VIDEHA — Issue 362 / अंक ३६२

Publication: VIDEHA · Issue: 362
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ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६२ म अंक १५ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६२) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 362 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-४४) १.२.अंक ३६१ आ ३६२ पर टिप्पणी (पृ. ४५-५२) २.गद्य खण्ड २.१.कुमार मनोज कश्यप- ट्रेण्ड (पृ.५५-५६) २.२.आचार्य रामानंद मंडल- काम से राम की ओर (पृ. ५७-६०) २.३.आचार्य रामानंद मंडल- यशोदा माय (पृ. ६१-६५) २.४.महाकान्त प्रसाद- ३ टा बीहनि कथा (पृ. ६६-६८) २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना (उपन्यास- खेप ९) (पृ. ६९-७१) २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- खिच्चड़ि (पृ. ७२-८०) २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास सातम पड़ाव) (पृ. ८१-८६) २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १९ म खेप (पृ. ८७-९१) २.९.डॉ किशन कारीगर- अकादमी पुरूस्कार वला नांगैड़ (हास्य कटाक्ष) (पृ. ९२-९४) २.१०.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ९५-१०५) २.११.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १०६-११६) २.१२.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ११७-१२५) २.१३.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १२६-१३३) २.१४.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १३४-१४०) ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- कोरोना: काल! (पृ. १४२-१४५) ३.२.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल (पृ. १४६-१४७) ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- हट्ठी जाड़ (पृ. १४८-१५१) ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण (पृ. १५२-१६०) 2

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३६१ आ ३६२ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार (मैथिली) २०२२ प्रसंग तीन टा जूरी रहथि डॉ सविता झा सोनी, डॉ मित्रनाथ झा आ श्रीमती नीरजा रेणु। पहिने अहाँकेँ बता दी जे साहित्य अकादेमी मात्र ब्राह्मणवादी सभकेँ अनुवाद असाइनमेण्ट दै छै, समानान्तर धाराक लेखकक हककेँ मारिकँ। रत्नेश्वर मिश्र जीकेँ प्राइज देबाक निर्णय दू टा जूरी केलन्हि, तेसर गोटे रुसि गेला/ गेली। ऐ नाटकक की जरूरी छलै? रत्नेश्वर मिश्रक अनुवाद बा साहित्यसँ कोनो सरोकार नै छन्हि, अपना जमानामे इतिहासक नीक ट्यूशन चलै छलन्हि, नोट बिकाइ छलन्हि। दोसर अनुवाद आब ई नै करता, जइ उद्देश्यसँ केलन्हि तकर पूर्ति भऽ गेलन्हि। साहित्य अकादेमी मैथिली परामर्शदातृ समितिमे सभटा चोरे-बनोर छै, आब साहित्य अकादेमीकेँ चोर-बनोर भेनाइ परामर्शदातृ समितिक सदस्यता लेल न्यूनतम क्वालिफिकेशन घोषित कऽ देबाक चाही, कारण नहियो केने छै तँ सएह सभ छै। हँ तेँ एकरा सभसँ तँ कोनो आशा अछिये नै, मुदा बाबू पुरस्कार लेनिहारक निर्लज्जता जबरदस्त छन्हि, आ तइ पुरस्कारकेँ स्वीकार करबा काल जे हुनकर भाषण हेतन्हि से फ्रेममे लगबैबला हेतै। २ १११म 'सगर राति दीप जरय' रहुआ संग्राममे सम्पन्न भेल साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष डॉ. अशोक अविचल व्यक्तिगत आधारपर १११म 'सगर राति दीप जरय'क आयोजन, वर्षक ३१ दिसम्बर २०२२ शनि दिन, रहुआ संग्रामक 'आदिनाथ मधुसूदन पारस मणि संस्कृत महाविद्यालय'क सभागारमे सफलतापूर्वक सम्पन्न करबेलनि। ३३ टा नूतन कथाक पाठ भेल। पठित कथा सभपर मैथिली कथाकार लोकनि टिप्पणी केलनि। एतऽ विभिन्न विधाक १७ पोथीक लोकार्पण सेहो भेल। ई आयोजन तीन-तीन मासपर, वर्ष भरिमे चारि खेप आयोजित होइए। प्रथम 'मार्च'मे, द्वितीय 'जून'मे, तृतीय 'सितम्बर'मे आ चतुर्थ 'दिसम्बर'मे। एतऽ किछु मूलधाराक साहित्यकार नाम नै लेबाक शर्तपर सूचित केलन्हि, जे अशोक अविचल आ सात टा गएर लिटेरेरी असोसियेशन साहित्य अकादेमीक मेम्बरशिपमे एकटा नाम आगाँ अनलक अछि- डॉ. अजय कुमार झा जे अशोक अविचलक भागिन छथिन्ह (किछु गोटेक अनुसार ममियौत पिसयौत); तेँ मूलधाराक कथाकार लोकनि १११म सगर जाति दीप जरयक बहिष्कार केलनि। ई पुछलापर जे तखन विभूति आनन्द, हीरेन्द्र कुमार झा, दमन कुमार झा आ अशोक कुमार मेहता केना १११म सगर राति दीप जरयमे पहुँचला, तँ ओ सभ सूचित केलनि जे तइ लेल ऐ चारू गोटेक करार अशोक अविचलसँ भेलन्हि जे ओ एकरा ११२ म सगर राति दीप जरय लिखता, मुदा ओ कोनो आमंत्रणमे से नै केलन्हि आ बैनरपर ऊपरमे छोट सन 'क्रम ११२' लिखलन्हि। तइपर संचालक हीरेन्द्र कुमार झा क उसकेलापर अध्यक्ष विभूति आनन्द समेत दमन कुमार झा आ अशोक कुमार मेहता २-३ घण्टा बाद खा पी कऽ ओतऽ सँ प्रस्थान कऽ गेला, मुदा समानान्तर धाराक सभ कथाकार भोर धरि गोष्ठीमे रहि एकरा सफल बनबेलन्हि। एतऽ ई स्पष्ट कऽ दी जे ई कृत्य हीरेन्द्र कुमार झा पहिनहियो केने छथि जे विदेहमे अभिलेखित अछि [८९म सगर राति दीप जरय, औरहा (लौकही), १५.५.२०१३, संयोजक- उमेश पासवान; हीरेन्द्र झा द्वारा क्रमांक ९० नै केलापर गोष्ठीक बहिष्कार आ हुनका उसकेलापर अशोक कुमार मेहता सेहो बहिष्कार केलनि]। एतऽ ईहो स्पष्ट कऽ दी जे हीरेन्द्र कुमार झा लूज टॉक करैमे माहिर छथि आ अपना सङे आयल लोकक विषयमे, कनियो जँ ओ सभ एम्हर-ओम्हर गेला, तँ ढाकीक ढाकी विषवमन करै छथि। संगहि ईहो स्पष्ट कऽ दी जे समानान्तर धाराक लेखक लोकनिक सगर राति दीप जरयमे आगमनसँ पूर्व, जखन हीरेन्द्र कुमार झा सभक बोलबाला छलन्हि, गोष्ठीमे सभ खा पी कऽ सूति जाइ छला आ मात्र कथा पढ़निहार असगरे जागल रहै छला, जकर विरोधमे आशीष अनचिन्हार कथा पढ़बासँ मना कऽ देने रहथिन्ह, मुदा मूलधारा भोरमे जे न्यूज देलक तइमे ई गप नै आयल। ई सभटा खेरहा हमर पोथी प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-२ मे अभिलेखित कएल गेल अछि जे उपलब्ध अछि http://videha.co.in/pothi.htm पर। साहित्य अकादेमी द्वारा गत दस बर्खसँ समानान्तर धाराक एकमात्र स्थल सगर राति दीप जरय केँ गीड़ि लेबाक प्रयास कएल जा रहल अछि। आगामी ११२म 'सगर राति दीप जरय'क आयोजन श्री रामचन्द्र रायक संयोजकत्वमे हुनक पैतृक गाम- सहुरिया (अन्धराठाढ़ी) मे 'मार्च' २०२३ मासक अन्तिम शनि दिन हएत, से सर्वसम्मतिसँ निर्धारित भेल। हीरेन्द्र कुमार झा अपन ब्लैकमेलिंग आगाँ सेहो पूर्ण निष्ठासँ जारी राखलनि जखन ०२.०१.२०२३ केँ रामचन्द्र रायकेँ फोन कऽ आगामी गोष्ठीक क्रमांक ११२ नै ११३ करबाक दुष्टतापूर्ण ब्राह्मणवादी आग्रह केलन्हि आ डरेलन्हि, जइ सँ कोनो तरहेँ साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरयक मान्यता भेटि जाय, फेर ०५.०१.२०२३केँ घट्टी मानलन्हि। साहित्य अकादेमी हुनकर दस बर्खसँ जारी ऐ कुत्सित प्रयासक मेहनताना दैत हेतन्हि आ जँ नै देने छन्हि तँ आगाँ देतन्हि। विदेहक आगामी साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक मे सभ गपक खुलासा हएत। ऐ सम्बन्धमे ई स्पष्ट कऽ दी जे अशोक अविचल ऐ गोष्ठीक आयोजन पूर्ण रूपसँ व्यक्तिगत रूपेँ केने रहथि। दिल्लीक साहित्य अकादेमीक गोष्ठी जे टैगोरक १५० जयन्ती बर्खमे आयोजित भेल आ जकरा साहित्य अकादेमी अपन वार्षिक रिपोर्ट आ आय-व्यय खातामे अपन गोष्ठीक रूपमे वर्णित केलक आ तकर पाइक वितरण देखेलक आ ऑडिटरसँ अप्रूव करेलक, जे सही मदमे टैगोरक कार्यक्रम लेल खर्च भलै (सगर राति दीप जरय लेल नै) केँ सगर राति दीप जरयक रूपमे मान्यता देबा लेल मूल धाराक पुरस्कार/ असाइनमेण्ट लोलुप आ ब्राह्मणवादी लोक गत दस बर्खसँ अपस्याँत छथि, से एक बेर फेर असफल भेल। रहुआ संग्राम गोष्ठीमे निम्न कथाक पाठ भेल, १. डॉ विभूति आनन्द : आस्था, विश्वास आ परम्परा; २. रवि भूषण कुमार : भोजक वहिष्कार; ३. मानब अनीष मण्डल : सत्यक भ्रूण हत्या; ४. रितिक मण्डल : गेलौं तँ हम गेलौं ; ५. पं. शिव कुमार मिश्र : वसुधा काहू को न होय; ६. उमेश मण्डल : अप्पन जिम्मा; ७. आचार्य रमानन्द मण्डल : बाल वैरागी; ८. राधाकान्त मण्डल : भुमहुर आगि आ अल्हुआ; ९. झोली पासवान : कारी नाग; १०. नारायण यादव : कनियाक जीवन; ११. कपिलेश्व राउत : चेफरी; १२.  जगदीश प्रसाद मण्डल : कुमहरक बतिया; १३. अमित मिश्र : अधलाहक परिणाम अधलाहे; १४. बैद्यनाथी राम : हमहीं धनीक छी; १५.  हरिश्चन्द्र झा : निरीक्षण; १६.  प्रीतम कुमार निषाद : बुढ़ारी भ्रूणक हत्या; १७.  श्रवण कुमार मण्डल : प्रेम विवाह; १८. रामसेवक ठाकुर : सात पूत रामकेँ; १९.  रामकृष्ण परार्थी : आड़ि; २०.  दुर्गेश मण्डल : द्वन्द; २१.  लालदेव कामत : मधुमाछी ; २२.  शारदानन्द सिंह : जावत सोंखा के नाव होयतो तावत; २३.  अरविन्द प्रसाद : नेंगरू आ मंगरू; २४.  अशोक अविचल : मनुआ नाचय मोर; २५.  नारायण झा : राजनीतिमे राजनीति; २६.  उमेश नारायण कर्ण : माय; २७.  दुर्गानन्द मण्डल : सपना; २८.  राम विलास साहु : नीक करब तँ बेजाए किए हएत?; २९.  नन्द विलास राय : रंगल नढ़िया; ३०.  रामचन्द राय : तोहीं जितलेँ हमहीं हारलौं; ३१.  रामेश्वर प्रसाद मण्डल : हमरो बहिन अछि; ३२. विनय मोहन जगदीश : छट्ठू; आ ३३. रमेश कुमार शर्मा : संघर्ष। गोष्ठीमे निम्न पोथी सभक लोकार्पण भेल- १. साहित्यकारक विवेक (कथा संग्रह)  :  जगदीश प्रसाद मण्डल; २. नब बनक नब फल (कथा संग्रह)  :  जगदीश प्रसाद मण्डल; ३. सुचिता (उपन्यास) :  जगदीश प्रसाद मण्डल; ४. प्रतिकार एखन बाँकी अछि (काव्य संग्रह) : रामकृष्ण परार्थी; ५. असल पूजा (कथा संग्रह)  :  नन्द विलास राय; ६. संयोग (कथा संग्रह) :  रबीन्द्र नारायण मिश्र; ७. लजकोटर (उपन्यास)  :  रबीन्द्र नारायण मिश्र; ८. इएह थिक जीवन (संस्मरण)  :  रबीन्द्र नारायण मिश्र; ९. राष्ट्र मंदिर (उपन्यास)  :  रबीन्द्र नारायण मिश्र; १०. मातृभूमि  (उपन्यास)  :  रबीन्द्र नारायण मिश्र ; ११. सीमाक ओहि पार (उपन्यास)  :  रबीन्द्र नारायण मिश्र; १२. नित नवल सुभाष चन्द्र यादव  :  गजेन्द्र ठाकुर ; १३. मैथिली समीक्षाशास्त्र (आलोचना)  :  गजेन्द्र ठाकुर ; १४. Rajdeo Mandal Maithili Writer :  Gajendra Thakur; १५. सुभद्रा कुमारी चौहान (विनिबन्ध)  :  डॉ. अशोक अविचल; १६. जेतए ने जाए कवि ओतए जाए अनुभवी (विचारोत्तेजक गद्यांश संकलन) :  डॉ. उमेश मण्डल; १७. जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य संग्रह (अनुसन्धान विश्लेषण) : डॉ. उमेश मण्डल। सुभाष चन्द्र यादव समानान्तर धाराक १११म सगर राति दीप जरयक सफलता लेल संदेश पठेलन्हि आ नै आबि सकबा लेल दुख व्यक्त केलन्हि। लोकार्पित पोथी 'नित नवल सुभाष चन्द्र यादव' लेल अपूर्व उत्साह देखल गेल, आ उपस्थित लोक मांगि-मागि कऽ ओ पोथी लेलनि आ फोनपर दूर दिल्ली आ आन-आन ठामसँ ऐ पोथीक ऑर्डर लोकार्पण दिने सँ आबय लागल। सगर राति दीप जरय पहिल सँ १११ धरिक कथा यात्रा १. मुजफ्फरपुर, २१.०१.१९९०, प्रभास कुमार चौधरी; २. डेओढ़, २९.०४.१९९०, जीवकान्त; ३. दरभंगा, ०७.०७.१९९०, डॉ. भीमनाथ झा, प्रदीप मैथिली पुत्र, विजयकान्त ठाकुर; ४. पटना, ३.११.१९९०, गोविन्द झा, दमनकान्त झा; ५. बेगुसराय, १३.०१.१९९१, प्रदीप बिहारी; ६. कटिहार, २२.०४.१९९१, अशोक; ७. नवानी, २१.०७.१९९१, मोहन भारद्वाज; ८. सकरी, २२.१०.१९९१, प्रो. सुरेश्वर झा, डॉ. राम बाबू; ९. नेहरा, ११.१०.१९९२, ए.सी. दीपक; १०. विराटनगर, १४.०४.१९९२, जीतेन्द्र जीत; ११. वाराणसी, १८.०७.१९९२, प्रभास कुमार चौधरी; १२. पटना, १९.१०.१९९२, राजमोहन झा; १३. सुपौल- १, १८.१०.१९९३, केदार कानन; १४. बोकारो, २४.०४.१९९३, बुद्धिनाथ झा; १५. पैटघाट, १०.०७.१९९३, डॉ. रमानन्द झा 'रमण' ; १६. जनकपुर, ०९.१०.१९९४, रमेश रंजन; १७. इसहपुर, ०६.०२.१९९४, डॉ. अरविन्द कुमार 'अक्कू'; १८. सरहद, २३.०४.१९९४, अमिय कुमार झा; १९. झंझारपुर, ०९.०७.१९९४, श्यामानन्द चौधरी; २०. घोघरडीहा, २२.१०.१९९४, डॉ. नारायणजी; २१. बहेरा, २१.०१.१९९५, कमलेश झा; २२. सुपौल (दरभंगा) , ०८.०४.१९९५, कमलेश झा; २३. काठमांडू, २३.०९.१९९५, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; २४. राजविराज, २४.०१.१९९६, रामनारायण देव; २५. कोलकाता (रजत जयंती, २८.१२.१९९६), प्रभास कुमार चौधरी; २६. महिषी, १३.०४.१९९७, डॉ. तारानन्द वियोगी/ रमेश प्रायोजित; २७. तरौनी, २०.०६.१९९७, शोभाकान्त; २८. पटना, १८.०७.१९९७, प्रभास कुमार चौधरी; २९. बेगूसराय, १३.०९.१९९७, प्रदीप बिहारी; ३०. खजौली, ०४.०४.१९९८, प्रदीप बिहारी; ३१. सहरसा, १८.०७.१९९८, रमेश; ३२ पटना, १०.१०.१९९८, श्याम दरिहरे; ३३. बलाइन; नागदह, ०८.०१.१९९९, पदम सम्भव; ३४. भवानीपुर, १०.०४.१९९९, डॉ. जिष्णु दत्त मिश्र; ३५. मधुबनी, २४.०७.१९९९, सियाराम झा 'सरस', डॉ. कुलधारी सिंह; ३६. अन्दौली, २०.१०.१९९९, कमलेश झा; ३७. जनकपुर, २५.०३.२०००, रमेश रंजन; ३८.  काठमांडू, २५.०६.२०००, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; ३९. धनबाद, २१.१०.२०००, श्याम दरिहरे एवं रामचन्द्र लालदास; ४०. बिटठो, २१.०१.२००१, डॉ. अक्कू,  प्रो.विद्यानन्द झा; ४१. हटनी (घोघरडीहा), १९.०५.२००१, प्रो. योगानन्द झा/अजित कु.आजाद; ४२. बोकारो, २५.०८.२००१, गिरिजानन्द झा 'अर्धनारीश्वर',  मिथिला सा. परिषद्; ४३. पटना, किरणजयंती, ०१.१२.२००१, अशोक, चेतना समिति, पटना; ४४. राँची, १३.०४.२००२, कुमार मनीष अरविन्द; ४५. भागलपुर, २४.०८.२००२, धीरेन्द्र मोहन झा; ४६. पटना, (विद्यापति भवन पटना), १६.११.२००२, अजित कुमार आजाद; ४७. कोलकाता, २२.०१.२००३, कर्णगोष्ठी, कोलकाता; ४८. खुटौना, ०७.०६.२००३, डॉ. महेन्द्र नारायण राम; ४९. बेनीपुर, २०.०९.२००३, कमलेश झा; ५०. दरभंगा, २१.०२.२००४, डॉ. अशोक कुमार मेहता; ५१. जमशेदपुर, १०.०७.२००४, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ५२. राँची, ०२.१०.२००४, विवेकानन्द ठाकुर ; ५३. देवघर, ०८.०१.२००५, श्याम दरिहरे एवं अविनाश; ५४. बेगूसराय, ०९.०४.२००५, प्रदीप बिहारी; ५५. पूर्णियाँ, २०.०६.२००५, रमेश; ५६. पटना, ०३.११.२००५, अजीत कुमार आजाद; ५७. जनकपुर (नेपाल) , १२.०८.२००६, रमेश रंजन; ५८. जयनगर, ०२.१२.२००६, नारायण यादव; ५९. बेगूसराय, १०.०२.२००७, प्रदीप बिहारी; ६०. सहरसा, २१.०७.२००७, किसलय कृष्ण; ६१. सुपौल-२, ०१.१२.२००७, अरविन्द ठाकुर; ६२. जमशेदपुर, ०३.०५.२००८, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ६३. राँची, १९.०७.२००८, कुमार मनीष अरविन्द; ६४. रहुआ संग्राम (मधुबनी), ०८.११.२००८, डॉ. अशोक अविचल; ६५. पटना, कथा गंगा-३, २१.०२.२००९, अजित कुमार आजाद/ चेतना समिति; ६६. मधुबनी, ३०.०५.२००९, दिलीप कुमार झा; ६७. समस्तीपुर, ०५.०९.२००९, रमाकान्त रय 'रमा'; ६८. सुपौल- ३, ०५.१२.२००९, अरविन्द ठाकुर; ६९. जनकपुर, ०३.०४.२०१०, राजाराम सिंह 'राठौर'; ७०. कबिलपुर (दरभंगा) , १२.०६.२०१०, डॉ. योगानन्द झा; ७१. बेरमा (झंझारपुर), ०२.१०.२०१०, जगदीश प्रसाद मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ७२. सुपौल, ०४.१२.२०१०, अरविन्द ठाकुर; ७३. महिषी, कथा राजकमल, ०५.०३.२०११, विजय महापात्र; ७४. हजारीबाग, १०.०९.२०११, श्याम दरिहरे; ७५. पटना, हीरक जयन्ती, १०.१२.२०११, अशोक एवं कमलमोहन 'चुन्नु'; ७६.चेन्नै, १४.०७.२०१२, विभा रानी; ७७. दरभंगा, किरण जयन्ती, ०१.१२.२०१२, अरविन्द ठाकुर ; ७८. घनश्यामपुर, ०९.०३.२०१३, कमलेश झा; ७९. औरहा (लौकही), १५.५.२०१३, उमेश पासवान; ८०. निर्मली (सुपौल), ३०.११.२०१३, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८१. देवघर, (बिजली कोठी, बम्पासटॉन, देवघर), २२.०३.२०१४, ओम प्रकाश झा; ८२. मेंहथ, (झंझारपुर), कथा बौध सिद्ध मेहथपा, ३१.०५.२०१४, गजेन्द्र ठाकुर; ८३. सखुआ-भपटियाही, ३०.०८.२०१४, नन्द विलास राय/फागुलाल साहु/सूरज नारायण राय 'सुमन'; ८४. बेरमा (मधुबनी), २०.१२.२०१४, शिवकुमार मिश्र, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८५. भागलपुर, (श्याम कुंज, द्वारिकापुरी भागलपुर), ०४.०४.२०१५, ओम प्रकाश झा ; ८६. लकसेना (मधुबनी), २०.०६.२०१५, राजदेव मण्डल 'रमण', सत्यदेव 'सुमन' ; ८७. निर्मली (सुपौल), १९.०९.२०१५, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी ; ८८. मध्य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर), ३०.०१.२०१६, कमलेश झा, अमर नाथ झा ; ८९. लौकही, २६.०३.२०१६, उमेश पासवान एवं प्रेम कुमार साहु; ९०. लक्ष्मीनियाँ (मधुबनी), १८.०६.२०१६, राम विलास साहु, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ९१. गोधनपुर (मधुबनी) २४.९.२०१६, दुर्गानन्द मण्डल; ९२. नवानी (मधुबनी), ३१.१२.२०१६, अजय कुमार दास 'पिन्टु'; ९३. रतनसारा (घोघरडीहा), २५.०३.२०१७, राजदेव मण्डल, स्थानीय साहित्यानुरागी ; ९४. लौफा (मधेपुर), २४.०६.२०१७, डॉ. योगेन्द्र पाठक वियोगी, स्थानीय प्रेमी  ; ९५. जलसैन डुमरा (मधुबनी), ०९.९.२०१७, नारायण यादव; ९६. धबौली (लोकही),  १६.१२.२०१७, राधाकान्त मण्डल ; ९७. बेरमा (लखनौर),  २४.३.२०१८, कपिलेश्वर राउत, बेरमा ग्रामवासी ; ९८. सिमरा (झंझारपुर), १६.६.२०१८, डॉ. शिव कुमार प्रसाद ; ९९. मुरहद्दी, (बड़की टोल), २२.९.२०१८, प्रो. प्रीतम निषाद , १००. निर्मली (तेरापंथ भवन), २२.१२. २०१८, उमेश मण्डल, नवरत्न वेंगानी, मनीष जालान ; १०१. झिटकी (मधुबनी),  ३०.३.२०१९, भारत भूषण झा  ; १०२. मझौरा, (मधुबनी), २९.०६.२०१९, जय प्रकाश मण्डल, आलोक कुमार; १०३. रामपुर (मधुबनी), २८.९.२०१९, उमेश नारायण कर्ण 'कल्प कवि' ; १०४. वलम नगर-महदेवा (लौकही), १४.१२.२०१९,प्रेम कुमार साहु,उमेश पासवान; १०५.दरभंगा (सीतायन सभागार), १३.०२.२०२१, कमलेश झा ; १०६. हटनी (घोघरडीहा, मधुबनी), २५.०९.२०२१, लालदेव कामत; १०७. बेलहा (फुलपरास), २५.१२.२०२१, जीवकान्तक स्मृतिमे, उमेश मण्डल, ई. शैलेन्द्र मण्डल; १०८. मधुरा (मधुबनी), २६.०३.२०२२, डॉ. श्रीशंकर झा; १०९. ननौर (मधुबनी), २५.०६.२०२२, प्रदीप पुष्प; ११०. सोनवर्षा (लौकही), २४.०९.२०२२, अच्छेलाल शास्त्री, स्थानीय साहित्य प्रेमी; १११. रहुआ संग्राम (मधुबनी) ३१.१२.२०२२। ११२म 'सगर राति दीप जरय'क आयोजन श्री रामचन्द्र रायक संयोजकत्वमे हुनक पैतृक गाम- सहुरिया (अन्धराठाढ़ी) मे 'मार्च' २०२३ मासक अन्तिम शनि दिन हएत। ३ कमलानन्द झा प्रसङ कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) क शीर्षक भ्रामक अछि। ई हुनकर किछु सवर्ण उपन्यासकारपर किछु सिण्डिकेटेड कथित समीक्षात्मक आलेखक संग्रह अछि, २६३ पन्नाक ई पोथी हार्डबाउण्डमे लाइब्रेरीकेँ मात्र बेचल जा सकत, जतऽ ई सड़ि जायत, अमेजनसँ हम ई चारि सय पाँच टाकामे किनलौं मुदा ऐमे पाँचो पाइक सामिग्री नै अछि। एतऽ एकटा भूल सुधार अछि, एकटा गएर सवर्ण लेखक सुभाष चन्द्र यादवक उपन्यास 'गुलो'केँ बिनु पढ़ने ओ दू पाँति लिखलन्हि आ निपटा देलन्हि, ओ दुनू पाँति हम एतऽ अहाँक मनोरंजनार्थ प्रस्तुत कऽ रहल छी। अहाँ गुलो पढ़नहिये हएब, जँ नै पढ़ने छी तँ पहिने पढ़ि लिअ, कारण तखन बेशी मनोरंजक अनुभव हएत, गुलो सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। "उपन्यासक कमजोरी अछि लेखकक राजनीतिक पूर्वाग्रह। राजनीति विशेषक पक्षधरता रचनाक संग न्याय नहि कऽ पबैत अछि।" जइ उपन्यासमे राजनीति दूर-दूर धरि नै छै ओतऽ 'राजनैतिक पूर्वाग्रह' आ 'राजनीति विशेषक पक्षधरता'क तँ प्रश्ने नै छै। राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङर धूमकेतु आ यात्री प्रयुक्त केलन्हि। सुभाष चन्द्र यादव जीक 'भोट' जे २०२२मे आयल जे सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर, से राजनीतिपर अछि मुदा ओतहुओ सुभाषजीक भगता शैलीकेँ राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङरक आवश्यकता नै पड़लै। पढ़ू हमर पोथी 'नित नवल सुभाष चन्द्र यादव' जे उपलब्ध अछि ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। कमलानन्द झाक बिनु पढ़ने सुभाष चन्द्र यादवक विरुद्ध ब्राह्मणवादी जातिगत पूर्वाग्रह एकटा खतराक घण्टी अछि। जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। ई अपन बायोडाटामे गएर सवर्णसँ छीनि कऽ, समानान्तर धाराक लोकक हककेँ मारि कऽ लेल साहित्य अकादेमीक मैथिल अनुवाद असाइनमेण्टक गर्वसँ चर्चा करैत छन्हि। आ ई असाइनमेण्ट हिनका मेरिटसँ नै जातिगत टाइटिलसँ भेटल छन्हि, अही सभ किरदानीक एवजमे भेटल छन्हि। हिनका सन लोक लेल मैथिली बायोडेटाक एकटा पाँति अछि, समानान्तर धारा लेल जीवन-मरणक प्रश्न। दिनेश कुमार मिश्रक 'दुइ पाटन के बीच मे' कोसी नदीक ऐतिहासिक आत्मकथा थीक, ओ मिथिलाक आन धार सभक ऐतिहासिक आत्मकथा सेहो लिखने छथि जेना बन्दिनी महानन्दा, बागमती की सद्गति!, दुइ पाटन के बीच में.. (कोसी नदी की कहानी), न घाट न घर, बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी, भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूंक, The Kamla River and People On Collision Course, Bhutahi Balan- Story of a ghost river and engineering witchcraft, Refugees of the Kosi Embankments। साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य पंकज कुमार झा पराशर द्वारा एकर पैराक पैरा मैथिली अनुवाद कऽ अपना नामे उपन्यास छपबाओल गेल अछि, जकरा छद्म समीक्षक ऐ चोर लेखकक रिसर्च कहै छथि! ई रिसर्च दिनेश कुमार मिश्रक थीक, जे आइ.आइ.टी. खड़गपुरसँ सिविल इन्जीनियरिङ मे १९६८ बी. टेक आ स्ट्रक्चरल इन्जीनियरिङमे १९७०मे एम.टेक छथि, आ ओइ रिसर्च लेल क्वालिफाइड छथि। जखन कोनो विषयमे नामांकन नै होइ छै तखन लोक हारि-थाकि हिन्दीमे नामांकन लइए, नै तँ कमलानन्द झा केँ बुझऽ मे आबि जइतन्हि जे ई काज कोनो सिविल इन्जीनियरक अछि।  हिन्दी आ मैथिली दुनुक स्क्रीनशॉट संलग्न अछि। दिनेश कुमार मिश्र मिथिलाक नै छथि मुदा मिथिलाक सभ धारक कथा ओ लिखने छथि, हम सभ हुनका प्रति कृतज्ञ छी आ हुनकर ऋणसँ मिथिलावासी कहियो उऋण नै भऽ सकता, मुदा मूलधाराक पुरस्कार आ पाइ लोलुप लोकसँ कृतघ्नते भेटत से फेर सिद्ध भेल। ऐ लेखककेँ दस बारह बर्ख पहिने सेहो तारानन्द वियोगी उद्धारक भेटल छलखिन्ह जे लिखने रहथिन्ह जे ओ प्रभावित भऽ अनायासे अपन रचनामे दोसरक सामिग्री आनि लइ छथि, एहने सन। आब ऐ कमलानन्द झा क आश्रय तकलन्हि मुदा दुर्भाग्य! दिनेश क़ुमार मिश्रक सभटा पोथी आब हुनकर अनुमतिसँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमेः http://videha.co.in/pothi.htm एतऽ एकटा गप मोन पाड़ि दी जे जखन बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे की ओ एक्स बॉक्स भारतमे पाइरेशीक डरसँ देरीसँ आनि रहल छथि तँ हुनकर उत्तर रहन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेशीक डरे कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। से विदेह पेटारमे हम सभ ऐ तरहक रिस्क रहितो एकरा आर समृद्ध करैत रहब, कारण समानान्तर धारामे सड़ल माँछ द्वारे पोखरिक सभ माँछ नै सड़ैए, एतुक्का मलाह गोट-गोट कऽ सभ सड़ल माँछ निकालैत रहल छथि, निकालैत रहता। कमलानन्द झा केर मस्तिष्क आ दृष्टि फरिच्छ करबा लेल दू टा पोथी हम रिकोमेण्ड कऽ रहल छी, ओ पढ़थु: पहिल अछि सुशीलक गामबाली (उपन्यास) (१९८२) आ दोसर अछि हमर दूषण पञ्जी- The Black Book, दुनू उपलब्ध अछि http://videha.co.in/pothi.htm पर। सुशीलपर जखन हमर समीक्षा शुरू हएत तँ कमलानन्द झा लेल राखल एकटा शिक्षा ओतऽ हम देब। ऐ छद्म समीक्षक कमलानन्द झा पर हमर नजरि रहत। (अगिला अंकमे जारी..) ४ ओना ज्योतिरीश्वर जेना धूर्तसमागममे केने छथि तेहने सन हमहूँ अपन महिसबार ब्राह्मणक गाम कथामे ऐ निर्लज्जताक चर्चा केने छी- "कारण पुछबन्हि तँ ओ सभ कारण कहती जे ई सभ निर्लज्ज होइए आ से ऐ कारणसँ जे जन्मेपर एकरा सभक पाछू ...मे थूक दऽ देल जाइ छै, जइसँ कथूक लाज कोनो गत्रमे नै हेतै।" ५ विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १. साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका (घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २. व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३. प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५. स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७. लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८. दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय।

