। काल्हि पटनामे मीटिंग छल। अखन पटनेसँ बीरपुर जा रहल छी। ऐ ठाम एलौं तँ मनमे भेल भऽ सकैए बाबूजी निर्मलीसँ घूमल हेता।" गेनालालक बोलती बन्द। ओ कखनो जियालालकेँ देखैथ तँ कखनो विवेककेँ आ कखनो ओइ स्कारपियो गाड़ीकेँ। जियालाल विवेकसँ पुछलखिन- "माएसँ असिरबाद लेबए कहिया अबै छहक।" तैपर विवेक कहलकैन- "मनमे तँ रहए जे पटनासँ घुमतीमे अहाँ सभसँ आर्शीवाद लऽ लेब मुदा दरभंगेमे रही तँ बीरपुरक एस.डी.ओ. साहैब फोन केलैन। ओ कहलैन जेतेक जल्दी बीरपुर पहुँच सकी पहुँचू। तँए बीरपुर जल्दी पहुँचब जरूरी भऽ गेल। रबि दिन गाम आबि रहल छी।" ई कहि ओ जियालाल आ गेनालालकेँ गोर लागि गाड़ीमे बसि कऽ चलि गेला। गेनालाल बजला- "भाय जियालाल, तोहर कठही साइकिलक मान रहि गेलौं। तोहर बेटा पढ़ि-लिख कऽ डी.एस.पी. भऽ गेलौ। वाह भाइ वाह!" तैपर जियालाल बजला- "भाय हमर बेटा कि तोहर बेटा नइ छियौ।" ई सुनि गेनालाल, जियालालकेँ भरि पाँज कऽ पकैड़ छातीसँ लगा लेलखिन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नन्द विलास रायक चारिटा कथा आ एकटा एकांकी जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नन्द विलास रायक चारिटा कथा कथा ३ भार रामनगर गाम। भोरुका समय। सात बजैत। लालबाबू आओर हुनकर बहनोइ नूनूबाबू दुनू गोरे दतमैन कुर्रा-आचमन कऽ दलानपर बैसबे केला कि लालबाबूक पुतोहु अंजली दू गिलास पानि आ दू कप चाह एकटा ट्रेमे नेने पहुँचली। जखने लालबाबूक नजैर अंजलीपर गेलैन कि ओ झमान भऽ कऽ खसला। हुनक मुँहक चुहचुही जेना बिलाए गेलइ। ओ उदास भऽ गेला। अंजली सफेद वस्त्र पहिरने, ने हाथमे चूरी आ ने गरदैनमे मंगलसूत्र आ ने मांगमे सेनूर। चेहरापर उदासी। उमेर लगधक 22-23 बर्ख। लालबाबू अंजलीसँ पुछलखिन- "सासु-माँ, ऑंगनमे नै छेली?" तैपर अंजली बड़ असथिरसँ बजली- "मॉं नहा रहली हेन।" लालबाबू बजला- "ठीक छै ट्रे टेबुलपर रखि दहक आ जा दूटा पान लगौने आबह।" दुनू सार-बहनोइ पानि पीब चाह पीबए लगला। कनेक कालक बाद अंजली एकटा तश्तरीमे दू खिल्ली पान, सुपारी, जर्दा आ पत्ती दऽ गेली। अंजलीकेँ गेला बाद नूनूबाबू बजला- "भगवानो बड़ बेइमान छथिन। कनियॉंक संग बड़ अन्याय केलखिन..!" तैपर लालबाबू बजला- "हमरे संगे भगवान कोन न्याय केने छैथ। एकेटा बेटा छेलए ओकरो दुनियासँ उठा लेलैन। आइ जँ एकटा बेटियो रहैत तँ संतोख करितौं। चिन्ता तँ ऐ बातक अछि जे हमरा दुनू परानीकेँ दुनियासँ गेला बाद ऐ अबलाकेँ की हेतइ..!" बजैत-बजैत लालबाबूकेँ बुकौर लगि गेलैन आ ऑंखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलैन। नूनूबाबू लालबाबूकेँ तोष दैत कहलखिन- "की करबै भैया होनीकेँ के टारि सकैत अछि। रहलै बात कनियाँक तँ ऐ विषयपर गम्भीरतासँ विचार करए पड़त। अहाँ कानू जुनि। ऐ विषयपर विचार करू जे की केलासँ कनियाँक जिनगी खुशीसँ कटतइ। अखन हम जाइ छी, परसू रबि छी। परसू आबि कऽ ऐ समस्यापर दुनू गोरे विचारब।" लालबाबू बजला- "जलखै खा लिअ तखन जाएब।" तैपर नूनूबाबू कहलखिन- "नै भैया अखन जलखै नै करब। गामपर जाएब स्नान करब आ खेनाइ खा दोकानपर जाएब। दस बजे तक दोकान खोलि देब।" ई कहैत ओ साइकिल लऽ विदा भऽ गेलाह। नूनूबाबूकेँ गेलाक बाद लालबाबू सोचमे डुमि गेला। हुनका दू बर्ख पहिनुका सभ बात मोन पड़ि गेलैन। केतेक धुमधामसँ विवेकक बिआहक बरियाती साजने रही। पनरहटा चारिचक्का गाड़ी आ मयूर नाचक संग बैंड बाजा रहए। बरियातीमे सामिल युवक सभ बैंड बाजापर खूब नाचल रहए। लड़कियोबला जान उपैछ कऽ खर्च केने रहैथ। केहेन भव्य पण्डाल लगौने रहए तइमे रोशनीक केतेक नीक बेवस्था रहइ। खानो-पान की कोनो आजी-गुजी रहए। दरभंगासँ कारीगर मंगा कऽ खेनाइ बनबौने रहैथ। वैष्णवक लेल अलग बेवस्था आ सॉंकट सभ लेल भीन बेवस्था। बरियाती सबहक भव्य स्वागत भेल रहैन। हमहूँ की कोनो एकटा छेदामो दहेज नेने रहिऐ जे नीक बेवस्था नै करैत। हमरा तँ मोनो रहए जे कम-सँ-कम दुल्हिनक सभ गहना बेटीबला दौउ। मुदा हमर बेटा विवेक मना कऽ देलक। ओ बाजल जे बाबूजी हम अपने आर्मीमे नौकरी करै छी। कहुना खा-पीब कऽ पचास हजार टका भऽ जाइए। दस-बारह बीगहा जमीनो अछिए। तखन दहेज लऽ कऽ की करब। बिना दहेजक बिआह करि मैथिल समाजमे एकटा नजीर पेश करब। बेटाक विचारपर हमरा गर्व भेल। आ हम बिना एक्को पाइ नेने बिआह करए लेल तैयार भऽ गेलौं। बड़ बढ़ियॉं जकाँ बिआह सम्पन्न भेल। दोसर दिन कनियॉंक विदागरी करा गाम एलौं। फर्नीचरसँ लऽ कऽ सखारी-पेटारी दूटा पीकप गाड़ीमे आएल। कनियॉंक रूप-रंग देख विवेकक माए केतेक खुश भेल छेली। सभ मेहमान खेनाइ खा नेने रहैथ। हम आ विवेक खेनाइयो खाइत रही आ टी.भी.मे समाचारो देखैत रही। तखने टी.भी.मे समाचार आएल- "कारगिलमे पाकिस्तानी फौज भारतीय भू-भागपर कब्जा कर लिया है। इसलिए सभ सैनिकों की छुट्टी रद्द करते हुए तुरन्त कामपर आपस लौटने का आदेश दिया गया है।" समाचार देख कऽ विवेक खेनाइपर सँ उठि गेल आ देवालमे टॉंगल घड़ी दिस तकलक। हम पुछलिऐ- "मर्र! की भऽ गेलह जे खेनाइपर सँ उठि गेलह।" विवेक बाजल- "बाबूजी समाचार तँ अहूँ देखबो आ सुनबो केलिऐ। हमरा आब एक पल भी रूकनाइ उचित नहि हएत। नअ बजैत अछि। साढ़े नअ बजे झंझारपुरमे ट्रेन अछि। वएह ट्रेन पकैड़ निकैल जाएब। जेतेक जल्दी भऽ सकत वोर्डरपर पहुँचबाक कोशीष करब।" हम आ ओकर माइक अलाबे बिआहमे जेतेक सर-कुटुम आ घी-स्वासीन आएल रहैथ सभ विवेककेँ समझौलक जे कम-सँ-कम आइ राति रूकि जा, भोरे अपना ड्यूटीपर चलि जहिहह। मुदा विवेक एकेटा बात बाजल- "भारत माताक अस्मिताक सबाल अछि। तँए अपने लोकैनक बात नै मानि रहल छी। ऐ लेल क्षमाप्रार्थी छी।" ई कहैत ओ हमरा सभकेँ गोड़ लागि विदा भऽ गेल। विवेकक ममियौत भाय ओकरा फटफटियासँ झंझारपुर टीशन पहुँचा आएल। विवेककेँ गेलाक एक सप्ताह बाद झंझारपुरसँ आबि कऽ दलानपर बैसले रही तखने चारि-पॉंचटा चरिचक्का गाड़ी आबि दलानक आगॉं सड़कपर रूकल। एकटा गाड़ी झंझारपुर थानाक सेहो रहइ। ओइ गाड़ीसँ झंझारपुर थानाक थाना प्रभारी उतरला आ बजला- "लालबाबू ठाकुर आप है?" हम कहलिऐ- "जी सर, हमहीं छी लालबाबू ठाकुर। की बात?" थाना प्रभारी बजला- "आपका बेटा फौजमे नौकरी करता था।" हम कहलिऐ- "जी सर। साते-आठ दिन तँ ओकरा गेना भेल हेन।" थाना प्रभारी बजला- "आपका बेटा कारगिलमे शहीद हो गया है।" ताबेतमे एकटा पीकप गाड़ीपर सँ किछ पुलिस एकटा मंजूषा उतारि कऽ खोललक। ओइमे तिरंगा झंडामे लटपटाएल विवेकक लाश रहए। जंगलक आगि जकॉं ई समाचार पूरा गाममे फैल गेल। मरद, जनिजातिक संग धिया-पुताक करमान लागि गेल। हम किंकर्त्तव्यविमूढ़ भऽ गेलौं। ई समाचार जखन अँगना पहुँचल तँ विवेकक माए पछाड़ खा गिर गेली। हुनका दॉंती लागि गेलैन। गामक जनिजाति सभ हुनकर दॉंती छोड़ेलकैन। विवेकक कनियॉं अंजली भरि पॉंज सासुकेँ पँजिया चिचियाए लगली। किछ जनिजाति सभ कनियॉंकेँ बोल-भरोस दिअ लगली। मधुबनी जिलाक पुलिस अधीक्षक हमरा कहलैन- "अंकल आपको गर्व होना चाहिए। क्योंकि आपका लाल मातृभूमि के रक्षा के लिए शहीद हुआ है।" हम कनियाँ आ अपन पत्नीक हालत देख कऽ अपनाकेँ सम्हारलौं। हम एस.पी. साहैबकेँ कहलयैन- "हजूर दुख एकेटा बातक अछि जे हमरा दोसर बेटा नै अछि। जँ दोसर बेटा रहितए तँ देशक रक्षा खातिर ओकरो फौजमे भर्ती कराबितौं।" हमर बात सुनि एस.पी. साहैब हमरा सैल्यूट मारने रहैथ आ बाजल रहैथ- "सर, मैं आपके जज्वाको हजार बार नमन करता हूँ। हुनके सबहक उपस्थितिमे विवेकक दाह-संस्कार सम्पन्न भेल।" अंजलीक नैहरसँ ओकर पिताजी आ बड़ भाय आएल आ अंजलीकेँ नैहरा लऽ जेबाक लेल हमरासँ आग्रह केलैथ। हम कहलयैन- "जँ अंजली नैहरा जाएत तँ लऽ जाइयौन। हमरा तरफसँ कोनो किन्तु-परन्तु नै अछि।" मुदा अंजली नै गेली। हम आ हमर पत्नी केतबो समझौलियै जे जा, किछु दिन नैहरामे रहि आबह। जखने मोन हेतह चलि अबिहह। मुदा अंजली नैहरा नै गेली। "यै जलखै नेने आबी?" लालबाबूक पत्नी- चन्द्रकला दलानक निच्चाँसँ बजली। तखन लालबाबू अतीतसँ निकैल वर्तमानमे एलाह। पत्नी पुछलकैन- "की सोचैत रहिऐ। तीन-चारि बेर हाक देलौं तखन जा कऽ अहाँक भक् खुजल।" लालबाबू बजला- "दू बर्ख पहिलुका बात मोन पड़ि गेल रहए।" तैपर चन्द्रकला बजली- "आब पिछलका बात सोचि कऽ की हएत। सोचबाक अछि तँ कनियॉंक बारेमे सोचियौ। ओकर पहाड़ सन जिनगी केना कटतइ।" लालबाबू बजला- "कनियॉंकेँ देखै छी तँ बड़ पीड़ा होइत अछि। अखने नूनूबाबू पाहुन गेला हेन। ओहो यएह बात कहै छला। कहलैथ जे रबि दिन अबै छी तँ ऐ बातपर विचार करब। कनेक लगमे आऊ एकटा विचार पुछऽ चाहै छी।" चन्द्रकला लग आबि पुछलखिन- "कहू की पुछए चाहै छी।" लालबाबू बजला- "हम सोचै छी जे कनियॉंकेँ दोसर बिआह कऽ दिऐ।" चन्द्रकला बजली- "हमहूँ तँ यएह सोचै छी। मुदा जाति-समाज मानत। बड़का बखेड़ा ठाढ़ कऽ देत। दोसर, कनियॉं सेहो मानत कि नहि।" लालबाबू बजला- "हमरा जाति-समाजक कोनो डर नै अछि। जे हेतै से देख लेब। अहाँ कनियॉंकेँ समझाबियौ। जँ ओ बात मानि जाएत तँ जेतेक खर्च करए पड़ए, एकटा योग्य लड़का खोजि कऽ बिआह कऽ देब।" चन्द्रकला बजली- "लड़का तँ सोझहेमे अछि। परसु आएलो रहए।" लालबाबू बजला- "के छी ओ लड़का। कनी फरिछा कऽ कहू ने।" चन्द्रकला बजली- "अहींक भागिन आलोक। परसू आएल रहए। कहैत रहए जे अही सप्ताहमे बहालीक चिट्ठी निकलत।" लालबाबू बजला- "आलोक बिआह करए लेल राजी हएत तखने ने।" चन्द्रकला- "अहाँक बात ओ मानि जाएत। किएक तँ मैट्रिक धरि ओ अपने ऐठाम रहि कऽ पढ़लक हेन। हमरा बिसवास अछि, ओ अहाँक बात नै काटत।" लालबाबू बजला- "से तँ बी.एड. करैले सेहो पच्चास हजार टका देने रहिऐ। आलोक कहने रहए कमाए लगब तँ दोबर लगा कऽ पैसा आपस कऽ देब।" ई गप-सप्प होइते रहए तखने साइकिलसँ आलोक आएल आ लालबाबू आ चन्द्रकलाकेँ गोड़ लगलक। लालबाबू बजला- "आबह! आबह! बहुत दिन जीबह। अखने तोरे चर्च करैत रहिहह। कहऽ बहालीबला चिट्ठी भेटलह।" आलोक बाजल- "हँ मामाजी। आइये भोरमे डाकपिउन चिट्ठी दऽ गेल हेन। अहीं गामक हाइ स्कूलमे बहाली भेल हेन। आइ नीक दिन छी तँए आइये योगदान करब। सोचलौं जे मामा-मामी हमरा लेल एतेक केलैन पहिने हुनका सबहक आशीर्वाद लेब तखन ज्वाइन करब।" चन्द्रकला बजली- "भगवान नीक करथुन।" आलोक बाजल- "मामा जाबे कोनो दोसर बेवस्था नै भऽ जाएत ताबे अहीठाम रहि कऽ स्कूल करब।" लालबाबू बजला- "ऐमे दोसर बेवस्थाक कोन खगता छै, जाबे धरि रामनगर हाइस्कूलमे रहबह, अहीठाम रहि कऽ स्कूल करहीअ। हमरा की कोनो बेटा-बेटी अछि। एकटा पुतोहु अछि। सोचै छी ओकरो कोनो रस्ता लगा दिऐ। तोरे बेटा बुझबह। जेहने बेटा तेहने भागिन।" आलोक बाजल- "मामा हमहूँ बेटा बनि कऽ अपने सबहक सेवा करब।" लालबाबू बजला- "अच्छा पहिने जलखै कऽ लएह आ स्कूल जा कऽ योगदान दऽ आबह।" आलोक बाजल- "मामा हम स्नान-जलखै कऽ नेने छी। हँ, टिफिनमे आबि कऽ खेनाइ खा जाएब। चारि बजे आपस गाम चलि जाएब। काल्हि दस बजेमे बोरिया-बिस्तर लऽ कऽ आएब।" लालबाबू आ चन्द्रकला एक्के बेर बजली- "बड़ बढ़ियॉं।" आलोक चल गेला। लालबाबू बजला- "अहाँ रातिमे कनियॉंकेँ समझाबियौ, जँ ओ मानि जेती तँ हम आलोकसँ बात करब। हमरा पूरा विश्वास अछि आलोक हमर बात नै टारत।" चन्द्रकला बजली- "ठीक छै। हम कनियॉंसँ बात करबै।" रातिमे जखन दुनू सासु-पुतोहु खेनाइ खा निचेन भेली तँ चन्द्रकला अंजलीसँ कहलखिन- "बेटी हम अहाँसँ किछ कहऽ चाहै छी। जँ मनमे दुख नै हुअए तँ कही।" तैपर अंजली बजली- "मॉं एहेन कोन बात छै जे अहाँ कहब तँ हमरा मनमे दुख हएत। ऐ दुनियॉंमे अहाँ सभकेँ छोड़ि हमरा के अछि। हमर माइयो-बाप दुनियॉंसँ चलिये गेला।" ई कहि अंजली कानए लगली। चन्द्रकला बजली- "बेटी कानू जुनि। हमर बात धियानसँ सुनू। बाबूजी कहै छला जे कनियॉं एहेन पहाड़सन जिनगी केना काटती।" अंजली बजली- "मॉंजी, हमरा भाग्यमे जे लिखल छल से भेल। दोसर उपाइये की अछि।" चन्द्रकला बजली- "बेटी उपाय तँ छै, मुदा अहाँ मानी तब...।" अंजली बजली- "की उपाय छै मॉं, कनी फरिछा कऽ कहु ने।" चन्द्रकला अंजलीक माथपर हाथ फेरैत बजली- "बेटी, हम आ अहाँक बाबूजी चाहै छी जे कोनो योग्य लड़कासँ अहाँक बिआह कऽ दी।" तैपर अंजली कनैत बजली- "मॉंजी, हमरासँ कोन एहेन गलती भऽ गेलैन जे अहाँ सभ हमरा ऐ घरसँ भगबए चाहै छी। नहि माँजी नहि, हमरा अहाँ सभ अपने चरणमे जगह देने रहू।" ई कहैत अंजली आओर कानए लगली। चन्द्रकला समझाबैत बजली- "नै बेटी अहाँसँ कोनो गलती नै भेल हेन। आ ने ऐ घरसँ हम सभ अहाँकेँ भगबए चाहै छी। अहाँकेँ हम सभ पुतोहु नै बुझि अपन बेटी बुझै छी। कहू बेटीक दुख कोनो भी माए-बाप देख सकैत अछि?" अंजली बजली- "मॉं, हमरा भाग्यमे पतिक सुख लिखल रहैत तँ हमर पति हमरे लग ने रहितए। ओ किएक भगवानक घर चल गेला।" चन्द्रकला बजली- "देखू बेटी, जे भऽ गेलै तेकरा बिसैर जाऊ आ जे कहै छी तैपर विचार करू। हम सभ अहीं वास्ते ने कहै छी। कहू हमरा दुनू परानीक बाद अहाँकेँ देखएबला के रहत। हम सभ पाकल आम भेलौं। कखन डारिसँ खसि कऽ धरतीपर अबि जाएब तेकर कोन ठेकान।" अंजली- "नहि मॉंजी, अहाँ सभकेँ होइत अछि जे अंजलीसँ कोनो उन्नैस-बीस ने भऽ जाए। तँए अहाँ सभ हमरा अपनासँ अलग करए चाहै छी।" चन्द्रकला- "नै बेटी से बात नहि अछि। अच्छा आब सुति रहू, बड़ राति भऽ गेल। काल्हि भोरमे बात करब।" दोसर दिन