VIDEHA — Issue 363 / अंक ३६३

Publication: VIDEHA · Issue: 363
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ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६३ म अंक ०१ फरबरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८२ अंक ३६३) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha e-Journal: Issue No. 363 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१३) १.२.३६२ पर टिप्पणी (पृ. १४-५९) २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) (पृ. ६२-७९) २.२.नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) (पृ. ८०-८४) २.३.आशीष अनचिन्हार- निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष (पृ. ८५-८७) २.४.प्रेमशंकर झा 'पवन'- मैथिली फकरा (लोकोक्ति) संकलन (पृ. ८८-८९) २.५.कुमार मनोज कश्यप- बलिक छागर (पृ. ९०-९१) २.६.आचार्य रामानंद मंडल- मैथिली साहित्य मे घोटाला (पृ. ९२-९४) २.७.आचार्य रामानंद मंडल- २ टा कथा (पृ. ९५-१००) २.८.योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'- ॐ तत्‍ सत्‍ एकम्‍ एव अद्वितीयम्‍ (पृ. १०१-१३२) २.९.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना (उपन्यास- खेप १०) (पृ. १३३-१३५) २.१०.जगदीश प्रसाद मण्डल- भंगतराह कवि (पृ. १३६-१४३) २.११.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास आठम पड़ाव) (पृ. १४४-१५०) २.१२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २० म खेप (पृ. १५१-१५४) २.१३.डॉ किशन कारीगर- मैथिली साहित्य मे सोलकन साहित्यकार सब के असलियत (पृ. १५५-१५७) २.१४.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १५८-१६२) २.१५.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १६३-१६८) २.१६.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १६९-१७०) २.१७.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १७१-१७६) २.१८.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १७७-१८०) २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- लालदासक मिथिला रामायण मे कुण्डलिया आ सम्पादक बा प्रूफरीडरक अज्ञानतावश ओइमे छन्दोभङ्ग (पृ. १८१-१९०) ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- चातर (पृ. १९२-१९६) ३.२.कल्पना झा- मायक आँचर (पृ. १९७-१९८) ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण (पृ. २००-२१७) अनुलग्नक: मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा प्रसंग (५६ पृष्ठ) 2

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३६२ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ (पछिला अंकसँ आगाँ) मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा प्रसङ कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) क शीर्षक भ्रामक अछि। ई हुनकर किछु सवर्ण उपन्यासकारपर किछु सिण्डिकेटेड कथित समीक्षात्मक आलेखक संग्रह अछि, २६३ पन्नाक ई पोथी हार्डबाउण्डमे लाइब्रेरीकेँ मात्र बेचल जा सकत, जतऽ ई सड़ि जायत, अमेजनसँ हम ई चारि सय पाँच टाकामे किनलौं मुदा ऐमे पाँचो पाइक सामिग्री नै अछि। एतऽ एकटा भूल सुधार अछि, एकटा गएर सवर्ण लेखक सुभाष चन्द्र यादवक उपन्यास 'गुलो'केँ बिनु पढ़ने ओ दू पाँति लिखलन्हि आ निपटा देलन्हि, ओ दुनू पाँति हम एतऽ अहाँक मनोरंजनार्थ प्रस्तुत कऽ रहल छी। अहाँ गुलो पढ़नहिये हएब, जँ नै पढ़ने छी तँ पहिने पढ़ि लिअ, कारण तखन बेशी मनोरंजक अनुभव हएत, गुलो सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। "उपन्यासक कमजोरी अछि लेखकक राजनीतिक पूर्वाग्रह। राजनीति विशेषक पक्षधरता रचनाक संग न्याय नहि कऽ पबैत अछि।" जइ उपन्यासमे राजनीति दूर-दूर धरि नै छै ओतऽ 'राजनैतिक पूर्वाग्रह' आ 'राजनीति विशेषक पक्षधरता'क तँ प्रश्ने नै छै। राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङर धूमकेतु आ यात्री प्रयुक्त केलन्हि। सुभाष चन्द्र यादव जीक 'भोट' जे २०२२मे आयल जे सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर, से राजनीतिपर अछि मुदा ओतहुओ सुभाषजीक भगता शैलीकेँ राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङरक आवश्यकता नै पड़लै। पढ़ू हमर पोथी 'नित नवल सुभाष चन्द्र यादव' जे उपलब्ध अछि ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। कमलानन्द झाक बिनु पढ़ने सुभाष चन्द्र यादवक विरुद्ध ब्राह्मणवादी जातिगत पूर्वाग्रह एकटा खतराक घण्टी अछि। जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। ई अपन बायोडाटामे गएर सवर्णसँ छीनि कऽ, समानान्तर धाराक लोकक हककेँ मारि कऽ लेल साहित्य अकादेमीक मैथिल अनुवाद असाइनमेण्टक गर्वसँ चर्चा करैत छथि। आ ई असाइनमेण्ट हिनका मेरिटसँ नै जातिगत टाइटिलसँ भेटल छन्हि, अही सभ किरदानीक एवजमे भेटल छन्हि। हिनका सन लोक लेल मैथिली बायोडेटाक एकटा पाँति अछि, समानान्तर धारा लेल जीवन-मरणक प्रश्न। कमलानन्द झाकेँ हम किए छद्म समीक्षक कहलियनि? कारण ओ छद्म समीक्षक छथि। ओ लिखै छथि- "मैथिली उपन्यास-यात्राक लगभग सय वर्षक बाद मैथिल अन्तरजातीय विवाहक सपना, संघर्ष आ विडम्बना पर गरिमायुक्त उपन्यास लिखबाक श्रेय गौरीनाथकेँ जाइत छनि।" तँ की कमलानन्द झा सुशीलसँ ई श्रेय छीनि लेलनि? की ई हुनकर ब्राह्मणवादी संस्कारक अहंकार- जे हम ककरो चढ़ा सकै छिऐ आ ककरो उतारि सकै छिऐ- केर पराकाष्ठा थीक, आकि हुनकर अध्ययनक अभावक प्रमाण? चलू अहाँकेँ लऽ चली कमलानन्द झा केर स्वार्थी दुनियाँसँ दूर, छल-छद्मसँ दूर सुशीलक जादूबला साहित्यक निश्छल दुनियाँमे।अहाँक स्वागत अछि सुशीलक साहित्यक दुनियाँमे। प्रस्तुत अछि सुशीलक 'गामबाली' (१९८२) जे आब उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमे लिंक http://videha.co.in/pothi.htm पर। पहिल पाँतीमे उपन्यास आरम्भसँ पहिनहिये 'गामबाली' उपन्यासक सम्बन्धमे सुशील लिखै छथि- "विधवा विवाह आ अन्तर्जातीय विवाहक समर्थनमे।" आ उपन्यास आरम्भ। गामबालीक मृत्यु आ तखने झमेला, गामबालीक दाह संस्कार के करतै? ब्राह्मण समाज कि जादव समाज? दिनेश कुमार मिश्रक 'दुइ पाटन के बीच मे' कोसी नदीक ऐतिहासिक आत्मकथा थीक, ओ मिथिलाक आन धार सभक ऐतिहासिक आत्मकथा सेहो लिखने छथि जेना बन्दिनी महानन्दा, बागमती की सद्गति!, दुइ पाटन के बीच में.. (कोसी नदी की कहानी), न घाट न घर, बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी, भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूंक, The Kamla River and People On Collision Course, Bhutahi Balan- Story of a ghost river and engineering witchcraft, Refugees of the Kosi Embankments। साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य पंकज झा पराशर द्वारा हिनकर पोथी सभसँ पैराक पैरा मैथिली अनुवाद कऽ अपना नामे उपन्यास छपबाओल गेल अछि, जकरा छद्म समीक्षक कमलानन्द झा ऐ चोर लेखकक रिसर्च कहै छथि! एतऽ स्पष्ट कऽ दी जे ई चोर लेखक आ छद्म समीक्षक दुनू अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालयक हिन्दी विभागमे छथि। ई रिसर्च दिनेश कुमार मिश्रक थीक, जे आइ.आइ.टी. खड़गपुरसँ सिविल इन्जीनियरिङ मे बी. टेक. १९६८मे आ स्ट्रक्चरल इन्जीनियरिङमे एम.टेक. १९७०मे केने छथि, आ ओइ रिसर्च लेल क्वालिफाइड छथि। जखन कोनो विषयमे नामांकन नै होइ छै तखन लोक हारि-थाकि हिन्दीमे नामांकन लइए, नै तँ कमलानन्द झा केँ बुझऽ मे आबि जइतन्हि जे ई रिसर्च कोनो सिविल इन्जीनियरेक भऽ सकैत अछि, भऽ सकैए बुझलो होइन्ह। हिन्दी मूल आ मैथिलीक स्क्रीनशॉट आँगा संलग्न अछि। दिनेश कुमार मिश्र मिथिलाक नै छथि मुदा मिथिलाक सभ धारक कथा ओ लिखने छथि, हम सभ हुनका प्रति कृतज्ञ छी आ हुनकर ऋणसँ मिथिलावासी कहियो उऋण नै भऽ सकता, मुदा मूलधाराक पुरस्कार आ पाइ लोलुप लोकसँ कृतघ्नते भेटत से फेर सिद्ध भेल। ऐ लेखककेँ दस बारह बर्ख पहिने सेहो तारानन्द वियोगी उद्धारक भेटल छलखिन्ह जे लिखने रहथिन्ह जे ओ कवितामे प्रभावित भऽ अनायासे अपन रचनामे दोसरक सामिग्री चोरि कऽ लइ छथि, एहने सन। आब ऐ कमलानन्द झा क आश्रय तकलन्हि मुदा दुर्भाग्य! जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। सीलिंगसँ बचबा लेल जमीन-जत्थाबला लोक कम्यूनिस्ट बनला आ आब ब्राह्मणवाद बचेबालेल वामपंथक शरण, एहेन लोक सभसँ कम्यूनिज्मकेँ बहुत नुकसान भेल छै। दिनेश क़ुमार मिश्रक सभटा पोथी आब हुनकर अनुमतिसँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमेः http://videha.co.in/pothi.htm एतऽ एकटा गप मोन पाड़ि दी जे जखन बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे की ओ एक्स बॉक्स भारतमे पाइरेशीक डरसँ देरीसँ आनि रहल छथि? तँ हुनकर उत्तर रहन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेशीक डरे कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। से विदेह पेटारमे हम सभ ऐ तरहक रिस्क रहितो एकरा आर समृद्ध करैत रहब, कारण समानान्तर धारामे सड़ल माँछ द्वारे पोखरिक सभ माँछ नै सड़ैए, एतुक्का मलाह गोट-गोट कऽ सड़ल माँछ निकालैत रहल छथि, निकालैत रहता। सिण्डीकेटेड समीक्षापर अन्तिम प्रहार। मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): यह ध्यान देने की बात है कि 1923 से 1946 के बीच कोसी क्षेत्र में मलेरिया से 5,10,000, कालाजार से 2,10,000, हैजे से 60,000 तथा चेचक से 3,000 मौतें (कुल 7,83,000) हुईं। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०३)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 12वीं शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था और इस काम के लिए उसने प्रजा से 'बीर' की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर बांध' कहलाया। इस तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (1810-11) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (1877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था कि इस तटबन्ध का निर्माण कार्य एकाएक रोक दिया गया होगा। छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा चोर उपन्यासकारक पीठ ठोकब, देखू छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा उद्धृत चोर पंकज झा पराशर (मैथिली उपन्यास, समय, समाज आ सवाल पृ. २५७-२५८): चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. ३१)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): कोसी के प्रवाह कि भयावहता की एक झलकफिरोजशाह तुगलक की फौज के सन् 1354 में बंगाल से दिल्ली लौटने के समय मिलती है। बताया जाता है कि जब सुल्तान की फौजें कोसी के किनारे पहुँचीं तो देखा कि नदी के दूसरे किनारे पर हाजी शम्सुद्दीन इलियास की फौजें मुकाबले के लिए तैयार खड़ी हैं। यह वही हाजी शम्सुद्दीन थे जिन्होंने हाजीपुर तथा समस्तीपुर शहर बसाये थे। फिरोज की फौजें शायद कुरसेला के आस-पास किसी जगह पर कोसी के किनारे सोच में पड़ गईं। नदी की रफ्तार उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही थी। आखिरकार फैसला हुआ कि नदी के साथ-साथ उत्तर की ओर बढ़ा जाय और जहाँ नदी पार करने लायक हो जाय वहाँ पानी की थाह ली जाये। सुल्तान की फौजें प्रायः सौ कोस ऊपर गईं और जियारन के पास, जो कि उसी स्थान पर अवस्थित था जहाँ नदी पहाड़ों से मैदानों में उतरती थी, नदी को पार किया। नदी की धारा तो यहाँ पतली जरूर थी पर प्रवाह इतना तेज था कि पाँच-पाँच सौ मन के भारी पत्थर नदी में तिनकों की तरह बह रहे थे। जहाँ नदी को पार करना मुमकिन लगा उसके दोनों ओर सुल्तान ने हाथियों की कतार खड़ी कर दी और नीचे वाली कतार में रस्से लटकाये गये जिससे कि यदि कोई आदमी बहता हुआ हो तो इस रस्सों की मदद से उसे बचाया जा सके। शम्सुद्दीन ने कभी सोचा भी न था कि सुल्तान की फौजें कोसी को पार कर लेंगी और जब उस को इस बात का पता लगा कि सुलतान की फौजों ने कोसी को पार करने में कामयाबी पा ली है तो वह भाग निकला। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०५)]: (... शीघ्र अही लिंकपर आर स्क्रीनशॉट अपडेट कएल जायत।) (अगिला अंकमे जारी..) २ विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १. साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका (घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २. व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३. प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५. स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७. लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८. दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय।