-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ६ आब अहाँ पुछब जे तकर प्रतिकार समानान्तर धारा केना केलक, ओ तँ कन्नारोहट नै करैए, तँ तकर उत्तर अछि हमर ३ टा पोथी जे १११म सगर राति दीप जरय मे लोकार्पित भेल ३१ दिसम्बर २०२२ केँ, वएह सगर राति दीप जरय जकरा साहित्य अकादेमी गत दस बर्खसँ गीड़ि लेबाक प्रयास कऽ रहल अछि। अहाँसँ ऐ तीनू पोथीपर टिप्पणी ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। पहिल दू पोथी मे राजदेव मण्डल आ सुभाष चन्द्र यादवक साहित्यक समीक्षा अछि जे हमर तेसर पोथी मैथिली समीक्षशास्त्रक सिद्धांतक आधारपर कएल गेल अछि। तीनू पोथीक लिंक नीचाँ देल गेल अछि। Rajdeo Mandal- Maithili Writer (Now with Supplement I & II) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (मिथिलाक्षर) मैथिली समीक्षाशास्त्र मैथिली समीक्षाशास्त्र (तिरहुता) संगमे पढ़ू कमलानन्द झा क ब्राह्मणवादपर प्रहार: दूषण पञ्जी- The Black Book दूषण पञ्जी- The Black Book (मिथिलाक्षर) ७ Parallel Literature in Maithili and Videha Maithili Literature Movement जगदीश प्रसाद मण्डलक पाँचटा लघुकथापर हमर टिप्पणी Five Short Stories by Sh. Jagdish Prasad Mandal Sh Jagdish Prasad Mandal has adjudged the following five short stories as his best: The Transmission (Sancharan) The Favourite Work (Bhari Man Kaaj) The Gone Hope (Aayal Aasha Chali Gel) The Gift of Life (Jeevan Daan) On My Behalf (Appan Sati) The Transmission (Sancharan): The philosophical musings of the life of Jeebachh Uncle have been depicted with all their splendour. The earthly comes in between, of course. The flood and the dam, the hope generated out of the Kosi River project regarding hydel power electricity and the subsequent despair arising out of its non-fulfilment. The irrigation facility for the farmers, the arrival of fertilisers, the projects leading to disturbance in the flow of small rivers, the memory of earlier mango plantations in villages, and the rain-based agriculture, all have been dealt with in detail. After fifty Jeebachh Uncle dissociated from the family life dispassionately and handed over the responsibilities to both of his sons. The Favourite Work (Bhari Man Kaaj): This story is the story of Gianchan. He is overwhelmed by his life, but then Sumitlal tells him a story and he feels relieved. The Gone Hope (Aayal Aasha Chali Gel): The people of village Rudrapur are preparing to go to Rameshwaram for a pilgrimage. A discussion ensues between Hiralal and Motilal. The Gift of Life (Jeevan Daan): Sumant and his wife is discussing life in the aftermath of an earthquake. Last week due to the earthquake all three houses collapsed. On My Behalf (Appan Sati): This story is a story of a happening village surrounding the shops at the roundabout. The people and their priorities, minor squabbling and all are witnessed here. Sh. Jagdish Prasad Mandal is known for giving Maithili stories which directly cater to the problems and solutions of the people of Mithila. The solution is there in the midst of the people and whoever finds the solution is the leader of his stories. And there is always one who finds the solution. He is better known for his stories which are anti-migration rather than anti-escapism. However, he has selected the above five short stories which are philosophical musings. But here also his priority is the people and their life. He says through Jeebach Uncle that the life of Jeebach Uncle was grand. So grandeur is not about money, but it is about the manner people live their lives. This grandeur of life has been depicted not through the lives of landlords but through the life of common people, who faces drought, flood, and negative results on the environment through the concept of neo-development, yet their demeanour is grand. ERA BEFORE AND AFTER: LITERARY SCENE IN MAITHILI AFTER THE ARRIVAL OF JAGDISH PRASAD MANDAL Amartya Sen wrote about the famine of Bengal (1942-43), talking about how lacs and lacs of people died in that famine (15 lacs as per estimates of the Famine Enquiry Commission), but that this did not include his loved ones. Likewise in 1967, there happened a great famine in Mithila. When Indira Gandhi (then the Prime Minister of India) visited the area, she was shown how the people from the Mushhar community survived simply by eating bisarh (roots of lotus and other plants). But this tragedy was written about only in 2009 by Sh. Jagdish Prasad Mandal, over forty years after it happened. And the reasons for that delay are obvious. In Maithili literature, there is a lopsided tendency which has made its journey slanted and ugly. The ones writing for mainstream Maithili literature have had no firsthand experience of tragedies of this magnitude, so they could never write on such subjects. The coming of Jagdish Prasad Mandal on the literary scene simultaneously started a renaissance and a reformation movement in Maithili literature. It commenced a shiny new era. He gets credit for correcting the dark and ugly course the literary scene had taken. He gets credit for filling the gap and correcting the lopsided course of Maithili literature, which was hitherto moving on a one-way road. Jagdish Prasad Mandal is an artist. He can convey the facts in such an amazing way that the reader is left in a trance. He can present the facts directionally and purposefully. Armed with this ability he has defined the literature of the Maithili language so greatly that we could bifurcate its history into two eras: the era before Jagdish Prasad Mandal, and the era which comes after. His facts are collated from every section of society. They are not placed in his prose as ornaments. Instead, they flow naturally. It is as if a high tide has shaken the coastlines of the so-called main drain of Maithili literature, which dies completely but then regains its shape during the monsoon. His words never present a lament. His writing never shirks from its responsibilities. No matter what hardships they face, the characters never lose hope or blame their lack of resources; they never grow dismal and resolutely keep marching on. He has respect for the lifestyles and contributions of every stratum of society, and that is very exceptional. This becomes effective because there is no mismatch between his words and his deeds, and this is because of the greatness of his personal and social life. What he thinks, what he does, and what he writes. It makes his literature truthful. The ups and downs of the lyrical voice of the Maithili language attracted even the great Yehudi Menuhin who, in a BBC programme, said it was one of the sweetest languages. He talked of how his entire body swung hearing this language. Jagdish Prasad Mandal uses the ups and downs of this lyrical/rhythmic language to show the affinity of mutual dependence with its society and culture. This will bring revolution not only in literature but also in the economic arena. Survey of some books written by Shri Jagdish Prasad Mandal SHAMBHUDAS Jagdish Prasad Mandal injects into the minds of the readers the deity Barham Baba. He shows that both the devotees as well as Barham Baba himself are quite cheerful. He shows the convergence of "Shambhua" (disrespectful calling) into "Shambhu" (respectful calling). And then he sees Shambhudas changing to Darbaridas. The crumbling institutions of Mithila and Shambhudas turned to rubble, which is proof that the arts practised in Mithila have been destroyed. But the main characters of his other short stories, like Bhaitak Lava or Bisarh, refused to crumble. So then why has Shambhudas become Darbaridas? Is it just a simple loss of power? Or is it a change in Jagdish Prasad Mandal, the writer, himself? Has he become tired; is he being defeated? Looking closer we find that Shambhudas is not in any way inferior to the heroes and heroines of Bhaitak Lava or Bisarh. Then why is Shambhudas losing? Shouldn't he be winning? Why does the writer push him to defeat? He is the writer, he's God as far as the characters are concerned, why he is letting the circumstances be such that Shambhudas finds himself in a losing position? Jagdish Prasad Mandal's characters are not artificial ones. And that is why they do not always win on every economic front. On the economic front, work is done through hands, through labour. But culture (including literature) is a very delicate handiwork. The characters of this story get entrenched in this handiwork. When Jagdish Prasad Mandal's other characters had to fight on the economic front, they fought like anything, and they triumphed. But to serve the area of Art, Shambhudas had to migrate (unlike the characters of Bisarh). So Shambhudas had to become a courtesan, a court artist. Economically it was thankless work. But doing this was the only way of true survival in these changing times, for it represented the survival of Art! But here also, in what may still be seen as defeat (for economically, it was), Shambhudas unfurled a flag of revolt. He decided not to marry. He decided to let go of the possibility of family life. Shambhudas became Darbaridas not for his economic survival. Indeed, he certainly is not a utilitarian, but he had to make the compromise for the sake of the survival of his Art. His decision not to marry was repentance for this compromise. The parallel tradition will topple if Art becomes "Darbaridas". If Shambhudas loses it will be a loss for Mithila. It is not just Jagdish Prasad Mandal who will lose, it is the entirety of Mithila who will lose in his defeat. Will Mithila heed this warning of Shambhudas? BAJANTA-BUJHANTA It is a collection of seed stories. The title seed-story Bajanta-Bujhanta (trans. talking-understanding) is a story of a parrot, who is Bajanta-Bujhanta. In this collection of seed stories, there is more symbolism like these than in the writer's other stories. In Chaukidari we see a labourer working even in the eighth month of her pregnancy, by tying a rope around her waist and stomach. The story Pator he dedicates to the famous seed-story activist Manoj Kumar Karn (alias Munnaji), and he assigns a piece of symbolism too. "Like a dark room which has serpents all around, like that are we too". This moves the seed story further forward. And Samdahi says "Oh, you have become the listener of the very language of the crow." TAREGAN This book lacks complex plotlines or complicated symbols for the simple reason that it was written to instil good values in children. But here, the whole story is a symbol. When Subhas Chandra Bose's father tells him that sleeping on the ground is not enough, it leaves a remarkable imprint on his mind. What this man did later for India is known to all. Satya Vidya Bhardwaj says that "Knowledge is bigger than heaven." This collection is not only of importance in children's literature. It expands the horizons of seed stories too. GEETANJALI Chalu Uchitpur poem features a place called Uchitpur, where everyone has the same body language and the same clothing. In this land, there is no difference between fire and water. The "new moonlike full moon" tells us many things about the deformed "bedhab roop". Yaar Yau is a song of tragedy. It describes everything that has been washed away in a flood, including the washing away of the spirit and the sense of existence. He dedicates the song to Sh. Rajnandan Lal Das's 'Yug-Yug', where he has described how all doors close when one is entrapped in a spiderweb. This complete collection of the song is dedicated to Professor Udaya Narayana Singh Nachiketa'. All the songs in this collection are lyrical. RAIT-DIN Baba did not understand the mischief of the barren trees. He tilled and ploughed and planted the trees. But then those trees became the abode of dead souls. They did not touch the soil, reaching the sky by holding the top. Halluk Kaaj (trans. easy work) details the technicalities of labour tools which make the work easy. It is an experience of satisfaction that the artists get after the completion of their work. How a world full of empathy is created, it describes that too. Whether it is in Patta Chhimee's syrupy mental level or in "the huge-lad is condemned", the writer brings new and distinct typical Maithili verse. It makes Rait-Din distinct. INDRADHANUSHI AAKASH We listen as someone sings Nachari (Maithili songs about Lord Shiva Songs) while fully swinging his voice and body. The spirituals and supernaturals have found their places. One is assembling (or creating), and the other is disassembling. The change is a mere game. The poet is incredibly careful in his selection of words and subjects. Mystery, disappointment, answers, along with questions and hope, all keep coming and going. TEEN JETH EGARHAM MAAGH In Ghare-Ghare every household is lit up by a diya, but the whole village is in darkness. In Kaushal-Jakhain we are told why the land turned barren and how the dark village ended up in its sorry state. In Aas Prem Sang, hope returns to the village. SARITA Here, Jagdish Prasad Mandal's verse keeps raising questions. It keeps on questioning. His poetry shows a painful awareness of facts and constantly brings up questions, even in its conclusion. If you compare his poetry with his prose, you will find much more pessimism in it, unlike his hope-filled prose. The short length of the poems does not give him time to analyse the questions, to find the answers. So, he keeps on raising questions and only questions, poking at the readers to look for the solutions themselves. This type of verse is an intriguing first for Maithili literature. (Language editing by Astha Thakur) Survey of some more books by Jagdish Prasad Mandal Ulba Chaur: Short Story, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2013 It is a collection of thirteen short stories, every story of this collection depicts the ups and downs of life, it investigates the causes of the problems and puts forward solutions after giving it modernistic solutions. Ardhangini: Short Story, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2013 This is a collection of twenty short stories. He depicts vividly the distress that salaried people face. On the other hand, he compares it with the jovial life of the agriculturists. At the same time, he takes head-on the pseudo-beliefs and other social problems faced by the village people and offers solutions. He underlines the caste-based occupations and delineates their importance and necessity for maintaining a good life in villages. Satbhaiya Pokhair: Short Story, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2013 This book has so far been run into four editions. Bhakmor: Short Story, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2013 The collection has nine short stories. The web ("ojhari") and other stories deal with the post-1947 period and deal with the degradation of democratic values and the deformation of public institutions. Nai Dharaiye: Novel, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2013 This novel is the fulfilment of the religion of literary creation, which has been faithfully by the author. It reflects the face of society through its moving depiction of life. Krantiyog: Short Story, PallaviPrakashan, Nirmali, Supaul, (Bihar), 2017 It contains six stories. The problem of drainage has arisen due to the construction of highways and link roads, high-plinth buildings, and houses. The damage to the environment and the problem of flood arising out of this have been depicted well. The number and area of ponds, well and orchards are declining. So, the thorny plants have abounded leading to a loss of harvest. Subhimani Jingi: Short Story, PallaviPrakashan, Nirmali, Supaul, (Bihar), 2018 The author has vividly depicted the third gender problem. An adolescent Shyama is neither a male nor female, so the people, including the mother, decide to hand over Shyama to the Kinnars. But the father rose in favour of the boy and decides to provide him with all such skills necessary for a respectable life. He gives an example of Lord Shiva who is called half male and half female (Ardhanarishwar), and of Krishna who enters the group of females by transforming himself into Shivani. The mother, seeing the resolve, also comes on the side of her husband. The problem of other sex, hitherto unknown in Maithili literature, has come to the attention of the author. Shyama is a child that is indisputable. Shyama has every right to live a dignified and respectful life and for that necessary skills are required and would be provided to him. The siblings convince the mother but after the stories of Shiva and Krishna are placed before her, she goes in repentance as to why she was not taught these stories earlier. The third sex, particularly in the village society, has been shown with a new perspective. Other stories of the collection also throw light on other aspects for example the issue of "Mathas" and asceticism in "Babak Bag-Bagiya" and the resolution of disputes in a village in "Kukurpan". In "Herayal Jingi" the issue of development in the village post-independence has been described with the example of Kamalpur village, the issue of caste and faulty development model has been given a fresh treatment. Subhimani Jingi (A respectful life) 2018 is a collection of short stories consisting of eight stories. The second short story is named Subhimani Jingi, which is the title of the book also. This book was written between the 23rd of January 2018 and the 9th of March 2018. Pallavi Prakashan has published this book, Nirmali. A night-long tri-monthly reading session of short stories (Sagar Rati Deep Jaray) is held in Maithili at different venues. The 97th such reading session was held on 24.03.2018 at Berma village in the convener ship of writer Sh. Kapileshwar Raut. This village happens to be the village of Sh. Jagdish Prasad Mandal also. On that occasion, this book was launched (released). All eight stories of this book depict the constant changes in the life of a village person vividly. The eight stories of this book consist of: 1. Kekra Lel Kelau: written on 23.01.2018 2. Subhimani Jingi: written on 28 Jan 2018 3. Babak Bag-Bagiya: written on 3 Feb 2018 4. Ab-Tab: written on 7 Feb 2018 5. Agilah: written on 11 Feb 2018 6. Kukurpan: written on 28 Feb 2018 7. Herayal Jingi: written on 5 Mar 2018 8. Asha Par Paani Phir Gel: written on 9 Mar 2018 1. Kekra Lel Kelau: This short story begins with a conversation among people sitting around a bonfire on winter days. Bhogilal bhay is an Ayurvedic Doctor who is not able to keep his health well. His family also became disconcerted, all his family except his wife migrated to cities. The conversation goes on regarding the environment and other aspects of the socio-environment of village people, which has changed for some people who were not able to cope with it. 2. Subhimani Jingi The author has vividly depicted the third gender problem. An adolescent Shyama is neither a male nor female, so the people, including the mother, decide to hand over Shyama to the Kinnars. But the father rose in favour of the boy and decides to provide him with all such skills necessary for a respectable life. He gives an example of Lord Shiva who is called half male and half female (Ardhanarishwar), and of Krishna who enters the group of females by transforming himself into Shivani. The mother, seeing the resolve, also comes on the side of her husband. The problem of other sex, hitherto unknown in Maithili literature, has come to the attention of the author. Shyama is a child that is indisputable. Shyama has every right to live a dignified and respectful life and for that necessary skills are required and would be provided to him. The siblings convince the mother but after the stories of Shiva and Krishna are placed before her, she goes in repentance as to why she was not taught these stories earlier. The third sex, particularly in the village society, has been shown with a new perspective. 3. Babak Bag-Bagiya This short story deals with the issue of "Mathas" and asceticism. Goverdhan Das was a poor child whose parents died while he was young. He becomes the successor of Mahant Gokul Das. Through his story, the author travels to the hinterland and presents the untouched states of village life. Through his gardens, the Baba was getting remembered but now these gardens are vanishing due to poor upkeep. 4. Ab-Tab: The vegetable articles used during the village feast are the medium through which the author takes the issue of development affecting village life. 5. Agilah Pakshadhar's Uncle returns to the village after retirement. Munilal is his cousin. Munilal's daughter is widowed. Munilal and his daughter Savitri are the objects through which Pakshadhar wants his reform agenda to go through. 6. Kukurpan The method of resolution of disputes in the village is the subject matter in "Kukurpan". The resolution can be provided only by a person who is capable of being so. 7. Herayal Jingi In "Herayal Jingi" the issue of development in the village post-independence has been described with the example of Kamalpur village, the issue of caste and faulty development model has been given a fresh treatment. 8. Asha Par Paani Phir Gel Lalit is a literate agriculturist. He starts farming sunflowers. Through his experiments, the author finds space for detailing actual problems faced by the agriculturists, the ravage of nature and so on. Dekhl Din: Short Story, PallaviPrakashan, Nirmali, Supaul, (Bihar), 2018 A family which is lived for three generations in a village and a family whose second generation has migrated to the town have been compared. The superiority of the former has been established in the title short story of the collection. Gapak Piyahul Lok: Short Story, PallaviPrakashan, Nirmali, Supaul, (Bihar), 2018 This is a collection of thirteen short stories. The title short story deals with have depicted the society existing at the time of the permanent settlement-Zamindars. The resources were held by a few, the system continued in Independent India. The people started capturing the lands resulting in litigation. The title short story depicts one such litigation involving thirty-five people along with Deenbandhu Kaka. On the day of the judgment of the case, there happened a bus accident which was carried. Lahsan: Novel, PallaviPrakashan, Nirmali, Supaul, (Bihar), 2018 BIRTHMARK (Lahsan): It is a story of a person from a village, who gets disenchanted with city life, where morality- both social and personal- has no meaning. It describes vividly the village and city life, and in that description, one finds no charm in city life for ordinary class people. Its plot revolves around personal upheavals, but the actual beauty of the novel lies in its vivid presentation of city and village life from the point of view of economically lower-class people. Rahe Joker Pariwar: Short Story, PallaviPrakashan, Nirmali, Supaul, (Bihar), 2020 The loss of livelihood is the major reason for the migration from Mithila. But the people who migrate include the well-offs also who migrate for an easier life. So, thirty years ago, despite being well off Shantinath left Chanpur and migrated to Shati Niketan (Shanti- peace!!) in search of peace. And even when some people from his village found him, he had no regret. Unlike his other books, this migration of the well-off in search for peace compares and depicts the tussle around the social life of Mithila. Gamak Jingi: Short Story, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2009 This collection of short stories contains nineteen short stories. The author was given Tagore Literature Award (Sahitya Akademi) for this book. Every story in this book depicts the hardness of village life. The people have to bow before natural calamities. However, the people in these stories rebound without exception and refuse to let down or migrate. Maulayal Gachhak Phool: Novel, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2009 It is his first novel which deals with the problem of migration from the villages. The novelist envisages the rejuvenation of worn-out systems which will stop migration. Utthan-Patan: Novel, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2009 Even the laziest can move forward if he has a desire for economic improvement. Shyamanand brings technology to agriculture. Unity is essential if one must stop the breaking of and migration from villages. JingikJeet: Novel, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2009 The writings which deal with village life are full of negative forces. The author puts a break on the disappointment arising out of such negative writings about village life. Mithilak Beti: Drama, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2009 This is a drama dealing with the miserable life of daughters in the villages of Mithila. There are many forms of discrimination, the author has chosen the deformation of relations after the marriage of the female. The reason for it is enshrined in the unequal treatment between daughter and son from the day he or she is born. Taregan: Inspirational Story Compilation, ShrutiPublication, New Delhi, 2010 This is children's literature and is a collection of 111 inspirational seed stories which includes the gist of some masterpieces from the world literature curated for the children. Jeevan-Maran: Novel, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2010 The spiritualism in the author comes to the fore, the real life would be the afterlife. । JeevanSangharsh: Novel, ShrutiPublication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2010 The author compares two villages the Banspura, which he tells us is the less developed and the Sisauni, which is comparatively more developed. The comparison is based on the perception of developed and less developed among the people of the villages, which is the view of the author as well. The Sisauni people have a middle school, they have their Public Durga Pooja in their village and the fair is organized there. But the Banspura people have none of these although they do organize on an individual basis a 24-hour kirtan and public langars occasionally. But the Barharba village is more developed than these two villages. They have a High School, and they organize more public functions. And lo! Here comes the Katharba village. It is the most developed where besides the High School, there is a hospital also, and they organize several other public functions. Bajanta-Bujhanta: Seed Story, Shruti Publication, New Rajendra Nagar, (New Delhi), 2013 This is a collection of sixty-eight seed stories which has been woven around different social issues. The ensuing social changes and upheavals going around the villages at the individual and social levels are the themes for the stories of this collection. - Gajendra Thakur, editor, Videha (Be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast list.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३६१ आ ३६२ पर टिप्पणी अंक ३६१ पर टिप्पणी आचार्य रामानंद मंडल संपादकीय मे मैथिली साहित्य अकादमी मे भ्रष्टाचार के सटीक समीक्षा कैल गेल हय।अइ बेर जे सदस्य बनलन हय सगा संबंधी के चुनल गेल हय।जे परिवारवाद के द्योतक हय।दोसर ओर जज सभ द्रोणाचार्य बनल हतन ।जे मूल मैथिली लेखक सभ के उपेक्षा के रूप मे अंगूठा काट रहल हतन।वो एकलव्य हतन चर्चित लेखक राजदेव मंडल। मैथिली साहित्य मे घोटाला मिथिला -मैथिली मे दूटा विद्यापति भेलन। ज्योतिश्वर ठाकुर (१२९०-१३५०) से पूर्व सोलकन नाइ जाति मे विद्यापति भेलन ।वो अपना साहित्य पर विदापत नाचो शुरू कैलन।वो नाच संपूर्ण मिथिला मे लोक शिक्षण करैत रहे। जेकर चर्चा ज्योतिश्वर कैले हतन।दोसर विद्यापति (१३५२-१४४८)ज्योतिश्वर के बाद मे भेलन।जे जाति के बाभन रहलन।वो संस्कृत आ अवहट्ट मे साहित्य रचना कैलन। परंतु मैथिली साहित्य मे नाइ विद्यापति के कृति के बाभन विद्यापति के कैल जा रहल हय। एगो दैनिक अखबार मे लेखक प्रवीण नारायण चौधरी लिखैत हतन - विरोध, निंदा आ आलोचनाक बाबजूद विद्यापति कवि कोकिल, महाकवि, जनकवि बनि गेलाह।लोक हुनकर संदेश के हाथोंहाथ स्वीकार कयलक।अपन सहज -सुंदर मैथिली रचना सभ एतैक जनसुलभ छल जे लोक ओकरा हृदयंगम कय लेलक।जन  - जन के कंठ मे अपन देसिल बयना (मातृभाषा) रचनाक कारण पहुंचि गेलाह विद्यापति।हुनकर नचारी,महेसबानी,राधा -बिरह ,नोंक झोंक आदि अनेकों महत्वपूर्ण रचना सं समाज में साहित्यिक धारा एहेन बहल जे विद्यापतिक पदावलि पर नाच परम्परा -विदापत नाच तक प्रचलन मे आबि गेल। विदित हो कि जनवर्गीय समाज मे एहि विद्यापति नाच के सहारे शिक्षाक समुचित प्रसार होबय लागल मिथिलाक लोक समाज मे। उल्लेखनीय हय कि ज्योतिश्वर पूर्व से विदापति नाच मे विद्यापति पदावली के नृत्य अभिनय होइत रहे।अइ विद्यापति के बारे मे कश्मीर अभिनव गुप्त (दशम शताब्दी के अंत आ एगारहम शताब्दी के प्रारंभ) -ईश्वर प्रत्याभिज्ञा -विभर्षणी ग्रंथ में लिखल हय। श्रीधर दास के सदुक्तिकर्णामृत (रचना ११फरबरी १२०६ मध्यकालीन मिथिला लेखक विजय कुमार ठाकुर) श्रीधर दास विद्यापति के पांचटा पद उद्धृत कैलै हतन जे विद्यापति के पदावली के भासा हय। जाव न मालती कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।आ मुंदला मुकुल मकरंद,ज्योतिश्वर (१२७५-१३५०)षष्ठ कल्लोल।अथ विद्यावंत वर्णन।। अष्टम कल्लोलक।।अथ राज्य वर्णन।।में विदापतके उल्लेख कैले हतन।से विद्यापति ततेक प्रसिद्ध भ गेल रहे जे ज्योतिश्वर तेकर उल्लेख नाचक रूप मे कैलै रहलन। उपर्युक्त कथन से स्पष्ट हय की विदापति नाच नाइ विद्यापति के हय। परंतु आबि साहित्यिक घोटाला क के बाभन विद्यापति के कृति बनायल आ बताओल जा रहल हय।अइ साहित्यिक भ्रष्टाचार के कड़गर निंदा होय के चाही। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सह साहित्यकार सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अंक ३६२ पर टिप्पणी उपन्यासकार के छथि, पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) दुखद RabindraChaudhary बड दुर्भाग्यपूर्ण, आपत्तिजनक आ आपराधिक कृत्य.. KumarManojKashyap ईसभ पढ़ि बहुत चिंतित छी। R N Mishra दुर्भाग्यपूर्ण KalpnaJhaPatna आहिरेबा..! फेर ई के छैथ? पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) हे भगवान..! ई ठीके चोरे छैथ। UmeshMandal नीक। एहन चोर केर देखार करब जरूरी पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) Gaurinath: ओकर त लेखकीय जीवने चोरी पर टिकल छै आ तकरा प्रश्रय देब'वाला सेहो मैथिली मे कम नहि। एहने चोर लोक सभ मैथिली आर मिथिला के अहित करय मे सदैव आगू रहैत छथि JhaPrasanna एकरा कोर्ट मे लऽ जेबाक चाही य़ोगेन्द्र पाठक वियोगी +91 98310 37532 SubhashChandraYadav: I condemn it. The thief must be exposed. अति दुखद, निन्दनीय ManojPathak सादर आभार। कोट कर सकैत हतन। परंतु श्रोत के चर्चा करनाई आवश्यक हय।न त साहित्यिक चोरी मानल जायत। RamanandMandal धन्यवाद। VidehaKeshavBhardwajDelhi Nabo Narayan Mishra दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति Mukund Mayank Oh प्रदीप पुष्प बहुत खराप बात। Abhilash Thakur · घृणित कार्य! लज्जा जोग Ajit Kumar Jha पता नहि लाजो नहि लगैत छन्हि एहन प्रवृति वाला महानुभाव सब केँ। एहन लोग सब केँ लेल सेहो अलग सँ पुरस्कारक घोषणा होयबाक चाही। पर्दाफाश करबाक लेल अपने केँ साधु वाद । Ramesh Kumar Sharma पुरस्कार पाबै के जल्दबाजी हेतै Kunal उपन्यास आ तकर लेखकक नाम घोषित करु Ashish Anchinhar Kunal जी, जँ कोनो समान्य पाठक ई प्रश्न पुछने रहितथि तखन हमरा नीक लागैत। प्रबुद्ध पाठक ओ लेखक वर्गसँ ई प्रश्न एबाक मतलब छै जे स्थिति गंभीर भऽ गेल छै। ओना जखन पुछिये देलहुँ अछि तखन एकर उत्तर अछि- पोथी, जलप्रांतर, पंकज पराशर। एहि पोथीक गदगदी आलोचक, कमलानंद झा। Kunal Ashish Anchinhar धन्यवाद । एना सार्वभौम जकां छइ जे बेस गंभीर आरोप लगाओल जाइ छइ मुदा नाम नइ लेल जाइ छइ।एना हमरा हाइपोक्रेसी क चरम लगइए। ई अनसोहांत छी ।......... आब नाम ल गेल छइ। त हमरा लगइए जे पंकज परासर ( उपन्यासकार) आ कमलानंद झा ( आलोचक ) के बाजक चाही । Lakshman Jha Sagar एहेन चोरक सामाजिक बहिष्कार हेबाक चाही।आगि पानि ढ़ाइठ देबाक चाही।मुँह मे कारी चुन लेपि के गदहा पर सरेआम घुरेबाक चाही।एहेन कुदशा कय देबाक चाही जे फेर क्यो एहेन घृणित काज नै करय। Chitragupta Chitragupta अत्यन्त दुखद जगदानन्द झा 'मनु' · मिथिला मैथिलीमे साहित्यक चोरी जगजाहिर अछि। मुदा आब साहित्य अकादमी आ ओकर लेकक द्वारा…. बहुत निंदनीय काज, एहेन एहेन लोककेँ अवश्य देखार करबा चाही अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.कुमार मनोज कश्यप- ट्रेण्ड २.२.आचार्य रामानंद मंडल- काम से राम की ओर २.३.आचार्य रामानंद मंडल- यशोदा माय २.४.महाकान्त प्रसाद- ३ टा बीहनि कथा २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना (उपन्यास- खेप ९) २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- खिच्चड़ि २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास सातम पड़ाव) २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १९ म खेप २.९.डॉ किशन कारीगर- अकादमी पुरूस्कार वला नांगैड़ (हास्य कटाक्ष) २.१०.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.११.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१२.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१३.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१४.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१.कुमार मनोज कश्यप- ट्रेण्ड कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा ट्रेंड "आब बात  पढ़ाईये-लिखाई के लैह ...... जे बच्चा बेसी चन्सगर  से साइंस पढ़ैत  अछि आ डॉक्टर-इंजीनियर बनि  पैघ कंपनी-अस्पताल मे नौकरी पबैत अछि।  जे पढ़ै मे कने दब्ब से आगू जा  मैनेजमेंट के पढ़ाई करैत अछि आ कंपनी-अस्पताल के मैनेजर भs जाईत अछि। मैनेजर के आगू डॉक्टर-इंजीनियर के झुकहि पड़ैत छै आ ओकर आदेशो मानs पड़ैत छै। आब जे केयो कोनो टेक्निकल डिग्री नहिं लs सकल से आगू जा कs सरकारी सेवा मे प्रशासक बनि जाईत अछि आ शासन-प्रशासनक  नीति-निर्धारण करैत अछि जकरा सभ के स्वीकार करब अनिवार्य। ओकरा आगू डॉक्टर-इंजीनियर-प्रबंधक सभ झुकैत अछि।  जे केयो एहि तीनू श्रेणी मे नहिं आबि सकल से विधायक-सांसद आ  मंत्री बनि जाईत अछि। राज-काज मे  एकर इच्छा  सर्वोपरि तैं पैघ-पैघ प्रशासक सेहो एकरा आगू नतमस्तक! आओर ........  जे एहि सभ मे सs किछु नहिं बनि सकल से बनि जाईत अछि ...... संत ! ....... महात्मा !! एकरा आगू सभ नतमस्तक!" कहि कs हरखू कक्का तमाकू के ज़ूम कसिया कs चुटकी मे दबा ठोरक निचा रखला आ अजेय दृष्टियेँ ओतs बैसल लोक सभ दिस तकला। गुम्म भेल सभ स्वीकृति मे मुड़ी हिलेलक। हमहुँ सोच मे पड़ि गेल रही। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आचार्य रामानंद मंडल- काम से राम की ओर आचार्य रामानंद मंडल काम से राम के ओर पहिले स्कूल दस बजे सुबह से चार बजे अपराह्न तक चले।हम एगो मिडिल स्कूल मे शिक्षक रही।हम आ एगो और शिक्षक वीरेंद्र बाबू समय से पहिले ही साढ़े नौ बजे तक स्कूल मे पहुंच जाइ। कुछ शिक्षक  दस बजे तक और बाकी साढ़े दस बजे तक आ जाय। कुल सात शिक्षक रही। विद्यार्थी सभ साढ़े दस बजे तक पहुंचे। सफाई प्रार्थना के बाद एगारह बजे से क्लास लगे। अइ बीच मे हम आ वीरेंद्र बाबू आपस मे बात करी।अहिना एक दिन वीरेंद्र बाबू एगो सच घटना सुनैलन। वीरेंद्र बाबू कहलन-दयानंद बाबू।हम जब सातवां क्लास मे पढैत रहली त हमरा गांव के स्थान मे के एगो बाबा जी,जे स्थान मे रसोइया रहे कहलन-वीरेन्दर।चला तोरा सीतामढ़ी घुमा देव छी। जानकी स्थान देखा देव छी।त हम कह ली चलू। साइकिल से चल देली।बाबा जी साइकिल हांके आ हम पिछा कैरियर पर बैठ गेली। केकरो कोई शक आ डर के कोनो बात न रहे।अइला कि बाबा जी स्थान मे बहुत दिन से रहे आ मिलनसार रहे। हं।त जानकी स्थान मे जानकी जी के दर्शन कैली।फेर साइकिल से रीगा बाला रोड मे चल अइली।उंहा बाबा जी साइकिल रोकलक। हमहु साइकिल पर से उतर गेली। हम साइकिल लेके खड़ा रही।बाबा जी रोड किनारे के चांपाकल पर गेलन।आ कुल्ला कैलन आ पानी से चनन के धो लेलन। पानी पीलन। हम कहली-बाबा चननो धोआ गेलो।बाबा जी कहलन-धुत्त बुरबक। बाबा जी फेर साइकिल पर बैक खींच के रिंग बांध होइत एगो छोटका सन टोला पर अयलन।उहां छोटका छोटका फुस के घर रहे। वोही के दुआर पर कहीं लैइकी त कहीं औरत खड़ा रहे। कोनो कोनो लैइकी छोट छोट ड्रेस पहिन ले रहे।  आधा छाती दिखाइत रहे। कोई कोई सिगरेट भी पियत रहे आ खराब इशारा भी करे। कहीं कहीं पक्का घर भी रहे। कोनो कोनो घर से हरमुनिया आ तबला के आवाज आबे। घुंघरू के भी आवाज आवे आ महिला के गीत गावे के आवाज आवे। हमरा उंहा केना दोन लागे। बाबा जी कहलन-बीरेन्द्र इहां कुर्सी पर बैठल रहा।हम कनिका देर मे अबै छी।हम कह ली ठीक हय। जल्दीये आउ।हमरा केना दन लगैय।। बाबा जी एगो लैइकी संग फुस के घर मे चल गेल।हम बाहर कुर्सी पर बैठल रही।हमरे तुरिया के एगो लैइकी कहलक-ऐ।तु कैला बैठल छा।चला हमरा जौरे भीतर।हम लजा गेली। वोही समय एगो औरत जे खड़ा रहे।अरे। माधुरी।इ अभी बच्चा हए।इ खेल बेल न जानै हए।देखै न छही। केना सिकुडल बैठल हैय।आ हमरा से पुछलक-ऐअ।तू इंहा केना आ गेला हए बाबा जी के साथ।हम कहली हमरे गांव के स्थान मे के बाबा जी हए।त उ कहलक-बाबाजी त महीना मे दू बार त अवश्ये अबैय। हमरा सभ के इहां त चोर डाकू,संत सिपाही सभ अबैय हए।हम सभ सभके देहके सुख दैइ छियै।सभ अपन देहके भुख के मिटाबे अबैय।ओइमे बिआहल आ न बिआहल सभ हए।हम सभ वेश्या छी।इ वेश्या टोला हए। बाबा जी आधा घंटा के बाद घर मे से निकललन। फेर चापाकल पर जाके मुंह हाथ धोयलन। हमरा आके कहलन आब घर चला। साइकिल से हम दूनू गोरे रिंग बांध होके फेर जानकी स्थान तर अइली।एगो जलपान के दूकान मे दूनू गोरे कचौड़ी जलेबी खैली। साइकिल से घरे के लेल चलली।रस्ता मे बाबा जी कहलन- हमरा इ मजबूरी हए। मानसिक भूख के लेल त पूजा पाठ करै छी।परंच शारीरिक भूख के लेल टोला पर जाय के परे हए।अइ टोला के रेडलाइट एरिया कहै छैय। हां बाबा।एगो औरत कहैत रहल हैय कि हम सभ वेश्या छी।इ वेश्या टोला हए। बाबा जी कहलन-हं। वेश्या टोला के रेडलाइट एरिया कहै हए।इ सभ केकरो न कहिया। हां बाबा।हम केकरो से न कहब।आब उ बाबा जी अइ दुनिया मे न हए । हमरो आचार्य रजनीश के लिखल संभोग से समाधि  आ खजूराहो के मुर्ति के मर्म समझे मे आवे लागल।दशम क्लास मे पढायल शिक्षक रणजीत बाबू के याद आबे लागल कि कला और जीवन के एगो पाठ मे खजुराहो के बारे मे बतबैत कहले रहथिन कि केना एगो माय बाप के अपन बेटी आ वोकर प्रेमी से भेंट खजुराहो मे नग्न मूर्ति के देखैत भे गेल रहे।आपस मे शर्मिंदा भे गेल रहे। आखिर सत्य त सत्य होय छैय। संभोग से समाधि के ओर अर्थात काम से राम के ओर। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.आचार्य रामानंद मंडल- यशोदा माय आचार्य रामानंद मंडल यशोदा माय बरहमपुरी गांव में एकटा पुजारी बरहम शर्मा रहे।जे गांव के महादेव मठ में पुजारी के काम करे। पुजारी मिलनसार रहे। पुजारी जी मठ में ही अपन पत्नी अहिल्या के साथ रहे।मठ में चौका बर्तन करे के लेल एकटा महिला मुनिया रहे।जे वही गांव के रहे। मुनिया के पति भी मठ के खेती बाड़ी के काम देखे। कुछ समय बाद दोनों अहिल्या आ मुनिया गर्भवती भेल। अहिल्या के लडका आ मुनिया के लड़की जनम लेलक। लेकिन तीन महीना बाद दूर्भाग्यवश डायरिया के कारण अहिल्या परलोक सिधार गेल। पुजारी जी अपना दूधमुहां बच्चा के लेल परेशान रहे लागे रहल।इ दुख मुनिया के देखल न गेल। मुनिया पुजारी जी से कहलक-पुजारी जी अंहा चिंता न करु। अंहा के बौआ के हम अपन दूध पिला के पालव।हम बुझब की हमरा जौंआ बच्चा भेल हय।हम समान रुप से पालब। पुजारी जी मुनिया से कहलन-मुनीया।तू हमरा मन के बात पूरा क देला।हम त बच्चा के पाले के लेल कहे चाहत रह ली हय। हम इ ऋण तोरा बेटी के पढा के पूरा करब। मुनिया पुजारी के बच्चा आ अपन बच्ची के अपन दूध पिला के पाले लागल। समय बीतल गेल।आइ पुजारी के लड़का सर्वजीत आ मुनिया के लड़की मेधा का नाम गांव के ही स्कूल मे पहिला वर्ग मे लिखायल गेल।साथे साथे सर्वजीत आ मेधा पढे लागल।संगे संगे खेले लागल। समय के साथ सर्वजीत आ मेधा गांव के नजदीक सुरसर डिग्री कॉलेज में पढ़े लागल।दूनू गोरे बीए आनर्स फस्ट क्लास मे पास कैलक। समय के साथ सर्वजीत पुलिस में बहाल हो गेल। दूनू में प्रेम भी रहे।अब सर्वजीत आ मेधा प्रेम विआह के बारे में बात करे लागल। लेकिन सर्वजीत में अपन माता पिता के छवि देखे। सर्वजीत कहलक-मेधा हम आ तू जौड़े जौड़े पढ ली हय।हम दूनू गोरे जबान छी।दूनू गोरे दू जात छी। प्रेम विआह में कोनो बाधा न हय। कानून भी हमरा पक्ष मे हय। लेकिन प्रेम विआह से पहिले बाबू जी से अनुमति चाहे छी। मेधा कहलक-हं हं। बाबू जी स अनुमति जरूर ले ला।हमहूं अपना माय बाबू जी से अनुमति ले ली छी। सर्वजीत अपन बाबू जी से रात में कहलन-बाबू जी।हम मेधा से बड़ा प्रेम करै छी।हम मेधा से विआह करे चाहे छी। पुजारी कहलन-सर्वजीत इ विआह न हो सकै हय। मेधा तोहर बहिन हय।भाई-बहिन में विआह न हो सकै हय। सर्वजीत कहलक-बाबू जी हम दूनू दू जात छी। हम बाभन आ मेधा सोलकन हय। विआह त हो सकै हय। पुजारी जी कहलन-सर्वजीत तू न जानैय छा।जब तू तीन महीना के रहा।तोहर माय मर गेलथून। मुनिया तोरा अपन दूध पिला के पाल ले हौअ। तोरा आ अपन बेटी मेधा के जौंआ संतान लेखा पाल ले हौअ। मुनिया तोहर यशोदा माय हौव। जेना भगवान किशन के यशोदा माय हय। सर्वजीत कहलक-बाबू जी इ बात हमरा मालूम न रहल हैय।हम त मेधा के माय के कामवाली समझैत रहली हय।आइ हम समझली मेधा हमर बहिन हय।काल्हि हम अपना हाथ में राखी बंधायब। इधर रात में अपन माय के मेधा कहलक-माय।हम सर्वजीत से प्रेम करै छी।हम दूनू गोरे एक दोसर के प्रेम करै छी।हम प्रेम विवाह करे चाहे छी।अइला कि हम दूनू गोरे दू जात के छी। सर्वजीत बाभन हय आ हम सोलकन छी। मुनिया कहलक-सर्वजीत से तोहर विआह न हो सकै हय।चाहे हम दू जाति के भले न होय।हम सर्वजीत के अपन दूध पिला के पोस ले छी। सर्वजीत जब तीन महीना के रहे त वोकर माय मर गेल रहे।हम अपन बेटा जेका पोस ले छी।हम सर्वजीत के यशोदा माय छियै। मेधा कहलक-माय। हम त सर्वजीत के पुजारी जी के बेटा समझैत रहली हय।आइ समझ ली कि सर्वजीत हमर भाई हय।हम काल्हि अपन भैया हाथ में राखी बांधब। काल्हि सबेरे मेधा अपना माय के साथ मठ में पहूच गेल। सर्वजीत अपना बाबू जी के साथ चौकी पर बैठल रहे। मेधा बोललक-भैया सर्वजीत। सर्वजीत बोललक-बहिन मेधा। दूनू आंख से आंख बात कैलक। कुछ बोले के जरुरत न पड़ल। मेधा अपन भाई सर्वजीत के हाथ में राखी बांध देलक। सर्वजीत आगे बढ़ के अपन यशोदा माय मुनिया के गोर छू के प्रणाम कैलक। यशोदा माय मुनिया अपन आशीर्वादी हाथ सर्वजीत के मुड़ी पर रख देलक। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी। -आचार्य रामानंद मंडल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.महाकान्त प्रसाद- ३ टा बीहनि कथा महाकान्त प्रसाद ३ टा बीहनि कथा १ चारण -महाराज! यौ महाराज?! -की हौ कैब, की बात? -कने ब्योंत करितिए न, बड्ड जरुरी अछि। -ठीक छै, काल्हिएसँऽ मंच सजतै। -हें हें..., कने साय भेट जएतै तऽ..! -हँ,हँ.. ,लैह। मुदा प्रचार हमरेटा होएक। -जी प्रचार आ भोट सेहो।महाराजक जय हो, जय हो! २ बिचार -हे, ऐना जे छिरहारा दै छैं, से सभ छोड़ा देबौ! -की भेल भाईजी से? हमरा सँऽ कोनहुँ गलती? -गलती? गलती आ सही से तोँ हमरा बुझेबेँ? -की से, अहीँ कहु न? -रे तोँ मुंह लड़ेबेँ? तोरा हम दरिभंगा छोड़ा देबौ। माय-बाप मरलौ, आब एहिठाम तोहर कोनहुँ हिस्सा-बखरा नहि। से जान। -से जे बिचार, हम तऽ छोट भाई छी, की कहब! -बिचार की? बिचारे-बिचार छै। ३ पंच परमेश्वर खदेरन केर पोखरि मे एकटा नकार(मगरमच्छ) ढ़ुकि गेल छल। एहिसँ माछक जीराक बड्ड हानि भऽ रहल छल। संगहि स्नान करऽबला लोक आ नेना भुटका लेल सेहो सदिखन डऽर बनल रहैत छल। खदेरन झट दऽ नकार भगएबाक निर्णय लेलक। खदेरन पोखरि मे पंपसेट लगा सभटा पाञि उपछा देलक। पाञि सुखने नकार भागि गेल, मुदा सभटा माछ मरि गेल। लाखहु टाकाक नोकसान भेल, परंच खदेरन हर्षित छल जे ओ नकार केँ बइला देलक। खदेरनक फरीक सभ जिनकर ओहि पोखरि मे हिस्सा छलनि, गामक पंचायत मे पंचैती लेल ऊजूर लगओलक।पंचायत बैसल। पंचैती मे नमगर-भरिगर बहस केर बाद फैसला देलक - 'खदेरनक नकार भगएबाक निर्णय  आ तरीका दुनू नीक ओ सही छल। एकर प्रभाव आ परिणाम की भेल, से कोनहुँ खास गप्प नहि।' तखनहि फरीकक कैएक व्यक्ति जनौलनि जे पोखरि सँऽ बइला देल गेल नकार फेरसँऽ पोखरि मे आबि गेल अछि। मुदा एहि दिस कोनहुँ  पंचक धेयान देब उचित नहि बुझल गेल। सरपंच बजला -'पंचायतक निर्णय अकाट्य अछि।आब कोनहुँ सोच विचार करब फजूल अछि। पंच मे परमेश्वर वास होएत छै।' पंचायत हरहरा कऽ उठि गेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना (उपन्यास- खेप ९) संतोष कुमार राय 'बटोही' मंगरौना (उपन्यास- नवम खेप) ई फ़हरीन नाज़ छथि। पुरनका दिल्ली मे हुनकर अम्मी केँ घर छन्हि।  अम्मी केँ ई दोसर निकाह भेल छन्हि। पहिल निकाह मे फ़हरीन जन्म लेलीह। पहिल सौहर सँ तलाक भेलाक बाद हुनकर दोसर निकाह कराउल गेलैन्ह मोहम्मद शाहिद  सँ - उम्र मे बीस साल पैघ बिजनेसमैन। सौहर बेसी मानदान करैत छलैन्ह - इनहोर  पानि  देह पर ढारैत छलन्हि। फ़हरीन केँ पहिल  ब्रदर हिनकर अम्मी केर उमर केँ छन्हि । फ़हरीन केँ ग्रेजुएशन धरि निक एकेडमी रिकॉर्ड नहि छलैन्ह। ओ पढ़ैत कम छलीह ;  घुमैत बेसी । ब्वाय फ्रैंड संग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय  के हॉस्टल मे कहियो-कहियो टाइम  मैनेजमेंट  करैत छलीह। ओतs सँ फेर आबि कs जामिया मे क्लास करैत छलीह। छौरा सभ ओकरा दिस टुकुर-टुकुर तकैत छलैन्ह। भीतरका  भेद हिनकर सभ कियो जनैत छलैन्ह। मोन नीक भेला  पर एम ए मे ओ बड़का पढ़ाकू बनि गेल छलीह। आबिद संग हुनका अहाँ जामिया कैम्पस  मे देखि सकैत छी। चाँद सन गोल मुंह । पाँच फुटक । नहि बेसी पातर नहि बेसी मोट देह। एक्कीस लमसम उमर। जवानी जोश मे। एम ए निक अंक सँ पास केलीह आओर एमफिल लेल जामिया मे एंट्रेंस  पास कएलीह। आबिद :  कहाँ गयी थी कल ? मैंने घर पर तुम्हें देखा नहीं। ' कबीर ' पर असाइनमेंट रहमान सर ने दिये हैं। फ़हरीन : कहीं नहीं। आबिद : अच्छा, छोड़ो । परसों  सबमिट करना है। हमने लाइब्रेरी से ' कबीर' पर बुक इश्यू करवा ली है। मैं असाइनमेंट बना रहा हूँ। फ़हरीन :  फिर मैं कब बनाएगी ? आबिद : कल तक मेरा पूरा  हो जायेगा। फ़रहीन : कल मुझे बुक दे देना। आबिद : ओके । जामिया मे सेमेस्टर सिस्टम  लागू भs गेल छै। असाइनमेंट बनौनै जरूरी कs देने छै। पंद्रह अंकक  असाइनमेंट होएत छै। हिंदी विभाग  केँ भूतल पर रहमान सर हिंदी साहित्य  पढ़ा रहल छथिन्ह। 'भक्तिकाल' मे निर्गुण काव्यधारा केर  व्याख्यान भs रहल छै क्लास मे। 'कबीर आइओ प्रासंगिक छथि' विषयक  ऊपर चर्चा भs रहल छै। फ़हरीन : सर, कबीर ने मुसलमानों की आलोचना की है जो एक भक्त कवि को शोभा नहीं देता। रहमान सर : वह कैसे ? फ़हरीन : इन पंक्तियों को देखिए - " कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाय । ता चढ़ि मुल्ला बांग दे का बहरा हुआ खुदाय ।।" रहमान सर : कबीर साहब प्रतीकात्मक  चीजों के खिलाफ थे, न कि इस्लाम के खिलाफ। वे इबादत के विरोधी नहीं थे, बल्कि इबादत अता करने के ढंग से खफा थे। इबादत बिना लाउडस्पीकर के भी किया जा सकता है। इससे दूसरे लोगों को कोई परेशानी नहीं होगी। फ़हरीन : जी सर ! एमफिल  मे हुनकर सेलेक्शन भs गेलै ! हम वेटिंग  लिस्ट केँ जाल मे फँसे गेलहुँ। एमफिल  करवाक  सपना सच नहि भेल ! मोन जामिया मे रहि गेल । एक साल पहिने ' लाउडस्पीकर ' विवाद छिड़ल छल। बिना मतलब के झंझट आओर खटपट ! अखबार मे,  चैनल पर आओर सोशल मीडिया मे अनघोल मचल छल जे मस्जिद  सँ लाउडस्पीकर हटाऊल जेबाक चाही, नहि तँ मंदिर सँ हमहुँ हनुमान चालीसाक पाठ करब।  ई की भs रहल छै देश मे ! बिना पेनक लोटा !! "सभ काज छोड़ि कs नेता सभ बांग देबाक विचार क्याक कs रहल छथि ? नेतागिरी  सँ देश नहि चलतै। देश सबहक छियैय, ताहि दुआरे सहनशील  बनवाक चाही। झूठमूठ  केँ समाजक शान्ति मे आगि जुनि लगबियौ।" दलान पर बैसल झूलन काका बड़बड़ाति छलाह । बुलन काका पुबैर  टोल सँ अबैत  हुनकर विचार केँ समरथन देलथिन्ह, - "सरिपहुँ , देशक महौल खराब नहि करक चाही । राहुल गांधी केँ ' भारत जोड़ो यात्रा ' देश मे नफ़रत  आओर ओलझोल केँ राजनीति केँ खतम करत।" (बाकी अंश अगिला खेप मे) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- खिच्चड़ि जगदीश प्रसाद मण्डल

