ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३६७ म अंक ०१ अप्रैल २०२३ (वर्ष १६ मास १८४ अंक ३६७) [विदेह ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Videha e-Journal: Issue No. 367 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१४) १.२.अंक ३६६ पर टिप्पणी (पृ. १५-१५) २.गद्य खण्ड २.१.महाकान्त प्रसाद- बीहनि कथा- बुन्नी (पृ. १७-१७) २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी- 'लव यू टू' (आगाँ) (पृ. १८-२१) २.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- संस्मरण - 'कुमरजी' (पृ. २२-२६) २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मकान मालिक आ किरायादार (पृ. २७-३२) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २४ म खेप (पृ. ३३-३६) २.६.कुमार मनोज कश्यप- प्रतिदान (पृ. ३७-३८) २.७.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१६) (पृ. ३९-४३) २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल-जिनगी भार बनि गेल (पृ. ४४-५१) २.९.आचार्य रामानन्द मण्डल-गौरी आ प्रेम मे धोखा (पृ. ५२-५९) २.१०. डॉ. किशन कारीगर- मिथिला मैथिली के घुन जेंका खोखैर के खा गेल (हास्य कटाक्ष) (पृ. ६०-६२) २.११.लाल देव कामत- तीन टा पोथीक समीक्षा (पृ. ६३-७६) ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र-नारी (पृ. ७८-८०) ३.२.मुन्नी कामत- रामायण (पृ. ८१-८४) ३.३.बाबा बैद्यनाथ- गजल- आधार- "रजनी छन्द" (पृ. ८५-८६) ३.४.डॉ. किशन कारीगर- हौ तोरे त गौंआ छियअह (पृ. ८७-८८) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३६६ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ रामचन्द्र राय प्रसिद्ध रामू सरक लघु आ दीर्घ कथाक संग्रह 'सपना साकार' रामचन्द्र राय प्रसिद्ध रामू सरक लघु आ दीर्घ कथाक संग्रह 'सपना साकार' क कथा 'तोहीं जितलेँ हमहीं हारलौं' मे सवर्ण आ गएर सवर्णक मिलि जुलि कऽ रहबाक वर्णनक संग ईहो जे नवीनक माय-बाबूक कौबला-पाती नोकरीक पहिल दरमाहासँ कौबले-पाती पूरा करता आ फेर एकटा अन्तर्जातीय प्रेम कथा, ई सभटा भेटत। प्रेम-प्रसंगमे अपहरणक केस दर्ज होइते छै, से एत्तौ भेल। मुदा नूनू भैया फेर मानि गेला। 'सपना साकार' आत्मकथात्मक अछि से बुझबामे किनको भाङठ नै हेतनि। आ गरदैनिक उतरी उतारबाक नव विधि, एगारहटा युवकक प्रतिज्ञा कर्मकाण्ड आ मृत्युभोजक विरुद्ध। फेंकाएल जिनगीमे स्त्रीक जीवन, मानसिक रोग सभ किछु भेटत। पगली पगली नै छलि। ओकरा घरमे भगमन्त बूझल जाइ छलै, मुदा बियाहक बाद..। मुदा ऐ संग्रहक श्रेष्ठ कथा सभ अछि दीर्घकथा "निरवासित जीवन" आ "बुधनी माइक बेथा"। 'बुधनी माइक बेथा' मे पंचायतक बैसारमे महिलाक उपस्थिति आह्लादित करैत अछि तँ ओत्तै बुधनी माएक इन्दिरा अवासक ढनमनायल घरक वर्णन सेहो छूटल नै अछि। सस्पेंस अछि, बुधमी माए ओत्तै खोलती नाम। चरणबाबू ओकरा धुतकारै छथि, एहेन पाप कइयो कऽ ओ जीवित केना छथि? युवक सभकेँ ओकरा जिन्दा जड़ा देबाक चाही। आ बुधनी शुरू- सभ पंचकेँ पैरनाम! आ जँ हम झूठ बाजी तँ देहपर बज्जर खसय, अंग काज नै आबय, सीताक भूमिमे प्रवेश मोन पड़ल? बाढ़िमे बान्ह टुटलै, गिरहत ओइठाम बरतन-बासन धोइ कऽ बोइन कऽ गुजर करै छली मुदा ओहो नै रहऽ देलकनि। म्दा अबैत काल जगत देखने रहन्हि..। मुदा बिनु पंचैती केने पंच सभ ई बजैत, जे जगत नजायज केलक, चलि गेला। जगतक धाकक चलते कियो बेशी नै बाजल। मुदा निसीभाग रातिमे माय बेटी तीनटा नवयुवकक कहलापर थाना बिदा भेली, मुदा जगतक धाक ओत्तौ रहै। मुदा तैयो.. मुदा पुलिस अपन बापोक नै होइ छै। मुदा आशाक किरिण अछि किछु नवयुवक सभ। बुधनी माय बच्चाकेँ जन्म देती, डी.एन.ए. केर विषयमे नै बुझल छन्हि मुदा से बुझल छन्हि जे कोनो टेस्ट होइ छै आ टेस्टसँ बाप जगते सिद्ध हेतै। "निरवासित जीवन" दीर्घकथा सेहो नीक अछि। एकर पहिल विशेषता अछि- मनुक्खक व्यंग्यात्मक शैली जकरा कथाकार उठेने छथि। भरामवालीक घरमे चोरि! चोरक बुइध चोरि भऽ गेल रहै की? मुदा भरामवाली भौजी केँ बुझल छन्हि जे ई चोरि नै कियो उछन्नर दऽ रहल छन्हि। आ से सुनि भुटकुन भाइ हुनकर खिस्सा बुझैले अपस्याँत भऽ जाइ छथि। ऐ दीर्घकथाक दोसर विशेषता अछि मनुक्खक जीवन शैलीक सूक्ष्मतासँ अवलोकन आ अभिलेखन। मटि-कट्टीक बहन्ने ओम्हर जेता भुटकुन मुदा भौजीक घरमे दलान नै छन्हि से सोझे आंगन केना चलि जेता? भौजी पुरुख सभकेँ छहरक काते-कात झाड़ा फिरैत देखि लजा जाइ छथि मुदा हुनका सभकेँ कोनो लाजे नै। मुदा से जँ स्त्री करय लागय तखन? आ पुरुख प्रधान समाजक दंश..। मुदा आब शिक्षोमे स्त्री आगाँ एलथि, अदहा-अदही आरक्षण सरकार हुनका देने छन्हि। ऐ दीर्घकथाक तेसर विशेषता अछि लेखकक शब्द भण्डार जे आवश्यक छल भरामवाली भौजीक जिनगीक अभिलेखन लेल। "निरवासित जीवन" आ "बुधनी माइक बेथा"एकटा औपन्यासिक विस्तार लेने अछि आ ऐमे हम रामू सरक रूपमे मैथिली लेल एकटा भावी उपन्यासकारकेँ देखै छी। २ ११२म 'सगर राति दीप जरय' सहुरिया-नवटोली मे सम्पन्न भेल 'सगर राति दीप जरय' कथा-साहित्य गोष्ठीक भव्य आयोजन दिनांक २५ मार्च २०२३क शनि दिन मधुबनी जिलाक अन्धरा बाजारक सटले शिवा पंचायत अन्तर्गत अभिनव शिक्षा निकेतन, सहुरिया-नवटोली केर परिसर मध्य प्रसिद्ध कथाकार श्री राम चन्द्र राय ऊर्फ रामू सरजीक संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल। आयोजनक शुभारम्भ बिहार सरकारक लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभागक पूर्व मंत्री डॉ. रामप्रीत पासवान, साहित्य अकादेमी द्वारा क्रमश: २०२० आ २०२१क पुरस्कार प्राप्त द्वय साहित्यकार डॉ. कमलकान्त झा आ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली साहित्य परिषद्क अध्यक्ष डॉ. धनाकर ठाकुर, प्रगतिशील लेखक संघ, मधुबनीक सचिव श्री अरविन्द प्रसाद, दिल्ली उच्च न्यायालयक अधिवक्ता श्री ब्रह्मानन्द प्रसाद आ वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामश्रेष्ठ दिवानाजी सामूहिक रूपेँ दीप प्रज्जवित कए केलैन। मंचासिन अतिथिगणकेँ पुष्पमाला आ नव वस्त्रसँ सम्मानित करैत उद्घाटन सत्रक मंच संचालक श्री राम चन्द्र रायजी कार्यक्रमकेँ आगू बढ़ौलैन। सर्वप्रथम सुश्री शशिप्रभा आ सुश्री चन्दा कुमारी द्वारा स्वागत गान प्रस्तुत कएल गेल। तत्पश्चात् हम (उमेश मण्डल) स्वागत भाषणक संग 'सगर राति दीप जरय'क ऐ कथा-यात्राक संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करैत बजलौं- ओ कहलैन, मैथिली साहित्यक विकास हेतु समर्पित अनेको मंचक मध्य मात्र यएह एक ओहन मंच अछि जैपर उपस्थिति लेल कोनो रोक-टोक किनको लेल नहि। मैथिली कथाक विकासमे 'सगर राति दीप जरय'केँ कथाकार-समीक्षक हेतु वर्कशॉप कहल जाइत अछि। उद्घाटनक सत्रकेँ जारी रखैत विभिन्न साहित्यकारक भिन्न-भिन्न विधामे कुल दस गोट पोथीक लोकर्पाण सेहो भेल। क्रमश: कथा सत्रमे प्रवेश करैत एक विशिष्ठ अध्यक्ष मण्डलक गठन भेल जइमे साहित्यश्री प्रीतम कुमार निषाद, श्री राम विलास साहु, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, प्रो. रामेश्वर प्रसाद मण्डल, श्री कपिलेश्वर राउत, श्री उमेश नारायण कर्ण आ पं. शिव कुमार मिश्रकेँ मंचासिन करौल गेलैन, संगे भरि रातिक ऐ सत्रक संचालन हेतु श्री नारायण यादव, श्री दुर्गानन्द मण्डल, श्री बैजनाथी राम आ श्री नन्द विलास रायजी सेहो मंचासिन भेला। सबहक सम्मानक संग प्रत्येक कथाकार ओ समीक्षक लोकनिकेँ सेहो नव वस्त्र आ पुष्पमालासँ सम्मानित करैत विभिन्न पालीमे कुल ३४ गोट कथाक पाठ भेल आ पठित कथासभपर पूर्व गोष्ठीक भाँत समीक्षा-टिप्पणी सेहो भेल। ६ बजे भिनसरमे दीप आ पंजी आगामी संयोजक (श्री नारायण यादव)केँ प्रदान कएल गेलैन। दीप-पंजी लैत श्री यादवजी आगामी आयोजनक घोषणा करैत कहलैन जे 'सगर रात दीप जरय'क ऐगला दीप, नहरी (खुटौना) गाममे जून मासक अन्तिम शनि दिन जरत। अवसरिपर लोकार्पित पोथी आ पठित कथा सबहक विवरण निम्न अछि- १. सपना साकार (कथा संग्रह) : श्री राम चन्द्र राय (ऊर्फ रामू सर);२. उपायन (काव्य संग्रह) : श्री राज किशोर मिश्र; ३. जगदीश प्रसाद मण्डल : एक जीवनी : श्री रामेश्वर प्रसाद मण्डल; ४. नाचि रहल छलि वसुधा (उपन्यास) : श्री रबीन्द्र नारायण मिश्र;५. अन्तर्ध्वनि (कथा संचयन) : डॉ. उमेश मण्डल; ६. Jagdish P. Mandal Maithili Writer : Sh. Gajendra Thakur; ७. सेहन्ता सेहनते रहि गेल (कथा संग्रह) : श्री जगदीश प्रसाद मण्डल; ८. सुनयना बेटी (उपन्यास) : श्री जगदीश प्रसाद मण्डल; ९. मिथिला सपूत डॉ. गुरमैता : डॉ. कमल कान्त झा; १०. मोबाइलक लिला (ललित निबन्ध) : डॉ. कमल कान्त झा कथा पाठ- १. घटैत-बढ़ैत चन्दा मामा- दिव्या चन्द्रा; २. गोबर बिछनी- नारायण यादव; ३. घी केतए हेराएल तँ दालिमे- नन्द विलास राय; ४. बहुगुनी रोटी- जनक लाल मण्डल; ५. देखलेपर देखब- पल्लवी मण्डल; ६. टाइम पास- धनाकर ठाकुर; ७. पढ़ब केना- रविभूषण कुमार; ८. मधुमाछी आ माछी- राम विलास साहु; ९. मोबाइल स्कूल- चन्द्र मोहन आचार्य; १०. कहबी फेल- कमलकान्त झा; ११. वुर्कावाली- उमेश नारायण कर्ण; १२. चारिम कथा- मानब अनीश मण्डल; १३. चकबिदोर- रामेश्वर प्रसाद मण्डल; १४. डायनोसोर हेबासँ बँचाउ- अरविन्द प्रसाद; १५. प्रेमक रिश्ता- दुर्गानन्द मण्डल; १६. परछाँही- झोली पासवान; १७. पुरना स्वीटर- रितिक कुमार; १८. असल चोर के- डॉ. वीणा प्रसाद; १९. सहोदर- कुमार सुनील नारायण; २०. माइक ममता- जगदीश मण्डल; २१. टेलिविजनक मुसलमान- राम नरेश यादव; २२. सनेसक गाछ- राधाकान्त मण्डल; २३. अप्पन आसा- प्रीतम कुमार निषाद; २४. गोबर कढ़नी- कपिलेश्वर राउत; २५. दस वर्षक बाद- उमेश मण्डल; २६. स्थानक महत्व- शिव कुमार मिश्र; २७. आमक खेतीमे गायक योगदान- बेचन ठाकुर; २८. भगवान भुखले नह राखय छथि- गौरी शंकर साह; २९. कनफुसकी- संतोष कुमार राय; ३०. परिश्रमक फल- परमानन्द कुमार राय; ३१. बाबूजीक अरमान- सत्यनारायण व्यास; ३२. दलित मजदूर -बैजनाथी राम; ३३. शॉर्टकट रास्ता- जगदीश प्रसाद मण्डल; ३४. नशामुक्त गाम- राम चन्द्र राय ऊर्फ रामू सर। सगर राति दीप जरय पहिल सँ ११२ धरिक कथा यात्रा १. मुजफ्फरपुर, २१.०१.१९९०, प्रभास कुमार चौधरी; २. डेओढ़, २९.०४.१९९०, जीवकान्त; ३. दरभंगा, ०७.०७.१९९०, डॉ. भीमनाथ झा, प्रदीप मैथिली पुत्र, विजयकान्त ठाकुर; ४. पटना, ३.११.१९९०, गोविन्द झा, दमनकान्त झा; ५. बेगुसराय, १३.०१.१९९१, प्रदीप बिहारी; ६. कटिहार, २२.०४.१९९१, अशोक; ७. नवानी, २१.०७.१९९१, मोहन भारद्वाज; ८. सकरी, २२.१०.१९९१, प्रो. सुरेश्वर झा, डॉ. राम बाबू; ९. नेहरा, ११.१०.१९९२, ए.सी. दीपक; १०. विराटनगर, १४.०४.१९९२, जीतेन्द्र जीत; ११. वाराणसी, १८.०७.१९९२, प्रभास कुमार चौधरी; १२. पटना, १९.१०.१९९२, राजमोहन झा; १३. सुपौल- १, १८.१०.१९९३, केदार कानन; १४. बोकारो, २४.०४.१९९३, बुद्धिनाथ झा; १५. पैटघाट, १०.०७.१९९३, डॉ. रमानन्द झा 'रमण' ; १६. जनकपुर, ०९.१०.१९९४, रमेश रंजन; १७. इसहपुर, ०६.०२.१९९४, डॉ. अरविन्द कुमार 'अक्कू'; १८. सरहद, २३.०४.१९९४, अमिय कुमार झा; १९. झंझारपुर, ०९.०७.१९९४, श्यामानन्द चौधरी; २०. घोघरडीहा, २२.१०.१९९४, डॉ. नारायणजी; २१. बहेरा, २१.०१.१९९५, कमलेश झा; २२. सुपौल (दरभंगा) , ०८.०४.१९९५, कमलेश झा; २३. काठमांडू, २३.०९.१९९५, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; २४. राजविराज, २४.०१.१९९६, रामनारायण देव; २५. कोलकाता (रजत जयंती, २८.१२.१९९६), प्रभास कुमार चौधरी; २६. महिषी, १३.०४.१९९७, डॉ. तारानन्द वियोगी/ रमेश प्रायोजित; २७. तरौनी, २०.०६.१९९७, शोभाकान्त; २८. पटना, १८.०७.१९९७, प्रभास कुमार चौधरी; २९. बेगूसराय, १३.०९.१९९७, प्रदीप बिहारी; ३०. खजौली, ०४.०४.१९९८, प्रदीप बिहारी; ३१. सहरसा, १८.०७.१९९८, रमेश; ३२ पटना, १०.१०.१९९८, श्याम दरिहरे; ३३. बलाइन; नागदह, ०८.०१.१९९९, पदम सम्भव; ३४. भवानीपुर, १०.०४.१९९९, डॉ. जिष्णु दत्त मिश्र; ३५. मधुबनी, २४.०७.१९९९, सियाराम झा 'सरस', डॉ. कुलधारी सिंह; ३६. अन्दौली, २०.१०.१९९९, कमलेश झा; ३७. जनकपुर, २५.०३.२०००, रमेश रंजन; ३८. काठमांडू, २५.०६.२०००, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; ३९. धनबाद, २१.१०.२०००, श्याम दरिहरे एवं रामचन्द्र लालदास; ४०. बिटठो, २१.०१.२००१, डॉ. अक्कू, प्रो.विद्यानन्द झा; ४१. हटनी (घोघरडीहा), १९.०५.२००१, प्रो. योगानन्द झा/अजित कु.आजाद; ४२. बोकारो, २५.०८.२००१, गिरिजानन्द झा 'अर्धनारीश्वर', मिथिला सा. परिषद्; ४३. पटना, किरणजयंती, ०१.१२.२००१, अशोक, चेतना समिति, पटना; ४४. राँची, १३.०४.२००२, कुमार मनीष अरविन्द; ४५. भागलपुर, २४.०८.२००२, धीरेन्द्र मोहन झा; ४६. पटना, (विद्यापति भवन पटना), १६.११.२००२, अजित कुमार आजाद; ४७. कोलकाता, २२.०१.२००३, कर्णगोष्ठी, कोलकाता; ४८. खुटौना, ०७.०६.२००३, डॉ. महेन्द्र नारायण राम; ४९. बेनीपुर, २०.०९.२००३, कमलेश झा; ५०. दरभंगा, २१.०२.२००४, डॉ. अशोक कुमार मेहता; ५१. जमशेदपुर, १०.०७.२००४, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ५२. राँची, ०२.१०.२००४, विवेकानन्द ठाकुर ; ५३. देवघर, ०८.०१.२००५, श्याम दरिहरे एवं अविनाश; ५४. बेगूसराय, ०९.०४.२००५, प्रदीप बिहारी; ५५. पूर्णियाँ, २०.०६.२००५, रमेश; ५६. पटना, ०३.११.२००५, अजीत कुमार आजाद; ५७. जनकपुर (नेपाल) , १२.०८.२००६, रमेश रंजन; ५८. जयनगर, ०२.१२.२००६, नारायण यादव; ५९. बेगूसराय, १०.०२.२००७, प्रदीप बिहारी; ६०. सहरसा, २१.०७.२००७, किसलय कृष्ण; ६१. सुपौल-२, ०१.१२.२००७, अरविन्द ठाकुर; ६२. जमशेदपुर, ०३.०५.२००८, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ६३. राँची, १९.०७.२००८, कुमार मनीष अरविन्द; ६४. रहुआ संग्राम (मधुबनी), ०८.११.२००८, डॉ. अशोक अविचल; ६५. पटना, कथा गंगा-३, २१.०२.२००९, अजित कुमार आजाद/ चेतना समिति; ६६. मधुबनी, ३०.०५.२००९, दिलीप कुमार झा; ६७. समस्तीपुर, ०५.०९.२००९, रमाकान्त रय 'रमा'; ६८. सुपौल- ३, ०५.१२.२००९, अरविन्द ठाकुर; ६९. जनकपुर, ०३.०४.