-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ आब अहाँ पुछब जे तकर प्रतिकार समानान्तर धारा केना केलक, ओ तँ कन्नारोहट नै करैए, तँ तकर उत्तर अछि हमर ३ टा पोथी जे १११म सगर राति दीप जरय मे लोकार्पित भेल ३१ दिसम्बर २०२२ केँ, वएह सगर राति दीप जरय जकरा साहित्य अकादेमी गत दस बर्खसँ गीड़ि लेबाक प्रयास कऽ रहल अछि। अहाँसँ ऐ तीनू पोथीपर टिप्पणी ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। पहिल दू पोथी मे राजदेव मण्डल आ सुभाष चन्द्र यादवक साहित्यक समीक्षा अछि जे हमर तेसर पोथी मैथिली समीक्षशास्त्रक सिद्धांतक आधारपर कएल गेल अछि। तीनू पोथीक लिंक नीचाँ देल गेल अछि। Rajdeo Mandal- Maithili Writer (Now with Supplement I & II) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (मिथिलाक्षर) मैथिली समीक्षाशास्त्र मैथिली समीक्षाशास्त्र (तिरहुता) संगमे पढ़ू कमलानन्द झा क ब्राह्मणवादपर प्रहार: दूषण पञ्जी- The Black Book दूषण पञ्जी- The Black Book (मिथिलाक्षर) ४ Parallel Literature in Maithili and Videha Maithili Literature Movement दुर्गानन्द मण्डलक पाँचटा लघुकथापर हमर टिप्पणी Five Short Stories by Sh. Durganand Mandal Sh Durganand Mandal has adjudged the following five short stories as his best: 1.The Red Sister-in-Law (Lal Bhauji) 2.Dr Karaveer (Doctor Karmveer) 3.The Birthday of Lord Krishna (Kishna Mutthi) 4.The Simpleton (Baklel) 5.The First Wedding Anniversary (Biyahak Pahil Salgirah) In Mithila, there is a tradition to call a sister-in-law by adding a prefix symbolising the colour Red or by adding the prefix New or Old or by adding a prefix of her father's village. The Red Sister-in-Law begins with a description of the winter season, the red sister-in-law is nowhere to be seen in the first half. It tells the story of an old couple. The second half describes the relationship between a newlywed woman and her brother-in-law in the backdrop of the Holi festival. The strength of the story is not in its plot but in the description of surroundings and relationships. The second short story Dr Karmveer begins with excitement relating to social work and change and ends with disappointment whether all these were for personal achievement. The Birthday of Lord Krishna is a story of a baby Marni. The economy of a poor family, how they survive, and the economy based on nature all are intricately woven in style. The festival on the occasion of the birthday of Lord Krishna is going to be held, the baby thinks of it not only for herself but for her siblings also. The mother comes to know about the money she got by selling wild grain, and the innocent reply of the baby wins hearts. The Simpleton is a story about Radha and Mohan, the newlyweds. Radha goes to her father's place and Mohan is dying to see her. The simple things have been dealt with, with dexterity and in a humorous way. The First Wedding Anniversary is a story of a celebration resulting in death. - Gajendra Thakur, editor, Videha (Be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast list.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३६२ पर टिप्पणी अंक ३६२ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार कुमार मनोज कश्यप जी लगातार आबि रहल छथि से नीक संकेत अछि। मुदा हिनक लघुकथा "ट्रेंड" कोनो प्रभाव नहि छोड़लक। ई वस्तुतः सोशल मीडियामे भाइरल भेल चुटकुला केर मैथिलीकरण अछि। उम्मेद अछि जे मनोजजी एहिपर धेआन देताह। किशन कारीगर केर रचना पढ़ल मुदा ई हास्य-कटाक्ष केर विधा नै अछि। एकरा मात्र कटाक्ष कहल जेतै। महाकान्त प्रसाद केर बीहनि कथा प्रभावित केलक। कल्पना झा, दिल्ली आभार अशेष। सरिपहुँ विदेह पेटार सुच्चा पेटार थिक। तात्पर्य जे भानुमतिक पेटार आ तेहने उत्तमोत्तम पत्रिका।एतेक रास मजनतब पाबि नेहाल छी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). http://videha.co.in/ अंक ३६२ क रिपोर्ट पर टिप्पणी …………………………….. उपन्यासकार के छथि, पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) दुखद RabindraChaudhary …………………………………….. बड दुर्भाग्यपूर्ण, आपत्तिजनक आ आपराधिक कृत्य.. KumarManojKashyap ……………………………………….. ईसभ पढ़ि बहुत चिंतित छी। R N Mishra ……………………………….. दुर्भाग्यपूर्ण Kalpna JhaPatna …………………………………………………… आहिरेबा..! फेर ई के छैथ? पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) हे भगवान..! ई ठीके चोरे छैथ। Umesh Mandal …………………………………………………….. Gaurinath: नीक। एहन चोर केर देखार करब जरूरी पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) ओकर त लेखकीय जीवने चोरी पर टिकल छै आ तकरा प्रश्रय देब'वाला सेहो मैथिली मे कम नहि। ……………………………………. एहने चोर लोक सभ मैथिली आर मिथिला के अहित करय मे सदैव आगू रहैत छथि JhaPrasanna ………………………………….. एकरा कोर्ट मे लऽ जेबाक चाही य़ोगेन्द्र पाठक वियोगी +91 98310 37532 …………………………………………………………………. SubhashChandraYadav: I condemn it. The thief must be exposed. …………………………………… अति दुखद, निन्दनीय ManojPathak ………………………………………. सादर आभार। कोट कर सकैत हतन। परंतु श्रोत के चर्चा करनाई आवश्यक हय।न त साहित्यिक चोरी मानल जायत। RamanandMandal ……………………………………… धन्यवाद। VidehaKeshavBhardwajDelhi ……………………………………………… Nabo Narayan Mishra दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति …………………………………………….. Mukund Mayank Oh ……………………………………………… प्रदीप पुष्प बहुत खराप बात। ……………………………………………. Abhilash Thakur · घृणित कार्य! लज्जा जोग ……………………………………….. Ajit Kumar Jha पता नहि लाजो नहि लगैत छन्हि एहन प्रवृति वाला महानुभाव सब केँ। एहन लोग सब केँ लेल सेहो अलग सँ पुरस्कारक घोषणा होयबाक चाही। पर्दाफाश करबाक लेल अपने केँ साधु वाद । ………………………………………………….. Ramesh Kumar Sharma पुरस्कार पाबै के जल्दबाजी हेतै ………………………………………………… Kunal उपन्यास आ तकर लेखकक नाम घोषित करु ……………………………………………….. Ashish Anchinhar Kunal जी, जँ कोनो समान्य पाठक ई प्रश्न पुछने रहितथि तखन हमरा नीक लागैत। प्रबुद्ध पाठक ओ लेखक वर्गसँ ई प्रश्न एबाक मतलब छै जे स्थिति गंभीर भऽ गेल छै। ओना जखन पुछिये देलहुँ अछि तखन एकर उत्तर अछि- पोथी, जलप्रांतर, पंकज पराशर। एहि पोथीक गदगदी आलोचक, कमलानंद झा। ……………………………………………………… Kunal Ashish Anchinhar धन्यवाद । एना सार्वभौम जकां छइ जे बेस गंभीर आरोप लगाओल जाइ छइ मुदा नाम नइ लेल जाइ छइ।एना हमरा हाइपोक्रेसी क चरम लगइए। ई अनसोहांत छी ।......... आब नाम ल गेल छइ। त हमरा लगइए जे पंकज परासर (उपन्यासकार) आ कमलानंद झा ( आलोचक ) के बाजक चाही । ……………………………………………………………. Lakshman Jha Sagar एहेन चोरक सामाजिक बहिष्कार हेबाक चाही।आगि पानि ढ़ाइठ देबाक चाही।मुँह मे कारी चुन लेपि के गदहा पर सरेआम घुरेबाक चाही।एहेन कुदशा कय देबाक चाही जे फेर क्यो एहेन घृणित काज नै करय। ………………………………………………………… Chitragupta Chitragupta अत्यन्त दुखद …………………………………………………. जगदानन्द झा 'मनु' · मिथिला मैथिलीमे साहित्यक चोरी जगजाहिर अछि। मुदा आब साहित्य अकादमी आ ओकर लेकक द्वारा…. बहुत निंदनीय काज, एहेन एहेन लोककेँ अवश्य देखार करबा चाही ………………………………………………………….. श्रीधरम ई पंकज परासर, हम त' पढ़बाक आवश्यकता नहि बुझलहुं। प्रतिभाक नाम पर मात्र जुगाड़ छनि हिनका लग। …………………………………………………………….. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). http://videha.co.in/ अंक २६-५० क रिपोर्ट पर टिप्पणी ……………………… kellner@ucla.edu" Dear Gajendra, thanks for the detective work. was there a response? best regards, Douglas Kellner, Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education, University of California-Los Angeles, Box 951521, 3022B Moore Hall, Los Angeles, CA 90095-1521, Fax 310 206 6293, Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html ………………………… dear Gajendraji, apnek mail milal. Pankajjik kritya janike bar dukh bhel. Ahi se maithilik nam kharab hoyat achhi. Apnek kadam ekdum uchit achhi.- Rajiv K Verma …………………………. These People are hellbent to bring down the literary discourse down to the gutter. Now you have been receiving mails like one. We are with you and i have forwarded your mails to Maithili speaking people all across the country. Sir I have sent the link of Parashar's duplicacy to several people along with Pranabh Bihari who had traslated that article. I had telephonic conversation with him also and he was quite upset over Parashar’s duplicay. Pranav is my junior and a good friend of mine. since you have referred Pranav who had traslated that article it is unfortunate that he was misused by Parashar. But i must congratulate you for exposing scam run by Parashar and his team. Parashar, though must not be blamed if he lifted the article of Nom Chomskey . Now i must doubt the artistic sensibility of Parashar who is now a pseudo-- intellectuals. I am amazed that how did he dare to publish the article of Nom Chomskey as his own. God bless him no more. - VIJAY DEO JHA ……………………………………… dhanyvad. muda ehne lok sabjagah aadar pabait achi. -shridharam ………………………………………………… अहां कें सूचनार्थ पठेने छी (किछु घृणित काज पंकज पराशरक) जे पंकज पहिनेहो इ सब काज करैत रहय छलैए।- aavinash ……………………………………………………… Dear Gajendra g, You are doing very well in the field of collecting all the documents related to the Maithili. Videha. Com realy a adventureous collection. I will also find some time to learm the article published through the videha. Now your detective style theft the sleeping of many of the so called literary personnel. Go a head. jai Maithili jai Mithila- Sunil Mallick, President, MINAP, Janakpur ………………………………………………….. your efforts are commendable. Anysuch ghost writer or fake identity holder must be boycotted from literature at once Thanks.- shyamanand choudhary ………………………………………………….. Namaskar. Chetna samitik sachiv ken mailak copy hastgat kara del achi.- Dr. Ramanand Jha' Raman' …………………………………………………. प्रिय गजेन्द्र जी , चेतना समिति हिनका सम्मानित कएलक अछि सेहो हमरा ज्ञात नहिं | यद्यपि हमहू चेतना क स्थाई सदस्य | जे हो. मुदा निंदास्पद घटना तं ई थिके तें दुखी कयलक | कतिपय नव मैथिल-प्रतिभाक आकलन-मूल्यानकनक हमर अपन स्नेग्रही स्वभाव, एहि दुर्घटनाक बाद तं आब चिंता मे ध' देलकय| देखी, हम अपने विस्मित भेलहुँ| बहुत दु:खद दृश्य | सृजन विरूद्ध साहित्यिक सन्दर्भ मे ई घटना आधुनिक मैथिलीक बहुत कुरूप प्रसंग क' क' स्मरण कैल जायत- सस्नेह,- गंगेश गुंजन. ………………………………………………. PRIYA MAITHILJAN, APPAN BHASHA- SANSKAR-SANSKRITI KE ASMARAN KARU AA EHAN VIVADAASAPAD LEKANI B KARANI KE VIRAM DIYA. ESWAR KE SAKCHI MANI - DIL PAR HATH RAKHI AA KULDEVI KE ASMARAN K-K YAD KARU KI SACHHAI KE KATEK KARIB CHHI.NIK BATAK LEL MANCH KE UPYOG KARI TA UTTAM. DHANYABAD.SAPREM- PK CHOUDHARY ………………………………………………………… Gajendra babu, pankaj puran chor achhi. Ham sab okar likhit ninda das sal pahine aarambh me kene rahi. Okra ban k kay ahan nik kayal. Chetna samiti ke seho samman wapas lebak chahi aa okar ninda karbak chahi.- subhash Chandra Yadav ………………………………………………………. प्रिय ठाकुरजी! (माननीय संपादक), “विदेह ई-पत्रिका” [मैथिली], एखन धरिक उपलब्ध साक्ष्यक आधार पर हम अपनहिक संग जाएब पसिन्न करब।- शंभु कुमार सिंह ………………………………………… Dear Gajendraji, I fully agree with you that we must fight against blatant cases of wrongful appropriation. हां अपन मेल में लिखने छी जे विदेह आर्काइव से संबंधित लेखक'क सबटा रचना हटा लेल जायत। अहि से आर्काइव सं ई प्रसंग सेहो, एकर साक्ष्य सेहो मेटा जायत। हमर मत ई जा साक्ष्यब रहबाक चाही निक आ अधलाह दुनु तरहक काज'क। अहां अप्पसन कामेंट आ र्निणय सेहो आर्काइव मे जा के संबंधित रचना के पोस्टा-स्क्रिाप्टर के रुप मे भविष्या'क पाठक'क लेल सुरक्षित राखि सकैत छियन्हि। ई दोहरेबाक बहुत औचित्यक नहि जे विदेह निक लागि रहल अछि आ अहांक परिश्रम एकदम देखा रहल अछि। ईति,सदन।- Sadan Jha ………………………………………. Thank you.- Nishikant Thakur …………………………………………… Thanx Gajendraji, for your immediate response. I must congratulate you for the work you have done to save the sanctity of the literature world as a whole. I feel proud for the person like you who shows the courrage to bell the cat. If the so called writers like Parasharji are there to spoil the sea, on the other side it is very hopeful sight to have a person like you who is alert enough to take care of such filth & keep the sea clean. Thanx for enlightening me on the subject. Regards- Bhalchandra Jha. ………………………………….. पंकज पराशरकेर एहन कार्य पर स्मरण अबैत अछि करीब बीस-पचीस साल पहिलुक घटना, जहिया आकाशवाणी दरभंगासँ म,म,डॉ, सर गंगानाथ झाक एकमात्र मैथिलीक कारुणिक पदकेँ एक गोट कवि द्वारा अपन कहि प्रसारित कए देल गेल छल, जे बादमे (सजग श्रोता द्वारा सूचना देलाक बाद) आजन्म बैन कए देल गेलाह । कहबाक तात्पर्य जे जँ हम मैथिल दरभैगा- मधुबनीमे गंगानाथ बाबूक पदकेँ अपन कहि सकैत छी तँ ई कोन बड़का गप। निश्चये एहन रचनाकारकेर सङ्ग कड़गर डेग उठाएब आवश्यक ।- ajit mishra …………………………………….. Dear Gajendrajee, We should take strong step to prevent such intellectual cheats. My support is always with you.- K N Jha ………………………………………………. This seems to be a dangerous trend and we should also try and refrain from publishing anything from such authors. Regards,- Prof. Udaya Narayana Singh ……………………………………………………….. प्रियवर ठाकुर जी, मैथिल साहित्यकार आब साइबर क्राइम सेहो क रहल छथि, ई जानि अपार प्रसन्नता भेल | पंकज पराशर के नकारात्मक बुद्धिक पूर्ण उपयोग करबाक लेल हम नोबेल प्राइज सा सम्मानित कराय चाहैत छी |- बुद्धिनाथ मिश्र ……………………………………………….. Sampadak Mahoday, Apne ehi prakarak durachar rokwak lel je prayash ka rahal chhee ohi lel dhanyabad.Ehen blackmailer sa maithili ken bachayab aawashyak achhi, Sadar- SHIV KUMAR JHA …………………………………………………. गजेन्द्र भाई, नमस्कार ! मैथिली मे एहि तरहक काज लगातार भ' रहल अछि । किछु व्यक्ति एहि धंधा मे अग्रसर छथि । मैथिलीक सम्पादक लोकनिक अनभिज्ञताक फायदा कतेको अंग्रेजी पढ़निहार तथाकथित साहित्यकार लोकनि उठा रहल छथि । पंकज जीक पहल मे छपल लेख के हम सेहो पढ़्ने र्ही आ किछुए दिनक बाद हम नेट पर मूल लेखकक आलेख के सेहो पढ़लहु । हमरा त' आश्चर्य लागल छल जे पंकज जी आलेखक कम स कम शीर्षक त' बदलि लैतथि मुदा हुनका एतेक ज्ञान रहितनि तखन की छल । एतबे नहि , हिनक बहुत रास कवितो अंग्रेजी साहित्य स' हेर-फेर कयल गेल अछि । खैर ! जे करथि ... । मुदा एहि बेर कहाबत ठीक होबाक चाही " सौ सोनार के त' एक लोहार के " । प्रकाशन मे जे भी कियो व्यक्ति गलती क' रहल छथि हुनका गंभीर क्रिमिनल बुझबाक चाही । धन्यवाद एहि लेल अहाँ के जे एतेक जोरदार तरीका स' एहि गप्प के उठैलहु ।- अहाँक- प्रकाश चन्द्र (प्रकाश झा, मैलोरंग) ………………………………………………. pankaj parashar vala prasang bar dukhad laagal. - kamini ……………………………………… Gajendr jee, maamailaa ke tool jatabe debainhi, sabhak oorjaa otabe svaahaa hetai. हमर मनतब एतबे, जे एक बेर अहां देखार क देलहुं, आब छोडि देल जाओ. हिन्दीयो मे एहिना भ रहल छै. बेर बेर आ खराब भाषा मे लिखल मोन के दुखी करैत अछि. फेर लागैत अछि जे अहि मे समय कियैक नष्ट करी? हिन्दुस्तान मे जाति आ सेहो मैथिली से जाति नयि जाएत. हम एकरा नयि मानैत छलहुं मुदा आब 30 बरख से मैथिली मे लिखनाक बाद आब देखल जे एक ओर 1 मैथिली साहित्य मे लिली जी, उषा जी आ शेफलिका जी के बाद यदि किओ नाम लैत अछि त हमर. 2 एखनो कोनो पत्रिका बै छै त हमरा लेल रचनाक आग्रह होइते छै. 3 एखनो हम ओतबे सक्रिय छी आ निरंतर लिखि रहल छी. 4 दुखद जे हमरा बाद (सुस्मिता पाठक आ ज्योत्स्ना मिलन के हम अपने तुरिया बुझैत छी) के बाद एहेन कोनो सशक्त कोन, महिला लेखने नयि आएलए. 5 ई स्थिति रहलाक बादो, आब जहन हम देखै छी, त पाबै छी जे हमरा पर, हमर रचना यात्रा अथव हमर रचना पर किछु नयि लिखल गेलए, चाहे ओ मोहन भारद्वाज रहथु अथवा आन किओ. जहन हमर दशक केर चर्च होइत छै, तीन चारिटा नाम पर सविस्तार चर्चा होइत छै, जाहि मे हमर नाम नयि रहैत छै. हमर नाम मात्र सन्दर्भ लेल जोडि देल जाइत छै. 6 एतेक दिन मे मात्र रमण जी हमरा पर एक गोट लेख लिखलन्हि. हम ओकरा पुन: टाइप करबा के अहां लग पठायब. 7 जाति पाति धर्म आ द्वेष पर कहियो ध्यान नयि देलाक कारणे त कही हमर ई स्थिति नयि छै, आब हमरा ई सोचबा मे आबि रहल अछि. 8 हमर शिक्षक, जे स्वयं हिन्दी के ख्यातिलब्ध कथाकार छथि, हमरा बुझेने रहलाह जे हम मैथिली मे लिखब बन्न क; दी, कियैक त हम गैर मैथिल (जाति विशेष) से नयि छी, तैं हमर लेखन के कहियो मैथिल सभ नयि नोटिस करताह, कहियो किछु नयि करता.. अपन भाषाक प्रति प्रेम के आगरह कारणे हम हुनकर बात नयि मानलियै, लिखैत गेलहुं, मुदा आब लागि रहलअए जे हुनकर कहबी सही छलन्हि की? 9 एखनो की हाल छै मैथिली मे, देखियो. ओकरा विरुद्ध किछु करियु. मैथिली मे जे पैघ पैघ संस्था चाइ, चेतना समिति सनक, सभ बेर विद्यापति पर्व मनबैत छथि. लाखो खर्च करै छथि, मुदा नीक लेखक केर पोथी सभ बेर 5-7 टा निकालैथु, से नयि होबैत छन्हि. 10 हमरा भेटल जानकारी के मोताबिक विद्यापति हॉल किराया पर चढै छै. तकरा मे कोनो आपत्ति नयि, यदो ओकरा से किछु आय होबै. मुदा ओकरा मैथिलीक काज अथवा नाटक आदि लेल मांगल जाएत, त; नयि भेटै छै. यदि ओकर शुल्क चुका दी, तहन त किरायाके रूप मे किऊ ल' सकि छै. एकरा सभ के उजागर करी. 11 व्यक्ति से संस्था पैघ होइत छै. जतेक संस्था सभ छै, तकरा पर लिखी, साहित्य अकादमीक मैथिली विभाग सहित. 12 लिली रेक सभटा रचनाक अनुवाद अधिकार हमरा देने छथि. हुनक साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त पोथी 'मरीचिका' केर हिन्दी अनुवाद लेल पिछला 2-3 साल से हम लिखि रहल छी. साहित्य अकादमीक पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य" मे हम पिछला 25 साल से अनुवाद सहित छपि रहल छी. मुदा हमरा से अनुवादक नमूना मांगल गेल. ओहि कुर्सी पर जे स्वनाम धन्य बैसल छथि, हुनका हमरा मादे नयि बूझल त कोनो मैथिल साहित्यकार से पूछि सकैत छलाह. ई तहिने भेलै, जेना एक बेर एक गोट चैनल ऋषिकेश मुखर्जी से हुनकर बायोडाटा मंगने छल आ एखनि पढल समाचारक अनुसारे आ. जानकी वल्लभ श्हस्त्री से हुनकर बायोडाटा पद्मश्री लेल मांअगल गेलैय. 13 अपन विनम्रता दर्शाबैत हम लिली जीक दू तीन टा कथाक हिन्दी अनुवाद हम पठा देलियन्हि. तैयो अई पर कोनो विचार नयि. लिखला के बाद हमरा कहल गेल जे हम लिली जी से साहित्य अकादमी के अनुवादक अधिकार दियाबे मे मददि करी. आरे भाई, अहां के अनुवाद से मतलब अछि ने, आ जहन हम अनुवाद क; के देब' लेल तैयार छी तहन अकादमी के किअयैक अधिकार चाही? अई लेल जे अकादमी अपन पसीनक आदमी के अनुवाद लेल द; सकय. एखनि धरि ओकरा पर निपटारा नयि भेलैये. अकादमी से फेर कोनो पत्र नयि आएल अछे. अनुवाद तैयार राखल छै. लिली जी आब बहुत बुजुर्ग भ; गेल छथि. हुनक मात्र इयैह इच्छा छै (आ बहुत स्वाभाविक) जे हुनकर पोथी सभ हुनका सोझा मे प्रकाशित भ; जाए. 14 लिली जी के पोथी हिन्दी मे आनबाक श्रेय हमरे अछि, ई मनितहुं ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. 15 मैथिली के भारतीय ज्ञानपीठ से पुस्तक प्रकाशन लेल हमही आगां एलहुं आ प्रभास जी आ लिली जी के पोथी बहार भेलै.भारतीय ज्ञानपीठ से मैथिली पुस्तक प्रकाशन के श्रेय हमरे छन्हि, ईहो मनैत ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. गजेन्द्र जी, मैथिलीक ई सभ मानसिकता पर आन्दोलन करी जाहि से रचनाकार आ वरिष्ठ रचनाकार सभ के अपमानित नयि होब' पडै. अहां चाही त' एकरा विदेह पर द' सकै छी. हम दोसर बात सेहो लिखि के पठायब. मुदा हम फेर कहब, जे हम व्यक्ति के नयि संस्था आ व्यक्ति के मानसिकता के दोष देबन्हि. लोक पढथु आ पूचाथु ई स्वनामधन्य सभ से जे जकरा से अहां के गोलौंसी अछे, तकरा पर अहां लिखब आ जकरा से नयि अछे, जे मौन भावे लिखि रहलए कोनो विविआद मे पडल बगैर, हुनका लेल ई व्यवहार? -विभा रानी. ………………………………………………. Shri gajendraji, good work. Anha sa ehina neer khshir vivekakak ummeed lagatar banal rahat. chor ke ehina dekhar kelak baad dandit seho karbak prayas karbaak chahi. anha bahut raas neek pahal ka rahal chhi. Saadhuvaad.- manoj pathak. …………………………………………… We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi Vidyapati. I know him very well and his group as well. They have no love for Maithili in fact they are the moles planted by vested Hindi writers to damage maithili. Parashar and likes are the distructive lots and they are the culprits for agonising senior writers of Maithili those who dedicated their life for Maithili language and literature. I have no sympathy for him. I cant say, even, God bless them. - Chitra Mishra ………………………………………….. तारानन्द वियोगी: (मिथिला सृजन: जून-जुलाई २०१०, वर्ष-१, अंक-२): हुनक (पंकज पराशरक) अनेक रचना एहनो छनि जकर जन्म दोसरक काव्य रचना पढ़लाक अनन्तर भेलनि अछि। कविता ओ परिपूर्णतः हुनके थिकनि मुदा किछु गोटेकेँ ई कहबाक अवसर भेटि गेलनि जे ओ पंकज चोर-कवि थिकाह। हम देखैत छी जे चोर समीक्षक भने ओ होथु, चोर-कवि ओ कदापि नहि छथि। मुदा एना किएक भेल? एहि दुआरे भेल जे आनक रचना पढ़ि कऽ अपन अनुभूतिमे उतरैत काल ओ आनक आभामंडलसँ तेना आक्रान्त छलाह जे तकर छाप कविताक दृश्यमे देखार पड़ि गेल। ई वस्तुतः सिद्धताक कमी थिक, जकरा क्यो रचनाकार रचिते-रचिते सिद्ध कऽ सकैत अछि। ……………………………………………………….. गौरीनाथ (अनलकान्त)- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। ………………………………………………….. ई पंकज झा पराशर पहिनहियेसँ एहि सभमे संलग्न अछि, हरेकृष्ण झाक कविताकेँ हिन्दीमे, बिना अनुमतिक, छपबै छथि; ई गप आर पुष्ट होइत अछि कारण विद्यानन्द झा जीक कविता सेहो ई पंकज झा पराशर एकटा हिन्दी पत्रिकामे बिना अनुमतिक छपबओलक (ई सूचना हरेकृष्ण झा जी द्वारा प्राप्त भेल, जे विदेहमे छपलाक बाद पंकज झा पराशर हुनका फोन कऽ कय टॉर्चर केलकन्हि जखन ओ बीमार रहथि। हरेकृष्ण झा जी फोन द्वारा सेहो सूचित केलन्हि, हम कहलियन्हि जे की ई सूचना विदेहसँ हटा दी? तँ हरेकृष्ण झा जी कहलन्हि, रहऽ दियौ, सत्य जे छै, से ईएह छिऐ- सम्पादक)। ई पंकज झा पराशर कएक बेर, केलक मुदा ऐ बेर तँ ओ अपने नामे दोसराक रचना छपबा लेलक, अनुवादक रूपमे नै।-सम्पादक) रमेशक आलेख-बहस-पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक- पर किछु पाठकक विचार: SHIV KUMAR JHA TILLOO JAMSHEDPUR said... Ramesh jee ken dhanyavad,satya gapp bajwak saahas "MITHILA" me aabi rahal achhi neek laagal,chhadma lokpriyatak khatir lok kichu ka sakait achhi..Pankaj Parasharak..aab charch karab seho nahi sohay laagi rahal..jatek ninda kayal jay kum parat.Muda RAMESH BABU HU APNE SABH NINDA KARAY CHHEE AA KICHU LOK KAHAIT CHHATHI PANKAJ JEE JUG-JUG JIWATHU,ONA HAMHU HUNAK DIRGHA JEEVANAK KAAMNA KARAIT CHHEE,PARANCH SABHAK JE JUG-JUG JIWAK KAAMNA KAYAL JAY MATRA PANKAJ PARASHARAK LEL NAHI.."SARBE BHAWANTU SUKHINAH", RAMESH BABU APAN LEKHANI KEN GATI NIRANTAR RAKHAL JAY... Rama Jha said... ehi vyakti pankaj parasharak ekta ehane ghrinit message ekta mahila je hamar mitra chathi, ke bhetal chhai, etek ghrinit je etay nai likhi sakai chhi, apan rachna ke dosar bhasha me mool kahi prakashit kaenai chori te nai bhelai, muda okara svayam dvara anoodit kahi prakashit karebak chahe, mool maithili se dosar bhasha (hindi aadi me), va dosar bhasha (hindi aadi se) maithili me. आशीष अनचिन्हार said... जहाँ धरि पराशर- घटना अछि ओहि जतेक खिध्धाशं कएल जाए ततेक कम। मुदा रमेश भाइ विभारानीक कोन भाषा मे समीक्षा कएल जाए हिदीं मे की मैथिली मे । हमरा हिसाबे एकै रचना के दू- तीन भाषा मे मूल कहि प्रकाशित करब सेहो चोरि भेल। एहू पर धेआन देल जाए। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रमेश बहस-पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक विदेह-सदेह २ (२००९-१०) सँ पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि आ साइबर अपराधक पापक घैलक महा-विस्फोट भेल अछि। ई पैघ श्रेय पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ जाइत छनि। हुनकर अपराध पकड़बाक चेतना केर जतेक प्रशंसा कयल जाय, कम होयत। “विदेह”क मैथिली प्रबन्ध-समालोचना- अंक, अइ पोल-खोल लेल कएक युग धरि विलम्बित भऽ कऽ निबद्ध रहत, से “समय केँ अकानैत” कहब कठिन अछि। साहित्योमे चौर्यकलाक उदाहरण पहिनहुँ अबैत रहल अछि गोटपगरा। मुदा एक बेरक चोरि पकड़ा गेलाक बाद प्रायः चोरिक आरोपी साहित्यकार मौन-व्रत धारण करैत रहलाह अछि आ मामिला ठंढ़ाइत रहल अछि। मुदा ताहि परम्पराक विपरीत अइ बेरक चोर ’सिन्हा चोर’ निकलल अछि आ विगत एक दशकसँ निरन्तर चोरि करैत जा रहल अछि- सेन्ह काटिकऽ। आ तेहेन महाचोरकेँ मैथिलीक साहित्यकार आ संस्था सभ तरहत्थीपर उठा-उठा कऽ पुरस्कृत केलक अछि आ समीक्षाक चासनीमे चोरायल कविता सबकेँ बोरि देल गेल अछि। विदेह-सदेह-२ प्रमाण-पुरस्सर अभियोगे टा नहि लगौलक, अपितु एहेन महत्वाकांक्षी असामाजिक तत्वक विरुद्ध साहित्यिक दण्ड आरोपित कऽ अपन “बोल्डनेस” सेहो प्रदर्शित केलक अछि। एक दशकमे तीन बेर पकड़ायल चोर प्रायः “डेयर डेभिल” होइत अछि आ अपन अनुचित। सीमाहीन महत्वाकांक्षाक पूर्ति लेल अपन वरीय संवर्गीय व्यक्तिकेँ सीढ़ीक रूपमे उपयोग करैत अछि आ स्वार्थ-सिद्धिक उपरान्त अपन पयर सँ ओही सीढ़ीकेँ निचाँ खसा दैत अछि। फेर ओकरा अपन ट्विटर-फेसबुक-नेट वा पत्रिकामे गारिक निकृष्टतम स्तरपर उतरऽ मे कनियों देरी नहि होइत छै। ओ नाम बदलि-बदलि कऽ गारि पढ़ैत अछि आ अपन प्रशंसामे जे.एन.यू.क छात्र-छात्राक पोस्टकार्ड लिखेबामे अपस्याँत भऽ जाइत अछि। ओ हिन्दीक कोनो बड़का साहित्यकारक बेटीक संग अपन नाम जोड़ि विवाहक वा प्रेम-प्रसंगक खिस्सा रस लऽ लऽ कऽ प्रचारित करैत अछि। एहेन प्रवृत्ति कएटा आओर तिकड़मबाजमे देखल गेल अछि जे हिन्दीक पैघ-पैघ नामक माला जपि कऽ मठोमाठ होअय चाहैत अछि। वस्तुतः ई चिन्ताजनक तथ्य थिक जे मैथिलीक नव-तूरकेँ हिन्दीक पैघ-पैघ नामक वैशाखीक एतेक जरुरति किऐक होइत छनि? “विदेहक” “इनक्वायरीक विवरण” पढ़ि कऽ रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। पहल-८६ आ आरम्भ-२३ मे जे पोल खूजल छल, अइ तथाकथित साहित्यकारक, तकरा बादे मैथिली साहित्यसँ बारि देल जेवाक चाहैत छल। मुदा विडम्बना देखू जे चेतना समिति सम्मानित कऽ देलक। “मैथिल ब्राह्मण समाज”, रहिका (मधुबनी) सन अँखिगर संस्थाकेँ चकचोन्ही लागि गेल, जखनकि संस्थामे विख्यात साहित्यकार उदयचन्द्र झा “विनोद” आ पढ़ाकू प्रोफेसरगण छथि। ई संशयविहीन अछि जे पुरस्कृत करेबामे विनोदजीक महत्वपूर्ण भूमिका रहल हैत। “विदेह” द्वारा रहस्योद्घाटन केलाक बावजूद एखन धरि चेतना समिति अथवा मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिकाकेँ अपन पुरस्कार आपस करेवाक वा आने कोनोटा कार्रवाई करवाक बेगरता नहि बुझा रहल छै आ सर्द गुम्मी लधने अछि। एहेन “जड़-संस्था” सभ मैथिली साहित्यक उपकार करैत अछि वा अपकार? ई केना मानल जाय जे पहल-८६ वा आरम्भ-२३ अइ दुनू संस्थाक कोनो अधिकारी वा साहित्यकारकेँ पढ़ल नहि छलनि? ई आश्चर्यजनक सत्य थिक जे मैथिलीक कएटा पैघ साहित्यकार पंकज पराशरक कृत्रिम काव्य आ आयातित शब्दावलीमे फँसि गेलाह अछि। “विलम्बित कएक युग मे निबद्ध” क भूमिकामे अनेरो विदेशी साहित्यकारगणक तीस-चालिस टा नाम ओहिना नहि गनाओल गेल अछि, अपन कविता केँ विश्वस्तरीय प्रमाणित करबाक लेल अँखिगर चोरे एना कऽ सकैत अछि। सम्भावना बनैत अछि जे डगलस केलनर जकाँ ओहू सभ कविक रचनाक भावभूमिक वा शब्दावलीक चोरिक प्रमाण एही काव्य-पोथीमे भेटि जाय। अंततः मि. हाइडक कोन ठेकान? मैथिलीमे तँ लोक विश्व-साहित्य कम पढ़ैत अछि। तकर नाजायज फायदा कोनो ब्लैकमेलर किऐक नहि उठाओत? आखिर टेक्नो-पोलिटिक्स की थिक- टेकनिकल पोलिटिक्स थिक, सैह किने? एकरा बदौलत झाँसा दऽ कऽ पाकिस्तानोक यात्रा कयल जा सकैत अछि। “टेक्नो-पोलिटिक्सक” बदौलत किरण-यात्री पुरस्कार, वैदेही-माहेश्वरी सिंह “महेश” पुरस्कार, एतेक धरि जे विदितजीक अकादमीयोक पुरस्कार लेल जा सकैत अछि। प्रदीप बिहारीक सुपुत्रक भातिज-कका सम्बन्धक मर्यादाक अतिक्रमण कयल जा सकैत अछि। प्रो. अरुण कमलक “नये इलाके में” सेंधमारी कऽ कऽ “समय केँ अकानल” जा सकैत अछि। आर तँ आर, अइ टेकनिकल पॉलिटिक्सक बदौलत जीवकान्तजी सन महारथी साहित्यकारसँ “विलम्बित कएक युग...” पोथीक समीक्षा लिखबा कऽ “मिथिला दर्शन” (५) सन पत्रिकामे छपवा कऽ स्थापित आ अमर भेल जा सकैत चछि। मैथिली साहित्यक सभसँ पैघ सफल औजार थिक “टेक्नो पोलिटिक्स”! ई मानल जा सकैत अछि जे मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ आरम्भ-२३ आ पहल-८६ कोलकातामे नहि भेटल होइन्हि। मुदा जीवकान्तजी नहि पढ़ने हेताह से मानबामे असौकर्य भऽ रहल अछि। जीवकान्त जी तँ प्रयाग शुक्लक “चन्द्रभागा में सूर्योदय” आ एही शीर्षकक नारायणजीक कविता (चन्द्रभागामे सूर्योदय) सेहो पढ़ने हेताह जे छपल अछि मैथिलीमे। तखन पंकज पराशरक समुद्रसँ असंख्य प्रश्न पूछऽवला कविताक भावार्थ किऐक नहि लगलनि जे समीक्षामे कलम तोड़ि प्रशंसा करऽ पड़लनि वा करा गेलनि? एकरा “प्रायोजित समीक्षा” किऐक नहि मानल जाय? की प्रयाग शुक्ल वा नारायणजीक समुद्र विषयक कवितासँ वेशी मौलिकता पंकज पराशरक कवितामे भेटलनि जीवकान्तजीकेँ? ओइ सभ कविताक कनियोँ “छाया”क शंको नहि भेलनि समीक्षककेँ? “सभ्यताक सभटा मर्मान्तक पुकार”क नोटिस लेबऽवला समीक्षककेँ साहित्यिक चोरि असभ्य आ मर्मान्तक पीड़ादायक नहि लगलनि? आब जीवकान्तजी सन समीक्षकक “पोजीशन फॉल्स” भऽ जेतनि से अन्दाज तँ मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ नहियें रहनि, उदय चन्द्र झा “विनोद” केँ सेहो नहि रहनि। ई अभिज्ञान तँ पंकजे पराशर टाकेँ रहल हेतनि? बेचारे “पराशर” मुनिक आत्मा स्वर्गमे कनैत हेतनि आ पंकसँ जनमल जतेक कमल अछि सब अविश्वसनीय यथार्थक सामना करैत हेताह। पराशर गोत्री भऽ कऽ तीन बेर चोरि केनाइ “पराशर” महाकाव्यक रचयिता स्व. किरणजीकेँ सेहो कनबैत हेतनि। आखिर जीवकान्तजी साहित्यिक चोरिक नोटिस किए ने लेलनि, जखनकि हुनका विचारेँ “मैथिलीक समीक्षक प्रायः मूर्खता पीबिकऽ विषवमन करैत अछि”(विदेह-सदेह-२-२००९-१०)/ विनीत उत्पल-साक्षात्कार आ जीवकान्तजी स्वयं पंकज पराशरक चोरिवला कविता-पोथीक समीक्षक छथि, अपितु चौर्यकला प्रवीण कविक घोर प्रशंसक छथि। तखन अइ समीक्षा-आलेखमे अन्तर्निहित असीम-प्रशंसा साकांक्ष-पाठककेँ “विष-वमन” कोना ने लगौक? हुनका सन “पढ़ाकू” समीक्षक-पाठककेँ “फॉल्स पोजीशन”मे अननिहार “एक्सपर्ट आ हैबिचुएटेड” साहित्य-चोरसँ प्रशंसा आ पुरस्कार दुनू पाबि जाय तँ मैथिली-काव्यक ई उत्कर्ष थिक वा दुर्भाग्य? अंततः विदेह-सदेह टा किऐक निन्दा केलक एहि घटनाक? आन कोनो पत्रिका किऐक नहि केलक? डॉ. रमानन्द झा “रमण” इन्टरनेटपर निन्दा करैत छथि तँ घर-बाहर पत्रिकामे किऐक नहि जकर ओ सम्पादक छथि? चेतना समिति, पटना सम्मानित करैत अछि एहने-एहने साहित्यकारकेँ तखन अपने पत्रिकामे कोना निन्दा करत, जखनकि पुरस्कार आपसो नहि लैत अछि, जानकारी भेलाक वा साकांक्ष साहित्यकारक अनुरोध प्राप्त भेलाक बादो? नचिकेताजी नेटपर निन्दा करताह आ “विदेह”मे छपत तँ “मिथिला दर्शन”मे किऐक नहि निन्दा वा सूचना छपल? कारण स्पष्ट अछि- जीवकान्तक समीक्षा पंकज पराशरक काव्य-पोथीपर छपत, तखन ओही पोथीक चोरि कयल कविताक निन्दा कोना छपत? चारु भाग साहित्यिक आदर्श, मर्यादा आ नैतिकताक धज्जी उड़ि रहल अछि- पितामह आ आचार्यगणक समक्ष आ (अनजाने मे सही) हुनको लोकनिक द्वारा। मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिका; चेतना समिति, पटना आ साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीमे अन्ततः कोन अन्तर अछि वा रहल? एहेन नामी पुरस्कारक संचालन आ चयनकर्ता महारथी सभकेँ नव लोककेँ पढ़बाक बेगरता किऐक नहि बुझाइत छनि? बिना पढ़ने पुरस्कारक निर्णय वा समीक्षाक निर्णय कतेक उचित, जखन कि ई चोरि तेसर बेरक चोरि थिक आ से छपि-कऽ भण्डाफोड़ भेल अछि। एकरा वरेण्य आ वरीय साहित्यकारगण द्वारा काव्य-चोरि, आलेख-चोरिकेँ प्रश्रय देल जायब किऐक नहि मानल जाय, जखनकि आरम्भ, मैथिल-जन, पहल आ विदेह-सदेह पहिनहि छापि चुकल छल? की साहित्यिक चोरिकेँ प्रश्रय देब, दलाल वर्गकेँ प्रश्रय देब नहि थिक? एहेन सम्भावनायुक्त नव कविकेँ प्रश्रय देब मैथिली साहित्य लेल घातक अछि वा कल्याणकारी, जकरा मौलिकतापर तीन बेर प्रश्न चेन्ह लागल होइक? की पोथीक आकर्षक गत्ता देखि वा विदेशी कविगणक नामावली (भूमिकामे) पढ़ि कऽ समीक्षा लिखल जाइत अछि वा पुरस्कारक निर्णय लेल जाइत अछि? जँ से भेल हो तँ सब किछु “ठिक्के छै भाइ”? अइ सबसँ तँ जीवकान्तजीक बात सत्य बुझाइत अछि जे समीक्षकगण दारू पीबि कऽ वा पैसा पीबि कऽ वा मूर्खता पीबि कऽ समीक्षा लिखैत छथि। डगलस केलनरक “टेक्नोपोलिटिक्स” तँ छपि गेल “पहल”मे चोरा कऽ। आब जीवकान्तजी, ज्ञान रंजनजी अथवा हिन्दी जगतक आन साहित्यकार-सम्पादकसँ पूछथु जे नोम चोम्स्कीवला रचना कतय गेल, की भेल, कोन नामें छपल? पंकज पराशरक नामें कि पदीप बिहारीजीक सुपुत्रक नामेँ (अनुवाद रूपमे)। ई रिसर्च एखन नहि भेल तँ भविष्यमे पुनः एकटा साहित्यिक चोरिक पोल खूजत? अंततः एकटा माँछकेँ कएटा पोखरिकेँ प्रदूषित करए देल जाय आ से कए बेर? उदय-कान्त बनि कऽ गारि पढ़वाक आदति तँ पुरान छनि डॉ. महाचोर केँ। ककरो “सरीसृप” कहि सकैत छथि (मैथिल-जन) आ कोनो परिवारमे घोंसिया कऽ विष वमन कऽ सकैत छथि। ऑक्टोपसक सभ गुणसँ परिपूर्ण डॉ. पॉल बाबाकेँ चोरिक भविष्यवाणी करवाक बड़का गुण छनि तेँ हिनका नामी फुटबॉल टीम द्वारा पोसल जाइत अछि, जाहिसँ “विश्व-कप”केँ दौरान अइ “अमोघ अस्त्रक” उपयोग अपना हिसाबेँ कयल जा सकय। सहरसा-कथागोष्ठीमे पठित हिनकर पहिल कथाक शीर्षक छल- हम पागल नहि छी। ई उद्घोषणा करवाक की बेगरता रहैक- से आइ लोककेँ बुझा रहल छैक। अविनाश आ पंकज पराशरक मामाजी तहिया हिनकर कथाकेँ “टिप्पणीक”क्रममे मैथिली-कथाक “टर्निंग प्वाइन्ट” मानने छलाह। आइ ओ “टर्निंग प्वाइन्ट” ठीके एक हिसाबेँ “टर्निंग प्वाइन्ट” प्रमाणित भेल, कारण कथाक ओहि शीर्षकमे सँ “नहि” हटि गेल अछि, हिनकर तेबारा चोरिसँ। हिनकर पहिल चोरि (अरुण कमलक कविता- नए इलाके में) क निन्दा प्रस्तावमे “मामाजी” आ डॉ. महेन्द्रकेँ छोड़ि, सहरसाक शेष सभ साहित्यकार हस्ताक्षर कऽ “आरम्भ”केँ पठौने छलाह। आइ ओ हस्ताक्षर नहि केनिहार सभ कन्छी काटि कऽ वाम-दहिन ताक-झाँक करवाक लेल बाध्य छथि। द्वैध-चरित्र आ दोहरा मानदण्डक परिणाम सैह होइत अछि। अविनाश तखन तँ देखार भऽ जाइत छथि जखन ओ विदेह-सदेह-२ मे लिखैत छथि जे “एकरा सार्वजनिक नहि करबै”। नुका कऽ सूचना देवाक कोन बेगरता? पंकज पराशरसँ सम्बन्ध खराब हेवाक डर वा कोनो “टेक्नोपोलिटिक्स”(?) केर चिन्ता? विदेह-सदेह-२ क पाठकक संदेश तँ कएटा साहित्यकारकेँ देखार कऽ दैत अछि। जतय राजीव कुमार वर्मा, श्रीधरम, सुनील मल्लिक, श्यामानन्द चौधरी, गंगेश गुंजन, पी.के.चौधरी, सुभाष चन्द्र यादव, शम्भु कुमार सिंह, विजयदेव झा, भालचन्द झा, अजित मिश्र, के.एन.झा, प्रो.नचिकेता, बुद्धिनाथ मिश्र, शिव कुमार झा, प्रकाश चन्द्र झा, कामिनी, मनोज पाठक आदि अपन मुखर भाषामे प्रखरतापूर्वक निन्दनीय घटनाक निन्दा केलनि अछि, ततहि अविनाश, डॉ. रमानन्द झा “रमण”, विभारानीक झाँपल-तोपल शब्द आश्चर्य-भावक उद्रेक करैत अछि। मुदा संतोषक बात ई अछि जे पाठकक “प्रबल भाव-भंगिमा” साहित्यकारोक “मेंहायल आवाज”क कोनो चिन्ता नहि करैत अछि। विभारानी तँ कमाले कऽ देलनि। एहि ठाम मैथिली भाषा-साहित्यक एक सय समस्या गनेवाक उचित स्थान नहि छल। ई ओनाठ काल खोनाठ आ महादेवक विवाह कालक लगनी भऽ गेल। कोनो चोर बेर-बेर अपन कु-कृत्यक परिचय दऽ रहल अछि आ हुनका समय नष्ट करब बुझा रहल छनि आ चोरकेँ देखार केलासँ दुःख भऽ रहल छनि? ओ अपन प्रतिक्रियामे कतेक आत्म श्लाघा आ हीन-भावना व्यक्त केलनि अछि से अपने पत्र अपने ठंढ़ा भऽ कऽ पढ़ि कऽ बूझि सकैत छथि। हिन्दीयोमे एहिना भऽ रहल अछि, तेँ मैथिलीमे माफ कऽ देल जाय? आब हिन्दीसँ पूछि-पूछि कऽ मैथिलीमे कोनो काज होयत? विभारानी ज्योत्सना चन्द्रमकेँ ज्योत्सना मिलन केना कहैत छथि? हुनकर उपेक्षा कोना मानल जाय? ओ सभ साहित्यिक कार्यक्रममे नोतल जाइत छथि, सम्मान आ पुरस्कार पबैत छथि, पाठक द्वारा पठित आ चर्चित होइत छथि। समीक्षाक शिकाइत की उच्चवर्णीय (?) साहित्यकारकेँ मैथिलीमे नहि छनि? समीक्षाक दुःस्थिति सभ जातिक मैथिली साहित्यकार लेल एके रंग विषम अछि। ओइ मे जातिगत विभेद एना भेलए जे ब्राह्मण-समीक्षक, आरक्षणक दृष्टिकोणेँ निम्न जाति (?)क साहित्यकारक किछु बेशीए समीक्षा (सेहो सकारात्मक रूपेँ) केलनि अछि। समीक्षा आ आलोचनाक विषम स्थितिक कारणें जँ नैराश्यक शिकार भऽ जाय लेखक, तँ लेखकीय प्रतिबद्धताक की अर्थ रहि जायत? विभाजीकेँ बुझले नहि छनि जे हुनका लोकनिक बाद मैथिली महिला लेखनमे कामिनी, नूतन चन्द्र झा, वन्दना झा, माला झा आदि अपन तेवरक संग पदार्पण कऽ चुकल छथि। हुनका ने कामिनीक कविता संग्रह पढ़ल छनि आ ने “इजोड़ियाक अङैठी मोड़”। हुनका अपन गुरुदेवक बात मानि हिन्दीमे जाइसँ के कहिया रोकलकनि? ओ गेलो छथि हिन्दीमे। मातृभाषाक प्रेरणा अद्वितीय होइत छै। मैथिलीक जड़ संस्था अथवा समीक्षक सभपर प्रहार करबामे हमरा कोनो आपत्ति नहि, मुदा अर्थालाभ तँ एतय नगण्य अछिए। सामाजिक सम्मान विभाजीकेँ अवश्य भेटलनि अछि। समाजमे “जड़”लोक छै तँ “चेतन” लोक सेहो छैक। हुनकासँ मैथिली भाषा-साहित्य आ मिथिला-समाजकेँ पैघ आशा छै, हीनभाव वा आत्मश्लाघासँ ऊपर उठि काज करवाक बेगरता छैक। सक्षम छथि ओ। हुनका श्रेय लेवाक होड़सँ बँचवाक चाही। अन्यथा साहित्य अकादेमी प्रतिनिधि, दिवालियापन केर शिकार जूरीगण आ मैथिलीक सक्षम साहित्यकारमे की की अन्तर रहि जायत? विभारानीक विचलनक दिशा हमरा चिन्तित आ व्यथित करैत अछि। ओ दमगर लेखिका छथि, सशक्त रचना केलनि अछि, आइ ने काल्हि समीक्षकगण कलम उठेबापर बाध्य हेबे करताह। समीक्षकक कर्तव्यहीनतासँ कतौ लेखक निराश हो? पंकज पराशरक श्रृंखलाबद्ध साहित्यिक चोरिपर सार्थक प्रतिक्रिया देब कोनो साहित्यकार लेल अनुचित नहि अछि कतहुसँ। साहित्यकार लेल साहित्यिक मूल्यक प्रति ओकर प्रतिबद्धता मुख्य कारक होइत अछि आ हेवाको चाही आ तकरा देखार करवाक “बोल्डनेसो” हेवाक चाही। “चाही”वला पक्ष साहित्यमे बेशीए होइत अछि। एहेन-एहेन गम्भीर विषयपर साहित्य आ समाजक “चुप्पी” एहेन घटनाकेँ प्रोत्साहित करैत अछि आ जबदाह जड़ताकेँ बढ़बैत अछि, भाषा-साहित्यकेँ बदनाम तँ करिते अछि। जाधरि पंकज पराशरक चोरि-काव्यक समीक्षा लिखल जाइत रहत, विभारानीक मूल-रचनाक समीक्षा के लिखत? ककरा जरूरी बुझेतैक? विभारानी अपने तँ समीक्षा प्रायोजित नहि करओती? सक्षम लेखकक व्यवहारोक अपन स्तर होइत छै। तेँ संगठित भऽ चोरिक भर्त्सना हेवाक चाही। राजकमल चौधरी आ आन लेखकक रचनाक चोरि पंकज पराशर प्रसंग पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... ParasharsIntellectualTheft पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक। तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि आ एकटा इनक्वायरी द्वारा एहि पोथीक ( डगलस केलनर बला घटनाक्रमक बाद) जाँच किछु चुनल लेखक-पाठक द्वारा कएल जएबा धरि रहत। प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि। विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... अन्तर्जालपर ब्लैकमेलिंग विरुद्ध गूगल, चिट्ठाजगत आ ब्लोगवानीकेँ सूचित करू, साइबर क्राइम आ ब्लैकमेलिंग रोकबा लेल सेहो ढेर रास प्रावधान छै, विशेष जानकारी ggajendra@gmail.com पर सम्पर्क करू। अहाँसँ पत्रकार, न्यूजपेपर, पत्रिका आ हिन्दीक गणमान्य लेखकगण/ प्रोफेसर/ विश्वविद्यालय आदिकेँ एहि घटनासँ सूचित करेबाक अनुरोध अछि। विशेष जानकारी लेबाक आ देबाक लेल ggajendra@gmail.com पर सूचित करू। Reply 01/26/2010 at 01:56 PM 2 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... you may also brought this episode before sanjay@jagran.com Thanks readers. Reply 01/26/2010 at 12:25 AM 3 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... But this time he has not used his name as maithil, mithila aa subodhkant but as Pankaj Parashar pparasharjnu@gmail.com Reply 01/25/2010 at 09:48 PM 4 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... The same blackmail letter has been sent by the blackmailer to my email address which has been spammed through ISP ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 and has been forwarded for taking Police action immediately. Reply 01/25/2010 at 09:45 PM 5 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... Professor Kellner has thanked me for this detective work, but it all your efforts dear reader. Reply 01/25/2010 at 08:21 PM 6 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... pahal=- 86, aarambh -23 aa arunkamalak naye ilake me ka sambandhit prishtha pathebak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/25/2010 at 08:16 PM 7 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... http://www.gseis.ucla.edu/courses/ed253a/newDK/intell.htm ehi link par douglas kellner ke lekhak anuvad pahal-86 ke page 125-131 par achhi- soochnak lel dhanyad pathakgan. Reply 01/24/2010 at 08:16 PM 8 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... ehi ghatnakram me kono pathak lag je Arun Kamal jik kavita "Naye Ilake Me" hoinh aa Aarambh (ank 23, maithili magazine editor Sh. Rajmohan Jha (March 2000) me prakashist maithili kavita "Sanjh Hoit Gam Me" te kripya ggajendra@gmail.com par soochit karathi- Dhanyavad. Reply 01/24/2010 at 08:02 PM 9 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... ehi ghatnakram me bahut ras aar jankari aa dher ras samarthan debak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/23/2010 at 11:40 PM 10 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... विदेहक पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक, प्रदीप बिहारीक बेटा प्रणव बिहारीसँ अनुवाद करबेलक आ कहलकै जे अनुवाद छपबा देब मुदा अपना नामसँ छपबा लेलक, प्रणवकेँ कहलकै जे अनुवाद रिजेक्ट भऽ गेल आ फेर हेरा गेल । तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि आ एकटा इनक्वायरी द्वारा एहि पोथीक ( डगलस केलनर बला घटनाक्रमक बाद) जाँच किछु चुनल लेखक-पाठक द्वारा कएल जएबा धरि रहत। प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि। विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। Reply 01/22/2010 at 12:03 PM 11 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... out of these three addresses of the spammer i.e. pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com the address pkjpp@yahoo.co.in, is fails verification test and addresses pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com stands verified and confirmed. Reply 01/21/2010 at 10:00 PM 12 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... the htpps host matches reliance communications and the corresponding email gamghar at gmail dot com and maithilaurmithila at gmail dot com is fake ids related with the actual spammers id i.e.pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com Reply 01/21/2010 at 08:50 PM 13 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... The office premise has been located, the blackmailer works in Dainik Jagran, Process to file complaint against Cyber Crime Act is being initiated and the organisation being taken into confidence. Reply 01/21/2010 at 06:13 PM 14 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... maithil, mithila aa subodhkant nam se abhadra aa blackmail karay bala blackmailer ke cheenhi lel gel achhi,ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 aa ban kayal ja rahal achhi, agan ohi organisation se seho sampark kayal jaayat jatay se ee email aayal achhi. Reply 01/18/2010 at 11:19 PM 15 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... comment moderation lagoo kayal ja rahal achhi Reply 01/18/2010 at 09:27 PM 16 सुबोधकांत said... अविनाशकेँ सेहो 220.227.174.243 आइ.एस.पी.सँ एहि प्रकारक ई-पत्र अबैत रहै मुदा ओ मामिला खतम कs देने रहथिन। ओ टिप्पणी सभ एतेक घृणित छैक तैयो एतए देल जा रहल अछि। पंकज पराशर उर्फ.....डगलस केलनर उर्फ अरुण कमल उर्फ... डगलस केलनरक नीचाँक आलेखकक पंकज पराशर द्वारा चोरि सिद्ध कएलक जे एक दशक पहिने एहि लेखक द्वारा अरुण कमलक चोरि सँ आइ धरि हुनकामे कोनो तरहक परिवर्तन नहि आएल छन्हि। हँ, आब ओ पटना विश्वविद्यालयक प्रोफेसरक रचना चोरेबासँ आगाँ बढ़ि गेल छथि आ कैलिफोर्निया वि.वि.क प्रोफेसरक रचना चोराबए लागल छथि। एहि सन्दर्भमे हमरा एकटा खिस्सा मोन पड़ैत अछि। २०-२२ बरख पुरान सत्य कथा। दरभंगामे रहैत रही, छतपर हम आ हमर एकटा पिसियौत भाइ साँझमे ठाढ़ रही। सोझाँमे सरवनजीक घरक बाअड़ीमे खूब लताम फड़ल छलन्हि। हमर पिसियौत भाइ हुनका इशारा दऽ कहलखिन्ह जे दस टा लताम आनू। ओ बेचारे दसटा लताम तोड़लन्हि आ आबि रहल छलाह आकि रस्तामे हमसभ देखलहुँ जे एकटा छोट बच्चा संग हुनका किछु गप भेलन्हि आ ओ पाँचटा लताम ओहि बच्चाकेँ दऽ देलखिन्ह। जखन सरवन जी अएलाह तँ कहलन्हि जे ओ बच्चा हुनका भैया कहि सम्बोधित कएलकन्हि आ पाँचटा लताम मँगलकन्हि- से कोना नञि दितियैक- सरवनजीक कहब छलन्हि। आब पंकज पराशर प्रसंगमे की भेल से देखी। प्रदीप बिहारीजीक बेटा प्रणवकेँ पंकज पराशर नोम चोम्स्की आ डगलस केलनरक रचना दैत छथिन्ह आ तकर अनुवाद करबा लेल कहै छथिन्ह। बेचारा जान लगा कऽ अनुवाद कऽ दैत छन्हि, ई सोचि जे जिनका ओ चच्चा कहै छथि- जे क्रान्तिकारी विचारक छथि (मार्क्सवादी!!!) से कोनो नीक पत्रिकामे ई अनुवाद छपबा देथिन्ह। मुदा छह मासक बाद चच्चाजी कहै छथिन्ह जे नोम चोम्स्की बला रचना हेरा गेल आ डगलस केलनर बला रचनाक अनुवाद नञि नीक रहए से रिजेक्ट भऽ गेल। मुदा क्रान्तिकारी कवि (चोरुक्का सेहो विवरण नीचाँमे अछि) दुनू रचना पहल पत्रिकामे पठा दै छथि- पहल-८६ मे डगलस केलनर बला रचना छपितो छन्हि (आ से अनुवादक रूपमे नहि वरन् मूल लेखकक रूपमे) आ ओ बैन सेहो कऽ देल जाइ छथि। हमर सरवन जी एकटा बच्चा द्वारा भैया कहलापर पाँचटा लताम ओकरा दऽ दै छथिन्ह मुदा हमर पराशरजी भातिजोक पाँचटा लताम निर्लज्जतासँ छीनि लैत छथि। आ हम हुनकर खिजबीन तखन करै छी जखन ओ विदेहमे आइडेन्टिटी बदलि हमरा गारि पढ़ैत छथि- हुनकर रियल आइडेन्टीटी नाङट करै छी। फेर सभसँ गप करै छी आ पाठकक सहयोगसँ आरम्भ, पहल क पुरान अंक भेटि जाइत अछि जतए हिनकर कुकृत्य छन्हि।। Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles, Box 951521, 3022B Moore Hall, Los Angeles, CA 90095-1521, Fax 310 206 6293 Phone 310 825 0977, http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html Intellectuals, the New Public Spheres, and Techno-Politics The category of the intellectual, like everything else these days, is highly contested and up for grabs. Zygmunt Bauman contrasts intellectuals as legislators who wished to legislate universal values, usually in the service of state institutions, with intellectuals as interpreters, who merely interpret texts, public events, and other artifacts, deploying their specialized knowledge to explain or interpret things for publics (1987; 1992). He thus claims that there is a shift from modern intellectuals as legislators of universal values who legitimated the new modern social order to postmodern intellectuals as interpreters of social meanings, and thus theorizes a depoliticalization of the role of intellectuals in social life. ....... अरुण कमल Arun lives in Patna where he teaches English at the Science College of Patna University. नए इलाके में जहाँ रोज बन रहे नये नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंजिला चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता रोज कुछ घट रहा है यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ जैसे वैशाख का गया भादो को लौटा हूँ और पूछो - क्या यही है वो घर? आ चला पानी ढहा आ रहा अकास शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर मैथिली भाषा-साहित्य के पाठक आ लेखक बंधु केँ की एहि प्रश्न सबहक उत्तर अवश्य जानबाक चाही। पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... नामक एहि व्यक्तिक बहुत रास कच्चा चिट्ठा –जेना एम.ए.मे प्रथम श्रेणीमे सर्वोच्च स्थान?? पत्रकारिताक कोर्स?? ई सभ नटबरलालक तर्जपर!! जे.एन.यू.क लड़कीसँ हिन्दी अनुवाद कराएब जे एहिसँ नोकरी भेटि जएतैक आ फेर तकरा अपना नामसँ छपबा लेब, प्रणवसँ डगलस केलनरक आ नोम चोम्स्कीक अनुवाद करबाएब आ अपना नामसँ छपबा लेब, अरुण कमल, श्रीकान्त वर्मा, इलारानी सिंह, गजेन्द्र ठाकुर आदिक रचना चोरि करब। ई सभ लेखक सभसँ हुनकर परिवारजनसँ कहै छन्हि जे अनुवाद लेल कथा-कविता दिअ आ फेर तकरा चोरा कऽ अपना नामसँ छपबा लैत अछि। हिन्दीमे बैन भेलाक बाद मैथिलीक सेवा! गौरीनाथकेँ पहिने गारि पढ़ै छन्हि आ फेर लिखित माफी मँगै अछि। पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर क ई हाल छै जे रमण कुमार सिंहकेँ ओकरापर कविता लिखै पड़ै छन्हि ..