खिच्चड़ि साइठ बर्खसँ जहिना रामसेवक मोतीलालकेँ जनैत-चिन्हैत तहिना मोतीलाल सेहो रामसेवककेँ जनैत-चिन्हैत। कहब जे दुनूक चर्च किए केलौं? नहियोँ करब ठीके होइत, किए तँ दुनूक बीच दोस्ती वा कोनो आने सम्बन्ध रहल होइन। ठीक। मुदा तँए एहेन सम्बन्ध नहि अछि जे एक अपनत्व रूपेँ देखैत होथि आ दोसर अ-अपनत्व रूपेँ देखैत होइथ। खाएर तइसँ रामसेवके आकि मोतीलालेकेँ कोन मतलब छैन, मतलब छैन अपन साइठ बर्खसँ अबैत सम्बन्धक। स्वतंत्रतासँ पहिनौं आ पछातियो, समाजक जागरणक लेल गाम-गाममे सभा-सोसायटी होइ छल, जइमे भाग लेलासँ सम्बन्धमे बढ़ोत्तरी दुनूक बीच सेहो होइत रहलैन। ओना, दुनू गोरेक माने रामसेवकोक आ मोतियोलालोक घर ने एक गाममे आ ने अड़ोस-पड़ोसमे छैन। अड़ोस-पड़ोसक माने भेल गामक चौबगली अड़ोस-पड़ोसक गाम। जइ बीच दोकान-दौरी, हाट-बाजार, स्कूल-कौलेज सम्बन्धक आधार होइए। दुनू गोरेक घरक दूरी करीब, औझुका नापमे पचास किलोमीटर आ पहिलुका नापमे दस कोस अछि। दुनू समाजक ओहन जातिक परिवारमे जन्म नेने छैथ, जइ समाज (जाति)मे पढ़ै-लिखैक चलैन कम रहने पढ़ै-लिखैक संख्यामे कमी सेहो छेलैहे। ओना, गरीबीक चलैत बच्चो सभसँ पढ़ै-लिखैक अवस्थामे परिवारक काज लेल जाइत छल, अछियो। ओना, मुख्य रूपसँ पढ़ै-लिखैक साधन कम रहने पढ़ै-लिखैक समुचित बेवस्थो नहि छल। ओना, बेवस्था आ कुबेवस्था दुनू अछिए। पारिवारिक स्थिति, आर्थिक दृष्टिये, दुनू परिवार एकरंगाहे मुदा दू इलाका रहने, एक कोसी-बलानक इलाका तँ दोसर कमला बलानक, दुनू समूहमे माने धाराक समूहमे, ताकतमे कमी-बेसी सेहो अछिए। जैठाम कमला बलानक क्षेत्र अधिक तगतगर अछि तैठाम कोसी-बलानक क्षेत्र कमजोर अछि। रामसेवकक घर कोसी-बलानक इलाकामे आ मोतीलालक कमला-बलानक। तँए खेती-पथारीक स्थिति मोतीलालक बेसी नीक आ रामसेवकक पछुआएल। जइसँ जमीनक कीमत, माने खेतक मूल्य, सेहो कम भइये गेल। दोसर कारण ईहो भेल जे रामसेवकक गामक किसान माने कनकपुराबला किसान मोतीलालक गामक किसानसँ माने चानपुराबला किसानसँ सभतरहेँ खेती करैमे कम लूरिगर। जइसँ चानपुराक उपजा-बाड़ी नीक आ कनकपुराक दब छेलैहो आ अछियो। ओना, बाढ़िक प्रभाव सेहो दुनू गामक बीचमे कम-बेसी अछिए। एक जातिक बीचक दुनू छैथ। जखन सर-सवारीक कमी छल तखन लोक पएरे एक-गामसँ दोसर गामक आबा-जाही करै छला। तँए दसकोसीएक बीच कथा-कुटुमैती करै छला जइसँ आएब-जाएबक सम्बन्ध बनले छल आ बनितो अछिए। राम सेवकक पारिवारिक सम्बन्ध, माने वैवाहिक सम्बन्ध मोतीलालक गाम चानपुरामे। देश आजाद भेना थोड़बे दिन भेल छल, जन-जागरणक वातावरण बनल रहबे करइ। हाइये स्कूलसँ रामसेवक राजनीतिक मंचसँ लऽ कऽ सामाजिक मंचपर जाए-आबए लगला, जइसँ बजैक कलामे दिनानुदिन सुधार सेहो भेलैन। स्कूल-कौलेजक पढ़ै-लिखैक क्रम सेहो जारीए रहलैन। जइसँ एम.ए. तकक डिग्री रामसेवक प्राप्त केलैन। रामसेवकसँ भिन्न जीवन मोतीलालक छेलैन। स्कूल प्रवेशसँ पहिनहि माने विद्यालयमे नाओं लिखबैसँ पूर्व, मोतीलालक पिताक मृत्यु भऽ गेल छेलैन। मुदा पढ़ै-लिखैक प्रति आकर्षण परिवारमे रहैन, तैसंग गामेमे स्कूल (लोअर प्राइमरी) सेहो छेलैन। गामक स्कूलमे गामेक बच्चा पढ़ैए, जइसँ आन गामक बच्चाक अपेक्षा सम्बन्ध स्थापित होइमे आसान होइते अछि। मोतीलालसँ तीन बरख जेठ हीरालाल भाय छेलखिन। जे स्कूलमे पढ़ै छला। एक तँ परिवारमे भाए सन संगी आ दोसर गामेक स्कूलो, तँए स्कूल धड़बामे मोतीलालकेँ ओइ बच्चा जकाँ नइ भेलैन जे स्कूल जाइ दुआरे केतौ नुका रहैए। हाइ-स्कूल तक अबैत-अबैत मोतीलालपर परिवारक भार पड़ए लगलैन। सोभाविको अछि। मोतीलालक माए, जे वैधव्य जीवन जीबै छेली, तैठाम मोतीलाल किछु छला मुदा बारह बर्खसँ ऊपरेक छला। अपना ऐठाम पुरुखक नाप तँ नहि अछि, मुदा स्त्रीगणक सियान हेबाक नाप तँ अछिए। अष्ट वर्षे च भवेत् गौरी..। मोतीलालक माए माने सुचिता, ओहन परिवारक छेली जिनका दरबज्जापर अपन महफा आ चारि जोड़ बरद आ सात गाड़ करीनक जोगार छेलैन। ओना, एकटा संयोग सुचिताकेँ आरो भेलैन। ओ भेलैन ई जे सुचिताक छोट मौसी, माने माइक सात बहिनमे सभसँ छोट बहिन,क सासुर सेहो चानपुरे। चानपुराक ओहन परिवारमे सुचिताक मौसी माने द्रौपदीक सासुर छेलैन जे सामाजिक-आर्थिक रूपेँ प्रथम कोटिक छल। विवाहक पछाइत तँ नहि, तइ समयमे दुरागमनक पछाइत आबा-जाही होइ छल, तेकर किछुए दिनक पछाइत द्रौपदी विधवा भऽ गेली। नि:सन्तान, सम्पैतिक कमी नहि, हुनके देखा-देखी सुचिता सेहो दू बेटाक आश्रयमे अपन जीवन हँसी-खुशीसँ बितबए लगली। दुनूक बीच माने रामसेवको आ मोतियोलालक बीच एकटा सुखद संयोग सेहो भेलैन। ओ भेलैन ई जे जहिना साले-साल क्लास ससरैत रामसेवक बढ़ला तहिना मोतीलाल सेहो बढ़ला। सुखद संयोग दुनूकेँ ई भेलैन जे ने कहियो घोड़ा जकाँ नम्हर टप्पा (टाप) दऽ पहिल श्रेणीक विद्यार्थी बनला आ ने कहियो कोनो क्लासमे फेल केलैन, तँए शुरूसँ अन्त धरिक पढ़ाइ-लिखाइमे दुनू संगे रहला। ओना, एक-आध क्लासक दूरी दुनूमे हाइ-स्कूलसँ रहलैन मुदा एम.ए.क परीक्षा पछुएने सेहो एकबट्ट भऽ गेलैन। ओना, चिन्हा-परिचय आ जान-पहचान दुनूकेँ शुरूहेसँ रहलैन, माने हाइ-स्कूलेसँ रहलैन, मुदा जीवन निर्माणमे दुनूक दू दिशा रहलैन। रामसेवक कौलेज छोड़ैत-छोड़ैत अपन कद एते ऊँच बना लेलैन, जिनका लग एकाध घन्टा बैस कऽ गप-सप्प करब, तेते समय नहि बँचै छेलैन। दोसर दिस मोतीलालक जीवन गाम-समाजक बीच रहलैन तँए जीवन-चेतनाक वास्तविक बोध भेने आत्मबलमे सकारात्मकता आबिये गेल छेलैन। साइठ बर्खक जीवनक बीच, चिह्न-पहचिह्न रहला पछातियो, कहियो एहेन अवसर दुनूकेँ नहि भेटलैन जे घन्टा-दू-घन्टा एकठाम बैस विचार-विनिमय करितैथ। दुनूक दृष्टिकोणमे स्पष्ट अन्तर आबिये गेल छैन जे जैठाम रामसेवकक नजैर सत्तोन्मुखी बनि गेल छैन तैठाम मोतीलालक नजैर जनोन्मुखी बनि गेल छैन। आइ पचहत्तैर बर्खक अवस्थामे रामसेवको आ मोतियोलाल पहुँच गेल छैथ। समाजक बीच राजनीतिक रूप सेहो बदैलिये रहल अछि। देखते छी जे जीवितक चर्च कम आ मृत्युक चर्च बेसी भइये रहल अछि। खाएर तइसँ मोतीलालकेँ कोन मतलब। अपना जीवनकेँ मोतीलाल अपना मुट्ठीमे बान्हि रखने छैथ, जेकरा सोभाविक जीवन कहि सकै छिऐ। जेकर सिहन्ता अपनो मनमे लगल अछि। सामाजिक परिवेशक विपरीत मनमे विचार उठल जे परसू जे मोतीलाल भायसँ गप-सप्प भेल, तँ कहलैन- 'बौआ, समय केहनो दुरकाल, भागवत-पुराणक धुन्धकारी जकाँ, भेल मुदा पचहत्तैर बरख पूर्व अपन देखल ओ दिन, आइयो ओहिना मन-मस्तिष्कमे बैसल अछि जहिया चौदह अगस्तकेँ अधरतियामे पटना रेडियो स्टेशनसँ नाजिर हुसेन शहनाईक टाँहि आ लालकिलापर स्वतंत्रताक तिरंगा झण्डाकेँ फहराएब, शुरू भेल।' ओना, ओछाइनेपर रही तखने मोन पड़ि गेल जे आइ मोतीलाल भाइक जन्म-दिन छिऐन, किए ने जन्म-यज्ञक मंगल गीत, 'आएल शुभ केर लगनमा, शुभे हे शुभे', लगमे जा कऽ बधैया गीत जकाँ गाबि मुँहक मांग मांगि आबी।' बिछानेपर, अपन दिन भरिक रूटिंग तैयार करए लगलौं। तइमे पहिल काज मोतीलाल भायकेँ शुभ सन्देश देब भेल। केतबो धड़फड़ेलौं मुदा सुतिकऽ उठैक जे नअबजिया समय अपन अछि, से भइये गेल। ओना, मनमे ईहो उठि गेल छल जे शुभ सन्देश शुभ दिनक शुभ बेलामे देब बेसी नीक होइत अछि, मुदा तइमे कनी पछुआ गेबे केलौं। जइसँ प्रभात बेलाक शुभ किरण छुबैमे देरी भइये गेल, मुदा पहुँचलौं। दरबज्जापर बैसल मोतीलाल भाय जेना किछु मने-मन सोचिकऽ मुस्किया रहला छल, तहिना बुझि पड़ल। कनी हटलेसँ बजलौं- "भाय साहैब, नब वर्षक शुभकामनाक बधाइ अछि.!" जेना ओंघाएलकेँ टोकलापर भक्क खुजैए तहिना मोतीलाल भाय आँखि खोलि देखते बजला- "बौआ, तोरे शुभकामने हम थोड़े शुभ-शुभ जीब, जीब तोहर सुकर्मे। मुदा तोंहूँ ठीके कहलह, किए तँ समाजमे दुनू धारा ओहिना प्रवाहित होइए जहिना बंगालक गंगाक धारमे होइए। सोलह घन्टा उत्तरसँ दच्छिन दिस, माने पहाड़सँ समुद्र दिस बहैए आ आठ घन्टा दच्छिनसँ उत्तर दिस, माने समुद्रसँ पहाड़ दिस बहैए। तहिना कर्म आ भावक बीच सेहो अछिए। कखनो कर्मक धार होइत भाव प्रवाहित होइए तँ कखनो भवधाराक संग कर्म सेहो प्रवाहित होइते अछि।" मोतीलाल भाइक विचार सुनि विचारए लगलौं कि बिच्चेमे मोतीलाल भाय कहलैन- "बौआ, चारिम दिन रामसेवकक समाद भेटल जे भेँट करए आबि रहल छैथ। से तोहर की विचार?" जहिना मोतीलाल भाय अपन भार दिअ चाहलैन तहिना अपनो घुमौआ भार, घुमौआ भार भेल गाम-गामक भार जे गामे-गाम तीन-गाम-चारि गाम घुमि बाइस-तेबाइस होइत असल जगहपर पहुँचैए, दैत बजलौं- "भाय साहैब! अहाँ तँ अपने विचारवान छी, जे नीक होइ से कहि दिअ। अपनेक कि कोनो आदेश हम काटब।" कनीकाल गुम्म भऽ मोतीलाल भाय मने-मन विचारए लगला जे केते दुखद विषय अछि जे समाजक पढ़ल-लिखल लोक माने रामसेवक जखन एते पुरान, एते बेवहारिक सम्बन्धकेँ जोड़िकऽ नहि रखि सकल तखन..? जेना मनक उद्वेग मोतीलाल भाइक विचारमे ठोकर मारलकैन, तहिना बुझि पड़ल, बजला- "बौआ! जिनगीक सम्बन्धक रस, दुनू गोरेक बीच सुखि गेल। आब तोंही कहह जे की नीक हएत?" ओना, मोतीलाल भाइक भितुरका की भाव छेलैन से तँ ओ अपने बुझैत हेता मुदा अपना बुझि पड़ल जे मने-मन मर्माहत जरूर छैथ। उधकी दैत उधकबैत पुछलयैन- "से की भाय साहैब?" जहिना अपने उधकियौलिऐन तहिना उधैक कऽ मोतीलाल भाय बजला- "बौआ, खिच्चड़ि आ खीर दुनू होइए गिलगरे। भात जकाँ टकुआ-तान नइ होइए, मुदा दुनूकेँ एक कहबहक?" बजलौं- "हमहीं कि आनो कियो ने एहेन बात कहता।" ओना, मोतीलाल भाइक विचारक सहे-सह अपनो ओम्हरे झुकाइत रही मुदा तइ बिच्चेमे मोतीएलाल भाय बजला- "खीर आ खिच्चड़िमे की अन्तर अछि, बुझै छहक?" अखन तक अपने यएह बुझै छेलौं जे नून देने खिच्चड़ि भेल आ चिन्नी देने खीर। बजलौं- "नूने-चिन्नीक तँ खेल अछि, खिच्चड़ि बनाबी कि खीर।" हमर बात जेना मोतीलाल भाइक हृदयकेँ छुबि देलकैन तहिना हृदयसँ मुस्कियाइत बजला- "बौआ, खीर आ खिच्चड़िक अपन-अपन जीवन-चरित्र अछि।" दुनूक अपन-अपन जीवन सुनि मन धकमकाएल। धकमकाइक कारण भेल, जैठाम अपने नून-चिन्नीक खेल बुझै छेलौं तैठाम दुनूक जीवनक चर्च मोतीलाल भाय केलैन अछि.! पुछलयैन- "से केना भाय साहैब?" जहिना कोनो कथाकार वा कवि अपन एक शीर्षकक शब्दमे कथा वा कविता सुना दइ छैथ तहिना मोतीलाल भाय बजला- "यएह जीवन दृष्टि छी जे जीवन देखबैए।" सच पुछी तँ मोतीलाल भाइक विचार नीक जकाँ नइ बुझलौं, तँए कहब जे सुनबो नइ केलौं सेहो झूठ नइ बाजब। मुदा मोतीलाल भाइक भवधारमे किछु बाजब, कठिन अछिए। पुछलयैन- "से केना भाय साहैब?" हमर विचार जेना मोतीलाल भाइक हृदयकेँ चुहुटिकऽ पकैड़ लेलकैन तहिना हीय खोलि बजला- "बौआ, खिच्चड़ि ओ भेल जइमे दालि-चाउरक सम्बन्धक जीवन छी।" जेना सोल्होअना मोतीलाल भाइक विचार मनमे गड़ि गेल तहिना बजलौं- "छीहे।" मोतीलाल भाय बजला- "मुदा, खिच्चड़िमे जहिना दालिक ठेकान नइ अछि, माने राहैड़सँ खेसारी धरि, तहिना चाउरक ठेकान सेहो नइ अछि। मोटका चाउरसँ महिक्का धरि जहिना, तहिना अरबासँ उसना धरि।" ओना, जेतेक जल्दीमे मोतीलाल भाय बजला तेतेक जल्दीमे अपन मन नहि बुझि सकल। एकर माने ईहो नइ जे किछु ने बुझलौं। बजलौं- "हँ, से तँ ठीके।" हमर 'ठीक' जेना मोतीलाल भायकेँ पीठ ठोकि देलकैन तहिना ठोकाएल मने बजला- "बौआ, रामसेवक आ अपन जीवनमे यएह अन्तर अछि। जहिना खीर मात्र एकटा अन्न अपन संगीक संग माने दूध-चीनी इत्यादि विन्यासक संग चलैए, यएह चलब ओकर जीवन छी।" मोतीलाल भाय जइ हिसाबसँ बजला तइ हिसाबसँ अपने नइ बुझि पेलौं। तँए बजैमे कनी धड़फड़ाएब भेबे कएल जे एना बजा गेल- "लोको खीर-खिच्चड़ि होइए, भाय साहैब। तखन तँ ओहो ने खिच्चड़िये भेल जे बिनु हारि-जीतक जिनगी जीबैए।" मोतीलाल भाय बजला किछु ने मुदा गम्भीर जरूर भेला। -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास सातम पड़ाव) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) सातम पड़ाव गामेक माने पलारपुरेक दूटा ड्राइवरकेँ कामेसर पकैड़ लेलैन। अपन पिताक अमलदारी तकक जे धरोहर चीज-वौस छेलैन सभकेँ समेटि आ ट्रेक्टरक डालो आ फाड़ो लऽ कामेसर कलकत्ताकेँ ओहिना विदाइ केलैन जहिना यात्रीजी मिथिलाक केने छला। निमहनु नइ निमहनु ई दीगर भेल। दोसर दिन कामेसर पलारपुर पहुँच गेला। अखन तक पलारपुरमे गामक कियो ने ट्रेक्टरे कीनने छला आ ने इंजीनियरिंगक शिक्षे पौने छला। सभ तरहेँ कामेसर अपनाकेँ नबे-नब बुझि रहल छला मुदा एते तँ मनमे बिसवास बनले छैन जे अही गामक धरतीपर जन्मो भेल अछि आ पाँच बर्ख धरिक जीवनो तँ बीतबे कएल अछि। ओना, गामक परिवेशमे माने मिथिलांचलक गामक परिवेशमे ट्रेक्टरक उपयोग हुअ लगल छल। खेतो जोतब आ माटियो उघबबला काज चलिये रहल अछि। उत्साहसँ भरल कामेसर आन-आन ट्रेक्टरबलासँ सेहो भेँट करैक आ जे सभ ट्रेक्टरसँ काज करौने छला तिनको सभसँ अनुभव प्राप्त करैक विचार केलैन। विचारक दौड़मे कामेसर अन्तर्द्वन्द्वमे फँसि गेला। फँसि ई गेला जे बिना बजौने केतौ जाएब उचित नहि। तँए किनको ऐठाम जाइसँ मन मनाही करैन जे उपकैर कऽ किनको ऐठाम जाएब उचित नहि। कहलो जाइए जे बिनु बजौने कोहवर गेलौं आ कनियाँक माए पुछलैन केतए एलौं.? मुदा ई विचार कामेसरक मनमे उठिये ने रहल छेलैन जे बिनु काजे केतौ जाएब जरूर, उपकैर कऽ जाएब भेल, मुदा काजसँ जँ केतौ जाइ छी तँ ओ काजे जाएब भेल। गामेक दुनू ड्राइवर, कामेसर ऐठाम गाड़ी लगा दुनू गोरे अपना-अपना ऐठाम चलि गेला। असगरे दरबज्जापर बैसल-बैसल कामेसर विचारक ओहन बोनमे फँसि गेला जहिना बेंतक बोनमे लोक फँसैए। एक तँ लतियाह गाछ बेंतक, तैपर कँटाह सेहो होइते अछि। तँए कहब जे लोक बेंत केतौ आन बोनसँ आनै छैथ, सेहो बात नहियेँ अछि। ओही बोनसँ माने बेंतक बोनसँ ने बेंत आनि पथियो-छिट्टा बनबैए, कुर्सियो-टेबुल सेहो बनबैए आ सिपाही हाथक लाठियो तँ बनैबते अछि। कहैले तँ लत्तियेक मारि थानामे मारल जाइए माने बेंतक, मुदा लत्तीक लाठी केहेन होइ छै ओ तँ थानामे भेटैए। तँए कहब जे बेंतक बोन जँ अहाँ जेबे ने करब तखन बेंतसँ भेँट केना हएत। बेसी बात कथीले, अखन एतबे बुझू जे बेंते-बातसँ जीवन ठाढ़ो अछि आ बेंते-बातपर जीवन चलितो अछि। चारि घन्टाक पछाइत दुनू ड्राइवर रघुवीर आ मुनेसर पुन: कामेसर ऐठाम पहुँचल। पहुँचब उचितो अछिए, किए तँ नोकरीक विचारपर ने दुनू गोरे गाम आएल अछि। जीवनक सभ किछु कामेसरकेँ नबे-नब आ पहिले-पहिल बुझि पड़ि रहल छेलैन। अपन जे पाँचो दियादी परिवार छैन ओ सभ घराड़ी दुआरे बाधमे बसल छैथ। लगले कामेसरक मनमे ईहो उठि जाइन जे जहिना जीवनक बीस बर्खक साधनासँ इंजीनियर बनि समाजमे (गाममे) एलौं अछि तहिना गाम केते तपस्यासँ तेज गतिक इंजीन जकाँ दौड़ैत चलत सेहो तँ देखब अछि। कामेसरक गाड़ीक प्रचार सौंसे गाम भऽ गेल। दूटा ट्रेक्टर गाममे आएल ऐसँ ओहन लोकक, जिनक काज पाइक अभावमे पछुआएल रहैन, मनमे विसवासू आशा जगबे केलैन जे समाज अखनो जीवित अछि किए तँ एक-दोसरक बीच पैंच-पालट चलि रहल अछि। काज हेबे करत। कामेसरक मनमे ने ततमती छैन जे बिनु बजोने किनको ऐठाम केना जाएब। मुदा समाजमे तँ से नहि अछि, सामाजिक रूपमे सभक दरबज्जाकेँ अपन दरबज्जा मानि अपन जीवनक क्रिया-कलापक विचार-विमर्श करिते छैथ। पाँच-सात आदमी कामेसर ऐठाम पहुँच चुकल छल। ओना, बंगालीक समाजसँ कामेसर आएल छला तँए अपन शिष्टाचार निमाहैक कोशिशमे छेलाहे मुदा अबेवस्थित जीवन जाधैर सुबेवस्थित नहि बनि जाइए ताधैर अबेवस्थित विचार आ शिष्टाचार सुबेवस्थित विचार आ शिष्टाचार केना निमाहि सकैए। जाधैर विचारे बेवस्थित नहि हएत ताधैर शिष्टाचारक पालन करब तँ दूर भेल, जे निरमानो नहि कऽ सकै छी। रघुवीर बजला- "कामे भाय, जहिना गाममे एक बनि पूर्वज संग रहि जीवन निमाहलैन, आ अपनो सभ जेना कलकत्तामे बनौने रहलौं, से गाममे केना बनि चलत, तइले तँ तीनू गोरेकेँ एक विचारमे आबि चलाबए पड़त किने। जइसँ सबहक नीक हएत।" रघुवीर ड्राइवरकेँ अपन ड्राइवरीक अनुभव रहैन, मुदा कामेसरकेँ तँ से नहि छैन, मुदा कामेसरोक मनमे एते तँ बनले छैन जे जहिना गोदामसँ गाड़ी निकालि रघुवीर गाम तक संग आएल अछि तेकरे संग ने अपनो चलब अछि। होशियार बनि कामेसर रघुवीरकेँ कहलैन- "जहिना अपना सभ, तीनू गोरे एक उमेरिया छी आ गाममे एकटा नव जुगक शुरूआत करए माने नव काज करए कलकत्तासँ एलौं अछि, तहिना तीनू गोरेक जीवन संगे-संग चलैत रहए, यएह ने तीनू गोरेकेँ निमाहबाक सेहो अछि।" नोकर चालक आ मालिक चलबाह, तइ बीच तँ सम्बन्ध सूत्र बनबए पड़त। तँए फूलक माला जकाँ रघुवीर आ मुनेसर अपन-अपन जगह देखबैत, जहिना सम्बन्ध रधुवीरकेँ कलकत्तामे ड्राइवरक रूपमे छल ओही सूत्रकेँ लागू करैत, अपन विचार रखलक। एक माटि-पानिपर रहनिहार तीनू गोरे, विचार-विमर्श होइते एक सूत्र स्थापित कऽ लेलैन। विचारकेँ निचोरि कामेसर बजला- "कारोबार छी, भूल-चूक हेबे करत मुदा हम सभ प्रमुख सूत्र एकरा मानि आगू बढ़ी जे कारोबारमे झूठ-फूस नहि बाजी। सही बातो आ सही लेनो-देनक कोनो-ने-कोनो रास्ता अपनामे विचार करि निमाहैत चलब।" कामेसरक विचार रघुवीरो आ मुनेसरोकेँ जँचल। जँचिते सबहक मन मानि गेलैन जे जँ तीनू गोरेक बीच सही काजो आ सही विचारो बनल रहत तँ जीवनमे केतौ विवादक जगह नहि रहत। मुस्की दैत रघुवीर बाजल- "आइसँ हम सभ एकसूत्रमे बन्हि अपन जीवनक भविसक तैयारीमे लागि जाइ।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "गामक जिनगी" लघु कथा संग्रह लेल "विदेह सम्मान- 2011", "गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- "टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011", मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- "वैदेह सम्‍मान- 2012", विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "नै धारैए" उपन्यास लेल "विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014", साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा "कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015", मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- "वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" सम्मान- 2016", रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- "कौमुदी सम्मान- 2017", मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा "स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018", चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध "यात्री चेतना पुरस्कार- 2020", मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा "राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020", भारत सरकार द्वारा "साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021" तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा "अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022"