२०१०, राजाराम सिंह 'राठौर'; ७०. कबिलपुर (दरभंगा) , १२.०६.२०१०, डॉ. योगानन्द झा; ७१. बेरमा (झंझारपुर), ०२.१०.२०१०, जगदीश प्रसाद मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ७२. सुपौल, ०४.१२.२०१०, अरविन्द ठाकुर; ७३. महिषी, कथा राजकमल, ०५.०३.२०११, विजय महापात्र; ७४. हजारीबाग, १०.०९.२०११, श्याम दरिहरे; ७५. पटना, हीरक जयन्ती, १०.१२.२०११, अशोक एवं कमलमोहन 'चुन्नु'; ७६.चेन्नै, १४.०७.२०१२, विभा रानी; ७७. दरभंगा, किरण जयन्ती, ०१.१२.२०१२, अरविन्द ठाकुर ; ७८. घनश्यामपुर, ०९.०३.२०१३, कमलेश झा; ७९. औरहा (लौकही), १५.५.२०१३, उमेश पासवान; ८०. निर्मली (सुपौल), ३०.११.२०१३, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८१. देवघर, (बिजली कोठी, बम्पासटॉन, देवघर), २२.०३.२०१४, ओम प्रकाश झा; ८२. मेंहथ, (झंझारपुर), कथा बौध सिद्ध मेहथपा, ३१.०५.२०१४, गजेन्द्र ठाकुर; ८३. सखुआ-भपटियाही, ३०.०८.२०१४, नन्द विलास राय/फागुलाल साहु/सूरज नारायण राय 'सुमन'; ८४. बेरमा (मधुबनी), २०.१२.२०१४, शिवकुमार मिश्र, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८५. भागलपुर, (श्याम कुंज, द्वारिकापुरी भागलपुर), ०४.०४.२०१५, ओम प्रकाश झा ; ८६. लकसेना (मधुबनी), २०.०६.२०१५, राजदेव मण्डल 'रमण', सत्यदेव 'सुमन' ; ८७. निर्मली (सुपौल), १९.०९.२०१५, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी ; ८८. मध्य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर), ३०.०१.२०१६, कमलेश झा, अमर नाथ झा ; ८९. लौकही, २६.०३.२०१६, उमेश पासवान एवं प्रेम कुमार साहु; ९०. लक्ष्मीनियाँ (मधुबनी), १८.०६.२०१६, राम विलास साहु, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ९१. गोधनपुर (मधुबनी) २४.९.२०१६, दुर्गानन्द मण्डल; ९२. नवानी (मधुबनी), ३१.१२.२०१६, अजय कुमार दास 'पिन्टु'; ९३. रतनसारा (घोघरडीहा), २५.०३.२०१७, राजदेव मण्डल, स्थानीय साहित्यानुरागी ; ९४. लौफा (मधेपुर), २४.०६.२०१७, डॉ. योगेन्द्र पाठक वियोगी, स्थानीय प्रेमी ; ९५. जलसैन डुमरा (मधुबनी), ०९.९.२०१७, नारायण यादव; ९६. धबौली (लोकही), १६.१२.२०१७, राधाकान्त मण्डल ; ९७. बेरमा (लखनौर), २४.३.२०१८, कपिलेश्वर राउत, बेरमा ग्रामवासी ; ९८. सिमरा (झंझारपुर), १६.६.२०१८, डॉ. शिव कुमार प्रसाद ; ९९. मुरहद्दी, (बड़की टोल), २२.९.२०१८, प्रो. प्रीतम निषाद , १००. निर्मली (तेरापंथ भवन), २२.१२. २०१८, उमेश मण्डल, नवरत्न वेंगानी, मनीष जालान ; १०१. झिटकी (मधुबनी), ३०.३.२०१९, भारत भूषण झा ; १०२. मझौरा, (मधुबनी), २९.०६.२०१९, जय प्रकाश मण्डल, आलोक कुमार; १०३. रामपुर (मधुबनी), २८.९.२०१९, उमेश नारायण कर्ण 'कल्प कवि' ; १०४. वलम नगर-महदेवा (लौकही), १४.१२.२०१९,प्रेम कुमार साहु,उमेश पासवान; १०५.दरभंगा (सीतायन सभागार), १३.०२.२०२१, कमलेश झा ; १०६. हटनी (घोघरडीहा, मधुबनी), २५.०९.२०२१, लालदेव कामत; १०७. बेलहा (फुलपरास), २५.१२.२०२१, जीवकान्तक स्मृतिमे, उमेश मण्डल, ई. शैलेन्द्र मण्डल; १०८. मधुरा (मधुबनी), २६.०३.२०२२, डॉ. श्रीशंकर झा; १०९. ननौर (मधुबनी), २५.०६.२०२२, प्रदीप पुष्प; ११०. सोनवर्षा (लौकही), २४.०९.२०२२, अच्छेलाल शास्त्री, स्थानीय साहित्य प्रेमी; १११. रहुआ संग्राम (मधुबनी) ३१.१२.२०२२, अशोक अविचल; ११२. सहुरिया (अन्धराठाढ़ी) मे २५ मार्च २०२३, रामचन्द्र राय। ११३ म सगर राति दीप जरय जून २०२३ मासक अन्तिम शनि दिन हएत- आगामी संयोजक श्री नारायण यादव [स्थान नहरी (खुटौना) गाम]। १११म 'सगर राति दीप जरय' रहुआ संग्राममे सम्पन्न भेल साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष डॉ. अशोक अविचल व्यक्तिगत आधारपर १११म 'सगर राति दीप जरय'क आयोजन, वर्षक ३१ दिसम्बर २०२२ शनि दिन, रहुआ संग्रामक 'आदिनाथ मधुसूदन पारस मणि संस्कृत महाविद्यालय'क सभागारमे सफलतापूर्वक सम्पन्न करबेलनि। ३३ टा नूतन कथाक पाठ भेल। पठित कथा सभपर मैथिली कथाकार लोकनि टिप्पणी केलनि। एतऽ विभिन्न विधाक १७ पोथीक लोकार्पण सेहो भेल। ई आयोजन तीन-तीन मासपर, वर्ष भरिमे चारि खेप आयोजित होइए। प्रथम 'मार्च'मे, द्वितीय 'जून'मे, तृतीय 'सितम्बर'मे आ चतुर्थ 'दिसम्बर'मे। एतऽ किछु मूलधाराक साहित्यकार नाम नै लेबाक शर्तपर सूचित केलन्हि, जे अशोक अविचल आ सात टा गएर लिटेरेरी असोसियेशन साहित्य अकादेमीक मेम्बरशिपमे एकटा नाम आगाँ अनलक अछि- डॉ. अजय कुमार झा जे अशोक अविचलक भागिन छथिन्ह (किछु गोटेक अनुसार ममियौत पिसयौत); तेँ मूलधाराक कथाकार लोकनि १११म सगर जाति दीप जरयक बहिष्कार केलनि। ई पुछलापर जे तखन विभूति आनन्द, हीरेन्द्र कुमार झा, दमन कुमार झा आ अशोक कुमार मेहता केना १११म सगर राति दीप जरयमे पहुँचला, तँ ओ सभ सूचित केलनि जे तइ लेल ऐ चारू गोटेक करार अशोक अविचलसँ भेलन्हि जे ओ एकरा ११२ म सगर राति दीप जरय लिखता, मुदा ओ कोनो आमंत्रणमे से नै केलन्हि आ बैनरपर ऊपरमे छोट सन 'क्रम ११२' लिखलन्हि। तइपर संचालक हीरेन्द्र कुमार झा क उसकेलापर अध्यक्ष विभूति आनन्द समेत दमन कुमार झा आ अशोक कुमार मेहता २-३ घण्टा बाद खा पी कऽ ओतऽ सँ प्रस्थान कऽ गेला, मुदा समानान्तर धाराक सभ कथाकार भोर धरि गोष्ठीमे रहि एकरा सफल बनबेलन्हि। एतऽ ई स्पष्ट कऽ दी जे ई कृत्य हीरेन्द्र कुमार झा पहिनहियो केने छथि जे विदेहमे अभिलेखित अछि [८९म सगर राति दीप जरय, औरहा (लौकही), १५.५.२०१३, संयोजक- उमेश पासवान; हीरेन्द्र झा द्वारा क्रमांक ९० नै केलापर गोष्ठीक बहिष्कार आ हुनका उसकेलापर अशोक कुमार मेहता सेहो बहिष्कार केलनि]। एतऽ ईहो स्पष्ट कऽ दी जे हीरेन्द्र कुमार झा लूज टॉक करैमे माहिर छथि आ अपना सङे आयल लोकक विषयमे, कनियो जँ ओ सभ एम्हर-ओम्हर गेला, तँ ढाकीक ढाकी विषवमन करै छथि। संगहि ईहो स्पष्ट कऽ दी जे समानान्तर धाराक लेखक लोकनिक सगर राति दीप जरयमे आगमनसँ पूर्व, जखन हीरेन्द्र कुमार झा सभक बोलबाला छलन्हि, गोष्ठीमे सभ खा पी कऽ सूति जाइ छला आ मात्र कथा पढ़निहार असगरे जागल रहै छला, जकर विरोधमे आशीष अनचिन्हार कथा पढ़बासँ मना कऽ देने रहथिन्ह, मुदा मूलधारा भोरमे जे न्यूज देलक तइमे ई गप नै आयल। ई सभटा खेरहा हमर पोथी प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-२ मे अभिलेखित कएल गेल अछि जे उपलब्ध अछि http://videha.co.in/pothi.htm पर। साहित्य अकादेमी द्वारा गत दस बर्खसँ समानान्तर धाराक एकमात्र स्थल सगर राति दीप जरय केँ गीड़ि लेबाक प्रयास कएल जा रहल अछि। आगामी ११२म 'सगर राति दीप जरय'क आयोजन श्री रामचन्द्र रायक संयोजकत्वमे हुनक पैतृक गाम- सहुरिया (अन्धराठाढ़ी) मे 'मार्च' २०२३ मासक अन्तिम शनि दिन हएत, से सर्वसम्मतिसँ निर्धारित भेल। हीरेन्द्र कुमार झा अपन ब्लैकमेलिंग आगाँ सेहो पूर्ण निष्ठासँ जारी राखलनि जखन ०२.०१.२०२३ केँ रामचन्द्र रायकेँ फोन कऽ आगामी गोष्ठीक क्रमांक ११२ नै ११३ करबाक दुष्टतापूर्ण ब्राह्मणवादी आग्रह केलन्हि आ डरेलन्हि, जइ सँ कोनो तरहेँ साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरयक मान्यता भेटि जाय, फेर ०५.०१.२०२३केँ घट्टी मानलन्हि। साहित्य अकादेमी हुनकर दस बर्खसँ जारी ऐ कुत्सित प्रयासक मेहनताना दैत हेतन्हि आ जँ नै देने छन्हि तँ आगाँ देतन्हि। विदेहक आगामी साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक मे सभ गपक खुलासा हएत। ऐ सम्बन्धमे ई स्पष्ट कऽ दी जे अशोक अविचल ऐ गोष्ठीक आयोजन पूर्ण रूपसँ व्यक्तिगत रूपेँ केने रहथि। दिल्लीक साहित्य अकादेमीक गोष्ठी जे टैगोरक १५० जयन्ती बर्खमे आयोजित भेल आ जकरा साहित्य अकादेमी अपन वार्षिक रिपोर्ट आ आय-व्यय खातामे अपन गोष्ठीक रूपमे वर्णित केलक आ तकर पाइक वितरण देखेलक आ ऑडिटरसँ अप्रूव करेलक, जे सही मदमे टैगोरक कार्यक्रम लेल खर्च भलै (सगर राति दीप जरय लेल नै) केँ सगर राति दीप जरयक रूपमे मान्यता देबा लेल मूल धाराक पुरस्कार/ असाइनमेण्ट लोलुप आ ब्राह्मणवादी लोक गत दस बर्खसँ अपस्याँत छथि, से एक बेर फेर असफल भेल। रहुआ संग्राम गोष्ठीमे निम्न कथाक पाठ भेल, १. डॉ विभूति आनन्द : आस्था, विश्वास आ परम्परा; २. रवि भूषण कुमार : भोजक वहिष्कार; ३. मानब अनीष मण्डल : सत्यक भ्रूण हत्या; ४. रितिक मण्डल : गेलौं तँ हम गेलौं ; ५. पं. शिव कुमार मिश्र : वसुधा काहू को न होय; ६. उमेश मण्डल : अप्पन जिम्मा; ७. आचार्य रमानन्द मण्डल : बाल वैरागी; ८. राधाकान्त मण्डल : भुमहुर आगि आ अल्हुआ; ९. झोली पासवान : कारी नाग; १०. नारायण यादव : कनियाक जीवन; ११. कपिलेश्व राउत : चेफरी; १२. जगदीश प्रसाद मण्डल : कुमहरक बतिया; १३. अमित मिश्र : अधलाहक परिणाम अधलाहे; १४. बैद्यनाथी राम : हमहीं धनीक छी; १५. हरिश्चन्द्र झा : निरीक्षण; १६. प्रीतम कुमार निषाद : बुढ़ारी भ्रूणक हत्या; १७. श्रवण कुमार मण्डल : प्रेम विवाह; १८. रामसेवक ठाकुर : सात पूत रामकेँ; १९. रामकृष्ण परार्थी : आड़ि; २०. दुर्गेश मण्डल : द्वन्द; २१. लालदेव कामत : मधुमाछी ; २२. शारदानन्द सिंह : जावत सोंखा के नाव होयतो तावत; २३. अरविन्द प्रसाद : नेंगरू आ मंगरू; २४. अशोक अविचल : मनुआ नाचय मोर; २५. नारायण झा : राजनीतिमे राजनीति; २६. उमेश नारायण कर्ण : माय; २७. दुर्गानन्द मण्डल : सपना; २८. राम विलास साहु : नीक करब तँ बेजाए किए हएत?; २९. नन्द विलास राय : रंगल नढ़िया; ३०. रामचन्द राय : तोहीं जितलेँ हमहीं हारलौं; ३१. रामेश्वर प्रसाद मण्डल : हमरो बहिन अछि; ३२. विनय मोहन जगदीश : छट्ठू; आ ३३. रमेश कुमार शर्मा : संघर्ष। गोष्ठीमे निम्न पोथी सभक लोकार्पण भेल- १. साहित्यकारक विवेक (कथा संग्रह) : जगदीश प्रसाद मण्डल; २. नब बनक नब फल (कथा संग्रह) : जगदीश प्रसाद मण्डल; ३. सुचिता (उपन्यास) : जगदीश प्रसाद मण्डल; ४. प्रतिकार एखन बाँकी अछि (काव्य संग्रह) : रामकृष्ण परार्थी; ५. असल पूजा (कथा संग्रह) : नन्द विलास राय; ६. संयोग (कथा संग्रह) : रबीन्द्र नारायण मिश्र; ७. लजकोटर (उपन्यास) : रबीन्द्र नारायण मिश्र; ८. इएह थिक जीवन (संस्मरण) : रबीन्द्र नारायण मिश्र; ९. राष्ट्र मंदिर (उपन्यास) : रबीन्द्र नारायण मिश्र; १०. मातृभूमि (उपन्यास) : रबीन्द्र नारायण मिश्र ; ११. सीमाक ओहि पार (उपन्यास) : रबीन्द्र नारायण मिश्र; १२. नित नवल सुभाष चन्द्र यादव : गजेन्द्र ठाकुर ; १३. मैथिली समीक्षाशास्त्र (आलोचना) : गजेन्द्र ठाकुर ; १४. Rajdeo Mandal Maithili Writer : Gajendra Thakur; १५. सुभद्रा कुमारी चौहान (विनिबन्ध) : डॉ. अशोक अविचल; १६. जेतए ने जाए कवि ओतए जाए अनुभवी (विचारोत्तेजक गद्यांश संकलन) : डॉ. उमेश मण्डल; १७. जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य संग्रह (अनुसन्धान विश्लेषण) : डॉ. उमेश मण्डल। सुभाष चन्द्र यादव समानान्तर धाराक १११म सगर राति दीप जरयक सफलता लेल संदेश पठेलन्हि आ नै आबि सकबा लेल दुख व्यक्त केलन्हि। लोकार्पित पोथी 'नित नवल सुभाष चन्द्र यादव' लेल अपूर्व उत्साह देखल गेल, आ उपस्थित लोक मांगि-मागि कऽ ओ पोथी लेलनि आ फोनपर दूर दिल्ली आ आन-आन ठामसँ ऐ पोथीक ऑर्डर लोकार्पण दिने सँ आबय लागल। - Gajendra Thakur, editor, Videha (Be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast list.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३६६ पर टिप्पणी अंक ३६६ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार नचिकेताक दुनू कविता हुनकर हस्तलिपिमे नीक लागल। नित नवल सुशील आ नित नवल दिनेश कुमार मिश्र नीक जकाँ आगाँ बढ़ि रहल अछि। यूनीकोड तिरहुता कीबोर्ड आ मैथिली संकेतलिपि सम्बन्धी सम्पादकीय उत्तम अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.महाकान्त प्रसाद- बीहनि कथा- बुन्नी २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी- 'लव यू टू' (आगाँ) २.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- संस्मरण - 'कुमरजी' २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मकान मालिक आ किरायादार २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २४ म खेप २.६.कुमार मनोज कश्यप- प्रतिदान २.७.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१६) २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल-जिनगी भार बनि गेल २.९.आचार्य रामानन्द मण्डल-गौरी आ प्रेम मे धोखा २.१०. डॉ. किशन कारीगर- मिथिला मैथिली के घुन जेंका खोखैर के खा गेल (हास्य कटाक्ष) २.११.लाल देव कामत- तीन टा पोथीक समीक्षा २.१.महाकान्त प्रसाद- बीहनि कथा- बुन्नी महाकान्त प्रसाद बीहनि कथा- बुन्नी
-मीता गेल छलियै ओतऽ ? -कतऽ यौ? -दक्षिणबरिया टोल, पोखरिक महार दिस। -गेल तऽ छलियै,भेटबो कएल, लसहरि छै ओकरा, मुदा से बाद मे बुझलियै! -तखन? -तखन की, हमर तऽ जे होएत से हेबै करत, अहाँ सभ बचि कऽ रहु- बजैत-बजैत ओकर मुंह पर पसेनाक बुन्नी चुनिया लगलैक। दुनू मीत गंभीर भऽ गेल छल।
तखनहि अकास सँऽ बुन्नी खऽसऽ लगलैक। दुनू अपन अपन घर दिस बिदा भऽ गेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी- 'लव यू टू' (आगाँ) संतोष कुमार राय 'बटोही' डायरी- 'लव यू टू' (आगाँ)
14-09-2013
मुगल गार्डन : राष्ट्रपति भवन
लल्ली केर मोन गदगद भ' गेलै , जखन ओ मुगल गार्डनक नाम सुनलीहि। मुगल गार्डन राष्ट्रपति भवन केर पाँछा मे छै। फूलक खुशबू सँ गमगम करैत रहति छै राष्ट्रपति भवन। मुगल गार्डन मे ओनाही नहि घुसि सकैत छी। मेटल डिटेक्टर सँ चेक करैत छथि सेकुरिटी गार्ड ।
लल्ली पिंक कलर केँ अंब्रेला सूट पहिनने छथि। हुनकर देह पर ई सूट खूब जँचै छन्हि। हमरा देखि कs मोन हरखित भेल जे लल्ली परी जँका लागि रहल छथि। मोन मे टिस मारs लागल छल। राधे-राधे ! कहिया लल्ली हमर संन्यासिनी बनती ई मोन में सोचि रहल छलहुँ आओर मुगल गार्डन घुमि रहल छलहुँ। लल्ली दिस ध्यान गेल तँ , ओ हमरा दिस ताकि रहल छलीह। हम किछु पछुआ गेल छलहुँ। पाएर तेजी सँ आगा बढ़बैत लल्ली केँ सोझा गेलहुँ हम। लल्ली हमर आओर पास आबि गेलीह । ओ एकटा फूल दिस इशारा करैत बजलीह - " Can you guess what is the name of this flower ?
