ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६४ म अंक १५ फरबरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८२ अंक ३६४) (विदेह www.videha.co.in ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Videha e-Journal: Issue No. 364 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-२४) १.२.३६३ पर टिप्पणी (पृ. २५-२५) २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) (पृ. २८-३३) २.२.नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) (पृ. ३४-३९) २.३.महाकान्त प्रसाद- बीहनि कथा- पियौज (पृ. ४०-४०) २.४.कुमार मनोज कश्यप- उड़ल चिड़ै (पृ. ४१-४२) २.५.आचार्य रामानंद मंडल- बर्चस्वबादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाज उर्फ पचपनिया संघर्ष (पृ. ४३-४६) २.६.योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'-शीघ्र दर्शन (पृ. ४७-५८) २.७.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१३) (पृ. ५९-६३) २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- कनियेँ-मनियेँ पूँजी (पृ. ६४-७१) २.९.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास नअम पड़ाव) (पृ. ७२-७९) २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २१ म खेप (पृ. ८०-८३) २.११.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ८४-९८) २.१२.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ९९-१०७) २.१३.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १०८-११२) २.१४.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. ११३-१२०) २.१५.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर (पृ. १२१-१२५) ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- गहन (पृ. १२७-१३०) ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'- पच्चीस टा रुबाइ (पृ. १३१-१३९) ३.३.आशीष अनचिन्हार-२ टा गजल (पृ. १४०-१४१) ३.४.आचार्य रामानंद मंडल- २ टा पद्य (पृ. १४२-१४७) अनुलग्नक १: मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा (प्रसंग- चोर लेखक पंकज झा पराशरक नूतन साहित्यिक चोरिक खुलासापर पाठकीय टिप्पणी) (पृ. १४८-१५४) अनुलग्नक २: मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा (प्रसंग- चोर लेखक पंकज झा पराशरक पुरान साहित्यिक चोरिक खुलासापर पाठकीय टिप्पणी आ किछु प्रमाण) (पृ. १५५-१९४) ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण (पृ. १९६-२१२) अनुलग्नक ३: मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा (प्रसंग- चोर लेखक पंकज झा पराशरक पुरान साहित्यिक चोरिक खुलासापर किछु प्रमाण) (५६ पृष्ठ) 2
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३६३ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ ऋगवेदक पुरोहित होता, सामवेदक उद्गातृ, यजुर्वेदक अध्वार्यु आ अथर्ववेदक ब्राह्मण; आ तकर सहयोगी पुरोहित सभ, पूरा-पूरी सत्रह तरहक पुरोहित वैदिक कालमे रहथि। आ आब एक्केटा ब्राह्मण पुरोहित केना भऽ गेल? ओडिसामे अखनो 'होता' टाइटिल होइ छै आ ओतुक्का ऋगवेदी, सामवेदी आ यजुर्वेदी ब्राह्मण हिंसक (!)पिप्प्लाद संहिताक अथर्ववेदी ब्राह्मणमे बियाह-दान नै करै छथि। दक्षिण भारतमे कतेक आदिवासी समाजक पुरोहित ब्राह्मण बनि गेला। कालीबन्दीक सेवा, भगैत, फुलहासि करैले पुरोहित अबै छथि, गएर ब्राह्मण बा ब्राह्मणो, कियो भऽ सकै छथि। जे फील्डवर्क बिनु केने बजता से कहता ब्राह्मण केना गहबर आ भगता बनत, मुदा ग्राम-रुद्रपुर (भाया तुलापतगंज, जिला मधुबनी) मे गहबरक सेवा ब्राह्मण भगैत करै छथि। मिथिलामे पसरल सतार (संथाल) समुदायमे मुर्मु पण्डित लयमे सिन्धु नदी घाटी सभ्यताक कालक ग्रन्थक बिनती पढ़ैत छथि, से संथाल समुदायक लोक अहाँकेँ बतेता। दलित विमर्शमे वाल्मीकि रामायणक उत्तरकाण्डक शम्बूक वधक चर्चा होइत रहैए, तप करबाक कारण शम्बूकक शिकाइत जे ओ आगाँ नै बढ़ि जाय, आ तइ शिकाइतक निवारणार्थ भगवान राम द्वारा शम्बूक वध। पुरुष-परीक्षामे विद्यापति कथा कहैत-कहैत लेखकीय वक्तव्य दै छथि जे राजपूतनी चरित्रहीन होइए। ई दुनू ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सकैत अछि बला वक्तव्य, जे सोशल मीडियामे आ अन्तर्जालपर अहाँकेँ भेटत, जकर कोनो सन्दर्भ मूल अथर्ववेदमे ताकैत रहू नै भेटत, बजनहार लुत्ती लगा कऽ निपत्ता, कोनो सन्दर्भ नै देता आ अहाँ अपस्याँत रहू, बर्डन ऑफ प्रूफ आरोप लगेनिहारपर नै, अहाँपर। अहाँक ऊर्जाक क्षय भेल मुदा फेर अन्तर्जाल ठीक कऽ लेलक, पाठ विकृत नै भेल। पहिने आउ पुरुष परीक्षापर, संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति जइ राजाक दरबारी रहथि तकर जातिक स्त्रीक विषयमे एहेन लिखबाक हुनका साधांश हेतनि? कोनो कलुषित मानसिकताक परवर्ती लिपिकार अपन भावनाक अनुसार हेरफेर जँ कऽ देलकै तँ आइक टिप्पणीकार आ अनुवादककेँ टिप्पणी दऽ कऽ स्थिति स्पष्ट कऽ देबाक चाही। राम शम्बूककेँ मारलनि बा शम्बूकक शिकाइत केनिहार कलुषित लिपिकार शम्बूककेँ मारलनि? आब आउ अथर्ववेदपर। अथर्ववेदमे लिखल छै हे नारी, हम सामवेद छी आ अहाँ ऋगवेद, हे वधु, अहाँक हाथ हम समृद्धि लेल ग्रहण कऽ रहल छी। आ ओहुनो व्रात्य परम्पराक अथर्ववेद आ सांख्य अछि, व्रात्य जे गायत्री मंत्र नै पढ़लथि तीन खाढ़ी आ तेँ बनि गेला वनचर, बनबीहर। आ अखुनका घर वापसी सन विध छल 'व्रात्यस्तोम' विध, समानान्तर धाराक व्रात्यकेँ घुरेबा लेल। कतौ हुनका शारीरिक आ लैंगिक हिंसक, निशांमे रहैबला सन विवरण भेटत मुदा अथर्ववेदमे हुनका योगीक रूपमे देखब। अन्यत्र ओ सत्यक रक्षक आ शिवभक्त वैद्य सन सेहो वर्णित छथि। मुदा अथर्ववेदी ब्राह्मणकेँ सेहो हिंसक कहल गेल। कलुषित लिपिकार वेदोमे क्षेपकक प्रवेश केलन्हि जे भाषा विज्ञानी आब पकड़ि रहल छथि। मन्त्रार्थमे महर्षि पतंजलिक वैज्ञानिक मन्तव्य "यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्" अर्थात् जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैए, सएह हमरा हेतु प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे जा कऽ वेदे प्रमाण अछि- से कोना भेल से नै जानि। वेदमे सामान्य जन उपयोगी आ निरपेक्ष साहित्य छल। सभ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्रमे दीप्ति भरि दियौ आ ओही दीप्तिसँ हमरो भरि दिअ।- ई यजुर्वेदमे छै। सीता अबै छथि, कमला धार पार करऽ चाहै छथि। मुदा मलाह कहै छन्हि जे हमरा इनाम चाही, आ इनामो की तँ सीताक ननदि। सीता कहै छथिन्ह, देलौं, भोग कर, युग-युग धरि। सीताक नैहर मिथिला छियन्हि , मलाह एतबो हँसी ठट्ठा नै करत। आ से मिथिलाक दूधवंशी सम्प्रदाय गबैत छथि, कोरैल आ बुधनक मायसँ हमर सुनल अछि। गिदरमाराक अलग भाषा होइ छै हौ, लोक सभ ओकरा सभकेँ गिदरमारा आ मगहिया डोम कहै छै मुदा ओ सभ अपनाकेँ बंजारा कहैए, अपन भाषाकेँ बंजारा भाषा कहैए। मुँहपर गिदरमारा कहि कऽ देखियौ, झगड़े कऽ लेत। बंजारा सभ ऐ विश्वकेँ नीक आ खराप द्वारा संचालित मानै छथि। नग्र सभमे कंगला-भिखमंगाक मोहल्ला बसि गेल छै, ऐ मोहल्लामे जाति-पाति नै छै। सिमरा लग बड़का टेण्टबला बस्ती छै बंजारा सभक, सुखेंतमे। बनैए उजरैए। सतार सभ मधेपुरसँ पूब दक्षिण दुआलकक दक्खिन करहरामे आ टढ़ियामे रहैए। तीर-धनुषमे माहिर संथाल सभ। सुभाष चन्द्र यादव मैथिली लोककथा 'एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया' केर सम्बन्धमे लिखै छथि -"मनुस्मृति मे कहल गेल छैक जे चुपचाप ककरो फूल तोड़ि लेब चोरि नहि होइत छैक। ; तहिना ककरो एकटा चीन खा लेब कोनो अपराध नहि भेल। इएह कथाक आत्मवाचन थिक। कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे सभक जीवक मोल बराबर होइत छैक । असहाय आ निर्धनो केँ जीबाक अधिकार छैक। एहि संसार मे ओकरो लेल एकटा स्पेस (जगह) हेबाक चाही।" ई मनुस्मृति एक ठाम एहेन सहिष्णु अछि, एकर पाठ आधुनिक विधि शब्दावलीसँ युक्त अछि, लगैए जेन विधिक दृष्टिसँ कोनो गैप नै छै, मुदा ओत्तै किछु क्रूर गप सेहो घोसिया देल गेल। वेदक विदेशी भाषा अनुवाद सभमे ऋषिक नाम हटा देल गेल, मुदा मूलमे अखनो भेट जायत। वैदिक द्रष्टा तँ स्त्री आ शूद्र ऋषि सेहो छथि, तखन शूद्र आ स्त्रीक विरुद्ध रचना के घोसियेलक? जे शूद्र ऋषि कवष ऐलूष वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, जे महिला अपाला वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, से कात-करोटमे किए ठाढ़ रहितथि? मुदा वेदमे ऋषि, देवता आ छन्द यएह तीनटा शब्द सभ सूक्त क्रमांकक संग भेटत, द्रष्टा हम अहाँ कहै छियन्हि, मुदा तकरो दुरुपयोगक प्रयास भेल। वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहै छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य ऐ कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतऽ आध्यात्म चेतना, आधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि। ओना ओइ समएमे सेहो सम्मिलित रूपेँ साल भरि ऋचा पाठ करैबलाकेँ पार्जन्यक स्वागतमे टर्र-टर्र करैबला बेङ-मण्डूक सन विशेषण अथर्ववेदमे देल गेल छै। माने गायनमे असहमतिक स्वरक स्वीकृति छलै। ऋगवेदमे सेहो मण्डूक गान छै। मन्त्रार्थमे महर्षि पतंजलिक वैज्ञानिक मन्तव्य 'यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्' अर्थात् जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैए, सएह हमरा हेतु प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे जा कऽ वेदे प्रमाण अछि- से कोना भेल से नै जानि। हमरा लेल तँ मंत्रक ऋषि, छथि, देवता छथि, दुनू कवि छथि सूक्तक लेखक, आ सएह हमरा लेल प्रमाण अछि। जनक सहस्र गाय केर शर्त पर शास्त्रार्थ राखलन्हि। याज्ञवल्क्य गाय सभकेँ रोमि बिदा होइपर छला आकि गार्गीक प्रश्न शुरू। याज्ञवल्क्यक उत्तरपर ओ प्रतिप्रश्न पूछऽ लगली। याज्ञवल्क्य बजला- अहाँक माथ ने भंगा जाय, माथक कइएक फाँक ने भऽ जाय प्रश्न पूछि-पूछि। मुदा गार्गी तइयो पुछलन्हि- समय काल ककर अधीन। याज्ञवल्क्य बजला- अक्षरक। जखन साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यताप्राप्त कथित लिटेरेरी एशोसियेशन चेतना समितिक पत्रिकाक सम्पादक आइयो लेखमे ब्राह्मणवादी संस्कारक अन्तर्गत जोड़-घटाव करै छथि। "पचपनिया मैथिली" मे सुभाष चन्द्र यादव ऐ सम्पादक महोदयक विषयमे लिखै छथि- "डॉ. रमानन्द झा 'रमण'अपन नोटबुक मे टिपने छलाह-'ब्राह्मण कहैत छथि सोइत छी, सोल्हकन कहैत अछि बाभन छी। हम की कही जे की छी?' एहि टीप मे सोल्हकन लेल जे निरादर व्यक्त भेल अछि, से आर किछु नहि; जातीय विद्वेष आ घृणाक भाषिक अभिव्यक्ति थिक।" यएह विषय हम महेन्द्र मलंगियाक नाटक सभमे प्रयुक्त अही तरहक शब्दावली पर उठबैत रहल छी, मुदा हुनकर जातिवादी रंगमंच कोनो निशांमे मातल अछि आ दोसरक भावनासँ ओकरा कोनो मतलब नै छै। मुदा जखन बीसम शताब्दीमे साहित्य अकादेमीक पोथीमे लोरिकपर मैथिली आलेखमे एकटा सज्जन लिखै छथि जे ब्राह्मणपर कएल शूद्रक अत्याचारक विरुद्ध लोरिक ठाढ़ भेलाह, रमानन्द झा 'रमण' आ मलंगियाक हाल देखबे केलौं तखन हिनकर सभक मनसि-पूर्वज अकबरकालीन तुलसीकेँ की दोष देल जाय! जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रक कथा कहैत-कहैत स्त्री आ शूद्रक पाछाँ अकारण क्रूर भऽ जाइ छथि सएह हाल राम चरित मानसक अछि। पंचतंत्रमे खिस्सा सभ नीक छै मुदा स्त्री आ शूद्रक पाछाँ विष्णु शर्मा पड़ि जाइ छथि, से एकर पुनर्लेखन नारायण पण्डित केलनि, ओही सभ खिस्साकेँ, हितोपदेश नामसँ। आ हितोपदेश बेसी व्यावहारिक अछि, तँ की रमानन्द झा 'रमण' आ महेन्द्र मलंगिया माफी मंगताह आ अपन रचना सभक पुनर्लेखन करता? पुरुष परीक्षाक अनुवादक उपयुक्त स्थलपर ई टिप्पणी करता जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक जखन राजाक प्रशस्ति-पाठमे पुनः-प्रात भेल छन्हि तखन की हुनकर ई साधांश छन्हि जे ओ राजपूतनीक चरित्रक विषयमे गलत बात लिखता आ ई समस्त काज जातिवादी लिपिकारक किरदानी अछि? पुनः हितोपदेशमे नारायण पण्डित कहै छथि: आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ आहार, निद्रा, भय आ मैथुन ई मनुक्ख आ माल-जालमे एक्के रङ होइए। मनुक्खमे विशेष खाली धर्म अछि नै तँ ऐ सँ विहीन ओहो माले-जाल सन अछि। २ अन्तर्जाल भेल साइबर स्पेस। मुदा खतरा ओत्तौ अछि, वाइरस, स्पैम, मालवेयर, स्पाइवेयर, ट्रोजन हॉर्स आ वॉर्मक खतरा। वाइरस अछि रक्तबीजी, अपने ई एकसँ दोसर प्रोग्राम बहार करैए, ओना ईहो अपने अछि प्रोग्राम। सिस्टम, स्टील्थ, फाइल आ पोलीमॉर्फिक वाइरस एकर प्रकार भेल। वॉर्म सेहो वाइरस सन प्रोग्राम अछि जे नेटवर्कसँ पसरैए। ट्रोजन हॉर्स बड़े कलामी, लागत जे करत ईर घाटक काज मुदा कऽ देत वीर घाटक काज।स्पाइवेयर अछि जासूस जे व्यक्ति बा संगठनक जासूसी करैए। मालवेयर अछि ऐ सभकक माने वाइरस, वॉर्म, स्पाइवेयर आ ट्रोजन हॉर्सक सम्मिलन जे नेटवर्कक कम्प्यूटरकेँ नुकसान पहुँचाबैए। कोनो फेक चीजकेँ किनबाक-बेसाहबाक लेल अज्ञात लोककेँ पठाओल बेहिसाब ई-पत्र भेल स्पैम। एण्टी वायरस ऐ सभपर लगाम लगबैए। फायरवाल हैकर बा क्रैकर सभकेँ अहाँक कंप्यूटर बा नेटवर्कक पर आक्रमण बा अधिकारकेँ रोकबालेल किलाक देबार अछि। आ अन्तमे हमर एथिकल हैकर, जे अछि हैकर बा क्रैकर सभक बाप, जे अहाँक भलाइ लेल अहाँक एण्टीवायरस आ फायरबालकेँ तोड़बाक प्रयास करैए, आ जँ से भऽ गेलै तँ एण्टीवायरस आ फायरबालकेँ आर मजगोता करैए नीक प्रोग्रामिंगसँ आ तखन फेर अटैक करैए। बुझियौ मॉकड्रिल करैए। एकटा अपन छवि बनाउ, जकरासँ नीक लोक प्रेम करैए आ जे योग्य अछि कर्मठ अछि। मुदा जेना जेना अहाँ आगाँ बढ़ब, समय बीतत हमरा सभमेसँ बहुतक अपन मोनक छवि दूषित हेबऽ लागै छन्हि आ से होइए ओइ गप सभपर ध्यान देलासँ जे दोसर हमरा विषयमे की सोचैए बा बाजैए। मुदा ओ अपन छद्म ज्ञान बा कहियो काल नीको ज्ञान बा कहू जानकारी तँ दऽ सकै छथि मुदा की ओ हमर अपन छवि बा योग्यता हमरा दऽ सकै छथि, नै वरन् ओ बेशीकाल तकर उनटा करै छथि। माता-पिता आ शिक्षक सेहो कखनो काल अनायास ऐमे सम्मिलित भऽ जाइ छथि। संगी-साथी, सर-समाज आ सम्बन्धी सेहो। ओ कम बा बेशी सुन्दर अछि, ओकर गणित ओइ बच्चासँ नीक-अधला छै, ओइ तेज बा बुड़बककेँ दोस्त बनाउ बा नै बनाउ, ओकरे दुआरे हम सभ जितलौं बा हारलौं। हुनकर क्रियाकलाप आ बोल ई सभ करैए, मुदा से तखने हएत ने जखन अहाँ तइपर कान-बात देबै। सफलता जे वास्तवमे सफलता होइ, बिनु कम्प्रोमाइजबला सफलता, तइसँ अहाँक आत्मविश्वास आगाँ बढ़त। असफलता लोककेँ हतोत्साहित तखने करत जखन ओ वास्तवमे असफलता होइ। जेक्स डेरीडाक विखण्डनवाद कतेक साहित्यकेँ नीचाँसँ ऊपर लऽ गेल आ कतेक केँ ऊपरसँ नीचाँ। तँ चोरि कऽ कय रचनात्मक साहित्य लिखब आ तइपर मिशेल फोकोक डिसीप्लीनरी इंस्टीट्यूशन सभसँ पुरस्कार लेब मूल्य लेब सफलता भेल आकि सफलता? आ सुभाष चन्द्र यादव सन सुशील सन जिनगी भरि अड़नाइ आ तकर मूल्य चुकेनाइ भेल सफलता आकि असफलता? तँ अपन आत्मविश्वास बनेने रहू, अनुशासन अडिग राखू। योग्यतामे सभदिन वृद्धि करैत रहू, जे एक दिन एहेन बीतय जे अहाँक योग्यतामे कोनो वृद्धि नै भेल तँ बुझू ओ दिन बर्बाद भऽ गेल। आ स्थितप्रज्ञ बनू, आत्मविश्वास राखू। आ जँ अहाँमे ई सभ गुण अछि तँ अहाँ समानान्तर धाराक लोक छी, अहाँक स्वागत अछि। भोरे सकाले उठू, घरक काज सेहो करू, ऐसँ अहाँ जबाबदेह आ आत्मनिर्भर भऽ सकब। समस्या एलापर सहायता मांगैसँ लाज नै करू आ दोसराक समस्यामे दोसराकेँ सेहो सहायता करू। शक्तिशाली दुश्मनक सोझाँ ठाढ़ भेनाइ कठिन अछि, ऐ लेल चाही साहस, नीक-अधलाक फरिच्छ दृष्टि आ सत्य, आ अन्यायक खिलाफ कखनो हथियार नै राखू। चिचियेलासँ कियो नै सुनत, कऽ कय देखाउ, कन्नारोहट आ उपरागा-उपरागीसँ किछु नै हएत, कऽ कय देखाउ, जे भाषण दै छी से करबो करू। अन्तर्जालपर सेहो बहुत रास खरा छै, ने फेक न्यू बनाउ नहिये पसारू, अन्तर्जालक अपराधी सभसँ बचू। अपनासँ कमजोर आ छोटकेँ डराउ नै, ओकरा प्रतारित नै करू, जे कियो अहाँ संग ई करैए तकर खिलाफ शिकाइत करू। जयपुर-फुट (नकली पएर), कम धुँआ बला चुल्हा सन समानान्तर साहित्य सेहो अन्वेषण, निष्काम कर्म आ बिनु पाइ/ पुरस्कारक लालचक कएल जा रहल अछि ज इसँ हम सभ नीक समाज बनाबी आगाँ बढ़ाबी। सभमे किछु ईलम होइ छै, जेना पिपही बजेबाक ईलम। जँ विश्वास नै हुअय तँ ओइमे फूकि कऽ देखियौ। ओइलेल कएक बर्खक प्रशिक्षणक आवश्यकता होइ छै। तहिना लोक नृत्य, नाचमे सेहो छै आ लकड़ी आ माटि सम्बन्धी ईलम सेहो छै। ओइ कलाक सम्मान करू। ओही विकासक स्वागत करू जइसँ पर्यावरण नष्ट नै होइत अछि, जतेक गाछ काटै छी तइसँ दस गुणा गाछ रोपू। असगर काज करैमे डर लागैए, छोटोसँ छोटो काज? मुदा से सभ काल नै भेटत, सभ काल ने संगे भेटत ने समर्थने। भूत केँ बिसरि जाउ, ई नीक हुअय तखनो, बा अधला हुअय तखनो। किछु संगी साथी आ संगठन अहाँकेँ दुखी करै छथि, तामस उठबै छथि, हतोत्साहित करै छथि, हुनका बिदा करबाक समय आबि गेल। नीक दिन अखनो आबैबल अछि, अधला समय कहियाधरि चलत। अधला समयमे सीखल शिक्षा दूरगामी होइत अछि जइसँ हम अपन गलती नै दोहराबी। काजक बीच विराम दऽ चिन्तन करब सेहो आवश्यक, गाम, सर-कुटुम, दोस-महीम ओइठाम एनाइ-गेनाइ सेहो आवश्यक। बिहारिक बाद पनिसोखा देखबा लेल तैयार रहू। सभ दिन हएत जादू। आ से हएत जखन अहाँ सभ दिन कोनो ने कोनो एक्को गोटेक सहायता करी। सदा अपन विचारकेँ लिखि कऽ जमा करैत रहू। जलखै बिनु नागा केने करू, सात-आठ घण्टा सूतू, भोजन एहेन करू जे शरीर लेल स्वास्थ्यकारी हुअय। मोन तैयो उचटऽ लागय तँ ध्यान लगाउ, चित्र बनाउ, पढ़ू, संगीसँ गप करू, घूमू फिरू, संगीतपर नाचू। जीवन अमूल्य अछि, एकर सभ क्षणक प्रति सम्मान राखू। बिनु शिकाइतक मेहनति करू आ से तखन तँ आरो करू जखन ऐसँ असफलता प्राप्त हुअय। देखल सपना माने लक्ष्य दिस सभ दिन एक डेग, आ ओ जँ मनोरंजक लागय तँ बुझू जे अहाँ समानान्तर धाराक लोक छी, अहाँक स्वागत अछि। कठहँसी, आँखि धरि नै गेल, तामसकेँ नुकेबा लेल, ई खुशी नै देखेलक, ई हास्यकणिका सुनलाक बादक हास्य हँसी नै छल, ई दोसराकेँ संगी बनाबैबला ओकरा विश्वास दिआबैबला जे ओ हमरा लेल खतरा नै अछि से हँसी नै छल। वृद्ध आ बेमारक सहायता करबाक चाही, युद्ध आ प्राकृतिक आपदासँ प्रभावित लोक आ देशक मदति करबाक चाही, ई कहियो निरर्थक नै हएत। अहाँक सोझाँ स्पष्ट लक्ष्य हेबाक चाही, परिश्रम आ लगनसँ ओ प्राप्त सेहो हएत। अन्यायी आ कष्ट पहुँचेनिहारक प्रति बजनाइ सीखू, मानवताक प्रति निष्काम भावसँ सेवा केनिहारक प्रति कृतज्ञ हौ। दिव्यांग लोकक प्रति हमरा सभकेँ ध्यान राखबाक चाही, हुनका प्रति संवेदनशील रहबाक चाही। दिव्यांक लोक दिव्यांगताक अलाबे सेहो बहुत रास गुणसँ विभूषित छथि, हमरा से देखबाक चाही, आ हुनका अपन अधिकार भेटनि तइमे संग देबाक चाही। विश्व स्वास्थ्य संगठनक अनुसार विश्वमे पन्द्रह प्रतिशत लोक दिव्यांग छथि। भारतमे पहिल बेर २००१ मे दिव्यांग लोकक गणना भेल जे मात्र २.१ प्रतिशत अछि, ई प्रतिशत विश्वास योग्य नै अछि। सहकर्मी, संगी साथी सन बनबाक द्वाब अहाँपर सदिखन रहत, मुदा अहाँ ओइ दवाबमे नै आउ। अपन व्यक्तित्व विकसित करू। हँसी-ठट्ठा लेल अपन जान गमेनाइ नीक गप नै। खेतमे रसायनिक पदार्थ वातावरणकेँ दूषित करैत अछि। जैविक पदार्थक उपजा बिनु रसायनिक पदार्थक होइत अछि, ई बेशी स्वस्थ्यकारी आ चहटगर होइत अछि। जिनकामे आत्म-सम्मानक भाव कम छन्हि ओ नीक अनुभव करै लेल दोसराक मान्यताक आवश्यकता पड़ैत अछि। फेसबुकपर पोस्ट कऽ कय लाइक गानैबला लेल ई गप अछि। कतेक घटना घटित भेल अछि जइमे सेल्फी लै काल व्यक्ति खधाइमे खसि पड़लथि, छातसँ खसि पड़लथि आ मृत्यु भऽ गेलन्हि। हँ मुदा सेल्फी केर प्रयोग अहाँ नीक उद्देश्य जेना बेटी संग सेल्फी आदिक रूपमे कऽ सकै छी। समयक महत्व बुझू, फालतू सभा समिति, खास कऽ प्रतिक्रियावादी समिति-संस्था अहाँक बहुत समय खराप कऽ सकैत अछि। कखनो नियत समयसँ नै पहुँचि सकी तँ दुख व्यक्त केनाइ नै बिसरू। पाइ हमरा सभकेँ प्रकृतिसँ दूर कऽ देने अछि। कनाडाक मूल इण्डियन अबेनाकी कबीला जे हुनका सभ लेल आरक्षित रिजर्व ओडानाकमे रहैए पर्यावरणक लेल कतेक सुन्दर सुन्दर लोकोक्ति बनेने अछि 'तखन जखन आखिरी गाछ कटि जायत, आ सभ धारमे माहुर दऽ देल जायत, तखन जखन गोट-गोट माँछ अहाँ मारि देब, तखने अहाँ बूझि सकब जे अहाँ पाइ नै खा सकै छी।' सामान्य जीवन जीबू जइसँ पर्यावरणकेँ नुकसान नै होइ, प्रकृतिसँ जुड़ि कऽ रहू। एक दोसरासँ मिलि जुलि कऽ रहू, मनुक्खे टा नै, माल-जाल, चिड़ै चुनमुनी, सभसँ, प्रकृतिसँ धारसँ। आ से जँ अछि तँ बुझू जे अहाँ समानान्तर धाराक लोक छी, अहाँक स्वागत अछि। कियो सम्पूर्ण नै होइए मुदा नीक बनबाक प्रयास तँ कैये सकै छी। हमरा सभकेँ सत्यवादी, इमानदार आ दयालु बनल रहबाक प्रयास करबाक चाही। ई संसार रहबा योग्य एकटा नीक स्थान बनल रहय तकर प्रयास सभकेँ करबाक चाही। हमरा सभकेँ खूब पढ़बाक चाही, नव नव चीज सिखैत रहबाक चाही। 3 Parallel Literature in Maithili and Videha Maithili Literature Movement Pseudo-criticism in Maithili and the case of Kamalananda Jha The title of Kamalanand Jha's book "Maithili Novel: Time, Society and Questions" (2021) is misleading. It is a collection of some syndicated so-called critical articles on some of his caste novelists. The 263-page book can only be sold in hardbound to libraries where it will rot. Here is a correction, a non-caste writer's work, i.e., Subhash Chandra Yadav's novel 'Gulo', has been dealt with by him in two lines, of course without reading it. I am presenting those two lines here for your entertainment. You must have read Gulo, if you haven't already, read it first because then you will have a more entertaining experience. Gulo is available on Videha Archive with the permission of Subhash Chandra Yadav at this link http://videha.co.in/pothi.htm. "The weakness of the novel is the author's political bias. The partisanship towards a particular politics does not do justice to the work." In a novel where politics is not remotely involved, there is no question of 'political bias and partisanship of a particular politics'. Dhumketu and Yatri used political bias or partisanship. Subhash Chandra Yadav's 'Vote' which came out in 2022 and is available with permission of Subhash Chandra Yadav on Videha Archive at this link http://videha.co.in/pothi.htm, is on politics but even there Subhashji's enchanting style obviates the need of any political bias... Read my book 'Nit Naval Subhash Chandra Yadav' which is available at this link http://videha.co.in/pothi.htm. On the other hand, Mr Kamlanand Jha sounds like a spokesperson of some political party or a casteist organisation rather than a literary critic. Kamalananda Jha's Brahministic bias against Subhash Chandra Yadav is an alarm bell. The parallel stream is conscious of how Kamalananda Jha takes the leftist stance to promote Brahminism and wants to sacrifice social justice. In his biodata, he proudly mentions the Maithili translation assignment bestowed on him by the Sahitya Akademi, and this assignment was allotted to him not on account of merit but solely on the ground of his caste title and in lieu of these deeds. For people like him, Maithili-related work is merely a line in their curriculum vitae, but it is a question of life and death for the people of the parallel stream. Why did I call Kamalananda Jha a pseudo-critic? Because he is a pseudo-critic. He writes: "After nearly a hundred years of journey, Gaurinath is credited with writing a dignified novel on the dreams, struggles and ironies of inter-caste marriage. So, did Kamalananda Jha take away this credit from Sushil? Is this the culmination of the arrogance of his Brahministic upbringing ("Through my whims and fancies I can place some literature on top and can downgrade some to the bottom") or is this the evidence of his lack of study? Let me take you away from the selfish world of Kamalananda Jha, away from deception and disguise to the sincere world of Sushil's magical literature. Welcome to the world of Sushil's literature. Here is Sushil's 'Gambali' (1982) which is now available in the Videha Archive at the link http://videha.co.in/pothi.htm. In the first line of this novel, even before the novel begins, Sushil writes about the novel 'Gambali': "In support of widow marriage and inter-caste marriage" and here begins the novel. The death of a village woman and then the trouble ensues, who will cremate this village woman? Brahmin community or Yadav community of the village? Dinesh Kumar Mishra's 'Dui Patan Ke Bich Me' is a historical biography of the Kosi River. He has also written historical biographies of other rivers of Mithila like 'Bandini Mahananda,' 'Bagmati Ki Sadgati!', 'Dui Patan Ke Bich Me... (Story of the Kosi River)', Na Ghat Na Ghar, Kamla River, 'Bhutahi River and Technical Herbalism', The Kamla River and People on Collision Course, Bhutahi Balan- Story of a Ghost River and Engineering Witchcraft, Refugees of the Kosi Embankments. Pankaj Jha Parashar, a member of the Maithili Advisory Committee of the Sahitya Akademi, Delhi has plagiarised paragraph after paragraph from his books and has published a novel in Maithili in his name, which pseudo-critic Kamalananda Jha mentions as research of this thief author Pankaj Jha Parashar! Let me clarify here that both the thief writer and the pseudo-critic are in the Hindi department of Aligarh Muslim University. This research is done by Dinesh Kumar Mishra, who is a graduate of IIT, Kharagpur in Civil Engineering (in 1968) and M. Tech in Structural Engineering (in 1970) and is qualified for that research. In Hindi, the cut-off for admission is the lowest across universities, otherwise, Kamalananda Jha would have known that this research could be done by a civil engineer only. The Hindi original and Maithili screenshots are attached below. Dinesh Kumar Mishra is not from Mithila, but he has authored the story of all the streams of Mithila. We are grateful to him, and the people of Mithila will remain indebted to him for this. This thief writer Pankaj Jha Parashar is a habitual offender. More than a decade ago he found a saviour in Mr Taranand Viyogi who wrote that he (thief writer Pankaj Jha Parashar) gets influenced involuntarily stole others' material in his works. Now he has found another saviour in Kamalananda Jha. The parallel stream is conscious of how Kamalananda Jha takes the leftist side to promote Brahminism and wants to sacrifice social justice. Communism has suffered a lot from people who became communists to escape the land ceiling. All books by Dinesh Kumar Mishra are now available in the Videha Archive with his permission: http://videha.co.in/pothi.htm Let us recall here that when Bill Gates was asked whether he was delaying the introduction of the X-Box in India for fear of piracy. His answer was Microsoft never delays the launch of products for fear of piracy. We will continue enriching Videha Archive (http://www.videha.co.in/archive.htm ), despite such risks because not all the fish in the pond rot by some rotten fish in parallel streams. The fishermen here have been and will continue to remove such rotten fish. The final blow to syndicated pseudo-literary criticism in Maithili. Original Dinesh Kumar Mishra (Dui Patan Ke Beech Me... 2006): It is noteworthy that between 1923 and 1946, 5,10,000 people died of malaria, 2,10,000 from Kala Azar, 60,000 of Cholera and 3,000 of smallpox in the Kosi region (783,000 total deaths). Thief Pankaj Jha Parashar (Member of Maithili Advisory Committee of Sahitya Akademi, Delhi) [Jalpranthar 2017 (p. 103)]: Original Dinesh Kumar Mishra (Dui Patan Ke Beech Me... 2006): On the Kosi River in Bihar, India, a dam was built by King Laxman II in the 12th century and for this, he received the title of 'Bir' from the people and the embankment of the river was called 'Bir Dam' The remains of this embankment are still visible in Supaul district, about 5 km south of Bhim Nagar. Dr Francis Buchanan (1810-11) speculated that the dam must have been an outer wall built to protect a fort as it stretched over a distance of 32 kilometres from Tilyuga to its confluence on the western bank of the Dhaus river. Dr W.W. Hunter (1877) did not agree with Buchanan's contention that the dam was the protective wall of a fort. Quoting locals, Hunter believed that most people did not consider it a fortress wall and according to him it was something else but he was not in a position to say anything. Yet the common impression is that it must have been an embankment built along the Kosi River to prevent the river's current from sliding westwards. People also said that it seemed that the construction of the embankment had suddenly stopped.