ककरासँ की चोरेने छी जे अनिद्रा पैसि गेल? अविनाश केँ गारि , श्रीधरम आ अनलकान्त केँ गारि , रामदेव झा केँ गारि , राजमोहन झा आ राजनन्दन लाल दास केँ गारि , सुभाषचन्द्रयादव-केदार कानन- तारानन्द झा तरुण- प्रोफेसर महेन्द्र- रमेश सभकेँ गारि- मैथिली सर्जनामे रामदेव झाकेँ गारि पढ़ैत सहरसा चिट्ठी आ सहरसा सभक साहित्यकारकेँ गारि पढ़ैत रामदेव झाकेँ चिट्ठी, ई दुनू चिट्ठी संगे छपल!! चोरक सीना जोड़बाक एहिसँ नीक उदाहरण भेटब मोश्किल। पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ.....क यथार्थ। # आख़िरी सफ़र पर निकलने तक / # पुरस्कारोत्सुकी आत्माएँ / # बऊ बाज़ार # मरण जल / # रात्रि से रात्रि तक # साला सब हँसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीख़ता छोड़कर / # हस्त चिन्ह / उर्फ श्वान रूप संसार है भूंकन दे झख मार उर्फ कुफ्र कुछ चाहिए ...की रौनक के लिए उर्फ गोयबल्स उर्फ कारेल चापेक उर्फ अपन कारी मुँह उर्फ मोहल्ला लाइव उर्फ पतनुकान उर्फ उदय प्रकाश उर्फ पहल उर्फ रवि भूषण उर्फ निराला उर्फ वर्चुअल स्पेस। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... हिनकर रियल आइडेन्टिटी हम नाङट करै छी आ ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। एहि ब्लैकमेलरक डॉ. जेकील आ मिस्टर हाइड बला चरित्र मैथिल सर्जनाक विरोधमे मैथिल-जन पत्रिकामे एक दशक पहिने उजागर भऽ गेल छल मुदा लोक हिनका पोसैत रहल। आरम्भमे सेहो ई एकटा चिट्ठी मैथिलीक सम्पादकक विरोधमे देलन्हि जे छपि गेल आ ओकर घृणित भाषाक कारण भाइ साहेब राजमोहन झाकेँ माफी माँगए पड़लन्हि आ फेर ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि। एकटा आग्रह आ आह्वान: सुभेश कर्ण आ समस्त मैथिली-प्रेमी-गण- एहि मिस्टर हाइडक ब्लैकमेलिंग आ एब्युजक द्वारे अहाँ सभकेँ मैथिली छोड़ि कऽ जएबाक आवश्यकता नहि अछि, कारण पापक घैला भरि गेलाक बाद ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। जे.एन.यू.मे छात्र-छात्रा सभसँ पोस्टकार्ड पर साइन लऽ ओहिपर अपन रचना लेल प्रशंसा-पत्र पठबैत घुमैत अपस्याँत कथित गोल्ड मेडेलिस्ट(!!!)। पहिल कथा गोष्ठीमे जखन ई सहरसामे सभसँ पुछने फिरै छथि जे साहित्यकार बनबासँ की-की सभ फाएदा छै तखन ई एकटा पाइ आ पुरस्कारक लेल अपस्याँत मैथिल युवा-पीढ़ीक प्रतिनिधित्व करै छथि, जे राजमोहन झा जीक शब्दमे मैथिलीसँ प्रेम नञि करैत अछि। ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि आ जखन ओ माफ कऽ देलखिन्ह तखन फेर हुनका गारि पढ़ब शुरु कऽ देलन्हि। हमरासँ लिखित मेल-माफी अस्वीकार भेलाक बाद मिस्टर हाइडक माथ नोचब स्वाभाविके। जे सरकारी नोकरी वा इन्कम-टैक्स, कस्टममे ई ब्लैकमेलर रहितए तँ देश जरूर बेचि दैतए। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... DO YOU KNOW "Fake Sahityakar" PANKAJ KUMAR JHA ALIAS PANKAJ PARASHAR.DO YOU KNOW WHAT THIS FAKE GOLD MEDALIST DID AT VASANT MAHILA COLLEGE, KADAMBINI, DAINIK BHASKAR AND DAINIK JAGRAN ? DO YOU KNOW WHAT HE DID WITH HIS FAMILY, FRINDS AND COLLEAGUES. READ the following to believe it. this mentally corrupt should be treated in the same manner... pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com besides other fake emails used by Pankaj Parashar on ISP 220.227.174.243” See his level. अहां कें सूचनार्थ पठेने छी जे पंकज पहिनेहो इ सब काज करैत रहय छलैए।- aavinash एहि चोर लेखक पंकज पराशरक दिमागी हालतिक असली रूप एतऽ सेहो भेटत जतए ओ नाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल (साभार-अविनाश)। Search Comments 220.227.174.243 · All · Pending (0) · Approved · Spam (0) Search Comments: Author Comment In Response To ranvijay ranvijay@rediff.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/09/02 at 5:07pm क्यूँ बे मादरचोद, रंडी की औलाद जिसका gauravshaali इतिहास होगा वही श्रेष्ठ की बात करेगा न मादरचोद....तू साले आदिवासी मादरचोद क्या बात करेगा श्रेष्ठ की, साले vanmaanush अपनी शकल देखि है कितनी कुरूप लगती है तेरे सूअर साथी अविनाश की तरह, मादरचोद....bhaunkna बंद कर.... In Response To ranvijay ranvijay@rediff.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/09/02 at 5:11pm अबे मादरचोद jagdeeshsvar चतुर्वेदी, उर्फ़ रंडी की औलाद, मादचोद किस naali में पैदा हुआ था सिवाय आलोचना और बकचोदी के तुझे कुछ आता है मके लौंडे.....कुछ काम कर जिससे सबका भला हो मादरचोद या तो नया नया कंप्यूटर चलाना सीखा है या अपने बलात्कारी दोस्त avinaash के साथ milkar चुदाई का धंधा चला रहा है इसीलिए इतना भौं रहा है माके लौंडे... जनसत्ता के बारे में अर्धसत्यों से बचो 22# चार्वाक सत्य binmst@yahoo.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/31 at 3:42pm जो आदमी हर मर्ज की दवा जाति को ही समझता हो, जातिवाद के धंधे में ही गले-गले तक डूबा हो उसका क्या शेष कुछ बचा रह गया है क्या? ऐसे रंगे सियारों को कम से कम प्रभाष जोशी और आलोक तोमर जैसे सम्मानित और विद्वान पत्रकार की आलोचना करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। नफरत और जहरबुझी भाषा से इस कथित लेखक की मंशा समझी जा सकती है। आलोक तोमर जी, कहां से आती है यह भाषा? 8# चार्वाक सत्य binmst@yahoo.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/29 at 4:59pm प्रभाष जी की आलोचना से या आलोक तोमर की आलोचना से कुछ हासिल नहीं होनेवाला है. इससे हिंदी समाज का क्या भला हो रहा है? इस तरह आरोप-प्रत्यारोप से पाठकों का क्या लेना-देना है? बहस को एक मुकाम पर पहुंचाकर, अगली यात्रा पर निकल जाना चाहिए. कौन है ये मवालि‍यों की भाषा बोलने वाला आलोक तोमर? 21# Pankaj Parashar pkjpp@yahoo.co.in 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/28 at 6:21pm मृत्युंजय, कल लिखी मेरी प्रतिक्रिया की अंतिम पंक्तियां हैं- हां, एक तकनीकी बात यह हो सकती है कि इन लोगों को सामान्य कोटे से बहाल किया गया हो। मैंने यह अनभिज्ञता जाहिर की, कि हो सकता है उनकी नियुक्ति सामान्य श्रेणी में हुई हो, जिसकी कोई सूचना मुझे नहीं है. इसमें न तो किसी कथित प्राब्लम शब्द का जिक्र कहीं है और न मेरे चेतन या अवचेतन में वह बातें हैं, जो व्याख्या की पोलिमिक्स के तहत आप कह रहे हैं। मनचाही व्याख्या और अनचाही सलाह से बचना चाहिए. इस संदर्भ में अनायास मनमानी व्याख्या का विरोध करती सूसन सौंटेग की 1966 में प्रकाशित पुस्तक Against Interpretation and Other Essays. की याद आ गई। खुदा खैर करे. जेएनयू का सच : होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे 16# Pankaj Parashar pkjpp@yahoo.co.in 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/27 at 6:34pm बाकी सेंटर्स और स्कूल की सूचनाओं से फिलवक्त मैं अपडेट नहीं हूं, क्योंकि कैंपस गए हुए महीनों गुजर जाते हैं। पर भारतीय भाषा केंद्र से तो वाकिफ हूं. सूची में दिखाया गया है कि अनुसूचित जाति से एक भी एसोशिएट प्रोफेसर नहीं हैं, जबकि पी-एच.डी में मेरे शोध निर्देशक रहे डॉ.गोबिंद प्रसाद अनुसूचित जाति से हैं और वे बाकायदा रीडर हैं। दूसरी ओर सूची में दिखाया गया है कि एक भी ओबीसी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं हैं, जबकि रूसी केंद्र में हमारे एक साथी हैं। मेरा ख्याल है कि ऐसे नाम और भी कई हैं जो सूची की त्रुटियों को साफ-साफ उजागर करते हैं। हां, एक तकनीकी बात यह हो सकती है कि इन लोगों को सामान्य कोटे से बहाल किया गया हो। जेएनयू का सच : होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे 16# Rafugar jinita@yahoo.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/25 at 5:35pm यार मामला व्यक्तिगत होता जा रहा है . बहस कहाँ से कहाँ जा रही है? ब्राह्मणों, हज्जामों, ठाकुरों….यानी जातिवाद ही सत्य है …महज यही तो भारत का सत्य नहीं है. प्रभाष जी की मति भ्रष्‍ट हो गयी है, आप सब रहम करें 53# michal chandan chandan25s@gmail.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/20 at 4:18pm भाई लोग, आप सब माने या ना माने परन्तु इस सत्य को आप अब स्वीकार करे की प्रभात जोशी नाम के वह महान पत्रकार-संपादक-चिंतक अब पूरी तरह से सठिया गए है। पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर आजकल उनका उजूल-फिजूल लिखना, कभी किसी अखबार और उनके मालिकों को टारगेट कर आलोचना करना, कभी झारखंड के एक अखबार के बारे में कसीदे लिखना और अब अपने मनुवादी भद्दे चेहरे को सबके सामने पेश कर चर्चा में बने रहना इनके सठियेपन की निशानी नहीं है तो क्या है। प्रभाषजी के विचार मानवताविरोधी हैं 30# Bottom of Form मैथिल आर मिथिला ब्लॉग मॉडेरेटर- ऊपरका सूचनाक अतिरिक्त चोरिक रचना जे हम एकटा ब्लॉगमे...मे पकरलौ तकर बाद ओ धूर्त लेखक एडिट कय ओकरा बदसूरत कविताक शक्ल द देलक, सम्पादक हमर प्रमाण के उरा देलक आ अपन जातिवादी हेबाक फेर प्रमाण देलक आ आब बशीर बद्र के एकटा कविता जातिवादी लोकनि द्वारा चोरा कय अपना नाम करबाक सूचना आयल अछि, ओ अपन गल्ति स्वीकरत वा फेर अपन रचना एडिट करत देखा चाही हम हाजिर होयब अहंक समक्ष शीघ्र... जातिवादी सोच के मारय टा परत मिथिलाक विकास लेल. जाबशीर बद्र के कविता जातिवादी लोकनि द्वारा चोरा कय अपना नाम करबाक सूचना आयल छल आ हम कहने रही जे ओ अपन गल्ति स्वीकरत वा फेर अपन रचना एडिट करत देखा चाही हम हाजिर भेल छी अहंक समक्ष, चोर महाराजक टटका रचनापर चोर महाराजक मौसेरा भाइक कमेंट आयल अछि जाहि से ई सिद्ध भेल जे ओ इशारा बुझि गेल जे ओकरो चोरि पकडा गेलैक। एकरे कहए छै चोर-चोर मौसेरा भाइ।- मैथिल आर मिथिला ब्लॉग सँ पंकज पराशरकेँ निकालल जा रहल अछि।- मैथिल आर मिथिला ब्लॉग मॉडेरेटर Recently Some Maithil Brahmin Samaj Organisation has started selling prizes in the name of Yatri (Vaidyanath Mishra, Nagarjun) and Kiran (Kanchinath Jha) . There has been trend recently to grant these prizes to those intellectual thiefs who are basically opposed to the ideology's of Kiran and Yatri (Nagarjun). The caste based organisations are killing the spirit of Yatriji and Kiranji, recently the fraud Pankaj Jha alias Pankaj Kumar Jha alias Pankaj Parashar alias Dr. Pankaj Parashar) was stage managed to get this casteist award, The lecturer of Hindi at Aligarh Muslim University, just appointed as adhoc staff, will teach now how to lift verbatim articles of Noam Chomsky and Douglas Kellner and poems of Illarani Singh, Rajkamal Chaudhary, Gajendra Thakur and Arun Kamal to his students. His Samay ke akanait (समय केँ अकानैत) is lifted from Magadh of Srikant Verma (श्रीकान्त वर्मा- मगध) and his Vilambit Kaik Yug me Nibaddha (विलम्बित कइक युग मे निबद्ध) is collection of pirated poems of Illarani Singh, Rajkamal Choudhary, Gajendra Thakur, Srikant Verma and others.ई संग्रह इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, गजेन्द्र ठाकुर, राजकमल चौधरी आदि कविक पंकज पराशर द्वारा चोराएल रचनाक कारण बैन कए देल गेल। "रचना"पत्रिकाक कथित अतिथि सम्पादकक रूपमे पंकज पराशर द्वारा कवि-कहानीकार सभसँ रचना सेहो मँगबाओल गेल आ तकरा अपना नामसँ छपबाओल गेल। ई छद्म साहित्यकार पराशर गोत्रक (!!)पंकज कुमार झा उर्फ पंकज पराशर बहुतो लेखकक अप्रकाशित रचना अनुवाद करबा लेल सेहो लेलक आ अपना नामेँ छपबा लेलक। पाठकक आग्रहपर आर्काइवमे ई तथ्य राखल जा रहल अछि।– सम्पादक, विदेह अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) २.२.नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) २.३.आशीष अनचिन्हार- निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष २.४.प्रेमशंकर झा 'पवन'- मैथिली फकरा (लोकोक्ति) संकलन २.५.कुमार मनोज कश्यप- बलिक छागर २.६.आचार्य रामानंद मंडल- मैथिली साहित्य मे घोटाला २.७.आचार्य रामानंद मंडल- २ टा कथा २.८.योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'- ॐ तत्‍ सत्‍ एकम्‍ एव अद्वितीयम्‍ २.९.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना (उपन्यास- खेप १०) २.१०.जगदीश प्रसाद मण्डल- भंगतराह कवि २.११.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास आठम पड़ाव) २.१२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २० म खेप २.१३.डॉ किशन कारीगर- मैथिली साहित्य मे सोलकन साहित्यकार सब के असलियत २.१४.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१५.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१६.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१७.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१८.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- लालदासक मिथिला रामायण मे कुण्डलिया आ सम्पादक बा प्रूफरीडरक अज्ञानतावश ओइमे छन्दोभङ्ग २.१.नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) दिनेश कुमार मिश्र, मिथिलाक बाढ़ि, धार आ ओइपर बनाओल छहर/ बान्ह, सन्दर्भ हुनकर बन्दिनी महानन्दा, बागमतीक सद्गति!, दुइ पाटनक बीच.. (कोसी धारक कथा), ने घाट ने घर, बगावत पर मजबूर मिथिलाक कमला धार, भुतही धार आ तकनीकी झाड़ा-फूंकी। मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा प्रसङ कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) क शीर्षक भ्रामक अछि। ई हुनकर किछु सवर्ण उपन्यासकारपर किछु सिण्डिकेटेड कथित समीक्षात्मक आलेखक संग्रह अछि, २६३ पन्नाक ई पोथी हार्डबाउण्डमे लाइब्रेरीकेँ मात्र बेचल जा सकत, जतऽ ई सड़ि जायत, अमेजनसँ हम ई चारि सय पाँच टाकामे किनलौं मुदा ऐमे पाँचो पाइक सामिग्री नै अछि। ई अपन बायोडाटामे गएर सवर्णसँ छीनि कऽ, समानान्तर धाराक लोकक हककेँ मारि कऽ लेल साहित्य अकादेमीक मैथिल अनुवाद असाइनमेण्टक गर्वसँ चर्चा करैत छथि। आ ई असाइनमेण्ट हिनका मेरिटसँ नै जातिगत टाइटिलसँ भेटल छन्हि, अही सभ किरदानीक एवजमे भेटल छन्हि। हिनका सन लोक लेल मैथिली बायोडेटाक एकटा पाँति अछि, समानान्तर धारा लेल जीवन-मरणक प्रश्न। दिनेश कुमार मिश्रक 'दुइ पाटन के बीच मे' कोसी नदीक ऐतिहासिक आत्मकथा थीक, ओ मिथिलाक आन धार सभक ऐतिहासिक आत्मकथा सेहो लिखने छथि जेना बन्दिनी महानन्दा, बागमती की सद्गति!, दुइ पाटन के बीच में.. (कोसी नदी की कहानी), न घाट न घर, बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी, भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूंक, The Kamla River and People On Collision Course, Bhutahi Balan- Story of a ghost river and engineering witchcraft, Refugees of the Kosi Embankments। साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य पंकज झा पराशर द्वारा हिनकर पोथी सभसँ पैराक पैरा मैथिली अनुवाद कऽ अपना नामे उपन्यास छपबाओल गेल अछि, जकरा छद्म समीक्षक कमलानन्द झा ऐ चोर लेखकक रिसर्च कहै छथि! एतऽ स्पष्ट कऽ दी जे ई चोर लेखक आ छद्म समीक्षक दुनू अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालयक हिन्दी विभागमे छथि। ई रिसर्च दिनेश कुमार मिश्रक थीक, जे आइ.आइ.टी. खड़गपुरसँ सिविल इन्जीनियरिङ मे बी. टेक. १९६८मे आ स्ट्रक्चरल इन्जीनियरिङमे एम.टेक. १९७०मे केने छथि, आ ओइ रिसर्च लेल क्वालिफाइड छथि। जखन कोनो विषयमे नामांकन नै होइ छै तखन लोक हारि-थाकि हिन्दीमे नामांकन लइए, नै तँ कमलानन्द झा केँ बुझऽ मे आबि जइतन्हि जे ई रिसर्च कोनो सिविल इन्जीनियरेक भऽ सकैत अछि, भऽ सकैए बुझलो होइन्ह। हिन्दी मूल आ मैथिलीक स्क्रीनशॉट आँगा संलग्न अछि। दिनेश कुमार मिश्र मिथिलाक नै छथि मुदा मिथिलाक सभ धारक कथा ओ लिखने छथि, हम सभ हुनका प्रति कृतज्ञ छी आ हुनकर ऋणसँ मिथिलावासी कहियो उऋण नै भऽ सकता, मुदा मूलधाराक पुरस्कार आ पाइ लोलुप लोकसँ कृतघ्नते भेटत से फेर सिद्ध भेल। ऐ लेखककेँ दस बारह बर्ख पहिने सेहो तारानन्द वियोगी उद्धारक भेटल छलखिन्ह जे लिखने रहथिन्ह जे ओ कवितामे प्रभावित भऽ अनायासे अपन रचनामे दोसरक सामिग्री चोरि कऽ लइ छथि, एहने सन। आब ऐ कमलानन्द झा क आश्रय तकलन्हि मुदा दुर्भाग्य! जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। सीलिंगसँ बचबा लेल जमीन-जत्थाबला लोक कम्यूनिस्ट बनला आ आब ब्राह्मणवाद बचेबालेल वामपंथक शरण, एहेन लोक सभसँ कम्यूनिज्मकेँ बहुत नुकसान भेल छै। दिनेश क़ुमार मिश्रक सभटा पोथी आब हुनकर अनुमतिसँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमेः http://videha.co.in/pothi.htm एतऽ एकटा गप मोन पाड़ि दी जे जखन बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे की ओ एक्स बॉक्स भारतमे पाइरेशीक डरसँ देरीसँ आनि रहल छथि? तँ हुनकर उत्तर रहन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेशीक डरे कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। से विदेह पेटारमे हम सभ ऐ तरहक रिस्क रहितो एकरा आर समृद्ध करैत रहब, कारण समानान्तर धारामे सड़ल माँछ द्वारे पोखरिक सभ माँछ नै सड़ैए, एतुक्का मलाह गोट-गोट कऽ सड़ल माँछ निकालैत रहल छथि, निकालैत रहता। सिण्डीकेटेड समीक्षापर अन्तिम प्रहार। मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): यह ध्यान देने की बात है कि 1923 से 1946 के बीच कोसी क्षेत्र में मलेरिया से 5,10,000, कालाजार से 2,10,000, हैजे से 60,000 तथा चेचक से 3,000 मौतें (कुल 7,83,000) हुईं। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०३)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 12वीं शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था और इस काम के लिए उसने प्रजा से 'बीर' की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर बांध' कहलाया। इस तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (1810-11) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (1877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था कि इस तटबन्ध का निर्माण कार्य एकाएक रोक दिया गया होगा। छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा चोर उपन्यासकारक पीठ ठोकब, देखू छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा उद्धृत चोर पंकज झा पराशर (मैथिली उपन्यास, समय, समाज आ सवाल पृ. २५७-२५८): चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. ३१)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): कोसी के प्रवाह कि भयावहता की एक झलकफिरोजशाह तुगलक की फौज के सन् 1354 में बंगाल से दिल्ली लौटने के समय मिलती है। बताया जाता है कि जब सुल्तान की फौजें कोसी के किनारे पहुँचीं तो देखा कि नदी के दूसरे किनारे पर हाजी शम्सुद्दीन इलियास की फौजें मुकाबले के लिए तैयार खड़ी हैं। यह वही हाजी शम्सुद्दीन थे जिन्होंने हाजीपुर तथा समस्तीपुर शहर बसाये थे। फिरोज की फौजें शायद कुरसेला के आस-पास किसी जगह पर कोसी के किनारे सोच में पड़ गईं। नदी की रफ्तार उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही थी। आखिरकार फैसला हुआ कि नदी के साथ-साथ उत्तर की ओर बढ़ा जाय और जहाँ नदी पार करने लायक हो जाय वहाँ पानी की थाह ली जाये। सुल्तान की फौजें प्रायः सौ कोस ऊपर गईं और जियारन के पास, जो कि उसी स्थान पर अवस्थित था जहाँ नदी पहाड़ों से मैदानों में उतरती थी, नदी को पार किया। नदी की धारा तो यहाँ पतली जरूर थी पर प्रवाह इतना तेज था कि पाँच-पाँच सौ मन के भारी पत्थर नदी में तिनकों की तरह बह रहे थे। जहाँ नदी को पार करना मुमकिन लगा उसके दोनों ओर सुल्तान ने हाथियों की कतार खड़ी कर दी और नीचे वाली कतार में रस्से लटकाये गये जिससे कि यदि कोई आदमी बहता हुआ हो तो इस रस्सों की मदद से उसे बचाया जा सके। शम्सुद्दीन ने कभी सोचा भी न था कि सुल्तान की फौजें कोसी को पार कर लेंगी और जब उस को इस बात का पता लगा कि सुलतान की फौजों ने कोसी को पार करने में कामयाबी पा ली है तो वह भाग निकला। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०५)]: (... शीघ्र अही लिंकपर आर स्क्रीनशॉट अपडेट कएल जायत।) मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ जुझैत रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक, बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाउ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतऽ शुरू भऽ गेल। मुदा ओइ क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नै अबैत अछि, कहियो अबितो रहय तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका लोक अ नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेला। हमरा मोन अछि ओ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जेबाक लेल हमरा बाढ़िक समयमे एबा लेल कहल गेल छल कारण ओइ समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता-चभच्चामे नाओ नै चलि पबैत अछि आ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कऽ कऽ ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक २००८ ई.क प्रकोप ओइ दुष्प्रचारकेँ खतम कऽ सकल। पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि? ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आ एतऽ बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन ऐत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नै भऽ सकल। किए? कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल ऐ छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे खतम भऽ गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किए नै बनि पाओल? छहरक बीचमे जे रेत जमा भऽ जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नै केलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाइए, तखन सभ साल बान्हक ऊँचाई बढ़ाबैए पड़त। जइ साल ई कार्य समयसँ नै शुरू होइए ओइ साल प्रलय अबैए। सएह बभल २००८ मे, फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्हमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम अपन आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ह लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भऽ गेलै एक ठामसँ, आ आँखिक सोझाँ हम देखलौं जे केना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भऽ गेल छल। आ ई कारण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कऽ एकटा नव धार पकड़बाक आ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल छल। भीमनगर बैरेज आब कोशीक एकटा सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल रहय। जइ राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओइ राज्यक दौड़ा करैत अछि आ अपन रिपोर्ट दैत अछि जइपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आ ओ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि बा नै। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छला, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौड़ा कऽ एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित केलन्हि। कारण ई लेवल-तेन केर आपदा छल आ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे- नहिये वित्तक लिहाजसँ आ नहिये राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ- पार पायब संभव नै छल। तखन राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल गेल, किसानक ऋण-माफी सेहो भेल। कुशेश्वर स्थानक आपदा सभ-साल अबैए, से सभ ओकरा बिसरिये जकाँ गेल। दामोदर घाटीक आ मयूरक्षी परियोजना जकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आ बागमतीपर किए सम्भव नै भेल? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किए सफल अछि? नेपाल सरकारपर दोषारोपण कऽ हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब? एकर एकमात्र उपाय अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ह बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कऽ हटाउ  आ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण करू। नेपाल सरकारसँ वार्ता कऽ आ त्वरित समाधन हुअय। आ जाधरि ई नै होइए तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि से करब, जेना बरखा आबयसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाउ, बरखा एबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करू, आ ऐ सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखू। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबा हेतु कइएकटा बान्ह बनाबऽ पड़त आ ओ सभ एकर समाधान कहिओ नै बनि सकत। कमला धारक नहरिसँ भेल लाभ हानिसँ सीखू। एक तँ कच्ची नहरि आ तइपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त हएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतऽ धरतीक ढलान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की हएत आकि की होइत अछि? ई बान्ह बनि जाइत अछि आ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल ऐ नहर रूपी बान्हसँ पटौनी हुअय वा नै एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपे डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नै चलि जाय, से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि ! कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आ ऐसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भऽ गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ कुशेश्वरक वर्णनसँ स्पष्ट अछि। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया ऐ सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नै अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल, तइ कारणेँ ऐ तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भऽ गेल। कमला धार जे बलानमे पिपराघाट लग १९५४ मे- मिलि गेली, हिमालयसँ बहि कऽ कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर ऐ धारमे २ मीटरसँ बेशी बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भऽ गेल आ ई माँग शुरू भऽ गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाय! कोशीक पानि माउन्ट एवेरेस्ट, कंचनजंघा आ गौरी-शंकर शिखर आ मकालू पर्वतश्रृंखलासँ अबैत अछि। नेपालमे सप्तकोशीमे, जइमे इन्द्रावती, सुनकोसी (भोट कोसी), तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी आ तामर कोसी सम्मिलित अछि। ऐमे इन्द्रावती, सुनकोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी आ दूध कोसी मिलि कऽ सुनकोसीक निर्माण करैत अछि आ ई मोटा-मोटी पच्छिमसँ पूर्व दिशामे बहैत अछि, एकर शाखा सभ मोटा-मोटी उत्तरसँ दक्षिण दिशामे बहैत अछि। ई पाँचू धार गौरी शंकर शिखर आ मकालू पर्वतश्रृंखलाक पानि अनैत अछि। अरुणकोसी माउन्ट एवेरेस्ट (सगरमाथा) क्षेत्रसँ पानि ग्रहण करैत अछि। ई धार मोटा-मोटी उत्तर-दक्षिण दिशामे बहैत अछि। तामर कोसी मोटा-मोटी पूबसँ पच्छिम दिशामे बहैत अछि आ अपन पानि कंचनजंघा पर्वत श्रृंखलासँ पबैत अछि। आब ई तीनू शाखा सुनकोसी, अरुणकोसी आ तामरकोसी धनकुट्टा जिल्लाक त्रिवेणी स्थानपर मिलि सप्तकोसी बनि जाइत छथि। एतऽसँ दस किलोमीटर बाद चतरा स्थान अबैए जतऽ महाकोसी, सप्तकोसी बा कोसी मैदानी धरातलपर अबैत छथि। आब उत्तर दक्षिणमे चलैत प्रायः पचास किलोमीटर नेपालमे रहला उत्तर कोसी हनुमाननगर-भीमनगर लग भारतमे प्रवेश करैत छथि आ कनेक दक्षिण-पच्छिम रुखि केलाक बाद दक्षिण-पूर्व आ पच्छिम-पूर्व दिशा लैत अछि आ भारतमे लगभग एक सय तीस किमी. चललाक बाद कुरसेला लग गंगामे मिलि जाइ छथि। कोसीमे बागमती आ कमलाक धार सेहो सहरसा- दरभंगा- पूर्णिया जिलाक संगमपर मिलि जाइत अछि। कोसीपर पहिल बान्ह बारहम शताब्दीमे लक्ष्मण द्वितीय द्वारा बनाओल वीर-बाँध छल जकर अवशेष भीमनगरक दक्षिणमे अखनो अछि। भीमनगर लग बैराजक निर्माणक संगे पूर्वी कोसी तटबन्ध सेहो बनि गेल आ पूर्वी कोसी नहरि सेहो। कुँअर सेन आयोग १९६६ ई. मे कोसी नियन्त्रणक लेल भीमनगरसँ तेइस किमी. नीचाँ डगमारा बैराजक योजनाक प्रस्ताव देलक जे वाद-विवाद आ राजनीतिमे ओझरा गेल। ऐ बैराजसँ दूटा फायदा छल। एक तँ भीमनगर बैरेजक जीवन-कालावधि समाप्त भेलापर ई बैरेज काज अबितय, दोसर ऐसँ उत्तर-प्रदेशसँ असम धरि जल परिवहन विकसित भऽ जाइत जइसँ उत्तर बिहारकेँ बड़ फायदा होइतय। मुदा ऐ बैरेज निर्माण लेल पाइ आबंटन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डॉ के.एल.राव नै देलखिन्ह। पश्चिमी कोसी नहरि एकर विकल्प रूपमे जेना तेना मन्थर गति सँ शुरू भेल मुदा अखनो धरि ओइमे काज भइये रहल अछि। कोसी लेल किछु नै भऽ सकल। विचार आयल तँ योजना अस्वीकृत भऽ गेल। जतेक दिनमे कार्य पूरा हेबाक छल ततेक दिन विवाद होइत रहल, डगमारा बैराजक योजनाक बदलामे सस्ता योजनाकेँ स्वीकृति भेटल मुदा सेहो पूर्ण हेबाक बाटे तकैत रहल! एनामे  विश्वेश्वरैय्या पड़ैत छथि मोन। हैदराबादसँ बिरासेी माइल दूर मूसी आ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर  मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्ह, हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कऽ देलन्हि। विश्वेश्वरैय्या निचुलका भागक चौड़ाइ बढ़ा कऽ ई कमी पूरा कऽ लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कऽ आ मलेरियाग्रस्त आ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाजले डॉक्टर बहाली कऽ, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कऽ आ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा समयक क्षतिपूर्ति केलन्हि। देशभक्त तेहन छला जे सीमेन्ट आयात नै केलन्हि वरन् बालु, कैल्सियम, पाथर आ पाकल ईटाक बुकनी मिला कऽ निर्मित सुरखीसँ ऐ बान्हक निर्माण केलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहिये द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कऽ लेल गेल। प्रधानमंत्री आपदा कोष आ मुख्यमंत्री आपदा कोषक खगता नै हुअय से जरूरी अछि,  संगहि  सरकारपर दवाब बनाउ जे स्कूल कॉलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समयमे छुट्टी दिअय। सी.बी एस.ई आ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नै कऽ सकल अछि।  भारतमे डगमारा बैराजक योजनाक प्रारम्भ कयल जाय, कारण भीमनगर बैरेज अपन जीवन-कालावधि पूर्ण कऽ लेने अछि। ऐमे फण्ड रेलवे आ सड़क दुनू मंत्रालयसँ लेल जाय कारण ऐपर रेल आ सड़क सेहो बनि सकैए आ से बनबाके चाही। बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाय। कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कऽ हटा देल जाय आ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाय, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाय्। बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य हुअब सन देखा रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कऽ, युद्ध-स्तरपर ऐ सभपर काज शुरू कएल जाय। १२म शताब्दीमे शुरू कएल बान्ह जखन पूर्ण हएत तखने धारसभ मनुक्खक सेविका बनि सकत। आब प्रस्तुत अछि दिनेश कुमार मिश्र जीक रिसर्चक सारांश मैथिलीमे, बेरा-बेरी बन्दिनी महानन्दा, बागमतीक सद्गति!, दुइ पाटनक बीच.. (कोसी धारक कथा), ने घाट ने घर, बगावत पर मजबूर मिथिलाक कमला धार, भुतही धार आ तकनीकी झाड़ा-फूंकी। बन्दिनी महानन्दा जखन कखनो भारतक गौरवशाली अतीतक चर्चा होइत अछि तँ पहिने बिहारक नाम लेल जाइए । जखन देव-दानव मिलि कऽ सागर मथैत छला, तखन सागर मथबामे मन्दार पहाड़क उपयोग होइ छल । ई स्थान वर्तमान भागलपुर जिला मे पड़ैए, भऽ सकैए समुद्रक सीमा ओइ समय एतऽ तक छल । ऐ क्षेत्रक कथा राजा जनकक समयसँ सुनल जाइत अछि । बिहार प्राचीन काल सँ याज्ञवलक्य, गौतम, च्यवन, श्रृंग, विश्वामित्र, अष्टावक्र, कात्यायन, पतंजलि, वर्ष, उपवर्ष, पाणिनी, अश्वघोष, वात्स्यायन, आर्यभट्ट आ वराहमिहिरा सन विद्वान आ कारीगर पर गर्व करैत रहल अछि । मिथिला प्राचीन कालमे संस्कृति, शिक्षा, कला आ साहित्यक एकटा पैघ केंद्र छल जे देशक विभिन्न क्षेत्रक विद्वानकेँ आकर्षित करै छल । भगवान महावीर ऐ धरती सँ समस्त संसारकेँ प्रेम, करुणा, सौहार्द आ सहिष्णुताक उपदेश देलनि । एतहिये राजकुमार सिद्धार्थ भगवान बुद्ध बनला, जिनकर वचनामृत सम्पूर्ण विश्वमे भेल । वाल्मीकि रामायणमे भगवान् राम अपन भाइ लक्ष्मण, भरत आ शत्रुघ्न संग विवाहक उद्देश्य सँ जनकपुर गेला। ऐ यात्रामे ओ बक्सर लग तारकाकेँ मारि सिद्धाश्रम, अहिल्या-आश्रम, गौतम आश्रम आ वैशाली होइत जनकपुर गेला । महाभारतक काल जरासंधक राजधानी वर्तमानमे राजगृह आ कर्णक अंग देशक राजधानी चम्पनागरी (भागलपुर) छल । पाण्डवक निर्वासन आ गुप्त निवासक बहुत समय पूर्णियाक जंगलमे बीतल । भीम कहियो मोदागिरी (वर्तमान मुंगेर) पर विजय प्राप्त केने छला आ खड़गपुर हवेलीक समीप अवस्थित भीम बांध भीम सँ संबंधित मानल जाइए । सोनपुर (छपरा) लग हरिहर क्षेत्रक संबंधमे कहल जाइए जे भगवान विष्णु एक बेर पशुपति नंदीक नेतृत्वमे एतऽ बहुत रास गाय अनने छला । जइ लेल ऐ स्थानक नाम हरिहर क्षेत्र राखल गेल । ऐ स्थान पर गज आ ग्राहक बीच झगड़ा भेल, भगवान विष्णुकेँ स्वयं खुल्ले पएर, बिना गरुड़क सवारीक गजक रक्षा लेल आबय पड़लनि। ऐतिहासिक कालमे बिहारक वर्णन संभवतः मगधक बिम्बसार (कॉमन एरा पूर्व छअम शताब्दी) सँ शुरू होइए आ मानल जाइए जे भगवान वर्धमान महावीर आ भगवान बुद्धक उदय ऐ कालमे भेल। ऐ कालक आसपास वैशालीमे लिच्छवी राज्य अपन सिद्धि प्राप्त कऽ रहल छल । नन्द वंशक पतनक संग मगधमे चंद्रगुप्त मौर्यक साम्राज्यक स्थापना ३२१ कॉमन एरा.पू.भेल। चन्द्र गुप्त मौर्यक उदयमे चाणक्य (कौटिल्य) क भूमिका महत्वपूर्ण छल। चाणक्य स्वयं कोन स्थानक निवासी छल तइ मे किछु मतभेद अछि । किछु लोक हुनका तक्षशिलाक निवासी मानै छथि जखनिकि दोसर मान्यताक अनुसार चाणक्य वर्तमान पश्चिम चंपारणक निवासी छला । मौर्य वंशक एकटा आर महत्वपूर्ण नाम सम्राट अशोक अछि जे २७२-२३२ कॉमन एरा पू. कलिंग विजयक बाद युद्ध आ बर्बरतासँ दुखी भऽ गेल आ ओ अपन शेष जीवन बौद्ध धर्मक प्रचारमे बिता देलक। मौर्यवंशक अंतिम सम्राट बृहद्रथक वध कऽ पुष्यमित्र १८७ कॉमन एरा पू. आ तकर बाद यूनानी, शक, कुशान आदि सन् ३२० धरि मगध पर शासन केलनि, जखन धरि चन्द्रगुप्त पाटलिपुत्रमे गुप्त साम्राज्यकेँ सुदृढ़ नै कऽ केलनि। गुप्त वंशक राजा चन्द्रगुप्त, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य आदि एक बेर फेर मगधकेँ अपन पुरान वैभव वापस दियेलनि । मुदा पाँचम शताब्दीक अन्तमे हून सभक आक्रमणसँ एक बेर फेर मगधक समृद्धि अवरुद्ध भेल आ हून लोकनि सातम शताब्दीक मध्य धरि एतऽ ओतऽ रहला, जखन पाटलिपुत्रपर हर्षवर्धन सन् ६४१ मे कब्जा क लेलनि। मुदा ई स्थायी नै भऽ सकल । आठम शताब्दी धरि ई शासनमे रहल आ गुप्त वंशक बाद बारहम शताब्दीक आरम्भ धरि पाल वंशक शासन पाटलिपुत्रपर बनल रहल। इन्द्रद्युम्न ऐ वंशक अंतिम राजा छल । बख्तियार खिलजी अपन समयमे मगधपर हमला केने छल। बिहारक कोनो चर्चा नालंदा आ विक्रमशिला विश्वविद्यालयक चर्चा केने बिना पूरा नै भऽ सकैए। सन् ४०५-४११ क बीच भारतमे रहयबला चीनी यात्री फा-हियान अपन लेखनीमे नालंदा बौद्ध विहारक वर्णन करै छथि मुदा ओ विश्वविद्यालयक विषयमे चुप छथि । लेकिन हुएन-त्सांग (भारतमे निवास सन् ६३०-६४३) नालंदाक शैक्षणिक वैभवक प्रशंसा निश्चित रूप सँ केने छथि। देशक विभिन्न शैक्षणिक वैभवसँ ऐ विश्वविद्यालयक बहुत प्रशंसा भेल अछि। ऐ विश्वविद्यालयमे देश-विदेशक विभिन्न कोन-कोनसँ करीब दस हजार विद्यार्थी ओतहिये रहै छला आ शिक्षा प्राप्त करै छला। ओतऽ व्याकरण, विधि, साहित्य, दर्शन आदि अनेक विषयक पढ़ाइ होइ छल । विश्वविद्यालयमे प्रवेश लेल कोनो विद्यार्थीकेँ दरबज्जेपर परीक्षा देमऽ पड़ै छलै आ संतुष्टिक बादे विद्यार्थीक प्रवेश होइ छलै। ई विश्वविद्यालय गुप्त वंशक राजा सभ द्वारा पाँचम शताब्दीमे स्थापित कयल गेल छल आ एकरा राजश्रयक अधीन राखल गेल छल । किंवदंती अछि जे नालंदा विश्वविद्यालयक निर्माण सम्राट अशोक द्वारा कएल गेल, मुदा तकर कोनो प्रमाण नै अछि। विक्रमशिला विश्वविद्यालयक स्थापना पाल वंशक राजा सभ द्वारा आठम शताब्दीमे वर्तमान भागलपुरसँ लगभग ४० किलोमीटर दक्षिण-पूर्वमे पाथरघाट पर्वतमे भेल। ऐ विश्वविद्यालयक मुख्य आचार्य आतिश श्रीज्ञान दीपंकर बहुत प्रसिद्ध भेला जे एगारहम शताब्दीमे तिब्बतक राजा द्वारा धर्म प्रचार लेल तिब्बत बजाओल गेल छला। ऐ विश्वविद्यालयमे १०८ टा आचार्य काज करै छला आ आठ हजार लोक एक संग बैसि कऽ एकर हॉलमे धार्मिक चर्चा सुनि सकै छला। एतऽ वेद, वेदांत, सांख्ययोग, मीमांसा, बौद्ध दर्शन आदि विषयक पढ़ाइ होइ छल । मुदा सन् १२०६ मे जखन तिब्बती भिक्षु-यात्री धर्मस्वामी ऐ क्षेत्रमे आयल छला तखन हुनका ऐ विश्वविद्यालयक खंडहर मात्र देखबामे एलन्हि। ऐ दुनू विश्वविद्यालयक अलाबे ओदांतपुरी विहार (वर्तमान बिहार शरीफ) नालंदा लग छल। ई विहार नवम शताब्दीमे पाल वंशक राजा लोकनि द्वारा स्थापित कएल गेल, मुदा ई कहियो नालंदा वा विक्रमशिलासँ प्रतिस्पर्धा नै कऽ सकल। तहिना आठम शताब्दीमे महिषी (वर्तमान सहरसा) मे आदिशंकराचार्य आ मंडन मिश्रक बीच बहस भेल छल। जकर मध्यस्थता मंडन मिश्रक विदुषी पत्नी भारती केने छली। मंडन मिश्र ऐ बहसमे हारल छला, मुदा भारती स्वयं शंकराचार्यसँ शंकराचार्य सँ बहस कऽ हुनका अतिरिक्त अध्ययन लेल समय मांगय लेल बाध्य कऽ देलखिन्ह। ओना विवाद अछि जे ई महिषी वएह महिष्मती अछि जतय शंकराचार्य आ मंडन मिश्रक शास्त्रार्थ भेल छल बा नै। विद्वान परम्परामे मिथिलाक भानुदत्त मिश्र, रत्नेश्वर, ज्योतिश्वर, भागदत्त, पृथिविधर आचार्य, गंगेश्वर उपाध्याय, जगधर, विद्यापति, शंकर मिश्र, वाचस्पति मिश्र आ प्रभाकर मिश्र आदि प्रमुख छथि। विद्यापति मिथिलाक घरे-घर बसि गेल छथि। ओ सम्पूर्ण हिन्दी आ बंगला साहित्यकेँ दिशा देबाक काज सेहो कयलनि अछि। मिथिलाक विद्वान महिला कोनो अर्थमे पुरुषसँ पाछू नै रहल छथि। ऋषि मैत्रेयी आ गार्गीक अलाबे १५ म शताब्दीमे लछिमा देवी, लखिया देवी, विश्वास देवी आ चंद्रकला देवी आदि साहित्य आ दर्शनक क्षेत्रमे अभूतपूर्व काज केलनि। बारहम शताब्दीक अंतमे अफगान आ तुर्कक हमला बिहारपर शुरू भऽ गेल। बख्तियार खिलजी पाल वंशक राजा लोकनिसँ हुनकर क्षेत्र छीन लेलनि आ ऐ सँ प्रशासनिक अस्थिरताक काल शुरू भेल । शासन दिल्लीक सुल्तानक, कखनो आगराक, कखनो जौनपुर बा गौर (बंगाल) क हाथमे रहल। मुदा पूरा बिहारपर हुनका सभक हाथ नै लागि सकल आ अलग-अलग भागमे हुनकर शासन जारी रहल। ऐ क्रममे कुतुबुद्दीन ऐबक, सुल्तान घियासुद्दीन, फिरोज शाह, सिकंदर लोधी धरि बहुत रास सम्राट आबि गेला। शेरशाह (सन १५४०-१५४५) एकमात्र शासक छल जे अपन साम्राज्यकेँ व्यवस्थित रूपसँ स्थापित करबाक प्रयास केलक। शेरशाह पटनाकेँ अपन पुरान वैभवमे वापस आनऽ चाहै छल आ ऐ दिशामे काज करऽ लागल। बख्तियार खिलजीक समयसँ चलि रहल राजधानी बिहार शरीफकेँ पटना अनलक आ नव किला बनौलक। ओ अपन राज्यक सीमाक विस्तार जोधपुर, ग्वालियर, मालवा आ रणथम्भौर धरि केलक आ एकटा सुशासन प्रणालीक पुनर्स्थापना केलक। बंगालसँ पंजाब धरि सड़क बनेबाक श्रेय शेरशाहकेँ छै। मुदा मुगलक बढ़ैत सत्ता शेरशाहक उत्तराधिकारी नै सम्हारि सकल आ अकबरक समयमे बिहार मुगलक हाथमे चलि गेल। बिहारक राजा/ जागीरदार लोकनि एहन बाहरी शक्तिकेँ सामान्य जकाँ स्वीकार नै केलनि। औरंगजेबक पोता अजीम-उशानक शासन कालमे अजीमाबादक महिमा (ई शहर अजीम-उशान द्वारा बनाओल गेल छल आ वर्तमान पटना शहरक इलाका कहल जाइत अछि) घुरल आ पटना आ बंगालक व्यापार बढ़ल। मुर्शिद कुली खान १७०४ मे बंगालक शासक बनल आ १७०७ मे औरंगजेबक मृत्युक बाद अजीमाबाद ओकर नियंत्रणमे आबि गेलै। १७४० मे अलीवर्दी खान मुर्शिदाबादमे शासन सम्हारलक आ ऐ क्रममे शासनक बागडोर जैरुद्दीन अहमद आ सिराजुद्दौलाक हाथमे चलि गेलै, जे अंग्रेज द्वारा मारल गेल। तकर बाद मीर जाफर आ मीर कासिम अली शासक बनि गेल। ओहो सभ समय नै रहल आ अंग्रेज सन् १७६५ मे अपन साम्राज्यक जड़ि मजगूत कऽ लेलक। बिहारमे ने अफगान, तुर्क आ ने मुगल शासक आसानीसँ  रहला, आ ने अंग्रेजकेँ रहय देलनि। सन् १८५७ मे जगदीशपुरक बाबू कुंवर सिंह आ बाबू अमर सिंह अंग्रेजक विरोध केलनि। ऐ क्रममे बाबू कुंवर सिंहकेँ एक बेर आजमगढ़ भागय पड़लनि, मुदा ओ बहादुरीसँ वापस आबि गेला आ अप्रैल सन् १८५८ मे गुलामीक बदला मृत्युकेँ स्वीकार केलनि। बादमे बाबू अमर सिंह सेहो सएह केलनि। दोसर दिस संथाल परगनाक सिद्ध, कान्हू, चांद आ भैरब भाइ १८५५-५७ क बीचमे दक्षिण बिहारमे अंग्रेज शासनक खिलाफ विद्रोहक झंडा फहरा देलखिन, फेर बिरसा भगवान १८९५-२००० क बीच छोटनागपुरक जंगलमे अशांतिक आगि जराबैत रहल। हिनके सभक संग तिलका मांझीक नाम सेहो बहुत श्रद्धापूर्वक लेल जाइत अछि। सन् १९०८ मे खुदीराम बोस आ प्रफुल्ल चाकी बंगालक दुर्नाम कलेक्टर किंग्सफोर्ड पर मुजफ्फरपुरमे बम फेंकलथि। कलेक्टर बचि गेल मुदा प्रफुल्ला चाकी पकड़ाइसँ पहिने आत्महत्या कऽ लेलनि आ किशोर खुदी राम बोसकेँ फाँसीपर लटका देल गेल। अप्रैल १९१७ मे चंपारणक किसान राजकुमार शुक्लक आग्रहपर महात्मा गांधी चंपारण आबि पहिल बेर गोराक अत्याचारक खिलाफ आवाज उठौलनि। तकर बाद स्वतंत्रता आन्दोलनमे बिहारमे बहुत रास नामी नेता जेना सर्व श्री ब्रज किशोर प्रसाद, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, श्री कृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, वैद्यनाथ झा, जयप्रकाश नारायण आ बाबू जगजीवन राम आदिक श्रृंखलाक अबैत अछि। बहुत रास विद्वान/स्वतंत्रता सेनानी बिहारकेँ अपन कार्यस्थल बनौलनि, जइमे आचार्य कृपालानी, महापंडित राहुल सांकृत्ययन, श्री काशी प्रसाद जायसवाल आ स्वामी सहजानंद सरस्वतीक नाम उल्लेख योग्य अछि। जतऽ बिहारमे विदेशी गुलामीसँ मुक्ति पाबय लेल बहुत आन्दोलन भेल छल, साहित्यक रसदार धारा बहेनिहार कृतवीर सेहो समय-समय पर ऐ धरतीपर जन्म लइ छलाह। राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, आचार्य शिवपूजन सहाय, आचार्य नलिन विलोचन शर्मा, श्री रामवृक्ष बेनीपुरी, श्री फनीश्वर नाथ 'रेणु', राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर',  नागार्जुन आ शाद अजीमाबादीक रचनामे देशक माटिक गंध आ चिंतन भेटत। बिहार (पटना) श्री गुरु गोविंद सिंह जी क जन्मभूमि अछि । अंग्रेजक आगमनक बादसँ बिहारमे कलकत्तासँ प्रशासनिक शासन होइत छल । सन् १८५७ क विद्रोहक समयसँ लोकमे बिहारकेँ अलग प्रांतक रूपमे देखबाक इच्छा छल। श्री सच्चिदानंद सिन्हा, बाबू शालीग्राम सिंह आ बाबू विशेश्वर सिंहक नेतृत्वमे आन्दोलनक फलस्वरूप अप्रैल १९१२ मे बिहार आ उड़ीसा अलग राज्य बनल । उड़ीसा सेहो अप्रैल १९३६ मे बिहारसँ अलग भऽ गेल। पचासक दशकमे राज्य पुनर्गठन आयोगक सिफारिशक अनुसार बिहारक वर्तमान भौगोलिक रूप सोझाँ आयल अछि। पूर्वमे पश्चिम बंगाल, पश्चिममे उत्तर प्रदेश, दक्षिणमे मध्य प्रदेश आ उड़ीसा आ उत्तरमे नेपालसँ घेरल ई राज्य पश्चिमसँ पूर्व दिस बहैत गंगा नदीसँ विभाजित अछि। भौगोलिक रूपेँ बिहार तीन भागमे विभाजित अछि। पहिल अछि उत्तर बिहारक गंगा क्षेत्र। बिहारक बीस टा जिला बिहारक ऐ मैदानी क्षेत्रमे अबैत अछि, जे नेपालक तराई आ गंडकक उत्तरी तटक बीच स्थित अछि। एकरा अलाबे भागलपुर जिलाक नवगछिया उपमंडल उत्तर बिहारमे पड़ै छै। ई पूरा इलाका उत्तर बिहारक नामसँ प्रसिद्ध अछि। मैदान आ नदीसँ भरल हेबाक कारणे उत्तर बिहार कृषिक दृष्टिकोणसँ बहुत समृद्ध रहल अछि। (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) सुशीलक रचना संसार: हुनकर रचना संसार छन्हि- घराड़ी (उपन्यास) (१९७३), गामबाली (उपन्यास) (१९८२), भामती (नाटक) (पहिल मंचन १९९१, प्रकाशन २०१३) आ अस्मिता (लघुकथा संग्रह) (२०१६) आ ई चारू पोथी हुनकर अनुमतिसँ विदेह पेटारमे उपलब्ध अछि लिंक www.videha.co.in/pothi.htm पर। मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा प्रसङ कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) क शीर्षक भ्रामक अछि। ई हुनकर किछु सवर्ण उपन्यासकारपर किछु सिण्डिकेटेड कथित समीक्षात्मक आलेखक संग्रह अछि, २६३ पन्नाक ई पोथी हार्डबाउण्डमे लाइब्रेरीकेँ मात्र बेचल जा सकत, जतऽ ई सड़ि जायत, अमेजनसँ हम ई चारि सय पाँच टाकामे किनलौं मुदा ऐमे पाँचो पाइक सामिग्री नै अछि। ई अपन बायोडाटामे गएर सवर्णसँ छीनि कऽ, समानान्तर धाराक लोकक हककेँ मारि कऽ लेल साहित्य अकादेमीक मैथिल अनुवाद असाइनमेण्टक गर्वसँ चर्चा करैत छथि। आ ई असाइनमेण्ट हिनका मेरिटसँ नै जातिगत टाइटिलसँ भेटल छन्हि, अही सभ किरदानीक एवजमे भेटल छन्हि। हिनका सन लोक लेल मैथिली बायोडेटाक एकटा पाँति अछि, समानान्तर धारा लेल जीवन-मरणक प्रश्न। कमलानन्द झाकेँ हम किए छद्म समीक्षक कहलियनि? कारण ओ छद्म समीक्षक छथि। ओ लिखै छथि- "मैथिली उपन्यास-यात्राक लगभग सय वर्षक बाद मैथिल अन्तरजातीय विवाहक सपना, संघर्ष आ विडम्बना पर गरिमायुक्त उपन्यास लिखबाक श्रेय गौरीनाथकेँ जाइत छनि।" तँ की कमलानन्द झा सुशीलसँ ई श्रेय छीनि लेलनि? की ई हुनकर ब्राह्मणवादी संस्कारक अहंकार- जे हम ककरो चढ़ा सकै छिऐ आ ककरो उतारि सकै छिऐ- केर पराकाष्ठा थीक, आकि हुनकर अध्ययनक अभावक प्रमाण? चलू अहाँकेँ लऽ चली कमलानन्द झा केर स्वार्थी दुनियाँसँ दूर, छल-छद्मसँ दूर सुशीलक जादूबला साहित्यक निश्छल दुनियाँमे।अहाँक स्वागत अछि सुशीलक साहित्यक दुनियाँमे। प्रस्तुत अछि सुशीलक 'गामबाली' (१९८२) जे आब उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमे लिंक http://videha.co.in/pothi.htm पर। पहिल पाँतीमे उपन्यास आरम्भसँ पहिनहिये 'गामबाली' उपन्यासक सम्बन्धमे सुशील लिखै छथि- "विधवा विवाह आ अन्तर्जातीय विवाहक समर्थनमे।" आ उपन्यास आरम्भ। गामबालीक मृत्यु आ तखने झमेला, गामबालीक दाह संस्कार के करतै? ब्राह्मण समाज कि जादव समाज? मुदा आउ पहिने हुनकर पहिल उपन्यास घराड़ीक चर्चा करी। घराड़ी (उपन्यास) (१९७३) ई उपन्यास अखिल भारतीय मिथिला संघ (बाबू साहेब चौधरी) द्वारा छापल गेल छल। बाबू साहेब चौधरीक समस्या नामसँ आमुख सेहो छन्हि। आ सुशील ई उपन्यास अपन मायकेँ समर्पित करै छथि। छोट-छीन लेखकीय वक्तव्यमे ओ अहाँकेँ मरुभूमिक यात्रा लेल चलैले कहै छथि, मुदा मरुद्यान सेहो छै, खजूर पानि जतऽ भेटै छै। पाठक जीक दलानपर उपन्यास प्रारम्भ होइत अछि, दूटा सन्दूक एकटा चौकी, दूटा लगहरि महींस, एकटा गाय, आ एक जोड़ा बड़द। बाँझी घूरमे झिंगुड़ा दैत अछि, सुखायल जाड़निसँ बेशी ई सजीव बाँझी जड़ै छै, प्रकृतिक लीला! आ उपन्यासकार सभटा सरंजाम केलाक बाद रतनक प्रवेश उपन्यासमे करबै छथि। मिलिट्रीमैन रतन। एतऽ भाषायी शिक्षा सेहो भेटत। अनावश्यक 'क' आ 'त' केर प्रयोग सुशील १९७३ मे सेहो नै करै छला, पी.डी.एफ.मे जतऽ शुरूमे ई आयल छै तकरा ओ पेनसँ काटि देने छथि, बादक फर्मा ठीक छै। ऐ उपन्यासमे मलाहक लड़की आ ब्राह्मणक बेटाक प्रेम सम्बन्ध सेहो भेटत। तँ की ई सिद्ध होइए जे, जे भाषायी रूपसँ फरिच्छ अछि ओ आगाँक सेहो सोचैए, ओकर विषय-वस्तु सेहो आगाँ दिसुका सोच लेने होइ छै। मूलधारामे ई दुनू निपत्ता भेटत। से दुल्हा गामक उदयचन्द्र झा 'विनोद' जे कि मेडियोकर छथि आ प्रतिक्रियावादी विचारधाराक छथि (विदेहक शरदिन्द् चौधरी विशेषांक आ प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक दुनूमे हुनकर छल-छद्म शरदिन्दु आ प्रेमलता जी अभिलेखित केने छथि), से मूलधारामे स्वीकृत भेलथि मुदा ओही दुल्हा गामक सुशील जे भाषा, विचार, रचनाक विषय आ रचनाक स्तर सभमे हुनकासँ बहुत आगाँ छथि, हुनके जातिक छथि से कतिआ देल गेला, मूलधारामे ओ अस्वीकृत केना नै होइतथि्? छद्म समीक्षक सभकेँ तँ हुनकर नामो नै सुनल छन्हि बा ओ सभ ऐ तरहक स्वांग करै छथि। रतनक घराड़ी जोति लेल गेल छै, लालबाबू जोति लेने छथिन्ह। ओकर छोटका भाय अपने हिस्सा ने लिखत, रतनक हिस्सा कोना लालबाबू लिखबा लेलन्हि? लालबाबू बदलेन करैले तैयार छथि (आगाँ जा कऽ कारण रतन केस कऽ देने छै) मुदा रतनकेँ वएह घराड़ी चाही, दोसर ठाम उपटि कऽ किए जायत? मुदा ई सूचना औपन्यासिक विस्तारमे आगाँ जा कऽ खुजैए। ईहो जे रतन, पिताक मृत्युक बाद, मिलिट्रीमे चलि गेल आ गामसँ निपत्ता भऽ गेल जखन आ सेहो जखन ओ पन्द्रह बर्खक रहय। देह दशा बीस बर्खक लागै, से ओ अपन उमेर बीस बर्ख बतेलकै, से मिलिट्री भर्ती लऽ लेलकै। पन्द्रह साल कोनो पते नै। ओकर भाय महादेव कोहुना लालबाबूक कृपापर अछि, पेट पोसि रहल अछि। माय आ कोरपोछुआ बहीन बाढ़िमे बहि गेलै। ओकर रोष स्वाभाविक। मुदा पाठकजी केँ अपन गोटी खेलेबाक छन्हि, अभिराम झा कने फरिछायल गप कहै छथि। बुच्चन, पाठक जीक बड़का बेटा। बुच्चन सरओं खेलाइत अछि, सोझमतिया अछि, कोन बाँसक दाहा बनतै से आब लालबाबू बुझथिन्ह, से बजैए। पाठक जी जकाँ गोटी सेट करय नै अबै छै, से पाठकजीसँ मतान्तर सेहो छै। पाठकजीक पौत्री कुमकुमक प्रवेश करबै छथि उपन्यासकार। कुमकुमक बड्ड पैघ रोल आगाँ आबैबला छै, अखन तँ ओ कानि रहल अछि, ओकर टेरलिनक फ्राकमे आगि धऽ लेलकै, पाकि गेल। पाठक जी बिदा होइ छथि अस्पताल। पहिल खण्ड समाप्त। बागमती कातक अस्पताल, लालबाबू (ललितेश्वर चौधरी)क प्रतापे, पाँच बीघा सोनक टुकड़ी हुनके देल। पाठको जीक योगदान, पाइसँ नै देहसँ। बुच्चुन आ ओकर युवा सेना धुनि कऽ श्रमदान देलक । आ ऐ परोपकारक कारण?  हुनकर बेटा ओइ काल दरभंगामे डाक्टरी पढ़ि रहल छला, आ ओ आब अही अस्पतालमे छथि। दूरक सोच! आ कुमकुम केँ पाठकजी लऽ जाइ छथि, अही अस्पताल जतऽ मलाह जातिक करुणा नर्स छै, आ लालबाबूक बेटा ब्राह्मण जातिक डॉ. बिनायक ओतऽ डाक्टर छै। आ लाल बाबू सेहो अस्पताल पहुँचि जाइ छथि। हुनका ऐ सभ गपमे मोन नै लगै छन्हि, हुनकर मोन टाङल छनि ओइ गपपर, रतन जे भोरमे गेल रहन्हि पाठकजीक ओइठाम। दोसर खण्ड समाप्त। तेसर खण्डक प्रारम्भ, ननु पोखड़िपर गप्प सड़क्का चलि रहल छै। पंचैती छै, रतन आ लालबाबूक बीच सुलह हेतै आकि नै? पाठक जीक छोटका बेटा मलय, वएह जे कुमकुमले टेरेलीनक फ्राक अनने रहै, आ लालबाबूक छोटका बेटा अजीत, दुनू बड़ा दिनक तातिलमे मुजफ्फरपुर कओलेजसँ गाम आयल छै, ओहो दुनू ओत्तऽ छै। विविध भारतीसँ बहीदा रहमान जयमाला प्रोग्राम प्रस्तुत कऽ रहल छथि। पी.डी.एफ.मे सुशील जी पेनसँ काटि कऽ अमीन सयानी केने छथि, मुदा अमीन सयानी बिनाका-सिबाका प्रोग्राम करै छला सीलोन रेडियोसँ, सैनिक भाइ लेल जयमाला विभिन्न कलाकार विविध भारतीपर होइए, अमीनो सयानी तकरा कऽ सकै छथि आ बहीदा रहमान सेहो, से हम प्रिण्टबला वर्सन लऽ कऽ चलि रहल छी। पंचैती धौत परीक्षा विजेता सुन्दर झा केर नामसँ स्थापित पुस्तकालयपर छै, ननु पोखड़िपर। लालबाबू बदलेन करैले तैयार छथि बरू दू कट्ठा बेसी देता मुदा रतनकेँ वएह घराड़ी चाही, ओ तमसा जाइए। आ खण्ड समाप्त। चारिम खण्ड प्रारम्भ, रतनक छोटका भाइ महादेबक हत्या! रतनपर आरोप छै। ओ भागि जाइए। मुदा बुच्चन ओकरा पक्षमे थानामे बाजैए जे जखन ओ ४-५ दिनसँ गाममे रहबे नै करय तँ ओ हत्या केना करत? ओकरा संगे ४-५ टा छौड़ो छै, फेर १०-१५ टा। पाठकजी अवाक छथि। लाल बाबू सन्न छथि। आ बतहन बाबू सभक मुखाकृति देखि रहल छथि। बतहन बाबू रतनक पक्ष बुच्चनसँ सुनने रहथि, आ बतहन बाबूक कहला हिसाबे बुच्चन बयान दैत अछि। पेंचपर पेंच। खण्ड समाप्त। पाँचम खण्ड। ब्राह्मण डॉ. बिनायक आ मलाह नर्स करुणा। करुणा कहैए, ई विवाह असम्भव अछि, ओ नीच जातिक अछि, मलाहक बेटी अछि आ बिनायक पैघ लोक। बिनायक नै मानैए। आ...  (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.आशीष अनचिन्हार- निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष आशीष अनचिन्हार निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष (हमर ई व्यंग्य निबंध विदेह केर १६८म अंकमे प्रकाशित भेल छल मुदा एक बेर फेर हम अही व्यंग्य दऽ रहल छी कारण हमरा लगैए एखन ई विषय पाठक लग फेरसँ पहुँचबाक चाही-लेखक)