हम अकबका गेल छलहुँ । हम अइ प्रश्न केर जवाब देबा लेल तैयार नहि छलहुँ। सच इहो छल जे हम ओइ फूल केँ नहि चिनहैत छेलियै। हम लल्ली सँ कहलियै - " Sorry, can you guess ?" ओ कहलीहि जे राति मे अइ फूलक नाम कहतीह।
9 -10-2013
हंसराज कॉलेज : डीयू
नॉर्थ कैंपस उतरि कs हम विश्वविद्यालय दिस चलैत रहलहुँ अछि। रोड केँ दुनु कात वोन छै। कियो रस्ता मे भेंट नहि भेल। शनै: शनै: हम आगाँ बढ़ैत गेलहुँ अछि। आगाँ जाकs रस्ता केँ दुटा फेज भs जैत छै। आब किछु दुरि पर एकटा आटो अबैत देखायल। ड्रायवर सँ पुछि कs आगाँ बढ़ैत रहलहुँ हम। ढेर राशि चलs पड़ल। दाहिना चलि कs 200 मीटर पर हंसराज कॉलेज केर गेट देखि कs मोन हरखित भेल जे लल्ली आब भेंट जेतीह।
हम अति विहनसरे चलि गेल छलहुँ। कॉलेज पर कियो नज़र नहि आयल। कनिक देर गेट लग ठाढ़ रहलहुँ हम, तँ एकटा गार्ड दिखाई देलक। समय करीब साढ़े सात होएत छलैह। गार्ड कहलक दस बजे कॉलेज खुलतै। आब हम की करब ? मोन हदबदा गेल। हम उल्टे पैर रिंग रोड दिस विदा भेलहुँ। लल्ली सँ मिलवाक झोंक चढ़ल छल।
रिंग रोड आबि कs हम बस स्टैंड पर बैस गेलहुँ । लल्ली केँ पेरा देखs लगलहुँ। लल्ली पर विश्वास छल जे ओ जरूर औतीह। साढे नौ बाजि गेलै। लल्ली केँ हम फोन लगौलियै। लल्ली फोन नहि उठौलक। कनेक मोन छोट भ गेल। परञ्च हम हारलहुँ नहि। फेर फोन लगौलियै। अइ बेर ओ फोन रिसीव केलीह। ओ आबि रहल छलीह आजादपुर मे।
हमर मोन गदगद भs गेल। इ लल्ली छथि। हमर मोन आओर दिल पर ओ कब्जा कs लेने छथि। आँखि डबडबा गेल। इ मिलन केँ बादक नोर छियैय। लल्ली हमर जान अछि , हृदयक स्पंदन अछि, ओ हमर कोमल भाव अछि , लत्ती जकाँ बढ़ैत अनुराग अछि।
हम ओकर हंस छियैय ओ हमर हंसिनी। हमरा लेल इंद्रलोकक परी फेल अछि। लल्ली केर सोझा मे मेनका फेल अछि। मोन, करम, वचन सँ ओ हमर छी।हमर ओकर छियैय। ओ हमर हृदयक मर्म केँ बुझैत छथि। जहिया हम मरब ओ हमरा लेल जरूरे कनतीह। हृदयक अथाह कोठरी मे ओ त्रिभंगी मुद्रा मे अटकल अछि। ओ राज बनल अछि।
25-12-2013
लल्ली हमर छी
हृदय अखनो धरि नहि मानैत अछि कि लल्ली हमरा छोड़ि कs चलि गेलीह। मोन कचोटि केँ हम रहि गेलहुँ। देवता-पित्तर हमर संग नहि देलक। हमर अंतिमो प्रयास बेकार भेल। लल्ली एक दिन धरि रणभूमि मे डँटल रहलीह, परञ्च धर्मेंद्रजी ओकरा रूम पर सँ टस-स-मस नहि भेलाह। लल्ली केँ पापा जहर खेवाक गप कहलाथि। लल्ली हारि गेलीह। हम हारि गेलहुँ। आब हम की करी ? जिनगी खत्म करै केँ विचार केलहुँ , परञ्च मायक अवस्था देखि कs इ विचार छोड़ि देलहुँ।
तेखंड कें अइ मकान में आइ मरल जकाँ हम पड़ल छी। हृदय टुटि गेल अछि । आँखि सँ नोर बहि रहल अछि। कियो सुननिहार नहि। गरीब केँ प्रेम करवाक कोनहुँ अधिकार नहि होएत छै। गरीब माने निर्जीव होयत छै। लल्ली हमर नहि भेलीह। हमर हृदय फाटि गेल। हमर विश्वास डगमगा गेल। आब दुनिया पर सँ हमर विश्वास उठि गेल। हम बपहैर काटि कs कानलहुँ अछि। मोन विरक्त भs गेल। परिवार , समाज, देश सँ हमरा वैराग्य भाव उत्पन्न भs गेल।
हमर दुनिया अनहार भs गेल। अमावस सँ दोस्ती भs गेल। लल्ली हमरा विसैर गेलीह, परञ्च हम ओकरा नहि विसरलियै अखनो धरि। अंतिम साँस धरि ओ हमर हृदय मे रहतीह। हम आजीवन ओकर गुलाम बनि गेलहुँ अछि। लल्ली केर शब्द 'आई लव यू टू' अखनो धरि हृदय मे उधम मचाबैत अछि। मोन मे हदबदी उठि जायत अछि। मोन मोसैर केँ रहि जायत छी। हमर लल्ली हमर छी चाहे दुनिया जेना बुझै।
-संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- संस्मरण - 'कुमरजी' संतोष कुमार राय 'बटोही' संस्मरण - 'कुमरजी'
घंटी टुनटुना रहल छै। विद्यार्थी सभ विद्यालय मे खेल रहल छै । चेतना - सत्र केर समय भs गेल छै। प्रभारी प्रधानाध्यापक जी मैक मे बाजs लगलाह , "प्रार्थना की स्थिति मे सावधान , गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु....।''
"तू ही राम है, तू रहीम है...". वगैरह कहैत चेतना-सत्र केँ तीन टा बालिका आगा बढ़ौलाथि।
आब ओ मोटगर पेना जकाँ छड़ी लsकs पाँति-पाँति घुमs लगलाह। आठवीं केँ आशुतोष केँ एक छड़ी दमैस कs देलथिन्ह। छौड़ा केँ पीठ अँचि गेलै। ओकर दुनु आँखि सँ नोर ढबढब खसs लगलै। पिशाच जकॉं ओ लाठी बजारैत छथिन्ह।
अभियान गीत केँ ओ अपने गबैत छथि - " घरे-घरे अलख जायेंगे हम , देखेंगे जमाना.....।"
माथ पर 'देवानंद' स्टाईल केँ कत्थी रंग केर टोपी पहनैत छथि। बजैत-बजैत फचुरी भेल रहैत छथि। सब धान बाईस पसेरी। हुनका लेल कियो पैघ आओर कियो छोट नहि छथि। सबको एके लाठी सँ हाँकैत छथिन्ह। हेडमास्टर सँ पैघ ओ विदूषक छथि। भरि दिन विपटा जकॉं स्कूल मे नाचैत रहैत छथि। ई किनको नीक लगतैन्ह वा नहि ओई सँ हुनका कोनहुँ परवाह नहि छन्हि।
नटुआ जकाँ हुनकर हाथ चमकैत रहैत छन्हि। कतौ टिक कs ओ नहि बैसैत छथिन्ह। जेना हुनका हौवहैट भेल रहैन्ह , ओ देह केँ मिचयबैत रहैत छथिन्ह। वकीलक कारी कोट भरि बरख पहनने रहैत छथि । गर्मी, जाड़ा, बरसात सभ मौसम मे एके पेहनावा।
प्रेमचंद जकाँ मोंछ , रंग गेहुंआ , छह फुटक कदकाठी , दोहारा देह , नाक खरगर छन्हि हिनकर। कोट पर शंकरामाइसिनक पाउडर छिड़िआयल रहैत छन्हि।
कोनहुँ नाटक पार्टी मे पहिने काज करैत छलाह मने। मउगी गारि हुनका खूब अबैत छन्हि। मेमोरी पावर अतेक मजबूत जे कम्प्युटर हुनका सोझा मे फेल छै।
खिस्सा कहबा मे गोलू झा केर कान काटैत छथि। ठहाका मारि के हँसैत छथि। स्वांग करवा मे हुनका महारत हासिल छन्हि। खने खंडित छथि किनको ऊपर, खने उहै वेक्ति सँ घुल-मिल कs गपियैत छथि। हुनका लेल कियो नहि परमानेंट दोस्त , नहि दुशमन।
बजैत-बजैत भसिया जैत छथि। की बजैत छी, कतs बजैत छी से सुधि-बुद्धि हरा जायत छन्हि। आचार-विचार सभ कोनटा पर टैंग दैत छथिन्ह। बटगबनी आओर फकरा कहै मे ओ बिहैर छथि।
" धर्मशाला है ? जब मर्जी तब आओ ! शरम ही नहि आता है। आओ सनम जाओ सनम। सभ ऐसे आयेगा जैसे बाप का घर है। इस्कूल है...इस्कूल।" हाथ चमकबैत हेडमास्टर साहब बाजि रहल छलाथि।
कलियुग आबि गेलै....घोर कलियुग ! शिक्षकगण एक डेढ़ घंटा लेट अबैत अछि आओर एक डेढ़ घंटा पहिने इस्कूल सँ भागै मे लागल रहैत छथि।
हेडमास्टर साहब पूरा फायर भेल छथि , " सभ केँ सभ परतैर रहल अछि , अपन दाव सुतैर रहल अछि।"
आब ओ मोटगर छड़ी उठाबैत छथि आओर इस्कूल कैंपस मे विद्यार्थी केँ होहोकारी दैत छथिन्ह। विद्यार्थी डरे चहुँ दिस भागि रहल छै।
"रूको...रूको अभी बताते हैं।" एकटा विद्यार्थी दिस लपकलकिन्ह। ओ निछोह बाहरि दिस भागल अपन जान बचौलक।
इस्कूल मे भनसिया सभ केँ लेट सँ अबैत देखि कs हुनकर पारा चढ़ि जायत छन्हि , " आशुतोष बाबू , देखियौ अकरा सभ केँ... होयत छै महारानी भs गेलहुँ। चान , खुरपी छुआ बैन हुआ सँ काज नहि चलतs । अपन-अपन समय पकड़s। जकरा फुर्सत नहि अछि ओ अपन घर देखियौ। इस्कूल अबै केँ काज नहि छै।"
ई रोजक हिनकर रूटिन छन्हि। किछु मास्टर हिनका नज़र मे बेसी नीक छथि। फेर किछु दिनकर बाद नीक मास्टर केर हुनकर लिस्ट बदलि जैत छन्हि। पीठ परोछ जे मोन मे आबैत छन्हि बाजैत छथि। सोझा मे सभ कियो केँ ओ बाबू आओर भाईजी कहैत छथिन्ह। खने दुशमन जकॉं करs लगैत छथि , खने सभ सँ मीठगर प्रेमी जकाँ।
एल एल बी आओर एम एससी केने छथि। टीचर ट्रेनिंग केला सँ पहिने ओ एयरफोर्स मे ट्रेनिंग सँ आबि गेल छलथिन्ह। तैं अपना केँ ओ फौजी मानैत छथि। मधुबनी कोर्ट मे किछु दिन धरि काज केने छथि। तैं कारी कोटक दाबा करैत रहैत छथि।
इस्कूल मे माँ सरस्वती केँ मंदिर छै । हरेक बरख पूजा एवं मेला लगैत छै। दु-तीन दिन इस्कूल पर रोमांच बनल रहैत छै। कलश यात्रा निकलै छै। खूब भव्य आयोजन होयत छै। पूरे बिरौल ब्लाक मे नामी सरस्वती पूजा लगैत छै। नीलकंठ महादेव बाबा केँ कमला नहर मे सँ कलश भरल जायत छै।
" हो... हो... हेडमास्टर साहब खूब नचलाह डीजे केँ गीत पर... गरदा उड़ा देलथिन्ह नाचि कs । छौड़ा सभ पीहकारी मारि रहल छै। सभ हँसि रहल छै ।
किछु लोकनि धुरछिया कs रहल छै। किछु जनीजाति कहैत छै , "मारधके...एहेन लबड़ा माहटर...सरधुआ... धियापुता जकाँ नाचि रहल छै। बुढ़ भs गेलै नाक लगले छै.....।"
इ सभ भेलाक बादो हुनका मोन मलिन नहि भेलन्हि जे लोक की कहि रहल अछि। अपने धुने बताह। नमगर-नमगर भाखा बजैत छथि। लालू जी केँ लंगोटिया यार मानि रहल छथि। चुटकी लेवा मे छप्पन छुड़ि बहत्तर पेंच छथि। बजैत-बजैत अंफसियाँत भेल रहैत छथि। शंकरामाइसिन केँ डिब्बी निकालि कs मुँह मे ढैर लेलाथि। हँसैत छथि तँ अगुआ दाँत केँ गह मे कारीख लागल बुझैत छन्हि।
खिलाबै-पिलाबै मे नाम कमैत छथि। किनको एला पर लाल चाह जरूर पीआबैत छथिन्ह। अइ वेवहार मे हिनकर सानी नहि।
आइ ओ रिटायर भs जेताह। इस्कूल केँ कार्यालय सजल छै। विदाई समारोह भs रहल छै। हुनका पाँच टूक कपड़ा पेहनौल गेलन्हि। पाग प्रभारी हेडमास्टर साहब हुनका माथ पर सजा देलकैन्ह। वरीय मास्टर साहब हुनका कन्हा पर सॉल ओढ़ा कs हुनका नमस्कार केलन्हि।
आब गाम पर चौक-चौराहा पर मिमियैत रहैत छथि। "की हौ कुमर , कहिया अयलह ? " कियो पूछलथिन्ह।
"दु दिन भेल अछि। रिटायर भs गेलहुँ अछि। हम की रिटायर हेबै। आब सरकारे रिटायर हेतै।" मुँह केँ बिचकबैत हेडमास्टर साहब कुमरजी साँसक आलाप लैत बजलाह।
-संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मकान मालिक आ किरायादार रबीन्द्र नारायण मिश्र मकान मालिक आ किरायादार आइ-काल्हिक युगमे लोकक आवास बदलैत रहैत अछि। नौकरीमे लोकक बदली होइत रहैत अछि । व्यापारीसभ सेहो अपन सहर बदलैत रहैत छथि । गाम-घरक लोक सेहो लगपासक सहरमे अपन घर बना लेने छथि । जिनकासभकेँ भगवान बेसी संपदा देने छथिन से सभ कैक-कैकटा घर बनेने रहैत छथि। जाहिर छैक कि फाजिल घरक ओ की करताह,किराया लगेताह वा बंद रखताह । घरकेँ बंद रखनाइ सेहो कोनो लाभकर समाधान नहि अछि ,तथापि किछुगोटे किरायादारक संगे झंझटमे नहि पड़ए चाहैत छथि आ घरकेँ बहुत-बहुत दिन धरि खालीए छोड़ि दैत छथि। ई बात सही अछि जे कैक बेर किरायादारक संगे मकान खाली करेबाक हेतु ,किंवा किराया वसूलीमे दिक्कति भए जाइत अछि मुदा तकर माने तँ ई नहि जे सदिखन सएह होइत रहत । फेर अहाँ जहन गाम-घर छोड़िकए बाहर जाएब तँ किरायाक मकान चाहबे करी,अपन मकान कतए-कतए बनबैत रहब?किरायाक मकान भेटैत रहए आ दुनू पक्षकेँ ठीकसँ समय बितनि ताही उद्येश्यसँ देशभरिमे किराया नियंत्रण कानून बनल अछि । मकान मालिक आ किरायेदारक बीचमे समस्या बहुत पुरान अछि । समस्याक जड़िमे मकानक अभाव आ बढ़ैत किराया अछि । मकान मालिक चाहैत रहैत छथि जे हुनकर किराया बढ़ैत रहनि आ जखन ओ चाहथि मकान खाली भए जानि । कहक माने जे एहन नहि होइक जे किराएदार मकानपर अबैध कब्जा कए लिअए,किराया सेहो नहि दिअए । मुदा किरायदारक समस्या सेहो मानबीय दृष्टिसँ देखब बहुत जरूरी अछि । मकान मालिक बेर-बेर जँ मकान खाली करबैत रहताह तँ ओकरा नाना प्रकारक समस्या होएब स्वभाविक। बच्चासभक इसकूल,अपन कार्यालय आ बढ़ैत खरचामे तालमेल बैसाएब मोसकिल भए जाइत अछि । कानून एहि समस्यासभकेँ समाधान करैत बीचक रस्ता निकालबाक प्रयास करैत अछि । मुदा कैक बेर ई संभव नहि भए पबैत अछि । दुनू पक्ष एक-दोसरसँ सामंजस्य नहि बैसा पबैत छथि आ मोकदमाबाजी धरि बात चलि जाइत अछि। जँ मकान मालिक दबंग अछि तँ जबरदस्ती सेहो करैत अछि । बदमासकेँ लगा कए किरायेदारक समान कैक बेर बाहर फेकि देल जाइत अछि । महानगर जेना कोलकाता,मुम्बइ, दिल्लीमे हालति आओर बहुत खराप अछि । कैकटा किरायेदार मुख्य व्यापारिक स्थानमे पाँच-दस रुपया किराया दैत छथि आ पचासो सालसँ अड़ल छथि,मकान खाली नहि कए रहल छथि। मकानक हालति जर्जर भए चुकल अछि। मकान मालिक मोकदमा ठोकने छथि । मुदा तेँ की? किरायेदारसभ आपसमे संगठन बना कए तकर प्रतिवाद करैत रहैत छथि,मुदा मकान खाली हेबाक कोनो संभावना नहि लगैत अछि । जौँ ओ मकानसभ आइ-काल्हि किरायापर लेल जाएत तँ किराया लाखोमे भए सकैत अछि । उदाहरणस्वरुप, जँ कनाटप्लेस दिल्लीक कोनो दोकान साबिक किरायापर चलि रहल अछि तँ किओ किएक खाली करत? जँ ओ ओहिठाम किरायापर मकान वा दोकान आब लेबए जाएत तँ किराया कतेक बढ़ि जाएत,सोचबो मोसकिल अछि। आनो महानगरसभमे तेहने हालति अछि । अस्तु,मकान मालिकसभक चिंता सेहो उचित अछि । आखिर लोक संपत्तिकेँ एहि लेल तँ नहि कीनलक जे ओकरा एहि तरहक घनचक्करमे गमा देल जाए? मुदा उपाय की अछि? जीवनमे भोजन,वस्त्र,आवास मौलिक आवश्यकता मानल जाइत अछि । भोजन.वस्त्रक बाद रहए लेल घर तँ चाहबे करी । लोको पुछैत अछि जे अपनेक कोन गाम घर भेल? माने जे घर आदमीक परिचय थिक। ग्रामीण परिवेशमे तँ अखनो घर माने अपन घर बूझल जाइत छैक ,कारण ओहिठाम किरायाक मकान ने उपलव्ध होइत अछि आ ने लोक लैत अछि । गाममे लोकक पुस्तक-पुस्त गुजरि जाइत छैक । एकहिठाम लोक जीवन भरि रहि जाइत अछि । पहिलुका समयमे ई बात सही छलैक । मुदा आब परिस्थिति बदलि गेल अछि । पढ़ाइ-लिखाइ,नौकरी,व्यापार हेतु लोक गाम-घरसँ बाहर होइत छथि । ई संभव नहि थिक जे सभ सहरमे अहाँ अपन घर बनेने फिरी । तेँ किरायापर मकान लेब जरुरी भए जाइत अछि । छोट सहरमे किरायाक मकान आसानीसँ भेटि जाइत अछि,किराया सेहो कम होइत छैक आ मकान मालिक जखन-तखन खाली करए सेहो नहि कहैत छैक । मुदा पैघ सहरमे खास कए महानगरमे हालति दोसर अछि । मुम्बइमे तँ ई हाल अछि जे एकहि कोठरीमे कतेको गोटे कहुनाक किरायापर गुजर करैत छथि। ऊपरसँ मकान मालिककेँ पगड़ी सेहो दिऔक,मासे-मासे किराया तँ चाहबे करी । रहि-रहि कए मकान मालिक दुलत्ती मारिते रहत,जाहिसँ अहाँ ई नहि बिसरि जाइ जे मकान किरायापर लेल गेल अछि आ किछु दिनक बाद खाली करहि पड़त । अस्तु,किरायेदारक हालति कैक बेर बहुत चिंताजनक भए जाइत अछि । मुदा समाधान की अछि? सभ आदमी मकान नहि कीनि सकैत छथि । किरायापर मकान लेनाइ एकटा मजबूरी रहैत छैक। एहि विषयमे कतेकोबेर न्यायलयमे मामिला कएल गेल । एहि विषयपर उच्चतम न्यायलय सेहो कतेको फैसला देलक । ओहिसभसँ किछु सुधारो भेलैक अछि। मकान मालिक आ किरायादारमे सामान्यतः दूइएटा बात लेल झंझट होइते छैक:-१.