The pseudo-critic Kamalananda Jha's saviour of the habitual offender thief Pankaj Jha Parashar quoted the plagiarised work as follows: (Maithili Novel, Time, Society and Questions pp. 257-258): Thief Pankaj Jha Parashar (Member of Maithili Advisory Committee of Sahitya Akademi, Delhi) [Jalpranthar 2017 (p. 31)]: Original Dinesh Kumar Mishra (Dui Patan Ke Beech Me... 2006): A glimpse of the horrors of the Kosi River can be seen in the event when the army of Feroz Shah Tughlaq returned to Delhi from Bengal. It is said that when the troops of the Sultan reached the banks of the Kosi, they saw that on the other side of the river, the troops of Haji Shamsuddin Ilyas were waiting, ready for a battle. This was the same Haji Shamsuddin who founded the cities of Hajipur and Samastipur. Feroze's troops were stranded on the banks of the Kosi somewhere around Kursela. The speed of the river was preventing them from moving forward. It was finally decided to proceed northward along the river and to locate the water where it was navigable. The troops of the Sultan went up about a hundred kos and crossed the river near Ziaran, situated at the same place where the river descended from the mountains into the plains. The river was thin, but the flow was so fast that heavy stones weighing five hundred manas were floating like straws in the river. On either side of the river where it was found possible to cross it the Sultan erected a row of elephants, and ropes were hung in the bottom row so that if a man loses control he could be rescued with the help of these ropes. Shamsuddin never thought that Sultan's troops would be able to cross the Kosi and when he came to know that Sultan's troops had managed to cross the Kosi, he fled. Thief Pankaj Jha Parashar (Member of Maithili Advisory Committee of Sahitya Akademi, Delhi) [Jalpranthar 2017 (p. 105)]: (More screenshots will be updated at this link http://www.videha.co.in/investigation.htm soon.) 4 Parallel Literature in Maithili and Videha Maithili Literature Movement नारायण यादवक पाँचटा लघुकथापर हमर टिप्पणी Five Short Stories by Sh. Narayan Yadav Sh Narayan Yadav has adjudged the following five short stories as his best: The New Daughter-in-Law (Navki Putohu) Communal Harmony (Sampradayik Swabhav) The Life of a Woman (Kanyak Jingi) The Change of Heart (Hriday Parivartan) The Village Unity (Gamak Ekta) The New Daughter-in-Law (Navki Putohu): The strength of this short story lies in the description of village life, and how every member contributes to earning a livelihood. But the whole harmony gets disrupted with the arrival of a new daughter-in-law, the wife of Anand. Anand's wife Sulekha is from an upper-class family and does not understand the pains of her mother-in-law Radha. But when Radha's Younger son Suresh gets married and his wife Roshni, who is literate, comes to this family, everything gets in order. Communal Harmony (Sampradayik Swabhav) is a story of how Rehman and Prakash's friendship moves forwards creating an atmosphere of harmony in the two communities. It may be treated as children's literature wherein a sensitive matter has been treated aptly. The Life of a Woman (Kanyak Jingi) tells the story of Kusum and the protagonist. But when the protagonist revisits her village after a long time he sees a widow who tells him that she is Kusum. The Change of Heart (Hriday Parivartan) is a story of a mother and his son. After the death of her husband, she goes to Patna accompanied by his son. The respect that her husband had in the hearts of his students makes her son repentant of his behaviour. The Village Unity (Gamak Ekta) is a story of a flood-ravaged village life interspersed with the delivery of a baby by Mala. The whole village strengthened the Ring Dam and later admitted her to a hospital. You may find references to opposition to intra-caste marriage as regressive, (Navki Putohu- Both were from the same case. They hated inter-caste marriages), but the strength of Narayan Yadav lies in the description of life around him. His delicate treatment of communal harmony, community living, and depiction of unity in the village as well as in families overpowers everything. ५ संजू दास जीक चित्रकलापर बहस चलि रहल अछि। किछु गोटे एकरा अश्लील मानि रहल छथि तँ किछु गोटे एकरा कलाक स्वतंत्र हेबाक परिचायक मानै छथि। विदेह दूनू पक्षसँ टाइप कएल आलेखक अपील कऽ रहल अछि, आलेख तथ्यपरक हेबाक चाही। व्यक्तिगत लगाव बा दुश्मनी बला आलेख नै हुअय। अपन आलेख editorial.staff.videha@gmail.com पर सेहो पठाउ। - Gajendra Thakur, editor, Videha (Be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast list.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३६३ पर टिप्पणी अंक ३६३ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार नित नवल दिनेश कुमार मिश्र पढ़लहुँ आ एहि संदर्भमे हम अतबे कहब जे तारानंद वियोगी वा कमलानंद झा सन प्रबुद्ध लोक आगुओ पंकज पराशर एवं ओहने साहित्यिक चोरक संरक्षणमे अबिते रहताह। कारण ई जे ई प्रबुद्ध लोक सभ सेहो ओही मानसिकता केर छथि।
नित नवल सुशील सेहो पढ़लहुँ। मैथिली उपन्यासक क्षेत्रमे ई आलोचना एकटा रिकार्ड कायम करत से उम्मेद अछि। ओना एहि आलोचनासँ ई तँ साबित भइए गेल जे मैथिलीक आने क्षेत्र जकाँ मैथिली उपन्यासमे कलकत्ताक एहन योगदान छै जे सभसँ अलग आ बोल्ड छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) २.२.नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) २.३.महाकान्त प्रसाद- बीहनि कथा- पियौज २.४.कुमार मनोज कश्यप- उड़ल चिड़ै २.५.आचार्य रामानंद मंडल- बर्चस्वबादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाज उर्फ पचपनिया संघर्ष २.६.योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'-शीघ्र दर्शन २.७.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१३) २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- कनियेँ-मनियेँ पूँजी २.९.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास नअम पड़ाव) २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २१ म खेप २.११.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१२.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१३.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१४.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१५.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर २.१.नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) दिनेश कुमार मिश्र, मिथिलाक बाढ़ि, धार आ ओइपर बनाओल छहर/ बान्ह, सन्दर्भ हुनकर बन्दिनी महानन्दा, बागमतीक सद्गति!, दुइ पाटनक बीच.. (कोसी धारक कथा), ने घाट ने घर, बगावत पर मजबूर मिथिलाक कमला धार, भुतही धार आ तकनीकी झाड़ा-फूंकी। दिनेश क़ुमार मिश्रक सभटा पोथी आब हुनकर अनुमतिसँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमेः http://videha.co.in/pothi.htm (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य पंकज झा पराशर द्वारा दिनेश कुमार मिश्र जीक पोथी सभसँ पैराक पैरा चोरा कऽ अपना नामे उपन्यास छपबाओल गेल अछि, जकरा छद्म समीक्षक कमलानन्द झा ऐ चोर लेखक पंकज झा पराशरक रिसर्च कहै छथि! लिंक http://videha.co.in/investigation.htm पर स्क्रीनशॉट अपडेट कएल गेल अछि।) बन्दिनी महानन्दा- दिनेश कुमार मिश्र (पछिला अंकसँ आगाँ) मध्य बिहार (आब दक्षिण बिहार) बिहारमे गंडकक दक्षिण तटक मैदान मध्य बिहार अछि । दुर्गावती, कर्मनासा, सोन, पुनपुन, फल्गु आदि धार सँ आच्छादित ऐ क्षेत्रक जमीन उत्तर बिहार जकाँ उपजाऊ अछि । कैमूर श्रृंखला पाथर सन बिनु गाछ-बृच्छक पहाड़ी ऐ क्षेत्रमे छै। मध्य बिहारक अर्थव्यवस्था खेतीपर आधारित अछि। छोटानागपुर अंचल (आब झारखण्ड) बिहारक गंडक घाटीक दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र पठार आ जंगलसँ घेरल अछि आ भारतक पूरा खनिज संपदाक एक तिहाइ सँ बेसी ऐ जंगल, पहाड़ आ जमीनक नीचाँ दबल अछि । बाराकर, दामोदर, सुवर्णरेखा, किउल, कोयल, औरंगा, अमनत, कन्हर, अजय आ मयूराक्षी आदि धारक ई क्षेत्र, छोटानागपुर आ संथाल परगना, उद्योगक दृष्टिकोणसँ बहुत समृद्ध अछि। कोयला, लोहा, मैंगनीज, अभ्रक, स्टीटाइट, चूना-पत्थर, आग्नेय माँटि, चीनी माँटिक बरतन, कैनाइट, तांबा, बॉक्साइट, एस्बेस्टस, डोलोमाइट, क्वार्ट्ज, यूरेनियम आदि ऐ क्षेत्रमे भेटैत अछि। यएह कारण अछि जे ऐ इलाकामे कइएकटा पैघ उद्योग अछि। जमशेदपुरमे टाटा ग्रुपक टिस्को आ टेल्को, बोकारोमे स्टील प्लांट, रांचीमे हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन, मुरी (रांची) मे एल्युमिनियम प्लांट, पूर्वी सिंहभूममे हिंदुस्तान कॉपर कॉरपोरेशन, सिन्दरीमे केमिकल फर्टिलाइजर प्लांट, धनबाद-झरिया कोल माइन्स, झिंकपानी जपला, खेलारी आ जमशेदपुरमे सीमेण्ट फैक्ट्री सभ ऐ इलाकामे स्थापित अछि । एतेक नीक उपजाऊ जमीन आ विस्तृत जल संसाधन आ अतुलनीय खनिज संपदाक मालिक रहलाक बादो बिहार राज्य देशक अन्य राज्यक तुलनामे विकासक सब स्थापित पैरामीटरमे पिछड़ल अछि। बिहार-पिछड़ल वर्तमान एतेक प्राकृतिक संसाधन रहलाक बादो जँ बिहार गरीब अछि तँ एकरा लेल केकरा दोषी ठहराओल जायत? सदीसँ परतंत्र रहलासँ उत्पन्न भेल कुंठा या प्रशासनिक, राजनीतिक आ सामाजिक कुप्रबंधनक कारण। अर्थव्यवस्था मूल रूपसँ खेतीपर आधारित अछि, एकटा गप निश्चित रूपसँ बुझल जाइत अछि जे जँ खेती कोनो तरहे सुव्यवस्थित कएल जाय तखने बिहारक लोक जमीनसँ जुड़ल रहि सकता। समस्या अछि जमीनक मालिकाना हक। ऐ ठाम ८४.६ प्रतिशत जोतेदार लग जमीनक मात्र ३७.७ प्रतिशत अछि। ऐमे सँ औसत होल्डिंग क्षेत्र २ हेक्टेयरसँ बेसी नै अछि। दोसर दिस १५.४ प्रतिशत लोक लग ६३.३ प्रतिशत जमीन अछि। एकर ई अर्थ छै जे जँ खेती-बाड़ीमे कनियो-मनियो गड़बड़ी हेतै तँ बहुत गोटेक रोजी-रोटीक नुकसान हेतै। बिहारक खेती बरखापर निर्भर अछि बा भगवान पर। बिहार लगभग सभ साल सूखा बा बाढ़िक शिकार होइत अछि। कखनो काल ई दुनू एक संग आबि जाइत अछि। कखनो एक इलाकामे रौदी आ दोसरमे बाढ़ि आ कखनो पहिने रौदी आ फेर ओही ठाम बाढ़ि बा पहिने बाढ़ि आ फेर रौदी। ऐ दुनू समस्याक सभ रूप घातक अछि। बिहारक भौगोलिक संरचनाक चारू कात धार आ दक्षिण बिहारक पठार क्षेत्रमे सूखाक कारण उत्तरमे बाढ़क संभावना अछि। मध्य बिहारमे हालात बदलैत रहैत अछि। पटना, आरा, रोहतास, भोजपुर, भबुआ आदि जिलामे सोन नहरक कारण किछु खेतीक प्रबंधन होइत अछि, मुदा ऐ जिलामे सेहो प्रायः बाढ़ि अबैत अछि। मध्य बिहार, गया, जहानाबाद, नालंदा, नवादा, गया आ औरंगाबादक बाकी जिला अक्सर सूखाक शिकार होइत अछि। बाढ़ि आ बिहार हम अपन अध्ययन बिहारमे बाढ़ि धरि सीमित राखऽ चाहै छी। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (१९८०) क रिपोर्टक अनुसार देशमे बाढ़िसँ हुअयबला नुकसानमे २२.८ प्रतिशत बिहारक हिस्सा अछि। देशमे बाढ़िसँ प्रभावित कुल क्षेत्रक मात्र १६.५5 प्रतिशत बिहारमे पड़ैत अछि। मतलब जे बिहारक अपेक्षाकृत कम इलाकामे बेसी नुकसान होइए। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (१९८०) क रिपोर्टक प्रकाशनक बाद १९८४, १९८७ आ १९९३ मे बिहारमे पैघ बाढ़ि आयल अछि, जइमे १९८७ क बाढ़ विनाशकारी मानल गेल अछि। ऐ बाढ़िसँ पूरा देशमे बाढ़िक संदर्भमे बिहारक दर्जा कनी बढ़ि गेल। एकटा रिपोर्टक अनुसार भारतक सभसँ बेसी बाढ़ि प्रभावित राज्य बिहार अछि। देशक कुल ४०० लाख हेक्टेयर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रमे सँ ६४.६१ लाख हेक्टेयर बिहारमे अछि। जे देशक कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्रक १६ प्रतिशत अछि। ई बिहारक भौगोलिक क्षेत्रफलक ३७ प्रतिशत अछि जे १७३.५० लाख हेक्टेयर अछि। जनसंख्याक हिसाबसँ कुल बाढ़ प्रभावित आबादीक ५६.५ प्रतिशत असगर बिहार राज्यमे अछि। ई तथ्य राष्ट्रीय बाढ़ आयोग द्वारा सेहो स्वीकार कयल गेल अछि । उत्तर बिहारक कुल क्षेत्रफल ५८.५१ लाख हेक्टेयर अछि। ऐ भाग मे ४४.४७ लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ि प्रभावित अछि। ऐ तरहेँ उत्तर बिहारक करीब ७६ प्रतिशत इलाका बाढ़ि प्रभावित अछि। जँ हम जीवनक गुणवत्ताक माप लेल मात्र साक्षरताकेँ पैरामीटर मानब तँ उत्तर बिहारक हालत पूरा बिहारक संदर्भ मे सेहो सभसँ दयनीय अछि। ऐ ठाम साक्षरताक प्रतिशत बिहारसँ कम अछि। तहिना बिजलीक प्रति व्यक्ति खपतक एकटा आर उदाहरण लऽ सकै छी- १९७८-७९, १९८०-८१ आ १९८१-८२ मे देशमे बिजलीक प्रति व्यक्ति खपत क्रमशः १५०.७३ किलोवाट, १५५.६२ किलोवाट आ १४३.४१ किलोवाट छलै। दोसर दिस ऐ कालावधिमे बिहारक प्रति व्यक्ति खपत क्रमशः ८७.१५ किलोवाट, ८२.५८ किलोवाट आ ८१.१३ किलोवाट रहल। जँ उत्तर बिहारकेँ अलगसँ देखल जाय तँ ऐ कालावधिमे ऐठाम प्रति व्यक्ति बिजलीक खपत क्रमशः २६.६० किलोवाट, १४८२ किलोवाट आ १३.४३ किलोवाट छल, माने राष्ट्रीय औसतक दसम हिस्सा सँ कम उत्तर बिहारमे उपलब्ध अछि। एकर अलाबे आइ-काल्हि बिहारक मोटामोटी ९ लाख हेक्टेयर जमीन पानीक कटाइसँ ग्रस्त छै आ ई सभटा इलाका उत्तर बिहारमे छै, जइ लेल सभ साल ऐक्षेत्रमे बाढ़ि आ एतुक्का जमीनक बनावट जिम्मेदार छै। अत्यधिक जल कटाइसँ कृषि उत्पादन आ कृषिसँ जुड़ल रोजगार दूनूपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ल छै आ आर्थिक संकट बढ़ल छै। घाघरा, गंडक, बुढ़ी गंडक, बागमती, अधवारा समूह, कमला, कोसी, महानन्दा मुख्य धार सभ अछि । ई सभ धार अपन मार्ग बदलबाक लेल प्रसिद्ध रहल अछि, जइमे कोसीक धारा सभसँ बेसी चलायमान अछि । ऐ समस्त क्षेत्रक पानिक निकासीक एकमात्र तरीका गंगाक माध्यमसँ अछि आ ई धार पूरा प्रांतक लेल जीवन रेखाक काज करैत अछि । गंगा दक्षिण बिहारक सुवर्णरेखा घाटीकेँ छोड़ि बिहारक शेष पानिक निकासी गंगाक माध्यमसँ होइत अछि आ तइ लेल गंगा बहुत महत्वपूर्ण भऽ जाइ छथि। गंगा लेल बिहार सेहो कम महत्वपूर्ण नै अछि। गंगाक एकटा नाम जाह्नवी अछि। आधुनिक भागलपुरक सुल्तानगंज लग गंगाक धारामे एकटा पहाड़ीपर भगवान शंकरक मंदिर अछि। कहल जाइए जे जलू ऋषिक एतय आश्रम छल। भगीरथ जखन गंगाकेँ अपन पूर्वजक उद्धार लेल कपिल मुनिक आश्रम धरि जेबाक लेल मना लेलखिन तँ गंगा हुनकर पाछु-पाछू चललीह आ जे किछु हुनकर रस्तामे आबि जाइ छल तइपर अपन छाप छोड़ि देलखिन। मुदा आब प्रतियोगिता जट्स ऋषिक संग छल जिनकर आश्रम गंगा बहाबयबाली छली। गंडकक प्रवाह देखि मुनि क्रोधित भऽ गंगाकेँ पीबि गेला। बेचारा भगीरथ कोनो तरहेँ ऋषिकेँ गंगा केँ मुक्त करबाक लेल मना लेलनि, तखन ओ गंगा केँ पेट सँ निकालि लेलनि। एत्तैसँ गंगाक नाम जाह्णवी पड़ल। गंगा धार उत्तर प्रदेशक उत्तर काशी जिलाक ७,०१६ मीटरक ऊंचाइपर गंगोत्री ग्लेशियरसँ उत्पन्न होइत अछि । मूलमे ऐ धारकेँ भागीरथी कहल जाइ छै, जे देव प्रयाग लग अलकनंदासँ संगमक बाद गंगा नाम लैत अछि आ लगभग २५० किलोमीटर नीचाँ बहलाक बाद ऋषिकेश लग मैदानमे उतरि जाइत अछि। एकर बाद ई धार वाराणसीसँ हरिद्वार, कानपुर, वाराणसी होइत करीब १५५ किलोमीटरक दूरीपर बिहारमे प्रवेश करैत अछि। उत्तर प्रदेशमे ऐ धारक कुल लम्बाई लगभग १४५० कि.मी. अछि जइमे गंगोत्रीसँ देव प्रयाग धरि भागीरथीक लम्बाइ शामिल अछि । बिहारमे ऐ धारक लम्बाइ लगभग ४३८ किमी अछि, जइमे ११० किमी उत्तर प्रदेश आ बिहारक सीमा बनबैत ई बहैत छथि। राजमहल लग बिहारसँ निकललाक बाद गंगा फरक्कासँ ४० किलोमीटर पूर्वमे दू भाग मे बँटैत अछि आ ऐ दुनू धाराक नाम अलग भऽ जाइत अछि। बाम धार, जे पूर्व दिस जाइत अछि, ओकरा पद्मा कहल जाइत अछि आ भागीरथी नामक दहिना धार दक्षिण दिस बहैत अछि आ मुर्शिदाबाद, बर्द्धमान, चौबीस परगना, कलकत्ता सँ होइत अनेक धारामे शाखाबद्ध होइत सागर द्वीप लग बंगालक खाड़ीमे मिलैत अछि। पश्चिम बंगालमे गंगाक कुल लम्बाइ ५२० कि.मी. छै। जतऽ एतेक पैघ आ एतेक धार अछि ओतऽ बाढ़ि कोनो पैघ बात नै। असलमे ऐ क्षेत्रक संरचना एहन अछि जे बाढ़ि आ धारक मार्ग बदलब एकटा स्वाभाविक प्रक्रिया छिऐ । उत्तर बिहारक पश्चिम चंपारणक सोमेश्वर पहाड़ीक क्षेत्रमे जमीन आ धारक ढलान कम हेबाक कारण बरसातक पानि आसानीसँ नै निकलैत अछि आ पैघ क्षेत्रमे पसरैत अछि। जखन गंगाक स्तर बेसी होइ छै तखन ओकर सहायक धारक पानि सेहो ठमकि जाइ छै। पानिक प्रसारक कारण एक दिस खेतमे नव माटि जमा भऽ जाइ छै आ जमीनक उर्वरता फेर ताजा भऽ जाइ छै। कखनो काल जँ भयंकर बाढ़ि आबि जाय तँ फसलक संग-संग बहुत रास जान-मालक नुकसान सेहो होइ छै। उत्तर बिहारमे बाढ़िक ऐ समस्याकेँ बुझबा लेल गंगा घाटीक निर्माणक प्रक्रियाकेँ बुझब आ संगे ई बुझब जे बर्खा आ पानिक अलग-अलग स्थिति, जकरा जलविज्ञान चक्र कहल जाइए, जरूरी अछि। तखन ई बुझि सकब जे धार केना अपन धारा बदलैत अछि आ तखन बाढ़िक रूप स्पष्ट हएत। (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) सुशीलक रचना संसार: हुनकर रचना संसार छन्हि- घराड़ी (उपन्यास) (१९७३), गामबाली (उपन्यास) (१९८२), भामती (नाटक) (पहिल मंचन १९९१, प्रकाशन २०१३) आ अस्मिता (लघुकथा संग्रह) (२०१६) आ ई चारू पोथी हुनकर अनुमतिसँ विदेह पेटारमे उपलब्ध अछि लिंक www.videha.co.in/pothi.htm पर। कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) मे लिखै छथि- "मैथिली उपन्यास-यात्राक लगभग सय वर्षक बाद मैथिल अन्तरजातीय विवाहक सपना, संघर्ष आ विडम्बना पर गरिमायुक्त उपन्यास लिखबाक श्रेय गौरीनाथकेँ जाइत छनि।" तँ की कमलानन्द झा सुशीलसँ ई श्रेय छीनि लेलनि? चलू अहाँकेँ लऽ चली कमलानन्द झा केर स्वार्थी दुनियाँसँ दूर, छल-छद्मसँ दूर सुशीलक जादूबला साहित्यक निश्छल दुनियाँमे। घराड़ी (उपन्यास)- सुशील (पछिला अंकसँ आगाँ) पाँचम खण्ड। ब्राह्मण डॉ. बिनायक आ मलाह नर्स करुणा। करुणा कहैए, ई विवाह असम्भव अछि, ओ नीच जातिक अछि, मलाहक बेटी अछि आ बिनायक पैघ लोक। बिनायक नै मानैए। आ कहैए जे ओ की करत जे करुणाक हृदयसँ डर भागतै। मुदा करुणा ओकरा थोपड़ा कऽ बिदा भऽ जाइए। मुदा सूतलमे उपन्यासकार ओकरा तंग करै छथिन्ह सपना सुना कऽ, से प्रेम तँ ओकरो छैहे। आ एम्हर बिनायक तामसे विखसँ सविख अछि। ओ करुणाकेँ कायर बुझैए। मुदा उपन्यासकार एकटा लाठी लेने बूढ़ाक प्रवेश ओकर स्वप्नमे करबै छथिन्ह- जे बिनायककेँ कहै छथि जे जकरा बिनायक सबला बुझि रहल छथि ओ समाजक गन्हायल परिपाटीक चलते अबला अछि, आ अपन चक्र सुदर्शन आ त्रिशूल हुनका देमय कहै छनि। साहसे टा नै, काजो कऽ कय देखबय कहै छन्हि, खाली झुट्ठेक प्रतिज्ञासँ की हएत? स्त्रीगण समाजकेँ विश्वास नै छै। मुदा बिनायक कहैए जे ओकर प्रतिज्ञा सत्य छै। ओ ई गप चिकरि कऽ कहैए जे ओ ई कइये कऽ रहत। आ ओकर भक खुजि जाइ छै। मलय आ अजीत बिनायक केँ घुरा लऽ जाइ छै। छअम खण्ड- महादेवक हत्याक बाद ओकर श्राद्धक भोज लालबाबू नीक जकाँ केलन्हि। मुदा बतहन बाबू आ पाठक जी ऐ गुलंञ्जरक कारणसँ अपरिचित नै छथि। महादेवक हत्याक पाछाँ कोन व्यक्तिक हाथ छै, से बुझबामे हुनका सभकेँ कोनो भाङठ नै छन्हि। मुदा खुलि कऽ विरोध करबाक साधांश नै छन्हि। आ ओम्हर लालबाबू सेहो हिनका दुनूकेँ मिला कऽ राखऽ चाहै छथि आ बतहन बाबूसँ सेहो सौजनियाँ जोड़ि लै छथि। उकबा उठल छै जे संतराजक बेटा रतन राति कऽ बुच्चनसँ भेँट करऽ अबै छै। परगासक बाप सरयू मण्डलक दू साल पहिने मृत्यु भऽ गेलै, श्राद्ध सभक सभटा खर्चा लालेबाबू देने रथिन्ह। से परगासक खानदान नूनक सैरियत दइ छै। परगास मैट्रिक पास कएने छल, लाल बाबू फीस माफ करबा देने रहथिन्ह। ओ बैकवर्ड क्लासक अनुदान लेल पैरबी केने रहय मुदा लाल बाबू उल्टा-पुल्टा बुझा कऽ ओकरा अपना लग राखि लेलखिन्ह, तीन बीघा खेत देलखिन्ह मुदा तकर कोनो लिखा-पढ़ी नै भेल छै। आ अन्तमे किछु हास्य बतहन बाबूक समधिक स्वागतमे- चाह हुनका गिलासमे देल गेलन्हि, बेसी दुआरे, मुदा हुनका भेलन्हि शरबत छिऐ, छटपटाय लगला जव्वह कएल मुर्गा जकाँ।छअम खण्ड समाप्त। ओम्हर रतन अपन मित्र शंकर भगवानक भक्त अवधेशक ताकिमे अछि। अवधेश कपिलेश्वर स्थान चोरा कऽ भागि जाइ छल, आ मिडिल पास केलाक बाद भगवान शंकरसँ सभ दिन भेँट होय तँय कपिलेश्वर हाइ स्कूलमे नाओं लिखेने छल। रतन निमतल्ला घाटमे भूतनाथ मन्दिरमे शंकर भगवानक शरणमे जाइत अछि। आ अवधेश भेट जाइ छै, भूपेन बोश एवेन्यूमे ओ पत्नी सुनीता संगे रहैए। कंगाली वेशमे रतन! पैघ अफसर अवधेश कङ्गालीकेँ पकड़ने सीढ़ीपर ठाढ़ अछि। सातम खण्ड समाप्त। मोती कुकुड़ संगे खढ़िआक शिकार रतन आ अवधेश मिलि कऽ करय। रतनपर वारंट छै। ओकरा जमानत चाही। मुदा एकटा चिट्ठी अबै छै, अवधेशक भायक। डॉ. बिनायकक बियाह ओ सभ अपन बहीन प्रेमासँ करबाबय चाहै छला, लाल बाबूकेँ सेहो पसिन्न छन्हि। मुदा आब अवधेशकेँ सोचय पड़तै। बिनायक तँ बिनायके अछि, मुदा लालबाबू? रतन कहैए जे बियाह तँ लड़कासँ ने हेतै। मुदा परिवारो देखऽ पड़ै छै। चिट्ठीमे लिखल छै जे लालबाबू जल्दीसँ काज भऽ जाय से चाहै छथि। से शंका उत्पन्न करैए। पहिने तँ ओ रुप्पैयाक लोभमे कहियो खुलि कऽ गप्प नै केलनि। आठम खण्ड समाप्त। कुमकुमक संग करुणा पाठक जीक आंगन जाइत अबैत रहैए, हेम-छेम बढ़ि गेल छै। लालबाबू करुणासँ बदली भऽ दोसर ठाम जेबा लेल कहै छथि, ओ दर्खास्तपर हस्ताक्षर कऽ दइए। लालबाबू जाइ छथि। करुणा कनैए, ओकरा देखि कुमकुम सेहो कानैए। पाठक जी अबै छथि। कुमकुमसँ कनबाक कारण पुछै छथि आ ओ भेद खोलैए, लालबाबू करुणापर तमसायल छलखिन्ह, कोनो कागचपर हस्ताक्षर लेलखिन्ह। खण्ड नौ समाप्त। करुणा आ बिनायकक गपशप। करुणाक नजरि लालबाबूक फोटो दिस जाइए। बिनायक दृढ़ अछि। दसम खण्ड समाप्त। पाठकजी आ बतहन बाबूक गपशप। पाठकजीकेँ कोनो गप बुझल छन्हि। लालबाबू करुणाकेँ नोकरी दिएबासँ पहिने मलहासँ कोनो शर्त मंजूरीक गप करै छला। पुछलापर नठि गेला, डिगरसारि पोखरिमे जीरा देमय चाहैए से कहि देलनि। मुदा कोनो पोखरि जीरा लेल नै देने छलखिन मलहाकेँ लालबाबू। तखन कोन एहेन गप छै जे मलहा आ लालबाबूए टा केँ बूझल छन्हि। करुणाक पढ़ाइ मुजफ्फरपुरमे 'कैथोलिक चर्च स्कूल' आ 'चैपमेन गर्ल्स स्कूल'सँ भेलै। पाठकजीकेँ कुमकुम पुछने छलन्हि जे करुणा दीदी ककर बेटी छथिन, दीदी बाबूकेँ ओ कहै छलखिन जे ओ तोहल बेटी छियौ आ रुपैय्या सेहो देलखिन। करुणा कथीपर हस्ताक्षर केलक? कुमकुमसँ पाठक जी बिनायककेँ कहबा देथिन्ह। बिनायक करुणासँ पूछत आ ओ मना नै कऽ सकत। आ फेर बिनायक आ करुणाक गपशप, बिनायक समाठक चोट करुणापर नै बजरऽ देता। एगारहम खण्ड समाप्त। अवधेशक पैरवीपर रतन कलकत्तामे सेक्युरिटी एडवाइजर अछि। मामिलाक तारीखपर मुजफ्फरपुर जाइए मुदा गाम नै जाइए। अवधेश संगे शेफालीसँ भेँट होइ छै। गपक क्रममे शेफाली कहै छथि जे अवधेश कतेक मैथिल सभकेँ नोकरी दियेलथिन मुदा वएह सभ हिनकर निन्दा करैत रहै छन्हि। शेफाली कहै छथिन जे शेफालीक मामा वकील छथिन्ह, ओ कहै छथिन्ह जे रतनक जीत हेतै मुदा असली हत्याराक पता सेहो लगबऽ पड़त। रतनकेँ विश्वास छै जे असली हत्यारा लालबाबूक जिरतिया परगा छै। अवधेश एकटा आर चिट्ठीक गप रतनकेँ कहै छै, बिनायककेँ करुणा संग लभ भऽ गेल छै, ओ ओकरासँ बियाह करऽ चाहैए। शेफालीक पिता रतनक सेक्युरिटी ऑफिसर, शेफालीक मामा कमल सरकार छथि वकील। शेफीलीक पिता राय जी मैथिल आ माता बंगाली। शेफाली मैथिलीमे कइएकटा पोथी सेहो लिखने छथि। शेफाली आ रतनक घटकैती! खण्ड बारह समाप्त। लालबाबू करुणाक बदलीक चिट्ठी पठबा दइ छथि, मुदा बिनायक करुणाकेँ छुट्टीपर पठबा दइ छथिन्ह आ पोस्टमैन नॉट अवलेबल लिखि कऽ चिट्ठी घुरा दइए। पोस्टमेन नवयुवक अछि आ बिनायक ओकरा नोकरी लगेबामे बहुत प्रयास केने रहथि। लालबाबू परगासक माध्यमसँ करुणाकेँ निपत्ता करबा देता मुदा हुनकर पत्नीकेँ सुनल दूटा शब्द 'देखिहें बचाकऽ' उद्वेलित कऽ दइ छन्हि। गर्मी तातिलमे मलय आ अजीत गामेपर अछि। परगास चारि गोटेसँ गेल मुदा करुणा दाँत काटि कऽ अपनाकेँ छोड़ा लेलक। आ ओकर चिचिऐब सुनि मलय, अजीत आ ड्रेसर सीरीचरण आबि गेलै। करुणा ओइ चारूमे सँ परगासकेँ चीन्हि गेलै। खण्ड तेरह समाप्त। करुणाक बदलीक चिट्ठी एकबेर ने घुरलै, आब फेर लालबाबू कोनो ब्योँत लगा रहल छथि, देखै छथि ओइ छुतहरियाकेँ आब के रखतै। रतन बरी भऽ जेत्तै, से वकील कहलकन्हि। करुणा आ परगासक बियाह करा देता आ मामिले खतम। घर घुरै छथि। पत्नी बिनायकक बियाहमे देरी हुनका द्वारा मांगल जायबला पूरेसूर तीस हजार रुपैय्या आ ऊपरसँ मोटरकेँ मानै छथि। खण्ड चौदह समाप्त। मिस्टर राय सभक बदौलत रतनकेँ नोकरीयो भेटलै आ जमानतो। लालबाबूक पत्नीकेँ भनक लागि गेलन्हि जे करुणा रतनक बहीन छिऐ मुनियाँ, ओकरा पहुँचीपर चिन्ह छै जइपर ओ घड़ी बान्हैत अछि, परगासक मायसँ किछु बजा गेल रहै। लालबाबू पछताइ छथि जे किए पाइ लेल अड़ि गेला, भने अवधेशक बहीनक संग बिनायकक बियाह करा दैतथि। बाताबाती होइए, पत्नी बिनायक आ करुणाक बियाह भऽ कऽ रहत से कहै छथि, लालबाबू धकेल दइ छथिन्ह, बिनायक बीचमे आबि जाइए, लाल बाबू तीतल बिलाड़ि सन पाछू हटि जाइ छथि। खण्ड पन्द्रह समाप्त। बिनायक संगे माय स्टाफ क्वार्टर चलि गेला। बतहन बाबू, पाठक जी आ मनसूर नदाफ लालबाबूकेँ मनबै लेल गेला। परगास बुच्चनक कहियो चेले छल, मुदा आब कहाँ जाइए। करुणाक बदलीक चिट्ठी फेर अबै छै, स्पेशल मेसेंजर द्वारा। करुणा चिट्ठी रिसीव कऽ लेलक। बिनायक तमसा जाइए, ओकरा नीच, बदमाश कहैए, कहैए जे जाति धर्म कतऽ जेतै! कहैए जे स्त्री नीच होइते अछि। कहैए नीच! कुलटा! मुदा 'प्राणेश' शब्द सुनिते बिनायक पिघलि जाइए। करुणा एकटा मोड़ल कागच बिनायकक हाथमे दैत अछि। बिनायक ओ पढ़ि लज्जित भऽ जाइए, क्षमा मांगैए। करुणा रिजाइन कऽ देलक ई गप सौंसे पसरि जाइए। लालबाबू खेनाइ-पिनाइ शुरू कऽ देलन्हि, जँ बिनायक घर आओत तँ ओ घर छोड़ि देता, एते धरि लालबाबू आंट कऽ देलनि। परगासकेँ लालबाबू अन्तिम नाटक खेलेबा लेल कहै छथिन्ह। खण्ड सोलह समाप्त। अन्तिम खण्ड अछि खण्ड सत्रह। दुर्गा भसानक दिन। दुर्गापूजामे तीनटा नाटक मंचस्थ कएल जाइए, दूटा मैथिली आ एकटा हिन्दी। आइ मैथिली नाटक छै- 'कुहेस', बिनायक रामकुमारक पार्ट अस्वीकार केलक, ओ डाक्टरक पार्ट खेलत। अजित रामकुमारक आ मलय उच्च शिक्षित युवक शंकरक पार्ट खेलत। बुच्चन वरक बाप सुवंश बनैत अछि। पार्ट खेलेलासँ लोक ओहने नै भऽ जाइए, बुच्चन सभकेँ रबाड़ि दैत अछि। मामिलाक तारीखक बाद रतन सेहो अवधेश आ बुच्चनक आग्रहपर दुर्गापूजा देखै लेल गाम आयल अछि। गाममे गुलंञ्जर छै जे करुणा मलाहक बेटी नै छिऐ, रतन करुणासँ दू-तीन बेर गप केलक, ओ अन्दाज करैए जे हो न हो करुणा ओकरे बहीन मुनियेँ ने हुअय। स्त्रीगणक गप ओकरा मोन पड़ै छै जे रतने सन एनमेन छै ई छौड़ी। रतन बुच्चन ओइठाम रहैए। चारि बजैबला छै, नाटक समाप्त होइबला छै, भसानक कारण देरी भेलै। करुणा अपन पिताकेँ सभ साल बजा लैत अछि, ओ अपनो मोने आबि जाइ छथि, अहू बेर आयल छथिन्ह। परगास रतनक पछोर धेने अछि। नवगछुलीक अन्तमे धूर छै, गाछक पाछाँ ओ धपायल अछि। मुदा छह धोखामे लालबाबूपर पड़ल, रतन पाछुए छल। फरीछ भऽ गेलै, लालबाबू अस्पताल एला। आ फेर रहस्योद्घाटन आ पश्चाताप। आ बिजयादशमीक नाटक समाप्त। (अगिला अंकमे जारी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.महाकान्त प्रसाद- बीहनि कथा- पियौज महाकान्त प्रसाद बीहनि कथा- पियौज
-एमपी हौ, की हाल सूरति छैह? -गोर लगै छी कक्का, नीके छी। आए कोना दर्शन देलियैक? -हौ प्रधानमंत्री कहने रहथिन्ह जे नहि खाएब आर नहि खाए देबैक। तोहर की बिचार छह? हमरा तऽ बुझाए यऽ जे...! -कक्का ओ खाएब-खोआएब मना कएने छलथिन्ह। पारस आ मोटरी बान्हब थोड़े बन्न कएलन्हि?! -रौ बहिं, ई तऽ बड़का पियौज निकलल,जतेक सोहियौ ओतेक छोट। -हँ से सैह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.कुमार मनोज कश्यप- उड़ल चिड़ै कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा उड़ल चिड़ै भैयाकाका के कान मे भनक तऽ पड़ल छलनि मुदा पतियायल नहिं रहथि जे भैयावन के सुड्डाह कऽ ओतऽ जूता के कारखाना लगतै। भैयावन सऽ भैयाकाका के एहू हेतु विशेष लगाव छलनि जे ओकर एक-एक टा गाछ ओ अपने हाथ सऽ लगेने छलाह.. पटेने छलाह.. बेढ़ने छलाह.. ओगरने छलाह.. आ नित ओकर बढ़ब, फूलब, फड़ब के अखियासने छलाह। जतेक पालन-पोषण लोक अपन संतान के करैत अछि ओहि सऽ कम्म तऽ नहिंए.. कहू तऽ बेसिये देखभाल भैयाकाका भैयावन के एक-एक टा गाछ के केने छलाह। आ तकरे कारण सऽ ओ गाछी भैयावन के रूपे जानल जाय लागल। आई भोरे सऽ सौंसे गाम दलमलित छलै। भैयावन के गाछ सभ के मोटरवला आड़ा मशीन सऽ धड़ाधड़ काटल जा रहल छै ...ई सुनिते भैयाकाका के हदांस उड़ि गेलनि। तऽ की सत्ते भोलू भैयावन के बेचि लेलाह आ हमरा जनतब तक नहिं! भैयाकाका के सौंसे देह मे जेना आगि पजरि गेलनि । तामस सऽ बुझबा मे नहिं आबि रहल छलनि जे एकर प्रतिकार कोना करथि। वृद्ध असक्क विछान धेने दलान पर पड़ल टुकुर-टुकुर तकैत रहैत छलाह। आई ओहि असक्क जीर्ण काया मे नहिं जानि ओतेक बल कोना आबि गेलनि जे एक्के झोंक मे बिछान सऽ उतरि गेलाह। मुदा पैर मे ठाढ़ हेबाक सक्क आब बाँचल कहाँ छलनि... तलमला कऽ खसि पड़लाह। मुँह सऽ बस अस्फुट 'भ...' बहरेलनि आ ईहलोक लीला समाप्त कऽ गेलाह। लोक बुझियो ने पौलक जे ओ कहऽ कि चाहैत छलाह -- 'भोलू कि भैयावन !' रफ़्तार मे भने फर्क छलै मुदा गाछ दुहू दिस कटि रहल छल -- एक दिस भैयावन मे आ दोसर दिस भूतही गाछी मे। भोलू धरि एखनो निर्विकार छलाह। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.आचार्य रामानंद मंडल- बर्चस्वबादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाज उर्फ पचपनिया संघर्ष आचार्य रामानंद मंडल बर्चस्वबादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाज उर्फ पचपनिया संघर्ष मिथिला मे बर्चस्वबादी समाज यानि ब्राह्मणवादी समाज, हाशियक समाज यानि बंचित समाज अर्थात् रार,सोलकन (इ नामांकरण ब्राह्मवादी संस्कृति के देन अछि ) वा ओबीसी पर वर्तमान मे भी सांस्कृतिक सामाजिक स्तर पर बर्चस्व बनैले अछि।मिथिलाक संस्कृति उच्च नीच पर आधारित अछि। जनकवि बैधनाथ मिश्रक अनुसार सुच्चा मैथिल-मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ अछि।इ दूनू मिल कैं ८०८वर्ष मिथिला पर राज कैलन अछि।बाभन राजा से मिलकै मैथिली के शोषक के भाषा बनैलेन आ इ शोषित बंचित के भाषा न बन पायल।साथै सत्ता, साहित्य आ सांस्कृतिक प्रतिष्ठान पर आई तक बर्चस्व बनैले अछि। लिंग्विंस्टिक सर्वे आफ इंडिया मे मिथिला पर गिरियर्सन अपन विचार प्रकट करैत लिखैत अछि कि मिथिला एकटा प्राचीन इतिहास वाला देश अछि जे अपन परम्परा के आई तक बकरार राखने अछि।अखनौ इ भूमि ब्राह्मण एकटा वर्गक आधीन आ बर्चस्व मे अछि।जे असाधारण रूप सं सत्ता आ कायदा कैं बकरार राखैं के दर्प स चूर अछि। सैकड़ो साल सं मिट्टीक ई टुकड़ा पर बहुत गर्व करैत रहल अछि।आ उतर,पूरब आ पश्चिम सं लगातार आक्रमण कैं झेलैत ई अपन पारंपरिक विशेषता बनौने रखने अछि।व अन्य राष्ट्रीयताक लोक सभ के समान भाव सं नै अपनावैत अछि। केदारनाथ चौधरी आबारा नहितन मे लिखैत अछि जे रेणु जी अप्पन एकटा भेंट मे हमरा बतलैनन कि मैथिली भाषाक क्षेत्र संकुचल,समटल आ एकटा विशेष जातिक एकाधिकार मे अछि। राजनीतिशास्त्रीक विचार अनुसार मिथिला मे दू तरहक संस्कृति अछि।एकटा बाभन कायथक संस्कृति आ दोसर गैर बाभन कायथक संस्कृति अछि। उदाहरण के लेल जनेउ, शादी ब्याह आ अन्य शुभ अवसर पर पाग पहननाइ, मधुश्रावणी,कोजगरा,नव बधुकैं टेमी से दागक प्रथा, विधवा विवाह निषेध प्रथा ,शुभ अवसर पर मांसाहार भोजन शामिल अछि। जौं कि इ सभ प्रथा गैर बाभन कायथक संस्कृति मे नै अछि। पं गोविन्द झा लिखैत छथि जे मिथिला मे दूटा समाज अछि।जे एक दोसर से अपरिचित आ अंजान छथि। बोली आ भाषा साहित्य कैं प्रश्र अछि। बिल्कुल अलग अछि।बाभन आ कायथ अपन मैथिली के शुद्ध आ मानक मानैत अछि।जे पाणिनि के व्याकरण जेना कठिन अछि। आ बंचित समाज के मैथिली कैं पश्चमी मैथिल यानी बज्जिका, दक्षिणी मैथिली यानी अंगिका,पुरबी मैथिली यानी ठेठी आ रार भाषा मानैत अछि।ज्योंकि बज्जिका आ अंगिका मे भाषा साहित्य के रचना भे गेल अछि।बज्जिका,अंगिका के सिद्ध कविजन के पदों के प्रयोग बर्णरत्नाकरमे ज्योतिश्वर (१३२४)कैले अछि। बाबजूद वै बज्जिका, अंगिका के मैथिली कैं भाषा नै, बोली मानके छांटि देल जाइत अछि। एकटा बज्जिका साहित्यकार अपन रचल पोथी लेके मैथिली साहित्य ,अकादमी गेला परंच रचना कैं मैथिली नै मानके लौटा देल गैल। बाभनवादी बर्चस्व मिथिला के बंचित समाज के बौद्ध तथा कबीर साहित्य से अपरिचित राखै मे कोनों कसर नै छोड़ैत अछि।तै बंचित समाज गैर ब्राह्मण साहित्य आ संस्कृति सं अनजान छथि। ब्राह्मण वर्ग अपन साहित्य आ संस्कृति के बल पर बंचित समाज कैं मानसिक गुलाम बनैले अछि। शास्त्र पुराण जेका मैथिली साहित्य भी ब्राह्मणक महिमा से भरल अछि।इनकर साहित्य मे बंचित समाज कैं अपना जमाने के प्रसिद्ध मैथिली गायक पं मांगैन खबास, साहित्यकार फणीश्वरनाथ नाथ रेणु, मिथिला के स्वांतत्र्य प्रथम शहीद रामफल मंडल , साहित्यकार अनूप मंडल शहीद जुब्बा सहनी, शहीद पूरण मंडल आ शहीद मथुरा मंडल के कोई चर्चा नै अछि। लेखक सह पत्रकार अरविंद दास अपना एकटा आलेख मे लिखैत छथि कि इक्कसवीं सदी कैं दोसर दशक मे भी मैथिली भाषा साहित्य मे बाभन आ कायथ के ही उपस्थिति दिखाई देत अछि। मैथिली भाषा के मे हाशिए पर के लोग जिनकर भाषा मैथिली अछि अदृश्य अछि। इतिहासकार पंकज कुमार झा लिखैत छथि आधुनिक कालि मे खास आजादी के बाद विद्यापति गौरवशाली मैथिल संस्कृति के प्रतीक चिन्ह बन के उभर लैन अछि। अइ आधार पर मिथिला मे दूं रंग के मैथिल अछि एगो बाभन आ दोसर सोलकन। मैथिली भी दूं रंग के एगो बाभन कैं मैथिली आ दोसर सोलकन के मैथिली। संस्कृत के नाटक मे निम्नवर्गीय पात्र के भाषा के अपभ्रंश बना देल जाइत रहै।तहिना विद्यापति भी जन सामान्य के लेल गीत गाना आ उच्च वर्ग के लेल पुरुष परीक्षा लिखनन।वर्ग भेद के आधार पर एहन रचना संस्कृत आ मैथिली साहित्य मे पायल जाति अछि।आजुक समय मे भी मैथिली के संस्कृतनिष्ठ आ शास्त्रीय भाषा बनाबे के षड्यंत्र चल रहल अछि।जे जन सामान्य साहित्य आ संस्कृति से बंचित रहै। मिथिला मे एते उच्च नीच आ छुआछूत के भाव है कि बाभन दलित वर्ग के आइ तक पूजा पाठ आ संस्कार नै करवैत अछि। दलित के इहां भोजन के सवाले नै अछि।सोलकन के पूजा पाठ आ संस्कार करवैत अछि।परंच आइ धरि सिद्ध अन्न (भात,दाल)भोजन नै करैत अछि।परंच कोरंजाभोजन ( चूड़ा,दही, चीनी, मिठाई आ फल)करैत अछि। मंदिर मे दलित गच्ची (मंदिर के चबूतरा) पर न चढ सकैत रहे।सोलकन मंदिर के गर्भगृह मे नै जा सकै अछि। केवल जनेऊधारी जा सकैत अछि। बंचित समाज के अइसे घबराय कैं नै चाही। कारण मैथिल आ मैथिली भाषी त बंचित समाज भी अछि।अप्पन संस्कृति आ समाज के हित मे निर्भय आ नि: संकोच साहित्य सृजन करबाक चाहि। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'-शीघ्र दर्शन योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' शीघ्र दर्शन पृथ्वी पर भक्त लोकनि द्वारा बनाओल भगवानक घर, अर्थात् मठ-मन्दिर, मे भगवानक दर्शन कठिन भऽ जाइत छैक। दर्शनार्थी लोकनिक भीड़क कारण मन्दिरक व्यवस्थापक सब भगवान कें कतेको घेरा मे बन्द कऽ कए राखि दैत छनि आ दर्शनार्थी कें भगवानक क्षणिक दर्शन लेल कतेको घंटाक कष्ट सहैत ढाठ बनाओल लाइन मे लागि चलए पड़ैत छैक। ई लाइन कतेकटा हेतैक आ कतेक घंटाक बाद भगवानक दर्शन होएत से निर्भर करैत छैक ओहि मठ-मन्दिरक प्रसिद्धि पर। भगवान ओएह, रूप एके, बूझू मूर्तिओ मे बहुत बेसी अन्तर नहि तैयो कोन मठ-मन्दिर मे अपने हुनकर दर्शन करैत छी ताहि पर निर्भर करत जे लाइन कतेकटा रहत आ कतेक लग सँ हुनकर दर्शन होएत। सब गाम मे एकटा शिव मन्दिर रहिते छैक, जतए ग्रामीण लोकनि फैल सँ पूजा-पाठ करैत छथि, शिवलिङ्ग पर अपन इच्छा भरि जल ढारैत छथि, हुनका पँजिअबितो छथि, अपन गीत-प्रार्थना सुबनैत छथि, किओ टोकनिहार नहि जे जल्दी करू, हटि जाउ आदि। तहिना गामक भगवती मन्दिर मे घंटाक घंटा बैसल रहू, पाठ करू, कियो नहि टोकत। एकर विपरीत देखि लियौक खेला वैद्यनाथ धाम मे, काशी विश्वनाथक मन्दिर मे, सोमनाथ मन्दिर मे, वैष्णो देवी मन्दिर मे, कामाख्या मन्दिर मे आ अन्य तथाकथित प्रसिद्ध मन्दिर सब मे। मन्दिरक प्रसिद्धिए अबैत छैक ओतए दर्शनार्थी लोकनिक भीड़ सँ आ कि एहि प्रचारित कथ्य सँ जे फलाँ मन्दिर मे पूजा-अर्चना अथवा दर्शन केला सँ मनोवाञ्छित फल भेटैत छैक। अपना देश मे तिरुपतिक पड़ोस मे तिरुमल पहाड़ी पर अवस्थित भगवान वेङ्कटेश्वरक मन्दिर दर्शनार्थीक भीड़क लेखें विश्व मे सबसँ प्रसिद्ध अछि जतए दर्शन लेल साधारणत: आठ-दश घंटा लाइन मे लागब जरुरी छैक। एही कारण यद्यपि आन सब तीर्थ भैए गेल छल, हम ओतए जेबा सँ परहेज कएने छलहुँ मुदा भगवाने जखन जिद कऽ कए बजा लेलनि तखन अपन कोन उपाय ? मान्यता छैक जे कोनो देवी-देवता जखन भक्त कें बजबैत छथिन तखने लोकक पएर ओहि मन्दिर दिश उठैत छैक आ हुनके आशीर्वादक फलस्वरूप यात्राक सबटा कष्ट कटैत जाइत छैक। भगवान वेङ्कटकेश्वरक इच्छा आ बंगलोर मे रहैत कर्नाटक राज्य पर्यटन विकास प्राधिकरणक 'शीघ्र दर्शन' बला आकर्षक विशेष पैकेज। तिरुपति बालाजीक दर्शन आ सेहो शीघ्र ! पैकेज मे वर्णित समयानुसार मात्र तीन घंटाक भितरे दर्शनक आश्वासन। जेना बुझियौ कोनो वरदान भेटऽ बला होइक आ कि कोनो जैकपॉटक निश्चित टिकट रहए। एहि बेर हम दूनू प्राणी हुनक दर्शन करबाक लेल तैयार भैए गेलहुँ। बंगलोर सँ राति मे बस चलैत छैक, अहलभोरे तिरुपति पहुँचि जाइत छैक, एकटा होटल मे पहिनहि सँ व्यवस्था कएल रहैत छैक। डेढ़-दू घंटा मे नित्यक्रिया सँ निवृत्त भऽ कए जलपानो कऽ लैत अछि लोक। तखन पहिने तिरुपतिए मे अवस्थित माता पद्मावती (जे दक्षिण भारत मे भगवान बालाजी अर्थात् विष्णुक प्रिया लक्ष्मीक रूप छथिन) के मन्दिर मे दर्शन करैत अछि। तखन तिरुमल पहाड़ी जा कए भगवान बालाजीक दर्शन करैत घुरि अबैत अछि, रस्ता मे दिनक भोजन सेहो भेटैत छैक आ प्राय: आठ बजे साँझ तक बंगलोर घुरि अबैत अछि। पैकेज मे शीघ्र दर्शनक लेल 300 टाकाक विशेष टिकट आ गाइडक सुविधा सेहो सम्मिलित छैक। बर बेस। भगवान बालाजी कें हृदय मे राखि पैकेज के दूटा टिकट कटा लेल। 11 अक्टूबर 2022 कें राति मे बंगलोर सँ बस सँ विदा भेलहुँ। बस बूझू दुइए बजे राति मे तिरुपति पहुँचि गेलैक। होटल शहरक बाहरे रस्ताक कात मे छलैक। सब गोटे उतरि कए अपन अपन रूमक चाभी लैत गेलहुँ। होटल ठीकेठाक, जकरा निम्न मध्यवर्गक बजट होटल कहल जाइत छैक, कमरा मे साफ सफाइ मे कोनो सिकाइति नहि, उज्जर तौलिया, दूटा साबुनक टिकिया, गरम पानिक गीजर आदि सब किछु, दूटा कुर्सी आ एकटा छोट टेबुल पर्यन्त। ठीक चारि बजे टूर गाइड सब कमरा मे केवाड़ ठकठका देलखिन। बाहर निकलि देखल जे बेसी लोक पहिनहि सँ जलपान करैत। जलपान शुद्ध दक्षिण भारतीय स्टाइल मे भरि पेटा मोटका उतप्पम, इडली, बड़ा, उपमा, पोंगल आदि चटनी साम्भरक संग सब किछु। लोक प्राय: सब किछु खेलक। हमरा एतेक भोरे जलपान करबाक इच्छा नहि भेल, श्रीमतीजी अपन रुचि सँ किछु खेलनि, चाह पीबि सब गोटे बस मे बैसलहुँ। बस शहर दिस विदा भेल। हमसब पहुँचलहुँ पद्मावती मन्दिर। उतरिते देखल थलकमलक गुच्छा लेने लोक सब ठाढ़, सब कें बलजोड़ी पकरबैत, पचास टाका दाम। तहिना एकटा महिला कर्पूरक पैकेट सेहो धरा देलनि, ओहो पचास टाका। अनेरे सौ टाका उड़ि गेल। तकर बाद देखल सूचना जे पैंट पहिरि दर्शन वर्जित, शुद्ध भारतीय पोशाक चाही। ओतहि दोकान मे विभिन्न दामक लुंगी भेटैत, अढ़ाइ सौ मे एकटा कीनल आ पैंटक उपर लपेटि लेल। वाह रे व्यवहार ! लुंगी बेचनिहारक धंधा भेलैक कि देवी-देवता कें ठकनाइ ? अस्तु, एहि सब मे तर्क के अवसर नहि भेटैत छैक। मन्दिर प्रशासन कानून बना देलकैक, मानए पड़त। गाइड रस्ता बता देलनि आ कहलनि जे घुरला पर तीन नम्बर गेट सँ बाहर निकलि जाएब तऽ बस भेटि जाएत। मन्दिर मे प्रवेशक लेल 25 टकाक टिकट लेबए पड़ैत छलैक। कोनो बात नहि, टिकट लेल कोनो पैघ लाइन नहि छलैक। टिकट लेलहुँ आ लाइन मे लागि गेलहुँ। लाइन बहुत पैघ तऽ नहि तैयो पचास व्यक्ति तऽ हमरे बस के छलाह। एहन किछु आर बस आएल छलैक। घुसकैत रहलहुँ। कने दूर गेलाक बाद एकटा प्रतीक्षालय मे बैसा देल गेल। देखल करीब तीसेक लोकक बैसेक लेल रेलवे स्टेसनक वेटिंग रूम बला कुर्सी लगाओल। साधारण घेरा आ एकटा गेट। एहने छओटा प्रतीक्षालय अगल-बगल बनल। मन्दिर प्रशासनक सिपाही सब एकटा प्रतीक्षालयक गेट खोलि करीब पन्द्रह-बीस मिनट रुकि जाइत छलाह तखने दोसर के गेट खोलैत छलाह। भीड़ कें कन्ट्रोल करबाक लेल उत्तम उपाय। किछु प्रतीक्षाक बाद हमरो सब के नम्बर आबिए गेल, चलैत गेलहुँ, दक्षिण भारतीय मन्दिरक रीतिक अनुसार एतहु दूरे सँ दर्शन करबाक छल, तहिना कएल। हाथक थलकमल एक ठाम सब जमा करैत छलैक, हमहूँ सब ओतहि राखि देलियैक, कर्पूर आगि मे देलियैक आ आपस आबि गेलहुँ। फेर तीन नम्बर गेट तक अबै मे आ बस तकै मे किछु समय तऽ लगबे कएल मुदा आन लोक सब तऽ आरो निश्चिन्त छलथि। हमरा सबहिक पहुँचलाक बाद करीब आरो पन्द्रह-बीस मिनट लगलैक बसक सब यात्री कें जमा करबा मे, तखन बस विदा भेल तिरुमल पहाड़ी दिस। पूरा रस्ता तिरुपति शहर कें देखैत जा रहल छलहुँ। मात्र एकटा जिला स्तरक शहरक हिसाबें जगह बहुत विस्तृत आ साफ-सुथरा। बिहारक कोनो शहर सँ तुलना करब व्यर्थ। बस मे सब गोटे कें गाइड महोदय शीघ्र दर्शन बला टिकट बाँटि देलखिन आ बेर बेर चेता देलखिन जे बिना परिचय पत्र के मन्दिर मे प्रवेश नहि होएत। करीब चालीस मिनट बाद हम सब पहुँचलहुँ तिरुमल पहाड़ीक नीचा अलिपिरि ट्रान्जिट बस स्टैण्ड, जतए आन्ध्र प्रदेश राज्य परिवहन के अनेक बस लागल छलैक। कहल गेल जे अति जरूरी सामानटा लऽ लैत जाउ, बाकी बंगलोर सँ आएल ओही बस मे छोड़ि देबाक अछि, ई बस निच्चे मे रहतैक, पहाड़ी पर जेबाक लेल आन्ध्र प्रदेश राज्य परिवहनक स्थानीय बस लेबए पड़त। ई स्थानीय बस यात्रीक लेल उपर-नीचा करिते रहैत छैक भरि दिन तें ओहि मे कोनो सामान नहि छोड़बाक छैक। सएह करैत गेलहुँ, शीघ्र दर्शन मे किछुए घंटाक तऽ बात छलैक, लोक कतेक सामान लेत ? पानिक बोतल जरूरे राखि लेल संग मे। स्थानीय बस सँ कने आगू गेलाक बाद एकटा चेकपोस्ट पर उतरए पड़ल, एतए सामानक एक्सरे जाँचक संग सिपाही लोकनि द्वारा लोकक शरीरक जाँच कएल गेलैक जहिना हवाइ अड्डा पर होइत छैक। तकर बाद ओहि कात जाकए फेर बस मे सवार होइत गेलहुँ। करीब पौन घंटाक बाद हम सब बालाजी मन्दिर परिसर मे बस अड्डा पहुँचलहुँ। एतए एकटा शॉपिंग कम्प्लेक्स छलैक जतए तीर्थयात्री लोकनिक लेल सनेसबारीक सामान भेटैत आ किछु भोजनालय सेहो। पैघ गाछ सब के चारू कात सीमेंटक चबूतरा बनाओल। एतहि एकटा दोकान मे हमरा लोकनिक जुत्ता-चप्पल आ मोबाइल रखबाक व्यवस्था कएल गेल। एकर बाद अगिला किछु घंटा खुले पएर रहबाक छल। मोबाइल नहि रहला सँ आब फोटो सेहो नहि लऽ सकैत छलहुँ। मन्दिर मे मोबाइल, कैमरा आदि निषिद्ध छैक। एखन करीब साते बाजल छलैक। गाइड महोदय एतबा कहि जे प्राय: एक घंटा प्रतीक्षा करए पड़त हमरा लोकनि कें छोड़ि कतहु निपत्ता भऽ गेलाह। टूर पैकेजक प्रोग्राम मे दर्शन लेल निर्धारित समय छल आठ बजे सँ एगारह बजे धरि। तें लोक कें कोनो हड़बड़ी नहि छलैक। लोक सब अपन अपन गऽर लगा लेलक आ बैसि गेल। बैसल बैसल किछु तऽ करबाक छलैक से अपन अपन रुचिक अनुसार चाह-काफी पीबऽ लागल। हम आब पैंट खोलि अपन नव लुंगी कें नीक जकाँ पहिरि लेलहुँ। जखन शुद्ध भारतीय ड्रेसक नियम एतहु छलैके तखन किएक अनेरे पैंटक उपर ओकरा लपेटने रहितहुँ ? करीब आठ बजे हमहूँ जलपान कऽ लेलहुँ आ प्रतीक्षा करैत रहलहुँ। करीब साढ़े आठ बजे गाइड महोदय उपस्थित भेलाह आ हमरा सब कें बराहस्वामी मन्दिर चलबाक लेल कहलनि। मान्यता छैक जे तिरुमल देवस्थान मे भगवान वेङ्कटेश्वरक दर्शन सँ पहिने भगवान वराहस्वामीक दर्शन करबाक चाही तखने वेङ्कटेश्वर भगवानक दर्शन सुफल होइत छैक। रस्ता मे ओ किछु बतबैतो जा रहल छलखिन मुदा मात्र कन्नर भाषा मे। बस मे ओ अंग्रेजी, हिन्दी सब बजैत छलाह मुदा एखन बिसरि गेलाह जे कन्नर नहि बुझनिहार तीर्थयात्री सेहो बस मे छलखिन। अस्तु, हुनका पाछू पाछू चलैत हम सब लाइन मे लागि गेलहुँ। एतए गाइड अलग भऽ गेलाह। भीड़ बहुत बेसी तऽ नहि तैयो मन्दिर तक घुसकै मे आ दर्शन करै मे प्राय: आधा घंटा लागिए गेल। एकरा समयक सदुपयोग सेहो कहल जा सकैत छैक। एतए सँ विदा भेलहुँ मन्दिर परिसरक एकटा रस्तें जाहि मे देखल प्रसाद बला लड्डूक स्टीलक खाली ट्रे के ढेर लागल। प्राय: एक मीटर लम्बा आ आधा मीटर चौड़ा ट्रे कतेक छल से कहब कठिन, तैयो हजार सँ उपरे रहल हेतैक। एहि सब दर्शनीय वस्तु कें देखैत पहुँचलहुँ ओहि गेट लग जाहि सँ शीघ्र दर्शनक टिकटधारी लोकनि प्रवेश करितथि। एतए बेस भीड़। शीघ्र दर्शनक टिकट मात्र हमरे सबहिक बसक यात्री लग तऽ नहि ने छलनि, ओहने अनेको पर्यटन कम्पनी कतेको बस भरि कए तीर्थयात्री सबकें अनने छल आ सबहिक संग ओ तीनसौ टाकाक टिकट छलनि। ओतबे नहि, बहुतो चतुर लोक अपनहि इन्टरनेट सँ शीघ्र दर्शनक टिकट कटौने छलाह सेहो एतहि प्रवेश करबाक लेल आबि गेल छलाह। लगैत छल आब फोकटिया दर्शन केनिहारे कम संख्या मे हेताह, आ 300 टाका के शीघ्र दर्शन केनिहार बेसी। आजुक परिस्थिति मे 300 टाका बहुत बेसी नहिए भेलैक। स्थिति कें देखैत जकरा जतए गऽर लगलैक, पोन रोपि देलक। कतेक काल लोक ठाढ़ रहत ? आ एखन तऽ असली लाइन बाँकिये छलैक। एतए गाइड महोदय बेर बेर ओहि गेट पर सुरक्षा कर्मचारी सबकें जिज्ञासा करथिन गेट खोलबाक समय लेल, मुदा ने हुनका कोनो समुचित उत्तर भेटनि आ ने हमरा लोकनि बूझि पाबी जे अगिला खेला कखन शुरू होएत। टूरक प्रोग्रामक हिसाबें समय बीतल जा रहल छलैक, आठ बजे सँ एगारह बजे के बीच दर्शन हेबाक छलैक मुदा एतए साढ़े नओ बजे गेटो खोलबाक कोनो सुरसार नहि। आ एहि गेट सँ कतेक दूर पर भगवान छथि से अज्ञात। अन्त मे करीब पौने दस बजे गेट खुजलै आ लोकक भीड़ ओहि मे ढुकि गेल। एखन तऽ लोक सड़के पर छल। जकरा जतेक सक्क छलैक ततेक तेजी सँ चलि रहल छल। हम सब अपनहि वेगें चलैत रहलहुँ। सड़क पर लोक बिना कोनो पाँती बनौने जँहि-तँहि चलि रहल छल। पाँती बनबैक कोनो इन्तजाम सेहो नहि देखा रहल छलैक। आब हमरा सबहिक बस के यात्री लोकनि छिड़िया गेल छलाह। ई कने चिन्ताक विषय छल मुदा पचास गोटे कें संग बान्हि कए राखब सेहो सम्भव नहि छलैक, ताहू मे सब उमेरक लोक, नवयुवक, नवयुवती सँ लऽ कए हमरहु सँ उमेरगर व्यक्ति सब बस मे छलाह। प्राय: सात-आठ मिनट चललाक बाद एक ठाम रेलिङ्ग बनल छलैक जाहि मे लोक ढुकि रहल छल। एतए कोनो सुरक्षा कर्मचारी नहि, भीड़ बेसी आ धक्कामुक्की सेहो। अपना देश मे भीड़ मे अनुशासन राखब असम्भवे होइत छैक। एक बेर तऽ बुझाएल जे भीड़क रेला मे खसि पड़ब। मुदा कहुना दूनू गोटे अपना कें सम्हारलहुँ। तकर बाद तऽ भीड़क संग चलैत रहलहुँ। गति साधारण, बूझू एकाध किलोमीटर प्रति घंटाक हिसाबें। आगू बुझाएल जे कतेक ठाम दू दिस सँ अबैत लाइन एक होइत छलैक। एहन स्थल पर फेर धक्कामुक्की भइए जाइत छलैक। रस्ता सब ततेक घुमावदार जे किछु बूझब कठिन कि कतेकटा लाइन छलैक। खुला जगह मे सड़कक कात यदि एहन लाइन रहितैक तऽ लोक कहियो सकैत छलैक जे दू किलोमीटर कि तीन किलोमीटर लम्बा लाइन छैक मुदा एतए आगू कि पाछू अहाँ मात्र पचीस-पचास फुट तक देखि सकैत छलियैक। बीच मे कतहु लाइन रुकियो जाइत छलैक। प्राय: आधा घंटा चललाक बाद जे इलाका सब आएल ओहि मे जगह जगह शौचालयक व्यवस्था बनल। लोक लाइन छोड़ि कए आवश्यकता भेला पर शौचालय जा सकैत छल मुदा ओतेक पछुआ जेबे करैत। बीच-बीच मे कोम्हरहु सँ दोसर लाइनक मेल भऽ जाइत छलैक आ फेर धक्कामुक्की शुरू। अपन संगी कें संग राखब एहन समय मे कठिन होइत छलैक, खास कऽ कए वयसाहु लोकक लेल। गोटेक घंटा चललाक बाद देखल कतहु कतहु इमर्जेन्सी गेट बनल। एक व्यक्ति कें बच्चा ततेक ने कानऽ लगलनि जे हुनका एहि गेटक व्यवहार करहिं पड़लनि बहरेबाक लेल। करीब बारह बजे हम सब पहुँचलहुँ ओहि इलाका मे जतए कुर्सी बला प्रतीक्षालय सब बनल छलैक। कुर्सीक व्यवस्था ओहिना जेना भोर मे पद्मावती मन्दिर मे देखने छलियैक मुदा अन्तर ई जे हॉल बेस पैघ आ उपर सँ नीच तक सीढ़ीक रूपमे गैलरीनुमा बनाबट। हॉल मे टीभी पर ऑनलाइन दर्शनक दृश्य चलैत। गर्भगृह मे पुजेगरी लोकनि पूजापाठ मे व्यस्त आ तकरा नजदीक सँ देखबाक अवसर एहि टीभी पर्दा पर छलैक। ध्वनि मुदा बन्द कएल छलैक। लोक ततेक ने थाकि गेल छल जे दर्शन मे होइत देरी कें गमितो कुर्सी पर बैसि रहल। जकरा जगह नहि भेटलैक से सीढ़ी सब पर छिड़िया गेल। कतेको व्यक्ति बिस्कुट, भुज्जा आदि निकालि उदरस्थ करए लागल जे आगूक यात्रा लेल ऊर्जा भेटतैक। थाकल रहला सँ किछु कें निन्न सेहो लागि गेलैक। हॉल मे हम सब गैलरीक उँचका भाग सँ प्रवेश कएने छलहुँ। नीचा हॉलक बाहर दोसर कात दर्शनार्थी लोकनि मन्दिर दिस चल जा रहल छलाह। कतेक पैघ लाइन तकर कोनो अनुमान नहि। लोक कें लगै जे अगिले मिनट मे ओ लाइन शेष हेतैक आ हमरा लोकनिक नम्बर आओत मुदा से होइ नहि। एहि हॉल मे हमरा लोकनि करीब पैंतालीस मिनट तक रुकलहुँ। तकर बाद फेर नीचा बला लाइन मे लागि घुसकए लगलहुँ। किछु कालक पश्चात एक ठाम देखल प्रवेशपत्र चेक करबाक काउन्टर सब बनल। एतए लाइन काउन्टरक हिसाबें बँटि गेल। काउन्टर पर काज बहुत मन्थर गतिएँ भऽ रहल छलैक। एहि लाइन मे हमरा बसक किछु यात्री लोकनि भेटि गेलाह। आश्वस्त भेलहुँ जे बस हमरा सब कें छोड़ि कए भागत नहि। करीब एक बजे हम सब काउन्टर पर पहुँचि अपन आधारकार्ड देखाओल। ओकरा टिकट मे देल विवरण सँ मिलाओल गेल आ तखनहि आगू बढ़बाक अनुमति भेटल। एखनहु भगवान बालाजी दूरे छलाह। घुसकैत रहलहुँ। आब फेर सब छिड़िया गेल आ बसक यात्री सब सँ सम्पर्क टूटि गेल। जतए मन्दिरक मुख्य द्वार छलैक ओतए फेर रोकि देल गेल। एकेटा गेट, भीतर गेनिहार आ बाहर एनिहार दूनू लेल। किस्त किस्त मे लोक कें दूनू दिस छोड़ल जाइत छलैक। कहुना करीब पौने दू बजे हमसब अन्तत: गर्भगृहक सामने पहुँचलहुँ जतए सँ दिव्य मूर्तिक दर्शन होइत छलैक। सामने भगवानक मूर्ति देखि लोक कें सब मनोकामनाक पूर्ति भैए जाइत छैक। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्रोच्चारक संग माथ झुका हुनका प्रणाम कएल। एतेक काल तक लाइन मे घुसकैत रहबाक फल भेटल। लोक कें एतए किछुए सेकण्ड रुकबाक अनुमति, किन्तु जेना सुनने छलियैक जे लाइन मे घुसकैते लोक क्षणिक दर्शन सुख पबैत अछि आ जाहि तरहक व्यवस्था सँ हम कलकतिया सब दक्षिणेश्वर कालीक मन्दिर मे पूर्ण परिचित छी, से नहि छलैक। लोक लाइन मे नहि छल, एक दोसरा कें धक्का सेहो नहि दैत छल, तें कतबो स्वयंसेवक सब बाजथु, लोक एहि कोन ओहि कोन धऽ कए दर्शन सुख प्राप्त करबाक प्रयास करितँहि छल। लोक थेथर, एतेक कष्ट सँ तऽ लोक जिनगी मे एक बेर एतए पहुँचैत अछि, शीघ्र दर्शनक व्यवस्था रहितहुँ कतोक घंटा लाइन मे लागल रहल, तखन कोना किछु सेकण्ड मे दर्शन सुख छोड़ि दिअए? हमहूँ दूनू गोटे कहुना जतेक सम्भव भेल अपन मोरचा सम्हारने रहलहुँ। ई व्यवस्था परिवर्तन मात्र आजुक लेल हमरे सबहिक समय भेल छलैक आकि आब एहिना रहैत छैक से कहब कठिन। हम ककरो एकरा मादे किएक पुछबैक? किन्तु एतेक तऽ निश्चित जे जहिना बहुतो आन तीर्थस्थल मे हमरा संग होइत रहल अछि, एतहु भगवान बालाजीक विशेष कृपा भैये गेल आ दर्शन सुख प्राय: आधा मिनट तक भेटल। फेर मोन मारि कर भगवान वेङ्कटेश्वर कें हृदय मे ध्यान धरैत "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" के जापक संग घुरतीक बाट धेलहुँ। मन्दिर प्राङ्गण के घुरती बला रस्ता मे एक ठाम मन्दिरक एकटा कर्मचारी लड्डू प्रसाद बँटैत, ई लड्डू एतुका प्रसिद्ध लड्डू सँ बहुते छोट, बूझू गामक दोकान के पँचटकहिया लड्डूक आकार, किन्तु वस्तु एके। एहि प्रसाद कें उदरस्थ कएल। घुरती मे गेटसँ बहराएब सेहो आसान नहि छल, कारण बुझिए गेल छिऐक गेट एकेटा। घुरती बला लोक लाइन मे सेहो नहि लागए चाहैत छल। ने कोनो बाध्यता छलैक आ ने कोनो व्यवस्था। मात्र गेट लग रस्सीक ढाठ दूटा स्वयंसेवक पकड़ने। एना मे जे हेबाक छलैक से भेबे केलै, जखने रस्सी उठाओल गेलैक लोक बान्हल पानिक धार जकाँ बेहिसाब जोर मारलकै आ एकटा महिला खसिए पड़लीह। संयोग जे ओ कात मे छलीह आ हुनक आत्मीय सब तुरत्ते हुनका सम्हारि लेलकनि नहि तऽ पैघ दुर्घटना भऽ सकैत छलैक। गेटक बाहर निकलि कए गेलहुँ असली लड्डू प्रसाद लेबाक लेल। शीघ्र दर्शनक टिकट मे एकटा लड्डू सामिल छलैक। टिकट देखाउ, लड्डू लिअऽ। अतिरिक्त लड्डू लेल पचास रुपैयाक हिसाबें अतिरिक्त भुगतान करियौक। काउन्टर कर्मचारी बेस दक्ष, ट्रे सँ लड्डू निकालि लोक कें देबा मे न्यूनतम समय लगबैत। एतए लड्डूक ट्रे सब एक के उपर एक गेंटि कए राखल। जखने एकटा ट्रे खाली भेल, उठा कए नीचा राखि देलक, ओकर नीचा बला ट्रे सँ बाँटऽ लागल। हजारो खाली ट्रे, जाहि मे लड्डू बनैत छल हेतैक, से तऽ देखिए लेने छलिऐक, लड्डू वितरण व्यवस्था देखि ओतुका व्यवस्थापक लोकनिक प्रशंसा कएने बिना कियो नहि रहि सकैत अछि। पैघ हॉल मे करीब तीसटा काउन्टर बनल। तैयो सब काउन्टर पर दस-पन्द्रह लोकक लाइन लगले छलैक। प्राय: एक मिनट लोक कें लगैत छलैक अपन कूपन देखेबा मे, अतिरिक्त लड्डूक पैसा देबा मे आ अपन लड्डू उठेबा मे। हमरो सब कें लाइन मे करीब पन्द्रह मिनट लागिए गेल मुदा शीघ्र दर्शनक चारि घंटाक तुलना मे ई किछु नहि छलैक। भगवान बालाजीक दर्शन भेल, प्रसाद भेटल, आब ई गौण बात भेल जे एगारह बजेक बदला दू बाजि गेल छलैक। एही दर्शन लेल लोक दिनक दिन एतए लाइन मे ठाढ़ रहैत अछि, सूति पर्यन्त रहैत अछि। तकर बाद घुरतीक वर्णन महत्वहीन भऽ जाइत छैक। रहस्य रोमांच सेहो नहि। मात्र अपन जगह, जतए जुत्ता-चप्पल आ मोबाइल राखल छल, तकबाक क्रम मे लोक कें जिज्ञासा करबा मे भाषाक समस्या बुझाएल। जेना विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थल छिऐक तेना सबतरि हिन्दी अंग्रेजी बुझनिहार लोक नहि। बल्कि पुलिस सेहो तेलुगु छोड़ि आन भाषा नहि बुझैत। इशारा सँ जगहक वर्णन करैत काज चलाओल। रौद तिक्ख भऽ गेल छलैक आ एतेक काल खुला पएरे चलैत आब हमर धर्मपत्नीक तरबा मे कष्ट होमए लागल छलनि। हेराइत भोतिआइत कहुना हुनका सम्हारैत ओहि अड्डा पर पहुँचिये गेलहुँ जतए भोर मे बस सँ उतरि जुत्ता रखने छलिऐक। एतए पहुँचि पहिने तऽ दोकान सँ मोबाइल लेल। ओ लोला हाथ मे अबिते आश्वस्त भेलहुँ जे आब बस छुटियो जाएत तऽ कहुना बंगलोर पहुँचिये जाएब आ सामान तऽ बंगलोर मे बस डिपो सँ लेल जा सकैत छलैक। मोन भेल होटल मे भोजन कऽ ली। बेरो भऽ गेल छलैक, भूखो लागि गेल छल किन्तु सहयात्री लोकनि कहलनि जे भोजनक इन्तजाम टूर पैकेज मे छैक आ देर-सबेर भेटबे करत। अस्तु, मोन मारि कए भोजनक विचार छोड़ि देल। लोक एतए अपना हिसाबें सनेसबारी किनैत गेल। एकटा फोटोग्राफर कहलनि फोटो खिचबा लै लेल। सत्ते एतए फोटो तऽ भेल नहिए। अपना कैमरा सँ मन्दिरक फोटो आ कि कोनो सेल्फी आदि असम्भवे छल। तखन ओ फोटोग्राफर हमरा दूनूक फोटो लेलनि, कम्प्यूटर मे मन्दिरक विस्तृत पृष्टभूमि के चित्र पर ओकरा फोटॉशॉप द्वारा जोड़ैत हमरा एकटा तथाकथित फोटो बना देलनि। एतुका इएह सबूत आ पैघ सनेस। किछु प्रतीक्षाक उपरान्त बस विदा भेल, नीचा गेला पर अपन बंगलोर बला बस मे सवार भेलहुँ। यद्यपि बहुत देरी भऽ गेल छलैक तथापि दिनुका भोजन के व्यवस्था ओही होटल मे कएल छल जतए भोरबा मे रुकल छलहुँ आ जलपान केने छलहुँ। साढ़े चारि बजे भोजन करैत गेलहुँ। शीघ्र दर्शन बहुत शीघ्र तऽ नहि भेल, तथापि भगवान बालाजीक ख्याति कें देखैत दू-तीन घंटा देर-सबेर कोनो पैघ बात नहिए कहल जेतैक। शीघ्र दर्शन शब्दे ततेक आकर्षक छलैक जे हमरो सन अहदी कें बालाजीक शरण मे पहुँचाइये देलक। कने बेसी समय तक भुखले रहए पड़ल आ कि कने थाकि गेलहुँ, ततबे कष्ट। उपलब्धिक आगू ई तुच्छ छल। कहल जाइत छैक जे तीर्थस्थान मे कष्ट भेले पर फल भेटैत छैक। घरमुहाँ बसो घरमुहाँ बरदे जकाँ कने तेज चलबे करैत छैक। करीब दस बजे राति मे बंगलोर पहुँचि गेलहुँ। शीघ्र दर्शन यात्रा समाप्त भेल। -सम्पर्क- ब्लॉक 8, फ्लैट 2बी, डायमन्ड सिटी नॉर्थ, कोलकाता 700055, मोबाइल 9831037532 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१३) निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १३)
निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग मे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँऽ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग - १३)
पूर्व कथा: दानव राज केशि संऽ पराजित इन्द्र के देवर्षि नारद राजा पुरूरवाक वीरता के संबंध मे जानकारी दैत छथि एवम हुनका संऽ सहायता मंगवाक निर्देश दैत छथि l आब आगू: देवर्षि नारदक अमृत बून्द सन मधुर वाणी वायुमंडल मे गूंजि रहल छल,एवम इन्द्र समेत उपस्थित सभ देवगण,अप्सरा गण कर्ण-गह्वर के मार्ग संऽ प्रविष्ट होमयवला ओहि अमृत वर्षा रूपी मधुर आवाज के पूर्ण गंभीरता संऽ ध्यान मग्न होइत अपन मस्तिष्क समेत हृदय मे स्थान दऽ रहल छलाह- "एहि समय भूमंडल पर सातो द्वीपक अधिपति सम्राट पुरूरवा छथि l ओ पुरूरवा जे चंद्र वंशक मणि छथि l हुनक पराक्रम के समक्षक कोनो अन्य नरेश्वर नहि ठाढ़ भऽ पाओलl हुनक महती शक्ति संऽ दानवराज केशि के सामना पूर्वहि मे भऽ चुकल अछि l ओ मार्ग मे उगल झार सन असुर सभ कें कटैत गेलथि आ केशि के पराजित कऽ देलाह l केशि हुनका सऽ भयभीत पाताल लोक मे एहन ने नुकायल कि फेर ओ कहियो पृथ्वी दिस ताकहो के हिम्मत नहि केलक। पुरूरवा स्वयं सभ नरेश्वर के शासन संचालनक शिक्षा देल l आब पृथ्वी पर कोनो देश एहन नहि छैक जेकर प्रजा निर्धन होय l अराजकता के नामोंनिशान नहि छैक। सभ दिशा मे शांति के साम्राज्य स्थापित अछि ! अमन चैन के बंशी बजैत अछि l ई सब पुरूरवाक दूरदृष्टि आ समझदारी सऽ भेल अछि l ओ एक सय आठ अश्वमेध यज्ञ केलथि l कतेको आर आन आन यज्ञ ओ केलथि l किंवा ओ चाहितथि तऽ स्वर्गक सत्ता पर्यंत अपन बाहुबल सऽ क्षण मात्र मे पलटि दितथि,मुदा ओ भूमंडल के शासन संऽ सन्तुष्ट छथि l पूर्व जन्मक तपस्या के कारण ओ तऽ स्वयं महा प्रतापी छलाह,तदापि ओ एहि जन्म मे अपन घोर तपस्या संऽ भगवान विष्णु के प्रसन्न कऽ लेलनि l एकर कारण हुनका एहन अपरिमित शौर्य आ बाहुबल प्राप्त भेलनि कि आहां सन सहस्त्रों के असगर दमे ओ भू-लुण्ठित कऽ सकैत छथि l ओ अत्यन्त रूपवान छथि l हुनक सौंदर्य के समक्ष स्वयं कामदेव अपना के हीन बूझि लज्जित रहैत छथि l हुनक समतुल्य सौंदर्यमयी नारी पृथ्वी पर नहि भेटलीह,जाहि कारण ओ एखन धरि अविवाहित रहि ब्रह्मचारी बनल छथिै l ब्रम्हचर्यक प्रताप हुनक तेज संऽ संयुक्त भऽ हुनका त्रिलोक मे अद्वितीय बना देलक l राक्षस-गण पर्यंत पाताल-लोक मे हुनक यशो गान करैत अछि l सुनलहुँ किछुए दिन पूर्व दानवराज केशि अपन पुत्री स्वर्णरेखाक विवाहक प्रस्ताव लऽ स्वयं हुनका समक्ष गेल छल परंच पुरूरवा ओहि प्रस्ताव के अस्वीकृत कऽ देलथि l दानवराज केशि ओहि प्रस्ताव के द्वारा पुरूरवा के अपन पक्ष मे करवा हेतु प्रयत्नशील छल ,परंच पुरूरवा ओकर प्रस्ताव के अस्वीकृत कऽ ओ संभावना समाप्त केलन्हि l कनिक सोचू देवेंद्र ! कहीं जे राजा पुरूरवा ओकर प्रस्ताव स्वीकृत कऽ नेने रहितथि तखन स्थिति कतेक भयंकर होइत ? ई बात तऽ अहुँ के बुझाईत होयत कि पुरूरवा यदि ओकर सहयोगी भऽ जइतथि,तखनि त्रिभुवनक अधिपति बनवा मे हुनका कनियो विलम्ब होयतनि l परंच हुनका स्वर्गक अधिपति बनवाक लालसा नहि छनि। आ हुनक सौम्य चरित्र हुनका दानवराजक कौनहु प्रकारक सहयोग करवा संऽ दूर रखलक। राजा पुरूरवा के शारीरिक सुंदरता,हुनक गुण आ पराक्रमक वर्णन केनाई हमर सामर्थ्य संऽ बाहर के बात अछि। ताहि संऽ एतबहि मे आहाँ संतोष करू l हँऽ हमर अनुरोध नहि आज्ञा अछि कि आहाँ पुरूरवा सऽ सहायताक याचना करू, एहि संऽ आहाँक प्रभुता पुनः आहाँ के प्राप्त होयत l दानव राज केशि के हस्तक्षेप स्वर्ग लोक संऽ समाप्त भऽ जाएत।" इन्द्र देवर्षि नारदक बात संऽ अत्यंत प्रसन्न भऽ गेलाह।हुनक चिंता मेटि गेलनि l ओ उचित अवसर पर नारद के मार्गदर्शन संऽ संतोष व्यक्त कयलथि। ऋषिवर नारद के अभ्यर्थना करैत ओ कहलथि - " अपनेक आज्ञा शिरोधार्य अछि देवर्षि l हम एखनहि सुसेन के द्वारा हुनका दानव के सँग देवताक युद्ध मे हुनक सहायताक याचना हेतु आमंत्रण पत्र पठवैत छी।" "हँऽ एहि कार्य मे शीघ्रता करू,आब स्वर्गक प्रतिष्ठा अहिंक हाथ मे अछि" - नारद बाजि उठलाह l नारद मुनि के मार्गदर्शन मे इन्द्र एक पत्र पुरूरवा के नाम लिखलथि l तत्पश्चात सुसेन के हाथ मे ओ पत्र सौंपि हुनका अनेकों प्रकार संऽ समझा-बुझाकऽ पृथ्वी पर पठौलथि l एकर बाद ओ देवर्षि नारद संऽ स्वर्ग लोक मे विश्राम करवा हेतु आग्रह करऽ लगलाह l परंच हुनक आग्रह के देवर्षि नारद अस्वीकृत कऽ देलथि।की किनको आग्रह पर नदीक प्रवाह ठहरल अछि ? चलति पवन किनको इच्छा पर थम्हल अछि ? सत्पुरुषक कार्य अछि संसार के कल्याण हेतु विचरण करैत रहनाई l संहिताक कथन उचिते अछि - 'चरैवेति-चरैवेति' l इन्द्र के प्रसन्न देख़ि सभ देवताक मुख पर प्रसन्नताक रेखा पसरि गेल। हुनकर सबहक मुख देखि बुझाइत छल किंवा ओ सभ एखनहि दानव गण के परास्त कऽ आबि गेल होथि l अपन स्वामीक प्रसन्नता मे प्रसन्न भेनाई,दु:ख मे दु:खी रहनाई एवं प्रत्येक अवसर पर हुनकर साथ देनाई ! यैह तऽ आश्रितक परम धर्म थिक ! नारद मुनि आपस जयवा हेतु उद्यत भऽ गेलाह l हुनका विदा करवा हेतु किछु दूर तक इन्द्र हुनका संगे गेलाह, तदुपरांत हुनका दंडवत प्रणाम करैत हुनका विदा केलथि l हुनकर प्रस्थान केला उपरांत इन्द्र अपन प्रासाद के दिशा मे गमन केलथि l अपन कक्ष मे पहुँचि इन्द्र धर्मपत्नी शची के सँग प्रेम पूर्ण संलाप मे मगन भऽ अपन एतेक दिनक चिंताक समाधान करऽ लगलाह l आई बहुत दिनक बाद निश्चिंत भऽ अपन पत्नी संऽ प्रेमालाप कऽ रहल छलाह इन्द्र l बहुत दिन संऽ पत्नी शची के हुनक दर्शन नहि भेल छलनि। आई हठात् हुनका अपन एतेक निकट देखि शची प्रसन्नता संऽ उत्फुल्ल भेल छलीह l चिंता एकटा एहन मानसिक व्याधि थिक जे उपहार स्वरूप शारीरिक दुर्बलता सहजे प्रदान करैत अछि।मानसिक शांति नष्ट कऽ दैत अछि,क्रोध के जन्मदाता अछि,बुद्धिक हरण कऽ लैत अछि, जीवन-चर्या बदलि दैतअछि,आ उन्नतिक मार्ग अवरुद्ध कऽ अकर्मण्यताक औषधि पियावैत अछिl "पुरूरवा" नाम देवता_गणके लेल दधीचिक अस्थि के सदृष राक्षसगण संऽ परित्राण हेतु सम्पूर्ण अवलंबन बनि गेल l हुनक शौर्य गाथा सुनि देवतागणक हृदय मे ईर्ष्याग्नि प्रज्वलित भेल छलनि।मुदा ओहि हृदय के एक कोन मे आशा के दीप प्रज्वलित छलनि।राक्षसगण संऽ परित्राण प्राप्त करवा हेतु l गंधर्व एवं किन्नर पुरूरवाक गुणगान अपन मधुर स्वर लहरी मे करऽ लगलाह l हुनक मधुर गीत मे सँग देमय अप्सरागण आबि गेलीह।घृताची,तिलोत्तमा,रंभा, मेनका, कृतस्थली,पुणजीकस्थल प्रम्लोचा,अनुम्लोचा,पूर्वचिति,सेनजित, चित्रलेखा अन्यान्य अनेकों अप्सरागण के मुख पर पुरूरवाक नाम छल l किछु इन्द्र के सँग तऽ कोईकोई विष्णु के सँग पुरूरवाक तुलना कऽ रहल छलीह l परंच हुनका सबहक मध्य एक गोट एहेन अप्सरा छलीह,जे अपन हृदय स्थल के अपन दुनू हाथ संऽ दाबने सबके स्तब्ध दृष्टि संऽ निरखि रहल छलीह l हुनक मुख पर नहि तऽ पुरूरवाक नाम छल आ ने कोनो प्रसन्नता l ओ किछु-किछु हेरायल बिसरायल सन अपना के अनुभव कऽ रहल छलीह l बुझाईत छल किंवा पुरूरवाक गुणगान संऽ हुनका हृदय मे काँट चुभचुभ करऽ लागल होइन्ह,ई काँटक लहरि सन दर्द पुरूरवाक नाम लऽ विद्युत लहरि सम पूरा शरीर मे दौरैत होइ। ओ सब किछु देखि रहल छलीह,सुनि रहल छलीह,परंच शव सन निश्चल भेल छलीह l हुनक एहि दशा पर सखी चित्रलेखा अनेको बेर आँखिक संकेत केलथि, हाथ संऽ कोंचि सभा मे अनवाक प्रयास केलथि,मुदा ओ अपन होश हवास बिसरायल किछु कहवाक स्थिति मे नहि छलीह l कोनो आनलोक मे ओ विचरण कऽ रहल छलीह। ओ छलीह उर्वशी - स्वर्गक सर्वाधिक सुंदरी अप्सरा ! सर्वश्रेष्ठ अप्सरा ! प्रेमकीट हुनका घायल कऽ गेल छल l भला ई बात चित्रलेखा कोना बुझि सकितथि ? पुरूरवाक अद्वितीय व्यक्तित्व उर्वशीक हृदय पर अपन अधिकार कऽ नेने छल l ओ शौर्य आ सौंदर्य के मणिकांचन सहयोग संऽ निर्मित ओहि आकृति के एक बेर अपन दृष्टि संऽ प्रकट रूपें देखि अपन नेत्र के धन्य करऽ चाहैत छलीहl उर्वशी के प्रतीत होइत छल जेना हुनक शरीर संऽ ह्रदय निकलि धरातल पर पुरूरवा के निकट चलि गेल होय l मात्र निश्चल निर्जीव शरीर स्वर्ग लोक मे रहि गेल होयो l
क्रमशः अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल- कनियेँ-मनियेँ पूँजी जगदीश प्रसाद मण्डल कनियेँ-मनियेँ पूँजी बीतल दू सालक दशा जहिना सभ गाम-गामकेँ भेल तहिना मनमोहनकेँ सेहो भेल। मनमोहनो तँ अही मिथिलाक एक अंश रूपक धरती अछि किने। जे मनमोहन दस साल पहिने, अन्न-तीमन-तरकारी, आम-केरा इत्यादि फल-फलहरी गामक पूर्ति करैत मनमोहनबला बाहरियो आमदनी करै छला ओइ मनमोहन गामक दशा देखै-जोकर नहि अछि। ऐठाम दुनू प्रश्न अछि। एक दिस गाममे बान्ह-सड़क-बिजलीक सुविधा भेल अछि तँ दोसर दिस गामक खेतीमे बिलैनी सेहो लागल अछि। बाढ़िक बचाउ ले एक दिस कोसी-कमला छहर-बान्हक गारंटी भेल तँ दोसर दिस गाममे सड़क-बान्ह भेने पानिक जमाव नहि भऽ रहल अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए, सेहो भेबे कएल अछि। जिलाक एहेन स्थिति बनि गेल अछि जे सरकारी कार्यालय तकक कागज-पत्तर पानिमे नष्ट होइए। खाएर जे अछि, हरि बोल, हरि बोल हो रामा। जहिना मनमोहन गाम-समाजक गति भेलैन तहिना अपनो गति नइ भेल से केना नइ कहब। गामक सभ जनिते छैथ जे मात्र बीघा भरि जमीन अछि। जइ बले किछु दिन पूर्व तक परिवार ठाढ़ छल। गाममे बान्ह-सड़क तँ भेल मुदा उपजाउ भूमि उपजै-जोकर नहि बनि सकल। अपना ओते शक्ति नहि जे भरपाइ कऽ सकब। असाध काज गाम-गाममे पसरिये गेल अछि। सिर्फ माटिक ऊपरेक माने उपजेक टा नहि, माटिकेँ समतूल बनाएब सेहो भइये गेल। आजुक मशीनी युगमे एहेन स्थिति बनल रहए, ओ दुर्भाग्य नहि तँ सौभाग्य केना कहल जाएत। जखन मनुक्ख बनि मनुक्ख जन्म लइ छैथ तखन जँ पाँच गोरेक परिवार सम्हारि गाम-समाज ले किछु ने करैथ, ईहो तँ दुर्भाग्ये कहल जाएत। मुदा मने-मन बुझनहि की हुअए। आने गाम जकाँ मनमोहनो चारू दिससँ घेरा गेल। बच्चाक विद्यालय बन्न भऽ गेल, अस्पताल बन्न भऽ गेल। काज-उदम बन्न भऽ गेल। एहेन एक गाममे नहि गाम-गाममे भेल। नब-धब अपने बंगलोरमे नोकरी पकड़नहि छेलौं। माने ट्रान्सपोर्टक काज, काजे खतम भऽ गेलइ। गाम आबि एकटा दोकान शुरू केलौं। कहब जे दोकानमे कमाइ केहेन होइए? तेकर जवाब तँ यएह ने देब जे ठाढ़ केना छी। तीन सालक जे समय रहल ओ बहुत किछु सिखेबो करबे केलक। ऐठाम सिखाएबक माने बदला लेब नहि, लूरिसँ अछि। बिजली एने बिजली-कारोबारक किछु लूरि सीख लेलौं। मोबाइल से किछु सीख लेलौं, गाड़ी-सवारी बढ़ने थोड़-थाड़ ओकर मरम्मत करब सीख लेलौं। एहेन विचार अपने कौलेजे जीवनसँ जानि गेल छेलौं जे पूजी श्रम छी नहि कि धन। ओना, एहेन परिवेश तीन-चारि सालक बीच बनल अछि नहि कि तइसँ पहिने छल। अपनो मानिते छी जे अखन तकक जे गाम रहल अछि ओ बहुत कठिन दौड़क बीच रहल अछि। ऐठाम मुड़कुट्टीमे एतबे कहब जे हजारो बर्खसँ अपना सभक पूर्वजकेँ गुलामीक जिनगी गुजरलैन। गुलामीक जिनगी केहेन होइ छै, तेकरा पचबैक अभ्यास भइये गेल अछि। गाम आबि, असगरेमे काजक पथार लगा देलौं। जहिना चैत-बैशाखक रौदमे गुरु गृहिणी अपन घरक अन्नकेँ रौदमे पसारि सुखबै छैथ। किसानी जिनगी छी, नोकरिहाराक नहि, तँए मन यएह ने कहलक जे गाम तँ गामे छी, तैठाम जँ असगरो ओते समस्याक निमरजनाक भार उठा लेब, बाल-बोधक धुड़खेल नइ ने छी। तखन तँ ईहो हेबे करत जे गामक ऐगला मुहरा बनि आगूए-आगूए चलए लगत। अखन तक गाम किसानक गाम कहबैत आएल अछि। जइसँ किसान शब्द एते तँ सम्मानित भइये गेल अछि जे जगत, जनक जननीसँ लऽ कऽ आजुक परिवेशक जे ऊँच कोटिक श्रेणी छैथ ओहो अपनाकेँ किसान परिवारसँ जुड़ल सम्मान अपन अभ्यन्तरमे करिते छैथ। आने गाम जकाँ मनमोहनोक उपजाक माने उत्पादनक पचास प्रतिशतसँ ऊपर जमीन मरि गेल अछि। ऐठाम भूगोलक धोखामे नहि पड़ब जे मरूभूमिक माने भेल उपजसँ मारल भूमि। अपना ऐठाम माने मिथिलांचलमे कूल भूमिक तिहाइसँ बेसी भूमि जल-जमावसँ ग्रसित अछि, तैसंग वन-विभागक डिक्शनरीए उनटल अछि। जे धरती बरहमसिया फल, बरहमसिया फूल, बरहमसिया तीमन-तरकारी आ बरहमसिया अन्न तकक धरती मिथिलाक धरतीकेँ बना नेने अछि, जैठाम चन्दन (बेल) सन फल अछि, तैठाम अकठ-बकठ बोन-झाड़ लगा धरतीकेँ अजबारि देब, ईहो केतौसँ उचित नहि अछि। किसानी जीवन दुनू दिस अछि। माटिसँ उपज करैबला सेहो आ पानिसँ उपज करैबला सेहो, अपना सभकेँ पूर्वांचलक माने बंगलाक किसानसँ किसानी जीवन सिखए पड़त। अपना सभसँ बेसी बरखो बंगालमे होइए आ अपने सभ जकाँ माटियो अछि। जहिना गंगाकातमे चक-चक बालु बक्सरसँ भागलपुर तक देखै छिऐ तहिना बंगालक मुर्शिदाबाद तक अछि। मुदा जे 'जानो मानो पान' मिथिलाक नामी-गरामी छल तैठाम अखन बंगला पान बंगालसँ मँगा कऽ खाइ छी, एकरा की कहबै? मिथिला छी, लोक पान खेबे करत, अतिथि-अभ्यागतकेँ खुएबे करतैन। गामक बीचमे, माने मनमोहन गामक बीचमे जे चारू दिससँ रस्ता आबि मिलल अछि, ओना अखुनका भाषामे चौक-चौराहा सेहो भेल, मुदा अखन तक मनमोहनबला ओकरा चौबट्टीए कहै छैथ। अपन तँ ओइठाम जमीन नहि, मुदा दोकानक नामपर समाज (गौंआँ) सहमति देलैन जे गामक ई मुराम जगह छी, ऐठाम दोकान खोलू। गाममे दोकान भेने गौंएँकेँ ने लाभ होइए। अपनो मनमे बिसवास बनले छल जे एहेन कानून तँ अछिए जे जेकर घर तेकर जमीन। जँ अपना तेकर सबूत नइ अछि तँ परचा रूपमे देले जाइए। संयोग एकटा ईहो छल जे मनमोहनमे एहेन संस्कार अखनो जीवित अछि जे घर बनबैले बाँस, खढ़ इत्यादिक सहयोग समाजमे होइत रहल अछियो। बेकतीगत रूपमे तँ कम देख पड़ैत मुदा सामाजिक रूपमे जीवित अछि। ओना, परिवेश ठीक विपरीत बनि गेल अछि, मुदा किछु भेल, अपना तँ घर (दोकानक घर) बनबैमे ने कोनो जमीनक समस्या भेल आ ने घर बनबैक। हमर सुर-सार, माने दोकान करैक सुर-सार देख पान-सात गोरे आरो हाँइ-हाँइ कऽ अपन दोकान करैक घर ठाढ़ केलक। बहुत तँ नहि, माने हजार बोल्ट बाउलक इजोत जकाँ तँ नहि, मुदा दिआरी पावनिक राड़ी-खढ़क उकारी जकाँ इजोतसँ बेसी धुँओक बीच, जहिना दिपावली पाबैन मनौल जाइए तहिना गामक किसानी जीवनमे कारोबारी जीवन सेहो छीहे। ओना, घुमन्तू रूपमे माने पथियामे समान लऽ माथपर उठा अंगने-अंगने जरूरियात वस्तु बेचैक चलैन समाजमे चलिये रहल छल। चौकपर पच्छिम रूखिये दोकान बना, अपन कारोबार शुरू केलौं। जइ दिन दोकान शुरू केलौं, तेकर पछुलका साँझ, दिनबन्धु भाय दोकानपर पहुँचला। छअ-पाँचमे पड़ि गेलौं, काल्हि लक्ष्मीक पूजा केलाक पछाइत ने दोकान ऐँठाएब आकि तइसँ पहिनहि लोककेँ चाह पीआ पान खुआ ऐँठा लेब। एकटा बात दिनबन्धु भाइक सम्बन्धमे सुनले छल जे जखन अहाँकेँ कोनो काज करैत देखता, तखन ओ ने चाहक आग्रह माने छैथ आ ने गप्प-सप्प करबकेँ पसिन करै छैथ। तइमे काजधारित जँ कोनो प्रश्न पुछबैन तँ मुहेँटा सँ नहि कहता, हाथसँ कैरियो कऽ देखा देता। तँए मनमे बिसवास जमले छल जे सोझामे माने दिनबन्धु भाइक सोझामे लुरू-खुरू जँ करए लगब तखन ओ अपने पहिनहि कहि देता जे चाह-ताहक जोगार नहि करियहह। अपन धर्मो बँचि जाएत आ धनो बँचि जाएत। सएह केलौं। हाथमे माटि-ताति लगले दिनबन्धु भायकेँ कहलयैन- "भाय साहैब, गोड़ लगै छी। अहीं सभक सेवा ले दोकान शुरू केलौं अछि।" ओना, बजला पछाइत अपने बुझि पड़ल जे बेसी बजा गेल। आब ओ अपन बात बजता कि हमरा असीरवाद देता। मुदा तइमे रच्छ रहल जे तइ बिच्चेमे दिनबन्धु भाय बजला- "बौआ, गेलह नेपाल कपार गेल संगे। मुदा तोहीं सभ ने अपन जन्मभूमिकेँ मातृभूमि बनबैक शक्ति छहक। तोरे सबहक ने गाम-समाज सभ किछु छिअ।" दिनबन्धु भाइक विचार सुनि मन तरो हुअ लगल आ ऊपरो हुअ लगल। तर-ऊपर शब्दक अर्थ समाजमे खुशीसँ लेल जाइए। नब वस्त्र वा नब खेलौना पेला पछाइत जे बच्चाक एक्शन (हाव-हाव) होइए, ओ तर-ऊपरक होइए। जहिना गाममे, तहिना लूरि-ढंगमे अपने सोल्होअना चौपट्टे तँ नहि छी। मुदा जइ गतिसँ गाम उनैट-पुनैट रहल अछि तइमे अपन जान बँचत कि जाएत से विचारणीय अछिए। दिनबन्धु भाइक विचारक प्रवाहमे अपने प्रवाहित होइत भँसि गेलौं कि बजा गेल- "हँ से तँ छिऐहिये भाय साहैब।" एकाएक दिनबन्धु भाइक मनक विचारमे दोसर प्रश्न उठि गेलैन, ओ बजला- "पूजी केते लगेलह अछि?" अखन तक अपन मन असथिर नइ भेल अछि जे लूरि-ढंग पूजी छी कि रूपैआ-पैसा। गप-सप्पक क्रममे लूरियोकेँ पूजी बुझै छी आ रूपैओ-पाइकेँ, मुदा ओ केकरा ले, जे करत तेकरे ले ने। ओना, केकरो लग फूसि नइ बजै छी, मुदा बाल-बोधकेँ वौसैकाल नइ बजै छी, सेहो केना नइ कहब। मुदा कारोबार तँ कारोबार छी, मिसियो भरि फूसि अनुचित छीहे। बजलौं- "भाय साहैब, पाइ-कौड़ीक पूजी कम अछि, मुदा साइकिलो आ मोटर साइकिलक भंगठी, मोबाइल-कम्प्यूटरक खोल-खाल, नब-धब बिजलीक आगमन अवस्थाक लूरि सेहो अछि, तैसंग समाजसँ तरकारी उपजौनिहारसँ उधारीक आश्वासन सेहो भेटल अछि।" दिनबन्धु भाय बजला- "समाजक जे रूप-रेखा अछि तइमे भरपूर पूजी छह। तैसंग किछु आरो क्रियमाण विचारक पूजी सेहो छहे।" पुछलयैन- "से की भाय साहैब?" मुस्की दैत दिनबन्धु भाय बजला- "पहिल छी, एकाग्र भऽ काज करब आ दोसर छी, आमदनीक हिसाबसँ परिवारक संग अप्पन निर्माण करब। ओना, जहिना शुरूक समाजमे कियो अपन औजार निर्मित कऽ जीवन बढ़ौलैन आ कियो शरीरे बले बढ़ला, तहिना तँ आइयो अछिए।" -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.