सभकेँ सभ तरहँक निसाँ होइत छै हमरो अछि। बहुत लोकक निसाँ देखार होइत छै मुदा हमर भितरिया अछि। किनको पाइकेँ निसाँ छनि तँ किनको जमीनक तँ किनको नौकरीक तँ किनको किछु मुदा हमरा सभ समय यूनिक चीज रखबाक आदति अछि तँए हमर निसाँ सेहो यूनिक अछि। हमरा गुट-निरपेक्ष बनबाक निसाँ अछि। हम सदिखन निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष बनबाक प्रयासमे रहैत छी। सभ तरहँक निसाँ सुलभ छै मुदा हमर निसाँ बड़ कष्ट साध्य। बड़-बड़ करतब करऽ पड़ै छै ऐमे। मोनकेँ अनेको तरहसँ असफल रूपें मनबऽ पड़ै छै। असफल रूपेम ऐ दुआरे जे संसारक तँ नियमे छै जे जँ हम अपना आपकेँ "निष्पक्ष" कहै छिऐ ताहिसँ स्पष्ट भऽ जाइत छै जे हम "केकरो" पक्षमे छिऐ। वस्तुतः बिनु केकरो पक्ष लेने हम "निष्पक्ष" भैए ने सकै छी। ओना संसारमे बड़का-बड़का भूप सभ छथि। मानि लिअ जे हम कहलहुँ जे "हम सत्यक संगमे छी" आब एहीसँ स्पष्ट भऽ जाइत छै जे हम "सत्यक पक्षमे छी" तखन फेर हम निष्पक्ष कोना भेलहुँ ? तँए कहलहुँ जे ई निसाँ बड़ कष्ट साध्य छै। बड़ करतब करऽ पड़ै छै। नील-टिनोपाल देल धोती पहीरि कऽ मंचपर बैसि कऽ हम "निष्पक्ष" बनि जाइत छी आ अपना आपकेँ भरममे राखि लैत छी। उदाहरण देब हमरा अभीष्ट नै मुदा ई जग-जाहिर अछि जे कोनो महापुरूष वा क्रांतिकारी वा युग-प्रणेता अपना आपकेँ निरपेक्ष नै कहला अछि। महात्मा गाँधी की सुभाष चंद्र बोस की नेहरू की भगत सिंह। ओ लोकनि सभ दिन अपन पक्ष प्रस्तुत कऽ ओइपर अड़ल रहला। गप्प चाहे नेल्सन मंडेलाक हो की मार्टिन लूथर किंग केर ईहो सभ कहियो अपनाकेँ निरपेक्ष नै कहला। जँ मध्यगुगमे चली तँ ने भगवान महावीर आ ने भगवान बुद्धे अपनाकेँ निरपेक्ष कहला आ ने हुनक विरोधी। तइसँ पाछू चली तँ भगवान कृष्ण तँ साफे-साफ अपनाकेँ "निरपेक्ष" मानबासँ मना कऽ देने छथि। जँ गीता केर निचोड़ देखी तँ ई साफे बुझाएत जे " निरपेक्ष" आ "नपुंसक" एकै थिक। राम की परशुराम की आन सभ अपन-अपन पक्ष संसारक सामने रखला। एतऽ धरि जे रावण, कौरव, बुद्ध-महावीर युगीन कर्मकांडी आ अंग्रेजसँ गोडसे धरि सभहँक अपन पक्ष छलै। मुदा ई सभ देखितो हम अपनाकेँ "निरपेक्ष" कहि रहल छी तकर कारण छै आ ओकरा ऐठाँ देब जरूरी नै। ओना हम ई कहि दी जे हम अपना मोने ई निसाँ नै चुनलहुँ। हमरा संसारक बड़ अनुभव अछि आ हम देखलहुँ जे विरोध करबै तँ किछु नै भेटत आ चमचइ करबै तखन सभ दूसत तँए बहुत मंथन केर बाद हम निरपेक्षताक चद्दरि ओढ़ि लेलहुँ। मने दुन्नू हाथमे लड्डू। विरोधो नै करबै आ ने चमचइ करबै से मोनमे अछि। भने हमर नाम महापुरूष वा क्रांतिकारी वा युग-प्रणेताक रूपमे नै आबए तात्काल तँ हम राजा-महराजा सन छी हमरा लेल सएह बहुत अछि। हम आशीष अनचिन्हार, पिता श्री कृष्ण चंद्र मिश्र, गाम भटरा-घाट, थाना बिस्फी, जिला मधुबनी, प्रांत-बिहार, गोत्र-शांडिल्य,मूल सोदरपुरिये-सरिसब,एखन धरि अविवाहित पूरा होशो-हवासमे घोषणा करै छी जे हम "निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष" छी। हमरा कोनो वस्तुसँ जोड़ि कऽ नै देखल जाए। आब हम विआह किए नै कऽ रहल छी से नै पूछू। हमरा डर अछि जे लोक कहीं ई नै पूछए जे सरकार बाल बच्चाक समयमे "निरपेक्ष" रहलिऐ की नै? ओना ऐमे डरेबाक कोनो प्रेश्ने नै छै। जमीन पलटि जाइ छै. अकास पलटि जाइ छै बसातो पुरबा-पछबाक बदला उतरा-दछिना भऽ जाइ छै तखन बाल-बच्चाक समय जँ निरपेक्षता छोड़ि हम "पक्षी" बनब तँ कोन अपराध। लोक किताबमे प्रगतिशील बनि अपन बेटीक प्रेम-विआहक विरोध करैए। पुरस्कार प्रतिनिधिक विचारक विरोध कऽ फेर ओकरे हाथसँ पुरस्कार लैए आ जखन ई सभ अपराध नै छै तखन हमहीं जँ पलटि जाएब तँ कोन अपराध। ओना पलटि गेनाइ अपराध तँ नै छै मुदा हम ईहो बूझै छी जे भने मिनट-दू मिनट लेल हम कूदि-फानि ली मुदा ई निसाँ पूरा जीवन नै चलत। रंगल सियारक रंग सेहो एक दिन उतरल रहै आ हमहूँ तँ रंगले मनुख छी ने? मुदा जा धरि चलै छै चलऽ दियौ। जहिया निसाँ उतरतै देखल जेतै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.प्रेमशंकर झा 'पवन'- मैथिली फकरा (लोकोक्ति) संकलन प्रेम शंकर झा 'पवन' मैथिली फकरा (लोकोत्ति) संकलन १. चलय ने आबय त अंगना टेढ़ २. भोज नै भात हर-हर गीत ३. चोरक मुंह चान सन ४. खीरा खाकें पेनी तीत ५. अनेर धुनेर कें राम रखवाईया ६. तीन तिरहुतिया तेरह पाक ७. धोबीकें कुत्ता नै घरकें नै घाटकें ८. बहिरा नाचे अपने ताले ९. देखय मे लिख सन बाजय मे बीख सन १०. बहय बरद हकमय कुकुर ११. अन्हरा गाम मे कन्हा राजा १२.ओझा लेंखे गाम बताह गामक लेंखॆ ओझा १३. राजा दुखी प्रजा दुखी योगीकें दुख दूना १४. पहिरने ओढ़ने कनिया वर, निपने पोतने अंगना घर १५. सस्ता गेहुम घर घर पूजा १६. बाप जनमल अन्हरिया मे बेटाक नाम पावर हाउस १७. दिदगरी कनियाकें भैंसुर लोकनिया १८. घरक भेदिया लंका डाहय १९. छोट खिखिरकें मोंट नांगरि २०.चलनी दुसलनि सूपकें जिनका बहत्तर टा छेद २१. पेंट बिगाड़े मुरही घर बिगाड़े बुरही २२. घर आंगन भौजीकें छल छल करथि नन्दो 23. हरबरी वियाह कनपट्टी सेनुर २४. बड़ियाक मारि लागय कुठाम २५. जे हर बहए से खर खाय बकरी खाय आचार अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.कुमार मनोज कश्यप- बलिक छागर कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा बलिक छागर रजवाड़ा परिवार छै धर्मेशबाबू के........एखनो धन-संपत्ति अथाहे छै। पढ़ाई-लिखाई, पद-प्रतिष्ठा मे सभ समाँग एक-स-एक!  आ यैह कारण छै जे सामंतशाही गेलाक बादो ई परिवार परोपट्टा मे एखनो नामी-गामी बनले छै।   से जखन एहि परिवार के बालक जे स्विट्ज़रलैंड मे सी० ए० छै, के मादेँ वियाह के प्रस्ताव प्रतापबाबू के भेटलनि तs लगलनि जेना संसारक अलभ्य वस्तु अनचोके मे भेट गेल..... एहन धनाढ़, प्रतिष्ठित परिवार आ तै पर लड़का विदेश मे सी० ए० आ तकर वियाहक प्रस्ताव अनायासे भेट जायब! प्रतापबाबू के भगवान पर आई  विश्वास आर बेसी गहींर भs गेलनि। बेटी सुन्दर छनि, सुशील छनि  ताहि मे तs कोनो दू राय नहिं; मुदा सुंदरते मात्र वियाहक कसौटी हेतै से कहियो सपनो मे नहिं सोचने छलाह।  ओ  तs नित चिंता मे रहैत छलाह जे कोना  बेटी के जातिक कोनो लड़का के अंक लगा देथि।  ओतs आई लड़के दिस सs आ ओहू मे एहन पैघ घर सs कथा ऐब ...... कोनो दैवीय चमत्कार सs एको मिसिया कम नहिं बुझा रहल छलनि!  ओ धखाईत घटक के कहने रहथिन - 'कथा तs हमरा सोलहो आना मंजूर अछि; मुदा हमरा भगवान सामर्थ कहाँ देने छथि जे एहन पैघ  घरक वर-बरियाती के सत्कार कs सकी।'  'आहाँ चिंता जुनि करू।  खाली आहाँ 'हँ' कहि दियौ तकरा बाद कान मे तूर-तेल दs  निश्चिन्त रहू।  बाकी सभटा  भार लड़का वला के छैन।' प्रतापबाबू के लगलनि जेना ओ स्वपन-लोक मे विचरण कs रहल होथि। शुभ-शुभ कs वियाह-दुरागमन सभ भs गेलै। मुदा लड़का जे स्विट्ज़रलैंड गेलै से आई दू बरख बीतलाक बादो गाम घुरि  नहिं एलै........ फोनो बंद ! कनफुसकी के बजार गर्म ..... जते लोक तते तरहक बात ! एम्हर प्रतापबाबू कोनो अनिष्टक आशंका सs दिनानुदिन व्यग्र ओम्हर धर्मेशबाबूक परिवार पूर्ववते हँसी-खुशी मे! -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.आचार्य रामानंद मंडल- मैथिली साहित्य मे घोटाला आचार्य रामानंद मंडल मैथिली साहित्य मे घोटाला मिथिला -मैथिली मे दूटा विद्यापति भेलन। ज्योतिश्वर ठाकुर (१२९०-१३५०) से पूर्व सोलकन नाइ जाति मे विद्यापति भेलन ।वो अपना साहित्य पर विदापत नाचो शुरू कैलन।वो नाच संपूर्ण मिथिला मे लोक शिक्षण करैत रहे। जेकर चर्चा ज्योतिश्वर कैले हतन।दोसर विद्यापति (१३५२-१४४८)ज्योतिश्वर के बाद मे भेलन।जे जाति के बाभन रहलन।वो संस्कृत आ अवहट्ट मे साहित्य रचना कैलन। परंतु मैथिली साहित्य मे नाइ विद्यापति के कृति के बाभन विद्यापति के कैल जा रहल हय। एगो दैनिक अखबार मे लेखक प्रवीण नारायण चौधरी लिखैत हतन- विरोध, निंदा आ आलोचनाक बाबजूद विद्यापति कवि कोकिल, महाकवि, जनकवि बनि गेलाह।लोक हुनकर संदेश के हाथोंहाथ स्वीकार कयलक।अपन सहज -सुंदर मैथिली रचना सभ एतैक जनसुलभ छल जे लोक ओकरा हृदयंगम कय लेलक।जन-जन के कंठ मे अपन देसिल बयना (मातृभाषा) रचनाक कारण पहुंचि गेलाह विद्यापति।हुनकर नचारी,महेसबानी,राधा -बिरह ,नोंक झोंक आदि अनेकों महत्वपूर्ण रचना सं समाज मे साहित्यिक धारा एहेन बहल जे विद्यापतिक पदावलि पर नाच परम्परा -विदापत नाच तक प्रचलन मे आबि गेल। विदित हो कि जनवर्गीय समाज मे एहि विद्यापति नाच के सहारे शिक्षाक समुचित प्रसार होबय लागल मिथिलाक लोक समाज मे। उल्लेखनीय हय कि ज्योतिश्वर पूर्व से विदापति नाच मे विद्यापति पदावली के नृत्य अभिनय होइत रहे।अइ विद्यापति के बारे मे कश्मीर अभिनव गुप्त (दशम शताब्दी के अंत आ एगारहम शताब्दी के प्रारंभ) -ईश्वर प्रत्याभिज्ञा -विभर्षणी ग्रंथ मे लिखल हय। श्रीधर दास के सदुक्तिकर्णामृत (रचना ११फरबरी १२०६ मध्यकालीन मिथिला लेखक विजय कुमार ठाकुर) श्रीधर दास विद्यापति के पांचटा पद उद्धृत कैलै हतन जे विद्यापति के पदावली के भासा हय। जाव न मालती कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।आ मुंदला मुकुल मकरंद,ज्योतिश्वर (१२७५-१३५०)षष्ठ कल्लोल।अथ विद्यावंत वर्णन।। अष्टम कल्लोलक।।अथ राज्य वर्णन।।मे विदापतके उल्लेख कैले हतन।से विद्यापति ततेक प्रसिद्ध भ गेल रहे जे ज्योतिश्वर तेकर उल्लेख नाचक रूप मे कैलै रहलन।(श्रोत -बिदेह) उपर्युक्त कथन से स्पष्ट हय की विदापति नाच नाइ विद्यापति के हय। परंतु आबि साहित्यिक घोटाला क के बाभन विद्यापति के कृति बनायल आ बताओल जा रहल हय। हालांकि कुछ लोग एके विद्यापति के नाइ त कुछ लोग बाभन बतबैत हय। परंतु उपर्युक्त तथ्य के आधार पर दूटा विद्यापति भेलन।एगो नाइ आ एगो बाभन। परंतु मैथिली साहित्य मे विद्यापति के लेके घोटाला कैल गेल हय। वर्तमान भौगोलिक स्थिति मे जैइ बिस्डीफी डीह के बाभन विद्यापति के जन्म स्थान बतायल जाइ हय वोकर पांच वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मे बाभन बस्ती न हय। परंतु नाइ बहुल हय। बाभन विद्यापति के जन्म अन्य क्षेत्र मे भेल रहे।बिस्फी डीह मे बाभन महाकवि विद्यापति समारोह न मनायल जाइत हय।अइ प्रकार मैथिली साहित्य मे घोटाला हय। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.आचार्य रामानंद मंडल- २ टा कथा आचार्य रामानंद मंडल २ टा कथा १ जैविक पिता सारा गांव-जवांर जनै कि छोटका मालिक खवास के जनमल हैय। लेकिन छोटका मालिक अइ बात से अंजान रहै। आखिर अंजान केना न होयत।केकरा में इ हिम्मत होयत,इ बात छोटका मालिक के बताबे के। लेकिन एगो अप्रत्याशित घटना से पता चल गेल कि हम खवास से जनमल छी।हमर जैविक बाप खवास हैय। घटना इ भेल कि खवास छोटका मालिक के चाय पीये लेल लबैत रहे कि टेबुल पर धरे के बेर हाथ से कप छूट गेल आ चाय गिर के छोटका मालिक के नयका सूट पर गिर गेल। छोटका मालिक आग बबूला हो के बिगड़ लन।खबासी करते करते बुढा गेल, लेकिन अब तक अकिल न भेल हैय।  मारे ला हाथ उठैलन।खबास बोले लागल, मालिक मालिक...! इ शोर के छोटका मालिक के माय सुनते, दौड़ल आयल आ हाथ पकड़ के जोर से बोललैन- इ कि कैला बौआ।इ तोहर बाप छथून। इ तोहर जैविक पिता छथून।इनकरे तू जनमल छा।इ माय,तू कि बोले छी।हां बौआ हम सही कही छिओ। हां बौआ,इ बात तोहर बाबू जी भी जनैत रहलथून ह। तोरा जनम होय से तीन महीना पहिले हमरा सब के छोड़ के दुनिया से चल गेलथून।तोहर बाबू जी के खवास जरूर रहथून, लेकिन तोहर जन्मदाता बाप छथून।चल जा इनका से गोर ध के माफी मांगा। छोटका मालिक आंख में आसू ले के ,गोर ध के बोललन, हमरा माफ क द बाबू जी। छोटका मालिक,हुनकर माय आ खबास बाबू, तीनों आदमी आपस में खुशी से लिपट गेलन। कुछ देर बाद छोटका मालिक के माय अहिल्या देवी अपना कमरा में जाके पलंग पर पड़ रहलन।आंखि मूंद ले अतीत के याद मे खो गेलन। भगवती पुर के पूर्व जमींदार के एकलौता पुत्र रवीन्द्र प्रताप से विआह भेल। रवीन्द्र प्रताप पच्चीस बरख के बांका जवान रहतन।गोर भुराक। बड़का बड़का आंख।कारी मोछ। चौड़ा सीना। देखते मन मोह लेलन। अहिल्या रामपुर के पूर्व जमींदार के बेटी रहे। तेइस बरख के अहिल्या गौर वर्ण के युवती रहे। अंडाकार चेहरा।कुइश आंखि। कमर तक लटकैत कारी केश। उन्नत उरोज के स्वामिनी अहिल्या के देखते रवीन्द्र प्रताप दिवाना भे गेलन। कुछ दिन बाद होली रहे। होली के दिन रवीन्द्र प्रताप चुपके चुपके पीछे से आके अहिल्या के बांह में भर ले लेन आ चेहरा में ललका रंग लगा देलन।आ फेर अबीर लगा देलन। जौं अहिल्या चेहरा में हरियरका रंग लगाबे के लेल रवींद्र प्रताप के लेल बढल। रबीन्द्रनाथ प्रताप  हरियरका रंग से बचे लेल पीछे के ओर अपन डेग कैलन।कि भटाक द रंग आ पानी से भीजल पक्का फर्श पर पीछर गेलन।हुनका रीढ के हड्डी में जबरदस्त चोट लगलैन।आ वो शरीर स अशक्त हो गेलन। अहिल्या आ रवीन्द्र प्रताप के खुशहाली दुःख दर्द में बदल गेल।परंच अइ दुःख दर्द में सहारा भेल रवींद्र प्रताप के साथी आ खवास रामवरन महतो।रामवरन हठ्ठा कठ्ठा जवान रहे। गेहूंआ रंग।औठिया केश,कारी मोंछ। चौरा छाती। देखे में आकर्षक पुरुष। रामवरन महतोआ रवीन्द्र प्रताप के उमर एके रहे।गांव के स्कूल में पांचवा तक साथे साथे पढे।साथे खेले।गरीबी के कारण रामवरन आगा न पढ पायल।रामवरन अपन साथी आ पूर्व जमींदार रवींद्र प्रताप के इहां खवासी करे लागल।परंच रवीन्द्र प्रताप रामवरन के अपन साथी के लेखा माने। अहिल्या भी रामवरन के देवर जैसन मान दे।परंच रामवरन रवीन्द्र प्रताप के मालिक आ अहिल्या के मालकिन माने। रवीन्द्र प्रताप अहिल्या के दुख देख के बड दुखी होय। रवीन्द्र प्रताप अहिल्या के शारीरिक सुख देबे में अक्षम हो गेल रहे।परंच अहिल्या त जवान रहे। एकटा दिन अहिल्या के सामने रवीन्द्र प्रताप रामवरन के कहलक-देखा रामवरन तू हमर खवास न हमर साथी छा। अहिल्या तोरा देवर लेखा मानौ हैय।हम आब शारीरिक रूप से अशक्त छी। आब अहिल्या के खुश रखे आ पुत्र सुख देवे के भार हम तोहरा देव छियो। अहिल्या के ओर देख के रवीन्द्र प्रताप कहलन-अहिल्या आबि तू रामवरन के स्वीकार करा। अपन वंश के चलाने के लेल  एगो पुत्र त चाही।एहन घटना महाभारत काल में भी होयल रहे। धृतराष्ट्र पांडू आ विदुर  के जनम अपन पिता से  अपन पिता से न भेल रहे वरना ऋषि वेदव्यास से भेल रहे। ऋषि वेदव्यास धृतराष्ट्र पाण्डु आ विदुर के जैविक पिता रहे। अपन पुत्र के जैविक पिता रामवरण होयत त कोनो हरज न।दुनू गोरे के स्वीकार त करे के पड़तैय। अइमे संकोच न करा। अहिल्या सिर झुका के मौन सहमति दे देलक।रामवरन सिर झुला के मौन स्वीकृति दे देलक। आबि अहिल्या आ रामवरन में प्रेम अंकुरित भ गेल। अहिल्या आ रामवरन रवीन्द्र पताप के खूब सेवा करे।अइ बीच अहिल्या गर्भवती भे गेल। रवीन्द्र प्रताप अचानक अइ दुनिया से विदा भे गेलन।तीन महिना के बाद छोटका मालिक पैदा भेल।खवास रामवरन छोटका मालिक के जैविक बाप वन गेल। इ सभ घटना चल चित्र जेखा अहिल्या देखत रहै कि छोटका मालिक के आवाज-माय माय से स्मरण विखंडित भे गेल। २ मिताइ सियाराम आइ इ दुनिया में न हैय। परंच जौं अकेला में रहि छी त बड याद आबैय।हम दूनू गोरे संगी रही। स्कूल में साथे पढी। मिडिल स्कूल में त एके साइकिल सं स्कूल जाइ।उ बैक खींच के ले जाय।उ फस्ट करे आ हम सेकेंड करी। हं। सियाराम के सर दर्द के बीमारी रहे। कहियो कहियो देखिए कि वो गमछा से माथा के खूब कस के बांध लेवे।खुब माथा में भिक्स रगड़े।आ खूब पढे।बुझाय कि जेना सियाराम के पढे के भी बीमारी हैय।बीमारो रहला पर पढाई न छोड़े। हाइ स्कूल में हास्टल में एके रूम में रही।पढे में दूनू गोरे के प्रतिस्पर्धा रहे।अपन लालटेन साफ रखे मे भी प्रतिस्पर्धा रहे। लालटेन के शीशा एकदम साफ रहे। खूब इजोत दे।हां। पढ़ाई के प्रतिस्पर्धा में दूइ बजे रात सं पढाई शुरू क देबे।जब जाने कि हम पढब त उ अपन लालटेन के लौ कम के सुते के ढंग ध लेबे।कि हम सुत रही। तब हम देख के सुत रही। जब हम पढे ला उठी त देखै छी त सियाराम पढैत रहे। कभी हम सेकेंड करी त उ थर्ड आ उ सेकेंड करी त हम थर्ड।तेसर लैयका वरुण हमेशा फस्ट करे। ग्यारहवीं यानी मैट्रिक के सेन्टप परीक्षा में एगो चौथा लैयका किशोर सेकेंड कैलक।हम थर्ड आ सियाराम चौथा स्थान पर चल गेल। वरुण फस्ट रहें। मैट्रिक बोर्ड में हम सेकेंड कैली आ सियाराम थर्ड। वरूण आ किशोर फस्ट। इण्टर में हम सेकेंड आ सियाराम थर्ड। अब सियाराम पढाई छोड़ देलक आ नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र के एगो स्कूल में पढाबे लागल। असल में सियाराम के घर नेपाल के तुलसीगामा में रहे। वो हमरा गांव में अपना संबंधी के इंहा रह के पढ़ें।सियाराम के शादी भेल।धिया पुता भेल। एगो बेटा इंजिनियर हैय।वो कबहु हमरा गांव अपना कुटुंब इंहा आवे तो हमरा से अवश्य मिले। हम हुं बेरोजगारी से जुझैत रही। हमरो कहे दयानंद ,चला नेपाल। नेपाल में साइंस टीचर के बड कमी हैय। दुर्गम क्षेत्र में दुगुना दरमाहा मिलै हैय। भारत के बहुत लोग साइंस टीचर हैय।परंच हम नेपाल न गेली।हम यही एगो वित्त रहित इण्टर महाविद्यालय में पढाबे लगली।कि आइ न काल्हि सरकारी कालेज हो जतै। तेरह बरख बीत गेल कालेज सरकारी न भेल। परंच हम प्राथमिक शिक्षक के लेल फार्म भर ले रही। पीटी में पास कैली। बाद में मुख्य परीक्षा भेल।ओहु में सफल भे के मध्य विद्यालय में योगदान कैली।बीच-बीच में सियाराम से भेंट होइत रहे। कुछ दिन से सियाराम से भेट न होय। तो हम हुनका कुटुंब से पुछली त कुटुंब बतैलक कि सियाराम बीमार हैय। नेपाल के बड़का बड़का अस्पताल में चिकित्सा भेल परंच बीमारी के पता न चल रहल हैय।आबि हुनकर चिकित्सा दिल्ली में मेदांता अस्पताल में चल रहल हैय। मेदांता में सियाराम के एगो बडका बिमारी ब्रेन ट्यूमर के पता चलल। कुछ दिन दवाई से चिकित्सा भेल। अंत में ब्रेन के सर्जरी भेल। चिकित्सा सफल न भेल ।सियाराम अइ दुनिया के छोड़ के सदा के लेल चल गेल। बुझाई सियाराम के सिर दर्द ब्रेन ट्यूमर के कारण होय। परंच इ बात पहिले न जानी। लगभग दस वरष भे गेल।हमहू अब सरकारी सेवा सं रिटायर्ड छी। परंच जब भी अकेला में होय छी सियाराम के मिताइ याद आबैय जे हमरा पढाई में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न कैलक। -आचार्य रामानंद मंडल, सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'- ॐ तत्‍ सत्‍ एकम्‍ एव अद्वितीयम् योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' ॐ तत्‍ सत्‍ एकम्‍ एव अद्वितीयम्‍ हम सब हिन्दू धर्म मे कतेक देवी-देवताक पूजा करैत छी ? प्रश्न कें दोसरो तरहें पूछल जा सकैत छैक- कतेक देवी-देवता छथि? एकर विभिन्न उत्तर भेटत। पुराणक अनुसार तैंतीस कोटि देवी-देवता छथि। विद्वान लोकनि कोटिक दू अर्थ बतबैत छथि। एकटा भेल करोड़, माने तैंतीस करोड़ देवी-देवता छथि। ओहिना जेना पृथ्वी पर मनुष्यक जनसंख्या अछि, हुनकर कहब छनि जे देवयोनि सेहो मनुष्ययोनि जकाँ दोसर योनि छिऐक आ मनुष्यलोक जकाँ देवलोक छैक। किछु अन्य विद्वान मानैत छथि जे कोटि माने भेल प्रकार, अर्थात तैंतीस प्रकारक देवी-देवता छथि। बृहदारण्यक उपनिषद मे याज्ञवल्क्यक उक्तिक अनुसार एहि मे आठ बसु, एगारह रुद्र, बारह आदित्य, इन्द्र आ प्रजापति (ब्रह्मा) कें राखल गेल अछि। आन ग्रन्थ सब मे छोट-मोट भिन्नता भेटि सकैत अछि। एहि सब बहस कें छोड़ि व्यवहारक धरातल पर आउ आ देखू जे मिथिला मे हम सब एकटा छोट-छीन सत्यनारायण पूजा करैत छी तखन कतेक देवी-देवता कें पूजैत छी ? गणेशजी तऽ शुरु मे रहबे करताह, तखन ब्रह्मा, विष्णु, महेश छथिए (आगू पाछू जे होइनि), लक्ष्मी आ सरस्वती कें निश्चिते पूजा करबनि, सीता-राम-लक्ष्मण किएक छुटताह ? एतबे नहि, नवग्रह, इन्द्र, दशदिक्पाल रहबे करैत छथि, आदिपुरुष, अनादिपुरुष संगहि छथि, आ वीर हनुमान कें कोना बिसरबनि यौ ? ओतबे नहि, भगवान सत्यनारायण सेहो एकसरे नहि, सआयुध, सवाहन, सपरिवार अपन पूजा करबैत छथि, एहि मे कोन कोन वाहन आ परिवारक कतेक सदस्य छनि से नहि बूझल। घरक कुलदेवी काली अपन विभिन्न रूप मे अलग सँ छथि। समय भेला पर दुर्गाक पूजा, कार्तिक के पूजा सेहो धूमधाम सँ करैत छी।  छठिक सूर्यदेव, चौठचन्द्रक चन्द्रमा तऽ रहिते छथि, महिला लोकनिक लेल गौरी पूजा विशेष महत्व रखैत छनि। आ गिरिधर सँ मुरलीधर तक बहुरुपिया बनल ओहि रासरचैया आदियोगेश्वर श्रीकृष्ण कें कतहु छोड़ल जाए ? फेर वैदिक युगक अग्निदेव, वायुदेव एखनहु देवरूप मे छथिए। ताहू सँ मोन नहि भरल तऽ आधुनिक युगक अवतार सब, जेना संतोषी माता, साइ बाबा आ अन्य कतेको छथि जिनका भक्त लोकनि पूजैत छनि। एहि सब कें मिला कए देखला पर हमर हिन्दू धर्म बहु-ईश्वरवादी बनि जाइत अछि। विश्व मे आन धर्माबलम्बी मे मुख्यत: एकेश्वरवादक प्रचलन अछि- ईसाइ, आ मुसलमान, जिनक जनसंख्या मिला कए विश्व मे करीब साठि प्रतिशत भऽ जाइछ, एके ईश्वर (ईशा मसीह आकि अल्लाह) कें मानैत छथि। बौद्ध धर्म मे बुद्ध कें ईश्वर मानि लेले गेलनि, ओना गौतम बुद्ध स्वयं अपना कें ईश्वरक अवतार नहि मानलनि, पश्चात भक्त लोकनि हुनका पद-प्रतिष्ठा दऽ देलखिन। एतहु एकेश्वरवाद भेल। यदि कियो आन धर्माबलम्बी पूछि दिअए "एतेक किएक ?" तखन की कहबैक ? आ यदि ओ कहए, "अच्छा, यदि कोनो एकटा चुनबाक होअए तऽ किनका राखब से कहू।" तखन अपना पूजाक मन्दिर मे जे अनेको फोटो सब अछि ताहि मे सँ कोन राखब आ कोन हटाएब से निर्णय करब सम्भव छैक की ?  किछु सम्प्रदाय विशेष, जेना शैव, वैष्णव आदि मे कोनो एक देवता कें विशेषाधिकार भेटैत छनि मुदा ओतहु पूर्ण रूपें एकेश्वरवादक स्थिति नहिए अबैत छैक। यदि एहन अवसर उपस्थित भऽ जाए जे एकटा कें नहि चुनि सकलाक स्थिति मे सरकार कहए जे अहाँक नागरिक अधिकार स्थगित भऽ जाएत अथवा रासन कार्ड आओर आधार कार्ड नहि भेटत, तखन ? हमर प्रश्न काल्पनिक नहि अछि। जनैत छिऐक एकटा एहन देश छैक जतए हिन्दू धर्माबलम्बीक जनसंख्या अपन आर्यावर्त के तीन देश (वर्तमान भारत, नेपाल आ बांगलादेश) के बाद सबसँ बेसी छैक आ सेहो कोनो सौ-पचास साल पुरान नहि, जेना कि इंगलैंड-अमेरिका मे बसल हिन्दू छथि। हम जाहि देशक खिस्सा कहि रहल छी ओतए हिन्दू धर्म प्राय: दू हजार साल पुरान छैक। अनुमान लागल ओहि देशक नाम ? एशियाक सुदूर पूर्व भाग मे स्थित ई देश थिक इन्डोनेसिया। जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, बाली आदि अनेको छोट-पैघ द्वीपक समूह जे वर्तमान मे जनसंख्याक हिसाबें विश्वक सबसँ पैघ मुस्लिम देश अछि। प्राय: डेढ़ हजार साल तक, बुझियौ जे पहिल शताब्दी सँ पन्द्रहम शताब्दी तक हिसाबें हिन्दू-बहुल देश छल। हिन्दू आ बौद्ध धर्मक अनुयायी बहुमत मे छलाह आ अपना मे सामञ्जस्यक संग रहैत छलाह। एहि समय मे ओतए भारतक पल्लव, गुप्त, पाल एवम्‍ चोल वंशीय राजा लोकनिक आधिपत्य रहल। कतेको स्थानीय हिन्दू आ बौद्ध राजवंश ओतए अपन प्रताप सँ शासन केलनि जाहि मे माताराम आ माजापहित बेसी प्रसिद्ध भेल। बहुतो भव्य हिन्दू आ बौद्ध मन्दिर आदि बनाओल गेल। पन्द्रहम शताब्दी बितैत बितैत ओतए मुस्लिम प्रभाव बढ़ए लगलैक आ यूरोपीय उपनिवेशवादक आगमन भेलैक। विभिन्न यूरोपीय देश मे अपना मे किछु उठापटक के बाद ई देश चल गेल डच शासन के अधीन। यद्यपि वर्तमान इन्डोनेसियाक आन द्वीपवासी अधिसंख्य मुस्लिम धर्म अथवा ईसाइ धर्म स्वीकार कऽ लेलनि, बाली द्वीप मे हिन्दू लोकनि अपन धर्म कें बचौने रखलनि। जखन 1945 मे डच लोकनि सँ इन्डोनेसिया कें स्वतंत्रता भेटलैक तखन मुस्लिम बहुल समाजक दबाब मे सरकार धर्मक रूप मे मात्र एकेश्वरवाद कें मान्यता देलकैक आ पूर्ण नागरिकताक अधिकार लेल कोनो धर्म सँ सम्बद्ध होएब सेहो आवश्यक बना देलकै। फल भेलैक जे हिन्दू लोकनि पूर्ण नागरिकता सँ वंचित भऽ गेलाह। बाली द्वीप मे एकर पुरजोर विरोध भेलैक, ओ सब अपना कें स्वतंत्र घोषित कऽ लेलनि। बालीक विद्रोही सरकार हॉलैंड आ भारत सँ राजनयिक सहायताक अनुरोध केलनि। ओहि समय भारत आ बालीक बीच छात्र लोकनिक आओर बहुत किछु सांस्कृतिक  आदान-प्रदान भेलैक। एहि सँ हुनका लोकनि कें हिन्दू धर्मक नव व्याख्या सिखबाक अवसर भेटलनि। आब घुरि आउ मूल प्रश्न पर। सामाजिक स्तर पर बहु-ईश्वरवादक पूजक होइतहुँ की हमसब दार्शनिक स्तर पर एहिना छी ? एहि गूढ़ प्रश्नक उत्तर भेटैत अछि वेद मे, उपनिषद मे आ सबसँ बेसी गीता मे। अथर्ववेदक काण्ड 13, सूक्त 4, श्लोक 16-18 मे कहल छैक, "न द्वितीयो, न तृतीयश्चतुर्थो।।।" अर्थात्‍ परमेश्वर एक छथि, हुनका सँ इतर दोसर, तेसर, चारिम आदि कतहु कियो नहि। एहि लेख के शीर्षक "ॐ तत्‍ सत्‍ एकम्‍ एव अद्वितीयम्‍" छान्दोग्य उपनिषद के अध्याय छओ, खण्ड दू के प्रथम सूत्रक अंश अछि। स्थूल रूप सँ एकर व्याख्या भेल जे ब्रह्म एक छथि, दोसर नहि। इएह एक ब्रह्म सँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्डक उत्पत्ति भेल अछि। ब्रह्म अनादि आ अनन्त छथि। एही बात कें गीता मे भगवान कृष्ण अर्जुन कें बेर बेर बुझबैत छथिन। ललित छन्दक प्रयोग करैत राष्ट्रकवि दिनकरक पाँती सब - "।।। मुझमे सारा ब्रह्माण्ड देख, ।।।। शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र; शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश; शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश; शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल; शत कोटि दण्डधर लोकपाल।।।" स्मरण होएबे करत। बालीक हिन्दू लोकनि एही मूल मंत्रकें अपन धर्मक मुख्य तत्व बना लेलनि, स्थानीय भाषा मे "साङ्ग ह्याङ्ग विधि वास" कें मानैत परमात्माक नव कल्पना सँ एकटा मूर्ति बनाओल गेल। अपना कें संगठित करबाक लेल बनौलनि संस्था "Parishad Hindu Dharma Bali" आ फेर एहि नव व्याख्याक पक्ष मे अनेको प्राचीन ग्रन्थक उद्धरण दैत मूलमंत्रक अंग्रेजी अनुवाद "Om, thus is the essence of the all pervading, infinite, undivided one" के संग इन्डोनेसिया सरकार सँ मुख्य धारा मे सम्मिलित हेबाक अपन माँग रखलनि। तखन 1959 मे राष्ट्रपति सुकर्ण मानि गेलखिन। मुदा किछु राजनीतिक अस्थिरताक कारण ई मान्यता अन्तत: 1962 सँ प्रभावी भेलैक। जखन एहि प्रकारें हिन्दू धर्म कें एकेश्वरवादक मान्यता भेटि गेलैक तखन ओहि देशक कतेको टापू सबहक जनजातीय निवासी सब, जे मूलत: प्रकृति आ पूर्वजक आत्माक उपासक छल आ पूर्ण नागरिकता सँ वंचित छल, अपना कें हिन्दू धर्म मे घोंसिया लेलक। एहि धर्मक विस्तृत आयामक कारणें ओकरा लोकनि कें अपन पारम्परिक पूजा अर्चना करैत रहबा मे कोनो बाधा नहि छलैक। हिन्दूक जनसंख्या बढ़ए लगलैक। अन्य द्वीपक हिन्दू सब जखन मान्यताप्राप्त नागरिक बनि गेलाह तखन परिषदक नाम बदलि कए "Parishad Hindu Dharma Indonesia" बना देल गेल। वर्तमान मे करीब पौने दू करोड़ हिन्दू इन्डोनेसियाक विभिन्न द्वीपमे छथि आ बालीक 85% जनसंख्या हिन्दू छैक। मुस्लिम बहुल समाज किछु समयक लेल जरूर हिन्दू लोकनि कें कष्ट मे दऽ देलकनि मुदा सम्पूर्ण इन्डोनेसिया मे हिन्दू रीति-रेवाज एतेक गहींर रचल-बसल छैक जे एखनहु कतेको मुस्लिम आ ईसाइ परिवार मे मुख्य पारिवारिक कार्यक समय हिन्दू रीतिएँ पूजा-चढ़ौआ आदि देल जाइत छैक। योग्यकर्ताक नवम सुल्तान के हवेली मे प्रतिदिन भोर मे सूर्योदय के समय एहि तरहक चढ़ौआक व्यवस्था एखनहु छैक। रामायण आ महाभारतक खिस्सा सँ सम्बन्धित अभिनय आ नृत्य मे मुसलमान होइतो कलाकार लोकनि भाग लैते छथि। ओतबे नहि, जावा द्वीप मे  कजावेन (Kejawen) अर्थात अगम जावा नामक एकटा धार्मिक परम्परा चालू भेलैक जे हिन्दू, बौद्ध आ प्रकृति-पूजन के मिश्रित रूप छिऐक। यद्यपि एकरा कोनो धर्मक नाम नहि देल गेल छैक तथापि सामाजिक परम्पराक रूप मे सरकार सँ मान्यता भेटल छैक। राजधानी जकार्ताक केन्द्रीय स्थल मे झीलक कछेर मे कृष्ण आ अर्जुन कें रथ पर सवार देखबैत प्रसिद्ध अर्जुन विजय मूर्ति छैक। छोट-मोट बात तऽ जाए दियौक, सरकारो अपन रुपैयाक नोट पर गणेशजीकें छापि देलकनि। 1998 मे 20000 रुपिया के एहन नोट छपल छलैक जे आब भेटबो नहि करत (इन्डोनेसिया मे इएह नाम छैक जकरा अंग्रेजी मे संक्षेप मे IDR लिखल जाइत छैक, एखन भारतक एक रुपैया, INR, भेल करीब 183 रुपिया, IDR)। एहि मादे जखन एकटा विदेशी पत्रकार तत्कालीन राष्ट्रपति सँ प्रश्न केने छलखिन तऽ हुनकर गर्वोक्ति छलनि, "हम सब अपन धर्म जरूर बदलि लेलहुँ मुदा संस्कृति नहि बदललहुँ"। एतेक उदार विचारक मुस्लिम समाज छैक ओतए। स्वतन्त्र इन्डोनेसियाक राष्ट्रचिन्ह छिऐक गरुड़, भगवान विष्णुक वाहन। राष्ट्रीय हवाइजहाज कम्पनीक नाम छिऐक गरुड़ एयरलाइन्स। नव धर्म आ प्राचीन संस्कृतिक एहन सम्मिलन विश्वक आन देश मे कतहु नहि भेटत। ओना दुर्भाग्य जे शनै: शनै: किछु नवयुवक मुस्लिम सब अरब देश सँ प्रभावित भऽ कए कट्टरपंथी इस्लामक प्रभाव मे आबि रहल छथि। कष्ट सहियो कए अपन धर्म कें सुरक्षित राखब कियो इन्डोनेसियाक हिन्दू लोकनि सँ सीखथि। एही कारण हमरा इन्डोनेसिया भ्रमणक तीव्र इच्छा छल। तैयारी पर्यटन लेल हम अपन प्रिय ट्रैभेल एजेन्ट बंगलोरक बियोन्डर सँ सम्पर्क कएल आ एकटा छोटछीन प्रोग्राम बनबए कहलिएनि। इन्डोनेसिया मे पर्यटक लेल कतेको आकर्षण छैक। बाली द्वीप युवा पर्यटक आ नव विवाहित दम्पतिक हनीमून लेल प्रसिद्ध छैक, संगहि समुद्र मे साहसिक खेल जेनाकि स्कूबा डाइभिंग, स्नोर्केलिंग आदि लेल सेहो उत्तम स्थल सब छैक। बियोन्डर मे नवके बहाल भेल पर्यटन कर्मचारी, एकटा मैथिल ललना, हमरा ओहने प्रोग्राम पठा देलनि जेना कोनो नवयुवक लेल  बनबैत छलखिन। मुदा हमरा अपन लक्ष्य छल हिन्दू सभ्यता सम्बन्धी स्थान विशेष के भ्रमण आ वर्तमान मे हिन्दू समाजक रीति रेवाज, परम्परा आदिक प्रथमदृष्टया किछु जानकारी प्राप्त करब आ रामायणक ओ नृत्य नाटिका देखब जे ओतए प्रसिद्ध छैक। इन्डोनेसियाक आओर एकटा विशेषता छैक बहुते रास सक्रिय ज्वालामुखी पहाड़। माउन्ट सेमेरु (ऐतिहासिक सुमेरु पर्वत) एखनहु मुह खोलि गर्म छाउर (lava) उगलि रहलैक अछि। कतेको हेरा-फेरीक बाद हमर जे कार्यक्रम बनल ताहि मे हमरा दू दिन योग्यकर्ता शहर के आसपास आ अढ़ाइ दिन बाली द्वीप मे घुमबाक छल। ज्वालामुखी लेल सुमेरु कें तऽ नहि, अन्य ज्वालामुखी, माउन्ट मेरापी, जे योग्यकर्ता शहरक पड़ोस मे छैक, देखबाक प्रोग्राम अपना लिस्ट मे जोड़ल। प्रोग्राम लेल वियोन्डर जे चार्ज केलनि ताहि मे पाँच रातिक चारि-सितारा होटल, जाहि मे जलपान शामिल, एकटा गाइड, ड्राइवर, पीबाक जल, आ हुनक लिस्ट मे देल सबटा पर्यटन स्थल लेल प्रवेश टिकट जोड़ल छल। पर्यटन पर कतहु जेबा काल मौसमक खियाल राखहि पड़ैत छैक। सेहो जखन दूर के अन्य देश मे जाएब। इन्डोनेसिया भ्रमणक लेल नीक समय अप्रिल सँ सितम्बर तक मानल जाइत छैक। अक्टूबर सँ मार्च तक ओतए मानसूनक बरखा होइत रहैत छैक। किछु अन्य व्यस्तताक कारण 2022 के दुर्गापूजाक अवधि मे हम ई यात्रा कएल एहि आशाक संग जे सितम्बरक अन्त आ अक्टूबरक शुरू मे ओतेक मूसलाधार वर्षा नहि हेतैक जे भ्रमण मे बाधा करत। यात्राक तैयारी मे सबसँ मुख्य छल शाकाहारी भोजनक जानकारी। इंटरनेट सँ एहि सम्बन्ध मे किछु सूचना एकत्रित कएल, ओहि भोजन सबके स्थानीय भाषा मे नाम सेहो ताकल आ ओकरा कागत पर छापि लेल जे कतहु ककरो देखा कए ओहि मे सँ कोनो व्यञ्जन ऑर्डर कऽ सकब। पहिल दिन, वृहस्पति, 29 सितम्बर 2022 बंगलोर सँ बैंकॉक आ इन्डोनेसियाक राजधानी जकार्ता होइत हमरा योग्यकर्ता जेबाक छल। अठाइस सितम्बरक राति मुदा तारीखक हिसाबें 29 सितम्बर कें हम बंगलोर मे थाइ एयरलाइन्सक विमान सँ विदा भेलहुँ। बैंकॉक मे जकार्ताक फ्लाइट लेल दुइए घंटाक प्रतीक्षा छल, एकर अधिकांश समय सिक्यूरिटी आदिक बाद नित्यकर्म करैत गेट तक पहुँचैए मे लागि गेल। तें प्रतीक्षा अखरल नहि। बेंकॉक सँ जकार्ता बला फ्लाइट मे जलपान देल गेल। हम पूरा यात्रा लेल एशियाई शाकाहारी भोजनक विकल्प देने छलियैक। फ्लाइट मे इडली-बड़ा-साम्भर के नीक जलपान भेटल, बुझना गेल जे ई जलपान हमरा संगहिं बंगलोरे सँ आएल छल। जे रहौक, मोन प्रसन्न भेल। करीब एगारह बजे जकार्ता उतरलहुँ। इन्डोनेसिया मे प्रवेश करबाक लेल लेल वीजा पहिने लेबाक कोनो सुविधा नहि, ओहि देश मे पहुँचला पर हवाइ अड्डा पर वीजा भेटैत छैक किन्तु ताहि लेल किछु समय चाही। ई सब सोचि कए हमर ट्रैभेल एजेण्ट जकार्ता मे चारि घंटाक समय राखि योग्यकर्ता लेल अगिला फ्लाइटक बुकिंग करौने छलाह। इमिग्रेशन इलाका मे देखल 'Visa on arrival' के बोर्ड लागल। कएकटा काउन्टर, तें लाइन बेसी पैघ नहि। एक ठाम पहिने पैंतीस अमेरिकन डॉलर फीस जमा करए पड़ल, एकटा रसीद भेटल, तखन दोसर खिड़की पर लाइन लगा किछु फार्म भरि वीजा देल गेल। हमर अगिला फ्लाइट दोसर टर्मिनल सँ छल, ओतए जेबाक लेल स्काइ ट्रेन लेबाक छल। पुछैत पुछैत स्काइ ट्रेनक स्टेसन गेलहुँ। ट्रेन मे बैसि दोसर टर्मिनल पहुँचि गेलहुँ। हमर सब फ्लाईटक अग्रिम वेव-चेक-इन कएले छल आ ओकर छपाओल प्रति सेहो संग मे छल। तथापि अपरिचित जगह रहला सँ चेक-इन काउन्टर पर जा कए पूछए पड़ल जे हमरा की करबाक चाही। ओ लोकनि सीधे सिक्यूरिटी के लाइन मे लागि जेबाक लेल कहलनि। बर बेस। ई केलाक बाद समय दू बाजि गेल छलैक। भूख सेहो लागल छल। डिपार्चर इलाका मे एकटा रेस्तराँ मे जा कए शाकाहारी भोजनक बारे मे पुछलियैक आ अपन कागत सेहो देखा देलियैक। एकटा व्यञ्जन, जे असल मे सलाद प्लेट छलैक, से ओकरा लग छलैक। ओएह ऑर्डर कएल। ओकरा संग एक प्रकारक चटनी देल गेल। छलैक तऽ ओ चिनियाबदामक मुदा मिट्ठ आ किछु विचित्र स्वाद के, से नहि अघरल। कोनो बात नहि, नोन छीटि कए छुच्छे सलाद खेबा मे हमरा कोनो समस्या नहि भेल। यूरोपक दीर्घ प्रवास मे कतेको बेर एना कएने छी। जकार्ताक एहि टर्मिनल के व्यवस्था अन्यत्र सब ठाम सँ भिन्न देखल। एतए दिल्लीक टर्मिनल-3 के विपरीत प्रस्थान गेट सब हटि हटि कए भव्य कौशल सँ स्थानीय वास्तुकला सँ निर्मित भेटल। योग्यकर्ता हवाइ अड्डा पर हमर टूर गाइड श्रीमान इवान संतोषाइवान प्रतीक्षा कऽ रहल छलाह। मुस्लिम धर्माबलम्बी इवान महोदय विदेश मे अनेको ठाम काज करैत पचासक वयस मे घर आबि टूर गाइडक व्यवसाय मे प्रविष्ट भेलाह। हुनका नाम मे संतोष शब्द देखि अपने आश्चर्यचकित नहि होइ, इन्डोनेसिया मे, कोनो धर्माबलम्बी होथु, लोकक नाम मे संस्कृत शब्दक व्यवहार बहुत छैक। ईहो ओतुका दीर्घ हिन्दू संस्कृतिक प्रभाव आ ओतुका लोकक उदार स्वभावक द्योतक छिऐक। मुस्लिम रहितो स्वतंत्र इन्डोनेसियाक प्रथम राष्ट्रपतिक नाम सुकर्ण छलनि, तकर बाद सुहर्त, मेगावती सुकर्णपुत्री, सुशील युधयोनो आदि नामधारी राष्ट्रपति भेल छथि। योग्यकर्ता मे नवका हवाइ अड्डा शहर सँ बहुत दूर छैक आ होटल अबैत अबैत मुन्हारि साँझ भऽ गेल। रस्ता भरि गाइड महोदय योग्यकर्ताक इतिहास बतबैत रहलाह। एखनुक सुल्तान के महलक बगल सँ हम सब होटल गेलहुँ। यद्यपि बियोन्डर हमरा प्रोग्राम मे आजुक लेल किछु स्थानीय हिन्दू मन्दिर, आबान्ग, बारोंग, कालासान आदि देखब लिखने छल, थाकल रहला सँ आ साँझ भऽ गेला सँ एहि मादे हम गाइड सँ कोनो चर्चो नहि कएल। अगिला दिनक प्रोग्राम छल सबेरे जलपानक बाद ज्वालामुखी देखब। ओहि सन्ध्या ओही होटल के रेस्तराँ मे जिज्ञासा कऽ कए एकटा शाकाहारी भोजन ऑर्डर कएल आ रात्रि विश्राम कएल। दोसर दिन, शुक्र, 30 सितम्बर 2022 हम सबेरे जलपान केलाक बाद भ्रमण लेल तैयार छलहुँ। समय पर गाइड हाजिर भेलाह आ हम सब विदा भेलहुँ। गोटेक घंटाक बाद एक जगह पर देखल बहुत रास जीप सब लागल जे पहाड़ी इलाका मे प्रयुक्त होइत छैक। एतए गाड़ी छोड़ि देल आ हम गाइडक संग पहिने सँ आरक्षित एकटा खुला जीप मे सवार भेलहुँ। हम सब मेरापी ज्वालामुखीक नजदीक जा रहल छलहुँ, पहाड़ी इलाकाक छोटछीन गाम सब, रस्ता तहिना। ई ज्वालामुखी 2010 मे फूटल छलैक आ बहुत तबाही भेल छलैक ओहि समय। आसपासक करीब चालीस किलोमीटरक इलाका मे ओकर गर्म छाउर पसरि गेल छलैक, किना रेयो (Kinah Reyo) नामक एकटा गाम पूर्णत: नष्ट भऽ गेलैक आ प्राय: तीन सौ व्यक्ति मारल गेलाह। पहिल पड़ाव भेल ओ जगह जतए ओहि कालक दृश्य सबहिक संकलन कएल छैक एकटा स्मारक सदृश भवन मे। किछु पशु जे मारक गेलैक, ओकर कंकाल सेहो संरक्षित छैक एतए। किछु समय बिताए हम सब आगू बढ़लहुँ तऽ गाइड महोदय देखौलनि एकटा विचित्र आकारक विशाल शिलाखण्ड (boulder) जे ओही ज्वालामुखी सँ निकलल छलैक। एकर रूपे एहन छैक जे स्थानीय लोक एकरा पराग्रही (alien) मानि बैसल। एतए शिलापट्ट पर एकर वर्णन छैक जे जावा द्वीपक स्थानीय लिपि मे लिखल छैक। गाइडक अनुसार एहि लिपि कें पढ़निहार आब बहुत कम लोक छथि कारण इन्डोनेसिया मे आधिकारिक रूपें अंग्रेजी लिपिक व्यवहार होइत छैक। आधिकारिक भाषा बहासा छिऐक किन्तु ई अंग्रेजीक अक्षर मे लिखल जाइत छैक। एहि जगह सँ मेरापीक शिखर देखाइत छैक, करीब पाँच किलोमीटर दूर। मुदा आकाश कने मेघौन रहबाक कारणें शिखरक ओतेक स्पष्ट दर्शन नहि भऽ सकल। पहाड़ी इलाका मे आकाश मेघाच्छन्न रहब साधारण बात छिऐक। एतए एक महिला छिट्टा मे कटहरक मोछि सदृश किन्तु लाल-करिछौन रंगक सेव-सन्तोलाक आकारक फल बेचैत छथि। गाइड ओकर नाम बुआ सलक (Buah Salak) बतबैत छथि। नव जगहक नव फल चिखबाक हेतु हम कीन लैत छी। गाइड ओकरा खोंइचा छोड़ा हमरा खेबाक लेल दैत छथि। फलक गुद्दा कने सक्कत, बीच मे एक-दूटा आँठी, अल्प मीठ, स्वाद तेहनाहे सन, जेना बूझू अधपाकल कटहरक को, अनठीया लेल थुकरि कए फेकऽ बला नहि तखन बहुत नीको नहि। फेर हम सब विदा भेलहुँ पहाड़क आर नजदीक ओहि जगह पर जतए धर्मगुरु (Juru Kunci) स्वर्गीय म्बा मारिद्जान (Mbah Maridjan) के म्यूजियम छनि। एतए अवसर विशेष पर नीचाक ग्रामीण लोकनि जुटैत छथि आ प्रार्थना आदि होइत छैक। धर्मगुरु श्रीमान मारिद्जान मेरापी ज्वालामुखीक समीप मे रहैत छलाह। हुनकर काज छलनि ज्वालामुखीक विस्फोट भेला पर आसपासक ग्रामीण जनताक रक्षा केनाइ। ई काज हुनका योग्यकर्ताक सुल्तान देने छलखिन। ओ सुल्तानक प्रति एतेक वचनवद्ध छलाह जे 2010 मे जखन विस्फोट भेलैक तखन अपन परिवारक अन्य सदस्य सबकें तऽ नीचा सुरक्षित जगह पर पठा देलखिन मुदा अपने ओतहि रहि गेलाह। एहि घटना कें टीभी पर देखेबा लेल जे दूटा रिपोर्टर गेलाह सेहो हुनका संग जान गमौलनि। मारिद्जानक पत्नी, पुत्र आदि एखन जीविते छथिन। एहि स्थल पर किछु फोटो आदि लैत हम सब नीचा उतरलहुँ जतए हमर गाड़ी ठाढ़ छल। फेर अपन ओहि सवारी मे विदा भेलहुँ बोरोबुदुर, आजुक दोसर पर्यटन स्थल। बोरो शब्दक अर्थ भेल पैघ (बंगला भाषाक बरो सँ मिलैत) आ बुदुर भेल बुद्धक विकृत रूप। बोरोबुदुर अर्थात्‍ पैघ बुद्ध, से बोरोबुदुर वास्तव मे विश्व मे सबसँ पैघ बुद्ध मन्दिर अछि। मात्र स्तूपक आकार कें देखबैक तऽ श्रीलंकाक स्तूप पैघ छैक मुदा परिसरक आकार, ओहि मे बुद्धक विभिन्न रूप, वास्तुकला आ सबसँ विचित्र बात जे ई मन्दिर कोनो एक पैघ परिसर मे छैके नहि, अपितु तीन ठामक मन्दिर मिला कए बनल छैक। मुख्य मन्दिर सँ किछु किलोमीटर के दूरी पर छैक पौओन आ एहू सँ किछु किलोमीटर हटि कए छैक मेन्दुत। ई तीनू एक सीध मे छैक। मान्यता छैक जे बौद्ध ब्रह्माण्डविज्ञानक त्रैलोक्य के कामधातु (the world of desire), रूपधातु (the world of forms) आ अरूपधातु (the world of formlessness) तीनू लोक कें निरूपित करैत छैक ई तीनू मन्दिर। बौद्ध तीर्थयात्री पहिने मेन्दुत जाइत छथि, तखन पौओन आ अन्त मे मुख्य मन्दिर बोरोबुदुर। पार्किंग मे गाड़ी छोड़ि हम सब जखन मन्दिर परिसर मे प्रवेश केलहुँ तखन टिकट चेक केलाक बाद सब कें आधा लीटर पानिक बोतल देल गेल। हम सब पैघ परिसर मे सुन्दर बाग बगीचाक बीच चलैत मुख्य स्तूपक लग पहुँचलहुँ। मुख्य मन्दिर सेहो एक के उपर एक नओ स्तर पर बनल छैक जाहि मे निचाक छओ स्तर वर्गाकार आ उपर के तीन स्तर वृत्ताकार छैक। छोट छोट स्तूप, जाहि मे अनेको छिद्र बनल छैक, विभिन्न स्तर कें सजौने छैक। सबसँ उपर एकटा स्तूप छैक। गाइड बतौलनि जे ई मन्दिर नवम्‍ शताब्दी मे शैलेन्द्र वंशक शासनकाल मे बनाओल गेल छलैक। मन्दिरक वास्तुकला पर भारतक गुप्त वंशक समयक प्रभाव देखल जा सकैत छैक किन्तु स्थानीय वास्तुकला, जाहि मे अपन पूर्वजक उपासना आ बौद्ध धर्म मे निर्वाण प्राप्त करबाक अवधारणा, दूनू सन्निहित छैक। तीर्थयात्री नीचाक आधार (जे कामधातुक निरूपण छिऐक) सँ होइत उपर चढ़ैत छथि आ तीन स्तर पर रूपधातुक आ अगिला तीन स्तर पर अरूपधातुक निरूपण बला स्थल पर पहुँचैत छथि। किछु सीढ़ी उपर चढ़लाक बाद पहिले स्तर पर देखल जे पुनरुद्धारक कार्य चलि रहल छलैक, सब तरि घेरा बनाओल छैक आ पर्यटक कें उपर चढ़ब बन्द कऽ देल गेल छलैक। बहुतो पर्यटक निरास भेल नीचा मे टहलि रहल छलाह। आब एहि परिसर मे करबाक किछु नहि छल। किछु काल तैयो छाहड़ि मे बैसि सुस्ता लेलहुँ कारण एखन तक भ्रमण करिते छलहुँ। तकर बाद विदा भेलहुँ रस्ता मे पौओन आ मेन्दुत मन्दिर देखबा लेल। ई दूनू अपेक्षाकृत छोट जगह छैक, दस मिनट समय लागल चारू कात घुमबा मे, किछु फोटो आदि लेबा मे। आब दू बाजि गेल छलैक, भूख सेहो लागि गेल छल। आइ आओर किछु नहि देखबाक छल। गाइड कें कहलिएनि कतहु भोजन करबा लेल चलथि। रस्ता मे एकटा रेस्तराँ मे गेलहुँ। गाइडक सहायता सँ शाकाहारी व्यज्ज्न, इटालियन पास्ता, ऑर्डर कएल। भोजन करबा काल बरखा होमए लगलैक, पहिने कम किन्तु बाद मे बेस जोर सँ। गुणक जे भोजन समाप्त होइत होइत बरखो बन्द भऽ गेल। हम सब करीब साढ़े चारि बजे तक होटल घुरि एलहुँ। शहर के मुख्य इलाका मालियोबोरो स्ट्रीट, जे हमरा होटल सँ टहलि कए जाएल जा सकैत छलैक, मे कतेको रेस्तराँ। गाइड महोदय होटल मे जा कए एहि सड़क पर पएरे एबाक रस्ता बता देलनि। हम हुनका अनुरोध केलिएनि जे 20000 रुपिया के ओ नोट, जाहि मे गणेशजीक फोटो छपल छनि, कोनो तरहें जोगार करथि। साँझ मे अपनहि टहलैत टहलैत एहि इलाकाक सौन्दर्यपान कएल आ गाइडक बताओल रेस्तराँ मे भोजन कएल। तेसर दिन, शनि 1 अक्टूबर 2022। आजुक प्रोग्राम देरी सँ शुरु हेबाक छल। यद्यपि वियोन्डर के बनाओल प्रोग्रामक अनुसार हमरा सबेर मे प्राम्बनन मन्दिरक भ्रमण करबाक छल आ साँझ मे ओही इलाका मे रामायण बैले देखबाक छल, गाइड कहलनि जे ओतेक दूर अनेरे दू बेर जाएब, नीक रहत जे कने देरी सँ हम सब निकलब, दुपहरिया मे प्राम्बनन मन्दिर देखब आ ओतहि कने प्रतीक्षा कऽ कए साढ़े सात बजे संध्या रामायण बैले देखि लेब। ई विचार हमरहु पसिन्न पड़ल। असल मे भारत मे बैसल ट्रैभेल एजेन्ट सब ओतेक नीक सँ प्रोग्राम नहि बना पबैत अछि से हमरा एतए बुझाएल। सबेर मे जलपान केलाक बाद किछु काल कमरा मे बैसि उपन्यास पढ़ैत बिताओल। दसे बजे गाइड होटल पहुँचि गेलाह, ओ गणेशजी बला नोट लेने आएल छलाह। कहलनि जे ई नोट आब पुरान वस्तु (एन्टीक) के बजार मे भेटैत छैक, तें एकरा लेल तीस हजार देबऽ पड़ल। हम बुझलहुँ सस्ते भेटल, हुनके सहायता सँ ओहि नोटक संग अपन फोटो लेल जे संलग्न कऽ देल अछि। तकर बाद ओ कहलनि, चलू आसपासक इलाका घूमि लेल जाए। ई तऽ बोनस भेल, कारण हमरा प्रोग्राम मे लीखल नहि छल। हम तऽ नेहाल भऽ गेलहुँ। होटलक पछुआर होइत बहरेलहुँ आ इलाकाक चाइनीज बजार देखल। सस्त वस्तुजातक अनेको छोट पैघ दोकान, कलकत्ताक कोनो मुनिसिपैलेटी बजारे सदृश, एखन भीर बेसी नहि तखन स्थानीय लोक अपन बेगरता लेल चीज वस्तु किनिते छल। मालियोबोरो स्ट्रीट पर आबि गाइड हमरा सड़कक दूनू कात दूटा परिसर देखौलनि, एकटा जे इन्डोनेसियाक स्वतंत्रताक समय किछु बरखक लेल ओकर राजधानी रहल छलैक आ दोसर डच लोकनि द्वारा स्थापित मिलिट्री किला जाहि मे एखन व्रेडेबुर्ग (Vredeburg) म्यूजियम छैक। समय छल, हम म्यूजियम देखबाक इच्छा प्रकट केलिएनि, गाइड तैयार भेलाह, मात्र टिकट हमरा अपनहि कीनए पड़ल कारण ई पैकेज मे शामिल नहि छल। कोनो बेसी महग नहि मात्र 10000 रुपिया, माने करीब 50 टाका। गाइडक प्रवेश नि:शुल्क। म्युजियमक भीतर गेला पर बहुत खुसी भेल, समय एक-डेढ़ घंटा जे नीक सँ बीतल, किछु इतिहास सँ सेहो परिचित भेलहुँ। एतए इन्डोनेसियाक स्वतंत्रता संग्रामक इतिहास विविध रूपें चित्रित कएल छैक। म्यूजियम के बाद हम सब प्राम्बनन विदा भेलहुँ। रस्ता मे गाइड एकटा विशेष रेस्तराँ मे लऽ गेलाह जतए हुनकर चूनल शाकाहारी व्यञ्जन भोजन केलहुँ। अनेक तरहक तरुआ, टमाटरक चटनी, भात आ रसम सदृश खट्टा झोड़। नीक स्वाद आ दामो बहुते कम। पूरा भोजन मात्र 25000 रुपिया मे भऽ गेल जखन कि भेज-कढ़ी आ भात 60000 रुपिया सँ कम मे कतहु नहि भेटैत छलैक। तकर बाद आधा घंटा मे हम सब पहुँचलहुँ पहिल हिन्दू मन्दिर, सम्बिसारी। ई मन्दिर पछिले शताब्दी मे अकस्मात एकटा किसान द्वारा खोजल गेल। पूरा परिसर करीब 5 मीटर मोट माटिक तह मे डूबल छलैक जे बहुत सम्भव मेरापी ज्वालामुखीक एगारहम शताब्दीक विस्फोट सँ आएल छाउरक अवशेष छलैक। मन्दिर आब खंडहर भेल छैक, तैयो किछु पुनरुद्धारक बाद देखबा योग्य बनि गेल छैक। पूरा मन्दिर परिसर सहरजमीन सँ करीब दश फुट नीचा छैक। बहुत सम्भव जे एहू कारणें छाउर सँ झाँपल मन्दिर सब लोक कें पता नहि चलैत छलैक। एकर मूल नाम की रहल हेतैक से नहि बूझल छैक, एखन ओ सम्बिसारी गाम मे अवस्थित छैक तें सम्बिसारी मन्दिर के रूप मे जानल जाइत छैक। मन्दिर के मुख्य भाग मे शिवलिंग छैक, आ तीन कात दुर्गा, गणेश आ अगस्त्य मुनिक भव्य मूर्ति बनल छैक। एतए सँ करीब पन्द्रह मिनट के ड्राइविंग रस्ता छैक प्राम्बनन मन्दिर। एहि मन्दिरक निर्माण सँ सम्बन्धित अभिलेख सब भेटल छैक तें एकर काल निर्धारण आसान भेलैक। अभिलेखक अनुसार एहि मन्दिरक निर्माण नवम शताब्दी मे भेलैक आ 856 इस्वी मे एकर उद्घाटन भेल छलैक। एकर निर्माण माताराम राजवंशक हिन्दू राजा महाराज संजय द्वारा कराओल गेल छलैक जे बौद्ध राजा शैलेन्द्रक समकालीन छलाह। मन्दिरक प्रत्येक पाथर पर भारतीय वास्तुकलाक प्रभाव देखल जा सकैत छैक। माताराम राजवंश लेल ई मन्दिर राजकीय मन्दिरक काज करैत छलैक आ राजमहलक सबटा धार्मिक कार्य एतहि सम्पादित होइत छलैक। इहो मन्दिर खंडहर बनि गेल छलैक, आ स्थानीय लोक एकरा बिसरि गेल छलैक। ताकल गेल अठारहम शताब्दी मे डच लोकनि द्वारा। तखन एकर पुनरुद्धारक बहुत किछु काज भेलैक आ काज एखनहु चलिये रहल छैक। प्राम्बनन मन्दिर इन्डोनेसिया मे सबसँ पैघ हिन्दू मन्दिर परिसर छिऐक। वर्तमान मे यूनेस्को द्वारा एकरा विश्व धरोहरक रूप मे मान्यता भेटल छैक। मन्दिरक मुख्य आकर्षण त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु आ शिव) कें समर्पित तीन टा विशाल मन्दिर छैक। बीच के सब सँ ऊँच मन्दिर, उँचाइ 47 मीटर (करीब 15 मन्जिला मकान बूझू), मे भगवान शिव स्थापित, आ दूनू कात ब्रह्मा आ विष्णु, कने न्यून मन्दिर मे। एहि तीनू मन्दिरक सामने मे तीनटा कने आर छोट मन्दिर छैक जे तीनू देवक वाहन हंस, नन्दी आ गरुड़ कें समर्पित छैक। एहि मन्दिर सब के दूनू कात, जेना घेरा मे पहरेदार होए, दूटा छोट मन्दिर छैक, जाहि मे गाइडक अनुसार, सरस्वती आ लक्ष्मीक मूर्ति छलनि। एहि मुख्य मन्दिरक अतिरिक्त एहि परिसर मे बहुते रास पूरक मन्दिर सब छलैक। पुनरुद्धारक बाद 2019 मे पहिल बेर मन्दिर मे देवता लोकनिक उत्तम अभिषेक आयोजित कएल गेल छलैक। तकर बाद आब उत्सव के अवसर पर नियमित रूपें स्थानीय लोक एतए पूजा-अर्चना करैत छथि। करीब तीन चारि वर्ष पहिने तक पर्यटक कें मन्दिरक भीतर जेबाक सुविधा छलैक, आब बन्द कऽ देल गेलैक। गेट सब पर मोटगर ढाठ बान्हल। मन्दिरक चारू कात घुमैत छी तऽ देवाल सब पर बनल रामायण आ महाभारतक कथा सँ सम्बन्धित कलाकृति देखाइत अछि। एहि सँ भारतीय प्रभाव स्पष्ट बुझाइत छैक। यद्यपि मन्दिर कें मुख्यत: शिव मन्दिरक रूप मे बनाओल गेल छलैक आ एकर प्राचीन नाम सेहो शिवालय आ शिवगृह छलैक, तथापि मन्दिर मे शिवलिंग नहि छैक। गाइड बतबैत छथि, एकटा मूर्ति छैक जकर मुखरा राजा बालितुंग सँ मिलैत बनाओल गेल छैक। मोन पड़ैत अछि कम्बोदिया के 'प्रिया को' मन्दिर जतए छओटा मन्दिर मे एहिना राजा लोकनिक मूर्ति छनि। सब मे नामकरण ईश्वर जोरि कए कएल, जहिना मिथिलाक गामघर मे विदेश्वर, कपिलेश्वर, जागेश्वर आदि नाम देल गेल छैक। मन्दिर परिसर मे एखनहु पाथरक अनेको ढेरी लागल। पुनर्निमाणक काज मे चुनि चुनि कए पाथर सब के मुह मिला कए जोड़ल जाइत छैक। ई काज यूनेस्को के देखरेख मे भऽ रहल छैक। प्राम्बनन मन्दिर ओपाक नदीक कछेर मे बनल छैक। नदीक ओहि कात त्रिमूर्ति स्थल मे रामायण नृत्यक आयोजन होइत छैक से गाइड देखा देलनि। नदी पर यदि पुल रहितैक तऽ ओहि प्राङ्गण जेबा मे पाँचो मिनट समय नहि लगैत मुदा से छैक नहि, घुमिए कए सड़क सँ जाए पड़ैत छैक। स्थानीय भाषा मे मन्दिरक नाम छिऐक रार जोङरांग मन्दिर आ एहि नाम सँ जुड़ल छैक एकटा दन्तकथा। रार जोङरांग कोनो राजकुमारी छलीह जिनका प्रेम मे बगल के राज्यक राजकुमार, जिनका दैत्य आ अलौकिक आत्मा सब पर काबू करबाक शक्ति छलनि, विशाल मन्दिर बनौलनि। मुदा राजकुमारीक मांग बढ़िते गेलनि आ अन्त मे हुनका शाप भेटलनि जे ओ एहि मन्दिर मे पाथर बनि कए रहतीह। दन्तकथाक अनुसार शिव मन्दिर के उतरबरिया पक्खा मे जे महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक मूर्ति छनि से ओही राजकुमारी कें अंकित करैत छैक। प्राम्बनन मे हिन्दू मन्दिर परिसर सँ कने हटि कए बौद्ध मन्दिरक विशाल परिसर सेहो छैक जाहि मे तीन टा मन्दिर संकुल छैक बुबराह, लुम्बुन आ सेवु। ई तीनू सेहो बौद्ध ब्रह्माण्डशास्त्रक त्रैलोक्य के तीन लोक, कामधातु (the world of desire), रूपधातु (the world of forms) आ अरूपधातु (the world of formlessness) कें निरूपित करैत छैक आ बौद्ध लोकनि एहि तीनू मन्दिर मे ओही तरहें एक के बाद दोसर आ तेसर मे जाइत छथि। सेवु मन्दिर मे सेहो बहुत रास पाथरक ढेरी लागल। एतहु कतेको छोट-छोट मन्दिर खंडहर अवस्था मे पड़ल छैक। सेवु मन्दिरक दोसर प्रसिद्धि छैक ओही रार जोङरांग राजकुमारी के दन्त कथा सँ सम्बन्धित, कारण  स्थानीय भाषा मे सेवु माने होइत छैक लगभग हजार। कहल जाइत छैक जे इएह हजार (अथवा करीब करीब हजार) मन्दिर रहल हेतैक जे ओकर प्रेमी राजकुमार बनौने छलैक। ई सब देखलाक बाद परिसर मे कने हटि कए एकटा म्यूजियम देखबा लेल गेलहुँ। म्यूजियम मे मुख्यत: बुद्धक अनेक मूर्ति, सब खंडहर अवस्था मे। एहि सब दृश्यावलोकन मे चारि बाजि गेल। आब थाकि सेहो गेल छलहुँ। रामायण प्रोग्राम सात बजे साँझ मे शुरु होइतैक। ताबत एही इलाका मे प्रतीक्षा करबाक छल। पार्किंग दिस घुरल अबैत रही कि वर्षा आबि गेल। छाता तऽ छल मुदा किछुए काल मे वर्षा ततेक जोर भऽ गेलैक जे छाता कोनो काजक नहि। परिसर बहुत पैघ छैक तें लोक लेल किछु बैटरी बला गाड़ी कखनहुँ कें चलैत छैक आ एकरा लेल जगह जगह पर छाही देल स्टैण्ड बनाओल छैक। कहुना दौड़ि कए एहने एकटा स्टैण्ड मे शरण लेल। वर्षा ततेक भेलैक जे सड़क पर पानि लागि गेलैक। गाइड कहलनि जे सीजनक ई पहिल पैघ वर्षा छलैक। खैर, घूमब समाप्त भऽ गेल छल तें ओहि स्टैण्ड मे प्रतीक्षा करैत अखरल नहि। वर्षा कने कम भेलैक, नीक जकाँ छुटलैक नहि, तखन हम सब कहुना प्लास्टिक ओढ़ने गाड़ी तक पहुँचलहुँ। एखन दू घंटा सँ बेसी समय छल, सोचल जे किछु हल्का-फुल्का टिफिन कऽ लेल जाए, कारण रामायण बैले खतम भेलाक बाद होटल घुमैत बहुत लेट भऽ जाएत आ कतहु रेस्तराँ मे बैसि भोजन करब सम्भव नहि होएत। अगिला भोर मे योग्यकर्ता छोड़बाको छल। गाइड लेने गेलाह एकटा रेस्तराँ मे जतए हुनके ऑर्डर पर गरम गरम पनीर पकौड़ा भेटल, चाह सेहो भेटल, दू प्लेट पकौड़ा खा लेलहुँ, बस काज भऽ गेल। गाइड आ ड्राइवर सेहो अपना रुचिएँ टिफिन करैत गेलाह। सब गोटेक बिल हमहीं देलियैक, सब किछु सस्ते लाग़ल। बुन्नी पड़िए रहल छलैक। हम सब रामायण बैले बला परिसर मे पहुँचलहुँ तऽ देखल जे कलाकार लोकनि तैयार भेल टहलि रहल छथि। सीता-राम-हनुमानक संग एकटा फोटो लेल। साधारणत: रामायण बैलेक आयोजन खुला जगह मे होइत छैक जाहि मे प्राम्बनन के मन्दिर, जे राति मे सुन्दर रूपें आलोकित कएल रहैत छैक, पृष्टभूमि मे देखाइत रहैत छैक आ नृत्यक दृश्य कें बेसी जीवंतता प्रदान करैत छैक। साँझ मे एहि कात सँ मन्दिरक छटे अलग छलैक। दर्शक लेल ऊँच नीच खाढ़ी मे बनल सीट सब। मोन पड़ल मिस्र भ्रमण मे गीजाक लाइट एण्ड साउन्ड शो प्रोग्राम। ओहो एहिना जाहि जगह पर आयोजित होइत छलैक ओतए राति मे स्फिंक्स आ तीनू पिरामिड पृष्टभूमिमे आलोकित रहैत छलैक आ ओकर रंगक संगहि आलोकित भागक छटा सेहो समय समय पर खिस्साक अनुसार बदलैत रहैत छलैक। मिस्र मे बरखाक डर नहि मुदा इन्डोनेसिया मे अक्टूबरक प्रथम दिन वर्षा ऋतु प्रारम्भ भऽ गेल छलैक। कार्यक्रमक प्रबन्धक लोकनि अन्त समय तक प्रयास करैत रहलाह जे कहुना बाहरे प्रोग्राम कराओल जाए। मुदा इन्द्र भगवान खिसिआएल छलाह, वर्षा छुटलैक नहि, आ हारि कए अन्त मे प्रोग्राम हॉल मे कराओल गेलैक। आयोजक लोकनि बहुत तरहें क्षमायाचना केलनि जे बाहरक दृश्य प्रभाव अन्दर मे ओ लोकनि नहि बना सकताह। तथापि भीतरो मे बहुत तरहक इन्तजाम कएले छलैक, स्टेज तऽ बूझू पूरा हॉले छलैक, लोक कें बैसै बला इलाका आ गवैया लोकनिक लेल किछु जगह छोड़ि कलाकार कतहु जा सकैत छलाह। पूरा प्रोग्राम बहुते आकर्षक छलैक, एकदम माँजल कोरियोग्राफर के निर्देशन मे चलैत, हॉल के भीतर दूनू कात पैघ एलईडी बोर्ड लागल जाहि मे शीर्षक अंग्रेजी आ स्थानीय भाषा मे लिखाइत छलैक। कलाकार मूक प्रदर्शन करैत, वाद्य यंत्र पर संगीतक संग एक गोटे संक्षेप मे डायलग सदृश किछु बजैत (ई मात्र स्थानीय भाषा मे)। दर्शक लोकनि मंत्रमुग्ध भेल, मुदा आधुनिक युगक टेक्नॉलोजीक फलस्वरूप कलाकरक अभिनय देखबा सँ बेसी मोबाइल अथवा अन्य कैमरा पर भीडियो बनेबा मे व्यस्त। खिस्सा शुरु होइत छैक धनुषयज्ञ सँ आ अन्त होइत छैक राम-रावण युद्धक बाद सीता आ रामक मिलन सँ। एकाध शब्द (जेना लंकाक नाम)  कें छोड़ि खिस्सा मे कोनो तरहक तोड़-मरोड़ हमरा नहि देखबा मे आएल। से आश्चर्ये जखन कि ओतुका लोककें भारत सँ सम्पर्क टुटना हजारो वर्ष भऽ गेलैक। कोनो कलाकार कें डबल रोल नहि, बानर सेना लेल पाँच-सात बरखक छोट-छोट बच्चा सब लगाओल, राक्षस सबहिक देह पर ओकरा लोकनिक कूदब-फानब बहुते चित्ताकर्षक छलैक। एहि बैले मे कुल 200 कलाकार काज करैत छथि। महिला-पुरुष सब मुसलमाने। प्रोग्राम समाप्त भेलाक बाद हम सब होटल आबि गेलहुँ तैयो पहुँचैत-पहुँचैत एगारह बाजि गेल। अगिला दिन सबेरे आठ बजे हमरा योग्यकर्ता सँ बालीक फ्लाइट लेबाक छल। गाइड महोदय कहलनि चारिए बजे तैयार रहबाक लेल (कारण एयरपोर्ट दूर छलैक) आ ओएह होटल मे डिब्बा बन्द जलपानक व्यवस्था करबा देलनि। चारिम दिन, रवि 2 अक्टूबर 2022। सबेरे चारि बजे तैयार हेबाक लेल हमरा प्राय: भरि राति जगले रहए पड़ल। आश्चर्य लागल जे गाइड कोना कए ओतेक दूर अपन घर गेल हेता आ फेर ओ कतेक सबेरे विदा भेला जे ठीक चारि बजे होटल मे हाजिर छला। अस्तु, हम चेकआउट कएल, जलपानक पैकेट लेल आ विदा भेलहुँ हुनका संग योग्यकर्ता एयरपोर्ट। सबेरे रस्ता खाली, तें गाड़ी नीक स्पीड मे चलि रहल छलैक। हमसब एके घंटा मे एयरपोर्ट पहुँचि गेलहुँ। गाइड आ ड्राइभर दूनू लेल बख्सिस हम एकटा लिफाफ मे पहिनहि पैक कऽ लेने छलहुँ, ओ लिफाफ गाइड कें दैत यथोचित अभिवादनक संग हुनका सँ विदा लेल। हमर वेब-चेक-इन कएल छले, बोर्डिंग पास सेहो छापल छल, चेक-इन लेल कोनो सामान सेहो नहि छल। बस सोझे सिक्यूरिटि होइत डिपार्चर गेट पहुँचि गेलहुँ। ओना तऽ एक कप चह होटल मे पिबिए लेने छलहुँ, तैयो अपना कें फ्रेस रखबाक लेल एयरपोर्ट पर सेहो फेर एक कप चाह पीलहुँ। डिब्बाक जलपान देखल, किछु खा लेल आ किछु फेर हवाइ जहाज मे खेबाक हेतु राखि लेल। योग्यकर्ता आ बालीक बीच एक घंटाक समय के अन्तर, अलग टाइम जोन। बाली पूब तें समय अगुआएल। समय पर बाली मे उतरलहुँ आ बाहर आबि ताकऽ लगलहुँ अपन नामक प्लेट लेने कोनो व्यक्ति कें। सामने एकटा नवयुवती भेटलीह, कहलनि हमहीं अपनेक गाइड छी एहि तीनू दिनक लेल। कोनो बात नहि, हुनका संग जाए गाड़ी मे बैसलहुँ। टूरक प्रोग्राम बनबै मे बियोन्डर बालीक लेल किछु गड़बड़ कऽ देने छल। एकटा दर्शनीय स्थल, ताना लोट, जे कि लोक सूर्यास्तक समय देखबाक लेल जाइत अछि, हमरा प्रोग्राम मे सबेरेक सूर्योदयक समय बना देने छल। हम एकरा बदलए चाहैत छलहुँ। मुदा गाइड कें प्रोग्राम मे हमर कोनो परिवर्तनक सुझाव पसिन्न नहि पड़लनि, सब विकल्प मे एकेटा बात- ट्रैफिक बहुत छैक आ जगह सब दूर-दूर छैक से सम्भव नहि होएत। हारि कए हुनके अनुसार चलए पड़ल। हम सब गेलहुँ उबुद इलाका मे मंकी फोरेस्ट देखबा लेल। एयरपोर्ट सँ एतए अबै मे प्राय: दू घंटा सँ बेसी समय लागि गेल। बाली मे बहुत ठाम सौन्दर्यीकरण के काज चलि रहल छलैक कारण किछुए दिन बाद ओतए जी-20 के अन्तिम मीटिंग होमए बला छलैक। हमर गाइड हिन्दू धर्माबलम्बी आ हुनके अनुसार शूद्र वर्णक कुमारि कन्या छलीह, नाम विडि (Widhi, असल मे ई विधि रहल हेतैक जे समयक चक्र मे उच्चारण दोष सँ विडि बनि गेलैक)। परिवार मे जेठ भाए, भौजी, माता-पिता। पहिने हिनक भाइयो टूर गाइडक काज करैत छलखिन, आब ओ गामे मे रहैत छथिन, खेतीबारी देखैत छथिन आ एकटा दोकान चलबैत छथिन। आब हमरा लाभ ई भेल जे हिनकहिं सँ इन्डोनेसियाक हिन्दू लोकनिक सामाजिक व्यवहार आदि जनबाक नीक अवसर भेटि गेल। गाड़ी मे चलैत हम हिनका प्रश्न पूछैत जैएनि आ ई उत्तर दैत जाथि। मंकी फोरेस्ट नाम गुण नहि लागल। ने बेसी बानरे, ने ततेक पैघ फोरेस्ट, तीनटा छोट-छोट मन्दिर, मुदा गेट पर ताला लागल आ मन्दिरक कपाट सेहो बन्द। गाइड कहलनि जे सबसँ पैघ मन्दिर दालेम आगुंग के छिऐक। जनश्रुति छैक जे बानर सब एहि म्न्दिरक रक्षक छिऐक। स्थानीय लोक सब जखन कोनो उत्सव मे एतए अबैत छथि तखने कपाट खोलल जाइत छैक। एकटा नाला बहैत, किछु माछ सब जल मे खेलाइत। सब किछु आधा घंटा मे आराम सँ घुमि लेलहुँ। एहि लेल बियोन्डर दू घंटाक प्रोग्राम बना कए रखने छल। आब हमरा किछु करबाक नहि छल। हम बियोन्डर कें शिकाएतिक एकटा ह्वाट्सएप मेसेज पठा देलियैक। ओहमर सँ जे किछु कएल गेलैक से प्राय: एतुका स्थानीय पार्टनर कें स्वीकार नहि भेलैक। गाइड कें आजुक कार्यक्रम मे एकेटा आर स्थल छलनि- हिन्दू परिवारक घर देखाएब। मंकी फोरेस्ट मे किछु आर समय बिताए हम सब चलि पड़लहुँ ओहि इलाका कें जतए ओ हमरा एकटा हिन्दू परिवारक घर देखौतीह। रस्ता मे लंच लेबाक लेल एकटा रेस्तराँ मे रुकलहुँ। एहि यात्रा मे ड्राइभर हमर ओतेक सहयोगी नहि बुझाएल। रस्ता मे कतेको ठाम दर्शनीय स्थल सब छलैक, मन्दिर समूहक तऽ कथे कोन, बाली मे जेना सुनल छल, मन्दिर बहुत, मुदा ड्राइभर ओहि सब जगह पर रोकबाक लेल तैयार नहि। एक बेर हमरा तामसो चढ़ल, तखन एकटा मन्दिर पर ओ रोकलक आ हम मन्दिरक दर्शन केलहुँ। भव्य मन्दिर, पैघ परिसर, आ तहिना पैघ बरामदा। गाइड बतौलनि जे उत्सवक अवसर पर एतए ग्रामीण लोकनि बैसैत छथि। हम स्थानीय लोक नहि छलहुँ तें हमरा मन्दिरक भीतर प्रवेश वर्जित छल। परिसर मे घुमलहुँ, वास्तुकलाक आनन्द लेलहुँ। ओहुना मन्दिर मे प्रवेश लेल ड्रेसकोड छैक, बिना सारोङ्ग पहिरने कियो मन्दिर मे प्रवेश नहि कऽ सकैत अछि। एतुका मन्दिर मे लोक जे प्रसाद अथवा किछु चढ़बैत छैक से साधारणत: नारिकेलक पात अथवा तारक पात के दोना मे, ओकरा लोक मन्दिरे मे एक कात मे छोड़ि दैत छैक। ढेरक ढेर एहन दोना हम ओहि मन्दिरक गेट पर राखल देखल। गाइड मिस विडी बतौलनि जे इएह प्रथा छैक, छोटछीन सामान लोक ओहिना छोड़ि दैत छैक, पैघ वस्तु घर लऽ जाइत अछि। हम जखन ओहि हिन्दू परिवारक घर पहुँचलहुँ तऽ गेटे पर गणेशजीक मूर्ति राखल देखल। नीक बात। आङन मे ओतुका प्रथाक अनुसार खर सँ छाड़ल एकटा घर, ओहि छोटका घर मे शुभ कार्य लेल आयोजन होइत छैक। एकटा साधारण पक्का घर, जे घरवासी अपना रहबाक हेतु व्यवहार करैत छलाह। आङन मे फल-फूलक गाछ, जेना अपना गामघर मे रहैत अछि। ई परिवार पेशा सँ मूर्तिकार, पाथरक मूर्ति बनबैत। सामने आङनक एक कात तीन-चारि फुट वर्गाकार आधार आ करीब सात-आठ फुट उँच तीनटा मन्दिर एक कतार मे बनल जाहि मे बिचला कने न्यून। एहि मे हुनक कुलदेवताक अतिरिक्त पूर्वज लोकनिक मन्दिर छलनि। ई प्रथा इन्डोनेसिया मे हिन्दू परिवार मे अनिवार्य छैक। एतुका हिन्दू लोकनि स्थानीय रीति-रेवाज, जाहि मे पूर्वजक उपासना अनिवार्य छैक, कें मानिते आबि रहल छथि। सब मन्दिर के गेट उज्जर कपड़ा सँ झाँपल। हमरा कहल गेल जे उत्सवे पर कपड़ा हटाओल जाइत छैक जखन पूजा कएल जाइत छैक मन्दिर सबमे कोनो मूर्ति नहि छलैक, मात्र पाथरक एकटा चबूतरा जकरा पद्मासन कहल जाइत छैक। इन्डोनेसियाक हिन्दू समाज मे भारत जकाँ जाति-प्रथा नहि छैक मुदा वर्ण-व्यवस्था छैक। समाज चारि वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र मे विभाजित छैक। एहू मे बहुत कठोर नियम सब नहि छैक, समाज मे माता-पिता द्वारा आयोजित विवाह बहुते कम होइत छैक। शूद्र वर्ण कुल हिन्दू समाजक प्राय: 90% जनसंख्या छथि कारण किसान एही वर्ण मे अबैत छथि। कियो अछूत नहि होइत छथि। बाल-विवाह एकदमे नहि छैक। भारतीय हिन्दू समाजक विपरीत एतए सब ठाम त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) कें पूजा कएल जाइत छनि। एकर अतिरिक्त पार्वती, गणेश, अर्जुन, शक्ति आदिक पूजा सेहो होइत छनि। समाज मे वेद, उपनिषद, पुराण आ इतिहास (रामायण आ महाभारत) मूल ग्रन्थ मानल जाइत छैक। चतुर मार्ग (भक्ति, ज्ञान, कर्म, राज) आ चतुर पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के मार्ग पर लोक चलबाक प्रयास करैत अछि। कोनो वर्णक रहओ, सब परिवार मे तीन बेर संघ्यावंदन कएले जाइत छैक। कार मे बैसल हम गाइड कें आग्रह केलिएनि तऽ ओ करीब दू मिनट तक बहुत रास मंत्रक संग गायत्री पाठ केलनि जकर हम भीडियो बनाओल। मिस विडी बतौलनि जे कोनो शुभ कार्य मे बलि देले जाइत छैक आ लोक मासु खेबे करैत अछि। यदि छोटछीन कार्य रहलैक आ खेनिहारक संख्या कम रहलैक तऽ मुर्गीक बलि देल जा सकैत छैक अथवा छागर-पाठी के, किन्तु यदि पूरा गाम कें खुएबाक हेतैक तखन गायक बलि सेहो देल जाइत छैक। ओतए हिन्दू लोकनि गोमांस भक्षण कें निषिद्ध नहि मानैत छथि। किन्तु साधारणत: ब्राह्मण लोकनि मासु नहि खाइत छथि। जीवन क्रम मे व्यक्ति कें चारिटा महत्वपूर्ण संस्कार होइत छैक- जन्म, अन्नप्रासन, किशोरावस्था आ विवाह। बच्चाक जन्मक 105 दिनक बाद ओकर पहिल संस्कार कोनो मन्दिर मे होइत छैक। एतेक दिन तक ओकरा धरती पर नहि राखल जाइत छैक कारण विश्वास छैक जे ओकरा मे ईश्वरक अंश रहैत छैक। किन्तु जन्मक 42 दिन तक माता कें अपवित्र मानल जाइत छनि आ हुनका कोनो मन्दिर मे प्रवेश वर्जित छनि। तहिना मासिकधर्मक समय सेहो महिला लोकनि कें मन्दिर मे प्रवेश वर्जित छनि। मृत्युक बाद एतए दाह संस्कार करबाक नियम क्लिष्ट छैक। तत्काले दाह संस्कार नहि कएल जाइत छैक। मान्यता छैक जे मृत्युक बाद आत्मा पुनर्जन्मक लेल मुक्त भऽ गेलैक। तें दाह संस्कारक विधि दिन तकाइये कए होइत छैक। साधारणत: दश-पन्द्रह दिनक अन्तर आबिए जाइत छैक तें तात्कालिक रूपें लोक मृत शव कें गारि दैत छैक आ उचित समय एला पर फेर ओकरा उखारि नियमत: दाह संस्कार कए अस्थि कें समुद्र मे प्रवाह कएल जाइत छैक। गाम-घर मे मन्दिरक पुजेगरी वंसानुगते होइत छथि आ ओ पुजेगरी साधारणत: बेसी पढ़ल-लिखल नहि होइत छथि। किछुए लोक बेसी पढ़ि-लीखि कए विद्वान पंडित बनैत छथि जे शिक्षक आ पैघ मन्दिरक पुजेगरी होइत छथि। स्कूल मे साल मे दू बेर सरस्वती पूजा होइत छैक। यदि स्कूल मे मुसलमान बच्चा छैक तऽ ओकरा इच्छा पर छैक जे ओ उत्सव मे भाग लिए अथवा नहि। सब स्कूल मे सरस्वतीक मूर्ति राखल रहैत छैक। रस्ता मे जाइत काल हम कतेको ठाम मूर्ति सबहक भण्डार देखल, जहिना सरस्वती पूजाक अवसर पर अपना देहात मे छलगोरिया टोल मे देखि सकैत छी। माटिक मूर्तिक प्रचलन नहि छैक। मूर्ति स्थायी रूपें सब दिनक लेल रहैत छैक तें पाथर सँ बनल मूर्तिक व्यवहार कएल जाइत छैक, नीके बात। उबुद इलाका मे दर्शनीय स्थल मे एकटा सरस्वती मन्दिर छैक मुदा ई हमरा पैकेज मे नहि छल तें हम नहि देखि सकलहुँ। दुर्भाग्य। आजुक कार्यक्रम ढीलढाल छल, किछु खास दर्शनीय नहि बचल। हमरा बाली के स्थानीय चॉकलेट फैक्ट्री देखबाक छल। ई बात हम इन्टरनेट मे पढ़ने छलहुँ जे ओतए लोक चॉलकेटक पैघ ढेप (250 ग्राम, 500 ग्राम आदि) कीन सकैत छल। मुदा ओहि पता पर जखन गेलहुँ तऽ बताओल गेल जे फैक्ट्री उठि कए एयरपोर्टक इलाका मे चलि गेल छैक, ढेप नहि बिकाइत छैक आ फैक्ट्री देखबाक लेल 1 लाख रुपिया टिकट छैक। अस्तु, ई जिज्ञासा एतहि शेष भेल। बियोन्डरक बनाओल प्रोग्रामक अनुसार आइ हमरा होटल मे चेकैंअ केलाक बाद साँझ मे केसाक नृत्य, जे महाभारतक खिस्सा पर आधारि होइत छैक, देखबाक छल। मुदा गाइड एहू लेल अपन असमर्थता व्यक्त केलनि, ई कहि जे ओ जगह होटल सँ बहुत दूर छैक। हम करीब साढ़े चारि बजे आबि गेलहुँ होटल जे कि समुद्रक किनार मे छल। इलाका होटले सब सँ भरल आ तहिना रस्ताक दूनू कात छोट पैघ अनेको रेस्तराँ बनल। चेक इन केलहुँ, मिस विडी अगिला दिनक प्रोग्राम बता देलनि जे आठ बजे तैयार रहबाक छल, अनेक मन्दिर दर्शन करबाक हेतु। एहि होटल (रेजर्ट) मे दुपहरिया मे चाह आ हल्का स्नैक्स देल जाइत छलैक, समय तीन सँ पाँच तक। हमरा लग एखन समय छल। गेलहुँ अपन हिस्सा चाह आ स्नैक्स लऽ कए समुद्रक कात एकटा आराम कुर्सी पर पलरि गेलहुँ। भोजनक कोनो चिन्ते नहि छल। आब शाकाहारी भेज-कढ़ी आ भात ऑर्डर करब सीखिए लेने छलहुँ। पाँचम दिन, सोम, 3 अक्टूबर 2022। आइ हमरा प्लान मे लीखल छल 'Temple Run' अर्थात मन्दिर सबहिक दर्शन। गाइड कें अपन बूझल रूट आ प्रोग्राम छलनि, हुनका बियोन्डरक लिखलाहा प्रोग्राम सँ कोनो सरोकार नहि। तीनटा मन्दिर आ एकटा अन्य दर्शनीय स्थल तीर्थ गंगा हमरा हिसाबें आइ देखबाक छल मुदा गाइड कहलनि तीर्थगंगा नहि जा पौतीह कारण एक तऽ ओ बहुत दूर छैक, रस्ता सँ हटि कए आ ओतऽ देखबाक किछु खास छैके नहि, ओ मात्र एकटा पिकनिक स्थल छिऐक। हम सब करीब अढ़ाइ घंटा ड्राइव केलाक बाद पहुँचलहुँ पुर बेसाकिह मन्दिर, जे बाली मे सबसँ पैघ मन्दिर छैक आ एकरा एक हिसाबें mother temple सेहो कहल जाइत छैक। गाइडक अनुसार आठम शताब्दी मे कोनो ऋषि मार्कण्डेय भारत सँ ओतए गेल छलखिन आ हुनके प्रयासें बालीक पैघ-पैघ मन्दिरक निर्माण भेल छलैक। मुदा विकीपीडियाक विद्वानलोकनिक अनुसार बालीक ई मन्दिर प्राय: 2000 वर्ष अथवा ओहू सँ बेसी पुरान छैक। हम एहि बात पर गाइड कें प्रश्न नहि केलिएनि। मन्दिर मे प्रवेश करबा सँ पहिने एकटा महिला लुंगी सदृश एकटा वस्त्र लेने अएलीह आ कहलनि अपना पैंटक उपर लपेटि लेबा लेल। उचित होइतैक जे हम सारोंग पहिरने रहितहुँ मुदा हजारो विदेशी पर्यटक से नहि कऽ पबैत अछि तें मन्दिर प्रशासन ई व्यवस्था केलक। एहि लेल कोनो फीस नहि छलैक। एहि नाटक मे आ अपना देश मे दक्षिण भारतक किछु मन्दिर मे प्रवेशक एहने व्यवस्था देखि हमरा लगैत अछि जे सब ठाम एके कथा छैक। मन्दिरक भीतर हमर प्रवेश सम्भव नहि, चारू कात बूझू घुमैत छी कि प्रदक्षिणा करैत छी। गाइड आइ अपन 'अपवित्रता'क कारण बतबैत मन्दिर मे प्रवेश नहि करैत छथि। गाइड बतबैत छथि जे एतए छोट-पैघ सब मिला कए तेइसटा मन्दिर छैक जाहि मे मुख्य आ सब सँ विशाल छैक पुरा पेनातरन आगुन्ग। पहाड़ीक ढलान पर एक-के-उपर-एक छओ स्तर पर बनल एहि मन्दिर मे सबसँ उपर पैघ आङन छैक। मन्दिरक वास्तुकला भारतीय आ इन्डोनेसियन स्थानीय कलाक मिश्रण छिऐक। गर्भगृह मे पद्मासन छैक। एतुका मन्दिरक विशेषता जे गर्भगृह बेसी काल बन्दे रहैत छैक, मात्र जखन कोनो ग्रुप पूजा आदि लेल अबैत अछि तखने ओकरा खोलल जाइत छैक। मन्दिर कें नजदीक सँ देखला पर हमरा भारतीय वास्तुकलाक कोनो प्रभाव नहि बुझना जाइछ। मन्दिरक उपरका डिजाइन पिरामिडक सदृश, जाहि मे छत्र सब बनल, जेना जेना उपर उठैत छैक, छत्र सब क्रमश: छोट होइत जाइत छैक। एहि डिजाइन कें मेरु टावर कहल गेल छैक। पिरामिडक विपरीत छत्र सब एक दोसर सँ सटल नहि, अपितु कने हटले रहैत छैक। बेसाकिह के 23 टा मन्दिर संकुल मे छोट-पैघ सब छैक आ मेरु टावर मे छत्रक संख्या पाँच-छओ सँ लऽ कए बीस-पचीस तक छैक। एहि सँ मिलैत जुलैत डिजाइन दरभंगा मे दोनारि चौक पर हनुमान मन्दिर मे सेहो छैक। ई डिजाइन प्राम्बनन के मन्दिर सँ एकदम अलग छैक। दोसर बात जे भारतीय मन्दिरक विपरीत, एतए देवाल मे अप्सरा, देवी-देवता आदिक कोनो नक्कासी नहि देखाएल। बालीक मन्दिर सब मे द्वार विशेष प्रकारें बनाओल रहैत छैक जे दूरहिं सँ लोक कें खूजल कपाटक बोध करबैत छैक, जेना दूनू पट्टा पूर्णत: खोलि देल गेल होए। एकरा स्वर्गद्वारक संकेत बूझल जाइत छैक। दूनू कात द्वारपालक भव्य मूर्ति बनल छैक जकरा डाँर सँ नीचा रंगीन अथवा छींट कपड़ा सँ झाँपल। एहन द्वार चारू कात बनल। गाइड एकटा चमत्कारिक घटना बतबैत छथि जे 1963 मे माउन्ट आगुन्ग सक्रिय भऽ गेल छलैक आ सगरे लावा पसरि गेल छलैक मुदा एहि मन्दिर लग मात्र तीन मीटरक दूरी पर आबि जेना अकस्मात लावाक प्रवाह ठमकि गेलैक। स्थानीय लोक एहि चमत्कार सँ बहुत प्रभावित भेल। ओकरा सबकें बुझेलैक जे ईश्वर अपन शक्तिक प्रदर्शन केलनि, संगहिं मन्दिर कें नष्ट होएबा सँ बचा लेलखिन। मन्दिर मे तखने स्थानीय लोकक एक झुण्ड यथोचित वस्त्र पहिरने माथ पर छिट्टा मे भोगक प्रसाद लेने पहुँचैत अछि आ सीढ़ी सँ उपर चढ़ि जाइत अछि। हम दोसर कातक द्वार सँ ओकरा लोकनिक पूजा विधि देखैत छी। किछु भीडियो सेहो बनबैत छी। एहि तरहें मन्दिर भ्रमण समाप्त भेल। आब कने बुन्नी पड़ऽ लगलैक अछि। कोनो बात नहि, गाड़िए मे रहब कि ने। तकर बाद हम सब चलैत छी अगिला मन्दिर, पुरा लेम्पुयांग़। ईहो मन्दिर माउन्ट लेम्पुयांग़ पहाड़ी पर छैक, जे  बाली मे आस्थाक प्रतीक छैक। पार्किंग कने नीचे मे बनल छैक आ स्थानीय मिनिबस द्वारा पर्यटक कें उपर मन्दिर तक पहुँचाओल जाइत छैक। मन्दिरक गेट पर सूचनापट्ट पर पैघ आकारक ॐ लिखल देखैत छी, हिन्दू पूजास्थल हेबाक लेल एहि सँ बेसी परिचय की हेतैक ? निर्माणकालक हिसाबें इहो बहुत प्राचीन छैक आ एतहु भारतीय वास्तुकलाक प्रभाव नहिए। ई एकटा प्रश्न रहिए जाइत अछि जे यदि मन्दिर सब भारतीय लोकनिक आगमन सँ पहिनहि बनि गेल छलैक तखन एकरा हिन्दू मन्दिर कोना मानल गेलैक। बहुत सम्भव जे मूल जनजाति, जे पूर्व मे प्रकृति आ पूर्वजक आत्माक उपासक छलाह, ओएह सब एहन मन्दिर बनौने होथि जे बाद मे हिन्दू धर्मक केन्द्र बना देल गेलैक। नीचा सँ उपर तक मन्दिर तीन स्तर पर बनल छैक, तीनू स्तर पर अपन अपन खूजल द्वार छैक। मध्य स्थलक स्वर्गद्वार पर लोक कें फोटो आदि लेबाक छूट छैक। फोटो आदि लेबा लेल टिकट लगैत छैक जे हमरा पैकेज मे जोड़ल अछि। गाइड टिकट कीनैत छथि तऽ संगहि एकटा कूपन देल जाइत छनि जे कतार मे हमर संख्या बतबैत अछि कारण ओहि स्थान पर फोटो लेबाक लेल भीड़ छैक, प्रत्येक व्यक्ति अथवा ग्रुप के कम सँ कम पाँच मिनट तऽ लागिए जाइत छैक। ओहि द्वार पर जेबाक लेल लोक नीचा सँ बनल सीढ़ीक प्रयोग सेहो कऽ सकैत अछि आ बगल बाटे सड़क पर हल्का चढ़ाइ चढ़ैत परिसरक पैघ आङन मे सेहो जा सकैत अछि। हम कात बाटे आङन मे प्रवेश करैत छी। ओतए एकटा खुला दलान जकाँ पैघ स्थल, जतए फोटो लेनिहार सब अपन अपन नम्बरक प्रतीक्षा कऽ रहल छथि। हमरा पता लगैत अछि जे हमर नम्बर एक सौ व्यक्तिक बाद आओत। माने भेल जे एको मिनट कें यदि प्रति व्यक्ति लगतैक तऽ दू घंटाक बादे। हम ओकर विचार छोड़ि दैत छी, कारण समय से भेल जा रहल छैक, भूखो लागल अछि आ एतए दू घंटा बिताएब कोना सेहो समस्या अछि। अपरिचितक संग कतेक गप करत लोक ? सामने उँच स्थल पर तीनटा मन्दिर स्थित छैक। एहि मन्दिर सब के सीढ़ी सब पर ढाठ लागल छैक, माने पर्यटक उपर नहि जा सकैत छथि। नीचा सँ फोटो आदि मात्र लोक लऽ सकैत अछि। हमरा दूगोटे भारतीय पर्यटक एतए भेटलाह, एकटा दिल्ली आ दोसर कलकत्ता सँ। हुनके सहायता सँ  ओहि मन्दिरक पृष्टभूमि मे हम अपन किछु फोटो लैत घुरि अबैत छी पार्किंग मे। एहि मन्दिर मे आओर किछु करबाक नहि, खाली वास्तुकलाकें निहारू आ प्राचीन लूरिक प्रशंसा करू। रस्ता मे एक ठाम भोजन लेल रुकैत हम सब करीब चारि बजे तेसर मन्दिर पर पहुँचैत छी। ई समुद्रक कछेर मे बनल छैक। पूरा गोआ लावा (Goa Lawah) नामक ई मन्दिर बालीक छओटा मुख्य मन्दिर मे एक मानल जाइत छैक। एतए एक कात पैघ बरक गाछक धोधि मे बादुरक झुण्ड भरल। एहि गाछ आ बादुरक पूजा सेहो होइत छैक। मन्दिर परिसर मे हम टहलैत छी, गाइड बाहरे रहैत छथि। एतहु स्थानीय लोकक एक दल पूजा लेल पहुँचैत अछि, तखन ढोल सदृश एकटा बाजा बजाओल जाइत छैक। ओ सब आङन मे नीचा मे बैसि जाइत अछि, पुजारी आगू मे बैसैत छथि आ सबकें पूजा करबैत छथि। इएहटा दृश्य हम किछु निकट सँ देखि पौलहुँ। मन्दिर परिसर मे एकटा खूजल घर मे बहुत रास वाद्ययंत्र गेरुआ रंगक कपड़ा सँ झाँपल राखल। एकर व्यवहार वार्षिक उत्सवक समय कएल जाइत छैक। आजुक मन्दिर भ्रमण एतहि शेष भेल। होटल घुरैत छओ बाजिए जाइत छैक, थाकिओ गेल छी तें दिनक अन्त मानल। अगिला दिन लेल हमरा दूटा काज बचल अछि- ताना लोट मन्दिर आ सनेस कीनब। ताना लोट मन्दिर लोक सूर्यास्तक समय जाइत अछि, मुदा हमरा लेल से सम्भव नहि। यद्यपि बियोन्डर हमरा सूर्योदयक समय एहि मन्दिर कें देखबा लेल लिखने अछि, हम ओहि विचार कें छोड़ि दैत छी कारण ई अव्यावहारिक लगैत अछि। दोसर गप जे आकाश कखनहु कए मेघाछन्न भए जाइत छैक तखन की सूर्योदय आ की सूर्यास्त ? कन्याकुमारी यात्राक अनुभव आ एतहि मेरापी देखबा मे मेघौन समयक कारण भेल बाधा मोन पड़ैत अछि। गाइड कें कहैत छिएनि नओ बजे आबथि। छठम दिन, मंगल, 4 अक्टूबर 2022 होटल सँ चेकआउट कैए कए बहराइत छी कारण ताना लोटक बाद हमरा सीधे एयरपोर्ट जेबाक अछि। बाली मे पछिला दू दिन भारी वर्षा नहि भेल छलैक। आइ होटल छोड़िते खूब जोर के वर्षा होमए लगलैक। किछुए काल मे सड़क सब पर पानि लागि गेलैक। गुनक जे ताना लोट पहुँचैत पहुँचैत वर्षा छूटि गेलैक मुदा आकाश मेघाछन्न बनले रहलैक। पहिने गाइड हमरा लगे मे एकटा स्टोर मे लऽ गेलीह जतए हम चॉकलेट आदि किनलहुँ। तकर बाद ताना लोट मन्दिर। ताना लोटक अर्थ स्थानीय भाषा मे होइत छैक समुद्र मे स्थित जमीन। ई मन्दिर समुद्रक कछेर मे चट्टान पर बनल छैक। मन्दिरक प्रवेशद्वार ओहिना खूजल केबाड़क पट्टा, स्वर्ग मे अपने कें आमंत्रित करैत। एखन भाटाक समय छैक तें कछेर मे पानि नहि छैक। एतए किछु दृश्य अनुपम अछि, खास कऽ कए एकटा चट्टान जे पुल बनि गेल छैक लोक कें बेसी आकर्षित करैत छैक। ई मन्दिर हमर एखन तक के देखल मन्दिर सब मे सबसँ नव अछि, सोलहम शताब्दी मे बनाओल गेल। बालीक हिन्दू लोकनि लेल ई समुद्री देवताक मन्दिर छिऐक, एतए वरुण देवक पूजा होइत छनि। एहि चट्टान पर मन्दिर कें प्राय: झँपने बहुत रास पैघ गाछ सब, तथापि मन्दिरक वास्तुकला देखबा मे आबिए जाइत छैक जे कालि देखल अन्य मन्दिर सँ मिलैत-जुलैत छैक। मन्दिर मे एकटा झरना छैक जाहि सँ नोनरहित नीक पेयजल खसैत रहैत छैक। एतुका लोक सब एहि जल कें बोतल मे भरि कए लऽ जाइत अछि, एकरा पवित्र मानल जाइत छैक, बूझू भारत मे गंगाजल। पर्यटक लोकनि ओहि झरनाक जल चिखबाक लेल लाइन लगौने। हमहूँ लाइन मे लागि जाइत छी। जल सत्ते नीक छैक। प्रश्न छैक समुद्रक कछेर मे मीठ जलक स्रोत कतए सँ एलैक ? एतए तऽ समुद्री नोनछराइन जल हेबाक चाहियैक। मुदा धरतीक गर्भ मे बहुतो एहन आश्चर्य छैके, सबसँ पैघ आश्चर्य तऽ मानसरोवर झीलक पड़ोस मे राक्षस ताल छैक जकर जल नोनछराइन छैक। मन्दिर मे प्रवेश करबाक कोनो प्रयास कियो नहि करैत अछि, पर्यटक लेल मन्दिर स्थल पूजाक लेल नहि, प्राकृतिक सुन्दरताक दृश्यावलोकन लेल छैक। विश्वास छैक जे समुद्री विषधर सब एहि मन्दिरक रक्षा करैत छैक। एखनहु चट्टानक एकटा छोट गुफा मे एकटा साप राखल छैक। गाइड कहैत छथि ई साप एतए सैकड़ो साल सँ छैक आ मान्यता छैक जे ई ताना लोट मन्दिरक रक्षक छिऐक। हमरा आश्चर्य लगैत अछि जे जीवित साप एतेक पुरान हेतैक कोना जखन कि सापक औसत आयु मात्र 25-30 वर्ष होइत छैक ? एहि मे ढोंग छैक से गाइड स्वीकार करैत छथि। तैयो लोक ओकरा देखबा लेल जाइत अछि आ किछु चढ़ौआ चढ़बैत अछि। साप कुण्डली मारने, लगबे नहि करत जे जीवित छैक आ कि प्लास्टिक के बनाओल। दूटा व्यक्ति, जे स्थानीय पुजेगरी बुझाइत छथि, सारोंग पहिरने ओतए बैसल ओकरा ओगरने। दू हजार रुपिया हमहूँ फेकल ओहि साप लेल। एतहु एकटा बंगाली परिवार भेटैत छथि। दुर्गापूजाक समय आ बंगाली लोकनि घुमबा लेल नहि बहराइथि से कोना हेतैक ? आ किछु तऽ बाली दर्शन लेल सेहो एबे करताह किने ? आकाश मेघौन छैक तें सूर्यक दर्शन नहिये होइत अछि। एक हिसाबें नीके नहि तऽ एगारह बजे प्रखर रौद मे खुला आकाशक तर ताना लोट घूमब प्रियगर नहिए होइत। हमर इन्डोनेसिया टूर समाप्त होइत अछि। एयरपोर्टक रस्ता मे हम बितलाहा पाँच दिनक लेखा-जोखा करैत छी तऽ लगैत अछि जे दर्शनीय स्थल कें नजदीक सँ देखबा-बुझबाक हिसाबें योग्यकर्ता बालीक तुलना मे नीक रहल। ओतए गाइड सेहो बेसी सहयोग केलनि, जे किछु हमरा प्रोग्राम मे लीखल छल ताहि सँ बेसिए अपनहि मोने देखा देलनि। बाली मे गाइड अपन महिला-जनित 'अपवित्रता'क कारणें (हम ई मानि लैत छी जे ओ झूठ नहि बजलीह) मन्दिरक भीतर नहि गेलीह आ विदेशी पर्यटक कें मन्दिरक गर्भगृह मे प्रवेश वर्जित रहला सँ भ्रमण ओतेक आनन्ददायक नहि रहल। बाली मे एकेटा लाभ भेल जे हिन्दू गाइड गाड़ी मे यात्रा करैत हमरा हिन्दू समाजक रीति-नीतिक बारे मे बहुत किछु बतबैत गेलीह, अपना मुहें गायत्री पाठ सुना देलनि आ किछु स्थानीय मधुर चिखा देलनि। एकर विपरीत जतेक हमरा प्रोग्राम मे लीखल छल ताहि मे किछु स्थल छोड़िओ देलनि आ सबसँ मुख्य बात जे ओ कोनो पंडित अथवा पुजेगरी सँ भेंट नहि करौलनि जाहि बातक लेल हम बियोन्डर सँ ओतेक जोगार करबौने छलहुँ। एहि छोट यात्रा मे तैयो सुदूर पूर्व मे बसल हिन्दू समाजक बारे मे बहुत किछु बुझबा मे आएल। खुशी भेल जे विषम परिस्थितिओ मे कोना ओ लोकनि अपन धार्मिक आ सांस्कृतिक व्यवहार बचा कऽ रखबा मे सक्षम भेलाह आ कोना आनो समाज कें आकर्षित करैत अपना मे सन्निहित करबा मे सफल भेलाह। एयरपोर्ट पहुँचि हम गाइड कें बख्सिसक एकटा लिफाफ पकड़ा देल आ हुनका बहुत धन्यवाद दैत अपना फ्लाइटक चेक-इन लाइन मे लागि गेलहुँ। -सम्पर्क- ब्लॉक 8, फ्लैट 2बी, डायमन्ड सिटी नॉर्थ, कोलकाता 700055, मोबाइल 9831037532 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना (उपन्यास- खेप १०) संतोष कुमार राय 'बटोही' मंगरौना (उपन्यास- दसम खेप) ''इ तोहर बपौती थोड़े छियौ। इ हम परिछन सँ किनने छी। पैंतीस बरख भ गेलै ।"