किराया बढ़बए हेतु,२.मकान खाली करेबाक हेतु । आओर छोट-मोट समस्यासभ सेहो भए सकैत छैक जेना मकानकेँ मरम्मति केनाइ,किराया बकिऔता भए गेनाइ,आदि-आदि । एहि समस्यासभसँ निपटए हेतु दुनू पक्ष मकान किरायापर लेबए- देबएसँ पहिनहि आपसमे किरायाक एकरारनामा बनबैत छथि। जौँ लीजक अवधि सालभरिसँ कम अछि तँ ओकरा निवंधित करबाक जरुरी नहि अछि अन्यथा एकर निवंधन सब-रजिष्ट्रारक ओहिठाम कराएब कानूनी बाध्यता अछि । जौँ किरायाक एकरारनामा बनल अछि तँ लीजक तय अवधिमे किरायाक ओहि मकानक सभ विषय-वस्तु तकरे अनुसार चलत चाहे ओ किराया बढ़ेबाक गप्प होइक,मकान खाली करेबाक गप्प होइक वा किरायाक भुगतान करब होइक । जँ किरायाक एकरारनामा नहि बनल अछि ,किंवा लीजक अवधि बीति गेल अछि तँ मकान मालिक आ किरायेदारक बीचमे स्थानीय सरकार द्वारा बनाओल गेल किराया नियंत्रण कानूनक अनुसार विवादक निर्णय होएत । किरायेदारक हेतु ई बहुत जरुरी अछि जे ओ तय किराया समयसँ मकान मालिककेँ दैत रहथि । किराया नहि देनाइए अपना-आपमे मकान खाली करेबाक हेतु प्रयाप्त कारण भए सकैत अछि। यदि मकान मालिक किराया नहि लैत छथि तँ किराया मुद्रादेशसँ पठाओल जा सकैत अछि । यदि सेहो संभव नहि होइत अछि तँ किराया नियंत्रण अधिकारीक ओहिठाम आवेदन दए किराया जमा करा देबाक चाही । सामान्यतः एहन परिस्थिति तखने होइत अछि जखन कि मकान मालिक मकान खाली कराबए चाहैत छथि । जँ मकान मालिक आ किरायेदारक विवाद आपसमे नहि सोझराइत अछि तँ दुनूमे सँ किओ किराया नियंत्रण अधिकारीक पास आवेदन दए अपन समस्या राखि सकैत छथि । उदाहरणस्वरुप,जँ मकान मालिक मकान खाली करबए चाहैत छथि तँ तकर कारण दैत मकान खाली करबा सकैत छथि । सामान्यतः मकान खाली करेबाक हेतु प्रमुख कारण मे किराया नहि देब,मकान मालिककेँ स्वयं मकानक आवश्यकता भए सकैत अछि। जँ किरायेदारकेँ अपन मकान छनि तँ किरायाक मकान खाली करेबाक ओ मजगूत आधार बनि जाइत अछि। मकान मालिक किराया निर्धारणक हेतु सेहो ओतहि अर्जी दए सकैत छथि। देश भरिमे सभ राज्य अपन-अपन किराया नियंत्रण कानून बनओने अछि । कैकटा राज्यमे ऐहि कानूनक अधीन आबएवला मकानक किरायाक सीमा तय कएल अछि । संगहि राज्य वा केन्द्र सरकार ,स्थानीय निकायक मकानसभ सेहो एहि कानूनसँ बाहर अछि। कैकटा राज्यमे नव निर्मित मकान किंवा धर्मार्थ कार्यरत संस्थाक मकान सेहो एहि कानूनक अधिकार क्षेत्रसँ बाहर राखल गेल अछि । विभिन्न राज्यक कानूनमे समरूपता होइक जाहिसँ ई कानून सर्वग्राही भए सकए आ सामान्य लोक एकर सुविधा सरलतासँ लए सकए,ताहि हेतु १९९२मे संसद द्वारा आदर्श किराया नियंत्रण कानून पास कएल गेल । एहिमे किरायेदारीक विरासतपर मौजूदा प्रावधानमे सँ किछुकेँ संशोधित करबाक प्रस्ताव छल आओर किरायाक एकटा सीमा सेहो निर्धारित कएल गेल जाहिसँ बेसी भेलापर किराया नियंत्रण लागू नहि होएत। तकरबाद दिल्लीमे ओहि आधारपर १९९७मे कानून बनबो कएल जे स्थानीय व्यापारी वर्गक विरोधक कारण लागू नहि कएल गेल। मकान मालिकक आ किरायेदारक बीच संवंध मधुर रहए आ कोनो मतभेद भेलापर सुगमतासँ तकर समाधान भए जाए ताहि हेतु ई आवश्यक अछि जे दुनू पक्ष मकानकेँ किरायादारी प्रारंभ हेबासँ पहिने स्पष्ट प्रावधानक संगे किरायाक लीज एग्रीमेन्ट( किरायाक एकरारनामा) उचित मूल्यक स्टांप पेपरपर हस्ताक्षरित करथि। ओहिमे सभ बात जेना किराया कतेक होएत,मकान कतेक दिन किरायापर रहत,मकानक मरम्मति केना की हएत, मकान कहिआ खाली करए पड़त, स्पष्टतासँ लिखल रहए । जौँ सालभरिसँ अधिक हेतु किरयापर मकान लेल जाइत अछि तँ एकरारनामाक निवंधन सेहो कराएब जरुरी अछि । एहिमे दुनू पक्षकेँ हितक समाधान भए जाइत अछि । अस्तु, मकान किराया लेबए वा देबएसँ पहिने उपरोक्त बातसभकेँ ध्यानमे रखैत कानून सम्मत किरायाक एकरारनामा बना लेबाक चाही आ तकर अनुवंधकेँ दुनू पक्षकेँ पालन करैत रहक चाही जाहिसँ सुख- शांति बनल रहए । ई सभ बात जँ ठीकसँ कएल गेल अछि तँ मकानकेँ किरायापर देबामे कोनो हर्जा नहि छैक। -रबीन्द्र नारायण मिश्र, mishrarn@gmail.com -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २५.दीप जरैत रहए (उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २४ म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- धारावाहिक २४ गोविंद आ माधव गाम पहुँचितहि ठोकले पाठशाला लग पहुँचलाह । "एहिठाम तँ किछु नहि बाँचल अछि?" "एतेक तेजीसँ ई सभ भेल से सोचि आश्चर्य लागि रहल अछि । ओहूसँ आश्चर्य एहि बातसँ होइत अछि जे दछिनबारिटोलक लोकसभ सभकिछु चुपचाप देखैत रहि गेल । किछु प्रतिकार नहि कए सकल । एहन तँ नहि छल ई टोल । एक समय छल जखन एहि टोलमे विद्वानसभ भरल छलाह । जतहि देखू ततहि शास्त्र चर्चा भए रहल अछि । ओही टोलमे आइ की हाल अछि? गामक एकटा प्रतिष्ठित संपदा छल ई पाठशाला ,तकरो रक्षा नहि कए सकलाह।" "जखन अपने आदमी शत्रु भए जाइत अछि तँ रक्षा करब ककरो हेतु मोसकिल भए जाइत अछि । सुधाकर तँ अपन पितोक बात नहि सुनलाह । कहाँदनि ओ बहुत कहलखिन । मुदा सुधाकर तँ जे छथि से सभकेँ बूझल अछि । " "आब की कएल जाए? एहिठाम तँ सुधाकर अपन मकान बना रहल छथि । एतेक तेजीसँ एकर काज आगू कोना बढ़ि गेल,से सोचि आश्चर्य लागि रहल अछि । हमरा लोकनिक गेला सात दिन भेल अछि । एतबे समयमे मकानक काज एतेक आगू भए गेल ।" ओ सभ आपसमे गप्प कइए रहल छलाह कि ओहिठाम सुधाकर आबि गेलाह । हुनका संगे लठैत सभ सेहो छल । "कहिआ गाम अबैत गेलह?" "आबिए रहल छी? "ओ! हम तँ सुनने रहिऐक जे आब तूँ सभ जयन्तक संगे जानकीधामेमे रहबह ।" "बीचे रस्तासँ वापस होबए पड़ल।" "से किएक? गाम कोनो भागल जाइत छलैक । किछु दिन जानकीधाममे रहितह । नीक-बेजाए बुझितहक।" "सोचने सएह रहिऐक । मुदा से अहाँ कहाँ होबए देलिऐक?" "लएह । हम की केलिअह?" "अहाँकेँ ई कुबुद्धि केना भेल जे पाठशालाकेँ तोड़ि कए ओहिठाम अपन घर बना रहल छी । ई तँ सार्वजनिक स्थान छलैक। गामक एकटा प्रतिष्ठा छलैक । अहाँक पूर्वजसभक कीर्त्ति छल । एना नहि करक चाहैत छल ।" सुधाकर लठैतसभकेँ इसारा केलथि । ओसभ लाठी भजैत हिनकासभ दिस बढ़ल । लठैत सभ गोविंद आ माधवपर दनादन प्रहार करैत गेल । लाठीक प्रहार लगितहि दुनूगोटे ठामहि खसलाह। "कहैत छलिअह जे एहि मामलामे टांङ नहि अड़ाबह। मुदा तोरासभकेँ बहुत दाबी भए गेल छह । हमर आपसी मामला अछि । ई जगह सार्वजनिक कोना भए गेलैक? सभदिनसँ हमर पुरखाक एहिपर अधिकार रहल अछि । हमर बाबूक नामे रसीद कटैत छनि । तूँ सभ तँ जबरदस्ती परेसान छह । आबो समय छैक। अपन काजमे लागि जाह ,नहि तँ.......।" दुनूगोटे मारि लगलासँ कुहरि रहल छलाह । की बजितथि? "हिनका दुनूगोटेकेँ घर धरि पहुँचा दहुन । आ हे! दबाइक दोकानबलासँ मलहम कीनि दिअहुन । चोटसभ पर लगबैत रहताह। "-से बाजि सुधाकर जोरसँ ठहाका पाड़लनि । गोविंद आ माधव बेसुध रहथि । प्रतिकार करबाक स्थितिमे नहि रहथि । हुनका लठैतसभ उठा-पुठाकए उतरबारिटोलक पाकड़ीक गाछतरमे ओही हालमे राखि देलक आ चलि गेल । -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २५.दीप जरैत रहए (उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.कुमार मनोज कश्यप- प्रतिदान कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा प्रतिदान " तोरा तीन-तीन टा संतान भगवान देनहे हौ ...... एकरे आउर लै भरि पेट अन्न आ दsढ़ कपड़ा तs जुमिते ने हई ....... चारिम लै और कहाँ से जुमि तै? बुधनी! उपरवाला जे करैत छथिन से नीके लागी .....अपन बौआ के भाग मे राजजोग हई ...... राज करतै .... राज! अपना आउर जड़े नईं है तइसे की ...... हई तs अपने खून! अपन जनमल सुख-चैन से रहौ .... उहे ने हर माई-बाप चाहै है! आर जे होउ .....बड़ भागमंत छै छौंड़ा .... अपनो राज भोगत आ हमरो आउर के दरिद्रा मेटेलक .......!" मुस्कियाईत रमलखना नोटक गड्डी सs बुधनी के मुँह पर हावा करs लगलै। फाटल समटायल केथड़ी पर चित्त पड़ल बुधनी चारक भूर बाटे हुलकी दैत सूर्यक रोशनी के निर्विकार एक टक्क तकैत रहलै। ओम्हर दूर शहर मे कतहु समारोह मनाओल जा रहल छलै.....तीन टा बेटी के बाद बेटा जे भेल छलै! -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१६) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग मे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँऽ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग - १६)
पूर्व कथा: उर्वशी राजा पुरूरवा के मंगल टीका लगा कs दानव सs युद्धक वास्ते विदा करैत छथि l एकर पश्चात् ओ अचेत भs भूलुंठित भs जाइत छथि l राजा पुरूरवा उर्वशी के प्रति आकर्षित भs जाइत छथि l आब आगू: युद्धक दुंदुभि बाजि उठल l ओकर हृदय-विदारक ध्वनि पाताल लोक में अत्यंत तीव्र गति संs प्रविष्ट भs गेल l देवता के द्वारा कएल आक्रमणक समाचार दानवराज केशि के भेटल,मुदा ओ क्षण मात्र के लेल विचलित अथवा चिंतित नहि भेल l कारण एकर आशंका सs ओ तs ओहि दिन संs युद्धक तैयारी करवा में लागल छल जाहि दिन इंद्र सँग पुरूरवाक भेंट होयवाक बात ओ सुनने छल अपन दूतक मुख संs l अपन दानव सेना के श्रेष्ठ योद्धा सभ के सँग सैन्य व्यूह रचना कs पाताल लोक सs युद्धक निमित्त प्रयाण केलक दानवराज केशि l ओकर हुंकार सs पृथ्वी काँपs लागल,दसो दिशा त्रस्त भs गेल। देवताक सैन्य-दल के मध्य आकाश मार्ग सs पुष्पक वृष्टि होमय लागल l त्रिदेवक रथ आकाश मार्ग में स्थित छल l आशीर्वाद स्वरूप हुनक रथ संs त्रिदेव के द्वारा पुष्प-वृष्टि कएल जा रहल छल। ई देखि देवतागण में हर्ष के लहरि पसरि गेल,अत्यन्त उत्साहित भs गेल छलाह ओ सभ l किछु क्षण उपरान्त आकाश मार्ग में ही दुनू पक्ष में युद्ध प्रारम्भ भेल। सर्वप्रथम इंद्र अपन सैनिक के सँग दानव सेना सs युद्ध-रत भेलाह l अस्त्र-शस्त्र के सनसनाहट-खनखनाहट वातावरण में गूंजि उठल l शनै:-शनै: युद्ध भयवह भेल जा रहल छल l देवता के पक्षक वीर सैनिक धराशाई भेल जा रहल छलाह l युद्ध में दानव पक्ष के बहुत कम योद्धा घायल अथवा मृत भेल छल l दानव-गण में उत्साहक तरंग उमगल छल l इंद्र के रथ टूटि गेलनि,ओ युद्ध क्षेत्र में रथ सs खसि परितथि,मुदा ओहि समय पुरूरवा आबि स्थिति के सम्हारि लेलथि l खसs सs इंद्र के ओ बचा लेलथि। आब इंद्र विश्राम हेतु चलि गेलथि,आ सेना पुरूरवा के नेतृत्व में युद्धरत भेल l देखितहि भरि में दानव पक्षक वीर योद्धा धराशाई होमय लागल l स्थिति एकदम विपरीत भs गेल,आब देवतागण में उत्साह उमगि पड़ल छल l दानव-गण धान-गहुमक बालि सन कटि-कट कs खसल जा रहल छल l केशि के भौंह क्रोध सs वक्र भs गेल l आब अपन सेना के नेतृत्व सम्हारs ओ स्वयं आबि गेल l घमासान युद्ध होमय लागल ,दुनू पक्षक वीर धराशाई होमय लगलाह l जखनि अस्त्र-शस्त्र के युद्ध में दानव-पक्ष के अधिक वीर धराशाई होमय लागल,तखनि आसुरी माया के प्रपंच दानवराज केशि पसारनाई प्रारंभ केलक l आग्नेयास्त्र,सर्पास्त्र इत्यादि के प्रयोग होमय लागल l अंधकार ओ तीव्र प्रकाशक माया रचs लागल l एक सs अनेक केशि दृष्टिगत होमय लागल l मुदा पुरूरवा वास्तविक केशि के चिन्हवा में कनिको गलती नहि केलथि आ ओकरा कुशलता सs चीन्हि कs अपन तीरक वर्षा करs लगलाह ओकरा ऊपर l ओ घायल भय खसि पड़ल। ओ आपस चलि गेल पाताल लोक विश्रामक वास्ते। आब दूसर-दूसर दानव सेनापतिय सबहक नेतृत्व में युद्ध होमय लागल l ई युद्ध लगातार चारि दिन तक होईत रहल l मुदा आब दानव-गण में उत्साहक क्षीणता आबि गेल छल दानवराज केशि के घायल भs युद्ध क्षेत्र सs बाहर होयबाक कारण । ताहि पर राजा पुरूरवा के कुशल नेतृत्व में अति विशिष्ट अस्त्र-शस्त्रक प्रहार के कारण एहि युद्ध में दानव अत्यंत कमजोर परि कs हारि गेल आ ओ सभ युद्ध क्षेत्र सs पलायन करs लागल । दानव सैनिक गणक उत्साह समाप्त भs गेल छल l युद्ध समाप्त भेल, देवता विजयी भेलाह l विजित देवगण में हर्षक लहरि पसरि गेल l देवगणक जयघोष के नारा सs दिग्दिगंत गूंजि उठल l देवगण के द्वारा इन्द्रक संग राजा पुरूरवा के जयघोषक नारा तीव्र स्वर में बहुलता सs लगाओल गेल l पुरूरवा के जय घोषक ध्वनि के संग देवगण पर पुनःपुष्प-वृष्टि भेल l हर्षोल्लसित पुरूरवा इन्द्र एवं अन्य देवता के संग स्वर्गक दिशा में आपसी लेल प्रयाण कs गेलथि l अमरावती में प्रविष्ट होइतहि मात्र देवांगना सभ पुष्प-वृष्टि प्रारंभ कs देलनि l सम्पूर्ण स्वर्गलोक आनंद सागर में सराबोर भs गेल छला l आई स्वर्ग लोक में परम आश्चर्य के बात भs रहल छल कि इंद्र के स्थान पर पुरूरवा के जय घोषक ध्वनि गुंजित भs रहल छल l एना बुझाइत छल जेना स्वर्ग का राजा इंद्र नहि पुरूरवा ही होथि l