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- १९ म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- १९ म खेप १९ ओहीरातिसँ उतरबारिटोलक युवकसभ पाठशालाक सुरक्षामे लागि गेलाह । मुदा ककरो ई साहस नहि भेलैक जे जयन्तकेँ सोझा-सोझी कोनो मदति देबाक गप्प करैत । भोजनक व्यवस्था हेतु बैसारमे चर्च भेल रहैक । मुदा ई बात सभकेँ बूझल रहैक जे जयन्त से मानताह नहि । सभकेँ ई आश्चर्य लगैक जे आखिर ओ  एतेक दिनसँ गाममे छथि ,ककरोसँ किछु लए नहि रहल छथि तखन जीबि कोना रहल छथि? खाइतो छथि की नहि ? "एहन ने होअए जे ओ अन्ने बिना प्राण त्यागि देथि । तखन तँ सभकिछु धएले रहि जाएत ।"-गोविंद बजलाह। "मुदा कएल की जाए ? ओ ककरोसँ कोनो व्यक्तिगत समस्याक बारेमे चर्चो नहि करैत छथि । ककरो ओहिठाम जएबाक तँ प्रश्ने नहि उठैत अछि ।"-माधव बजलाह। "किछु ने किछु तँ हमरोसभक कर्तव्य अछि कि नहि?" "से तँ अछिए । मुदा तकर निराकरण कोना होअए? यदि हुनका से स्वीकार रहितनि तँ  कालीकान्तक  आग्रहे किएक नहि मानि लितथि जाहिसँ हुनका संपूर्ण सुख-सुविधाक होइतनि।" "से बात सही छैक । तथापि हमसभ काल्हि भोरे जा कए हुनकासँ प्रत्यक्ष गप्प किएक नहि कए ली?" "एकदम सही कहलहुँ । काल्हि भोरे हमसभ पाठशाला चलब । अपना भरि प्रयास करब, आगू भगवानक इच्छा ।" एहि तरहे गोविंद आ माधव आपसमे चर्च करैत छलाह । उतरिबारिटोलक लोकसभक सहानुभूति जयन्तक संगे एहूबात लए कए रहैक जे ओ नागबाबाक बहुत प्रियपात्र छलाह आ नागबाबा तँ उतरिबारिए टोलक छलाह । ओहिटोलक लोक सदिखन जानकीधाम जा कए हुनकासँ मार्गदर्शन लैत रहैत अछि। ओ बेर-कुबेर गरीब-गुरबासभकेँ मदतिओ करैत छथिन । उतरबरिआटोलक बैसार आ ओहिमे लेल गेल एकतरफा निर्णयसभक जयन्तकेँ कोनो जानकारी नहि रहनि । भए सकैत अछि जे प्रात भेने गोविंद आ माधव एहिसभक चर्च हुनकासँ करितथि । मुदा सुरक्षाक प्रश्नकेँ टारब उचित नहि बुझेलनि तेँ गोविंद  चारिगोटेकेँ ओही रातिसँ पठेनाइ शुरु कए देने रहथि । सुधाकर आ हुनकर लठैतसभ नहि सोचने हेताह जे एतेक जल्दी ई सभ भए जेतैक । तेँ रातिक अन्हरिआ आ खराब मौसमक फएदा लैत ओही राति अपन कार्यक्रमकेँ आगू बढ़एबाक बिचार केलनि। रातिमे मौसम बहुत खराब छल । रहि-रहि कए बिजलौका चमकि उठए । लगैत छल जे कोनो क्षण बरखा शुरु भए जाएत । घटाटोप मेघ सौंसे आसमानमे भरि गेल छल । एहन भयावह माहौलमे जयन्त एसगर ओहि पाठशालाक ढहल-ढनमानइत  चारक नीचामे कहुना कए जान बँचबैत छलाह । एहनो स्थितिमे हुनकर संपूर्ण ध्यान ओहि शोधग्रंथ  पर लागल रहैत छलनि । ओकर उपसंहार लिखि काजक इतिश्री करबाक छल । ओहि राति संयोग एहन भेल जे ओ लघुशंका हेतु कनीके फटकी गेल छलाह । शोधग्रंथकेँ सिरमा तरमे राखि देने रहथिन। लठैतसभ तँ धपाएल रहबे करए । मौका देखतहि ओहि पाठशालामे  प्रवेश केलक आ जान-बेजान शोधग्रंथकेँ ताकए लागल । अन्हारमे किछु देखाइत नहि छल । चारूकात ओसभ हसोथि रहल छल । ताबे बिजलौका चमकल। उतरबारिटोलक रखबारसभ पाठशालासँ सटले गाछीमे नुकाएल छल । बिजलौकाक प्रकाशमे ओ सभ लठैत सभकेँ देखबे नहि केलक,चिन्हिओ गेल । औ बाबू! आब तँ देखएबला दृश्य भए गेल । चारूकातसँ चारूगोटे पाठशालामे पैसल। पाठशालामे एकटा लठैत एमहर-ओमहर शोधग्रंथ तकबामे व्यस्त छल । ओकर एकटा संगी बाहर रखबारी करैत रहैक । ताबतेमे लाठी बजरल -धमाक! धमाक! ओहि लठैतक बामा पैरपर लाठी लगलैक । ओ ठामहि खसल । ताबे जयन्त सेहो आबि गेलथि। बाहर ठाढ़ सुधाकरक लठैत चिचिआ रहल छल - "चोर! चोर! दौड़ैत जाउ औ गौंवा-घरुआसभ । लठैतसभक चिकरब-भोकरब सुनि कए दुनूटोलक लोकसभ जमा भए गेल । दूपहर रातिक समय छल। अन्हार गुज्ज। आसमान मेघसँ आच्छादित छल । बरखासे शुरु भए गेल छल । एहन स्थितिमे चोर पाठशालामे की चोरबए आएल? ओतए छल की? इएह सबाल सभक मोनमे  घुमि रहल छल । उतरबारिटोलबला सभ कहए जे सुधाकरक लठैतसभ चोरी करए आएल छलाह आ ओ सभ से उतरबारिटोलक रखबारक नाम लगबैत छल । एतबेमे पाठशालाक पछबरिआ देबालक बिचला सोङर खसि पड़लैक । चारूकातसँ लोकसभ दौड़ल । कहुना कए ओकरा फेर ठाढ़ कएल गेल । "हमरा नहि लगैत अछि जे एहिठाम केओ चोरी करए आएल होएत । जरूर किछु आओर बात अछि।"-सुधाकर बजलाह। "अहाँसभ अनेरे एतेक रातिमे परेसान भेलहुँ । चिंताक कोनो बात नहि अछि ।"-जयन्त बजलाह । "एहि बातक तफसिआ होएब बहुत जरूरी अछि जे आखिर ई सभ  एहन खराब मौसममे एतेक रातिमे एतए की करए आएल रहथि? ततबे नहि हमरेसभपर उलटे दोख मढ़ि रहल छथि।"-उतरबारिटोलक रखबारसभ बजलाह । "आब एतेक रातिमे ई सभ विषयपर चर्चा करब उचित नहि । सभगोटे अपन-अपन घर जा कए विश्राम करू । काल्हि सभबातपर विचार कएल जेतैक ।"-जयन्त बजलाह । जयन्तक बात मानि लोकसभ हहरि गेल। मुदा उतेरबारिटोलक रखबारसभ लग-पासमे  नुकाएल रहि गेलाह कारण  ओ सभ जयन्तक सुरक्षा हेतु बहुत चिंतित रहथि । -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.डॉ किशन कारीगर- अकादमी पुरूस्कार वला नांगैड़ (हास्य कटाक्ष) डॉ. किशन कारीगर अकादमी पुरूस्कार वला नांगैड़ (हास्य कटाक्ष) बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै जे कहअ त एहनो कहूँ नांगैड़ भेलैयै जे गुमाने चूर भेल नंगड़डोलौन सन नांगैड़ डोलबैत रहौअ. कोई बुझलक गमलक किछो नै आ फूफकार जे ओकरा सन बुझनूक आन कोनो तेसर नै? हम किए एकरा सबहक गप माइन लियअ जे बलू जोगता बले पुरूस्कार भेटलैइए? जूरी सब ताबे कोन किताब लिख नेहाल कअ देलकै? मैथिली किताबक कोन रेकाड तोड़ बिक्री हुअ लगलै? आ सबटा ढेलमारा सब अपना ताले अगिया बेताल भेल हो हो क रहल जे आब साहित्य अकादेमी मे नव त्रिमूर्ती संजोजक बनलै त आब मैथिली साहित्य वला सब के नोबेल पुरूस्कार वला नांगैड़ भेट जेतै आ नंगड़डोलौन सब त की कहियअ. हमे बाबा से पूछली हो बाबा भिंसरे भिंसरे की होलौ कोई भांग मिला परसादी चढाए देलकौ जे एतना बड़ बड़ कर रहलौ? होलौ की से बोलहो ने जे बलू कनी हमरो अरू बुझबै ग. हमर बात सुन बाबा तमसाएल बोललकौ हौ कारीगर तोरो हरदम लोहछैले गप होई छह? तामसे हमर देह जड़ल जा रहल आ तोरा मजाक बूझा रहल छह? हम्मे बोललीयै नै हो बाबा हमरा मजाक न सूझ रहलौ अच्छा तोरा देह जड़ रहलौ त एक लोटा पानी फूल बेलपत चढ़ा देबै तबे त सबूर होतै. एतना सून बाबा हां हां के बजलौ हौ कारीगर तहूं पत्रकार भऽ की अगतिया छौंड़ा सन बिचारै छह. हम्मे कहलियै हो बाबा होलौ की से बोलहो ने कैमरा सामने लोको अरू कनी बुझतै. बाबा बोललकै अच्छा पहिने एक जूम तमाकुल खुआबह फेर कहै छियअ सबटा खेरहा. फेर हम बाबा के खैनी चुना देली. तमाकुल खा बाबा बोले लगलै हौ की कहियअ ई भागेसर पंडा हरदम नंगड़डोलौन जेंका केने फिरतह. हरदम दमसी झारतह जे हमरा अकादमी पुरस्कार भेट चुकल अछि. हमरा सन वरिष्ठ साहित्यकार आन तेसर के? हम कहलियै हौ भागेसर तोहर लिखल किताब कए गोटे देखलकह पढलकह से कहअ त कनी. अच्छा कोन किताब लै पुरूस्कार देल गेलह? भागेसर हमरा कहलक जे पेन डराइव मे जूरी आ कमंडल मे पुरूस्कार कृति लेल हमरा साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल. हमरा हँसी स रहल नै गेल. हम पुछलियै हौ भागेसर ई कहअ त तोहर लिखल किताब कए गोटे देखलकह पढलकह? त भागेसर पंडा कहैईए जे तै स हमरा कोन काज? जूरी देख लेलकै पुरूस्कार भेटि गेल आर की? कहअ त जोगाड़ बले पुरूस्कार भेटलह आ नंगड़डोलैन भेल अगिया बेताली करै छह. भागेसर बाजल यौ बाबा अहाँ के त साहित्य के एक्को रति गिआन नै अछि. हम बजलौं हं तोरा त तकेर गिआन छह जे नोबेल पुरूस्कार वला लाजे लजा गेल. कवि सम्मेलन में त तोरा नामे लाखक लाख टिकट कटाई छै कहलकै जे. हम्मे बाबा से पुछली हो बाबा कुछौ मैथिली भाषा साहित्य पर बोलहो ने. एतना सुन बाबा हां हां करैत बोले लगलौह हौ कारीगर की कहियअ पुरूस्कार दुआपे मैथिली वला सब निर्लज्ज पैतता भेल जा रहलै. अईं हौ मैथिली किताब दर्शक पाठक देखबे किनबे नै करै छै तब कथी झूठो तितमहा जे मैथिली साहित्यकार? ओना सब अपना गिरोह लेल वरिष्ठ साहित्यकार कथाकार कवि आ एकरा सब के गिरोहक लोक छोइड़ आम दर्शक पाठक चिन्हबे जनबे नै करै जाइ छै. चंदा क आ मैथिली भोजपुरी अकादमी रूपैया पर भेल कवि सम्मेलन मे जा नेहाल होइत रहतह. तहू मे दर्शको स बेसी कवि आ तइओ निरलज्ज भेल जोगाड़ बले अकादमी पुरस्कार लऽ नंगड़डोलौन बनल घूरतह जे हमरा पुरूस्कार भेटि गेल. जेना अइ निरलज्जा सबहक धोती ढेका मे अकादमी पुरूस्कार वला नांगैड़ लागल होउ? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा कथा १ संचरण तीस बर्ख पहिलुका जीवन जीबछ कक्काक बदैल गेलैन। जे गामक कियो-कियो देखियो रहला अछि आ बेसी लोक नहियेँ देख पेब रहल छैन। जे कियो नहि देख पेब रहल छैन ओ सोल्होअना आन्हरे छैथ सेहो बात नहियेँ अछि। आँखियो छैन्हे आ देखबे करिते छैथ। कहब जे ई तँ गौंआँक बात भेल जे कियो देख पेब रहल छैन आ कियो नहि देख पेब रहल छैन, मुदा जीबछ काका सेहो तँ अपने ओही गाममे रहै छैथ, ओ अपने की देख पेब रहला अछि? जीबछ काका अपने दुनू तरहक विचार तँ देखिये रहला अछि आ तइसँ संचरित होइत तेसरो विचार माने 'निरविचार'केँ सेहो देख रहला अछि। माने ई जे जीबछ कक्काक अपन खेती-बाड़ी जीविका छैन ओ पूर्ववते छैन, तँए ओहन देखनिहारो आ अपनो वएह किसान रूपमे ओहिना देख रहला अछि। दोसर तरहक जे गौंआँ आ अपनो विचार छैन तहूमे ओ वएह सामाजिक रूप देख रहला अछि, तँए बदलल सन देखैमे आबि रहल छैन। ओ स्पष्ट देख रहला अछि जे सामाजिक जीवन जइ ढाँचागत चलि रहल अछि तइमे सभकेँ किछु-ने-किछु रक्का-टोकी, झगड़ा-झंझट, मारि-पीटि आ केस-फौदारी भऽ रहल छैन, तैठाम जीबछ काका केस-फौदारीक कोन बात जे मारियो-पीटि, झगड़ो-झंझट आ रक्को-टोकी केकरोसँ नहि होइत देख रहल छैथ। चाहक दोकानपर चाहक उधारी ले, तहूमे कियो उधारीक झगड़ा करैत तँ कियो चाहक गिनतीएकेँ कम-बेसी करैत। तहिना कपड़ा दोकान हुअ कि नून-तेलक, सभठाम एक्के गति। कम-बेसी जे हुअए मुदा होइए सभठाम। से जीबछ काकाकेँ नहि होइ छैन। एहेन बेवहारिक रूप देख समाज दोसर नजैरसँ जीबछ काकाकेँ देखै छैन। आब चलू जे जीबछ काका अपने अपनाकेँ निरविचारी रूपमे केना देख पेब रहला अछि। तीस साल पूर्व अपना ऐठामक किसानक मनमे धारणा बनल छेलैन जे कोसी नहर आ पनिबिजलीक उत्पादन भेने सभकियो गरमी मासक रातिमे खेतो-खरिहाँन आ चासो-बासमे लक्ष्मीक संग रमकैत समय बिताएब, मुदा आइ की देख रहला अछि? ..जीवनक एहेन दब-उनार गामक आनो-आन किसान देखलैन आ जीबछ काका सेहो देखलैन। जखन-सत्ता दृष्टि किसान-दृष्टिसँ मिलल तँ अनेको संकटमे पड़ल किसानपर दृष्टि देबाक परियास भेल। बीसमी सदीक अस्सी-नब्बेक दशकमे धुर-झाड़ तँ नहियेँ मुदा सीमित रूपमे गाम-गाममे बोरिंगक लेल नब्बे प्रतिशत मूल्यक सरकारी सहायतासँ पानिक जागरण भेल। खेतीक लेल पानिक मूल्य ओहने अछि जेहने जीवनक लेल अछि। उपजा बढ़बैले खादक सहायता आ बीआक सहायताक संग छोट-छीन इंजिनचालित मशीनक संग हस्तचालित मशीन सेहो गाम-गाम आएल। यएह ने भेल हाथक हथियारमे संचरण। जेना-जेना संचरण बढ़त, तेना-तेना जीवन सेहो बढ़त। तेतबे नहि, सभ पंचायतमे तँ नहियेँ मुदा किछु पंचायतमे चेकोस्लोवाकियाक सहयोगसँ स्टेट बोरिंग सेहो भेल। जे बिजलीचालित अछि, मुदा बिजलीक अभावमे चालित तँ नहि भेल मुदा किसानक बीच आशक प्रज्ज्वलन आरो बेसी, किए तँ मिथिलेक भीतर दुनूक सृजन रहने। जहिना कोसी नहर तहिना बराहक्षेत्रो नूनथर आ शीशापानी भेबे केलैन।  तहूमे अपन मिथिलामे एहेन रंग छेलैहे जे पचास-पचास बीघाक नीक-नीक आमक कलम-गाछी सेहो छल। भगवानक देल आम सन फल, कोनो कि रखैबला उपाय छल, सीमित समयमे ओकरा खाइक छै, नहि तँ अपने सड़िकऽ समाप्त भऽ जाएत।  तँए बेसी-सँ-बेसी लोककेँ आम सन फल भेटते छल। गाछी-कलमबला जँ बड़ करता तँ अम्मट बनौता, मुदा ओहो केते बनौता? तहूमे अम्मट कि अखुनका खस्सी, मुर्गीक मांस छी जे पाँच किलोक पचान एकेटा सोडामीनक गोलीसँ हेमाल भऽ जाएत। आकि हजार-पनरह साए रसगुल्ला-लालमोहन छी जे एकेटा पेशावमे पानि बनि जाएत। अम्मट तँ अम्मट छी, तहूमे आमक। अढ़ाइ साए ग्रामसँ जँ पान साए ग्राम चढ़ेबै तँ तीन दिन ओछाइन धड़ेबे करत। खाएर जे से..। किसानक एहेन समस्या आइये नहि, ओना आइ बदलल सेहो अछि, सभ दिनसँ रहल अछि। जइसँ साले-साल किसानक जिनगीमे उनट-फेर होइत आबि रहल छैन। कोनो साल अधिक बरखा भेल जइसँ पानिक नोकसान तँ कोनो साल कम भेने आकि बरखे नइ भेने रौदी भेल जइसँ फसलक पैदावार नहि भेल। रौदियोक एहेन-एहेन रूप रहबे कएल अछि जेकरा बरहबर्खा कहै छिऐ। सभकेँ बुझल अछिए जे बारह बर्खक रौदीक पछाइत सीताक जन्म भेल रहैन। तँए कहब जे किसानक मनोनुकूल साल कहियो नहि भेल सेहो बात नहियेँ अछि। सेहो कोनो-कोनो साल भेबे कएल अछि। ओना, किसानक संग अनेको समस्या छैन। किसानी जीवनक मूल आधार भूमि आ पानि छी। गाम-गामक बुनाबट सेहो भिन्न-भिन्न रूपक अछिए, तहूमे अपना सबहक माने मिथिलांचलक, जे धार-धुर इलाका छीहे। मात्र मधुबनी जिलामे दू दर्जनसँ बेसी नदी अछि जे तीनू रंगक अछि। कोनो-कोनो नदी सालो भरि, माने बारहो मास चलाइमानक अछि तँ कोनो-कोनो छअ मास, आ कोनो-कोनो बालुक बुर्जा बनि सेहो चमकैत रहैए। खाएर नदी-धारक चर्च अखन नहि। गामक बुनाबटमे ऊपर-निच्चाँ माने नीच-ऊँच रूप अछिए। जहिना घर बनबैले ऊँच भूमिक जरूरत होइए तहिना पोखैर-झाँखैरक खगता सेहो अछिए। मुदा से अखन नहि, अखन एतबे जे गाम-गामक एक तिहाइ-चौंथाइ ओहन जमीन अछि जेकरा चौरी कहै छिऐ, जेकर उपजक कोनो भरोस नइ अछि। ओना, आजुक परिवेशमे अनेको साधन बनियेँ गेल अछि। मुदा से सैद्धान्तिक रूपमे अछि बेवहारिकमे नहि अछि। उन्नैस साए साठिक दशकसँ कोसी नहर आ पनिबिजलीक लेल ऐठामक किसान उठि कऽ ठाढ़ भेला। स्वतंत्रता आन्दोलनसँ जुड़ल सत्ताधारी सभ सेहो छेलाहे। इमानदारीक जीवन बनने इमानदार छेलाहे। इमानदारीसँ मिथिलांचलकेँ देख कोसी नदीसँ नहर लेल आ धारक उपद्रवकेँ रोकैले सेहो कोसियो धारक बगलमे आ कमलो धारक बगलमे बान्ह-छहर बनल। कमला छहरमे तँ ओते जन सहयोग नहि मुदा कोसी बान्ह बनबैमे भरपूर जनसहयोग भेटल। राजेन्द्र बाबू सन राष्ट्रपति आ कृष्णबाबू सन मुख्यमंत्री अपना माथपर माटिक पथिया उठा बान्ह बनौलैन। कोसी-कमलाक बान्ह-छहर बनला पछाइत राजनीतिक खेल शुरू भेल। सालक-साल कोसियो बान्ह आ कमलो छहर टुटए लगल। बाढ़िक घेरल पानि गामक-गामकेँ उजाइर लगबए लगल। गाम-गामक पोखैर-इनार, गाछी-कलम, बान्ह-सड़क, घर-दुआरि नष्ट हुअ लगल। गाम-गामक काजमे माने गिरहस्तीक काजमे, कमी आएल। बेरोजगारी बढ़ल। मिथिलांचलक भूमि छीहे, जैठाम बारह मासमे छअटा रितु आ तीनटा मौसम-जाड़, गर्मी, बरसात होइते अछि। तँए जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ गाछ-बिरीछ होइत मनुक्ख धरिक बाढ़ि एतए अछिए। आन देश जकाँ तँ मिथिला नहि अछि, जैठाम एक दर्जन बच्चा पैदा केनिहारि राजमाता थिकीह। पुरस्कृत होइ छैथ, तैठाम मिथिला तँ मिथिला छी। ऐठाम दर्जन भरि बच्चा तँ लुल्हियो-नेंगरीकेँ होइए तखन सुरेबगर तँ सहजे सुरेबगरे छैथ। जँ माए-बाप सुरेबगर रहत तँ बाल-बच्चा लुल्हे-नाँगर किए हएत। ओना, अपने ऐठाम-टाक नहि, माने मिथिलांचलेटाक नहि छपरा-भोजपुर तकक श्रमिक, खेतिहार श्रमिक, नेपालसँ लऽ कऽ आसाम, बंगाल, बंगला देश लगा, तक पटुओ काटए आ धान रोपैयोले आ काटैयोले जाइ छला, छअ मास बाहर खटि परिवारक गुजर चलबै छला। देशोक स्थिति अन्नक मामलामे वएह छल जे आन-आन देशसँ अन्न कर्ज लऽ लोकक पेट भरल जाइ छल। पेटक समस्या भयंकरे नहि महा भयंकर छल। ओना, आजुक नजैरिये जँ देखब तँ देशक खेतसँ तीन अरब टन अन्न उपजौल जा सकैए। तैठाम पचीस करोड़ टन उपजपर अँटकल अछि। ओना, एतेपर अँटकने माने पचीस करोड़ टनपर अँटकने प्रति-बेकती दस किलो अन्न महीनामे उपलब्ध भइये गेल अछि। माने तँ स्पष्ट अछिए जे जँ पचास करोड़ टन उपज हएत तँ बीस किलो प्रति-बेकती महीनाक हिसाबे अन्न उपलब्ध भऽ सकैए। सभकेँ बुझले अछि जे गामक जीवनसँ लऽ कऽ देशोक जीवन ओहन अछिए जे गरीब लोक बेसी अन्न खाइ छैथ आ अमीर लोक कम। तैठाम जँ मिथिलांचलक लोक पसेरी भरि माने पाँच सेर जँ खाइ छैथ तँ बेसीए केना खेलैन? तहूमे पेटक कि कोनो नाप अछि, कौरे-कौरे पेटक छबे-छबे खेतक बढ़ोत्तरी सेहो होइते अछि। खेतसँ खाली भोजने-टाक पैदावार नहि होइए। आइसँ तीस साल पूर्व, जखन अपना देशक पछुआएल अर्थव्यवस्था छल, तखन खेतक उपजक भागीदारी पैंतालीस प्रतिशत (45%) कल-कारखानाक छल आ आन-आन क्षेत्रक माने खान-खनीजक पचपन प्रतिशत छल। मुदा आजुक तँ एहेन स्थिति बनियेँ गेल अछि जे जेकरा गोबरछत्ता कहै छिऐ, जइमे धिया-पुताकेँ भिरै तकसँ परहेज करबै छेलौं से अखन भोजने नहि महाभोजनक विन्यासक श्रेणीमे अछि। खाएर जे अछि जेतए अछि तइसँ जीबछ काकाकेँ कोन मतलब छैन, मतलब एतबे छैन जे जहिना साठि बर्ख जीवनक समय हरक बरद जकाँ कन्हा ठाढ़ केने बीतेलैन तहिना शेष जीवन केना बीततैन, बस तेतबे। बुझले बात तँ अछिए जे सिकन्दर जखन मृत्युसजियापर जाइक अवस्थामे पहुँचला, माने हुनका जखन बुझि पड़लैन जे आब दुनियाँ नहि धाड़त तखन सहयोगी सभकेँ कहलखिन- 'जखन असमसान जाइले चचरीपर चढ़ब तँ हमर दुनू हाथ खोलि चचरीसँ निच्चाँमे लटका दिहऽ, जइसँ देखनिहार बुझता जे दुनियाँपर शासन करैबलाक सपना केतए गेल। ने कियो दुनियाँमे किछु लऽ कऽ आएल अछि आ ने लऽ कऽ जाएत..।' पश्चिमी देशक सिकन्दर छला तँए मरैबेर मे माने अन्तिम समयमे ई बात बुझलैन, मुदा अपना सभ तँ मिथिलांचलक ने भेलिऐ, पैछला पुरुखा चेताइये गेल छैथ ने जे भाय भूत-भविस दुनू फुसि छी, वर्तमान सत्य छी। तँए वर्तमानक क्षण-क्षण पल-पलकेँ क्षणैक-क्षणैक पलैक-पलैक आनन्दित भऽ आनन्दक जीवन जीबैत चलिहऽ। यएह दुनियाँक रहस्य छी आ जिनगीक धर्म। जखने कर्ममय जीवन धर्ममय धड़ि चलत तखने ने योगमय यज्ञमय बनि चलत। आ तखने ने मर्तभूमिक अस्सल टपान भेल। जीबछ कक्काक भाग्य नीक छैन्हे जे जहिना जीवनमे कहियो केकरोसँ एक पाइ मदैतिक रूपमे नहि लेलैन तहिना बेटी नहि रहने दानो-दैछना देबए नहि पड़लैन। शब्देक तँ खेल छी, 'दान-दहेज'केँ 'दान-दैछना' बना दियौ, कानूने की करत। एक तँ ओहुना जीबछ कक्काक संस्कारमे समाजक प्रति विरोध छैन्हे जे केते निरलज समाज बनि गेल अछि जे माता-पिता अपन पेट आ जीवन काटि जँ बेटीकेँ समरूप सन्तान बुझि, बीस-पचीस लाख रूपैआ खर्च करि डॉक्टरी शिक्षा दिअबै छैथ, तैपर बिआहमे पचास लाख दहेजमे खर्च हुअए, यएह तँ निरलज समाज छी। जिनका एतबो बुझैक होश नहि छैन जे पुतोहुक कमाइ अपना घर औत नहि कि जन्मदातक..! मंचपर प्रवचन दिन-राति होइए जे 'दहेज पाप छी', 'दहेज अपराध छी' मुदा तइले ने कानून अछि आ ने सामाजिक बन्धन। किछु दिन पूर्व तक, समाजमे बेटाक प्रति जे दहेज लइ छला ओ समाजक बीच मुँह खसा कऽ चलै छला मुदा आइ ओ ओहिना मुँह उठा कऽ चलि रहला अछि जेना पैघ-सँ-पैघ यज्ञ केला-पछाइत यज्ञकर्ता चलै छैथ। देखते छी जे सोझा-सोझी केना पाप धर्म बनैए आ धर्म केना पाप बनैए। विचारैक प्रश्न अछि जे दहेजसँ समाजमे कोन-कोन तरहक बाधा जीवनमे उपस्थित भऽ रहल अछि। जीवन अधिक-सँ-अधिक सुगम ढंगसँ चलए, यएह ने सबहक कामना अछि। जीबछ काकाकेँ दूटा बेटा छैन। अपन पितृ दायित्व बुझि दुनू बेटाकेँ अपना शक्तिक अनुकूल पालन केलैन। माने ई जे आने माए-बाप जकाँ जीबछ काका सेहो दुनू बेटाकेँ पाललैन, जइसँ पाँच-पाँच बर्खक समय दुनू देख लेलकैन। माने जन्मसँ पाँच बर्खक अबस्था धरि। ओना, दुनू सन्तानक बीच जन्मक दूरी पाँच बर्ख छैन, मुदा सेवा एकरंगाहे केलैन। आने माए-बाप जकाँ पहिल बेटा- सुभद्रकेँ गामक स्कूलमे नाओं लिखौलैन। भैयारीमे असगर सुभद्र तँए माए-बापक पूर्ण सिनेहसँ सिनेहिल हृदय सुभद्रपर रहलैन। सुभद्र पाँच बर्खक भेल तखन सुशीलक जन्म भेल। ओना, भैयारीमे सुभद्र लगा सुशीलकेँ माता-पिातक संग जेठ भाइक सिनेह सेहो भेटए लगलैन। माता-पिता होथि वा परिवारक कियो आन आकि बच्चा-बच्चाक बीच सेहो अपन प्रेम-बन्धन अछिए। जन्मेकालसँ माने माइयक गर्भसँ सन्तान जन्मक समय धरि जहिना माए तहिना बच्चा असीम गड़ूमे रहिते छैथ। दुखक ओहन रूप दुनूपर रहबे करैए जेकरा असीम पीड़ा सेहो कहिते छिऐ। जइ देशक वा परिवारक एहेन भयंकर स्थिति रहैए, माने अन्न बेतरे माइक शरीर तहस-नहस भेल रहै छैन, तैठाम तँ बच्चाक जन्मक पीड़ाक संग घरमे अन्नक अभावक दुखसँ दुखित मन आरो पीड़ित रहिते छैन। तैठाम जँ जच्चा-बच्चाक मृत्युदर देशक मृत्युदरसँ ऊपर रहत तँ ऐमे आश्चर्ये की भेल। से रहबे कएल अछि। ओना, आजुक परिवेशमे संचरण होइत किछु सुधार भेबे कएल अछि। मुदा तहूमे तँ खाड़ीनुमा अछिए। जे केहेन परिवारक मृत्यु-दरक सीमा केहेन अछि। संयोग कहियौ आकि जीबछ कक्काक परिवारक स्थितिक संग दुनू परानीक धर्म-कर्म, जहिना जेठ सन्तान- सुभद्रकेँ पालैत-पोसैत दस बर्खक बनौलैन तहिना छोट सन्तान- सुशीलक सेवा सेहो शुरू केलैन। ओना, ईहो कहिये सकै छी जे आन जकाँ गिधकिच्चैन सन्तान सेहो नहियेँ भेलैन। गिधकिच्चैन भेल, साले-साल सेहो आ एकसंग एकसँ अधिक बच्चाक जन्म सेहो। जहिना जीबछ काका बच्चाक प्रति अपन कर्मक धारकेँ सन्तानोन्मुखी बना परिवारमे ठाढ़ छला तहिना श्यामा सेहो ठाढ़ रहली। ओना, दुनू बेकतीक बीच, माने जीबछ काका आ श्यामा काकीक बीच वैवाहिक सम्बन्ध जहिये भेलैन तहिये दुनू परानी विचारि कऽ सहमत भऽ गेलैथ जे मनुक्ख मात्र अन्ने-पानि, माले-जाल आकि गाछ-बिरीछ-टाक सृजनकर्ता नहि, मनुक्खक सृजनकर्ता सेहो छथिए, तँए अपना दुनू परानीक जीवनकपहिल संकल्प यहए भेल जे बच्चाकेँ जन्म-सँ-चेतन अवस्थामे पहुँचा स्वतंत्र रूपमे छोड़ि दिऐ..। ओना, जहिना जीवन जाल छी तहिना महाजाल सेहो छीहे, तँए जंजाल महाजाल रूपमे अछिए। कृष्ण युधिष्ठिर आ दुर्योधनकेँ कहलैन जे द्वारकामे नीक आदमी केते अछि आ अधला आदमी केते अछि, एकर सूची बना कऽ दुनू गोरे दिअ। अपन-अपन नजैरिये दुनू गोरे नीक-अधलाक सूची बनबए द्वारका नगरमे प्रवेश केलाह। एक दिससँ पहियबैत दुनू गोरे अलग भऽ सूची तैयार करए लगला। सूची तैयार केला-पछाइत युधिष्ठिरो आ दुर्योधनो, दुनू गोरे कृष्ण लग पहुँचला। दुनू अपन-अपन सूची प्रस्तुत केलैन। दुनू सूचीमे किछु नहि लिखल देख कृष्ण दुर्योधनकेँ पुछलैन। दुर्योधन जवाब देलकैन- "महाराज.! एक्केबेर नहि, सात बेर सौंसे नगर घुमिकऽ मुआइना केलौं मुदा एकोटा नीक लोक नहि भेटल, सूची केकर बनैबतौं, तँए सूचीपत्र खाली अछि।" दुर्योधनक तर्क सूची गजेरी जकाँ कहियौ आकि परबा-पौरकी जकाँ कृष्ण अपन पेटक साँस पेटेमे घोंटलैन। बजला किछु नहि। मनमे फुरलैन लगले फेर युधिष्ठिरकेँ पुछलखिन। युधिष्ठिर जवाब दैत कहलकैन- "महाराज, हमरो वएह समस्या भेल। सात बेरकेँ कहए जे सौंसे द्वारका नगर हम नअ बेर घुमि-घुमि कऽ एक-एक बेकती आ एक-एक परिवारक जाँच-पड़ताल केलौं मुदा एकोटा अधला आदमी नहि भेटल। तँए की लिखितौं, सूची पत्र खाली अछि।" आब कहब जे दुनूमे किनकर रिपोर्ट सही छेलैन आ किनकर गलत छेलैन? ने किनको सही छेलैन आ ने किनको गलत छेलैन। अपन-अपन नजैरिये दुनूक सहियो आ गलतियो तँ छेलैन्हे। यएह छी दृष्टि। कहैकाल तँ सभ कहै छिऐ दृष्टिहीन। मुदा हीन आ श्रेष्ठ दृष्टि की भेल से भाँजेपर चढ़बे ने करैए। बीस बर्ख पुरैत-पुरैत सुभद्र अपन जीवनक एक सीढ़ी पार कऽ गेल। माने ई जे मैट्रिक तकक शिक्षा ग्रहण करैत पारिवारिक रूपमे शादी-सुदा सेहो भऽ गेला। जीवनो तँ जीवन छी, जहिना पहाड़, समुद्रसँ धार फुटि निकलैए तहिना मनुक्खोमे होइते अछि। धार रूपमे संचारित होइत जीवन सेहो आगू मुहेँ प्रवाहित होइते अछि। सुभद्रकेँ परिवारक क्रिया देख जहिना एक दिश जीबछ काका आर्थिक बोझ कमैत देखलैन तहिना अपन जीवनक भारग्राहीक रूप सेहो देखलैन जइसँ मनमे तृप्तिता जगलैन। मुदा परिवारक गतिक जे मति अछि तइमे कमी नहि भेलैन। नइ होइक कारण भेलैन जे एक दिस सुशीलक जीवन निर्माण पछुआएल छेलैन आ दोसर अपनो जीवन तँ एक खाड़ी टपिये रहल छेलैन जइसँ दोसर जीवनक निर्माण सेहो करबे छेलैन। ओना, अखन तकक जीवनानुभवमे जीबछ काका अपन तंत्र-मंत्रकेँ मजगूत करैत एते मानियेँ कऽ बुझि गेल छला जे मनुक्खक जीवन अमूल्य सम्पदा छी, एकर कोनो मूल्य नहि छै। तँए मूल्यहीन जीवन बना जीब लेब सभसँ पैघ भेल। जीबछ काका नीक जकाँ बुझि रहला अछि, जे जहिना जीवन अकाशोन्मुख सात सीढ़ी अछि तहिना पतालोन्मुख सेहो अछिए। अहीक बीच, माने चौदहो भुवनक बीच जीवनक संचरण होइत चलैए। मनुष्यक जीवनक योग रूप कहियौ आकि योगी रूप, ओ शरीरधारी मनुक्खेटाकेँ भेट सकैए। सत-चित्त-आनन्द जहिना कहै छिऐ, तइमे भगवानो छँटि जाइ छैथ। तँए देवतो सभ मनुक्ख बनैले ललाइ छैथ। अखन जीबछ कक्काक उम्र साठि बर्खक छैन। मुदा जखन ओ पचास बर्खक भेला तखन परिवारक जिम्मेदारीसँ अपनाकेँ मुक्त कऽ लेलैन। माने ई जे दुनू बेटाक अपन दायित्व बनै छैन जे अपन-अपन सखा-सन्तानकेँ अपना रूपमे तैयार करैथ। तँए जीबछ काका आश्वस्त भऽ गेला जे ऐगला पीढ़ीक भारसँ मुक्त भेलौं, मुदा विचार-विनिमय करबक दायित्व तँ अछिए। कियो अपन करए वा नहि करए ई जिम्मा नइ रहल, मुदा जखन पारिवारिक जीवन अछि तखन जस-अजसक तँ भागी बनबे करब। ओना, आजुक जे परिवेश बनि रहल अछि ओइमे अतीतक प्रति दृष्टिहीनता आ भविष्यक प्रति दृष्टिपूर्णता आबिये रहल अछि। माने ई जे पैछला पीढ़ी माता-पिता, दादा-दादीक प्रति जहिना नव पीढ़ीक दृष्टिमे दोषहीनता एलैन अछि तहिना अपन बाल-बच्चाक प्रति पूर्णता सेहो एबे केलैन अछि। ई दीगर भेल जे श्रमशीलता श्रमहीनता दिस बढ़ि गेने सुविधाभोगी जीवनक विकास तेजीसँ भऽ रहल अछि, मुदा एकरा शुभ केना कहबै? प्रज्जवलित होइत शक्ति जँ आगूक दिसक होइत तखन ने, से तँ ओहन प्रज्जवलन तैयार भऽ रहल अछि जे ईंधनक स्वरूप बनि रहल अछि.! साठि बर्ख टपला पछाइत जीबछ काका अपन जीवनक विराट रूप देखबैत सुभद्रकेँ कहलैन- "बौआ, यएह अपन जीवन छी।" ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा कथा २ भरि मन काज शासनतंत्रक सूत्र-नीतिसँ जहिना जीवन उठै-खसैए ठीक तहिना गियानचनकेँ अपन जिनगी देख मन खसए-उठए लगलैन.! मन कहलकैन दुनियाँकेँ तखने ने जानि पाएब जखन अकास-सँ-पताल आ पताल-सँ-अकास देखैक अक्ष आँखिमे औत। मुदा से कोनो पैथक आई ड्रॉपसँ थोड़े औत। ओ औत जखन जिनगीकेँ खन्तीसँ, ऐठाम कबीर बाबाक खन्ती नहि बुझब जे जगरनाथमे समुद्रक सीमापर जा कऽ खँतियौलैन, खुनि कऽ खत्ती बना खतियाएब, तखने ने खेत-पथारक खतियौन जकाँ जीवनोक खतिआन बनत। ओना, सभकेँ बुझल अछिए जे चौबीस घन्टाक भीतर दिन-राति होइए, मुदा दिनमे दिन केहेन भेल आ रातिमे राति केहेन भेल, यएह देख पएब ने भेल दुनियाँमे अपनाकेँ देख पएब.! दिनमे दिन आ रातिमे राति की भेल? रातिक बीच एकटा राति ओहन अछि जे पूर्णिमाक चानसँ जगमगाइए आ दोसर राति की एहेन नहि अछि जइमे इजोरिया-इजोतक दरसो ने रहैए आ अमावाश्याक अन्हारक अन्हार छाड़ने रहैए? सेहो तँ अछिए.! मुदा दुनूमे जहिना अन्हार अछि तहिना इजोतो नहि अछि, से केना नहि कहल जाएत। हँ, एते देखमे जरूर अबैए जे पूर्णिमाक एकटा चान अन्हारकेँ डँसने रहैए आ दोसर अमावश्याक अन्हारकेँ लाखो-करोड़ो तरेगन डँसैले परियासरत रहैए। खाएर जे रहैए ओ प्रकृतिक खेल छी, मुदा जीवनक बीजक तँ से नहि छी, ओकर तँ अपन प्रकृति होइए जे अपन प्रकृतिगत रूपमे चलैत आबि रहल अछि। एकाएक गियानचनक मन ओइ सीमापर पहुँच गेलैन जैठाम बनमानुख अपन दिन-रातिकेँ जोखै-तौलैए। एक सीमा परक दृश्य देखते ज्ञानचनो भूत-भविसकेँ तराजूक दुनू पलड़ापर राखि वर्तमानक डण्डी पकैड़ जोखए लगला कि धक-दे एकटा बिसरल बात मोन पड़लैन। मोन पड़लैन, जहिना रामायण-महाभारत वा कबीरक बीजकक एक-एक पाँतिक एक-एक शब्दकेँ भिन्न-भिन्न रूपमे विभाजित करैत कियो अपन जीवनक पाँतीकेँ पँतियबैए, तहिना अपनो किए ने पँतियाबी। ओना, गियानचनक अखनुक जीवन रोगाह भइये गेलैन अछि, जइसँ मनमे खिन्नता सेहो अपन जगह बना रहल छैन, मुदा उपाइये की? उपाय तँ ओइठाम अछि जैठाम जीवन अछि। जैठाम जीवने नहि रहत तैठाम तँ केहनो अट्टालिका किए ने बनौने रही, मुदा ओ भूताहि भइये जाइए। मानि लिअ, अहाँ दिल्लीमे वा मुम्बइमे नोकरी वा बेपार करै छी जइसँ नीक कमान कमाइ छी, मुदा अखन धरिक जे अपना सभक ग्रामीण परिवारक इतिहास रहल, माने आइसँ बीस-तीस बरख पूर्वक, ओना तइसँ पहिनौंसँ गामक लोक सभ दिल्ली-मुम्बइक अट्टालिका देख नेने छला आ पाइ कमेला पछाइत ओहो ओही अट्टालिकाक प्रवाहमे अपनो रहैक घर शहरोमे बनौलैन आ गामक जे अपन पूर्व-जीवन छेलैन, माने शहर अबैसँ पूर्वक, ओ तँ यएह ने कहलकैन जे गाममे पाँचो प्रतिशत परिवारसँ कम परिवारक घराड़ीपर पजेबाक नाओं लेल गेल अछि। गामक अतीतक दृश्य यएह ने छल जे आजुक परिवेशसँ बहुत दूर छल। गामक जे पूर्व सिनेह छेलैन तइ अनुकूल परदेशी भाय गामोमे रहैक घर बना लेलैन। देखिये रहल छी जे एक दिस मेट्रो ट्रेनक जरूरत अछि तँ दोसर दिस ढेरक-ढेर लोक बैसल-बैसल समय काटि रहल अछि। एक दिस स्कूल-कौलेजमे शिक्षक नहि अछि मुदा तेकरे दोसर दिस परीक्षाक रिजल्ट नीक भऽ रहल अछि। अपन बहैत मनकेँ गियानचन ई कहि बोइस कऽ रोकलैन जे कबीर बाबा बिनु डन्डी-पलड़ाक तराजूपर दुनियाँकेँ जोखि लेलैन आ अपना बुते अपनो जीवनकेँ तौलल नहि हएत.! ..पहाड़ी झड़नाक पानि जकाँ गियानचनक मन पहाड़पर सँ उतरलैन। उतैरते जहिना झड़नाक झहरबकेँ पाथरक कोनो टुकड़ा पहाड़पर सँ खसि रोकिकऽ मुँह घुमा दइए तहिना गियानचनक मुँह घुमि गेलैन। मुदा जीवन तँ जीवन छी.! थर्मामीटरक पारा जकाँ जीवनकेँ हाथसँ पकड़ब कठिन अछिए। लीलाक संग जहिना रासलीला अछि तहिना ने कदमलीला सेहो अछिए.! विचित्र स्थितिक बीच गियानचन अपना मनकेँ थीर करैक कोशिश करए लगला मुदा..। मुदा ई जे अखन तक गियानचन एतबे बुझै छला जे समाजमे बेटा वा पतिक मृत्युक पछाइत जहिना माए वा घरनीकेँ, समाजक दाइ-माइ यएह ने असीरवाद दैत कहै छैथ जे राजा-दैव अहिना होइए, तँए मनकेँ थीर करू। भलेँ असीरवादक माने अर्थ अपने बुझैथ वा नहि। मनकेँ थीर करब बाल-बोधक खेल नइ ने छी, ऐठाम महाभारतक प्रह्लादक बात नहि बुझब जे बालपनेमे मनकेँ थीर कऽ लेलैन। ऐठाम गियानचनक बात चलि रहल अछि। जहिना जीवनक खेल असान अछि तहिना कठिन सेहो अछिए। तहूमे मनक खेलकेँ पकड़ब तँ आरो कठिन अछि। सभ जनिते छी जे ऐ संसारमे दुखसँ जीवन शुरू होइए आ अड़ना साँढ जकाँ मनक थीरता होइत जाइए। दुनियाँ तँ दू भागमे बँटाएल अछिए। एक भाग भेल दुखक दुनियाँ आ दोसर भाग भेल सुखक दुनियाँ। कबीर बाबा भनेँ ने कहने छैथ जे दो पाटन के बीच मे, बाँकी बचे ने कोइ। खाएर कबीर बाबाक अपन दिन छेलैन आ अपन दुनियाँ छेलैन मुदा गियानचनक तँ से नहि छैन। जे छैन सएह ने देखता। यहए ने देखता जे जहिना दुखोक डरे मन थरथरेने अथीर भइये जाइए, तहिना सुखोक जे मन होइए ओहूमे घब-घबी धैये लइए। ओल आकि अरिकंचन जकाँ पातो आ फलोमे कब-कबी आबिये जाइए जइसँ मन थिर होइत-होइत असथिर भइये जाइए। यएह तँ छी मन, जे अपन तीन तरहक खाना बनेने अछि, सुखक मन, दुखक मन आ दुनूक बीचक सु-दुखक मन। एकाएक गियानचनक मनक किछु कुहेस छँटलैन। छँटिते दुनियेँ जकाँ अपन जीवनकेँ ध्रुवीकरण केलैन। जहिना भूगोलक भाषामे उत्तरी ध्रुव आ दच्छिनी ध्रुव अछि, जैठाम छअ मासक दिन आ छअ मासक राति होइए, तहिना ने जीवनोमे अन्हार-इजोत दुनू अछि। जैठाम छअ मासक राति हएत तैठाम कि अखुनका जकाँ लोक बिजलीक इजोतमे रातिकेँ दिन बना जीवन लीला करत आकि कुम्भकर्ण जकाँ सुतबे करत। दुनियाँक ध्रुवीकरण नहि, अपने जीवनक ध्रुवीकरण करैत ने विद्यापति कलैप-कलैप कहलैन, 'आध जनम हम नीन गमाओल.!' ..एक तँ आधा जीवन ओहिना चलि जाइए। बाँकी जे बँचल आधा अछि तइमे अपन शरीर क्रियाक संग जीवन-धर्मोक क्रिया तँ करबे अछि, तइले समाइये केते बँचैए.! जिनगीक खेलसँ, माने परेशानीसँ गियानचनक मन भीतरे-भीतर अकछए लगलैन। ऐठाम ई नहि बुझब जे, जे दुनियाँ प्रिय धार बहबैक शक्ति अपना पेटमे रखने अछि, तइ दुनियासँ लोक थोड़े विरक्त हुअ चाहैए। ओ तँ महाजन जखन सूदक-सूद आ मूड़-मूड़क हिसाबक बेवहार जीवनमे आबि व्यक्त करैए तखन ने ऐ दुनियासँ लोककेँ अकच्छ लगैए। जइसँ मूसेक दबाइ खा वा गरदैनमे फँसरी लगा दुनियाँसँ अपनाकेँ मेटैबते अछि। कहब जे मूसक दबाइ तँ पुरान भऽ गेल, तहिना फँसरी लगाएब सेहो पुरान भऽ गेल, आब तँ एहेन बिजली आबि गेल अछि जे तुलसी बाबाक रामायणिक पाँती, मरैकाल बहुत भारी दुख होइए, माने प्राणान्त होइकालक दुख, सेहो बदलैले कहबे करै छैन। भाय! जीवन छी ने। वनमे जखन सीताक हरण भऽ गेलैन तखन राम जहिना गाछ-बिरीछकेँ पुछि-पुछि सीताक भाँज लगबए चाहलैन तहिना ने जीवनो छी। मृत्यु अमृतकेँ पुछि-पुछि पुछियाबए पड़ैए। सघन जीवनक वनमे जहिना जीवनकेँ तकैले निच्चाँमे उतरए पड़ैए, माने मूल लग जाए पड़ैए, नइ तँ पतालक पानि जकाँ ऊपरका-नीचला लेयरक पानिक गुण बुझबे ने करब, तहिना ने जीवनोक ताक ताकए पड़ैए। अयोध्यासँ निकलला पछातिये, माने जखन राम पँचवटी पहुँचला तखन, रामकेँ ढेरो लोकसँ भेँट भेलैन, मुदा ओइ ढेरीमे किछु गनले-गूथल ने मित्र बनलैन, बाँकी तँ ओहिना ने वनमे घुमैत रहि गेला। तहिना ने जीवनो अछि। हाट-बाजार वा मेला-ठेलामे लाखो लोकक भीड़ रहैए मुदा तइमे सर-सम्बन्धी वा हित-मीतक संख्या कम रहिते अछि, ओही कमक सम्बन्ध ने जीवनक धार टपबैए। ऐठाम हम ई नहि कहै छी जे आजुक एहेन परिवेश बनि गेल अछि जइमे ने उपार्जनेक ठेकान अछि आ ने उपभोगेक। दुनू बेठेकान जकाँ भऽ गेल अछि। जीवनक जे आधार अछि ओकरा जाबे नहि ठेकनाएब ताबे जीवनकेँ ठाढ़ केना करब। जखन मनुक्खक रूपमे दुनियाँमे छी तखन जँ दुनियोँ आ अपनो ठेकान पेब लेब तखने ने दुनियाँक संग पएर-मे-पएर, माने गति-मे-गति मिला दुनियाँक धारक धारामे प्रवाहित होइत समुद्र पहुँचब। खाएर जे अछि, तइ सभसँ गियानचनकेँ कोन मतलब छैन। मतलब एतबे छैन जे समग्र रूपक जिनगी केना बनाकऽ सामाजिक रूपमे जीवन धारण केने रहता। बजैक क्रममे सभ बजिते छी जे फल्लाँसँ उपकार भेल आ फल्लाँकेँ उपकार केलिऐ, एहेन विचार एकांकी जीवनक छी, मुदा जखन समग्र रूपमे अपनाकेँ ढालि चलब तखन यएह विचार उपकारक जगह अपन दायित्व भऽ जाइए। अपना समाजमे सभ बुझिये रहला अछि जे कोइ करे आप ले माए ले ने बाप ले। ..तखन जँ ई बुझबै जे हम माता-पिताक सेवा केलौं, तँ अपन दायित्व  की भेल? जहिना पोखैर वा तालावमे देखल कोनो माछकेँ पकड़ैले बेर-बेर मछवाह जाल फेकैए तहिना ने जीवनोक मूल तत्त्व पकड़ैले कर्मक जालकेँ बेर-बेर फेकए पड़ैए। तहूमे ओइठाम जैठाम मटियार माटिक रस्ता अछि, जेकर दुनू पीठ पीछराह होइते अछि। पीछराहो की एक्के रंग होइए। पानिमे भीजल माटिक पीच्छर सेहो होइए आ बिनु पानिक माने रौदमे सुखल पीछराह सेहो होइते अछि। तैठाम तँ जीवन जीवाइन हेबे करत किने। अन्हार-इजोतक बीच खेलेनिहार मनुक्ख तँ छथिए। मानि लिअ जे हम कोनो काज निर्धारित केलौं, समय, परिवेश इत्यादि अनेको सोझामे अछिए, तइसँ जँ कम केलौं, तइयो गलत भेल आ जँ बेसियो केलौं तँ ओ की भेल, ओहो ने गलत्ते भेल। एक-एक क्षण विष अमृतक संग चलैत रहैए। तइले अपन विष-अमृतकेँ चिन्ह चलबे ने जीवन पएब भेल। बजैक क्रममे सभ बजिते छी जे मनुक्खकेँ जीवनक स्वतंत्रता हेबा चाही, मुदा अधिकार आ कर्तव्यकेँ कातमे राखि कऽ नइ ने हएत? जहिना स्वतंत्र जीवन निर्गुण  अछि तहिना ने ओकर अपन सीमा सेहो अधिकार-कर्तव्यक बीच अछि। ऐठाम ईहो विचार बीचमे अछिए जे एक उपकार भेल अगुरवार, माने जिनकर कोनो उपकार ऊपरमे नहि अछि, तिनकर उपकार, दोसर अछि जीवनमे उधार उपकारक कर्ज। माने भेल जे जहिना जीवनक एक पलड़ा भेल जन्म आ दोसर भेल मृत्यु, तइ दुनूक बीच ने सभ छी, जे माए-बाप जन्मक पछाइत बच्चाकेँ धरतीपर ठाढ़ करै छैथ, ओते कएल काजक, ऐठाम सेवा नहि, दायित्वक दायित्व बेटा-बेटीक कपारपर चढ़िये जाइ छैन, जेकरा दायित्वपूर्ण उधार उपकार कहि-बुझि सकै छी। तहूमे एहेन दायित्व जे ने बिसरल जा सकैए आ ने छोड़ल जा सकैए। तैठाम जँ बेटा-बेटी माए-बापकेँ कहैथ जे अहाँ की केलौं, दुखद भेबे कएल। ऐठाम एकटा बात आरो अछि। ओ अछि जे दुखक सेहो सीमा नहियेँ अछि। तन-मन-धन-जन, केते कहब, असीम दुखक सीमान अछि। तैठाम दोसर बात सेहो अछिए। भलेँ ओ विपरीते किए ने हुअए मुदा अछि तँ जरूरे। की ओहन माए-बापकेँ ई नहि पुछल जानि जे जखन बेटाकेँ बेचि  नेने छी, तखन अहाँकेँ ओइ बेटा-पुतोहुपर कोन अधिकार बँचल अछि? जे मुँह उठा बेटा-पुतोहु दिस देखब। खाएर जे अछि, बुझले बात अछि जे जहिना समुद्र अछि तहिना समाजो अछिए। नीक-बेजा होइते रहैए। नीक-बेजाइक माने भेल, एकटा नीक एकटा बेजाए , मुदा एहनो नीक अछिए जे जगह आ समय पेब अधला बनि जाइए आ एहनो बेजा अछिए जे समय पेब नीक बनि जाइए। ऐठाम तँ वेदक मंत्र देखए पड़त किने, 'गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण वर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्।' जुड़शीतल पावनिक पोखरिक पानि जकाँ जीवन थहाएलो आ बलुआएलो तँ अछिए। जहिना एकटा धुरियाएल अछि तहिना दोसर सुढ़ियाएल सेहो अछिए। एहने फेड़मे पड़ि ने गियानचन ओझरा गेल छैथ। बेवश-बेकाबू भेल मन जेठक रौदियाएल हाथी जकाँ चितकार मनमे मारिये रहल छेलैन। एकाएक दरबज्जापर सँ उठि गियानचन अपन बाल मित्र- सुमतिलाल ऐठाम विदा भेला। मन तेते चितैर गेल छेलैन जे रस्ता, माने अपना ऐठामसँ सुमतिलालक घरक बीचक बाट, केना कटलैन से अपने बुझबे ने केलाह। मन असथिर रहितैन तखन ने बुझितैथ जे रस्ता अपना कटैए आकि अपने रस्ताकेँ काटै छी। उद्गिन देख सुमतिलाल फरिक्केसँ बुझि गेला जे गियानचन समयक कोनो फेड़मे पड़ल अछि। अखनुक दरबज्जाक चर्च नहि करै छी, पूर्वक मिथिलाक चर्च करै छी, समाजमे किछुए परिवार एहेन छला जिनका अपन परिवारसँ बेसी सुतै-बैसैक जगह दरबज्जाक रूपमे छेलैन। जेना-जेना पाछू उनैट देखब तेना-तेना पछुआएल स्थिति नजैरिक सोझमे औत। आइये नहि सभ दिनसँ अपना ऐठाम दरबज्जाक महत्व रहल अछि। परिचित-अ-परिचित सबहक लेल सार्वजनिक स्थल बना पूर्वज अपन मर्यादा बनौने छलाहे। मुँह देख मुँगबा बँटैक कला छेलैन्हे। भुखल-दुखल वा रूखल-सुखल सभकेँ मुँगबा खुआ मुँह मिठा दरबज्जापर समय बितैबते छला। अखुनका चर्च नहि करै छी, जे गज-फीतासँ घराड़ियो नापल जाइए आ धरती-सँ-अकास धरिक बिकरी सेहो हुअ लगल अछि। मुदा तहू बीच की ओहन लोक नहि छैथ जिनका अप्पन घराड़ी नइ रहने इन्दिरो आवास नहि भेटै छैन? गरीबक सेवा तँ भइये रहल अछि, मुदा भीखमंगाक संख्या सेहो बढ़ि रहल अछि, ईहो ने देखब। जैठाम भीखमंगाक पेट नहि भरल अछि तैठाम सम्पन्नता की भेल। सुमतिलालमे एते होश छेलैन्हे जे जहिना चेहरा देख केकरो जीवन आँकि लइ छैथ तहिना मुँह देख जीवन-चरित्रक बोध सेहो भइये जाइ छैन। उदिग्न चेहरा देख सुमतिलाल गियानचनकेँ कहलैन- "आबह-आबह गियान। केतए हेराएल रहै छह।" सुमतिलालक विचार सुनि गियानचनक मनमे उठलैन जे जँ पहिने अपन मनोदशा कहबैन तँ ओ धड़फड़ा कऽ बाजब हएत। तँए पहिने किए ने अपन मनक विचार नहि कहि विचारक चौहद्दीए बान्हि ली। गियानचन बजला- "भाय साहैब, लोक तँ ओतए हेराइए जेतए अगम-अथाह समुद्र जकाँ जीवन देखैए मुदा जैठाम दुनियेँ हेरा गेल अछि तैठाम लोकक हेराएब केना भेल।" गियानचनक विचार सुनि सुमतिलाल बुझि गेला जे, जे गियानचन दुनियाँकेँ हेराएबक चर्च कऽ रहल अछि ओ अपने नहि हेराएल अछि, मन केतौ लसकामे लसैक गेल छइ। अपन विचार उठबैत सुमतिलाल बजला- "गियानचन, तेहेन समय आबि गेल अछि जे मन सदिकाल रेजानिस-रेजानिस रहैए। कखनो एक घन्टा बैस दोसरो-तेसरक जीवन-यापनक विचार करब से पलखैतिये ने होइए।" अपना जनैत सुमतिलाल सभ बात बाजि गेला मुदा गियानचनक उदिग्न मन रहने नीक जकाँ बुझबे ने केलकैन। गियानचन बजला- "सुमति भाय, भरि दिन औनैनी-बिलौनी धेने रहैए। केतबो मनकेँ जाँति कऽ राखए चाहै छी, से रहबे ने करैए।" गियानचनक भाव भूमि सुमतिलाल आँकि लेलैन, मुदा ठोह फाड़ि कहैसँ परहेज करैत बजला- "गियानचन, मन कि जाँतिकऽ रहैबला छी, उ तँ एहेन भूत छी जेकरा काजमे  जखन बान्हिकऽ राखल जाएत तखने जाँतिकऽ रहि सकैए, नहि तँ औनेबो-वौएबो करत।" सुमतिलालक विचारक शब्द सुनि गियानचन भावुक भऽ गेला मुदा शब्दक भीतर जे मर्म अछि से बुझबे ने केलैन। विह्वल होइत पुछलखिन- "से केना भाय साहैब?" गियानचनक विह्वलता देख सुमतिलालक मन विचार देलकैन माने सुमतिलालकेँ कहलकैन, खिस्सा-पिहानीसँ लोक बेसी बुझैए आ सोझे शब्दवाणसँ कम बुझैए। कथा-पिहानीमे ई शक्ति केना अबैए, से अखन नहि, अखन बस एतबे जे शब्द-शक्ति जेते मृत्युवान अछि तइसँ कम कथाशक्ति अछि। सुमतिलाल बजला- "एकटा खिस्सा सुनबै छिअ, गियानचन। एकटा ऋषि रहैथ, अपन सम्बन्ध दुनियासँ हटा अपनाकेँ अपनेमे समेट नेने छला तँए असगरे रहैथ।" बिच्चेमे गियानचन बजला- "पत्नियोँ ने रहैन?" सुमतिलाल बजला- "कियो ने रहैन। संयोगसँ एकटा भूत आबि उपद्रव करए लगलैन। कहियो कॉपीक पन्ना उलटा कऽ राखि दैन तँ कहियो किताबक जगहे बदैल कऽ राखि दैन। तंग होइत ओ ऋषि भूतकेँ कहलखिन, तूँ एना किए करै छह? तैपर ओ भूत कहलकैन, हमरा संच-मंच बैसल नीक नइ लगैए। तँए उपद्रव करै छी। ऋषि कहलखिन, बस तहीले। हाथक इशारासँ आगूमे ठाढ़ भेल आमक गाछकेँ देखबैत ऋषि कहलखिन, ऐ गाछपर सदिकाल चढ़ैत-उतरैत रहह। भूत सएह करए लगल। तइसँ ऋषि चैन भऽ गेला।" सुमतिलालक सभ बात गियानचन नहि बुझि सकला मुदा एते तँ बुझबे केलाह जे भरि मन काज जखन केकरो भेट जाइए तखन अनायासे ने जीवन पाबि जाइए। गियानचन बजला- "भाय साहैब, अखन जाइ छी। फेर कहियो..।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा कथा ३ आएल आशा चलि गेल सुर्जग्रहण वा चन्द्रग्रहण छुटला पछाइत जहिना लोक नदी, सरोवर वा पोखैरमे नहाइले धरोहि लागि जाइ छैथ तहिना रूद्रपुर गाममे रामेश्वरमक दर्शन करैक विचार समाजक लोकमे जगलैन। जिनका अपना हाथमे बटखर्चा  रहैन से तँ निचेने रहला मुदा जिनका अपना हाथ-मुट्ठीमे पाइ नहि रहैन ओ ऋण-पैंच ताकए दोसरा-तेसराक घरपर जाए-आबए लगला, जइसँ रामेश्वरम जेबाक जिज्ञासा अधिकांश लोकक मनमे जगलैन। मोतीलाल सेहो मने-मन विचार कऽ लेला जे जखन समाजक अधिकांश लोक एकमुहरी भऽ रामेश्वरम जाइले तैयार भेला अछि तखन अपनो किए ने जाएब। असकर-दुसकरमे ने कोनो नव प्रश्न उठने मनमे अधिक विचार जगैए मुदा समूहमे तँ से नहि होइए। भेड़िया-धसान लोक भइये जाइ छैथ। जहिना अपन-अपन विचारक कान्हीनुकूल लोक केतौ बाहर जेबाकाल संगी ताकए लगै छैथ तहिना मोतीलाल अपन विचारी संगी ताकैले हीरालाल ऐठाम विदा भेला। ओना, हीरालाल आ मोतीलालक उमेरमे दस सालक तरपट छैन, मुदा एकविचारी रहने एकउमेरिया भाए-भैयारी जकाँ दुनूक बीच सम्बन्ध बनियेँ गेल छैन। हीरालालक उमेर साइठ बरख टपि एकसठममे चलि रहल छैन आ मोतीलालक एकावनमक अन्तिममे जा रहल छैन। दरबज्जापर बैसल हीरालाल सेहो गाम-समाजकेँ देख मने-मन विचारि रहल छला जे आएल आशा चलि गेल.! चालीस बरख पूर्वे मनमे रोपाएल छल जे परिवारसँ निचेन होइते, माने परिवारक जवाबदेहीक काजसँ निचेन भेला पछाइत चारू धामक दर्शन करि कऽ शरीर तियाग करब, मुदा से मनेमे रहि गेल। मने-मन हीरालाल सोचिये रहल छला कि तइ बिच्चेमे मोतीलाल लगमे आबि टोकलकैन- "भाय, अहींकेँ कहैले एलौं हेन जे गामक लोक उनैट कऽ रामेश्वरम जा रहल अछि, अपनो दुनू भाँइ चलू।" मोतीलालक विचार सुनि हीरालाल मने-मन विचार करए लगला जे जखन मोतीलाल दरबज्जापर आबि कहि रहल अछि तखन की कहिऐ? जँ 'नइ जाएब' कहबै तँ पुछबे करत जे 'किए ने जाएब?' आ जँ 'हँ' कहबै तँ अनेरे पैंच-उधारक पेंचमे पड़ि जाएब.! हीरालालकेँ चुप देख मोतीलाल दोहरा कऽ पुछलकैन- "भाय, किछु बजलौं नहि?" हीरालाल बजला- "मोतीलाल, मनमे अपनो विचार छल जे जखन परिवारसँ निचेन हएब तँ चारूधामक तीर्थ जरूर करब, मुदा..।" मोतीलाल बजला- "की मुदा, भाय?" अपन मनक दाबल विचारकेँ खोलैत हीरालाल बजला- "मोती, एक तँ ओहुना केकरो लग झूठ नहि बजै छी, तूँ तँ सहजे छोट भाए सदृश छह, तोरे केना झूठ कहबह।" मोतीलाल पुछलकैन- "से की भाय?" हीरालाल बजला- "आइ ने देखै छहक जे समाजक अधिकांश लोक एकमुहरी भऽ रामेश्वरमक दर्शन करैक विचार केलैन अछि मुदा अपना मनमे आइसँ चालीस बरख पूर्वे रोपि नेने रही जे अखन परिवारकेँ सम्हारि असथिर करब जीवनक सभसँ महत्वपूर्ण काज अछि। जखन परिवार असथिर भऽ चैनसँ चलए लगत तखन तीर्थ-वर्त करब।" ओना, हीरालाल अपन पेटक सभ विचार बाजि गेला मुदा मोतीलाल से बुझबे ने केलैन। बजला- "भाय, नीक जकाँ नहि बुझि पेलौं?" हीरालाल बजला- "मोती, आइसँ चालीस बरख पूर्व, जहिया अपन दुरागमन भेल आ पत्नी घर एली, तही दिनक विचार छी। जाबे तक दुरागमन नहि भेल छल आ माए-बाबू सेहो जीबै छला ताबे तक हुनके परिवार बुझै छेलिऐन। मुदा जखन दुरागमन भेल आ पत्नी घर एली तखन परिवारक बीच नव परिवारक उदय ओहिना भेल जहिना बाँस, खरही वा केराक बीटमे नव गाछक जन्म भेने होइए।" अपना जनैत हीरालाल अपन जीवनक सत्यवृत्तिकेँ मोतीलालक सोझामे रखलैन, मुदा समाजक बीच जे अखन तकक वैचारिक परिवेश रहल अछि ओ तँ यएह ने रहल अछि जे जाबे तक परिवारमे माता-पिता जीबैत रहै छैथ ताबे तक पत्नीक कोन बात जे धियो-पुतो भेला पछातियो लोक अपन परिवार नहि बुझि माते-पिताक परिवार बुझै छैथ, तहिना मोतीलाल सेहो बुझलैन। तँए परिवारक बीच नव परिवारक सृजन केना होइए तइ दिस मोतीलालक नजैर गेबे ने केलैन। बजला- "भाय, एहेन कि अहींटाकेँ भेल अछि आकि सभकेँ होइए।" मोतीलालकेँ अपन विचारानुकूल बनबैक खियालसँ हीरालाल बजला। जहिना कोनो रचनाकार वा संगीतकार अपन पैछला विचार वा धुन (लय) केँ ऐगला विचार वा लयकेँ जोड़ैकाल विचारवद्ध वा लयवद्ध होइ छैथ तहिना हीरालाल मोतीलालक विचारकेँ विचारवद्ध करैत बजला- "मोती! तोहींटा नहि, अपनो देखबो करै छी आ बुझितो तँ छीहे जे माता-पिताक अमलदारीमे परिवारक जवाबदेह बेटा नहि माइये-बाप होइ छैथ, मुदा जखन परिवारक सृजन होइए, माने पति-पत्नीक गठन होइए, तखन तँ बेटो जवाबदेह बनियेँ जाइए किने।" अपना जनैत हीरालाल परिवार-सृजनक पहिल सूत्र बाजल छला, मुदा से सूत्र मोतीलालक मनमे घर करबे ने केलकैन। सरपट चालिक दौड़ दौड़ैत मोतीलाल पुन: अपनहि धुनिमे बजला- "भाय, एहेन कि अहींटाकेँ भेल अछि आकि सभकेँ होइ छै।" मोतीलालक विचारकेँ अधडरेरपर सँ काटैत नहि बल्कि लवान करैत, माने मोड़ैत, हीरालाल बजला- "हँ, से तँ सभकेँ होइए.! मुदा बेकती-बेकतीक विचारमे सेहो अन्तर होइते अछि। जेकर जेहेन विचार रहल से तेहेन बुझबो करैए आ ओहने जीवनो बनैबते अछि।" ओना, मोतीलालक मनमे रामेश्वरम जेबाक विचार नाचिये रहल छेलैन कि बिच्चेमे हीरालाल अपन जीवनक विचारक चर्च शुरू कऽ देलैन। मुदा से मोतीलालक मनकेँ नीक जकाँ छुबिये ने रहल छेलैन, जइसँ उखड़ल-उखड़ल सन मन मोतीलालक छेलैन्हे। अपन विचारकेँ पुन: अगुअबैत मोतीलाल बजला- "भाय.! परिवार छी ने, ने दूटा परिवार एकरंग होइए आ ने बिना दू-परिवारकेँ एकसंग चलने कल्याणे होइए।" हीरालाल बजला- "हँ से तँ नहियेँ होइए।" हीरालालक विचारक सह पेबिते मोतीलाल बजला- "अही दुआरे ने एलौं हेन। जखन आनो-आनो परिवारक संग तीर्थ-वर्त करैत चलब तखने ने एक-दोसरमे जीवनक संकल्प-सूत्र सेहो मजगूत होइत जाएत आ एक-दोसरपर बिसवास सेहो बढ़ैत चलत।" हीरालाल बजला- "हँ, से तँ होइते अछि।" हीरालालक विचारक सह देख मोतीलाल बजला- "भाय, लग-पासक स्थान (धर्मस्थान) मे लोक असगरो-दुसगर जाइ-अबैए, मुदा रामेश्वरम तँ से नहि छी। देशक दच्छिनवरिया छोरपर स्थापित अछि, जैठाम पहुँचैले हजारो किलोमीटरक रास्ता तय करए पड़ैए।" हीरालाल बजला- "हँ, से तँ तय करैये पड़ैए।" 