भोरमे लालबाबू चाह पीबए अँगने एला। ओना, आन दिन ओ दलानेपर चाह पीबै छला। मुदा आइ अंजलीसँ किछु गप करए चाहै छला। जखन लालबाबू ऑंगन एला तँ पत्नी चन्द्रकला एक गिलास पानि आनि कऽ देलकैन आ पुतोहुसँ कहलखिन- "बेटी, बाबूजीले चाह नेने अबियौन।" अंजली चाहक गिलास नेने एली आ लालबाबूक हाथमे चाहक गिलास दैत बजली- "बाबूजी, हमरासँ कोन अपराध भऽ गेलैन जे अपने सभ हमरा अलग करए चाहै छैथ।" अंजली कानए लगली। लालबाबू बजला- "नै बेटी, अहाँसँ कोनो अपराध नै भेल हेन।" अंजली- "तखन मॉं किएक हमरा पाछॉं हाथ धोइ कऽ पड़ल छथिन?" लालबाबू बजला- "एकटा बात कहू तँ बेटी, हम सभ अहाँकेँ बेटी बुझै छी कि पुतोहु?" अंजली बजली- "से तँ अपने सभ हमरा बेटी बुझै छी। आ बेटीए जकॉं बेवहारो करै छी।" लालबाबू बजला- "तखन अहीं कहू जे कियो माए-बाप अपना बेटीक दुख देख सकत? देखू बेटी, अहाँ अपना खुशी खातिर नै तँ हमरे दुनू गोरेक खुशी खातिर हमरा सबहक बात मानि लिअ। हमरा सबहक माथसँ भार उताइर दिअ।" बजैत-बजैत लालबाबू कानए लगला। हुनका ऑंखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलैन। लालबाबूकेँ कनैत देख अंजली सेहो कानए लगली। ओ कनैत बजली- "बाबूजी, हमरा सोचैले किछु समय दिअ।" तैपर लालबाबू बजला- "बेटी, नीक जकॉं सोचि लअ। हम सभ कोनो बेजए बात नै कहै छी।" अंजली रातिमे जखन सुतए गेली तँ हुनका निन्ने ने होइन। ओ सोचए लगली। अखन बीसे-बाइस बर्ख उमेर भेल हेन। एटेटा पहाड़ सनक जिनगी केना बिताएब। सासु-ससुरक मरलाक बाद हमरा के देखभाल करत। अपन माए-बाप बेटियेक सोगे सोगा कऽ दुनियॉंसँ चल गेला। भाय-भौजाइ केकर दुनियॉंमे भेलैए जे हमर हएत। अखन नब-धब छी तँए लोक किछ नै बजैत अछि। काल्हि रंग-रंगक अबलट्ट लगाएत। जीअब हराम कऽ देत। मोन पड़लैन नैहराक बात। खुटौनावालीक पति दिल्लियेमे सड़क दुर्घटनामे मरि गेलइ। ओकरा दूटा बालो-बच्चा छइ। तीस-बत्तीस बर्ख उमेरो हेतइ। ओ सासुरेमे रहि गेल। किछु दिनक बाद गाममे हवा उड़लै जे खुटौनावाली दीअर संगे फँसल अछि। एकबेर ओकरा पेटमे दरद उखरलै। गाम-घरक डॉक्टरसँ देखौलक मुदा ठीक नै भेलइ। लोक सभ कहलकै जे सभसँ नीक दरभंगे चलि जाए। ओतए अल्ट्रासाउन्ड करा लिहह सभ पता चलि जेतह। ओ दीअरकेँ संग कऽ इलाज कराबऽ दरभंगा गेल। एमहर गाममे हवा उड़लै जे खुटौनावाली बच्चा गिरबैले दरभंगा गेल हेन। अंजली आगॉं सोचलक जे घटना खुटौनावाली साथे भऽ रहल छै काल्हि हमरो साथे भऽ सकैए। दोसर बात ई सोचलक जे के कहलक काल्हि हमरासँ कोनो उन्नैस-बीस घटना भऽ जाए तँ दुनू कुलक नाक कटि जाएत...। अंजलीक एक मन कहै जे सासु-ससुरकक बात मानि ली। दोसर मन कहै सासु-ससुरक बात मानि जे दोसर बिआह करब तँ जाति-बेरादरी बड़का बखेड़ा ठाढ़ करत। फेर मन कहै जे नैहरक लोक कहत जे छौरीकेँ जवानी बरदास नै भेलै तँए दोसर बिआह कऽ लेलक। सएह बात सासुरोक लोक कहत। की करी की नहि। फेर मनमे होइ जे सभसँ नीक जे माहूर खा कऽ मरि जाइ। फेर सोचए जे मरियो जाएब तँ लोक किछ-ने-किछु अबलट्ट लगाइये देत..! यएह सभ सोचैत-सोचैत अंजली नीन्न पड़ि गेल। सपनामे देखलक जे पति विवेक एला हेन। ओ तिरंगा झंडा हाथमे नेने छैथ। अंजली हुनका गोड़ लगलकैन। तैपर विवेक आर्शीवाद दैत कहलखिन- खुश रहू। अंजली विवेकसँ कहलखिन- हम खुश केना रहब। अहाँ तँ हमरा लगसँ भगवानक घर चल गेलौं। हम तँ विधवा भऽ गेलौं। कहू तँ विधवो केतौ खुश रहल हेन। तैपर विवेक बाजल- देखू अंजली, अहाँ हमरा माए-बाबूक बात मानि लिअ। माए-बाबू अहाँक हालत देख बड़ दुखी छैथ। दोसर बात अखन अहाँक पहाड़सन जिनगी काटैक अछि। बादमे लोक रंग-रंगक अबलट्ट लगाएत। तेसर बात जाधैर अहाँ दोसर बिआह नै कऽ लेब हमरा आत्माकेँ शान्ति नै भेटत। हमर आत्मा भटकैत रहत। कहू अंजली अहाँ हमरा आत्माकेँ शान्ति चाहै छी कि नहि। तैपर अंजली कनैत बजली- हँ चाहै छी। विवेक बाजल- तखन माए-बाबूक बात मानबै ने? अंजली कनैत बजली- हँ मानब। अच्छा हम जाइ छी। अहाँ अपना बातपर कायम रहब। विवेक चलि गेला। "कनियॉं! कनियॉं!! की भेल किए कनै छी।" चन्द्रकला अंजलीकेँ देह पकैड़ डोलबैत पुछलखिन। अंजलीक नीन टुटि गेल। "नहि मॉं कहाँ कनै छी। एकटा सपना देखै छेलिऐ।" -अंजली बजली। चन्द्रकला- "एह, अहाँ तँ खूब कानै छेलिऐ। अच्छा कहू सपनामे की देखलिऐ जे एना कनै छेलौं।" अंजली सपनाक सभ बात सासुकेँ बता देलकैन। भोरमे चन्द्रकला रौतुका सभ घटना लालबाबूकेँ बता देलखिन। तैपर लालबाबू पुछलकैन- "कनियासँ पुछलयैन नै जे आब की करती। अपना सबहक बात मानती कि नहि?" चन्द्रकला बजली- "हम तँ नै पुछलयैन हेन, मुदा हमरा बिसवास अछि जे रौतुका सपनासँ ओ अपन सबहक बात मानि जेती। चलू अँगनेमे चाहो पियब आ पुछियौ लेबइ।" लालबाबू बजला- "अहाँ चलू हम दतमैन केने अबै छी।" दतमैन-कुल्ला-आचमन कऽ लालबाबू अँगना एला। चन्द्रकला अंजलीसँ कहलखिन- "बेटी बाबूजी-ले चाह बना दियौन।" अंजली चाह बना कऽ लालबाबूकेँ देमए एलखिन तँ लालबाबू चाहक कप पकड़ैत पुछलखिन- "बेटी, हमरा गपपर अहाँ की सोचलिऐ?" अंजली बजली- "बाबूजी, अपने सबहक जे आदेश हेतै, पालन करब मुदा हमरो एगो शर्त्त अछि।" लालबाबू बजला- "बाजू, अहाँक कोन शर्त्त अछि।" अंजली बजली- "अपने हमरा जइ लड़कासँ बिआह करब हुनका अहाँक बेटा बनि कऽ अहाँ सबहक सेवा करए पड़तैन।" लालबाबू कहलखिन- "हमरा अहाँक शर्त्त मंजूर अछि। एकटा बात कहू जे आलोक-दे अहाँक की विचार अछि?" तैपर अंजली बजली- "बाबूजी, हमर कोनो विचार नहि। अपनेक आदेशक पालन करब।" ऐगला दिन दस बजे दिनमे आलोक अपन बोरिया-विस्तर लऽ कऽ रामनगर मामा ऐठाम पहुँचला। सभ समान रखि ओ स्कूल चल गेलाह। आलोक प्रगतिशील विचारक युवक। ओ विवेकसँ छह मासक छोट। देखबा-सुनबामे बड़ नीक। रातिमे जखन दुनू मामा-भागिन खेनाइ खा कऽ दरबज्जापर सुतैले एला तँ आलोक बजला- "मामा जँ बिगड़ी नहि, तँ एक बात कही।" तैपर लालबाबू कहलखिन- "ऐमे बिगड़बाक कोन बात छइ। जे कहबाक छह निधोक कहह।" आलोक बाजल- "मामा, अंजली भाभीकेँ बिआह करि दियौ।" लालबाबू बजला- "के करत ओकरासँ बिआह। तोरा नजैरमे कोनो योग्य लड़का हुअ तँ कहह।" आलोक बाजल- "लड़का तँ एक-पर-एक भेटत मुदा अंजली भाभी तैयार हेती तखन ने।" लालबाबू बजला- "ई हमरापर छोड़ि दहक। अच्छा ई कहह जे तोहर की विचार छह अंजलीक प्रति?" आलोक अकचकाइत बाजल- "मामा, अहाँक बात नै बुझि सकलौं, कनी फरिछा कऽ कहू।" लालबाबू बजला- "तों अंजलीसँ बिआह कऽ सकै छह?" आलोक बाजल- "मामा, हमरा सोचबाक समय दिअ। मुदा हमरा सोचलासँ की हएत। अपने हमरा बाबूजीसँ पुछि लियौन। हुनकर केहेन विचार छैन।" लालबाबू- "ठीक छै, हम पाहुनसँ बात करबैन।" रबि दिन प्रात: आठ बजे नूनूबाबू रामनगर एला। आलोक शनियेँ दिन चारि बजे गाम चलि गेल छला। चाह पीला पछाइत गप्प शुरू केलैन। नूनूबाबू बजला- "ओइ दिन कहने रही जे कनियॉंक पहाड़सन जिनगी केना कटतइ, ऐ बातपर विचार करू।" लालबाबू- "अपनेक की विचार अछि?" नूनूबाबू- "कनियॉंक दोसर बिआह करि दियौ।" लालबाबू- "एक तँ जाति-बेरादरी ऐ प्रसंगपर बड़का बखेड़ा खड़ा करि देत। किएक तँ अपना सबहक जातिमे विधबा बिआहक चलैन नै छइ। मुदा तेकर हमरा चिन्ता नै अछि। मुदा कोनो योग्य लड़का अंजलीसँ बिआह करत?" नूनूबाबू- "किएक नै करत। ओकरामे की कमी छइ। पढ़ल-लिखल अछि। देखबा-सुनबामे सुन्नैर आ सुशील सेहो अछिए।" लालबाबू- "कमी तँ ठीके नै छइ। तब एकटा बात छै...।" नूनूबाबू- "कोन एकटा बात?" लालबाबू- "सभकेँ अपन-अपन सोच अछि। सबहक अपन-अपन विचार अछि। तखन एक बात...।" नूनूबाबू बिच्चेमे बजला- "कोन बात?" लालबाबू- "अहाँ अपना आलोकक बिआह अंजलीसँ करि सकै छिऐ?" आब तँ नूनूबाबूक बेालती बन्न भऽ गेलैन। ओ गुम्म भऽ गेला। सत् पुछू तँ ओ अकबकाए लगला। सपनोमे नहि सोचने रहैथ जे लालबाबू हमरा एहेन प्रश्न पुछि देता। लालबाबू, नूनूबाबूकेँ चुप देख आगॉं बजला- "एना चुप किए भऽ गेलौं। जाति-बेरादरीक डर होइए किने?" तैपर नूनू बाबू बजला- "नै से बात नै छइ।" लालबाबू- "तखन?" ताबेतमे नूनूबाबू अपनाकेँ सम्हारि नेने छला। बजला- "हमरा एक सप्ताह सोचैक मौका दिअ आ दोसर बात ऐ विषयपर अहाँक बहिन यानी आलोकक माएसँ सेहो विचारए पड़त किने।" लालबाबू- "ठीक छै, एक सप्ताह नै दस दिनक समय दइ छी। विचारि लेब जँ विचार भऽ जाए तँ खबर कऽ देब।" नूनूबाबू- "बड़ बढ़ियॉं।" नूनूबाबू जलखै खा कऽ गाम विदा भऽ गेला। रस्तामे सोचए लगला। कहू तँ, एहनो होइ। राह देखा तँ आगू चल। ई कोन बात भेल। हम जे कहलयैन जे कनियॉंक दोसर बिआह करि दियौ तँ लालबाबू ई ढोल हमरे गरदैनमे बान्हैले विचार करए लगला। दू-दूटा कुमारि बेटी अछि। जाति-बेरादरीबला तँ जीनाइ हराम कऽ देत आ बेटीक बिआहमे तँ भारी फिरीशानी उठबए पड़त। बाप रे बाप, लालबाबू तँ बड़का फाँसमे हमरा दिअ चाहै छैथ। बुझलिऐ, आलोककेँ पढ़बै-लिखबैमे हुनकर बड़ योगदान छैन एकर माने ई नहि ने जे ओकरा गलामे फॉंस लगा दियौ। ई सभ सोचैत गामपर पहुँचला। पत्नी सुलोचना लग एलैन तँ पतिक मुँहक सुरखीसँ बुझि गेली जे किछु ओझरीमे पड़ि गेला हेन। पुछलखिन- "मर! मन बड़ खसल देखै छी। की भेल?" तैपर नूनूबाबू बजला- "आलोकक बदली रामनगर स्कूलसँ करबए पड़त। बदलीमे तँ समय लागत, मुदा ओकर डेरा मामा ओइठामसँ हटा दोसर जगह राखए पड़त। जँ कोनो बेवस्था नै हएत तँ स्कूलेमे डेरा रखि लेत।" तैपर पत्नी पुछलकैन- "किएक, मामा ओतए रहैमे कोन दिक्कत भऽ गेलै। लालबाबू भैया अपना बेटा जकॉं मानै छथिन। वएह मैट्रिक धरि अपना घरपर रखि पढ़ेबो केलखिन आ बी.एड. सेहो करैले ढौआ देलखिन।" नूनूबाबू- "तँए ने आलोककेँ गरदैनमे फॉंस लगबए चाहै छथिन।" सुलोचना- "की फॉंस? नै बुझलौं कनी फरिछा कऽ बाजू।" नूनूबाबू- "लालबाबू चाहै छथिन जे आलोक हुनका पुतोहु अंजलीसँ बिआह कऽ लिअए।" सुलोचना- "एहेन अभगलीसँ हम अपना बेटाक बिआह करब! जे बिआह होइते सॉंएकेँ खाए लेलकै। कहू तँ ई भैयासन केहेन भेलै। जँ पुतोहुकेँ दोसरे बिआह करए चाहै छथिन तँ की दुनियॉंमे लड़काक आछन भऽ गेलै हेन जे एहेन करमजरलीहीकेँ हमरा बेटाक कपारमे साटए चाहै छथिन। की भैया अहाँसँ किछु कहलक हेन।" नूनूबाबू- "हँ, हमहीं कहलयैन जे कनियॉंक दोसर बिआह करि दियौन, तैपर बजला अहाँ आलोकक बिआह अंजलीसँ कऽ सकै छी।" सुलोचना- "अहाँ की कहलिऐ?" नूनूबाबू- "हम की कहितिऐ। हम कहलिऐ अहाँक बहिनसँ विचारि कऽ समाद पठा देब।" सुलोचना- "नहि-नहि, हम अपना बेटाक बिआह एहेन अलक्ष, हराशंखसँ नै करब।" नूनूबाबू- "आलोककेँ कहियौ अपन रहैक बेवस्था इस्कूलेपर करि लेत। लालबाबू ओतए रहब ठीक नइ हेतइ।" सुलोचना- "हँ, ठीके कहै छिऐ।" लालबाबू झंझारपुर गेल रहैथ। सॉंझमे गामपर एला तँ आलोककेँ दलानपर नै देखलैन। ओ पत्नी चन्द्रकलाकेँ पुछलखिन- "मर, आलोककेँ नै देखै छिऐ। गाम गेल हेन की?" तैपर पत्नी चन्द्रकला बजली- "नहि, गाम नइ गेल हेन। ओ अपन सभ समान लऽ कऽ स्कूलपर गेल हेन। कहलक जे स्कूलेमे डेरा राखब आ ओतै चटिया सभकेँ पढ़ेबो करब आ खाना बना कऽ खेबो करब, रहबो करब।" लालबाबू- "हूँ..! तँ ई बात छी। बुझि गेलिऐ।" चन्द्रकला- "की बुझि गेलिऐ?" लालबाबू- "पाहुनसँ पुछने रहिऐन जे अहाँ आलोकक बिआह कनियाँसँ करि सकै छी।" चन्द्रकला- "तँए आलोक अपन डेरा अतए-सँ स्कूलपर लऽ गेल हेन। माए-बाप सोचने हेतै जे मामा-मामी ओइठाम रहत तँ हो-न-हो मामा-मामीक बात मानि बिआह कऽ लिअए। तँए आलोककेँ कहलक हेन, डेरा स्कूलपर लऽ जेबा लेल।" लालबाबू- "जाए दियौ। दुनियॉं बड़ीटा छइ।" एक दिन लालबाबू चौकपर चाह पीबैत रहैथ। तखने मंगल आ जंगल अपनामे गप करैत रहए। जेकरा लालबाबू सुनए लगला। मंगल- "हौ जंगल भाय, सुनै छी लालबाबू पुतोहुकेँ दोसर बिआह करए चाहैए।" जंगल- "हँ हौ भाय। हमहूँ सुनलिऐ हेन। हे भाय, बेचारीक दोसर बिआह भऽ जेतै तँ बुझहक ओकर जीवन सुफल भऽ जेतइ। कहह, पहाड़ सन जिनगी केना काटत।" मंगल- "हौ भाय, कहलहक हेन तँ ठीके मुदा हमरा तँ होइए जे लालबाबू पुतोहुक दोसर बिआह करि अपना धन-सम्पैतक सुरक्षा चाहै छैथ।" जंगल- "की सुरक्षा, नै बुझलियह।" मंगल- "देखह जाबे धरि कनियॉं रहत ताबे धरि लालबाबूकेँ जते भी धन-सम्पैत छै सभकेँ वारिस वएह छी। लालबाबू चाहैए जे कनियॉंक दोसर बिआह कऽ सभटा धन-सम्पैत भागिनकेँ लिख दी आ बुढ़िया (लालबाबूक पत्नी) चाहैए जे किछु जमीन अपना भातीजकेँ दी...।" ई सभ बात सुनि लालबाबू छगुन्तामे पड़ि गेला। पानो नै खेलैन आ सोझहे अँगना एला आ पत्नी आओर पुतोहुकेँ तैयार होइले कहलखिन। चन्द्रकला पुछलखिन- "की बात छिऐ। हम आ कनियॉं तैयार भऽ कऽ केतए जाएब?" लालबाबू बजला- "झंझारपुर रजष्ट्री ऑफिस चलब। जेतेक जमीन-जत्था अछि सभ कनियॉंक नामे लिख देब।" तैपर अंजली बजली- "कोन एहेन बात भऽ गेलै हेन जे बाबूजी अपन सभ भार हमरा माथपर दऽ रहल छथिन?" लालबाबू- "अहाँ नै बुझबै। अहाँ दुनू गोरे जल्दीसँ तैयार भऽ जाउ, ताबे हम टेम्पूबलाकेँ बजौने अबै छी।" अंजली- "बाबूजी, अपने जे हमरा जमीन लिख देब तखन जे कियो हमरासँ बिआह करत ओ धने लेाभसँ करत। तँए हम नै चाहै छी जे अपने हमरा नामसँ जमीन लिखी।" लालबाबू- "ई बात गोपनीय रहत। खाली हम, अहाँ आ अहाँक सासु ई बात बुझती।" लालबाबू झंझारपुर जा जेतेक भी चल अथबा अचल सम्पैत छेलैन सभ अंजलीक नामे कऽ देलखिन। आब लालबाबू अंजलीक लेल लड़का खोजैमे लागि गेला। हुनका सासुरसँ सार समाद देलकैन जे एकटा लड़का छइ। ओ सासुर गेला। जखन लड़काक बारेमे पता केलखिन तँ पता चललैन जे लड़का विधुर छैथ। उमेर 45-46 बर्ख। पहिलुकी पत्नीमे एकटा बेटा आ दूटा बेटी छैन। लालबाबूकेँ तड़बाक लहैर मगजपर चलि गेलैन। सार जे समाद देने रहैन तिनका बड़ गंजन केलखिन आ बिनु खेनाइ खेने सासुरसँ चल एला। लालबाबू बड़ चिन्तित रहए लगला। हुनका मनमे रहैन जे कोनो योग्य लड़कासँ अंजलीक बिआह करी। तैसंग अंजलीक शर्त्त सेहो मन रहैन। अही तारतममे छला कि एक दिन हुनकर ममियौत भाए- श्यामजी एला। कुशल-क्षेम भेल। लालबाबू कहलखिन जे आइ रूकि जाउ। रातिमे किछु गप्प करबाक अछि। श्यामजी रूकि गेला। रातिमे लालबाबू श्यामजीकेँ अंजलीक वियाहक चर्च केलखिन। संगे अंजलीक शर्त्त सेहो कहलखिन। लालबाबू श्यामजीकेँ कहलखिन- "जँ अहाँक नजैरमे कोनो लड़का अछि तँ कहू। लड़का योग्य आ सुशील हेबाक चाही। धन-सम्पैत नहियोँ होइ तैयो कोनो बात नहि।" श्यामजी कहलकैन- "हमरा गाममे एकटा लड़का छै। नाओं छिऐ विकास, मुदा अछि बड़ गरीब। माए मसोमात छथिन। ओना, लड़का एम.