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जखनि सs देवताक विजय भेल दानव-गण पर,ओहि दिन सs नितदिन कोनो ने कोनो उत्सव मनाओल जा रहल अछि स्वर्ग लोक में । प्रत्येक उत्सव में पुरूरवाक सम्मान भs रहल अछिै l आश्चर्य तs सभ के एहि बातक होइत छनि कि इंद्र अपन प्रमुख गुण ईर्ष्या के बिसारि चुकल छथि l ओ तs स्वयं पुरूरवाक पराक्रम पर मोहित भेल छथि। ओ हुनक समक्ष अपना के अत्यंत तुच्छ अनुभव करs लागल छथि l हुनका अनुभव होइत छनि जेना कि स्वर्गक सिंहासन के वास्तविक अधिपति पुरूरवा होथि इन्द्र नहि! ओ अपन मोन में पुरूरवाक विशिष्ट योग्यता स्वीकार कs नेने छथि।ओ अपना के पुरूरवाक समक्ष अत्यंत निम्न स्तर पर पाबि रहल छथि। पुरूरवा के समक्ष ओ मात्र एक सामान्य सैनिक सन मानि रहल छथि अपना के। मुदा पुरूरवाक विचार भिन्नहि अछि। ओ विजय केर सम्पूर्ण श्रेय पुरंदर के ऊपर समर्पित कs रहल छथि l राजा पुरूरवा के हृदय या मष्तिस्क के गर्वक लेश मात्र स्पर्श तक नहि केलक अछि l ओ अपना के सामान्य मानव बुझि रहल छथि l अपन एतेक प्रशंसा सुनि ओ कनिको गर्वित नहि भेलैथि। लेकिन एकर अर्थ ई नहि जे राजा नि:स्पृह छथि। राजा के हृदय में नि:स्प्रिहता नहि भरपूर उछाह छनि - कारण थिकीह उर्वशी! राजा के उछाह छनि उर्वशी सs पुनः भेंट होयवाक! ओ उर्वशी जे अप्रतिम सुंदरी!अप्सरागण में सर्वाधिक सौंदर्यवती सँग गुणवती छथि ! एहि कारण तs ओ पुरूरवा के हृदय के सम्मोहित केने छथि! पुरूरवा मुग्ध छथि हुनका पर ! पुरूरवा! जे पृथ्वी पर अपना के ब्रह्मचर्यत्व के महान पुजारी बुझैत छलाह! स्वर्ग में अपन ओ विशिष्ट धन गुमा चुकल छथि! उर्वशी के प्रेम में विदग्ध,विह्वल प्रेमी समान ओ तs उर्वशी सs मिलन केर कोनहुना उपयुक्त अवसर प्राप्त होयवाक प्रयास में छथि! मुदा प्रतिदिन के व्यस्तता में ओ अपना के असहाय सन अनुभव कs रहल छथि l उर्वशी सs कोना पुनः भेंट होनि ओ बूझि नहि पाबि रहल छथि l उर्वशी सs मिलन करवा हेतु हुनक ह्रदय अत्यंत व्यग्र छनि l ओम्हर उर्वशी के मनो स्थिति एहि सs किछु भिन्न नहि छनि। हुनको ह्रदय में पुरूरवा विराजमान छथि ! उर्वशी के ह्रदय रमल अछि पुरूरवा में ! स्वर्ग में आयोजित कोनो उत्सव में ओ नहि जाईत छथि l कतेको निमंत्रण के ओ अस्वीकृत कs देने छथि l पुरूरवा सs मिलन केर अवसरक संधान में स्वयं उर्वशी अत्यंत व्यस्त छथि। अन्य समस्त कार्य हुनका समक्ष एहि समय गौण भेल छनि। बहुत समय तक दानवगण सँs त्रस्त शासन व्यवस्था के बाद पुनः नवीन रूप में स्वर्गक शासन में आमूल परिवर्तन करवा हेतु इंद्र अपन सभ सभासद के दरबार में आमंत्रित कएने छथि ।देवर्षि नारद एहि अवसर पर विराजमान छथि स्वर्गलोक में। पुरूरवा के एहि सभ कार्य में कनिको रुचि नहि छनि,तथापि ओ अन्यमनस्क भाव सs बैसल छलाह सभा में l सप्तऋषि के विचार छलनि कि स्वर्ग के सिंहासन पर पुरूरवा के बैसाओल जाए,मुदा हुनक एहि प्रस्ताव के पुरूरवा स्वयं अस्वीकृत कs देलनि l एहि अनुचित प्रस्ताव सs इंद्र अत्यंत भयभीत भs गेलथि,मुदा सप्तऋषि के सम्मुख ओ किछु बाजि नहि सकलाह l एहि संबंध में सभ केओ विचार मग्न छलाह ओहि समय आकाशवाणी भेल - "पुरूरवा के स्वर्गक अर्द्धशासक बनाओल जाए" - ई धीर गंभीर प्रिय वाणी भगवान विष्णु के छलन्हि l इंद्र ई आकाशवाणी सुनि निराश भs गेलाह। सप्तऋषि के सम्मति एहि देववाणी सँs आर दृढ़ भेलैन्हि l इंद्र के स्वर्ग में अपन अर्द्धासन पुरूरवा को देमय पड़लन्हि l ओना तs पुरूरवा के सहमति एकर पक्ष में नहि छल,मुदा भगवान विष्णु के आदेशक अवहेलना केनाई पुरूरवाक वास्ते असंभव कार्य छल l स्वर्ग में पुरूरवा के राज्याभिषेक के विशाल आयोजन होमय लागल l सभासदगण में अति प्रसन्नताक लहरि व्याप्त भेल l सभ देवपुरुष देवांगना प्रसन्न छलथि,मुदा राजा के कोनो विशेष प्रसन्नता नहि भेलनि l ओ तs उर्वशी के वियोग जनित पीड़ा सँs अपन हृदय में उठि रहल दर्दक लहरि के सहन करवा में असमर्थ भs रहल छलाह l हुनक हृदय मंदिर में तs एक अनिन्द्य सुंदरी कोमलांगी देवी प्रतिष्ठित भय गेल छलीह l ओ छलीह त्रिलोकक सभ सौंदर्यवती नारी में सर्वश्रेष्ठ सौंदर्यवती अप्सरा उर्वशी ! हुनक हृदय तs जेना काँच सूत सs बन्हायल हुनके दिस प्रेरित होइत छलन्हि l अनमनायल सन भाव सs ओ सभा के कार्यकलाप के देखि रहल छलाह l सुरसरि के जल सs हुनक अभिषेक भेलैन्हि,एवं राजमुकुट स्वर्गक परंपरानुप हुनका धारण करय पड़लन्हि l क्रमशः अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.जगदीश प्रसाद मण्डल-जिनगी भार बनि गेल जगदीश प्रसाद मण्डल जिनगी भार बनि गेल नोकरीसँ निवृत्त भेला पछाइत हेमन्त कुमार गामेमे रहैक विचार मनमे रोपि लेलैन। किछु छी तँ गाम-समाज गामक समाज छी। केतबो आफद-आसमानी, बाढ़ि-रौदी किए ने भेल मुदा गामक समाज अखनो ओहने अछि जेहेन हजार बरख पूर्व छल। एकर माने ई नइ बुझब जे गाममे रोडो-सड़क ओहिना अछि आ पोखरियो-इनार ओहिना अछि जहिना हजार बरख पूर्व छल। एकर माने ई जे अखनो गामक किसान खेतीसँ जुड़ल छैथ, गाए-महींस पोसबसँ जुड़ल छैथ। ओना, किछु नब बेवसार सेहो बढ़ल अछि आ किछु पुरान बेवसार सेहो समाप्त भेबे कएल अछि। समयानुसार जीवन चलैए। जँ से नहि चलत तँ ओ नष्ट भऽ जाएत। जेना बैलगाड़ी, हाथी, घोड़ाक सवारी नष्ट भऽ गेल आ नब-नब इंजीन-चालित सवारी आबि गेल अछि। गाममे रहैक विचार हेमन्त कुमारकेँ ई छेलैन जे सेवा निवृत्त होइसँ सात दिन पहिने धरि गामकेँ बिसरल छला। जहियासँ नोकरी शुरू केलैन तहियेटा सँ किए कहब जे तहूसँ पहिनेसँ, मोटा-मोटी जन्मेसँ बुझू, किएक तँ पिता सरकारी नोकरी करै छेलैन, परिवार संगे रखै छला, कहियो काल माने सालमे मास दिनक छुट्टी भरि, गाममे बितबै छला। वएह एक मासक छुट्टीक समयक गाम हेमन्त कुमारक मनकेँ पकैड़ नेने छेलैन। पकैड़ ई नेने छलैन जे शहर-बाजारक एहेन जीवन अछि। जे एक मकानमे अनेको राज्यक लोको रहै छैथ, जिनकर जीवन शैली सेहो भिन्न छैन। तैसंग शहर-बाजारमे काजक व्यस्तता सेहो बेसी रहिते अछि, जइसँ दोसरसँ सम्बन्ध बनैमे कठिन भइये जाइए। गामक जीवन अखनो ओहन अछि जेकर सम्बन्ध-सूत्र अल्पांशे किए ने मुदा अखनो जीवित अछि जे जाति, पाँजि आ सम्प्रदायसँ ऊपर उठल अछि। माने ई जे जेकरा समाजमे निम्न बुझै छिऐ, तहू परिवारक वृद्धजनकेँ समाजक आनो जातिक बच्चा-जुआन �बाबा�, �काका�, �भैया� कहै छैन आ ओही नजैरसँ आदर सेहो करैत आबि रहल छैन। ऐठाम एकरा एक सामाजिक धाराक प्रवाह कहि सकै छिऐ। मुदा एक जातिकेँ दोसर जातिक बीचक किरदानी की कहब जे जाति-जातिक भीतर कटुता सेहो एते दूरी बनौने अछि जे सदिकाल एक-दोसरकेँ निच्चाँ देखैए। खाएर जे अछि, तइसँ हेमन्त कुमारकेँ कोन मतलब छैन, मतलब छैन अपन सेवा-निवृत्तिक पछातिक शेष जीवनसँ। सूर्यास्तक समय। ने सूर्य पूर्णरूपेण डुमल छल आ ने दिनक प्रकाश जकाँ प्रकाशित छल। हेमन्त कुमारकेँ ऑफिसमे सूचना भेट गेल छेलैन जे ऐगला आठम दिन अहाँक लेल ई कार्यालय नहि रहत। सातम दिन सेवा-निवृत्तिक सूचना भेट जाएत। जहिना सामान्यो लोक बुझैए जे सभ दिन अहिना रहब। माने मृत्यु नहि हएत, तहिना अखन तक हेमन्त कुमार सेहो बुझै छला। तँए राम नामक लूट अछि, जेते लूटि लेब तेते अपने सुख हएत। अखन तक हेमन्त कुमारकेँ गाम कहाँ मोन छेलैन, जँ से रहितैन तँ दिल्लीमे फ्लैट किए किनतैथ। पटनेमे मकान कीनबाक कोन खगता छेलैन। सरकारी क्वाटरमे सभ दिन रहला तखन मकानक कोन खगता छेलैन। गाममे अखनो बाबाक बनेलहा ईंटा-खपड़ाक घर छैन। दिन भरिक सूर्यक किरण पेब जहिना फूल चकचकाइत रहैए आ सूर्यास्त होइते जेना मलपन पसरए लगै छै तहिना हेमन्त कुमारकेँ पाँच बजे अपन कार्यालयसँ निकलला पछाइत, भेलैन। मुदा, हाइ स्तरक अफसर जहिना अपन स्तरक मेनटेन करै छैथ तहिना हेमन्त कुमार सेहो केलैन। ओना, ऑफिससँ निकलला पछाइत, माने अपन कार्यालयसँ निकलला पछाइत, शेष जे दूटा स्टाफ कार्यालयमे छैन, ओ दुनू बुझि गेल छला जे सातम दिन साहैब सेवा निवृत्त भऽ चलि जेता। ऐगला अफसर केहेन अबै छैथ से देखा चाही। तँए कार्यालयसँ अप्पन जे कोनो सम्बन्धित काज अछि ओ सभ करा लेब, भविष्यक लेल नीक रहत। कार्यालयसँ अपन सेवा-निवृत्तिक सूचना-पत्र हाथमे नेने हेमन्त कुमार अपन डेरा पहुँच ड्राइंग रूपक टेबुलपर रखलैन। कपड़ा खोलि, हाथ-पएर, मुँह-कान धोइकऽ बैसकमे बैसबे केलाह कि पत्नी- रश्मि जलपानक प्लेट आगूमे रखि, पुन: किचेन दिस बढ़ि गेली। अपूछ-वस्तुक किचेन छेलैन्हे। भरि मन हेमन्त कुमार जलपान करि, चाह पीबए लगला। रश्मि सेहो चाहक कप नेने आगूमे बैस पीबए लगली। तही बीच हेमन्त कुमारकेँ सेवा-निवृत्तिक चिट्ठीपर नजैर गेलैन। ओना, अपनो अपन आयुक हिसाबसँ बुझिये रहल छला जे एते दिन नोकरी केलौं। मुदा से बिसैर गेल छला जे आइ पुन: चिट्ठी हाथमे एला पछाइत मोन पड़लैन। मोन पड़िते चाहक चिस्कीमे गतिरोध आबए लगलैन। माने जेना चाह पीबै छला, तइमे खरोंच उत्पन्न भेलैन। बजला- �सेवा निवृत्तिक चिट्ठी भेट गेल। काल्हिसँ सेवा-मुक्त भऽ जाएब.!� बोल-भरोस दैत रश्मि बजली- �अहींटा सेवा-निवृत्त हएब आकि सभ होइए।� ओना, हेमन्त कुमार अपन जीवनक चढ़ा-उतरी देख रहल छला मुदा तेकरा छिपबैत बजला- �हँ, से तँ सभ होइते अछि। मुदा एते तँ मनमे खुशी अछिए जे बत्तीस सालक नोकरीक जीवन बेदाग रहल।� रश्मिक मनमे किए अबितैन जे जीवन बदलने सभ किछु बदलैए आ दोसर जीवन पद्धति शुरू होइए। चाह पीलाक पछाइत चिट्ठी पढ़ि हेमन्त कुमार पत्नीकेँ कहलैन- �अखन अहाँ अपन काज देखू, मन किछु भरियाएल बुझि पड़ैए, तँए थोड़ेकाल आराम करू।� एक तँ ओहुना पढ़ल-लिखल गुनशील होइते छैथ तहूमे ऊपर स्तरक जे महिला छैथ ओ तँ आरो बेसी होइते छैथ। जहिना हेमन्त कुमार बजला तहिना रश्मि ड्राइंग रूमसँ बहरा गेली। सोफापर ओङैठ, आँखि मुइन हेमन्त कुमार अपन जीवन गुनए लगला। जीवनक ओइ मोड़पर आइ आबि गेल छी, जैठामसँ एक जीवन बदैल दोसर जीवनक सिमानमे पएर राखत। अखन तकक अपन जीवन यएह ने रहल जे पिताजीकेँ नीक नोकरी छेलैन, भरपुर कमाइ छेलैन, परिवारक संग चारू भाँइक भरण-पोषणक आ नीक शिक्षा-दीक्षा सेहो भेटल, जइसँ नीक-नीक नोकरी चारू भाँइकेँ अछि। मुदा चारू भाँइक बीच अपन जीवन रेखा की अछि, तही बीच ने आगूक जीवन निर्धारित करब। अपन तँ यएह ने अछि जे माता-पिता मरि गेला। बीचमे अपने दुनू परानी छी। माने पति-पत्नी, तैबीच दूटा बेटी अछि। ओ दुनू डॉक्टरी शिक्षा पौनहि अछि। दुनू अप्पन-अप्पन सासुर बास करैए। रातिक नअ बाजि गेल। तेसर साँझक सीमा सेहो टपि गेल। मुदा आँखि बन्न केने कुरसीपर ओङठल हेमन्त कुमार काल्हुक जीवन ले निश्चयात्मक विचार नहि कऽ सकल छला। निश्चयात्मक विचार कइयो केना सकितैथ। किएक तँ दू जीवनक बीच विचार फँसल छेलैन। एक जीवन ओ छेलैन जे सरकारक हाई स्तरक अछि आ दोसर सामाजिक जीवन छेलैन। बेवहार रूपमे सरकारी छेलैन आ विचार रूपमे सामाजिक छेलैन, जइ बीच अपन शेष जीवन बिताएब छैन...। तइ बिच्चेमे रश्मि ड्राइंग रूममे आबि कहलकैन- �अहींटा सेवा निवृत्त भेलौं हेन आकि सभ होइए, तइले अनेरे किए एते मथहानि केने छी।� पत्नीक विचार सुनि हेमन्त कुमार बजला- �यएह नइ तय कऽ पाबि रहल छी जे आगूक जिनगी केतए आ केना बिताएब?� अपन पिताक सेवा निवृत्तिक जीवनकेँ अख्यिाइस रश्मि बजली- �ऐठाम अपन की अछि जे रहब। अपन तँ सभ किछु गाममे अछि, तँए नीक हएत जे गामे चली।� पत्नीक विचार हेमन्त कुमारक हृदयमे नीक गड़ान गड़लैन मुदा अखन तक जे सुविधा छेलैन, ओ गाममे नहि देख पेब रहल छला। मुदा एते तँ मन मानियेँ रहल छेलैन जे पुस्त-दर-पुस्त लोक गामक धरतीपर बितबैत आबि रहला अछि। मनक जेना सभ विचार तर पड़ि गेलैन, आ एकाएक मुहसँ बहरा गेलैन- �काल्हि गाम चलि जाएब।� एक तँ सेवा-निवृत्तिक पछातिक जे लेन-देन छेलैन सेहो आ नोकरीक बीच जे बँचल छेलैन, जे बैंकमे छेलैन, सेहो सभटा मिलाकऽ जखन हेमन्त कुमार देखला तँ मन कहि देलकैन शेष जीवने केतेटा अछि जे कोनो तरहक असोकर्ज हएत। कोनो तरहक अभाव नहियेँ हएत, तहूमे पेंशन सेहो मासे-मास भेटबे करत। किए मनमे अबितैन जे जहिना जन्मक पछाइत बच्चाक देख-रेख जँ माए-बाप नहि करैथ तँ ओ बच्चा धरतीपर नहि टिक (जीब) पौत, तहिना वृद्धावस्था सेहो होइते अछि। एक दिस शरीरक अंग-प्रत्यंग शिथिल होइए दोसर दिस बर-बेमारीक आक्रमण सेहो होइते अछि, तइले दोसरक जरूरत पड़िते अछि। सघन परिवार जँ रहल तँ बेटा-पुतोहु, पोता-पोती सेवा करैए आ जँ से नहि रहल तँ नोकर-चाकरक बलेँ चलैए...। जीवनक सघन वनमे हेमन्त कुमारक मन ओते चक्कर नहि लगा सकलैन जेते चक्कर लगबैक जरूरत छेलैन। हेमन्त कुमार बजला- �काल्हिक लेल काल्हि सोचि लेब। चलू पहिने भोजन करब।� रश्मि बजली- �औझुके सोचल-विचारल सँ ने काल्हि चलत।� हेमन्त कुमार बजला- �काल्हि गाम चलि जाएब। गामक लोक चाहे किछु होथु मुदा पुस्तैनी समाज तँ छियाहे।� गाम आबि, छअ मासक बीच हेमन्त कुमार अपन रहैक ओहन सभ बेवस्था, माने सुविधापूर्ण जीवन चलैले, कऽ लेलैन। जइसँ मन मानि गेलैन जे शान्तिपूर्ण ढंगसँ शेष जीवन बिता लेब। आइ तेसर दिन, माने अखन तक हेमन्त कुमार घर-आँगन, दुआर-दरबज्जा बनबैक पाछू लगल छला तँए गाम दिस कोनो धियाने ने छेलैन, दुनू परानी दरबज्जाक ओसारपर बैसल गाम दिस देख रहल छला। रश्मि बजली- �अखन तकक बीतल जीवन की रहल आ अबैबला भविष्यक जीवन केहेन हएत?� निर्वलक बल जहिना आत्माराम होइए तहिना हेमन्त कुमार आत्मबलक संग बजला- �जिनगी तँ भार बनियेँ रहल अछि, मुदा आँखि तँ तकै छी।� -जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन। मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'
रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरिक जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबिजी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.आचार्य रामानन्द मण्डल-गौरी आ प्रेम मे धोखा आचार्य रामानंद मंडल गौरी आ प्रेम मे धोखा १ गौरी पंडित महादेव मिश्र बीस बीघा जमीन के जोतिनिया रहथि।जमींदारे लेखा ठाठ बात। कनाती वाला हबेली आ छतदार दरबाजा।नौकर -चाकर,दू जोड़ा बैल,हरबाह,जन,एगो भैस आ ऐगो गाय,चरबाह। पंडित जी पूजा न कराबथि वरन् पूजा करैत।माने की यजमानी न। सुबह पूजा पाठ के बाद दरवाजा पर बैठकी। जहां मुंहलगा सभ के संगे चाय -पान आ तशवाही।एकर इ न माने कि खेती पर ध्यान न,से बात न। खेती के समय खेत के आड़ी पर बैठ के जन मजदूर पर ध्यान। खेती से दू सौ मन धान,एक सौ मन गेहूं आ भरपूर तेलहन-दलहन हो जाइन। गांव के राजनीति करे मे माहिर रहतन। प्रतिष्ठा खूब रहैन। पंडित जी के पत्नी सती देवी रहिन।सति देवी खुब सुन्नर रहय।मृदुभाषिणी आ वाक्पटुनी सेहो रहय।त पंडित जीयो कम न। सामान्य कद के गोर शरीर, बड़ बड़ आंख आ रोबदार मोछ।माथा पर त्रिपुंड। परिवार खुश हाल। परंतु बिधना के बिधान।सती देवी एगो सुन्नर लड़िका के जनम देलक। परंतु छठियार के बिहाने सती देवी परलोक सिधार गेल। पंडित जी के विधवा बुढ़ी माय वोइ लड़िका पाल लक। पंडित जी दुखी रहे लगलन। पंडित जी आबि भगवान शंकर के आउर पूजा करे लगलन। अपने हाथे माटी के महादेव बनाबथि, बेलपत्र पर राम नाम लिखैत। वोइ बेलपत्र आ कनेर -धथुर फूल से पूजा करैथ। पंडित जी आबि पैदल कांबर लेके बाबा बैद्यनाथ धाम जाय के बिचार कैलन आ अपन मुंहलगुआ सभ के बतैलन।बिचार भेल कि अइ माघ श्री पंचमी के बाबा बैद्यनाथ पर जल चढायल जाय।सभ तैयारी भेल नौकर -चाकर संगे रसोइया तक कांवर लेके जायत।माने कि खाय पिये के सभ समान भरिया लेके चलत।खाली जलावन ठहराव स्थान पर खरीदल जायत। पंडित जी अपन चचेरा ससुर के बाबा धाम चले के संवाद पठैलन।चचेरा ससुर गिरीश पाठक से खूब पटैन। पहिलोही कहीं तीर्थाटन मे जायत रहलन त पाठक जीयो संगे रहैन। पाठक जी बाबा धाम जाय के लेल पंडित जी के घर कैलाशपुर अइलन। परंतु संग में रहैन पच्चीस साल के युवती बेटी गौरी। पाठक जी सोचलैन कि अइ साल गौरी के हाथ पीला क देबय।अइसे पहिले गौरी के बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करा दैबक चाही। गौरी कालीदास स्मारक महाविद्यालय,चंदौना से बीए समाजशास्त्र कैले रहे। गौरी गौरांगी, कोमलांगी आ व्यवहार कुशल नवयौवना रहय। पंडित महादेव मिश्र गौरी के बाबा बैद्यनाथ धाम दर्शन कराबे के विचार से प्रसन्न भेलन। पंडित महादेव मिश्र आ गौरी के यदा कदा ओझा -सारी बाला मनोविनोदो भेल रहय।अइ भेंट से दूनू गोरे हर्षितो रहय। बाबा धाम यात्रा शुरू भेल।सभ पियर -पियर वस्त्र मे।सभसे आकर्षक पंडित महादेव मिश्र आ गौरी पाठक लागे। जेना संयासी -संयासिन।सभसे पहिले कुल देवता,गांव देवता आ महादेव मठ में पूजा भेल आ बाबा धाम के लेल प्रस्थान।हर हर महादेव के स्वर से धरती आकाश गुंजायमान हो गेल। सभ ठहराव स्थान पर शिव पुराण के चर्चा पंडित महादेव मिश्र करैथ।सुनिहार केवल आ केवल गौरी पाठक।आउर लोग खाना -पीना के व्यवस्था मे। मुख्य व्यवस्थापक रहथि -गिरीश पाठक। शिव पुराण के कथा मे शिव -सती के प्रेम,सती के हवन कुंड में प्रान त्याग आ गौरी के शिव से पुनर्विवाह। प्रेम कथा से दूनू गोरे के प्रभावित होय लागल ।धीरे धीरे पंडित जी आ गौरी मे प्रेम के प्रस्फुटन होय लागल।प्रेम के रंग मे रंगाय लागल।अन्य लोग अइ प्रेम से अंजान रहय। आबि त गौरी, पंडित जी के पैरों दबाबे लागल। परंतु बाबा बैद्यनाथ धाम दर्शन आ जल चढाबे के ध्यान रहय। पंडित जी आ गौरी साकंक्ष रहतन। यात्रा समाप्ति भेल। ठीक माघ श्रीपंचमी के बाबा बैद्यनाथ के दर्शन भेल आ पंडित जी आ गौरी लिंगाकार बाबा बैद्यनाथ पर जल चढैलन।सभ लोग जल चढैलन। पंडित महादेव मिश्र अप्पन कुल पुरोहित पंडा के यहां डेरा डाल लन आ गिरीश पाठक से कहलन -दू सप्ताह बाबा धाम में रूकब।दू गो कमरा लेल गेल। भोजन बनाबे के लेल अलग से।एगो कमरा में पंडित जी, गौरी आ गिरीश पाठक।दोसर रुम में बांकी लोग।परंच गिरीश पाठक के ज्यादा समय भोजन आदि के व्यवस्था में बीते ।ज्यादा तर दोसर कमरा में रहथि। पंडित जी आ गौरी के एकर लाभ मिलैत रहय।दूनू गोरे के प्रेम परबान चढ़ैत रहय। एक तरह से शिव आ गौरी के कथा दुहराबे के विचार करे लगलन। एकटा दिन पंडित महादेव मिश्र बजलन -गौरी । बाबा धामे मे दूनू गोरे के बिआह क लेबे के चाही।एहन पवित्र स्थान आ समय कंहा पायब। गौरी बाजल -हां। ओझा जी।बात त पवित्र आ नेक हय।हमहूं आबि अंहा बिना न जीव सकैय छी। अंहा से हमरा पवित्र प्रेम हो गेल हय। पंडित महादेव मिश्र बजलन -बिधाता के इहे मंजूर बुझाय हय। भगवान भोलेनाथ के जीवन घटना सन हमरा संगे घट रहल हय। गौरी बाजल -बिधाता जे करय छथिन,अच्छे करय छथिन। परंतु बाबू जी से पूछ लिये के चाही। पंडित महादेव मिश्र बजलन -हम गिरीश बाबू से पूछ लेबैय। हमरा विश्वास हय जे वो मान लेतन। गौरी बाजल -जी। हमरो विश्वास हय जे बाबू जी मान लेथिन। दोसर दिन रात मे जब गिरीश बाबू सूते ला अइलन त पंडित जी बजलन -गिरीश बाबू।एगो महत्वपूर्ण बात करे के चाही छी। गिरीश पाठक बजलन -ओझा जी।बाजू। पंडित जी -हम अंहा से गौरी के हाथ मांगै छी। हमरा विश्वास हय जे हमरा गौरी के हाथ देब। गिरीश पाठक -अचानक इ मांग सुनके सन्न रह गेलन आ सोचे लगलन। गौरी बाजल -हां। बाबू जी। ओझा जी ठीके मंगलैन हय। हमहूं ओझा जी से प्रेम हो गेल हय। हमरा वो साक्षात महादेव लगैत छथि।हम हुनकर गौरी।हमरो विश्वास हय जे अंहा ओझा जी के मांग मान लेबैय। गिरीश पाठक बजलन -ठीक हय। काल्हि रात मे बतायब। गिरीश बाबू मन मे गुनधुन करय लगला।सांझ तक निष्कर्ष निकाल ला कि ओझा पंडित महादेव मिश्र आ गौरी के बिआह सर्वथा उचित होयत। रात मे जब सुते गिरीश बाबू अइलन त पंडित जी पुछलैन -गिरीश बाबू कि बिचार कैलियन। गिरीश बाबू बजलन -जे अंहा आ गौरी के विचार हय सेहे विचार हमरो हय।इ उचित आ मंगल विचार हय। काल्हिये बाबा के मंदिर मे शुभ पानिग्रहन सम्पन्न कैल जाय। आइ सबेरे दोपहर से पहिले गिरीश बाबू , गौरी के हाथ पंडित महादेव मिश्र के हाथ मे सौंप देलन।बाबा भोलेनाथ के साक्षी मानैत पंडित महादेव मिश्र गौरी के मांग मे सेनूर भर देलन।विआह बाबा धाम के पंडा करैलन।आइ गौरी महादेव के अर्धांगिनी बन गेल।सभ खुश रहे। बाबा के जयकारा लागल। एगो स्कार्पियो आ एगो मिनी ट्रस्ट भाड़ा भेल। स्कार्पियो से दुल्हिन गौरी - दुल्हा महादेव आ ट्रक से गिरीश बाबू आ अन्य लोग घरे कैलाशपुर अइलन। पंडित महादेव मिश्र के माय दुल्हिन गौरी आ दुल्हा महादेव के आरती उतार लैन आ गृह प्रवेश करैलन। कुछ काल बाद गौरी एगो लड़िका विश्वनाथ के जनम देलक।सती के जनमल लड़िका काशीनाथ केयो गोरी खूब माने। दूनू लड़िका काशीनाथ आ विश्वनाथ जवान भेल। शादी विआह भेल। गौरी आ पंडित महादेव मिश्र आइ दादी -दादा बन गेलन। परंतु गौरी पाठक आ पंडित महादेव मिश्र के प्रेम आइयो दिगार मे चर्चित हय। २ प्रेम मे धोखा आइ प्रो श्याम मोहन के खून बोकरैइत परान पखेरू उड़ गेल। वो हमरे मुहल्ला मे मकान बना के रहैत रहलन। हम अतीत मे खो गेली।जब हम खेमका कालेज मे पढैत रही। हम साइंस के विद्यार्थी रही। वो समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहलन। वो हंसमुख, मिलनसार आ लोकप्रिय रहत। विद्यार्थी सभ हुनकर पढ़ाई शैली से संतुस्ट आ खुश रहे। हम हुनका कालेज के कामन रुम मे बैडमिंटन खेलैइत देखी। कहियो एकल त कहियो डबल बैडमिंटन खेलैइत। लेकिन हुनकर प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी होइत रहे वरून कुमार जे खेमके कालेज के एगो प्रोफेसर के बेटा रहे। वरून कुमार आ प्रोफेसर श्याम मोहन के दोस्ताना संबंध रहे। कारन कि एक तुरिया रहे। जब मैच होय त प्रो श्याम मोहन अपन सुन्नर पत्नी सोनिया के मैच देखाबे के लेल अवश्ये लाबे। सोनिया अपना संग अपन साल भर के रुपवान बेटा, एगो पानी के बोतल आ चाय से भरल थरमस भी लाबे।मैच के दौरान जब प्रो साहेब के कंठ सुखे त सोनिया से लेके पानी पियैथ आ थकान महसूस होय त चाय पियैथ। लेकिन वो वरून के अवश्ये पानी आ चाय पिआबथि। मैच मे प्रो साहेब आ वरून के प्रतिस्पर्धा देखैइत बने। शारीरिक कसाबट मे वरून प्रोफेसर साहब से बीस रहे।जेकर फायदा अंततः बरून के मिल ही जाय। प्रोफेसर साहब बरुन से मैच हार जाय। माने कि पांच मैच होय त दू मैच प्रोफेसर साहब जीते त तीन मैच बरून जीत जाय।अइ मैच के असर त प्रोफेसर साहब आ बरुन पर त न परे। लेकिन असर प्रोफेसर साहब के पत्नी सोनिया पर अवश्ये पड़े। सोनिया बरून के तरफ आकर्सित होय लागल। धीरे धीरे सोनिया प्रो श्याम मोहन से कटे लागल। जब प्रो श्याम मोहन ड्यूटी पर कालेज जाय त वरुन प्रोफेसर साहब के आवास पर आ जाय।बरून आ सोनिया प्यार के बात करे।आ एक दिन प्यार करैत करैत दुनू के देह एक हो गेल। माने कि सोनिया आ बरुन में बासना के प्यार रहे। हालांकि बरून के बिआह भे गेल रहे। प्रोफेसर साहब दुनू के रासलीला एक दिन देख लेलन। प्रोफेसर साहब सोनिया के खूब समझैलन। अंहा इ सभ कियैक करै छी। अंहा एगो बेटा के माय भी छी। लेकिन सोनिया कह लक कि हम बरुन से प्यार करैइ छी।हम बरून के संगे रहब। प्रोफेसर साहब कहलन-हमरा घर से निकल जाउ। लेकिन सोनिया कहलक-अंही घर से निकल जाउ।इ मकान त हमर हए। हमरा नाम से जमीन आ घर हए।अपना बेटा के भी ले जाउ। प्रोफेसर साहब त सोनिया से सच्चा प्रेम करैत रहे।आंखि से लोर चुअबैत बेटा प्रियांशु के लेइत घर से निकल गेलन। वो आ शहर मे अपना घर से दूर भाड़ा पर डेरा लेके रहे लगनन। बाद मे यही महल्ला मे जमीन खरीद के मकान बना लेलन।बेटा के भी पढाबे लगनन। अपने पत्नी के देल प्रेम मे धोखा आ पत्नी के प्रेम के बियोग मे शराब आ सिगरेट पिये लगला।बेटा इंजिनियरिंग पढ़ैत रहे।दूर्दिन एहन भे गेल कि इंजीनियरिंग कॉलेज से आवास अबैत काल बाढ़ में उफनैत नदी मे नावि उलैटि गेला से डुब के मर गेल। प्रोफेसर साहब प्रेम में धोखा आ इ आघात नहिं सहि सकिला।वो खाट पकड़ि ले ला। पड़ोसी सभ डागडर से देखैलन।पर वो खुन बोकरैत दुनिया से विदा भे गेलन। सोनिया के अनुकंपा पर कालेज मे किरानी के नौकरी मिल गेल। सारा विरासत के मलकाइन बन गेल। अइला कि प्रो श्याम मोहन पत्नी के देल प्रेम मे धोखा के बादो अपन प्रेम के कारण तलाक न देले रहथि। बरुन आइ सोनिया के छोड़ के अपना परिवार संग जीवन जी रहल हए। सोनिया अकेले जीवन बिता रहल हए।अपना कोठरी मे प्रो श्याम मोहन के फोटो टंगलै हए ।जै पर सुखल माला टांगल हए। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०. डॉ. किशन कारीगर- मिथिला मैथिली के घुन जेंका खोखैर के खा गेल (हास्य कटाक्ष) डाॅ. किशन कारीगर मिथिला मैथिली के घुन जेंका खोखैर के खा गेल (हास्य कटाक्ष) बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै जे इ सब घुन जेंका खा गेल सब किछ? तइयो एकरा सबहक पेट नै भरलै? एकरे सब दुआरे मिथिला के एहने दुर्गति छै की. सबटा उलुआ अपने कबलितीए चूर यै जे हमरा सब सन काबिल कियो ने? मगधिया सरकार मिथिला के बाधक छै? एक्को टा मिथिला वला अपन दोख कहत किन्नौ? ई सब घून जेंका सब किछु खा गेल?
हम बाबा स पुछली जे कि होलै हौ बाबा, तोहर खटिया घून खा गेलहो की? औरी तोरे पोतबा सब खटिया तोरि देलकौ से एते गरमाएल छहू? बाबा बजलै हौ कारीगर तहूं मीडिया वला सब की हमर मोन अघोर करै मे लागल छह? हमे फेर बजली हौ बाबा हौलौ की से कहू ने तबे ने हमरा अरू बुझबै ग? तबे बाबा बोललै धू जी पहिले तमाकूल खुआबह त निचेन स कहै छियअ.
हमे बाबा के खैनी बना के खुएली आ पुछली जे आब कहो ने कथि घून खाए गेलै कोन बरगांही सब ढेरे काबिल बन रहलौ? फेर बाबा बोललकै जे देखै नै छहक मिथिला मैथिली के घुन जेंका खोखैर के खा गेल ई होहकारी, पेटपेसुआ नेता, साहित्यिक दलाल सब. तइयो यथार्थक मुँह झंपबह? हम बजली जे बाबा पूरा फैरक्षा के कहू ने जे की होलै? बाबा मँह बिजकबैत बोललकै हौ सबटा हमहीं कहियअ तूं सब मीडिया वला नै देखै छहक मिथिला मैथिली के दुर्दशा? हमे कहलियै तोंहे कहो ने हौ बाबा मिथिला मैथिली के हाल.
बाबा बजलै देखै छहक मिथिला मैथिली मे होहकारी, पेटपोसुआ नेता, साहित्यिक दलाल सब अफरजात भऽ गेल. ई सब मिथिला मैथिली के घून जेंका खा गेल? होहकारी छौड़ा सब ने किछ बुझतह गमतह आ झूठौ हो हो केने फिरतह जे सबटा मैथिलीए छियै त दरभंगा स देवघर जनेगर स गोड्डा तक सबटा मिथिले छियै आ राजधानी दरभंगे हेबाक चाही? ई होहकारी सब भंगपीपबहा सब बतकुट्टबैल टा करै जेतह? करतब नै देखतह आ जाति देख लोकक आकलन करतह की? तहिना ई पेटपोसुआ नेता सब मिथिला राज हो हो करैत दलाली केने फिरत. आई तलिक एकरा सबके चिन्नी मिल चालू कराउले नै भेलै आ मिथिला राजक नाम पर चंदाखोरी पोस्टरबाजी आ जंतर मंतर पर भाषणबाजी टा करै जाइए?
हम बाबा के कहली हौ बाबा मिथिला राज बनतौ त तोरो मंत्री संत्री बनाई देतौ त नीक रहतौ ने अप्पन भाषा मैथिली मे राज काज होतौ? एते सुनते बाबा आरो खिसिया गेलौ. हमरा स बोललकौ हौ कारीगर तोंहू साहित्यिक दलाल वला चलकपनी बतियाई लगलह? हमे बाबा स पुछली जे साहित्यिक दलाल केहेन होई हई?
बाबा के हंसी छूटि गेलै बजलै अईं हौ कारीगर तोरो अई साहित्यिक दलाल सब दिया नै बुझल छह? हौ यैह मानकी दलाल सब त मैथिली भाषा के शुद्ध अशुद्ध, केन्द्रीय मैथिली राड़ बोली, दैछणाहा पैछमाहा कोसिकनहा मधेशी के भेद कए खंड बिखंड केलक? हम पुछली से की? बाबा बोललकै हौ कारीगर तोरा लिखब बाजब के ई सब मोजरे ने करतह? बहुजन वर्गक बोली के ई सब राड़ बोली कहतह. लिखबा काल सेहो तोहर बोलीक मौलिक स्वरूप के बदैल संस्कृताह मैथिली बना देतह की? सबटा पुरूस्कार आयोजन मे अपने टा आ दू चारी टा मोनलग्गू पिछलगुआ के संग रखतह? ई साहित्यिक दलाल सब धूर्तै क मैथिली भाषा के वर्ग भेदी बना घून जंका खा गेलै. कहला पर एक्को टा दलाल यथार्थ गप मानत किन्नौ उनटे यथार्थक मूँह टा झांपत की?