"हँ यौ कक्का ,इ अहाँ किनने छी। परञ्च हमर तँ पुश्तैनी छियैय। मंगरौना गाम जहिया बसलै तहिये सँ इ रस्ता छै।"

"तँ तोहर की मोन हम अपन जमीन छोड़ि दियैए ?"

"अहाँ केँ हम जमीन छोड़ै लेल थोड़े कहैत छी। रस्ता तँ जरूर छोड़ि दियौ। इ रस्ता सभहक छियैए। सभ कियो अइ रस्ता धरि चलैत छथि।"

अतेक गप भेलाक बादो बटुक काका रस्ता नहि छोड़लकिहीन। ओ एक कड़ी बढ़ा क' रस्ते पर पिलर गाड़ि रहल छथिन्ह। अइ सँ पहिने डीलर काका रस्ता पर बढ़बैत दीवार जोड़ि देलथिन्ह। सभ कियो विरोध केलन्हि जे रस्ता बन्न नहि करियौ। इ रस्ता आइ धरि नहि छै। छह-सात पुश्त तँ इ रस्ता छै। अइ रस्ता केँ उत्तर स्वर्गीय दरबारी बाबा केँ दालान छलन्हि। ओई दालान पर भरि गाम केँ लोकनि जमल रहैत छलाह। कुश्ती-पहलवानी केँ रणनीति ओई दालान पर बनैत छल।

गाम मे दु फाँड़ भेल छेलैह। एकटा गुट के नेता लखन बाबा छलथिन्ह, तँ दोसर गुट के नेता युग राय छलथिन्ह। गाम मे अशान्ति रहैत छल। मसोमात के जमीन हरपै लेल बड़-बड़ धंधा होएत छलैह। मसोमात केँ अगर बेटा नहि छलैह तँ हुनकर जमीन हरपनै आओर आसान छलैह। मसोमात केँ बेटी के अपन फाँस मे फँसा लिअ । ओकरा सँ बलजोरी ब्याह क' लिअ। आब मसोमात के जमीन-जायदाद अहाँ केँ भ जाएत। इ आम गप छल।

लखन बाबा बेस पैघ कद-काठी के पहलवान छलाह। कुश्ती मे हुनका सँ आगा सिर्फ युगेसर छलाह। केहनो पहलवान के पटखनी देबा मे ओ आगाँ छलाह। बबितिया केँ घरवाला हैजा मे मरि गेलै । ओ मसोमात भ गेलीह। ओकरा एकटा बेटी छलैह - 'मरनी' ।

मरनी के जनम बाप केँ मुइला बाद भेल छलैह , तैं ओकर नाम मरनी राखल गेल। गाम मे घटना आओर परिघटना केँ हिसाब सँ नाम राखै केँ परंपरा छलैह । जेना जे नेना कोठी दोगा मे बेसी नुकायत छलाह , तँ लोकनि हुनकर नाम 'मुसाय' रैख दैत छलथिन्ह।जकर ढोंढ़ी बढ़ल होएत छल तँ हुनकर नाम ' ढोरबा' पड़ि जैत छल। मंगल के जनमल मंगला वगैरह-वगैरह...।

लखन मरनी केँ अपन परेमक जाल मे फँसौंलथि। दुनु केँ चुमौन भेलन्हि । मरनी सुहागिन भेलीह। मरनी केर संपति पर लखन केँ कब्जा भेलन्हि । संपति बढ़बै केँ ई नीक जुगाड़ छल। गाम मे अइ सँ पैघ-पैघ करम-कांड भs जाएत छल , परंच गाम मे कियो बैज नहि सकैत छलाह जे ई काज नीक नहि छियैय। गाम मे हिटलरशाही छलैह।

आजु बिजली केर खंभा नहि गाड़s दैत छै गाम मे लोकनि । हम इजोत मे रहब , तूँ अनहार मे रह। इ नीक विचार नहि कहल जा सकैत अछि। सभ कियो अमरीत नहि पीने छथि। इ मृत लोक छियैय। एक दिन छोड़s पड़तन्हि सभ कियो केँ ई धराधाम। तँ फेर अतेक गुमान कोन गप केर ? माटिक देह माटि मे मिल जेतै। सभ माया मोह छुटि जेतैन्ह अही ठाम।