ए. पास कऽ शिक्षा मित्र छैथ। लड़का बड़ सज्जन आ सुशील छैथ।" लालबाबू- "हुनकर माइक केहेन सोभाव छइ। की ओ कनियाँसँ अपन बेटाक बिआह करैले तैयार हेती?" श्यामजी- "भऽ जेबाक चाही।" लालबाबू- "ठीक छै, अहाँ जाउ। अहाँ लड़काक माएसँ गप करब। जखन ओ तैयार भऽ जेती तँ समाद देब।" श्यामजी- "ठीक छइ।" श्यामजी विहान भने गाम गेला। गाममे विकासक माएकेँ सभ गप कहलखिन। विकासक माए स्वयं अनुभवी छथिए जे एकटा विधबाक की जिनगी आ केहेन दशा होइत अछि...। विकासक बिआह अंजलीसँ करैले तैयार भऽ गेली। विकाससँ बात केलैन तँ ओ बजला- "जे माए हमरा बोइन-बुत्ता करि एम.ए. पास करौलक ओ जे कहत से करब।" विकासक माए सुभद्रा तीसे बर्खक उमेरमे विधबा भऽ गेल छेली। अखन हुनक उमेर पच्चास-एकावन बर्ख हेतैन। विधबा नारीकेँ कोन-कोन वेदना सहए पड़ै छै से अनुभव छैन्हे। तँए ओ अपना बेटाक बिआह विधबा अंजलीसँ करैले सहर्ष तैयार भऽ गेली। अगहन मास, बिआह-पंचमीक दिन सखड़ा मन्दिरमे भगवतीकेँ साक्षी रखि विकास आ अंजलीक विआह भऽ गेल। बिआहक बाद जखन विकास आ अंजली लालबाबूकेँ पैरपर गोड़ लगलकैन तँ लालबाबू बजला- "अहाँ दुनू गोरे हमरा माथपर सँ बड़का भार उतारि देलौं। अंजलीक ऑंखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.नन्द विलास रायक ४ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नन्द विलास रायक चारिटा कथा आ एकटा एकांकी जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नन्द विलास रायक चारिटा कथा कथा ४ जीन्स पैन्ट सॉंझखिन बाघ दिससँ घुमि कऽ गामपर एलौं तँ पत्नीकेँ चाहक आढ़ैत देलिऐन। पत्नी चाह बना कऽ नेने एली। हम आ पत्नी चाह पीबए लगलौं। एकटा दिल्लीसँ आएल छौड़ा सड़कसँ जाइत रहए। मोबाइलमे गीत बजबैत रहए- 'जीन्स ढीला करू...।' हमर पत्नी बजली- "जा...। हम तँ बिसैरिये गेल छेलौं। यौ कंचनाक बाबूजी नन्दनीकेँ जीन्स पैन्ट आ टी शर्ट कीनि कऽ आनि दियौ।" चाहक चुस्की लैत हम पुछलयैन- "एतेक छोट बच्चाकेँ जीन्स पैन्ट। कीनलाक साले भरि पछाइत छेाट भऽ जेतइ।" पत्नी बजली- "से तँ ठीके। नन्दनी तेहेन ने बढ़नुक अछि जे साले भरिमे सभ कपड़ा आ जूत्ता-चप्पल ओछ भऽ जाइ छइ।" हम पुछलयैन- "तखन?" पत्नी बजली- "कनी नमहरे कीनब। जीन्स पैन्ट तँ छौड़ा सभकेँ देखै छिऐ जे नीचासँ मोड़ने रहै छइ।" तैपर हम पुछलिऐ- "अमरेलाकट फ्रॉक आ चुस्त सलवार आनि देबै से नै नीक हएत की? लड़की सभकेँ तँ अखन यएह ड्रेसमे देखै छिऐ। लड़कीक लेल तँ अखन यएह ड्रेसक चलती अछि।" पत्नी बजली- "जीतू, बौआ-ले जीन्स पैन्ट आ टी शर्ट कीनि कऽ आनलक हेन। जखनसँ नन्दनी देखलक हेन तखनसँ ओहो जिद्द केने अछि जे हमहूँ जीन्स पैन्ट आ टीशर्ट लेब।" हम कहलयैन- "अच्छा ओकरो-ले आनि देबइ।" नन्दनी हमर नातिन। जेठकी बेटी कंचनाक जेठ सन्तान। उमेर पाँच बरख। हमरे सभ लग रहैत अछि। जीतू हमर भातीज। ओकरा एकटा बेटा, नाओं प्रकाश। सभ कियो ओकरा 'बौआ' कहैत अछि। ओकर उमेर सात बरख अछि। दुर्गापूजाक समय। आइ पंचमी तिथि छी। सभ कियो धिया-पुता-ले नव-नव कपड़ा कीनि-कीनि अनैत। हमरो भातीज जीतू सेहो अपन धिया-पुता-ले कपड़ा कीनि कऽ आनलक। हमर परिवार आ हमर जेठ भैयाक परिवार एके अँगनामे अछि। एक्के अँगनामे रहने नन्दनी जीतूक बेटाक जीन्स पैन्ट आ टीशर्ट देखलक, ओहो नानीसँ कहए लगल- नानी हमहूँ जीन्स पैन्ट आ टीशट लेब।' चाह पीला पछाइत हम भैंस दुहि अँगना अबैत रही, तेतबेमे हमर छोटकी बेटी वीणाक संगे दुर्गास्थानसँ सॉंझ दऽ नन्दनी आएल। हमरा देखते बाजल- "नाना जीन्स पैन्ट आ टीशट आनि दियऽ।" हम कहलिऐ- "काल्हि आनि देब।" हाथ-पैर धो, कुर्रा-आचमन कऽ हम गोसॉंइकेँ धूप दऽ भगवती माएकेँ फोटो लऽ धूप-आरती देखा कनेक काल दुर्गा पाठ केलौं। खाना खेला पछाइत जखन ओछाइनपर सुतल रही मुदा रही जगले। तँ किछु पिछुलका बात सभ मोन पड़ि गेल। सिनेमा जकॉं एक-एकटा दृश्य हमरा सामने आबए लगल। एम.ए. केला पछाइत केतेको बेर नौकरीक लेल परियास केलौं मुदा नौकरी नै भेटल। भेटबो केना करैत। कहावत छै ऐ जुगमे भगवान भेटब असान अछि मुदा नौकरी भेटब मोसकिल। तहूमे सरकारी नौकरी तँ आरो मोसकिल अछि। जेना-तेना खेती-गृहस्ती कऽ अपन परिवारक गाड़ी खींचए लगलौं। नेपालमे प्रजातंत्रक उदय भेल। प्रतिनिधि सभाक चुनावक घोषना भेल। हमरो ससुर महराज सक्रिय राजनीतिमे छैथ। सभ कियो हुनका नेताजी कहिते छैन। हुनको पार्टी टिकट दऽ उम्मेदवार बनौलकैन। हमरा पता चलल तँ हमहूँ हुनका चुनावमे मदत करए गेलिऐन। आर्थिक मदत तँ नहि केलिऐन मुदा अपना शरीरसँ एक मास धरि खटल रही। खाएर जे किछु...। हमर ससुर महराज चुनाव जीतला। जीतला पछाइत काठमांडो गेला। संसदक सत्र समाप्त भेला पछाइत दुर्गापूजामे गाम एला तँ हमरो पिताजीसँ भेँट करए हमरा गाम एला। हमरा कहलैन, आऊ राजविराज। ओतए कोनो बिजनेस-बेपारक बेवस्था कऽ देब। मुदा हम जाइले तैयार नहि छेलौं। पत्नी बेर-बेर चरियाबए लगली। बेर-बेर कहैथ- जखन बाबूजी कहि गेलखिन हेन तँ कोनो-ने-कोनो बिजनेस-बेपारक बेवस्था कइये देता। तैयो हमर मन जाइले तैयार नहि भेल। एक दिन हमर लंगोटिया मीत मदनजी एला। ओ निर्मली महाविद्यालयमे किरानी छैथ। हमर पत्नी हुनका सभ गप कहलकैन। मदनजी हमरा कहला- "जखन सांसदजी तोरा राजविराज अबैले कहलखुन हेन तँ तों किए ने जाइ छी। कोनो बिजनेस-बेपार करमे तँ परिवारक आर्थिक हालत सुधैर जेतौ। खेती-गृहस्तीसँ पेटो चलब मोसकिल छौ।" तैपर हम कहलिऐ- "रौ मीता, से तँ ठीके कहै छीही। मुदा सासुरमे रहएबलाकेँ कोन-कोन अपमान सहए पड़ै छै से तूँ कोनो नै बुझै छीही।" मदन बाजल- "हम सभ बुझै छिऐ। मुदा समय-समयक बात छइ। अखन तोहर दिन कुदिन छौ तँए तों ऐ गप-सप्पपर विचार नै करहीन। जखन दूटा पाइ कमाइ लीहेँ तँ ऐ गप-सप्पपर विचार करिहेँ। रौ अपन काज रहै छै तँ लोक गदहोकेँ बाप कहै छै आ सांसदजी तँ तोहर ससुर छथुन जे एकमानेमे बापे भेलखुन।" खाएर हम राजविराज गेलौं। नेताजीक एकटा डेरा काठमांडोमे आ दोसर राजविराजमे। जखन संसदक सत्र चलैत छल तँ ओ काठमांडोमे रहै छला नहि तँ राजेविराजमे। नेताजी राजेविराज संसदीय निर्वाचन क्षेत्रसँ जीतल छला। दोसर गप ई जे राजविराज सप्तरी जिल्लाक सदर मुकाम सेहो छी। नेताजी जिल्ला मुख्यालयमे रहि जिलाक राजनीति आ प्रशासनक गतिविधिपर सेहो नजैर रखैत छला। खाएर जे किछु...। हम नेताजीक डेरापर रहए लगलौं। डेराक काज सेहो करए लगलौं। जेना- बजारसँ जारैन, तरकारी, किराना समान सभ हमहीं कीनि आनी। डेराक आरो काज सभ करी। नेताजी बिजनेस-बेपारक कोनो गप्प नै करैथ। ऐ तरहेँ छह मास बित गेल। एक दिन हम अपन ससुर महराजसँ कहलयैन- "बाबूजी छह मास बीति गेल मुदा एखन तक हमरा बिजनेस-बेपारक कोनो जोगार नै भेल?" तैपर ओ बजला- "एना धड़फरेलासँ काज हएत! हम बेवस्थामे लागल छी किने। अहाँ असथिरसँ रहू।" एक मासक बाद एक दिन हम फेर हुनका टोकलिऐन- "बाबूजी, जँ बिसनेस-बेपारक बेवस्था नै हएत तँ ऐठाम कथी-ले समय बेरबाद करब।" तैपर ओ बजला- "दिल्ली-पंजाब जाएब की?" हम कहलयैन- "दिल्लियो पंजाब तँ लोके जाइत अछि किने, की कोनो जानवर जाइत अछि।" ओ हमरा दिस ताकए लगला। कनीकालक बाद बजला- "जँए सात-आठ मास रूकलौं तँए दू-तीन मास और रूकि जाउ। हम कोनो बेवस्था कऽ देब।" तही बीच हमर सारहु एला, तँ ओ हमरा पुछलैन जे की भेल कोनो बेवस्था अहाँक बिजनेस-बेपारक? हम कहलयैन- "अखन धरि कहाँ कोनो बेवस्था भेल हेन। कनेक अहूँ बाबूजीसँ पुछियौन ने।" तैपर ओ बाबूजीसँ (ससुरसँ) बात केलैन आ हमरा कहलाह- "हिनका (ससुरक) फेरमे नै रहू। ई अहाँकेँ ठकै छैथ।" तैपर हम कहलयैन- "दू-तीन मासक नाओं कहने छैथ। तँए तीन मास धरि आओर प्रतीक्षा करब।" सारहु कहलैन- "जँ तीन मासक बाद बाबूजी बिजनेसक लेल ढौआक बेवस्था नै कऽ देता तँ अपन डेली-खोनी लेब आ वापस इण्डिया चल जाएब। हम मने-मन सोचलौं कहै तँ छैथ बिलकुल ठीक।" आ हम तीन मास आओर रूकि गेलौं। राजविराजमे लोक सभकेँ जीन्स पैन्ट पहिरने देखिऐ। ओतुक्का बेसी लोक फुलपैन्टे-शर्ट पहिरैत अछि। अपना ऐठाम बिहारमे तँ लोक धोती-कुरता, पैजामा-कुरता आ फुलपैन्ट-शर्ट पहिरैत अछि मुदा नेपालमे धोती-कुरताक चलैन बुढ़-बुढ़ानुस मात्रमे अछि। ओहो भारतीय मूलक बुढ़-बुढ़ानुसमे। हमरो दुनू सार आ सारहु सभ जीन्स पैन्ट पहिरैत अछि। ओ सभ नेताजीक डेरापर जीन्स-पैन्ट पहिर कऽ अबैत रहैथ। हमरो मोनमे भेल जे हमहूँ जीन्स पैन्ट पहिरतौं। भादव मासक समय रहइ। नेताजी सपरिवार काठमांडोमे छला। संसदक सत्र चलैत रहइ। भोला भायजी नेताजीक मुहलगुआ छथिन। ओ काठमांडो जाइबला रहथिन। एक दिन हुनका कहलयैन- भायजी, हमरो मन होइए जे हमहूँ जीन्स पैन्ट पहिरतौं। तैपर ओ बजला- मन होइए तँ चलु अखने कीनि दइ छी। हम कहलयैन- अखन टका कहाँ अछि। ओ बजला- अहाँ टकाक चिन्ता जुनि करू। अहाँ नेताजी कक्काक जमाए छिऐन, हमरो बहनोइए भेलौं। हम अहाँसँ जेठ छी। नीक जीन्स पैन्ट सात-आठ साए टकामे हएत। सएह ने। कोनो दस-बीस हजार लागत। हम कहलयैन- "भायजी, बहुत-बहुत धैनवाद।" ओ पुछलैथ- "तँ हमरा पाइक जीन्स नै लेब?" हम कहलयैन- "नै भायजी, से गप नै छइ। जँ लोक बुझत तँ कहत- नेताजीक जमाए लोकसँ कपड़ा खरीदाबैत अछि। आ जँ हमर सार सभ बुझता तँ ओ सभ आर कुटिचौल करता।" भोला भायजी बजला- "कियो नहि बुझत।" हम कहलयैन- "भायजी, एकटा उपाय अछि। हम दर्जीसँ लम्बाइ आ कमर नपबा लिखि कऽ अहाँकेँ दऽ दइ छी। अहाँ आइ काठमांडो जाइए रहल छी, नेताजीसँ कहबैन खरीद देता।" ओ बजला- "बड़ सुन्नर। चलु अखने मिथिला टेलर्समे नपबा कऽ लिखि लइ छी।" सएह केलौं। दुनू गोरे मिथिला टेलर्समे जा लम्बाइ आ मोटाइ नपबा कागजपर नोट कऽ भोला भायजीकेँ दऽ देलिऐन। सॉंझमे मोरंग एक्सप्रेस बसपर चढ़ि ओ काठमांडो चलि गेला। एक सप्ताहक बाद भोला भायजी काठमांडोसँ घुरला। हमरा डेरापर एला। हमरा भेल जे शायद जीन्स पैन्ट देबए एला हेन। कुशल-समाचारक बाद ओ बजला- नेताजी काका, अहाँक नाप रखि लेलैथ, दुर्गापूजामे गाम औता तँ नेने औता। हम कहलयैन- "भायजी, हम जीन्स पैन्ट पहिर लेलौं।" तैपर ओ बजला- "किए, अहाँकेँ होइए जे नेताजी काका जीन्स नै नेने औता?" हम कहलयैन- "से देखबे करब।" कलशस्थापनसँ तीन दिन पहिनहि नेताजी सपरिवार काठमांडोसँ राजविराज पहुँचला। दोसर दिन राजेविराजमे सभ परिवार लऽ कपड़ा कीनलैथ। कपड़ा कीनलाबाद डेरापर एलैथ तँ हम कहलयैन- पूजामे हमहूँ गाम जाएब। तैपर ओ बजला- ठीक छै, काल्हि भोरे चल जाएब। कनीकाल रहि फेर बजला- अहाँ भेला दिया जीन्स पेन्टक नाप भेजने रहिऐ। से तँ राजविराजोमे भेटै छइ। हम किछु नै बजलौं। हमर मन खसि पड़ल। भोरे हम बस पकैड़ गाम आबि गेलौं। मुँहक उदासी देख पत्नी पुछलैन- "लगल कोनो जोगार बिजनेस-बेपारक?" हम कहलयैन- "जे एकटा हजार-पान साए टकाक जीन्स नै खरीद कऽ दऽ सकै छैथ ओ बिजनेस-बेपार करैले पच्चीस-पचास हजार टकाक बेवस्था केना कऽ सकता।" पत्नी पुछलैन- "से की, से की?" हम सभ गप कहि कऽ सुना देलिऐन। ओ सुनि कऽ दुखी भेली। जखन पत्नीकेँ सभ गप कहैत रहिऐन तँ हमर माए सभ गप सुनि गेली। दोसर दिन भोरे माए पुछलक- "केतेकमे जीन्स पेन्ट होइ छइ?" हम कहलिऐ- "सात-आठ साए टकामे।" माए पुछलक- "निर्मलीमे भेट जेतौ किने?" हम जवाब देलिऐ- "भेट जेबाक चाही।" माए हमरा एक हजार टका देलक आ कहलक- "जलखै खा कऽ निर्मली जो आ जीन्स पेन्ट कीनि-ले।" हम कहलिऐ- "तों रूपैआ केकरासँ आनलीही?" तैपर माए बजली- "आम खाइसँ मतलब राख ने गाछ किए गिनै छँह।" आगॉं बजली- "पॉंच मास पहिने एकटा छागर एक हजार टकामे बेचने रही। ओ टका पीपरावाली लऽ गेल रहए। काल्हि वएह टाका दऽ गेल हेन।" हम कहलिऐ- "गइ माए, ई टका तों राख। हम अखन जीन्स पैन्ट नै लेब। तोरा हाथमे टका रहतौ तँ बेर-बेगरतामे काज देत।" तैपर माए बजली- "अँइ रौ, तोहर मन जीन्स पैन्ट पहिरै कऽ भेलौ आ ससुरसँ मांगलीहीन तँ नै देलखुन जखन कि अपन सभ परिवार-ले कपड़ा कीनलखिन। जो अखने निर्मली आ कीनि आन ग जीन्स पैन्ट आ पहिर कऽ ससुरकेँ देखा दहीन ग।" जखन माए संग ई गप-सप्प होइत रहए तखने बाबूजी चाह पीबऽ अँगना एला तँ माएसँ पुछलखिन- "कथीक घोल-फचक्का भऽ रहल छल।" माए बाबूजीकेँ सभ गप कहलखिन। बाबूजी बजला- "नन्दुकेँ तँ फुलपेन्ट छेबे करइ।" तैपर माए बजली- "जीन्स पैन्ट लेत।" बाबूजी पुछलखिन- "जीनस पेन्ट केकरा कहै छइ?" माए बजली- "काल्हि धीरू बौआ जे नीलरंगक फुलपेन्ट पहिरने रहए, वएह जीन्स पेन्ट छी। ससुरकेँ काठमांडो नाप पठौने रहइ मुदा ओ नै कीनि देलखिन। जखन कि अपन बेटा-पुतोहु, पोता-पोती सभ-ले कपड़ा कीनलखिन। हमरा लग एक हजार टका छल वएह देलिऐ हेन।" तैपर बाबूजी पुछलखिन- "आ बिजनेस-बेपारक की भेलइ?" हम कहलयैन- "कम्मे उम्मीद अछि।" हमर बाबूजी हमरा कहलैन- "हमर बात मानवें तँ ससुरक आशा छोड़। अखन जीनसो पेन्ट नै कीनि। एक हजार टका माए लग छौ आ हमहूँ काल्हि दू हजारक भूसी बेचलौं हेन। दुनू मिला कऽ तीन हजार भेलौ। दू हजार टकाक इन्तजाम आओर कऽ ले। पॉंच हजार टका पूजी लगा कऽ कोबीक खेती कर, कपारो बुड़ि जेतौ तँ 70-80 हजार टका आमदनी हेबे करतौ।" बाबूजीक विचार हमरा नीक लगल। दस कट्ठा ऊँचरस खेत, जइमे सैठी धान रहए, खाली भऽ चुकल छल। ओही खेतमे बाड़ीमे राखल सड़लाहा गोबर गिरा देलिऐ। संयोग ई रहए जे खेत सड़के कातमे अछि। सभटा सड़लाहा गोबर टायरसँ उघि कऽ खेतमे देलिऐ। मधुबनी जा हरगोविन्द बीज भण्डारसँ हाइब्रीडबला कोबीक बीआ लऽ अनलौं। दरबज्जेपर दस छिट्टा माटि दऽ कोबीक बीआ पाड़लौं। उचित देखभाल करैत रहलौं। एम्हर खेतक तैयारीमे सेहो जुटि गेलौं। बीससँ पच्चीस दिनमे कोबीक बीआ रोपै जोग भऽ गेल। खेतेमे दसटा कियारी बना कऽ सभटा कोबी गाछक थाला लगा देलौं। दस-बारह दिनपर कियारीमे सँ थाला काटि-काटि सभटा कोबीक पौधाकेँ उखारि-उखारि खेतमे रोपलौं। समय-समयपर कमठान, कीटनाशक दबाइक प्रयोग आ सिंचाइ करैत रहलौं। कोबी नीक सुतरल। एक-एकटा फूल कमतीमे दू किलोक भेल। ओना, तीन किलोसँ साढ़े तीन किलोक फूल सेहो भेल। अगता खेती रहए तँए भाव सेहो नीक पकड़ाएल। पैकारे सभ पनरह साए रूपैये क्विंटल खेतेपर सँ लऽ गेल। सभ खर्चा काटि कऽ दू लाख पच्चीस हजार टाकाक आमदनी भेल। बाबूजी कहलैन जे निर्मली जा कऽ दूटा जीनस पेन्ट आ दूटा टीशट कीनि आ। हम जलखै खा निर्मली गेलौं। ओतए हनुमान रेडिमेडमे एकटा नीलरंगक आ एकटा मटमैला रंगक जीन्स पैन्ट कीनलौं। तेनाहिये एकटा कारी रंगपर उज्जर-उज्जर धारी आ एकटा हरियर रंगपर उज्जर-उज्जर धारीबला टीशर्ट कीनलौं। सासुरमे पितिऔत सारिक बिआह रहए। हमरो दुनू परानीकेँ कार्ड भेज कऽ मंगौने रहए। तहूमे हमरा अलगसँ कार्ड भेजने रहए। तखन केना ने जइतौं। माए सेहो कहलक जे जो जीन्स पेन्ट पहिरकऽ ससुरकेँ देखा दही ग। हम सासुर गेलौं। बिआहक दिन चारि बजे दिनमे लड़की आ महिला (सारि-सरहोजि) सभकेँ देखलिऐ मेकप कऽ रंग-बिरंगक कपड़ा पहिरैत। कियो बनारसी साड़ी पहिरैत तँ कियो जार्जेट। विवाहितो आ अविवाहितो लड़की सभ रंग-बिरंगक सलवार-सूट पहिरलक। तेनाहिये हमर सार सभ आ सारहु सभ सेहो किछु गोरे जीन्स पैन्ट-टीशर्ट आ किछु गोरे पायजामा-कुरता पहिर-पहिर दरबज्जापर एला। तखन हम धोतीए-कुर्ता पहिरने रही। हमर पत्नी हमरा एकटा कोठरीमे बजा कहलैन- जीन्स पेन्ट आ टीशर्ट जे अनने छी से कोन दिन ले। हम नील रंगक जीन्स पैन्ट आ हरियरका टीशर्ट पहिरलौं। पहिर कऽ जखन कोठरीसँ निकललौं तँ हमर सासु-ससुर ओसारपर राखल एकटा चौकीपर बैसल छला। हमरा पाछाँ हमर पत्नी सेहो छेली। हमरा जीन्स पैन्ट आ टीशर्टमे देख हमर सासु हमरा पत्नीकेँ कहलखिन- "देखही तँ पाहुनक देहमे जीन्स पेन्ट केतेक नीक लगै छैन। केतेकमे कीनलखुन हेन।" तैपर हमर पत्नी जवाब देलखिन- "जा...। अखने बिसैर गेलही। दुर्गापूजामे जे काठमांडौसँ कीनि कऽ अनने रही सएह ने जीन्स पेन्ट छिऐ।" हमर सासु हमरा ससुर दिस ताकए लगली आ हमर ससुर एकबेर हमरा पत्नी दिस देख मुड़ी निच्चाँ मुहेँ गोंइत लेलैन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.नन्द विलास रायक १ टा एकांकी- जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल
ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नन्द विलास रायक चारिटा कथा आ एकटा एकांकी जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नन्द विलास रायक एकटा एकांकी पइत (एकांकी) पात्र-परिचय ठीठर- भैंसवार : उमेर 45 बर्ख लोटन- भैंसवार : उमेर 35 बर्ख भोल्टा- भैंसवार : उमेर 32 बर्ख भिलवा- भैंसवार : उमेर 30 बर्ख बुचना- भैंसवार : उमेर 15 बर्ख रबिया- भैंसवार : उमेर 13 बर्ख लालबाबू- रूपा आ दीपाक पिताजी : उमेर 55 बर्ख श्यामजी- लालबाबूक दोस्त : उमेर 54 बर्ख मोहनबाबू- लालबाबूक समैध, विभाक पिता: 56 बर्ख शोभाकान्त- मोहनबाबूक मीता : उमेर 55 बर्ख जियालाल- बरक पिताजी : उमेर 55 बर्ख आलोक- शोभाकान्तक बेटा : उमेर 28 बर्ख प्रकाश- मोहन बाबूक बेटा : उमेर 30 बर्ख विनीत- लालबाबूक बेटा : उमेर 22 बर्ख रामू- लालबाबूक एकटा गौंआँ : उमेर 35 बर्ख दीनानाथ- मोहनबाबूक गौंआँ : उमेर 30 बर्ख
पहिल दृश्य- (स्थान- एकटा पच्चीस-तीस बिगहाक परती। छह-सातटा महींसवार महींस चरा रहल अछि। बीचला परतीपर गाछक छाहैरमे ठीठर (उमेर- 45 बर्ख), लोटन (उमेर 35 बर्ख), भोल्टा (उमेर 32 बर्ख) आ भिलबा (उमेर 30 बर्ख) बैसकऽ तास खेल रहल अछि। बुचना (उमेर 15 बर्ख) आ रबिया (उमेर 13 बर्ख) बैसकऽ तासक खेल देख रहल अछि। ठीठर धोती-गोलगला, लोटन लूंगी-गंजी, भोल्टा हाफ पैन्ट-टीशर्ट, भिलबा धोतीकेँ दोबरा कऽ लूंगी जकाँ आ कुरता पहिरने अछि। बुचना पायजामा-गंजी आ रबिया जीन्स पैन्ट (जे ठेहुना लगसँ काटल अछि।) आ भेस्ट पहिरने अछि। (परदा उठैत अछि)
ठीठर- रऊ रबिया कनी भैसोंकेँ देखही। केकरो जजातिमे नइ चलि जाइ रऊ। रबिया - काका! हमर धियान भैंसोपर छै। केकरो जजातिमे नइ जाए देबइ। अहाँ निफिकिर रहू। लोटन- एकबेर खड़ो भऽ कऽ देखही तँ, सभटा भैंस परतीएपर छौ ने। रबिया- अच्छा काका हम देखै छिऐ। (रबिया खड़ा भऽ कऽ भैंस सभकेँ हियासए लगैत अछि। एम्हर भोल्टा तास फेंट कऽ पत्ती बँटैत अछि।) भिलबा- हँ तँ बजै जाइ जाह। की, ठीठर काका बजबह? ठीठर- नइ हम नहि बाजब। पत्तीए नीक नहि आएल। लोटन- सोलह। भोल्टा- सत्तरह। लोटन- हमहीं। भोल्टा- अठारह। लोटन- चल बना रंग। अठारहेपर डबल। रबिया- देखहक हऊ, ठीठर काका, दिल्लीसँ कियो आबि रहल अछि। पीठपर बड़काटा बैग आ हाथमे अटैची छै। पछरल अबैए। लोटन- तों केना बुझै छी जे दिल्लीएसँ अबैए। राही-बटोही सेहो भऽ सकैए। रबिया- राही-बटोहीकेँ एतेकटा बैग आ अटैची थोड़े रहै छै। ओ तँ दिल्ली, कलकत्ता आकि मुम्बईयेक पैसेंजरकेँ रहै छै। ठीठर- रबिया ठीक्के कहै छौ। परदेशे खटनिहारकेँ ने बैगो आ अटैचीयो रहैए। राही-बटोहीकेँ बड़ रहल तँ एकटा बैग नइ ते झोरा रहल। रबिया- हऊ ठीठर काका, ई तँ फुदन भैया बुझाइत अछि। बुचना- (खड़ा भऽ कऽ रस्ता दिस तकैत) ठीक्के ई तँ फुदने भैया छी। भिलबा- सुनै छिऐ दिल्लीमे करोना बड़ बढ़ि गेल हेन। तँए लोक दिल्लीसँ पड़ाए कऽ गाम आबि रहल अछि। ठीठर- ठीक्के बजलह हेन। हमहूँ रातिमे मोहन भैयाक टीबीमे समाचार देखलौं हेन। बड़ लोक मरि रहल छै। (गाम दिससँ जानकी बिआहक वर्णन, ध्वनि विस्तारक यंत्रपर आबए लगल अछि) (फुदनक प्रवेश। पीठपर एकटा बड़का बैग आ हाथमे अटैची छै। गाछ लग आबि अटैची निच्चॉं रखैत पीठपर सँ बैग उतारि सेहो जमीनपर रखैत बैस जाइत अछि।) फुदन- गोड़ लगै छी, ठीठर काका। ठीठर- नीक्के रहह। कहह की हाल छह दिल्ली-के? फुदन- नइ पुछू काका। दिल्लीक हाल बड़ खराप भऽ गेल अछि। डेली साए-सबा-साए लोक मरै छै। लोक पड़ाए कऽ गाम आबए चाहै छै मुदा गाड़ी-सवारीक अभावमे आएल नहि होइ छै। जे बसबला सात-आठ साए टकामे दिल्लीसँ नरहिया-निर्मली लोककेँ अनै छेलै वएह बसबला अखन चारि हजार- पाँच हजार टका मंगै छै। ट्रेनसँ जे औत सेहो ट्रेनक टिकट नइ भेटै छै। की करत लोक, छटपटा कऽ रहि जाइए। भोल्टा- तों केना एलही हेन? फुदन- हऊ भोलट काका, हमर तँ पहिनेसँ टिकट बनल रहए तँए ट्रेनमे जगह भेट गेल। ओना हम ट्रेनेसँ दिल्ली जाइ-अबै छी। बसमे हमरा उल्टी भऽ जाइए। लोटन- सुनै छिऐ ट्रेनपर चढ़ैबला पैसेंजरकेँ रेलवे टीशनपर पहिने करोनाक जाँच होइ छै। जखन बेमारी नहि रहल तखन ट्रेनमे बैसऽ दइ छै। फुदन- ठीक्के सुनलह हेन भैया। हमरो जाँच भेल। रिपोर्ट निगेटीव आएल। सेनीटाइजर पूरा देहक कपड़ापर छीटलक आ हाथपर सेहो देलक, तखन जा कऽ ट्रेनमे चढ़ए देलक। हऊ ठीठर काका, गामपर जानकी बिआहक वर्णन बजि रहल अछि। केकर बिआह छिऐ? ठीठर- तोरा नइ बुझल छह। आइ लाल भैयाक बेटी रूपाक बिआह छी। फुदन- नइ काका, नहि बुझल अछि। परदेश खटै छी। केना बुझल रहत। भोल्टा- आब तँ मोबाइलक युग छी। मोबाइलसँ लोक अमेरिका-इंग्लैंडक गप मिनटमे बुझि जाइए। ई तँ दिल्लीए छी। अच्छा गामपर जाह, नश्ता-चाह करह-गे। कखनी खेने हेबह, कखनी नइ। फुदन- ठीठर काका, हम बैग नेने जाइ छी। अटैची अत्तै रहत। गामपरसँ केकरो पठा देब, लऽ जाएत। ठीठर- बड़बढ़ियाँ। ताला लागल छह किने। आ जल्दीये केकरो पठा दिहक। फुदन- (उठैत) हँ काका, ताला लगल अछि। ओना, अहाँ सभ की कोनो आन छी। जाइ छी जल्दीए केकरो भेज देब। (फुदनक प्रस्थान) (परदा खसैत अछि)
दोसर दृश्य मंचपर चारिटा कुर्सी राखल अछि। एकटा कुर्सीपर लालबाबू आ दोसर कुर्सीपर हुनकर मीत श्यामजी बैसल छैथ। दूटा कुर्सी खालीए अछि। ध्वनि विस्तारक यंत्रपर मधुर स्वरमे शहनाइक धुन बजि रहल अछि। परदाक पाछाँ बेस चहल-पहल अछि।) (परदा उठैत अछि।) लालबाबू- (श्यामजीसँ) मीत हमर तँ छाती धक-धक करैए। बेटाबलाकेँ दू लाख टका बाँकी छैन। बरियाती दुरा लगलाक जस्ट बाद ढौआ देबाक वादा केने रहिऐ। मुदा जे ने करए ई मोदी। तेहेन समयमे ने नोटबन्दी केलक जे बैंक पाइये नहि देलक। आब लड़काबलाकेँ केतबो कहबैन तँ ओ मानता। श्यामजी- यौ मीत भगवानपर भरोसा राखू। लड़काबला परिहारपुरबला समैघकेँ दोस्त छथिन किने। परिहारपुरबला समैघ सभ सम्हारि लेता। लालबाबू- के कहलक, हुनको बात मानतैन कि नहि मानतैन। अखन धरि परिहारपुरबला समैधो कहाँ एला हेन। ओना, बेटी-जमाए तँ गोसाँइये गीत दिन आबि गेल छला। श्यामजी- बैंक जे पाइ नइ देलक तइ बातक जानकारी परिहारपुरबला समैधकेँ मोबाइलसँ नइ देलिऐन? लालबाबू- नइ देलिऐन। सोचलिऐ परिहारपुरबला समैध मोहनबाबूकेँ फोनपर कहबैन आ जँ आन कियो सुनि लेता वा बुझि जेता आ बरक पिताजी शोभाकान्त बाबूकेँ मालूम भऽ जेतैन तखन ओ बरियाती लऽ कऽ औता कि नइ तेकर कोनो ठीक छै। तँए नइ कहलयैन। श्यामजी- अहूँक सोचब ठीक्के अछि। (मोहनबाबूक प्रवेश) लालबाबू- आऊ। आऊ समैघ। बहुत दिन जीब। अखने अपनेक चर्च भऽ रहल छल। मोहनबाबू- की करब। ऐन-वक्तपर मोटर साइकिल धोखा दऽ देलक। तँए टेम्पू भाड़ा करि एलौं हेन। तँए अबेरो भऽ गेल। ओना, बरियातीबला बसोपर आबि सकै छेलौं मुदा विभा संग भऽ गेली। विभो काल्हि पटनासँ गाम पहुँचली। आइ कहली जे बाबूजी हमहूँ भौजीक बहिनक बिआहमे जाएब। प्रकाश सेहो भोरमे बससँ उतरल। ओ कहलक जे हमहूँ जाएब। हम कहलिऐ चलै-चलह ऐमे कोन हर्ज छै। लालबाबू- ई तँ हमर सौभाग्य जे विभा बुच्ची आ प्रकाश बौआ हमरा बेटीक बिआहमे एला हेन। हमर बेटी-जमाए आ नाति गोसाँइ गीत दिन पहुँचल छला। मोहनबाबू- गामपर आब अहाँक समधिनियेँटा रहि गेली। श्यामजी- (हँसि कऽ) यौ समैध समधिनीयोंकेँ नेने अबितिऐन किने। मोहनबाबू- कहलिऐ तँ बड़ नीक बात मुदा घरोक ओगरवाही करए लेल तँ कियो चाही ने। श्यामजी- से तँ ठीके। विभा बुच्ची पटनामे की करैत अछि। मोहनबाबू- मेडिकल प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी कऽ रहली हेन। श्यामजी- वाह! बड़ बढ़ियाँ बात..! आ प्रकाश बाबू? मोहनबाबू- ओ मैकेनिकल ट्रेडसँ औभरसियरी कऽ एयरटेलमे जॉव करैए। छह मास पहिने ज्वाइन केलक हेन। श्यामजी- वाह! लालबाबू- प्रकाश बौआक बिआहक केतौ गपो केलिऐ हेन? मोहनबाबू- यौ समैध, प्रकाशक जे केतौ बिआहक गप चलत तँ सभसँ पहिने अहीं सभकेँ मालूम हएत। अहाँक बेटी हमर पुतोहु छैथ। मोबाइलक युग छी तँए पहिने अहीं सभकेँ खबरि भऽ जाएत। ओनाहियोँ अहाँकेँ बिना पुछने केतौ सम्बन्ध थोड़े कऽ लेब। लालबाबू- यौ समैध, एकटा बड़का समस्या खड़ा भऽ गेल हेन। हमर तँ छाती धक-धक करैए। मोहनबाबू- से की समैध। कनेक फरिछा कऽ बाजू ने। लालबाबू- यौ समैध, विनीत (लालबाबूक बेटा) दिल्लीमे संगी सभसँ पैंच-पालट करि दू लाख टाकाक बेवस्था केलक। ओइ दू लाख टकाक ड्राफ बना लेलक। नोटबन्दीसँ चारि दिन पहिने दिल्लीसँ गाम पहुँचल। बिहाने भने बैंकमे ड्राफ जमा केलक। बैंकक मैनेजर तीन दिन बाद भुगतान लेमए लेल विनीतकेँ समय देलक। मुदा अगिले दिन नोटबन्दीक घोषणा भऽ गेल। तँए बैंक ढौआक भुगतान नहि केलक। बड़ परियासक बाद बैंक मात्र पच्चीस हजार टका भुगतान केलक। मोहनबाबू- बहुत पैघ समस्या खड़ा भऽ गेल। लालबाबू- बरक पिताजी शोभाकान्त बाबू अपनेक लंगोटिया मित्र छैथ। अपेनक परियाससँ ई कुटुमैती भऽ रहल अछि। अपने शोभाकान्त बाबूकेँ बुझा देबैन। ओ अपनेक बात नहि टारता। जखने बैंक पाइ भुगतान करत, हम शोभाकान्तबाबूकेँ पहुँचा देबैन। केनाहुओं कऽ हमर पइत बचाऊ। मोहनबाबू- (गम्भीर मुद्रामे) शोभाकान्त हमर लंगोटिया मित्र जरूर छैथ। मुदा पाइक मामलामे ओ थोड़ेक दोसर तरहक लोक छैथ। ओना, हम पूरा प्रयास करब। अहाँ दिससँ हम बकियौता पाइयो गछि लेबै, देखियौ की होइ छै। (डी.जे. बाजाक आवाज सुनाइ पड़ि रहल छै) श्यामजी- शायद वरियाती पहुँच गेल। (विनीतक प्रवेश) (विनीत, मोहनबाबूक पैरपर गोड़ लगैत अछि।) मोहनबाबू- (विनीतक माथपर आशीर्वाद दैत) नीक्के रहू। लालबाबू- (विनीतसँ) की बरियाती स्कूलपर पहुँच गेल। विनीत- हँ बाबूजी। लालबाबू- तखन तों स्कूलेपर चलि जा। सभ बरियातीकेँ चाह-नास्ता करा दहुन। कियो छूटै नइ आ ने कोनो दिक्कते होइ। विनीत- जी बाबूजी। (विनीतक प्रस्थान) लालबाबू- (मोहनबाबूसँ) समैध हमर छातीक धड़कन बढ़ि रहल अछि। भगवान जानए की हएत की नहि। श्यामजी- अहाँ बेकारक चिन्ता करै छी। यौ, समैध छैथ ने, सभ सम्हारि लेता। (रामूक संग एक गोटाक प्रवेश) लालबाबू- की बात छिऐ रामू? आ ई बाबू के छैथ। रामू- काका ई बरियाती छैथ। ई अपनकेँ बजबए एला हेन। मोहनबाबू- (बरियातीसँ) की हौ दीनानाथ कहह बरियातीकेँ नास्ता-चाह भऽ रहल छै किने। दीनानाथ- हँ, काका, हम नास्ता आ चाह-पानक बाद एलौं हेन। शोभाकाका हमरा लड़कीक बाबूजीकेँ बजबए भेजलैन हेन। ओ कहला हेन जे मीत मोहनबाबू भेटता तँ हुनको बजेने एबैन। मोहनबाबू- अच्छा तों बढ़ह, हमसभ पीठेपर एलौं। (रामू आ दीनानाथक प्रस्थान।) लालबाबू- (मोहनबाबूसँ) समैध हमर तँ छातीक धड़कन बढ़ि गेल हेन। भगवान जानैथ बरक पिताजी बात मानता कि नहि। श्यामजी- धैर्य राखू मीत। समैध मोहनबाबू छैथ किने, ओ सभ सम्हारि लेता। मोहनबाबू- चलू, देखै छिऐ। हँ ओ पच्चीस हजार लऽ लिय ते। लालबाबू- ओ टका संगेमे अछि। मोहनबाबू- तखन चलू। चलू यौ श्यामबाबू, अहूँ चलू। (लालबाबू, मोहनबाबू आ श्यामजी केर प्रस्थान) (परदा खसैत अछि)