हम बाबा स पुछली जे इ कहो त यथार्थ के टोपी पहिरा मुँह झांपि देतहो की? बाबा बोललकै हं हौ ई सब टोपी पैहरबै मे पारंगत सब छै. अच्छा ई कहअ त बसहा बरद के तों की कहबहक? हमे बोललियै जे हमे त ठेठी मे बरदे कहबै ने? बाबा बजलै धू जी मैथिली मानक वला सब त बसहो बरद के कामधेनू गाए बना देतै आ कहतै दुनू देखै मे उजर हइ त मनमाना जे मोन हएत से कहबै. यथार्थ देखौला तकैला पर जे बसहा बरद की कामधेनू गाए की रहै तेकर यथार्थ लोकक सोझहा एबाक चाही त उनटे ई साहित्यिक दलाल सब हमरे तोरा जातिवादी आ मंचलोभी कैह यथार्थक मुँह झंपबाक फिराक मे रहतह की? जे देखार चिन्हार ने भ जाए? जाबे तक होहकारी, पेटपोसुआ आ साहित्यिक दलाल सबहक देखार चिन्हार ने हेतै ताबे तक ई सब मिथिला मैथिली के घून जेेंका खाोखरि के खाइत रहत की? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.लाल देव कामत- तीन टा पोथीक समीक्षा लाल देव कामत तीन टा पोथीक समीक्षा १ प्रक्रियाधीन सामाजिक परिवर्तन'क स्वर
मैथिली साहित्यमे राजनीति शास्त्रीय आ मनोवैज्ञानिक साहित्य क' रचना कम देखल जाईत अछि। आजुक परिवेश मेँ एकछाहा नवकविता वा कहि सकैत छी अकविता लिखबाक बाढि आयल छैक। पद्दके बनशव्त गद्य लेखन काज कम भ' रहलैक हन्। एहि चलनसारिके ढिठियाबैत आत्मकथा, निवंध, यात्रा प्रसंग, कथा संग्रह आ प्रेरक संस्मरण दिश उन्मुख रहैत श्री रविन्द्र नारायण मिश्र जी एगारह गोट उपन्यास धरि प्रकाशित कय चुकल छथि। हालहिमे हुनक "बदलि रहल अछि सभ किछु" मैथिली उपन्यास पढलौंह। जेकर ओ स्वयं लेखक आ प्रकाशक छथि। एहि पोथी मेँ १३२ टा पन्ना अछि। निमन कागतमे छपल पोथीके सरकारी आईएसबी एन प्राप्त भेल छैक आ २५० टाका दामधरि निर्धारण कयने छथि। १४ अप्रैल २०२२ केँ ग्रेटर नोएडा (उ०प्र०) दिल्ली एनसीआर प्रक्षेत्र सँ छपल एहि पोथीके ओ अपन पितामह स्व० श्रीशरण मिश्र जीके स्मृतिमे समर्पण कयने छथि।पोथीक मादे पाठक केँ अपन रचना सभक विषयमे सेहो कहने छथिन जे "ई- पत्रिका विदेह" मेँ नियमित अभरैत रहलाह हन्। धरि आवरण रंगील गत्ताक विषयमे पृथक सँ जनतब देलनि,जे पौत्री काश्वी दिशसँ दिवाल पर उकेरल गेल चित्र थिकैनि।हिनकर पूर्व प्रकाशित उपन्यास विधामे यथा-: नमस्तस्यै,महराज,लजकोटर,सीमाक ओहिपार , मातृभूमि ,स्वप्नलोक, शंखनाद, ढहैत देबाल,हम आबि रहल छी,प्रलयक प्रात,बिति गेल समय, प्रतिबिम्व आओर सद्य:प्रकाशित नव उपन्यास ' बदलि रहल अछि सभ किछु ' छन्हि। हिन्दी आ अंग्रेजी मेँ सेहो पुस्तकक रचना कतेको भेल छन्हि, जे ईन्टरनेट पर उपलब्ध छैक। एहिमे पाठककेँ राजनीति दलक नेताक आन्तरिक चरित्र आ व्यवहारिक चरित्रमे जे अन्तर छैई तेकर ठेह भेटैत य। कुल ३४ टा पाठके एकेसुरमे गहींर अभिरुचि केर संग पढल जा सकैत छै।ओना मैथिलीमे पाठकक आब अकाल अछि। तेँ पत्र_ पत्रिकाक संगहि स्तरीय पोथीक किननिहार लोक आ संस्था कमशम देखाइ छथि। बहुत परिपक्व पाठक पोथी समीक्षा पढि - गमि नव पोथी किनैमे प्रकाशन आ दोकानधरि पहुँचैत छथि।एखन राजनीति जे बिहारक चलैत आछि से पुर्णत: राजनितिज्ञ क' आगू- पाछू घुमैत अछि।तै मेँ समाजक लोकके समय आ परिश्रम सेहो जाइत छैन्।संतोखक लेल भेटैत छन्हि संररक्षक सँ प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ संरक्षण।रहस्यमय स्थितिक राज बनाकय उपयोग करैत जे नायक कार्यकर्ता ओ लठैत - समांग बनाकय पोसने रहैत ; अपना पाँछा टिकौने रहैत छथि, सयह पैघौत बनल देखाईछ। मुदा जहिना उदय भेलासन्ता सूरूजो कमतर होईछ,तहिना स्थापित नेताजी केँ समयक सँग परिस्थिति भोगय पड़ैत छैक। प्रस्तुत उपन्यासक कथ्य, भाव-भंगिमा क' नाप शिर्षस्थ उत्कर्ष धरि पहुँचल छैक।आखिर समकालीन उपन्यासकार हेतुकर झा जे "ककरा ले अरजब हे !" मेँ क्षेत्रीय निम्नता _पंचकोशी,दक्षिणाहा आ भदौसक प्रयोग कयने छथि,ओहिठाम रविन्द्र नारायण मिश्र फरीछ स्थान शक्तिपुरम आ विजयपुरम सन भारतमे प्रचलित दक्षिण ईलाकाक नाम मुन्दर्य कयलनि अछि।देहाती मयटुअर-बपटुअर अबोध बालिका'क भरण- पोषण ओकर मामाजी अपना गाममे करैत बी ए धरि पढबैत छैक।एक प्रतापी नेताजी केँ ओ बालिका केर मामूजी ओहिठामक अबरजात रहैत छैक। से हुनक गहिंकी नजैर अवश्ये पड़ल छलैक,तेँ सुझाव दैत छैक जे एकरा वियाहक चिन्ता एखन नँय करी। हमरा डेरा पर शहरमे लेने अबियौक।ओतय नीक जकाँ ओरियाउन क' संगहि नोकरी धरा देबैनि।ओहि सँ कथा-संबंध पैघ घर-बड़मे आसान सँ भ' जायत। मुदा हुनका हृदयमे किछ दोहरे भाव उमरैत रहैक।आने किछु लोकसन संदीपजी सेहो ओझरा गेलाह नेताजीक संग। उपन्यास'क पाठक पढैतकाल आरम्भे मेँ वास्तविक जीनगिक अनुभव करैत संभवत: स्व० रेलमंत्री ललीत नारायण मिश्र जीके बंम हत्याकांड आ स्व० प्रधानमंत्री राजीव गांधी जीके मृत्यु बंमविस्फोट कांड , मंच परहक दृश्य सँ भयाक्रान्त भ' उठैत होथि।ओना आगू जे दृष्टांत भेटैछ नेताजीक पत्नि महिमाक ' राज्यप्रमुख बनैत घरी स्वत: वास्तबिक जीवनमे बिहार'क एक मुख्यमंत्री जीके धर्मपत्नि मोन पड़तैन।जे हो परंच दीर्घ कथा क' विस्तार पबैत ई सामाजिक उपन्यास एक राजनीतिक षढयन्त्र क ' नजारा बड़ा जैमकेँ देखबैमे समर्थ भेल छैई। नवतुरिया लोकनीक राजनीतिक दल गठन होईछ-जनक्रांति दल। एहि दलक हम 'शव्द' सँ तात्पर्य अछि- लेखक स्वंय , जे कदाचित लेखकक हृदयमे बसैत अछि। शक्तिनाथ आ संदीप केँ संग पुरैत नारी निकेतन सँ भागि परायल शिखा प्रमुख पात्र रहैत छथीन।ओम्हर समग्र विकास दलक राज्यप्रमुख नेताजीक सब तरहेँ चलती रहैत छैन।एक तरहेँ अन्तरराष्ट्रीय तस्करी गिरोह 'क परोक्ष समर्थन रहैत छैन। नारी निकेतनक अपना ईच्छा सँ अनैतिक प्रयोग करैत छथि।पाँचटा मूशदण्ड निजी लठैत सदा हरदम अपने छाह जेकाँ काज आबै छैन।सरिया गाममे शीखा नहिँ भेटैत छैक मुसकदण्ड सबके।विकट स्थिति झेलैत जहन आजीवन कारावास भोगय छथि,तँ पत्नीक सहारे पार्टीक तागैत अपने लग राखै छथि।ओहि अपराधी मुशदण्डक दखलंदाजी सँ त्रस्त होइत,हृदय परिवर्तन होय छैन महिमा जीके।आ ओ संदीप सँ जे पहिले पूर्व परिचित कार्यकर्ता नेताजीक रहनि, एसकरे भेंट करय आबि जाई छथिन। ताहि सँ पुर्वधरि अपना पद सँ त्याग -पत्र देबाक जनतब मीडिया केँ सेहो द' देने रहै छथीन्ह।आब विपक्षीक तागैत शिखाजीक नेतृत्वकला सँ एतेक बढैत छन्हि जे विजियोत्सव मनाबैत योग्य होईछ।पाँचटा सीट मात्रे निर्दलीय उम्मीदवार जीतै छैक,सेहो वयह जे हिनका अपनहि पार्टीक असंतुष्ट टिकट वंचित क्रान्तिकारी छथि।राज शासनक सब प्रत्याशी हारि गेलै,कारण दू गुट बनल छलैक आ मतदाता'क बीच सेहो छवि धूमिल भेल रहैक।श्वेत वस्त्रधारी आब गुलाबि परिधान मेँ प्रतिनिधि सभाक बैसारमे आबि अपना जगह पर स्वयं नँय बनि श्री शक्तिनाथ केँ फूलमाला लाधैत राज्य प्रमुख मनोनीत करैत सत्ता सोंपलीह। एहि स्वेच्छाचारिता ले समर्थक जनता लोकनि जिन्दावाद नाराक जयघोष करैत रहल। चुनावी राजनीति समयमे महिमाजीक पार्टीक किछ असंतुष्ट नेता आ कार्यकर्ता जे अलग गुट बनाकय पार्टीक प्रतिष्ठा मलीन करैत भट्ठा बैसा देलकैक, ताहि गुटक नामधारी लेखक महोदय नै क' सकलाह।आओर नेताजीक शुभ संज्ञा सेहो किछ राइख सकै छलाह। श्री मिश्र जीक उपन्यास लेखन शैलीक हम कायल छी,किछु एहनसन पाँति द्रष्टव्य अछि-: सरकारी घोषणा सँ जनता बहुत खुश रहय।मासे-मासे पानि बिजलीक बिल नहिं देबय पड़ैक। मासमे दू बेर किलोक किलो मंगनीमे राशन भेटि जाइक। सभ अपन-अपन दरबाजा पर तास खेलाए,भोजन करए आ सांझ पड़तहि सुति रहए । पृष्ट-११० सँ उधृत। उपन्यासमे दू दलक उपरचढ़ , पुलिसिया कार्रवाई , हवाई जहाज यात्रा , अस्पतालक दृश्य, सीबीआई जांच , माननीय उच्च अदालत केर निष्कर्ष रोचक लागत।आब २० शाल सँ बेसिये राज्य करैत समै खपि गेलैक।समाजक अनुकूल वातावरण सृजन भेलैक, जाहि सँ बालिका सब डाक्टर, इंजिनियर बनि रहलैक। सर्व जातीय एकता बढल आ सामुहिक भोजमे- उत्सवमे समरसता देखल जाइक। खानपियन सबजाना हुअ लगलै आ शिखाक त्याग सँ हुनक स्वप्न साकार होईत गेलैक।एहि तरहेँ सामाजिक परिवर्तन सतत् साकारात्मक दिशन बढैत डेग सन बुझाय। सामाजिक सद्भावना सभा जखन-जखन कतौह करथि तँ आखरिमे एक निशन्न शव्द -चरैबेति - चरैबति अवश्ये शिखाजी कहथि। २ मिथिलामे मांगैन खवाश छइ! जगत जननी माय मिथिला उर्फ जानकी'क पर्यायवाची नामे जे जिला अछि , अति श्रधान्वित रुपेँ तै सीतामढ़ी सँ चर्चित नाम उभैर आयल अछि आचार्य रामानंद मंडलक । मैथिली भाषा'क कवि श्री मंडल जीक हालहिमे एक नव पोथी केँ मिथिला समाज ट्रस्ट - दिल्ली, प्रकाशित केलक अछि। एहि कविता संग्रह "भासा के न बांटियौ" ९९ पृष्टक पोथी केँ अद्योपरान्त पढल। मनलगू विषय सब पाठक केँ सद्यप्रकाशित ऐ ८७ गोट नव काव्यमे सब रसक रसास्वादन करवैत, अनेक तरहक अनुभव सेहो प्राप्त हेतन्हि। सीमावर्ती क्षेत्रक रहवासिक मैथिली भाषा मेँ नेपालक वज्जिका टोन देखाईछ। यथा - मिथिला मे की छइ ? मिथिला मे सीता छइ! सीता'क जनम असथान छइ! मिथिला मे नदी आ पोखर एइ! पान माछ आ मखान छइ ! मिथिला मे दरभंगा राज छइ ! लाल - लाल मकान छइ! मिथिला मे राजकवि विद्यापति छइ! मिथिला मे मांगैन खवाश छइ ! पचगछिया घराना के राग छइ! मिथिला मे भारती आ मंडन छइ! सुग्गा पढ़इत पुरान छइ! मिथिला मे अयाची छइ! परसौत कलियानी माय महान छइ! रचना मे माटि के सौंध छइ ! मिथिला मे शहीद रामफल मंडल छइ! देस लेल सहादत महान छइ ! मिथिला मे पाग छइ ! पगड़ी छइ! मिथिला के शान छइ! रामा मिथिला महान छइ !! एहि विशिष्ट शैलीक भाषाक उपभाषा ,बोली - वाणीक मानक केर फेरमे किछ लोक आरंभ सँ रहैत अयलाह हेन। परंच ताहि सँ मातृभाषा अनुरागी समस्त लोक बीच सार्वजनिकता मेँ संकीर्णता फेंटैक काज मानल जाइछ। ओना भाषाक मानकीकरण करय बाला कियो के होय छथि? जहन मायक मुखारविन्द सँ निकलल वाणीकेँ नान्हिटा सँ बच्चा सुनैत - सिखैत आगू बढैत अपना परिवेश मेँ अपन गप्प सँ अगिला मैंग पर रहल लोक केँ तथ्य बुझौनाई मे सफल होइते छैक। तखन ई तितम्हा ठाढ करबाक कोन काज? ग्रियर्सन सर्बेमे मानलनि जे मैथिली भाषा अतितमे बाभनके नहिं रहनि। हुनक भाषा संस्कृत आ लोकबाणी वादमे अवहट रहनि,जाहिमे विद्यापति जीक रचना प्रमाणित रुपेँ छन्हि। मिथिला क' सोल्हकन समाजक जे भाषा बोली रहय सयह मैथिली थीक। एहिके राइतो राति मान्यता र्दैत शासकीय स्तर पर महत्व बढ़ल रहैक। सर्वे में इहो भेटलनि मिथिला'क वासी हिन्दू समाज बीच चौदहो देवान पूजल जाइक। कोनू - कोनू व्यक्ति जाति आ वर्गमे एकहुटा देवी देवता आ ईष्ट गुरूकेँ रूपमे भगवान् भगवती अराध्य देव रहैत आयल छैक। घरक अर्थात् गहवरमे एकटा देवान रुपमे ' साहेब खवास ' क ' पूजा भाव सेहो होइत रहल छैक। एक गोसाईं घरक भगत मुहेँ भाव खेलैत,वाक् दैत सुनल अछि - "हो सेवक! तों सब खवास शव्दक पैघौत खूब मानैत अयलह। जे पहिले समयमे खवास नहि सम्बोधन करेय तँ मारि खाए छलै आ आब जौं ओहि वंशजके कियो लोकनिके खबाश कहबहक तँ मारि ओकरा हाथे खेबेटा करबह। आजादीक वाद जमाना उनैट गेलैक। ओना समाजमे जे दियादि पैघ संख्याँमे रहैत अछि ,से अल्प दियादि बालाके फुटबैत मोजर नहिँ दैत, उपेक्षा करय सँ वाज नै अबैछ। भारतीय संविधान क' राष्ट्रीय स्वीकृत लक्ष्य य - समानता। मुदा असमानता भरल छैक। सामाजिक न्यायके जगह सामाजिक अन्याय मचल छैक।तेँ कविवर महोदय अपन पाँति सँ मुखर भ' कवितधारा क' अजस्त्र स्रोत बहेने छथि। यथा :- संस्कृत मे लिखाइ अ शतपथ वराम्हन। हिन्दी मे लिखाइ अ चतुरी चमार ।। मैथिली मे लिखाइ अ सतिया धनुकाइन। लिखेबाला छइथ वर्चस्ववादी रचनाकारगन।। बर्चस्ववादी के सनमान दलित के अपमान। सभ ग्रन्थन मे हय वर्चस्ववादी के गुनगान।। दलित उपेक्षित के हेय कइलन अपमान। दलित उपेक्षित कर जोरि के करइत प्रभूगान।। तएं वो दलित उपेक्षित के करइत हैय गुणगान! आइयो समाज मे पूजल जाइ विभेदकगन!! कवि जीक तात्पर्य छन्हि औजको तिथि मेँ लोक खास बनय चाहैत छैक। खास शव्दक पर्यायवाची रूपमे खवास निहितार्थ पाँति ऐ तरहेँ क्र०-६९ शिर्षक पाठ "खवास" मेँ गबैत छथि। यथा -: खवास छी, राजाक खवास छी। राजा छी, राजाक खवास छी। साधू - संत छी , ईश्वरक खवास छी। हनुमान छी, रामक खवास छी। संत तुलसी छी , रामक खवास छी। उगना महादेव छी , विद्यापति क' खवास छी। सामाजिक व्यवस्था मे , राजनीतिक प्रक्रिया मे ,आईधरि बहुसंख्यक आबादी वाला मिथिला क' लोकक हर स्तर पर उपेक्षा आ दोहण- शोषण होइत रहलैक। सभा सोसायटी क' भीड़क हिस्सा बनैत बैकवार्ड क' बीच मंचक शोभा बढबैत फारवर्ड केँ सचेत करैत अपना कविता मे कवि चित्कार कय उठबैत छथि।पाँति द्रष्टव्य अछि-: अहां के सुनली,हम्मर सुनूं । अहां के मानली, हम्मर मानूं। अहां के जानली, हम्मर जानू । अहां के पढली, हम्मर पढू। अहां के पुजली, हम्मर पुजू। अहां के गइली, हम्मर गाउ।
३ शेष युद्ध " जीवटपन" केर नाम थीक! मैथिली साहित्यकार प्रो0 (डाॅ0) राजाराम प्रसाद जीक सद्यप्रकाशित लघु उपन्यास "शेष युद्ध" एक विकट समयमे लिखल गेल इतिहासिक कृति थीक। मैथिली विषय सँ एम०ए०आ पी एच डी श्री राजारामजी पूर्व प्रति कुलपति,पटना विश्वविद्यालय मेँ रहि चुकल छथि।ओ एम एल टी कालेज सहरसा केर पूर्वमे प्राचार्य रहि चुकल छथि। शेष युद्ध मैथिली पोथीक किमत ५५० टाका, पृष्ठ संख्या ११२ पहिल संस्करण २०२० ई० ; सरस्वती प्रेस पटना सँ मुद्रित आ कबिलपुर लहेरियासराय (दरभंगा) केर अभिषेक प्रकाशन सँ बहराएल छन्हि। एक बदनाम शब्द 'कोरोना' संदर्भमे हिनक ई पोथी लिखल गेल अछि।