'करैये पड़ैए' सुनिते जहिना साधारणो हवाक सिहकी पेब गाछसँ पाकल आम धब-धब खसैए तहिना मोतीलालक पेटक विचार धब-दे खसलैन- "भाय, लग-पासक धर्मस्थानो ओहने होइए जेहेन नीक-सँ-नीक विचार बेकतीगत होइए, मुदा दूरक स्थानो तँ ओहन होइते अछि जेहेन समूहक बीच सामूहिक काज होइए।" हीरालाल बजला- "हँ, से तँ होइते अछि।" हीरालालक सहीट विचार सुनि मोतीलाल बजला- "भाय, जेतए जे होइए से तेतए होउ। जानए जअ आ जानए जत्ता। मुदा अपना दुनू भैयारीमे से नहि अछि, जहिना एक-दोसरक सुख-दुखकेँ दुनू भाँइ एक बुझै छी तहिना ने जीवन-यात्रामे सेहो एकसंग रहबे करब। एकरंग परिवार रहने जहिना अहाँक परिवार अछि तहिना ने अपनो अछि। तँए जँ कोनो नीक-बेजाए काजक यात्रा रहत तँ दुनू भाँइ विचारिये कऽ ने करब।" हीरालाल बजला- "एकरा के काटत।" अपन अकाट्य विचार सुनि मोतीलालक मन दहैल गेलैन। बजला- "भाय, जखन समाजक अधिकांश लोक एकमुहरी भऽ तीर्थ करए जा रहला अछि तखन अपनो दुनू भाँइ किए ने चली।" मोतीलालक विचार सुनि हीरालाल बजला- "समाजक लोक तँ लोके छैथ, सदिकाल भेड़िया-धसानक बाट पकैड़ चलिते छैथ। मुदा अपनो सभ जँ ओहिना चलब तखन भेड़िया-धसान लोकसँ अन्तरे की भेल। अपन बीतल दिनक विचार पहिने सुनि लएह, पछाइत विचारकेँ सूहकारि आगूक विचार करब।" मोतीलाल बजला- "भाय, काज छोड़ि माने परिवारक काज, मात्र देवस्थानक विचार करए आएल छेलौं तँए समय कम अछि, अगुताएल छी।" हीरालाल बजला- "बेसी नहि मात्र एक्केटा विचार अछि, लगले कहि दइ छिअ।" हीरालालक विचार सुनि मोतीलाल चुपे रहला, मुदा नजैर उठा हीरालालक नजैरपर जरूर देलैन। हीरालाल बजला- "रामेश्वरमेटा नहि, देशक चारू धाम रामेश्वरम, जगरनाथ, द्वारिका आ अमरनाथ क दर्शन करबक विचार अपनो मनमे रोपने छेलौं, मुदा धीरे-धीरे बाल-बच्चा भेने सेहो आ माता-पिताक आयु बढ़ने सेहो, परिवारक भारक बोझ बढ़िते गेल, जइसँ चारूधामक दर्शनक विचार तर पड़ैत गेल। अखन तक देखते छहक, माता-पिताक पार लगबैत दूटा बेटोकेँ पढ़ेलौं-लिखेलौं, बिआह-दान केलौं आ चारिटा बेटीक बिआह-दान सेहो करबे केलौं।" 'चारिटा बेटीक बिआह-दान' सुनि मोतीलालक नजैर अप्पन दुनू बेटीपर पड़लैन। बजला- "भाय, तेहेन दुरुह परिवेश समाज बना लेलैन अछि जे गंगो असनानसँ भारी बेटीक बिआह-दान भऽ गेल अछि।" भारी-सँ-भारी काज किए ने हुअए, जेकरा करैकाल कठिन-सँ-कठिन परिस्थितिक सामना किए ने करए पड़ए, मुदा काज भेला पछाइत मन जहिना समगम भऽ जाइए तहिना हीरालालकेँ भऽ गेल छेलैन, मुदा मोतीलालकेँ तँ से नहि भेल छेलैन तँए नजैर निच्चाँ खसि रहल छेलैन, जेकरा देख-सुनि बोल-भरोस दैत हीरालाल बजला- "मोतीलाल, पारिवारिक जीवन जँ शान्त-चित्तसँ निमाहि ली, तँ ओ गंगोअसनानसँ पैघ काज भेबे कएल किने।" हीरालालक विचारक वाण जेना मोतीलालक हृदयकेँ छेद देलकैन तहिना तिलमिलाइत बजला- "भाय, परिवारक विचार छोड़ू। जइ काजे आएल छी तैपर विचार करू।" हीरालाल बजला- "मोती, अखन अपने साइठ बरख टपि एकसठममे प्रवेश केलौं अछि। तैबीच मातो-पिताक पार-घार लगेलौं आ बेटा-बेटीक सेहो पार-घाट लगेबे केलौं। जइसँ परिवारक भारसँ मुक्त भइये गेल छी, तँए आब अपनो मनमे अछि जे शेष जिनगी किए ने धर्म-कर्ममे बिताबी, मुदा..?" 'मुदा' सुनिकऽ तँ नहि मुदा हीरालालक जीवन देख मोतीलाल बजला- "भाय, अहाँक जीवनक हिसाबे अपने बीच मझधारमे पड़ल छीहे, तैठाम रामेश्वरमक दर्शन करब जरूरी आकि बेटीक बिआह-दान पार लगाएब?" मोतीलालक विचार सुनि हीरालाल बुझि गेला जे जइ मने मोतीलाल आएल छल से आब आगू-पाछू हुअ लगलै। हीरालाल बजला- "मोती, सभ दिन मनमे छल जे चारूधामक यात्रा करी मुदा दूरक यात्रा रहने बेसी ओरियानो-बातक खगता छऽले। एक तँ ट्रेनक सफर हएत जइमे समैयक संग खर्चो-बर्च हेबे करैत। मुदा जखन साइठ बर्खक उम्रसँ बेसीबलाकेँ गाड़ीक भाड़ामे सुविधा भेटल तखन मन आरो हलैस गेल जे परिवारक निमरजना भेला पछाइत चारू धामक दर्शन सेहो हेबे करत। मुदा गाड़ीक भाड़ामे जेतेक छूट भेल तइसँ बेसी बढ़िये गेल, माने सुविधा समाप्त भऽ गेल, आब नइ जा सकब। ओना तीर्थ-वर्तक नामपर पैंच-पालट सेहो समाजमे भेटते अछि, मुदा जखन कर्जे लऽ कर्ज चुकाएब तखन कर्जासँ छुटकारा केना भेटत।" मोतीलाल बजला- "हँ, से तँ नहियेँ भेटत।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा कथा ४ जीवन दान दरबज्जाक आगूक भालसरी फूलक गाछक निच्चाँमे बैसल सुमन्त भाय, अपन जीवन देख रहल छैथ। सात दिनसँ सोगाएल सुमन्त भायकेँ कोनो बाट नहि सुझि रहल छैन। सात दिन पूर्व एहेन भुमकम भेल छल जइमे सुमन्त भाइक तीनू घर खसि पड़लैन, यएह सोगक कारण छिऐन। दरबज्जाक आगूक चापाकलक पाइप बालुसँ तेना भरि गेलैन जे पानि देब बन्न भऽ गेल छेलैन। घर खसने बरद-महींस मरि गेलैन। एक दिस सुमन्त भाय जीवनक अन्त देख रहल छैथ तँ दोसर-दिस धरतीपर बैसल एकटा प्राणप्रिय मनुक्ख सेहो सोझहेमे रहैन। रहि-रहि कऽ सात दिनक बीच सतरहटा सँ बेसी छोट-छोट भुमकम भेल, ओना तइसँ जान-मालक कोनो क्षति गाममे नहि भेल मुदा धरती तँ डोलबे कएल। सोगाएल मन रहने सुमन्त भाइक आँखिक आगू शोकसँ भरल दुनियाँ पसरल छेलैन कि तइ बिच्चेमे टुटल मने पत्नी आबि पुछलकैन- "आब की करब?" पत्नीक प्रश्न सुनि सुमन्त भाय धड़फड़मे किछु उत्तर दइसँ अपनाकेँ परहेज केलैन। परहेज करैक कारण भेलैन जे देखते छी जे एहेन चलैन गाम-समाजमे बनले अछि जे कियो पुछता, भाय की हाल-चाल? तँ मुहेँ लागल दोसरक उत्तर भेटै छैन जे 'सब ठीके-ठाक अछि।' की जीवन खेल छी जे एते असानीसँ ठीक-ठाक भऽ जाएत? ठीक होइमे की सभ करए पड़ैए से तँ ठीक भेलहा जनै छैथ, जे केना केते जीवन केना ठीक भेल...। मने-मन सुमन्त भाय मन-मथनो करै छला आ पत्नीकेँ ऊपर-सँ-निच्चाँ, माने माथसँ पएर लग तक आ निच्चाँसँ ऊपर, नख-सिख कहियौ आकि सिख-नख तक, नजैर सेहो खिरा रहल छला। मरैत मन सुमन्त भायकेँ अपने पत्नी-दे उपैक कहलकैन- 'आब ओ नइ जीती। एक दिस तँ बनल-बनाएल जीवन संसार नष्ट भऽ गेलैन आ दोसर-दिस शरीरमे आब ओ शक्ति नहि रहलैन जे पुन: पहिलुके जकाँ बना पौती।' एक दिस सुमन्त भाइक मनमे बिआहक परात भने जे सासु आसिरवाद दैत कहने छेलैन, 'बाउ, दुनूक जीवन जुड़ि रहल अछि। अहिना, जाधैर आँखि तकैत रहब ताधैर जुड़ल राखब।' उठलैन, तँ दोसर-दिस ईहो उठबे केलैन जे अखन जइ स्थितिमे पहुँच गेल छी, पुन: ओइ दुनियाँक आशा तोड़ि नव रूपमे अपन जीवनक नव दुनियाँ बनबए पड़त। पत्नी तँ पत्नी भेली, जीवनक सभसँ लगक संगी, तैठाम जँ प्रिय वा जनप्रिय विचारसँ संचालित नइ हएब, तखन तँ ओहने हएत जेहेन कियो साधक सितारपर अपन साधनाक स्वर साधि रहला अछि आ बगलक लोहार घनसँ नहाईपर नमहर चोट कऽ रहला अछि। मुस्कुराइत सुमन्त भाय बजला- "करैले ते ई दुनियाँ पड़ल अछि, तखन तँ.?" 'तखन तँ' कहि सुमन्त भाय ऐ दुआरे चुप भऽ गेला जे कम-सँ-कम पत्नियोँ तँ किछु अप्पन विचार रखबे करती। हुनको लेल तँ नमहर संसार छैन्हे। अपने आँखिये ओहनो तँ देखबे करै छैथ जे केकरो कमाइबला जवान बेटा मरि जाइए, तैयो छाती सक्कत करबे करैए तँ कोनो बाल-बोधक माए-बाप मरि जाइए तँ फेर ओ केना जीबैए..! मुदा से विचार सविता भौजीक मनमे जगबे ने केलैन। एक तँ ओहुना कम पढ़ल-लिखल लोक बेसी बिसरै छैथ, माने बिसराह होइ छैथ आ अधिक पढ़ल-लिखल लोक कम बिसरबो करै छैथ आ बिसराहो तँ होइते छैथ। सविता भौजी तँ सहजे विद्यालय-महाविद्यालय जेबासँ सोल्होअना बेमाक रहली। मुदा तैयो सविता भौजीक मनमे जीवनक प्रति एते तँ सिनेह छेलैन्हे जे कहुना-ने-कहुना, किछु दिन आरो देख ली। पचपन-साठि बर्खक अवस्था दुनू संगीक भइये गेल अछि। जँ अपनो औरुदासँ मरब तँ पाँच-दस बरख आरो सएह ने जीब। सघन धुनि लगल जकाँ सविता भौजीक मनमे कोनो एहेन विचार उठिये ने रहल छेलैन जे जहिना धुनिमे अन्हार रहितो किछु पृथ्वीपुत्र तँ एहेन छथिये जे ओकरा  अन्हरियाक अन्हार नहि बुझि, दिने जकाँ कर्मभूमिमे मगन भेल कर्मयोग मिलैबते छैथ। भलेँ हुनका मनमे एहेन आएल होनि वा नहि आएल होनि जे हजार बरख पाछू माने अतीत कहियौ आकि भूत, आ हजार बरख आगू माने भविस कहियौ कि सपना, दुनूक बीच तँ आजुक जोड़ अछिए। मुदा आजुक जोड़ तँ आजुक कर्मेसँ माने काजेसँ जोड़ैत आजुक अन्तिम सीमापर पहुँचा, काल्हिक कर्म काल्हिले सेहो छोड़िते अछि। अही क्रममे ने मानव समयक संग प्रकृतस्थ भऽ जीवन धारण करै छैथ। एक दिस सविता भौजीक मन शोकसँ व्याकुल छैन तँ दोसर-दिस सुमन्त भाइक मन कबीरबाबाक संग-संग मिथिलाक गामे-गाम घुमि-घुमि गाबि रहल छेलैन जे 'दो पाटन के बीचमे बाँकी बँचए ने कोइ।' भाय, राति अछि तँ दिनो हेबे करत, दुख अछि तँ सुखो हेबे करत। तहिना रौदी अछि तँ दाहियो हेबे करत। बुझिते छी जे धरतीक प्राणीसँ केते गुणा बेसी पानि दुनियाँमे पसरल अछि, तखन पानिक अभाव किए अछि? कहब जे ओ नोनगर अछि। किए नोनपन अछि, सेहो तँ अपने सभकेँ ने बुझए पड़त। कबीर बाबा कहनहि छैथ जे 'पानी में मीन पियासी, देख-देख लागै हांसी।' मगन भेल सुमन्त भायकेँ अपन बिआह-दिनक सविताक रूप आगूमे आबि ठाढ़ भऽ गेलैन। सविताक रूप देख सुमन्त भाइक मन-मन्तर विहुसैत कहलकैन- 'अनेरे जे रोग कम आ दरदक पीड़ा बेसी बना आहि-आलम करब तखन ई दुनियाँ एको दिन जीबए देत।' जहिना एक दिस प्राकृतिक प्रकोप अछि तँ दोसर-दिस साढ़े तीन हाथक लोकक प्रकोप सेहो अछिए। तहिना एक दिस जहिना देव ठाढ़ अछि तँ दोसर-दिस दानवो नइ ठाढ़ अछि, सेहो केना नइ कहल जाएत। तखन तँ भेल जे दुनूक बीचक जे योगक्रिया अछि ओकरा जखन इमानदारीसँ 'इ-मान' मानि आगू चलब तखने ने रसपूर्ण जीवनक रसाएल फल भेटत। खाएर, जे भेटत वा भेट रहल अछि, सबहक सोझामे अछिए। मने-मन सोचैत सुमन्त भाइक नजैर सवितापर बिजलौकाक इजोत जकाँ छिटकलैन। चेतन अवस्थामे पतिकेँ देख सविता भौजी अपनाकेँ चेतबैत बजली- "जखन दुनू परानीकेँ जीबै-मरैले मतो-पिता आ सरो-समाज बान्हि देने छैथ तखन तँ यएह ने नीक हएत जे एक्के सिरहाने मरी वा जीबी।" पत्नीक विचार सुनि, अपन दुनू परानीक जीवन देख सुमन्त भाय बजला- "उचिते किने?" ओना, बजैक क्रममे सुमन्त भाय बाजि गेला, मुदा बजला पछाइत अपने मन मोह जगबैत कहलकैन, 'एहनो तँ सम्भव अछिए जे अपना मनमे जे कर्मशील विचार अछि ओ हुनकामे  नइ होइन। मुदा से बुझब केना?' तैबीच सविता भौजी बजली- "हमर मतो-पिता आ समाजो अहाँक हाथ पकड़ा ने हमरा छोड़लैन। तैठाम आब अहाँ ने सोचबो करबै आ जीबैले किछु करबो करबै।" पत्नीक विचार सुनि सुमन्त भाइक मनमे जेना प्रशान्त महासागर उमैड़ गेल होनि तहिना उमैड़ गेलैन। प्रशान्तचित्त होइते सुमन्त भाय बजला- "कोनो चिन्ता-फिकिर करैक जरूरत नइ अछि। जीवन पएब कठिनो अछि आ उकड़ूओ अछि, मुदा देब  तँ असाध्य नहि अछि। तँए एहेन फसल विचार मनमे उपजबै पड़त ने जे संग मिलि जीबे ने सार्थक जीवन छी।" पत्नीक मुँहलगुआ पुरुख जकाँ तँ सुमन्त भाय छथिए, उनटा कऽ पत्नीकेँ पुछलैन- "आब की करब। जीवन तँ घेघ बनियेँ गेल अछि।" अपन मुहसँ निकलल 'घेघ' शब्द जेना सुमन्त भाइक अपने मनकेँ घेंघिया देलकैन। मुदा इमानदारियोक जीवन तँ जीवनक उच्चकोटिक सीमा छीहे। जइ इमानसँ लोक अपन इमनदारियोक ओइ सीमाकेँ छुबिये लइए, जैठामसँ मन-मन्दिरक मणि मणिमय भऽ चतुर्दिक छिटकैए। पतिक विचारकेँ गृहीत  होइत देख सविता भौजी बजली- "अपना तँ कोनो बाटक इजोत नहियेँ देख पेब रहल छी, अहाँ ने पति छिऐ?" पत्नीक विचार सुनि सुमन्त भाय पघिल गेला। भाय, पघिलब भेल, कोनो वस्तुक ओ रूप आ अवस्था, जैठामसँ ओ सड़ैनिक सीमामे प्रवेश करैए। दुनियाँ तँ दुनियाँ छी जे साध्य-असाध्य दुनू छी। जहिना दुनियाँक जे बनाबट अछि ओ एकरंग नइ अछि, तहिना जन्मभूमिक बनाटब सेहो एकरंग नहियेँ अछि। कोनो क्षेत्र एहेन अछि, जेना साइवेरिया, जेकरा भूगोलक भाषामे उत्तरी-ध्रुवक सभसँ लगक भूमि बुझै छी। जैठामक उपजाऊ भूमिक दशा ओहन अछि जे नअ-नअ मास धरि बर्फक ढाकसँ ढकल रहैए। तैठाम जँ भूमध्य सागर क्षेत्रीय भूमिक कल्पना मनमे रोपि किसान जीवन चलबैक विचार करता, तखन तँ ओहिना ने हेतैन जेना ध्रुवक कोन दोख भेल छेलैन जे सतयुगसँ बेचारेकेँ एकटंगा ठाढ़ केने छैन। तैठाम ईहो ने अपने सोच-विचार करबै जे अभिमन्यु किए बाल्ये वयमे हनुमान जकाँ सीता रामकेँ हृदयमे रोपि रणभूमिक संकल्प लेलक? वएह संकल्प ने बेचारेकेँ आइयो कृष्ण जकाँ बच्चेक रूप लोक-समाजमे पसरलो अछि आ पसारलो तँ जाइये सकैए। खाएर जे अछि, सबहक अपन दुनियाँ अछि। अपन दुनियाँकेँ अपने चाही तँ दुनियाँकेँ खेलौना बना खेली वा दुनियेँ खेलौना बना खेलए, से तँ भेल भविस आ भविसक कल्पना..! विस्मित होइत, विस्मित भेल, जीवनसँ हारि मानि ओइ नारकीय जीवनमे पहुँच जाएब जेकरा मृत्युक अवस्था कहै छिऐ, सेहो तँ जीवन नहियेँ भेल। ठाँहि-पठाँहि सुमन्त भाय सविता भौजीकेँ कहलैन- "जखन दुनू बेकती चारि आँखिसँ तकै छी, तखन जँ जीवन मूस जकाँ माटिक तरमे नुकाए चाहत से थोड़े हुअ देबइ।" मुसहरक बच्चा जहिना माटिक तरक बिलमे मूसक संग मूसक बच्चोकेँ पकैड़ खेलौना बना, मुसरीकँ गोबर सुँघा-सुँघा जीवन दइते अछि, भलेँ ओ पुन: मुसरीसँ टुसरीए किए ने बनि जाए, तहिना सुमन्त भाइक मनमे भेलैन। पत्नीक विचारकेँ देख-सुनि सुमन्त भाय ओइ सीमा-रेखापर पहुँच गेला, जैठाम पहुँचला पछाइत मनुक्ख अपन जीवनचक्रमे अपनाकेँ समाहित करैत दिशा-निर्धारित करैए। अपन हारिकेँ हरण नहि कहि हरनाहकेँ हरण नहि जीयन सेहो दइते अछि। हराएल-भोथियाएल कहियेकऽ ने दुनियाँसँ जेबो करबे करत जे उचितो हएत। सुमन्त भाय ओइ सीमापर पहुँचला, माने वैदिक सीमापर, जेतए जीवन पद्धतिक दिशा-निर्देश भेटैए। वैदिक सीमापर पहुँचते सुमन्त भाइक मनमे संकल्पक उदय भेलैन। तैबीच सविता भौजी सेहो अपनाकेँ संकल्पित करैत गाबए लगली- "साथी हाथ मिलाना, एक अकेला थक जाये..।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं- १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी Videha_01_09_2016 २. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_353 ३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी VIDEHA_354 ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:- १.कपिलेश्वर राउत २.उमेश मण्डल ३.राम विलास साहु ४.राजदेव मण्डल ५.आचार्य रामानन्द मण्डल ६.नन्द विलास राय ७.जगदीश प्रसाद मण्डल ८.दुर्गानन्द मण्डल ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा कथा कथा ५ अप्पन साती रमबतिया गामक चौक। भिनसुरुका आठ बजि गेल छल। नीलकण्ठ काका अपन समयानुसार चौकपर पहुँच गेल छला। ओना, चौकक चाहक दोकान तीन बजे भोरेसँ शुरू भऽ जाइए मुदा सोना-चानी, कपड़ा-लत्ताक दोकान आठ बजे खुजैए। स्कूल भलेँ दस बजे किए ने खुजए मुदा सभक सहयोगे भोरेसँ चौक तँ चलिये रहल अछि। आब कहब जे जखन चौकक चाहक दोकान तीन बजे भोरेमे खुजि जाइए तखन नीलकण्ठ काका आठ बजेमे किए जाइ छैथ? नीलकण्ठ कक्काक अपन सोच छैन तँए अप्पन सोचानुसार चालि छैन, जइकेँ पकैड़ नीलकण्ठ काका चलि रहल छैथ। सोचानुसार चालि ई छैन जे सौंझुका ताड़ी पीबनिहारकेँ तीन बजे भोरमे चाहक तृष्णा जगै छै, तँए पहिने ओ पहुँचैए। सोझे चाहेटा पीबैले लोक थोड़े चौकपर अबैए। चाहक दोकानपर बिनु बजौल पाँचगोरेसँ गपो-सप तँ करिते अछि। तहूले ने लोक चौकपर अबैए। अधरतिया समय रहिते छै तँए दिनुका काज अखन हेबे ने करत, तखन तँ भेल जे निसचिन्तीक समय छीहे। तृष्णा तृप्तिक लेल चाह पीबिते अछि। मन शान्त भेलो पछाइत जँ लोक निसचिन्तसँ अपनो जीवन गाथा नइ गाओत तखन गाओत कखन। गामेक चौक छी, जहिना-जहिना दोकानक कड़ी बढ़ैए, तहिना-तहिना गहिंकीक आबा-जाही सेहो बढ़िते अछि। जइसँ विचारोक कड़ी चलिते अछि। सौंसे गामक समाचार, ऐठाम समाचारक माने घटना विशेषसँ अछि, सामान्य जीवनसँ नहि अछि, एकठाम बैस लोककेँ भेटिये जाइए। आठ बजे होइत-होइत गामक चित्र-विचित्र सभ समाचार चौकपर पहुँचिये जाइए। तँए नीलकण्ठ काका अप्पन चाह पीबैक समय, आठ बजे बनौने छैथ। ओना, चौकपर बैइसैक अड्डो चाहे टोकानटा केँ मानल जा सकैए। बाँकी दोकान एकभग्गू अछि तँए ओइठाम एकभग्गूक जमाव रहैए। एकटा बात आरो पुछि सकै छी, ओ ई जे चाहक चलैन एहेन भऽ गेल अछि जे कोढ़ियो-काहिलो जखन ओछाइनेपर मोरनिंग-टीक सेवन करैए आ नीलकण्ठ काका सन पुरान उमेरक लोक आठ बजेमे चाह पीबए चौकपर किए जाइ छैथ? नहि, बात दोसर अछि। ओ अछि गामक समाचारक समीकरण सुनए जाइ छैथ, चाह तँ एकटा बहाना छिऐन। ओ नीक जकाँ जानि रहला अछि जे रूपैआ-दू-रूपैआक गिलास वा कपक वस्तु छी चाह, तहूमे एकरूपता नइ अछि। अनेको सीढ़ीमे चाह बनितो अछि आ बिकरियो भऽ रहल अछि। जखने चाहक दोकानपर जाएब कि दोकानदार पुछि देता, 'कोन चाह पीब?' खाएर जे जेतए अछि से तेतए अछि तइसँ नीलकण्ठ काकाकेँ कोन मतलब छैन, मतलब एतबे रखने छैथ जे चाहे रूपैआ घटिया भेल हुअए आकि चीजे-वौस घटिया भऽ जाए, मुदा अपन जे बन्हौआ जीवन अछि, बस तहीमे ने चलैक अछि। बुझिते छी जे परिवेश एहेन बनि गेल अछि जे गुणगरे वस्तु किए ने हुअए मुदा जँ ओकर दाम कम छै तँ ओकर पूछ बाजारमे कमि जाइ छै आ अगुणशीलो आकि अगुणकारियो वस्तु जँ महग छै तँ ओकर पूछ बढ़ि जाइ छइ। यएह तँ प्रचार माध्यम छी, जे तीतकेँ मीठ बनबैए आ मीठकेँ तीत। मीडियो युगक जे लक्षण अछि, सेहो तँ देखेबे करत किने। गामक चौकपर नीलकण्ठ काका चाह पीबिते रहैथ कि दू गोरेक बीच चाहे दोकानपर घोंघाउज शुरू भेल। एकगोरे अपन विचार दइत जे चाहे दोकान ने गामक चौक बनौलक, तँ दोसर गोरे विचार दइत जे चाहो दोकानकेँ चौकपर कोनो मोजरे अछि...। तेकरे घोंघाउज हुअ लगल। लतिआहे  जकाँ विचारो आ गप्पो-सप्प अछिए। माने ई जे जहिना लत्ती अपने पैरपर तँ नहि मुदा धरतीए धेने आकि कोनो आलमे, आलम भेल सहयोगी, भेटने दिन-राति तँ बढ़बे करैए, तहिना दुनू गोरेक बीच माने मखानलाल आ सिंगहारलालक बीच गप-सप्प बढ़ि गेल। मखानलाल बाजल- "कोनो गाम-घरमे जाबे चाहक दोकान नहि खुजत ताबे चौक-चौराहा नइ बनत। तँए चौक-चौराहाक निरमानकर्ता चाहक दोकान भेल।" सिंगहारलालकेँ तामस उठि गेलइ। ओना, तामस उचिते उठलै जे जाबे धरि गाम-गाममे बेपारीक लेन-देन नइ शुरू हएत ताबे चौक-चौराहाक मोले की। ऐठाम ई नइ बुझब जे गाम-गामक वौससँ लऽ कऽ गहना-जेबर धरिक लूट बाहरी लोक कऽ रहल अछि। ..सिंगहारलाल बाजल- "पानिमे की मखानेटा होइए जे सभ तर-ऊपर होइए।" ओना, गप-सप्प ओहन लोकक बीच भऽ रहल छल जे पानियेँमे सँ पाइकेँ छानि अनैए आ पानियेँक रसमे माने ताड़ी-दारूमे, तीतैत-भीजैत गमबैए। अपना विचारे मखानोलाल बाजल आ सिंगहारोलाल बाजल। कातमे बैसल नीलकण्ठ काका दुनू गोरेक विचार सुनि मने-मन मगन भऽ रहल छला। मगन होइक कारण अपना मनेमे विचार उठि गेलैन जे मिथिलांचलक डोह-डाबरसँ लऽ कऽ चौर-चाँचर, पोखैर-झाँखैर, मरल-धार, मरल धार ओ भेल जे जेकर धारा बन्न भऽ गेल आ पोखैर जकाँ बीच-बीचमे बनि गेल अछि। तैसंग गाम-गाममे सड़क बनने सेहो पानिक जमाव बढ़ि गेल अछि। प्रश्न मखानक अछि। मखानक खेतीक योग केते जलकर अछि। अखन तक जे मखान उपजबैक तकनीक रहल अछि ओ केहेन रहल अछि, आ नब तकनीकक अनुकूल जे खेतीकेँ सीमित जाइतिक बीच, पहिलुका ढंगसँ, कएल जाएत तखन लाभक अंश केते रहत.? अखन बेसी नहि। माने अखन आन्ध्र प्रदेशक झिंगा आ इलिस माछ नीक कि अपना ऐठामक रोहु-भाकुर नीक, से बादमे। अखन अनेरे किए समय दुरि करब जे सपेता (मालदह) जकाँ रोहु माछो हजार बरख पहिने जेहेन होइ छल तेहने अखनो होइए। सभ चीजमे नब तकनीक आएल, माने सभ चीजक विकसित रूप सोझमे आएल आ अपना सभ ताबे स्वर मिलानी करैत गबैत रही जे 'सभ सखी सासुर गेल हमरा लेल चैत पड़ि गेल।' चाहक दोकानपर तँ दर्जनो रंगक समाचार दर्जनो लोकक रहिते अछि। मखानोलाल आ सिंगहारोलालकेँ गुलटेन ललकारिकऽ कहलक- "चाहक दोकानकेँ ठट्ठा बुझै छहक। अपन-अपन मुँह बन्न राखह। दोसरो-तेसरो गप-सप्प हएत कि तोरे दुनू गोरेक घोंघाउज लोक सुनैत रहत।" गुलटेनक विचार सुनि दुनूगोरे चुप भऽ गेल। चुप्पो केना ने होइत। समाज तँ समाज छी। अपनो विचार लोक बँटैए आ लोकोक विचार समटैए। बेकतीसँ लऽ कऽ परिवार, समाज धरि अछिए। आजुक जे स्थिति अछि, तइ अनुकूल सत्यकेँ पकैड़ जखन डेग उठत तखन ओ सही धरतीपर पड़त। मखानलाल आ सिंगहारलालक बीचक गलगूल नीक जकाँ शान्तो ने भेल छल कि चाहक दोकानक आगुएमे मनसुखलाल जोर-जोरसँ बेटाकेँ कहैत- "इस्कूल जेमे कि नहि?" बेटा, दुलारचन बजैत- "इस्कूल नइ जेबह, मोबाइल कीनि दाए, गामेपर असगरे पढ़ब।" नीलकण्ठ काका गुलटेनकेँ कहलखिन- "गुलटेन, कने बहराकऽ नीक जकाँ बुझक तँ, कथीक गलगूल होइए।" गुलटेनक मनमे उठल, अनेरे अनकर कहा-कहीक मोटरी अपना सिरपर किए लेब। नीक यएह हएत जे मनसुखलाल दुनू-बापूतकेँ नीलकण्ठ कक्काक सोझामे पहुँचा देब। गुलटेन सएह केलक। मनसुखलाल दुनू-बापूतकेँ नीलकण्ठ कक्काक आगूमे पहुँचा, अपने कातमे ठाढ़ भऽ गेल। नीलकण्ठ काका मने-मन विचारिये रहल छला जे पहिने मनसुखलालकेँ पुछिऐ आकि दुलारचनकेँ, तइ बिच्चेमे मनसुखलाल अपने फुरने बाजल- "काका! की कहब, बीत भरिक छौड़ा भोरे-भोर ठकि लेलक।" मनसुखलालक विचार सुनि नीलकण्ठ काका मने-मन विचारिये रहल छला जे मनसुखलालकेँ पुछिऐ जे की ठकि लेलकह? मुदा बिच्चेमे मनसुखलाल दोहराकऽ बाजल- "काका, चाह-बिस्कुट खुआ, छौड़ाकेँ जखन इस्कूल जाइले कहलिऐ तखन कहलक- 'कौंपी नहि अछि।' संगे आनि चौकपर कौंपी जखन कीनि देलिऐ, आब कहैए जे मोबाइल कीनि दाए घरेपर पढ़ब।" विषयक गम्भीरता देख नीलकण्ठ कक्काक मनमे उठलैन जे ने चुप रहब नीक हएत आ ने बाजब। बाप-बेटाक बीचक प्रश्न अछि। तहूमे एक अबोध, दोसर सबोध। सबोधक तँ उचित बनिते अछि जे अबोधकेँ सबोधि रास्ता धड़ाएब। विचारमे मोड़ दैत नीलकण्ठ काका बजला- "मनसुख, बालबोध बेटा छह, कहुना बौस-बासिकऽ इस्कूल धड़ावह।" नीलकण्ठ कक्काक विचार सुनि मनसुखलाल अपन बेटाकेँ अगुएने घर दिस विदा भेल। गुलटेन बाजल- "काका, की कहब! जेहो ने होइ-कऽ अछि सेहो सभ होइए।" हँ-हूँ बिना बजनहि नीलकण्ठ काका मने-मन विचारए लगला। विद्यालय बच्चा जाए वा नहि जाए? एकाएक नीलकण्ठ कक्काक मन उनैटकऽ ओइ धरतीपर पहुँच गेलैन, जैठाम सरकारी विद्यालयकेँ पंगु बना, शिक्षाकेँ बेपारीकरणक दिशा दिस मोड़ल गेल। जइसँ समाज-तंत्र कमजोर पड़ल। महाविद्यालयसँ विश्वविद्यालय धरि अराजक स्थिति बनि गेल। तीन-तीन-चारि-चारि सालक परीक्षा रूकि गेल। सर्टिफिकेटक बिकरी-बट्टा शुरू भेल। मनक विचार नीलकण्ठ काकाकेँ तेते धधैक गेलैन जे जोर-जोरसँ बाजए लगला- "कियो अप्पन साती समाजमे बाजह वा मुँह चुप राखह, मुदा हमरो तँ एते सामाजिक सरोकार अछिए जे अप्पन विचार समाजक बीच राखी।" नीलकण्ठ कक्काक गर्जन सुनि मनमे भेल जे ओइठाम माने नीलकण्ठ काका लग, पहुँचब जरूरी अछि। अपने घरेपर रही। चौकक बगलेमे अपन घर अछि। मुदा अपने मन पाछुओ तकए तँ हुअए जे परसू साइरिक बिआहमे जाएब जरूरी अछि। तहूमे बेचारी बिआहक पराते अमेरिका चलि जाएत। नीलकण्ठे काका छिआह, जँ कहीं गपे-सप्पमे मारि फँसा लेलैन तखन कोट-कचहरी देखब आकि साइरिक बिआह देखए जाएब.? मन आगू-पाछू करिते रहए कि नीलकण्ठ काका अपने चुप भऽ गेला। जइसँ गरजैत मेघक गर्जन जकाँ, जे वायुमण्डलमे अनेरो ढनढनाइत रहैए वा शान्ते रहैए, तहिना सभ शान्त भेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- कोरोना: काल! ३.२.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- हट्ठी जाड़ ३.१.राज किशोर मिश्र- कोरोना: काल! राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी कोरोना: काल!