जगदीश प्रसाद मण्डल- मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास नअम पड़ाव) जगदीश प्रसाद मण्डल मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास) नअम पड़ाव दस बर्खक पछाइत कामेसरक जीवन जेना ढहि कऽ समतल भूमि जकाँ बनि गेलैन। ने ओ देवी आ ने ओ कराह रहलैन। लोहाक बनल इंजन एक निश्चित अवधिक लेल होइए। तेकरा तेना उपयोग करैक अछि जे अपन पारिवारिक जीवनक संग पूजीक जिनगीक सेहो केना जीवित बनि चलत तइ दिस कामेसरक नजैर गेबे ने केलैन। स्वर्गक कल्पवृक्ष जकाँ जे मांगब, जेते मांगब भेटैत रहत एक्के उपे पाँच बर्ख धरि दुनू ट्रेक्टर भरपूर आमदनी कामेसरकेँ देलकैन। छोट-मोट पार्ट तँ सामान्य रूपेँ लगिते अछि मुदा अस्वस्थ शरीर जकाँ जखन इंजन अस्वस्थ हुअ लगलैन, तखन एक-एक पार्टक टूटो-फूट आ मरो-मरम्मतिक खगता हुअ लगलैन, जइसँ आमदनीक अधिकांश भाग, अधिकांश भागक दू रूप पहिल गाड़ी कम चलब आ दोसर पार्ट कीनैक खर्च, गाड़ीए दिस जाए लगलैन। मुदा तैयो कामेसरक मनसूबामे मिसियो भरि डगमगाहट नहियेँ एलैन। तैसंग ईहो भेलैन जे ट्रेक्टरक बैंक लोनकेँ बंगाल सरकार माफ कऽ देलकैन। जीवनक आमदनीमे कमी, माने आर्थिक कमी, रहितो कामेसर अपन जे छवि समाजमे बना लेलैन अछि तइमे कमी नहि हुअए, तेकर पूर्तिक शक्ति भलेँ क्षीण किए ने भेल होनि, मुदा ओइ क्षीणताकेँ अपने मनमे दाबि आनक मनमे अपनाकेँ ओहिना जीवित रखला, जेना कठ-पुतली नाच होइए। खाइ-पीबैक वस्तुसँ लऽ कऽ ओढ़ै-पहिरैक कपड़ाक संग पारिवारिक बेवहारक रख-रखावमे कमी सेहो आबए लगलैन। जइसँ अपनो आ परिवारोकेँ अकासक तरेगन दिनेमे देखाए लगलैन। ओना, सुभद्रा जे बी.ए. पास छैथ, पतिक मनोवेगकेँ सेहो आ मनीवैगक दाबकेँ सेहो बुझैत रहली, मुदा जहिना पति पत्नीक आगू आ पत्नी पतिक आगू अवाच नहि बाजए चाहै छैथ तहिना सुभद्रा सेहो सभकिछु बुझितो किछु ने नहि बाजए चाहै छेली। मनमे संतोखक गाछ हरियाएल रहबे करैन जे अपन सीमा बुझि सभकेँ जीबाक चाही। जखन घरक (परिवारक) गारजन पति छैथ तखन हुनका काजमे किछु बाजब माने दखल देब, पत्नीक लेल अनुचित छीहे। केतौ-केतौ होइतो अछिए। ओना, कामेसरक मनमे चिड़चिड़ापन सेहो भरपूर जागिये चुकल छेलैन। गाम-समाजक तँ अपन इज्जत-प्रतिष्ठा अछि जे समत्व रूपमे रहल अछि, ओना एकत्व रूपमे सेहो अछि, रहबो केना ने करत। समत्व-सँ-एकत्व आ एकत्व-सँ-समत्वक बीचक आबा-जाही सभक जीवनमे लगल रहिते अछि। गामक बगलेक गाममे माने पलारपुरक सटल दुलारपुर गाममे दुनियाँलाल नामक एकटा बेकती छैथ। समाजमे दुनियाँलालक अपन पहचान छैन जइ पहचानक फल सेहो भेटिते छैन जे झूठो बजनिहार हुनका लग आबि सत्य बात सुनबो करैए आ बजबो तँ करिते अछि। भलेँ ओ ओहने बजनिहार किए ने हुअए जे बाघकेँ बिलाइक भतीजीए कहैत होउ। दुनू गामक चौकपर, माने दुलारपुर आ पलारपुरक बीच, दसटा दोकानक चौक अछि जेकरा पलारपुरबला पलारपुरक चौक बुझै छैथ आ दुलारपुरबला दुलारपुरक चौक बुझै छैथ। संजोग भेल जे कामेसर सेहो भोरक एकतोर काज करि ओही चौकक एकटा चाहक दोकानपर पहुँचल छला आ दुनियाँलाल सेहो पहुँचला। गरमाएले कामेसर चाहक दोकानपर पहुँचिते जोरसँ बजला- "दुलारपुरबलाकेँ जवानक कोनो ठीक नहि अछि.!" खगल लोकक मनमे असंतोषसँ जहिना होइए जे की भेटत, केतए भेटत; तहिना कामेसरकेँ सेहो मनमे जनमियेँ गेल रहैन। घटबीए धारक पानि जकाँ कामेसरक दिन-दुनियाँ धीरे-धीरे निच्चाँ उतरए लगलैन। चाहक दोकानपर बैसल दुनियाँलाल बिना किछु बजनहि कामेसरक गट्टा पकैड़ पुछलकैन- "की दुलारपुरबलाकेँ जवानक ठीक नहि अछि?" संस्कारसँ कामेसर अपनाकेँ ओइ सीमापर स्थापित कऽ लेने छैथ जे सभ्य समाजक बेकती सभ्य होइए। कामेसरक मनमे किछु दिन बनल रहलैन जे पछुआएल समाजक बीच पहिल इंजीनियर छी, कलकत्ताक माटि-पानिमे अपन वालावस्था बीतल अछि। मुदा से सभ विचार धीरे-धीरे मनसँ विलीन भऽ गेलैन, आ मनमे रोपा गेलैन जे अपनो पाइबला छीहे आ संगियो-साथी पाइयेबला छैथ। जहिना दुनियाँलाल गट्टा पकैड़ कामेसरकेँ पुछलकैन तहिना कामेसर अपना गट्टामे झिट्टा मारि छोड़बए लगला कि दुनियाँलाल तराक-दे मुँहपर एकटा थापर मारि पुछलकैन- "अहाँ इंजीनियरिंगक शिक्षा पौने छी, बड़बढ़ियाँ, मुदा समाज की छी, केना बनल अछि आ केना बनल आगू मुहेँ दौगैत चलत, एहेन विचार तँ हर मनुक्खमे एबा चाही। से जाबे धरि नहि औत ताबे धरि तँ समाज लड़खड़ाइते रहत किने? तैबीच जे अहाँ बेकतीक काजकेँ सामाजिक रूपमे बुझि बजै छी, तेतबो बुझैक अवगति नहि अछि।" मुँहमे थापर लगला पछाइत कामेसरक मनमे जेना चेत जगलैन। जइसँ अपन कमी मनमे जरूर एलैन मुदा लोकक बीच जे थापर मुँहमे लगल छेलैन, तेकर विसविसी मनमे रहबे करैन। बजला- "गाम-गामक सभ्य लोक चौक-चौराहापर बेइज्जत होइए।" दुनियाँलाल बजला- "की न्यायालय चलिकऽ फड़ियाएब.! आकि समाजेमे दस गोरेकेँ बइसाकऽ फड़ियाएब?" दुनियाँलालक विचार सुनि कामेसर सकसका गेला। दुनियाँलालकेँ अखन तक कामेसर नहि चिन्हिने, से आइ चीन्हि गेला। तैबीच दुनियाँलाल पुन: बजला- "समाज छी, सभकेँ एकेठाम रहब अछि।" दुनियाँलालक विचार जे 'समाजमे सभकेँ एकेठाम रहबाक अछि' सुनि कामेसर चुपे रहि गेला। चाह पीब पुन: अपन काजपर पहुँचला। तखन दुनियाँलालक मनमे उठलैन जे ईहो बातक जानकारी तँ लिअ पड़त जे कामेसर एहेन बात बाजल किए। संजोग बनल, संजोग कि बनल जे गाम-समाजमे एना होइते अछि जे जखन दू गोरेक बीच कहा-कही होइए तँ दुनू अपना-अपना रस्ते समाज दिस बढ़बे करैए तइले समाजोकेँ जना प्रतिकारक रस्ता सेहो बनिते अछि। रामलाल सेहो अपन विचारकेँ जनबैले चाहेक दोकानपर पहुँचला। रामलालकेँ देखते दुनियाँलाल बजला- "रामलाल भाय, अहाँ बहुत दिन जीब।" जहिना कोनो खिस्सा-पिहानी वा कोनो पोथी पढ़ए लगै छी, तैबीच जहिना कोनो पात्र बेर-बेर आगूमे अबैत रहै छैथ तिनकर औरुदा बेसी भइये जाइ छैन, तहिना रामलालकेँ देख दुनियाँलाल बाजल छला। अपन व्यथित कथाकेँ रामलाल सुनबैत बजला- "दुनियाँ, तोहर मोल आन गाममे जे हुअ मुदा दुलारपुरक तँ शिरमौर्य हम तोरे बुझै छिअ। गामक बात छी, तोहीं सभ ने देखबहक।" रामलालकेँ बुझल नहि जे दुनियाँलाल एक थापर कामेसरक मुँहपर मारि चुकल छैथ। आहे-माहे, रामलालक मुहसँ सुनि, किसुनलाल चरियबैत बाजल- "रामलाल भैया, अहूँ रामे जकाँ बड़ मायावी छी, केतौ ब्रह्म बनि जाइ छी तँ केतौ बनवासी आ केतौ सीताक भाँजमे गाछो-बिरीछसँ पुछए लगै छिऐ, तँ केतौ रामलला सेहो बनि जाइ छी.! सोझ-साझ बाजू जे कामेसरक संग की भेल अछि?" मनक पीड़ाकेँ सुनि जहिना कियो ओकर पीड़पनकेँ पकड़ए चाहै छैथ, जइसँ पीड़ितकेँ जे पीड़पन भेटै छैन तहिना रामलालकेँ सेहो भेलैन। हलसैत बजला- "किसुन ट्रेक्टरक काज करै छैथ। एडभान्स अधा पाइ दऽ देने छेलिऐन। काज भेला पछाइत जखन हिसाब करए लगलौं तखन एडभान्स पाइ जोड़बे छोड़ि देने छैथ।" रामलालक विचार सुनि दुनियाँलाल घटनाकेँ बिसरजने करब नीक बुझलैन। जँ एहेन-एहेन घटनाक गिनती करए लगब तखन जे बुझै छी जे आइधरि चौदहो हजार लड़ाइ दुनियाँक धरतीपर भेल अछि, से बात नहि अछि, एक-एक गामक एहेन इतिहास अछि जे चौदह हजारसँ बेसीए लड़ाइ भेल अछि। खाएर जे अछि, घटना बिसरजन करैत किसुन लाल बजला- "भाय साहैब, छोड़ू ऐ बातकेँ। काजक बेर अछि अपन-अपन दुनियाँ देखए चलै चलू।" दिनुका भोजन करैले जखन कामेसर एला तखन सुभद्रा भोजने करैकाल बजली- "डॉनवास्कोबला तीनू बच्चाकेँ चेतावनी दैत कहलक अछि जे परसू धरि जँ फीस नहि जमा करब तँ विद्यालयसँ निकालि देब।" जहिना कोनो झंझावात कानमे पड़िते झनकारि दइए तहिना कामेसरक मन झनैक उठलैन। झनैक ई उठलैन जे अपने कलकत्ताक ओइ कौलेजमे पढ़ने छी जइमे सुभाष बाबू, विधानचन राय आदि अनेको बंगालक रत्न पढ़ने छैथ, पत्नी सेहो भागलपुरक टी.एन.बी. कौलेजसँ ग्रेजुएशन केने छैथ। तैठाम बाल-बच्चाकेँ डॉनवास्को सन विद्यालयसँ चेतावनी भेट रहल अछि.! कामेसरक मन टुटए लगलैन। टुटैत मन बनर्जीदादाक ओ बात आइ मानैले तैयार भऽ गेलैन अछि जे बात कामेसरकेँ इंजीनियरिंग कौलेजमे प्रवेश पबै दिन बनर्जीदादा कहने छेलखिन जे 'कामेसर, दृढ़ संकल्प ले दृढ़ पथोक खगता अछि, जँ से नहि भेल तखन ओइ संकल्पकेँ रहै-जाइक अनिश्चितता बनले रहैए।' -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "गामक जिनगी" लघु कथा संग्रह लेल "विदेह सम्मान- 2011", "गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- "टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011", मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- "वैदेह सम्मान- 2012", विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा "नै धारैए" उपन्यास लेल "विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014", साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा "कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015", मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- "वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" सम्मान- 2016", रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- "कौमुदी सम्मान- 2017", मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा "स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018", चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध "यात्री चेतना पुरस्कार- 2020", मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा "राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020", भारत सरकार द्वारा "साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021" तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा "अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022"
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २१ म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- २१ म खेप २१ दोसर दिन भोरे नागबाबा पाठशाला आबि जयन्तसँ भेंट केलनि । "हम वापस जानकीधाम जा रहल छी । भेल जे जएबासँ पहिने अहाँक भेंट केने चली ।" "अहाँ अएलहुँ तँ हमरा बहुत उसास भेल । हमरा इच्छा छल जे अहाँक सामनेमे पाठशालाक काजकेँ आगू कएल जाए । एक बेर शुरु भए जेतैक तँ चलैत रहतैक ।" "एतेक आसान बात नहि अछि । एहिठाम बहुत तरहक बातसभ छैक । एहिमे बड़का-बड़का लोकसभक हाथ छैक । अहाँक शोधग्रंथ लए कए सेहो बहुत षड़यंत्र भए रहल अछि । अहाँकेँ तँ स्वयं बुझले अछि जे जानकीधाम धरि ई लठैतसभ अहाँक पछोड़ केने छल। " "तखन की कएल जाए?" "हमरा विचारसँ एहि शोधग्रंथकेँ कालीकान्त लग पठा दिऔक । ओतहि एकर विमोचनो होएत आ तकरबाद आगूक कार्यक्रम सेहो तैयार कएल जाएत ।" "मुदा ई कालीकान्त लग जाएत कोना?" "बढ़िआँ होइत जे अहाँ हमरे संगे चलितहुँ । ताबे एहूठाम माहौल शांत हेतैक ।" "ठीक छैक। " साँझमे जयन्त नागबाबाक संगे शोधग्रंथ लए बिदा भए गेलाह । जयन्तके नागबाबा संगे जाइत देखि सौंसे उतरिबारिटोल उलटि गेल । सभकेँ भेलैक जे जयन्त तंग भए लखनपुर छोड़ि रहल छथि । ओना ई बात जयन्त ककरो कहने नहि रहथिन । ककरो पतो नहि चलितैक। मुदा जखन नागबाबाक संगे धारक कात ओ पहुँचलाह तँ सुधाकर अपन लठैतसभक संगे थानासँ छुटि कए आबि रहल छल । हिनका लोकनिकेँ जाइत देखि ओकर प्रसन्नताक अंत नहि छल । "नागबाबा! धन्य छी अहाँ । ई काज जँ पहिने केने रहितहुँ तँ एतेक फसाद नहि होइत । खैर! कोनो बात नहि । हम तँ जयन्तकेँ पहिने कहने रहिऐक जे गामक वातावरण ओकरा सन विद्वानकेँ रहए जोगर नहि अछि । ओकरा जानकीधामेमे रहब ठीक हेतैक । ओहुना आब पाठशाला के जाइत अछि? चारूकात अंग्रेजी माध्यमक इसकूलसभ खुजि गेल छैक । लोक देहो बेचि कए अपन बाल-बच्चाकेँ पब्लिक इसकूलमे पढ़बए चाहैत अछि ।" "नागबाबा किछु नहि जबाब देलखिन, ने जयन्त किछु बजलाह । सुधाकर विजयी मुद्रामे लठैतसभक संगे आगू बढ़ि गेलाह । गामसँ जयन्तक जएबाक समाचार क्रमशः सौंसे पसरि गेल। ई बात गोविंदक कान धरि सेहो पहुँचल । पहुँचैक रहैक । थोड़बे कालक बाद गोविंदक माधवसँ भेंट भेलनि । "जयन्त गाम छोड़ि कए जा रहल छथि।"-गोविंद बजलाह। 'से तूँ कोना बुझलहक? -माधव पुछलकनि । "सौंसे गाममे हल्ला छैक । लोकसभ धारपर करमान लागल अछि । हुनका लौटबाक आग्रह कए रहल अछि ।" "तँ की ओ मानि नहि रहल छथि?" "चलह ने । ओतहि जा कए सही बातक जानकारी भेटि सकैत अछि ।" माधव आ गोविंद धारक कात पहुँचैत छथि । ओहिठाम लखनपुर दुनूटोलक लोकक करमान लागल छल । सभ एतबे बाजि रहल छल - "ई तँ बहुत खराब भेल । एहन विद्वान लोककेँ अपन डीह-डाबर छोड़ए पड़ि रहल छैक ।" भीड़केँ चीड़ैत दुनूगोटे जयन्त लग पहुँचलाह । ओ सभ जयन्तक पैर पर खसि पड़ैत छथि । "हम किन्नहु अहाँकेँ वापस नहि जाए देब । ई तँ बहुत भारी अन्याय होएत । हमरासभकेँ जीबैत ई कदापि नहि होएत ।" "अहाँसभ परेसान नहि होउ । थोड़ेदिनक बाद जयन्त स्वयं गाम वापस आबि जेताह । जानकीधाममे किछु जरूरी काज छनि। तकरबाद आगूक बात-विचार कएल जेतैक ।" " जँ हमरा दुनूगोटेकेँ संगे जएबाक अनुमति देथि तखने हिनका जाए देबनि ।" "कोनो हर्ज नहि । जँ अहाँ सभकेँ सएह इच्छा अछि तँ चलि सकैत छी । मुदा गौंवासभकेँ तँ मनाउ ।" गोविंद,आ माधव जयन्त आ नागबाबाक संगे बिदा भए गेलाह । गौंवासभ बड़ीकाल धरि ई दृश्य देखैत रहि गेलाह ।
-रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-१ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नारायण यादवक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नारायण यादवक ५ टा कथा कथा १ नवकी पुतोहु आनन्दक बिआह बड़ धूम-धामसँ भेल छल। कनियाँ अति सुन्नैर, तँए दानो-दहेज कमे भेटल छेलैन। आनन्दक पिताश्रीक घोषणा छल- "कद ऊँची, नाक लम्बी और रंग गोरी हो तो आओ, नहीं तो बाहर जाओ।" अही अधारपर कनियाँक चुनाव भेल छल। कनियाँक आगत-भागतमे आनन्दक माए राधादेवी परेशान छेली। मनमे होइत रहैन जे पुतोहु औत तँ काम-काजमे मदद करत। सेवा सुश्रुषा करत। भानस-भात करत। माल-जालक देख-रेख सेहो करत। बाधसँ आएब तँ एक लोटा पानि लाबत आ बिऐन हौंकत...। आदि-आदि सभ टहल-टिकोरा करत...। आइ आनन्दक माए राधा देवी बड़ खुश छैथ। खुश ऐ लेल नहि जे आनन्द कनियाँ लए कऽ आबि रहल छैथ, खुश ऐ लेल जे आनन्द बिआह करैले तैयारे नहि भऽ रहल छल। बिआहोक उमर होइ छइ। उमर ढरल जा रहल छेलइ। ओ बिआह नइ करबाक हेतु अनेको बहाना बना रहल छल। कहैत छल ऐगला साल करब, आ जखन ऐगला साल आएल तँ फेर ऐगला सालक बहाना करैत रहै छल। राधाक आग्रहपर बिआहक लेल तैयार भेल छल। तँए राधा खुश छेली। ओ दिन आबि गेल जखन आनन्द अपन पत्नीकेँ अपना घर अनलक। मोटर गाड़ीक अबाज सुनिते अड़ोस-पड़ोसक दाइ-माइ लोकैन सभ अपन-अपन काम-काज छोड़ि-छाड़ि कनियाँ देखए आबए लगली। ननौरवाली सागमे सँ अटकी-मटकी बीछि रहल छेली। ओहो सभ किछु छोड़ि दौगल एली। लौफावाली बच्चाकेँ दूध पियाबैत छेली से बच्चाकेँ नेनहि दौगली। हरड़ीवाली आ ठाढ़ीवालीकेँ आमक टुकला लेल झगड़ा होइत रहै, ओहो दुनू गोरे झगड़ा छोड़ि कनियाँ देखए लफरल विदा भेली। राधा बरतन माजै छेली। बरतन माजब छोड़ि कनियाँक परिछण हेतु सामग्री ओरियाबए लगली। सभ दाइ-माइ जमा भऽ गेली। माथपर दौरा जइमे दीप जरैत छेलै, लय मरौत बन्हने गीत गबैत मोटर गाड़ी लग, पहुँचली। गीतक बोल छल- "एलै शुभ-के लगनमा शुभे हे शुभे...।" पाँच-सात गोट सधवा मौगी सभ कनियाँक परिछण केलक। तेकर बाद कनियाँक ननैद रूपम दाइ कनियाँ-बरकेँ आँगन लए गेल। जतेक दाइ-माइ लोकैन आएल छेली ओ सभ अपन-अपन घर दिस विदा भेली। बाटमे कनियाँक टिका-टिपण्णी हुअ लागल। सिसवारिवाली काकी जे सभसँ बुजुर्ग छेली ओ बजली- "गे दाइ, आइ तक एहेन कनियाँ नइ देखने रही। देखही ने केकरो देख कऽ माथो झँपलकै। हमर पुतोहु एहेन रहैत ने तँ छाउर लगा कऽ जी खींच लैतिऐ। कहू तँ ससुरोक लाज केलकै।" नवानीवाली बजली- "एतेकटा कहीं मौगी होइ छइ..!" तैपर भेजावाली बजली- "पीठ केहेन चाकर-चौरस छै, जेना गामा पहलमान होइ!" गुलछर्रा छोड़ैत सभ अपन-अपन घर गेल। राधा भनसा घरमे जा बेटा-पुतोहुक लेल खूब नीक तीमन-तरकारी बनौलक। पापड़, तिलौरी, तिलकोरक तरूआ थारीमे सजा बेटा आनन्द आ पुतोहु सुलेखा लेल ओकरा कोठलीमे पहुँचली। माएकेँ देखते आनन्द बाजल- "माए, अखन आठो नहि बाजल अछि आ तूँ खाना लऽ कऽ आबि गेलेँ।" राधा बजली- "हँ बेटा,कनियाँ जे आएल अछि। नहि जानि कनियाँ कखन भोजन केने हेती।" बजैत राधा टेबुलपर थारी राखि चापाकलपर सँ एक लोटा जल आ एकटा गिलास सेहो आनि कऽ टेबुलपर राखि देलक। आनन्द आ ओकर पत्नी सुलेखा दुनू गोरे भोजन करए लागल। सुलेखा बजली- "भोजन के बनौलक अछि।" आनन्द कहलकै- "भोजन माँ बनेने हेती।" सुलेखा बजली- "खाना बनबैले नौकरानी नहि रखने छी। हमरा ओतए तँ आँगनक लेल एकटा नौकरानी आ दरबज्जा परहक लेल एकटा नौकर अछि।" आनन्द आ सुलेखा भोजन करए लागल। राधा बीच-बीचमे आबि परसन दए दैत रहथिन। भोजन समाप्त भेल। राधा जूठ फेरि एक जग पानि आ एकटा गिलास आनि टेबुलपर राखि देलखिन। आनन्द आ सुलेखा पूरब-पच्छिमक गप-सप्प करैत कखन सुतली से राधा नहि बुझि सकली। राधा भोरे उठि अँगना-दरबज्जामे झाड़ू लगौलक। घर आ आँगनमे फिनाइलबला पानिसँ पोछा लगौलक, तेकर बाद रसोइ घरमे जा सभ बरतन-वासन सभ साफ केलक। चाह बनौलक। दू कप चाह पहिने सुलेखा आ आनन्दक हेतु छनलक। चाह लऽ कऽ आनन्दक कोठरीक दरबज्जा खटखटेलक आ बाजल- "बेटा आनन्द, उठू। देखू सुरूज भगवान निकैल गेल छैथ। चाह पीब लीअ तखन सुतब।" दरबाजा खुजल राधा चाहक ट्रे टेबुलपर राखि बाहर आबि गेली। एक कप चाह अपन बेटी रूपम लेल आ एक कप चाह अपने वास्ते लए पीअ लगली। आनन्द आ सुलेखा सेहो चाह पीबैत रहैथ। सुलेखा रौतुका भोजनक आ अखुनका चाहक प्रशंसा करैत बजली- "आनन्दजी, अहाँक माए अनमोल रत्न छैथ। हिनका हाथक चाह आ भोजन तँ मुहोँसँ नहि छुटैत अछि।" आनन्दजी बजला- "सुलेखा, माएकेँ सभ लूरि छइ। एकटा बेटी छइ। देखियौ ने ओकरो सभ लूरि सिखा देने अछि। हमरा बहिनकेँ कोन लूरि ने अछि। ई सभटा माइक देन अछि।" ताबत चाहक चुस्की लैत रूपम भौजीक कोठरीमे प्रवेश केली आ बजली- "भौजी, हमर चर्चा किए करै छी।" सुलेखा ऐंठैत बजली- "हम अहाँक चर्चा किएक करब। अहाँक भाइये अहाँक चर्चा करैत अछि।" आनन्दजी बजला- "बहिन, कनी भौजीकेँ अपन लूरि सभ सीखा दहीन।" भौजी चद-दे बजली- "हमरा कोन लूरि नइ अछि। जे हम अहाँक बहिनसँ लूरि सिखब। ओ अपन लूरि अपने लग राखथु।" रूपम अपन भौजीक हाव-भाव, बात-विचार आ अहंकारकेँ भाँपि चुकल छल। ओ चाह पीबैत अपना कोठरीमे चलि गेल। आनन्द अपन खेती-पथारीकेँ देखैले बाध-बोन जाए लगला। राधा जन-बोनिहारक जलखै लए खेतपर पहुँचाबए लगली। राधा ओमहरसँ माल-मवेशीक लेल एक पथिया घासो नेने अबैत छेली। राधाकेँ मनमे होइत रहैत छल जे पुतोहु खाना बना कऽ रखने हेती। मुदा पुतोहु तँ जलखै कए जे सुतै छेली से सासुकेँ बाधसँ एलाक बाद आ भोजन बनलाक बादे उठै छेली। उठि स्नान कए अपनेसँ खाना परैस बिनु केकरो खुऔनहि अपने खा कए पुन: कोठरीमे बन्द भऽ जाइत छेली। ऐ तरहेँ बहुतो दिन बीति गेल मुदा सुलेखामे कोनो सुधार नहि भऽ सकल। कएक बेर आनन्दो कहि कऽ थाकि गेल छला। सुलेखा घरक वातावरणकेँ बिगारए लागल। सासु-पुतोहुमे मन-मुटाव बढ़ि गेल। राधाक मनमे भेल छलैन जे पुतोहु औत। सेवा करत। कपड़ा-लत्ता साफ करत। मुदा सभ मनोरथ...। सेवा केनाइ तँ दूर जे प्रेमसँ बातो नहि करैत छेलैन। राधा भोरे उठि सभ घर-दुआरकेँ झाड़ूसँ साफ कए पोछा लगा मवेशीक लेल चारा लाबए चल गेल। जखन ओ बाधसँ आबैथ तँ सुलेखाकेँ सुतले देखलैन। मन तँ घोर भऽ गेलैन। मनमे ई आशा लागल रहैत छेलैन जे घर जाएब तँ सुलेखा एक लोटा पानि आनि आगाँमे देती। बिऐन डोलेती। मुदा एकोटा मनोरथ पूर नहि भेल। पुतोहुकेँ सुतल देख राधा अपनेसँ चापाकलपर जा हाथ-पएर धोलैन। रसोइ घर खोलि नाश्ता परोसि कए हवामे बैस नाश्ता कए लैत छेली। राधा सुलेखाक खातिरदारी करैत-करैत उबि चुकल छेली। बिना किछु बजनहि। किछु ठंढाइत फेर भनसा घर खोलि भानस करए लगली। मुदा सुलेखा सुतले रहली। राधा मनमे सोचै छेली जे बेटा खेतसँ आएत आ भोजन समयपर नहि भेटतै तँ सुलेखाकेँ गारि-फज्झैत करत। आइ बेटासँ शिकायत करबाक उचित मौका देख रहल छल। तँए सुलेखाकेँ सुतले छोड़ि देलक। सुलेखाक नीन अचानक टुटि गेल। ओ धड़फड़ाइत भनसा घर गेली। ओतए देखलैन जे सासु भनसा बना रहली अछि। सुलेखा बजली- "चुल्हा लगसँ हटथिन ने हम भानस बना लइ छी।" राधा चुल्हा लगसँ नहि उठली। सुलेखा मुँह बिजकबैत अपना कोठरीमे जा सुति रहली। आनन्द खेतमे काम-काजकेँ सलटिया जखन कलौ बेरमे घर एला तँ देखै छैथ माए खाना बना रहल अछि आ सुलेखा अपना कोठरीमे सुतल अछि। माएसँ पुछलखिन- "माए, भानस तूँ बना रहल छेँ! सुलेखाकेँ किछु भऽ गेलैहेँ की?" राधा अपन बेटाक मुहसँ ई बात सुनिते तमशाएल मुद्रामे बाजल- "कनियाँकेँ की हेतइ। हम तँ तोरा सबहक नौकरानी छीहे।" आनन्द तामसे सुलेखाकेँ उठौलक आ ओकरा गाड़ि-फज्झैत करए लागल। सुलेखा मानएवाली नहि। ओहो आनन्दक तेरहो-पुरखाकेँ उकटए लागल। आनन्द खेतसँ गरमाएल आएले छल, तमसाएल छलाहे सुलेखाकेँ एक-दू थप्पर लगा देलक। आब तँ सुलेखा जोर-जोरसँ कानए लगली। कानब सुनि अड़ोसिया-पड़ोसिया जमा भऽ गेल। राधो भनसा घरसँ दौगल एली। आ बेटाकेँ डॉंट-फटकार देबए लगली। आनन्दकेँ हाथ पकैड़ कोठरीसँ बाहर केली। आ सुलेखाकेँ बोधए लगली। पुतोहु पैघ बापक बेटी तँए ओ केकरो ताना-बाना सहएवाली नहि छेली। राधोकेँ गाड़ि-फज्झैत करए लगली। बात दिनानुदिन तनाव आ अशान्तिक तरफ बढ़ए लागल। सुलेखा दू दिनसँ किछु ने खेने छेली। राधाक काम-काज बढ़ि गेल। आब तँ आनन्द आ आनन्दक माइयो परेशान रहए लागल। दुनूकेँ डर होमए लगलैन जे कहीं आत्महत्या ने कऽ लिअए। केतेक बुझैला-सुझेलासँ आ घटनाक जिम्मेदारी अपना ऊपरमे लए दुनू माय-पुत गलती सुलेखासँ मानलक, तखन सुलेखा जे दू दिनसँ भूखल-पियासल छल। दतमैन केलैन आ मुँह धोलैन। आ पछाइत भोजन केलैन। राधा हारि मानि सभ कार्य पूर्ववते करैत रहल। धीरे-धीरे दुनू पति-पत्नीमे मिलान भेलइ। आनन्द बाजल- "सुलेखा सभ माइ-बापक इच्छा होइ छैन जे पुतोहु घरक काम-धन्धाकेँ देखैथ आ सासु-ससुरक सेवा करैथ।" आनन्दक एतेक बजनाइयो समाप्त नहि भेल छल कि बिच्चेमे सुलेखा बाजि उठल- "हम अहाँ-सबहक नौकरनी बनि नहि आएल छी। हमर बाप केहेन छला जे हमरा एकटा भिखमंगा ओतए बियाहि देलक।" कहैत सुलेखा कानए लगली। सुलेखा धनिक घरक बेटी। कहियो भानस केनाइ तँ दूर जे अपन कपड़ो नहि साफ करैत छल। ऐ प्रकारे ओ अपन मर्जीसँ काम-काज करैत छल। राधाक इच्छा छल जे पुतोहु हमरासँ पुछैथ जे खानामे की सभ बनेबाक अछि। केतेक चाउर, केतेक दालि... इत्यादि इत्यादि। मुदा सुलेखा अपन मर्जीसँ कोनो काज करैत छल। अपना मन मोताबिक रसोइ बनबैत छल। ओ खाना दोसरकेँ पसिन होइ अथबा नहि। एक दिनक बात छी। सुलेखा तरूआ छानि रहल छल। ई देख राधा बाजल- "छानि कऽ खेबाक छह तँ बापकेँ कहक जे एक टीन तेल भेज देतह।" ऐपर सुलेखा जवाब देलक- "हिनकर बाप कहियो एक किलो तेल भेज देने छेलैन।" राधा सुलेखाक जवाब सुनि तिलमिला कऽ रहि गेली। ऐ प्रकारे सासु आ पुतोहुमे कोनो-कोनो छोटो-छोटो बातपर कखनो बहसवाजी शुरू भऽ जाइत छल। राधा अपन मन मसोइस कऽ रहि जाइ छेली। कामकाजु राधा दिन-प्रति-दिन चिड़चिड़ा स्वभावक होबए लागल। ओना, एहेन बात नहि छल जे आनन्द अपना पत्नी सुलेखाकेँ नहि समझाबैत छल। परन्तु सुलेखा अपना सामने केकरो मोजरे ने दैत छल। एवम् प्रकारेण पति-पत्नीमे सेहो मन-मुटाव बढ़ि गेल। सुलेखा अपना परिवारकेँ नरक बना देने छल। सुलेखा रूपवती छल तँए दहेजोमे छूट भेल छल। ओकरा अपन सुन्दरता आ बापक सम्पैतपर घमण्ड छेलैन। ओ अपनाकेँ घरक मालकिन आ अन्य सदस्यकेँ नौकर बुझैत छल। राधा टुटि चुकल छल। एक तँ काम-काजक बोझ, दोसर छोटो-छोटो बातक लेल हर-हर खट-खट होइत छल। एमहर दोसर बेटा सुरेश प्रतियोगिता परीक्षामे दिन-राति लागल रहैत छल। बी.एड. पास कए चुकल छल। टीईटी परीक्षामे सेहो नीक अंक आएल रहइ। तँए ओ शिक्षक भऽ गेल छल। मुदा सुरेश अपना घरमे जेठ भाइक पत्नी जे बड़का घरक बेटी छल, ओकर किरदानी देख नेने छल। तँए हेतुए ओ सोचैत छल जे हम कोनो मध्यम वर्गक परिवारक लड़कीसँ शादी करब। लड़कीक शील-स्वभाव नीक होइ। काजुल होइ। घरक काज-करैमे निपुण होइ। ओहन गुणवाली लड़कीसँ शादी करबाक सोचमे छल। सुरेशक पिताजी आब बुढ़ भऽ गेल छला। ओ जेठकी पुतोहुक व्यवहारसँ एतेक ने आहत भऽ गेल छला जे ब्लड-प्रेसरक शिकार भऽ गेला। सुरेशक माएकेँ जतेक प्रसन्नता जेठका बेटाक बिआह करैमे छल ततेक सुरेशक बिआहमे नहि। ओ गोनू झाक बिलाड़ि जकॉं पाकि चुकल छेली। तँए छोटका बेटाक बिआहक चर्चो नइ करै छेली। आ राधाकेँ कोनो विशेष जिज्ञासो नहियेँ छल। संयोगवश भवानी प्रसादजी अपन बेटी रोशनीक कथा लऽ कऽ एला। सुरेश पहिनहिसँ ओइ परिवारकेँ जनैत छल। भवानी प्रसादक पुत्र सुरेशक संगी छल। तँए सुरेश भवानी प्रसादक ओइठाम जाइत-अबैत छल। रोशनीक शील-स्वभावसँ सुरेश ततेक ने प्रभावित छल जे एको बेर नाकर-नुकर नहि केलक। कथाक मंजूरी दए देलक। दुनू परिवार स्वजातीय छल। अन्तरजातीय विवाहसँ ओ घृणा करैत छल। एमरह राधाकेँ कोनो उत्सुकता आ प्रसन्नता नहि छल। ओ मने-मन सोचैत छल बड़की पुतोहु तँ सभ गुर गोबर कय देलक। आब ई की करत ओ भगवान जानैथ...। सुरेशक बिआह भेल। बर-कनियाँ घर आएल। राधाक मन टुटल छल तँए ओ परिछनोमे नहि गेल। लाचार भऽ दियादनी सुलेखा बर-कनियाँक परिछण कए घर लौलक। राधा तबियत खरापक बहाना केने छेली। रोशनीकेँ जखन पता लागल जे सासु माँ बीमार छैथ तँ ओ कोहबर घरसँ निकैल सासुक कमरामे गेल आ पहिने राधाक पएर छुबि प्रणाम केलक आ पुछलक- "माँ, तबियत ठीक अछि की नहि।" एकाएक नबकी पुतोहुकेँ देख राधा लजा गेली। उठि कऽ बैसैत बजली- "कनियाँ, माथमे दर्द भऽ रहल अछि।" रोशनी तुरन्ते भिक्स लए सासुक माथमे लगौलक। आ किछु काल धरि पएरकेँ सेहो दबौलक। आइ बड़ फुर्तीसँ सुलेखा खूब नीक जकाँ भानस-भात कए रोशनीकेँ भोजन परोसि खेबाक लेल दैत बाजल- "कनियाँ, खाना खा लीअ, कखन खेने हएब कखन नहि।" रोशनी बजली- "जखन सासु माँ भोजन करती तेकर बादे हम भोजन करब।" तैपर सुलेखा बजली- "माँक तबियत खराप छैन, जखन इच्छा हेतैन खा लेती।" रोशनी अपन खाना लए खुद सासु माँक कमरामे गेली आ एक कौर भात दालिमे मिला हाथमे लए बजली- "माँ, छोटकी पुतोहुक हाथसँ एक कौर खाना खाथु।" कहैत हाथ सासु माँक मुँहमे देलक। राधाक एक कौर भातसँ सभ दुख दूर भऽ गेल। भोजन करैत कहलक- "बेटी, जाउ अहूँ भोजन कए लीअ।" "नहि माँ जाबत अहाँ नहि खाएब ताबत हमहूँ नहि भोजन करब।" राधा छोटकी पुतोहुक जिद्दकेँ नहि टारि सकल। राधा भरि पेट भोजन केलक। राधाक खाना खेलाक बाद रोशनी जूठ फेरि कोठरीसँ बाहर भेल। पछाइत सुलेखा आ रोशनी माने दुनू दियादनी संग-संग भोजन केलक। भोजन केला बाद सुलेखा सुतबाक लेल अपना कोठरीमे चल गेल। आ रोशनी एक लोटा पानि लए सासु माँक कोठरीमे जा राखि देलक आ सासु-माँक पएर दबाबए लागल। राधा जखन बाजल- "जाउ कनियाँ, अहाँक आइ पहिल दिन अछि, थाकल ठेहियाएल हएब। अराम करू गे।" तखन रोशनी सासु-माँकेँ बिछौन झारि मशहरी लगा कए अपन कोठरीमे आराम करक लेल चल गेली। राधा मने-मन रोशनीकेँ आशीर्वाद दऽ रहल छल। आ सोचैत छल। भविष्यमे जे आँगा हुअए मुदा अखन तँ अबैत देरी एतेक खातिरदारी तँ केलक। राधा छोटकी पुतोहुक परिछणमे नइ गेली तेकर आब पश्चाताप हुअ लागल छेलैन। रोशनी साक्षात देवी छैथ जे हमरा घरकेँ स्वर्ग बनौत...। यएह सभ सोचैत-विचारैत राधा कखन सुति रहली से नहि जाइन। रोशनी आ राधाक बीच जे क्रियाकलाप होइत छल से सुलेखा देखैत रहल। सुलेखा अपन सासु-माँक अदखोइ-बदखोइ रोशनीकेँ सुनाबए लगली। रोशनी सुलेखाक कोनो बातक जवाब नहि दइ छेलखिन। रोशनीकेँ अपन बिआहक पूर्वहिसँ सुलेखाक किरदानी सुरेशक माध्यमसँ बुझल रहैन। भोरे रोशनी उठि झाड़ू लऽ कऽ घर-आँगनकेँ बाहरए-सोहरए लगली। फरीच नहि भेलाक कारणे जखन सुलेखा अँगना बहारैत देखलक तँ ओकरा पहिने भेलैन जे राधाआन दिनुका जकाँ आँगनमे झाड़ू लगा रहल अछि। मुदा जखन आगॉं बढ़ल तँ रोशनीकेँ बाढ़ैन लगबैत देखलक तँ आश्चर्यचकित होइत बाजल- "कनियाँ, अहाँ काल्हिये एलौं आ आइये बाढ़ैन पकैड़ लेलौं। कहू तँ अहाँक माए-बाप की कहता। एतेक काज केनाइ कोनो जरूरी छइ!" रोशनी बजली- "बहिन, ई तँ हमर अपन काज अछि। हम नइ करब तँ के करत।" सुलेखा चुपे रहि गेली। राधा भोरे उठि बाधसँ घास आनए गेल छेली। छोटकी पुतोहुक व्यवहारसँ राधा गदगद छेली। तँए राति खूब मनसँ सुतलो छेली। रोशनी घर-दुआरिकेँ बहारि एकटा टोकरीमे बाहरन-सोहरन उठा रहल छेली। ताबत राधा घास लऽ कऽ आँगनमे प्रवेश केलैन। आकि रोशनी देखलक, चटे बाढ़ैन छोड़ि सासुक माथपर सँ घासक छिट्टा लऽ घास रखैक जगहपर जा कऽ राखि आएल। राधा रोशनीकेँ कहए लागल- "तूँ किएक बढ़नी धेलह। हम अबितौं तँ झाड़ू लगा दितौं।" ई कहैत रोशनीक हाथसँ बाढ़ैन लेबए लगली। मुदा रोशनी बजली- "माए, आब अहाँकेँ काज करैक जमाना नइ अछि। अहाँ बैसू, अराम करू आ हम सभ काज करब।" राधा सुसताए लागल। ताबत रोशनी सासुक लेल एक लोटा पानि आ एकटा दतमैन आनि हाथमे थम्हबैत बजली- "सासु-माँ, ई दतमैन करौथ हम ताबत जलखै बना दइ छिऐन।" जलखै तैयार भेल। सुरेशक लेल भोजन आ टिफीन सेहो तैयार केलक। किएक तँ सुरेशकेँ विद्यालय जेबाक छेलैन। आनन्द आ राधा जलखै कऽ अपन-अपन काजमे लागि गेल। एमहर रोशनी अपन जेठ दियादनीकेँ माने सुलेखाकेँ हुनक कोठरीमे जलखै लऽ कऽ पहुँचली। सुलेखा आ रोशनी संगे जलखै केलैन। आ दुनू अपना-अपना काजमे लागि गेली। रोशनी राधाक आधासँ बेसी काजकेँ सम्हारि लेलैन। सुलेखा रोशनीक व्यवहारसँ आहत होइत रहली आ मने-मन अपनाकेँ अपराधी मानि पश्चातापो करैत रहै छेली। रोशनीक ज्ञान, विद्वुता आ चालि-चलन ओकरा घमण्डकेँ तोड़ि देलक। राधा आब सकुन महसूस करए लगली। फेर घरमे खुशहाली आबए लागल। एक दिन रोशनी अपन घरक सभ काम-काज निपटा भोजन कए सुतल छेली। ताबत रोशनी कोठरीमे चौकीपर सुतल राधाक पएर दबा रहल छेली। ओही समय ग्लानिसँ मर्माहत सुलेखा कनैत ओइ कमरामे घुसल आ बाजल- "माए, ऐ अभागिनकेँ क्षमा कए दीअ। अहाँ हमरा सबहक सुख-सुविधाक लेल एतेक दिन-राति खटैत रहै छी। माए, हमरासँ अहाँकेँ बड़ कष्ट भेल। हम अहंकारी भऽ गेल छेलौं। रोशनी हमरा घरक साक्षात लक्ष्मी छैथ। एतेक पढ़ल-लिखल भऽ कऽ जे हमरा सबहक सेवा करै छैथ ओहीसँ हमरो रोशनीसँ शिक्षा भेटल जे परिवारक सदस्य खास कए सासु-माँ सँ बढ़ि ऐ संसारमे कियो नहि अछि। तँए हमरा सन अभागिनकेँ माफ कए दीअ।" कनैत सासु-माँकेँ पएर दबाबए लगली। राधा बजली- "बेटी भोरक हेराएल जँ साँझमे घर आबि जाए तँ ओकरा हेराएल नहि कहल जाइ छइ।" आनन्द पढ़ल-लिखल युवक, सभ तमाशा देख रहल छल। बाजल- "माए, सुलेखाकेँ माफ कए दहीन। कुल आ नीक खानदानक बेटी छोटकी कनियाँ हमरा घरकेँ साक्षात् लक्ष्मी छैथ। मध्यम घरक बेटी एहेन होइत अछि जे बिगरल घरकेँ सुधारि दैत अछि।" ई कहैत आनन्दोक आँखिसँ नोर झहरए लागल। -नारायण यादव, पत्नीक नाम : श्रीमती सुमित्रा देवी। जन्म : 14 जनवरी 1956, पिताक नाम : स्व. राजेश्वर यादव। माताक नाम : स्व. महेश्वरी देवी। दादाक नाम : स्व. भोला यादव। नानाक नाम : महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. राम लखन सल्हैता। जन्म स्थान : डुमरा, मूल गाम : डुमरा, पो.- डुमरा, भाया : रूद्रपुर, प्रखण्ड : अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी (बिहार) मातृक : नरही, थाना : खुटौना, पेशा : अध्यापन, अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक, मात्र पेंशनपर आधारित जिनगी। शिक्षा : एम.ए. (मैथिली), लेखन : कथा, कविता आ आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। मोबाइल नं: 9939041116, 9430631993, 8541096004 सद्य: प्रकाशित कृति : खाली घर (कथा संग्रह), प्रकाशित/अप्रकाशित अन्य कृति : (1.) नाती दुसलक नानाकेँ (कविता संग्रह), (2.) बाबा नाम केवलम (कथा संग्रह) , (3.) समझौता (कथा संग्रह), (4.) नवकी पुतोहु (कथा संग्रह) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-२ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नारायण यादवक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नारायण यादवक ५ टा कथा कथा २ साम्प्रादायिक सद्भाव कानपुर शहरमे छोट-पैघ बहुतो मोहल्ला अछि। ओइ शहरमे हरेक जाति,धर्म, सम्प्रदायक लोक रहैत अछि। ऐ शहरमे एकटा हिन्दू वाहुल्य मोहल्ला अछि आ एकटा मुस्लिम बाहुल्य। दुनू मोहल्लाक बीच किछु उग्रवादी, कट्टरपंथी मुल्ला पण्डित नफरतक खाधि खोइध देने अछि। एक-दोसराक खूनक प्यासा हरदम, एक-दोसर बनल रहैत अछि। एक मोहल्लाक लोक दोसर मोहल्लामे नहि जाइत अछि। भय आ आतंकक माहौल हरदम बनल रहै छइ। हिन्दू मोहल्लामे सुरेश नामक व्यक्तिकेँ एक मात्र पुत्र अछि जेकर नाम अछि प्रकाश कुमार। प्रकाश अति मेघावी छात्र अछि। सुरेश कर्त्तव्यनिष्ठ, इमानदार, निष्पक्ष आ निष्ठावान व्यक्ति अछि मुदा गरीब अछि। गरीब रहितो हिन्दू समाजमे सुरेशक बड़ मान्यता छैन। प्रकाशक व्यवहार आ मेघापर खुश भऽ मोहल्लाक लोक सभ चन्दा दए ओकरा पढ़ेबाक लेल सहयोग करैत छला। प्रकाश आठमी पास कए नौमीमे नाओं लिखौलैन। ओइ कक्षामे रहमान नामक एकटा लड़का सेहो पढ़ैत छल। रहमानक पिताक नाओं सुलेमान छिऐन। सुलेमान धनी-मनी ओ नेता टाइपक लोक छैथ। मोहल्लावासीक कल्याणक बात सदिखन सोचैत रहै छैथ। रहमान, सुलेमानक एकलौता बेटा अछि। ओ महा उदण्ड तथा ईर्ष्यालु स्वभावक लड़का अछि। पढ़ैमे महा भुसकौल, मुदा फुटवॉल-क्रिकेटमे चैम्पियन अछि। खेलमे ओहन लड़का ओइ परोपट्टामे कोनो दोसर नहि छल। प्रकाश आ रहमान एक्के वर्गमे पढ़ैत अछि। दुनू दू धाराक लड़का तँए दुनूमे मोहल्लाक वातावरणक अनुसार एक-दोसराक जानी दुश्मन बनल रहैत अछि। रहमान वर्गक उदण्ड लड़का सबहक एक टोली बनौने छल। प्रकाशसँ ओकरा जलन होइत रहै छइ। गुरुजी आ छात्र लोकैनक बीच रहमानसँ बेसी प्रकाशक मान्यता छेलइ। जइले रहमान प्रकाशसँ ईर्ष्या करैत छल। रहमान प्रकाशकेँ नीचा देखबैले ओकरा मारबाक तैयारीमे लागल छल। ऐ बातक जानकारी प्रकाशकेँ भऽ चुकल छल। प्रकाश मने-मन सोचलक जे बुधिसँ काज लेबाक चाही। प्रकाश भीतरे-भीतर रहमानसँ दोस्ती करैक प्रयासमे लागि गेल। एक दिन विद्यालयक क्रिया-कलापक निरीक्षण हेतु जिला शिक्षा पदाधिकारीक आगमन भेल। वर्ग शिक्षक अपन-अपन वर्गमे छात्र लोकैनकेँ ऐ सूचनाक जानकारी दए चुकल छल। छात्र लोकैनकेँ ऐ बातक जानकारी सेहो दए देल गेल छल कि सभ किलासमे पदाधिकारी बच्चा सभसँ पृथक-पृथक प्रश्न पुछथिन। आब रहमान छटपटाए लागल, जेना बिनु पानियेँ माछक दशा होइत अछि। रहमानकेँ तेहने सन हुअ लगलै। पदाधिकारीक प्रश्नक जवाब केना देल जा सकैत अछि। ऐ गुनधुनमे लागल छल रहमानक तखने प्रकाशपर नजैर पड़लै। प्रकाशसँ दुश्मनी छेलै। ओकरा ओ मदद करैले केना कहत।