एहि सँ पूर्व श्री प्रसाद जीक अन्य मौलिक रचनाबलीमे कथा परिधि-१९९७, मेघ लागल आकाश २०११ छपि चुकल रहनि। मैथिली लोक नाट्य- (आलोचना २०१०) आ साहित्य सरोरूह -२०१२ प्रवंध निवंध विधाके अतिरिक्त मैथिली लोक साहित्य क' विस्तृत इतिहास - २०१९ प्रकाशित भेल छन्हि। पचमनियाँ समाजिक पहचानकर बीच चोटीक' रचनाकार प्रो० राजाराम बाबू अध्ययन- चिन्तनमे लागल रहैत छथि। आ लेखन सृजनक काज क्रमिक रूप सँ करैत रहैत छथि। हिनक सहभागिता राष्ट्रीय - अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी क' व्याख्यान आओर साहित्यिक विधा पर भेल अधिवेशनमे मिज्झर भय मुख्रर रहैत छथि। पहिले कहलहुँ,एक बदनाम शब्द "कोवीड-१९" पर हिनक कलम जे चललनि से एक लघु उपन्यास रूपेँ सोझा आयल अछि। पाठक दू साल पूर्वहिक समय केँ धियानमे आनि अकानथि तँ एहि शव्दक अनुगूँज सँ कान धरि बहिरसन भ' जाइछ । कोरोना वाइरस सन वैश्विक महामारी आई जाहि रूपेँ संसार भरिमे पसरल आ तकर समाधान ले वैज्ञानिक लोकनि टीका अविष्कार कय समान्य लोकक सुरक्षा क' उपाय स्थाई तौड़पर सोझा आनि देलकैन ; जै सँ आब चैनक शांस भेट रहल छैक। चीनक बुहान शहर सँ प्रथमतया ई छुआछूत रोग निकलल ,जे प्रायः सब महादेशमे त्वरीत गतिये वायु द्वारा पसरल। एहि रोग केर लक्षण देख तत्काल वचाओक तरीका अपनायल गेल। किछु ढिठगर लोक नियम पालनमे सर्वथा शिथिलता बरतैक सँ इतर अकड़पन देखाबै जे अथाह चिंताके विषय रहैक। तैयो सब समुदाय आ वर्गके नेतागण अपना -अपना प्रभाव सँ समाजमे जागरूकता बढौलनि। भारतवर्षके यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी सब तरहक हथकंडा अपनाबैत जन जागरण करैते रहलाह। एहि महत्वपूर्ण काजमे हुनकर बात मानि जे कर्मी सेवार्थ जुटलाह से अदम्य साहसक' काज कयलन्हि। सरकारी कर्मीमे डाक्टर - नर्स आ सहयोग करैत स्टाफ वैरियर गजबके साहस आ जीवटपन देखेलनि। ताहि कार्य बावत ओहि कठिण परिस्थितिके आकलन करैत एक नीमन पोथी क' लेखन काज अलबत अविस्मरणीय भेलैक। पोथीके रोचकताक सँग पढल जाए ताहि लेल उपन्यास मेँ प्रचलित लोकोक्ति आ अमर वाणी एहि रुपेँ जगह - जगह देल गेल छैक। यथा - नाशे काल विनाशे बुध्दि, मारि कम बपराहरि वेशी, एसगर वृहस्पतियो झूठ, उनटा चोर कोतवालके डांटय, बर - बर घोड़ी भासल जाए - नड़ही घोड़ी कहय कतेक पानि, सादा जीवन उच्च विचार, बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, बसुधैव कुटुंबकम् । गौस्वामी जीक संदेश -: ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुख राशि।। कवितधारामे उपन्यासकार महोदय गबैत छथि- माई हे! कोरोनाक कहर कहलो ने जाय.............. दोहा -: कोरोना काल नहिं महाकाल थिक! लोकक जीवनक लेल महाजंजाल थिक!! जगत धरणीक विनाशक भूचाल थिक! विश्व मानवता 'क अभिशाप थिक!! कोरोनाक महामारी केर वचाउ मेँ लागल महापराक्रमी कर्मीके याद दियाबैत अपनाके महायोद्धा सिध्द करय ले हुनका महाकवि विहारीक पाँति सेहो स्मरण करैत दुःख आ असफलता स्थिति सँ उबरास होइक मनोबल प्रधानता देखेलनि अछि-: " दई दई क्यों करत है , दई दई मीनिहोरि! जापै सुख चाहत लियोँ ,ताकतें दुखहि न फेरी!!" पोथीक एगारहो पाठ धरि पाठकके ऐ विषय मेँ एक -एक पल कोना मानव मात्रके बित रहलैक आ आगूक समय कोना खेपल जाए, से चिन्तित रहैत अपन लेखन कार्यमे पुरान श्लोक संस्कृत मेँ सेहो ठाम - ठाम प्रयोग कयने छथि। जेनाकि-: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युस्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। एहि तरहेँ देखल जा सकैछ -: परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे - युगे।। गीता - रामायण, महाभारत मेँ वर्णित कतेको तथ्यके एहिमे समेटने छथि । जाहि सँ उपन्यास पढैत काल आस्था प्रगाढ़ भ' उठैछ । यथा -: कर्मप्रधान विश्वकरि राखा जो जस करहि सो तस फल चाखा जस करनी तस भोगहु ताता नरक जातपुनि क्यों पछताता सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: / सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत् // ईहाँ न लागए राऊर माया अछि वृथा न जाए देव - ऋषि वाणी आब संस्कृत भाषा सँ समान्य पाठक दुर होइत जाइछ,से एहि उपन्यास 'शेष युद्ध ' केँ पढैत घरि सहजे अभ्यास क' सकैत अछि -: कर्मणा मानसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा । सर्वत्र मैथुन त्यागो ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ।। दोसर देखू -: दम्भो दर्पोsमिमश्च क्रोध: पारूव्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ।। असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वाम् । अपरस्यास्मभूतं किममन्यत्कामहैतुकम ।। एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोsल्पबुध्दय: । प्रभवनत्युग्रकर्माण क्षयाय जगतोsहिता: ।। भुमिराजोsनलो वायु: को मनो बुध्दि रेव च । अहंकार आत्मीय में भिन्नता प्रकृतिरष्टधा ।। एहि तरहेँ देखल जा सकैछ जे दुर्गासप्तशती सँ सेहो पाँति मोन पाड़लनि अछि -: जयन्ति मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।। उपन्यासकार जीक'क पहिल ऐ विधामे डेग उठलन्हि अछि, तेँ भाषल तँ नहिये छथि,परंच गाँथल वा गुथल प्रचलित देहाती शव्द केर जगह पर पिरोयल नइशन्न शव्दक प्रयोग कयने छथि। अपन कवित भावें ऐ तरहेँ राजाराम प्रसाद जी पाँति रैचके मैला आँचलके अमर कथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु जीके शैलीकेँ जीवन्त रखलनि हन्। कोरोना जायत अपन कलिकपुर गाम । भारती आँगन बनत मनोरम नाम ।। नव चेतन नव - विहान सँ देवकी होयत प्रयाण । जन - जन करत राष्ट्र गुणगान । सर्वधर्म समन्वय सँ सभक होयत उत्थान। देवकी जन - लोकमे नव अभियानक होयत मान ।। आ करोना महायोद्धा लोकनिके समर्पित करैत अपन उपन्यास मेँ सेहो कवि हृदय हुनक जागि गेल छन्हि। आब मूलभूत चर्चा करै सँ पूर्व जखन सुख शांति प्राप्ति पर ओ मगन भ' गाबि रहलाह ,से पाँति हरसठे मोन पड़ैत य -: अयं निजं परोवैत्ती गणना लघु चेतसाम्। उदार - चरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्।। ज़हन कोनो समय संकट उपस्थित होइछ तँ सनातनधर्मी लोक थपरी पारनाई,शंख फूकनाई आ थारी बजौनाई आदि काज करैछ। से दिनांक २२-३-२०२० केँ ५ मीनट धरि रविदिन सांझकेर ५ वजे जनता कर्फ्यू केर आगाज भेल। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जीके रेडियो पर "मन की बात" कार्यक्रममे जनतब सेहो देल गेलैक। भारत वर्षमे प्रथम चरण केँ २४ मार्च सँ २१दिन ले ९ मीनट तक दीप लेसकय मध्य रात्रि २९ मार्च ९ वजे रात्रि सँ शूरू रहैक। फेर द्वीतिय चरणके ३ मई सँ २० मेई धरि आ पुनः घोषणा १४ -४-२० केँ माननीय मोदीजी जयनाद कयलन्हि। रोग बढैत गेल,मर्ज बढैत गेल। तेसर बेर फेरों लाकडाउन कें बढाओल गेल , जे ४ मई सँ १७ मई २०२० ई० तक दू सप्ताह लेल आदेश जारी भेलैक। १८-५-२० सँ ३१-५-२०२० तक १४ दिनक लेल प्रभावी लाकडान रहल। जाधरि दवाई नँय तावत् धरि ढिलाय नहिँ ! सन नारा गामेगाम शहर-बजारधरि जोरसोर सँ चलल। चारीम १ ८- ५ सँ ३१ तारीख धरि दू सप्ताह लेल बढाओल गेलैक। चारीम १ सितम्बर २० कें निर्देश जारी भेलैक जाहिमे देशक विभिन्न राज्यमे आन्तरिक विशेष सुविधाक सँग जारी भेलैक। अनलाक ८ जून २० सँ चालू भेल, २१ जून केँ होयबाला छठा अन्तराष्ट्रीय योग दिवस करोना केँ बैल चढि गेल। १६ जुलाई सँ ३१ ता० तक लाकडाउन रहल। ई तिथि ऐतिहासिक महत्व के छैक जे कोरोना विषय पर शोध कयनिहार शोधकर्तागण केँ एहि उपन्यास सँ बहुत किछ ज्ञान भेटतनि। कहल गेल छैक ' सेवा ही परमो धर्म:' से " वयं सेवा महे" भारत केर मिशन थीक - सेवा करब, परोपकारी होयब।हरेक गामक स्कूल, सार्वजनिक मकान मेँ गामक लोक जे प्रवासी शहर सँ कोरोना कालीन समयमे अपन गाम आयल तँ खाइक ,चाह जलखै, साबुन सेनेटाइजर आ लुगीं- गमछा धरि मुखिया- वार्ड सदस्य कें आपूर्ति करबाक आदेश बीडीयो सँ भेटलैक। राहत काजमे अनियमितता करय बाला सब नेहाल भेल। जिला प्रशासन अनुमंडल केँ , ओतुका अधिकारी अंचलमे अपन जिम्मा थोपलनि। एहि उपन्यास पढैत काल इहो बात सब पाठक केँ समक्ष आओत। कोरोना वारियर्स मास्कक आदैत धरि सबके लगाके छोड़लक। नन्द विलास रायकेँ सेहो अपन मैथिली कथामे विनु मास्कके प्रहरी चेकपोस्ट लग तैनात पुलिसकर्मिगणके मोटरसाइकिल सवार सँ मास्क नहिं लगेबाक कारणें दण्ड ओसुलैत देखल नहिं गेलैक। गाम आयल आगंतुक अतिथि केँ लोक ठहराव केनाय छोड़िए देने रहय। आवश्यक काज सँ अल्प समयमे हाट बजारक काज निपटाबैक। बाईलीके नव जान पहचान छोड़ि, चिन्हारे लोक सँ सेहो लसघैर केर आशंकामे लोक सचेत रहथि। एहनामे राज्य सरकार द्वारा सख्त घोषणा भेल रहैक - मृतकके दाह संस्कार मेँ मात्र ५० गोटे ,आ वैवाहिक कार्यक्रम मेँ दूनू पक्ष सँ २० गोटे वर-वधू सहित भाग लिअ। हमरो कचोट य जे भातीजाक आदर्श वियाहमे हीत अपेक्षित केँ बराति सिपौल नहिं ल ' जा सकलौंह। जौं कदाचित कियो मोबाइल सँ फोटो खिचकय जिला प्रशासनमे विडियो वाइरल करैत तँ , समधीन जीके परेशानी बढि जयतैन। खायर अठबभनो ल' केँ तँ जनेऊ उपनाइनमे पारघाट नीको समयमे लागिये जाईछ। कोरोना महामारी एक तरह सँ जीवनक हर मोड़ पर किछु न किछ समय अनुरूप सहजीवन सीखेलक।लोकमे स्फूर्ति स्वत: बढलैक। मानव जतेक भोग कोरोना समयमे भोगलक से अपन अनुभव सँ राजाराम प्रसाद जी सन अनेकों लेखक ऐ ज्वलंत मुद्दा पर सब विधामे खुब रचना कयल। परंच छपाई केर समस्या बहुत राश रहैक।एहनामे 'परिचय प्रकाश' केर लेखन काज स्वयं दीनानाथ प्रसाद " जुबराज" अपन कविता क' टीका कयलन्हि, से श्लोक प्रकाशन दरिभंगा सब तरहक धरि पापड़ बेलनाई सीखा छोड़लैक छपाई काल। दोसर कोनू रचनाकार धरि एतेक लगरपन सँ कोनो समयके एहन उदाहरण अतितमे नँय य, जेहन कोरोना समय वृहद रुपेँ धरि साहित्य सृजन भेल य। ई पोजेटीव बात भेल परंच पोजेटीव होय सँ सबके बँचय पड़ैक। इयह विनाश लीला केर बीच अदम्य साहसक परिचय देलनि महायोद्धा लोकनि। हुनक संघर्षक दस्तान थीक ई पोथी। एहि कृतिकेँ जहन -जहन पढल जाएत , रोम-रोम पुलकित होइत रहत से आश जगैत अछि। देश - विदेश, दोसर राज्य नगर सँ प्रवासी धैर्यक सँग अपन गृह पहुँच कय आर्तनाद गाबथि -: जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी! -मो०७६३१३९०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.राज किशोर मिश्र-नारी ३.२.मुन्नी कामत- रामायण ३.३.बाबा बैद्यनाथ- गजल- आधार- "रजनी छन्द" ३.४.डॉ. किशन कारीगर- हौ तोरे त गौंआ छियअह ३.१.राज किशोर मिश्र-नारी राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी नारी
सृष्टि मे, शक्ति क रूप अछि ना री , सर्वो च्च,वि धि रचना क खा ढ़ी ।
गुण ओ शी ल सँ चमकैत आनन, सि र पर शो भि त कुन्तल -का नन।
पति व्रता जा नकी , गेली ह प्रभु रा म संग वन मे, गा र्गी उगली ह नक्षत्र सन, ब्रम्हज्ञा न -गगन मे।
दौ ड़ली सा वि त्री ,जमरा जक दो आरि , सत्यवा न् जी गेलथि ,गेला यम हा रि ।
केहेन वी रां गना , परा क्रमी , छली ह, झाँ सी क रा नी ? ना री -शौ र्यक अनगनि त इति हा स मे अछि कहा नी ।
अहि बा ती बनि कऽ पति क' सि नेह, शि शु लेल मा ए, ममता क गेह।
बुद्धि , परा क्रम, शौ र्य,वि ज्ञा न, सभ क्षेत्र मे बेटी ,बेटा समा न।
ना री चला बथि अंतरि क्ष या न, खेतो मे वएह ,कटैत छथि धा न ।
पड़ल चरण एवरेस्टक शि खर, भा मि नी बि नु घर नहि हो इछ घर।
कतेको कंपनी क, सी .ई.ओ, को न क्षेत्र मे पछा ड़त ना री के कि ओ?
नेत्री , अभि नेत्री , वि दुषी , गुरुआइनि , गि रहस्ती क वएह छथि न्ह गि रथा इनि ।
प्रशा सनि क, पुलि स ,सैन्य अधि का री , को न क्षेत्र मे नहि अछि ना री ?
सो हा गि नि हा थ मे लहठी -चूड़ी , सीं थि मे चमकैन सि न्दूर, भा नस लेल पजा रथि चुलहा , आ, वि ज्ञा नक शो ध के करथि पूर।
चिं तन कम्प्यूटरक तकनी क पर, वएह टाँ गथि मटकूड़ी सी क पर।
आॕफि सक वरि ष्ठ प्रशा सि का , जमा एक क' रहली ह चुमा न, ना री क प्रति भा देखि कऽ, भऽ रहल जुग के अछि गुमा न।
जुग मा नि गेल, को नो तरहेँ नहि पुरुख सँ पा छू अछि ना री , पढ़ा बथि नहि जे बेटी के, कऽ रहल ओ छथि , गलती बड़ भा री ।
कि एक, महि ला रहती अबला ? प्रति भा को न नहि छन्हि , भला ?
बुझि औ बा त केँ सऽभ कि ओ , 'पुजल जा इत छथि जतए ना रि '
शा स्त्रका र कहैत छथि , 'देव बसैत छथि ओहि दो आरि '। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.मुन्नी कामत- रामायण मुन्नी कामत रामायण
राजा दशरथ अवधक सूत तीन रानी चारि सपुत। कौशल्या केँ पाहुन राम केकई पुत्र भरत ललाम। सुमात्राक दू टा लाल लक्ष्मण, शत्रुघ्न शोभित भाल। विहुसैए लागल अवध धाम बाल रूपमे विष्णु अहिठाम। अलौकिक छटा रघुनंदन भाई बाल-क्रिडा देख शिवशंभू ललचाई। ज्ञान उपार्जन लेल बनल जोगी ऋषि विशिष्ट लग पहुंचल चारू सहयोगी। ऋषि विशिष्टक शिक्षा महान गुणी बनल सब बालक कैर गुरूअक मान। भेल उजागर सबदिशा रामचरित्र ओतय पहुँचला विश्वामित्र । संगहि लऽ रघुवरके ऋषिवर चलला दूर्गम पथ पर। किछ काज छल जे ठमकल तर देथिन पुरूषोत्तमें ओकर उत्तर। भेल विश्वास मुनिवर केँ करति अवश्य यैह खण्डित धनुख केँ। मंद मुस्कान संग पहुँचला जनक धाम आयोजित छल सियाक स्वंयमवर ओहिठाम। शिवक सिद्ध धनुख कोय नै हिला सकलक देख ई जनक मुख अपन मलीन केलक। जे पहाड़ बनल सब लेल छल ओतबे सहज प्रभु राम लेल छल।
चारू धिया जनक केँ,अवध कुलक मान बनल सीता-राम, मांडवी -भरत,उर्मी-लक्ष्मण,श्रुतकीर्ती -शत्रुघ्न संगे चलल। मिथिलामे पाहुन राम ऐला घर -घर मंगल गान बजल जनक दुलरी आब अवधक लाली मोहफा संगे सभ सखी चलल। देख रंग -रूप सियाके तीनों रानी हर्षित भेल बेर -बेर उतारि नजऐर सोना -चांदी लुटाउल गेल।
राज्याभिषेक होउत रामक सीता राजरानी हेती भोरे सब ऋषि मुनियक बीच पुरूषोत्तम राम उत्तराधिकारी हेती। पर विधान लिखल किछ और छल मंथराक कूटनीतिमे केकैय फांसल छल। कूटभवन में स्वयं केँ कैद केलक राजा दशरथ लग अपन सहचर पठौलक। यैद दियेलक ओऽ तीन वचन जे देने छेलखिन युद्धक क्षण। मांगैय लेल अखने तत्पर्य भेल विनाशे काल बुद्धि हरि गेल। राजा दशरथ नै देखलक केकैय संग कारी नाग कैह बैसल बाजू कि लेब बचन अछि हमर राखब अहाँक मान। मांगि बैसल जिह्वा पर बैसल नाग डसि लेलक एकहि शब्दमे पूरा ब्रह्मांड। भरत लेल राज्याभिषेक राम लेल १४बरखक वनवास सुनते अतबे दशरथ कें रुकि गेल सांस। त्यागलक तखने कुलटा नारी बनल काठ राजा गेल मति मारी। सुइनते राम धेलक वनवासी रूप बाल्या,भ्राता सगे त्यागलक भूप। ढ़नमनैत रहल तिलकक साज नै -नै करैत कनैत रहल अवध समाज । केवट, निशान्त,शबरी उबारा तपस्वि राम सबहक सहारा। रूप लक्ष्मणक देख भेल सूर्पनखा मोहित बिया अंकुरैल अतैय सीताक अहित। नाक कटा सूर्पनखा केलक चितकार भ्राता नारीये,नारीक लिखलक दुख गाथा। सीताक हरण रावणक पापक अंत छल अहिलेल तँ भनवन अवतरित भेल छल। हनुमान सन नै भक्त कोनो सुन्दरकाण्ड सजल अछि ह्रदयमे जकर बसल सियावर छाती फारि देखबैत अछि। पापक घैला फूटल रावणक संहार भेल अवध नगर में सियाक धोबी मुँहे अपमान भेल। भरल कोखि राजमहल त्याग सिया असगर फेर वनवासी भेली हम अवला नै छी सशक्त नारी बैन लव -कुशक जननी हुनका सभ विधामे निपूर्ण केली।
माएकें दियाबए उचित सम्मान बालक लव- कुश घुरि ऐला प्रायश्चित करैय लेल अवध वाशी केँ ओऽ राम -सिया कथा कैह सुनेला। भरल सभा बजाउल गेल माँ जानकी एक बेर दियैय लेल कहल गेल हुनका अग्नि परीक्षा फेर। बेर -बेर अहि परीक्षा लेल मर्यादित धिया नै रजली फाटल धरती सोनियैल भूमिजा ओहिमे विलुप्त भऽ गेली। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.बाबा बैद्यनाथ- गजल- आधार- "रजनी छन्द" बाबा बैद्यनाथ ॐ गजल आधार- "रजनी छन्द" 2 1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2 सख-मनोरथकेँ बिसरिकय मोनमे दाबी। बूढ़ भेलहुँ तेँ अहाँ नहि आब भसियाबी।
पुत्र वा पुतहुक अनर्गल बात ली सुनियोँ, दाबि ली तामस अपन नहि आगि सुनगाबी।
आइ शिष्टाचार ताकब एक सपना थिक, कहि उचित झगड़ा बढ़ा नहि जोर अजमाबी।
आपसी मतभेदकेँ नहि आन क्यो जानय, प्रेम बुधियारी सहित सभ बात सुलझाबी।
माँ भवानीपर जखन विश्वास हो "बाबा"-, खुद रहब निश्छल तखन ऐश्वर्य-सुख पाबी।
-बाबा बैद्यनाथ, पूर्णियाँ(बिहार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.डॉ. किशन कारीगर- हौ तोरे त गौंआ छियअह डाॅ. किशन कारीगर हौ तोरे त गौंआ छियअह
हौ तोरे त गौंआ छियअह
नीक हइ की अधलाह की करबहक लै? कोई हाकीम रहौ की कोई छै हरबाह? एक दोसरा के हाल चाल पुछैत रहबहक हौ तोरे तं गौंआ छियअह.
हमरा गाम मे एना भऽ गेलै उ कम्पीट क गेलै हमरा गामक फलां बड्ड नामी फलां जमींदार धू जी अहाँ की बाजब? अहाँ गाम मे एना भेल? आब गामक बोध वला लोक सब कहाँ रहि गेल?
आब नै ओहेन गामे रहलै आ नै गमैया लोक नीक बेजाए सुनला बादो गाम स सीनेह गामक नामे गुमान अभिमान फरिछा लेब मान कोइ ने बोल भरोस देत जे तोरे त गौंआ छियअह?
आब वार्ड मे बँटा गेल गाम मुखिया सरपंच के गुलाम भेल गाम ककरो अनका स माने मतलब नै? आफत विपैत मे कोई ककरो संग नै देत?
जन हरबाह गिरहत बोनिहार हाकीम अफसर सब एकदोसरा स जुड़ल रहैत रहै आब सब अपना सुआरथे भेल आनहर कतौ बिला गेल तोरे त गौंआ छियअह वला गाम. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 88 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३६७ म अंक ०१ अप्रैल २०२३ (वर्ष १६ मास १८४ अंक ३६७)|| 87
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