तेसर दृश्य बरक पिताजी शोभाकान्तक संग तीन-चारि गोटे कुर्सीपर बैसल छैथ। चारिटा कुर्सी खाली अछि। (परदा उठैत अछि।) शोभाकान्त- अखन तक दीनानाथ वापस नहि आएल। (दीनानाथक प्रवेश।) शोभाकान्त- की भेलह दीनानाथ। की लालबाबू अबै छैथ। मोहन मीता भेटबो केलखुन। दीनानाथ- हँ काका। मोहनो काका भेटलैथ आ लालोबाबू। मोहन काका कहला, चलह पीठेपर अबै छी। (लालबाबू, मोहनबाबू आ श्यामजीक प्रवेश।) लालबाबू- (शोभाकान्तसँ) नमस्कार समैघ। शोभाकान्त- नमस्कार! नमस्कार!! सभ ठीक-ठाक किने? लालबाबू- हँ, किछ ठीको आ किछ गड़बड़ो। शोभाकान्त- गड़बड़ की? (तीनू गोटे कुर्सीपर बैसैत छैथ) लालबाबू- (जेबीसँ पच्चीस हजार टका निकालि शोभाकान्तकेँ दैत।) ई राखल जाए। शोभाकान्त- कतेक अछि। टका तँ बड्ड कम बुझाइत अछि। मोहनबाबू- असलमे नोटबन्दीक कारण बैंक पच्चीसे हजार टका भुगतान केलकैन। शोभाकान्त- तखन? लालबाबू- यौ समैघ जखने बैंक भुगतान करत हम अपनेकेँ पहुँचा देब। शोभाकान्त- (आवेशमे) तखन वियाह नइ हएत। कहावत छै- भेल वियाह मोर करबह की धिया छोड़ि कऽ लेबह की। कताक ठाम एहेन घटना भऽ चुकल छै। वियाहमे जे लड़काबलाक बँकियौता रहलैन ओ वियाहक बाद लड़कीबला नहि देलकैन तँए जाबे धरि हमरा पूरा पाइ नहि भेट जाएत, हम अपन बेटाक बिआह नहि करब। रहल अहाँ जे दू लाख टका देने रही तेकर बात, तँ अखने दू लाखक चेक दऽ दइ छी। मोटर साइकिल जे लड़का लेल कीनलौं से अहीं ओइठाम अछि।
लालबाबू- (खड़ा भऽ कऽ) समैध माफ करू। अहाँक हम पएर पकड़ै छी। हमर प्रतिष्ठा बचा लिअ। शोभाकान्त- हम किछ नइ सुनब। (खड़ा भऽ जाइ छैथ) सुनू यौ बरियाती लोकैन ई बिआह नहि हएत, तँए सभ अपना-अपना गाड़ीमे बैइसै जाइ जाउ। लड़काकेँ कहियौ ओ गाड़ीमे बैसत। मोहनबाबू- मीत, जँ लालबाबू पाइ नइ देता तँ हम देब। एक मासक समय दिअ। लालबाबूक प्रतिष्ठाक संग हमरो प्रतिष्ठाक सवाल अछि।
शोभाकान्त- हम बिना पूरा ढौआ नेने कोनो भी हालतमे बेटाक बिआह नहि करब। लालबाबू- (अपन माथपरसँ पगड़ी उतारि शोभाकान्तक पैरपर राखि दैत अछि।) समैघ हमर पगड़ी अहाँक पैरपर अछि, आब लात मारी वा हमरा माथपर राखी।
शोभाकान्त- बन्द करू ई सिनेमाबला नाटक। हम किछ नहि सुनए चाहै छी।
मोहनबाबू- तँ मीत हमरो बात नइ मानबै। जिनगी भरिक दोस्ती अछि।
शोभाकान्त- नहि, अखन हम अपन बापोक बात नहि मानब। हमरा टका चाही सेहो अखन। जँ टका नहि भेटत तँ बरियाती लऽ कऽ वापस विदा भऽ जाएब। मोहनबाबू- सएह बात।
शोभाकान्त- हँ सएह बात।
लालबाबू- (हाथ जोड़ि) शोभाबाबू एहेन अन्याय नहि करियौ। हम केतौ-के नहि रहि जाएब। हमर सभ केलहा-धेलहा पानिमे चलि जाएत।
मोहनबाबू- (लालबाबूसँ, आवेशमे) अहाँ चूप रहू। अहाँकेँ पइत हम राखब। (मोहनबाबू शोभाकान्तक पैरपर सँ पगड़ी उठा लालबाबूक माथपर रखैत अछि।) प्रकाश अछि ने हमर बेटा प्रकाश, ओकर बिआह अहाँक बेटी- रूपासँ अखन हएत अखन। (दर्शक दिससँ खूब थोपड़ी बजैत अछि।) (परदा खसैत अछि।)
चारिम दृश्य
शोभाकान्त अपना दलानपर कुर्सीपर बैसल अछि। (परदा उठैत अछि।) शोभाकान्त- (स्वगत) मोहन मीताक संग चालीस बर्खक दोस्तियारे रहए जे टुटि गेल। आइ मोहन मीताक बेटी- विभाक बिआह छी आ मोहन मीता हमरा नतो-हकार नहि देलैन। मुदा दोख तँ हमरे छल। ढौआ खातिर बेटाक बरियाती आपस लऽ अनलौं। मोहन मीता हमरा बड़ समझौलैथ मुदा किनको बात नहि सुनलयैन। (आलोकक प्रवेश) आलोक- बाबूजी एकटा खुशखबरी अछि। सुनब तँ खुशीसँ नाचए लगब। शोभाकान्त- कोन एहेन खुशखबरी छह जे हम सुनब ते नाचए लगब। लॉटरी-टॉटरी निकललह आकि कोनो प्रतियोगिता परीक्षा पास केलह हेन। आलोक- नइ से सभ नहि अछि। शोभाकान्त- तखन कोन खुशखबरी छह। आलोक- अहाँकेँ तँ बुझले हएत जे आइ मीता कक्काक बेटी- विभाक बिआह छी। शोभाकान्त- से किएक ने बुझल रहत। ओना, मोहन मीता हमरा नोत-हकार नहि देलैथ मुदा गामक बात छी तँए बुझल तँ रहबे करत किने। आलोक- अहाँकेँ तँ एतबे बुझल अछि जे आइ विभाक बिआह छी। मुदा...। शोभाकान्त- मुदा की? आलोक- विभाक बिआह नइ भेल। बरक पिताजी मीता कक्काक दरबज्जापर सँ बरियाती लऽ कऽ वापस चल गेलाह। बरियाती दूरक छी, तँए राति भरि स्कूलमे आराम करत आ सबेरे भोरमे वापस अपन गाम जाएत। शोभाकान्त- तोरा के कहलकह? आलोक- पूरा गाममे अही बातक चर्चा भऽ रहल अछि। मीते कक्काक दरबज्जापर सँ भोलबा अबै छेलए, वएह कहलक। शोभाकान्त- ई तँ कोनो खुशीक समाचार नहि भेल। ई तँ दुखक समाचार भेल। आलोक- अहूँ की बजै छिऐ बाबू? ओ दिन बिसैर गेलिऐ जे जइ लड़कीसँ हमर बिआह करए लेल अहाँ बरियाती लऽ कऽ गेल रहिऐ तइ लड़कीसँ मीता काका अपन बेटा प्रकाशक बिआह करौलैथ। आ बिना कनियाँक हमर बरियाती वापस भऽ गेल। शोभाकान्त- ऐ मे हमरे दोख छल। नोटबन्दीक कारण ठीके बैंक लालबाबूकेँ पाइक भुगतान नहि केने रहए। लालबाबू हमरा लग बड़ गिड़गिड़ाएल, मुदा हमरापर जेना किछु सबार भऽ गेल रहए हम किनको गप नहि सुनलिऐन। मोहनो मीता हमरा समझौलैथ, एत्ते तक जे बँकियौता पाइ देमऽ कऽ जिम्मा लऽ लेलैथ मुदा हम नहि मानलयैन। तइ परिस्थितिमे मोहन मीता अपन बेटा प्रकाशक संग लालबाबूक बेटीसँ बिआह करि कऽ लालबाबूक पइत रखलखिन। मोहन मीताक संग चालीस बर्खक दोस्तियारे ढौआ खातिर समाप्त कऽ लेलौं। अच्छा ई कहह जे बरक पिताजी आखिर कोन कारणसँ बरियाती लऽ कऽ वापस भऽ गेलाह? आलोक- सुनै छिऐ मीताकाका लड़कीक सभ जेबर, जइमे पाँच भरि सोन आ पच्चीस भरि चानीक जेबर रहै, गछने रहथिन। गप ई भेल रहै जे बरमालासँ पहिने मीता काका लड़कीक सभ जेबर बरक पिताजीकेँ दऽ देथिन, पछाइत वरमाला हेतै। शोभाकान्त- जखन मोहन मीता लड़कीक सभ जेबर गछने रहथिन तखन किएक ने देलखिन? आलोक- भोलबा कहलक जे लड़कीक सभ जेबर, पच्चास हजार टका आ पच्चीस हजार टकाक कपड़ा लऽ कऽ मीता कक्काक जेठका बेटा यानी दीपक भैया पूनासँ गाम अबै छला मुदा समस्तीपुर दरभंगाक बीच नशाखुरानी गिरोहक शिकार भऽ गेलाह। जइ अटैचीमे जेबर, नगदी आ कपड़ा छेलै नशाखुरानी गिरोह पार कऽ देलकै। जेबीमे पच्चीस हजारक मोबाइल रहै सेहो लऽ लेलकै। जिन्समे पर्स रहै जइमे पाँच हजार टका छेलै सेहो निकालि लेलकै। शोभाकान्त- ई बात मोहन मीता बरक बापकेँ नहि कहलखिन। आलोक- एहनो कहीं नइ कहै। सभटा बात बरक पिताजीकेँ कहलखिन। मुदा बरक बाप कहलकैन जे अहाँ झूठ बजै छी। आ अहाँक बेटा बहाना कऽ रहल अछि। शोभाकान्त- बरियाती अखन स्कूलपर रूकल अछि सएह ने? आलोक- हँ, भोलबा तँ सएह कहलक हेन। बरियाती मिडिल स्कूलपर रूकल अछि। शोभाकान्त- (जेबीसँ चाभी निकालि आलोककेँ दैत) ई कुंजी लएह, गोदरेजमे जेबरबला बैग अछि, नेने आबह आ हँ, तहूँ कपड़ा पहिर लाए आ हमरा संगे चलह। आलोक- कोन जेबरक गप कहै छिऐ। शोभाकान्त- हऊ, तोरा बिआहमे जे लड़कीक लेल जेबर बनौने रहिऐ से जेबरक बैग। जा, जल्दी नेने आबह आ चलह। गामक पइतक सबाल छै, समाजक मान-प्रतिष्ठाक प्रश्न अछि। एकटा कन्यॉंक जीवनक बात छै। जा जल्दी करह। (आलोकक प्रस्थान।) परदा खसैत अछि।
पाँचम दृश्य स्थान- गामक मिडिल स्कूल। एकटा जाजीम ओछाकऽ बरक पिताजी जियालाल आ पाँच-छह गोरे बैसल छैथ। (परदा उठैत अछि।) (प्रकाशक प्रवेश) प्रकाश- (हाथ जोड़ि जियालालसँ) बाबूजी, बिआह नइ भेलै तँ नइ भेलै। बरियाती सभकेँ कहियौ खाना खा लेतइ। तीन साए आदमीक खाना जियान भऽ जेतै। एक आदमी- एहनो कहीं भेलैए। बिआह भेबे ने केलै आ बरियाती भोजन कऽ लेतइ। (शोभाकान्त आ आलोकक प्रवेश। शोभाकान्तक हाथमे एकटा झोरा अछि। प्रकाश अचम्भित भऽ आलोक आ शोभाकान्तकेँ देखैत अछि।) शोभाकान्त- की बात छिऐ प्रकाश? प्रकाश- मीता काका, जिया बाबूसँ कहै छिऐन बिआह नइ भेलै तँ नहि भेलै। सभ बरियाती भोजन कऽ लिअ, नहि तँ सभ खेनाइ जियान भऽ जेतै। शोभाकान्त- जाह! तों बरमालाक तैयारी करऽ गऽ। बिआह हेतै। (प्रकाश शोभाकान्तक मुँह दिस देखए लगैए।) तोरा कहलियह ने जा कऽ बरमालक तैयारी करैले, तों बकर-बकर हमर मुँह किए तकै छह। जा जल्दी जा...। (प्रकाशक प्रस्थान) शोभाकान्त- (जियालालसँ) बरक पिताजी अपने छिऐ? जियालाल- हँ, बरक पिताजी हमहीं छिऐ। अपने..? शोभाकान्त- जी, हमर नाओं शोभाकान्त छी। हमर नाओं तँ जरूर सुनने हएब। जखन मोहन मीतासँ गप भेल हएत तँ जरूर ओ (मोहन मीता) हमर नाओंक चर्च केने हेता। जियालाल- हँ! बुझल अछि। जइ लड़कीकेँ बियाहि कऽ आनए लेल अपने बरियाती साजि कऽ गेल छेलौं ओही लड़कीसँ मोहन बाबू अपना बेटाकेँ बिआह केलैथ। शोभाकान्त- बिल्कुल ठीक बुझल अछि। जियालाल- मोहन बाबूकेँ ई नहि करबाक चाही। शोभाकान्त- मोहन मीता जे केलैथ बिल्कुल ठीक केलैथ। ऐ मे गलती हमर छल। हमरा ऊपर जेना किछु चढ़ि गेल रहए। लड़कीक बाप अपन पगड़ी हमरा पैरपर राखि देने छेलैथ मुदा हम अपन धनक घमण्डमे चूर रही। मोहन मीता सेहो हमरा समझौलैथ। एत्ते धरि जे बँकियौता टका देमए केर वादा केलैथ। हुनके कराओल कुटुमैती रहए। लड़की हुनकर पुतोहुक छोट बहिन छेली। मुदा हम किनको गप नहि सुनलयैन। तइ परिस्थितिमे मोहन मीता जे केलैथ बिल्कुल ठीक केलैथ। बादमे हमरा पछताबा भेल मुदा अब पछताबा का करें चिड़िया चुग गयी खेत। जियालाल- अहिठाम की प्रयोजन लऽ कऽ एलौं हेन। शोभाकान्त- (झोरासँ बैग निकालि कऽ देखबैत) ऐ बैगमे सात भरि सोनाक जेबर अछि जे हम अपना बेटाक बिआहमे लड़की लेल लऽ गेल रही। पता चलल हेन जे अपने जेबरक कारण बरियाती आपस लऽ जा रहल छी। तँए ई जेबर लिअ आ बरियाती मोहन मीताक दरबज्जापर लऽ चलू। ओना, हम चाही तँ अपन बेटाक संग मोहन मीताक बेटीक बिआह अखने कऽ सकै छी मुदा नहि, हम अपन गाम-समाजक पइतक संग अपनेक पइत सेहो राखए चाहै छी। आब निर्णय अपनेकेँ करबाक अछि। जियालाल- (हाथ जोड़ैत) वाह! शोभाकान्त बाबू वाह!! अपने हमर आँखि खोलि देलौं। अपने महान छी। अपने सन-सन लोकपर धरती टिकल अछि। जे मोहन बाबू अपनेक होमए-बला पुतेाहुसँ अपन बेटाक बिआह केलैथ ओइ मोहनबाबूक पइत बँचबए अपने सात भरि सोनक जेबर लऽ कऽ एलौं हेन, निश्चित रूपसँ अपने धन्यवादक पात्र छी। अपनेक अभिनन्दन, वन्दन। चलू बिना सोनक हम अपन बेटाक बिआह करब। चलू गाड़ीमे बैसू। (एकटा बरियातीसँ) हऊ राजे, ड्राइवरसँ कहह हमर बला गाड़ी लाओत। आ बरियातीसँ कहह जे मोहनबाबूक दरबज्जापर पहुँचत। दुल्हासँ कहह जे ओ अपना गाड़ीमे बैसत। डी.जे. बाजा बजबाबह। हम आगा भऽ कऽ जाइ छी तों सभ दुल्हा आ बरियाती लऽ कऽ पण्डालमे पहुँचह। (परदा खसैत अछि।)