ई मृत्युक को नो महा दूत , आफद के प्रलयंका री पूत।

ई टुनकी सम्पूर्ण वसुधा पर, बि ख -वा ण, जी वन -सुधा पर।

घो रलक वि षा णु बि ख वा यु मे, सेन्ह लगेलक ,आयु मे।

भऽ गेल मा नव असहा य, वनक' आगि सन, पसरल जा इ।

सबहक प्रा ण पड़ल परलय मे, बि तै रा ति -दि न केवल भय मे।

नेना -भुटका , वृद्ध, जुआन, घर मे दुबकि , बचा बै जा न।

थम्हि गेल जनु जि नगी के चक्का , मा नवअस्ति त्व पर अछि ई धक्का ।

रुकि गेल दुनि आ के का रबा र, ला गै, वसुधा तऽ, जमक दो आर।

बा ट -घा ट ,सभ सुनसा न, चमकै आगि , दमकै मसा न।

बन्हक जि नगी को रो ना क हा थ, झि कैक प्रा ण ,लगा को नो ला थ।

को रो ना क' को नो ने छलैक दबा इ , लो कक अरुदा , छि नि -छि नि खा इ।

मा स्क सँ जबलक मुह ,लो क, असा वधा न, गेलथि परलो क।

जगह , भेटब मो सकि ल अस्पता ल मे, कि छु बाँ चल ,आ कि छु का ल-गा ल मे।

प्रलय मचअओलक को रो ना बेसी , पहि लो सँ ,दो सर खेप मे, घरहञ्ज परि वा र -परि वा र भेल, आङन -घर डूबल नेप मे।मे