मनमे संकोच भऽ रहल छेलइ। प्रकाशो ऐ ताकमे छल कि रहमानसँ दोस्ती कोन हिसाबे करी। दोस्ती ऐ लेल जे रहमान धनीक बापक बेटा अछि। रहमानक पिताक दबदबा ऐ परोपट्टामे छल। दोस्ती आ दुश्मनी बराबरीएमे होइत छइ। दुनू एके किलासमे छल। प्रकाश गरीब बापक बेटा छल तँए ओ बुधिसँ काज लेबाक ताकमे छल। आइ रहमानकेँ अधिक चिन्तित देख प्रकाश इशारासँ ओकरा बजौलक। रहमानो अही ताकमे छल जे प्रकाशसँ मदद केना भेटत। रहमान आ प्रकाश गुप्तगू करए लागल। प्रकाश रहमानकेँ सलाह दैत कहलक- "अहाँ आइ हमरे बगलमे बैसब। हम सभ प्रश्नक जवाब अपना हाथपर लिख, हाथ अहाँक आगूमे राखि देब। अहाँ देख कए जवाब दए देबइ।" आब रहमान बड़ खुश छल। खुश ऐ कारणे जे आब हमरा अपमानित नहि हुअ पड़त। आफद-विपैत आ मुसिबत एलापर शत्रुओ मित्र भऽ जाइत अछि। बाढ़ि एलापर जहिना सभ जीव जन्तु जखन एकटा टिला ऊँचगर स्थानपर शरण लैत अछि तँ राग-द्वेश, दुश्मनी सभटा मित्रतामे बदैल जाइ छै तहिना रहमानकेँ भेलैन। प्रकाश अपन बुधिक प्रयोग रहमानपर केलक। वर्गमे अगुलका ब्रेंचक पाछूबला ब्रेंचपर बीचमे दुनू गोरे बैसल। दुनूकेँ एकठाम आ एक ब्रेंचपर बैसल देख वर्गक सभ छात्र अचम्भित भऽ गेल। वर्ग शिक्षककेँ सेहो ऐ टटका मित्रतापर आश्चर्य भेलैन, ओ अति हर्षित भऽ गेला। हर्षित ऐ लेल जे रहमान उदण्ड छल। उदण्ड छात्रक संग डरे आकि मित्रतासँ आरो छात्र सभ साथ देबए लगैत छइ। जखैन-तखैन वर्गमे हल्ला-फसाद करबए-बला छात्र रहमान आइ विद्यालयक शिष्ट, अनुशासित छात्रक मित्र भऽ गेल। ऐसँ खुशी आर की। निर्धारित समयपर जिला शिक्षा पदाधिकारी नवम वर्गमे प्रवेश केलैन। पहिने निर्लोभी बनि पदाधिकारी विद्यालयक निरीक्षण करैत छला। पूरा दिन विद्यालयमे दऽ एक-एक छात्रक प्रगतिसँ अवगत होइत छला आ विद्यालयक सर्वांगीण विकासक लेल मार्ग निर्देश करैत छला। शिक्षाक गुणवत्तापर सबहक धियान रहैत छेलैन। शिक्षको कर्त्तव्यनिष्ठ आ परिश्रमी होइत छल। मुदा आजुक दिनमे गुणवत्तापर विशेष भाषण आ काम विपरीत देखना जाइत अछि। छात्र कम आ शिक्षकक भरमार रहितो एको घण्टी किलास नइ चलैत अछि आ ने पदाधिकारीए इमानदार छैथ। निरीक्षणक क्रममे विद्यालयसँ सेवा शुल्क, गाड़ी तेलक बहाने विद्यालयक प्रधानसँ चुंगी असूल करै छैथ। पदाधिकारी लोकैनक कोनो मूल्य विद्यालयमे नहि रहि गेल अछि। भ्रष्टाचार सीमा पार कए चुकल अछि। ऊपरसँ नीचा धरि भ्रष्टाचारमे आकण्ठ डुमल अछि। जेना मकानक सीढ़ीक सफाइ नीचाबला पौदानसँ नहि कएल जा सकैत अछि। ऊपरका पौदानसँ साफ कएलासँ पूरा सीढ़ीक सफाइ होएत तहिना भ्रष्टाचारक खात्मा उपरेसँ सम्भव अछि। रहमान आ प्रकाश दोसर ब्रेंचपर एकेठाम बैसल छला। पदाधिकारी छात्र लोकैन सभसँ प्रश्न पुछए लगला। छात्र लोकैन यथासम्भव जवाब देबए लागल। रहमानक वारी एलइ। पदाधिकारी रहमानसँ प्रश्न पुछलैन- "शिक्षक के अतिरिक्त नहीं बोलनेवाला गुरु कौन होता है?" रहमान प्रकाशक बामा हाथपर लिखल जवाब देख बाजल- "पोथी।" पदाधिकारी- "अंग्रेजी के सिंगुलरमे कितने अक्षर होते हैं?" रहमान किछु सोचैत ओंगरीपर गिनैत प्रकाशक हाथपर देख उत्तर देलक- "आठ।" हरेक छात्रसँ तीन प्रश्न पुछबाक छेलै तँए तेसर प्रश्न पदाधिकारी पुछलखिन- "एक से नअ तक का योगफल कितना होता है?" रहमान किछु सोचबाक आकृति करैत हाथ मुँहकेँ चमकबैत आगूमे प्रकाशक हाथकेँ देखैत बाजल- "पैंतालीस।" जिला शिक्षा पदाधिकारी तीनू प्रश्नक सही जवाब सुनि बजला- "यह लड़का बहुत जिनीयस है।" रहमानक प्रशंसा पदाधिकारीक मुहसँ सुनि वर्ग शिक्षक आ वर्गक छात्रसभ आश्चर्य चकित भेला। ताबत प्रकाश जे अपना हथेलीपर जवाब लिखने छल तेकरा खूब नीकसँ मेटा देने छल। ऐ करिश्माकेँ वर्ग शिक्षक आ दुनू छात्रे जानि सकल। आब प्रकाश आ रहमानमे मित्रता बढ़ए लागल। दुनू एक-दोसरकेँ दिलोजानसँ मानए लागल। वर्ग शिक्षक सेहो बड़ खुश छला। खुशी ऐ लेल छला जे रहमान विद्यालयकेँ तनाव ग्रस्त बनौने रहै छल। आब प्रकाश निर्भिक रूपे पठन-पाठन करए लागल। रहमानकेँ सभ विषयक तैयारी करबए लागल। रहमानमे हठात् ई परिवर्तन देख रहमानक अब्बा सुलेमान एकर राज जनबाक प्रयास केलैन। बेटासँ पुछलखिन। रहमान सभटा वृतान्त अब्वाजानकेँ कहि सुनौलक। सुलेमानकेँ प्रकाशक प्रति सिनेह जागल। समय-समयपर सुलेमान प्रकाशकेँ उपहार रहमानक हाथे भेजए लागल। ऐ बातक जानकारी प्रकाशक पिताजीकेँ सेहो भेलैन। दुनू अविभावककेँ एक-दोसराक पुत्रक प्रति सिनेह-भाव जागल। प्रकाश रहमानकेँ दिशा निर्देश आ रहमान प्रकाशकेँ अपन खेलबला कौशलसँ दक्ष बनेबामे लागल रहैत छल। रहमानक दिन घुमि गेलइ।सभ अवारापनी, बदमाशी छुटि गेलइ। हदीशक एक पाँति छै- 'ला इलाही ईललह मुहम्मदे रसुलल्लाह।' किछु दिनक बाद रमजानक मास आबि गेल। मुसलमानक बच्चासँ बुढ़ धरि, मर्दसँ जनानी तक अल्लाहक इवादतमे रोजा राखए लागल। रहमान सेहो इस्लाम धर्मक रक्षार्थ रोजा रखैत छल। रमजानक अवधिमे प्रकाश रोजा खोलबाक (इफ्तार पार्टी) हेतु कोनो-कोनो समान रहमानक हेतु घरसँ लाबि दैत छल। रबि दिन रोजाक बाद ईद पर्व आबि गेल। रहमान, प्रकाशकेँ ईदक खुशीमे दाबत देलक। आब प्रश्न छेलै जे एक टोल-दोसर टोलक जानी दुश्मन बनल रहैत छल। प्रकाश ओइ टोल केना जेता, ऐ तारतम्यमे छल कि एकटा उपाय सुझलैन। प्रकाश पाजामा-कुर्ता पहिर दुपहरमे रहमानक ओतए पहुँचल। रहमानक माए-बाबूजी प्रकाशकेँ देख बड़ खुश भेल। प्रकाशक खूब आव-भगत भेल। खूब मेवा-मिठाइ खुऔलक। दुनू मित्र संध्या धरि खेलाइत-धुपाइत आ गप-सप्पमे लागल रहल। मुनहारि साँझ भऽ गेल। प्रकाश घर आबक लेल धड़फड़ाइत सीढ़ीसँ नीचा उतरए लागल, आकि सीढ़ीसँ पएर पिछैर गेलैन। सीढ़ीपर लुढ़कैत निचला पौदानपर गिरल। कपार फुटि गेलैन। बहुत रास खून बहलैन। रहमानक पिता सुलेमान अपन चारिचकिया गाड़ीसँ प्रकाशकेँ डाक्टर लग लऽ गेलैन। क्लिनिकमे ओकरा खूनक आवश्यकता पड़लै। सुलेमानक खूनक जाँच भेल। प्रकाशक खूनसँ मिलल। आवश्यकतानुसार सुलेमान अपन खून दए प्रकाशक जान बँचौलक आ सभ दवाइ खरीद दवाइयक संग प्रकाशकेँ घर पहुँचौलक। प्रकाशक पिता सुरेश बड़ खुश भेला। किछु दिनक पश्चात ठीक भेलाक बाद प्रकाश पुन: विद्यालय जाए लागल। प्रकाश आ रहमानक दोस्ती विद्यालयमे पुन: शैक्षणिक माहौलकेँ स्थापित केलक। आब विद्यालयमे प्रकाश आ रहमान पहिल आ दोसर स्थान प्राप्त करए लागल। किछु दिनक बाद होली पावैन आबि गेल। होलीमे प्रकाश, रहमानकेँ अपना घरपर पावैनमे भोजन करैले नौत देलक। रहमान अपना माए-बाबूसँ बिनु पुछनहि बढ़ियाँ पाजामा-कुर्ता पहिर प्रकाशक घर पहुँचला। प्रकाशक माए-बाप रहमानकेँ अपनो बेटासँ अधिक मानए लागल। खूब नीक-नीक भोजन करौलक। दुनू खूब आनन्द मनौलक। साँझू पहर किछु ग्रामीणक टोली, होली गबैत जोगिरा गबैत सड़कपर जाइत छल। प्रकाश आ रहमान ओइ मण्डलीक अभिनय देखबाक लेल पहुँचला। फगुआक गीत गबैत किछु ग्रामीण- 'बुरा न मानो होली है' कहैत प्रकाशकेँ रंगसँ सरावोर कए देलक। किछु शरारती लड़का रहमानकेँ प्रकाशक रिश्तेदार जानि ओकरो रंग देबाक लेल दौगल। रहमान रंगक डरसँ नहि, अपन अब्बाजानक डरसँ रंगसँ बँचबाक लेल एकटा गलीमे पड़ाएल। गलीक अन्तिम छोरपर एकटा इनार छल, इनार बिना घेरल छल। रहमान भागैक क्रममे ओइ इनारमे खसि पड़ल। हल्ला भेल।प्रकाश आ प्रकाशक बाबूजी दौग कऽ एला। प्रकाशक पिताजी इनारमे कड़ी पकैड़ नीचा उतरला। रहमानक कपार फुटि गेल छल। रहमानकेँ सुरेश इनारसँ निकाललक। अपन अंग पोछासँ ओकरा फुटल कपारकेँ बन्हलक आ तुरन्त डाक्टर लग गेल। रहमानकेँ जाबत डाक्टर लग लऽ जाथि ताबत माथसँ बहुत खून बहि चुकल छल। रहमानक प्राण बँचनाइ मुश्किल भऽ गेल। देहसँ खून निकैल चुकल छल। डाक्टर इलाजक हेतु खूनक आवश्यकता बतौलक। खूनक जाँच भेल। रहमानक खून प्रकाशक माइक खूनसँ मिलल। प्रकाशक माइक खूनसँ रहमान ठीक भेल। आ आधा रातिक पहरमे सुरेश रहमानकेँ लए ओकरा घरपर पहुँचा सुलेमानकेँ सभटा वृतान्त सुनौलक। सुलेमानक मात्र एक गोट सन्तानक रक्षा सुरेशजी केलैन। ईद पाविनक दिन सुलेमान सुरेशक बेटाकेँ बँचौने छला। सुलेमानक मनमे उठल- कर भला तँ हो भला...। तैबीच रहमान मुँहमंगा इनाम सुरेशकेँ देबए चाहलैन। मुदा गरीब रहितो सुरेश एकरा पाप बुझलक। भिनसरमे सुलेमान दवाइक दोकानसँ रहमानक लेल दवाइ खरीदवाक लेल गेल। सभ दवाइ खरीद अनलक आ रहमानकेँ दवाइ खुएबाक हेतु ओकरा विस्तर लग गेल तँ रहमान भाव-विभोर भऽ बाजल- "अब्वाजान, प्रकाशक माताक खूनसँ हमर जान बँचि सकैत अछि आ अहाँक खूनसँ प्रकाशक जिनगी आपस आबि सकै छइ। ऐसँ तँ ई साबित भऽ गेल जे हिन्दू-मुसलमानक खूनमे कोनो फर्क नइ अछि। तँ दुनू सम्प्रदायक बीच दुश्मनी किए छै। अब्वाजान, दुनू टोलक बीच साम्प्रादायिक सद्भाव कायम करबाक प्रयास किए ने करै छी।" रहमानक ई बुद्धिमतापूर्ण बात सुनि सुलेमान अवाक् रहि गेल। -नारायण यादव, पत्नीक नाम : श्रीमती सुमित्रा देवी। जन्म : 14 जनवरी 1956, पिताक नाम : स्व. राजेश्वर यादव। माताक नाम : स्व. महेश्वरी देवी। दादाक नाम : स्व. भोला यादव। नानाक नाम : महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. राम लखन सल्हैता। जन्म स्थान : डुमरा, मूल गाम : डुमरा, पो.- डुमरा, भाया : रूद्रपुर, प्रखण्ड : अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी (बिहार) मातृक : नरही, थाना : खुटौना, पेशा : अध्यापन, अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक, मात्र पेंशनपर आधारित जिनगी। शिक्षा : एम.ए. (मैथिली), लेखन : कथा, कविता आ आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। मोबाइल नं: 9939041116, 9430631993, 8541096004 सद्य: प्रकाशित कृति : खाली घर (कथा संग्रह), प्रकाशित/अप्रकाशित अन्य कृति : (1.) नाती दुसलक नानाकेँ (कविता संग्रह), (2.) बाबा नाम केवलम (कथा संग्रह) , (3.) समझौता (कथा संग्रह), (4.) नवकी पुतोहु (कथा संग्रह) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-३ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नारायण यादवक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नारायण यादवक ५ टा कथा कथा ३ कन्याँक जिनगी बी.ए.क छात्र छेलौं। गरमीक छुट्टी छल। मन बहलबै-ले अपन जेठ बहिनक गाम गेल रही। पाँच भाए-बहिनमे सभसँ जेठ बहिन, माए-बाबूक बड़ दुलारू छेली। बड़ धूम-धामसँ नामी-गामी परिवारमे बिआहो भेल छेलैन। बहिनक जेठ ससुरकेँ एकटा बेटी छेलइ। ओकर नाओं कुसुम छल। नामे सन सुन्नैर सेहो छेली कुसुम। ओ मैट्रिक प्रथम श्रेणीसँ पास भऽ इन्टरमे पढ़ैत छेली। सोलह बर्खक ओ मैथिल ललना, जेकर सुन्दरता विद्यापतिक कवि कल्पना कामिनी आ इन्द्र भगवानक उर्वसीसँ उपमा प्राप्त करएवाली आ हम 20-22 बर्खक कौलेजक छात्र। जखन दीदीक गाम पहुँचलौं तँ ओ सुन्दर हाथमे लोटा लए हाथ-पएर धोबाक लेल पानि अनलक। हम हाथ-पएर की धोअब, ओइ सुन्दरीक मुख-मण्डलकेँ एकटक निहारैत रहलौं। दीदी हमर भावनासँ अवगत होइत बजली- "बौआ, ई हमर ननैद छैथ। ई अहीं जोकरक कनियाँ छैथ। हम एकर बिआह अहींसँ करा देब। जँ इच्छा हुअए तँ।" ई बात सुनिते हम भाव-विभोर भऽ गेलौं। मनमे नाना प्रकारक उद्वेग जागए लागल। ओ सुन्दरी हमरा संग मजाक करैत बजली- "की हम एहने बरसँ बिआह करब।" मजाकमे तँ ओ जे बजबाक छेलै से बाजि गेल मुदा कुसुमक हृदयमे हमर स्थान प्रियतमक रूपमे बास करए लागल। जहिना हमरा लेल ओ अनमोल रत्न स्वरुपा छेली तहिना हुनका लेल हमहूँ। ओहो हमरा आगत-भागतमे लागि गेली। दुनूक एक-दोसराक प्रति आकर्षण स्वभाविके छल। ओ आइ हमरा स्वागतक लेल अपनेसँ छप्पन प्रकारक व्यंजन बनौलक। दीदी दोसर काजमे बाझल छेली। कुसुम झट-दे हमरा भोजन करेबाक तैयारीमे जुटि गेली। घरमे पीढ़ी दए भोजनक जोगार करए लगली। हाथमे पानि लए हमरा लग ठाढ़ भऽ बजली- "पाहुन, भोजन करए चलू।" हमहूँ भूखल छेलौं। भोजनक प्रत्यासामे छेलौं। आ मनमे कुसुमक सन्हियाइक जिज्ञासाक तलास करिते छेलौं। भोजन करैले उठलौं। पीढ़ीपर आबि बैसलौं। कुसुम थारीमे भोजन साँठि हमरा आगूमे देलक आ एकटा बिऐन लऽ बगलमे बैस पंखा डोलबए लगली। हम प्रेमसँ भोजन करए लगलौं। पंखा डोलबैत कुसुम बजली- "की पाहुन, तीमन-तरकारी खेबाक योग बनल अछि किने?" "खेबाक योग किएक ने रहत, कारण बनौलक के अछि। आइ धरि एतेक सुस्वादु भोजन नहि केने छेलौं।" अपन प्रशंसाक शब्द सुनि कुसुमक साहस बढ़लै आ हमरासँ पुछलक- "छुट्टी केतेक दिन आर अछि जे जाइक लेल अखनेसँ व्यग्र छी। की एतए मन नइ लगैत अछि?" हम तुरत जवाब देलौं- "एतए मन नहि लागत तँ केतए लागत, कौलेजक होस्टलमे। जेतए भातमे आंकर आ दालिमे निच्छक पानि रहै छइ।" हम खाइतो छेलौं आ बतियाइतो छेलौं। ओही क्रममे एकटा सजमैनक बीआ हाथमे आबि गेल। हम मजाक करैत बजलौं- "हे कोइली हे कोइली, हमर बियाह केतए।" तँ बीओ कुसुमक देहपर चलि गेल। ई प्रक्रिया तीन बेर केलौं। तीनू बेर बीआ कुसुमेक तरफ गेल। हम बजलौं- "कुसुम,कोयली तँ अपन निर्णय सुना देलक।" ई सुनिते कुसुम लजा गेली। कुसुमो मजाकेमे बजली- "हम एहने दुलहासँ वियाह करब!" ओना, ओकरा मनमे होइत रहै जे कखन हम ऐ दुलहाकेँ अपन भतार बना ली। हमरो मनमे होइत छल जँ लोक आ गारजियनक सहमति होइत तँ हम कुसुमकेँ अपन अर्द्धांगिनी बना ली। एहने स्थितिमे प्रेमी आ प्रेमिका घरसँ फरार भऽ जाइत अछि। आ प्रेम बिआह कऽ लैत अछि। दीदीक गाममे मन लागए लागल। कुसुमक प्रेम हमरा प्रति आ हमर प्रेम कुसुमक प्रति दिनानुदिन बढ़ए लागल। दुनू खूब बतियाइत रही। आ खूब खेलाइत रही। खूब मन लगैत रहए। केना कौलेज खुजैक दिन लग आबि गेल से नहि जानि पेलौं। एक दिनक वास्ते आएल छेलौं आ दस दिन बित गेल। हम कौलेज अबैक तैयारीमे लागि गेलौं। कुसुम खिन्न मने हमरा तैयारीमे सहयोग करए लगली।हम दीदीक गामसँ विदा भेलौं। कुसुमकेँ हमरासँ विछुड़बाक बड़ कष्ट भऽ रहल छेलै, ओ छटपटाए लगली। आइ ओ बड़ उदास बुझना जाइत छेली। विदा होइत काल एकटा टिफिन-कैरियर हमरा हाथमे दैत ढबढबाएल आँखिये बजली- "ई बटखर्चा छी। एकरा राखि लिअ। बाटमे भूख लागत तँ खा लेब। आ पाहुन अहिना अबैत जाइत रहब।" कौलेज आबि गेलौं। बहुत दिन बित गेल। कुसुमक धियान मनसँ हटि गेल। ओमहर कुसुमक पिताजीक देहान्त भऽ गेल। दीदी सेहो बहनोइक संगे दिल्ली चलि गेली। कुसुमक माइक हालत दयनीय भऽ गेल। बहुत रास जमीन-जत्था कुसुमक पिताक इलाजमे बिका गेल। कुसुमक बिआह दहेजक कारणे योग्य बरसँ नइ भऽ सकल। कुसुमक दुलहा महा शराबी आ जुआरी निकलल। जतेक जे कुसुमक गहना-गुड़िया आ जमीन-जत्था छल, सभटा बेच कऽ पीब गेल। अन्तमे कुसुमक भाग्य फुटि गेल आ खतरनाक बेमारीसँ घरबलाक मौत भऽ गेलइ। वेचारी कुसुम अनाथ भऽ गेली। सासुरक नौजवान लड़का सबहक कुदृष्टि कुसुमपर पड़ए लगलै। कएक बेर ओकरा पटयबाक वास्ते परियासो भेल छल। ओ अपनाकेँ अनाथ बुझि सासुर छोड़ि नैहरमे आबि रहए लगली। हमहूँ पढ़ि-लिख कऽ नोकरी करए लगलौं। बिआह-शादी भेल। बाल-बच्चा सेहो भेल। किछु दिनक बाद दीदीक गामसँ एकटा निमंत्रण-पत्र आएल, जइमे हमर भागिनक विआहक उल्लेख कएल गेल छल। भागिनक विआहमे भाग लेबाक लेल दीदीक गाम एलौं। एतए एलाक बाद कुसुम मन पड़ि गेल। कुसुमक खोज केलौं। एकटा विधवा सन मौगीसँ भेट भेल। हुनकासँ कुसुमक हाल-चाल पुछैत कहलयैन- "हमरा कुसुमसँ मिला दीअ।" ओ कानए लगली आ बजली- "पाहुन, हमहीं कुसुम छी।" हम अवाक् भऽ गेलौं। बड़ कष्ट भेल कुसुमक दुर्दशा देख कऽ। सोचमे पड़ि गेलौं- एतेक दिनमे ई परिवर्त्तन भऽ गेल! कन्याँक जिनगी केहेन होइत अछि..! -नारायण यादव, पत्नीक नाम : श्रीमती सुमित्रा देवी। जन्म : 14 जनवरी 1956, पिताक नाम : स्व. राजेश्वर यादव। माताक नाम : स्व. महेश्वरी देवी। दादाक नाम : स्व. भोला यादव। नानाक नाम : महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. राम लखन सल्हैता। जन्म स्थान : डुमरा, मूल गाम : डुमरा, पो.- डुमरा, भाया : रूद्रपुर, प्रखण्ड : अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी (बिहार) मातृक : नरही, थाना : खुटौना, पेशा : अध्यापन, अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक, मात्र पेंशनपर आधारित जिनगी। शिक्षा : एम.ए. (मैथिली), लेखन : कथा, कविता आ आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। मोबाइल नं: 9939041116, 9430631993, 8541096004 सद्य: प्रकाशित कृति : खाली घर (कथा संग्रह), प्रकाशित/अप्रकाशित अन्य कृति : (1.) नाती दुसलक नानाकेँ (कविता संग्रह), (2.) बाबा नाम केवलम (कथा संग्रह) , (3.) समझौता (कथा संग्रह), (4.) नवकी पुतोहु (कथा संग्रह) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा-४ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नारायण यादवक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नारायण यादवक ५ टा कथा कथा ४ हृदय परिवर्तन गिरधारी बाबू एक बहुमुखी प्रतिभाक धनी, मिलनसार, कर्त्तव्यनिष्ठ सरकारी विद्यालयक प्रधानाचार्य छलाह। सेवाकालक दरम्यान ओ बहुतोकेँ उपकार कयने छलाह। कोनो असम्भवसँ असम्भव काम आसानीसँ करा दैत छलाह। विद्यालयक हरेक गति-विधिपर हिनक ध्यान रहैत छलैन्ह। छात्रसँ लय शिक्षक धरि सभ कियो हिनकासँ खुश रहैत छल। हिनक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ विद्यालयक आसो-पासक लोक सभ खुश रहैत छल। छात्र आ अभिभावकेँ जे कोनो विद्यालयक कार्य रहैत छल ओ अपन काम बुझि तुरंत करा दैत छलाह। इलाका भरिमे हिनक यश फैलल छल। हिनक अवकाश प्राप्तिक उपरान्त विदाइ समारोहमे इलाका भरिक लोक आयल छलाह। प्रभारी पैघ आयोजन कयने छलाह। सेवा निवृतिक लाभ हेतु जिला पदाधिकारी कार्यलयक चक्कर लगबय लगलाह। बहुतो दिनक बाद जिला कार्यलयसँ हिनक कागजात महालेखाकार कार्यालय पहुँचल। आब गिरधारी बाबू पटनाक चक्कर लगवय लगलाह। बड़ कठिनसँ पैंशन चालू भेलैन्ह। घर-परिवार नीक जकाँ चलय लगलैन्ह। दूटा बेटा आ दूटा बेटीक शादी-बियाह सेहो नीक परिवारमे भेल छल। सभ तरहेँ ठीक ठाक छल। किछु दिनक पश्चात ओ स्वर्गवासी भय गेलाह। पत्नी जीबित छलथिन्ह। बेटाक संग अपन गाँवमे रहैत छलीह। गिरधारी बाबूक देहांतक पश्चात सरकारी नियमानुसार हिनका पत्नीकेँ पेंशन भेटक चाही। ताहि हेतु किछु आवश्यक फार्मपर हिनका पत्नीकेँ हस्ताक्षर करऽ पड़ितन्हि। एहि लेल दुनू मायपूत महालेखाकार कार्यलय पटना जयबाक हेतु विचार करय लगलाह। आई धरि ने बेटा आ ने माय पटना गेल छल। कोनो शहरो सेहो नहि गेल छल। शहरक चहल-पहल विचित्र छल। माय बेटा सोचमे पड़ि गेल। कोना पटना जायव। पेंशनक आब ओ व्यवस्था नहि अछि। आब तँ सभ कार्य बैंकक माध्यमसँ भय जाइत अछि। बेटाक स्वभाव एहेन छल जे हरेक बातपर मायकेँ डँटैत रहैत छल। हर हमेशा मायसँ नाराजे रहैत छल। जखन पेंशन हेतु पटना जयबाक लेल बेटाकेँ कहलैन तँ बेटा झुझलाइत मायकेँ डॉंटय लगलाह। बेटा मायकेँ माय नहि बुझैत छल। हर हमेशा गारि-फजहैत सेहो करैत छल। माय बेटाक द्वारा देल कष्टकेँ सहन करैत रहलीह। माय बेटाक हर हमेशा खातीरदारीमे लागल रहैत छलीह। बेटा मायक महत्व नहि बुझि रहल छल। बेटा उदास रहय ओ मायकेँ नीक नहि लगैत अछि। मायक नजरिमे जबानो बेटा बच्चे रहैत अछि। माय संसारमे सभसँ दुर्लभ बस्तु थिक। जकर तुलना संसारमे कोनो बस्तुसँ नहि कयल जा सकैत अछि। तेँ गिरधारी बाबूक पत्नी अपना बेटाकेँ नासमझ जानि ओकर सभ गलतीकेँ बिसैर जाइत छलीह। माय बजलीह- "बेटा, पेंशने घर चलयबाक हेतु सहारा अछि। जँ एकरा चालू नहि करायव तँ गुजर कोना चलत। पटना तँ जेबाके छह।" बेटाकेँ पटना जयवामे परेशानी बुझना जाइत छलैन्ह। मायक बात सुनि बेटा कर्कस स्वरमे बाजल- "ओ कोनो गाम-घर छिऐ जे ककरो ओहिठाम रहि जाउ। ओ तँ शहर छैक। शहरक लोककेँ कामसँ फुर्सत कहाँ रहैत छैक। शहरमे एक दोसरासँ ककरो मतलवे नहि रहैत छैक। शहरमे कियो मरि जाय कियो जी जाय, एतय सभ तेहले छैक। बहुत पढ़लो लिखलो लोक सभटा निठल्ले छैक। एक दोसराकेँ ठकै-फुसियवैमे लागल रहैत छैक।" माय बजलीह- "बेटा, ओतय धर्मशाला तँ छैक। होटल तँ छैक। ओतहि रहि जायव।" मायक बात सुनि बेटा मायकेँ डँटैत कहलक- "तू चुप रह। अनेरे दिमाग नहि खराव कर।" माय चुप भऽ गेल। किछु सोचैत बाजलि- "कोनहुना पुछैत-पाछैत पटना ए.जी. ऑफिस चलिये जायब।" दोसर दिन गिरधारी बाबूक बेटा पटना जयबाक हेतु इन्टरसीटी ट्रेनक टिकट कटा अनलक तँ मायकेँ कहलक जे माय, टिकट भऽ गेल। माय बाजलि- बेटा, बटखर्चा किछु बना लीअ। बेटा फेर झुझलाकय बाजल ओतहि कोनो होटलमे खा-पीव लेब। माय फेर असथिर मनसँ प्रेमसँ बाजलि- "बेटा, ओतय भोजन असिया-बसिया भेटत आ पैसा सेहो अधिक लागत।" मायक बात सुनितहि बेटा जोरसँ बाजल- "जो जे मन होइ छौ से कर।" माय बटखर्चाक बास्ते पूरी, तरकारी, पेड़ा बनौलक। ऊपरसँ कनेक नून, हरियरका मीरचाई आ अचार सेहो एकटा झोरामे लय लेलक। सुबह 6 बजे जयनगरसँ इन्टर सीटी ट्रेन जे डेढ़ बजे पटना पहुँचै छैक से ट्रेन पकरलक। रेल गाड़ी मधुबनीसँ साढ़े छह बजे खुजल। माय बेटा ट्रेनमे चढ़ल। एहि इन्टर सीटीमे भीड़-भार कम रहैत छैक तँ दुनू माय बेटा मन पसन्द सीट खोजि कऽ वैसल। खिड़की लगक सीट बढ़िया बुझेलैक तँए दूनू आमने-सामने बैसल। गाड़ी द्रूत गतिसँ चलय लागल। गाड़ीक बाहरक वाताबरण, प्रकृतिक सौन्दर्यताकेँ निहारए लागल। आई धरि माय बेटा एहेन दृश्य नहि देखने छल। इन्टर सीटी समस्तीपुर पहुँचल। इंजन आगूसँ काटि पाछामे जोड़ल गेल। मुजफ्फरपुर होइत डेढ़ बजे पटना पहुँचल। पटना स्टेशनसँ उतरि स्टेशनसँ बाहर आयल। दूनू माय बेटा महावीर मन्दिर पहुँचल। पैर-हाथ धोय बजरंग वलीक पूजा कयलैन्ह। प्रसाद चढ़ौलैन्ह। फेर दूनू माय बेटा सड़कपर आयल। एकटा वटोही बाट धयने जा रहल छल। बेटा-बटोहीकेँ टोकलक- "हमरा महा लेखाकार कार्यालय जयबाक अछि से कोना जायब रास्ता बता दीअ।" बटोही बाजल- "एहिठामसँ टेम्पू पकड़ि लीअ आ ओ टेम्पू आर. ब्लॉक चौराहासँ आगा मोड़पर उतारि देत आ अहाँ ओहिठामसँ दहिना बगलमे महा लेखाकार कार्यालय चलि जायव।" दुनू गोटे टेम्पूपर चढ़ल आ किछुए देरमे महा लेखाकार ऑफिस पहुँचि गेल। ककरोसँ पूछि अन्दर जाय लागल। गेटपर बैसल सिपाही टोकलक- "कहाँ जा रहे हैं? पहले परमिशन ले लें तव अन्दर जाऐंगे।" बेटा दक्षिणवरिया रूममे गेल आ अपन सभ कागजात परमिशन देनिहार कर्मचारीकेँ देखा देलक। कर्मचारी पेंशनबला कागज देखि एकटा परमिशनबला पूर्जा थमा देलनि। ओ पूर्जा लय सिपाही लग गेल। सिपाही पूर्जा देखि अन्दर जाइक लेल आदेश देलक। ताबत कर्मचारी लोकनिक टिफिन समाप्त भऽ गेल छल। कैंनटीन खाली भऽ गेल छल। दुनू माय-पूतकेँ भूख बेसी लागि गेल छल। दुनू कैटिंगमे गेल। एकटा रूम खाली छल, कुर्सी, टेबुल सेहो लागल छलैक। ओतय पानि पीबाक नल सेहो लागल छल। दुनू माय-पूत ओहि कोठरीमे जा कय कुर्सीपर बैसि टेवुलपर झोलासँ पूरी सब्जी निकालि दू ठाम अखवार पर परोसा लगाइये रहल छल आकि दूटा सज्जन व्यक्ति ओहि कमरामे प्रवेश कयलैन्ह। पहिने तँ दुनू माय-पूतकेँ डर भेलैन्ह। ओ दुनू सज्जन माय बेटाक मनोदशाकेँ भॉंपि ओहिमे सँ एक सज्जन बजलाह- "मायजी, पेंशनबला फारमपर साइन करक लेल आयल छी?" मायजी बजलीह- "हँ बेटा।" फेर दोसर सज्जन बजलाह- "माईजी घरसँ बटखर्चामे की सभ बना कऽ लौने छी। बहुत नसीवबलाकेँ मायक हाथक भोजन भेटैत अछि।" ई बात सुनैत माय बजलीह- "बौआ, जखन हमरा अहाँ माय कहलहुँ तखन हमरा हाथक बनौल पूरी, सब्जी, पेरा जरूर खा लीअ।" मायजी ओहो दुनू आदमीकेँ पूरी, सब्जी, पेड़ा पेपरपर परोसि आगाँ बढ़ा देलक। दुनू सज्जन नलपर सँ हाथ धोइ, खाय लागल। खयलाक बाद भोजनक प्रसंशा करैत बाजल- "मायजी, मजा आबि गेल। एतेक स्वादिष्ट भोजन जीवनमे पहिल बेर खयलहुँ।" सज्जन बजलाह- "मायजी, अहाँक बेटा बड़ भाग्यशाली अछि जे अहाँ सन माय ओकरा भेटलैक। आई हमरो अपन मायक स्मरण आबि गेल।" आ ओहि सज्जनक ऑंखिसँ नोर टपकय लागल। दूनू सज्जनक बात सुनि गिरधारी बाबूक बेटा जे हर हमेशा अपन मायपर तमसाइले रहैत छल। मनहि मन सोचय लागल जे ई दुनू सज्जन जे अनजान छथि, ओ हमरा मायकेँ एतेक सम्मान देलक आ हम समीपमे रहितहुँ मायक ममताकेँ नहि बुझि सकलहुँ। बेटाक मन ग्लानिसँ भरि गेल। ओ मनहि-मन पश्चाताप करय लगलाह। ओहि सज्जनमे सँ एक सज्जन बजलाह- "मॉंजी कनेक काल ठहरू। हम तुरंत ऑफिससँ आबि रहल छी। अहाँक काज करा देब। कोनो कष्ट नहि होमय देब।" ओ सज्जन कनेकालक बाद एकटा फारम हाथमे नेने माय लग अयलाह आ बजलाह- "माय अहाँ लग जे कागज अछि ओ लाऊ।" ओहि फारमकेँ पेंशनबला कागजसँ सभ मिलान कऽ सभ फारममे देल व्यौराकेँ भरलक। कागज हाथमे लय मायकेँ संग कय ऑफिस पहुँचल। मायसँ ऑफिसरक सामनेमे हस्ताक्षर करा कागज (फार्म) जमा कय देलथिन्ह। दस मिनटमे सभ काज करा माय सहित ओ सज्जन बाहर अयलाह। बेटाक लेल ई काम बड़ कठिन बुझना जाइत छल। माय आ बेटा बड़ खुश छल। माय ओहि दुनू सज्जनकेँ हृदयसँ आशीर्वाद देलैन्ह। बेटा सोचय लागल जे मायक नूनमे एतेक शक्ति छैक जे चुटकीमे हमर काज भऽ गेल। माय ओहि दुनू सज्जनकेँ आशीर्वाद दैत बजलीह- "बेटा, अहाँ लोकनिक उपकारकेँ हम जीवन भरि नहि भूइल सकै छी।" एहिपर दुनू सज्जन बाजल- "माय, हम अहाँक नमक जे खयलहुँ। हम सभ अहाँक बेटा समान छी।" ई बात सुनैत बेटाकेँ शर्मसँ माथ झूकि गेलैक। बेटाकेँ ई एहसास भेलैक जे माय ओकरा जन्म देलक, पोसलक, पाललक आ हाथ पकड़ि चलेनाइ सिखौलक। अपन दूध पिआ हमरा एतेकटा बनौलक। आ हम ओहि मायकेँ तिरस्कार करैत छलहुँ। हमरासँ बढ़ि एहि संसारमे कियो पापी नहि अछि। ओ दुनू सज्जन मायसँ विदा लैत अपन काजपर चलि गेल। ओ दुनू सज्जन गिरधारी बाबूक नामपर मायक सभ काम करा देलक। कियैक तँ ओ दुनू सज्जन गिरधारी बाबूक शिष्य छल। ओ सज्जन लोकनि गिरधारी बाबूक पत्नीकेँ चिन्हैत छल। मुदा अपन परिचय नहि देलक। आब गिरधारी बाबूक बेटा जे मायकेँ हमेशा तिरस्कृत करैत छल तेकर हृदय परिवर्तन भय गेलैन्ह। आ मनहि-मन शपथ खयलैन्ह जे मायकेँ जीवन भरि सेवा करब। मायक पैरपर खसि पड़लाह आ हबो ढकार भय कानय लगलाह। बजलाह- "माय, हमरासँ बड़ पैघ गलती भेल। हमरा जे दण्ड देबाक छौ से दय दे।" माय बेटाकेँ हाथ पकड़ि उठौलक आ कलेजासँ लगा लेलक। बेटाक हृदय परिवर्तन भय गेल। -नारायण यादव, पत्नीक नाम : श्रीमती सुमित्रा देवी। जन्म : 14 जनवरी 1956, पिताक नाम : स्व. राजेश्वर यादव। माताक नाम : स्व. महेश्वरी देवी। दादाक नाम : स्व. भोला यादव। नानाक नाम : महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. राम लखन सल्हैता। जन्म स्थान : डुमरा, मूल गाम : डुमरा, पो.- डुमरा, भाया : रूद्रपुर, प्रखण्ड : अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी (बिहार) मातृक : नरही, थाना : खुटौना, पेशा : अध्यापन, अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक, मात्र पेंशनपर आधारित जिनगी। शिक्षा : एम.ए. (मैथिली), लेखन : कथा, कविता आ आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। मोबाइल नं: 9939041116, 9430631993, 8541096004 सद्य: प्रकाशित कृति : खाली घर (कथा संग्रह), प्रकाशित/अप्रकाशित अन्य कृति : (1.) नाती दुसलक नानाकेँ (कविता संग्रह), (2.) बाबा नाम केवलम (कथा संग्रह) , (3.) समझौता (कथा संग्रह), (4.) नवकी पुतोहु (कथा संग्रह) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.नारायण यादवक ५ टा कथा- कथा ५ जइपर सम्पादकीय समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर समीक्षा सीरीज ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि नारायण यादवक ५ टा कथा जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक नारायण यादवक ५ टा कथा कथा ५ गामक एकता माला एक सप्ताह पहिने अपन सासुर आलापुरसँ नैहर मझारी आयल छलीह। कियैक तँ ओकरा बच्चा होनिहारी छैक। सातम मास बित आठम चढ़ल छैक। बेटीक लेल माइये सभसँ अधिक आत्मीय होइत अछि। प्रसब बेदना माईक मुँहे देखलासँ कम भय जाइत अछि। प्राय: देखल गेल अछि जे संतानोत्पतिक समयमे नैहरे नीक होइत छैक। रामधनी काका हकासल पियासल, दौगल दौगल घर अयलाह आ हँफसियैत अपन पत्नीसँ कहलैन्ह- "आई अखन मालाकेँ सासुर आलापुर भेज दियौक। कियैक तँ बड़ जोर बाढ़ि आबि रहल छैक। अपना सभक घर कोसीक कछेर पर अछि। गामक चारू कात रिंग बान्ध अछि। ओ रिंग बान्ध पर पानि लापलप कय रहल अछि। कखनो रिंग बान्धकेँ तोइर अपना गामकेँ दहा देत। तेँ मालाकेँ सासुर भेज दियौक। कमसँ कम ओतय तँ ओकर जान बॉंचि जेतैक। नदीक पानि बढ़ि रहल अछि। जेमहर ताकू ओमहर पानिये-पानि देखा रहल अछि।" एहि इलाकामे सभ साल बाढ़ि अबैत अछि। बाढ़ि की औतैक, आफद् विपत आ मुसिवत आबि जाइत अछि। कोशीकन्हा लोकक जीवन बरसात भरि बड़ कष्टप्रद भय जाइत अछि। जान माल सदिखन खतरेमे रहैत अछि। कोशीकन्हामे खेतीये सभक जीवनक सहारा अछि। सालमे तीनटा फसल नीक जकॉं उपजैत अछि। गेहुँ, मकई, धान आ एकर अतिरिक्त सरसों, तोड़ी, राई, धनियॉं, प्याज, लहसून, तीसी आओर अजमाइनक खेतीसँ ओतुका लोक सभ समृद्ध रहैत छथि। नकदी फसलक महत्व किछु आओर छैक। केवल बरसातमे किछु कष्ट सहय पड़ैत छन्हि। खेतीक प्रधानता एतय मुख्य अछि। कहबी छैक उत्तम खेती, मध्यम वाण, निषिद चाकरी भीख निदान। ई बाढ़ि खेतीकेँ चौपट कय देलक अछि। माला एक सप्ताह पहिनहि अपन सासुरसँ एतय आयल छलीह। ओकरा बच्चा होनिहारी छैक। सातम बित आठम चढ़ल छैक। बेटीक लेल माय सभसँ प्रिय आ आत्मीय लोक होइत अछि। प्रसव वेदना माइक मुँह देखलासँ कम भय जाइत अछि। प्राय: देखल जाइत अछि जे बेटीक संतानोत्पतिक समय नैहरे नीक होइत छैक। माई जतेक यतनसँ देख भाल बेटीकेँ करैत अछि ओतेक सासु नहि। माय आ सासुमे बड़ अन्तर छैक। मायक ममता जतेक बेटी पर रहैत छैक ओतेक ममता सासुकेँ नहि रहैत छैक। कतौ-कतौ ओहो देखल गेलैक अछि जे सासु अपनो मायसँ पुतोहुकेँ प्रसवक समय बेसी देख-रेख करैत अछि। एहेन कमे सासु अछि। अधिकत्तर सासुकेँ पुतोहुक प्रति भावना खराव रहैत अछि। तेँ मालाकेँ ओकर माय अपना ओहिठाम बजा लेलकन्हि। संगमे दू सालक एकटा बेटा सेहो छल। मालाक मायकेँ पता नहि छल जे एहेन भीषण बाढ़ि औतैक। नहि तँ बेटीकेँ नहि अनितथि। गर्भवती रहलाक कारणे मालाकेँ लौने छल। जे नैहरमे रहत। एतय अस्पतालमे भर्ती करा देबैक। मुदा हाय रे देबक चक्र जे बाढ़िमे घरसँ निकलब कठीन भय गेल। माय गुमसुम बैसि सोचि रहल छलीह, जे आब की करक चाही? मालाकेँ सासुर भेज दियैक की नहि। एहि तारतम्यमे पड़ल छलीह। सासुर भेजनाइक अर्थ भेल अपन मानहानि। बेटीकेँ सभ दिन सासु दियादनीक उपराग सुनय पड़तैन। सासु दियादनी ई कहितथि जे देखलियौ तोरा माय-बापकेँ जे बिना विदागरी करौनहि सासुर भेज देलकौ। किछुओ दिन नहि राखि सकलहुँ। माय ई सोचि दृढ़ निश्चय कयलक जे अपने मरब तँ मरब मुदा बेटीकेँ सासुर नहि भेजब। ईहो सोचय लगलीह जे हरेक साल बाढ़ि अबैत अछि। सरकार आ प्रशासन बाढ़िक नाम पर लूट-खसोट करैत अछि। बाढ़ि नहि आओत ओकर स्थायी समाधान नहि करैत छथि। बाढ़िक जँ स्थायी समाधान भय जायत तँ आइ ई दिन देखबामे नहि अबैत। मालाक बाबूजी फेर ओकरा मायकेँ टोकलक- "जँ बाढ़ि चलियो जायत तँ पानिकेँ घटैमे एक दू मास लागि जायत। तँ मालाकेँ आइये सासुर भेज दियौक। दू-चारि दिनक झंझट नहि अछि। ई कैक दिनक संकट अछि।" मुदा मालाक मायक मन नहि मानैत छल जे हम मालाकेँ सासुर भेज दी। ओ सोचैत छलीह जे अपने भुखले रहब तँ रहब मुदा बेटीकेँ कोनो कष्ट नहि होमय देबैक। बिना विदागरी करौनहि कोना सासुर जाय देबैक। जीबन भरि हमरा बेटीकेँ लोक उलहन उपराग देत। मालाक माय अड़ल रहलीह। ओ मालाकेँ किन्नहुँ नहि सासुर भेजबाक पक्षमे छलीह। मालाक माय आ बाबूजीमे बतंगर होमय लागल। मालाक माय अड़ल रहलीह। इज्जत प्रतिष्ठाक सवाल अछि। हम कोना बेटीकेँ सासुर भेजब। दुनू प्राणीमे जोर-जोरसँ बात होमय लगलैक। आस-पासक परोसिया लोकनि जमा भय गेल। सभ दुनूक बात बुझलक। समाजक लोको सभ मालाक मायक पक्षमे बोट देलक। किछु कालक बाद पूरा गामक स्त्री-पुरुष जमा भऽ गेल। सभक विचार भेल जे सभ कियो मिलि रिंग बान्धपर सँ जे पानि गाममे आबक लेल झिरझिराइत छल तकरा रोकबाक उपाय करक चाही। सभ कियो मिलि खलिया सिमेंटक बोरामे मॉंटि भरि बान्ध पर जमा करय लागल। पानि जे बान्ध पर होइत गाममे अबैत छल से बन्द भय गेल। भरि राति पूरा गौंऑं जागल रहि गेल। बोरा-पर-बोरा देमय लागल रिंग बान्धकेँ ततेक ने मजगूत कयलक जे ने बान्ध टुटल आ ने एको रत्ती पानि गामयमे आयल। गौंऑं-घरूआ आ समाजक कठिन मेहनतसँ गाममे पानि नहि आयल। दू-चारि दिनक बाद बाढ़िक पानि कम होमय लागल। गौंऑं सभ कहय लागल- "माला हमरा गामक बेटी अछि। हमरा सभक बेटी अछि। ओकरा बिना सासुरबलाक बिदागरी करौने कोना सासुर जाय देबैक। गामक नर-हँसाय नहि होमय देबैक। एकरा रक्षाक हेतु जतेक राति जागय पड़त ओतैक राति जागब। मुदा अपना इज्जतकेँ बुरऽ नहि देब। माला हमरा गामक इज्जत अछि। हमर मर्यादा थिकीह।" पूरा गॉंवबला दू तीन दिन तक कठिन परिश्रम कय पानिकेँ गाममे नहि आबय देलक। रसे-रसे पानि कम भय गेल आ बान्ध सेहो मजगूत भऽ गेल। गौंऑं सभक विचार भेलैन्ह जे प्रसव काल धरि माला एतय रहतीह। किछु दिनक बाद बाढ़िक पानि कम भय गेल। मालाकेँ बच्चा जन्म लेबाक समय लगिचा गेल। माला बड़ कमजोर छलीह। मालाक पिताक हालत दयनीय छल। ओकरा ओतेक उपाय नहि छलैक जाहिसँ मालाकेँ अस्पतालमे भर्ती कराओल जाय। जहिना गाममे बाढ़ि नहि आबय तकरा रोकक लेल ग्रामीण एकता प्रबल छल तहिना पूरा गॉंव एक भय किछु आर्थिक मदद कय मालाकेँ अस्पताल पहुँचौलक। मालाकेँ पानि चढ़य लगलैक। मालाक स्वास्थ्यमे सुधार भेलैक आ ओ स्वभाविक रूपे बच्चाकेँ जन्म देलक। पूरा मझारी गामक लोक खुश छल। अस्पतालक डॉक्टरकेँ सभ बातक जानकारी भेलैक। डॉक्टर साहेब सेहो भरपूर मदद कयलन्हि। दबाईक ब्यवस्था अस्पालेसँ भय गेलैक। डॉक्टर साहेब बजलाह जे ग्रामीण एकतामे ओ शक्ति छैक जे कठिनसँ कठिन कामकेँ आसान बना दैत अछि। ग्रामीण जीवनमे समाजिकताक यैह मतलब रहैत छैक जे अपने दु:ख काटि दोसरकेँ सुख प्रदान करी। -नारायण यादव, पत्नीक नाम : श्रीमती सुमित्रा देवी। जन्म : 14 जनवरी 1956, पिताक नाम : स्व. राजेश्वर यादव। माताक नाम : स्व. महेश्वरी देवी। दादाक नाम : स्व. भोला यादव। नानाक नाम : महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. राम लखन सल्हैता। जन्म स्थान : डुमरा, मूल गाम : डुमरा, पो.- डुमरा, भाया : रूद्रपुर, प्रखण्ड : अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी (बिहार) मातृक : नरही, थाना : खुटौना, पेशा : अध्यापन, अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक, मात्र पेंशनपर आधारित जिनगी। शिक्षा : एम.ए. (मैथिली), लेखन : कथा, कविता आ आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। मोबाइल नं: 9939041116, 9430631993, 8541096004 सद्य: प्रकाशित कृति : खाली घर (कथा संग्रह), प्रकाशित/अप्रकाशित अन्य कृति : (1.) नाती दुसलक नानाकेँ (कविता संग्रह), (2.) बाबा नाम केवलम (कथा संग्रह) , (3.) समझौता (कथा संग्रह), (4.) नवकी पुतोहु (कथा संग्रह) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र- गहन ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'- पच्चीस टा रुबाइ ३.३.आशीष अनचिन्हार-२ टा गजल ३.४.आचार्य रामानंद मंडल- २ टा पद्य ३.१.राज किशोर मिश्र- गहन राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी गहन
झाँ पल नहि छथि धो न्हि सँ, आ' ने बा दल, हुनका सँ नरा ज, मा र्तण्ड केँ ग्रसि त केलक अछि , रा हु -केतु के अछि ई का ज।
संपूर्ण गहन ,पसरल अन्हा र , लगैछ ,नि शा के कृष्णपख। दि वस बनि गेल रा ति अछि , घुघुआए रहल अछि शतमख,
इजो तक महा ज्यो ति ष्पिं ड, ज्यो ति र्मय करथि त्रि लो क, हुनका अछैते प्रका श को ना कऽ, मना रहल अछि शो क?
छुटता ह नहि जँ तम -पा श सँ, भऽ जा एत जग मे प्रलय, जी ति जा एत ति मि र ,आओर भऽ जा एत ओकरे जय।
दि वा कर असो थकि त भेल, भऽ गेल छथि ओ असहा य, अन्हा रक कबजा मे वसुधा , अछि तम के ई केहेन अन्या य?
मुदा , जी ति को ना जा एत अन्हा र? प्रका श तऽ ,हो इत अछि अजेय, कि छुए का ल के बा द मे, जो ति पअओलक जी तक' श्रेय।
मुक्त भेला ह तमि स्त्रा सँ, पुनि उगला नभ मे दि वा कर, हेबा क जएह, सएह भेलैक , तम, फेर इजो तक चा कर।
ओहि ना , कहि ओ ,पूर्णि मे रा ति , भऽ जा इ छथि गहन-ग्रसि त रा केश, इजो रि आ सा ती घो र तमि स्त्रा , चा ननि नहि कनि को रहि जा इछ शेष।
गहन तऽ परि णा म अछि , दुर्घटना ,खगो लक दो आरि , एम्हर ,उठैछ समुद्र मे , नमहर -नमहर जो आरि ।
खग्रा स मे तऽ इजो त स्वयं , भऽ जा इत अछि ओ अना थ, दुष्प्रभा व बा न्हल -छेकल नहि , पड़ैत अछि पृथ्वी क मा थ।
वि ज्ञा नक खो ज उपरा न्त मे, चलल ,पता गहन के हेतु, ग्रहणक दो खी कि ओ ने अछि , नहि रा हु ,आ' नहि केतु।
वि शेष परि स्थि ति खगो ल के, सूर्य ओ पृथ्वी क बी च जँ चा न, ॲंटकैछ रवि -इजो त, रस्ते मे, सूर्य गहनक इएह अछि प्रमा ण।
जँ, वि वस्वा न् आ चन्द्र बी च मे, पृथ्वी आबि गेली ह, एहि का रण सँ चन्द्रगहन, वि धुरश्मि ने भू पअओली ह।
ठा ढ़ रहैत नहि अछि परि स्थि ति , बदलैत,चलैत रहैत अछि , मनुखक जि नगी क सहयो गि नी , आ, कखनो छलैत रहैत अछि ।
देवो नहि छथि छुटल गहन सँ, बदलैत रहैछ , एहि ना क' समय, गहन -उगरा स हो इते रहैछ, परा जय कखनो ,आ कखनो जय।
ता कक' चा ही बा ट उगरा सक, छो ड़ी ने कखनो हा थ आसक।
टुटतै सि न्धु मे जो आरि क बल, आपस जेतै ,प्रलय के जऽल।
देखबै , नि कलतै , इजो त अन्हा र सँ, उठतै संगी त, वी णा क टुटल ता र सँ।
मरुभूमि मे फुटतै पा नि क धा र, चलैत छैक उमेदे पर संसा र।
कमजो र पड़तै भमरक आवर्त्त, बंधन सँ मुक्ति के, छै को नो शर्त।
बि ड़रो -बि हा रि क टुटतै टा ङ, ओकरे सँ को नो , फुटतै समा ङ।
एलै गहन उगरा स भेलै, चलि गेलै, तहन।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'- पच्चीस टा रुबाइ जगदानन्द झा 'मनु' पच्चीस टा रुबाइ रुबाइ 1 आँचर नहि उठाबू आँखिसँ पीबय दिअ हम जन्मसँ पियासल करेज जुड़बय दिअ के कहैत अछि निसाँ शराबमे बड़ अछि कनी अपन प्रेमक निसाँमे जीबय दिअ रुबाइ 2 हम पीलौं तँ लोक कहलक शराबी अछि कहू एतअ के नहि बहसल कबाबी अछि बुझलौं अहाँ सभ दुनियाक ठेकेदार हमरो आँखिसँ देखू की खराबी अछि रुबाइ 3 पीब नै शराब तँ हम जीब कोना कय फाटल करेजकेँ हम सीब कोना कय सगरो जमाना भेल दुश्मन शराबक सबहक सोंझा तँ आब पीब कोना कय रुबाइ 4 पीलौं शराब तँ दुनियाँ कहलक बताह बिन पीने ई दुनियाँ भेल अछि कटाह जे नहि पीलक कहाँ अछि ओकरो महल तँ पिबिए क' किएक नहि बनि जाइ घताह रुबाइ 5 भेटल नहि सिनेह तेँ शराबे पीलौं दर्शन हुनक हरदम गिलासमे केलौं के कहैत अछि शराब छैक खराब 'मनु' बिन हुनक रहितौं शराबे सँ हम जीलौं रुबाइ 6 ढोलक धम-धमा-धम बजैत किएक छै घुँघरू खन-खना-खन खनकैत किएक छै दुनू भीतरसँ छैक एक्केसन खाली दुनू अपन गप्प नहि बुझैत किएक छै रुबाइ 7 पीलौं नहि तँ की छै शराब बूझब की बिन पीने दुनियाँमे करब तँ करब की एक दोसरकेँ सभ अछि खून पीबैत खून छोड़ि शराबे पी कय देखब की रुबाइ 8 गोरी तोहर काजर जान मारैए छौंरा सभ सगर हाय तान मारैए पेएलक बड़ भाग काजर विधातासँ तोहर आँखिमे कते शान मारैए रुबाइ 9 काजर बुझि कय अपन आँखिमे बसा लिअ मित बना कय कनीक करेजसँ लगा लिअ ऐना जुनि अहाँ कनखी नजरि घुमाऊ आँखिक अपन करीया काजर बना लिअ रुबाइ 10 फूसियो जँ कनी अहाँ इशारा करितहुँ भरि जीवन हम अहीँक बाटमे रहितहुँ मुस्कीमे अहाँक अपन मोन लूटा क' तरहत्थीपर जान लेने हम अबितहुँ रुबाइ 11 अनकर घर जड़ा हाथ सेकै सभ कियो दोसरक करेजा तोरि हँसै सभ कियो अपना पर जे बिपति एलै कएखनो माथा पकडि हिचुकि-हिचुकि कनै सभ कियो रुबाइ 12 कोन बिधि मरि कय हम रुपैया कमेलौं सुख चैन निन्न रातिकेँ अपन हरेलौं गाम घरक सबटा सऽर संबंध तियागि बिन कसूरे बाहर वनवास बितेलौं रुबाइ 13 घाट-घाट पर सुतल कतेको गोहि अछि साउध लोककेँ मोन लेने मोहि अछि धर्मक नाम पर खुजल कतेक दोकान टाका लs छनमे सभटा पाप धोहि अछि रुबाइ 14 बाबूजीक करेजमे सदिखन रहलहुँ हुनक तन मन धन सगरो हम पेएलहुँ रौद पानि दाहीसँ सदिखन बचेलन्हि सेबाक बेड़मे हम परदेश भगलहुँ रुबाइ 15 देह जान सबटा बाबूजी देलन्हि जे किछु छी एखन बाबूजी केलन्हि अपने रहि भूखे हमर पेट भरलन्हि सुधि अपन बिसरि हमरा मनुख बनेलन्हि रुबाइ 16 जे जन्म देलन्हि ओ कहलन्हि गदहा जे पोसलन्हि ओ मानलन्हि गदहा गदहा जँका सगरो जिन्दगी बितेलहुँ जिनका बियाहलहुँ ओ बुझलन्हि गदहा रुबाइ 17 मैथिली साहित्यक आँच सुलगैत अछि सगरो नव विधाक ज्वला पजरैत अछि कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि विदेहक बारल आगि 'मनु' लहकैत अछि रुबाइ 18 सिस्टम आइकेँ किए बबाल बनल अछि नेता सभ तँ एकटा जपाल बनल अछि बड़ बड़ बागर बिल्ला राज चलबैए जनताक प्राणेपर सबाल बनल अछि रुबाइ 19 गामक अधिकारी भेला सैंया हमर कोना क पकड़तै कियोक बैंया हमर सभक पेटीक माल आब हमरे छैक सैंया लऽ लेथिन सभटा बलैंया हमर रुबाइ 20 साँवरिया पिया अहाँ ई की कएलहुँ साउन चढ़ल छोड़ि चलि कोना गएलहुँ बहल हवा शीतल सिहरैए हमर तन कोना रहब बिनु अहाँ बुझि नै पएलहुँ रुबाइ 21 गोरी तोर मुस्कीमे छौ जहर भरल नै एना मुँह खोल कते घायल परल जँ निकैल गएलौ फूलझड़ी सन हँसी बाटपर भेटत कतेको छौंड़ा मरल रुबाइ 22 नैन्हेटा हाथमे केहन लकीड़ छै नै माय बाप ई केहन तकदीर छै धो धो कऽ ऐँठ कप लकीड़ो खीएलै नै सुनलक कियो ई दुनियाँ बहीर छै रुबाइ 23 कर्जा कय क जीवन हम जीव रहल छी फाटल अपनकेँ कहुना सीब रहल छी सभ किछु लूटा कय 'मनु' अपन जीवनकेँ निर्लज जकाँ हम ताड़ी पीब रहल छी रुबाइ 24 अभिमन्यु जकाँ चक्रव्यूहमे फसलौं नै बचब सिख हम अर्जुन बनि पेएलौं 'मनु' जीवनकेँ एही महाभारतमे सगरो ठार हम कौरव केर देखलौं रुबाइ 25 हम जरैत छी की अहाँ प्रकाशित रही अहाँक सुख लेल खुशीसँ हम आँच सही बातीकेँ जरैत ई दुनिया देखलक तेल बनि हम तँ जरलौं दुख कतेक कही -जगदानन्द झा 'मनु', गाम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी। मोबाइल- 92124 61006 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.आशीष अनचिन्हार-२ टा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल १
रघुपति राघव राजाराम कोना चुकतै श्वासक दाम
सुंदर सुंदर चकमक नग्र उपटल बिलटल सभहँक गाम
गरदनि खातिर एकै रंग सोना चाँदी लोहा ताम
पुछने रहियै एकै प्रश्न उत्तर देलक इमली आम
उज्जर शोणित पीयर नोर हरियर थाकनि कारी घाम
सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। "रघुपति राघव राजाराम" लक्ष्मणाचार्य रचित "श्री नम: रामायणम्" केर अंश अछि।
२ हुनकर आँखिक अतबे सपना हिंदू मुस्लिम चमरा बभना
साहित्य आ कि राजनीतिमे अबिते रहलै अदना पदना
अधरतियामे हमहूँ देखल एकै भेलै अरघा बदना
नोर नोर नोर नोरे नोर अतबे लिखने रहथिन विधना
दुख भेटल रहै मुँहदेखाइ दुक्खे रहै हमर मुँहबजना
सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.आचार्य रामानंद मंडल- २ टा पद्य आचार्य रामानंद मंडल २ टा पद्य १. महाकवि कालिदास मिथिला मे महाकवि पंडित कालिदास भेलन महान। उच्चैठ दूर्गा स्थान मधुबनी भेलैन हुनक ठाम। संस्कृत पाठशाला के रहलन मूर्ख अनुचर छात्रावास । काटि रहलन रहे बैठल गाछ के डाल। देखिलन धूर्त पंडित विधोतमा से हारल पंडित। छल से पानिग्रहन करैलन कालिदास के संग। सुहागरात मे भेल परिचय मूर्ख कालिदास संग। हमर संग मिलत जौं बनब विद्वत जन। घुरि अयला पाठशाला करे लगला फेर अनुचारा। आयल भादव सांझ चमकैत गरजैत बरसैत मेघ। आयल बाढि नद डूबल चांचर खेत खरिहान। के बारैत दीप मैया के दूर्गा स्थान। सभ कैलन विचार बारैत मूरख कालिदास दीप। छोड़त चिह्र दीप पोतलैन दूर्गा मुख कारीख। खुश दूर्गा देलन वरदान जेते पुस्तक छूवे आइ रात। सभ जयतो कंठाग्र छूएत सरस्वती बसगेल कंठाग्र। कालिदास कवि महान रचलन अभिज्ञान शाकुन्तलम मालविकाग्निमित्र। आ रचलन मेघदूतम रचलन ऋतुसंहार कुमारसंभव रघुवंशम्। पैलन विद्योतमा पियार प्रसिद्ध भे गेलन संसार। मिथिला मे कवि महान रामा महाकवि कालिदास महान। २. कवि आदि विद्यापति नाई कवि आदि विद्यापति नाई। रहलन मधुबनी विस्पी ठाई।१। दसम शताब्दी काल आईं। मिथिला नाउं विद्यापति पाईं।२। पिता महेशठाकुर घर आईं। कुल भूषण नाई कहलाई।३। नित नव कविता बनाईं। नित विदापत नाच कराईं।४। समाज में नवजागरन कराईं। जोतिश्वर वर्नरत्नाकर चर्चा करईं।५। मिथिला मे विद्यापतिगीत गाईं। भेद न जान विद्यापति पाईं।६। मैथिल चर्चा न करईं। बाभन विद्यापति के समझईं।७। मिथिला मैथिली जागरन होंहईं। घर घर विद्यापति गाईं।८। मिथिला धन धन होंहईं। रामा आदिविद्यापति चर्चा करईं ।९। -आचार्य रामानंद मंडल, सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अनुलग्नक १: मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा (प्रसंग- चोर लेखक पंकज झा पराशरक नूतन साहित्य चोरिक खुलासापर पाठकीय टिप्पणी) विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). http://videha.co.in/ अंक ३६२-३६३ क रिपोर्ट पर टिप्पणी …………………………….. उपन्यासकार के छथि, पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) दुखद RabindraChaudhary …………………………………….. बड दुर्भाग्यपूर्ण, आपत्तिजनक आ आपराधिक कृत्य.. KumarManojKashyap ……………………………………….. ईसभ पढ़ि बहुत चिंतित छी। R N Mishra ……………………………….. दुर्भाग्यपूर्ण Kalpna JhaPatna …………………………………………………… आहिरेबा..! फेर ई के छैथ? पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) हे भगवान..! ई ठीके चोरे छैथ। Umesh Mandal …………………………………………………….. Gaurinath: नीक। एहन चोर केर देखार करब जरूरी पंकज पराशर (जल प्रांतर उपन्यास) ओकर त लेखकीय जीवने चोरी पर टिकल छै आ तकरा प्रश्रय देब'वाला सेहो मैथिली मे कम नहि। ……………………………………. एहने चोर लोक सभ मैथिली आर मिथिला के अहित करय मे सदैव आगू रहैत छथि JhaPrasanna ………………………………….. एकरा कोर्ट मे लऽ जेबाक चाही य़ोगेन्द्र पाठक वियोगी +91 98310 37532 …………………………………………………………………. SubhashChandraYadav: I condemn it. The thief must be exposed. …………………………………… अति दुखद, निन्दनीय ManojPathak ………………………………………. सादर आभार। कोट कर सकैत हतन। परंतु श्रोत के चर्चा करनाई आवश्यक हय।न त साहित्यिक चोरी मानल जायत। RamanandMandal ……………………………………… धन्यवाद। VidehaKeshavBhardwajDelhi ……………………………………………… Nabo Narayan Mishra दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति …………………………………………….. Mukund Mayank Oh ……………………………………………… प्रदीप पुष्प बहुत खराप बात। ……………………………………………. Abhilash Thakur · घृणित कार्य! लज्जा जोग ……………………………………….. Ajit Kumar Jha पता नहि लाजो नहि लगैत छन्हि एहन प्रवृति वाला महानुभाव सब केँ। एहन लोग सब केँ लेल सेहो अलग सँ पुरस्कारक घोषणा होयबाक चाही। पर्दाफाश करबाक लेल अपने केँ साधु वाद । ………………………………………………….. Ramesh Kumar Sharma पुरस्कार पाबै के जल्दबाजी हेतै ………………………………………………… Kunal उपन्यास आ तकर लेखकक नाम घोषित करु ……………………………………………….. Ashish Anchinhar Kunal जी, जँ कोनो समान्य पाठक ई प्रश्न पुछने रहितथि तखन हमरा नीक लागैत। प्रबुद्ध पाठक ओ लेखक वर्गसँ ई प्रश्न एबाक मतलब छै जे स्थिति गंभीर भऽ गेल छै। ओना जखन पुछिये देलहुँ अछि तखन एकर उत्तर अछि- पोथी, जलप्रांतर, पंकज पराशर। एहि पोथीक गदगदी आलोचक, कमलानंद झा। ……………………………………………………… Kunal Ashish Anchinhar धन्यवाद । एना सार्वभौम जकां छइ जे बेस गंभीर आरोप लगाओल जाइ छइ मुदा नाम नइ लेल जाइ छइ।एना हमरा हाइपोक्रेसी क चरम लगइए। ई अनसोहांत छी ।......... आब नाम ल गेल छइ। त हमरा लगइए जे पंकज परासर (उपन्यासकार) आ कमलानंद झा ( आलोचक ) के बाजक चाही । ……………………………………………………………. Lakshman Jha Sagar एहेन चोरक सामाजिक बहिष्कार हेबाक चाही।आगि पानि ढ़ाइठ देबाक चाही।मुँह मे कारी चुन लेपि के गदहा पर सरेआम घुरेबाक चाही।एहेन कुदशा कय देबाक चाही जे फेर क्यो एहेन घृणित काज नै करय। ………………………………………………………… Chitragupta Chitragupta अत्यन्त दुखद …………………………………………………. जगदानन्द झा 'मनु' · मिथिला मैथिलीमे साहित्यक चोरी जगजाहिर अछि। मुदा आब साहित्य अकादमी आ ओकर लेकक द्वारा…. बहुत निंदनीय काज, एहेन एहेन लोककेँ अवश्य देखार करबा चाही ………………………………………………………….. श्रीधरम ई पंकज परासर, हम त' पढ़बाक आवश्यकता नहि बुझलहुं। प्रतिभाक नाम पर मात्र जुगाड़ छनि हिनका लग। …………………………………………………………….. आशीष अनचिन्हार नित नवल दिनेश कुमार मिश्र पढ़लहुँ आ एहि संदर्भमे हम अतबे कहब जे तारानंद वियोगी वा कमलानंद झा सन प्रबुद्ध लोक आगुओ पंकज पराशर एवं ओहने साहित्यिक चोरक संरक्षणमे अबिते रहताह। कारण ई जे ई प्रबुद्ध लोक सभ सेहो ओही मानसिकता केर छथि। ………………………………………………….. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अनुलग्नक २: मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा (प्रसंग- चोर लेखक पंकज झा पराशरक पुरान साहित्यिक चोरिक खुलासापर पाठकीय टिप्पणी आ किछु प्रमाण) विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). http://videha.co.in/ अंक २६-५० क रिपोर्ट पर टिप्पणी (प्रसंग- चोर लेखक पंकज झा पराशरक पहिलुका साहित्य चोरि) ……………………… kellner@ucla.edu" Dear Gajendra, thanks for the detective work. was there a response? best regards, Douglas Kellner, Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education, University of California-Los Angeles, Box 951521, 3022B Moore Hall, Los Angeles, CA 90095-1521, Fax 310 206 6293, Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html ………………………… dear Gajendraji, apnek mail milal. Pankajjik kritya janike bar dukh bhel. Ahi se maithilik nam kharab hoyat achhi. Apnek kadam ekdum uchit achhi.- Rajiv K Verma …………………………. These People are hellbent to bring down the literary discourse down to the gutter. Now you have been receiving mails like one. We are with you and i have forwarded your mails to Maithili speaking people all across the country. Sir I have sent the link of Parashar's duplicacy to several people along with Pranabh Bihari who had traslated that article. I had telephonic conversation with him also and he was quite upset over Parashar’s duplicay. Pranav is my junior and a good friend of mine. since you have referred Pranav who had traslated that article it is unfortunate that he was misused by Parashar. But i must congratulate you for exposing scam run by Parashar and his team. Parashar, though must not be blamed if he lifted the article of Nom Chomskey . Now i must doubt the artistic sensibility of Parashar who is now a pseudo-- intellectuals. I am amazed that how did he dare to publish the article of Nom Chomskey as his own. God bless him no more. - VIJAY DEO JHA ……………………………………… dhanyvad. muda ehne lok sabjagah aadar pabait achi. -shridharam ………………………………………………… अहां कें सूचनार्थ पठेने छी (किछु घृणित काज पंकज पराशरक) जे पंकज पहिनेहो इ सब काज करैत रहय छलैए।- aavinash ……………………………………………………… Dear Gajendra g, You are doing very well in the field of collecting all the documents related to the Maithili. Videha. Com realy a adventureous collection. I will also find some time to learm the article published through the videha. Now your detective style theft the sleeping of many of the so called literary personnel. Go a head. jai Maithili jai Mithila- Sunil Mallick, President, MINAP, Janakpur ………………………………………………….. your efforts are commendable. Anysuch ghost writer or fake identity holder must be boycotted from literature at once Thanks.- shyamanand choudhary ………………………………………………….. Namaskar. Chetna samitik sachiv ken mailak copy hastgat kara del achi.- Dr. Ramanand Jha' Raman' …………………………………………………. प्रिय गजेन्द्र जी , चेतना समिति हिनका सम्मानित कएलक अछि सेहो हमरा ज्ञात नहिं | यद्यपि हमहू चेतना क स्थाई सदस्य | जे हो. मुदा निंदास्पद घटना तं ई थिके तें दुखी कयलक | कतिपय नव मैथिल-प्रतिभाक आकलन-मूल्यानकनक हमर अपन स्नेग्रही स्वभाव, एहि दुर्घटनाक बाद तं आब चिंता मे ध' देलकय| देखी, हम अपने विस्मित भेलहुँ| बहुत दु:खद दृश्य | सृजन विरूद्ध साहित्यिक सन्दर्भ मे ई घटना आधुनिक मैथिलीक बहुत कुरूप प्रसंग क' क' स्मरण कैल जायत- सस्नेह,- गंगेश गुंजन. ………………………………………………. PRIYA MAITHILJAN, APPAN BHASHA- SANSKAR-SANSKRITI KE ASMARAN KARU AA EHAN VIVADAASAPAD LEKANI B KARANI KE VIRAM DIYA. ESWAR KE SAKCHI MANI - DIL PAR HATH RAKHI AA KULDEVI KE ASMARAN K-K YAD KARU KI SACHHAI KE KATEK KARIB CHHI.NIK BATAK LEL MANCH KE UPYOG KARI TA UTTAM. DHANYABAD.SAPREM- PK CHOUDHARY ………………………………………………………… Gajendra babu, pankaj puran chor achhi. Ham sab okar likhit ninda das sal pahine aarambh me kene rahi. Okra ban k kay ahan nik kayal. Chetna samiti ke seho samman wapas lebak chahi aa okar ninda karbak chahi.- subhash Chandra Yadav ………………………………………………………. प्रिय ठाकुरजी! (माननीय संपादक), “विदेह ई-पत्रिका” [मैथिली], एखन धरिक उपलब्ध साक्ष्यक आधार पर हम अपनहिक संग जाएब पसिन्न करब।- शंभु कुमार सिंह ………………………………………… Dear Gajendraji, I fully agree with you that we must fight against blatant cases of wrongful appropriation. हां अपन मेल में लिखने छी जे विदेह आर्काइव से संबंधित लेखक'क सबटा रचना हटा लेल जायत। अहि से आर्काइव सं ई प्रसंग सेहो, एकर साक्ष्य सेहो मेटा जायत। हमर मत ई जा साक्ष्यब रहबाक चाही निक आ अधलाह दुनु तरहक काज'क। अहां अप्पसन कामेंट आ र्निणय सेहो आर्काइव मे जा के संबंधित रचना के पोस्टा-स्क्रिाप्टर के रुप मे भविष्या'क पाठक'क लेल सुरक्षित राखि सकैत छियन्हि। ई दोहरेबाक बहुत औचित्यक नहि जे विदेह निक लागि रहल अछि आ अहांक परिश्रम एकदम देखा रहल अछि। ईति,सदन।- Sadan Jha ………………………………………. Thank you.- Nishikant Thakur …………………………………………… Thanx Gajendraji, for your immediate response. I must congratulate you for the work you have done to save the sanctity of the literature world as a whole. I feel proud for the person like you who shows the courrage to bell the cat. If the so called writers like Parasharji are there to spoil the sea, on the other side it is very hopeful sight to have a person like you who is alert enough to take care of such filth & keep the sea clean. Thanx for enlightening me on the subject. Regards- Bhalchandra Jha. ………………………………….. पंकज पराशरकेर एहन कार्य पर स्मरण अबैत अछि करीब बीस-पचीस साल पहिलुक घटना, जहिया आकाशवाणी दरभंगासँ म,म,डॉ, सर गंगानाथ झाक एकमात्र मैथिलीक कारुणिक पदकेँ एक गोट कवि द्वारा अपन कहि प्रसारित कए देल गेल छल, जे बादमे (सजग श्रोता द्वारा सूचना देलाक बाद) आजन्म बैन कए देल गेलाह । कहबाक तात्पर्य जे जँ हम मैथिल दरभैगा- मधुबनीमे गंगानाथ बाबूक पदकेँ अपन कहि सकैत छी तँ ई कोन बड़का गप। निश्चये एहन रचनाकारकेर सङ्ग कड़गर डेग उठाएब आवश्यक ।- ajit mishra …………………………………….. Dear Gajendrajee, We should take strong step to prevent such intellectual cheats. My support is always with you.- K N Jha ………………………………………………. This seems to be a dangerous trend and we should also try and refrain from publishing anything from such authors. Regards,- Prof. Udaya Narayana Singh ……………………………………………………….. प्रियवर ठाकुर जी, मैथिल साहित्यकार आब साइबर क्राइम सेहो क रहल छथि, ई जानि अपार प्रसन्नता भेल | पंकज पराशर के नकारात्मक बुद्धिक पूर्ण उपयोग करबाक लेल हम नोबेल प्राइज सा सम्मानित कराय चाहैत छी |- बुद्धिनाथ मिश्र ……………………………………………….. Sampadak Mahoday, Apne ehi prakarak durachar rokwak lel je prayash ka rahal chhee ohi lel dhanyabad.Ehen blackmailer sa maithili ken bachayab aawashyak achhi, Sadar- SHIV KUMAR JHA …………………………………………………. गजेन्द्र भाई, नमस्कार ! मैथिली मे एहि तरहक काज लगातार भ' रहल अछि । किछु व्यक्ति एहि धंधा मे अग्रसर छथि । मैथिलीक सम्पादक लोकनिक अनभिज्ञताक फायदा कतेको अंग्रेजी पढ़निहार तथाकथित साहित्यकार लोकनि उठा रहल छथि । पंकज जीक पहल मे छपल लेख के हम सेहो पढ़्ने र्ही आ किछुए दिनक बाद हम नेट पर मूल लेखकक आलेख के सेहो पढ़लहु । हमरा त' आश्चर्य लागल छल जे पंकज जी आलेखक कम स कम शीर्षक त' बदलि लैतथि मुदा हुनका एतेक ज्ञान रहितनि तखन की छल । एतबे नहि , हिनक बहुत रास कवितो अंग्रेजी साहित्य स' हेर-फेर कयल गेल अछि । खैर ! जे करथि ... । मुदा एहि बेर कहाबत ठीक होबाक चाही " सौ सोनार के त' एक लोहार के " । प्रकाशन मे जे भी कियो व्यक्ति गलती क' रहल छथि हुनका गंभीर क्रिमिनल बुझबाक चाही । धन्यवाद एहि लेल अहाँ के जे एतेक जोरदार तरीका स' एहि गप्प के उठैलहु ।- अहाँक- प्रकाश चन्द्र (प्रकाश झा, मैलोरंग) ………………………………………………. pankaj parashar vala prasang bar dukhad laagal. - kamini ……………………………………… Gajendr jee, maamailaa ke tool jatabe debainhi, sabhak oorjaa otabe svaahaa hetai. हमर मनतब एतबे, जे एक बेर अहां देखार क देलहुं, आब छोडि देल जाओ. हिन्दीयो मे एहिना भ रहल छै. बेर बेर आ खराब भाषा मे लिखल मोन के दुखी करैत अछि. फेर लागैत अछि जे अहि मे समय कियैक नष्ट करी? हिन्दुस्तान मे जाति आ सेहो मैथिली से जाति नयि जाएत. हम एकरा नयि मानैत छलहुं मुदा आब 30 बरख से मैथिली मे लिखनाक बाद आब देखल जे एक ओर 1 मैथिली साहित्य मे लिली जी, उषा जी आ शेफलिका जी के बाद यदि किओ नाम लैत अछि त हमर. 2 एखनो कोनो पत्रिका बै छै त हमरा लेल रचनाक आग्रह होइते छै. 3 एखनो हम ओतबे सक्रिय छी आ निरंतर लिखि रहल छी. 4 दुखद जे हमरा बाद (सुस्मिता पाठक आ ज्योत्स्ना मिलन के हम अपने तुरिया बुझैत छी) के बाद एहेन कोनो सशक्त कोन, महिला लेखने नयि आएलए. 5 ई स्थिति रहलाक बादो, आब जहन हम देखै छी, त पाबै छी जे हमरा पर, हमर रचना यात्रा अथव हमर रचना पर किछु नयि लिखल गेलए, चाहे ओ मोहन भारद्वाज रहथु अथवा आन किओ. जहन हमर दशक केर चर्च होइत छै, तीन चारिटा नाम पर सविस्तार चर्चा होइत छै, जाहि मे हमर नाम नयि रहैत छै. हमर नाम मात्र सन्दर्भ लेल जोडि देल जाइत छै. 6 एतेक दिन मे मात्र रमण जी हमरा पर एक गोट लेख लिखलन्हि. हम ओकरा पुन: टाइप करबा के अहां लग पठायब. 7 जाति पाति धर्म आ द्वेष पर कहियो ध्यान नयि देलाक कारणे त कही हमर ई स्थिति नयि छै, आब हमरा ई सोचबा मे आबि रहल अछि. 8 हमर शिक्षक, जे स्वयं हिन्दी के ख्यातिलब्ध कथाकार छथि, हमरा बुझेने रहलाह जे हम मैथिली मे लिखब बन्न क; दी, कियैक त हम गैर मैथिल (जाति विशेष) से नयि छी, तैं हमर लेखन के कहियो मैथिल सभ नयि नोटिस करताह, कहियो किछु नयि करता.. अपन भाषाक प्रति प्रेम के आगरह कारणे हम हुनकर बात नयि मानलियै, लिखैत गेलहुं, मुदा आब लागि रहलअए जे हुनकर कहबी सही छलन्हि की? 9 एखनो की हाल छै मैथिली मे, देखियो. ओकरा विरुद्ध किछु करियु. मैथिली मे जे पैघ पैघ संस्था चाइ, चेतना समिति सनक, सभ बेर विद्यापति पर्व मनबैत छथि. लाखो खर्च करै छथि, मुदा नीक लेखक केर पोथी सभ बेर 5-7 टा निकालैथु, से नयि होबैत छन्हि. 10 हमरा भेटल जानकारी के मोताबिक विद्यापति हॉल किराया पर चढै छै. तकरा मे कोनो आपत्ति नयि, यदो ओकरा से किछु आय होबै. मुदा ओकरा मैथिलीक काज अथवा नाटक आदि लेल मांगल जाएत, त; नयि भेटै छै. यदि ओकर शुल्क चुका दी, तहन त किरायाके रूप मे किऊ ल' सकि छै. एकरा सभ के उजागर करी. 11 व्यक्ति से संस्था पैघ होइत छै. जतेक संस्था सभ छै, तकरा पर लिखी, साहित्य अकादमीक मैथिली विभाग सहित. 12 लिली रेक सभटा रचनाक अनुवाद अधिकार हमरा देने छथि. हुनक साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त पोथी 'मरीचिका' केर हिन्दी अनुवाद लेल पिछला 2-3 साल से हम लिखि रहल छी. साहित्य अकादमीक पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य" मे हम पिछला 25 साल से अनुवाद सहित छपि रहल छी. मुदा हमरा से अनुवादक नमूना मांगल गेल. ओहि कुर्सी पर जे स्वनाम धन्य बैसल छथि, हुनका हमरा मादे नयि बूझल त कोनो मैथिल साहित्यकार से पूछि सकैत छलाह. ई तहिने भेलै, जेना एक बेर एक गोट चैनल ऋषिकेश मुखर्जी से हुनकर बायोडाटा मंगने छल आ एखनि पढल समाचारक अनुसारे आ. जानकी वल्लभ श्हस्त्री से हुनकर बायोडाटा पद्मश्री लेल मांअगल गेलैय. 13 अपन विनम्रता दर्शाबैत हम लिली जीक दू तीन टा कथाक हिन्दी अनुवाद हम पठा देलियन्हि. तैयो अई पर कोनो विचार नयि. लिखला के बाद हमरा कहल गेल जे हम लिली जी से साहित्य अकादमी के अनुवादक अधिकार दियाबे मे मददि करी. आरे भाई, अहां के अनुवाद से मतलब अछि ने, आ जहन हम अनुवाद क; के देब' लेल तैयार छी तहन अकादमी के किअयैक अधिकार चाही? अई लेल जे अकादमी अपन पसीनक आदमी के अनुवाद लेल द; सकय. एखनि धरि ओकरा पर निपटारा नयि भेलैये. अकादमी से फेर कोनो पत्र नयि आएल अछे. अनुवाद तैयार राखल छै. लिली जी आब बहुत बुजुर्ग भ; गेल छथि. हुनक मात्र इयैह इच्छा छै (आ बहुत स्वाभाविक) जे हुनकर पोथी सभ हुनका सोझा मे प्रकाशित भ; जाए. 14 लिली जी के पोथी हिन्दी मे आनबाक श्रेय हमरे अछि, ई मनितहुं ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. 15 मैथिली के भारतीय ज्ञानपीठ से पुस्तक प्रकाशन लेल हमही आगां एलहुं आ प्रभास जी आ लिली जी के पोथी बहार भेलै.भारतीय ज्ञानपीठ से मैथिली पुस्तक प्रकाशन के श्रेय हमरे छन्हि, ईहो मनैत ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. गजेन्द्र जी, मैथिलीक ई सभ मानसिकता पर आन्दोलन करी जाहि से रचनाकार आ वरिष्ठ रचनाकार सभ के अपमानित नयि होब' पडै. अहां चाही त' एकरा विदेह पर द' सकै छी. हम दोसर बात सेहो लिखि के पठायब. मुदा हम फेर कहब, जे हम व्यक्ति के नयि संस्था आ व्यक्ति के मानसिकता के दोष देबन्हि. लोक पढथु आ पूचाथु ई स्वनामधन्य सभ से जे जकरा से अहां के गोलौंसी अछे, तकरा पर अहां लिखब आ जकरा से नयि अछे, जे मौन भावे लिखि रहलए कोनो विविआद मे पडल बगैर, हुनका लेल ई व्यवहार? -विभा रानी. ………………………………………………. Shri gajendraji, good work. Anha sa ehina neer khshir vivekakak ummeed lagatar banal rahat. chor ke ehina dekhar kelak baad dandit seho karbak prayas karbaak chahi. anha bahut raas neek pahal ka rahal chhi. Saadhuvaad.- manoj pathak. …………………………………………… We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi Vidyapati. I know him very well and his group as well. They have no love for Maithili in fact they are the moles planted by vested Hindi writers to damage maithili. Parashar and likes are the distructive lots and they are the culprits for agonising senior writers of Maithili those who dedicated their life for Maithili language and literature. I have no sympathy for him. I cant say, even, God bless them. - Chitra Mishra ………………………………………….. तारानन्द वियोगी: (मिथिला सृजन: जून-जुलाई २०१०, वर्ष-१, अंक-२): हुनक (पंकज पराशरक) अनेक रचना एहनो छनि जकर जन्म दोसरक काव्य रचना पढ़लाक अनन्तर भेलनि अछि। कविता ओ परिपूर्णतः हुनके थिकनि मुदा किछु गोटेकेँ ई कहबाक अवसर भेटि गेलनि जे ओ पंकज चोर-कवि थिकाह। हम देखैत छी जे चोर समीक्षक भने ओ होथु, चोर-कवि ओ कदापि नहि छथि। मुदा एना किएक भेल? एहि दुआरे भेल जे आनक रचना पढ़ि कऽ अपन अनुभूतिमे उतरैत काल ओ आनक आभामंडलसँ तेना आक्रान्त छलाह जे तकर छाप कविताक दृश्यमे देखार पड़ि गेल। ई वस्तुतः सिद्धताक कमी थिक, जकरा क्यो रचनाकार रचिते-रचिते सिद्ध कऽ सकैत अछि। ……………………………………………………….. गौरीनाथ (अनलकान्त)- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। ………………………………………………….. ई पंकज झा पराशर पहिनहियेसँ एहि सभमे संलग्न अछि, हरेकृष्ण झाक कविताकेँ हिन्दीमे, बिना अनुमतिक, छपबै छथि; ई गप आर पुष्ट होइत अछि कारण विद्यानन्द झा जीक कविता सेहो ई पंकज झा पराशर एकटा हिन्दी पत्रिकामे बिना अनुमतिक छपबओलक (ई सूचना हरेकृष्ण झा जी द्वारा प्राप्त भेल, जे विदेहमे छपलाक बाद पंकज झा पराशर हुनका फोन कऽ कय टॉर्चर केलकन्हि जखन ओ बीमार रहथि। हरेकृष्ण झा जी फोन द्वारा सेहो सूचित केलन्हि, हम कहलियन्हि जे की ई सूचना विदेहसँ हटा दी? तँ हरेकृष्ण झा जी कहलन्हि, रहऽ दियौ, सत्य जे छै, से ईएह छिऐ- सम्पादक)। ई पंकज झा पराशर कएक बेर, केलक मुदा ऐ बेर तँ ओ अपने नामे दोसराक रचना छपबा लेलक, अनुवादक रूपमे नै।-सम्पादक) रमेशक आलेख-बहस-पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक- पर किछु पाठकक विचार: SHIV KUMAR JHA TILLOO JAMSHEDPUR said... Ramesh jee ken dhanyavad,satya gapp bajwak saahas "MITHILA" me aabi rahal achhi neek laagal,chhadma lokpriyatak khatir lok kichu ka sakait achhi..Pankaj Parasharak..aab charch karab seho nahi sohay laagi rahal..jatek ninda kayal jay kum parat.Muda RAMESH BABU HU APNE SABH NINDA KARAY CHHEE AA KICHU LOK KAHAIT CHHATHI PANKAJ JEE JUG-JUG JIWATHU,ONA HAMHU HUNAK DIRGHA JEEVANAK KAAMNA KARAIT CHHEE,PARANCH SABHAK JE JUG-JUG JIWAK KAAMNA KAYAL JAY MATRA PANKAJ PARASHARAK LEL NAHI.."SARBE BHAWANTU SUKHINAH", RAMESH BABU APAN LEKHANI KEN GATI NIRANTAR RAKHAL JAY... Rama Jha said... ehi vyakti pankaj parasharak ekta ehane ghrinit message ekta mahila je hamar mitra chathi, ke bhetal chhai, etek ghrinit je etay nai likhi sakai chhi, apan rachna ke dosar bhasha me mool kahi prakashit kaenai chori te nai bhelai, muda okara svayam dvara anoodit kahi prakashit karebak chahe, mool maithili se dosar bhasha (hindi aadi me), va dosar bhasha (hindi aadi se) maithili me. आशीष अनचिन्हार said... जहाँ धरि पराशर- घटना अछि ओहि जतेक खिध्धाशं कएल जाए ततेक कम। मुदा रमेश भाइ विभारानीक कोन भाषा मे समीक्षा कएल जाए हिदीं मे की मैथिली मे । हमरा हिसाबे एकै रचना के दू- तीन भाषा मे मूल कहि प्रकाशित करब सेहो चोरि भेल। एहू पर धेआन देल जाए। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रमेश बहस-पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक विदेह-सदेह २ (२००९-१०) सँ पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि आ साइबर अपराधक पापक घैलक महा-विस्फोट भेल अछि। ई पैघ श्रेय पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ जाइत छनि। हुनकर अपराध पकड़बाक चेतना केर जतेक प्रशंसा कयल जाय, कम होयत। “विदेह”क मैथिली प्रबन्ध-समालोचना- अंक, अइ पोल-खोल लेल कएक युग धरि विलम्बित भऽ कऽ निबद्ध रहत, से “समय केँ अकानैत” कहब कठिन अछि। साहित्योमे चौर्यकलाक उदाहरण पहिनहुँ अबैत रहल अछि गोटपगरा। मुदा एक बेरक चोरि पकड़ा गेलाक बाद प्रायः चोरिक आरोपी साहित्यकार मौन-व्रत धारण करैत रहलाह अछि आ मामिला ठंढ़ाइत रहल अछि। मुदा ताहि परम्पराक विपरीत अइ बेरक चोर ’सिन्हा चोर’ निकलल अछि आ विगत एक दशकसँ निरन्तर चोरि करैत जा रहल अछि- सेन्ह काटिकऽ। आ तेहेन महाचोरकेँ मैथिलीक साहित्यकार आ संस्था सभ तरहत्थीपर उठा-उठा कऽ पुरस्कृत केलक अछि आ समीक्षाक चासनीमे चोरायल कविता सबकेँ बोरि देल गेल अछि। विदेह-सदेह-२ प्रमाण-पुरस्सर अभियोगे टा नहि लगौलक, अपितु एहेन महत्वाकांक्षी असामाजिक तत्वक विरुद्ध साहित्यिक दण्ड आरोपित कऽ अपन “बोल्डनेस” सेहो प्रदर्शित केलक अछि। एक दशकमे तीन बेर पकड़ायल चोर प्रायः “डेयर डेभिल” होइत अछि आ अपन अनुचित। सीमाहीन महत्वाकांक्षाक पूर्ति लेल अपन वरीय संवर्गीय व्यक्तिकेँ सीढ़ीक रूपमे उपयोग करैत अछि आ स्वार्थ-सिद्धिक उपरान्त अपन पयर सँ ओही सीढ़ीकेँ निचाँ खसा दैत अछि। फेर ओकरा अपन ट्विटर-फेसबुक-नेट वा पत्रिकामे गारिक निकृष्टतम स्तरपर उतरऽ मे कनियों देरी नहि होइत छै। ओ नाम बदलि-बदलि कऽ गारि पढ़ैत अछि आ अपन प्रशंसामे जे.एन.यू.क छात्र-छात्राक पोस्टकार्ड लिखेबामे अपस्याँत भऽ जाइत अछि। ओ हिन्दीक कोनो बड़का साहित्यकारक बेटीक संग अपन नाम जोड़ि विवाहक वा प्रेम-प्रसंगक खिस्सा रस लऽ लऽ कऽ प्रचारित करैत अछि। एहेन प्रवृत्ति कएटा आओर तिकड़मबाजमे देखल गेल अछि जे हिन्दीक पैघ-पैघ नामक माला जपि कऽ मठोमाठ होअय चाहैत अछि। वस्तुतः ई चिन्ताजनक तथ्य थिक जे मैथिलीक नव-तूरकेँ हिन्दीक पैघ-पैघ नामक वैशाखीक एतेक जरुरति किऐक होइत छनि? “विदेहक” “इनक्वायरीक विवरण” पढ़ि कऽ रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। पहल-८६ आ आरम्भ-२३ मे जे पोल खूजल छल, अइ तथाकथित साहित्यकारक, तकरा बादे मैथिली साहित्यसँ बारि देल जेवाक चाहैत छल। मुदा विडम्बना देखू जे चेतना समिति सम्मानित कऽ देलक। “मैथिल ब्राह्मण समाज”, रहिका (मधुबनी) सन अँखिगर संस्थाकेँ चकचोन्ही लागि गेल, जखनकि संस्थामे विख्यात साहित्यकार उदयचन्द्र झा “विनोद” आ पढ़ाकू प्रोफेसरगण छथि। ई संशयविहीन अछि जे पुरस्कृत करेबामे विनोदजीक महत्वपूर्ण भूमिका रहल हैत। “विदेह” द्वारा रहस्योद्घाटन केलाक बावजूद एखन धरि चेतना समिति अथवा मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिकाकेँ अपन पुरस्कार आपस करेवाक वा आने कोनोटा कार्रवाई करवाक बेगरता नहि बुझा रहल छै आ सर्द गुम्मी लधने अछि। एहेन “जड़-संस्था” सभ मैथिली साहित्यक उपकार करैत अछि वा अपकार? ई केना मानल जाय जे पहल-८६ वा आरम्भ-२३ अइ दुनू संस्थाक कोनो अधिकारी वा साहित्यकारकेँ पढ़ल नहि छलनि? ई आश्चर्यजनक सत्य थिक जे मैथिलीक कएटा पैघ साहित्यकार पंकज पराशरक कृत्रिम काव्य आ आयातित शब्दावलीमे फँसि गेलाह अछि। “विलम्बित कएक युग मे निबद्ध” क भूमिकामे अनेरो विदेशी साहित्यकारगणक तीस-चालिस टा नाम ओहिना नहि गनाओल गेल अछि, अपन कविता केँ विश्वस्तरीय प्रमाणित करबाक लेल अँखिगर चोरे एना कऽ सकैत अछि। सम्भावना बनैत अछि जे डगलस केलनर जकाँ ओहू सभ कविक रचनाक भावभूमिक वा शब्दावलीक चोरिक प्रमाण एही काव्य-पोथीमे भेटि जाय। अंततः मि. हाइडक कोन ठेकान? मैथिलीमे तँ लोक विश्व-साहित्य कम पढ़ैत अछि। तकर नाजायज फायदा कोनो ब्लैकमेलर किऐक नहि उठाओत? आखिर टेक्नो-पोलिटिक्स की थिक- टेकनिकल पोलिटिक्स थिक, सैह किने? एकरा बदौलत झाँसा दऽ कऽ पाकिस्तानोक यात्रा कयल जा सकैत अछि। “टेक्नो-पोलिटिक्सक” बदौलत किरण-यात्री पुरस्कार, वैदेही-माहेश्वरी सिंह “महेश” पुरस्कार, एतेक धरि जे विदितजीक अकादमीयोक पुरस्कार लेल जा सकैत अछि। प्रदीप बिहारीक सुपुत्रक भातिज-कका सम्बन्धक मर्यादाक अतिक्रमण कयल जा सकैत अछि। प्रो. अरुण कमलक “नये इलाके में” सेंधमारी कऽ कऽ “समय केँ अकानल” जा सकैत अछि। आर तँ आर, अइ टेकनिकल पॉलिटिक्सक बदौलत जीवकान्तजी सन महारथी साहित्यकारसँ “विलम्बित कएक युग...” पोथीक समीक्षा लिखबा कऽ “मिथिला दर्शन” (५) सन पत्रिकामे छपवा कऽ स्थापित आ अमर भेल जा सकैत चछि। मैथिली साहित्यक सभसँ पैघ सफल औजार थिक “टेक्नो पोलिटिक्स”! ई मानल जा सकैत अछि जे मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ आरम्भ-२३ आ पहल-८६ कोलकातामे नहि भेटल होइन्हि। मुदा जीवकान्तजी नहि पढ़ने हेताह से मानबामे असौकर्य भऽ रहल अछि। जीवकान्त जी तँ प्रयाग शुक्लक “चन्द्रभागा में सूर्योदय” आ एही शीर्षकक नारायणजीक कविता (चन्द्रभागामे सूर्योदय) सेहो पढ़ने हेताह जे छपल अछि मैथिलीमे। तखन पंकज पराशरक समुद्रसँ असंख्य प्रश्न पूछऽवला कविताक भावार्थ किऐक नहि लगलनि जे समीक्षामे कलम तोड़ि प्रशंसा करऽ पड़लनि वा करा गेलनि? एकरा “प्रायोजित समीक्षा” किऐक नहि मानल जाय? की प्रयाग शुक्ल वा नारायणजीक समुद्र विषयक कवितासँ वेशी मौलिकता पंकज पराशरक कवितामे भेटलनि जीवकान्तजीकेँ? ओइ सभ कविताक कनियोँ “छाया”क शंको नहि भेलनि समीक्षककेँ? “सभ्यताक सभटा मर्मान्तक पुकार”क नोटिस लेबऽवला समीक्षककेँ साहित्यिक चोरि असभ्य आ मर्मान्तक पीड़ादायक नहि लगलनि? आब जीवकान्तजी सन समीक्षकक “पोजीशन फॉल्स” भऽ जेतनि से अन्दाज तँ मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ नहियें रहनि, उदय चन्द्र झा “विनोद” केँ सेहो नहि रहनि। ई अभिज्ञान तँ पंकजे पराशर टाकेँ रहल हेतनि? बेचारे “पराशर” मुनिक आत्मा स्वर्गमे कनैत हेतनि आ पंकसँ जनमल जतेक कमल अछि सब अविश्वसनीय यथार्थक सामना करैत हेताह। पराशर गोत्री भऽ कऽ तीन बेर चोरि केनाइ “पराशर” महाकाव्यक रचयिता स्व. किरणजीकेँ सेहो कनबैत हेतनि। आखिर जीवकान्तजी साहित्यिक चोरिक नोटिस किए ने लेलनि, जखनकि हुनका विचारेँ “मैथिलीक समीक्षक प्रायः मूर्खता पीबिकऽ विषवमन करैत अछि”(विदेह-सदेह-२-२००९-१०)/ विनीत उत्पल-साक्षात्कार आ जीवकान्तजी स्वयं पंकज पराशरक चोरिवला कविता-पोथीक समीक्षक छथि, अपितु चौर्यकला प्रवीण कविक घोर प्रशंसक छथि। तखन अइ समीक्षा-आलेखमे अन्तर्निहित असीम-प्रशंसा साकांक्ष-पाठककेँ “विष-वमन” कोना ने लगौक? हुनका सन “पढ़ाकू” समीक्षक-पाठककेँ “फॉल्स पोजीशन”मे अननिहार “एक्सपर्ट आ हैबिचुएटेड” साहित्य-चोरसँ प्रशंसा आ पुरस्कार दुनू पाबि जाय तँ मैथिली-काव्यक ई उत्कर्ष थिक वा दुर्भाग्य? अंततः विदेह-सदेह टा किऐक निन्दा केलक एहि घटनाक? आन कोनो पत्रिका किऐक नहि केलक? डॉ. रमानन्द झा “रमण” इन्टरनेटपर निन्दा करैत छथि तँ घर-बाहर पत्रिकामे किऐक नहि जकर ओ सम्पादक छथि? चेतना समिति, पटना सम्मानित करैत अछि एहने-एहने साहित्यकारकेँ तखन अपने पत्रिकामे कोना निन्दा करत, जखनकि पुरस्कार आपसो नहि लैत अछि, जानकारी भेलाक वा साकांक्ष साहित्यकारक अनुरोध प्राप्त भेलाक बादो? नचिकेताजी नेटपर निन्दा करताह आ “विदेह”मे छपत तँ “मिथिला दर्शन”मे किऐक नहि निन्दा वा सूचना छपल? कारण स्पष्ट अछि- जीवकान्तक समीक्षा पंकज पराशरक काव्य-पोथीपर छपत, तखन ओही पोथीक चोरि कयल कविताक निन्दा कोना छपत? चारु भाग साहित्यिक आदर्श, मर्यादा आ नैतिकताक धज्जी उड़ि रहल अछि- पितामह आ आचार्यगणक समक्ष आ (अनजाने मे सही) हुनको लोकनिक द्वारा। मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिका; चेतना समिति, पटना आ साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीमे अन्ततः कोन अन्तर अछि वा रहल? एहेन नामी पुरस्कारक संचालन आ चयनकर्ता महारथी सभकेँ नव लोककेँ पढ़बाक बेगरता किऐक नहि बुझाइत छनि? बिना पढ़ने पुरस्कारक निर्णय वा समीक्षाक निर्णय कतेक उचित, जखन कि ई चोरि तेसर बेरक चोरि थिक आ से छपि-कऽ भण्डाफोड़ भेल अछि। एकरा वरेण्य आ वरीय साहित्यकारगण द्वारा काव्य-चोरि, आलेख-चोरिकेँ प्रश्रय देल जायब किऐक नहि मानल जाय, जखनकि आरम्भ, मैथिल-जन, पहल आ विदेह-सदेह पहिनहि छापि चुकल छल? की साहित्यिक चोरिकेँ प्रश्रय देब, दलाल वर्गकेँ प्रश्रय देब नहि थिक? एहेन सम्भावनायुक्त नव कविकेँ प्रश्रय देब मैथिली साहित्य लेल घातक अछि वा कल्याणकारी, जकरा मौलिकतापर तीन बेर प्रश्न चेन्ह लागल होइक? की पोथीक आकर्षक गत्ता देखि वा विदेशी कविगणक नामावली (भूमिकामे) पढ़ि कऽ समीक्षा लिखल जाइत अछि वा पुरस्कारक निर्णय लेल जाइत अछि? जँ से भेल हो तँ सब किछु “ठिक्के छै भाइ”? अइ सबसँ तँ जीवकान्तजीक बात सत्य बुझाइत अछि जे समीक्षकगण दारू पीबि कऽ वा पैसा पीबि कऽ वा मूर्खता पीबि कऽ समीक्षा लिखैत छथि। डगलस केलनरक “टेक्नोपोलिटिक्स” तँ छपि गेल “पहल”मे चोरा कऽ। आब जीवकान्तजी, ज्ञान रंजनजी अथवा हिन्दी जगतक आन साहित्यकार-सम्पादकसँ पूछथु जे नोम चोम्स्कीवला रचना कतय गेल, की भेल, कोन नामें छपल? पंकज पराशरक नामें कि पदीप बिहारीजीक सुपुत्रक नामेँ (अनुवाद रूपमे)। ई रिसर्च एखन नहि भेल तँ भविष्यमे पुनः एकटा साहित्यिक चोरिक पोल खूजत? अंततः एकटा माँछकेँ कएटा पोखरिकेँ प्रदूषित करए देल जाय आ से कए बेर? उदय-कान्त बनि कऽ गारि पढ़वाक आदति तँ पुरान छनि डॉ. महाचोर केँ। ककरो “सरीसृप” कहि सकैत छथि (मैथिल-जन) आ कोनो परिवारमे घोंसिया कऽ विष वमन कऽ सकैत छथि। ऑक्टोपसक सभ गुणसँ परिपूर्ण डॉ. पॉल बाबाकेँ चोरिक भविष्यवाणी करवाक बड़का गुण छनि तेँ हिनका नामी फुटबॉल टीम द्वारा पोसल जाइत अछि, जाहिसँ “विश्व-कप”केँ दौरान अइ “अमोघ अस्त्रक” उपयोग अपना हिसाबेँ कयल जा सकय। सहरसा-कथागोष्ठीमे पठित हिनकर पहिल कथाक शीर्षक छल- हम पागल नहि छी। ई उद्घोषणा करवाक की बेगरता रहैक- से आइ लोककेँ बुझा रहल छैक। अविनाश आ पंकज पराशरक मामाजी तहिया हिनकर कथाकेँ “टिप्पणीक”क्रममे मैथिली-कथाक “टर्निंग प्वाइन्ट” मानने छलाह। आइ ओ “टर्निंग प्वाइन्ट” ठीके एक हिसाबेँ “टर्निंग प्वाइन्ट” प्रमाणित भेल, कारण कथाक ओहि शीर्षकमे सँ “नहि” हटि गेल अछि, हिनकर तेबारा चोरिसँ। हिनकर पहिल चोरि (अरुण कमलक कविता- नए इलाके में) क निन्दा प्रस्तावमे “मामाजी” आ डॉ. महेन्द्रकेँ छोड़ि, सहरसाक शेष सभ साहित्यकार हस्ताक्षर कऽ “आरम्भ”केँ पठौने छलाह। आइ ओ हस्ताक्षर नहि केनिहार सभ कन्छी काटि कऽ वाम-दहिन ताक-झाँक करवाक लेल बाध्य छथि। द्वैध-चरित्र आ दोहरा मानदण्डक परिणाम सैह होइत अछि। अविनाश तखन तँ देखार भऽ जाइत छथि जखन ओ विदेह-सदेह-२ मे लिखैत छथि जे “एकरा सार्वजनिक नहि करबै”। नुका कऽ सूचना देवाक कोन बेगरता? पंकज पराशरसँ सम्बन्ध खराब हेवाक डर वा कोनो “टेक्नोपोलिटिक्स”(?) केर चिन्ता? विदेह-सदेह-२ क पाठकक संदेश तँ कएटा साहित्यकारकेँ देखार कऽ दैत अछि। जतय राजीव कुमार वर्मा, श्रीधरम, सुनील मल्लिक, श्यामानन्द चौधरी, गंगेश गुंजन, पी.