छअम दृश्य मोहनबाबूक दरबज्जा। मोहनबाबू आ लालबाबू कुर्सीपर उदास मुद्रामे बैसल छैथ। तीन-चारिटा कुर्सी खाली अछि। (प्रकाशक प्रवेश।) मोहनबाबू- की प्रकाश। की भेलह? प्रकाश- नहि बाबूजी, हम केतबो परियास केलौं मुदा ओ सभ बात नहि मानलक। ओ सभ बजला- एहनो केतौ भेलै हेन, लड़का-लड़कीक बिआह भेबे नइ केलै आ बरियाती खेनाइ खा लेतइ। मोहनबाबू- की करबहक। एक लाखसँ बेसी खेनाइमे खर्च अछि। सभ खेनाइ जिआन भऽ जेतै मुदा उपाए की? प्रकाश- बाबूजी, मीता काका आ आलोक भायजी स्कूलपर पहुँचल छैथ। मीता काका हमरा बरमालाक तैयारी करैले कहलैन हेन। (स्कारपिओ गाड़ी बन्द होइक आवाज) लालबाबू- टोन्ट केला हेन। (शोभाकान्त, जियालाल, आलोक आ एकटा बरियातीक प्रवेश) शोभाकान्त- के टोन्ट केला हेन लालबाबूजी। (प्रकाशसँ) तों आँगन जा। बरमालक तैयारी करए ग। आलोक तों पण्डालमे कुर्सी सभकेँ बेवस्थित कर गऽ। जइ घड़ी ने बरियाती पहुँचल। (आलेाक आ प्रकाशक प्रस्थान) मोहनबाबू- (खड़ा भऽ कऽ) बैसै जाइ जाऊ। (सभ गोरे कुर्सीपर बैस जाइ छैथ) जियालाल- हँ! हँ!! दस पनरह मिनटमे बर-बरियाती पहुँच जाएत। (लालबाबू कखनो जियालाल दिस तकैत तँ कखनो शोभाकान्त दिस, मोहनबाबू शोभाकान्त दिस तकैत।) (जियालाल खड़ा भऽ हाथ जोड़ि, मोहनबाबूसँ) समैघ हमरा माफ कए दिअ। गलती हमरासँ भेल। मुदा धैनवाद छैन शोभाबाबूकेँ जे ऐन वक्तपर पहुँच कऽ हमर आँखि खोलि देलैन। शोभाकान्त- नइ तँ हमरे जकाँ पश्चातापक आगिमे जिनगी भरि जरैत रहितौं। जियालाल- ठीक कहलिऐ शोभाबाबू। (डी.जे. बाजाक आवाज सुनाए पड़ि रहल अछि।) शोभाकान्त- (मोहनबाबू आ लालबाबूसँ) हमरासँ बड़ पैघ गलती भेल अछि। तइले अहाँ दुनू गोरेसँ माफी चाहै छी। जँ हमर गलतीक माफी भेट गेल तँ आऊ मीत गलासँ गला मिलू। (शोभाकान्त आ मोहनबाबू गलासँ गला मिलै छैथ।) जियालाल- आ हमरासँ गला नइ मिलब। शोभाकान्त- ओ लगनवट्टी बेरमे मिल लेब नहि तँ बर-कनियाँक विदा होइत काल। जियालाल- यौ लगनवट्टी बेरमे लड़का-लड़कीक माम गला मिलत। हम तँ अखने समैधोसँ आ समैधोसँ पहिने अहाँसँ गला मिलब। शोभाकान्त- (खड़ा भऽ कऽ) तँ आऊ पहिने हमरेसँ गला मिल लियह, पछाइत मीतासँ गला मिलब। (जियालाल आ शोभाकान्त, गलासँ गला मिलै छैथ। दर्शक खूब थोपड़ी बजबैत अछि।) जियालाल- आऊ, समैध, गला मिलू। (जियालाल आ मोहनबाबू गला मिलै छैथ।) मोहनबाबू- (लालबाबूसँ) अहाँक मुँह किएक लटकल अछि। अहूँ शोभाबाबूसँ गला मिलि लिअ। शोभाकान्त- हँ, हँ, किएक नहि। हँ जे कुटमैती हमरा आ लालबाबूक बीच नइ भेल तेकर हम भरपाइ करए चाहै छी। लालबाबूक छोटकी बेटी जे प्रकाशक कनियाँक जौंआ बहिन छी तिनकासँ आलोकक बिआह करए चाही छी। बिना एक्को पाइ दहेजक। जँ लालबाबूकेँ आपैत नइ होनि तखन। जियालाल- की यौ लालबाबूजी, की विचार अछि? लालबाबू- हमर कोनो विचार नहि। जे करैथ मोहनबाबू समैध। मोहनबाबू- जखन शोभा मीता अपन गलती स्वीकार कऽ कुटमैती करऽ लेल पहल केलैन हेन ते कुटमैती हेतइ। प्रकाशक कनियाँक बहिन दीपा बुच्ची आएल अछि। अही मरबापर विभाक संग दीपोक बिआह हएत। (लालबाबूसँ) की समैध ठीक किने। लालबाबू- अपने जे निर्णय केलौं वा करब ओ हमरा सहर्ष स्वीकार अछि। मोहनबाबू- तखन अहाँ आ शोभा मीता गलासँ गला मिलू। (शोभाकान्त आ लालबाबू गलासँ गला मिलै छैथ।) डी.जे.क आवाज लग आबि गेल हेन। ध्वनि विस्तारक यंत्रपर शहनाइक आवाज बाजि रहल अछि। (परदा खसैत अछि।) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.कुमार मनोज कश्यप- १ टा लघुकथा- अपन-अपन संसार कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा अपन-अपन संसार रधिया निर्धन भने अछि; मुदा अछि ईमानक पक्का! कुटान-पिसान कs कs अधहो पेट खा ओ दू-दू टा बेटी के कहुना जाति के हाथ धरा देलकै। ओकर ईमानदारी, दृढ़ता, बातक पक्का, मेहनत ..... सभक परतर दै छै लोक! से रधिया जखन अपन बेटी के जन्माशौच हमरा सs पाँच सय रूपया उधार मँगलक तs हमरा 'नहिं' नहिं कहि भेल। ई जनितो जे हमरा लग मात्र साते सय रूपया बाँचल अछि आ महिना लगै मे एखनो तीन दिन छै, हमर हाथ अनायस जेब तक चलि गेल। दूइये दिन के तs बात छै; परसू दरमाहा भेटिये जैत। ताबत कहुना चलिये जेतै। कोनो अप्रत्याशित खर्च आबि जैत तs तखन के तखन देखल जेतै। आई रधिया बेटी ओहि ठाम सs लौटल तs हर्षित मोने कागज़ के ठोंगा हमरा दैत बाजल - 'मालिक! आहाँ हमर ईज्जत राखि लेली। हम अई रूपया लै ककर ने पैर पकड़ली! रूपया हम पचा तs नै लितियै ...... आई ने काल्हि चुकाईये दितियै; तैयो केयो नाक पर माँछी ने बैसs देलक। आहाँ देवता बनि हमर ईज्जत बँचा लेली। ओहि रूपया मे सs साढ़े तीन सय मे छौंड़ी लै साड़ी-साया किनलियै, एक सय मे बच्चा के कपड़ा भेलै आ पचास रूपया मे कचड़ी-मुड़ही-झिल्ली आ ई शकरपाला ...!! खाली हाथ गेनाईयो नीक नईं ने होइतै ? चलि तs हम गेलियै पैरे। आहाँ सभ के पैरक दुआ सs चिल्हका-चिल्हकौड़ी सभ नीके छै।' रधिया बजैत रहल मुदा हम एकरा बाद अकानि ने सकलियै। पाँच सय रूपया के एखनो एतेक क्रय-शक्ति छै से पहिने हम सोचनेहो नहिं रही! -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१६.वृषेश चन्द्र लाल- कथा- डीप डिप्रेशन वृषेश चन्द्र लाल कथा- डीप डिप्रेशन डाक्टरक बात सुनिकए ओ अपन ठोर पसारि देलक । मुदा, डर भीतरतक पसरि गेल छलैक जे ओ नुकबए नहि सकल छल । ओकरा डिप्रेसन त नहि हएबाक चाही ! बच्चेसँ ओ सभलग निडर, साहसी, केहनो परिस्थितिसँ डटिकए भीड़एबलाक रुपमे अपनाकेँ चिन्हबएमे सफल भेल अछि । ओहो अपनाकेँ साहसी आ जुझारुये बुझैत आएल अछि । एकरे ने आत्मविश्वास कहैत छैक ! कहिओ ककरोसँ डेराएल नहि आ ने कहिओ कतहु हिम्मते हारलक ! त कोना ओकरा भ' जएतैक डिप्रेशन ? जरुर डाक्टरकेँ धोखा भेलैक अछि । एकर डाइग्नोसिस ठीक नहि छैक । ओकरा लगलैक जे ओ कहैक,- 'अहाँक डाइग्नोसिस ठीक नहि भेल । कतहुँ कोनो गल्ती भ' गेल अछि ।' मुदा फेर ओ सोचैत अछि जे किए कहौक ? डाक्टर आओर भ्रमित भ' जाएत ! कहाँदोन डिप्रेशनक रोगी कहिओ अपन बिमारी नहि स्वीकारैत छैक आ ने दबाइयो खाए चाहैत छैक । एखन कहतैक जे नहि, हमरा ई रोग नहि लागल अछि । अथवा, किछु आयँटायँ बजतैक त डाक्टरकेँ लगतैक जे बिमारी तेज छैक आ ओ दबाईक मात्रा बढा देतैक । चलू अहिना ठीक छैक ! ... दोसर ई जे सभ डाक्टरबा अपना छाड़ि दोसरकेँ मनुख नहि गनैत अछि । महान आ भगवान बुझैत अछि अपनाकेँ ! पारा दस गुणा चढ़ले रहैत छैक । ओ बाजएलेल खुलल अपन मुह बन्द क' लैत अछि ! ... डाक्टर ओकर चुप्पीकेँ स्वीकारोक्ति बुझैत अछि आ ओकरा लगैत छैक जेना ओ खूब प्रसन्न अछि । तँए त गर्वसँ चारुभर देखिरहल अछि ! मुदा साँच त ई जे ओकर डाइग्नोसिस फुसि छैक । ओकरा लगैत छैक जे संगे आएल ओकर छोटका डाक्टरक बातसँ सहमत भ' गेल अछि । बेचारा बड्ड चिन्तित अछि । छोटकाक मुह देखि ओ आओर गम्भीर भ' जाइत अछि । फेर घरमे सेहो सभक चिन्ता बढ़ि जएतैक, पूरा परिवारकेँ सुखैनी लागि जएतैक । ओ सहज रहए चाहैत अछि । एकरो किछु ने किछु प्रभाव त अवस्से पड़तैक । ओ सोचैत अछि,- 'चलू ठीक छैक !' ओकरा पते नहि चललैक जे ओ चुपचाप टकटकी लगओने डाक्टरकेँ देखिरहल अछि । डाक्टर फट् द' बाजि उठलैक,- "किआ घुरैत छी ! चिन्ता करक कोनो कारण नहि ! एहन कोनो बात नहि । दबाइ नियमित खाउ, एकदम ठीक भ' जाएत । ... आइकाल्हि ई रोग सामान्य छैक । सगरो देखएमे अबैत छैक । आधुनिकताक देन अछि ! विकासक संगी !! " आब भेल ! लिअ' !! ओकरा लगलैक जे ओ फेर बिनासेतीये हारि गेल अछि । अहिना होइत अएलैक अछि । ओ कोनो काज सोचि सोचि कए करैत अछि कि केओ ने केओ टपकिए जाइत छैक । ओ त चाहिते रहए जे कहैक,- "ठीक छैक डाक्टरसाहेब, हमरा रोग त नहि लागल अछि तैयो ई दबाइ जौँ हानि नहि करए त हम नियमित खाएब ।'' बाजएमे कनियेँ देरी भेलैक कि कहिदेलकैक जे घुरैत छिऐक कहाँदोन ! "भिनसरे किछु खा' क' एक गोटी खा लेब आ रातिमे सुतए काल एकटा ! घी तेल आ फ्याटी खानपानसँ बचक कोशिश करब !!" - कहैत डाक्टर पूर्जा थमा देलकैक । * * * आइ फेर ओ झूठ बाजलि । ओकरा वास्तविकता पहिनेसँ बुझल रहैक । बात त एकदम छोट मुदा झूठ बाजक प्रयोजन की ? छोटो बातकेँ महीन त ई ने बना दैत छैक ! यएह प्रश्न ओकरा बेचैन क' दैत छैक । ओ विचलित भ' जाइत अछि आ ओकरा लगैत छैक जे छाती बाहर फेका जएतैक । ओ अपन छातीपर अनेरे हाथ राखि लैत अछि । छातीक कुदनाइ किछु कमतैक की ?! ... ओकर बिमारिये यएह छैक । एहिना होइत आएल छैक । डाक्टरोक इलाजसँ लाभ कहाँ भेलैक ? आखिर बिमारीक कारण हटैक तखन ने ! शुरुआत त ओकरहिसँ भेल रहैक । शुरुआती दिनक बातसँ ओ आओर घबरा जाइत अछि । ओ आओर कसिकए अपन छाती पकड़ि लैत अछि । लगैत छैक ओकर दम फुलि जएतैक । ओ चिन्तित भ' जाइत अछि । दिवालपरक घड़ी देखि अपन नाड़ी देखए लगैत अछि । ठीके त छैक ! कनेके बेशी ने छैक !! एहिसँ कोनो गड़बड़ी नहि हएत । सोचैत अछि, एकबेर प्रेसर सेहो देखि लेअए, मुदा एक मने लगैत छैक बेकारे ! कहुँ बेसी हएतैक तखन ? जे हएतैक से हएतैक ! किछुओ होइक !! ओ ओछानपर ओलटएपलटए लगैत अछि । फेर सोचैत अछि जे सावधानी लेबाके चाही । गुरुजी कहथिन्ह,- "जीवन महत्वपूर्ण अछि । मृत्युलोकमे लोक अनुभूतिलेल अबैत अछि । प्रेमघृणा, दुःखदर्द, हर्षपीड़ा, मित्रतादुश्मनी, सहयोगअसहयोग, निर्णयअनिर्णय, नीतिअनीति आदिइत्यादिक अनुभवसँ आत्मा परिष्कृत होइत अछि जे जन्मजन्मान्तरतक संचित रहैत छैक । नहि जानि कतेक जन्मकक बाद आत्मा परिपूर्ण होइत अछि आ तखन ओ दोसर परायात्रालेल काबिल भ' जाइत अछि !" तहिना कहाँदोन कतेक परायात्रा होइत रहैत छैक । ओकरा ई सभ बात अबूह लगैत छैक । एक दिन ओ गुरुजीकेँ कहबो कएने रहन्हि,- "आ अन्तमे की होइत छैक ?" गुरुजी बाजल रहथिन्ह,- "से हमरा बुझल नहि अछि ! तखन फेर एहि यात्रासभक आवश्यकते किए रहि जाएत ? एखन एतबे बुझू ! जीवनकेँ पूरा आ मनसँ जीबू !! कोनो काज करैत काल मनसँ पुछू । जे कहैत अछि सएह करु । मने त असली गुरु अछि । कहिओ बेजाय निर्देश नहि देत अहाँक मन ! " ओ मनसँ पुछए लगैत अछि । ओकर हाथ ससरकिए फेर नारी पर चलि जाइत छैक । ... ठीके छैक । तखन एना किए होइत छैक ? ओ सोचैत अछि एक बेर आओर दोहरा लैत छी । ओ दोहरएलक, तेहरएलक । ठीके छैक ! ओ अन्ठाकए सुतए चाहैत अछि । अपनाकेँ बुझबक कोशिश करैत अछि । मनेमन कहैत अछि,- 'छोटछीन बातपर एतेक विचलित नहि हएबाक चाही ।' बाबा कहथिन्ह,- 'चिन्ता जिविते चितासन अछि, तँए चिन्ता नहि करी !' ओ अपन माथ झटैक लैत अछि । मुदा, कहाँ हटैत छैक चिन्ता ?! चिन्ता कोनो लोक जानि क' करैत अछि ? कए बेर सोचलक, ओ मजबूत अछि आ ओकर हृदय मजबूत छैक । ओ आब एहिसभ बातपर ध्यान नहि देत । ओकरा लोक साहसी कहैत छैक । ओ कहाँदोन संकटकेँ अपन धैर्य आ सहनशीलतासँ सहि लैत अछि । ओकरा अपनो बुझाइत छैक जे वास्तवमे एहि गुणसँ ओ परिपूर्ण अछि । सामान्य अवस्थामे जेनातेना मुदा असमान्य अवस्थामे ओ अपनाकेँ मजबूत महशूस करैत अछि । लगैत छैक जेना भीतर केओ आन पसि गेल होइक । केओ कतहुँ लिखने रहैक जे महान आत्मासभ खतरामे लोककेँ रक्षा करैत छैक । तँए शायद कहिओ काल ओ असामान्य रुपसँ साहसी, बुद्धिमान आ विवेकशील भ' जाइत अछि । कहुँ ओकर पितृसभ ओकर रक्षा करैत होइथिन्ह ! एतहुँ साहस देथुन्ह ने ! अहू चिन्तासँ मुक्त करितथिन्ह त कतेक नीक होइतैक !! ... ओ आँखि मुनि लैत अछि । आब चिन्ता नहि करत । सभ ठीक भ' जएतैक । मुदा होउक तखन ने ! तर्क ओकरा कहैत छैक जे ओ सोचैत अछि से नहि हएतैक । हएबो करतैक त की अन्तर ? इहलोक आ परलोकमे एहिसँ की अन्तर ? मुदा व्यवहारमे त एतहि अन्तर बुझारहल छैक ! ओ गुरुजीकेँ याद करैत अछि । ओकरा लगैत छैक जेना कहैत होइथिन्ह,- 'मनुख अपनालेल अनुभूति करैत अछि, ककरो दोसरलेल नहि । यदि एहनो छैक त कोनो बात नहि । अहाँकेँ कोनो असर नहि पड़त । रोकक कोशिश धरि करक चाही । तँए, संकेत धरि अवस्से क' दिऔक । आक्रामक नहि बनब । दोसर, जे अनुभवकेँ आत्मसात क' लिअ आ दोसर दिस ध्यान करु । दोसर अनुभूतिक तैयारी करु !' ओ सोचैत अछि आब अध्यात्मदिस ध्यान देत । कतहु चलि जाएत । ध्यानपर अपनाकेँ केन्द्रित करत । मुदा भविष्यक निश्चित रेखाङ्कनक आभावक कारणेँ ओ डेरा जाइत अछि । एहिमे कोनो शंका नहि जे एहि बातकेँ आब बेशी तुल नहि देबाक चाही । तँए, ओ मनसँ हटाइयो लैत अछि । पूरा बिसरि जाइत अछि मुदा एकदम छोटछीन बातपर सभकिछु फेर प्रकट भ' जाइत छैक । सिनेमाक रील जकाँ ! जखने ओकरा लगैत छैक जे फेर झूठ बाजल जारहल अछि, ओकरा झाँसा देल जारहल छैक, कोनो बहन्नाक कोशिश कएल जारहल अछि त ओ तिलमिला जाइत अछि । पहुनकासभ घटना ओकर माथमे घुमए लगैत छैक । बिसरने नहि बिसराइत छैक । आ फेर जेना छातीमे केओ भाला भोंकि देने होइक तेना ओकर हृदय कुदए लगैत छैक, कुहरए लगैत छैक । मनक भोकासी छातीक ढ़कढ़कीक रुपमे निकलए लगैत छैक आ हाथ सोझेँ छाती पकड़िकए दाबि लैत छैक । लगैत छैक जे कतहुँ परान निकलि ने जाय ! कोनो दिन कहुँ अहिना परान निकलियो नहि जाइक !! आइकाल्हि ओकरा टकटकीयो लागि जाइत छैक । मनमे कोनो बात अबैत छैक आ ओहीमे ओ केन्द्रित भ' जाइत अछि । लगपासक कोनो चीज वा हलचल ओ बुझिए नहि सकैत अछि । शरीर पूरा थीर भ' जाइत छैक । ओकर आँखिक पपनी अपन हिलडोल बन्द क' लैत छैक । सत्य कहू त ओ गतिहीन बनि जाइत अछि । घण्टा त नहि मुदा बीसो मिनटतक ओ एहिना रहैत अछि । जखन छाती दुखाए लगैत छैक त होश अबैत छैक आ ओ बुझि जाइत अछि जे फेरो ओ कीकी कहाँदोन सोचए लागल छल आ तखन ओ छाती हँसोसति अपन ध्यान दोसरदिस घुमाब'क कोशिश करए लगैत अछि । मुदा कहाँ घुमैत छैक ध्यान ? ओकरा लगैत रहैत छैक जेना आब ओ बिसरघोर भ' गेल अछि । नजदीकक लोकक सेहो नाम याद नहि रहैत छैक । मुदा, सभसँ पीड़ा त तखन होइत छैक जखन जाहि बातसभकेँ ओ बिसरए चाहैत अछि तकरा बिसरिए नहि सकैत अछि । उफ ! कोना कोना बिसरओ ओ ओहि घटनासभकेँ ?! केओ सिखा दितैक ! ओकरा ओहिना याद छैक जे ओ आनायासे अफीससँ सबेरे लौटि गेल रहए । गेट ढ़कढ़कओलक त लेटसँ खुजलैक । भीतर प्रवेश कएलक त बरण्डापर एकगोटे आओर रहैक । ओ ओकर परिचय कलेजक अपन सहपाठीक रुपमे करओलखिन्ह आ कहलखिन्ह,- "अचानक दोकानपर भेँट भ' गेल छल । कलेजक बाद पहिल बेर भेँट भेल । बहुत रिक्वेष्ट कएलिऐक त चाय पिअएलेल आएल ।" ओकरा त खुशी भेल रहैक । हृदयसँ स्वागत कएने रहैक ओ । ओकर सासुरसँ सम्बन्धित जकाँ लागल रहैक । चाहैत रहए जे ओकरासँ कनेक गप्पसप्प करैक । मुदा, ओ तुरत्ते जाएलेल तैयार भ' गेल । कहए लागल -"जल्दी अछि । ओहिना बड्ड अबेर भ' गेल अछि । एक गोट अप्वाइन्टमेन्ट अछि ।" जाइतजाइत तुलसीक पुड़िया खएने रहैक । मुहसँ त ओहुना तुलसी खैनी पत्तीक गन्ध अबिते रहैक । ओ चलि गेलैक त ओकर नजरि