(शेष अंश अगिला खेप मे) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.जगदीश प्रसाद मण्डल- भंगतराह कवि जगदीश प्रसाद मण्डल भंगतराह कवि भंगतराह कविक माने भेल शास्त्रीजी। भाय, साहित्य जगत छी माने साहित्यकारक समाज छी, ऐ बीच शास्त्री, उपशास्त्री, आचार्य, उपाचार्य इत्यादिक भरमार अछियो आ रहक्को चाहबे करी। अपना गाममे माने किसानपुर गाममे सेहो गोटि-पंगरा साहित्यकार साहित्यसँ जुड़ल छथिए। भाय, ऐठाम एहेन धोखा नइ हुअए जे एहनो-एहनो गाम सभ अछि जइमे छेहा माने सोल्होअना साहित्यकारे छैथ आकि सोल्होअना प्रोफेसरे वा डॉक्टरे छैथ। गोटि-पंगरा साहित्यकार, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, डॉक्टर गामे-गाम आइये नहि, सभ दिनसँ होइत आबि रहल अछि। किसानपुर गाममे माने अपना गाममे रविकान्त भाय सेहो साहित्यसँ जुड़ल छैथ। रविकान्त भाइक संग चारि-पाँच आरो साहित्यकार ओहिना काँखमे झोड़ा टंगने रहै छैथ जहिना भाड़ा-किराया पाबि सीताराम सीताराम करैबला मंडली सभ अछि। एकर माने ई नइ बुझब जे हम हुनकर खिदहौंस करै छिऐन। हुनकर एकनिष्ठता छैन। जखन समाजमे ओहन वस्तुक मांग बढ़ल तखने ने एहेन-एहेन मंडलीक माल उठिकऽ ठाढ़ भेल। आजुक जे भोज-भात अछि, ओ जँ प्राचीन पद्धतिक समाजसँ चलैत, तँ गाम-गाममे भानस करैबला श्रमिक वर्ग बनि केना पबैत? जे अखनो भरि दिन चुल्हिक आगि लग अपन देह झड़कबैए। तेतबे नहि, भोज्य-विन्यासक सैंकड़ो नब रूप गढ़ैक लूरि सेहो रखने अछि। मुदा ओकर मेहनताना केते होइए? खाएर ऐठाम से नहि। बस एतबे जे रविकान्त भाय साहित्य सेवामे लगल छैथ। रविकान्त भाय एक उमेरिया छैथ। ओना, अपन जीवनकेँ ढंगसँ पकैड़ रविकान्त भाइक सीमा धरि जरूर पहुँच गेल छी मुदा पण्डित जवाहरलाल नेहरूजी जकाँ चाचा बनैमे देरी अछिए। नइ तँ विज्ञान पढ़निहार केतौ इतिहास लिखैथ। अपने जीवन जकाँ जँ बुझबैन, तखन हुनकर जीवन नीक जकाँ नहि ने बुझि सकब, मुदा जखन हुनकर जीवन-साधनाक बाट पकैड़ देखब, तखन हुनकर वास्तविक रूपक स्वरूप जरूर देख लेब। साहित्य मंचसँ जुड़ल जहिना शास्त्रीजी छैथ तहिना रविकान्त भाय सेहो छैथ। ओना, दुनू भैयारीमे जहिना भाय-भाइक भैयारीक सम्बोधनसँ होइए, तहिना दुनू गोरेक बीच सेहो होइ छैन। अपन आ रविकान्त भाइक एक तँ एकठाम घर रहने दिनमे तीन बेर भेँटो होइते छैथ। आ दोसर, अपनो जिज्ञासा रहैए जे गामसँ बाहर तँ वएह बेसीकाल निकलै छैथ, अपने तँ भरि दिन परिवारेमे ओझराएल रहै छी। तँए, साँझूपहर-के बड़बैर भेँटो करिते छिऐन। भाय, पोखरिक महारपर जे नट सभ बसल अछि ओ सभ जहिना साँझूपहरमे अपन परिवारकेँ माने पत्नीकेँ, ताड़ी पीला पछाइत लठियेबो करैए आ भरि राति सेवो नइ करबैए सेहो केना नइ कहल जाए। केतबो मारि-गारि किए ने सुनए मुदा अंगरेज जकाँ तलाक नइ ने देत। शास्त्रीजी आ रविकान्त भायमे चेहराक रंग विचित्र रहितो एकचित्र बनल छैन्हे। माने ई जे जीवनमे, आयुक हिसाबसँ, रविकान्त भाय ऊपर छैथ। माने बीस बरख ऊपर छैथ आ शास्त्रीजी निच्चाँ छैथ। मुदा साहित्यिक जीवनसँ देखल जाए तँ शास्त्रीजी ऊपर छैथ। माने जैठाम रविकान्त भाइक साहित्यिक जीवन बीस बर्खक छैन, तैठाम शास्त्रीजीक जीवन पैंतीस-चालीस बर्खक छैन। साहित्यसँ माने सम्पूर्ण साहित्यसँ जेतेक रूचि शास्त्रीजीकेँ जे रहल होनु, मुदा कवितासँ रूचि शुरूहेसँ रहलैन, तँए पैंतीस-चालीस बर्खक कवि शास्त्रीजी भेबे केलाह। तैसंग कखनो-काल मंचक अनुकूल आरो-आरो साहित्यिक विधामे सेहो वक्तव्य दइते छथिन। शास्त्रीजीक अपन मनक बात छिऐन जे अपन विचार अनका खूब सुनबए चाहै छैथ आकि अनको बात सुनए चाहै छैथ। भाय एहेन विचार शास्त्रीएजी टामे छैन सेहो बात नहियेँ अछि। अपनोमे अछिए। माने ई जे सदिकाल मनमे रहैए जे अपन बात आन सुनबेटा नहि मानबो करए, मुदा अनकर बात सुनैले, मानैक तँ कोनो गप्पे नहि, अपना छुट्टीए ने अछि। पैंतीस-चालिस बर्खसँ शास्त्रीजी साहित्यिक विधामे किछु-ने-किछु लिखैत आबि रहल छैथ, मुदा सोभावसँ भंगतराह रहने कोनो लिखित रचनाक ठेकान नहि छैन। कहब जे भंगतराह किनका कहबैन? भांग पीबि कियो शिव-दरबारमे माने महादेवक दरबारमे शिव-भक्ति वा महादेव भक्ति करै छैथ आ कियो चौक-चौराहापर भाँगक दोकानसँ भाँग कीनिकऽ पीबि रस्ते-पेरे अर्र-दर्र करै छैथ। ओना, शास्त्रीजी केँ सोल्होअना भंगतराह नहि कहबैन। परिवारक जे अस्त-व्यस्तता छैन, ओ शास्त्रीजी केँ एकाग्र हुअ'ए ने दइ छैन, जइसँ केलहो श्रम हेरा-ढेरा जाइ छैन। एक तँ श्रम अपने-आपमे अनमोल रत्न छीहे मुदा ओकरा परेखब आ प्राप्त करब तँ आरो, माने जखन कुशल परेखनिहार आ प्राप्तकर्ता रहता तखने ने भेट सकै छैन। शुरूमे माने हाइ स्कूलमे जखन साइंस, आर्ट, वाणिज्य इत्यादि विषयक पढ़ाइ फुटैए, तइ समयमे शास्त्रीजी साइंसक विद्यार्थी छला, जे कौलेजमे आबि बी.एस-सी.क क्रममे मोड़ लेलकैन आ साइंस पढ़ब छोड़ि संस्कृत विषय पढ़ब शुरू केलाह। विश्वविद्यालयसँ 'शास्त्री'क उपाधि पौलैन। ओना, लगनशील एहेन जे वैदिक साहित्यकेँ धांगि देलैन। मुदा कोन रूपमे धँगलैन, से वएह बुझै छैथ। तीन भाँइक भैयारीक बीच माझिल छैथ शास्त्रीजी। पाँच बीघा जमीन परिवारमे। शास्त्रीजी घुमन्तू भइये गेला। इलाकाक हिसाबसँ शास्त्रीजीक विवाह गड़बड़ भेलैन। इलाकाक हिसाबक माने भेल जे भौगौलिक बनाबटक कारणेँ कोनो इलाकामे श्रमशील माने शरीरसँ श्रम करैबला मनुक्खक निर्माण होइए आ कोनो इलाकामे श्रमक बदलल स्वरूप रहने वौद्धिक मनुक्खक निर्माण होइते अछि। विवाह गड़बड़ ई भेलैन जे पढ़ल-लिखल पत्नी रहने परिवारक स्तर ऊपर उठलैन, मुदा आर्थिक संकटसँ खसैत रहलैन। किसान परिवार शास्त्रीजीक छैन्हे। आ तैपर शास्त्रीजी घुमन्तू भइये गेल छैथ। कविता पाठ, भागवत-पुराणक प्रवचन, गीता प्रवचन इत्यादिमे अपन सोल्होअना समय लगैबते छैथ। जेठो भाय आ छोटो भाय, माने तीन भाँइक बीच शास्त्रीजी माझिल छैथ, गामक खेत हथिया लेलकैन। जाबे तक छोट परिवार शास्त्रीजीक रहलैन ताबे तँ कोनो समस्या नइ बुझि पड़लैन, मुदा जखन अप्पन दुनू बेटा छँटगर भेलैन, परिवारमे खेत-पथारक विवाद शुरू भेलैन, तखन अपन आमदनी कमलैन आ खर्च बढ़लैन। अखन तकक जे जीवन शास्त्रीजीक रहलैन ओ परिवारक बेवहारक अनुकूल नइ रहलैन। परिवार बुझि शास्त्रीजी अपन पत्नियोँ आ बच्चो सभकेँ भाएपर ओंगठौने रहला मुदा अप्पन कमाइक कोनो हिसाबे ने रहलैन। सभ बुझिते छी जे लोअर प्राइमरीक बच्चाक पढ़ाइमे की खर्च अछि। तैठाम साहित्यकार सन भुखाएलक की खर्च हएत। ओना, साहित्य जगतक बीच शास्त्रीजीक एहेन वफादारी छैन्हे जे जैठामसँ हुनका हकार पड़ै छैन, तैठाम ओ जरूर पहुँचै छैथ। साइठ बर्खसँ ऊपरक उमेर भेलो पछाइत शास्त्रीजी पएरे वा साइकिलक सवारीसँ जीवन चला रहला अछि। परिवारक विवादक एहेन स्वरूप बनि गेल छैन जे कोर्ट-कचहरीक काज दिनो-दिन बढ़िते जा रहल छैन जइसँ दिन-रातिक बीच एक्को पल चैन भेटब कठिन भऽ गेल छैन। गारजनक हैसियतसँ शास्त्रीजी जवाबदेह छथिए। अपन जे जीवन छेलैन, माने केस-मुकदमासँ हटल, तइमे काफी बदलाव आबि गेलैन। एक दिस आमदनीक कमी हुअ लगलैन, दोसर दिस यत्र-तत्र खर्चा बढ़ि गेल छैन। खाएर किछु छैन मुदा मनुक्ख बनि अखन तक तँ शास्त्रीजी ठाढ़ छथिए। नइ सभ कार्यक्रममे, माने साहित्यिक कार्यक्रममे, भाग लऽ पबै छैथ, तँए नहियेँ लइ छैथ सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। स्वभावसँ शास्त्रीजी साहित्यकारक ठाठ-बाठक लोक छथिए। अर्थशास्त्रसँ कहियो भेँट नहि भेलैन जे बुझि पेबितैथ, भावलोकक अर्थनीति की अछि आ भुवनलोकक अर्थनीति की अछि। अखनो शास्त्रीजीक अप्पन मन गवाही दइते छैन जे दानी बनि दान देब महादान छी, तँए मानबकेँ मानि लेबा चाही। साहित्यिक कार्यक्रमक जे परिदृश्य बदैल रहल अछि तइ अनुकूल शास्त्रीजीक विचारक परिमार्जन नहि भऽ सकलैन। अपना संयोजकत्वमे शास्त्रीजी साहित्यिक कार्यक्रम करैक निश्चय केलैन। तिथि निर्धारित कऽ लेलैन। साहित्य संसारमे बिरले कियो बाँचल हेता जिनकासँ शास्त्रीजीक सम्बन्ध नहि छैन। वहुआयामी वृत्तिक शास्त्रीजी छथिए, तँए सम्बन्ध स्थापित होइमे देरी लगिते ने छैन। परिवारोसँ फ्री छथिए। आजुक परिदृश्यमे महिलाक हाथ-मुट्ठीमे की सभ छैन। बुझल बात अछिए जे महिलाक अधिकार दिआबैले सभ अपसियाँत छी, मुदा कोन घर एहेन छुटल अछि जइ घरमे महिला शासक नहि छैथ। निर्धारित समयपर रविकान्त भाय अपन संगीक संग शास्त्रीजीक ऐठाम पहुँचला। जहिना सतयुगमे ऋषि-मुनि गाछक निच्चाँमे माने छाहैरमे अपन कला-संस्कृतिक प्रदर्शन करै छला तहिना शास्त्रीजीक दरबज्जाक आगूमे तीनटा आमक गाछ छैन्हे। रविकान्त भाय, गामक एकटा ढेरबा बच्चाकेँ पुछलखिन- "बौआ, आँगन जा कने शास्त्रीजीक भाँज लगाबह ते।" जेना ओइ बच्चाकेँ बुझले रहै तहिना टपैक बाजल- "दछिनबारि टोलमे छैथ।" "केते दूरपर टोल अछि?" "सटले-सटल टोल सभ अछि।" अपन पाँचो-सात संगीकेँ संग केने शास्त्रीजीक भाँज लगबैत दच्छिनबारि टोल पहुँचते रविकान्त भाय देखलैन जे शास्त्रीजी धुरझाड़ कविता वाचि रहला अछि आ दस-बारहटा श्रोता हुँहकारी दऽ रहल छैन। मने-मगन शास्त्रीजी, हाथक इशारासँ रविकान्त भाय सभकेँ बइसैले कहलखिन आ अपन कविताक अन्तिम चौपाइमे हाथ लगौलैन। सामंजस करैत रविकान्त भाय, शास्त्रीजीक मनोनुकूल अपनाकेँ निरमित करैत शास्त्रीजीक कविताक विराम होइत देख मुड़ी उठा शास्त्रीजी पर देलैन तँ शास्त्रीजीकेँ भक्क खुजलैन। भक्क खुजिते मनमे उठलैन, बेवहारानुकूल अपना बुते तँ अतिथि लोकनिकेँ समयपर ठंढो-गरम आकि चाहे-पान नहि करा सकलयैन..! गामक तरक तह पकैड़ शास्त्रीजी बाहरी सभ साहित्यकारकेँ संगोर केने गाम दिस विदा भेला, मनमे यएह शुभेक्षु इच्छा रहैन जे समाजो दुनियाँक समाजसँ परिचित हेता आ बाहरियो समाज कर्मीक समाजसँ परिचित हेता। चारिये डेग जखन आगू बढ़ला, कि एकटा सुभ्यस्तगर परिवारक गारजन सोझमे पड़लैन। हुनका देखते शास्त्रीजी बजला- "हौ जगरनाथ, आइ अपना गामक सौभाग्य जगल। इलाकाक नामी-गरामी साहित्यकार सभक पदार्पण भऽ रहल छैन से केना पार लगेबह।" शास्त्रीजीक विचारक मर्मकेँ जेना जगरनाथ बुझि गेला तहिना बजला- "हम अहाँ कि कोनो बाँटल छी, ईहो दरबाजा तँ ओही गामक छी ने, जइ गाममे साहित्यकार सभकेँ बजौलिऐन हेन। सभ खर्च हम करब। तखन तँ कनी-बिलम्म हेबे करत।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास आठम पड़ाव) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) आठम पड़ाव पाँच बर्खक पछाइत, कामेसरक मन मानि गेलैन जे जँ अपन हाथक औजार दुरुस्त रहत तँ जीवन चलब किछु ने छी। माने आसानीसँ जीवनक गाड़ीकेँ खींच सकै छी। ने खाइ-पीबैक अभाव आ ने नोकरीक दरमाहा-वेतनसँ कम आमदनी पतिकेँ देख सुभद्रा सेहो मने-मन आनन्दित जीवनक अनुभव कइये रहल छेली। मात्र भोजन बनाएबटाकेँ अपन काज सुभद्रा बुझै छैथ। एकटा तेहेन दाइ रखि नेने छैथ, जिनकर संस्कार घरक गारजनीसँ भरल छैन माने परिवारक मुँहपुरुखीसँ। जइक चलैत चंचलिया अपन बेटा-पुतोहुसँ झगड़ा करि नोकरी करै छैथ। ओना, दरमाहाक नामपर जीवने-यापनटा छैन, मुदा से कामेसर बुझि रहला अछि जे अनुमानित जेते वेतन दाइकेँ हेबा चाही तेते हिनका नामपर मासे-मास जमा करैत रहब तँ सालमे एकबेर जे देशाटन करब तइमे हुनको तीर्थाटन करा देबैन। जइसँ एते तँ कहैले हेबे करत जे बेटा-पुतोहु छोड़ि देलकैन तैयो ओ अपना कमाइसँ अन्तिमो समयमे सात गंगाक स्नान सालमे एकबेर करिते छैथ। तइसंग ईहो हएत जे धर्मक नामपर कएल खर्च बेइमानी नहि होइए। सोभावमे जे गारजनी चंचलियाक छेलैन तइमे बेटा-पुतोहुसँ झगड़ा भेला पछाइत किछु मोड़ लेलकैन। मोड़क कारण भेलैन जे अपन परिवार आ दोसर परिवारक बीचक मानसिक दूरी, चंचलियाक मनोभावकेँ कामेसर नीक जकाँ नहि बुझि सकला मुदा सुभद्रा तह तक आँकि लेली। जइसँ अपन बच्चोक सेवा आ परिवारक कपड़ो-लत्ता खींचबसँ लऽ कऽ चुल्हि लगक जरना-काठी धरिक सभ काजक सोल्होअना भार चंचलियाक माथपर लादि देलैन। जइसँ चंचलियाकेँ कखनो ने छुट्टी भेटैन आ ने अपन गारजनीक संस्कार जोर मारैन। अपन बेटी जकाँ सुभद्रा चंचलियाक बनि अपन भार उतारि लेली। ओना, बेटीक प्रति चंचलियाक मनमे अखनो एहेन धारणा बनले छैन जे कमाइ-खटाइवाली जखन बेटी होइए तखन परघर गेने ओ परधन छी, तँए जेते सम्भव हुअए तेते कम सेवाक उपयोग माता-पिताकेँ करक चाही। मुदा ऐठाम ईहो प्रश्न तँ अछिए जे जन्मसँ बिआह धरिक जे बीचक समय अछि, वएह समय बेटीक निर्माणक सेहो छी। माइये ने बेटीकेँ भानस करैक लूरि सिखौथीन आकि पिता। हँ, ओहन स्थितिमे पितो जरूर सिखौथीन, जखन मातृहीन बेटी भऽ जाइए। ओना, परिवारक महजालक जाल ओहन अछिए जे जगह बदैल पिता सेहो बेटीक सेवा करिते छैथ आ सासुर बसलो पछाइत बेटी सेहो माता-पिताक सेवा करिते छैथ। ओना, चंचलियाक मनमे सदिकाल बनल रहिते छैन जे जेकर अन-पानि खाइ-पीबै छिऐ तेकरा जँ एकटा नीक बोल नहि कहबै सेहो केहेन हएत। तँए बेसीकाल चंचलिया सुभद्राकेँ कहल करथिन- "कनियाँ, जिनगीमे आरो की अछि, सुख-भोगसँ जिनगी जीब ली, यएह ने भेल मनुक्खक जिनगी।" ओना, अपना धुनिमे चंचलिया बजै छेली, मुदा सुभद्राक देहमे तेकर प्रभाव नइ पड़ै छेलैन, ओना कनकनी-झनझनी नहि अबै छेलैन, सेहो बात नहियेँ अछि। तथापि सेवाकेँ हृदयसँ सेवा करबैक खियालसँ सुभद्रा नकछोहैन करबे करैथ- "दादी, सभसँ पैघ कुकर्म छी बाल-बच्चा हएब।" 'बाल-बच्चा' सुनि चंचलियाक मन दहैल जाइन। दहलाइत बाजैथ- "कनियाँ, जँ से लोक बुझि कऽ मानत तँ ई दुनियाँ चलत। जे दुनियाँ देखै छी से दुनियाँ रहि भलेँ सकैए मुदा चालि तँ धरत मनुक्खे बुते। अहाँकेँ कोन दुख अछि, भगवान तेहेन कमासुत पति देलैन जे दिन दूना राति चौगुणा होइए, तैपर बाल-बच्चाक सेवा-टहल करैले हमहूँ छीहे तखनो जँ सुख-भोग नहि करब तँ जीवने की भेल।" सुभद्रा अपन पीठपोहू बना मनसँ मनमे रोपि चंचलियाकेँ तेना राखए लगली जे चंचलिया साँझ-भोर अपन बेटा-पुतोहुकेँ दसटा गारिक असीरवाद प्रति दिन दइ छेली। संजोग बनल, पाँच बर्खक बीच सुभद्राकेँ तीन सन्तान, तीनू बेटीए, भऽ गेलैन। सभतरहक सुविधा रहने सुभद्राकेँ अभावी महिलासँ सन्तान जन्मक पीड़ा कम होइ छेलैन। बेटी जन्मक प्रति कामेसरक मनमे कहियो ई नहि उठलैन जे समाजक बीच पढ़ल-लिखल नौजवान युवक हमहूँ छी तँए किए ने नव पीढ़ीकेँ बुझा बेटा-बिआहक लेन-देनक प्रथाकेँ समाप्त करी। नीक कमाइ भेने बेटी बिआहकेँ घरक सामान्य प्रक्रिया कामेसर बुझै छैथ। तँए ई बुझैक खगते की छैन जे सभ कालमे शास्त्र-पुराणक विचार सभ बुझै छिऐ मुदा बिआह आ बिआहक दान-दहेज लइ घड़ीमे सभ किछु बिसैर जाइ छी। जइ समाजमे बेटाक प्रति दहेज लेल पिताक मुँहपर दुतकारनिहार होइ छला, तही समाजमे ओहन लोक माने दुतकारनिहार, अपने अखन मुड़ी गोंति सड़कपर झुटका गनए लगल अछि। यएह छी आजुक समाज। अपन काजमे कामेसर तेना मगन भऽ गेला, माने रमि गेला जे समाजक संग अपन परिवारोकेँ बिसैर गेला। समाजक बीच दान-दहेजक बेवहार देख कामेसर दान-दहेजकेँ समाज चलैक प्रक्रिया, माने सामाजिक चलैन बुझि रहल छैथ। अखन तक कामेसरक जानकारीमे दूटा ट्रेक्टरक जे आमदनी छेलैन तइसँ डेढ़िया-दोबर आमदनी हुअ लगलैन। डेढ़िया-दोबर आमदनी होइक प्रक्रियामे किछु खास-खास परिस्थिति भेटलैन। पहिल ई भेटलैन जे गाम-समाजमे जेते काज अछि ओइ काजकेँ सम्हारने बिना समाज केना ठाढ़ हएत। मुदा समाजो तँ समाज छी। बेकता-बेकती समस्यो अछि आ समाधान करैक रस्तो अछिए। जेते काज करैक माने ट्रेक्टरसँ काज लइक, शक्ति कामेसरकेँ छेलैन, आठ घन्टाक, तइसँ आगू बढ़ि तेरह-चौदह घन्टा काज लिअ लगला। दोसर परिस्थिति कामेसरकेँ ईहो संग देलकैन जे जानकार लोक जकाँ लेन-देन नहि रहलैन। गमैया लोक, गौआँ बुझि आँखि मुनि बिसवास करैत रहलैन। तइसँ ड्राइवरक माध्यमसँ किछु ऊपरी आमदनी सेहो भाइये जाइ छैन। तेसर ईहो परिस्थिति कामेसरकेँ संग देलकैन जे इलाकाक जेतेक ट्रेक्टरबला छैथ, सभक संग लेन-देनक सम्बन्ध सेहो बनि गेलैन, जइसँ नव समाजक रूपमे एकटा नव समाजक निर्माण सेहो भेलैन। जइसँ ऐगला-पैछला कमाइक आशामे लेन-देन सेहो सहयोगी भेलैन। घरसँ सटले, माने कामेसरक घरक सटले, डेढ़ कट्ठाक चौमास, जे बासभूमि सेहो छी, डाकपर चढ़ा कीनि लेलैन। तैसंग गामक बीचमे जे चौबट्टी अछि, तैठाम सेहो कट्ठा भरि जमीन कीनलैन। ओना, कामेसरक मनमे ईहो नचिये रहल छेलैन जे मकान बनौने कारोबार कऽ सकै छी, रहैयोले तँ मकाने चाही, तैसंग ईहो तँ छेलैन्हे जे बैंकेक रूपैआक आमदनी जकाँ आमदनी सेहो अपने औत। खाएर जे किछु कामेसरक मनमे रहल होनि मुदा ईहो तँ बलिहारी देले जा सकैए जे घर लगसँ गामक चौक होइत, तीन कोस हटल बाजारमे सेहो डेढ़ कट्ठा घराड़ी कीनि लेला। तैसंग फूसिघरे किए ने होइ, मुदा घर बना कामेसर अपन परिवारकेँ बजारू जीवन तक सेहो पहुँचेबे केलैन। पाँच सालक बीच जहिना कामेसरक जीवनमे आर्थिक बाढ़ि एलैन तहिना रघुवीरो आ मुनेसरोकेँ भेबे कएल। तेतबे नहि, गामक लोकक बीच श्रमक प्रति आकर्षण सेहो जगबे कएल। -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "गामक जिनगी" लघु कथा संग्रह लेल "विदेह सम्मान- 2011", "गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- "टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011", मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- "वैदेह सम्‍मान- 2012", विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "नै धारैए" उपन्यास लेल "विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014", साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा "कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015", मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- "वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" सम्मान- 2016", रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- "कौमुदी सम्मान- 2017", मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा "स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018", चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध "यात्री चेतना पुरस्कार- 2020", मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा "राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020", भारत सरकार द्वारा "साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021" तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा "अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022"

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २० म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- २० म खेप २० प्रात भेने संयोगसँ नागबाबा घुमैत-फिरैत उतरिबारिटोल पहुँचलाह । उतरिबारिटोल हुनकर जन्मस्थान अछि । तेँ गाहे-बगाहे ओ एतए अबैत रहैथ छथि । एहूठामसँ कैकगोटे हुनकर आश्रममे जानकीधाम जाइत रहैत अछि। गाम एलाक बाद ओ अपन पैतृक घरमे नहि रहैत छथि । पाकड़ीक गाछसँ सटले नागबाबाक सहयोगसँ ओतए मंदिर बनाओल गेल । दछिनबारिटोल लोकसभ ओहि समयमे नागबाबाक सहयोग नहि केने रहथि। संभवतः हुनकर सभक अहं बाधक भए गेल रहए । मुदा नागबाबा ककरोसँ किछु नहि लेलथि । कहाँदनि नागबाबाक एकटा भक्त सभटा खर्च देलकैक । गाम अएलाक बाद नागबाबा ओही मंदिरपर रहैत छलाह। नागबाबाक अबितहि ओहिठाम लोकक करमान लागि गेल । लग-पासमे जे केओ हुनका अबैत देखलक,हुनकर पाछू-पाछू मंदिर धरि चलि आएल । नागबाबा मंदिरपर अएलाक बाद लोकसभसँ हालचाल लैत रहथि कि जयन्त ओतए पहुँचि गेलाह। ओ हुनका साष्टांग प्रणाम केलनि । नागबाबाकेँ जयन्तक सभटा समाचार पता रहनि । "कालीकान्त अहाँक समाचार सुनि बहुत चिंतामे पड़ि गेल छथि । हुनके कहलापर हम गाम अएलहुँ अछि । ओना हमरा केदारनाथ -बद्रीनाथ जएबाक कार्यक्रम छल। मुदा कालीकान्त अड़ि गेलाह । कहए लगलाह- "जयन्त गाममे बहुत झंझटमे पड़ि गेल छथि। हुनका लेने अबिअनु । जानकीधाममे हुनकर बहुत आवश्यकता अछि ।" नागबाबाक बात सुनि जयन्त तुरंत कहैत छथि- "हम अहाँक उपकारकेँ नहि बिसरि सकैत छी । मुदा जन्मभूमिक ॠण के उतारत? पाठशालाक काज जाधरि आगू नहि होएत हमरा शांति नहि भेटि सकैत अछि ।''-जयन्त बजलाह । "अहाँक विचार तँ बहुत उत्तम अछि । मुदा एहिमे सभसँ भाङट तँ अहाँक अपने समाङ कए रहल छथि।"-नागबाबा बजलाह । "आब अहाँ आबिए गेल छी । सभटा सलटि जेतैक । हम तँ निर्णय लए चुकल छी । हमर जीवन तँ एही पाठशालाक हेतु समर्पित अछि आ रहत । आगू ईश्वरक इच्छा ।"-जयन्त बजलाह। "हमसभ जयन्तकेँ संगे छी । पाठशाला अवश्य बनि कए रहत । एहि हेतु हमसभ सर्वस्व त्याग करबाक हेतु तैयार छी।"- उतरिबारि टोलक लोकसभ बाजल । "अहाँ लोकनिक उत्साह प्रशंसनीय थिक । परंतु पाठशाला कोनो एकदिनक चीज नहि अछि । एहि हेतु योज्ञ शिक्षक चाही, प्रतिभाशाली विद्यार्थी चाही आ सभसँ बेसी शांति चाही जाहिसँ शिक्षाक हेतु उचित आ आवश्यक वातावरण रहैक । झंझट-फसाद केलासँ तँ पाठशाला नहि चलि सकैत अछि । -नागबाबा बजलाह। साँझमे पाठशालापर दुनू टोलक लोक जमा रहए । नागबाबा सेहो आबि गेल रहथि । उतरबारिटोलक बच्चासँ बूढ़ धरि पहुँचि गेल रहए । गोविंद आ माधव नागबाबासँ सटले बैसल रहथि। दछिनबारिटोलक लोकसभ सेहो बेराबेरी आबि रहल छलाह। सुधाकर अपन लठैतसभक संगे अबितहि बाजए लगलाह- "नागबाबा पहिने अपन पाप धो लेथि तखन पाठशाला बनबिहथि । "की बाजि रहल छह आ ककरा कहि रहल छहक से होस छह?"-केओ गौंवा बाजल । "तोरा सभकेँ किछु नहि बूझल छह तँ किएक बजैत छह? कोनो जरूरी अछि जे सभ बातमे लारि देबे करी ।"-सुधाकर बाजल। "तूँ अंट-संट बजैत रहबह आ लोक सुनैत रहत, से जमाना गेलैक । आबो जँ नहि सुधरबह तँ ई लठैतक बले कैक दिन चलबह?"-दोसर गौंवा बाजल । "खबरदार! बिना बुझने-सुझने एहि तरहक बात बजबाक परिणाम भोगबाक हेतु सेहो तैयार रहह । कतबो किछु बदलि गेलैक अछि ,मुदा ताहिसँ की?-सुधाकर बाजल । "अहाँ कहए की चाहैत छी, से साफ-साफ किएक नहि बजैत छी जे जिलेबी जकाँ बातकेँ घुमा रहल छी।" "नागबाबापर हत्याक आरोप रहैक । जान बँचाबक हेतु तहिआसँ गामसँ भागि कए बबाजी भए गेल अछि आ सभकेँ ठकने फिरि रहल अछि । "-सुधाकर बाजल । "सत्य कहि रहल छथि, सुधाकर ।"-हुनकर समर्थन करैत लठैत सभ गरजल । "तूँ कोनो थानेदार नहि छह जे नागबाबाक केसक जाँच करबह । नागबाबा एहिगामक प्रतिष्ठित संत छथि आ हमरा लोकनिकेँ ओ निरंतर कल्याण केलनि अछि । हमसभ हुनकर खिलाफमे एकशब्द नहि सुनि सकैत छी।-गोविंद बाजल । वाद-विवाद बढ़ैत देखि नागबाबा हस्तक्षेप करैत बजलाह- "हम जे छी, नहि छी ताहि लेल ककरो परेसान रहबाक प्रयोजन नहि अछि, ने हमरा ककरो प्रमाणपत्र चाही। मुदा ई स्पष्ट करू जे अहाँ जयन्तक पाछू किएक पड़ल रहैत छिअनि । ओ अपन पैतृक जगह पर पाठशाला बनाबए चाहैत छथि तँ अहाँकेँ एहिमे की परेसानी अछि? दोसर बात जे रातिमे अहाँक लठैतसभ हुनका लग की करए गेल रहए? एतबे नहि -जानकीधाममे सेहो इएहसभ पहुँचल रहथि आ हुनकर शोधग्रंथकेँ चोरबएमे लागल रहथि । जँ हम कालीकान्तकेँ नहि मनबितिअनि तँ एकरासभकेँ फाँसी भेल रहैत।"-नागबाबा बजलाह । "ओकरासभकेँ जखन जे हेतैक नहि हेतैक, मुदा तोरा तँ अखने थानामे बंद कएल जेतह । देखहक सामने दिस । पुलिस आबि रहल अछि ।"-सुधाकर बजलाह । बात सही रहैक । एक दर्जन पुलिस जीपमे पाठशाला दिस आबि रहल छल । पुलिसकेँ अबैत देखितहि ओतए पड़ाहि लागि गेल । दछिनबारिटोलक लोकसभ इएह-ले ओएह-ले भागल । मुदा उतरबारिटोलक लोकसभ टस सँ मस नहि भेल । पुलिस आएल जरूर, मुदा ओ तँ अबितहि नागबाबाकेँ दंडवत प्रणाम केलक । चारू लठैत आ सुधाकरकेँ गट्टा धेलक आ अपना संगे जीपपर बैसा कए थाना लेने चलि गेल । बैसारमे जोरसँ नारा लागल- "नागबाबाक जय!"

-रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.डॉ किशन कारीगर- मैथिली साहित्य मे सोलकन साहित्यकार सब के असलियत डाॅ. किशन कारीगर मैथिली साहित्य मे सोलकन साहित्यकार सब के असलियत मैथिली साहित्य मे सोलकन साहित्यकार सब के मोजरे की हई? कुछो ने. नै कोनो सम्मान बात आ नै दै जाई हइ कोनो साहित्यिक आयोजन सब मे हकार. हं जे सोलकन सब बाभन लाॅबी के पिछलगुआ भरिया बनल रहलै आ अखनीयो छेबो करै तकरा अरू के त बलू हकारे हकार रहै हइ. आ उहे पिछलगुआ होहकारी सब कभी मैथिली साहित्यक गिरोहवादी दलाल सबहक बिरोध नै करत. ओकरा अरू के कोनो साहित्यिक मंच बनबै ले कहियौ त एतेक ने बहन्ना बोलत जे हमरा छुट्टी नै यै त के अइ फेर सब मे पड़त कनी धैरज राखू पुरूस्कारक बिरोध नै करियौ नाना प्रकारे मनोबल तोड़बाक प्रयास करत जहिना बाभनवाद लाौबी वला सब सोलकन साहित्यकार के योजना बना आगू नै बढ़ै देत ओहिना इ पिछलगुआ सोलकन साहित्यकार सब सोलकने के आगू नै बढाउत आ ने बढअ देत. हँ पिछलगुआपनी क जी हजूरी मानक भैज के एकरा अरू के अप्पन पेट भरक चाही.

मैथिली साहित्य मे दू तरहक साहित्यकार सब यै. पहिलुका 1. अप्पन माई के बोली छोड़ मैथिली मानक भजै गबै मे बेहाल. किए त तबे वाभन लाॅबी मठाधीश सब कनी मनी एकरा सबके मोजर देतै. 2. साहित्यिक आयोजन सब मे हकार भेटै लोभे आ कनि मनी रचना छपै लोभे मैथिल मठाधीश सबहक गुलामी करब. किए त सबटा साहित्यिक मंच संस्था बाभने सब बनौने छै आ सब ठाम ओकरे कब्जा हई. 3. कहियो मैथिली साहित्य के कुकृत्यक बिरोध नै करै जेतै. एना करला पर त मैथिली मंच एकरा सबके बाईर देतै आ रस्ता रोकने रहतै. 4. पुरूस्कार पाग लोभे मैथिली लौबी के चरणवंदन करत ओहिना जेना बाघ सबटा माउस खा थोड़बू हड्डी गुड्डी माउस नरहिया लै छोड़ देलक. 5.कभीयो सोलकन साहित्यकार के मंच निर्माण करै लै नै सोचत. 6. कोनो साहित्यिक आयोजन वा लौबी बिरोध बेर मे चोरनुकबा बनल निपत्ता रहै जाएत आ उनटे उपदेश देत जे मैथिली साहित्य मे ओहिना होइत आबि रहलै. की करबै लै. 7. सोलकन साहित्यकार सबके मोजर दियाबै लै कोनो प्रयास जतन नै करत. हं पिछलगुआपनी अपन नाम मोजर लै अबस्से हो हो मे रहत. 8. केकरो उपेक्षा भेला होला पर कोनो अवाज नै उठाउत नै बिरोध केला पर फेर ओकरे नाम छंटा जेतै. 9. पाग मंच लोभे अप्पन मूल संस्कृति आ विध वेबहार छोड़ बभनौटी धारण क सोलकने के नाम हंसारत करत आ अपना के खूब काबिल आ मातृभाषा प्रेमी कहाउत. 10. मैथिली मानक भैज गाइब दाउ सुताइर मैथिली लाॅबी के चमचै करब आ साहित्यकार हेबाक गुमाने चूर रबह. किए त सोलकन के अप्पन साहित्यिक मंच पत्र पत्रिका सब छै ने सबटा बाभनक अधीन.

दोसर तरहक 1. सोलकन साहित्यकार सब में थोड़ बहुत संघर्ष करै वला साहित्यकार सब यै जे मंच निर्माण करै लै प्रयास त करैए लेकिन तेहेन मानसिक आर्थिक सहजोग नै भेटलै. तइयो बाभन लाॅबी सबहक षड्यन्त्रक विरोध क गाइर फज्जिहत सबटा सहै लै वेबश रहैए. 2. एकरा सबके मान सम्मान क फिकीर रहै छै आ कोनो लौबी मठाधीशक चक्कर चाइल मे नै फंसैए. 3.सोलकन साहित्यकार सबके जगेबाक प्रयास करैये लेकिन सफलता नै मिललै. 4. ई संघर्षशील सोलकन साहित्यकार सब समावेशी मैथिली लै प्रयास करै जाईए लेकिन पिछलगुआ सोलकन आ अगुआ बाभन गैंग एकरा सबके मनोबल तोड़ै मे रहैए. 5. सुप्पत गप बजै आ मैथिली लौबी के वाजिब बिरोध कारणे ई सब हरदम बारले रहैइए. 6. मिथिला मैथिली मे नव सुधार नव बिचार लै संघर्ष करैत रहलै यै. 7. समावेशी मैथिली लै कतेको लोहा लड़ाई लड़ब बेमतलबो उपहासक पात्र बनब तइयो मैथिली साहित्य कार्यक्रम सबमे जरूरी सुधार लै अवाज उठबैत रहल. 8. सोलकन साहित्य मंच के निर्माण लै जरूरी काज करै मे लागल रहत. लेकिन सोलकन सहजोगक घोर अभाव सहत. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा १ लाल भौजी पैछला अड़तालिस बर्खक सभ रेकार्ड घ्वस्त करैत ऐ बेरक जाड़ पाछाँ छोड़ि देलक। कहबी छै जाड़ मासमे रुइये आकि दुइए मुदा रुइ ततैक महग जे बेसाहब कठिन। जँ दाम पुछबै तँ माधो मास सौंसे देह पसीनासँ तर-बत्तर भऽ जाएत। जहाँ धरि दुइयेक स्ट अबैत अछि तँ ई सुख प्रायः सबहक कपारमे लिखले नै अछि। जँ कियो किशोरावस्थाक बालक-बालिका छैथ‍ तँ राति सपनाइते बितैत छैन‍, आ बुड़हा-बुड़हीक तँ कथे नै पुछू किएक तँ आइ ने ओ बुढ़ भेलाहेँ मुदा एहेन केतेको जाड़ कऽ ओ लोकैन देखने छैथ‍ आ खेपने छैथ‍। तँए फलक रूपमे केराक घोड़ जकाँ हथ्थे-हत्थाक असथानपर गन्डाक-गन्डा धिया-पुता सोहरल छैन। बाल-बच्चाक समर्थ रहबाक कारणे ओकरा सभकेँ तँ अपने खाए-खेलाएसँ पलखैत नहि। तहूपर सँ जँ कोनो पाहुन-परख चल आबैथ तँ घरक र्स्‍वथा अभावे। सभ घरकेँ बेटा-पुतोहु अलगे छेकने। तँए बुढ़ा- बुड़ही लेल तँ माघ मासक जाड़ प्राणक हार बनल रहैत छैन‍। कोनो तेहन अवसरे नै भेट पबै छैन‍‍ जे समय सँ ओइ कहबीसँ किछु लाभ उठबैथ। तँए ओमहर बुड़ही कोनेा कोन मे धोकरी लगा पुआर मे धोंसिआइल रहैत छैथ‍। आ एमहर बुड़हा दलानक कोनो केानमे पोता पोतीक संग जाड़सँ सर्घष करैत रहैत छैथ‍। कोनो तरहेँ दुनू परानी (बुड़हा-बुड़ही) राति खेपक लेल मजबुर। मुदा से केते दिन धरि? एक दिन मौका पाबि़ बुढ़ा बुड़हीकेँ हाक दइ छथिन- "सुनै छै हाथ-पएर जाड़े ठिठुरि रहल अछि, कनी कोनो मालीमे लहसुन तेल पका कऽ लेने आबो तँ। बुड़ही आँगनेसँ उतारा दैत छथिन हँ हँ सुनै छिऐ एते जोरसँ किए हाक दइ छै, कोनो की हम बहीर छी? लेने आबै छिऐ। ताबे माले घरमे आगि तापो। बुड़हा पुनः बाजि उठैत छैथ‍- "हे जल्दी सँ औते हम माले घरमे छी।" बुड़ही करीब दस मिनटक बाद मालीमे लहसुन तेल पका दुरुखे सँ हाक दइ छथिन- "केतए छै हइया लौ।" बुड़हा फेरि बाजि उठैत छैथ‍- "एम्हरे लेने आबो ने हइया छिऐ।" बुड़ही लग अबैत बाजि उठैत छैथ‍- "ई किछो नै बुझै छै? जे बेटी-पुतोहुबला अँगना-घर भेलइ। सुतौ तेल लगा दैत छिऐ।" बुड़हा पुआरक बिछौनपर ओंघरा जाइ छैथ‍ आ बुड़ही तेलक मालीश करए लगै छथिन। कनी कालक बाद बुढ़ा तेल लगबैत गरमा जाइ छैथ‍। प्रेमसँ बुड़हीकेँ पुछै छथिन- "भानस भातमे देरी छै की? बच्चा सभकेँ अँगना दऽ आबौ खा पी कऽ सुइत रहतै आ ई एत्ते आगि तापो।" बुड़ही आँगन जा धिया-पुताकेँ पुतोहु सभकेँ दैत अपने बुड़हा लग आबि जाइ छैथ‍ आ मालक घरमे पजरल घुरा लग बैस आगि तापए लगैत छैथ‍। दुनू परानीक गप-सप्प करैत बुड़हा हाथ-पएर सुग-बुगबए लगैत छैथ‍। आ अपन दहिना हाथ बुड़हीक बामा... हाथ दैत बाजि उठैत छैथ‍ एकरा एक्को रत्ती कोनो बातक धियान नै रहै छइ। कहौ तँ केतेक जाड़ होइत छै... कहैत बुड़हीकेँ पाँजमे उठा आ पुआरक बिछौनपर ओंघरा जाइ छैथ‍। कनीए जा कि लट्टा-पटी होइत आकि तखने आँगनसँ पोता-पोती खा कऽ सुतैले बाबा किलोल करैत मालक घर दिस दौड़ पड़ैत अछि। बुड़ही बाजि उठैत छैथ‍- "छोड़ौ ने, छोड़ौ धिया-पुता सभ आबि रहल छइ।" आ दुनू परानी माने बुड़हा-बुड़ही एक-दोसरासँ धड़फड़ा कऽ अलग भऽ जाइ छैथ‍। रहल जबान-जुआनक गप, जबानीक धाह पाबि जाड़ो गरमाएले रहैत अछि। बुझू तँ दू परानी जबान-जुआन होथि आ ऊपरमे रजाइ परल हो तँ जाड़ोकेँ जाड़मे पसीना छुटए लगैत छइ। मुदा प्रकृति तँ स्थिर रहत नहि। ओ तँ अपना कालक्रमे चलैत रहत। बितल जाड़ मास आएल सरस्वती पूजा उड़ए लगल वातावरणमे रंग-अबीर चारू कात डारि-पातपर चीड़ै-चुनमुनी चहकए लगल। कोइली धिया-पुताकेँ मुँह दुसब शुरू कऽ देलक। आमक गाछ मंजरसँ महमह करए लगल। मुनगा फूल धरए लगल, राइ, तोड़ी, तीसी आ सेरसोमे पीअर-पीअर फूल सेहो लहलहाए लगल। वातावरण किछु दोसरे रंगक भऽ गेल। चारूकात महमह करैत। कथा-कुटमैती शुरु भऽ गेल। कथकिया सभ ठाम-ठाम जाए-आबए लगला। कथा फरिछेला उत्तर लाल-पीअर धोती आ तैपर लाठी हूरबला लाल-लाल ठप्पा अपन मैथिल सभ्यताक परिचए दिअ लगल। नेना-भुटका सभ फगुनहैट गीत गाबए लगल- "यै बड़की भौजी, करियौ बिचार, केते दिन रहबै आब हम कुमार दैखैत देखैत हमरा ई भऽ गेलै अहाँ बहिनसँ हमरा लभ भऽ गेलै..."। हरबाहो-चरबाहो सभ फगुआसँ सम्बन्धित मैथिली आ भोजपुरी गीत गाबए लगल। बाध-बोनमे मालो-महींस चराबए आ घर-घसबहिनीकेँ देखैत ई गीत गाबए- "तोहर लहंगा उठा देव रीमौटसँ...।" घसबहिनी सभ सेहो उत्तारा देनाइ नै बिसराए ओहो सभ गाबए ई गीत- "रओ छोड़ा बज्जर खसतो...।" बुझू जे जाड़क खुमारी लोक सभ फागुनेमे उताड़ए चाहैत। जिनका परिवारमे नव बिआह भेल रहैन, बुझू तँ हुनकर छओ आँगुर घीएमे आखिर ऐ समयसँ भला गोधनपुर गामक रामदेव बाबूक छोटका बचबा उगन किएक ने लाभ उठैबतैथ। किएक तँ एहीबेर बाइस दिसम्बर 2009 इस्‍वीमे हुनक अग्रज दुर्गानन्दजीक बिआह दरभंगा जिलाक बरुआरा गाममे सम्पन्न भेल छेलैन। तँए भैयासँ तँ डर जरुर रहैन मुदा नवकि कनियाँ अर्थात लाल भौजीसँ खूब रंग-रभस होइ छेलैन। उगनक भौजी सेहो करीब एक्कैस बर्खक छेली। बीस बसन्त तँ सुखले-साखले बितौलैन मुदा एक्कैसम बंसन्त बुझू जे ओ तँ रससँ उगडुम करै छेली। बेस पाँच हाथ नमहर-छड़गर, देहो दशा बेस भरल-पूरल गाल तँ बुझू हाइ ब्रीड टमाटर जकाँ लाल टरैस आ बेस गुदगर। आँखि एहेन कटगर जे जेकरा दिस एक बेर ताकि देथिन तँ बुझू सोनित एक्को ठोप नै खसैत मुदा ओ बेचारे घाएल भऽ जाइत। हुनकर जुट्टी तँ बुझू सुच्चा गहुमन साँप जकाँ फूफकार छौड़ै छेलैन। नव विवाहित भेलाक कारणे सदिखन भरि बाँहि चुड़ी आ भरि हाथ मेहदी, आरतसँ रंगल पएर, भरि आँखि काजर आ भरि माङ सेनुर लाल टुहटुह करैत। कियो जँ धोखोसँ देखैत तँ आँखि चोन्हरा जाइत। सभसँ सुन्दर हुनक वस्त्राभुषणक पहिरब आ ओढ़ब छैन‍। एक तँ गोरि-नारि तैपर सँ सुगा पंखी रंगक साड़ी आ बेलाउज आ ओहीक तरमे उज्जर धप-धप करैत ब्रेसिअर जे पहिरैथ ओकर उज्जरका फिता, से देख उगनकेँ तँ मौगति भऽ जाइ छेलैन। ओ मने-मन बिचारैथ जे ऐबेर फगुआमे लाल भौजीकेँ सभ तरहेँ लाल कऽ कए देबैन। दिन बितैत कोनो कि देरी लगैत छइ। संयोग एहेन जे ऐबेर फगुओ पहिले मार्चमे छल। जेना-जेना फगुआ लगिचाइल जाए उगनक मना तेना-तेना लाल भौजीक जुआनीसँ बौराइल जाइ छेलैन। फगुआसँ एक दिन पहिने उगन दरभंगा अपना डिपटीपर सँ गाम अबैत छैथ‍। किलो दुइ मधुर नेने किलो एक अंगुर, आसेर काजू आ दू पैकेट किशमीस आ चारि-चारि पैकेट हरियर लाल रंग सेहो हाथमे टंगने आएल संग-संग दू शीशी रम सेहो नेने आएल। पीठपर एम.आर. बला बैग। उगन आँगनसँ स‍सैर ओसारपर जाइ छैथ‍ आ ओतैसँ हाक दइ छथिन- "भौजी, यै लाल भौजी केतए गेलौं, आउ-आउ लग आउ हम छी उगन।" लाल भौजी पलंगपर सँ उठि बाहर अबैत छैथ‍। तात उगन पीठपरक बैग निचाँ राखि एक हाथे मधुरक पैकेट लाल भौजीक हाथमे दैत आ दहिना हाथमे पहिनेसँ धोरल लाल रंग लाल भौजीक बामा गालपर लगबैत आ दहिना गालमे चुम्मा लइत बाजि उठैत छैथ‍- "अधला नै मानब फगुआ छी। भौजी यै भौजी आब कहू मन केहन लगैए?" लाल भौजी चौबनियाँ मुस्की दैत बाजलि- "धूर जाउ, हमरा अहाँक ई चालि नै सोहाइए।" बाजि लाल भौजी अपना पलंगपर चलि जाइ छैथ‍। आ उगन अपन कोठलीमे। राति भरि उगनक आँखिमे नीन नै भेल। सुतलियो रातिमे रहि-रहि मोन पड़ि उठैत छैन‍ भौजी, लाल भौजी...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा २ डाक्टर कर्मवीर

मोन पड़ैत अछि 6 जून 2003। जहि दिन तय ई छल जे भारतक प्रधानमंत्री मिथिलांचलक घरती निरमली (जे सभ तरहेँ, सभ दृष्टिकोणसँ सभ मामलामे किछु बेसीए पिछड़ल अछि) औता। आ कोसीमे बनऽ बला रेल पुलक शिलान्यास करता। जेठक दुपहरिया, सभठाम लोक सभ गर्मी-गुमाड़सँ अफसियात, सबहक देह धामे-पसीने तर-बतर मुदा सभ कियो मंत्रीजीकेँ देखबाक लेल ओतबे हरो-हरान, ओतबे फिरिशान। एहेन बुझना जाइ छल जे खेत-पथाड़, बाध-बोनसँ आग उठि रहल अछि, सड़कपर धुरा-विड़ोक रूप लैत, सन-सन सन-सन हवा आ लू चलैत। तखनो ओइ दिन परोपट्टाक लोक सबहक उजाहि उठल, सगर बाजार, बाजारक चारूकातक, जे पूर्णरुपेण अतिक्रमित छल, प्रशासनक चुस्ती-दुरुस्तीसँ एकदम साफ-सुथड़ा। एना, जेना ऐना झक-झक करैत। खूब प्रचार-प्रसार भेल, जगह-जगह पर्चा-पोस्टर साटल गेल, उदेस अधिकसँ अधिक लोक आबि मंत्रीजीक भाषणसँ लाभ उठाबैथ। ओइ दिनक रौदो एहेन बुझना जाइ छल जेना छाहैरो रौद आ गर्मीसँ फिरिशान भऽ केतौ छाहैर ताकि रहल अछि। किछुए काल पछाइत‍‍ एहेन बुझना गेल जे चारूकातक वाट कौलेजेक फिल्ड दिस मुड़ि गेल हो जैठाम मंत्रीजीक प्रोग्राम तय छल। जेम्हरे ताकू मुड़ीए-मुड़ी, कपारे-कपार, लोकहिपर लोक, लोकक मुड़ी छोड़ि आर किछु नहि। सभ एक दोसराकेँ धकियबैत, आगू बढ़बाक अथक प्रयास करैत, किछु सफलो भेला, आ असफल बेसी। साँझ पड़ैत-पड़ैत लोकक लेल गदमिशान उठऽ लगल। जे जेतै रहैथ से ओतै रहि गेला। एको मिशिया-आगू या पाछु हेबाक साहस नै कऽ सकला। एतबेमे सबहक आँखि अकाशमे हहाइत किदुनपर पड़लै। किदुन तँ बढ़-बढ़िया नाओं छै ओकर। किदुन तँ कहै छै हँ-हँ मोन पड़ल हेली-कोप्टर। सभसँ पहिने उतरला सेनाक जवान पछाइत‍‍ प्रधान मंत्रीजी, जोर-जोरसँ हल्ला होमय लगल- "इन्कलाव जिन्दावाद!" "जिन्दावाद-जिन्दावाद।" "आज का नेता कैसा हो?" ... जैसा हो।" तत्पश्चात शुरु भेल भाषण-भूषणक कार्यक्रम सभ कियो कान पोति सुनऽ लगला- बीच-बीचमे फेरि वएह नारावाजी। इन्कलाव-जिन्दावाद। जिन्दावाद-जिन्दावाद।। ऐ तरहेँ ऐ सबहक मध्य भाषणक कर्यक्रम समाप्त भेल। सभ अपन-अपन घरक बाट धेलैन। हुनके सबहक संग हमहूँ अपन वासापर एलौं। हाथ-पैर धोइत जाकि खुरसीपर बैसलौं देखै छी एकटा बेकती हमर अता-पता पुछैत अबैत छैथ‍ आ अपन परिचए ऐ तरहेँ दैत छैथ‍- श्रीमान् सम्भवतः अपने हमरा नै चिन्ह सकलौं! हम कनी अकचकाइत पुछलयैन, से की? अपने पहिने बैसल तँ जाउ, सामने राखल ब्रेन्‍चपर बैसते ओ बजला- "हम छी कर्मवीर।" एतबे सुनिते करेज सूप-सन चाकर भऽ गेल। हृदए आनन्दातिरेकसँ झुमि उठल। नै जानि किएक आँखिसँ दू ठोप नोर खसि पड़ल। ओ बजला- "श्रीमान् अपने कनैत किएक छी? हम कहलयैन‍- "तो नै बुझबहक। तोरा देखते हम अपने आपकेँ नै रोकि सकलौं, आ ई नोर तँ खुशीक अछि। आई एहेन सौभाग्य जे पाहुन बनि ऐठाम एलह, अहो भाग्य हमर। ओ तँ अबाक। किछु नै बजला, बजला किछु कालक पश्चात जे- "श्रीमान् हमरा चरिबजिया गाड़ी छुटि गेल। हम आइ अपने ऐठाम रहब आ भोजनो करब। सुनिते हर्ष भेल जे कर्मवीर कमे उमेर मे एतेक स्पष्टवादी, सभ किछु खोंइलचा छोड़ा कऽ बजनिहार, जे चाहे अहाँकेँ कष्ट हुअए वा खुशी। कनेक काल पछाइत‍‍ हमरा लोकैन चाह-पान करऽ लेल चौक दिस विदा भेलौं। गामक चौक। बड़कीटा पाखरीक गाछ चारूकात चबुतरासँ घेरल। गामक अधिकांश लोक चाह-पान पीबाक लेल साँझ-परात ओते आबैथ। बगलमे छल फुसियाही दूसाधक धान-गहुम पीसऽ बला मीशील, आ घोघना मियांक कोटाक दोकान। सटले छल मुनेसराक कनीयेँटा नोन-तेलक दोकान। आ बगलेमे छल रामा मुखियाक मुरही, कचड़ी, मटर, घुघनी आ इचना माछक चखना बला एकचारी देल दोकान। दसे डेग हटि कऽ छल अगहनियाँ पसीनीयाँक ताड़ीक दोकान, जैठाम दर्जनो घैल ताड़ीसँ भरल, पूब मुहेँ राखल आ घैलसँ बहरा रहल छल जे बुलबुला, बुलबुला-बुलबुलाकेँ स‍सैर घैलक पेन तरमे राखल बीरबापर खसैत छल। किछु पीयाकक आगूमे राखल छेलै दू बेचाही ताड़ी, मुरही, कचड़ी आ इचना माछक चखना। लोक सभ ताड़ी पीब झुमय, मने मस्त छेलै सबहक आ समवेग स्वरमे गबैत छल ई गीत- "ताड़ीवाली ताड़ी पी आ दऽ... ताड़ बला ताड़ी दऽ खजूर बला कम... ताड़ीवाली ताड़ी पिआ दऽ। दृश्ये छल लाजवाब! सभ किछु देखैत हमरा लोकैन पहुँचलौं ठको कक्काक चाहक दोकानपर। एकेटा चाहक दोकान आ ढ़ेर रास लोक चाह पीबिनिहार। पाखरीक गाछक चबुतरापर बैसेत हम हाक देल- "ठको काका दू कप चाह हमरो सभकेँ दिहह.. करीब दस मिनटक बाद‍ ठको काका डंटी विहीन कप, जे कोरोपर कनी फुटले छेलै नेने आएल चाह। एह चाह तँ चाह छल! महींसक दूधक अगब चाह, एको ठोप पानिक छुति नहि, मीठगरो तेतबे, ठोरमे ठोर सटऽ बला चाह। अर्थात् चाहक चाह। चाह पीब कैंचा दऽ हमरा लोकैन बढ़लौं बौआ कक्काक पान दोकान दिस। लग पहुँचैत कहलयैन- "गोड़ लगै छी काका कनी दू सीक्की पान देब"। कठघारामे बैसल बौआ काका पुछलैन- "हौउ नीके छह किने? बहुत दिनक बाद देखलियह, कहह कोना की हालचाल छह अरविन्दक आ घौलुक?" पुछैत पान लगबए लगला। "हँ काका सभ अहाँ सबहक असीरवाद छी। सभ कियो नीके -सुखे छी।" बौआ काका पान लगा आगाँ बढ़ौलैन। हमरा लोकैन पानक आनन्द लेबए लगलौं। पानो तेतबे सुअदगर। किएक तँ शुद्ध देशी पान छल। तहूमे बेरमा बरैबक। एक तँ मिथिला दोसर मैथिल ऊपरसँ बेरमा बरैबक पान, बौआ कक्काक लगौल। अपूर्व! गप-सप्पक क्रमे लोक सभसँ भेँट भेल, कुशल- छेम सभ एक-दोसराक हाल चाल पुछैत सभसँ कर्मवीरक परिचए करौलयैन‍। नै जानि जे हिनकामे कोन एहेन गुण छेलै जे जिनकेसँ परिचए करबयैन सभ हुनकासँ प्रभावित भऽ जाइथ। अकाइन नै सकलौं जे कर्मवीरक मनमे कोन कल्पना जन्म लऽ रहल छेलइ। ओ तँ जेकरा हम कल्पना मात्र बुझै छेलौं से तँ साकार करक प्रवल सम्‍भावना लैत राति खेबाक काल बजला...। दुनू गोटाक आगूमे दूटा थारी राखल छल, जइमे कनीयेँटा कटोरी, आ कटोरीमे घीड़ाक तीमन खेड़हीक दालि देल, दू फॉक पियाजु आ नान्हियेटा टुकड़ी छल अचाड़क, आर छल काँच मेरचाई एक-एक प्रति, प्रति थाड़ीमे। लोटा आ गिलास जलसँ भरल छल, आ दुनू गोरे बैसल रही खेबाक लेल, तेतबेमे अरविन्द आ घोलू दुनू बौआ टीशन पढ़ि कऽ आएल। कर्मवीरजीकेँ गोड़ लागि असीरवाद लऽ अपन-अपन छिपलीमे रोटी लऽ खैए लगला। भोजनक क्रमे किछु काल धरि गुम्म-सुम्म रहला पछाइत‍‍ कर्मवीरजी बजला- "श्रीमान् मन होइत अछि जे जँ अपने आदेश दी तँ हमहूँ एकटा क्लीनिक खोलि प्रैक्टिस करितौं। सुनि मन हर्ष भेल जे हिनकामे किछु करबाक उत्साह छैन‍। आ गामक प्रति एतेक सिनेह जे केतौ आन ठाम नै जा कए गामेमे सेवा करता। नै तँ प्रायः परदेश खटऽ बलाक तँ उजाहि उठल छइ। एहेन सन बुझना जाइत जे सभ सुख परदेशेमे छै! मुदा ई तँ हमरा लोकैनक धोखा छी धोखा! हम कहए चाहै छी जे जँ देहमे खुन अछि तँ गामोमे कियो भुखे नै रहता। एक तँ साधारणो मजुरी 80 टाकासँ 150 टाका धरि अछि, तहूपर जन-मजदूरक अभावे। दस दिन खुशामद करियौ तखन एक दिन आबि काज कए देत। ओतबे नै माए-बाप, भाय-भौजाइ, पर-परिवार बाल-बच्चाक संग रहबाक सुख केतए पएब गामेमे ने? आकि परदेशमे? उत्तर एकेटा भेटत- गामेमे, तखन अहीं सभ कहूँ जे परदेश खटबै कथी लेल? की ऐ लेल जे अबै काल सनेशमे एड्स लेने आएब। हम तँ सप्पत दऽ कहह चाहै छी, जे गामक माटि-पानि आ थाल-कादोमे सभ सुख अछि। कोनो गामसँ चिक्कन अप्पन गाम, आ कोनो धामसँ चिक्कन मिथिलाधाम। अहूँ सभ अप्पन-अप्पन करेजपर हाथ राखि कहू जे हम फुसि कहै छी? आब प्रश्‍न ई उठैत अछि जे जखन सभ कियो परदेशे खटबै तखन गामक विकाश हेते कोना? मुदा कर्मवीरजीमे हमरा भेटल जे ओ गामेमे रहि गामक आ समाजक विकाश करबाक भावना हुनका हृदैमे हिलकोर मारि रहल छल। मन गद-गद भऽ उठल। आर किछु काल गप-सप्प करैत हमरा लोकैन सुति रहलौ। प्रातः किछु गोटा (मेडिकल लाईनसँ जुड़ल) सँ भेँट करौलयैन‍, तत्पश्चात एकटा नीक दिन तका हिनक क्लिनिकक उद्धाटन सम्पन भेल। जीवनक दोसर रूप संधर्ष होयत छइ। मुदा तइसँ कर्मवीरजी धबरेला नै बल्‍कि जीवनक लेल संधर्ष करए लगला। से तइ तरहेँ जे काल्हुक कारी झामड़ सूखल-साखल देह, पिचकल-पुचकल गाल, धसल- धसल आँखि पेट पाँजरमे सटल खपटासन, कोनो पहिरलहे पेन्ट आ शर्ट पहिर पुराने-धुराने जूता आ चप्पलसँ समय खैपऽ बला, जीवनकेँ एतेक लगसँ देखऽ बला कर्मवीर, हमरा आइओ हुनक ई बात मोन पडै़त अछि जे ओ पुछने रहैथ- "श्रीमान् की अपने कहियो राति भरि भुखले सूतल छी? माथमे नै घुसल ई बात जे हुनक प्रश्‍नक भाव की छैन‍? मुदा सत बात तँ ई छल जे ओ काल्हुक राति उपासे रहला, भुखले सुति रहला। भरि राति धरि निन्न नै भेलैन, कोनो तरहे कछमछा केँ राति बितौलैन‍। प्रातः भेँट भेलापर हुनक धसल आँखि आ भुखल पेट हमरा किछु पुछि रहल छल। मुदा हम छेलौं निःशब्द। काल क्रमे समैक संग मेहनत रंग देखौलक। रोगी सभ आबए लगलैन, भगवती जस लगबैत गेलखिन। गुजर-बसर करए लगला तँ पत्नियोकेँ लए अनलैन आ आनन्दसँ रहए लगला। भोला बाबाक कृपासँ दिन दूना आ राति चौगुना आमदनी होमय लगलैन। आइ ओ दस धूर जमीन लए घर बना बाल-बच्चाक संग हँसी-खुशीसँ छैथ‍। एकटा सफल बेकतीक रूपमे आ सफल डाक्टरक रूपमे। डाक्टर कर्मवीर। कहियो कताल हमरो हुनका घरपर जेबाक मौका लगैत अछि। एक डिब्बा बटर-बेक बिस्कुटक संग। डाक्टर साहैबक दुनू बच्चा निछोह दौड़ल अबैत अछि ऐ अवाजक संग मम्मी-मम्मी अंकलजी आए- अंकलजी आए। तात घरसँ बहार होइ छैथ‍ डाक्टर साहैबक पत्नी-पुनम, जेहने नाओं-तेहने पुनमक चाँन सन मुँह। आँखि चोन्हिआ जाइत अछि। बेस पाँच हाथ ऊँच! देहो दशा खूब भरल-पूरल। कनेक श्याम रंग, कलकत्तिया आमक फारा सन-सन आँखि, बादामी नाक, औंठिया केश कारी भौर, दुनू कात जुट्टी गुहल आ तइ जुट्टीकेँ धुमा कऽ खोपा बन्हने, कसल-कसल वाँहि, आ पाकल तिलकोरक फड़ सन दुनू ठोर। जतबे देखऽ मे सुन्दर, तेतबे मीठ-मीठ बोल। नमहर-नमहर हाथ आ दुनू हाथमे रहैन भरि-भरि हाथ चुड़ी। हाथक आँगुरमे बेस कीमती पाथड़क औंठी। सुगा पंखी रंगक ब्लाउज आ साड़ी पहिरने, माथपर साड़ी लैत, आँचर सम्हारि दुनू हाथ जोड़ि, पएर छुबि गोड़ लगैत छैथ‍। सौभाग्यवती भवः असीरवाद दैत आँखि नोड़ा जाइत अछि। मोन पड़ैत छैथ‍ डाक्टर कर्मवीर छह फीट छह इन्‍ची ऊँच, भरल-पूरल देह, मोती जकाँ झलकैत दाँत, क्लीन सेभ, कनेक बहराएल पेट आ हँसैत ई अभिवादन- "प्रणाम श्रीमान् कुशल छी किने? अन्तर स्पष्ट भए जाइत अछि कौल्हुका कर्मवीर- आजुक डाक्टर कर्मवीर। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१६.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा ३ किसनामुट्ठी