के.चौधरी, सुभाष चन्द्र यादव, शम्भु कुमार सिंह, विजयदेव झा, भालचन्द झा, अजित मिश्र, के.एन.झा, प्रो.नचिकेता, बुद्धिनाथ मिश्र, शिव कुमार झा, प्रकाश चन्द्र झा, कामिनी, मनोज पाठक आदि अपन मुखर भाषामे प्रखरतापूर्वक निन्दनीय घटनाक निन्दा केलनि अछि, ततहि अविनाश, डॉ. रमानन्द झा “रमण”, विभारानीक झाँपल-तोपल शब्द आश्चर्य-भावक उद्रेक करैत अछि। मुदा संतोषक बात ई अछि जे पाठकक “प्रबल भाव-भंगिमा” साहित्यकारोक “मेंहायल आवाज”क कोनो चिन्ता नहि करैत अछि। विभारानी तँ कमाले कऽ देलनि। एहि ठाम मैथिली भाषा-साहित्यक एक सय समस्या गनेवाक उचित स्थान नहि छल। ई ओनाठ काल खोनाठ आ महादेवक विवाह कालक लगनी भऽ गेल। कोनो चोर बेर-बेर अपन कु-कृत्यक परिचय दऽ रहल अछि आ हुनका समय नष्ट करब बुझा रहल छनि आ चोरकेँ देखार केलासँ दुःख भऽ रहल छनि? ओ अपन प्रतिक्रियामे कतेक आत्म श्लाघा आ हीन-भावना व्यक्त केलनि अछि से अपने पत्र अपने ठंढ़ा भऽ कऽ पढ़ि कऽ बूझि सकैत छथि। हिन्दीयोमे एहिना भऽ रहल अछि, तेँ मैथिलीमे माफ कऽ देल जाय? आब हिन्दीसँ पूछि-पूछि कऽ मैथिलीमे कोनो काज होयत? विभारानी ज्योत्सना चन्द्रमकेँ ज्योत्सना मिलन केना कहैत छथि? हुनकर उपेक्षा कोना मानल जाय? ओ सभ साहित्यिक कार्यक्रममे नोतल जाइत छथि, सम्मान आ पुरस्कार पबैत छथि, पाठक द्वारा पठित आ चर्चित होइत छथि। समीक्षाक शिकाइत की उच्चवर्णीय (?) साहित्यकारकेँ मैथिलीमे नहि छनि? समीक्षाक दुःस्थिति सभ जातिक मैथिली साहित्यकार लेल एके रंग विषम अछि। ओइ मे जातिगत विभेद एना भेलए जे ब्राह्मण-समीक्षक, आरक्षणक दृष्टिकोणेँ निम्न जाति (?)क साहित्यकारक किछु बेशीए समीक्षा (सेहो सकारात्मक रूपेँ) केलनि अछि। समीक्षा आ आलोचनाक विषम स्थितिक कारणें जँ नैराश्यक शिकार भऽ जाय लेखक, तँ लेखकीय प्रतिबद्धताक की अर्थ रहि जायत? विभाजीकेँ बुझले नहि छनि जे हुनका लोकनिक बाद मैथिली महिला लेखनमे कामिनी, नूतन चन्द्र झा, वन्दना झा, माला झा आदि अपन तेवरक संग पदार्पण कऽ चुकल छथि। हुनका ने कामिनीक कविता संग्रह पढ़ल छनि आ ने “इजोड़ियाक अङैठी मोड़”। हुनका अपन गुरुदेवक बात मानि हिन्दीमे जाइसँ के कहिया रोकलकनि? ओ गेलो छथि हिन्दीमे। मातृभाषाक प्रेरणा अद्वितीय होइत छै। मैथिलीक जड़ संस्था अथवा समीक्षक सभपर प्रहार करबामे हमरा कोनो आपत्ति नहि, मुदा अर्थालाभ तँ एतय नगण्य अछिए। सामाजिक सम्मान विभाजीकेँ अवश्य भेटलनि अछि। समाजमे “जड़”लोक छै तँ “चेतन” लोक सेहो छैक। हुनकासँ मैथिली भाषा-साहित्य आ मिथिला-समाजकेँ पैघ आशा छै, हीनभाव वा आत्मश्लाघासँ ऊपर उठि काज करवाक बेगरता छैक। सक्षम छथि ओ। हुनका श्रेय लेवाक होड़सँ बँचवाक चाही। अन्यथा साहित्य अकादेमी प्रतिनिधि, दिवालियापन केर शिकार जूरीगण आ मैथिलीक सक्षम साहित्यकारमे की की अन्तर रहि जायत? विभारानीक विचलनक दिशा हमरा चिन्तित आ व्यथित करैत अछि। ओ दमगर लेखिका छथि, सशक्त रचना केलनि अछि, आइ ने काल्हि समीक्षकगण कलम उठेबापर बाध्य हेबे करताह। समीक्षकक कर्तव्यहीनतासँ कतौ लेखक निराश हो? पंकज पराशरक श्रृंखलाबद्ध साहित्यिक चोरिपर सार्थक प्रतिक्रिया देब कोनो साहित्यकार लेल अनुचित नहि अछि कतहुसँ। साहित्यकार लेल साहित्यिक मूल्यक प्रति ओकर प्रतिबद्धता मुख्य कारक होइत अछि आ हेवाको चाही आ तकरा देखार करवाक “बोल्डनेसो” हेवाक चाही। “चाही”वला पक्ष साहित्यमे बेशीए होइत अछि। एहेन-एहेन गम्भीर विषयपर साहित्य आ समाजक “चुप्पी” एहेन घटनाकेँ प्रोत्साहित करैत अछि आ जबदाह जड़ताकेँ बढ़बैत अछि, भाषा-साहित्यकेँ बदनाम तँ करिते अछि। जाधरि पंकज पराशरक चोरि-काव्यक समीक्षा लिखल जाइत रहत, विभारानीक मूल-रचनाक समीक्षा के लिखत? ककरा जरूरी बुझेतैक? विभारानी अपने तँ समीक्षा प्रायोजित नहि करओती? सक्षम लेखकक व्यवहारोक अपन स्तर होइत छै। तेँ संगठित भऽ चोरिक भर्त्सना हेवाक चाही। राजकमल चौधरी आ आन लेखकक रचनाक चोरि पंकज पराशर प्रसंग पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... ParasharsIntellectualTheft पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक। तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि आ एकटा इनक्वायरी द्वारा एहि पोथीक ( डगलस केलनर बला घटनाक्रमक बाद) जाँच किछु चुनल लेखक-पाठक द्वारा कएल जएबा धरि रहत। प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि। विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... अन्तर्जालपर ब्लैकमेलिंग विरुद्ध गूगल, चिट्ठाजगत आ ब्लोगवानीकेँ सूचित करू, साइबर क्राइम आ ब्लैकमेलिंग रोकबा लेल सेहो ढेर रास प्रावधान छै, विशेष जानकारी ggajendra@gmail.com पर सम्पर्क करू। अहाँसँ पत्रकार, न्यूजपेपर, पत्रिका आ हिन्दीक गणमान्य लेखकगण/ प्रोफेसर/ विश्वविद्यालय आदिकेँ एहि घटनासँ सूचित करेबाक अनुरोध अछि। विशेष जानकारी लेबाक आ देबाक लेल ggajendra@gmail.com पर सूचित करू। Reply 01/26/2010 at 01:56 PM 2 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... you may also brought this episode before sanjay@jagran.com Thanks readers. Reply 01/26/2010 at 12:25 AM 3 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... But this time he has not used his name as maithil, mithila aa subodhkant but as Pankaj Parashar pparasharjnu@gmail.com Reply 01/25/2010 at 09:48 PM 4 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... The same blackmail letter has been sent by the blackmailer to my email address which has been spammed through ISP ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 and has been forwarded for taking Police action immediately. Reply 01/25/2010 at 09:45 PM 5 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... Professor Kellner has thanked me for this detective work, but it all your efforts dear reader. Reply 01/25/2010 at 08:21 PM 6 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... pahal=- 86, aarambh -23 aa arunkamalak naye ilake me ka sambandhit prishtha pathebak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/25/2010 at 08:16 PM 7 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... http://www.gseis.ucla.edu/courses/ed253a/newDK/intell.htm ehi link par douglas kellner ke lekhak anuvad pahal-86 ke page 125-131 par achhi- soochnak lel dhanyad pathakgan. Reply 01/24/2010 at 08:16 PM 8 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... ehi ghatnakram me kono pathak lag je Arun Kamal jik kavita "Naye Ilake Me" hoinh aa Aarambh (ank 23, maithili magazine editor Sh. Rajmohan Jha (March 2000) me prakashist maithili kavita "Sanjh Hoit Gam Me" te kripya ggajendra@gmail.com par soochit karathi- Dhanyavad. Reply 01/24/2010 at 08:02 PM 9 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... ehi ghatnakram me bahut ras aar jankari aa dher ras samarthan debak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/23/2010 at 11:40 PM 10 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... विदेहक पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक, प्रदीप बिहारीक बेटा प्रणव बिहारीसँ अनुवाद करबेलक आ कहलकै जे अनुवाद छपबा देब मुदा अपना नामसँ छपबा लेलक, प्रणवकेँ कहलकै जे अनुवाद रिजेक्ट भऽ गेल आ फेर हेरा गेल । तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि आ एकटा इनक्वायरी द्वारा एहि पोथीक ( डगलस केलनर बला घटनाक्रमक बाद) जाँच किछु चुनल लेखक-पाठक द्वारा कएल जएबा धरि रहत। प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि। विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। Reply 01/22/2010 at 12:03 PM 11 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... out of these three addresses of the spammer i.e. pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com the address pkjpp@yahoo.co.in, is fails verification test and addresses pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com stands verified and confirmed. Reply 01/21/2010 at 10:00 PM 12 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... the htpps host matches reliance communications and the corresponding email gamghar at gmail dot com and maithilaurmithila at gmail dot com is fake ids related with the actual spammers id i.e.pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com Reply 01/21/2010 at 08:50 PM 13 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... The office premise has been located, the blackmailer works in Dainik Jagran, Process to file complaint against Cyber Crime Act is being initiated and the organisation being taken into confidence. Reply 01/21/2010 at 06:13 PM 14 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... maithil, mithila aa subodhkant nam se abhadra aa blackmail karay bala blackmailer ke cheenhi lel gel achhi,ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 aa ban kayal ja rahal achhi, agan ohi organisation se seho sampark kayal jaayat jatay se ee email aayal achhi. Reply 01/18/2010 at 11:19 PM 15 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... comment moderation lagoo kayal ja rahal achhi Reply 01/18/2010 at 09:27 PM 16 सुबोधकांत said... अविनाशकेँ सेहो 220.227.174.243 आइ.एस.पी.सँ एहि प्रकारक ई-पत्र अबैत रहै मुदा ओ मामिला खतम कs देने रहथिन। ओ टिप्पणी सभ एतेक घृणित छैक तैयो एतए देल जा रहल अछि। पंकज पराशर उर्फ.....डगलस केलनर उर्फ अरुण कमल उर्फ... डगलस केलनरक नीचाँक आलेखकक पंकज पराशर द्वारा चोरि सिद्ध कएलक जे एक दशक पहिने एहि लेखक द्वारा अरुण कमलक चोरि सँ आइ धरि हुनकामे कोनो तरहक परिवर्तन नहि आएल छन्हि। हँ, आब ओ पटना विश्वविद्यालयक प्रोफेसरक रचना चोरेबासँ आगाँ बढ़ि गेल छथि आ कैलिफोर्निया वि.वि.क प्रोफेसरक रचना चोराबए लागल छथि। एहि सन्दर्भमे हमरा एकटा खिस्सा मोन पड़ैत अछि। २०-२२ बरख पुरान सत्य कथा। दरभंगामे रहैत रही, छतपर हम आ हमर एकटा पिसियौत भाइ साँझमे ठाढ़ रही। सोझाँमे सरवनजीक घरक बाअड़ीमे खूब लताम फड़ल छलन्हि। हमर पिसियौत भाइ हुनका इशारा दऽ कहलखिन्ह जे दस टा लताम आनू। ओ बेचारे दसटा लताम तोड़लन्हि आ आबि रहल छलाह आकि रस्तामे हमसभ देखलहुँ जे एकटा छोट बच्चा संग हुनका किछु गप भेलन्हि आ ओ पाँचटा लताम ओहि बच्चाकेँ दऽ देलखिन्ह। जखन सरवन जी अएलाह तँ कहलन्हि जे ओ बच्चा हुनका भैया कहि सम्बोधित कएलकन्हि आ पाँचटा लताम मँगलकन्हि- से कोना नञि दितियैक- सरवनजीक कहब छलन्हि। आब पंकज पराशर प्रसंगमे की भेल से देखी। प्रदीप बिहारीजीक बेटा प्रणवकेँ पंकज पराशर नोम चोम्स्की आ डगलस केलनरक रचना दैत छथिन्ह आ तकर अनुवाद करबा लेल कहै छथिन्ह। बेचारा जान लगा कऽ अनुवाद कऽ दैत छन्हि, ई सोचि जे जिनका ओ चच्चा कहै छथि- जे क्रान्तिकारी विचारक छथि (मार्क्सवादी!!!) से कोनो नीक पत्रिकामे ई अनुवाद छपबा देथिन्ह। मुदा छह मासक बाद चच्चाजी कहै छथिन्ह जे नोम चोम्स्की बला रचना हेरा गेल आ डगलस केलनर बला रचनाक अनुवाद नञि नीक रहए से रिजेक्ट भऽ गेल। मुदा क्रान्तिकारी कवि (चोरुक्का सेहो विवरण नीचाँमे अछि) दुनू रचना पहल पत्रिकामे पठा दै छथि- पहल-८६ मे डगलस केलनर बला रचना छपितो छन्हि (आ से अनुवादक रूपमे नहि वरन् मूल लेखकक रूपमे) आ ओ बैन सेहो कऽ देल जाइ छथि। हमर सरवन जी एकटा बच्चा द्वारा भैया कहलापर पाँचटा लताम ओकरा दऽ दै छथिन्ह मुदा हमर पराशरजी भातिजोक पाँचटा लताम निर्लज्जतासँ छीनि लैत छथि। आ हम हुनकर खिजबीन तखन करै छी जखन ओ विदेहमे आइडेन्टिटी बदलि हमरा गारि पढ़ैत छथि- हुनकर रियल आइडेन्टीटी नाङट करै छी। फेर सभसँ गप करै छी आ पाठकक सहयोगसँ आरम्भ, पहल क पुरान अंक भेटि जाइत अछि जतए हिनकर कुकृत्य छन्हि।। Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles, Box 951521, 3022B Moore Hall, Los Angeles, CA 90095-1521, Fax 310 206 6293 Phone 310 825 0977, http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html Intellectuals, the New Public Spheres, and Techno-Politics The category of the intellectual, like everything else these days, is highly contested and up for grabs. Zygmunt Bauman contrasts intellectuals as legislators who wished to legislate universal values, usually in the service of state institutions, with intellectuals as interpreters, who merely interpret texts, public events, and other artifacts, deploying their specialized knowledge to explain or interpret things for publics (1987; 1992). He thus claims that there is a shift from modern intellectuals as legislators of universal values who legitimated the new modern social order to postmodern intellectuals as interpreters of social meanings, and thus theorizes a depoliticalization of the role of intellectuals in social life. ....... अरुण कमल Arun lives in Patna where he teaches English at the Science College of Patna University. नए इलाके में जहाँ रोज बन रहे नये नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंजिला चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता रोज कुछ घट रहा है यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ जैसे वैशाख का गया भादो को लौटा हूँ और पूछो - क्या यही है वो घर? आ चला पानी ढहा आ रहा अकास शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर मैथिली भाषा-साहित्य के पाठक आ लेखक बंधु केँ की एहि प्रश्न सबहक उत्तर अवश्य जानबाक चाही। पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... नामक एहि व्यक्तिक बहुत रास कच्चा चिट्ठा –जेना एम.ए.मे प्रथम श्रेणीमे सर्वोच्च स्थान?? पत्रकारिताक कोर्स?? ई सभ नटबरलालक तर्जपर!! जे.एन.यू.क लड़कीसँ हिन्दी अनुवाद कराएब जे एहिसँ नोकरी भेटि जएतैक आ फेर तकरा अपना नामसँ छपबा लेब, प्रणवसँ डगलस केलनरक आ नोम चोम्स्कीक अनुवाद करबाएब आ अपना नामसँ छपबा लेब, अरुण कमल, श्रीकान्त वर्मा, इलारानी सिंह, गजेन्द्र ठाकुर आदिक रचना चोरि करब। ई सभ लेखक सभसँ हुनकर परिवारजनसँ कहै छन्हि जे अनुवाद लेल कथा-कविता दिअ आ फेर तकरा चोरा कऽ अपना नामसँ छपबा लैत अछि। हिन्दीमे बैन भेलाक बाद मैथिलीक सेवा! गौरीनाथकेँ पहिने गारि पढ़ै छन्हि आ फेर लिखित माफी मँगै अछि। पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर क ई हाल छै जे रमण कुमार सिंहकेँ ओकरापर कविता लिखै पड़ै छन्हि ..ककरासँ की चोरेने छी जे अनिद्रा पैसि गेल? अविनाश केँ गारि , श्रीधरम आ अनलकान्त केँ गारि , रामदेव झा केँ गारि , राजमोहन झा आ राजनन्दन लाल दास केँ गारि , सुभाषचन्द्रयादव-केदार कानन- तारानन्द झा तरुण- प्रोफेसर महेन्द्र- रमेश सभकेँ गारि- मैथिली सर्जनामे रामदेव झाकेँ गारि पढ़ैत सहरसा चिट्ठी आ सहरसा सभक साहित्यकारकेँ गारि पढ़ैत रामदेव झाकेँ चिट्ठी, ई दुनू चिट्ठी संगे छपल!! चोरक सीना जोड़बाक एहिसँ नीक उदाहरण भेटब मोश्किल। पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ.....क यथार्थ। # आख़िरी सफ़र पर निकलने तक / # पुरस्कारोत्सुकी आत्माएँ / # बऊ बाज़ार # मरण जल / # रात्रि से रात्रि तक # साला सब हँसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीख़ता छोड़कर / # हस्त चिन्ह / उर्फ श्वान रूप संसार है भूंकन दे झख मार उर्फ कुफ्र कुछ चाहिए ...की रौनक के लिए उर्फ गोयबल्स उर्फ कारेल चापेक उर्फ अपन कारी मुँह उर्फ मोहल्ला लाइव उर्फ पतनुकान उर्फ उदय प्रकाश उर्फ पहल उर्फ रवि भूषण उर्फ निराला उर्फ वर्चुअल स्पेस। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... हिनकर रियल आइडेन्टिटी हम नाङट करै छी आ ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। एहि ब्लैकमेलरक डॉ. जेकील आ मिस्टर हाइड बला चरित्र मैथिल सर्जनाक विरोधमे मैथिल-जन पत्रिकामे एक दशक पहिने उजागर भऽ गेल छल मुदा लोक हिनका पोसैत रहल। आरम्भमे सेहो ई एकटा चिट्ठी मैथिलीक सम्पादकक विरोधमे देलन्हि जे छपि गेल आ ओकर घृणित भाषाक कारण भाइ साहेब राजमोहन झाकेँ माफी माँगए पड़लन्हि आ फेर ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि। एकटा आग्रह आ आह्वान: सुभेश कर्ण आ समस्त मैथिली-प्रेमी-गण- एहि मिस्टर हाइडक ब्लैकमेलिंग आ एब्युजक द्वारे अहाँ सभकेँ मैथिली छोड़ि कऽ जएबाक आवश्यकता नहि अछि, कारण पापक घैला भरि गेलाक बाद ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। जे.एन.यू.मे छात्र-छात्रा सभसँ पोस्टकार्ड पर साइन लऽ ओहिपर अपन रचना लेल प्रशंसा-पत्र पठबैत घुमैत अपस्याँत कथित गोल्ड मेडेलिस्ट(!!!)। पहिल कथा गोष्ठीमे जखन ई सहरसामे सभसँ पुछने फिरै छथि जे साहित्यकार बनबासँ की-की सभ फाएदा छै तखन ई एकटा पाइ आ पुरस्कारक लेल अपस्याँत मैथिल युवा-पीढ़ीक प्रतिनिधित्व करै छथि, जे राजमोहन झा जीक शब्दमे मैथिलीसँ प्रेम नञि करैत अछि। ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि आ जखन ओ माफ कऽ देलखिन्ह तखन फेर हुनका गारि पढ़ब शुरु कऽ देलन्हि। हमरासँ लिखित मेल-माफी अस्वीकार भेलाक बाद मिस्टर हाइडक माथ नोचब स्वाभाविके। जे सरकारी नोकरी वा इन्कम-टैक्स, कस्टममे ई ब्लैकमेलर रहितए तँ देश जरूर बेचि दैतए। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... DO YOU KNOW "Fake Sahityakar" PANKAJ KUMAR JHA ALIAS PANKAJ PARASHAR.DO YOU KNOW WHAT THIS FAKE GOLD MEDALIST DID AT VASANT MAHILA COLLEGE, KADAMBINI, DAINIK BHASKAR AND DAINIK JAGRAN ? DO YOU KNOW WHAT HE DID WITH HIS FAMILY, FRINDS AND COLLEAGUES. READ the following to believe it. this mentally corrupt should be treated in the same manner... pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com besides other fake emails used by Pankaj Parashar on ISP 220.227.174.243” See his level. अहां कें सूचनार्थ पठेने छी जे पंकज पहिनेहो इ सब काज करैत रहय छलैए।- aavinash एहि चोर लेखक पंकज पराशरक दिमागी हालतिक असली रूप एतऽ सेहो भेटत जतए ओ नाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल (साभार-अविनाश)। Search Comments 220.227.174.243 · All · Pending (0) · Approved · Spam (0) Search Comments: Author Comment In Response To ranvijay ranvijay@rediff.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/09/02 at 5:07pm क्यूँ बे मादरचोद, रंडी की औलाद जिसका gauravshaali इतिहास होगा वही श्रेष्ठ की बात करेगा न मादरचोद....तू साले आदिवासी मादरचोद क्या बात करेगा श्रेष्ठ की, साले vanmaanush अपनी शकल देखि है कितनी कुरूप लगती है तेरे सूअर साथी अविनाश की तरह, मादरचोद....bhaunkna बंद कर.... In Response To ranvijay ranvijay@rediff.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/09/02 at 5:11pm अबे मादरचोद jagdeeshsvar चतुर्वेदी, उर्फ़ रंडी की औलाद, मादचोद किस naali में पैदा हुआ था सिवाय आलोचना और बकचोदी के तुझे कुछ आता है मके लौंडे.....कुछ काम कर जिससे सबका भला हो मादरचोद या तो नया नया कंप्यूटर चलाना सीखा है या अपने बलात्कारी दोस्त avinaash के साथ milkar चुदाई का धंधा चला रहा है इसीलिए इतना भौं रहा है माके लौंडे... जनसत्ता के बारे में अर्धसत्यों से बचो 22# चार्वाक सत्य binmst@yahoo.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/31 at 3:42pm जो आदमी हर मर्ज की दवा जाति को ही समझता हो, जातिवाद के धंधे में ही गले-गले तक डूबा हो उसका क्या शेष कुछ बचा रह गया है क्या? ऐसे रंगे सियारों को कम से कम प्रभाष जोशी और आलोक तोमर जैसे सम्मानित और विद्वान पत्रकार की आलोचना करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। नफरत और जहरबुझी भाषा से इस कथित लेखक की मंशा समझी जा सकती है। आलोक तोमर जी, कहां से आती है यह भाषा? 8# चार्वाक सत्य binmst@yahoo.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/29 at 4:59pm प्रभाष जी की आलोचना से या आलोक तोमर की आलोचना से कुछ हासिल नहीं होनेवाला है. इससे हिंदी समाज का क्या भला हो रहा है? इस तरह आरोप-प्रत्यारोप से पाठकों का क्या लेना-देना है? बहस को एक मुकाम पर पहुंचाकर, अगली यात्रा पर निकल जाना चाहिए. कौन है ये मवालियों की भाषा बोलने वाला आलोक तोमर? 21# Pankaj Parashar pkjpp@yahoo.co.in 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/28 at 6:21pm मृत्युंजय, कल लिखी मेरी प्रतिक्रिया की अंतिम पंक्तियां हैं- हां, एक तकनीकी बात यह हो सकती है कि इन लोगों को सामान्य कोटे से बहाल किया गया हो। मैंने यह अनभिज्ञता जाहिर की, कि हो सकता है उनकी नियुक्ति सामान्य श्रेणी में हुई हो, जिसकी कोई सूचना मुझे नहीं है. इसमें न तो किसी कथित प्राब्लम शब्द का जिक्र कहीं है और न मेरे चेतन या अवचेतन में वह बातें हैं, जो व्याख्या की पोलिमिक्स के तहत आप कह रहे हैं। मनचाही व्याख्या और अनचाही सलाह से बचना चाहिए. इस संदर्भ में अनायास मनमानी व्याख्या का विरोध करती सूसन सौंटेग की 1966 में प्रकाशित पुस्तक Against Interpretation and Other Essays. की याद आ गई। खुदा खैर करे. जेएनयू का सच : होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे 16# Pankaj Parashar pkjpp@yahoo.co.in 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/27 at 6:34pm बाकी सेंटर्स और स्कूल की सूचनाओं से फिलवक्त मैं अपडेट नहीं हूं, क्योंकि कैंपस गए हुए महीनों गुजर जाते हैं। पर भारतीय भाषा केंद्र से तो वाकिफ हूं. सूची में दिखाया गया है कि अनुसूचित जाति से एक भी एसोशिएट प्रोफेसर नहीं हैं, जबकि पी-एच.डी में मेरे शोध निर्देशक रहे डॉ.गोबिंद प्रसाद अनुसूचित जाति से हैं और वे बाकायदा रीडर हैं। दूसरी ओर सूची में दिखाया गया है कि एक भी ओबीसी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं हैं, जबकि रूसी केंद्र में हमारे एक साथी हैं। मेरा ख्याल है कि ऐसे नाम और भी कई हैं जो सूची की त्रुटियों को साफ-साफ उजागर करते हैं। हां, एक तकनीकी बात यह हो सकती है कि इन लोगों को सामान्य कोटे से बहाल किया गया हो। जेएनयू का सच : होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे 16# Rafugar jinita@yahoo.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/25 at 5:35pm यार मामला व्यक्तिगत होता जा रहा है . बहस कहाँ से कहाँ जा रही है? ब्राह्मणों, हज्जामों, ठाकुरों….यानी जातिवाद ही सत्य है …महज यही तो भारत का सत्य नहीं है. प्रभाष जी की मति भ्रष्ट हो गयी है, आप सब रहम करें 53# michal chandan chandan25s@gmail.com 220.227.174.243 Submitted on 2009/08/20 at 4:18pm भाई लोग, आप सब माने या ना माने परन्तु इस सत्य को आप अब स्वीकार करे की प्रभात जोशी नाम के वह महान पत्रकार-संपादक-चिंतक अब पूरी तरह से सठिया गए है। पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर आजकल उनका उजूल-फिजूल लिखना, कभी किसी अखबार और उनके मालिकों को टारगेट कर आलोचना करना, कभी झारखंड के एक अखबार के बारे में कसीदे लिखना और अब अपने मनुवादी भद्दे चेहरे को सबके सामने पेश कर चर्चा में बने रहना इनके सठियेपन की निशानी नहीं है तो क्या है। प्रभाषजी के विचार मानवताविरोधी हैं 30# Bottom of Form मैथिल आर मिथिला ब्लॉग मॉडेरेटर- ऊपरका सूचनाक अतिरिक्त चोरिक रचना जे हम एकटा ब्लॉगमे...मे पकरलौ तकर बाद ओ धूर्त लेखक एडिट कय ओकरा बदसूरत कविताक शक्ल द देलक, सम्पादक हमर प्रमाण के उरा देलक आ अपन जातिवादी हेबाक फेर प्रमाण देलक आ आब बशीर बद्र के एकटा कविता जातिवादी लोकनि द्वारा चोरा कय अपना नाम करबाक सूचना आयल अछि, ओ अपन गल्ति स्वीकरत वा फेर अपन रचना एडिट करत देखा चाही हम हाजिर होयब अहंक समक्ष शीघ्र... जातिवादी सोच के मारय टा परत मिथिलाक विकास लेल. जाबशीर बद्र के कविता जातिवादी लोकनि द्वारा चोरा कय अपना नाम करबाक सूचना आयल छल आ हम कहने रही जे ओ अपन गल्ति स्वीकरत वा फेर अपन रचना एडिट करत देखा चाही हम हाजिर भेल छी अहंक समक्ष, चोर महाराजक टटका रचनापर चोर महाराजक मौसेरा भाइक कमेंट आयल अछि जाहि से ई सिद्ध भेल जे ओ इशारा बुझि गेल जे ओकरो चोरि पकडा गेलैक। एकरे कहए छै चोर-चोर मौसेरा भाइ।- मैथिल आर मिथिला ब्लॉग सँ पंकज पराशरकेँ निकालल जा रहल अछि।- मैथिल आर मिथिला ब्लॉग मॉडेरेटर Recently Some Maithil Brahmin Samaj Organisation has started selling prizes in the name of Yatri (Vaidyanath Mishra, Nagarjun) and Kiran (Kanchinath Jha) . There has been trend recently to grant these prizes to those intellectual thiefs who are basically opposed to the ideology's of Kiran and Yatri (Nagarjun). The caste based organisations are killing the spirit of Yatriji and Kiranji, recently the fraud Pankaj Jha alias Pankaj Kumar Jha alias Pankaj Parashar alias Dr. Pankaj Parashar) was stage managed to get this casteist award, The lecturer of Hindi at Aligarh Muslim University, just appointed as adhoc staff, will teach now how to lift verbatim articles of Noam Chomsky and Douglas Kellner and poems of Illarani Singh, Rajkamal Chaudhary, Gajendra Thakur and Arun Kamal to his students. His Samay ke akanait (समय केँ अकानैत) is lifted from Magadh of Srikant Verma (श्रीकान्त वर्मा- मगध) and his Vilambit Kaik Yug me Nibaddha (विलम्बित कइक युग मे निबद्ध) is collection of pirated poems of Illarani Singh, Rajkamal Choudhary, Gajendra Thakur, Srikant Verma and others.ई संग्रह इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, गजेन्द्र ठाकुर, राजकमल चौधरी आदि कविक पंकज पराशर द्वारा चोराएल रचनाक कारण बैन कए देल गेल। "रचना"पत्रिकाक कथित अतिथि सम्पादकक रूपमे पंकज पराशर द्वारा कवि-कहानीकार सभसँ रचना सेहो मँगबाओल गेल आ तकरा अपना नामसँ छपबाओल गेल। ई छद्म साहित्यकार पराशर गोत्रक (!!)पंकज कुमार झा उर्फ पंकज पराशर बहुतो लेखकक अप्रकाशित रचना अनुवाद करबा लेल सेहो लेलक आ अपना नामेँ छपबा लेलक। पाठकक आग्रहपर आर्काइवमे ई तथ्य राखल जा रहल अछि।– सम्पादक, विदेह अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण ४. विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण सूचना Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. - Robert Louis Stevenson ............................................ Videha: Maithili Literature Movement Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. १ "विदेहक जीवित साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी- रंगमंच-निर्देशक पर विशेषांक शृंखला" विदेह अपन ३६९ म (०१ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक अशोक पर आ ३७० म (१५ मई २०२३) अंकमे मैथिली लेखक राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' पर विशेषांक निकालत। विशेषांक लेल रचनाकार/ कलाकर्मीक काज, रचना-संपादन, संस्मरण आ अन्य रचनात्मक कार्यपर सभ प्रकारक रचना (संस्मरण, आलोचना, समालोचना, समीक्षा आदि) आमंत्रित अछि। अहाँ अपन रचना ३६९म अंकक विशेषांक लेल २४ अप्रैल २०२३ धरि आ ३७०म अंकक विशेषांक लेल ८ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। विदेह अरविन्द ठाकुर विशेषांक विदेह जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक विदेह रामलोचन ठाकुर विशेषांक विदेह राजनन्दन लाल दास विशेषांक विदेह रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक विदेह केदार नाथ चौधरी विशेषांक विदेह प्रेमलता मिश्र प्रेम विशेषांक विदेह शरदिन्दु चौधरी विशेषांक -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA २ "विदेह द्वारा एक बेरमे कोनो एकटा संस्थाक समग्र मूल्याकंन शृंखला" विदेह अपन ३७१ म (०१ जून २०२३) अंकमे "मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.)" पर विशेषांक निकालत। मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एम.एस.यू.) पर निच्चा लीखल बिंदुपर मैथिलीमे आलेख आमंत्रित अछि। १) एम.एस.यू. केर गठनक प्रमाणिक इतिहास, २) एम.एस.यू. आ मिथिला केर नव चेतना, ३) एम.एस.यू. आ विभिन्न जाति केर समन्वय, ४) एम.एस.यू. द्वारा भेल विभिन्न आंदोलन आ तकर लेखा-जोखा एवम् ओकर प्रभाव बा ५) एम.एस.यू. संदर्भित आन कोनो लेख। ३७१म अंकक विशेषांक लेल अहाँ अपन रचना २५ मई २०२३ धरि वर्ड फाइलमे ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छी। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ३ "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला विदेह अपन जीवित रचनाकार/ कलाकर्मी पर विशेषांक शृंखलाक अन्तर्गत (१)अरविन्द ठाकुर, (२)जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, (३)रामलोचन ठाकुर, (४) राजनन्दन लाल दास, (५)रवीन्द्र नाथ ठाकुर, (६) केदार नाथ चौधरी, (७) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' आ (८) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक निकालने अछि। अही सन्दर्भमे आठो साहित्यकार पर "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत "मोनोग्राफ" आमंत्रित कयल जा रहल अछि। "विदेह मोनोग्राफ" शृंखलाक विवरण निम्न प्रकार अछि: (१) इच्छुक लेखक ऊपरमे कोनो एक रचनाकार पर अपन मोनोग्राफ लिखबाक इच्छा editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकै छथि। मोनोग्राफ लिखबाक अवधि सामान्यः एक मास रहत। (२) विदेह आठ रचनाकारपर आठ लेखकक नाम मोनोग्राफ लिखबाक लेल चयनित कऽ ओकर सार्वजनिक घोषणा करत। "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक निअम: (१) मोनोग्राफ पूर्ण रूपेँ रचनाकारपर केन्द्रित हुअय। साहित्य अकादेमी, एन.बी.टी. आ किछु व्यक्तिगत रूपेँ लिखल मोनोग्राफ/ बायोग्राफीमे लेखक संस्मरण आ व्यक्तिगत प्रसंग जोड़ि कय रचनाकारक बहन्ने अपन-आत्म-प्रशंसा लिखैत छथि। "विदेह मोनोग्राफ" फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल सन रहत। फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल एहेन एकमात्र टूर्नामेण्ट अछि जतय कोनो "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" सेरीमनी नै होइत छै आ तकर कारण छै जे "ओपेनिंग" बा "क्लोजिंग" मे टूर्नामेण्टमे नै खेला रहल लोक मुख्य अतिथि/ अतिथि होइत छथि आ फोकस खिलाड़ी सँ दूर चलि जाइत अछि। फीफा मात्र आ मात्र फुटबाल खिलाड़ीपर केन्द्रित रहैत अछि से ओकर टूर्नामेण्ट "ओपेनिंग सेरीमनी" नै वरन् सोझे "ओपेनिंग मैच" सँ आरम्भ होइत अछि आ ओकर समापन "क्लोजिंग सेरीमनी"सँ नै वरन् "फाइनल मैच आ ट्राफी"सँ खतम होइत अछि आ फोकस मात्र आ मात्र खिलाड़ी रहैत छथि। तहिना "विदेह मोनोग्राफ" मात्र आ मात्र ऐ "सातो रचनाकार"पर केन्द्रित रहत आ कोनो संस्मरण आदि जोड़ि कऽ फोकस रचनाकारसँ अपनापर केन्द्रित करबाक अनुमति नै रहत। (२) मोनोग्राफ लेल "विदेह पेटार"मे उपलब्ध सामग्रीक सन्दर्भ सहित उपयोग कयल जा सकैए। (३) विदेहमे ई-प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' ई-पत्रिकामे प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। (४) "विदेह मोनोग्राफ"क फॉर्मेट: रचनाकारक परिचय (रचनाकारक जन्म, निवास-स्थान आ कार्यस्थलक भौगोलिक-सांस्कृतिक विवेचना सहित) आ रचनावली (समीक्षा सहित)। घोषणा: "विदेह मोनोग्राफ" शृंखला अन्तर्गत (१) राजनन्दन लाल दास जी पर मोनोग्राफ निर्मला कर्ण, (२) रवीन्द्र नाथ ठाकुर पर मुन्नी कामत आ (३) केदार नाथ चौधरी पर प्रेम मोहन मिश्र द्वारा लिखल जायत। मैथिली पुत्र प्रदीप पर "विदेह मोनोग्राफ" लिखताह प्रेमशंकर झा "पवन"। शेष ५ गोटेपर निर्णय शीघ्र कएल जायत। घोषणा २: ओना तँ मैथिली पुत्र प्रदीप पर विदेह विशेषांक नै निकालने अछि, मुदा हुनकर अवदान केँ देखैत प्रेमशंकर झा "पवन"क हुनका ऊपर "विदेह मोनोग्राफ" लिखबाक विचार आयल तँ ओकरा स्वीकार कयल गेल। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४ (१) विदेह द्वारा जे विशेषांक प्रकाशित होइ छै तकर संगे विदेह ओहन लेखक-साहित्यपर अपन धेआन सेहो केंद्रित करत जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नै प्रकाशित भऽ सकल। ऐ नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- १) हम एकटा कोनो लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करब जकर भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी रहत। ऐ पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे ऐत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करत। २) ऐ शृंखलामे सुभाष चंद्र यादवपर केंद्रित "नित नवल सुभाष चंद्र यादव" एवं राजदेव मंडलपर केंद्रित "Rajdeo Mandal- Maithili Writer" प्रकाशित भेल अछि। दुनू पोथीक लोकार्पण ३१ दिसम्बर २०२२ केँ १११म सगर राति दीप जरय मे कएल गेल। ३)आगाँक घोषणा लेल http://videha.co.in/investigation.htm देखैत रही। कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) क शीर्षक भ्रामक अछि। ई हुनकर किछु सवर्ण उपन्यासकारपर किछु सिण्डिकेटेड कथित समीक्षात्मक आलेखक संग्रह अछि, २६३ पन्नाक ई पोथी हार्डबाउण्डमे लाइब्रेरीकेँ मात्र बेचल जा सकत, जतऽ ई सड़ि जायत, अमेजनसँ हम ई चारि सय पाँच टाकामे किनलौं मुदा ऐमे पाँचो पाइक सामिग्री नै अछि। एतऽ एकटा भूल सुधार अछि, एकटा गएर सवर्ण लेखक सुभाष चन्द्र यादवक उपन्यास 'गुलो'केँ बिनु पढ़ने ओ दू पाँति लिखलन्हि आ निपटा देलन्हि, ओ दुनू पाँति हम एतऽ अहाँक मनोरंजनार्थ प्रस्तुत कऽ रहल छी। अहाँ गुलो पढ़नहिये हएब, जँ नै पढ़ने छी तँ पहिने पढ़ि लिअ, कारण तखन बेशी मनोरंजक अनुभव हएत, गुलो सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। "उपन्यासक कमजोरी अछि लेखकक राजनीतिक पूर्वाग्रह। राजनीति विशेषक पक्षधरता रचनाक संग न्याय नहि कऽ पबैत अछि।" जइ उपन्यासमे राजनीति दूर-दूर धरि नै छै ओतऽ 'राजनैतिक पूर्वाग्रह' आ 'राजनीति विशेषक पक्षधरता'क तँ प्रश्ने नै छै। राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङर धूमकेतु आ यात्री प्रयुक्त केलन्हि। सुभाष चन्द्र यादव जीक 'भोट' जे २०२२मे आयल जे सुभाष चन्द्र यादव जीक अनुमति सँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवपर ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर, से राजनीतिपर अछि मुदा ओतहुओ सुभाषजीक भगता शैलीकेँ राजनीतिक पूर्वाग्रह बा पक्षधरताक सोङरक आवश्यकता नै पड़लै। पढ़ू हमर पोथी 'नित नवल सुभाष चन्द्र यादव' जे उपलब्ध अछि ऐ http://videha.co.in/pothi.htm लिंकपर। कमलानन्द झाक बिनु पढ़ने सुभाष चन्द्र यादवक विरुद्ध ब्राह्मणवादी जातिगत पूर्वाग्रह एकटा खतराक घण्टी अछि। जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। ई अपन बायोडाटामे गएर सवर्णसँ छीनि कऽ, समानान्तर धाराक लोकक हककेँ मारि कऽ लेल साहित्य अकादेमीक मैथिल अनुवाद असाइनमेण्टक गर्वसँ चर्चा करैत छथि। आ ई असाइनमेण्ट हिनका मेरिटसँ नै जातिगत टाइटिलसँ भेटल छन्हि, अही सभ किरदानीक एवजमे भेटल छन्हि। हिनका सन लोक लेल मैथिली बायोडेटाक एकटा पाँति अछि, समानान्तर धारा लेल जीवन-मरणक प्रश्न। आब अहाँ पुछब जे तकर प्रतिकार समानान्तर धारा केना केलक, ओ तँ कन्नारोहट नै करैए, तँ तकर उत्तर अछि हमर ३ टा पोथी जे १११म सगर राति दीप जरय मे लोकार्पित भेल ३१ दिसम्बर २०२२ केँ, वएह सगर राति दीप जरय जकरा साहित्य अकादेमी गत दस बर्खसँ गीड़ि लेबाक प्रयास कऽ रहल अछि। अहाँसँ ऐ तीनू पोथीपर टिप्पणी ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। पहिल दू पोथी मे राजदेव मण्डल आ सुभाष चन्द्र यादवक साहित्यक समीक्षा अछि जे हमर तेसर पोथी मैथिली समीक्षशास्त्रक सिद्धांतक आधारपर कएल गेल अछि। तीनू पोथीक लिंक नीचाँ देल गेल अछि। Rajdeo Mandal- Maithili Writer (Now with Supplement I & II) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (मिथिलाक्षर) मैथिली समीक्षाशास्त्र मैथिली समीक्षाशास्त्र (तिरहुता) संगमे पढ़ू कमलानन्द झा क ब्राह्मणवादपर प्रहार: दूषण पञ्जी- The Black Book दूषण पञ्जी- The Black Book (मिथिलाक्षर) -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४(२) नित नवल दिनेश कुमार मिश्र दिनेश कुमार मिश्रक 'दुइ पाटन के बीच मे' कोसी नदीक ऐतिहासिक आत्मकथा थीक, ओ मिथिलाक आन धार सभक ऐतिहासिक आत्मकथा सेहो लिखने छथि जेना बन्दिनी महानन्दा, बागमती की सद्गति!, दुइ पाटन के बीच में.. (कोसी नदी की कहानी), न घाट न घर, बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी, भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूंक, The Kamla River and People On Collision Course, Bhutahi Balan- Story of a ghost river and engineering witchcraft, Refugees of the Kosi Embankments। साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य पंकज झा पराशर द्वारा हिनकर पोथी सभसँ पैराक पैरा मैथिली अनुवाद कऽ अपना नामे उपन्यास छपबाओल गेल अछि, जकरा छद्म समीक्षक कमलानन्द झा ऐ चोर लेखकक रिसर्च कहै छथि! एतऽ स्पष्ट कऽ दी जे ई चोर लेखक आ छद्म समीक्षक दुनू अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालयक हिन्दी विभागमे छथि। ई रिसर्च दिनेश कुमार मिश्रक थीक, जे आइ.आइ.टी. खड़गपुरसँ सिविल इन्जीनियरिङ मे बी. टेक. १९६८मे आ स्ट्रक्चरल इन्जीनियरिङमे एम.टेक. १९७०मे केने छथि, आ ओइ रिसर्च लेल क्वालिफाइड छथि। जखन कोनो विषयमे नामांकन नै होइ छै तखन लोक हारि-थाकि हिन्दीमे नामांकन लइए, नै तँ कमलानन्द झा केँ बुझऽ मे आबि जइतन्हि जे ई रिसर्च कोनो सिविल इन्जीनियरेक भऽ सकैत अछि, भऽ सकैए बुझलो होइन्ह। हिन्दी मूल आ मैथिलीक स्क्रीनशॉट आँगा संलग्न अछि। दिनेश कुमार मिश्र मिथिलाक नै छथि मुदा मिथिलाक सभ धारक कथा ओ लिखने छथि, हम सभ हुनका प्रति कृतज्ञ छी आ हुनकर ऋणसँ मिथिलावासी कहियो उऋण नै भऽ सकता, मुदा मूलधाराक पुरस्कार आ पाइ लोलुप लोकसँ कृतघ्नते भेटत से फेर सिद्ध भेल। ऐ लेखककेँ दस बारह बर्ख पहिने सेहो तारानन्द वियोगी उद्धारक भेटल छलखिन्ह जे लिखने रहथिन्ह जे ओ कवितामे प्रभावित भऽ अनायासे अपन रचनामे दोसरक सामिग्री चोरि कऽ लइ छथि, एहने सन। आब ऐ कमलानन्द झा क आश्रय तकलन्हि मुदा दुर्भाग्य! जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। सीलिंगसँ बचबा लेल जमीन-जत्थाबला लोक कम्यूनिस्ट बनला आ आब ब्राह्मणवाद बचेबालेल वामपंथक शरण, एहेन लोक सभसँ कम्यूनिज्मकेँ बहुत नुकसान भेल छै। दिनेश क़ुमार मिश्रक सभटा पोथी आब हुनकर अनुमतिसँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमेः http://videha.co.in/pothi.htm एतऽ एकटा गप मोन पाड़ि दी जे जखन बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे की ओ एक्स बॉक्स भारतमे पाइरेशीक डरसँ देरीसँ आनि रहल छथि? तँ हुनकर उत्तर रहन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेशीक डरे कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। से विदेह पेटारमे हम सभ ऐ तरहक रिस्क रहितो एकरा आर समृद्ध करैत रहब, कारण समानान्तर धारामे सड़ल माँछ द्वारे पोखरिक सभ माँछ नै सड़ैए, एतुक्का मलाह गोट-गोट कऽ सड़ल माँछ निकालैत रहल छथि, निकालैत रहता। सिण्डीकेटेड समीक्षापर अन्तिम प्रहार। मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): यह ध्यान देने की बात है कि 1923 से 1946 के बीच कोसी क्षेत्र में मलेरिया से 5,10,000, कालाजार से 2,10,000, हैजे से 60,000 तथा चेचक से 3,000 मौतें (कुल 7,83,000) हुईं। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०३)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 12वीं शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था और इस काम के लिए उसने प्रजा से 'बीर' की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर बांध' कहलाया। इस तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (1810-11) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (1877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था कि इस तटबन्ध का निर्माण कार्य एकाएक रोक दिया गया होगा। छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा चोर उपन्यासकारक पीठ ठोकब, देखू छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा उद्धृत चोर पंकज झा पराशर (मैथिली उपन्यास, समय, समाज आ सवाल पृ. २५७-२५८): चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. ३१)]: मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): कोसी के प्रवाह कि भयावहता की एक झलकफिरोजशाह तुगलक की फौज के सन् 1354 में बंगाल से दिल्ली लौटने के समय मिलती है। बताया जाता है कि जब सुल्तान की फौजें कोसी के किनारे पहुँचीं तो देखा कि नदी के दूसरे किनारे पर हाजी शम्सुद्दीन इलियास की फौजें मुकाबले के लिए तैयार खड़ी हैं। यह वही हाजी शम्सुद्दीन थे जिन्होंने हाजीपुर तथा समस्तीपुर शहर बसाये थे। फिरोज की फौजें शायद कुरसेला के आस-पास किसी जगह पर कोसी के किनारे सोच में पड़ गईं। नदी की रफ्तार उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही थी। आखिरकार फैसला हुआ कि नदी के साथ-साथ उत्तर की ओर बढ़ा जाय और जहाँ नदी पार करने लायक हो जाय वहाँ पानी की थाह ली जाये। सुल्तान की फौजें प्रायः सौ कोस ऊपर गईं और जियारन के पास, जो कि उसी स्थान पर अवस्थित था जहाँ नदी पहाड़ों से मैदानों में उतरती थी, नदी को पार किया। नदी की धारा तो यहाँ पतली जरूर थी पर प्रवाह इतना तेज था कि पाँच-पाँच सौ मन के भारी पत्थर नदी में तिनकों की तरह बह रहे थे। जहाँ नदी को पार करना मुमकिन लगा उसके दोनों ओर सुल्तान ने हाथियों की कतार खड़ी कर दी और नीचे वाली कतार में रस्से लटकाये गये जिससे कि यदि कोई आदमी बहता हुआ हो तो इस रस्सों की मदद से उसे बचाया जा सके। शम्सुद्दीन ने कभी सोचा भी न था कि सुल्तान की फौजें कोसी को पार कर लेंगी और जब उस को इस बात का पता लगा कि सुलतान की फौजों ने कोसी को पार करने में कामयाबी पा ली है तो वह भाग निकला। चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०५)]: (... शीघ्र अही लिंकपर आर स्क्रीनशॉट अपडेट कएल जायत।) विदेहक ३६३ म अंक दिनांक ०१ फरबरी २०२३ सँ प्रारम्भ... नित नवल दिनेश कुमार मिश्र http://videha.co.in/ विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) पर। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ४ (३) नित नवल सुशील कमलानन्द झाकेँ हम किए छद्म समीक्षक कहलियनि? कारण ओ छद्म समीक्षक छथि। ओ लिखै छथि- "मैथिली उपन्यास-यात्राक लगभग सय वर्षक बाद मैथिल अन्तरजातीय विवाहक सपना, संघर्ष आ विडम्बना पर गरिमायुक्त उपन्यास लिखबाक श्रेय गौरीनाथकेँ जाइत छनि।" तँ की कमलानन्द झा सुशीलसँ ई श्रेय छीनि लेलनि? की ई हुनकर ब्राह्मणवादी संस्कारक अहंकार- जे हम ककरो चढ़ा सकै छिऐ आ ककरो उतारि सकै छिऐ- केर पराकाष्ठा थीक, आकि हुनकर अध्ययनक अभावक प्रमाण? चलू अहाँकेँ लऽ चली कमलानन्द झा केर स्वार्थी दुनियाँसँ दूर, छल-छद्मसँ दूर सुशीलक जादूबला साहित्यक निश्छल दुनियाँमे। अहाँक स्वागत अछि सुशीलक साहित्यक दुनियाँमे। प्रस्तुत अछि सुशीलक 'गामबाली' (१९८२) जे आब उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमे लिंक http://videha.co.in/pothi.htm पर। पहिल पाँतीमे उपन्यास आरम्भसँ पहिनहिये 'गामबाली' उपन्यासक सम्बन्धमे सुशील लिखै छथि- "विधवा विवाह आ अन्तर्जातीय विवाहक समर्थनमे।" आ उपन्यास आरम्भ। गामबालीक मृत्यु आ तखने झमेला, गामबालीक दाह संस्कार के करतै? ब्राह्मण समाज कि जादव समाज? मैथिलीक सिण्डीकेटेड समीक्षापर अन्तिम प्रहार। विदेहक ३६३ म अंक दिनांक ०१ फरबरी २०२३ सँ प्रारम्भ... नित नवल सुशील http://videha.co.in/ विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) पर। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA ५ संजू दास जीक चित्रकलापर बहस चलि रहल अछि। किछु गोटे एकरा अश्लील मानि रहल छथि तँ किछु गोटे एकरा कलाक स्वतंत्र हेबाक परिचायक मानै छथि। विदेह दूनू पक्षसँ टाइप कएल आलेखक अपील कऽ रहल अछि, आलेख तथ्यपरक हेबाक चाही। व्यक्तिगत लगाव बा दुश्मनी बला आलेख नै हुअय। अपन आलेख editorial.staff.videha@gmail.com पर सेहो पठाउ। ६ विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" विदेह "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" लेल निम्नलिखित विषयपर आलेख ई-मेल editorial.staff.videha@gmail.com पर आमंत्रित अछि। १. साहित्य, कला आ सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गएर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काज करबाक तरीका (घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक बा यथार्थ २. व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति ३. प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक ४. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सबहक आचरण ५. स्कूल-कॉलेजक मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूप- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति ६. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच-माला-माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा ७. लेखक सबहक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव , कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति ८. दलित एवं लेखिका सबहक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका ९. कोनो आन विषय। ७ विदेह ब्रॉडकास्ट लिस्ट विदेह WWW.VIDEHA.CO.IN सम्बन्धी सूचना लेल अपन whatsapp नम्बर हमर whatsapp no +919560960721 पर पठाउ, ओकर प्रयोग मात्र विदेह सम्बन्धी समाचार देबाक लेल कएल जाएत। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६४ म अंक १५ फरबरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८२ अंक ३६४)|| 209 210 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA
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हि. कवका जा फूल MS TA पढ़ल-लिखल आ सचेत पात्रक में ra aga कका कहैत छथिन, TATE बेर बारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन eter बंगाल के सेन वंशक शासक BAe जे 78% 205 ई. घरि शासन ली उपन्यास : समय समाज आ सवाल + 257 ही . = - हिन्दी विभागमे प्रोफेसरक पद पर Fre
भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 2c शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था. और इस काम के लिए उसने प्रजा से ‘dk’ की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर ate’ कहलाया। इस 'तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (7870-7) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था. कि. इस. cere का... निर्माण... कार्य एकाएक . रोक. दिया... गया... होगा।
* ब्ेश, तँँ सुनू । 7354 से फिरोजशाह grees के wits जस्बन व्वंगात्त सँँ faecit aR tect wer, ते कोसीक vere aga तेज रतन greet Sar sre कोसी के किनार पर पहुँचत्त, तँँ कोसीक otf पार से हाजी शम्सखद्दीन इत्नियास से सेना ुगल्लकी सेना सै सोकाव्यस्ता sare Aer उसस्तर-शस्त्र or कप लैयार we aS हाजी शम्सऊद्दीन were, जे छाजीपुर डा समस्तीपुर नगर व्वसौनें Teles | Forester चुगलक के सेना संभवत: कुरसेत्ता के उ्मास-पास कोसी के तेज ae Sa ae सोच्च से पड़ गेल after रफ्तार Sf aoe लुगल्तकी सेना केँ नदी पार ्करव्वाक fsa afr भ' रहत्न Se! staat: लुगत्तकी सेनापति तय sacs, जे नदीक किनारे- किनार उत्तर दिस eget जाय । जलय जा कप नदीक पा करने कस व्यूझि पड़, sie पानिक ere ret जायल । एक्ठि sien से फौज उतर दिस aga रहत्न ETT aaa ate sunt गेस्ताक व्वाद व्कोसी के पेट at शिकस्त geet कोसी उ्मोलक्ि पहाड़ a नीचाँ sate sf पानिक सैर के ora ufe ef कसत्त जा सकैए, जे पाँच-पाँच सय सनक ores ere Aare creat व्यक्ति रत्न wer । तुगात्तव्की सेनासति के जलय सदी पार ae करें Sram aaah, sity एक cnet से सैकड़ों टा हाथी केँ org ae’ देस्त Fer Aral aren लाइन से ages - व्वडकका रस्सा cee ket Fret, जे St seit पानि से भास् जायत, team के safer सँँ निकात्ति Ger जायत। ule तरहेँ फिरोजशार लुगत्नकव्क सेना कोसी पार कक गेल । हाजी शम्सखद्दीन सपनों से fe सोचने च्ल,जे तुगत्नकी सेना ra पार क' जायत | Shas हाजी शस्सठद्दीन BF पता लगलनै जे तुगत्तककी सेना HA पार ae? set उसक्छि, F sit St से पड़ा गेल । ले ae Sreftes से ज enc से wt’ seu waar aneaieears करे wer रखी जय पर ग |”
USA HA WS गप के AM बढ़बेत कहलखिन, ' फूल बाबू, कोसी नदीक बेसिन प्राचीन काल सँ मनुक्खक निवास लेल उपयुक्त स्थान रहल अछि। बारहम-तेरहम सदी मे भारत मे जखन कइक टा नदी सुखा गेल, तँ ओहि ठामक पशुचारक समाजक लोक एतय आबि कए बसलाह। तहिये सँ बढ़ैत जनसंख्या आ कोसी नदीक बदलैत प्रवाहक मध्य टकराहटि होमय लागल | नदीक अनियंत्रित धारा केँ लोक बाढ़ि बूझय लागल | पहिल बेर बारहम शताब्दी मे लक्ष्मणसेन द्वितीय कोसी ade पुबरिया किनार दिस ore बनौलनि | लक्ष्मणसेन द्वितीय बंगाल के सेन वंशक शासक छलाह, F778 सँ 7205 Heat धरि शासन कयनेँ छलाह। Ue बान्हक अवशेष sel एखनो भीमनगर सँ दू कोस पश्चिम मे देखि wha छी। एकटा पश्चिमी विद्वान फ्रांसिस बुकानन के अनुमान रहनि, जे ई are संभवत: कोनो किला के रक्षा हेतु बनाओल गेल होयत | मुदा बुकानन के मत SF Se, डब्लू. हंटर सहमत नहि भेलखिन। ओ साफ कहलखिन, जे कोसीक किनार पर are एहि दुआरे बनाओल गेल होयत, जे नदी पच्छिम दिस नहि ae’ लागय।' पढ़आ कका सँ मुँहजबानी wie रास ऐतिहासिक तथ्य सुनियो कए फूल बाबू सहमति मे मूड़ी नहि डोलेलखिन | जाहि सँ ओतय बैसल लोक सबहक उत्सुकता और बढ़ि गेलनि, जे गप मे एहेन कोन तथ्य Ue गेलै जे फूल बाबू संतुष्ट नहि भेलखिन ? लोक के बुझेलनि जे फूल बाबू शास्त्रार्थ के अखड़हा पर माटि फेकि teat छथिन। पढ़आ कका केँ आइ जोड़ीदार भेटि गेलनि! जलप्रांतर / 3l
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गे पंकज पराशरक पहिल उपन्यास “जतप्रांतर' (20i7) शोधपरक _ sore अछि। मैथिलीमे शोधपरक उपन्यास लिखबाक परम्परा Ale रहल _अछि। एहि दुआरे ई उपन्यास रेखांकन योग्य अछि । पराशरजी ue _उपन्यासमे कोसी नदीक aren इतिहास-कथा लिखलनि अछि। उपन्यासक बैशिष्ट्य ई जे बारहम शताब्दीसँ ल' क' आधुनिक काल धरि कोसी पर बान्ह ah दुसाध्य प्रयत्न, प्रशासनिक उठा-पटक, राजनीतिक cata Mee विस्तृत व्योरा रोचक कथाक माध्यम कहलनि aS | ध्यान देबाक तल ई जे सभटा सूचना आ व्योरा अत्यन्त विश्वसनीय oft पड़ल अछि। का आ फूल बाबू सदृश्य पढ़ल-लिखल आ सचेत पात्रक माध्यम नुसन्धानकें रखलनि अछि। दलान पर बैसल लोकक जिज्ञासाकें कका कहैत छथिन, “पहिल बेर बारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन fe पुबरिया किनार दिस are बनौलनि। लक्ष्मण सेन बुंशक शासक छलाह जे L78e 205 ई. धरि शासन
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चिदेह . देह ३६४ म अंक १५ फरबरी २०२३ (वर्ष १६ मास १८२ अंक ३६४) | | 49 Bs St RAT Oe _ bon ककका आ फूल TS, सदृश्य पढ़ल-लिखल आ सचेत पात्रक माध्यम om एहिं TETAS रखलनि AS | दलान पर बैसल लोकक जिज्ञासाकें Dna gen कका कहैत छथिन, “पहिल बेर बारहम शताब्दीमे लक्ष्मणसेन aaa कोसी नदीक पुबरिया किनार दिस are बनौलनि। लक्ष्मण सेन Beda बंगाल के सेन वंशक शासक छलाह जे 78A 205 ई. धरि शासन मैथिली उपन्यास | समय समाज आ सवाल ८ 257 ’ a Wy ‘ i a a ee).
4. Beene bias
| पंकज पराशर fs बुद्धिजीवी, लोक वृत्त और coat पॉलिटिक्स है बौद्धिक जगत में इन दिनों बुद्धिजीवियों का वर्गीकरण भी विवाद का विषय बनता जा रहा है। जिगमेंट बोमन बुद्धिजीवियों को समाज की एक ऐसी इकाई के रूप में देखते हैं जो सामाजिक संस्थाओं की सेवा करने के लिए वैश्विक मूल्यों का विधेयन करते हैं । इस वर्ग के बुद्धिजीवियों के बारे में ऐसा माना जाता है किये बुद्धिजीवी अपनी योग्यता के आधार पर आम जनमानस के लिए मानवाकृतियों, लोक में घटित घटनाओं आदि की बेहतर व्याख्या प्रस्तुत करते हैं । अमेरिकी बौद्धिक जगत में इन दिनों बुद्धिजीवियों की भूमिका को लेकर जो गरमा-गरम बहस छिड़ी हुई है उनमें से एक धड़े का मानना है कि फिलवक्त जो सामाजिक और वैश्विक हालात हैं उसमें बुद्धिजीवियों की स्थिति में आधुनिक बुद्धिजीवियों से लेकर उत्तर आधुनिक बुद्धिजीवियों तक में बदलाव आया है । दिलचस्प यह है कि पश्चिम के बुद्धिजीवियों में जैसे ही यह बदलाव आया उसका त्वरित असर हिंदी के उन उत्तर-आधुनिक बुद्धिजीवियों पर भी पड़ा, जो कुछ साल पहले तक उत्तर- आधुनिकता के भारतीय प्रवक्ता होने का दावा करते नहीं अघाते थे। जहाँ एक ओर आधुनिक बुद्धिजीवी वैश्विक मूल्यों के कार्यकारी इकाई के तौर पर नई आधुनिक समाज-व्यवस्था का विधेयन करते हैं वहीं दूसरी ओर इस प्रकार सामाजिक जीवन में बुद्धिजीवियों की भूमिका के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत का भी प्रतिपादन करते हैं । नोम चोम्स्की के बाद की पीढ़ी में वामपंथी रुझान के कवियों/विचारकों और बुद्धिजीवियों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी जारी है । लुश प्रशासन अपनी तमाम नीतियों को लेकर पनप रहे असंतोष और मुखर होते ग्रतिरोधी स्वर को लेकर भी हैरान-परेशान है । गौरतलब है कि 2003 में इराक हमले की पीठिका बनते समय भी वहां के बुद्धिजीवियों ने बुश प्रशासन की आलोचना की थी और आज आम जनता वहाँ से अमेरिकी सैनिकों की अविलंब वापसी की मांग कर रही है । मगर राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू. बुश के सिपहसालारों ने इन 'विरोधों की न तब परवाह की और न अब ऐसा लगता है कि उन पर कोई खास असर पड़ा है । अमेरिका स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर डगलस कैलनर ने कुछ वर्ष पूर्व, 2005 के आखिर में छपी अपनी किताब ' मीडिंया स्पेक्टैकल्स एंड द क्राइसिस ऑफ डेमोक्रेसी ' में इन मुद्दे पर जोरदार बहस की है कि इन दिनों मीडिया में जिन मुद्दों को जनहित के नाम पर उठाया जा रहा है वह असल में जनहित के वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की एक शातिर चाल है 9/7 के बाद मीडिया ने जिस तरह से अपना चेहरा और चाल दोनों को बदला है - कैलनर खास तौर पर इससे चिंतित होते हैं और बुद्धिजीवियों के बीच खास- पहल - 86 25
खास बिन्दुओं पर चिंतन का आह्वान करते हैं । इसी तरह “द वार फॉर द व्हाइट हाउस' किताब में वे अमेरिकी विदेश, रक्षा और आर्थिक नीतियों की गंभीरता से नये-नये तथ्यों की रोशनी में न सिर्फ आलोचना करतें हैं बल्कि खासी मज़म्मत भी करते हैं । अभी हाल ही में छपी वाशिंगटन Shalt. के बाशिंदे मिखाइल मैकडोनाल्ड की 'द अमेरिकन sete नामक छपी किताब में खास तौर पर अमरीकी हितों और वैशिवक परिदृश्य की पड़ताल की गई है । उन्होंने एक और बेहद दिलचस्प किताब “द स्ट्रेंजर इन क्राउफोर्ड' में जार्ज बुश और कालजयी फ्रेंच उपन्यासकार A कामू के बीच तुलना करते हुए एक किताब ही लिख मारी है । बहरहाल, असली मुद्दा यह है कि मीडिया की बदली प्राथमिकता और चाल की बेहतर समीक्षा प्रस्तुत करते हुए डगलस कैलनर ने ‘cal पॉलिटिक्स' जैसी शब्दावली के सहारे बुद्धिजीवियों की भूमिका और नई-नई आने वाली चुनौतियों को रेखांकित किया है । बुद्धिजीवियों को दो वर्गों में वर्गीकृत करते हुए कैलनर कार्यकारी बुद्धिजीवी (फंक्शनल इंटेलेक्चुअल ) के बारे में कहते हैं, ये स्थापित सामाजिक मूल्यों का उत्पादन और विधेयन करते हैं । जबकि इसके ठीक विपरीत विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी (फ्रिटिकल-अपोजीशनल इंटेलेक्चुअल ) स्थापित सामाजिक व्यवस्था का विरोध करते हैं । कभी -कभी विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी समाज में मौजूद मूल्यों के खिलाफ ही अपनी आवाज बुलंद करते हैं और ऐसा मानकर चलते हैं कि इन मूल्यों का समाज में दबदबा बढ़ रहा है | मसलन कानून, न्याय, सत्य और अधिकार आदि। ऐसे बुद्धिजीवी कई बार और भी गंभीर मुद्दों का विरोध करते हैं - जैसे लोकतंत्र, समाजवाद, अश्वेत लोग और स्त्रियों की समानता आदि। कार्यकारी बुद्धिजीवी पहले रूढ़ और काफी हद तक आदर्शवादी थे, जबकि आज उन वर्गों और तकनीकविदों के हितों के संरक्षक बने हुए हैं जो परिणामों तक पहुँचने के लिए समर्थ साधनों का इस्तेमाल करते हैं । ये बुद्धिजीवी अपनी क्षमताओं को विभिन्न क्षेत्रों, जैसे दवा, भौतिक विज्ञान और अतीत में मौजूद तकनीकी ज्ञान को बढ़ाने के लिए करते हैं । बिना नतीजे की ओर उँगली उठाये और किसी चीज की परवाह किये बगैर वे जिन मूल्यों की स्थापना और वापसी के लिए प्रयत्नशील रहते हैं - उसकी उपयोगिता और अनुपयोगिता पर आज विमर्श करना बहुत आवश्यक है । कार्यकारी बुद्धिजीवी समाज को बेहतर बनाने ( अपने तरीके से ) के लिए तकनीकी जानकारियों में दक्षता हासिल करते हैं, वहीं विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी आलोचक सामाजिक बेहतरी के लिए संघर्षरत हैं । देश-विदेश में ऐसे बुद्धिजीवियों की एक लंबी thefts है जिन्होंने आंदोलनों में न सिर्फ शिरकत की, बल्कि ता-उम्र के लिए उससे जुड़ ही गए । तेलुगू में वरवर राव, अंग्रेजी में अरुंधति राय, बांग्ला में महाश्वेता देवी आदिं लेखकों-बुद्धिजीवियों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है । विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी परंपरागत तौर पर अपने ज्ञान और लेखन का प्रयोग अन्याय, शक्ति के दुरुपयोग, सत्य के लिए संघर्ष और अन्य वैशिवक मूल्यों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए करते हैं । ज्याँ पॉल सार्त्र के शब्दों में कहें तो, '' विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी का कार्यक्षेत्र आम जनता तक सीमित है ।'' सारत्र के इस कथन के आधार पर एक विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी का काम समाज की विभिन्न कुरीतियों का विश्लेषण करना तथा उनको और अधिक FSU प्रदान करना है । यह बुद्धिजीवी के शाब्दिक हथियार हैं जिनके जरिये उन्हें समाज में कहीं भी हो रहे अन्याय का विरोध करना है | हेबरमास (989) के कथन की रोशनी में अगर देखें at आधुनिक समय में विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी का कार्यक्षेत्र आम जनता से जुड़े मुद्दे राजनीतिक वाद-विवाद और विभिन्न किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में छपी चीजों पर लिखना और विमर्श करना है ।'' हालांकि सभी विरोधी खेमे के बुद्धिज्नीवी वैचारिक रूप से प्रगतिशील नहीं हैं, बावजूद इसके समाज के आधुनिक होने से बुद्धिजीवियों की भौतिक और मानसिक दशाओं में तब्दी लियाँ आई हैं । इन दिनों बुद्धिजीवी वे लोग हैं जो नये विचारों और नये 26 पहल - 86
| संस्कारों को पैदा करने में माहिर होते हैं । इनमें से भी कुछ बुद्धिजीवी वर्तमान समाज का समर्थन करते हैं तो कुछ उसका विरोध करते हैं । शायद इन वजहों से भी बुद्धिजीवी, कार्यकारी और विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी के रूप में de गए । कार्यकारी बुद्धिजीवी जहाँ एक तरफ समाज की सेवा तकनीकी जानकारियों से करते हैं वहीं नये आदर्श पैदा करके वर्ग, रंग और लिंग को वैधता प्रदान करते हैं । कहना न होगा कि अपने देश में भी सांप्रदायिक शक्तियों के सत्तासीन होते ही ऐसे-ऐसे ay खाँ, * बुद्धिजीवी ' का बिल्ला लगाये हुए कभी “वाजपेयी aera’ बना रहे थे, तो कभी उनकी कविताओं को नये-नये ' रागों ' में गाकर सत्ता की आराधना में aaa दिखा रहे थे - अभूतपूर्व समाजवादियों के समर्थन पर टिकी भाजपा राज के समय। विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी अन्यायी और शोषकों के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं । जबकि विरोधी खेमे के परंपरागत बुद्धिजीवी उत्तर आधुनिक सिद्धांतों द्वारा पैदा की गई चुनौतियों के साथ-साथ नई तकनीकों द्वारा तलाशी गई लोकतांत्रिक बहसों की संभावनाओं पर चर्चा करना मुफीद समझते हैं । यह सारी बातें विरोधी खेमे के बुद्धिजीवी और उनकी भूमिका को ठीक से पुनर्परिभाषित करने की माँग करता है । लोकक्षेत्र ( पब्लिक स्फीयर ) और बुद्धिजीवी अगर मूल परिभाषा पर नजर दौड़ाएं तो लोकतंत्र मूलतः सत्ता के विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ सरकारी मामलों में जनता की भागीदारी का नाम है । पुनर्जागरण और 8 वीं शताब्दी की राजनीतिक क्रांति के काल में एक ऐसा लोकक्षेत्र उभरकर सामने आया जहाँ आम आदमी अपने से जुड़े मुद्दों पर बहसें कर aerator दिलचस्प यह है कि उस काल में सरकार की आलोचना खास तौर पर आम जनता तक पहुँचाई जाती थी । खुद को अभिव्यक्त करने का साधन बना अखबार और पत्र-पत्रिकाएं । उस वक्त तत्कालीन प्रेस | की आजादी आम जन को काफी कुछ सही रूप से चीजों को जानने-समझने का रास्ता फराहम कराती थी । वैचारिक आदान-प्रदान के लिए लोग कॉफी हाउस, पान की दुकान, नाई की दुकान आदि जगहों पर बैठा करते थे और वहीं विभिन्न मुद्दों पर चर्चाएं छिड़ जाती थीं । दुखद यह है fH Gai समाज के टूटने के बाद | तमाम लोगों ने अपनी-अपनी पार्टियाँ बना लीं, संस्थाएं बना लीं और विचारधाराएं विकसित कर लीं । बकौल | डगलस कैलनर, “* आम जनता को रिझाने के लिए विभिन्न पार्टी और संस्था के लोग लिखने लगे और खुद को | खुद के ही द्वारा बुद्धिजीवी का दर्जा दे दिया । देखते-देखते शोषित वर्गों ने भी अपने बुद्धिजीवी पैदा कर लिए | | हालांकि ये बुद्धिजीवी विद्रोही विचारधारा के थे और शोषकों के मुकाबले शोषितों के बुद्धिजीवियों में खास ara यह थी, वे समाज के सारे तबके का प्रतिनिधित्व करते थे।'' ध्यान रहे कि मेरी वोलेस्टोनक्राफ्ट जैसी | महिलाओं ने महिला अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की थी । शोषित वर्ग के विद्रोही विचारधारा वाले इन |... बुद्धिजीवियों ने दमन और उनके कारणों के खिलाफ तो आवाज बुलंद की ही साथ ही इसके हल के लिए | > इनके समाधानों को सिद्धांत से उठाकर वास्तविकता के धरातल पर प्रयोग करने की बात कही | इसलिए 9 वीं शताब्दी में कर्मचारी वर्ग के लोगों ने शोषकों के खिलाफ अपना एक अलग ही लोकक्षेत्र विकसित किया। यूनियन हॉलों, दफ्तरों, सार्वजनिक स्थानों में इनकी सभाएं, चर्चाएं होने लगीं । इसी दौर में बकौल जुरगेन हेबरमास, “' अमेरिका और यूरोप में पनप रहे लोकतंत्र और श्रमिक आंदोलनों ने एक वैकल्पिक प्रेस को जन्म दिया। इसके साथ ही हड़ताल और बैठकों जैसी चीज ने शोषक-विरोधी लोकक्षेत्र को एक नया मंच ... प्रदान किया।'' आधुनिक समाज के बुद्धिजीवियों में विरोधाभासी रूप से सामाजिक कार्यों को लेकर हमेशा एक मतभेद बना रहा । पारंपरिक रूप से विरोधी खेमे के बुद्धिजीवियों जैसे टॉमस पेन, मेरी वोलेस्टोनक्राफ्ट और बाद में मार्क्स, ह्यूगो, act और मा्क्वेज जैसे लोगों ने पुनर्जागरण के दरम्यान अन्याय और शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की । इसके बावजूद संकीर्ण विचारों के बुद्धिजीवियों ने पुनर्जागरण और पहल - 86 प27
फ्रांसीसी क्रांति की कामयाबियों पर हमला करते हुए कुछ इस तरह का इजहार-ए-खयाल किया जिसके तहत वर्ग, लिंग और रंग के नाम पर दमन और उत्पीड़न को जायज ठहराया गया। इन बुद्धिजीवियों के विरोध में मिशेल फूकों ने शिकायत की थी, “ant ने एक आदर्शवादी नमूना प्रस्तुत किया है, जो बुद्धिजीवियों को वैश्विक मूल्यों, मसलन, सत्य, अहिंसा, आजादी और मानवता आदि के लिए लड़ने की सलाह देता है।'' फूको ने इसके विरोध में विशेष बुद्धिजीवी का प्रस्ताव किया जो बिलकुल तटस्थ होकर शोषितों-उत्पीड़ितों के सवालों से जुड़े खास मुद्दों के लिए अपनी आवाज बुलंद करे। फूको का यह विचार उत्तर-आधुनिक राजनीति में प्रासंगिक हो गया और राजनीति को पार्टी की राजनीति से हटाकर सामाजिक आंदोलनों की तरफ मोड़ दिया गया | उत्तर-आधुनिक राजनीति के लिए शक्ति का विकेन्द्रीकरण जरूरी है। डगलस कैलनर कहते हैं, ''मैं यह मानता हूँ कि आलोचक बुद्धिजीवी या कहें विरोधी खेमे के बुद्धिजीवियों के कुछ विचार उपयोगी हैं । आम बुद्धिजीवी वैश्विक मूल्यों के हनन के खिलाफ आवाज sara हैं, जबकि आम लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी दूसरों के लिए आवाज उठाने के बदले व्यक्तिगत या वैश्विक मुद्दों से जुड़े खास मुद्दों पर ही अपनी राय जाहिर करते हैं।'' नतीजा यह होता है कि वर्तमान परिवेश में | लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी कहलाने के लिए वैश्विक बुद्धिजीवी के पूरे गुण होने की आवश्यकता नहीं है | कहना न होगा कि बुद्धिजीवियों को व्यक्तिगत इच्छाओं/अनिच्छाओं से ऊपर उठकर सोचना चाहिए | बिना किसी पक्षपात के अपनी 'बात कहनी चाहिए - तमाम पूर्वग्रहों को छोड़कर । इसके साथ-साथ अपनी सीमाएं जानते हुए खुद को दूसरे की जगह रखकर सोचना चाहिए। नई तकनीक, लोकक्षेत्र और नये बुद्धिजीवी कुछ मामलों में बुद्धिजीवियों और तकनीक में कोई खास संबंध नहीं होता । आज के उच्च तकनीक से संपन्न समाज में कंप्यूटर और त्वरित मीडिया युग में प्रतिबद्ध आम बुद्धिजीवियों को परिभाषित करने की जरूरत है । बीसवीं सदी की शुरुआत में जॉन fed ने ' थॉट =a नामक एक ऐसे अख़बार की परिकल्पना की थी जिसमें विज्ञान की नवीनतम खोजों और विचारों को जगह दी जाए। इसके अलावा बर्टोल्ट ब्रेख़ और वाल्टर बेंजामिन ने सिनेमा और रेडियो के क्रांतिकारी परिणामों को देखा था और दूसरे बुद्धिजीवियों से यह अपील की, कि वे इन साधनों का इस्तेमाल समाज को और अधिक लोकतांत्रिक बनाने और उसे बदलने में करें । ज्यॉँ पॉल सार्त्र ने भी रेडियो धारावाहिकों का अध्ययन किया और इस बात पर बल दिया कि प्रतिबद्ध लेखकों को भी रेडियो और सिनेमा का इस्तेमाल करना चाहिए | इससे भागना ठीक नहीं है। पहले रेडियो, टेलीविजन और दूसरी इलैक्ट्रानिक मीडिया पर तमाम तरह की बंदिशें आयद थीं | रेडियो और टेलीविजन का विवाद, बहसें, जानकारियां आदि एक नये लोक वृत्त का निर्माण करते दिखाई दे रहे हैं। डगलस कैलनर जोर देकर कहते हैं कि, ** बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वे इन माध्यमों का उपयोग करके जन मामलों में सीधे जनता की भागीदारियों को सुनिश्चित करें और एक नयी संचार राजनीति और मीडिया-परियोजनाओं का निर्माण करें "7 ः यह तथ्य अब धीरे-धीरे असलियत को काफी हद तक स्पष्ट करता जा रहा है कि आज की राजनीति में यदि कोई बुद्धिजीवी लोकवृत्त (पब्लिक स्फीयर ) में अपनी पैठ बनाना चाहता है, समाज को नई दिशा देना चाहता है - तो नई तकनीकों का उन्हें अधिक से अधिक इस्तेमाल करना चाहिए। पहले रेडियो और टेलीविजन ने एक लोकक्षेत्र का या कहें लोकवृत्त का निर्माण किया था लेकिन अब कंप्यूटर और इंटरनेट ने अपने अलग लोकवृत्त बनाये हैं । जानकारियां, aed, लोकतांत्रिक सहभागिता और विचारों को पहुँचाने के. 28 पहल - 86
| | लिए नई संभावनाओं को भी पैदा किया है । ...और यह कहना शायद गैर-जरूरी है कि इस्तेमाल में लाने से पूर्व इन तकनीकों का बारीकी से अध्ययन जरूरी है । आज के समय में बुद्धिजीवी होने का मतलब है नई तकनीकों का उपयोग करके विचारों के क्षेत्र में नई और ऊर्जस्वी विचारों की खोज, उसका संपूर्ण वितरण और इससे तैयार हुए लोकवृत्त में अपनी पूरी भागीदारी | डगलस कैलनर इस मुद्दे पर अपनी राय साफ-साफ जाहिर करते हैं, कुछ इस तरह, ** आज के | नये बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वह अपनी नीतियां इस तरह से बनाएं कि शिक्षा, लोकतांत्रिक विकास के साथ ही अपनी नीतियों को बेहतर ढंग से प्रसारित करने के लिए नई तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करें । भविष्य में जो वक्त आएगा उसमें बुद्धिजीवियों और नई तकनीक के बीच नाभिनालबद्ध रिश्ता बनाना अनिवार्य हो जाएगा।'' इसके बगैर नई तकनीक से भागने वाले लोग अपनी मेधा का सही इस्तेमाल कर ही नहीं पाएँगे और तब वें कैसा लोकवृत्त बनाएँगे और किस तरह के बुद्धिजीवी रह जाएंगे, यह मुद्दा बहसतलब है। नव पूँजीवादी समाज में लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह और भी आवश्यक है कि लोकतांत्रिक मीडिया राजनीति (डेमोक्रेटिक मीडिया पॉलिटिक्स) नई रणनीति के तहत की जाए | मीडिया की लोकतांत्रिक राजनीति में दो तरह की नीतियां होती हैं - पहली कार्यरत मीडिया को लोकतांत्रिक बनाना और दूसरी आम | जनता की सुविधाओं, इच्छाओं और जरूरतों के प्रति मीडिया को जिम्मेवार बनाना। मुख्य धारा की मीडिया के विकल्प के तौर पर एक विपक्षी मीडिया को तैयार करना भी आने वाली ‘Se पॉलिटिक्स ' का मुकाबला करने के लिए आवश्यक है । लोकतांत्रिक मीडिया राजनीति के लिए मुख्य धारा की पूँजीवादी मीडिया समर्थित नीतियों की तीखी आलोचना, उसमें सुधार और वैकल्पिक मीडिया का | विकास, इसकी जरूरी शर्तें हैं । मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास तभी संभव है जब एक वैकल्पिक |. प्रेस का निर्माण हो। आम जनता की पहुँच में टेलीविजन हो और एक सकारात्मक विपक्षी राजनीति के | साथ-साथ ऐसी वैचारिक gear से सम्पन्न नीतियां हों जो मुख्यधारा की मीडिया को प्रभावित करें । उसकी | नीतियों की परत-दर-परत पड़ताल करके उपयुक्त भाषा-शैली और अंदाज में बेनकाब करने का बेहतर | एजेंडा हो। | पिछले कुछ दशकों में टेलीविजन संचार माध्यम के एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। 970 में अमेरिका में हुए टेलीविजन के विकास में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के लिए नई संभावनाएं पैदा की थीं । उसने इस तरह के कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जो तत्कालीन संकीर्ण समाज की कठोर आलोचनाएं करता था - उन दिनों मुख्यधारा की मीडिया में इसकी भरमार थी | 970 में जब टेलीविजनों की संख्या में इजाफा होने लगा तब वहाँ ' फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ' का एक आदेश आया जिसके अंतर्गत 972 के बाद के नए ' केबल सिस्टम' को कम-अज़-कम एक चैनल सरकार को शिक्षा और आम आदमी को नई जानकारियां मुहैया कराने के लिए देने होंगे। शुरुआती दौर में कुछ कंपनियों ने एक चैनल मुहैया कराई तो कुछेक ने दो या तीन | ...... कई लोग ऐसा मानते हैं कि लोकतांत्रिक राजनीति में आम सहमति बनाने के लिए आमने-सामने बैठकर बातचीत करना जरूरी है लेकिन एक चतुराई पूर्ण सहमति के लिए जनता का जागरूक और जानकार दोनों होना बेहद आवश्यक है । कहना न होगा कि वर्तमान संदर्भ में यह रेडियो और टेलीविजन के * द्वारा ही मुमकिन है । यह जरूरी नहीं है कि मीडिया वर्तमान राजनीति की पूरक बने लेकिन मीडिया राजनीति Hl बढ़ावा अवश्य दिया जाना चाहिए ताकि इसके माध्यम से जागरूक और जानकार लोग सूचनाओं को | पहल - 86 429
अधिक-से-अधिक लोगों तक प्रसारित कर सकें | अमेरिका के टेक्सास राज्य में * काउंसिल फॉर पब्लिक मीडिया' अपने कार्यकर्ताओं और आमजनों को यह बताता है कि नई तकनीक और कम्प्यूटर वगैरह का इस्तेमाल अपने विचारों को ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए कैसे करें ? मीडिया राजनीति में ज़्यादा लोगों की भागीदारी, राजनैतिक संरचना की इसकी आवश्यकताओं को दर्शाती है । इसलिए आज नव | पूँजीवाद और भूमंडलीकृत शोषण के हथियारों को मात देने के लिए मीडिया राजनीतिं को और अधिक विकसित करने की जरूरत है - साथ ही इसके लिए और अधिक मेहनत करने की जरूरत भी है । | अगर कोई विकासशील समूह या आंदोलन से जुड़े आंदोलनकर्मी वर्तमान राजनीतिक माहौल में | * अधिकारों ' का कोई विकल्प तलाश करना चाहते हैं तो हर हाल में उन्हें अपनी बात अधिक-से-अधिक | लोगों तक पहुँचानी होगी और खुद से ज़्यादा-से-ज्यादा लोगों को जोड़ना होगा। आखिर ज्यादातर लोग | समाचार और अन्य अनेक सूचनाएं टेलीविजन से ही प्राप्त करते हैं । प्रसार माध्यम ही आम जनता के विचारों | को बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है और यह तय करता है कि किस चीज को गंभीरता से लें और. किसको गंभीरता से नहीं लें । अगर वैकल्पिक विकास के यूटोपिया से लैस लोग राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं तो उन्हें नई तकनीकों को ध्यान में रखकर ही अपनी नीतियों का निर्माण करना पड़ेगा । लोकतांत्रिक समाज. के निर्माण और विकास में ' टैक्नो पॉलिटिक्स' को बढ़ावा देने के लिए कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी नई-नई संभावनाएं पैदा करता जा रहा है । ऐसा लगता है कि आने वाले समय में घर- घर में मनोरंजन और जानकारियों का भंडार होगा - मगर वे भारतीय नागरिक हर चीज की तरह इससे भी stad: वंचित रह जाएंगे जो आज भी दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्षरत हैं और कल भी संघर्ष से शायद नहीं उबर पाएंगे। यह सारा ताम-झाम अंतत: इन मध्यवर्गीय नागरिकों को फायदा पहुँचाएगा जिन्हें मूलभूत आवश्यकताओं के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है । दूसरी चिंता इसके साथ यह जुड़ी हुई है कि अगर वैकल्पिक विचारों वाले मीडिया का विकास नहीं हुआ तो इसका उपयोग वही कर पाएंगे जो आर्थिक रूप से बेहद मजबूत स्थितियों में होंगे । नतीजा यह होगा कि गरीब मुल्कों के लोग किसी भी तरह इसका लाभ नहीं उठा पाएंगे | नाइजीरिया, कांगो गणराज्य और दक्षिण अफ्रीकी मूल के लोगों की इस तक पहुंच हो ही नहीं सकेगी | भारत के ' हिंदी पट्टी ' के लोग तो आज भी छोटी-से-छोटी जानकारियां नहीं पा सकते हैं । फलस्वरूप, इन निजी मनोरंजन माध्यमों का विकल्प Gor जरूरी होता जा रहा है । आज के इस cat पूँजीवादी समाज में कंप्यूटर और प्रौद्योगिकी की बढ़ती महत्ता विकासशील मीडिया की जरूरत के रूप में उभरा है । पूरी दुनिया कंप्यूटरीकृत होने जा रही है और आनें वाले वक्त में जिस देश के नागरिक की इस दुनिया तक पहुँच और दखल नहीं होगी वे हर तरीके से दुनिया में रहकर भी किसी और दुनिया के वासी में तब्दील होते चले जाएंगे | गरीब मुल्कों की सरकारें जिस तरीके से बहुराष्ट्रीय पूँजी के आकाओं और पूंजीवादी मीडिया के सेठों को अपने यहाँ बुलाकर मनचाहे तरीके से काम करने के लिए सारी . सुविधाएं उपलब्ध करवा रही हैं उसके कारण भी जनता अपनी मूलभूत जरूरत की चिंताओं में ही गर्क है। उन्हें यह सोचने और जानने का मौका ही उपलब्ध नहीं करवाया जा रहा है कि हमारा आनेवाला वक्त कैसा होगा और हमारी सरकारें किस तरह की दुनिया बनाने वालों के साथ हैं, सहयोगी हैं ? इसलिए निजी कंपनियों और सरकारों के एकाधिकार से बचने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि नये-नये जानकारी केन्द्रों की *. स्थापना की जाए ताकि लोकतांत्रिक समाज में अपनी सहभागिता को सुनिश्चित किया जा सके | कंप्यूटर अपनी क्षमताओं के कारण अंततः एक लोकतांत्रिक तकनीक है, जहां प्रसारण के माध्यम मात्र "बन वे ट्रैफिक ' हैं वहीं कंप्यूटर और इंटरनेट द्विपक्षीय माध्यम है | कंप्यूटर, इंटरनेट, चैटिंग आदि का उपयोग आम जनता एक दूसरे से बातचीत करने के लिए कर सकती है। मोडेम और टेलीफोन लाइनों की 430 पहल - 86
सहायता से तमाम लोग - जो इससे जुड़े हैं, जुड़ सकते हैं - वे लोग तमाम मुद्दों पर विमर्श कर सकते हैं । इस तरह यह एक नये संसार और प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है । वर्तमान समय में जन सरोकारों से जुड़े लोगों के | लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वे ऐसे कार्यक्रमों से जुड़कर, इस दुनिया में प्रवेश करके गरीब मुल्कों ।..... की व्याख्या प्रस्तुत करें, जिससे उन दमित और शोषित तबकों तक भी इसका लाभ पहुंच सके - जो आज | तक तो वंचित हैं ही और सरकार की जैसी नीतियाँ हैं, राजनीतिज्ञों की जो कार्य शैली और प्रतिबद्धताएं हैं | उससे आगे भी दुनिया में हो रही हलचलों से वे वंचित रहेंगे । ' टेवनो पॉलिटिक्स' में शामिल विरोधी खेमे के | बुद्धिजीवियों पर ही अंतत: यह जिम्मेदारी आयद होती है कि वे एक वास्तविक लोकवृत्त के निर्माण के लिए | जन-जन तक सूचनाएं अपने-अपने तरीके से पहुँचाएं। सहायक ग्रंथ . . फ्रेडरिक जेमसन : ए क्रिटिकल रीडर, सं. डगलस कैलनर एंड सीन होमर, 2004 2. मीडिया स्पेक्टेकल्स एंड द क्राइसिस ऑफ डेमोक्रेसी : डगलस कैलनर, 2005 3. मीडिया कल्चर : कल्चरल स्टडीज, आइडेंटिटी एंड पॉलिटिक्स बिटवीन द मॉडर्न एंड द पोस्ट मॉडर्न : डगलस कैलनर (7995) | 4. . द रोल ऑफ पब्लिक इंटेलेक्चुअल : एलन लाइटमैन । | 5. © स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉरमेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर : एन इनइविवटी इंटू ए कैटेगरी ऑफ बुूर्ज्वाजी सोसाइटी, जुरगेन | हेबरमास, 997, अनुवाद : थॉमस बर्जर, एम.आई.टी. प्रेस । 6. ARS, Fras, एंड द पब्लिक स्फीयर : माइक हिल, वारेन AM, Fal, 2007 7. पावर एंड पॉलिटिक्स इन ग्लोबलाइजेशन : द इंडिस्पेंसबल स्टेट : होवार्ड wa. लैन्टर, 2004 8. रूल ऑफ एक्सपर्ट्स : इजिप्ट, teh पॉलिटिक्स, मॉडर्निटी : टिमोथी मिथेल, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस, 2002 | | | | पंकज पराशर प्रायः, महत्वपूर्ण किताबों को लेकर ‘see’ में लिख रहे हैं। नोम चोम्स्की के बाद पूंजीवादी दुनिया में वामपंथी रूझान बढ़ने के दृश्य पर वे विस्तृत काम कर रहे हैं । नोम चोम्स्की की ताज़ा किताब ‘thes स्टेट्स' पर अगले अंक में संपादकीय टिप्पणी पाठक पढ़ सकेंगे। पहल - 86 3
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लव बुढ़ियाक तमाकुल माँगब सोन qa Ba शक-एक h Trey wa afe wa gH घर ? घर नहि ma isa afg वा at afe मोन aida अछि घर at afs चिन्ह पबेए वा at ओकरा नहि fate ae ओ गेल छल कि घरे shad गेल छल ई एकटा भयंकर समस्या अछि उपस्थित ufe मुन्हारि साँझमे जे निरन्तर me Fe जा रहल-ए तेज आँचपर sida दूध wat at ae अछि निरन्तर अस्पष्ट होइत जा tea साँझक गाछ at थ ay se अछि ठकमकाएल साँझ क' घुरल सुग्गा जकाँ घर के ata alan गाछभे गाछक झाँखुड़ सबद्गक दोगमे निरन्तर अस्पष्ट gia गाम आरंभ es
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नये इलाके में इन नये बसते इलाकों में जहाँ रोज बन रहे हैं नये नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ धोखा दे जाते हैं पुराने निशान खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंजिला और मैं हर बार एक घर पीछे चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता यहाँ रोज कुछ बन रहा है रोज कुछ घट रहा है यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया जैसे FIT का गया पतझड़ को लौटा हूँ नये इलाके में : 74
जैसे बैशाख का गया भादों को लौटा हू अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ और पूछो- कया यही है वो घर ? समय बहुत कम है तुम्हारे पास आ चला पानी ढहा आ रहा अकास शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर 4: नये इलाके में द्