ओतए राखल चायपर पड़ि गेलैक । ओ कहबो कएलकैक,- "चाय नहि पिलक ?!" मुदा कोनो जबाब नहि आएल रहैक । किछु खास त बुझएलैक मुदा किछु बाजल नहि । घरमे भीतर गेल त खिड़कीसभ बन्द रहैक आ पर्दा लागल रहैक । किछु असामान्य जकाँ । ओ तैयो चुप्पे रहल । कोना कहितैक ? ओहिना आरोपित करब त अन्यायपूर्ण होइतैक ने ! ... रातिमे ओछानपर गेल त तुलसीक ओएह दिनका गन्ध महशूस भेल रहैक । ... धत्त ! ओ बड्ड शंकालु अछि । फेर किदन कहाँदन सोचए लागल । ओ माथ घुमाकए फुलवारीदिस ताकए लागल । एकटा कौआ गाछपर बैसल रहैक । ओकरा देखलकैक त लोल घुमा लेलकैक । लगलैक कौआ किछु नुकारहल छैक । ओकर दृष्टि कौआपर आओर कसिकए ठमकि गेलैक ! कएगोट कष्टप्रद प्रसंग ओकरा पछुअबैत रहैत छैक । ... कएबेर बहुतो किछु ओकरा असामान्य लगैत रहैत छैक आ ओ झटकारए चाहैत रहैत अछि, मुदा ओ सभ प्रसंग ओकरा शंकालु बनबिते जारहल छैक । ओ ठीके बिमार होइत जारहल अछि । ओ अपनाकेँ बुझबक बहुतो कोशिश करैत अछि मुदा पीड़ा बढ़िते जारहल छैक । * * * डाक्टरक क्लिनिकमे प्रतिक्षा करैत ओकरा बैचैनी जकाँ भ' रहल छैक । ओकर हाथ छातीकेँ कसिकए पकड़ने छैक । लगैत छैक घामे ओ नहा जाएत । छोटका एम्हरओम्हर घुमिरहल छैक । समय त बुझाइत छैक ओ पहिंनहिसँ नेने रहैक । पता नहि दोसर रोगीमे डाक्टर कतेक काल लगाओत ? ... गोटैक दस-बारह दिनसँ ओ बेशी बेचैन भ' गेल अछि । मुदा, ककरो किछु कहने नहि रहैक । सोचलक ककरो नहि कहतै । कहिओ क' करतैक की ? आ कहबो की करौक ? ओ नियतिकेँ स्वीकारि नेने रहए । एहि जीवनमे एहनो परिस्थितिकेँ ओकरा भोगहीक छैक । ओ त ओहि दिन छोटका अएलैक त नहि जानि की भाँपि लेलकै । सामान्य हालचाल पुछने रहैक आ ओ एकर असामान्य बेचैनीकेँ बुझि गेलैक । ओकर मुहेसँ बुझाइक जे ओ चिन्तित अछि । कहक कोशिश कएलक जे चिन्ताक कोनो बात नहि ओ ठीक अछि, मुदा बकार नहि फुटलैक । जिजिविषा आ मोह छुटल त नहिअे छैक ने ! ओकरा अपनो मन त हड़बड़ाएले छैक । रहिरहिकए डाक्टरक कोठरीदिस ध्यान चलि जाइत छैक जे दुआरि खुजलैक कि नहि ?! दुआरि खुजलैक त जोड़सँ डाक्टर ओकरे नाम चिचिअएलैक । ओ ठाढ़ भ' गेल । छोटका ओकरा भीतर ल' गेलैक । ओ रोगीक सीटपर आश्वस्त भ' बैसि गेल जे चलू समयपर डाक्टरलग छी, आब किछु नहि हएत ! छोटका सेहो ठाढ़ रहैक । टुकुरटुकुर देखैत । बेचारा ओकरा बड्ड स्नेह आ सम्मान करैत छैक । डाक्टर ओकरा बाहर जाएलेल इशारा कएलैक आ कहलकैक,- "हम हिनकासँ असगरे बतिआएब !" छोटका चुपचाप बाहर निकलि गेल छल । "की होइअ ?" - जखन डाक्टर पुछलकैक त ओ तपाकसँ बाजल,- "जी, मन बेचैन भ' जाइत अछि । लगैत अछि जेना छाती घड़फड़ा जाइत हुअए । कुदए लगैत हुअए ! आ घबराहट बढ़ि जाइत अछि ।" ओ अपनाकेँ संयत करैत कहने रहैक । ध्येय रहैक जे डाक्टर ओकरा मानसिक विषादसँ अलग मानौक । मानसिक रुपसँ ओ ठीक अछि से बुझौक । ई नहि जे ओ ई बात नहि बुझैत अछि । मुदा, ओ चाहैत अछि जे केओ ओकर मनक परत तक नहि पहुँचओ । ओकरा आओर नहि खोधओ । ओ एहिसँ डेराइत अछि । एहि पीड़ाकेँ आओर भोगए नहि चाहैत अछि । "ठीक छैक । अच्छा, कनेक जाँच क' लैत छी ।" - कहैत डाक्टर अपन प्रेसरक मशीन निकालि लेलक आ ओकरा सुताकए दहिना बाँहिपर कसए लागल । पम्पसँ हावा देलकैक आ फेर आला कानमे लगाकए हाथपर राखि प्रेसर देखए लगलैक । ओ आरामसँ सुतल रहल । एखन ओकरा बहुत आराम बुझारहल छैक । डाक्टर लग अछि ने, किछु अपरझट्टे त होमए नहि दैतैक ! "ब्लडप्रेसर त ठीक अछि । तखन एना होबक त नहि चाही । जरुर किछु बात हएतैक ?" - डाकटर पुछलकैक,- "एना कखन क ' होइत अछि ?" "कखनो भ' जाइत अछि । समयक कोनो ठेकान नहि, डाक्टर साहब ।" "हूँ ऽऽऽ ! ... अच्छा, कतेक काल रहैत अछि ओना ?" "कखनो एकाध मीनेट । मुदा, कखनो त नीके नहि होइत अछि, बड़ी कालधरि खेहारैत रहैत अछि ।" "एना असगरमे की लोकक बीचमे ?" "एसगरिमे त बेसीकाल । कहिओ काल लोकक बीचमे सेहो ।" - ओ कनेक झेंपिकए बाजल । ओकरा लगलैक डाक्टर आब ओकर असल नब्ज पकड़िरहल छैक । "जरुर किछु बेसी सोचैत हएबैक ? की सोचैत रहैत छी ? कोनो विशेष बात ? " "नहि, तेहन खास त नहि ।" "किछु त जरुर छैक जे आहाँकेँ बेचैन क' दैत अछि । ... हमरा कहू , हम ककरो नहि कहबैक । आहाँक इलाजमे हमरो सुविधा हएत आ अहूँकेँ जल्दी ठीक हएत । कोनो बात, किछुओ होए त कहू । पूरा गोप्य रखैत छिऐक हम । यदि कोनो अपराधो भेल होए त कहू ! केओ सूँघए सेहो नहि पाओत !! कहू !!! " - डाक्टर बातक जड़ि पकड़ि नेने रहैक । ओ फेर बेचैन भ' गेलैक । ओ फेरो अपन छाती जोड़सँ पकड़ि लेलकैक । माथ घामसँ बुनबुना गेलैक । "अच्छा, अहाँक बेचैनी फेर बढ़ि गेल । कनेक फेरो सुतू त !" - डाक्टर ओकर बेचैनी नीकसँ बुझि गेल छलैक । फेर ब्लडप्रेसर लेबए लागल । ओ चुपचाप पड़ल रहल । " हूँ ऽऽऽ ! ... एखन किछु अनायासे बढ़ल अछि !" - डाक्टर अपन कुर्सीपर बैसि ओकरा स्टूलपर बैसक इशारा करैत कहलकैक - " किछु त जरुर अछि जे अहाँकेँ हम अनचेते याद करा देलहुँ । .... देखू, साफसाफ कहए पड़त । नीक इलाज तखने सम्भव हएत ।" "जी नहि तेहन कोनो बात नहि छैक !" - ओ जोड़ दैत कहलकैक । " अहाँ नुकारहल छी !" " जी नहि ! " "देखू डाक्टर आ वकीलसँ झूठ नहि बाजी । गलत इलाज भ' जाइत छैक । वकीलकेँ जौँ सभ बात नहि कहलजाय त मुद्दा हारब निश्चिते बुझू । तँए, सभ किछु बताउ । ... एकदम ठीक भ' जाएत ।" - डाक्टर सम्झओलकैक मुदा ओ चुप्प रहल । कोना किछु कहौक ? सोझेँ लांछना कोना लगादौक ! बिर्रो उठि जएतैक । ओकर सम्पूर्ण परिवार बिखरि जाएत । ओकर अपनो इज्जत कतहु बाँकी रहतैक ?! फेर कोनो प्रमाण त नहि छैक !... नहि एहन अन्याय नहि करत । किछु क' लेतैक त ?! ओकर दुनियाँ उजरि जएतैक । फेर ओ ओहन नेओतल पीड़ा कोना बर्दाश्त करए सकत ? एहि डाकटरक कोन ठेकान ? कतहुँ बाजि देलकैक त ? नहि, नहि ओ एहन काज नहि करत । ओ एखनधरि अपन एहि समस्या गुरुजीकेँ त कहनहि नहि अछि, त एकरा कोना कहत ? चाहे किछु भ' जाउक । ओ रहओ वा नहि । एहन अन्याय नहि करत । असह्य दुख बैसाहि क' अपनेसँ नहि धरत । बरु सहि लेत । अपन मनकेँ अपने सम्झाबुझा लेत । डर खाली एक्केटा जे ओ झूठ नहि बाजथु ! झूठ बजिते ओकरा फेर ई सभ बात तंग करए लगैत छैक । स्लाइड जकाँ स्वचालित देखाए लगैत छैक । डाक्टर अनेक प्रकारसँ ओकरा किछु ने किछु पूछैत रहलैक । लेकिन ओ कतिआइते गेल । ओकरा लगलैक जे डाक्टर आब थाकि गेल छैक । तँए, त ओ नम्हर साँस लैत कहलकैक,- "ठीक छैक ! अहाँसँ फेरो बात करए पड़त । एखन ई दबाइसभ खाउ । १५ दिन बात फेरो आएब । ... आ आहाँक संग जे आएल छथि .... कनेक हुनका बजबिऔन्ह ।" - ओ टेबुलपर झुकिकए दबाइ लिखए लागल । केबार खोलि ओ छोटकाकेँ इशारा क' देलकैक आ अपने दुआरिपर कान थपने ठाढ़ भ' गेल । ओ बाहर ठाढ़े छल । छोटका धड़फड़ाकए भीतर पैसलैक त ओकर कानमे डाक्टरक शब्द गुँजलैक - "डीप डिप्रेशन !" आ केबार ढ़प्प द' बन्द भ' गेलैक ! * अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१७. प्रेमशंकर झा- लघुकथा- नाकक नकलोल प्रेमशंकर झा लघु कथा नाकक नकलोल
मिथिला में चुटकुला सुनबाक आ सुनेबाक प्रथा बहुत पुरान अछि, बीसवीं सदीकें अंत तक, मनोरंजन कें सीमित साधन होयबाक कारण लोक चुटकुला, खीसा-पिहानी सुनि-सुना मनोरंजन करैत छलाह। हमरा अखनो यादि अछि जे बड़का दलान पर बड़का सतरंजी ओछाकें सांझ आ दुपहर, लोक काज सँ निश्चिंत भेला पर बैसैत छलाह। एक मात्र कुर्सी पर बाबा स्व. देबनारयण झा बैसथि आ एगो अखरा चौकी पर किछु बिशेष लोक बैसि, बाबाकें चुटकुला सुनि जोर-जोर सँ ठहक्का मारि हसैत छलाह। बच्चा सब लेल संदूक छल, जाहिपर बैसि बाबाक चुटकुला सुनबाक सौभाग्य हमरा भेटल अछि। बाबा लग चुटकुलाकें बखारी छलनि, जकरा सुनबाक लेल गाम भरि सँ लोक अबैत छलथि। संदूक के कोण मे जा बैसि जाइत छलौ, जाहिसँ हमरो रोज नया चुटकुला सुनबाक लेल भेट जाइत छल। ओहिमे सँ एकटा "नाकक नकलोल" छल। बड़की काकी टोल भरिमे सबसँ बुझनुक रहथि। ककरो लग कोनो समस्या आबनि त चट दनि बड़की काकी कें बजाओल जाइत छल आ बड़की काकी फट सँ समस्या के निदान कय दैत छली। बात बहुत पहिलुका छी जखन अंग्रेज के शासन छल, लोक आधुनिकता सँ अनभिज्ञ रहय, एका- दूका शहर खटैत छलाह। जे समय-समय पर नव अविष्कारक वस्तु आनि सबकें आश्चर्य चकित क दैत छलाह। ओहिमे सँ एक नव विवाहित दूल्हा सेहो शहर खटैत छलाह। मदोश्रावणी में जखन गाम अयला त कनिया लेल एकटा नवका बस्तु भेजलनि। ओहि बस्तु के उपयोग ओहि सँ पहिने टोल परोस मे कियो नहि केने रहथि। आब समस्या भ गेल जे इ कोन गहना थिक। जखन कियो ओहि गहना कें नहि चिन्हलक, तखन सबकें बड़की काकी कें यादि अयलनि। बड़की काकीकें बजाकें आनल गेल आ सब एक संग पुछलकनि जे बड़की काकी इ कोन गहना थिक। नव बस्तु देखि बड़की काकी सेहो चकरा गेलि, एहि सँ पहिने त ओहो कहियो एहन गहना नहि देखने छली, मुदा इ बात ककरो कोना कहती, जे ओहो नहि जनैत छथि। बड़की काकी हिम्मत कय सब कें कहलखिन जे हाय रे बकलोल इहो नहि जनैत छहक, इ त छी "नाकक नकलोल"। आब सब कियो आश्चर्य चकित भय गेल जे इ नाकक नकलोल कोना भय सकैत अछि, आ नाकमे पहिरल कोना जायत, मुदा बड़की काकी कहने छलीह ताहि कियो मना नहि क सकैत छल। मानि लेबाक सिवा दोसर कोनो उपायो नहि छल, कारण एहिसँ पहिने कियो देखनो नहि छल, आ नहि जानिते छल। बड़की काकी इ नाक मे पहिरल कोना जायत हिम्मत कय के कनिया के माय पुछलखिन। बड़की काकी चप्पल के फीता पकरि कहलखिन जे इ खोलि के नाक मे दुनू तरफ छेद कय पहिरल जायत। मुदा इ त बड़ मोट अछि एतेक छेद नाक मे कोना करब? पुनः कनिया के माय असमंजस मे आबि पुछलखिन। बड़की काकी तमतमाइत कहलखिन जे गहनो पहिरब आ छेदो सं डरायब से कोना होयत। फेर की छल सब मिल कनिया के नाकमे दुनू कात छेद कय चप्पल पहिरा देलखिन। कनिया तखने सं अहुँछिया काटय लगलीह जे आब हमर प्राण कें अंते होयत, मुदा बाजि नहि सकैत छलीह कारण पति परमेश्वर कें पठाओल नव गहना छल। राति में जखन दूल्हा अयलथि त देखलथि जे सासुर मे मातम पसरल अछि, आखिर की बात भेल तकर जानकारी लेबाक लेल छोटकी सैरकें बजौलथि। छोटकी सारि सबिस्तर सबटा बात कहैत, कहलखिन जे अहा तेहन गहना पठेलो जे सब परेशान अछि। दूल्हा चौंकैत कहलथि जे कोनो गहना त नहि, पैरमे पहिरय वाला हवाई चप्पल भेजने रहि, से की भेल? मुदा बड़की काकी त कहलखिन इ त नाकक नकलोल छी, नाक मे पहिरल जायत आ ओएह कयल गेल, सैर कहलखिन। एतबे सुनिते दूल्हा धरफराइत दुल्हिन लग पहुँचलथि, आ दुल्हिन के हाल देखि मांथा हाथ देलथि जे कोन करम केलो जे अनजान वस्तुकें पठेलो। आब जे हेबाक से त भय गेल छल, तुरंत सब उपचार कयल गेल आ बड़की काकीकें बजाकें फजहति कयलनि, जे चीज नहि जनैत छलीह ओहिमे तुक्का लगेबाक कोन काज छल। बड़की काकीकें सेहो पश्याताप होमय लगलनि जे हुनका बुधियारीकें कारण आई ककरो जान चलि जाइत। अब कहियो एहन गलती नहि करती एहि बातक सप्पत खाइत सबसँ माफ़ी मंगलथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- सुखाएल पोखरि ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- एकटा विरहा- देहक सिंगार छी हमर ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- अभ्यास: सफलताक सीढ़ी ३.४.बद्रीनाथ राय- दूटा पद्य ३.५.कल्पना झा- छगुनता ३.६.आशीष अनचिन्हार- भक्ति गजल ३.१.राज किशोर मिश्र- सुखाएल पोखरि राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी सुखाएल पोखरि छलै समय ओ जेठ-मा स, पा नि छलै पो खरि मे शेष, जल बि नु, जा ठि क पा ग खसै छल, ओहि ना झलकै मो नक क्लेश।
पो खरि जकर प्रति ष्ठा , जल सँ, का दो मे ओँघड़ा एल छल, मा था ओकर, था ल सँ पो तल, बि नु जल नयन नो रा एल छल।
के जनैत नहि अछि जगत् मे? मी न-नी र सम्बन्ध, मा छ तड़पि ,परलो क गेल, आ, भेल ने जलक 'प्रबन्ध।
डी ह-डा बर छो ड़ि , कछुआ, आन -ठा म लेल वि दा भेल, गैंची -मा छ था ल मे डूबल, रुकए लेल, जि दि आ गेल।
मो ह भरल, डो का -सि तुआ मे, 'तजि वा स, ने जा एब आन ठा म, दुः खो पा बि एतहि रुकि जा एब, देखब पो खरि , करब प्रणा म। '
बि ख सँ भरल भुजंग सभ, भ्रमण करैत छल पो खरि मे, कि छु त' ओहि मे ,बि ल तकैत छल, आ, कि छु गा छक खो धरि मे।मे
नमहर -नमहर डेग बढ़ा क ' फूर्ती सँ नि कसि गेल काँ को ड़, बहुत जो र तमसा एल छल, छलै ,पा नि बि ना बड़ मो न घो र।
मा रत था ल मे लो ल चि ड़ै? आबि -आबि , आपस जा इत छल, खगक 'नि रा शा देखि , गुमसुम, नभ, डो का के, तका इत छल।
खौं झा -खौं झा क' बेंङ कुदैत छल, मुदा , छो ड़ि ने सकल सूखल तड़ा ग, पो खरि लेल सि नेह ततेक जे, ओकर सुख -दुः ख,बुझए नि ज भा ग।
चरि क' आएल छलि मही स, ओँघड़ा ए गेलि ओहि था ल मे, ला गल जेना , सि नेहक मा टि , लगा लेलक नि ज गा ल मे।
दुः ख त' छलै फति ङ्गो के, भरल पो खरि ओ देखने छल, उड़ि -उड़ि , ओहि के ऊपर, ओ देखैत रहैत छल, सूखल -तल।
अनमनस भेल, कि ना र मे, जा ल बुनैत छल मकड़ा , वी तरा ग, वैरा गी सन, मा या ने पकड़लक ओकरा ।
परंपरा नि र्वा ह करैत, अबैत छल भेँट करए मा छी , दैत छलैक, भरो स पो खरि के , जुनि करु चिं ता , हम सभ छी '।
पेटका न्ह लधने छल पड़ल, जल -कुम्भी क' छो ट समूह , नि मि त्त मा त्र हरि अरी छलै, छलै, लटकल कतबा मुह?