मरनी भिनसुरके पहर बेलाराही चौरीसँ एक गैलन काकोड़ बीछि अनने रहए। मेला-ठेलाक समय रहै तैं, कोठीसँ दू मुजेला काटू निकालि अँगनामे सुखैले देलकै। ओकर बाद नहा-सोनाह आ खाए कऽ सुतैले खेन्हरा लऽ डेढ़ियापर चल गेल। पुरबा हलफी दैत छेलै, निन्न टुटलै। आँखि मिड़ते उठल आ हाँइ-हाँइ कऽ काँटू डेंगाबए लगल। डेंगा-ठठा लेलाक बाद सुपसँ फटैक‍ माएक तहवनमे बान्हि माएसँ नुका कऽ धऽ आएल कोठिक दोगमे। झल अन्हार भेलै तँ भगबत्ता दोकानसँ बेच अनलक। तीन सेर भेलइ। आठ अने दरसँ डेढ़ गो टाका भेलइ। ओ भगवतेसँ कहि सुनि कऽ चारि गो चौबन्नी आ दू गो अठन्नी भजोखा लऽ चुपे-चाप आँगन चल गेली। विहान भेने मेला छेलै 'किसना मुट्ठी'। मरनी तरे-तर हिसाब लगोने जे चारि-चारि आना पाइ दुनू छोटकी बहिन अभेलिया आ सुगियाकेँ देबइ। चारि आनामे बौआले एकटा कठपुतरी किन लेब आ एकटा फूका। चारि आनाक कचौरी आ चप कीनि लेब। ओकर तँ मने छेलै चप-चप। आठ आनामे एकटा अलता आ फीता लऽ लेब। घुरती काल आठ आनाक जिलेबी कीनि लेब। भोरे विहान फेर ओ अपन गैलेन लऽ चलि गेल चौर‍ आ बीछि‍ लेलक एक गैलेन काँकोड़। आँगन आबि बकरी घरमे गैलेन राखि ओ नहाइ-सोनाइले चलि गेल आ नाहा-सोना, खा-पी कऽ सुति रहल। एमहर नहेबा काल ओकरा माएकेँ तहबन नै‍ भेटलै तँ औना कऽ एमहर-ओमहर तकलक तँ देखलक, ओ तँ कोठी दोगमे फेकल अछि- आ मरूआक किछु दाना लगल छेलइ। कोठीक मुन्ना फूटल। से देख ओकरा आगि लेस देलकै। ओकरा हरलै ने फुरलै सुतलैमे मरनीकेँ गट्टा पकैड़‍ लात्ते-मुक्के धुनि देलकै। गाड़ि पढ़ि-पढ़ि पुछए लगलै- "बाज सौतीन बाज की केलही पाइ मरूआ बेच कऽ?" अबोध बच्चा कनैत बाजल- "माए गइ माए मेला देखैले जेबै बलबा परतीपर मेला।‍" माए तामसे अघोड़ रहबे करै फेर बाजलि- "बाज सौतीन ‍बाज कथीक मेला।" माए, गइ माए, मेला देखैले जेबइ मेला 'किसना मुट्ठीक मेला।' अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१७.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा ४ बकलेल

गर्मीक समय, जेठक दुपहरिया, प्रचण्ड रौद, बिजली लापत्ता। एहेन बुझना जाइ छल, जेना दाता-दीनानाथ आइ मनुखक परीक्षा लेमए चाहैत छैथ‍। केतौसँ वसातक कोनो आश नहि। नेना-भुटका सभ एमहर भेँए तँ ओमहर भेँह, एमहर केँ तँ ओमहर केँ करै छल। बुझना जाइ छल जेना मखना तेलीक पहरा होअए। माल-जाल गर्मी सँ परेशान भऽ एकहक हाथ जीभ बबैत छल। लेड़ू आ परड़ुक तँ तेरहो करम भऽ गेल छल। कोनो तरहेँ चंडलबा रौद आ दुपहरिया झूकल, मन कनेक थिर भेल मुदा राति खन उएह हाल, जतबे गर्मीसँ परेशानी तेतबेक मच्छड़ आ उड़ीसक उपद्रब। ओकरा सभमे एकता तेतेक जँ हाँ-हाँ नै करियोक तँ सोझे उठालेत आ नेने-नेने सकरी चीनी मील लग रखि आओत। केतौ चैन नै...। भोजनोपरान्त देह-हाथ सोझ करबाक लेल विछाउनपर गेलौं, मुदा चैन नहि। कछमछ-कछमछ कऽ रहल छलौं। कती राति गुजारला पछाइत‍‍ कनी जा कि आँखि लगल, आकि ध्यान किछु आर-आर विषय दिस चल गेल। आँखि यधपि बन्न मुदा चेतनामे अनेकानेक तरहक बात धुमए लगैत अछि। पड़ल छी विछौनपर मुदा मन जीनगीक चौबट्टीपर ठढ़ वर्तमानक अधरपर भूतसँ भविष्यक, भविष्यकेँ विषयमे सोचए लगैत अछि। सरकारी सेवामे रहबाक करणें कमे काल गाम जेबाक मौका लगैत अछि। पावैनियोँ तिहार जतै छी ततै करए पडै़त अछि। तखनो अस्सी बर्खक बुड़ही माए आ करीब सए बर्खक बुढ़ बाबूजीकेँ देखए लेल गाम जरुरे चल जाइ छी। टोला-पड़ोसाक सभकेँ भेँट कऽ सबहक कुशल-छेम जानि अपना कऽ धन्य बुझै छी। ऐ प्रकारे विभिन्न प्रकारक लोकक चारित्रिक विश्लेषण करबाक सेहो मौका लागि जाइत अछि। सम्भवतः एहने स्थितिमे मोन पड़ैत छैथ‍ एकटा सज्जन सरोज बाबू। ओ एहेन बेकती जे कोनो सुरतमे अपने कऽ किनकोसँ कम मानक लेल तैयार नै होइ छैथ‍। माए-बापक एक मात्र वेटा नान्हियेटा सँ पढ़ै-लिखैमे तेजगर मुदा तेतबेक थेथरलोजीमे सेहो निपुण। विषय कोनो किएक नै हो मुदा एक चोखैर थेथरलोजी जरुर करता। जेना की ओ सर्वज्ञ होथि। तँए हुनकर किछु संगी-साथी हुनका 'मिस्टर नो ऑल' सेहो कहै छेलैन। लोक सभ बकलेल सेहो कहथिन। परुकेँ साल अगहन मासमे हुनकर बिआह झंझारपुरक बगले महरैल गाममे सम्पनन भेल। बिआहक मादे एकोटा सर-कुटुम नै छुटैथ अइले ओ एकटा बही अलगसँ बना आ क्रमबद्ध सभकेँ नत-लिऔन आ हकार पठाएब नै बिसरला। बिआहोत्सवमे सभ उपस्थित भऽ बराती गेला। जइसँ एक बात स्पष्ट भऽ गेल जे लड़का कोनो नीके समाजसँ जुड़ल छैथ‍। गौंआँ-घरुआ आति प्रसन्न भऽ बढ़ि-चढ़ि कऽ बारातीक सुआगत-बात केलैन। ममिऔत-पिसिऔत सभ ऐसँ प्रसन्न जे बर-आ कनियाँ दुनूक जोड़ी सीता-रामक जोड़ी लगैत अछि। भगवानक असीम कृपासँ अनुगृहित भऽ नीके कथा सम्पन्न भेल। असली कथा आब ऐठामसँ शुरु होइत अछि। बिआहोपरान्त कनियाँ विदागरी भऽ सासुर एली। दाइ-माइ लोकैन अरैछ-परैछ कनियाँ घर केलैन। आ अइहब-सुहब होथू असीरवाद दैत अपन-अपन घर चल गेली। कनियाँ तँ कनीयेँ दिनमे अपन सासु-ननैदक दिल जीत लेलैन। बर-कनियाँ समर्थ रहबाक कारणें विदागरी चौठारी दिन नै भऽ सौन-भादोमे भेल। पहिल सौन-भादो नवकी कनियाँ नैहरमे मनबैत छैथ‍, ऐ तरहक मिथिलाक आ मैथिलक एकटा मान्यता छइ। नीक दिन तका कनियाँ विदागरी भऽ सासुरसँ नैहर चल गेली। आब तँ भेल पहपैट। सरोज बाबू जे एते दिन सदिखन घरेमे धुसल रहैथ आ सदिखन कनियेकेँ निंधारैत आ गबैत छला ई गीत- 'मन होइए अहाँ केँ हम देखते रही, किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही, मन होइए अहाँकेँ...। आठ मास कोना वितल से नै बुझि सकला आ कनियाँ आठे मासक फला-फलक रूपमे नौ मासक सनेश लऽ नैहर चल गेली। से तँ, एको दिन, एको पहर बितब सरोज बाबूक लेल पहाड़ सन बुझना जाइ छेलैन। कोनो बातक सुधए-बुधिए नै रहैन। सदिखन एकदम बकलेल जकाँ करैथ। एहेन सन बुझना जाइ छेलैन जे शरीर गाममे होइन आ आत्मा सासुरमे। भोजनक प्रति अरुची जागए लगलैन। समयसँ स्नान-भोजन करब सेहो सुधि-बुधि नहि। लोक सभ अपनेमे बाजैथ जे सरोज बाबू एना किएक करैत छैथ‍- एकदम बकलेले जकाँ जहिना अपना गाम बेरमामे सरोज बाबू तहिना अपना नैहर महरैलमे सरोजनी दुनू बेकती एक दोसराक विरहाग्निमे जरैत। दिनो-दिन मुरझाएल जाइ छला। सोभाविके अछि। किएक तँ बड़-कनियाँ समर्थ रहबाक कारण जीवनक अपूर्व आनन्द जे उठौने रहैथ। एकटा पूर्ण पति-पत्नीक रूपमे। एक-एक दिन पहाड़ भेल चल जाइ छेलैन। नै तँ एम्हरे आँखिमे निन्न आ ने ओम्हरे एको मिन्टक चैन। माए-बापक डरे नै तँ कनियाँ करैन आ ने बाबूजीक डरे सरोज सासुर जेबाक साहस कऽ पबैथ। किएक तँ अखनो केतौ- केतौ एहेन प्रथा छे जे बिना दिन-दूरागमनक बर-सासूर नै जाइ छैथ‍। तँए सरोज बाबूक डेग सासुर जइले नै उठैन। समय बितैत देरी नै लगैत छै देखैत-देखैत चौठ-चन्द्र पावैन आएल... चल गेल। जितिया बितल आबि गेल आसीन मास... सगरो दुर्गापूजाक तैयारी शुरु भऽ गेल। ओमहर सरोजनीक नैहरमे जोड़ा करिआ छागर बलि-प्रदानक लेल राखल छल। जेकरा ओ लोकैन खूब जतनसँ दाना-पानि खुआबैथ-पिआबैथ। देखते-देखते दुनू छागर, सबैयासँ डोढ़ा भऽ गेल। जँ जँ दुर्गापूजा लग आएल जाइत, सरोज बाबू आ सरोजनीक हृदैक धड़कन हृदयागंम हेबाक लेल मचलए लागल। देखते-देखते कलश स्थापन भेल। पहिल पूजा बितल दोसर बितल आबि गेल पंचमी। मुदा अखन‍ धरि सासुरसँ सरोज बाबूक लेल कोनो खोज-खबैर ‍ नै कएल गेल! एक दिन माए पुछलखिन- 'बौआ, कनियाँक खोज खबैर‍ नै केलहक? कोनो फोनो-तौनो नै अबै छह?' बेचारे की बजता अपन हारल आ बहुक मारल कियो की बजै छै? हारि-थाकि पंचमी राति फोन लगौलैन। घण्‍टी भेल, फोन उठौलखिन हुनकर शारि- कमलनी, ओमहरसँ अवाज अबैत अछि- 'हेलो... हम महरैलसँ बजै छी?' 'हम छी सरोज बेरमासँ। कनी... दीदी... केँ फोन...।' कमलनी माँ दिस तकैत बाजि उठैत अछि- 'माए गे माए जीजाजी केँ फौन छिए।' एमहरसँ हेलौ-हेलौ होइत रहैत अछि। कमलनी फोन लऽ कऽ दैत छै अपन दीदी सरोजनीकेँ। सरोजनी फोन लइत- 'परनाम करै छी। अहाँ नीके छी की नहि? माँ बाबूजी कोना छैथ‍? अपना शरीरपर धियान दइ छी की नहि? मन लगैए की ने? मेला देखऽ कहिआ एबइ? कमलनी आ अजय, विजय अहाँक विषयमे पुछैत रहैए। दीदी गइ दीदी, जीजाजी कहिया ऐतौ?'' सरोज बाबूक जवाब छल एको-रत्ती मन नै लगैत अछि। सम्भवतः दुर्गापूजामे नै आबि सकब। धिया-पुताकेँ मेला देखक लेल दस-दसटा टाका दऽ देबइ। तामसे टीक ठाढ़ केने फोन काटि दैत छैथ‍। सरोज बाबूक लेल असमंजसक स्थिति रहैन, जे जेकरा घरमे जोड़ा छागर बलि प्रदान हेतै, से अखन‍ धरि एको बेर एबाक लेल नै कहलैन। एहेन कोन सासुर, कोन सासु आ ससुर, केहेन सारि आ शरहोजि। तामसे मन अधोड़ आ टीक ठाढ़। की करी आ की नै करी? ई द्वन्‍द्वात्मक स्थिति बनल रहैन। किछु नै फुरैन। मुदा अष्टमी अबैत-अबैत- ये दिल है कि मानता नहीं ये वेकरारी क्‍यों हो रही है, ये जानता नहीं...। अपना कऽ नै रोकि सकला। आ चलि गेला अपन सासुर महरैल। भगवती दर्शन कऽ जहाँ की पानक दोकानपर जाए छैथ‍, पान खेबाक लेल, आकि मेला देखक लेल आएल सारि-शरहोजिक नजैर हुनकापर पड़ैत अछि आ ओ सभ पकैड़ लैत अछि हिनकर गट्टा। जीजाजी, जीजाजी अहाँकेँ गामपर चलए पड़त। दीदीओ कहने छल, सप्पत दऽ कऽ। मुदा सासु ससुरक आग्रह नै तँए अखनो धरि हिनक टीक ठाढ़े। अन्ततः थाकि-हारि एक किलो मधुर लऽ सारि-शरहोजिक संग चलला सरोज बाबू सासुर। पहिल-पहिल बेर सासुर गेल छला तँए सुआगत-बातमे कोनो कमी नै रहल। चाह-पान बढ़ियाँसँ भेल। मुदा खेबा काल ओ पसारलैन बड़का नाटक, जे हम नै खाएब। हम खाऽ आएल छी, भुख नै अछि। सासु आग्रह केलखिन कोनो असर नहि, ससुर हाथ पकड़लखिन, कोनो फरक नहि, बड़का सार सेहो खुशामद्‌ केलखिन मुदा कोनो असर नहि। एके ठाम जे हम खा कऽ आएल छी, भूख नै अछि। आ ओ भोजन नहियेँ केलैन। ओमहर दुनू छागर जे बनल ओकर सुगन्धसँ टोला-पड़ोसा गम-गम करैत। टोलाक निमंत्रित सज्जन सभ आबि मासु-भात अर्थात छागर रुपी प्रसाद पाबैथ आ ओकर स्वादक सविस्‍तार चर्चा करैथ। एह छागर जे जुआएल छल, चर्वी केहेन तरहत्थी सन छेलै आ प्रसाद बनल केतेक सुन्दर अछि! वाह मन तँ भीतरसँ प्रसन्न भऽ गेल, चर्चा करैत बाँसक सीक्‍कीसँ खैरका करैत कुरूर कऽ पान खा ओ लोकैन तृप्‍तिक ढेकार लैत चल जाइ गेला। एमहर सरोज बाबूक पेटमे बिलाड़ि कुदऽ लगल। ओत भुखे लहालोट। राति खसल जाए, बहरबैआक बाद घरबैओ सभ खा कऽ सुतए गेला। मुदा किछु लिऔनवाली सभ अखनो जगले, ओ लोकैन पाछाँ काल कऽ भोजन करैथ, फैलसँ पलथा मारि मासु आ भात, खाथि आ ओइ छागरक मासुक चर्चा करैथ। आग्रह अलग जे दीदी कलेजी दू पीस लिअ। हे यै फल्‍लाँ गामवाली हे ई चुस्‍ता लिअ। हे यै दाय, हे, ई हड्‌डी बला दूटा पीस लिअ। आग्रहपर आग्रह। आ ओ लोकैन बड़ी काल धरि गप-सप्प करैत, भोजन करए गेली। एमहर सरोज बाबू जठराग्‍नि आरो तेज भेल चल जा रहल छल। आब होइ छेलैन जे कियो आबि आग्रह करितैथ तँ भरि पेट मासु-भात खइतौं। मुदा से तँ आब सभ कियो सुतए चल गेल छल। धियो-पुता मासु-भात खा फोफ कटैत छल। आब तँ हिनका किदुन- जे अपने करनी गइ मुसहरनीक परि भऽ गेल छल। थाकि हारि किछु काल पछाइत‍‍ हरलैन ने फूरलैन सरोज विदा भेला भनसा घर दिस। आ अपने सँ मासु-भात भरि थारी निकालि आ चुपे-चाप भोकसए लगला। किनको ऐ बातक पत्तो नहि। जागल जे सभ रहैथ से सभ हिनका खोजए लगल जे पाहुन केतए, पाहुन केतए। आ पाहुन तँ भनसा घरकेँ केबाड़ तर नुका कऽ गुप-गुप मासु-भात दऽ रहल छथिन। तात गणेशजीक वाहन ऐ कोठीसँ ओइ कोठी जा कि छरपल आकि कोठीपर राखल खापड़ि पाहुनक कपारपर खसल। अवाज सुनिते लोक सभ ओइ घर दिस दौगल। देखलक जे पाहुन तँ केबाड़क दोगमे नुका कऽ मासु-भात भोकैस रहल छैथ‍। परल बड़का पिहकारी, शारि-शरहोजि मारलक ताली खूब जोरसँ शोर-गुल सुनि सुतलहो लोक सभ जागि गेल। ताली आ पिहकारी पड़ि रहल अछि। पाहुन तँ लाजे कठौत भऽ गेला। रति जखन सुतए घर गेला तँ कनियाँक कटू व्‍यंग वाणक बर्खा होमए लगल। पाहुनक तँ मने शान्त। किछु नै फुरैन‍। सोचला जे अन्‍हरोखे गाम चल जाएब। विदाओ भेला, मुदा अन्हार बेसी रहबाक कारणे कुकुर सभ झॉउ-झॉउ करए लगल। लोक सभ जागि गेल देखलक जे आगू-आगू पाहुन आ पाछू-पाछू कुकुर हिनका खिहारने जाइत अछि। लोक सभ दौड़ल महरैलक हाटपर आबि हिनका पकड़लक। घुमि जेबाक आग्रह केलक। मुदा हिनकर मन तँ तामसे अधोर छल। किनको बातक मोजर नहि, हाक दैत दैत धोती पकड़लक से हुनकर ढेका खुजि गेल, धड़फड़ा खसला, मुदा ओ तैयो नै रूकि लटपटाइत धोती खोलि फेकैत गारि दैत परात होइत-होइत अपन घर पहुँचला। कहू तँ एतेक पढ़ल-लिखल लोकक ई काज कोनो बकलेल जकाँ काज केलैन। सरिपौं जँ अधला नै लागए तँ हुनका बकलेले न कहबैन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१८.दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक दुर्गानन्द मण्डलक ५ टा कथा कथा ५ बिआहक पहिल साल गिरह

राधा आ मोहन दुनूक बिआहक पहिल साल गिरह। दुनू परानीक मनमे उठैत खुशीक कोनो सीमा नहि। दुनूक बीच प्रेम एतेक जे साल केना बितल से बुझिए ने पेलक। परिवार छोट भेने जीवन जेतबए सुखमए तेतबए सरस सेहो। मोहन बैंकक कर्मचारी। तँए पटनेमे जमीन लऽ मकान बना, जेबा-एबा लेल नैनो गाड़ी सेहो कीनि लेलक। भिनसरसँ लऽ कऽ जाधैर‍ ऑफिस जाइ छला ताधैर‍ राधाक मदमस्त जुआनी देख समय केना बित जाइ छेलैन‍ से पते ने चलैन‍। मुदा दस बजे धरि तैयार भऽ ऑफिस जरूर चलि जाइ छला। दिन भरिमे ऑफिसोसँ एक-आध बेर राधाकेँ फोन कऽ हालि-चालि जरूर पुछि लइ छेलखिन। पाँच बजे ऑफिस बन्न भेला पछाइत‍‍ किछु ने किछु सनेस लऽ मोहन घर चल अबै छला। राधा ताधैर‍ बाट तकैत रहै छेली। जाधैर‍ गाड़ीक हौरन नै बाजि उठै छेलैन‍। ऐ तरहेँ दुनू परानी लेल सभ दिन होली आ राति दीवाली रहै छल। देखैत-देखैत साल बित गेल आ आबि गेल बिआहक पहिल साल गिरह। दुनू परानी आपसमे विचारलैन‍ जे बिआहक पहिल साल गिरह छी, तँए ऐ शुभ अव‍सैर‍पर अपना दोस्त सभकेँ एकटा शानदार पाटी देल जाए। पाटीमे खेबाक-पीबाक पुरकस इंतजाम छल। रवि दिन रहलाक कारणे पाटियो समैसँ शुरू भेल ओइ दिन तँ राधा आ मोहनक सुन्दरते अपूर्व छल। दुनू परानी फिल्‍मी हिरो-हिरोइन जकाँ लगै छला। साँझ पड़िते दोस्त-दोस्ति‍नी सभ आबए लगलैन‍। सभसँ उपहार लऽ राधा डैनिंग हॉलमे रखि-रखि आबैथ। पाटीमे कोनो वस्‍तुक कमी नै छल। सभ कियो खूब खेलक-पीलक आ नाच-गान करए लगल। मोहनकेँ दोस्तक बीच रहैत-रहैत पीबैक चस्का लगि गेल छेलैन‍। तँए आइ मोहनो खूब पीलैन‍। पीला पछाइत‍‍ राधाकेँ डाँरपर हाथ दऽ दोसर हाथ पकैड़ ओहो नाचए लगला। नाच-गान खतम भेला बाद सभ दोस-दोसतिनी अपन-अपन घर गेल। मुदा ओही दोसक बीच मोहनक एकटा अभिन्न दोस अरूण जेकरा पीबैक हिस्सक नहि, ओ जलखै मात्र केला पछाइत‍‍ अपन घर चलि गेल। "राधा हे राधा, देखू अहाँले मोहन केते बेकरार अछि। आउ अहाँ तँ हमर जान छी। हमर परान छी, आउ ने।" कहैत मोहन उठै काल पलंगसँ टकरा गेला। राधा दौग एली देखली जे मोहन तँ किछु बेसीए पीब लेने छैथ‍। मोहन बजला- "ओह राधा, छोड़ू ने ई गप-सप्प। प्‍लीज एमहर आउ ने। हमरा आब अहाँ एना जुनि तड़पाउ। ओह राधा, अहाँ केते सुन्दर छी। मन होइए अहाँकेँ हम देखते रही। किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही।" गीत गबैत मोहन राधाकेँ अपना बाँहिमे कसि पलंगपर ओंघरा देलखिन। प्रेमक सागरमे डुमए चाहलक। मुदा सागरमे डुमैसँ पहिने एना भेलै, मोहन औक करए चाहलक। राधा हाँइ-हाँइ मोहनकेँ उठाबए चाहलक। ताबए तँ मोहन पलंगेपर बोकैर‍-बोकैर‍‍ भरलक। सौंसे घर गंधसँ भरि गेल। नाके ने देल जाइ। शराबक निशाँमे मोहन बेसुधि। कनीए कालक बाद मोहनकेँ फेर मन भेलै जे औक हएत। निशेमे मातल मोहन जाकि पलंगसँ उठल आकि पलंगेपर खसि पड़ल, कपार फुटि गेलै, शोनितक टघार चलए लगलै। राधा जेना-तेना मोहनक माथसँ बहैत शोनितकेँ रूमालसँ पोछि-पाछि माथकेँ बान्हि देलक। मुदा एतबोपर मोहनक मन थीर नै भेलइ। पेटमे दर्द उठलै। दरदे छड़पटाए लगल। ओही अवस्थामे मोहन एकबेर फेर औक केलक। मुदा ऐबेर खुने केलक। समुच्चा घर खुने-खुनामे भऽ गेल। मोहन खून बोकैर‍‍ रहल छल। तथाइपो ओकर दर्द कम नै भऽ रहल छेलइ। एमहर असगरे राधा की करती। राधाकेँ मोन पड़लैन‍ अरूण। अरूण मोहनक दोस जे शराब नै पीब अपना घर चलि गेल छल। अरूण... अरूण... अरूण... हल्‍ला करैत राधा अरूण दुनू परानीकेँ बजौलक। अरूण दुनू परानी दौगल राधा ऐठाम आएल। मोहनक हाल देख दुनू परानीकेँ होश उड़ि गेल। अरूण बाजल- "भौजी, मोहन भैयाक हाल ठीक नै छैन‍। हम गाड़ी निकालै छी अहाँ दुनू गोरे भैयाकेँ पकैड़‍ बाहर लाउ।" गाड़ीक पैछला दरबज्जा खोलि, सीटपर मोहनकेँ पाड़ि राधा आ अपन पत्नीक संग अरूण अस्पताल दिस विदा भेल। अरूण तीव्र गतिसँ गाड़ी चला रहलए अपना धुनिमे। जे जल्दीसँ जल्दी अस्पताल पहुँच जाइ। बाटमे मोहनकेँ बड़ी जोड़सँ दर्द भेलै आ हिच्‍की उठलै दर्दसँ छटपटाइ-कछमछाइत एकबेर फेर खूब नमहर खूनक औक भेलइ। किछुए कालक पछाइत‍‍ मोहन कालकलवित भऽ गेल। राधाकेँ शंका भेलइ। ओकर करेज भालरि जकाँ काँपि उठलै। जोरसँ कानए लगल। अरूण बोल-भरोस दैत अस्पताल पहुँचल। अरूण आ पूजा दुनू परानी मोहनकेँ स्‍ट्रेचरपर लादि डाक्टर लग लऽ गेल। डाक्टर साहैब आला लगा नारी देख तजबीज करैत बजला- "माफ करू, ई आब नै छैथ‍।" सुनिते राधा पछाड़ खा मोहनक मृत शरीरपर गाछ जकाँ खसली। पूजा कनैत राधाकेँ सम्‍हारैत बजली- "दीदी, उठू होश करू। की करबै धैरज राखए पड़त। जिनगीकेँ जीबए पड़त।" पूजा उठौलैन‍। राधा उठली। मुदा फेर पछाड़ खा मोहनक शरीरपर खसि पड़ली। जोर-जोरसँ कनैत राधा मोहनक देहकेँ डोलबैत बाजलि- "स्वामी यौ स्वामी, अहाँ केतए चलि गेलौं यौ स्वामी? उठू ने अहाँ तँ कहैत रही जे मोन होइए अहाँकेँ हम देखते रही। देखू ने हम छी अहाँक राधा। उठू ने। उठू ने। देखू ने। अहाँक राधा...।" अहुरिया कटैत राधाकेँ देख अरूण बाजल- "भौजी, उठू होश करू। आब ओ घुरि नै औता।" ई कहैत अरूण एकबेर राधाकेँ सम्‍हारि उठौलक। मुदा राधा पुन: पछाड़ खा स्वामी-स्वामी कहैत मोहनक मृत शरीरपर खसि बेहोश भऽ गेलि। के... मोहनक राधा...। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- लालदासक मिथिला रामायण मे कुण्डलिया आ सम्पादक बा प्रूफरीडरक अज्ञानतावश ओइमे छन्दोभङ्ग गजेन्द्र ठाकुर लालदासक मिथिला रामायण मे कुण्डलिया आ सम्पादक बा प्रूफरीडरक अज्ञानतावश ओइमे छन्दोभङ्ग १ लालदासक रामायण चौपाइसँ सृजित अछि। बुझू जे ९५ प्रतिशत भाग चौपाइ, आ फेर बाँचल भागमे रूपमाला छन्द आ गीतिका। मुदा हम एतऽ कुण्डलियाक चर्चा कऽ रहल छी, जे बहुत कम मात्रामे अछि मुदा हमरा ओ बहुत प्रभावित करैत अछि। कुण्डलियाक प्रकृति रुबाइसँ मिलैत अछि आ जँ अहाँ ओमर खय्यामक रुबाइ पढ़ब तँ कुण्डलियासँ प्रेम करऽ लागब। कुण्डलिया अछि की? कुण्डलिया बुझै लेल अहाँकेँ दोहा आ रोला बुझऽ पड़त। लालदासक मिथिला रामायण मे कुण्डलियाक अलाबे रोला आ दोहा सेहो अहाँकेँ भेटत। मुदा एकर सम्मिलन अछि कुण्डलिया। दोहा दोहा   मात्रिक छन्द अछि। दोहामे दू पाँती आ चारि चरण होइत अछि। पहिल चरणमे   १३,दोसर चरणमे ११,तेसर चरणमे १३आ चारिम चरणमे ११ मात्रा होइत अछि। पहिल आ   तेसर चरणक आरम्भ जगणसँ (जगण U। U) नै हएत आ दोसर आ चारिम चरण अन्त हएत दीर्घ-ह्रस्वसँ। रोला रोला   सेहो मात्रिक छन्द अछि। रोलामे चारि पाँती आ आठ चरण होइत अछि। पहिल चरणमे   ११, दोसर चरणमे १३, तेसर चरणमे ११ आ चारिम चरणमे १३ मात्रा, पाँचम चरणमे   ११, छअम चरणमे १३ मात्रा होइत अछि। सभ पाँतीक पहिल चरणक अन्तमे   दीर्घ-ह्रस्व, वा ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व होइत अछि। सभ पाँतीक दोसर   चरणक अन्तमे चारिटा ह्रस्व, वा दूटा दीर्घ, वा दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व (भगण । U U), वा ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ (सगण U U ।) होइत अछि। रोलाक प्रारम्भ ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्वसँ नै करू। कुण्डलिया दोहा   आ रोलाक कुण्डली (मिश्रण) भेल कुण्डलिया। दोहा लिख दियौ, फेर दोहाक  अन्तिम  चरणकेँ (११ मात्रा बला) रोलाक पहिल चरण बना दियौ (पुनरावृत्ति) आ  फेर रोला  जोड़ू। खाली ई ध्यान राखू जे दोहाक पहिल चरणक पहिल शब्द आ रोलाक  अन्तिम  चरणक अन्तिम शब्द एक्के रहए। कुण्डलियाक पहिल शब्द आ अन्तिम शब्द  एक्के  होइए। कुण्डलियाक चारिम आ पाँचम चरण सेहो एक्के होइए। २ आब सोझे पहुँचि जाउ मिथिला रामायणक सुन्दर काण्डक अन्तमे जतऽ अहाँकेँ चारिटा कुण्डलिया भेटत। कुण्डलिया दोहा (मैथिली अकादेमी)** रघुनायक करुणायतन देखि विभीषण दीन। देल प्रमाणहिं राज्य पद तनि पद रहु मन लीन॥ तनि पद रहु मन लीन हीन दीनक प्रतिपालक। शरणागत वत्सल दयाल लालक दुख घालक॥ लोकपाल यमकाल डरथि लखि जनिक सुसायक। सकल लोक निश्शोक करथि से विभु रघुनायक॥१॥ अधनाशिनी रघुपति कथा, सुनितहि हो दुख दूर। तनिपर प्रभु अनुकूल रहि, करथि मनोरथ पूर॥ करथि मनोरथ पूर क्रूर सौं सदा बचाबथि। धन जन विजय विभूति जूति सुख तनिक बढ़ाबथि॥ काम आदि सौं बचथि भक्ति पाबथि अविनाशिनि। पापताप सभ तनिक हरथि गंगा अघयाशिनी॥२॥ चितचकोर की चाख नित, विषय विषम अंगार। सीतारामक भजन भल, करफल अमिय अहार॥ करफल अमिय अहार भार संसारक छोड़ी। लेल सकल पद ब्रह्म भक्त भव बन्धन तोड़ी॥ पतितहुँ काँ गति जतय ततय रहि लहु सुख समुचित। हित निश्चित निज जानु अपर भव विषयक अनुचित॥३॥ मन विहङ्ग कति दुख सहह भवपिंजर मे आबि। गहह लाल जौं सुख चहय श्रीपद तरुवर पाबि॥ श्रीपद तरुवर पाबि गाबि रहु रामकथा नित। नहि तेहि सौं अछि अपर युक्ति कल्याण त्राण हित॥ कत पातकि भव सिन्धु तरल नहि रहल एक क्षण। गाबि  गाबि हरि कथा यथा मति लाबि एक मन॥४॥ उपरका पाठ मैथिली अकादेमीक पोथीसँ लेल गेल अछि। ३ मात्रिक गणना मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ। शास्त्रमे प्रयुक्त 'गुर' आ 'लघ' छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ 'गुणिताक्षर' बनैत अछि।क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक 'अक्षर' कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना 'अवाक्' शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा । १. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर 'लघ' मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। २. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर 'गुर' मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि। जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत। माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:- क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १ क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २ क्ष= क् + ष= ०+१ त्र= त् + र= ०+१ ज्ञ= ज् + ञ= ०+१ श्र= श् + र= ०+१ स्र= स् +र= ०+१ शृ =श् +ऋ= ०+१ त्व= त् +व= ०+१ त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १ ह्रस्व + ऽ = १ + ० अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी। ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+० दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+० जेना हँसल= १+१+१ साँस= २+१ बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत। जा कऽ = २+१ क् =० क= क् +अ= ०+१ किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि। U- ह्रस्वक चेन्ह ।- दीर्घक चेन्ह एक दीर्घ । =दूटा ह्रस्व U ४ छन्दोभङ्ग आब लालदासक मिथिला रामायणक चारू कुण्डलियापर आउ। अहाँकेँ स्पष्टरूपेँ छन्दोभङ्ग भेटि जायत। कवि लालदास तँ छन्दोभङ्ग कऽ नै सकैत छथि। एतऽ टाइपिंग मिस्टेक तँ स्पष्ट रूपेँ नै अछि। तखन ई मात्रिक गणनासँ अनभिज्ञ मैथिली अकादेमीक सम्पादक बा प्रूफरीडरक काज भऽ सकैए, जे वर्तनीक एकरूपता अनबा लेल छन्दोभङ्ग केलन्हि।  मुदा साहित्य अकादेमीक लालादास रामायण (सम्पादक रामदेवझा)मे छन्दोभङ्ग नै भेटत, से रामदेव झा केर दावा छलन्हि आ हुनकापर मूलपाठकेँ परिवर्तित करबाक जे आरोप लगाओल गेलन्हि आ जे आरोप लगेलन्हि से मात्रिक गणनासँ अनभिज्ञ बुझाइत छथि, से हुनकर कहब छलन्हि अपन उत्तरमे। मूलपाठसँ अन्तर छन्दोभङ्ग ठीक करबाक उद्देश्यसँ ओ केलन्हि से हुनकर दावा छलन्हि। माने कुण्डलिया छन्द जँ लालदास लिखने छथि तँ सम्पादककेँ एतेक तँ ज्ञान हेबाके चाही जे ओ देखय जे खाली हेडिंग कुण्डलिया देने काज नै चलत। आ रामदेव झा जीक विचारे साहित्य अकादेमीक लालादास रामायणकेँ अन्तिम पाठ मानबाक चाही। आब देखू साहित्य अकादेमीक पाठ। **रामादेव झा द्वारा सम्पादित लालदासक कुण्डलिया (साहित्य अकादेमी) कुण्डलिया दोहा रघुनायक करुणायतन देखि विभीषण दीन। देल प्रमाणहिं राज्य पद तनि पद रहु मन लीन॥ तनि पद रहु मन लीन हीन दीनक प्रतिपालक। शरणागत वत्सल दयाल लालक दुख घालक॥ लोकपाल यम काल डरथि लखि जनिक सुसायक। सकल लोक निश्शोक करथि से विभु रघुनायक॥१॥ अधनाशिनी रघुपति कथा, सुनितहि हो दुख दूर। तनिपर प्रभु अनुकूल रहि, करथि मनोरथ पूर॥ करथि मनोरथ पूर क्रूरसौं सदा बचाबथि। धन जन विजय विभूति जूति सुख तनिक बढ़ाबथि॥ काम आदिसौं बचथि भक्ति पाबथि अविनाशिनि। पापताप सभ तनिक हरथि गंगा अघनाशिनी॥२॥ चितचकोर की चाख नित, विषय विषम अंगार। सीतारामक भजन भल, कर फल अमिय अहार॥ कर फल अमिय अहार भार संसारक छोड़ी। लेल सकल पद ब्रह्म भक्त भव बन्धन तोड़ी॥ पतितहुँकाँ गति जतय ततय रहि लहु सुख समुचित। हित निश्चित निज जानु अपर भवविषयक अनुचित॥३॥ मन विहङ्ग कति दुख सहह भवपिंजरमे आबि। गहह लाल जौं सुख चहय श्रीपद तरुवर पाबि॥ श्रीपद तरुवर पाबि गाबि रहु रामकथा नित। नहि तेहि सौं अछि अपर युक्ति कल्याण त्राण हित॥ कत पातकि भवसिन्धु तरल नहि रहल एक क्षण। गाबि  गाबि हरि कथा यथा मति लाबि एक मन॥४॥ ओना तँ मैथिली अकादेमीक पाठ आ ऐ पाठमे खास कोनो अन्तर नै अछि, मात्र विभक्ति आ दूटा शब्द कतै सटायल गेल अछि आ कतौ फराक कऽ देल गेल अछि। दोसर कुण्डलियाक अन्तिम शब्द अघयाशिनी केँ अघनाशिनी कऽ देल गेल अछि। कर्णाटकक गोकर्ण गंगावली आ अधनाशिनी धारपर अछि आ 'पापताप सभ तनिक हरथि गंगा' माने पापनाशिनी गंगा माने 'अधनाशिनी' प्रयोग समुचित अछि, 'अघनासिनी' नै, प्रायः टाइपिंग मिस्टेक अछि। ओना तँ छन्दोभङ्ग ठीक करबाक दावा तँ पुष्ट नै भेल, मुदा शब्दक उचित प्रयोगक प्रयास भेल अछि से मैथिली अकादेमीक पाठसँ साहित्य अकादेमीक पाठ हमरा श्रेयस्कर लागि रहल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- चातर ३.२.कल्पना झा- मायक आँचर ३.१.राज किशोर मिश्र- चातर राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी चातर

बहेलि पसा रने कुटि ल जा ल, छि ड़ि अओने अन्नक दा ना , का त करो ट, अऽढ़ मे बैसल, लगअओने को नो बहा ना ।

किं कि रा तक नि ष्कपट नेना , उड़ि रहल छल पेट लेल, दा ना देखि उतरल ,तऽ फॅंसि गेल जा ल मे, बि नु बुझनहि खेल।

शि शु सूगा , नहि बुझलक, भेलै की , आ ,ओ बहेलि क जा ल मे, नहि जनलक दुनि आ के फरेब, नि र्दो ष ,आब एहि हा ल मे।

ओ, फड़फड़ा रहल अछि पाँ खि , ता कि रहल अछि ,चा रू का त, छटपटा रहल अछि ,नि कसऽ लेल, कि ओ तऽ बुझअओ ओकर बा त।

बा ट तकैत अछि मा ए -बा प लेल, खग- भा खा मे का नि रहल अछि , पछता ए रहल अछि लो भक दो आरे, 'नेना गलती मा नि रहल अछि '।

निः सहा य भेल गा छ दि सि ता कए, का तर भेल ता कए लत्ती , हा रल, था कल , रहलै भरो स ने, नि कलऽ के, एक्को रत्ती ।

ता कि रहल छल व्या ध दि स, कऽ दि अए मुक्त ओ जा ल सँ, दया करय ;मुदा व्यर्थ या चना करब भेल ,कृपा - कंगा ल सँ।

अपना भरि ,ता गति लगा रहल अछि , चा तर सॅं ऊड़ऽ के, मो टगर -मो टगर सूत ओकर, तेॅं,वृथा प्रयत्न तो ड़ऽ के।

हा रि गेल बंदी सूगा -शि शु, गद्-गद् अछि ओ शि का री , बहेलि आ केँ ता कि रहल अछि , बनि कऽ दया -भि खा री ।

परा धी न पंछी के बेचलक, बहेलि आ को नो गहि की क हा थ, धनि क मा लि क, चा नी -पि जरा मे, बन्दी बना कऽ लऽ गेल सा थ।

स्वा मी क धी आपूता सभ, दैक खा ए लेल मधुरगर फल, कि छु -कि छु बा जि खेलै ओकरा संग, घऽर के नेना -भुटका -दल।

आबैक दला न पर, मेना ,परबा , तऽ ,देखि क' लगैक सेहन्ता , 'बेका रे भेलहुँ सूगा -बच्चा , चि ल्हो रि , कड़ा ङकुल कि ओ अनता ?

परि चर्या ने चा ही , मा लि कक, ने मि ठ-मि ठ आम, ने अन्न, परा धी न भेलहुँ जखने सँ, एहि सुख सँ लगैत अछि गन्ह।

जा ढ़-मा स मखमलक ओढ़ना सँ, झाँ पल गेल हमर पि जरा , ला गल, नर्क मे, सुख कि छु-कि छु क' जेना ,देल गेल अछि मि झरा ।

बड़ का नैत हो एत मा ए -बा प, आ, ता कैत हो एत हमर बा ट, स्वच्छंदता हमर ,ने जा नि को ना , बि का गेल ओ, को नदन हा ट।

आबऽ बला छैक भरदुति आ, बहि न तकैत हो एति ,हमरे बा ट, ला ल ठो प, उजर चा नन लेल, अवश्य ,ओ ता कति ,हमर लला ट।

नी क ने लगैत हेतै बहि न के, छुटि गेल सभ संघति आ, की नी न हो एत रा ति मे ? जा गले, पहर रति आ।

बि सरि गेलहुँ उड़ना इ आब, पूरा नभ हो इत छल अपने दो आरि , उड़ैत रहैत छलहुँ, जतय मो न भेल, ओहि लेल का टै छी बपहा रि ।

मो न पड़ैत अछि अपन घर ओ, गा छ -बि रि छ, नदी मे सना न, करत परतर ई रजत -पि जरा ? खोँ ता मे फाँ ड़ैत छलहुँ धा न।

कुहेस फटैछ, जी वन अछि बन्हक, नहि चा ही ई सभ ,सुख आ सुवि धा , 'दुक्खो नी क, स्वतंत्र जि नगी क' नहि हमरा एहि मे कनि को दुवि धा ।

परतंत्रता के जि ज्जि र सँ, को ना कऽ लगा बू नेह? मो न -आत्मा उड़ैत अछि नभ मे, पि जरा मे केवल देह।

हे स्वा मी !अहाँ जँ बुझैत हो इऐक, खग लो कनि के भा षा , कि छु नहि चा ही अहाँ क देल, दऽ दि अ स्वतंत्रता -आसा ?

चा ही ने हमरा रा ज -पा ट, बस, छो ड़ि दि अ अहाँ हमर बा ट।

फा टौ पृथ्वी , खसौ वज्र, उठौ बवंडर, बि ड़रो , तुफा न, खुजि जा इ पि जरा के दो आर, छुटि जा ए हमर ,को हुना कऽ जा न।

आब हम नहि रहब पि जरा मे, ला गल हमरा अछि उचा ट, परा धी नता सँ मुक्ति क, को नो तऽ हेबे करतै बा ट।

छो ड़ब नहि हम अपन उमेद, कहि ओ तऽ खुजतै चा नी क दो आर, एहि का रा गृह सँ , नभ मे उड़ब , ओकरा लेल नहि हम अनभो आर।

ता कि लेब हम अपन खोँ ता , भेटत मा ए -बा प -बहि नि , तकर बा द तऽ नहि लऽ जा एत, हमर स्वतंत्रता के कि ओ कि नि ?'