खखड़ी भऽ गेल गम्हरा एल धा न, को इखे मे छूटल ,शि शुक प्रा ण।

अस्पता ल मे गेँटल मुर्दा सबहक ,ला गि गेलै भी ड़, अंति म ठाँ ' पअओलक कतेको

मृतक, बा लु मे, नदी -ती र।

जि नगी भेल अन्हा रे -अन्हा र, लो क, लो क सँ अनचि न्हा र।

अनगनि त परि वा र भेल अना थ, आएल वि पत्ति ,नेना सभ मा थ।

अदृश्य अछि ई महा दुष्ट, खून पि बि -पि बि ,भेल पुष्ट।

परञ्च, थम्हल गेल, प्रलय, फेर, जि नगी क' भेल जय।

कि छु समय बा द ,को रो ना के, चा ङ्गुर सँ छुटलै लो कक जा न, वैज्ञा नि क, डा कदर सभ मि लि कऽ, जल्दी सँ लअओलथि , समा धा न।

महा कवच ,को रो ना क वि रुद्ध, आएल वैक्सी न ,लड़य युद्ध।

सफल, सुफल भेल समा धा न, बाॅं चल ,महा मा री सँ प्रा ण।

मुदा , छो ड़लक नहि एखनो जा न, करी , सुरक्षा -प्रो टो कॅलक' सम्मा न।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल

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हमहीं खाली सुंदर सुंदर बाँकी दुनियाँ बानर बानर

हुनकर ठेकाना नोट करू सत्ता डोरी जिम्हर जिम्हर

रस्ता भेटल चिक्कन चुनमुन पहिया लेकिन पंचर पंचर

सभ टा सपना पुरबे केलै बाँकी सपना आँचर काजर

अमीर लग छथि गंगा जमुना छथि गरीब लग ईंटा पाथर

सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि।

2

अपने कहलक आह अपने बुझलक वाह

अपने मोने प्रीत अपने मोने डाह

अपने बनलै धार अपने लेलक थाह

अपना आगू लोह अपने पाछू लाह

अपने मरहम भेल अपने बनलै घाह

सभ पाँतिमे 22-2221 मात्राक्रम अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.श्याम बिहारी मिश्र- हट्ठी जाड़ श्याम बिहारी मिश्र

हट्ठी जाड़ जो रे हट्ठी जरलहबा जाड़ क रहले अछि सबके बीमार नई छौ दरेग धीया - पुता पर बुढ़- पुरान के केने लाचार सौंसे बढ़ल जा रहल अछि तोहर अत्याचार जो रे हट्ठी जरलहबा जाड़ क रहले अछि सबके बीमार।। छोट भेल दिन आ नमहर भेल रायत बुईझ ने पड़े कि जाड़ आब जायत ओढ़ने चादर आ धेने विस्तर जवनका सब भेल सेहाे लाचार आबो भाभट समेट तु ऐही मादे करै विचार जो रे हट्ठी जरलहबा जाड़ क रहले अछि सबके बीमार।। गाम आब शहर बैन रहलै जारैन काठी के परल अकाल सभहक घर आब गैस सिलिंडर घुरक नै छै कोनो जोगार आब कह हम कोना झेलब पूस मास के वज्र प्रहार जो रे हट्ठी जरलहबा जाड़ क रहले अछि सबके बीमार।। स्कूल कॉलेज सब बंद परलै काम - काज सब भेलै ठप श्याम बिहारी मिश्र कहैत अछि ध्यान सों सुनु हमर गप राखू चादर बान्हू गाँती नै राखब कत्तो उघार बाँचब के अछि येह उपचार किएक त जाड़ आब छोइर रहल गहुमन सन फुफकार जो रे हट्ठी जरलहबा जाड़ क रहले अछि सबके बीमार।। पहिलका बात किछु और रहैत छल घर पिछु एकटा दलान रहैत छल दलान पर घूरक ओरियान रहैत छल तीला संक्रांति सन पाबैन पर चुरलाई-मुरही के जलपान रहैत छल आब नै ओ दलान नै रहल ओ घूर आब अपनो स लोक रहै छथि दूर लौकिकता के भेल उजार मोबाइल आ इन्टरनेटे तक समटल रहि गेल अछि परिवार जो रे हट्ठी जरलहबा जाड़ क रहले अछि सबके बीमार।।

-श्याम बिहारी मिश्र, वरिष्ठ लेखाकार, स्नातकोत्तर (वाणिज्य), राघोपुर, दरभंगा, बिहार - 847239 मो. 8743953128 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण सूचना १ "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson ............................................ Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार/ कलाकर्मीक काज, रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल २०२३ धरि आ ३७०म अंकक विशेषांक लेल ८ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। विदेह अरविन्द ठाकुर विशेषांक विदेह जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक विदेह रामलोचन ठाकुर विशेषांक विदेह राजनन्दन लाल दास विशेषांक विदेह रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक विदेह केदार नाथ चौधरी विशेषांक विदेह प्रेमलता मिश्र प्रेम विशेषांक विदेह शरदिन्दु चौधरी विशेषांक -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA २ "विदेह द्वारा एक बेरमे कोनो एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकंन शृंखला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson ............................................ Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३७१ म (०१ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.)" पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। १) एम.एस.यू. केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, २) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नव चेतना, ३) एम.एस.यू. आ विभिन्न जाति केर समन्वय, ४) एम.एस.यू. द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम् ओकर प्रभाव बा ५) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनो लेख। ३७१म अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला विदेह अपन जीवित रचनाकार/ कलाकर्मी पर विशेषांक शृंखलाक अन्तर्गत (१)अरविन्द ठाकुर, (२)जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, (३)रामलोचन ठाकुर, (४) राजनन्दन लाल दास, (५)रवीन्द्र नाथ ठाकुर, (६) केदार नाथ चौधरी, (७) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' आ (८) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक निकालने अछि। अही सन्दर्भमे आठो साहित्यकार पर "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत "मोनोग्राफ" आमंत्रित कयल जा रहल अछि। "विदेह मोनोग्राफ" शृंखलाक विवरण निम्न प्रकार अछि: (१) इच्छुक लेखक ऊपरमे कोनो एक रचनाकार पर अपन मोनोग्राफ लिखबाक इच्छा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छथि। मोनोग्राफ लिखबाक अवधि सामान्यः एक मास रहत। (२) विदेह आठ रचनाकारपर आठ लेखकक नाम मोनोग्राफ लिखबाक लेल चयनित कऽ ओकर सार्वजनिक घोषणा करत। "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक निअम: (१) मोनोग्राफ पूर्ण रूपेँ रचनाकारपर केन्द्रित हुअय। साहित्य अकादेमी, एन.बी.टी. आ किछु व्यक्तिगत रूपेँ लिखल मोनोग्राफ/ बायोग्राफीमे लेखक संस्मरण आ व्यक्तिगत प्रसंग जोड़ि कय रचनाकारक बहन्ने अपन-आत्म-प्रशंसा लिखैत छथि। "विदेह मोनोग्राफ" फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल सन रहत। फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल एहेन एकमात्र टूर्नामेण्ट अछि जतय कोनो "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" सेरीमनी नै होइत छै आ तकर कारण छै जे "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" मे टूर्नामेण्टमे नै खेला रहल लोक मुख्य अतिथि/ अतिथि होइत छथि आ फोकस खिलाड़ी सँ दूर चलि जाइत अछि। फीफा मात्र आ मात्र फुटबाल खिलाड़ीपर केन्द्रित रहैत अछि से ओकर टूर्नामेण्ट "ओपेनिंग सेरीमनी" नै वरन् सोझे "ओपेनिंग मैच" सँ आरम्भ होइत अछि आ ओकर समापन "क्लोजिंग सेरीमनी"सँ नै वरन् "फाइनल मैच आ ट्राफी"सँ खतम होइत अछि आ फोकस मात्र आ मात्र खिलाड़ी रहैत छथि। तहिना "विदेह मोनोग्राफ" मात्र आ मात्र ऐ "सातो रचनाकार"पर केन्द्रित रहत आ कोनो संस्मरण आदि जोड़ि कऽ फोकस रचनाकारसँ अपनापर केन्द्रित करबाक अनुमति नै रहत। (२) मोनोग्राफ लेल "विदेह पेटार"मे उपलब्ध सामग्रीक सन्दर्भ सहित उपयोग कयल जा सकैए। (३) विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' ई-पत्रिकामे प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। (४) "विदेह मोनोग्राफ"क फॉर्मेट: रचनाकारक परिचय (रचनाकारक जन्म, निवास-स्थान आ कार्यस्थलक भौगोलिक-सांस्कृतिक विवेचना सहित) आ रचनावली (समीक्षा सहित)। घोषणा: "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत (१) राजनन्दन लाल दास जी पर मोनोग्राफ निर्मला कर्ण, (२) रवीन्द्र नाथ ठाकुर पर मुन्नी कामत आ (३) केदार नाथ चौधरी पर प्रेम मोहन मिश्र द्वारा लिखल जायत। मैथिली पुत्र प्रदीप पर "विदेह मोनोग्राफ" लिखताह प्रेमशंकर झा "पवन"। शेष ५ गोटेपर निर्णय शीघ्र कएल जायत। घोषणा २: ओना तँ मैथिली पुत्र प्रदीप पर विदेह विशेषांक नै निकालने अछि, मुदा हुनकर अवदान केँ देखैत प्रेमशंकर झा "पवन"क हुनका ऊपर "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक विचार आयल तँ ओकरा स्वीकार कयल गेल। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४ विदेह द्वारा जे विशेषांक प्रकाशित होइ छै तकर संगे विदेह ओहन लेखक-साहित्यपर अपन धेआन सेहो केंद्रित करत जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नै प्रकाशित भऽ सकल। ऐ नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- १) हम एकटा कोनो लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करब जकर भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी रहत। ऐ पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे ऐत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करत। २) ऐ शृंखलामे सुभाष चंद्र यादवपर केंद्रित "नित नवल सुभाष चंद्र यादव" एवं राजदेव मंडलपर केंद्रित "Rajdeo Mandal- Maithili Writer" प्रकाशित भेल अछि। दुनू पोथीक लोकार्पण ३१ दिसम्बर २०२२ केँ १११म सगर राति दीप जरय मे कएल गेल। ३)आगाँक घोषणा लेल http://videha.co.in/investigation.htm देखैत रही। Rajdeo Mandal- Maithili Writer (Now with Supplement I & II) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (मिथिलाक्षर) -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ५ विदेह ब्रॉडकास्ट लिस्ट विदेह WWW.VIDEHA.CO.IN सम्बन्धी सूचना लेल अपन whatsapp नम्बर हमर whatsapp no +919560960721 पर पठाउ, ओकर प्रयोग मात्र विदेह सम्बन्धी समाचार देबाक लेल कएल जाएत। ६ विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १. साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका (घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २. व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३. प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५. स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७. लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८. दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय।

-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA 158 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६२ म अंक १५ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६२)|| 157

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= > ace cites पारिककाय-नानक आ ंगंडका्मी- बंगंड-सिर्लेशक नव विप्ग्लक भू बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. Pr - Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement Pree 255 H (0> HA2022) HOT AAA ATA ATS ATTN H (>७ सर २0२३) woe eran san कानड़ि Se oa hosts मिकालऊउ। MoRIS CT PITH) कलाकार्मीक DTS, बहमा-प्रँगागम, SIS a0 OTIS DHHS STS ST OHSS, आ्लाहमा, SOTTO, ST ah) aT अठि। “SF अनस SOT 28 SHS Ome (तल २४ IT 2022 HEF AT OHA ORTH तल ८ T2022 थंवि न FISTIG gs USS editorial.staff.videha@gmail.com #3 नहा सके ढी। sis हाकृज, sare few, whatsapp no +99560960722 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- 5472 VIDEHA 2 ore ब्रावा Ss RO ONT अकटो SED STIS घरूलाकंन मूं बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. { ~ Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement विलड नस 279 F (03 7202) sewer "िथिला पटटेडंट a (आए-अर-दू)" oa roma मिकालऊ। Rite See re (बर-बर-,) गय सिठा ली बल er (ेशिलीएय आपतव as अदा दी % की बकरा, कब भहियक amie उखिराए, Ke 2) SLesIg, आा BRET (कब नल कमा, a मे 2) आर: ar BSR जाि AST, Qe SsumanifsdemscmccaiemersTs Ss Ky) ७) DLS SHES आन IT TA SS Y AD ona des fonts (लल axl अनन यहना २७ Hg २०२३ HAS TENT HO पेड Ss Bb editorial. staff.videha@gmail.com #4 ना प़कि ढी। p peer ere aura fam, whatsapp no +9956096072I HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- — 547X VIDEHA

ala wwe 4 दि ‘ ''विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक on रंगमंचकर्मी- रंगमंच निर्देशक पर विशेषांक शृंखला” हे Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. Sah ‘Videha: Maithili Literature Movement. विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार कलाकर्मीक काज, 'रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल २०२३ धरि आ Yeo stores विशेषांक लेल ८ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र TEA editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सके छी। aries org, सम्पादक विदेह, whatsapp no +9956096072i HTTPIVIDEHA.CO.INI ISSN लि a fe द्वारा एक बेरमे कोनों एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकं॑न शृंखला” Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. Vida: Mail LRrature Movement विदेह अपन ३७१ म (०९ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम. एस. यू." पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (GH. gw.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। 2) एम.एस.यू. केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, २) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नव चेतना, शिि िम्य ४) एम.एस.यू. द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम्‌ ओकर प्रभाव बा 4) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनों लेख। ७इम अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ UR वर्ड फाइलमे ई-पत्र सडकेत editorial. staff.videha@gmail.com पर पठा सके छी। -गजेन्द्र वाकुर, सम्पादक बिदेह, whatsapp no +9956096072i HTTP://VIDEHA.CO.IN/ISSN 2229 SA7KVIDERA suk हे लत Biol AS sul 4 टैग, U

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जय मैथिली.! wa साहित्य.!! आजुक जीवन आजुक साहित्य. !!! भरि राति चलएबला मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध केर iow कथागोष्टीमे| अपने समस्त मैथिली साहित्य प्रेमीगण सादर आमंत्रित छी स्थान: मध्य विद्यालय, झहुरी मेला परिसर, सोनवर्षा (लौकही) दिनांक : 24 सितम्बर 2022 समय : 6 बजे Tied 6 बजे भिनसर घरि कार्क्रि : दीए TAC, स्वागत पोधी लोकार्पण कथा पाठ; ढ TH, आलोचना, धन्यवाद ज्ञापन, समापन, FACTS... | श्री विनोद कुमार साह, अध्यक्ष, शिक्षा समिति, जिला परिषद्‌, मधुबनी श्री रंथीर गोइत, पूर्व मुखिया, झहुरी पंचायत डॉ. जय शंकर पाठक, प्रधानाचार्य, श्री युगेश्वर महन्थ पाठक संस्कृत महाविद्यालय , मंसापुर पोथी लोकार्पण! i, Sitar दान (कथा संग्रह) 8 जगदीश प्रसाद मण्डल 2. Tor साती (कथा संग्रह) 8 जगदीश प्रसाद मण्डल 3. नढ़िया भुकैए हमर घराड़ीपर (गजल संग्रह) : ...... जगदानन्द झा 'मनु 4. पंगु (अनुदित उपन्यास) 8 रामेश्वर प्रसाद मण्डल 5. अभ्यन्तर (विचारोत्तेजक गद्यांश संकलन). :. डॉ. उमेश मण्डल 6. जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य संसार (अनुसन्धान विश्लेषण) : डॉ. उमेश मण्डल 'व्यवस्थापक- संयोजक- समस्त ग्रामवासी अच्छेलाल शास्त्री सोनवर्षा-धोबियाही (कविजी)

जय मैथिली! wa साहित्य.!! आजुक जीवन आजुक साहित्य!!! हकार! हकार!! Tar!!! af ofa चलएबला मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध “सगर राति दीप जरय'क आगामी आयोजन मे अपने समस्त मैथिली साहित्य प्रेमीगणक उपस्थिति प्राथनीय अछि... दिनांक : 3। दिसम्बर 2022 (शनिदिन) WAT : 6 बजे Aiea 6 बजे भिनसर घरि पोथी लोकार्पण I. साहित्यकारक विवेक (कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डल 2. Aa बनक नब फल (कथा संग्रह) : जगदीश प्रसाद मण्डल 3. सुचिता (उपन्यास) 3 जगदीश प्रसाद मण्डल 4. हमर मीठ बैना (मुक्तक संग्रह) 5 नूतन झा 6. प्रतिकार एखन बाँकी अछि (काव्य संग्रह) : रामकृष्ण परार्थी 7. संयोग (कथा संग्रह) : रबीन्द्र नारायण मिश्र 8. इएह थिक जीवन (संस्मरण) 8 रबीन्द्र नारायण मिश्र 9. राष्ट्र मंदिर (उपन्यास) दर रबीन्द्र नारायण मिश्र 0. नित नवल सुभाष चन्द्र यादव : गजेन्द्र ठाकुर nL, मैथिली समीक्षाशास्त्र ( आलोचना) 8 गजेन्द्र ठाकुर I2. Rajdeo Mandal Maithili Writer: Gajendra Thakur I4, जेतए ने जाए कवि ओतए जाए अनुभवी उमेश मण्डल सम्पर्क- = ee निवेदक- नारायण झा, 953453045 9006056324

जय मैथिली.! wa साहित्य. !! आजुक जीवन आजुक साहित्य!!! हकार! हकार!! हकार!!! भरि राति चलएबला मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध TAR राति दीप जरय'क आगामी आयोजन अपने समस्त मैथिली साहित्य प्रेमीगणक उपस्थिति प्राथनीय अछि... स्थान : आदिनाथ मधुसूदन पारस मणि संस्कृत महाविद्यालय, रहुआ संग्राम (मधुबनी) दिनांक : 3! दिसम्बर 2022 (शनिदिन) समय : 6 बजे Tare 6 बजे भिनसर धरि पोथी लोकार्पण .. साहित्यकारक विवेक (कथा संग्रह) दर जगदीश प्रसाद मण्डल 2. Aa बनक नब फल (कथा संग्रह) : जगदीश प्रसाद मण्डल 3. सुचिता (उपन्यास) : जगदीश प्रसाद मण्डल 4. . प्रतिकार एखन बाँकी अछि (काव्य संग्रह) द रामकृष्ण परार्थी 5. असल पूजा (कथा संग्रह) : ae foes राय 6. संयोग (कथा संग्रह) : रबीन्द्र नारायण मिश्र 7, लजकोटर (उपन्यास) $ रबीन्द्र नारायण मिश्र 8. इएह थिक जीवन (संस्मरण) ६? रबीन्द्र नारायण मिश्र 9. राष्ट्र मंदिर (उपन्यास) : रबीन्द्र नारायण मिश्र 30. मातृभूमि (उपन्यास) : रबीन्द्र नारायण मिश्र 44. सीमाक ओहि पार (उपन्यास) ० रबीन्द्र नारायण मिश्र 32. नित नवल सुभाष चन्द्र यादव : गजेन्द्र ठाकुर 43. मैथिली समीक्षाशास्त्र (आलोचना) ‘ गजेन्द्र ठाकुर उव4. Rajdeo Mandal Maithili Writer 8 Gajendra Thakur 35. सुभद्रा कुमारी चौहान (विनिबन्ध) : अशोक अविचल 36. जेतए ने जाए कवि ओतए जाए अनुभवी 5 उमेश मण्डल 37. जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य संग्रह उमेश मण्डल सम्पर्क- काया का. या SS SS SSS काया या निवेदक- विनयमोहन जगदीश, 96640627 अशोक अविचल नारायण झा, 9534530457 9006056324

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हि. कवका जा फूल MS TA पढ़ल-लिखल आ सचेत पात्रक में ra aga कका कहैत छथिन, TATE बेर बारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन eter बंगाल के सेन वंशक शासक BAe जे 78% 205 ई. घरि शासन ली उपन्यास : समय समाज आ सवाल + 257 ही . = - हिन्दी विभागमे प्रोफेसरक पद पर Fre

भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 2c शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था. और इस काम के लिए उसने प्रजा से ‘dk’ की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर ate’ कहलाया। इस 'तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (7870-7) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था. कि. इस. cere का... निर्माण... कार्य एकाएक . रोक. दिया... गया... होगा।

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0 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA जय मैथिली. ! जय साहित्य. !! 'आजुक जीवन आजुक साहित्य. !!! हकार! हकार!! हकार!!! भरि राति चलएबला मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध “सगर Ula दीप जरयक आगामी आयोजन अपने समस्त मैथिली साहित्य प्रेमीगणक उपस्थिति प्राथनीय अछि... स्थान : आदिनाथ मधुसूदन पारस मणि संस्कृत महाविद्यालय, रहुआ संग्राम (मधुबनी) दिनांक : 3: दिसम्बर 2022 (शनिदिन) समय : 6 बजे Biers 6 बजे भिनसर aft पोथी लोकार्पण .. साहित्यकारक विवेक (कथा संग्रह) दर जगदीश प्रसाद मण्डल 2. नब बनक नब फल (कथा संग्रह) दर जगदीश प्रसाद मण्डल 3, सुचिता (उपन्यास) दृ जगदीश प्रसाद मण्डल 4. . प्रतिकार एखन बाँकी अछि (काव्य संग्रह) व रामकृष्ण परार्थी 5. असल पूजा (कथा संग्रह) x नन्द विलास राय 6. संयोग (कथा संग्रह) रबीन्द्र नारायण मिश्र 7. लजकोटर (उपन्यास) दर ‘eas नारायण मिश्र 8, इएह थिक जीवन (संस्मरण) द् रबीन्द्र नारावण मिश्र 9. राष्ट्र मंदिर (उपन्यास) 5 रबीन्द्र नारायण मिश्र 0. मातृभूमि (उपन्यास) डर 'रबीन्द्र नारायण मिश्र 4, सीमाक ओहिं पार (उपन्यास) A रबीन्द्र नारायण मिश्र 2. नित नवल सुभाष चन्द्र यादव 2 गजेन्द्र ठाकुर 3. मैथिली समीक्षाशास्त्र (आलोचना) ू गजेन्द्र ठाकुर 4. Rajdeo Mandal Maithili Writer: Gajendra Thakur 45. सुभद्रा कुमारी चौहान (विनिवन्ध) ट् अशोक अविचल 6. जेतए ने जाए कवि ओतए जाए अनुभवी [2 उमेश मण्डल ये, जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य संग्रह t उमेश मण्डल सम्पर्क- ee eee eee निवेदक- 'विनयमोहन जगदीश, 96640627 अशोक अविचल नारायण झा, 953453045 9006056324

विदेह ३६२ म अंक १५ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६२) | | 77 जय मैथिली.! जय साहित्य. !! आजुक जीवन आजुक साहित्य. !!! wert eR हकार! ak राति चलएबला मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध TAR राति दीप SRP आगामी आयोजन मे अपने समस्त मैथिली साहित्य प्रेमीगणक उपस्थिति प्राथनीय अछि... स्थान : आदिनाथ मधुसूदन पारस मणि संस्कृत महाविद्यालय, रहुआ संग्राम (मधुबनी) दिनांक : 3 दिसम्बर 2022 (शनिदिन) समय : 6 बजे aad 6 बजे भिनसर धरि पोथी लोकार्पण I. साहित्यकारक विवेक (कथा संग्रह) 4 जगदीश प्रसाद मण्डल 2. Fa बनक नब फल (कथा संग्रह) : जगदीश प्रसाद मण्डल 3. सुचिता (उपन्यास) g जगदीश प्रसाद मण्डल 4. हमर मीठ बैना (मुक्तक संग्रह) : नूतन झा 5. असल पूजा (कथा संग्रह) क we विलास राय 6. प्रतिकार एसन बाँकी अछि (काव्य संग्रह) : रामकृष्ण परार्थी 7. संयोग (कथा संग्रह) 5 रबीन्द्र नारायण मिश्र 8. इएह थिक जीवन (संस्मरण) पर रबीन्द्र नारायण मिश्र 9. राष्ट्र मंदिर (उपन्यास) 5 रबीन्द्र नारायण मिश्र l0. नित नवल सुभाष चन्द्र यादव डे गजेन्द्र ठाकुर i. मैथिली समीक्षाशास्त्र ( आलोचना) पु गजेन्द्र ठाकुर 2. Rajdeo Mandal Maithili Writer: Gajendra Thakur 33. सुभद्रा कुमारी चौहान (विनिबन्ध) : अशोक अविचल 4. जेतए ने जाए कवि ओतए जाए अनुभवी: उमेश मण्डल I5, जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य aE: उमेश मण्डल सम्पर्क- a कु हु ही ही हु हु निवेदक- विनयमोहन जगदीश, 96640627 अशोक अविचल नारायण झा, 953453045 9006056324

46 | | http://www.videha.co.in/ jw.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA ea eT Aaa ant EBT आ फूल TS सदृश्य Tectia आ aaa Was माध्यम लेखक We अनुसन्धान रखलनि अछि | दलान पर बैसल लोकक जिज्ञासाकं cid पढ़ुआ कका FET ae, “पहिल बेर वारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन ada कोसी नदीक पुबरिया किनार दिस sre बनौलनि। लक्ष्मण सेन द्ितीय बंगाल के सेन वंशक शासक छलाह जे 78% 205 ई. ate शासन मैथिली उपन्यास : समय समाज ST सवाल : 257 a tT Se |

विदेह ३६२ म अंक १५ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६२) | | 7 £ aE g wee I Bé ee e. कर हुं fees || Ona ‘debe. 3 E 4 fu & BS a mE es rope Hee किट aba ili भारतवर्ष में बिहार मं कोसी नदी को बांधने का काम 24 शताद्द मं किसी राजा sera ed करवाया था और इस काम के लिए उसने प्रजा से ‘ate की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर बांध' कहलाया। इस ewes के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (870-9) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योकि पह बांध थौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दुरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू डब्लू, हन्टर (877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की. दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहें की स्थिति मैं नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई aera रहा होगा. जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा से। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था. कि. इस. तदबन्ध.. का... निर्माण... कार्य. एकाएक dee दिया. गया... होगा।

कर विदेह ३६२ म अंक १५ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६२) | | 47 अंक ३६२ पर टिप्पणी टिप्पणी २ पर टिप्पणी बात इज सभटा Se ह...आ ककका आ फूल TS सदृश्य पढ़ल-लिखल आ सचेत Wash माध्यम ea एहिं अनुसन्धानकें रखलनि अछि | दलान पर बैसल लोकक जिज्ञासाकें gid पढ़ुआ कका कहैत छथिन, “पहिल बेर बारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन ara कोसी नदीक पुबरिया किनार दिस are बनौलनि। लक्ष्मण सेन Dacia बंगाल के सेन वंशक शासक छलाह जे 78a i205 ई. धरि शासन जैथिली उपन्यास : समय समाज आ सवाल : 257 -s — A # / - ‘ % hee a) a

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fate ३६२ म अंक १५ जनवरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८१ अंक ३६२) | | 59 दर "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला” | Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. am a ET us. *Robert Louis Stevenson ‘= ei Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि “ware! पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार! कलाकर्मीक काज, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल 2023 धरि आ ३७०म Somes विशेषांक लेल ८ मई २०२३ UR वर्ड फाइलमे ई-पत्र TESA editorial. staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक बिदेह, whatsapp no +97956096072 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA a “fate द्वारा एक बेरमे कोनो एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकंन शृंखला” Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३७१ म (०१ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.)” पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। 8) एम.एस.यू., केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, 2) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नब चेतना, 2) एम.एस.यू, on विभिन्न जाति केर समन्वय, | ४) एम.एस.यू, द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम्‌ ओकर प्रभाव बा. | ५) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनों लेख। | eRe अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ UR वर्ड फाइलमे ई-पत्र सडकेत editorial. staff.videha@gmail.com पर पठा सके छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no *979560960727 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA : sy ASU Mithila Student Union

460 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA wa की We "खिजरक sine ewes a जैगपंठकर्मी- बैशपंठ-निरमनक गज खिन्मशंक भूं बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. , a | a - Robert Louis Stevenson tet tet Videha: Maithili Literature Movement FAGE BRT २०9 मे (09 NA २०२३) OT ARH (त बक OSS 7S जा 270 पा (DB Ht 2029) aes Het Crean san arts sna नय fonio निकालऊ। feria qa asa कलाकर्मीक काऊ, यहन्वा-प्रँगागन्, SST SGV SOAS कार्यणड NS ADTES SAT (SIGS, SICTONT, SHIGTONT, परीक्षा ath) 'आामंकिऊ अति। sat अगन उठा 2d50 as Rrossias (सता २४ aT २०२२ धंखि a श१0प iss romain (लत ८ Nt 2027 I AS TIS gS MSS editorial. staff.videha@gmail.com #4 tS SH -sigra Sea, Sars fac, whatsapp no +9956096072I HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- 547X VIDEHA 2 “BE TST अक SACI SIT GT प्रैंचक SAS RETA भुं बला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson Videha: Maithili Literature Movement. aoe अनन 27> मे (09 BAT 2022) dpa "Rar mest BA (an.25.g.)" 974 forates निकालऊ। ike पांडे TARA (9n.95.2.) गय न्रिठा ली बल Bore 0ेशिलीएर ancra sities as 9) GL. (कब अर्डनक sok fee, * 2) 95.3. a Re Saad GSAT, : | 2) 65.65.22 Ros ats era ER, @ ही QELGSLZ, FST SET FAAS SOTA SI उकय CA-GST A GAL ७कय HST At ति ७) GS. SASS शान (कामना (सा g (Sa sin 'बंकक लि(नयांक (सल wei aR FEAT २७ Hg २०२२ FAAS FIST H-NET oy editorial.staff.videha@gmail.com गज नठी प़राकि ढी। “जन्म Seg, Sars fac, whatsapp no +9956096072I HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229- en टू 547X VIDEHA itul AS सकने Mithila Student Union