उगि आएल छल , घा स -पा त, पा बि , सुखा एल भूमि , कतहु -कतहु ,बड़की चुट्टी , परि क्रमा करै छल, घूमि ।
खसि , भीँ ड़ परहक गा छ सँ, उधि आए रहल छल फूल -पा त, श्रद्धां जलि छल पा बि रहल, तरु-समूह सँ, पो खरि क गा त।
पो खरि क तल, था ल सँ सा नल, छल -प्रपंच के, आसन छल, छद्म -महल मे षड्यंत्रक ' जनु, बनल सुंदर सिं हा सन छल।
थलगर मा टि , बनि गेल दलदल, मो सकि ल नि कलब फँसि क' करैत छलैक व्यंग्य, पो खरि के दुर्दशा पर, हँसि क'।
भा ग्य छलै रुसल पो खरि सँ, जल -वैभव सँ नड़ा एल छल, देह ओहि ना छलै बाँ चल, परञ्च, जल -प्रा ण हेरा एल छल।
जल -दरि द्रता सँ ग्रसि त, तड़ा गक आँगन छलै, अन्हा र, सजल कंचन -घट सँ की ? नी र बि ना हो इत अछि बेका र।
पा नि बि ना छलै रुग्ण भेल, पकड़ने हो इक, जनु महा व्या धि , केवल, जलक 'बि ना , ने ओ सकैत छल को नो शक्ति , सा धि ।
वा रि वि ही न पो खरि मे, छल भरि पो ख भरल उदा सी , जनु, समदा ओन गबैत छल, सब मि लि , पो खरि क वा सी ।
एहन वि परी त समय मे, एकदिन, उठलै बरजो र, गलञ्जर, एहि बेर त'पड़तै अका ल, भूमि , पड़ले रहतै बंजर।
आ, अबि तहिँ नभ मे मेघ को नो , जल बरसओतै थो डे़-थो ड़, भा भट सँग घओना पसा रतै, तखन ,नयन सँ झहरतै नो र।
तड़ा ग -मो न भ' गेलै अशां त, पा बि झूठ -फूसि समा चा र, ओकरा ऊपर सद्यः ई छल, मनो वैज्ञा नि क अत्या चा र।
कि छु दि न बा द, अलह भो रे, उमड़ल नभ मे का री मेघ, वि लम्ब भेलैक, मुदा तैओ, एलैक त' जलधर के दरेग।
बरसल खूब, झमा झम बरखा , पो खरि मे कि छु त भरलै पा नि , अखा ढ़ो त' छलै आबि गेल, आपस आएल कछुआ, ई जा नि ।
जेहने गी त अबै बेङ के, जो र -जो र सँ छो ड़लक ता न, भरल खुशी सँ सुना रहल छल, भरि पो खरि के, अपन गा न।
टुघरल -टुघरल काँ को ड़ आएल, पहुँचि गेल नि ज पूर्व -नि वा स, भेलै खतम दुर्दि न, मो न मे, उमड़ल छलै सुख बहुत रा स।
पो खरि -सहजी वी सभ केँ, पुनि - -मि लन -सुअवसर, देल बरि सा त, आमो द -नृत्य हो अए ला गल, आ, सि हकय ला गल नव -बसा त।
जेना -जेना , हो इत गेलै बरखा , भरैत गेलै सरो वर - उदर, कतेको जी वक हो इत छलै, ओही पो खरि सँ गुजर -बसड़।
समय संग, ओहि पो खरि मे, आएल मा छ, उपजल मखा न, प्रा प्त पुनः भेल पो खरि के, जी वन, प्रति ष्ठा ओ सम्मा न।
पो खरि क 'स्वा स्थ्य-सौं दर्य द्वा रे कतेको रहथि गुमा न मे, घुमैत कतेको , प्रशस्ति -पत्र ल' सरो वर के सम्मा न मे।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- एकटा विरहा- देहक सिंगार छी हमर संतोष कुमार राय 'बटोही' एकटा विरहा- देहक सिंगार छी हमर
की गलती भेल हमर अहाँ के किनकर भेल डर अहाँ प्यार छी हमर देहक सिंगार छी हमर
बहि रहल आँखिक नोर अछि अहाँ बिनु सुखल हमर ठोर अछि अहिं संसार छी हमर देहक सिंगार छी हमर
के बाँटत दरद हमर विजन भेल चहुंओर अहिं घर-द्वार छी हमर देहक सिंगार छी हमर
दहिन भेलाह शनि हमर कानैत-कानैत गुम भेल स्वर अहाँ कंठहार छी हमर देहक सिंगार छी हमर
भूलि कs सजना हमर अपने हाथ दैतहुं जहर अहाँ जिनगी केर सार छी हमर देहक सिंगार छी हमर
-संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम-मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- अभ्यास: सफलताक सीढ़ी श्याम बिहारी मिश्र
अभ्यास: सफलताक सीढ़ी
अभ्यास की थीक ? अभ्यास परिश्रम थीक, अभ्यास नियमितता थीक, अभ्यास धीरज आ सहनशीलता थीक, अभ्यास बुझु लड़कपन साँ परिपक्वता, अकुशलता सों दक्षताक बीचक रास्ता थीक।।
अभ्यास ओ थीक जे, अबला के बलवान बनाबैय, दुबला के पहलवान बनाबैय, औजी निर्धन के धनवान बनाबैय! मूर्ख के विद्वान बनाबैय, जौं एक आखर में कही त अभ्यास हैवान स इंसान बनाबैय।।
बुद्धि में प्रबलता के लेल, विद्या में निपुणता के लेल, कार्य में कुशलता के लेल, वाणी में समरसता के लेल, जीवन में सफलता के लेल, योग में सिद्धि के लेल, संसार में प्रसिद्धि के लेल अभ्यास जरूरी अछि।
अभ्यास ओ औषधि थीक जाहि दम पर, मोहम्मद गौरी के अठारहम बेर में विजय दियायल, साधारण तुलसी के कवि महान बनायल, महाभारतक कर्ण अर्जुन सों श्रेष्ठ धनुर्धर कहायल, वैज्ञानिक एडीसन दुनिया के अनहार सों इजोत करायल, मेजर ध्यानचंद "हॉकी के जादूगर" बनि अपन लोहा मनवायल।
सफलता के तखने अछि आस, जौ करब अहां नित अभ्यास, राखब जौ मोन में धीरज आ विश्वास पूरित हाेयत जीवनक लक्ष्य रूपी उपवास।।
-श्याम बिहारी मिश्र, वरिष्ठ लेखाकार, स्नातकोत्तर (वाणिज्य), राघोपुर, दरभंगा, बिहार - 847239 मो. 8743953128 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.बद्रीनाथ राय- दूटा पद्य बद्रीनाथ राय दूटा पद्य १ मिथिला जेकर अपन छै, ओकरे मे हम साटब | रक्ष भाव जे रखने मन मे, पैर ओकर हम काटब||
ज्ञानक गरिमा हम जनै छी, ताँइ आइ मैथिल कहबै छी| हमरे मिथिला हमरे धरती , हम उपज के काटब|| मिथिला...... बण्ठा भाइसँ लेब विचार हम, आऔर लोरीकसँ लाठी लेब| दीनाक देल इजोतक दर्शन, हम समाज मे बाँटब || रक्ष भाव. ...... ज्ञान सुधामयी निर्मल मिथिला, भव्य दिव्य अछि भाल | जाति धर्म के भेद के भेदब, आओर खाइध के पाटब|| मिथिला....... मिथिला के जे बाँटि रहल अछि, देखियौ हमरे डाँटि रहल अछि| हेतै विकाश मिथिला धरतीकेर, बैसि विचार के बाँटब | रक्ष भाव..... मिथिला के हम क्रान्तिदूत छी, घेरने रोग बिमारी, एहि अनहार मे चाही हमरा, वैचारिक चिनगारी| गली गली अनहार घर मे,चन्द्र सूर्य के साटब मिथिला....... जे हमरा बुरिबक बुझइए, बुझियौ अपने पैर कटइए| आब चलाकी मुदा नञि चलतै, अंकुशसँ हम आँकब|| मिथिला........ सुख शान्ति समृद्धि मनोहर, हम समाज मे आनब| बहुत ठकेलहुँ फेर ठकाएब नञि, आब आगि नञि पाकब | मिथिला..... हमरा मिथिला राज नञि चाही, भेटत तँ विधिवत् हम लेब | हम्मर हिस्सा हमरा चाही, नञि सुनब हम डाँटब || मिथिला...... वैचारिक कोमल किसलयसँ, हम वैचारिक आगि जराएब| बहिन चनैनिकेर खोंइछि भरब हम, सलहेशक पौरुष हम पाएब|| मिथिला...... ......
२ कौवाकेर पंचैती बैसल, पहीरि पाग अछि निर्णय भेल। जनसेवाकें काज करि किछु, सत्ता लेल शतरंजक खेल।। विष्ठा पर अधिकार हमर अछि, विष्ठा पौष्टिक च्यवनप्राश। लड़ि लड़ाक'खेलहुँ सब दिन गिद्ध नीति पर एखनो आश।। लोक कहाँ अछि बाँचल बुरिबक जे सुनि लितए बात हमर। बुझलक हमर चलाकी सबटा, सावधान अछि गाँव नगर।। एक मात्र मार्ग अछि बाँचल, भाषा पर किछु काज करी। हम चलाक छिहें पहिनहिसँ, मिथिला राजक नाम धरी।। हम कौवा मर्मज्ञ ज्ञानकेर, मुखिया मात्र रहब हमहीं। ज्ञानक मात्र एक ठिकेदार हम बाँकी सभ कनहा कनही।। गुदा मार्गसँ बाजि रहल छी, गुदा मार्ग अछि देवक देल। झुठ साँच किछुओ हम बाजब, करब चलाकी सत्ता लेल।। हम किनको मैथिल नञि मानब, मैथिल मात्र हमर खनदान। बाँचल आब प्रपंचेटा अछ, पापी पेटक करी निदान।। हम छी दागल साँढ़ प्रतिष्ठित, ढ़ेकरब अछि भाषाकेर मानक। हम जे लिखलहुँ सत्य शुद्ध अछि अछि अशुद्ध लिखल जे आनक।। हम मैथिल छी महा मनस्वी, मिथिला पर हमरे अधिकार। हमर दुष्टता जग जाहिर अछि, मिथिलाकेर हमहीं रखबार।। घर्मक आरि मे बैसि खेलहुँ हम , मलपुआ घृत आऔर मलाइ। दुरूपयोग केलहुँ क्षमताकेर, सत्ता छलि हमर भौजाइ।। धर्मक नेता मिथिला नेता, सभ दलकेर हम नेता छी। बुरिबक लोक बात नञि बुझए, हम ज्ञानक विक्रेता छी।। हम अनाथ छी,जगन्नाथ नञि, रूसली हमर अपन भौजाइ। एकबेरि पुनि चालि चलब हम, मिथिला राजक देब दोहाइ।। -बद्रीनाथ राय, पिता स्व जयदेव राय, ग्राम पोस्ट करमौली, जि मधुबनी, बिहार। शिक्षा प्रवेशिका उत्तीर्ण, इलाहाबाद हिन्दी विद्या पीठ सँ प्रथम भाग साहित्यरत्न उत्तीर्ण। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.कल्पना झा- छगुनता कल्पना झा
छगुनता
दीन बन्धु सब जागु आबो,नहि त रहब हरान। सत्य कहय छी सुनु ध्यान सं ,हाथ मे लिअ कमान। हिस्सा,बखरा मोन मुटौवल, कते करब संग्राम। जगत क लोभ में एना नय फोसू, नहि त होयब बदनाम। क्रोध, तृष्णा आर क्षुधा,नीक नहि होतयत परिणाम। अगता, खगता आर बेगरता ,इ कि जीवन क मोकाम। अरजल धन पर फुफकारं नय छोड़ू,समय होयत बलवान। चिंता करब कहिया धैर ,लौट चलूं अपन धाम। जाबंतो चीज सं भरल बजार,नहि ढौआ त सब बेकार। देख छगुनता लागि रहल, आंखि सं ढब ढब नोर बहल। -कल्पना झा- बोकारो अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.आशीष अनचिन्हार- भक्ति गजल आशीष अनचिन्हार
भक्ति गजल
अते नहि करू मान मोहन मुरारी अधम दिस दियौ ध्यान मोहन मुरारी
सहज ओ सरस बनि सरल ओ तरल बनि सुनाबथि अपन तान मोहन मुरारी
रचा रास योगी सुना सत्य भोगी रसिक रस कला ज्ञान मोहन मुरारी
शरणमे जे पहुँचल से सभ मोक्ष पेलक नै जानथि अपन आन मोहन मुरारी
हमर भाव जे छै अहीं लेल रहलै लियौ तुच्छ दुभि धान मोहन मुरारी
सभ पाँतिमे 122-122-122-122 मात्राक्रम अछि। गजलमे मान्य छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मुतकारिब मुसम्मन सालिम अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण सूचना १ "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson ................... Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार/ कलाकर्मीक काज, रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल २०२३ धरि आ ३७०म अंकक विशेषांक लेल ८ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA २ "विदेह द्वारा एक बेरमे कोनो एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकंन शृंखला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson ....... Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३७१ म (०१ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.)" पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। १) एम.एस.यू. केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, २) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नव चेतना, ३) एम.एस.यू. आ विभिन्न जाति केर समन्वय, ४) एम.एस.यू. द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम् ओकर प्रभाव बा ५) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनो लेख। ३७१म अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला विदेह अपन जीवित रचनाकार/ कलाकर्मी पर विशेषांक शृंखलाक अन्तर्गत (१)अरविन्द ठाकुर, (२)जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, (३)रामलोचन ठाकुर, (४) राजनन्दन लाल दास, (५)रवीन्द्र नाथ ठाकुर, (६) केदार नाथ चौधरी, (७) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' आ (८) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक निकालने अछि। अही सन्दर्भमे आठो साहित्यकार पर "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत "मोनोग्राफ" आमंत्रित कयल जा रहल अछि। "विदेह मोनोग्राफ" शृंखलाक विवरण निम्न प्रकार अछि: (१) इच्छुक लेखक ऊपरमे कोनो एक रचनाकार पर अपन मोनोग्राफ लिखबाक इच्छा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छथि। मोनोग्राफ लिखबाक अवधि सामान्यः एक मास रहत। (२) विदेह आठ रचनाकारपर आठ लेखकक नाम मोनोग्राफ लिखबाक लेल चयनित कऽ ओकर सार्वजनिक घोषणा करत। "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक निअम: (१) मोनोग्राफ पूर्ण रूपेँ रचनाकारपर केन्द्रित हुअय। साहित्य अकादेमी, एन.बी.टी. आ किछु व्यक्तिगत रूपेँ लिखल मोनोग्राफ/ बायोग्राफीमे लेखक संस्मरण आ व्यक्तिगत प्रसंग जोड़ि कय रचनाकारक बहन्ने अपन-आत्म-प्रशंसा लिखैत छथि। "विदेह मोनोग्राफ" फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल सन रहत। फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल एहेन एकमात्र टूर्नामेण्ट अछि जतय कोनो "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" सेरीमनी नै होइत छै आ तकर कारण छै जे "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" मे टूर्नामेण्टमे नै खेला रहल लोक मुख्य अतिथि/ अतिथि होइत छथि आ फोकस खिलाड़ी सँ दूर चलि जाइत अछि। फीफा मात्र आ मात्र फुटबाल खिलाड़ीपर केन्द्रित रहैत अछि से ओकर टूर्नामेण्ट "ओपेनिंग सेरीमनी" नै वरन् सोझे "ओपेनिंग मैच" सँ आरम्भ होइत अछि आ ओकर समापन "क्लोजिंग सेरीमनी"सँ नै वरन् "फाइनल मैच आ ट्राफी"सँ खतम होइत अछि आ फोकस मात्र आ मात्र खिलाड़ी रहैत छथि। तहिना "विदेह मोनोग्राफ" मात्र आ मात्र ऐ "सातो रचनाकार"पर केन्द्रित रहत आ कोनो संस्मरण आदि जोड़ि कऽ फोकस रचनाकारसँ अपनापर केन्द्रित करबाक अनुमति नै रहत। (२) मोनोग्राफ लेल "विदेह पेटार"मे उपलब्ध सामग्रीक सन्दर्भ सहित उपयोग कयल जा सकैए। (३) विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' ई-पत्रिकामे प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। (४) "विदेह मोनोग्राफ"क फॉर्मेट: रचनाकारक परिचय (रचनाकारक जन्म, निवास-स्थान आ कार्यस्थलक भौगोलिक-सांस्कृतिक विवेचना सहित) आ रचनावली (समीक्षा सहित)। घोषणा: "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत (१) राजनन्दन लाल दास जी पर मोनोग्राफ निर्मला कर्ण, (२) रवीन्द्र नाथ ठाकुर पर मुन्नी कामत आ (३) केदार नाथ चौधरी पर प्रेम मोहन मिश्र द्वारा लिखल जायत। मैथिली पुत्र प्रदीप पर "विदेह मोनोग्राफ" लिखताह प्रेमशंकर झा "पवन"। शेष ५ गोटेपर निर्णय शीघ्र कएल जायत। घोषणा २: ओना तँ मैथिली पुत्र प्रदीप पर विदेह विशेषांक नै निकालने अछि, मुदा हुनकर अवदान केँ देखैत प्रेमशंकर झा "पवन"क हुनका ऊपर "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक विचार आयल तँ ओकरा स्वीकार कयल गेल। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४ विदेह ब्रॉडकास्ट लिस्ट विदेह WWW.VIDEHA.CO.IN सम्बन्धी सूचना लेल अपन whatsapp नम्बर हमर whatsapp no +919560960721 पर पठाउ, ओकर प्रयोग मात्र विदेह सम्बन्धी समाचार देबाक लेल कएल जाएत। ५ विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १. साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका (घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २. व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३. प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५. स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७. लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८. दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA 302 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६१ म अंक ०१ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६१)|| 303
डे a A री
= > ace cites पारिककाय-नानक आ ंगंडका्मी- बंगंड-सिर्लेशक नव विप्ग्लक भू बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. Pr - Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement Pree 255 H (0> HA2022) HOT AAA ATA ATS ATTN H (>७ सर २0२३) woe eran san कानड़ि Se oa hosts मिकालऊउ। MoRIS CT PITH) कलाकार्मीक DTS, बहमा-प्रँगागम, SIS a0 OTIS DHHS STS ST OHSS, आ्लाहमा, SOTTO, ST ah) aT अठि। “SF अनस SOT 28 SHS Ome (तल २४ IT 2022 HEF AT OHA ORTH तल ८ T2022 थंवि न FISTIG gs USS editorial.staff.videha@gmail.com #3 नहा सके ढी। sis हाकृज, sare few, whatsapp no +99560960722 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- 5472 VIDEHA 2 ore ब्रावा Ss RO ONT अकटो SED STIS घरूलाकंन मूं बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. { ~ Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement विलड नस 279 F (03 7202) sewer "िथिला पटटेडंट a (आए-अर-दू)" oa roma मिकालऊ। Rite See re (बर-बर-,) गय सिठा ली बल er (ेशिलीएय आपतव as अदा दी % की बकरा, कब भहियक amie उखिराए, Ke 2) SLesIg, आा BRET (कब नल कमा, a मे 2) आर: ar BSR जाि AST, Qe SsumanifsdemscmccaiemersTs Ss Ky) ७) DLS SHES आन IT TA SS Y AD ona des fonts (लल axl अनन यहना २७ Hg २०२३ HAS TENT HO पेड Ss Bb editorial. staff.videha@gmail.com #4 ना प़कि ढी। p peer ere aura fam, whatsapp no +9956096072I HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- — 547X VIDEHA
ala wwe 4 दि ‘ ''विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक on रंगमंचकर्मी- रंगमंच निर्देशक पर विशेषांक शृंखला” हे Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. Sah ‘Videha: Maithili Literature Movement. विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार कलाकर्मीक काज, 'रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल २०२३ धरि आ Yeo stores विशेषांक लेल ८ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र TEA editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सके छी। aries org, सम्पादक विदेह, whatsapp no +9956096072i HTTPIVIDEHA.CO.INI ISSN लि a fe द्वारा एक बेरमे कोनों एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकं॑न शृंखला” Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. Vida: Mail LRrature Movement विदेह अपन ३७१ म (०९ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम. एस. यू." पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (GH. gw.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। 2) एम.एस.यू. केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, २) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नव चेतना, शिि िम्य ४) एम.एस.यू. द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम् ओकर प्रभाव बा 4) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनों लेख। ७इम अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ UR वर्ड फाइलमे ई-पत्र सडकेत editorial. staff.videha@gmail.com पर पठा सके छी। -गजेन्द्र वाकुर, सम्पादक बिदेह, whatsapp no +9956096072i HTTP://VIDEHA.CO.IN/ISSN 2229 SA7KVIDERA suk हे लत Biol AS sul 4 टैग, U
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304 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA | 2B él t "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला” | Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. am ‘of us. *Robert Louis Stevenson ‘= ei Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि “ware! पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार! कलाकर्मीक काज, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल 2023 धरि आ ३७०म Somes विशेषांक लेल ८ मई २०२३ UR वर्ड फाइलमे ई-पत्र TESA editorial. staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक बिदेह, whatsapp no +97956096072 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA a “fate द्वारा एक बेरमे कोनो एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकंन शृंखला” Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३७१ म (०१ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.)” पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। 8) एम.एस.यू., केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, र) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नव चेतना, 2) एम.एस.यू. on विभिन्न जाति केर समन्वय, | ४) एम.एस.यू, द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम् ओकर प्रभाव बा. | ५) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनों लेख। | eRe अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ UR वर्ड फाइलमे ई-पत्र सडकेत f editorial. staff.videha@gmail.com पर पठा सके छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +9956096072] HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA : Pitot AAS Mithila Student Union
विदेह ३६१ म अंक ०१ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६१) | | 305 wa की We "खिजरक sine ewes a जैगपंठकर्मी- बैशपंठ-निरमनक गज खिन्मशंक भूं बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. , a, | - Robert Louis Stevenson tet tet Videha: Maithili Literature Movement FAGE BRT २०9 मे (09 NA २०२३) OT ARH (त बक OSS 7S जा 270 पा (DB Ht 2029) aes Het Crean san arts sna नय fonio निकालऊ। feria qa asa कलाकर्मीक काऊ, यहन्वा-प्रँगागन्, SST SGV SOAS कार्यणड NS ADTES SAT (SIGS, SICTONT, SHIGTONT, परीक्षा ath) 'आामंकिऊ अति। sat अगन उठा 2d50 as Rrossias (सता २४ aT २०२२ धंखि a श१0प iss romain (लत ८ Nt 2027 I AS TIS gS MSS editorial. staff.videha@gmail.com #4 tS SH -sigra Sea, Sars fac, whatsapp no +9956096072I HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- 547X VIDEHA 2 “BE TST अक SACI SIT GT प्रैंचक SAS RETA भुं बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement. aoe अनन 27> मे (09 BAT 2022) dpa "Rar mest BA (an.25.g.)" 974 forates निकालऊ। ike पांडे TARA (9n.95.2.) गय न्रिठा ली बल Bore 0ेशिलीएर ancra sities as 9) GL. (कब अर्डनक sok fee, * 2) ag. hen (एकय नर OO, ¢ % 2) GLa2. artes wis (कय माय, aq ही QELGSLZ, FST SET FAAS SOTA SI उकय CA-GST A GAL ७कय HST At ति ७) GS. SASS शान (कामना (सा Se) sin 'बंकक लि(नयांक (सल wei aR FEAT २७ Hg २०२२ FAAS FIST H-NET oy editorial.staff.videha@gmail.com गज नठी प़राकि ढी। “जन्म Seg, Sars fac, whatsapp no +9956096072I HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- en टू 547X VIDEHA piuiul AS सकने Mithila Student Union