शि शु सूगा , कपो ल -कल्पना मे, डूबल, पि जरा मे पड़ल -पड़ल, टूटल मो न, आ दूनू आँखि मे , खा ली ,नो रे -नो र भरल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.कल्पना झा- मायक आँचर कल्पना झा मायक आँचर कते स्नेहगर माय तोहर आंचर, लाल ढबुस हरियर आंचर, बांहि गिटठऽ में किछु रहै नुकेने, लोक समाज आ सब सं चोरोने, ढबरल नोर हमर तों पोछलैं, नहिं आगु किछु पाछु बजलैं, माय बिदा भेलूं गिटठ खोल ने, कि रखने छैं कनि देखो ने, आंचर क गिटठ क मोल बहुत छै, माय क स्नेह अनमोल होति छै, ठहक्का मारि माय जहन हंसल, फुजि गिटठ किछु कहि रहल, मुठ्ठी बांहि हम लेलुं नुकाय, माय क सपना रहै बिलैल । -कल्पना झा, बोकारो अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण सूचना Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. १ "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson ............................................ Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार/ कलाकर्मीक काज, रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल २०२३ धरि आ ३७०म अंकक विशेषांक लेल ८ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। विदेह अरविन्द ठाकुर विशेषांक विदेह जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक विदेह रामलोचन ठाकुर विशेषांक विदेह राजनन्दन लाल दास विशेषांक विदेह रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक विदेह केदार नाथ चौधरी विशेषांक विदेह प्रेमलता मिश्र प्रेम विशेषांक विदेह शरदिन्दु चौधरी विशेषांक -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA २ "विदेह द्वारा एक बेरमे कोनो एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकंन शृंखला" Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson ............................................ Videha: Maithili Literature Movement विदेह अपन ३७१ म (०१ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.)" पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। १) एम.एस.यू. केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, २) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नव चेतना, ३) एम.एस.यू. आ विभिन्न जाति केर समन्वय, ४) एम.एस.यू. द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम् ओकर प्रभाव बा ५) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनो लेख। ३७१म अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला विदेह अपन जीवित रचनाकार/ कलाकर्मी पर विशेषांक शृंखलाक अन्तर्गत (१)अरविन्द ठाकुर, (२)जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, (३)रामलोचन ठाकुर, (४) राजनन्दन लाल दास, (५)रवीन्द्र नाथ ठाकुर, (६) केदार नाथ चौधरी, (७) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' आ (८) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक निकालने अछि। अही सन्दर्भमे आठो साहित्यकार पर "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत "मोनोग्राफ" आमंत्रित कयल जा रहल अछि। "विदेह मोनोग्राफ" शृंखलाक विवरण निम्न प्रकार अछि: (१) इच्छुक लेखक ऊपरमे कोनो एक रचनाकार पर अपन मोनोग्राफ लिखबाक इच्छा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छथि। मोनोग्राफ लिखबाक अवधि सामान्यः एक मास रहत। (२) विदेह आठ रचनाकारपर आठ लेखकक नाम मोनोग्राफ लिखबाक लेल चयनित कऽ ओकर सार्वजनिक घोषणा करत। "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक निअम: (१) मोनोग्राफ पूर्ण रूपेँ रचनाकारपर केन्द्रित हुअय। साहित्य अकादेमी, एन.बी.टी. आ किछु व्यक्तिगत रूपेँ लिखल मोनोग्राफ/ बायोग्राफीमे लेखक संस्मरण आ व्यक्तिगत प्रसंग जोड़ि कय रचनाकारक बहन्ने अपन-आत्म-प्रशंसा लिखैत छथि। "विदेह मोनोग्राफ" फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल सन रहत। फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल एहेन एकमात्र टूर्नामेण्ट अछि जतय कोनो "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" सेरीमनी नै होइत छै आ तकर कारण छै जे "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" मे टूर्नामेण्टमे नै खेला रहल लोक मुख्य अतिथि/ अतिथि होइत छथि आ फोकस खिलाड़ी सँ दूर चलि जाइत अछि। फीफा मात्र आ मात्र फुटबाल खिलाड़ीपर केन्द्रित रहैत अछि से ओकर टूर्नामेण्ट "ओपेनिंग सेरीमनी" नै वरन् सोझे "ओपेनिंग मैच" सँ आरम्भ होइत अछि आ ओकर समापन "क्लोजिंग सेरीमनी"सँ नै वरन् "फाइनल मैच आ ट्राफी"सँ खतम होइत अछि आ फोकस मात्र आ मात्र खिलाड़ी रहैत छथि। तहिना "विदेह मोनोग्राफ" मात्र आ मात्र ऐ "सातो रचनाकार"पर केन्द्रित रहत आ कोनो संस्मरण आदि जोड़ि कऽ फोकस रचनाकारसँ अपनापर केन्द्रित करबाक अनुमति नै रहत। (२) मोनोग्राफ लेल "विदेह पेटार"मे उपलब्ध सामग्रीक सन्दर्भ सहित उपयोग कयल जा सकैए। (३) विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' ई-पत्रिकामे प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। (४) "विदेह मोनोग्राफ"क फॉर्मेट: रचनाकारक परिचय (रचनाकारक जन्म, निवास-स्थान आ कार्यस्थलक भौगोलिक-सांस्कृतिक विवेचना सहित) आ रचनावली (समीक्षा सहित)। घोषणा: "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत (१) राजनन्दन लाल दास जी पर मोनोग्राफ निर्मला कर्ण, (२) रवीन्द्र नाथ ठाकुर पर मुन्नी कामत आ (३) केदार नाथ चौधरी पर प्रेम मोहन मिश्र द्वारा लिखल जायत। मैथिली पुत्र प्रदीप पर "विदेह मोनोग्राफ" लिखताह प्रेमशंकर झा "पवन"। शेष ५ गोटेपर निर्णय शीघ्र कएल जायत। घोषणा २: ओना तँ मैथिली पुत्र प्रदीप पर विदेह विशेषांक नै निकालने अछि, मुदा हुनकर अवदान केँ देखैत प्रेमशंकर झा "पवन"क हुनका ऊपर "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक विचार आयल तँ ओकरा स्वीकार कयल गेल। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४ (१) विदेह द्वारा जे विशेषांक प्रकाशित होइ छै तकर संगे विदेह ओहन लेखक-साहित्यपर अपन धेआन सेहो केंद्रित करत जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नै प्रकाशित भऽ सकल। ऐ नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- १) हम एकटा कोनो लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करब जकर भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी रहत। ऐ पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे ऐत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करत। २) ऐ शृंखलामे सुभाष चंद्र यादवपर केंद्रित "नित नवल सुभाष चंद्र यादव" एवं राजदेव मंडलपर केंद्रित "Rajdeo Mandal- Maithili Writer" प्रकाशित भेल अछि। दुनू पोथीक लोकार्पण ३१ दिसम्बर २०२२ केँ १११म सगर राति दीप जरय मे कएल गेल। ३)आगाँक घोषणा लेल http://videha.co.in/investigation.htm देखैत रही। कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) क शीर्षक भ्रामक अछि। ई हुनकर किछु सवर्ण उपन्यासकारपर किछु सिण्डिकेटेड कथित समीक्षात्मक आलेखक संग्रह अछि, २६३ पन्नाक ई पोथी हार्डबाउण्डमे लाइब्रेरीकेँ मात्र बेचल जा सकत, जतऽ ई सड़ि जायत, अमेजनसँ हम ई चारि सय पाँच टाकामे किनलौं मुदा ऐमे पाँचो पाइक सामिग्री नै अछि। एतऽ एकटा भूल सुधार अछि, एकटा गएर सवर्ण लेखक सुभाष चन्द्र यादवक उपन्यास 'गुलो'केँ बिनु पढ़ने ओ दू पाँति लिखलन्हि आ निपटा देलन्हि, ओ दुनू पाँति हम एतऽ अहाँक मनोरंजनार्थ प्रस्तुत कऽ रहल छी। अहाँ गुलो पढ़नहिये हएब, जँ नै पढ़ने छी तँ पहिने पढ़ि लिअ, कारण तखन बेशी मनोरंजक अनुभव हएत, गुलो सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। "उपन्यासक कमजोरी अछि लेखकक राजनीतिक पूर्वाग्रह। राजनीति विशेषक पक्षधरता रचनाक संग न्याय नहि कऽ पबैत अछि।" जइ उपन्यासमे राजनीति दूर-दूर धरि नै छै ओतऽ 'राजनैतिक पूर्वाग्रह' आ 'राजनीति विशेषक पक्षधरता'क तँ प्रश्ने नै छै। राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङर धूमकेतु आ यात्री प्रयुक्त केलन्हि। सुभाष चन्द्र यादव जीक 'भोट' जे २०२२मे आयल जे सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर, से राजनीतिपर अछि मुदा ओतहुओ सुभाषजीक भगता शैलीकेँ राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङरक आवश्यकता नै पड़लै। पढ़ू हमर पोथी 'नित नवल सुभाष चन्द्र यादव' जे उपलब्ध अछि ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। कमलानन्द झाक बिनु पढ़ने सुभाष चन्द्र यादवक विरुद्ध ब्राह्मणवादी जातिगत पूर्वाग्रह एकटा खतराक घण्टी अछि। जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। ई अपन बायोडाटामे गएर सवर्णसँ छीनि कऽ, समानान्तर धाराक लोकक हककेँ मारि कऽ लेल साहित्य अकादेमीक मैथिल अनुवाद असाइनमेण्टक गर्वसँ चर्चा करैत छथि। आ ई असाइनमेण्ट हिनका मेरिटसँ नै जातिगत टाइटिलसँ भेटल छन्हि, अही सभ किरदानीक एवजमे भेटल छन्हि। हिनका सन लोक लेल मैथिली बायोडेटाक एकटा पाँति अछि, समानान्तर धारा लेल जीवन-मरणक प्रश्न। आब अहाँ पुछब जे तकर प्रतिकार समानान्तर धारा केना केलक, ओ तँ कन्नारोहट नै करैए, तँ तकर उत्तर अछि हमर ३ टा पोथी जे १११म सगर राति दीप जरय मे लोकार्पित भेल ३१ दिसम्बर २०२२ केँ, वएह सगर राति दीप जरय जकरा साहित्य अकादेमी गत दस बर्खसँ गीड़ि लेबाक प्रयास कऽ रहल अछि। अहाँसँ ऐ तीनू पोथीपर टिप्पणी ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। पहिल दू पोथी मे राजदेव मण्डल आ सुभाष चन्द्र यादवक साहित्यक समीक्षा अछि जे हमर तेसर पोथी मैथिली समीक्षशास्त्रक सिद्धांतक आधारपर कएल गेल अछि। तीनू पोथीक लिंक नीचाँ देल गेल अछि। Rajdeo Mandal- Maithili Writer (Now with Supplement I & II) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (मिथिलाक्षर) मैथिली समीक्षाशास्त्र मैथिली समीक्षाशास्त्र (तिरहुता) संगमे पढ़ू कमलानन्द झा क ब्राह्मणवादपर प्रहार: दूषण पञ्जी- The Black Book दूषण पञ्जी- The Black Book (मिथिलाक्षर) -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४(२) नित नवल दिनेश कुमार मिश्र दिनेश कुमार मिश्रक 'दुइ पाटन के बीच मे' कोसी नदीक ऐतिहासिक आत्मकथा थीक, ओ मिथिलाक आन धार सभक ऐतिहासिक आत्मकथा सेहो लिखने छथि जेना बन्दिनी महानन्दा, बागमती की सद्गति!, दुइ पाटन के बीच में.. (कोसी नदी की कहानी), न घाट न घर, बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी, भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूंक, The Kamla River and People On Collision Course, Bhutahi Balan- Story of a ghost river and engineering witchcraft, Refugees of the Kosi Embankments। साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य पंकज झा पराशर द्वारा हिनकर पोथी सभसँ पैराक पैरा मैथिली अनुवाद कऽ अपना नामे उपन्यास छपबाओल गेल अछि, जकरा छद्म समीक्षक कमलानन्द झा ऐ चोर लेखकक रिसर्च कहै छथि! एतऽ स्पष्ट कऽ दी जे ई चोर लेखक आ छद्म समीक्षक दुनू अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालयक हिन्दी विभागमे छथि। ई रिसर्च दिनेश कुमार मिश्रक थीक, जे आइ.आइ.टी. खड़गपुरसँ सिविल इन्जीनियरिङ मे बी. टेक. १९६८मे आ स्ट्रक्चरल इन्जीनियरिङमे एम.टेक. १९७०मे केने छथि, आ ओइ रिसर्च लेल क्वालिफाइड छथि। जखन कोनो विषयमे नामांकन नै होइ छै तखन लोक हारि-थाकि हिन्दीमे नामांकन लइए, नै तँ कमलानन्द झा केँ बुझऽ मे आबि जइतन्हि जे ई रिसर्च कोनो सिविल इन्जीनियरेक भऽ सकैत अछि, भऽ सकैए बुझलो होइन्ह। हिन्दी मूल आ मैथिलीक स्क्रीनशॉट आँगा संलग्न अछि। दिनेश कुमार मिश्र मिथिलाक नै छथि मुदा मिथिलाक सभ धारक कथा ओ लिखने छथि, हम सभ हुनका प्रति कृतज्ञ छी आ हुनकर ऋणसँ मिथिलावासी कहियो उऋण नै भऽ सकता, मुदा मूलधाराक पुरस्कार आ पाइ लोलुप लोकसँ कृतघ्नते भेटत से फेर सिद्ध भेल। ऐ लेखककेँ दस बारह बर्ख पहिने सेहो तारानन्द वियोगी उद्धारक भेटल छलखिन्ह जे लिखने रहथिन्ह जे ओ कवितामे प्रभावित भऽ अनायासे अपन रचनामे दोसरक सामिग्री चोरि कऽ लइ छथि, एहने सन। आब ऐ कमलानन्द झा क आश्रय तकलन्हि मुदा दुर्भाग्य! जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। सीलिंगसँ बचबा लेल जमीन-जत्थाबला लोक कम्यूनिस्ट बनला आ आब ब्राह्मणवाद बचेबालेल वामपंथक शरण, एहेन लोक सभसँ कम्यूनिज्मकेँ बहुत नुकसान भेल छै। दिनेश क़ुमार मिश्रक सभटा पोथी आब हुनकर अनुमतिसँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमेः http://videha.co.in/pothi.htm एतऽ एकटा गप मोन पाड़ि दी जे जखन बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे की ओ एक्स बॉक्स भारतमे पाइरेशीक डरसँ देरीसँ आनि रहल छथि? तँ हुनकर उत्तर रहन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेशीक डरे कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। से विदेह पेटारमे हम सभ ऐ तरहक रिस्क रहितो एकरा आर समृद्ध करैत रहब, कारण समानान्तर धारामे सड़ल माँछ द्वारे पोखरिक सभ माँछ नै सड़ैए, एतुक्का मलाह गोट-गोट कऽ सड़ल माँछ निकालैत रहल छथि, निकालैत रहता। सिण्डीकेटेड समीक्षापर अन्तिम प्रहार। मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): यह ध्यान देने की बात है कि 1923 से 1946 के बीच कोसी क्षेत्र में मलेरिया से 5,10,000, कालाजार से 2,10,000, हैजे से 60,000 तथा चेचक से 3,000 मौतें (कुल 7,83,000) हुईं। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०३)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 12वीं शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था और इस काम के लिए उसने प्रजा से 'बीर' की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर बांध' कहलाया। इस तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (1810-11) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (1877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था कि इस तटबन्ध का निर्माण कार्य एकाएक रोक दिया गया होगा। छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा चोर उपन्यासकारक पीठ ठोकब, देखू छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा उद्धृत चोर पंकज झा पराशर (मैथिली उपन्यास, समय, समाज आ सवाल पृ. २५७-२५८): चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. ३१)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): कोसी के प्रवाह कि भयावहता की एक झलकफिरोजशाह तुगलक की फौज के सन् 1354 में बंगाल से दिल्ली लौटने के समय मिलती है। बताया जाता है कि जब सुल्तान की फौजें कोसी के किनारे पहुँचीं तो देखा कि नदी के दूसरे किनारे पर हाजी शम्सुद्दीन इलियास की फौजें मुकाबले के लिए तैयार खड़ी हैं। यह वही हाजी शम्सुद्दीन थे जिन्होंने हाजीपुर तथा समस्तीपुर शहर बसाये थे। फिरोज की फौजें शायद कुरसेला के आस-पास किसी जगह पर कोसी के किनारे सोच में पड़ गईं। नदी की रफ्तार उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही थी। आखिरकार फैसला हुआ कि नदी के साथ-साथ उत्तर की ओर बढ़ा जाय और जहाँ नदी पार करने लायक हो जाय वहाँ पानी की थाह ली जाये। सुल्तान की फौजें प्रायः सौ कोस ऊपर गईं और जियारन के पास, जो कि उसी स्थान पर अवस्थित था जहाँ नदी पहाड़ों से मैदानों में उतरती थी, नदी को पार किया। नदी की धारा तो यहाँ पतली जरूर थी पर प्रवाह इतना तेज था कि पाँच-पाँच सौ मन के भारी पत्थर नदी में तिनकों की तरह बह रहे थे। जहाँ नदी को पार करना मुमकिन लगा उसके दोनों ओर सुल्तान ने हाथियों की कतार खड़ी कर दी और नीचे वाली कतार में रस्से लटकाये गये जिससे कि यदि कोई आदमी बहता हुआ हो तो इस रस्सों की मदद से उसे बचाया जा सके। शम्सुद्दीन ने कभी सोचा भी न था कि सुल्तान की फौजें कोसी को पार कर लेंगी और जब उस को इस बात का पता लगा कि सुलतान की फौजों ने कोसी को पार करने में कामयाबी पा ली है तो वह भाग निकला। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०५)]: (... शीघ्र अही लिंकपर आर स्क्रीनशॉट अपडेट कएल जायत।) विदेहक ३६३ म अंक दिनांक ०१ फरबरी २०२३ सँ प्रारम्भ... नित नवल दिनेश कुमार मिश्र http://videha.co.in/ विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) पर। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४ (३) नित नवल सुशील कमलानन्द झाकेँ हम किए छद्म समीक्षक कहलियनि? कारण ओ छद्म समीक्षक छथि। ओ लिखै छथि- "मैथिली उपन्यास-यात्राक लगभग सय वर्षक बाद मैथिल अन्तरजातीय विवाहक सपना, संघर्ष आ विडम्बना पर गरिमायुक्त उपन्यास लिखबाक श्रेय गौरीनाथकेँ जाइत छनि।" तँ की कमलानन्द झा सुशीलसँ ई श्रेय छीनि लेलनि? की ई हुनकर ब्राह्मणवादी संस्कारक अहंकार- जे हम ककरो चढ़ा सकै छिऐ आ ककरो उतारि सकै छिऐ- केर पराकाष्ठा थीक, आकि हुनकर अध्ययनक अभावक प्रमाण? चलू अहाँकेँ लऽ चली कमलानन्द झा केर स्वार्थी दुनियाँसँ दूर, छल-छद्मसँ दूर सुशीलक जादूबला साहित्यक निश्छल दुनियाँमे। अहाँक स्वागत अछि सुशीलक साहित्यक दुनियाँमे। प्रस्तुत अछि सुशीलक 'गामबाली' (१९८२) जे आब उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमे लिंक http://videha.co.in/pothi.htm पर। पहिल पाँतीमे उपन्यास आरम्भसँ पहिनहिये 'गामबाली' उपन्यासक सम्बन्धमे सुशील लिखै छथि- "विधवा विवाह आ अन्तर्जातीय विवाहक समर्थनमे।" आ उपन्यास आरम्भ। गामबालीक मृत्यु आ तखने झमेला, गामबालीक दाह संस्कार के करतै? ब्राह्मण समाज कि जादव समाज? मैथिलीक सिण्डीकेटेड समीक्षापर अन्तिम प्रहार। विदेहक ३६३ म अंक दिनांक ०१ फरबरी २०२३ सँ प्रारम्भ... नित नवल सुशील http://videha.co.in/ विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) पर। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ५ विदेह ब्रॉडकास्ट लिस्ट विदेह WWW.VIDEHA.CO.IN सम्बन्धी सूचना लेल अपन whatsapp नम्बर हमर whatsapp no +919560960721 पर पठाउ, ओकर प्रयोग मात्र विदेह सम्बन्धी समाचार देबाक लेल कएल जाएत। ६ विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १. साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका (घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २. व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३. प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५. स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७. लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८. दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६३ म अंक ०१फरबरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८२ अंक ३६३)|| 215 214 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA

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भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 2c शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था. और इस काम के लिए उसने प्रजा से ‘dk’ की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर ate’ कहलाया। इस 'तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (7870-7) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था. कि. इस. cere का... निर्माण... कार्य एकाएक . रोक. दिया... गया... होगा।

USA HA WS गप के AM बढ़बेत कहलखिन, ' फूल बाबू, कोसी नदीक बेसिन प्राचीन काल सँ मनुक्खक निवास लेल उपयुक्त स्थान रहल अछि। बारहम-तेरहम सदी मे भारत मे जखन कइक टा नदी सुखा गेल, तँ ओहि ठामक पशुचारक समाजक लोक एतय आबि कए बसलाह। तहिये सँ बढ़ैत जनसंख्या आ कोसी नदीक बदलैत प्रवाहक मध्य टकराहटि होमय लागल | नदीक अनियंत्रित धारा केँ लोक बाढ़ि बूझय लागल | पहिल बेर बारहम शताब्दी मे लक्ष्मणसेन द्वितीय कोसी ade पुबरिया किनार दिस ore बनौलनि | लक्ष्मणसेन द्वितीय बंगाल के सेन वंशक शासक छलाह, F778 सँ 7205 Heat धरि शासन कयनेँ छलाह। Ue बान्हक अवशेष sel एखनो भीमनगर सँ दू कोस पश्चिम मे देखि wha छी। एकटा पश्चिमी विद्वान फ्रांसिस बुकानन के अनुमान रहनि, जे ई are संभवत: कोनो किला के रक्षा हेतु बनाओल गेल होयत | मुदा बुकानन के मत SF Se, डब्लू. हंटर सहमत नहि भेलखिन। ओ साफ कहलखिन, जे कोसीक किनार पर are एहि दुआरे बनाओल गेल होयत, जे नदी पच्छिम दिस नहि ae’ लागय।' पढ़आ कका सँ मुँहजबानी wie रास ऐतिहासिक तथ्य सुनियो कए फूल बाबू सहमति मे मूड़ी नहि डोलेलखिन | जाहि सँ ओतय बैसल लोक सबहक उत्सुकता और बढ़ि गेलनि, जे गप मे एहेन कोन तथ्य Ue गेलै जे फूल बाबू संतुष्ट नहि भेलखिन ? लोक के बुझेलनि जे फूल बाबू शास्त्रार्थ के अखड़हा पर माटि फेकि teat छथिन। पढ़आ कका केँ आइ जोड़ीदार भेटि गेलनि! जलप्रांतर / 3l

हि. कवका जा फूल MS TA पढ़ल-लिखल आ सचेत पात्रक में ra aga कका कहैत छथिन, TATE बेर बारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन eter बंगाल के सेन वंशक शासक BAe जे 78% 205 ई. घरि शासन ली उपन्यास : समय समाज आ सवाल + 257 ही . = - हिन्दी विभागमे प्रोफेसरक पद पर Fre

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गे पंकज पराशरक पहिल उपन्यास “जतप्रांतर' (20i7) शोधपरक _ sore अछि। मैथिलीमे शोधपरक उपन्यास लिखबाक परम्परा Ale रहल _अछि। एहि दुआरे ई उपन्यास रेखांकन योग्य अछि । पराशरजी ue _उपन्यासमे कोसी नदीक aren इतिहास-कथा लिखलनि अछि। उपन्यासक बैशिष्ट्य ई जे बारहम शताब्दीसँ ल' क' आधुनिक काल धरि कोसी पर बान्ह ah दुसाध्य प्रयत्न, प्रशासनिक उठा-पटक, राजनीतिक cata Mee विस्तृत व्योरा रोचक कथाक माध्यम कहलनि aS | ध्यान देबाक तल ई जे सभटा सूचना आ व्योरा अत्यन्त विश्वसनीय oft पड़ल अछि। का आ फूल बाबू सदृश्य पढ़ल-लिखल आ सचेत पात्रक माध्यम नुसन्धानकें रखलनि अछि। दलान पर बैसल लोकक जिज्ञासाकें कका कहैत छथिन, “पहिल बेर बारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन fe पुबरिया किनार दिस are बनौलनि। लक्ष्मण सेन बुंशक शासक छलाह जे L78e 205 ई. धरि शासन

4. Beene bias

अनुलग्नक: मैथिलीमे Gar समीक्षा आ कमलानन्द झा प्रसंग ANNEXURE

| पंकज पराशर fs बुद्धिजीवी, लोक वृत्त और coat पॉलिटिक्स है बौद्धिक जगत में इन दिनों बुद्धिजीवियों का वर्गीकरण भी विवाद का विषय बनता जा रहा है। जिगमेंट बोमन बुद्धिजीवियों को समाज की एक ऐसी इकाई के रूप में देखते हैं जो सामाजिक संस्थाओं की सेवा करने के लिए वैश्विक मूल्यों का विधेयन करते हैं । इस वर्ग के बुद्धिजीवियों के बारे में ऐसा माना जाता है किये बुद्धिजीवी अपनी योग्यता के आधार पर आम जनमानस के लिए मानवाकृतियों, लोक में घटित घटनाओं आदि की बेहतर व्याख्या प्रस्तुत करते हैं । अमेरिकी बौद्धिक जगत में इन दिनों बुद्धिजीवियों की भूमिका को लेकर जो गरमा-गरम बहस छिड़ी हुई है उनमें से एक धड़े का मानना है कि फिलवक्त जो सामाजिक और वैश्विक हालात हैं उसमें बुद्धिजीवियों की स्थिति में आधुनिक बुद्धिजीवियों से लेकर उत्तर आधुनिक बुद्धिजीवियों तक में बदलाव आया है । दिलचस्प यह है कि पश्चिम के बुद्धिजीवियों में जैसे ही यह बदलाव आया उसका त्वरित असर हिंदी के उन उत्तर-आधुनिक बुद्धिजीवियों पर भी पड़ा, जो कुछ साल पहले तक उत्तर- आधुनिकता के भारतीय प्रवक्ता होने का दावा करते नहीं अघाते थे। जहाँ एक ओर आधुनिक बुद्धिजीवी वैश्विक मूल्यों के कार्यकारी इकाई के तौर पर नई आधुनिक समाज-व्यवस्था का विधेयन करते हैं वहीं दूसरी ओर इस प्रकार सामाजिक जीवन में बुद्धिजीवियों की भूमिका के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत का भी प्रतिपादन करते हैं । नोम चोम्स्की के बाद की पीढ़ी में वामपंथी रुझान के कवियों/विचारकों और बुद्धिजीवियों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी जारी है । लुश प्रशासन अपनी तमाम नीतियों को लेकर पनप रहे असंतोष और मुखर होते ग्रतिरोधी स्वर को लेकर भी हैरान-परेशान है । गौरतलब है कि 2003 में इराक हमले की पीठिका बनते समय भी वहां के बुद्धिजीवियों ने बुश प्रशासन की आलोचना की थी और आज आम जनता वहाँ से अमेरिकी सैनिकों की अविलंब वापसी की मांग कर रही है । मगर राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू. बुश के सिपहसालारों ने इन 'विरोधों की न तब परवाह की और न अब ऐसा लगता है कि उन पर कोई खास असर पड़ा है । अमेरिका स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर डगलस कैलनर ने कुछ वर्ष पूर्व, 2005 के आखिर में छपी अपनी किताब ' मीडिंया स्पेक्टैकल्स एंड द क्राइसिस ऑफ डेमोक्रेसी ' में इन मुद्दे पर जोरदार बहस की है कि इन दिनों मीडिया में जिन मुद्दों को जनहित के नाम पर उठाया जा रहा है वह असल में जनहित के वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की एक शातिर चाल है 9/7 के बाद मीडिया ने जिस तरह से अपना चेहरा और चाल दोनों को बदला है - कैलनर खास तौर पर इससे चिंतित होते हैं और बुद्धिजीवियों के बीच खास- पहल - 86 25

खास बिन्दुओं पर चिंतन का आह्वान करते हैं । इसी तरह “द वार फॉर द व्हाइट हाउस' किताब में वे अमेरिकी विदेश, रक्षा और आर्थिक नीतियों की गंभीरता से नये-नये तथ्यों की रोशनी में न सिर्फ आलोचना करतें हैं बल्कि खासी मज़म्मत भी करते हैं । अभी हाल ही में छपी वाशिंगटन Shalt. के बाशिंदे मिखाइल मैकडोनाल्ड की 'द अमेरिकन sete नामक छपी किताब में खास तौर पर अमरीकी हितों और वैशिवक परिदृश्य की पड़ताल की गई है । उन्होंने एक और बेहद दिलचस्प किताब “द स्ट्रेंजर इन क्राउफोर्ड' में जार्ज बुश और कालजयी फ्रेंच उपन्यासकार A कामू के बीच तुलना करते हुए एक किताब ही लिख मारी है । बहरहाल, असली मुद्दा यह है कि मीडिया की बदली प्राथमिकता और चाल की बेहतर समीक्षा प्रस्तुत करते हुए डगलस कैलनर ने ‘cal पॉलिटिक्स' जैसी शब्दावली के सहारे बुद्धिजीवियों की भूमिका और नई-नई आने वाली चुनौतियों को रेखांकित किया है । बुद्धिजीवियों को दो वर्गों में वर्गीकृत करते हुए कैलनर कार्यकारी बुद्धिजीवी (फंक्शनल इंटेलेक्चुअल ) के बारे में कहते हैं, ये स्थापित सामाजिक मूल्यों का उत्पादन और विधेयन करते हैं । जबकि इसके ठीक विपरीत विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी (फ्रिटिकल-अपोजीशनल इंटेलेक्चुअल ) स्थापित सामाजिक व्यवस्था का विरोध करते हैं । कभी -कभी विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी समाज में मौजूद मूल्यों के खिलाफ ही अपनी आवाज बुलंद करते हैं और ऐसा मानकर चलते हैं कि इन मूल्यों का समाज में दबदबा बढ़ रहा है | मसलन कानून, न्याय, सत्य और अधिकार आदि। ऐसे बुद्धिजीवी कई बार और भी गंभीर मुद्दों का विरोध करते हैं - जैसे लोकतंत्र, समाजवाद, अश्वेत लोग और स्त्रियों की समानता आदि। कार्यकारी बुद्धिजीवी पहले रूढ़ और काफी हद तक आदर्शवादी थे, जबकि आज उन वर्गों और तकनीकविदों के हितों के संरक्षक बने हुए हैं जो परिणामों तक पहुँचने के लिए समर्थ साधनों का इस्तेमाल करते हैं । ये बुद्धिजीवी अपनी क्षमताओं को विभिन्न क्षेत्रों, जैसे दवा, भौतिक विज्ञान और अतीत में मौजूद तकनीकी ज्ञान को बढ़ाने के लिए करते हैं । बिना नतीजे की ओर उँगली उठाये और किसी चीज की परवाह किये बगैर वे जिन मूल्यों की स्थापना और वापसी के लिए प्रयत्नशील रहते हैं - उसकी उपयोगिता और अनुपयोगिता पर आज विमर्श करना बहुत आवश्यक है । कार्यकारी बुद्धिजीवी समाज को बेहतर बनाने ( अपने तरीके से ) के लिए तकनीकी जानकारियों में दक्षता हासिल करते हैं, वहीं विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी आलोचक सामाजिक बेहतरी के लिए संघर्षरत हैं । देश-विदेश में ऐसे बुद्धिजीवियों की एक लंबी thefts है जिन्होंने आंदोलनों में न सिर्फ शिरकत की, बल्कि ता-उम्र के लिए उससे जुड़ ही गए । तेलुगू में वरवर राव, अंग्रेजी में अरुंधति राय, बांग्ला में महाश्वेता देवी आदिं लेखकों-बुद्धिजीवियों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है । विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी परंपरागत तौर पर अपने ज्ञान और लेखन का प्रयोग अन्याय, शक्ति के दुरुपयोग, सत्य के लिए संघर्ष और अन्य वैशिवक मूल्यों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए करते हैं । ज्याँ पॉल सार्त्र के शब्दों में कहें तो, '' विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी का कार्यक्षेत्र आम जनता तक सीमित है ।'' सारत्र के इस कथन के आधार पर एक विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी का काम समाज की विभिन्न कुरीतियों का विश्लेषण करना तथा उनको और अधिक FSU प्रदान करना है । यह बुद्धिजीवी के शाब्दिक हथियार हैं जिनके जरिये उन्हें समाज में कहीं भी हो रहे अन्याय का विरोध करना है | हेबरमास (989) के कथन की रोशनी में अगर देखें at आधुनिक समय में विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी का कार्यक्षेत्र आम जनता से जुड़े मुद्दे राजनीतिक वाद-विवाद और विभिन्न किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में छपी चीजों पर लिखना और विमर्श करना है ।'' हालांकि सभी विरोधी खेमे के बुद्धिज्नीवी वैचारिक रूप से प्रगतिशील नहीं हैं, बावजूद इसके समाज के आधुनिक होने से बुद्धिजीवियों की भौतिक और मानसिक दशाओं में तब्दी लियाँ आई हैं । इन दिनों बुद्धिजीवी वे लोग हैं जो नये विचारों और नये 26 पहल - 86

| संस्कारों को पैदा करने में माहिर होते हैं । इनमें से भी कुछ बुद्धिजीवी वर्तमान समाज का समर्थन करते हैं तो कुछ उसका विरोध करते हैं । शायद इन वजहों से भी बुद्धिजीवी, कार्यकारी और विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी के रूप में de गए । कार्यकारी बुद्धिजीवी जहाँ एक तरफ समाज की सेवा तकनीकी जानकारियों से करते हैं वहीं नये आदर्श पैदा करके वर्ग, रंग और लिंग को वैधता प्रदान करते हैं । कहना न होगा कि अपने देश में भी सांप्रदायिक शक्तियों के सत्तासीन होते ही ऐसे-ऐसे ay खाँ, * बुद्धिजीवी ' का बिल्ला लगाये हुए कभी “वाजपेयी aera’ बना रहे थे, तो कभी उनकी कविताओं को नये-नये ' रागों ' में गाकर सत्ता की आराधना में aaa दिखा रहे थे - अभूतपूर्व समाजवादियों के समर्थन पर टिकी भाजपा राज के समय। विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी अन्यायी और शोषकों के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं । जबकि विरोधी खेमे के परंपरागत बुद्धिजीवी उत्तर आधुनिक सिद्धांतों द्वारा पैदा की गई चुनौतियों के साथ-साथ नई तकनीकों द्वारा तलाशी गई लोकतांत्रिक बहसों की संभावनाओं पर चर्चा करना मुफीद समझते हैं । यह सारी बातें विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी और उनकी भूमिका को ठीक से पुनर्परिभाषित करने की माँग करता है । लोकक्षेत्र ( पब्लिक स्फीयर ) और बुद्धिजीवी अगर मूल परिभाषा पर नजर दौड़ाएं तो लोकतंत्र मूलतः सत्ता के विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ सरकारी मामलों में जनता की भागीदारी का नाम है । पुनर्जागरण और 8 वीं शताब्दी की राजनीतिक क्रांति के काल में एक ऐसा लोकक्षेत्र उभरकर सामने आया जहाँ आम आदमी अपने से जुड़े मुद्दों पर बहसें कर aerator दिलचस्प यह है कि उस काल में सरकार की आलोचना खास तौर पर आम जनता तक पहुँचाई जाती थी । खुद को अभिव्यक्त करने का साधन बना अखबार और पत्र-पत्रिकाएं । उस वक्‍त तत्कालीन प्रेस | की आजादी आम जन को काफी कुछ सही रूप से चीजों को जानने-समझने का रास्ता फराहम कराती थी । वैचारिक आदान-प्रदान के लिए लोग कॉफी हाउस, पान की दुकान, नाई की दुकान आदि जगहों पर बैठा करते थे और वहीं विभिन्न मुद्दों पर चर्चाएं छिड़ जाती थीं । दुखद यह है fH Gai समाज के टूटने के बाद | तमाम लोगों ने अपनी-अपनी पार्टियाँ बना लीं, संस्थाएं बना लीं और विचारधाराएं विकसित कर लीं । बकौल | डगलस कैलनर, “* आम जनता को रिझाने के लिए विभिन्न पार्टी और संस्था के लोग लिखने लगे और खुद को | खुद के ही द्वारा बुद्धिजीवी का दर्जा दे दिया । देखते-देखते शोषित वर्गों ने भी अपने बुद्धिजीवी पैदा कर लिए | | हालांकि ये बुद्धिजीवी विद्रोही विचारधारा के थे और शोषकों के मुकाबले शोषितों के बुद्धिजीवियों में खास ara यह थी, वे समाज के सारे तबके का प्रतिनिधित्व करते थे।'' ध्यान रहे कि मेरी वोलेस्टोनक्राफ्ट जैसी | महिलाओं ने महिला अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की थी । शोषित वर्ग के विद्रोही विचारधारा वाले इन |... बुद्धिजीवियों ने दमन और उनके कारणों के खिलाफ तो आवाज बुलंद की ही साथ ही इसके हल के लिए | > इनके समाधानों को सिद्धांत से उठाकर वास्तविकता के धरातल पर प्रयोग करने की बात कही | इसलिए 9 वीं शताब्दी में कर्मचारी वर्ग के लोगों ने शोषकों के खिलाफ अपना एक अलग ही लोकक्षेत्र विकसित किया। यूनियन हॉलों, दफ्तरों, सार्वजनिक स्थानों में इनकी सभाएं, चर्चाएं होने लगीं । इसी दौर में बकौल जुरगेन हेबरमास, “' अमेरिका और यूरोप में पनप रहे लोकतंत्र और श्रमिक आंदोलनों ने एक वैकल्पिक प्रेस को जन्म दिया। इसके साथ ही हड़ताल और बैठकों जैसी चीज ने शोषक-विरोधी लोकक्षेत्र को एक नया मंच ... प्रदान किया।'' आधुनिक समाज के बुद्धिजीवियों में विरोधाभासी रूप से सामाजिक कार्यों को लेकर हमेशा एक मतभेद बना रहा । पारंपरिक रूप से विरोधी खेमे के बुद्धिजीवियों जैसे टॉमस पेन, मेरी वोलेस्टोनक्राफ्ट और बाद में मार्क्स, ह्यूगो, act और मा्क्वेज जैसे लोगों ने पुनर्जागरण के दरम्यान अन्याय और शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की । इसके बावजूद संकीर्ण विचारों के बुद्धिजीवियों ने पुनर्जागरण और पहल - 86 प27

फ्रांसीसी क्रांति की कामयाबियों पर हमला करते हुए कुछ इस तरह का इजहार-ए-खयाल किया जिसके तहत वर्ग, लिंग और रंग के नाम पर दमन और उत्पीड़न को जायज ठहराया गया। इन बुद्धिजीवियों के विरोध में मिशेल फूकों ने शिकायत की थी, “ant ने एक आदर्शवादी नमूना प्रस्तुत किया है, जो बुद्धिजीवियों को वैश्विक मूल्यों, मसलन, सत्य, अहिंसा, आजादी और मानवता आदि के लिए लड़ने की सलाह देता है।'' फूको ने इसके विरोध में विशेष बुद्धिजीवी का प्रस्ताव किया जो बिलकुल तटस्थ होकर शोषितों-उत्पीड़ितों के सवालों से जुड़े खास मुद्दों के लिए अपनी आवाज बुलंद करे। फूको का यह विचार उत्तर-आधुनिक राजनीति में प्रासंगिक हो गया और राजनीति को पार्टी की राजनीति से हटाकर सामाजिक आंदोलनों की तरफ मोड़ दिया गया | उत्तर-आधुनिक राजनीति के लिए शक्ति का विकेन्द्रीकरण जरूरी है। डगलस कैलनर कहते हैं, ''मैं यह मानता हूँ कि आलोचक बुद्धिजीवी या कहें विरोधी खेमे के बुद्धिजीवियों के कुछ विचार उपयोगी हैं । आम बुद्धिजीवी वैश्विक मूल्यों के हनन के खिलाफ आवाज sara हैं, जबकि आम लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी दूसरों के लिए आवाज उठाने के बदले व्यक्तिगत या वैश्विक मुद्दों से जुड़े खास मुद्दों पर ही अपनी राय जाहिर करते हैं।'' नतीजा यह होता है कि वर्तमान परिवेश में | लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी कहलाने के लिए वैश्विक बुद्धिजीवी के पूरे गुण होने की आवश्यकता नहीं है | कहना न होगा कि बुद्धिजीवियों को व्यक्तिगत इच्छाओं/अनिच्छाओं से ऊपर उठकर सोचना चाहिए | बिना किसी पक्षपात के अपनी 'बात कहनी चाहिए - तमाम पूर्वग्रहों को छोड़कर । इसके साथ-साथ अपनी सीमाएं जानते हुए खुद को दूसरे की जगह रखकर सोचना चाहिए। नई तकनीक, लोकक्षेत्र और नये बुद्धिजीवी कुछ मामलों में बुद्धिजीवियों और तकनीक में कोई खास संबंध नहीं होता । आज के उच्च तकनीक से संपन्न समाज में कंप्यूटर और त्वरित मीडिया युग में प्रतिबद्ध आम बुद्धिजीवियों को परिभाषित करने की जरूरत है । बीसवीं सदी की शुरुआत में जॉन fed ने ' थॉट =a नामक एक ऐसे अख़बार की परिकल्पना की थी जिसमें विज्ञान की नवीनतम खोजों और विचारों को जगह दी जाए। इसके अलावा बर्टोल्ट ब्रेख़ और वाल्टर बेंजामिन ने सिनेमा और रेडियो के क्रांतिकारी परिणामों को देखा था और दूसरे बुद्धिजीवियों से यह अपील की, कि वे इन साधनों का इस्तेमाल समाज को और अधिक लोकतांत्रिक बनाने और उसे बदलने में करें । ज्यॉँ पॉल सार्त्र ने भी रेडियो धारावाहिकों का अध्ययन किया और इस बात पर बल दिया कि प्रतिबद्ध लेखकों को भी रेडियो और सिनेमा का इस्तेमाल करना चाहिए | इससे भागना ठीक नहीं है। पहले रेडियो, टेलीविजन और दूसरी इलैक्ट्रानिक मीडिया पर तमाम तरह की बंदिशें आयद थीं | रेडियो और टेलीविजन का विवाद, बहसें, जानकारियां आदि एक नये लोक वृत्त का निर्माण करते दिखाई दे रहे हैं। डगलस कैलनर जोर देकर कहते हैं कि, ** बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वे इन माध्यमों का उपयोग करके जन मामलों में सीधे जनता की भागीदारियों को सुनिश्चित करें और एक नयी संचार राजनीति और मीडिया-परियोजनाओं का निर्माण करें "7 ः यह तथ्य अब धीरे-धीरे असलियत को काफी हद तक स्पष्ट करता जा रहा है कि आज की राजनीति में यदि कोई बुद्धिजीवी लोकवृत्त (पब्लिक स्फीयर ) में अपनी पैठ बनाना चाहता है, समाज को नई दिशा देना चाहता है - तो नई तकनीकों का उन्हें अधिक से अधिक इस्तेमाल करना चाहिए। पहले रेडियो और टेलीविजन ने एक लोकक्षेत्र का या कहें लोकवृत्त का निर्माण किया था लेकिन अब कंप्यूटर और इंटरनेट ने अपने अलग लोकवृत्त बनाये हैं । जानकारियां, aed, लोकतांत्रिक सहभागिता और विचारों को पहुँचाने के. 28 पहल - 86

| | लिए नई संभावनाओं को भी पैदा किया है । ...और यह कहना शायद गैर-जरूरी है कि इस्तेमाल में लाने से पूर्व इन तकनीकों का बारीकी से अध्ययन जरूरी है । आज के समय में बुद्धिजीवी होने का मतलब है नई तकनीकों का उपयोग करके विचारों के क्षेत्र में नई और ऊर्जस्वी विचारों की खोज, उसका संपूर्ण वितरण और इससे तैयार हुए लोकवृत्त में अपनी पूरी भागीदारी | डगलस कैलनर इस मुद्दे पर अपनी राय साफ-साफ जाहिर करते हैं, कुछ इस तरह, ** आज के | नये बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वह अपनी नीतियां इस तरह से बनाएं कि शिक्षा, लोकतांत्रिक विकास के साथ ही अपनी नीतियों को बेहतर ढंग से प्रसारित करने के लिए नई तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करें । भविष्य में जो वक्‍त आएगा उसमें बुद्धिजीवियों और नई तकनीक के बीच नाभिनालबद्ध रिश्ता बनाना अनिवार्य हो जाएगा।'' इसके बगैर नई तकनीक से भागने वाले लोग अपनी मेधा का सही इस्तेमाल कर ही नहीं पाएँगे और तब वें कैसा लोकवृत्त बनाएँगे और किस तरह के बुद्धिजीवी रह जाएंगे, यह मुद्दा बहसतलब है। नव पूँजीवादी समाज में लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह और भी आवश्यक है कि लोकतांत्रिक मीडिया राजनीति (डेमोक्रेटिक मीडिया पॉलिटिक्स) नई रणनीति के तहत की जाए | मीडिया की लोकतांत्रिक राजनीति में दो तरह की नीतियां होती हैं - पहली कार्यरत मीडिया को लोकतांत्रिक बनाना और दूसरी आम | जनता की सुविधाओं, इच्छाओं और जरूरतों के प्रति मीडिया को जिम्मेवार बनाना। मुख्य धारा की मीडिया के विकल्प के तौर पर एक विपक्षी मीडिया को तैयार करना भी आने वाली ‘Se पॉलिटिक्स ' का मुकाबला करने के लिए आवश्यक है । लोकतांत्रिक मीडिया राजनीति के लिए मुख्य धारा की पूँजीवादी मीडिया समर्थित नीतियों की तीखी आलोचना, उसमें सुधार और वैकल्पिक मीडिया का | विकास, इसकी जरूरी शर्तें हैं । मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास तभी संभव है जब एक वैकल्पिक |. प्रेस का निर्माण हो। आम जनता की पहुँच में टेलीविजन हो और एक सकारात्मक विपक्षी राजनीति के | साथ-साथ ऐसी वैचारिक gear से सम्पन्न नीतियां हों जो मुख्यधारा की मीडिया को प्रभावित करें । उसकी | नीतियों की परत-दर-परत पड़ताल करके उपयुक्त भाषा-शैली और अंदाज में बेनकाब करने का बेहतर | एजेंडा हो। | पिछले कुछ दशकों में टेलीविजन संचार माध्यम के एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। 970 में अमेरिका में हुए टेलीविजन के विकास में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के लिए नई संभावनाएं पैदा की थीं । उसने इस तरह के कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जो तत्कालीन संकीर्ण समाज की कठोर आलोचनाएं करता था - उन दिनों मुख्यधारा की मीडिया में इसकी भरमार थी | 970 में जब टेलीविजनों की संख्या में इजाफा होने लगा तब वहाँ ' फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ' का एक आदेश आया जिसके अंतर्गत 972 के बाद के नए ' केबल सिस्टम' को कम-अज़-कम एक चैनल सरकार को शिक्षा और आम आदमी को नई जानकारियां मुहैया कराने के लिए देने होंगे। शुरुआती दौर में कुछ कंपनियों ने एक चैनल मुहैया कराई तो कुछेक ने दो या तीन | ...... कई लोग ऐसा मानते हैं कि लोकतांत्रिक राजनीति में आम सहमति बनाने के लिए आमने-सामने बैठकर बातचीत करना जरूरी है लेकिन एक चतुराई पूर्ण सहमति के लिए जनता का जागरूक और जानकार दोनों होना बेहद आवश्यक है । कहना न होगा कि वर्तमान संदर्भ में यह रेडियो और टेलीविजन के * द्वारा ही मुमकिन है । यह जरूरी नहीं है कि मीडिया वर्तमान राजनीति की पूरक बने लेकिन मीडिया राजनीति Hl बढ़ावा अवश्य दिया जाना चाहिए ताकि इसके माध्यम से जागरूक और जानकार लोग सूचनाओं को | पहल - 86 429

अधिक-से-अधिक लोगों तक प्रसारित कर सकें | अमेरिका के टेक्सास राज्य में * काउंसिल फॉर पब्लिक मीडिया' अपने कार्यकर्ताओं और आमजनों को यह बताता है कि नई तकनीक और कम्प्यूटर वगैरह का इस्तेमाल अपने विचारों को ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए कैसे करें ? मीडिया राजनीति में ज़्यादा लोगों की भागीदारी, राजनैतिक संरचना की इसकी आवश्यकताओं को दर्शाती है । इसलिए आज नव | पूँजीवाद और भूमंडलीकृत शोषण के हथियारों को मात देने के लिए मीडिया राजनीतिं को और अधिक विकसित करने की जरूरत है - साथ ही इसके लिए और अधिक मेहनत करने की जरूरत भी है । | अगर कोई विकासशील समूह या आंदोलन से जुड़े आंदोलनकर्मी वर्तमान राजनीतिक माहौल में | * अधिकारों ' का कोई विकल्प तलाश करना चाहते हैं तो हर हाल में उन्हें अपनी बात अधिक-से-अधिक | लोगों तक पहुँचानी होगी और खुद से ज़्यादा-से-ज्यादा लोगों को जोड़ना होगा। आखिर ज्यादातर लोग | समाचार और अन्य अनेक सूचनाएं टेलीविजन से ही प्राप्त करते हैं । प्रसार माध्यम ही आम जनता के विचारों | को बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है और यह तय करता है कि किस चीज को गंभीरता से लें और. किसको गंभीरता से नहीं लें । अगर वैकल्पिक विकास के यूटोपिया से लैस लोग राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं तो उन्हें नई तकनीकों को ध्यान में रखकर ही अपनी नीतियों का निर्माण करना पड़ेगा । लोकतांत्रिक समाज. के निर्माण और विकास में ' टैक्नो पॉलिटिक्स' को बढ़ावा देने के लिए कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी नई-नई संभावनाएं पैदा करता जा रहा है । ऐसा लगता है कि आने वाले समय में घर- घर में मनोरंजन और जानकारियों का भंडार होगा - मगर वे भारतीय नागरिक हर चीज की तरह इससे भी stad: वंचित रह जाएंगे जो आज भी दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्षरत हैं और कल भी संघर्ष से शायद नहीं उबर पाएंगे। यह सारा ताम-झाम अंतत: इन मध्यवर्गीय नागरिकों को फायदा पहुँचाएगा जिन्हें मूलभूत आवश्यकताओं के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है । दूसरी चिंता इसके साथ यह जुड़ी हुई है कि अगर वैकल्पिक विचारों वाले मीडिया का विकास नहीं हुआ तो इसका उपयोग वही कर पाएंगे जो आर्थिक रूप से बेहद मजबूत स्थितियों में होंगे । नतीजा यह होगा कि गरीब मुल्कों के लोग किसी भी तरह इसका लाभ नहीं उठा पाएंगे | नाइजीरिया, कांगो गणराज्य और दक्षिण अफ्रीकी मूल के लोगों की इस तक पहुंच हो ही नहीं सकेगी | भारत के ' हिंदी पट्टी ' के लोग तो आज भी छोटी-से-छोटी जानकारियां नहीं पा सकते हैं । फलस्वरूप, इन निजी मनोरंजन माध्यमों का विकल्प Gor जरूरी होता जा रहा है । आज के इस cat पूँजीवादी समाज में कंप्यूटर और प्रौद्योगिकी की बढ़ती महत्ता विकासशील मीडिया की जरूरत के रूप में उभरा है । पूरी दुनिया कंप्यूटरीकृत होने जा रही है और आनें वाले वक्‍त में जिस देश के नागरिक की इस दुनिया तक पहुँच और दखल नहीं होगी वे हर तरीके से दुनिया में रहकर भी किसी और दुनिया के वासी में तब्दील होते चले जाएंगे | गरीब मुल्कों की सरकारें जिस तरीके से बहुराष्ट्रीय पूँजी के आकाओं और पूंजीवादी मीडिया के सेठों को अपने यहाँ बुलाकर मनचाहे तरीके से काम करने के लिए सारी . सुविधाएं उपलब्ध करवा रही हैं उसके कारण भी जनता अपनी मूलभूत जरूरत की चिंताओं में ही गर्क है। उन्हें यह सोचने और जानने का मौका ही उपलब्ध नहीं करवाया जा रहा है कि हमारा आनेवाला वक्‍त कैसा होगा और हमारी सरकारें किस तरह की दुनिया बनाने वालों के साथ हैं, सहयोगी हैं ? इसलिए निजी कंपनियों और सरकारों के एकाधिकार से बचने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि नये-नये जानकारी केन्द्रों की *. स्थापना की जाए ताकि लोकतांत्रिक समाज में अपनी सहभागिता को सुनिश्चित किया जा सके | कंप्यूटर अपनी क्षमताओं के कारण अंततः एक लोकतांत्रिक तकनीक है, जहां प्रसारण के माध्यम मात्र "बन वे ट्रैफिक ' हैं वहीं कंप्यूटर और इंटरनेट द्विपक्षीय माध्यम है | कंप्यूटर, इंटरनेट, चैटिंग आदि का उपयोग आम जनता एक दूसरे से बातचीत करने के लिए कर सकती है। मोडेम और टेलीफोन लाइनों की 430 पहल - 86

सहायता से तमाम लोग - जो इससे जुड़े हैं, जुड़ सकते हैं - वे लोग तमाम मुद्दों पर विमर्श कर सकते हैं । इस तरह यह एक नये संसार और प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है । वर्तमान समय में जन सरोकारों से जुड़े लोगों के | लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वे ऐसे कार्यक्रमों से जुड़कर, इस दुनिया में प्रवेश करके गरीब मुल्कों ।..... की व्याख्या प्रस्तुत करें, जिससे उन दमित और शोषित तबकों तक भी इसका लाभ पहुंच सके - जो आज | तक तो वंचित हैं ही और सरकार की जैसी नीतियाँ हैं, राजनीतिज्ञों की जो कार्य शैली और प्रतिबद्धताएं हैं | उससे आगे भी दुनिया में हो रही हलचलों से वे वंचित रहेंगे । ' टेवनो पॉलिटिक्स' में शामिल विरोधी खेमे के | बुद्धिजीवियों पर ही अंतत: यह जिम्मेदारी आयद होती है कि वे एक वास्तविक लोकवृत्त के निर्माण के लिए | जन-जन तक सूचनाएं अपने-अपने तरीके से पहुँचाएं। सहायक ग्रंथ . . फ्रेडरिक जेमसन : ए क्रिटिकल रीडर, सं. डगलस कैलनर एंड सीन होमर, 2004 2. मीडिया स्पेक्टेकल्स एंड द क्राइसिस ऑफ डेमोक्रेसी : डगलस कैलनर, 2005 3. मीडिया कल्चर : कल्चरल स्टडीज, आइडेंटिटी एंड पॉलिटिक्स बिटवीन द मॉडर्न एंड द पोस्ट मॉडर्न : डगलस कैलनर (7995) | 4. . द रोल ऑफ पब्लिक इंटेलेक्चुअल : एलन लाइटमैन । | 5. © स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉरमेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर : एन इनइविवटी इंटू ए कैटेगरी ऑफ बुूर्ज्वाजी सोसाइटी, जुरगेन | हेबरमास, 997, अनुवाद : थॉमस बर्जर, एम.आई.टी. प्रेस । 6. ARS, Fras, एंड द पब्लिक स्फीयर : माइक हिल, वारेन AM, Fal, 2007 7. पावर एंड पॉलिटिक्स इन ग्लोबलाइजेशन : द इंडिस्पेंसबल स्टेट : होवार्ड wa. लैन्टर, 2004 8. रूल ऑफ एक्सपर्ट्स : इजिप्ट, teh पॉलिटिक्स, मॉडर्निटी : टिमोथी मिथेल, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस, 2002 | | | | पंकज पराशर प्रायः, महत्वपूर्ण किताबों को लेकर ‘see’ में लिख रहे हैं। नोम चोम्स्की के बाद पूंजीवादी दुनिया में वामपंथी रूझान बढ़ने के दृश्य पर वे विस्तृत काम कर रहे हैं । नोम चोम्स्की की ताज़ा किताब ‘thes स्टेट्स' पर अगले अंक में संपादकीय टिप्पणी पाठक पढ़ सकेंगे। पहल - 86 3

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आ Way se at निरन्तर अस्पष्ट Wa जा रहेल-ए निरन्तर बाढ़िमे आस्ते-आस्ते saa al अंतत: चक्कड़म होइत घर जकाँ al atise Fa जा रहल-ए | ata खत wWaF | गाममे साँझे wa at fadta Fa जा रहल-ए ) आस्ते - आस्ते = ) aed ~ atta = | aed = ater जा

नये इलाके में इन नये बसते इलाकों में जहाँ रोज बन रहे हैं नये नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ धोखा दे जाते हैं पुराने निशान खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंजिला और मैं हर बार एक घर पीछे चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता यहाँ रोज कुछ बन रहा है रोज कुछ घट रहा है यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया जैसे FIT का गया पतझड़ को लौटा हूँ नये इलाके में : 74

जैसे बैशाख का गया भादों को लौटा हू अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ और पूछो- कया यही है वो घर ? समय बहुत कम है तुम्हारे पास आ चला पानी ढहा आ रहा अकास शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर 4: नये इलाके में द्